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Sama Veda (hindi Arth Sahit)
Front matter
S सामवेदका सुबोध अनुवाद भूमि का धेद पार है, ऋग्वेर, पजुर्वेद, सामवेर और अपवेद । स्पष्ट हो जाएगा, किं घेद-त्रयी और घेद-चतुष्टयोमें कोई ऋग्वेदमें देवताओंके गुणों का वर्णन है, पजुर्वेद में नाना प्रारके भेद नहीं है । और वेद-प्रयोके कारण जो अपर्वयेवको पोछेसे यज्ञोंको किसप्रकार परना चाहिए यह बताया है, सामवेवमें बना हम मानते हैं, वे भी समझ जायेंगे कि उनको यह धारणा भने मनोका गायन किप्रकार होना चाहिए यह मताया है गलत है। और भयर्ववेदम प्रहातान है । इसप्रकार धारों बेदरेको विषप पदमें जो पादबदमत्र ऋग्वेद मा अथर्ववेदसे लिए गए ध्यवाया है। है, वे पढ़के समान नहीं योले जाते, अपितु गध से बोले वेदनपी व पेदचतुष्टयी जाते है, अर्थात् ये ही मर ऋग्वेद, सामवेद और अथर्ववेदमें पाके अनुसार छन्? पोले जाते है और ही मय पर 'वेद-धयो " भी कई स्थलों पर माया है जिसका अर्थ बोमने के समय गचके समान योले जाते हैं। मोंके पाठको है, पथ, गद्य मौर गायन । "पादवद्धव्यपस्था" पाले यह परिपाटी पुरानी है। मर ऋग्वेद, "गध माग" यजुर्वेद और पाय मोंका वेद-प्रयो अथवा वेव-चतुष्टयोके अनुसार मत्र गणनाम गायन सामदेर है । यह घेदधयो है । अथर्ववेद मोंकि पादबद्ध कोई फरक नहीं पड़ता । येर-त्रयीमें भाषाको रचना मुख्य है होने के कारण उनका मन्ताव ऋग्वेदमें ही हो जाता है। और वेद धतुष्टयोमें प्रतिपाद्य विषयको मुख्यता है । इसको देवयोंके घार होनेपर भी उनका समावेश (१) पध, और स्पष्ट करने के लिए नीचे एक तालिका प्रस्तुत है-- (२) गद्य और (३) गायन इन तीन विभागोंमें हो सकता १ वेद-त्रयी- पद्यमत्र, गद्यमान और गानकै मन्त्र । है। इसलिए "घेद-त्रयो" और " वेद-चतुष्टयी " के मत्रोंको सत्यामें कोई फरफ नहीं है । वेदत्रयो कहनेको पारण २ वेद-चतुष्टयी- गुण वर्णनके मत्र, पराकमक मत्र, अथर्ववेद पीछेसे बना यह नहीं समझना चाहिए। क्योंकि गानके मत्र और ब्रह्मज्ञानके मन्त्र । पोंमें " ग्रह्मा" अपर्दवेधी ही होता है, और "ब्रह्मा" की इन दोनों प्रकारको गणतामों में मसल्पामें कोई भेद मज्ञ यावश्यकता होती ही है, तब अथर्ववेद पीछेसे सना नहीं आता। फैसे कहा जा सकता है। सामवेदका विभूतिमत्त्व पथ, गद्य और गान यह ही वेद-त्रयो है । सभी भगवान श्री कृष्णने गोतामें भगवान को विभूतियों का भाषाओंके याडमयमें ये तीन विभाग होते ही हैं। इससे यह वर्णन करते हुए " चेदानां सामवेदोऽस्सि" ऐसा कहा (४) सामवेदका सुवोध अनुवाद है। चारों वेदोंमें सामवेद भगवानको विभूति है । पत्र, गद्म छान्दोग्म-उपनिषदमें कहा है- और गायनमें मन पर "गायन" का विशेष प्रभाव पडता साम्नः उद्गीथो रसः॥ (छ. उ.शश) है इसका अनुभव सबको होगा। यही सामगानका विभूतिमत्व " सामका रस उद्गीथ है " इसप्रकार सामवेदका महत्व है। भाषाके तीन प्रकार, गायनका प्रकार मन पर अधिक वणित है । यह सामवेद ही भावान्को विभूति क्यों है ? प्रभार डालता है। सामारण मनुष्यके मन पर गायनके इसके अन्दर कौनसी विशेषता है, इसका सब विचार करते हैं- आनन्दका प्रभाव ज्यादा होता है। रोगोके मन पर भी गायनफा यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। प्रभाव पड़ता है और वह शीघ्र स्वस्थ होता है । गायनका तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ।। परिणाम खेती, बाग और पौधोंपर भी होता है। खेतम (गी. १०४१) यदि गायन किया जाए तो अनाज मधिर उपजता है, रोगि- विभूतिका यह लक्षण गोतामें कहा है। जहां जहां विशेष योंके अस्पतालमें यदि गाने के रिकॉर्ड्स लगाये जाएं तो उनके विभूतिका तत्व होगा, थीमत्व दोखेगा, झर्जित-भावना अनु कारण रोगो जल्दी ही स्वस्य बन जाता है । दुपाए गायको भवौ आएगी, वहां वहां भगवान्पो विभूति है, यह रामझना दुहते समय यदि उसे गाना सुनाया जाए तो वह ज्यादा दूध चाहिए। इस लक्षणके आधार पर सामवेद वेदोंमें निःसन्देह देती है। इसप्रकार गायनका प्रभाव पड़ता है। एक विभूति है । सामवेद गायनरूप होने के कारण "शब्द- इस सामगानको पद्धति में और माधुनिक पद्धतिमें थोडासा अह" को गायनरूपी विभूति है। तान अथवा मालापसे साम- अन्तर है, उसका भी विचार यहां अत्यन्त आवश्यक है, साम- वेदको शोभा दोसती है, यही इसकी शोभा अयया धीमा है। गानमें स्वरको ऊचे आलापसे शुरु करके उसे धीरे धीरे नीचे उसीप्रकार इस सामवेदका समजितत्व विकार - विश्लेषण • आलाप पर लाया जाता है, उसके कारण मनको शान्ति अभ्यास • विराम स्तोभ इन गानोंकी योजनासे श्रोताओंको मिलती है और भटका हुआ मन सामगानको सुनकर शान्त अनुभधर्म आयेगा। साधारण गद्यको अपेक्षा छन्द, छन्दको हो जाता है । इसप्रकार सामपानसे शान्ति मिल सकती है। अपेक्षा फाय्य, काव्यको अपेक्षा गापन और गान तानोंका याधुनिक पद्धति के गानेमें ऊंचे और नीचे तानोंके मिश्रण बालाप विशेष प्रभावशाली होता है। इसीकारण सामवेदकी होने के कारण उस गानेसे मन शान्त होनेके यगाय और विशेष महत्ता है । यह हो छान्दोग्य-उपनिषदमें कहा है- हाधिक विकारवश होता है । दोतों प्रकारके मानेकी पद्धतियों में याचारग्रसा,चः सामरसा। यह भेद है ! इसलिए मन को शान्त करने के लिए सामानका साम्न उद्रीथो रसः॥ (E. उ. १२१२) उपयोग लाभप्रद है। "पाणीका रस ऋचा है, चाफा रस साम है, और यही सामवेदका गोतोक्न विभूतिमत्त्व है । उन्मुखलमनको सामका रस उद्गीथ है । और भी कहा है- मात करतेका काम सामगान कर सकता है । सामवेद एव पुष्पम् । (घा.. ३३१) महाभारत के मनुशासनपर्वमें भी कहा है- " जैसे घृक्षके पत्ते और फूलोंमें फूल विशेष शोभारायक होते है, उसोप्रकार गापनाप होने के कारण सामवेर घर. सागरेदश्च वेदानां यनुपां शतरद्रियम् । चुतका फूल है। (म.भा. ११३७) सामवेदका अर्थ चारों वेदों में "सामवेद" और यजुर्वेद में "शतलतिय" सामवैका थर्य और उसका स्वरूप क्या है? इस पर विशेष महत्व पर है। गीतामें कहा है- मणधः सर्पयेदेपु॥ (गी ७८) भय विचार करते है । सामपैदशा अपं पेषल मंत्ररांग्रह हो है तया महाभारतमें भी- अथवा गान भी है, यह भर देखते है । छान्दोग्य उपनिषदका बोकारः सर्ववेदानाम् ॥ (महा मायमेप. ४१६) कपर है- या मा तत्साम । (छा.उ. ४) औतारको पेष्ठता यताई है। इस ओंकारको प्रसासे " चामोंका संपह ही काम है । " योर भी- सामरणे महत्व में अपनता मामाए, ऐसी बात नहीं। क्योंकि ऋचि अध्यूट साम । ( Bा. ११) "बोकार" "उद्रीय" दोनों समानार्थक है मौर * माम शुधा पर मापारित होते है।"सान पाको उगीप सामवेरा पार है। डोरकर मौर रिसीके भाभपसे नहीं रहता। शावर मोर सामयेदका सुयोध अनुवाद (५) "हूँ और " पा सामवेदका "स्त्री पुष्प " के समान एक जोडा है, ऐसा "सामको गति क्या है। स्वर - मालाप - ही सामको भी कहा है- गति है । स्थर अयया सालापके विना साम नहीं होता तया- अमोऽहमस्मि सात्वं, सामाहमस्मि सर त्वं । तस्य हैतस्य सानो यः स्यं घेद, भवति हास्यं स्वं, चौरई पृथिवी ।ताविह संभाय, प्रजा तस्य स्वर एव स्वम् । (प. उ. १३२५ ) माजनयावहै। ( अयर्य. १४१२१७१, ऐत. मा. ८०२७ प. उ. ६४१२०) को गणना नारदीय - शिक्षामें इसप्रकारको गई है- " सापका स्वरूप आलाप है।" इस सामके स्वरमाला- में पति “अम" हूँ और स्त्री " प्रचा सप्तस्वरा यो मामाः मूर्छनास्त्वेकविंशतिः । साम अचा" तू है, " चो" में हूँ गौर ताना एकोनपंचाशत् इत्येतत्स्वरमण्डलम् ॥ पृथियो " तू है, हम दोनों मिलकर यहाँ उत्पन्न होते रहें, और भी कहा है- प्रजा उत्पत करें। इसमें साम शब्दको व्युत्पत्ति दी है। यः सामगानां प्रथमः स घेणोर्मध्यमः स्वरः । सा+अमः यो द्वितीयः स गांधारः, तृतीयस्त्वृपमः स्मृतः। सामः । “सा" पतलय "हचा" और "अम" मतलय मालाप, आT: “साम" का अर्थ है ऋचामौके चतुर्थः पन्ज्ञ इत्याहुः पंचमो धैवतो भयेन् । आधार पर किया गया गात। पठो निषादो विशेयः, सप्तमः पंचमः स्मृतः ॥ (नारदीय-शिक्षा) पादवद्धमंत्रोंका गान इस नारदीय शिक्षामें धैवत और निधारका स्थान-परि- प्रग्वेद और अथर्ववेदमें पादवद्धमंत्र है, और उनका गान पतन रोखता है, उसका विचार संगोरश करें। ये स्वर होता है । "ऋचा" रूपी स्त्री और "सामगान " रूपी सार्माकके अनुसार ऐसे होते हैं- पुरुषका विवाह हुमा हुआ है । " पति पत्नी " के समान अतिश्रुष्टः पंचमः। साप और ऋचाका सम्बन्ध है । उपनिषदोंने इनका एक १मथम: (येणोः) मध्यमःम। और भी सम्धन्य दिपापा है, यह इसप्रकार है- २ द्वितीयः गांधारःग वाक्चप्राणश्चमक्च साम च। ३ तृतीया मारे। (छ..१३२५) ४ चतुर्थः पहजःसा "वाघ सामाणोऽमस्तस्लाम (ो, उ. ११७१) ५पंचमः निपाद: । ति। " वाणी और प्राण क्रमशः शक और साम है। यानी ६ पष्ठः (अतिस्वार्थः) धैवतः। ध। ७ सप्तमः पंचमः।। ऋचा है और माण साम है।" वाणी और माणका जैसा सम्बन्ध है पेसा हो सायन्य ऋचा और सामका है। । अष्टः ) तयोसी कुष्टतम इव सानः स्वरस्त देवा उपजीवन्ति ।।प। स्वर-मण्डल १ योऽवरेप प्रथमस्तं मनुष्या उपजीयन्ति ।म। चाफा गयं है धरणयुक्त-मंत्र । इन मंत्रोंका पड्ज, २ यो द्वितीयस्तं गन्धर्वाप्सरसा उपजीवन्ति ।गा मध्यम आदि स्वरोम आलाप होता है । इसलिए कहा है ३ यो तृतीयस्तं पशवः (वृषभः ऋपमा) गीतिपु सामाख्या ॥ ( जं. सू. २०३६) उपजीवन्ति। रे। "बेदमंत्रोंके गानको संज्ञा साम" है। न केवल मंत्र- ४ यश्चतुर्थस्तं पितरो ये चाण्डेपुशेरते । स । पाठको हो " हाम" संज्ञा है और न केवल मानेको हो, ५ या पंचमस्तमसुरक्षांसि (लिपादः) उपजी. अपितु इन दोनोंके मिश्रण को हो " साम" संशा है। धन्ति । नि। शालायरय बालभ्यके संवादमें कहा है- (अन्त्य ) योऽन्त्यस्तमोषधयो वनस्पतयचा. फा साम्रो गतिरिति ? स्वर इति होवाच । न्यजगत् (सामयिधान ग्राह्मणे ) ।। (छ. उ१८४) सामगान के में स्थरमण्डस हं। उद्गाता इन स्वरों में साम- " (६) सामवेदका सुयोध अनुवाद स २ ११३ ३१ L । {" गान करते है । छ सामविकार होते हैं, वे इसप्रकार है- मंत्र और सामगान विकार -विश्लेषण - विकर्षण-अभ्यास - विराम-स्तोमा ऋग्वेदके मन जो सामयेवमें आये है, उन पर किस तरहके १ विकार- "अ" का " ओनायि" होता है । गान बने हैं, यह यहां दिखाते है- २ विश्लेपण- "वीतये" का "चोयि तोया- ऋग्वेदका मत्र- थि" होता है। ३ विकर्षण- "ये" का " या२३यि" होता है । अम आयोहि वीतये गृणानो हव्यदातये । ४ अभ्यास- बार बार बोलना, जैसे " सोयामि। नि होता सस्सि बहिपि ।। (ऋ ६।१६।१०) तोपारपि है। सामवेदका मन्त्र ( सामयोनि ) ५ गिराम- बसे "गृणानो हत्यदातये' गुणानोह । व्यदातये " ऐसा बोलते हैं, पद्यपि मूल अम आ याहि वीतये गृणानौ हव्यदातये मत्र "गृणानोह पदातये" ऐसा रूप नहीं है, फिर नि होता ससि यहिपि ॥ (ऋ, ६१६३१०) भी पाने के सौफर्य के लिए बोध हो तोर दिया जाता है, इसे विराम कहते है। इस मत्रके सामगान- ६ स्तोभ- ऋचाओंमें न आये हुए अक्षरोंको बोलना। ( १ ) गोतमस्य पर्फम्। जसे " औ होगा। हाऊ" इत्यादि। ओग्नाई । आयाहीऽ३ 1 वौइतोयाइरह । सामयेर गानरूप निस्सन्देह है, पर सामवेद जो भाज पुस्तकके रूप में है, यह तो फेयल पानीका तरह है। इनमें बोयाऽ२६ । गणाना ह । व्यदातोपाऽ२६ । एक भी सामयान नहीं है। जिन मकि भाषार पर गान होते हैं, वे " योनिमंत्र" है । अर्थात् सामवेद के ये मात्र तो याऽ२६ । नाइ होतासाऽ२३ । साऽ२६ । गाये नहीं जाते है, अपितु इनके आधार पर बने हुए जो गाने वाऽ२३५ औहो वा । होऽ२३४पी ॥ १ ॥ है, पे गाये जाते है । ऋषियोंने इन योनिमयों के आधार पर हमारों गाने बनाये है। वे मान सामगान कहे जाते है । (२) कश्यपस्य पाहिपम्- मामत्रेदमें १८७५ मत्र है, उन मन्त्रों पर करोय करोय अग्न आयाहि ची । तया३ । गुणांनो हव्यदाताऽ ४००० सायगान बने है । " कौथुमी सामवेद है और इस पर हो चार हजार गाने मने हैं, दूसरी २३याइ । नि होना सरिस पोऽ२३६पी नहींऽ२ "राणायणी"शखाका सामवेद दूसरा और भी ४००० गाने पृथक बने हैं। इसमकार सामवेद अनेक है इपाऽ२३४ औं होगा। वहींऽ३पी३२३४५ ॥२॥ और उसके गाने भी अनेक है। ये सामगान निरा ऋपिन (३) गोतमस्य पर्कम् । बनाये उसके नाम में गाने आज भी प्रसिद्ध है, जैसे "गोतमस्य पक, पश्यपस्यपाहिला अग्न आयाहि । वाऽ५इतयाइ । गृणानो हन्य- ग्रामगान, यारण्यकगान, ऊहगान, दाs१ ताऽ३ये । नि होताऽ२३४सा । साड. आदि नामोंसे प्रसिद्ध है। सामवेद के यंत्र सत्र ऋग्वेदसे हो लिए गए है और करीब २३४ वाऽ३ । हाऽ२३४ इपोऽदहा है। १० मन्त्र जो ऋग्वेदको आश्वलायन शाखामें नहीं मिलते पहा प्रथम ऋग्वेदका एक पत्र दिया है, यही मंत्र साम- पास्यापन ाषामें मिलते है। तात्पर्य यह कि सामवेद घेदमें गाये लिए लिया गया है। यहां सामवेदके अक्षरोपर श्रावेदके मौका हो साह है । अत सामवेद जो मत्र है जो बंक है, अक उदात्त, अनुरात भावि स्वरभेद विसाने उनके अलावा जो ऋावेद या अपर्ष वेदमें मत्र हैं, उनका भी वाले है । ऋग्वेदमें जो स्वर नीचे और ऊपर है, उन्हीको गान किया जा सरता है अर्थात जितने पावसयमत्र है उन सामपेदमें संशों द्वारा दिखाया गया है । मो वेदमें सब पर सामगान बन सकते है। अमरातका निदर्शक नोचेको लोर (-) है उसके लिए " शाखाका यह । उह्यगान 1 "3"-उदात, 7 - सामयेदका सुबोध अनुवाद (७) सामवेद में ३ अंक है। ऋग्वेदमें उदात्त के लिए कोई चिए रायणीयाः, धृताः, प्राचीनाः, तजसा, आने नहीं है, सामवेदमें उसके लिए १ का अंक है। ऋग्वेदमें फाश्चति । हरितके लिए पटी रेग ( होती है, उसरे लिए सरमा इस सरह सामगान पहले हमार भेव थे, पर ये सब धीरे येवम २ अंक है, जैसे- धोरे नष्ट होते चले गए और अब फेवल उसके २-३ भैर अग्न आ याहि वीतये से उपलस्प है। और उत्तम सामगान करनेवासे तो जंगलियों पर गिने जा सफ्ते है। दक्षिण भारतमें विशेषकर मसूरको अम आ याहि वीतये तरफ पोडेमे रह गए है। उअउ स्वप्रअउस सामवेदरी सेरह पाखायें है, यह "साम - पंज- पिपि" में लिया है। उनके नाम इस प्रकार है-- "-स्वरित, अनुदात्त, "स्थ "- सनतर पे स्वर है। सावेदमें जो १ राणायण, २ शापमुग्न्य,३ व्याप्त, ४ भागुरि, स्पर नीचे और ऊपरफो रेसासे पिताये गये है, उन्हींवो ५ औलुण्डी, ६ गोरगुलची, ७ भानुमान-श्रीपमन्यय, मामयेदम अंकों द्वारा दिखाया गया है । चिन्हमें फरक होने ८ फाराटि, ९मशक मार्य, १० यार्पगन्य, ११ फुल्थुम, पर भी उच्चारपमें कोई फरक नहीं है। सामवेदके अंक १२ शालिहोत्र, १३ जैमिनी। गाने के अंक महीं है, यह यहां प्यान देने योग्य यात है । इन तेरह शाखाओंमसे आज, "राणायणी, कोथुमी ऊपर गोतमके दो और कश्यपका एक ऐसे सीन सामगान और जैमिनीय "ये तीन शाखायें उपलब्ध है। चरणव्यूहम वियें है। सामगान सान मालाप यादिस्वरों में पाये जाते है। सामवेदको जो हजार शाखायें कही गई है, वे मान्य नहीं है, मूलमंत्र गानोंमें विकृत हो जाते हैं, इसलिए उनका अर्थ, यह बात यंगालके प्रसिद्ध विद्वान् सस्पटात सामअमौने सिट भावार्य और स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। परके दिखाई है। पुराणों में और भी सामको शाखाओं के नाम सामगानके अनेक भेद मिलते हैं, वे विचारणीय है- सहस्रवर्मा सामदः" इस प्रकार पतंजलिने इन शालाओंके गानोम बहुत भेद है। जैसे- अपने व्याकरण महाभाष्यम कहा है । सामानके हजारों भेद कौथुमी যাবলী है । गायक प्रवीण होने के बाद अपने गायनका नयादंग प्यार हाउ हाव राइ रापि फरता है। ऐसे अनेक उत्तम गायक उसके अनेक प्रकार वाजेषु णो बनाते हैं। इसीलिए सामवेदको "सहनवर्मा" कहा है । उसके प्रकार " गोतमस्य पक, कश्यपस्य याहिपं" यह पाठभेद इन दोनों शाखाओके गागरेंमें मिलता है। मादि मार्मोस दिखाये है । गोतमका सामगान पृथफ और सामवेदमें ऋग्वेरके बातखिस्यमसे भी कुछ मात्र माए है। कश्यपका सामगान पुपर है । इस प्रकार अनेक गान हो एन परसे ऐसा दीयता है कि पालखिल्यक मंत्रोंका समावेश ऋग्वेदमें होने के बाद इस सामवेदका मंत्रसंग्रह हमा है। सामवेदकी शाखा ऋग्वेदमें सामका उल्लेख ऋग्वेदमें सामका उल्लेख भनेकबार भाया है- सामयानके प्रकार दानेक होनेके कारण उसकी शाखायें भी यहूल है और अति प्राचीनकालसे इन अनन्त शाखाओंका १ अंगिरसां साममिः स्तूयमानाः ( देवाः)। प्रचलन होता माया है। चरणपूहमें शाखाके विषयमें इस- (र. १३१०७१२) प्रकार लिखा है- २ अंगिरसोन सामभिः।(. १०७८५) १ तत्र सामवेदस्य शाखासहवं आसीत् । ३ उभी वाची वदति सामगा इष गायत्रं च २ राणायणीयः, सात्रामुख्या:, कालापः, महा- भं चानुराजति। कालापः, काँधुमार, लांगलिकाश्चेति । कौशु १ उदातेय शकुने माम गायसि ब्रह्मपुत्र श्य मानो पद् भेदाः भवन्ति-सारायणीयाः, वात सवनेषु शंससि । (ऋ. २०४३।१-२) वाने नो (८) सामवेदका सुबोध गनुपाद " वह पक्षी सामगानेवाले के समान गायत्री और त्रिष्टुभ् सकं घनाते हैं, असे साम और प्रष्टुमसे पाणी उत्तम होती इन दोनो छन्दों में साम गाता है और उसके कारण यह है । वे सामकी अपेक्षा और किसीको श्रेष्ठ नहीं समझते हैं। शोभित होता है । हे शकुने । तू उगाता के समान सागमान १७ त्वष्टाजनत् साम्न साम्नः कविः। करता है । तू मह्मपुत्रके समान यज्ञके सयनमें गाता है" (२।२३३१७) ५ यो जागार तमु सामानि यन्ति। १८ साम कृण्वन् सामन्यो विपश्चित् ऋन्द ति । ( ५।४४११४) (रा९६२२) जागृत रहनेवाले के पास ही साम जाते है"। १९ परावतो न साम तयवा रणन्ति धीतयः । (१ ९।१११०२) ६ तमेघ ऋषि तमु ब्रह्माणमाटु. यशन्यं सामा २० स हि द्युता विद्युता वेति साम । उक्थशासम्। (ऋ. १११०७६) ( १०१९९२) " उसीको ऋषि, उसीको ब्रह्मा, उसीको यज्ञ करनेवाला, २१ तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत सच. सामाति उसोको सामगायक और स्तोत्र बोलनेवाला कहते है। जशिरे। (१०९०९) ७ उपगासिपत् श्रवत्साम गीयमानम् । " त्वष्टाने तुझे सामका ज्ञानी बनाया है। सामका निर्माण (ऋ. १८१५) करते हुए सामगायनमें महान ज्ञानी पान करता हुआ भागे ८ यूय सपि अयथ सामविप्रम् । (ऋ १५४११४) होता है । सामगान जिससे दूर तक सुनाई पड़े, इस तरहसे " सामगान करो, और सामगान सुनने दो । सामगानमें ज्ञानी जोरसे स्तोत्र बोलते हैं। यह इन्द्र प्रकाशमान विद्युत्के कुशल ब्राह्मण ऋषिको तुम रक्षा करो"। समान आयुध लेकर साम सुनने के लिए बाता है । उस सर्व ९ पतो बिन्द्र स्तवाम शुद्ध शुद्धेन सामा। हुत यज्ञसे ऋचा जोर साम उत्पन्न हुए। ( ८1९५७) २२ प्रशीतिमि तिसृभिः सामगेभि इष्टापूर्त १० इन्द्राय साम गायत विमाय पृहते बृहत् । अवतु.न:। ( अथर्व २२१२४) ( ९८१) २३ सच साम यजामहे याच्या कर्माणि कुर्वते । शुद्ध साम गाकर तेरी हम स्तुति करते हैं। जानी (अथर्व ७१५४१) इन्द्रको पहत नामक सामका गान करके दिखामो"। २५ वृहत परिसामानि पठात् पंचाधि निर्मिता। (१८९४) ११ बृहस्पति सामभिः सक्यो अर्चतु। २५ पडु सामानि पडह वहन्ति । ( अ ८९।१५) (१०१३६५) २६ सामानि यस्य लोमानि । (म ९६२) १२ मर्चन्त पके महि साम मम्वत । ( ८।२९।१०) "८०४३-२४० गायकोंके साथ इष्टापूर्त हमारी रक्षा करें। ऋचा और सामरो-हम यजन करते है, जिससे हम कर्म " सामगानरो पूजयनीय बृहस्पतिको पूजा हो।कोई महान् करते हैं। छठे महत्के आधार पर पाच प्रकारके साम हमने सामका गान करते है। यनाय है। सामविनके यज्ञमें चलते है । साम जिसके १३ आगूप्य शवसानाय साम। (१ १।६।२) सोम है।" १४ ऋतस्य सामन् रणयन्त देवा. (११४७१) २७ सपत्नह ाक्सशितः सामतेजा। १५ गायनेण मति मिर्माते भर्फ गण साम (१०५।३०) प्रेणुमेन याम्। (१६४१२४) २८ पत्र ऋषयः प्रथमजा ऋच. साम यजुर्मही। १६ ये न पर. साम्रो विदु । ( २२२०१६) ( १०७.१४) "महा यलदान् इन्द्र के लिए बांगष्य सामका गान करो। २९ साम्ना ये साम संविपुः अजस्तहपृशे क्य। पसमें सामगानको सुनकर देव मानन्दित हो गए । गायत्री ( १८४५) ॥ . ।
सामधेदका सुयोघ अनुयाय (२) २० घशा समुद्रे प्रानृत्य भावःसामानि यिभ्रती। सामानि यस्य लोमानि। (अष.१०॥७॥२०) ( म. १०।१०।१४) ऋचः सामानि छन्दासि । (अप. ११७२४) ३६ प्रणा परिगृहीता गाम्ना पदा। इन मंत्रोंमें "साम" का अर्थ "सामवेद " है ऐसा (अ. १९१३।१५) प्रतीत होता है । यासीके मंत्रों में सामगानके बोषक " साम" "शत्रुओंको मारनेपाला, प्रधाओं हारा तोश्ण पिया अपया "सामानि "ये पर हैं। इन मंत्रोंसे यह स्पष्ट गया व सार्मोसे तेजस्वी यह यनापा गया है। जिसमें प्रथम होता है कि ऋषाओं के आधारसे सामगान करनेको परति जन्में हुए पि, प्रघा, साम, यजु प थियो साधित है। विककात चार थी और सामवेर भी बन गया था। यज्ञमें सामसे सामको जो अच्छी तरह जानते हैं, उन्होंने अजन्माको मो नदेरके मंत्र गाये जाते हैं, उनका संग्रह यह सामवेद भला कहां देखा ? यशा ( गाय ) ऋचा और मामको धारण है। सामवेदको अनेक शाखायें प्रचलित थी और उनकी करके भव समुद्र में नृत्य करने लगी। बहाने उसे चारों संहिता मी पृथक् बनी हुई थी। ओरसे पकड लिया और सामने उसे घेर लिया।" ऋग्वेदमंत्रोंमें सामगानके नाम " धेरूपं, बृहत् गौर- ३२ सक्सामयजुरच्छिष्ट उनीथ प्रस्तुतं स्तुतम्। पीति, यतं, मकै, गायत्रं, श्लोक, भद्रं" स्यादि उच्छिष्टे स्वरसाम्नो मेडिश्च तन्मयि ।। आए है, इसप्रकार अपर्ववेवके मोंमें भी सामगानके नाम (अ. ११७१५) मिलते है, यजुर्वेदमें रथन्तरं ( यजु. १०११)वृहत् ३३ प्राचः सामान छन्दांसि पुराणं यजुपा सह । (य. १०११), रूपं (य. १.१२); वैराज (य. (म. १११७५२४) १०१३); वैखानसं, घामदेयं, यशायशियं (प. १२३४) ३४ शरीरं ग्रह्म प्राविशत् याचा सामायो यजुः । शाफ्वर, रैवतं (य. १०।४); गायत्रं, गौरिवीत, अमा. (अ. ११३८।२३) ३५ ब्रह्माणो यस्यामन्ति कम्भिः साम्ना यजुर्विदः लोक, भद्र, राजन्, अक्य, इलान्द, इत्यादि साम यत, कोश, सत्रस्यधेि, प्रजापतेर्हृदय, श्लोक, मनु- २६ तमृचएच सामानि च यांप च ब्रह्म चानु- व्यचलन् । (अप.१५३६८) ऐतरेय ब्राह्मण, 'पृहत्, स्थन्तरं, पैरुपं. पैराज, ३७ ऋचां च स साम्नांच यजुषां च प्राणश्च शास्वरं, रैवतं, गायत्र, श्येतं, नोघसं, रौरवं, योधा- प्रियं धाम मपति। (अय. १५।६।९) जयं, अग्निष्टोमीयं, भासं, विकर्णे" इत्यादि नाम ऋचा, साम, यजु, उगोष, प्रस्ताय, स्तोत्र, स्वर और दीखते है। सामने आलाप उच्छिष्टमें है। वे मुझमें मा। ऋषा, सान, ये नाम उस उस सामगानको विशिष्टता दिखाते है। छन्द और पुराण यजुर्वेद के साथ उच्छिष्टसे उत्पन्न हुए। मवेद मादि में आये हुए वर्णनासे यह निश्चत होता है कि हया सास और यजु ये ब्रह्मान शरीरम प्रविष्ट हुए। जिस सामगानो देवाको प्रार्थना की जाती थी। एशमें सोमरस भूमिपर ऋचा, साम और यजु जाननेवाले ब्राह्मण पत्तका निकालकर, उसमें पानी मिलाकर छानकर व दूधके पाय,' करते हैं। उसके पीछे ऋचा, साम, यजु और ब्रह्म पले । यह मिलाकर वह पौने के लायक होने तक सामगान चलता था पा, साम, यज और ग्रामका प्रिम धाम होता है।" और यह दूरसे सुनाई पड़ता था । गायन निस्सन्देह उत्तम इन मंत्रों में ऋचा, साम,यजु और ब्रह्म ये चार वेदोंक होता था। कुछ लोगोंकी धारणा है कि सामगानको पद्धति वाचक शब आये हैं। इनमें कुछ मोंमें में देशोंफे पाचक सर्वाचीन है, पर यह उनकी धारणा गलत है। है, तो कुछ मत्रोंमें ये शाम्ब उन उन वेरमंत्रोंके वाचक है। सामवेदकी स्वरगणना हमारा प्रस्तुत विषप सामवेद और सामगान है । कपरके कुछ मन्त्रों में सामवेद ऐसा भी अर्य है। सामइको स्वरगना बहत उत्तमतासे की गई है। उसकी तसाधवात्सर्वहुतः ऋचः सामान अक्षिरे । सावमानौसे गणना कहीं और नहीं दिखाई देती है। यह (मम. १९५६।१३, ऋ. १०१९०९ मजू ३१७) पणना कैसी है, देखिए- २ [ साम. हिन्दो भूमिका] (अय. १२।११३८) मा नाम भाये है, सामवेदका सुबोध अनुवाद ३0 २३ 73३30 २५ ५८७ आरण्यक ए ६ " १२३२ तीन सधमाद इन्द्रे सन्तु तुधियाजा।। १२) भारण्यक गेयगान, (३)ऊहगान, ( ४ ) उह्य- गान, अथवा रहस्य गान ये अप प्रसिद्ध है। क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥ १॥ १०८४ इन गान प्रयोंमें कितने मात्र मौर कितने गान है, उन्हे दिखाते है- आध स्वायान् त्मना युक्तः स्वौतभ्यो धृष्णवी- माय शाखामंत्र जैमिनीयशाखामत्र याना । ऋणोरक्ष न चक्यो ।॥ २॥ १०८५ पूर्वाधिक आ यद् दुर्गा शतक्रतवा काम जरि तृणाम् । उत्तराचिक १२२५ १०४१ १६८७ ऋणोरक्ष न शचीमिः ॥३॥ १०८६ महानानि इन मात्रों पर चिन्ह रहित मार हैं। १८७५ १६९३ १८८४-नः। स । सान्तु । इससे ज्ञात हो जाएगा कि प्रत्येष शाखाके सामवेदमें मत्र. १०८५-धृाण वि।। सत्या और मत्र - क्रममें भिन्नता व न्यूनायिकता है । अब इन- १०८६- या दुशताका काजारि। शो मत्रों पर जितने गान पने है उन्हें दिखाते है- ४+४+१०१८ १८ अक्षर चिन्ह रहित है । यह "घा १८' फौथुमीय गान जैमिनीय गान इस पदसे दिखाया है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रामगेयगान १९९७ मात्र अन्तफा अक्षर स्पर चिन्हरहित होते हुए भी नहीं भारण्यफरोयगाम २१४ गिना जाता। प्रथम मरके अन्तके "जाम" दो थौर १०२६ १८०२ तीसरे मन्त्रका अन्तिम अक्षर "भिः" इसप्रकार तीन अक्षर उह्मयान २०५ ३५६ अन्तम होनेके कारण नहीं गिने गए हैं। तपा २७२२ ग्यजन होने के कारण नहीं लिया गया है । तात्पर्य यह कि तीन मत्रोंमें १८ अक्षर स्वर चिहरहित है। कौथुमी शाखाके सामवेदमें मम १८७५ है और गाने उन इन तीन मत्रोंमें उकार चिन्हके अक्षर दो हैं। द्वितीय और पर २७२२ घने है। जैमिनीय शासाके सामवेदमें मत्र १६९३ मत्र है, पर उनपर बने हुए गाने ३६८१ है। इसप्रकार तृतीय मत्रमें "जो " यह हो अक्षर दो भाया है, सामवेतको प्रत्येक शाखाके मत्र गानोंमें भेद है। उसे " उ. २" इस सकेतसे दिखाया है। रकार चिन्हवाले चार मार इन सीन मत्रोम है। सामवेद के ब्राह्मण यामाची ये तीन तीसरे मरमें और दूसरे मत्रमें (१) ताण्ड्य ब्राह्मण, (प्रौढ अथया पंचविश "क्यो.. " पह एक मिलकर पार अक्षर रकार चिन्ह प्राह्मण) (२) पइविश ब्राह्मण, { ३) सामविधान पाले है । यह " स्व-४" के सकेतसे दिखाया है। ब्राह्मण, (४) आय ब्राह्मण, (५) देवताध्याय इतनी सूक्ष्मवृष्टिसे यह स्वर गणनाको गई है, अत साम- ग्राह्मण, (६) उपनिपग्रामप, ( सहितोपनिषद गानमें स्वरोंको गल्ती नहीं हो सकती । घ्राह्मण अथवा मंत्र ब्राह्मण, (७) वंश ग्राह्मण आदि सामवेबके साह्मण है। सामवेदके गानग्रंथ पविश ब्राह्मण ताण्डप पाहाणका २६ वां भाग है। ऋषियोंने ऋग्वेद के मौके आधार पर गान बनाये फिर इसलिए यहला भाग "पंचविंश ब्राह्मण" के नामसे उन गानोंका संग्रह करके अनेक प्रेस यनाये। उनमें (१) प्रसिद्ध है। और उत्तर भाग" पड्विंश ब्राह्मण" के नामसे ग्रामगेय गान अथवा गेयगान अथवा प्रकृतिगान, प्रसिद्ध है। पचविंश ब्राह्मण, पाविश ब्राह्मण और छान्दोग्य सामवेदका सुयोध अनुवाद " होता है। उपनिषद् मिलकर ताण्ड्य महाप्राह्मण सय वेदा यत्पदमाममन्ति तपानि सर्वाणि च पपिशवाह्मणम अदभुत कथाओंका संग्रह होनेके कारण उसे यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत् ते अद्भुतवाह्मण" भी कहते हैं। सामवेदके दूसरे वाह्मणोंका पदं संग्रहेण प्रवीमि ओम् इत्येनत् ।। दूसरा नाम "अनु माह्मण' भी है। मिनीय उपनिषद् (फ उ. २०१५) बाह्मणौ " केनोपनिषद् " है । इस जमिनीय शाखाका "सय वेद जिस परका वर्णन करते है, सब प्रकारको तप पूसरा नाम " तवलकार शासा" भी है, इसलिए फैनो- जिसके लिए दिए जाते है, ब्रह्मचर्यका पालन जिसको प्राप्तिको पनिषदको तवलकारोय केनोपनिषद भी कहते हैं। इच्छासे किया जाता है, उस पदको मैं संक्षेप तेरे लिए रहता सामवेदके सूत्रमंथ हूं कि यह " मोवम् " है " । गर्यात् “ मोहम्" पादसे जिस तत्वका सकेत है उप्तो परमात्माका वर्णन सब पेव करते (१) मशफाल्पसूत्र, (२) शुद्रसूत्र, (३) लाट- है। सम तपश्चर्या उसके लिए की जाती है और ब्रह्मचर्यका यायन श्रौतसून, (४) गोभिलीय गृह्यसूत्र । और राणा- पालन भी उसके लिए किया जाता है। यही भागेके मंत्रमें पणीय शापाके (१) द्राह्मायण श्रौतसूत्र, (२) प्रतिपादित है- खादिरगृह्यसूत्र, (३ ) पुष्पसूत्र । ये सामवेदके सूत्रग्रंथ तदेवाग्निः तदादित्यः तद्वायुः तदु चन्द्रमाः। "प्रातिशाख्य " के नाम से भी प्रसित है। तदेव शुक्र तद् ब्रह्म ता आपः सः प्रजापतिः ॥ वेदमंत्रोंके अर्थ (यजु ३२१) (तत् एव अग्निः) वह बह्म हो अग्नि, मादित्य, वायु, वेदमपोंके अयंके सम्यन्यमें बहुत मतभेर है। वास्तवमें चन्द्रमा, शुक्र, मह, आप और प्रजापतिपदोंसे वेदमों में देवाशी एफ अपनी भिन्न शैली है। यह शंलो या प्रक्रिया पणित है " । अर्थात् अग्नि, आदित्य,याय आदि नाम यद्यपि समझमें बाजाय तो फिर मतभेदका कोई फारण नहीं रहता। भिन्न भिन्न है तथापि उन विभिन्न नासि उस एक हो यहाका सर्व प्रपम पेदमंत्राने ही कहा है कि सत्य यस्तु एक है । और वर्णन वेदों में किया गया है । यही मैत्रायणी उपनिषदमें और कवियोंने उस एक तत्व के अनेक गुर्गों को देखकर उसके अनेक स्पष्ट किया है- नाम रख दिए है। बाहरणार्य- एप खलु आत्मा ईशानः शंभुर्भयो रुद्रः। इन्द्रं मित्रं यरुणं अग्निमाहुः अथो दिव्यः स प्रजापतिर्विश्वसत् हिरण्यगर्भः सत्यं प्राणो सुपों गगत्मान् । एफसत् विमा यदुधा वदन्ति हंसा शान्तो विष्णुः नारायणोऽर्कः सविता अग्निं यमं मातरिशानमाहु. । (ऋ. ११६४१४७ ) धाता सम्राट् इन्द्र इन्दुरिति ॥ (मंत्रायणी ५/८) (एकं सत् ) एक ही सद्वस्तु है, उस एक वस्तुका " यही मारमा ईश्वर, शंभु, भव, ख, प्रजापति, विश्व. विप्रा बहुधा वदन्ति ) ज्ञानी लोग अनेक नाम देकर स्रष्टा, हिरण्यगर्भ, सत्य, प्राण, हम, शान्त, विष्ण, नारायण, वर्णन करते है। उसो एक सदस्तुको ज्ञानी इन्द्र, मित्र, वरण, अर्क, राविता, पाता, सम्राट्, इन्द्र, इन्दु आदि नामोसे वर्णित मग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गरमान्, यम, मातसिवा आदि नामोसे है।" इस विवेचनासे स्पष्ट है कि मग्नि. इन्द्र यादि नामोंस पणित करते है। मुख्यत. एक आत्मा अर्यात परमेश्वरका ही वर्णन किया इस मंत्रने बंदकी प्रक्रियाका यया वर्णन किया है। जाता है । यह हो श्री यास्काचायं अपने निवान कहते हैं। अर्यात अग्नि, वाय, इन्द्र,यम गादि नाम उस एक परमेश्वरके महाभाग्याइवतायाः एक आत्मा यहुधा स्तूगते । है और इन नामोंसे उनके गुणोंका वर्णन हुआ है। एकस्य आत्मनः अन्ये देवा प्रत्यंगानि भवन्ति । मत्र अग्नि देवताका हो, अयवा इन्द्र देवताका हो, उन ...आत्मा पच पपां रथो भवति, प्रारमा अश्वः, मोंका मुख्य भाव परमामा परक ही है, यह यहां ध्यान देने आत्मा आयुधं, मारमा इपयः, यात्मा सर्व देवस्य योग्य है। अग्निको “विश्ववेदाः" कहा है। " विश्व- (निकता वेदाः 'का गयं है "सर्वश"। अग्नि सर्वज्ञ न होकर "देवोंके महान भाग्यके कारण, महान् सामर्थ्यके कारण परमात्मा सर्वश है" यह ऊपरके मंत्र, पहा है। एक ही आत्माको अनेक प्रकारसे स्तुति होती है। एक सामवेदका मुबोध अनुवाद वक्ता आत्माके दूसरे देव भा होते है । आत्मा ही इनका रथ, देवताओंका राज्य है, बिलकुल से ही इस मानव शरीरमें अध, शस्त्र, बाण और सब कुछ मारमा ही है। उन देवताओंके अंशरूप देवोंका राज्य है । देव चाहे बडे हों इस प्रकार वेबके वर्णनोंका तात्पर्य समझना चाहिए। या अशरूप उनके देवस्वमें कोई फरक नहीं पड़ता। यह यहाँ वेदमंत्रोंमें जो रथ, घोडे आदियोंका वर्णन है, ये सब आलं- ध्यान में रखने योग्य है। वारिक है। आत्माको शक्ति बहुत बडी है. और वह उन दावानल घड़ा होता है और उसकी चिन्गारी छोटी होती उन रूपाने प्रकट होतो है, ऐसा समझना चाहिए। है। पर बोनोंमें भग्निका अंश रामान है । उसीप्रकार अग्नि इन्द्र घोके रथसे अमुक यज्ञमें पहुचा, ऐसा वर्णन यदि इन्द्र थादि विशाल वेब विश्वमें है और उनका अंश शरीरमें कहीं है तो इन्द्र अर्यात् आत्मा हो यहां पहुवा, यही सत्यार्थ है। दोनों स्थानों पर देवत्वका अंश समान है । इस प्रकार है और उसके रय, पोडे, चायुक सारथी आदि सब उसकी अध्यारम • मानयोय - शरीर, वे हो देव अस्प है और शक्तिके आलंकारिक वर्णन है। उसी प्रकार आत्मा कहीं अपिदंवत - विश्व - में ये हो देव महान आकारमें है। आता माता नहीं, यह तो सर्वत्र है, इसलिए उसका आमा शरीरमें इन देवोंका ज्ञान गुणों के कारण होता है और जाना भी आलकारिक ही है। समाज अथवा राष्ट्रमें ये गुणो मनुष्य के रूपमें धोखते है, मह 'समशके लिए बोचे तालिका की है- अध्यात्म, अधिभूत और अघिदैवत अध्यात्ममें अधिभूतमें अधिदेवतमें अग्नि, यामु, सूर्य, चन्द्र आदि देव विश्यमें कार्य करते हैं। वाणी अग्नि उनका वर्णन येवमत्रोंगे है। ये देव उस सर्वव्यापक विश्वात्माके शौर्य विराट् देहमें उसके अवयव बन कर रह रहे है। सूर्प उसकी सूर सनिक युद्धा आस है, वायु उसका प्राण है, पृथ्वी उसका पांव, अन्तरिक्ष मात् प्राण प्राणी वाय पेट और शुलोय उसका मस्तक है । इस प्रकार यह विराट कारीगरी कारीगर विप्टा पुरुष है । और उसके अवयव अग्नि, वाय, इन्द्र आदि देव है। शानी इससे यह समझमें याजाएगा कि पेट मंत्रों में अग्नि आदि ब्रह्मणस्पति चिकित्सा चिकित्सक अश्विनी देवोंका वर्णन म होकर विश्वात्मा विराद पुरुषकै अवयवोंका पाव ही पर्णन है। पृषी रक्तवाहिनिया नाडिया) नदियां आप, जलप्रवाह किसीकी आस अभया फानका वर्णन जिसप्रकार किसी भाग्यवान् अवयवफा न होकर उस पूर्ण पुरुष का हो वर्णन होता है, उसी प्रकार अनि, याय, इन्द्रादि देवॉका वर्णन उसी विश्वात्मा इस प्रकार व्यक्तिमें गुणहपसे, समाज और राष्ट्र में गुणी. विराट् पुरुषके विराट् पारीरका वर्णन है। यह विराट् पुरुषका रूपसे और विश्वमें देवताके रूपसे में देवता रहते है। उनका वर्णन वाधिदैवत वर्णन है । यह विश्व देका वर्णन है। हान अत्यावश्यक है। प्रत्येक देवता स देहमें कहा रहते हैं, यह समझना चाहिए देरमत्रों में जो वर्णन है वे आधिदंषत वर्णन है । ये हो वर्णन और उनका यह वर्णन है यह जाने । wreme. दिल-में गहएम देखने, शारिए और, - ये सभी देव मानव शरीरमें अशरूपये है- भौतिक अर्थात् समाज और राष्ट्र में गुणी मनुष्यों के रूप सर्या यस्मिन्देवता गायो गोष्ठ इवाप्सते ।। देखने चाहिए। इससे वेदमंत्रोंका सरपार्ष समझमें आ (अपवं. ११८३२) माएगा। इन तीनों स्थानोंमें अर्थशा स्परूप से देखना " सन देवता इस मानवी देहमें रहते हैं, जिसप्रकार गा कि अयं इस दृष्टिमे देखने पोग्य है। उदाहरणार्थ- धाहिए, उसे विचार करके निश्चित करना चाहिए। मंत्रों में गौशाला में रहती है। " सूर्य आंख में, पाय नाम, विशा सान, अग्नि महमें, इन मजा और छाती, घग्रमा दयमें, इन्द्रका अर्थ अन्तरिक्ष उदर, पम्यो परमें, जल शिश्नम और मरम अध्याप"इन्द्र" कार्य " जीयात्मा" है। इस नाभि इसप्रकार सब देव मानव शरीरमें अंग्रहपसे रहले मामाको शक्ति इन्द्रिय है । इन्द्रको शक्ति दिखाने के लिए है और इस हमें कार्य करते हैं। से विश्व का वो यह इन्दिय दाब बना है। "वंद्र इस पारीरम ज्ञान भाग्य ।
सामवेदका सुबोध अनुवाद (१३) इन्द्र के गुण आत्माने छिद्र गनायें है।" में देखना चाहता हूँ" आमाके " इस महान् मारमाका हो वर्णन ये सूक्त करते है। इस संकल्प के साथ ही नेत्रको जगह दो छैद हो गए 1" में अध्यात्म प्रकरणमें " सोम" "मात्मा "है। यह इन्द्रियोंको श्वासोच्छ्वास करंगा " इस संकल्पके कारण मारके स्थान पैदा करनेवाला है" और मागे स्पष्ट करते है- पर छेद हो गए । इसप्रकार इसने इस शरीरमें अनेक छिद्र महिषो मृगाणामिति अयमपि महान् भवति बनायें । इसलिए इसका नाम "इदंद्र" हुआ। उसका मृगाणां मार्गणकर्मणामिन्द्रियाणां । श्येनो संक्षेप “द्र" है। इस प्रकार यह इन्द्र दारीरमें जीवात्माके हपमें है। गृधाणामिति श्येन आत्माभवति श्यायते शनि. कर्मणः । गृध्राणि इन्द्रियाणि गृध्यतेनि- अधिभूतमें अति समाज अथवा राष्ट्र र एखो कर्मणः ॥ (निश्क्त) लिए, राष्ट्रको स्वतंत्रताको रक्षा करने के लिए होनेवाले "मगोंमें महिष बहा है। मग अर्थात् खोजनेयाती इद्रिये, पुचोंमें भाग लेनेवाला मतुल पराश्मी वीर है। यह उन इन्द्रियोंमें पह बात्मा वा है । श्येन गोधोमें बड़ा है । इन्द्र" अर्यात् “ दाधुओंको फाडनेवाला" पराक्रमी वोर है। यह सेनाको तय्यार रखता है । शत्रुको हलचल पर पोंकि यह शान प्राप्त करता है। থা अप है शानके सापन इन्द्रिय, उनमें क्यम मारमा है मजर रखता है और उनका नाश करनेके लिए जो कार्य आवश्यक होते हैं उन्हें करता है । इसप्रकार मंत्रोंका अर्थ समझना चाहिए। आपिवतमें इन्द्र मध्यस्थानीय देवता विजलो है। यह देवताओंका गुणवर्णन मेघाको फोडकर पानी बरसाता है । जहां बिजली गिरती है यहाँ पचके गिरनेके समात शरद होता है। अब सामवेदमें देवताओंका जो गुणवर्णन किया गया है। उसे दिखाते है- इसप्रकार वेदमंत्रों के अपं अध्यात्म, अधिभूत और अधि. वत इन तीन क्षेत्रोंमें होते है । अध्यारमका मतलर माव- घीय शरीरफा वर्णन, अधिभूतका भयं मानवसमाज अथवा १ प्रचेसाः [१४१२-शानी, विषारशील, विशेष- राष्ट्रपरक वर्णन है। यहाँ " भूत " हाम्रका अर्यप्राणी' घिन्तन करनेवाला लेना चाहिए । “भूत" का अर्थ " पंच महाभूत " नहीं। २ शुद्धः [१५१२- शुद्ध, निदोषी। अधिदेवतका अर्थ है विश्व । येवोंके मंमि आपितविक ३ विचर्षणिः [१४८७]- विशेष श्रेष्ठ । अनि विश्वपरक वर्णन है। इस वर्णनमें ही अन्य दोनो ४ अशस्ति-हा[१६३७]-विपत्ति दूर करनेवाला। भाव समाने चाहिए- ५ सुगोपाः [ १७२० ]- उत्तम संरक्षण करनेवाला। सोमदेवता ६ नामवतः[ १७१८]-नामसे मुप्रसिद्ध । सोम एक सता है । उसका मंत्र इसप्रकार है। ७ कात्वियः [१७९८]- ऋतुके अनुसार उप्रति करनेवाला। ५२७ सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृधिव्याः। लोफत् । १४.१ लामाका करनेवाला। ९ भशत्रुः । १८०२]- जो स्वयं किसीसे शत्रुता नहीं जनितानेर्जनिता सूर्यस्य करता। जनितेन्द्रस्य जनितीत विष्णोः । (ऋ. ९९६५) १० गिर्यणः [१४३१ ]- स्तुत्य, प्रशंसनीय । " सोम मुस किया जाता है । वह बुद्धिमोंको पैरा करने ११ महान् । १३५५ - महान्, मम। वाला चुलोकको, पृथिवीको, भग्निको, सूर्यको, इन्द्रको और १२ मंहिष्ठः [१३६१]- महान् । विष्णुको भी पंदा करनेवाला है " इस मंत्र पर मास्क अपने १३ जनुषा मनातल्यः [१३८९]- जन्मते ही शश्रुता निस्कत इसप्रकार कहते हैं- न करनेवाला। अर्थतं महारतमात्मानं एतानि सूक्तानि १४ यशाः[१४११]- यशस्वी, विजयी । पता ऋचोऽगु प्रयदन्ति। १५ चर्पीतिः [ १४११]- मानवजातिका धारण- अथाध्यात्म । सोम यात्मा अपि पतस्मादेव। पोषण करनेवाला। इन्द्रियाणां जनिताश्त्यर्थः।। (निदवत) १६ पाधानः[१४११-अपनी शक्ति से बहनेवाला। . . - सामवेदका सुबोध अनुवाद १७ वृपमा [१३६ - बलवान्, बलके समान साक्त । ४९ शत्रुः [ १३६१ ]- दुष्टोका शत्र। १८ बजयाहुः [ १४२६]- वनके समान कठोर ५० मृधः सासहिः [१४८७]- भाभोंको हरानेवाला। भुजाओंवाला। ५१ वीरतरः नहि [ १५११ ]- जिससे यहकर धीर १९ भूयोजाः [ १४८४]- बहुत सामर्यवान् । सरा नहीं है। २० वीर्यः वृद्धा [ १४८७]- पराकमसे महान् । ५२ अद्रिवः [१३५४ ]- वजधारी, शस्त्रास्त्रधारी। २१ पत्। १४४२.]- शत्रुओंको हरानेवाला। ५३ चर्पणीसहः [१३६१ 1- शत्रुसेनाको हरानेवाला। २२ महिपः तुविशुष्मा [१४४६ ]- भैसेके समान ५४ पृतनापाट् [१४३३]-शत्रुसेनाका नाश करनेवाला। पुष्ट और महान शक्तिमान् । ५५ अमिभू। [ १४३०]- शत्रुको हरानेवाला । ५३ शचीपतिः [१५७४ ]- शक्तिमान् । ५६ शूरः [१४३४ ]- वीर। २४ घृपा [ १३६० ]- बलवान, भक्तोंकी कामनापूर्ण ५७ सहावान् [ १४३४]- शत्रुको हरानेका सामर्थ्य करनेवाला। अपने पास रखनेवाला। २५ अभंयकरः [१३६१]- अभय देनेवाला । ५८ अप्रतं दस्युं ओपः{ १४३४ ]- नियममें न घलने- २६ शवसः पतिः [१४११]- सामर्थ्ययुक्त । वाले सोको नष्ट करनेवाया। २७ अनुत्तः [१४११]- अपराजित । ५९ विश्वासु पृतनासु हव्यः [१४९२]- सब पुर्यो २८ असु-०1१४११]- बलवान्, गरीरसे हृष्टपुष्ट । सहायताके लिए गुलाने योग्य । २९ जनानां राजा [१३५६]- लोगों का राजा । ६० उग्रः[१६०५]- उपपोर। ३० संवनन: [१३६१]- सेवाके योग्य । ६१ सदस्कृतः [१६०८]-साहसके काम करनेवाला। ३१ मघवा [१४५९]- धनवान् । ६२ चर्पणि-प्राः[१७९३लोगोंका पोषण करनेवाला। ३२ अश्यवान्, गोमान् , यवमान [ १४५२]- घोडे, ६३ अदया वीर।। १८५५]-शपर दया न करने- गाय और नौपासमें रखनेवाला। पाला योर। ३३ सत्पतिः गोपतिः[१४८९]- सज्जनोंका पालक, ६४ शतमन्युः [ १८५५]- शत्रुपर सैकरों प्रकारसे गायोंका पालन करनेवाला । क्रोध करनेवाला। ३४ हरीणां पति[१५१० - घोई पालनेवाला । ६५ अयुध्यः । १८५५]- जिसके साथ युद्ध करना ३५ अश्वस्य पौरः [१५८०]- घोका उत्तम पोषण कठिन है। करनेवाला। ६६ दुश्च्यवनः [ १८५५]- अपने स्थान परसे कठिन- ३६ गवा पुरुकृत् । १५८० ]- गायोंका उत्तम पालन तासे हिलनेवाला मोशा। करनेवाला। ६७ अप्रतिप्कुतः [१६२२]- जिसका प्रतिकार करना ३७ ऋचीपमः [१६४४-दर्शनीय । अशक्य है। ३८ मद्यः [१६५७]- प्रसन्नवृत्ति धारण करनेवाला । ६८ प्रर्तिपु विश्वाः स्पृधः अमि भसि [ १६३७ ] ३९ सत्त्या [ १६६६ - बलवान् । -युद्ध में सब स्पर्धा करनेवाले शत्रुओंको मारनेवाला। ४. शाकी [ १६६६]- सामर्यवान् । ६९ तरुप्यन् [ १६३७ - शत्रुओंको यूर करनेपाला। ४१ सदावृधः वारः १६८४]- सामनेवाला पीर । ७० अनर्वाणः [१६४३ ]- युद्ध करनेमें कुशल । ४२ शिप्री, १९९६ ]- शिरस्त्राण धारण करनेवाला । ७१ अनपच्युतः । १६४३ ]- पराभूत न होनेवाला । ४३ तुविशुप्मः [ १७७२ ] - महा बलवान् । ७२ भवार्यक्रतुनरः । १६४३ ] - जिसको कोई रोक ४३ सुविक्रतुः(१७७२ - बडे बडे कार्य करनेवाला । नहीं सकता। ४५ शचीयः[ १७७२- शक्तिशाली। ७३ दस्यु-हा ! १६६८1- दुष्टोंश नायर करनेवाला। ४६ शविष्ठः । १७७२]-शविलशाली। ७१ रजी[१६]-वनधारी, शपयारी। ४७ विद्वेषी ! १३६१]- शत्रुओंसे द्वेष करनेवाला। ७५ स्थिरः रणाय संस्कृतः [१६९८]- युद्धमें स्थिर ४८ अपक्षी [१३६१]- शत्रुओं को टक्कर देनेवाला । रहनेवाला, युद्ध करने में कुशल।
सामनेदका सुयोघ अनुवाद अग्निके गुण धाला। ७६ समूहसि [ ३९० ]- संगठन करनेवाला । ९६ इन्द्रे विश्वा भूतानि येमिरे ! १५८८ ]- इन्द्रके ७७ ईशानरुत् [१४९३]- शासया निर्माण करनेवाला। आषयसे सय प्राणी रहते हैं। ७८ तुविद्युम्नः [ १४९३ ]- अत्यन्त तेजस्यों। ९७ तुविकूर्मिः [ 10 ]- महान कार्य करनेवाला। ७९ परमज्या [ १४९२]- जिसके धनुषको डोरो ९८ ऋतीपहः [१७७१]- पात्रुको दूर करनेवासा, उत्तम है। प्रलोभनों में न फंसनेवाला। ८० उमयाधी[१६- भौतिक और आध्यात्मिक ९९ विपीमान् [ १४८८]-तेजस्यो। ऐश्वयं देनेवाला। १०० सम्रादायन् । १६२१ ]-एकदम फल देनेवाला। ८१ वृत्रहा अहिं अवधीत् [१४५१]- वृत्रघातक ये इन्त्रके गुण पाचक देखें। इन्हे मनसे धारण करनेपर इन्द्रने अहिका वध किया। हो शरीरमें बल बढ़ता है और मनको शक्ति पाती है। ८२ नवनवति पुरः बाह्रोजसा विभेद [ १४५१]- शत्रुके निन्यानवे नगरोंको इन्द्रने अपने वाहुबलसे सोडा। ८३ अप्रतीनि पुरुषत्राणि हंसि [१४५]- बहुतसे १ अग्निः १३४३ ] - अग्रणी " अमिः कलात् । यलिष्ठ शत्रुओंको मारता है। अग्रणीभवति" (निरक्त) ८४ चित्राभिः ऊतिभिः अवतात् [१४५१]- अपने २ पायक [१३४३]- पवित्र कररबाला। विलक्षण रमणके साधनोंसे इन्द्र रक्षा करता ३ होता [१३४३]- हवन करनेवाला, देवोंको मुसाने- ८५ सुम्नेषु ना आयामयः [१४५१- सुख और समृद्धिमें हमें बढा। ४ कविः [१३४६ ]-शानी, दूरदर्जी। ८६ योजसा फ़र्वि युधा अभ्यवत् [१४८८]- इन्द्र ५ मधुजिया [ ३३४९]- मधुरभाषी। अपने सामयंसे पानुमोको युद्धमें जीतता है। ६ प्रियः [१३४१]- सबको प्रिय लगनेवाला। ७ नराशंसः [ १३४९]-सब मनुष्यों द्वारा प्रशंसित ८७ शतक्रतुः [१४५९ ]- सैकडों महत्वपूर्ण कार्य होनेवाला । करनेवाला। ८ मनुर्हितः [१३५० ]- मनुध्योका हित करनेवाला । ८८ पुरां दर्चा [18]- शत्रुके नगर तोडनेवाला। ९ प्रशस्तः [११७४]-प्रशसित । ८२ दृढा चित् आरुजा [ १७१९]- सुदृढ शत्रुओंको २० दूरे रक् [१३७४]- दूरसे बोलनेवाला, पूरी । भी उत्साह फेंकनेवाला। ११ गृहपतिः१३७४ ]- गृहस्वामी। ९० ते शुष्मं तुरयन्तं [ १६३८]-रे यल शओंका १२ अथव्युः [१३७४ - प्रातिशील । नाश करते है। १३ सुप्रतिचक्ष्यः [ १३७४ ]- अत्यन्त दर्शनीय । ९१ गोत्रभित् क्सयाहुः अज्म जयन् ओजसा १४ यविष्ठयः[१५]-तरण । प्रमृणन्त [ १८५४]- शक फिले तोडनेवाला, पत्रके १५ दक्षाय्यः [३४] बल बढानेवासा। समान पठोर बाहुओंवाला हो युद्धम विजयी होता है और १६ शंतमा [१३८.]-शान्ति मुख देनेवाला। शत्रुओंको नष्ट करता है। १७ अंहसः पातु [१२८१]-पासि रक्षा करनेवाला। ९२ सपा राजा [१७१५]- समों पर एक साथ १८ रणे रणे धनंजयः [१२८२]- प्रत्येक पुरमें शासन करनेवाला। विजयी। ९३ अनुत्तमन्युः [ १७९५]- जिसका कोप व्यर्थ १९ भारतः [१३८५]- मरण पोषन करनेवाला। नहीं होता। २० मजरः [11८५]- कभी पूरी न होनेवाला, हमेशा ९४ राधानां पतिः [१६००]- पोंका स्वामी। तक्ष्ण रहनेवाला। ९५ यघिदः [१५७९]- निवाप्तके सापन पास २१ दविद्युतम् । १३८५]- तेजावी । रपनेवाला। २२ धुमत् [ १३८५]- प्रकाशयुक्त ।
सामवेदका सुयोध अनुवाद युक्त अन्न दे। २३ वृत्राणि जंघनत् [१२९६]- शत्रुको मारनेवाला। ५२ शुचिः [ १५६७ }- शुद्ध, पवित्र । २४ सहन्त्यः [१४.७- शत्रुको हरानेवाला। ५३ धुयः [१५६७ ]- स्थिर। २५ विश्वचर्षणिः [ ४७]- सब जनोंका हित ५४ अमृतः[१५६८]- अमर । करनेवाला। ५५ जागृविः [ १५६८ ]- जागृत रहनेवाला। २६ सुभगः [ १४१७]- उत्तम भाग्यवान् । ५६ विभुः १५६८]- व्यापक। २७ सुदीदितिः [ १४९७]- उत्तम सेगस्वी । ५७ विश्पतिः [१५६८]- प्रजाका पालन करनेवाला। २८ श्रेष्ठशोची: { ४१७]- पिशेष प्रकाशमात् । ५. जनानां जामिः मित्रः प्रिया [१५३६]- सोगका २९ प्रजापत् ग्रह भाभर .[ १३९८ ]-पुत्रपौत्रोसे प्रिय मित्र । ५९ दर्शतः [१५३८]- सुग्दर, वर्शनीय । ३० अपां-न-पात् [ १४१४ - जालोंको नीचे गिरनेम ६० मन्द्रः[ १५४३ ]- आनन्दित, प्रिय । देनेवाला। ६१ विमावसुः[१५४३]- तेजस्वी । ३१ तनू-न-पात् [१३४६ ]- शरीरको गिरने न ६२ रौद्रः[१५४९] - भयकर। देनेवाला। ६३ भद्रः [१५४६ ]- कल्याण करनेवाला। ३२ ऊर्जा-न-पात् [१७१२]-पल कम न करनेवाला। ६४ विश्वा साक्षान् अमृक्तः [.५५८]- सब शत्रु ३३ द्विजन्मा [ १७७६ ]- द्विज, वो अरणियों में जन्म ओंको हरानेवाला, विजयी, न हारनेवाला। सेनेवाला। ६५ समासु सासहिः [१५६०]- पुखमें विजयी । ३४ नुहंसर [१८१५]- पुष्टोंको जानसे मारनेवाला । ६६ वरेण्यः [ १६१९]- श्रेष्ठ, ज्येष्ठ । ३५ मानुषे जने हितः [१४७४ ]- मनुष्योंका हित ६७ अमित्रं अर्दय [१६४८]- शत्रुका नाश कर। करनेवाला। ६८ उरुरुत् । १६४९]-बहुत कर्म करनेवाला । ३६ घेधः [१४७६]-विशेष कर्म करनेवाला। ६९ जरायोध [१६६३ ]- स्तुतिसे प्रमुख होनेवाला । ३७ सुकतु [१४७६]- उत्तम रीतिसे कर्म करनेवाला। ७० दस्म [१६६०]- सुन्दर, दर्शनीय । ३८ चित्रभानुः [ १४९८ ]- उत्तम तेजस्वी । ७१ यतावा [ १७०८]- सत्यनिष्ठ । ३९ सहस्कृता[१५०३]-बल बढानेवाला। ७२ वैश्वानरः १७०८]- सबका मेतृत्व करनेवाला । ४० प्रचेताः [१५:४]-विशेष भानी। ७३ चशी [१७०९]- सबको अपने अधीन रखनेवाला। ४१ गातुवित्तमा [ 1५1६]- उसम रीतिसे मार्ग ७४ पावकशोचिः [१२]- जिसका प्रकाश जाननेवाला। पवित्रता करनेवाला है। ४२ आर्यस्य वर्धन: [१५१५]- मार्योको बढानेवाला। ७५ स्निहितिषु कृष्टिषु जग्मनासु दाशुषे गर्य ४३ पांचजन्यः [ १५.९]- पांचों जनोंका कल्याण अरक्षत् [१३८०]-शधुके आक्रमण करने पर दाताके परकी करनेवाला। रक्षा करता है। ४४ ऋषिः[ १५१९]-मानी, द्रष्टा । ये अग्निके गुण भी अत्यन्त बोधप्रद है। मनुष्यको ये गुण ४५ पचमानः [ १५१९]- शुद्धता करनेवाला। अपने अन्वर बढ़ाने पाहिए। ४६ पुरोहिता[१५१९ - नेता, आगे रहनेवाला, मागे स्थापित किया हुआ। ४७ महागयः[१५१९]- महान् घरवाला। १ जागृवि [ १३५७ ] - जागृत रहनेवाला । ४८ स्वईफ [१५१९]- आत्मष्टिवाला आरमझानी। २ सक्षणिः वृत्राणि परि [ १३५७ ]- साहस करने ४९ स्वपतिः [१५३३]- स्वयंशासित । वाला वीर शत्रुको कुचलता जाता है। ५० वृपणः [१५४०]- मलवान् । ३ शुक्रः [१३५७ ]-पीयं यजानेवाला। ५१ जातयेदाः [ १५६६ ]- जिससे ज्ञान उत्पन्न होता ४ दिव्यः [ १३५७ ]- घुलोकमें रहनेवाला, पर्वतपर है, उत्पन्न होको जाननेवाला। जगनेवाला। सोमके गुण सामवेदका सुबोध अनुवाद (१७) पुस्त। ५ पीयूषः [ १३५७ ] - अमृतरूप। ३१ सुमतिः [ 1४४४ ]- उत्तम पृद्धिमान् । ६ सोम. आनः [१३५८]- सोम रक्षण करता है। ३२ रक्षांसि अपनन् । १४३९ ]- राक्षसोंको मारने- ७ वर्धनः [ १३५९ 1- बल बहानेवाला। वाला। ८ दक्षसाधन:[१३८८]- बल बहानेका सापन। ३३ अमिमहा [ १४४७ ] - शत्रुओंको मारनेवाला। ९ वीरः [१३९५ ]- शूरवीर । ३४ विश्व-वणि. [ १४४७ ]- सब लोढेका हित १० हरिः [ १३९५ ]- दुःखोंका हरण करनेवाला। करनेवाला। १. प्रियः [ १३९५]- सवोको प्रिय । ऐसा यह सोम है। सोमके ये गुण सोमरस पीनेवालों में १२ कवि [१४०० ] ज्ञानी, बुरवी। दौखते हैं। ये गुण सौमके कारण मनुष्योमे उत्पर होते है, १३ रत्नधा [ १४०८]- रत्नोंको धारण करनेवाला । इसलिए वे गुण सोमके हो समझे जाते है। १४ शूरग्राम [ 1४०९]- शूरोंका समुदाय अपने अन्य देवताओका वर्णन सामवेबमें थोडा थोडा है इसलिए साय रखनेवाला। उनका विचार करनेको यहाँ आवश्यकता नहीं है। १५ सर्ववीर [१४.९]- सब प्रकारसे वीर । १६ सहापान [ १४०९]-अनुरो हराने को दाक्तिये अनुनासिक-सहित मुद्रण सामवेदका मुद्रण अनुनासिक राहिंत परस्परासे होता मा- १७ जेता [ १४०९]- युद्ध जीतनेवाला । रहा है। र, श, ष, स, ह इन अक्षरोंसे पहते यदि मनुस्वार १८ तिग्मायुधः [ १४०९]- तीक्ष्ण शस्त्र अपने पास मा जाये तो उससे अनुनासिक हो जाता है। जैसे- रखनेवाला। मनांक अनुनासिकरहित अनुनासिकसहित १९ क्षिप्रधन्वा [१४०९]- पनुषको बहुत शोन स्तोम हदाय चलानेवाला। स्तोमरुद्राय २७ अपां रेतासि २० समन्सु अपान्हा [१४०९]- युद्ध में शत्रुओं के अपाछरेतासि २७८ लिए मसा। शतशत २ यशाना होता मजाना होता २१ पृतनासु शन सादान [१४०९/- युद्धमें शत्रु- मोको हरानेवाला। इसप्रकार मनुनाशिक - सहित सामवेदका मुद्रण होना चाहिए। २२ वृपा ( 1४1%]- बलवान् । २३ सुमेधा. [ १४२० ], उत्तम पद्धिमान् । इसप्रकार सामवेदके विषपमें पोटासा परिचय यहाँ दिया २४ तेजिप्टर. [१४२४]-तेजस्वी। है । उसका विस्तार बहुत बरा हो जाएगा । इसलिए इसका २५ यशसा यशस्सर: [१४01]-यशसे यशस्वी। विचार करके यहां पोडासा परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत २६ वधुः[१४४ ]- भूरे रगका । २७ स्वतया - अपनी शक्तिरे शतिमान् । निवेदन २८ अरुणः।।४४४]- धमवनेवाला। २९ मनसः पतिः[४]-मनश स्वामी। श्रीपाद दामोदर सातयलेबर ३० शुप्मी । १४४४ ]- मलवात् । मध्यक्ष-स्वाध्याय मणल, पारसी शतकात रिया है। ३ [ माम हिदी भूमिरा ܒ सामवेदका सुबोध अनुवाद पूर्वाचिकः (छन्द आर्चिकः) आन काण्डम् । १ ३ अथ प्रथमोऽध्यायः। अथ प्रथमपाठके प्रथमोऽधः । [१] (१-३०) १, २, ४, ७, ९ भारद्वाजो बार्हस्पत्य , ३ मेधातिथि काव , ५ उशना पाव्य , ६ सुदीतिपुरुमिदा- वागिरसो, तयोर्वाऽन्यतर, ८ वत्स काण्व , १० वामदेव ॥ अग्नि ॥ गायत्री । अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बहिपि।। १ ।। (ऋ ६।१६।१०) त्वममें यज्ञाना होता विश्वपार हितः । देवभिमानुषे जने ॥२॥ अनि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुकतुम् ॥३॥ ( 1१२) [१] प्रथमः खण्ड । [११ हे भग्ने । (वीतये या याहि ) हवि भक्षण करनके लिए तू मा, देवोरी ( हव्य-दातये गृणान.) हवि देनेके लिए जिसकी स्तुति की जाती है, ऐसा तु (छोता) पशमें ऋत्विज होता हुमा (पहिपि नि सत्सि ) पतमें वासन पर बैठ॥१॥ (१) वीति:--- जाना, गति करना, उत्पन्न करना, उपभोग करना, खाना, साफ करना, वाटना। (२) हव्यदाति'- देवोंको हवि पहचाना, हदि देना । (३) होता- बुलानेवाला, देवोरो अपने पास लानेवाला, । (४) वहि:-आसन, अन्तरिक्ष, जल, यज्ञ । [२] हे अग्ने ! तू ( विश्वेषां यज्ञानां त्व होता) सब यशोमं देवोंको बुलानेवाला है, और (देवेभि ) देवोंने हो तुसे (मानुपे जने हित ) मानवी जनोंके योचमें स्थापित किया है ।। २ ।। [३} हम (विश्व-वेदस) सबको जाननेवाले, (होतारं) देवोंको बुलानेवाले (अस्य यशस्य सुश्तु) इस याको उतम रीतिसे करनेवाले इस (अगि) अग्निको (दूत वृणीमहे ) दूत मानकर स्वीकार करते है ॥ ३॥ १ (२) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ भनेपं काण्डम् १२.३१२ १ र ७ ४ अमित्राणि जनद् द्रविणस्युपिन्यया । समिद्धः शुक्र आहुता ॥४॥(अ.६६३४) ५ प्रेष्ठं वो अतिथिरस्तुपे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने स्थं न वेद्यम ॥५॥ (R. Clin) ६ त्वं नौ त्वं नो अग्ने महोमिः पाहि विश्वस्या अरातेः । उत द्विषो मयस्य ॥६॥ (ऋcom) एह्यू पु नवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः । एमिर्धास इन्दुभिः ॥७॥ (ऋ ६६) आ ते वत्सो मनो यमत्परमाचिसधस्थात् । अन त्यो कामये गिरी ।। ८ । (र ८11110) त्यामने पुष्करादध्यथा निरमन्यत । मू विश्वस्य वायतः ॥९॥(1) १० अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महै । देवो पास नो दृशे ॥१०॥ (वाग्दे नास्ति ) इति प्रपमा दशतिः॥१॥प्रथम. वद्ध ॥१॥ [स्वरिता ९। उ० नाघा० ३७१ () ॥] ८ . (१-१०) १ आयुद्धक्ष्याहि (ऋ. पिरप आगिरस ) २ यामदेयो गौतम ; ३,८-९ प्रयोगो भागय ; ४ मपुच्छता बवामित्र, ५, ७ शुन शेप माजोगति । ६ मेधातियि काव'; १० वत्स काण्व ॥ अग्नि ॥ गायत्रो । ११ नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कश्यः । अमेरमित्रमर्दय ॥१॥ (ना. ८७५110) [४](विपन्यया) विशेष प्रकारको स्तुतिसे प्रसन्न हुआ हुआ, (द्रविण-स्युः) उपासकोंको पन देने की इच्छा याला (समिद्धः) अच्छी तरहसे प्रकाशित (शुफा) शुस भौर (आधुतः) सहामार्थ बुलाया गया यह मग्नि (घृत्राणि जंघनद) धेरनेवाले शत्रुओंवा नाश करता है ॥४॥ [५] (पाप्रेष्ठं) तुम्हारे अत्यन्त प्रिय (मियं मिनं श्य) प्रिय मित्रके समान प्रेम परनेवाले, (अतिथि) मति- पि समान पूग्य अग्निको (वेद्यं रथं न) धन देने वाले रपकी जैसे स्तुति को जाती है, उसी प्रकार (स्तुपे) में स्तुति करता हूं ॥५॥ [६] हे (भ) मग्ने ! (स्व) व (विश्वस्या अरातेः) सभी समोसे (उत ) और (दिपः मत्य॑स्य) परनेवाले मनुष्यते (महोभिः) भरे बडे साधनोंसे (नः पाहि) हमारा संरक्षण पर ॥६॥ [७] हे मग्ने । (पाह उ) श्रा, (ने) तेरे लिये हो (त्या) इस प्रकार (इतरा गिरः) दूसरी स्तुतियो में (सुप्रमाणि) अच्छी तरहसे कर रहा हूं, (पभिः इन्दुभिः पर्षासः) इन सोमरसॉस तू घर, महान् हो ॥७॥ [८] मग्ने ! (यत्मः) यह तेरा पुत्र (ते मनः) सेरे मन (परमात् सघस्यात् ) यहन श्रेष्ट स्थानसे भी (आ यमत् ) अपने वश करता है। हे भाने ! (गिरावां फामये) अपनी स्तुतिसे तेरी प्राप्ति की मारता हूँ 11८॥ [९] हे माने । (भपर्वा ) मपर्माने (त्यां ) तुरे ( विभ्यस्य यायत' मूर्भः) म वियरे आमार, भूत परम श्रेष्ठ (पुष्परात्) पुनरो (निरमन्यत ) मप पाके प्रामिन रिया ॥ ९॥ (१०) अग्ने (अस्मभ्यं गदे ऊनये ) हमारी उराम मारे लिये ( बियस्यात् ) निवास पाने योग्य पर (भा मर)हमें दे, (नः दो। हमें मार्गको हिलानेवाला तुही (देयः हि मसि) देव है ॥१०॥ ॥ यदा पहिलाएं ममात दुमा॥ [-] द्वितीयः पण्डः। P११1१ अने! हेरेव । (एटया) मनुष्य ( ते मोजसे ) से दो लिपे (नमः गृणास) मार पर। (म) मपनो पारिन (ममित्र मर्दय ) Antit (१) पशि:-मनुष्य, विमान । (२) मम-बाल, शानि।
प्रथम अध्याय] सामवेद्का सुयोघ अनुवाद १३१२ ३ १७१२ । १२ दूत को विश्ववेदस हव्यवाहममय॑स् । यजिष्ठमृञ्जसे गिरा ॥ २ ॥ (१८) उप त्या जामयो गिरी देदिशतीविष्कृतः । वायोरनी के अस्थिरन् ॥३॥(ऋ. ८1१०२।१३) १४ उप स्वाग्ने दिवेदिवे दोपावस्तधिया वयम् । नमो भरन्त एमास ॥ ४ ॥ (ऋ. ११११७ ) १५ जरायोध तद्विविद्धि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमरुद्राय दृशीकम् ॥५॥ (ऋ. ११२७११० ) १६ प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्रायसे । मरुद्भिरम आ गहि ॥६॥ (ऋ. १।१९।१ ) १७ अश्च न त्वा वावन्त बन्दच्या अनि नमोभिः । सम्राजन्तमध्वराणाम् ।।७।। (ऋ. ११२७॥१) १८ औभृगुपच्छुचिममवानवदा हुचे । अग्नि समुद्रयाससम् ॥ ८॥ (ऋ. १०२।४) १९ अग्निमिन्धानो मनसा धियंसचेत मयः । अमिमिन्धे विवस्वमिः ॥९॥ (ऋ. ८1१०२।२२) २० आदित्यनस्य रेतसौ ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परी यदिध्यते दिवि ॥१०॥(ऋ. ८।६।३०) इति द्वितीया दशतिः ॥ २॥ द्वितीयः खण्डः ॥२॥ [ स्व० ६ । उ० २। पा० ५२। (पा)] [१२] हे आने ! (विश्व-वेदसं ) सब धनोंके स्वामी ( हव्य-वाई ) हविको ले जानेवाले, (अम] ) अमर (दूत) दूत तया ( यजिष्ठं) अत्यधिक यज्ञ करनेवाले अग्निको (चः) तुम्हारे लिए में (गिरा ऋक्षसे) अपनी प्रार्थ- नासे अनुकूल बनाता हूँ॥२॥ [१३ ] है अग्ने ! (हविपरतः ) हवन करनेवालेको (जामयः गिरः ) वहिनके समान प्रिय स्तुति ( देदिशती) मेरे गुणों को प्रकट करती हुई (बायो अनीके) वायुके पास ले जाकर (उप अस्थिरन ) स्थापित करती है ॥३॥ [१४] हे अग्ने ! (दिवे दिवे) प्रति दिन ( दोगवस्तः ) रातदिन (वयं) हम (घिया नमो भरन्तः ) बुद्धि पूर्वक नमस्कार करते हुए ( त्या उप पमसि) तेरे पास माते है ॥४॥ [१५] हे (जरा-चोध ) स्तुति से ज्ञात होनेवाले अग्ने ! (विशे विशे) प्रत्येक मनुष्य के हितके लिये ( यशि- याय) पूग्य, (सदाय ) दुष्टोको रुलानेपाले तेरे लिए (दशीकं स्तोम) सुन्दर स्तोत्र गाये जाते है, (तत् विविढि) उन्हे तू जान ॥५॥ {१) जरा-स्तुति, (२) जरा-बोध- स्तुतिसे मित्तके गुणोंका ज्ञान होता है, (३) यशिय- पून्प, (४) रुद्र-शत्रुको रुलानेवाला, (५) दृशीक- दर्शनीय, सुन्दर । [१६] हे अग्ने ! (त्यं चार अध्वरं प्रति ) उस उत्तम-हिंसारहित यज्ञमें (गोपीथाय प्रहयसे) सरक्षणके लिए तुझे बुलाया जाता है, हे अग्ने ! तू (मरुद्भिः आ गहि ) महतोके साथ आ॥६॥ । १७ (वारयन्तं अश्वन) अयालयाले घोडेके समान जो (अ-ध्यराणां सम्राजन्त) हिमारहित यतीम उतम प्रकार प्रकाशित होनेवाले (त्वा अग्नि) तुन मग्निको (नमोभिः चन्दध्य) नमस्कारोंसे हग बन्दना करते है ॥७॥ [१८] (ममुद्रयाससं ) ममुद्रम रह्नवाले (शुचिं मानं ) शुद्ध अग्निको (और्व भृगुवत् ) और्वभृगुके समान तया ( अमवानवत् ) अप्नवानके समान ( आ हुवे) में स्तुति करता हूँ॥ ८॥ [१९ । (मनसा अर्शि इन्धानः ) मन लगाकर अग्निको जलानेवाला (माः) मनुष्य (धियं सचेत ) अपनी श्रद्धाको प्रवीत धरता है और (वियस्यभिः अग्निं इन्धे ) सूर्य किरणोंके साय अग्निको भी प्रचलित करता है ॥ ९ ॥ [२०] (परो दिषि) चुलोकमे ( यत् इभ्यते) जो प्रकाशित होता है, (आत् इत्) उसी (मन्नस्य रेतसः) प्राचीन बलसे युक्त (वासरं ज्योतिः ) दिनके प्रकाशको (पश्यन्ति ) लोग देखते है ॥ १० ॥ ॥ यहां दुसरा खंड समात हुआ।
(४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [यानेयं काण्डमें - - , २ ३ २३ १ ११३ ។ (१-१४) १ प्रयोगो भार्गव , २,५ भरद्वाजो बार्हस्पत्य , ३, १० वामदेवो गौतम , ४, ६ वसिष्ठो मैत्रावरणि । ७ विरूप आडिगरस , ८ शुन शेप आजोगति , ९ गोपदन मात्रेय , ११ प्रस्कण्व काण्व , १२ मेधातिथि काव , १३ सिन्धुद्वीप आम्बरीष , नित आत्यो वा, १४ उशना काव्य ॥अग्नि ॥ गायत्री॥ २१ अग्नि वो घन्तमध्यराणां पुरूतमम् । अच्छा नत्रे सहस्वते ॥ १ ॥ (ऋ. ८।१०२१७) २२ अग्निस्तिग्मेन शोचिपा यसद्विश्व न्यत्रिणम् । अग्मिनों चरसते रयिम् ॥२॥ (३.६।१६।२८) २३ अमे मूड महार अस्यय आ देवयुं जनम् । इयेय बहिरासदम् ॥३॥ (ऋ४९१) २४ अग्ने रक्षा णो अहसः प्रति स देव रीपतः। तपिष्ठेरजरो दह ॥४॥ (ऋ ७।१५।१३) २५ अग्ने युड्वा हि ये तवाचासो देव साधवः । अरं वहन्त्याशवः ॥५॥ (ऋ. ६।१६।४३) २६ नि त्या नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् । सुवीरमग्न आहुन ॥६॥ (ऋ ७।१५७) [३] तृतीयः खण्डः। [ २१ । (व.) तुम्हारे (अध्यराणा) अहिंसा पूर्ण पज्ञोंका (न) नाश न करनेवाले (पुरूतम) अतिश्रेष्ठ (सहस्पते) बलवान् (वृधन्त) समको बडानेवाले (अग्निं अच्छा) अग्निके पास [ सेवा करनेके लिये ] जा ॥१॥ (१) म-वर.- हिंसा रहित यज्ञ, (२) अघ-र.- मार्ग दिखानेवाला, (३) नप्ता (न-प्ता)- न गिराने. वाला, सरक्षक, (४) सहस्थान्-शत्रुको हरानेवाला । [२२] (अग्निः) अग्नि (तिग्मेन शोचिषा) अपने तीक्ष्ण तेजमे (विश्व अत्रिणं) सब [स्वय ] खानेवाले शत्रुको (नि यसत्) नष्ट करता है, वह अग्नि (नः रयिं वसते) हमें धन देता है ।।२।। (१) अनि. (अद्)- स्दय खानेवाला, अत्यधिक खानेवाला शत्रु । [२३] हे अग्ने ! तू (मृड) हमें सुखी कर (महान् असि ) महात् है, (देव-यु जनं अयः) स्वरको उपासना परनेवाले मनुष्य के पास ना, और (वर्हि. भासद) भासन पर बंउनके लिए तू (इयेथ) मा॥३॥ (१) देवयु. (देव-यु)- ईश्वरको उपासना करनेवाला, ईश्वरसे अपना सम्बन्ध जोडनेवाला । [२४] हे आने ! (अंहस ) पापो और (रीषत ) हिसक रासे (न ) हमारा (रक्ष) सरक्षण कर, और (अ-जर.) मुरापासे रहित तू (तपिष्ट. प्रति दह स्म) अपने तेनोसे (पात्रुको जला दे ॥४॥ (१) भद:- पाप, पापी, दुष्ट । (२) रीपत्-हिसर शन, तोडफोड करनेवाला मनु । (१) अजर.- जरारहित, तक्ष्ण । [२५] हे अग्नि देव ! (ये) जो (तप साधर अभ्यास.) तेरे उतम पोडे है, जो (आशव भरं यहन्ति) येगरी पूर्ण होकर तुझे ले जाते है, उनसे अपने रथम] (युश्श्य दि) जोड ॥ ५॥ (१) माशुः-- धेगरी जानेवाले पोई। [२६] है (नश्य) दारणमें जाने योग्य, (विश्-पते) प्रजातीचे पालय, (माहुत) रायवे सहायरे लिए बुलाये गये हे (अमे) मग्ने । (पय) हम (घुमन्त सुपीर ) तेजस्यो, उत्तमवीर तेरा हो (धीमहि) ध्यान करते है ॥६॥ (१) नक्ष्य- (न)-पाग जाना, पास जाने योग्य, (२)धुमान्-प्रसामान, सेजस्वी । (३) सुधीर:- उत्तम वीर, मोहा।
प्रथम अध्याय] सामवेदका सुबोध मनुवाद 3 ३" र २ ३ 3 २७ अमि/ दिवः ककुत्पतिः पथिव्या अयम् । अपार रेतासि जिन्वति ॥७॥ (ऋ.८४४।१६) २८ इमम् पु स्वमसाकर सनि गायत्रं नव्या रसम् । अग्ने देवेषु प्र चोचा ॥८॥(. १२७४) २९ त्वा गौपचनो गिरा जनिष्ठदमे अङ्गिरः । स पायक श्रुधी हवम् ॥९॥ ( ८1७४।११) ३० परि वाजपतिः कविरमियान्यक्रमीत् । दधद्रनानि दाशुषे ॥१०॥(ऋ. १५१३) ३१ उदु त्ये जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाप सूर्यम् ॥११॥ (ऋ. १।३०।१यजु. ७१४१) ३२ कविमनिमुष स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचाउनम् ॥ १२ ॥ (ऋ. १११२१७) ३३ नो देवीरभिष्टय ॐ नौ भवन्तु पीतये । ॐ योरभि संवन्तु नः ॥ १३ ॥ (ऋ. १०।९।४; यजु. ३६।१२) [२७] (अयं अग्निः) यह अग्नि (मूर्धा) सबसे मुख्य स्थानपर रहने वाला है, यह (दिवः फफुत्) घुलोमा उच्च भाग है, और (पृथिव्याः पतिः) पृथ्वीका पालन करनेवाला है, वही (अपां रेतांसि जिन्वति) कोका फल देकर सबको प्रसन्न करता है॥७॥ (१) आप्- जल, कर्म, जोवन । (९) जिन्व्- सन्तुष्ट करना | [२८] हे मग्ने ! (त्वं) (अस्माकं इमं नन्यांसं) हमारे इस नवोन (सनि) अन्नको और (गायत्र) गायत्री छन्द किए गए स्तोत्रको (देवपु सु प्रयोचः) देवोम पहुचा ॥८॥ (१) सनिः- अन 'मण-दाने', (२) गायत्रं- गायत्री छन्दमें गाया गया साम-गान । [२९] (तं त्या) उस तुझे (गोपमनः) गोपयन ऋषिन ( गिरा जनिष्ठत् ) अपनो स्तुतिसे उत्पन्न किया, हे (अंगिरः) शरीरफे मगोमें रस रूप में रहनेवाले (पावक) पवित्र मरनेवाले अग्ने ! (सः) यह त (हथुधि) हमारी प्रार्थना सुन ॥९॥ (१) अंगिराः- एक ऋषि, अगोंमे रसरूपमें रहनेवालो शक्ति (अगि-रस), (२) पावक-पवित्र करनेवाला । [३०] (बाजपतिः कविः) अन्नोंका स्वामो, शानी, अग्नि (हव्यानि परि अकमीत्) हवनीय पदार्थोंको स्वोषार करता है, और (दाशुषे रत्नानि दधत् ) दानशील मनुष्यको रत्न देता है ॥ १० ॥ (३१४ (विध्याय ,सूर्य दृशे) विश्वको सूर्य दिखाने के लिए उसको (केतवा) किरणे (जातवेदसं देवं) जिससे वेद उत्पन्न हुए है, उस देवको (उत् उ यहन्ति) मच्छो तरह धारण करतो है ॥११॥ (१) जात-वेदाः-- जिससे ज्ञान प्रकट होता है, जिससे वेद प्रकट होते है, किरणे सूर्यको आकाशमें इसी लिए धारण करती है, कि जिससे वह सबसे दिखाये। [३९] (अध्वरे) हिंसारहित यश, ( सत्यधर्माण ) सत्य धर्मसे युक्त ( फर्षि अग्नि) ज्ञानी अग्निकी (उपस्तुहि) स्तुति फर, यह (देवं ) देव (अमीय-चातनं) रोग नष्ट करनेवाला है ॥ १२॥ (१) अमीव-चातन:-कन्जसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंशे दूर करनेवाला। [३३] (नः ) हमें ( अभिपये) इच्छित मुख देनेके लिए (देवी शं) दिव्य जल कल्याणकारी हो । (नः पीलये शं) हमारे पौनके लिए सुखदायी हों। (नः ) हमें (शं योः अभिम्रवन्तु ) मुख और शान्ति देते हुए जल प्रवाह बहें ॥ १३॥ (१) अभिष्टि-इच्छित मुख, (२) पीति- पानी पीना ।
सामवेदका सुयोघ अनुवाद
[मानेयं काण्वम्
१२३३१३
.
३.३
३११२
३१
9
२३११
३१२
सन्तु मरया।
३४ कस्य नूनं परीणांस थियो जिन्वसि सत्पते । गोपाता यस ते गिरः॥१४॥(ऋ. ८1८४७)
इति तृतीया दशति ॥३॥ तृतीय खण्ड ॥३॥ [स्व० ११० २१ घा० ५७१ (थे) ॥]
[४]
(१-१०) १,३,७ शयुर्हिस्पत्य (७ तृणपाणि ), २.५७८-९ भर्ग प्रागाय ; ४ वसिष्ठो मैत्रायणि प्रकायः
काय; १० सोभरि फायः ॥ अग्निः ॥ बहती ।।
यज्ञायज्ञा वो अमय गिरागिरा च दक्षसे ।
प्रम वयममृतं जातवेदसं प्रिय मित्रं न शरसिपम् ॥१॥ (रु. ६।४८०१)
पाहि
अग्न एकया पाहत द्वितीपया।
पाहि गीमिस्तिसमिरूजां पते पाहि चतसृभिर्वसो ॥२॥ (३.८६०९)
पहद्भिरने अचिभिः शुक्रेण देव शोचिपा ।
भरद्वाजे समिधानो यविष्ठय रेवत्पायक दीदिदि
॥३॥ ( ६४८७)
खाहुत
प्रियास
यन्तारा ये मघवानी जनानामूर्व दपन्स गोनाम्
॥४॥ (ऋ. ११६७)
[ ३४ 1 है ( सत्पते ) सत्यके पालन करनेवाले ! (नूनं फस्य धियः ) निश्चपसे किराको बुद्धिसे (परिणसि
जिन्वसि ) समिलित होकर तू आनन्दित होता है (यस्य ते गिरः) जिसके कारण तेरी स्तुति (गो-पाता) मानस
दर्शन करनेवाली होतो है ॥१४॥
(१) गो-पाता- गापरा पालन करना, इन्द्रियोंका पालन करना, नानका दान मरना।
। यहां तृतीय खंड समाप्त हुआ।
[४] चतुर्थः खण्डः।
[३५ ' (क) तुम (यशा यमा) प्रत्येक यज्ञमें और (गिरा गिरा) प्रत्येक स्तोत्रमें (दक्षसे मग्नये ) यलवान्
अग्निरो मासा करो, (वर्य) हम ( जातवेदसं अमृतं ) यो जाननेकाले अमर अग्निरी (प्रिय मित्रं न) प्रिय
मित्रवे समान (प्रशंपिषम् ) प्रशसा करते है ॥१॥
[२६ हे अग्ने ! (पकया नः पाहि ) एक प्रार्थनासे हमारा सरक्षण कर, (उत द्वितीयया पादि) और
घसरी प्रानाने भो हमारी रक्षा रहे । ऊजी पते ) अमरे स्यामी । (निसभिः गीर्भिः पाहि ) तीसरी भाना
हमारा सण पर, है (यसो) सयको यमानेवाले धाने! (चतसमिः पाहि) चौथी प्रार्थनासे भी हमारापान कर॥२॥
[७] हे अणि देष । (पृद्भिः अर्चिभिः) दही पड़ी ज्यासासिए प्रभावित है। (शुषेण शोचिग) र
सेमी प्रमानित हो. हे (यनिष्टय रेवन् पात्रक) ताण, पनयान और पवित्र मरनेवाले देव! (भवाजे समिधान:)
भारे लिए अच्छी तरह प्रदीप्त होकर दू (ददिदि) प्राति ऐ॥३॥
१८ हे मारे ! (त्ये) गुगर्भ (स्याहुन.) उतम रोणिसे हपन परवाने (मूरयः) विद्वान् (प्रियामः
सन्तु) से प्रिय हो. (ये मयमानः ) जो धनदान (जनानां यन्तार) प्रशानोंपर शामन करते हैं, वे (गोना अर्य
दयन्तः) गार्पोर समूहका पालन करते हैं॥४॥
प्रथल मायाय]
सामवेदका सुयोध अनुपाद
(७)
३.१
१३
9%
३३३३३
३९ अमेरितविपतिस्तपानो देव रक्षसः |
अप्रोपिवान् गृहपते महार असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः ॥ ५॥ (*. ८६०।१६)
अमे विवस्वदुपसचित्र राधी अमर्स ।
आ दाशुपे जातवेदो वहा त्वमया देवा उपर्युधः ॥६॥ (३११४४१)
४१ व नविन ऊत्या वसो राधासि चोदय ।
अस्य रायस्त्वममे स्थीरसि विदा गा, तुचे तु नः ॥ ७ ॥ (*. ६४८१९)
४२ मिसप्रथा अस्यमे पाततः कविः ।
वा विनासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वैवसा
॥८॥ (ऋ. १६०१५)
४३ नो अग्ने वयोवृध रपि पावक शरस्पम् ।
रास्वा च न उपमा पुरुस्पृह सुनीती सुयश्वस्तरम् ॥९॥ ( ६०११)
३१
२
आ
२
३३
9
[३९] हे (जरितः अग्ने देव) जानो अग्नि देव ! तू (विपतिः) प्रजाका पालक है, ( रक्षसः तपानः)
राक्षसोंगो सताप देनेवाला है। हे (गृहपते) परके स्वामी ! तू (अ-प्रोपिवान् ) बाहर कहीं न जानेवाला (दुरोणयुः)
घरमें ही रहनेवाला (महान् असि ) महान् है, और ( दिवस्पायुः ) धुलोकका रक्षण करनेवाला है ॥५॥
{४०] है (अमत्यं अग्ने) भमर अग्नि देव ! (उपसः विरस्थत् ) उपासे प्राप्त होनेवाले (चित्रं राधा)
विलक्षण घनको (दाशुषे आ वह ) दानशील आदमोको दे, है (जातवेदः) सर्वग अग्ने ! (त्व अद्य ) तू माज (उप-
र्बुधः देवान् ) प्रात काल उठनेवाले देवोंको (आ यह ) ले आ ॥ ६ ॥
[३१]हे (वसो भन्ने) सबको बसानेवाले भोग्न देव ! (लं चित्र.) तू अद्भुत शक्तिवाला है. (उ त्या
राधोसि ) सू अपने सरक्षाके सरमयंसे धनोंको (नः चोदय) हमारे पास पहुचा(२) (अस्य रायः) इस पनको
(रथीः असि) रपके द्वारा लानेवाला है, तू (नः तु) हमारे पुत्र आदियों के लिए (गाधं तु विदाः । प्रतिष्ठादे
[१२] है आने ! है (त्रातः) रक्षण करनेवाले ! (त्वं इत) त निश्चपसे (स-प्रथा.) बहुत प्रसिद्ध है, इसी
लिए तु (कतः कविः) सत्य और ज्ञानी है, हे (दीदिवः) तेजस्वी अग्ने । (त्यां समिधानं) तेरे प्रज्वलित हो जानेके
बाद (वेधसः विप्रासः) जानी विन तेरो (मा बिरासन्ति) सेवा करते है॥८॥
[१३] हे (पायक अरो) पवित्र करनेवाले अग्ने ! तू (न) हमें (शंस्यं वयोवृधं रयि रास्य) प्रशसनीय
बनानेवाले धनको है। है (उपमाते) ज्ञान सम्पन्न ! (सुनीती) उत्तम नौतिके मासे (पुरु-स्मृह) जिसको बहुतसे
लोग प्रशंसा करते है, ऐसे (सुयशस्नरं) उत्तम यश देनेवाले धनको (ना। हमें दे ॥९॥
(८)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[आग्नेयं काण्डम्
३१
घर
३१ २३"
र
४४ यो विश्वा दयत बसु होता मन्द्रो जनानाम् ।
मधोन पात्रा प्रथमान्यसै प्रस्तोमा यन्त्वनये ॥१०॥ (ऋ.८०१०३६)
इति चतुर्थी दशति. J४॥ चतुर्थः खण्डः ॥ ४ }] [स्व० ९] ३०३] पा० ८३) (दो)॥]
१२११३
१२ १२३
शेप बनेषु मातृपु
३३१२३ १३१
(१-१०) १ वसिष्ठो मंत्रावरुणिः, २ भर्गः प्रागायः, ३, ७ सौभरिः काण्वः, ४ मनुयस्वतः ५ गुदीतिपुरूमो-
ळावागिरसो ६ प्ररकण्वः प्रायः, ८ मेधातिमेप्यातियो कावौ ९विश्वामित्रो गायिनः, १० कण्वो घोरर
॥ अग्निः, ८ इन्द्रः ॥ बहती॥
२१३१२
एना यो अनि नमसोजों नपातमा हुवे ।
प्रिय चतिष्ठमरतिर स्वध्वरं विश्वस्य दूनममृतम्
॥ १।। (ऋ.७११६१)
सं त्या मतास
त्या मास इन्धते ।
अतन्द्रो हव्यं यहसि हपिष्फत आदिदेयेषु राजसि ॥२॥ (ऋ. ८०६०।१५)
अदर्शि गातुवित्तमा यसिन्नतान्यादधुः ।
उपो पु जातमार्यस्य वर्धनमनि नक्षन्तु नौ गिरः
॥३।। (ऋ.८1१०३१)
[४] (य) मो (विश्वा पसु दयते) सब धन देता है, गो (जनानां) मनुष्योंमें (होता मन्द्रः) देवोंको
गुलाकर उन्हें आनन्द देनथाला है, (अस्मै अग्नये) इस अग्निके लिए (मधोः प्रथमानि पात्रा न ) मोमके पात्र जो
प्रथम दिये जाते हैं, उसी प्रकार (स्तोमाः यन्तु ) स्तोत्र किए जाते हैं ॥ १० ॥
यहां चौथा खंड समाप्त हुआ।
[५] पञ्चमः खण्डः।
१४५ ) ( एनर नमसा) इस मनरो (ऊों-न-पातं) पलको भोण न होने देनेवाले, (प्रियं चेति) प्रिय और
घेतनाको देनेवाले (मरति, स्यध्वरं ) मुख्य, उत्तम और हिसारहित यज्ञ परनेवाले, (विश्वस्य दूत) सरको शान देने.
घाले, (अमृनं भनि) अमर अग्निको (आहुये) में बुलाता हूँ, उसी में प्रार्थना करता हूँ ॥१॥
[१६] हे भग्ने ! (योपु) भगलोंम (मारापु) भूमिमें अपया माताके गर्नमें (शेरे) गुप्त रूपसे रहता है
(मनासः त्या में न्धते) मनुष्य तुझे उत्तम रीतिसे प्रदीप्त करते हैं, (अ-तन्द्रः) आलस्यको छोरा (हविष्यतः
इन्य पदसि) हवन परलेवालेको हथियारोत देयोतक पहुंचाना है, (आत् इत्) भोर (देवेषु राजसि) देवोंमें तु
प्रकाशित होता है ॥२॥
[s] (गानु-वित्तमः) धर्मरे मार्गोको उतम प्रशारसे जाननेवाला, अग्नि (अदर्शि) रोसने लगा है, (यस्मिन्
मनानि आदधुः ) जिग एप नियम रिये गाने (गुजातं) उतम प्रबारसे प्रयट ए (आर्यम्य पर्धन) मार्यो
पगनेवारो (स) निको (नः गिरः नक्षन्नु)हमारी स्तुतिय प्राप्त हो ॥३॥
9. देवा ५१ १२ 8 3१ २०७३ प्रथम अध्याय] सामवेदका सुयोघ अनुवाद (९) ४८ अमिरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो वहिरध्वरे । ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पते अवो चरेण्यम् ॥४॥ (5. ८२७१) ४९ अग्निमीडियावसे गाथाभिः शौरशोचिपम् । अमिर राय पुरुमीद थतं नरोऽमि सुदीतये छदि। ॥५॥ (फ ८१७१।१४) ५० श्रुघि श्रुत्कर्ण वहिमिदेवरग्ने सयावभिः । आ सीदतु यहिषि मित्रो अर्यमा प्रातयविभिरध्वरे ॥६॥ (ऋ. ११४४११३) प्रदेवोदासो अग्निदेव इन्द्रो न मन्मना । मातर पृथिवीं वि वावृत्ते तस्यो नाकस्य शमणि ॥ ७॥ (ऋ. १०२) ५२ अध मा अधषा दिवो बृहतो रोचनादधि । अया वधस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण ॥८॥ (ऋ. ८०1140 कायमानो वना त्वं यन्मातरजगन्नपः । न तत्तै अमे प्रमुपे निवर्तनं यद् दूरै सन्निहामुषः ॥ ९॥ (ऋ. ३।९।२) [३८] (उफ्थे अग्निः पुरोहितः) उरय पक्षमें अग्निको सबसे पहले स्यापित किया जाता है । (अध्वरे) हिंसा रहित यामें (यावाणः) सोम कूदने के पत्थर रहते है, तया (यर्हिः) आसन भी फैलाये जाते है । (मरुतः) हे महतो ( ब्रह्मणस्पते ) हे ब्रह्मणस्पते ! (देवाः) हे देयो ! (ऋचा) वेदमत्रों के द्वारा मैं तुमसे (घरेण्यं मयः यामि) श्रेष्ठ संरक्षण मांगता हूँ॥४॥ [४९] (शीर-शोचिष) जिराको ज्वालाप प्रज्वलित हो चुकी है, ऐसे (अग्नि) अग्निकी (अबसे) अपने रक्षणके लिए (गाथाभिः ईडिप्व) स्तोत्रोंस स्तुति कर, (पुरु-मीढः) स्तोता (अग्निं) अग्निको (राये) पनकी प्राप्ति के लिए प्रार्थना करता है, (शुनं अनिं) इस प्रसिद्ध मीनको (नरः) मन्थ्य (सुदीतये छर्दिः) उत्तम प्रकाशयुक्त घरको प्राप्तिके लिए प्रार्थना करते है ॥५॥ [40] है (श्रुत्कणं) प्रार्थना सुननेवाले अग्ने ! (श्रुधि) हमारी प्रार्थना मुन (सयायभिः) समान गति युक्त (देवैः वहिमिः ) दिश्य अग्नि साय (मित्रः अर्यमा) मित्र और अर्यमा (प्रातांवभिः) सप्रेरे जानेवाले देवोंके माय (अम्बेर पहिपि आसीदतु) यसमें आपनपर आकर बैठे ॥६॥ [५११(मज्मना इन्द्रःन) शक्तिमें इन्दके समान, (दैवोदासः अग्निः देवः) दिवोदासका अनिदेव (मातरं भूमियों) पृथ्वी माताएर अनुप्र घायते) अनुकूलतासे प्रकाशित हुआ, उसके बाद वह अपनी श्रेष्ठताके मारण (नाफ- स्य शर्मणि तस्थौ) स्वर्गके बायसें रहने लगी ॥७॥ १५२ ) हे अग्ने ! ( अधज्मः) पृथ्वोपर ( अधया ) अथवा (वृहतः रोचनात् दिवः अधि ) अत्यन्त तेजस्वी द्युलोकपर (अया तन्वा अर्धस्व) अपने तेजसे बढ । हे (मु-कतो) उत्तम यज्ञ करनेवाले अग्ने । ( गिरा) अपनी वागीसे (ममा जाना पूण) मेरे सम्बन्धी जनोंका पोपण कर ॥ ८॥ [५३ ] हे अग्ने ! ( त्वं ) (धना कायमानः) बनको इच्छा करनेवाला है. तु (यत् मातृः अपः )जो माताके समान जलकि पास गया, (तत ते निवर्नेनं ) वह तेरा जाना हमसे (न प्रमृपे) नहीं सहा गया ( यत् ) पयोंकि ( दूरे सन् ) तू दूर होता हुमा भी ( इह आभुवः) यहीं रहता है ॥ ९॥ २ (साम, हिंदी) (१०) सामवेदका सुवोध गनुवाद (माने काण्डम् २र३" २ .3१२३१ १ कर १२ ३. २ 8. ५४ निवामी मनुर्दधै ज्योतिजनाय शश्वते । दीदेय कम्य अवजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥१०॥ १॥३६.१९) इति पञ्चमी दशतिः ॥ ५) पञ्चमः खण्डः ॥ ५॥ । स्व० उ० ६ । पा० ७१। ()"] इति प्रथमप्रपाठके प्रथमोऽर्थः।।१॥ [६] (१-८) १,७ वसिष्ठो मंत्रावरुणि.; २,३,५ कण्दो और ४ सौभरि फाण्य.; उत्कील: कात्यः, ८ विश्वामित्रो गाथितः ॥ अग्निः; २ ब्रह्मणस्पतिः, ३ यूपः ॥ बहती ॥ अथ प्रथमप्रपाठकस्य द्वितीयोऽधः ॥१॥ ५५ देवो वो द्रविणोदाः पूर्णा विवष्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिवो देव आहते ॥१॥ (ऋ. ७१६:११) ५६ प्रेतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सन्ता । अच्छा नये पङ्क्तिराधसं देवा पत्र नपन्तु नः ॥२॥ . ११४०३) ५७ ऊर्ध्व ऊ पण ऊतये विष्ठा देयो न सविता । ਵਕ वाजस्य सनिता यदञ्जिभिवावद्भिर्विहयामहे ॥३॥(ऋ. १३६१३) [५४ } है अग्ने ! ( मनुः त्यो नि दधे ) मननशील मनुष्य तुझे धारण करता है, (शश्वते जमाय ज्योतिः) माधोनकालसे आनेवाले मनुष्योंके लिए तेरो ज्योति प्रकाशित है, (कण्ये दीदेथ ) ज्ञानवान ऋषिके आश्रममें तू प्रकाशित होता है, ( मात्-जाता उक्षितः ) मनके लिए उत्पन्न होनेपर तू और अधिक प्रज्वलित किया जाता है, (.यं कृष्टयः नमस्यन्ति ) जिसको मनुष्य नमन करते है ॥ १० ॥ ॥यहां पञ्चम सं समाप्त हुआ ।। [६] पटा खण्डः। {५५ ] (घा देवः ) सुम्हारा देव ( द्रविणो-दाः) पन देनेवाला है, अतः यह ( पूर्णा भासिचं विषष्टु ) अभी तरह भरे हुए ग्रुचाको स्वीकार करे, और तुम ( उत् सिंचा) ऊपरसे घो डालो, (या उप पृणभ्य) और बार पार पचा भर भरपर आतुति दो, (आत् इत् ) इसरे याद हो ( देवः या ओहते ) वर देव तुम्हें उन्नतिक मार्ग पर से जाएगा। [ ५६ ] (माणसानिः ) शाना स्यामी यह देव (म एतु) हमारे पास आये, (मनृता देवी प्र एतु) राय स्पपालो सरस्वती देवो हमारे पास आये, (नः यमं) हमारे यजम ( देवाः } सब देव (नर्य पंक्ति-राधर्स चोर) मानव जातिके हित रनथाले, [अपनी सेनाही] परितको यशरवो घनानेवाले वीरको (अच्छा नयन्तु ) उसम मासे से जावे ॥२॥ [५018 माने ! ( ऊन) हमारे मरणो लिा (ऊर्यः मुनिष्ट ) चे स्पाना उप्तम रौनिय पित हो.(मरिना देवान) मूपं देवरं गमान (ऊर्थः ) उप्रत होरर (याजम्य मनिगा) अन्नयो रेनषाला हो, ( यत् अधिभिः) गिरा पारग स्तोत्रोंगे (यादिः विहयामदे ) स्तुति करने परम पूर्ण बलाते ९ ।।३।। ।
६. 3.२ ३ र २२ ३१३ प्रथम अध्याय सामघदका सुयाध अनुवाद (११) ५८ प्रयो राय निनापति मतों यस्तै यसो दाशत् । स वीर धत्ते अन्न उक्थश सिन त्मना सहस्रपोषिणम् ॥४॥(ऋ८11०३४) प्र वो यह पुरूणां विशां देवयतीनाम् । अग्निसक्तभिर्वचौभिष॑णीमहे यसमिदन्य इन्धते ॥५॥ ( ११३६१) अयमानः सुवीर्यस्येशे हि सौभगस्प । राय ईश स्वपत्यस्य गोमत ईशे पुत्रहानाम् ॥६।। (ऋ ३१६१) ६१ त्वमग्ने गृहपतिस्त्य ५ होता नो अपरे । पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि वार्यम् ॥ ७॥ ( ७/१६५) ३२१ ससायस्त्या वत्महे देवं मास ऊतये । अपां नपातर सुभग सुदसम सुप्रतृर्तिमनेहसमू 11८।। (* १९१) इति षष्ठी दशति ॥ ६ ॥ षष्ठ सण्ट ॥ ६॥ स्व० ११ । उ० २१ पा० ५७ ॥ (ख)) । ५८ ] हे (घसो) मयको बसानेयाले अग्नि देव ! ( य. मतः ) जो मनुष्य । राये निनीपति ) धन प्राप्तिके लिए तेरो उपासना करता है, । यः ते दाशत् ) जो तुझे हवि देता है, (स ) वह ( उपयशसिन ) स्तुति करनेवाले, ( सहमपोपिण ) हजारों मनुष्योंका पोषण करनेवाले ( वीर ) योर पुत्रको ( त्मना धत्ते । अपने सामर्थ्यसे उत्पन्न करता है ॥ ४॥ [५९ ) ( य अन्ये स-इन्धते ) जिस अग्निको दूसरे पुरुष उत्तमतासे प्रज्वलित करते हैं, उस ! देवयतीना पुरूणां विशा ) देवत्वको प्राप्त करनेवाली नागरिक प्रजामोको ( यह ) महान् भक्तिका (मूत्तेमि' वचोभिः) मुफ्तोंके धारयोंसे ! वृणीमहे ) हम वर्णन करते हैं ॥५॥ [६० (अयं अग्नि.) यह अग्नि (सुधीर्यम्य) उत्तम पराकमका और (सोभगस्य) उत्तम भाग्यका (हि इंशे) स्वामी है, (राय ईशे) वह धनका स्वामी है, (स्पत्यस्य गोमन ईगे ) वह अपने पुत्र पौत्र और गायोका स्वामी है (पृनहथाना) घेरनेवाले शत्रुको मारनेवालोका भी यह स्वामी है ॥ ६॥ (६१) हे आने ' ( त्वं गृहपतिः) तू परोफा स्वामी हैं, (न अध्वरे वं होता ) हमारे हिंसारहित यज्ञमें तू होता है, है (विश्ववार) सभीके द्वारा स्वीवार करने योग्य अग्ने । (न्य पोता)तू पवित्रता करनेवाला है, (प्रचेता.) तू उतम नानी है, (बार्य यक्षि ) तू स्वीकार करने योग्य धनोंको देता है । ( यासि च ) और यह धन प्राप्त भी करता है ॥७॥ (६२ । हे अग्ने ! (समाय. मासः) हम सभी समान विचारवाले मनुष्य ( ऊतये ) अपने संरक्षणके लिए (सु-भग) उत्तम ऐश्वर्यवाले, (सु-दंसस) उत्तम कर्म करनेवाले (सु-प्रवृति ) पापोका नाश करनेवाले (अमेहम) पापरहित (अपां-न-पात ) पानीको न गिरानेवाले ( त्या देव ) तुझ देवको ( यवृमहे) प्राप्त करनेको इच्छा करते है ॥८॥ १ अपा-न-पात.- पानीको नीचे न पिरानेवाला, मेघोंने अन्दर अग्नि रहनके कारण मेघाल पिघलनसे पानी नहीं बरसता, (अपा-नपात) पानीका पौत्र, पानीके पुत्र वृक्षोको परस्पर रगडसे पक्षोषा पुष अग्नि पंदा होता है। । यहां छठा खंड समाप्त हुआ।
. 9 ११२ १ 39२ ३२ ३५२ 31. ३३ क र 3 ३.१ 3 १ र ३ २७ २ ३13 सामवेदफा सुवोध अनुवाद [आग्नेयं काण्डम [७] (१-१०) १ श्यावादयो बामदेवो वा, २ उपस्तुती वाहिप्टव्य , ३ बृहदुक्यो वामदेय्य , ४ कुस्स आगिरस , ५-६ भरद्वाजो बार्हस्पत्य , ७ वामदेवो गौतम , ८, १० वसिष्ठो मंगावरणि, ९ विशिरास्त्याष्ट्र ॥ १,३,५,९ त्रिष्टुप, २, ४ जगती, १० विपाहिराङ्गायत्री ।। आ जुहोता हथिया मर्जयछ नि होतारं गृहपत्ति दधिध्वम् । इंडपदे नमसा रातहव्य५ सपर्यता यजस पस्त्यानाम् ॥१॥ (ऋन्मेदे नास्ति) ६४ चित्र इन्छिशोस्तरुणस्य वक्षयो न यो मातरायन्वेति धातवे । अनूषा यदजीजनदधा चिदा चवक्षत्सद्यो महि दृत्या३ चरन् ॥२॥ (ऋ. १०।११५५१) ६५ इदं त एकं पर उ त एक तृतीयेन ज्योतिषा सं विशख संपेशनस्तन्वेश्चारुरेघि प्रियो देवानां परम जनित्र ॥ ३ ॥ (ऋ १०६६।१) ६६ इमर स्तोममहते जातवेदसे स्थमिव से महेमा मनीपया । भद्रा हिना प्रमविरस्य समयग्ने सख्ये मा रिपामा वयं तवं ॥४॥ (ऋ. ११९४।१ ) [७] सप्तमः खण्डः। [६३ ] (हविषा आ जुहोत ) है मनुष्यो ! हवि द्रव्योंसे बन करो, (मर्जयध्वं ) सर्वत्र सुस्ता परो, (होतारं गृहपति ) हवन करनेवाले घरके स्वामी अग्निको (नि दधिध्वं) स्थापित करो, ( इड. पदे पायोके यश. म्यानमें ( पस्न्यानां यतह पं) प्रारम्भ हुए हुए यज्ञ, हवनीय पदायाँको देनेके साथ साथ (नमसा समर्पय) नमस्कार पूर्वक अग्निका सत्कार करो ॥१॥ [३४] (शिशोः तरुणस्य) इस तरुण यालक अनिका (यक्षथः चिया) जोधन पडा ही विचित्र है. (या) जो (धात ) दूध पीने के लिये (मातरी अपि न पनि ) दोनों ही माताओं पास नहीं जाता, (अन्-ऊधः) स्तन रहित माताप्रामे (यदि अजीजनत) यदि यह उत्पन हुया है, तो ठीक है, (अध च) उत्पन्न होनेके याद यह अनि (महि दूर चरन् ) पडे बडे दूतके काम को करते हुए (यक्ष ) देवोंको हघि पहुचाता है ॥ २॥ दो अरणियोंके सघर्षसे अग्नि उत्पन्न होती है, पर पैदा होने के याद यह याताके पास दूध पीने नहीं जाती, क्योंकि उसमी मानावे स्तन ही नहीं होने, पर यह उत्पन्न होते ही देवोरी हर्षि पहुचाने स्प दूतके काम करने लगती है। यह [५] (ते इदं प.) तेरा यह एर अग्नि हप बारीर है. (ते एर. २) तेरा दूसरा यायुरप शरीर है। (एतायेन ज्योनिमा) तीसरे सूर्यहप तेजसे (सं विशम्ब) तू मिल जा, (नन्यः मं घेशने) शरीरये इस प्रार सतत हो जानेपर (चारा. एधि) तू गुदर होरर , (पामे जनित्र देवाना प्रिया ) परम श्रेष्ठ उत्पत्ति स्थानमें सू देवोका प्रिय होकर रह ॥३॥ मरनवे पाव भूतारी या समस्या होती हैं. यह पहा सताया गया है, इसका एष स्थूल शरीर अग्निी मिल जाता है. दूसरा शरीर पायो मिल जाता है। पहले गूप में पधार यह पत्याणमय यितिमें रहता है, इस पंच स्थानमें यह देवाजा प्रिप होर रहना। यह मानन्दरी पिति होती है। १६६ ] ( भनि जानवेदस ) पूग्य जातयेद अग्निो लिए (इम स्नोमं ) इस स्तोत्ररपी पारी (रयंप) रपोपमान ( मनीषया) डियर (मं मोम) उरा प्रारम्पार गते ( अम्य मंदि) हा प्निो पा पानम (नमा प्रमनि. ) हमारी रस्यागमप दिया तोह।(पपं तय समये) हम तेरी मित्रताम (मा मिनी मदहो॥४॥ आमचर्य।
प्रथम अध्याय]
सामयेदका सुशोध अनुवाद
१३३३
॥ ५॥ (ऋ. ६११)
॥६॥ (ऋ.६२४१६)
२
६७ मूर्धान दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरस्त आ जातमग्निम् ।
कविर सम्राजमतिथि जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः
६८ वि त्वदापो न परतस्य पृष्ठादुक्थेभिरने जनपन्त देवाः ।
तसा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजि न गिववाहो जिग्युरश्वाः
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रर होतार सत्ययजर रोदस्योः ।
तनीयसोरचित्ताद्विरप्परूपमय से कृणुध्वम्
नमोभिर्पस प्रतीकमाहुतं घृतेन ।
नरो हव्येभिरीडते साध आमिरप्रमुपसामशचि
प्र केतुना वृहता यायमिरा रोद॑सी वृपमो रोरवीति ।
दिवश्विदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिपो ववर्ध
अग्नि पुरा
॥७॥ ४३11)
३ १७
राजा
७०
समयों
||८|| (.७१)
॥९॥ (ऋ. १०1८३१)
( ६७] (दिवः सूर्धानं ) लोकके शिर स्थानीय ( पृथिव्या अनि ) वीके स्वामी (ऋते आजात ) यज्ञम
उत्पन्न हुए (वैश्वानरं ) सब विश्यक नेता (फर्षि सम्राज) शानो और प्रयासमान (जनानां अतिथि) मनुष्योंमें
अतिथियो समान पूज्य ( आसन ) मुखके समान मुख्य (पात्रं ) योग्य ( आन) अग्निको ( देवाः जनयन्त) देवोंने
उत्पन्न किमाई॥५॥
[६८ हे अग्ने ! (परतस्य पृष्टान् आपःन) पर्वतको पीठसे जैसे जल प्रवाह महते हैं, उसी प्रकार (देवाः उक्थेमिः
पग पर्ता विद्वान् स्तोत्रोंके द्वारा(वि जनयन्त) अनेक प्रकारसे तुझे उत्पन्न करते हैं, हे (गिर्ववाहः)वाणीस-स्तुतिसे जानने
योग्य माने । (अश्वाः आजिन ) घोड़े जैसे सग्राममें जाते हैं और (जिग्युः) विजय मिलती है, उसी प्रकार (मुद्युतयः
गिरः) उत्तम स्तुतिसे युक्त हमारो वाणी (त्वं त्वा वाजयन्ति ) उस तुझे बलवान बनाती है ॥ ६ ॥
[ ६९ ॥ ( अ-धरस्य राजानं हिंसा रहित यज्ञके राजा ( रदं ) घोषणा करते हुए (रोदस्योः सत्य यज)
धावा पृथिवीमें सत्य रूपले यज्ञ करनेवाले (होतारं हिरण्यरूपं अर्शि) होता, सुवर्ण रूप अग्निको (अचित्तात् )
स्वाभाविक हासे (स्तनयिलोः) दिद्युत्से ( पुरा अवसे रुणु) पहले अपने सरक्षणके लिए उत्पन्न किया ।। ७ ।।
१- पहले विद्युत् अग्निसे इस अग्निको उत्पन्न किया था।
[७० ] ( अर्यः राजा अग्निः) यह श्रेष्ठ राना भग्नि ( नमोभिः स इन्धे) अन्नोंसे प्रज्वलित किया जाता है,
(यस्य प्रतीक ) जिसका रूप (घृतेन आहुतं ) घृतके हवनसे बढाया जाता है, ( नरः सवाध हव्येभिः ईडते ) सब
मनुष्य मिलकर हवनोंसे इसकी पूजा करते हैं (अग्निः उपसां अग्ने अशोचि ) इस प्रकार यह अग्नि उपा कालसे पहले
ही प्रचलित हुई है ॥८॥
[१] अग्नि (वृहता केतुना) महानु प्रकाश साप (प्रयाति) प्रकट होता है, (रोदसी) चाया पृथ्वी
(वृषमा रोरवीति ) यह बलवान अग्नि गर्जन करता है, (दिवः अन्तात् चित् ) अन्तरिक्ष लोक्के एक (उपमा उद्
मानद ) पासके भागसे वह प्रयम प्रक्ट हुआ, और (अपां उपस्थे ) जलोंके बीचम-मेघों के बीच में (महिषः वर्ध)
यह सामर्थ्यशाली अनि बढ़ने लगा ॥९॥
(१४) सामवेदका सुयोघ मनुवाई [आग्नेय काटम् ३२ ३२ ३१.38 ३१३३११ . २३२ ३२ ३ १३ २१२ 3 २३.२ ३१११३१३१२३ ३२३१.२ ७२ अनि नरो दीधितिभिररयोहस्तच्युतं जनपत प्रशस्तम् । दूरदृशं गृहपतिमयच्युम ॥१०॥ (ऋ. ७१११) इति सप्तमी दशति ॥ ७॥ सप्तम खण्डः ॥७॥[स्व० १५ 1 उ०८पा० १०४॥ (पो)। [८] (१-८) १ बुधगविष्ठिरावानेयो, २, ५ वरसप्रिनालन्दन ; ३ भरद्वामो याहस्पत्य ; ४, ७ विश्वामित्रो गाधिनः। ६ वसिष्ठी मंत्रावणिः ८ पापुर्भारद्वाजः ॥ अग्नि , ३ पूषा ॥ त्रिष्टुप् । ७३ अयोध्यमिः समिधा जनाना प्रति धेनुमिवायतीमुपासम् । यहा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ ॥१॥ (ऋ. ११) प्र मूर्जयन्तं महां विपोधां मरमर पुरां दर्माणम् । नगन्तं गीर्चिना धियं धा हरिश्मधं न वर्मणा धनचिम् ॥२॥ (ऋ १०१४६९) [७२ 1 (नरः ) यज्ञ करनेवाले नेता मनुष्योंने (दीधितिभिः) अपनी अंगुलियोरो (अरण्योः) दो अरणियोंके बीचमें ( हस्तच्युतं ) हायोंके बलसे उत्पन्न हुए (प्रशस्तं दृरेदशं ) प्रशसित तया दूरसे ही दोखनेवाले (गृहपति) परके स्यामी ( अथव्युं अग्निं जनयन्त) गतिशील अग्निको उत्पन्न किया ॥ १० ॥ एक अरणीमें दूसरी डालकर वे अरणिया घिसो जाती है, इस घर्षणसे अग्नि उत्पन्न होती है, और इस प्रकार यह यजगहा स्वामी प्रशसित होता है। ॥ यहां सातयां खंड समाप्त हुआ ।। [८अएमः खण्डः। [७३ ] यह( अग्निः) अग्नि (जनानां समिधा ) यज्ञकर्ता मनुष्योकी समिधामोसे ( अबोधि) प्रज्वलित हुआ है। (धेतु इय) [अग्निहोत्र के लिए पाली हुई ] गाय जिम प्रकार [ प्रातः काल जागती है | उसी प्रकार ( आयती उणसं प्रति) आनंदाली उषा [ उठकर इस अग्निको प्रज्वलित करो | उत्त अग्निको (भानवः ) ज्यालायें (वयां प्रोग्जि हानाः यहाः ) गलियोको फैलानेवाले महान् वृक्षके समान (अच्छ नाकं प्रसनते ) उत्तम रीतिसे आकाश फैलतो (१) वयां मोन्जिहाना: यहा:- शारदाओको फैलानेवाले महान् वृक्षके समान । (२) भानयः अच्छ नाकं प्रसनते- अग्निको किरणे अन्तरिक्ष में पंलता है। (३) अग्निः जनानां समिधा अयोधि- अग्नि यज्ञ करनेवालोंको समियासि प्रज्वलित हुआ है। (४) धेनुं इव यायती उगास प्रति- गायके पास जैसे मनुष्य सबेरै जाता है, उसी प्रकार आनेवाली उपामें मनुष्य अग्निके पास जाकर उसे जलाते है। (७४ 1 हे मनुष्य ! (जयन्तं ) मगुरोको नौतनवाले (महां रिपोधों) महान अधिमानोंको धारण करनेवाले (मूरैः पुरा दर्माण ) मूखौंको नगरियोका नाश करनेवाले ( अमूरं ) जानो अग्निको स्तुति करने के लिए (प्रभूः) समर्थ हो, (गीर्भिः चना नयन्तं ) स्तुतियोंसे धनकी तरफ से जानेवाले (याणा न) वनके समान रहनेवाले (हरिदम,) मुनहरे रंगको ग्यासामोसे मुक्त (धनर्चि) जिसके लिए स्तोत्र दिए जाते है ऐसो अग्निको ( धियं धाः) स्तुति कर ।
प्रथम अध्याय
सामयेदका सुबोध मनुवाद
३.३.३३ १.स
312
।।३।। (ऋ. ६९८१)
३"
31
३१
३.
॥ ४॥ (ऋ. ३१६११)
७५ शुक्र ते अन्ययजतं ते अन्यद्विपुरूप अहनी चौरियासि ।
विश्वा हि माया असि म्बधावन्भद्रा ते पूपन्निह रातिरस्तु
७६ इडामने पुरुदरस सनि गोः शश्चत्तम हवमानाय साप ।
स्याना सुनुस्तनयो विजावाने सा ते सुमतित्वस्मे
प्र होता जाता मदानमाविन्नृपया सीददपां वियते ।
दधयो धायी सुते वारसि पन्ता वसूनि विधवे तनूपाः
प्र समाजमसुरस्य प्रशस्त पुसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य ।
इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि बन्दद्वारा बन्दमाना विघष्टु
॥५॥ (ऋ. १०४६१)
१ १३
॥६॥
(ऋ. ७६१)
(७५ 1 है ( पूगन् ) पूषा देव ! (ते शुभी अन्यत् ) तेरा तेजस्वी वर्णयाला दिन पृथक है. (ते यजतं अन्यत्)
उसी प्रकार तेरी कृष्ण वर्णको रात्री पृथर है, इस प्रकार (वि-पु-रूपे अहनी) आपसमें एक दूसरेसे भिन्न दिपसके ये दो
भाग तेरी महिमासे होते हैं, (धीइय असि हि) घुलोकके समान प्रकाशित होता है, है (स्वधावन ) अन्नधान् देवता !
व (विश्वाः मायाः अवसि ) सब प्रजासोका संरक्षण करता है. (ते भद्रा रातिः) तेरे कल्याण करनेवाले दान (इह
अस्तु ) यहाँ हमें प्राप्त हों ॥३॥
(१) पूपा- सूर्य, (२) यजत-दिवससे सम्बन्धित, कृष्णवणं, (३) स्वधा- अन्न, अपनो धारण शक्ति ।
(४) मायाः- कुशलतासे काम करनेवाली प्रजा, कपटका प्रयोग ।
{ ७६ ] हे अग्ने ! (पुरु-सस) बहुत कार्योंमें उपयोगी (गोः सनि इड) गायोंको देनेवाली पाणी
(शश्वत्तम हवं भानाव) निरन्तर हवन करनेवाले पनमानके लिए (साध), (नः सूनुः तनयः स्यात् ) हमारे
पुन और पौत्र हो, ऐमो जो (ते सुमतिः ) तेरी उत्तम बुद्धि है, यह ( गस्मे विजावा भूतु) हमारे लिए सफार
हो॥८॥
(१) विजाया- सवय, सफल ।
[७७] (यः नृपद्मा) जो मनुष्यों घरोंमें रहनेवाला अग्नि (अपां विवर्ते) पानी से भरे हुए अन्तरिक्ष विद्युत
रूपसे रहता है, वह इस समय (होता जाता) यज्ञ करनंदाला हो गया है, यह (महान् नमोवित्) महान् तथा अन्त-
रिसको जाननेवाला अग्नि (प्रसीदत्) येदिमें प्रज्वलित हो गया है, वह (दधत् ) हषियोंको धारण करनेवाला (सुधायी)
घेविम उत्तम रीतिसे रहनेवाला है, हे स्तुति करनेवाले उपासक ! वह अग्नि (विधते ते) उपासना करनेवाले तेरे लिए
(यांसि) अन्न और (वसूनि ) धनोंको (यन्ता ) देनेवाला (तनू-पाः भवतु) और शरीरोंका संरक्षण करनेवाला
होवे ॥५॥
[७८) (मसुरस्य पुंसः) बलवान् बोरके और (रुष्टीना अनुमाघस्य) मनुष्यों द्वारा स्तुतिकै योग्य (तबसः
इन्दस्य इय) बलमें इन्द्रके समान उस अग्निक (प्रशस्तं सम्राज ) प्रशंसनीय उतम तेजको (मस्तीतु) स्तुति करो।
(यन्दद्वारा चन्दमाना ) स्तुति और चन्दन यादि कर्मोसे (प्र वियष्टु) उसको उपासना करो ॥६॥
सामवेदका सुबोध मनुवाद
[ आग्नेयं काण्डम
।
॥७॥
३२३२ ३
3
७९ अरण्योनिहिती जातवदा गर्भ इचेत्सुभृतो गर्भिणीभिः
दिवेदिय ईडयो जागृवद्भिहविष्मद्भिर्मनुष्पभिरग्निः
(ऋ ३।२९।२)
सनादो मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षारसि पृतनाशु जिग्युः ।
अनु दह सहप्रान्कपादो मा ते हत्या मुक्षत देव्यायाः ॥ ८॥ (१०८७१९)
इति अष्टमो दशति ॥ ८ ॥ अष्टम खण्ड ॥८॥ [स्व० १३ 1 1० ११ पा०६।()]
३१. २
२
(१-१०) १ गप आत्रेय , २ वामदेव , ३, ४ भरद्वाजो बाहत्पत्य ; ५ द्वितो मक्तवाहा आग्रेय, ६ पस्यय
आग्रेया ; ७,९ गोपधन आत्रेय , ८ पूरुराय , १० वामदेव , कश्यपो वा मारीचो, मनुर्वा ववस्वत, उभी
या ॥ अग्नि ॥ अनुष्टुप ॥
अम ओजिष्ठमा भर घुम्नमसम्यमधिगो ।
प्र नो राय पनीयसे रत्सि वाजाय पन्थाम्
॥१॥ (ऋ. ५:१०11)
८२ यदि वीरो अध्यादमिमिन्धीत मर्यः ।
आजह्वद्धव्यमानुपक शर्म भक्षीत देव्यम्
॥२॥ (ऋग्वेदे नास्ति)
(७२ । (जातघेदा. अमिः । सव ज्ञानसे युक्त यह अग्नि (गर्भिणीभि मुभृतः गर्भ इय) गर्भ धारण करने
पाली स्त्रियों द्वारा उत्तम रीतिसे धारण किए हुए गर्भ समान (अरण्योः निहित.) अरणियोंमें रहता है. यह अग्नि
(इपिद्भिः जावद्भिः मनुष्येभि.) हवि संप्यार पर हमेशा जागृत रहनयाले मनुष्यों द्वारा दिये शिवे ईडया)
प्रतिदिन स्तुतिने योग्य है ॥७॥
[८०] हे अग्ने । तू (मनात् ) हमेशा (यातुधानान् मणसि) पट और पीडा देनेवाले शाओंसे मारता है
(स्या पृतनासु) दुशे गाममें (रक्षासिन जिम्युः) राजा मोत नहीं रास्ते, इस प्रकार (सहमूरान्) समूल
(यादः) मांस भक्षर राक्षसोंचो (यनुदद ) जला डाल (ते दैव्याया. देत्या ) सैरे दिव्य हमिपारसे कोई भी शत्रु
रमा मुक्षत ) म टूटे ॥८॥
(२) सदमूरा-जा सहित । (२)पयादः- मारा सानेवाले ।
॥ यहां भायां पंड ममास हुआ।
[१नयम पण्ड ।
(हे भग्ने ! (मोजिष्ट प्रम्न) पलवर पन (मम्मभ्य भाभर) हमें भरपूर है (मधि-गो) शिरा
र टो गरिमाले अग्ने ! (पनीयमे गगे) प्रशमनीय धन मिलनेर मारी (नाम) में im, उसी प्रकार
(पाताय) मन मिरगे सपा बल बहानेरे (पन्यां रमिर) माग विणा ॥३॥
100(यदि धीर: स्यात् । रियोर पुत्र उत्पन्न हो, सो (मय मरिधीन) मनुष्य भग्निरो मार
लिप बरे और (मनु) पारमें हय भानुपए माजुदन्) हनीय परापोरा गया एपर परे, और (दास शर्म
भधीन) सि नुन पारे॥२॥
प्रथम अध्याय] सामवेदेका सुयोध अनुपाद ३२ २३१४ ।। ३ ।। (ऋ. ६६) ८४ ॥४॥ (8. ६।२।१) १२३५ १ ฯ त्वपस्ते धूम ऋण्वति दिवि सं च्छुक आवतः । सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे त्वहि क्षेतवद्यशोऽने मित्रो न पत्यसे । वं विचर्षणे अवो वसो पुष्टि न पुष्यसि प्रासरमि: पुरुमियो विश स्तवतातिथिः । विश्व यासनमत्र्य हव्यं मास इन्धते ८६ यद्वाहिष्ठं तदप्रये बृहद विभावसो । महिपीव त्वयिस्त्वद्वाजा उदीरते ५ विशेविगे वो अतिथि वाजयन्तः पुरुप्रियम् । अमि यो दुर्य वचः स्तुपे शूपस्य मन्मभिः ३१ ॥ ५॥ (१.६।११) 4 ॥ ६ ॥ (E. ५/२५७) ८७ ॥ ७ ।। (ऋ. ८१७४१) (८३ 7 (त्वेषा ते ) प्रज्वलित होने के बाद तेरा (शुक्रः धूमः ) साफ धुआ (दिवि आततः) अन्तरिक्षम फैलता है, और (ऋण्यति) यहीरो वह बोलने लगता है, हे (पावक) पवित्रता करनेवाले अन्ने । (सूरसन) सूर्यके समान (रूपा) स्तुतिके (धुता) प्रकाशसे (हि रोचसे) प्रकाशित होता है ॥३॥ {८४ ] हे माने । (६) निश्चयसे (त्व) तू (क्षेतयत् यशः) सखी समिधाहर अम (मित्रान) सूर्यके समान (पत्यसे) प्राप्त करता है, हे (विचपणे ) सर्व द्रष्टा (यसो) समको बसानेयाने भन्ने । ( त्वं श्रवः) तू मतको और (पुष्टिं न पुप्पसि) पुष्टीको बढ़ाता है ।॥ ४॥ (१) क्षेत-ससो लाडो, (२) यश:- अन्न, या. [11(पुरु-भियः ) भनेकोंको प्रिय लगनेवाले (विशः अतिथिः ) मनुष्यों के परमे अतिथिरे समान जान- दाले ( आमिः) अनिको ( प्रातः स्तमेत) प्रातः काल स्तुति को जाती है, ( यस्मिन् समये) जिप्त अमर अग्निमें (विश्वे मर्तासः) सब मनुष्य (हव्यं इन्धते ) हवनीय पदार्थोका हवन परते हैं ॥५॥ [८६] ( पाहिष्ठं यत् ) अति शीघ्र पहुंचने वाला जो स्तोत्र है (तत् अनये ) यह अनिके लिए दिया जाता है, (विभाषसो) हे तेजस्वी माने (वृहत् अर्च) यहुतसा पन और अन हमें दे, (त्यत् ) तुमरो (महिषी रयिः) बहत पन और (त्वत् ) तुप्तसे ही (वाजा उदीरते) मन मिलता है ॥६॥ [८७Jहे मनुष्यो। तुम (वाजयन्तः) अन्न और बलको इच्छा करते हुए (विशः विशः) सय प्रजामोक (पुरु-प्रियं) अत्यन्त प्रिय ( अतिथिं मार्सि) इस पूज्य अग्निको स्तुति करो, में (यः दुर्य) तुम्हारे लिए घरों में रहने- पाल मग्निको (शूपस्य मन्मभिः ) सुख देने वाले स्तोत्रीस और (यवः स्तुपे ) अपनी वाणीसे स्तुति परता हूँ ॥७॥ ३ (पाम.हिदी)
(१८)
सामवेदका सुबोध मनुवाद
[आग्नेयं काण्डम
१
२
३३
१२
२१३२
१
२४१२ 8.२१२
८८ वृहद्वयो हि भानवेऽर्चा देवायोग्य ।
मित्र न प्रशस्तये मोसो दधिर पुरः
॥८॥ (ऋ. १।१६।१ )
अगन्म वृत्रहन्तम ज्येष्ठमानमानवम् ।
य स श्रुतर्वनाक्ष्य वृहदनीक इज्यते
॥ ९ ।। (ऋ. ८1७४४)
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्धिः सहाभुवः ।
पिता यकश्यपस्याग्निः श्रद्धा मावा मनुः कविः ॥१०॥
इति नवमी दशतिः ॥ ९॥ नवम खण्ड. ॥ ९॥ [स्व० १४। उ०७१ पा० ५१। () ॥]
[१०]
११-६) १ अग्निस्तापरा , २, ३ यामदेव कश्यप, अगितो देवलो या, ४ सोमाहुतिर्भार्गव ५ पायुर्भाखामा,
६ प्रत्वव काय ॥ अग्नि १ विश्वेदेवा , २ अगिरा। अनुष्टुप् ॥
९१ सोमर राजानं वरुणमनिमन्वारमामहे ।
आदित्य विष्णु सूर्य ब्रह्माणं च घृहस्पतिम् ॥१॥ (१०।१४१॥३)
९२
इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या सहन् ।
प्र भूर्जयो यया पोधामनिरसो यपुः
॥ २॥
[८] (भानवे अमये ) तेजस्वो अग्निके लिए (पृहत् वयः) यहतसा हविका अन्न दिया जाता है, (हि.)
क्योंवि सुम ( देवाय मर्च ) प्रवाशयुक्त अग्निको ही पूजा करते हो । ( मर्तासः) मनुष्य (य मित्रं न )जित अनिको
मित्र समान (प्रशस्तये पुरः दघिरे) उत्तम स्तुति करने के लिए भागे स्यापित करते है ॥ ८॥
[८९ (वृत्रहन्तम ) वो मारनेयाले (ज्येष्ठ गानयं) श्रेष्ठ मनुष्योंके हित ररनवाले (मनिं मगन्म)
अग्निको हम प्राप्त करते है (यः) जो अग्नि ( आसे थुतर्वन् ) ऋक्ष पुत्र भूत के लिए (पृहत् अनीकः) मोटो मोटी
ज्वालाओष साप (अध्यते स्म) प्रग्यलित पिया जाता है।॥ ९ ॥
[९० ) हे भग्ने ! ( यत् सद्भिः सह अभुवः) जो या स्विोंके साप उत्पन्न होता है, उस (परेण
धर्मणा) उत्तम धमरे माय त (जातः) उत्पन्न हुमा हं. (यत्) जिस अग्निरा (करपपस्य पिता) जयप पिता,
(भया माता) भगा माता और (मनुः फरि।) मनु पनि ह॥१०॥
॥यदा नवम संड समाप्त हुआ।
[१०] दशमः खण्डः।
१९१] हम (गजानं सोम) सोमरामारो तया वरण, अग्नि, मादिस्य, सूर्य, ब्रह्मणस्पति, विष्णु और महापतिको
(अन्यारमामहे) बार बार यात परते हुए पुलाते है ।।१।।
१९२१ (एने भूर्जयः मानिरसः)ये या पानेवाले मागिरग (यथा) से ( उमययुः) बमोग्लो पहुंचे,
(पथा इस उदारदन ) उत्तम मासंगे यहाँसे यहाँ बले गए और (दिय पृष्ठानि यायहन) लोगो पीठपर भार
चा गए॥२॥
१.31 ३३ १७.३ 9 ३१.२30 श ३१२ १२ १२ प्रथा अध्याय सामयेदका सुयोध अनुवाद राये अग्ने मई वा दानाय समिधीमहि । इंडिया हि महे वृपं द्यावा होत्राय पृथिवी ९४ दधन्य वा यदीमनु पोचद्रक्षेति पे तत् । परि विश्वानि काव्या नैमिश्चक्रमिवामुपद ॥४॥ (8. २१५३) ९५ प्रत्यग्ने हरसा हा भूणाहि विश्वतस्परि। यातुधानस्य रक्षसो पलं न्युजवीर्यम् ॥५॥ (ऋ.१०1८७।२५) स्वमग्ने वसूरिह रुद्रा आदित्यार उत । यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतग्रुपम् ॥६॥ (ऋ. ११४५१ इति दशमो ददातिः ॥ १० ॥ दशमः खण्डः ॥ १०॥ स्व. ४ । ३० ३ 1 पा० २० । (वी) ॥ इति प्रथमप्रपाठके द्वितीयोऽधः प्रथमः प्रपाठकश्च समाप्तः॥१॥ अथ द्वितीयप्रपाठके प्रथमोऽधः॥ .(१-१०) दीर्घतमा औषय्यः, २, ४ विश्वामित्रो गायिनः, ३ गोतमो राहगणः ५ त्रित आप्त्यः; ६ परिस्थिति काण्वः ७,८,१० विश्वमना वयश्वः, जिश्वा भारद्वाजः ।। अग्निः ५ पवमानः सोम. ६ यदितिः, १विश्वे देवाः ।। उप्णिक् ॥ ९७ पुरु त्वा दाशिवाश्वोपरिरने तब स्विदा । तोदस्येव शरण आ महस्प ॥१॥ (ऋ. १११५०११) {९३ | हे अग्ने ! (त्या) तुमे (महे राये दानाय) अधिक धन देने के लिए हम (समिधीमहि ) प्रोप्त करते है ! हे (पुपन) बलवान् अग्ने ! (महे होत्राय ) महान् अग्नि होत्रके लिए (धाया पृथिवी) चुलोक और पुग्योलोककी (डिप) स्तुति कर ॥३॥ {९४] (वा) अथवा (ई अनु दधन्वे) इस अग्निको लक्ष्य करके अन्दर्यु आदि लोग (ग्रह अनुवोचत् ) स्तोत्र कहते हैं, (तत् वे उ) उन सबको वह जानता है, यह अग्नि ( विश्वानि काव्या) सब काम्दोंको, सध कमोको (नेमिः चर) नाभि चको जैसे धारण करती है, उसी प्रकार (परि अमुवत) धारण करता है ॥४॥ [९५} हे माने ! (हरसा) अपने तेजते (यातुधानस्य हरः) यातना कष्ट देनेवाले राक्षसकि मुसवा हरण करनेवाला तू उनके (वलं ) बलको (विश्वतः) सब प्रकारसे (परि प्रति णीहि ) चारों तरफसे नष्ट कर, (रक्षसः घीय) राक्षसोंक पराक्रमको (न्युज) नष्ट कर ॥५॥ [१६] हे आते 1 (स्वं इह ) त यहां (यसून महान् उत आदित्यान् ) वसु, रुद्र और आदित्य इन वेवोंके लिए (यज) यत कर, उसी प्रकार (मनुजात) मनुप्से उत्पन्न हुए (घृत-प्रपं) घृतका सिंचन करनेवाले (स्वधरं जन यज) उत्तम या करनेवाले मनुष्यका सत्कार कर ॥ ६॥ यहां दशम खंड समाप्त हुआ। [११] एकादशः खण्डः। १९७१ हे जाने ! (त्या पुर दाशियान्) तुझे बहुतसी हरि देता हुआ (बोचे) मैं कहता है, कि (महस्य तोदस्य इव) पडे धनवान्को (शरणे आ) शरणमें आये हुए सेवाकै समान में (तब स्विद् आ भरिः) तेरा हो सेवक हूं॥१॥ २ 923 ( ख
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[मानेयं काण्डम
१
3
३२३११३,
१
२१
१२.१२
३१२
३
१११
९८ होत्र पूज्य वचोऽनये
भरता वृहत् ।
विपी प्योती पि बिभ्रते न वेधसे
(ऋ. १०)
९९ अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो।
असे देहि जातवेदो महि श्रवः
(ऋ. १७९४)
१०० अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवा देवयते यज ।
होता मन्द्रो वि राजस्यति निघः
॥४॥ (ऋ.३11०७)
१०१ जशानः सप्त मातृभिमघामाशासन दिये।
अयं ध्रुवो रयीणां चिकेवदा
॥५॥(ऋ.९।१०२४)
१०२ उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्यागमत् ।
सा शन्ताति मयस्करदप सिंघा
॥६॥ (ऋ १८७)
१०३ इंडिया हि प्रतीच्या३ यजस्व जातवेदसम् ।
चरिष्णुधूममग्रमीतशोचिपम्
॥१॥ (
(०२३३१)
[९८] (विपां ज्योतीपि विभ्रते) ज्ञानियोंके तेजोंको धारण करनेवाले (वेधसे होने न ) विधाता और देयोको
मुलानेपालेणे समान ( भग्नये ) अग्तिके लिए (वृहत् पूर्यं वचः) महान् और प्राचीन स्तोत्रोंको (प्र भरत ) कहो ॥ २॥
[११] (सहसो यहो अग्ने) है बलसे उत्पन्न हुए अग्ने ! (गोमत चाजस्य ईशानः) गायोंसे उत्पन्न होनेवाले
भन्नका तू स्वामी है, इस कारण है (जात-वेदः) शानको उत्पन्न करनेवाले अग्ने ! (अस्मे महि भवः देहि) हम
बहुतसा धन दे ॥३॥
[१००] हे अग्ने ! तू ही (अध्वरे यजिष्ठः) यज्ञमें पूजाके योग्य है, (देवयते) यज्ञकर्ता लिए (देवान् यत्र)
देवों के लिए यज्ञ कर, तू (होता मन्द्रः) देवोंको बुलाकर लानेवाला अग्नि (नि अति विधा) शत्रुओंको पराजित करके
(राजलि) शोभित होता है ॥४॥
[१०१ ) ( सप्त मातृभिः जमानः) सात माताओं-नदियों की सहायतासे उत्पन्न होनेवाला, (मेघां थिये
भशासत) मन करनेवाले सोमोंको शोभाके लिए प्रमल करनेशला ( अयं धुर ) यह स्थिर अग्नि ( रयीणा मादि-
केतद् ) पनौको उत्तम रीतिसै जानता है ॥ ५॥
[१०९] (उत स्या मात ) और वह बुद्धि (ब-दिति ) न खण्डित होनेको स्थितिमें (ऊत्या ) संरक्षणको
शक्तिपे साथ (दिया न. आगमत् ) आजके दिन हमें प्राप्त होवे, (सा) यह (शतातिः मयः) शान्ति और हुसको
एमारे लिए (करत ) प्रदान करे, और (सिघ अप) सभोको दूर करे ॥६॥
१०३ | ( प्रती या ईडिय हि ) शत्रुको पराजित करनेवाले अग्निकी स्तुति कर, (अ-मीत-शोचिप)
जिसके प्रवासारो कोई भी नहीं रोक सस्ता, (चरिष्णु-धूम ) निसरा धुझा धारों दिशाओं फैलता है, ऐसे (जान
घेदस) समको जाननेवाले अग्निरो (यजस्य) पूजागर॥७॥
प्रथम अध्याय)
सामवेदका मुयोध अनुवाद
.
२११२३
१
१०४ न तस्य मापया च न रिपुरीशीत मयः ।
यो अपये ददाश हव्यदाये
॥८॥ (ऋ. ॥२३॥१५)
१०५ अपत्यं जिन ररिपुरस्तनमाने दुराज्यम् ।
दविद्यमस्य सत्पते कधी सुगम्
॥९॥ (६५१११३)
श्रुष्टयमे नवस्य में स्तोमस्य वीर विश्पते ।
निमापिनस्तपसा रक्षसो दह
॥१०॥ (ऋ २३६१४ )
इति प्रपमा दशति ॥ १ ॥ एकादश पण्ड ॥११॥ [स्व० ९ । उ०३ । घा० ४२॥ (दा)॥]
[२]
(१-८) १ प्रयोगो भागव २ (१० सौभरि कायः ), २, ३, ५-७ सौभरि काय , ४ प्रयोगो भागव ,
काम्यो या, ८ विश्वमना वयश्व ॥ अग्नि । उष्णिक
१०७ म मरहिष्ठाय गायन ऋताने वृहते शुक्रशौचिपे ।
उपस्तुनासो गये
॥१॥ (8. ८1१०३८)
प्र सो अग्ने तयोतिमिः सुवीरामिस्तरीत वाजकर्ममिः ।
यस्य वसरुपमाविध
॥२॥ (ऋ ।१९।३०)
सौमरि
२ .
{१०४ 1(य) मो ( हव्य-दातये अग्नये ) हवनीय पदाको देनवाले अग्निके लिए (ददाश) हपि देता है।
( तस्य ) उसके ऊपर ( मर्त्य रिपु ) कोई भी शत्रु (मायया चन) कपटसे भी ( न ईशीत ) शासन नहीं कर
सफता ॥८॥
[ १०५ ) हे भग्ने ! (त्य ) उस ( वृजिन रिपु) कपटी शनु और (दुराज्य स्तेन ) कठिनासे वशमें आने
योग्य चोरको । दुनिष्ठ अपास्य) दूर कर, हे ( सत्पते) सत्यके पालक आते । हमारे लिए (सुग कृधि) मागको
आसानीसे जाने योग्य बना ॥९॥
[ १०६] है (वीर) पोर ( विश्पते ) हे प्रजाक पास आने ! इस (मे नवस्य स्तोमस्य) मरे नप सोत्रको
(श्रुधी) मुनकर (मायिनः रक्षस ) छली, कपटी राक्षसोको ( तपसा निदह) अपने तेजसे जला दे ॥१०॥
। यहा ग्यारहया खड समाप्त हुभा ॥
[१२] द्वादश सण्ड ।
[१७] है ( उपस्तुतासः) स्तुति करनवाले उपामको ! तुम ( महिष्याय) महान् (मतान्ने) मत्पके पालक,
पशके पालक, ( वृहते) महान ( गुम शोचिषे ) स्वच्छ प्रकासे पुक्त (अग्नये) अग्निके लिए ( मगायत) स्तोत्रोंका
गान करो॥१॥
[१८] हे मग्ने ! (त्व यस्य सरय आविथ ) तू जिसका मित्र हो जाता है (स ) वह (तथ) तेरे
(सुपौराभिः) उतम वीरोंसे युक्त (चाज-कर्मभिः) अन्न देनवाले और पुरुषायसे प्राप्त होनवाले (अतिमि ) सरक्षणवे
सापोंस (प्रतरति) दुःखोसे पार हो जाता ह ॥२॥
सामवेदका सुयोघ मनुवाद
[माग्नेय कापटम्
३११२
२
२
१०९ ते गूधया स्वर देवासो देवमरति दधन्विरे ।
दैवत्रा हव्यमूहिपे
(ऋ. १९१)
मा नो हणीया अतिथि वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एप ।
यो सुहोता स्वयंवर
॥४॥ (१.८1१०३।१२)
१११ भद्रो नो अमिराहतो भद्रा राति सुभग मद्रो अध्वरः ।
मद्रा उत प्रशस्वय:
॥ ५ ॥ (१९१९)
११२ यजिष्ठं त्वा बबुमहे देवं देवत्रा होतारममय॑म् ।
अस्य यज्ञस्य सुझतम्
॥६॥ (. १९३)
११३ चदने धुन्नमा भर यरसासाहा सदन के चित्रिणम् ।
॥७॥ (ऋ. १९।१५)
३१
२९
क
मन्यु जनस्य दृट्यम्
[ १०२.1 हे उपासक ! (स्वः नरं तं गूर्द्धत ) स्वर्गको हवि पहुंचानेवाले अग्निको स्तुति कर, (देवासा)
ऋत्विा गण (देव) जिस देवको (अरतिं दधन्विरे ) स्वामी मानकर उपासना करते हैं, उस अग्निको सहायताते
(देवत्रा ) देवोंको (हव्यं आ जहिये) हवनीय द्रव्य तू पहचाता है ॥ ३ ॥
[ ११०] (नः अतिथि) हमारे यज्ञसे अतिथिके समान प्रिय अग्निको दूर (मा gणीयाः) मत लेना, (यः
मुहोता) जो अग्नि देवोंगे उत्तम रोतिसे पुलानेवाला, (स्वधरः) उत्तम यज करनेवाला, (एपः) यह (पुरु-
प्रशस्तः वसुः ) अनेकोंसे प्रशसित होनेवाला तथा सयको रसाने वाला है ॥ ४ ॥
[१११ (आहुतः ) जिसमें हवन किया गया है, ऐसा (आगः) यह अग्नि (न: भदः) हमारा कल्याण परने
पाला होथे, है ( सुभग) उत्तम ऐश्वर्थवाले हमें (भदा रातिः) कल्याणकारो धन प्राप्त होने, (अध्वरः भद्र ) हमारा
पक्ष रत्याग गरनेवाला होये, (उत) और (प्रशस्तया भदाः) स्तुतियां हमारा कल्याण करनेवाली होवें ॥५॥
[११] हे आने । (यजिएं) यम करनेवाले, (देवया देव) देवोमे प्रमुख देव (अमाय होतारं) अमर होता,
( अस्य यस्य सुभानुं) इस पहरो उत्तम रोतिसे करनेवाले (त्या घट्टमहे) तुम्हारा हम सरकार करते हैं ॥ ६ ॥
[११३] हे अग्ने ! (तत् धुनं आभर ) उस तेन्दस्वो या हमें दे, (यत्) जो (सदने ) यह स्थान अथवा
घरमे (कंचित् अधिणं) रिसी भी अपित सानेवाले शरी (आ सासाह) या सरे, उसी प्रकार (ढ) दुष्ट
पति और (जनस्य मन्युं ) लोगों कोषको दूर कर ॥७॥
प्रथम मापाय] सावदका मुबोध अनुवाद १ 39 ३१ ११४ यहा उ विश्पति शितः सुप्रीता मनुषो विशे । विश्वदतिः प्रति रक्षासि सेधति ॥८॥(ऋ. ८०२३३१३) इति द्वितीया दशतिः ॥ २॥ द्वादशः खण्डः ॥ १२॥ [स्व० १२ । उ० २ पा०४४ । (छी) 1] इत्याग्नेयं पर्व काण्डम् दा ।। इति प्रथमोऽध्यायः ।। इति प्रथम पर्व ॥ आग्नेयकाण्डस्य मन्त्रसंख्या ११४ (१-३४) बहत्यः २८ (३५-६२) विष्टुभ. १८ (६३-८० अनुप्दुभ. (८१-१६) उष्णिह [ ११४ ] ( यत् ) जय (विश्पतिः शितः) पजमानोंका पालन करनेवाला अग्नि हविसे प्रज्वलित होता है. तम वह अग्नि (सुप्रीतः) अच्छी तरह प्रसन्न होकर (मनुपः विशे) मनुष्यके घर जाता है, तब यह अति (विथ्या रक्षांसि इत् ) सब राक्षसोंको (प्रतिषेधति उ) नष्ट करता है ।। ८ ॥ । यहां यारहवां खंड समाप्त हुआ। ॥ इति आग्नेयं कार्ड समाप्तम् ॥ अग्निका खरूप सामवेदके प्रथम कार' भनिय काण्ड में ११४ मंत्र है, भने । देवत्व प्राप्त करने की इच्छा करनेवाले मनुष्योंकी पद्यपि इनमें कहीं कहीं दूसरे देवताबोंक भी मंत्र है, पर इस तू प्राप्त हो ' तुझे प्राप्त करनेका अर्थ है उपासको देवत्वकी कारका मुख्य देवता - मनि' है । लोग देवताभोंका वर्णन प्राप्ति, अर्थात् उसका उद्धार । यह देवत्व प्राप्त करना है, इसी. पढ़ें, पढकर उनके गुणों को अपने अन्दर धारण करें, धारण को मुख्य रूपसे करने के लिए वेदने कहा है, उसे वैदिक धर्मि- करके उन्हें पढावें और मनुष्यसे 'देव' बने इसके लिए वैदिक याँको करना चाहिए । सुपासना और स्तुति है।'देव' बननेही इच्छा प्रत्येक स्तुति बाज हम सामवेद 'भाप काण्ड ' का विवेचन करते करनेवाले मनमें होनी चाहिए । मैं देवताको स्तुति करता है, इस काण्डका मुख्य प्रतिपाद्य देवता अग्नि है । इस कारण मैं इस देवताडे गुमा वर्णन करता हूं, इसका उद्देश्य है कि इस सर्व प्रथम ममि खम पर विचार करते हैं- देवताके तुम मेरे अन्दर आयें, और इन शुभ गुणोंसे में धुत हो। यत् देयाः अकुर्वन तत् फरवाणि । शतपय ब्राह्मण । इस सालेय काण्ड में निम्न गुणोंका वर्णन है- ३ विश्व-वेदाः- (विश्व) को (वेदा जानने देवासको प्राप्त करें और देव बनकर समाप्रमें शोमित हो इसी. बाला, सर्वज्ञानी, विशेषज्ञान युज (म.) 'सम धन युक्त। को भाग्नेय काण्ड में इस प्रकार कहा है, यह भी इस शब्दपाय रे, क्योंकि वेद धन भी कहते हैं। देव-युं जनं आ अयः 1. IA, साम. २३ वेदस् इति धन नाम ' (निपं. 1) आनिके गुण . .
(२४) सामवेदका सुवोध गनुवाद [ आग्नेय काण्डम् के योग्य। वाला, २ जात-वेदाः (मं. 1)- (जातं वेत्ति) सत्र २६ दक्षाः (मं. ३५)- चतुर, कमि सदा निपुण, उत्पन हुओंको जाननेवाला। २७ होता (म. १,२/- देवोंको बुलाकर लानेवाला, ३ कविः ( म. ३.)- ज्ञानी, फ्रान्तदशी, दूरदशी। सत्पुरुषों को अपने साथ लानेवाला, हवन करनेवाला। ४ पुरोहितः (मं. ४८)- भागे रहनेवाला, पुरोहित, २८ प्रेष्ठः (म.५)- सबका प्रिय, सबको चाहनेवाला मनुष्यों का सबसे पहले हितकरनेवाला । २९ प्रियः (म.५)-सबका प्रिय, सपके द्वारा चाहने ५प्र-चंताः(म. ११)-विशेष पुद्धिमान, विशेषज्ञानी योग्य, ६ अतिथि में. ५/- अतिथिके समान पूज्य सरकार ३० वाजपतिः (म.३.)-अन मोर मला अधिपति । ११ विवस्वस् (मं.१.)- ( विवः) हानसे (वन) ७ जरा-बोधः (मं. १५/- स्तुतिसे ज्ञात होनेवाला, युरु. मानो, सबको बसानेवाला, जिसकी स्तुति होती है। ३२ वृधन ( म. २१)-बढानेवाला, संवर्धन करनेवाला । ८ रुदः ( में. १५/-(रुत्-र०) बोलने घका ३३ सुधारः ( में. २६)-उत्तम वीर, महायर (रुद्-भः) शत्रुको रलानेवाला। ३४ वृत्राणि जंघनत् (म.४)- घेरनेवाले शत्रुको ९पावकः- (मे. २८ ) पवित्रता करनेवाला, शुद्धि करने. मारनेवाला, घाला, १५ सु-वार्यस्य ईशे (मं. ६.)-उत्तम बोर्यका १० चेतिष्ठः (म. ४५/- पेतना देनेवाला, प्रेरणा देने. स्वामी, वाला, शानो, ३६ पुरा.दर्माण (मं. ४)-शत्रुके नगरों को तोडने- घाला, ११ गातु-चित्-तमा { मं. ४०/- मार्ग जाननेवालों में सर्व श्रेष्ठ, मार्गको बाननेवाला। ३७ पृत्रहन्तमा (म.८५)-पत्रों को मारनेवाला, १२ आर्यस्य यर्धनः (म.४६)- आर्योको- श्रेष्ठ पुरु. पाला, दल बगानेवाला । ३८ ऊजॉन-पातः (मं. ४५)- बलको फम न करने. घाँको-पढ़ाने वाला, ३९ ऊो पति (मं.३६)-पल और सम पालक । १३ शुत्-कर्णः(म. ५.)- मकोंकी प्रार्थना सुनकर ४० जयन् ( म. )-विषयी उनकी कामना पूर्ति करनेवाला। ४१ प्रत्ना (.१०)प्राचीन, अनादि १४ पोता (म. 11/- स्वछता परनवाला, एक भावयु १२ अमृतः (में. ३५)- अमर १५ विपो-धाः (म. ७४)-विशेष शानी लोगोको ४३ यूपभः (मे. )- पलयान्, सामर्थ्यशाली, पोष्ट महारा देनेवाला । शानियों का माश्रयदाता। करनेवाला, १६ अ-मूर (मं. 01-जो मूस नई अर्थात ज्ञानी। ४५ पुर- मिया (मे...)- बहुतों को प्रिय, प्रिय। १७ सु-भगः (म. ६१) नाम ऐश्वर्यवाला। (मं.१५) १८ यस्य सु-मतुः (मं. ३:- यशका धर्य साम १५ सम्वर (म.४५)-(शु-अधर) सा रहित सतिसे करनेवाला। यशघनेवाला। १९ सत्य-धर्मा (म.)- पालन कानेवाला, ४६ पुरु-मशरतं ( 4.11.)-बहुतावास प्रसंसिस याका पालन करनेवाला। ४७ द्रषिणस्युः (मं. ४)-पनवान, बलवान, (नि २० सत्पतिः (म.३४मनों का पालन नेवाला। २।१०।१५ घन, 1168) २१ विश्पतिः (में. ३)-शामाका नाम ऐतिम ४८ सीमगरपशि रायशि (मं... सीमारय और धनका स्वामी। पालन करने वाला। २२ प्राता(4.४१)- संरक्षण समेवामा, उत्तम संरक्षण, बले मम्मोको रन देनेवाला। ४९ दामुपे रनानि यत् ( म. ३.)- पान देने. २३ मतः (म.४२ यस, योय, पश, पूग्य। २४ पैश्या-रा(म...)- मनुष्योन हित करने ५. द्रविणोदः (में.५५)-पन देनेवाला, ५१ देवानां प्रियः (म.६५/- पोको प्रिप, विमानों का वामा सानि। चाहनेवाला ९५ म-तम्। (म.) आमय रक्षितपस्वीरिक, ५२ देपेपुराति (म.४१)- देवन प्रभावित होनेवाला, रावस्या युद्धा विद्वानोर की।
अपम अध्याय] अग्निका स्वरूप (२५) ५३ गृहपतिः (म...)- गृहस्थ, घरोंका खामी, वर्णन है ! ये गुण यदि मनुष्य अपने अन्दर यतालें, तो उनकी ५४ अनेहस् (म.६२)- पापरहित, योग्यता नि मन्देह बढेगी। पाठक इस दृष्टि से इन गुणाका ५५ शुफशोची (मे १०७)- तेजस्वी, प्रकाशित विचार करें, और जो गुण अपने अन्दर ला सकते हैं, उनको होनेवाला। ला मोर उन्हें बहावें । मनुष्य इन गुणोंसे युक्त हो इसलिए ५६ सहस्वान् (म. २१)- बलवान , शनुको पराजित वेदके ये मंत्र है। करनेवाला। अग्निका सामर्थ्य ५७ रतिः (म. ६.)-प्रगतिशील, ५८ माते जातः (म ६.)- सत्यके लिए प्रयत्न करने. भमिका सामर्थ्य ददुत महान है, इसलिए इसको 'पुस्तम:' बाला, यशके लिए सरपन्न हुआ। (२१)- सबमें श्रेष्ठ कहा है । शक्ति में यह सबसे महान है, ५९ अर्यः राजा-( ७.)-घेष्ठ राजा, इसलिए कहा है, कि 'महान् असि ' (२३)-तू बहुत ६० परेण धर्मणा जाता (म. ९० ) श्रेष्ठ धर्मोके साथ बम है, ये सबरी करनेवाला कोई दूसरा नहीं है, तुम जैसा उत्पन्न हुमा, थेट धोका पालन करनेवाला । महान् कोई नहीं है। ६१ सत्पत सुगं कृधि (मं. १०५)- हे बजनोंक कृष्टया मोजसे वे नमा गृणन्ति ( म. 11)- पालन करनेवाले ! हमारे मार्ग सरलतासे जाने योग्य बना, करते हैं। मनुष्य शफिके लिए तुझे नमन करते हैं, और तेरी स्तुति अग्नि मार्गको सरलतासे जाने योग्य बनाता है। इस प्रकारको भीमकी शक्ति है। ६९ अपराणां सम्राट् (10)-हिंसा रहित कर्मोका आर्योंका संवर्धन सम्राट् । ६३ सत्य-यजः (मं.६.)- सत्य या करनेवाला, उत्तम सु-जाते मार्यस्य अधनं न गिरः नक्षन्तु (४४) या करनेवाला। उत्तम तिरी उत्पन्न हुए और श्रेष्ठ पुरुषोंको बानेवाले भमि। ६४ अगृमीत-शोचिः (म. 101)-सिका सेज वर्णन हमारी वाणी करती है। कम मही होताजिसका तेज रोका या दवाया नहीं जा सकता। मसके तीन भर्य है, (1) देव-पूजा, (२) समतिकरण ६५ रिपुमत (मं...)-जिस पर शत्रु धामन और (३) वान, इनसे मनुष्योंकी शक्ति बदती है । कैसे। इस नही कर पाता, बाछो हरानेवाला। प्रहार कि धमाजमें रहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषाका सत्कार होने श्रेष्ठ १६ तन-पा(म. ५.)- शरीरका रक्षण करनेवाला, पुरषों को क्या करती है, इराठे यमाज होता है। उसके ६७-यना (म..)- मानवीय घरों और शायरोंमें बाद संगति-रणको आवश्यकता होती है, संगति-करणका अर्थ रहनेवाला। है, संघटन, रामाने संगठन होने का भसमाजवी किया ६८ मानुषे जने देवेभिः हित (मं. ३)- मनुष्योंके पितार तीसरा पक्ष है दान । दानका मर्प मेदन धन देना ही शरीरमे देवाद्वारा स्थापित किया हुमा । नहीं है, भपि भिसके पास जो चीज नहीं है, वह चार उसको ३९ पमु' (म. 1)- सबको बनानेवाला, निवास देकर उसका रहार करना मी दान दी है। करनेवाला। यह दान पार प्रकारका है-(1) विद्या दान, (२) 8. ६. अमीब चातना (म.३२)- रोगोंको घर परनेवाला) दान, (३) धनदान और (४) कर्मदान । इन चार प्रकार के १ सहम-पोपिणं पोरं मना घले (म ५८ - दानोंसे राष्ट्रडी गति होती है। अशानियों) विद्याका दान भारों ममुम्पोका पोषण करनेवाले दौरको-वीर पुत्रको सय करनेसे वे शानवान होकर उसत होते हैं। जो निर्वत है, उनके पारण करता है। बलको बढाकर उन बलवान बनाना यह धरा धार्य है। जनानां सम्रार (म..)- मोगोंडा बामट् । धनका दान देकर देशम बन उपम हाने साधनको बहाना ७३ दिरण्यरूप. (मं.)- गाने के समान रोगस्यों, यह राष्ट्रको नतिमें सीसस महासपूर्ण कार्य है। थोपा काम सहवामा है,कराको घाम देकर उन्हें धन मिले ऐसा प्रयकरना। श्राम हन गुहा न इस मामेय का है। इनका प्रचाके दानो देशको नाति हो सकता। हामिहामहावन ही सके पर भार परपोरता म ये दोन १३ म तिमे राष्ट्रही नक्षति कानेवाले ४ (बाम. बिस) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [आग्नेयं काण्डम् , गोवाको पालना है। इस कारण यह राष्ट्र और समाजकी उन्नति होती है। मनुष्यका रोग इस प्रकार दूर हो सकता है, कि मनुष्य यह हमारा विचार विरुकुल ठीक है। रोगसे पारित है, उस रोगको शान्त करनेवाली औषधियाँ गृहपति कूटकर उसका तथा गायके घोका हवन यदि उस रोगाके कम- में किया जाए तो यज्ञमें डाली गयी सामग्रो अग्निमें जलकर यद्यपि यह अनि घरके हवन-कुण्ड में ही रहता है, पर तो सूक्ष्म हो जाती है, और वह सूक्ष्म भंग श्वास द्वारा रोगोके भी उसे वहा 'गृह-पति ' घरका मालिक सहा गया है। अन्दर जाकर रसमें मिल पाता है, और इस प्रकार यह रोगीके यज्ञका अमि निश्रयसे घरका खामी है। रोगी दूर करता है। गृहपते ! अ-प्रोपितवान् महान् असि (३९) अमिको 'हव्यवाद' कहा है, क्योंकि यह हवनमें दाले "हे गृहखामी अमे! तू कहीं दूसरी जगह नहीं पूमता, तू गए पदार्थोशे जहाँ पहुंचाना होता है, वहां पहुंचा कर इटित निश्वयसे महान् है । ' ( अ-धोपितवान् ) त् बाहर इधर कार्यो सिम करता है। उधर बिना कारण नहीं घूमता । परमें ही रहते हुए तथा किस तुम किन औषधियों का हवन किया जाए यह संशो- घरच हित करते हुए र मरना समय रिवाता है, इसलिए तू नाय विषय है। यदि इस संशोधन कर उसके अनुसार (महान् असि ) महान् है। अपने घरका सब प्रकारसे हवन किया जाए तो वैयक्तिक और सामुदायिक आरोग्यका कल्याण करना गृहस्पोका मुख्य कर्तव्य है । सब गृहस्थी इस लाभ होगा. इधमें कोई संशय नहीं । संशोधोका कम्य है। बहुदसा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। कि इस मादपूर्ण विषयक संगोपन अवश्य करें। ज्ञानी अग्नि गायोंको पालना गृहस्थियाँका एक मुख्य कर्तव्य है। घरों में अनि शानी है, यह पहले ही दिखलाया है। अन्धोमें यदि गायें भरयन्त आवश्यक है । परोंमें बच्चोंको गायका दूध, घी, ममिको जलाया जाए तो या उस स्थानमा उत्तम शान करा माखन भावि प्रा होना उतम ऐश्वर्यका माण है। इसे देता है। कौनसा मार्ग है, और यह मार्ग कहीं काटी और मनुष्य काम्बी उमबाले होते हैं- परथरोसे भरा हुआ तो नही है, कहीं मार्गमे गले तो नहीं है, मधयानः जनानां यन्तारा गोनां व दयता (३८)- इन सबका ज्ञान भामि करा देता है। मनुष्यों को इसका अनुसार कन 'नो मनुष्यों पर उत्तम प्रकार शासन करते हैं, वे धनवान सब जाननेवाला कहा गया है। कदम पर मिलता है। इसीलिए 'विश्यवेदाः' (३) गायों के झुमका भी संरक्षण करते है। वे लोगोंको गाय देते घाजपतिः कविः हव्यानि परि अफ्रमीत् (३.) मोर गायोंसे मोगोंकी सहायता करते हैं। पुग्दसंगो सनि इडा शश्वत्तमहयमानाय साध{)- दोले गए पदार्थों को चारों दिशाभोंमें फैलाता है । अमिय मित्र यह मान या बलका खामी भौर एवर्ण,भौर पद यामें स्तुति करनेवालको अनेक प्रकार से भव देनेवासे सब प्रकार के दालने पर भामराठे हुए मनुष्योटो छौ आने लगती है, अज देने वाले असायचा दान । उसी प्रकार सुगंपित पदार्षीका हवन करनेपर पामें हुए गोवाडा दाम यज्ञ करनेवालोंको करें। गाय भी यह मुख्य मनुयोको मुध भाने लगती है । इस प्रकार यह भीम इनमें साधन है । हान गायके पूध भोर पीये होता है । गायके गले गए पायो मह (पर्यक्रमीत ) पारों दिशादि पोको प्राममें भाहुति देने पो मारकेा शुद्ध माता है इसलिए इवे- करता। यमस्य मुक्रतुः (1)ो उत्तम राति सम्पत प्रातुसधिपु चै च्याधिर्मापते । नेवासा ताया है। जिन यज्ञीय पक्षापासहरनमें मनुमधिपु यहा क्रियन्ते। --गोपथ बाण माहुति दी जाती है, उन पदार्थोडो याममा विणणाम अनुमोरे पधि काम मा एक कतरे एमाप्त होनेपर पेलार यो सत्तम परिणामको एक रन काश्रिीको प्राप्त बासरीमा एम्म होती , तब वादनगो रोग हताहै। दाउनम परिधाम मनुष्योरभनुम माना। हामिए अनुमोवापि मा लिएकाले इनिए इन पापा में रामा पारिये और राम रक्षा गायीपारामात बरसाते अन्यान्य मे मी, मध पिचार पूजोपन ना माधियोसरिया बाना दे, रगो रोग दूर होते। +t- प्रथम अध्याय] भाग्नका स्वरूप (२७) वादिए । अयं अग्निः सुवीर्यस्य ईशे (६०) है, यह बात समझने योग्य है । ' उपा-बुधा' उपा कालमें यह अति उत्तम बलका स्वामी है। इसलिए इसमें त्रिन उठकर अपने कार्यमें लग जाना यह देवत्वका एक लक्षण है। पदार्थोसा हवन किया जाए उन पर पहले विचार कर लेना. 'देयेषु राजसि ( ६ )- वह देवों में तेजस्वी होता है। देवोंके गुण अपने अन्दर धारण करनेसे मनुष्य देवा में चमकने पते भूर्णय: आंगिरसः चां उत्प्रययुः, इत उदा- लगता है । देवोंमें केवल बसना ही नहीं अपितु देवोंके बीच हरन्, दिया पृष्ठानि मारुहन ( ९२) तेमस्त्री होना ही विशेष महत्वको बात है। सभी देव तेजस्वी 'ये उत्तम यज्ञ करनेवाले भोगिरस ऋषे युलोपर पहे, हैं, उनके बारमें जो पिरोष तेजस्वी होता है, वही देवमि चम- यहाँसे और उप स्थानपर पहुंचे, फिर युलोकको पीठपर बार कता है। विशेष देशखित परत करना ही इसका तात्पर्य है। वहावे विराजमान हुए '। सयापमिः देयः घन्दिभिः माताधामः मध्वरे यह यशकी शक्ति है । इसलिए य सदा पाजोपास होना चर्दिपि मासीदतु (५०)- 'साथ साथ चलनेवाले भागे चाहिए । 'भंग-रस' मगाम जो जीवन रस बहता है, उसे ले जानेवाले तथा प्रातःकाल उठकर काममें लगनेवाले देवों के मंगरस कहते हैं, यह रख सब भंगा रहता है। यह रस से साय यम बासनपर बैठ' (स-यावभिः) समान तिसे तैमार होता है, कैसे बनता है, और कम निर्दोष बनाया मा प्रगति करनेदाळे (माता यावभिः) प्रातःकाल उठकर उमति. सकता है, इस विद्याको जो जानते हैं, वे ' आगिरस' होते हैं। कारक कामों में लगनेवाले और (पहिः) आगे ले जानेवाले भंगके ओवन रसको दिया जो ऋषि मानते हैं, वे मागिरस देवोंके साथ यह भावनपर बैठनेको योग्यता प्राप्त हो, इसलिए ऋषि कहाते हैं । मागिरनि इस वियाका सशोधन करके उसे इस प्रकारके गुण अपने अन्दर धारण करने चाहिए। मिल मिलाकर बदाया, और यमस होनेवाले परिणामोको लोगों के सामने सिद्ध सामुदायिक प्रगति करना, प्रातःकाल उठकर काममं लगना, कर के दिखलाया, इस कारण ये आंगिरस ऋषि श्रेष्ठ बने । और आतिशील मार्ग जाना ये तीन गुण भग्निमें ह । मशकी भाम प्रात:काल प्रज्वलित होती है, सबस्विजमिलकर उसकी देवत्व प्राप्त करना सामना करते हैं, और सप उमति के मार्गपर जाते है, अर्थात् समी रडाका यदि कोई दश्य है, तो केवल देवत्व प्राप्त निरोप यज्ञ करते है। इन गुणोको अपनाकर ही मनुष्योंकी कराना ही है। देवोंके जो गुण मंत्रों में बतायें हैं, उन्हें भपने सति हो सकती है । इस प्रकार यह भामे देव मार्गको दिखा. अन्दर धारण करके सन्दे षडाना यह साधन है, यह कर्तव्य नेपाना है, इसलिए कहा है- कम है, यह मनुष्यों द्वारा करने योग्य है। नःशे देव. असि (..) देवयुं जनं मा भयः (२३) 'हमो मार्ग-दिखानेवालादू देव है'। मामि देव इस देवस्व प्राप्त करने की इच्छावाले और उसके साधनोंका भनु. प्रकार लोगों को मार्ग दिखानेवाला है। अन्धकारमें अमि अपने छान करनेवाले मनुष्यों के पाप अमि जाता है। इस भामेय प्रकाश लोगोंको मार्ग दिखाता है, या सबके अनुभवों ओन. का' में अगिक जो गुण बताये है, वे गुण अपने अन्दर पाली बात है। 'अग्निः कस्माद, मप्रणी भवति' बढाने का जो प्रयत्न करते हैं, और उनका यह अनुशान जितना (निरुक्त), इसे अनि इसीलिए कहते हैं, क्योंकि यह श्रम- पाता है, उतना ही उनके अन्दर अनि बढती है और वे नी होता है, मर्यात (मग-नी) मागे मागमें रहनेवाला, ममि समान तेजस्वी होते है। आगे ले जानेवाला यह भनि देव है। पा समधे भतिक उपर्युपा देवान् मा यह (.)- उप.हाल में मार्गसे ले जाता है, इसलिए उसका पूरा नाम 'अप्र-पी' नागनेवाले देवांश इस यज्ञमें ले भा। 'उप-मुध' सा है, शिवच संक्षिप्त का 'अग्नि' हो गया है। काममें उठना, ति न रहना यह देवत्वका एक चिन्द है। मप्र-नो- अप्र-जी सवेरे पाढे चार बजे उठना मामानी हो सकता है। पांच, मुंह धोना, स्नान, मध्या नपासना करके बने को अपने यह यानि भी उसी प्रकार अप्र-की है, क्योंकि वह अपने काम माता है, उसको, प्रात प्रल वठने कसा उत्साह सपायरी प्रगतिक मास मागे ले जाता है- प्राप्त होता है, यह अनुमत्र होगा । और इसके विपरीद पाठ प्रिय मित्रप (५)-प्रिय मित्रक समान पहारा देश मोनालिस्तरमें पड़ा निवाला रितना टरमार हान होता भपने भजनों को आगे ले जाता है- मग्-नी- माने (२८) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [आमेयं काण्टम् शत्रुनाशक अग्नि बने। ते मनः परमात् सघस्थात् भायमत् (८)- जो सनात् यातुधाना मृणास। ..)- दमेशा इष्ट पार तेरे मनको उंचे स्थान से अपने पास बुला लेता है, वेरे मनको देनेवाले शत्रुको तू नष्ट करता। अपने अनुकूल बना लेता है, वह श्रेष्ठ बनता है। देवताके त्या पृतनासु रक्षांसि न जिग्युः (८०)- तुझे मनको अपने अनुकूल बनाने के लिए देवताके गुणों को अपने युद्धमें राक्षस जीत नहीं सकते। गन्दर लाने की भावश्यकता है । नहीं तो यदि अपना भाचरण महमूरान् कव्यादा अनुदह । .)- सूर्योके साथ देवताके गुणके विरुद्ध होगा, तो निश्चय देवता हमपर क्रोधित रहनेवाले भौर का मांस खानेवाले बोशनु हैं, इन्हें जला दे । होगें। इसलिए देवताके कौन कौनसे गुणा है, इनको जानकर ते दैन्यायस्याः मा मुक्षत (८०)- शत्रु उन्हें अपने अन्दर मनुष्य पारण करें, और देवता मनसे [रे दिव्य शाम न छूटे। अपने अनुकूल बनावें। हरसा यातुधानस्य हरः यलं विश्वतः परि प्रति- जाहि (९५)-मपनी पारितसे दुष्टके सरके संहार करने- अमिके कुछ गुण पहले दिखाये । अब 'आमेय काण्ड' में पाले बलको सब तरहसे नए कर । अमिकी युद्ध कुशलताका ओ वर्णन है, उसपर विचार करते हैं- रक्षसाबलं न्युन्ज (९५)- राक्षसोंका बल नष्ट कर । अग्निः यत्राणि जंघनत् (४)- अग्नि वृत्रों को मारता विधः अपकर ( १०२)- शनुको दूर कर । है । षका अर्थ है, चारों ओरसे घेरनेवाला शत्रु । पत्रका अर्थ तस्य मर्त्यः रिपुः मायया चन न शिते (१०४)- है, मेघ, गृत्रका अर्थ है सब प्रकार के शनु ! इन शUभोंको भनि उसको मारनेवाला शत्रु मपनी चतुरतारो फिर शक्तिशाली न म कर देता है। अयं अनि वृत्रहपानां च (१.)- यह ममि वृत्रको मारनेघाले शूरवीरों में प्रधान है। त्यं पुजिनं रिपुं दुराभ्यं स्तेने दषिष्ठं पास्य घुपदन्तम ज्येष्ठं मानव अग्निं भगन्म (५)- (१०५ )- उस पापी और कठिनताये बरामें करने योग्य चोर पेरनवाले शनुमोको नष्ट करनेवालोंमें प्रमुख गुरवार में भी मुख्य शत्रुको दूर फेंक दे। - उघ भनिने में प्राप्त होता है, उसकी मैं उपासना करता है। मायिनः रक्षसा तपसा निदं (101)- कपटी उससे मैं मित्रता करता है, उसके पास जाकर में रहता हूँ, राक्षसी भपने तेजसे जला दे। उसके माध्यमें में रहता है। सदने कंचित् भत्रिणं मा सासघाम (N विश्वस्य भरातः महोमिा पाहि (1)- सभी शत्रु- अपने घरमें अथवा राष्ट्रमें कोई बाऊ शत्रु भा जाये तो उसे भारी अपनी महती शकि द्वारा हमारा संरक्षण कर । हम पराजित करें। मर्यस्य द्विपः पाहि (१)- देष करनेवाले मनुष्यों विश्वा रक्षांसि प्रतिपेति (१४)- सम राक्षसोंने और शत्रुओंसे हमारी रक्षा कर। यह मारता है। ममः ममि मर्दय (1)- अपनी शक्तिसे हमारे इस प्रकार अपने सब शनुमकि वैयक्तिक मार राष्ट्रीय . शत्रुओंको नष्ट कर दे। मोके नाश करने का विचार इस आमेष काळमें किया गया है। स्पदः (१५) धों. मलाप, है। अब समय और सा स्थान में शत्रुओके मालिस पू अनि तिग्मेन शोचिपा पिय पत्रिणं नियंसत् की इच्छा प्रकट की जाती है । मनुष्य इस प्रकार अपने शत्रु- (११)- भमि अपनी सीक्ष्ण मागासे सय भत्साधिक साने मोको दर करनेका प्रयत्न करें। माना कि बाद, अपने वाले शत्रुओंके। मारतामतिः' अत्यधिक खानेवाला संगठनभाबल बढावें, अपने सामानको भार नाका पल शत्रु (अतिति पत्रिः)। बदायें भोर माने सादर मार मन्दरके सभी प्रमोंको दूर करें। माअंहसः रितः रक्ष (१४)- हमारा पापी हिंसक पाभोंसे संरक्षण कर घोडे पसर तपिठे प्रतिवद (२४)-पुढापे रहित सदा भमि भपने रथमें गगे पौरनेवाले पानीको बोतर माता सरण स्वासात भपने तेज शत्रुभाको बला दे। है। इस विषय में कहा है- विपतिः रक्षसा तपाना (१९)-प्रमोंका पालन ये तय साधया मारायः अभ्यासा मरं पारित कानेवाला श्राम को वनवाई। युक्य हि(१५)- 1 प्रथम मायाय] मालिका स्वरूप जो तेरे चशम प्रकारचे शिक्षित और गसे जानेवाले घोडे त्वं यस्य सव्यं माथियास तष सुवीरमिः हैं, जो तुझे बहुत शीघ्र दोहर ले जाते हैं, उन घोडको तू याज कर्मभिः ऊतिमिः प्रतरति-झो तुमसे मित्रता अपने रयमें जोडकर शनिबा। करता है, वह तेरे उत्तम, वीरतायुक्त, बलने युक संरक्षणांके यह घोगोंका वर्णन आनंकारिक है, या पोका तात्पर्य कारण दुःखोंपे पार हो जाता है। अमिकी किरणों से है, क्योंकि यह अग्नि घोडशेवाले स्यमहकर चर्य तय लरपे मा रिपाम (41)- हम तेरी कहीवाता नहीं। मित्रतामै नष्ट न हो। शरीर रूपी रयमें बैठकर भारमा यो ममि इस पृथ्वी पर विश्वाः मापा अवसि (७५)- शोके सष रूपट उतरती है, और इस रपमें सय देव अंश रूपसे आकर बैठते हैं। जालोंको दूर करता हुभा तू हमारा संरक्षण करता है। यह वर्णन बिल्कुल ठीक है । इसके सम्बन्ध मागे विस्तारसे मतिः अदितिः सत्या दिवा न मा गमत्, सा शंतातिः भयः करम् (म. १०२)- दीनतासे रहित होकर, इस प्रकार मामले रथके घोछेका वर्णन माळहारिक है। मनन शक्ति और संरक्षण शक्ति के साथ दिन माज हमारे पास संरक्षण भाया है, उसने हमारे लिए मुख शान्तिका निर्माण ममि अपने भकॉका संरक्षण करने के लिए युर करता है, किया है। यह स्पष्ट है। अपने भक्तों के भोंको दूर करने और उनको यह संरक्षणको शक्ति है। 'अ-दिति' का अर्थ है 'म- सुरक्षित रपने के अतिरिफ सका भौर कोई उद्देश्य नहीं है। दीनता' अपनी बुद्धि कभी भी होनताको भावनासे युक्त नहीं भफगण इसको अपनी प्टिमें रखकर अपनी शक्ति बढावें और करनी चाहिए । अपने में कमी हीनताको भावना (Inferiority निमय होकर है। Complex) नहीं आने देना चाहिए । नस दौनतासे रहित घं प्राता समयाः (२) श्रपे । तू इमारा होकर मनुष्य सर्वदा उत्साहसे युक्त र संरक्षण शकि पानता संरक्षण करनेवाला प्रषिद्ध है। साय कमी ही नहीं मरती। अदीनता और संरक्षण शकिती प्राचा परेपयं मया यामि- वेदमंत्रोंकी सहायतासे घोडी रहती है । वह दीनता रहित संरक्षणका घामय हमें मैं नतम संरक्षण प्राप्त करता है। वेदमंत्रोम से कहा है, बाज प्रार हुआ है। दिन में हम उद्योग धन्धोंम घलान रहते हैं, उसके अनुसार पमी अपना पर स्वयं बहावे, सब अपना उस समय ठासाहयुक्त संरक्षण शक्ति हमारे पास बात रहती संरक्षण स्वयं करें। यही 'चरेण्यं भवधेिठ संरक्षण है, इस प्रकारका उत्साहयुक्त सरक्षणको शक्ति हमारा क्षण शीर-शोधियं अग्निं अबसे गायाभिः इविष्य करती है। 'माते:-अदितिः-अतिः ' मुद्धि, मदीनता (४९) विशेष तेजस्वी भमिकी अपने संरक्षण के लिए वेदमंत्रोंसे और संजय शीक ये तीनों ही मनुष्यको उमति करनेवाले स्तुति करो। इन वेदमंत्रों की स्तुति करते हुए भमिक गुण कौनसे है, यह देने, उन्हें अपने अन्दर पारण करे, इस प्रकारको धनकी प्राप्ति ताम पुद्धि सपासक की हो, वह अपने संरक्षण के लिए प्रयत्न मनुष्याको धनको आवश्यकता रहती है। प्रत्येक कार्यों करे और येणबते। एनको रूरत होती है । को देनेशाला है। पो! ना अतये ऊः मुतिष्ठ (५५) हे अमे! लिए उसे 'इषिण-स्यु'()- कहा है। इस उपासक हमारे संरक्षण के लिए यहा रह । (यसो ऊध्र्य-ज्वलनं) पन मांगते हैं। भमिकी ज्वालायें हमेशा कार हो जाती पानी हमेशा नीचेकी असम्पं महे ऊतये पिवत्यत् मा मर(1.)- मोर पाता है, पर भमि कभी भी नीचे को और नहीं अलती, हमारे महान संरक्षण के लिए हमें भरपूर धन दे। उसकी माला सर्वदापी सती हैं। हमेशा स्थिर भोर सस नारथि पंसते (२२)-वह अनि हमें पन देता। रहना पीरताका लक्षण है। 'समे कायशिरोमीयं धारयन् दामुपे रत्नानि दयत् 11.)- यह दानशील मनु. अचलं पि:'(गीता) भाने शरीर, गर्दन और विरको यो रान देता है। सास बहे हैं और पलें, यह धीरताका द्योतक उपसः विवसन् चित्रं राधा दायुधे आ यह है, और यह दो कारण होता है। (..:.-घालमें प्राची भौर अद्भुत धन पायो । - (३०) सामवेदका सुबोध मनुषाद आग्नेय काण्टम । हमें दो। यसो! वं चिः। ऊत्या राघांसि नः चोद भद्रा रातिः (119)- तेरे घन कल्याण करनेवाले हैं। (1)-हे सवको रसानेवाले ! तू विलक्षण सामध्यवास। तत् घुम्न मामर (१३)- उस तेजखा धन को हमारे संरक्षणके साथ अनेक प्रकारके धनोंको हमारे पास भेजा हमें दे। त्वं सस्य रायः रथी मास (1)- तू इस धनका अय ध्रुवः रयीणां माचिकेतत् (१०१)- यह अवल स्या है, इस धनका लानेवाला है । मामि धनोंगे जानता है, धन से प्राप्त होता है, यह मानता हे पावक ! ना शंस्य पयोषधं रयि रास्य (४३)- हे पवित्रता करनेवाले अमि देव । हमें प्रशंसनीय, भायु बढाने. एनके लिए मनुष्य भमिकी उपासना करते हैं, क्योंकि धन वाला अथवा यसको बढानेवाला धन दे। प्रासिक उत्तम मार्गको वह जानता है। सुनीता पुरुस्पृह सुयशस्तरं नः राख (४१)- बडवाशि उत्तम मार्गसे, उत्तम प्रशंसनीय तया यशको पगनेवाला धन पडवाप्तिका वर्णन जो इस भामेय काण्डमें है, पर इस प्रकार है। विश्या यसु दीयते (४४)- वह सब तरहके धन समुदयाससं अग्नि माहुवे (10)- समुबके अन्दर देता है। निवास करनेवाले भमिकी में स्वति करता हुँ । सबमें गवामि धुतं अग्नि नरः सुदीतये उर्दि (5)- इस सुप्र- रहती है। सिद्ध भमिसे लोग प्रकामा युक पर मांगते हैं। सूर्य और अमि यामतः राये निनीपति (५८)- जो मनुष्य धनके सूर्य युलोकमे रहता है। उसका भामेय रूप है, उपका लिए तेरी उपासना करते हैं। वर्णन सामक इस अग्नि काण्डमें इस प्रकार है- मयं पनि सौभगस्य राय शेि (६.)- यह अमि परो दिघि यत् ध्यते, मादित् प्रत्नस्य रेतस. उत्तम ऐश्वर्य धार धनका खामी है। यासरं ज्योतिः पश्यन्ति (२०)- गुप्लोमें जो चम, स्वपापस्य गोमतःश (1)- उत्तम सन्तान और यह प्राचीन वीर्यका सेज प्रकाशित होता है, उसे मनुष्य देखते गोषका स्वामी है। है। सूर्यके उदय होनेपर जो सूर्यका तेज चाहता है, पर पार्य यक्षि यासि च (8)- वाचार करने योग्य महान तेज है, उसीको सप मनुष्य आशमें देखते हैं। धन देते हो और स्वयं भी प्राप्त करते हो। विश्वाय सूर्य एशे फेतयः जातवेदस देयं उन ते मदा रातिः इह अस्तु (७५/- तरे कल्याण करने. दन्ति (11)- समाको सूर्यका दर्शन हो, इसलिए प्रकाशके पाले धन हमें यही मिलें। हिरणे ज्ञानी देवको-सूर्य रूपी अप्रिको-बाधामे पारण करती विधतेते पासि पति यन्ता तनूपा मघतु (..)-सुभाने उपाएको मन और धन देनेवाला भार यह माशश दोसनेवाला सूर्य भमिका ही है। उस पारीरका भरछा प्रचार सरक्षण करनेवाला हो। अग्निमन्थन मोशिष्टं पुम्नं मलम्पं मामर (01)-बल १di. यसमें जिस भागका प्रयोग होता है, वह दो मणियार नेवाले सोपन हमें मापूर दे। मंपन उत्पच होती है और न प्रयोग किया जाता। पृहद स्वत् महिपी रयिः त्यद याजा उदीरत नाही और कारकी इस प्रकार दो भानियां होती है। (८५/- बहुत सारा धन (मद। दुनमे बहुत सारा धन दोनोमय करके यह अमिरपन की जाती और मन में मिले। या कुण्ड में स्थापन यिा जाता है, फिर में इनके योय या महेरापे समिधीमहि (1)- अधिक धन पदार्थ बाहुतियां दी जाती है। किपास पर्षन इस परने के लिए एम हरी खति है। आमय प्रहने प्रकार है। भस्मे महिधयः देटि(९)- हमें बहुतपा यशसी अपांग्यां विश्वस्य पापता पुष्करादमिर मम्पत (91- अपन तुम बमेश स्तुति करनेवाले प्रथम अध्याय अग्निका स्वरूप (३१) राव कवियों के समूहमें शिरस्थानीय पुष्तरसे मय करके उत्पन्न 'पृथिवी ' यह नाच मणि है, और 'धुलोक' यह किया है । इस पुष्करका अर्थ नीचेको अरणी है। मपनेसे वहाँ कारकी भरणा है इन दोनों प्राणियों के मथनेसे सूर्य रूपी अनि उत्तम होती है । अथर्वा यज्ञका 'प्रमा' होता है, उसके अमिको उत्पत्ति होती है। इन दोनों ही परणियों में गति है। निरीक्षण में अनि मन्यन होता था। प्रा बादस भाषउमें टकराते हैं, तर उनसे बिजली हो पुष्कर-कमल, सळवारकी धार, माण, देवा, अन्तरिक्षा अति पैदा होती है, जिसे हम अपनी भाषामें बिजली पम. पानी, युद्ध, हापीको सूरके मागेहा हिस्सा, तालाब, साप, पना कहते हैं। सूर्य और मेघ । भी भार पुरुष ये दो मरणियों है । म्रो नोचेकी मोर पुरुष घाघता-या कर्ता गण, स्तुति करनेवाले । ऊपरको भरणी है। इन दोनोंके सम्बन्ध भमि रूपी पुत्र माग्नि देवा जनयन्त (६५)- अनिको देवाने पंदा उत्पन्न होता है। किया। विद्या घरारी है और बाचार्य उत्तरारणा है, इनके दियः मूर्धान पृथिव्या. अरति पैश्वानरं अन मन्धनसे 'शानी तरुण' उ पन्न होता है। जो शानामि प्रा. माजात अग्निं {१७)-- युलाक के ऊचे स्थान और पृथ्वीके शित होता है । नीचे स्थान, इस प्रकार इन दोनों परणियाने या वैवानर इस प्रकार यह अमि उत्पन होती है। ये सभी वन्दनाके मामि उत्तम हुई है। योग्य हैं। इनको सप लोग नमस्कार करते हैं। यज्ञामि समका मर दीधितिभिः भरणपो हस्तच्युतं प्रशस्तं दूरे प्रतीक है । इस यज्ञामिक लिए सम नमन करते हैं, इस विषयमें दृशं प्रहपति अथव्युं अग्निं जनयन्त (७२)- यज्ञ नोके मन माग देखने योग्य है। करनेवाले विष अरणियों को मथकर प्रशसाके योग्य, पूरसे अग्निको नमस्कार दीगनेवाले, सरस्वामी रूप, निरन्तर प्रगति करनेवाले, ज्वाला दिवे दिये दोषावस्त धिया नमो भरन्त एमसि सि तेजस्वी दीसनेवाले समिको उत्पन्न करते हैं। (१४)-प्रति दिन और रात्री बुद्धिपूर्वक नमस्कार करते हुए हाथों मरणियाँको मथकर अमिको ऋखिम लोग यसो हम तेरे पास आते हैं। लिए सत्पन्न करते हैं भायराणां सम्रा मानिनमोभिः चन्दध्ये (१५). जातवेदा अनि अरण्यो. निहिता दिवे दिवे यसके सपाट अनिको हम नमस्कारों अथवा मलकी आहुति- ख्या (५) जातवेदा अभि आणियों उत्पन्न होने के योंसे वन्दना करते हैं । नम:- मश, नमन, बाद से यश में स्थापित करते हैं, और प्रतिदिन उसमें यं कृष्टया नमस्यन्ति (५४)- जिय अमिको मनुष्य हवन किया जाता है। नमस्कार करते है अग्नि जमानी समिधा अयोधि (१)- अमि इस प्रकार भानको नमन किया जाता है और उसमें अनकी ऋविजोंकी समिधासे प्रज्वलित किया जाता है। आहुति दी जाती है। अयं अग्निः दिव ककुद, पृथिव्या मूर्धा पति अपां रेतांसि जिन्यति (२७)-- यह अप्ति धुलोकके अग्नि प्रकाशसे युक्त ज्वालाओंबाला होता है । पक्षको इस सच मागपर तथा पृथ्वी पर जगतके उच्च स्थानपर रहनेवाला अग्निको प्रश्वलित करते हैं। समीका पालन करमेवाला है, और यह कक बलको प्राप्त कण्ये दीदेय (५४)- कण्व भाममें गह भाम करता प्रकाशित अथवा प्रज्वलित होता है। इस प्रकार नीचे और ऊपरकी अरणिया मथकर भनि उत्पन्न शश्वते जनाय ज्योतिः (५४) की जाती है। जिसकी यह पहले मालूम होगा, कि यह पर. निरन्तर रहनेपाली ज्योति प्रकाशित होती है। णियोंसे अग्नि के उपस का जाती है, उसका समसमें यह माता जाता उक्षित (५४)- यज्ञके लिए प्रथम पमि सप माजाएगा। सत्पन्न की जाती है, फिर बादमें वह प्रकाशित होती है। भव यहाँ भरणिके विषयमें जिससे कुछ सान हो इसलिए मनुस् त्वा दधे (५४)-मननशील मनुष्य से हमेशा संक्षेपसे समपर विचार करते हैं। धारण करते हैं। अन्नि उत्पाद करनेवाली दो अराशयां होती है, एक नीचे भमिक प्रज्वलित होने पर उसे स्थान देकर उसका सकार होती है और दूसरी ऊपर होती है। दोनोंको बिसने भाभि किया जाता है, क्योंकि वह भतिषि होता है। और मतिपिका हरपा होती है। सरकार होना ही चाहिए। । प्रकाशयुक्त ज्वालायें लोगों में यह (३२) सामवेदका सुयोघ वानुवाद (मानेय काण्डम् - वीर पुत्र अग्निकी स्तुति अतिथिका आसन सक्तमि. पचोमिः वृणीमहे (५९)- जिव दूसर अत्तिा आयरे याहः (२०- यज्ञ आसन फैलाया हुआ है। भलित करते हैं, उन सब देवलो प्राप्त करनेवाले प्रजा के बर्हिः भासदं इयेच ( २३/- माहनपर बैठने के लिए प्रिय अग्निी हम सूक्तोंसे और भाषणों स्तुति करते हैं। मईते जातवेदसे इमं स्तोम, रथ इष, मनीषया यझमें अग्निके समान सब देवोंके लिए इसी प्रकार साधन सं महेम (१६) पूज्य मानिके लिए ये स्तोत्र, स्यके समान, फलाकर रख दिए जाते हैं, और देव पण आकर उनपर अपनी युटिसे भाल पूर्व कहते है। मुष्टुतयः गिरः या पाजयन्ति (१८)- उत्तम सुतिके वचनोंसे तेरा वर्णन करते हैं। प्रशस्तं सन्नाजं प्रस्तोतु (v)- सित सम्राट पदि चोरः स्यात् मत्यं अग्नि पीत (८२- अमिती स्तुति करो। यदि वीर अपात पुत्र होता है, तो मनुष्य प्रामिको प्रज्वलित पुरुप्रियः विशः अवियिः मग्निः प्रातः स्तठ करके उसमें हवन करते हैं। (८५)-सबाँके प्रिय, भौर प्रवाभा के लिए अतिथिक समान पूज्य, अनिकी प्रात चात स्तुति करनी पाहिए। भाणियाँस अमितत्पन होती है। उसे यज्ञ कुछमें स्थापित घा दुर्य शूपस्य मन्ममि पचः स्तुपे (८०)- करके उसमें समिधा डालकर प्रदीप्त करते है और प्राविग्गण अपने घरमें रहनेवाले मनिसरी राम सुसारक स्वोत्रों और उसकी स्तुति करते हैं। इस स्वाति 'विपन्या' कहते हैं। भाषणोंये मैं स्तुति करता हूँ । इस रवि विश्यमें अनि कामें इस प्रकार लिखा है- विषां ज्योतीषि विभ्रते येधसे अग्नये यास पूर्य प्रेष्ठ अतिथि स्तुपे (५)- मैं इस ममिको स्थति पर मरत (९८)- शानियाँको गतिको धारण दरनेवाले तथा यह करनेवाले अमिके लिए, महान् मोर मात इतरा गिरः प्रयाणि (0)- अधिक सुति स्तोत्र हो। प्रतीच्या रिप्य(१.१)-पा प्रतीकार एनेगले रयां गिरा कामपे (4)-अपनी शगिसे तुले प्राप्त मामी स्थातिर । परनेही हत्या करता हूँ। मंदिष्टाय याताय्ने पृथते शुकशोचिये मायेप्रणा यजिष्टं गिरा सबसे (१२)- पूज्य भमिरी यत्त (१.५)- महान् . यह करनेवाले, से, प्रकाश अपनी वाणांसेति ताद। दाले, ममि लिए स्तोरा मान । विशे विशे यशियाय सदायशी स्तोम (१५) यशिष्ठं देयमा देयं समाये होतारं यशस्प सुर प्रत्येक मनुष्य के हित लिए पूजनीय तथा आमाको रसानेबाने त्या पमरे (१२)- करनेवाले, देवों में रहनेयमे, अमित खरे सुन्दर सत्र है। अमर होना, यश म तम (सिमरनेशले पनि पषि सत्यधर्माण समीपपातनं देवं उपस्तुहि देवय में पति हरता है। (५.- शनी, पास पान, अमेपले, और देश में पति कप और भामूहिक प र प्रभार इस प्रकार मोहततिशत वन करनेवाले मंत्र इस भनि करनेवाले रेसतिर। पर्य जातवेदसं अमृत, प्रिय मित्र म, भसिपम् भमिती स्तुति की जाती है। (१५)-पानी, समर मारी, विष मित्रो समान, इसमें निममीन लिया जाना हार एमा नमसा कोमपान पिपं तिष्यति पहुंषाने १५ मि इस प्रकार पाने डरम सम्परं विश्वस्य दूतं या भाईये (५)- सपना दूत है- मनोमानेमे, यि और काम देनेमामे प्रगति. दूतं मानि पूतीमई (1)-इस पूरा करने पाने, विवस मि में मुति ममिधे मांगा है। पिपेस समय दून (५)- हो मापे एपने, देपपतीनों पुम्ना पिणं पर बानराजा भार भरा। अपि दूत प्रथम अध्याय] अग्निका स्वरूप (३३) । । इसमें जो कुछ भी डाला जाता है, उसे यह जहां पहुंचाना ४ समिधा शुकः माहुतः (४)- प्रज्वलित करके शुद्ध होता है, पहुंचा देता है । इस कारण लमि किया दुआ हयन अपि पाहुति दी जाती है। अनेक प्रकार योगा होता है व्यक्ति और समाज दोनोंका ५हव्यवाहः (१)- इवि नहीं पहुंचानी होती है वह लाम इस प्रकार हो सकता है। सशसे यहो काम होता है। पहुंचाता है। ६ मनसा अग्नि दन्यानो मर्यः धियं सचेत (15)-- यशामिमें भनेक पदाकि हवन किए जाते हैं, यह सभी) मन लगाकर अप्रियो जलानेवाला मनुष्य अपनी भक्षापाता है। मालूम है । महतुभोंके संधि कालम रोग उत्स होते हैं, उन ७ साहुतः सूरया ते प्रियासः सन्तु (३८)- राम रोगोंक नाशके लिए यज्ञ किया जाता है। ऐमा गोपय माझगमें आहुति देनेवाले शानी तुत प्रिय होते हैं। कहा है। आरोग्य बढाने के लिए यज्ञ किए जाते हैं । इस या ८ दौदिया! त्या समिधानं घेधसः विप्रासः विषयमें इस हाण्या इस प्रकार कहा है-- अधिवासान्त (४२)- प्रकाशमान भने ! तो प्रदीत १ थायराणां न-सा (२१)- भादसापूर्व कर्मोदो करके ज्ञानी विप्र तेरी सेवा करते हैं। करनेवाला । न-मा-न गिरानेवाला, उपत करनेवाला, हिंसा २ भद्रा वर(११)- यस कस्याग करनेवाला है। रहित कमाको उतरनेवाला। १० मासात्वा समिन्यते (४१)- मनुष्य तुझे २नः यथं देवाः नये पंकिराघवं बोर मच्छ उत्तम रीति प्रदीप्त करते हैं। नयन्तु (५६)- हमारे यह सव देव, मानवाहित करने- ११ अमे। वृहतः रोचनात् अधि अया तन्या वाले, मनुष्यों का यश बढानेवाले वरि ममिको यहाँ लावें। पधंस (५२)- हे अमे! लोक पर इस तेजस्वी शरीरको ३ स्वं गृहपतिः, नः अध्वरे त्वं होता, पोता वडा । प्रवेताः (44/- तू घरका खामी है, हमारे याने त् देवाको १९ हे मुकतो 1 गिरा मम जाता पृण (५२)-हे मुलासर बानेवाला, पवित्रता करनेवाला और नाम प्रकारसे उत्तम कर्म करनेवाले अग्ने ! अपनी पाणीसे मेरे पुत्र, पौत्रीका सेतना देनेवाला है। पोषण कर। ४शिश तरुणस्य यक्षप: चित्रः यः पातवे १३ पूर्णा भासिचं विघा (५५)- पूर्ण भरे हुए मातरी थपिन पति (६४)-इस तषण अनिरूप पालकका घुचाके इस बर्षणको स्वीकार कर । विचित्र जीवन कम है। यह अपने पोषण के लिए अपनी माता १४ उत् सिंवध्य, उप पृणम्प, सादिर देव.पः भरणी-के पास जाता तक नहीं है। मोहते (५५)- मर करके आहुति दो, फिर भरकर माहुति ५ माहे दूत्यं चपन् पयक्ष (६५)- उत्तम होने के दो, इस प्रकार करनेसे आमि देव तुम्हें उन्नत करेंगे । पाद ही महान् दृतके कामको करते हुए इवि देवाको पहुचाता है। १५ हविषा मा जुहोतन (६३)- हवि द्रव्यों का हवन इस प्रकार यह यज्ञ करनेाला है। इस अप्रिम हवन किया करो। जाता है। स विषयक मंत्र इस प्रकार है- १६ इद्ध पदे पस्त्यानां रातहव्यं नममा समर्पय हवन (१)-पृथ्वी पर यश स्थानमें यज्ञमें देवि देनेवालेको पहोंमें हवन मुख्य है । हवन करने के पहले अमिकी स्तुति नमस्कार हो। की जाती है । इन स्तुति-मत्रोंके प्रारम्भ होनेपर भनि प्रश्द २७ अपत्ये विश्व मासा हव्यं इन्ध (५)- लित की जाती है, फिर बादमें उसमें हवन किया जाता है। समर अनिमें सब यज्ञ करनेवाले मनुम्य हरनीष पदापा। इस वर्णन इस काण्ड में इस प्रकार है- हवन परते है। १ पोतये ध्यदातये गृणाना मायादि (1) १८ भानवे अग्ने वृद्वयः (८८)- तेजस्वी अनिमें हवि भक्षण तथा देवोंको दवि पहुंचाने के लिए तुम समिकी बहुतसे मनोका हनन किया जाता है। स्तुति की जाती है, तू हमारे पाएमा । १९ हव्य-दातये अग्नये ददाश (१०४)- हत्य २ विश्वेषां यहां होता (२)- सब यलों में तू होता पदाधि जिसमें हवन किया जाता है, उस अग्निको अर्पण करता है। करो। विभिः मानुषे जने हितः (२)-देवाद्वारा मनोम २० खनेर तं गूधय (1.९)- खर्गको हाँ पहुचाने. यह भी स्थापित की जाती है। बाले अभिकी स्मृति कर। ५ (साम, हिदी) (३४) सामवेदका सुबोध गनुवाद [माग्नेयं काण्डम् २१ देवत्रा हव्यं मा अहिपे (१०९)-तू देवोंको हवन किया जाता है और इस प्रकार हानि रोग दूर करने- हदि पहुंचाता है। वाली और आरोग्य पढानेवाली है। २२ सु होता स्व-घरा पुरु प्रशस्ता वसः (१०) मातु संधिषु वै व्याधिर्जायते । जिसमें मातम हवन किया जाता है, जिसमें उत्तम यज्ञ होता है, ऋतु संधिषु यज्ञाः क्रियन्ते । गोपथ माग । ऐसा यह भमि बहुतोंसे प्रशंसित और सबको घसानेवाला है। 'ऋतुओंके सधिकालमें रोग उत्पन्न होते हैं, उन रोगोंक) २३ माहुतः अग्निः नः भद्रः (१११)- जिसमें नर करने के लिए यज्ञ किये जाते हैं । यह गोपथ ब्राह्मणका यह हवन होता है ऐसा वह ममि हमारा कल्याण करनेवाला है। कयन इस प्रगमें देखने योग्य है। इस प्रकार यज्ञशाषीय इन हवन मंत्रोका बत्तम रीतिसे विचार हो गया, अर्थात् दृष्टिसे बहुत महत्वका है । यह व्यक्ति और समाजका आरोग्य यज्ञ अथवा यशनि हमारा (भद्रः) कल्याण करनेवाली किस बढानेवाला है। प्रकार है, यह समझमें आ गया होगा। कार यज्ञ-विषयक और हवन-विषयक मंत्राम'यह अनि सर्व प्रथम अमिको परणियोंको पिसार उत्पन्न किया जाता हमारा सबसे उत्तम कल्याण करनेवाला है। यह जो वर्णन है, है, उसे कुण्डमें स्थापित कर उसमें समिधा तया पीछा माहुति यह केवल स्तुतिकी दृष्टि से ही नहीं बल्कि शास्त्रीय दृष्टि से भी देकर उसे जलाया जाता है। अमि जल करके आसपासको सत्य है। यह बात पाठकोको ध्यान रखनी चाहिए । हवाको गर्म कर देती है। वह गरम हवा कार चली जाती है, इस दृष्टिसे कौनसे रोगों कौनसी वनस्पतियों का वन लाभ- और वह चारों ओरकी हवा आ जाती है। यह क्रिया अग्निके दायक होगा, इसकी शास्त्रीय दृष्टि से घोन करके तथा अनुभव अलेते रहने तक रहती है। यह अबतक चालू रहता है, तबतक करके निषित करना चाहिए। अतः वैद्यों और संशोधकों को पासको हवा गरम होकर उपर जाती है, और दूसरी हवा चाहिए कि वे इस दिशामें खोन करें। उसका स्थान ले लेती है। हवा शुद्ध होने का यह एक लाभ यासे इसके अलापा यश एरनेवाले यामानोंकी, ऋविजोको बो होता है। शुभेच्छा और सद्भावना इसके पीछे है, तया मंत्रोचारणसे जो पहले हर घरमें हवन होता था। समझो, यदि एक घंटा पवित्रता मिलती है, वह भयधिक होती है। उधको किसी भी भर मी घरकी अनि मलती रही, तो घरकी हवाके ऊपर माने माय मापस नहीं जा सकता। और बाहर की इवाके अन्दर बानेसे घरको इवा शुद्ध हो जाती इस प्रसर यज्ञ और उसके अन्दर हवन करना कल्याणकारी यो । प्रत्येक घरमें अनि जलानेसे प्रत्येक घरकी यह हवा-पलट है। इसलिए यज्ञ कर सकनेवाले लोगों को इस तरफ ध्यान देना नेको किया समझमें आ आएगी। चाहिए। पहले दर चौराहे अथवा शहरके मध्यमें पदी बढी यज्ञ- उपमा शालायें होती पी। उनमें बडे बडे यज्ञ होते थे। उससे बातों १ मित्र व प्रियं (५)- प्रिय मित्र के समान (अतिथि दुरी इवा कर जाने तथा बाहरको शुद्ध हबाके वहां मानेको अभिकी स्तुति कर 1) (में. ३५) किया यलती रहती थी। इस प्रकार यज्ञानिक रहने वायु २ रथं न वेध (५)-जैसे धन देनेवाले रथको सुति परिवर्तन होता था, और वह लाभदायक था। की जाती है उसी प्रकार अप्रिकी स्तुति की जाती है)। राज देवल भमि ही नहीं जलायी जाती अपितु उसमें ३ बाइसन्तं अश्वं न(10)- नतम अयाल (गईनके गाय का घी आहुति के रूपमें टाला जाता है। यह गायका पो बाल ) से युक्त घोटे समान (जो जालाओंसे युफ है चस भागमें जलता है और उसकी सुगंध हवामें फैलती है, और ममिको मैं नमस्कार करता हूँ) यहाँ घोडेके साल भार उससे हराम रहनेवाले रोगके कीटाणु नष्ट होते है। गायके अग्निको ज्वालाओं की समानता देखने योग्य है। पोमे यामें रहनेवाले रोगके कीटाणुओंको नष्ट करने का उहाम मधो। प्रथमानि पात्राम()-बेस मधु गुण है । यसारिन इस प्रकार वायु रोगाणुभोंसे रहित करने (सोमरस) के सबसे प्रथम दिए जानेवाले पात्र होते हैं (उसा घाला है। प्रकार भनिछी सबसे पहले स्तुति की पाती है)। इके मनाया यशमें ऋतुओंके अनुसार हवनीय द्रव्य मी ५ सविता देवः न (५७)- सूर्यके समान (अंचे हाले जाते हैं। जिम में हवा के बदलने से जिन रोयोका स्थान पर रहकर अन्नका दान करनेवाला यह ममि है) झना सम्भव है, न रोमोशे नष्ट करनेवाला बनस्पतियों के ६रयं च (18)- रयके समान (युमिपूर्वक रटौत्रका) अथवा रन बनस्पतियाँ कावेसे तैयार किए गए गायक धोका ७ पर्वतस्य पृष्ठात् अप. न (१८)- जिस प्रकार पंथम अभ्याय] अग्निको स्वरूप पवंतस जल बहते हैं, उसी प्रकार अमिके लिए स्तोत्र कहे ५ नः दशे देवः असि (१.)-तू हमें मार्ग दिखाने जाते हैं) वाला देव है। ८ अश्या आजि न जिग्युः (६८)-जिस प्रकार पोर ६ हे अंश देय ! कृष्टयः ते भोजसे नमः कृण्वन्ति जीतते हैं (वसी प्रकार ते। स्तुति तेरा वर्गन करके यशस्वी (19)- मनुष्य तेरे बलके लिए तम नमस्कार करते हैं । होती है) ७ अस्मे अमिनं अर्दया (११)- इसके लिए तु शनुका ९ धेनुं इव (७३)- गायके समान (अमि सबेरे प्रज्व नाश कर। लित होती है) ८ विश्ववेदसं अमात्य दूतं गिरा जसे (१२)- १० यद्वा च प्रपयां जिहाना: {५१)-वहा सर्वत भयवा सब भनॉक स्वामी, भमर दूत निको अपने थप जैसे अपनी शाखाओंको फैलाता है, (सस प्रकार अग्नि अनुकूल बनाता है। अपना ज्वालाओंको फैलाता है)। ९दिये दिवे दोषावस्ता घिया नमः भरन्तः धयं ११ चौः इव मसि (५)- धुलोकके समान (भग्नि त्वा पमलि (४)- प्रति रात्री और प्रतिदिन बुद्धिपूर्वक प्रकाशित होता है) नमस्कार करते हुए हम तेरे पास आते हैं। १२ गर्भिणीभिः सु-भृतः गर्म इव (७९)-गर्मिणी १० जरा-योधा विशे विशे यशियाय रद्राय खियां जिस प्रकार गर्भ धारण करती हैं (इस प्रकार दो भर- शीकं स्तोम, तत् विविढि (१५)- हे स्तुतिसे णियों के बीच में अग्नि रइतो है)। ज्ञात होनेवाले अमे प्रवेक प्रशाजनके हित के लिए पूज्य और १३ पुरः न (८३)- सूर्यके समान (अपने तेरस भीम शत्रुको रुलानेवाले अग्निके लिए ये स्त्रोत्र पढे जाते हैं, उन्हें प्रकाशित होता है) तुजान। १४ मित्रान (८४)- सूर्यके घमान ( अग्नि यशके। ११ अग्निः तिग्मेन तेजसा विश्व प्रत्रिग नि प्राप्त करता है) यसत् (२२)- भनि भपने तीक्ष्ण तेजसे सम खास शभुभाको १५ मित्रं न (१७)- मित्रके समान (अनिको आगे नष्ट करता है । अधि- साऊ, रोगोत्पादक कीटाणु । स्थापित करते हैं) १९ नः रयिं बसते (२२)- भान हमें धन देता है। १६ नामः चकन (९४)- अप (रपको) नामि १३ हे समेमृड (२३)- भो। हमें मुखौ कर। पकको धारण करती है, उसी प्रकार (सप स्वार अग्निक धाश्र. १४ महान् असि (२३)-तू महान है। यसे रहते हैं) १५ देवयु जनं मा मयः (२३)-ईवरकी उपासना १७ महस्य तोदस्प शरण इय (10)-पडे धनवा करनेवाले मनुष्य के पास उसकी सहायता के लिए ना। नके सेवक रामान (मैं अमिजावक है) १६ भार! न. अंहसः रोपता रक्ष (२४)- हे अने! ये उपाय आप्रेय-काण्डमें बाई है । इनमें 'न' यह शब्द हमारा पापी और हिंसक शभुओंसे संरक्षण कर । उपमार्थक है, और 'ध' (समान) के समान उसका अर्थ १७ मजर. प्रति ? प्रतिदह (२४)- बुढापेसे रहित तू अपनी ज्यालाओस शत्रु से जला दे। आग्नेय काण्डके सुभाषित १८ नक्ष्य विश्पते भने । वयं शुमन्त सुधीर १समिद्धा शुफा पुत्राणि जघनत ()-प्रज्वलित धीमहि (२६) हे शरणमें जाने योग्य, जापालक अरें। हुभा भनि पत्रों को मारता है। पृत्र- दोष, रोगों को पैदा करने हम तहसी तया नत्तम यार तेरा ध्यान करते हैं। साले कीटाणु। १९ घाजपविः कपिः दाशुषे रत्नानि बधत् (३.)- २३ अग्ने विश्वस्य अराठा, उत द्विपः मयस्य अन्नका खामी भोर शानी यह माम दानशील मनुष्यको सन महोमिना पाहि (१)-हे अप्ने । सय पात्रुओं और देष देता है। करनेवाले मनुष्यों से अपने महान् सामयसे हमारा संरक्षण कर। २० अध्वरे सत्पथर्माण कविं अनि उप स्तुति ३ मपर्वा रयां निरमन्यात (5)- अर्थाने तो गप (३२)-हिंसा रहित सहने पर धर्म प्रचार करनेवाले करके पक्ष किया। अमिती स्तुति करो। मलय मह ऊतये विवस्वत मा भर (1.) २१ देयं अमीय-वातनं (३२) -भग्नि देव रोग हमारे दाम रक्षण के लिए निवास करने योग्य । होता है।
सामवेदका सुबोध अनुवाद [मामयं काण्टम् २९ नः पीतये शं (३३)- पानी पीने के लिए कल्याण. पोरं मना घचे (५८)- जो तुझे हवि देवा है, वह खोत्र कारी हो। दरनेवाले, हजारौका पोषण करनेवाले दौर पुत्रको स्वयं पारमण २३ नः शंयोः अभिनवन्तु ( ३३, जनो ! हमें करता है, जन्म देता है। शान्ति और सुख दो। ४० अयं अग्निः सुवीर्यस्य सौभगस्य ईशे (६.)- २४ वयं जातवेदसं अमृतं प्रशंसिपम् (३५)-हम वह अनि उत्तम पराक्रम और साम ऐश्वर्यका स्वामी है । सर्वज्ञ भौर भमर भमिकी प्रशसा करते हैं। ४१ सु-अपत्यस्य ईशे (६.)- THम सन्तानका २५ गृहद्भिः अर्चिभिः शुक्रेण शोचिषा दीदिहि खामा है । (३५)-पही ज्यालाओं और शुद्ध तेजसे प्रकाशित हो। ४९ वृत्र-थानां शेि (६. )- घेरनेवाले शत्रुओं को २६ विश्पतिः रक्षसः तपानः (३९)- तू प्रमाणे मारनेवालोंमें यह सबसे मुख्य धार है। पालक और राक्षसोको सन्तार देनेवाला है। ४३ प्रचेताः पार्य यक्षि (3)- तु शानी उत्तम पन देनेवाला है। २७ जासषेद ! रवं अद्य उपधुंधः देवान् मा यह ४१ अतये सुमग सुदंसस सु प्रतूतिं अनहस (..)-हे ज्ञानी अमे! तू भाष सबैरै उठनेवाले देवाको ले आ। त्वा देवं ववृमहे (६२)- अपने संरक्षण के लिए उत्तम २८ त्ये चित्रः, ऊत्या राधांसि न. वोदय (पारहित नम देवो हम प्राप्त करते हैं । भागवान् , उत्तम कर्म करनेवाले, पापियों का नाश करनेवाले, तू विलक्षण शक्तिवाला है। संरक्षणों के साथ धनों को हमारे ४५ हविषा आ जुहोत, मर्जयध्वं (६३)- इयनीय पास मेज। १९नः तुचे गाघं विदाः (१)- हमारे सन्तानोंको द्रव्योंसे हवन करी, शुद्धता करो। ४६ वयं तव सरपे मा रिपाम (६६-इम तेही यादे। मित्रता नष्ट न हो। ३० श्रातः स्यं स-प्रधाः ऋतः कविः (४१)- ४७ अग्नि स्तनयित्नोः पुरा मवसे छणुचं (१९)- हे रक्षा अग्ने ! तू प्रसिद्ध, सत्य और ज्ञानी है। पहले अपने संरक्षण के लिए अग्निको विमलीसे उत्पन्न किया। ३१ हे पावक ! नः शस्य चयोधं रयिं रास्त (४३)-हे पवित्र करनेवाले भो। हमें प्रशंसित तथा भायुको कालसे भी पहले प्रज्वलित हुआ। ४८ अग्नि उपसा अग्रे गशोचि (७०)- ममि उपा पढानेवाला धन दे। ४९ नरः अरण्योः हस्तव्युतं गृहपति पनि जन- ३२ सुनीति, पुरुस्पृहं सुयशस्तरं ना राव (४३)- यन्त (७२)- मनुष्य अरणियों को एक पूसरे के ऊपर रख. उत्तम नीति के मार्गसे मिलनेवाले, बहुताद्वारा प्रशंसित, उत्तम पर हाथों से मपर घरके स्वामी अमिकी उत्पन करते हैं। यशको पढानेवाले घनको हम। ५.विश्वा मायाः मति (७५)-- सब प्राओंकी २३ यः विश्वा यसु दयते ( ४ )-ओ सय प्रशारके रक्षा करता है। धन देता है। ५१ ते रातिः मद्रा (७५)-तेरे दान कल्याण करने ३४ आर्यस्प वर्धनं माग्ने नः गिरः नक्षन्तु (४७)- वाले हैं। भार्योका संवर्धन करनेवाले थमिकी स्तुति हमारी वाणी काती है। : ५२ नः सूनुः तनयः स्यात्, से सुमतिः अस्मे ३५ ऋवा घरेण्यं भवः यामि (४८,-वेदमंत्रोंसे में या हमारे लिए सफल होवे । बिजाया भूतु (M)- हमारे पुत्र पनि हो, यह तुम्हारी श्रेष्ठ संरक्षण मांगता हूँ। ३६ श्रुतं अनि नरः सुवीतये छर्दिः (४९)- इय पीडा देनेवाले अनुमोका नाश करता है। ५३ सनात् यातुधानान् मृणासि (८.)- सदा तू प्रसिद्ध अग्निसे लोग उत्तम प्रकाश युक्त घर मांगते हैं। ५४ स्वा पृतनासुरक्षांसि न जिग्गुः (८. तुमे ३७ देवाः नये पंक्तिराघसं पोरं मच्छा नयन्तु युद्ध में राक्षम औत महीं सकते। .(५६)- सब देव मानद अतिका हित करनेवाले, समूहको ५५ सहमूरान् श्राव्यादः अनुदह (८.)- मत यारको बनानेवाले बोरो सरल और उमति मार्गसे ले सहित ये मौको सानेवालों जला सल। पाते हैं। ५६ ते देव्यायाः हत्यामा मुक्षत (८०/-रे दिम्प ३८दे भने । उचः सुतिष्ठ (५५)- हे अमेशखों में कोई न छूटे। अंचे स्थान पर रहा ५७ मोजिष्ठ घुम्नं भरसभ्यं मा भर (८१)- इल ३१ पातेवाशास उपयशसिनं सहपोषिणं खाने वाले तेजस्वी पन हमें मस्र दे।
प्रथम अध्याय प्रापि और देवतामाकी सूची (१७) यज्ञ का। ५८ पनीयसे राये नः प्र८1)- प्रशंसित धन जिसके प्रकाशको कोई भी रोक नहीं सकता ऐसे इस अभिमें मिलनेकामा हमें बता। ५९ वाजाय पन्या रारिस (८१)- अन्न मिलनेके ६९ तस्य मयः रिपुः मायया चन शीत (१०४)- मार्गको दिखा। उसपर कोई भी मनुष्य शत्रु कपटसे भी शासन नहीं कर सकता। ६० यदि वो स्यात् मर्त्यः अग्नि इन्धीत (८२) ७. त्यं वृजिनं रिपुं, दुराज्य स्तेने दबिष्ट मास्य यदि पुत्र हो तो मनुष्य अमिको प्रज्वलित करे । (१०५)- उस कपटी शनु और कठिन तासे नशम मानेवाले ६१ अस्मिन् अमत्यें विश्व मर्ताला हव्यं इन्यते' चोरको दूर कर । (८५)- इस अमर अनिमें सब मनुष्य हवनीय पदार्योका हवन ७१ सुगं कृधि (१:५)- हमारे मार्गको सुगम कर। ७२ है पौरमायिनः रक्षसः तपसा नि दह ६९ वृन-हन्तमं ज्येष्ठ मानवं मणि मगन्म (४९)- (१०६)- है वीर ! कपटी राक्षको अपनी ज्यालासे जला दे। वृनको मारनेवाले, येछ मानवों का हित करनेवाले, भामिक पास ७३ हे अने| त्वं यस्य सख्ये याविथ, स तय हम जाते हैं। सुधीरामिः ऊतिमिः प्रतरति (१०८)- है तू ६३६ बग्ने ! हरसा यातुधानस्य पलं विश्वता लिन मित्र होता है, वातरे 'टत्तम वीरोंसे युफ संरक्षणों परि प्रति शणीहि (९५) हे भो ! अपने तेजसे तू दुःोंसे पार हो जाता है । पीमा-कष्ट देनदाल राक्षसोक पलको सब ओरस नष्ट कर। ७४ मग्निः नः मदः (11)- अमि हमारा कल्याण ६४ रक्षसः पीय न्युज (५५)- राक्षसों की शक्ति करनेवाला हो। ७५ सत्पुम्न आभर (११३)- उस तेजस्वी धनको ६५ मन्द्रः पि अतिनिधा राजसि (100)- आन• हमें भरपूर है। न्दित अनि शत्रुओंको हटाकर शोभित होता है । ७६ सदने फैचिद् अत्रिणं आ सालहा (१३)- ६६ सातातिर मया करत् विधा अप (१.२)- हमारे घरमें कोई भी शत्रु हो उसे पूर कर । बह शान्ति और सुख देनवाला ममि हमें मुख देवे और शत्रुओं को ७७ दुब्य जनस्य मन्यु- धुरी बुद्धिनाले मनुष्योधकोष दूर करे। मी दूर कर। ६७ प्रीव्यां रिध (1.)--शको पराजित ७८ सु-प्रीतामनुपः विशे विश्वा रक्षासि प्रति. करनेवालकी स्तुति कर। धति (११४- सन्नु हुमा अग्नि मनुष्य के परमें सब राक्ष- ६८ अनुमीत-शोचिपं जातवेदसं यजस (१.३)- साँको दूर करता है । नष्ट कर। आनेय काण्डके ऋषि और देवताओंकी सूची ऋग्वेदस्थान देवता भमि छन्द: गायत्री मंत्र-संख्या १ २ ३ " १२१२१ " 1 ऋषि भरद्वाजी पाईस्पत्यः माताजी बाईस्पत्यः मेधातिषिः पाप भरद्वाजी बाईपल्या उशनाच्या मुदातिपुरुमायो आंगिरसो भरद्वाजोगाईस्पत्यः यसः पाव' मरदात्रीबाईपत्यः " । " " ८1८४१ ८७१६१ " " . Con ८१७ ६१६१३ . । " ८७५१० १ आयुक्तादि वामदेव गौतमः सामर्षदको सुयोघ मनुवाद माप्यं काण्डम देवता ऋग्वरस्थान का१०।१३ छन्दः বাবা " . मंत्र-संश्या १३ १४ १५ 1 . २७१० " " . ११११ 1108 दा१०।१२ ८६०० " . " . . " " २३ २४ २५ . ॥ " " ८.२०१७ ६।११।२८ ११ ७१५।११ ६।१६४३ १७ ८1०१६ १२७४ C७४।११ ४१५३ १५०११ " प्रयोगों मामेवा मधुरउन्दा वैशामित्रः शुनाशेप भाजीगतिः मेधातिथिः काम शुनः शेप आणागतिः प्रयोगी मार्गद प्रयोगी मार्गवा वसाय: (३) प्रयोगो भार्गवः मरवाजो बाईपला वामदेव गौतमः घसिष्ठो मंत्रावणिः মাসী আখঃ वसिष्टो मैत्रावरुणा विरूप भागिरसा शुनोप माजीतिः गोपदन प्रायः बामदेव गौतमः प्रस्कन्दः वाय मेघातिपिकापा सिन्धुदीप बाम्बरोपः त्रित भाग्योदा उशना काम्या (४) युईि सत्या भग: प्रागाथा शंयुषदिसलः बरिष्ठो मैत्रावणिः भः प्रागापः प्रवः काव शेयुर्हिस्पत्या मंगा प्रागाथ भर्ग: प्राणाय- सौभरिः काण्वः २७ ०८ . " १०।९।४ 21080 " ५० " . 11 " " ६४८१ ८६०५ ६४८1७ ७९६७ ८६०१९ १।४४१ ६४दार . " ४० " h " ८६०१११ ८१०३६ 88 बसिष्ठी मत्रावणि " " ४५ 8६ ७१६१ ८६०१५ भगः प्रागापः H " प्रथम अध्याय] प्रापि और देवताओंकी सूची मंत्र-संख्या ऋषि ব্য ऋग्वेदस्थान ८१०३१ कार सौभात काश्य बृहसी " BE " मनुवरखता अदीतिपुरूमीळाकारसा ४९ . " प्रस्कण्वः काण्वः . " सौमरिय काय. " शा१३ दा१०३२ ८११८ ३२९२ २०३६।१९ मेधातिथिमेध्यातिथी काण्या विश्वामित्रो गाधिनः कण्वो धौरः भमि " ५० ७१।११ १।१०।३ " " " मम्रणम्पतिः यूप भाना ५८ वसिष्ठी मेनापणि हको पौरस कण्वो घोर सामारः काव कण्वो धौरः उत्कीलः कात्यः पमिछ। मैत्रावरणि विश्वामित्रों गायिन. ८.१०३४ 8 " ६० ॥ २१६१ ७१६५ ३।११ " " ६२ " ६४ . १०।११५१ १०.५६१ १०९।१ ६.७१ ६२४६ १ टा ૨૦૧૮ অ্য त्रियुप् जाती त्रियुप् " " " ७० " " " ७२ श्यावाचो वामदेवोश उपस्तुले पाहिएभ्यः बृहदुक्यो वामदेण्य. कुस्स भागिरयः मरवाती राईस्पत्यः माद्वाजो बाईस्पत्यः वामदेव गौतम वसिष्ठी मेवावणि त्रिशिरास्त्वाष्ट्र. वसिष्ठो मैत्राक्कशि. (८) धुधगविष्ठिरावायो वस्वप्रिलिंदनः भरद्वाली बाई सत्य विशामेनो मापिन बरपत्रिकदन: बसिहो मैत्रावणिः विश्वामित्रो पाविना पाशुभारमात्र " विश विपद गायत्री " त्रिभु " ७ ७५ १०।०६५ ६५८१ 19 पूमा मामा " " १०७६१ ७६१ ७८ . " 7 ८० १०८७१९ अफ ऐन्द्र काण्डम् । अथ द्वितीयोऽध्यायः। ३१२३ . (१-१०) १ युर्हिस्पत्यः, २ श्रुतकक्षः सुकको या आंगिरस.; ३ हर्यतः मागायः, ४,५ भुतकशः (ऋ० गुकक्षो या, ५ मुकमः ) आगिरसः; ६ देवजामय इन्द्रमातरः ऋषिकाः; ७, ८ गोपूक्त्यश्वसस्तिनी करण्यायनौ; ९, १० मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधाचागिरराः || इन्द्रः ( ऋ० ३ अग्निहबोपि वा) ॥ गायत्री ॥ ११५ तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिन ॥१॥ (ऋ. ६।४।२२ ) ११६ यस्तै नून शतकतावन्द्र धुम्नितमो मदः । तेन नन मद मदेः ॥२॥ (*. १९२।१६ ) ११७ गाव उप वदावटै मही यज्ञस्य रसुदा । उभा को हिरण्यया ॥३॥ (ऋ. ८1७२।१२; वा. यजु, ३११९) ११८ अरमवाय गायत श्रुतकक्षार गये । अरमिन्द्रस्य धाम्ने ॥४॥ (*. १९२१२५) ११९ तमिन्द्र वाजयामसि महे त्राय हन्तवे । स वृषा वृषमो मुवत् ॥५॥ (ऋ. ८1९३६७) (१)प्रथमः खण्डः। । ११५] हे स्तुति करनेवाले उपासको ! (चः सुते) तुम्हारे सोम तय्यार करनेके ग्राद (पुरुहूताय सत्यने) अनेकों जिसको स्तुति करते है, ऐसे इस बलवान् इन्द्र के लिए (तत् सबा गाय) उन स्तोत्रोंको एक स्थान पर बैठ करके गानो । (यत) जो स्तोत्र (गवे न) गायको जैसे घास सुख देते हैं, उसी प्रकार शाकिने शं) शक्तिमान् इन्द्रको सुस देते है॥१॥ १ पुरु-हताय सत्वने सचा गाय- अनेकोंसे प्रशसित मास्तिशाली इन्द्र के गुणोंका गान करो। 1११६ ) है (शत-तो) संकदो प्रकारके कर्म करनेवाले इन्द्र । (यः द्युति-तमः मदः) जो तेनस्यो सोमररा (नूनं ते) निश्चित रूपसे तेरे लिये तैयार किया गया था, (तेन नूनं ) उस रससे निश्चपसे तू ( मदे ) मानदित हुआ, उस कारण हमें भी (मदेः) पनादि देकर तू मानन्दित कर ॥ २॥ [१९७) है (गायः) गोको । तुम ( अयटे) यज्ञके स्थानको (उप पद) मामो, तुम यास्य मही रप्सुदा) यतके लिए बहुतसा दूष रूपी मान देनेवाली हो । तुम्हारे ( उभा कर्णा हिरण्यया) दोनों ही कान सोने के आभूपों। शोभित हं ॥३॥ १ गायः ! भवटे यहस्य मही रप्मुदा-है गायो ! तुम यज्ञमें बहुतसा अन्म देती हो । [११८] है । श्रुतकक्ष) भूत-कक्ष ! ( अभ्याय मरं) पोडेके लिए ( गये अरं ) गायके लिए, (इन्द्रस्य धाने पर के स्थान के लिए पर्याप्त मात्रा ( गायत) स्तोत्रोंका गान कर ॥४॥ ६११९] ( महे वृप्राय इन्तये) उस महान् पत्रको मारने के लिए (तं इन्द) उस इन्द्रको हम (पाजयामसि) प्रसंसा करते है, स्तुति करते हैं। (सापा) यह बालवान् इन्द्र ( वृषभः भवत् ) हमें पन देनेवाल होये ॥५॥ १पम:- मलयान्, भनकी वृष्टि करनेवाला, कामना पूर्ण करनेवाला। २मदे माय इन्तये इदं पाजामसि-महान् शमिताली पुत्र पर करने के लिए हम इसको प्रशंसा करते है। ६ (पामदि) (४२) सामवेदका सुयोघ अनुपाद पेिन्द्र कानम् 9 स १२० त्वमिन्द्र घलादधि सहसो जात ओजसः । वसन्पन्पेदसि ॥ ६॥ (ऋ. १०।१५३३२) १२१ यज्ञ इन्द्रभवर्धयद्यद्भमि व्यवर्तयत् । चक्राण ओपशं दिवि ॥७॥ (ऋ. १४५) १२२ यदिन्द्राई यथा त्वमीशीय वस्व एक इव । स्तोता में गोसखा स्यात् ।। ८ ॥ (ऋ. ८।१४ १२३ पन्यपन्यमित्सोतार आ धावत माय । सोम वीराप शूराय ॥ ९ ॥ (ऋ. दारा२५) १२४ इदं बसो सुतमन्धः पिया सुपूर्णमुदरम् । अनामयिरिमा ते ।। १० ।। (ऋ. १२) इति तृतीया दशतिः ।। ३ ।। प्रथमः खण्डः ॥ १॥ / स्व० १०१३० ४ । पा० ४६ । (भू) ॥] [४] (१-१०), २ सुमधाभुतकक्षी (ऋ० सुरुमा आगिरसः); ३ भारद्वाजः (१० शंयुबहिस्सत्यः); ४ भुतकक्षः (ऋ० सुकक्षो या आगिरसः) । ५, ६ मधुच्छन्दा वंश्वामित्रः; ७, ९, १० विशोकः काभ्यः; ८ वसिष्ठो मंत्रावणिः ॥ इन्द्रः (९३० भनीन्त्री) ॥ गायत्री ॥ १२५ उद्धदमि श्रुतामयं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेपि सूर्य ॥१॥ (ऋ. १३१) (२२० ] हे इन्द्र ! (त्वं ) (सहसः यला ) शत्रुयो पराभव करनेवाले बलरो तरा (ओजसः) सामर्थ्यसे (अधिजातः । प्रसिद्ध है; हे (पन ) बलवान् इन्द्र ! तू (सन् ) धलपान होते हुए भी ( पृपा इत् असि ) इच्छित पदार्यको देने वाला है॥६॥ १ हे हुन्द्र ! त्वं सहसः बलात् ओजसः अधिजात:- हे इन्द्र ! तू साहस, यल और सामयंके कारण सबसे श्रेष्ठ है। ( १२१ ] ( यत् ) जिस यज्ञने (दिवि ) आकाशमें (ोपर्श चक्राणः) लटकाकर (भूमि वि अवर्तयत् भूमिको घुमाते हुए रखा है, उस (यशः) मजने (इन्द्र अवर्धयत् ) इन्द्रका यश बढाया ॥७॥ [ १२२ ] हे इन्त्र ! (यथा त्वं ) जसे तू ( एकः इत् ) अकेला ही ( वस्वः) पनोंका स्वामी है, उस प्रकार (अहं ) में भी ( यत् इंशीय ) यदि पोंकर स्वामी हो नाऊँ, तो (मे स्तोता ) मेरो स्तुति करनेवाला ( गो-सखा स्यात् ) गार्योका मित्र हो जाये ॥८॥ { १२३ 1 है (सोतारः ) सोमयज्ञ करनेवाले याजको 1 ( मद्याय शूराय बीराय) आनन्दित, शूरवीर इन्द्रके लिए (पन्यं पन्यं इत् ) प्रशंसाके योग्य (सोमं आ धावन ) सोमरसका अर्पण करो ॥९॥ १ धोराय शूपय एन्यं सोमं आघावत-शूरवीर इन्द्र के लिए प्रशंसनीय सोमरस हो । [ १२४ } है ( वसो) सयको बसानेवाले इन्द्र ! (वं सुतं गन्धः) इस सोमरस रूपी अमको ( पिय) पो, निरासे (उदरं सुपूर्ण) तेरा पेट पूरा भर जाप । है (अनाभयिन् ) निर्भय इन्द्र ! (ते ररिम ) तेरे भानन्दके लिए यह सोमरस हम देते है ॥ १० ॥ १ अनामयिन् ! ते ररिम- हे निर्भय इन्द्र ! तुझे आनन्द हो, इसलिए ये सोमरस हम देते हैं। ॥ यहां पहिला खंड समाप्त हुआ। [२] द्वितीयः खण्डः। [१२५] है (सूर्य) सूर्यरूपी इन्द्र ! तू (भुता-गर्घ) प्रसिद्ध धनवान् (पमं) बलवान् (न-अपसं) मान- धोंके हितके लिए कार्य करनेवाला और (अस्तार) शस्त्र फेंकनेवाला है (इदं उदेषि ध) ऐसा न मम उदय हो रहा ३ नुतामघं वृपभ नर्यापसं अस्ताएं-- प्रसिट, धनवान्, दलवान्, मानका हित करनेवाले और शनुपर मास्न फैरनेवाले इन्द्रकी प्रशमा कर।
द्वितीय आपाय] सामवेदका सुघोघ अनुवाद (४३) १ ३ ३" 3 १२६ पदय कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य । सो तदिन्द्र ते वो ॥२॥ (क. ८/९३४) १२७ य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम् । इन्द्रः स नो युवा सखा॥ ३॥ (अ. ६।५।१) १२८ मा न इन्द्राम्याई दिशा मरो अक्तुष्या यमत् । त्या युजा वनेम तत् ॥४॥(ऋ. ८.९२॥३१) १२९ एन्द्र सानसियमजित्वान सदासदम् । पर्षिष्ठमूतये मर ॥५॥ (ऋ. १८०१) १३० इन्द्र वयं महाधन इन्द्रममें हवामहे । युज पोप वञ्जिणम् ॥६॥ (ऋ. १७१९) १३१ अपियकद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाहे । तपाददिष्ट पोस्यम् ॥७॥(8. ८४५२६) [ १२६ ) है (पुत्र हन् ) शत्रुको मारनेवाले (सूर्य) सूर्यरूपी इन्द्र ! ( अध) आग ( अभि उद्गाः) व उदय हुआ है, हे इन्द्र ! (तत् सर्वे) वह सब (ते चशे) तैरे अधीन है ॥ २ ॥ १ ते यशे तत् सर्व-तेरे आधीन सब कुछ है। [ १२७] (यः) जो इन्द्र शत्रु द्वारा दूर फेके हुए (तुर्मशं यदु ) तुर्वश मौर यदुको (सु-नीती) उत्तम नोतिरो (परावतः आनयत्)दूरस्थानसे भी पास ले आया (युवासः इन्द्रः) ऐसा वह तरुण इन्द्र (नःसपा)हमारा मित्र है।।३।। १ यः सुनीती नुर्वशं यहूं परायतः आनयत्, युवा सः नः सखा- जो इन्द्र तुर्दश और पदुको उत्तम मार्गसे सुखसे ले माया, ऐसा यह इन हमारा मित्र है। 1 १२८ ] है इन्द्र ! (आदिशः) चारों दिमाओरो शस्त्रोंको फेंकने वाला । सूरः) निरन्तर चलनेवाला रारा (अक्तुषु) राभियोंमें (नः मा अम्पायमत्) हमारे ऊपर आक्रमण करनेकी इच्छासे न आवे, और यदि यह आ भी जाये तो (तत् त्वा युजा) तेरी राहायतारो (चनेम ) उसको हम मार दें॥४॥ १ आदिशः सूरः अतुपु नःमा अभ्यायम, तत् त्या युजा वनेम-धारों विशासि धास्त्रोको फेंकते हुए राक्षस रात्रीके समय हम पर आक्रमण न करे, और यदि वह को भी तो तेरो सहायतासे हम उसे मार दें। [१२९ 1 हे इन्द्र ! (ऊतये) हमारे सेरमणके लिए (सानसिं) उत्तम उपभोग देनेवाले (स-जित्वानं) शत्रु पर विजय दिलानेवाले (सदा-सह) सदा शत्रुको हरानेवाले (यर्पिष्ट रपि) श्रेष्ठ पनसे (आमर) हमें भर ॥५॥ (१) ऊतये सानसि सजित्वानं सदासह वर्षिष्ट यि आभर- हमारे संरक्षणके लिए उपभोगके योग्य, शत्रुपर विजय प्राप्त करानेवाले, हमेशा शत्रुओंको हरानेवाले घेष्ठ धनोंसे हमें भर दे। [१३० १(वयं) हम (महायने) वडे संप्राममें (इन्द्र) इसको बुलाते हैं, (यमें इन्द्रं हवामहे ) छोटे पुद्धम भी इन्दको बुलाते हैं, (पु) पत्र साथ होनेवाले युद्धोंमें भी (युजं वञिण ) सहायता करनेवाले राया वन पारण करनेवाले इन्द्रको हम बुलाते है ॥६॥ (१) ययं महाधने, अर्भ, त्रेषु युजं वनिणं हवामहे- हम बड़े सया छोटे संग्रामोंमें तथा पत्रके माकरणों में सहायता करने वाले तया वनको धारण करने वाले इन्द्रको सहायतारे लिए बुलाते है। (१३१] (इन्द्रः) इन्द्रने (कद्यः)का ऋषिके (सुनं परत्) सोमरसको पो लिया, (सहस्रपा) हजारों भुजाभावाले शत्रुको युदमें मारा (तर) उसमें इन्द्रपा (पोस्रं आददिष्ट) माम प्रपन्ट हुआ ॥७॥ (६) सहन-यातुः-- हजारों सैनिको रसनेवाला । (२) सहनशाहे तत्र पास्यं भाददिष्ट-- सहन पाहु नामक दात्रुको मारा उससे इन्द्रको शरित समरी।
(४३)
सामधेदका सुबोध अनुवाद
(पेन्द्र काण्डम्
२.
१३२ वमिन्द्र स्वायवोऽभि प्र नौनुमो वृषन् । विद्धी त्वा ३ स्य नो वसो ॥ ८ ॥
(ऋ.७३१।४)
१३३ आ पा ये अभिमिन्धते स्तृणन्ति बहिरानुषक् । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥९॥
(8. ८४५१)
१३४ मिन्धि विश्वा अप द्विपः परि वायो नही मृधः । वसु स्पाई तदा मर ॥१०॥
(ऋ.८१४५/४०)
इति चतुर्थो वशतिः॥४॥ द्वितीयः खण्डः ॥ २॥ [स्व० ८।०३ । पा० ३२ । (डा) |)
(१-१०) १ कण्वो पौर, २ विशोकः काण्वः; ३ वत्सः काण्वः ४ कुसोरी काण्यः, ५ मेधातिपिः काण्यः
६ श्रुतकक्षः (ऋ० सुकक्षः) आगिरसः ७ श्यावाश्व आत्रेयः ८प्रगापः काकः ९बरस काय
१० इरिबिटि. कायः॥ इन्द्रः।। (३०१ मरुतः, ४ विश्वे देवा. ५ब्रह्मणस्पति.; ७ सविता)॥गायत्री॥
३१२
१३५ इहेय मृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि याम चित्रमृजते
॥१॥(ऋ. १३७१३)
१३६ इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः । पुष्टावन्तो यथा पशुम् ।।२।।
१. ११
।
स.२
१२
3
.
३"
!
[१३२ ) हे (वृपन् इन्द्र) बलवान् इन्द्र ! (त्वायवः) तुझे पानेको इश करनेवाले हम तुझे (अभि नोनुमः)
सामनेसे नमस्कार करते है, है (चसो) सबको निवास देनेवाले इन्द्र! (अस्प नः विद्धि ) इस हमारे स्तोत्रो भावको
समक्ष॥८॥
[१३३] (ये) जो ऋत्विज (आ घा) मागे होकर (अनि इन्धते ) अग्निको जलाते हैं, (येषा) जिनका (युवा
इन्द्रः सखा ) तरुण इन्द्र मित्र है, जिसके लिए वे (थानुपक् यहि स्तुणन्ति) क्रमसे आसनको फैलाते हैं ॥९॥
[१३८ । (विश्याः द्विपः) सब शत्रुओंका ( अप भिन्धि ) नाश कर, (बाधः मृधः परि जाहि) विन गलने-
वाले शत्रुओंको हरा, उसके बाद (स्पा तत् वसु) चाहने योग्य धन (आ भर ) हमें भरपर वे ॥१०॥
(१) विश्वाः द्विषः अभिन्धि- सब शत्रुओंका नाश कर। (२) धाघः मृधः परि जहि-~-विन
करनेवाले शत्रुओंको हरा । (३) स्पाहे घसु आभर- चाहने योग्य धनको हमें भरपूर थे।
यहाँ दूसरा खंड समाप्त हुआ।
[३] तृतीयः खण्डः।
[१३५] (एप हस्तेपु कशाः) इत महतोके हाथों में चाबुम है, वे ( यद् बदान ) जो शरद करते हैं उनको में
(रह इव शृण्वे ) यहीं होने के समान सुनता हूँ, वह धनि (याम ) युद्ध में (चिनं न्यूखते) अदभुत शक्तिको दिखाता
है ॥१॥
१ याम चित्रं न्युअते- युद्धमें आश्चर्यजनक सामथ्र्य दिखाता है।
। १३६) हे इन्ट 1 ( इमे सोमिनः सखायः) ये सोमयाग करनेवाले मित्र (पुष्पापन्तः यथा पो जातको
हायमें लिए हुए शिकारी जैसे पशुको रेखते हैं, उसी तरह एकाग्र चित्त होकर (त्या विचक्षते) तुझे विशेष करके
देखते है॥२॥
द्वितीय अध्याय) सामवेदका सुबोध अनुवाद (४५) ३१ " ३"12 ३. - १३७ समस्य मन्यत्र वियो विश्वा नमन्त कुष्टयः । समुद्रायैव सिन्धवः ॥३॥ (ऋ. ८६४ } १३८ देवानामिदयो महत्तदा वृणीमहे क्यम् । वृष्णामसम्पमूतये ॥४॥ (ऋ. ८1८३१) १३९ सोमानास्वरणं कहि ब्रह्माणस्पते । कक्षीयन्तं य औशिजः ॥५॥ (११) १४० घोषन्मना इदस्तु नो वृनदा भूर्यासुतिः । भृणोतु शक्र आशिपम् ॥ ६ (७. ९३।१८) १४१ अद्य नो देव सवितः प्रजावत्सायोः सौभगम् । परा दुःस्वप्न्य रसुव॥ ७॥ (ऋ ५॥८२।४ ) १४२ क्वश्स्य वृपभो युवा तुविनीयो अनानतः । ब्रह्मा कस्तसपर्यति ॥ ८॥ (ऋ. ८१६४७ ) १४३ उपहरे गिरोणार गासङ्गमे च नदीनाम् । घिया विप्रो अजायत ॥९॥(ऋ.८१६२८) [१३७ ॥ (विध्वाः कृष्टयः विशः) सब प्रजायें ( अस्य मन्यये) इसके स्तोत्रको सुनने के लिए (सनुदाय सिन्धयः इच) जिस प्रकार समुद्रफी ओर नदिया दौडतो है, उस प्रकार (सं नमन्त) सब मिलकर नन होकर बैठती है ॥३॥ मन्यु--क्रोध, स्तोत्र, मननीय वचन (१३८ । (देवानां अवः इत् महत्) देवोरे ये सरक्षण निश्चयसे महान् है । (घृष्णां तत् ) कामनाओंको पूर्ण करनेवाले उन देवोंसे मिलनेवाले सरक्षणोंको (अस्मम् ऊतये) अपने संरक्षणके लिए (अयं आवृणीमहे) हम स्योकार करते है ॥४॥ (१) देवानां अवः महत् इत्- देवोंसे मिलनेवाले सरक्षण निश्चयसे महान् है । (२) पृष्णां तत् अस्मभ्य ऊतये वयं आवृणीमहे- हमारी इच्छा पूर्ण करनेवाले सरक्षणरे साधनोंको अपनी रक्षाके लिए हम स्वीकार करते है। {१३९) हे बह्मणस्पते ! (सोमानां) सोमयज्ञ करनेवाले (फनीवन्तं ) कमोवान्को (यः भोशिजः) जो उशिषका पुत्र है, (स्थरणं कृणुहि) प्रकाशमान र ॥५॥ [१४० 1 (वृत्र-हा) पुत्र रामसको मारनेवाला, (भूरि-आसुतिः ) जिसके लिए बहुतसे लोग सोमरस तय्यार करते हैं, यह इन्द्र (नः) हमारी (बोधत्-मनाः) इच्छाको जाननेवाला (इह अस्तु ) पहा होये । वह (शमा ) साम• वात् इन्द्र (आशिपं गृणोतु) हमारी स्तुति सुने ॥ ६ ॥ १४१ है ( सविनः देव) पूर्य देव ! (नः) हमें ( अद्य) आन (प्रजापत् सोमगं) पुत्र पौधोंसे मुक्त ऐश्वयं-धन (सावीः) (दुचन्यं परा सुब) दुसरायर स्वप्नोको लानेवाले दुर्भाग्य हमसे दूर कर ॥७॥ (१) सवितः देव! नः अद्य प्रजावत् सौभगं सावीः- है सविता देव ! हमें मान पुन पौरोंसे पुस्त धन दे। (२) दुय्वप्न्यं परा सुख-दुख देने वाले स्वप्नों दूर कर । (१४२] (सापभः) वह सामर्यवान् (युवा) तरुण (तुषि-ग्रीवः) मनबून गर्दनवाला( मनानतः) कभी भी किसीसे न झुक्नेवाला (क) कहा है ? (कः ब्रह्मा) कौन ज्ञानी (तं सपति) उसको पूजा करता है ? 11८॥ (१)स पृषभः युवा तुचिनीयः अनानतः घा-- वह तरुण, बलवान्, मजबूत गर्दनवाला, किसीसे न शुकाया जानेवाला इन्द्र कहाँ है ? (२) तुनिमी:-- गर्दन जिसको यो है। (1) अनानतः- किसीसे न झुकाया जा सक्नेवाला। ११४३ (गिरीणां उपहरे) पर्वतोगरी उपत्यकामें (च) और (नदीनो संगमे ) नदियोंके संगमपर (धिया) भरनी बक्षिसे-मानी स्तुतियोंत (विमः अजायत) मनुष्य विशेष शानी होता है 11 ९ ॥
सामवेवका सुयोघ अनुवाद
[पेन्द्र काण्टम्
१
१४४ प्र संम्राज चर्षणीनामिन्द्ररस्तोता नव्य गीमि। । नर नृपाह महिष्ठम् ॥१०॥
(ऋ८६१)
इति पञ्चमी दाति ॥ ५॥ तृतीय षण्ड ॥३॥ स्व० ९ । उ० ना०। पा० ४४ । लो।]
इति द्वितीयप्रपाउके प्रथमोऽध ॥१॥
[६]
(१-१०) १ श्रुतकक्ष (ऋ० सुकमा ) आङगिरस , २ मेधातिथि (०शयुर्वाहस्पत्य) काप', ३ गोतमो
राहगण', ४ भरद्वाजो बाहस्पत्य ५ बिदु पूतदक्षो या आइगिरस , ६, ७ धृतकक्ष सुकक्षो वा (ऋ०
सुकम ) शागिरस , ८ वत्स काण्व , ९शुन शप आनोगत १० शुन शपो माजोगति, वामदेयो
था ॥ (ऋ. इसापूपणो) ५ मात ॥ गायत्री।।
१४५ अपादु शिष्यन्धसः सुदक्षस्य प्रहोपिणः । इन्दौरिन्द्रो याशिरः ॥ १॥ (ऋ ८९२।४ )
१४६ इमा उ त्या पुरूवसोऽभि प्र नौनुनगिरः । गावो यत्स न धेनवः।। २ ।। ( ना ६/४५।२६)
१४७ अत्राह गोरमन्चत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इन्धा चन्द्रमसो गृहे ॥३॥(ऋ ११८४११५)
१४८ यदिन्द्रो अभयद्रितो महीरपो धूपन्तमः । तत्र पूपाभवत्सचा
॥४॥(६/५७१४)
.
४३१२
१२% २१
३२.२
[१४४ ] (चर्षणीना सम्राज) मनुष्योंमें उत्तम रोतिसे प्रकाशमान होनशाले (गीर्भि नव्य) स्तनोंसे स्तुति
फरमके योग्य (चाह नरं.) शत्रुओंको पराजित करनवाले नता (महिए इन्द्र) महान इनकी (प्रस्तोत) स्तुति
कर।।१०॥
(१) चर्षणीना सम्राज नृपाह नर महित इन्द्र प्रस्तोत- मनुष्योंमें सम्राट शत्रुओंको हरानयाने
नता महान इद्रको स्तुति करो।
॥ यहा तीसरा खड समाप्त हुआ।
१४] चतुर्थ खण्ड ।
(१४५] (शिग्री इन्द्र ) शिरस्त्राण धारण करनवाले इद्रने (प्र-होषिण सुदक्षस्य) विशष हवन करनवाले
सुपरसपने (फाशर) जो बाट आरे दूधपोमा दो बायस) समरसर पर ब्राप्तो पार सपा
१४६] है (पुरू-बसो) अनको प्रकारके धन रतनवाले इन्द्र (गाव धेनव वत्स न) जिस प्रकार दूध देत
मालो गायें अपन बछडों के पास जाती ह उसी प्रकार (त्या) तुझ (इमा गिर मनोनयु) स्तोत्र बार बार प्राप्त
होले ह तेरी बार बार स्तुति करते ह ॥२॥
[१४७] (अत्रा ह) इस (गोः चन्द्रमस ) गतिमान् च के (गृहे) घरम-च दमण्डलमें (त्या ) त्वष्टा इस
अपका (म-पीच्य नाम) रात्री के समय छिप जानेवाला प्रसिद्ध तेज ह (इत्था अमन्यत) ऐसा लोग मानते हैं ॥ ३॥
[१८] ( यत् पुप तम इन्द्र ) जब बहुत बलवाला इ7 (मही रित ) ब बड़ प्रवाहोंके रूपमें बहनेवाले
(अप) पर्यास आये हुए जलोंको (अनयत्) बहाता है (तर) तब (पूपा सचा भुवत्) पूषा उसका सहायक
होता ह ॥४॥
द्वितीय अध्याय) सामवेदका मुयोध मनुवाद (४७) १४९ गौर्धयति मरुतारश्रवस्युमाता मघोनाम् । युक्ता बहा रयानाम् ॥ ५ ॥ (B. ८/९४१) १५. उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पत्ते । उप नो हरिमिः सुतम् ।। ६ ।। (.८।९३६३१) १५१ इष्टा होगा असृक्षतेन्द्र वृधन्तो अधरे । अछातभृधमोजसा ॥ ७ ॥ (१.८/९३।२३) १५२ अहमिद्धि पितुष्परि मेघामृतस्य जग्रह । अहरपर्य इवाजनि ॥८॥ (ऋ. ८६१०) १५३ रेवतीनः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः । भुमन्तो याभिमदेम ॥९॥ अ. १।३०।१०) . १५४ सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासा सुक्षितीनाम् । देवना रथ्योहिता ॥ १० ॥ इति षष्ठी वशतिः॥६॥ धतुर्यः तण्डः ॥ ४॥ [स्य० ८11० ५। पा० ४४। (गो)।] (१-१०) १, ४ श्रुतका सुरक्षो का माइनिरतः२ प्रसिष्ठो मंगावरुणिः; ३ मेधातिथिः पाण्यः; प्रियमेपश्चागिरसः; ५ इरिचिलिः काण्वः; ६. १० मपच्छन्दा बश्यामित्र: ७ निशोकः काण्या; ८ कुसोदी काण्वः ९ पुनः शेष भागी- गतिः बद्रः ।। गायत्री ।। १५५ पान्तमा वौ अन्धत इन्द्रममि म गायत । विश्वासाहशतक मरहिष्ठं चर्षणीनाम् ॥ १ ॥ (ऋ.८९२) - -- {१४९ (मघोनां मरुतां) पनयान् मगलोंकी ( माता) माता (स्थानां युक्ता पह्निः ) रयोंमें जोडी हुई और उनको खोचनेवाली (गोः) पाय (श्रवस्युः) अम देनेरी इच्छा करती हुई (धयति) दूध देतो है ।। ५ ।। [१५० 1 है (मदानां पते) सोमरसोंके स्वामी इन्द्र ! (हरिभिः) अपने पोझेसे (नः मतं उप यादि) हमारे सोम पहमें आ । (हरिभिः नः सुतं उपयाहि ) घोडोसे हमारे यज्ञमें भा ॥ ६ ॥ ११५१] (अध्वरे वृधन्तः) हमारे यसमें इन्द्रको प्रशंसा करते हुए (इष्टाः होत्राः ) यज्ञ करनेवाले होता गण (अवभृथं अच्छ) अवभूय स्नान होनेतक (ओजसा) अपने बलमे (इन्द्र असृक्षत) इन्द्र के लिए माहुति देते हैं ॥७॥ १९५२] (अहं इत्) मन (पितुः पठनस्य मेधां ) पालन करनेवाले यतस्पी इन्त्रको सुद्धिको (परि जग्रह) अपनी ओर मोड लिया है। (हि) इस कारण में (सूर्यः इव अजनि) सूर्यके समान तेगस्यो हो गया हूँ॥८॥ (१५३ । ( याभिः क्षु-मन्तः मदेम) जिसको सहापतारो हम अन्न मुक्त होकर आनन्दित होते है, (सधमादे इन्द्र) इन्द्र के साथ हर्षसे मुक्त होकर (नः) हमारी यह गाय (रेवतीः ) दूध और घी देनेवाली होकर (तुवि-बाजाः सन्तु) अधिक बाल देनेवालो हो ॥९॥ (१५४] (देवना) देवोंमें (रथ्यः अर्हिता) रयपर मंठने योग्य (सोमः) सोम (पूषा च) और पूषा (विश्वासां मुक्षितीनां चेततुः) सब मनुष्योंको उत्साह देने वाले हैं ॥ १०॥ ॥ यहां चौथा पंड समाप्त हुआ। [५] पञ्चमः खण्डः। [१५५] (वः) तुम (विश्वा-माई) सब शत्रुओंके नाश करनेवाले (शतभातुं) संकडों कर्म करनेवाले (चर्ष- णीनां महिछं) मनुष्योम महान् सामथ्र्यबाली (अन्धसः बापान्तं) सोमरस पीनेवाले (इन्द्रं अभिम गायत) इन्द्रका विशेष स्तुतिरो गान करो॥१॥ १ विश्वासाई शतकतुं चर्षणीनां मंहिष्ठ इन्द्रं भभि भगायत- सब शत्रुकि नाश करनेवाले, संकों कम करनवाले, प्रनाओं में सर्वाधिक शक्तिशाली, इन्द्र के गुणोंका स्तुतिसे गान करो।
(१८) सामवेदेका सुयोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम् २. १५६ प्र व इन्द्राय मादनहर्यश्वाय गायत । संसाया सोमपात्रे ॥२ ।। (ऋ. १९०१) १५७ क्यमु त्वा तदिदी इन्द्र त्वायन्तः सखायः । कण्वा उक्थेभिर्नरन्ते॥ ३॥ऋ. ८/२०१६) १५८ इन्द्राय मदने सुत्त परि टोभन्तु नो गिरः । अमर्चन्तु कारयः ॥४॥३.८९२।१९) १५९ अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बहिपि । एहोमस्य या पिय ॥५॥(ऋ. १७११) १६० सुरूपकलुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि विधवि ॥६॥ (ऋ. ११४१) १६१ अभि त्वा वृषमा सुते सुत सृजामि पीतये । तम्पा व्यश्नुही मदम्।। ७ ।। (ऋ. ८४६।२२) १६२ य इन्द्र चमसेवा सोमश्चमूषु ते सुतः । पिवेदस्य त्वमौशिप ॥८॥(*.८८२७) 3 २३१.१३१२ [१५६ ] हे (सखायः) मित्रो ! (4) तुम (हर्यश्याय) हरि नामके घोडौंको रखनेवाले (सोम-पामे) सोम पोनेवाले (इन्द्राय) इन्द्र के लिए (मादनं प्रगायत) आनन्द देनेवाले स्तोत्रोंको गाओ ॥२॥ [१५७] हे (इन्द्र) इन्द्र (त्यायन्तः सखायः घयं ) तुझसे मित्रता करनेकी इच्छावाले और तेरे मित्र हम (तत्-इत्-अर्थाः) तेरो स्तुति करनेकी इच्छा रखनेवाले (कण्वाःउ) कण्व भी (उक्थेमिः त्याजरन्ते) स्तोत्रोंसे तेरी प्रशसा करते हैं ॥३॥ [१५८] (मदने इन्द्राय) आनन्दके स्वभाव धाले इन्द्र के लिए (सुत) निकाले गए सोमरसको (नः गिर परि-स्तोभन्तु) हमारी पाणिया प्रशसा फरें। ( कारवः) स्तुति करनेवाले (अ% अर्चन्तु) इस पूज्य सोमको अर्चना करें ॥४॥ [१५९ ] हे इन्द्र ! (भयं सोमः) मह सोम रस (से) तेरे लिए (बर्हिषि अधि) वेरिपर रखे गए आसन पर (निपूतः ) शुद्ध करके रखा हुआ है । ( पहि) इसके पास बा, (द्रय) दौडकर आ और (पिब) पी ॥५॥ (१६० ] (ऊतये) हमारे सरक्षणके लिए(सु-रूपकनुं) सुन्दर रूपको बनानेवाले इन्द्रको (चवि-धवि) प्रति. दिन (गोदुहे सुदुइव) जिस प्रकार दूध दुहने के समय उत्तम दूध देनेवाली गायको बुलाया जाता है, उसी प्रकार (जुनमसि) हम बुलाते हैं॥६॥ १ ऊतये सुरूपठतुं घरि घधि जुहूमसि- अपने सरक्षण के लिए सुन्दर रूप बनानेवाले इन्द्र के लिए हम प्रतिदिन स्तुति करते हैं। { १६१] हे (पा) बलवान् इग्न ! (त्या) तुझे (सुते) सोमयज्ञमें (सुतं पीतये) सोमरस पीने के लिए भनि सजामि ) में सोमरसका अर्पण करता हूँ, उस समय (राम्पा मदं व्यरनुदि) सप्त करनेवाले या भानन्य देनेवाले सोमरसको स्वीकार करो॥७॥ ( १६२ ] हे पन्त ! (ते) तेरे लिए (सुतः सोमः ) तम्यार विधा हुआ सोमरस (चमसेपु चमूपु आ) और छोटे बर्तनोंमें भरा हुआ रहा है । ( अस्य त्वं पिब इत् ) इसको दूपी, हे इन ! (शिपे)तू सामान्य शाली है ॥८॥ ५ त्वं रशिये-दूसरा स्वामी है।
द्वितीय अध्याय) सामदका सुयोघ अनुवाद १३ .."" १६३ योगेयोगे नवस्तरं वाजेबाजे हवामहे । सखाय इन्द्र मूतये ॥९॥ (१ १३०७) १६४ आ त्वेता नि गोदतेन्द्रममि प्र गायत । सखायः स्तोमवाहसः ॥ १०॥ (ऋ. १।५।१ ) इति सप्तमी दशतिः ॥ ७॥ पञ्चमः सण्डः॥५॥ स्व० ५। उ०२ । धा० ३१ । (फो)। [८] (१-१०) १ विश्वामित्रो गायिनः, २ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः; ३ फुसोदो काण्वः ४ प्रियमेध यागिरसः ५.८ मामयो गौतमः, ६,९ भुतकाः सुरुक्षोः या आंगिरसः, (९० सुकता आगिरसः); ७ मेधातिथि: काण्वः, १० बिन्दुः पूतदक्षी या आगिरसः॥ इन्द्रः (ऋ० ७ सबसस्पतिः १० मरतः) गायत्री। १६५ इद हान्योजसा सुत राधानां पते । पिचा त्वाइस्य गिर्वणः ॥ १॥ ऋ. १९१।१०) १६६ महारइन्द्रः पुरश्च नो महित्वमस्तु पनिणे । धौर्न प्रथिना शा ॥२॥ (ऋ. ११८१५) १६७ आ तू ने इन्द्र क्षुमन्त चित्र ग्राभरसं गृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन॥ ३॥ (ऋ. १८११) १६८ अभि प्र गोपति गिरेन्द्रमर्च यथा विदे । सूनुसत्यस्य सत्पतिम् ॥ ४ ॥ (. ८।६९।४ ) [१६३ ] (योगे योगे) प्रत्येक कार्यमें ( वाजे बाजे) प्रत्येक संग्राममें (ऊतये ) अपने संरक्षणके लिए तयस्तरं इन्द्रं ) अति बलवान् इन्द्रको (सखायः) मित्र के समान व्यवहार करनेवाले हम (हवामहे) बुलाते हैं ॥९॥ १ योगेयोगे वाजेबाजे ऊतये तवस्तरं इन्द्रं हवामहे-- प्रत्येक कार्प और सनाममें अपना संरक्षण हो इसके लिए हारको सहायताके लिए बुलाते हैं। [१६४ हे (स्तोम-घाहसः ) यज्ञ करनेवालो। (सखायः ) हे मित्रो! (मा तु भारत ) शीत्र यहाँ मावो और (निपीदत ) यहा बैठो, और (इन्द्रं धाम प्रगायत ) इन्द्र के स्तोत्रोंका गान करो ।। १० ।। । यहां पांचया खंड समाप्त हुआ। [६] पष्ठः खण्डः। [१६५] हे (राधानां पते) पनोंके स्वामी । है (गिर्वणः) स्तुतिके योग्य इन ! (ओजसा) वलस तयार किए गए (इदं सुतं) इस सोमरसको ( अन्य तु अनु पिय हि ) र शीघ्र ही अनुकूल होकर पी ॥१॥ [१६६] (नः इन्द्रः महान्) हमारा यह इन्द्र महान् है, और (परः च) भेष्ठ भी है, (घनिणे महित्वं मस्तु) वनको धारण करनेवाले इन्द्रका यश बढे, (धौः न)धुलोकके समान (शवः प्रथिना) उसका बन पडता है ॥२॥ [१६७ 7 हे पद ! (महा-हस्ती) बडे बडे हाथोंदाला तू (नः तु) हमें देने के लिए (क्षुमन्तं चि प्राम) प्रशंसनीय और अनेक प्रकारसे स्वीकार करने योग्य धन (दक्षिणेन आ संग्रमाय) दायें हायोंमें ले ॥३॥ [१६८] (गो-पति) गायोंका पालन करनेवाले ( सत्यस्य सर्नु) सत्यके प्रचारक (सत्-पर्ति) सजनोंक पालम करनेवाले (इन्त्र) इनकी (गिरा अभि प्र अर्च) वापसे प्रार्थना कर (यथा विदे) जिससे कि उसकी सहा. पतासे यसका और उस इन्दका ज्ञान हो ।॥ ४॥ ७ (साम. Rदी)
(५०)
मामवेदका सुबोध अनुवाद
ऐन्द्र काण्डम
२२३
३१३३
२
३१२
1२२१२.
१३१२
३.३३ १३
9
३
३२३13
१६९ कथा नविष आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥ ५॥
(ऋ. ४(३१॥१७ यजु. ३७१३९)
१७. त्यमु वा सत्रासा विश्वासु गीर्वायतम् । आ च्यावयस्यूतये
१७१ सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनि मेधामयासिपम् ॥७॥
(ऋ. १९८६, यजु. ३२११३३)
१७२ ये ते पन्था अघो दिवा येभिर्व्यश्वमैरयः । उत औपन्तु नो भुवः ॥ ८ ॥
१७३ भद्रभद्रं न आ मरेपमूर्जशतक्रतो । यदिन्द्र मृडयासि ना
॥९॥(ऋ.८।९।२८)
९७४ अस्ति सोमो अयसुतः पिबन्त्यस्य मरुतः । उत स्वराजौ अश्विना ॥१०॥ (ऋ. १९४४)
इति अष्टमी दशतिः ॥ ८॥ पठाण्डः ॥ ६ ॥ | स्व० १२। उ० १ । घा० ४०। (बी) ॥)
[९]
(१-३०) १ देवजामय इन्द्रमातरः, २ गोधा पिका; ३ दध्यड्टायर्वणः, ४ प्रस्फम्वः काण्यः५ गोतमो राहगणा;
६ मधुच्छन्दा श्वामित्र, यामदेवो गौतमः ८ वत्सः काण्वः ९ शुन शेप आजोगतिः, १० उलो वातायनः ।।
इन्द्रः (ऋ० ४ अश्विनी; १० वायुः ) ।। गायत्री ॥
१७५ ईयन्तीरपस्युव इन्द्र जातमुपासते । बन्चानासः सुवीर्यम् ॥१॥ (ऋ. १०।१५३।१ )
[१६९] (सदा-धृधः) सदा बढ़नेवाला (चिनः सखा) विलक्षण श्रेष्ठ मित्र पह इन्द्र (कया अति ) कौनसे
संरक्षणको शक्तिसे युक्त होकर (नः आ भुयत्) हमारे पास भावेगा ? उसो प्रकार (फया शचिठया वृता) कोनसी
शक्तिसे युक्त व्यवहार वाला होकर वह हमारे पास आएगा? ॥५॥
[१७० (सत्रा-साई) बहुतसे शत्रुओंको हरानेवाले (यः) तुम्हारी (विश्वासु गीH आयत , सब स्तुतियोंमें
यणित (त्य उ) उस इन्द्रको (ऊतये) अपने संरक्षणके लिए तुम (भाच्यापयसि ) अपने पास बुलायो ॥६॥
[१७१ ( मेधां ) मुनि पाने के लिए (अद्भुतं) अपूर्व ( इन्द्रस्य मियं ) इत्रको प्रिय (काग्य ) इच्छा करने के
योग्य घनके ( सनि) दान देनेवाले (सदसस्पति) सदसस्पति देवको (अयासिगं ) मने प्राप्त किया है ॥७॥
[१२] हे इन्द्र ! (ये ते पन्थाः) जो तेरे माग ( दियः अधः) पुलोक्से नीचे है (येभिः विश्व परयः)
जिन मार्गासे सब विश्वोंको तू चलाता है, (ते) ये मार्ग (नः भुवः उत श्रोपन्तु ) हमारे यत स्थानमें पहुंचते हैं, उन
मार्गसि हमारे पर स्थानको आ॥८॥
[१७३ ] हे (शतक्रतो) सैकड़ों कार्य करनेवाले इन्द्र ! (म भद्रं ) आयन्त कार्य करनेवाले (पं ऊन) मान
और यसको दबानेवाले पन (नः आ भर ) हमें भरपूर दे। (यत्) पोंकि (नः मृळयासि) तू हमें मुखी
करता है ॥१॥
१हे मातकतो! भदं पं ऊर्जनः गाभर--हे रोष उत्तम करनेवाले! पत्याण करने
थाले, अन्न और मलको हमें भरपूर दे । २ नः मृळयाम्पि- हमें तू सुती परता है।
[१५४ (अयं सोमः सुनः अस्ति) यह सौमरस हमने संप्यार करके रखा हुआ है। (अस्य) से (स्वरामः
मरुतः) तेजस्वी मद् गण (पियन्ति) पोते ।। उन अश्विना) मौर अश्विनी देय भी पीते है ॥१०॥
॥ यदां छटाखंड समाप्त हुआ ।
[७] सप्तमः पण्डः।
[२५५] (तु-यार धन्यानासः) उत्तम मत प्राप्त गरी मावाली (ईसयन्तीः) पाग (भपस्युपः)
गाम पारनेरी या पालो इनरी माता (जातं तं उपासते) प्राट ए उगाहारी सेवा भरती ॥१॥
द्विसीय मध्याय]
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(५१)
२१
३.
१७६ नकि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि । मन्त्रथुत्यं चरामसि ॥ २॥ (ऋ. १०।१३४६७)
१७७ दोषो आगाद् वृहदाय द्युमगामनाथर्वण । स्तुहि देवरसवितारम् ।। ३ ।। ( अर्थ. ६।१।१ )
१७८ एषो उपा अपूया व्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुपे चामश्विना बृहत्।। ४ ॥ (ऋ. १४६।१ )
१७९ इन्द्रो दधीची असमित्राण्यप्रतिष्कृतः । जघान नवतीन ॥५॥ (ऋ. १८॥१३)
१८. इन्द्राहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महा अभिष्टिरोजसा॥ ६ ॥
(क्र १९)
१८१ आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नसाकममा गहि । महान्महीमिरुतिभिः ॥ ७ ॥ ( ४।३२।१ )
१८२ ओजस्तदस्य तित्विष उमे यत्समवर्तयत् । इन्द्रधर्मव रोदसी ॥८॥ (ऋ. १६२)
[१७६। हे (देवाः) देवो । (न कि इनीमसि) हम कोई हानि नहीं करते और (न कि मायोपयामसि) हम
कोई विरुद्ध कार्य नहीं करते (मन्त्र-श्रुत्यं चरामसि) वेद-मत्रों में जो कहा है, उसके अनुसार हम आचरण करते हैं ॥२॥
१न कि इनीमसि-हम किमीको हानि नहीं करते। २. कि आयोफ्यामसि- हम कोई बिरुद्ध कार्य
नहीं करते । ३ मन्नत्यं चरामलि~ वेदमत्रोमें जो कहा है, उसके अनुसार हम आचरण करते है ।
११७७] हे (पृहद् गाय) बृहत् नामक सामका गायन करनेवाले, हे (युमत्-गामन् ) प्रकाशके मार्गसे जानेवाले
(माथवण) अथर्ववेदी ब्राह्मण ! (दोषः अगात्) यज्ञकर्ममें जो शेष हों उन्हें दूर करने के लिए (देवं सवितार स्तुहि)
सविता देवकी स्तुति कर ॥ ३॥
१ दोपः अगात् , देवं सरितारं स्तुहि-दोष होनेपर सविता देवकी स्तुति कर।
{ १७८ ) (एग मिया ) यह प्रिय (अपूऱ्या उपा) अपूर्व उपा (दियः व्युच्छति) घुलोफसे प्रकाशित होती है,
है (अभियनो) अश्विदेयो । (चां वृहत् स्तुपे) तुम्हारी हम बहुत बड़ी स्तुति करते हैं ॥४॥
। १७२) (अ-प्रतिप्कुतः) जिसका मुशमना नहीं कर सकता ऐसे इस इन्द्रने (दधीचः अस्थमा)
बघौधिको हड्डियोंसे (नव नवतीः) आठ सौ दस (वृत्राणि) यत्रोको (जधान) मारा ॥५॥
१ नव नवती:- नौ गुना नब्बे, ९०४९ - ८१०।
(१८०) हे इन्द्र । (पहि) आ (अस्थतः) अन्न रूपी (विश्वेभिः सोमपर्वभिः) सब सोमरसोंसे (मत्ति)
मानन्वित होता है, भव (ओजसा) अपने बलसे (महान् अभिष्टिः) वडेसे बडे शत्रुको भी हराने वाला हो ॥ ६॥
१ ओजसा महान् अभिष्टि-- सामयंसे यह महान् शत्रुको भी हरानेवाला है।
{१८१] है (वृष-हन) पत्ररूपो शत्रुको मारनेवाले इन्द्र ! तु (नः हमारे पाम ( महान मा तु) महान् होकर
मा । (महीभिः ऊतिभिः) महान् सरक्षप्पके साधनौके साथ (अस्माक अधं आगहि) हमारे पास आ ॥ ७ ॥
२ महीनिः अतिभिः अस्माकं अर्ध आगहि- महान् संरक्षण साधनौके साथ हमारे पास आ ।
[ १८२] (अस्य तत् बोजा ) इस इन्द्रका वह सामन्यं (तित्यिपे। चमकने लगा है, (यत् ) जिसके कारण
यह इन्द्र (उभे रोदसी) लोक और भूलोकको 'चर्म इच समपर्तयत् ) चमडेके समान फैलाता है॥८॥
(५२)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[ ऐन्द्रं कापडम्
३११
१८३ अयम् ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तञ्चिन्न ओहसे ॥९॥ (१३०४)
१८४ वात आवातु भेषज शम्भु मयोभु नो इदै । प्र न आयूपि वारिपत् ॥ १०॥
(ऋ. १०११८६१)
इति नवमी रशति ॥ ९॥ सप्तम खणः॥७॥ [स्व. १०।०२॥धा० ४५। (फ)॥]
[१०]
(१-९) १ कण्वो धौर, २, ३, ९ वत्स. (ऋ० २, ९ वशोऽश्व्यः) काप्या; ४ भुतरमः सुफलो या भागिरराः।
५ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः ६ वामदेवो गौतमः; ७ इरिम्बिठिः काय.; ८ सत्यपतिर्वाणि ॥ इन्द्रः (१०
१ वरुणमित्रार्यमण; ८ आदित्यः) गायत्री॥
१८५ य रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्थमा । न किस दम्यते जनः ||१|| ऋ. ११४१।१)
१८६ गव्या पुणो यथा पुराधयोत रथयो । वरिवस्या महोनाम्
१८७ इमारत इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम् । एनामृतस्य पिप्युपीः ॥ ३ ॥ (ऋ. ८।६।१९)
१८८ अया धिया च गव्यया पुरुणामन्पुरुष्टुत ! यत्सोमेसोम आभुवः ॥ ४ ॥ (ऋ ८।९३।१७)
[१८३ है इन्द्र ! (अयं उ) यह सोमरस निश्चयसे (ते) तेरे लिए तैयार किया गया है, उसके पास (सम-
तसि) तू जाता है (कपोतः गर्भधिं इव ) जैसे घबूतर गर्भको धारण करनेमें समर्थ स्तरीके पास जाता है (तत्
चित् ) उसी प्रकार (नः यचः ) हमारी स्तुति (ओहसे) द सुनता है ॥९॥
[१८४ ) ( घातः) यह पाय (नः हदे शंभु मयोभु) हमारे हदयको शान्ति और सुन्न देनेवाली (भेपज) औष-
थियोतो ( आ यातु) साकरफे देवे, वे औषधियां (नः आयूषि मतारिवत् ) हमारी भायुको लम्बो करें ।। १० ।।
१ यातः नः हदे शंभु मयोभु भेपज आ वातु- यह वाय हमारे हृदयको मुल और आरोग्य देनेवाली
औषधियोंको लाकर देवे । २ नः आयूपि म तारिपत्- हमारी उम्र लम्बी करे ।
॥ यहां सातयां संड समाप्त हुआ।
[८यएमा सण्डः।
[१८५ (प्र-चेतसः) ज्ञानी (यं रक्षन्ति ) निसका सरक्षण करते हैं (सः जनः) वह मनुष्य (न कि
दभ्यते) दिमीसे भी नहीं दपाया जा सकता ॥१॥
१ प्रचेतसः यं रक्षन्ति स जना न कि भ्यते-सानो देव गिसकी रक्षा करते हैं, उसे कोई भी मही
दया सरता।
[१८६] है इन्द्र ! (यया पुरा) पहले के समान (नः ) हमें ( गया। उत्तम गार्यो समूह, (उ अध्यया) उत्तम
पोरे (उत्त रथया ) और रप तया ( महोना ) पाबनानेवाले थन देने की इच्छारो (यरियस्प) हमारे पास मा ॥२॥
११८७] है इन्द्र ! (तेरमाः पृश्नयः) तेरी ये गायें (प्रातस्य पिप्युगः ) पारो बनानेवाली है, और (पृत
पना आशिरं ) पो देने वाले भूपये (दुहते ) दुहती हैं ॥ ३॥
[१८८) हे (पुर-नामन् ) भनेर नार्मोदाले भौर (पुर-पुत) बहुतगि प्रामित हम (मोमे मोगे ) प्रत्येक
मोमपान ( यत् भाभुवः) जहाँ भूभाता है, वहाँ ( मया गन्यया घिपा) म गायकी परनेपानी स्तुति हम
तेरी निगरते ॥४॥
द्वितीय अध्याय सामयेदका सुघोष मनुवाद . (५३) . ४३१४ ३ ११ २ १८९ पायका नः सरबती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञ यष्टु धियावसः ॥ ५॥ (ऋ. १।३।१०) १९. के इम नापीष्वा इन्द्र सोमस्य तर्पयात् । स नो वस्न्या भरात ॥ ६ ॥ १९१ आयाहि सुपुमा हि त इन्द्र सोम पिया इमम् । एदं पहि: सदो मम ।।७।। (ऋ. ८११७।१) १९२ महि त्रीणामवरस्तु युक्ष मित्रस्यायम्णः । दुराध वरुणस्य ॥८॥ (ऋ. १०११८५१) १९३ स्वावतः पुरूवसो चयमिन्द्र प्रणेतः । मसि स्थातर्हरीणाम् ॥९॥ (.18६१) इति शमी वशतिः ॥ १०॥ अष्टमः खण्डः ॥८॥ [स्व०६।०४ ॥धा० ३५ । (घ)।] इति वितोयप्रपाटके द्वितीयोऽय, द्वितीयः प्रपाठकश्च समाप्तः। अथ तृतीयप्रपाठके प्रथमोऽधी। १ ११ १.२ 3 (१-१०) १ प्रगायः काण्वः; २ विश्वामित्रो गायिनः; ३, १० वामदेयो गौतमः, ४, ६ श्रुतकमः आगिरसः (ऋ०४ सुककोः था; ६ सुकक्ष आगिरस.); ५ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः; ७ गृत्समदः शौनकः, ८,९ भरद्वाजः (ऋ० -८ शयः ) बार्हस्पत्यः ।। इन्द्रः (९ऋ० इन्दापूपर्णी ) । गायत्री ॥ १९४ उता मन्दन्तु सोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः । अब ब्रह्माद्विषो जहि ॥१॥ (क्र. १६४।१) (१८९] (पावका ) पवित्रता करनेवाली (वाजिनीवती) अन्न देनेवाली ( धिया वसुः) पुद्धिको सहायताले धन देनेपाली ( सरस्वती ) क्यिा देयो ( वाजेभिः) गोंसे ( नः यर्श घg ) हमारे पशको पूर्ण करे ॥ ६ ॥ [ १९०] (नाहुपीपु) प्रजाजनोंम (इम इन्द्रं ) इस इन्द्रको ( का तर्पयात् ) कौन भला तृप्त करता है ? (सः) यह इन्द्र (नः वसूनि आ भरत् ) हमें भरपूर पन देवे. ॥६॥ ( १९१] हे इन्द्र ! ( आयाहि ) तू मा, हमने (ते ) तेरे लिए (सुपुमा हि) सोमरस उत्तम रीतिसे तैय्यार किया है, (इम सोमं पिच ) इस सोमरसको तू पी, (मम ) मेरे (इदं याहः ) इस आसनपर ( आसदः) बैठ ।।७।। ११९२ ) (मित्रस्य, अर्यम्णः वरुणस्य ) मित्र भर्यमा और वरुण इन (त्रीणां ) तीन से मिलनेवाले (घुक्षं) तेजस्वी (दुराधर्ष) दूसरोंके द्वारा सहनमें कठिन ऐसे (महि अवः ) महान् संरक्षण (अस्तु ) हमारे लिए हो ॥८॥ १ धुक्षं दुराध मदि भयः अस्तु- तेजस्वी, दूसरोंको हराने में समय, महान् सरक्षण हमें मिले। [१९३] है (पुरु-चसो) बहुतसे धनको अपने पास रखनेवाले, (-नेतः) उत्तम कर्म करनेवाले, (हरीणां स्थातः) पोडोंपर बैठनेवाले इन्द्र ! (त्वावतः घय स्मसि ) तुझसे संरक्षित होकर हम सुरक्षित रहें ॥९॥ । यहां पाठयां खंड समाप्त हुआ। १९) नवमः खण्डः। [१९४] हे इन्द्र ! (त्या) तुझे (सोमाः) ये सोमरस ( उत् मदन्तु) उत्तम आनन्द देखें, है (अद्रि-वः) पत्रको पारण करनेवाले इन्द्र ! न हमें (राधः कृणुप्व) पन दे और (ब्रह्म-द्विपः) शानसे वेष करनेवाले शत्रुओंको (अव जहि) तू मार ॥१॥ १ राघः कृणुष्व- हमें धन दे। २ ब्रह्मद्विपः अवजहि-मानसे द्वेष करनेवालोंको तू मार।
(५४) सामवेदका सुधि अनुवाद (पेन्द्र काण्डम ३.७.२३२ १३२ । १९५ गिर्वणः पाहि नः सुतं मघार्धाराभिरब्यसे । इन्द्र वादानमिद्यशः ॥२॥ ऋ ३४ ०/६) १९६ सदा व इन्द्रवपदा उपौ न स सपर्यन् । न देवो वृता शूर इन्द्रः ॥ ३ ॥ १९७ आ त्वा विशन्विन्दवः समुद्रमिय सिन्धयः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥ ४ ॥ (ऋ. १९२।१२) १९८ इन्द्रभिदायिनो बृहदिन्द्रमभिरविणः । इन्द्रं वाणीरन्पत ॥५॥ ( १६७१) १९९ इन्द्र इपे ददातु न ऋभुक्षणमृभुपिम् । वाजी ददातु वाजिनम् ॥ ६॥ (ऋ. १९३३४) २०० इन्द्रो अङ्ग महद्भयममी पदप चुच्यवत् । स हि स्थिरो विचर्षणिः ॥ ७ ॥ ( २।४ १।१०) २०१ इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः । गावो वरस न धेनवः।। ८ । (5. ६।१५।२८) [१९५] हे (गिर्वणः) स्तुतिके योग्य इन्द्र । (म सुतं पाहि) हमारे द्वारा निकाले गए सोमरतोंको पो, योकि न इस (मधोः धाराभिः अज्यसे) सोमरसको धाराभोसे मींचा जाता है, और है इन्द्र । (त्यादात इत् यशः) तेरों सहायतासे पश मिलता है ।।२।। १ त्यादात यशः इत्-- तेरी महायतासे यश मिलता है। [१९६] (इन्द्रः) यह इन्ट ( सदा उपो नु) सदा तुम्हारे पास है, (सः सपर्यन ) यह पूजित होता हआ (य: आचस्पत् ) तुम्हारे यज्ञको ओर आकर्षित होता है, (न' धृतः इन्द्रः देयः शूरः) हमारे द्वारा स्वीकार किया गया इन्द्र देव महान् वीर है ॥३॥ १नः वृतः इन्द्र देव शूर:- हमारे द्वारा स्वीकार किया गया इन्द्र देव बहुत योर है। [१९७] हे इन्द्र । सिन्धय समुद्र न) जिस प्रकार नदियां समुद्रसे मिलती है, उसी प्रकार ये (इन्दया) सोमरस (त्या आविशन्तु ) तुममें प्रविष्ट हों, है (इन्द्र) ! (त्या) तुझसे बढकर (न अतिरिच्यते) और कोई महान् नहीं है॥४॥ १ हे इन्द्र! त्यां न अतिरिच्यते - है इन्द्र ! तुझसे बढ़कर और कोई महान् नहीं है। {१९८] (गाधिनः) सामगान परनेगले मनुष्य (इन्द्र इत्) इन्द्रको हो (वृहत् अनूपत) महत्साभको गाकर असम करते हैं। (अर्किणा अभिः) पूजा करनेवाले मनुष्य स्तोपोंसे उसीको पूजा करते हैं, (याणीः इन्द्रं अनूपत) हमारी वाणी इन्द्ररा ही गान करती है ॥५॥ (१९९] इन (सभुक्षण ये ) श्रेष्ठ पन हमें देवे (मभुना इपे ददातु ) हमें अभरे लिए भारीगर र (पाजी वाजिनं ददातु) बलवान इन्द्र हमें धन दैवे ।। ७॥ १मभु-क्षणं रयिं ददातु-इन्न पारोगरों पालन करनेवाले पन हमें देवे । २ न.पे कभु वदातु-हमें अन्न मिलने के लिए भारीगर देवे । ३ घाजी पाजिनं ददातु-यलयान् इन्द्र बल देवे । [२००१ (स्थिरः घिचणि.) स्पर, अवधल यह ज्ञानी - { महत् भय ) महान भयो । अंग मिमी पन्)ी ही दूर करता है, और उन भयोंको (अप-चुच्यवन् । स्थानमे हा देता है ॥७॥ १स्थिर विवणिः महर भय अभीपत् अपयुन्ययन--- युमि स्थिर रहलेवासा और गानो यह ग महान् भयको दररता है और उन्हें स्यानसे दा भी रेता है। (२०१ हे (गियंण.) तिरे पोप ! ( गुने मुने) प्रापेर मर्म (मा गिरः । ये हमारी स्तुरिया (रया) हो (परस धेनय गापः म ) प्रित प्रणा बोरो दूध देनेवाली गायें प्राप्त होती है, उमी प्रशा (नक्षन्ते) प्राप्त होती ।८॥
द्वितीय भभ्याय] सामवेदका सुवोध अनुवाद । २ 3 ३ १ १३ ३१२ २ 3 १ ११ 73 २०२ इन्द्रा नु पूपणा क्य संख्याय स्वस्तये । हुनेम वाजसातये ॥९॥ (ऋ. ६५७१) २०३ न कि इन्द्र स्वदुत्तरं न ज्यायो अस्ति वृत्रहन् । न पर्व यथा त्वम् ॥ १० ॥ (5. ४.३०११) इति प्रथमा दशतिः॥१॥ नवमः खण्डः ॥९॥ [स्व० ८11०७१ पा० ३५ । (१) ॥] [२) (१-१०) १,४ निमोकः काण्व'; २ मधुच्छन्दा स्वामित्रः; ३ वत्स. काय; (ऋ० पशोऽन्यः); ५ सुरुक्ष आगिरसः; ६, ९ वामदेवो गौतम', ७ विश्वामित्रो गायिनः । ८ गोपूक्त्यश्वसूषितनी कान्वायनो; १० धुतकक्षः सुपक्षो वा आडिगरसः ॥ इन्द्रः ।। गायत्री ॥ २०४ तरणि यो जनानां पदं वाजस्य गोमतः । समानमु प्रशसिपम् ॥ १॥ ( ८१४५।२८) २०५ असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत । सजोपा वृषम पतिम् ॥२॥ (ऋ. १९४) २०६ सुनीयो घास मयों यं मरुतो यमर्यमा । मिनास्पान्त्यद्रुहः ॥३।। (ऋ. ८१४६४) २०७ यद्वीडोपिन्द्र परिस्थरै यस्पर्शाने पराभृतम् । वसु स्पाई तदा भर ॥ ४ ॥ (ऋ. ८/४६।४१) (२०२।(इन्द्रा पूपणा ) इन्द्र और पूषा इन देवताओंषो (नु वयं ) हम (स्वस्तये ) अपने कल्याणके लिए ( सख्याय ) मित्रताके लिए भौर (याज-सातये) अन्नको प्राप्तिपे लिए (हुवेम ) प्रार्थना करके युलाते हैं ॥९॥ (२०३ ] है (पुत्र-हन् इन्द्र ) दात्रुको मारनेवाले इन्द्र ! (त्यत् उत्तरं न कि अस्ति ) तुमसे ज्यारा पेष्ठ और कोई नहीं है, और (ज्यायान ) महान् भी कोई नहीं है (यथा त्वं) नंसान है. ( एवं ) वैसा (न कि) दूसरा कोई नहीं है॥१०॥ १हे वृत्रहन् इन्द्र ! त्वत् उत्तरं न कि अस्ति-हे वत्र नाशक इन्द्र ! तुमसे महकर भेष्ठ कोई भी नहीं हैं। ॥ यहां नयां खंड समाप्त हुआ (१० दशमः खण्डः। [२०४१ (वजनानां तरणि) तुम लोगोंको [ दुखोंसे ] पार करानवाले (नदं) शवको भय दिखानेवाले (गोमतः याजस्य) गायोंसे मिलनेवाले अन्नका दान करनेवाले (समानं उ) और सवा उन्नत रहनेवाले इनको (प्रशंसिपम् ) में प्रासा करता जनामा तराण, पदं समानं प्रशसिपम्- समका पार करनेवाले और बाबुको मम देनषालेको हम सदा स्तुति करते हैं। [२०५] हे ! (ते गिरः असून) सेरो स्तुति के लिए स्तोत्रोंको मैंने तप्पार किया है । वे स्तुतियां (पृषभ पति त्या) यसवान और सबका पालन करनेवाले तुरे (प्रति उदहासत) प्राप्त हुई है, और उनरा तूने (स-जोपाः) सेवन पिया है ॥२॥ [२०६ 1 (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाले महत्, मित्र और अर्यमा (ये पान्ति) गिरको रमा करते हैं, (सः मर्त्यः) वह मनुष्य (मु-नौशः घ) निश्चय उत्तम मागपर चलनेवाला होता है रय अनुहः पान्ति स मर्त्यः सुधि:- जिसका दोहन करनेवाले देव सरमण करते है, यह मनुष्य उत्तम मापसे जानेवाला होता है। [२०७] हेर! (यत्) को पन मूने (पीसी) ममजत समान में रखा हुआ है. (पत स्थिरे) को वन पिर स्थान में रखा हुआ. (यत् पशाने पराभृतं ) जो भूमिमें रखा हुआ है, (तत् स्पाई यमु) समपतको (मामर) हमें भरपूर ॥४॥ ॥
(५६) सामवेदका सुयोघ भनुशाद [ पेन्द्र काण्डम 3 २०८ श्रुतं वो यहन्तम प्र शधै चर्षणीनाम् । आशिष राधसे महे ॥५॥(.८१९१६) २०९ अरे त इन्द्र श्रवसे गर्मम शूर वाचतः । अरशक अरशक परेमा २१. धानायन्ट करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातर्जुपस्व नः (३३५२) २११ अपां फेनैन नमुचे। शिर इन्द्रोदवर्तयः । विश्वा यदजय स्पृधः ॥ ८ ॥४. ८।१४।१३) २१२ इमे त इन्द्र सोमाः सुतासो ये च सोत्वा । तेषां मत्स्व प्रभूवसो।। ९ ।। २१३ तुम्य रसुतासः सोमाः स्तीर्ण यहिविभावसो | स्तोतुम्प इन्द्र मृडया॥ १० ॥ (ऋ९३१२५॥ इति द्वितीया शति ॥ २॥ शमः सा ॥ १०॥ [स्व०८/२० २१ पा० ३३ ॥ (8)] [२०८) (वृत्र-हन्तमं शर्धे) आयुषे मारनेवाले यलको तुमने (श्रुतं) सुना ही है, (चर्पणीनां) मनुष्योंमें (महे राधसे ) महान् धनको प्राप्तिके लिए उस बलको (प्रमाशिपे) उपभोगके लिए (प.) तुम्हें देता हूँ ॥५॥ [२०९ ) है (शूर इन्द्र) वीर इन्द्र ! (ते श्रवसे) तेरा यश सुनने के लिए ( अरं गमेम) बहुतसे अवसर हमें मिन, हे (शक) सामभ्ययान् इन्द्र ! (चावतः परेमाणि) तेरे रामान श्रेष्ठ देवताके सरक्षणमें ( परं) मानन्वित होने के लिए हमें पर्याप्त अवसर मिले ॥६॥ [२१० ] हे इन्द्र ! (धानावरी) भुने हुए, (परम्भिणं) रही और सनसे मिश्रित (अपूरयन्त) पुभोंक साप तपा (उथिनं) स्तोत्र जिमके माप घोले जाते है, ऐसे (नः) हमारे मोगरसको (प्रातः जुषस्य) समरे सेवन कर॥७ [२११] (यत्) जय (विभ्याः स्पृधः अजयः) सर माधुरी सेना को हरा दिया, तब (इन्दः) नं (मपा फेनेन) जोंके गागसे (नमुचे शिरः उदवर्तयः) ममुधिये सिरदो तो। ॥ ८॥ १ मा फेन-पानीका गग, समुद्री प्रभाग । २ नमुचिः- दोन माछा न होनेवाला रोग, शीत महा म होनेशाला रोग सो माग अनुपानसे टोक हो जाता है। [२१२॥ (इन्द्र)! (ते) तेरे लिए (इमे मोमाः) में सोमरस (मुतासः) तिर पार गिर गए है (च ये सोत्याः) मोर जो रस निकासार तय्यार लिए गए हैं. है (प्रभू-यसो) बहुत सारा धन पास स्तमेशाने PRI (तेषां मास्य) उन शोमागि मानम्ति हो ॥९॥ {२१३Jहै (पिभापमा तेजावी पन पागम रसपाने इम! (gप मोमा सुनाम:) तेरे लिए वे गोमरण निकासार तयार लिए है, मौर (यहि नाणे) मासन ऐसार लामा है, है ! म दुशमन और शोध पोतका (मनोवस्या) पगारो (मृत्य) गुनी ॥१०]] ॥ यहां रसयां पर समाप्त दुमा ।
द्वितीय अध्याय] सामवेदका सुयोध अनुयाद (५७) ३१२ २ 3" १३ (१-९) १ शुन शेष भानोति , २ धृतरुक्ष आगिरस (ऋ० सुरक्षो आगिरसोया, ) ३ विदोककाय ; ४ मेधातियि वार; ५ गोतमो राहगण', ६ ब्रह्मातिथि काण्य ७ विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा; ८ प्रस्फपद काण्व. ( म० कण्वो धौर.); १ मेपातिथि, काण्य ॥ इन्द्र. (०५ विश्वेदेवा ), ६ अश्विनी; मियावरणौ ८ महत., विष्णु ) ॥ गायत्री ।। २१४ आ व इन्द्रं कृषि यथा वाजयन्तः शतक्रतुम् । महिठरसिश्च इन्दुभिः ॥ १ ॥ (नर १३०११) २१५ अवश्चिदिन्द्र न उपा याहि शतयाजया । इपा सहस्रवाजया ॥२॥(८९२।१०) २१६ आ धुन्द पुत्रहा ददे जाता पृच्छाद्वि मातरम् । के उनाः के ह शृष्विरे ॥ ३ ॥ (ऋ. १४५४) २१७ वदुक्थरहवामहे सूप्रकरस्नमूतये । साधः कृण्वन्तमयसे ॥४॥(ऋ. ॥३२॥१०) २१८ अजुनीती नौ वरुणो मित्रो नयति विद्वान् । अर्थमा देवः सजोषा ।५।। (ऋ. १९९०११) २१९ दूरादिदेव यत्सतोऽरुणप्सुरशिश्विवत् । वि भानुं विश्वयातनव ॥६॥ (5. ८1५1१) ३-१ ३१२ रेर १२ १२ १२ ३३११ M [११] एकादशः खण्डः। [२१४ ] ( वाजयन्तः) मनवाले हम यजमान (शतमातुं) सैकडों उतम काम करनेवाले (महिष्ठं) महान् (यः इन्द्रं तुम्हारे इन्दको (कार्वि यथा ) संतको जसे पानीले तींचते है, उसी प्रकार (इन्दुभिः सा सिञ्चे) सोमरसोंसे सोंचते है।॥१॥ [१५] है इन्द्र ! (मतः चित् ) इरा लोपगे (शत-बाजया) संपों प्रकारके यलमे ता (सहस्र- याजया) हजारों तरहसे अनसे पुक्त होकर (इपा) रोंके साय (नः ) हमारे पास ( उप याहि) मा ॥२॥ (२१६] (जाता नहा) उत्पन्न होते हो वो मारनेवाले इन्द्रन (युन्द आददे) वाण हायमें से लिया और (मातरं पच्चात् अपनी मातासे पूछा कि (के के उग्राः इह शृपिरे) कौन कौन महान् वोर यहां प्रसिद्ध है ॥३॥ [२१७] (ऊतये ) सभीके सरक्षण के लिए (सूप्रकरस्ते ) हायोको फैलानेवाले, (अपसे) सरक्षण लिए। साधः पुण्यन्त ) सायनोंको देनेवाले, मीर ( यदुक्थं) जिसको बहुत स्तुति को जाती है, ऐसे उस इन्द्रको (हवामहे) हर गुलाते हैं। ४॥ (२१८] (मिनः यरुणः) मित्र और वरुण ये (द्विान् । गानो देव (ना) हमें (गजु-नीती नयति ) सरल नौतिक मामि से जाते हैं । (देव सजोपाः अर्थमा ) देवी साप समान रीतिसे रहनेयाला अर्पमा भो हमें परस मार्गसे उन्नतिको पहपारे ॥५॥ { २१९ (रात्) दूर साकाशको पूर्व दिशामागे (हसतः पय ) मानों पहीं है ऐगी रिपाई नियात्ो गया (अरुणप्पुर) मरण मराको फैलानेवाली उपा ( यत् थनिश्चितत् । जब प्रसारित होने सपो, तर भानु) प्रा- mmm (विश्वया व्यतन ) चारों घोर फसाने रुगो ॥६॥ ८ (साम, हिदी) सामवेदका सुबोध मनुवाद [पेन्द्र का उम् - २२० आ नो मित्रावरुणा धृतर्गव्यूतिमुक्षतम् । मधा रजासि सुक्रतू ॥ ७ ॥ (श ३।६२।१६) २२१ उदु त्यै सुनयो गिरः काष्ठा यज्ञेष्वनत । पाश्री अमिनु यात ॥८॥ ( ११३७१०) २२२ इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दघे पदम् । समूढमस्य पारसुले ॥९॥ (ऋ. १।२२।१७) इति तृतीया वति ॥ ३॥ एकादश खण्ड ॥ ११ ॥ [ स्व० ६ । उ० १ । पा० ३१ । (को) ॥] (१-१०) १,७,८ मेघातिथि काय , २ वामदेवो गौतम , ३, ५ मेघातिथि काण्व , प्रियमेघश्चागिरस , ४ विदा. मित्रो गायिन , ६ दुनित्र (सुमित्रो का ) कौत्स , ९ विश्वामित्रो गाथिनोभीपाद उपलो वा, १० भुतका (ऋ० सुकक्षो वा) आगिरस ॥ इन्द्र ॥ गायत्री। २२३ अतीहि मन्युपाविण सुपुवा समुपस्य । अस्य राती सुतं पिच ॥१॥(. ८॥३२२२१) २२४ को प्रचेतसे महे चर्चा देवाय शस्यते । तदिध्यस्य वर्धनम् ॥२॥ २२५ उक्थं च न शस्यमान नागो रयिरा चिकेत । न गायत्रं गीयमानम् ।। ३ ॥ ( ८।२।१४) २२६ इन्द्र उक्थैभिमन्दिष्ठो वाजानां च वाजपतिः । इरिवात्सुताना सखा ॥ ४ ॥ [ २२० ) ( मु-ऋतू मित्रा-वरणा) उत्तम कर्म करनेवाले मित्र और वरुण (न. गव्यूर्ति) हमारे गौ-समूहको (घृत मा उक्षत ) घोसे अथवा पो उत्पन्न करनेवाले पसे भरपूर करे, अर्थात् हमें बहुतसा रूप देनेवाली गायें दे, (रजासि) लोकोंको (मध्वा ) मधुर रस सिचित करे ॥ ७॥ [ २२१ ) ( त्ये सूनव गिर.) तेरे पुत्र मरुत् गर्जना करते हुए ( यज्ञेषु ) पशम (काष्ठा दिशाओसे ज्वालाओं के समान फलते हैं इस कारण ( वाधा. ) रभरती हुई गायोंको ( अभिनु यातये) घुटनेतक भरे पानी में जाना पडता है॥८॥ [२२२ ] (विष्णु ) व्यापक ईश्वरने (श्व विचक्रमे ) इस विश्वमें ऐसा पराकम किया है, कि यह (धा पद निदधे) तीन प्रकारसे अपने परोंको इसने रखा है। (अस्य पासुले ) इसके धूलसे भरे एक कदमके स्थानमें सब जगत (समूढ) समा गया है ॥९॥ ॥यहा ग्यारहवां खड समाप्त हुआ। [१२] द्वादशः खण्ड । [ २२३ ] हे इन्द्र ! (मन्यु-पाविण ) क्रोधित होकर सोमरसोंको निकालने वाले यजमानको (अतीहि ) छोडवे, (सु-नुयास उपेरय ) और उत्तम रीतिसे सोमरस निकालनेवालेके पास जा, और ( अस्य राती) इसके याने ( सुत पिय ) सोमरस पो॥१॥ { २२४ (महे प्रचेतसे देवाय) महान् शानी इन्द्र देवके लिए ( कटु यच शस्यते ) दुग्धसा दिखाई देनेवाला हमारा स्तोत्र भी प्रशसित होता है, क्योंकि (तत् इत् अस्य वर्धन) वे स्तोत्र इन्द्र के गुणोंका वर्णन करनेवाते हो है।॥२॥ [२२५ (अ-गो ) स्तुति न करनेवालेका ( अयि ) शत्रु इन्द्र (शस्यमान उपथ चन) बहे मानवाले स्तोत्रौंको (न माधिवेत) नहीं जानता है, ऐसो बात नहीं, और (गीयमान गायत्र न ) गाये जानेवाले गायन सामको नहीं सुनता, ऐर भी नहीं, वह अवश्य जानता और सुनता है॥३॥ [२२६] (वाजाना वाजपति ) बलवानोंमें भी सबसे अधिक बलवान् (धरिवान् इन्द्र )घोगेको पास रस वाला (उपधेमि मन्दिष्ट.) स्तोत्रों से प्रसन्न होकर (सुताना सखा) सोमया करनेवालात मित्र हताkun उ उत् अत्नते) द्वितीय अध्याय] सामघेदका सुयोध अनुवाद (५९) २३ १३१ स २.१३ ३ १ 7 ३२ २२७ आ याद्युप नः सुतं बाजेमिर्मा हणीयथाः । महाहव युवजानिः ॥ ५॥ (ऋ. ८।२।१९) २२८ कदा वसो स्तोत्रहयत आ अब श्मशा रुधाः । दीर्घरसुतं वाताप्याप ॥ ६ ॥ (ऋ. १०१०११) २२९ बामणादिन्द्र रायसः पिया सोममृतू एन । तवेदश्सख्यमस्तृतम् ॥ ७॥ ( १।१५।५) २३० वयं घा ते अपि ससि स्तोतार इन्द्र गिर्वणः । त्वं नौ जिन्य सोमपाः ॥८॥ (१८३७) २३१ एन्द्र पृक्षु कामु चिनम्णं तनूषु धेहि नः । सत्राजिग्र पौरस्यम् ॥ ९ ॥ २३२ एवा धसि वीरपुरेवा शूर उन स्थिरा 1 एवा ॥१०॥ (ऋ ८१९२१२८) इति पतुर्षी दशतिः ॥ ४॥ हादश. सण्डः ॥ १२॥ स्व० १२ 1 उ० ना । पा० ३० । यो॥ इति द्वितीयोभ्यायः ॥२॥ इत्येकसामि समाप्तम्॥ [२२७] हे इन्द्र ! हमारे (सुतं उप आ याहि ) सोमयज्ञमें श्रा, (वाजेभिः मा हणीयथाः) दूसरों के द्वारा दिए गए हविष्याप्त पर दृष्टि भी मत दाल, (युषजानिः महान् इव) जवान स्त्री रखनेवाला तरुण पुष अपनी स्त्रीको और जिस प्रकार नजर रखता है, उस प्रकार तू कर ॥५॥ [२२८) हे ( यसो) व्यापक इन्द्र ! (स्तोत्रं हर्यते ) स्तोत्रोंको सुननेको इच्छा करनेवाले तुझे ( दीर्घ सुतं ) विशेष रूपसे निकाले गए तोमरसाम ( यातायाय श्मशा) जल मिलानेरे लिए जैसे नहरें रोकते है, उसी प्रकार( फदा अवारयत् वा) तुझे कय रोके और तुशे परण करें ॥६॥ (२२९] हे इन्द्र । (ब्राह्मणात् राधसः ) बाह्मण प्रथोंको बोलनेवालेके यज्ञ पात्रसे (सोमं मतम् अनु पिय) सोमको तुओंके अनुसार पी, क्योंकि ( तब इदं सख्यं) तेरो मह मित्रता (अस्टून) कभी न टूटने वाली है ॥७॥ १ तव सख्यं भस्मृतं- तेरी मित्रता कभी टूटती नहीं है। [२३०] हे (गिर्वणः इन्द्र) प्रशसनीय इन्द्र ! (ने) तेरी (वयं घ) हम (स्तोतारः स्मसि) स्तुति करने. पाले हैं, है (सोम-पाः) सोम पानेवाले इन्द्र ! (त्वं नः जिन्य ) न हमें सन्तुष्ट कर ॥ ८॥ (२३१] हे इन्द्र ! (पृक्षु कासुचित्) सम्बन्धमें भाये हुए किन्हीं (नः तनूपु) हमारे भगोंमें (नृ-मणं माहि) मल स्थापन कर, है (उप्र) वीर इन्द्र । (सवा-जित् पास्य) सब शोगों जिससे हम एव साय शोत में ऐसा हम म्यापित कर ॥९॥ १ प्रचना वनूपु नृम्णं आधेहि- हमारे सम्बन्धियोंमें नेतृत्वले गुणों और बतासे पड़ा। २ सत्राजित् पोस्यं आधेहि- सब भत्रुको एक साय जितानेवाले पलो हमें दे। [२३२) हे इन्द्र! (वीर-युः पय मसि) बलशाली धुओंके साथ भी न पढ़ करनेवाला है। (हि) क्योंकि (शूरः उत स्थिर) शूर है और य में स्थिर रहनेवाला है। इसलिए (ते मनः) तेरा मन (राध्य ) स्तुति योग्य १पारयुः असि-दादि साप टू युद्ध करनेवाला है, अथवा वोरोंको सयुक्त करके उन्हें तू लाने. वाला है। २सूरः उत स्थिरः आस-तू सूरवीर गौर पुॉमें स्पिर रहनवारण है। ३ ते मनः राय-तेरा मन स्तुति और पूजावे योग्य है। ॥ यहां यारहवां खंड समाप्त हुआ।
(६०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [पेन्द्र काटम् अथ तृतीयोऽध्यायः। - १२ चनः । २२ ३३.३ 9 ३१२ ३१२३ १ २३ 3. २११२३३२ ३०.१ ३३ १२ (१-१० ) १, ६, ९ वसिष्ठो मैत्रायणि , २ भरद्वाग (ऋ० गयु ) याहस्पत्य ; ३ प्रस्वण्य पाण्य , ४नोपा गौतम ५ कलि. मागाय, |७ मेधातिथि काण्व ८ मार्ग प्रागाय , १० प्रगायो पौर. काप्य ॥ इन्द्र, ९ मरत ॥ बहतो ।। २३३ अमि त्वा शर नोनुमोऽदुग्धा इव ईशानमस्य जगता स्वदृशमीशानमिन्द्र तस्थुपः ॥१॥ ( ७३२।२२) २३४ स्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रविन्द्र सत्पति नरस्त्यां काष्ठास्वर्यतः ॥२॥ (द. ६।४६१) २३५ अभि प्र वा सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे। यो अरितम्यो मघया पुरूवसुः सहोणेष शिक्षति ॥३॥ (8८४९।१) २३६ तं वो दसमतीपद वसोर्मन्दानमन्धसः । अभि वसं न स्वसरेषु धनः इन्द्र गौभिनवामहे ॥४॥ (१) [१३ ) बयोदशः सण्डः। [२३३] हे (शूर इन्द्र) शूर इन्द्र। (अस्य जगतः तस्थुप. ईशानं) इस जगम और स्थावर जगत् के स्वामी तया (स्वर-दशं त्वा) सोको देखनेवाले तुझे हम (अ-दुग्धाः धेनवः इव) दूध न दुही हुई गार्यो समान (अभि नोनुमः) प्रणाम करते हैं ॥१॥ १ अस्य जगतः तस्थुपः ईशानं स्वदृशं त्वा अभिनोनुमः- इस चलनेवाले और स्थिर जगत्का तू स्वामी है, तू सनीको देखनेवाला है, तुझे हम नमस्कार करते है। [२३४] (कारवः ) स्तुति करनेवाले हम (चाजस्य सातो ) अन्नका दान होने के समय हे इन्द्र ! (त्यां इत् हि हवामहे) तुझे हो बुलाते है (सत्पति) सज्जनों के पालन करनेवाले तुझे ( नरः वृष हवन्ते ) सब मनुष्य के साप होनेवाले युद्ध में सहायताके लिए बुलाते हैं, उसी प्रकार (अर्चतः) घोडोके कारण होनेवाले (काष्टासु) युद्धोंमें भी तुम हो सहायतारे लिए बुलाते है ॥२॥ १ सत्पति त्वा नर. वृधेपु हवन्ते- सज्जनोंका उत्तम पालन करनेवाले तुझे लोग युद्धोंमें भववके लिए बुलाते है। २ काप्ठासु त्या हवन्ते- अन्य युद्धोंमें भो तुझे हो बुलाते हैं। [२३] (यः पुरू-यमुः मधया)जो बहुतसा धन अपने पास रखनेवाला इन्द्र (जरितभ्यः सहस्रेण इव शिक्षति) स्तुति करनेवाले हमारे लिए हजारो प्रकारसे धन देता है, (यथा-विदे) जैसे जैसे तुम जानते हो, उस प्रकार है यज्ञ करनेवालो ! (व.) तुम (सु-राधसं इन्हें) उत्तम धन देनेवाले इन्द्रकी (आभि अर्च) पूजा परो॥३॥ १ पुरवसुः मघा सहस्रेण शिक्षति-~बहुत पनवाला वह इन्त्र हतारों प्रकारसे न देता है। [२३६] हे यजमानो' (दस्म ) सुन्दर और (ऋती-पह) रयाद पैदा करनेवाले को मारनेवाले बसो भन्धसामन्यानं ) मयको जीवन देनेवाले सोमरस रूपी अग्नको पीकर आनन्दित होनेवाले (वः) तुम्हारे पूज्य इन्दको (स्वसरेपु) गौशालामें (धेनवः घन्सं न) गा जैसे बछड़े के पास जातो है, उसी प्रकार (गीर्भिः अभिनयामहे ) स्तुति करते हुए हम प्रणाम करते हैं ॥४॥ १ ऋतीपहं गीर्भिः अभि नवामहे - बाधा करनेवाले शत्रुओंको मारनेवाले इन्द्रको हम नमस्कार करते है।
तृतीय अध्याय] सामवेदका सुयोघ मनुवाद ॥५॥ (5. ८०६६१) ३१ २३१२ ३" २ १२ ॥६॥(ऋ. ७१३२।२०) २३७ तरौभिवों विदद्वसुमिन्द्र रसबाध ऊतये । बृहदायन्तः सुतसोमे अपरे हुये भर न कारिणम् २३८ तरणिरित्सिपासति चार्ज पुरन्ध्या युजा । ओ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमि तष्टेव सुद्रुवम् सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः । पिनों बोधि सधमाये घे३ऽसावन्तु ते धियः २४० स्वरयहि चेरवे विदा भग बसुत्तये । उद्वावृपस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये २३"३३३' २ ३१२ २३९ पिया ॥७॥ (ऋ. ८००१) ॥८॥ (ऋ.८०६७) (२३७ ] हे ऋत्विजो ! (धः) तुम (वरोभिः) तेज दौडनेयाले घोडसे युक्त (विदद् वसुं) धनधान् (इन्द्र) इनकी (स-याधः) शत्रुओंसे ( ऊतये) सरक्षण के लिए (वृहत् गायन्तः ) बृहत् साम गाते हुए पूगा परो, मै भी (सुत-सोमे भघरे) सोम यज्ञमें ( भरं कारिणं न ) भरपूर पोपण करनेवाले इन्द्रको (हुये ) बुलाता हूँ ।।५।। १ विदद्वमुं इन्हें ऊतये वृहत् गायन्तः हुवे- पनयान इन्द्र को अपने सरक्षणके लिए गृहत् सामका गान करते हुए सहायताके लिए हम बुलाते हैं। [२३८ । (तरणिः इत् ) युद्धोंमें तारनेवाला वोर (युजा पुरन्ध्या) उत्तम बुद्धिसे जो (धाजं सिपासति) मान प्राप्त करना चाहता है, और (सुद्रुयं नेमि ) उत्तम लकडीको धरा (त्वष्टा इव) जैसे वहई ठीक करता है, उसी सरह (पुर-हतं) अनेकोंके द्वारा पूजित होनेवाले (इन्द्र) इन्द्रो (गिरा यः आ नमे) यागोसे नमस्कार करये अपने अनुकूल बनाते है॥६॥ (२३९] हे इन्द्र ! (रसिनः गोमतः ) रसपाले तथा गौदुग्ध से मिश्रित इस (नः सुतस्य पिर) हमारे द्वारा निचोडे गए सोमरसोंको पी, और (मत्स्स ) मानन्दित हो, (सधमा) एक साथ बैठकर जिसमें आनन्दित होने है, ऐमे इस यज्ञमें (आपिः) व हमारा भाई होता है, इसलिए (नः वृधे योधि) हमारे उन्नतिरे मार्गको दिसा, (ते धियः अवन्तु ) तेरी बुदि हम सबोंका सरक्षण करें॥७॥ १ सघमाद्ये भापिः नः वृधे बोधि-- एवत्र बैठकर जहा यर्म किया जाता है, उप्त काममें तू हमारा मित्र हो, और हमारी उन्नतिका मार्ग हमें बता । २ ते धियः भवन्तु-- तेरो वृद्धि हमारा सरक्षण करे । १२४० हे इन्द्र ! (हि त्य) निश्चयसे तू (यमुत्तये एहि ) धन देने के लिए या, और आरर (चेरये) उत्तम आधरण करनेवाले मुझे (भग निदाः) घन दे, हे (मघय ) धनवार इन्द्र ! (गयिष्टये उत् पापस्य) गायोंको TEE करनेवाले मुझे गाय दे, हे इन्द्र ! (इष्टय ) ला करनेवाले मुझे अभ्यं उत्) घोश भी दे hen १ त्यं यमुत्तये पहि-हपन देनेरे लिए मा ! २ चेरये भगं पिदाः- उत्तम आवरण करनेवाले मनुम्पको धन दे ।
सामवेदका सुबोध मनुवाद (ऐन्द्र कायम १ ३२ ३.२५ १ २ ३१ ३१११३१३ " 3 8 ३" २ १२ २४१ न हि वश्चरम च न वसिष्ठः परिमसते असाकमद्य मरुतः सुते सचा विधे पिपन्तु कामिनः ॥९॥ (ऋ.७५९) २४२ मा चिदन्यवि शंसत सखायो मा रिपण्यत । इन्द्रामस्तोता वृषण रसचा सुते मुहुरुक्था च शरसत ॥१०॥ (. ११) इति पञ्चमी दशति. ॥ ५॥ प्रथम खण्ड ॥१॥ [स्व० १२ । उ०५१ घा० ७३ । (त्रि) इति तृतीय प्रपाके प्रथमोऽधः ॥१॥ [६] (१-१०) १ पुरुहामा आगिरस', २, ३ मेधातिथि-मेध्यातियो काण्वौ ४ विश्वामित्रो गायिनः ५ गोतमो (गौतमो वा ) राहूगण ; ६ नुमेधपुरमेयावागिरसो; ७, ८, ९ मेधातिथिध्यातिपिर्वा (ऋमेध्यातिपि.) काण्व १० देवातिथी कावः ॥ इन्द्रः बहती ।। २४३ नकिष्ट कर्मणा नशयश्चकार सदावृधम् । इन्द्रं न यनविश्वगतमम्बसमधृष्टं धृष्णुमोजसा ॥१॥ (ऋ. ८1०13) २४४ य म चिदमिथिषः पुरा जत्रुभ्य आवृदः । सन्धाता सन्धि मघवा पुरूवसुनिष्कता विद्रुतं पुन: ॥२॥ (ऋ.८1१।१२) [२४१] है (मरुतः ) मरुतो ! ( यसिष्ठः वः) पसिष्ठ ऋषि तुमसे (चरम चन ) छोटेको भी (नदि परि- मंसते ) छोडकर स्तुति नहीं करता, अपितु सभीको स्तुति करता है, (अद्य) आज (अस्माकं सुते ) हमारे पशम (विधे मरतः) सब मरत (सचा) एक स्थानपर बैठकर सोमरस (पियन्तु) पोय ॥९॥ [२४२) (समायः) मित्रो । ( अन्यत् मा चित् विशंसत) इन्द्र के सिराय और पिसीकी स्तुति न करो, (मा रिपण्यत ) बेकार परिश्रम मत करो, (सुने) सोम यज्ञमें (वृषणं इन्द्रं इत्) बलवान् इन्द्रको हो (सचा स्तोत) एक माय बैठकर स्तुति करो, ( उक्था च) और स्तोत्रोंको (मुहुः शंसत) धार बार हो ॥१०॥ १ सचा स्तोत-- ए जगह बैठकर स्तुति करो। यहां तेरयां खंड समाप्त हुआ । (8'चतुर्दशः खण्डः। २४३ ) (य.) यो यजमान (सदा-धं) सदा वृद्धि प्राप्त होनेवाले (विश्य गर्ने) सभीसे प्रशमित होते. पाले (म्पस ) महान् ( मोजसा गधृष्टं) दलके मारण विसोसे न दरनेवासे (घृणु) दात्रुको रयानवाले (पन्द) इगो में (यान चकार) यमरो यो मनुकूल बनाता है। (तं) उस यजमान (पर्मणा न लिनशत्) खि रोईवा नहीं सरता ॥१॥ म-समान, अनुएल, नहीं। १२४०11)ोm (अभि-थिएः जोनके गानोंके (ऋते चिद) पिना भी (जाभ्यः भावना) गरेरो नापुसि रात निकलने पर भी (पुग संधि सन्धाता) शिर संथियों ओर देता है, वह (मधया पुरयर) चनमान् भोर बहुतसे प्रयोको पाम रतनेवासा इन्द्र (विटुतं पुनःनिष्पा) कटे हुए भार्गोरिमोद देता है at मधि धाता-फिर सन्धिोरो गोरता है। २पिन्गुतं पुनः निष्का-हुए भागोरो बोहता है। १
तृतीय अध्याय]
सामवेदका सुयोध अनुवाद
१
३
३२३.
२.३१२
३१२३
कैशिनों वहन्तु
( ८1१।२४)
॥४॥
(ऋ. ३।४५१)
२४५ आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता र दिरप्पये
बमयुजो हरय इन्द्र
सोमपीतये
२४६ आ मन्द्ररिन्द्र हरिभिर्याहि मयूरोमभिः ।
मा त्वा के चिन्नि यमुरिन्न पाशिनोऽति धन्येव वाहि
२४७ त्वमङ्ग प्रशसिपो देवः शविष्ठ मय॑म् ।
में त्वदन्यो मघवन्नस्ति मतिन् पीमित !
२४८ त्वमिन्द्र यशा अस्य॒जीपी श्वसस्पतिः ।
त्वं चत्राणि हस्पतीन्पक इत्पुर्वनुत्तश्चर्पणीतिः
२४९ इन्द्रमिदेवतातय इन्द्रं प्रयत्यघरे ।
इन्द्रसमीकै वनिनो हवामह इन्द्र धनस्य सातये
॥५॥ (ना. १८४१९)
(ऋ. १९०५)
11३१२३
36033
॥७॥
(ऋ ८०३९)
--
[२४५] हे इन्द्र ! (ब्रह्म-युजः फेशिनः) मत्र बोलते ही जुड़ जानेवाले, अच्छे वालोंवाले (हिरण्यये रथे)
सोनेके रपमें (युक्ताः) जुड़े हुए (या सहस्र शतं ) सैकड़ो और हजारों (हरयः) घोडे (त्या) तुझे (सोमपीतये)
सोम पीने के लिए (आवहन्तु) ले आवे ॥ ३॥
शतं सहस्रं हरयः-- संकडों और हजारों घोडे, किरण ।
[२४६ ] हे इन्द्र ' (मन्द्रः) आनन्ददायक (मयूर-रोमभिः) मोरके समान वेशोसे युक्त ( हरिभिः) पोडोरो
पायो जैसे (धन्या इव) रेगिस्तानको पार कर जाता है, उसी प्रकार(तान् अति मायाहि ) बोच मानेवाली रुकावटोंको
दूर करते हुए मा, (इत् ) और (पाशिनः न) हायमें जालको लेकर शिकारी जैसे पक्षियोंको पकडता है, उस प्रकार
(स्वा मा तियेमुः) तुझे पकडकर तेरे बोचमें कोई रुकावट पैदा न करे, (एहि । तू आ ॥४॥
(२४७] (अन शविष्ठ) हे प्रिय और बलवान् इन्द्र ! (देवः) प्रकाशित होनेवाला तू (मर्त्य प्रशसिपा)
उपासक मनुष्योंकी प्रशंसा करता है, हे (मघवन् इन्द्र) धनवान् इन्द्र! (त्यदन्यः) तेरे सिवाय दूसरा कोई भी
(मड़िता नास्ति) मुख देनेवाला नहीं है, तेरे लिए हो (पचः प्रवीमि) ये स्तुतिया करता हू॥५॥
१ त्वद् अन्यः मार्डिता नास्ति- तेरे अलावा और कोई मुख देने वाला नहीं है ।
[२४८ । (इन्द्र) हे इन्द्र! (त्वं) तू (शवसः पतिः) बलवान् (जीपी) सोमरस पीनेवाला और (यशाः)
पास्वी (मसि) हातू (म-प्रतानि पुर वाणि) अत्यधिक बलशाली बहुतसे मित्रोंको (अनुत्तः) किसीकी प्रेरणाके
बिना हो (चर्पणी-धृतिः) लोगोंके सरक्षणके लिए (एकः इत् ) अकेले ही (इंसि) मारता है ॥६॥
१ अप्रतानि पुर पृवाणि मनुत्तः, चर्पणी-धृतिः एक इत् हंसिपीछे न हटनेवाले यतरो शत्रुओंको
दूसरे पिसोको प्रेरणाके मिना, सब मनुष्योंके हित करने के लिए अकेले मार देता है।
(२४९ 1 (देवतातये) देवोंके लिए किए गए यशमें (इन्द्रं इत् हयामहे) इन्द्रको हो हम बुलाते हैं, (मयते
अध्वरे इन्द्र) पज्ञके प्रारम्भ हो जानेपर इन्द्रको ही बुलाते है (समीके वलिनः इन्द्र) यत्तके समाप्त हो जानेपर मी
हम उपाराक इन्द्रको बुलाते है, उसी प्रकार (धनस्य सातये इन्द्रं ) धनको प्राप्तिके लिए भी इन्द्रको बुलाते हैं ॥७॥
(६५) सामवेदका सुयोघ अनुषाद [ऐन्द्र काण्डम् १ र २३ २ २१ १२२ ११ १२३ ३२३ ३.३.३३ व 3 २ ३२ ३३१२ a २३ १३ र २५० इमा उ त्या पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभिस्तोमरनूपत (३३) २५१ उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते । सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव ॥९॥ (ऋ. १५) २५२ यथा गौरी अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम् । आपित्वे नो प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिव ॥१०॥ ( १३) इति पळो शातिः॥ ६॥ द्वितीयः खण्डः ॥२॥ [स्व० ११13०७॥ पा० ७२ । (ला) ॥] (१-१०) १ भगः प्रागायः; २,८ रेभः काश्यपः, ३ जमदग्निर्भार्गव ४, ९ मेयातिथिः करण्या; (ऋ० मेध्या- तिथिः काण्व ); ५, ६ नमेघपुरुमेघावागिरसौ ७ वसिष्ठो मैद्यावणिः, १० भरद्वाजः (ऋ० शय् ) बाई. स्पत्यः ॥ इन्द्रः; ३ मित्रावरुणावित्याः ॥ बहती ॥ २५३ शग्भ्यू३षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि (ऋ. ८०६१) २५४ या इन्द्र भुज आमरः स्वर्षा असुरेभ्यः । स्तोतारमिन्मघवन्नस्य चर्षय यै च खे वृक्तपिः ॥२॥ (र. १९७१) [२५० 1 है (पुरू-यसो ) बहुत धनवान् इन्द्र ! (मम इमाः याः गिरः) मेरी ये जो स्तुतियां हैं, ये (श्या पर्धन्तु ) तैरे यशको वहावे, ( पापक-वर्णाः ) अग्निक समान तेजस्यो ( शुचयः विपश्चितः ) पवित्र विद्वान् लोग तेरो (स्तोमः अभ्यनूपत) स्तोत्रीरो स्तुति करते हैं ॥८॥ [२५१ ] (सत्रा-जितः) सदा जानुभोरो गोतनेवाले (धन-सा) धन देनेवाले ( अक्षित-ऊतयः) कोण होनेवाले सरक्षोको करनेवाले, (धाजयन्तः ) यलदान (रथाः इव) रथये समान (स्ये मधुमत्तमाः गिरः) बहुत उत्तम स्तुति यौर (स्तोमासः ) स्तोत्रौंको (उत् ईरते ) योला जाता है ॥९॥ [२५२ । (यथा गौरः ) जैसे पोर मृग ( तृप्यन ) प्यासा होकर (भपा तारिणं) पानीसे भरे हुए शाला: परे पास (अति ) जाता है, उसी प्रकार (यापित्वे प्रपित्वे ) भाई पारेको पार करके है (इन्द्र)! (ना तूप आगहि) हमारे पास मल्यो पा, और । कण्या सचा मु पिय) वण्यये यहमें बैठकर उत्तम रीतिरी सोम पो ॥ १० ॥ ॥ यहां चौदहवां पंड समाप्त हुआ। [१५] पञ्चदशः खण्डः। [२५३ (आधीपते शुर इन्द्र) शनि सम्पन्न रहन ! (विश्वामिः ऊतिमिरारे सापक पाप (शग्धि किस पर मैं है, (भग न ) ऐश्वर्यवानरे रामान (यशसं ) पास्वो मोर (पातु-पि) मन पाले (स्था) री ( मगुचगमगियाराना हम परते॥१॥ [ २५५ है इन्द्र । ( सर्वान् ) माम शातिरो मात (पाः भुजः) ओ भोप ( अनुरेन्यः माभरः) भरोग से मापा (मपान ) पनथात् ! (अम्म)ग पनसे (म्तोतारं यर्धय) तेरी तुति धामोरा मान (च) मौर (पेत्ये पृषा-दिपा)मो at लिए या मापनको पैसाले ई. महोबा ॥२॥ 1 है.
द्वितीय अध्याय] सामवेदका सुघोध अनुवाद २." १४ १ २ ३१२४ g ₹ ३३३३ २५५ प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो । वरूथ्येश्वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्र राजसु गायत ॥ ३ ॥ (5.1१.१५) २५६ अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेमिरायवः । समीचीनास प्रभवः समस्वरचंद्रा गृणन्त पूर्यम् ॥४॥ (म. ८३७) २५७ प्र व इन्द्राय वृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रहनति वृत्रहा शतक्रतुर्वण शतपर्वणा ॥५॥ (प्र. ८1८९३) २५८ बृहदिन्द्रीय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्त्तावृधो देवं देवाय जागृषि ॥६।। (5. ८८९१) २५९ इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षा को अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥७॥ (ऋ ७१३२।२६) १ स्वर्वान याः भुजा असुरेभ्यः आभरः, अस्य स्तोतारं वर्धय- अपनी शक्तिसे पुरत रहनेयालाद जो धन अपुरोरो ले आया है, उस धनको सहायतासे उपासकोंनो बढ़ा। [२५५] है (कता-बसो) यज्ञके लिए अपने पास धन रखनेवाले यज्ञ करनेवालो ! (मित्राय) मित्रके लिए (अर्यम्णे ) अर्थमाके लिए और (वरूथ्ये वरणे ) यश गालामें मैठे हुए वरुणके लिए ( सचथ्य छन्दयं वचः) गाने के योग्य, छन्दोवद्ध स्लोत्रोंको (राजसु प्रगायत ) उनके विराजमान होजाने के बाद गायो ।। ३ ।। (२५६ "हे (इन्द्र ) इन्द्र ! (आयवः) याशिक जन (पूर्व-पीतये ) सबसे पहले सोमपोनेके लिए ( स्तोमेभिः त्यो अभि) स्तोत्रोंसे तेरी स्तुति करते है, ( समीचीनासः भवः) एकत्रित हुए ऋभुओंने (समखरन ) तेरी स्तुति को, (रदाः) रुद्रके पुत्र भरतोंने भी ( पून्यं गृणन्त ) पहलेके पुरुषों के समान तेरो स्तुति को ॥४॥ [२५७] है ( मरतः ) मरतो । (वृहते ) महान् इन्द्र के लिए (1) तुम (ब्रह्म पर्चत) स्तोत्रीको कहो, उसके अनन्तर (मृन-हा) पत्रका नाश करनेदाला (शत-ऋतुः ) संकडों फर्म करनेवाला ( शत-पर्यणा वग्नेण) सेफडों धाराओंवाले पनसे (पृ हनति ) को मारता है ॥५॥ १ मरता-मरुत् गण, स्तुति करनेवाले, यज्ञ करनेवाले। २ नहा शतक्रतुः शतपर्यणा वशेण खूनं हनात- वृनको मारनेवाला तमा संकड़ों कार्य करनेवाला इग्र संकों शारदाले बरसे वनको मारता है। { २५८ ] हे (मरुतः ) यज्ञ कर्ताओ ! (इन्द्राय) इन्द्र के लिए (यूष हन्तमं वृहत् गायत) qषको नष्ट परनेवाले बृहत् नामर सामका पान करो, ( ऋता-वृध.) यज्ञको यगनेवाले लोगोंने ( देवाय ) इन्द्र देवके लिए (देयं जागृषि ज्योतिः ) दिव्य जागृतिको करनेवाली सूर्यको ज्योति ( येन अजनयत् ) उसकी सहायतासे उत्पन्न को है ॥ ६॥ [२५९] हे (इन्द्र) इन्द्र । (नऋतुं आभर) हमें या कर्म करनेका ज्ञान दे, (यथा पिता पुत्रेभ्यः) निस प्रकार पिता पुत्रको शिक्षा देता है, उसी प्रकार (नः शिक्ष) में शिक्षा दे, है (पुर-हूत) बहुतोंद्वारा बुलाये जानेवाले इन्द्र । (यामनि) पराम (जीवाः ) हम लोग (ज्योतिः मशीमहि ) सूर्यको ज्योति प्रतिदिन देखें ॥७॥ १नः ऋतु आभर- हमें मुष्टि दे, उतम कर्म करनेको बुद्ध दे ! २ यथा पुत्रेभ्यः पिता, नः शिक्ष- असे पिता लल्फोंको शिक्षा देता है, उस प्रकार तु हमें शिक्षा दे। ३ यामनि जीयाः ज्योतिः अशीमहि-याने जीवित रहार हम तेज प्राप्त करें। ९ (साम. हिंदी)
(६६)
सामवेदका सुबोध मनुवार
[ऐन्द्र काण्डम्
१
१
3
१३
२६० मा न इन्द्र परा वृणग्मवा ना सधमाये ।
वन ऊती त्वमिन्न आप्प मा न इन्द्र परावृणक्
॥८॥ ( ८1९७७)
२६१ वयं घ त्या सुतावन्न आपो न वृक्तवहिपः ।
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते
॥ ९॥ (ऋ. ॥३२॥१)
२६२ यदिन्द्र नाहुपौवा ओजी नृम्णं च कृष्टिषु ।
यद्वा पञ्चक्षितीनां घुम्नमा मर सत्रा विश्वानि पौरस्या
॥१०॥ (ऋ.६१६७)
इति सप्तमी दशति ॥७॥ तृतीय खण्ड ॥ ३ ॥ [स्य. १० । उ० ११ पा० ६२ । (पा)1]
२६ २१
(१-१०) १ मेधातिषिः (० मेप्यातिथि ) काय २ रेभ काश्यप, ३ यत्स यशोशष्य);
४ भरद्वाज (शय ) बार्हस्पत्य । ५ नमेघ आगिरस , ६ पुरुहन्मा मागिरस ७ नुमेप-पुश्मेधावागिरसो,
८पसिळो मंत्रावरुणि , ९ मेधातिथि-मेध्यातिपो काण्वो, १० कलि प्रागाय ॥ इन्द्र ।। बहती ॥
२६३ सत्यमित्था वृपैदसि वृपतिर्नोऽविता ।
वृपा ह्युग्र शृण्विषे परावति वृपो अविति श्रुतः ॥१॥ (ऋ.८॥३३॥१०)
[२६० ] है इन्द्र ! (नःमा परावृणा) हमें दूर मत कर, (नः सधमाद्ये भव) हमारे यज्ञमें आ, है इन्द्र।
(त्वं न ऊती) तू हमारा रक्षक है, (वं इत् नः आप्यं) तू ही हमारा भाई है, है इन्द्र ! (नः मा परावृणक् )
हमें दूर मत कर ॥८॥
१हे इन्द्र ! ना मा परायणक्-है इन्द्र ! तू हमें दूर मत कर।
२नः सधमाधे भव-हमारे यश आ और सबके साय बंठ।
३ त्वं नः ऊती-तू हमारी रक्षा करनेवाला है।
४ त्वं नः आप्यं- हमारा भाई है ।
[२६१ ] है (वृत्रहन ) बत्रको मारनेवाले इन्द्र । (त्या) तुझे (वयं घ सुतावन्तः ) सोमरस तय्यार करनेवाले
हम सोमयज्ञमें ( आपःन) जल प्रवाहोंके समान प्राप्त होते है, (पवित्रस्य प्रनवणेपु) पवित्र योंमें (यूक्त-धाईप.
स्तोतार.) आमन फैलाकर स्तुति करनेवाले ( परि भासते) एकत्र बैठते है, उसी प्रकार हम ठते है ॥९॥
[२६२ ] हे इन्द्र ! (नाहुषीषु टिपु ) मानवी प्रजाओंमें (ओज. नृम्णं च ) जो बल और पौरुष है, (पद
घा ) अयया जो (पवक्षितीनां शुम्न ) पाच जनोंमें जो धन है, उस प्रकारके धन (आ भर ) हमें भरपूर है, उसी
प्रकार (सया) एकतासे बहनेवाला (विश्यानि पास्या) सब बल हमें दे॥१०॥
१ पचक्षितीनां शुम्न आमर- पधजनोंको एकतासे उत्पन्न होनेवाले तेज हमें प्राप्त हों।
२ सना विश्वानि पास्या आभर- एकतासे उत्पन्न होनेवाले सब बल प्राप्त हों।
॥ यहां पंद्रहवां खड समाप्त हुआ।
[१६] पोडशः खण्डः।
[२६३ ] हे (उम्र ) बोर इन्द्र ! तू (इत्या ) इस प्रकार ( सत्यं वृपा इत् असि ) निश्चयते बलवान् है,
(धूप-जूति नः अविता ) सोमयत करनेवालों द्वारा रक्षाके लिए बुलाने के कारण तू हमारा सरमण कर। तू (कृपा
हि विषे) बलवान् मुना जाता है। ( परावति घृपा) दूर देशमें भी तू बलवान है और ( अर्यापति श्रुतः ) पासम
मी तू ही यसदान सुना जाता है॥१॥
द्वितीय मण्याय) सामपेदका मुशोध मनुवाद ॥२॥ (ऋ. १९७४) २६४ यच्छक्रासि परावति यदावति वृत्रहन् । अतस्त्वा गीर्भि'गदिन्द्र केशिभिः सुतावा आ विवासति २६५ अमि यो वौरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचैतसम् । इन्द्रं नाम श्रुत्यस्याकिन वचौ यथा २६६ इन्द्र निधातु शरणं विवरूपस्वस्तये । छर्दिर्यच्छ मघवद्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमैम्प: २६७ थायन्त इव सूर्य विधेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जावो जनिमान्योजसा प्रति भाग न दीधिमा ॥३॥ (ऋ. ८१४६।१४) ॥४|| (ऋ.६४६९) ॥ ५॥ (ऋ. ८।९९३) 1 १ वृपा-बलवान्, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, २ वृपा ऋण्यिपे-तू पलवान् प्रसिद्ध है। ३ परावति अर्वायति वृषा श्रुतः- वूर और पासके देशों में शक्तिमान् प्रसिद्ध है। [२६४ ) हे (शक) सामथ्र्यवान् इन्द्र ! ( यत् परावति असि) जपत दूर देशमें रहता है, और हे (पृन-इन) वृत्रको मारनेवाले इन्द्र ! (यत् अर्वावति ) जब तू पासके देशमें रहता है, है इन्द्र 1 (अतः) इस स्थानसे (केशिभिः गीभिः ) मपाल वाले घोडेके समान शीघ्रगामी स्तुतियोंसे (सुतावान् ) सोमया करनेवाला (त्या आविवासति ) तुझे पुलाता है ॥२॥ १ शक । परावति असि, अर्यावति असि- हे इन्द्र ! जैसा तू दूर है, वैसा ही तू पास भी शक्तिमान है। २अयाल-गर्दन गाल। [२६५] हे उद्गाता ! (प.) तुम अपने हितके लिए (अन्धसः मदेषु) सोमरसके आनन्दर्भ (धीरं नाम) स्वयं घोर रहते हए यात्रुको मुकानेवाले (विचेतसं श्रुत्यं ज्ञानी और सुप्रसिद्ध (शाकिन इन्द्र) इन्द्रको शक्तिशाली (मक्षा गिरा वचः यथा) विशेष स्तुतिके स्तोत्रौंको जैसे हो से (गाय) गालो ॥३॥ [२६६] हे (इन्द्र) इन्द्र ! (नि-धातु त्रिवरुथं) तीन मजिलवाला तया तीनों ऋतु में सुख देनेवाला (स्थस्तये छदिः शरणं) सुख रहने योग्य उत्तम घर ( मघयद्यः) धनवान् यजमान्को ( मा च) और मुझे भी दे (एभ्यः दिधु यावय) और इनसे शास्त्रोंको दूर कर ॥४॥ १ त्रि-धातु त्रियरूथं छर्दिः शरणं स्वस्तये-- तीन मजिलोवाले और तीनों ऋतुओंमें सुख देनेवाले घर रहने के लिए प्राप्त हो। (२६७] (सूर्य श्रायन्तः इव) जिस प्रकार किरणे सूर्यका माधप लेकर रहती है, उसी प्रकार (विश्वं इन्) सब जगत् (इन्द्रस्य भक्षत) इन्द्र ही आत्रयसे रहता है पयोंकि यह इन्द्र (जातः जनिमानि) उत्पन्न हुए और उत्पन्न होनेवालोंको (ओजसा करोति) वलसे भाग देता है जैसे पुत्रको अपने (भाग न) पिताके घनमें से भाग प्राप्त होता है, उस प्रकार (प्रति दीधिमः) हम अपने भागको इच्छा करते हैं ॥५॥ १विश्व इन्द्रस्य भक्षत- सब जगत् इन्द्र के माधयसे रहता है। २ जातः जनिमानि मोजला कोत-- उत्पन्न हए और होनेवाले राबोंको यह भपनो शक्तिसे बनाता है। 9 (६८) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पन्द्र कापटम् २१ - ११ ॥६॥ (ऋ८७०१७) २ २ 32 २३ . १ ।।७।। (ऋ. १९०१) २६८ न सीमदेव आप तदिप दीर्घायो मर्त्यः एतम्या चिद्य एतशो युयोजन इन्द्रा हरी युयोजते २६९ आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्र समत्सु भूपत । उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या चीपम २७० तदिन्द्रायम वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम् । संत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि न किट्या गोषु वृश्यते २७१ स्वयथ क्वेदसि पुरुत्रा चिद्धि ते मनः । अलपि युध्म खजकृत्पुरंदर प्र गायत्रा अगासिपुः 323 ॥८॥ (ऋ. ७।३।१६) 3 २१२ 39 २ ॥ ९॥ (ऋ. १७) (२६८ ] है (दीर्घायो ) लम्बी आयुवाले इन्द्र ! (अ-देवः मर्त्यः) ईश्वरको उपासना न करनेवाला मनुष्य (सी तत् ) उस प्रसिद्ध अन्नको (न आप ) नहीं पा सकता, (यः) जो ( एतम्या चित्) बहा जानेको इच्छा करते हुए (एतशः युयोजते) भोडे जोडता है, उसी प्रकार (इन्द्रः दरी युयोजते ) इन्द्र भी अपने घोडौंको यज्ञके स्थानको जाने के लिए जोडता है ॥ ६ ॥ १ अदेवः मर्त्यः सीन आप-- ईश्वरकी उपासना न करनेवाला उस प्रसिद्ध घनको प्राप्त नहीं कर सकता। [२६९ / (यिभ्यासु समत्सु ) सब युद्धोंमें (हव्यं इन्द्रं ) सहायताके लिए बुलाने योग्य इन्द्रको (नः ब्रह्माणि उप भूपत ) हमारे स्तोत्र सुशोभित करते हैं, इन्द्रको स्तुति करते है । हे ( यत्र-हन्) वनको मारनेवाले (परम-ज्याः) जिसके धनुषकी डोरी उत्तम है ऐसे ( रुची-पम) मत्रोंसे स्तुति करनेके योग्य इन्द्र ! (सवनानि ब्रह्माणि उप) हमारे तीन सबनो और स्तोत्रोंको अलकृत कर ॥॥७॥ [ २७० ] हे इन्द्र 1 (अवर्म वसु तर इत्) सबसे निम्न कोटिका धन तेरा ही है. (त्वं मध्यम पुष्यसि ) त हो मध्यम कोटि धनका पोषण करता है, (परमस्य विश्वस्य सना राजसि) और न ही सबसे उत्तम धनका भी अपेला ही स्वामी हैं, (त्या ) तुझे (गोपु नकि पृण्वते) गाय आदि देते हुए कोई भी रोक नहीं सकता ॥८॥ १हेन्द्र अवसं पट लव इन-रिहण्ट पर देश ही है। २त्यं मध्यमं 'पुप्यसि-ही मध्यम धमको बढाता है। ३ परमस्य विश्वस्य सना राजासि- सबसे उत्तम धनका भी अकेला ही स्वामी है। [२७१ इन्द्र ! (क इयथ) तू कहा गया था ? ( क इत् असि ) अब तू कहा है ? (पुरु-मा चित् दि ते मनः ) बहुतसे स्थानोंपर तेरा मन जाता है, है (युध्म ) युद्ध करनेमें कुशल, (खज-त् ) युद्ध करनेवाले (पुर- दर) दात्रुको नगरीका नाश करनेवाले इन्द्र (अलर्षि) आ (गायनाः प्रगासिपुः) हमारे गानेमें कुशल लोग स्तोत्रोंका गान करते है ॥९॥ १ हे युध्भ, खजकृत्, पुरंदर, मलपि-- हे युद्धौ कुदाल, युद्ध करनेवाले, के नगर तोडनेवाले इन्द्र! ।
तृतीय अध्याय] सामयेदका सुयोघ अनुवाद १.१२१ ३३ 3"२३३ २९ १ २७२ वयमेनमिदा घोडपीपेमेह वज्रिणम् । वसा उ अद्य सपने सुतं भरा नून भूपत श्रुते ॥१०॥ (८६६७) इति अष्टमी दातिः ॥८॥ चतुर्यः खण्डः ॥ ४॥ स्व० १४ । उ०११ पा० ७४ । (ती).] [९] (१-१०) १६ पुरहमा मागिरसः, २ भर्गः प्रागापः, ३ इरिम्बिठि शायः; ४ जमदग्निर्भार्गवः, ५, ७ देवा. तिथि काण्व. ८ वसिष्ठो मंत्रावरणि, १ भरद्वाजो बाहस्पत्यः, १० मेप्यः पाण्यः । इतः (०३ वास्तोपतिर्वा; ४ सूर्य इन्द्रानी ) ॥ बृहती॥ २७३ यो राजा चर्पीना याता रथेभिरध्रिगुः । विश्वासां वरुता पृतनाना ज्येष्ठ यो वृत्रहा गृणे ॥१॥ ( ८1७०11) २७४ यत इन्द्र मयामहे तो नौ अभयं कृधि । मघवञ्छन्धि तव तन्न ऊतये वि द्विपा वि मृधो जहि ।।२।। (ऋ. १६१६१३) २७५ चास्तोष्पते धुवा स्थूणासत्र सोम्पानाम् । द्रप्सः पुरा मैत्ता शश्वतीनामिन्द्रो मुनीनार सखा ॥३॥ (ऋ ९१४) [२७२ ] (वयं) हम मजमानोंने (पनं वजिर्ण) इस वज्रधारी इन्द्रको (इदा) इस समय और (ह्यः) कल (अपीपम) सोमरस पिलाकर तृप्त क्यिा, (तस्मा उ) इसीलिए (अध सपने) भाजके पशमें भी (सुतं भर) सोमरस भरकर उसे दे, (नूनं श्रुते आभूपत) निश्चयसे इस समय स्तोत्र सुननेके याद उसको अलंकृत कर ॥ १०॥ ॥ यहां सोलहवां खंद समाप्त हुआ। [१७ ] सप्तदशः खण्डः। [२७३ ] (यः चर्षणीनां राजा) जो इन्द्र मानयोका राजा है, (रथेभिः अधि-गुः याता) रपसे शोप्रतासे जो जाता है, (विश्वासां पृतनानां तस्ना) सब शत्रु सेनाओंका नो नारा करता है, (यः वृन-हा) जो पत्रको मारने- पाला है (ज्येष्ठं गृणे ) उस अंग्छ इन्नको मै स्तुति करता हूँ ॥१॥ [२५] हे इन्द्र ! (यतः भयामहे) नहासे हम डरते हैं, (ततः नः अभयं कृधि) यहासे हमें निर्मम यनागो, है (मधयन ) धनवान् इन्द्र ! (शग्धि) तू समर्थ है, (तत् । इसलिए (तब ) अपने सामर्थ्यसे (नः ऊतये) हमारे सरमणके लिए (द्विषः विजादि ) शत्रुभोंका नास कर मौर (मृधः विज्ञहि ) हिमकोंको नष्ट कर ॥२॥ १ यतः भयामहे ततः नः अभयं दृषि- जहासे हम डरते हैं, वहासे हमें भयरहित करो। २नः ऊतये द्विपः धिजाहि, मृधः विजहि-- हमारे सरक्षणके लिए शनों और हिसकोको नष्ट कर । ३ शग्धि-- तू सामर्थ्यशाली है। [२७५) है (वास्तोपते ) गृहस्वामी ! (स्थूणा धुवा) घरके खम्भ दृढ़ हों, (सोम्यानां अंस) सोमयर करनेवालों में मनमा बल उत्तम हो, (इप्सा) सोम पोनेवाला (शश्वतीनां पुरां भेत्ता) असुरोको बहुतसो नगरियोको तोड़नेवाला (इन्द्रः) इन्द्र (मुनीना मला) ऋषिपोंग मित्र है ॥३॥ १ शश्वतीनां पुरा भेत्ता मुनीनां ससा इन्द्रः- असुरोंको बहुतसो नारियोंको तोडनेवाला इन्द्र मुनि- योका मित्र है।
(७०) सामयेदका सुबोध गनुवाद (पेन्द्र काण्डम् १३ " २ ॥४॥ (ऋ. ११.११११) 9 २३ ३३ (1४९) . र २७६ यमदार असि सूर्य वडादित्य महा असि । महस्ते सतो महिमा पनिष्टम महा देव महा असि २७७ अधी रथी सुरूप इदोमायदिन्द्र ते सखा । श्वात्रमाजा वयसा सचते सदा चन्द्राति समामुप २७८ ययाव इन्द्र ते शत शर्व भूमारुत स्युः । न त्वा वजिन्सहस्रसूयी अनु न जातमष्ट रोदसी २७९ यदिन्द्र प्रामपागुदग्न्यग्वा हुयस नृमिः । सिमा पुरू नृपूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्ध तुझे २८० कस्तमिन्द्र त्वा वसवा मत्यो दर्पति । श्रद्धा हि ते मघवन्याय दिवि बाजी वा सिपासति ३१ 8.३११३ (ऋ.८/७०५) ॥७॥ (ऋR) ॥८॥ (ऋ. ७३२०१४) [२७६ ) हे ( सूर्य ) प्रेरक इन्च (महान् असि) तू महान है, (वद) यह रात्य है, हे (आदित्य) अवितिके पुत्र इन्द्र ! तू (महान् असि } महान है यह (य) सत्य है, (महः ते सतः महिमा) महान् होनेवाले तेरी महिमाका (पनिष्टम) वर्णन हम करते हैं, है (देव) देव ! तू (महा महान असि) अपने बलसे तू महान है ॥४॥ [२७७ ] हे इन्द्र ! (यत् ते सखा) जब तेरा मित्र कोई मनुष्य होता है, तब (इत्) वह (अश्वी) घोस युक्त (रथी) रथ रखनेवाला, (सुरूपः) उत्तम हपषाला (गोमान् ) बहुत गायें रखनेवाला, (श्वान-भाजा) धनवान (वयसा सदा रावते) अनसे सदा उनतिशील होता है, तथा वह हमेशा (चन्द्रः सभा उप याति) उत्तम भूषणोंसे मुक्त होकर सभामें जाता है ॥५॥ [२७८ ] हे इन्द्र ! (यत् धावः शतं स्युः) पवि घुलोक सौ गुना हो जाये तय भौ (त्या न अनु-अए) गुप्ते घेर नहीं सकते, (उत भूमी शतं स्युः) पृथ्वी सौ गुनी हो जाये, तो भी यह तुझे आधार नहीं दे सकती है (पानिन्) यवपारी इन्द्र ! (सहस्र सूर्याः) यदि हजारों सूर्य हो जाये, तो भी (त्यान) तुझे प्रकाशित नहीं कर सकते, (अनुः जातं न अष्ट) तेरे पीछे हुए ये सब तुझे व्याप नहीं सकते, में (रोदसी) घलोक और पृथ्यो लोक तुझे घ्याप नहीं सकते ॥६॥ [२७९ ] हे इन्द्र । (यत् माग्) क्योंकि पूर्व दिशासे (अपान) पश्चिमसे (उदय न्या) उत्तर दिशा भषया दक्षिण दिशासे (नृभिः हुयसे तू मनुष्योंद्वारा सहायताके लिए बुलाया जाता है, इस कारण है (सिं) इन्द्र ! (भानवे पुरु नृपूतः असि) अनुके लिए महत प्रकारसे तेरी प्रार्थना होती है, है (प्रश) शत्रुनाशक इन्द्र ! (तुर्वशे) तुर्यशफे लिए भी उसी प्रकार तुझे बुलाया जाता है ॥७॥ [२८०१ (बसो इन्द्र ) है सबको धमार्नवाले इन्द्र ! (तं त्वा का मर्त्यः यादधति) उस सुझै कौन मनुष्य भला भय दिखाता है ? हे (मघवन्) यनवान् इन्द्र ! (ते श्रद्धा) हुमपर श्रद्धा रखनेवाला ( चाजी) बलवान होता है। और वह दु खोसि (पार्ये विवि) पार होनेके दिनमें भी (वाजं सिपासति) अनका दान करनेकी इच्छा करता है। १ ते श्रद्धा वाजी-शुनपर श्रद्धा करनेवाला मनुष्य बलवान होता है।
सुतीय मापाय]
सामधेवका सुपोध गणुपाद
१३१२
२८१ इन्द्रामी अपादिय पूर्वागात्पद्वतीभ्यः ।
हित्वा शिरो जिहया सरपचरविशत्पदा न्यक्रमीद
॥९॥ (5. ६।५९६)
२८२ इन्द्र नेदीय एदिहि मित्रमेधाभिरूतिभिः ।
आ शंतम शेतमामिभिष्टिभिरा स्वाप स्वापिमिः
॥ १०॥ (ऋ. १९३५)
इति मममी पातिः ॥ ९॥ इति पञ्चमः परः॥५॥ [ स्व० १६।३० ५.पा.२ । (४) u]
[१०]
(१-१०) १ नमेष मागिरसः, २३ वसिष्ठो मंत्रायणि, ४ भरद्वाज. (माय:) माहस्पत्यः ५ परुच्छेपो दैयो-
बासिः ६ यामदेवो गौतमः, ७ मध्यातिथि. कावः, ८ भगं प्रागायः १,१० मेधातिथि-मेप्यातिपी काण्यौ ।।
इन्द्रः ( ५० आश्विनौ ) । महती ॥
२८३ इत ऊती वो अजर प्रहतारमप्रहितम् ।
आशु जेतार हेतार रथीतममनून तुग्नियाधम्
॥१॥ (8. ८/९९७)
२८४ मो षु त्वा वायतश्च नारे अनि सस्मन् ।
आराचाद्वा सधमादं न आ गहीह या समुप श्रुधि ॥२॥ (5. ७३२।१)
3
२
३१३a.३
3".
३३१
१
२३१३
(२८१) हे इन्द्र और अग्नि ! (अ-पाद् इयं ) विनायरोंबातो यह उपा (पद्धतीम्या) परोसे युक्त, सोई हुई
प्रजामोंसे (पूर्वा भगात्) पहले ही आ गई है, (शिरः हित्या) सिरको छोडकर (जिह्वया रारपत्) शोभसे प्रेरणा
करती हुई यह (चरत्) आगे जातो हुई (त्रिंशत् पदानि अकमीत् )तोस कदम-तीस मुहूर्त एक दिनमें चलती है ॥९॥
(२८२] हे इन्द्र ! (नेदीयः) पास ही हमारी यज्ञशाला है, इस कारण तू ( आ इत् इहि ) आ, (मित-
मेघाभिः अतिभिः) बुद्धिमान, और सरक्षणको इच्छा करनेवालोंके साय आ, है (शन्तम) अत्यन्त शान्त स्वभाववाले
इन्द्र! (शन्तमाभिः अभिटिभिः आ) अत्यन्त सुग्व देनेगली अभिलापाओं के साथ मा, है (सु-आपे) उत्तम बन्यो !
(स्वापिभिः आ) उत्तम भाइयोंके साथ आ ॥१०॥
यहां सत्रयां खंड समरस हुआ।
[१८] अष्टादशः खण्डः।
१२८३ ] (4:) तुम (अ-जर) बुढापा रहित (म-हेतारं) शत्रुपर महार करनेवाले, (अ-प्रहितं) कोई भी
जिसे प्रेरणा नहीं दे सकता, ऐसे (आशु जेतारं) शीघ्र विजय प्राप्त करनेवाले, (हेतार ) यतमें जानेवाले (स्थीतम)
उत्तम रयवाले (अ-तूर्त) क्सिीसे भी न मारे जानेवाले (तुप्रिया-वृधं ) जलोंको वृद्धि करनेवाले इन्द्रको (ऊतये)
संरक्षणके लिए (इतः) यहाँ ले आओ॥१॥
[२८४] हे इन्द्र । (त्या) तुझे ( वाघतः चन) यजमान (अस्मत् पारे) हमसे दूर (मा उ निरमन् )
जाकर आनन्दित न हो, इसलिए तू ( आरात्तात् वा) पास रहकर (न. सधमाद) हमारे पजम (सु आगहि)
उत्तम रोतिसे मा. (या इह सन् ) उसी प्रकार यहाँ रहकर ( उपाधि हमारो स्तुतियोंको पाससे सुन ॥२॥
(७२) सामघेद का सुबोध अनुवाद [पेन्द्र काण्टम १२ २१ २१ 30 २ ३११ ११ २ र ३२.१.१३३२३ २८५ सुनोत सोमपान सोममिन्द्राय वजिणे । पचना पतीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्निस्पृणते मया ॥३॥ ( ७३२८) २८६ या सत्राहा विचणिरिन्द्रं तर हूमहे वयम् । सहसमन्यो तुविनम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे ॥४॥ (२६४६३) २८७ शचीभिर्नः शचीवर दिवा नक्तं दिशस्यतम् । मा वा गतिरुपदसत्कदाचनास्मद्रातिः कदाचन ॥५॥ (ऋ.१।१३९।५) २८८ यदा कदा च मीदुपे स्तोता जरेत मयः । आदिद्वन्देव वरुणं निपा गिरा पचा विवतानाम् २८९ पाहि गा अन्धसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे । यो समिश्ला योयो हिरण्यय इन्द्रो बज्री हिरण्ययो ॥७॥ (ऋ. १३३१४) [२८५] हे याजको ! (वत्रिणे सोमपाने इन्द्राय) ववको धारण करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले इनके लिए (सोमं सुनोत) सोमरस निकालो, (अवसे) अपने सरक्षणके लिए अथवा उसको प्रसन्नताके लिए (पक्ती पचत) पुरोषाश पकाओ (कृणुध इत्) इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिए पश करो, क्योकि इन्द्र (मयः पृणन् इत् } यजमानको मुख देते हुए (पृणते) स्वर भी हवि ग्रहण करता है ।। ३ ।। (२८६ (य. सत्रा-हा) जो एक साय शत्रुओंको मारता और (विश्व चर्षणिः ) समको देखता है, (तं इन्द्र- वयं हूमहे) उरा इन्द्रको हम बुलाते हैं, हे (सहस्र-मन्यो) हजारों उत्साहोंसे युक्त (तुवि-मृम्ण ) बहुत धनवान (सत्पते) सन्जनोके पालक इन्द्र ! (समत्सु) युद्धमें (नः वृधे भव) हमारे ऐश्वर्यको वृद्धि में सहायता करने वाला हो॥४॥ १ यः सनाहा विश्व-चर्षणिः । इन्द्रं वयं हूमहे-- जो शत्रुओं को एक साथ मारता और मानवौंका कल्याण करता है, उस इन्द्रको सहायताके लिए हम बुलाते है । २ हे सहस्र-मन्यो तुविनृभ्ण सत्पते ! समत्सु नः वृधे भव- हे हजारों उत्साहसे युक्त, बहुत 'यनयान और सामोंकि पालक इन्द्रों में हमार पर बड़े ऐल कर [२८] है (शची-वसू) कर्म करके पन प्राप्त करनेवाले अश्विनीकुमारो । दुम (शचीभिः) अपनी शक्तिसे (दिवा-नतं दिशस्यत) रात दिन हमें इच्छित धन दो, (घा रातिः कदाचन ) तुम्हारे दान कभी भी (मा उपदसत्) कम नहीं होते. (अस्मत् रातिः कदाचन) हमारे दान भी कभी कम म हो ॥५॥ (२८८ ] ( यदा कदा च ) जिस समय (मोन्हुपे) यज्ञ करनेवाले के लिए (मर्त्यः) मनुष्य (स्तोता जरेत स्तुति करे, (भात् इत् ) उस समय वह (वित्रतानां धार धरुणं) विशेष रूपरे भनेक कर्माको धारण करनेवाले बरुणकी (चपा गिरा चन्देत) विशेष रक्षण करनेवाली स्तुतियोसे बन्दना करे ॥६॥ [२८९] हे मेध्यातिये ! (यः इन्द्र.) जो इन्द्र (हयोः संमिश्नः) दो घोडौंको अपने रथमें जोडता है, और जो (पी) पन धारण करता है, और जो (हिरण्ययः) रमणीय है, तया जो (हिरण्ययः) सोनेके रथमें बैठता है ऐसे (इन्द्राय) इन्दको (मन्धसः महे) सोमपानसे उत्साह प्राप्त होनेके याद (गाः पादि ) अपनी गायका संरक्षण कर ॥७॥ ( तृतीय अध्याय) सामवेदका सुयोघ अनुवाद (७३) 331 9 १ १ २८ २९० उभय शृणवच न इन्द्रो अर्वागिदं वचः। सत्राच्या मधवान् सोमपीतये धिया शविष्ठ आगमन ॥८॥ (न.॥६११) २९१ महे च न त्वाद्रिवः परा शुल्काय दीपसे । न सहस्राय नायुताय वजियो न शनाय मतामघ ।।९।। (INR) २९२ वस्याहन्द्रासि मे पितुरुत प्रातुरभुञ्जतः । माता च मे छदयथः समा वसो वसुत्यनाय राधसे ॥१०॥ (इ. ८१६) इति दशमी पति-1 १०) पष्ठ खण्ड ॥ ६॥ [स्व०१५) उ०४ ७६ (भू)। इति तृतीयप्रपाठके द्वितीयोऽय, तृतीय प्रपाठकश्च समाप्त ॥ २१२१ २ [२९० ] (नाइदं उभयं वचः) हमारे इन दोनों ही प्रकारके स्तोत्रोको (अर्याक् इन्द्रःणयत् ) पास माकर इन्द्र सुने, (च) और (सत्राच्या धिया) एक स्यानपर बैठकर गाये जानेवाले स्तोत्रोको मुनकर (शीनष्ठः मघवान ) बलवान् और धनवान् इन्द्र यहाँ (सोम-पीतये आगमत् ) सोम पीने के लिए लाये ॥ ८॥ (२९१हे (अद्रि-व') वचको पारण करनेवाले इन्द्र! (महे च शुल्काय) बहुतरो पनके बदलेमें भी (त्या) तुम (न परा दीयसे) देचा नहीं जा सकता, है (वजि-वः) वचधारी इन्द्र ! (सहस्राय न) हजारके बदलेमें भी नहीं देखा जा सकता, है (शता-मघ) बहुत पोंसे युक्त इन्द्र। (न शताय)न सौके (अयुताय न) और न बस हजारके यवलेमें ही तुझे वेचा जा सकता है ॥९॥ १६ अ-द्वियः! महे शुल्फाय त्या न परा दीयते-हे वसपारी ! मतप्ता धन मिल पर भी में तुझे नहीं दगा। २हे यजि-वः ! सहनाय न-हे वनको धारण करनेवाले इन्द्र ! हजारोंमें भी तुझे नहीं दूगा । ३ हे शतामघ ! शताय न-है एनवान् ! सौम भी नहीं दूगर । ४न अयुताय- दस हजारमें भी मैं तुझे नहीं देगा। [२९२ ] है पन्छ । तू (मे पितुः यस्पान ) मेरे पितासे भी अधिक धनदान है, (उत अ जत. भ्रातु.) और भोजनको म देनेवाले मेरे भाईको अपेक्षा भी तू महान है, है (यसो) सबको बसानेवाले इन्न ! (मे माता च समा) मेरी माता और तू समान है, दू (वसुत्यनाय राधसे उदययः ) धनवान् और अनवान होनेके लिए मुझे यशस्वी बना॥१०॥ १हे इन्द्र ! मे पितुः वस्यान्-है इन ! मेरे पिताको अपेक्षा तू अधिक मनवान है। २ अर्भुजत. भ्रातुः-- न लानेवाले भाईकी अपेमा हू महान् है। ३ मे माता समा- मेरी माता तेरे समान है। ४ घसुत्धनाय राधसे छदयय:- धनधान् गौर मन्तवान् होने के लिए मुझे महान् बना। ॥ यहां भट्ठारहवां खड समाप्त हुआ!! १० (साम. हिक)
" ११२
१२
"
२१.
"
२७१३
३१
२३१२
१२४१२
(७३)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[पेन्द्र काण्टम्
अथ चतुर्थप्रपाठके प्रथमोऽधः।
[१]
(१-१०) १ वसिष्ठी मंत्रावरुणि, २,६,७ वामदेवो गौतम.; ३ मेधातिथि-मेध्यातियो काण्बो, विश्वामित्र इत्यक
४ नोपा गौतमः, पमेधातिपिः ( ऋ० मेथ्यातिथिः) फावः, ८ भुष्टिगः कावा; ९ मेध्यातिथिः
( मेधातिथि ) काण्व.; १० नुमेध आगिरसः ॥ इन्द्रः ७ बहुः ।। महती ॥
२९३ इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरा ।
ताआ मदाय वजहस्त पीतये हरिम्यां याद्योक आ
॥१॥(ऋ.७३२४)
२९४ इम इन्द्र मदाय ते सोमाश्चिकित्र उक्थिनः ।
मधोः पपान उप नौ गिरः शृणु रास्व स्तोत्राय गिर्वणः
॥२॥
२९५ आ त्वाश्य सपधारहुवे गायत्रवेपसम् ।
इन्द्रं धेनु सुदुधामन्यामिपमुरुधारामरकृतम्
॥३॥ (३.८११.)
२९६ न त्वा बृहन्तो अद्रयो घरन्त इन्द्र पौडवः ।
यच्छिसि स्तुवते मावते वसु न फिटदा मिनाति ते
॥ ।। (*८८३)
२९७ के ई वेद सुते सचा पिपन्न कद्वयो दधे ।
अयं यः पुरी विभिनत्योजसा मन्दानः शिष्यन्धसः
॥५॥ (*. ८॥३३७)
[१९ एकोनविंशः खण्डः।
[२९३) है (व-हस्त) वज्रको हाथमें धारण करनेवाले इन्द्र ! (दध्याशिरः इमे सोमासः) वहीं मिले हए
पे सोमरस तुझ (इन्द्राय) इन्द्रके लिए (सुन्विरे.) तय्यार किये गये हैं, (मदाय) आनन्द प्राप्त करने के लिए तथा
(तान् ) उन सोमरसोंको (पीतये) पीने के लिए (ओका आ) यज्ञमण्डपको (हरिभ्यां आ याहि) घोडके वारा
[२९४ ) हे इन्द्र ! (ते मदाय) तेरे आनन्दके लिए ( उस्थिनः) यज्ञकर्ताओन (इमे सोमाः चिकित्र )ये
सोमरम बुद्धिपूर्वक तय्यार किए है, (मधोः पिपानः) इन मधुर रसोंको पीकर (नः गिरः उपशृणु) हमारो स्तुति
पाससे सुन, है (गिर्वणः ) प्रशसित इन्द्र ! (स्तोत्राय राख) स्तुति करनेवालेके लिए धन दे ॥२॥
[ २९५ ] है इन्द्र ! (अद्य) आज (सबर्दघां) अधिक दूध देनेवाली ( गायत्र-वेपर्स ) प्रशसनीय बापाली
(सु-दुघां) सुखसे दूध देनेवाली (अन्यां जरुधारा) विलक्षण रौतिसे बहुत सा दूध देनेवाली (इपं धेनु)
पासमें
रखने योग्य गायके समान तुम (भरं कृतं तु आहुये) अलकृत इन्द्रको में बुलाता है ॥ ३॥
[२९६ } हे इन्द्र । (बृहन्तः वीडयः अद्रयः ) महान् दृढ पर्यत भी (त्या न घरन्ते) तुझे अपने कर्तव्यसे डिगा
नहीं राफते, (स्तुवते मावते ) स्तुति करनेवाले मुझ जैरो पुरुषको (यत् धातु शिक्षसि ) तू जो पन देता है, (ते तद)
उस तेरे शानको (न कि आमिनाति) कोई भी रोक नहीं सकता ॥४॥
[२९७] (सुते) शोमपत (सचा पिवन्त है) एक नगह घंठकर सोमरस पोनेवासे इस इन्द्रको (कः घेद)
भला कौन जानता है तथा वह ( कत् ययः दधे ) पितगा अन्न धारण करना है इसे भी कोन जानता है? (या
अये शिपी) जो यह इन्न शिरस्त्राण धारण करके (अन्यतः मन्दानः) सोमरससे उत्साहित होकर (मोजसा पुरः
विभिनचि) अपने सामपसे शत्रुओं नगरोंने तोड़ता है।५।।
आ॥१॥
तृतीय अभ्याय] सोमयेदका सुयोध मनुवाद (७५) २१ १.२. २ ३२३ १३३१२ १२९ २९८ यदिन्द्र शासो अग्रत घ्यावया सदसस्परि असाकमरों मघवन्पुरुस्पृहं वसव्ये अघि बईय ॥६॥ २९९ वटा नो दैव्यं वचा पर्जन्यो ब्रह्मणस्पतिः । पुत्रेधीवभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रामणं वचः ३०० कदा चन स्वरीरासि नेन्द्र सबसि दाशुषे । उपोपेशु मघवन्भ्य इन्नु ते दानं देवस्य पृष्पते ॥८॥ (*८1९१७) ३०१ युङ्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः । अर्वाचीनो मघवन्त्सोमपीतय उन मावमिरा गहि ।। ९ ।। (ऋ. १३१७) ३०२ त्वामिदा यो नरोऽपीप्यन्वजिन्भर्णयः । स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि ॥ १०॥ (ऋ. ९९१) इति प्रथमा दशतिः॥१॥ इति सप्तमः खण्डः ॥७॥ । स्व. १३ । २०२। पा ८२ । (ठि) ॥] २१ । [२९८] हे इन्द्र ! (यत् शासः) जिस कारण अपराधियोंको तू दण्ड देता है, इसलिए (सदसः परि अनत च्यावय) हमारे यशस्थानके चारों ओरसे पज्ञ न करनेवालोंको दूर कर, है ( मघवन्) धनवान् इन्द्र! (पुष-स्पृहं अस्माकं अंशु) हमारे प्रशंसनीय सोमरसको (वसव्ये अघि यहय) यज्ञ स्थानमें बढा ॥६॥ (२२९ । (त्वष्टा ) देवोंका कारीगर त्वष्टा देव (पर्जन्यः) वृष्टीका देय, (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्मणस्पति ( पुत्रैः भ्रामि अदितिः) अपने पुत्र और भाइयोंके साय अदिति-देवमाता, ये सब देवता (दुस्तरं त्रामणं न वच ) दु खोसे पार करानेवाली और रक्षा करनेवाली हमारी स्तुतियोंसे सन्तुष्ट होकर (नु पातु ) निश्चयसे हमारी रक्षा करें ।।७।। 1 ३०० ] हे इन्द्र! तू (कदाचन) कभी भी (स्तरी. न असि) सन्तान उत्पन्न न करनेपाली [पन्या] गायके समान नहीं है (दाशुषे सश्वसि) हवि देनेवाले यजमानसे तू मिला हुआ रहता है, है (मययन) धनवान् इन्द्र ! (देव. स्य ते) प्रकाशस्वरूप तेरे (भूयः दानं ) वड्डलसे दान (उपोपेत् पृच्यते) हमारे पास आकर पहुचते है ।। ८ ।। [ ३०१7 है (घृत्रहन्तम) यत्रके नाश करने में कुशल इन्द्र ! (हि हरी मुश्व ) निश्चयसे अपने घोडे रयमें जोड, है (मप्रयन् ) धनवान् इन्द्र ! (उग्रः अर्याचीनः) बलवान् होकर सामने (परावतः) दूरके देशसे (कप्वेभिः) सुन्दर मरतोंके साप (आ गहि) आ॥९॥ [ ३०२. है (वजिन् ) वनको धारण करनेवाले इन्द्र ! (त्वां) तुझे (भूर्णयः नरः) पजकर्ता पनमानोंने (इदा ह्यः अपीच्यन् ) बाज और पहलेके दिनोंमें भी सोमरस पीने के लिए दिया, है इन्द्र ! (सः) वह न ( इह ) इस यज्ञ (स्तोमवाहसावधि ) स्तोत्र कहनेवाले याज्ञिकोंके स्तोत्रोंको सुन, और इससे लिए (खसरं उग आ गहि) यत मडपमें मा॥१०॥ । यहां उन्नीसवां खंड समाप्त हुआ। to
(७८)
सामपेदका सुर्याध अनुवाद
[पेन्द्र काण्डम
.
र
३.
[२]
(१-१० ) १,२०६ यसिष्ठी मंत्रावरणि, ३ गानुरात्रेय , ४ पृर्वय , ५ सप्तगुरागिरम , ७ गौरिवीति शाश्त्य,
८ नो भार्गव , ९ पृहस्पतिनंकुलो वा, १० सुहोत्रो भारद्वाज ॥ इन्द्र, (ऋ० ५ इन्नो कुन्छ )
८ वेन' ।। त्रिष्टुप् ॥
३१३ असावि देवं गोमाजीकमन्धो न्यासमिन्द्रो जनगेसोच ।
चौधामसि त्या हर्यश्च योधा न स्तोममन्धसो मदेषु
॥१॥ (ऋ खा२११)
सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहत प्र याहि ।
असो यथा नोऽविता वृश्चिदौ यसनि ममदश्च सोमैः
1.२॥ (७/२०१)
३१५ अदर्दरुत्समसृजो विखानि न्वमर्णवान्यवधाना५ अरम्णाः ।
महान्तमिन्द्र पर्व वि
पदः सृजद्धारा अव यहानवान्हन्
३१६ सुष्वाणास इन्द्र स्तुमसि त्या सनिष्यन्तश्चितुविनृम्ण चाजम् ।
आ नो भर सुवितं यस्प कोना तना मना सयाम स्वोता
॥४॥ (क्र १०१४।१)
३१४ योनि
११.२ ३.३.१४
33
॥३॥ (ऋ ५।३।१)
प्रा
[२१] पकविंशाखण्ट ।
[३१३ ) ( देवं गो-काजीक अन्धः) दिव्य तेजस्वी गायके दूधसे मिथित सोमरूपो अन्न (असायि) तयार
किया है, ( इन्द्रः) यह इन्द्र (अस्मिन् जनुपा नी उचोच ) इस सोमरसमें स्वभावत ही प्रेम करता है, हे सहरी
अन्य ) घोओंको पालनेवाले इन्द्र ! (स्या यो बोधामसि ) तुझे इस यतके द्वारा कहते हैं, कि ( अन्धस' मदेषु)
सोमरसके आनन्दमें (न. स्तोमं बोध ) हमारी इन स्तुतियोपर ध्यान दे ॥१॥
[३१४ ] ( ते सदने योनिः अकारि ) तैरे बैठने के लिए हमने स्थान बनाया है, हे (पुर-हत ) महसि
सित इन्द्र। (तं नृभिः आ प्र याहि ) उस स्थान पर अपने मनुष्योक साथ तू जा, और (न. यथा भविता ) हमारी
रक्षा करनेवाला बन और (वृधे च अस ) हमारा सवर्धन करनेके लिए तैय्यार रह हमें (वसूनि च ददः) अनेक
प्रकारके धन दे और (सोम ममदःच) सोमरससे आनन्दिन हो ॥२॥
[३१५) हे इन्द्र । (त्य उत्सं अदर्दः) तूने मेघोंको फोडा, और (खानि वि अएज.) पानी निकलनेके बरवा
जोको खोला (बद्वधानान् अर्णवान् अरम्णा ) सुन्ध होनेवाले महान् समुद्रोंको आनन्दित पिया, और। महान्त पर्वत)
महान् वादलोंको फाडा, और (धारा व्यसृजत् ) जलको धाराभोंको बहाया, और (यत् दानवान् अवहन) तब तूने
दानोंको विनष्ट किया ॥३॥
[ ३१६ । है इन्द्र (सुप्वाणास ) सोमरस तैयार करनेवाले यज्ञकर्ता । त्या स्तुमास ) तेरो स्तुति करते हैं।
है (तीव-नृम्ण ) बहुत पनवान् इन्द्र ! (वाज सनिष्यन्तः । पुरोडाश नय्यार करनेवाले हम तेरी स्तुति करते हैं।
इसलिये (न. सुपितं मा भर) हमें उत्तम धन भरपूर दे, (यस्य कोना) जिस घनको हम इच्छा करते हैं, यह
हमें थे, (त्या ऊता) तुझसे अच्छी प्रकार रक्षित हुए हम लोग (तना) बहुत धन (त्मना सह्याम ) अपनी
वितसे प्राप्त करते है॥४॥
कृतीय मायाय]
सामेघदका सुबोध अनुवाद
(७९)
१३
२. १२3
9
२१
.
३१
२
11 २३.३
9
१३
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२०
Pr
३१३१३
योनौ शकुन भुरण्युम्
३. १३२
२३.32
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३ र
१३.१२
३१७ जंगृला ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं यस्ययो वसुपते बसनाम् ।
विधा हि त्वा गोपति शुर गोनामसम्मं चित्र अपगरपि दाः ॥५॥ (. १०१४७।१ )
३१८ इन्द्रं नरो नेमधिता पन्त यत्पायर्या युनजते धियस्ताः ।
शरो नृपावा श्रवसव काम आ गोमति जे मजा वं न। ॥६॥ (ऋ.७२७१)
३१९ चयः सुपर्णा उप सेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः ।
अप वान्तमूहि पूर्षि चक्षुर्मुमुच्या सान्निधयेव बद्धान् ॥७॥ (ऋ. १०१७३।११)
३२० नाफे सुपर्णमुप यस्पतन्त रहदा वनन्तो अभ्यचक्षत त्वा ।
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दस यमस्य
॥ ८॥ (ऋ. १०११२३।६)
३२१ ब्रह्म जज्ञानं प्रथम पुरस्तावि सीमा सुरुची वेन आवः ।
स बुध्न्या उपमा अस्प विष्ठाः सतश्च योनिमसतय विव: ॥९॥
अथर्व. ५।६। यजु १३।३
[३१७ ] हे ( वसूनां चसुपते इन्द्र) बहुतसे धोंके स्वामी इन्द्र ! (ते दक्षिणं हस्तं ) तेरे दायें हायको (घसूयवः
जगृह्मा) धनकी इच्छा करनेवाले हम पकडते है, है ( शूर) योर इन्द्र ! हम (त्या) तुझे (गोनां गोपति विद्य)
गार्योके पालन करनेवाले रूपमें जानते हैं, इसलिए (चित्रं वृषणं रयिं अस्मभ्यं दाः) अनेक प्रकारसे बल बहनेवाले
पन तू हमें दे॥५॥
(३९८] ( यत् ) नब (ताः पार्याः धियः युनजते ) संकटसे बचनेके लिए मुखिपूर्वक कर्म किए जाते हैं, तम
(नरः नेमधिता) नेतारण पुद्धके समय ( इन्द्रं हघन्ते ) इन्टको अपनी सहायताके लिए बुलाते हैं, इस प्रकार (त्वं
शूरः नृपाता) शूर और मनुष्योंको धन देनेवाला है, (श्नयसः चकाना ) मल बढानेको इच्छा करनेवाला (त्व)
सू (गोमति यजे) गायोंके याडे (नः या भज) हमें पहुंचा ॥ ६ ॥
[३१९) ( सुपीः वयः) उत्तम पंखवाली चिडियोंकि समान (प्रिय-मेघाः, क्रपया नाघमानाः) गतसे प्रेम
करनेवाली, सर्वदर्शी, प्रशाधुद्धिको पानेको इच्छा करनेवाली सूर्यको किरणें (इन्द्रं उपसेदुः) इन्द्रको प्राप्त हुई, अब है
इन्द्र ! तू (ध्यान्तं मपोर्मुदि) अन्धकार दूर कर, (चक्षुः पूधि) तेजसे आखोंको भर दे, (निधया बद्धान इव)
पाशोसे यये ए ( अस्मान् मुमुग्धि) हमें मुक्त कर ॥ ७॥
१ निघया ग्रद्धान् अस्मान् मुमुग्धि- पाशोंसे बंधे हुए हम मुक्त कर ।
[३२०] (सुपर्ण पतन्तं) उत्तम पससे युक्त और आकाशमें अच्छी तरह उड़नेवाले (हिरण्यपक्ष) सुनहरे
पंलोगले (चरुणस्य दूतं) वरुणके दूत (यमस्य योनौ ) अग्निके उत्पत्ति रयान-अन्तरिक्षमें शकुन) पक्षो रूपमें रहने
वाले, (भुरण्यु) सबका पोषण करनेवाले (त्या) तुझे (हृदा वेनन्ता) लोग हृश्यसे जानते हैं, तब वे (नाके अभ्य-
चक्षत) अन्तरिक्षम तुझे देखते हैं ॥८॥
[३२१ (येना) वेन (पुरस्तात् जज्ञानं ब्रह्म) अपनेसे प्रयम उत्पन्न हुए बह्म तेजका (प्रथमं विसी) पहलेसे
उपदेश करते हुए (अतः सुरुचः आवः) अपने उत्तम तेजसे सबका रक्षण करते हुए सबको कातियुक्त किया (सः
युध्न्या) यह अन्तरिममें (अस्य उपमाः) इस ब्रह्मको उपमा देने मोग्य कान्तिको (चिष्टाः) विशेष रूपसे स्थापित
करता है, (सतः असतः च योनि) पहले उत्पन्न हुए और भागे उत्पन्न होनेवाले विश्वको उत्पत्तिके कारणको वही
(यिक) उत्पन्न करता है ॥९॥
(८०)
सामधेदका सुबोध अनुषाद
[पेन्द्र काण्डम
१२३३२
32
३२३१२
॥१॥ ( ८/९६१३)
" २
॥२॥ (१९६७)
॥३॥ (१०५५/५)
३२२ अपूर्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय ।
विरप्शिन वनिणे शन्तमानि वचारस्यस्मै स्थविराय तक्षुः ॥ १०॥ (ऋ ६३२।१)
इति तृतीया दशति ॥३॥ इति नवम खः ॥९॥ स्व० १३॥ उ०६। पा० ९१ ॥८॥]
[४]
(१-१) १, २, ४ घतानो गारत (मा. तिरश्चीरागिरस ), ३ मूहदुक्यो वामदेम्प , ५ सामवेयो गोतम , ६,
८ सिप्टो मेगावनि, ७ विश्वामित्रो गायिन , १ गोरिवीति शाक्त्य ॥ इन्न ॥ विष्टुप, (६ ऋ० विराट् ) ।
३२३ अब द्रप्सो अशुमतीमतिष्ठदीयानः कृष्णो दशमिः सह ।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमपं स्नीहिति नमणा अद्रिा
३२४ वृत्रस्य त्वा श्वसथादीपमाणा विश्वे देवा अजहुये सखायः ।
मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि
३२५ विधु दद्राण समने बहूना युवानसन्त पलितो जगार ।
देवस्य पश्य काव्य महिलाद्या ममार स ह्या समान
[ २२२ ] (महे वीराय) महान् वीर (तवसे नुराय ) बलवान् और जल्दो काम करनेवाले (विरप्शिने
पत्रिणे) स्तुतिके योग्य और पनपारी (स्थायराय अस्मै ) वृद्ध इस इन्द्र के लिए (अपूर्या ) अपूर्व और (पुरुत
मानि) बहुतसे (शंतमानि वचासि) स्तुति करनेवाले स्तोत्र ( तभु ) बोले जाते हैं ॥ १० ॥
॥यहा कीसचा खड समाप्त हुआ।
[२२] द्वाविंश. खण्ड।
[३२३ ] (इप्स' ) शीन चलकर आनेवाला (दशभि सहस्त्रेइयान.) दस हजार सैनिकों के साथ आक्रमण
करनेवाला (कृष्ण ) कृष्ण नामका असुर (अशुभती अवातिष्ठत्) अशमति नदी पर पाकर पहुच गया, (शल्या
धमन्त त ) अपन बलसे जगतको कष्ट देनेवाले उस असुर पर (इन्द्र आवत् ) इन्द्र पद दौडा, (अथ) यादम (Y-
मणा.) लोगोंके मनोंको अपनी तरफ संपनेवाले इन्द्रमे (स्नीहिति अधदा) उसको हिसका सेनाओं को भी मार
गिराया ॥१॥
(३२४ ] है हन्द्र ! (ये विश्वे देवा )जो सब देव तेरे ( सजाय. ) मित्र थे, वे सब देव (वृत्रस्य श्वसथात् )
पत्रासुरके श्वाससे डरकर ( ईपमाणा त्या अजदु) चारों दिशाओंमें भाग गए और तुमे छोड गए, हे इन्द्र ! मय
(मरुनि ते सख्य अस्तु ) मरतोंके साथ तेरी मिनता होवे और (मथ) इसके बाद तू (श्मा. विभ्या पृतना
जयासि) इन सब शत्रुको सेनाओंपर विजय प्राप्त कर ।।२।।
{ ३२५] (समने विधु) पद्धम काम करनेवाले, (यहूनां दद्वाण) बहुतसे शत्रुके संगिकोंको भगानेवाले (युवान)
तरण इन्द्रको कृपासे (परित जगार) सफेद गालोबाला तु भी अपने कर्तव्य जागरूक एता है (देवस्य महित्वा)
इस हरक महत्व अबका पराकमसे भरे हुए (काव्य पश्य गाव्यको देखो जो ( मद्य ममार) गो माज मर जाता है
पर भगले दिन (सब समान ) मह ही कलके समान ससारमें कार्य करने लगता है ॥ ३ ॥
एतीय अध्याय] सामवेदका सुशेष मनुवाद १. 31 1 र" ३२६ त्यह त्यत्सप्तम्या जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवा त्रुरिन्द्र । गूढ़ द्यावापृथिवी अन्धविन्दो विभुमद्भयो भुवनम्यो रणं धाः ॥ ४॥ ( ८९६१६) ३२७ मेडि न त्या बाज भृष्टिमन्त्र पुरुधमान वृषभ स्थिरपनम् । करोष्यर्यस्तरुपीर्दुवस्युरिन्द्र धुकं वृत्रहणं गृणीपे ३२८ प्र वो महे महे वृधे भरघ्नं प्रचेतस प्र सुमति कृणुध्यम् । विशः पूर्वी प्र चर चर्पणिमा ॥६॥ (ऋ. ७।३१।१०) ३२९ शुन हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्मरे नृतम वाजसातौ । शृण्वन्तमग्रमूतये समत्सु पन्त त्राणि सति धनानि ॥७॥ ( ३।३०।२२) ३३० उदु ब्रह्माण्यरत श्रवस्येन्द्र समर्प मइया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि श्रवसा ततानोपश्रोता म ईबतौ वचारसि ॥८॥ (ऋ ७२१) २ 9. २२ (३२६) हे इन्ट ! (स्वं त्यत् जायमानः) तू उत्पन्न होते ही (अ-शत्रुभ्यः सप्तभ्यः) अयतक भानुओंसे रहित कृष्ण-यम-नमुचि-शम्यर आदि सात मसुरोका (शत्रुः अभवः) शत्रु होगया, है इन्द्र ! गूढे धावाथिवी) अन्धकारमें पड़े हुए धु और पृथ्वी लोकको (अन्यविन्दः) प्रकारामें ले आया और अब तू (विभुमद्भयः भुवनेभ्यः) यमयशालो भुयनोंमें (रणे धा) सुन्दरतासे स्थापित इन लोगोंशो और अधिक रमणीय बनाता है।॥४॥ (३२७ ] हे इन्द्र ! (दुवस्युः ) प्रशसनीय (अर्यः) शत्रुनाशक तू हमें (तरुपीः) विजयी करता है, ( मेडिन) जिस प्रकार प्रशसनीय मनुष्यको स्तुति की जाती है, उसी प्रकार में (वृष-हणं ) यूत्रको मारनेवाले (धु-क्षे) धुलोकम रहनेवाले (पुर-धस्मानं ) अनेक प्रामुमोके नादा करनेवाले (प) बलवान् (स्थिर-प्नु ) युद्धमें स्थिर रहनेवाले (चत्रिण) बचधारी (भृष्टि-मन्तं) मधुनाशक ( त्या गृणा) इनकी स्तुति करता हूँ॥५॥ [३२८) हे मनुष्यो। (य) तुम ( महे वृधे महे प्रभरपं) यडे बडे कार्य करनेवाले महान् इन्द्रको भरपूर सोम दो, (प्रचेतसे सुमति प्ररणुध्वं ) विशेष ज्ञानी इन्द्रको उत्तम स्तुति करो, हे इन्न ! (चर्पणि-प्राः) प्रजाओंकी इच्छा पूरी करनेवाला तू (पूर्वी विशा प्रचर ) हघि देनेवाले हम प्रमाजनोंको सहायता पर॥६॥ {१२९ (वाज-साती अस्मिन् भरे.) मन्त्रको प्राप्ति होनेवाले इस पुश्में शुनं ) उतमाही (मधयानं नृतमं) धनवान्, दोरों में श्रेष्ठ (शृण्वन्तं ) प्रार्थनार्कोको सुननेवाले, (उI) भूरवीर (समत्सु वृत्राणि घ्नन्त । पुमें शा. शे मारनेवाले, (धनानि संजितं इन्द्र) पनोंको जीतनेवाले इनको हम (ऊतये हुवेम अपने संरक्षण के लिए मुताने [३३० (श्रास्या) मनको पानेको इन्चासे ( महाणि उत् ऐरयन) स्तोत्रों कहो, ( थसिष्ठ) दिपाशी बीतनेवाले पै । (यः विश्वानि ) जो सब तोपोंको (धवसा आततान ) मनसे अपवा पासे पाता है, और जो (ईपता में) उपासना करनेवाले मेरो (यासि उप भ्राता) प्रार्थनामाको मुनता है ऐसे (इन्द्र) इन्द्रकी महिमा (समर्ये महय ) यसमें वर्णन पर॥८॥ साम.ग्दी)
(८१)
सामवेदका सुबोध मनुवाद
[पेन्द्र काण्डम
३३१ चक्रं यदस्याप्स्वा निपलमुतो तदस्मै मच्छिद्याद !
पृथिव्यामतिषित यद्धः पयो गोष्पदधा ओषधीषु
।।९।। (ऋ. १०७८९)
इति चतुर्थी वशतिः ॥ ४ ॥ दशमः खण्डः ॥ १०॥ [ स्व० १६ । उ०६।पा० ७३ | किरा)
[५]
(१-१०) १ अरिष्टनेमिस्ताक्ष्यः; २ भरद्वाजः (ऋ० गर्गो भारद्वाजः); ३ विमद ऐनः, वसुद्धा पासुक?
(० प्राजापत्यो वा) ४-६, ९ वामदेवो गौतमः ( ९० यमो बैवस्वती) ७ विश्वामित्रो गायिनः ८रेण
श्वामित्रः १० गोतमो राहगणः ।। इन्द्रः। (ऋ० १ ताः, ७ पर्वतेन्द्रो; ९पमो यवस्यतः)। त्रिष्टुप् ।।
३३२ त्यम् पु वाजिन देवजूत५ सहावान नरुतार श्यानाम् ।
अरिष्टनेमि पृतनाजमाशुश्वस्तये सायमिहा हुवेम ॥१॥ (ऋ. १०।१७८१०)
३३३ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र ५ हवेहवे सुहवर शूरमिन्द्रम् ।
हुवे नु शर्क पुरुहूतमिन्द्रमिद हविर्मघवा वेविन्द्रः
(न. ६१४७११)
३३४ यजामह इन्द्रं वजदक्षिणहरीणाध्याइविव्रतानाम् ।
प्र श्मश्रुमिदोधुवर्ध्वधा भुवद्वि सेनाभिर्भयमानो वि राधसा ॥३॥ (ऋ. १०।२३।१ )
२१
3३३
8
[३३१) (अस्य चक्र ) इस इन्द्रका वज्र (अप्सु ा निषत्तं) अन्तरिक्षमें चमकता है, (उत उ) और वह
(अस्मै मधु इत् चच्छद्यात् ) इस उपासकके लिए मोठा जल भेजता है, उसी प्रकार (पृथिव्यां अतिपितं यत् ऊधः)
पृथ्वीपर जो जल बहता है, ( गोपुः पयः ) उन्हें गायोंमें दूषके रूपमें और (ओषधीषु आधाः) औषधियोंमें रस
रूपसे रखता है ॥९॥
॥ यहां बाइसवां खंड समाप्त हुआ।
[२३ ) प्रयोविंशः खण्डः।
( ३३२ ] (स्य पाजिनं ) उस चलवान् (देव-जूतं सहोवान) देवोंके द्वारा सेवित्त, शक्तिमान् , (रथानांतर
तारं ) रयोंके संग्राममें तारनेवाले (अ-रिप-नेमि ) तीक्ष्ण शस्त्र अपने पास रखनेवाले (पृतनाज) शत्रुको सेनापर
विजय प्राप्त करनेवाले, (आशुं तार्थ ) शीन उडनेवाले सुपर्णको हम ( स्वस्तये इह हुनेम ) अपने फाल्याणके लिए
यहां बुलाते है ॥१॥
( ३३३ । (त्रातारं इन्द्र एवे) संरक्षण करनेवाले इन्द्रको में सहायताके लिए बुलाता हूँ, (अवितारं इन्द्र)
सहायक इन्द्रको में बुलाता हूँ, (हवे हवे सुहवं ) प्रत्येक युद्ध में बुलाने योग्य (शूरंश पुरु-हत इन्द्रं शूर, सामयं.
पान और बहुतक द्वारा बुलाये जानेवाले इन्द्रको सहायताके लिए बुलाता हूँ, ( मघवान्) इन्द्र (इदं वि वेतु) इस
हविष्यान्नको खावे ।। २॥
। ३३४ ] ( वन-दक्षिणं) अपने दायें हायमें पत्रको पारण करनेवाले (विवृतानां हरीणां रथ्य ) वेगसे दौडने
वाले घोडोंके रयमें बैठनेवाले (इन्द्रं यजामहे ) इन्द्र के लिए हम यत करते हैं, वह इन्द्र ( श्मश्रुभिः दोधुवत् ) अपनी
दादी और मूछके द्वारा हो सबको कपाता है, वह (ऊर्ध्वधा विभुवत् ) सदको अपेक्षा श्रेष्ठ है, (सेनाभिः भयमानः)
अपनी सेनासे शत्रुओंको भयभीत करता हुआ वह (राधसा यि ) उपासकोंको पन देता है।॥३॥
तृतीय पायाय
सांगयेवफा सुशोध मनुवाद
31
३
३३"
१९३४
३
"१
॥४॥ (ऋ ४१८)
॥ ५॥
यं
३३५ सत्राहणं दापि तममिन्द्रं महामपारं वृपभरसुवनम् ।
हन्ता यो घर सनितात वाज दाता मपानि मघवा सुराधार
२३६ यो नो वनुष्यामिदाति मते उगणा वा मन्यमानस्तुरो वा ।
विधी युधा शवसा घा तमिन्द्राभी ध्याम पमणस्वोनाः
वृत्रषु क्षितय स्पर्धमाना य युक्तेषु तुरयन्तो हवन्ते ।
यशरसाती यमपामुपज्मन्यं विप्रासो वाजयन्ते स इन्द्रः
३३८ इन्द्रापर्यता वृहता रथेन वारिप आ वहत सुवीराः ।
चौत हव्यान्यधरेषु देवा पधैयां गोभिरिडया मदन्ता
३३९ इन्द्राय गिरो अनिशितसगी अपः भैरयत्सगरस्य पुन्नात् ।
यो अक्षणेव चक्रिया शचीभिविष्यक्तस्तम्भ पृथिवीमत द्याम्
२२
"११
२
॥६॥
।। ७॥ (ऋ. ३१५३१)
॥८॥(ऋ.१०1८९४)
। ३३५) हम (समा-साई) एक साप अनेक गनुओंको मारनेवाले, (दार्षि) मात्रुको भयभीत करनेवाले,
(तुन) को भगानेवाले (महा अपारं वृप) महान् अत्यधिक शक्तिशाली (सु-चनं इन्द्रं) उत्तम बचको धारण
करनेवाले इन्द्रकी स्तुति करते है, (यः पृचं हन्ता) जो वृथका वध करता है, (उत चार्ज सनिता) और अन्न देता है.
वही (सु-राधा मघना) उत्तम धन पास रखनवाला इन्द्र (मघानि दाता) भक्तोंको पन देनेवाला है॥४॥
(३३३ (यः मतः) गो शत्रु मनुष्य (न पनुष्यन् ) हमें जानसे मारनेको इच्छा करते हुए ( अभि दासति)
हम्पर घटा चला आता है, और जो (मन्यमानः ) घमंडी (सिंधी युधा शरसा) महार करनेवाले हथियारोको लेकर
बहुत धेगसे (उगणाः तुरः) सेनाओं के साथ हम पर पाई करता हुआ घला खाता है, उसको हम (त्या ऊताः) तुझसे
रक्षित होकर तथा (पृष-मणः ) बलवान् मनसे मुक्त होकर ( अभिप्याम ) हरायें ।। ५ ॥
१ ३३७ 1 (पु स्पर्धमाना शितयः ) शत्रुओंके साथ युद्ध करनेपाली प्रजायें, (यं हवन्ते ) जिसको सहायताले
लिए बुलाती है, (युक्तेपु तुरयन्तः यं) शास्त्रोंको हाथमें लेकर जल्दी ही मारकाट करनेवाले वीर जिसको भुलाते है,
(भर-सातौ ) शूरोंके युद्धोंमें जिसे बुलाया जाता है (अपां यं) पानोरे लिए जिसे पुकारते है, ( उपज्मन् यं) वर्षा
होने के लिए जिसको प्रार्थना की जाती हैं, (विप्रासा वाजयन्ते ) ज्ञानी यत करनवाल जिसके लिए हवि देते हैं. (सः
इन्द्रः) पह इन्द्र है॥६॥
[ ३३८ ) है (इन्दा पर्वता) इन्द्र और पवत । (पृहता रथेन) महान रथसे आकर (पामी सुवीराः) स्तुति के
पोप, उत्तम वीर पुत्रोंसे युक्त (पः भारहत) अन्न लाकर हमें दो, हे (देयाः) देवो ! (अध्वरेषु हव्यानि वीत )
हमारे धर्मोम हविको खाओ, (इडया मदन्ता ) हमारे द्वारा दिये गए अनौरी मानन्दित होनेवाले तुम्हारे मा (गाभि.
वर्धेयां) हमारी स्तुतियोंसे बड़े ॥७॥
[३३९] (य.) जो इन्द्र (शचीमि') अपनी शक्तियोंसे (पृथिवी उत घो) पम्वी और धुलोकको (चीक्रया
शक्षण इव) जिस प्रकार चोंको हाल यामता है, उसी प्रकार (विष्वक् तस्तम्भ ) चारों ओरसे धारण घारसा है।
(इन्द्राय अनिशित सर्गा गिरः) ऐसे इन्द्रको उचे स्वरसे को जानेवाली स्तुतिया ( सगरस्य बुध्नात् अप प्रेरयत्)
अतरिसके पानसे जलोंको बहाती है॥८॥
(८४) सामवेदका सुवोध गनुवाद । पेन्द्र कापडेम् २ १.२ ३४० आ त्वा सखाया सख्या ववृत्युस्तिरः पुरू चिदर्णवां जगम्या । पितुर्नपातमा दधीत वैधा असिन्क्षय प्रतरां दीद्यानः ॥९॥ (१९०१) ३४१ को अद्य युक्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो मामिनो दुईणायून् । आसन्नेपामप्सुवाहो मयोभून्य एषां भृत्यामृणवत्स जीवात् ॥ १० ॥ इति पञ्चमी दशति ॥ ५॥ एकादशः खण्ड ॥ ११ ॥ । स्व० १८। उ०४ । पा ८६ । (६)] इति त्रिष्टुप् समाप्ता॥ इति चतुर्थप्रपाठकस्य प्रथमोऽर्थः ॥ १॥ २ १२ १२ (१-१०) १ मपुच्छन्दा वैश्वामित्र , २ जेता मापुच्छन्दस , ३, ६ गोतमो राहगण ; ४ अप्रिीम , ५, ८ तिर- चौरागिरस , ७ नोपातिथि काय , ९ विश्वामित्रो गायिन , १० तिरश्चोरागिरस शर्हिस्पत्यो वा ।। ॥ इन्द्र'। अनुष्टुप॥ 832 ३४२ गायन्ति त्वा गायत्रिणोर्चन्त्यर्कमणिः । ब्रह्माणस्त्या शतक्रत उद्वशमिव येमिरे ॥१॥ (ऋ ११०१० ३४३ इन्द्र विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचर्स गिरः । रथीतमयीनों बाजाना सत्पति पतिम् ॥२॥ (१९०१) (३४० ] है इन्द्र ! (सखाय. ) मित्र जन (सण्या त्या आयवृत्यु ) उत्तम स्तोत्रोंसे तुझे अपने सामने खुलाते है, तिर पुरु अर्णवं जगम्या ) ऊपर जाकर विस्तृत अन्तरिक्षमें पहुंच गया है। (मस्मिन् क्षये ) इस यत्नमें (प्र तरां दीध्याना') अत्यधिक प्रकाशित होकरके (वेधाः) वह इन्द्र (पितु.नपातं आदधीत) पिताये माती पोते मर्थात् मेरे लडका लडका हो ऐसा करे ॥९॥ [३४१1 ( अद्य ) आज (तस्य धुरिः) यश जानेवाले इन्द्ररे पनी पुराने ( गा.) दोडनेवाले (शिमीयत भामिन) वीर और तेजस्वी (दु-ईणायून) पर भस्यधिक क्रोध परनेशने (मयोभून ) सुखदायक पोको (सासन ) मुलसे कहे जानेवाले स्नोत्रोंको सहायतासे ( क युक्त ) भला कौल जोड़ता है? (या पाभृत्यां प्राणपत्) जो शाके [घो]ि भरण पोषणके कार्य करता है, (सः जीवात् ) यही जीवित रहता है ॥१०॥ । यहां तेइसयां संड समाप्त हुआ। [२५] चतुर्विशः सण्ड । [३४२) हे (शत-प्रतो) संकों उत्तम कार्य करनेवाले इन्न ! (त्या गायत्रिणः गायन्ति ) उगाता तेरा वर्णन भरते हैं, (अणि म अचंन्ति स्तुति करनेवाले पूजोपहरषा सत्कार करते हैं, पाणः) बाह्मण (स्था) तुझे शप) जिस प्रकार नद लोग यातो ऊपर पा रखते ह उसी प्रकार (उत् येमिरे ) ऊपर पापित परते है. अर्थात् सेरो प्रशसारते ह॥१॥ [ ३४३] ( विश्वा गिरः) सब स्तुतियां (ममुद्य्यनस) समारे समान शिन्त (रथीनां रचीतग) र मंटनेयाले बोरोंमें पोष्ट बोर (यानाना पति) योर और मनोर रामी (मरपति द) समोर पालन करनेवाले पपरी महिमा वाती है ।।२।।
ताप अध्याय
समिवेदका सुपौध अनुवाद
(८५)
3.
३१२ 96 र
३२४
3
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१
॥
१३
२
१
३१३
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२३२३
३४४ इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममय मदम् ।
शुक्रस्य त्वाम्पक्षरन्धारा ऋतस्य सादने
॥३॥ (ऋ. १८४४)
३४५ यदिन्द्र चित्र म इह नास्ति त्वादावमाद्रियः ।
राधस्तनो विदद्वस उमयाहस्त्या मर
।।४।। (ऋ ५:३९।१)
३४६ झुधी हवं तिरच्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति
सुवीयस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाअसि
॥५॥ (ऋ. १९५४)
३४७ असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि ।
आ त्या पवित्वन्द्रिय रजः सूर्यो न रश्मिभिः
॥ ६॥ ( १८४१)
३४८ एन्द्र यादि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम् ।
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवायसो
॥७॥ (१३४१)
३४९ आ त्वा गिरो रथीस्विास्थुः सुतेषु गिर्वणः ।
अभि त्वा समन्पत गायो वत्स न धेनवः
॥८॥ (ऋ ८९५१)
[३४४ । हे इन्द्र ! (इमं ज्येष्ठं मदं ) इस श्रेष्ठ और भानन्द बढानेवाले ( अमत्यै सुतं पिन ) अमर सोम
रगोको पी, क्योंकि (मानस्य सदने ) यस माप (गुरु घाराः) मा सोमरराको पारा (त्या अभ्यक्षरन्)
तेरी सरफ बह रही है ॥३॥
[३४५) हे (चित्रः अद्रियः) विलक्षण और पत्रको पारण करनेवाले विदद्धसो इन्द्र) पनवान् इन्द्र !
(यत् त्वादातं राधा ) जो तेरे देने योग्य पन (इद मे नास्ति) यहा मेरे. पाम नहीं है, (नत् नः) उस धनको हमें
(उभया हस्या आभर) दोनों हायोंसे भरपूर दे ॥४॥
[ ३४६॥ हे इन्द्र ! ( यः त्या सपर्यति । मो तेरो उपासना करता है, ऐसे उस (तिरदच्या हवं अधि)
तिरश्चि पिको प्रार्थना मुन, और तू (सुवीर्यस्य गोमतः राय.) उतम बल युक्न और गाय युफ्त धन पर (पूधि)
हमें पूर्ण पर,(महान् असि महान है ।।५॥
[१४७ हे इन्त्र ! (ते सोम' असावि) मेरे लिए सोमरस निकाला है, है (शनिष्ठ) बलवान् (कृष्णो).
भारो हरानेवाले इस ! (आ गहि) मा, (इन्द्रियं त्वा) सोमपानसे तेरे अन्दर शक्ति (सूर्यः रदिमभिः रजन)
जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणोंमे अन्तरिक्षरो भर देता है, उसी प्रसर (आ पृणक्तु) भर जाए ॥६॥
३४८] है इन्द्र ! । कपस्य मुद्दति) वी उत्तम स्तुति पास ( हरिभिः उप याहि ) पोरि रामा,
(अनुप्य) इसके (दिवः शासत.) पुलोपने शासन में हमें गुख मिलता है, इसलिए है ( दिवायसो) तेरे साथ रहने-
पास इन्द्रा (दिवं यय) लोक पर जा ॥७॥
(३१९ है (गिर्वणः) स्तुतिके मोर इन! (सुतेपु) मोम यजमें गिरः) हमारी स्तुतिया ( रवीव)
रपम घटनवाले पोर जिस प्रकार अपने और स्थान पर पहुंच जाते है, उसी प्रकार (स्या अस्था) मेरे पास पहुंचत्री
है. रे ! (पसं धेनवः गायन) बरे पार से दुपार गार पहुंचती है, उसी प्रकार हमारी स्मृति (स्या
आम समनश्त) तेरे पास पहवी है ॥८॥
सामवेदका सुराध मनुषाद
(पेन्द्र काण्टम्
.
३३३
.
१
.
३५० एतो विन्द्ररस्तवाम शुद्ध शुद्धेन साना ।
शुद्धैरुक्थैवविघ्वास गुद्वैराशीर्वान्ममतु
॥९॥ (१९५७)
३५१ यो रयि वो रयिन्तमो यो द्युम्नैर्युम्नवचमा !
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वघाफ्ते मदः
॥ १० ॥ (ऋ ६१४१)
इति षष्ठी दशतिः ॥ ६॥ द्वादश खण्ड ॥१२॥ [स्व० ४।३० ४ । पा० ५४ । (घो) ।
इति तृतीयोऽध्याय ॥३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः ।
[७]
१-१० ) १ भरद्वानो बार्हस्पत्य ; २ वामदेव गौतम , शकपूतो वा, ३ प्रियमेध अगिरस', ४ प्रगाय काय
५श्यावाश्व आत्रेय , ६ शयुर्हिस्पत्य , ७ वामदेवो गौतम, जेता माधुच्छन्दस ॥ इ, ५ मत ,
७ दचित्रा वा अनुष्टुप् ॥
३५२ प्रत्यस्मै पिपीपते विश्वानि विदुपे मर । अरहमाय जम्मयेऽपश्चादवने नरः
(ऋ ६४२)
३५३ आ नो वयो वयाशयं महान्तं गहरेष्ठां महान्तं पूविणेष्ठाम् । उन बचौ अपावधीः ॥२॥
1 ३५०] (नु पत उ) जल्दी आ, (शुद्धेन साना) शुद्ध साम और (शुद्ध उक्थैः) मुट मोरे द्वारा हम
(मुझे इन्दं स्तराम ) शुद्ध इन्द्रको स्तुति करते हैं. (यामांस) शक्तिको पदानेवारे इन्द्रको (शुद्धः) पट मोसे
तम्यार पिए गए ( आशीर्वान् ममत्तु) गो दूपसे मिले हुए सोम आनन्द देवें ॥९॥
[३५१) हे इन ! (या रयितम) को अत्यन्त शोभायुक्त है, और (यः युः गुम्नवत्तमः ) जो तेजसे
अत्यन्त तेनरयो है. (सः सोमः) यह सोन (प.) तेरे उपासकोको (ग) धन देता है है (स्वधापते) अपनी पारमा
पारितसे पुश्त इन्म 1 (मुत ते मदः अस्ति) यह सोमरस तुझे आनन्द देनेवाला हो ॥१०॥
यहां चोयीसवां संड समाप्त हुआ।
[२५] पचविंशः पण्डः ।
(३५२) हे यामको ! (नर ) यहको मागे से जानेवाले तुम पनकर्ता (भम्म पिपते) इस सोप पोरी
या परपाले (पिश्यानि विदुरे) राबरो जाननेवाले ( भरं गमाय) उचित समय पर और स्पान पर पहुंचानेवाले
(जम्मये) मा जानेवाने (म-गयात्-आयने) सबसे पहले पहुंचनेवाले (प्रति मर) marनुसार
सोमयो॥१॥
[२५३ (महान्तं गहरेष्ठां पर शयं) महान पर्व पर रहनेवारी और मह मिनामे (या) सोमानी
म (न.) हमारे लिए (आ भर) भरपूर से मा। (महाग्ने पर्पिनेठा ) बहुत सारे प्रगिस होवाले (उप्रं यथः
भाषधी )टोर मापगोरोदरपुरेशा हमारे पास मात्र ऐमार ॥२॥
चतुर्थ मध्याय । सामवेदका मुपोध अनुवाद १ 3 १३ २.....२ 9 ..." ॥३॥ (ऋ. १६८१) १ ॥४॥ ( ८६२११) ३५४ आ त्वा रथ यथोतये सुमाय वर्तयामसि । तुविकूर्मिमृतीपहमिन्द्र शविष्ठ सत्पतिम् ३५५ स पूयों महोनां वैनः ऋतुमिरानजे । पस द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे ३५६ यदी वहन्त्यायो भ्राजमाना रवैया । पिरन्तो मदिरं मधु तत्र श्रवासि कृण्वते ३५७ त्यमु वो अग्रहणं गृणी शवसस्पतिम् । इन्द्रं विश्वासाई नर शचिष्ठं विश्ववेदसम् ३५८ दधिक्राव्णो अकारिप जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करप ण आयूरपि तारिषद ॥५॥ ३ २९३"३ ॥६॥ (. ६४४४) ॥७॥ (ऋ.४३९।६) ३५४ ] है ( शविष्ठ) मलवान् इन्द्र ! (ऊतये सुम्नाय) संरक्षण और मुखके लिए (रयं यथा) जैसे रयको घुमाते हैं, उसी प्रकार (तुषि-कूर्मि ) बहुत पराक्रमी (कती-पहं ) शत्रुओंको हरानेवाले (सत्पति त्या इन्द्र) सज्जनों के पालन करनेवाले तुम इन्द्रको (चर्तयामसि ) हम लाते हैं ॥ ३ ॥ १ तुवि-कृर्मि ऋती-पहं सत्पति त्या इन्द्र वर्तयामसि अत्यन्त पराश्रमी, शत्रु को हरानेवाले सज्जनोंका पालन करनेवाले इन्द्रको हम पास लाते हैं। [ ३५५] (सः पूर्व्यः ) यह इन्त्र मुख्य है, ( महोनां मातुभिः ) महान् यजमानके यतको सहायतारो ( पेन: मानजे) हविष्यान्नको इच्छा करते हुए वह इन्द्र यज्ञमें आता है, (यस्य द्वारा) जिस यज्ञके द्वारा (धियः) कर्माको करते हुए ( देवेषु पिता मनुः आनजे) देवोंमें सबका पालन करनेवाला मननशील यह इन्द्र प्रकट होता है ॥ ४॥ [३५६] (यदि ) जहां जिस यज्ञमें (भ्राजमाना आशयः ) तेजस्वी और शीघ्न जानेवाले मरुत् (मायहन्ति ) तुझे पहुंचाते हैं, (तत्र ) उस पलमें थे (मदिरं मधु पियन्तः ) आनन्द बढानेवाले उस मपुर सोमरसको पोते है, और (श्रधांसि कृण्वते ) मन्न उत्पन्न करते है, अर्थात् पानी परसाकर मन्न उत्पन्न करते हैं ॥ ५॥ [३५७] (1) तुम्हारे हित के लिए (त्यं उ अपहणं) उस उपकार करनेवाले-हिमा न करनेवाले (श्रवसः पति) चलके स्वामी, अन्नके स्वामी (विश्या-साई) सब शत्रुओंको हरानेवाले (नरं शोचिष्ठं) नेता और शक्तिमान् (विश्ववेदसं) सर्वज्ञ इन्द्रकी (गृणापे) में स्तुति करता हूँ ॥६॥ [३५८] (जिष्णोः) विजयो (अध्वस्य याजिनः) अश्वस्पो वेगवान् (दधिकाव्णः) दषित्रावको स्तुति (अकारिपं) मैने को, पह (नः मुखा सुरभि करत्) हमारे मुखारि अंगोंको शक्तिसम्पन्न करता है। ( ना भापि प्रतारिपत् ) और हमारो आयु बढाता है ।। ७ ॥
सामवेदका मुरोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम् 3 १.२ ३१ . 9 1 3. १ ३५९ पुरा भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता बनी पुरुष्टुतः ॥८॥ (म. ॥११॥४) इति सप्तमी दशति |॥७॥ इति प्रथमः खण्डः ॥ १॥ [स्व० ५। उ०२। घा० ४५। (3) ॥] [८] (१-१०) १, ३, ५ प्रियमेध आगिरस , २, १० वामदेवो गौतमः ४ मधुच्छन्दा धेश्वामित्रः ६ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ७ मत्रिीम; ८ प्रस्कपद काख ९ त्रित आप्त्यः ( ऋ० आपिरसो शा) ॥ इद (६ऋ० अग्नि) ८ उपा, ९ विश्वेदेवा. ॥ मनुष्टप् ।। ३६० प्रप्र वनिष्टुभमिपं बन्दद्वीरायेन्दथे । घिया वो मेघसाठये पुरन्ध्या विवासति ।। १ ।। (ऋ ८१६९१) ३६१ कश्यपस्य स्वर्विदो यावाहुः संयुजाविति । ययोर्विश्वमपि व्रतं यज्ञं धारा निचाय्य ॥२॥ ३६२ अर्चत प्रार्चत नः प्रियमेधासो अर्चत । अर्चन्तु पुत्रका उत पुरमिद पर्चत ॥३॥ (ऋ. १६९।८) ३६३ उक्थमिन्द्राय शरस्य वर्धन पुरुनिापिधे । शको यथा सुतेषु नो शरणमख्येषु च ॥४॥ (प्र. ११०५) ( ३५९) (पुरा भिन्दुः ) शश्रुके नगरोंको तोडनेवाला, ( युवाः कविः | तरुण, मानो (अ-मित-ओगाः) अपरिमित पलवान् , (विभ्यस्य कर्मणः धर्चा) सब शुभ कर्मोको धारण करनेवाला (पुर-टुतः इन्द्रः अजायत) अनेकों द्वारा प्रदासित पह इन्द्र उत्पन्न हुआ है॥८॥ यहां पच्चीसवां खंड समाप्त हुआ। [२६ ] पदिशा ५०ः। [३६० ] हे यागको ! (यः) तुम (त्रिष्टुमं पं) तोन स्तोत्रोंमे तैयार किया गया अन (यन्दर पीराप इन्दवे) प्रमारानीय कोर नन्दके पास (मप्र) पहुंधायो, वह इन (4) तुम्हें (मेधसातये) पाके अनुष्ठान के लिए (पुरंग्या धिया । विशेष युतिरी किए गए कर्मोस (भा चियासति । इष्ट फल देकर तुम्हारा सरकार करता हं॥१॥ (२६५ 1 ( काश्यपस्य ) गद्रष्टा पत्रक (यो) जो दोनों पो है । ययोः) गिनके (विश्व भपि प्रतं) सर कार्य ( यश इनि) पा ही है, ऐसा (निचाय्य) निश्चय करके ( सयुजी) ये दोनों पोरे रयमें जोड़े जाते है, ऐसा (स्वपिदः धीराः माहुः) तानी और मुद्धिमान् पुरुष रहते ह॥२॥ ( ३६२ ) हे नरः) मनुष्यो । तुम (अर्थत एनया सत्कार करो, (प्र वर्चत ) शेिष पसे सरकार र है (पिय-मेघासः) यज्ञसे प्रेम करनेवानो । ( भर्चत) का सरकार परो, है (पुत्रकाः) पुत्रो ! (पुरं इत्रण) भागात या पूर्ण परनेवाले, शत्रुको हरापाले (मर्यन्तु, अर्चत) लोग मापार मरें मोर तुम भी सतार ( ३६३ ! (पुर-नि:-श्चिादाय) बहुतसे गमोरे मात करनेवाले गरे लिए (यधने उप ) इसके मारो गाने वाले स्तोत्र (शम्य) हो, यह शकः ) शाम शान् ! (नः) हमारे । सुतेपुष मण्येपु) पुत्रो और मित्रोम (यथा रारण) मिस सेनिम रत्तम बोले, प्रभास हारे लिए स्तोत्रॉोहोnxn चतुर्थ अध्याय ] मामयेदका सुघोष मनुवाद ३३.३ ॥ ५॥ ( ८1८1) (.६२४) २ ३ ३ ३. ३ ३६४ विश्वानरस्य वस्पतिमनानतस्य शवसः । एण्य चर्षणीनामृती दुवे स्थानाम ३६५ सपा यस्तै दियो नरी धियो मतस्य मतः । ऊनी म हतो दिवो द्विपो अहो न तरवि ३६६ विभोष्ट इन्द्र राधसो विम्बी रातिः शतक्रतो । अथा नो विश्वचर्पणे द्युम्न सुदन महय ३६७ चयश्चित्त पतत्रिणो द्विपाचतुष्पाद नि । उपः प्रारऋतू श्रनु दिवा अन्तम्यस्परि ३६८ अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचन दिव कद्व मातं कदमृत का प्रत्ना व आहुतिः (ऋ. ११३८०१) (छ. ११४९३) 113 13. ॥९ ।। (१९०१५) - [३६४ . ( विश्वानरस्य) सबसनों के सैनिकोंपर आक्रमण करनेवाले अथवा विश्रके नेता( अनानतस्य) शत्रुके आगे कभी न झुकनेवाले (शवसः पर्ति ) बलके स्वामी इन्द्रको, हे मरुतो ! (यः) तुम्हारे (चर्षणीनां एवेः) सैनिकोंके आरमपके लिए होनेवाले गोरके समप (स्थानां ऊती हुये) रयोंके सरक्षणको लिए हम बुलाते हैं ॥५॥ । ३६५१ (यः) नो (शमतः मर्तस्य ) शान्त मनुष्पको (दिवः ते धिया) तेनरको दोखनेवाली उस स्तुतिको सहायतासे (नरः ससा) मनुष्य मित्र होता है, (सः) यह मनुष्य ( वृहतः दियः ऊती ) महान् दिव्य समापसे युक्त होकर (अंहः न) पापसे सुरक्षित होने के समान (द्विषः तराते ) दामोसे सुरक्षित होता है ॥६॥ १ सः वृहतः दिव. ऊती, अंहः न, द्विपः तरति-- जो मनुष्य इस विशाल सरक्षणसे युक्त होता है, यह जैसे पापसे सुरक्षित होता है उसी प्रकार शत्रुओं से भी मुरक्षित होता है ॥ ६ ॥ (३६६) है (तस्तो इन्द्र) हे संकडों पराक्रम ररनेवाले इन्द्र ! (विमो राधमः) बहुतसे धनोंको (ते रातिः चिम्नी ) तेरे बान महान् है, ( अथ) इसके बाद (विश्व चर्पणे सु-दन)हे सर्वद्रष्टा और उत्तम दान देनेवाले इन्द्र । (नः धुम्न महय) हमें धन देकर महान् कर ॥७॥ (३६७ । है ( अर्जुनि उपः ) शुभ्र वर्गको उये ! (ते ऋतन अनु) तेरे आने के बाद (द्विपाद चतुष्पाद) मनुष्य और पशु (पतत्रिणः बयः चित् ) तमा पखोंवाले पक्षी भी (दिघः अन्तेभ्यः) याकाशके अन्ततक (परि प्रारम् ) ऊपर इच्छानुसार उडते है ।1८॥ [३६८ हे देवा ) देवो । (ये अभी) जो इन (दिव आरोचने) दिनोंक प्रकाशित होनेपर (मध्ये स्थन) तुम उस आकाशमें रहते हो, (वः ऋतं कद् । तुम्हें वहा श्या या प्राप्त होता है । अथवा क्या (वः प्रत्ला आहुतिः का)बहा तुम्हें पहलेके समान कोई माहुति भी मिलती है ॥९॥ १२ (साम हिन्दी)
(९०)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[पेन्द्र काण्डम्
।
.
-
३१
.
३६९ मच५ साम यजामहे याम्या कर्माणि कृण्वते
वि ते सदसि राजतो यज्ञ देवेषु वक्षतः
॥१०॥
इति अष्टमी दशति ॥ ८॥ द्वितीय खण्ड ॥ २ ॥ इत्यनुष्टुभ ॥ स्व० ७ । उ० ३ । पा० ५४ । जो 1J
[९]
(१-११) १ रेभ काश्यप २ सुवेदा शैलूपि , ३ वामदेव गौतम , ४,७,८ सध्य आइगिरस , ५ विश्वामित्रो
गायिन , ६ कृष्ण भाइगिरस , ९ भरद्वानो बार्हस्पत्य , १० मेधातिथि काण्व (ऋ० मान्धाता यौवनाश्व ),
११ कुरस आडगिरस ॥ इन्द्र , ९ द्यावापृथिवी ॥ जगती, १ अति जगती, १० महापडित ।।
३७० विश्वाः पृतना अभिभूतर नरः सतस्ततक्षुरिन्द्र जजनुश्च राजसे ।
त्व बरे स्मन्यामरीमतोग्रमोजिष्ठं तरस नरस्विनम्
॥१॥ (१८९७४१०)
३७१ असे दधामि प्रथमाय मन्यवेऽहन्यदस्यु नये विपरपः ।
उमे यत्या रोदसी धावतामनु न्यसाते शुष्मात्पृथिवी चिदद्रिवः ॥ २ ॥ ( १०।१४७११)
३७२ समेत विश्वा ओजसा पति दियो य एक इन्द्रसिर्जिनानाम् ।
से पूठयों नूतनमाजिगीप त पनीरनु वावृत एक इन् ॥३॥
। ३६८ । ( याभ्या कर्माणि पुण्यते) जिसको सहायतासे यज्ञादि कर्म किए जाते हैं, (कच साम यजामहे)
उस ऋचा और सामको गाकर हम यज्ञ करते ह, (ने) वे ऋग् मय और साम मत्र (सदसि विराजत.) यज्ञ मण्डपमें
विराजमान है, और वे ही (देवेषु यज्ञ वक्षत ) देवोंमें यज्ञको पहचाते है ॥ १०॥
।। या छम्चीसयां खण्ड समाप्त हुआ।
[२७] सप्तविंश सण्ड ।
( ३७२ } (विश्या पृतना. नर.) सब शत्रुसेनाके नेता वीर सैन्यके साथ ( सजू ) एकषित होनेके यार वे
(अभि-भू-तर इन्द्र नतथु ) शत्रुको बुरी तरह हरानेवाले इन्द्र शस्त्रास्त्रोंसे युक्त करते हैं. (च राजसे जजनुः)
और अधिक प्रकाशित करते हैं (उत) और (प्रत्ये वरे स्थान ) यज्ञमें श्रेष्ठ स्थानपर ऋत्विर बैठकर (आमुरी)
पायको मारनेवाले 1 उप ओजिष्ठ तरस तरस्चिन ) उग्र, धीर, सामम्पवान , प्रतापी और शीघ्रता कार्य परमयाने
इद्री प्रार्य करते है ॥१॥
(३७१ है ( अद्रि-य ) यघारी इद्र ! ( ने प्रथमाय मन्यो ) तेरे महान् प्रोपपरम (चत् दधामि )
श्रद्धा करता हूँ (यत् दस्यु पाइन् ) क्योंकि वह पोष दुष्टोंगो मारता है, और (नय थप चिर) मनुष्यों लिए हित
गरी पानीको प्रवाहित करता है, (उभे रोदसी) रोनों हो चुलोक मौर पृथियोलोक ( यत् त्या अनु धायता) गाय तेरे
अमल होकर गति परते ह और (पृथिवी चित्) एपिसे भी (ते शुष्मात् भ्यसाते ) तेरे बलोरण कांपने
। ३७२ ११ (विश्या ) रय प्रजाओ ! ( ओजसा दियः पर्ति ) अपने नतिगे इन पुलोषमा स्यामी । उसको
(ममेन ) व एप स्पानपर मिलवर स्तुति करो, (य एक इत् ) जो अफेसा हो ( जनाना अतिथि भू मनुष्योपा
पनिपिने गमान पूरुप है. ( पूयं मा) यह पुराण पुष इन (आजिगीपन नूतन) अपने शत्रुओंको जीतनेशी
गोमपे पोरॉपो ( पर इस ) मोला हो (घनी अनुयायते) विजयरे मागो मागे ले जाता है ॥३॥
लगती॥२॥
चतुर्थ अध्यार]
सामवेदका मुयोध अनुवाद
(९१)
३
३
१३
ये
चरामास प्रभूवसो ।
२३
.
३१२
३
3.
31३
M
परि वजन्त जनयों यथा पER
31
३१
२५३१२
3.
३७३ इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत त्वारम्य
न हि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः संघक्षाणीरिय प्रति तद्धर्य नौ यचः ॥ ४ ॥ (ऋ. १६७४ ,
३७४ चर्पणीघृतं मघवानमुक्भ्यामिन्द्रं गिरी बृहतीरम्यनूषत ।
वावृधानं पुरुहूतर सुवृक्तिमिरमत्य जरमाणं दिवेदिवे ॥५॥ (ऋ. ३९११)
३७५ अच्छा व इन्द्रं मतयः स्वर्युवः सधीचाविश्वा उशतीरनूपत ।
न शुन्ध्यु मघवानमूतये ।। ६ ।। ऋ. १०४३।१)
३७६ अभि त्यं मे पुरुहूतमृम्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम् ।
यस द्यायो न विचरन्ति मानुपं भुजे महिठममि विमर्चत ॥७॥ (ऋ. १९११)
३७७ त्यसु
मै महया स्वर्विद शतं यस्य सुसुवः साममीरते ।
अत्यं न चाज हवनस्यद रमिन्द्रं ववृत्यामबसे सुवृक्तिमि 11८॥ (१९२१)
[ ३७३ ] (प्रभूवसो पुरुष्टुत इन्द्र ) हे अत्यधिक धनवान और बहुतोंसे प्रशसित इन्न !( ये ) जो हम (त्या
भारभ्य चयमसि ) तेरा आश्रय लेकर कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, (ते इमे वयं ते) पे ये हम सेरे ही है, हे ( गिर्वणः)
प्रवसनीय इन्द्र ! (स्यद्-अन्यः ) तुझसे भिन्न और कोई दूसरा (गिर न हि सयत स्तुतिके योग्य नहीं है, (तत्)
इसलिए (नः घचः) हमारी स्तुतियोंको (क्षोणीः इव) पृथ्वी जैसे सबको स्वीकार करती है, उस प्रकार (प्रति हर्य)
स्वीकार कर ।।४।।
{ ३७४ ] (यहती गिरः ) हमारी बहुत स्तुति (चर्षणी-धृतं) सब मनुष्योका भरणपोपण करनेवाले (मघवानं
उअध्यं) धनवान् और प्रशसनीय(यावृधानं पुरहतं) सब भवनोंको बढानेवाले और बहुतोंसे प्रशसित ( अगत्य) अमर,
और (सुनिभिः दिवे दिवे ) उत्तम स्तोत्रों ने प्रतिदिन (जरमाणं) प्रशसित (इन्द्रं ) इन्द्रको ( अभि अनूपन ) प्रशमा
करती है ॥ ५॥
१ ३७५ 1 (यथा जनयः मयं पति न ) जैसे स्त्रियां अपने पतिका (परिपजन्त ) आलिंगन करती है, उसी
प्रकार ( ऊतये ) अपने सरक्षणके लिये ( शुन्ध्यु मघवानं इन्द्रं । शुद्ध और धनवान् इन्द्रको (स्वा-युयः) आत्मालो
शक्तिको बढानेवाली (सधीचीः) एकत्रित हुई हुई (चिभ्याः उशती मतयः) सब उन्नतिको इच्छा करनेवाली हमारी
स्तुतिया ( अच्छा अनूपत) प्रशसा करती है ॥६॥
[.७६] (त्यं मे ) उस शत्रुको हरानेवाले (पुरु-हतं ऋग्मिय ) बहुतोके द्वारा प्रशसित, वेद मत्रोसे जिसकी
स्तुति को जाती है. ऐसे (वस्थः अर्ण) धनके समुद्र (इन्ई) इन्द्रको (गीमिः अभि मदत) स्तुतिसे आनदित
करो, (यस्य मानुपं ) जिससे मनुष्यों के लिए हितकारी कार्य (धान न) द्युलोकके समान (विचरन्ति) चारो हो
ओरमे प्रभावशाली होते है, अत. (भुजे) भोग मिलें इसलिए ( मंहिष्ट विप्रं) महान् ज्ञानी इन्त्रको (भभि मचंत)
पूजा करो॥७॥
1 ३७७ । ( यस्य सुभुयः) जिसके उत्तम स्थान (शतं साकं ईरते) संकडों एक समयमें ही उन्नति करते है।
सं मे स्वर्विदं रथं ) उस आयुओंसे स्पर्धा करनेवाले, पन देनेवाले रयके समान इन्छित स्थानमें पहुंचानेवाले (अत्यं
पार्जन) वेगसे दौडनवाले घोरेंके समान (हवन-स्पद) यसरे स्थानपर जानेवाले (इन्द्र) इन्द्र के यदरको (अवसे)
मपने सरक्षणके लिए (सु-वृतिभिः महय ) उतम स्तोत्रोंसे प्रकट करो, और (शत आयवृत्यां) स्तुति संकटो बार
कहो ॥८॥
सामवेदका सुयोध अनुवाद (ऐन्द्र काण्डम् ३२३ १३ ३.२ ३१ समाज 37 21 १३.१२ २३१२३१२ 39२ . १ 35 १ ३७८ घृतवती मुचनानाममिश्रियोची पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा । यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजर भूरितसा ॥९॥( (ऋ. ६७१) ३७९ उभे यदिन्द्र रोदसी आपप्राथोपा इव । महान्तं त्वा महीना चर्पणीनाम् । देवी जनिव्यजीजनद्भद्रा जनित्यजीजनत् ॥१०॥ (ऋ. १०११३४१) ३८० प्र मन्दिनै पितमदर्चता बचो या कृष्णगर्मा निरहन्नृजिश्चना । अवस्यवो वृपणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तर संख्याप हुवेमहि ॥११॥ (११११११) इति नवमी दशतिः॥९॥ तृतीयः खण्डः ।। ३॥ [स्व० १४ । उ०७ । १० ९३ । धि ॥) ॥ इति जगत्यः ।। [१०] (१-१०) १ नारदः काण्या; २,३ गोषूक्त्यश्वास्तिनी काण्वापनौ; ४ पर्वतः काण्य. ५-७, १० विश्यमना वैश्यः, ८ नुमेप आङ्गिरसः ९ गोतमो रहूगणः || इन्द्रः ।। उष्णिक ।। २०२३२३१ ३८१ इन्द्र सुतेषु सोमेपु ऋतुं पुनीप उक्थ्यम् । विद वृषस्य दक्षस्य महारहि पः (प्र. ०११) [ ३७८ ) ( द्यावापृधिवी) ये द्युलोक और पृथियोलोक (घृनाती) जलदाले, (भुवनानां अभिथिया) सब माणिपोको माधय देनेवाले (उ/ पृथ्यो) महान और विस्तीर्ण (मधु दुधे ) मोठा जल दैनयाले (सु-पेशसा ) उसम एपरो मुक्त (यरुणस्य धर्मणा विधाभिते ) ईदवरको पारशक्तिरो रहनयाले (भजरे भूरि रेतसा) नरारहिन, निस्य और उतम योर्यसे सम्पन्न है॥९॥ [३७९ ) हे इन्द्र ! ( उभे रोदमी) घुलोक और पृथ्वीलोक इन दोनोको (यन् ) नो न (उपा इव) उपारे समान अपने तेजस (आ पप्राथ) भर देता है ऐसे (महीनां महान्न) महानगे भी महान (चर्षणीनां मनाज) मनुष्यों सनाट् ( त्या इन्द्रं ) सुश इन्द्रको ( देवी जनित्री ) देवमाता अदितिने (अजीजनन् ) उत्पन्न किया, (भद्रा जनित्री अजीजनत् स्याण करनेपाली देयीने उत्पान रिया ॥१०॥ (३८८ हे विनो। ( मान्दिने) प्रशासनाप (पितुमन पयः भ मर्चन) हापध्यान पुर र रो, (A) निगइन्द्रने (प्रजियना) ऋमिश्वकरी सहायता ( राण-गमा) पृष्ण सगुरो गर्भयो पिचोंको पणो माप (निरहन ) जातसे पार रिया, उग (वभ्र-दक्षिण) दाय हायमें पत्र पारण ररनेवाले (मगन्यन्न) मोती सेनारे गाव रनवाले ( पृषणं ) बलवान एरो अयम्यः) भप सरमणकोरा करनेवाले हम (मायाप दुवेम) मित्रा सिप माते है।।१।। ॥यहां मत्तामय पण्ड समाप्त हुआ। [२८] मष्टारिंशः सपा { २R! (मोमेषु मुतेपु) मोमरसोंगे निकालने के बार (पृधम्य मनाम्य पृधे) बहानेवाले प्रमों प्राव पपिए (ऋतुं उपध्यं पुनी) पल मौर गाम गात मुगार में परिवारलाई नि! ( मदान दि) महान १॥ १३13.१ 92
चतुर्थ अध्याय]
सामवेदका सुवोध अनुवाद
३३
3
13"
॥२॥ (ऋ. ११)
१२
२३२
3
॥३॥ (ऋ ८।१४)
१
॥४॥ (ऋ. ८।१२।१६)
३८२ तमु अभि प्र गायत पुरुहूत पुरुष्टुवम् ।
इन्द्र गौभिस्तविषमा विवासत
३८३ तं नै मदं गृणीमसि वृपणं पशु सासहिम् ।
उ लोककृत्नुमद्रियो हरिश्रियम्
३८४ यत्सोममिन्द्र विष्णच या पत्रित आप्त्यै ।
यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः
३८५ एदु मधोमदिन्तर सिञ्चाध्धयों अन्धसः ।
एवा हि वीरस्तपत्ते सदावृधः
३८६ एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पियाति सौम्यं मधु ।
प्र राधारसि चोदयते महित्वना
३८७ एतो निन्द्र५ स्तवाम सखाया स्तोम्यं नरम् ।
कटीयो विश्वा अभ्यस्त्येक इव
।। ५।। (ऋ. ८०२४।१६)
.
घर
॥६॥ (*. २४.३)
३२
॥७॥ (ऋ. ८।२४।१९)
। ३८२ ) हे स्तुति करनेवाले ! (पुर-हतं) अनेकोंसे युलाये जानेवाले (पुर-स्तुतं ) और अनेकोंसे प्रासित होनेवाले
(त उ अभि प्रगायत ) उस इन्द्रको ही भार यार स्तुति करो, (तविष इन्द्रं ) महान् इस इन्द्रको (गीर्भिः आ
विरासत) मत्रोसे आरायना करो ॥२॥
[३८३ 1 हे (अद्रि-या) पन्नधारी इन्द्र ! (ते ) तेरे (तं ) उप्त (पृषणं । बलपान (पृच सासर्हि ) संग्राम
दापो हरानेवाले (लोक कत्तुं ) मनुष्योंके लिए हितकर काम करनेवाले (हरि-श्रियं 3) पोडे जिसके पास शोभित
होते हैं, ऐसे ( मदं) सोमपानसे उत्पन्न हुए इस उत्साहकी (गृणीमसि) हम प्रशसा करते हैं ॥३॥
1 ३८४ ] हे इन्द्र ! यद्यपि (विष्णवि) विष्णुके माने याद होनेवाले यतमें (यत् सोम ) जो सोगरा ने पिया
(यद् वा ) अथवा (भात्ये विते । आप्त्य त्रितवे पजम ( यद्वा मात्लु) मयया मरोंके साथ अपया (मन्वसे) भन्य
पोंमें सोम पोकर आनन्दित होता है, तो भी तू (इन्दुभि. स) हमारे सोमरस पोकर प्रसन्न हो ॥४॥
(३८५ ] हे ( अध्ययों) ऋरियो । (मधोः अन्धसः) मोठे सोमके इस (मदि-तरं इत्) मानन्द देनेयाले
रस (भा सिंच) इन्दरो अर्पण करो क्योंरि यह (वीरः सदा-वृध.) पराक्रमी और सरा मदानेवालान्त (पयहि
स्ताते) ही स्तोत्र पढनेवालोंके द्वारा प्रासित होता है ॥५॥
(३८६ ] हे कृत्यिनो ! (इन्द्राय इन्, सिंचत) इनारे लिए सोमरस दो, उराणे याव (सोम्यं मधु पियाति)
मोठा सोमरस यह पोता है, और वह अपनी (महित्वना ) महत्तासे ( राधांति प्रचोदयते) पन घेता है ।।
[ ३८७ हे । (समायः) मित्रो! (नु एत) शीघ्रानो. (तं स्तोम्यं नरं लगाम ) उस प्रशसनीय मेता
इमरी स्तुति करें, (य. एका इत् ) जो अकेला ही किया. पष्टीः भभि अस्ति) सब शत्रुसेनाओंको हाताई ॥७॥
[पेन्द्र काण्डम् ॥८॥ १४ ३३१२३ २३१ सामघदका सुबोध अनुवाद ३८८ इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते वृहत् । ब्रह्मकते विपश्चिते पनस्य (९८१) ३८९ य एक इद्विदयते वसु माय दाशुषे । ईशानो अप्रतिकुत इन्द्रो अङ्क ॥९॥ ( १८४७) ३९० सखाय आ शिपामई ब्रह्मेन्द्राय वजिणे । स्तुप ऊ पु वो नृतमाय धृष्ण ॥१०॥ (२४१) इति वशमी गति ॥१०॥ इति चतुर्थ खण्ड ॥४॥ [स्व० १०॥ उ० ४ । पा० ६२] इति घतुयप्रपाठके द्वितीयोऽर्थ, चतुय प्रपाठकश्च समाप्त । मग पञ्चमा प्रपाठक। ६ - (१-८ १ प्रगायो धौर काव , २ भरद्वामी वाहस्पत्य', ३ नमेष मादगिरस , ४ एवंस काण्य , ५ ७ परिस्थिति विश्यमना वैपाय, ८ तिष्ठो मंत्रायणि ॥ इद्र, ५, ७ आदित्या || उणिक ८ बिराणि ॥ ३९१ गृणे तदिन्द्र ते शच उपमा देवतातये । यद्धप्ति वृत्रमोजसा शचीपते ॥१॥ (ऋ८६२८) ३९२ यस्य त्यच्छम्बर मदे दिवोदासाय रन्ध्यन् । अपरस सोम इन्द्र ते सुतः पिय ॥२॥ (ऋ ६२) [३८८1 हे उदगाताओ! (विप्राय ) शानी (इते ब्रह्मयते) महान स्तुति जिसके लिए को गाती है एमे (विपश्चिते ) विद्वान् और ( पनस्यने ) स्तुतिके योग्य (इन्द्राय) इन्द्र लिए। बृहत् माम गापत ) महत नामके सामा पानपरो॥८॥ [३८] (य एक इत् ) जो मरोला हो (दापे माय ) बानगीत मनुष्यो ( वसु विदयते ) पन देता ह (अ-प्रतिष्णुत इन्द्र निराका प्रतिकार कोई कर नहीं सकता, एरा यह इत्र ( या ईशान हे प्रिय ! भीका स्वामी है॥९॥ [३९० है ( ससाय ) मित्रो (पतिणे) पनपारोमो (घ्रम माशिषामहे । स्तोत्रति स्तुति परते हमसे हम मागोदि मांगते ह (य) तुम सबके लिए (मृतमाय शृष्णचे सुस्तुऐ ) पाठ चोर और गोवा पराभव करनेवाले को म स्तुति करता हूँ॥१०॥ ॥ यहा अट्ठाइसया खड समाप्त हुआ। [२९] एकोनत्रिंश एण्ड । (३९१ (नेतत् शय ) उस तेरे सामप्यारी (उपमा देवतातये गणे पागरे यह स्तुति करत शचीपने ) (मोजसा मृत्र इंमि ) अपने सामापसे इनको मारता ह॥१॥ [३०२) हे ! ( यम्य मदे) जिस सोमरगमो पोर उत्साह प्राप्त होनेपर (दिवोदामायरियोग लिए( स्पा सम्पर ) सम्बर (मगधपन ) जानसे मार गला ( स मयं पह(सोग ) मोमर (मे मुततेरे लिए तम्मार गिराह उसे पी॥२॥ , चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुयोघ अनुवाद ३१२ १२.२ १२ ३१ ३ 3 18 २ 3 २र२३१२ १३ १४ ३ १२ २... ३९३ एन्द्र नो गधि प्रिय समाजिदगोस । गिरिन विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः ॥३॥ (ऋ ९८५४) ३९४ य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चतति । येना हसि न्याईत्रिण तमीमहे ॥४॥ (क्र ८।१२।१) ३९५ तुचे तुनाय तत्सु नौ द्राधीय आयुजीवसे । आदित्यासः सुमहसः कृणोतन ।। ५ ।। (ऋ. ८1१८१८) ३९६ चैत्या हि नितीनों वज्रहस्त परिवजम् । अहरहा शुन्ध्युः परिपदामिव ॥६॥ (ऋ. ०२४।२४) २९७ अपामीवामप निघमप सेधत दुर्मतिम् । आदित्यासो युयोतना नौ अहसः ॥७॥ (ऋ. १०) ३९८ पिपा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा य ते सुपाव हर्यश्वादिः । सौतुहुम्यार सुयतो नार्या ॥८॥ (8. ७१२२१) इति प्रथमा बदाति ॥ १॥पञ्चम खण्ड ।। ५॥ दस्युटिणह । स्व०५। उ०२।०५१ । १ ।। [३९३] (प्रिय ) है सबके प्रिय 1 (सत्राजित् ) एक साथ नत्रुओंको जोतनेवाले (अ-गोह) किसीसे न हारनेवाले इन्द्र 1 (गिरिन) पर्वतके समान ( विश्वतः पृथु ) धारों औरसे विशाल (विषः पतिः । धुलोका स्वामी तु (ना आगहि ) हमारे पास आ ।। ३ ।। ( ३९५ } हे इन्द्र ! ( यः सोमपा-तमः ) तू अत्यधिक सोम पोनेवाला और (शविष्ठः ) यसवान् है, वह मेरा (या मदः) उत्साह (चेतति ) जगाता है, ( येन) जिस उत्साहरो ( अविण नि हंसि) खाऊ राक्षसोको मारता है, ति ईमहे ) उस तेरी हम प्रार्थना करते हैं ॥४॥ [३९५ है ( सुमहसा आदित्यासः) महान् आविस्यो ! (नः तुचे) हमारे पुत्रोंक और (तुनाय) पोनर (जीवसे दीर्घजीवन के लिए (तत् द्राधीय आयुः ) यह दीर्घ आयु प्राप्त हो, ऐगा ( सु कृणोत्तन ) करो ॥५॥ [३९६ ] है ( वन-हस्त) हायमें वध धारण करनेवाले इन्द्र ! ( नितीनां परिवृज) विघ्न करनेवालोंको दूर करनेका मागं तू । वेस्था हि) जानता हो है, इसलिए (अहः अहःगुन्युः) प्रतिदिन स्वयंको शुद्ध रखनेवाला मनुष्य जिस प्रकार (परि-पदांच) आपत्तियोंको-रोगादिकोंको दूर करता है, उसी प्रकार हु विपत्तिोको दूर करता है॥६॥ [.९७ ] है (आरित्यासः) आदित्यो ! ( अमीयां अप सेघत) हमारे रोगोंको दूर करो, (सिघं मप) मागोंको दूर करो, (दुर्मति अप) दुष्टयसिको दूर करो, और (नः अंहसः युयोतन) हमें पासि र सलो ॥७॥ [३९८ ] हे इन्द्र । (सोम पिय ) मोमरस पो, थे सोमरस (त्या मदन्तु ) तुर्ग मानन्दित करें, है (हरि-मय) घोडे पासमें रखनेवाले इन्द्र (ते सोतुः) तेरे लिए सोमरस निकालनेवालेका ( याहुभ्यां भयो न सुरतः) रस्सीसे पोये कामान अच्न माह सपा हुआ (अयं यद्भिः) यह परपर तेरे लिए ( सुगर) सोमरस निकालता है ॥ ८॥ यह उम्तीसयां मण्ट समाप्त दुमा ।
(९६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्रं काण्डम् ३" २३.२ ३.१३॥ २ , ३,२३१३ २३ १२ जनस गोमतः [२] ( १-१०) सौमरि काण्व ; ७, ८ नमेध आगिरस ॥ इन्द्र , ३, ६ मरुत ॥ ककुम् ।। ३९९ अभ्राहव्यो अना वमनापिरिन्द्र जनुपासनादसि । युधेदापित्वपिच्छसे (२०१३) ४०० यो न इदमिदं पुरा प्र यस आनिनाय तमु व स्तुपे । ससाय इन्द्रमूतये ॥२॥ (ऋ ८२१९) ४०१ आ गन्ता मा रिपण्यत प्रस्थावानो माप स्यात समन्यवः । हा चिद्यमयिष्णवः ॥ ३ ।। (ऋ. (१२०१) ४०२ आ याहयामिन्दयेऽश्वपत गोपत उर्वरापते । सोम सोमपते पिच ॥ ४॥ (ऋ. ८।२१।३ ) ४०३ त्वया इ विधुजा वयं प्रति वसन्त घृषभ धीमहि । (ऋ. ८।२१।११) ४०४ गाविद्धा समन्यवः सजात्येन मरुतः सबन्धवः । रिहते ककुमो मिथः (ऋ. ८२०२१) [३०] त्रिंशः खण्डः। [ ३९९ 1 है इन्द्र ! (त्वं जनुपा अभ्रातव्यः) तू जन्मसे ही शत्रुरहित है, (अ-ना) तुझपर शासन करनेवाला कोई नहीं है, (सनात् अनापिः) सदाले हो भाईरहित है, (युधा हत् । मुद्धसे तू (भापित्य इच्छसे ) भाइयोंको पानेको इच्छा करता है, भक्त हो ऐसी इच्छा करता है ॥ १ ॥ १ अ-धातृव्य भाईबन्धोंके झगडेसे मुक्त । २ अनापिक-अफेला, जिसको सहायता के लिए कोई भी भाई नहीं है। [ ४००] है ( सखायः ) मित्रों ! (य ) जिस इन्द्रने (पुरा) पहले ( इद वस्यः) यह पन (नः प्र. आनिनाय) हमें रिया, (तं उ इन्द्र ) उसी इन्द्रकी (यः ऊतये स्तुपे ) तुम्हारे सरक्षणके लिए में स्तुति करता हूँ ॥२॥ {५०१ हे (प्रस्थायान) गतिमान् महतो (आगन्त )हमारे पास आओ, (मा रिपण्यत) हमें हानि मत पहचाओ, (स-मन्यवः ) हे उत्साहो पोरो' (दृढा चित् यमयिष्णवः ) बलवान् शत्रुओं को भी तपानेवाले मरुतो ! (मा भपस्थात) हमसे दूर मत रहो ॥३॥ 1 १०२ ) है (अभ्व-पते )पोदोंके स्वामी । (गौ-पते) गौयोंके स्वामी । और है ( उर्वरा-पते) भूमिके पालक हुन्छ । (इम्दये) सोमरस पीने के लिए (अयं) यह सोमरस निकाला है, (आयाहि ) मा और हे (सोम-पते ) सोमरस पोनेवाले इन्द्र (सोम पिव) सोमरस पो॥४॥ ४०३ (वृषम ) बलवान् इन्द्र ! (गोमतः जनस्य संस्थे) गाय पालन करनेवाले लोगोंके समूहमें (श्वसन्तं) कूर कर्म करनेके कारण लम्बी लम्बी सास लेनेवाले शत्रुको (त्यया युजा ) तेरी सहायतासे (ह स्वित् ) हो (प्रति मुधीमहि ) योग्य उत्तर देकर उसे हटाये ॥५॥ 1101 | (समन्यवः) समान रीतिसे उत्साहित मरुतो! (गावः चित् ह) वे गायें भी (स-जात्येन सबन्धना) एक जातीय होने के कारण परस्पर यहिने है, वे (ककुभः) अनेक दिशाओं में घूमती दूसरेको चाटती है॥६॥ (मिथ रिहते ) परस्पर एक १ गायः सजायन सबन्धव कफुमः मियः रिहते-- गायें सजातीय होने के कारण एक दूसरेको वहित है, वे नाना देशों में घूमती र परस्पर एक दूसरेको चाटती है, उसी प्रकार मनुष्योंको भी एक दूसरे प्रेम करना चाहिए। ।
चतुर्थ गध्याय ] सामयेदका सुवोध अनुवाद १ १३ ४०५ न इन्द्रा भर ओजो नृम्ण शतको विचर्पणे । आ वीर पृतनासहम (ऋ. १९८110) ४०६ अंधा हीन्द्र गिर्वण उप त्या काम ईमहे ससृग्महे । उदेव ग्मन्त उदभिः ॥८॥ (3. ८/९८७) ४०७ सीदन्तस्तै यो यथा गोश्री मधी मंदिरे विवक्षणे । अमि त्वामिन्द्र नोनुमः ॥९॥ (ऋ. ८२११५) ४०८ वयम् वामपूर्ण्य स्थूरं न कच्चिदान्तोऽवसवः । वार्ज चित्र हवामहे (ऋ०२११) इति द्वितीया दशति ॥ २ ॥ षष्ठः खण्ड ॥ ६॥ इति ककुभः । [स्व. २ । उ०२। पा० ४१ छ ।] (१-१०) १-८ गौतमी ( सम्मदो वा ) राहगण । ९ गित. आप्रय ( ऋ० कुत्स आंगिरसोपा) १० अवस्पराय. ॥ इन्द्र । ९ विश्वदेवा., १० अश्विनी । पषित । ४०९ खादोरित्या विषुवत मधोः पिपन्ति गाय:। या इन्द्रेण सयावरीकृष्णा मदन्ति शौमथा वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१॥ ( ऋ ११८४४१० ) [४०५] है (शत-क्रतो थि-चर्पणे इन्द्र ) संकों कार्य करनेवाले विशेष मानी इन्द्र (त्यं नः ) तू हमें (ओजः नृम्प ) यल और पन ( आ भर ) भरपूर दे। उसी प्रकार ( पृतना-सहं वीरं आ) शत्रुसेना हरानेवाला पोर पुत्र भी 2 ॥७॥ १ त्वं नः ओजः नम्णं पृतना-सहं वीरं आ भर-तू हमें सामर्थ्य, मानसिक्वल और दानुसैनाको हरानेवाले वीरोंका सामन्यं भरपूर दे । १४०६ हे (गिर्वण इन्द्र) स्तुत्य इन्द्र ! ( अधा हि त्वा ) अब हम गुमसे ( काम ईमहे )अपनी कामनाओं प्रतिके लिए प्रार्थना करते हैं, और ( उप ससम्महे ) तेरो पासरो स्तुति करते हैं, जिस प्रकार ( उदा ग्मन्ता उदमिः इय) पानी ले जानेवाले मित्र मित्रताके कारण पानीसे खेलते हैं, उसी प्रकार हम तुझसे मित्रता करते है ॥ ८॥ [ ४०७ 1 है इन्द्र ! ( गोश्रीते ) गाय दूपसे मिश्रित (मदिरे विपक्षणे) आत्माह घटानेवाले, प्रपाल परनेवाले (ने मौ) तेरे लिए निकाले गए सोमरसरे पास (ययो यथा ) जिस प्रकार पझी इकट्ठे होते है, उसी प्रकार हम (त्यां नाम नोनुमा) र मुझे नमन करते हैं।" [४०८ } है (मन्न्यं वसिन ) अपूर्व, दयको धारण परनेवाले इन्द ! (त्यां उ) तुझे हो (चित्रं मरन्तः , इस ग्लिशण सोमरसको भरपूर देते हुए ( अवस्यका ) अपने संरपागको इच्छा करनेवाले हार (हवामहे । तेरी प्रार्थना करते है, जिस प्रकार (कचित् स्थूरं न ) किमी गुसि महान् मनुष्यरे पास दूसरे मनुष्य जाते हैं, उसी प्रकार हम तेरे पास बाते है॥१०॥ ॥ यहां तीसयां सण्ड समाप्त हुआ। [३१] एकत्रिंशः वण्ड। [१०९ (स्पादो) स्वादिष्ट (इत्या विपूवतः ) इस प्रकार सम पोंमें होनेवाले इस मधोः ) मोटे मोमरण. (गौर्यः पियन्ति ) खेत पर्णी गाय पीती है, (या)ो पाएँ (पा सधारी ) भातोशी सामना पूर्ण करने. पाले नसाय वसनेवाली ( मदन्ति ) आनन्दसे रहती है, और (शोभयाः) मुभित होतो है, ये (पम्धी ) उत्तम अप देती हा (पराज्यं मनु) स्वराग्यके मनुल का रती है ॥ १॥ १३ ( सामल्दिो) (९८) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ऐन्द्रं काण्डम् . B११ २४" 337 ४१० इत्या हि सोम इन्मदौ ब्रा चकार वर्धनम् । शविष्ठ चजिनोजसा पृथिव्या निः शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ २ ॥ । ऋ. १०) ४११ इन्द्रो मदाय वाधे शवसे वृत्रहा नृमिः । तमिन्महत्खाजिपूतिममें हवामहे स वाजेपु प्र नोऽविपत ॥३॥ (ऋ ११८११) ४१२ इन्द्र तुम्यमिदद्रिवोनुचं जिन्वीर्यम् । यद्ध त्यं मायिन मृग तव त्यन्माययावधीरचन्नन स्वराज्यम् ॥ ४॥ ( १५८०१७) ४१३ प्रेहमीदि धृष्णुहि न ते वो नि यसते । इन्द्र नृम्णरहि ते शयो हनो वृत्रं जपा अपोचमनु स्वराज्यम् ॥५॥ (ऋ. १८०३ ) ४१४ यदुदीरत आजयो घृष्णवे धीयते धनम् । युड्ड्या मदच्युता हरी का रहना के वसौ दोऽस्माइन्द्र वसौ दधः ॥६॥( १।८१॥३) [४१०] हे (शविष्ठ बनिन् ) बलवान् और वज्रपारी इन्द्र ! (इत्था हि ) इस प्रकार (सोमे मदः) सोम- रसमें उत्साह बढानेवाले गुण है, इसलिए उनके ( वर्धनं ब्रह्म चकार ) गुणवर्णन करनेवाले ये स्तोत्र बनामे है, (स्वराज्य अनु अर्चन ) स्वराज्यको लक्ष्य करके ( पृथिव्याः स-हिं ) पृथिवीपर कम न होनेवाले शत्रु (निः शशाः) बिल्कुल नष्ट हो जायें, ऐसे करना चाहिए ॥२॥ [४११ ] ( वृत्र-हा इन्द्रः ) वनको मारनेवाले इन्द्रमा यश ( मदाय शवसे) आनन्द और उत्साहको प्राप्त करने के लिए ( नृभिः वावृधे) मनुष्योंके द्वारा बताया जाता है, इस कारण (तं कति इत् । उस रक्षण करनेवाले इन्द्रको ही हम (महत्त्सु आजिपु ) महान् युद्धोम और ( अ ) छोटे युद्धोंमें ( हवामहे ) बुलाते हैं, (सः याजेषु ना प्राविपत् । यह युद्धोंमें हमारा सरक्षण करे ॥ ३ ॥ [४१२ ] है (अदि-या बनिन् इन्द्र) पर्वतपर रहनेवाले वनपारी इन्द्र ! (तुभ्यं इत् वीर्य अनुत्तं ) तेरा ही सामयं शत्रुओं से पराजित नहीं हो पाता, ( यत् ह ) जो निश्चयसे (सराज्यं अर्धन अनु) स्वराज्यको अर्चना करने बालोंको उपयोगी है ऐसे सामयंसे (मायिनै मृगं त्यं) कपटसे लडनेवाले, खोज करके मारने योग्य पत्रको तु( तव मायया अवधीः) अपने छल और कपटके प्रयोगसे ही मारता है ॥४॥ [४१३ ] हे इन्द्र ! (प्रेहि ) शधूपर चढ़ाई कर ( अभीहि ) चारों ओरसे हमला कर, (धृष्णुहि ) शोंका नाश कर ( ते वजन नियंसते) तेरा वन कम मास्तिवाला नहीं है. (ते शवः नृम्प) तेरा बल शत्रुओं मुकाने वाला है, (हि स्व-राज्य अनु अर्चन् ) स्वराज्यको अर्चना अनुकूलतासे करते हुए (पुत्र हनः ) वृत्रको मार ( गपः जय ) और जलोंको जीत ॥ ५॥ [१४] (यत् भाजयः उदीरते ) जब युद्ध शुरू हो जाते हैं, उस समय (धृष्णवे धनं धीयते शत्रुको जोतने घालैको ही धन मिलते हैं, है इन्द्र । इस प्रकार युद्धके शुरू होनेपर (मद-च्युता हरी युझ्व ) मर चुमानेवाले अपने घोडोंको रथ जोड, (कं हनः) तू किसे मारे और (कं वसो दधः) किसे धन दे, यह तेरे आधीन है, इसलिए हे इन्द्र ! ( अस्मान् वसो दधः) हमें पनोंमें स्थापित कर, हमें बहुत सारा धन दे।। ६ ।। १ यत् आजय. उदीरते धृष्णये धनं धीयते- जब युद्ध शुरू हो जाते हैं, तब शत्रुओंको परोसे कुचलने- पालेको ही धन मिलता है।
चतुर्थ अध्याय]
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(९९)
3"
72
२१
२
1
४१५ अक्षममीमदन्त झव प्रिया अधूषत ।
अस्तोपत स्वमानवो विनविष्ठया मती योजा बिन्द्र है हरी ॥७॥ (ऋ. ११८२१)
४१६ उपो पु शृणुही गिरौ मघवन्मातथा इव ।
कदा नः सूनृतावता कर इदर्थयास इद्योजा बिन्द्र ते हरी ॥८॥ (ऋ. १८२१)
४१७ चन्द्रमा अप्स्वाऽन्तरा सुपर्णो धावते दिति ।
न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं में अस्य रोदसी ॥ ९॥ (* १।१०।१ )
४१८ प्रति प्रियतमरथं पणं वसुवाहनम् ।
स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमैमिपति प्रति माध्वी मम श्रुतं हवम् ।। १० ।। (ऋ8 ५।७२।१ ).
इति तृतीया रशतिः ॥ ३॥ सप्तमः खण्डः ॥७॥(स्व० १३ । उ० ५। पा० ७५ ॥ ॥]
[४)
(१-८) १, वसुश्रुत मात्रेयः, २, ४ विमद ऐडः (३० प्राजापत्यो वा, वसुद्धा वामुक्र ) : ३ सत्यथवा मात्रेपः
५, ६ गोतमो राहगणः; ८ अंहोमुग्वामदेव्यः (१० पुल्मलबहिषः शलूपि;)॥ अग्नि', ३ उपाः
४ सोमः। ५, ६ इन्द्रः ८ विश्वेदेवाः ॥ पवित. ८ बृहती ।।
४१९ आ ते अम इधीमहि घुमन्त देवानरम् ।
यद्ध या ते पनीयसी समिहोदयति धीपर स्तोत्रम्य आ भर ॥१॥ (ऋ. १/६४)
[४१५ ] हे ( इन्द्र) इन्द्र ! यजमानोंने (मशन ) अन्न ला लिया और (हि अमीमदन्त ) ये तृप्त हो गए
(प्रियाः अब अधूपत ) मानन्दित होकर उन्होंने अपने सिर आनन्दसे हिलाये, उसके बाद ( २-भानवः विप्राः । स्वयं
सेजस्वी दीखनवाले उन ब्राह्मोन (नपिष्टया मती अस्तोपत )नवीन स्तोत्रति स्तुति की, अव तू इस याम मानेरे लिए
(तेरी नु योज) अपने घोडे जोड ॥७॥
। ४१६] (मघयन इन्द्र) हे धनवान् इर! (गिर उप उ सु शृणुहि) हमारे स्तोत्र पास भाकर मुन,
(अ-तथा इव मा) पहले के विरुद्ध व्यवहार मत कर, (नः सूनुतावतः कदा करा ) हमें सत्यभाषण करनेवाला पय
करेगा? तू (मर्थयासे इत्) हमारी स्तुति जाननेको इच्छा करता है, इसलिए (ते हरी नु योज) तू अपने घोडे जोर॥८॥
[४१७१ ( अप्सु अन्तः ) अन्तरिक्ष में रहनेवाला (सु-पणी चन्द्रमाः । उत्तम किरणोंवाला चन्द्रमा ( दिवि
माघारते ) आकाश दौडता हूँ. (हिरण्यमयः विद्युतः) हे सोने के समान चमकनेवाले बिजलोस्पो लेगो । (यः
पद) तुम्हारे घरणरूपी किरणोंको मेरी इन्द्रिय (न विन्दन्ति ) नहीं पा सकनो, है ( रोदसी) यावापृषिषियो ! (में
अस्य वित्तं) मेरी इस स्तुतिरो तुम जानो.९॥
४१८) हे (अश्विनी ) अश्विनी देवो! (यां प्रियतमं ) तुम्हारे अत्यन्त प्रिय, (वृषणं वासु-वाहनं ) मजबूत
और धनको बोकर से आनेवाले, (रथ) रपरो (स्तोता ऋषिः । स्तुति करनेवाला ऋषि स्तोमेभिः प्रति भूपति)
स्तोत्रोंसे गुशोभित करता है, है (माघी) मधुविद्याको आरनेवाले अश्विनीकुमारों ! ( मम हयं श्रुतं ) मेरी प्रार्थना
सुनो ॥१०॥
। यहां तीसवां एण्ड समाप्त हुआ।
[३२] द्वात्रिंशः खण्डः।
[४१९ है (अग्ने देय ) मग्निदेव ! (शुमन्तं मजरं ते । तेजस्वी और बुहासे रहित तुझे ( मा रधीमहि)
हम मसाते है. (यत् । नित्रपसे । ते स्या पनीयसी समित् ) तेरी बह प्रशसनीय ज्योति (परि वादपति)
मशेर धमालो हस्तिोदया भा भरवतोतामोको मन भरपूर वे ॥१॥
(१००)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[पेन्द्र काण्डम्
३१
३१
३३
३१७११"
२२
४२० आग्निं न स्ववृक्तिमिहोतारं त्वा वृणीमहे ।
शोर पावकशोचिष वि यो मदे यज्ञेषु स्तीर्णवहिप विवक्षसे
॥२॥ (ऋ. १०१२॥१७
४२१ महे नो अद्य बोधयोपो राय दिविस्मती ।
पथा चिन्नो अयोधयः सत्यवसि वाय्ये सुजाते अश्वननृते
॥३॥ (ऋ. ११७९३१)
४२२ गद्रं नो अपि वासय मनो दक्षमुत ऋतुम् ।
अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदेरणा गावो न यवसे विवक्षसे ॥ ४ ॥ (ऋ. १०।२५।१)
४२३ ऋत्वा महाए अनुष्षधं भीम आ वावृते शवः ।
श्रिय ऋष्य उपाकयोनि शिपी हरियां दधे हस्तयोर्वजमायसम् ॥५॥ ( १८१४ )
४२४ स घा तं वृषण र रथमपि तिष्ठाति गोविदम् ।
या पात्र हारियोजनं पूर्णमिन्द्र चिकेतति गोजा बिन्द्र ते हरी ॥६॥ (ऋ ११८२।४ )
१२
२
3
१
२
१२
[४२० १ (न) इस समप ( सु-वृक्तिभिः ) उत्तम स्तुतियोंसे ( होतारं ) हवन करनेवाले (वः यथेषु) तुम्हारे
यसमें जिसके लिए (स्तीर्ण-वहिप) आसन फलाये गये हैं. ऐसे (शीरं पावक-शोचिप) व्यापफ, पवित्र करनेवाले तेजसे
युक्त ( त्या अनि ) तुझ अग्निको (वि-मदे आवृणीमहे ) विशेष आनन्द प्राप्त करनेके लिए हम आराधना करते है।
(पिवक्षसे)तु महान् है ॥२॥
{ ४२१ 7 ( उपः । हे उपादेयो । ( अद्य) आज (दिविरमती) तू प्रकाशित होकर (नः महे राये बोधय)
हमें धनती प्राप्ति के लिए उसी प्रकार जगा, ( या चित् नः अयोधयः । जरो हमें पहले जगाती थी, हे । सुजाते)
उत्तम रीतिसे प्रकट हई उषे ! ( अश्व-सूत्रने) हे सत्यप्रिय उये ! ( बाय्ये सत्यथवास ) मै वयका पुत्र सत्यत्रया हूँ
अत मुगपर कृपा पर ॥ ३॥
। ४२२ ) हे सोम ! (पियक्षसे) महान होने के लिए (अन्धसः विमदे ) सोमरसके आनन्द में (नः मन. ) हमारा
मन (दक्षं इत ऋतु ) बलकी, फर्म करनेको तमा ( भई यातय) कल्याण करनेको शक्ति प्राप्त करे ऐसो प्रेरणा कर,
(अथ ते सम्ये) और तेरो मित्रता प्राप्त हो, ऐसा कर, (यसे रणाः गावः न ) जिस प्रकार घासको सुन्दर गाय माप्त
करता है, उसी प्रकार हम तेरी मित्रताको प्राप्त हो ॥४॥
४ि२३ (क्रया ) सामथ्र्यसे ( महान् भीमः । बहुत भयकर इन्द्र ( अनु-प्वधं शव आ चावृते । सोमरस
पोकर अपना बल बढाता है, उसके बाद (कर) सुन्दर, (शियो ) उतम शिरस्त्राण धारण करनेवाला और दरि-
वान् ) रथ घोडे जोडनेवाला वह ! उपाको हस्तयो.) पे हाथमें ( आयसं वनं ) कौलारो बने पन्नको (भिये
निदधे) शोभाके लिए धारण करता है ॥ ५॥
[४२४ (या) जो रथ (हारि-योजनं पूर्ण पानं ) पोल और सोमसे भरे हुए पात्र धारण करता है, ऐसे
(वृषणं गोविदं रथं ) मनबूल और गामको प्राप्त करानेवाले रमपर (स घा) यह इन्च (अधि तिष्टाति पार बैठता
है, तथा { तं चिरतति ) उस रपको जानता है । इसलिए है इस ! (ते हरी नु योज ) अपने पो रथमें स जोर ॥ ६ ॥
३२४.
७
२
३१११
३२३
१
चतुर्थ अध्याय]
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(१०१)
४२५ अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्त यं यन्ति धेनवः ।
अस्तमर्वन्त आशवोऽस्त नित्यासो वाजिन इषर स्तोत्रम्य आ भर ॥ ७ ॥ (ऋ ५।६।१ )
४२६ न तमरहो न दुरितं देवासो अष्ट मर्यम् ।
सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयति वरुणो अति द्विषा ॥८॥ (मु. १०११२६।१ )
इति चतुर्क दशति.॥४॥ अष्टम. खण्ड.॥८॥[स्व० ७ । उ० ३ 1 पा० ५७ । ने]
इति पंक्तयः॥
१५
३१,
3
(१-१०) ऋण प्रसदस्यू; ( १, ३-५, १० अग्नेयो पिण्या ऐश्वरा; २, ६ श्यरुणस्त्रवृष्ण, अमरस्यु पौरुकुत्स )
७ वसिष्ठो मंत्रायणि ८ वामदेवो गौतम ॥ पवमानः सोमः ७ मरत ८ अग्नि, ९ वाजिनः।।
द्विपदा पिरादः ८ पदपवित. पुरउणिक, २, ६ रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामप्या ।।
४२७ परि प्रधन्वेन्द्राय सोम स्वादुमित्राय पूष्णे भगाय ॥१ ।। (ऋ.९।१०९१)
४२८ पर्यु पु प्रपन्य वाजसातय परि वाणि सक्षणिः ।
द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे
॥२॥ (ऋ ९।१२०११)
४२९ पवस्व सोम महान्समुद्रः पिता देवानां विश्वामि धाम
॥३॥ (२.९:१०९।४)
[४२५ 1 ( या यातुः अस्तं ) जो पतरूपी अग्नि घरमें है। (यं घेतरः यन्ति ) जित अग्निके पास पायें जाती है,
मस्तं भाशय गन्तः) जिस यज्ञके घरको और वैगवान् घोटे जाते है. ( अस्तं नित्यासःचाजिनः) जिस यजम्यान-
की ओर अन्नको पासमें रखनेवाले अनमान जाते हैं, (त आग्निं मन्ये ) उस अग्निको में स्तुति करता हूं, (स्तोत्रम्प
पं आ भर) स्त्रोताओं के लिए भरपूर अन्न दे ॥ ७॥
[४२६ / (देवासः ) है देवो । (स-जोपसः ) एक विचारसे रहनेवाले ( अर्यमा, मिना, वरुणः ) अर्यमा,
मित्र और पण (अति-द्विपः ) शनुमो दूर करके (यं नयति ) जिसको उन्नतिको ओर ले जाते हैं, (तं मत्य) उरा
मनुष्यको (हान) पाप नहीं लगता और (दुरितं न गट ) दुर्गति उसे छूनीतक नहीं ॥८॥
। यहां बत्तीसवां सण्ड समात हुआ।
[३३] प्रयस्त्रिंशः खण्डः।
[४२७ 1 हे मोर ! (स्मादुः) स्वादिष्ट तू (इन्द्राय मित्राय पूष्णे ) इन्द्र, मित्र और पुगके लिए और
(भगाय) भगके लिए (पारे प्रघन्य ) पतनमें भरा रह॥१॥
[३२८] हे सोग ! तू ( वाज-सातये ) अन्नको प्राप्ति के लिए (सु परि प्रधान ) उत्तम रोतिसे यतन, भरा
रहा(सक्षणिः यत्राणि परि सामथ्र्यवान् होरर मरर हमला पर, (नामणया) हमारे शोरो नष्ट करनेवाला
न (दिपः तरध्ये) दात पार होने के लिए (इरसे) उन गनुओंपर चडाई करने के लिए जाता है ॥२॥
[४२९ हे सो!(महान् समुदः) महान समुद्ररे समान (पिता) पालन करनेवाला (देवानां विश्या
धाम) देवति सब स्थानों में - पात्रों में- (अभि पवस्व) भरा रह ॥ ३ ॥
र ३१ ३ ३ २ २१ ध ३१३ २ ३३ २४ २५ २३ २.१२ " (१०३) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्र पाण्डम् ४३. पयस्व सोम मह दक्षायाधो न निक्तो वाजी धनाय ॥४॥ (ऋ. ९।१०९।१०) २३२३ २४१३ ४३१ इन्दुः पविष्ट चारुमदायापामुपस्थे कविर्भमाय ।। ५ ।। (ऋ ९।१०९।१३) ४३२ अनु हि त्वा सुतर सोम मदामसि महे समर्यराज्ये वाजा५ अभि पवमान म गाहसे ॥६॥ (ऋ. १।११.२) ४३३ कई व्यक्ता नर सनीडा रुद्रस्य मर्या अथा स्वश्वा! ॥७॥ (ऋ. ७१६३१) ४३४ अग्ने तमाच न स्तोमैः क्रतुं न भद्र हदिस्पृशम् । ध्यामा त ओहे। (ऋ. १०) ४३५ आविर्या आ चार्ज वाजिनो अग्मं देवस्य सवितः सचम् । स्वर्गाअर्वन्तो जयत ॥९॥ ४३६ पवस्व सोम घुम्नी सुधारो महार अवीनामनुपूर्य: ॥१०11 (ऋ (९:१०९।७) इति पञ्चमी दशतिः ॥ ५॥ इति नवमः खण्डः ॥ ९॥ (स्व. ८11०२१ मा ३५१८॥ इति पञ्चमप्रपाठकस्य प्रयमोऽर्थः॥१॥ [४३०] हे सोम ! (अश्वः न ) घोडे के समान (निकः ) पानीसे साफ किया हुआ (वाजी) बल बढानेवाला (महे दक्षाय) महान् एल और ( धनाय) पनको प्राप्तिके लिए । पवस्व ) बर्तन में भरा रह ॥ ४॥ [४३१ (चारुः कविः ) सुन्दर ज्ञानी ( इन्दुः) यह सोम ( अपां उपस्थे ) पानीके पास ( भगाय मदाय) ऐश्वर्यपुस्त आनन्दके लिए (पविष्ट ) पहुंचता है, पानीमें मिलाया जाता है ॥५॥ [४३२ ] हे सोम ! (सुतं त्वा ) रस निकालनेके बाद तेरी ( अनु मदामसि हि) हम उत्तम प्रकारसे स्तुति करते है । है ( पवमान ) पवित्र सोम । ( महे समर्य-राज्ये ) महान् श्रेष्ठ राजाके संरक्षणके लिए ( याजान अभि प्रगाहसे ) अपते बलसे युक्त होकर सानुसेनापर तू हमला करने के लिए जाता है ॥ ६ ॥ [४३३ । ( व्यक्ताः नरः) हे प्रसिद्ध नेताओ ! (स-नीडाः मर्याः) एक घरमें रहनेवाले ( अथा स्वश्या) उत्तम पोडे पासमें रखनेवाले महत् (ई रुद्रस्य के ) इस रुद्रके कोन लगते है ? ॥ ७॥ वीर भरुद्गण इस बद्रके पुत्र है। [४३४ ] हे अग्ने ! ( अद्य ) आज हम इस यज्ञके ऋत्विन ( ओहे स्तोमैः ) ओह नामक स्तोत्रोसे ( अश्यं न ) पोडेके समान और (तुं न ) यज्ञकर्ता के समान ( भद्रं हदि-स्पृशं ) कल्याण करनेवाले और हृदयको छूनेवाले अर्थात् अत्यन्त प्रिय ( ते ऋभ्याम ) तेरे पशको बढानेवाली स्तुति करते है ॥ ८॥ १ अश्वं न- जैसे घोडा पजस्थानको पहुंचाता है उसी प्रकार त उन्नतिके स्थानपर पहुंचाता है। २ क्रतुंन-यज्ञकर्ता जैसे उपकार करते है, उसी प्रकार तू उपकार करता है। [४३५ ] ( मर्याः) मनुष्योंका हित करनेवाले तमा (आधिः वाजिनः ) प्रकाशित हुए इस बलवान् देवता ( सवितुः सवं वाजं ) सवितादेवके लिए तैयार किए गए सोमरसरूपी अन्नको ( अम्म) प्राप्त किया है, इसलिए है यजमानो तुम ( स्वर्ग) स्वर्गको और ( अर्वन्तः जयत) घोडोंको विजयके लिए प्राप्त करो॥९॥ (४३६ ! हे सोम ! तू (घुम्नी) तेजस्वी, (सु-धारः) उत्तम प्रकारसे पार कर बर्तनमें गिरने वाला, (अनु-पः महान् ) पहलेके समान ही महान् रहनेवाला है, अत: तू ( अचीनां अनु पवस्व ) रखे जानेवाले स्तनमें ठीक प्रकारसे भर जा। वर्तनमें सोमरस भरा जाता है॥१०॥ । यहां तैतीसवां खण्ड समाप्त हुआ।
चतुर्थ अध्याय) सामवेदका सुवोध अनुवाद ११०३) 8 १२ १२ 33 १२ २ पर [६] (१-१०) सदस्पः ७ संवतं आंगिरसः॥ इन्द्रः ६ विश्वेदेवाः, ७ उपाः ।। द्विपदा विराट् ॥ १३ ४३७ विश्वतोदावन्विश्वतो न आ भर यं वा शविष्ठमीमहे ॥१॥ ४३८ एप ममा य अस्विय इन्द्रो नाम श्रुतो गणे ॥२॥ ४३९ ब्रह्माण इन्द्रं महयन्ती अरवर्षयत्रहये हन्तवा उ ॥३॥ (ऋ. १९३१॥४॥ ४४० अनवस्त रयमश्वाय तक्षुस्त्वष्टा वजं पुरुहूत घुमन्तम् ॥४॥ (ऋ. १/३१॥१) ४४१ 0 पदं मप रयोपिणौ न काममवतो हिनोति न स्पृशद्रयिम् ॥ ५ ॥ ४४२ सदा गावः शुचयो विश्वधायसः सदा देवा अरेपसः ४४३ आ याहि वनसा सह गावाः सचन्त बनि यद्धभिः ॥७॥ (ऋ. १०१९७२।१) (३४ ] चतुर्विंशः खण्डः। [४३७ ] है । विश्वतो दाचन ) सब तरफरो शत्रुयाँको नष्ट करनेवाले इन्द्र ! (विश्वतः नः आ भर) तय बोरसे हमें इन्छित मन भरपूर है, (यं शविष्ठं त्वा ईमहे ) जिस मत्यन्त द्रलयान् तेरी हम प्रार्थना करते है ।। १ ।। [४३८ । (ऋत्वियः यः इन्द्र) ऋतुओंके अनुसार काम करनेवाला लो यह इन्द्र (नाम वैता) गामसे प्रसिद्ध है, ( पपः ब्रह्मा ) यह बहुत ज्ञानी है, उसकी मैं ( गृपो) स्तुति करता हूँ ॥२॥ [१३९ ( अहये हन्त) अहि असुरको मारनेके लिए { अ: महयन्तः ब्रह्माणा ) स्तोत्रोंसे स्तुति करनेवाले शानी (इन्द्र अवयम् ) इन्द्रके यज्ञको बढाते हैं ।। ३ ।। { ४४० ] हे इन्द्र ! (अनया) मनुष्यरपो शुभु देवतामोने (ते अभ्याय ) तेरे घोडोंके लिए (रयं तनुः ) रप तस्यार किया, हे (पुरु-हत ) मनकोसे बुलाये जानेवाले इन्द्र ! ( त्वष्टा ) स्वष्टाने (घुमन्तं धर्ज ) तैमस्यो बसको तेरे लिए बनाया ॥४॥ १ अनचः अश्वाय रथं तभुः- मनुष्यरूपी ऋभुदेवता या कारीगरोंने इन्द्रशे घोडेके लिए उत्तम रथ तय्यार पिया २ त्वष्टा घुमन्तं यत्रं- स्वष्टाने तेजस्वी यच बनाया। [५४१(याषिणः ) पगको अपंग करनेवाले पाजक लोग (शं पदं मधं ) सुख, उत्तम रपान मौर धन प्राप्त करते है। ( अ-ग्रता ) पज्ञ न करनेवाला, (न हिनोति ) कुछ भी प्राप्त नहीं करता, मौर ( कामं रयि न स्पृशत् ) अपने इच्छित घनको तो यह छू भी नहीं सकता ॥ ५॥ १ रयीषिणः पदं मघं-धनको देनेवाले याजक शान्ति, उत्तम स्थान और धन प्राप्त करते हैं। २ अ-यतान हिनोतिनो वतार माघरण नहीं करता, उत्तको कुछ भी नहीं मिलता । [४४२) ( गावः) पाये ( सदा गुचयः) हमेशा रहती है. ( विश्व-धायसः) सभीया पोषणारनेवाली और ( सदा देवा अ-रेपसा ) हमेशा उन्मत और निष्पाप रहती हं॥६॥ (४४३ } है उपे । ( घनसा सह आयाहि ) इति तेजरे साय मा, (यत् ऊधभिः ) मो भरे हुए पनवानी है. ये (गाय) गा ( पनि सचन्ते ) तेरे मागम घरती हं ७॥
(१०४) सामवेदफा सुबोध अनुवाद र [पेन्द्रं काण्डम् 8 पर 93 ३१२ 3 २१.११ ३३ ४४४ उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुप्येम रयि धीमहे त इन्द्र 1॥८॥ ४४५ अर्चन्त्यक मरुतः स्वको आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्र ॥९॥ ४४६ प्रच इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गार्थ गायत यं जुजोपते इति पछी दशतिः॥६॥ दशम खण्डः ॥१०॥ [स्व०७/२०२। पा० ४२१ ठा॥1 [७] (१-१०) १ पृपध्र काय ; २, ३, ४ यन्धुः सुमन्पुः श्रुतयन्धविप्रवत्पुश्च क्रमेण गोपापना लोपापना या; ५ संवतं मागिरस.; ६ भुवन माफ्यः; सापनो वा भौयनः ७ कपप ऐलप., ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः, ९ आत्रेय १० वसिष्ठो भत्रावरुणिः ॥ अग्निः; ५ उपाः; ६, ७, ९ विश्वेदेवाः; ३, ४,८१० इन्द्रः॥ द्विपदा विरादः १० एफपदा ॥ ४४७ अत्यमिचिकितिहव्यवाट् न सुमद्रया (ऋ०१६/५) ४४८ अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भुवा वरुध्या ॥२॥ (ऋ. १।२४।१; यजु. ३।२५) ४४९ भगो न चित्रो अमिहोनों दधाति रत्नम् ॥३॥ प्र स्तोम पुरो वा सन्यदि वेह नूनम् ॥४॥ [४४४मधुमति प्रक्षे) मधुररससे भरे हुए धममें हविको रखकर ( ते क्षियन्तः ) तेरे पास रहनेवाले हम, हे इन्द्र ! ( रयिं पुप्यम ) धन प्राप्त करें, और तेरा ( धीमहे ) ध्यान करें ॥८॥ [४४५] (स्वीः मरुतः) उत्तम तेजस्वी मरुतगण ( अर्के अर्चन्ति) पूजनीय इन्द्रकी पूजा करते है, (स.) यह (युवा) तरण (धुतः ) प्रसिद्ध (इन्द्रः ) इन्द्र ( आ स्तोभति) सब शत्रुओंको मारता है ॥९॥ १ युवा श्रुतः आ स्तोभति- तरुण प्रसिद्ध वीर सब शत्रुओंको मारता है। [२४६ हे जानी लोगो! तमाय विप्राय इन्द्राय ) वृत्रको मारने में निपुण, ज्ञानी इन्द्र के लिए (गार्थ गायत) स्तोत्रोंका गान करो, ( ये जुजोपते ) जिनसे वह मानन्दसे सुनता है ॥ १० ॥ यहां चोतीसवां खण्ड समाप्त हुआ) [३५] पंचत्रिंशः खण्डः। [४४७] (हन्य-वाद ) हविको देवताके पास पहुंचानेवाला, (चिकितिः) विशेष युतिमान् (सुमद् ) उत्तम हविसे जो भरा हुआ है, वह (रथः न) रथके समान इच्छितस्यावको पहचानेवाला (माशिः अचौत) यग्नि सब जानता है ॥१॥ [४४८ हे (अग्ने ) अग्नि (यरुथ्यः) रोवा करनेके योग्य (त्वं ) ( ना अन्तमः ) हमारे समीप (उन शिवः प्राता) और कल्याण करनेवाला संरक्षक (भुव) हो गया है ॥ २ ॥ [४४९ ] (महोना भगः न ) बड़ोंमें सूर्यके समान (चित्रः अग्निः ) पूज्य अग्नि याजकोंको (रत्नं दधाति ) धन देता है॥३॥ [४५०१ (विश्वस्य प्रस्तोभ वह सारे शत्रुओं का नाश करता है, (यदि वा इ६ नूनं ) और इस यज्ञमें निरषयरों वह ( पुरो या सन् ) पूर्ण रीतिसे निवास करता है ॥४॥ ४५० विश्वस्य ( ३४ ३२ ३२ २ 2 २ २२३१२ ३१२ ३१३ २ सर स ई चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुघोष अनुवाद (१०५) ४५१ उपा अस्वसुष्टमः सं वर्तयति बनिर सुजातता ॥५॥ (ऋ. ११०२४) ४५२ इमा नु के भुवना सीपधेमेन्द्रय विश्वे च देवाः ॥६॥(ऋ. १०११५७१) ४५३ वि सूतयों यथा पथा इन्द्र वद्यन्तु रातयः ॥७॥ ४५४ अया वाजं देवहित ५ सनेम मदेम शतहिमाः सुवीरा ॥८॥ (२.६१७१५) ४५५ ऊर्जा मित्रो वरुणा पिन्यतेडा पौधरीमिपं कही न इन्द्र .४५६ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥१०॥ (वा. य. ३६८) इति सप्तमी वशतिः ॥ ७ ॥ एकादश. खण्डः ॥ ११॥ त्व०५। उ०४१ पा०४१ ।। [८] (१-२०) १.१० गृत्समदः शौनकः; २ गौरागिरसः ३, ५, ९ परछेपो देवोदासिः, ४ रैभः काश्यपः, ६ एयपामरुतात्रेयः ७ अनानतः पारच्छेपि, ८ नकुलः ॥ १, ३, ४,१० इन्द्रः २ सूर्पः। ५ विश्वेदेषाः ६ माता, ७ पवमानः सोमः, ८ सविता; ९ अग्निः ॥ १,१० अष्टिः (१० अतिशपरी था); ३, ५, ७-९ अत्यष्टिः, २, ४, ६ अतिजाती ( अप्टिा ? | ४५७ प्रिकदुकेषु महिपो याशिरं तुविशुष्मस्तम्पत्सोममपिपाद्वष्णुना सुतं यघावशम् । ममाद महि कर्म कर्तये महामुरु सैन सचदेवो देवर सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥१॥ (ऋ. २।१२।१) ८४५१ ] ( उपाः ) उपा ( स्वसुः तमः ) अपनी बहिन रात्रीके अन्धकारको (अप संघर्तयति ) नष्ट करती है, गौर (सुजात्तता) अपने उत्तम प्रकादासे ( वर्तनि ) भपने मार्गको प्रकाशित करती है ॥ ५॥ [४५२] (इमा मुवना) हुन सब भुवनोंको (नु ) निश्चयमे मुख प्राप्तिके लिए ( सीपधेम) में नियमोमें चलाता हूँ(न्दा च विश्वेषा च ) इन्द्र और सव मन्य देव इस कार्यमें मैरी सहायता करते हैं ॥5॥ [४५३हे इन्द्र 1 ( त्वत् रातयः ) सुझसे मिलनेवाले दान ( पथा घुतयः यथा ) बो राजमार्गमें जो दूसरे छोटे-छोटे रास्ते मिल जाते हैं, उसी प्रकार (वि यन्तु ) सयको प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥ [४५४ ( मया देवहितं धाजं सनेम ) इस स्तुतिसे देशों के द्वारा दिए गए अन्न अथवा बल प्राप्त करें, और (सु-धीरा शत-हिमा मदेम ) उत्तम वीर पुत्रोमे युक्त होकर सौ तक आनन्दसे रहूँ ॥८॥ १ मु-धीराः शतदिमाः मदेम- उत्तम पोर पुत्रोंसे युक्त होकर हम सौ वर्षतक आनन्दसे रहें । [:५५] हे इन्द्र ! ( मित्र पक्षण. ) मित्र और यण देव ( ऊर्जा इसाः पिन्वते ) मा बढानेवारो भान हमें देने है. (ना) हमारे अन्नको ( पीयर एणुहि ) और अधिक पुष्ट लयाला मना ॥९॥ नापं पीवरी शादि- हमारे अन्नदो अधिक पुष्टि देनेवासा बना। [४५६] (इन्द्रः) ( विश्वस्य राजति ) सब भवनोपर शासन करता है ॥ १० ॥ "यहाँ पैतीसवां खण्ठ समात दुमा ।। [३६] पत्रिंशः खण्डः। [४५७ ( महिपः तुषि-अप्मा ) मलवान और मत्यंत सामन्याली (हुंपत्तप्त होनेवाले इन (विकटुकेषु सुन) तीन पात्रा रन हुए मोयरसमें (यवाशिरं ) जो आटा मिलाकर (सोम ) उग मोपरी (विष्णुना ) विके साथ { यथा-पुन ) इरानुसार ( अपियत् ) पिया, (सः) उम मोमन ( महि कर्म पर्न) महान् कर्म करने के लिए ( महां उर) महान् थेष्ठ इन्दको ( ममाद ) उत्साहित रिया, सत्यः इन्दा देयः सः) उत्तम, यह शोमापी प्रकाशमान स ( सत्यं पन देयं इन्द्र) उत्तम गुर्गोमे यान इस न देयो ( सस) प्राप्तहमा १४ (साम. हिरो) (१०६) सामनेदया सुबोध अनुवाद [ ऐन्द्रं काण्डम् २३१२ ३.१२. ३२ २. २ ११.११ २४ २ १ ४५८ अय सहस्रमानयो दृशः कवीनां मतिज्योतिर्विधर्म । बनः समीचीरुपसः समरयदरेपसः सचेतसः स्वसरे मन्युमन्तश्चिता गोः ।।२॥ ४५९ एन्द्र याद्युप नः परावतो नायमच्छा विदथानीव सस्पतिरस्ता राजेव सत्पतिः । हवामहे स्वा प्रयस्वन्तः सुतेष्वा पुनासो न पितर वाजसातय मरदिष्ठ वाजसातये ।। ३ ।। ( १३१३०१) ४६० तमिन्द्र जोहवीमि मघवानमुपर सत्रा दधानमप्रतिकुतर श्रवास भूरि महिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्त रायै नौ विश्वा सुपथा कृणोतु वजी ॥४॥ (ऋ ८।२७१३) ४६१ अस्तु श्रौपट पुरो अपि धिया दध आ नु त्यच्छों दिव्यं वृणीमह इन्द्रषापू वृणीमहे । यद्ध क्राणा विवस्वते नामा सन्दाय नव्यसे । अब प्र नूनमुप यन्ति धीतयो देवा अच्छा न धीतयः ( ॥१९॥ [४५८] ( सहन-मानवः ) हजारों मनुष्योंका हित करनेवाला (श ) दर्शनीय ( फटीना मतिः) बुद्धिमानों द्वारा सम्मानके योग्य ( विधर्म-ज्योतिः ) विशेष धर्मसे मुक्त और तेजस्वरूप ( अयं अध्नः ) यह सूप (समीची अ-रेपसः ) निर्मल और अन्धकाररहित ( सचेतसः उपसः ) तेजस्यो उपाओंको ( समैरयत् ) प्रेरित करता है, उसके बाद ( स्वसरे) दिनमें ( मन्युमन्त ) तेजस्यो दीखनेवाले चन्द्र आदि ( गो) सूर्यफे तेजके भाणे (चिता ) तेजरहित फोके हो जाते है ॥ २ ॥ [४५९] है इन्द्र ! (परात न अन्ना उप आयाहि ) दूरदेशसे तू हमारे पास आ, (अयं न) असे (सत्पति ) सगाका पालन करनेवाला होकर (विदथानि इव) यनशालामें आता है, और जरो (अस्ता सत्पति राजा इय)ग पर शारत्र फेंकनेवाला उत्तम पालक राजा अपने घर आता है, उसी प्रकार आ(प्रयस्वन्तः सुतेषु त्या हयागहे. हरिप्यान लेकर हम सोमयनमें तुझे बुलाते हैं, (पुनासा घाजसातये पितरं न ) पुत्र जैसे अन्न पानेके लिए पिताको मुलाते है, और जैसे ( महिष्ठ वाम-सातये ) महान् धोरको महायुद्ध में चुलाते है, उसी प्रकार हम तुम बुलाते हैं ॥३॥ [४६०] (मधपान ) पनयान् ( उग्र ) घोर (सत्रा भूरियांसि दधान ) एक साथ बहुतसागस धारण करनेवाले तया ( अ-प्रतिकृतं त हन्नं ) शवमसि कभी भी पराजित न होनेवाले उत्त इन्द्रको (जोयीमि) सहायतारे लिए युमाता हूँ, ( महिष्ठ यशिया) य और पोंमें सवारके योग्य इन्द्रको ( गीर्भि मा पर्त) स्तोत्रोंसे स्तुति की जाती है, इस प्रकार ( बनी) वयको धारण करनेवाला , (राये ) पनको प्राप्तिके लिए (नाविश्या सुपया एणोतु ) हमारे सय मार्ग सुगम करे ॥४॥ [५६१] (पुर अनि ) उत्तरयेदोमें अग्निको (धिया आरधे) मानपूर्वक मैने स्थापित रिया, ( त्यत् दिम्य शर्धः ) उस रिप्य बलवान् अग्निको ( या पृणीमहे । हम आरापना करते हैं (इन्द्रयायू) और वायुक) (वृणीमहे ) हम प्रार्थना करते हैं। ( यत् ६) जो (वि-यस्यने नव्यसे ) धनवान मोर नयोन यजमानरे (नामा । पारयानवे मुख्य स्थानपर (मन्दाय पाणा) एक जगह बाकर मनोरथ पूरा गरते हैं। (धापर मातु) ख स्तुतियोरा भाग होये । ( अध) इस बार ( न धीनय. ) हमारी स्तुतिया ( प्र नून उपयन्ति) निवपले तेरो मोर जाएंगी, (देयान अघ्डा नः) देवोंको योर पहुंचानेरे लिए हमारे (घीतप.) ये मर्म चल रहे है ॥ ५ ॥ यह नि
२३१३
२ पु
विश्वा यदुपा
२३
933
१३.३३९
१२
चतुर्थ अध्याय ]
सामवेदका सुवोध मनुवाद.
(१०७)
४६२ प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एचयामरुन
प्र शर्धाय प्र यज्यत्र सुखादये तवसे मन्ददिष्टये धुनिवनाय शवसे ॥ ६ ॥ (ऋ. १८७१ )
४६३ अया रुचा हरिण्या पुनाना विश्वा द्वेषासि तरति सयुग्वमिः सरो न सयुग्वभिः ।
धारा पृष्ठम्य रोचते पुनानो अरुपो हरिः ।
परियास्यवभिः सप्तास्येभिकमिः
(ऋ ९।११९०१)
४६४ अमि त्यं देव सवितारमायोः कविक्रतुमामि सत्यसबर रत्नधामभि प्रिय मतिम् ।
ऊो यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः ॥८॥
(वाय ४१२५)
४६५ अग्निहोतारं मन्ये दास्यन्तं वस: सूनु सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम् ।
य ऊर्धया स्वध्वरी देवी देवाच्या कृपा ।
पृतस्य विनाटिमनु शुक्रशोचिप आजुहानस्य सपि? ॥९॥
(ऋ. १।१२७१)
८४६२] ( एवया मरत् ) एवया मरत नामरे ऋषिके द्वारा अपनी (गिरिजाः मतयः ) वाणीसे को हुई
स्तुतियां ( मरुत्वते विष्णचे ) महतोंके साथ रहनेवाले विष्णुको और ( महे यः प्रयन्तु ) महान तुझ इन्द्रको प्राप्त हों,
उसी प्रकार (प्र-यज्यवे ) विशेष यज्ञ करनेवाले ( सु-खादये ) उत्तम आभूषण पहननेवाले ( तवसे ) बलवान्
(मन्ददिष्टये ) स्तुतिडपी यज्ञ करनेवाले (धुनि-घताय ) शत्रको दूर करना जिनका वत है, ऐसे ( शवसे शर्धाय)
उस उन्नतिदायक मरके बलको (म) प्राप्त हो ॥ ६॥
[४६३ ] ( पुनानः ) छाननीसे छानानानेवाला सोमरस ( हरिण्या अथा रचा ) हरे रगो अपने इस तेजमे
(विश्वा द्वेषांसि तरति) सय शत्रुओंको दूर करता है, (सूरः सयुम्वभिःन) सूर्य अपनो पिरोसे जैसे अन्धकारको
मष्ट करता है, उसीप्रकार ( पृष्ठस्य धारा रोचते ) उत्तम दौखनेवाले इस सोमरसरी घार घमन्ती है, (पुनानः हरि
अरुप.) छानाजानेवाला हरे रगका यह सोमरस घमहना है, ( यत् ) नो ( सप्तास्येमि प्राकभिः । तेनये सात मुखों
तथा स्तो? और (ऋग्वभि ) तेजोसे (विश्या रूपाणि परियासि ) अनेक रूप धारण करता है ॥ ७ ॥
(४६४ ] (यस्य माः ) जिसका प्रकाश (ऊर्धा ओण्योः अदिद्युतन् ) उच्चगतिमे इस पृथियो और धुलोको
बोधगें फंसता है ऐसे उस ( कवि-कार्नु) ज्ञानपूर्वक कर्म करनेवाले ( सत्य-मयं ) सम्यको प्रेरणा देनेवाले (रत्न-धां)
धन देनेवाले (अभि-प्रियं) अत्यन्त प्रिय (मति त्यं सवितारं दे) बुद्धिमान उम सवितादेवको ( अ मि) में मारा.
पना करता हूँ, (सीमान अमतिः) उत्पन्न होनशे मार इसका प्रकाश पेलता है, (सु-ऋतुः हिरण्य-पाणिः ) उतम
परनेवाला और सोनके समान चमकनेवाला सविता (कृपा स्यः अमिमीत ) कृपामे अपना प्रभार लाता है ॥ ८ ॥
[४६५ ] (होतारं ) जिसमें हवन किया जाता है, ऐसे (दाररन्तं ) धन देनेवाले (यसोः सहमः ) निवासक
बल ( सूनुं )पुत्र अर्थात् यस मनानेवाले, ( जात-वेदसं विप्रं न ) विद्वान् ब्राह्मणके समान (जातवेदसं आश मन्ये)
परम पूज्य मग्निरी में स्तुति करता हूं. (यः देवः ) जो अग्निदेव (पु-मध्यरः ) उत्तम गमवाते (ऊर्चया देवाच्या
एषा) उच्च देवोंपा हो इस इच्छामे (शुक्र-शोचिषः) शुद्ध तेजस्वी ( माजुहानस्य) जिससे हपन दिया जाता
है. ऐसे उस ( सर्पिष.) तुम्हारी पोको ( विधार्टि ) आहुति बार प्रसन्न होता है ॥९॥
(१०८) सामवेदका सुयोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम् १३ १२ १२ 3 १२३ २ उ732 २३ १.3131 ३.० १३ २१ गाय ४६६ तव त्पन्नयं नृतोऽप इन्द्र प्रथम पूज्यं दिवि प्रयाज्यं कृतम् । र ३ यो देवस्य शवसा प्रारिणा असु रिणन्नपः । भूषा विश्वमभ्यदेवमोजसा विदेज शतक्रतुविदेद्विपम् (२।२२।४) इति अष्टमी दशति ॥ ८॥ द्वादश खण्ड ॥ १२ ॥ इत्येन्द्र पर्व काण्ड या समाप्तम् ॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ऐन्द्रकाण्डे । ३९९-४०८ (१०) पक्तय ४०९-४२६ (१८) (१९८) तत्र ४२६ 'नतमि' त्युपरिष्टाइवहतो । तत्र १५५ 'पान्तं' इत्यनुष्टुप् । द्विपदा (२५) बृहत्य २३३-३१२ (८०) विष्टम [४२८, ४३२,४३४,४३५ अनुप्टपादयस्तयोक्ता ) ३१३-३४१ अस्पष्टप सत्र ३२८ 'नको' इति निपाविराट् । (११) तर ४५६ 'इन्द्रो विश्वस्ये' स्येकपा । अनुष्टुभ ३४२-३६९ (२८) जगत्य ३७०-३८० सार ३७९ ' उभे यदिन्द्रे' ति महापरित । ऐन्द्रकाण्डम्य मन्त्रसंख्या ३५२ उरिणह ३८-३९८ {१८) आग्नेयकाण्डस्य मनसंख्या १२४ सत्र ३९८ 'पियेति विराट् । सर्वयोगः ४६६ [४६६ ] हे (नृत इन्द्र) सबको अपनी इच्छासे चलानेवाले इन्द्र ! ( नयें ) सब मनुष्योंका हित बरनवाले (प्रथम पूष्य ) सर्व प्रथम, मुख्य (तव त्यत् अपः) तेरे वे कर्म (दिवि प्रयाच्यं कृत) पलोकमें प्रशासनोप हुए है, पर पल यह है कि (देवस्य असु ) राक्षसीके प्राणोंको सून (शवसा रिणन ) अपने बलसे नष्ट किया, और ( अपः अरिण) जलोंको महाया। उस तून ( विश्व भदेव ) तय अनुरोंको (ओजसा अभिभुन } अपने पलसे हराया, इसलिए ( शत- ऋतु ) संकड़ों कर्म करनेवाला इन्द्र (ऊर्ज इप विदेत् ) मलवान् हो और उसको हविष्यान प्राप्त होपे ॥ १०॥ ॥ यदां छत्तीसवां खण्ड समाप्त हुआ। ॥ ऐन्द्र पाण्ड समात॥ ऐन्द्र काण्ड इन्द्र के गुण सामवेबरे इस ऐन सण ३५२ मत्र है, यह कर फिर बार यह रेलगे, रिग मध्यपनसे हमस्या यद्यपि "ऐन्द्र काण्ड" नामसे प्रसिद्ध है तो भी शिक्षा मिलती है। उगमें “अनि मरत् " माधि मन्य देवतामोरे भी मत्र भाये है। पर हम देवताओंरी प्रचीमें स्पष्ट रंगे । इस रामदेवता अधिक मय होनेरेपारण इस कारण यह गारमाहीशानी भी सोनाम ऐश-ग" ला गया है। इसमें विवाहपरो भोर गुणको प्रकट ररनेवाले पे बिषय इस राप गाहो पर्णन है, इसलिए पहले इनके गोरा भम्पयन माये है- (१०९) चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुवोध अनुवाद १ युवा कतिः (३५९)-यह इन्द्र तरुण कवि है, कविका २१ गोपति । १६८) गायोंका उत्तम रीतिसे पालन भर्य है। कान्तदर्शी, दूरसे हो देखनवाला, दूरदर्शी, ज्ञानी । करनेवाला है। २ एपः ब्रह्मा ( ४३८)- यह ज्ञानी है, बह्मको जानने २२ सत्यस्य सूनु (१६८ )- सत्यका प्रचारक है। वाला है। २३ मध्वः ( ४२३ /- महान, सुन्दर है। ३ विप्रः ( ३८८)- विशेष बुद्धिमान, विशेष ज्ञानी। २४ शिप्री (१४५)- शिरपर शिरस्त्राण धारण ४ विपश्चित्, वृहत् ब्रह्मकृत् ( ३८८ )- ज्ञानी, करनेवाला है । बह्मजानका प्रसार करनेवाला। २५ य अचम्पत् ( १९६ )- वह इन्द्र अपने ज्ञानसे ५ श्रुतः इन्द्रः (४४५)-ज्ञान के लिए विशेष प्रसिद्ध । और चतुराईसे तुम्हें अपने पास आकर्षित करता है। ६ नाम श्रुतः { ४३८)- नामसे ही ज्ञानी प्रसिस । २६ चन्द्रः सदा उपो न ( १९६ )- इन्द्र हमेशा ७ कश्यपः ( पश्यकः) { ३६१ )- द्रष्टा, ठीक ठीक पास ही रहता है। सबके पास जाकर निरीक्षण करता है। स्थिति जाननेवाला। २७ स्य नः ऊती (२६०)- हमारा उत्तम ८ विश्वानि विदुपे (३५२)-सभी शानोंको जाननेवाला । सरक्षक है। ९ विद्वत्सु चित्रः ( ३४५)- विद्वानों में विलक्षण, २८ त्वं न. आय. ( २६० -तू हमारा मित्र है। अप्ठ मानी। २९ नः सधमादे भव ( २६० )- हमारे एक माप १० वि-चेता. ( २६५)-विशेष बुद्धिमान्, विचार बठनके स्थानपर आकर बैठ । करनेवाला। ३० न परावृणक् (२६०)- हमारा त्याग मत कर। ११ विचर्षणिः (१९९)-विशेष ज्ञानी। इस प्रकार इन्द्रकेशानी और आकर्षक गुण सम्बन्धी १२ मुनीनां सखा (२७५/-ऋषि-मुनियोंका मित्र, विशेषण है, और उसके सार्वजनिक हित फरणेषाले उनका हित करनेवाला। गुण ये है- १३ देवस्य महित्या कान्यं पश्य ( ३२५ )- इस १ सु-नीती ( १२७)- इन्द्र उतम नीतिके मार्गसे इन्द्र के महत्वके काव्य देख। चलनेवाला है, और लोगोंको भी उत्तम नीतिसे चलाता है। १४ कंचित् स्थूरं न अवस्ययः त्वां वृणीमहे २ नर्य-अपस् ( १२५ )- सय लोगों के हितकारी कार्य (४०८)- जैसे मनुष्य विद्वान्के पास सलाह लेने मौर करनेवाला । विचार करने जाते है, उसी प्रकार अपने सरक्षणके लिए ३ यस्य मानुपं द्यायन विचरन्ति (३७६)- जिसबै इन्द्र के पास हम जाते हैं। मार्वजनिक हितके वायोमें कोई भी रोजा नहीं अटका सकता। १५ सुरूप-कृनुः (१६०)- उत्तम सुन्दर एपको इन्द्र ४ चर्षणीनां सम्राट् ( १४४ )- मनुष्पोरा सम्राट् । बनाता है, वह उतम पारीगर है । ५ शत-ऋतु, ( ११६ )- संकड़ों प्रभारसे कर्म करने १६ युवा ( १२७ )- वह मययुषकके समान उत्साही याला, संकडो प्रकारको बुद्धि और मुक्तियोंवाला, जिनकी पौर विचार करनेवाला है। सहायतासे वह जन्मते हो उसम हित कर सकता है। १७ सखा, मित्रः (१२७ )- यह यराबरके मित्रके इन्द्रका पल समान है। १८ चित्रः सखा ( १६९)- वह विलक्षण और हित इन्द्र जैसा विद्वान् है, वैसा हो वह यख्वान् भी है- करनेवाला मित्र है। १ सत्या ( ११५)-सत्ववान्, यलयात् । १९ पतिः ( २०५)- उत्तम पालक, उत्तम मधिकारी, २ शामिन् ( ११५)- शक्तिमान् । ३ शशा(१४०)-सामध्यवान् । २० सापतिः (१६८)- सजनोंका उत्तम पालन ४ वृषन्तमः । १४८ )- अश्यम्त सामर्यवान्, फरनेवाला है। बलवान् । स्वामी।
सामवेदका सुबोध अनुवाद ऐन्द्रं काण्डम् श्रेष्ठ है। महत्त्व है। शक्तिशाली है। ५ वृपभ , घृपा (११९)- बलवान्, वर्षा गिरानेवाला। चर्म इय समवर्तयत् ( १८२ )- इसका वह सामन्यं घम- ६ तुचि-ग्रीयः ( १४२) मजबूत गर्दनवाला, अर्थात् कता है कि जिराको सहायतासे यह दोनों धावा-पपिवियोको उसका सिर नहीं कापता। चमडेके समान लपेट देता है। ७ मंहिष्टः ( १४४)- महान, शक्तिसे महान् । २७ त्यावतः परे मणिः अरं गमेम [ २०९)-री ८ इन्द्रः महान् परः ( १६६ )- इन्द्र महान् और सहायतासे सुरक्षित होकर और तेरे आश्रयमें रहकर हम कृतकृत्य हों। २ बज्रिणे महत्वं अस्तु ( १६६ )- वज्रपारी इन्द्रका २८ शग्धि ( २७४)- तु सामध्यंवाला है। २९ वीरं नाम श्रुत्यं शाकिन इन्दं गाय ( २६५ )- १० महा-हस्ती ( १६७ )- इनके हाय मजबूत और इन्द्र थोर है, को मुकानेवाला है, प्रसिद्ध बलवान् है, इस. लिए उसके गुणोंका गान करो। २१ त्वत्तः उत्तर ज्यायान् न कि अस्ति (२०३) ३० परावति धृपा, भापति घृषा, वृपा हि तुझसे अधिक बलवान् कोई दूसरा नहीं है । ण्यिपे, सत्यं वृषा असि, पजूतिः नः अपिता १२ यथा त्वं एवं न फि (२०३)- जसा तू है, वैसा (२६३)- तू दूर वैशमै बलवान् है, पासके देशमैं भी बलवान् दूसरा कोई नहीं है। है, तेरी बलवान् कीति में सुनता है, निश्वपसे व बलवान् १३ अमित-रोजाः (३५९)-अपरिमित सामसे युक्त। है, मलसेतू हमारा सरंक्षण करता है। १४ शची-पतिः (२५३)-शक्तिका स्वामी, सामर्थ्यवान् । वृपा- इसका दूसरा अयं है, कामनाओंको पूर्ण करने १५ स्वर्वान ( २५४ )- आत्मशक्तिसे युक्त । वाला। १६ शविष्ठः धृष्णः ( ३४७ )-मलवान् और शत्रुपर ३१ अ-देयः मर्त्यः सी त न आप (२६८)-श्वर- आक्रमण करनेवाला को उपासना न करनेवाला घर नहीं पासकता, मर्यात् . १७ इन्द्रियं त्या आपूणस्तु ( ३४७ )- इन्द्रियोंको को उपासना करनेवाला हो उस योग्य अभको प्राप्त उत्तम पाक्ति तेरे पास भरपूर है। १८ सहसः बलात् ओजसा अधिगातः ( १२०)- सरता है। साहस, बल और सामर्थ्यके कारण जग्भसे ही यह प्रसिद्ध है। इन्द्र महापताके लिए बुलाने योग्य है । ऐसा वह दाक्तिमान है। ३२ गियासु समत्सु व्यः ( २६९)-सब यु १९. सर्व ते यशे (१२६)- सय फुछ तेरे आधीन है। २० ऊनये तयस्तर इन्द्र हवामहे (१६३) - अपने ३३ युध्मः, खज-रत्, पुरन्दर. अलर्षि (२७१)- सरदाण लिए हम महान् यरुषान् इन्दको मुलाते हैं। इन्द्र युद्ध परनमें कुशल, युद्ध करनेवाला, शत्रुके गारोको तोरनेवाला है, यह हमारी सहायता के लिए आये। २१ शवः प्रधिना ( १६६)- उसका पल बहता ही ३४ शरसतीनां पुरा भेत्ता ( २७५ /- मायून बने २२ त्यां न अतिरिच्यते ( १९७ )- तेरो अपेक्षा हर गोले गरले मोतोलेकाला है। कोई भी अधिक दलयात् मही है। ३५ चर्षणीनां राजा, रयेभिः अधिगा, पाता, २३ बन्दुदीरः । ३६० )- वीर पुष्प जिसका हमेशा विश्वासां पृतनानांतरता. वृत्रहा, ज्येष्ठः शृणे (२७१/- पवन पाते है। सब मनुष्योकारित करनेवाला राजा, रोसे आगे जानेवाला, २४ चाजी पाजिनं ददातु-( १९९) बलवान् इन सयले मागे जानेवामा, राजुपर पाकरण परनेवाला, मनु. हमें पल देये, हमें बलवान् परे, हमें पलपान्दोरों की सहायता सेनारा गाय करनेवाला, को मारनेयासा, ऐगा पैठण प्राप्त हो। है, में शरीप्रसाररता हूँ। २५ ममानि विध्या गाम्यामा भर । २६२) सय १६ घाया-थिरी गर्न स्युः, भूमीः तं स्यु, पाम एकही ममप प्राप्त हो। माहर्ष सूर्या, नया भगु भष्ट, अनु जान मनु २६ मस्य नम् मोज. नियिरे यत् उभे रोदमी भष्ट, रोदसी न मनु भए ( २८ )- पापिषी, - इन्द्रका शौर्य जाता है। अतुर्थ अध्याय ] सामवेदका सुबोध अनुवाद (११) भूमि ये संकों हो जाए, हजारों सूर्य हो जाए, वे सभी भी ४९ सहसमन्यो तुधि-नृम्ण, सत्पते ! समत्सु नः सेरी बराबरी नहीं कर सकते । पोछेसे होनेवाले पदार्थ तेरी वृधे भव (२८६)-हे हजारों उत्साहोंसे युक्त, बहुत बलवान, घरावरी नहीं कर सकते। सज्जनोंके पालक, इन्द्र तू युद्ध में हमारी उन्नति करने ३७ यतः इन्द्र भयामहे, ततः नः अभयं कृषि वाला। हो। (२७४)- है इन्द्र ! नहासे हमें भय हो, यहासे हमें निर्भप कर। ५० त्या वाघत अस्मत् आरे मा निरमत् (२८४}-- ३८ न ऊनये द्विष. विजाह, मृधः विजाहि (२७४) तेरो स्तुति करनेवाले भक्त तुझे हमसे दूर न जायें । - हमारे सरक्षणके लिए शत्रुओंको जीत, दुष्टोंको हरा। ५१ आरात्तात् न सधमादे सुमागहि (२८४ )- ३९ ते सखा अश्वी, रथी,गोमान् , सुरूप , श्वापः हमारे हमारे पास ठीक तरह आ। मागः वयसा सदा सचते। चन्द्रेः सभा उपयाति ५२ महे शुल्काय त्या न परा देयां, न शताय न (२७७)-तेरा मित्र इन्द्र पोडे रखनेवाला, रथ में बैठनेवाला, सहनाय न भयुताय परा देयां ( २९१)- बहुत साधन गाय रखनेवाला, सुन्दर, शीघ्र ही कार्य करनेवाला, पपसे- मिलनेपर भी मं तुझे दूर नहीं करू, सौ, हजार यासहजार- तारण्यसे मुक्त रहता है, यह भाभूषण पहनकरके सभामें के यदलेमें भी तुझे न दू । ४० इन्द्र हरी युयोजते ( २६८ )- इन्द्र पौडौंको इस प्रकार इन्द्र के बलका वर्णन है, अब उसके शौर्यका अपने रपमें जोडता है। वर्णन देखिए- ४१ इन्द्रः हयाः संमिश्ल., वझी हिरण्यय (२८९) १ मघ शूरवीरः(१२३ )- इन्द्र आनन्द देनेवाला इन्द्र घोडे रखता है, वत्र धारण करनेवाला और तेजस्वी है। शूर और योर है। ४२ सत्रा-हा विश्व-चर्षणिः तं ययं हूमहे (२८६) २ अनामयिन् ( १२४)- निर्भय, भयरहित । इन्द्र सब शत्रुओंको एक साथ मारता है । सब मनुष्योंका ३ अनानत (१४२)- किसीके भी आगे न झुकनेवाला । कल्याण करता है, इसलिए हम उसको सहायतार्य गुलाते हैं। ४ अस्ता (१२५)-दाता, शत्रुपर शस्त्र फेंकनेवाला । ४३ प्रशर्घः ( २७९)- शत्रुनाशक वलसे युक्त इन्द्र है। ५ नर (१४४) प्रनेता-(१९३)-नेता, शोर्यके साथ ४४ अनये पुरु नृपूत. मसि (२७९)- सब मनुष्योंका मागे लेजानवाला । हित करनेके लिए लोग तेरी बहुत प्रार्थना करते है। ६ त्वं इशिपे । १६२)-तू रायपर शासन करता है। ७ अ-प्रति-कुतः(१७९)- जिसका विरोष कोई ४५ रवा कः मतः आदधति ( २८० )- तुझे कौन भी नहीं कर सकता। मनुष्य हरा सकता है ? अर्थात् कोई भी नहीं। ८ सदा-वृधः ( १६९ )- हमेशा बढ़नेवाला। ४६ ते श्रद्धा याजी पायें दिवि वाल सिपासात ९ स्थिरः । २००)- मुद्धोंगे हमेशा स्थिर रहनेवाला। (२८०)-तेरे ऊपर श्रद्धा रखनेवाला बलवान होता है १० विशा-साई चर्पणीनां मंहिष्ठं इन्द्रं अभि और अन्तिम दिनतक भी दान कर सकता है । प्रगायत ( १५५ )- सव शत्रुओंको हरानेवाले, सब लोगोंमें ४७ अ-जरं, प्रहेतारं, अ-प्रहितं, आशुजेतारं, घेष्ठ इन्द्र के गुणोंका गान करो। होतारं रशीतम, अ-तूते, ऊतये इत (२८३)- जरा ११ महद् भयं अभीपत् अप चुच्युवत् ( २०० )- रहित, प्रेरणा देनेवाले, पोछे न रहनेवाले, शत्रुको शोज महान् भोंसे हमें पूर करो। जोतनेवाले, दान देनेवाले, त्या बैठनेवाले, किगौसे भी न १२ घणं, पुरु धस्मानं, वृषभ, स्थिरप्रन, हारनेवाले, इन्द्रको पहां हमारे पास बुलावो, सहायताके पनिणं, मृष्टिमन्तं गृणे (३२७) -को मारनेवाले, बहुतों लिए उसे अपने पास बुलावो। द्वारा पूनित, यलवान्, हमेशा दुष्टोंका मारा करनेवाले, पन. ४८ सु आपे ! स्यापिभिः आ (२८२)- हे उत्तम प्रारी, मत्रुनाशक इन्द्रकी में स्तुति करता हूँ। मित्र इन्त्र! अपने उत्तम मियों के साथ यहां आ, हमारे पास १३ त्यत् जायमानः, अ-शत्रुभ्यः सप्तभ्यः शत्रुः रमारी सहायता लिए । त्वं अभया (३२६)- उत्पम होते ही, जिनमोई भीशन (११२) सामवेदका सुबोध अनुवाद पेन्द्र काण्डम् नहीं पा, ऐरी सात शत्रु राक्षसोका तू अकेला हो शत्रु हुआ। उस असुरको घेरकर, मनुष्योंका हित करनेको छासे इन १५ बहूनां ददाणं युवान पलित जगार ( ३२५)- उस हिंसक सेनाको नष्ट कर डाला। बहुतोको मारनेवाले जवान शनुको सफेद बालोंवाला बड़ा धोर २५ यत् पार्ण धिय. युनजते, नरः नेमधिता इन्दं भी पराजित करता है। यदि इन्द्र उनको सहायता करे।) हयन्ते (३१८) जब सफटोसे पार होनेको बुद्धि होती है, १५ वाजसाती अस्मिन् भरे नृतम इन्द्रं हुवेम तब सग्राममें सड़नेवाले लोग इन्द्र को अपनी सहायता के लिए ( ३२९ ) - बलसे लड़े जानेवाले इस युद्ध में मनुष्योंमें श्रेष्ठ बलाते है। इन्द्रको हम सहायताके लिए बुलाते है। नेमधिता सग्राम । १६ शृण्वन्तं उग्नं समरसु वृत्राणि नन्तं इन्द्रं हुवे २६ यत् शासः सदस परि अग्रतं च्यावय ( ३२१ ? भक्तको प्रार्थना सुननेवाले, वीर, युद्धोंमें शत्रुओंको ( २९८ )- तू शासक है, इसलिए हमारे समूहसे मत न मारनेवाले, इन्द्रको सहायताके लिए में बुलाता हूँ। पालन करनेवाले अथामिकोंको दूर कर । १७ नातारं अवितारं हवे हवे सुहवं शकं इन्हें २७ भरे भरे हव्यः ( ३०९)-प्रत्येक युधम सहापदार हुये (३३२)- सरक्षण करनेवाले और प्रत्येक युद्ध में सहायता के लिए इण्ट बुलाने के योग्य है । लिए बुलाये जानेघाले, सामर्यवान् इन्द्रको में पुलाता हूँ। २८ दिया सदोभ्य ओजसा प्ररिरिक्षे (३१२)- १८ वज-दक्षियं विवृतानां हरीणां रथ्यं इन्दं द्युलोकसे भी तू श्रेष्ठ है । यजामहे ( ३३४ )- अपने दायें हायमें पक्षको धारण २९ नः अनिता वृधे च अस. ( ३१४ )- हमारे करनेवाले, धेगवान् घोडोंके रथ, बंठनेपाले इन्द्रको में पूजा रक्षा और वृद्धि करनेवाला है। करता है। ३० त्वं यावत: इशिषे एतायत् अहंशीय (३१०)- १९ सनासाहं दाधा तुम्नं महां अपारं वृषभं तेरा जितने के ऊपर अधिकार है,उतनेपर मेरा भी अधिकार हो। सुवर्ग ( ३३५ ) शत्रुओका एक साप नाश करनेवाले, ३१ न पापरवाय रंसिपम् ( ३१०)- पार्पोमें हम म रमें, ऐसा कर। शत्रुको डरानेवाले, यात्रुको दूर करनेवाले, महान् अपार भकिासे पचपारी इन्द्रको प्रशसा करता हूँ। इस प्रकार इसका वर्णन सामवेदमें मापा है । ये गुण मनुष्य देखें और इन्हें अपने अन्दर धारण करणे उk २० इन्द्रा-पर्यता यामी सु-धारा ( ३३८ )- इन्द्र धा।" यद्देवाः अफुर्चस्तत्करवाणि " असा आवरण और पर्वत पे प्रशसनीय उत्तम पीरहे। देवोंने किया, उसी प्रकार में भी कहें। यह उद्देश्य मनुष्य २१ अयं शिप्री ओजसा पुरः विभिनत्ति ( २९७)- यह शिरस्त्राण धारण करनेवाला इन्द्र अपने बरसे शत्रु रखकर उसरे अनुसार आचरण करें, इन्टके इन गुणोंको नगरोंको तोडता है। यहाँ इसं मत्रसंग्रहमें इसलिए कहा है कि मनुष्य भी हमारे २२ मदे धीराम तपसे तुराय विशिने यक्षिणे समान शूर, बोर, उत्साही, सतत परिश्रमी, पदमें कुशाप्त, स्थरिराय असे अपूर्या पुरुतमानि शंतमानि यचासि उदार, प्रमाऔवे पालक और सरक्षक हों। तनुः (३२२)- महान् योर, बलवान्, पीप्रतासे वार्य ररने- ये यदि दो घार मत्रोपर हो प्यान दिया जाए और पाले, मई वनधारी, घुट ऐसे इस इनके लिए अपूर्व, बहुत उनको अपने अदर धारण करनेका प्रपल frया जाए, तो और धम्ति यानेवाले तोत्र हे जाते हैं। उनसे भी मनुष्यपी उन्नति अपाय होगी, ऐसे में गुण है। २३ इमाः विश्वाः पृतनाः जयासि ( ३२ )- इन अब एमकी युद्ध में दुशलता सिप्रारत है, उसपर सारे मानों पर विजय प्राप्त करता है। विचार करते हैं। २४ दप्सः दशभिः महन. यानः कृष्णः अनु. इन्द्रकी युद्ध कुशलता मनी मयानिष्टद, शच्या धमन्तं तं लः पायत् एट विपराम्प, संरक्षण की मपया पर-मंत्री है। नुमणा स्निहति अधदा ३२३)- मारमण परवाता हमशरण उसरा भोर साय गुर बराबर रोजा एमा कृष्ण भमुर अपने दमगार में निकोरे साय अंगमति मरी है। अत यह पुरसेरता है, उसरे प्रारमt पर पहुंच गया, अपने पारमणरो लम्बी लम्बी माम मेनेवाले सी है, इस विशार मरते है।
चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद . १ नृ-पाहः । १४४ - शत्रुके योरोंको हरानेवाला। कल्याण करने उहें आदित परनेवाले, प्रजाओंगी सम्पत्ति २ अद्रियः ( १९४)- अवधारण करके लडनेवाला, बढानेवाले इन्द्रको हम प्रशसा करते है। "हरि" पदका अर्थ (अद्रि-घ.) पहाडोंके किली में रहनेवाला, अथा फिलेमें मनुष्य है, “हरिरिति मनुष्य नाम" (निघ २।३।१०)। रहर लडनेवाला। लोगोको शोभा बढानेवाला इन्द्र है। ३ पृतनासहा वीरः (४०५)- मनुका सेनाकोहराने. १२ ते महत्तु आजिपु अभै चित् अतिं हवामहे वाला वीर। (४११/- उस इन्दको महान् और छोटे युद्धोने अपने ४ स्वराज्यं मनु मर्चन् त्य मायिनं मृग वृनं मायया सरक्षणके लिए हम बुलाते है । अधी. (४१२)- स्वराग्यको दृढ बनातेके लिए उस १२ साबाजेपुना गाविपत् (४११)- यह इन्द्र यसमें मायावी यमासुर और मायावी पपिका वध किया । बत्रासुर हमारा उत्तम रारक्षण करता है। ऐसा वह पराक्रमी है। कपटसे लड़ता था, उसे इन्नने पटसे ही मारा । कपटियोंसे १३ ते शव नृम्ण (४१३)- तु हमें यात्रुओको झुकाने- कपटका हो म्यवहार करें, यह बोप यहा मिलता है, और वाला बल भरपूर है। अपने स्वातम्य-सरक्षण मौर प्रजामौके सरक्षणके लिए २४ उपायो' हस्तयो मायस बखं श्रिये निदधे कपटी शत्रुओंका नाश करनेका उपदेश इसमें है। ( ४२३)- अपने हाथों में फौलादी पत्रको कल्याणके लिए ५या एका इत् बिश्याः कृटी अभ्यस्यति (३८७)- धारण करता है। यह इन्द्र अकेले ही सब के सैनिकोंको हरा देता है। इसका १५ प्रहि, अाहि, धृष्णुहि न ते घनो नियंसते इतना सामयं और युद्ध-कौशल्प है। (४१३)- शत्रुपर साक्रमण कर, चारों ओरसे आक्रमण कर, ६ विभ्यतोवाचन ( ४३७ )- सब समोंका नाश गनुका मार कर, तेरा वन किसीसे पराजित होतेयाला नहीं । इस स्थानपर 'प्रेहि, अभीहि, धृष्हि' ये तोग ७ यिभ्यस्य प्रस्तोम ( ४५० )- सब शत्रुओंका इन्द्र शब्द युद्धका वणन करनेवाले है । " मेहि का अर्थ है, प्रवन करता है। शत्रुपर चढ़ाई करना, "अभीहि" का अर्थ है चारों ओर ८ यः कृष्णगर्भाः निरहनु ( ३८० - कृष्ण नामरे से शत्रुको घेरफर उन्हें चक्करमें अलकर फिर उनपर असुरको गर्भवती पत्नियोंका भी इन्द्रने नाम किया। वृष्ण आक्रमण करना, और "कृष्णहि " का अर्थ है शत्रुओका नामका एक मार या, यह लोगोको बहुत कष्ट देता था, पर्पण करना, सभीका वध करना और अन्य रीतिसे उसका दस-दस-हजार राक्षसोंकी सेना लेकर वह आक्रमण करता नाश करना । इन्द इन सब युद्ध प्रणालियोंमें कुशल है । पा, इन्द्र ने सद सेनाकै माय कृष्णका वध किया, और जिससे १६ अरंगमाय जग्मने अपश्चादने (३५२)- आगे उसका वश भी न रहे, इसलिए उसकी गर्भवती स्त्रियों- इन्द्र पूर्ण रीतिसे शत्रुपर आक्रमण करता है, शत्रुओंको कुच. लता चला जाता है। शत्रुओंको कुचलनेमें वह देर नहीं करता। ९ वृत्रहन्तम शर्ध श्रुतं, चीतां महे राधसे प्र समपपर जहा पहुचना होता है, वहां पहुच जाता है। आशिप ( २०८)- वृत्रनामक असुरके नाश करने में इन्द्र- तीनों ही गुण बोरों में यावश्यक है । शत्रुपर बड़ाई करना, का जो बल प्रसिद्ध हुमा, उसे समीने सुना। यह सब इन्द्रने शत्रका पूर्णतया नाश करना और उचित समय पर आश्मण इसलिए किया कि इससे प्रजाजोंका महान् कल्याण हो । करना घे आवश्यक तत्त्व है। सुप्रासुर प्रशाओंको कप्ट देता था, वे कष्ट दूर हो इसलिए १७ पुरा भिन्दुः, युवा कवि', अमिताजा ,विश्वस्य उसका इन्द्रा वप किया, उससे प्रजामोंको महान् उन्नति, कर्मणः धर्ता, अजायत (३५९ )- शत्रु नारोंको प्रजाओंको यायित स्थिति उतम हुई और प्रभाओंका तोडनेवाला, तरण, शायो, अपरिमित सामन्यवाला, सब काँको पारण करनेवाला यह इन्द्र है, ऐसा यह दौर है। १० पशु सासहि लोकरातुं मदं हरिप्रियं गृणी १८ पुरं धृष्णुं अवंत ( ३६२ )- भाके नगरोंको नारा मसि ( ३८३ - मुखम पोंको हरानेवाले, प्रनामोश करनेवाले इन्द्रकी अर्चना करो। १५ (साम हिन्दी) को भी मार डाला।
( १९४) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम् १९. इन्द्रो विश्वस्य राजति (४५६)- इन्द्र विश्वका २९ वृषेपु सत्पति नरः हवन्ते, अर्यतः काष्ठासु राना है, विश्वका आधिपत्य इन्द्र के पास है, इतना वह त्वा हवन्ते ( २३४ )- वृत्रादि असुरोंके साप पुस करने के सामर्थ्यवान् है। रामय नेता लोग राज्जनोका पालन करनेवाले तुश इन्द्रको २० ऊतये सुम्नाय तुवि-कृमि मातीपहं सत्पति हो बुलाते हैं। प्रयत्नको अत्यधिक करनेके याद अपनी इन्द्रं वर्तयामसि ( ३५४ } - हमारा सरक्षण हो इसलिए सहायताके लिए तुझे ही बुलाते हैं। सुरादायी, विविध सामोंका कार्य करनेवाले, हिंसक शत्रु ३० उभे रोदसी त्या अनुधावतां ( ३७१ )- दोनों भोको हरानेवाले, सज्जनोरा पालन करनेवाले, इन्द्रको हम ही धुलोक और एम्वोलोक तेरे अनुगाल ही घन्ते है। यहा लाते हैं। ३१ पृथियो ते शुष्माद् अभ्यसाते (३७१)- पृथियो २१ पुरु-निःपधे इन्द्राय उक्थं शंस्यम् ( ३६३ )- तेरे बलसे भयभीत है । इस प्रकार इन्द्रका बल है। पहतरो शानुओका नाश करनेवाले इन्द्रको प्रशंसाके स्तोत्र ३२ समाजितः अक्षित-ऊतयः, वाजयन्तः रथाः कहो। इव, गिरः उदीरते ( २५१)- एकसाय सब पशुओंको २२ विश्वानरस्य अनानतस्य शवसः पर्ति हुये हरानेवाले, जिसके सरक्षणके साधन कभी दोण नहीं होते, ( ३६४ )- विश्वका नेता, किसीके धागे अपना सिर न ऐसे तेरे भक्त, यलदान् रयके समान, स्तोत्र कहते है । सुश झुकानेवाला, बलका स्वामी इन्द्र है, उसे में सहायताके लिए इन्द्र के पाका गान करते है । बुलाता हूँ। इस प्रकार इन्द्रकी युद्ध कुशलताका वर्णन सामयेवमें विधा २३ चर्पणीनां स्थानां पयैः ऊती हुये ( ३६४)- गया है। इसको देखनेरो इन्द्रको कितनी विशाल दारित थी गनुष्योंके रयवि संरक्षणके सायनसि हमारा रक्षण हो, इस- इसको कल्पना हो सकती है। लिए इन्द्रको हा भुसाते है। यहाँ इन्द्र के वर्णन करनंका यही उद्देश्य है, मिग्री २४ विश्वाः पृतनाः नरः अभिभूतरं भामुरि उग्नं समान अपने भी बोर भपने राष्ट्रको तय्यारी करें, और अपने ओजिष्ठ तरसंतरस्रिन इन्हें राजसे ततनुः (३७०)- राष्ट्रको सबल बगावें । सत्र मनुष्योके भेताओंने दुराचारोदात्रुओं को हरानेवाले, शत्रु- इन्द्र अपने पास वन रखता है, उसी प्रकार हम भी को मारनेवाले, उप, बलवान्, दुखोंसे पारपरानवाले इन्द्ररी कों पाराओंवाले फौलादी वद्य ग्यार करें और उनका राजा बनाने के लिए प्रकट किया। उपयोग रें पह उद्देश्य यहां नहीं है, अपितु जैसे उसके पास २५ यः सदावृध, विश्वगतं, कभ्वपस, ओजसा ताण न है, उसी प्रकार हमारे पास भी हमेशा तोरण राष्टं धुणुं इन्द्रं यशः चकार ( २४३ )- जो हमेशा दास्त्र रहें, यह उपदेश यहाँ ग्रहणीय है। बदनेवाले, सबोंसे प्रशमित, महाबुद्धिमान, महान् सामभ्यंके पारण जिसया सभी भी पराभव नहीं होता, ऐसे शत्रुको अपने साधुओंशा नाश घरता है, उसी मबार हम भी अपने इसी प्रकार दूसरे उपदेशोंके विषयमें भी सममें । हरानेवाले इन्द्रको पससे भक्ति ररता है, ( यह महान् दानोंका नाश करें । शत्रुनाशरे साधन शस्त्रास्त्र समय होता है। समयपर बदलते है। परलेरे जमानेमें पनुप-पाणसे घर २६ तं पर्मणा न कि नशत् ( २४३)-पितो भी होते थे, पर मान अनु मात्र है। पर दोनों सामोंमें गाय बमसे उसरा भार नहीं हो सकता। एकरी है शत्रु नाश करना । वह रेश्य शिन सापनोंगे २५ नः तनपु नृम्णं आधेहि, सत्राजित् भी पूरा हो उन पो उपयोग गरी समयानुसार पास्यं आधेहि ( २३१)- हेन । हमारी प्रजारि सारा परा लिए जानेवाले पोषो दूर करें। शरीरमें पहलमा बल है, और गय समापसाप मारने- पावस भीया का नाश २. वाय. पाजमाती या हयामहे । २३४ )- हम हमा मुख्य कार्य राय प्रजार्मोगा राम राम करता मंशा परमें तुरे ही सहायता मिए नमाने हैं। है। योग माने है, उनका सपून मगर प्रमालाश चतुर्थ अध्याय] सामवेदफा सुबोध अनुवाद 1 सरक्षण परना यह कार्य इन्द्र यरता है। उसीको घेदमत्रोमें जघान (१७९)- इसने दपीचिकी हड्डियोंसे नो गुना नब्बे पत्रोको मारा | ९४९०३८१० शत्रुओका इन्द्रने नार पिया। १ महे वृत्राय हन्तवे इन्द्र याजयामसि ( ११९) दधीचः अस्थमिः- पौचिकी हटी दधीचिन महान् यत्रका व्य करने के लिए हम इन्द्रवे यसको गाते हैं। अपनो हड्डी दी, और उससे बने हुए शस्त्रोंसे इतने राक्षसोंका का अर्थ है (आवृणोति इति वृत्र ) चारों ओरसे नाश हुआ, यह आलकारिक कथा है। घेरनेवाला । ऐगे शमुवे आनेपर उसके लिए इन्द्ररी ११ मोजसा महान् अभिष्टिः (१८.)- अपने बुलाते हैं। सामर्थ्यमे महान् शत्रुओंका पराभव करनेवाला । २ पृष-हा ( १२६ )-वृत्रका वध करनेवाला इन्द्र है। १२ ब्रह्माद्विपः अवजाहि ( १९४)- ज्ञानले द्वेष करने- इन्द्रका यह नाम ही है। पालेका पराभव कर। ३ वयं महाधने अमें इन्द्रं हवामहे ( १३० )- हम १३ विश्वाः स्पृधः अजयः, इन्द्रः अपां फेनेन महान् युद्धौ और छोटे युद्धम अपनी सहायताके लिए इन्द्रको शिरः उदवर्तयः ( २११ )- सव शत्रुओंको हराया, और बुलाते हैं। इन्द्रनै पानी झागसे समुचिका सिर तोड़ा। १ नेपु युजं यजिणं हवामहे (१३०)- वृनके साथ 'अपां फेनः'- यह समुद्री शाग है," न-मुचिः" होनेवाले सग्राममें पञपारी इन्द्रको मित्र समझकर सहायता दीन दूर न होनेवाला रोग, ऐसे रोग पर समुद्री झाग के लिए बुलाते है । यहा " पुनपु” इस प्रकार यहुवचनका उत्तम औषध है, यह क्या मालपारिक है । प्रयोग हुआ है । भनेफ पुत्र है । वृत्रका अयं केवल एक १४ अप्रतीनि पुरु-वृत्राणि अनुत्तः, चर्पणीधृतिः, शत्रु नहीं, अपितु घेरनेवाले अनेक शत्रु । ऐसे सब शत्रुओंफा एक इत् हसि-(२४८)- अत्यपिक शक्तिवाले बहुत इन्द्रने नाश किया। शत्रुओंको स्वप पराभूत न होनेवाले इन्द्रने सब प्रजाओंक ५ तत् त्या युजा वनेम (१२८)- इस प्रकार तेरे कल्याण लिए अमेले हो मारा । साप रहकर तेरी सहायतामे सब शनुमोको मार दें। इन्द्रके १५ पुन-हा शतकनुः शतपर्वणा वज्रेण सापसे और उसकी सहायतासे हमारो दाक्ति बढ़ती है । हनति ( २५७ )- वृत्रको मारनेवाले, संकड़ों कार्य करने. ६ आदिशः सूरः अस्तुपु नः मा अभ्यायमत् वाले, इन्द्रने संक्टों धाराओंवाले वज्रसे त्रको मारा। (१२८)- आज्ञा करनेवाले शक्तिमान राक्षस अयदा शन १६ इन्द्राय नहन्तमं वृहत् गायन ( २५८)- रात्रीमें हमारे ऊपर आक्रमण न करें। “आदिशः "आज्ञा इन्दके लिए वो मारनेवाले बृहत् नामक सागका देनेवाले, ऐसा कर और ऐसा न कर ऐसो आता देनेवाले गान करो। शत्रु । सूरः'(मु-उर) जिसकी छाती विशाल हैं। ऐसे १७ त्वं प्रतृर्तिपुरानभ्याः स्पृधः अभ्यसि (३११)- मजबूत सोनेवाले शत्र रामोके समय हमपर मारमण न पारें, तू युमें सब शत्रुओंवा नाश करता है। इसलिए हे इन्द्र ! हमारी रक्षा कर। १८ तूर्यः ( ३११)- शत्रुका दिनाश करनेवाला । आदिश:- आदेश देनेवाले, शस्त्र फेंकनेवाले । १९ अशस्ति-हा (३११)- अप्रशसनीपोंका नाश सूर:- हमेशा चलनेवाले, विशाल छातीवाले। करनेवाला। ७ सहन-पाढे तर पास्यं आवदिप(१३१)हनारो २० जनिता (३११)- शत्रुओंपर आपति लानेवाला। मनिशको साथ लेकर याक्रमण करनेवाले शत्रुपर जद इन्द्र २१ तमप्यतः पुत्र-तः असि ( ३११)-विन परमे. पलकर गया, तब उसका सामम्यं प्रकट हुआ। वालोवा विनाशक है। ८विश्वाः द्विपः अप भिन्धि (१३४)- सव शनुमो २२ ते प्रथमाय मन्यवे शत् दधामि, यत् दस्यु अहन् (३७१)- तेरे प्रथम यापे हुए उत्साहपर में पहा ९ वाधः मृधः परिजाह ( १३४). रकावटें उत्पन्न करता हूँ, बयोंकि तूने उमसे शत्रुको मारा। करनेवाले शो शत्र है, उनका पराभव कर । २३ दिवोदासाय त्यत् शम्परं अरंधयन ( ३९२) १० इन्द्रः दधीयो अस्थभिः नवनवतीः वृधाणि -रिपोबाराके हित के लिए तूने उस माम्बर राक्षसको मारा। को मार। * (११६) सामवेदका सुवोध अनुवाद पेन्द्र काडम् मागते है। २४ येन अत्रिणं नि हंसि ( ३९४)- जिससे सुने तू शत्रुओंको मारनेके लिए अपने शत्रुनाशक सामभ्यं से द्वेष केवल स्वयं खानेवाले शत्रुओंको मारा। करनेवालोको करने का प्रयल करता है। २५ वृनेपु स्पर्धमानाः क्षितयः यं हवन्ते (३३७) इन्द्र शत्रुओको मारता है, और इस प्रकार वह शत्रुरहित युद्धोंमें लडनेवाले मनुष्य जिसको सहायताके लिए बुलाते है। होता है । इसलिए वह प्रबल शक्तियों से सम्पन्न है। यह सब २६ युक्तेषु तुरयन्तः यं हवन्ते (३३७)- युद्धके वाते इन वचनोंमें पाठकोको मिलेगी। इसलिए पाठक इन प्रारम्भ होनेपर युद्ध करनेवाले जिसको सहायताके लिए वचनोंको पानसे प गौर स्वयं शक्तिसम्पास कैसे हो, यह बुलाते है। विचार करें। पाठक इस दृष्टिसे इसका अध्ययन करें २७ शूरसातौ यं हवन्ते (३३७)- शूरोसे जिसमें लड़ाई और उससे भोप प्राप्त करें। जो इस रोतिसे अभ्ययन करेगा, होती है, ऐसे युद्धोंमें लड़नेवाले लोग जिसको अपनी सहायता- यह इन्द्र के समान शूरवीर और शत्रुको जोतनेवाला होगा। के लिए बुलाते है । वह श्रेष्ठ इन्द्र है। संरक्षण करनेवाला इन्द्र २८ यामतः ना धनुष्यन् , आभेदाति, मन्यमाना, क्षिधी युधा, शवसा उगणाः, तुरः त्योता. वृपमणः सभी देवता मनुष्यों का संरक्षण करते है, पर उनमें भी अभिप्याम ( ३३६ )- जो शत्रु हमारी हिंसा करनेको इन्द्रका सरक्षण विशेष महत्वका है, इस विषयमें निम्न मत्रोंको देखो- इच्छासे हमपर चढा चला आता है, अपनेको बहुत शक्ति- शाली समझता है, तथा विनाशक शस्त्रोंसे आत्रमण करता १ देवानां महत् अयः, ऊतये घयं आ वृणीमहे हुआ चला आता है, उन सबको, शौनतासे कार्य करनेवाले (१३८)- देवोंका महान् संरक्षण हम अपने रक्षा के लिए हम सब जन तेरे सरक्षणसे सुरक्षित होकर सथा बलवान् मनसे युक्त होकर मारें। २ का ऊती, कया शविष्ठया पृता, नः आभु यत् २९ व उत्सं अदर्दः (३१५)- तूने मेघोंको फोड़ा। सामध्यके साथ यह इन्द्र हमारे पास आये ? (१६९)- कौनसी सरक्षणको शक्ति के साप, और कोनसे ३० खानि व्यसृजः (३१५ ,-पानीके द्वारोंको खोल ३ ऊतये सत्रा-साई, विश्वासु गीर्ष, आयतं, दिया। आच्यावयसि (१७०)- अपने सरक्षणके लिए, सब ३१ महान पर्वतं धारा अएजत् (३१५)- महान् शत्रुभोंको एक साथ मारनेवाले, सब स्तुतियोंसे वर्णनके योग्य पर्वतके ऊपरसे पानीको पारा छोडी। इन्द्रको अपने पास बुलाओ। ३२ यदधानान् अर्णवान् अरम्णाः (३१५/ महीभिः ऊतिभिः अस्माकं अर्थ शगहि (१८२) उफनते हुए ममुद्रको आनदित किया। - महान संरक्षण के साधनों के सामन हमारे पास प्रा। २३ यत् दानवान् अयहन् ३१५)- जब तूने ५ प्रचेतसः य रक्षन्ति, साजना न कि दभ्यते दानयोंको मारा । यह वर्णन मेघोंसे पानी बरसानेशा है। (१८५)- शानी जिसका संरक्षण करते हैं, उस मनुष्यो आलकारिक रूपमें मेघ यह राक्षस है, और उसे इन्नने मारा कोई भी दया नहीं सकता। यह पर्णन किया है। ६ धुने दुराधर्षे महि अयः भस्तु (१९२)- तेजस्वी, ३१ गोमतः जनस्य संस्थे श्वसन्तं त्या युजा प्रति दूसरे निमपर मायमण नहीं कर सस्ते, ऐसे संरक्षों प्रवीमहि ( ४०३) गाप पास रखनेवाले, लोगों स्थानों. महान् साधन हमें प्राप्त हों। पर आक्रमण परनेवाले, सम्यो लम्बो सांस लेनेवाले शत्रुको ७ त्यायना ययं मसि ( १९३)- तेरे संरक्षणमे हम सेरी महापता हम उत्तम उत्तर दें। मुरक्षित रहें। ३५ स्वराज्यं अनु मर्चन् पाथेयाः आहे नि: ८ जनानां तरणि प्रद गोमतः याजम्य ममाने शशाः (४१०/- स्वराज्या संरक्षण परनरे लिए प्रशसिपम् (२०४). लोगोंरो दुनोस तारनेवाला, पृथियोपर बाये हुए अहि नाम पर तूने शासन किया। शे भय शिवानवाल,मार्योमे मिलनेवाले मोशran ३६ सक्षणिः प्राणि परि, नः ऋणया दिया है, उसी प्रांगा परता। तरम्य, रमे (१२८ उरसाएसे मुक्त है, इसलिए ९ ऊतये एमकरनं, भयमे माधः एप्पाने, चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद स्वदुक्थं हवामहे ( २१७)- सरक्षणके लिए अपना हाथ ९० धन-सा ( २५१-धनोका दान करनेवाला । मागे बढानेवाले, सुरक्षितताके लिए सापनीको तय्यार रखने ११ धनस्य सातये इन्द्र हवामहे ( २४९ )- धनके वाले सब जिसको प्रशसा करते है, ऐरो इन्द्रको हम सहा- दानके लिए हम इन्द्रको बुलाते है। यताके लिए बुलाते है। १२ पंच क्षितीनां द्युम्नं आ भर ( २६२)- पांच १० तरोभिः दिवसुं इन्हें कतये वृहत् गायन्तः प्रकारके जनोके तेजस्वी धन हमें भरपूर दे। ( २३७) अनेक बलोसे युक्त, सब प्रकार के ज्ञान जिससे ना सुचितं आ भर (३१६)- हमें उत्तम होते हैं, ऐसे इन्द्रके लिए यहत् नामके सामको हम अपने घन दे। रक्षणके लिए गाते है। ५४ धनानि संजितं ऊतये हुवेम (३२९)- धनोको ११ ते धियः नः अवन्तु ( २३९)- तेरो बुद्धि हमारा जीतकर लानेवाले इन्द्रको अपने सरसपके लिए हम सरक्षण करे। अपने पास बुलाते है। १२ विभ्वाभिः ऊतिभिः शग्धि ( २५३) सब १५ माघते स्तुवते यत् वसु शिक्षमितत् न कि: सरक्षणके साधनसित सामर्थ्यवान है। भामिनाति (२९६ ) मेरे जैसे स्तुति करनेवालेको जो धन १३ महिषः तुचि शुप्मः (४५७)-तू सामर्म्यवान् गौर त देता है, उसे कोई भी रोक नहीं सकता। अन्यधिक बलवान है। १६ देवस्य ते भूयः दानं उपोपेत् पृच्यते (३००)- १४ सना भूरि थवांसि दधानं अप्रतिष्फुर्त इन्द्रं तू इन्द्रदेव है, तेरे दिए हुए दान पास आनेपर यहते हैं। जोहवीमि ( ४६० )- एकसाथ बहुतसा यश प्राप्त करने १७ ज्यायः इन्द्रः, इपता कनीयसः तत् आ भर वाले, जिसका मुकाबला कोई भी पर नही सकता ऐसे इन्द्र- (३०९)- हे इन्द्र! तू श्रेष्ठ है, अत इच्छा करनेवाले और को हम अपनी सहायताले लिए बुलाते है तेरी अपेक्षा छोटे मुझे वह धन भरपूर दे। १५ चनी राये विश्वा सुपया फरत् ( ४६०) १८ वसूनि ददः (३१४)- अनेक प्रकारके पन दे। वजधारी इन्द्र धन प्राप्तिके राव मागोको सरल करता है। १९ त्यं मेप माग्मिय, यस्वः अर्णवं गीर्भिः अभि- इस तरह इन्द्र सरक्षण करता है, इस विषयके उत्तम प्टुत (३७६)- उस प्रशसनीय, मत्रोंसे स्तुतिले योग्य, पनोंके वचन विचार करनेके योग्य हैं। उनका विचार पाठक करें, समुद्र इन्द्रको स्तोत्रोंसे स्तुति करो। और अपने में ऐसो सरक्षणको शक्ति बढावें। २० मंहिष्ठं इन्द्रं अभ्यर्चत (३७६)- महान् इन्द्रको धनवान् और धनदाता इन्द्र २१ मे पितुर वस्यान् (२९२)- मेरे पिताको अपेक्षा इन्द्र स्वय पनवान् है और वह धन दूसरोंको देकर उनकी तू धनवान् है। सहायता करनेवाला भी है। इस विषयमें निम्न वचन २२ अर्भुजतः भ्रातुः चस्यान् ( २९२)- धनोंका उपमोग न करनेवाले भाईयो अपेक्षा भी तू धनवान है। 'थुता-मघः (१२५)- प्रसिद्ध पनवान् । २३ मे माता समा(२९२)- मेरो मा तेरे समान है। (१३२ -सबको वसानेवाला, धनवान् । २४ वसुत्वनाय राधसे छदयधः ( २९२)- धन- ३ राधानां-पतिः ( १६५)- अनेक प्रकारके धनोंका प्राप्ति और सिद्धि के लिए हमारा सरक्षण कर । २५ त्वोता तना त्मना सह्याम (३१६)- तेरे पासरो ४ पुरु-यसुः (१४६ - बहुतमा धन जिसके पास है। सरक्षण प्राप्त होने के बाद हम पनसे सुमपान हौं । ५ निभा-वसुः ( २१३)- तेजस्वी पन रखनेवाला । २६ ऊतये सानर्मि सजित्वानं सदामहं वर्षिष्ठं ६ मभु-सुः (३७३)- प्रभुत्व करनेवाले पन निराक रयिया भर ( १२९)- हमारे सरक्षण के लिए, उपभोगरे पाम है। मोग्प, शत्रुको पराजित करनेवाले, हमेशा विजय प्रापा ७ दिवा-वसुः ( ३४८)-विष्य धनोंको रखनेवाला। करानेवाले, पेष्ठ घन हमें भरपूर है । ८ तुरि-नृम्णः (३१६)- बहतरौ धनोगे पुल। २७ हे शतकतो ! भद्रं पं ऊर्जनः आ भर (१७३) ९ त्वं एकः इत् यस्यः ईशीयः (१२२)- तुमकेसा -हसंशों मं करनेवाले इन्द्र! कल्याण परनेवाले मन हो धनौका स्वामी है। और सामर्म हमें। पूजा करो। D स्वामी।
(१९८) सामवेदका सुरोध अनुवाद पेन्द्र काण्डम् ! करते हैं। २८ ऋभु-क्षणं रयिं वदातु ( १९९)- कारीगरोंके कौन भला नहीं मागता ? सब अपने स्वामोसे हो मागते संरक्षण करनेवाले धन हमें इन्द्र देवे । है, उसी प्रकार में मांगता हूँ, अतः क्रोध न करते हुए मत २९ यत् वीडी, यतिस्थर, यत् पर्शाने पराभृतं तत् धन दे । स्पार्ह वसु आ भर (२०७) जो धन मजपूत सजानेमें ४१ सुराधाः मयया मधानि दाता ( ३३५)- उत्तम रखा हुमा है, जो धन स्थिर रुपने रसा हुआ है, जो पन घनसे युक्त इन्द्र धन देता है। फटिन स्मानपर भूमिमें गाढा गया है, उरा सुन्दर धनको हमें ४२ यत् त्वा आदातं राधा में नास्ति, तत् नः भरपूर दे। उभया हस्त्या भर (३४५/- तेरे दिए गए धन अब मेरे ३० पुस-यसुः मघया जरितभ्यः सहस्रेण शिक्षति पास नहीं रहे, इसलिए दोनो हापोंसे मुझे भरपूर पन रे । (२३५)- यह तसे धनोंको पासमें रखनेवाला, इन्द्र अपने ४३ सुधीर्यस्य गोमतः रायः पूर्धि ( ३४६)- उत्तम उपासकोंको अनेक प्रकारके धन देता है। वीर्षसे पुक्त गायोंवाले पन हमें भरपूर दे। ३१ हे इन्द्र ! बसुत्नये राहे, चेरवे भागं विदाः, ४४ विश्यचर्पणे सुदन ! ना घुम्नं मंहय (३६६) गविष्ठये बावृपख (२४० )- हे इन्द्र ! पन देनेये लिए -हे सथ लोगोंके हित करनेवाले, उत्तम गत देनेवाले इन्द्र! अर, सदाचारी मनुष्योंको धन दे, गायोंको अपने पास रखने- हमें पन देकर महान् बना। की इच्छायालेको गाय देकर बलवान् कर। ४५ महित्वना राधांसि प्रचोदयते (३८६ )- है १२ दाशुषे रत्नानि धत्तं ( ३०६ )- दानशीलके लिए इन्द्र ! तू अपने पदाके अनुरूप ही पन देता है। रत्न दे, अर्थात् धन है। ४६ यः पुरा इदं यस्य न प्रा निनाय, ते इन्द्र ३३ या भुजा भगुरेभ्य मा भरा, अस्य स्तोतारं ऊतये स्तुये (४०० ) जो इन पहलेसे ही हमें पन देता वर्धय, ये च त्ये वृक्तयहिंप. ( २५४)- जो उपभोगफे आया है उस इनको हम अपने संरक्षण के लिए स्तुति योग्य धन है, उन्हें असुरोंचे पाससे ले आ, उनकी सहायतासे उपासकोंको महान् कर, जो तेरे लिए आसन फैलाते हैं, उन्हें ४७ यत् भाजयः उदीरते, कृष्णये धनं दीयते भी महान् कर। (४१४)- जब युद्ध शुरू होते है, उस समय दायितशाली योगेको धन प्राप्त होता है। ३४ अवमं वसु तव, मध्यम त्वं पुप्यसि. परमस्य विश्वस्य सभा राजसि, त्या गोपु न किः वृष्यते ४८ फंहनः १ क पसौ पः१ असान् घसी दधः (२००/- निष्ट पन तेरा है, मध्यम पनका तू पोषण (१४)-नदिराको मारता है ? रिसको धन देता है? परता है, परम श्रेष्ठ पनोपर भी तेरा हो मधिरार है, गाप यह सब तेरे ऊपर है, पर हमें पन दे । देनेवाले सेरा कोई भी प्रतिकार नहीं कर सकता। इन्द्र पन प्राप्त परता है और उन्हें अपने पाराकोरो ३५ अस्मत् पतिः कदाचन मा उपदसत् (२८७)- देता है, उन पनोंको सेकर उपारा उत्तम रिपतिमें रहते हैं, हमारा दान कभी भी नष्ट न हो। धनका अयं गाय, पोरे, रय, भूमि, सोना, एन और मरे २६ चित्रं वृपणं रयि दा(३१७- विलक्षण और बल गो, हमार, अयुत-इसहजार आरि शम्द भी मर्यो अपुरुन भी पदार्थ जिनरी राहापता मनुष्य एथयशाली होता है। मायाले पन हमें दे। ३७ ते दक्षिणं हस्तं वसूययः गृहमा ( ३१७ ) ४२ मधवा सहस्रेण शिक्षति (२३५)-हगारों पा प्राप्तिको ला ररनेवाले हम तेरे पायें हाथी परते दान देता है। है. (तू उस हापरो पम देता है)। ५० थीडी, स्थिर, पशाने पराभूत (२०७)- ३८ रया गोनां गोपति पिन ( २१७)- गार्यो तिमोरीम रो,स्थिर और भूमिपोंमें गो हुए ये तीन प्रकारे स्वामी है, यह हम जानते हैं, इसलिए व गाय है। धन होते हैं. ऐसा पहरा है। ३९. अहं सदा याचन् नुराधं ( ३०७)- मेरे में पामोहर, रपये इस पर होंगे एंगे गाम हमेशा मांगा रहनेगे पातु गुस्सा हो गया है? पाता है। सौ. हमार, रममा सामान गिने जाते ४० काशानं न याचिरत (३०)- अपने स्वामीसे ऐ. ऐगी कोई चीज होगी। यह विचारणीय है।
चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुशेष भनुवाद १९१९) . यह धन ऐसा होना चाहिए जो तिजोरी में रखा जा सके, शु-मन्तं - शव पारनेवाले, अन्न देनेवाले। कमें स्थिर रूपमें रखा जा सके, और भूमिमें पर्तन में बन्द इन शब्दोंके विधारसे यह ज्ञात होता है कि ये पन करके गाड़ा जा सके। सोनेके मोहरके रूपमें ये धन होंगे ऐसा चमकनेवाले अर्थात् सोने, चांदीके, हायोंमें अनेक संख्याम कुछ प्रतीत होता है। लेने योग्य और शन्द करनेवाले, आवाज करनेवाले होते माजकल सो, हजार, दसहजार तकके कागजके नोट होंगे। धातुके सिक्के अपरा विशिष्ट प्रकारले टुकडे ही में प्रयोगमें आते है, पर उस समय इसप्रकार कागजके नोट का हो सकते हैं । 'आ संगृभाय ' यह शब्द यह बताता है, कि प्रचलन नहीं या । रत्नोंफा प्रयोग था पहले, पर उन्हें भी लोग इनका संग्रह करते थे। इससे, में सिबके छोटे छोटे हजार, दमहनारोंको संख्याम देना सम्भव नहीं था, इस- टुफकि रूपमें थे, यह भी प्रतीत होता है। लिए सोने, चांदीको ही मुद्रा होगो ऐसा प्रतीत होता है। पर यह विचारणीय है। ६ नः सुगव्या अश्वया रथया महोना परिचस्य (१८६)- हमें उत्तम गाय, उत्तम घोडे और उत्तम रोसे यदि मैं धनवान हो जाऊं बो? रामद कर। इसमें गाय, घोडे और रय भी संपत्ति में ऐसा यदि में धमवात् हो जाऊं तो मेरो प्रतिष्ठा बढेगो, यह कहा है, पर यह पन 'ग्राभं' अनेक संख्याओंमें हायमें ग्रहण विचार प्रत्येक मनुष्यका स्वाभाविक है । इस प्रकारका एक करने योग्य, क्षु-मन्तं ' आपाज देनेवाले, और 'चित्रं वाक्य निम्न मंत्र आया हुमा है-- चमक वाले नहीं है । इस लिए गाय, घोडे और रयोंकी सम्पत्ति हजारोंको संख्या दिए जानेवाले पनसे भिन्न है। १ अहं यत् वस्वः ईशीय, में स्तोता गोपखा इस प्रकारका धन वैदिक कालमें उपयोगमें आता था। स्यात् ( १२२)- यदि मै घनका स्वामी हो जाऊं तो मेरी स्तुति करनेवाला गापका मित्र हो जाए। में पनवान हो यह विषय और भी विचारणीप है। जाऊं तो मेरो स्तुति होती रहेगी, ऐसा यहां कहा है। धनवान- रथ और घोडे को सब जगह स्तुति होती है। इन्द्र पनपान् है, इसलिए इन्द्र रम और रथ घलाने के लिए उत्तम शिशित उसको सब लोग स्तुति करते हैं। उत्तो प्रकार जो धनयान् घोडे भी उसके पास थे। होगा, उसको स्तुति सभी करते रहेंगे। पयोंकि स्तुतिसे १ मन्द्रः मयूर-रोमाभा हारेभिः आयाहि (२४६)- मसम होकर यह धन देगा । यहां प्रयुक्त हमा पन 'वसु' सुन्दर मोरके रंगके समान भयालयाले घोड़ोंसे है इन्द्र गौयोंके रूपमें नहीं है, यह व्ययहारमें थाने योग्य कोई पूसरा यहाँ आ । हो पन है, लोहमारोंको संख्यामें दूसरोंको दिया जाता था। २ःरीणां स्थाता (१९३)- घोडोंके रयमे येठने- २ स्पा घसु आ भर ( १३४ )- सुन्दर पसु नामका माला इन्द्र। पन हमें भरपूर दे। ३ पृपणा हरी उप युयुजे वृत्रहा आ जगाम ३ साना वसूनि आ भर (१९०)- यह इन्द्र हमें (२०८)- बलवात् दोनों पोडे उसने रयम जोड लिए है, यमुनामक पन देवे। और कुत्रको मारनेवाला इन्द्र मा गया है । ५ राधः कृणुष्व (१९४)- हमें धन है। ४ ब्रह्मयुजः फेशिनः हिरण्यये रपे युक्ताः मा ५ क्षुमन्तं चित्रं ग्राम दक्षिणेन था संगृभाय सहन्नं शतं हरयः त्वा आ वहन्तु (२४५ /- कहने {१६७)-दाद करनेवाले, लेने योग्य, विलक्षण था वाये मारसे हो रयमें ना जानेवाले सुन्दर अपरालवाले, सुनहरे हायसे संग्रह करके हमें दें। रपमें जोटे जानेवाले लारों और संका घोरे इन्द्रशे जहां इसमें "चित्र, माम, क्षुमन्तं"तीन पनके जाना होता है, वहां पहुंचाते हैं । इस धरनमें इनके पोर्ट विशेषण है। यहां उनका योग सा विचार करते हैं। कसे मुशिक्षित पे, यह बताया गया है। चित्र-मिलाण, पमरनेवाले, तेजस्यो। ब्रह्म-युजः- सूचनाके शम्द सुनकर ही घटकर सटे हो प्राम-हायरें लेने योग्य । जानेवाले, मंत्र योलते ही रपमें गुर जानेवारी । यह उत्तम - (१२०) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम् - 44 सुशिक्षित घोडोंका लक्षण है । इशारा होते ही खुद ब खुद यह गायोका वर्णन इस ऐन्द्र काण्डमें है। बहुतसी गायें जागकर खड़े हो जानेयाले । अत्यन्त सुशिक्षित घोडे ही ऐसा हमारे पास रहे, और दूध व घो खूब मिले, ग्रह तात्पर्य है। कर सकते हैं। इन्द्रकी माता केशिनः- उत्तम अयाल ( गर्दत के बाल ) वाले। हिरण्यये रथे युक्ताः- सोने रथमें जोडे १ इन्द्रं त्या देवी जनिती अजीजनत् (३७१ )- जानेवाले। तुझ इन्द्रको सबको उत्पन्न करनेवालीद्यायाथिको इन देवियोंने सहस्रं रातं हरया-हजारो अयवा सो घोडे । उत्पन्न किया । इस इन्द्रकी दो मातायें है। एक रथ में हजार अयदा सो घोडोका जोडा जाना सम्भव २ यन्यानासः ईखयन्तीः अवस्युवः जातं त नहीं । इन्द्रपे साथ दूसरे अधिकारी भी होगे, ये घोडे उन्हींके उपासते ( १७५ )- स्तुतिके योग्य, गति करनेवाली, होंगे। बडे लोगोंके रथके साथ अनेक घुडसवार होते हैं, उसो निरन्तर कार्य करनेवाली उस माताका यह मतदालो पुत्र प्रकार इन्द्र के साय भी होंगे । अथवा आल्फारिक भाषामें उत्पन्न हुआ, उस पुत्रको यह उपासना करने लगी, उसके यह " किरणों" का वर्णन होगा क्योंकि अनेक स्थलपर पास रहकर उसकी सेवा करने लगी। 'हरी" दो घोडोंके जोडे जानेका वर्णन है। दो घोडोका एक स्थानपर बैठकर स्तुति करना रपमें जोड़ा जाना सम्भव है। अत हजार और सौ यह वर्णन आलकारिक होना चाहिए अथवा किरणोका वाचक की उपासना मार्य लोग करते थे। एक स्थानपर बैठकर, सब सगठित होकर इन्द्र परमेश्वर होना चाहिए। १ तत् सचा गाय (११५)- उन स्तोत्रोंको एक गाथ स्थानपर बैठकर गावो। इन्द्रका सम्बन्ध जैसा घोडके साथ है, वैसा ही गायोके २ आइत, निपीदत, इन्द्र अभिप्र गायत(१६४)- साथ भी है। जैसे- आओ, चंगे और, सब मिलकर इन्द्र के स्तोत्र गाओ। १ यशस्य मही रसुदा (११७)- यज्ञके लिए बहुतसा दूध देनेवाली गायको आवश्यकता होती है, क्योंकि यजमें ३ इन्द्रं इत् सवा स्तोत, मुहेः शंसत ( २४२)- इन्द्रको बुलाया जाता है। इन्द्रकी एक जगह बैठकर स्तुति करो और उसकी बारवार २ उभा कर्णा हिरण्यया (११७ )- गायके दोनों स्तुति करो। फान सोनेके चिन्हसे मुशोभित होते है। ४ यामनि जीवाः ज्योतिः अशीमहि (२५/- ३ ना रेवती तुषि-याजाः सन्तु (१५३)- हमारी यज्ञमें एक जगह मिलकर स्तोत्र गायें और तेज प्राप्त करें। गायें बहुत दूध देनेवाली हों। ५ सत्राच्या धिया मघवान् आगमत् (२९० }- ४ श्रवलः च कामः गोमति मजे नः आ मज एकत्र बैठकर गाये गये स्तोमोंको सुनने के लिए इन्द्र आता है। (३१८)- बल अयया अन्नको इच्छा करनेवाला तू हमें ६ विध्या योजसा दिवः पति समेत ( ३७२/- गाोंके गोष्ठको दे। गाकि गोप्टमें हम रहें । अपने बलसे युलोकके स्वामी इन्द्रको एक जगह इस्ले ५ सयर्द्धयां सुदुर्या उरुधारां इपं धेनुं इन्द्रं होकर बेदकर स्तुति करो। आहुपे ( २९५)- दूप देनेवाली, सरततारो बुहनेवाली, ७ बयो यथा, त्या सीदन्त अभिनोनुमा (10)- बहुत दूध देनेवालो, मनरूपी गायके लिए इन्द्रको में प्रार्थना पक्षी जैसे एक जगह इकट्ठे होते है, उसी प्रकार हम भी एक जगह इकट्ठे होकर उसे नमस्कार करते है। ६ नः गब्यूति घृत' या उक्षतं { २२० )- हमारे ८ सयमाघे आपिना वृधे भय ( २३९/- या गार्योरे स्थानोपर धीको वर्वा हो, हमें भी बहुत मिले। स्थानमें एकत्र बैठकरत पद! हमारा मित्र हो, औरहमारी ७ धेनवः गायः वत्स ( २०१)- बार गाय भपने उमतिमें सहायक हो। पछाके पाम जाती है। जहां पज्ञ होता था, यहां सब मा मातेचे, एक जगा (१२) चतुर्थ अध्याय ] सामवेदका सुवोध अनुवाद बनता है। इकट्ठे होकर बैठते थे और सब मिलकर इन्द्रको प्रार्थना, (२४४ )- यह इन्द्र जोउनका कोई साधन न होते हुए भी स्तुति और उपासना करते थे और एक जगह बैठकर प्रार्थना किसो सपिके टूट जानेपर शीघ्र जोर देता है, और धनवान, परने कारण उनमें एकता थी । एक जगह इस्ले होनेका बहुत ऐश्वर्यवान् इन्द्र टूटे हुए भागोंको उत्तम रोतिसे फिर यह लाम है। जोड देता है, और घावोंको ठीक करता है। ज्ञानी कैसे होता है ? शस्त्रास्त्रोंसे युद्ध करनेवाले वीरोंको इसका ज्ञान आवश्यक है। युद्ध में शास्त्रों जहम तो होने ही है, पर उनको शीघ्र १ का ब्रह्मा त इन्द्रं सपर्यति ( १४२)-कौन ज्ञानी उस इन्द्रकी उपासना करता है। एक त्यानपर बैठकर हो ठीक करने का ज्ञान होना मावश्यक है। इन्द्र इस विद्या, उसको प्रार्थना करनेसे बानको वृद्धि और सामयं प्राप्त देवोंमें मश्विनीकुमार इस कार्यमें निपुण है, पर इन्द्र वीर कुशल है, इसे उपरोक्त वचन स्पष्ट करता है। अन्य होता है। २ उपहरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया निनो होते हुए भी घावोंको ठीक करनेमें वह कुशल है । यह पहां द्रष्टव्य है। अजायत (१४३)- पर्वतको उपत्यका और नदीके सगम पर बंटकर अपना मन उस परमात्मा लगानसे महाज्ञानी दुास दूर करना इन्द्र दूसरोके दुःख दूर करता है । इस विषयमें निम्न शागो बनने के लिए ऐमो तपस्या करनी चाहिए । पर्वतपर मत्र है- और नदोश सगमपर मनकी एकाग्रतारे लिए अनुकूल १ दुप्पप्न्यं परासुव (१४१)- बुरे स्वप्नोंको और वातावरण मिलता है । घरमें भी परि एकान्त स्थान मिले उनके कारमोको दूर कर । दुख देनेवाले स्वप्न आये हो न मौर मन एकान हो इसके लिए आवश्यक तय्यारो करके ऐसार। साधना प्रारम्भ होनेपर मन एकाग्र होनेसे जो लाम होने २ नितीनां परिजं वेत्थ ( ३९६ )-दुखोंको दूर सम्भव है, ये लाभ हो सक्ते हैं। थोड़े अधिक षष्ट होंगे, से दिया जाए यह तू जानता है । यस इतना ही है, पर लाभ होगा अवश्य । ३ अहः यहाशुन्भ्यु परिपदांवर ३९६)-प्रति- इन्द्रका रथ और वज्र दिन अपनी शुद्धता करनेवाला अपनी अनिष्ट अवस्था पूर २ अनया (मभवः) ते अश्याय रथं ततश्च ,त्वष्टा करता है। उसी प्रकार रोज साफ रहनसे विपत्तिया दूर घुमन्तं वनं ( ४० )- मनुष्य कारीगर भुषोंने इन्द्र के होती है। घोडोके लिए रथ बनाया, और देवों कारीगर त्यष्टाने ४ अमीरां अप दुर्मति अप, नः संहसः अप इनके लिए तेजस्वी वस तैय्यार दिया। युयोतन ( ३९७ )- रोग दूर करो, दुईद्धि दूर करो और उत्तमसे उत्तम त्य और वय लेकर इन्द्र उत्तम प्रकारसे हमसे होनेवाले पाप दूर करो। दुष्ट वृद्धि दूर होनेगा मर्य तप्पार हो जाता था, और शुभु रप इत्यादि बनाते थे और है, पाप दूर होना और पाप दूर होनेवा मतलब है रोगोश त्वष्टा फौलादके यन्त्र बनाकर इन्द्रको देता था । युद्ध करने- दूर होना । वाले वोरोंको उत्तमसे उत्तम शस्त्रास्त्र बताना आवदयर है, ५ द्विपः अति नयति, मन्य अंहःम, दुरितं नहीं तो युद्ध में विजय गिलना अत्यन्त कठिन हो जाता है । न मष्ट ( ४२६)-जिसे शत्रुसे दूर ले जाया जाता है, उस इन्द्र के पास ऋभ, स्वप्टा आदि उत्तम कारोगर है, और मनुष्यको पाप नहीं लगता और दुष्ट माय भी उसरे पारा युद्ध के लिए मावश्यक शापोंका उत्तम रीतिसे निर्माण करते नहीं आते । । इस कारण इन्द्र सदा ही विजयी होता है। पापके कारण दुध उत्पन्न होते हैं, इसलिए अपने पापरी प्रवृत्ति न हो, अन सावधान रहना चाहिए । अपना शरीर, इन्द्र जरूम ठीक करता है मन, इन्द्रिय गुल रहें, पापरी प्रवृति दूर होइन भरे १ यः अभिधिपः मने चित् जत्रुभ्यः आदः पुरा होनमे हमसे दुल स्वय ही दूर हो जायेंगे, और हम गुणी सधि संधाता,मघया पुरु-चमुः बिहुनं पुनः निष्कर्ता होंगे। पापसे दूर होनेरा यह प्रपल प्रत्येक्रोना चाहिए। १६ (माम हिन्बो) (१२२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्रं काण्डम् घर कैसे हों विरुद्ध आचरण न करना हो शत्रुरहित है, तेरे ऊपर शासन करनेवाला कोई नहीं है। तेरा भाई कोई नहीं, युद्धसे तू नाईपनेको इच्छा करता है । हम विरुद्ध आचरण न करे, इस विषयमें आगेके मत्र देखें- इन्द्रका कोई भाई नहीं, इस कारण भाईबन्यका सडा १ न कि इनीमांस ( १७६ )- हम कोई हानिकारक उसके लिए कुछ है ही नहीं। इन्द्र पर शासन करनेवाला काम नहीं करते। भी कोई दूसरा नहीं है, क्योंकि यह हो सर पर अधिकार २न फि आयोपयामसि ( १७६ /- हम कोई विरुद्ध करता है। इसको बिसी मित्रको भी कोई आवश्यकता नहीं, वार्य नहीं करते। क्योंकि यह इतना सामग्वान् है, कि यह अकेला ही सारे ३ मंत्रश्रुत्यं चरामसि ( १७६ )- मत्रोंमें जो उपदेश शत्रुओं का नाश कर सकता है। यह युद्ध द्वारा सब शत्रुओंको किया है। उसोका हम आचरण परते है। दूर करता है, इस कारण जिसके शत्रु दूर होते है, यह इससे ४ हे आर्यण। दोपः भागात्. सवितारं देवंस्तुहि प्रेम करता है । इस प्रकार इसके चाहनेवाले मित्र बहुत है। ( १७७ )- है अपर्ववेद के अध्ययन करनेवाले । यदि तेरे पर वे इन्द्रको युद्ध कुशलताके कारण ही मिले है। आचरणमें कोई दोष हो गया हो तो जगत्के उत्पन्न करनेवाले देवकी स्तुति कर। " सविता चै सर्वस्य प्रसविता" सविता यह सब १ त्रिधातु त्रिधरूयं स्वस्तये छर्दिः दियुं शरणं जगत्का उत्पन्न करनेवाला देव है । उसको स्तुतिसे सब मा [देहि ] ( २६६) - तीन मजिल, तीन छापरवाले, दोष दूर होते है। रहनेवालोंका कल्याण करनेवाले, आश्रयके योग्य और उत्तम ५ उग्नं वचः अपायधीः (३५३ )- क्रोधयुक्त बातें न प्रकाशयुक्त घर मुझे है। कर, इससे बहुत कष्ट होते है। घर तीन मजिलोंवाले हो, तीन भागवाले हों, उसमें बहुत ६ अवतः न हिनोति, कामं रपि न स्पृशते (४४३) प्रकाश आवे रहनेवालोका कल्याण हो, उसमें लोगोको - शुद्ध आचरण न करनेवाला मनुष्य उस उच्च स्यामको रहनेको इच्छा हो, ऐरो सुखकारक पर हों । नहीं पा सकता । जितना चाहिए उतना पन नहीं पासक्ता। दीर्घायु हों ७ विद्वान मित्रः नः ऋजुनीती नयति ( २१८)- ज्ञानी मित्र हमें सरल मार्गसे ले जाता है। १ पातः नः हृदे शंभुः मयोभुः भेषजं आवातु, नः यायूंपि प्रतारिपत् ( १८४ )- वायु हमारे घरमें हृदयको ८ यं अद्रुहः पान्ति ला मर्त्यः सुनीथ घ(२०६) सुख और मारोग्य देनेवाले औषष अपने साथ लाये, इससे - जिसकी द्रोह न करनेवाले देय रक्षा करते हैं, यह मनुष्य हमारी अप लम्बी हो । घरमें शुद्ध वायु आवे, उसके साथ सुनीतिसे चलनेवाला होता है । उत्तम मार्गसे चलनेवाले आरोग्य देनेवाले, शुभ गुण हमारे घरमें मनुष्योंको प्राप्त हों, मनुष्यको देवोंके सरक्षण मिलते हैं, इसलिए सदाचारसे और इस कारण हम सब दीर्घायु हो। बर्ताव करें, यह वेदमें कहा है। २ नः तुचे तुनाय जीवसे दाघीयः आयु सु ९पि-प्रतानां धर्तारं वरण वपा गिरा बन्देत कृणोतन { ३९५ )- हमारे पुत्र पौत्रोंको दीर्घजीवन उतम ( २८८ )- विशेष शुद्ध नियमों के पालन करनेवाले वरुणको रौतिसे प्राप्त हो । स्तुतिपूर्वक वन्दना करें, और उसके समान स्वय मी उत्तम नियमोंका पालन करें। ३ सुवीराः शतहिमाः मदेम (४५४ ) - उत्तम वीर पुष्टिकारक अन खावें सन्तान हमारे हों, और ये सब सौ वर्ष तक आनम्बसे रहें। १नः इषं पीवरी तृणुहि (४५५/- हमारे अन्न यश प्राप्त हो अधिक पोपण करनेवाले कर, और ऐसे अन तू ला । १ त्वादातं इत् यशः (१९५)- तेरी सहायतासे यश मिले। भाईबन्ध कोई नहीं २ शवसा पति. यशाः असि ( २४८)-तूबरका १ त्वं जनुषा अभ्रातृव्या, अ-ना, सनात् अनापिः, स्वामी है, और यशस्वी है। युधा इत् आपित्वं इच्छसे (३९९)- हे इन्द्र ! तू जन्मसे इसलिए हम यशस्वी हों, ऐसा कर ।
चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद (१२३) दाली बनाया। भूमि घूमती है ६ सोमः विश्वासां सुक्षितीनां चेततुः ( १५४ )- सोम सब उत्तम मनुष्योंका उत्साह बहाने वाला है। भूमि घूमती है, इस विषयका मागे मत्रभागमें उल्लेख है- ७ नि पूत ( १५९ )- सोमरस छानकर शुद्ध क्यिा १ भूमि व्यवर्तयत् ( १२१ )- उसने भूमिको फिरने- जाता है। ८ दध्याशिरः सोमामः ( २९३ )- सोमरसमें दही चन्द्रको सूर्यको किरणे प्रकाशित करती है मिलाकर वह पिया जाता है। १ गो चन्द्रमस. गृहे त्यष्ट अपीच्यं नाम ९ आशीर्धान ममत्तु ( ३५० )- दूध आदि जिसमें अमन्वत ( १४७ )- प्रकाशित होनेपाले चन्द्र मण्डल, मिलाया जाता है, ऐसा वह सोमरस हमारा उत्साह यदाता है। सूपंकी गुप्त किरणें विलीन होकर उसे प्रकाशित करती है, १० रायन्तमः घुसवनमः सोमः (३५१ }- शोभावाला और तेजस्वी सोमरस है। ऐसा माना जाता है। ११ पुनाना हरिण्या रुचा विश्रा द्वेपालि तरति विद्यादेवी (४६३ )- सोम शुद्ध होकर अपने हरे रंग तेजसे सभी १ पावका वाजिनीवती घियावसुः सरस्वती शआँको मारता है। उसके पनि इतना बल अगम बढ़ता है। (१८९)- पवित्र करनेवाली, अम और यल देनेवालो, बुद्धि १२ धारा रोचते । पुनानः हरिः अरुपः (४६३)- बढाकर धन देनेवाली, सरस्वतीदेवो है। इस सोमरसको पारा चमकती है। छाननेके बाद पह सोमरस चमकता है। सौभाग्य प्राप्त हो १३ रसिमः गोमतः सुतम्य पिन ( २३९)- गायके २ अध नः प्रजावत् सौभगं सावी ( १४१)- दूध मिश्रित सोमको पो। आज हमें उत्तम सन्तानोंके साथ सौभाग्य दे। १४ सोमं सुनोत । पक्ती पचत (२८५/-सोमरस २नः मूळयासि ( १७३ )-हमें तू मुखी करता है। निकालो और पुरोडाशको पकाओ। ३ स्तोतृभ्यः मृळय ( २१३ )- स्तुति करनेवालोंको १५ धानावन्तं करम्भिणं अपूपचन्तं उक्थिन नः प्रातः जुषस्व (२१० }- धानको खीलते मिश्रित, पुरोडावास ४ इन्द्रापूपणा घयं स्वस्तये सख्याय वाजसातये तया स्तोत्रोंसे मुक्त हमारे इस सोमरमको सबेरे पी। (पाना- हुयेम ( २०२ )- हम इन्द्र और पूधाको अपने शल्पाणके वन्त) धानको भूजकर उसका आटा सोमरसमें मिलाते हैं, लिए, अपने साथ मित्रताके लिए, अप्न और बल बढ़ानेके (काम) एतू मिले हुए दहीको करम्भ कहते है, (अपूर्ण) पुए और धान घोन सोमके साप पाये जाते हैं। यह इन्दरा सबेरेका नाश्ता है। सोमरस १६ अश्मया नता अंशुना क्षपमाणः, यथा आदन्, पत्रको यससे बुलाया गाता है, वह माता है और भासन इत्यं उ(३०५)- पायरोसे लोग पीसके कारण पनमान पर बैठता है, उसके बाद उसे सोमरस दिया जाता है । उन क जाने पर भी बहुतसा मन सानेवाले रामाफै समान, सोगारसोपा पर्णन इस प्रकार है- सामर्यवान ही होता है, निर्यल नहीं होता। २ बन्यः (१२४)-सोमरस यह मार है। सोमलता यह एक वनस्पति हिमालयके मौजवान शिर २ धुनितमः ( ११६)- सोमरस तेजस्वी है, यह र उगती यो । १०-१२ हगार पोटको ऊचाई पर मिला। पाता सोम अत्युत्तम माना जाता था, यज्ञमें यह सोमलता ३न्दुः। १४५/- मन्द समान यह धमकता है। माई जाती थी, अथवा गाववालोंसे परीदी जाती थी। पह ४ तेन नूनं मदः (११९)- उससे उत्साह और आनन्द पता पत्यरोसे कूदी जाती यो, योर हायसे अलियोंसे पेसाकर उमरा रस निकाला जाता था, उसके बाद उसे ५ यया शिरः (१४५ )- जोका भाटा और दूर भरोप छलनीसे धान कर उसमें पानी, दूध, दही मिलाया मिलार उसे रिया जाता है। जाता था, हर भी उसमें मिसाया जाता पा, सम यह पीरे - सुखी पर। लिए बुलाते हैं। धमपता है। मिलता है। * (१२५) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ऐन्द्रं काण्डम् इन्द्र स्तुत्य है लायक होता था। केवल रस तीखा होता था, उममें पानी, इन्द्रकी स्तुति वही अथवा दूध मिलाकर थोडा शहद मिलानेसे वह पीने के १ योधन्मना शमः आशिष शृणोतु (१४०)- योग्य होता था। यह रस अन्धेरेमें चमकता था । इसके साथ पुमा, बडे, हमारे मनको इच्छा जाननेवाला सामर्थ्यवान् इन्द्र हमारी स्तुति सुने। सोले और पुरोडा आदि खाने के लिए दिया जाता था। इसको पीने के बाद शूर पुरुषोंमें महान उत्साह उत्पन्न होता था, मंहिष्ठं इन्हें प्रस्तोत (१४४ )- मनुष्योंके सम्राट, २ चर्पणानां सम्राजं, गीर्भिः नव्य, नृपाहं नरं और उस उत्साहमें वीर पुरप महान् शौर्यके काम करते थे। स्तोत्रोंसे स्तुति करने योग्य, शत्रुका पराभव करनेवाले, नेता इन्द्र यह रस पेट भरकर पोता था, दूसरे लोग भी इसे महान् इन्द्रको स्तुति करो। पोते थे। आनन्द बढानेवाला उत्साह बढानेवाला यह पेय ३ जतये सुरूप-रखें धषि विजुहमसि (१६०)- होता था। यज्ञमें यह पेय तय्यार किया जाता था। हमारे सरक्षणके लिए, उत्तम रूप करनेवाले इन्द्रको हम हवन के करने के बाद यह पिया जाता था। यह सोमरसका प्रतिदिन बुलाते हैं। वर्णन है। ४ इन्दं गिरा अभि प्र अर्च । १९८)- इन्दको स्तुति करो। इद्र बहुत पराक्रमी है, इसलिए उसको चारों ओरसे ५ इन्दं वाणी अनूपत ( १९८)- इन्द्रको हमारी वाणो स्तुति करती है। स्तुति की जाती है । देखिए- ६ ते गिरः असून, वृषभं पति त्याप्रति उदहासव १ पुर-हतः ( ११५ )- बद्भुत लोप जिप्तको स्तुति (२०५ )- तेरी स्तुति हमने को, यह बलवान स्वामी तुझ करते है। इन्द्रको पहुंच गई है। २ गिर्वणः (१६५)- प्रशसनीय । ७ महे प्रचेतसे देयाय कदु वचः शस्यते, तत् ३ त्वदन्यः गिरः न हि सघत् ( ३७३ )- तुम्न इत् अस्य वर्धनम् ( २२४ )- महान् ज्ञानी इन्द्रको इन्द्र के सिवाय और किसीकी स्तुति नहीं होती। साधारण स्तुति भी उसके महत्त्वका वर्णन करती है। न्या आरभ्य चरामसि,ते इमे वयं ते (३७३) ८ यथा विदे सु-राधसं इन्दं अभि अर्च (२३५) -जो तुहासे स्तुति करना प्रारम्भ करते है, ये ये हम तेरे ही जता जानते हो, देसा हो इन्द्रको माराधना करो। है, तेरे भक्त है। ९ अन्यत् मा चित् विशंसत, मा रिषण्यत, ५ महान असि ( ३४६)- इन्द्र 'तू महान है। वृपणं इत् स्तोत ( २४२) दूमरा कुछ न करो, धेशर ६ विभ्या गिरः समुद्र-ट्यचसं, रथीनां रथोतम, प्रयत्न मत करो, बलवान् इन्दको ही स्तुति करो। पाजानां पति, सत्पर्ति इन्द्रं अचीवृधन् ( ३४३ )- सब १० इमा गिर या वर्धन्तु ( २५० /- यह स्तुति स्तुतियां, समुद्र के समान विस्तीर्ण, रथियोंमें मुख्य, बलोंके तेरा प्रभाव बढाती है। स्वामी, सज्जनों के पालना इन्द्र के यहाको बढ़ाती है । ११ पासवर्णाः शुचयः विपश्चितः स्तोम. ७ याजानां यानपतिः, हरियान् इन्द्रः उपथेभिः अभ्यनूपत ( २५० )- अग्निके समान तेजस्यो शुद्ध शानो मन्दिष्ट ( २२६ ) बलोंके और अनके स्वामी, घोसी स्तोत्रोंसे इन्द्रको स्तुति करते हैं । रखनेवाला इन्द्र स्तोत्रोंसे प्रशमित होता है। १२ गृहते ब्रह्म अर्वत ( २५७)- महान् इन्द्र के लिए ८ तव इदं सन्यं अस्तृतं ( २२९)-तेरी यह मित्रता स्तोत्र कहो। २३ इन्दं नः ब्रह्मााण उप भूपत ( २६७)- दो ९त्पदन्या माईतान अस्ति ( २४७ )- तेरे सिवाय हमारे स्तोत्र अलकृत करते है। स्तुति योग्य और भोई भी नहीं है । १४ गायाप्रेण. त्य गायन्ति, आणि. घर १० काची-पमः (१९९ - वेदमसि इस इन्द्रको अर्चन्ति, ब्रह्माणः त्वा उमिरे (३४२)- पापन स्तुति दी जाती है। गर्नेवाले मनुष्य तेरे स्तोत्र गाते है, उपासक तेरी उपासना अटूट है।
सामवेदका सुबोध अनुवाद चतुर्थ अध्याय] वर्णन करते हैं। जाती है। करती है। करते हैं, और बाह्मण तुरा इन्द्रका यह सबसे श्रेष्ठ है, ऐसा उपमा वेदोंमें उपमा देकर विषय समनाया जाता है, ये उपाय १५ शुद्धन साम्नाशुद्धः उक्थैः, शुद्धं इन्द्रं स्तयाम ( ३५० )- मुद्ध सामगानसे, शुद्ध स्तोत्रोंगे । इन्द्रको ऐन्द्र-काण्डमें इस प्रकार है- स्तुति करते है। १ गये शं न ( ११५ )- गायको जैसे पास सन्तोष १६ भप्रहणं शवसः पति विश्वासाहं नरं शविष्ठं देते है, उसी प्रकार ये स्तोत्र ( शाकिने इन्द्राय शं) विश्ववेदमं इन्द्रं गृणीषे ( ३५७ )- पामिकोंका सरक्षण शक्तिमान् इन्द्रको सन्तोष देते हैं। परनेपाले, बलके स्वामी, सब शवभोंका नाश करनेवाले, २ पुष्टावन्तः यथा पशुं । १३६ )- जाल हायमें लिए नेता, सामर्यवान्, सयंता इन्द्रकी स्तुति करो। शिकारी जैसे पशको खोजते हैं, उसी प्रकार हम (त्या विचक्षते ) तुझ इन्नको खोजते १७ विया ओजसा दिवः पति समेत ( ३७२ )- सय सामयंसे धुलोको पालक इन्द्रको एक स्थानपर समुद्रको प्राप्त होती है, उसी प्रकार (विश्या कृष्टयः विशः ३ सिन्धयः समुद्राय इव ( १३७ )- नदियां जैसे बैठकर उपासना करो। अस्य मन्यये संनमन्त) सय प्रनायें इस इन्द्र के उत्साहके १८ यः एक इत् जनानां अनिधिः भूः ( ३७२ )- भागे झुकती है। जो अकेला ही इन्द्र अतिथिके समान लोगोका पूज्य है। ४ गायः धेनवः वत्संन ( १४६ ) जैसे दुधारु गाय १९ गृहतीः गिरः चर्पणी-धृनं इन्द्रं अभ्यनूषत बछडेके पास जाती है, उसी तरह हमारो (इमाः गिरः ( ३७४ )- बहुत स्तुतियां मनुष्योंके पूज्य इन्द्रको स्तुति त्या अभि प्रनोनुयः ) ये स्तुतियां तुझ इन्द्र के पास २० अयसे इन्द्र सुवृक्तिभिः महय ( ३७७ )- अपने ५ सुदुयां गोदुहे इथ ( १६० )- उत्तम दूध देनेवाली संरक्षणके लिए इन्द्र के महत्त्वको उत्तम वचनोंस बढावो। गायको जिस प्रकार दूध-दुहुनके समय युलाते है, उस तरह २१ शतं आयवृत्याम् (३७७)- इन्द्रको स्तुति सैकडों ( ऊतये सुरूपकृत्तुं चवि थावे जुहमसि ) अपने समय करो। सरक्षणके लिए उत्तम रूप करनेवाले इन्द्रको रोज बुलाते है। इस प्रकार इन्द्रको स्तुति की जाए, यह इस वर्णनका ६ द्यौः न ( १६६ )- जिस प्रकार धुलोक विस्तीर्ण उद्देश्य है । इन्द्र के गण गानेवाले, सुननेवाले और दूसरे लोग है, उस प्रकार (शवः प्रथिना)इस इन्द्रका बल विस्तृत है। जो समामें है, उन सबका लाभ इस स्तुतिक श्रवणसे होता ७कपोतः गर्भधि इव (१८३)-जिस प्रकार कबूतर पाबूतरीके पास जाता है, उसी प्रकार (अयं ते) यह तेरे " वज्रपारो, शुरवीर, पराजित न होनेवाला, हमेशा पास आता है। विनपो, सब शत्रुओंको एक साथ मारनेवात्ता, युद्धमें किसीफे ८ सिन्धवः समुद्रं न (१९७)- जिस प्रकार नदियां मागे न झुकनेवाला इन्द्र है। समुद्रको प्राप्त होती है, उस प्रकार (इन्दवः त्या आधि. यही इन्द्रको स्तुति है । वारदार यह कहा गया है। बार- शन्तु ) ये सोमरस तुझे प्राप्त होते हैं। भार सुननेसे अपने मनपर उसका परिणाम क्या होगा ९ साभु क्रभुक्षणं पिन (१९९)- कारीगरको इसका पिचार पाठक करें। इस स्तुतिको करनेवाले में और जिस प्रकार पोषण करनेवाले अन्न मिलते हैं, उसी प्रकार मुननेवाले में, मेरे अन्दर ये गुण आवें, ऐसा भाव उत्पन्न होता (वाजी वाजिनं ददातु नः ) बलवान् इन्द्र हमें पन देवे । है, और यदि वह यल करे तो कुछ दिनोंके अनुष्ठानसे उसमें १० वाजयन्तः शर्वि यथा (२१४) अन्न उत्पन्न पे गुण ना जायेंगे और तब यह सूर बन सकेगा। स्तुतिसे करनेवाले जिस प्रकार कुंके पानीसे खेतको सींचते है, उसी यह लाभ होता है देवोंके गुण मुझमें भावें ऐसे विचार प्रकार ( मंहिष्ठं इन्दुभिः सिंच ) महान् इन्द्रको सोमरसो- आनंका मतलब है कि उन्नति प्रारम्भ हो गई। उसके आगे से सींची। उन गुणोंको अपने अन्दर लानेका यल करना चाहिए। ऐसा १५ युवजानिः महान् इव ( २२७ )- तरुण स्त्रीका जो यल करेगा वह थेष्ठ होगा इसमें कोई शंका ही नहीं है। पति जिस प्रकार स्त्रीके पास जाता है, उसी प्रकार ( सुतं " सामइका सुबोध अनुवाद [पेन्दं काण्डम् जाते हैं। उप याहि ) इस सोमरे पाप्त सूमा। इसमें समान मनके शिक्षा देता है, वैसे हो (नः शिक्ष) तू हमें भी शिक्षा है । आम्र्पणका वर्णन है। २२ आप. न ( २६१)-जैसे पानी सोममें मिलाया १२ सुतं चाताप्याय श्मशा (२२८)- सोमरसमें पानी जाता है, बसे हो हम तुझे प्राप्त करते है। मिलाने के लिए लोग जिस प्रकार पानी नहारे पास २३ सूर्य श्नायन्तः इव ( २६७ ) जिस प्रकार किरणे जाने है, उसी तरह ( दीर्घ सुनं फदा अवारुध्यात) सूर्यका सहारा लेती है, उसी प्रकार (विश्वेत् इन्द्रस्य इस महान् यतमें तुझे ताने लिए तेरे पास पर मायें ? मक्षत) सब विश्व इन्द्रका आश्रय लेता है । १३ अटुग्धा. धेनर न ( २३३ )- जिस तरह लोग २४ भागं न। २६७)-पिताके परे भागको बिस न दुही गायके पास जाते हैं, उसी तरह (अम्य जगतः तह पुत्र पानको इच्छा करता है, उसी तरह (प्रति तस्थुषः ईशानं स्वत्या अभिनोनुमः ) इस स्थावर दीधिमः) हम अपने पितारे धनमैरो हिस्सा मिले ऐसा य जगम जगतके स्वामी और आत्मज्ञानी हम तुझे नम्र चाहते हैं। होकर कर मिले? २५ निधया पद्धान् इव (२१)-सत्यनमें पाएको १४ स्वसरेषु धेनवः पन्सं न ( २३६ )- गौशालाम जैसे मुक्त किया जाता है, उसी तरह ( भस्मान मुमुग्धि) दुपार गाय जिस तरह अपने यहडेके पास जाती है, उसो हमें मुक्त कर । प्रवार (दसं नानीपह इन्द्रं गीर्भिः अभि नवामहे । २६ चक्रिया भक्षेण इच ( ३३९)- जैसे पर पुरिये मुन्दर और मायुको हरानेवाले इन्द्ररे पाम स्तुति करते हुए आधारपर रहते हैं, उसी तरह (पृथिवीं उत या विध तस्तंभ) पृथिवी और दोनों ही सोशेरो यह आपार १५ सुद्यं नेमि त्वष्टा इव ( २३८ )- उत्तम सरोगे देता है । पुराणो यई जिस प्रकार उत्तम बनाता है, उमी तरह २७ वंशं इव त्या उधेमिरे ( ३४२)- यास जैसे पार (पुरहतं गिरा आ नमे ) पहनों द्वारा प्रमसित इन्टरो उठाते हैं, उस तरह सुप्से उन्नत करते हैं। इन्दगी स्तुती मंप्रणाम पर अनुरल बनाता गावर इतर पक्षको पाते हैं। १६ पाशिनः धन्या व नानु अति आयाहि (२४६) रिसे अन्तरिम भर देता है। उस प्ररार (इन्द्रियं २८ सूर्यः रश्मिभिः रजान (३४७)-जैसे सूपं मानी -शा हायर्याप धारण करोवाले सिगरी जिग तरह रेगिस्तानको पार पर जाते हैं, उस प्रकार व दुष्टोंगे पार लाभा एणपतु ) तेरी इडियको दाविन तो मर है। २९ रथीःश्व (३४१)-यमें मंठनेवाले वीर जंगे १७ पाशिनः न, मा त्या नियेमुः, पहि ( २४६ )- अपने इच्छित स्थानपर पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हमारो मा लिए इए शिकारी निर प्रसार पदियोरी परते हैं, (गिरः ) सतिया तो पहफ्नोई। उस प्रकार तो बीच कोई भी न पर, एमारे पाम मा। ३० यासं घेनयः गायः इव (३४९)के पास १८ याजयन्ता रथाः च ( २५१)- अन्न लेरा आने तेरे पाग हमारी स्तुति पहपती है। दुपार गाय जाती है, उस सरह (सामभि अनूपत) पाले रपमान (मधुमत्तमाः गिरः त्या उदारते ) ३१ रथं यथा { ३५४ )-रपा अंगे हम पलाय मपुर स्तोत्र तो लिए पोले जाते है. ये समता पहुंचते है। मपो इग्नि पान से जाते है. उगी तह (इन्द्रमा १९ यथा गौरः (मृगः ) गध्यन् अपारतं हरिणं पतंगामाम) हम पामें है। पनि ( २५२ )-जिम प्रशार प्याका हिण पाव भरे ३.हन (३६५)-हम पापमे से अपने ती हुए तामारे पाग जाता है, उसी प्रकार (मातृय तरा(सिसने भी अपना पापरते है। आगदिमारे पाग मारीमा। ३३ धोणीःश्य (२७)- गायोगे सो पार २० मा न ( २५३) - भाग्यशारे समान ( या रेली(नः पया प्रति वर्ग) गीतर हमारी पसुधिर स्या परामरामि) पायी, पावा तेरो एग स्पोरारपर मारामा ४ यथाजनया मगनिfranA110५/- २१ यथा पुरेश्या पिला (२५९)-जो पुर्णपिm से रिपो मपने पति मालिनी गातार कर मार (१२७) चतुर्थ अध्याय] सामवेदया सुबोध अनुवाद (ऊतये इन्द्रं स्वर-युवः मतमः अच्छा अनृपत) अपने सरक्षणके लिए इन्द्रको मात्मज्ञानयुक्त अपनी स्तुतिसे प्राप्त ४ त्वं सहसः बलात् ओजसः आधिजातः (१२०) - तू शत्रुको हरागंगाले बल और श्रेष्ठ सामरी उत्पन्न होते हैं। ३५ उपा इव (३७९)-उपा जिस प्रकार प्रकाशमै ५ भूमि व्यवर्तयत् । १२१ )- उसने भूमिको घुमाते विश्वको भर देती है, उस प्रकार तू (उभे रोदसी आ हुए स्थापित किया है । पप्राय) पृथ्वी और धुलोकको अपने तेजसे भर देता है । ६त्त्वं एक इत् वस्व ( १२२)-तू अकेला हो यनोया ३६ गिरिः न ( ३९३ )- पर्वतके समान (पिदनतः स्यामी है। पृथुः दियस्पतिः) सबरो महान् तू द्युलोकका स्वामी है। ७ हे अनाभयिन् । तेररिम (१२४)- हे निर्भयौर। ३७ उदा ग्मन्ता उदमिः इच ( ४०६ )- पानी लेकर तुझे हम आनन्दित करते हैं। जानेवाले मित्र जिस प्रकार पानीसे खेलते है, उसी तरह हम ८ नर्यापस तृपमं अस्तारं ( १२५)- सार्वजनिक (त्या उप ससृग्महे ) तेरे पास आते है । हितके दाम कलवाले, बलदान और शत्रुपर शस्त्रको फेंकनेवालेको मै प्रशसा करता हूँ ३८ यवसे रणा गावः न ( ४२२)- जिस प्रकार पासको मुन्दर गायें प्राप्त करती है, उसी तरह ( ते सत्ये) सब तेरे आपोन है। ९ हे इन्द्र तत् सर्व ते घशे ( १२६ )- इन्द्र ! ये सेरो मित्रताके लिए हम तेरे पास जाते है। १० युवा ससा सुनीती आनयत् (१२७ )-मो ३९ पुनासः वाज सातये पित्तरं न ( ४५९ )-पुत्र तरुण मित्र है, वह सुनोतिते सुख लाता है। मन प्राप्ति के लिए जैसे पिताके पारा जाते है, वैसे ही हम ११ थादिश सूरः अस्तुपु नः मा अभ्यायमत तेरे पास माते है। { १२८/- चारों ओरसे शस्त्रोंजी मार करनेवाला शत्रु ४० महिपं वीरं वाज-सातये (४५९)- जिस प्रकार महान् वीरको युद्धमें बुलाते हैं, उसी तरह तुझे अपने हमारे ऊपर रात्रीके समय घटाई न फरे। सरक्षणके लिए बुलाते है। १२ तत् त्या युजा वनेम ( १२८,- यदि सा शव भावे भी तो हम तेरो सहायतारो उसे दूर करें। ४१ सूरः सयुग्भिः न ( ४६३ )- सूर्य जैसे अपनी १३ ऊतये सानासि सजित्वानं सदासह वार्षिष्ठं फिरोसे चमकता है, उसी प्रकार सोमरस (पृष्ठस्य धारा रयि माभर ( १२९) हमारे सरक्षणके लिए, उपभोग रोचते ) अपने तेजसे चमकता है। ४२ नृत ! मर्य प्रथम पुर्य तव तत् अपः दिवि पोग्य, शत्रुपर विनय प्राप्त करानेवाले, हमेशा शो भवाच्यं ( ४६६ )- हे इन्द्र ! मनुष्योंना हित करनयाले हरानेगले, श्रेष्ठ घनसे हमें भर दे। १४ वय महाधने अर्भ वृत्रेषु युज धनिण इन्द्र तेरे ये अपूर्व कर्म लोकौ प्रशसनीय हो गए है। हवामहे ( १३० ) हम बडे तया छोटें युद्धोंमें और घेरने- ४३ देवस्य असुःसहसा रिणन (४६६ / रामके पाले पारे साथ होनेवाले छोटे युद्ध में राहायताके लिए मित्ररे प्राण तू मष्ट करता है। देवः- राक्षस ) समान इन्द्रको सहायतारे लिए बुलाते हैं। ४४ विश्व अ-देवं सहसा अभिभुवः { ४६६ ) १५ सहनयाहे पोस्य याददिष्ट (१३१ -हमारों सभी असुरों सने अपने सामथ्र्यसे पराजित किया। भुजामोवाले राक्षगोरे साथ होनेवाले युद्ध, इन्द्ररा बल प्रकट होता है। सुभाषित १६ विश्वाद्विप अपभिन्धि (१३४) सब सोका १ सत्वने सचा गाय (११५/- सामथ्यशाली नारा इयरी एर साय स्तुति करो। १७ याधः मृधः परिजाह (१३४)-पापा करने. २ शाक्नेि शं (१५५)- दाक्तिमानको मुत प्राप्त वाले शोरो नष्ट कर । १८ स्पाई तत् यमु ाभर (३४)-भुन्दर धन ३ हे शतमातो! ते घुम्नितमः { ११६ )-हे संकडो हमें भरपूर है। समरनेवाले चोर। तेरा सानन्द निश्चयो तेजको १९ याम चित्रं न्यूजते (१५)- परम मद्भुत भूयोरता वह दिखाता है। होता है। पानेवाला है।
(१२८) सामयेदका सुबोध अनुवाद (ऐन्द्रं काण्डम् दूर हों। २० विश्वाः कष्टयः विशः अस्य मन्यचे संनमन्त ३५ योगे योगे पाजे बाजे ऊतये तवातरं इन्द्र ( १३७ )- सय प्रजा इसके क्रोयके आगे झुकती है। हवामहे (१६३ )- प्रत्येक कार्यमें अपनी रक्षाके लिए २१ देवानां भवः इत् महत् ( १३८) देवोसे प्राप्त इन्द्रको प्रार्थना करते हैं। होनेवाले सरक्षण निश्चयरो महान् है। ३६ इन्द्रः महान् परच (१६६)- इन्द्र महान और २२ तत् अस्माक उत्तये वयं आवृणीमहे । १३८)- उन सरक्षगोंको हम अपनी रक्षाके लिए स्वीकार करते है। ३७ वञिणे महत्त्वं अस्तु (१६६)- पञ्चधारी इन्द्रको यश प्राप्त हो। २३ न प्रजावत् सौभगं सावी: ( १४१ ) हम पुत्र पौत्रों को प्राप्त करानेवाले सौभाग्य दे। ३८ धौः न शवः प्रथिना ( १६६ )- धुलोरके समान २४ दुप्वप्न्यं परासुव { १४१)- दुखकारक स्वप्न उसका यश विशाल है। ३९ नुमन्तं चित्रं ग्राभं दक्षिणेन आ संगृभाय २५ सा वृपभः युवा तुवि ग्रीयः अनानत क? (१६७ /- तेजस्वी, विलक्षण और ग्रहण करने योग्य बन (१४२ )- वह बलवान्, तरुण, मजबूत गर्दनवाला, और हमें रा हायसे दे । किसीके आगे न झुकनेयाला इन्द्र वहा है' ४० सत्रासाई ऊतये आच्यावयामसि (१५०/- २६ गिरिणां उपतरे च नदीनां संगमे धिया विनः सय शशुओंको एक साय मारनेवाले इन्द्रको अपने सरक्षणके अजायत (१४३)- पर्वतोंको उपरपका और नदियोंकि सगम लिए अपने पास बुलाते है। पर बैठकर बुद्धि स्थिर करके मनुष्य ज्ञानी होता है। ४१ हे शतकतो । भद्रं भद्रं पं ऊर्जन आ भर (१७३)-हे सैकनों कर्म करनेवाले इन्द्र ! हमें पल्याण- २७ चर्षणीनां सम्राजं नृपाहं मंहिष्ठं नरें इन्द्रं कारक अन्न और बल भरपूर दे। प्रस्तोत ( १४४ )- मनुष्यों सम्राटके रामान, शत्रुका ४१ न मुळयालि (१७३)- हमें न हो सुलो मारता है। पराभव करने वाले, श्रेष्ठ नेता इन्द्रको स्तुति करो। ४३ न कि इनीमसि ( १७६)-हम कोई हानिवारण २८ चन्द्रमसः गृहे त्वष्णुः अपांच्यं नाम [१४) कार्य नहीं करते। चन्द्र के मण्डलमै सूर्पका प्रकाश धमकता है। ४४ न कि आयोण्यामसि ( १७६ )- हम कोई भी २९ अहं पितुः ऋतस्य मेधा परिजग्रह सूर्यः इव विरुद्ध कामं नहीं करते। अजनि (१५२)- मने पालन करनेवाली सत्यकी बुद्धि ४५ मंग्रश्रुत्य चरामसि ( १७६ )- वैदमत्रोंमें जो स्वीकार करली है। इस कारण में सूर्पये समान तेजस्यो हो कहा है, वही हम करते है। गया हूँ। ४६ हे आथर्वण ! दोप आगान् देव सवितार ३० नः रेवतीः तुवि-याजाः सन्तु (१५३)- स्तुहि ( १७७ )- हे अपर्या ! यदि कोई योष हो गया है हमारो गायें बहुत दूध देनेवाली होयें। सो सवितादेवको स्तुति कर। ३॥ विश्वासां सुक्षितीनां चेततुः ( १५४)- सय नयती प्राणि जघान { १७५)- निराला कोई मुकायमा ४७ अप्रतिप्फुतः इन्द्रः दधीचा अस्थभिः नव उत्तम मनुष्यों को उत्तम प्रेरणा मिले। ३२.विश्या साहं शतकातुं चर्षणीनां महिष्ठं इन्द्रं मारा। नहीं कर सकताऐसे हग्रने दधीचिकी हलियारे ८१० चोरी अभि प्र गायत (१५५/- सब शत्रुओंके नाश करने ४८ मोजसा महान् अमिति ( १८० अपने पाले, संपरों का करनेवाले, सब प्रजाभोंमें श्रेष्ट इनरी साम-परो शत्रुको हराता है। स्तुति से। ४२ महाभिः ऊतिभिः अस्माकं मधं धागादि (१८) ३३ ऊतये सुरूपटरनु घविधगि जुइमसि ( १५०) - महान् सरल साधनोर साय हमारे पास भा। - अपने सरागके लिए मुहर रूप बनातेवाले रो रोग ५० यातना दे शंभु मयोभुभेषजं भायातु,ना मायूंषि प्रतारिषत् ( १८४ )- यह पापु नास्ति और गुल ३४ त्यं शिप (११२)-राभोगस्वामी। मार औरपि हमारे पाग ये और हमारी भा पाये।
(१२९) चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुबोध मनुवाद योग्य है। ५१ पाचका वाजिनीवती धिया वसुः सरस्सती ६८ जातः वृत्राहा बुन्दै आददे, के के उना! ( १८९)- पवित्र करनेवाली, भन्न देनेवाली और बुद्धिसे घिरे, मातरं यि पृच्छात् ( २१६ )- उत्पन्न होते हो धन देनेवाली यह विद्याकी देवी है । इन्द्रने वाण हायमें लिया और अपनी मातासे पूछा कि कौन ५२ साना वसूनि आमरात् ( १९० )- वह हमें कौनसे वीर सुने जाते हैं। भरपूर धन दे। ६९ ऊतये समारलं, साध. कृष्पन्तं हवामहे ५३ शुक्षं दुराधर्ष महि अवः अस्तु ( १९२ )- ( २१७ )- हमारे सरक्षणके लिए जो बाहुओको फैलाता है, तेजस्वी और शन जिस पर आक्रमण नहीं कर सकते, ऐसे और जो सरक्षणके साधनोंको तप्यार करता है, उम इन्तको महान् सरक्षण हमें मिले। हम अपनी सहायताके लिए बुलाते हैं। ५४ हे अद्रिवः ! राधः कृणुप्प ( १९४ )- हे वत्र ७० तव इत् सख्यं अस्तृतं ( २२९)- तेरी ही पारी इन्द्र ! हमें धन है। मित्रता न टूटनेवाली है। ५५ ब्रह्म-द्विप. अवजहि (१९४)- ज्ञानसे द्वेष करने ७१ नः पृच तनूपु नृम्णं आधेहि ( २३१ - हम बालोंको मार। लोर्मोमें नेतृत्व करनेवाले दलको बहा । ५६ वादात इत् यशः ( १९५ /- तेरो सहायतासे ७२ सत्राजित् पास्यं आधेहि (२३१)- सब शनुओंको ही यश मिलता है। एकसाथ जीतनेवाला सामर्थ्य हमें दे । ५७ नः वृतः देवः इन्द्र शूरा (१९६) हमारे द्वारा ७३ वीरयु अलि ( २३२)- शत्रुके साय लडनेवाला वरण किया हुआ इन्द्र देव शूर है । ५८ हे इन्द्र ! त्यांन अतिरिच्यते ( १९७ )- है ७४ शूर' उत स्थिरः अभि ( २३२ )-दूर धोर इन्द्र । तेरी अपेक्षा कोई भी महान नहीं है। और युद्धोंमें स्थिर रहनेवाला है। ५९ कभुक्षणं रायिं ददातु (१९९)- कारीगरोंका रक्षण ७ ते मनःराध्य (२३२)- सेरा मन माराधनाके पारनेवाला धन हमें दे। ६० नः इपे कमैं ददातु ( १९९)- हमें अन्न प्राप्त ७६ अस्य तस्थुपः जगतः शिानं स्वदेशमा हो इसलिए कारीगरी दे। अमिनोनुम- ( २३३) इस स्पायर और जगम जगन्ने ६१ याजी याजिनं ददातु ( १९९)- बलवान् इद्र स्वामी और आत्मज्ञानी तुझे हम नमस्कार करते है। हमें बल देवे। ७७ सत्पनि त्या नरः वृत्रेषु हवन्ते ( २३४ )- ६१ स्थिरः विचर्षणिः महत् भय अभीपत्, अचु- सज्जनोंके उत्तम पालन करनयाले तुम पुदमें सहायताके लिए युवत् (२००)- लो पुलोम स्थिर रहता है तथा महाज्ञानी हम बुसाते है । है। वह महान् भयको दूर करता है। ७८ काप्ठासु त्या हयन्ते- ( २३४ ) छोटे पुद्धोंमें भी ६३ हे वृत्रहन् ! त्वत् उत्तरंम किः अस्ति (२०३) तुम्ने बुलाते है। - हे वृत्रनाशक इन्द्र । तुमसे महान् कोई नहीं है । ७९ पुरुषसुः मघवा सहनेण शिक्षति ( २३५ )- ६४ जनानां तरणि, पदं, समानं प्रशंसिपम् यहुत धनवान् इन्द्र हजारों प्रकाररो पन देता है। ( २०४)- सब लोगोंको तारनेवाले, शत्रुको षष्ट देनेवाले, ८० मातीपहं गीर्भिः अभि नवामहे ( २३६ )- सरको समान मुल देनेवाले, इनकी में प्रशसा करता हूँ। बाधक शत्रुको हरानेवाले इन्द्रको हम नमस्कार परते हैं। ६५ यं अनुहः पान्ति, स मर्त्यः सुनीथ (२०६) ८१ चिददमुं इन्दं ऊतये हुये (२३७ )- पनवार - जिसका संरण द्रोह न करनेवाले देव करते हैं. वह मनुष्य इन्द्रको अपने संरक्षणके लिए बुलाते हैं। उत्तम और नीतियाला होता है। ८२ सधमादे आपिनः वृधे योधि ( २३९)- एक ६६ विश्याः स्पृधः अजय (२११)-सम स्पर्धा करने- जगह मंठकर नहां कर्म लिए जाते हैं, यहां इन हमारा मित्र वाले दामोपर जय प्राप्त हो। और उन्नति करनेवाला हो। ६७ अपां फेनेन नमुचे शिरः उदवर्तयः (२११) ८३ ते धियः अवन्तु ( २३९)- तेरो पहिया हमार! -दने पानी माग नचिके सिरको फोगा। १७ (साम हिन्दी) सरक्षण गरें।
(१३०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [पेन्द्रं काण्डम् ८४ सचा स्तोत, मुहुः शंसत (२४२}- एक स्थान १०१-पंच क्षितीनां शुम्ने आ भर ( २६२)-पाव पर बैठकर स्तुति करो, बारपार स्तुति करो। जनोको एकतासे उत्पन्न होनेवाले तेज हो । ८५ यः सदावृधं विश्वगृति, ओजसा अधृष्टं, १०२ परावति भवति युपा श्रुतः ( २६३)- दूर धृपणं इन्दं चकार, तं नकिः कर्मणा नशत् ( २४३ }- और पासके देशोमें तू ही शक्तिके लिए प्रसिद्ध है। जो सदा बढानेवाले, सबके द्वारा स्तुति किए जानेवाले, १०३ शक। परावनि असि, अर्यावति असि सामर्यके कारण जो किसीसे दवाया नहीं जा सकता, जो (२६४) हे इन्द्र ! तू बूर है और पास भी हैं । शानुओंको मारता है, उस इन्द्रको जो उपासना करता है, १०४ निधातु नियस्थं स्वस्तये छर्दि. शरण महा उसे कोई भी नष्ट नहीं कर सकता। (२६६ )- तीन मजिलोंवाला और तीनो ऋतुओंमें सुख- ८६ संधि सन्धाता ( २४४ )- टूटी हुई सन्धियोंको कारक, हमारे कल्याणके लिए उत्तम आश्रय देनेवाला पर है। जोउनेवाला। १०५ विदया इन्द्रस्य भक्षत ( २६७)- सब जगत् ८७ विन्दुतं पुनः निष्कर्ता ( २४४ }- कटे हुए इन्द्र के आश्यरो रहता है। भागोगो फिर ठीक करता है। १०६ जातः जनिमानि ओजसा करोति ( २६७)- ८८ त्वदन्यः माईता नाऽस्ति ( २४७ )- तेरे सिवाय उत्पन्न हुए और उत्साप्त होनेवाले सभी पदार्योको अपनी दूसरा कोई भी सुप्त देनेवाला नहीं है । शाक्तिसे धनाता है। ८९. अप्रतीनि पुरचूनाणि अनुत्ता चर्पणी-धृतिर १०७ अदेवः मयासीन थापः (२६८)- ईश्वरयो एक इत् हंसि ( २४८)- बहुत बलशाली यहतसे वनोंको उपासना न करनेवाला उस धनको प्राप्त नहीं कर सकता। स्वप ही, केवल सब लोगों के हित करनेरे लिए अकेलाही तू १०८ हे इन्द्र ! अयमं मध्यमं पुप्यसि, परमस्य ९. हे शचीपते शूर इन्द ! विश्वामि ऊतिभिः विश्वस्य सभा राजसि ( २५० )- हे इन्द्र ! कनिष्ठ शग्धि ( २५३ )- हे सामग्यवान् इन्द्र ! सब सरक्षणके और मध्यम धन तेरे ही है, श्रेष्ठ पाषा तू अकेला ही सापों सापत सामर्थ्यवान है। स्वामी है। ९१ भग यशसंघमुविदं त्वा परिचरामि ( २५३)- १०९ हे युध्म, सजरत्, पुरन्दर ! अलपि (२७१) ऐश्वर्यवान्, यदास्यो और धनवान् सेरो आराधना हम करते है। वाले वोरम ! यहां आ । -हे योद्धा, समाम वरनेवाले और शत्रुओं नगरोंगो तोडने. ९२ याः भुजः असुरेभ्यः आ भरः अस्य वर्धय ११० या चर्पणीनां राजा, रथेमि. अभिगुः याता, ( २५४ }- जो धन तू असुरोसे छीनकर लापा, उनसे हमें विश्वासां पृतनानांतरता, गुन-हा ज्येष्ठ गृणे (२७३) -जो सब मनुष्योग राजा, रचसे मोन ही मागे जानेवाला, ९३ नः क्रतुं आ भर (२५९)- हमें अच्छो युद्धि है। ९४ यथा पुनेम्प पिता, नः शिक्ष (२५९)- जैसे राय शत्रुसैनाबा नाश करनेवासा, मोर पत्रको मारनेवासा पिता अपने लड़यों को शिक्षा देता है, उसी प्रकार सू हमें है। उस इन्सको में स्तुति करता है। शिक्षा दे। १११ यतःभपामदे, तत. न. अभयं पृधि (२४) ९५ जीया ज्योतिः अशीमहि (२५९)-हमनीवित जहाँ जहाँसे हम पर है, पहासे हमें निर्भय एपर तेजस्विता प्राप्त गरें। ११२ नाऊतय द्विपः यिनाहि, मृयाचिजादि (२७४) ९६नामा पराणा (२६)- हमें दूर मत। -हमारे संहारे लिए सोशो दूरपर मौरपरमे २७ स्वंना ऊती २६०)-मू हमारा संरक्षर है। ग्रामोंग मारे। १८ स्वं न आप्यः (२६०)-हमारा भाई है। १३ शरिय! २४ ). पह सामध्यंगन है। १९ नामघमाधे भय (२६०)- हमारे हाय ठ। १५४ यतीनां पुगं भेत्ता, मुनीनां मगाम १०० सपा विश्वानि पास्या मा गर (२९२ {२७५)- अनुरोरो गममी गगरियोरा नाम राहा पसाय सब पलखें। और मुनियोंरा मित्र इम है। पदा। - (१३१) सामवेदका सुबोध अनुवाद चतुर्थ अध्याय ११५ महः सतः ते महिमा पनिष्टम ( २७६ )- तेरे १२८ चिग्रतानां धारं वरुणं वपा गिरा वन्देत जैसे महा पुरुषको महिमाका हो वर्णन किया जाता है। (२८८)-विशेष अनेक कोको धारण करनेवाले वरुणको ११६ महा महान् असि ( २७६ )- तू अपने यशसे विशेष सरक्षण के लिए स्तुति करके वन्दना करते है। महान् है। १२९ गाः पाहि ( २८९)- गायोंका रमण कर । १६७ यः अश्वी रथी सुरूपःगोमान्, श्वात्रमार्जा १३० इन्द्रः होःसंमिलायब्रीहिरण्ययः (२८९) वयसा, सदा सचते, चन्द्रः सभा उपयाति (२७७) - इन्द्र अपने रवमें घोडे जोडता है, वच धारण करता है, जो घोड़े रखता है, रयमें बैठता है, उत्तम पवाला है, और सुनहरे रथमें बैठता है। गायोंको पालता है, धन और अन्नरो युक्त है, ऐसा वह इन्द्र १३१ हे अद्रिवः ! महे शुल्काय त्या न परादीयले आभूषणोंको पहनकर सभामें जाकर बैठता है । (२९१) हे यजधारी इन्द्र ! यदि बहुत धन प्राप्त हो तो ११८ यत् द्यावः शतं स्युः, उत भूमी शतं स्युः, भी मै तुझे दूसरेको देनेको तैय्यार नहीं । सहस्र सूर्याः, अनुजातं त्वा न अष्ट ( २७८ )- सैकडो १३२ हे पनिवः । न अयुताय, न सहस्राय, न चुलोक, संकडों पृथिवी, हजारो सूर्य अयवा जो कुछ भी पीछे शताय ( २९१ )- दस हजार, एक हजार अथवा सो मिले उत्पन्न हुए पदार्थ है, वे सब भी तेरी मरारी नहीं कर सकते। तो भी मैं तुझे छोडनेवाला नहीं । ११९ घसो इन्द्र ! तं त्या का मतः आदधपति १३३ हे इन्द्र । मे पितुः यस्यान् (२९२)-है ( २८० }- हे सबको वमायाले इन्द्र ! उस तुझे कौनसा इन्द्र मेरे पिताको अपेक्षा न अधिक धनवान् है। मनुष्य भय दिखा सकता है ? १३४ मे अभुंजतः भ्रातुःवस्यान् ( २९२ )- भोग १२० ते श्रद्धा वाजी ( २८० )- तुझ पर श्रद्धा रखने- न भोगनेवाले मेरे भाईसे भी तू अधिक धनवान् है। वाला बलवान होता है। १३५ मे माता समा ( २९२)- मेरी माता तेरे १२. आपेस्वापिभिः आ( २८२ )- हे उतम समान है। मित्र! उत्तम मित्रोंके साय आ। १३६ बसुत्वनाय राधसे छदयथः ( २९२ )-धन १२२ अ-जरं, प्र-हेतारं अ-प्रहितं माशुं जेतारं और अन्नके लिए महान् बना। हेतारं रथोतम अन्त ऊतये इत (२८३)- जरारहित, १३७ वृहन्तः वीडयः अद्रयात्वा न घरन्ते (२९६ ) शत्रुपर प्रहार करनेवाले, कोई भी जिसका विरोध नहीं • बहुत बड़े बड़े पर्वत भी तुडने अपने कर्तव्यसे डिगा नहीं कर सकता, शोना विजय प्राप्त करनेवाले, प्रेरणा करनेवाले, सकते। रथिपोंमें श्रेष्ठ, जिसे कोई भी मार नहीं सकता, ऐसे इन्द्रको १३८ यत् वसु शिक्षास, तत् न कि आ मिनाति (२९६)-जी धन देने की इच्छा करता है, उस तेरे मानको २२३ यः समाहा विश्ववणिः, ते इन्दं वयं हमहे कोई भी रोक नहीं सकता। (२८६)-शानुगौंको एकसाय मारनेवाले, और सब मनुष्योंका १३९ यः अयं शिनी ओजसा पुरः विभिनत्ति हित करनेवाले उस इन्द्रको हम सहायार्य युलाते हैं। (२९७)- यह शिरस्त्राण धारण करनेवाला इन्द्र अपनी २२५ हे सहस्रमन्यो । तुविनम्ण सत्पते! समत्सु दाक्निसे दात्रके नगरोंको तोडता है। ना वृधे भव (२८६ )-हे हजारों उत्साहरी कार्य करनेवाले! १४० यन् शासः सदसः परि अयतं च्यायय बहुत धनवान्, और मजनकि पालक इन्द्र ! युद्ध में हमारा ( २९८ )- तू शासन करता है, इसलिए हमारे त्यानरो यश चढे ऐसा कर। दुराचारियोंको दूर पर। १२५ शचीभिः दिवानक्तं दिशस्यतं ( २८७)-तू १४१ कदाचन स्तरीनः भमि (३00)-तू पनी अपनी पाक्निसि हमें रातदिन पन है। भीयांश गायके समान नहीं होता। १२६ यां रातिः कदाचन मा उपदसत् ( २८७) १४२ देवस्य तेदानं भूयः उपोपेत् पृच्यते ३०.1 तेरा दान कभी भोरम न हो। सेरे जैसे देवरे दान बहुत होगरहमारे पाम आरवाते है। १२७ असत् रातिः कदाचन मा उपदसत् ( २८७) १४३ शची-वगु ( ३०४)- यह इन्द्र पी पालिसे •हमारा दान भी कभी कम न हो। धन प्राप्त करनेवाला है। * (१३२) सामवेदका सुबोध अनुवाद ऐन्द्रं काण्डम् योग्य है। १४५ दामुपे रत्नानि धत्तं ( ३०६ )- दानशीलको १६२ हे वसूनां वसुपते! वसूथवा ते दक्षिणं हस्तं रलव धन दे। जगृह ( ३१७). हे घनोके स्वामी ! धनको इच्छा करने १४. अहं सदा याचन् अबुध ( ३०७) - श्या वाले हम तुझे दाये हायसे पकडते है । हमेशा मागते रहने कारण तू मुझसे नाराज हो गया है ? १६३ हे शूर! चित्रं वृपणं रपि दाः १३१६)- है १४६ कः ईशानं न याचिषत् ( ३०७ )- अपने पूर । अनेक प्रकारके बल बढानेवाले धन दे। स्वामीसे भला कौन नहीं मागता । १६४ यत् पार्याः धिय. युनजते नरः नेमधिता १४७ वृषणा हरी उपयुयुजे, वृनहा आ जगाम इन्द्र बन्ने ( ३१८)- जब मकटसि पार होने के लिए पति- (३०८)- बलवान् घोटोंको रयम जोड लिया है, और पूर्वक काम किए जाते हैं, तब युद्ध के समय लोग इन्द्रको नको मारनेवाता आ गया है। भवरके लिए बुलाते हैं। १४८ ज्यायः इन्द्रः पितः तत् वनीयसः अभिमा १६५ त्वं शूरः नृपाता शयसाधकानः । ३१५/- भर ( ३०९ - महान् इन्द्र इच्छा करनेवाले छोदेको भी तू मूर, मनुष्योंको धन देनेवाला, वलसे तेजस्वी है । यह पन भरपूर दे। १६६ निधया यद्वान् अस्मान् मुमुग्धि ( ३१८/- १४९ पुरु-सुः भरे भरे हव्यः (३०९)- महत पाशोसे वर्षे हुए हमें मुक्त पर। धनवान् वह इन्द्र प्रत्येक युदमें सहायताके लिए बुलाने १६७ महे वीराय तवसे तुराय विरप्शिने यक्षिणे १५० यत् त्व यावतः ईशिषे एतायत् अहं ईशीय महा, बोर, शक्तिमान, मोर शोर कार्य करनेवाले, बच स्थविराय अस्सै अपूर्या पांसि नक्षु. ( ३२२ )- (३१०)- तू जितने पोंका स्वामी है, उतने मुझे मिले, पारो, स्थिर ऐसे इरा इन्द्र के लिए मदभुत स्तुति करो । ऐसी मै इच्छा करता हूँ। १६८ द्रप्सः दशभिः सहस्रः यानः पप्पाः १५१ पापयाय न रंसिपं ( ३१० )- पापी होनेको अंशुमती अवातिष्ठत्, शच्या धमन्तं तं इन्द्रः में प्यार नहीं। १५२ त्वं प्रर्तिपु विश्या स्पृधः अभ्यसि (३११) यावत्, अध नृमणाः स्नीहिति अघटाः { २२३ )- आक्रमण करनेवाला कृष्ण असुर दस हजार संनिर साप --तू युद्ध में सभी शवों मारा करता है। अनुमती नदो पर आया पर अपने पलसे जारी भप देने १५३ स्वं प्रशास्तिहा (२११)- तू दुष्टोंका नादा याले उस अमुर पर इन्दने आक्रमण किया और उसरी हिंसक करता है। मैनाको भी मार डाला। १५४ जनिता ( ३११)-सके लिए आपत्तियोंको पैदा करनेवाला है। १६९ इमाः विश्ना. पृतना जयासि (३२४)- सा माघुसेनाओं पर तू जय प्राप्त करता है। १५५ तरप्यतः वृषतः असि (३११)-तू विप्न १७० देवस्य महिन्या काम्य पक्ष्य (१२५)- रेपो बरनेवालोगो नष्ट करता है। पाको प्रकट करनेवाले बाध्य देख। १५६ घिय अति धरक्षिथ (३१२)-दूसर विश्व ध्याप्त है। १७१ अद्य ममार सा समान ( १२५)ो बार १५७ नः अपिता धेच अमः (३१)- न हमारा मर गया, वही पल पहरोके समान मारने लगता है। रार और हमें बताने वाला है। १७२ त्यं तत् जायमानः शभ्य मसभ्यः ठः २५८ यमुनि दद:- (२१४)-पन दे। अभयः ( १२६ }- तू उत्पम होने हो शमि रहित उन १५. यत् दानयान् अरदन (३१५)- जर दुने गात असुरोंगा हुआ। हाादोशमारा १७३ गूढे धापाधिनी मन्यायदः ( ३२६). १६० ना मुवित्त आ भर (३१६)- हमें उत्तम पत। हो अंधारम पर पाया पिषीयाँको प्रदर्भ साया १५. सोताः नना ग्मना पयाम (३१६)-दुमसे १७. विभुमदय भूपनेभ्यः रणं धाः ( ३२६. संरक्षित ए हम सब हो पनपा। भवामी भुक्नॉगी और मधिर पर बनाया।
(२३३) चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद १७५ दुवस्युः अर्यः तस्पीः ( ३२७ /- प्रशसनीय १८५ य न हन्ता, वाजं सनिता, सुराधाः और शवनासक तू हमें विजयो करता है। मघया, मप्रानि दाना ( ३३५)- वह इन्द्र को मारने- १६ महणं पुक्षं पुर-धस्मानं वृपमं स्थिरप्स्लु बाला, अन्न देनेवाला, उत्तम पनवान् है, यह भक्तोंको पन वामिणं भृष्टिमन्तं त्या गृणीषे ( ३२७ )- वृनको मारने देता है । घाले तेजस्वी, अनेक शत्रुओंका नाश करनेवाले, बलवान् १८ यःमती ना बनुप्यन् मभिदाति, मन्यमानः पद्धर्म स्थिर रहनेवाले, बज्रधारी, अनुनाशक ऐसे तुम्न शिधी युधा शवसा उगणाः तुरः, त्योताः वृप-मणा: इन्की में स्तुति करता हूँ। अभिष्याम ( ३३६ )-जो शन हमें मारनेकी इच्छा करता १७७ वाजसातौ अस्मिन् भरे शुनं मघवानं इन्द्रं नाशक शस्लोगे लेकर तेजसे सेनाके गाय पढ़ाई करता हुआ हम पर चढ़ाई करता हुआ आता है, जो घमण्डी हुवेम ( ३२९)- धन प्राप्त होनेवाले इस युद्ध में उत्साही है उसे हम तेरे सरक्षोंसे रदिन होकर चलवान मनसे धनवान् इन्द्रको अपने मदद के लिए बुलाते है। युक्त होकर पराजित करें। १५. कृपयन्तं उग्रं समत्सु वृत्राणि नन्तं धनानि १८७ विश्वानि विदुपे अरंगमाय जग्मये अपदचा- संजिन ऊतये हुवेम { ३२९)- प्रार्थना सुननेवाले, उग्र दृष्यने प्रति भर ( ३५२ )- सर्व ज्ञानी, ठीक समय पर बोर, युद्धमें वका नाा करनेवाले, पनोंको जोतनेवाले पहुचनेवाले, सबसे पहले पहुचनेवाले इन्द्रको भरपूर सोम दे । इन्द्रको अपने सरक्षणके लिए हम बुलाते है। १८८ उमं पचः अपायधीः ( ३५३ )-कठोर भाषण २७९ वाजिनं देयजूतं सहोवान रथानां तरवार मत करो। अरिपनेमि पृतनाज्यं, आधु ताय स्वस्तये हुवेम २८९ तुषि-कृमि सापहं. सत्यति त्या इन्द्रं (३३२)- बलवान्, देवोंसे सेवित, सामथ्र्यवान, रयोंको वर्तयामसि ( ३५४ ) बहुत पराप्रमी, शओंका पराभव सग्रामों में पार करनेवाले, तेज अस्त्र पासमें रखनेवाले, शनु फरनेवाले, सरजनकि पालय इन्द्रको हग लाते है। सेनापर विजय प्राप्त करनेवाले, शीघ्रगामी सुपर्णको अपने रल्याण के लिए हम बुलाते है। १९० रयं अ-ग्रहणं श्रवसः पनि विभ्यासाह १८० नातारं अपितारं, हवे हये सुहयं, शूरं शक्रं शविष्ठ विश्ववेदसं नरं गृणोपे ( ३५७ ) - उस उपकार करनेवाले बलके स्वामी, सब शत्रुओको हरानेवाले, शक्तिमान्, इन्द्र हुवे ( ३३३ )- दुखोसे पार करनेवाले, सरक्षण करलेवाले प्रत्येक युद्ध में सहापार्य बुलाने योग्य इस सूर और सर्वज्ञ नेताकी में स्तुति करता हूँ। बलवान् इन्द्रको हम बुलाते हैं। १९१ पुरा भिन्दुः युवा कवि: अमिनोजाः विश्वमा १.८१ बज-दक्षिणं, चि मतानां हरीणां, रथ्य इन्द्र कर्मणः धर्ता, पुरुष्टतः इन्द्रः अजायत ( ३५९ )- यजामहे ( ३३४ )- दायें हायमें पत्रको धारण करनेवाले, शके नगरोंको तोउनेवाला, तरुण, कवि, अपरिमित सेज बौडनेवाले घोडों रपमें बैठनेवाले इन्द्रको हग यज्ञमें सामर्मवाला, सर वाँको धारण करनेवाला, पढ़तोंरो मुलाते है। प्रशसित इन्द्र है। २८२ श्मश्रुभिः दोधुयत्, ऊर्चया पि भुषत् १९२ हे नरः ! यचंत. मार्चत, शृष्णु अर्चन्तु (३३४ )- यह अपनी बाहो और मूछोंको हिलाते हुए (३६२)- है मनुष्यो । तुम इन्द्रका सार परो, सूब सत्यार करो, पाको हराने वाले इन सवार सभी करें। १८३ सेनाभिः भयमान. राधला वि (३३४ ) १९३ पुग-नि-पिये इन्द्राय वर्धनं उपथं शम्य मपनो सेनासे शधुरो भय दिखलार पन लेता है। (३६३)- बहुतसे सगाँको हरानेवाले इन्द्रो पक्ष प्रस्ट c४ सभामाई दाभृषि तुम्नं महां अपार पृषभं परनेवाले स्तोत्र गायो । सुवनं इन्द्र ३३५)- हम एक्साप अनेक शोरो १९५ विश्वानरस्य अनानतस्य शयमा पनि दुवे मारनवाने, शत्रको भयभीत करनेवाले, गौरी भगानेवाले, (३६४ )- सब दाधुमेनाभीपर मारमा परलेवाने, शारे महान्, अपार बलवान्, उत्तम व्यपारी इसी प्रशंसा मागे भो न मुक्तेदाते, गामयके रशमोरो में यमाता हैं। १९५ सा वृहतः दियः ऊनी द्विपः तरति (३६५)- सबसे श्रेष्ठ हमा है। करते है।
(१३४) सामवेदफा सुबोध अनुवाद [ऐन्द्र पाण्डमें देता है। बह महान दिध सरक्षणोंसे युक्त होकर सब शत्रुओंको दूर उस बलवान, युद्ध में शत्रुओंका पराभव करनेवाले, सब करता है। लोगोंका हित करनेवाले आनन्दको में प्रशसा करता हूँ। १९६ शतकतो! विभोः राधसा ते गतिः विभ्वी २०८ यः एकः इत् विश्या कृष्टीः अभ्यस्यति (३६६)-हे सैकड़ों कर्म करनेवाले इन्द्र | बहुत धनोंके (३८७ )- जो अकेला ही इन्ध राब शत्रुसेना का विनाश तेरे दान बहुत महान् और विशाल है। करता है। १९७ विश्वचर्पणे सुद्ध ! नःद्युम्नं महय (३६६) २०९ यः एकः इत् दाशुषे माय पसु विदयते है सर्य द्रष्टा, उत्तम दान देने वाले इन्द्र ! हमें थन देकर (२८९ )- नो अकेला ही रान देनेवाले मनुष्यको धन महान् कर। १९८ सामुरि उग्रं गोजिरसं तरखिन (३७०) २१० अप्रतिप्युतः इन्द्रः ईशानः (३८९)- जिसका हम शत्रुको मारनेवाले, उग्रवीर, सामथ्र्यवान्, प्रतापी और कोई भी प्रतिकार नहीं कर सकता ऐसा इन्द्र सबका ईश्वर है। शीघ्रतासे कार्य करनेवाले इन्द्रको स्तुति करते है । २११ नृतमाय धृष्णवे सुस्तुपे ( ३९०) में श्रेय १९९ पूर्यः सः आ जिगीपन्तं नूतनं एकः इत् बोर भौर शत्रुका पराभय करनेवाले इन्द्रको स्तुति करता हूँ। वर्ननी अनु वावृते ( ३७२ )- यह पुराण पुरुष इय २१२ ओजसा त्वं पूर्व हंसि (३९१ ). अपने शामओंको जीतनेकी इच्छावाले नये वीरोंको अकेला ही सामHसे तू वृत्रको मारता है। विजयके मार्गसे लेजाता है । २१३ सत्राजित् अगोह ! विश्रतः पृथु दिया, २०० वृहती गिरः चर्षणीधृतं यावृधानं अमन्ये पतिः, नः आगाह (३९३ - हे सब शत्रुओको जीतनेवाले, इन्द्र अपनपत ( ३७४ )- हमारी बहूतसो स्तुतिया जिसे पोई भी हरा नहीं सकता ऐसे इन्द्र! तू सब ओरसे मनुष्योका धारणपोषण करनेवाले, बढानेवाले अमर इन्द्रको विशाल और घुलोकका स्वामी है । तू हमारे पास ।। प्रशसा करती है। २१. मत्रिणं निहंसि, तं ईमहे (३१४)- साफ २०१ ऊतये शुन्ध्यु इन्द्रं चर्युवः उशतीः मतयः शत्रुभोदो तू मारता है, अत तेरी हम प्रार्थना करते हैं। अच्छ अनूपत ( ३७५)-हमारे सरक्षणके लिए पवित्र २१५ समहसः आदित्यासः नः तुचे तुनाय परनेवाले इन्द्रो, भात्मदाक्ति बढ़ानेवाती, उन्नतिको इच्छा जीवसे द्रापीयः वायुः सुरुणोतन (३९५)- महान् करनेवाली, हमारी रतुति प्रशसा करती है । आदित्य हमारे पुत्रपौत्रोंको जीनेके लिए दीर्घायु करें। २०२. त्यं मे वस्वः अर्णवं इन्द्रं गीमिः अभि. २१६ वज्रहस्त! नितीनां परिग्रज घेत्थ ( ३९६) मदत (३७६ )- उम शत्रुका पराभव करनेवाले पनके -हे यवपारी इन्द्र ! विघ्न दूर करमेरे मार्ग तू नानता है। समुद्र इन्द्रको स्तुतिसे आनन्दित करो। २१७ अहः अहः शुन्ध्युः परिपदा ( ३९६)-प्रति. २०३ यस्प मानुपं द्यायन विचरनि ( ३७६)- दिन स्वच्छता रखनेवाला रोगोंको दूर करता है। जिसके मनुष्पोके लिए हितकारी कार्य शुलोष के समान सब २१८ हे मादित्यासः अमीयां, प्रघं, दुनि अंदमः नः अप युयोतन (३९७ )- है आवित्यो । रोग, पर, २०४ भुले महिप्ठं विषं अभ्यर्चत ( ३७६)- भोग दुष्टबुद्धि, पाप इन सबको हमसे दूर करो। प्राप्तिके लिए महान् शानो की अराधना करो। २१९ स्यं जनुपा मभ्राध्या, अ-नार, अनापिः ००५ यः कृष्णगर्भाः निरहन (३८०)- जिस इन्धने (३९९)- हे इन्ध ! तु जन्ममे ही शपुरहित है, तेरा नेता पणी गर्भवती स्त्रियों मारा। कोई नहीं है, और भाई भी कोई नहीं है। २०६ वखदक्षिणं वृषणं अवस्य हुवेम ( ३८० ) २२० युधा इत् आदित्य इच्छसे (२१९)- तू पुरो दायें हाप बन्न पारण परनेवाले पलवान हम अपने ही कोई भाई मिले ऐसी मारता है। -सी इच्छा करनेवासे हम बुलाते है। २२१ या पुरा घग्यः नः प्र आनिनाय तंन्द .०७ हे घनियः !ने पृरणं पृच सासहि लोकः ऊतये स्तुये (४०)- निमने हमें पहले भी पन रिया, गर्नु मदं गृणीमसि ( ३८३ )- हे बयपारीमा तेरे उस मंस्तुति ताम्। .
(१३५) चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद मांगने है। २२२ दृढाचित् यमयिप्णवःमा अवस्थात (४०१) २३७ नः सूनुतायतः कदा करः (४१६ )- हमें - बलमान और यात्रुको झुकानवाते वीरो! हमसे दूर मत सत्यवोलनेवाला कब करेगा, कब धन दान देगा। रहो। २३८ स्तोतृभ्यः इषं मा भर (४१९)- स्तुति करने. २९३ श्वसन्तं त्वया युजा प्रति ग्रुीमहि ( ४०३) पालोको भरपूर घन दे। र कर्म करने के कारण लम्बो सासें लेते हुए शत्रुको तेरी २३२ मःमनः दक्षं उत ऋतुं भद्रं चानय ( ४२२) सहायतासे हम ठीक जवाब दें। हमारे मन, बल, कर्म और कल्याण प्राप्त हो इसलिए २२४ त्वं नः ओजः नृम्णं आभर, पृतनासह धीरं प्रेरित कर । था भर ( ४०५)- तू हमें सामयं और धन भरपूर है, २४० शिणी उपाकयोः हस्तयोः आयसं वनं और शत्रुसेनाको पराजित करनेवाला पराक्रम भी हमें दे । निये । ४२३ -शिरस्त्राण धारण करनेवाले इन्द्रने अपने २२५ स्वराज्य अनु अर्चन् पृथिव्याः अहिं निः दोनों हायोंमें फौलादके वचको धारण किया । शसा (४१०)- स्वराज्यके संरक्षणको दृष्टिसे पृयिवोके यं सजोषसा द्विपः अति नयन्ति, तं मर्त्य अहि नामक शत्रुपर तूने शासन किया। अंहःन, दुरितं न मष्ट ( ४२६- जिसको समान विचार २२६ तं महत्सु आजिषु अमें च अति हवामहे और मनवाले देव दानुगि दूर करके उन्नतिके रास्ते ले जाते (४११)- उससे बडे और छोटे संग्रामों में संरक्षणके साधन है, उस मनुष्यको पाप नहीं लागता और दुर्गति उसके पास फटकती भी नहीं। २२७ सा वाजेपुनःप्राविपत् ( ४११)- वह युद्धेमें २४२ सक्षणिः पुत्राणि परि, नः ऋणया द्विपः हमारा संरक्षण करे। तरध्ये ईरसे (४२५)- सामयशाली तू मधुपर घटाई २२८ अद्विवन् यजिन् इन्द्र ! तुभ्यं इत् वीर्य से पार होने के लिए शपर घमाई करने के लिए जाता है। करनेके लिए जा, हमारे ऋोको दूर करनेवाला तू शत्रु- अनुत्तं (४१२)- हे वनधारो इन्द्र ! तेरा पराक्रम २४३ हे विश्वतो-दाचन् ! विश्वतः नः आ भर २२९ स्वराज्यं अनु अर्चन मायिनं मृगं वृत्रं मायया (४३७)- हे धारों ओरसे शभोको नष्ट करनेवासे इन्न ! अबधीः ( ४१२)- अपने स्वराज्यको रमाके लिए कपटी चारों ओरसे हमें भरपूर धन दे । वृत्रको तूने क्पटसे ही मारा। २४४ पप महा (४३८)- यह पद हानी है। २३० प्रेहि अभिहिष्णुहि (४१३) -परमाक्रमण २४५ त्वष्टा धुमन्तं पर्स (४०)- रवष्टात सेजस्वी कर, चारों ओरसे आक्रमण कर और उनका नाश कर। वन संम्पार किया। २३१ ते यजःन नियंसते (४१३)- सेरा पर २४६ रयीषिणःशं पदं मद्य (wt)-पनसे पर विमोसे भी रोका नहीं जा सकता। करनेवाले शान्ति, उत्तम स्थान और धन प्राप्ति करते हैं। २३२. ते शवः नृम्णं (१३)- तेरे यल शत्रुको २४७ अ-मतः नः हिनोति (mm). जो धतका गुकानेवाले हैं। पालन नहीं करता उसे कुछ भी नहीं मिलता। २३३ स्वराज्यं मनु अर्चन् पृत्रं हनः अपः जय •४८ गायः सदा शुचयः (२)-गाये हमेशा पुर (४१)- स्वराज्यको अर्चना करने के लिए भको मार रहती है। और इन कोतकर अपने मधिशरम है। २४९ युवा थुतः इन्द्रः मा स्तोभति-(४५)- •३४ यत् भाजयः उदीरते, पृष्णये धनं घीयते तण और प्रसिद्ध इन राव दात्रुओंको मारता है। (११४- जब युद्ध शुरू होता है, तब को जीतनेवालेको २५० हे अग्ने ! त्वंना अन्तमः शिवः पाता भुषः (werहेमाने हमारे पास पल्याण करनेवाला २३५ कं हनः (१)- पिमको मारता है। मौर संरक्षक है। २३६ के पसी दयः (४१४)-किमको धनमें स्थापित २५१ विश्यस्य प्रस्नोमः (४५.)- सब शेरा कसा है मात रिम प्रत देता है। मास करनालाहहै। अजेय है। पन मिलता है।
(१३६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्रं काण्डम् २५२ सुचीरा शतहिमा मदेम (४५४) उत्तम वीर अप्रतित इन्द्र जोहवीमि ( ४६० ।- हम धनवान, पुत्रोंसे युक्त होकर हम सौ वर्ष तक आन दसे रहे । उपवार, बहुत बल धारण करनवाते, शत्रुसे कभी पराजित २५३ न इपं पीवरी पृणुहि ( ४५५ )- हमारे न होनेवाले, उस इन्द्रको सहायताके लिए बुलाते हैं । अन्नको पुष्टिकारक बना। २५६ बजी राये विश्वा सुपथा करत् (४६० }- बनधारी इन्द्र धन प्राप्तिके राम मार्ग सुगम करता है। २५४ इन्द्र विश्वस्य राजति ( ४५६) विश्वपर राज्य करता है। इस प्रकार इस ऐन्द्र काण्ड में सुभाषित है। ये शल्यान, लेख अयवा पुस्तकोमें प्रयोग करनके लिए उपयोगी और २५५ मघवान उग्र सत्रा भूरि श्रवासि दधान शिक्षाप्रद है। इन्द्र सब ऐन्द्रकाण्डान्तर्गत ऋषि-देवता सूची मनसण्या ऋग्वेदस्थान कृषि देवता गायत्री " ६।३५२२ ८९९।१६ ८.७२।१२ ८१९२१२५ इन्द्र (श अग्निहोषिया) " ॥ " १२० १०.१५३१२ " " (३) शयु हस्पत्य श्रुतकक्ष मुक्क्षो वा आमिरस हपत मागाय श्रुतका मागिरस युतकक्ष मागिरह देवजामय इन्द्रमातर ऋषिका गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनों गोपूक्त्यश्वरक्तिनो काम्यायनी मेपातिथि काय, प्रियमेपश्चागिरस मेधातिथि काण्व प्रियमेषश्चागिरत (४) मुरुवातको सुरक्षयुतकक्षो " ८१४१ दारा३५ ૮ શt 1 " t 11 " " " ८.९३४० ६३५१ ८९९।३१ . " " . भुनकक्ष मधुच्छन्दा श्वामित्र मधुच्या श्वामित्र " " १३० १३१ " " १७१५ ८४५१६ ३२४ ८४५१ टा४५१४० " पिशोक पाव वसिष्ठो मंशावरणि विशोक काव विनोक काव " ॥ १३४ " " सम्वो पौर " " ११३७३ ८४५५१६ त्रिशोकराव ॥
(१३७) सामवेदका सुबोध अनुवाद चतुर्थ अध्याय ] देवता मनसत्या गायत्री . " १२७ ૧૨૮ १३९ २४० " ऋावेवस्थान दादा ८८३३१ १११८०१ दा९३११८ ५.८।४ ८६४७ ८६०८ ८.१६०१ ऋषि वत्सः काण्वः कुसीदो काण्व मेधातिथि.कावः भुतकक्ष. आगिरस श्यावाश्व. आत्रेय प्रमायः काव वत्सः काण्य इरिम्बिठि. काय " 1 . " " १४ १४३ १४३ " " " २४१ भुतकक्ष मागिरस " " मेधातिथि काण्द गोतमो राहूगण भरद्वाजो बाहरपत्य १४६ १४७ १४८ " " महत. " ॥ ८1९18 ६४५/२५ १८४१५ ६५७।३ ८९४१ ८.९॥३१ ८१९३३२३ द६१० ॥३०॥१३ " " १५० १५१ " विन्दु पूतदक्षो या यागिरस भूतकक्ष सक्क्षो या मृतकक्ष सुरक्षो वा वत्स काग्य भुन शेष आजोगति शुन शेप माजोगति वामदेवो वा " " . २५४ " " " " १५७ १५८ " ८.९२।१ ७.३१६१ दा॥१६ ८.९२११९ ८.१७११ १।४।१ ८४५२२ ८८२७ १३३०७ " " १६० " भूतकक्ष सुरक्षो वा आगिरस वशिष्ठो मंगावरुणि मेधातिथि काण्व प्रियमेधश्चागिरस श्रुतका सुक्क्षो वा आंगिरस इरिम्बिठि. काय मधुच्छन्वा वंश्वामित्र त्रिशोक काव. कुसीदो काण्ड शुन दोप माजोगति. मधुग्छन्वा वैश्यामित्र (८) विश्वामित्रो गायित. मधुच्या श्वामित्र दुसोदी काय प्रियमेप मागिरा वामदेवो गौतम भुतपक्ष मुक्क्षो वा आंगिरस " २६४ 10 " ॥ ३१५९१० " " " " " " " ८८११ ८/६९४ ४॥३१०१ ८९०७ १८ ( साम हिंदो) (१३८) सामवेदया सुयोध अनुवाद [ पेन्द्र काण्डम् मनसख्या ऋग्वेदस्यान देवता छन्द गाययो १७२ - कृषि मेधातिथि काव वामदेव गौतम भुतकक्ष सुकक्षो वा मागिरत बिन्दु पूतदक्षो वा भागिरस " , ८९३३२८ ८९४४ १७४ " १०११५३३१ १०११३४७ " " १७७ १७८ १७९ " . १८४१३ १९.१ ४३२१ " " " " " १८३ १८४ ११३०४ १०११८६१ " 1. देवजामय इन्द्रमातर गोधा ऋषिका दम्पड्डापर्वण प्रस्कच काय गोतमो राहगण मधुच्छन्दा वैश्वामित्र पामदेवो गौतम वस्म काण्व शुन प आजोगति उलो वातायन (१०) कायो पौर यत्स काण्च वत्स काग्व श्रुतवक्ष सुरक्षो वा मागिरस मधुच्यन्दा वैश्वामित्र वामदेवो गौतम इरिस्थिति राय सत्यतिरिणि वस शव १८५ " " " १२७ १.४१ ८४६१० ८६०१२ ८१९३३१७ ११३०१ " " " " ग दार७१ १०1९८५१ " " " ८६४१ ३॥४॥ प्रगाय काय विश्वामित्रो गापित वामरेयो गौतम " " " " . " दा९२२५२ २७१ ८९३१३४ २४९० ६४५८ धतक्क्ष आंगिरस मयुग्मन्दा श्वामित्र धुता आपिरम गुल्ममद गौनक भरद्वाज बाईस्पत्य N " " " स " भात बार्हस्पत्य पामोयो गौतम " " चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद (१३९) मंत्रमच्या ऋग्वेदस्वातं ऋषिः देवता २०४ इन्द्र गायत्री ८४५२८ श९४ ८४६४ टापा " " 1 २०७ " " " " " त्रिशोक पाव मधुच्छन्दा घश्वामित्रः वत्स पाव त्रिशोक काय मुक्स मागिरस वामदेव गौतम विश्वामित्रो माचिन गौरवश्व सुदिननी करण्वायनी धामदेवी गौतम धुतकक्षा सुरक्षो वा मागिरस (१३) सुन शेप मागीपति ३५१ ८५११३ २२० २११ २१० " " " * " ८९३१२५ " " " धुतकक्ष माविरस. " १२३०१ टा९०१० ८४५४ ८॥३२॥१० ११९०१ " चिसोका कापवः मेधातिथिः कावः ॥ " गोतमो राहूगण " अश्विनी मिश्रावणी " २२० " ३।६।१६ ११३७४१० શરરાચ્છ " ૨૨ मप्त विष्णः " २२३ २४ ८३२००१ यहातिपि. कान विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्नि प्रापण्य काय मेधातिथिः काव (१४) मेधातिथि वादः वामदेयो गौतम मेधातिथि कायः प्रियगेपश्चागिरस विश्वामित्रो गाथिन पेपालिथि.काण्वः प्रियमेषश्चागिरसः दुर्मित्र (मुमिनो वा) पौत्स. मेधातिथि: काय. मेधातिमिपाव विश्वामियो गापिनोभीपाद् उदलो वा ८/२०१४ " " " १०11०५१ . " " " २६० ८।३०७ " " - " २३२ ८.९२०२८ भूतपदा यागिरसः " ७(३२१२२ " दसिष्टो मंत्रायणि भावाज, पाईपत्य " " ८४२.१ " (१४०) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पेन्द्र काण्डम देवता संघसंख्या २३६ २३७ ऋग्वेदस्यानं ૮૮૯i क्षार ७३०२० बहती " " ऋषिः मोधा गौतमः कलि: प्रागाथ: वसिष्ठो मंत्रावरुणि. मेधातिथिः काव भर्ग:प्रागायः वसिष्ठो मंत्रावरुणिः प्रगापो घोरर काय " " " " २३९ ३४० २४१ २४९ ८६१७ ७१५९३ ११ मक्तः " " पुषहम्मा आंगिरसः " २४३ २४४ " " " " 11 ८७०३ दाश१२ दा१२४ श५१ १८४१९ ८९०५ ८३५ " " " २६८ " २४९ २५० २५१ " दश१५ टा " मेधातिथि-मेध्यातिथी कारों मेधातिथि-मोप्यातिषी काग्वी विश्वामित्रो गापिन: गोतमो नमेधपुरुगेधावांगिरसो मेधातिथिमध्यातिथियों काण्वः मेधातिथिमप्यातिथिर्वा काग्वः मेधातिथिमध्यातिथिर्वा काव: देवातिथिः काण्वः (२७) भर्गःभागायः रेभः काश्यप जमदग्निर्गिवः मेधाविधिः काकः ममेधपुरुमेघावागिरसौ नमेधपुरमेघावांगिरसो वसिष्ठो मैत्रावणि रेभ कारयफ. मेधातिथिः काश्व भरद्वाज वार्हस्पत्य " " " ८६०५ दा९७१ ८१०१५ ८७ ८८९३ २५४ २५५ २५६ १५७ " " " " " " :५९ २६० " " ७॥३९॥२६ ८.९७७ ८३३३१ ६४६७ " " " मेधातिथि काण्व- रेभ. काश्यप " २६४ " " ८९७४ टा५३०१४ " 11 " " भरद्वाज बार्हस्पत्य नमेष आगिरस पुरुहन्मा आगिररा नृमेधमुरुमेघावागिरसौ " ८७०१७ ८1९० " (१४१) चतुर्य मायाय ] सामयेदका मुयोध पाद देषता मंचसख्या बहतो ऋग्वेदस्पानं U३९१६ . बसिष्ठो मंत्रागि मेपातिषि-मेध्यातियोगाची कलि मागाय (१९) " " २७२ ८६६७ " " पुव्हमा बांगिरस " २७४ " नग मागाय इरिम्बिठि काय जमदग्निर्मागव देवातिथि काण्व २७३ " ८ ८६१४१३ ८९७४ ८१०१११ दा४९ ८1७०१५ टापा ७३।१४ " " पुरुहमा आंगिरस 1 " " ७९ २८० २८१ ક ८1५३३५ " १ २८३ २८४ ८९९७ ७१३२१ ७.३२८ " " " " ११३९५ " " " २८८ " " देवातिषि काण्व यसिष्ठो मंगावरणि भरद्वाजो बार्हस्पत्य मेध्य काय (२०) नमेष मागिरस वसिष्ठो मंत्रावरणि वसिष्ठो मंत्रायणि भखात याहस्पत्य पाछपोदोवामि वामदेव गौतम मेष्यातिाय काय भग मागाप मेधातिथि-मेध्यातिषीकाम्यो मेधातिषि-मेध्यातियो काग्वी (२१) वसिष्ठो मंत्रावणि वामदेवो गौतम मेषातिाप-मेध्यातियो काण्यौ विश्वामित्र इत्यके नौधा गौतम मेधातिथि काय पामदेदो गौतम वामदेवो गौतम स्वष्टा, पजरय, झापति, रिति -अष्टिा काष मेधातिथि काय मृमेष प्रांगिरस दा३३३ ८६११ ८.११५ ८६६ " " ७१३०४ " - " " २९४ " ८।१।१० दादा " " " " २९७ २९८ " " २०० ३०१ ३०२ ८.५२७ ८१३१७ " १९ ( साम हिग्यो) (१४२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्र काण्डम् देवता छन्दः ऋषिः मनसख्या अावेदस्थान बहती ७८१०१ ७७४१ उपा अश्विनी " ३०४ । " " " " ३०७ ३०८ ३०९ ३१० (२२) वसिष्ठो मंत्रावण यसिष्ठो मंत्रावरून अश्विनी ववस्वती प्रस्कण्व काग्व मेधातिथि-मेध्यातिथी कावी देवातिथि काण्वः वसिष्ठो मंत्रावरुण वसिष्ठो मंत्रावणिः नमेष आगिरसः नौधाः गौतम. (२३) वसिष्ठो मैत्रायणि वसिष्ठो मंत्रावणि " १४७१ ८1१।२० ८४११ ७३५४४ ७.३२११८ ८.९९. ८८1८८५ " " 12 " " त्रिष्टा " 1" ३१४ ३१५ " गातुरायः पृथुन्यः " " खा२११ ७२४१ ५३२११ २०११४८१ २०४७.१ ७२७११ १०७३।११ १०४१२३१६ . " " " ३१८ ३२९ " वेनः इन्द्रः " ३२१ " " ३२२ ६३२१ " " ३२३ " " " ८९७ १०१५५५५ टा९६१६ सप्तगुरांगिरसः वसिष्ठो मैत्रावणि गोरिवोति शाक्त्य येतो भागव. बृहस्पति कुलो वा सुहोनो भारद्वाज (२४) घुतानो मारुत. धुतानो मारत बृहदुक्यो वामदेश्य धुतानो भात वामदेवो गौतम वमिष्ठो मंत्रावरुणि विश्वामित्रो गाथिन वसिष्ठो मंत्रावणि गोरियोति शाक्यः (२५) अरिष्टनेमिस्ताव्यं भरद्वाज विमद ऐन्द्रः, घटावामुक यामदेवो गौतमः " 1 " " " " ७।३।१० ३३०२ ७१२३३१ १०॥७३॥९ " " " " ३३५ २०१७दार ६४७२१ १६३१ ४।१७१८ " " "" (१४३) सामवेदका सुवोध अनुवाद चतुर्ध अध्याय] देवता मंत्रसंख्या ऋग्वेदस्यानं मिष्टुप 1. ऋषिः बामदेव गौतमः वामदेवो गौतमः विश्वामित्रो गायित रेणुश्वामित्र बामदेवो गौतमः " M " " १३८ ३३९ १४० ३४१ २५६ १०८९४ १०.२०१ १८४१६ " गोतमो राहगणः (२६) मनुष्ट्रप " १।१०।१ मधुच्छन्दा वैवामित्रः " " " ३४३ " . m ३४५ २४६ " १५८४४ ५.३९६१ ८।९५४ १५८०१ ८३४१ ८९५ार ८.९५७ ६४४ार " " ३४८ १४२ जेता माधुन्छन्दसः तमोराहगणः अधिमामः तिरमवीरागिरसः गौतमो राहगणः नौपातिथिः काय. तिरश्चौरागिरस. विश्वामित्रो गाधिनः शिरश्चौरांगिरसः दायुर्हिस्पत्यो वा (२७) भरद्वाजो याहस्पत्यः बामदेवी गौतमः, गारपूतो या प्रियमेपः आमिरसः प्रगाप काय 1, " " " " ६४१ ३५३ " टा६८१ ८६३३१ " यायाश्व मात्रेय " दपिया इमा ६1888 ४३३९६ १२१श पूर्हिस्पत्यः पामदेवो गौतम जेता मापुग्मन्दसः (२८) प्रिपमेष: आंगिरग वामोवो गौतमः प्रियमेपः सांगिरसः " " " 150 " .. ८1९९८ मपुजवा वामित्रः " " . प्रिपमेपः अगि मरद्वाजो बाहरपल्पः प्रतिमामः . दादा ६।१४ पार " किवीताः विभाएयः वामदेयो गौतमः (१५४) सामवेदका सुवोध अनुवाद (पेन्द्र काण्डम् मत्रसंख्या म्हग्वेवरपान ऋषिः देवता छन्दः . ८९७१० १०।१४७१ भति जगती जगती " " १५७४ " " ॥ " " ४ FREE । " १०॥४३१ श५१२१ १०५२।१ ६७००१ २०१३४१ १।१०११ " यावापृथिवी इन्द्रः रेभः काश्यपः सुयेदाः शेलपिः यामदेव गौतमः सस्य भोगिरत. विश्वामित्रोगापित कृष्ण मागिररा. सम्य मांगिरसः राज्य आंगिरसः भरद्वाजो मार्हस्पत्यः मेधातिषि कावः कुत्स आंगिरसः (३०) नारद काण्य. गोपूरत्पश्वमुक्तिनो काण्यापतो गोषूक्यश्वसूक्तिनो कायापनो पर्वतः काकः विश्वमना बयस्यः विश्वमना यश्वः विश्वमना वयश्वः नृमेघ आंगिरस महपंक्तिः जाती उष्णिक ३८१ १८२ " " " " " सासर दा१५५१ ८१५४ ८।१२।१६ ८।२४।१६ ८.२४१३ ८५११ दा९८१ १८४७ " १८६ " " " " पोतमो राहगणः 18 " विश्वमना यंपश्व ८६२८ " प्रगायो पोर. काद भरद्वाजो बार्हस्पत्य " " दा९८४ नमेष आगिरस " " " आदित्या " ८।१८१८ दा२४१२४ दा१८५१० ७.१२॥१ आदित्या विराष्णिक पर्वतः काग्व इरिम्बिठिकावः विश्वमना वयश्वः इरिम्बिठि काण्व वसिष्ठो मैत्राथमि (३२) सौभरि काण्य. सौभरि काय शोभरिकाण्व. सौभरि कापवः दाश१३ " ४०० ४०१ " 21९०१ ८२११३ मस्त इन्द्र (१५) चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद देवता मंत्रसंख्या कप पिः सौभरि काब सौभरिःकाका ४०३ मदत महादेवस्यानं ८.२१।११ ८.२०१५१ ૮૨૮૨૦ ८.९८७ ८।२२५ शर ४०५ ४०६ 2019 मेघ बांगिरसः नमेष आंगिरसः " " " पंनिः " ४०९ ४१० १८४१० १८०१ " " ४१२ सौभरिः काश्वः सौभरि फायः (३३) गोतमो ( सम्मदो वा) राहगणः गोतमो ( सम्मदोवा) राहूगणः गोतमो (सम्मदो धा) राहगणः गोतमो (सम्मदो वा) राहगणः गोतमो ( सम्मदो या ) राहगणः गोतमो ( सम्मदो पा) राहू गण. गोतमो ( सम्मदो पा) राहगणः गोतमो ( सम्मदो या) राहगणः त्रित आप्त्यः अपस्मुरायः (३४) " " icong १८०३ १५८१३ १२८२ १२८२११ ०१०पार ५.७५१ ४१४ ४१५ 11 विश्वेदेवाः अदियनी ४९७ " अतिः यमुथा गायः ४१९ ४२० विमद ऐन्द्रः सत्यथवा मात्रयः " उपा सोमः : " 1. ४१२ ४२३ ५।६।४ १॥२॥१ ५७९१ २०२५ार १५८२४ १५८२४ ५६१ १०।१२६९ विमद ऐनः गीतमो राहगणा गोतमो राहगणः " " अग्निः कियेदेवाः यमुष्त मात्रेपः गृहली अहोमुग्यामरेग्यः पवमानः सोमः ९१०११ ९११०१ सुण प्रसरस्यू रुन प्रसवस्यू . द्विपरा विराट विपरा अनुष्टुप्पिरी. मिसामया पिरादिराद २८ . इन सदस्यू ९१०९३ ९१०९।१० 11 ४३१ BER पिपरामनुष्पा रिपीलिकामया पिरामिण्ट ऋण प्रसरत्यू ९४११० ७५६१ ४११ वरिष्ठो मंचाररभिः वामदेव गौतमः नगर मणिः पादित परीन (१४६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ऐन्द्र पाण्डम् मार्सच्या प्राग्येवस्थान ९।१०९७ देयता पवमान सोम द्विपदा विराट ४३७ विपश विराट " 11 ५॥३॥ ५.३१२४ " ४४० ४४१ " " " " १०॥१७॥१ विश्वेदेवा उषा " ४४३ ४४४ ४४५ " ४४७ ४४८ ऋण प्रसदस्यू (३६) प्रसदस्य ग्राम्य प्रसदस्प प्रसवस्य प्रसदस्या प्रसदस्य सवतं आगिरण प्रसदस्युः प्रसदस्य प्रसवस्य (३७) प्पन काय बन्धु मुबघु श्रुतबघु विप्र- वपुश्च पमेण गोपायना लौपायना या बन्प सुबन्धु धुतबन्युविप्र- वापश्च क्रमेण गोपापना लौपायना या अषु सुबन्धु श्रुतबन्धुर्विप्र- मन्युश्च कमेण गोपायना लोपायना या सर्त अगिरस भुवन बाप्त्य साथमो वा भौवन कयष ऐलूप भरद्वाजो बार्हस्पत्य आश्रेय वसिष्ठो मैत्रावणि (३८) मन्ति " ८५६५ पा२४१ " ४४९ इन्द्र " ४५० 11 २०११७२४ १०।१५७१ विश्वेदेवा " " ४५२ ४५३ ४५४ ४५५ ४५६ विश्वेदेषा " यजु० ३६ाद एकपा २०११ गृत्समद शौनक ४५७ ४५८ ४५९ ४६० पर्य १०१३०१ दा९७१३ २११३९६१ पा९७१ ९।१११११ " अप्टि अतिजगती अत्यष्टि अतिजगती अत्यष्टि अतिनमती सत्यष्टि गौरागिरस परच्छेपो देवोवासि रेन काश्यप पहच्छेगो धोदास एवयामदानेय अनानत पादच्छेपि भकुल पहच्छेपो दबोवासि ४६३ ४६३ ४६४ ४६५ विश्वेदेवा महत पपमान सोम " सविता अग्नि १२१२७१ २०१२४ " गुस्समद शौनक अष्टि
पश्चा अध्याप]
सामवेदका सुपोध अनुवाद
(१७)
अय पापमान काण्डम् ।
अथ पञ्चमोऽध्यायः।
9.
tr
[९]
(१-१०). ४ अमहीपुराइगिरणा, २ मपच्छन्दा वाणित , ३ भूपूणिमनिर्भारशे या; ५ त्रिन मारयः,
६ कश्यपो मारोष.; ७ जमनिर्भागवः; ८ दृापत आगस्त्य. ९,१० मसित पायपो रेषतो या।।
पवमानः सोम ।। गायत्री।।
४६७ उचा ते जातमन्धसो दिवि सद्धम्मा ददे । उनगम महि श्रयः॥१॥( ९।६११०)
४६८ स्वादिष्टया मंदिष्ठया पास्त्र सोम धारया । इन्द्राय पातवे सुतः ॥ २ ॥ (प्र. ९।१११)
परस्य धारया मरुत्वते च मत्सरः । विश्वा दधान ओजसा ॥ ३॥ (ऋ. ९।६५।१०)
४७. यस्ते मदो परेण्यातना पवस्वान्धमा । देवावीरपरसहा ॥४॥(स. ९.६१।१९)
१२३
१३
.
४६९
[१] प्रथमः खण्डः।
८४६७ ] हे सोम! (ते अन्धमा ) तेरे इस मन रसा(जातं उद्या ) भन्म अचे (दिवि) धुलोक,
हुआ है. (सत् उनं शर्म) चुलोरमें होनेवाले प्रभावशाली मुक्त और (महि भवः) महान् अन्न (भूम्या ददे ) भूमि
पर प्राप्त होते हैं ॥१॥
१ ते जातं दिवि उध-सुर सोमरा जन्ग लोकमें ऊचे स्थान पर हुमा है।
२ उम्र शर्म महि थरः भूम्या ददे- यहाँसे महान् सुन्न और उत्सम अन्न पृथ्वी पर हमें प्राप्त होते है।
[१६८ 1 है (सोम) सौम! (इन्द्राय पातये सुतः) इसके पोनरे लिए निकाला गया यह रसाप व्र
(स्वादिष्टया) स्वादिष्ट और (मविष्टया ) हर्ष उत्पन्न करनेवाली (धारपा पवस्त्र धारासे प्रवाहित हो ॥ २ ॥
१ इन्द्राय पातये सुतः- इन्द्र के पीने के लिए यह रस निकाला गया है।
२ स्वादिष्टया मदिष्टया धारया पवस्व- यह र स्वादिष्ट और हवं बड़ानेवाला है।
[४६९1 हे सोम! (वृपा धारया पपस्स) बलशाली धारासे तु कलशमें आ और (मरत्व ) महत् जिसकी
सहायता करते उस इन्द्र के लिए (विश्वा ओजसा दधानः ) सर सामसे युक्त होकर ( मत्सरः) आनन्द बढाने.
१वृपा पयस्थ धारया-जोरके प्रवाहसे यर्तन में रस पड़े।
२ मरुत्यते (इन्द्राय)-इन्द्र के मदके लिए मरत आते है।
३ विश्वा ओजसा दधानः- सय सामथ्यसि धारण कर ।
४ मत्सरः (मद्-सरः)- आनन्द बदानेवाला हो । सोमरस पानसे शक्ति और आनन्द बढता है।
[१७03 हे सोम। (ते देवानी) तेरा नो देवोंको धुलानेशला ( यय-शंस-हा) पायी और दुष्टोका नाश
करनेवाला, (परण्या मदः) भेळ मानन्द देनेवाला (या रसः ) जो रस है, । (तेर अन्धसा) सामान रूप रसके
साथ ( पयस्व) कला तू या !!४
पालाहो॥३॥
(१४८) सामवेदका सुबोध मनुवाद [पायमानं काण्डम् १३ ४७१ तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः । इरिगति कनिक्रदत् ॥ ५॥ (१ ९।३३।५ ) ४७२ इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पयस्व मधुमत्तमः । अस्य योनिमासदम् ॥६॥(ऋ. ९।६४।२२ ) ४७३ असाव्य शुर्मदायाप्सु दक्षौ गिरिष्ठाः । श्येनो न योनिमासदर ॥७॥ (ऋ. ९।६२।४ ) ४७४ पवस्त्र दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे । मरुद्भयो वायवे मदः ॥८॥ ( ९२९१) १ देवावी. (देव-आधी )-देवोंको प्रिय, देव जिसे पीते है। २ अय-शंस-हा- पापो और दुष्टोका नाश करनेवाला । ३ घरेण्यः मदः- धेष्ठ आनन्द देनेवाला । ४ पवस्व- स्वच्छ होने के लिए बर्तन में डाला जाता है, । साफ होकर बर्तन में गिर । [४७१] (तिन चाचः उदीरते ) ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीन वेदोंके मन यौले जाते है । (धेनव' गा: मिमंति ) दुधारू गायें दूध दुहतेके लिए शाद करती है, (हरिः कनिकदत् एति) हरे रगका सोम शब्द करता हमा छाना जाता है || ५॥ १ तिम्नः याचः उदीग्ते- तीन वेदोंके मत्र बोले जाते हैं। २ धेनवः गावः मिमंति- दुधारू गायें अपना दूध जल्दी ही दुहाने के लिए शरद करती है। ३ हरि कनिक्रदत् पति- हरे रगका सोम शम्द करता हुआ छाना जाता है। सबेरे यज्ञशालामें क्या होता है, उसका यह वर्णन है। (४७२] है (इन्दो) सोमरस ! (मधुमत्तमः) अत्यन्त मोठा तू (अर्कस्य योनि) यज्ञके मध्य भागमें (आसदं) चंठनेके लिए (मरुत्यते इन्द्राय) महन् जिसकी सहायता करते हैं, उत्त इन्द्र के लिए (पवस्व ) कलशमें जा ॥६॥ १ मधु-मत्-तमा-- अत्यन्त मोठा। २ अस्य योनि -पूजनीय यश जहाँ होते है, अर्फ-पूग्य। ३ पयस्व-रस छानने के लिए एक बर्तनसे दूसरे बर्तन में डाला जाता है। [४७३ ] (गिरि-टाः अंशुः ) पर्वत पर होनेवाले सोमका रस (मदाय असायि) आनन्द प्राप्तिके लिए निचोड़। है, (अप्सु दक्षः । पानीमें मिलकर वह बढा है, (श्येनः न ) इयन पक्षीके समान ( योनि आसदत् ) अपने स्थान पर वह जाकर बैठा है॥७॥ १ गिरि-ठाः अंशु-पर्वत पर सोमलता होती है। २ सावि- Rक्षा, रस.निकाला है." ३ अप्सु दक्षः-पानीमें मिलकर यह बहा है। वह बल बढानेवाला हो गया है। ४ श्येनः न योनि भासदत्-श्येन पक्षी जैसे पर्वतसे उडकर अपने स्थान पर आता है, उसी प्रकार यह सोम पर्वतसे पहा यज्ञशाला में लाया है। [४७४ ] है (हरे ) हरे रगके सोम! (दक्ष-साधना) पल यानेषा सापन तू (मा) मानन्ददायक ( देवेभ्यः मरुद्भः पीतये) देवों और मौके पीने के लिए (पवस्व ) इस बर्तनमें था॥ ८॥ १ हरि.-- सोम हरे रगका होता है। २ दक्ष-साधना- यल बढ़ानेका यह साधन है। ३ मद:- मानव बढानेशला तोमरस है। ४ देवेभ्यः पीतये- यह देवोंके पोने में आता है। ५ पयस्व-यह छाना जाता है।
पञ्चम अध्याय] सामवेदका सुरोध अनुवाद (१४९) ४७५ परि स्यानो गिरिष्ठाः पवित्र सोमो अक्षात् । मदेषु सर्वदा असि ॥ ९॥ (ऋ. ९।१८।१ ) ४७६ परि प्रिया दिवः कविर्वया सिनयोहितः । सानोति कविक्रतुः ॥१०॥ ( ऋ ६।९।१ ) इति नवमी दशति. ॥ ९॥ प्रथम सा. स्व०१1 उ०३ पा० । ४२ । गा] १०] (१-१०) १ (कषिर्भपापी ) श्वापार आने २ रित मापय , ३, ८ अमहापुरागिरस , ४ भृगुयाणिजमर- जिर्भागयो था, ५, ६ कश्यपो मारीच , ७ निधूदि काश्यप, ९, १० मसित पायपो देवलो वा॥ पवमान सोम || गायत्री॥ ४७७ सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम् । सुता विदथै अक्रमुः ।। १ ।। ( ९।३२।१ ) ४७८ प्रमोमासो विपचिवोडो यन्त ऊपः । मानि महिप इव ॥२॥ ९॥३३१) ४७५] ( सोमः पवित्रे पर्यक्षरम् ) सोमरस छलनीसे नीचे गिरता है, (गिरि-पा. मानः ) यह सोम पर्वतपर होना है, यहाँ माकर इसका रस निकाला जाता है । ( मदेषु सर्वधा असि) आनन्द बेगवालों में तू राजसे पंछ है ॥९॥ १ स्थान:- उसका रस निकाला जाता है। २ सोमा पनि परि-अक्षरत्-- सोमरस छलनी से छाना जाता है, और यह नीचे वर्तनमें गिरता है। ३ मदेषु सर्प-धा मसि- भावाब देनेवाले पदायोमें यह सबसे अधिक आनन्द देनेवाला है। [४७६ (कवि-ऋतु- पविः ) पृद्धिको बढानेवाला तथा स्वय सानवान् यह सोम र नप्त्यो हित.) सोमरस मिकालनेके दो तलाक योचमें रखा गया है, (दिवालिया वयांसि ) वे पुलोकके प्रिय पक्षी अर्थात पहाडवे परयर ( स्वानः ) रम निकालने के लिए (परियाति ) उसके ऊपर चलते हैं, सोम पाप से पीसा जाता है ।। १० ॥ १ कवि-ऋतु:- सोम शुद्धि और कार्य करनेकी शक्ति बढाता है । २२प्त्यो हित:- दो लकहरेक पट्टोके बीच सोम रखा जाता है, और पाकर उसका रस निकाला साता है। ३ दियः पयांसि-पहाडके पत्थर, एलोकके पभो। ४ स्थानेः परियाति-(स्वान -सुवानः ) रस निकालनेवाले याजक परथरोंसे सोम पीसकर उसका रस निकालते है। ॥ यहां प्रथम सण्ड समाप्त हुभा ॥ [२] द्वितीयः खण्डः। [19] (मद-व्युत्त. सोमास. आनद यदानवाले सोमरस (मुताः ) निचोडे गए हैं। ( मघोनां नः विदथे ) हवि देनेवाले हमारे इस यराम { श्रबसे प्रारमुः ) मन और पशके लिए ये रस पायमें भरे गए है ॥ १ ॥ सोमरप्त मानन्द बढानेवाले है। २ मघोनां नः विदथे- हविष्यात तयार करके हम यस करते है। ३ श्रवसे प्राममु सोमरसरूपी अक्षरस पीने के लिए उन रसोको तमोमें भरा है। [४७८(विपश्चितः सोमास ) बुद्धिको बहावाले सोमरस (अपः ऊर्मय । पानीके लहरोके साथ मिलापे जाते हैं, महिपाः बनाने इय) भैसे से पनमें जाते है, उस तरह ये सोमरस (नयन्त ) पानी १ सोमास. मदच्युता. - wom मिलाये जाते है।॥२॥ २० (साम हिन्दी) (१५०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [पाबमानं काण्डम् ४७९ पवस्येन्दो वृषा सुता कधी नो यशसौ जने । विश्वा अप द्विषो जहि ॥३॥ (ऋ. ९।६१२८) ४८० घृपा ह्यसि भानुना घुमन्त त्वा हवामहे । पयमान स्वदशम् ॥४॥. ९।६१६४) ४८१ इन्दुः पविष्ट चतनः प्रिया कवीना मतिः । सृजदश्वरीरिव ॥५॥ (ऋ. ९।६४।१०) ४८२ असक्षत प्रवाजिनो गच्या सोमासो अश्या । शुक्रासो वीरपाशवः ॥६॥(9. ९।६४५) १ २ १.१२ १३१ १ सोमासः विपश्चित:- सोमरस युद्धि और उत्साह पढानेवाला है। २ अपः ऊर्मयः- पानीको लहर । पानी में ये रस मिलाये जाते है। ३ महिषाः वनानि स्व-पशु जैसे धनमें जाते हैं, उसी तरह पे रस पानीमें जाते है। ४ प्रनयन्त- विशेष पद्धतिसे वे पानीमें मिलाये जाते हैं। [५७९] है ( इन्दो ) सोम ! (सुतः ) निचोडा गया और ( वृषा) बल बढानेवाला न ( पवस्व ) पवित हो, (जने नः यशसा ऋधि ) लोगोंमें हमें यशस्वी कर, और (विश्वाः द्विषः अप जहि ) सब शत्रुओंको हरा ॥ ३ ॥ १ हे इन्दो ! सुता- हे सोम ! तेरा रस निकाला है। २ वृपा पवस्व-तु बल बढानेवाला है, तू इस पानमें छाना जाता है। ३ जने नः यशसः कृषि-लोगोंमें तू हमें यशस्वी कर । विश्वाः द्विपः अप जहि-सब शत्रुओंको पराभूत कर, दूर कर। [४८० ] हे सोम ! (हि वृषा असि)निश्चयमे तू बल बढानेवाला है । हे (पवमान ) पवित्र होनेवाले सोम! (स्व-ईशं) सबको देखनेवाले (भानुना द्युमन्तं ) तेजसे चमकनेवाले (त्वा हयामहे ) तुझे हम बुलाते है ॥ ४ ॥ १ हि वृपा असि- निश्चय से तु बल बढानेवाला है। २ पवमानः-- छनकर पवित्र होनेवाला, छानने के बाद वह साफ होता है। ३ स्व:-री-अपने भाप घमकनेवाला। ४ भानुना घुमन्त त्या हवामहे- तेजसे चमकनेवाले तुझे हम बुलाते है. तेरा वर्णन करते हैं। [४८१] (चेतनः प्रियः इन्दु. ) उत्साह बढानेवाला प्रिय सोमरस ( कवीनां मतिः) ज्ञानी लोगोंकी स्तुति के साप (पविष्ट ) बर्तन में छाना जाता है, ( रथीः अश्वं हव) रथका स्वामी जैसे घोडेको चलाता है, उसी प्रकार (सृजत् । यह पात्र भरा जाता है, ॥५॥ १ चेतन प्रिय. इन्दुः- उत्साह बढानेवाला होने के कारण यह सोमरस सभीको अन्छा लगता है। २ कवीना मतिः पविष्ट- ज्ञानी लोगोंके स्तोत्रके साथ-साथ यह छाना जाता है, और वर्तनमें भरा जाता है। ३ रथीः अश्वं इच सृजत्- रयमें बैठनेवाला जिस प्रकार घोरोंको हाकता है, उसी प्रकार यह सोमरस पात्रमें भरा जाता है। 1.४८२] (याजिनः) पल वढानेवाले ( माशयः) और उत्साह प्रदानेपाले, और (शुक्रासः सोमासः) चमकनेवाले सोमरस (गव्या अश्वया वीरया) गाय, घोडे और वीर पुत्रोंको इच्छा करनेवालकि द्वारा (प्रासृक्षत) निचोरे जाते है| ॥॥ १ पाजिनः पाशवः सोमासा- ये सोमरस बल और उत्साह बढानेवाले है। २ गन्या अभ्यया धीरया प्रारक्षत्- गाय, घोडे और चौर पुत्र प्राप्त हों, इप्त इच्छासे यजमान द्वारा रस निकाला जाता है।
पश्चम अध्याप] सामवेदका सुबोध अनुवाद .. २ 18 १३३ ३२७ ४८३ पवस्व देव आयुपगिन्द्र गच्छतु ते मदः । वायुमा रौह धर्मणा ॥७॥ (१९६३।२२) ५८४ पवमानो अजीजनहिवयित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वेधानर वृहद ॥८॥(क्र.९१६१।१६) ५८५ परि स्वानास इन्दयो मदाय यहणा गिरी । मधो अन्ति धारया ॥९॥ (ऋ ९११०१४ ) १८६ परि प्रासिष्यदकविः सिन्धोरूमविधि श्रितः । कारु विभ्रत्पुरुस्पदम् ।।१०॥ (ऋ९।१४१) इति बनामी पदाति. ॥ १०॥ द्वितीय खण्डः ॥२॥ (स्व० ११ । उ०मा । पा० ४९ । हो ।) इति पञ्चमप्रपाठकस्य द्वितीयोऽर्थ, एश्चम प्रपाठक समाप्तः ॥ ५॥ [४८३ ] हे सोम! (देवः पवस्व ) तू घमफ्नेवाला है, अब पात्र छनने के लिए जा, (ने मदः) तेरा यह भानन्द पढानेवाला रस ( आयुषक इन्द्रं गच्छतु ) सपके साथ इन्दरे पास जाये, (धर्मणा) अपनो धारकझाक्ति (घायुं मारोह ) वायुसे मिल ॥७॥ १ देवः पयस्व-तू धमक्ते हुए जाना जाकर साफ हो । २ ते मदः भायुपा इन्द्रं गच्छतु-- तेरा यह आनन्द बढानेवाला रस सबके साथ इन्द्रको प्राप्त हो। ३ धर्मणा यायु आरोह- अपनी पारशक्तिसे यह यायुको प्राप्त होवे। सोमरस शुद्ध होने के बाद इन्द्र और वायुको दिया जाता है। [३८४ (पवमानः ) पपित्र हुए इस शोभराने (दिवः चित्र) धुनोरम दोखनेवाले ( वृहत् वैश्वानरं ज्योतिः) महान् वैश्वानर तेजको ( तन्यतुं न ) विजलीके समान (अजीजनत् ) उत्पन्न विया ॥ ८॥ सोमरस छनकर शुर हो जानेपर चमकने लगता है, उसको देखकर देखनेवाले समझते हैं कि मानों बिजलो हो घमा रही है। [१८५] (स्थानासः इन्दवः ) निचोड़े जाने के बाद ये सोमरस ( यर्हणा गिरा) मधुर स्तोनों के साथ तमा (मधोः धारया ) इस मोठे रसको पाराके साप (मदाय ) आनन्द वदान के लिए (परि अर्षन्ति ) छान से छाने जाते है॥९॥ १ स्थानास-सुवानासः इन्दप:- सोमरस निकालते हुए ( यर्हणा गिरा) अधी आवाजसे स्तोत्र बोले नाने है, मौर उस समय यह मोठे रसको मारा, शेनेवालोक यानन्द बढाने के लिए बर्तन में छोड़ी जाती है, और छाननीसे छानो जाती है। [४८६] ( कधिः । ज्ञान दर्धक, सिन्धोः ऊौ ) सिन्ध नदीके लहरम ( अधिश्चित ) मिला हुआ (पुर- स्पृहं कालं बिभ्रत्) अनेकोंम प्रशसनीय, स्तुति करनेवाले यज्ञकर्ताओं को धारण करनेराला यह सोम(परि मासिष्यदत् ) पात्रमें टपकता है॥१०॥ १ कविः सिन्धोः ऊमा अधिधितः- ज्ञान बढानेवाला यह सोमरस नदीके पानीमें मिलाया जाता है । इसमें पानी मिलाया जाता है। २ पुरुस्पृहं कारु विभ्रत्- प्रशसनीय याजक एए स्थानपर बैठते हैं । यज्ञमण्डपमें सभी पाजक बैठते है। ३ परि मासिष्यदत् - यह सोग छाननीमे छाना जाता है । छाननीका नाम " भापवित्र " है, इस दशा- पवित्रमे यह रस नीचे बर्तनमें पड़ता है। 1 यहां द्वितीय खण्ड समाप्त हुआ।
(१५२) सामवेदका सुवोध अनुवाद [प्राधमात काण्डम् 3 ए २ १३ अपापवसे मृधः भय एप्पराठकस्य प्रथमोऽध .६॥ (१-१०१ १, ८, ९ अमहीयुरागिरस , २ बृहन्मतिरागिरस.; ३ जमदग्निर्भार्गव ४ प्रभूवसुरागिरस., ५ मेण्या- तिथि काव , ६, ७ निवि. काश्यप, १० उधम्य आगिरस.॥ पवमान. सोमः। गायत्री ॥ ४८७ उपो पु जातमप्तुरं गोमिभद्रं परिष्कृतम् । इन्दु देवा अयासिपुः ॥१॥ (ऋ.९।६।१३ ) ४८८ पुनानो अक्रमीदमि विश्वा मृधो विचर्षणिः । शुम्भान्ति विमं धीतिभिः ॥२॥ (प्र. ९६४०११) ४८९ आविशन्कलाई सुतो विश्वा अपनभि श्रिया । इन्दुरिन्द्राय धीयते ॥ ३ ॥ (ऋ. ९।६२।१९) ४९० असार्ज रथयो यथा पवित्र चम्बोः सुतः । कामवाजी न्यक्रमीच ॥४॥ (ऋ. ११३६।१ ) ४९१ म यद्गावो न भूर्णयस्त्वेपा आयासो अक्रमुः । मन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥ ५ ॥ (भू ९४" ४९२ कविसोम मत्सर । नुदस्वादेवयु जनम् ॥ ६॥७.९।६।२४) [३] सृतीयः खण्डः। ८४८७1 (सु-जातं ) उत्तम रीतिसे तैयार किये हुए (अप्तुरं ) पानीमें मिलाये हुए (भंग ) को मारले. पाले (गोभिः परिष्कृतं ) गायके दूधमें मिले हुए (इन्दु ) सोमरसके पास ( देवाः उप अयासिपुः ) देव पहथे ॥१॥ सोमरस निकालने के बाद ( अप्-तुरं ) उसमें पानी मिलाया जाता है, ( गोभिः परिष्टतं ) उसमें गायका दूध मिलाया जाता है, और यह (भाई) माशो मारनेवालोंका उत्साह पानेवाला होता है । उसपे पास सोमरस पीनको इच्छासे देव आते है। [४८८3 (विचर्षणिः) ज्ञान बढानेवाला { पुनाना) पवित्र सोमरस (विभ्या मृधः अभ्यममीत ) गाय समभापर आक्रमण करता है, (विरं ) उस शान बढानेयाले सोमको ऋयिक (घीनिभिः शुम्भन्ति ) स्तोत्रों सुशोभित करते है ॥२॥ मोमरस पोनेके पार उत्साह यढता है, उस रसको छानर र योनसे सर गनुभोंपर मात्रमण करनेट रत पदता है। उस सोमरसको निकालने समय मत्र पोले जाते हैं इस कारण वे और अधिक सुशोभित शो है। [४८९] (मुता) सोमरस निकालनेके यार (कलशं आयिशर) मलार्म भरने के समय (विभ्या थियः अभ्यर्षन् ) राय दौमाओले खानेपाला (दुः) यह सोमरस (इन्द्राय धीयते ) इनके लिए दिया जाता है।॥३॥ [४९०] ( पथा रथया) जिस प्रकार रएका घोश होगमाता है, उस प्रकार (चम्पोमुतः मोयोरे पशि नियोग या पह शोमरस (पचित्रे असर्जि) जालनेके यांनमें हा जाता है, मगर यह (यानी) मालयान सोमरस (यामन न्यक्रमीत् ) देवोंको शापित करे लाता है और बर्तन में भग एका है ॥४॥ ४९. (यत् भूर्णयः ) जो शोप्रतापरनेवाले (त्येषाः अयामः) नरयो भोर गरिनेयाले गम मानी (रष्णा स्प) माली प्रमहीको ( अपनन्तः) दर वरते हुए मनको ( प्र मनमुः) प्राराभाले । गायान) गा निग प्रसर गारमें जाती है, उसी प्रकार सोमरस या जाता है और या रहा है ॥ ५॥ मोमगरे कारको कालो परोहानसे दूर हो जाती है, और यह सोमरसा मनोगे मी रो में जाना जाता है। पाने पर पासाने माना है, मोर मामशे माणेशालेके सिर प्रत परता है। [१९२१ गोग! (मर-म) मानद बानेशमा और ऋतु-पिन् ) ममी पनि माननेशमा गृपा अपप्मन्) भोर हुए ( पयसे) पति होता है, (प्र-देय-युंजन नुस्य) देरी मतिर गणेशने मनुष्योपूर.६॥ - पञ्चम अध्याय . सामवेदका सुवोध अनुवाद , ३ ४९३ असो वस्त्र धारया पयो सूर्यमरोचगा । हिन्वानो मानुपारपः ॥ ७॥ (ऋ. १६६३।६ ) ४९४ स पवस्व य आपियन्द्र वृत्राग हन्तवे । वनिवास महारः ॥८॥(ऋ. १६॥२२) ४९५ अया वीती परि सब यस्त इन्दो मदेवा । अवाहनवतीनव ॥९॥ (इ. ९.६१११) ४९६ परि घुक्षर सनद्राय भरद्वाजं नौ अन्धसा । स्वानो अर्थ पवित्र आ॥ १० ॥(ऋ. ९५९।१ ) पति प्रथमा शतिः ॥ १॥ तृतीयः खणः ॥३॥ [स्व० ९| उ०६। पा० ३५ । तु ॥] ( १-१४) १ मेधातिषिः काण्यः, २, ७ भृगुर्वाणि मदग्नि गयो या ३ उचथ्य भागिरराः; ४ मवस्तार: काश्यपः । निभूयिः काश्यप.; ६, १० असित: काश्यपो देवलो था; 4. कश्यपो मारोच:, ११ कविर्भार्गवः; १२ जमदग्नि गयः, १३ अपास्य आगिरस. १४ अमहीपरागिरस. ॥ पवमानः सोमः ॥ गायो । ४९७ अचिक्रदट्टया हरिमहामित्रो न दर्शतः । संसूर्येण दिद्युते ॥१॥ (ऋ.९१२६) १ भदेवयु जनं नुदस्य- देवको भक्ति न करनेवाले मनुष्यको दूर कर। २ मृधः अपघ्नन्-डायुको नष्ट कर। ३ प्रवसे- तुझे शुद्ध किया जाता है, तुझे छाना जाता है। [४९३] हे सोग ! ( मागुपीः अपः हिन्यानः ) मनुष्यों के लिए हितकारी पानीको प्रेरणा देते हए ( यया सूर्य अरोचयः ) जिस प्रकार तूने सूर्यको प्रकाशित किया, (अया पयस्य ) उरी पाराले नौवेके वर्तनने छनता हुआ तू जा॥७॥ पानो मण्योका हित करनेवाला है, उस पानीको सोमरसमें मिलाया जाता है। तब यह रस और अधिक धमकने लगता है, ऐसा प्रतीत होता है कि मानों वह सूर्यको भी प्रकाशित करता हो, ऐसा यह सोमरस मीचे के पात्रम छाना जाता और भरा जाता है। ८४९४ हे सोम! ( महीः अपर पवियांस ) महान् जल प्रवाहोपणे अपने अधिकारमें रजनेपाले ( वृक्षाय दन्तये ) वृत्रको पारने के लिए ( इन्द्रं माविथ ) इन्द्रको उत्साहित कर और ( सः पवस ) वह तू नौवे बर्तन में छनता जा॥८॥ वत्र जल प्रवाहोको रोक दिया था, इन्द्रने वृत्रको मारकर जल बहाया। इस इन्द्रका उत्साह सोम पीनसे ही बदा था । पत्रका अर्थ है मेप। इन्द्र मेघोंको तोडता है और पानी बहाता है । बरसात होती है। ९५] हे (इन्दो ) सोम! ( अया चीती परिस्रव ) इस प्रकार इन्द्रको सौम पिलाने के लिए तू कलशमें छन। (ते यः ) तेरा यह रस ( मदेषु ) सप्राममें ( नयी नय अपाहन ) शत्रुके निन्यानवे नगरोंको तोडने के लिए मन्दको सामर्यशाली बनाता है ॥ ९॥ '१९६7 (धुक्षे ) तेजस्यो भऔर ( सनद राय ) देने योग्य धनको और (वाज ) बलको ( अन्धसाना परि भरत ) अपने अनरूपी रससे हममें बड़ा ता (स्नानः पवित्रे आ अप ) रस निशालने के बाद साफ होकर पात्रमें भरा रह॥१०॥ ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुभा ॥ [४] चतुर्थः खण्डः। .४९७ (वृपा हरि.) बनवान और हरे रंगका तया ( महान् मित्रःन ) महान् मित्रके समान (दर्शतः) शंनीष सोम ( अविक्रदर आम्द करता है, (सूर्यग सं विद्युते ) और सूर्य के समान प्रकाशित होता है ॥१॥ सोमरस चमकता है और उसके रस निकालनेका शव भी होता है।
(१५४) सामवेदका सुयोध अनुवाद [पावमानं काण्डम् २ १३ २ १ १ - ४९८ आ त दक्ष मयोभुवं वह्निमधा वृणीमहे । पान्तमा पुरुस्पृहम् })२ (३.९।६।२८) ४९९ अघयों अद्रिभिः सुतः सोम पवित्र आनय । पुनाहीन्द्राय पीतये ॥३॥ (ऋ.९।६१।१ ) ५०० तरस मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः । तरस मन्दी धावति ॥४॥(ऋ ९१५८४१ ) ५०१ आ पवस्व सहस्रिण रवि सोम सुवीर्यम् । असे श्रवासि धारय ॥ ५॥ ऋ ९।६३॥१) ५०२ अनु प्रभास आयवः पदं नायो अक्रमुः । रुचे जनन्त सूपम् ॥६॥ (ऋ. ९।२३।२ ) ५०३ अर्षा सोम घुमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुयत् । सीदन्योनौ वनेम्वा ।। ७ ।। (ऋ ९६६५।१९) ५०४ पृषा सोम घुमार असि वृपा देव वृषमतः । वृपा धर्माणि दध्रिपे ॥ ८ ॥ ( ९६४१ ) ५०५ इपे पवस्व धारया मृज्यमानी मनीषिभिः। इन्दो रुचाभि गा इहि ॥ ९ ॥ (ऋ.९।६।१३ ) [४९८है सोम । (ते ) तेरे ( मयो-भुवं ) सुख देनेवाले ( यदि ) धन आदि देनेवाले, ( पान्तं ) शत्रुओंसे रक्षा करनेवाले और (पुर-स्पृहं ) अनेक लोगों द्वारा पाहने योग्य ( दक्षं ) बलको हम ( अध आवृणीमहे ) भान धारण करते हैं ॥२॥ [ ४९९ ] है ( अध्वर्यो ) अध्व' । ( आदिभिः सुतं सोमं ) पत्थरों से कूटकर निकाले गए सोमरसको (पवित्र आनय ) जानने के बर्तनके पास ला (इन्द्राय पातये) इन्द्रको पिलाने के लिए (पुनाहि ) उसे छानकर पवित्र कर ॥ ३॥ [५५० ] (सुतस्य अन्धसः धारा) सोमरसरूपी अन्नरसको धारा ( मन्दी) आनन्द देनेवाली है, (स: तरत् ) वह सोम नीचभावोंसे दूर रहता है और वह ( धावति ) प्रगति करता है ॥४॥ सोमरसको पोनेके बाद उत्साह बढता है और उस कारण यह उत्तम काम करने लगता है। [५०१ ( सोम) हे मोम ! ( सहनिणं सुवीर्य गि) हजारों प्रकारसे उत्तम शक्ति बढ़ानेवाले धन (आ पवस्व ) हमें दे, और ( असे) हमें (श्रयांसि धारय ) अप्न दे ॥ ५ ॥ [५०२] (प्रत्मासः आयर) प्राचीन लोगोंने (नयीयः पदं ) योन उत्तम स्थान ( अनु अक्रमुः) प्राप्त किया और (रुचे ) तेजको प्राप्त करनेके लिए (सूर्य) सूर्यके समान तेजस्यो सोमको ( जनन्त ) उत्पन्न किया ॥६॥ सूर्य:- गुपके समान तेजस्वी दोखनेवाले सोमरसको निकाला। ६५०३ ] है ( सोम ) सोन! (धुमत्तम.) अत्यन्त तेजस्वी तू (द्रोणानि ) पाश्रमे (रोरवत् वर्ष ) पाय करता हुआ छनता जा. (चनेषु योनो आलोदन ) और तू यनमें और यमालामें रह ॥ ७ ॥ सोमरराको घनते समय शब्द होता है, उस समय वह बहुत चमकता है, बनों पतशालायें बनाते है, उसमें यह सोमरस तम्पार किया जाता है। ६५०४ ] हे (सोम ) सोम। ( वृश घुमान् असि ) तू बलवान् और तेजस्वी है, हे ( देव ) सोमदेव ! (घृपर पग्रत) बलपान और बलबहाने के प्रतका पालन करनेवाला है। (वृषा धर्माणि धिये) पल बसानेवाले पोको तू धारण करता है ॥ ८॥ [५०५] हे { इन्दो ) सोम! ( मनीषिभिः मुज्यमाना ) जानो ऋविनों द्वारा हाना नाता हमातु ( इथे घारया पयस्व } आभाराको प्राप्तिके लिए पारासे छाता जा (रचा) तेरसे ( गारमाभि इहि ) गायोको माप्त हो ॥९॥ ऋत्विज रस निकालते हैं, और यह रत छामा जाता है, बादमें- १ गाः अभि इहि ~ प्रापको भाषा हो । गायका दूध उसमें मिलाते है । गायको प्राप्त होनेका अर्म है। सोममें गायका दूध मिलाना । (रुचा) यह सोमरस धमक्ता है ।
पञ्चम अध्याय] सामवेदका सुरोध अनुयाद १ 3. 3. 1 ५०६ मन्द्रया सोम धारया वृपा पवस्य देवयुः। अव्या वारेभिरस्मः ॥ १० ॥ (ऋ. ९६१) ५०७ अगा सोम सुकन्यया महान्सबम्यवर्धयाः । मन्दान इट्टपायसे ॥ ११ ॥ { ९४७१ ) ५०८ अयं विचर्षणिहिता पवमानः स चेतति । हिन्धान आप्य बृहद ॥ १२ ।। (ऋ. ९।६२।१० ) ५०९ । न इन्दो महे तु न ऊमि न विनदर्पसि । अभि देवार अयास्या ॥ १३ ॥ (ऋ. ९८४४११ ) ५१० अपमन्पवते मृधोऽप सामो अराव्णः । गच्छनिन्द्रस निष्कृतम् ॥ १४ ॥ (ऋ ९६६१।२५ ) प्रति द्वितीया दशति ॥ २॥ चतुर्य: सड, ॥ ४॥ [स्व० १५ 1 3०२ । पा० ५७ । फो॥] इति गायत्र्य । [३] (१-१२ ) सप्तर्षय (१ भरवाजो वाहस्पत्य , २ सयपो मारोप , ३ गोतमो राहगग , ४ अनि माम५ विश्वा- मित्रो गायिन ; ६ जमदग्निर्भार्गव ७ पशिष्ठी मंत्रायणि ) ॥ पवमान सौम ॥ बृहती ॥ ५११ पुनानः सोम धारयापो सानो असि । आ रसधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः ॥१॥ ९।१०७१४) [५०६ 7 है ( सोम) सोग ! (पा) बल बढानेवाला (देध-युः । देवताभोंको प्राप्त होनेवाला ( असा-- युः) हमें मिलनेवाला ( अध्या) सरमण करनेवाला F ( पारेभिः) बालोंको छाननीसे (मन्द्रया धारया पयस्य) मानन्द देनेवाली पारासे शुद्ध हो ॥१०॥ १ वारेभि:- सालोंको छाननी, पापवित्र, इस छलनीसे सोमरस जाना जाता है। २ देव-यु: -छान कर देर्वोको पीने के लिए दिया जाता है। ३ अश्मयुः- बादमें ऋत्विज भी पीते हैं। [५०७] हे (सोम) सोम! ( अया सुरुरयया) इस उत्तम कार्यसेन ( महान् सन् ) सम्मानके योग्य होकर ( अभ्य-ययाः) महान होता है, { मन्दानः इत् ) शानन्द देकर (वृपायसे ) पास बढाता है ॥ ११ ॥ सोम स्वय सम्माननीय है, और वह दूसरोंको भी अधिया बलवान् करता है। ५८(वि-चर्षणिः) विदोष शान बढानेवाला ( हितः परमानः) पाश्रमें भरा हुआ और शुद्ध किया दमा (अयं) यह सोमरस (आय) जलसे मिश्रित होकर (वृधत् हिन्याना) बहुत आम बेता हुमा (सचेतति) प्रसिद्ध होता है ॥१२॥ [५०९1 (इन्दो) हे सोम! (नः महे तु न ) हमें बढ़त धन मिले, इसके लिए (प्र असि )तु कलशमें छाना जाता है । ( अयास्यः न ) अयास्य ऋषि अघ (मि यिभ्रद ) तेरो लहरोंको धारण करते हुए (देवान् आम योंको पूजा करने के लिए जाता है ॥ १३ ॥ अयास्प ऋषिने सोमरस छान लिया है, और अब वह आ पतकर्म करने के लिए जाता है। [५१०) ( सोमः मृधः अपनन् ) सोम शत्रुओंको मारता है। (अराणा ) रान न देनेवालोंको भी मारता है, और (इन्द्रस्य निष्कृतं गच्छन् ) इन्द्र के स्थानके पास जाप्ता हुआ (पयते) छनता है ॥ १४ ॥ ॥ यहां चौथा खण्ड समाप्त हुभा॥ r५] पनमः खण्डः। १८५१९ हे (सोम) सोम! (पुनानः ) पवित्र होते हुए (अपः यसानः) पानीसे मिलते हए (धारया भलि) पाराले तू नो वर्तनम गिरता है, (रन-धा) रत्न धन-देनेवाला तू ( कतस्य योनि ) यज्ञके स्थानपर (आसीदसि ) माकर बैठता है, और (देवः) प्रकाशित होकर (हिरण्ययः उत्सा) चमकते हुए रहता है ॥१॥ . 4 सामवेदका सुवोध अनुवाद [पारमानं काण्डम् Ba ३ 3 १ दर ३१ २१३१७ ३२.५२ ३१२ १११ ३ ३३" ५१२ परीतो पिञ्चता सुनर सोमो य उत्तम हविः । दधन्वार यो नयाँ अप्स्वान्तरा सुपाव सोममद्रिभिः ।।२।। (ऋ. ९९०७१) ५१३ आ सोम यानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया । जनी न पुरि चमौविशद्धरिः सदा वनेषु दधिपे ॥३॥ (रु १।१०७/१०) ५१४ प्र सौम देववीतये सिन्धुन पिप्ये असा । अयोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोश मधुश्चुतम् ॥४॥ (ऋ. ९।१०७/१२) ५१५ सोम उ वाणः सौभिरधि ष्णुमिरवीनाम् । अवयेर हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया ॥५॥ (ऋ. ९।१०७८) ५१६ तवाहर सोम शरण संख्य इन्दो दिवेदिये । पुरुणि पभो नि चरन्ति मामय परिधी रति तारइहि ॥ ६॥ (ऋ ९/९०७११९) [५१२ ] (यः सोमः उत्तमं हविः) नो यह सौम है, वह उत्तम हवि है । (नर्यः) वह मनुष्योंका हित करने- वाला है, ( या अप्सु मन्तः दधन्यान ) जो पानी में मिला हुआ है, ऐसा (सोमं अद्रिभिः सुपाव) यह सोमका रस पत्यरसि कूटकर यजमान द्वारा निकाला गया ऋत्विजो। इस (सुतं इतः परिचित) सोमरसमें पानी मिताओ॥२॥ [५१३ ] है (सोम ) सोम! तेरा (अद्रिभिः स्थानः) पत्यसि कूटकर निकाला हुआ रस (अन्यया पाराणि तिरः) भेडोंके बालोंको छाननीसे नीचे के पात्रमें छाना जाता है, (हरिः चम्योः ) हरे रगका पह रस बर्तन(पुरि जनः न ) नगरीमें पुरुष जैसे प्रवेश करते हैं, उस प्रकार (विशत् ) प्रविष्ट होता है, और (यनेषु सदः दधिपे) लकरीके बर्तन में अपने स्थान पर रहता है ॥ ३॥ १ धन- जगल, जपलमें होनेवाले वृक्षोंकी लकडी, लकडोके बर्तन। [५१४] हे (सोम) सोम ! (त्वं देव-चीतये) देवोंके पीने के लिए (सिन्धुः न) सिन्धु मौके समान (अर्णसा प्रपिप्ये) पानीसे मिश्रित किया जाता है। (मदिन जागृतिः) तू आनन्ददायक होने के साथ साप जापति उत्पन्न करनेवाला भी है, तू (अंशोः पयसा) वतन में पानीसे मिलकर (मधुश्चुतं को अच्छ) मधे रसफो उद्वेलनेवाले बर्तन में जा ॥४॥ [५१५] (सोभिः स्थाना ) निचोडनेवाले याजकोंके द्वारा निचोडा गया (मोमः) सोमरस (अधीनां स्तुभिः) बकरीफे बालोंको बनो छलनीसे शुद्ध होवर (आधेि याति) नीचे दर्तन में पड़ता है, (उ) पह सत्य है, ( अश्या व ) मोडोके समान ( हरिता धारया याति) हरे रमको धारासे यह सोम बर्तनमें जाता है, ( मन्द्रया धारया याति ) मानन्ददायक पारासे यह बर्तन में जाता है ॥ ५॥ ६५१६] हे (इन्दो सोम ) सोमरस! { तर) मेरो ( सख्ये ) मित्रता (दिचे दिये गह) प्रतिदिन में (राण) आनन्दित होऊ, (यभो)सोम! (पुराणि मां न्यपचरन्ति) बहुतसे दुष्ट मनुष्य मो कष्ट देते है। (तान परिधीन अतीहि ) उन दुष्टोंको नष्ट कर ॥ ६ ॥ - पञ्चम अध्याय सामवेदका सुयोध अनुवाद (१५७) 33 ( ९३१०७।२१) t ૨ ૩ 0 2 ( ९।१०७९४) 3 ५१७ मृज्यमानः सुहस्त्या समुद्रे वाचमिन्वसि रयि पिराङ्ग बहुलं पुरुस्पृह पवमानाम्यसि ५१८ अभि सोमास आयकः पवन्ते मा मदम् । समुन्द्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युतः ५१९ पुनाना सोम जागृविरव्या चार! परि प्रियः । स्वं विप्रो अभवोऽङ्गिरस्सम मघा यज्ञ ५२० इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः । सहस्रधारी अत्यध्यमर्पत्ति मी मृजन्त्यायवः ५२१ पयस्व वाजसातमोऽमि विश्वानि वार्या स्वर समुद्रः प्रथमे विधर्म देवेम्पा सोम मत्सर । 2 ? मिमिक्षणा (ऋ ९१०७६) . घ १७ १ स ॥१०॥ (९.९।१०७११७) १ २." २३५ २. ॥ ११ ॥ (ऋ ९।१०७/२३) [५७ है (सु-हत्या ) उत्तम हायोचो भलो निकाले गये सोम! (मृज्यमान:) पवित्र करनेगला तू (समुद्रे पाचं इन्दसि ) गीचे पानीके बर्तन में पाता हुमा शब्द करता है, हे (परमान) शुद्ध होनेवाले सोम! न (पिशंग ) पोले रगके ( बटुलं पुर-स्पृहं रपि ) बहुत चाहने योग्य पन ( अभ्यर्षसि ) देता है ।। ७ ॥ १ समुद्रा-पानीसे भरे हुए यतन । २ पिशंग रय-पीले रगका सोना, सोने के सिको। ५१८ (आययः मनीषिणः) मनुष्योंका हित करनेवाले, ज्ञान प्रदानेवाले ( मत्सरासा मदच्युतः सोमाप्त:) भानन्य देनेवाले, जागनीसे नीचे गिरनेवाले सोमरस (समुद्रस्य विष्टपे अघि ) पानीरो भरे हए कलसेमें (म मर्द) आनन्द देनेवाले अपने रसको (अभि परन्ते ) साफ करके छोड़ते हैं ॥ ८ ॥ १५१९( जाणवः प्रियः पुनान ) उत्साही, प्रिय और शुद्ध होनेवाला तू ( मयाः परि परि ) परोके बालोंकी छलनीसे नीचे गिरता है, है ( अगिरस्तम ) अगिरसों घेष्ठ सोम! तू (विप्रः ) गानो, (अभया) हुआ है, मत अब पू (नः यशं ) हमारे यतको (मया मिमिक्ष)मपुर रसरी पवित्र कर ॥ ९ ॥ [५२०] (मदः सुस' सोम ) आनन्ददायक निचोदा हुमा सोम (मरते इन्द्राय परते) मतोंक साय रहनेवाले इसके लिए शुद्ध होता है, या यह (सहन-धारः) अनेक पारामोंसे (अश्यं अत्यति)रो मारोगी एलनोसे धनता है, (तं ) उसे (मायया मृजन्ति ) ऋत्विन शुद्ध करते है ।। १० ।। २९(सोम) सोम ! (विश्वानि वार्य) सय स्तोपोंमे पवित्र हुआ और ( अगि) मुख्य रूपसे (याज- सातमः ) मन्त्र प्राप्त करनेवाला तु ( पयस्य ) गस हो, हे शोम ! (देवेभ्यः म सर:) देवताओरी आन्द देनेवाला तू (समुद्रः) पानोरे बोध मिलकर (विधर्मन् ) विशेष गायम मुक्त होकर (प्रथमे ) भेष्ठ यसमें पवित्र हो ॥१५॥ २१ (साम हिन्दी) सामवेदका सुयोध अनुवाद [पावमानं काण्डम् 99२ " १९३१७ २२ स ५२५ विनो ५२२ पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया । मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधाममि प्रयास च ॥ १२ ॥ (ऋ ९।१०७।२६) इति तृतीया दशति ॥ ३ ॥ पञ्चम खण्ड । ५ ॥ इति यहत्य ॥ स्व०१९। उ०३ था ९१ व ॥ [४] (१-१०) १, ९ उशना काव्य , २ षगणो वासिष्ठ, ३, ७ पराशर शाक्य, ४, ६ परिप्ठो मैनावरुणि ५, १० प्रतर्दनो देषोदासि; ८ प्रकण्य काण्व ॥ पवमान सोम. ॥ विष्टप ॥ ५२३ प्र तु द्रव परि कोर्श नि पौद नृभिः पुनानौ अभि वाजमर्प । अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा वही रशनामिनयन्ति ( ९७१) ५२४ म काव्यमुशनैव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति । महिवतः शुचिपन्धुः पावका पदा वराहो अम्पति रेमन् ॥२॥ (ऋ.९।९७७) बाच ईरयत्ति न वहिर्मतस्य धीति ब्रह्मणो मनीपाम् । गावो यन्ति गोपत्ति पृच्छमान सोमं यन्ति मतयो वावशानाः ॥३॥ (ऋ. ९।९७४३४ ) ५२२] (मरत्वन्तः ) मरतोंसे युक्त (मरमरा) आनन्द देनेवाले (इन्द्रिया.) इन्द्रको पानेवाले, (मेघां प्रयांसि ) स्तुति और अन्नको (अमि) सामने रखनेवाले (हयाः परमानाः) यज्ञमें जानेवाले और शुद्ध होनेवाले सोमरस (धारया पवित्र असतत ) धाराके रूपमें छाननोमसे नीचे गिरने लगते है। १२॥ ॥ यहां पांचवां खण्ड समाप्त हुआ। [६] पाठः खण्डः। ८५२३ 7 हे सोम । (तु प्रद्रव) तू शोघ्र जा, और (कोश परि निपीद ) बर्तन में जाकर रह, (नृभिः पुनानः ) याजोंके द्वारा शुद्ध किए जाने के बाद (वाजं अभ्यएँ ) अन्न यजमानको 2, ( याजिनं अश्यं न ) बलवान् घोडेको जैसे शुभ फरते है, उसी प्रकार ( त्वा मजयन्तः ) तुझे शुद्ध करनेवाले ऋत्विज ( रशनाभिः वहि अच्छ नयन्ति ) अगुलिमोंसे यज्ञ स्यानके पास तुमे लेजाते है ॥ १॥ ५२४ ] (उशना इय) उशना ऋषिके समान (कायं चुवाणः) स्तोत्र बोलनेवाला (देवः) स्तोता (देवानां जनिमा प्र विवक्ति) देवोंके जन्म वृत्तान्तोंका वर्णन करता है । ( महि-नतः शुवि-बन्धुः पावकः) महान् पत करनेवाला, शुद्ध तेजसे युक्त और शुद्धि करनेवाला (वराहः ) उत्तम श्रेष्ठ दिनमें निकाला मा सोमरस (रेमन यदा अभ्येति । शव करते हुए पात्रमें जाता है ॥ २॥ [५२५ ] ( वान्हे.) हवि लेजानेवाला यजमान (तिनः वाच. ) ऋक्, यजु, साम इन तीनोंसे स्तुति (प्रेरयति) करता है, (तस्य धीति । यसको धारण करनेवाली (ब्रह्मणः मत्तीपां ) ज्ञानसे की गई स्तुति वह बोलता है, (गोपति गाय यन्ति ) बेलके पास जैसे गायें जाती है, उसी प्रकार (पृच्छमानाः पाचशानाः) पच्छा करनेवाले, इच्छा करने वाले तथा (मतयः) स्तुति करनेवाले (सोम यन्ति) सोमके पास जाते है ।। ३ ॥ १पृच्छमाना:- श्रेष्ठताका विचार करनेवाले। २ यायशानाः-मुखको इच्छा करनेवाले। ३ मतयः-बुद्धिमान, स्तुति करनेवाले। ४ सोमं यन्ति- सोमयागमें जाते है।
पञ्चम अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद २ २३१ १३१ 39 १३ ३ ५२६ अस्य प्रपा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समवृक्त रसम् । सुतः पवित्रं पर्येति रेभन् मितेष सम पशुमन्ति होता ॥४॥ (स.९९७१) ५२७ सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दियो जनिता पृथिव्याः । जनितार्जिनिता सूर्पस्य जनितेन्द्रस्य जनितांत विष्णोः (ऋ. १९६३) ५२८ अभि निपृष्ठं वृषण क्योधामझौषिणमयावशन्त बाजी चना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि स्नधा देय वार्याणि (३ ९।९०२) ५२९ अक्रोत्समुद्रः प्रथम विधर्म जनयन् प्रजा भुननस्य गोपाः । बृपा पवित्र अघि सानो अव्ये वृहत्सोमो वावृषे स्वानो अद्भिः ॥ ७ ॥ ( ९।१७।१० ) E५९६] { अस्य प्रेधा) इस यज्ञका प्रेरक (हेमना पूयमानः ) सुवर्णले पवित्र हुआ ( देवः रसं) दिव्य सोमरस ( देवेभिः ममपृत ) देवोंको दिया जाता है, (सुत रेभन पवित्र पर्येति) निचौडा हुआ यह सोमरस छाननीसे वर्तनमें गिरता है । ( होता मिता ) हवन और यज्ञ करनेवाला तया ( पशुमन्ति सभ इय) गायोंको रसनेयाला जरो मशालग जाता है, उसी तरह सोमरस बर्तन में पाना जाता है ॥ ४ ॥ १ हिरण्यपाणिः अमिपुणोति- (स० भा०) सोनेको मगूठी पहने हुए हायोगे सोमरस विराला जाता है। [५२७ ] (मतीनां जनिता) बुद्धिको उत्पत करनेवाला (दिवः जनिता) घुलोषको उत्पन्न करनेवाला (पृथिव्याः जनिता) पृस्योको उत्पन्न करनेवाला ( अग्नेः जनिता ) अग्निको उत्पन्न करनेवाला ( सूर्यस्य जनिता) सूर्यको उत्पन्न करनेवाला ( इन्द्रस्य जनिता ) इन्त्रको उत्पन्न करनेवाला । उत विष्णोः जनिता)और विष्णुको उत्पत्र करनेवाला (सोमः परते ) सोम पवित्र किया जा रहा है । छाना जारहा है ॥ ५॥ सोमयाग प्रारभ होनेपर देय आते हैं। इसलिए सोमको यहाँ देवॉका लानंदाला या प्रेरक यताया है, उसीको आलंकारिक भाषामें देवोंको उत्पन्न करनेवाला रहा है। [५२८, (त्रि-पृष्ठं ) तीन स्थानोंमें रहनेवाले, (वृपणं वयो-धां) बलवान और अन्नदाता सोमयों { अंगो- पिणं ) ऊने स्वरसे ( वाणी बारशन्त ) स्तोताची वाणियों स्तुति करती है । (सिन्धुः वाणान) से पानी में परण रहता है, उसी तरह (बना यसानः ) पानीमें मिला हुआ सोम { रन-धा ) रत्न और (चार्याणि दयते) पन स्तोतामोको रेता है।॥६॥ ८५९९ (समुद्रः) जलम मिला हुआ (गो-पा) गोश पालन करनेवाला, ( वृण) मल प्रशावाला (स्वान ) निकाला हा मोम (मयमे ) पहले (भुवनस्य विधर्मन् प्रजाओंगो रत्साह देते हुए (प्रजाः जनयन् । प्रजाजनोंकी उन्नति करते हुए ( मप्रान् सरसे अष्ट हो गया है ।। ७ ।। १ गोपा:-- गायरा पालन रनेवाल, सोमरसमें गो दूध मिजाते है इसलिए सोग गौवोंको पासयामा है। २ भुवनस्य ग्धिर्मन्- भुवत प्राणियोंका उत्साह पाता है। ३ प्रजा। जनयन्-प्रजाओं में शक्ति बनाता है। * ७ २ २७ ३ वृषा वृष्णः परि पवित्र अक्षाः । ३२७ ऊ र - १३.२ १२३ २ sta सामवेदया सुबोध अनुवाद [पाचमान काण्डम् ५३० कनिक्रन्ति हरिश सृज्यमानः सीदन्वनस्य जठरे पुनामः । नभिर्यतः कृणुते निर्णिजे गोमतो मति जनयत स्वाभिः (ऋ ९।९५१) ५३१ एप स्य ते मधुमार इन्द्र सोमो सहस्रदाः शतदा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थाद (ऋ ९(७४) ५३२ पवस्व सोम मधुमा५ ऋतावापो बसानो अधि सानो अव्ये अब द्रोणानि धृतवन्ति रोह मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपाना (% ९९६१३) इति चतुर्थी दशति ॥ ४ ॥ पष्ठ षण्ड ॥ ६ ॥ [ स्व० १८ । उ०३ । पा० ८५ ॥ ३॥ [५] (१-१२) १ प्रतर्दनो दंघोदासि , २, १० पराशर. शाक्य , ३ इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ट , ४ वसिष्ठो मंत्राणि , ५ फर्णवासिष्ठ , ६ नोपा गौतम , ७ कादी पौर , ८ मन्यु सिष्ठ , ९ कुत्स आङ्गिरस', ११ काश्यपो मारीच ; १२ प्रस्कण्य काण्व ॥ पवमान सौम ।। विष्टप ।। 3१३.३ ५३३ प्र सेनानीः शूरो अग्ने स्थानां गन्यन्नेति हवे अस्य सेना । भद्रान कण्वन्निन्द्रहवाससिम्य आ सोमा बना रसानि दत्ते ॥१॥ (ऋ९९१) ५३० (आ सृज्यमानः ) रस निकाले जानेवाला ( हारेः । हरे रंगका सोम { कनिकन्ति ) शरद करता है, छानते गमप उसका शब्द होता है, (पुनानः । पवित्र किया जाता हुआ (वनस्य जठरे सीदन् ) पनको लकडीसे तम्यार किए गए बर्तनमें पडता हुआ (नृभिः यतः ) मनुष्यों द्वारा दबाकर निकाला गया सोम (गां निर्णिज पृणुते) गायके दूधका रुप पारण करता है। गौ दुग्धमें वह मिलाया जाता है। इसकी ( मति स्वधाभिः जनयत ) स्तुति हविष्यासके साथ यहाई करते है॥८॥ [५३१] हे इन्द्र ! ( वृष्ण. ते ) बल बढानेवाले तेरा (एपः स्य ) यह कह सोम ( मधुमान युपा ) मीठा और बलवान होकर ( पविभे पर्यशा. ) वर्तनमें टपकता है, उसी प्रकार वह (सहस्रदा शतदा) हजारों और संकों और ( भूरिदाचा) बहुतसा धन देनेवाला ( वाजी ) बलवान् सोम ( शश्वत्तम बर्हिः ) निरन्तर घलनवाले यज्ञमें जाकर (वस्थात् ) बैठता है ।।९॥ [५३२ ] हे (मोम ) मोम ( मधुमान ) मीठा तू ( अप. वसान पानी में मिलकर ( अधि सानो अन्ये पवस्व ) ऊचे स्थानपर रखे हुए बकरीके यालको छलनीसे छनता जा, उसके बाद ( मन्दितम. ) आनन्ददायक और (इन्द्र पान ) इन्द्र के यो योग्य ( मत्सर ) आनन्द देनेवाला यह सोम, घृतवन्ति द्रोणानि ) जलयुक्त पात्रमें ( अधरोह ) जाकर रहता है ॥ १०॥ ॥यहां छठयां खण्ड समाप्त हुआ। [७] सतम सण्ड। [५३३ ] (सेनानी. ) सेनाको बलामेवाला (पूर सोमः ) सूर सोम (गन्यम् ) गायको इच्छा करते हुए (रथाना अग्रे) रथके मागे (प्रौते) जाता है, (अस्य सेना हर्पने ) इसको सेना आनन्दित होती है । (सखिभ्यः) मित्रों के लिए पाजकोंके लिए (इन्द्र-हवान भद्रान् कृण्वन् ) इन्टको प्रार्थनाको कल्याणकारी यमाते हए (रमसानि पना आदते) तेजस्वी वस्त्रोंको धारण करता है ॥ १ ॥ १ सेनानी - सेना, याजकोका समूह। २ सोम गयन्- सोम गायकी इच्छा करता है। सोम अपने में गायका दूध मिलाया जाए, ऐसी इच्छा करता है। ३ अस्य सेना हर्षते- सर यागकोंको आनन्द होता है । ५ रभसानि यस्ता मादत्ते-तेजस्वी वस्त्रोंको धारण करता है । दूप मिलाने के कारण वह नस्वी होता है -
पश्चम अध्याय]
सामवेदका सुबोध अनुवाद
१२
3
8
,
१
५३४ प्र ते धारा मधुमतीरसग्रन्चार पत्पूनो अत्यप्पव्यम् ।
पवमान पबसे घाम गोनां जनयंरसूर्यमपिन्वो अको २|| (ऋ. १९७३१)
५३५ : गायताम्यचर्चाम देवात्सोमहिनात महते धनाय ।
स्वादः पवतामति चारमन्यमा सीदतु कलशं देव इन्दुः
(ऋ. १९७४४)
५३६ प्रहिन्यानो जनिता रोदस्यो रथो न वाज सनिपनयासीत् ।
इन्द्रं गच्छन्नायुधा सशिशाना विश्वा वसु इस्तयोरादधाना ॥४॥
(३ ९/९०१)
५३५ तक्षपदी मनसा बेनती बाग ज्येष्ठस्य धर्म ग्रुशोरनाक ।
आदीमायवरमा वावशाना जुष्टं पति कलश गाव इन्दुम् (ऋ ९९७।२२)
५३८ साकमक्षा मर्जयन्त स्वसारी दश धीरस्य धीतयो धनुग्री
हरिरापर्यद्रवजा सूपस्य द्रोण ननक्ष अत्यो न वाजी ।
(र. ९९१)
६५३४ (यत् पूतः अगं घारं अत्येषि) जव पवित्र होने के लिए परीके बालोंकी एलोपे नीचे वर्तनमें गिरता
है, तब (ते मधुमती धारा प्रारमन् ) तेरी मीठी धारायें यहती है। है (पवमान ) पवित्र सोम ! (धाम पवसे)
दूयमें पवित्र होता है। (जनयन ) उत्पन्न होने के बाद मान (भः सूर्य थपिन्या) व अपने तेजसे सूर्यको चमकाता
है॥२॥
१ घाम परसे- अपने स्थानसे पवित्र होता है । दूप सौमना स्या है। सोममें दूध मिलाया जाता है।
२ अर्कः सूर्य अपिन्या- तेजसे सूर्पको पूर्ण करता है। सोमरस विशेष चमकने लगता है।
५३५] ( प्र गायत) सोमको स्तुति करो, ( देवान् अभि अर्थमः) देवोंकी हम पूजा करें (महते धनाय
सोमं हिनोल) यहुत धनकी प्राप्ति के लिए सोमको प्रेरित करो। (स्वादुः अपं पारं अति पयतां ) पश्चात् पह मीठा
रस परीके बालोको छनोसे घाना गावे (देवः इन्दुः ) मह तेजल्यो गोमरस ( फलशं अति आसीदतु) कलसमें
भरा रहे ॥३॥
[५३६ ] (महिन्यानः ) गति पालेवाला मा बहनेवाला ( रोदस्योः जनिया) धारापिकोका उत्पादक मह
सोम (इन्द्र गच्छन् ) इन्द्र के पास जाता हुआ (घा सनिपन ) मनको देता है । (आयुधा स शिशानः ) शस्त्रोंको
उत्तम रोतिम तीक्षा करता हुआ यह सौम (विश्या वसुहम्तयो' आदधाना. सब धन अपने दोनों हामि पारण
करता हुआ (म अयासीत् ) हमें देने के लिए आया है ॥४॥
[५३७१ (येनतः मनसः वाद) उधतिको इच्छा पानेवालो मनमें विचारों द्वारा प्रेरित स्तुति ( यत् तक्षव)
जिसको तय्यार करती है, उस (धर्म ज्येष्ठस्य धुक्षोः अनाके) या धेळ हरिये पास तोमको प्रसंसा होती है,
(भा पर जुध) इस बार अवधी सर नेम्मार दिए गए (प्रति ) पाला सौर ( कलशे) कलममें रहनेवाले (.
इन्दु)रा सोमके पास ( पाशानाः गायः सायन् ) इच्छा करनेवाली गायें बानी है ॥५॥
यशोंमें स्तोपोंदा गान होता है, सोम कूटकर उसका रस निकालते है, यह परासमें Ern जाना है, मोर यादमें
उसमें गायका दूध मिलाया जाता है । इस विधिस यह मामारिक वर्णन है।
[५३८] { सार्क उक्षा स्वसार एक जगह रहार राय परपातौ परिने भरिया(मजयन्तः ) मोमो
पुरती है, (दश धीतयः) दस अगलिया (धीरस्य धनुधीः ) पामर्पयान् सोगरी पारण परती और हिलानी
है। यह (बरि हरे पता सोम ( सूर्यस्य जार पर्यव्यम् सूर्य द्वारा उसम्म विशाओमधुमाया जाता है। (सत्यः
पाजीन) वेगते दोधाले घोके समान यह मोम (द्रोणं ननक्षे) लसेमें गिरता है॥६॥
(१६२) सामवेदका सुवोध भनुवाद [पायमान काण्डम् २७ पर अपो वृणान: ३१३२ ५३९ अभि यदसिन्धाजिनीव शुमा स्पर्धन्ते धियः सुरे न विशः । पवत कवीयान्वन न पशुवर्धनाय मन्म ॥ ७॥ (ऋ.९९४१) ५४० इन्दुवाजी पवते गोन्योपा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय । इन्ति रक्षो बाधते पर्यराति परिवस्कृण्वन्यजनस्य राजा (ऋ. ९९७१०) ५४१ अया पवा पवस्वैना वनि माश्चत्य इन्दौ सरस प्रपन्च । अध्नविद्यस्य पातो न जूति पुरुमेधाचित्तकवे नर धाद ॥९॥ ( ९/९७१९२) [५३९] (अस्मिन् वाजिनि इव शुभः ) जिस प्रकार घोडेको जेवर पहनाकर उसे सजाते है, उसी प्रकार (सूरे विशः न ) सूर्यको किरणे उस सोमको शोभा बढाती है, (घिय. अधि स्पर्धन्ते ) बुद्धिपूर्वक अगुलियां रस निकालने में स्पर्धा करती है, ( अपः वृणानः ) पानीमें मिलाते हुए और ( कनीयान् पवते ) स्तोत्रोंको सुनते हुए सोम छनता जाता है, जिस प्रकार (पशुवर्धनाय मन्म यजंन ) पशु सवर्धन के लिए गोपाल उत्तम गोशाला जाता है ॥७॥ १ वाजिनि शुभः- जैसे घोडौंको जेवरसे सजाते है, उसी प्रकार सोममें दूध आदि मिलाकर उसकी शोभा बढाते है। २ सूरे विशा- सूर्यमें जैसे किरणे चमकतो है, उसी तरह सोमका तेज धमकता है। ३ घियः अधि स्पर्धते- युटिपूर्वक अगुलिया रस निकालनेको स्पर्षा करती है। इस तरह रस पडता है। ४ फीयान्-- रस निकालते हुए स्तोत्रोंका पाठ किया जाता है। ५ पयते- सोमरस छाना जाता है। ६ पगुवर्धनाय मन्म प्रज- पशुसवर्षनके लिए जैसे गोपाल गोशालामें जाता है, रो हो सोम बर्तन में छाना जाता है। [५५० (वाजी इन्दु ) बलवान् ( गोन्योधा.) मोचे रखे वर्तनमें छाना जानेवाला (इग्दे सहः इन्यन ) इन्द्रका बल बढानेवाला ( परिधः कृण्वन् ) यानकोंको धन देता हुआ (जनस्य राजा सोम') बलका राजा सोम (मदाय) आनन्द बढाने के लिए ( पवते ) छाना जाता है । वह ( रक्ष. हन्ति ) राक्षसोंको मारता है, और (अ-राति परि बाघते ) दुष्टोको दूर करता है ॥ ८॥ [५४१] हे सोम (या पया ) इस शुद्ध हुई धारासे ( एना वसूनि पवस्व ) ये धन हमें दे, है (इन्दो) सोम । (मांश्चत्वे ) सम्मानको प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले (सरसि) पानीके कलसेमें (प्र धन्व) जा। ( यस्य प्रनश्चित् ) जिसका मूल आधार आदित्य ( चप्स न ) जिस प्रकार घायुको प्रेरित करता है, उसी तरह (नर जूति धात् । नेतारो बेगको मह मोम पारण करता है, और वह सोम (पुरु-मेधाःचित् ) बहुत बुद्धिमान् इन्द्रको भी (तरचे) प्राप्त करता है ॥१॥ १ अया पवा-एक धारसे सोम छाना जाता है। बादमें- २ सरलि प्रधन्व- पानीके कलसे पहुचता है । छाननेके बाद उसे पानी मिलाया जाता है। ३ प्रश्नः वातान- सूर्य जैसे वायुको प्रेरित करता है, उस तरह छाननेवाला सोमको पति देता है, और यह ( पुरु-मेधाः तक ) बुद्धिमान् इन्दको दिया जाता है । ४ मांश्चत्ये सरसि प्र धन्य-जैसे लोग समाननीय लोगोंक पास जाते है, उसी प्रकार पानी सम्मानके योग्य सोममें मिलाया जाता है। ।
पञ्चम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद २ २3 9 १ २३२ ३१ ३१२ २४२ १२.७१ २ ५४२ महत्त्सोमो महिपथकासपी यद्गणीत देवान् । अदधादिन्द्र पवमान ओजोऽजनयसूर्य ज्योतिरिन्दुः (ऋ. १९७४१) ५४३ असजि क्या रथ्य यथाजो घिया मनाता प्रथमा मनाया। दश स्वसारो अधि सानो अव्ये मजन्ति वा सदनेनन्छ ॥११॥ (कु. ९।९११) ५४४ अपामिवेदूर्मयस्ततुराणा न मनीषा ईरते सोममच्छ । नमस्यन्तीरुप च यन्ति संचाच विशन्त्युचतीरुशन्तम् ॥ ।। १२ ।। (. ९९१३) इति पञ्चमी दशतिः ॥ ५॥ सप्तमः खण्डः ॥७॥ [स्व० १९ । उ०३ । पा० ८२१दा 17 इति त्रिष्टुभः ॥ इति षष्ठप्रपाठकस्य प्रथमोऽयं ॥ ६॥ ३1३331318 ६.५४२ ] (महिपः सोमः) महान् पलपान् सोम ( महत् तत् चकार ) उन महान् कार्योको करता है । उसके कार्य ये है- यत् अपां गर्भः) पानीको अपने गर्भ धारण किया, बादमें ( देवान् भवृणीत ) देवोंको प्राप्त किया (पवमानः इन्द्रे योजः न्यधात् ) शुद्ध हुए सोमने इन्द्रमें सामर्थ्यको स्थापित किया और (इन्दुः सूर्ये ज्योतिः) सोमने सूर्यमें तेज ( अजनयत् ) उत्पन्न किया ॥ १० ॥ १ अपां गर्भ:--पानीको अपने गर्भ में धारण किया । सोममें पानी मिलाया जाता है। २ देवान अपृणीत~ देयोंका वरण किया। देवोंको पीने के लिए सोम दिया जाता है। ३ इदम वल बढापा, सूर्यमें तेज बढाया। सोमरस पोनेके कारण देवोंका सामर्थ्य वढा । {५४३] (मन अता ) सबका मन जिसमें सलग्न है, ( प्रथमा मनीषा) पहले हो जिसकी स्तुति को है, वह (यफ्या) शव्द करनेशला सोम ( आजी घिया) पाम स्तोत्र पाठके साथ { रथ्ये यथा) जिस प्रकार संग्राममें पोई भेजे जाते हैं, उस तरह (असर्जि) पानी में मिलाया जाता है ( दश संसारः) दर मंगुलियां ( सदनेषु पाई ) यस स्थानमें पहुचनेवाले सोमको ( सानो अधि ) उच्च स्थानपर { अध्ये अच्छ मृजन्ति ) बकरीके बालोंकी छाननीसे उतम रीतिसे शुद्ध करती है ॥ ११॥ १मनोता-मन जिस पर लग गया है, यह सोम । २ प्रथमा मनीषा--प्रयम जिसकी स्तुति की है, ऐमा सोम । ३ पश्चा- शब्द करनेवाला; छाने जाते हुए यह शब्द करता है। ४ माजी धिया असर्जि-- यज्ञम स्तोत्र पाठ करते हुए सोमरस पानीमें मिलाया जाता है। ५ अव्ये मृजन्ति -- पकरीकै हालको छाननौसे खाना जाता है। [42d 1 (अपां ऊर्मयः इव) पानीको लहरें जिस प्रकार जल्दी चलती हैं, उस प्रकार ( तर्तुराणाः इत् ) सोमता करनेवाले ऋत्विज ( मनीयः) स्तुतियोंको ( सौम अच्छ ईरते ) सोमके पास शो प्रेरित करते हैं। (उशतीः नमस्यन्तीः ) उन्नतिको इच्छा करनेवालो और नमस्कार करनेवाली स्तुति ( उशन्तं ते उपयन्ति च) इच्छा करनेवाले सोमके पास पहुंचती है। ( सं आविशन्ति च ) और उसमें प्रवेश करती है ॥ १२ ॥ सप ऋत्विज सोमको एकदम स्तुति करते हैं। । यहां लातयां खण्ड समास हुषा।
(१६५) सामवेदफा सुबोध अनुवाद [पावमानं काण्डम् ३११ ३१२ ऊस ३१२ ३११ [६] (१-९) १ अन्धोगु श्यावावि ; २ नहुषों मानव , ३ ययाति हुप., ४ मनु. सावरण , ५, ८, अम्बरीषो धागिरः ऋजिप्वा भारद्वाजश्च, ६, ७ रेभसूनू काश्यपो, ९ प्रजापतिश्वामित्रो वाच्यो बा || पवमानः सोम 1 अनुप्टप ७ वहती॥ अय पष्टप्रपाठकस्य द्वितीयोऽर्थ ॥६॥ ५४५ पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे । अप श्वान रश्नविष्टन सखायो दीर्घजिह्वयम् (ऋ. ९/१०१०१) ५४६ अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अति । पतिर्विश्वस्य भूमना व्यख्यद्रोदसी उभे ॥ २॥ (ऋ ९।१०१७) ५४७ सुवासो मधुमत्तमाः इन्द्राय मन्दिनः। पवित्रयन्तो अक्षरन देवान् गच्छन्तु वो मदाः (ऋ.९।२०१४) ५४८ सोमाः पवन्त इन्दयोऽस्मभ्यं गातुविचमाः । मित्रा स्वाना अपसः स्वाध्यः स्वविंदा ॥४॥ (ऋ. ११०१११०) ५४९ अभी नो वाजसातम रयिमर्प शतस्पृहम् । इन्दो सहस्रमर्णसं तुविद्युम्नं विमासहस् (ऋ. १९८१) [८] अष्टमः खण्डः। १५४५) (सखायः) स्तुति करनेवाले याजको 1 (2) तुम ( पुरोजिती अन्धसः) आगे रखे हुए सोमरूपी अनके ( मादायेणवे सुताय ) आनन्द देनेवाले इस रसके पास ( वीर्य-जिव्हा श्वानं अपश्नथिष्टन) जानेको इच्छा. वाले बडो जोम वाले कुत्तको दूर हटायो ।॥ १ ॥ कुत्ते सोमरस न चा ऐमा करो। [५५६] (पूषा भगः रविः अयं सोम. ) पोषण करनेवाला, सेवन करने योग्य, शोभावान् ऐसा पह सोमरस पुनानः अर्पति ) दाना जाता हुआ नीचे के बर्तन में गिरता है । ( विश्वस्य भूमनः पतिः सोमः ) सब प्राणियोंका पालन करनेवाला यह सोमरस ( उभे रोदसी व्यरयत् ) दोनों ही घुलोफ और पप्पोलोकको अपने तेजसे प्रकाशित करता है॥२॥ सोमरस चमकता है, इसलिए आलकारिक भाषामें उसे दोनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाला बताया है। [५४७ 1 (मधुमनमा मन्दिनः) मोठे और मानन्द अडानवाले (सुतासः ) सोमरस (पचित्रवन्तः) हनते हुए इन्द्र के लिए तय्यार होते हैं, हे सोम ! ( 2 ) तुम्हारे ( मदाः ) पे आनन्ददायक रस (देवान् गच्छन्तु ) देयोंके पास पहुवे ॥ ३॥ {५४८ ] (गातु-वित्-तमाः) माणोंको उत्तमरीतिसे जाननेवाले ( मित्रा.) मियके समान ( स्वाना ) रस निकाले हुए (भ-रेपसः ) निष्पाप (स्वाभ्यः ) मनको उत्तमताने एकान करनेवाले (स्वः-विदः इन्दवः) भाम- शानी ये ( सोमाः ) सोमरस ( अस्मभ्यं परन्ते ) हमारे लिए पवित्र होते हैं, जाने जाते हैं ॥ ४ ॥ [५६९] है (इन्दो) सोम 1 ( शत-स्पृहं ) संकडों जिसको प्रशसा करते है ( सहन-मर्णसं) हजारोंका जो पोषण करता है ( तुविद्युम्न ) बहुत तेजस्वी ( रिमा-सहं ) विशेष प्रकाशाको अपेक्षा भी अधिक प्रकाशमान ( घाज- सासम ) बस बानेवाले (रयि ) धन (न अभ्यर्ष) हमें दे ॥ ५॥ १ विमा-सह-विशेष सैजस्वी लोकोसि भी पह सोम अधिक तेजस्वी है।
पञ्चम अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद 3 3१३ स २ 9 २ २१३१२ र १३ ५५० अभी नवन्ते अद्रुहः प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । वत्स न पूर्व आयुनि जातरिहन्ति मात्र (३ ९१1) ५५१ आ हर्यताय कृष्णवे धनुष्टन्यन्ति पौरस्यम् । शुक्रा वि यन्त्यसुराय निर्णिजे विपामग्रे महीयुचः ॥७॥ (प्र.९९९।१) ५५२ परि त्यहत हरि पद्म पुनन्ति वारेण । यो देवान्विश्वाइपरि मर्दन सइ गच्छति {क्र. ९९८७) ५५३ प्रसुन्वानायान्धसो मा न वष्ट तद्वचः । अप श्वान मराधस रहता मखं न भृगका .(ऋ.९।१०।१३) इति षष्ठी दशतिः ॥ ६॥ अष्टम. खण्ड. ॥ ८॥ [स्व० १० उ० ५। पा० ६१.nu] इत्यनुष्टुभः ( एका वृहतो)। ५५०] (मातरः ) गौमाता ( पूर्व आयुनि जातं वत्सं ) पहली आयुमें उत्पन्न हुए मण्डेको (रिहन्ति न) चाटती है, उस प्रकार ( अ-द्रुहः ) द्रोह न करनेवाले जल (इन्द्रस्य प्रियं काम्यं) इन्द्र के प्रिय और पाहने योग्य सोमको (अभिनवन्ते) प्राप्त होते है ॥६॥ १ अ-द्रुहः इन्द्रस्य प्रियं अमि नवन्ते-द्रोह न करनेवाले जल, इन्द्रको प्रिय लगनेवाले सोमको प्राप्त होते है । जल सोमरसमें मिलाया जाता है। ८५५१1 (हर्यताय ) सोसे पूजनीय और (धृष्णये) का पराजय करनेवाले सोमको (पोस्य धनुः आतन्यन्ति ) जो पुरुषार्थ प्रस्ट करनेवाले धनुष लेकर उसपर डोरी बताते हैं, उसी प्रकार विज छानने के लिए तैयार फरते है । (विपां भरे) विद्वानों के आगे ( महोयुवा शुकाः) पश्योपर पूनित होनेवाले अवयं स्यन्ध गायके दूपको (थसुराय निर्णिजे ) बलवान् गोमके रूपको घमनाने के लिए (वयन्ति ) आच्छादित करते हैं ॥७॥ १ शनिय जिस प्रकार पनुपपर डोरो चटाकर की तैयारी करते है, उसी प्रकार विज सोम छानेको तय्यारी करते है। २ स्वच्छ गाय के दूधसे सोमरराको ढक देते हैं । अर्थात् सोमरसम गायका दूध मिलाते है। [५५२ ] ( हर्यतं हरि ) मुन्दर हरे रगके और (व, त्यं ) भूरे रंगले उस सोमरो (वारेण परि पुनन्ति ) उनको जाननोसे छना जाता है। (यः) पह सोम (विभ्यान देयान् इत् ) सब देवोंके पास( मदेन सह परि गच्छनि) अपने आनन्ददायक गुणों के साथ जाता है ।।८।। [५५ (सुन्यानाय सम्धसा) सोमका रस निकालने के बाद उस ममका (तत् पच.)यह वर्णन ( मर्तन प्रवष्ट) सभी मनुष्य न सुनें, (अ-राघसं मखं भृगरान ) जैसे पान-दक्षिणासे रहित पतको भगइदिने दूर कर दिया उसी प्रकार (श्या अपहत) कुत्र्तको दूर फरो॥९॥ १ अन्धसः तत् घच. मतःन प्रयए- सोमरसके उस यरको सभी आदमी न मुनें। केवल विशेष योग्यतावाले ही उसे सुनें। }यहां गाठयां सड समास दुमा । २२ (पाम. हिन्दी) (१६६) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पावमानं काण्डम् १२ 9 ३ ३१२ [७] ( १-१२) १-३, ५ कविर्भार्गवः ४, ६ सिकता निवावरी; ७ रेणुवस्वामित्रः ८ येनी भार्गवः; ९ यसुर्भारद्वाजः, १० पत्सर्भािलन्दः११ गृत्समदः; शौनकः १२ पवित्र आइगिरसः || पवमानः सोमः ॥ जगतो॥ ५५४ अभि प्रियाणि परत चनहितो नामानि यह्रो आधि येषु वर्धते आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्माधि स्थ विष्वञ्चमहद्विचक्षणः ॥१॥ (*. ९/७५/१) ११३ ३२१२७११ ५५५ अचोदसो नो धन्यन्त्यिन्दवः प्र स्वानासो बृहदेवेषु हरयः । विचिदनाना इपयो अरातयोऽयों ना सन्तु सनिषन्तु नौ धियः ।। २ ।। (ऋ. ९७२।१ ) ५५६ एप प्रकोशे मधुमा अचिक्रददिन्द्रस्य वजो वपुपो वपुष्टमा । अभ्यश्तस्य सदुघा घृतश्चुतो वाधा अर्पन्ति पयसा च धेनवः ॥३॥ (ऋ. ९/७१) ५५७ पो अयासादिन्दुरिन्द्रस्य निष्कत सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम् । मर्य इच युवतिभिः समर्पति सोमः कलशे शतयामना पथा ॥४॥ (ऋ. ९७६६) [९] नवमः खण्डः। [५५४ ) (चनो-हित ) अब अर्थात् हितकारक सोम (शियाणि नामानि अभि पचते) प्रिय जलोंमें मिलाकर छाना जाता है। (येषु यहा अभिवते) उन जलोंमें वह मिलकर बढता है, पावमें ( हन् । महान् होकर (बृहतः सूर्यस्य महानु सूर्यके (विप्वचं रथं अधि) सब जगह जानेवाले रयपर ( विचक्षणः भायहत् ) विश्वको देखनेवाला सोमदेव चढता है ॥१॥ ( १५५] (अचोदसः } किसी दूसरेके द्वारा प्रेरित न होनेवाले (हरयः स्वानासः) हरे रगके उत्तम रीतिसे निकाले गये (इन्दयः ) सोमरस (नः पृहदेवेषु प्र धन्यन्तु ) हमारे पनमें हमें प्राप्त हो । ( अ-रातयः) दान न करनेवाले (मा अरयः) हमारे शत्रु ( इपयः ) अमको इच्छा करते हुए ( अश्नानाः वि चित् ) भूपे-अन्न न पाने- पाले ( सन्तु ) होवे, (नः धिया सनिपन्तु) हमारे स्तोत्र देवोंको प्राप्त होवे ॥२॥ १ थ-रातयः नः अरयः इषयः अनानाः वि चित्-हमारे शत्रुओंको सामेके लिए अन्न न मिलें, वे पैसेही विना अमके भूखे रहें। {५५६] (इन्द्रस्य यज्रः) इन्द्रका बस मानों यही है, ऐसा (यपुषा वपुष्टमः ) यलसे बहुत बलशाली (एप मगर यह मोटा मोमरमा ( कोरे प्र. गरिमा) कलमे में, शब्द करता है । ( स्तम्य.), यज्ञके लिए, सुदुयः घृतश्चुतः ) उत्तम रूपसे दूध देनेवालों, और घी चुदानेवाली (वाभाः पयसा धेनवः च) रंभाती हुई दुधार गायें (आभ अर्पन्ति ) पास आती है ॥ ३॥ १ सोमके पास दुधारु गायें आती है, सोमरसमें गायका दूध मिलाया जाता है। [५५७ ] ( इन्दुः ) यह सोम (इन्द्रस्य निष्कृतं ) इन्द्र के स्थानम-पेटमें (मउ अयासीत् ) जाता है और यहां जाकर ( ससा) मित्ररूपी यह सोम ( सख्युः संगिरं) मित्रस्पी इन्द्रफे पेटम (नप्रमिताति) कोई भी कष्ट नहीं देता, (युवतीभिः मर्यः च ) जिस प्रकार तरुण पुश्प अनेक स्त्रियोंके साथ रहता है, उस प्रकार सोम जलके साय (सं अपीते ) मिलकर रहता है । यह सोम (शत-यामना पथा) सौ ट्रेवाले छलनीके रास्ते ( फलो) कलशमें पाना जाता है।।४॥ १ युपातिभिः मर्यः इय सं अति- अनेक स्त्रियों के साय जैसे एक पति मिसकर रहता है, ना प्रकार सोम जलमें मिलाया जाता है अर्थात् सोमरस बहुत सारे जलमें मिलाया जाता है।
सामवेद का सुबोध अनुवाद १.१ । १७ ११ ३१२ ३२ पञ्चम अध्याय ११६७) ५५८ धर्ना दिवः पवते कल्यो रसौ दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः । हरित सृजानो अत्यो न सत्वभिधा पाजा सि कशुषे नदीघा ।।५।।(. ९७६१) ५५९ वृपा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अहां प्रतरीतोपलादिया । प्राणा सिन्धूनारकलशार अचिक्रददिन्द्रस्य हार्याविशन्मनीषिभिः ।।६।। (ऋ. ९।८६।१ ) ५६० निरस्मै सप्त धेनवो दुदुहिरे सत्यामाभिर परमे व्योमान चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारुणि चक्क यहतरेपर्धत ॥७॥ ११००१) ५६१ इन्द्राय सोम सुपुतः परि सापामीया भवतु रक्षसा सह । ते रसस्य मत्सव द्वयाविनो द्रविणस्यन्त इह मन्विन्दया ॥८॥ (.९/८५११) ५६२ असावि सोमो अरुपो वृपा हरी राजेव दस्मो अमि गा अभिक्रदर । पुनानी पारमत्यज्यव्यय इनो न घृतवन्तमासदत् ॥९॥ ऋ ९८२१) [५५८1 (धर्ता रत्व्यः रसः) पारणशक्तिसे युक्त फर्म करनेवाला यह सोमरस (देवतानां दक्षः) देवताओंका बल बढानेवाला (नृभिः अनुमाद्यः ) ऋत्विनों द्वारा प्रशसित (हरिः) हरे रगका सोम (दिवः पयते) उपरके बनते छनता हुमा नोबेके कलशे में गिरता है । ( सत्वभिः सजाना) लयाम् ऋत्विों द्वारा निकाला गया यह रा ( अन्य न) पोरके समान (वृथा ) सरसतारी हो (पाजांसि ) अपनी शक्तिरी (नदीपु रुणुते ) नदीके जलमें अपर्नेको मिलाता है॥५॥ [५५९J (मतीनां वृपा) स्तुति करनेवालोंको इच्छा पूर्ण करनेवाला (वि-चक्षणः ) विशेष ज्ञानी ( अहां उपसांदिया) दिन, उषा और सूपके बलको (प्रतरीता) पढानेवाला ( सोमः पवते) सोम छाना जाता है। (सिन्धूनां माणाः नदीके प्राणरूपी जलमें मिलाया गया ( मनीपिभिः) शानी ऋत्विजों द्वारा निकाला गया यह सोमरस (इन्द्रस्य हार्दि आविशत् । इन्द्र के पेट में जाने के लिए (कलशान अभि ) कलशमें ( यचिमवत् ) शब्द फरता हुझा जाता है ॥६॥ [५६० ] (परमे व्योमनि । श्रेष्ठ यज्ञमें रहनेवाले (अस्मै ) इस सोमरसके लिए (जि. सप्त धेनयः ) इकोस गायें ( सत्यां आशिरं दुदुहिरे ) निदचपसे बुध देती है, और पह सोग ( यत् ऋतैः अवर्धर ) जय पासे बढाया जाता है । तब (अन्या चत्वारि भुवना } एमरे चार भवनोंमें जलके चार बर्तनोंमें निर्णिजे करनेके लिए (चारूणिचने ) उत्तम कल्याणकारी पद्धतिसे शुद्ध किया जाता है ॥ ७॥ बारह मास, पांच ऋत, तीन लोक और यह मादित्य मिलकर २१ गा है, यह भाव पहा दिसाया है। [५६१ हे (सोम ) सोम 1 (सु-पुतः ) उत्तम प्रकारसे रस निकालने के बाद ( इन्द्राय परिनर इसे लिए प्रवाहित हो, ( अमीया रक्षसा सह अप भवतु ) रोग राक्षसों के साय दूर हो जाए (ते रसस्य ) तेरे रसको पोकर (इया विना ) सत्य और असत्म दोनोका माचरण करनेवाले दुष्ट मानन्दित न हो। ऐसे दुष्टोंको सोमरस पानेको नमिले। (इन्दया) सोमरस ( इह ) इम यज्ञम ( द्रविणस्वन्तः सन्तु ) धनपत होये ॥ ८ ॥ [५६२] (अल्पः वृषा) नेजस्वी, बलवर्धक (हरिः सोमः हरे रमका सोमरस ( असाथ) निकाला है। यह (गजावदस्म) राजाके समान सुन्दर है। (गा यामि.) गायका दूप मिलातेके यार ( अविनादत् । शब्द करता दुमा वह (पुनाना) छाने जाते हुए ( अन्यं वारं अत्येषि) मफरीके वालोंको यो छाननगरे छाना जाता है, छाना जाने मावश्येनः न ) श्येन पसौके समान (धृतवन्तं योनि आ सदर) जलयुक्त फलामें बह जाकर ष्टता है॥१॥ छानकर शुद्ध
(१७०)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[पापमान काण्डम्
५७४ गोमन्न इन्दो अश्ववरसुतः सुदक्ष धनिच । शुचि च वर्णमधि गोषु
धारय ॥९॥
(ऋ. ९।१०५४)
५७५ असभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनपत । गोमिष्टे वर्णमामि वासयामसि ॥१०॥
(ऋ. ९।१०४४)
५७६ परते हर्मतो दरिति रिस रया । अयम् स्तोम्यो बोरवयशः ॥११॥
(ऋ. ९।१०६।१३)
५७७ परि कोर्श मधुश्चुत५ सोमः पुनानो अर्षति । अभि पाणीपीणा सप्ता भूपत ॥ १२ ॥
(ऋ. ९।१०१३)
इत्याप्टमी दशतिः॥८॥ दशमः परः || १० ॥ (स्व० ८13०३ । पा० ४६ । ४॥)
[९]
(१-८) १ौरवीति. शत्यः; २ उर्वतश आगिरस.; ३, ८ ऋजिश्वा भारद्वाज ; ४ कृतयशा मागिरतः
५ ऋणंचयो राजपि.; ६ शक्तिर्वासिष्ठः, ७ कारागिरसः ॥ पवमानः सोमः ।। ककुम्, ५ यवमच्या गायत्री ॥
५५८ पयस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम ऋतुविचमो मदः । महि द्युक्षतमो मदा ॥१॥
(४.९१०८९)
१३
२
२
३१२
३.२२
३
[५७४J (सुदक्ष इन्दो) हे बलवान् सोम ! (सुतः ) रस निकालने के बाद (ना)
( गोमत् मश्यपत्
घनिच ) गाप, घोड़ोंते युक्त धन दे। उसके बाद तू (शुचि वर्णे ) शुद्ध धर्णको ( गोपु आधे धारय ) गायके दूपमें
प्राप्त कर ॥९॥
गोदूधमें सोमरस मिलाया जाता है, फिर उसका तेजस्वी पर्ण घमकता है।
[ ५७५ ] हे सोम! ( वस्तु-विदं त्या) धन देनेवाले तेरो ( अस्मभ्यं वाणीः अभि अनूपत ) हमें धन मिले
इसलिए हमारी वाणो बहुत स्तुति करती है। प्रकार हम (ते वर्ण ) तेरे वर्णको (गोभिः अभिवासयामति)
गायके दूधसे आच्छादित करते हैं ॥ १०॥
[ ५७६ ] { हर्षतः हरिः)प्रशंसनीय हरे रंगका सोम { हा दरांसि अति पयते ) घेगसे बुरै भागोंको दूर करता
हुआ नोचेके पात्रमें जाता है। खराब हिस्सेको दूर करता हुआ छनता जाता है । है सोम ! तू (स्तोतभ्यः ) स्तोताओंको
(धीरयत् यशः) पुत्रयुक्त कोति ( अभ्यर्प ) दे ॥ ११ ॥
[५७७ ] ( पुनानः सोमः ) छाना जानेवाला सोम(मधुश्चुतं कोशं परि अति)मोठे रसको कलशे में होता
है, (कपिणां सप्त पाणी ) ऋषियोंको सात परोंवाली वाणी इस सोममी ( अभि अनूपत) स्तुति करती है।॥ १२॥
॥ यहां दसवां खण्ड समास हुआ।
[११] पकादशा खपडा।
[५७८ ] हे सोम ! (मधुमत्तमः ) बहुत मोठा (ऋतु वित्तमः ) यज्ञके सम्बन्ध राब कुछ माननेवाला, (महि
पयुक्षतमः) महान् तेजस्वी और (मदः) हर्ष बढानेवाला तू ( इन्द्राय मदः पयस्व) इन्द्रको आनन्द देने के लिए
वित्र हो॥१॥
पञ्चम अध्याय]
सामदका सुयोध अनुवाद
२३
३११
3
५७९ अमि द्युम्नं वृहद्यश इपरपवे दिदौहि देव देवपुम् । वि कोश मध्यम युव ॥२॥
(ऋ.९।१०८९)
५८० आ सौता परि पिञ्चतार्थ न स्तोममप्तुर शजस्तुरम् । धनप्रक्षामुदतम्
( ९।१०८७)
५८१ एतमु त्यं मदच्युतर सहस्रधारं वृपमं दिवोदुहम् । विश्वा यसनि चिनतम्
॥४॥
(ऋ. २११०८।११)
५८२ स सुन्चै यो चसूनी यो रायामानेता य इडानाम् । सौमौ यो मुक्षितीनाम्
(ऋ९।१०।१३)
दैव्य पर्वमान जनिमानि घुमत्तमः । अमृतत्वाय घोपयन्
( ११०८५)
५८४ एप स्य धारया सुतोऽच्या चरिभिः पयते मदिन्तमा । क्रीडन्नूमिरपामित्र
(ऋ. ९।१०९०५)
३
५८३ व
साल
1५७९ } हे (पस्पते ) आरके स्वामी ( देव ) प्रकाशमान देव सोम ! ( देवयु) तू वैवोंको प्राप्त होनेवाला है,
तू हमें (धुम्न हत् यशः) तेजस्वी और श्रेष्ठ यश ( ममि दीदिदि ) दे, और (मध्यम कोशं ) शहदके कलामें
(वि युव ) जाकर भर जा ॥२॥
(५८० ] हे अस्तिो ! ( अश्य न ) घोडके समान वेगवान् ( स्तोम ) स्तुति के योग्य (अप्तुर ) जलके समान
धेगवान ( रजस्तुरं) प्रकाशको फिरणके समान शीनता करनेवाले (वन-प्रक्षं ) जलसे मिश्रित ( उद-प्लुतं ) जलके
काय मिले हुए मोमका ( सोत ) रस निचोडो, ( परि पिंचित ) और उसमें दूध मिलाओ ॥३॥
[५८१] (दिवः) तेजस्यो ऋयिन { मदच्युतं सहस्रधार) आनन्दफे प्रेरक और हजारों पाराओंसे वर्तनमें
गिरनेवाले ( धूपम ) बलवर्षक (विश्वा वसूनि विभ्रतं ) सर यनोंके यारण करनेवाले (पत स्य उइस उस सोमका
(दुई) रस निकालते हैं ॥४॥
[५८२) ( यः वसूनां ) जो धनौका (य रायां ) जो दूध आदि पदार्योका (य. इडानां) जो भूमियाँका
(4. साक्षतानां) जो उत्तम सन्तानोंका ( आनेता) देनेवाला है, (स) उस सोमका रस (सुन्चे) निकाल
लिया है ॥ ५॥
[५८३ ] हे (पयमान ) शुद्ध होनेवाले सोम! (युमत्तमः । अत्यन्त लेजस्दो (स्यं हि तू ( देव्यं जनिमानि।
दिव्य जन्मोंको जानता है, और है ( अंग ) प्रिय सोम ! तू (अमृतत्वाय घोषयन् ] अमरताको घोषणा करता है॥६॥
(५८४ ] (मदिन्तमः ) अत्यन्त आनन्द देनेवाला (अप ऊर्मि इव क्रीडन् । जलके लहरके समान खेल
करते हुए ( स्यः एपः सुतः) यह सोमरस ( अन्या' यारेभिः ) मकरोके थालोंसे बने हुए छाननीसे (धारथा परते)
धार बांधकर कलश छाना जाता है।॥७॥
(१७२) सामवेदका सुपोध अनुघाद [पायमान काण्डम् ५८५ में उस्त्रिया अपि यो अन्तरमान निर्गा अन्तदोजसा । अभि में तलिप गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्णवा रुज । ओ३म् वर्भाव धृष्णया रुज ॥ ८ ॥ (ऋ.१०८०६) इति नवमी दशतिः ॥ ९ ॥ एकादशः खण्डः ॥ ११॥ [स्व०७। उ०१था० ४३ । चि॥] इत्युरिणामः॥ इति पष्टप्रपाठकस्य द्वितीयोऽध, षष्ठप्रपाठकश्व समाप्तः ॥ ६॥ इति पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ इति छन्दोगप्रकृतिका समाप्ता ॥ इति सौम्य पावमान का पर्व वा समाप्तम् ॥ ॥ इति पूर्वार्चिकः ( उन्द आर्चिकः ) समाप्तः ॥ पायमानकाण्डस्य मन्त्रसंख्या ११९ तत्र गायभ्यः ४६७-५१० (४४), बहत्यः ५११-५२२ ( १२), विष्टुभः ५२३-- ५४४ ( २२ ), अनुष्टुभः ५४५-५५३ (९),[तत्र 'माहर्गत' इति ५५१ बृहती ], जगत्यः ५५४-५६५ (१२), उणिक्याफुभः ५६६-५८५ ( २०), ११९ ऐन्द्रकाण्डस्य मन्नसंख्या आग्नेयकाण्डस्य मन्त्रसंख्या १२४ सर्वयोगः [५८५] (या जो (उस्रियाः अपि या ) फैलनेवाले और जलोको धारण करनेवाले (अश्मनि अन्तः) मेरोंमें गाः ) जलोंको (ओजसा निरन्तन् । अलसे छिन्नभिन्न करते हुए तू ( गव्यं अश्व्यं व्रज) गाय और घोडों समूहको ( अमि तनिषे) चारों ओरसे घेरता है। हे (धृष्णो )शनुमोको पारनेवाले सोम! (वर्मा इव आरुज ) कवच धारण करनेवाले बीरों के समान तू शत्रुओं का नाश कर ॥ ८॥ ॥ यहां ग्यारहवां खण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति पवमाने फाण्डम् ॥ पवमान काण्ड " पवमान का अर्थ है, 'शुद्ध होनेवाला, छाना जाने- इन्द्रको देनेके ओर विजों द्वारा स्वय पीनेके वर्णन करने वाला, छानकर जिसका कूडा बाहर निकाल देते है, इस पाले मंत्र है। प्रकार " पवमान " का अर्थ हुआ यह सूक्त जिसमें सोमको सोम यह एक बेल है उसका रंग हरा होता है। उसके छाननेका वर्णन है। पवमान सूपतका अर्थ है सोमरस छान रसको निकालकर उसे देवोंगे पिलाकर बादमें ऋत्विज कर स्वच्छ करनेका वर्णन मरनेवाला सूरत। “ पवमान लोग स्वयं पाते है। इस परके कारण ही सामवेदके इस काण्डका नाम " पयमान 'काण्ड" है । अग्रके नवम मण्डलमें" पवमान सूक्त" ही सोमका उत्पचि स्थान है। उनमसे कहीं कहाँसे मत्र लेकर सामवेदके पयमान काण्डको सोमका उत्पत्ति स्थान पर्वतका ऊंचा प्रदेश है। इसलिए रचना की है। इस पवमान काण्डमें सोगररा छाननेके, उसे से- पञ्चम वाय] सामवेदका सुबोध अनुयाद (१३) पत्थरोंसे कूटना सुख १ गिरि-ठाः अंशुः (४७३ )- ' पर्वत पर होनेवाली ३६ अगुलको घर्गाकार पहियां हो जाती थी। इन पट्टियोपर सोम बैल है', ऐसा कहा है। काले हिरणको खाल विधाते थे। उसपर सोपवल्ली रखकर २ ते अन्धसः जातं उथा दिवि ( ४६७ )- "अन्न- पत्थरोंसे कूटते थे। रूप सोमका स्थान ऊचे प्रवेश द्युलोक में है।" इससे यह चम्योः सुतः (४९०)- दोनो पट्टियो पर रखकर और मालूम पड़ता है कि पर्वतके ऊचे स्थान पर सोम उगता था। सोमका रस निकालकर उसे बर्तनोंमें भरकर रखते थे। पहासे यह मैदानोमें लाया जाता था। देखिए- १ सत् उग्मं शर्म भूम्या ददे (४६७ )- " देनेवाले उप अन भूमिपर लापे गमे " पर्वतके ऊचे भाग रस निकालने के लिए सोमको पत्थरोंसे मच्छी तरह फूटते पर उगनेवाली यह सोमवल्ली पहोंसे यज्ञके लिए भूमीपर थे। इन पत्थरोका वर्णन इस प्रकार है- लाई गई। ऋग्वेदमें इस सोमको “ मौजवान् " कहा गया है। १ कविक्रतुः नप्त्योः हिता, दिवः प्रिया घयांसि, सोमस्पेव मोजयतस्य मक्षः ।। १ । (१०॥३४११) स्वानः परियाति (७६)-शानी और कर्ममें कुशल इस सोमके पट्टियोंपर रखे जाने के माद चुलोसे प्रियपक्षी अर्थात् " मौजवान् पर्वतपर होनेवाले सोमरसरूपी अप्न अत्यन्त कूटनेके पत्थर रस निकालनेवाले अन्ययुके द्वारा इसपर भिय है, " इस मत्रमे " मौजवान् " पर्वत पर होनेवाले किराये जाते थे । अवयुका मतलब है यश करनेवाले। वे सोमको उत्तम माना गया है। मौजवान् हिमालपका एक उन पत्यरोंसे सोमवल्ली कूटते थे और उसका रस निकालते शिखर है। उसपर १२ हजार फीटको उचाई पर पाया । पहा पत्थरोंको "प्रिया ययासि" प्रिय पक्षो कहा है। जानेवाला सोम उतम माना जाता है । अपर 'उथा दिवि' पतसे से सोमवल्ली लाते थे, वो ही पायर भी पहाडसे जरे लोक, यह सोमरूपी अन्न उत्पन्न होता है, ऐसा रहा हो लाये जाते थे। इसलिए पत्पर ऊपर बैठनेपाले पक्षी हो है । हिमालय पर्यसपर १२ हजार फोट या उससे अधिको अलकारने ऊचाईके स्थानको धुलोक समझा जाता है । " त्रिविष्टिप्" इस शब्दका अपभ्रश होकर "तिब्बत" शब्द बना है। यह स्थानः ( सुघानः )- रस निकालनेवाले ऋत्विम् सोम "तियत " हिमालय पर्वत, १२ हजार फीटको ऊपाईपर कूटते थे, उसके बाद उनका रस निशलते थे। है। प्रिविष्ट हो धुलोक या स्वर्गलोक है। २ सोमं अदिमि मुपाव (५१२)- सोमरस परयरोरो गगा नदीका नाम "त्रिपथगा" है। स्वर्ग, भूलोक और कूटकर निकाला गया। यहां "अदि." पद " पर्वत " का पाता सोफइन तीनों स्थानोंपर यह बहती है। वह हिमालपसे वाधक है और यह पद यहां पर्वतपर होनेवाले पत्थरोंका निवलकर, भूमिरर महतो हुई नीधे जाकर समासे मिलती वाधक है। यह पेदको अपनी विशेष शैली है । उस शैलीरो है। इससे भी यह मान होता है कि हिमालयका वा प्रदेश समझाने के लिए यहां कुछ उदाहरण देते है। हो स्वर्ग है । और युदोकपर उगनेवाली सोमवाली भेष्ठ अंशके लिए पूर्णका प्रयोग होती है। यत करनेवाले लोग इस मोमयान् पतसे सोमवल्लो लाते पत्थर पपरका मत है । उस अशापी पपरपे लिए पूर्ण पर्वतका प्रयोग किया गया है। पर्वत"श अर्थ पर्वता थे, अपका यहारो लाकर येचनेवाले लोगसि वे तरीदते थे। सोमको गाय देकर खरीदते थे। इस सोमवल्लीको गुळमें या "पत्थर" है । इस प्रयोगके और भी उदाहरण है, जैसे- यांपफरमाते थे। उन्हें सफडियोंके वो तस्तोंके धीधमें १ अद्रिभिः सुतः ( ४९९)- रखते पे- २ अद्रिभिः स्यात. (५१३)- (अद्रि) पर्यशोंमे १नत्योदित (१७)-को सस्तोके बीचमैं उसे अति पहाइके पत्परसि शुटरर सोमयकोश रस निकाला रखा जाता था, इस पोको पहियोंको "अभिषण फा" लाता था, यह रस सकडोके पतनोंमें रखा जाता था। उसका कहते थे। इसका अर्थ " सोमरस निकालनेको पट्टी" है।में वर्णन इस प्रकार किया है। पट्टियाँ को होती थी। प्ररपर पट्टीको लम्बाई ओर घोड़ाई ३ वनेषु सदाधिपे (५१३ )- ३६४१८ अगुल होतीपी । दोनो पट्टियों को मिलाकर सनसे ४ आसुज्यमानः हरित शनिमन्ति, वतम्य जहरे २३ (साम हिन्दी) (१७४) सामवेदका सुवोध अनुवाद [पारमानं काण्डम् " " " सीदन् ( ५३०)-पनको अपना घर बनाया है । सोसका है यह कहने के बजाय सोम नदियों स्नान करता है, ऐसा हरे ग्गका रस सन्द करता हुआ बनके पेट में जाता है। कहा है। बनेषु सद. " और "यनस्य जठरे " इन वाक्योंका ११ सिन्धूनां प्राणाः फलशान अमि अचिमदत् अर्थ है, पार- 'बनमें वृक्ष होते है, उन वृक्षोंसे लकडी बनती (५५९)- नदोके प्राण बर्तन में याद करते हुए जाते है। है, और उस लक्डोसे बर्तन बनते हैं, इसलिए पात्र अश है इसका अर्थ है कि नदी के प्राणरूपी पानी बर्तनमें भरे जाते और वृक्ष अथवा वन पूर्ण है। इस अशके लिए पूर्णका समय शब्द करते हैं। प्रयोग यहा हुआ है। इस कारण " धनेषु सदः दधिपे", १२ सिन्धोः उच्छ्चासे पतयन्तं उक्षणं हिरण्य- अथवा 'वनस्य अटरे सौदन ' इसका अर्थ है, कि पायः पशु गृभ्णते (५६४)- नदीके पानी में पड़े हुए बलको लकडोके वर्तनमें सोमरसका रखा जाना । मह वैदिक वर्णनकी सोने के आभूषणको पहने हुए हायोंसे पशु समझकर पकडते शैली है । " बन" का अर्थ है, " लकडोके यौन " यह देदकी है। उक्षा "-बैल, सोमरस, पशु, जानवर, देखनेवाला, परिभाषा है । यह दौलो टोक तरह समझ लेनी चाहिए, चमकनेवाला, मदीके पानी सोम मिलाया जाता है, और नहीं तो येदमोंपा अर्थ ठीक तरहसे ध्यानमें नहीं आएगा यह वहा घमकने लगता है, और वह सोनेको अगूठी पहने और अर्यये अनर्थ होने में कठिनाई भी नहीं होगी। इस हुए हाशे माना जाता है। यहा“सिन्धो उच्छ्या" दौलीके दूसरे उदाहरण भी यहा देखने योग्य है ( नदोके भवरम ) यह शब्द नदीके पानीसे भरे हुए वर्तनके ५ कविः सिम्यो ऊमाँ अधिश्रितः { ४८६ }- ज्ञानी लिए प्रयुक्त हुआ है । " पशु शब्दका अर्थ है, चमक सिन्धुके लहरोमें रहता है । ( कपिः ) ज्ञानी, ज्ञान बढाने वाला सोमरस । याला सोम नदीके पानी में मिलाया जाता है। पश्यात इति पशुः " जो देखता है यह पशु है। ६ सोमानः अप ऊर्मयः प्रनयन्त(४७८)- सोमरस देखनेका अर्थ है चमकना। रत चमकता है, वह अपने तेजसे पानीके लहरके पास लाया गया। सोमरस पानीमें मिलाये सबको देखता है । उक्षा:- मेल, बल बढानेपाला मोम । इस प्रकार " अंशके लिए पूर्णरु प्रयोग " वेदमें ७ मृज्यमानः समुद्रे याचं इन्यसि (५१७ )- शुद्ध संकरों स्थानपर आता है। उन्हें समझ लेना अत्यावश्यक है। होता हुआ यह सोमरस समुद्र में शब्द करता हुआ जाता है। इसके पोडेसे और भी उदाहरण देखिए- सोमरस छनते समय पानीके बर्तनमें शब्द करते हुए पडता हैं। नीचे पानी के बर्तन है, उसका निर्देश यहाँ दूधमें सोमरसका मिलाना समुद्र पदसे किया है। गाय के दूध सोम मिलाया जाता है । इसका वर्णन वेवमें ८ सोमासः समुद्रस्य विष्टपे भाभ यवन्ते (५१८)- इस प्रकार है- सोमरस समुद्रके ऊपरके भागमें छाने जाते है । मोमरस १ सुजातं अप्नुरं गोभिः परिष्कृत इन्दु (४८७)- पानीके बर्तनमें छाने जाते है। उत्तम प्रकारसे तैयार किया गया और शीघ्रतासे पानी में ९ देवेन्य. मत्सरः समुद्रः ( ५२१ )- देवोंके लिए मिलाया गया सोमरस ( गोभिः परिष्कृतं ) गायके दूध आनन्द देनेवाला यह सोमररा रामुद्र में मिलाया जाता है, मिलाया जाता है । " गायसे मिश्रित" का अर्थ है " गायक अयया सोमरसया समुद्र लहरा रहा है। अर्थात् सोमरस दूषसे मिथित "। दूध गायका भश है, इस अशके लिए पूर्ण पानी मिलाया जाता है। का प्रयोग किया है। और भी देखिए- १. अत्यः न वृथा पाजांसि नदीपु रणुते १५५८) २ हे इन्दो । गा अभि रहि (५०५)- हे सोमरस घोडा जैसे सरलतापूर्वक अपनी शक्ति से स्नान करता है, तू गायके पास जा, अर्थात् तू गाय के दूध मिल जा! यहां उसी प्रकार ये सोमरस नदी में स्नान करते हैं । अर्थात् पर "गाः" भनेव गार्पोरा प्रयोग " गाय के दूध" के लिए सोमरस पानी मिलाया जाता है। इस स्यानपर "नदीपु" विश है। उसी प्रकार- ( नदियोंमें ) यह पद महबघनमें प्रयुक्त हुमा है । अनेक ३ नुभिः यतागा निर्णिजंपुरते (५३०/- मनुष्यों - नदियोमें स्नान करता है। सोमरस पानी में मिलाया जाता ऋस्पिनों द्वारा माफर निचोडा गया सोमरस पापरा का जाते है। " गाय " पश्चम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद - पारण करता है, अर्थात् सोमरस गाय दूध मिलाया जाता इस प्रकार हायमें पहनी हुई सोनको अगूठी मोमरससे है। “गा निर्णिजं" गायके रूपका मतलब है " गायक छूतो थी। इससे सोनेसे उसमें कुछ विशेष गुणोंका आना दूधका रूप" । गो शब्द मायके दूपका वाचर है। अशके स्थानाधिक है। लिए पूर्णका प्रयोग वेदमें इस प्रकार होता है। और भी इस कटे हुए सोमका रस हायसरी अगुलियोंसे दबाकर देखिए- निकाला जाता था । उसका वर्णन इस प्रकार है- ४ कलशे इन्दुं वावशानाः गानः यायन् (५३७)- १ साकै उक्षः स्वसार: मर्जयन्तः, दश धीतयः पलाम सोमके पास इच्छा करती हुई गायें आई । इसका धीरस्य धनुनीः (५३८)- एक जगह रहार कार्य परने अर्थ है कि कलाम भरे हुए सोमरसमें मार्योका दूध मिलाया याली बहनें- हायको अगुलिया सोमको शुद्ध करती है, सोमको जाता है। फलशमें गाम जा हो नहीं सकती। जब एक ही पोसकर उसका रस निकालती है। ये दस अगुलिया धर्यवान नहीं जा सकती तो फिर अनेक कैसे जा सकती हैं। मत यहा सोमको धारण करती है, हायसे रस निकालती है । इस गायको दूपका वाचक मानना पडेगा। प्रकार सोमवल्लीसे रस निरसता था। ५ शुचिं वर्ण गोपु गधि धारय ( ५७४ - शुद्ध सोमरसमें पानी मिलाना वर्णको गायमें स्थापित पर । सोमरसके शुद्ध वर्णको गायके ऊपर लिखे एके अनुसार सोमका रस निकालनेसे वाद दूयमें मिला । सोमरस और गायरे दूधका मिश्रण कर! जो परार हिस्सा हायसे वधता उसे " जीप" कहते ६ ते वर्ण गोभिः अभिवासयामसि ( ५७५ )- तेरे थे। यह खराव हिस्सा एक तरफ बरके रस निकाला जाता सोमकै रगको गायसे माच्छादित करते हैं। सोमरसम गायका था। फिर पह रस छल्नोसे जाना जाता था। इसे छाने बूर मिलार उसमें दूधका राफेवरन हम लाते हैं। पहले इसमें पानी मिलाले थे। पानीको मिलाने सम्यम्पमें ७ रस हरि. दिव पवते (५७८)-हरे रगका सोम- वर्णन इस प्रकार है- रस शुलोकसे छाना जाता है। " ऊपरके पर्तनसे " सोमरस १ अनु दक्षः ( ४७३) - पानी में मिला हुआ सोसरस छाननीसे छाना जाता है । " ऊपरके वर्तनसे " कहने के बजाय बल बढानेवाला होता है। "दिवा" धुलोकसे कह दिया । धुलोक हमेशा ऊपर ही है, २ कवि सिन्धो. ऊौ अधिश्रितः (४८६ - पट इसलिए ऊपर प्रर्तनको " लोकका सूचव मत्रमें शान बढानेवाला मोमरस नदीफे पानी में मिलाया गया है। माना गया। ३ मानुपीः अपः हिचान. (४९३ ) मनुष्योवा इस प्रकार " अदाके लिए पूर्ण प्रयोग " को वैदिर नौलो हित परनेवाले पानी में मोमरस मिलाया गया है । देखने योग्य है । यह वैदिक मयोंको विशेषता मननीय है । ४ मही अपायनिवास (४९४)- महत्त्ववाले जलोमें सोमको सोनेसे छना सोमरस मिलाया गया है। ५ विचर्षणिःहित. पवमान. अयं आप्यं पृहत् सोमवल्ली पत्थरोंमे कुटो जानो पो । ये पत्यर कूटनने हिन्यानः स चेतति ( ५०८)- ज्ञानी, हितकारी, शुद्ध समय पफड़ने के लिए ऊपर पतले और नोचेकी ओर गोल किया जानेवाला यह सोमरस महान् जोंमें मिलाने के बाद और मोटे होते थे। कूटने के बाद हायकी अगुलियोंमे दयाकर शक्तिको बढ़ानेवाला होता है । इससे ऐसा प्रतीत होता है रस यर्तन में भरते थे । उस हायमें सोनेको अगूठी पहनने थे। कि सोमरस दुगुने या तिगुने पानी में मिलाया जाना था। इस सोनेके उस रसके साय लगनेसे रसमें विशेष गुण उत्पन्न 'वृहत् भाप्य हि गानः" अधिश परनीमें यह मिलाया होते थे। इसलिए कहा भी है- १ हेमना पूयमानः देयः रस, देवेभिः समस्त ६ मन्तु अन्तः दधन्वान् ( ५१२)- पानी मोमरस (५२६)- सोनेरो पवित्र होनेवाला मह दिय्परम देवोंको मिलाया जाता है। पिलाया जाता है। ७ सुतं परिचित (५१२)- सोमासमें पानी डालो। २ हिरण्य-पावः (५२७)- मोनेसे पवित्र होनेवाला इससे भी मालूम पड़ता है कि मोमरमसे पानी अधिक होता था। जाहा पा (१७६) सामवदका सुयोघ अनुवाद [पायमान काण्डम् . ८ अर्णसा प्रपिप्ये (५१४ )- पानीमें सोम मिलाया सोमका दूघसे मिया होने के बाद यह साहबसे भरे मर्तनमें जाता है, " अर्णस्" का अर्थ है पानीका समुद्र। समुद्र में सौपा जाता है । मिलानेसर अर्य है, बहुतसे पानी मिलाना। इस प्रकार सोमरसमें पहले पानी मिलार यह धामा ९ देवेभ्यः मत्सरः समुद्र पिधर्मन् (५२१) जाता था। हापोंसे दवाकर निकाला गया सोमरस गादा होता देवोंको देने के लिए आनन्दवर्षक सोम पानी मिलाया जाता पा, उसमें पानी मिलानेसे वह पतला होता था। उसके मार है । इसे मिलाने के बाद वह विदोष गुणोंसे युक्त होता है, यह दशापवित्र अर्यात बकरीके बालोस यनो एलनीसे वह अर्थात् पीने लायक होता है। छाना जाता था, उससे उनसे सोमवल्लोका मोटा-मोटा १० चना वसानः रत्न-घा ( ५२८ )- पातोम मिला भाग उसमें नहीं गाता था, और यह पोनेलायक होता था। हुमा सोम रत्नोको धारण करता है । वह चमकता है। सोमरसकी छलनी ११ मधुमान अप. यसाना ( ५३२)-मोठा सोम पानी में मिलाया जाता है। सोमरस छाननेशी माननी बररीके पालोगे पुनी हुई १२ सरसिप्रध-व (५४१)-पानीमें जाकर मिल जा। होती थी। उस छलनीका वर्णन इस प्रकार है- १३ अपां गर्भ सोम महिएः (५४२ /- मानीमें १ वृपा देवयु अव्यायारेभिा मंद्रया धारया पयस्य मिला हुमा सोम यलवान है । पानीके गर्भ में सोम रहता है, (५०६)- बल बानेवाला के पास जानेवाला सोमरस मात् पानी अधिक और सोम थोडा रहता है। परीके यालोंकी छलनीसे धीरे धीरे माना जाता है। १४ रथ्ये यथा असजि ( ५४३ )- युद्धमें जिस प्रकार २ सोमि स्वान अयानां स्लुमिः अभियाति घोरा भेजा जाता है, उसी प्रकार सोम पानी में घोरा जाता है। (५१५)- रस निकालनेवाले ऋत्विजों द्वारा निधो गया १५ अ-शुदः प्रियं काम्यं अमि नवन्ते ( ५५०)- सोमरस बकरीके बालोंसे पाना जाता है । दोहन करनेवाले पानी प्रिय और चाहने योग्य सोमसे मिलने ३ भव्या पारेः परि पुनाना (५१९/- यारोके लिए जाता है। सात यह मिश्रण मुदर और उत्तम होता है। बालोस उनपर वह रस नीचे गिरता है। १६ सिन्धूनां प्राणा इन्द्रस्य दार्दि माविशन् ४ पुनानः अव्य यारं अयेपि (५६२)- जाना जाता (५५९)- नदोरे प्राण इन्द्रये प्रिय सोममें मिल गए।न्द्रको हुआ वह रस मेरी यालोको साननीसे नीचे गिरता है। सोमरस बहन मा लगता है, उसमें नरोके प्राण मर्यात ५ पुनान सोम ऊर्मिणा अन्य पार विधायति पानी मिलाया जाता है। 1 ५७२ )- जाना जाता हा मोमररा सहमि पुम होर १७ अनि अन्तुरं यनप्रनं उद्धृतं सोत परि भर गलोंको जननीमें दोडकर गाता है। न ही मोघे पिंचत (५८०.मोके समान पानासानेपाला, पानोसे जाता जाता है। मिपिन होनेमात सोम है। उरारा निरालकर उत्तम ६ मुतः मन्या पापेभः धारया परते (५८)- पानी मिलाओ। गोमरा निरासनेरे यार वह भेरो पानोपी धाननौगे १८ मदिन्तमा अपां मिः य पीटन (५८४- होता है। मार देनेगा मोम पानोरे पटरि साप खेलता है। ७ सोमा पवित्र पर्वक्षरत (४५)- सोमपटमोगे सोमरम पास मिलाया जाता है। मीचे पता है। १९ ममुद्गः गोपाः पृा स्थानः (५२९)- पानी मौर गायये दूपमें मिलाने बार वह यस गानेवाला होता है। ८ सहनधारा अय्यं अस्यानि ( ५२०)-ए पारामोंगे, और बालोरीजनोगे मोपे गिरता है। २० अपः यगाना पुनानः धारया पनि ५:१)- पूनः मायं धार भयेर (५४/-गुर होता पानी मिला दार धाना आता हुआ मोम पारस नोधेरे हाव भालो एमनोगे मोघे गिरता है। निगिरता है। १.म्पा मम्मे यार यति पषताम् (५१५/- २१ भगो पपमा मधुसुनंबसं म {५१४)- मन पर मोरग सोनोगे मी साना me पञ्चम अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद (१७) । रस भर ११ हरि त्यं वारेण परि पुनन्ति ( ५५२ )- हरे (४८६) ज्ञान पढ़ानेयाला सोमरस नदी के पानी मिलाने रगो उस सोमको छलनी धानते हैं। याद नीचे वर्तनमें गिरता है। १२ हरिः रखा दरासि गति पवते ( ५७६ )- हरे ८ सुत. कलशं आविशत् (४८९) सोमरस घलामें रंगका सोमरस अपनसे खराब हिस्सैको दूर करते हुए गिरता है। शुख होता है। ९ सुतः पवित्रे असर्जिन्यक्रमीत् ( ४९० - सोम. इन पदोंसे मोमरस छाननेको रल्पना अन्धो तरह को रस छाननीसे जाना जाता है । जा रामतो हैं । भेडसे पार्लोको बगो हुई यह छलनी होती है, १० भूर्णयः स्येपा अयासः कृष्णां त्वचं अपनन्त वह यौनके ऊपर मापी जाती है, और उपरसे एक यतनमे प्रामुः (४९१)- जल्दी से जानेवाले तेजस्वी, गतिशील धार बांधकर उस छाननीपर पानी मिश्रित सोमरस डाला सोमरस अपने हरे रगके पालको उतार कर वतनमें छनले जाता है। जो पुछ सोममें फूड़ा करकट होता है, वह रस ए जाते हैं। छाननीपर रह जाता है, और नीचे बर्तनमें ११ अया परस्य । ४९३)- इस धाराले छन जा। जाता है। माननोसे छाने बिना रसको दिसी भी देवताके १२ अया बीती पयस्व (४९५)- इस रीतिसे दास हो। लिए नहीं दिया जाता। ग्रादि देयोंको देने के लिए कुछ कुटा १३ स्थानः पवित्रे या वर्ष ( ४९६ - रस निकालनेके सोमरसमें न रहने पाये, इसलिए यदी ही सावधानीसे छाना बाव जननीते छन । जाता पास प्रकार यह सोमरस छाना जाता था, उसके माद उसमें दूध आरि मिलाया जाता था। इसलिए पहले इस १४ पृण हरिः पनिप्रदत् । ४९७)- माज बढाने- छानने के सम्बन्ध मप्रमें क्या कहा है, वह द्रष्टव्य है। याला यह हरे रगरा सोम शम्द करता हुआ छनता जाता है। सोमरस छानते हुए शब्द होता है १५ पवित्रे आनय, इन्द्राय पातये पुनीदि ( ४९९) -एलनी सोमरस डाल । इन्द्र के पौनके लिए पवित्र कर । कोई द्रय पदार्प जब दूसरे द्रय पदार्यमें डाला जाता है, १६ द्रोणानि रोस्यत् अर्थ ( ५७३ )- वर्तनमें शब्द तब शम्ब होता है । उमी प्रकार सोमरसको छानते हुए शम्म करता हुआ जा। होता था। नीचेके वर्तनमें पानी होता था। उसमें एलनीके २७ मनीषिभिः मृज्यमानः धारया पवस्व (५०५) द्वारा सोमरस छाना जाता था। इस कारण भावाज होती -वृद्धिमान् ऋविजों द्वारा शुद्ध होनेवाला तूपारासे शुद्ध हो। यो । उसका वर्णन वेदमत्रमें इस प्रकार है- १८ इन्द्रस्य निष्कृतं गच्छन् पयते (५१०)-इन्द्रफे १ हरिः कनिमारत् पति (४७१/- हरे रगका सोम• पास जाने के लिए शुद्ध होता है। रस याद करता हुआ नीचेके बर्तन में जाता है। १९ अन्यया याराणि तिर पक्से ( ५६३)- २ सुतासाथवसे प्रामामुः (४७७)- सोमरस पशो भंडके बालोंको बनी छलनीसे सोमरस शुद्ध होता है। लिए शब्द करते हुए मोचेके वर्तनमें जाता है। २० हारः चम्पो, पुरि जनः न, विशत् (५१३)- ३ सोमासः अपः ऊर्मयः प्रनयन्त ( ४७८)- हरे रगका सोमरस वर्तनमें, जिस प्रकार नगरमें मनुष्य जाते सोमरस पानी लहरोंमें लेजाया जाता है। पानी में मिलाया है, उसी प्रकार जाता है। २१ सुहस्त्या मृज्यमानः समुद्ने वाचं इन्यति ४ सुतः वृषा पवस्व ( ४७९)- रस निकालने के बाद (५१५)- उत्तम हायसे निकाला गया और छाना गया बल बढाने के लिए ईनता जा। यह सोमरम समुद्र में शरद करता हुआ प्रविष्ट होता है । ५ पवमानः (४८०)- छाना जानेवाला सोम । नीचे बर्तन में रखे हुए पानोम सोमरस मिलाया जाता है । ६ स्वानासः इन्दवः मधो धारया मदाय परि २२ धारया पवित्र असक्षत ( ५२२ )- धार बांध- अपति ( ४८५ )- रस निकाला हुआ सोम मीठो धारासै कर छलनीसे नीचे मोमरस याता है। आनन्द पदाने के लिए छाना जाता है। २३ प्रदव कोप परि निपीद (५२३ )- वर्तनमें ७ कविः सिन्धोः ऊमाँ अधिश्रित, परि प्रासिष्यत् भर ना ।
(१७८) सामवेदका सुयोध अनुयाद [पायमानं काण्डम् २३ वराह रेभन् पदा अभ्येति ( ५२४ ) उत्तम रस भेडके बालोस बने छलनीसे नीचे के पानी के बर्तन में छाना दिनमें शन्द करता हुआ बर्तन में जाता है। जाता है, तब उसका दाद होता था। ये वर्णन अपरके २५ सुतः रेभन् पवित्रं पति (५२५ ) सोमरस मंत्रोंमें अनेक प्रकार किये हैं। उनको देखने मे छानने की शाद करते हुए छाननीसे नीचे आता है। क्रिया अच्छी तरह ज्ञात होगी। २६ मधुमान वृपा पवित्रं पर्यशाः ( ५३१ /- मोग सोमका धमें मिलाना और बल बढानेवाला सोमरस छाननीसे टपकता है। सोमरसको पानीमें मिलाकर छानने के बाद वह दूध २७ अधिसानो अव्ये एवस्त्र ( ५३२)- ऊचे स्थान मिलाया जाता था। इस सम्बन्धमे वर्णन इस प्रकार है- पर भेडके बालको छलनीसे छनता जा। १ सु-जातं अस्तुरं गोभिः परिष्कृतं इन्दुं देवाः २८ मत्सरः धृतवन्ति द्रोणानि अवरोह ( ५३२ )- उप अयासिपुः ( ४८७ )- उत्तम प्रकारसे तैयार किये आनन्द देनेवाला सोमरस जलके पान में उतरता है। गये सोमरसमें पानी मिलाने के बाद गाया दुप मिलाते है, २९ मधुमतीः थाराः प्रासमतं ( ५३४ ) - मीठी और फिर सब देव सोमके पास जाते हैं। इससे राब पत्रिन्याया धारा बहती है। ज्ञान हो जाता है, प्रथम सोमरस निकालना, फिर उसमें ३० देवः इन्दुः कलशं मति आसीदतु ( ५३५ )- पानी मिलाकर उसे छानना, उसके बाद उसमें दूध और शहद तेजस्वी सोमरस कलशमें जाकर बैठता है। मिलाना फिर अन्तम पोना यह सोमरसकी प्रक्रिया थी । ३१ धियः अधिस्पर्धते (५३९}- अगुलिया रस निकाल• २ रुचा गाः अभि इहि (५०५)- चमकनेवाला के लिए परस्पर स्पर्धा करती है। सोमरस गायके दूधके पास जाता है, अर्थात् वह गाय के दूपमें ३२ सोम पुनाना अर्पति (५४६)- सोम छाना जाता मिलाया जाता है। हुआ बर्तन में पाता है। ३ सोमः गव्यन् ( ५३३ )- सोम गाय के दूधर्मे मिलाया ३३ स्वानाः स्वबिदा इन्दवः सोमा पपग्ते (५४८) जाता है। - रस निकालनेके बाद ये तेजस्वी सोमरस छाने जाते है। ४ हे पयमान ' धाम पवसे (५३४)-हे सोमरस ! ३. चनोहितः प्रियाणि नामानि अभि पवते तू दूध मिलाया जाता है, अपना स्थान पवित्र करता है। (५५४)- अन्नके समान हितकारी सोम प्रिय जलोंमें मिला. दूध मिलाने के बाद सोमका घर पवित्र होता है। कर छाना जाता है। ५ फलशे इन्, वायशाना गाय: आयन ( ५३७)- ३५ येपु यहा अभिवर्धते ( ५५४)- इन जलोंमें कलामें सोमरसको इच्छा करती हुई गायें माई, अर्थात् मिलाने के कारण सोमरस बढ़ता है। सोमरसमें गायका दूध मिलाया गया। ३६ एष फोशे म अचिक्रदत् ( ५५६)- यह सोम ६ शुक्ला असुराय निर्णिजे वयन्ति ( ५५१). रस बर्तन में शब्द करता है। सफेद राका गायका दूध बलवान् सोमके रूपको साफ करने के ३७ शतयामना पथा फ्लशे संपति (५५७)- लिए माच्छादित करता है । दूय सोम मिलाया जाता है। शोधिवाती चलती रास्तेसे यह सोमरस कलशेमें जाता है। ७ सुदुयः युतश्चुतः वाभाः पयसा धेनवः अभि ३८ पयमानः फनिक्रदत् । ५७२ )- सोम छानते भर्पन्ति ( ५५६ ) - उतम य देनेवाली, घी घुमानेवाली, समय शब्द करता है। रभाती हुई गायें सोमके पास माती है । अर्यात सोममें गाय. ३९ पुनानः सोमः मधुश्चुत कोशं परि अपात का दूध मिलाया जाता है। ( ५७७ )- छाना जाता हमा सोमरस मीठे रस डानेजाने ८ असे भिसप्त धेनय: आ शिरं दुदुहिरे (५६०)- वाले बर्तन में जाता है। इस सोमके लिए २१ गाय दूध देती है। इन गार्योका दूध १० मध्यम फोशं पियुष (५७९)- शहदो सोमरस मिलाया जाता है। ९ घेनय वचनयन्तः उन्नियाः ज्यभिः परिरनुतं इस प्रकार मोम जाना जाता है। कपरके बर्तन सोम- निर्णिजं घिरे । ५६३ )- गायें रभातो हुई अपने मनसे . बर्तन में मिल!
पञ्चम अध्याय] सामवेदका सुबोध मनुवाद (१७९) टपकनेवाले दूपरो सोमके कपको पारण करती है, अर्थात् ७ हिरण्ययः देव. (५११)- पह सोने के समान दूध सोम मिलाकर उसे सफेच यनाती है। धमकता है। १० शुचिं वर्ण गोपु अधियारय (५७४ - शुद्ध ८ रभसानि यत्रा भादचे (५३३ /- यह सीम राग गायोंमें स्थापित कर सोमरस गायो यूपमें मिलकर तेजस्वी घरच पहनता है। श्येत रगका हो जाता है। १अः सूर्य अपिन्य (५३४)- तेगसे सूर्यको भरता ११ ते वर्णे गोभिः अभिवासयामसि (५७५)- तेरे है। सूर्यको भी तेज देता है, इतना यह सोमरस तेजस्यो है । सोमके गिरोहन गायके दूधसे आच्छादित करते हैं । अर्यात १० सोम उमेरोदसी व्यरयत् (५४६ )- सोम- सोमरसफा हराए गायके दूपसे आच्छादित होनेपर सफेद रस दोनों ही लोको-पायापुषिधीको -तैमस्वो परता है। रगा दीखने लगता है। ११ रिचक्षणः सूर्यस्य रथ अधि आरुहत् (५५४) इस प्रकार मापका दूध सोमरसमें मिलाने के बाद यह हरे पह ज्ञानी सोमरस सूर्यके रथपर चढ गया है, अर्थात् रंगका सोमरस सफेव पोखने लगता था और धमकाने लगता इससे पूर्वका तेज बहा है, अर्थात यह त्यय तेजस्यो है। पाइसके बाद यह पिया जाता था। सोनेके पहले उसमें १२ राजा इव दस्म (५६२)- राजाके समाा पह दाहर डाला जाता था, जौरा आटा भारि इच्छा हो तो तेजस्वी धोखता है। मिलाया जाता था, जो भूनकर उराका भाटा यनारर मिलाते इस प्रकार सोमरस अपने तेजसे चमकता है इस विषय में ये और फिर उसे पोते थे। यह यगन उपरोक्त मत्रोंमें आया है। अब इसका एक दूसरा यह चमकता भी था, उसके विषपमें इस प्रकार वर्णन है-- गुग देखिए- सोमरस चमकता है उत्साह पढानेवाला सोम सोमरस पानी और दूध में मिला के पाव चमकने लगता सोमरस चमकता है, अर्थात उसमें स्वामाविक तेज है। पा, मोर इनके बिना भी यह चमकता था। इससे ऐसा ऐसा कोई पदार्य उसमें है, जिसके कारण वह चमकता है। मालूम पडता है कि उसमें फास्फोरसको मात्रा अधिक होती अपने घमकनेवाले गुश्के कारण हो यह उत्साह बढ़नेवाला होगी। उसके चमकनका यह गुण यहुत महत्त्वका है, इसी है । देखिए-~- कारण उसे युद्धिवर्धक, उत्साह्यधक और आनन्दवर्धक कहा १ चैतन प्रिय इन्दु (४८१)- यह सोमरस चेतना है। अब उसके चमकनकै विषयमें वणन देखिए बहानयाला है. इस कारण यह सभीको प्यारा है। १ स्वर्दश भानुना गुमन्त हवामहे (४४०/-स्वयं २ वाजिन शव सोमास मासूक्षत (४८२)- तेजस्वी और अपने तेजसे चमकानेवाने सोमरसको हम नुताते पलपर्षक और उत्साह बढानेवाले सोमरस छाने जाते है। है, हम उसको स्तुति करते हैं। मदिरः जागृवि (५१४)-आनद बढानेवाला २देव पवस्व (४८३) चमकनमाला सोम शुद्ध और उत्साह बढानेवाला, सबको जाप्रत रखनेवाला यह सोम है। होवे, तू छनता जा। ४ भदाय परते (५४० )- आनर बढानेवाला यह ३ पयमाता वैश्वानर ज्योतिः दिवः चित्र अजी- सोम शुद्ध किया जाता है। जनत् (५८४) छाना जानेवाला यह सोमरस सब मनुष्यों- इस प्रकार सोमरम उत्साह बढानेवाला है, पे इस सम्बपने का हित करनेवाला, तेजस्वी, धुलोकमें चमकनेवाला उत्पाद यणन है। जिस कारण वह चमकता है इसीलिए यह उत्साह बढानेवाला है । अब उसके मानन्द बडानेवाले गुणों का वर्णन ४ बायका रचे सूर्य जनन्त ( ५०२)- मनुष्योंने देखिए- ऋत्विोंन तेजके लिए सर्य -सोम उत्पन्न दिया है। ५ घुमत्तम (५०३)- सोम बहुत तेजस्वी है। आनन्द बढानेवाला सोम ६ हे देव ! वृपा घुमान् असि ( ५०४ -हे प्रकाश १ मदेषु सर्वधा असि ( ४७५/- मानव देनेशते मान् सोम! तू यस बहानेशला और तेगरयो है । शोंमें सोमरस सबसे अधिक मानद देनेवाला है।
सामवेदका सुवोध अनुवाद [पावमानं काण्डम " २ ते मदः इन्द्रं गच्छतु (१७८)- तेरा आनन्द बढाने. इस मंत्रम सोमरस अत्यन्त स्वादिष्ट और हर्ष बढानेवाला है, याला गुण इन्द्रको प्राप्त हो। यह कहा है। ३मत्सरः ऋतुवित् पवसे (४९२ :- आनन्द बढाने २ तेन अन्धसा पयस्व (४७०)- सोममें अन्नका वाला और यज्ञम जानेवाला सोमरस छाना जाता है। सत्त्व है और यह सुसदायक है। ४ सुतस्य अन्धसः धाप मन्दी (५००)- सोमरस ३ मधुमचमः ( ४७२)- यह मत्यन्त मोठा है। रूपी अन्नको धारा मानन्द देनेवाली है। ६ एप मधुमान (५५६ )- यह मोठा है। ५ मन्दानः वृपायसे ( ५०७)- हे सोम ! तू मानन्द इस प्रकारका यह सोमरस है, स्वादिष्ट और मोठा होता और बल बढानेवाला है। था। इस कारण वह लोकप्रिय हो गया था। इस प्रकार यह सोमरस आनन्द मदानेवाला है। मनुष्योंका हित करनेवाला सोम धुद्धिवर्धक सोम सोम मनुष्योंका हित करनेवाला है, यह मं. ५१२ में अब सोमफे पुद्धिवर्धक गुण देखें- नर्यः" शब्दसे प्रगट किया है। १ कविः ( ४८६ )- ज्ञानी, बुद्धिमान्, क्रान्तदर्शी। दुष्टोंका नाश करनेवाला सोम २ कवीनां मतिः (४८१)- ज्ञानी लोगोंको पद्धि सोम भरपोरोंका उत्साह बढानेवाला है। उससे बल और बढानेवाला। शौर्य बढ़ता है। इस कारण शूर सोमरसका पान करते है, और ३ कविक्रतुः (४७६ )-शानी और कर्म जाननेवाला। वे शूर वीरताके काम करने लगते हैं। इस कारण दुष्टोंका ४ विमः अभवः (५१९)- सोम शानका बढानेवाला है। नाश होता है । इस विषयमें निम्न मत्र है-- ५ पुरमेघाः ( ५१४ )- बहुत बुद्धिमान् । १ अघ-शंस-हा (४७०)- पापकोंक लिए प्रसिद्ध ६ सोमासः विपश्चितः (४७६ )- सोमरस रधि मनुष्योंका नाश करनेवाला है। सोमरस पीनेसे बोरों में बढानेवाला है। उत्साह बढता है, और वह उत्साह पापोलोगोंका नाश करता है। ७ मनीषिणः सोमासः (५१८)- बुद्धि बढानेवाले २ अ-रावण अपनन् (५१०)- दान न देनेवाले कजूसोंका सोम नाश करनेवाला है। इस प्रकार सोम बुद्धिवर्धक है। ३ विश्वाः द्विपः अप जहि (४७९)- सब देष करते. बलवर्धक सोम घालोंका नाश करनेवाला है। ४ विश्वाः मृधः अभ्यफ्रमीत (४८८)- सब दुष्टोंका सोम पीने के बाद बल बढाता है। १ दक्षसाधनः (४७४)- सोमरस बल बढानेवाला है। ५ मृधः अपघ्नन् ( ४९२)-वह शत्रुओंको मारता है। २ वृष्ण असि ( ४८०)- तू बलवान है। ३ वृषा चपनतः (५०४ )- सोम बलवान है, और ६ अदेवयुं जनं नुदस्य ( ४९२ )- देयोंकी भक्ति न पीनेवालेरे प्रत और बल बढानेवाले है। करनेवाले दुष्टोको दूर कर। ४ ते दक्ष यलं आवृणीमहे (४९८)- तेरे सामH ७ ते मदेषु नवती: नव अवाहन (५५)- तेरे भौर बल हम ग्रहण करते हैं। पीनेसे उत्साह बढने के कारण वोरोंने युके निन्यानवे नगरों- इस प्रकार उसके बल बढानेवाले गुणका वर्णन है। को तोडा। ८ सेनानी शूरा सोमः स्थानां अग्ने प्रति, अस्य स्वादिष्ट और मीठा सोम सेना दर्पते (५३३ )- सेनाका रुचालन करनेवाला पूर सोम स्वादिष्ट और हर्ष बढानेवाला है। सोम रपके अप्रभाग जाता है और इसकी सेना हषित १ स्वादिष्टया मदिष्टया धारया पयस्व (४६८)- होती है । सोमरत पीनरो इस प्रकार बात यहता है। स्वादिष्ट और उत्साहवर्षक धारासे सोमरस छाना जाता है। ९ रक्षा हन्ति, अरातीः परि याधते ( ५४०)- सोमरस है। नाश कर।
(१८९) सामवेदका सुबोध अनुवाद पञ्चम अध्याय] सोम है। देता है। राक्षसोंको मारता और दुष्टों को पीटा देता है। ऐसा यह सोम धन देता है सोम पनको भी देनेवाला है। इस विषयमें निम्न मंत्र है- १० वृत्राय हन्तवे इन्द्रं आविथ (४९४)- धूत्रको मारने के लिए इन्द्रका दल बहाया। सोमरस पोने के कारण १ रत्नधाः (५११ )- सोम रत्न देनेवाला है। धनशे मारनेका पल इनमें बढा । २ वार्याणि दयते । ५२९ )- सोम धन देता है। सोम पीकर शूर सैनिक ऐसा कार्य कर सकते हैं। ३ सहनदाः शतदाः भूरिदाया पाजी ( ५३१)- हजारों, सैकड़ों और बहुतसा धन देनेवाला सोम है। इन्द्र के लिए सोमरस ४ शतस्पृहं, सहनभर्णसं तुविद्युम्नं रयि न इनमें सोमपानसे शोयं बढ़ता है और यह राक्षसोंका यघ अभ्यर्प { ५४९)- संकोंके द्वारा चाहने योग्य हगारोका करने में समय होता है। इसलिए इन्द्रको सोम देनेको परिपाटी पोषण करनेवाले, तेजस्वी धन हमें दे। है, देखिए- ५ पिशंगं पडलं परस्पृहं रयिं अभ्यर्पसि ( ५१७ ) १ इन्द्राय पातये सुतः (४६८)-दन्द्रयो पिलानेके -पीले रंगके बहुतोंके द्वारा धाहने योग्य बहुतसे धतको तू लिए यह सोम तैय्यार किया गया है। २ इन्दु इन्द्राय धीयते (४८९)- सोमरस इन्द्रके ६ सहनिणं सुवीर्य रयिं आ पवस्व (५०१ )- लिए है। हजारों प्रकार उत्तम पराक्रम करनेवाले धन हमें दे। ३ मधुमत्तमः घुक्षतमः मदः इन्द्राय पयस्य ७ नः महे तुने प्र अर्पसि ( ५०१/- हमें बहुत धन (४७८)- अत्यन्त मोठा, तेजस्वी और आनन्द बढानेवाला प्राप्त हो इसलिए तू धागा जाता है। यह सोमरस इन्द्र के लिए धान । सोम धन देता है, अर्थात् सोमयाय करनेवाले यजमानको ४ मरत्वते इन्द्राय पवस्व (४७२) मरतोंको लोसे धन मिलता है । यज्ञ याग महान् पवित्र कार्य है। सेनाके साय इन्द्रको यह सोमरस छानकर दे।इन्द्रको पिसानेके उसमें बड़ा खर्व होता है। यह घनिर्कोसे दानाप मिलता है। साय उसके सैगिकोंको मी रस पीने के लिए दिया जाता है। वेदमंत्रोका गान अर्थात् सब उत्साहित होकर शत्रुओंका नाश करते है। ५ सुतासः पवित्रवन्तः इन्द्राय क्षरन् (५४७ )- सोमरस निकालते हुए मंत्रोका पाठ भी साथ-साथ सोमरस छाना जानेके बाद इन्द्रको दिया जाता है। चलता है, उसके सम्बन्धमें ये निर्देश है- ६ इन्दुः इन्द्रस निष्कृतं मयासीत्, सख्युः १ तिनः वाचा उदीरते (४७१)- तीन वेदोका पाठ संगिरंन प्रामिनाति (५५७)-सोमरस इन्द्र के पेटमें जाता होता है। है, और वहा अपने मित्रके पेटमें कुछ भी फष्ट नहीं देता। २ पुनानाय प्रगायत (५६८)- सोमरसको छानते सोमरसको पीने से इन्द्रको कोई कष्ट नहीं होता। समप वेद मंत्रोका गान करो। ३ पुनानं तं अभिगायत (५६८)- सोमरस छानते सोमरस मकैले इन्द्रको ही दिया जाता हो ऐसी बात हुए वेद मंत्रोंका गान करो। नहीं, अपितु सभी देवोंको दिया जाता है। देखिए- ऋषीणां सप्तवाणीः अभि अनूपत (५७७ )- ७ देवेभ्यः पीतये पवस्व (४७४)- देदोको पिलाने कृषियोंको सात छन्दोंवालो धाणी-वैर कहो। योग्य सोमरस छान। ५ इन्द्रवाहान् मद्रान् रुपयन (५२३)- इन्द्रकी ८ मदा देवान् गच्छन्तु (५४७)- सोमररा देवोंको दो। कल्याण करनेवाली स्तुतिका गान करो। ९ विश्यान् देवान् मदेन सह परि गच्छति (५५२) ६ विनं धीतिभिः गुम्मन्ते (४८८)- ज्ञानी सोगको -सब देवोंके पास यह सोमरस अपने आनन्द बढानेवाले छानने के समय स्तोत्रोंकी शोभा बढाई जाती है। गुणके साथ जाता है। ७ वर्हणा गिरा (४८५ )- महान् स्तोमेरो गंग बोले इस प्रकार सब देव सोमरस पीते हैं और उसकारण वे जाते है। उत्साह मोर मानन्द युक्त होते है। इस प्रकार वेदपाठ करते हुए सोमरस छाना जाता है। २४ (साम. हिन्दी) -- - (१८२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [पायमान काण्उम् । यज्ञ कर्ताओंका संगठन (४९०)-जिस प्रकार रथकै घोडे छोडे जाते है, उसी प्रकार सोम यज्ञकर्ताओंका संगटन करनेवाला है । इस विषयमें बर्तनमें सोमरस छलनीसे छाने जाते हैं, नीचे छोडे जाते है। मंत्र देखिए- १ त्वेषाः अयासः, गायः न प्रअक्रमुः (४९१)- १ पुरुस्पृहं का विभृत् ( ४८६ )- अनेक जिराको जाती है, उसी प्रकार यज्ञ मण्डपमें जाता है। तेजस्वी प्रयमनशील सोमरस, जिस प्रकार गायें गोष्ठमें प्रशंसा करते हैं, उन यज्ञ कर्ताओंको यह सोम संगठित करता है। यज्ञ फरनेरो महान् संगठन होता है । यस संगतिकरणका जिस प्रकार सूर्यको प्रकाशित किया, उसी प्रकार पानीमें ७ यथा सूर्य अरोचयः, अपः हिन्धानः (१९३)- एक महान् साधन है। जाकर तू भी तेजस्वी हो गया। कुत्तेको दूर करो ८ महान मित्रो न दर्शत, सूर्येण संदिद्युते (४९७) यज्ञमें कुत्तको आने नहीं देना चाहिए। मंत्र भी कहता है- -महान् मित्रके समान दर्शनोप सोमरस पूर्यके समान चमकता है। १ श्वान अप हत ( ५५३)-कुतेको दूर करो। २ सुताय दीर्घजिन्हं भ्यान अपनविटन ( ५४५)- ९ हरि चम्योः, पुरि जनान, विशत् (५१३ )- हरे रंगका सोम वर्तनमें, नगरमें जिस प्रकार मनुष्य जाते सोमाके पास लम्बी जीभवाले कुत्तेको मत जाने दो। है, उसी प्रकार जाता है। इस प्रकार यज्ञ मण्डपमें कुत्तको सोमरसके पारा नही १० मदिरःन जागृविः ( ५१४)- आनन्दित होने के जाने देना चाहिए यह स्पष्ट कहा है। समान तू जागृत है। उपमा ११ अश्वया इव हरिता धारया याति ( ५१६)- घोडीके समान, यह सोम हरे रंगको धारासे बर्तनमें जाता इस पावमान काण्डमें जो उपमायें माई है, और उन उपमामों द्वारा जो शान दिया गया है, यह उनके अोंको है। घोडो जिस प्रकार एक लगामसे चलती है, उसी प्रकार यह सोमरस एक धारासे बर्तनमें पड़ता है। देसकर समझामें आएगा- १२ हयाः पवमानाः, मत्सरा धारया पवित्र असू- १ श्येनः न गिरिष्ठाः अंशुः योनि आ सदत् क्षत (५२२ )- घोडे जैसे धोये जाते हैं, उसी प्रकार गोम- (४७३)- येन पक्षीके समान पर्यंत पर रहनेवाला सोम रस एफ पारासे छानकर शुद्ध किया जाता है। यज्ञशालामें जाकर बैठता है। श्येनके समान सोम भी पर्वत पर रहता है, और वहासे जैसे श्येन पक्षी उड़कर अपने जिस प्रकार यलवान् घोडेको थोते हैं, उसी प्रकार सोमको १३ वाजिनं अश्यं न, त्वा मर्जयन्तः (५२३)- स्थानपर जाता है, उसी प्रकार सोम यज्ञशालामें आता है। छानकर शुद्ध करते है। २ महिपा धनानि इय, सोमासः अप ऊर्मय.प्र नयत (४७८)- भैसे जिस प्रकार वनमें लाकर पानी पीते दो दौडनेवाले घोडेके समान, हरे रंगका सोम वर्तनमें १४ अत्यः वाजी न, हरिद्रोणं ननक्षे (५३८)-पुर है, उसी प्रकार सोमपानीमें मिलाया जाता है, और जिस जाता है। प्रकार से बलवान होते है, उसी प्रकार सोमभी बलवान १५ वाजिाने इव शुभः, सूरे विशा, पशुवर्धनाय होता है। घनन मन्म (५३९)- जिस प्रकार पोडेको वरसि ३ रथी अश्य इव इन्दुः पविष्ट असृजत् ( ४८१) सजाते है, सूर्यमें किरणें चमकती है, जिस प्ररार पशुकि -जिस प्रकार रथ बैठनेवाला घोडेको हांकता है उसी प्रकार संवर्षनके लिए ग्वाला विचारतोल होकर गायोंके गारमें सोम छाना जाता हमा नोचेके बर्तन में जाता है। जाता है, उसी प्रकार सोमरस बर्तन में जाना जाता है, सय ४ पवमानः दिवः चित्रे ज्योतिः, तन्यतुं न, अजी- यह चमरने लगता है। जनत् (४८४) छाना जानेवाला सोम, पतोक चमक्ने १६ मातरः पूर्ये यायुनि जातं वत्सं रिहन्ति न, ले बिजलीके समान, चमरता है। अनुहः इन्द्रस्य काम्यं अभिनयन्ते (५५०)- जित ५ यथा रथ्यः, चम्योः सुतः पवित्रे असहिं प्रकार गाय पहले पहलरे पञ्चेरो घाटतो है, उसी प्रकार पञ्चम अध्याय] सामवेदफा सुयोध मनुवाद (१८३) जाते हैं। द्रोह न करनेवाले जल इनको प्रिप लगनेवाले सोममें मिलाये ५ मदेषु सर्वधा असि ( ४७५/- मानन्द देनेवाले पदायों में तू सयते अधिक आनन्द देनेवाला है। १७ अराधसं मस भृगवान, श्वान अप हत ६ जने ना यशसः कृधि ( ४७१ )- लोगों में हमें (५५३)- जिस प्रकार दान दक्षिणासे रहित यतको भृगुऋषिः परास्यो कर। ने त्याग दिया था मर्यात् दूर कर दिया था, उसी प्रकार यज्ञ ७ विश्वा द्विपः अप जहि ( ४७९)- राव शत्रुओंको भूमिसे कुत्तको दूर करो। हरा। १८ युगतिभिः मर्याइच, इन्दुःसं अति (५५७) ८ स्वर्दशं भानुना द्युमन्तं त्वा हरामहे ( ४८.)- अनेक स्त्रियोंके साथ जैसे एक पुरुष रहता है, उसी प्रकार निरीक्षण करनेवाले और अपने तेमसे प्रकाशित होनेवाले सोमरस जलोंके साथ मिलाता है। तुझे हम बुलाते हैं। १९ अत्यान, पृथा रसः नदीपु रुणुते (५५८)- २ चेतनः प्रियः कवीनां मतिः पविष्ट (४८१)- जसे घुडदौडका घोडा दौडता है, उसी प्रकार सरलतासे ही शान देनेवाला, प्रिय और तानियोंको युद्धि देनेवाला शुद्ध सोमरस नदीके पानी में मिलया जाता है। होता है। २० श्येन न, सोमः धृतवन्तं योनि आ सदत् १० देवः परस्त्र(४८१ )- तू तेजस्वी और शुद्ध हो । (५६२)- श्येनके समान मोमरस जलसे भरे हुए बर्तन में ११ पवमानः वैश्वानरं ज्योति. अनीजनत् (४८४) जाकर मंदता है ! पानी में मिलाया जाता है। शुद्ध होने के बाद सब मनुष्योका हित करनेवाले तेन प्रकट ११ शिशुं न, थिये परिभूपत ( ५६८)- जिस होते है। प्रकार वालकको जेवरसे सजाते है, उसी प्रकार सोमरसको १२ पुरस्पृहं कार विभ्रत् ( ४८६)- बहुतोंसे प्रया- शोमारे लिए गायको दूपमें मिलाते हैं। सित कारीगरको धारण करता है। "कार" कारीगर २२ शिशुंन, हव्येः गूर्तभिः स्वदयन्त (५६१ )- पाजक। जिस प्रकार वालकको नेवरोंसे सजाते है, उसी प्रकार हष्य १३ भगं देवाः उप अयालिपु. ( १८७)- शवका पदार्थो गर्यात धूप आदि पदाति और स्तुतियोंरो स्वादिष्ट मार करनेवाले वोरको देव प्राप्त होते हैं। १४ विचर्षणिः विश्वाः मृघ. अभ्यनमीतू (४८८) २३ भृति न, सोमाय वचः प्रोच्यते ( ५७३ )- विशेष ज्ञानी सब शओंको हराता है। नोकरको जैसे पन देते हैं, उसी प्रकार होसकी स्तुति करते १५ विदा थिय. अभ्यर्पन (४८९)- सय शोभाको है, यहां प्राचीनकालमें भी नौकर वेतन देकर रखे जाते थे, बढाओ। और उन्हें मासिक अथवा दैनिक वेतन पनके स्पर्म दिया १६ मत्सरः मृधः अपमन् (४९२)- सोमका मानन्द जाता पा ऐसा प्रतीत होता है। पात्रको दूर करनेवाला है। १७ अ-देव-युंजन उदस्थ (४९२)- देवको भक्ति न सुमापित करनेवाले मनुष्यको दूर कर। १. वत् उग्रं शर्म, महि श्रवः भूम्या ददे (४६७) १८ ते या मदेपु नयती: नघः अवाहन ( ४९५ )- सौर्यसे मिलनेवाले सुख और महान् पर अपदा अन्न तेरा यह उत्साह मुद्धमें शत्रुके ९९ नगरोंफो तोडता है। भूमिपर हमें मिले। १९ घुझ सनत् रवि अन्धसान: परिभरत् (४९६) २ विश्वा ओजसा दधानः मत्सरः ( ४६९)- सम तेजस्वी और देने योग्य धन अनके साथ हमें दे। सापयंसे मुक्त होकर मानन्द बढानेवाला वह सोम हो । २० ते दक्ष पलं अद्य आवृणीमहे ( ४९८ )- तेरे ३ ते देवावी अघशंसक्षा वरेण्या मद. (४७०)- मल और सामयं मान हम ग्रहण करते है। तेरा मानन्य देयोंके पास पहुंचानेपाला, पापियर्योका नाश २१ ते धलं मयोभुवं वन्हि पान्तं परस्पृई (१९८)- करनेवाला औरधद हैं। तेरे पल सुखदायी, धन देनेवाले, रक्षा करनेवाले और महतो ४ दक्षसाधनः मदः (४७४ - तेरा यह मानन्द बल द्वारा प्रशसित होते हैं। बदानवाला है। २२ सहस्रिणं सुयीय रायि अस्सै थासि धारय करते है। - (१८४) सामवेदका सुयोध अनुवाद [पावमानं काण्डम (५०१ )- हजारों प्रकारसे बल बढानेवाले और उत्तम ४० अस्प सेना हपते (५३४)-इसको सेना मानन्दित पराक्रम करनेवाले धन दे, और इसे अन्न अयवा यश दे। होती है। २३ वृपा धुमान् असि ( ५०४ )-हू बलवान् और ४१ धाम पवसे (५३४)-अपना घर स्वच्छ राखता है। तेजस्वी है। ४२ देवान् अभि अचमि (५३५ )- देयोंको हम २४ वृपतमः धर्माणि दधिपे ( ५०४)- तू अत्यन्त पूजा करते है। बलवान् है और बल बढानेवाले सब गुणधर्मोको धारण ४३ महते हिनोति (५३५ )- महान कार्य के लिए करता है। प्रेरित करता है। २५ वृपा देवयुः ( ५०६)- तू बलवान् और देवोको ४५ आयुधा संशिशानः ( ५३६)-शास्त्रोको तोष्ण प्राप्त करनेवाला है। करता है। २६ अया सुकृत्यया महान् अभ्यवर्धथाः (५०७) ४५ विश्वा बसु हस्तयो आदधानः प्रायासीत् -इस उत्तम शुभ मर्मसेतू महात् होता है। (५३६ )- सब धनोंको अपने दोनोंही हायोंमें रखकर यह २७ मन्दाना वृषायसे । ५०७ )-तू मानन्दित होकर आता है। बनवान होता है। ४६ भराती परि वाघते (५४०)- यह शत्रुओंको २८ विचर्षणिः हितः स चेतति (५०८)- ज्ञानी दूर करता है। हितकारक होकर ज्ञान देते हैं। ४७ शतस्पृहं सहस्रमणसं तुविद्युम्नं विभासह २९ मृधः अराष्णः अपघ्नन् (५०९)- पशुओं पागसातम रयिं नः अभ्यर्प ( ५४१)- फों निसको थोर दान न देनेवालोंको यह मारता है। स्तुति करते हैं, हजारों मनुष्योंका जो पोषण करता है, जो ३० रत्नधा ऋतस्य योनि भासीदसि (५११)- तेजम्यो है, जो विशेष प्रकाशमान है, जो बल पढाता है यह रत्नोंको पारण फरके सत्यके आधारसे यह रहता है। घन हमें दे। ३१ नर्यः ( ५१२)- मानदोफा हित करनेवाला है। ४८ अ-रातय. नाभरयाइपया अशान्तः विचित् ३२ मदिरा न जागृविः (५१४ )-तु मानन्द देनेवाला सन्तु (५५५)- दान न देनेवाले हमारे शा, और जावत रहनेवाला है। करते हुए भी अन्न न मिलने से भुसे हो रहे । ३३ पुरुणि मान्यवचरन्ति, तान परिधीन अतीहि ४५ युवतिभिः मर्य सं अति ( ५५७)- धनक (५१६)- महतसे दुष्ट मुशे कष्ट देते हैं, उन दुष्टोंका तू स्त्रियोंके साथ एक पुरुष आनन्दसे रहता है। ५० अमीवा रक्षसा सह अप भरतु (५३५)- ३४ पिशंगं बटुलं पुरस्पृहं रयि अभ्यर्षसि (५१७) रोगके कोटाणु रामयि साय दूर जाये। -पीले सोनेके रंगवाले बहुतों द्वारा प्रशसनीय बहुत धन तू ५१ दयानिनः मा मासत (५६१)- दो तरहा भाधरण बरयाले (मनो और माधरण और) मानवित ३५ आयवः मृजन्ति (५२०)- मनुष्य शुद्ध होते हैं। न हो। ३६ देवः देयानां जनिमा प्र विवक्ति (५२४) ५२ राजाइयादरम(५६२)-राजाके समान शुन्दर है। देव देवोंके जन्मोका वर्णन करता है। ५३ अ-तत-तन्। तत् आमान अश्नुते (५६६) ३७ रनधाः चाणि दयते (५२८)- रस्नोको -तप न करनेवाला उस सुलो प्राप्त नहीं पर रायता । पारण दानेवाला घनोंको धारण करता ५४ तास इत् तत् समाशते (५६९)- तपो ३८ सहस्रदाः शतदा भूरिदाया बाजीराश्यतमं सपा शाही उरा मानबरो पा सरता है । पहिः अस्यात् ( ५३१)- हजारो, सेतों और बढ़त ५५ घुमन्त स्थदिं शुष्म या मर ( ५६७)- सापन देनेवाला सामग्यवान पोर निस्य आसनपर बंदता है। सेजस्वी शान मदाने वाले पल में है। ३९ सेनानी शुर. रथाना प्रति (५७) ५६ मृति न प्रभर (५६२)-नौपको मि प्रहार सेनारा चालक पुरवीर रपके मादा है। पेतन देते हैं. उस प्रकार हमें मन है। अमकी का नामाकर। देता है।
सामवेदया सुयोध अनुवाद (१८५) पञ्चम अध्याय मुस्त या दे। ५७ धीरवत् यश अभ्यर्प ( ५७६)- पोर पुत्रोंसे (५५८)-सेरा मानद भरयन्त मोठा, मरनेको पद्धति जाननेयाला, और अत्यधिक रोगस्यो है। ५४ झापीणां सप्तयाणी अभि अनूपत् ( ५७७)- ऋषियोरी सात एदोवाली पाणीहो-वेदमत्र मोलो। ६० देवयु घुम्न गृहद् यश अमि दिदीहि (५७९) ५९ मधुमत्तम फतुवित्तम महि प्रक्षत्तमा मदः -देवोंको प्राप्त करनेवाले तेजस्वी और महान् या हमें रे। पवमानकाण्डान्तर्गत ऋपि-देवता-छन्द सूची देवता उवा मरसत्या शायदस्थान पयमान सोमा गायत्री ९।११।१० १६७ " " " " ४६९ ខ១១ " ९६५१० ९।२१।१९ १।३३३ ९चार " . " 8७२ ४७३ " " प्र १९५१ ९।१८।१ " " ४७५ ४७३ " • कृषि (३९) अहमीपुरागिरस मधुमन्दा पंश्वामित्र भगुर्याणिजमग्निनियो वा अहमीपुरागिरस त्रित आप्त्य पायपो मारीच जमदग्निर्भार्गव दाभ्यत आगस्त्य असितापायपो देवलोपा असित काश्यपो देवलो वा (४०) श्यावाश्व वाय त्रित आप्त्य अमहीपुरागिरसः भगारुणिर्ममदग्नि गयो परयो मारीच कदपपो मारीच निधुदि का यप अमहीयुरागिरस मसितः काश्यपो देवलोया मसित काश्यपो देवलो धा (४१) अनहीपुरागिरसः दहमतिरागिरस जमदग्निर्भागव 11 U H " ९॥३२॥ ९३३३१ ९ ।०२८ ९६५३ सा १४ ४७७ B७८ ४७९ ४८० ४८१ दर या " . " " " ४८३ " - ९६४१६ ९।१०४ ९।१४।१ " ४८५ ४८६ " " ९१६१४१५ १०१ ९१६२११९ ४८७ ४८८ ४८९ " " (१८६) सामयदका सुयोघ अनुवाद [पापमानं काण्ड मंगसंख्या ऋग्वेदस्थानं छन्व: देवता पपमानः सोम गायत्री ४९० ४९१ ९।४११ ९।२४ 12 " " " " ४२३ " ९।६११२२ ९१६९ ९।१२।१ ॥ " ४९७ " " ९६६५।१८ १५१०२ ९५८.१ ४९९ ५०० ५०१ " 21 " " " ५०३ ५०४ ५०५ ५०६ ५०७ ९॥२३॥ ९६५।१५ ९९४१ श६४।१३ " " " ऋषिः प्रभूक्सुरागिरसः मेध्यातिथिः काण्दः निभूतिः काश्यपः निवि. कास्यपः अमही पुरागिरसः अमहीगुरागिरसः उचथ्य आगिरस: (४२) मेधातिथिः काण्वः भपूर्वाणिजमदनिर्भार्गपो वा उपथ्य आंगिरसः अवत्सार-काश्यपः निविः काश्यपः असितः काश्यपो देवलो वा भगरिणिर्जमदग्निर्मार्गवो वा कश्यपो मारीचा कश्यपो मारोतः असितः काश्यपो रेवलो वा फयिर्भाग्यः जमदग्निर्भागवः अपास्यापिरसः अमहोपरांगिरः (४३) सप्तपय [ १ भदागो याहस्पत्यः २ कश्यपो मारोतः३ गोतमो राहगणः, ४ अतिभाम ५विश्वामित्रो गापिनः ६ जमदग्निर्भार्गवः ७ वसिष्ठो मंत्रावणिः] सप्तर्षयः सप्तर्षयः सप्तर्षपः सप्त सप्तयः सप्तर्षयः सप्तयः सपाय सरायः सप्त सपंप: " " ९।४७१ ९।६।१० ९४ार ९।६२१५ " " ॥ ९.१०७४ " हती " " " " ॥ " ९.१८७१ १०१००१० ९।१०७ १२ ९९०७१८ ९.१०१९ ९९०७१ १५२०४१४ ११०३१६ ९।१०७७ ९1०७३ ९१०७.१५ It . " " M ५२० ५२१ " " N JP n सामवेदका सुयोध अनुवाद (१८७) पञ्चम अध्याय ] देवता एमः मनसंख्या देवस्थान ऋषिः पवमान. सोमा पहली " ५२३ ५२४ ५१५ " " (४५) उशना काण्वः वृषरणो पासिष्ठिः पराार:वारयः वसिष्ठो मंत्रावागि प्रतवंनो देषोरासि यमिठो मंत्रायगि परामरावत्यः " ९८७ ९१९७७ ९।९०३४ ९९७१ ९९६ार ९२९०१२ ९.९७४४० M " " ५७ ५२८ " त्रिष्टुप " ५३० " કાર ९९६१३ 11 " ५२४ उसनाकाच्या प्रतईनो देवोवासिः (४५) प्रतर्दनो वैवोरासिः पारशास्यः प्रमतिर्वासिष्ठः वसिष्ठो मंत्रावणिः कर्ण दासिष्ठः नौषा गौतम. कम्यो घोर गन्पर्वासिष्ठः " १९६१ ९।९७१३१ ९२२७४ ९१९०१ १९७१२२ ९१९३११ ૨૨? ९९७१० " " ५३७ U ॥ " " " कुरस आगिरसः " ५४० ५१ ५४२ ५४३ १९७४१ ९९१ ९९५३ पराशरःशाकरयः कश्यपोमारीद: , " मनुष्य " " (४६) अधोगः स्यावावि नहुषो मानव ययातिनदिपः " ५४५ ५४६ ५४७ ५४८ ५४९ ९।२०११ ९।१०१८ ९३१०१४ ९।१०।१० " " " 11 मनु सावरण " " भम्बोरीयों वागिरः जिष्वा भारदासश्च " ५५० ९.१००१ रेभानू काश्यपो रेमननू काश्यपी H बहती मनुष्ट्रप " ५५१ ५५९ ५५३ H ९९८७ ९।१०।१३ अम्बरीषो वागिर ऋजिष्वा भारद्वाजश्व प्रजापतिर्वश्वामित्रो वाच्यो वा (१७) कविभार्गव कविर्भागद. जाती " ५५४ ९७५११ ९७९१ " (१८८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [पायमानं काण्डम् देवता मत्रसंख्या पवमान सोस जगती ५५६ ५५७ " " " " " ऋषिः कविर्भार्गव सिकता निवावरी कविर्भार्गव सिकता निवावरी रेणुश्वामित्र वेनोभार्गव यसुर्भारद्वाजः वत्समिलिन्द. " " " ऋग्वेवस्थान ९७७११ ९।८।१६ ९७६ार ९८॥१९ ९।७०११ ९८५ार ९।८।१ ९६१ ९८६३ ९८३१ ५६० " " ५६२ 21 ५६३ ५६४ " गृत्समद. शोमक. " अष्णिक " ५६७ " " " " " 11 " ९१०६२ ९।१०६४ ९।१-४१ ९५१०५१ ९।१०।१ ९।१०६७ ९.१०६।१० ९।२०३३१ ९।१०५३ ९१०५।४ ९.१०६।१३ ५७० ५७१ ५७२ ५७३ ५७४ " " " " पवित्र आगिरसः (४८) अग्निश्चाक्षुषः घामानव पर्वतनारवी काण्वों पर्यतनारदो काण्वों त्रित आप्त्यः मनुरासपा अग्निश्चाक्षुषः दित आप्त्यः पर्वतनारदौ काण्वो पर्वतनारदी काग्दी अग्निश्चाक्षुषः द्वित आप्त्य. (४९) गौरवीतिशावत्यः झर्वसमा मागिरसः ऋजिश्वा भारद्वाजः कृतपशा बागिरस ऋणंचयो राजषिः शक्तिर्वासिष्ठः ऊहरागिरसः ऋजिश्व भारद्वाजः " ॥ " ५७६ ५७७ कप ॥ " ५७८ ५७९ ५८० " " ९।१०८।२ १।१०८ार ९।१०८७ ९.१०८।११ ९।१०।१३ ९1१०८३ ९.१०८५ ९।१०८६ पवमच्या गायत्री " ५८२ " " ५८४ " " पठ मायाय] सामयेदपा सुबोध भावाद (१८९) अध आरण्यकाण्डमा अथ पष्ठोऽध्यायः। १ ३ . 3 १३१ ए र ११३ (२-१) १ युहिग्यत्यः ( भरद्वाज'); २ यसिष्ठो मंत्रावणि.; ३, ६ घामदेवो गौतमः, ४ शुन.शेप माजोगतिः कृत्रिमो देपरातो वावामित्रो या; ५ पुरस आंगिरसः ( गृत्समदः); ७, ८ महीपुरागिरस आत्मा ॥ इन्द्रः, ४ वरुण, ५, ७, ८ पवमान. सोमा ६ विश्वे देवाः; ९ बानम् ॥ यहती; २, ४, ५, ९ मिष्टप: ३,७-८ पामत्री ६ एकपाग्नगतो।। ५८६ इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठ पुपुरि थवः । यधिक्षम वजहस्त रोदसी उमे सुशिम पा ॥१॥ (३.६४६९) ५८७ इन्द्रो राजा जगतवर्षणीनामधिक्षमा विश्वरूपं यदस्य । वो ददाति दाशुषे चमान चौद्राध उपस्तुतं चिदर्याक् ॥२॥ (ऋ.७२७१३) ५८८ यस्येदमा रजोयुजस्तुले जने वनस्वः । इन्द्रस्य रन्त्यं वृहद ॥३॥ (अथर्व. ६।३३।१ ) [१] प्रथमः खण्डः। ६५८६ ] है ( चन-हस्त) हाप पत्र धारण पानेवाले सपा (सु-शित । मुन्दर ठोदीपाले इन्द्र ! (ज्यो, ओजिष्टं ) श्रेष्ठ और बल बहानेवाले (पपुरिश्रयः)च्छा पूर्ण करनेवाले अन्न (नाथाभर) हमें भरपूर है । (यत्) नो मन हम ( दिधृक्षेम ) पास में रसनेको इन्सा करते हैं, और ओ ( उभे रोदसी) धुलोक और पुग्वीलोक दोनोंको हो ( था पमाः) पूर्ण करते हैं, उसे हमे ॥ १॥ १ ज्येष्ठं योजिष्ठं पपुरि श्रयः नः आभर- सबसे उत्तम और सरमर्य बढानेवाले तथा इच्छा पूरी करने. पाले अन हमें भरपूर दे। २ यत् दिधृक्षेम---जिसको हम अपने पास रखनेको इछा करते हैं, उसे हमें दे। १५८७] (इन्द्रः ) इन्द्र (जगतः चर्षणीनां राजा ) चलनेवाले पशुओं और मनुष्योंका पता है, उसी प्रकार (अधिक्षमा ) इस पदोपर (विश्वरूपं यत् ) वनेक रूपोवाले जो कुछ है ( अस्य ) इन सपना वही राना है। (ततः दागुपे वसूनि ददाति ) इसलिए दानशीलको यह पन देता है, उसी प्रकार ( उप-स्तुतं ) पाराणे उत्तम स्तुति करनेवालेको ( राधः) घन ( अर्धा चोदत ) लाकर देता है ॥२॥ १६न्द्र जगतः चर्षणीनां, अधिक्षमा विश्वरूपं यत् अस्य राजा- इन्द्र इस स्थावर जगम, मनुष्य और इस पृथ्वोपर अनेक रोगले जितने पदार्थ है, उन सबका अकेला ही राजा है। २ दामुपे वसूनि ददाति- दानशीलको वह धन देता है। ३ उपस्तुतं अर्वाद राधः चोदत्- उत्तम स्तुति करनेवालेके पास यह पन भेजता है। [५४८ ] ( यस्य रजो यु) जिस अत्यन्त तेनस्वी इन्द्रका (इदं ) यह वान (स्वः तुजे जने वन ) स्वर्गमें भौर वान देनेवाले नोंमें प्रशंसनीय है, इसलिए (इन्द्रस्य वृहत् रन्त्य ) इन्द्र दान महान् और रमणीय है ॥ ३ ॥ २५ ( साम.हिन्दी)
(१९०)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
यारण्य काण्डम्
२
३२"
११
३३3३३
५८९ उदुत्तमं वरुण पाशमसदवाघमं वि मध्यम ग्रंथाय ।
अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम
॥४॥ (ऋ. १२।१५)
५९० त्वया वयं पर्वमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुपाम शश्वत् ।
तो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उन घौः ॥५॥
५९१ इम वृपणं कृणुतेकामिन्माम्
५९२ स न इन्द्राय यज्यचे वरुणाय मरुद्भया वरिवोविपरित्रव
॥७॥
(ऋ. १।६।१२ वा. य. २६१२५)
५९३ एना विश्वान्पर्य आ घुम्नानि मानुपाणाम् । सिपासन्हो पनामहे ॥ ८ ॥
(ऋ.७९।६।११ वा. य.२६।१५)
[ ५८९] हे ( यरुण ) उत्तम देव! ( उत्तम पाशं 'असत् उत् श्रथाय ) गाम बन्धनोंको हमरो दूर
कर, ( अधर्म पाशं अवनथाय ) अधम पा शिथिल कर और (मध्यमं पार्श विश्नथाय ) मध्यम पाशको ढीला कर,
(अथ) इसके बाद है ( आदित्य ) अवितिके पुत्र वरुण! ( तव व्रते ) तेरे कार्यम (घयं ) हम (अ-दितये) हमारा
नाश न हो इसलिए ( अनागसः स्याम ) पापरहित होकर रहें ॥४॥
१ वरुणः- उत्तम देव, श्रेष्ठ ईश्वर।
२ उत्तम, मध्यम और अधम पाश -ति, मन और इन्द्रियों के बंधन, इनके कारण होनेवाले विघ्न दूर कर
( अय-श्रथाय, उच्छथाय, विश्रथाय ) होले कर ।
३ अदितिः- अपराधीनता, स्वतता, अविनाश ।
४ अदितये अनागम: स्याम- मुक्त होने के लिए निष्पाप होऊ ।
५ तब प्रते-तेरे नियम के अनुसार में रहँ, तेरे नियमोंका पालन कर।
[५९० है ( सोम ) सोम! ( पवमानेन त्वया ) शुग होनेवाले तेरी सहायता (भरे) समागमें
(शश्वत् कृतं ) हमेशा किए जानेवाले कर्तव्य ( घयं वि चिनुयाम ) हम विशेष सावधानीसे करें, ( तत् ) इसलिए
वरुण, अदिति, सिन्प, पृथियो ( उत धौ ) और घुलोक ये ( मा महन्तां ) मुझे यश प्रदान करें ॥ ५ ॥
१ भरे शश्वत् एतं वयं चिनुयाम- युद्धमें किए जानेवाले कोको हम सावधानी से करें।
३ तत् मा महन्तां-उसकी सहायतासे मुझे यश प्राप्त हो ।
[५९१] हे देयो ! ( पर्फ इम) इस एकको ( यूपर्ण कृणुत ) तुम बलवान् करो, उसी प्रकार (मां) मारे
भी अपने कार्यमें सफल करो॥६॥
(५९२] हे सोम! (सः परिषो वित् ) धनको अपने पास रखनेशला यह तू (नः यज्यवे इन्द्राय)
हमारे द्वारा जिसके लिए यश किया जाता है, उस पृश्य इसके लिए (वरुणाय मरुद्रयः) वरुण और महतों के लिए
(परित्रव) उत्तम प्रकारसे छनता जा ॥ ७॥
[ ५९३ (पना) इस सोमकी सहायतासे ( मानणणां ) मनुष्योंके ( विश्वानि द्युम्नानि) सब पत्रों के
(अयः) पारा जाकर (सिपासन्ता) उसके उपभोगको इच्छा करनेवाले हम (मनामहे) उस अन्तको प्राप्त
करते है॥८॥
पष्ट अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद -- . 9 . ५९४ अहमसि प्रथमजा तस्य पूर्व देवेभ्यो अमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इदेवमावदहमनमनमदन्तममि ॥ ९॥ इति प्रथमा दशति ॥१॥ प्रथम खण्डः॥१॥ [२] (१-५) मृतका मागिरस ; २ पवित्र आगिरस ; ३, ४ मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, ५ प्रयो वासिष्ठ, ६ गृत्समद शौनक', ७ नुमेषपुरमेपावापिरो । इन्द्रः, २ पवमान सोम , ५ विश्वे देवाः, ६ थायु ॥ गायत्री, जगती, ५ विप्यु, ५ जनाए । ५९५ स्वमेतदवारया कृष्णासु रोहिणीषु च । परुष्णीषु रुपया (ऋ.८।१३।१३) ५९६ अरूरुचदुपसः पृश्निरनिय उक्षा मिति भुवनेषु वाजयुः । मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः ।। २ ।। (१ ९८२३३) ५२४] (देवेभ्यः पूर्व ) देवोंसे पहले (मई) में मनरुपी देवता ( अमृतस्य मतस्य प्रथमजा अस्मि नाम) विनाशरहित यज्ञमें प्रयम उत्पन हुआ हूँ। (य. मां ददाति ) जो मुझे दान में देता है ( साइत् पवं आवत्) यह निश्चयपूर्वक इस पानसे समीषा रक्षण करता है । ( अन्नं अदन्तं ) अन्नको स्वय पानेवाले लोभी मनुष्यको ( अह अन्नं अनि ) में मार देवता हो सा जाता हूँ॥९॥ १देवेभ्यः पूर्व अहं मन्न- सब देवोंसे पहले उनपे लिए आवश्यक यह आम उत्पन्न हुआ। प्राणियोके उत्पन्न होने के पहले ही उनका पोषण करनेवाला म उत्पन्न हुमा । २ अमृतस्य ऋतस्य प्रथमजा अस्मि. - अमर यज्ञके पहले ही यह अन्न उत्पन्न हुआ। उस अर उत्पस होनेके बाब पर किया गया। ३ यः मां ददाति स आवल-~जो अन्नका दान करता है, यह इस दानसे सयका संरक्षण करता है। ४ अनं मदत मह बन्न पनि- अन्नका धान न करते हुए जो स्वय हो भन्नको लाता है, उस स्थायी मनुष्यको वह अन्न देवता ही सो जाता है, नष्ट कर देता है। । यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ। [२] द्वितीयः खण्डः । (५९५ 1 है ! ( कृष्णासु) काली (रोहिणोपु ) लाल ( पराष्णीषु ) और अनेक रगोवाली गार्यों ( मात् पतत् पयः ) तेजस्वी सफेद रगहा दूध (त्व अधारया) तुने रखा है, यह तेरा भभुत सामर्थ्य है ॥ १ ॥ [५९६ ) ( उपसः पृश्निः ) पासे सम्बन्ध रखनेषाला सूर्य ( अग्रियः ) यहा मुख्य है । वही ( अरुश्चत् ) धमकता है। ( उक्षा) परसात गिरानेवाला मेय अरका में (मिमोत) गगडाहटका शव परता है। (भुवनेषु घाजयु) प्राणियों में मनको इच्छा उत्पन्न करके (मायापिन') कौमें कुशलता दिखानेवाले देयोंने (भस्य मायया ममिरे) इस अपनी कुशलतासे जगतका निर्माण किया । (नृचक्षल. पितरः) मतृप्योका निरीक्षण करनेवाले पितरोने मालाके पेट में (गर्भ भादधुः) गर्भ स्थापित किया । इस प्रकार सष्टि उत्पन्न हुई ॥ २॥ १ उपस पृश्नि. अग्रियः अम्गचत्- उप कालो बाद उदय होनेवाला सूर्य इस स्थानपर मुख्य है और वह उदय होने के बाद प्रकाशित होने लगता है। २ उक्षा मिमेति- जोंसे भूमिको सींचनशाला मेघ आकाशमैं गर्जना करता है। ३ भुवनेषु वाजयुत -प्राणियों में अम पाको इच्छा उत्पन्न होती है। ४ मायाविन अस्य मायया ममिरे- लो कुशल है वे अपनी कुशलतासे सृष्टिका निर्माण करते है। ५ मृचक्षसः पित्तरः गर्भ आदा-मानयोंफ कोका निरीक्षण करनेवाले पितर माताले पेट में गर्भ स्थापित करते है, जिससे सृष्टि होती है।
सामवेधा सुरोध भनुवाद
[आरण्य काण्डम्
१
१३१३
,
स
१३
31
२६
३
१ १३३
.
3३३२
13..
.
५९७ इन्द्र इद्वयोः सचा सम्मिश्ल था बचोयुजा । इन्द्रो वजी हिरण्ययः ॥ ३॥(ऋ. १।७२ )
५९८ इन्द्र वाजेपु नोऽच सहस्रपधनेषु च । उग्र उग्रामिसतिभिः ॥४॥ (ऋण)
५९९ प्रथश्च यस्य सप्रथच नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्पद ।
धातु(तानात्सवितुश्च विष्णो स्थन्तरमा जमारा वसिष्ठः ॥५॥ (ऋ १०११८११)
६०० नियुत्वान्यायवा गायर शुक्रो अयामि ते । गन्तासि सुन्वतो गृहम् ॥ ६॥(ऋ २०४१।२)
६०१ यायथा अपूज्य
मघवन्यत्रहत्याय । तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तन्ना उतो दिवम् ।। ७ ।।
(ऋ. ८८९५
इति द्वितीया यशति ॥२॥ द्वितीय खण्ड ॥२॥
[३]
( १-१३) १, ५, ७, १० यामवेयो गौतम , २, ३, गौतमो राहगण , ४ मधुच्छ दा वैश्वामित्र , ६ गृत्समव बौनक
८ भरद्वाजो वाहस्पत्य , ९ ऋजिश्वा भारद्वाज , ११ हिरण्यस्तूप आगिरस , १२, १३ विश्वामियो गायिन (१२ ब्रह्म)।
१ प्रजापति , २, ३ सोम , ४, ५ ८, १३ अग्नि , ६ अगनपात, ७ रात्रि , ९ विश्वेदेवा, १० लिगोक्ता
११६, १२ आत्मा अग्निर्वा । विष्टुप, १,७ अनुष्टुप, ४ गायत्री, ८, ९ जगती, १० महापक्ति ॥
६०२ मयि वौँ अथो यशोऽयो यज्ञस्य यस्या । परमेष्ठी प्रजापतिदिवि यामिव दृहतु ॥१॥
६५९७ ] ( इन्द्र इत्) हो (हयो ) दो घोडोंको अपन रथों (सचा समिरल ) एक साथ जोनवाला
है। ये घोडे ( वचो-युजा) सतरे हो रपमें जुड़ जानेवाले ह इस प्रकार मह (इन्द्रवजी हिरण्यय ) इन्द्र वन
धारण करनेवाला और सोनेके भाभूषण धारण करनेवाला है ॥ ३ ॥
(५९८]तू ( उग्र ) योर है, इसलिए (उप्राभि अतिमि )योरता मुक्त सरक्षणोंसे ( वाजेषु) छोटे पुखोंमें
( सहस्र-मधनेषु च ) हगारों प्रकारके धन प्राप्त होनेवाले बड़ बडे सग्रामोमें (न अव) हमारा सरक्षण कर ॥४॥
१ सहस्र प्र-धन- शत्रुको हरानके बाद उसे लूटकर अनको तरहके धन जिसमें मिलते है एसे बड़े सप्राम।
२ उग्रा ऊति
वोरतास रिए गए सरक्षण।
[५१९ ] (यस्य प्रथ च स-प्रथ च नाम) जिसके प्रप और सप्रय नाम ह जिनके लिए ( अनुष्टुभस्य
हविष हाच यत् ) अनुष्टुभ छदमें मत्रका पाठकर हविका अपण किया जाता है 1 उत ( धुतानात् धातु ) तजस्वी
धाता, सविता, विष्णु के पाससे वसिष्ठने ( रथन्तर आजमार) रथ तर साम प्राप्त किया ॥ ५॥
[ ६०० } हे (पायो ) वायुदेव तू ( नियुत्यान् ) नियुत नामक रपसे ( आ गाहे ) । ( अय शुरु ) यह
चमकनवाला सोमरस ( ते अयामि ) तर लिए तम्यार किया गया ह ( सुचत गृह ) तू सोम पन करनेवालेके घरको
(गन्ता असि) जाता है ॥६॥
[१] अ-पूर्य मघवन् ) अद्भुत धनवाले (वृत्रहत्याय) वृत्रके वषारतके लिए ( यत् जायचा)
जब तू तय्यार हमा (तत् पृथियों अप्रथय ) तर तूने पृथ्वीको विस्तृत किया (उत उ दिव अस्तम्ना ) और
घुलोक्को ऊपर स्थिर किया ॥ ७॥
॥ यहा दुसरा खण्द्ध समाप्त हुया ॥
[३] तृतीय खण्ड ।
८६०२](परमेष्ठी प्रजापति ) श्रेष्ठ स्थानपर रहनेवाला प्रजाओंका पालक परमेश्वर ( मपि) मुसमें (वर्च
सम ( अथो यश ) और 1 (अथो यज्ञस्य यत्पय ) और यहमें प्रयुक्त होनवाला भी दूप ह, उहें (दिविधा
इप) चुलोकरें जिस प्रकार तेज होता है उसी प्रकार (बहतु ) बढा ॥१॥
पा अध्याय सामवेदया सुयोध अनुवाद स ३ ११ 312 ११ " १३२३६ 3 ६०३ स ते पयासि सम्मु यन्तु पाजा। सं वृष्ण्पान्यमिमातिपाहा । आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवारस्युत्तमानि धिष्य ॥२॥ (9, ११९१८) ६०४ त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गा। त्वमातनोतिरिक्ष व ज्योतिषावि तमा बनर्थ ॥३॥(ऋ. ११९१२२) ६०५ अप्रिमोडे पुरोहित यज्ञस्य देवमृस्विजम् । होवार रनधातमम् ॥४॥ (ऋ. १११।१ ) ६.६ ते मन्वन प्रथम नाम गोना त्रिः सप्त परमं नाम जानन् । वा जानतीरभ्यनुपत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्षशसा गावः ॥५॥ (ऋ. १९१६) परमेश्वर मुझे तेज, यश और दूप आदि अपने पदार्थ भरपूर देवे, आकास जिस प्रकार तेजस्वी है, उसी प्रकार में भी तेजस्वी होऊ। .६०३] हे ( सोम ) सोम ! ( अभिमाति-पाहः ] शत्रुका पराभव करनेवाले (ते ) तेरे पास (पयांति से यन्तु ) दूप हो, ( चाजाः सं यातु ) अप्न तेरे पास हो और ( वृष्णाणि सं ) यलता प्राप्त होयें। ( अमृताय आप्यायमान: ) अमरत्व प्राप्त करने के लिए बढते हुए (दिवि उत्तमानि श्रवांसि धिप्प) लोकमे उत्तम मनोको प्राप्त कर॥२॥ १ ते पयांसि सं यन्तु- तेरे पास दूप हो, तेरे अन्दर दूध मिलाया जाए। सोमरसमें दूध मिलाते हैं। [६०४० है (सोम) सोम! ( त्वं ) तूने (इमा विश्वाः ओषधीः अजनयः ) इन सभी औषधियोंको उत्पन्न किया, (अपः ) तूने जल उत्पन्न किया, (वं गाः) ने गायोंको उत्पन्न किया, (त्वं उरुः अन्तरिक्षं तनोः) तूने ही विस्तृत अन्तरिक्षको फैलाया (त्वं तमः ज्योतिरा वि यवर्थ) तूने मन्धकारका तेजसे नाश किया ॥३॥ [६०१ ] (पुर:-हित ) आगे रहनेवाले ( यज्ञस्य देवं ) यज्ञके प्रकाशक ( अधि) ऋतुओंके अनुसार हवन करनेवाले (होतारं ) देषोंको बुलाकर लानेवाले (रत्न-धातम) रनोंको धारण करनेवाले ( अगिरंडे ) अग्निको मै स्तुति करता हूँ ॥४॥ यज्ञमें अग्निका सामने स्थापन किया जाता है, उसमें हवन किया जाता है । ऋतुओंके अनुसार यज्ञ होता यह सब देवोको खुलकर लाता है, मानकों के शरीरपर धारण करने के लिए यह रनोंको देता है, ऐसे अग्नि देयको हम स्तुति करते हैं। [६] (ते) उन ऋषियोंने ( गोलां नाम ) वाणोके शान्द (प्रथम अमन्यत) स्तुति करनेके योग्य है, पह प्रथम समता, फिर (निसत परमं नाम जानन् ) तीन गुना सात अर्थात् २१ छन्दोम स्तोत्र होते हैं, यह जाना इसके पाद उन्होंने सावधानीसे ( ता जानतीक्षा अग्यनूपत ) उस वाणीसे उपाको स्तुति की, उस (यशसा) जसे (अरुणी गापः माषिभुवन् ) अरुण रंगको गायें-किरण प्रकट हुई ॥५॥ १ऋषिोंने भापाके शव स्तुतिके योग्य है, यह प्रयम समना। २ उसके भाव २१ छंदोंमें स्तोत्र हो सकते है, यह जाना। ३ उससे उपा देवताके रतीर बनाये और उनका गान दिया। ४ तब सूर्यको किरणे बाहर निकली, सूर्यका उदय हुआ। " सामषेदका सुवोध अनुवाद [आरण्यं काण्डम् 181383 ३. २१३१२ 3 १२ 3. ४. २ १२३१३ पवते ६०७ समन्या यन्त्युपयन्स्यन्याः समानमूर्य नद्यस्पृणन्ति । तमू शुचिर शुचयो दीदिवारसमपानपातमुप यन्त्याप? ॥६॥ (ऋ. २।३५३) ६०८ आ प्रागाद्भद्रा युवतिरक्षा कैप्समार्सति । अभूखद्रा निर्वशनी विश्वस्य जगतो रात्री ॥७॥ ६०९ प्रक्षस्य वृष्णो अगस्य न महः प्र नौ वचो विदया जातवेदसे । वैश्वानराय मतिनव्यसै शुचिः सोम चारुरग्नये ॥८॥. (ऋ.६८) ६१० विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञम रोदसी अपां नपाच मन्म । मा दो बचा:सि परिचयाणि बोचर सुग्नेबिटो अन्तमा मदेम ॥ ९ ॥(ऋ ६५२।१४ ) ६११ यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती । यशो भगस्य विदन्तु यशो मा प्रतिमुच्यताम् । यशसा३स्याः ससदोऽहं प्रवदिता स्याम् । ॥१०॥ [६०७] (अन्याः संयन्ति) दूसरे वर्षाके जल मिल जाते है, (अन्याः उपयन्ति ) दूसरे पानी भी इसमें मिलाये जाते हैं, ये राब पानी ( समान नद्यः) एक साथ मिलकर नदीके रूपसे (ऊर्व पृणन्ति ) बाडवानल सागरफी अग्नि- की आनन्दित करते है, (तं उ शुचिं दीवियांसं अपानपातं) उस शुस तेजस्यो जलके पौत्ररूपी भग्निके पास ( आपः उपयन्ति ) सब जलप्रवाह पहुंचते है ॥ ६ ॥ १ अपां न-पावः- जलोंको नीचे न गिरने देनेवाला मेध, (अपां नपातः) जलोंका पौत्र- अग्नि । २ सब पानी मिलकर नवौके रूपमें सागरमें मिल जाते हैं, उसी प्रकार सोमरसमें पानी मिलाया जाता है, पोनों ही तरहके पानी सोमरसमें मिलाये जाते है। ८६०८/भद्रा युवति.) कल्याण करनेवाली स्त्री (प्रगात् ) रात्री आगई है, (अक्षः केतून) दिवसकी हिरोका (सं ईसति ) यह प्रतिबन्ध करनेको इच्छा करती है. (विश्वस्य जगतः निवेशनी) सब जगत्को विमा वेनेवाली यह ( रात्री भद्रा अभूत् ) रात्री कल्याण करनेवाली है ॥ ७ ॥ ८६०९ (प्रक्षस्य वृष्णः) व्यापक, बलवान् ( अरुपस्य ) और तेजस्यो अग्निके ( महः ) तेजको मै (नू) स्तुति करता है, ये (नः वचः ) हमारे स्तोत्र (विदथा ) यज्ञमें (जातवेदसे ) अग्निके लिए (प्र) पोले जाते है। (नन्यसे वैश्वानराय अग्नये ) नवीन, सब मनुप्योका हितकरनेवाले अग्निके पास वे (शुचिः चार मतिः) भूब सुन्दर स्तोत्र ( सोमःच पयते ) सोमके समान जाते है ॥ ८॥ [६१०] (विश्वे देवाः ) सब देव (मम यश मन्म ) मेरे पूज्य स्तोत्र (शृण्वन्तु ) मुने, ( उभे रोदसी) सोनों पुलोक और पृथ्वोलोक (अपां नपा ) और अग्नि मेरे स्तोत्र सुनें, है (देवाः) देवो! ( परिचयाणि) मुम्हारे द्वारा न सुनने योग्य ( वासि मा कोचं ) स्तोत्रोंको में न बोलू । इसीलिए {धा अन्तमाः सुम्नेषु इस् मदेम) हुम्हारे पास जाकर तुम्हारे द्वारा दिए गए मुखोंमें आनन्दित होई ॥१॥ [६१(धावा-पृथिवी) लोक भोर पृष्योलगेरे ( यशामा) पश मुझे प्राप्त हो, (इन्द्रावस्पती मा शः) मोर पहरपतिसे भी मुन्ने यश मिले (भगस्य यशः मा विन्दतु ) भाग देवता या मुझे प्राप्त हो, मगे यशा ) या ( मा पति मुच्यताम् ) छोडकर दूर न जाए, (मस्या. संसद यशसा इम ससको पासे में पूरी । होऊ ( भाई प्रयविता स्पां) मै सभा, भाषण करनेवाला बनू ॥१०॥ .
पष्ठ अध्याय] सामवेदशा सुरोध अनुवाद . 3_129 11 ३३.३१ ६१४ पात्यमिवियो ६१२ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रबोचं यानि चकार प्रथमानि बनी। अहन्नहिमन्वपस्तवदर वक्षणा अभिनत्पर्वतानास् ॥११॥ ( ११३२।१) ६१३ अमिरसि जन्मना जातवेदा घृत में चक्षुरमत म आसन् । विधातुरो रजसो विमानोजसं ज्योतिईविरसि सर्वम् ।। १२ ।। (ऋ २२६७) अग्नं पदं वे पाति यहथरण सूर्यस । पाति नाभा सप्तशोणिमनि पाति देवानामुपमादमृधः ऋ.३।५।२) इति तृतीया दशति ॥ ३॥ तृतीय सण्ड ॥ ३॥ [१] (१-१२ ) मामदेवो गौतम ३-७ नारायणः ॥ १-२ मग्नि , ३-७ पुरुष, धादापियो, ९-११, १२ गाव ॥ अनुष्टप, १-२ पक्ति ८, ११, १२ प्रिष्टुप् ॥ ६१५ प्राजन्त्यमे समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि । स त्वं नो अमै पयसा वसुविद्राय व! शेऽदाः ६.६१२] ( वज़ी) वन पारण परलेपाले इन्द्रने (यानि प्रथमानि) जिन मुल्य ( वीर्याणि चकार ) पराक्रम कार्य किए, उस (इन्द्रस्य) इन्द्र के उन पराक्रमझे कार्योका (नु प्रयोच ) में वर्णन करता हू. ( महिं अहन ) अहि मंपोंको उसने मारा, ( अनु अपः ततर्द ) उसके बाद उनसे पानी बहापा, और ( पर्वतानां वक्षणा' प्र अभिनत् । पर्वतपरकी नदियोंको बहने योग्य बनाया ॥ ११ ॥ [६१३] (जन्मना याग्नि' अस्मि ) में जन्मसे ही अग्नि हूँ, मैं (जात-वेदाः ) रावको जाननेवाला हूँ ( मे चक्षुः घृतं ) मेरो माले प्रकाश सायन घो है, ( अमृत में मासन ) अमरत्व मेरे मुसमें है, (निधातु अर्गः ) प्राण, अपान और ध्यान इन तीनोंमें रहनेवाला प्राण में हूँ ( रजस विमान. ) अन्तरिताको मापनेवाला पाय में हूँ, (म-जस्त्रं ज्योतिः ) हमेशा तेजसे युक्त रहनेवाला सूर्य में हूँ (सर्व हविः अस्मि) सभी प्रकारका हवि में ह ॥ १२ ॥ में जन्मसे ही अग्नि-तेजरप हूं, में सर्वत हूँ, पतके हवनसे जो प्रकाश होता है, उसको देखनेपाला में हैं। अमरत्व देनेवाली वाणी मेरे मखमें है, में प्राण हूँ। वायु में हूं, सूर्य में हूँ, हवि भी मेरा ही रूप है। अग्निका अर्थ है अप्रणी, शरीरमें अगणी लात्मा है, और यही शान स्वरूप है, सभी यही है। [६१५३ (अभिः) यह अग्नि ( घेः विप.) गति करनेवालो भूमिके (अपं पदं पाति) मुख्य स्थानका रक्षण है।( पक्ष सूर्यस्य चरम पाति) महार अपिट सपरे जाने मागेका रमण करती है। मामा) अनिमें (सत शीण ) सात गों में रहनेवाले महलोंका (पाति) रमत करती है, (कप्पः अग्निः ) दर्शनीय पह अग्नि (देवानां उपमादं पाति ) देवोंको मानन्द देनेवाले यतका रक्षण करती है ॥ १३ ॥ अग्नि, भूमि, अन्तरिक्ष और घुलोकका सरक्षण करतो है । भूमि पर मग्नि रूपसे, अन्तरिक्षम विद्युत् परो मौर चुलोपमें सूर्यरूपसे यह भग्नि रहती है । मरन् पाप है, वहा विद्यन् अग्नि है, यौर यज्ञमें मग्नि नो होती है वह हवनके द्वारा सब देवोश सरक्षण करती है। ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ । [४] चतुर्थः सण्ड। ॥ ६१५१ ( समिधान अने) हे प्राप्त हुए अग्नि देव 1 तेरे ( भ्रामाती आसान ) जम्दी मुरमें तेरी (जिवा ) जीन वाला (चरति ) हरिका भक्षण करतो है, है ( अग्ने बसुचित् ) धनयुक्त पाने ! (सः स्व) दह न (नः) हमें (पयसा ) महपी अभसे युक्त (राय) धन और ( रशे वर्थ.) दर्शनीय तेज (बदाः) दे ॥ १
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[आरपयं काण्डम्
२२१
N
१२
३२
२
3
३ १ २
१३९३.३५
३१
3.
६१६ वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः ।
३
वोण्यनु
शरदो हेमन्त शिशिर इन्नु रन्त्यः
॥२॥
६१७ सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
से भूमि सीतो वृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम्
॥३॥ १०९०१)
६१८ त्रिपाद्र्ध उदैत्पुरुषः पादोऽस्यैहामवत्पुनः ।
तथा विपद् व्यकामदशनानशने अमि
॥४॥ (१०१९०४)
६१९ पुरुष एवंदर सर्व यद्भूत यच्च माव्यम् ।
पादोऽस्य सर्व भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि
॥५॥ (१९०१)
६२० तावानस्य महिमा ततो ज्यायोरथ पूरुषः ।
उतामृतत्त्वस्येशानी यदनातिरोहति
॥६॥(*. १०१९०३)
६२१ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुपा ।
से जातो अत्यरिच्यत पश्चामिमथों पुरः
॥७॥( १०१९०७)
[६१६० (घसन्तः इत् नु स्यः) वसन्तपातु निश्चपसे रमणीय है, (ग्रीष्मः इत् नु न्यः) ग्रीमातु
भी रमणीय है, ( वर्षाणि शरदः हेमन्त शिशिरः ) वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ये ऋतुपें भी (इत्
रन्त्य ) रमणीप है ॥२॥
[६१७] (सहनशीपः ) हजारों सिरवाला, (सहस्र-अक्ष. ) हमारी माखोवाला और ( सहस्रपात् )
हजारों परवाला एक पुरुष है, ( सा भूमि सर्वतो वृत्या ) यह भूमिको सब ओररो घेर कर (दशांगुलं मत्यतिछत्)
इस इन्द्रियोस भोगने योग्य इस जगत्को घेरकर भी शेष बचा हुआ है ॥३॥
८६१८ (त्रिपाद् पुरषा ) तीन भागोंपाला यह पुरुष (ऊर्व उदैत् ) अचे स्थानपर रहता है, (भस्य
पादः पुन इह अमवत् ) इसका चौया भाग इस ससार, फिर किरप्रकट होता है, (साशन-अनशने अमि )
अन्न खानेवाले और अपन खानदालेके चारों और (तथा विपद् व्यकामत् ) विविध रूपोवाला वह व्याप्त है ।। ४ ।।
2. ६१९] (यत् भूत )जो उत्पन्न मा यत् च भन्यं) और जो उत्पन्न होने वाला है, (इदं सर्य पुरुषा
एच) यह सब पुरुष ही है, ( अस्य पादः सर्या भूतानि) इसका चौमा भाग में सम प्राणी है, और ( अस्य त्रिपाट
दियि समृसं) इसके तीन भाग लोकम समर है ॥ ५॥
[२०] (अस्य तावान महिमा) इस पुरुषको ऐमी महिमा है, गस्तयमें वह (पुरुषा) पुरुष(ततः ज्यायान
५) उसको अपेक्षा भी पता है, ( उत अमृतस्वस्य ईशानः) और यह अमरत्वका स्वामी है, ( यत् अनेन भाति
रोहति) को अनसे बढते है, उनका भी वह स्वामी है ॥ ६ ॥
[६२९] (ततः विराट् अगायत) जरा पुरुषले विराट् पुरुष हमा, { मिराजः अधि पूरुषः ) उस विराट
पुरपका निरीक्षण करनेवाला एक पुरुष है, ( स जातः यह उत्पन्न होते ही ( अति भरिच्यतः ) सबसे श्रेष्ठ हमा
उसने सबसे पहले ( भूमि ) यो उत्पन्न की और ( भयो पश्चात् पुर) गाव मारोर उत्पन्न पिए ॥ ७॥
पष्ट अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद (१७) ६२२ मन्ये वा द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथयाममितमभि योजनम् । द्यावापृथिवी भवन स्याने ते नी मुखतम हसा ॥ ८ ॥ (अथर्व. ४।२६) ६२३ हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरिवो हरी । तं त्या स्तुपन्ति कायः पुरुषासो बनर्गः ॥९॥ ६२४ यवचौ हिरण्यस्य यद्वा वची गामुत । सत्यय ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा सरसृजामसि ॥१०॥ ६२५ सहस्तन्न इन्द्र दंयोज ईश यस महतो विरप्शिन् । मातुं न नृम्गस्थविरं च वाज वृत्रेषु शत्रून्त्सहना कधी ना ६२६ सहर्षमाः सहवत्सा उदेत विद्या रूपाणि विनंतीद्व'नीः । उरुः पृथुरय अस्तु इमा आप: सुप्रपाणा इह स्त ॥ १२॥ इति चतुर्यो दशति ॥४॥ चतुएं म ॥४॥ २ म 3 ३१२ २३ २२ २३" २३. ११ चो [६२२] हे (घावा-पृथिवी ) धूलोक और पुग्यो कोको ! (या सु-भोजसी) तुम उत्तम भोजन देनेवाले हो, इस प्रकार ( मन्ये ) मैं मानता हूँ (ये ) नो पे रोनों लोक है, वे ( अमितं योजनं ) मपरिमित धन मारि (अभि अ. प्रथेचा ) हमें देवे, हे (धावा-पृथियी ) हे घुलोक और पृथ्वी लोको ! तुम ( स्योने भवत ) हमारे लिए सुखदायो होवो, ( ते नः अंहसः मुंचतं ) वे हमें पापसे छुड़ावें ॥८॥ [६.३ हे ( इन्द्र)! (ते मणि हरी) तेरो भूः हरे रगणो हो गई है. (उत ते हरिती इरी) और तेरे दोनों घोरे पीले रंग के है, ( बनर्गवः) उत्तम गायोंको पालनेवाले (कवय पुरुषास. ) मानो पुगप (तं त्या स्तुवन्ति ) उस तेरी स्तुति करते है ॥९॥ १ ते ३मधूणि हरी- सोमरस हरे का होता है, उसे पीने के कारण तेरो मूछे हरे रंगको हो गई है। [१२४ 1 (हिरण्यस्य यत् घर्च.) सोनका जो हेज है, ( यन् वा गया यत् यः)ो गार्योवा सेन है (उत) मौर (सत्यस्य ब्रह्मणः यचं. ) सायज्ञानका नो र है, (तेन मा संएजामसि ) उस तेजसे में युक्त होता हूँ॥१०॥ ६६२५३ हे (विरप्शिन इन्द्र ) बहुतमा धन अपने परम रखनेवाले इन्न । (तत् सह. ओजः न ददि वह मल और सामयं हमें थे, (दि अस्य महताशे ) क्योंकि तू इस महान बलका स्वामी है, हे इन्द्र ! (नः) हमारे (प्रतुं न ) पजके समान (नृम्णं स्थविर याज ) पन और महान् सामभ्यं (नः धि ) हमें ३, और (पुत्रेषु शन सहना अधि) पु शत्रुनोंको हरानका मल हमें रे ॥११॥ [ ६२६] हे (सह-ऋपमा) बलों साए हनवाली, ( सह-यत्साः) बहके साथ रहनेवाली, (नीः) इगर्ने पक्षे दुपाशमवाली (विश्या रूपाणि रिभ्रती. ) मनेक रूपोको पारण रिलेषालो गापो ! तुप(उदेत) हमारे पास मामओ, ( उस पृयुः भय लोष. या सस्तु )महान् मोर पिशाल पह लोक तुम्हारे लिए हो, ( इमा: आप ) ये पल प्रवाह (सु-प्रपाणावह स्त) सबसे पौने योग्य होकर तम्हें यहाँ मिनें ॥ १२ ॥ । यहां चौधा एण्ड समाप्त हुआ। २६ ( साम हिन्दी) (१९८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [भारण्य काण्डम् ३ 13 १३२ - . [५] (१-१४ ) १शत यसानसा , २ विभ्राट् सौर्य , ३ कुत्स आगिरस , ४-६ सार्पराजौ, ७-१४ प्रस्थय काय ॥ सर्प, १ अग्नि पयमान , ४-६ आत्मा वा ॥ गायत्रो, २ जगतो, ३ त्रिष्टुप् ॥ १३३२३५२ . ६२७ अग्न आयूपि पबस आसुवोजमिपं च नः । आरे बाधस्व दुच्छनाम् ॥१॥ ( ९६६।१९) ६२८ विभ्राड् हस्पियतु सोम्प मचायुधधनपतावविहुतम् । वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपति बहुधा नि राजति ॥ २ ॥(ऋ. १०।१७०।१ ) ६२९ चित्र देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याः । आना याचाप्रथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च ।। ३ ।। (ऋ ॥११५।१। ६३० आयं गौः पृभिरक्रमोदसदन्मातर पुरः । पितरं च प्रयन्त्स्य ॥४॥ (ऋ. ११८९।१; या. य ३६) ६३१ अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती। व्यख्याहिपो दियम् ॥५॥ (ऋ१०१८९२ यजु ११७) [५] पञ्चमः खण्डः। [२७] ( भने ) माने । (आयूपि परसे ) दीर्घ आयु हमें दे, (नः ऊजें इपं च भासुय) हमें पाल और अन्न दे, और ( दुच्छुना थारे वाधस्य ) राक्षसोंको दूर पर ॥ १॥ १ दुच्छनां-(दु:-शुनां ) पागल कुते, राक्षस, दुर्दय, द वापर। ८६२८] (वि-भ्राट् ) विशेष प्रकाशमान् सूर्य ( गृहत् सोम्य मधु पियतु ) बहुत गोमरस पोये, ( यश-पता) पत परनेवालेको ( अ-रि-दरत आयुः दधत् ) कुटिलनारहित मायष्य प्राप्त हो, ( घात-जून यः) वायुसे युक्त पर पूर्ण ( त्मना प्रजाः अभिरक्षति ) स्वयं ही राव प्रजाओंका रक्षण करता है, उससे (पिपति प्रो पूर्ण करता है और ( बहुधा विराजति) मनेर प्रशारसे प्रकाशित होता है । २ ॥ १ अ-वि-तं आयु:- उपरवाहित पाय। २ बात-जूत' सूर्य। त्मना प्रजा. अभिरक्षति पिपनि-वावे साप पूर्व सब प्राणियों पण परता है, और उन्हें पत्र देरर पुष्ट करता है। ६२२.१ (देयानां चित्रं भनी उदगार ) : मद्भुत तेज सहरूपी सूर्य उदय हो गया है, यह मित्र, पण मोर मनिका (घचः ) नेत्राप है, उरम होते ही इसने (धायाधिरी अन्तरिक्षं मामाः ) पुलोत, भूलोक भौर अन्तरिक्ष तेजरो भर दिया है, ऐसा पह सूर्य (जगत. तस्थुषः च भात्मा) गम और स्पापा गगनती धागा है।॥३ ३०] (अय गीः) यह गतिमान् (पृश्नि ) गायी मयं ( मा भरमीत् ) उपरोपर कार हो गया है। (पुर:मातर मापदत् ) पहले वा पम्मी माता प्राप्त हुप्रा, फिर यह (पितरं स्य. प्रपन् ) पोषयी मरने पितापो प्राप्त होता है। [३१] (यस्य गेनना ) म पूरा प्राय (अन्तः परनि) मारा गंगाररता है । (प्राणा अपागनी ) गयरे यार प्रमानित रोगारात होने पर मिलीन हो जाता है । (मदिर दिर्य एग्यम् ) पह महान पूर्व नोरोसिप स्प प्रतिरता.५॥
पष्ट अध्याय
सामवेदका सुघोष अनुपादं
(१९९)
३२३१२
२३
3
२
31२
२३ १२
॥८॥
६३२ त्रिशद्धाम वि राजति वाक्पतझाय धीयते । प्रति यस्तोरह युभिः
(ऋ. १०।१८९।३ प ३१८)
६३३ अप त्यै तायको यथा नक्षत्रा यन्त्यातुमि । सराय विश्वचक्षसे
(ऋ १५०२, अथर्ष १३।२।१७, २०४७।१४)
६३४ अन्नस्य केतवा दिरहमयो जना अनु । भ्राजन्तो अन्नयो यथा
(ऋ १६०१३, अपर्व १३।२।१८, २०४७६५)
६३५ तरणिविश्वदर्शतो ज्योतिष्कदास सूर्य । विश्वमाभासि रोचनम्
(ऋ. ११५०१४, अर्थ. १३२११९, २०४७१६)
६३६ प्रत्पङ् देवानां विशा प्रत्यङ्देषि मानुपान् । प्रत्यङ् विश्व स्वदेशे
( १९०५; अनं. १३१२१२०, २०५७।१७)
६३७ येना पावक चक्षसा भरण्यन्त जना अनु । त्वं वरुण पश्यसि
(१०६ अर्ब १३१२।२१२०१४७१८)
२३१
१२
१२८
२
)
आत्मपक्ष .(अस्य रोचना इस मात्माका तेज (अन्तः चरति ) शरीरके बन्दर संचार करता है,
(माणात् मपानती ) प्राण और अपानके रूपोमे उराको गति शरोरम होनी है, यह (महिपः) महान् शक्तिमा
आरमा (दिवं व्यख्यत् ) मस्तिस्क जाना प्रकार करता है ॥ ५ ॥
[६३२ ] (यस्तो त्रिंशत् धाम चिराजति) निके तीस मुहुर्त होते है ( अहः } यह सूर्य (शुभिः विरा-
अति ) अपनी किरगसि प्रकाशित होता है, ( पगनाय चार प्रति धीयते) उस सूर्यको स्तुति की जाती है ॥ ६ ॥
६.६३३] (विश्य चक्षसे सूराय । सयको प्रकाश देनेवाले पूरे उदय होने के बाद (नक्षयाः अक्तुभिः)
मात्र रानिके साथ साथ (यथा त्ये तायः) जैसे दिनमें चोर छिप जाते है, उसी प्रकार (अप यन्ति) छिप जाते हैं ॥७॥
[३४] (अस्य फेतवा रश्मयः ) इस सूर्यको प्रकामा किरणें (जनान् अनु वि अश्रन) लोगों को देखतो
है। (यथा भ्राजन्तः अग्नयः) जिस प्रकार प्रज्वलित हुई अग्निको किरणें देखनी है ॥ ८ ॥
[६३५] है (सूर्य) सूर्य ! (तरणिः) सयोंको तारनेवाला (विश्व-दर्शता) सर्वोकि द्वारा देखे जाने योप
(ज्योतिफत् मति) का करनपाला है, (विश्व रोवन आमालि) सब मानेकाले मायाँको Fre
काता है।॥९॥
अध्यात्मपक्ष-(सूर्य) हे सवको प्रेरणा देनेवाले परमात्मन् ! तू (तरणिः ) सरको तारनेवाला है,
(विन दर्शता सर्वाक द्वारा सत्कार करने के योग्य ( ज्योतिष्फत् असि ) तेजस्यो गोलगोंका न एता है,
(वि रोचनं आभासि ) सब तेजस्वी लोगोंको दू ही प्रकाशित करता है ।॥ ९ ॥
१६३६ सूर्य ! तूं (देवानां विशः प्रत्यष्ड् ) देशके प्रजाजन को पस्त है, उनके सामने (मानुपान मसह)
मनुष्योंकि मागे, (विश्व स्वशे प्रत्य) सब विश्वको देखने के लिए मामने (उदेपि) उस्य होता है ॥ १०॥
॥ ६३७) हे (पायक परुण ) पवित्र करनेवाले प्रेष्ठ सूपं ! (त्वं) न ( जनान् मुरण्यन्तं ) माणिरि पोषण
करनेवाले इस शोरको (येन चाललाअनु पक्ष्यसि } निस प्रवाशसे देखता है, उस तेरे प्रामो हम स्तुति करते ॥११॥
(२००) सामवेदका सुबोध अनुवाद [आरण्य काण्डम् २ कर ६३८ उद्दयामेपि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः। पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥ १२॥ (क्र १३६०१७; अपर्व १३।२।२२, २०१४७११९) ६३९ अयुक्त सस शुन्ध्युवः सूरो स्थस्य नव्यः । ताभियोति स्वयुक्तिमिः (* १९०९; अपर्व. १३।२।२४, २०४७।२१) ६४. सप्त त्वा हरितो रथ वहन्ति देव सूर्य । भौचिकेश विचक्षण ॥१४॥ (ऋ. ११५० अर्व, १३२।२३, २०४७।२०) इति पञ्चमी दशति. ॥५॥ पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥ इति पप्टोऽध्यायः॥ ६ ॥ इति सामवेद-सहितायामारण्य काण्ड पर्व वा समाप्तम् ॥ [६३८ हे सूर्य ! ( पृथु रजः घां उदेषि) तू इस विस्तृत अन्तरिक्ष और घुलोकमें सचार करता है, (पहा अक्तुभिः मिमानः ) दिनको रात्रीसे नापता हुआ (जन्माने पश्यन् ) जन्म लेनेवाले प्राणिमात्रको देखता जाता है ॥१२॥ [३९] (सूर्यः) सूर्यने (गुन्ध्युवः सप्त अयुक्त ) शुद्ध करनेवाले सात घोओंको अपने रथमें गोरा है, (रथस्य नयः) जो रपको चलाते (ताभिः स्वयुक्तिमिः याति) उनसे और अपनी योजना से वह सूर्य जाता है ॥ १३ ॥ १ गुन्ध्युवा- सूर्यकिरणें स्वच्छता करनेवाली होती है। २ सप्त-सूर्यकिरणें सात रगको होती है। ३ रथस्य नव्या- रय चलानेवाली घोडेख्यो किरगे है। [१०] (वि-चक्षण देव सूर्य ) हे प्रकाशक पूर्यदेव ! (सप्त हरित ) सात पोडे-सात रिणे (शोचि. प्फे त्या) शुद्ध करनेवाली किरणोंसे युक्त तुझे (रथे यहन्ति ) रथसे ले जाती है।॥ १४ ॥ १शोचिकेश:- सूर्यको किरणे शुद्धता करनेवाली है। २ सस हरित -सात गको सात किरणें। ॥ यहां पांचवां खण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति भारण्य काण्डम् ॥
२ 35mm १ . १३ २३ 7 ३२३. ग पष्ठ अध्याय] सामवेदका सुदाध अनुवाद (२०१) अफ महानायाचिका (१-१०) प्रजापति- ॥ इन्द्रस्त्रलोक्यात्मा ॥ विक= [ ९ प्रथम द्विपदा+ (२) ततस्त्रय शायरा पावाः + (३) तत उपसit + ( ३ ) उभय ( शायरोपसगा ) + (५) तत. शामरास्थय पादा + ( ६ ) उपसर्ग ] ६४१ विदा मघवन् विदा गातुमनुश रसिपी दिशा। शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरुषसो ॥१॥ ६४२ आमिष्टमभिष्टिमि वा पशुः । प्रचेतन प्रचंतयेन्द्र घुमाय न इप ६४३ एवा हि शको राये वाजाय वजिवः शनिष्ठ वजिन्नुञ्जस महिष्ठ वजिन्नृञ्जसे । आ याहि पिर मत्स्य ६४४ बिदा राये सुधीर्य भुवो बाजानां पतिशा अनु । महिष्ठ कजिन्नसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥४॥ ६४५ यो महिष्ठो मघोनामर शुन्न शोचिः । चिकित्यो अमि नौ नयेंद्रो पिदै तमु स्तुहि ॥५॥ ६४६ ईश हि शक्रस्तमूतये हवामहे जेवारमपराजितम् । स नः सर्पदति द्विपः क्रतुश्छन्द ऋतं वृहद [६४१] है (मघवन् ) धनवान परमात्मन् ! (निदाः) तु सब जानता है, (गातुं विदाः ) न योग्य मार्ग जानता है, : दिश. अनु शंसिपः) हम कौनसो दिशासे जायें, उसका हमें उपदेश कर, हे (पूर्वीणां शचीनां पते) मादि शासिके स्वामी ! (पुर-बसो) हे धनसम्पन्न प्रभो । (शिक्ष) हमें शिक्षा दे ॥ १ ॥ ६४२] हे (प्रचेतन ) चेतनता देनेवाले ईश्वर ! हे (इन्द्र) इन्द' (स्व.न) सूर्यके समान (अंशुः। तेजस्वी तू' मामिः अभिष्टिमिः । इन सराणोंने ( इथे धुन्नाय ) मन और तेज प्राप्त करनेके लिए हमें (चेतय) प्रेरित कर॥२॥ [६४३ 1 है (मंहिष्ट प्रजियाः) महान् और वनधारी इन्द्र ! तू (शक्रः एव हि ) सामर्यवान् है, इसलिए है (शविष्ठ । बलवान् प्रभो! तू हमें (राये वाजाय मुजसे ) धन और यल अथवा अन्य प्राप्त करनेके लिए समयं करता है (अजमे ) हमें सामन्यान् कर । (आ याहि ) हमारे पास आ (पिर) यह सोम पी और (मत्स्य) आनन्दित हो॥३॥ ८६४४] है इन्द्र! (राये मुवीर्य विदाः ) पन प्राप्त करने के लिए उत्तम सामर्य कैसे प्राप्त करें यह सू जानता है. ( या दराणां शरिष्ठ' ) जिस प्रकार भूर पुष्यों में दलवान है, उस प्रकार जोन है, है ( मंदिष्ट बनिन् । महान् पधारो इन्द्र ! यह तू । वाजानां पति भव) सव शक्तियोंत स्वामी है. न ( वशान अनु ऋजसे) अपने वश होकर अनुकूल हए भलोंको सामर्यवान् करता है ॥४॥ [६४५ ] (य मघोनां महिष्ठः ) जो महान् पनिकों भी बहुत महान् है, (अशु. न) और स्वयं प्रकाशित होने- पालोके समान (शोचि. ) प्रकाशमान है, बसा तू है. है (चिकिन्व.) ज्ञानवान् ! (इन्द्रः) ऐश्वर्यसम्पन्न है, इस लिए (नानिदे अभिनय ) हमें ज्ञान प्राप्त कराने के लिए योग्य मार्गास भा, (तं ऊ स्तुदि ) व उसी प्रसार जोहानमार्गसे जाता है॥५॥ [६] (शेहि ) शनिशाली होते हुए यह स्वामित्व करता है, इसलिए (ऊतये जेतारं अपराजितं त यामहे ) अपने संरक्षणरे लिए हम विजयो और पराजित न होनेगले उस पोरको बुलाने है, (सः नः द्विप, मु अर्पत ) यह हमारे मनोगोर करता है, यह हो ( प्रातुः ) रात्कनौका का (छन्दः) रक्षक, ऋतं) माय भm मौर ( गृहत् ) महान है ॥ ६॥ - (२०२) सामवेदका सुयोध अनुवाद [आरण्यं कापड . . . ३1३३३३३३ . ११ ६४७ इन्द्र धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् । सनः स्वर्षदति द्विपा स नः स्वदति दिषा ॥ ७ ॥ ६४८ पूर्वस्य यत्ते अद्रियोऽशुभदाय । सुम्न आ धेहि नो वसो पूर्तिः शविष्ठ शस्यते । वर्ण हि शको नूनं तमव्यस ॥८॥ ६४९ प्रभो जनस्य वृत्रहन् समयेंषु प्रवावहै । शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयुः ॥९॥ भय पञ्च पुरीषपदानि ॥ ६५० एवाह्येऽ३३३७३ व । एवा ह्यने । एवाहीन्द्र । एवा हि पूपन् । एवा हि देवाः ॐ एवाहि देवार इति पञ्च पुरीषपदानि ॥ पति महानाम्न्याचिक' समाप्त. ॥ इति सामवेद सहितायां पूर्वाधिक समाप्तः । पूर्षिकस्य मन्त्रसंस्था १ आग्नेयस्य काण्डस्य (१-११४, २ ऐनस्य काण्डस्य (१९५-४६६) ३५२ ३पावमानस्य काहस्य (४६७-५८५) ४ आरण्यकस्प पायस्य (५८६-६४०) ५ महानाम्न्याचिकस्य (६४१-६५०) सर्पयोगः ५० [६४७] (धनस्य सातये) मनरी प्राप्ति के लिए हम ( अपराजितं जेतारं इन्द्र) पराजित न होनेवासे विनती पारो सहायता के लिए बुलाते है. (सानः द्विपः मति अपत् ) वह हमारे शत्रुओंको दूर मरे ॥७॥ [६४८] है (अद्रियः) वधारी ! (पूर्वस्य ) सबसे पहले रहनेवाले तेरे (पत् भंगु मदाय को भशा आनन्द याने के लिए है, है ( यो ) हे सबको मसानेयाले इन्न! उसे ( नः सुसे थादि ) हमारे मुराके लिए हमें हे, हे (शषिष्ठ) पलान् । (पूर्तिः शस्यते ) पूर्णता करने की शश्निही हो गर म xim होतो. नूनं शक अशी ) निश्चयरोन सामन्यवान् मोर सयको काम वाला है, इसलिए ( नत् नप्य संन्यसे ) में इस मयीन स्तुति योग्य तुझे अपने मार्ग स्थापित रता हूँ॥८॥ [६४२) हे (पृत्रहन प्रमो) को मारनेवाले प्रभो ! ( जनस्य समधु म प्रयाग ) भेष्ठ मनुष्यों से ही हम प्राप्ता पाते है, (गः)मो ( गोषु गच्छति ) गार्योम रहता है, वह (मखा) मि (मझौषः ) गतम प्रहार मेवारने योग्य मोर (अ-न्यु हितोय घेष्ठ है ॥ १॥ ८६५01 (पया दिय) पह ऐसा ही है, हे माने । (पया दि) तुम एंगे प्रशायरप हो. हाय! (ग दि) तुम इस प्रकार सरो हरानेवात हे (पूगन् ) शा! (पया दि) तुम ऐगे ही पोषण का हो (देघा) गब देवो! तुम ( एपादि) nreणगान .॥ १० पठ अध्याप] सामवेदया सुरोध अनुवाद (२०३) आरण्यक काण्ड सहिता - माह्मण - आरम्पक और उपनिषद् ये प्राचीन सत्य वस्तुको ( विप्राः बहुधा वदन्ति ) ज्ञानौलोग अनेक पाहमयके चार विभाग हैं । सहितामें मत्रपाठ, ब्राह्मणोंमें नामोंसे पुकारते हैं, उसीका मान, इन्द्र, मित्र, वरुण, विम्य पज्ञकाण्ड और आरण्यक तया उपनिषदोंमें वेदमत्रोंमें आये सुवर्ण, गात्मान्, यम, मातरिश्वा मादि नामोंस वर्णन करते हुए अध्यात्म-विद्याका विस्तारसे वर्णन है । इस आरण्यक है। अर्थात् अग्नि, इन्द्र, वरुण आदि नाम यद्यपि भिन्न-भिन्न पाण्डमें अन्तके महानाम्नि अाचिकको तया कुछ अन्य मत्रोंको है, तयापि उन नामसि वर्णित की जानेवाली राद्वस्तु एक हो छोडकर शेष सब मंत्र ऋग्वेवके हो है । उनका पता हर है। इस सिद्धान्तसे बहु - देवतावादका खण्डन होता है और मात्रक नीचे दिया हुआ है । जो मत्र ऋग्वेदमें नहीं है, एक-देवतावाद ( सब देवता मिलकर एक देवताका प्रति- उनका नहीं दिया गया। पादन करते है ) को सिद्धि होती है। मारण्यफॉका विषय अध्यात्मज्ञानका स्पष्टीकरण ही है। इस आरम्पक काण्डका विचार करते हुए यह आवश्यक इस प्रकार इस सामवेदीय आरण्यक काण्डका विषय भी है कि हम अपनी दृष्टि एकात्मवाद पर हो रेन्द्रित रखें। अध्यात्मज्ञानका प्रकटीकरण ही है। और इस दृष्टिसे हो इस काण्डका विचार करना चाहिए- ग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार वेद है। १ अथ तव व्रते वयं अ-दितये अनागतः स्याम ऋग्वेदमें देवोंको स्तुति है, यजुर्वेदमें यशकाण्डका विषय है, (५८९ )- हे ईश्वर ! तेरे नियममें रहकर, हमारा विनाश सामवेद उपासनाका वेद है, और जयवंवेदमें ब्रह्मज्ञान मुख्य न हो, इसलिए हम पापरहित हों। " दिति " का अर्थ है है । पद्यपि इस प्रकार ये विभाग है, पर प्रत्येक देदम रिसी सण्डित होना, दुबई होना, विभक्त होना, और अदितिका में किसी स्पसे अध्यारमका विषय मा हो गया है। पशुर्वेद अयं है, मसण्डित स्थिति, स्वतत्रता अविनाश, मोसी कर्मकाण्डका प्रन्य है, पर फिर भी उसफा अन्तिम चालीसा अवस्था । यह मवस्था पाने के लिए मैं पाप रहित होऊ । अध्याय "ईश उपनिषद" है । अथर्ववेदमें ब्रह्मशानवे परमेश्वरका जो नियम है, मनुष्योंको उत्ततिके लिए उसने अनेक नो नियम निश्चित किए है, उन नियमोश पालन करके उसी प्रकार सामवेदके इस भारण्यक-काण्डमें मध्यात्म- हम उस पूर्णावस्थाको प्राप्त करें। मुक्त होने का वर्णन का विषम आपा है। इसके मत्र यपि कम्बके हो है, पर यह मन उत्तम रीलिसे करता है- उनका माराय अध्यारमकी दृष्टिो देखना चाहिए। बन्धन ढीले कर इसमें अग्नि, इन्द्र, वाय, वषा यादि देवताकि मत्र है, ये विभिल रेवता है, इनका अध्यात्मके साथ कोई सम्बन्ध १ उत्तम पाश अस्सह उत्थथाय। महीं, ऐसा कोई यदि समझे, अपदा ऐसा समलकर शका भी मध्यम पाशं असत् वि श्रथाय। करे, तो उसका निराकरण श्रावेदके निम्न मत्रमें उत्तम अधर्म पाशं अगत् अब श्रथाय । तिसे किया गया है- उत्तम, मध्यम और अघम ऐसे तीन प्रपोंसे मनुष्य एक सत्य वस्तु बांश गया है। बुद्धि, मन और शरीर इन तीन स्थानों ये बन्धन है । वृद्धिका अपन अज्ञानसे है, मनका बन्धन इन्द मिथं घरुणमनिमाहुः विधारोंको होमताके कारण है और शारीरका बन्धन याचार अथो दिव्य सासुपर्णो गररमान् । होनताके पारण है। बहुतमे मनुष्य इन बन्धनोस जकरबर एक सद्विमा यहुधा पदन्ति बांध दिये गए हैं। उत्तम तत्वज्ञान प्राप्त पर मुडिके अनि यम मातरियानमाहुः॥ पाशॉरो दोलेरो, उत्तम विचारोंसे मन और उत्तम (४६) अपर्व ११०२८) यावामि शरीरके अन्यन दूर करने चाहिए। ऐसापरलेसे (एकं सत् सत्य वस्तु एर हो है, पर उम एम हो तीनों पाशोंमें मनुष्य मुश्त हो सकता है। सक्त है।
(२०४) सामवेदका सुवोध अनुवाद [ आरण्यं वाण्डम् । २त्यया भरे शश्वत् कृतं वयं चिनुयाम (५९० } { ६४१ /- हे धनवान् इन्द्र ! तू राय भागोको जालनेवाला हे ईयर! तेरो सहायनासे हमेशा करने योग्य स्पर्धाओं हम है, उत्तम मार्ग कोनसा है, यह तू जानता है । हम कौनसी अपने कर्तव्योंको सावधानीसे करें। प्रमाद न करें। मनुष्य दिशासे जाए इसका तू हमें उपदेश कर । हे आदिशक्तिके इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ तवसे उसके जीवनमें स्पर्धा शुरु स्वामी । है घनसम्पन्न प्रभो ! हमें उत्तम शिक्षा दे, और हुई, छोटीसी स्पर्धा ही विशाल स्पर्धा अर्थात् सनामका रूप उत्तम मार्गसे हमें चला। धारण कर लेती है। यह स्पर्धा चालू ही है। इस स्पर्धाम यह प्रार्थना उपासकोको करनी चाहिए। ईश्वरके पास अपना पतंव्य न घूरते हुए विजयी होना ही मनुष्यका कर्तव्य अनन्य भावनासे ही यह प्रार्थना करनी चाहिए। तब देवगण है । पाश या बन्धन ढोले करने के लिए इसको आवश्यकता है। मार्गको बताते हैं। इस प्रकार निर्दोष मार्ग ध्यान में आता ३ या अन्तमाः सुम्नेषु मदेम ( ६१० /- हे ईश्वर! है। उपासक स्वय भी कौनसा मार्ग उतम है और कोनसा तेरे पास रहकर तेरे द्वारा दिए गए सुखमै भानन्दसे हम रहें। नहीं इसका विचार करके निश्चय करें। मनुष्योंको देवोके पास जाकर रहना चाहिए । देवोंके कौन- मुझे श्रेष्ठ होना है कौनसे गुण है उन्हें देखना चाहिए, और वे ही गुण अपने अन्दर बढाकर देवकि सानिध्यमें आनन्वसे रहें। मनुष्योंकी मुझे महान होना है, यह भावना मनमें होनी चाहिए। उन्नतिका यही साधन है। इस विषय में उपदेश इस प्रकार है- वेदोंम देयोको स्तुति इसी लिए है कि उस स्तुतिमें जो १ तत् नः मियो घरणों मा महन्तां अदितिर देवों के गुण वणित हैं, घे हो गुण उपासक अपने में बढावें ! सिन्धुः पृथिवी उत धोः (५९०). " इसके लिए मित्र, यह हो मनुष्योंकी उन्नति है। " यत् देवा भकुन तत् वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथिवी और धुलोक मुझे महान् करें।" करवाणि" (शतपथ ब्राह्मण) जो देव करते हैं उसीको में इसमें पृथ्वीसे लेकर धुलोक तक, रहनेवाले सब देव मेरे पारा । यह उन्नतिका नियम है। देयोंकी जो स्तुति है महान होने के काममें सहायक हों, यह प्रार्थना है । मनुष्यको उसका विचार करफे,उसका मनन करके उपासक देवताओंके यदि महान होना है तो उसे इन सय देयोंकी सहायता गुन अपने भग्दर अधिकसे अधिक किस तरह बढावें, यह अवश्य ही चाहिए। मनुष्य के शरीरमें ये सब देवताएं है। देखना चाहिए देयोंकी स्तुति मानयोंकी उन्नतिमें इस प्रकार यदि एक भी देब प्रतिकूल होगा तो यह अवयव रोगी हो सहायक होती है। प्रथम अपने में देवस्व लावें, फिर भ जाएगा और उसकी उत्ततिमें रुकावट आ जाएगी। गुणोंसे उसकी वृद्धि परें। यही अनुष्ठान मनुष्यों द्वारा करना २ इमं एफ घृपणं वृणत ( ५९१)- इसको अद्वितीय चाहिए। शक्तिमान् करो । अद्वितीय शक्तियाला यदि मनुष्य हो जाए पुरे पचन न बोलना को उसके महान होने में कोई सन्देह ही नहीं। सबसे पहले वाणीको शुद्धता करनी चाहिए ! यह इस चेतय (६४२ - हे प्रेरक ईयर ! इस अपने संरक्षणसे ३ हे प्रचेतन ! भाभिः अभिष्टिमि पे शुम्नाय न प्रकार है- अन्न व सेज प्राप्त करने के लिए हमें प्रेरित कर, अर्थात् हम १ हे देवाः! या परिचयाणि पासि मा बोच उत्तम मार्गसै जावें सया अन्नबाले और तेजस्वी होयें। (६१०)- हे वैयो। तुम्हें अच्छे न मानेकाले वचनोंको में न बोलू । यह रोति वाणीको गुट परनेको है। याणीको ४ धावापृथिनी, द्रा-पृहस्पती, भगस्य यशः शुद्धिसे महतो काम सिद्ध हो जाते है । मा विन्दतु ( ६११ )-प, प्रायो, त्र, महस्पति, भौर भग इन देवसि मुझे यश प्राप्त हो । शुद्ध मार्गोका ज्ञान ५ यशः मा प्रति मुम्चतां (११) पा मारे अपने आपरणके मार्ग दाट और स्वरा होने चाहिए। छोटकर दूर न जाये। हमेशा मा मुने हो हिसता रहे। इस विषय में वेदवचन है- वर्षात मै सदा पारवी रोम। १६ मघवन् ! विदा गानुं विदा । दिशः अनु ६ एना मानुगणां रिश्वानि घुम्नानि यःमिया शसिषः। पूर्याणां शचीनां पते. पुरवसो शिक्ष। सातः पनामहे ( ५९३)- पहायतामे मनुष्योर ।
पष्ठ अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद पास रहनेवाले सब तेजोंको प्राप्त करके उसका उपभोग (६४७ )- धनको प्राप्तिके लिए विजयी और भी भी करने की इच्छावाले हम उतम तेज प्राप्त करें। पराजित न होनेवाले वीरको हम अपने सरक्षणके लिए ७ अस्याः संसद, यशसा अहं प्रवदिता स्याम् बुलाते हैं। (६११)- इस ससदके यशसे में पुफ्त होऊ और में इम ३ राये सुवीय विदाः (६४४)- धन प्राप्त परने के राभाने उत्तम भाषण करनेवाला होऊ। लिए उत्तम पराक्रम करनेको शक्ति अपने में किस प्रकार सब प्रकारसे मेरो उति होकर में सभा उत्तम प्रकारसे लावे वह तु जानता है। प्रभावशाली भाषण करनेवाला होऊ, राष्ट्रमें ऐसा मान H राये वाजाय ऋजसे (६४३)- धन प्राप्त करने के प्राप्त होना उन्नतिका लक्षण है। लिए हम दल प्राप्त करें, अत त हमें सहायता दे। पूर्णताकी प्रशंसा ५ नः अजै इपं च आसुन ( ६२७ )- हमें सामय्यं और सन्म दे। जगत्में पूर्णताको हो प्रशसा होती है इसलिए कहा है कि- ६ हे यिरशिन् ! तत् सहः ओजः न दद्धि । १ पूर्ति शस्यते नूनं शक्रः पशी (६४८)- पूर्णता अस्य महतः ईशे । नः नृम्णं स्थविरं वाजः पृधि सदा प्रशमित होती है, निश्चयसे जो शक्तिशाली है वह (६२५)- हे बहुतसा धन पासमें रखनेवाले इन्द्र ! यह सभोको पक्षम करके अपने अधीन करता है। साहस मौर सामर्य हमें दे। इस महान् सामयंका तू स्वामी २ शक ईशे हि ( ६४६ )- सामर्यवान् ही ईदान है, तू हमको धन और महान् स्थायी बल दे। करता है । निर्यल शासन नहीं कर सकता इसीलिए कहा है। ७ हिरण्यस्य, गयां, सत्यस्य ब्रह्मण', यत् पर्चः, ३ जेतारं अपराजित ऊतये हवामहे ( ६४६ )- जो तेन मा संसृजामसि ( ६२४ )- सोना, गाय और सत्य विजयो और अपराजित है उस वीरको अपने सरक्षणके लिए गातका जो तेज है, उससे मुझे मुक्त कर । हम बुलाते है। ८ अमितं योजन अभि अप्रथेथाम् ( ६२२ )- ४ यज्ञियः शविष्ट ( ६४३)- है वनपारी बलवान् अपरिमित धन योजनापूर्वक हमें दे । पौर ! हमारी सहायता कर। ९ चायापृथिवी स्याने भवतं, ते नः अंसा ५ गये वाजाय जसे ( ६४३)- धन और अन्नकी मुंचतम् (६२२ )- घुलोक और पृथ्योलोप हमें मुख प्राप्ति करने लिए हमें समर्प करता है। देनेवाले हों, और वे हमें पापसे बचाये । ६ यः शूराणां शविष्ठः,वाजानां याजपतिः, घशान हम निष्पाप हो, अर्यात हमारे पास धन आवै, उसी प्रकार अनु मंजसे ( ६४४ )- जो शूरोंमें अत्यधिक बलवान् है, बल और सामार्य भी प्राप्त हो । धन मारि साधन मिले तो जो बलिष्ठोंमें भी सबसे अधिक बलवान है, यह अपने पशम भी आयुके रहनेपर हो उप्तका उपभोग किया जा सकता है, रहनेवालोंको सामर्यवान् बनाता है। इसलिए मायुको कामना हम करें, ऐसा कहा है- ऐसोही शक्ति हमें भी प्राप्त हो, ऐसी इच्छा मनुष्योंको मनमें करनी चाहिए । सामर्यशाली होनेरी पन मिलता है। १ अग्ने ! आयूपि पवसे ( ६२७ )- हे भग्ने ! हमें इस घनके विषय में निम्न वचन इस काण्डमें हैं। दोर्याय है। धन २ यज्ञपती म-विहतं आयु. दधत् (६२८- यात जिससे मनुष्य धन्य होता है, यह धन है । घनका अर्ष करनेवालेको उपावरहित दीर्घ आय है। इस प्रशर वायु पेयल रुपये हो नहीं है, अपितु घर, पुत्र, गाय, घोर्ड आदि प्राप्त करें यह इच्छा इन वचनों में है। भी धन है। इनको पास रहने से मनुष्य धन्य होता है। संरक्षण १ नः सुम्ने बाधेहि (६४८)- हमें सुख देनेवाले हमें धन, बल, तेज, दीर्घायु आदि प्राप्त हों और अपने पनमें स्थापित र लिए सरक्षण मिलें यह मनुधारी इच्छा स्वाभाविक है। इस २ धनस्य सातये जेतार अपराजितं हवामहे विषय में निम्न वपन देखिये- २७ (साम हिन्दी) दीर्घ आयुष्य (२०६) सामवेद का सुबोध अनुवाद [मारण्यं काण्डम् भेजता है। १ उन उमाभि. अतिमि वाजेषु सहस्रप्रधनेषु ३ अभिमातिपादः (६०३)- यह याओंका पराभव नामय ( ५९८) तू महान् वीर है, इसलिए अपने उत्तम करनेवाला है। सरक्षसे छोटे और बडे युद्धोंमें हमारा सरक्षण कर । ४ वजी यानि प्रथमानि वीर्याणि चमार, नु २ बातजूतः (सूर्य ) त्मना प्रजा अभिरक्षति, प्रवोचं ( ६१२ )- वज्रधारो हन्नने प्रथम जो पराक्रम किया पिपर्ति बहुधा विराजति ( ६२८ )- वायुके साय सूर्य उसका में वर्णन करता हूँ। स्वय हो सब प्रजाओका सरक्षण करता है, सभी अग्नीको ५ इन्द्रः जगतः चर्पीनां राजा ( ५८५ )- पूर्ण करता है, और उन्हें विशेष रोलिसे प्रकाशित करता है। ६ अधिक्षमा विपुरूपं यत् अस्ति (५८७ )- ३ सूर्यः जगत तस्थुपः आत्मा ( ६२९)- सूर्य इस ७ दाशुषे वसूनि ददाति ( ५८७ /- स्थावर और जगम जगतका राजा है। ८ उपस्तुतं राधः अर्धा चोदत् ( ५८७ )- ४ सूर्य. तरणिः विश्वदर्शतः ज्योतिष्ठत् असि इन्द्र स्थावर जगम और सब मनुष्योका राजा है । इस विश्यं रोचनं आभासि ( ६३५ )- सूर्य सबको तारनेवाला, पृथ्वीपर अनेक रगरूपपाले जो कुछ भी पदार्थ है, उनका सब देखनेवाला, प्रकाश करनेवाला और सरक्षण करनेवाला भी वही राजा है। वानगोलको वह अनेक प्रकारके धन देता है । सब विश्वको वह प्रकाशित करता है। है। जो उसको स्तुति करता है, उसके पास यह पन युद्ध पदि मंरक्षण करना है तो शत्रुके साथ युद्ध करके शत्रुको ९ ज्येष्ठं ओजिष्ठं पपुरि श्रवा ना भाभर १५८६)- पराजित करना ही पड़ता है। उसके बिना उत्तम सराण श्रेष्ठ, बलवर्षक और पूर्णता करनेवाले यश और अन्त हमें हो ही नहीं सकता। इसलिए युद्ध करना आवश्यक ही है। भरपूर दे। इस युद्ध के सम्बन्धमें निम्न वचन है- १० परमेष्ठीः प्रजापतिः मयि वर्चः अथो यशः पयः १ सः नः दिप. सु अर्पत् (६४६)- वह हमारे शत्रु हतु ( ६०२ )- परमेष्ठी प्रजापति मुझे तेज, यश और ओंको दूर करता है। २ पृत्रेषु शरन् सहना पृघि ( ६२५ )- युद्ध, (६५) हे अग्ने ! हमें दूपके साथ धन और तेज दे। ११ हे अग्ने । नः पयसा रयिं दृशे वर्चः अदाः शशुओंको अपने बलसे पराजित कर । ३ अहिं अहन ( ६१२ )- शत्रुको तूने मारा। हमें अन्न और तेज दें। ४ हे अपूर्य मघवन् ! वृघहत्याय जायथाः (६०१) १२ धावापृथिवी सुभोजसो (६२२)- घुलोक हे मद्वितीय पायान् इन्त्र! तू यत्रको मारने के लिए उत्पन्न वोलोक हमें उत्तम भोजन देवें । १३ परियोयित् (५९२)-धन अपने पास रखनेवाला। इस प्रकार शत्रुसे युद्ध करना अत्यावश्यक है, उसको किए १४ रनधातमं अग्निं इंडे (६०५)- रल चनेवाले बिना प्रजाका सरक्षण हो ही नहीं सकता। युद्धमें उत्तम घोर अग्निकी में स्तुति करता है। होने चाहिए। ये बीर हरे हो यह इन्द्र देवताके वर्णनके द्वारा ये देवताओंके गुण है। उन्हें देखें और उन गुणोंको अपने दिखाया है । इसलिए इन्द्र देवताका वर्णन यहाँ देखें- अन्दर बढानेका उपाय करें और देवत्वसे युक्त हों। सभी समय उत्तम है देवो विशेष सामर्थ्य होता है, इसी सामर्थ्य के कारण प्राय.लोग समयको दोष देते हैं, पर सभी समय उत्तम है- उनको देवत्व प्राप्त हुआ है। उन देवोंके गुण देखिए र वसन्तः, प्रीष्मः, वर्षाणि, शरदः, हेमन्ता, १ वजहस्त (५८६)- हायोमें यज्ञ धारण करने- शिशिर रस्त्यः (१६)- ये सभी ऋतुपे रमणीय है, सुख देनेवाली है, इसलिए समयको दोष देना ठीक नहीं। • इन्द्रः यत्री हिरण्ययः (५९७)- इन बच धारण अपने प्रयत्नमें शेष होते है, उन प्रयत्नोंको मयामोग्य करना | करता है और वह सोनेके बाभूषण भी धारण करता है । चाहिए । इसीलिए वेदोंमें मनुष्यको “तु" कहा गया दूध देवे। देवोंके गुण पाला इन्द्रा सामवेदका सुवोध अनुवाद पष्ठ अध्याय (२०७) है। मानवो जोवन झनुरूप-यज्ञरूप होना चाहिए। इस १ या मां ददाति सावत् अन्नं अदन्तं अहं यर्स उद्देश्यरो कहा है- अनि (५१४)- जो मुझ अमको दानस्पसे दूसरों देता ऋतु है, उसका सरक्षण होता है, पर जो दान न देता हुआ अन्नको सः क्रतुः छन्दः ऋतं घृहत् ( ६४६ )- वह कर्म स्वय ही दाता है उस कन्स मनुष्यको मै स्यय अन्न हो खा करनेवाला है, उसका पुरुषार्थ करनेका स्वभाव है, यह सत्य- जाता हूँ, अर्थात् पहले अन्नका दान करें फिर स्पय अन्न सावे। निष्ठ और सरल व्यवहार करनेवाला है, इस कारण वह सच्चा मित्र महान् है। ये चार शब्द बहुत ही महत्त्व होनेके कारण १ ससा सुशेवः अपयुः । ६४९)- वह ही सध्चा इनके अर्थ आये दिए जाते है- पित्र है, जो उत्तम सेवाके योग्य और दोहा पवहार नहीं ऋतु:-निश्चय, शक्ति, बुद्धि, यज्ञ, अन्त प्रकाश, प्रशा। करता । अन्दरसे दूसरा और बाहरसे दूसरा जो व्यवहार उन्द:- आनन्द, इच्छा, निश्चय, तत्परता। करता है यह सच्चा मिश्र नहीं। मातं- योग्य, सत्य, सामप्य, शूर, पूज्य, तेजस्थी, नियम। कल्याण करनेवाली रात्री गृहत् - उच्च, महान, बहुत, सामर्थ्यवान् । १ भद्रा युवति रात्री प्रागात्, अहः केतून से इस प्रकार इनके अनेक उत्तम अर्य है, और वे अर्थ ईसति, विश्वस्य जगतः निवेशनी रात्री भद्रा अभूत् सापकों को मार्ग दिखाते है। (६०८)- कल्याण करनेवारी रात्रीरपो स्त्री मा गई है। यह अन्न दिन प्रकारले रोस्तो है। राव गगनको विधाम देनेवाली अन्नका यज्ञ किया जाता है । ये अन्न देवोंके पहले भी यह रात्री निश्चयसे लोगोंगा हित करनेवाली है। उत्पन्न हुए-- कुत्तोंको दूर करो १ देवेभ्यः पूर्व अई अमृतस्य ऋतस्य प्रथमजा १ दुन्दुना थारे घाधस्स {६२७ }- दुष्ट फुत्तोरो अस्मि (५९४ )- देवों पहले, अमरत्व देनेवाले यज्ञके दूर पर दुष्टोको दूर कर । सुष्ट हमारे काम विन न पैदा पूर्व मै मात्र उत्पन्न हुगा। पहले अम उत्पन्न हर और उसके करें ऐसा कर। बार उसे पानेयाले उत्पन्न हुए। घास पहले पैदा हुई और घोडे घास पानेवाले पशु यादमें उत्पन्न हुए । फलके वृक्ष पहले देवपि रप पोडे जुने होते हैं । उसमावर्णन उस प्रकार है- पैदा हुए मौर फल सानेवाले मनुष्य पोय से पैदा हुए। १ इन्द्र इत् एयोः पचा प्राममिदलः पचोयुजा (५९७)- इन्द्रहो घोडा सच्चा मित्र है और उन पोडोसी अपने रथ जोडनेवाला है। वे पोर्ड कहने मात्र हो रधर्म १ शणामु रोदिणापाणीपु सशत् पयः अधा. रयः (५९५ - पालो, लाल और अनेक गाय जानेवाले है । इतने वे शिक्षित है। इस प्रकार घोग सिसापर सुनिशित करना चाहिए। तेजस्यो दूधको तूने स्थापित किया। यह देयोपा महान् २ बायो नियुगान् आगाह । ६००)-हे पायो । तू अपने नियत नामो पोटोंको अपने रयमें मोरकर उनसे मा। • सहमपभा. महबरमा यूभीः विश्यम्पाणि यहाँ यायुरे घोडरो नियत पहा है। "गियुन" रा निम्रती उदेत (६२६) लोक गाय रहनयाली, योंके शामरा अर्थ हो, त्यमें उत्तम प्रकारसे जोर सम्मेवाने है। साय रहनेशली, दुग्ने यो पनौशाली अनेक रगती गायें हमारे पास सायें। ३ शुभयुवः सस अयुक्त, रथस्य नत्र्य.(६३९)- ४ साहरितःशोधिपत्यारथे यहन्ति (६४.) दानका महत्व -पवित्रतारनेवाले सान पोदे, पवित्रता परमानी शान धान उत्पन्न हुमा, बप मिलने लगा, और उससे यह होने किरणें जिसरी, ऐसे मुझे रयो के जाते है। सहए तय वानरा महत्व समामे भाया| उसके सरपणे मह सर्पका विशेषण "शोचि पेश" दिया है । यही प्रार है- रिरणे यता परयाती होती है। सात पारे परिणार गायोंमें दूध सामप्प है। * (२०८) सामवेदका सुयोध अनुवाद [आरण्यं काण्डम् - सात रग है । अर्थात सात घोडे व घोडिया आलकारिक है। नाम जानन् ( ६०६ )- इन ऋषियों, याणीके शब्दोंग वायु और इन्द्र के घोडोंका प्रयोग आलकारिक है। वायु रयमें प्रयम विचार करके स्तुति करने योग्य है ऐसा समझा ! बैठता है, इन्द्र और सूर्य रयमें बंटते है यह भी सब आल• पह स्तुति इकोस छन्दोमें हो सकती है, इस प्रकार उम कारिक है । सच्चे घोडेका यहा कोई सम्बन्ध नहीं है। अपिने अनुभव किया। नक्षत्र भाषाके शब्दोमें गूढ अर्थ है और उन शब्दोंसे इक्कीम जिस प्रकार चोर राधीमें घूमते है और दिनमें छिप जाते छन्दोंमें स्तोत्र धनते हैं । इस प्रकारका महान् शान ऋषिको है, उसी प्रकार तारे रात्रीके समय आकाशमें चमकते है हुआ, यह शान होने के बाद अनेक छन्दोंमें स्तोत्र बनाये और और दिनमें सूर्यके आते हो छिप जाते है । इसका वर्णन मत्र प्रकट हुए। उन मत्रों में अध्यात्म -विद्या प्रकट हुई, देखिए- उसे देखने के लिए मानवजाति उत्पन्न हुई। मानवोको कृत. १ नक्षत्रा अक्तुभिः अपयन्ति यथा त्ये ताययः कृत्यता इस शानसे हुई। (६३३ }-जिस प्रकार चोर राषीके समाप्त होने के साथ वैश्वानरकी कल्पना साय विलीन हो जाते है, उसी प्रकार नक्षत्र रात्रीके साथ वैश्वानर, विश्वकृष्टि, सब मनुष्य अपवा पृथ्वीके सब साथ छिप जाते है, यह उपमा अलकारका एक उत्तम मनुष्य मिलकर एक "पुरुष " है, पृथ्वीके सब मनुष्य एक उदाहरण है। विशाल " शरीर " है । इतनी एकता मनुष्य समाजमें होनी मोक्ष चाहिए, यह ध्येय वेदने इस स्थानपर कहा है । वह मन्त्र मनुष्य जो कुछ भी प्रयत्न करता है मह बधनसे टूटनेके यहा देखिए- लिए ही करता है। सभी आध्यात्मिक ज्ञान, जो अबतक १ सहनशी पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । कहा है, बन्धनसे निवृत्ति और मोक्ष प्राप्तिके लिए ही है। स भूमि सर्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम् (६१७) हस विषयमें कहा है- हजारों सिर, हजारों आंख और हजारों पैरोंवाला एक १ अमृताय आप्यायमानः दिवि उत्तमानि वांसि पुरुष है । वह पृथ्योके चारों ओर भाप्त है, इस इन्द्रियोंसे धिप्य ( ६०३ )- अमरत्व प्राप्त करने के लिए उच्चस्थिति ज्ञात होनेवाले जगत्को व्याप रहा है। प्राप्त करते हुए गुलोकसे उत्तम अन्न प्राप्त कर । स्वास पृथ्वीपर आज लगभग २०० करोड मनुष्य है । सम्पूर्ण उत्तम उपभोग प्राप्त कर। मनुष्योंकर मानव समाज रूपी एक शरीर है। उस शरीरये अमरता प्राप्तिको इरछासे जो अनुष्ठान किया जाता है, २०० करोड मस्तक, चारसौ करोड पर, चारसौ करोड माखें मनुष्यको उन्नति होती रहती है और उसे आदि है । यह पृथ्वीपर चारो ओर है। ये दो सौ करोड़ उन्नतिके मार्ग, स्वर्गके भोग मिलनेसे आनन्द प्राप्त होता मनुष्य परस्पर मिलकर शरीरम अवयोंके समान एकताका रहता है । यह इस अनुष्ठान करनेवालेको प्रत्यक्ष अनुभव यर्ताव करें। एक शरीरम जिस प्रकार सिर, हाय, पेट और होता है । इस अनुष्ठानका साधक पृथ्वोपर रहते हुए भी पाव सब एक दूसरेको मदद करते हुए सुखसे रहते हैं, उसी उसका मन दिव्य आनन्दका लाभ उठाता है। इसे द्युलोको प्रकार सब मनुष्य एकतासे रहते हुए अपनी उन्नति करें इस जानेको जरूरत नहीं। उसे यही विग्यसुखको प्राप्ति होती सन्देशको व्यवहारमें लाने के लिए सब मिलकर प्रयत्न करें, है और यह सदा आनन्द प्रसन्न रहता है। इसको यहा सूचना दी है। ऋपिका कार्य सुभाषित १ कचय' पुरुषास. त्या स्तुपान्त { ६२३ )- कवि १ ज्येष्ठ मोजिष्टं पपुरि श्रय' न. आमर (५८६)- देवोंको स्तुति करते है। यह स्तुति मनुष्योंको उन्नतिका मागं श्रेष्ठ और यल बदागेवाले, सृप्त कर वाले अन्न हमें भरपूर हैं। दिखाती है। इसलिए स्तुतिको सायक सावधानीसे करे और २ इन्द्रः जगत. चर्षणीनां राजा (५८७) इन्द्र उसमें अयं और गूदार्थको अपने प्यार लावे । प्रभु-चलनेवाले प्राणियों और मानवोंका राना है। २ ते गोनां नाम प्रथम भमन्यत निःसत परम ३ अधिक्षमा विश्वरुपं यद, अस्य राजा( ५८७) उन्हें करते पष्ठ सध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद (२०९) - इस पृथ्वीपर अनेक रूपवाले जो कुछ भी पदार्थ है उनका १८ भुवनेषु वाजयुः (५९६)- प्राणियों में अन्न खानेको भी यही राजा है। इच्छा होती है। ४ दागुपे वसूनि ददाति (५८७)- दानशील मनुष्यको १९ मायाविनः अस्य मायया गमिरे (५९६ - वह राजा धन देता है। कुशल लोग अपनी कुशलतासे पदार्थोंका निर्माण करते हैं। ५ उपस्तुतं राधा अाक् चोदत् (५८७)- ईवरको २० उग्रः उग्राभिः ऊतिभिः घाजेपु सहस्रप्रयनपु स्तुति करनेवालेको वह पन मिलता है। चनः अव (५९८)- तू भूर है, इसलिए अपने विशेष ६ यस्य रजोयुजः इन्द्रस्य इदं वृहत् रन्त्यं स्यः संरक्षणोंमे छोटे और महान् मुद्धोंमें हमारा संरक्षण कर । तुजे जने वनम् (५८८)- इस तेजावी इन्द्र के ये महान २१ परमेष्ठी प्रजापतिः मयि पर्चः, यश, पयः रमणीय पन दानी और प्रेरणा करनेवाले लोगों प्रशंसनीय है। हतु ( ६०२ )- परमेश्वर मुझे तेज, दल, यश और दूप ७ घरणः उत्तम, अधम, मध्यमं पाशं अस्मत् भरपूर देवे । उत् अथाय (५८९) हे वरुण | उत्तम, अषम और २२ अभिमातिपाहः ते पयांसि बाजाः सृष्ण्यानि मध्यम बन्धनोंको हमसे दूर कर। सं यन्तु ( ६०३ )- तू मानुका पराभव करनेवाला है, इस ८ सय बते वयं अ-दितये अनायसः स्याम (५८९) लिए तुझे दूप, अग्न और बलको प्राप्ति हो। - तेरे नियममें रहते हुए हम स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निप्पाप २३ अमृताय आप्यायमानः दिवि उत्तमानियवासि होवें। धिष्व १६०३)- मोक्ष प्राप्तिके लिए तू अपनी पति करते ९ पचमानेन त्वया भरे शश्वत् रुतं ययं विधि- चुयाम ( ५९० )- पवित्र रहनेवाले तेरी सहायतासे हमेशा ए गुलोका उत्तम यश प्राप्त कर । २४ त्वं तमः ज्योतिरा घि यवर्थ (६०४ )- किए जानेवाले कर्तव्य हम सावधानीसे करते रहें। तत् मा महस्तां ५९० )- उत्तको सहायताले मुझे अन्धकारका तेजसे ना करता है। महानता प्राप्त हो। २५ पुरोहितं, यजस्य देयं, ऋत्विज, होतार, रत्न- ११ इमं पकं वृपणं कृणुत (५९१)- इस एकको तुम धातम अग्नि ईडे (६०५)- प्रागै रहनयाले, यज्ञके प्रयतम, पलयान करो। तुओंके अनुसार यज्ञ करनेवाले, देवोंको अपने साथ लाने- १२ एना मानुपाणां पिश्यानि घुम्नानि अर्यः, बाले और उपासकोंको रत्न देनेवाले अप्रणीको में स्तुति लिपासन्ना, बनामहे (५९३) इसको राहायतासे मनुष्यों करता हूँ। द्वारा इच्छित घनोंके पाम जाकर उसके उपभोग बरनरी २६ भद्रा युवतिः रात्री प्रागात् (६०८ }-रल्याण हा करनेवाले हम उस घनको प्राप्त करते हैं। करनेवालोरात्रीरुपी स्त्री वा गई। १३ अमृतस्य भानस्य प्रथमजा थस्सि (५९४)- २७ विश्वस्य जगतः निवेशनी रात्री भद्रा अभूत् अमर पत्रके पहले अन्न उत्पन हमा, मै भी यज्ञके पहले (६०८ }-सब जगतो भाराम देनेवाली रात्री सबका उत्पन्न हुमा, अतः में इस अवका यज्ञ करता हूँ। पल्याण करनेवाली है। १४ यःमां ददाति स आयन् ( ५९४ - जो इस २८ प्रक्षम्य वृष्ण. अगम्य महानायचा (६०९) माता रान करता है, वह सबका संरक्षण करता है। - पापक, बलवान्, संजस्यी और महान देवरी में स्तुति १५ असो अदन्तं अहं अनं अनि ( ५९४)-जो करता हूं। अन्ना नमसे स्वयं पाता है, उसे में अन स्वयं सा २९ वैश्वानराय सुचि. चामः मतिः (६०९/- जाता हूँ। सब मनुष्यो हित करनेगले मुद भोर सुन्दर स्तुति से १६हेन्द्र शासु,रोहिणी, पप्णीपुमान गयः मधारयः (५९५)-हेन्द्र! तूपाली, लास और ३० हे देवाः ! या परिचयाणि यासि मा पोचं बनेर रंगरी गायोम तेजस्थो दूप स्पापित करता है। (६१.)-हे देवो! सुम्हारे न मुनके पोय दापोरी में १७ उपस: अग्नियः पृश्निः अकराचार (५९९/- म बोल । उप.पालबार गर्नपाता सूर्य प्रकाराने लगता है। ३१ या मत्तमाः सुम्नेषु इस् मम (११/- 1 जाती है।
(२१०) सामवेदका सुघोध अनुवाद [आरण्य काण्डम् तुम्हारे पास रह करके तुम्हारे द्वारा दिए गए सुखमें हम ४६ ततः विराट् अजायत ( ६२१)- इस पुरुषसे आनन्दसे रहें। विराट् पुरुष हुआ। ३२ यशामा प्रति मुच्यतां ( ६११)- यश मुझे ४७ विराजः अधि पूरुषः । ६२१)- विराट् पुरुषका छोडकर दूर न जावे। मुझे यश मिलता रहे। अधिष्ठाता एक पुरुष है। ३३ अस्याः संसदः यशसा अहं प्रचदिता स्याम् ४८ स जात। अत्यरिच्यत, भूमि पश्चात्, पुरर १६११)- हम सभा में तेजस्वितासे बोलनेवाला होगा ( ६२१ )- वह उत्पन्न हुए प्राणियोंसे धेष्ठ था, पहले भूमि, ३४ वी यानि प्रथमानि वीर्याणि चकार, प्रयो· बाद भूमिपर उत्पन्न हुए दूसरे पदायोंके रूपसे यह प्रकट हुआ। चम् ( ६१२)-धनथारी इन्टने जो महान् पराकम किए ४९ हे द्यावापृथिवी ! चां सुभोजसी ( ६२२) है उनका में वर्णन करता हूं। घु और पृथ्वी लोको ! तुम ही उतम भोजन देनेवाले हो। ३५ जन्मना जातवेदाः अमि। अस्मि (६१३ / ५. हे घावापृथिवी ! स्योने भवत ( ६२२)- हे जन्मसे ही में सर्वज्ञ और अनमोहूँ। पावापृथियो ! तुम हमारे लिए सुख देनेवाले होयो । ३६ हे पसुबित् आने ! नः पयसा रयि दृशे वर्चः ५१ ते नः अंहसः मुंचतम् ( ६२२ )- तुम हमें अदाः (६११ )- हे धनवान् अग्ने । हमें दूषके साथ धन पापोंसे छुटायो, और दर्शनीय तेज दे। ५२ अमितं योजनं अभि अप्रथा ( ६२२)- हमें ३७ वसन्तः, ग्रीष्म . घर्षाणि, शरद, हेमन्ता, अपरिमित पन योजनापूर्वक दो। शिशिरस, रन्या, ( ६१६ )- यसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरब, ५३ यनर्गवः कवयः पुरयास त्या स्तुवन्ति (१२२) हेमन्त और शिशिर ये ऋतु रमणीय है। - गाय पालनेवाले जानी जन ता इन्द्रको स्तुति परते है। ३८ सहस्रशोर्पा, सहस्राक्षः, सहस्रपाद, पुरुषः ५५ हिरण्यस्य, गर्ग, सत्यस्य प्राणः यत् वी, स भूमि विश्वतो वृत्या दशांगुलं अत्यतिष्ठत् (११७) -हगारों सिर, हजारों से हजारों पायाला एक पुरुष है, नेन मां संसृजामसि (६२४)- सोना, पाप और सत्य यह सय पृथ्वोपर पारों ओर व्याप्त होकर दस अंगुलियों के गान इनमें जो तेज है उस से जरी मारे यात फर। ५५ है विगिन् ! सहः गोजाना दसि । ६२५)- समान इस विश्वको प्याप्त करके रह रहा है। ३९ त्रिपाद् पुरुषः ऊः उर्दत (११८) तीन है यद्त धनवान् ! हमें सामापं और यल है। ५६ थस्य महतः ईशे ( ६२५/- इस महाा पला भामोंवाला यह पुरुष ऊपर स्वरां स्थानमें रह रहा है। तू स्वामी हं। ४० अस्य पादः पुनः समपत् (६१८)- ५७ मा नृरणं स्थचिरं या कृधि ( ६२५) हमारे मका एक भाग इस जगत्में बार-यार पैदा होता है। लिए धन और स्थायी महान बल है। ४१ ततः मशन-अनसने अभिविपत् व्यामत ५. पुरेपु शयन सदना रधि (१२५)- संपाम (६१८)- बादमें मन्न सानपाले और न सानेवाले ऐरो सभापति एवानेत सामपं हमें है। विविध स्पोते चारों भोर प्रपट होता है। ५९ सद-ऋषभाःमहयामायनी उयेन (५२९) ४२ यत् भूतं यत् च माध्यं इदं सर्व पुपर एवं जो पाप एlari, म साप मानिना, तंबो (११९)- जो उत्पन्न हो गयौर को होवाला है वह पायवाली गाय हमारे पास मा । मब यह पुटप ही है। ६० उमः पृथुः अयं स्टोकः (२६- यह मूनोर ४३ सर्या भूतानि मम्य पादः ( ६१९)- सारे तुम्हारे लिए मान मोर पितृन हो। नए प्राणी इमो पो हो हिस्से है। ३१ अझे । मायूमि पथमे (६२०/- आतू We अस्प ताथान महिमा ( ६२०]- इसरो ऐगो हमें पं माहे। महिमा है। ६२ ना ग घ भामुय (९२७) -पल और ४५ मरमायस्पशानः (२.)- ममाता या भगरे। ६३ दुहुना भारे याधम्य (९२०)- पुरुषोंगरमा। बिमोहै।
पष्ठ अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद (२११) सूर है। - ६४ यक्षपती अविहरतं आयुः दधत् ( ६२८) ८२ शूराणां शविष्ठा(६४४ )- दारोंमें सबसे अधिक यजमानको उपद्रवरहित माय है। ६५ प्रजाः अभिरक्षति, पिपर्ति ( ६२१ )- वह ८३ वाजानां पतिः (६४४)-तू बलोंका स्वामी है। प्रजाओंका सरक्षण करता है । और मतको पूर्ण करता है। ८४ वशन् अनु ऋामे (६४४)- अपने अनुकूल ६६ सूर्यः जगतः तस्थुपः च आत्मा (६२९)- सूर्य रहनेवालोंको तू सामग्यशाली बनाता है। स्थावर और जगम जगतमा मात्मा है। ८५ मघोनां महिष्ठ (६४५)- महात् धनवानोंसे भी ६७ महियः दिवं व्यर यत् (६३१)- यह महान् तू अधिक धनवान है। सूर्य द्यलोषको प्रकाशित करता है। ८६ अंशुः न शोचिः (६४५)- सूर्य के समान तू ६८ यथात्ये तायवः, विश्ववक्षसे सूराय, नक्षना मराशमान है। थक्तुभिः अपयन्ति ( ६३३ )- जैसे चोर दिनमें छिप ८७ नः विदे अभिनय (६४५ )- हमें ज्ञान प्राप्त जाते है, उसी तरह सबको प्रकाश देनेवाले सूर्यके उदय होते करनेके लिए तू उत्तम मार्गसे ते ज्ञा। ही तारे रात्रीने साय विलीन हो जाते है । ८८ शक्र. ईश ( ६४६ )- नो सामप्यशाली होता है, ६९ अस्य फेतव. रश्मयः जनान् अनु व्यदृश्यन् वह स्वामी होता है। (६३४ )- इस सूर्यको किरणें लोगोंको देखती है । लोगोंका ८९ ऊतये जेतारं अपराजितं हवामहे (६४६ )- निरीक्षण करती है। सरक्षणके लिए विजयी और अपराजित वोरको हम बुलाते है। सरणिः विशदर्शतः ज्योति कृत् अप्ति (६३५) ९. साना द्विष. अर्पत् (६४६ )- यह हमारे - तू सवको तारनेवाला, साँसे देखने योग्य मोर प्रकाश शोको दूर करता है। करनेवाला है। ७१ विश्वं रोचतं आभासि ( ६३५)-सब तेजस्वी ९१ सा ऋतुः छन्दः शतं वृहत् । ६४६/- वह कर्म करनेवाला, रक्षक सत्यनिष्ठ और महान है। पदार्योको तू प्रकाशित करता है। ९२ धनस्य सातये अपराजितं जेतारं इन्द्र हवामहे ७२ मानुपान विश्व स्वईशे प्रत्यक्ष् उदेषि (६३६) मनुष्यों के आगे सब विश्व दीसे इसलिए तू उदय होता है। इन्द्रको अपनी महायताके लिए बुलाते है । (६४७ )-पनको प्राप्तिके लिए अपराजित और विजयी ७३ मघवन् विदाः (६४१)- हे धनवान् परमात्मन् ९३ पूर्तिः शस्यते (६४८) पूर्णता करनेको सापितको द सब कुछ जाननेवाला है। प्रससा होतो है। ७४ गातुं विदाः (६४१)-तू उत्तम मार्गाको जानता है । ९४ शकः चशी । ६४८)- सामर्थपान सबको पाम ७५ दिशः अनु संशिपः (६४१)- हम कौनसी परता है। विशो जाए यह बता। ७६ पूर्वानां डाचीनां पते ! पुरुषसो शिक्ष (६४१) मित्र, उत्तम प्रकारसे मेघाके योग्य तया दोगला व्यवहार न ९५ यः सपा सुशेवः अद्युः (१४९ - जो उत्तम - हे आदिशक्तिके स्वामी | धनवान् ! हमें ज्ञान दे । ७७ प्रचेतन ! आभिः अभिष्टिभिः इपे घुम्नाय प्र करनेवाला है, वह उतग होता है। उपमा चेतय (६४२)- है वेतादेनेवाले देयो ! इन सरसोंसे पन्न और तेज प्राप्त करने के लिए हमें उत्तम मार्गसे प्रेरित करो। १ दिवि घां इव ( १०२) निम प्रभार प्रलोकमें ७८ मंदिष्टः वनियामा एव हि (६४३)-हे तेज है, उत्तो प्रकार ( यशस्य पयः यशका पहोता है। महग्न पयपारी इनसामयान है। २ यथा स्ये तायवः (१३३-जसे चोर दिनमें भाग ७९ हे विष्ट । महे पाजाय जसे । ६४३)- जाते हैं, उसी प्रकार ( नक्षत्रा भक्तुभिः अपयन्ति ) है बलवान् । महान् धन और बत प्राप्त करने के लिए हमें तारे गतरे साए हिप जाते हैं, दिलम शेखते नहीं। समर। ३ यथा भ्राजन्तः अग्नयः (६३४)- जिप्त प्रसार ८० अान्जसे । ६४३/- तू सामभ्यंगालो मनाता है। तेजावी अग्नि जलती है, उसी प्रकार ( अस्य प्रेतय ८१ राये सुर्याय विदाः (६४४)- पन प्राप्त करने के रसमया ) इस सूर्यो किरणे चमरती हैं। लिए उत्तम सामर्य जित प्ररार प्राप्त गरें, यह जानता है। इस मारण्य काण्डमें इतनी ही उपमायें है। - !
(२१२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [भारण्यं काण्डम् आरण्यकाण्डान्तर्गत अपि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋग्वेवस्थान ऋषिः देवता छन्दः ७॥२७३ बहती निष्ट गायत्री " ५८९ श२४।१५ वरण. शंयुर्हिस्पत्यः ( भरद्वाजः) वसिष्ठो मंत्रावरुणः वामदेव गौतमः शुनाशेप माजीगतिः कृषिमो देवरातो वैश्वामित्रो वा कुत्स आंगिरसः ( गृत्समदः) बामदेवो गौतमः अमहीयरागिरसः अमहीयुरागिरसः आत्मा त्रिष्टा ५९० १।२७०५८ पवमानः सोमः विश्वेदेवाः एकपाद्गगतो गायत्री पवमान. सोम. ५९२ ५९३ १२ ९६१३११ " " यमम् त्रिष्टुप (२) श्रुतकक्ष आगिरसः ५९५ ५९६ दा९३।१३ ९/१३ पवित्र बागिरसः पवमानः सोमः गायत्री. जगती गायत्री मधुच्छन्दा वश्वामित्रः मथुन्छन्ता श्वामिन " प्रयो वासिष्ठः १७॥ १११८०१ पारश ८८९५ विश्वेदेवाः पायुः ६०० ६०१ गृत्समदः शौनकः विष्ट गायत्री সনুৎ नमेषपुरुमेपावागिरसौ वामदेवो गौतमः সলারি सोमः अनुष्टुप निष्ट्रप ११९११८ २९१०२२ गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः " " ६०४ ६०५ अग्निः गायत्री त्रिष्टुप ४११०१६ " ६.७ ६०८ ६०१ अपानपात रात्रिः अग्नि. मनुष्ट जगती ફાદાર ६।१२।१४ मधुच्छन्दा श्वामित्रः घामदेव गौतमः गृत्समदः शौनकः वामदेव गौतमः भरद्वाजी बार्हस्पत्यः ऋजिश्या भारद्वाज वामदेव गौतमः हिरण्यस्तूप मानिरस विश्वामित्रो गाषितः (ब) विश्वामित्रो गापिनः (ग्रह) " विप्रेदेवाः लिगोषता: महापंक्तिः निष्टप मामा अग्नि ६५४ " (२१३) पा अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद देवता मंत्रसंख्या ऋावेवस्थान अग्निः पंपितः 0 " पुरुषः अनुष्टुप ६२७ ६१८ " १०९०११ २०१९४ १०९ १०.९०१३ २०१९००५ ऋषिः (४) पामदेवो गौतमः वामदेवो गौतमः नारायणः नारायणः मारायणः नारायणः नारायणः बामदेव गौतमः थामवेषो गौतमः बामदेवो गौतमः वामदेव गौतमः यामदेव गौतमः EEEE. . . EEE EFFEE: चापापिनी त्रिष्टुप मनुष्ट्रप इन्द्रः " " ૨૨ ६२३ ६२४ ६२५ " " अग्निः पवमानः सूर्यः ६२७ ६२८ गायत्री जगती त्रिष्टुप गायत्री . सूर्य मात्मा था ६३० ६३१ ६३२ " " सूर्पः " " ९६६।१९। १०॥१७००१ २११५१ १०।१८९१ ११८९९ १०।१८९०३ १३५० १२५३ श५४ श५०५ १५०६ १९०19 રાધાર 8140tc ग ६५४ " " ६३६ " " ६१८ शत यखानसाः विभ्राट् सौर्य: कुत्स आंगिरस: सपंराज्ञी सर्पराजी सर्पराज्ञी प्रस्कण्वः प्रस्कभ्यः प्रस्कवः प्रस्कषधः प्रस्कण्वः प्रवण्वः प्रस्कण्वः प्रस्कन्धः अथ महानाम्न्याचिंका। प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः प्रजापतिः " " ६४० इस्त्रलोक्याामा " । " " ६४१ ६४. ६४३ ६४४ ६४५ ६०६ ६१७ ६४८ ।।।।।।।।। . सियोक्ता ६५० (हिन्दी)
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सामवेदका सुवोध अनुवाद (उत्तरसंहिता) उत्तरार्चिकः । अथ प्रथमोऽध्यायः। अथ प्रथमप्रपाठके प्रथमोऽधः॥१॥ [१] (१-२३) १ स्तिः काश्यपी देवलो या २ कश्यपोः मारोया, ३ शतं येलानसा, ४, २१ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः ।। ५, ७ विश्वामित्रो गायिनः; ५ जमदग्नि ६ इरिबिठिः काण्वः ८ ममहीयुरागिरसः; ९ सप्तर्षयः (१ भरद्वानो पार्हस्पत्यः; २ कश्यपो मारोगः ३ गोतमो राहगणः; ४ भत्रिगामः, ५ विश्वामित्रो गायिनः ६ नमाग्न गया। ७ वसिष्ठो मंत्रापणिः); १. उशना काम्यः, ११ वसिष्ठो मंग्रावणिः, १२ वामदेव गौतमः, १३ नोधर गौतम १४ कलिः प्रागायः १५ मधुच्छन्दा श्वामित्रः, १६ गौरवीतिः शाश्त्यः, १७ अग्निश्वाशुप., १८ मन्धोगः श्यावारियः १९ कविर्गिय २०१युर्हिस्पत्यः, (तृणपाणि.) २२ सोभरिः काण्वः; २३ नुमैया आंगिरसः ॥ १-६, ८-१०, १५-१९ पवमानः सोमः, ४, २०, २१ अग्निः ५ मिग्रावणी; ७ इन्द्राानी; ६, ११-१४, २२-२३ इन्द्रः ॥ १-८, १२ (१-२), १५, १८ (२-३), २१ गायत्री; १, ११, १३, १४, २० प्रगायः = ( विषमा बृहती, समा सतो पहती); १० त्रिष्टुपः १२ ( ३ ) सोदनिचन्ः १६, २२ काभः प्रगायः = (विषमा ककुप् सभा सतो यूहती १७ उष्णिक १८ (१) अनुष्टप, १९ जगतो; २३ (१) फकुर, (२) अभि (३)पुर उष्णिा ॥ ६५१ उपास्मै गायवा नरः पवमानायेन्दवे । अभि देवा इयक्षते ॥१॥ (. ९।११।१ ) ६५२ अमि ते मधुना पयोधर्वाणो अशिश्रयुः । देव देवाय देवयु ॥२॥ (प्र. ९।११।२) [१] प्रथमः राण्डा। .६५१] है (न) अस्विजो ! (देवान् अभि स्यक्षते ) देवोंके लिए हदन करनेको हावाले (पयमानाय भस्मै इन्दचे) होनेवाले इस मोमको ( उप गायत ) तम स्तुति करो॥१॥ सोमरसको छानकर प्यार करके उससे देवोंके लिए हवन किया जाता । उसे छानते हए यज परनेवाले उस सोमके लिए स्तोत्रोंका गायन करते हैं। [६५१] ( ते देवयु देयं ) सेरे देवोंको दिए जानेयाले दिप्य रसको ( देयाय ) इन्द्रदेयके लिए ( मधुना पयः) मोठे दुपके साथ ( अथर्वाणः ) अपर्यवेरे ऋषियोंने ( अमि-अशिश्रयुः) मिलाया है ॥ २॥ दिव्य मोमरस देवोंको दिये जानेके लिए गायके मोदे हुए के साथ मिलाकर उसे पिलोग तम्यार करते हैं। मपर्वदेवीमारनेवाले सोमरसको दूध के साथ मिलाते है। १ [साम. हिन्दी भा.२] ।
(२) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ उत्तरार्चिका - 18 131३ ६५३ स नः पयस्व शं गये अंजनाय शमर्वते । शाजन्नोषषीम्यः ॥३॥ १ (वी)॥ (ऋ ९।१३) ६५४ दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या पो । सोमा शुक्रा गाशिरः ॥ १॥ (ऋ. १६६४१२८ ) ६५५ हिन्वानो हेभिहित आ वाज वाज्यक्रमीत् । सौदन्तो वनुपो यथा ॥२॥ (ऋ. ९६६४।२९ ) ६५६ अधक्सोम स्वस्तये संजगमानो दिवा कवे । पवस्व सूर्यो हो ॥३॥२(यि)॥ (म. ९६४।३०) ६५७ पवमानस्य ते क वाजिसा असूक्षत । अर्धन्तो न अवस्यवः ॥ १॥ ( ९॥६६॥१० ) [६५३ ) हे ( राजन् ) तेजस्वी सोम ! (स.) यह इ (नः गवे शं) हमारी गायोका कल्याण फर, (जनाय श) पुत्रपौत्रोंका कल्याण कर (अस्ते शं) मारे थोडोंका कल्माण कर और (ओपधिभ्यः शं) भौषधियोका कल्याण कर, तथा (पवस्व ) तू स्वय भी छाना जाकर शुद्ध हो ॥ ३ ॥ सोम गाय, घोडे, पुत्रपौत्र और औषधियोंका हित करे और वह स्वयं भी छनकर पविन होये। [३५४ ] (दविद्युतत्या रुचा ) तेजस्वी कान्तिसे युक्त और (परिष्टोभन्या ) शरद करनेवाली पारारो पुक्त (शुभाः सोमाः) स्वच्छ सोमरस ( गवाशिरः ) गायके दूध मिलाकर तय्यार किये गये है ॥ १ ॥ सोमरस चमकता है और धार बाधकर छाना जाता है, तब थम्ब होता है, उसमें गायका दूध मिलाकर उसे प्यार किया जाता है। [६५५ 3 (बाजी) बलवर्धक सोमरस ( हेभिः हिन्यानः) स्तोताओंसे प्रशमित होता है, (हितः) वह हित करनेवाला (या अनमीत् ) यज्ञमें चलता माता है, { यथा) जिस प्रकार ( वनुपासीदन्त ) मुद्ध करनेवाले वोर मुद्धभूमिमें आक्रमण करते है ॥ २॥ सोमरसके स्तोत्र पाये जाते है और उनका रस निघोजा जाता है । बादमें वह सोम सबका हित करनेवाला होकर यज्ञमें उसी प्रकार प्रविष्ट होता है, जिस प्रकार योद्धा शत्रुपर आक्रमण करने के लिए युद्धभूमि प्रविष्ट होते है। सोम पीने के बाद उत्साह बढ़ता है और उससे बोरोंको वीरता भी बढ़ती है। वे धीर शत्रुओंपर माक्रम करके यशस्वी होते है। ६६५६ हे ( फवे सोम) ज्ञानो सोम! तू ( सूर्यः ) सूर्यके समान (नया) ऊपर घटपर (संजरमानः) सेजसे युक्त होकर ( स्वस्तये शे)सबके कल्याणके लिए (दिवा) दिम्प प्रकारसे मुक्त होकर (पवस्व) छनता जा ॥३॥ सोमरससे जानयुक्त उत्साह पढता है। जैसे सूर्य ऊपर चढता-घढला तेजस्वी होता है, उसी प्रकार सोमरसको धमक बढती जाती है । सोमरससे सबका कल्याण होता है, तेज और उत्साह रहता है । [६५७ Jहे (कये याजिन् ) ज्ञानी और बलदर्घक सोस। (पवमानस्य ते) जाने मानेवाले तेरी (श्रवस्यवः सर्गाः ) पशवो पारा (अवन्त न ) घोडे जसे घुडसालसे थाहर वेगसे दौडते है, उसी प्रकार ( असूक्षत ) वर्तन गिरती है ॥ १॥ सोमरस भान और बल बढाता है, छानते समय उसकी धारा छाननीते नौवे के बर्तन में उसी प्रकार गिरती है, हिरा प्रार पोडे धुऊसालभे बाहर आकर दोस्ते पोहे जिस प्रकार बेगसे दोरते है, उसी प्रकार तोमरी पारा ऊपरको माननीसे नोवेक बर्तन में देगसे गिरती है।
प्रथा अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद ३३१२ ३१३ 32 9 १३ १३.१ न ६५८ अच्छा कोश मधुवचुतमस्य वारे अव्यये । अवावशन्त धीतयः ॥२ ।। (ऋ. ९।६६।११) ६५९ अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गायो धेनवः । अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥ ३ ॥ ३ (को) । (ऋ९६६१२) ॥ इति प्रथम खण्ड ॥१॥ [२] ६६० अम आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बहिपि ॥१॥ (ऋ ६।१६।१०) ६६१ तं त्या समिद्भिरगिरो धृतेन वर्षयामसि । यहछोचा यविष्ठय ॥२॥(६३१६।११ ६६२ स नः पृथु श्रवाथ्यमच्छा देव विवाससि । वृहद सुवीर्यम् ॥ ३ ॥ ४ ॥(ऋ. ११६।१२ ) ६६३ आ नो मित्रावरुणा धृतर्गव्यतिमुक्षतम् । मधा रजासि सुक्रतू ।। १ ।। (ऋ. ३।६२।१६ ) [ ६५८ ] (मधुइचुतं कोशं अच्छा ) मोठा रस निसमें भरा नाता है, उस कलशमें ( अन्यये पारे) भेडरे पालसे बनी छलनीसे हम सोमरसको ( असूनं) छानते हैं, (धीतयः ) हमारी उगलियां (अवानशन्त ) वारपार दबाकर रस निचोडनेकी इच्छा करती है ॥२॥ वर्तनके ऊपर भेडके रालोस बनी छलनी होती है, उसने रस छाना जाता है और यह नौके फलोमें गिरता है। हमारी उगलियां सोम दधाकर रस निचोडनेका प्रयत्न करती है। [६५९ (इन्दयः) सोमरस (समुदं ) जलयुक्त कलसेम (गायः धेनवः मस्त ऋतस्य योर्नि न) गिरा प्रकार चलती हुई गाये अपने पर अर्थात् यजस्थान (भा अग्मन् ) जाती है, उसी प्रकार ( अच्छ) सीधा जाता है ॥३॥ सोमरस पानोसे मुक्त कलमें छाना जाता है। वे सोमरहके प्रवाह फलोमें उगो देगसे लाते हैं, जिस येगमे गायें अपने स्थानमें जाती है। ॥ यहां पहला खण्ठ समाप्त हुआ। [२] द्वितीयः सण्डा [६६० ] हे ( अग्ने ) अग्निदेव ! तू ( गुणानः ) स्तुतिके बाद ( पीतये ) हवि द्रों भक्षण करने के लिए और (व्य-दानये ) हवि देवोंको पहचान लिए । याहि ) गा, हमारे यजम (होता देयोंको बसानेवाला होकर (पहिय नि पति )भामनपर ॥१॥ [६६१ 1 हे मंगिरः ) मुरर थाने ! (तं त्या ) उस तुम्ने ( समिद्भिः ) मनिषालोंमे और (घृतेन ) पोरे (घर्धयामास ) हम प्रालिन करते हैं, हे ( यविष्टर ) सण अग्ने । (यहत् सोय ) तू अपिद प्रकाशित हो ॥ २ ॥ [६६२ ] है ( देव ) तेजायो अग्निदेव ! ( सः) वह दू (पृथु थ्रयाय) बहुत महास्थी ( गृहत् सुचार्य) महा पराक्रम पारनेराले समय (ना) हमें ( अच्छ विवाससि) सरलता प्राप्त हों ऐसा ॥३॥ ॥ ६६३ ] है ( सुप्रत) उत्तम भरनेवाले ( मित्रा-घराणा ) मित्र और पण देवो ! (ना गयूनि) हमारे पापो स्थान(पृतः मा उक्षतं ) पोरो ताचो, और (मामा) मोठे रससे ( रजांसि ) को लोग दूसरे लोग स्पानको उत्तरोतिरो सिचितरो॥१॥ हमें गावसे भरपूर पी मिले और सब स्पार्वोपर मोठा मामरस प्राप्त हो।
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सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिक
६६४ उदारसा नमोवृधा महा दक्षस्य राजयः । द्राधिष्ठाभिः शुचियता ॥२॥(ऋ ३६२।१७)
६६५ गुणाना जमदमिना योनावृतस्य सीदतम् । पातर सोममृतावृधा ॥ ३ ॥ ५ (थि) ॥
(ऋ. श६२१८)
६६६ आ याहि सुपुमा हि त इन्द्र सोमं पिया इमम् । एदं यहिः सदो मम ।।१॥ ( 4१७१)
६६७ आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना । उप ब्रह्माणि नः शृणु ॥ २॥ (ऋ. ११७२)
६६८ ब्रह्माणस्त्वा युजा चयर सोमपामिन्द्र सोमिनः । सुतावन्तो हवामहे ॥३॥ ६ (फौ)।
(ऋ. १७३)
६६९ इन्द्रामी आ गत सुतं गीमिर्नभी वरेण्यम् । अस्य पातं घिपिता ॥ १ ॥ (ऋ. ३।१२।१ )
६७१ इन्द्रामी जरितः सर्चा यज्ञो जिगाति चेतनः । अया पातमिम सुतम् ।।२।। (ऋ. ३।१२।२)
१
२
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२३.१
७२३४३
[४] हे (शुचि-प्रता) हे शुद्ध कर्म करनेवाले मित्रावरुणो । ( उरशंसा) बढ़त प्रशासित और ( नमो
वृधा) हविष्यानसे यउनेवाले तुम (द्रापिठाभिः) महान् स्तुतिसे प्रशसित होकर ( दक्षस्य महा राजथः) अपने
बलके माहात्म्यसे शोभित होते हो ॥२॥
८६६५हे मित्रावरुणो। (जमदग्निना ) जमदग्नि ऋषिके द्वारा (गणाना) स्तुति किए गए तुम दोनों
(ऋतस्य योनी ) यसको स्थानपर (सीदतं ) बेटो, और (ता-वृधा ) मनको बहानयाले तुम दोनों (सोमं पातं)
सोमरस पियो ॥३॥
६६६६१ हे (इन्द्र) इन्द्र 1 ( आ याहि ) आ, हमने (ते) तेरे लिए ( सुपुमा हि ) सोमरस निकाला है,
(इम सोमं पिय ) यह सोमरस पो, और (मम इदं हि मा सदा ) मेरे इस भासनार बैठ ॥ १ ॥
[६६७ 7 हे (इन्द्र) इन्द्र ' ( प्रम-युजा ) गम बोलते ही रयमें जुड़ जानेवाले ( फेशिना हरी) अयालवाले
दोनों घोडे ( त्या भावहता) तुझे पहा ले आये, और यहा आकर तू ( नः ब्रह्माणि ) हमारे स्तोत्र ( उप शृणु) पाससे
सुन ॥ २॥
[६६८Jहे (इन्द्र) इन्न ! { सोमिन सुतायन्तः वयं ) सोमयज्ञ करनेवाले और सोमरस तैय्यार करनेवाले
हम ( ग्रह्माणः ) मानी यज्ञकर्ता (सोमपां त्या) सोमरस पीनेवाले तुझे (युजा हवामहे ) योग्य स्तोत्रोंसे बुलाते है ॥ ३ ॥
[६६९) हे (इन्द्राग्नी) इन्द्र और आने ! (गीमिः ) स्तो?से प्रशसित ( नमः आगतं ) माकाशसे अर्थात
पर्वतके ऊचे शिषरमे आपा हुआ यह ( वरेण्यं ) श्रेष्ठ सोमरस है ( धिया इपिता ) बुद्धिसे प्रेरित किए गए सुम(अस्य
पातं) इसका पान कगे॥॥
मोमलता पर्वतके ऊचे शिखरसे लाई जाती थी, इसलिए उसे " नमः आगते " याकाशसै लाया एमा सोम
ऐसा कहा गया है।
६७० (इन्द्रानी) इग्न और माने 'तुम (जरितुः सचा ) स्तुति करनेपालके सहायक होवो, (यक्षः
चेतन जिगाति ) जिससे यज्ञ होता है, और जो चेतना - स्फूति देता है, वह सोम तुम्हें प्राप्त होता है, ( भया) इस
स्तुतिरो धुलाये गये तुम ( इमं सुतं पातं ) इस सोमरसका पान करो ॥ २॥
प्रथम अध्याय सामवेदका सुयाध अनुवाद . ३१. ६७१ इन्द्रममि कविच्छदा यत्रस्य त्या वृणे | ता सोमस्येह सम्पताम् ॥ ३॥ ७ (ता)॥ (ऋ. ३२१२३) पति द्वितीया ॥२॥ [३] 3 234 ३१ १७२ उचा ते जातमन्धसो दिवि सद्भुम्या दर्द । उग्र शर्म महि अंजः ॥ १ ॥ (ऋ.९।६।१०) ६७३ स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भया । परियोविपरि सव ॥२॥ (भ.९.६१२) ६७४ एना विश्वान्यर्य आ घुमानि मानुपाणाम् । सिपासन्ता पनामहे ।। ॥३॥ ८ (ठी)॥ (ऋ. ९।६११) ६७५ पुनानः सोम धारयापो वसानो अप्ति । आ रसधा योनिमृतस्य सीदस्पुत्सो देवो हिरप्पया ॥१॥(ऋ. ९/१०७४४) 13" ६६७२ ] (यशस्य जूत्या) पज्ञसे प्रेरित होकर ( कविच्दा) स्तुति करनेवालोरो योग्य फल देनेवाले इन्द्र मौर थाम्न देयोग (वृणे) में स्वीकार करता हूँ. ( ता इह) ये दोनों इस यज्ञ में (सोगस्य तृम्पती ) सोमरसके पानसे तप्त होयें ॥३॥ । यहाँ दूसरा खण्ड समात हुआ। [३] तृतीयः खण्ड। [१२] हे लोन ! ( ते अन्धसः ) तेरे अनरूपो सोमका (दिषि उद्या जातं ) घुलोपमें ऊचे स्थानपर जन्म हमा है, तेरे ( उग्रं सत् ) दौर्यको बढानेवाले ( शर्म महि श्रवः ) मुख देनेवाले महान् यशवाले अन्न { भूमि माददे) भूमिपर हम प्राप्त करते है ॥ १ ॥ सोमलता हिमालय पर्वतकी मौजवान् नामक ऊंची चोटीपर उगती है, वहासे वह पृथ्वीपर लाई जाती है, और पशमें उसका प्रयोग किया जाता है, उस सोमलताका रस शक्तिवर्धक, सुखदमक सौर पुष्टि करनेवाला है। १६७३ है (परियो-वित्) धन देनेवाले सोम 1 (सः) पहन (नः यज्यपे ) हमारे पूज्य ( इन्द्राय धरणाय ) इन्द्र, वरुण और (मरुद्भयः ) महनों के लिए ( परिसर) छनता जा ॥ २॥ [६७४] है सोम 1 (मानुपाणां ) मनुष्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य (पना विश्वानि घुम्नानि)इन सारे पनौंको (आ अर्यः) प्राप्त करके तेरी (सिपासन्तः) सेवा करनेकी इच्छा करनेवाले हम (वनामहे) तेरा भजन करते हैं ॥३॥ [६७५] हे (सोम) सोम (पुनानः) छाना जाता हुआ तू ( आपः वसानः) पानी में मिलायामा धारया थपसि) धार वायकर बर्तनमें गिरता है। (रत्नधा) स्लॉको देनेवाला और ( उत्सः देयः) जलरूपसे चमकनेवाला (हिरण्यया) सोने के समान तेजस्वो तू (सतस्य योनि बासीदसि) यज्ञके स्थानपर घटता है ॥ १॥ सोमरस पानी मिलाया जाता है. फिर वह छलनीसे छाना जाता है, तब वह, पमकता है, ऐसा यह सोम यसमें रखा जाता है।
सामवेदका सुवोध अनुवाद [उत्तराधिका २६३१ ३२३११ १ २१३१३ . 3 ६७६ दुहान ऊधदिव्यं मधु प्रियं प्रत र संघस्थमासदत् । आपृच्छय परुष वाज्यास नृमियोती विचक्षणः ॥ २ ॥ ९ (लु ) ।। (ऋ. २११०७।६ ) ६७७ प्र तु द्रव परि कोश नि पीद नृभिः पुनानो अमि वाजमर्ष । अश्वं न त्या वाजिन मर्जयन्तोऽच्छा वहीं रशनाभिनयन्ति ॥१॥ (ऋ. १८७१) ६७८ स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजना रक्षमाणः । पिता देवानां जनिता सुदक्षौ विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः ॥ २॥ ( ९१८७२ ) ६७९ ऋषिर्वित्र पुर एता जनानामृभुधीरे उशना काव्येन । स चिद्विवेद निहितं यदासामीच्या३५ गुहाँ नाम गौनाम् ॥३॥१० (४) । (ऋ. ९१८७३३) ॥ इति तृतीयः खण्ड ॥३॥ " [३७६ ] (मधु प्रियं दिव्यं ऊधः) मोठे, प्रिय और दिव्यरसको (दुहानः) दुहनेवाला यह सोम (मन्नं सबस्य । प्राचीन यशस्थानपर (आसदत् ) बैठ गया है, उसके बादमें (याजी ) बलवर्षक सोम (नृभिः धोतः) यज्ञ- फर्ताओं द्वारा छाना गया है । यह ( विचक्षणः) विशेषरूपसे निरीक्षण करनेवाला सोम (आपृच्छचं धरण) प्रशंसनीय घको धारण करनेवाले यजमानको (असि) प्राप्त होता है ॥ २ ॥ पर्वतसे सोम यज्ञशालामें लाया जाता है, यज्ञकर्ताओं द्वारा उसका रस निकालकर वह णना जाता है उसके बाद वह यज्ञ करनेवाले यजमानके पास पहुचाया जाता है। [६७ हे सोम । तु (तुमद्रव ) शीघ्र ोडकर आ, (कोश परि निपीद ) कलशमें भाकर भर जा (नृभिः पुनाना ) याजकोंसे छाना जाने के बाद (याज अभि अर्प) हविरूप अन्न होकर रह, (याजिनं असं न ) बलवान् पोडेको जिस प्रकार स्वच्छ करते हैं, उसी प्रकार (त्या मर्जयन्तः ) तुझे शुद्ध करनेवाले ऋत्विज (यहि अच्छ) यज्ञ स्थानके पास ( रशनाभिः) गुलियोंसे तुझे (नयन्ति) ले जाते है ॥ १॥ सोमरस छानकर साफ किया जाता है, घोडेको जिस प्रकार साफ करते हैं, उसी प्रकार सोभरसको साफ करते है, और बावर्मे यशस्थानके पास ले जाते है और यहा उसका हवन करते है। [६७८ (स्वायुधः) उत्तमदास्त्रास्त्रोंसे युक्र (अ-शस्ति-हाशकामाश करनेवाला (वृजना ) उपद्रवोंको दूर परनेवाला, (रक्षमाणः ) रक्षण करनेवाला (पिता) पालन करनेवाला (देवानां अनिता ) देवोंको उत्पात करने- याला (सु-दक्षा) उत्तम बलवान् (दिवः विष्टम्भः) द्युलोकको आधार देनेवाला (पृथिव्या. घरुणः) पृथियोको पारण करनेवाला (देव इन्दुः पवते ) दिव्य सोम छाना जाता है ॥ २ ॥ सोमरस बल और उत्साह मानेवाला होने के कारण ऊपरके विदोषण आलंकारिक रूपसे उसे दिए गए है। ६७९] (विप्र. पुरः एता) मानी और मागे मागे चलनेवाला (जनानां मानः लोगोंका तेजस्वी नेता(धीर उशना ऋषि) पर्यशाली उशना पि है, (स चिस् ) यह ही (आसां गोनां) इन गायोंमें रहनेवाला ( यत् अपीच्यं गुहां नाम ) जो गुप्तरूपसे दूध है, उसे (काव्येन विवेद ) काम्पकी सहापतामे जानता है ॥ ३॥ गोषोंमें जो गुप्तरूपसे रहनेवाला उत्तम दूध है, उसे उशना ऋषित जान लिया और नेता होने के कारण उसे सब मनुष्योंको बताया। यहां तीसरा सण्ड समाप्त हुआ।
प्रथम अध्याय
सामवेदका सुबोध मनुवाद
(५)
..
ए
.
[81
६८. अभि वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः ।
ईशानमस्य जगतः स्वर्टशमीशानमिन्द्र तस्थुपः
॥१॥ ७१३२।१२)
६८१ ने त्याचार अन्ो दियो न पार्थियो न जातोन निष्यते ।
अधान्तो मघवनिन्द्र पाजिनो गत्यन्तस्त्या हवामहे ॥२॥ ११ (यो) |॥
( ७३२३)
६८२ कया नाधिन आ भुवती सदायुधः सा । कया गधिष्ठया वृता ॥ १ ॥ (ऋ. ४।३१।१०
६८३ कस्त्वा सत्यो मदानां महिष्टो मत्सदन्धसः । इदा चिदाजे वसु ॥२॥ ४१३११२ )
६८४ अभी पु णा ससीनामविता जरितॄणाम् । शतं भवास्यूतये ॥ ३ ॥ १२ (टा) ॥
(*. ४३१३)
६८५ ते यो दसमृतीयहं यसोर्मन्दानमन्धसः ।
अमि वसं न स्वसरेषु धनव इन्द्रं गोभिनगामहे
॥१॥
(८८२)
[४] चतुर्थः सपडः ।
[६८०] हे (शूर शूरवीर इन्द्र । (अ-दुग्याः धेनवः हय) न दुही गई गायें जिस प्रकार यछडे के पास
जाती है, उसी प्रकार हम ( अस्य जगतः ईशानं ) इस जगम जपतके स्वामी और ( तस्थुपः ईशानं )स्थावर जगत्के
स्वामी (स्वः दृशं त्वा ) स्वय सभोया दर्शन परनेवाले तुझे ( अभिनोनुमा ) प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥
[६८१] है (मघवन् ) धनयान इन्द्र 1 (स्वावान् ) तेरे समान { थन्यः) दूमरा कोई भी (दिध्यान)
धुलोकमें नहीं है, और (पाधियान) सम्योपर रहनेशला भी नहीं है, (न जातः)न को हुमा यौर (न। अमिप्यते)
न कोई होगा, है (इन्द्र ) इन्द्र 1 (थशायन्तः ) घोडको इच्छा करनेवाले (वाजिनः) धनको इच्छा परनेवाले
(गव्यन्तः) गायकी इच्छा करनेवाले हम (त्या हवामहे ) तेरी प्रार्थना करते हैं ॥२॥
[६८२] (सदा-वृधः) सदा पढनेवाला (चिनः सखा विलक्षण मित्र यह इन्द्र ( कया ऊती) कोन
सोनसे सरक्षणके साधनोंते ( शविष्टया कया वृता) और कोसी क्लिो युक्त होकर (नआभुपत् । हमारे पास
आएगा?||१॥
६६८३] (मंहिष्ठः) महान् ( सत्यः) सत्यकर्म करनेवाला और (मदानां का) आनन्द देनेवालोंमें कौन भला
विशेष आनन्द देनेवाला है ? ( भन्यसा) सोमरस ऐसे आनन्दका देनेवाला है, क्योंकि वह (रढा चित् व आरजे)
सुदृढ रहनेवाले शो पनरो विनष्ट करने के लिए (स्वा मत्सत् ) तुझे उत्साहित करता है ॥२॥
[६८४] (सखीनां जरितृणां) अपने मित्र स्तोताओंकी तू ( अपिता ) रक्षा करनेवाला है, इसलिए (नः)
हमारी (शतं ऊतये ) संकटों प्रकारको रक्षा करने के लिए ( सु अभि भवासि ) उत्तम प्रकारसे संप्यार होकर सामने
स्थिर रह् ॥ ३॥
। ६.५] (स्वतरेषु ) गौशालाभोंम ( यासं धेनवः इब) बछडके पास जिस प्रकार गायें जाती है, उसी प्रकार
(दर) दर्शनीय और ( वतीय) ने हरानेवाले (बलो अन्धसः मन्दानं) पानमें रखे हुए सोमरससे आनन्दित
होनेवाले (चावं इन्द्र) तुम्हारे उस इन्द्रको ( गीमिःनवामहे ) स्तोत्रोंसे हम स्तुति करते हैं ॥१॥
(८) सामवेदफा सुबोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः ३ २२ ३११ २४३१२ . १ २ ३. २२ ३२% २१ ६८६ द्युक्षण सुदान तविपीमिरावृतं गिरि न पुरुमोजसम् । क्षुमन्तं बाजार शतिन५ सहस्रिणं मक्ष गोमन्तमीमहे || २॥ १३ (ही)॥( ८८२) ६८७ नरोभियों विदद्वसुमिन्द्र सवाध ऊतये । घुदायन्तः सुतसोमे अधरे हुवे भरं न कारिणम् ॥ १ ।। । ८६६) ६८८ न यं दुधा वरन्ते न स्थिरा मुरी मदेषु शिप्रमन्धसः । य आरत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम् ॥ २॥ १४ (जु)। (ऋ ८६६२ ) ॥ इति चतुर्थ एण्ड ॥ ४॥ [५] ६८९ स्वादिष्टया मंदिष्ठया पवस्व सोम धारया । इन्द्राय पातवे सुतः ॥१॥ . ९२१११) ६९० रक्षोहा विश्वचर्षणिरभि योनिमयोहते । द्रोणे सधस्थमासदद ॥२॥ (ऋ ९) [६८६ ] (ए-क्ष) लोकमें रहनेवाले ( सु-दान ) उत्तम दान देनेवाले ( तविषीभिः आवृतं ) भनेक सामोसे युक्त और ( पुरु-भोजसं ) बहुत भोजन करनेवाले इन्द्रफे पाससे ( क्षुमन्तं ) पोषण करनेवाले ( शतिनं सहस्रिणं ) संकड़ों और हजारों घनसे युक्त (गोमन्तं घाज ) गायोसे उत्पन्न किए अन्न (मभु ईमहे ) मीन मिले ऐसी इच्छा हम करते है ॥२॥ [६८७ ] हे ऋत्विजो। () तुम (सुतसोमे अध्वरे ) सोमयाग ( तरोभिः । वेगवान् अश्यों के साथ रहने वाले ( विदरसुं इन्द्रं ) धनके दान करनेवाले इन्द्र के लिए (स-याधः ) शत्रुओंसे ( ऊतये ) रक्षणके लिए (वृहत् गायन्तः) बृहत् नामके सामका गायन करो, (भरन) भरण पोषण करनेवाले जिस प्रकार बुलाये जाते हैं, उसी प्रकार ( कारिणं हुवे ) हित करनेवाले इन्द्रको मै सहायतार्थ बुलाता हू॥१॥ ८६८८] (सु-शिम ये ) सुन्दर ठोडीवाले इस इन्द्रको (दु-भाः न परन्ते) दुष्ट शूर असुर भी नहीं हटा सकते, (स्थिराम ) युद्धमे स्थिर रहनेवाले शूर भी इन्द्रको नहीं हटा सकते, (मुर.) मरनेवाले शत्रु भी उसका निवारण नहीं कर सकते, ऐसा ( य:) जो इन्द्र है, वह ( अन्धस. मदे ) सोमरसके मानन्दम (पाहत्य शशमानाय ) अन्वरो स्तुति करनेवाले (सुन्यते जरित्रे ) सोमयज्ञ करनेवाले स्तोताके लिए ( उपथ्य दाता ) प्रासनीय घन देता है ॥२॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ !! [५] पचम खण्डः। [ ६८९ ] है ( सोम ) सोम । (इन्द्राय पातवे ) इन्द्र के पाने के लिए (सुतः) निकाला हुआ यह सोमरस है, ( स्वादिया मदिष्टया धारया) स्वादिष्ट और मानन्द बढानेवाली घारासे ( पवस्प) छनता जा ॥ १ ॥ [२०] (रक्षो-हा) रामका नाश करनेवाला (विश्व-चपणिः)सव मनुष्योंका हित करनेवाला (अयोदते द्रोणे) सोनेके बर्तन में छनकर (सधस्थं योनि) पासके यज्ञस्थानमें ( अभि आग्दत् सोमरस जाकर बैठ गया ॥ २॥ सोमरसको छानकर मोनेके बर्तन में भर दिया ।
प्रथम अध्याप] सामवेदका सुरोध गनुवाद ६९१ वरिवोपातमो सयौ म रहिष्ठो वृत्रहन्तमः । पपि राघो मघोनाम् ॥३॥१५ (पौ)। (भा. ९९३) ६९२ पवस्व मधुमचम इन्द्राय सोम ऋतुविचमो मदः । महि द्युक्षतमा मदः ॥१॥ (ऋ ९१०८1१) ६९३ यस्य ते पीत्वा वृपभो पायतेऽस्स पीत्वा स्वदिः । स सुमकेतो अन्यक्रमादिषोऽन्छा बाज नशा ॥२॥ १६ (५)। (३.९२१०२) ६९४ इन्द्रमच्छ सुता इमे वृपणं यन्तु हरयः । श्रुष्टे जावास इन्दवः स्वपिदः (ऋ.९।१०६१) ६९५ अयं मराय सानसिरिन्द्रीय पयते मुत। । सोमो जैत्रस्य चेतति यथा बिदे ।। २ ।। (ऋ.९।१०६२) ६९६ अपेदिन्द्रो मदेप्या ग्राम गृणाति सानसिम् । च वृपणं भरत्समप्सुजित ॥३॥ १७ (कि) (ऋ ९१०६।३ ) ३.१३ [६९१ ] हे सोम (परियो-धातमः) पन देनेवाला (मंहिष्ठः ) महान् (धृत-हन्तमा ) शत्रुका युरो तरह नाश करनेवाला ( भुवः) है, इसलिए ( मघोनां राधः पर्षेि ) धनवान गनुके पास रहनेपाले धन हमें दे ।।३।। [ ६९२) हे सोम! हू (मधुमत्तमः) मत्यन्त भोया ( ऋतु-पित्-तमः) कर्म करनेके मार्गको उतम रोतिसे जाननेवासा ( माद |क्षनमः । महान् तेजस्वी और (मदः) आनन्द देनेवाला है इसलिए ( इन्द्राय मदः । इन्द्रको मानार के लिए (पवस्त्र) छनकर सप्यार हो ॥१॥ । ६९३ ] हे सोम ! (पमः ) बलवान पद ( यस्य ते पीत्वा ) जिस से पोकर ( घृपायते ) अधिक यज्वान् होता है, ( स्वः-विदः अस्य पीत्वा ) मात्मतानी भी इसे योकर आनन्दित होता है । ( सु-प्र-केतः सः ) उतम मानी वह इन्द्र (इपः) के अप्नोंको (एतशः चार्ज अभि न) जिस प्रकार घोडा मग्राममें जाकर विजय प्राप्त करता है, उसी प्रकार ( अभ्यममीत् ) गपने अधिकारमें करता है ॥ २॥ ८६९४ 7 (ऐ) शोन हो ( जातासः इन्दवः) तम्पार हुए, धमकनेवाले और ( स्व:-विदः हरयः इसे सुताः) शान बढानेवाले हरे रंगरे में सोमरस (वृपणं इन्द्रं अच्छ यन्तु ) बलवान् इनके पास शीघ्र पहचे ॥१॥ [६९५] (भराय ) संग्रामके समय ( सानसिः ) सेवन करनेके योग्य ( अयं सुतः) यह सोमरस (इन्द्राय क्षरति) के लिए जाना जाता है, यह ( जैत्रस्य चेतति ) विजयी इन्द्रको उत्साहित करता है, (यथा विदे। जैसा कि सब लोग जानते हैं ॥२॥ [६९६] (अस्य इत् मदेषु) इस सोमके मानन्दमें ( मानसिं ) सेदन करनेके योग्य ( ग्राभं गृभ्णाति ) पञ्षको पकडता है, नाव ( अप्सुजित् इन्द्रः ) पानी के प्रवाहाँको जीतनेवाला इन्द्र (वृषणं धनं च ) मलवान् वनको (संभरत् ) पारण करता है ॥ ३ ॥ • २ [साम.हिन्यो भा.२] सामवेदका सुबोध अनुवाद [ তনয়া ११२ १ त ६९७ पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नये । अप श्वानश्नथिष्टन सखायो दीर्घजिहथम् (3. ९।१०११) ६९८ यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः । इन्दुरश्वो न कृत्व्यः ॥२॥ (ऋ ९।१०।२ ) दुरोपममी नरः सोमं विश्वाच्या धिया । यज्ञाय सन्त्वद्रयः ॥३॥ १८ (यि) ॥ (8 ९.१०११) अमि प्रियाणि परत चनोहितो नामानि यहाँ अधि येषु वर्धते । आ सूर्यस्य पहनो वृहन्नधि रथं विष्वश्चमरुद्विचक्षणः ॥१॥ (ऋ. ९/७५11) '७०१ ऋतस जिह्वा पवते मधु प्रिय वक्ता पतिधियो अस्या अदाभ्यः । दधाति पुनः पित्रोरपीच्यांनाम तृतीयमधि रोचनं दिवः ॥२॥ (३.९१७१२) ६९७ ] है ( सखाय ) मित्रो ! (घ. पुरोजिती ) तुम अपने आगे विजय है ऐसा समशर ( अन्धसः सुताय ) अग्नरूपी इस सोमरसते ( मादयित्नबे ) आनन्द देनेवाला होने के कारण आनेवाले ( दीर्घ-जिय ) सम्यो जोमवाले कुत्तको ( अपदनथिएन ) दूर करो ॥१॥ कुत्ता सोमरसको न घाटे ऐसी सावधानी बरतो। [६९८] (सुतः फुत्दयः) सोमरस यसका सहायक है, । यः इन्दु ) यह सोमरस ( पावफया धारया ) दाद्ध होनेवाली धारासे ( अश्मन) जसे घोडा जोरसे दौडता है, उसी प्रकार (परि प्रस्यन्दते ) ना जाता है ॥२॥ सोमरस यतका सहायक है, वह शुद्ध होने के लिए छलनीसे जाना जाता है, और नीचे के बर्तन अखण्ड पारसे छनता जाता है, घोग जैसे दौडता है, उसी प्रकार यह नोचेके वर्तनमें वेगसे गिरता है। ६९९.1(नर') ऋत्विज लोग (दुरो) दुष्टोंका नाश करनेवाले (तं सोमं अभि ) उस सोमपे पास जाकर (विश्याच्या धिया ) सबके सरक्षण करनेको इटिस (साप) गजको ( अन्नयः सन्तु ) भावरसे देखने पाते हों ॥ ३॥ [७००] (चमो-हित ) अमरूपसे हित करनेवाला सोम ( प्रियाणि नामानि अमि पयते ) सयको तुप्त करनेवाले पानीको पवित्र करता है, (येषु) जिन जलोंमें ( यहः अधिवर्धते ) मह महान मोम पड़ता है। (पृथतः सूर्यस्य) महान सूर्यो (विष्य धिरयं स जगह नानपात रपर (पत् विपक्षण कामदार यह पहला और सर्व द्रष्टा सोमपाता है॥१॥ सोम साप है, वह पानी मिलाया जाता है, तब वह पानी पवित्र परता है। पानी मिलाने पारण सोमाय मरता है, गारमें यह सूर्य प्रमाणामें रखा जाता है। [७०९] (मनस्य-जिना) मानों यह पारी भीम ही है, ऐसा यह ( पत्ता) समपरवाला सोमाली मिय मधु पयते) निप भोर मौज रस ना जाता (भस्य धियः पति । स मारम पार पह लोग नीरो (म-दाभ्यामरसनेमाल है, मौर(पुत्रः पजमानरूपी यह पुत्र (पित्रो' भपीच्य) मातापितारे मामरोन जानगंगाते (दिया रोचनं ) लोरर प्रान नेपाले (एतीयं नाम ) तीसरे मामले (मधि दधाति) पारगरता है ॥२॥ सोमरस धाने जाने के समय उसरासर होता है, इसलिए वह मोम बसा है।यह मरवाया गानेगला मारा है, यसरे साल सशरारी" सोमवानो" यह तोमरा मान मिलना। मर एप माम, स्याहारमें हमरा माग भोर या परनोरम " सोमानी " यह तीसरा नाम मे मिला है।
प्रथम अध्याय
सामवेदफा सुबोध मनुवाद
३१ ३.१
७०२ अब पुतानः कलशा अचिक्रदन्नृभिमाणः कोश आहिरण्यये ।
अभी तस दोहना अनूपताधि लिपृष्ठ उपसो वि राजसि
।। ३ ॥ १९ (दि)॥
(ऋ. ९१७२१३).
॥ इति पञ्चम. खन्डः ॥ ५ ॥
२३१२
७०३ यज्ञायज्ञा वो अप्रये गिरागिरा च दक्षसे ।
प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रिय मित्रं न शसिपम् ॥१॥ (ऋ६४८१)
७०४ ऊों नपात रस हिनायमसयुदर्शिम इम्पदातये ।
सुरद्वाजे वविता सुवध उत त्राता तनूनाम् ॥२॥२० (यु)(ऋ. ६११८।२)
७०५ एयू पुत्राणि सेऽन इत्थेतरा गिर । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥१॥ (ऋ.६।१६।१६)
७०६ या च ते मनो दक्षं दधम उचरम् । तत्र योनि कणवसे ॥२॥ ( ६।१६।१७ )
६.७०२ (युतानः) तेजस्वी सोम (नृभिः ) विनों द्वारा (हिरण्यये कोशे ) सोनेके कलश (येमानः)
जाना जाता हुआ (कलशान् अचिकदर ) कलसे में दान करता हुआ भरता है, इस समय ( ऋतस्य दोहनाः ) पज्ञ
करनेवाले ऋत्विन सोको ( ममि भनूपत ) स्तुति करते हैं, है सोम 1 (त्रि-पृष्ठः ) तीन सव!में ( उपसः अघि)
उप.पालके प्रकारे थार (विराजसि ) चमकता है ॥३॥
सोमरस ऋत्विजों द्वारा सोनके पात्र छाना जाता है, वह शब्द करता हुआ नीचे के बर्तन में गिरता है । उस
समय ऋत्विज इस सोमके स्तोत्र कहते हैं । दोनों ही सवनोंमें यह सोमरस समकता है।
॥ यहां पाचवां खण्ड समाप्त हुआ।
[६] पष्ठः एण्डः।
८७०३है स्तुति करनेवाले ऋविमो ! (42) तुम (यशायमा ) प्रत्येक यश ( दक्षले अग्नये ) प्रदीप्त
होतेवाले अग्निको ( गियगिरा ) अपनी वाशीसे स्तुति करो। (च) और (धयं) हम भी ( अमृतं जातवेदसं)
अमर मानी अग्निको (प्रिय मित्रं न ) प्रिय मित्र के समान (प्रशंसिपम् । प्रासा करते है ॥ १॥
[७०४] (ऊर्जान-पातं । वल कम न करने वाले अग्निकी हम स्तुति करते हैं, (हिना सः अयं )निश्चपसे
वह यह अग्नि ( भस्मयुः ) हमारा हित करनेवाला है, ( हव्य-दातये दाम ) देवोंको हवि पठ्धानेवाले इस अग्निको
हम हवि देते हैं, यह ( याजेपु अविता ) युद्धोंमें हमारी रक्षा करनेवाला भोर ( वृध.) हमारो पद्धि करनेवाला
(भवत ) होवे, ( उत ) और (तनून जाता मुत् ) हमारे शरीरोंका रसग करनेवाला होवे ॥२॥
[७०५] है आने ! (पहि ) आ, (ते गिरः) तेरे स्तोत्रोंको हम (इस्था सु प्रमाणि) इस प्रकार उत्तम
रोतिसे कहते हैं. (उ) और ( इतराः) इसरे सोत्रोंको भी कहते हैं, उन्हें दू मुन, ( पभिः इन्दुभिः) इन सोम-
रस (पर्धासे ) तू बढ़ता है ॥ १॥
६७०६(ते मनः) तेरा मन ( यत्र का च) जहाँ वहीं है, (तत्र ) वहां ( उत्तरं दक्ष ) घेष्ट मलका
(दधसे) तू स्थापन करता है, उसी प्रकार वहाँ ( योनि कृणवसे) घरका भी निर्माण करता है ॥ २ ॥
" य . a १ १ ३२ इन्द्रवाहा स्वबिंदा सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः ७.७ न हि ते पूर्तमक्षिपशुपनेमानां पते । अथा दुवो वनवसे ॥३॥ २१ (यी)। (ऋ. ६।१६।१८) ७०८ चयमु त्यामपूयं स्थूरै न कचिदन्तोऽवस्यवः । बजि चित्ररहवामहे ॥ १॥ ८॥२१॥१) ७०९ उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्वकाम यो धृपद । यामिध्यवितारं यत्महे सखाय इन्द्र सानसिम् ॥२॥ २२ (च)॥ (. ०२११२) ७१० अधा हीन्द्र गिर्वण उप वा काम ईमहे समृगह । उदेव मन्त उदभिः ॥१॥ ( 5. ८९७) ७११ वाले स्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि । यावृध्वास चिदद्रियो दिवेदिये २॥ (१९८८) ७१२ युआन्ति हरी इपिरस्य गाययोरौ रथ उरुयुगे वायुजा । 1॥ ३ ॥ २३ (यि) ॥ (ऋ. १९८९) ॥ इति पष्ठ. सण्ड || ॥ इति प्रथमप्रपाठके प्रथमोऽध ॥१॥इति प्रथमोऽध्यायः॥१॥ [७०७ । हे भग्ने । (ते पूर्त अक्षिपत् ) तेरा तेज नेत्रोंको हानिकारक (नदि भुवर ) नहीं होता, हे (नेमानां पते ) नियमान रहने वाले मनुष्यों के स्वामिन् ! (अथः दुवः ) या हमारी सेवा ( वनयसे ) स्वीकार ॥३॥ [७०८) है ( अपूर्ण चनिन् । अपर्व यजधारी इन्द्र! (भरतः ) तुझे सोमरस देनेधाते और (अयस्यया । अपने घरको माले हम ( चिनं त्वं उ) विलमण और श्रेष्ठ सुशे सहायता के लिए { पच्चित् शूरं न) जोसे कोई बड़े भावनीको बुलाता है उसी प्रकार ( हयामहे ) बुलाते हैं॥१॥ ७०९) हे (इन्द्र) इन्द्र ! ( कर्मन् ) कर्म करते हुए (ऊतये ) सरक्षणरे लिए ( उपचमाम ) तेरे शरा हग माते है। (यः ) जो (पत् ) शत्रुओंका पराभव करनेवाला (युवा उमा) तरुण और शूरवीर है ऐसा (ना) हमारे पास मा, (ससाया) हम तेरे मित्र (मानसिं अपितारं त्या इत् ) सेवा करने योप्प और संरक्षण पानेवारे तुज ही सहायता के लिए (यवृमहे) स्वीकार करते है, (दि) यह सभीको मालूम है ॥ २॥ १०) हे ( गिर्वणः इन्द्र) हे स्तुत्य इन्द्र! (अधा हि ) यव त्या पामे ईम) तेरी अपनी याप्त करने के लिए प्रार्थना करते है, और ( उदा ग्मन्तः उदभिः इव) पानी लेजानेवाले मनुष्य जिस प्रकार पासीमे संसते है. उसी प्रकार हम ( उप सरगम तेरे पास आते है।।१॥ पानी लेआनेवाले जिस प्रकार एक दूसरेपर पानी फेंगसर सेलते है, उनी प्रकार अपनी हालेर लिए हमारे पाम जाते है, वह हमारी इम्रा पूर्णरेगा, जो भी इच्छा हम इन्द्ररोसे है, उरो पहरापरता है। [१] (अद्रियः पूर) हे दशधारी र इन्न ! जिरा प्रल (घार्ण) गमागे ( अट्यामिा यन्ति) नधियो या तो प्रकार स्तुति करनेवासे ( ग्रहाणि स्तोत्र गा-मार (यात्रा चित्) महालेर स्या दिपेदिये दुरो प्रतिक्षित याने ३ ॥ २] (रिस्य) tax ( ऊरयुगे । महान् नभाशाले (3) महान रप (. पादाको टोनेवा, (पयो-युठा) मोग ना नानगले (पा-विदः) स्वयं ही मारे पास मारा। (एसोनों गोरे (गापया युंजनि लोको बोलेही जानते है 11॥ ॥ यदां छठया यण्ट समाप्त हुमा । ति प्रथमोऽध्यायः ॥
(१३) प्रथम अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद प्रथम अध्याय इस अध्यायमें इन्द्र, सोम, अग्नि, मित्र, वरुण इत्यादि सामन्यसे युक्त होकर वह हमारी सहायताके लिए हमारे देयोंकि मंत्र है। इन देवताओंका गुणवर्णन इस अध्याय में पास मावे ? किया है । देवताओंके ये गुण उपासक अपने अन्दर धारण ८ यं मुशिमं दुधाः न वरन्ते (६८८]- उत्तम करें मोर बहार्वे इसलिए यह गुणवर्णन है। अतः यहा पहले शिरस्त्राण धारण करनेवाले जिस इन्द्रको कोई भी दुष्ट शत्रु हम उनके गोंका विचार करते है- हरा नहीं सस्ता। १ शुचि यता [ ६६४ ] - शुद्ध और पवित्र व्रतके ९ स्थिराः यं न यरन्ते [ ६८८]- युद्ध में स्थिर रहन- याले वीर भी जिसे हरा नहीं सकते। माघरण करनेवाले, अपवित्र आचरण कभी न करनेयाले । २ उग-शंसा [६६४]- जिनको प्रशंसा बहुत होती १० मुरःन परन्ते [ १८८]- बप करनेमें कुशल है, सब लोग जिनको प्रशंसा पाते है। का भी जिसका पराभव नहीं कर सकते मारने ३ नमो-वृधा [ ६६४ ] - भाग वढनवाले, अपने पास चतुर शाके यौर मी जिसके आगे स्थिर नहीं रह सकते । बहुतमा सन्न रखनेवाले, नम्रतासे बहनेवाले। १५ देय ! सत्यं पृथु धयाय्यं वृहत् सुवीय नः ४ दक्षस्य महा राजधः ६६४ ]- अपने सामसे अच्छ विवाससि [ ६६२ ]- यह तू महान् पशस्वी प्रचार विराजमान होते हैं । अपनी स्वयंको महानतासे वो तेजस्वी सामन्मं हमें सरलताने मिले ऐसा कर । होता है। १२ वाजेपु अविता [ ७०४ ]- युद्धम हमारा रक्षण ५ कता वृधा [ ६६५]- यसको बढानेवाले, सत्य- करनेवाला। मार्गसे बढ़नेवाले, मत्यको बढानेवाले। १३ वृधा-भुवत् [७०५ ]- हग बढानेवाला। ६ ऋतस्य योनौ सीदतं [६६५]- पनके स्थानपर १४ तनूनां माता भुवत् १७०४ - हमारे शरीरोंका बैठते है, सस्पकर्म को करने के लिए तैयार रहते हैं। संरक्षण करतेयाला होवे। ७ फपिच्छदा [ ६७१ 1- ज्ञानी जिसको स्तुति करते १५ ते मनः यत्र कच, तत्र, उत्तरं दक्षं दधसे, है । दूरवों लोग जिसका बखान करते हैं। योनि कृणधसे [७०६] - तेरा मन जहाँ रहता है, वहां तू मिय और वरुणके उपर्युस गुग है, अब इन्द्र गुण थेप्टबल बदाता है, और अपना घर निर्माण करता देखिए- १६ दस्म कतीपहं यसोः अन्धसः मन्दानं इन्द्र १वृपणः इन्द्रः [९]- बलवान् इन्द्र है। नयामहे [ ६८५]- दर्शनीय शत्रुको हरानेवाले, सोमरससे २ सदा-वृधः । ६८२]- हमेशा बढनेवाला, महान् आनन्दित होनेवाले इन्द्रको हम स्तुति करते हैं। होनेवाला। १७ सखीनां ययिता [६८४]- मित्रोंका रक्षण ३ चित्रः ससा ( १८२]- अद्भुत और दहा मिर, करनेवाला । सहायक। १८ नः शतं ऊतये सु माभ भयासि [ ६८४]- ४ अप्सु जित् [१९६]- अन्तरिक्ष में विजयी होनेदाला, हमारे संकड़ों प्रकारसे रक्षण करने के लिए तू उत्तम प्रकारसे पानीके प्रवाहोंको जीतकर अपने अधिकारमें रखनेशला। तैय्यार रहता है। ५ यजं संभरत् [१९]- पत्र धारण करके १९ स-बाधः ऊतये [६८७ - साया करनेवाले नहता है। शानुनोंसे रक्षण करने के लिए तय्यार रह । ६ सानसिं ग्राम गृभ्णाति [६९६]-हार्योम पकड़ने २० हे अपूयं यजिन् । अवस्या भरन्तः वयं योग्य धनुषको हायमें धारण करके लड़ता है। चित्रं त्यां हयामहे १७०८-हे अद्वितीय शास्त्रधारी इन्द्र! ७ फया उती कया शचिष्टया घृता, नामुवत् अपने संरक्षणको इच्छा करनेवाले हम विलक्षण शक्ति धारण [६८२]- कौनसे संरक्षणके सापनोंके साथ और कोनसे करनेवाले तुझे अपने संरक्षणके रिए बुलाते है।
सामवेदका सुवोध अनुवाद [ उत्तराचिंका २१ कर्मन् ऊतये उप चकाम ! ७०९]- हम फर्म २३ स्व.विदः{६९३]-शान बढानेवाला, जाननेवाला। करते हुए अपने सरक्षणके लिए तेरे पास आते है। २४ सु-प्र-केतः [ ६९३ ]- उत्तम ज्ञानी । २२ यः धृपत् युवा उग्रः नः चक्राम [७०९ ] २५ हरयः इन्दवः [६९४]- हरे रगका सोम । यह शत्रुओंका पराभव करनेवाला तरुण उग्रवार हमारे पास २६ चनोहितः [ ७००- अन्तरूपसे हितकर । हमारे सरक्षणके लिए आवे। २७ धुतानः[७०२१-तेजस्वी। २३ सानसिं अवितारं त्या वृमहे [७०९- विभयो २८ विचक्षणः [६]- विशेष ज्ञानी । सरक्षक तुझे हम परण करते हैं। २९ वाजं अभि अर्प [ ६७७ ]-बस बना। २४ गिर्वणः इन्द्र ! त्या कामे ईमहे, उप ससृग्महे ३० प्र-द्रव] ६७७ ]- दौड, वेगसे जा। [७१० ]-हे स्तुतिके योग्य इन्द्र! हमारी इच्छा पूर्ण ३१ पुनानः [६७७ ]- साफ होनेवाला, साफ किया जानेवाला। करने के लिए हम तेरो प्रार्थना करते हैं। अव सोमके विशेषण देखिए- ३२ स्वायुधः [६७८]- उत्तम शस्त्रास्त्रोंको पासमें रखनेवाला। १देवः [ ६५२-तेजस्वी, चमकनेवाला। ३३ अशस्ति-हा[६७८-अप्रशस्तोंकानार करनेवाला। २ देवयुः [ ६५२ ]- देवोंके साथ रह्नवाला । ३४ जना [ ६७८]- उपद्रवकारी शभोंको दूर ३ राजन् । ६५३ ]- तेजस्वी, चमकनेवाला। करनेवाला। ४ दविद्युतत्या रचा ६५४]- चमकनेवाले तेजसे ३५ रक्षमाणः पिता [६७८]-पिताके समान रक्षा करनेवाला। ५ शुकः सोमः [ ६५४ ] धौर्यवान् सोम, स्वच्छ। ३६ सु-दक्षः [ ६७८]- उत्तम दक्ष । ६ वाजी [६५५]- बलवान् । ३७ पृधिव्या धरुणः '[६७८]- पूपियीका धारण ७ हितः [६५५]- हितकारक । करनेयाता। ८ हेतृभिः हिन्वानः [ ६५५ - स्तोताओं के द्वारा ३८ विप्रः [ ६७९-शानी। प्रशसित होनेवाला। ३९ जनानां पुर पता[१]-सोगकि मागे घसने. ९कविः[१५६-शाती। वाला, नेता। १. संजगमान:५६]-तेजस्वी, मिलकर रहनेवाला। ४. धीर[६७१/- धैर्यमालो योर । ११ दिवा [ ६५६ ]- तेजस्यो, धमरुनेवाला। ४१ सत्यः [ ६८३ - सत्य कार्य करनेवाला । १२ रक्षो-हा। १९०]- राक्षसों को मारनेवाला। ४२. कृल्या १९८]- वर्म करनेवालेया सहाया। २३ विश्व-चर्षणिः । ६१. ]- सब देखनेवाला। ४३ दुरोपं सोमं [६९९]- दुष्टोंरा नाश करनेवाला १३ मंहिछः [६९१]- महान् । सोम है। १५ वृत्रहन्तम' [६९१]- घेरनेवाले शायुको मारने में अब अग्निके विशेषण देखिए- प्रवीण। १ अर्जन पात: (७०४-बलको मनपरनेवाला। १६ परियो-धा-तमः ९१- अधिक धन देनेवाला। इस अप्यायम ये देवताओंके गुण वणित है। उन्हें उपासा २७ मधुमत्तमः (९२]- अत्यन्त मोठा। अपने अन्दर धारण करें और यहा तपाइन मोंगे मात १८ मतुवित्तमः [ १९२]- मोंगे उत्तम प्रकारसे होवे, इसलिए इन गोरा यहाँ वर्णन गिया है। परनमें प्रवीण इससे मनुष्यको उन्नति हो सरती है। इन गुणोंमें पुष्ट १९ महि घुलतमः । ९९२-महान सेनाको । गुण दारे, मनिके, पदणारे और मित्रो है, और कुछ २० पदः ६९२]- आनर बहानेवाला। सोमरे । पाहे देवता से हों या छोटे, उनरे गुोरो २१ पृषमः [ १९३]- बलवान् । ओर ताप रसना पाहिए, और देवाय प्रारला पाहिए। २२ तस्य पीत्या पृगयते । १९३]- उस पीनेसे दूसरेरी और प्यान न देना चाहिए, पह नियम यहाँ बस बहता है। पासनीय है।
प्रथम अध्याय ] सामवेदपा सुघोध अनुवाद मुक्त, मुद्ध करो। धन प्राप्त करना यनको उसे हराकर हम अपने पास ले बायें ऐसी इच्छा यहां मनुय्यको उन्नतिके सब कार्य धनसे होते हैं। पनके बिना है। शत्रुको हराने का बल अपनेमें हो यह इसका उद्देश्य है । कुछ नहीं हो सकता। धनका उचित उपयोग करने से मनुष्म अन्दर होने चाहिए यह भाव यही है। घनके साथ - साथ यल, सामथ्र्य, सूरवीरता मादि अपने गुण धन्य होता है । इस प्रकार यह धन मनुष्यको सुख प्राप्त करानेवाला है । इस घनफे सम्बन्धम इस अध्यायमें इस देवों के लिए सोम प्रकार कहा है- सोमरसपो तंप्यार करके पहले देवोंको अर्पण करना १ घु-क्ष ६८६]- लोकमें रहनेवाला, तेजस्यो, घुलोकर्म पाहिए फिर याजकोंको पोना चाहिए। यह दिखाने के लिए जो कुछ भी है, यह तेजस्वी है, उसी प्रकार पन तेजस्यो है। कहा है- २ सु-दानुं । ६८६ - उत्तम दान देने योग्य। १ इन्द्राय मदः परस्य ६९२]- ३ तविषीभिः यातं [ ६८६]- अनंक सामपंसि २ इन्द्राय वरुणाय मरद्यः परिसय ७३]- जिसके कारण अनेक प्रकारके सामयं प्रकट होते है। इन्द्र, वरण, मरुत् मादि देयोंके लिए सोमरस छानकर ४ पुरभोजसं [६८९ 1- बहुतसा अन्न देनेवाले । यदि धन पासमें हो तो बहुतामा भान प्राप्त हो सकता है। ३ सः अस्मयुः, हव्यदातये दाशेम [७०४ ]- वह ५ क्षु-मन्तं [ ६८६ ] बहुत अमरो युक्त । भनि हमारा हित करनेवाला है। उसे हल्य देने के लिए हम ६ शतिनं सहस्रिणं । १८६ ]- सैकडों और हजारों हवनीय द्रव्य देते है। सामोसे युक्त । ७ गोमन्तं वाज १८७] - गापोंसे युक्त अन्न देनेयाला। ४ पुरोजिती [ ६९७ )- तुम ऐसा समझो कि जय तुम्हारे सामने है । अपनी पराजय कमी न हो इतना बल पनो पे गुण इन मंत्रों में रहे है, ये रतनीय है- अपने में होता पाहिए, जरा भी भय न होना चाहिए । तभी ८मानुपाणां विश्या द्युम्नानि आ अर्यः सिपासन्तः विजय निश्चित है। पनामदे । १७४ - मनुष्योंके लिए उपयोगी सब धनोंको प्राप्त करके तेरी सेवा करने की इच्छा करनेवाले हम तेरी सोमरसके पास कुत्ता न आवे स्तुति करते है। सोमरस जहां रखा जाता है, उस जगह कुत्ता म आवे, ९ रत्नधा देयः हिरण्ययः ऋतस्य योनि आसी- इतनो सावधानी रखनी चाहिए । इसलिए कहा है-- दसि [ ६७५ ]- रत्नोंको धारण करनेवाला यह सुवर्णमय १ मुताय मादयित्नये दीजिदयां अप अथिष्टन देव यजमें अपने स्थानपर बंदता है। यह देव रनोंको धारण [६९७]- यह सोमरस आनन्द देनेवाला होने के कारण करता है । यह अपने भक्तोको धन देता है। लम्बी जोनवाला कुत्ता पास न आवे । कुतको बहुत बूर १० हे इन्द्र ! अश्यायन्तः गव्यन्तः वाजिनः त्या करना चाहिए। वह सोमरसके पास न पहुचे, ऐसा प्रबन्ध हयामहे । ६८१1-हे इन्द्र ! पोडे, गाय और पन अयवा करना चाहिए। अन्नको इच्छा करनेवाले हम तेरी प्रार्थना करते हैं। हमें स्तुतिसे लाग ११ हढा चित् वसु आरजे त्या मरसता ६८३ ] इन्द्रादि देवोंकी स्तुति यज्ञमें मुख्य होती है। देवोंको स्तुति सुदृढ रहनेवाले शधुओंका पन विनष्ट करने के लिए यह सोम सुनें और देवोंके समान हों, यह स्तुतिका उपयोग है। तुझे प्रसन्न करता है। १नः प्राणि उप शृणु [६६७ }- हमारे स्तोत्रोंको १२ जरिने उपाय दाता [ ६८८]- स्तुति करने पाससे मुत। ब्रह्म शब्दका अर्थ है, "शान" देनेवाले बालोंको प्रशंसनीय धन देता है। स्तोत्र । महान होनेको शिक्षा देनेवाले स्तोत्र मनुष्योंको महान् १३ मयोनां राधः पर्षि [ ६९१ - धनवान् शत्रुके होनेको शिक्षा देते हैं । देवोंके गुण सुनकर उन्हें अपने अन्दर पास रखे हुए पन हमें दे। धारण करके उन्हें बढाने से मनुष्य महान होता है। प्रशंसनीय इस प्रकार धनके विषय इस अध्यायमें कहा है । शत्रुके होता है । यह सब दे। । " सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराचिंका २ मघवन् । त्वाचान अन्यः दिव्यः न, पार्थिवः और उन्हें शिक्षित करता है । इस विषयमें इस प्रकार न, न जातः न अनिष्यते [ ६८१ 1- है इन्द्र । तेरे वर्णन है- समान दूसरा कोई भी धुलोको अथवा पृथ्वीपर न हुआ है, १ तरोभिः इन्द्रं वृहत् गायत [ ६८७ }- घोडक न होगा। ऐसे अद्वितीय हम स्वयं भी बनें, यह स्तुतिका साथ रहनेवाले इन्द्रको बहत् नामका साम सुनाओ। "तरु" आशय है। का अर्थ यहा शोन बोडनेवाले पोडे ऐसा है। युद्धोंमें जिन ३ यशायझा वक्षसे अग्नये गिरागिरा [ ७०३ ]- घोडोंका प्रयोग होता है, वे घोडे इन्द्र के पास रहते है। प्रत्येक यज्ञमें चतुर और बलवान् अग्निकी स्तुति करो। जो २ ब्रह्मयुजा केशिनी हरी त्या आ वहता ६६७/- दक्ष और बलवान होता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है, शब्दोंका मकेत होते ही रयमें जुडजानेवाले, सुन्दर भयालवाले इसलिए कर्तव्यमें चतुर और बलवान् बनें । ऐसा जो होगा, दो घोडे इन्द्रको रथसे ले जाते है । घोडौंके अयाल उतम उसको सब जगह प्रशसा होगी । होते हैं, इसलिए उन्हे यहा " केशिनौ " याहा गया है । देवताओंकी स्तुतिरो ऐशा लाभ होता है ३ इपिरस्य उरुयुगे उरौ रथे इन्द्रवाहा बचोयुजा यज्ञ स्थर्विदा हरी गाथया युंजन्ति [ ७१२]- प्रगतिशील, यज्ञ देवोंको सन्तुष्टि के लिए है। इन्द्रके महान् जुएवाले रयम शब्दोंके सकेतसे ही जुड़ जाने- वाले इन्द्र के दोनों घोडे स्वयं ही अपने स्थानपर जानेवाले, ऋतुसंधिषु व्याधिर्जायते। स्तोत्रके कहते हो जुड़ जाते है । मातुसंधिपु यशाः नियन्ते ॥ ( गोपथ ब्रा ) इस प्रकार इन्द्र के घोडे है । उनको केवल इशारेकी ही ऋतुओंके सन्धिकालमें हवा बिगडती है, इस कारण दोष जरूरत है, शेष सारा काम घे स्वयं ही कर देते है। इतने वे दूर करने के लिए यज्ञ किए जाते है। में यज्ञ ओषधियोंसे होते हैं, अर्थात् जिन रोगोंके उत्पन्न होने की सम्भावना होती होशियार है । यहा यह बताया है कि घोडोको इस प्रकार शिक्षित करना चाहिए। है, अयचा जो रोग शुरू हो गए है उन रोगोंको दूर करने- वाली औषधियोंके सूर्णसे हवन किए जाते है । इससे हवामें सोम रहनेवाले रोगबीज नष्ट हो जाते है, और वायु शुद्ध सोमरसका यजमें बहुत महत्त्व है। यह ऊचे पर्यतसे लाया होती है। जाता है। देखिए- १ त्वा समिन्द्रिः पृतेन वर्धयामसि [ ६६९]- तुयो १ नमः आगतं वरेण्यं सुतं [ ६६९]- आकाशसे रामिषाओं और गायके पीसे हम प्रदीप्त करते है । यसमें लाया गया यह महान् सोम है, उसका रस निकाला है। पायका घी ही डालना चाहिए, और दूसरे पीसे काम नहीं हिमालयके ऊचे शिखरसे यह सोम लाया गया है । ते अन्धसः दिधि उचा जातं [६७२- तुम मन- २ ययि प्ठ्य ! बृहत् शोच [६६१]- हे तरुण अग्ने । रूप सोमको उत्पत्ति ऊचे छुलोकमें हुई है। यहाँ धुलोकका तू अधिक प्रकाशित हो, अधिक जल । अर्थ है हिमालयका अशा शिखर । ३हव्यदातये आयाहि । ६६०-हवनीय द्रव्योको देवोंके पास पहुचाने के लिए आ। अर्थात् तुझमें हम जो भी ऐसे चुलोवरूपी दुग्धाशयसे यह दुहकर निकाला गया है । ३ मधु प्रियं दिव्यं ऊधः दुहानः [६७६]- मोठे प्रिय हवनीय रम्य बाले, उन्हें न देयोंको प्राप्त करनेके लिए उन्हें देयोंके पास पहुचा। ४ दिवः विएम्भः देवः [६७८]- धुलोकको आधार ४ नः गन्यूर्ति घृतैः उक्षतम् [६६३ ]- हमारी गायें देनेवाला यह दिष्य सोम है । जहां रहती है, यहा ायके घोका सिंचन होकर यह स्थान इस प्रकार सोमका स्थान ऊचे हिमालयका शिक्षर है। पवित्र हो। गायके पुतके हवनसे स्थान पवित्र होता वहांसे यह लाया जाता है, और उसका रस निकालकर है, इसना विपरो नष्ट करनेका सामयं गायो पोमें है। उसरो यज्ञ किया जाता है। ५ उग्रं सत् शर्म गहि श्रका भूमि भाददे । ६७२) इन्द्र के घोई - उग्रता और धीरता बढानेवाले मुखदायी सोमररारुपी पन्द्र के घोरे प्रसिद्ध है। इन्द्र पोझेदी नरत सुभारता है महान भन्न भूमिपर आगये है। सोम स्वर्गले पृथ्वीपर लाया चल सक्ता। २ प्रथम अध्याय सामघेदका सुबोध अनुयाद (१७) ܚܙ जाता है। सोमरस यश-प्राप्तिके उत्कृष्ट साधन है। सोमयज्ञ शब होता है, यह पमरता है। इस सब वर्णनको आलं. करनेवालेको महान् पर प्राश होता है। शरिक मापा थेदमें वहा है। सोमरसको पानी में मिलाना सोम छानने के समय सामगान १ सोमः पुनानः, मापः वसानः धारया अति जय गोमरस पशमें छाना जाता है, उस समय उदगाता J६७५]- सोमरसको छानने से पहले पानी में मिलाया जाता है, सामका गायन करते हैं। एक तरफ सामगान पलता है, फिर यह छाननीरो नोचैके बर्तन में जाना जाता है। यह नी. दूसरी तरफ सोमरस छाना जाता है। के बर्तन में पार पाधकर पड़ता है, तब उसका शम्द होता है। १हे ना! पवमानाय इन्दवे उप गायत [१५१]- २ धीतयः भयावशन्त । ६५८]- हापकी अगुलियो हे पाजको ! सोमरस छानते हुए तुम उसरे पास ठपर सोमको मारवार दवाकर रस निकालनेको इच्छा करती है। सामगान करो। अन्छी तरह दबाये बिना उससे सारा रस बाहर नहीं २ ऋतस्य दोहना अभि अनूपत, त्रिपृष्ठः उपसः निवलता। अघि विराजसि [७०२]-- यज्ञ करनेवाले ऋत्विज सोमकी ३ यहिः पच्छ रशनाभिः नपन्ति [ ६७७ 1- यज्ञ- स्तुति गाते हैं । तीनों सपनोंमें उप फालके यार हे तोम ! स्थानके पास अगुलियोंसे पफाडकर ऋत्विज लोक सोमको अधिक समकता है। लेजाते है। सोमरसमें दूध मिलाना छलनी १ देवयु देवाय मधुना पयः अभि अशिथयुः १ अन्यये बारे मधुचुत पोश अच्छ असनं १ ६५२ - देवको देने के लिए तैयार रिया गया तोमरस [ १५८ ]- भेंडके यालोको बनी छलनीसे मोठा रस भरनेके मोठे गायके दूध के साथ मिलाया जाता है। बर्तन में छानता हूँ। २ रचाः शुक्रा मोमागवाशिरः [६५४- तेजस्वी भेडफे पालोको बनो छलनीसे वह रस छाना जाता है। सोमरस गायके दूध, मिलाया जाता है। ३ विप्रः पुर एता जतानां ऋभुः धीरः ऋषिः सोमरस छानना गोनां अपीय गुह्य नाम काव्येन विवेद [ ६७९]- १ दिया पवस्थ [६५६ - दिव्य प्रकाशसे युक्त गानी, अप्रणी, मनुष्योंका नेता, धर्मशालो ऋषि गायोंमें जो होकर छनता जा चमकता हुआ धनता जा। गुप्तरूपसे दूध है, उसे अपने शानसे जानता है। २हे सोम ! इन्द्राय पातवे सुतः स्वादिष्टया इस प्रकार गरयके दूध छाना हुमा सोमरस मिलाया मदिछया धारया पवस्व [ ६८९]- हे सोम! इन्द्र के जाता है, और बादमें उसे देवोंको अर्पण किया जाता है, लिए स्वादिष्ट और आनन्दकारक पाराले छनता जा। उसके बाद उसे दूसरे लोग पीते है। ३ अयोहते द्रोणे सघस्थं योनि अभि भासदत् इस प्रकार इस प्रथम अध्यायमें वर्णन है । उगे पाटकगण ६६९०]- सोनेके पाधर्म पास ही पनशालामें सोमरस घंटा है। ध्यानपूर्वक पढ़ें, और धोष प्राप्त करें। ४ चनोहिता प्रियाणि नामानि अभिपरते, येषु सुमापित या अधिवर्धते [७०० ]- अन्नरूप हितकारक सोम सबको १हे राजन् ! न गये, अर्यते, जनाय ओपधिभ्यः तुत करनेशले पानी में मिलकर छना जाता है, इस कारण शम् ! ६५३ ]- हे राजन् ! गाय, पोडे, मनुष्य, और यह महान् सोम घडता जाता है । भाषधि हमारे लिए कल्याणकारी होवें। ५ ऋतस्य जिला धक्का मधु पवते, अस्य धिया २ हितः घाज अक्रमीत्, यथा धनुषः सीदन्तः पतिः अदाभ्यः [७.१]- गानों यह यज्ञकी जिल्हा ही [ ६५५]-हित करनेवाले वोर युद्धभूमिपर जावे, जिस ऐसा गारद करता हुमा मोठा, यसका पालन करनेवाला और प्रकार योद्धा युद्ध में जाते है। म दवनेवाला यह मोमरस धनता जाता है। ३ सस्तये दशे दिवा पयस्य [ ६५६ ]- सबका इस प्रकार सोमरस छाना जाता है, उस समय इसका बल्याण हो, इस दृष्टिस तैयमे युक्त होने के लिए शुद्ध हो। ३ [ साम. हिन्दी मा.२] (१८) सामयेदका सुयोघ अनुयाद [उत्तरार्चिकः बहत पशवाले ४ श्रयस्ययः सर्गाः अएक्षत [६५७]- ययस्यो २० वाजी विचक्षणः नृभिः धौता यापृच्छयं धरणं कामं उत्पन्न करें। अर्पसि [ ६७६ - बलवान, जानो, योर नेताओं द्वारा ५ धीतया अयावशन्त [६५८]- अगुलियां कार्य करने निर्दोष किया गया, प्रशासनीय कमाको करता है। की इच्छा करती है। २१ स्वायुध.अ शस्ति हा जनारक्षमाणः देवानां ६ मत्तस्य योनि आ अग्मन् [ ६५९ ]- सत्यके मूल पिता जनिता सु-दक्षः देवः पवते [ ६७८]- उत्तम कोन्द्रमें जा। सत्यके अथवा यज्ञके केन्द्र में जा। शास्त्रास्त्रोको धारण करनेवाला, यात्रुओंका नाश करनेवाला, ७ हृदयदातये भायाहि [ ६६०]- अभ्रदान करनेके उपद्रवोंको दूर करनेवाला; संरक्षण करनेवाला, उत्तम लिए आ। व्यवहार करनेवालोका पालफ, चतुर हो शुस होता है। ८ बर्दिपि नि सत्सि [६०]- अपने आसनपर बैठ। २२ विमः पुर एता, जनानां कभुः धी। ऋषिः ९ हे यविष्ठ्य वृहत् शोच [ ६६१ ]- है तरण ! काव्येन विवेद { ६७९ - ज्ञानी, नेता, अर्ग सलनेयाला, तू विशेष तेजसे युक्त हो । विशेष तेजस्वी हो। धर्यशाली, इष्टा अपने ज्ञान से सब जानता है। १० हे देय ! पृथुअयाव्यं वृहत् सुवार्य नः अच्छ नोनुमः । ६८० - इस सब स्यावर जंगमके स्वामी और २३ अस्य तस्थपः जगतः ईशानं स्वदृशं अभि विवाससि ६६२]- हे देव! महान् सामय हमें प्राप्त हो ऐसा कर । मात्मवर्गीको हम प्रणाम करते है। ११ शुचिवता उरशंसा नमोवृधा वक्षस्य मह्ना २४ हे इन्द्र ! स्वावान् अन्या दिव्यः पार्थिवान जात. न जनिप्यते [६८१]-हे इन्द्र ! तेरे समान घुलोक राजथः [ ६६४ ]- शुद्ध निर्दोष यतका भाचरण करपे, और पृथ्वीपर कोई भी दूसरा न हुआ न होगा। तेरे समान पहुत प्रशसित होकर अन्नको समृद्धि करके सामर्यको महानतासे दही है। विराजमान हो। १२ ऋताधा ऋतस्य योनौ सीदत [६६५]- सत्य, शचिया पता न. आ भुवत् [ ६८२ ] - हमेशा बढ़ने- २५ सदायुधः चित्र ससा कया ऊत्या कया मज्ञ कर्मका सवर्धन करके यसरे स्थानपर बंट। पाला उत्तम मित्र भला कौनसी सरक्षणकी शक्तियोंसे मुक्त १३ नः ब्रह्माणि उपटणु [६६७]- हमारे ज्ञान होकर हमारी सहायताके लिए हमारे पास आएगा बढानेवाले स्तोत्रोंको पास आकर सुन । २६ मंहिष्ठ सत्य मदानां का ६८३]- महान्, १४ ब्रह्मापा त्या युजा हवामहे [६६८]- हम मानी सत्यका आचरण करनेवाला आनन्द देनेवाला है। तुझे मित्रताके नाते सहायताके लिए बुलाते है। २७ नः शतं ऊतये सु अमि भवासि [ ६८४]- १५ यक्षः चेतनः जिगाति [ ६७० - यज्ञ चेतना हमारा सैकड़ों प्रकारसे सरक्षण करनेके लिए उत्तम उत्पन्न करके तुम्हें प्रेरणा देता है। सहायता करनेवाला है। १६ पास्य जूत्या कविच्छदाणे [६७१-यतको २८ वस्म ऋतीपह अ-धसः मन्दानं इन्द्रं गीर्भिः प्रेरणासे प्रेरित होकर जानके छन्द पारण करनेवालोंको में नयामहे । ६८५ ]- सुन्दर, शत्रुभोंका पराभव भरनेवाले, स्वीकार करता हूँ। अनसे आनन्दित होनेवाले इन्द्रको पाणीसे हम स्तुति करते हैं। १७ उग्नं सत् महि श्रवः शर्म [ ६७२]-तेरे उप्रता २९ धुक्षं सुदा तविपीभिः आवृतं पुरुभोजसं और वीरताको बढानेवाले महान यश पाल्याण करनेवाले है। भुमन्तं शत्तिनं सहनिणं गोमन्तं वाजमक्ष ईमहे १८ मानुपाणां विश्वा झुम्नानि आ अर्यः सिपा. ( ६८६)- तेजस्वी उत्तम दान करनेवाले, अनेक सामोरो सन्तः बनामहे । ६७४ - मनुष्योंको इष्ट सब तेजस्वी युक्त, बहुत भोजन देनेशाले अन्नोंसे युक्त, सकों और हमारों धनोंको प्राप्त करके हम तेरी सेवा करनेको इच्छावाले तेरो प्रकारके गायोंसे उत्पन्न होनेवाले अन्नकी प्राप्ति शीघ्र हो, सेवा करते है। ऐसी इच्छा हम करते है। १९ रत्नघा हिरण्ययः देवः ऋतस्य योनि सी ३० सवाधः ऊतये इन्द्रं वृहत् गायत [ ६८७]- दसि ( ६७५]- रत्नोंको धारण करनेवाला, सोनके समान उपद्रव करनेवाले शत्रुओले सरक्षण करनेवाले इन्द्र के लिये तेजस्वी देव यज्ञ के स्थानपर बैठता है, यज्ञ करता है। बृहत् नाम सामका मान करो। १ प्रथम अध्याय सामवेद्का सुयोध अनुवाद + ३१ भरं न फारिणं हुवे [६८७ - भरण पोषण ४७ घृधः भुषत् [७०४ ]- यह हमारी शक्ति करनेवाले के समान कार्य करने वाले मै बलाता हूँ। महानेवाला है। ३२ सु.शिप्रं दुधाः स्थिराः मुम्न परन्ते[६८८] - ४८ तनूनां पाता भुवत् ७०४ ]- यह हमारे उत्तम सफा संपनेपाले इन्द्रका प्रतीकार दुष्ट, स्थिर, मोर पसेरोंकी रक्षा करनेवाला है। मूर्स शानु नहीं कर सकते। ४९ ते मनः यत्र फ्य च तत्र उत्तरं दक्षं दधसे ३३ जरिये उपथ्यं दाता [६८८]- स्तुति करनेवालेको ६७०६] तैर मन लहाँ कहीं भी हो, उत्तम मतको पारण यह प्रशंसनीय पन देता है। करता है। ३४ रक्षोदा विश्व-चर्षणिः [६९० - राक्षसोंका ५० योनि कृणवसे । ७०६]-तू अपना घर तैयार वध करनेवाला सब मनुष्यों का हित करता है। करता है ३५ परियोधातमा वृत्रहन्तमा मघोनां राधः पर्षि ५१ ते पूर्त अक्षिपत् न हि भुवत् [ ७०७]- तेरा [ ६९१]- अधिक पन देनेवाला, गोको मारनेवाला तू तेज आखोंको हानि पहुंचानेवाला नहीं है। गदुओंके धन धौनकर हमें दे। ५२ हे अपूर्व्य यजिन ! भरन्तः वयं अवस्यवः ३६ मधुमत्तमः ऋतु-वित्तमः महि घुक्षतमः [६९२] चित्रं त्या हवामहे [७०८ ]- है अदितीय पनवारी - अत्यन्त मोठा, पनको विधि उत्तम रोतिस जाननेवाला इन्द्र ! हम तो हयनीय पाय देते हैं, अपने साक्षणके लिए महान् तेजस्वी है। विलक्षण शक्तिवाले तुझे सहायता के लिए बुलाते है। ३७ स्या-विदः सु-प्रतापः अभ्यक्रमीत् [६९३] ५३ अवितार या धवृमहे । ७०९/- रक्षण करनेवाले -आत्मज्ञानी विशेष विद्वान् शाके असपर अपना अधिकार तुझे हम मुलाते हैं। स्थापित करता है। ५४ कर्मन् ऊतये उप चझाम [७०९- कर्म करते ३८ जैत्रस्य चेतति । ६९५ - विजय प्राप्त करनेका हुए संरक्षणके लिए हम तेरे पास माते है। उत्साह देता है। इस प्रकार इस अय्यायमें मुभापित है। पाठकोदो सरलतामे ३९ इन्द्रः ग्राभं धूपणं वने च गृभ्णाति [६९६]- सपा मामाए इसलिए इनका अर्थ योढा विस्तारसे दिया है। यह वीर इन्द्र धनुष और मलयुक्त पत्रको धारण करता है। उपमा १० पुरोजिती [ ६९७ }- अपने सामने विजय है, ऐसा इस प्रपम अध्यायमें मागे दी हुई उपमायें आई है- ४१.नर दुरोपर्स तं विश्वाच्या धिया भद्रयासन्तु १ हितः चाजी या अक्रमीत् यथा वनुषः सीदन्तः [ ६९९ - नेतागण, दुष्टोंवा नाश करनेंदाते उस धोरका [१५५ ]-हित करनेवाला सोम पज, उसी प्रकार जाता समका संरक्षण करनेवालेको बुद्धिसे आदर करें। है, जिस प्रकार घोडा वीर युद्धभूमिमें जाते है । ४२ विवंचं अधिर विचक्षणः आरुहत् {७००] २ अन्त न[ ६५७ )- घोडे जसे घुसालके बाहर -चारों ओर जानेवाले रथपर विशेष ज्ञानी बैठा है। जाते हैं, उसी प्रकार “पवमानस्य ते सर्गाः अक्षत ४३ अस्य धियः पतिः अदाभ्यः [ ७०१- इस शुद्ध होनेवाले सौमको धारा नीचे के बर्तन में पड़ता है। फर्मका पालन करनेवाला दवाया नहीं जा सकता। ३ घेनयः अस्तं न [६५९-गाय जिस प्रकार अपने ४८ यज्ञायशा दक्षसे गिरा भगृतं प्रशसिपम् बाईमें जाती है, उमी प्रकार " इन्दवः समुद्र कलशं न [७०३]- प्रत्येक यसमें बल प्राप्तिके लिए अपनी पापीसे अच्छ भा अग्मन् " सोमरस पानी के बर्तन सोपे जाते हैं। अमर देवकी स्तुति करो। ४ वाजिनं अभ्यं न, त्या मर्जयन्तः [ ६७७ ]- ४५ ऊजों न-पातं (७०४]- बत्तको कम न करनेवालेको बलवान् घोडेको जिस प्रकार धोते है, उसी प्रकार सोमरसको में प्रशंसा करता हूँ। साफ करते है। ४६ वाजेषु अपिता [v०४ }- युद्धोम वह हमारा ५ अदुग्धाः धेनवः इच, गगतः तस्थुषः ईशानं रक्षण करनेवाला है। स्वदेशं त्वा अभिनोतुमः [ ६८० -बिना इहो हुई पाय समा " (२०) सामवेदका सुयोध अनुराद उत्तराचिका . जिस प्रकार अपने बछडे के पास जाती है, उसी प्रकार त्यावर -घोडेके समान सोम धार बांधकर आना जाता है, वर्तनमें जगमो ईयर तेरे पास नम्र होकर हम भाते है। जाता है। ६ ससरेषु वासं धेनच इव, दर्स इन्द्रं गीर्भिः [७.३]- प्रिय मित्रके समान अमर अग्निको में प्रासा १० प्रिय मित्रं न, अमृतं जातवेदसं प्रशसिपम् नवामहे [ ६८५ ]- गौशालामें गायें जिस प्रकार अपने करता हूं। पछडफे पास जाती है, उसी प्रकार दर्शनीय इन्द्रके पास ११ स्थूरं न, चित्र त्या हवामहे [७०८]- असे अपनी बाणोसे स्तुति करते हुए हम जाते हैं। कोई महान मनुष्यको बुलाता है, उसी प्रकार विलक्षण, श्रेष्ठ ७ भरं न, कारिणं हुवे [६८७]- भरणपोपण करने- तुझे हम अपनो सहायताके लिए बुलाते हैं। बालेको जिस प्रकार आवरसे युलाते है, उसी प्रकार कर्मशील १२ उदा इच ग्मन्त उदभिः वा उप सहन्महे पुरुषको हम बुलाते है। [७१०]-पानी लेकर जानेवाले जिस प्रकार पानीसे ८ एतशः वाजं अभि न, सु प्रति इपा अभ्य- खेलते हैं, उसी प्रकार हम तेरे साप खेलते हैं। प्रमीत् [ ६९३ ]- घोडा जिस प्रकार पुदमें विजय प्राप्त १३ हे अद्रिय शर! वाण. यन्याभिः वर्धन्ति,चा. करता है, उसी प्रकार उत्तम कानी इन्द्र सोमासरपी अग्नको जस स्थपिद दिदिये । ७११-है, यवाणी पद। प्राप्त करता है और उसपर विजय प्राप्त करता है, और जिस प्रकार समुद्रको मदिया सताती हैं, उसी प्रकार बढने. उसे पी लेता है। वाले तुझको हम रोग स्तुतिसे बढाते हैं। ९ अश्वन, इन्दु धारया परि मस्यन्दते [ ६९८ ] इस प्रकार ये उपमायें इस अध्यायमें बाई है। प्रथमाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मनसख्या ऋग्येवस्थान ऋषिः देवता पवमान सोम गायत्री " " . " " ६५५ " . ९।११०३ ९।६४९८ ९।६।१९ ९६४३० ९६६०१० ९।६६।११ " " " असित काश्यपो देवलो पा असित काश्यपो देवलोमा मसित वाश्यपो रेषलोया कश्यपो मारीच पश्यपो मारीच काश्यपो मारीच शत पंखानस शत पंखानस पात खानप्त (२) भरद्वाजो शाहरपत्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य भरद्वानो याहस्पत्य विश्यामित्रो गाचिन विश्वामित्रों गाथिन 11 " . " গলি " " " ६१६१० ६।१६।११ ६१६१२ ३॥६५॥१६ ६१६९।१७ " मित्रावरुणो U ९६४ " " (२१) प्रथम अध्याय] सामवेदका सुयोघ अनुयाद एव: मंत्रसंध्या मित्रायणी गायत्री शादेवस्थान ३।६।१८ ८१७१ દ્વારકા ८1१७३ ६६६ इन्द्रः " " ऋषिः विश्वामित्रो यायिनः जमदग्निर्वा इरिम्यिठिःशयः हरिबिठिकाण्यः इरिम्बिठिः काव: विश्वामित्रो गाथिनः विश्वामित्रो गापिन: विश्वामित्रो गायिनः " " इन्द्रानी ६६७ ૬૬૮ ६६९ ६७० ६७१ " " " शश ३।१२।३ " " पवमानः सोमः ९६१।१० " ૬૭૨ ६७३ ६७१ ६७५ अमहोपररागिरसः समहीपुरागिरसः अमहीपुरांगिरसः सप्तपयः " " ५३११११ ९।२०७४ प्रगायः(विषमा यहती, समा सतो बृहतो) " " त्रिष्टुप ६७६ ६७७ ६७८ ६७२ " ९१७५ ९८७१ ९८७ ९५८७१३ सप्तर्षयः उशनाराय्य: उमानाकाव्यः " " उदानाकारक (४) वसिष्ठो मंत्रापणिः ७.३०२२ प्रगायः( विषमा यहती, ममा पता बहती) " गायत्री " ६८९ " " ७३१२३ ४।३११ ॥३१॥२ ॥३१३ દ્વાર यसिष्ठी मंत्रावणिः यामदेवो गौतमः वामदेवो गौतमः वामदेवो गौतमः नौधा गौतमः " ६८४ ६८५ पावनिचत् प्रगायः(विषमा बहती, समा सतो बृहती) " " " " " दादा द६६१ दावार नौघा गौतम कलि: प्रागाथः कलिःप्रागापः " " ૧૮ पवमानः सोमः गायत्री " ६९० ११०१ ९१२ ९१३ ९१०८१ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः मयुच्छन्दा वश्वामित्रः मधुच्छन्दा वश्वामित्रः गौरवौति माक्त्यः ६९२ काकुमा प्रापाथः (विवमा शाकुम्, रामा सतो यहती) 2 १९०८२ पौरखीति शास्त्या सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तचिका (२२) देवता मनसख्या पवमान सोम उष्णिक ६९४ " ग 11 " ६९७ ऋग्वेदस्थान १।१०१ ९।१०। ९१०६३ ९।१०११ ९।१०११ ९।१०११३ ९७५१ ९७५१ १७५३ अनुष्ट्रप गायत्री ऋषि अग्निश्चाप निश्चाक्षुप अग्निश्चाक्षच अन्धीगु श्यावाश्वि अन्यौगु श्यावाश्वि अधोग स्यावाश्यि कविर्भार्गव कविर्भार्गव कविर्भार्गव (६) शयर्हिस्पत्य (तृणपाणि ) " जगती ७०० ७०१ " " अग्नि ७०३ ६४८१ प्रगाय ( विषमा बहती समा सतो यूहती) " ७०४ गायत्री " ७०५ ७०६ ॥ " Bટાર ६१६१६ ६१६१७ ६।१६१८ द९११ आयुर्हिस्पत्य (तृणपागि) भरद्वाजो बार्हस्पत्य भरद्वाजो बाहस्पत्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य सोभरि काण्व " ७०७ इन्द्र काकुभ प्रगाय (विषमा कुकुप्, समा सतो बहती ) " सोभरि काय " ७०९ ७१० ७११ ७१३ दा९८७ दा९८८ " ककुप उणि पुरउष्णिा नमेष मागिरसः नमेष आगिरस नमेघ मागिरस ८९८९ द्वितीय अध्याय] (२३) सामवेदका सुयोध मनुवाद अथ द्वितीयोऽध्यायः मथ प्रथमपाठके द्वितीयोऽधी ॥१॥ [१] (१-२२) १, ४ धुतकक्षः सुगमो या आगिरः; २,4,१३.१५ पसिष्ठो मंत्रावणिः ३ मेधातिथिः काण्वः; प्रिपमेष- श्वागिरः ५इरिम्बिठिः कावासोदी काका ७ त्रिशोकः काण्यः विश्वामित्रो गापितः १.मधुच्छन्दा वश्वामित्रः, ११ शनःशेष आजोगतिः; ,१२ मारदः काण्वः, १६ अयत्सारः काश्यपः, १७ (१) नशेष भाजी- गतिःस देवरातः कुत्रिमो श्वामिनः १७(२-३) मेष्यातिथि, काव. १८(१,३) असितः काश्यपो देवलो वा १८(२) अमहीयुरागिरराः, १९ त्रित आप्रयः; २७ सप्तर्षयः (१ भरद्वाजो बार्हस्पत्या, २ काययो मारीचः; ३ गोतमो राहगण , ४ अत्रिभौमः, ५ विश्वामित्रो गायिनः, ६ जमदग्निर्गिवः, ७ वसिष्ठी मंत्रावणिः); २१ वाव आत्रेयः; २२ ( १.२) अग्निश्चाशुषः, २२ (३) प्रजापतिर्वश्वामित्रो पाध्यो वा ॥२-१२ इन्द्रः १३ अग्निः, १४ उपा., १५ अश्विनो १६-२२ पवमानः सोमः ।। १(२-३ )-११, १६-१९; २१, गायत्री, १२, २२ (१-२) उणिक, १३-१५, २० प्रगायः= (विषमा वृहतो, समा सनोव्हती); (१), २२ (३) अनुष्टप। ३ "३" . २a २ २४२३ ७१३ पान्तमा चो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायव । विश्चासाहशतक्रतुं महिष्ठं चर्पणीनाम् ॥१॥( १९२१) ७१४ पुरुहूत पुरुष्टुतं गायान्या३५ सनश्रुतम् । इन्द्र इति नवीन ॥२॥(ऋ. १९२२) ७१५ इन्द्र इन्नो महोना दाता वाजाना नृत। । महाअभिश्वा यमन ।। ३ ॥१(वा)। (ऋ.८१९२१३) ७१६ प्रव इन्द्राय मादन हर्यश्वाय गायत । सखायः सोमपाने ॥१॥(8. ७/३१३१) प्रथमः खण्डः। [७१३ 1 (चः अन्धसः आपान्तं । तुम्हारे द्वारा दिए गए सोमरूप अन्तका पान करनेवाले, (विश्वा साह) सव शभाका पराभव करनेवाले ( शत-ऋतुं) सैकडों प्रकारके कर्म करनेवाले (चर्पणीना-मंदिष्ठं) मनुष्यों महत महान् ( इन्द्र अभि प्रगायत) इन्द्रको स्तुतिका गान करो।" [७१४ ] (पुरु-हतं ) बहुत लोग सहायताके लिए जिसे बुलाते हैं, पुरुष्टुतं ) बहुत लोग जिसको स्तुति करते है, (गाधान्यं ) जो स्तुति करने के योग्य है, (सन-श्रुतं ) सनातन कालसे को प्रसिद्ध है, (इन्द्र इति प्रचीतन) उम पद्धको इस प्रकार स्तुति करो॥२॥ [७५] (न्तुः ) सबको चलानेवाला (महोना याजानां दाता) महान् धन और बनको देनेवाला ( महार इन्द्रः रत् अभिः) महान् इन्द्र ही हमारे सामने भाकर (ना) हमें ( आ यमत्) पन आदि देवे ॥३॥ १ नृतु:-- रावको नचानेवाला, सबको चलानेवाला। २ अमि:-:--सामनेसे देखनेवाला। [१६] हे (सखायः) मित्रो ! (वः) तुम (हर्यश्वाय) घोडौंको पास रखनेवाले (सोम-पाने) सोम पौनेशले इन्द्रको मादन मगायत ) आवाव देनेवाले स्तोत्र गालो। १ हर्यश्वः (परि-अश्वः) लाल घोडे जिसके पास रहते है।
(२४) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ उत्तरार्चियः २३ 9 १ ३२३ 3 ३१२ ३७१३ ३२३ ७१७ शसेदुक्थप सुदानव उत यथा नरा । चकमा सत्यराधसे ॥२॥ (ऋ ७।३।२ ) ७१८ त्वं न इन्द्र वाजयुस्त्वं गव्युः शतक्रतो । स्वहिरण्ययुर्वसो ॥३॥२ (गो)॥ (ऋ.७३११३) ७१९ वयमु स्वा तदिदाँ इन्द्र स्वायन्तः सखायः । कण्या उपथभिर्जरन्त ॥१॥ (फ. ८।२।१६ ) ७२० न घमन्यदा पपन वजिन्नपसो नविष्टौ । तदु स्तोमश्चिकेत ॥२॥ ( ८।२।१७) ७२१ इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वमाय स्पृहयन्ति । यन्ति प्रमादमनन्द्राः ॥३॥ ३ (पा)॥ ( २०१८) ७२२ इन्द्राय मदने सुतं परि धोभन्तु नौ गिरः । अमर्चन्तु कारवः ॥ १ ॥( ८१९२।१९ ) ७२३ यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त संसदः । इन्द्र र सुते हवामहे ॥ २ ॥ (ऋ. ८०९।२०) [७१७ ] (उत) और है मित्रो ! (सु-दानवे) उत्तम दान वेनेवाले, ( सत्य-राधसे ) सत्यतासे अपने पास धन रखनेवाले इन्द्र के लिए (उपथ) स्तोत्रका गान करो, (नर ) स्तुति करनेवाले दूसरे लोग जिस प्रकार स्तुति परते है, सो स्तुति सुम (पुक्षं शंस) तेजस्यो रौतिसे करो, (इत् चरम) और हम भी उसी स्तुति करते हैं॥२॥ [७१८] है (इन्द्र) इन्द्र ! (त्यं नः घाज-युः हमें अन देनेवाला हो, है (शत-प्रतो) भनेष प्रारो पराक्रम करनेवाले इन्द्र ! (त्वं गव्युः ) व गाय देनेवाला हो, है (घसो) सपरो बसानेवाले इन्न (त्यंदिरण्ययुः) तू सोना देनेवाला हो ॥३॥ [१९] ! (त्यापन्तः ) तुझे प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले (सरसापः) हम मित्र (तदिव.) उसी प्रयोजन के लिए (त्या) तेरी स्तुति करते है, (उ) और (कण्याः) मण्यगोचमें उत्पन्न होयाले लोग भी (उपथेभिः जरस्ते । स्तोत्रसि स्तुति करते हैं ॥१॥ [७२०] हे (पजिन ) वनपारो इन्ध ! ( अगसः ) यश पौमसे (मर नविष्ठी) तेरे गये पतम (थन्यत् घेम्) में तेरे स्तोत्रके सियाय दूसरे स्तोत्र (ना-पपन) गहूँगा ही महो। (तय इत् उ) तेरी ही (स्तोत्रः चियता स्तोत्र स्ततिला जानता हूँ॥२॥ [७२१] (देयाः) देवगण (सुन्यन्तं इच्छन्ति) पोमयत करनेवालेसे प्रेम करते है. (म्यानाय न पर यन्ति) मातमीसे प्रेम महीरते, (मतदाः) परिश्रमी देव (प्रमाई यन्ति) परम आदि पाले सोगको प्राप्त . [७२२] (मदने दाय) भारदरापर सोमरो का रवाले हमारे लिए (मुर्त ) गोपरग तम्पार नेपाल (न: गिर परिष्टोमन्तु हमारी पापी उराशी स्तुति करती है, (कारया ) रतो (म मर्चन्तु। मुतिो पोप सोगरी स्तुति ॥ [७२३] थिम्मिन) मिण हमें (पिश्याश्रिया मधि) मारो बोभा एती है, मोर (मासंगरारगि) सिरी हनुम पारे सात ऋविरते हैं. उस () गरो (गुने दयामदे) गोमया हम समान है।
द्वितीय अध्याय
सामवेइका सुबोध अनुवाद
७२४ त्रिकद्रुकेपु चेतनं देवासो यज्ञमनन । तमिर्धन्तु नौ गिर ।। ३॥ ४ (ला)॥
(१९२२)
॥ इति प्रथम खण्ड ॥१॥
[२]
७२५ अयं त इन्द्र सोमौ निपूतो अधि यदिप । एहोमस्य द्रवा पिव ॥ १॥ ( ८१७११)
७२६ शांचिगो शाचिजनाय रणाय ते सुतः । आखण्डल प्रहूपसे ॥ २ ॥ ( ८1१७॥१२ )
७२७ यस्तै मृङ्गपो णात्मणपात्कुण्डपाय्यः । न्यसि दध आ मनः ॥३॥ ५ (दि)।
(ऋ. १९१३)
७२८ आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्र ग्रामर सं गृमाय । महाहस्ती दक्षिणेन ॥१॥ ( ८1८१।१ )
७२९ विद्या हि त्या तुविकूमि तुविदेणं तुवीमघम् । तुविमात्रमवाभिः ॥ २ ॥ ( ८८१।२ )
७३० न हि त्या शूर देवा न मासो दित्सन्तम् । भीम न गां वारयन्ते ॥ ३॥ ६ (के)॥
(.०८१३)
[७२४] (देवा ) सब देय (वि-कटुकेषु? यज्ञके तीन दिनगें (चेतनं ) उत्साह बढानेवाले यज्ञका (अत्नत)
विस्तार करते है। तं इत् } उसीको (न. गिरः वर्धन्तु ) हमारी वाणी प्रशंसा करती है ॥ ३॥
यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ।
[२1द्वितीयः खण्डः।
[७२५] हे ( इन्द्र ) इन्द्र ! (ते } तेरे लिए ( अयं सोमः) यह सोम ( याही अधि वेदोपर (निपूतः )
जाना जाता है, (मस्य एहि ) इसके पास आ (द्रय) शोध आ, और ( पिर ) उसे पो॥ १॥
[७२६] (शाचि-गो) सामर्यवान् किरणों से युक्त और (शाचि-पूजन ) शक्तिशाली होने के कारण पुगे
जानेवाले, (आ-सण्डल } शाओंको तोडनवाले है इन्द्र | (ते रणाय ) तुझे सुख हो इसलिए (भयं भुत.यह रस
संय्यार किया है, इसलिए (प्र हूयसे ) तुझे युलाते हैं ॥ २॥
[७२७] (शृंगा-वृपा-न-पात् ) किरणोंके विस्तारको राकुचित न करनेवाले इन्ध (ते प्रणपात्) तेरा
सहायक ( यः कुण्डपाययः) कुशपाय नामका मो सोम-पानका यज है, (अस्मिन् मनः या नि दः) उसमें अपना
१*गः-वृषः-न-पात - किरणकि प्रसारको कम न करनेवाला । प्रकाशको जो फैलाता है।
२ कुण्ड-पाय्य:- जिसमें बड़े वर्तनसे सोम पिया जाता है ऐसा यज्ञ ।
[७२८] हे इन्द्र! (महा-हस्ती) बड़े हाथोंवाला तू (ना) हमारे लिए (भु-मन्तं चिन नाम ) तेजस्वी,
विलक्षण और स्वीकार करने के योग्य धन (दक्षिणेन सं गृमाय ) हाय हायसे धारण कर, धन देनेके लिए हापोंमें पन
[७२९] हे इन्द्र ! (तुविकूर्मि)मनेक पराकम करनेवाले (तुषि-देणं ) देने योप्प महतसे धनको अपने पासमें
रखनेवाले (तुषि-मघं ) महान धनवान् (तुवि-मात्र ) महान् आकारवाले ( अयोभिः) संरक्षणके अनेक सायमोंसे
युवत (त्वा) तुझे (विन हि हम जानते है ॥२॥
[७३०] हे (शूर ) योर इन्द्र ! ( दित्सन्तं त्वा } नेको इन्छा करनेवाले तु ( देवाः ) देव और (मास)
मनुष्य भो (न पारयन्ते किसी प्रकार हटा नहीं सकने, जिस प्रकार ( हि भीमं गां न ) भपकर बैलगे कोई हटा नहीं
४[शाम, हिन्दी भा.२]
.
मन रुगा ॥३॥
धारण कर ॥१॥
सकता ॥३॥
(२६)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[ उत्तरार्षिक:
J
२
२
B.
२
977
9
३१२
७३१ अभि त्या वृपमा सुते सुत सृजामि पीतये । हम्पा व्यश्नुही मदम् ॥१.। (ऋ. ८।४।२२ )
७३२ मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दमन् । मा की प्राद्विपं वनः ॥२॥
(ऋ ४५/२३)
७३३ इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्त राधसे । सरो गौरो यथा पिच ।। ३ ॥ ७ (या) ।
(४१।२४)
७३४ इदं वसो सुतमन्धः पिया सुपूर्णमदरम् । अनाभयित्रारमा ते
॥१॥ ( २६१)
७३५ नृभिधाता सुवो अभैरव्या पारः परिपूतः । अधो न निक्यो नदीपु ॥२॥ (5. ८।२।२ )
७३६ तं ते यवं पथा गोमिः स्वादुमकर्म धीणन्तः । इन्द्र त्यासित्सधमादे ॥३॥ ८ (थौ) ।।
(मा. दारा)
॥ इति द्वितीयः खण्डः॥२॥
[३]
७३७ इद हान्योजसा सुतरोधानां पते । पिवा वास गिर्वणः ॥१॥ ( ३।११।१०)
[७३१] हे ( घृपम) बालयान् इन्द्र ! (सुते त्या) सोमयाम तेरे (पीतये सुतं अभि सृजामि) पीने के लिए
सोमरस अच्छी तरह तय्यार करता हूँ,(सम्प) तू उससे तृप्त हो, और (मदं प्यनुाह) उस पानन्ददायक रसको पो॥१॥
[७३२] हे दन्द्र ! (त्या) तुरे ( भविष्यवः भूराः) रमणकी इच्छा करनेवाले मूर्ख (मा दमन ) न वयाय,
तेरा { उपहस्वाना मा) उपहास करनेवाले भो तुझे न दवायें, (ब्रह्म-द्वियं ) ज्ञानप्से द्वेष करनेवालेको (मा की घना)
न महायता न कर ॥२॥
[७३३ ] हे इन्द्र ! (इह ) इस पशमें (गो-परीणसं ) गाय दूय से मिला हुआ सोमरस अर्पण करके यामक
{महे राधसे ) बहुत सारा पन प्राप्त करने के लिए {स्या मदन्तु ) तु मानन्दित करने (यथा गीरः सस)
जिस प्रकार मग तालाबपर जाकर पानी पीता है, उसी प्रकार त (पिर) सोमरस पी ॥३॥
[७३४ ] है ( वसो ) निवासक इन्द्र ! (दं मुतं अन्धः ) यह सोमरसहपो अन तू (उदरं सु-पूर्ण) पेट
भरकर (पिय ) पो, है ( अनामयिन् ) निर्भप इन्! (ते ररिम ) तुझे हम सोमरस देते हैं ॥१॥
३५] (नृभिः धातः | पाजकोंसे स्वच्छ किया गया, ( मनः मुतः। पत्थरोसे टकर निकाला गया यह
र अन्या पारेर परिप्तः) भेटके वालोंसे बनो छलनीसे छाना गया है । ( नदीपु सभ्यः न ) नवीमें जिस प्रकार
पोको घोते है, तो प्रकार पानी धोपा हुआ और (निका) छानकर तप्पार किया गया यह रस है ॥ २॥
[७३६ ] है इन्द्र ! (तं से ) वह रस तुसे देने के लिए ( य यथा ) जिप्त प्रकार का पुरोगास बनाते हैं, उसी
प्रकार (गोमि धीणन्तः ) गापके दूध शारिस मिलाकर ( स्यादु अकर्म ) मोग किया गया है । है । इदा!
(स्या अस्मिन् सघमादे) तुओ इस यतमें आनन्द प्राप्ति के लिए बुलाते हैं ॥ ३ ॥
॥ यहां दूसरा सण्ड समाप्त हुआ।
[३] हनीयः खण्डः।
[७३७ ] ( राधानां पते ) है धनपते ! (गिणः स्तुति पोप ! ( भोजमा) बाल गारद (वं
सुतं भनु) इस सोमसा के अनुल होकर (यस्य नु पिय ) इसको पो॥ १॥
(२७) द्वितीय अध्याय] सामवेदका सुरोध अनुवाद २१ 30 . 323 १३.३ ३ न ७३८ यस्तै अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ, तन्वम् । स त्या ममत्तु सोम्य ॥ २॥ (ऋ. ३।२१।११ ) ७३९ प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र नमणा शिरः । प्रबाहू शूर राधसा ॥३॥ ९ पी) ॥ (ऋ. ३१५१११२) ७४. आ स्वेता नि पीदवेन्द्रमभि प्र गायत । ससाय स्तोमवाहसः ॥१॥ (ऋ १२) ७४१ पुरुतम पुरूणामीशानं वार्याणाम् । इन्द्र सोमै सचा सुते ॥२॥ (ऋIR) ७४२ सपा नो योग आ मुवत्स राय स पुरन्ध्या । गमद्वाजेमिरा स नः ॥३॥१० (टी) ।। (ऋ. १३) ७४३ योगेयोगे यस्ता बाजनाजे हवामहे । सखाय इन्द्रमतये ॥१॥ (ऋ ११३०७) ७४४ अनु प्रलस्पोकसो हुवे तुविप्रति नरम् । य ते पूर्व पिता हुये ॥२॥ (ऋ॥३०९) [७३८ ] हे इन ! (ते यः ) तेरे लिए यह सोम (स्वधा अनु मसत् ) अन्नके समान है, ( सुते ) इस सोम पत्तम त (तन्वं नियच्छ ) अपने शरीरको ले जा, और हे ( सोग्य ) सोमके योग्य इन ! (सः त्या ममतु । वह सोम तुझे आनन्दित करे ॥२॥ [७३९ ] है (इन्द्र ) इन्द्र ! ( सः ते कुश्योः प्राश्नोतु ) वह सोम तेरे कुभियोंमें भरा रहे। ( ब्रह्मणा शिरः) स्तोत्र द्वारा वह तेरे सिरतक-सव शरीरम-पहुंचे, है ( शूर) शूर इन्द! (राघसा वाहू प्र ) पन देने के लिए तेरे बाह भी उसे प्राप्त हो ॥ ३॥ [७४० ] है ( स्तोम-याहसः सखायः ) यन करनेवाले मित्रो । (तु आ पत ) शौन याओ, (निपीदत ) मंठो, मौर (इन्द्रं अभि प्र गायत ) इन्द्रको लक्ष्य करके साम-गान फरो. ॥ १ ॥ [७४१ ] ( सचा) एक जगह बैठकर ( सुते ) सोम यज्ञ ( पुरूनम ) बहुतसे शत्रुओंको हरानेवाल, (पुरुणां यार्याणां ईशानां ) बहुत श्रेष्ठ धनकि स्वामी (इन्द्रं ) इन्दको स्तुति करो ॥२॥ १ पुरु-तम • बहुतसे शत्रुओंका नाश करनेवाला । २ तमा-नाश करनेवाला। ३ चाय- ग्रहण करने योग्य घन । [७४२] ( सघ) वह निश्चयसे ( नः योगे) हमारे पुरुषार्यकै ( थाभुयत् कर्ममें सहायक होदे, (सःराये) यह पन प्राप्त करनेके कार्य ( सः पुरुया । यह बहुत बुद्धि प्राप्त करने के कार्यमें सहायक होवे, ( स. वाजेभिः ना आगमत् ) यह अनके साथ हमारे पास आये ॥३॥ १ पुरं-घी- बहुत बुद्धि, स्त्री। २ योग- अपनी सहायतासे मिले हुए धन, जोडना । [७४३ ] हे ( सखायः) मित्रो ! ( योगे-योगे ) प्रत्येक कार्यके प्रारम्भमें ( वाजे-बाजे ) और प्रत्येक युद्ध (तवस्तरं इन्द्रं ) मस्यन्त बलवान् इन्द्रको ( ऊतये हवामहे ! संरक्षण के लिए बुलाते है । १॥ [७४४ ] (मलस्य मोकसः ) अपने प्राचीन परसे ( तुषि-प्रति ) बहतोंके पास जानेवाले (नरं) नेता इन्द्रको (मनु हुवे ) में सहायताके लिए दलाता हूँ। यते) जिE ( पितापूर्वे हुवे ) मेरे पिताने पहले बुलायाथा ॥२॥ १ प्रत्नस्य ओकसः - इन्द्रका प्राचीन पर यह विश्व है । स्वर्गधाम है। - - * (२८) सामवेदका सुबोध अनुवाद । उत्तराधिका 3 २ 3 3. ३.3 3" ७४५ आ पा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीमिरूतिमिः । वाजेमिरुप नो हवम् ॥ ३॥ ११ (ला) ॥ (प्रा. ११३०१८) ७४६ इन्द्र सुतेषु सोमेषु ऋतु पुनीप उक्थ्यम् । विदे वृधस्य दक्षस्य महाहि प. (ऋ.११) ७४७ स प्रथमे व्योमनि देवाना सदने वृधः । सुपारसुश्रवस्तमः समप्सुजित ॥२॥ { १२) ७४८ तमु हुये वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम् । मवा नः सुन्ने अन्तमः सखा वृधे ॥३॥ १२(चा)॥ (ऋ (१९३) ॥ इति तृतीयः खण्ड ॥३॥ [] ७४९ एना वो अग्निं नमसोजो नपातमा हुये । प्रिय चतिष्ठमरति५ स्वध्या विश्वस्य गमृतम् ॥१॥ (ऋ.७१६।। या य. ११५) [७३५] ( यदि ना हवं श्रवत् ) यरि यह हमारी प्रार्थना सुन लेगा तो ( सहस्रिणीमिः ऊतिभिः सह ) हगारों तरो सरक्षणके साधनों के साथ और ( वाजेभिः) भन्नके साथ पह ( उप आगमत् ) हमारे पारा मायेगा ( मा घ) पह निश्चित है॥३॥ [७४६ ] है ( इन्द्र ) । ( सुतेषु सोमेषु ) सोमरस निकालने के याव ( पृधस्य दक्षस्य विदे ) महान् या प्राप्त करनेके लिए (क्रतुं उक्थ्यं पुनीपे ) वर्ग मोर स्तोपोंको तू पवित्र करता है, ( सः महान हि । ऐसा वह सू महान है।॥१॥ [१७] (सः ) यह इन्द्र ( पथमे व्योमनि देवानां सदने ) प्रथम आराम देवोंके घरमें (पृधः) यजमानरों बापाला (सुपारः ) उत्तम प्रकार दोसे पार करानेवाला (मु-भ्रवस्तमा) उत्तर पारयो ( सं समुभित् ) राक्षसोंगे जीतनेवाला रहता है, उसे हम बुलाते हं ॥२॥ (सं-अनु-जित् - पानीको रोकनेवाले रासोरो जोतनेयरमा पालेको रोरनेवाने में अपर मई होते हैं, उस प्रतिपयको दूर परोपाला। २ देवानां सदन- त्यां। [७४८] । उ ) गत (भिप इन्दं ) बयान को पान-गातये| भगय ) भान प्राप्त पाने पजरे लिए! हुये) पुलाता है । हे इन्द्र ! { 5-म्ने अन्तमा भव ) गुभो तमप हमारे पाग रह. मी मरार (पृधे ससा) उन्नति रामर मित्र होपर हमारे पास रह ॥३॥ ॥यहां तीसराखण्ड मामा [५] चतुर्थः सण्डा [११] (य) सारे लिए (पना नमसाइम रनोमि (ऊर्जन-पात) मरो मनेले, (प्रिय तिष्टएि मोर घेतानेवाले (भाति मतिमी सुमपरं ) म य रमेश र विया) सभी पाररित (भगत अग्नि) भार मानतो (या एघे) में बनाता हूँ !"
(२९) द्वितीय अध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद 3 स ७५१ प्रत्य ७५० स योजते अरुपा विश्वभौजसा स दद्रयत्स्वानः । सुब्रदा यज्ञः सुशमी वसनों देवर राघो जनानाम् ॥ २॥ १३ (तु ) ।। (ऋ १६२) अदर्याय युईच्छन्ती दुहिता दिवः। अपो मही वृणुते चक्षुपा तमो ज्योतिष्कृणोति सनरी ॥१॥ (.७८०१) ६५२ उदुनियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमविद तवेदुपा व्युपि सूर्यस्य च सं भक्तन गमेमहि ॥२॥ १४ (वा) ॥ ( ७ ७८१२) ७५३ इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना । अयं वामहेश्वसे शचीयर विशेविश हि गच्छयः ॥ १॥ (७७४१) ७५४ युवं चि ददधुर्मोजनं नरा चोथार सूनृतावते । अप्रिय समनसा नि यच्छत पियत सौम्यं मधु ॥२॥ १५ (चा)॥ ( . ७७५.२ ) ॥ इति धतुर्यः खण्ड. ॥ ४॥ १६ ) [७५० ] (सा) वह अग्नि ( अरुषा यिश्य-भोजसा) तेजस्वी और सर्वभक्षक भोंको ( योजते ) अपने रयम जोडता है। उसके बाद (सु-प्रसा) उत्तम जाती (यशः ) पूज्य (सु-दशमी) उतम सयमी (स्वाहुत:) उत्तम माहुतिपसि प्रदीप्त हुआ पह अग्नि देवोंको लाने के लिए । दुद्यत् ) जाता है । तब (देचं ) उस अग्निको (यसनां राधः ) घनोश ऐश्वयं प्राप्त होता है ॥२॥ [७१] (आयती उच्छन्ती ) यावर चमकनेवालो ( दियः दुहिता उपाः ) पुलोक्सी पुत्री उपा (प्रति अदर्शि) दीपने लगी है, वह ( महीं तमः उ ) महान् अन्यकारको (चक्षुषा उप वृणुते उ) प्रकाशसे हराती है (सूनरी ज्योति. कृणोति ) उत्तम नेतृत्व करनेवाली यह उपा प्रकाश करती है ॥ १॥ [७१२] ( सूर्यः ) सूर्य ( सचा ) एकदम ( उम्नियाः ) अपनी किरणोंको फैलाता है, (उद्यत् ) उदय होने के पाव ( नक्षनं ) मावराशमें ग्रह नक्षत्र प्रकाश फैलाते हैं । हे ( उपः ) उपे ! ( तव सूर्यस्य च ) तेरे और सूर्यरे (व्युपि ) प्रराना होने के बाद (भक्तेन संगमेमहि इत् ) अन्नसे हम युक्त हो ॥२॥ [७५३ ] हे { भश्विना ) अन्तिा देयो (इमा दिविष्टय उ ) इस स्वर्गको इच्छा करनेवाली प्रजायें (उनी चां हयन्ते ) सबको बसानेवाले तुम्हें सहायता के लिए पलाती है, है (शची-वस्) अपनी शक्तिसे निवास करनेवाले देवो । (अयं । मह स्तुति करनेवाला ( अवसे ) रक्षणके लिए (घां अद्धे ) तुम्हें बुलाता है, ( हि ) क्योंकि मुम ही (विशं विशं गच्छधः ) प्रत्येक प्रजाजनके पास जाते हो॥१॥ [७५४ ] (नरा) है नेतामो ! मश्विदेवो (युवं ) तुम (चित्रं भोजनं ददधु ) विलक्षण भोजन देते हो, (सन्तावने चोदेथां ) स्तुति करनयालेको तुम प्रेरित करते हो, तुम ( स-मनसा ) एक विचारसे ( रथं अर्याक् नियच्छतं ) रथको पर रोरो और यहां ( सोम्यं मधु पियतं ) मोग सोमरस पियो ॥२॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ !!
(३०)
सामयेदका सुयोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिक
२३ १२
३.
"
3291
11
२४
२
२
[५]
७५१ अस्य प्रतामनु धुत शुक्र दुहे अहयः । पयः सहस्रसामृषिम् ॥ १॥ (ऋ ९।६४।१ )
७५६ अयर सूर्य इबोपगयर सराशस धावति । सप्त प्रयत आ दिवम् ॥२॥ (ऋ. ९।२४।२ )
७५७ अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि । सोमो देवो न मर्पः ॥३॥ १६ (ते)॥
(ऋ ९।१४।३)
७५८ एप प्रत्नेन जन्मना देयो देवेम्या सुता । हरि पवित्र अर्पति
॥१॥ (ऋ.९।३।९)
७५९ एप प्रत्नन मन्मना देवी देवेम्यस्परि । कविविप्रेण वावृधे ॥२॥ ९१४२।२)
७६० दुहानः प्रनमित्पयः पचित्रे परि पिच्यसे । क्रन्द देवार अजीजनः ॥ ३ ॥ १७ (हा) ॥
( ९४४)
७६१ उप शिक्षापतस्थुपो भियसमा धेहि शत्रये । पवमान विदा रयिम् ।। १ ।। (ऋ. ९।१९।६ )
७६२ उपो पु जातमातुर गोभिमङ्ग परिष्कृतम् । इन्दु देवा अयासिषुः ॥२॥ (छ ९५६१।१३ )
[५] पञ्चमः खण्डः।
६७५५] { अस्य ) इस सोपरसके (प्रत्नां द्युतं अनु) पुराने तेजको याद करके (श सहनसां) तेजस्वी
और हजारों इच्छा पूर्ण करनेवाले ( नापि पयः ) ज्ञानवर्धक रसको ( अद्वय दुदुहे) ज्ञानी गण तय्यार करते हैं ॥१॥
[७५६] (अय ) यह सोम ( सूर्यः इव) सूर्यके समान ( उप-दृक् ) सबको देखनेवाला है, ( अय सरांसि
धावति) यह [ तीस ] जलके पात्रोंमें छाना जाता है, उसी प्रकार ( आ दिवं ) लोकतक यह (सप्त प्रयते) सात
धाराओंमें बहता है ॥२॥
१ संरासि-[तोस ] पानीके वर्तन ।
२ धावति-दौडता है, छाना जाता है।
[७५७ ] (अयं पुनानः सोमः } यह पवित्र होनेवाला सोमरस ( विश्वानि भुवना उपरि ) तय भवनोपर
(सूर्य देवः न ) सूर्यदेवके समान (तिष्ठति ) प्रकाशित होता है ॥३॥
[७५८] (हरिः एप. देवः ) हरे रगका यह सोम ( प्रत्लेन जन्मना ) पहलेसे हो ( देवेभ्यः सुतः) देयोंकि
लिए निचोडकर (प्रथिने अति ) छलनीसे छाना जाता है ॥ १ ॥
[७५९] (प्रत्नेन मन्मना ) प्राचीन स्तोत्रोंको सहायतासे ( एपः देवः ) यह प्रकाशमान् ( कविः) मानी सोम
(देवेभ्यः) देवों के लिए ( विरोण परिवावृधे ग्राह्मणों द्वारा बढाया जाता है ॥२॥
[७] (प्रत्नं इत् पयः) पहलेसे यह रस बर्तन में (दुहानः ) निचोल जाता है, और बाद में ( पवित्रे परि.
पिच्यते । छलनीसे छाना जाता है । यह (क्रन्दन ) शब्द करता हुआ (देवान् अजीजनः ) देवोंको मानों यक्षम
बुलाता है ॥३॥
[७६१] है ( परमान ) सोम ! (उप-तस्थुपः) पासमें बैठनेवालोंको ( उप शिक्ष) समाकर मता और
(शत्रवे) मात्रुको (भियस आधेहि ) भय हो ऐसा कर तया (रपि विदाः) धन हमें दे ॥ १ ॥
[७६२ ] सोमरस (जातं ) निकालने के बाद ( अप्-तुरं) पानी में मिलाया जाता है। (मंग) शत्रुके नाश
करनेवाले ( गोभिः परिष्कृत) गायके दूधसे मिले हुए (इन्दु) सोमरसके पास ( देवाः उप भयासिपुर) देव
जाते है ॥२॥
। ३.३३ द्वितीय अभ्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद (३१) ७६३ उपासै गायता नरा पर्वमानायेन्दये । अभि देवा इयक्षते ॥ ३ ॥ १८ (चौ) । (ऋ. ९।१९०१) ॥ इति पञ्चमः खण्डः॥५॥ [६] ७६४ प्र सोमासो विपश्चितोऽपो नपन्त ऊप।। चनानि महिपा इय ॥१॥ (ऋ. १।३३।१ ) ७६५ अभि द्रोणानि ययः शुक्रा प्रतिस्य धारया । पार्ज गोमन्तमक्षरन् ॥२॥ (ऋ ९।३३।२ । ७६६ सुता इन्द्रीय वायवे वरुणाय मरगयः । सोमा अर्पन्तु विष्णये ।। ३ ।। १९ (वि)॥ (ऋ ९।१३।३) ७६७ प्र सोम देववीतये सिन्धुन पिप्यै अर्णसा । अशी पयसा मदिरी न जागृविरच्छा कोश मधुश्चुतम् ॥१॥ (ऋ ९१०७/१२) ७६८ आ हर्यतो अर्जुनो अकै अभ्यत मिषः मनुर्न मज्यः । तमा हिन्वन्त्यपसौ यथा रथं नदीपा गमस्त्यो। ॥२॥ २० (रु) ॥ ऋ. ९।१०।१३) ७६९ प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम् । सुता विदये अपुः ॥ १ ॥ (ऋ. ९।३२।१ ) [७६३ ] है (नरः ) याजको ! (देवान् मभि इयक्षते) देवोंके लिए या करने की इच्छा करनेवाले यजमानको अपेक्षा ( परमानाय अलै इन्दवे ) माने जानेवाले इस सोमके लिए ( उप-गायत) सामका गान करो ॥ ३ ॥ । यहां पाचवां खण्ड समाप्त हुआ । [६] यष्ठः खण्डः। [७६५] (विपश्चितः जर्मयः सोमासः ) ज्ञान बढानेवाले ये सोमरस ( चनानि महिपाः च ) मिरा प्रकार पनमें भैसे जाते है उसी प्रकार ( आपः प्रनयन्ते) पानी में मिलापे जाते है ॥१॥ [७६५] (पभ्रयः शुक्राः) भूरे रंगके ये सोमरस (ऋतस्य धारया) पानीको पाराके गाम (द्रोपान ) पात्र में (गोमन्त पाज) गो दूधरूपी अनके साथ ( अभि प्रसान् ) मिलाये जाते हैं ॥२॥ [७६६ ] (सुताः सोमा) सोमरस निवडनेके वार इन्द्र,वायु, मयत्, विगु इन देवोको ( अर्पन्तु ) प्राप्त हो ॥३॥ .६७] है ( सोम) सोम! तू (देव-पीतये) देवोंको देनेके लिए ( अर्णसा) पानीमें (सिन्धुः न) जिस प्रकार नदिया पानीसे भरी जाती है, उसी प्रकार (प्र पिये) मिलाया जाता है। (मदिरः न जागृधिः) मानन्द देनेवाले पदायोंके समान तू उत्साह बढानेवाला है, (अंशोः ) इस सोमरसको (पयसा दूध मिलाओ, बार, (मधुश्चुत कोशं अच्छ) इसमोठे रसको रखनेके वर्तनमें मच्छी तरह भरो॥ । [७६८] (हर्यतः स्नु नप्रिम पुत्र के समान (मयः भर्जुनः ) शुद्ध होनेवाला यह स्वच्छ सोमरस (अत्के आ पयत ) वर्तनम छाना जाता है। (67/ उस इस सोमको (नदीषु ) जलों में (गमस्त्योः) हावरेते (भपसः रथं यथा) जिस प्रकार वेगवान् रयको संग्राममें ले जाते हैं उसी प्रकार (मा हिन्वति ) मिलाते है ॥ २ ॥ [७६९ ] {मद-व्युतः सोमासः) आनन्द बझनेवाले ये सोमरस ( सुताः) निनोहे जाने के बाद (विदथे । पन (मघोना ना) हविष्यान देनेवाले हमारे (श्रवसे } यशके लिए {प्र अभामुः। सहायक होते है ।।१।।
(३२) सामपेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराविका ३ ३१ २३. २ 31 ३१२ ३. ३ २२ १८९ १२.. २३ १३. ७७० आदौर हरसो पा गणं विवस्याविशन्मतम् । अत्यो न गोभिरज्यते ॥ २ ॥ (ऋ. १९३२॥३) ७७१ आदी वितस्य योपणो हरिर हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥३॥ २१ । ली)॥ (ऋ. ९॥३२॥२) ७७२ अया पवस्व देवयु रेभन्पवित्र पर्षेपि विश्वतः । मधोर्धारा असुक्षत ॥१२॥ (. ९।१०६।११ ) ७७३ पाते हर्यतो हरिरति हर्गसि रह्या । अभ्यर्प स्तोत्रम्पो वीरपद्य ॥२॥ (ऋ. ९।१०६।१३ ) ७७४ म सुन्यानोपान्धसो मतों न यष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधस इता मसं न भृगता ॥३॥ २२ (लि) ॥ (ऋ.९१०१।१३) ॥ इति पष्ठः खण्डः ॥ ६॥ ॥ इति प्रथमप्रपाठके द्वितीयोऽयः प्रपमप्रपाऽथ श्च समाप्तः॥ १॥ ॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ [७७०] (आत् है और यह सोम (हंसः यथा गणं ) हंस जिसप्रकार अपने समूहमें जाता है, उसी प्रकार (विश्वस्थ मति ) सबको मुखिको ( अवीवशात् ) वशमें करता है, { अत्यः न ) घोडा जिस प्रकार पानीमें मुमता है, उसी प्रकार ( गोभिः अग्यने ) यह गायके दूधर्मे मिलाया जाता है ॥ २ [७७१ ] ( वात् ई हरि इन्द्रं ) इस हरे रंगके सोमको ( वितस्य योपणः ) त्रित ऋषिको मालियां (इन्द्राय पीतये ) इन्द्र के पोने लिए ( मद्रिभिा हिन्वन्ति ) पत्थरोंसे कूटती है ॥ ३ ॥ [७७२ ] हे सोम ! (देवा-युः ) देवोंसे मिलने को इचा करनेवाला तू ( अया पवस्व ) धारारो छनता जा, (रेभन ) काग्र करता हमा ( पवित्रं विश्वता पपि ) छलनीसे चारों और बाहर गिरता है, और बादमें तेरे ( मधोः धारा असूक्षत ) मोठे रसकी धारा बाहर गिरने लगती है ॥ १॥ [७७३] ( हर्पतः हरिः) इच्छा करनेके योग्य यह हरे रंगका सोम ( स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालोंको ( वीर- यत् यशः) पोर पुत्रों सहित यशको (अभ्यर्पन) देकर (रहा) रमणीय (दरासि अति पवते) छलनीसे छाना) जाता है ॥२॥ ..[७७३] (सुन्यानाय अन्धसः) निनोहे जानेवाले इस अमरूपी सोमके बदले में तत् वचः) तेरे होन पचनको (मान प्रवष्ट ) मनुष्य न सुने, हे याजको । ( अ-राधसं ध्यान ) भयोग्य कुत्तेको (भूगवः मखं न) जिस प्रकार भृगुने अयोग्य यमको दूर किया मा, उसी प्रकार (अप हत) दूर करो ॥३॥ ॥ यहां छठयां खण्ड समाप्त हुमा ।। ॥ति द्वितीयोऽध्यायः द्वितीय अध्या. सामवेदका सुशेच मनुवाद द्वितीय अध्याय इन्द्रदेवता १९ यत्री [७२०] - वधका उपयोग करनेवाला, वनधारी। इस द्वितीय अध्यायमें आये हुए इन्द्र के गुण इस प्रकार है- १ विश्वा-साहा[७१३]- सब शत्रुओंको हरानेवाला। २० मद्-या [७२२]- आनन्दित, जिसके पास मानन्द है। २ शत-ऋतुः [७१३] सैकड़ों उत्तम कर्म करनेवाला। २१ यस्मिन् विश्वाः धिय. अधि [७३२]-जिराके ३ चर्षणीनां मंहिष्ठः [७१३]- मनुष्योंमें अत्यधिक पास सब प्रकारको सम्पत्ति और ऐश्वर्य है। २२ शाचि-गुः [७२६ ] - जो अपनी शक्तिरो मुप्रसिद्ध महान् । है, जिसको इन्द्रिय शक्तिशाली है। ४ इन्द्रः (इन्द्रः)[७१३]-शत्रुओंको फाडनेवाला। २३ शाचि-पूजनः [ ७२६]- शक्तिके कारण पूगा ५ पुरु-हता [७१४]-जिरो बहुत लोग अपनी सहायताके जानेवाला। लिए बुलाते है। २४ भा-खण्डलः [७२६ ]-शत्रुके टुकड़े करनेवाला, ६ पुरु-प्दुतः [७१४]- बहुतोंक द्वारा प्रशंसित । राओंको मारनेमें प्रयोग। ७ गाथान्यः [७१४]- प्रशंसनीय, स्तुत्य । २५ रंग-वृपः न पात् । ७२७ ] - अपने प्रकाशको ८ सन-श्रुतः [७१४/- सनातन कालसे जिसकी प्रशंसा कम न करनेवाला। किरणोशो पारों मोर फैलानेवाला । होती आई है। ९ नूतुम ७१५ - रायोको घलानेवाला, सयौंको अपने जिराके सींगोंका बल कम नहीं होता। अपने कार्यमें प्रवृत्त करनेवाला। २६ मदाहस्ती [७२८] मजबूत और परे हार्थोषाला। १० महोना चाजानां दाता [७१५]- बहुत धन और २७ महाहस्ती नः क्षुमन्तं चित्रं प्राभं दक्षिणेन अन्न देनेवाला। संगृभाय [७२८]- मजयून हापोंवाला यह इस तेजरवी, ११ हर्यश्यः (हरि-अश्यः) [१६]- सास रंगके अनेक प्रकारके मौर ग्रहण करने योग्य पन हमें देने के लिए घो अपने पास रखनेवाला। दायें हायमें लेता है। १२ सुदानुः[७१७]- उतम दान देनेवाश। २८ तुवि फूर्मिः [७२९]- पराकमो अनेक कार्य १३ सत्य-राधाः [७१७-घेळ पन जिसके पास करनेवाला। है । हमेशा रहनेवाले धन जिसके पास है । हित करनेवाले २९ तुयि-देणः ७२९]- इनके लिए यहुत धन पनौकोनी अपने पास रखता है। अपने पास रखनेवाला। १४ धु-क्ष. [१७]-धुलोकमें रहनेवासा, धुलोकमें ३० तुषि-मघः [७२९]- बहुत धनवान् । ३१ तुवि-मात्रः [७२९]- ममयत शारीरका । १५ पाज-युः [७१८] माल और बल देनेवाला, अन्न ३२ अघोमिः त्या विभाहि [७२९]- संरक्षणके मोर और बस जिसके पारा भरपूर है। साधन वह पत्र अपने पास रखता है, यह हमें मालूम है । १६ गन्युः [७१८]-गो गार्योका पालन करता है, ३३ शूर [७३०]- भूरवीर। गायें जिसके पास है। ३४ वृषमा [३१]- सवान, बलके समान १७ यसु[१८]- निधारा करानेशला, पनवान, शामयवान् । माठ यमु जिसके पारा है। पाठ वसु-मापः, भूवः, सोमः, १५ दित्सन्तं त्या देयाः मतांसान पारयन्ते [३०] परः, मनिलः, प्रापः भोर प्रभासः । वमुके मर्य- भिष्ट, -धन देश या करनेवाले तुझे देव और मनुष्य रोशनहीं मोठा, मन, रल, सुवर्ण, उत्तम, जल, पत, किरण, पनवान् । सकते। १८ हिरण्य-युः [१८]- सोना पासमें रखनेवाला, ३६ मयिध्ययः त्या मा दमन् [१२]अपने सोनका रान करनेवाला। संरक्षयरोगकरनंदाले मूर्स सोग तु न गये। ५ गाम. हिरी भा.२] सम्वो।
(३४) सामवेदका सुबोध मनुवाद [उत्तराचिका ३७ ब्रह्माद्विप मा कि धनः [७३२]- ज्ञानसे दंप ५९ हे सखाय.! योगे योगे, बाजे बाजे तवस्तर करनेवाले को तू सहायता मत कर। इन्द्रं उतये हवामहे [ ७४३ ]- हे मित्रो! प्रत्येक लाभके ३८ अनामयी ( अन्-आभयी) [७३४]- निर्भय, काम करने के समय, प्रत्येक युद्ध के समय अत्यन्त बलशाली मरनेवाला। इन्द्रको सरक्षणके लिए हम बुलाते हैं। ३९ राधानां पतिः [७३७]- अनेक पनौका स्वामी। ६० सखाय.! बा एत, निषदित, इन्द्र अभि प्र ४० गिर्वणः [७३७]- स्तुत्य । गायत [७४० ]-है मित्रो! आओ, बैठो, और इन्द्रके ४१ हे शूर! राधला पाह ७३९]- हे शूर इन्द्र ! गुणोंका गान करो। तेरी भुगायें धन रखनेवाली है। ६१ सचा सुते पुरूतम पुरूणां ईशानं वार्याणां ४२ तवस्तर[७४३]- अत्यन्त बलवान् । इन्द्र [७४१]- यज्ञमें बहुत धनोके स्वामी ऐसे इन्द्रके ४३ तवस्तर ऊतये हवामहे । ७४३]- बलवान् वीर गुणोंका वर्णन करो। इन्द्र को अपने सरक्षणके लिए हम बुलाते हैं। इस प्रकार इन्दके श्रेष्ठ गुणोंका वर्णन इन मत्रोंमें आया ४४ तुवि प्रतिः {७४४]- बहुतोंके पारा सहायता है । सौर्य, वोर्य, युद्ध कौशल्य, लोगोंको सहायता करनेकी पारनेके लिए जानेवाला। सैम्यारी, जनताके हित करनेको सत्परता इत्यादि सवगुण ४५ नर• [७४४]-नेता, आगे चलनेवाला। इन वर्णनोंमें आये हैं। ४६ प्रत्नस्य ओकसा तुवि-प्रति नर हुवे [७४४] पर केवल "इन्द्रपूर है इतना पढनेका कुछ अपने पुराने घरसे बहुतोंकी सहायताके लिए जानेवाले नेता उपयोग नहीं, तब तक कि वह शूरता अपने में न लाई जाए। इन्द्रको में अपने सरक्षणके लिए बुलाता हूँ। वेदोंने जो धर्म बतायें है, उनका उपयोग तभी हो सकता है, ४७ य ते पिता पूर्व हुवे [७४४]- जिस इन्द्रको रे अब उनके अनुसार आचरण किया जाए । अत पाठक याद पूर्वजोंने सहायताके लिए बुलाया था। उन धोका आचरण करें ओर उन्मत हों। ४८ स महान् हि [७४६] - वह इन्द्र महान् है । अग्नि देवता ४२ वृधः [७४६]- बढानेवाला, शक्तिका विकास करनेवाला। १ ऊों-न-पात् [७४९]-बल पम न करनेवाला, उत्साह कम न करनेवाला। ५० सु-पार [७४६]- सकटोंसे पार पहचानेवाला। ५१ सुश्रयस्तम ७४६]- कीर्तिमान्, पशस्वी। शरोरमें गर्मीके रहनेतक ही इस शरीरमें बत रहता है। ५२ स-अप्मुजित् [७४६]- पानोमें रहनेवाले शत्रुओं- शरीरके उड़े होते ही इसकी हलचल बद हो जाती है । इससे को जीतनेवाला। यह ज्ञात हो जाएगा कि अग्नि किस प्रकार बलको आधार देनेवाला है। ५३ शुक्ष्मी [७४८- मलपान, सामर्मवान् । २ भराति 1७४९]-प्रगतिशील। ५४ मुम्ने अन्तम ७४८J- मुखके समय पास प्रिय, चौतष्ठ । ७४९ - प्रिय और चतय उत्पन्न रहनेवाला। करनेवाला। ५५ वृधे सखा [७४८]- उन्नति करानेमें मित्रके समान । ४ अमृत [७४९]- अमर, नष्ट न होनेवाला। ५६ सुष्मिण इन्द्र वाजसातये भराय छुवे [७४८ ] -बलवान् इन्द्रको भन्नका हान होनेवाले यज्ञमें बुलाता हूँ। ५ सु-अधर [७४९ ]- उत्तम हिसारहित कार्य करनेवाला। ५७ सहत्रिणीमि अतिमि सह उपागमत् [७४५] ६ विश्वस्य दूत [७४९] - विश्वका बूत, हयनमें हजारो सरक्षणके साधनोंके साप वह इन्द्र आता है। पाले गए परार्थको सब जगह पहुचानेवाला । ५८ सः योगे राये पुरण्या चाजोभ न आगमत् ७ सु-पहा[७५.] - उत्तम ज्ञानी। [७४२]- यह इन्द्र लाभ होने के समय, घन मिलने के समय, ८ यत. [७५०] पूण्य । और बुद्धि के काम करने के समय अन्नके साथ हमारी तरफ ९ सु-शमी [ ७५० ]- उत्तम प्यमी। याता है। १० सु-आहुत.[७५००-उत्तम बाहुति जिसमें परती है।
द्वितीय अध्याय सामवेदशा सुवोध अनुवाद (३५) ११ दुद्रवत् [७५०]- देवोंको लानेके लिए शीघ्र २ उता [७५३ - प्रभात, प्रकाश, चमकनेवाला जाता है। माकाश, गाप, पृथ्बी, अश्विनीकुमार। १२ देवं वसूनां राधः [७५० - इस अग्निदेवको ३ शचीवस [७५३ ]- अपनी शक्तिसे रहनेवाले। धनोंसे प्राप्त होनेवाले ऐश्वर्य मिलते हैं। ४ नरा[७१४]- नेतृत्व करनेवाले । १३ स अरुया विश्वमोजसा योजते । ७५० - वह ५ युवं चिन भोजनं ददथुः [७५४ [- तुम विलक्षण तेजस्वी, लाल रगके घोड़ोंको अपने रयम जोडता है। मुणकारो भोजन देते हो। इतने गुण अग्नि देवताके इस अध्यायमें पाए है। ६ सूनृतावते चोदेथा [ ५५४ ]- सत्यमार्गसे चलने- उपा देवता वालेको उत्तम प्रेरणा तुम ही देते हो। ७ समनसा रथ अर्याक नियच्छतं [७५४ ]- एक उपा देवता गुण भी पडे महत्वके और मननीय है- विवारवाले होकर अपने रपको घर लामो । १आयती उच्छन्ती [ ७५१]- उषा आती है और प्रकाश फैलने लगता है। अन्धकार दूर करने के लिए प्रकाश ८निशं विश गच्छथः [७५४]- तुम प्रत्येक प्रजा- फैलाना अत्यन्त आवश्यक है। जनकी ओर जाते हो । उसके रोगको चिकित्सा करने लिए २ दिवः दुहिता उपा प्रत्यदर्शि [७५१]- द्युलोकको जाते हो। पुत्री उषा दोखने जग गई है। उसका प्रकाश फैलने ला ९ अवसे घा महे [७५३ ]- अपने सरक्षणके लिए गया है। हुमको में बुलाता हूँ। ३ महीतमः चक्षुपा उप वृणुते [ ७५१ ] - वह उपा १० इमा. दिविटय. उम्रो वा हवन्ते [ ७५३ - ये महान् अन्धकारको अपनी आलो-किरणोंसे नष्ट करती है। देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाली प्रजायें अश्विनौकरी अधारतो प्रकाशसे दूर करती है । अपनी सहायताके लिए एलाती है। ४ सूनरी ज्योतिः कृणोति [७५१ [- उत्तम नेतृत्व अश्विनौ दो देव हैं। इनमें एक शस्त्रक्रिया कुशल है शरनेवाली प्रकार करती है । अन्धकार दूर करके प्रकार और दूसरा औषधि - चिकित्सा । ये दोनों ही रोगोके पाप्त फैलाती है। जाते है और उसके रोग दूर करनेका प्रयत्न करते है । ये देय ५ सूर्य. सत्रा उनियाः उत्सृजते [७५२]- उपाके हैं पर उनके रोगो मानव होते है, अर्थात वे देय होते हुए भी साय सूर्य भाकर अपनी किरणे फैलाता है। मनुष्योको चिकित्सा करते हैं। ६ उधत् नक्षनं अर्चियत् । ७५२ ]- उदय होते हो रोगीको पे ऐसा उत्तम भोजन तैयार करके देते हैं कि मात्र चमकने लगते है। उसको साने मे ही रोगी भला भगा हो जाता है । मौषधि ७ हे उप ! तव सूर्यस्य च ब्युपि मक्तेन संगमे सेवनको अपेक्षा औषप मिभित भोजनको सानेसे रोगोको महि [७५२ 1- तेरे मौर के प्रकाश बार हम अप्रका मषिक साम होता है। क्योंकि औषधि लेते हुए 'मनमें सेवन करें। " में रोष हूँ" ऐसो भावना रहती है, पर भोजन खाने में उया माती है और प्रकाश फैलाकर अपकार दूर करना बैशी भावना नहीं रहती। रोगीको ऐसा मालूम होता है कि शुरु करती है। उपाके पाद सूर्य उदय होकर प्रकाशने लाता " में मार नहीं हूँ, अपना भोजन में खाता हूँ"। मत है । तात्पर्य यह कि उषाके उस होते ही अपकारका नारा मानसिक स्वास्थ्यको वृष्टिसे औषधिको अपेक्षा भोजन रूपये प्रारम्भ हो जाता है । उसी प्रकार मनुष्यको अपने समान व दारीरमें रवाई पढपाना और उसको सहायतासे रोगोको रोग राष्टमें अपने कार्यद्वारा अज्ञानाम्पकारका नाश करना मुक्त करना अधिक साभदायक है। पाहिए और अपने समाज व राष्ट्रप्रकाश लानेराप्रपल पंचों मपने रोगियों पर ऐमे प्रयोग करने पाहिए। शाना चाहिए । उया प्रतिदिन लोगोंको यह ज्ञान देता है। उस शानरो मनुष्यों अपने जीवन में उतारना चाहिए। मानके द्वारा रोगिशिरोरमें शोषय पहुचाना विपिसारा एक उतम उपाय है। अश्विनी देवता अश्विनीमारी बना " हा गया है, पोरि दे १ उनिया [७५२ ]- सेजस्यो, घमानेकाले, किरण, सो रोगिरेंगे तरस जाते हैं। रोपिरो निरीक्षण र प्रकाशको हिरण, पल, पिर, सुपं, दिवस, मषिनीकुमार। लिए सरेका रामय उसम होता है।
सामवेदका सुमोघ अनुवाद [उत्तराचिका मोगवान् सोग" सोम पतन है। सोमरस पानीके घनमें जाता है और यहाँ नापर सोम हिमालयके मौजवान् शिखरपर मिलनेवाली एक पानौसे मिल जाता है । बेनका नाम है। इसीलिए वेदों में उसे " ३ हरिः एप देवेभ्यः सुतः पवित्रे अर्पति [७५८] कहा है। -यह हरे रगका चमकनेवाला देवोंको देने के लिए निघोडा सोमको छानते समय सामगान गया, वह सोमरस छलनीसे होकर नीचेके वर्तममें गिरता है। १ एपः देव. देवेभ्यः विप्रेण परि वावृधे ७५९}- घसमें सोमको छानते समय सामगान किया जाता था, यह चमकनेवाला रिप्य सोमरस ब्राह्मणों के द्वारा बनाया उस विषयमें वर्णन इस प्रकार है- जाता है, अर्थात् ब्राह्मण उसमें पानी मिलाकर उसे बाते १ पवमानाय इन्दरे उप गायत [७६३]- छाने हैं, और उसे पीने योग्प धनाते हैं। जानेवाले सोमके लिए सामान बोलो। ५ दुहानः पवित्रे परिपिच्यते [७६०]- रस निकालने के इस समय बरे वचन बोललाठीक नहीं, ऐमा स्पष्ट कहा है- याद छलनोसे वह छाना जाता है। एनते समय यह नीचेके २ सुन्नानाय अन्धस. तत् धच मनः न प्रबष्ट फलामें गिरता है और उसरे कारण शब्द होता है, उस [७७४ ]- निचोडे जानेयाले इरा अन्नरूपी सोमके विषयमें अपने शाम्दसे वह देवोंको बुलाता है । यह मालकारिक भाषा है। मिसोको भी होन शब्द नहीं बोलने चाहिए । तया सोमरस ६ फन्दन देवान अजीजन [५६०]-लिनोसे नौये निकालते हुए उस स्थानपर कुत्ते न आ पायें ऐसा भी प्रपन्य गिरते हुए जो सोमवा मन्द होता है, उससे मानो यह ऐपयोंको करना चाहिए- गुलाता है। ३भराघसंसान अपहत [७७४]- अनुहारकुता ७ विपश्चित: ऊर्मयः सोमरसः माप. मनयन्ते परि यहा गाजाए तो उसे मारकर भगा । [७६४]- ज्ञान मानवाने ये सोमरस हरके स्पर्मपानीके पारा लेजाये जाते हैं अर्थात सोमरस पानीमें मिलाये जाते हैं। सोमको कूटकर रस निकालना ८ सोम! देयवीतये असा प्रपिप्ये [016- सोमवी पेल लाई जाती थी, उसे पत्य से पटते पै, और सोम! तू देयोरे पोनके लिए पानी मिलाया जाता है। उसका रस निकालते थे। इस विषय में मंत्र इस प्रकार है ९ नदीपु गभस्त्योः भा हियन्ति [७६८]- बीके १ हरि इन्दुं योपण इन्द्राय पीतये अदिभिः पानीमें यह सोमरस हार्योसे मिलाया जाता है। यहाँ "नदी" हिन्यन्ति [ ७७१]- हरे रगके घमनेवाले सोगरोहाप " नदियों में मिलाया जाता है " ऐसा कहा है। मौके पत्थरोसे कूटते है और कूटने के यार उगलियां उसे दबाकर पानीमें " करने के स्थानपर " भरियोंग " ही पह विणा है। उसका रस निकालती है।परके पोनकरी देने के लिए यह किया ससके लिए पूर्णका प्रयोग में होता है।" जस " के जाता है। लाडो पट्टे पर सोमको रयार उसे पल्पसे लिए " मरी" का प्रयोग आलंकारित है। टते है फिर हार्योसे उसका रस निकाला जाता है । ऐसे जार, म अध्यायमें गोमरम निशाला, पानी में इस रस निचोडनेरे यार पानी मिलाकर इसे छाना जाता मिलाने और शारा वर्णन है। है। ननेपा वर्णन इस प्रकार है- १० गोभिः श्रीणन्त स्वादु अफर्म [७३१]- गायक १ नृभिः धौन , म भुत , अव्यापारे परिपूत यूपमें सोमरस मिलाकर उसे हमो मीठा पर दिया है। निपत (७३५-याहारेवारा प्रथम पोया गया, पायरोंसे पूटपर रा निराला गपा, भंणे बालोको धनी पसनौसे १५ जान अतुर मह, पोमि परिष्टन इन्दं देपा उप थपासिपु [६२ 1-0 मग निकाल पार उमः घाना गया यह गोपारा है। पानी मिलाते। उस पारो भारतेषाले शौमरो गायके रा निकाहने पर उगे पानी पिलाते हैं मोर गारमें दूप मिला सब उगोपाल देव जाते हैं। मनिहातमा, एसीसे उसे जानते हैं। पानी मिलाना, जानना और इसमें गापा दूप मिलाना २ मपं गरीमि धापति [७५१]- यह मोष सरोवर पार पाना मपणा न उगरी मानि रहिरपीना। * पागरिता मारा है। यहां "सर" पानी पह पम है मोमो तेम्पार पर।
द्वितीय अध्याय ] सामघेदका सुयोघ अनुपाद बालते हैं। १२ पक्रयः शुकाः ऋतस्य धारया द्रोणान् २८ सोम्यं मधु पिरतं [७५४]- सोमके मधुर रसो गोमन्ते या अभि भक्षरन् [१५]- स्वाट मोपरम पियो । पानी पाराले साथ ससेमें तथा गौदुग्यरूपी अभके साय २९ देवयुः [७७२]- यह सोम देयोके पास जानेवाला है। मिला माते है। ३० विश्वस्य मति मा विवशत् [७७० ]- सबको १३ अंशोः पयसा मधुश्च्युतं कोशं मच्छ [७६७] मुहियोंको यह अपने अधिकारमें रखता है। सबको मृद्धिपर -सोमरस दूध मिलाने के बाद उसे मोठे रसवाले वर्तनमें अपना प्रभाव डालता है। ३१ उदरं सुपूर्ण सुतं अन्धः पिच [७३४]- पेट १४ गोमिः भज्यते [७७० - पायक पूषके शाप भार सोमरसहपो म पो। सोमरस मिलाया जाता है । यहा“ गो" पर गाय के दूधका ३२ मदच्युतः तोमासः सुताः विदथे मघोना नः भ्रवसे प्राममुः [७६९]- भानन्द बहानेवाले सोमरम १५ मयः अर्जुनः भत्के मा अव्यात् [७६७ ]- पझमें यजमाना यश यदाते है। एट होनेवाला सोम यर्तनमें एलनीसे छाना जाता है। शत्रुको भयभीत करना १६ रेभन् पवित्रं विश्वतः पयपि [७७२]- द्वाद सोमरस पीने पाद मनका उत्साह बढता है, शरीरको करता हमार छलनीसे नीचेके यतनमें गाता है। शक्ति पड़ती है। और शत्रुको भय हो ऐसा सामर्प उत्पम ५७ अया पयस्व [७७२]- धार बांधकर छनता जा। १८ मधोः धारा भगक्षत [७७२]- मोठे रसको होता है- घारा नीचे गिरती है। ३३ हे सोम ! उपस्थुपः उपशिक्ष, शत्रये भियसं १९ इयंत हरिः,स्तोतृभ्यः धीरयत्यशःअभ्यर्षन् आधेहि [७६१ ] है सोम ! पात बैठनेवालोंसे कहा कि वे रंबा दरांसि अति पयने [७७३ [-हरे रमका सोमरस नुको भयभीत करें। स्तोताओं वीरपुत्रों के साथ मिलनेवाला या देकर छलनीसे दाको भयभीत करने योग्य यल सोमासको पोनेसे पता छनता है। है। सब देव इसे पोकर सामपंवान् होते है और ओंको २० अयं सूर्यः इव उपदृश् [७५६] - यह सूर्यके हराते हैं। रामान तेजस्वी यौर सोशो देखनेवाला है। २२ अयं पुनानः सोमः विश्वा भुवना उपरि, देवो न सूर्यः तिष्ठति [७९७]- यह स्वच्छ होनेवाला सोमरस सब भुवनोंके ऊपर सूर्य के समान प्रकाशित होता है। सुभापित इस सोमरसको हवन करके देवोंको पीनेके लिए दिया इस दूसरे अध्यापमें सुभाषित इस प्रकार है- जाता है। १ विध्या-साह, शतक्रतुं, चर्षणीनां मंहिष्ठ इन्द्र २२ हे इन्द्र! त्या मस्मिन् सधमादे [७३६ ]- हे प्रगायत [७१३]- सब शत्रुओंको हरानेवाले सैकड़ों इन्द्र ! तुझे इस यसमें बुलाया जाता है। प्रकारके कर्म करनेवाले मनुष्योंमें बहुत महान् इन्द्रको २३ इदं सुत भनु पिर [७३७] - इस सोमरसको तूपी) स्तुति करो। २४ ते या स्वयां अनु असत [७३८]- तेरे लिए २ नुतुः ना महोनां पाजानां दाता [ ७१५]- वह सोमरस अन्नके समान है। इन्द्र सोने चलानेवाला और हमें बहुतसे पन मोर मनका २५ सुते तन्य नियच्छ [७३८] सोमपसमें अपनेको देनेवाला है। २६ सोम्य ! स त्या ममन्तु [७३८]- सोम पीनेवाले ३ वा हर्यश्राप सोम-पाने प्रगायत [१६]-है इन्द्र ! यह सोम तुझे आनन्द देवे । मियो ! तुम पोकि रखनेवाले, सोम पीनेवाले के लिए २७ म ते पुक्ष्योः प्राश्नातु [२९]-यह तेरे कोसोंमें मानन्द देनेवाले स्तोत्रोंका गान करो। भर जाने । ४ सुदानवः सत्य-राधसः [७१७]- यह इन्द्र सामवेदका सुवोध अनुवाद [उत्तराचिका उत्तम दान देनेवाला और ईमानदारोसे धन अपने पास मात्र अयोभिः [ ७२९ - अनेक पराक्रम करनेवाला, देने रखनेवाला है। योग्य बहुतसे धनोंको अपने पास रखनेवाला, महान् पनवान्, ५ वाज-यु, गन्युः, हिरण्य-युः [७१८/- वह महान आकारपाला, सरमणके अनेक साधनोंसे पुश्त यह इन्न हमें अन, गाय, और सोना देनेवाला है। स्वायन्तः सखाय त्या [७१९]-है २० हे शुर! दिसते त्या देवाः म, महान हन्छ ! तुमे प्राप्त करने की इच्छा करनेवाले हम मित्र तेरी वारयन्ते [३०]- हे बोर इन्द्र दान देनेको हा स्तुति करते हैं। करनेवाले तुझे देव मयया मनुष्य, कोई भी रोक नहीं सकता। ७ अपसः तब नविष्टो अन्यत् न घे आ पपन २१ त्या आविष्यवः मूराः उपहस्वाना मा दमन [७२० ]-है ! यज्ञकोमसे तेरे नये यहमें तेरे [७३२]-तुझे रक्षणकी इच्छा करनेवाले मूर्ख और उपहास स्तोत्रके सिवाय में दूसरेके स्तोत्र नहीं पहूगा। करनेवाले भी कष्ट न देवें। ८ तब इ उ स्तोमः चिकेत [७२० ]- तेरे ही २२ ब्रह्म-द्विष मा वीं धनः [७३२ - शानसे उप स्तोत्रोंसे स्तुति करना मैं जानता हूं। करनेवालेको सू महायता मत कर। ९ देवाः सुन्वत इच्छन्ति [७२१]- देव सोमरस २३ राधानापते गिर्वण : मोजसा पिर [७३७]- निकालनेवालेको इच्छा करते हैं, अर्यान सोमयज्ञ करनेवालेसे हे पनपते । स्तुत्य इन्द्र । बलसे पुक्त तू इस सोमरसको पी। प्रेम करते हैं। २४ हे शूर ! राघसा या प्र[७३९J-पन देनेगे १० स्वप्मायन स्पृहयन्ति [७२१]-मालसी मनुष्यको लिए तेरे बाह भी सोमरसको प्राप्त हों। पसन्द नहीं करते। २५ पुरू-तम पुरुणां यार्याणां ईशानः [ur.J- ११ अ-तन्द्राः प्र-माद पन्ति [७२१]- परिचमी पह इन पहुतने शत्रुओंको हरानेवाला मोर स्वीकारले देवता परम मानन्द देनेवाले सोमको प्राप्त करते है, अर्थात योग्य महतसे धनौका त्यामो है। उद्यमी मनुष्य ही मुखको प्राप्त कर सकता है । २६ सः घनः योगे, राये, पुरल्या आ भुयत् १२ यस्मिन् विभ्याः धियः अधि { ७२३]-स [७४२)-बह इन्ट निम्मपसे हमारे पुरुषापके पामोंमें, पन इसमें सभी शोभा रहती है। प्राप्त करने के कामों में, यहुत अधिक प्रयोग करके लिए २३ सप्त संसदा रणन्ति [७२३]-इन्द्रको स्तुति जानेवाले कार्यो में सहायक होगे। पसके सात ऋत्विज करते हैं। २७ योगे-योगे, पाजे-याजे तपस्तरं न्दं जनये १४ देया प्रि-कदुकेषु चेतन अनत [७२४ - दयामहे [७४३ - प्रत्येर कमरे प्रारम्भमें और प्रत्येक सर देवता यहके तीन दिवसमें उत्साह बानेवाले यशमा पुसमें अत्यन्त बलवान् इन्द्रको सरक्षण करने के लिए हम विस्ताररते है। चलाते हैं। १५ शाचि-गो-शावि-पूजनः [७२६]- पहरण २८ प्रत्नस्य ओरसा, तुवि-प्रति नरं तु दुपे सामर्थवान शिरोसे पुरत और विधमान होने के कारण [७]- अपने पुराने पर पहतो पाग मानगो मेता पूमा नाता है। इनको हम सहायतारे लिए बुसाने हैं। प्रत्नम्प मो- १६ हे मा-सपहल ! प्रायसे [७२६]- हे शसे क्सः" इन्द्रा सनातन पर यह विश्व ही है। मारनेवाले इन मोमो लिए पुणे बुलाते है। १९ सामहान दि [७४५] • वह महान् है। २७ मंग-वृषःन पार [७२७]-किरोर पिसारको ३० सः देयाना मदने पृधः गु-पार। सु-भय- पम मारनेवाला यहाद है। स्नमः सं अपा-जिन 11-बहागरापारमे १८ न! महा-दस्ती न सुमन चित्रं मा* यजमानी बसानेवाप्ता, मी एगे गि पाराने. पक्षिणेन में गृभाय । ७२८ म-हे! महान् हापो. बासा, उतम परास्यो मोर राभोले जीतनेवाला। पाना हमारे लिए बायो विलक्षण मौर स्वीकाराने ३१ इन्द्र ! मुम्ने अन्तमा भय, ध साता पोप पन देने के लिए कहें दायेंशपमधारण [७४८]-हेगा परे मार भी हमारे पास ए, तो १९ नुधिर्मिी, तुधि देणः, तुच मयः, नुयि- प्रगर उनिक समप भी हमारे पाग रह।
सामयेवफा मुयोध अनुराव (३९) दिनीय अध्याप] ३२ ऊर्जन-पातं, प्रिर्य, चेतिएं भरति म-मयर [७७३ - चाहनी योग्य यह रंगका सोम स्तुतिपरने विश्वरा दूतं अमृतं अग्नि मा दुये [९]- यसो याला दोर पुत्रोरो पात यदा घेता है। बम मलवाले प्रिय, मान देनेयाले प्रगतियोस, उत्तम ४७ तत् यचा मतः न नष्ट [७४ ]- यह हीन या परनेवाले सभी पामरोक लिए नये समान उस भमर वचन मनुष्य म मुनै । अग्निरो हम शुसासे हैं। ४८ अ-राधसं श्यानं अपहत [७७४ ]- अयोग्य ३३ सः भगा विश्व-गोजसा योजते [७५० ]- तो सोमगे दूर रो। वह मग्नि सेगस्यो, राबरे भक्षर अयोगे अपो रपमें am- सोडता है। परती है। ३३ सु-प्रहा, या सु-शमी-आहुत: [७५१] - उपमा यह मनि उतम शानी, प्रग्य, उत्तम माहुतिपोसे प्रग्यालिप्त इस अध्यापमें निम्नलिखित उपमायें आई है- हमा है। ३. आयती उच्छन्ती दिया दुहिता उपाः महतमा निवारण कोई नहीं कर सकता, उसी प्रकार "दिरसन्तं १ भीम गां न [७३०]- मिस प्रकार भार यसका चक्षुरा उप वृणुते उ [७५१] - पारर पमरनेवाली पुलोरको पुत्री उथा महा अपमारमा प्रकाश निवारण त्या न देयाः न मर्तासः पारयन्ते "शन देनेरी परनेवाले हरा निवारण देव भपया मनुष्य रोई भी नहीं पर सश्ता। ३६ सनरी योनिः रणुते [ ७५१]- उत्तम नेतृत्व इम मत्रमें "गा" पर सका याचक है। परनेवाली यह उषा प्रशा परती है। २ यथा गौर: सरः [७३३ ] - जिस प्रकार गौर मग ३७ उपः। तर सूर्यस्य च युपि भफ्तेन संगमे. उसी प्रकार "गो-परीणसं महि [ ७५२ - हे उपे | तेरे और सूर्यके प्रकार हो जाने सरोवरपर पानी पोता पर बमसे हम मुक्त हों। पिय " गाय दूधमें मिले हए मोमरसकोपी। मग सरोवरके ३८ अश्विना! इमाः दियिष्टय. उम्री यां हयन्ते पास जाता है और पेट भरकर पानी पोता है, उसी प्रकार '७५३] हे अश्विनी देयो ! इस स्वर्गको इच्छा करनेवालो इन्द्र भी या नाकर पैट भरकर सोम पीये। ग्जा सयरो बसानेवाले सुम्हें महायताके लिए बुलाती है। ३ नदीपु मध्य न [७३५ - नदी पानीमें जैसे घोडे घोये जाते है, उसी प्रकार " अश्न सुतः नृभिःधीत: ३२ विश विशं गच्छथः [७५३]- तुम प्रत्येक अन्यायाः परिपूत प्रजाजनके पास जाते हो। " पत्थरोस पटकर रस निकाला गया, याजकों द्वारा पानीसै घोकर स्वच्छ किया गया, भेजे ४० नरा! युव समनसा चित्र भोजनं ददयुः बालोंकी बनी छलनोसे छानकर साफ किया गया गोमरस [७५४ - हे नेता प्रदियदेयो ! तुम विलक्षण भोजन देते हो। तयार किया जाता है। ४१ शुक्र सहसा पयः [७५५ ]- तेजस्वी और ४ देयो सूर्य न [७५७ ]- सूर्य जिस प्रकार सबसे अनेकों प्रकारको इच्छा पूर्ण करनेवाला यह मोमरस है। ऊचे स्पानपर शोभित होता है, उसी प्रकार “अयं पुनाना ४२ अयं सूर्य इव उपक् [७५६]- यह सोम सूपरे सोम विश्वा भुवना उपरि तिष्ठति " यह छानकर साफ समान सबको देखनेवासा है। दिया गया सोमरस सब लोकोमें अन्य सब पेयोंकी अपेक्षा ४३ अयं सोम विश्वानि भुयना उपरि तिष्ठति श्रेष्ठ है । जैसे पूर्य तेजस्वी और श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सोम [७५७ ]• यह सोमरस राब लोकों पर प्रकाशित होता है। तेजस्वो और भेष्ठ है। ४३ पवमान | शत्र भियसं आधेहि [७६१ ५ यनाति महिपा इव [१४]- मैसे बनमें तालायके हे सोम! शत्रुको भय प्राप्त हो ऐसा कर। पारा भैसे गाते है, तो प्रकार "सोमास: भाप: प्र ५५१ विश्वस्य मति मा विवशत् [७७० ]- यह नयन्ते " सोमरस पानी मिलापे जाते हैं। सोम सबकी वृद्धिको वश करता है। ६ सिन्धुःन [७६५] - जिस प्रकार नदी पानीसे भरी ४६ हयंत.हरिःरतोतृभ्यः वीरवत् यश अभ्यर्पत रहती है, उसी प्रकार सोमरम " असा म पिध्ये" (४०) सामवेदका सुवोध अनुवाद [ বিঃ - पानीसे पूर्ण किया जाता है। सोमरस पानी में मिलाया जाता है। १० हंसः गणं यथा [७७०] हंस जैसे अपने झुण्ड में ७ मदिरः न आगृविः [७६७ ]- आनन्द पढानेवाले जाता है, वैसे ही सोम" विश्वस्य मति भाविवशत्' पदार्यके समान तू लोगोंको जापत करनेवाला उनका उत्साह सबको यक्षिपोमें जाता है, मुनियोंको उतम प्रेरणा देता है। बढानेवाला है। सोमरस जो पीते है उनमें आनन्द और ११ मत्यान [७७०- घोडेको जिस प्रकार नहलाते उत्साह बढ़ता है। है, उसी प्रकार सोम " गोभिः अज्यते " गायके यूपमें ८ हर्यतः सूनुः न [ ७६८ ]- प्रिय पुत्रके समान यह मिलाते हैं, उसे दूधसे नहलाते हैं। "मर्यः अर्जना" शुद्ध होनेयाला और छाना गया तोम १२ भृगवः मखं न [७७४]- जिस प्रकार भोंमे अयोग्य यज्ञको दूर किया, उसी तरह यज्ञसे " श्वानं अप- ९ अपसः रथं यथा [ ७६८ ]- वेगवान् रयको जैसे हत" कुतेको दूर करो। युद्ध में ले जाते है, वैसे ही " नदीषु गभस्त्योः आ इस प्रकार दूसरे मायायका निरीक्षण यहां किया है। हिन्वन्ति " सोमरसको नदीके अलोंमें हार्योसे मिलाते हैं। पाठक वृन्द इस अध्यायके मनोका सूक्ष्म अध्ययन करणे उरा बेगमे मोम पानी में ले जाते है। जैसे रय युद्ध जाता है । पर मनन करें। प्रिय है। द्वितीयाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची গায়ত্ত ऋग्वेवस्थान छा अनुष्टा गायत्री " ७१४ ७१५ " " " " टा२।१ ८९०२ ८.५३ ७.३११ शर ७१३॥ दा२।१९ ८.१७ ८११८ ८.९९१९ दा९११२० ८१९१११ ग " ७२० " हथित (१) श्रुतकवाः सुकलो वा लगिरस: भूतकाः सुफलो वा आंगिरसः युतकक्षः मुकलो वा मोनिरस. दसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठी मंचावरणिः वसिष्ठी मंत्रावणिः मेधातिपिः काय, प्रियमेयावागिरसः मेधातिपि. काय, प्रियमेपरपिरसः मेपातिपिः काय, शियमेपाागिरस: भूतानः सुरभो वा भोपिरा मतरमा गुरुयो का मागिता भूतपणः सुगसो वा मागिराः (२) त्रिबिठिःपाय: हरिविठिकाव इपिपिडिपाव दुमीको वाय. इसीरी . " ७२२ १ " ७४ M P ८1१७११ ८१७ ८1१७११ " " ७०८ " " " H सामयेदका सुपोध मनुयाद (४१) द्वितीय मायाय] क्षेषता मंदिया गायत्री . ७१३ " " " ७३७ ७१८ ७१९ 11 प्रास्पानं पिः ८८ सोसे परायः ८४५२२ विशोषः ८1९३ प्रियः ८४१४ विशोक पायः सार वसिष्ठो मंत्रावगिः 108 पसिष्ठो मंत्रायणिः 401 परिप्ठो मंचावणिः (३) ६५६१० विश्वामित्रो गाधिनः २५३११ विश्वामित्रो पापिनः ३।५।१२ विश्वामित्रो गाधिनः मपुग्छन्दा वंदवामित्रः मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः मधुच्छन्दा श्वामित्रः १३३०७ गुनाहोप माजीगतिः ११३०९ दान दोपलानीतिः ३०८ गुनाहोप बाजोगतिः ८०११ भारदःरायः दार मारःकायः ८॥१॥३ मारण्य (४) ७१६१ परिसष्ठो मंचावणिः । " " " ७११ ७३२ ७१३ ७४५ " " " " अगिए ७१६ " । ७४८ मग्निः प्रगाय (विपमा यहती, समा सतो बहती) ७४९ 11 " ७५० " " " . ७११ ७५३ " " गायत्री १६९ वसिष्ठो मंचावणिः ७८२३१ यसिष्ठो मंत्रावरणिः उपा ७८२ पसिष्ठो मंत्रावरणिः ७७४१ पसिष्ठो मंत्रावणिः अश्विनी 15812 वसिष्ठी मंत्रावणिः (५) ७.४१ अवत्सारः कास्यपः पवमानः सोम. ९५४ार अवत्सारःकाश्यपः ९.५४३ यवासारराश्यपः ९२९ दानाप बाजीगतिः देवरातः कृत्रिमो ইতালির ९४२२ मेध्यातिथिःकाण्वः ९४२३ मेध्यातिथिः काकः ६ । साम हिरी मा. २] " " " ७५७ ३ " " " " ७६० (४०) सामवेदका सुवोध अनुवाद [ उत्तरार्चिक पानीरो पूर्ण किया जाता है। सोमरस पानी में मिलाया जाता है। १० हंसः गणं यथा [७७०] हस जैसे अपने झुण्डमें ७ मदिरा न जागृषिः [७६७ ]- आनन्द बढानेवाले जाता है, धरोही राम " विश्वस्य मतिं आविवशत्" पदार्य के समान तु लोगोको जाग्रत करनेवाला उनका उत्साह सयको बुद्धियोंमें जाता है, बुद्धियोको उत्तम प्रेरणा देता है। बढानेवाला है। सोमरस जो पीते हैं उनमें मानन्द और ११ अत्यःन [७]- घोडेको जिस प्रकार नहलाते उत्साह बढ़ता है। है, उसी प्रकार सोम “गोभिः अज्यते" गाय के दूपर्ने ८ हर्यतः सूनुःन [ ७६८ ]- प्रिय पुत्रके समान यह मिलाते है, उसे दूधसे नहलाते है । "मयः अर्जन: "शुस होनेवाला और छाता गया सोम १२ भृगवः मखं न ! ७७४ - जिस प्रकार भृगुओंने अयोग्य यज्ञको दूर किया, उसी तरह यज्ञसे " श्वानं अप- ९ अपसः रथं यथा [७६८]- वेगवान् रयको जैसे हत". कुत्र्तको दूर करो। युद्धमें ले जाते है, वैसे हो" नदीपु गभस्त्योः आ इस प्रकार दूसरे अध्यायका निरीक्षण यहां किया है। हिन्वन्ति " सोमरसको नवीके जलोंमें हार्योसे मिलाते है। पाठक बन्द इस अध्यायके मंत्रोका सूक्ष्म अध्ययन करके उस वेगसे सोम पानी से जाते है। जरो रप पढमें जाता है । पर मनन करें। प्रिय है। द्वितीयाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मनसस्या ऋष्येवस्थान देवता छग्य: मनुष्टुप गायत्री " ७१४ ७१५ ८।१२।२ ८०९१३ ७३१११ " " " " It ७१८ ७१९ " " ७१३१३३ दारात ८॥९७ ८1९1१८ ८।१२।१९ ८९२० ८।९।११ पिः (१) भूतकाः सुकशो वा बांगिरसः भ्रतकक्षः मुकलो या आंगिरसः भूतकक्षः सुकलो का भोगिरसः वसिष्ठो मैत्रावणिः बसिष्ठो मैत्रावरणिः बसिष्ठो मंत्रावरुणिः मेधातिथि: काण्व, प्रियमेपश्चांगिरस: मेषातिपि. काव:, प्रियमेषश्चागिरस: प्रियमेपश्चागिरसः भूतकाः सुकशी वा मागिरसः मृतकक्षः सुकमो वा भागिरस: भूतकाशः सुरुको वामगिरता (२) इरिम्धिति काय इरिम्बिठिकाग्वः इरिम्बिठिकाण्व. कुसीदी काय कुसोयी काय मेघातिथिः काग्वः " " " " ७२२ ७३ " " " ७२५ . ७२६ I " दा१११ ८.१७१२ दा११॥ ८८०१ " " " २८ १२९ " द्वितीय मापाय ] सामयेदका पोध भनुयार (४) मंत्रात्या महादेवस्थान गायत्री " " " ७३२ " । ८४५/१२ २३ दा४०४ पर ८१ 101 . " ७३ ७३५ ७३६ " . . .. " ७७ " " " ५१११ २१५१०१२ शपार दुसीबी रायः पितोरण्यः विनोपायः प्रिोतः पसिष्टो मंत्रावरणिः पसिष्ठो मंत्रावणिः पसिष्ठो मंत्रावणिः (३) विश्वामित्रोणाधिनः विश्वामित्रो गापिनः विश्यामित्रो गाधिनः मयुष्ठन्दा बावामित्र. मपन्टन्दा पंवामित्रः भन्छन्दापयामित्रः पुनःोप माजीगतिः गुन-शेप मागोपतिः अन शेप मामीतिः नारदःरायः नारदराज्य: मारवःपाय: (४) वसिष्ठी मंशावरणिः " " " " " " " " " ७४३ ७३४ ७.५ ११३०७ १॥३०९ २३०८ " ॥ उरिणा " " " दार दर " ७१८ अग्निः ७४९ ७१६१ प्रगाय (विषमा बहती, समा रातो यहती ) . " उथा ७११ " " ७११ डा१६९ ७८.४१ ७८२ ७1981 U७४॥ पसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावरणिः पसिष्ठो मंत्रावणिः पशिष्टो मंत्रावणिः वसिष्ठो मैत्रावणिः मश्विनी ७३ ७५४ " पवमानः सोमः गायत्री " ७५५ ७५६ " " 11 ७.४१ यवत्तारःकाश्यपः ९५४२ भवस्सारः काश्यपः ९५४३ भयत्सारःकाश्यपः ९३९ गुनोप माजोगतिः स वेवरातः कृत्रिमो वश्वामिनः ९४२२२ मेध्यातिथि:कायः १९९३ मेष्यातिथिः कावः ६ [साम. हिन्दी भा.२] " " " ७५९ 21 सामवेदका सुयोध मनुवाद (४२) [उत्तरार्चिकः देवता मप्रसस्था ७६१ गायत्री अग्रस्थान ९९६ ९६३ पवमान सोमः असित. काश्यपो देवलोया ममहीपुरोगिरसः असित. काश्यपो रेषलोवा ७६१ ७३ " " " " ७६४ ७६२ ७६२ ७७ वित आफ्य. त्रित आप्रयः त्रित आफ्यः 1 सप्तर्षपः " ९३१०११ प्रगाय (विषमा बृहती, समा सतो बहती) " ७६८ गायत्री " ७७० ७१ " ९।१०७१३ सप्तर्षय. श्यावाश्व आत्रेपः स्यावाश्व आत्रेयः ९॥३२॥ प्यावाश्व आत्रेय ९।१०६।१६ अग्निश्चानुषः ११०६१ अग्निश्चाक्षुषः प्रजापतिश्वामित्रो पायोधा उणिक " ७७२ ७७३ ७७४ अनुष्टा
वृतीय अध्याय ]
सामवेदका सुयोध अनुवाद
अप तृतीयोऽध्यायः
।
अथ द्वितीयप्रपाठके प्रथमोऽधी ॥२॥
[१]
(११-१९) १ जमदग्निर्भार्गवः; २, ५, १५ अमहीपुरागिरसः; ३ सयपो मारोधः, ४, १० भृगुणिजमरग्निर्मा-
गंवो या ६-७ मेधातियिः काकः ८ मधुच्छन्दा वयामित्रः ९ वसिष्ठो मन्त्रावणिः, ११ उपमन्यर्वासिष्ठः;
१२ शंयुर्हिस्पत्यः, १३ वालविल्याः, प्रस्कष्यः काग्वः, १४ नुमेध बांगिरराः१६ नहुषो मानवः; १७
(१-२) सिकता निवावरी; १७ (३) पृश्नियोजाः, १८ भूतकमा कक्षो वा आंगिरसः, १९ जेता
माधुच्छन्वसः ॥१-५,१०-११,१५-७ पवमानः सोमः अग्निः
मित्रावणी, ८, १२-१४,
१८-१९ इन्द्रः ९ इनानी ॥ १-१०, १५, १८ गापत्री; ११ विष्टपः १२-१४ प्रगाय:-
( यिषमा पती, समा सतोरहती), १६, १९ अनुष्टर, १७ जगती ॥
।
७७५ पवस्व वाचो अग्रियः सोम चिनामितिमा । अनि विश्वानि काच्या ॥१॥
(ऋ९।१२।२५)
७७६ त्यसमुद्रिया अपोऽग्रियो वाच ईरयन् । पयस्त विश्वचर्षणे ॥२॥ (ऋ. १/६२।२६)
७७७ तुम्पेमा भुवना कवे महिले सोम सस्थिरे । तुभ्यं घावन्ति धेनवः ॥३॥ (पी)।
(३ ९।६।२७)
[१] प्रथमः खण्डः।
[५] हे ( सोम) मोम ! ( अग्रियः )तू आगेके भागमें रहनेवाला अर्थात् मुख्य है, तू (चित्राभिः तिमिः)
मपनी विलक्षण रक्षणको शक्तिसे युक्त होकर (वचः पवस्व ) हमारी स्तुतिको सुन, उसी प्रकार तू ( विश्वानि काव्या
भमि ) अपने सब स्तुतिके काष्योंको गुन ॥ १ ॥
१ अग्रिय:--मागे रहनेवाला ।
२ चित्रा ऊतया- विशेष संरक्षणको शक्ति अपने पास हो।
३ विश्वानि कान्या ममि-सब स्तुतिके काम्य हों, ऐसे कर्म करने चाहिए।
[७७६ ] है ( विश्व-चर्पणे ) सरका निरीक्षण करनेवाले सोम! (अनियः) तू मागे घलनेवाला होकर (यायः
ईरयन् ) स्तुतियों को प्रेरित करता हुमा ( समुद्रियाः मापः) अनारिशके जलको ( पवस्य ) प्राप्त कर। सोमरसमें
जल मिलाया जाता है ॥२॥
१ विश्व-चर्षणिः-- सब कोका अच्छी तरह निरोजन करना चाहिए । सार्वजनिक हित करनेवाला ।
२ अग्रिया-ऊचे स्थान पर रहें, नेता बनें।
३ याचः ईरयन्- दूसरोंको वाली स्तुति करने में प्रवृत्त हो, ऐसे उतम कर्म करने चाहिए।
४ समुद्रियाः आपः पयस्व- सोमरसमें अन्तरिक्षसे पक रूपमें प्राप्त होनेवाले जलको मिलावें ।
[७] है ( कवे ) दूरदर्शी सोम ! ( तुभ्यं ) तेरी ( महिम्ने } महानताके कारण (इमा भुघना तस्थिरे)
पे भुवन स्थिर है, उसी प्रकार ( घेनवः ) ये गा (तुभ्यं धावन्ति ) तुझे दूप देने के लिए तेरे पास दौरही है॥३॥
३१२ १ ". २ ३ २३"३ 3 (४६) सामवेवफा सुबोध अनुवाद उत्तराचिका ७८८ ये ते पवित्र मर्मयोऽभिक्षरन्ति धारया । तेमिनः सोम मृडय ॥२॥ (ऋ. १६११५) ७८९ स नः पुनान आ भर रयिं वीरवतीमिपम् । ईशानः सोम विश्वतः ॥ ३ ॥ ५ (ला) ॥ (ऋ. ९९६६) पति प्रथम ॥१॥ [२] ७२० अमिं द् वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्स यज्ञस सुक्रतम् ॥१॥ (ऋ. ११२१) ७९१ अमिममि हवीमामा सदा हयन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम् ॥ २ ॥ (ऋ. १।१२।२ ) ७९२ अग्ने देवा५ इहा वह जवानो वृक्तवहिपे | असि होता न ईडयः ॥ ३॥ ६ (यौ)॥ (ऋ१।१२१३) ७९३ मित्रं वय हवामहे वरुण सोमपीतये । यो जाता पूतदक्षसा ॥१॥(ऋ.॥२॥४) [७८ ] हे सौम ! ( ते ये ऊर्मयः ) तेरो जो लहरें है, वे (धारया पवित्रं अभिक्षरन्ति ) एक घारासे छननीसे भीचे गिर रही है, (तेभिः नः मृडय ) उनके द्वारा हमें सुख मिले ऐसा कर ॥२॥ [७८९ ] है सोम! (विश्वतः ईशानः ) तू सबका स्वामी है, (सः पुनाना) वह तू रस निकाल कर छाना जानेके बाव (नः ) हमें (यि वीरवती इपं आ भर ) पन और पुत्रपौत्रफर अन्न भरपूर दे ॥ ३ ॥ १ विश्वतः ईशानः- सब प्रकार सबका स्वामी । २ पुनानः-- पवित्र होकर । ३ रयिं वीरवती इयं मा भर- धन और पुत्र देनेवाले अन्न हमें भरपूर दे । ॥ यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ। [२] द्वितीयः खण्डः। [७९०] ( होतारं ) देवोंको मुलाकर लानेवाले { विश्व-पेइस ) सब पन पासम रखनेवाले ( अस्प यास्य मुऋतुं) इस यजको उत्तम ढगसे सिद्ध करनेवाले (दूतं आणि वृणीमहे ) देयोंको हपि पहुंचामेयाले अग्निको हम आराधना करते है ॥ १॥ १ होता-श्रेष्ठ देवोको पलाकर लानेवाला । २ विश्व-वेदाः- सब प्रकारके धनोंको अपने पास रखनेवाला । ३ ययस्य मुक्रतुः-पत्रको उत्तम ढंगसे करनेवाला। ४ दूतः- हवि देवोंको पहुचानेवाला। ५ अग्नि - "अग्नि करमादग्रणीभीत ” (निरुस्त )- अप्रणी, आगे ले जानेवाला, मंगिल तक पहुंचानेवाला। [२१] (विश्पति) प्रजाओं के पालन करनेवाले ( हव्य चाहे ) हविको देवोंके पास पहपानेवाले (पुरु-प्रियं) बहुतोंको प्रिय लगनेवाले ( अग्नि अनि ) आगे ले जानेवाले नेता अग्निको ( हवीमभिः सदा हवन्ते ) हवनके मों हम सदा बुलाते है ॥२॥ [७९२ ] है (अग्ने ) अग्नि देव ! ( गज्ञानः ) अरणियोंसे उत्पन्न होने वाला तु ( घृत-हिपे ) आसन फलान भाले यजमानके लिए (इह देवान् माघह) इस पश देवोंको मुला ला, तू (नः होता ईडयः असि ) देवोंको मुलाने पाला, स्तुत्य और हमारा सहायक है ॥३॥ [१३] (वयं ) हम सोम-पीतये जो पन मानेवाले और पवित्र मसयुक्त है, उन (मित्रं वरणं ) मिः और वरुणको घामदे) बुलाते हैं। - सृतीय अध्याय 3 सामवेदका सुबोध अनुवाद (१७) ३." 1113 ३"२ २ २११३३३३३ 3 9 स्वामी ७९४ सवेन यातायातस ज्योतिषस्पती ! ता मित्रावरुणा हुवे ॥२॥ (ऋ. १॥२॥३) ७९५ वरुणः प्राविता भुवन्मियो विधाभिरूतिमिः । करतां नः सुराधसः ॥ ३॥ ७ (वा) ॥ (* १९३६) ७९६ इन्द्रमिद्गाथिनो गृहदिन्द्रमर्केमिरणिः । इन्द्र वाणीरनूपत ॥१॥(118) ७९७ इन्द्र इवयो : सचा सम्मिश्ल आ वायुजा । इन्द्रो वजी हिरण्ययः ॥ २॥ (ऋ ११७२ ) ७९८ इन्द्र वाजेषु नोऽत्र सहस्रप्रधनेषु च । उग्र ग्राभिरूतिमि ॥३॥ (8 ११७४) ७९९ इन्द्रो दोघीय पक्षस आ सूर्य रोहयदिवि । वि गोभिरद्रिमरयत्न ॥४॥८(खा)। (१३) ८०० इन्द्रे अन्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेश्यामदे । पिया धेना अबस्यबा ॥१॥ (ऋ. १९४१४, ८०१ ता हि शश्चन्त ईडत इत्था विप्राय ऊतये । साधा वाजसातये ॥२॥ (ऋ. ७१९४।५) [७९४ ] ( यो अतेन ) जो सत्यवचनसे ( ऋताधी ) सत्यका सवर्धन करते हैं, जो ( ज्योतिषः पती } तेनो है, (ता मित्रावरुणा ) उन मित्र और वरुणको में (हुधे ) बुलाता हूँ॥ २ ॥ १ तेन सतावृधी- मत्प नियमका पालन करके रात्रके मार्गको उत्पति करते हैं। २ ज्योतिषः-पती-प्रकार के स्वामी, प्रकाश फैलाते हैं। [७९५ ] (धरणः मिन ) यहण और मित्र ( विश्वामि. अतिभिः ) अपने सब सरक्षणके सायनोरो ( प्राविता भुपद ) हमारे सरक्षण करनेवाले हों, (नासु राधसः करतां ) और हमें उत्तम धनसे युपत करें ॥ ३ ॥ ७९६ ] ( गाधिनः ) सामगान करनेवालोंने ( इन्द्रं इत् । इन्द्रको हो ( वृहत् अनूगत ) बुहत नामक सामगानसे स्तुति की। (अणिः ) अर्चना करनेवालोंने ( अभिः इन्द्र) मनोसे इन्द्रको स्तुति की, उसी प्रकार (वाणीः इन्द्र) स्तोत्रोंसे भी इन्द्रको ही स्तुति की ॥१॥ [७९७] (पनी हिरण्ययः इन्द्रद ) ववधारी, सोने के आभूषण धारण करनेवाला इन्द्र (बचो युजा होः) पहनरो । रपमें ] ना जानेवाले घोडाको ( सचा) एक साय ( आ संमिश्लः) अपने रयमे नौग्नवाला है ॥२॥ [७९८] है (इन्द्र ) इन्द्र ( उग्र.) वीर तू (उग्राभिः अतिमि ) सरक्षणके प्रवल साधनोंसे (सहन. प्रघनेषु वाजेषु । हजारों प्रकारकै धन प्राप्त होनेवाले युद्धोंमें (नः मय) हमारी रक्षा कर ॥ ३ ॥ १ उग्रः उग्राभिा अतिभिः नः अप- उग्रवीर होकर उन सरदाणके सापर्नेसि हमारी रक्षा कर । २ सहस-प्रधनेषु वाजेपु नो अब हजारों प्रकार के धन प्राप्त होनेवाले सोंमें हमारा रक्षण कर । [७९९] (इन्द्रः ) इन्दने । दीर्याय चक्षसे ) महान प्रकाश लिए (दिपि मर्य आरोहयत् ) लोक्में सूर्यको बहाया, उसी प्रकार ( गोमिः भद्रं व्यैरयत् । किरणोंसे मेघोंको प्रेरित किया ॥ ४॥ [८००] (अधस्या. ) अपने सरसको इच्छा करनेवाले हम (इन्द्र) के पाप्त और ( भन्नी ) अग्निके पास ( बृहत् नमः मुक्ति ) बहुत अन और उत्तम स्तुति (पेरयामहे । रहते हैं, उसी प्रकार (चिया धेनाः । बदिपूर्वक उनकी प्रार्थना करते है ॥ १ ॥ [८०९] (ताहि ) उस इन्ट और अग्निको ( शवन्तः घिमास.) गतले शानी मिलार ( ऊतये ) अपने सरसके लिए (इत्थं ईदत ) ऐसी स्तुति करते हैं, जिस प्रकार (स-वाधः ) मापसमें भगा करनेवाले (वाज-सानये) मत प्राप्तिके लिए स्तुति करते है ॥२॥ ,
(४८)
सामेबदका सुयोघ अनुवाद
[ उत्तराचिका
२
31
३३
3
२६
३
८०२ वा वा गाभिविपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे । मेघसाता सनिष्यवः ॥ ३ ॥ ९ (हु)
(.७९४६)
॥ इति द्वितीयः सः॥२॥
[३]
८०३ वृषा परस्य धारया मरुत्वते च मत्सरा । विश्वा दधान ओजसा ॥ १ ॥ (ऋ. ९६५।१०)
८०४ ते त्वा धरिमोण्यो३: पबमान स्वदृशम् । हिन्ये चार्जपु वाजिनम् ॥२॥ (ऋ. ९।६६।११)
८०५ अया चित्तो विपानया हरिः पयस्य धारया । युयं वाजेषु चोदय ॥३॥१० ()।
(ऋ. ९।६९।१२)
८०६ वा शोणो अभिकनिक्रदद्दा नदयनेपि पृथिवीमत द्याम् ।
इन्द्रस्येव बग्नुरा मृण्य आजी प्रचोदयनपसि वाचममाम् ॥१॥ (ऋ. ९/९७/१३)
८०७ रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयनेपि मधुमन्तमम् ।
पवमान सन्तनिर्मपि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिपिच्यमानः
॥२॥ (3. ९९७१)
[८०२] ( विपन्यवः ) स्तुति करतंको इच्छा करनेवाले (प्रयस्वन्तः) हविष्यान्नको पासमें रखनेवाले
( सनिप्यवः ) घन पानेको इच्छा करनेवाले और ( मेध-साता) यज्ञ करनेवाले हम (ता यां) उन तुम दोनों इन्द्र
भौर अग्निको (गीर्भिः हवामहे ) रतुतिरो बुलाते हैं ॥ ३॥
॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[३] एतीयः खण्ड।
[८०३ ] हे सोम! तू (वृपा ) बल बढागेवाला होकर. (धारया पवस्व ) एक पारासे छनता जा, और तू
(विश्वा भोजसा दधानः) सब धनोको अपने वलसे धारण करके (मरत्यते मत्सरः) मरतोंके साथ रहनेवाले
इन्द्रको आनन्द देनेवाला हो॥१॥
[८०४] हे (पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम! (भोण्योः धतीर) द्यावापृथियोको धारण करनेवाले (सा-दृशं
चाजिनं ) आत्माको साक्षात् करनेवाले, बलवान (तं त्वा) ऐसे उरा सुशे में ( वाजेपु हिन्वे) संग्राममें जाने के लिए
प्रेरित करता हूं ॥२॥
साभ'मया धिपा। इस बभलामो चित्त हा रिजहर नपा हरे सप्तकारखा"
परस्य ) एक पारासे पराश छनता ना, और ( वाजेषु युवं चोदय ) युद्धमें जाने के लिए अपने मित्र इन्त्रको प्रेरित
[८०६] ( शोणः पा) लाल रंगवाला बैल ( गाः सभि कनिक्रदत् } गायको देखकर जिस प्रकार शग
करता है, उस प्रकार ( नदयन ) शब्द करनेवाला यह सौम है, हे सोम! न ( पृथिर्षी उत धां पपि) पृथ्वी और
चुलोकको प्राप्त होता है, (आजी ) मुवमें (इन्द्रस्य वन्नुः इय ) इनके शब्दके समान तेरे शब्दको (माण्ये ) में
सुनता है, (प्रचेतयन ) अपने स्वरूपका गान देता हुआ (इमा वाचं आ अपसि ) इरा स्तुतिरूप पाणीको तू प्राप्त
E८०७ ] (रलाययः ) प्रथम स्वयं मधुर और ऊपरसे ( पयसा पिन्यमानः ) गायो दूध मिलाने से और अधिक
(मधुमन्तं ) मधुर हए (अंशुं) सोपको ( ईरयन् एपि) प्रेरणा करते हुए तू जाता है। हे ( सोम ) सोम ! (परि-
'पिच्यमान पवमानः पानी मिलाकर छावा जानेवाला तू ( संतान कृण्वन् ) अपनी धारा बनाते हए (इन्द्राय
पपिपत्रको प्राप्त होता है ॥२॥
सृतीय अध्याय ] सामवेदका सुयोध अनुवाद (४९) १ १२7 १६.१९ ८०८ एवा पवस्व मंदिरो मायोदग्रामस नमयन्वधस्नुम् । परि वर्ण भरमाणौ रुशन्तं गव्यों अर्थ परि सोम सिक्तः ॥ ३ ॥११ (रि)। (ऋ. १९७१५) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ [४] ८.९ स्वामिद्धि हवामहे साती वाजस्य कारवः । खां पुत्रेनिन्द्र सरपति नरस्त्वों काष्ठास्वतः (म ६५६।१) ८१० स त्वं नविन वजहस्त धृष्णुया मह स्तवानी अद्रिवः । गामधारध्यमिन्द्र सं फिर सत्रा वाज न जिग्युपे ॥ २ ॥ १२ (फु)॥ [धा. १०।उ २ । स. ५ ] ( . ६।४६।२ ) ८११ अमि म का सुराघसमिन्द्रमर्च पथा विदे। यो जरितम्यो मघवा पुरुषसुः सहस्रेणेव शिक्षति ।।१॥ (ऋ. ८।१९१) [८०८] हे सोम! ( मदिरा ) उत्साह बढानेवाला तू ( वध-रखं अवय होनेके याद ( उमाभस्य नमयन् ) पानी बहानेवाले मेघको झुकाते हुए ( मदाय पवस्व ) मानन्द देने के लिए छनता जा । (रुशन्तं वर्ण परिभरमाणः) तेजस्वो रंगको पारण करते हुए (सिक्तः) पानी छनते हुए ( गब्युः ) गाय के दूधको इच्छा करते हुए (नः परि मसू हमारे चारों ओर यह ॥३॥ । यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ। [४] चतुर्थः सण्डः। [८०९] है { इन्द्र) इन्द्र ! ( कारयः ) स्तुति करनेवाले हम ( याजस्य सातो) अन्नकी प्राप्तिके लिए (स्यां इन हि हयामहे ) तुम्ने हो बताते हैं, है इन्द ! (सत्पतिं घेष्ठ पुरुषोंका पालन करनेवाले तुझे (नरः) सोग (पत्रेषु हियन्ते) शत्रुके उत्तम होनेपर बुलाते है, उसी प्रकार ( अर्यतः फाष्ठासु ) योकि युमें भो(त्यां सुह हो सहायताके लिए बुलाते है ॥१॥ [८१०] (चित्र पत्रस्त अद्रिवः ) है विलक्षण पराक्रमी, वनपारो तथा वंतपर रहने वाले इन ! (कृष्णुया) अपनी दात्रुनाशक शक्तिसे ( महः) महान् हासू (स्तवानः) स्तुति दिए जाने के बाद (गां अरध्य संकिर) गाय, घोडे और रप उत्तम प्रकाररो हमें , (जिग्युरे) विजयी पुरुषको ( सत्रा चान) जो एक साय पो? आदि पापं तू देता है, उसी प्रकार हमें दे ॥२॥ १ धृष्णुयामहः- के पराभव करमेरो शालिसे महानता प्राप्त होती है। २ जिग्युरे सत्रा याज-विजयो वोरको महजम हो बान भौर बल प्राप्त होता है। [८११] (पुरू-वसुः मया ) बहुत सारा पन मारमें रखनेगला पनवान् ऐसा (य) मोर (जरिएभ्यः मदनेणाच शिक्षाति) स्तुति करनेवालोंको हजारों प्रकारसे पर देता है. ऐसे मु-राधस इन्द्र) उत्तम धन देनेवाः रा इनकी (4) तुम (यथा-विदे) जिन प्रकार मानते हो, उस प्रकर ( मभि प्र मर्च ) स्तुति करो ॥१॥ ७ [साम-हिन्यो भा.२] .
(५०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिका २१ 3 ३". ८१२ शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुपे । गिरेषि प्र रसा अस्प पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः ॥२॥ १३ (हि)॥ [धा. १६ । उ. ना. । ख ३ (८४९२) ८१३ स्वामिदा यो नरोऽपीप्यन्वजिन् भर्णयः । स इन्द्र स्तोमवाइस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि ( ८/९९१) ८१४ मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूपन्ति वेधसः । तव श्रवारस्युपमान्युक्थ्य सुतैपिन्द्र गिर्वणः ॥२॥ १४ (ल)॥ [घा १९ । उ. ना. व ११(१९९२) ॥ इति चतुर्य खण्ड |॥ ४॥ [५] ८१५ यस्तै मदो वरेण्यस्तैना पवस्वान्धसा । देवावीरवश सहा ॥१॥ ( ऋ ९/६१।१९) [८१२] (कृष्णुया शतानीक इव ) शूरवीर जिस प्रकार शत्रुसेनापर (प्रजिगाति ) चढाई करता है, उस प्रकार इन्द्र ( दाशुषे वृषाणि हन्ति ) दान देनेवालेके लिए शभुओंको मारता है, (पुर-भोजत. ) बहुत साधन अपने पास रखनेवाले (मस्य) इस इन्द्रके (दत्राणि ) दान लोगोंको, ( गिरेः रसाः इव) जिस प्रकार पर्वतके जल लोगोको तुप्त करते हैं, उसी प्रकार ( प्र पिन्धिरे ) तृप्त करते हैं ॥ २॥ १ धृष्णुया शतानीक व प्र जिगाति-शूर पुरुष अपने शौसे शत्रुसेनापर आक्रमण करताऔर विजय प्राप्त करता है। २ दाशुपे युवाणि हन्ति- वह इन्द्र उपकार करनेवालोंकी उन्नतिके लिए शत्रुओंको भारता है, और दाताओकी रक्षा करता है। ३ गिरे रसा इव अस्य बत्राणि प्रपिन्विरे- पर्वतके जल जिस प्रकार सबको मिलते हैं, उस प्रकार इसके दान सबके लिए लाभकारी होते हैं। [८१३] हे (यनिन ) वधारो इन्द्र (भूर्णयः नर.) हदि देनेवाले यजमान ( इदा त्यां अपीप्यन् ) आज पहले ही दिनसे दुझे सोम देते है । । सः) वह तू ( स्तोम-वाहस.) स्तोत्र गानेदालोको स्तुतियोंको ( इह श्रुधि) इस पक्ष गुन और ( स्पसरं उपागलि ) पक्षस्थानमें विराजमान हो॥१॥ [८१०] हे (सु-शिमिन् हरिया गिर्वणः) सुन्दर शिरस्त्राण धारण करनेवाले, घोडोका पालन करनेवाले, स्तुति के योग्य इन्द्र ! (वेवस) तेरी सेवा करनेवाले, त्वया मामूपन्ति ) तुझे उत्तम प्रकारसे मुशोभित करते है, ( मत्स्व) तु सोम पीकर तुप्त हो, हे । उपथ्य ) स्तुतिके योग्य इन्द्र ! (सुतेपु) सोमरस तैयार होने के बाद तुझे । तव उपमानि श्रवासि ) तेरी उपमा देने योग्य अम भी दिए जाते है ॥२॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुभा। [५]पञ्चम खण्डः। [८१५] है सोम ! (देवची') देवताको देने योग्य (अध शंस हा) पापी राक्षसोंको मारनेवाला और (वरेण्या मद. य.) श्रेष्ठ आनन्द देनेवाला जो तेरा रम है. (तेन अन्धसा पयस्य) उस सेवन करने योग्य रमकै साथ तूपात्रमें छनतामा १॥ - तृतीय अध्याय सामवेदका सुशेध अनुवाद २ ....३ 39 १३ ३१ ३ १ 7" २१३३ 3" २ , घर १ ३१२ ८१६ जमित्रममिनियरसस्निवाज दिवेदिये । गोपतिरवसा असि ॥२॥ (ऋ. ९।६ १९२० ) ८१७ सम्मिश्लो अरूपो भुवा सूपस्यामिन धनुभिः । सीर्द च्छयेनो न योनिमा ॥३॥ १५ (च) ।। [धा. १२ । उ ११ स. नास्ति ] (ऋ ९६९।२१) ८१८ अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अपति । पतिविश्वस्य भूमना व्यस्वद्रोदसी उमे (ऋ ९।१०१७) ८१९ समु प्रिया अनूपत गावो मदाय ध्वयः । सोमासा कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः ॥२॥ (ऋ. १९०११८) ८२० य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रयाय्यम् । या पञ्च चर्पणीरभि यि येन नामहे ॥ ३ ॥ १६ (फु)॥ [धा १९ । उ. २ । स्व ५] ( ९/१०११) ८२१ वृपा मतीनों पर विचक्षणः सोमो अहां प्रतरीतोपसा दियः । प्राणा सिन्धूना कलशा५ अचिक्रददिन्द्रस्य हाधिमनीषिभिः ॥१॥ (* ९८६१९ [८१६] हे सोम! तू ( अ-मिनिय वृत्र जनि ) शटरी दुष्टोका नाश करनेवाला है, तू ( दिवे दिये) प्रति- दिन (पाजं सस्तिः) युद्धर्म जाता है, और (गो-पाति ) गायका दान योर (अश्व-सा असि)घोडका गनन करता है ॥२॥ १ अ-मिनिय वृन जति शत्रुका यय करना चाहिए। २ दिवे दिवे वाज सस्ति:-प्रतिदिन त युद्ध करता है। [८१७ 7 हे सोम । लू ( सु-उपस्थाभिः धेनुभिः संमिश्लः ) सुबर गायके चूध मिलनेपर ( श्येन न) जिस प्रकार बान (योनि आसीदं) अपने घोसले बैठकर (न अरुपः भुवः) तेजस्वी होता है, उसी प्रकार अमरता है ।।३N [८१०] ( पूर्ग) पोषण करनेवाला { भग ) भजनोय । रयिः) पनके समान { अयं पुनानः अर्पति) यह सीम छाने जाते हुए कलशमें जाता है, (विश्वस्य भूमनः पतिः सोमः) सब प्राणियोंका पालन करनेवाला यह सोम (उभे रोदसी व्यापयत् । बोनों घुलोक और पृथ्वी लोक पर अपने तेजसे पाता [८१५] (प्रिया. घृषयः गाव.) प्रेम और स्पर्धा करनेवालो गायें ( मदाय समनूपत } आनन्द प्राप्त करने के लिए स्तुति करती है. (उ) यह सत्य है कि (पनमानासः इन्दया ) शुद्ध होने वाले तथा ऐश्वर्पयाले सोमास ) पोमरस (पथ परते ) अपने यहनेके मार्गको बनाते है ॥ २ ॥ ६८२० ] है ( पवमान ) सोम! ( य: सोनिष्ठः) जो सोमरस शनि मानेवाला है, (य.) गो (पंच चर्पणी पचिन नोंको ( अभि । प्राप्त होता है, और (येन राय वनाम जिसको सहायताले हम धन प्राप्त करते ₹ उस ( श्रवारय सभर प्रशंतनीय रसको हमें भरपूर ॥३॥ [८२१J (मतीनां वृषा) बुद्धिका यल बनानेवासा (शिवक्षणः ) विशेष ज्ञानो, (हा उपसा दियः प्रत. रीना दिन समोर पुलोका तेज बहानेवाला (सिन्धूनां प्राणा ) नदियों की प्राण ( मनीषिभिः मिशानों द्वारा स्तुति दिए जाने योग्य ऐसा यह सोग (इन्द्रस्य दार्दि माविशन् ) यो हरयम प्रवेश परनेकी इच्छा रहए ( कलशान भचिनदर तथा सम्म करते हुए पलमा माता है, माना जाता है | (
१३२
३१
७.२७
(५२)
सामघेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराचिका
८२२ मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविमिर्यसः परि कोशार असिष्यदत् ।
वितस्य नाम जनयन्मधु क्षरनिन्द्रस्य वायु संख्याय वपन् ॥२॥ (*. ९८६०२०)
८२३ अयं पुनान उपसो अरोचयदयं सिन्धुभ्यो अभवदु लोककन् ।
अयं त्रिः सप्त दुहान आशिरर सोमो हदे पवते चारु मत्सरः ॥ ३ ॥ १७ { गी)॥
[घा. ३६ 1 8. ३. स्व. ४ ] (ऋ ९८६२१)
॥ इति पञ्चम खण्ड.॥५॥
।
८२४ एवा हासि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः । एवा ते राज्य मनः ॥१॥ (१९।२८९)
४२५ एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धाभि । अधा चिदिन्द्र नः सचा ॥ २ ॥
( ८/९२।२९)
८२६ मा पु ब्रह्मेष तन्द्रयुभवा घाजानां यते । मत्स्वा सुतस्य गोमतः ॥ ३ ॥ १८ (ति) ॥
[.. १४.उ १।स. ३(१८१९२।३०)
८२७ इन्द्र विश्वा अवीवृधसमुद्गव्यचस गिरः
रथीतमा रथीनां वाजाना सत्पति पतिम्
(११११)
[२२] (पूर्व्यः कविः) महोरो ही ज्ञानी यह सोग ( मनीषिभिः पवते ) याजकों द्वारा छाना जाता है (नृभिः
यतः) पतकर्तामों द्वारा नियन्त्रित यह सोम ( कोशान पर्यसिष्यदत्) कलशमं जाता है, (नितस्य इन्द्रस्य नाम
जनयन् ) तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होनेवाले इन्द्रकै नामको और अधिक प्रसिद्ध करता हुआ ( मधु ) यह मधुर रस (न्द्रस्य
सख्याय ) इन्द्रको मित्रता लिए ( वायुं वर्धयन् ) वायुका रोवन करता हुआ (क्षरन ) वर्तनमें गिरता है ॥ २ ॥
E८२३] ( लोक-कृत् ) लोगोका हित करनेवाला (अयं पुनाना ) यह तोम पवित्र होता हुआ ( उपस अरो
चयत् ) उषाको प्रकाशित करता है, (सिन्धुभ्यः अभवत् ) नदियोंको बढानेवाला यह है, (भयं हदे ) यह सोम पेटमें
जाने के लिए ( नि:-सप्त दुदुहान.) इको गायोका यूप निकालकर (मत्सरः चार पयते) आनन्ददायक होकर
उत्तम रीतिरो छाना जाता है ॥ ३॥
यहां पांचयां खण्ड समाप्त हुआ।
[६] पठः खण्डः।
[८२४] हे इन्द्र! तू ( धीरयुः एव असि हि ) युद्ध में बोरोंका उपयोग करनेवाला है, क्योंकि तू (यूर पर)
शुर है, (उत स्थिर ) गौर युद्धमें रिपर रहनवाला है, इसलिए (ते मनः ) तेरा मन (राध्य एव ) भराधना करने के
योग्य है ॥१॥
[८२५ ] है ( तुवी-मध ) बहुत पनवान् (इन्द्र) इन्द्र। (विश्वेभिः धातृभिः) धारण करनेवाले तब
देवताओंको हर्षि देनेवाले यजमानोंके पास तेरे द्वारा दिए गए (रातिः) दान (घापि चित् स्थिरपसे रहते हैं. (अथ)
इसलिए, हे इन्। (नः सचा) हमें धन देकर हमारी महायता कर ॥२॥
[८२६ ] हे (चाजानां पते) अन्नोंके व बलों के स्वामी इन्द्र ! (तन्द्र-युः ब्रह्मा इव ) आलसी ब्राह्मण के समान
( मा उसु भुवः ) तू आलमी मत हो, अपितु ( गोतमा सुतस्य मत्स्य ) गोप्य मिश्रित सोमरसमे भानन्दित हो ॥ ३ ॥
[८२७] (विभ्याः गिरः) सब स्तुतिया ( समुद्र-व्यचसं ) समुद्र के समान विस्तृत (रथीनारपीतम) रपी
वीरों में अत्यन्त षष्ठ (याजानां पति) बलोंके स्वामी (सत्पति इन्द्र अधीवृधन् सत्पुदोंके सरक्षण करनेवाले इन्द्रका
वर्णन करती है, और उसके मशको बढाती है ॥१॥
(५३) मृतीय अध्याय ] सामवेदका सुबोध अनुवाद . 2312 ३१ २२ ८२८ सख्य त इन्द्र वाजिनो मा मैम शवसस्पते । स्वाममि भ नौनुमो जेतारमपराजितम् ॥२॥ (ऋ. ११॥२) ८२९ पारिन्द्रस्य रातयो वि दस्यंत्यूतयः । यदा वाजस्य गोमत स्तोत्र्भ्यो महत मपम् ॥३॥ १९ (ली)॥ [था. १८। उ. नास्ति । स्व. ४ ] ( १॥१॥३) ॥इति षष्ठः सप्ड ॥६॥ ॥ इति द्वितीयप्रपाठके प्रथमोऽर्ष ॥२॥ ॥ इति तृतीयोऽध्याय ॥ ३ ॥ [८२८ ] है (शवसः पते ) बलोंको रक्षा करनेवाले (इन्द्र) इन्द्रा (ते सरये वाजिनः ) तेरी मित्रता बलवान होकर हम (मा भेम) न उरें, निर्भय हों, (जेतारं ) विजयों ( अपराजितं ) पराजित म होनेवाले ऐसे (Rai अभि मणोनुमः ) तुझे हम प्रणाम करते है ॥ २ ॥ [८२९] (इन्द्रस्य रातयः पूर्वी.) इन्द्र के दान प्राचीनकालसे मिलते भा रहे हैं, ( स्तोतृभ्यः स्तुति करने वागेको ( गोमतः वाजस्य मघ ) गायसे उत्पन्न हुए अन्नस्पी धन (यदा मंहते ) जब वह देता है, तब उसने (रातयः) वान (न वि दस्यन्ति ) म नहीं होते ॥ ३ ॥ ॥ यहां छठवां खण्ड समाप्त हुगा । ॥ इति तृतीयोऽध्यायः॥ तृतीय अध्याय इन्द्र-देवता ७ याजानां पतिः [८२६]- अन्न औरबलोंका स्वामी। इस अध्यायमें इन्द्र देवताके गुणों का वर्णन इस प्रकार है- ८ है इन्द्र ! सहस्र प्रधनेषु घाजेषु नः अय [७९८]- हे इन्द्र ! हनारों पन जिसमें प्राप्त होते हैं ऐसे ५ उप्रः [७९८-इन्द्र उप्रवीर है, वह पूर है। युद्धम हमारी रक्षा कर। २ घनी:-[७९७ ]- यह वनको धारगरता है। ३ इन्द्रः (इन् द्र.) [१७]-शानुभोंको फाडता है। युवम हजारों प्रारके पन मिलते है । दानोंको हरानरे ४ हिरण्ययः । ७९७ ]- सोने के आभूषण धारण बाद उससे जो लूटा जाता है, उस लूट में पन प्राप्त होता है, करता है। अति पदमें विजय मिलने के बाद दात्रुको सूटनेका अपार ५ यचो गुजा हो। सवा आ संमिश्लः [७९७]- विजयो योरोंको है। यह प्रपा वेदोरोमायचो, ऐसा रोखता है। पादोंको सुनते ही रपमें जुम्मानेवाले ऐसे होसियार घोरे ९ हे इन्द्र। धीरयुः शूरः मसि, स्थिरः मसि [८२४]-हेतात धोरोंरे साप रहारपूरता रिसाने. इगरे घोरतनी अग्दो तरह शिक्षित हरिदार बोलते वाला है। मौर युटमें अपनी जगह पर स्थिर रहनेवाला है। होमानी जगह जारर बरे हो जाते है। क्योरि उसको हार कभी भी नहीं होती, इसलिए यह एग ६ उपच्या [८१०]- स्तुप, प्रशसनीय। मुटने मपत्री जगह पर स्थिर रहता है।
सामवेदका सुवोध अनुवाद [ उत्तरार्चिक १० सरपति नरः वृनेषु हवन्ते । ८०९- उत्तम " बज्रधारी" इन्द्र हैं। हम " वधारो" नहीं हो सकते, रीतिसे पालन करनेवाले इन्द्रयो लोग पुद्ध में सहायता लिए क्योकि हमारे पास वज्र नहीं है, पर हम " शस्त्रधारी" तो बुलाते है। हो हो सकते हैं। इस रीतिसे इन्द्र के गुणोका ज्ञान इन मत्रोंमें ११ सुशिप्रिन् हरिवः गिर्वणः [ ८१४ ]- उत्तम दिया गया है। उन्हें जानें और उनके मासयको अपने अन्दर साफा साधनेयाला और उत्तम घोडे पाल्नेयाला प्रशंसनीय लानेका प्रयत्न करें। अब दूसरे देवोंके गुण देखिए--- अग्नि-देवता १२ धुप्णुया शतानीक व प्रजिगाति [ ८१२]- धंसे सैकडो संनिक पासमें रखनेवाले वीरके समान शत्रु पर अग्नि देवताके निम्न गुण इस अध्यापमें आए है- इन्द्र आक्रमण करता है। १ अग्निः [८१०]- अग्रणी • आगे ले जानेवाला, १३ दाशुषे वृत्राणि हन्ति [८१२]- दान देनेवालोंके अन्ततक पहुचानेवाला। कल्याण करने के लिए उनके शत्रुओंको मारता है। २ विश्व-वेदाः [७९० ]- सर्वज्ञ, सब धनको अपने १४ हे इन्द्र ! कारयः वाजसातो त्या हवन्ते [८०९] पास रखनेवाला । -हेन्द्र स्तुति करनेवाले अनके परम तुझे बुलाते है। ३ यज्ञस्य सुकातुः [७९० ]- यतका सम्पादन उत्तम १५ गायिनः इन्द्रं यहत् अनूपत, अर्किणः अभिः रीतिते करनेवाला, सजनोका सत्कार करनेवाला, सब लोगों- का सगठन करके और दान देकर सबका उद्धार करनेवला । याणी इन्द्रं [ ७९६]- स्तोत्र कहनेवाले इन्द्रकी बहत साम गाकर स्तुति करते है, अर्चना करनेवाले मंसि मासा ४ विश्पतिः [७९१/- प्रजाओंका पालन करनेवाला। करते है, सभीको पाणी इन्द्रका वर्णन करती है । ५ पुरु-प्रियः [ ७९१ ]- बहुतोंको प्रिय । १६ अवस्थवः इन्दे अनौ बृहत् नमः सुपुक्ति ६ हव्यवाह [७९१]- हवि देवोको पहुंचानेवाला। ऐरयामहे । ८००]- अपने संरक्षणको इच्छा करनेवाले ७ दूतः [७९०]- हविको देयों तक पचानेवाला दूत । इन्ट और अग्निको हम महान् स्तुति करते है, ऐसा कहते है। ८ होता [ ७९० - देवोंको बुलाकर लानेवाला । ३७ विश्वाः गिर समुद्रव्यधस रथानां रथीतम ९ जशान वृक्त-बर्हि पे इह देवान् आ यह [७९२]- घाजानां पति सत्पति इन्द्र अवीवृधन् । ८२७ ]- सम उत्पन्न होते ही यजमानोंके लिए देवोंको बुलाकर ला। स्तुतियां समुद्र के समान विदाल, श्रेष्ठ रथी, धनोंके स्वामी, १० ना होता ईडयः असि [७९० ]- तु हमारा उत्तम अधिपति ऐसे इन्द्रफे यशको बढाती है। होता और स्तुत्य है। १८ इन्द्रः दीर्घाय चक्षसे दिवि सूर्य आरोह्यत् यहा पर अग्निको देवोंको बुलाकर लानेवाला और यज्ञ [७९९ - इन्धने महान् प्रकाशके लिए सूर्यको धुलोक शालामें उन्हें अपने अपने स्थान पर बैठानेवाला कहा गया २९ गोभिः दि व्यरयत् १७९९१- किरपोस मेयोको माला नेत्र स्थानमें सूर्य, हृदयके स्थान पर चन्द्रमा, फुफ्फुस में है। यहाँ यज्ञशाला हमारा शरीर है। इस शरीररूपी यश- फोटा और पानी बरसाया। वाय, छातीमें इन्द्र, मुखमें अग्नि, कानमें दिशा ऐसे अनेक इन्द्र के ये गुण इन मयों में आए है। इनमें से जो गुण अवयदोंमें अनेक देव आकर बसे हुए है और इस हमें अपने में लाये जा सकें उन्हें पाठक लाने का प्रयल करें, और अपना - अपना काम ये करते हैं। देव शारीरमें उष्णता जो गुण न आ सकते हो उनका आशय ही पाठक अपने मनमें स्थी अग्निके रहनेतक ही रहते हैं। शारीपे होने के पहले ही धारण करें। जैसे “ सबके प्रकाशके लिए इन्द्रने सूर्यको सब निकल जाते है। इसलिए कहा है कि अग्नि शरीररूपी बाकाश पर महाया" इस प्रकार सूर्यको चढाना मनुष्योंके पतमाला सब देवोंको मुलाकर लगता है और उन्हें अपने • पशको बात नहीं है, फिर भी सज्ञानान्धकारम पड़े हुए अपने स्थान पर गता है, और उनके द्वारा यहा सब कार्य मनुष्यों को प्रातका प्रकासा देकर उन्हें ज्ञानयुक्त करनेका करता है। दारोर, यह अनुभव सभी सापोंको सेना काम बासि आसानीसे हो सकता है। प्रत सापकों को ऐसे पाहिए । मौर अपने शरीर रूपो परासाला सब देव कैसे काम अवश्य करने चाहिए। और कहाँ रहते है, यह जानना चाहिए। पर चढ़ाया।
सामवेदका सुबोध अनुवाद (५५) तृतीय गध्याय] यनशालाका चित्र बिरी -- O भन्न Y OGRO मा Ho दि ० PRO दा o विपद पज्ञशाला दरोरका चित्र है । इस प्रकार मग्निके जो गुण हविष्यका हषन करनेवाले, पनकी इच्छा करनेवाले, यस मंत्रमें कहे हैं उन्हें पाठक अपने मन्दर धारण करें। करनेवाले हम तुम दोनों-दर और पग्निको स्तुति करके देवाको यसाकर लानेका अयं राष्ट्रमें विद्वानोंको बसाकर गुलाते है। लाना है । "विद्वांसो हि देवाः " (ना.पा.) विद्वान् ४ यथायिदे सुराधसं इन्द्रं अभि प्र मर्च [८५१] हो राष्ट्रम देव है। इस प्रकार देवोंके गुण अपने राष्ट्रीय -जसो जानकारी है येसो हो उत्तम धन देनेवाले इन्द्रकी और वैयक्तिक पतम्यकी जानकारी दे रहे हैं। उसे जानकर आराधना करो। अपनी उन्नति करनी चाहिए। इस प्रकार इन्द्र और बरिनकी स्तुति इस अध्याय है। इन्द्र-अग्निकी स्तुति मित्र और वरुणकी स्तुति इन्द और मग्निकी स्तुति एक ही जगह है, इस विषयम मित्र और वक्षण इन दोनों देवताओंको स्तुति भी इस इस प्रकार कहा है। अध्याय में है। १ ऊतये ता इत्था इंडते [८०11- अपने संरक्षणके १ ऋतेन प्रतावृधौ ज्यातिपस्पती मित्रावरुणा लिए उन दोनोंको दस प्रकार स्तुति की जाती है। हुवे [७९४ ]- सत्य पालनसे सम्पक मार्गका संवर्धन २ सवाधः वाजसातये ईडते [८०१]- शत्रुके वाधा करनेवाले, तेजोंसे तेजस्यो, मित्र और धरण है, उन्हें में डालने के लिए मानेपर अन्न प्राप्तिके लिए इनकी स्तुति की शहायताके लिए बुलाता हूँ। इनमें मित्र और वरणको सत्यका पालन करनेवाला-और ३ विपन्यतः प्रयस्वन्तः सनिष्यवः मेघसाता सत्यमार्गका संवर्धन करनेवाला रहा गया है । सत्यपालन तायां गीमिः हवामहे [८.२]- स्तुति करनेवाले, और सत्यमार्ग का संवर्धन ये दोनों मुग रितने महत्व केह, जाती है।
सामवेदका सुबोध अनुवाद उत्तराधिका यह जानकर उन्हें अपनायें। घे तेजस्वो है अत हम भी तेजस्वी तेजस्वी बनें। २ विश्वामिः ऊतिभिः मित्रः चरणः प्राषिता भुत् १ हे परमान! स्वदृशं भानुना घुमन्त त्या हया [ ७९५ ]- सब प्रकारके सरक्षणों सा और महे { ७८४ ]- हे शुद्ध होनेवाले सोम! तू आत्मसी और अपने तेजसे तेजस्वी है, ऐसे तुझे सहायताके लिए हम बुलाते है। वरुण हमारा सरक्षण करते हैं। अपने सरभगके साधन लोग अपने पास रखें और उससे गुण महत्वके हैं। सब कुछ अपनी शक्तिसे ही देखें, चूसरेको यहा " स्वः-दृशं" और "भानुना घुमन्त" दूसरोकी भी रक्षा करें। दाक्तिसे न देखें, दूसरेको दृष्टिसे न देखें । उसी प्रकार अपने ३ नः सुराधसः करताम् [ ७९५ }- हमें पे उत्तम सेजसे तेजस्वी हों, अपने तेजसे विश्वमें घमके। पनसे यशस्वी होना दान ये देवता रान देते है। ये उदार है- १ जने नः यशसः धि [७७८- मनुष्योंमें हमें १ गा अर्वतः नः राये दुर विधि [ ७८३ ]- गाय यशस्वी पर । और घोडे सू देता है, इसलिए धन प्राप्तिके दरवाजोको २ तय श्रयांसि उपमानि [८१४ [- तेरे यश उपमा हमारे लिए खोल दे। देने योग्य है। २ अभिपुतः पुनान नरपि चीरवती इर्ष आभर इस लोपमें अपना पर ऐसो कोशिशप्रायेषको करनी [७८९ ]- रस निकालने के याद छाने जानेवाला न हमें धन पाहिए । जीवन यशस्वी परना यहाँ अत्यन्त आवश्यक है। और पुत्र पौत्रसे मुक्त भरपूर मान दे। शत्रुको दूर करना पन और अन्न पुत्र पौसि पुरत हो, घरमें अन्न और तो दूर करने उपरेश अनेक प्रकार इस अध्यायमें धनये ताप उनका उपभोग करनेवासे पुत्र पौत्र भी हो। आया है। ३ चित्रपजहस्त अद्रिवः धुष्णुयामहा स्तयान १ विश्याः द्विषः अप जहि [७७८]- ओंको गां रथ्यां सकिर [८१०] हे विलक्षण पराक्रमी वन दूर कर पारण करनेवाले और फिलेमें रहनेवाले इन ! अपनी शत्रु २ ते देवघी अघांस-हा घरेण्यः मदः । ८१५] मासक पाक्तिो बड़ी स्तुति होनेके पार पाप और घोडे हमें -तेरा मानन्द देयोंसे सम्यन्य जोडनेवाला और पापियानो उत्तम रीतिसे दे। मारनेवला है । पापी पुष्टोंको मार पर दूर परना चाहिए। ४ पुरयसु. मघया जरिभ्यः सहस्रण र ३ अमिप्रियं वृनं जमिः [८१६]ोको र शिक्षति [ 1] यहत धनवान् इन्द्र अपने स्तोताओं को मारनेवाला है। हजारो प्रकारके धन देता है। ४से सण्ये, तब उत्तमे गुम्ने, पृतम्यतः सास. ५ पुरभोजस. अस्य दवाणि प्रयिन्यिरे । ८१२]- हाम[७७१ ]- तेरो मित्रता और तेरी तेजस्वितारो पात महत मनवाले इस इसके बार भी बहुत से है। हुए हम, सेना सेर भरने म्यर पाते एनसे मानेकाले ६ गोपातिः अयमा [ ८१६]- गाय और पोतोको हरा सकें। वानरता है। ५ ते या भीमानि तिग्मानि आयुधा धूषणे, साप सदस्य. रातयः पूर्षी [८२९]-हरके धार परते. निदानाक्ष [७८०/- तेरे पाग मो मार और सीकर से चलते भा रहे है। शास्त्र समोर मानेके लिए है। उनरेारा हमारे ८ स्तोतभ्या गोमतः याज्ञस्य मघ यदा मंहते, निकोस हमारी रक्षा। उसयान यिदस्यन्ति [२९]- स्तुनिसरनेवालोहितिए ६२शपमस्पतेन्टसेसम्ये याजिनामा म नागाशि वापत महषी मन यह रेलातर भी [८१०]- Rat मित्रता होने पर रारेबान नहीं होते। एम बलवान् बना। MIR मम्याप दानके पर। तारं मपगजिनं रपा ममि मनोनुम [८२८/- एतीय गायाय] सामवेदका सुबोध अनुवाद सोमके गुण धणित है- (५७) विजयो और भी भी पराजित होनेवाले तुम हम पार २ विश्वानि फान्या अभि पवस्व [५७५ -हमारे मार प्रणाम करते है। स्तुतिके काय सुन। सयु दूर करने के विषय तथा शत्रुको हराकर उसके नारा ३ हे वृषन् ! यूप्णा ते शवः वृष्ण्य [७८२]- है पने विषयमें इस तरहरे वर्णन इस अध्यायम है। पलयान् देव ! तेरे समान पलवान् वीरया सामर्थ्य विशेष प्रभावशाली है। सोम हिमालयकी चोटी पर जानेवाली एक खेल है। ४ धन पा [ ७८२]- तेरा सेवन पल पदानेवाला है। उसका रा देव और यत करनेवाले पोते है, और उसकारण ५ सुतः वृषा [७८२]- सोमरस बल बढानेवाला है। उनका उत्साह बढ़ता है, शौर्य बढता है, और ये प्रत्येक ६ त्वं वृपा असि [५८२ ]- तू बल बदानवाला है। काममें यशस्यों होते हैं । इस सोमवे उत्तम गुण इस अध्यायमें सोमरसके ये वर्णन उसके बल बढानेवाले गुणके कारण है। सोमरस पौनसे धोरोंका मल बहता है, इसलिए ये गुण १ देव [७८१]- तेजस्वी, प्रकाश करनेवाला । सोमरस हो है ऐसा कह दिया। २ घुमान् [७८१]- हजारी, पमानवाला। सोमके वीर्य और तेज ३ इन्दुः [७८६]- चमकनेवाला। सोम वीर्यवान् और तेजस्वी है। ४ पृपा [14]- बलवान्, शक्तिमान, सामभ्यं सम्पन्न । ५ धुपगतः [८१]- बल बदानेका जिसका प्रत है। व्यायत् । ८१८]- सब प्राणिपात्रका पालन करनेवाला १ विश्वस्य भूमनः पतिः सोमः उभे रोदसी ६ पविः[७७७]- ज्ञानी, दूरदर्शी। सोम पुग्नी और धुलोकमें मपने तेजसे धमरता है। ७ अप्रियः [७७५]- मागे रहनेवाला। २ हे सु-आयुध मन्दमान' सुर्य भा पवस्व ८सु-आयुधः [७८११-उत्तमशस्त्रपारण करनेवाला। ९ विभ्य-चपंणिः [ ७७६ ]- सब मनुष्योंका हित (७८६]- हे उत्तम मापथ धारण करनेवाले सोम । मानद रेनवाला होकर हमें उत्तम योर्य प्रदान कर। इस परनेवाला। १०विश्यता ईशान [७८९]- सबका स्वामी, सबका स्थानपर मोनको उत्तम शस्त्र धारण करयाला बताया है, उसका सारपर्य यह है कि पोर लोग सोमरस पोते हैं, उससे ईश्वर। सोमके ये गुण इस अध्याय दिए गए है। उनमें कुछ उनका उत्साह बढ़ता है, और ये उत्तम शस्त्र लेकर जाते गुण यालंकारिक है, जैसे “ कवि" दूरदर्शी विद्वान सोम- है। यह सब सोम पानसे होता है, इसलिए सोको रस पोते है और उसके कारण उनको ज्ञानशक्ति उत्तेजित उत्तम शस्त्रास्त्र लेकर लडनेवाला बता दिया। ३हे पवमान 1 मोजिष्टः श्रयाय्य आभर, य: होनी है। इसलिए यह सोमरस कवि है। पचचर्षणि आर्भ तिष्ठति, येन रयिं वनामहे [२०] शूरपुरुष सोमरस पीते हैं और उनका उत्साह बढता है और उसके कारण ये शूरवीरताके काम कर सकते हैं, स- - है सौम ! तू सामथ्र्य बढानेवाला है, इसलिए यश बढ़ाने लिए यह शौर्य और बन बढानेवाला है। यह उत्तम शास्त्रीका दाले सामर्थ्य हमें भरपूर दे। पांच प्रकारके लोगोंका कल्याण प्रयोग करता है, क्योंकि शरवोर सोमरस पोकर और उत्साहित करनेके लिए तैय्यार रह और हमें धन मिलें एसा कर सोम पीनेसे ऐया सामपं बढ़ता है। होकर युद्धमें जाते है और यहां अपने तोपण शस्त्रास्त्रोका उपयोग करते है। इस प्रकार आलकारिक रीतिसे इन पदोंको सोमकी महिमा समझे और जिस प्रकार सोम बलवान्, शर और विजयी है, १ तुभ्य महिम्ने मा भुवना तस्थिरे [७७७ }- उसी प्रकार साधक भी बर्ने। तेरी महिमाके लिए ही ये सारे भवन स्थिर है, अर्थात् सय सोमकी रक्षणशक्ति मगह तेरी महिमा ही सबका उत्माह बढाती है। १ चित्राभिः ऊतिभिः वचः परस्य [७७५] २ वृपा धर्माणि दमिपे [७८१]-दूमपने बलमै सपनो दिला सरक्षणको शक्तिले स्तुतिके वचनको सब कर्तव्योंको धारण करता है। पवित्र कर। इस प्रकार सोमको महिमा समया रस्साह दातो है। ८ साम शिली भा २] (५८) सामवेदका सुवोध अनुवाद [ उत्तराचिका सोममें उत्साह बढानेका सामर्थ्य है, इतना ही इस वर्णनका लौका आटा इनमसे जिसकी इच्छा हो उसे मिलाते हैं, फिर तात्पर्य है। इसलिए हम सोमके साथ मित्रता करें और उसके उसका हवन होता है और अन्त में उसे लोग पीते हैं। उत्साहसे उत्साहित होकर अपने अपने कार्य करते रहे। सोममें पानी मिलाना सोमके साथ मित्रता १ समुद्धिया आपः परस्य [७८५]- अन्तरिक्षल्यो १ पयमानस्य ते सतित्वं आवृणीमहे [७८७ ]- समुद्रका पानी मिलाओ । पुग्यौरे समुद्र खारे पानीके होते सोमके साथ मित्रता करनेको हम इच्छा करते हैं। हैं । और वह पारा पानी पीने के लायक नहीं होता। अन्तरिक्षने २ ते ऊर्मयः धारया पवित्रं अभि क्षरन्ति, तेभिः मेघ होते हैं, और वह मोठे पानीका समुद्र है । उसका, कुएर ना मृड [ ७८८]- तेरी लहरें एक पारासे छलनी में गिरती भयवा नदी और नहरोंका पानी सोमरसमें मिलाया जाता है। है, उससे हमें सुखी कर। २ आयुभिः मम॒न्यमानः यत् अद्भिः पारेपिच्यसे सोमसे उरगाह बढता है और महान कार्य करनेको शक्ति दोणे सधस्थं अनुप [ ७८५ J- नय अारियज होमको अपने अन्दर बढती है । इसलिए उसके साथ मित्रता करनेको धानते हैं, तब वह पानोमें मिलाया जाता है और द्रोश . इच्छा लोग करते हैं। यह मित्रता सोमरस पोनेरी इच्छा ही कलसेमें भरा जाता है । फलश में उसे स्पान मिलता है, अर्थात् छना हुमा सोमरस है । सभीको इच्छा ऐसी रहती है, क्योकि उत्साह बढे और हम महान कार्य करनेमें समर्थ हो ऐसी इच्छा सबके लिए ३ रुशन्तं वर्ण परि भरमाणः सिक्त गन्यु पर्यपि स्वाभाविक है। [८०८]- तेजस्वो रग धारण करये पानोरे साथ मिलकर सोमपान पापके दूधको इच्छा करते हुए सोमरस मागे जाता है। १ ययं सोम-पीतये पूतदक्षसा मित्रं धरणं हवामहे छानने के बाद उसमें गायकाप मिलाया जाता है। सोमको [७९३]- हम सोमान करने के लिए पवित्र असे युक्त छलनीसे छाननेका वर्णन इस प्रकार है। मित्र और पक्षणको बुलाते है। १ गया विपानया हरिः धारया पवस्व [८०५ मित्र और धषणके यल पवित्र कामों में बडे उपयोगी है। हे सोम! इन अगुलियोप्से निकाला गया हरे रणका तू एक अत उनको सोमपानके लिए मुलाया जाता है । इन्द्र आदि धारमे छनता जा । दूसरे देवो भी ऐसे ही सोमपानके लिए बुलाया जाता है। २ अयं पुनानः अपति ( ८१८] यह सोम पवित्र राय देय यज्ञमें आते हैं, सोम पोते हैं और महान् सार्वजनिक होता छनता हुआ नीचेके बर्तन में गिरता है। हितके पाम करते है। उसी प्रकार दूसरे भी पशमें लापर ३ मृमि यत कोशान् पर्यसिप्यदत् [८२२ सोमरसका पान करते है और उत्साहरो अपना वर्तव्य याजकों द्वारा निरला गया यह सोमरस श्लोमें गिरता है। ४ फलशान् अचिक्रदर ! ८२१]- धनता हुमा कलसेम शरद करता हुआ जाता है। [ परते है।
तृतीय अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद सोमरसमें दूध मिलाना ४ हे को! तुभ्य महिम्ने इमा भुवना तस्थिरे छाननकै घार सोमरसमें इच्छासार यूप, दही इत्यादि [७७७] - हे दुरदशी शानो पुरुष | तेरो महानता के लिए हो ये लोक स्थिर है। मित्मा गाता है । इस विषयमें इस प्रकार वर्णन है- १ धेन तुभ्यं धान्ति [७७७ ]- गायें तुरा गोगके दौडतो हुई भाती है। ( इतना प्रेम गाय पर है )। ५ घेनयः तुभ्यं घावन्ति [७७७]- गामें तुझे देखकर पास दौरतो भाती है। गायका दूध सोमरसके पास साया ६पा पवस्व [ ७७१]-बलवान् होफर मुट हो। जाता है। बनेन यशसः कृधि [७७८ ]- लोगोमें हमें २ रसारयः पयसा पिन्यमानः मधुमन्तं अंj पास्थी कर। ईरयन पपि [८०७]- परसे मोठे फिर गायके दूघसे और ८ विश्वाः द्विषः अप जाहि [७७८ ]- सर शत्रुओका अधिक मीठे हुए हए सोमको प्रेरित करते हुए तू जाता है । पराभव कर ३ प्रिया घृपय गान मदाय समनूपत परमानास: ९ यस्य ते सम्ये, तव उत्तमे युग्ने, पृतन्यतः इन्दध सोमास: पयः ग्यते (८१९]- प्रेम और सासाम [७७९ - तेरे साथ मित्रता होने वार तेरे सर्या करनेवाली गाय गोमके साथ मिसनके मानन्दको प्राप्त उत्तम सेनसे तेजावी होकर, संन्यके साथ हम पर पल पर परनको इच्छा करती है। शुद्ध सोम दूप प्राप्त करते है। आनेवाले मनुको हम हरायें। ४ लोकसत् अयं पुनानः सिन्धुभ्यः अभवत् । १० ते या भामानि तिग्मानि आयुधा धूर्वणे, अयं हदे त्रिः सप्त दुहानः मत्सरा चारु पयते (८२३] समस्य निदान रक्ष [७८० ]- तेरे जो भयकर तीक्ष्ण लोगों का हित करतेयाला यह माना जानेवाला सोम नदियोको अस्त्रानुके नाश करने लिए है, उनमे सहायता से हमारे बढानेवाला है । इसके लिए इपीस गाये दुही जाती है, सब निन्दक शत्रुओंसे हमारी रक्षा कर। बादमें वह मानन्य देनेयासा होता है। ११ वृपा धुमान् असि [ ७८१ ]-तू बलवान और मर्यात् इसमें पहले नदोका पानी मिलाया जाता है, यादमें तेजस्वी है। गामका दूपा १२ हे देय! वृपा पुषग्रतः वृपा धर्माणि दधिरे ५ गोमतः मुतस्य मत्स्स (८२६]- गोदुग्प मिधित [५८१ ]- हे देव ! द वलसत् है पल बनानेमा तेरा पत्त सोमरससे आनन्दित हो। है, ऐसा तू क्लयान होकर अपने कर्तव्य स्वय करता है । इस प्रकार सोमरस गायका दूध मिलाया जाता है और १३ घृश्न ' कृष्णः ते शय दृष्यं [७८२ ]- बल फिर यह पिया जाता है। रवानेवाले तेरे सामरर्य अत्यन्त प्रभावशाली है। १४ नं वृपा असि [७८२]- तू निश्चयसे बलवान है। १५ नः राये दुरः विधि [७८६] लिए सुभापित सम्पत्ति प्राप्त होने के दरवाजे खोल दे। १६ स्था-दृशं भानुना धुमन्तं त्या हवामहे {७४४] १ अप्रियः चिनामिः ऊतिभिः वचः पवस्व - स्वय देखने की शक्तिसे युक्त तथा स्वयके तेजसे तेजस्वी हुए [७७५]- नेता होकर अपने विलक्षण सरक्षणोंसे अपने वचन तेरी हम प्रशसा करते हैं। १७ आयुभिः मर्मुज्यमान [७८५]- मनुप्योके द्वारा तू अग्रणी हो, अपने पास सरक्षणके माधनोश साह करके शुद्ध होनेवाला। राव और अपनी वाणीको पवित्र विचारोंसे मुक्त कर १८ सु-आयुध! मन्दमानः सुवीय आ पयस्व २ विश्वानि काव्या अभि७७५]- सब श्रेष्ठ काम्पोंग [v८६]- हे उत्तम शस्त्रों को पासमें रखनेवाले थोर । देख, सुन। आनन्द वहानेवाला होकर उत्तग वीरता प्रकट पर। ३ हे विश्व-चर्षणे। अग्नियः वाचा ईयरन परस्त्र १९ पयमानस्य ते सखित्व आवृणीमहे [ ७८७ ]- [७७६] है सबके निरीक्षण करनेवाले ! नेता होकर पवित्रता करनेवाले तेरी दोस्तीको हम इच्छा करते है। अपनोवाणीको प्रेरणा से सबको पवित्र बर। २७ नः मुख्य [ ७८८)- हमें सुखो कर। पवित्र कर।
(६०) सामवेदका सुयोध अनुवाद । उत्तराचिका -- २१ विश्वतःईशानःनारयिं वीरवती वं माभर ३८ सत्पतिं नरः वृत्रेपु हवन्ते [८०९]- सज्जनों के ६७८९ ]-तू सवका स्वामी होकर हमें वीर पुत्रोंसे युक्त पालन करनेवालेको लोग युद्धोंमें सहायताके लिए बुलाते है। धन और अन्न भरपूर दे। ३९ हे धजहस्त अद्विवन् ! धृष्णया मदः गां २२ होतारं विश्व-वेदसं यास्य सुक्रतुं दूतं आग्निं रथ्यं संकिर [ ८१० 1- हे वनधारी इन्द्र। अपनी शन- वृणीमहे [७९०] - देवताओंको बुलाकर लानेवाले, सर्वज्ञ, नाशक शक्तिसे आनन्दित हुआ तू गाय और घोडे हमें दे । यज्ञको उत्तम रीतिसे करनेवाले दूत अग्निका हम वरण ४० जिग्युपे सत्रा वाजं [८१०]- विनयो वीरको करते है। एक साथ अन्न और बल मिलते है। २३ विश्पति पुरप्रियं अग्निं सदा हवन्ते [ ७९१] - प्रजाओं के पालक बहुतोंको प्रिय ऐसे अग्रणीको हम हमेशा { ८२६/- बहुत घनयान इन्द्र स्तोताओंको अनेक प्रकार के ४१ पुरुवसुः मघवा जरितृभ्यः सहस्रेण शिक्षति अपने पास थुलाते हैं। धन देता है। २४ इह देवान् आ यह [७९२]- यहां देवोंको बुलाला। ४२ यथा विदे सुराधसं इन्द्रं अभि प्र अर्च [८११] २५ न ईडयः असि [७९२]- प्रशंसाके योग्य तू जैसे 'तुम जानते हो वैसे ही इन्द्रको आराधना करो। हमारा सहायक है। २६ पूत-दक्षता वयं हवामहे [७९३]-जिनके पवित्र ४३ धृष्णुया शतानीका इचप्र जिगाति [८१२]- सामय है, उन्हे हम बुलाते है। शूरवीर इन्न वात्रुको सेना पर आक्रमण करता है। २७ ऋतेन तावृधौ ज्योतिपस्पती हुये [ ७९४] ४५ दागुपे वृत्राणि हन्ति [ ८१२ ]- दाताके हितके सत्यसे सत्यधर्म पढानेवाले तेजस्वी पोरोंको में बुलाता हूँ। लिए शत्रुओं को मारता है। २८ विश्वामि. अतिभिः प्राविता भुवत् [ ७९५ ४२ पुरुभोजसः अस्य दत्राणि प्र पिन्चिरे ८१२]- सब संरक्षणके साधनोंसे हमारी रक्षा करनेवाला हो । बहुत अन्नसे युक्त इस इन्द्र के दान सभीके लिए लाभकारी है। २९ नः सुराधसः करतां । ७९५]- हमें उत्तम ४६ तव उपमानि थंचासि [८१४]- तेरे यश उपमा थलसे युक्त कर। देनेके योग्य है । तेरे अन्न उपमाके योग्य है। ३० गाथिनः इन्द्रं वृहत् अनूपत [७९६]- हे साम• ४७ ते मदः देववी अघशंस-हा वरेण्यः [८१५/- गायकोतुम इन्द्रको बृहत् सामके द्वारा स्तुति करो। तेरे आनन्द देवोंके पास पहुंचनेवाले और पापियोंका नाश ३१ उग्रा उग्राभिः ऊतिभिः सहस्रप्रधनेषु नः अव करनेवाले तया येष्ठ है। [७९८ - उपयोर, ! प्रबल संरक्षणके साधनोंसे हजारों ४८ अमित्रियं वृत्रं जनिः [ ८१६]-तू शरूपी प्रकारफे धन प्राप्त होनेवाले पजमें हमारी रक्षा कर। दुष्टोंका नाश करनेवाला है। ३२ इन्द्रः दीर्घाय चक्षसे दिवि सूर्य प्रारोहयत् ४९ दिये दिवे वा सस्नि. [ ८१६ ] - प्रतिदिन तू [७९९ ] - इन्द्रने विशेष प्रकाशके लिए लोकमें सूर्यको युद्ध करता है। ५० गोपातिः अश्वसा[८१६]-तू गार्यों और घोडेकर ३३ विश्वा ओजसादधानः[८०३]- सब सामोको दान करता है। धारण कर। ५१ अरपा भुयः[८१७]- तू तेजस्वी हो। ३४ स्य-दृशं याजिनं त्या बाजेषु हिन्वे । ८०४ - ५२ पूषा भगः रयि [८१८]- यह पोषण करनेवाला, आत्मदर्शी बलवान ऐसे तुझे संग्राममें जानेको प्रेरणा करता हूँ। भाग्य बढानेवाला और धन देनेपाला है। ३५ वाजेपु युजं चोदय [८०५]- युद्धमें जाने के लिए ५३ विश्वस्थ भूमनः पतिः [८१८]- सम प्राणियोंका मिनको प्रेरणा दे। पालन करनेवाला। ३६ आजौ इन्द्रस्य यग्नु आ ज्ये[८०६पढौ ५३ भोजिष्ठः वाय्यं आ भर [८२०]- बल बहाने- इन्द्ररे शरद सुनाई देते हैं। वाला तू प्रशंसनीय धन भरपूर दे। ३७ वधस्तुं नमयन्, मदाय पयस्व ८०८]- वष ५५ येन र्यि वनामहे । ८२० ]- जिससे हमें धन करनेवाले शवको मुकाकर आनन्द बढाने के लिए शुर हो। मिले ऐसा कर। चढ़ाया।
तृतीय अध्याय ] सामवेदफा सुबोध मनुवाद ५६ मतीनां वृपा [ ८२१]- तू द्धिका घळ यहाने ६८ जेतारं य-पराजितं अभि प्रणोनुमः [८२८]- वाला हो। विजयी और अपराजित चौरको हम प्रणाम करते हैं। ५७ पूर्व्य कवि [८२२]- पहलेसे हो तू ज्ञानी ६९ इन्द्रस्य रातयः पूर्वी. [ ८२९ [- इन्द्र के दान प्रसिद्ध है। प्राचीनकालसे चलते आ रहे हैं। ५८ लोकशात् पुनानः उपसः अरोचयत् [८२३]- ७० मघ यदामंहते, रातयःन विदस्यन्ति [८२९] लोगोंका हितकारी, यह पवित्र पानेवाला उप.मालमें - जब यह धन देता है, तब उसके दरान कम नहीं होते । प्रकाशित होता है। ५१ हे इन्द्र ! धीरयु. अखि [८२४]- हे इन्द्र ! तू घोरों का उपयोग करनेवाला है। उपमा ६० सूरः एव असि [ ८२४ ]- तू भूर है। इस अप्यायमें निम्न उपमाय मापी हैं। ६१ स्थिरः असि [८२४ ]- तू युद्ध में अपनी जगह पर स्थिर रहता है। १ अभ्यान [७८३]- घोडेके समान (संचनाव) ६२ ते मनः राध्यं [ ८२४ ]- तेरा मन आराधना सोमरस छनते समय शब्द करता है। करनेके योग्य है। २ शोणः यूपा गाः अभि कनिकदद् [८०६]- लाल ६३ रातिः धायि चित् । ८२५]- तेरे दान स्थिर, रगका बल जिस प्रकार गायको तरफ देखकर शब्द करता है, टिकनेवाले है। उसी प्रकार सोम गाय के दूध के साथ मिलते हुए शब्द करता है । ६४ नः सचा [ ८२५ ]- हमारा मित्र हो। ३ जिग्युपे सत्रा याजं न [८१०]- विनयो पुरुषको ६५ तन्द्रयुः मा सु भव [८२६]- तु बालसो मत हो। एक साय तू घोडे इत्यादि देता है, उसी प्रकार हमें दे । ६६ विश्वाः गिरः समुद्र-व्यचसं, रथानां रथी ४ गिरेः रसाः इव [८१२]- पर्वतसि जैसे जलप्रवाह तमं, सत्पति इन्द्रं भवीधत् । ८२७]- सब स्तुतिया बहते है, उसी प्रकार इनके दान लोगोंकी ओर बहते है। समुद्र के समान विस्तृत, रयोदोरों में थेठ, बलोंके स्वामी, ५ श्येनःन योनि आसीदन८१७ -पान पक्षी सज्जनोंकी रक्षा करनेवाले इन्द्रको महिमा बढाती है। जिस प्रकार अपने स्थान पर बैठ फर सुशोभित होता है, ६७ हे शयस -पते इन्द्र! ते सरये वाजिनःमा और ( न अस्पाः भुवः) जिस प्रकार यह चमकता है, उसी भेम [ ८२८ ]- हे बलवान् इन्द्र ! तेरी मित्रताके कारण प्रकार सोम चमकता है। हम बलवान् होकर निर्भय होवें। इस प्रकार इस मध्याय में उपमा आई है। तृतीयाध्यायान्तर्गत ऋपि-देवता-छन्द सूची देवता मंत्ररिया ऋग्वेदस्थान पवमानः सोम. गायत्री " " " ७७५ សខ្ចី ७७७ ७७८ ७७१ ९६१२५ ९६२ ९२६१२७ ९।६११८ ९१६०९९ जगवग्निनिव जमदग्निर्भागद. जमदग्निभागव. ममहीयुरापिरस अमहीपुरागिरस " " n " (६२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराचिंका मंघसंख्या देवता पवमान. सोमः गायत्री ७८० ७८१ " " " . ७८३ ऋग्वेवस्थान ९६१३० ९।। ९६४ार ९६३ ९।१५।४ ९१६५६ ९२६५५ ९।१४ ९॥३ " " " ७८५ " " " 1" ऋषिः अमहीयुरागिरस कश्यपो मारीचः कश्यपो मारीच. कश्यपो मारीचः भगवणिर्जमदग्नि गयो घा भगुरुणिजमदग्नि गयो घा भगुरुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा गमहोयरागिरसः अमहीयसंगिरसः अमहीयरागिरसः (२) मेपातिथि:पाण्वः मेपातिथिः कापव. मेधातिथिः कावः मेधातिथि. काका मेधातिथिः कावः मेधातिथिः काकः " ७८८ 11 " अग्निः " ७९० " " १।१२।२ " " मित्रावरणी " " " ७९२ ७९३ ७९४ ७१५ ७९६ ७९७ " " " 1 ६॥२३॥ शश श२३६ ११७१ १७२ ११७18 श ७१३ ७१९४१५ ७९४६ मधुच्छन्दरा यश्वामित्रः मधुच्छन्दा वश्वामित्र मपुच्छन्दा श्वामित्रः मधुन्छन्दा वैश्वामित्रः " " " ७९९ ८०० ईन्द्रााती " " " ८०१ " ८०१ पवमान सोग 11 " " ८०४ ९०६५।१० ९६५।११ ९१६५।१२ ९।१७।१३ ९९७१४ ९।९७।१५ वसिष्ठो मैत्रावणिः वसिष्ठो मैत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावणिः {३) भगुर्वाक्षणिर्जमदग्नि गयो वा भगुरुगिर्जमदग्नि गयो वा भगरिणिनंगदग्नि गयो वा उपमन्युर्वासिष्ठः उपमन्यु सिष्ठः उपमन्युसिष्ठः (४) नायुर्हिस्पत्य. निष्ट्रप " ८०७ " ८०८ ६०१ प्रगाथ:-(विषमा महतो, समा सतो पहतो) (६३) तृतीय अध्याय] सामवेदका सुयोध भगुवाद देवता छन्द: मंत्रसंख्या ऋग्वेवस्थान ६४दार ऋषिः शंयुबहिस्पत्यः प्रगायः- (विषमा महतो, समा सतो बृहतो) " " घालखिल्याः प्राकण्यः वावः वालसिल्याः प्ररकण्वः काय ॥ " કાકરાશે દ્વાર टा९९१ ८१९९२ " " नमेघ आंगिरसः नमेष मागिरसः " 17 ८१४ पवमानः सोमः गायत्री " " ८७ अनुष्ट्रा " ८१८ " " ९२० ६०१ ९।२०१७ ९।१०३८ ९।२०१९ ९८६१९ १८६० ९८१ ८२० अमहोपांगिरसः अमहीयुरोगिरसः अमहोमुरागिरसः नहुषो मानवः नहुपो मानवः नहुपो मानवः सिकता निवावरी सिकता निवावरी पश्निोऽजाः (६) धुतकक्षः मुकलो या मागिरसः धुतक्क्षा सुरक्षा या यागिरसः श्रतकक्षः सुकलो वा आंगिरसः " " " गायत्री " ८५४ n " सारस२८ ८११२९ ८०९१० " है " M ३११२ जेता मपन्ठान्दसः जेता मपणादसः जेता मघृच्छान्दसः " ८२८ ८२९ (६६) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तराचिका 3 - २३ ८४३ पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम् । द्युतानो वाजिभिहितः ॥ ३ ॥ ४ (या) ॥ [धा० १७ । उ० नास्ति । २० २ ] (*. १६६४।१५) ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥१॥ [२] १६ ८४४ अग्निनानिः समिध्यवे कविहपतियुवा । हव्यवाड् जुह्वास्या ॥१॥ (ऋ. १२२६) यस्त्वामाने इविष्पति देव सपर्यति । तस्य स प्राविता मंत्र ॥२॥ (ऋ. १।१२।८) ८४६ यो अभि देववीचये हविष्मा आदिवासति । तसै पायक मृडम ॥ ३॥ ५ (रि) ॥ धा०१३। उ० नास्ति । स्व० ३] (ऋ १।१२।९) ८४७ मित्र हुवे पूतदक्ष वरुणं च रिशादसम् । घियं घृताची साधन्ता ॥१॥ ( ११२१७ ) ८४८. प्रतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । ऋतुं यहन्तमाशाये ॥२॥(रास) ८४९ कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ३ ॥ ६ (व)॥ [ धा० १० उ० नास्ति । स्व० १] (ऋ. १।२।९) ८८४३ ] हे सोम ! ( वाजिमिः ) अनेक शक्तियोंसे ( धुतानः ) तेजस्वी बोखनेवाला ( देव-धीतये पुनाना) देयोंको देने के लिए पवित्र किया जानेयाला (हितः ) हितकारी तू सोम (इन्द्रस्य निस्कृतं याहि । इन्द्रफे स्थानके पास जा ॥३॥ ।। यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ। [२] द्वितीयः खण्डः। ८८४४ ] ( कविः) दूरवर्णी (गृह-पतिः ) यज्ञगृहका रक्षण करनेवाली (युवा ) तरुण (हव्य-वाद। हयिको देषोंतक पहुचानेवाली ( जुदास्यः अग्निः ) जहनामक मुखवाली मग्नि (अग्निना समिध्यते ) मथनसे उत्पन्न की जाने घालो अग्निको सहायतासे प्रदीप्त की जाती है ॥ १॥ [८४५ ] है ( अग्ने देव ) मग्ने ! ( यः हविष्पतिः ) जो हविष्यान्नको देवोतक पहुचानेवाला यजमान ( दूत स्वां सपर्यत) तुझ दूतको उत्तम प्रकारसे पूजा करता है, तु (तस्य प्राविता भव । उसकी पूरी तरह का कर ॥२॥ [८४६है ( पायक) शुद्ध करनेवाले अग्नि! (या हविष्मान् ) जो हवि अर्पण करनेवाला यजमान ( देव- बीतये) देयोंको देनेके लिए (यति बा विवासति) तुझ अग्निको आराधना करता है, त (तस्मै मृद्धय ) उसे सुखी कर॥३॥ [८४७] मे (पूत-दक्ष मित्र ) पवित्र बलगले मित्रको और (रिश-असं वरुणं च ) हिंसक शत्रुके मारक वरुणको ( हुवे थुलाता हूँ। ये मित्र और वरुण (घृताची प्रियं साधन्ता) जल उत्पन्न करने के कार्य सिद्ध करते है ॥१॥ [८४८] (मिश्रा-वरुणौ ) मित्र और वरुण ये देव { ऋता-वृधौ ) सत्य यज्ञको पढानेवाले है, (ऋत-स्पृशी) रान्यको सार्थक करनेवाले है, हे देवो ! तुम दोनों ( वृदन्त ऋतुं ) इस महान् पक्षको ( मातेन आशाये ) सत्यसे पूर्ण परते हो ॥२॥ [८०९] (फबी दूरदर्शी ( तुवि-जाता ) भनेक कौके लिए उपयोगी ( उप-क्षया / अनेक स्थानों में रहनेवाले (मिना-परणा) मित्र और वरुण ( ना दक्ष अपसं दधाते ) हमारे धलको और कार्यको पुष्ट करते है ॥ ३ ॥ - .
३१ २ ३१२
३३
३०...
२१
चतुर्थ अभ्याय ]
सामवेदका सुगंध अनुवाद
(६७)
८५० इन्द्रेण स हि दृससे संजग्मानी अधिम्युपा । मन्द समानवर्चसा ॥१॥(रु. १६७)
८५१ आदह स्वधामनु पुनर्गमत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ॥२॥(ऋ १६४)
८५२ बीड चिदारुजनुभिर्गुहा चिदिन्द्र वाहिभिः । अविन्द उस्त्रिया अनु ॥ ३॥ ७ (ति)।
[धा० १५ १३० १ १ ३० ३ ] (१९६५)
८५३ ता हुवे गयोरिद पप्ने विश्व पुरा कृतम् । इन्द्राग्नी न मर्धतः ॥ १ (६६०१४)
८५४ उग्रा विनिना मध इन्द्रानी हवामहे । ता नौ मृडात ईदृशे ॥२॥ (*६६०६)
८५५ इयो नाण्यााँ यो दासानि सत्पती । यो विश्वा अप दिपः ॥ ३ ॥ ८ (पी)॥
[ धा० १० उ०१ख०४ ] (ऋ६६०६ )
॥इति द्वितीय सण्ड.॥२॥
[३]
८५६ अभि सोमास आयना पयन्त मध मदम् ।
समुद्रस्याधि विष्टप मनोपिणो मत्सरासो मदच्युता ॥१॥ ( ९।१०७।१४)
[८५० ] ( मन्दू ) मानन्दित और ( समान वर्चसा ) समान तेमत्यो ऐसे मददगण ( अविभ्युषा इन्द्रेण सं
जग्मानः ) निर्भय इन्द्र के साथ रहकर ( सं इक्षसे हि ) उत्तम दीखते हैं ॥ १॥
[८५१] (थात् मह ) शीघ्र ही (खां अनु ) अमको लक्ष्य करके ( यशियं नाम दधानाः) पूज्य नामको
पारण करनेवाले महत् (पुनः गर्भवं इरिरे) फिर गर्भको प्राप्त होते हैं। ॥ २ ॥
[८५२] हे (इन्द्र) इन्द्र ! (बीड चित् । सुदृड किलोको भी ( आ रुजत्नुभिः ) लोडनेवाले (पहिभिः
मरुद्भिः) तेजस्यो मरतोंने (गुहा चित्) गुहामें रहनेवाली ( उनियाः ) गायोंको ( अनु-अविन्दः) प्राप्त
[८५३] (तारन्द्राग्नी हुवे) उस इन्द्र और अग्निको में सहायता के लिए बुलाता है. (ययोः) जिन दोनों के
द्वारा (पुरारतं विश्व इत् ) पहले किए गए सभी पराक्रमोंको (पप्ने ) स्तुति की जाती है, वे इन्द्र और अग्नि (न
मर्पतः) स्तुति करनेवालोंको दुःत नहीं देते ॥ १॥
[५५४] वे ( उमा) उपयोर (मृधः विघनिना ) शत्रुका नाश करनेवाले हैं, उन (इन्द्र-अग्नी) इन्द्र अग्निको
हम सहायता के लिए ( हवामहे ) बुलाते हैं। (तौ ) ( ईदृशे ) इसप्रकार इस सप्राममें (नः मृडातः ) हमें सुषी
करें ॥२॥
[८५५ ] हे इन्द्र और भनि । ( आर्या) श्रेष्ठ तुम ( वृत्राणि हथ. ) शनुमोको मारो, ( सत्पती ) सज्जनों
पालन करनेवाले तुम (दासान हथः मोर्चाको घर करो, उसी प्रकार विश्वाः द्विपः अपहथः ) सब देय करनेवालोंका
माश करो॥३॥
।। यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ ।।
[३] तृतीयः सष्ठः।
[८५६] ( मनीषिणः मायवः) बुद्धिमान् ऋत्विज ( मत्सगसः मदच्युतः सोमास.) आनन्द बढानेवाले,
समाही मोमरमाको ( समुद्रस्य अधि विष्टपे) जलपात्रके ऊपर रखी हुई छलनीमते ( मयं मदं अभि परन्ते ) बार
और उत्साह बढ़ाने के लिए सानते हैं ॥१॥
मिया ॥२॥
सामवेदका सुवोध अनुवाद [उत्तराचिका a - २ R १ . २ २ १३३२०३७ १ , १ . ३२ ३" २ 29 ८५७ तरसमुद्र पवमान अमिणा राजा देव ऋतं वृहत् । अर्पा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं वृहद ॥२॥(ऋ |१०७६१५) ८५८ नृभिर्यमाणो यतो विचक्षणो राजा देवः समृद्रथः [धा० १५ । उ० नास्ति । २०५1(ऋ८।१०७/१६) ८५९ तिम्रो पाच ईश्यति प्र बहिर्मतस्य धीति ब्रह्मणो मनोपाम् । गायो यन्ति गोपति पृच्छमानाः सोम यन्ति मतयो वावशानाः ॥१॥(ऋ. ९।९७।३४ । ८६० सोम गावो धेनवो वावशाना सोमं विप्रा मतिमिः पृच्छमाना। सोमः सुत अच्यते पूयमान: सोमे अर्कात्रिष्टुभः सं नवन्ते ॥२॥ (ऋ. ९।९७।३५ ) ८६१ एवा नः सोम परिपिच्यमान आ पवस्व पूयमानः स्वस्ति । इन्द्रमा विश बृहता मदेन वर्षया वाचं जनया पुरंधिम् ॥ ३ ॥१० (पी)॥ [धा० ३० । उ० १। स्व० ४ ] ( . ९।९७।३६ ) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥३॥ [८५७] ( पवमानः देवः ) शुद्ध किया जानेवाला ( राजा ) तेगस्वो सोम ( बृहत् ऋतं समुदं ) महान् जलसे युक्त कलशमें ( ऊर्मिणा तरत् ) लहरोंसे युक्त होकर बहता है, (हिन्यानः ऋतं वृहत् ) प्रेरणा देनेवाला यह सत्य सोमरस ( मित्रस्य घरपास्य ) मित्र और यरुण बारा (धर्मणा प्रभ) धारण किए जाने के लिए छाना जाता है, फलशमें गिरता है॥२॥ [८५८] (नृभिः येमाणः ) ऋत्विजोंके द्वारा तय्यार होनेवाला ( हर्यतः विचक्षणः) पर्णनीय, विशेषात चढानेवाला ( देवः राजा) दिश्य सोम राजा ( समुन्धा) जलोंमें इन्दके लिए छाना जाता है ॥ ३ ॥ [८५१ ) ( वह्नि तिम्रः वाचः प्रेरयति ) यज्ञकर्ता ऋक, यजु और साम इन तीन वाणियोंका उच्चारण करता है, (तस्य धीति ) यज्ञको रीति और ( ब्रह्मणा मनीषां) ज्ञानरो पवित्र हुए विधारका इसमें उच्चारण किया जाता है, (गारगो-पति मन्ति) निस प्रकार या गोपाल शर जाती है उसी प्रकार (इन्छमार सोनयन्ति म शब्द करती हुई सोमके पास जाती है, तब ( वावशानाः मतयः) इच्छा करनेवाली वृद्धियां उसकी स्तुति करती हैं ॥१॥ [८६०] (धेन गार') दुधार गायें ( सोमं वापशानाः) सोमको इच्या करती है, (विप्राः मतिभिः सोम पृच्छमानाः ) जानी लोग अपनी बुद्धियोंसे सोमका वर्णन करते है, (सुतः सोमः) सोमरस निकालने के बाद (पूगमान सन्यते ) छाना जाता हुआ सोम रखे हुए बर्तनोंमें गिरता है, (त्रिष्टुभः अर्काः सोमे संनयन्ते निष्ट पदके मत्र सोमका वर्णन करते हैं. २॥ [८६६ ] है ( सोम ) सोम! ( परिपिच्यमानः ) बर्तन में पानीसे मिलाया हातपा (पूयमान ) पवित्र होता हमा तू (नवनि परम्प हमारे कल्याणके लिए इनता जा, (वृहता मदेन इन्द्रं आविश 3 आनन्दसे व इन्द्र के पेट में झा, { गर्म वर्धय } स्तुतिका समर्थन कर, (पुरन्धि जनय) यहुत काम करनेवानी वृद्धिको उत्पन कर ॥ ३ ॥ ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ।
चतुर्थ माध्याय
सामघेका सुयोध अनुवाद
३३३१
४०
,
१
२
२३१२
a.
3११
3.
[४]
८६२ यत् धाव इन्द्र ते शत शतं भूमीत' स्युः ।
न वा वजिन्सहस्र सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी ॥१॥ (111)
८६३ आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृपत्रिधा शविष्ठ शवसा ।
अस्माअव मघवन् गौमति बजे पाच चित्राभिरूतिभिः
॥ २ ॥ ११ (ली)।
धा० १९ । उ० नास्ति । ख० ५ ] ( ८३७०६ )
८६४ वयं घ त्या सुतावन्त आपो न वृक्तवहिपः ।
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि तोतार आसते
॥१॥ (२०३३।१)
८६५ स्वरन्ति वा सुते नरो सो निरैक उधिनः ।
कदा सुत पाण ओक आ गमदिन्द्र स्वन्दीव वसंगः
॥२॥(३२)
८६६ कण्वेभिर्धष्णया धुपदार्ज दर्षि सहस्रिणम् ।
पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्पणे
मल
गोमन्तमीमहे
॥३॥ १२ (छा)॥
[धा. २७ । उ०२।०२( ८३३३३)
[४] चतुर्थः खण्डः।
[८६२ ] हे इन्द्र ! (ते। तेरी बराबरी करने के लिए (यत् द्यायः शत स्युः ) यदि लोक सौ हो गाये, ( उत्त
भूमिः शतं स्युः ) और भूमियां भी सो होजाये और है (मजिन ) वञयारी इन्द्र ! (सहन सूर्याः ) हजारों सूर्य
हो जावें, तो वे सब भी (स्वा न अनु न अट) तेरो बराबरी नहीं कर तक्ते, (जात न अनु अष्ट ) कोई भी पैदा
मा जगत् तेरी राबरी नहीं कर सकता { रोदसी ) ये दोनों पावापुभियो भी तेरो तमता नहीं कर सकते ॥१॥
[८६३ ] हे (पन् ) बलवान् इन्द्र ! तू अपने (वृष्ण्या महिना ) सामर्थ्यके महत्यसे युक्त ( शवसा ) बलो
(विश्या आ पाथ) सभीको पूर्ण करता है । है ( शविष्ठ ) बलवान् ( मघमन् घन्जिन ) धनवान, वनपारी इन्न ।
(गोमति बजे ) गायों से भरे हर गोशालामें { विनाभि तिमि।) अनेक प्रकारके सरक्षणके साधनोंसे (नः भव)
हमारी रक्षा कर ॥२॥
[८६४] हे (पृषहन ) शत्रुका वध करनेवाले इन्द्र ! ( त्वां वयं घ) तेरे पास हम (सुतायन्तः ) सोमरस
निकाल कर ( आपन जलप्रवाहके समान आते हैं ( पवित्रस्य प्रत्रवणेषु) पवित्र सोमको शुद्धि करते हुए ( वृक्त-
यदिपः स्तोता) आसनको लाकर स्तुति करनेवरले { परि उप भासते) तेरो उपासना करते है ॥१॥
[८६५] हे ( वसो) निवाराक इन्द्र ( सुते निरके } सोमरस निकालने के बाव ( उफ्थिनः नरः ) पति
करनेवाले ऋत्विन (स्या स्वरन्ति ) तेरो स्तुति करते है, । सुतै उपाण! ) सोमरस पीने की इच्छा करनेवाला इन्द्र
(वंसगा) यलसा ( स्वन्द्रीय शद करता हुआ ( कदा मोकः पागमत् ) कब हमारे पर पाएगा? ॥२॥
[६] (कृष्णो ) है शूरवीर इन्द्र । (फपवेभिः ) कयोंके द्वारा स्तुति दिए जाने के बाद उन्हें सू (सहनिर्ण
याज आदर्षि नारों प्रकारके बल अपया धन देता है । है (मघवन् विचर्पणे) पनवान और शानी इन्द्र ! तेरे पाससे
( पद का नाश करनेवाले (पिशंग-रूपं ) सोने के समान घमकनेवाले ( गोमन्तं धाजं ) गायसे ताप रहनेवाले
पन (मभुईमहे) शील पाना चाहते हैं ॥ ३ ॥
(७०) सामवेदफा सुयोध अनुवाद (उत्तराधिपः , ३२.".२ ॐ ३३११ ३२ 39. ३११ र श ८६७ तरणिरित्सिपासति वाजं पुरंध्या युजा । आ व इन्द्रं पुरुहूत नमे गिरा नेमि तष्टेव सुद्रुवम्॥१॥ (ऋ. ७/३२।२०) ८६८ न दुष्टुतिद्रविणोदेषु शस्यते न संपन्तरयिनशव । सुशक्तिरिन्मघव तुम्य मावते दणं यत्पाय दिवि ॥२॥ १३ (यि)॥ [ धा० १७ | उ० नास्ति । स्व.३] ( ७/१२।२१) ॥ इति घतुयं. खण्ड ॥४॥ [५] ८६९ तिम्रो बाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः । हरिगति कनिक्रदत् ॥ १॥ ९।३३।४ ) ८७० अभि ब्रह्मारनपत यहीझतस्य मातरः । मर्जयन्तीदिवः शिशम् ॥ २॥ १।३३।५ ) ८७१ सपा समुद्राश्चतुराऽस्मम्पसोम विश्वतः । आ परस्त्र सहस्रिणः ॥३॥१४ (टा)॥ [धा० १८ । उ०१ । स. २] (ऋ. ९।३३।६) ८७२ सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः । पवित्रवन्तो अक्षरं देवान्गच्छन्तु वो मदाः ॥१॥ (ऋ. ९।१०१४) [८६७ ] (तरणिः इत् ) दुखको पार कर जानेवाला चोर ही (युजा पुरंध्या) योग्य और विशाल बुटिकी सहायतासे (वार्ज सिषासति ) बल प्राप्त करना चाहता है । हे यन करनेवालो ! (2) तुम्हारे लिए ( गिरा) स्तुति के धारा ( पुरु-इतं इन्द्रं ) बहुनों के द्वारा स्तुति किये गये इन्दको जिस प्रकार (तष्टा सुद्रुवं नेमि इव ) बढई लफडीकी परि मनाता है, उसी प्रकार ( नमे) नमन करता हूँ ॥१॥ [८६८ (द्रविणोदेषु ) धनके दान करनेवाले पुर्षोंको ( दु-स्तुतिः न शस्यते ) निन्दाकी कोई भी प्रशसा नहीं करता है, ( सेयन्तं ) दान दाताओंको स्तुति न कर पालोको (रयि. न नशत् ) धन प्राप्त नहीं होता, है (मघवन्) धनधान् इन। ( पायें दिषि ) सोमयज्ञके दिन (मावते ) मुझ जैसोको, (देष्णं यत् ) देने योग्य जो धन है, (तुभ्यं सुशक्ति इत् ) उन्हें तुझसे उत्तम शक्तिशाली ही प्राप्त करता है ॥२॥ ॥ यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ ॥ [५] पञ्चमः खण्डः। [८६९ (तिम्रः वाचः उदीरते ) ऋक्, पजु, साम इन तीन वाणियोंका पक्षका उच्चारण करते है, (धेनवः गावः मिमन्ति ) दुपार गायें रभाती है, { हरि कनिमदत् पति ) हरे रगका सोमरस शब्द करता हुआ पालाम गिरता है | E८७० ] (दियः शिशुं मर्जयन्ती) पुलोकके पुत्ररूपी सोमको शुद्ध करती हई (ब्रह्मीः ) वेदोंमसे ( ऋतस्य यह्वीः मातरः) यशके बड़े महत्वका वर्णन करनेवाली स्तुतियां ( अभि अनूपत ) पाई जाती है ।। २ ।। [८७१] हे (मोम) सोम! (रायः चतुरः समुद्रान् ) घनके चार समुद्रोंको ( अस्मभ्यं ) हमारे लिए (विश्यता आ पवस्व ) चारों हो गोरसे लाकर दे, और ( सहनिणा ) हमारी हजारों इच्छाओंको तृप्त कर ॥ ३ ॥ [२] { मधुमत्तमाः ) अत्यन्त मोठे । मन्दिनः सुतासः ) मानन्द बदरनेवाले सोमरस {पविश्वन्तः ) शुभ 7 होकर (न्द्राय भक्षरन् । इन्द्र के लिए कलशमें पाते है, है ( सोमाः) सोमरसो! (4मदाः देयान् गच्छन्तु। तुम्हारे मानायक रस देयोंको प्राप्त हों॥१॥ ) । ” २ . ३३३३ ३१... 3.३१ १३ १ १२ चतुर्थ अध्याय सामवेदका सुयोध मनुवाद (७१) ८७३ इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन् । याचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा ॥२॥ (ऋ ९।०१२) ८७४ सहस्रधार, पवते समुद्री वाचमीझयः । सोमस्पती रयीणासखेन्द्रस्य दिदिवे ८॥ ३ ॥१५ (लि)॥ {धा० २९ । उ० नास्ति । स्व.२ (ऋ. ९।१०१६) ८७५ पवित्र ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रसगात्राणि पयपि विश्वतः । अतप्ततनून तदामो अश्नुते मृतास इद्वहन्तः स तदाशत ॥१।। (ऋ.९८३१) ८७६ तपोष्पषि विततं दिवस्पदेच॑न्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन् । अवन्त्यस्य पवितारमाशयो दिवः पृष्ठमधि रोहन्ति तेजसा ॥२॥ (क्र. ९८) ८७७ अरुचदुपसः पृश्निनिय उक्षा मिति भुवनेषु वाजयुः । मायाविनी ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः ॥ ३ ॥ १६ (टु) । [ धा० ३८ । उ०।१०५] (ऋ. ९।८३१३) ॥ इति पञ्चम खण्ड ।।५।। [८७३ ] (इन्दुः) सोमरस ( इन्द्राय पयते । इन्द्र के लिए छाना जाता है, (इति देवासः अनुक्न । इस प्रकार स्तुति करनेवाले कहते है, (चाचा-पतिः) स्तुतियों के रक्षक और (विश्वस्य योजसः ईशानः सय यलोके स्वामी इस सोमका ( मखस्यते । यजमें उपयोग किया जाता है ॥ २॥ [८] (समुद्रः) पानीमें मिलाया हा (घाचं ईखयः) पाणीप्रेरणा देनेवाला ( रयीणां पति.) धनोंका स्वामी । इन्द्रस्य सखा ) इन्द्रका मित्र ( सोमः ) यह सोम ( दिये दिये ) प्रतिदिन ( सहन-धारः पवते ) हगारों पाराओंति कला छाना जाता है॥३॥ [८७५ ] है ( ब्रह्मणः पते मोके स्वामी सोम ते पवित्रं विततं ) तेरा पवित्र हुआ भाग सब जगह फंसा हुआ है, तू (प्रभुः ) सामय॑वान् गामाणि पॉप ) पोनेवालोंके अवययोंमें व्याप्त होता है, (विश्वतः अ-तप्त-तनः । सब तरफसे शारीरको तपसे बिना तपापे (आमः तत् न अश्नुते ) अपश्य शरीरसे उम मुखोई प्राप्त नहीं र सकता। (तासः इत् ) जो परिपार हो ये हो ( पहन्त तन से आशने पत परते हुए सुख प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥ [८७६] (तपोः पवित्र ) को तरानेवाले सोमके पवित्र मा (दिव गदे वितत) पृलोरके स्थानमें से दए है (अस्य तन्तयः) इसी किरणे ( अर्चन्ता व्यस्थिरन ) पमनो विशेष रोति स्थिर हो गई है. (अस्य माशया) इस सोमो जल्दी ही फैलनेवाले एस (पवितार मान्ति इद्ध करनेवालोंको रक्षा करते हैं, ये ( दियः पृष्ठं) एसोकके पृष्ठ भाग पर ( तेजसा मधिरोदन्ति ) यपने जमे घटकर मंडने हं॥ २ ॥ [43] ( उपप्त: दिनः ) उपसल मर्म (अप्रियः अरूगचत् ) पहले भारित होता है ।( उक्षा ) वर्षा करनेवाला वह ( भुवनेषु मिमेति } सब भुनोंमें जल नीचता है और प्रमाणे (पाज-युः मनमे सातता हैमाया पिनः शानिमान देवता (मस्प मापया इसको दारिखते (ममिरे । जानुमा विशेष करते हैं, समय इस सोममी शक्ति (नृचक्षसः पित) मानवोंका निरीक्षण करनेवाले पालम (गर्भ प्रादधुः। योवयि गर्भ स्थापित रहे। है यहां पांचो पण्ड ममास दुमा प्र (७२) सामधेदका सुबोध मनुवाद [उत्तरार्चिकः ३ २३१३ २ ८७८ प्रमाहिष्ठाय गायन प्रताने पहते शुक्रशोचिपे । उपस्तुतासो अग्नये (8.0१०६८) ८७९ आ वसते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्न्याहुत।। कृषिन्नो अस्य सुमतिमवीयस्यच्छा वाजेभिरागमन ॥२॥१७ (या)। | धा० १० उ० नास्ति । स्व०२] (ऋ. १०३९) ८८० तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृच सासहिम् । उ लोककुत्नुमद्रियो हरिश्रयम् ॥ १ ॥ (. १५) ८८१ येन ज्योतीरख्यायवे मन च विवेदिय । मन्दानो अस्य बहिषो विराजसि ॥२॥ (र. ८॥१९१) ८८२ तदद्या चित्त उथिनोऽनु टुवन्ति पूर्वथा । वृपपत्नीसो जया दिवेदिवे ॥ ३ ॥१८ (ह)। [धा० २१ । उ० नास्ति । स्व० १.८।१५।६ ) ८८३ श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति । सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्षि महाअसि ॥ १ ॥ (ऋ. १९५४) २१ ३ [६] पाठः खण्डः। [८७८ ] (उप-स्तुतासः } हे स्तुति करनेवालो! तुम ( मंदिठाय ) श्रेष्ठ (ऋताने ) यज्ञ करनेवाले (हते शुक्र-शोचिषे) महान् तेजस्वी ( अग्नये प्रगायत ) अग्निके लिए स्तुतिका गान करो ॥१॥ [८७२ ] (मघवा घुम्नी) पनवान तेजस्यो ( समिद्धा आहुत' ) प्रीप्त और हवन किया गया अग्नि ( वीरवत् या पुसि होनेघाला पश ( आ धंसते) देता है, ( अस्य ) इस अग्निकी (मवीयसी सुमतिः) हमारे अनुपाल रहनेवाली बुद्धि (ना अच्छ) हमारे पास (वाजेभिः ) अनोंके साप (कुवित् आगमत् ) अनेक बार आये ॥ २ ॥ [८८०] हे (अद्रियः पञ्चपारी इन्द्र ! (ते वृपणं ) तेरे मनोरथको पूत्ति करनेवाले (पृक्षु सासहिं) पुरम पात्रको हरानेयाले ( लोकारनं उ) लोकोंका हित करनेवाले (हरि-भियं) अधोंको शोभा जिसके पास है, ऐसे (तं मदं ) उस सोम पीनेसे उत्पन्न हुए हए उत्साहको (गृणीमसि ) हम प्रशंसा करते है॥१॥ [८८१] हे इन्ट ! (येन) जिस उत्साहसे { आयवे मनवे ) वोर्घायुधाते मनुष्य के हितके लिए (ज्योतीपि विवेदिय) सूर्यादि अनेक तेजस्वी पदार्थ प्रकाशित किए, उती उत्साहसे युक्त होकर (अस्य बर्हिपः मन्दाना ) इस यज्ञ- कफि मासन पर आनन्दित होकर (विराजसि विराजमान होता है ॥ २॥ [८८२] हे इन्द्र ! (ते तत् ) मेरे उस पलकी (अद्या चित् ) आज भो (पूर्वधा ) पूर्वके समान (उक्थिना अनुस्तुवन्ति ) स्तुतिकर्ता स्तुति करते है, इस प्रकार तू (पपत्नी अपः ) बलके पालन करनेवालोंको ( दिये दिवे जय) प्रतिदिन जीत करके प्राप्त कर ॥३॥ [९८३] ( या त्या सपर्यति ) जो तेरी आराधना करता है, हे ( इन्द्र ) ! (तिराच्या इयं श्रुधि) बस तिरश्वि ऋषिकी प्रार्थना सुन और (सुधीर्यस्य गोमतः रायः पूधि ) उत्तम पेष्ठ पुरसे युक्त और गासि युक्त यनसे हमें पूर्ण कर । (महान् असि) महान है ॥१॥ -- चतुर्थ अध्याप] सामवेदका सुबोध अनुवाद " ३४२ ८८४ यस्त इन्द्र नवोपसी गिरं मन्द्रामजीजनत् । चिकित्यिन्मन संघिय प्रनामृतस्य पिप्युपीम् ॥२॥ (१९४२) ८८५ तमु एवाम ये गिर इन्द्रमुक्यानि वावृधुः । पुरुण्यस्य पौरस्या सिपासन्तो वनामहे ॥ ३ ॥१९ (फा)॥ ॥ ६ [ धा० १५ । उ०२१ स्व०२] (. ८९५/६ ) ॥ इति पष्ठ खण्ड ॥६॥ ॥ति वितीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्ष । द्वितीयापाठकश्च समाप्त ॥ २॥ ॥ इति चतुर्योऽध्यायः ॥ ४॥ [८८४] (इन्द्र ) इन्द्र! (यः ) जो (नवीयसी) नयी और (मन्द्रां गिरं) आनन्ददायका स्वति (ते अजीजनत् । तेरे लिए करता है, उस स्तोताको (प्रत्नां ऋतस्य पिप्युपी) पुरातन यज्ञको भढानेवाली (चिकित्विन् मनसं) मनको शुद्ध करनेवाली (धियं । युद्धि दे ॥ २ ॥ [८८५] हम ( त उ इन्द्र लाम ) उस इन्द्रको स्तुति करते हैं, ( यं गिरः उक्थानि वावृधुः ) जिसकी महिमा मत्र और स्तोत्र याते हैं, इसलिए { अस्य ) इस इनके (पुरुणि पोस्या) महान् पराक्रमोंका हम (सिपासन्ता बनामहे । भवितसे वर्णन करते हैं ॥ ३ ॥ ॥ यहां छठा सण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ चतुर्थ अध्याय इन्द्र के गुण इस धोये अध्याय में दरका जो गण वर्णन किया है, वह १० पुरु-हता [८६७] जिसे बहुत लोग अपनी सहायताके लिए चलाते हैं। ११ अस्य पुरुणि पोस्या सिषासन्ता चनामहे 1८८५]- इस इवये बससे पराक्रमके कार्योंका वर्णन हम- १ अविभ्युपः [८५०]- निर्भय, किसीसे न डरनेवाला। भक्तिसे करते है। २ धृष्णु. १८६६]-दाओं को दूर करनेवाला, शूरवीर। ३ तरणिः [८६७ ]- दु'खरो पार होनेवाला । १२ सुवीर्यस्य गोमता रायः पूधि [ ८८३]- उत्तम वीर्यवान पुत्र और गार्योसे मुक्त धन हमें भरपूर दे। ४ वृषा [ ८६३ ]- पलपान्, सामर्यवान् । ५ जिन् [१३]- वचधारी, सशस्त्रधारी। १३ हे पन् ! पृण्या महिना शवसा विश्या या ६ शविष्ठ:1८६३ - सामय॑षान् । पमाथ [८६३ - हे बलवान् इन्द ! सामये और महान् ७ मघवान । ८६३ - धनवान् । बलसे तू राम कार्योको पूर्ण करता है। ८ यः[८६५]- धनवान्, निवास करानेवाला। १५ हे इन्द्र ! यानवीयसी मन्द्र गिरते अजी.. ९ विचर्षणिः [८६६ ]- विशेष मानी जनत, प्रत्नां तस्य पिप्युरी चिरित्विन् मनस १० [साम हिंदी भा.२) (७४) सामवेदका सुवोध अनुवाद [उत्तरार्षिक: [८८४ ]- हे इन्द्र ! जोतेरी नई और आनन्द बढानेवाली हरानेवाले, सोने के समान चमकनेवाले, गायोंके साथ रहनेवाले स्तुति करता है, उसे प्राचीनकालसे हो यसको बढानेवारी धन हमें शीघ्र प्राप्त हों, ऐसी हम इन्छा करते हैं। और मनको पवित्र करनेवाली बुद्धि तू देता है। ३ तरणिः युजा पुरन्ध्या वाजं सियासति [८६७] १५ हे इन्द्र ! यत् धान शत स्युः, यत् भूमिः - खोसे पार होनेवालावीर तेरी उत्तम और विशाल घुतिसे रातं स्युः, सहस्रं सूर्याः त्वा न अनु अष्ट, जात न घल अथवा धन पानेको इच्छा करता है। अनु अए, रोदसी न अनु अए [८६२]- हे इन्द्र ! यदि ४ पुरुहूतं इन्द्रं आनमे [८६७]- बहुतोंक द्वारा सो पुलोक होजाये, संकडों भूमिपा हो जायें, हजारो सूर्य हो स्तुति किए गए इन्द्रको में अपनी सहायताके लिए बुलाता है। जाये, तो भी वे तेरी बराबरी नहीं कर सकते, उत्पन्न हुआ ५ द्रषिणोदेषु दु-स्तुतिः न शस्यते [८६८]- धन जगत् तेरो बराबरी नहीं कर सकता, थायाधिधी भी तेरी देनेवाले इन्दादिको निन्दा करना अच्छा नहीं है, क्योंकि वरावरी नहीं कर सकते। उनको उत्तम स्तुति ही करनी चाहिए। गुण इस अध्यायमें वर्णित है, उन्हें उपासक ६ हे मघवन् ! पायें दिवि मावते देष्णं तुभ्यं अपने अन्दर लानेका प्रयास करें। जो अपने अन्दर लाके सुशक्तिः इत् [८५८]- हे इन्द्र ! दुःखोसे पार करनयाले है, धे तेरे पाससे योग्य न हों तो उनका भावार्य मनमें लाकर उनको जितना दिव्य यज्ञमें मुझ जैसेको देने योग्य जो धन धारण किया जा सकता है, उतना करें। उत्तम शक्तिमान् ही प्राप्त कर सकता है । शक्तिमान् यस करता है और धन पाता है। इन्द्रका रक्षण इन्द्र उपासकोंको पम देता है, इस विषयमें ऊपरके मन्त्र इन्द्र सभीका सरक्षण करता है, इसलिए कहा है- भाग मनन करने योग्य है। याम दादि देवोको सोमरस १ हे मघवन् ! यनिन् ! गोमति बजे चित्राभिः दिया जाता है, इस विषय मन्त्र भागोंको अब देखिये-- ऊतिभिः नः अव ८६३ 1-हे धनवान् वसपारी इन्द्र ! इन्द्रको सोम देना पायोसे भरी हुई गोशालामें अनेक सरायके सरधनोसे हारारा मनमें सोमका रस निकाला जाता है, और यह इखादि सरक्षण कर, अर्थात् हमें गापोंसे भरी हुई गोशाला भी दे और साथ ही हमारा सरक्षण भी कर। देवोंको दिया जाता है । इस विषयमें निम्न मत्र है-- २ हे अदिया! ते वृषणं पृच सासहि लोकसत्तुं १न्दुः इन्द्राय परते इति देवासः अनुवन् [८७३] मदं गृणीमसि [८८०]- हे पत्रधारी इन्द्र! पलशाली, सोम इन्द्रको दिया जाता है ऐसा देवोंने कहा है। युद्ध में शत्रुको हरानेवाले लोगोंका हित करनेवाले ऐसे तेरे २ रयीणां पतिः दियेदिवे इन्द्रस्य सखा सोमा उत्साहको हम प्रशसा करते हैं । इन्द्रका उत्साह लोगोंका हित सहनधारः पवते [८७४]- ऐश्वयोंका पालक, प्रतिदिन करनेवाला है। इन्द्रका मित्र सोम हजारों धाराओंसे छाना जाता है। ३ ते तत् अद्याचित् पूर्वथा उक्थिनः अनुस्तुवन्ति ३ वाचस्पतिः विश्वस्य ओजसः ईशानः मखस्यते [८८२ - तेरे उस शूरवीरताको पहले के समान मान भी [८७३ 1- वाणीका पति, सब सामयोंका ईश्वर ऐसा यह स्तोता स्तुति करते हैं। सोम यज्ञमें सम्मानके योग्य है। यज्ञमें इन्द्रको पोनके लिए इन्द्र धन देता है दिया जाता है यह सोमका सम्मान है। ४ वृहता मदेन इन्द्रं आविश[ ८.१] है सोम ! इन्द्र स्तुति करनेवालोको पन देता है, इस विषय मागेके तू महान् आनन्दसे इनमें प्रवेश कर। मन्त्र भाग देखने योग्य है- ५ वाचं वर्धय पुरन्धि जनय (८६१]- यस्तृत्वशक्ति १ हे धृष्णो | सहनिर्ण वाजं भादपि [ ८६६ ]- बढा और उत्तम प्रति निर्माण कर। सोमरस पीने के बाद जो हे पूरपोर इन्द्र । हमें हजारों प्रकारके बल अथवा धन उत्साह बढता है उससे मच्छी तरह वोलतको शक्ति आती है और यति भी तीच होती है। २ हे मघवन् विचर्षणे धृपत् पिशंगरू गोमन्तं इस तरह इन्द्रादि देवता सोमरस पोते है. भोर महानगर वाज मा ईमहे |८६६]- है धनवान ज्ञानी इन्द ! शयुको घोरताके काम परते हैं । देखिए--- देता है।
चतुर्थ अध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद करते है। ६ सवृत-कृष्णु महामहिमतं मदं शतं पुरः रु. २ उक्षा भुवनेषु मिमेति [ ८७७ ]-वृष्टि फरपाला क्षिण [८३७ जिसने अपने सत्र हरा दिए, जो महान् पह सूर्य सब भुवोंमें जलका सिंचन करता महान कार्य करता है, जो शरे सौ दिले तोडता है, उस ३ मायाविनः अस्य मायया ममिरे ८७७]- कुशल सोमरसके आनन्दकी हम प्रशंसा करते है । सोमरस पीनेसे देवता इस सोमफे सामयंसे जगतमें पदार्योका निर्माण पराकम करनेको शक्ति अपने अन्दर माती है। इस प्रकार इन्द्र वर्णन इस अध्यापम है । अब अग्निके उप शाल होते ही उठना और दूसरोंको प्रकरदाके द्वारा वर्णन देखिए -- मार्ग दिखाना, दूसरोंको जल अर्थात् जोवन देकर अनेक अग्निका वर्णन प्रकारके कुशलताके काम करने के लिए प्रेरणा देना ये बोप इन वचसे मिल सकते है । इस अध्यायमें अग्निका इसप्रकार गुणवर्णन किया है-- १ कविः८४४]- ज्ञानी, दूरदर्शी। मरुत २ युवा [ ८४४]- तरुण। मस्त देवताका वर्णन इस अध्यायमें इस प्रकार किया है- ३ गृहपति. [८४४]- परकी रक्षा करनेवाला। १ मन्दू समानरर्चसा अग्भ्युिपा इन्द्रेण संज. ४ पावकः[८४६]- पवित्र करनेवाला। ग्मानः सरक्षसे [८५०]- स्वभावसे मानन्दयुक्त और ५ प्रावता[८४.)- उत्तम रीतिसे रक्षा करनेवाला। समान तेजस्वी मत गण निर्मप इन्द्र के साथ रहने के कारण ६ मघवा [८७९]-पनवान । उत्तम तेजस्वी दीखते है। ७ घुम्नी [ ८७९ ]- तेजस्वी । २ चोळु चित् आरुजरनुभिः पन्हिभिः मरुद्भिः ८ महिष्ठ-[८७८]-महान् । गुहाचित् उमिया. अन्धविन्दः [८५२]- मजबूत फिरे ९ मतान् [ ८७८ ]- सत्यपालक, मज्ञ करनेवाला, तोडनेवाले तेजाबी मोंने गुफा छिपायो गई गायोंको उत्तम कर्म करनेवाला। शप्त किया। १० वृहत् । ८७८ ]- वजा, महान् । मत गणा ऐसे तेजस्वी और ला बोर है, ये शायुके किले ११ शुक्रशोचि ८७८]- शुस प्रकाशवाला । सोडते है और उन पर अपना अधिकार करते है । ऐप्ती १२ हव्यगर [८४४]- हयन किए गए पदार्य देवताओंके वीरता लोग अपने अन्दर बढाये। पास पहचानेवाला। इन्द्र और अग्नि १३ दूत: ८४.- देयोंको हदि पहचानेवाला। इन्द्र और अग्नि इन देवताओंका वर्णन मोइस अध्यापमें १४ वीरवत् यशःमा यसते [८७९]-पुत्रपौत्रों के साय मिलनेवाला यश प्राप्त कराता है। आया है। यह भव देखिए- १५ अस्य मवीयसो सुमतिः न. अद्य वाजेभि १ ता इन्द्राग्नी, ययो. पुरात विश्व पप्ने [८५३] पुचित् यागमत् [८७९]- इसके अनुकूल होनेवाली उत्तम - के सुप्रसिद्ध इन्द्र और अग्नि है, जिनके द्वारा पहले किए युद्धि हमारे पास आज अनके साथ आवे। गए मद उत्तम काँका शान किया जाता है। २नमर्धत [८५३]- वे कभी भी दुख नहीं देते। इस तरह अग्निके गुण इस अध्यायमें वर्णन किये है, ये गुण यदि मनुष्य अपने मदर धारण कर ले तो उसकी योग्यता ३ ता उमा मृधः विघनिना इन्द्रानी हवामहे कितनी अंधी हो आए [८५४]- ये उपयोर शत्रुका नाश करनेवाले इन्द्र और अग्नि सूर्य है, उन्हें हम अपनी सहायताके लिए बुलाते है। ४ ईदृशे न. मृडातः [८५४ ]- ये हमें मुख देते है। सूर्यका वर्णन इस अध्यायके एक ही पत्र में किया है, उसे ५ हे इन्द्रासी । आर्या वृत्राणि हथः [ ८५५]- हे देखिए- इन्द्र और अग्नि ! तुम आयकि कल्याण करने के लिए ओंका १ उपसा दिन अग्नियः गम्मच [८७७] - उष - महार करते हो। कालके बाद पूर्व प्रथम चमकने लगता है। ६ हे सत्पनी दासानि विश्वा द्विप अप हथ. ? * (७६) सामवेदका युबोध मनुयाद [ उत्तरार्षिक: रक्षक। [८५५]-हे सत्यपालको ! तुम मोचोको और उसी प्रकार ३ सहा जुधः [८३४]- बल बढानेवाला। सब शत्रुओंको मारो और दूर करो। ४ संयुक्त-कृष्णुः [ ८३७ )- जिसने अपने सभी इस प्रकार उपासक उत्तम पीर बनें और जो शत्रु हों उन्हे सामथ्र्यवान् शत्रुओको हरा करके नष्ट कर दिया है। दूर करे। ५ महा-माहि-प्रतः । ८३७ ] - अनेक महान महान पानीकी उत्पत्ति कार्य करनेगाला। ६ सुप्रतुः [८३८]- उत्तम कर्म करनेवाला। मित्र और वरुण ये दोनों वायु है, ये पानी उत्पन्न करते ७ विश्वस्य ओजस. ईशानः [८३७]- सब है, ऐसा नत्र में कहा है- सामयोका स्वामी। १ मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुण च रिशादसम् । धियं ८ शतं पुर. रुरुक्षी [८३७]- धात्रुके संकडो मार धृताची साधन्ता [ ८४७ ] - (पूत-दक्षं मित्र ) पवित्र तोडनेवाला। बलवाले मित्रको और (रिशादस वरुणं ) हिंसक शत्रुओंके ९ पुर दुरिता विनन् [८३१]- बहुतसे घातक नाश करनेवाले बरुणको ( हुवे ) मै बुलाता हूँ, ये दोनों शत्रुओंका-याप कर्म करनेवालोंका नाश करनेवाला । {घृताची धियं साध-ता) यानी उत्पन्न करनेके काम १० तपोः पविनं [८७६ ]- शत्रुको दुख देनेवालेका पवित्र भाग। २ रिश-अदर वरण. [८४७ ]- जग लगानेवाला, ११ विचणिः [८३९]-विशेष शानी। (ऑक्सीजन घायु) जो जा पैदा करता है। १२ अमिष्टिकृत् [८३९]-इच्छित का?को करनेवाला। ३ पूतदक्षा मित्र. [८४७]- पवित्र बलवान् वाप १३ मतस्य गोपा [ ८४०]- सत्यका रक्षक, पतका (हाइड्रोजन )। इसमें "रिश, रिष्ट ( रस्ट Rust) ये दोनों धातु किसी १४ हितः[८४३]-कल्पाण करनेवाला । धातु (लोहे आदि ) में आग लगनेके भावको दिखाते है। १५ देवः [८५७]- प्रकाशमान, विष्य । इग्लिसका "रस्टू" (Rut) भी सस्कृत के " रिदा " में १६ वाचा-पतिः [८७४]- भाषण देनेवाला, वाणीकर निकट सम्बन्ध रखता है। स्वामी। ४ मित्रावरुणो कतावृधी [४८]- मित्र और वरुण १७ ब्रह्मण-पतिः[८७५]- ज्ञानका स्वामी, शानी। घे पानी बढानेवाले हैं। १८ विचक्षणः (८५८ - विशेष ज्ञानी, पतुर। ५ कवी तुविजाताउस्क्षया मित्रावरुणा न. अपस १९ हर्यतः[८५८]- पूज्य, वन्दनीय । चलं दधाने [ ८४९]-(फ-वी)"क" का अर्थ है जल २० पुरन्धि जनय [८६१]- विशाल बुद्धि प्रकट और “घी" का अर्थ है उत्पन्न करनेवाले, (तुविज्ञाता) करनेवाला । अनेक कार्यमें उपयोगो, (उरु-क्षया) भनेक स्थानो पर २१ इन्द्रिय हिन्वानः [८३९]-अपनी प्रिय दाक्तिको रहनेवाले मित्र और वरुण ये बाप हमारे कार्य और बलको उत्साहित करनेवाला । २२ मनीषिभि. मृज्यमानः [८४१]- ज्ञानी जिसकी इस मत्रमें ये दोनों पाप (घृत-अची धियं साधता) शुद्धता करते है, शानियोंके द्वारा शुद्ध होनेवाला । पाती उत्पन्न करने के कार्य करते है ऐसा स्पष्ट कहा है । २३ विश्वले स्वदेशे साधारण: [४०]- सब भाम- पर्शी शानियों में मापारणतया रहनेवाला। २४ वाजिभि द्युतान [८६३]- बलवानों द्वारा इस अध्यापमें सोमका भी वर्णन है। उसमें सोमके गुण प्रप्त किया गया, बलवान जिसे आगे स्थापित परते हैं। दणित है। उन्हें अम देखिए- २५ मत्सरामदच्युतः [८५६]- मानन्द मानेवाला। १ घाजी [८१०]- बलवान, अभवान् । २६ पवमान [८५७]-मुस होनेवाला। २ राजा [ ८३३ - राग्य चलानेवाला, तेजस्वी, २७ पृहत् ऋतं दिन्यान. [८५७]- महान् सरप प्रार धावनेवाला। परदेशला, महान् पक्ष परनेवाला। पुष्ट करें। सोमके गुण बनाते हैं। पुरुष वीरताके चतुर्थ अध्याय ] सामवेदको मुयोध अनुवाद २८ दिवा पदे पिततः [८७१]- विम्य स्थानमें सोम गाय और घोडे देता है रहनेवाला। १ वाजिनः, पुर दुरिता विघ्नन्तः, तोकाय मु गाः २९ मधुमत्तम [ ८७२]- अत्यन्त मोटा। अर्वतः त्मना स्यन्तः [८३१]- बल बढानेवाले, बहुतसे ३० रयीणां पतिः[८७४-पतोंका स्वामी। पापोंका नाश करनेवाले ये सोमरा, हमारे पुत्रपौत्रोंने ११ रयिःअभि भयत्[८३८]- धनके पास नानेवाला । लिए उतम गाय और घोरे मिले, इसलिए स्वय ही मार्ग ये सोमके गुण इस अध्याय में वर्णित है। सोमरस पीने से जो उत्साह और सामर्थ्य बढता है, उससे धीर काम करते हैं, इसलिए ये गुण सोमके ही है, यह वात आल. २ हे इन्दो शातग्विनं गयां पोष, स्वर यं भगति कारिक भाषामें कही है। यह बात ध्यान में रखमेसे ऊपरके न आवह [ ८३५ ]- हे सोम! सो गायोसे मुक्त, गापोका गुण तोमके किस प्रकार है, यह स्पष्ट पोषण करनेवाले मुन्दर घोडसे युक्त ऐसे भाग्यकै दान हमें दे। जाएगा। सोमका स्वर्गसे लाया जाना इस प्रकार सोम गाय और घोडे देता है । सोमका यज्ञमें उपयोग होता है और यज्ञमें गाप और घोडे आते है। वह सोम स्वर्गसे पृथ्वी पर लाया गया, इस प्रकार मोमका मानो सोम हो लाता है इसप्रकार आलकारिक भाषा वर्णन वेदों में अनेक जगह पर आया है। मौजवान् हिमालयके वर्णन है। एक कचे शिखरका नाम है । उस ऊची चोटी पर सोम उगता सोमका पानी में मिलाना है और वहाँसे लाया जाता है। हिमालयके ऊपरवा भाग स्वर्ग है, वहाँसे सोम लाया जाता है, इसलिए वह स्वर्गसे लाया सोम कूटकर उसका रस निकालते है, और उसमें पानी गया ऐसा कहते हैं। यह वर्णन अब देखिए- मिलाकर उसे छागते है,इस विषयके वर्णन आगेके मत्रोंमें है- १ रविः अभि अयत् राजानं त्या दिवः अव्यथी १ हे सोम! परिपिच्यमानः, नः स्वस्ति पयस्थ सुपर्णः आभरत् [८३८]- गनके पास पहुचनेवाले तेजस्वी [ ८६१ ]- है सोम । वर्ततमें रखे हुए पानी में मिलपर राजाके रामान तुझे स्वर्गसेदु स न माननेवाला गया ले आया। हमारे कल्याण के लिए छनता जा। २ मतस्य गोपा, विश्वस्मै स्थईशे साधारण वित २हे सोम! रायः चतुर समुद्रान् अस्मभ्यं भरत् [८१०]- पराके सरक्षण करनेवाले, सब स्वर्गको विश्वतः आ पवस्त्र [८७१1-हे सोम! धमके धारो देखनेवाले, देवोंको साधारण रोतिसे प्राप्त होनेवाले मोमको समुद्रोको हमारे लिए चारों ओरसे लाकर छनता जा। पक्षी ले आया। पानी में मिलाकर तथा छानकर सोम शुद्ध किया जाता है। ३ तपोः पवित्र दिया पदे विततं [८७६ - शत्रुको सोमरस छाना जाता है लाप देनेवाले सोमके वे पवित्र अग स्वर्गलोकमें फैले हुए है। सोमको पानी में मिलाने के बाद उसे छाना जाता है- ४ दियः पृष्ठं तेजसा अधिरोहन्ति [८७६]- स्वर्गको १ पते आशयः इन्दवः तिः पविनं भएनम् [८३०] पौर पर सोम अपने तेजसे बनता है। सोमकील चमकती है। - ये शो गति करनेवाले सोमरस छलनीसे छाने जाते है। इस प्रकार सोम स्वयंसे लाया जाता है, और यज्ञमें उसका २ हे इन्दो ! मनीरिभिः मृज्यमानः इपे धारया रस निकाल कर उसका हवन किया जाता है। पवस्व [८४१]- है सोम! बुद्धिमान् यानोंके द्वारा शुद्ध सोम धन देता है किया जानेवाला द हमारे अन्नके लिए छनता जा । सोमके धन देनेके विषय मागेके मत्र देखने योग्य है ३ वाजिमि धुतानः देवीतये पुनानः हितः १न्धः विश्वानि सौभगा अभि [ ८३० ]- सोम इन्द्रस्य निस्कृतं याहि [८४३)- अनेक शक्तियोंसे तेजस्वी सब सौभाग्य देता है। दोलनेवाला, देशको देने के लिए छनता हुआ, हितका करने- २ महो दिव सधस्येपु, नृम्णानि यिभ्रां, चारतं वाला सोम इन्टके पास जावे । त्या सुकत्यया ईमहे । ८३६ ]-महान् धुलोकके अनेक ४ मतीपिण. आयर, मत्सरासा मदच्युतः स्थानों में रहनेवाले अनेक प्रशर पनोंको धारण करनेवाले, सोमाप्तः समुद्रस्य अधिविष्टपे, मधे मदं अभि परन्ते मुन्दर ऐसे तुम सोपको उत्तम यसके द्वारा प्राप्त करते हैं। [८५६] - बुद्धिमान् यानरः मानन्द बढानेवाले उत्साही (७८) सामवेदका सुयोध अनुवाद । उत्तराचिका सोमरसोंको, जलके वर्तनके ऊपर रखी हुई धमनीसे आनन्द अर्यतः त्मना कृण्वन्तः [८३१]- यल यढानेवाले और और उत्साह बढाने के लिए छानते है। बहुतसे पापोंका नाश करनेवाले पुत्रपौत्रोंके लिए उत्तम गाय ५ पवमानः देवः राजा वृहद् ऋतं समुद्रं अर्मिणा व घोडे मिलें इसलिए अपने आप यत्न करते है। तरद्, हिन्वानः ऋतं घृहत् मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा ३ गये अस्मभ्यं वरिवः इडां कृण्वन्तः [८३२]- प्र अर्प ८५७] - शुद्ध किया जानेवाला तेजस्यो सोम राजा, पारों के लिए और हमारे लिए श्रेष्ठ पन और अन प्राप्त सडे जल मुक्त कलशमें धारासे, मित्र और वरुणके लिए छाना करने के लिए यरन करते हैं । जाता है। ४ मनी अधि पवमानः राजा मेधाभिः अन्तरिक्षण भिः येमाणः हर्यतः विचक्षणः देवः राजा यातये ईयते [८३३]- मनुष्योम शुद्ध होनेवाला राजा समुद्रयः [ ८५८ ] - ऋविनों द्वारा तैय्यार किया जाने- अपनी बुद्धिसै उच्च मार्गसे जाने की कोशिश करता है । याला, वर्णनके योग्य और ज्ञान बढानेवाला वह दिस्य सोमरस जलों में मिलाकर छाना जाता है। ५ देववीतये सहा पर्चसे ना आ भर { ८३४]- देवत्व प्राप्त करने के लिए शत्रु को हरानेको शक्ति हमारे तेज ७ सुतः सोमः पूयमानः ऋच्यते, बिटुभः अकाः बढाने के लिए हमें भरपूर दे। सोम संनयन्ते । ८६०]- सोमरस छनकर पानीमें गिरता है, उस समय त्रिष्टुप् छन्दके मंत्र सोनका वर्णन करते है। ६ शातग्विनं गर्वा पोपं, स्वयं भगति ना आ यह [८३५]- सो गायोसे युक्त, गामका पोषण करनेवाले इस प्रकार सोमरस पानी में मिलाकर छाना जाता है। तथा उत्तम घोडोंवाले भाग्य हमें दे । छानने के बाद उसमें वूध मिलाया जाता है और पिया जाता है। ७ नृस्णानि विभ्रतं चार त्या सुकृत्यया मिहे सोमरसको गायके दूधमें मिलाना [८३६ ]- अनेक धनौके धारण करने वाले मुन्दर ऐसे तुझे इस विषय में आमेके मंत्र देखें- उत्तम कर्म करके प्राप्त करनेको इच्छा हम करते है। १ रुचा गा: अभीहि [१]-तेमस्वी सोमरस ८ संवृक्त-कृष्णुं उफ्थ्य महामहिवतं मदं शतंपुरः गायके दूधमें मिलाये जाते हैं। रएक्षिणं [८३७]- जिसने अपने प्रभावी शत्रु नष्ट किए है २ धेनवः गावः सोमं वावशाना: ८६० ]- दुपार ऐसे प्रशंसनीय और अनेक महत्वकै कार्य करनेवाले, यानन्द गायें सोमकी इच्छा करती है । अपना दूध तोमरसमें मिलाया देनेवाले, शत्रुके सैकड़ों नगरोंको तोडनेवाले योरमे हम पन जाये ऐसी इच्छा करती है। मांगते है। ३ आशिरं सृजानः पुनानः [८४२]- दूध में मिलाकर ९ हे सुकतो! रयिः अमि अयत् त्वा राजानं सोम छाना जाता है। अन्यथी आभरत् [८३८]-हे उत्तम कर्म करनेवाले! ४ धेनयः गायः मिमन्ति, हरिः कनिक्रदत् पति धनके पास जानेवाले तैरे समान राजाको कर्म करनेमें दुःख [८६९]- दुधारु पायें रंभाती है और हरे रंगका सोम शब्द न माननेकाले मनुष्य लाये है। करते हुए कलशमें जाता है। १० विचर्षणिः, अभिष्टियत्, इन्द्रियं हिन्याना, इस प्रकार सोमका वर्णन इस अध्याय में है । इस वर्णन ज्यायः महित्वं आनशे [ ८३९ - विशेष मानी और देवताओंका जो गुण वर्णन है. उन्हें सापक अपने अदर ला इष्टको सिद्धि करनेवाला अपनी शक्तिको प्रयोगमें लाकर और पडावें और देवरव प्राप्त करके पशस्वी बनें। श्रेष्ठत्व प्राप्त करता है। ११ ऋतस्य गोपा, विश्वस्मै स्वदेशे साधारणं भरत् [८४० ]- सत्यके संरक्षण करनेवाले, अपनी दृष्टिसे सुभापित देखनेवाले, सर्बोके योधने साधारण तौरसे रहनेवाले तेज हमें १ विश्वानि सौभगा अभि अप [८३०]- सम्र १२ जनाय वरिवः ऊर्ज झाधि [८४२]- लोगोंमें प्रष्ठ मौभाग्य - धन प्राप्त करने के लिए ये मागे जाते है। बल पैदा कर। २ मागिनः, पुरा दुरिता यिन्ता, तोकाय सु-गा: १३ याजिमिः द्युतानः पुनानः हितः [८४३]- प्राप्त ।
चतुर्थ अध्याय ] सामवेदशा सुयोध अनुयार (१) अनेक शासियोंसे तेजस्यो, स्वच्छ तथा निशेष रवाना हो २६ सापती दातानि यः [८५५]- तुग सरजनोंक हितकारक होता है। पालन करनेवाले हो, इसलिए नीघोंगो मारकर घर करो। १४ फायः गृहपतिः युवा भार समिभ्यते [८४४] २७ रिश्याः द्विषः मप हयः ८५५/- सब देष करणे. दूरदर्श, घरका स्वामी, तरुण, आगे रहनेवाला प्रज्वलित वाले शोका नाश करो। किया जाता है, अधिक तेजस्यो किया माता है। २८ घाचं वर्धय [८६१]- बाइगयका सेवन कर । १५ यः सपति तस्य प्रापिता भव [८४५]- जो २९ पुरन्धि जनय [८६१]- बहुतमे उसम कर्म पूजा करता है, उसरा टू रक्षक हो। करने में समयं पुद्धिको उत्पन्न पर। १६ यः अमिमा विवासति तस्मै मृडय [ ८४६] ३० हे वृषन् ! पृण्या महिना शयसा विश्वा मा को अग्निकी आराधना करता है उसे सुपी कर। पमाय [८]- हे बलवान् वीर ! सामर्मपरत माहात्म्पसे १५ पूत-दर्श मित्रं रिशाइसं वरुणं हुये, घृताची और मलसे न सय पार्य पूर्ण करता है। घियं साधन्ता [८४७/- पवित्र मलसे युवा मित्र और ३१ हे शविष्ठ मघवन् थनिन् ! गोमति बजे दायुको दूर करनेवाले वक्षणको में सहायता के लिए पलाता हूँ। वित्राभिः ऊतिभिः नः अथ [ ८६३ ]- हे बलवान् खे घृत यर्थात् पौष्टिया पदार्य प्राप्त करनेवाली पुद्धिको बदाले पनदान वयथारी योर ! गायोंसे भरी हुई गौशाला में विलक्षण है पवित्र कार्य करनेवाले यस मौर शत्रुको दूर करने के प्रकारके सरक्षणके साधनोंसे हमारा रक्षण पर। सामयं जहां होते हैं, वहां पोपण करनेवाले पदार्य भी रहते हैं। ३२ हे विचर्षणे मययन् 'कृषत पिशंगनपं गोमन्नं १८ ऋतावृधी ऋतस्पृशी ऋतेन गृहन्तं प्रतुं वाज मा ईमहे { ८६६ 1- हे मानी और धनवान् इन्द्र । आशाये (८४८]- सरय पदानेवाले, सत्यको स्वर्ग करनेवाले तेरे पाससे शके नाश करनेवाले, सोने के समान चमकनेवाले, सत्यसे हो महान कार्य करते है। गायोंके साथ रहनेवाले धन शीघ्र प्राप्त हो, ऐसी हमा करते है। १९. कवी तुविजाता उरभया अपसं यलं दधाते ३३ तरणिः युजा पुरन्ध्या या सिषासति [८६७) [८४९]- अनेक कार्य करनेवाले, अनेक स्थानोंमें रहनेपाल, उत्तम काम करने के मलको धारण करते हैं। -दुःखमे पार हो जानेवाला धोर, विशाल और उत्तम युद्धिरी बल प्राप्त करनेकी इच्छा करता है। २० मन्दू समान यर्चसा अविभ्युषा संजग्मानः [८५० - आनन्दित और सेजावी घोर न डरनेवाले धीरफे पनों दान करनेवालोंको निन्दा करना अच्छा नहीं । ३४ दविणोदेषु दु-स्तुतिः नः सम्यते [ ८६८ }- हाय मिल गया है। ३५ रथिः न नशत् [4६८]- उस निन्दकको पन २५ चीडु भा रजानुभिः यलिभिः गुहा उनियार नहीं मिला। अन्वविन्दः { ८५२ - शके मजबूत किलोको तोडनेवाले १६ मावते देणं तुभ्यं सुशक्तिः । ८६८ ]- मुस तेमस्वो धोरोंने शत्रुओं द्वारा धुराकर ले जाई गई और जसोको देने योग्य धनको तुझसे शक्तिशाली ही प्राप्त कर गृहामें छिपाकर रखो गई गापोको प्राप्त किया। सकते हैं। २२ ता पुराकृत विश्व इत् पप्ने, न मर्धतः ८५३] ३७ धेनवः गायः मिमन्ति [८६९/- दुपार गाय दूध - उनके द्वारा पहले किए गए सब पराक्रमोको स्तुति होती दुहनके समप रभाती है। है, में वे ख नहीं देते। ३८ ग्रहीः मतस्य यह्वीः मातरः दिवाशिमर्ज २३ ता उमा विघनिना हवामहे ]८५४]- ये तवा यन्ति [ ८७. 1- ज्ञानी रात्यको मडी गाता एक दिनके घोर प्रात्रुके नाश करनेवाले हैं, उनको हम अपनी सहायताके बच्चेको नहलाती है। लिए बुलाते है। ३९ रायः यस्मभ्यं विश्वता मापवस्या ८७१]- २८ ईशे ना मृहातः [८५४ ]- इस प्रकारफे इस धन हमें धारों औरते लाकर दे। संग्राममें हमें वे मुखो करते है। ४. याच:-पतिः विश्वस्थ औजसः शिानः मख- २५ मार्या पुत्राणि हथा [८५५]- अरोक कल्याणके स्यते { ८७३ - वाणीका स्वामी - विद्वान् म सामम्पोका लिए तुम शत्रुमोको मारो। स्वामी हो तो पूग्य होता है।
सामवेदका सुयोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः मिल सकता। ४१ हे ब्रह्मणस्पते! ते पवित्र वितत [ ८७५ ]- हे [ ८७८ - जो श्रेष्ठ, सत्यनिष्ठ और महान तेजस्वी है उसका जानके पति - हे ज्ञानो ! सेरे पवित्र कार्य सब जगह फैले वर्णन कर। ४९ मघवा वीरवत् यशः आ चंसते [ ८७९]- ४२ अतप्ततनूः आमः तत् न अनुते । ८७५ धनवान् इन्द्र पुत्रपौत्रोंके साथ होनेवाला पश देता है। निसने सप नहीं किया ऐरो अपश्व शरीरदालेको सुख नहीं ५० ते वृपणं पृच सासहिं लोकसत्तुंमदं गृणीमसि [ ८८०- बलवर्धक पुदमें शत्रुओंको हरानेवाले, लोगोंका ४३ तासः इत् तत् समाशते [८७५]- जो परि- हित करनेवाले तेरे उत्साहको हम प्रशंसा करते है। पक्य होते हैं उन्हें ही वह सुख मिल सकता है। ५१ ते तत् पूर्वधा भद्य उफ्थिनः अनुस्तुघन्ति ४. तपो पवित्रं दिवः पदे विततं [८७६]- शत्रुको [८८२]- तेरे उस बलको पहलेके समान भाग भी स्तोता साप देनेवाले धोरोंका यह पवित्र स्थान चुलोकमें फैला हुआ है। स्तुति करते हैं। ४५ दिवः पृष्ठं तेजसा अधिरोहन्ति [८७६ ]- वे ५२ सुवीर्यस्य गोमतः रायः पूधि [ ५८३]- उत्तम माको कष्ट देनेवाले ] घलोकको पीठ पर अपने तेजसे श्रेष्ठ पुत्रोंसे युक्त और मार्योसे मुक्त घनसे हमें पूर्ण कर। घटकर घंटते है। ५३ ऋतस्य पिप्युपी चिकिरियन् मनसं धियं ४६ उपसः पृदिनः अप्रिया अरुरुचत् । ८७७ ]- [८८४ ]- सत्यका पोषण करनेवाली, मनको शुद्ध करने. ज्य कालरे बाद सूर्य मार्ग होकर चमकने लगता है । वाली शुभ बदि । ४७ उक्षा भुवनेपु मिमेति याजयुः [ ८७७ ] - मेघ ५४ अस्य पुरुणि पौस्या सिपासन्तः वनामाहे. पुम्दी पर बरस त गिराता है और अन उत्पन्न करता है। [८८५]- इसके बहुतसे पराकमके कार्गोका वर्णन हम ४८ मंहिष्ठाय ताटने वृहते शुक्रशोचिपे प्रगायत भक्तिते करते हैं। चतुर्थाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सुची मत्रसंख्या यावेवस्थान अधिः देवता छाद: पवमानः सोमः गायत्री " દ્રા " " " H ९१६५११६ ९६५।१८ ९५७ કેટl ९४ा १४८३ जमदग्निर्भागवः जमदग्निर्भागवः जमनिर्भागवः भगणिजमदग्निर्गियो वा भूपूर्वाणि मदग्नि गयो का भृगुरिगिमदग्निमांगो वा विगियः पविर्भागवः कविर्भागवः पविर्माग परिर्भागः पायो मारोप: पापो मारोषः " . " " " " SI . ९४ . " (८१) चतुर्थ अध्याप] सामवेदका सुयोध अनुयाद मंत्रसंख्या परस्थान ९६५१५ ऋषिः रस्सपो मारीपः गायत्री पवमानः सोमः मग्निः १२१२१ " ८B8 ८४५ ८४६ मित्रावणी ११२७ " " " ८४८ ૮૪૨ ८५० १३९ " मयत " इन्चाप्ती 11 १६७ शक्षा श६५ ६६018 ६६०५ ६६०६ " " मेधातिथि: काका मेधातिभिः काकः मेधातिथिः काय मपुज्यन्दा वंश्वामित्रः मपुश्छन्दा वामित्रः मान्दा श्यामित्रः मपन्धन्दा श्वामित्र: मपस्यन्दा बयामित्रः मधुच्छन्दा श्वामित्रः भदाजी बार्हस्पत्यः भरद्वानो पार्हस्पत्यः भरवाजो याहस्पत्यः (३) सप्तर्षयः राप्तर्षयः सप्तर्षयः परातार:शावत्यः पराशरसावत्यः पराशावत्यः (४) पुल्हन्मा आंगिरसः ८५४ ८५५ IN पवमानः सोमः " प्रगायः (विषमा बहती, समा सतो यहती) द्विपदा विराट विष्ट ८५७ ८५८ " ९।१०७.१४ ९।१०७१५ ९।२०७।१६ ९९७१३४ १९७१३५ १९७५३६ " U ८६० ८६१ प्रगायः (विषमा बृहती, समा सतो वहतो) ८1७014 " " पुष्हमा मांपिरसः बहती ८७०१६ ८३१ " ८६४ ८६५ मेध्यातिथिः काया मेध्यातिषिःकावः मेम्यातिथिः काया वसिष्ठो मंत्रावणिः " १ ८१३३३३ ७३।१० प्रगाय ( विपमा वृहती, समा सतो बृहती) ប " ७१३२।११ वसिष्ठो मंत्रावणिः गायत्री पवमानः सोम. M ८६९ " " " ९३३३४ त्रित आप्त्यः त्रित आपयः त्रित याप्स्यः ११ [साम. हिन्दी भा.२] सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तराचिका मंत्रसंख्या देवता उमः ८७२ ऋग्वेवस्थान ९1१०18 १।१०४५ पयमानः सोमः मनुष्टप " 498 ८७५ जगतो ९८३१ ९८३१ पयाति हपः ययातिन हपः ययाति द्वषः पवित्र आंगिरसः पवित्र मागिरस पवित्र मागिरता (६) सोभरि काण्वः " ८99 હિટ अग्निः प्रगापः (विषमा पप समा सतो बहती) सोभरि कापः " " ८७९ ८८० उरिणा ॥ " ८1१०३१९ ८॥१५४ ८०१५॥ ८०९५६ ८१५४ ८२५५ दापा गोवत्पश्यनक्तिनौ काण्यानो गोयूक्पश्वसूक्तिनो काण्यायनी गोखूपत्यश्वसूक्तिनी कामायनी तिरस्चीरागिरसो तिचौरागिरसो तिरश्चीसगिरसो अनुष्दा " " पक्षमा मायाय सामवेदका सुबोध मनुवाद (८३) अथ पंचमोऽध्यायः मथ दतीयप्रपाठके अपमोsधी [१] (१-२२) १ मष्टा माषा', २ अमहीपुरागिरसः, ३ मध्यातिथि. कायः १, १२ बृहन्मतिसंगिरसा, ५ भृगुर्वा. दगिर्गमदग्नि गयो वा ६ सुमर या ७ गुस्सम शौनक ८,२१ गोतमो राहमणः ९, १३ वसिष्ठो मंत्रा पर्शग १.बुद्धच्युत स्य. ११ सप्तर्षयः (भखाजो वाईस्परया, २१यपो मारोधः ३ गोतमो राहगणः। ४ मत्रिभीम. ५ विश्वामित्रो गायिनः, ६ जमदग्निर्गिया, ७ यसिष्ठो मशवाणः । १४ रेमः काश्यप, १५ पुषहन्मा मागिरस., "१६ मसितः काश्यपो देवलो दा; १७ (१) शाक्तिर्वासिष्ठः, १७ (२) उपरांगिरस १८ अग्निश्चानुषः १९ प्रतदनो देवोरासिः, २० प्रयोगो भार्गका २१ पावकोऽग्निहि. स्परयो या, गृहपतियविष्ठी सहसः पुत्रान्यतरोया; २२॥ १-५; १०-१२, १६-१९ पवमानः सोमः ६२० अग्निः, ७ मित्रावदगी, ८, १३-१५, २१ इन्त्रम ९ इन्द्राग्नी २२ ॥ १६ भगतो; २-५, ७-१०, १२, १६, २० मापनी, ११, १५ प्रगाय- ( विपना महतो, समा सतोयूहतो ), १३ विराट १४ (१) मति जगतो, १४ (२-३) उपरिवार बहती; १७ काभः प्रगाप.- (विषमा ककुप तमा सतोवृहती); १८ उष्णिक १९त्रिष्टा, २१ अनुष्ट । १ ३.. ये ८८६ प्रत आचिनी पवमान धेनवो दिव्या असृग्नन्पयसा घरीमणि । प्रान्तरिक्षात्याविरीस्ते असृक्षत त्या मृजन्त्यपिपाण धसः ॥१॥ ( ९८६४) ८८७ उमयत: पर्वमानस्य समयो धवस्य सतः परि यन्ति केमा । यदी पवित्र अघि मृज्यते हरिः सत्ता नि योनी कलशेषु सीदति ॥ २॥ (ऋ. १५८६।६ ) २३" ૧ २९ ११." [१] प्रथमः खण्डः। [८८६] (पवमान) शुद्ध होनेवाले सोम! (ते) तेरो (आशिनीः धेनवः) वेगवान् दुधार गायें (दिव्या) विश्य है, { पयसा) अपने दूभरो (धरीमणि) कलश (प्र भएनन् ) पहुंचती है । प्रापिपाण) हे ऋषिके द्वारा निकाले गए सोमरस ये वेघसा त्वा मृजन्ति ) नो नो दिन मुझे छानते है (ते) दे ऋश्विन ( अन्तरिक्षात् ) अपरके वर्तनसे (स्याविरी: प्रसूक्षत ) स्थिर पारासि नौके कलशमें तुझे पहुंचाते है। [s] (पयमानस्य ध्रुवस्य सतः ) छाने जानेवाले स्थिर सोमको (रवमया केतय उभयत परियन्ति) किरणे गेनों ही तरसे लती है (यदि ) जब (पवित्र हरिः अधिमूज्यते ) एलनीसे हरे रंगका सौग छाना जाता है, उस समय ( सत्ता) स्थिर रहनेको इन्छा करनेवाला सोम (योनी फलशेपु निपीदति) कलाही बर्तन में जाकर रहता है॥२॥ *
(८४)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
उत्तगचिका
१९३३.३.३
३
3
30
१
३२
(
८८८ विश्वा धामानि विश्वचक्ष अवसः प्रमोष्ट सतः परि यन्ति कैतवः ।
यानी पवसे सोम धर्मणा पतिविश्वस्य भुवनस्य राजसि ॥३॥ १ (वी)॥
[घा० ३५ 1 उ० नास्ति । स्व० ४] (. ९८६९)
८८९ पवमानो अजीजनविचित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वैश्वानरं हेत् ॥ १ ॥ (ऋ. ९।६।१६)
८९० पवमान रसस्तव मदो राजन्नदुच्छुनः । वि वारमध्यमर्पति
॥२॥ (ऋ.९।६।१८)
८९१ पवमानस्य ते रसो दक्षो वि राजति युमान् । ज्योतिविश्व स्वदृश ॥ ३ ॥ २ (पा)॥
[धा०२० । उ० १ । स्व०२] (ऋ.९।६१।१७)
८९२ प्र यद्गावो न भूर्णपस्त्वेपा अपासो अक्रमुः । मन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥१॥ (ऋ. ९।४।१ )
८९३ सुषितस्प बनामहेऽति सेतुं दुराय्यम् । साह्याम दस्युमव्रतम् ॥२॥( ९८४१२)
८९४ शृण्ये पृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः । चरन्ति विद्युतो दिवि ॥ ३॥ (क्र. ९१४ १।३ )
८९५ आ पवस्व महामिप गोमदिन्दो हिरण्यवत् । अश्ववत्सोम वीरवत् ॥ ४॥ (ऋ ९४४)
[८८८] (विश्ववक्षः ) सब जगह देखनेवाले सोन! (प्रभोः सतः ते ) प्रभुत्वकी इच्छा करनेवाले तेरो
(साम्बसः फेतवः ) पडी बडी फिरणे ( घिश्या धामानि परियन्ति ) सब जगह पहुंचती है, सम हे (सोम ) सोम !
(व्यानशी ) व्यापक स्वमायका तू (धर्मणा पवसे ) अपने स्वभाव धर्मसे शुद्ध होता है, और (विश्यस्य भुवनस्य
पतिः ) सब भुवनों का स्वामी तू (राजसि) घमकता है ॥३॥
[८८९] ( पवमानः ) पवित्र किया जानेवाला सोम (वृहत् वैश्वानरं ज्योतिः) महान् वैश्यानर मामके तेजको
( दियः चित्रं तन्यतुं न) लोकौ विलक्षण तेजस्वी बिजलोके समान (अजिनत ) उत्पन्न करता है, वह
धमक्ता है।
[८१०] हे ( राजन् पवमान ) तेजस्वी शुद्ध होनेवाले सोम! (तय मदः ) तेरा उत्साह मडानेवाला तथा ( अ-
दुच्छुन रसः) राधासोंफो न मिलनेवाला रस ( अव्यं पारं वि अर्षति) करोके गालोंको छलनीसे नीचे मर्तन में
पड़ता है।। २॥
[८९१ ] हे सोम! ( पवमानस्य ते) शुख किए जानेवाले ऐसे तेरा ( दक्षः घुमान रस.) बलवान् और
तेजस्वी रा (विराजति) चमकता है (विश्व स्वः ज्योतिः शे) सर्प ध्यापफ तेरो ज्योति पहां दोसतो है ॥ ३॥
[८९२] ( गारान) गायों के समान (भूर्णयः) शोन जानेवाला (त्येपाः अयासः) तेजस्वी गतिमान् (यत्)
जो सोम (रुणां त्वचं अपानन्तः) पालो चमडी [छाल] को दूर करके (प्रभामुः) अनिमें गिरता है, उसकी
प्रशसा होती है ॥१॥
८८९३] (सु-चितस्य) सुखदाई सोमकी (दुराय्यं अति सेतुं ) दुष्प्राप्य बन्धनको दूर करने के लिए हम
( पनामहे ) प्रार्थना करते है, (अ-प्रत दस्यु साह्याम ) सरकर्म न करनेवाले शत्रुको हम हरायें ॥२॥
[८९८] (पृष्टेः स्मनः एव ) पृष्टिके शब्दके समान (पयमानस्य ) गुद किए जानेवाले सोमका शर(थूयते)
गुना जाता है । उस समय (शुस्मिणः विद्युतः ) बलशाली सोमको किरणें (दिवि चरन्ति ) भाकाशमें संचार
करती है।
[८९५] है (इलो सोम) रसम सोम सू (महीं पं) महतसा अन्न (गोमत्) गायोंकि साप (हिरण्ययात)
सोनो साय ( अश्यत् ) घोके साय मौर (वीरव३) पुत्रपौत्रों साप हमें (मा पषस्थ ) दे ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
सामवेदपा सुयोध अनुवाद
1
३२४
3
११
३२.२
३२
३
१
३१
८९६ पवस्त्र विश्वचर्षण आ मही रोदसी पृण । उपाः सूर्यो न रश्मिभिः ॥५॥(* ९३४ ११५ )
८९७ परिणः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः । सरा रसेव विष्टपम् ॥६॥३.(भी)।
[धा० ३५ ॥ उ०४ । स्व० ४ (१ ९८४१६)
॥ इति प्रथमः खण्य. ॥१॥
[२]
८९८ आशुरर्प गृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना । यत्रा देवा इति ब्रुवन् ॥१) (ऋ. ९।१९।१)
८९९ परिष्कृण्वन्ननिष्कृत जनाय यातयनिपः । वृष्टि दिवः परि सब ॥२॥(९३९०२)
९०० अयस यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ । सिन्धोरूर्मा व्यक्षरन् ॥३॥ (ऋ ९१३९।४ ।
९०१ सुत पति पवित्र आ विपि दधान ओजसा । विचक्षाणो विरोचयन् ।।४।। (ऋ ९।३९।३ )
९०२ आश्विासपरातो अथो अावतः सुतः । इन्द्राप तिच्यते मधु ॥५॥ (* ९।१९।५ )
९०३ समीचीना अनूपत हरि हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतयै ॥६॥ ४ (जी) ।।
[ धा० ३२ । उ० ३ । २०४ ] (ऋ. ९१३९।६)
[८९६] हे ( विश्व-चर्पणे ) सबको देखनेवाले सोम ! ( पवस्त्र ) शुद्ध हो, और मपने इस रससे (मही
रोदसी इन महान घलोक मोर पृथ्वीलोको (सूर्यः रमिमि. उपान)निस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से उपकालने
भाव सब विश्वको भर देता है उसी प्रकार ( आ पृण) भर ॥५॥
[८९७ ] है ( सोम ) सोम 1 (विष्टप रसाइब) इस भूलोकको जैसे पानी धेरै हुए है, उसी प्रकार अपनी
(शर्मयन्त्या धारया) सुखदायक पारारो (न.विश्वतः परि सर हमें चारों मोरसे पर ले ॥३॥
॥ यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ।
[२] द्वितीयः खण्डः।
[८९८] हे ( बृहन्मते ) यद्धिमान् सोम । (प्रियेण धान्ना ) अपने प्रिय शरीरसे - पारारो ( आशु परि अर्प)
शोध आ. ( या देयाः ) जहा देव रहते हैं । इति शुवन ) ऐसा कहते हैं, उस यज्ञ या ॥१॥
[८९९] (अनिष्कृतं परिष्कृण्वन् ) सस्काररहित स्थानको सस्कारयुक्त करते हुए ( जनाय इपा यातयन् )
लोगोंको भार देनेके लिए (दिवः पृष्टिं परिनर ) गुल्लोको वर्षा कर ॥ २ ॥
[२००] (यः दिवः परि रघुयामा ) जो एलोव के अपर धीरे धीरे चलता है, (स: अपं ) यह यह सोम
(पदिने ) छलनीसे छाना जाता है, और ( सिन्धोः ऊर्मा वि अक्षरत् ) पानी लहरमें टपकता है ॥ ३ ॥
[२०१] ( मुतात्विर्षि दधानः ) सोमरस तेजस्विता पारण करके (विचक्षाणा विरोचपन सबका निरीक्षण
करके सबको प्रकाशमान करते हुए ( पोजसा ) वैगसे (पवित्रे या एति) छलनीसे शीघ्र छाना जाता है ॥ ४ ॥
६.९०२ (सुत । रस निकालने के बाद ( परावता अथो अर्थावत रसे और पाससे ( आ विवासन ) शुरु
करके (इन्द्राय ) इन्द्रको ( मधु ) यह मधुर रस (सिच्यते ) दिया जाता है ॥ ५ ॥
१९०३] (समीचीनाः) स्तुति करनेवाले एक जगह संगठित होपर (अनूपत ) स्तुति करते है, (इन्द्राय
पीतये ) इन्द्रको पौनेको देने के लिए (हरि इन्दु ) हरे रंग के सोमको (अद्विमिहिन्यन्ति ) पायरोंसे कूटते हैं ॥ ६ ॥
(८६)
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[उत्तराचिका
९०४ दिन्यन्ति मरमुनयः स्वसारी जामयस्पतिम् । महामिन्दं महीयुवः ॥ १॥ (ऋ. ९।६।१ )
९०५ पवमान रुचारुचा देव देवेभ्यः सुतः । विश्वा वमन्या विश
॥२॥ (ऋ. ९।६।२)
९०६ आ पवमान सुष्टुति वृष्टिं देवेभ्यो दुवः । इपे पयस्य संयतम् ॥३॥ ५ ()
[धा० ११ | उ० नास्ति । स्व०१] (ऋ. ९।६।२)
॥ इति द्वितोपः खण्डः ॥२॥
9.
.
२
.
२
३.२
83
[३]
९०७ जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे ।
उप्रवीको बृहवा दिपिम्पृशश घुमद्वि माति भरतेभ्यः शुचि ॥ १ ॥ (ऋ. १९११)
९०८ स्वामने अङ्गिरसो गुहा हितमन्धविन्दं ब्लिश्रियाण बनवने ।
स जायसे मध्यमानः सहो महत्त्वामाहुः सहसस्पुत्रमगिरः ॥२॥(ऋ. १९४६)
3.२
१२ १
३१. ११
[९०४३ (उम्रया जामयः स्वसारः ) सब जगह जानेवाली, आपसमें प्रेमसे रहनेवाली बहिनें - अंगुलियो
( मही-युयः) महान कार्य - सोमरस निकालने का कार्य करती है, और (सूरं पति ) श्रेष्ठ स्वामी ऐसे (महां इन्दु )
महान् सोमरसको ( हिन्वन्ति ) निकालती है, सोमरसको निचोडती है ॥१॥
८९०५] है ( रुचा रुवा ) तेजसे (देव पवमान ) चमकनेवाले तथा शुद्ध होनेवाले सोम! (देषेभ्यः सुता)
देवोंको देने के लिए निचोडा गया तू (विश्वा वसूनि आ विश) सब धन हमें दे, सब धनोंमें न प्रविष्ट होकर रह ॥२॥
[९०६ 7 हे (पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम ! (सुपुर्ति नृष्टिं) उत्तम स्तुतिके योग्य वर्षाको (देवेभ्या दुवः)
देवतामोसे प्राप्य होनेवाले माशोक्केि समान (आ पयस्व) हमारे पास पहुंचा, (पे संयतं) भन्न प्राप्त हो इसके
लिए वर्षा कर ॥ ५॥
॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[३] तृतीयः खण्डः।
[९०७] (जनस्य गोपा) लोगोंका रक्षक (जागृवि सुदक्षः ) जागृत और उत्तम कर्ममें कुशल (अग्निः )
अग्नि (नन्यसे सुविताय अजनिष्ट) नये प्रकाररो लोगोंका पल्याण हो इसलिए प्रफट हुआ है, उसके बाद (घृत-
प्रतीका) घुतसे प्रज्वलित किया गया ( बृहता दिविस्पृशा ) महान् गुशोकको स्पर्श करनेवाले तेजसे युक्त (शुचिः)
शुसता करनेवाला अग्नि (भरतेभ्यः) यज्ञ करनेवाले लोगों के लिए (घुमत् विभाति ) प्रकाशमान होकर चमकता है ॥१॥
[९०८] है (अग्ने) यग्निदेव । (अंगिरसः) अंगिरस कृषिोंने (गुहा-हितं) गुहा रखे हुए (धने बने
शिधियाणं) प्रत्येक सके मात्रयसे रहनेवाले (त्वां भन्यविन्दन् ) तुझ अग्निको प्राप्त किया। (महत् सः सः)
महान् पलसे युक्त तू अनि (मथ्यमानः जायसे) मयन करके पैदा किया जाता है । हे (अंगिरः)ोंने रहनेवाले
याने। (त्वां सहसा पुत्रं माहुः) तुझे सामर्यका पुत्र कहते है ॥२॥
पश्चम मध्याय
सामयेदका सुयोध अनुवाद
(८७)
२१३११
"३
a"
९०९ यशस केतुं प्रथम पुरोहितमान नरखिषधस्थे समिन्धते ।
इन्द्रेण देवैः सस्यरस पहिपि सीदनि होता जथाय सुक्रतुः ॥३॥ ६ (चे)॥
[पा० ३० । उ० नास्ति । २०७] (ऋ. ११॥२)
९१० अयं पा मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा । ममेदिह श्रुवरवम् ॥१॥ (ऋ २०४१।४ )
९११ राजानावनभिद्रुदा धुवै सदस्युत्तमे । सहस्रस्थूण आशाते ।।२।। (ऋ. २।११।५)
९१२ ता समाजा घृतासुती आदित्या दानुनरपती । सचेते अनबह्वरम् ॥३॥ ७ (मि)॥
[धा० १५ १०१। स्व०३] (ऋ २१४११६)
९१३ इन्द्रो दधीची अस्थमित्राण्यप्रतिकुतः । जघान नवतीनव ॥१॥ (ऋ. १८४४१३)
९१४ इच्छमश्वस यच्छिपर्वतेष्वपश्रितम् । द्विदच्छपणापति
॥२॥ (१९८४१४)
९१५ अग्राह गारमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गई ॥३॥ ८ (डी) ॥
[घा० १३ । उ०२ । १०४ (११८४५)
३"३३३१
स.२
१३.१
E९०९] (नए) स्विज लोग ( यशस्य फेतुं ) यज्ञफे ध्वज, (पुरोहित) गागे रखे गए (देवैः सरर्थ)
रेदॉफ साप एक रपपर बैठनेवाले (प्रथमं अग्नि ) मुख्य अग्निको (नि-सघस्थे) तीन जगह ( सं हन्यते ) यन्छी
तरह प्रज्वलित करते है, उसके बाद (सुझतुः होता सः) उत्तम कर्म करनेवाला तथा देवोंके लिए हवन, करनेवाला वह
अग्नि (पहिषि) अपने स्थानम (यजथाय) यज्ञ करने के लिए (निपीदत् । बैठता है ॥ ३ ॥
[९१० ] हे (स्तावृधा मित्रावरुणा ) यातको बढानेवाले मित्र और वरुण ! (घा) तम्हारे लिए ( अयं सोम
सुतः) यह सोम निकालकर बोर छानकर रखा गया है, इसलिए (इह) यहाँ इस पशमें (मम इत् हवं श्रुतं) मेरो हो
प्रार्थना सुनो ॥१॥
[९९१ 1 है (राजानी अनभिद्रुहा) तेजस्वो और मोह न करनेवाले मित्र और परणो । (भुये उत्तमे सहन-
स्थूणे सदलि) स्थिर, श्रेष्ठ और हजार सम्भोंवाले इस यश मन्डप (भाशाते ) माफर धेठो ॥ २ ॥
[९१२] (समाजा) सम्राट् (पृतासुती) पृतरूपी मम खानेवाले (आदित्या) मवितिके पुत्र (दानुन
पति ) मनके स्वामी ऐसे (ता) २ मिन मोर वरुण (मनयन्हर) कुटिलतासे रहित यजमानको (सचेते) सहायता
करते हैं ॥ ३॥
१९९३7 (म-प्रति-कुतः)जितया कोई विरोपी नहीं ऐसे (इन्द्र.) इयने (दधीच. अस्वाभा) स्पोषिको
हड्डियोंसे (नवती: नय) निन्यानवे (नाणि जघान ) घेरनेवाले शत्रुमोको गारा ॥ १॥
[९१४] (पर्वतेषु अपश्रित) पर्वतोंमें रखा हुआ (अश्वस्य यत् शिरः) घोडेका जो सिर है, उसे
(इन्छन् ) प्राप्त करनेको इन्द्र ने इछा को, उस इन्छने (शर्यणायति तत् विदत् । शर्यगावती सरोकरके पास उसेमार
किया और उससे असुरोंका सहार किया ॥ २ ॥
८९१५] (अत्राह ) यहाँ (गो चन्द्रमला गृहे) गाम करनेवाले चन्द्रमाके मण्डल में (पष्टुः अपीज्यं माम)
पूर्णको गुप्त किरणे समोके समप प्रकाशित होती हैं ( इत्या धमन्यत ) ऐसा माना जाता है ॥ ३ ॥
(८८)
सामवेदफा सुयोघ अनुवाद
[उचसर्विरः
३२
९१६ इयं वामस मन्मन इन्द्राग्नी पूर्वीस्तुतिः । अभ्रादृष्टिरिवाजनि ॥१॥ ( ७९१)
९१७ मृणुतं जरितुईवमिन्द्रामा वन गिरः । ईशाना पिप्यत धियः ॥२॥ (ऋ. ७९४ार)
९१८ मा पायवाय नो नरेन्द्रामी माभिशस्तये । मानो रीरधत निदे
॥३॥९ (चा)॥
[धा० १२ । उ० १ । स्व.२ ] (ऋ.४९११३)
॥ इति तृतीय सण्ड ॥ ३॥
[४]
९१९ पवस्व दक्षसाधनो देवम्यः पीतये हरे । मरुद्भयो वायवे मदः
॥१॥ (*. ९।२५।१)
९२० सं देवैः शोभते वृपा कवियौनावधि प्रियः । पर्वमानो अदाम्या ॥२॥ (ऋ १।२५४३)
९२१ पवमान धियो हितोऽभि योनि कनिक्रदत् । धर्मणा वायुमारुहः ॥३॥ १० (ख) ॥
[था० ११ । उ०२ । स्व०१(क्र. ९।२६।२)
९२२ तवा सोम शरण संख्य इन्दो दिवेदिवे
पुरुणि यत्रो नि चरन्ति मामव परिधी रति नाहि ॥१॥ (ऋ. ९९०७११९
[९१६ ] है (इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्नि ! (इयं वां पूर्व-स्तुति.) यह तुम दोनोंकी अपूर्व स्तुति (मस्य
वामस्य मन्मनः) इस सुन्दर और मननीय विद्वान्से (अभ्रात् वृष्टिः इव) जिरा प्रकार मेघसै वर्षा होती है, उसीप्रकार
(अजनि) उत्पन्न हुई है ॥१॥
८९१७ 7 हे इमानो ! (जरितुः हयं णुतं ) स्तोताको प्रार्थना तुम सुनो, (गिरः बनतं) उसकी स्तुति सुनो
(शाना) शासन करनेवाले तुम दोनों (धियः पिप्यतं ) उसके कोका फल दो ॥२॥
१९१८] (मरा इन्द्राग्नी ) है नेता स्वरूप इन्द्र और अग्ने ! (नः) हमें ( पापत्वाय मा रीरघतं ) पापके
कामोंमें न लगाओ, (अभिशस्तये मा) हिंसाके कार्यो में हमें युक्त मत करो, (निदेन मा) और निंदाके लिए भी
हमें मत लगाओ॥१॥
॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[४] चतुर्थः खण्डः।
[ ९१९ ] हे(हरे) हरे रंगके सोम ! (दक्ष-साधना मदः) बल व उत्साह बगनेवाला (देवेभ्यः मरुप )
रेयों और मोके तथा (वायवे) वायुके (पीतये पयस्थ) पीने के लिए पवित्र हो ॥ १॥
[९२० ] ( वृषा कविः) दलवर्षक ज्ञानी (योनो अधि) अपने स्थान पर (पधमान प्रियः) शुब होने के
कारण प्रिय और ( अदाभ्य) न दवाया जानेवाला सोम (देवे संशोमते) वेर्योक साप उत्तम प्रकारसे गोमित
होता है॥२॥
[९२१ ] हे (पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम (घिया हिता) विचार कर अच्छी तरह रखा गया तू (कनि-
ऋदर ) शब्ब करते हुए (योनि अभि आरुहः ) फलशेमें गिरता है, (धर्मणा यायु आवह ) अपने गुणोंसे वायुको
[ ९२२] हे (इन्दो) सोम(तय सख्ये ) तरी मित्रताके लिए (अह दिवे दिवे रारण) में प्रतिदिन यल
करता हूँ, हे ( बभ्रो ) फान्तिमान् सोम । (पुरुणि मां ) बहुतसे राक्षस मुझे (नि अघ चरन्ति ) कष्ट देते है ( तान,
परिधान अति दि) उन शोकले नष्ट कर ॥ १॥
प्राप्त कर ॥ ३॥
पञ्चम मायाय] सामवेदका सुयोघ अनुवाद 31 " २31. (३.९४०१) ९२३ तबाह नक्तमत सोम वे दिया दुहानो वन ऊधनि । घृणा तपन्तमति एर्य पर शकुना इव पप्तिम }॥२॥११ (वि)॥ [धा० १४१३० १५.१] (ऋ. ९५१०७१२०) ९२४ पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृषो विचर्षणिः । शुम्भन्ति वि धीतिमिः ॥ १ ॥ ९२५ आ योनिमरुणो रुद्मदिन्द्रो वृपा सुतम् । ध्रुवे सदसि सीदतु ॥ २ ॥ (ऋ. ९८५०।२ ) ९२६ - नो यि महामिन्दोऽस्मम्प सोम विश्वतः । आ पयस्व सहस्रिणम् ॥३॥१२ (चा) ॥ [धा० १२ । उ०१९।०२)( ९४०३) ॥ इति चतुर्ष. ख॥४॥ r५] ९२७ पिपा सोममिन्द्र मदन्तु त्वा य ते सुपाय हर्यश्वादिः । सोहिम्पार संपतो नार्या ॥१॥ (२) ९२८ यस्तै मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्च हरसि । स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु ॥ २ ॥ (४७.२।२) [९२३) हे (यो) भूरे रंगके सोम! (उत नर्क उत दिया ) रात अथया दिन ( तप ऊनि महं) तेरे पास में रहं. (ते घृणा) अपने तेजसे (तपन्तं ) घमरनेवाले तुमे तथा (परं सूर्य ) वर धमकनेवाले पूर्यको (शफुनाः इघ अति पतिम) पीके समान हम देखते है ॥ २ ॥ [९२४] (पुनानः विचर्षणिः) पवित्र होनेवासा निरीक्षक सोम (विश्या मृधः अकमीत ) सब शाओंको हाता है, उस (चित्र) शानो सोमको ऋविन (धीतिमि शुम्भान्त ) स्तुतियोंसे सुशोभित करते हैं ॥ १ ॥ [९२५] (भरणः ) अपण रसका सोम (योनि आरुहत् कलशमें घुसता है, बाबमें (वृपा इन्दः) बलवान इन (सुतं गमत् ) उस सोमरसके पास जाता है, और (धुवे सदसि ) स्थिर स्थानमें (सीदतु) रहता है ॥ २॥ [९९६] (इन्दो सोम) है सोमरस ! (अस्मभ्यं ) हमें (B) शीय हो (महा साहमिण रपि) महान् और मनेको कारके धन (विश्वत मा पवस्व ) चारों ओरसे लाकर दे॥ ३॥ । यहां चौथा खण्ड समास शुमा ॥ [५] पञ्चमः खण्डः। ८.९२७ 1 हे (द) इन्द्र (सोम पिन) सोमरस पो, (त्या मदातु) तुझे ये रस मानन्द देवें, है (हर्यश्व) पोरे पालनेवाले इन्द्र । (ते) तेरे लिए (सोतु बाहुभ्यां ) सोमरस निकालनेवालेको भनाओं द्वारा (सु-यतः पादः) पाहमा परपर (यं सुपाय) जिस रसको निकालता है, वह रस (अर्धा न) घोडेके समान तुझे आनन्द देवे || ९२८ ] है ( हर्यश्व इन्द्र) हरि नामक घोडे पास रखनेवाले हन्द ! (ते युज्यः ) तेरे योग्य (चारः मदः) उसम मानन्द देनेपाला (यः अस्ति) जो सोम है (येन वृत्राणि } जिसके उत्साहसे न ओंको (हसि ) मारता है, है ( प्रभूवसो) बहुत धनवान् ! (सत्या ममत्तु) यह सोम तुझे मानन्द ऐये ॥ २ ॥ १२ [साम हिन्दी ना.२३
(९०)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्विका
३
१
९२९ योधा सु में मघवन्याचमेमां यां ते वसिष्ठो अचति प्रशस्तिम् ।
इमा अझ सधमाद जुपस्य
॥३॥ १३ (चा)॥
[ धा० १२ । उ०१। स्व.२] (ऋ. रा)
९३० विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततारिन्द्र जजनुश्च राजसे ।
कत्व वरे स्थमन्यामुरीमुताग्रमोजिष्ठं तरस वरस्विनम्
॥१॥ (र. ८१९७१०)
९३१ नाम नन्ति चक्षसा मैप विना अभिस्वरे
सुदीतयो वो अहोऽपि करें तस्विनः समक्षामा ॥२॥ (२.८९७१२)
९३२ समु रेमासी अस्वरनिन्द्र सोमस्य पीतये ।
स्वः पतिपदी वृधे धृतवतो द्योजसा समूतिभिः ॥३॥ १४ (ची)॥
[धा० २२ । उ
०.४](र. ८/९७३११)
९३३ यो राजा चर्षणीना याता रथेमिरधिगुः ।
विश्वासा तरुता पृतनानी ज्येष्ठ यो वृत्रहा गूगे
॥१॥ (*. ८1७011)
.
E९२९] हे (मघवन्) पनवान हन्न। (यां प्रशस्ति पाचं) जिस स्तुतिरूप पाणीसे (वसिष्ठः ते अर्चति)
पसिष्ठ री मर्चना करता है, (मां सुआ योध) उस स्तुतिको त उत्तम रीतिरो समाकर स्वीकार कर और (इमा
ना ) इस ज्ञानको अथवा इस अपको (सधमादे जुपस्व) यज्ञशालामें सेवन कर ॥ ३ ॥
[९३०] (विश्वाः पृतनाः) सब संग्राममें शत्रुको (अभिभूतरं इन्दं ) पराजित करनेवाले इन्द्रको (नर सजून
ततक्षुः) सब लोग मिलकर स्तुति करते हैं । (राजसे जजनः) इनका तेज बढाने के लिए स्तोतागण उराका सामर्थ्य
बढाते हैं (फत्वे परे स्थेमान) अपने कर्तृत्वसे थेठ स्थानों में रहनेवाले (आमुरि ) शत्रुको मारनेवाले (उग्रं ओजिष्ठं)
धीर ष महा अलिष्ठ (तरसं तरस्विनं ) श्रेष्ठ और शीप्रतासे सब काम करनेवाले इन्द्रको सब स्तुति करते हैं ॥१॥
[९३१ ] (विप्राः अभि स्वरे) ऋत्यिज महान् स्यरसे स्तोत्र कहते हुए (मेघ नेमि चक्षसा नमन्ति ) शक्तिमान्
ध्यापक इन्द्रको बोलसे देखकर ही पहले ममस्कार करते है । हे स्तुति करनेवालो! (सु-दीतय अ-द्वदः) उत्तम तेजस्वी
और द्रोह न करनेवाले (या) तम ( अपि ) भी (तरस्विनः ) शीघ्रतासे (कणे) इन्द्र के कानोंतक पहुचे ऐसे स्वरसे
(ऋक्वभिः सं) ऋचाओं द्वारा उसको स्तुति करो ॥२॥
[९३२] (रेमासः) स्तुति करनेवाले ऋस्विन ( सोमस्य पीतये) सोगरस पीने के लिए (इन्द्रं उ सम-
स्परन ) इन्द्रकी ही उत्तम रीतिसे मिलकर स्तुति करते हैं ( यत्) जव ( स्वः पतिः) स्वर्गका पालफ इन्द्र (वृधे)
यजमानको महान करनेको इच्छा करता है, उस समय (धृत-ग्रता) पोंका आचरण करनेवाला इन्द्र (ओजसा
ऊतिभिः सं) अपने सामसे व अपने संरक्षणके साधनोंसे (सं) युक्त होता है ॥ ३ ॥
[९३३] (यः चर्षणीनां राजा ) जो मनुष्योंका राजा है, ( रथेमिः याता) लो रयसै जानेवाला है, (माधि.
गुः ) को पाये जानेवाला है, ( विश्वासां पृतनानां तस्ता ) जो सब शोसे भक्तको पार कराने वाला है, (यः
पहा ) जो धानुका नाश करनेवाला है, उस ( ज्येष्ठं गृणे ) श्रेष्ठ इन्द्रको मैस्तुति करता हूं ॥१॥
पञ्चम भघ्याय
सामवेदका सुयोध मनुवाद
(९१)
२
-
३
११
9
..
38..
१३७१३
९३४ इन्द्रं तं शुम्म पुरुहन्मन्नस यस्य द्विता विधवार ।
हस्तेन वजा प्रति धायि दर्शतो महाँ देवो न सूर्यः
॥२॥१५ (चि)॥
[धा० १७१३०११ ख०३] (७०२)
॥ इति पञ्चम' पगः ॥५॥
[६]
९३५ परि प्रिया दिवः कविःयारमिनप्त्योहितः । स्वनियोति कपिकत ॥१॥ (ऋ. ९।९।१ ।
९३६ स सानुर्मातरा शुचिर्जातो जाने अरांचयत् । महामही माताधा ॥२॥(ऋ.९९३)
९३७ प्रप्रयाय पन्यसै जनाय जुष्टो अनुहः । पीत्यर्प पनिष्टये ॥३॥१६ (रि)॥
1 धा०३/३० नास्ति । ५.३] ( ९९२)
९३८ वर पा३ दैव्य पवमान जनिमानि घुमत्तमा । अमृतत्वाय घोपयन
( १।१०८३)
९३९ येना नववा दव्यपोते येन विमास आपिरे ।
देवाना सुम्ने अमृतस्य धारुणो येन वारस्याशव ॥२॥ १७ (पौ)॥
[घा० ११1 3041स्य नास्ति || ऋ ९।१०८४)
[९३४ ] (पुरुहन्मन् ) हे मनेक दात्रुको मारनेवाले इन्द्र के उपासक ! ( अबसे तं इन्द्रं शुम्भ ) अपने सरवणके
लिए उस दन्द्रकी उपासना र ( यस्य विधर्तरि ) शितको संरक्षण शक्तिमें (द्विता ) दोनों प्रकारको शक्तिमा है, विनाश
और कृपा करनेकी दोनों प्रकारको वितया है, वह इन्द्र ( दर्शन. महान् या पर्शनीय और महात् पञ्चको ( देव
सूर्यन) तेजस्वी के समान ( इस्तेन प्रति घायि) हापमें धारण करता है ।॥ २ ॥
। यहां पांचवां खण्ड समास हुआ।
[६] पष्ठः सण्डः।
[९३५] ( कवि.) ज्ञानी ( फविक्रतुः ) बुद्धिसे कर्म करनेवाला (नयोः द्वितः ) पठले पर रखा गया, (दिवः
परिप्रिया वयांसि ) धुलोकसे अति प्रिय पक्षोल्प पत्थरोंसे निकाला गया सोमरस (स्वानः रस निकालनवाले अध्वKगोसे
(परियाति प्राप्त होता है॥१॥
[३६] (शुचि जातः ) शुद्ध हुमा हमा ( महान् सः) महान् यह सोम नामक ( सूनुः पुत्र ( मही माता-
पृथा जाते मातरा ) महान यसको प्रकाशित करने बढानेवाले प्रसिद्ध माता धु और पृश्योको (अरोचयत् । प्रकाशित
करता है ॥२॥
[१३७ ] है सरेम ! {मप्र क्षपाय ! तेरे निवास के लिए यल करनेवाले ( अद्रुहः ) द्रोह न करनेवाले और
(पन्यसे जनाय ) स्तुति करनेवाले मनुष्य के लिए (धीति) भक्षणके ( जुटः ) उपयोग लाया गया ( पनिष्टये
अ) स्तुतिको प्राप्त हो ।। ३ ।।
[२३८] (दैन्य पवमान ) दिव्य सोम ! (झुमत्तमः त्वं हि ) अत्यन्त तेजस्वी ऐमा ( मग ) मीन
(घोपयन् ) घोषणा करके ( जनिमानि ) अपने दिथ्य जन्मको लक्ष्य रखकर अमृतधाय ) अमरपनको प्राप्त हो ]] १॥
[९३९] (नव-ग्या दव्या नो गार्योका पोषण करनेवाला दष्य ऋषि (येन अपोथुते ) निस सोमके द्वारा
पतका बार खोलता है, (विमासा येन आपिरे) पज्ञ करनेवाले विप्रोंने जिस सोमको सहापतासे गाय प्ररस्त की,
( देवानां सुम्ने } देवोंके यजसे मुख प्राप्त होनेपर (चारुणः यमृतस्य श्रवांसि ) श्रेष्ठ भन्नको सहायता से मिलनेवाले
को (न आशत ] जिस सोमको सहायतासे मनमान प्राप्त करते है, यह न सोम देवोंको प्राप्त हो ॥ २ ॥
सामवेदका सुयोध अनुयाद
। उत्तरार्चिकः
३ २३
.
३३३३३३१२
3
२७
३१.
२१३१२
९४० सोमा पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं विधावति । अग्रे वाचः पर्वमानः कनिकदव ॥१॥
(ऋ.९।१०६१०)
९४१ धामिर्मुजन्ति वाजिनं वने कीडन्तमत्यविम् । अभि निपृष्ठं मतयः समस्वरन् ॥२॥
(९।१०६।११)
९४२ असजि कलशा अमि मीनात्ससिन वाजयुः ।
पुनानो वाचे जनयनसिप्यदत्
॥३॥ १८ (फा)॥
[धा० १०। उ०२ । ५०२] (ऋ. ९।१०६।१२)
९४३ सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पथिव्याः ।
जनितानेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितात विष्णो:
॥१॥ (१९६९६५)
९४४ ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामपिविषाणां महिपो मृगाणाम् ।
गृधाणार स्वधिनिबनाना सोमः पवित्रमत्येति रेमन् ॥ २ ॥ (ऋ. ९९६६)
."
३४
२..
पूर"
३३२
”
२३॥
३..
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[९४० ] ( पुनानः सोमः ) शुद्ध किया जानेवाला सोम ( उर्मिणा ) अपनी पाराले { अव्यं वारं विधापति)
भेडके बालोंकी छलनीसे नीचे पडता है । ( पवमानः ) शुद्ध किया जानेवाला सोम (वाचा अग्रे कनिक्रदत् । स्तोत्र
पाठके याद धान्य करते हुए नीचे के बर्तनमें गिरता है ॥ १॥
[९४१] ( वाजिनं ) बलवान् ( वने फ्रीडन्त) जलमें मिलाया जानेवाला, (अति अर्वि) छलनीसे छामा
जानेवाला मोम (धीभिः मृजन्ति ) स्तोत्रोंको सहायताले ऋत्विजों द्वारा शुद्ध किया जाता है ( त्रिपृष्ठं ) तीन बर्तनोंमें
रहनेवाले सोमरसको (मतयः अभि समस्वरन् ) स्तोत्र प्रशसा करते हैं ॥ २ ॥
[९४२ ] ( वाजयुः) अन्नसे युक्त होनेवाला ( मोद्यान ) और जलमें मिलनेवाला सोम ( कलशान अभि
असर्जि ) कलामें गिरता है । ( सतिन) पोडा जैसे समागमें जाता है, उसी प्रकार (पुनानः ) शुस होनेवाला सोम
(वाचं जनयन् ) शव करते हए (असिष्यदत् ) मर्तनमें छाना गाता है ॥ ३ ॥
[९४३] (मतीनां जनिता) स्तुतियों को उत्पन्न करनेवाला (दिवा जनिता) धुलोकको प्रकट करनेवाला
( पृथिन्याः जनिता) पृथिवीका जनक ( अग्नेः जनिता ) अग्निका जनक (सूर्यस्य जनिता) सूर्यका जनक (इन्द्रस्य
उत विष्णोः जनिता) इन्द्र और विष्णुका जनक (सोमः पवते ) सोम शुद्ध किया जाता है ॥ १॥
इन देवोंको सोम पालामें लाता है, इसलिए यह इनको उत्पन्न करता है ऐसा बालकारिक वर्णन इस मनमें
किया है । सोमके होने पर ही ये देव यज्ञशालामें आते हैं।
[९४४ ] ( देवानां ब्रह्मा) देवोंमें महमा ( कवीनां पदवी ) कवियों में शब्दोंडो योजना करनेवाला (विप्राणां
ऋषिः विप्रोंमें ऋषि (मृगाणां महिषः ) पशुओंमें भैस ( गृध्राणां श्येनः ) पशियोंमें पान (घनानां स्वधितिः)
हिंसकोंमें शस्त्ररूप यह सोमरस (रेभन् ) वाग्द करता हुआ ( पवित्रं अति पति ) छलनीसे कलशमें छाना जाता है ॥२॥
पश्चम अश्याय]
सामवेदका सुशोध अनुवाद
333
३.
प
९४५ प्रावीविपाप ऊमि न सिन्धुगिर स्तोमान्पर्वमानो मनीषा।
अन्तः पश्यन्वृजनेमावराण्या तिष्ठति वृषभो गोषु जानन् ॥३॥ १९ ()॥
[धा०1०11०२ (१०६] (ऋ. ९।९७७)
॥ इति षष्ठः एण्डः ॥६॥
607
१
२
३17
3
१
९४६ अमि वो वृधन्तमचरणी पुरूतमम् । अच्छा नत्र सहस्त्रते
(ऋ. १०२१७)
३३७,३३"
९४७
अय
यथा न आवश्वष्टा रूपंव तक्ष्या । अस्य क्रत्वा यशस्वत। ॥२॥
(ऋ. १०२८)
९४८ अयं विश्वा अभि थियोऽमिदेवेषु पत्यते । आ वाजरुप नो गमत ॥ ३ ॥२०(डा)
[धा० ८। उ०३ । १०२] (क्र. ८11०६९)
९४९ इममिन्द्र सुतं पिर ज्येष्ठममयं मदम् । शुक्रस्प त्वाम्यक्षरन्धारा भतस्प सादने ॥१॥
(ऋ. ११८४४)
३२311.2
३११
3.a
[९४५] (सिन्धुः वाचः ऊर्मि न ) जिस प्रकार बहनेवाली नदीको लहरें शम्द करती हुई चलती है। उसी
प्रकार ( पवमानः ) गुरु होनेवाला सोम ( मनीषाः गिर स्तोमान ) मनको अच्छे लगनेवाले दामोको (प्रावरिपत्)
प्रेरणा देता है, (वृषभः) बलवान ऐसा यह सोम ( अन्तः पश्यन् ) अपने अन्दर देशकर ( गोषु जानन ) गायों दूप
है यह जानकर ( यवपणि ) कम न होनेवाले (इमा वृजना ) इन बलोंको ( आतिष्ठति ) प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
। यहां छठा खण्ड समाप्त हुआ ।
[७] सप्तमः खण्डः।
[१६] हे ऋत्विजो ! {4) तुम ( सावराणां नप्त्रे ) बलवान्के माती ( सहस्पते वृधानां ) बलवाको
घढानेवाले (पुस्तम अग्निं श्रेष्ठ अग्निके (अच्छ ) पास जाओ ॥१॥
१ सयरः ( अ-चरः)- जिसका नाम नहीं किया जा सकता ऐसा बलवान् ।
[९७] (त्वप्टा तक्या रूपा इव) जिस तरह पढई लकडोको टोक करता है, उसी प्रकार (अयं ) यह अग्नि
(नः आभुपत् ) हमें ठोक करता है, ( अस्य कन्या यशस्वतः ) इसके कर्मसे हम यशस्वी होते हैं ॥ २॥
[९४८] (देवेषु ) देयोंमें ( अयं अग्निः ) यह अग्नि ( विश्वाः श्रियः सब ऐदवयों को ( अमिपत्यते । प्राप्त
होता है। ऐसा यह अग्नि (न. हमारे पास ( वाजै उपागमत् ) अनके साप मावे ॥ ३ ॥
[९४९] हे (इन्द्रः) इन्द्र (ज्येष्ठं मदं) भेष्ठ मानन्द देनेवाले ( अमत्य ) दिव्य ऐसे ( मुत इम पित्र)
इस सोमरसको पो । (तस्स साइने ) पज्ञको शालामें (शुक्रस्य धाराः ) ये तेजस्वी सोमको पारायें (यां अक्षरन् ।
दुसे प्राप्त होने के लिए नीचे गिरती है ॥ १॥
9 १ १२ । (९४) सामवेदका सुयोध अनुयाद उत्तराधिका ९५० न किष्ट्रवद्रधीतरी हरी यदिन्द्र यच्छसे । न किष्ट्वानु मउमना न कि स्वच आनशे ॥२॥ (ऋ. १८४६) ९५१ इन्द्राय ननमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन । सुता अमत्सुरिन्दयो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥३॥ २१ (२) [धा० ८। उ० नास्ति । स्व०१] (ऋ. १८११) ९५२ इन्द्र जुपस्य प्र वहा याहि शूर हरिह । पिया सुतस्य मतिर्न मघोयकानयारुमदाय ॥१॥ ९५३ इन्द्र जठर नव्यं न पृणस्व मधोदिवो न । अस्य सुतस्य स्वाइनोप त्वा मदा। सुवाचो अस्थुः 1॥ २॥ ९५४ इन्द्रस्तुरापामित्रो न जयान वृत्र यतिन । विभेद वल भृगुर्न ससाई शत्रून्मदै सोमस्य ॥ ३ ॥ २२ (क)॥ [पा० ११ । उ०५ वि०१] पति सप्तमः खण्डः ॥७॥ ॥ इति तृतीयप्रपाठके प्रथमोऽपः ॥ ३ ॥ ॥ इति पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥ [९५०] हे (इन्द्र ) इन्द्र ( यत् जिसके कारण तू (हरी यन्छसे ) अपने घोडोंको रपमें जोडता है, उस कारण (त्यत् । तेरेसे बढकर (रथीतरन किः ) थेष्ठ घोर दूसरा कोई नहीं है, (मज्मना ) बलमें हो (त्वा अनु नकिः ) तेरे समान दूसरा कोई नहीं है। (सु-अश्वः ) उत्तम घोडे पालनेपाला भी (न किः आनशे) दूसरा कोई नहीं है ॥२॥ [९५१ ] है ऋत्विजो ! (नून इन्द्राय भर्चत ) निश्चपसे तुम इन्द्रको ही पूजा करो, ( उपथानि च प्रचीतन) [इन्द्र के लिए हो ] स्तोत्र बोलो। ( सुता इन्दवः अमत्सुः ) छाना हुमा सोमरस इन्द्रको मानन्द देवे। (ज्येष्ठ सहा ) भेष्ठ बलवान् इन्द्रको (नमस्थत ) नमस्कार करो ॥३॥ [९५२] हे ( हरिह शूर इन्द्र) घोडे पासमें रखनेवाले शूरवीर इन्द्र ! ( आयाहि ) आ, (प्र यह ) हविष्याग्मको स्वीकार कर, (चारः मदाय) उत्तम आनन्द प्राप्त हो इसलिए (न चकानः ) इस समय इच्छा करते हुए (सुतस्य मघोः) मधुर सोमरस ( मतिः) अपनी इच्छानुसार (पिय) पो॥ १॥ [९५३ ] हे (इन्द्र) इन्द्र! (दिवान ) जैसे धुलोकसे ( सुवाचःमदः) उत्तम स्तुतिका आनन्द ( त्वा उप अस्थुः) तुझे प्राप्त होता है, और जैसे ( स्वःन) उस स्वर्गीय आनन्दको तू भोगता है, उसी प्रकार (सुतस्य भस्य मयोः) इस मधुर सोमरससे (जठरं नव्यं न ) अपने पेटको (था पृणस्व) भर ले ॥२॥ [९५४] (तुयपाद इन्द्रः) जल्दी हो शत्रुको हरानेवाला इन्द्र ( मित्रान) मित्रके समान (पुत्रं जयान) को मारता है, ( यतिः न वलं रिभेद } जिस प्रकार संयमी वीर बल राक्षसको मारता है, तपा (सोमस्य मदे। सोमके भानन्द ( मृगुन शन् सासहे) भगु जैसे शत्रुओंको हराता है, उस प्रकार तू शओंको हरा ।। ३ ।। । यहां सातवां खण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति पञ्चमोऽध्यायः॥
पञ्चम मध्याय] सामवेदका सुयोष अनुवाद पञ्चम अध्याय सरा कोई इन्द्रके गुण इसलिए तेरो अपेक्षा महान् रममें मंटनेपाला कोर नहीं है। समप्याप इन्द्रफे गण इस प्रकार यणित है- २२ ज्येष्ठं सहः नमत्यत [ ९५१ ]- इन्द्र के श्रेष्ठ १-प्रतिप्फुतः [९१३]- जिसका कोई भी प्रतिकार साहसपूर्ण कार्यको नमस्कार करो। नहीं कर सकता। २३ यस्य विधर्तरि द्विता [१३४ ]- जिसकी पारक- २ चर्षणीनां राजा [९३३ 1- सब मनुष्योंका राजा, शक्तिमें दो शश्तिया है। एक कृपा करनेको शक्ति और सवकासासका दूसरी विनाश करनेकी शक्ति । ३ रथेभिः याता[९३३] - रपते जानेवाला, जिसके २४ दर्शतः मनान वनः हस्तेन प्रतिधायि [९३४] साथ बहुतसे रप होते हैं। जिसके साथ सरदारोंके रय देखने योग्य महान् वनको यह हायोंमें शत्रुको मारनेर रहते हैं। लिए धारण करता है। ४ अधि-गु{ ९३३]- आगे जानेवाला । २५ पुरु-हन्-मन् ! अपले त इन्द्रं शुम्भ [५३४] ५ ज्येष्ठः [९३३]- श्रेष्ठ, सबसे बडा । -हे बहुतसे शत्रुओंको मारनेवाले भक्त! अपने संरक्षणके ६ तुरापार [ ९५४]- दोघतामे प्रावको हरानेवाला) लिए उस इन्द्रकी उपासना कर । ७ हरिः [१५२]- घोडौंको पासमें रखनेवाला, दुलोका २६ नूनं इन्द्राय अर्थत, उफ्धानि च प्रवीतन हरण करनेवाला। [९५१]- निश्चयसे इन्द्रको अर्चना करो, उसके स्तोत्र कहो। ८ शरः [१५२ शूरवीर। २७ रेभासः इन्द्रं समस्वरन् [९२२]- स्तोता इन्द्रको ९ तरस्त्री [९३१]-शोधतासै सय कार्य करनेवाला । स्तुति करते हैं। १० स्थ:-पति [९३२]- वर्गका स्वामी, आत्मविजयो। २८ यत् स्वर-पति वृधे, घृतवतः मोजसा तिमिः ११ धृत-प्रतः [९३२]-नियमोंका पालन करनेवाला। सं [ १३२]- जब स्वर्गका स्वामी संवर्धन करनेकी इच्छा १२ युरहन्मर [१३४]- अनेक सोको मारनेवाला। करता है, तब यह नियमानुसार चलनेवालर अपने सामध्ये १३ ज्येष्ठ सदः [९५१]-जिसके पासष्ट सामभ्यं है। और सरक्षणके सापनसि सहायता करता है। १४ इन्द्रादधीचः अस्थभिः नवत्ती नय वृत्राणि २९ विप्राः अभिस्वरे. मेप नेमि नमन्ति [ ९३१/- जधान [९१३]- इन्नने थोचीको हड्डियोंके अस्त्रसि ९९ जानो एक आवाजसे उस इन्द्रको स्तुति करते है। रास मारे। इस प्रकार इन्द्र के गुण इस अध्यायमें वर्णित है। १५ विश्वास पृतनानां तश्ता नृत्रहा १९३३]- सब शत्रुको मेनाओंको हरानेवाला इन्द्र है। अब इस अप्यायमें गाए हुए अग्निके गुणोंको देल- १६ इन्द्रः वृनं जघान [९५४- इन्दने कृषको मारा। १ जागृधिः [९०७]- जागृत रहनेवाला। ५७ इन्द्रः वलं विमेद (९५४४- इन्द्रने दलको मारा। २सु-दक्षः[२०७-चतुर। १८ सोमस्य मदे न सासहे १९५४]- सोमके ३ जनस्य गोपा [ ९०७ - मनुष्योंका रक्षक। मानन्दमें सब धानोंको इन्त्रने पराजित किया। ४ शुचिः [९०८]- शुढ, पवित्र, निर्मल। १९ मामना स्वा अनु न कि १५० - बलम तेरे ५ अंगिरस: १.८]-बर-प्रत्यंपमें जो प्रकारता है। समान कोई नहीं है। ६ यक्षस्य केतुः [ ५०९]- पतको पताका, पिम्ह । २० सु-अश्वान कि-1 २५०]- उत्तम घोहे पालने- ७ सुमातुः [१०९]- उत्तम कर्म करनेवाला। पाला भी तेरे सिवाय दूसरा कोई नहीं है । ८ सहस्वान् [ ९४६ - सामप्यते पुस्त। २१ हे इन्द्र ! यत् हरी हुन्छसे, त्या स्थीतरःन ९ सुधिताय मजनिष्ट [ ९०५ ]- लोगोंका कल्याण कि[ १५० ]- हे इन्द्र। धोरे अपने रथ जोड़ता है, कानेके लिए उत्पन्न हुआ। अनिके गुण सामवेदका सुयोघ अनुवाद [उत्तरार्चिकः - १० धुम भाति [९०७]- तेजस्वी प्रकाशित होता है। ३ हे नरा इन्द्राग्नी! नः पापत्वायरीरधम् ।९१८] ११ महतः सहः सः मध्यमानः जायसे [९०८]- -हे इस भोर मग्ने ! हमें पापमें प्रवृत्त मत करो। महान् बलसे मयने पर वह प्रकट होता है। ४ मभिशस्तये मा, निदेना मा ९१८]- हिंसा १२ अस्य ऋत्या यशस्वन्तः [९४७]- इसके कार्यसे करनेके कार्यमें प्रवृत्त मत करो, निन्दनीय कर्मोमें भी मत हम यशस्वी होते हैं। लगाओ। १३ देवेपु अयं अग्निः विश्वाः धियः अभि पत्यते अर्थात् तुम हमारी प्रवृत्ति अच्छे कामोंको ओर हो [ ९४४ ]- देयोंमें यह भग्नि सघ. शोभाओंको स्थापित लगायो, इस प्रकार देवताओंको प्रार्थना की गई है, कि करता है। हमारी प्रवृत्ति उतम कानोंको ओर हो हो, खराब कामोंकी १४ नः वाजैः उपागमत् [ ९४४ ]- हमारे पास वह ओर न हो। देवताओंके गुण इसीलिए वर्णित है । देवों के अग्नि अन्न और बलके साथ आये। गुणोको हम धारण करें, यही उत्तम प्रवृत्ति है, इसके विपर १५ त्या सहसः पुत्रं आहुः [९४४]- तू बलसे उत्पन्न जो है, वह यसत् या बुरी प्रवृत्ति है । मनुष्य सरप्रवृत्तिको होता है ऐसा कहते है। धारण करें और असत्यत्तिको अपने से इस प्रकार इस अग्निका वर्णन इस अध्यायमें हुआ है। यज्ञमें सोमरस तैय्यार करते है, और उसे पन्द्रको अर्पित मित्र और वरुण करते हैं। इस विश्यमें वर्णन अब देखिए- मय मित्र और वरण इनका वर्णन वेतिए-- इन्द्रको सोम १ ऋताधा मित्रावरुणा [१०]- सत्य अपवा १ सुतः आ विपासन इन्द्राय मधु सिव्यते [९०२] पाको पढानेवाले मित्र और वरुण है। - सोमरस निकालने के बाद उसे छानकर शुद्ध करके इसको २ राजानौ अनभिदुहे धुवे उत्तमे सहस्रस्थूणे वह मोठा रस दिया जाता है । इसको मोठा करने के लिए सदसि भाशाते [९१ - पे दो राजा है, घे परस्पर उसमें गायका दूध मिलाया जाता है। लड़ते नहीं और स्थिर तथा हजार खम्भोंवाली उत्तम सभाम २ इन्द्राय पातवे हरि इन्दु आदिभिः हिन्वन्ति ये चंठते है। [९०३-इन्द्रको सोमरस पीनेको देनेके लिए हरे रंगका ३ सम्राजा धृतासुती आदित्या दानुमः-पती सोम पत्यरोंसे फूटा जाता है। अनयहरं सचेते [९१२]- वे दोनों सम्राट् है, धो मिला ३ घृषा इन्द्रः सुतं गमत्, ध्रुवे सदसि सीदतु हमा अन्न खाते है, आदित्यके पुत्र और धनके स्वामी है, वे [९२५]- बलवान् इन्द्र सोमयाग स्थान पर आता है और हुटिल व्यवहार न करनेवालेको सहायता करते हैं। स्थिर यज्ञशालामें जाकर बैठता है। इस प्रकार मित्र और वरुणका वर्णन पहां किया है। ४ हे इन्द्र ! सोमं पिव, त्या मदन्तु [९२७]-है इन्द्र और अग्नि इन्न ! तु तोमरस पी, ये सोमरस तुझे आनन्द देवें। ५ हे हर्यश्व ते सोतुः बाहुभ्यां सुयतः अद्विः अब इख और अग्निके वर्णन देखिए- यत् सुपाव [ ९२७]-हे उत्तम घोडे रखनेवाले ! १ हे इन्द्राग्नी । इयं घां पूर्व्यस्तुतिः, अस्य भन्मनः रा निकालनेवालेके हाक द्वारा पकडे गए पत्थरोंसे यह अनि [९१६]-हे इन्द्र और बग्ने ! मह तुम दोनोंको रस निकाला गया है। अपूर्व स्तुति इन मनन करनेवाले विद्वानोंसे उत्पन्न हुई है। ६ हे इन्द्र ! ज्येष्ठं मदं अमत्यधर्म सुतं पिय [९४९] २ हे इन्द्राग्नी ! जरितुः हवंशृणुतं, गिरः वनत, - हे इन्द्र । श्रेष्ठ अमर और शिष्य आनन्द वेनेवाले इस शाना धियः पिप्यतं [९१७-हे इन्द्र और अग्ने! सोमरसको पो। स्तोता प्रार्थना करता है, उसे तुम सुनो, उसकी स्तुति सुनो, ७ ऋतस्य सादने शुक्रस्य धाराः त्वां अक्षरन् तुम दोनों हो अधिकारी हो, इसलिए उसके योर कोका [९४९]- पतके स्थान पर इस वीर्यवान् सोमरसको धारा उत्तम पल दो, मषा उसको परिको परिपक्व करो। तेरे लिए निकली है, तेरी तरफ बह रही है। !
सोमके गुण पश्चम अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद (९७) ८चारुः मदाय सुतस्य मधी मतिः पिव [ ९५२ - १८ देवैः सं शोभते १९२०]- देवोंके साप पुशोभित उत्तम आनन्द प्राप्त होने के लिए यह अपर सोमरस इन्टर- होता है। नुसार पी। १९ फविक्रतुः [१५]- उत्तम कर्म करनेवाला । ९इन्द्रसुतस्य मधोः मदः त्या उप अस्थुः २० मतीना, दिया, पृथिव्याः, अग्नेः, सूर्यस्य, जठरं पूणस्व [ ९५३]- हे इन्द्र ! इस मोठे सोमरसका विष्णो जनितासोमः [९४३]- बुद्धि, धूलोक, आनन्द तुझे मिले, अतः पेट भर कर पो। पृथ्वी, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, विष्णु इनमें उत्साह पैदा करनेवाला । इस प्रकार सोमरस इन्दको और अन्य देवताओको दिया जाता था, वे सय यत्तशालामें बैठकर पोते और उत्साहित घटते हैं, इसलिए ये सोमके गुण है ऐसा कहा है । पे सोमके गुण है, सोमरस पीने से ये गुण उत्साहफे कारण होकर अपने कार्य उत्तम रोतिसे करते थे। स्वर्गसे सोम शशुको हरानेवाला सोम १ या दियस्परि रघुयामा । ९०० - जो लोक पर १ हे इन्दोतब सख्ये अहं दिवे दिवे रारण ! हे. रहता है, वह पह सोम है, हिमालय के शिखरपरने ठिकाने यभ्रो । पुरुणि मां अवचरन्ति, तान् परिधान गति सोम उगता है। यहांसे या करनेवाले यजमान उसको लाकर इहि [ ९२२]- है मोम ! तेरी मित्रता में रहूं, ऐसी इच्छा पर उसका उपयोग करते है। में प्रतिदिन करता हूं, क्योंकि है 'सोमा पहुससे शनु मुझे बारबार कष्ट देते है, उन्हें तू दूर कर। २ पुनानः विचर्षणिः विश्वाः मृध अकमीत् १ पयमानः [८८६]- शुसपवित्र, छाना जानेवाला । [९२४]-छाना जानेवाला, विशेषज्ञानी, मोम पर • शापि-पाणः [८८६]- ऋषि यजम जिसका उपयोग माफमण करके उन्हें दूर करता है। करते है। ३ हे हर्यभ्य इन्द्र ते युज्याचारः मदायः अस्ति, ३ धुकः [८८७]- स्थय देनेवाला। येन धृभाणि हंसि [९२८]- है लाल रंगरे घोडे पास, ४ हरिः ८८७]-दु खोका हरण करनेवाला, हरे राहा। रखनेवाले इन्द्र! तेरे योग्य मह उत्तम मानन्द है, जिससे तू ५ विश्वचक्षः { ८८८]- सब देखनेवाला, सर्व प्रष्टा। शत्रुओंको मारता है। ६ मभु[८८८]- स्वामी। ७ विभ्यस्य भुवनस्य पतिः ८८८]- सम्पूर्ण भुश्नोंका इस प्रकारपोरोम ऐसा उत्साह उत्पन्न करता है कि उसके कारण शके विनाशके कामोशो करने के लिए प्रोग्य होते हैं। ८ म्यानशी [८८८)- व्यापक, सब पर प्रभाष ऐसा इस सोमरसका प्रभाय है। शासनेवाला। ९दक्षः घुमान् रसः [८९१]- बसवान और अंगुलियोंका रस निकालना तेजावी सI सोमको येलको शयर पाट पर रखकर पत्परोसे कटा १० अ-दुच्छुनः [८९०- दुष्टोंको प्राप्त न होनेवाला। जाता है, और उंगलियोसे दवाकर उसका रस निकाला जाता २१ चिश्य स्यः ज्योतिः 1 ८९१ - सम्र प्रकार हैं । उसका वर्णन इस प्रकार है- गरवी ज्योति। १२ विश्व चणिः ८९६]- सब देखनेवाला । १ उनियाः, जामय, स्वतारः, महायुयः, सरे १३ वृदन्मतिः । ८९८]- महान युनियासा। पति महा इन्दु हिन्वन्ति [१०]- सब लगह जानेवाली, १५ कविः ९२० - ज्ञानी, दूरही । महिनके समान एक मतसे पाम करनेवाली ऐसी उंगलिया, १५ पा[९२०]- यसवान् । महान कार्य करतको इन्टर करके, भेष्ठ स्वामी महान् मोरको १६ प्रियः । ९२० - प्रिया इशाकर उसका रस निकालती है। १७ अ-दाभ्यः १२01-न पनेवासा, कोई भी सोमका त निकालना एक हाकार है, प्योंकि उसो जिसे या नहीं सकता, ऐसा मामवान् । सोमपा तिब होता है और उससे सब रेय सन्तुष्ट होते हैं। १३ (साम, हिन्दी भा.२३ स्वामी। - (९८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिक सोम धन देता है ३ हे राजन् पयमान ! तर मदः अदुछुनः रसः अव्यं वारंरिअर्पति [८९०]-हे सोम ! तेरा आनन्द १ देवेभ्यः सुत विश्या वसूनि आपिश [ ९०५]- देनेवाला तथा बुरे और दुष्ट लोगोंको न मिलनेवाला रस देवोंके लिए निकाला गया सोमरस हमारे लिए सब धनोंमें भड़के वालोंको वनो छलनीसे छनकर नीचे जाता है। प्रविष्ट होवे, मर्यान सब पन हमें देवे। ४ ओजसा पविगे शीघं आ एति [ ९.१]-गसे २ हे इन्दो सोम ! अस्मभ्यं महा सहस्रिणं रयिं छलनीके द्वारा शीघ्र छाना जाता है। विश्वत. आ पवस्व [९२६ ]-हे तेजस्वी सोम ! तू ५ हे हरे ! दक्षसाधनः मदः देवेभ्यः पीतये हमें महान् और हजारों प्रकारके धन पारों सोरसे दे। पवस्व [ ९१९ - हे हरे रगके सोम । बल बढाने के सायन सोमयाग, सब लोग धन देते हैं, तब यह धन सोम हो तेरे आनन्द देनेवाले रस देवोंके पौनके लिए छानकर तैय्यार देता है, ऐसा कहा जाता है। किये जाते है। सोमका पानीमें मिल जाना ६ पुनानः सोमः ऊर्मिणा अव्य पार वि धावति सोम फूटकर उसका रस निकालते हैं, बादमें उसमें पानी [९४०7- छाना जानेवाला सोम पारसे भंडके बालोंको मिलाते हैं, तत्पश्चात् उसे छाना जाता है, और जाने हुए छलनीसे दौड़ता हुआ नीचे के बर्तन पडता है। सोमरसको कलशमें भरकर रखते हैं । इस सम्बन्धमें वर्णन इस प्रकार सोम छाना जाता है और यह छलनी भेटके इस प्रकार है- बालोंकी बनी होती है। १ या दिव. परि रघुयामा, सः अयं पवित्रे मा सोममें गायका दद्ध मिलाना तिधो. ऊर्मा वि अक्षरत् [९०० ]- जो सोम घुलोक १ हे पयमान ते आश्विनी धेनवः दिव्या, पयसा पर होता है वह सोम छलनीसे छाना जाता है । यह नदीके धरीमणि प्र अमनन् [८८६]- हे सोम ! तेरी धे तहरमें टपकता है । नदीका पानी मिलाकर वह छाना घेगवान् गायें दिव्य है, वे अपने दूघसे कलशमें पहुचती है। जाता है। कलशमें छते हुए सोमरसमें गायका दूप मिलाया जाता है। २ वाजिनं वने श्रीडन्त अति अर्चि धीभि. मृजन्ति २ वृषभ अन्तः पश्यन्, गोपु जानन्, अवराणि {९४१] बलमा सोमहरे पानी में मिलाकर भेउके सालोंको इमा पृजना मा तिष्ठति {९४५- सल्यान सोमरस बनी छलनीसे स्तोत्र बोलकरके याजक छानते हैं। अपने बन्दर देखता है, और गाय दूध है यह जनता है, ३ वाजयुः मीद्वारा फलशान् अभि असर्जि[९४२] कम न होनेवाले बलोंको वह गायके दूधसे प्राप्त करता है। यान देनेवाला पानीमें मिलाया हुआ सोम कलशमें छाना इस प्रकार मालकारिक भाषासे सोमरसमें गायका दूध मिलाया जाता है इसका वर्णन इन मत्रोंमें किया है। इस प्रकार सोमरसको पानीमें मिलानेका वर्णन है। इसके सोमका अन्न देना मार बह जाना जाता है, उसका वर्णन निम्न प्रकार है- १ हे न्दो सोम 1 मही इप गोमत् आ पवस्व सोमरसका छाना जाना [८९५]- हे तेजस्वी सोम! तू घडे अन्न तपा गार्योसे १ हे ऋपिपाण! ये वेधसः त्वा मृजन्ति, ते अन्त- मुक्त पन हमें रे। रिक्षात् स्थाविरी. असृक्षत्[८८६ -हे ऋषियोंके द्वारा २५ प्रक्षयाय अद्रुहः पन्यसे जनाय बीति जुष्टः निकाले गए सोम ! जो ज्ञाती तुझे निकालते हैं, वे ऊपरफे पनिष्टये मर्प । ९३७]-हे सोम ! तेरे निवास करने के लिए यतनसे एक पारसे नोचेके वर्तनमे तुझे पहचाते हैं. छानते हैं। पल करनेवाले, द्रोह न करनेवाले और स्तुति करने वाले २ यदि पवित्र हरि अधिमृत्यते सत्ता योनो मनुष्य के खाने के लिए प्रयुक्त हुभा तू स्तुतिको प्राप्त हो। निदति [८८७]- जब एलनीसे हरे रगका योग छाना जाता है, उस समय स्थिर रहनेको इच्छा करनेवाला यह सोमरसको छाने जाते समय उसका शव होता है। उसका सोम कलशमें जाकर बंडता है। वर्णन इस प्रकार है- जाता है। सोमका शब्द पश्चम अध्याप] सामवेदफा सुवोध अनुयाद १ सृष्टेः स्मनः इव परमानस्य श्रूयते [८९४] ४ विश्व स्वः ज्योतिः दशे [८९१]- सोमका अपना वर्षाको जैसी आवाज होती है उसी प्रकार छाने जानेवाले तेज दौलता है। सोमको मादान मुनी जाती है। ५ शुश्मिण विद्युतः दिवि चरन्ति [८९४ २ घिया हिता कानक्रदत् योनि अभि आरहः बलवान सोमकी किरणे धुलोकमें फैलती है। [९२१]-बुद्धिसे पहमें रखा गया सोम शब्द फरतामा ६ मही रोदसी मा पृण [८९६]- विशाल धाया- कलसे जाता है। पृथ्वीको अपने तेजसे भर है। ३ पवमानः वाचा धर्म निमावत् । ९४० - छाना ७ सुना विर्षि दधानः विचक्षणः निरोचयन जाता हआ सोम शरद करता है। [९०१ ]- सोमरस तेज धारण करते हुए तेजस्वी होकर ४ घि; मतय अभि समस्यरत् [९४१] - तोन चमकने लगता है। यतेनोंमें स्तुतिके साप - साय सोम शम्ब करते हुए जाता है। ८ रुचा देय पयमान [९०५]-सेजते सोमदेव ५ पुनान वाचं जनयन् असिप्यदर [ ९४२]- सुशोभित होता है । छाना जाता हुआ सोनाब्द करते हुए वर्तनमें पड़ता है। १ शुचिःजाता महान् सः सूनु मही ऋतावृधा ६ सोम रेभन् पवित्र अति यति । १४४ Jो जाते मातरा अपेक्यत् ! १३६ / Tag मा सोम धान करते हुए छलनी से छनता जाता है। नामक पुत्र महान् यज्ञको बढ़ानेवाली प्रसिद्ध माता द्यावा. ७ पयमानः मनीपाः गिरः स्तोमान् प्राचीविपत् पृथ्वीको प्रकाशित करता है। १० देव्य पयमान ! घुमतमा त्य [ १३८ ]- हे [ ९४५]- शुद्ध होता हुमा सोम मनको प्रिय लगनेवाले दादाको प्रेरणा देता है। प्रकाशमान् सोम ! तू तेजस्वी है। इस प्रकार सोम तेजस्वी है। इस तरह सोमरस छाना जाता हमा शब करते हुए छलनीमसे नीचे के बर्तन पडता है, उसका मालकारिक वर्णन ऊपरके मत्रोंमें किया है । किसी वर्तनमें पहले ही द्रव पार्य रखा हो और उस पर ऊपरसे द्रव पदार्य गिराया जाए तो शब्द तो होना ही हमा। उसी प्रकारका यह पाम है। नीचेके वर्तनमें दूध है और उसमें ऊपरसे सोमरस छलनीसे १ ध्रुवस्य सत: केतच. उभयतः परियन्ति [८८७] गिरने ला जाये, तो उसका शब्द तो होगा हो। वह ही -स्थिर और उतम मार्य करनेवालोंशा तेज दोनों ओर सोमका वाव है। फैलता है। सोमका तेज २ हे विश्ववक्ष ! प्रभो सता ते मभ्यस्य केतयः विश्या धामानि परियन्ति [८८८]-हे सबके निरीक्षण सोमलता तेजस्वी है। उसका रस भी तेजस्वी है । इस करनेवाले निरीक्षक ! शासन करनेकी इच्छावाले तैरा महान् सेजस्विताका वर्णन इस प्रकार है- प्रकाश सब स्थानमें पहचता है। १ पवमानस्य धवम्य सतः केत: उभयत. परि- ३ धर्मणा पनसे [ ८८८]-अपने पर्म से शुद्ध होता है। यन्ति [८८७]- छाने जानेवाले स्पिर सोमको किरणे दोनों ४ विश्वस्य भुवनय पति राजलि । ८८८ - तू सब ही मोर फैलती है। भवनोंका स्वामी होकर चमकता है। २ पवमानः बृहत् वैश्यातरं ज्योति. अजीजनत् ५ पयमानः वृहत् वैश्वानर ज्योति दिव चित्र [८८९]- छाना जानेवाला मोम महान् ध्यापक तेज उत्पन्न तन्यतुं न अजीजमत् । ८८९]- पवित्र मा सोम महान् करता है। तया सब मनुष्यों के हित करनेवाले तेजको, पुलोकौ चमकने ३ पवमानस्य ते दक्ष. शुमान् रसः विराजति वाली बिजली के समान, उत्पन्न करता है। [८५१]-छाने जानेवाले सौम के बलवर्धक तेजस्वी रत ६ हे राजन् ! तव मदः अ-दुन्छुन' [८१०]- है मुशोभित होते है। एनन् । रामानन्द दुष्ट नहीं पा सकते। सुभाषित * (१००) सामयेदका सुघोष मनुवाद [उत्तराचिंका ७ ते दक्षः द्युमान् विराजात [८९१]- तेरा तेजस्वी २२ जनस्स्य गोपा, जागृथिः सुदक्षः अग्नि, बल प्रकाशित होता है। मध्यसे सुविताय अजनिष्ट [ ९०७]- मनोका संरक्षण ८ विश्व स्वः ज्योति। एशे [८९१]- सब विषमें करनेवाला, जाग्रत और चतुर, आगे ले चलनेवाला, नये मात्माको ज्योति दीखती है। मागसे सबका कल्याण करने के लिए प्रकट हुआ है। ९ त्वेषाः अयासः प्रमुः [८९२] - तेजस्वी और २३ वृहता दिविस्पृशा शुचिः भरतेभ्यः धुमत् क्रियाशील ही प्रगति करते है। भाति [९०५)- महान् आकाशको स्पर्श करनेवाले तेजसे १० अन्नतं दस्यु साह्याम [८९३]- सरकर्म न पवित्र हुआ हुआ यह वीर भारतदेशमें लोगोंके हितके लिए करनेवाले शत्रुको हम पराजित करें। तेजावी होकर चमकता है। ११ शुप्मिणः विद्युतः दिवि चरन्ति [८९४] २४ सः महत् सहः [९०८]- यह नत्रुका पराभव बलशाली बिजली का प्रकाश धुलोकर्मे फैलता है। करनेवाले महान् पलसे युक्त है। १२ पृष्टेः स्वनः श्रूयते [८९४ ]- वृष्टिका शारद २५ त्वां सहसः पुत्रं आहु[१०८]- तुझे सामय सुनाई दे रहा है। या बलका पुत्र कहते है। १३ गोमत्, अश्ययात्, हिरण्यवस्, धीरयात् मही २६ राजानौ अनभिगृही धृवे उत्तमे सहम्नस्थूणे इपं आ पवस्व [ ८९५]- गाय, घोडे, सोना और धीर- सदसि भाशाते [ ९११] - जो राजा आपसमें भिडते पुत्रोंसे युक्त महान् अन्न हमें है। नहीं, ये स्थिर, उत्तम और हजार खम्भोंवाली सभा वैठते है। १. हे विश्व-चपणे! मही रोदसी आपण [८९१] २७ सम्राजा दानुन:पती अनयहरं सचेते [९१२] -हे सब लोगकि हित करनेवाले पोर ! तू अपने तेजसे इस - सम्राट् घनके स्वामी होकर कुटिलता रहित सत्कर्मको महान् घुलोक और पृथ्वीलोकको भर दे। सहायता करते है। १५ सूर्यः रश्मिभिः उपान [८९६]- सूर्य जैसे २८ अ-प्रतिकुतः इन्द्रः दधीचः अस्थमानवती अपनी किरणों से उप.कालके बाद जगत्को भर देता है, उसी नय वृत्राणि जघान [९१३ ]- जिसको कोई भी हरा भी अपने तेजसे जगत्को भर दे। नहीं सकता ऐरो इन्द्रने ऋषिको हडिपारो ९९ वृत्रोंको मारा, १६ ना शर्मयन्त्या धारया विश्वतः परिसर [८९७] यात्रुको मारने के लिए ऋषिने अपनी हड्डी राष्ट्रहितके लिए -हमें सुप वेनेवाले अघरसकी धारामे चारों ओरसे घेर ले। समपित को। २७ हे वृहन्मते ! प्रियेण धाम्ना आशुः परि अर्ष २९ गोः चन्द्रमसः गृ त्वाः अपीच्यं नाम इत्था [८९८]- हे बुद्धिमान् ! अपने प्रिय जीवनप्से युक्त होकर अमन्वत [ ९१५ ]- गमन करनेवाले चन्द्रमाके मण्डल पर शीन पर आ। सूर्यको गुप्त किरणें इस प्रकार प्रकाशित होती है । सूर्यको १८ अनिष्कृतं परिष्कृण्वन् सनाय इपः यातयन् , किरणें चन्द्र पर जाकर पडती है, यहासे उनका परावर्तन परिम्नय [८९९]- असंस्कृतको सुसंस्कृत करते हुए, लोगोंको होकर राम्रिके समय पृम्बोपर उस चन्द्रमाका प्रकाश पडता है। अन देते हुए चारों ओर भ्रमण कर। ३० ईशानाः धियः पिप्यतं [ ९१७ - तुम दोनों १९ स्विपिं दधानः, विचक्षणाविरोचपन, मोजसा ही स्वामी हो, इसलिए हमारी बुद्धिको पूरी तरह शीनं आ पति [११]- तेज धारण करके, सबको विकसित करो। देखनेवाला, स्वय प्रकाशमान होनेवाला अपने सामर्थ्यसे शीघ्र ३१ हे नरा इन्द्राग्नी ! न. पापत्याय मा, अभि- प्रगति करता है। शस्तये मा, निदे मा, रीरघतं ९१८]-है नेता, इन्द्र २० उस्त्रयः जामयः स्वसारः महीयुवः सूरं पति और भनियो ! हमें पापके कार्यो मत लगाओ, हिंसा हिन्यन्ति [ ९०४ ]- तेजस्यो तथा एक जगह रहनेवाली करनेमें प्रवृत्त न करो, तपा निदाके कार्यो में भी मत वहिने महान कार्य में स्वयंको लगाकर अपने तेजस्वी पतिको भी उत्तम कार्य में प्रेरित करती है। ३२ वृपा कविः प्रियः अदाभ्यः संशोभते १९२०]- २१ रुचा यिश्या वमनि विश [९०५]- अपने बलवान् कवि, प्रिय, तया न दवाया जानेवाला होता है, यह तेजसे सब भनो में दू प्रविष्ट होकर रह । मुसोभित होता है। प्रकार तू युक्त करो ।
पञ्चम अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद १०६) प्रयत्न कर। ३३ धिया हितः धर्मणा मारहः । ९२१ - वृद्धिसे ४७ चर्षणीनां राजा आध्रिगुः, विश्वासां पृतनानां जो हितकारक है, वह अपने गुण धर्मसे उन्नत होता है। तरता पुत्रहा ज्येष्ठं गृणे [ ९३३ ]- मनुष्योरा शासक, ३४ पुरुणि मां नि अवचरन्ति तान् परिधान अति प्रगति करनेवाला, सब को सेनामोसे पार करनेवाला इन्द इहि [ ९२२ ]- बहुतसे दुष्ट शत्रु मुझे कष्ट देते है, उन्हें है, उस श्रेष्ठ इन्द्रको में स्तुति करता हूँ। दूर कर। ४८ पुरुहन्-मन ! अबसे ते इन्द्रं शुम्भ [ ९३४ ] घृणा तपन्तं अति पप्तिम [ १२३ ]- तू अपने - हे शत्रुके मारनेवाले इन्टके उपासक अपने सरक्षणक तेजसे चमकता है, ऐसा हम देखते हैं। लिए उस इनकी उपासना कर। ३६ विचर्षणिः विश्वाः मृधः अक्रमीत् [ ९२४ ]- ४१ यस्य विधर्तरि द्विता [९३४ - जिसको सरक्षण विशेष निरीक्षण करनेवाला अपने सब शत्रुओं को हराता है। शक्तिमें दोनों प्रकारको शक्तियां है । एक शत्रुके बिना ३७ विर्भ धीतिभिः शुम्भन्ति {१२५]- उस ज्ञानीको करनेको शक्ति और दूसरी भक्त पर कृपा करने की शक्ति । सब विद्वान स्तुतियोसे सुशोभित करते है। ५० महान दर्शतः या हस्तेन प्रतिघायि [१३४] १८ रा इन्द्रः ध्रुवे सदास सीदति [ ९२५]- - महान् दर्शनीय पत्रको वह हापसे पारण करता है। बलवान इन्द्र स्थिर मभामें बंटता है। ५१ शुचि जातः मही ऋतावृधा मानरा अरोचयत् ३९ अस्मभ्यं महां सहस्रिणं रयिं विश्वतः आ [ ९३६] - शुद्ध हुमा हा अपनी बडी, साप यदानेवाली पवस्व [ १२६]- हमें महान हमारों कारके पन चारों मातामोको प्रकाशित करता है। ओरसे लाकर दे। ५२ धुमत्तमा त्वं जनिमानि अमृतत्वाय [ १३८] अत्यत तेजस्वी तू अपने जन्ममें अमृतरको प्राप्ति के लिए ४० ते युज्यः चार मद य अस्ति. येन वृत्राणि हंसि [ ९२८]- तेरा योग्य और उत्तम उत्साह जो है, जरासे तू पाको मारता है। ५३ बस्य फत्वा यशस्वन्तः [९४७]- इसके पुरुषार्ष ४१ विश्वाः पृतनाः अभिभूतरं इन्द्रं नर सजूः प्रयल से हम यशस्वी होते है। ५४ अयं विश्वाः श्रियःअभि पत्यते,माघाजै उपा- ततनुः [१३०- सब शत्रुके संनिकोंको हावाले इन्द्रको सब लोग मिल करके स्तुति करते है। गमत् [९४८] - यह सब ऐश्वयों से युक्त है, वह हमारे पास अन्नके साप आये। ४२ राजसे जजनुः । ९३० ]- उसका तेज यदाते हैं। ५५ यत् हरी यच्छ से त्वतरीतराने कि [९५०) ४३ प्रात्ये चरे स्थेमान, आमुरि उग्रं मोजस्विनं, • जिस कारण तू अपने दोनों ही घोडे रयमें जोड़ता है, उस तरसं तरस्थितं [ ९३० ]- अपने कार्यले श्रेष्ठ स्थान; कारण तेरी अपेक्षा उत्तम रथी और धीर दूसरा कोई नहीं है। रहनेवाले, पाको मारनेवाले, उग्र और महा रलवान्, धेष्ठ ५६ मन्मना त्या अनुन कि १५०- बलमें सेरे और शीघ्रता से कार्य करनेवाले को स्तुति की जाती है । समान वोई दूसरा नहीं है। ४४ विप्राः अभिस्वर मेघ नेमि नमन्ति ! ९३१ - ५७ सु अध्यान कि आनशे [९५०/- उत्तम पोर शानो महान् स्वरमे दाविनमान मोर व्यापक इन्द्रो नमार पालनेवाला भी कोई दूसरा नहीं हैं । ५८ ज्येष्ठ सहः नमस्सत [ ९५१ ]- बाबुको हराने. ४५ मु-दीतयः अद्रुहः यः तरस्सिनः कर्णे बाले रलको धारण करनेवाले इदको नमस्कार करो। ऋपचभिः संR६१-उराम तेजस्वी और द्रोह न करने ५९ तुरापार रन्द्रः वृधं जघान (९५४] -प्रतासे पाले तुम भी प्रतासे इसके कानोतर पहुंचने वाले स्परके शवको हरानेवाला इन्द्र को मारता है। द्वारा मन्त्रसि उसकी स्तुति करो। ६० शनिः न पल विभेट [९५४ - संगमी पुरया ४६ यत् स्वापनि धे, धृतवताओजलांऊतिभिः समान वल नामक राक्षसरो मारना है। सं[९३२]- जर स्वर स्वामी इन्द्र भला संवर्धन ६१ भृगुः न शन् सास है । ९५४ - भृगु समान रना चाहता है, तब नियमोहरा पालन करनेवाला इन्द्र कोहराता है। मरने सामसे मोर संरक्षगरे सापों से मुक्त होता है। करते है।
(१०२) सामवेदका सुबोध अनुवाद । उत्तराचिका उपमा ८ अर्या न [९२७]- घोडा असे आनन्द देता है, उसी प्रकार ( अद्रिः यत् सुपाय) पत्थर जो सोमका रस अब इस अध्यायने जितनी उपमा है, उनको देखें निकालते हैं, वह तुझे पानाव देता है। १ दिवः चित्रं तन्यतुं न [ ८८९ ]- आकाशमें जिप्त ९ देयः सूर्यः न [९३४ ]- सूर्य देव जैसा तेजस्यी है, प्रकार विजली चमकती है, उसी प्रकार (पपमानः वृहत् उसी प्रकार ( दर्शतः महान् वनः) दर्शनोप महान् पत्र वैश्वानरं ज्योतिः) सोमका महान् और विश्वका नेतृत्व तेजस्वी है । करनेवाला तेज फैलता है। १० सप्तिः न [ ९४२]- जैसे घोश मुबमें जाता है, २ गायः न [ ८८२ ]- गायके समान - गायके दूधके उसी प्रकार ( पुनानः वाचं जनयन् असिष्यत् ) छाना समान (भूर्णपा स्वेपाः अयासः कृष्णा स्यवं अपनतः जानेयाला सोम शब्द करता हुमा कलसेमें जाता है। प्र अमु. ) शीघ्रगामी तथा तेजस्वी सोमरस कालो छालको ११ सिन्धुः वाचः ऊमिन [९४५]-जिस प्रकार दूर करते हुए नीचे के बर्तन में गिरता है। गायका दूप सोमरस नशे शम्य करती हुई पहतो है, उसी प्रकार ( पवमानः में जब मिलाया जाता है, तब सोमका काला रंग दूर होता स्तोमान् प्रावीविपत् ) छाना जानेवाला सोम स्तुतियोंको है और वह सोम नीचे रखे वर्तनमें पड़ता है। प्रेरित करता है। ३ पृष्टेः स्वनः इय [ ८९४ ]- वृष्टिका जैसा शब्द १२ त्यष्टा तक्ष्या रूपा च [९४७]-जिस प्रकार होता है, उसी प्रकार ( पवमानस्य श्रूयते ) सोमका शब्द बढई साधनसि लकडोको सुन्दर बनाता है, उसी प्रकार सुनाई देता है। ( अयं ना मा भुवत् ) यह अग्नि हमें सुन्दर बनाती है। ४ सूर्यः रश्मिभिः उपा.न [ ८९६]- सूर्प अपनी १३ दिवः न [९५३]-धुलोकरी से प्रकाश माता है किरणसि उप.कालके बाद विश्वको जैसे व्याप्त करता है उसी प्रकार (सुतस्य मदः) सोमरससे भानंद मिलता है। वैसे हो ( विचर्षणे! मद्दी रोदसी आ पृण ) हे सबको १४ स्वः न [९५३]- स्वर्गीय आनन्द के समान सोमका देखनेवाले सोम! तूइरा महान् चायापृथिवीको [ अपने तेजसे ] आनन्द है । १५ नव्यं न [ ९५३ ]- नवीन होनेके समान ( जटर ५ विष्टपं रसा इव । ८९७ ]- इस भूलोकको जिस पृणस्व ) अपना पेट भरकर सोमरस पी। प्रकार पानी व्याप्त करता है, उसी प्रकार (हे सोम! १६ मित्रान [९५४ ]- मित्र जैसे सहायता करता धारया विश्वतः परि सर ) हे सोम! तू अपनी रसको है, उसी प्रकार (इन्द्रः वृत्रं जघान) इन्द्रने पत्रको मारकर धारासे चारो ओर व्याप्त हो । सहायता की। ६ अभ्रात् पृष्टिः इव [९१६]- मेघसे जैसे पुष्टि होती १७ यतिः न [९५४ ]- संयमो धीर जैसे शत्रुको है, उसी तरह ( इयं पूर्व्यस्तुतिः अस्य मन्मन: अजनि) मारता है, उसी प्रकार इन्द्रने (गलं विभेद ) बल मह अपूर्व स्तुति इस विद्वान्से हुई है। राक्षसको मारा। पृणा तपन्तं परं सूरै शकुना हर अति १८ भृगुः न [ १५४ }- भा जैसे मनुका नाम करता पतिम { २२३ ]- अपने तेजसे चमकनेवाले दूरके सूर्यको है, उसी तरह इन्द्र (शत्रून् सासह ) का पराभव से पक्षो देखते है, उसी प्रकार में चमकनयाले सोमको करता है। इस प्रकार इस अध्यायमें उपमायें आई है। देखता हूँ।
पश्चम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद (१०३) पञ्चमाध्यायान्तर्गत ऋपि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋग्देवापानं देवता बन्द ८८६ पवमानः सोमा जाती 11 ८८८ " " गायत्री " " ८९० ८९१ " " ९८४ ११८६६ ९८६३५ १२६१०१६ ९।६।१८ ९२६११७ १४१३१ ९४१११ ९।१०३ રાકેશ ९४१५ ९६ " " to ८९४ ॥ " " " . अकृष्टा माषाः अकृष्टा मापाः अष्टा मापाः अमहोपांगिरसः अमहोपरांगिरस: अमहीपुरागिरसः मेष्यातिषिः काश्वः मेम्यातिथिः काया मप्यातिथिः काग्यः मैय्यातिथि: कायः मेध्यातिथिः काम्यः मेध्यातिथिः कावः (२) बृहन्मतिरागिरसः बृहन्मतिरागिरसः पहन्मतिगिरम: बहन्मतिरापिरसः यूहन्मतिगिरसः महन्मतिरागिरम भगक्षणिमनिर्भागको वा भूगावणिजमदग्निगियोमा भगुवारणिमरनिर्गिको वा " " ९३९१ " " ए " ८९९ ९०० ९०१ " " 7 " ९१३९४४ ९३९५ ११३९२६ " ९०० ९०३ " " " " " . ९०५ ९०६ ९।५।३ " " (३) ५।१२।१ मग्नि- जगतो ९०७ ९०८ ९०९ " " " मुतभर आत्रेप: मुतभर मात्रेपः सुतमर आत्रेयः गुरसमरौना गरगमरः शौनकर गरसमरौनक- पिशाहो । ९१२ " " ९१४ " " २१४१५ २०१६ १1८३113 १८० ११८९५ ७९४१ ७९॥ ७९१३ गोतसो रागम योगमोराहगणः गोतमोराहगणः अमिष्टो मंत्रावणिः जसिष्ठो मंत्रापतिः मिठो मंत्रापनि (४) पाणी " " पापामगोपा गारको म्यून मागस्पा परम्पत मामारयः P ९० ११ M (१०४) सामवेदका सुबोध अनुयाद [उत्तरार्चिमा मंघसंख्या ९० ऋग्वेवस्थान २३१०७९९ ऋषि. सप्तर्षयः देवता पवमानः सोमः प्रगाय: ( विषमा बृहती, समा रातो यहती) ६१०७/२० IN " ९२४ गायत्री " सप्तर्षयः उहत्मतिरागिरसः बहन्मतिरांगिरसः बृहन्मतिरागिरसः " 11 २।४० ९४०३ " " विराष्ट्र " " ९२७ ९२८ ९२९ ९३० ७२११ ७२।१ ७॥२॥ ८९१० ८०९७.१२ ८1९७५११ ८1७018 वसिष्ठो मंत्रावगिः वसिष्ठो मैत्रायणि वसिष्ठो मंत्रावरणिः रेभः काश्यपः रेभः काश्यपः रेभ: काश्यप " अतिजगती उपरिष्टायहती प्रगायः (विषमा बृहती, समा सतो यहती) " 1 पुष्हन्मा आगिरस- " ९३४ ८1७०१२ पुषहन्मा आगिरसः " ९३५ पवमानः सोमः गायत्री " ९९१ ९।९।३ सार શહાર असित काश्यपो देवलो वा असित. काश्यपो देवलो.या असित काश्यपो देवलोवा शक्तिर्वासिष्ठः " " " काफुभःप्रगापः (विषमा ककुप, समा सतो यहती) ९३९ ९४० उष्णिक " " ९४२ ९।१०८।४ ९।१०६।१० ४१०६।११ ९।१०६।१२ ९९६५ ९।१६६ ९५९६७ ऊररागिरसः अग्निश्चाक्षुष अग्निश्चाक्षुषः अग्निश्चाक्षुषः प्रतर्दनो दवोदासिः प्रतवनो देवोदासि. प्रतदंनो देवोदासिः त्रिष्टुप " " " " " अग्नि. गायत्री ९९७ प्रयोगो भार्गवः प्रयोगो भार्गव प्रयोगो भार्गवः " " " ८१०२७ ८१०८ ८1१०२।९ 14818 १८४६ १८४१५ ९४२ अन्ष्ट्रा गोतमो राहगः गोतमो राहगण. गोतमो राहगणः " " ९५१ ९५० " सघात्मक सूक्तम् - पायकोऽग्निवार्हस्पत्यो या ग्रहपति- पविष्ठौ सहस. पुत्राग्यतरोधा पावकोऽग्निवर्हिस्पत्यो घा, गृहपति- यविष्ठी सहसः पुत्रान्यतरोधा पादकोरिनहिस्सत्यो वा, गृहपति- यविष्ठी सहस. पुत्रान्यतरो वा ९५४ " पष्ठ मध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद (१०५) अय पष्टोऽध्याय अथ तृतीयमपाटफे द्वितीयोऽर्धः ॥ ३॥ , [१] (१-२३) १ (अकृष्टा मापावयः त्रयः ऋषयः, २ पश्यपो मारीच.; ३, ४, १३ अप्तितः काश्यपी देवलो पा; ५ अवत्सारः काश्यप, ६, १६ जमदग्नि गंवा ७ अणो तहस्यः८ उपचकिराया पुरसुतिः काया १० भरद्वाजो बाहत्य, ११ अगुमिनिमदग्नि दो था; १२ सप्तर्षयः । १ भरद्वानो बार्हस्पत्या, २ कश्यपो मारोपः, ३ गोतमो राहगणा, ४ अप्रिमोम., ५ विश्वामित्रो गायिनः, ६ जमदग्निभोगवा, ७ वसिष्ठो मंगा. याणिः); १४, १५, २३ गोतमो राहूगणः, १७११) उध्वंसथा मागिरसः, १७(२) कृतपशा आगिरस १८ रित मारयः, १९ रेभसून काश्यपी; २० मन्युवासिष्या २१ पसुश्रुत मामः, २२ गमेष मागि- रसः ॥१-६, ११-१३, १६-२० पदमानः सोमः ७, २१ अग्निः ८ मित्रावरुणो; १, १४-१५, २२-२३ इन्द्रः, १० इदानी ॥ १, ७ जगतो; २-६, ८-११, १३, १६ पापत्री; १२ मुहतो, १४, १५, २१ पक्तिः१७ काकुभः प्रणायः (विषमा फकुप, समा सतो बृहती); १८, २२ उरिणय १९,२३ मनुष्टप: २० विष्टुप् ।। ९५५ गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्यविक्रेतोधा इन्दौ भुवनेप्यक्तिः । वर सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा नर उप गिरेम आसते ॥१॥ । ऋ. ९।८६।३९ ) वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान पृथम ता विधायसि । स नः पवस्व वसुमद्धिरण्यघद्वय५ स्याम भुवनेषु जीवसे ॥२॥ (*. ९८६३८) [१] प्रथमः खण्डः। १९५५) हे {इन्दो) मोम 1 (गो-वित् ) गायोंको पासमें रखनेवाला,(पसु-वित ) पनको पासमें रखनेगाता, (हिरण्य-विद ) सोनेको पासमें रखनेवाला (रेतो-धाः) वीर्य पारण करनेवासा (भुवनेषु अर्पितः। भवनों में रहते. पाला ऐसाद (परस्त्र) छनता जाहे । सोम) सोम! तू ( मुगीरः) उत्तमवीर और ( विश्व-वित् ) म शानी ( असि) है है (नरः नेता सोम ते त्या ) उस सेरी (इमे गिरा उपासते) ये प्रदिन स्तोत्रसे उपासना करते हैं॥१॥ [९५६] हे { पवमान पृषभ सोम ) पर होनेवाले बलवर्धक सोप ! (श्यं विश्वतः सुरक्षाः असि ) सब प्रहारसे मनुष्योंका साक्षी है। (ता विधावसि ) उनके पास तू जाता है ( साना यह सू हमारे लिए ( पयस्थ ) एनमा जा, उसको सहायताले ययं) हम (यसुमन हिरण्यम् ) पन और सुवर्णसे पुत्त होकर (भुवनेषु जीयसे स्थाम) सोशोंमें मोदनवाले हो.॥२॥ १४ [ साम, हिन्दी मा.२] (१०६) सामवेदका सुयोध अनुपाद [ उत्तरार्चिकः 8 २ ३ - ९५७ ईशान इमा भुवनानि इससे युजान इन्दो हरितः सुपर्णः । तास्ते क्षरन्तु मधुमघृतं पयस्तव व्रते सौम तिष्ठन्तु कृष्टया ॥३॥ १ (खी) ॥ [घा०४१। ल०२ । २०४] (ऋ. ९८६०३७) ९५८ पबमानस विश्ववित्त ते सर्गा असूक्षत । सूर्यस्येष न रश्मयः ॥१॥ (ऋ. ९।६१७) ९५९ केतु कव दिवस्परि विश्वा रूपाम्यसि । समुद्रः सौम पिन्यसे । २॥( ९६४८) ९६० जज्ञानो वाचमिष्यसि पर्वमान विधर्मणि । न्दं देवो न सूर्यः ॥३॥२ (पा)॥ [धा० १५ । उ०१। स्व०२] (१.९६४९) ९६१ प्र सोमासो अधन्विपुः पवमानास इन्दवः । श्रीगाना अप्सु वृञ्जते ॥१॥ (ऋ. ९।२४।१ ) ९६२ अभि गावो अधन्विपुरापो न प्रयवा यती । पुनाना इन्द्रमाशत ॥ २ ॥ (ऋ. ९।२४।२) ९६३ प्र पवमान धन्वसि सोमेन्द्राय मादनः । नृभिर्यतो वि नीयसे ॥३॥ (क्र.९।२४३) ९६४ इन्दो यदद्रिभिः सुतः पवित्रं परिदीयते । अरमिन्द्रस्य धाग्ने ॥४॥ (ऋ. ९।२४५) [ ९५७ ] है (इन्दो ) सोम! (ईशानः ) सबका स्वामी तू ( हरितः सुपर्ण्य युजाना) हरे रगयो शीघ्र चलनेवाले धोको रयम जोडकर (इमा भुवनानि ) इन सब भुवनोंमें ( ईयसे) जाता है । (ताः ) 2 ( ते तेरे रस (मधुमत् घृतं पयः ) मोठे और चमकनवाले जलोंमें ( क्षरन्तु ) माने जायें। हे (सोम ) सोम ! ( कृष्टया ) या करनेवाले मनुष्य (तव ग्रते तिष्ठन्तु ) तेरे यशफर्ममें सलग्न रहें ॥३॥ [९५८] है ( विश्ववित्) सर्वत सोम ! ( पवमानस्य ते सर्गः) छनकर शुद्ध होनेवाली तेरी धारा (सूर्यस्य रश्मयः इच) सूर्यको किरणों के समान (न प्रासृक्षत ) हरा वक्त नीचे गिर रहो है ॥ १॥ [९५९ ] हे ( सोम ) गोम । ( समुदा ) पानी मिलाया गया न ( केतुं कृण्वन ) गानका प्रसार करते हुए (निश्या रुपा) सय पति पुरत होकर ( दिवः परि अम्पपसि ) अन्तरितके मागसे जाता है और हमें ( पिन्यसे) अनेक प्रशाके पन देता है॥२॥ [९९०] है (पवमान ) शुस होनेवाले सोम ! (देवः सूर्यःन) तेजस्वी सूर्यके समान ( जसाना ) प्रकट होने. पाला न (विधर्मणि ) छलनोसे (क्रन्दन् ) शद करते हुए (याचं प्यसि ) स्तुतिको प्राप्त होता है ॥३॥ [९६१ ] ( पपमानासः इन्दवः सोमासः छाने जानेवाले सोमरस (माघन्धिपुः) मोके बर्तन में गिरते है, ( श्रीणानाः ) ये सोमरस दूर मिलाकर ( अप्सु पूंजते ) पानोम मिलाये जाते हैं ॥१॥ [९६२ ] (गायः इन्दयः]) छान जानेवाले सोमरस (प्रयता यती) नीचे बर्तन में जाते हए ( मापान) पानी समान ( मामे मन्यिपुः ) सनोसे नीचे छाने जाते हैं। (पुनानाः) छने हए ये सोमरस (इन्द्रं आशत) इमको प्राप्त होने हैं. २॥ [९६३ ] हे (परमान सोम) आने जानेवाले सोमवाय माइन) को उत्साह देनेवाला (म धन्यसि ) मनोगे नीचे गिरता है, बारमें (नृभिः पता ) स्विरि द्वारा यिनीयसे तमा स्यानके पास से झापा भाता है [९६५ ] (इन्दो) सोमत (पत् मद्रिभिः सुत ) गर पापरों द्वारा एकर रस मिलने के बार (पपि पारदीयसे | मनोरे पास ले जाया जाना है, तब (इन्द्रस्य धाम्ने अर) प्यो पेटमें जाने योग्य होगा.
पष्ठ अध्याय)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(१०."
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२
१r
९६५ त्वश्सोम
नुमादन पवस्व चर्पणीधृतिः । सस्नियों अनुमायः ॥५॥ (ऋ.९।२४१४)
९६६ पयस्व वृत्रहन्तम उक्थेभिरनुमाया। शुधिः पार्यको ॥६॥ (ऋ १२४१६)
९६७ शुचिः पावक उच्यते सोमः सुतः स मधुमान् । देवावरिश सहा ॥७॥ ३ (है)।
[घा०४११० नास्ति । स्व०८] (९।२४१७)
॥ इति प्रथमः सः ॥
१
९६८ में कवियवीतयेऽव्या बारेभिरष्यत । साहान्विधा अमि स्पृधः ॥१॥ (कृ. ९।२०।१ )
९६९ सहि मा जरिदम्य आचार्ज गोमन्तमिन्वति । पचमानः सहस्रिणम् ॥ २॥ ९।२०१)
९७० परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती । स नः सोम श्रयो विदः॥३॥ { ऋ. ९।२०१३)
९७१ अपर्प वृहद्यशो मघवनयो ध्रुव रयिम् । इपस्तोवम्य आ भर ॥ ४ ।। (ऋ. ९।२०१४ )
९७२ त्वं राजैव सुव्रतो गिरः सोमाविवेशिय । पुनानो बढे अद्भुत १५॥ (5. ९/२०१६)
९७३ स बहिरप्सु दुष्टरो मृज्यमानो गमस्त्योः । सोमवमूपु सीदति
॥६॥ ९।२०१६)
[९६५ ] है ( सोम ) सोय ! (मादनः ) मनुष्योको लानन्द देनेदाला (चर्पणी-धृतिः ) ऋत्विों के द्वारा
पारण किया गया (त्व परख दरानला जा(यः सरितः जो सोम शुद्ध और ( अनुमायः ) प्रशंसनीय है ॥५॥
[९६६ 7 हे सोम ! ( उक्येमिः अनुमाघः स्तोत्रति स्तुति करने योग्य ( अद्भुतः शुचिः पावकः ) अद्भुत
शुरु और पवित्र न (वृषहन्तमः पवस्व माथुका नाश करनेवाला होकर पवित्र हो॥६॥
[९६७ ] (सुनः मधुमान ) निचोडा गया, मोग (शुचि. पारकः ) पविभ, गुर (देवावी.) देयोको तृप्त
करनेवाला और (अय-शंस-हासः) पापो असुरोंका नाशक ऐसा यह सोम (उच्यते )वर्णित होता है ॥ ७ ॥
।यहां पहला खण्ट समाप्त हुमा ।।
[२१ द्वितीयः खण्डः।
[९६८ ] (फयिः ) मानी सौम ( देव-धीतये । देयों के देने के लिए ( मन्या यारेमिः ) भेटके याजको छलनीप्ते
[ अन्यत) माना जाता है । ( सामान ) माधुको हरानेवाला सोम ( विश्वाः स्पृधः अभि) सब दुष्टोंको हराता है ॥१॥
[९६९] (पवमानः ) पवित्र होनेवाला (स हि स्म) यह सोम हो (जरितृभ्यः) स्तुति करनेवालोंको
(गोमन्तं सहारणं वाजं } गायोति युक्त हनारों प्रशारके सम मावति ) देता है ॥२॥
[९७० ] है (सोम ) सोम । । (मती हमारा स्तुति के लिए ( मृज्यसे ) हाना शाता है, (३) वह सू(नः)
हमें (चेतसा ) युटिपूर्वक (विभ्यानि यः विदः) अनेक प्रकार के अन्न दे ॥३॥
[९७१] हे सोम ! (भयपद्या स्तोतभ्यः ) धनवान् स्तोतामक लिए { वृहत् यशः) महान् या धुवं
गये पापो पन (अभ्यर्प) दे और (इपाभर) अनमो भरपूर ॥
१९७२ हे (बड़े ) यह करनयाले ( अनुत सोम ) अद्भुत मोम ! (सुपत पुनानः राजा इव) उत्तम
पर्म करनेवाले पविन हम्पराले रानाके समान (गिरः मा विवेशिय) हमारी स्तुतिको त स्वीकार करता
८ ९७३ (पहिः) यह करनेवाला ( अप्सु दुएरः ) जलमें मिलाया मानेवाला { गमल्यो मृज्यमानः )
हामि साफ रिया जानेवाला (सः सोमः ) वह सोम (घमूपु सीदति ) वर्तनम माकर रहता है।
॥५॥
(१०८) सामयेवफा सुयोध अनुवाद उत्तराचिका ९३२ १२ ३ १३. ७२ ३ ९७४ फ्रीडमखो न म हयुः पवित्र सोम गच्छसि । दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥ ७॥ ४ (को) ॥ [धा०२१ । उ० १ । स्व०९] (ऋ ९।२०१७) ९७५ ययवं नो अन्धसा पुष्टंपुष्टं परि सत्र | विश्वा च सोम सौभगा ॥१॥ ( ऋ९।१५।१ ) ९७६ इन्दो यथा तव स्तवो यथा ते जातमन्धसः । नि बहिपि प्रिये सदा ॥ २ ॥(ऋ ९।१५।२) ९७७ उत नौ गोविदश्ववित्पयस्व सोमान्धता । मभूतमेरिहभिः ॥३॥(ऋ. ९२२५४३) ९७८ यो जिनाति न जीयते इन्ति शत्रुममीत्य । स पवस्व सहस्रजित् ॥ ४॥ ५ (हि) । [धा० ११ । उ० नास्ति । ख०३ (ऋ ९।१५।४) ९७९ यास्ते धारा मधुश्रुतोऽसृग्रमिन्द ऊतये । तामिः पवित्रमासदः ॥ १ ॥ ( ९।६२१७) ९८० सो अपेंन्द्राय पीतये तिरो वाराण्यव्यया । सीदभूतस्य योनिमा ॥२॥ (ऋ ९६२।८ ) ९८१ त्व सोम परि स्रव रवादिष्टौ अशिरोम्पा । परियोविद्धृतं पयः॥ ३॥ ६ (हि) ॥ [धा० ११ । उ० नास्ति । स्व०३] (र. ९।६२।९ ) ॥ इति द्वितीय. खण्ड ॥२॥ [९७४ ] हे (सोम ) सोम ! (फीदु ) खेल करनेवाला (मख. न ) यज्ञके समान (मंह-युः ) यान घेर्नेको इच्छा करनेवाला तू (स्तोत्रे ) स्तुति करनेवालेको (सुवीर्य दधत् ! उत्तम योरता देकर ( पवित्रं गच्छसि ) छलनी पर जाता है ॥७॥ ९७५] हे (सोम ) सोन ! (ना) हमारे लिए (पुष्टं पुएं यवं यवं ) अत्यधिक पौष्टिक रसको ( अन्धसा परिम्नव ) अन्नको धारा बहाता रह (च) और ( विश्वा सीमगा) सब ऐश्वर्य दे ॥१॥ [९७६ ] है (इन्दो) सोम ! (ते अन्यस स्तर) तेरे मन के स्तोत्र ( तय यथा जातं ) तेरे लिए जैसे बनाये गए है, उसी प्रेमके साप तू ( प्रिये यहिपि निषद ) प्रिय आसन पर पं०॥ २॥ [९७७] (उत सोम) सौर हे सोम ! (न ) हमें तू ( मस्तमेभिः अहमि ) यहुत जल्दी ही (गो-वित् । गाय रेनेवाला ( अभ्यविस् ) घोडे वेनेवाला, ( बन्यसा पवस्व ) और अन देवाला हो ॥ ३ ॥ [९७८ 1 हे (सहनशित्) हजारों शभोंको जोतनेवाले सोम! (य जिनात ) जो तू ओंको जीतता है और (राअभीत्य क्षन्ति ) शत्रुपर माफमण करके उन्हें मारता है, पर (न जीयते ) स्पय शत्रसे कमी जोता नहीं जाता (स परस्व) ऐसा वह पारो छनता जा ||४|| [९७१ ] है (इन्दो ) सोम! (ते ) तेरी ( मधुश्चुतः या' घाराः) मोठी रसको यो धारायें है, ये (ऊतये अनन् । सरक्षणके लिए है, (तामिः पविध थासद ) उन पारादि साय तू छलनी पर चा ॥१॥ [९८०] है सोम ! (सः) यह त ( अध्यया पाराणि ) भेर बालोंको धनी छलनीसे (तिरः) छनसा है, (मातस्य योनि मासीदन ) यज्ञके स्यानपर बैठकर (इन्द्राय पीतये अर्थ ) हन्ना पीने के लिए व्रतम्मार हो, छन ॥२॥ [९८१ ] हे (सोम ) सोम । ( स्वादिष्ठ समाविष्ट है, और ( परियो-धित् ) पन बेनेदाला है, इसलिए (अंगिरोभ्यः) अगिराषियों के लिए (घृतं पय पग्लिय) तेजस्वी दूध दे ॥३॥ - ॥ यहां दूसरा सण्ड समाप्त हुभा ॥
पष्ट अध्याय
सामवेदका सुबोध भनुपांद
(१०)
३१२१२
१३७२३२७
२.
३७२७१३
[३]
९८२ तब श्रियो वर्धम्येव विद्युतोऽनेथिकित्र उपसामिवातयः ।
यदोषधीरभिसृष्टी धनानि च परि स्वयं चिनुपे अन्नमासनि ॥ १ ॥ (ऋ. १९१५)
९८३ वातोपजूत इपिता वशार अनु वपु यदना वेविषद्वितिष्ठसे
आ ते यतन्ते रथ्यो३यथा पृथक् शाश्स्यने अजरस्य धक्षतः ॥ २ ॥ (ऋ. १०९१७)
९८४ मेधाकार विदयस्य प्रसाधनमग्नि होतारं परिभूतर मतिम् ।
त्यामर्मस्य हविषा समानमित्वा महो वृणते नान्यं त्वत् ।। ३ ।। ७ (यु)
[घा० १९ । उ०३।२०५] (ऋ. १०९१८)
९८५ पुरूरुणा चियस्त्ययो नूनं वां वरुण । मित्र वसि वासुमतिम् ।। १ ।। (ऋ ५/७०१)
९८६ ता वा सम्पगढुवाणेपम
पेपमश्याम धाम च । वयं वां मित्र। स्याम ॥२॥ (ऋ. १७०११ )
3
३१
[३] तृतीयः पण्ड।।
[ ९८२] हे आने ! ( यत् ) जब रा ( ओपधी वनानि च ) औषधी और घन ( अभिदृष्टः ) जलाने के लिए
लेता है, ( स्वयं भासनि ) तब स्वयं अपने मुंहमें ( अन्नं परिविनुषे । स्थावर और जगमरूपी नगल्के अमको गसता है,
उस समप (तय धियः) तेरी किरण ( घर्यस्य विद्युतः इव । वर्षाकालमें बिजली के समान ( उपसां ऊतयः इय)
अपवा उप.फालके प्रकार के समान (चिकित्रे ) दीखने लगती ह॥१॥
६.९४३] है { अग्ने ) आने ! ( यत् वातोपजूतः ) जब व चामुके द्वारा कंपारा जाता है। तम ( वशान मनु ,
प्रिय वनस्पतियोंमें (त्यु इपितः ) शीघ्र प्रेरित होकर { मन्ना येषिपद ) यपने अन्नको धेरता है, और (वितिष्ठसे।
वहीं पर रहता है, तब ( अजरस्य धक्षतः ते ) घुापारहित तरुणके समान भस्म करनेको इच्छाबाले तेरे ( शर्धासि ।
तेम ( रथ्यः यया) रपपर घटे हुए पोरके समान ( पृथक् आयतन्ते ) पृथक पृथक् बढते हुए दिखाई देते हैं॥२॥
[९४४] (मेधाकारं ) वृद्धिको बढानेवाले ( विदयस्य प्रसाधनं ) यमके सायन ( होतारं ) देषोंको बुलाकर
लानेवाले । परि-भू-तरं ) शके पराभव करनेवाले मति ) युनिके प्रेरक ( अग्निं ) मरितको हम प्रार्थना करते है।
मग्ने ! (त्वां इत् ) तुझे हो र मर्मस्य हविः) पोडेसे हरिप्यानरो खानेके लिए ( त्यां इन महः ) और सुने हो
बहुतसी हघि लाने के लिए (समानं वृणते ) एकत्र होकर प्रार्थना करते है, युलाते यत् अन्य न) से गिवाय
और किमी देवता को नहीं युलाते ॥ ३॥
[९८५] है मित्र और वरुणो ! ( वां ) तुम दोनोंक ( पुरुरुपा अधः ) बहुतसे संलगके साधन ( नूनं अस्ति)
निश्चपसे हैं, यह (दि) प्रसिद्ध हो है, चिस् ) और ( यरुण मित्र | हे मित्र और क्षण! हमें (यां सुमति पंसि)
सुम्हारी अनुएल और उत्तम बुद्धि प्राप्त हो ॥ १॥
९८६] म स्तोता ( अ-हाणा ) दोहन करनेवाले ( ता यां) तुम दोनोको ( सम्यक ) अच्छी तरह स्तुति
करते हैं। (घ) हम (पां मित्रा स्याम ) तम्हारे मित्र हो और (वं ) मागे (व धाम) और स्थान (भायाम)
प्राप्त॥२॥
(१९०) सामवेद्का सुवोध अनुवाद उत्तचिका 31 ९८७ पातं नौ मित्रा पायुमिरुत आयेथासुत्रात्रा । मायाम दस्यूं तमिः ॥ ३॥ ८ (य)॥ [धा० १२ । उ० नास्ति । २०१] (ऋ. ११७॥३) ९८८ उचिठनोजसा सह पीत्वा शिप्रै अवेपयः । सोममिन्द्र चम सुतम् ।। १ ।। (ऋ. ८1७६।१०) ९८९ अनु त्वा रोदसी उमै स्पर्धमान मदेताम् । इन्द्र यहस्युहाभवः ॥२॥(ऋ. ८।७६।११) ९९० चाचमष्टापदीमई नवस्रक्तिमृतावृधम् । इन्द्रात्परितनं ममे ॥३॥ ९ (ही)॥ [घा० ११ | 3. नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ. १७६।१२) ९९१ इन्द्राग्नी युवामिममि स्तोमा अनूषत । पिवतं शम्भुवा सुतम् ॥ १॥ (ऋ. ६६०७ ) ९९२ या वासन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा । इन्द्राग्नौ ताभिरा गतम् ।।२।। (ऋ. ६/६०।८) ९९३ ताभिरा गच्छत नसदसवन रसुतम् । इन्द्राणी सोमपीतये ॥३॥ १०४ा)॥ [धा० ११ । उ० नास्ति । १०२] (ऋ. ६६०१९) ॥ इति तृतोपः खण्डः ॥ ३॥ [0] ९९४ अर्षा सौम घुमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत् । सौदन्योनौ वनप्वा ॥ १ ॥ (ऋ. ९।६६।१९ ) [९८७ ] है (मित्रा ) मित्र और वरुणो | तुम ( नः) हमारी ( पायुमिः पातं ) सरक्षणके सापोंसे रक्षा करो, ( उत ) और ( सुभाना मायेयां ) उत्तम संरक्षण करनेवाले तुम हमारा पालन करो, हम भी ( तनूभिः ) अपने शारीरिक सामसि (दस्यून साधाम ) आषा पराभव करें ॥ ३॥ [९८८] है (इन्द्र) इन्द्र! तू (चमू सुतं सोमं पीत्वा । बर्तन में रखे हुए सोमरसको पीकर ( मोजसा सह उतिष्ठन् ) मल लगार उठकर ( शिप्रे भवेषयः ) अपनी डोको हिला ॥१॥ [९८२] है । स्पर्धमान इन्द्र स्पा करनेवाले ! (त्या अनु ) तेरे अनुकूल (उभे रोदसी)ोनों ही धुलोक और पृषीलोक ( मदेतां ) मानन्दित होते है ( यत् । जब सू ( दस्युहा भयः ) नाश करनेवाला होता है ॥२॥ १९९०] (अष्टापी) मा परणको (नय-घत्ति ) नई पसनासे युक्त (माता-धं) सत्यको भानेवाली (तन्वं याचे )ोटी ही स्तुति (अहं परिममे ) में करता हूँ ॥ ३ ॥ [९९१] है (इन्द्राग्नी ) इन्द्र और भन्ने ! (युर्ग) तुग रोनोंको (मे स्तोमाः अभ्यनूपत ) में स्तुति करनेवाले स्तुति करते है.हे (शं-भुया ) सुख देनेवाले इन्द्र और अग्नि! सुतं पियतं ) सोमरसको पिभो ॥१॥ ९९२] (मरा इन्द्राग्नी) हे मेता इन्द्र और आने ! (यां) तुम दोनोंके (पुरु-स्पृहः ) बहुतों द्वारा मांसा कानैरे योग्य (दाशुषे) पान देनेवालेशी सहायतारे लिए (याः नियुतः गन्ति ) जो पोटिया (तामिः आगतं) उनी महापतासे यहां आनी ॥२॥ [९९३] (नरान्दानी ) मेताइल और मग्ने । (दं सुतं सवनं उप ) इस शुट दिए गए सोमरसके पाम (सोम-पीनपे) सोम पाने के लिए (ताभिः आगउ) उन घोडियोरे साप मानो ॥३॥ ॥ यहां तीसरा सण्ड समास हुआ। [४] चतुर्थः एण्डः। [१९] (सोम) हे सोम! (घुमत्तमः) तेमालो (यनेषु योनी मासीदन् ) सामोरे पात्रमें रहकर (मोगानि भमि)ोग इसमें (पेययत् भ) र करते हुए जा ॥१॥ .
पष्ठ अध्याय] सामवेदका मुगेध अनुवाद 3 .. ११२ . १ ३स ३२3. ३२ ९९५ अप्सा इन्द्राय वायव वरुणाय मरुदया। सोमा अर्पन्त विष्णवे ॥ २॥ (8. ९।६५।२०) ९९६ हर्ष तोकाय नौ दघदसम्यर सोम विश्वतः । आ पवस्त्र सहस्रिणम् ॥३॥११ (ला)। [धा०१४उ० नास्ति । स्व.२] (१९१६५।२१) ९९७ सोम उ प्वाणः सौतभिराधि प्युमिरवीनाम् । अश्वयेव हरितो याति भारया मन्द्रया याति धारया ॥१॥(२१.७१८) ९९८ अन्य गोमान् गोमिरक्षाः सोमो दुग्धामिरक्षाः । समुद्र न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोश्ते ॥२॥ १२ (क)॥ [ध धा० १५ । उ०२ । स्व०१] (अ. ९।१०७९) ९९९ यत्सोम चित्रमध्ये दिव्यं पार्थिवं वसु । तत्रः पुनान आ भर ॥१॥ ( ९।१९०१) १००० पा पुनान आयूरपि स्तनयमधि बहिपि । हारेर सन्योनिमासदः ॥ २ ॥ १. ९॥१९॥३) १००१ युवदि स्था स्वापती इन्द्रश्च सोम गोपती । ईशाना पिप्यतं धियः ।। ३ ।। १३ (पु।। [धा० १५ । उ०१। स्व०५] (ऋ९११९) ॥ इति चतुर्य खण्ड ॥ ४॥ [१९५] (अप्सा) पानोरे साथ मिले हुए (सोमाः) सोमरस (इन्द्राय वायवे) इन्द्र, वाय (परुणाय मरुद्यः ) वरण, मत् (विष्णये अर्पन्तु ) और विष्णुके लिए कलसमें मावें ॥ २ ॥ [९९६Jहे (सोम) सोम ! (तोकाय) हमारे पुत्रोंने लिए (पं दधद ) वन दे, (सहनिण) हजार प्रकारके पन (विश्वतः अस्मभ्यं आपवस्व) चारों ओरसे हमारे लिए लाकर दे ॥३॥ ८९९७१ (सोभिः) सोमरस तम्पार करनेवाले स्विजोंके द्वारा (स्मान सोम.) निचोरा गया सोमरस ( अधीनां स्तुभिः) भेंडके बालोंको मनी छलनीसे ( अघि याति)घेगसे घाना जाता है, यह रम (ड) निश्चयसे ( अश्वया इथ) पोडोको समान (हरिता धारया ) हरे रगको पारासे (मन्द्रया धारया) आनन्दकारक पारासे (पाति) पलमें गिरता है ॥१॥ [१९८] (गोमान् सोमः ) गार्योसे युक्त सोम ( अनूपे गोभिः अक्षा. ) कलसेमें गायरे दूधके साथ टपकता है, (सोमः दुग्धाभिः अक्षा) सोम दूषके साम टपकता है, ( समुदेन) जिस प्रकार समुद्र में नदियां पिरतों है बसो प्रकार (संचरणानि मामन ) सोमरसपी अन कलरोमें गिरता है, (मन्दी मदाय तोशते) आनन्ददायक सोम मानव प्राप्तिके लिए फूटा जाता है। २॥ [९९९] | सोम ) मोम | ( यत् ) जो (चित्र उपथ्यं दिव्य ) विलक्षण, प्राप्तनीय और विश्व (पाधि पछ) ऐसा पृथ्दोके ऊपर धन है (तत्) वह घन (पुनान न आभर) शुद्ध होनेवाला दू हमें मरपूर ॥१॥ ८१०००(आयूपि पुनाना ) याजकोंके आयुओंको पवित्र करनेवाला (वृपा स्तनयन ) यससे राम करता हमा हे गोम (माधि याषि) प्रामन पर (हरिः सन् ) हरे रगका होता हुआ न ( योनि मासदः) अपने स्थान परमंठ॥२॥ 1 १०.१] (सोम चान्द्र) हे सोम और इन्द्र! (युध हि स्व पती स्थ ) तुम दोनों निरामय सबके स्थामी हो, (गोपती ईशाना ) गोपालरू और ऐश्वयोंकि स्वामी ऐसे तुम (घिय पिप्यत) हमारो वृद्धियोंको पुष्ट करो। ॥ यहाँ चौथा सण्ड समाप्त हुमा ।
(११२) सामवेदका सुवोध अनुयार [उत्तरानिकः [५] २ १२ ३१२ ३१२ " ३ १३ १२ १ २३१२ २3 कर , २२ 31१३3 ३ २३ २ ३१२ १००२ इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः । तमिन्महत्स्वाजिपूतिम हवामहे स वाजेपु प्र नोऽविषत् ॥१॥ ( १८११) १००३ असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः । असि दप्रस्य चिद्धो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु ॥२॥ ( १॥८॥२ ) १००४ यदुदीरत आजयोः धृष्णवे धीयते धनम् । युझ्या मदच्युता हरी कहनः कर वसौ दधोऽस्मा५ इन्द्र वसौ दधः ॥३॥१४ (सु)। [घा० २६ । उ०२ । २०५] ( ऋ ११८१३) १००५ स्वादोरित्था विपूवतो मधोः पिबन्ति गीर्यः । या इन्द्रेण सयावरीष्णा मदन्ति शोभया वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥ १॥ (ऋ. १।८४११०) १००६ ता अस्य पृशनायुवः सोम श्रीणन्ति प्रश्नयः । प्रिया इन्द्रस्य धेनवो व हिन्वन्ति सायक वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥२॥( १८४१) [५] पञ्चमः सण्ड।। ८.१००२(पुत्र-हा इन्द्रः) बाशुनाशक इन्द्र ( मदाय शवसे) आनन्द तथा पलकी प्राप्तिके लिए (नृभिः घावृधे ) याजकों द्वारा हो और अधिक महान् किया गया है, (तं इत् ) उसके पाससेही ( महत्सु भाजिपु) महान् सप्रामोंमें और (अमें) छोने युद्धों में (अति हवामहे ) हम तरक्षण मागते हैं, (स. घाजेपु) वह युद्ध में (नः प्राविषम् ) हमारा परक्षण करे ॥१॥ [ १००३ ] है (वीर) वीर इन्द्र ! (सैन्य असिः) तू सैनिक है, इसलिए ( भूरिः पादादिः असि ) शत्रका बहतसा धन हरण करनेवाला है, (दभ्रस्य बित् घृध)छोर्टाको महान् करनेवाला है । (सुन्वते यजमानाय शिक्षति) सोमयाग करनेवाले यजमानोंको तू धन देता है, क्योंकि (ते भूरि घसु) तेरे पास बहुतसा धन है ॥२॥ [१००४ ] (यत् भाजयः उदीरते) जब युद्ध उत्पन्न होते हैं तब (घृष्णवे धना धीयते) विजयी वीरको पर मिलता है, हे इन्द्र ! युद्ध के समय (मदच्युता हरी युंश्व) मर चुमानेयाले पोडे रथमें मोड। (फ इनः ) किसको माना है और (फ यसौ दधः) रिसको धनमें स्थापित करना है यह निश्चित कर । है (इन्द्र) इन्द्र! (अस्मान चमी दधः) हमें धनों में स्थापित कर ॥ ३ ॥ [१००५] (स्वादो.) मोरे (इस्था विपूवत मधोः) और इस प्रकार सय पतमें प्यापनेवाले मोठे सोमरसको (गायः पियन्ति ) सफेद रगकी गायें पोती है (याः इन्द्रेण शोभयाः) जो इन्द्र के साय रहकर मुशोभित होती है। (घृष्णाः सयावरी: मदन्ति) पलशाली इन्द्र के साथ जानेवाली गायें आनन्दित दीखती है ऐसौ( यस्त्री स्वराज्य मनु दूप देकर निवास करनेवाली गायें अपने राज्यमें रहती है ॥ १ ॥ C१००६] (ता अम्य ) वे इस इन्द्र के ( शनायुवः पृश्नयः) स्पर्शको इशा गरनेवाली गामें (सोम थीणन्ति ) अपना तूप सोमरप्तमें मिलाती है। इन्द्रस्य प्रिया धेनवः ) इनको प्रिय गाय ( सायफ यचं हिन्यन्ति) पाशुनागर पयको प्रेरणा देती हैं। (घस्सीः स्वराज्यं अनु ) अपना दूध देकर अपने राज्यमें रहती है॥२॥ ) पाठ अध्याय सामवेदफा सुयोध गनुपाद ३ ३१७ ३३२ १००७ ला अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः। बतायस्प सथिरे पुरूणि पूर्वचित्त वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥३॥१५ (4)॥ [धा० १२ । उ० नास्ति । स ( *. ११८४१२) 3 १ १२ ॥ इति पञ्चमः खण्डः ॥ ५॥ .3 ३ . [६] १००८ असापर शुर्मदापाप्सु दक्षो गिरिधार । पेनो न योनिमासदत् ।। १ ॥ १.९।६२।४ ) १००९ शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धौत नृभिः सुतम् । स्वदन्ति गावः पयोभिः ॥ २ ॥ (* ९।६।२) १०१० आदीमश्च न हेतारमशूशुभन्नमृताप 1 मधो रस सधमादै ॥ ३ ॥ १६ (चु) ॥ [धा० १२ । उ०१६ ख०५] (*. १/६२।६) १०११ अमि थुन्नं गृहप पश्पते दिदीहि देव देवयुम् । वि को मध्यम गुन ॥१॥ (ऋ.९१०८९) २१३१२ 31२ [१००७ ] ( प्रचेतसः ताः) विशेष पुलिवाली ये गायें { अस्य सहः । इस इनके साहसको (नमसा सगर्यन्ति । अपने दूसरुपी अरसे पूजतो है, (पूर्व-चिचये) पूर्वके कार्मोको समझाने के लिए ( अक्ष्य पुरुणि प्रतानि । इस इन्द्र के पहले के बहनसे कामोंका ( सश्चिरे ) प्यान दिलाती है, (घस्वी स्वराज्यं अनु ) दूध देकर अपने सम्पमें इस इन्द्र के अनुकूल होकर रहती है ॥३॥ । यहां पांचवां मण्ड समाप्त हुआ । [६] पाठः खण्डः। E१००८] (गिरिष्ठाः अंशुः) पर्वत पर उगनेवाले सोमका ( मवाय असायि) आनन्दके लिए रस निकाला है। (असु दक्षः ) यादमें पानी में भी मिलाया है, उसके बाद ( दयेमान बाज यदी के समान ( योनि आसदत् । यह अपने स्थान पर मैटता है ॥१॥ [ १००९] ( देव-यातं शुभ्र अग्धः ) देवोको देने के लिए व भोर मुन्दर भर अात् । नृभिः सुते ) हरियो द्वारा तैयार किए गए ( सासु धोतं) पानी मिलाये गए सोमरसको (गावः ) मा (पयोभिः स्वदन्ति ) अपमा प मिलाकर स्वादिष्ट बनाती है ॥२॥ [१००(मात् ) बादमें ( हेतारं रे मोर रसं ) स्फूति देने वाले इस सोमरसको ( सघमा अमृताय भशशुमन ) या अमरत्व प्राप्त करने के लिए ऋरियन (अयन) थोडेके समान सुशोभित करते है ॥३॥ [१०११] (पस्पते देव । हे पत्र के स्वामी सोमदेव ! (देययु शुम्नं इत् यशः देश निराको इच्छा करते है. ऐसे माफी और महान मन्त्र ( अभि दिदीहि ) हमें ३, मध्यम कोशं पियुव) महदो बर्तन में जाकर रह ॥१॥ १५ (सामहिन्दी मा. २]
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराचिंका
३.३३३
.
१२
३१
1312
३१.१२
७.9
२
१०१२ आ च्यस्व सुदक्ष चम्बोः सुतो विशां वहिन विश्पतिः ।
वृष्टिं दिवः पवस्व रोतिमपी जिन्यन् विष्टय धियः
॥२॥ १७ (डा)॥
[ धा० १८ । उ०३ । २०२ (ऋ १।१०८।१०)
१०१३ प्राणा शिशुमहीना हिन्वन्नृतस्य दीधितिम् ।
विश्वा परि प्रिया भुवध द्विता
॥१॥ (ऋ ९।१०२।१)
१०१४ उप त्रितस्य पाप्योरमक्त यद्गुहा पदम् । यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम् ॥ २ ॥
(ऋ ९।०२।२)
१०१५ त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्ठेष्वैस्यद्रयिम् ।
मिमीते
अस्य योजना वि सुकता
॥ ३ ॥ १८ (री)।
[धा० ८ 1 उ० नास्ति । स्व० ४ ] ( ९।१०।३)
१०१६ पवस्व वाजसातये पवित्र धारया सुतः । इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तरः ॥१॥
(R. ९३१००१६)
१०१७ वारिदन्ति धीतयो हार पविग्ने अद्रुहः । वत्सं जात न मातरः पवमान विधर्मणि ॥२॥
(ऋ. ११००७)
[१०१२ ] है (सु-दक्ष ) उत्तम मसशाली सोम ! (चम्योः सुतः) कलसेमें रखा हुआ तू ( यह्नि न) सब
प्रनामोंका पालफ या नेता जैसे राजा होता है, उसी प्रकार (निशां विश्पतिः) तू प्रजाओंका पालक होकर ( ा
यच्यस्य ) कलरोमें मा, ( गविष्टये ) गाय पानेको इच्छावाले यजमानको ( धिपः जिन्वन् ) युखियोंको प्रेरित करते हुए
(दिवः सपः पृष्टिं रीति ) चुलोकसे जैसे पानी गिरता है, उसी प्रकार ( पवस्व ) नोचेके बर्तन में पूछनता जा ॥ २ ॥
[१०१३] (प्राणाः ) यज्ञका प्राण ( महीनां शिशु ) अलोंका पुत्र तोम ( कृतस्य दीधिति हिग्यन ) पराके
प्रकाशक अपने रसको प्रेरित करते हुए (विश्या प्रिया परिभुवत् ) सर्व प्रिय हविको अपेक्षा भी अधिक महत्वका होता है,
मोर (अध द्विता ) पाप लोक और पृथ्योलोक दोनोके मोचमें रहता है ॥ १॥
१०१४ (त्रितस्य गुहा ) त्रित नामके ऋषिको गहामें ( पाप्योः पदं ) दो पटोंके योयके स्यानमें ( यत्
उप अभक्त) जव उन सोमोको प्राप्त किया, (अध । सब ( यज्ञस्य सप्त धामभिः ) पसके सात छन्दोंसे (प्रिय
अभिप्रिय सोमको ऋत्विज स्तुति करने लगे ॥२॥
[१०१५] हे सोम! ( धारया ) अपने रसको पारासे (रितस्य त्रीणि ) त्रितके सोनों सदनोंमें (पृष्ठेपु रवि
ऐरयत् ) सामगानके शुरु होनेपर पन देनेवाले इनको प्रेरित कर, क्योंकि (सु-ऋतुः) उत्तम यश करनेवाला स्तोता
( अस्य योजना ) इसके स्तोत्रोंका हो ( थिमिमीते ) उच्चारण करता है ॥ ३ ॥
[१०१६] हे (सोम ) सोय ) ( सुत.) रस तैम्पार मरने के बाद तू (इन्द्राय विष्णये देयेभ्यः) हन्न
विष्णु और सय देखि लिए (मधुमत्तर ) अत्यन्त मोठा होकर ( याज-सातये ] अमको प्राप्तिके लिए पिपिने
धारया पयस्य छनोमस पारासे टपक ॥ १॥
[१०१७] है ( पयमान } शुर होनेशले सोम 1 (विधर्मणि ) यनमें (य-द्रुहः पीतयः ) मोहन परनेपाली
अलिया (हरिहरे रंगवाले (त्या पवित्रे रिहन्ति ) तुम छलनीम उसी प्रकार दमाती है जिस प्रकार (जात यरसं
मातरम ) नये उत्पन्न हर वको पाएँ चाटती है ॥२॥
पष्ट अध्याय] सामवेदका सुवोध अनुवाद १ ३३ २३ २ ३३३१२ १२ २ " स २ २३.. 13.13 २ १.१८ यां च महियत पथियों चाति जत्रिपे । प्रति द्रापिममुञ्चथा। पवमान महित्वना ॥३॥ १९ (ता)॥ [ धा० २४ । उ० १ १ स्व०२ ] ( . ९।१००१९) १०१९ इन्दुर्घाजी पपवे गोन्योषा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय । रक्षो बाधते पर्यराति परिवस्कृण्वन्यजनस्य राजा (%. ९/१७११.) १०२० अध धारया मध्या पृचानस्तिरो रोम पवते अदिदुग्धः । इन्दुरिन्द्रस्य संख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरी माय ।। २ ।। (ऋ. ९९७१११) १०२१ अभि अवानि पनवे पुनोनो देवो देवान्स्पेन रसेन पृञ्चन् । इन्दुर्धर्मावृतुपा यसानो दश क्षिपो अव्यत सानो अव्ये ॥ ३ ॥ २० (पी)॥ [धा० २० । उ०१। २०४] (ऋ. १९७१२) ॥ इति षष्ठः सण्डा ॥६॥ [७] १०२२ आ वे अग्न इधीमहि घुमन्तं देवानाम् । पद्ध स्था ते पनीयसी समिहोदयति धवीप स्तोतृभ्य आ भर ॥ १ ॥ १. १६१४ ) ८१०१८] (महीनत परुप महान् मत करनेवाले सोम(त्वं ) तू (धां च पृथिवीं च) पुलोक और पृष्पोको ( अति जझिपे ) उतम रीतिसे पारण करता है, है ( पयमान ) गुब होनेवाले सोग ( महित्वना द्वापि) अपने महत्वकै पोग्य स्वधको (प्रति अमुचथा) शारण करता है ॥ ३ ॥ [१०१९] ( याजी ) बलवान् ( गोग्योधा ) रस जिससे बहता है, ऐसा (इन्दुः सोमः ) सोम (इन्द्रे सहः इन्सन ) इन्द्रमें साहस उत्पन्न करके ( मदाय पकने } मानव बढाने के लिए जाना जाता है, (मनस्य राजा ) पलका राजा (परिधः कृण्वन् । स्तोताओंको धन देता है, (रशः हन्ति ) राक्षसोंका नाश करता है, और (य-राति परि याधते) शत्रुओंको कष्ट देता है." [ १०२० ] (मघ) उसके बार( अदिदुग्धः) परपरसे रस निकाला गया सौम (मस्या पारया पृचान ) मोठी पारासे देवोंको तृप्त करता हुआ { रोम तिरः पयते) भेडकै चासोको छलनीसे छाना जाता है। इन्द्रस्य सख्यं जुपाणः) इन्द्र के पास मित्रताको इच्छा करते हुए देयः मत्सर इन्दु मानेवाला मानायक सोम (देवस्य महायपरते) दन्द्रको उरसाहको पाने के लिए जाना जाता है ॥२॥ १०२१] (धर्माणि प्रतानि ! पार्मिक पतोंको (ऋतुधा यसानः ) ऋतुनोकि मनुकूल करते हए (पुनानः बन्दुः ) ना जानेवाला सोम ( अभि पवते ) में जाना जाता है, ( देवः ) सेनामी सोम (स्पेन रसेन देवान् चन ) अपने रामे देर्योको सन्तोष देता हुमा, (दशक्षिपः ) बम मंगुलियोंके द्वारा (सानो भव्ये मध्यत ) स्थानमें ये गए पालोको ललनीमें पहुंचाया जाता है ।।३॥ ॥ यदा उठा खण्ड समाप्त हुआ ॥ [७] सप्तमः खण्डः। [१०२२ ] है { भने ) मग्ने ! (थुमन्तं बजरं ) नेजस्को और अारहित ऐसे { तुमे हम (मामा) अषिक प्रदीप्त करते हैं, ( यत् ६ ते स्या पनीयती समिद ) जब तेरी यह प्रशमनीय समिया (पयि दीदयति). कमें प्रभागने लगती है, तब है पाने । (स्तोतम्या पं नामर) स्तुति करनेगलोंगो भन्न मयूरो॥१॥ .
सामवेदका सुयोध अनुवाद । उत्तरार्चिका १३ २३ - ३ १२ १०२३ आ ते अन्न ऋचा हाव। शुक्रस्य ज्योतिषस्पते । सुश्चन्द्र दस्म विश्पते हव्यवाद तुभ्य हुयत इपर स्तोत्भ्य आ भर ॥२॥ (ऋ. १६५) १०२४ ओभे सुश्चन्द्र विश्पते देवी श्रीणीप आसनि उतो न उत्युपूर्ण उक्थेषु शक्सस्पत इप ५ स्त्रोतभ्य आ भर ॥ ३ ॥२१(रा)॥ [पा०२८ । उ० नास्ति । स्व०२] (ऋ. १६९) १०२५ इन्द्राय साम गायत विप्राय पृहत बृहद । बझकते विपचित पनस्पधे ॥ १ ॥ (२.८९०१) १०२६ त्वमिन्द्राभिमसि त्वर सूर्यमरोचयः । विश्वकर्मा विश्वदेवो महार असि ॥२॥ (ऋ. १९८२) १०२७ विभ्राजं ज्योतिपा स्वरगन्छो रोचन दिवः। देवास्त इन्द्र संख्याय येमिरे । ॥३॥ २२ (व)॥ [ धा० ११ । उ० नास्ति । स्य. १ ] (*. १९८०३) १०२८ असायि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि । आ त्वा पृणक्त्विन्द्रिय र रजः सूयों न रश्मिभिः ॥१॥ (ऋ. १८४) [१०२३] (सुश्चन्द्र हे श्रेष्ठ मानन्द देनेवाले ! (दस्म शत्रुनाशक (विश्पते ) प्रजापालक और (हव्यवाद) हयि पहुँचानेवाले (ज्योतिषपस्ते मग्ने । प्रकाशमान् अग्ने ! (शुक्रस्य ते ) प्रदीप्त हुए तेरे सादर (ऋचा इविः मा इयते ) मंत्र बोलकर हदि दी जाती है, ( स्तोतृभ्यः इपं आमर) स्तुति करनेवालोंको भरपूर अन्न दे ॥ २ ॥ [ १०२३ ] हे (शवसस्पते, विश्पते सुश्चन्द्र ) बलके स्वामी, प्रगापालक भौर अति तेगस्वो अग्ने ! ( उभे दर्षी ) दोनों ही भर्तन (सासनि श्रीणीपे ) तेरे मुसके पास पहुंचाये जाते है, ( उत उ) और ( उक्थेषु ना उत्पुपूर्याः) स्तुति करनेके गद हमें तू पूर्ण करता है, ( स्तोगृभ्यः इषं आभर ) स्तुति करनेवालोंको अर भरपूर वे ॥३॥ [१०२५] हे उद्गातामो ! (विप्राय यहते) जानो महान् ( ब्रह्मरते विपश्चिते ) शान फलानेवाले विद्वान (पनस्यये इन्द्राय ) और प्रशंसाके योग्य पदके लिए (पृहत् साम गायत ) बहत नामके सामका गान करो॥१॥ [१०२६] है ( इन्द्र पन्त ! (त्वं अभिभूः अलि ) तू माधुओंको हरानेवाला है, (त्वं सूर्य भरोचयः) तूने सूर्यको प्रकाशित किया, तू । विश्वकर्मा विश्वदेवा महान माम ) सब कार्य करनेवासा, सब देवों के समान महान है ॥२॥ [१०२७] हे (इन्द्र) इन्द्र ! ( ज्योतिपा दियः रोचनं) अपने तेजसे सूर्य का प्रकाशक तपा (स्या विधाजन ) अपना प्रकाश फैलानेवाला तू ( आगच्छ ) भा, (देवाः ते सरयाय येमिरे) सब देव तेरे साप मित्रता पानेको दरमा करते है।३॥ [१०२८ ] हे (एद्र ) इन्द्र 1 (से सोमः असावि ) तेरे लिए सोम तैयार किया है, (शविष्ठ कृष्णो) हे यसपा और भानुको हरानेवाले पण! (आ गहि )मा, (सूर्यः रश्मिभिः रजःन) सूर्य किरणोंमे नंगे मन्तरिशरो भर देता है, उसी प्रकार (त्या इन्दियं मा पृणस्तु ) तुमे सोमपानसे महान् शारित प्राप्त हो ॥ १॥ " १ १ १ P 23 १३ १ १२ १हे स्पर्धमान इन्द्र । यत् त्वं दस्युहा भवः, ऊमे साते है। पाठ अध्याय सामवेदका मुद्याध अनुवाद (११७) १९७१ ३.१३ १ १०२९ आ तिष्ठ वृत्रहन्नथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी । अर्वाचीन १५ मु ते मनो ग्रावा कृणोतु वानुना ॥२॥ (*. १८४३) १०३० इन्द्रमिद्धरी वहतोऽप्रतिष्टशवसम् । श्रपीणा सुष्टवीरुप यज्ञं च मानुपाणाम् ॥३॥ २३ (पा)॥ [धा० १०। उ० १ । स्व०२J ( १८४२ ) ॥ इति सप्तम खण्ड ॥७॥ ॥ इति तृतीयप्रपाठके द्वितीयोऽर्य. ॥३॥ ॥ इति तृतीय प्रपाठकश्च समाप्त ॥३॥ ॥ इति पष्टोऽध्याय ॥६॥ [ १०१९हे (वृत्रहन ) शत्रुको मारनेवाले इन्द्र ! ( रथं आ तिष्ठ ) रथपर घर ( ते हरी ह्मणा युक्ता ) तेरे दोनों ही धोडे हमने मोसे जोर दिपे है, ( ग्रावा ) सोमको कूटनेवाला पत्थर ( पग्नुना ) मनको भापित करनेवाले शन्दोंस (ते मनः } तेरा मन ( आर्वाचीन सुटणोतु ) हमारी ओर आकर्षित करे ॥ २ ॥ [१०३० ] (अ-प्रति-धृष्ट-शवसं इन्हें इत् । न हराये जाने पोप्य वलसे युक्त इन्द्रको (सपीण मानुपाां) ऋषि और ऋत्यिजों के द्वारा ( सुटतीः ) ती गई स्तुतियोंके पास ( यमं च ) और यशके पास ( हरी) घोडे ( उप यदतः) पहुवाते है ॥३॥ । यहां सातवां खण्ट समाप्त हुआ । ॥ इति पष्ठोऽध्यायः॥ पष्ठ अध्याय इस छठे अध्यायमें इन्द्र देवताके पर्गन इस प्रकार है ४ ते महासुभाजिपु अर्भ जात हवामहे १०००- उस इनको यई सया छोटे युद्धों में अपनी रक्षा के लिए हम रोदसी मनु मदेताम् [९८२ - हे पर्ण करनेवाले ५ स वाजेपुनः प्राविषत् [ १००२ 1- यह पोंमें ! जब तशयका नाश करनेवाला होता तब रोनों हमारी रक्षा करता है। हो पुलोक और भूलोक आनन्दसे तेरे अनुकूल होते है। ६हेन्द्रस्य अभिभूः मति (१०२५]-हे ! २ यत् प्राजयः उदीरते, पृष्णवे धनं घीयते व शत्रुओशो जीतनेवाला है। ११००४- जर युदर होते है, तब विशयो वीरको धन ७ हे शविष्ठ पृप्यो ! भागहि [ १०२८]- हे पलवार मिलते है। और विजयी मामारी सहायतारे लिए का। ३ पृषहा इन्द्रः मदाय शयसे नृभिः यायुधे ८ म-प्रति-कृष्टशवस इन्हं ऋषीणां मानुपाणां १२]- बुरे नाश करनेवाले इन्दरे आनन्द व मलको सुष्टुतिः यच हरी उपयहता १.६० - जिसके धेय यहानेरे लिए लोग पसरा यश पाते। भोर साहस मी म नहीं होते, उसको शषि और सामघेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराचिका अब अग्निके मनुष्यों की स्तुतियों के पास अर्थात् यत्रके पाम उसके घोडे इस प्रकार इन्द्र के गुणों का वर्णन इस अध्यायमें आया है। ले जाते है। गुण ९ हे इन्द्र ! सोमं पीत्वा ओजसा सह उत्तिष्ठन् अभि शिप अवेपयः [९८८]- हे इन्द्र | सोम पोकर अपने सामयंसे उठ और अपनी ठोढीको कपा, अपनी शूरवीरता इस अध्यायमें अग्निके गुणोंका वर्णन इस प्रकार है- दिखा। १ अजर [९८३]- जरारहित, सदा तरुण, वृद्धावस्था १० हे वीर । सेन्यः असि, दभ्रस्य चित् धृध' जिसके पास आती नहीं। [ १००३ ] हे वीर इन्द्र | तू सेनाके साथ रहता है, छोटोको २. मेधाकारः [ ९८४]- मुखिके कार्य करनेवाला, बुद्धि तू बडा बनाता है। बढानेवाला। ११ प्रचेतसः तागाव. अस्य महः नमसा वर्ध ३ विदयस्य प्रसाधनः [९८४]- युद्धका औरयतका यन्ति [ १००७]- बुद्धियुक्त वे गायें इस इन्द्र के सामयंको सापन। अपने दूधसे बढाती है। ४ होता [९८४]-देवोंको बुलाकर लानेवाला, हवन करनेवाला। १२ पूर्वचित्तये अस्य पुरुणि ब्रतानि सश्चिरे [१००७ ]- पहलेके पराक्रमोको याद दिलाने के लिए इसके ५ परिभूतरः [९८४]- शत्रुओंको हरानेवाला। बहुतसे साहसिक कार्यो। वर्णन किया जाता है। ६ मतिः [ ९८४]- बुद्धिमान् । १३ वृत्रहन रथं यातिष्ट [१०२९]- हे वृत्रको मारने. ७ घुमान् [१०२२-तेजस्वी। पाले इन्द्र अपने रथपर बैठ । ८ सुश्चादः १०२३]- उत्तम तेजस्वी। १४ मदच्युता हरी युक्ष्व, क हनः, कं वसो दध', ९ दस्मः [ १०२३]- दर्शनीय, सुन्दर । अस्मान् वसी दधः [१००४]- मदोन्मत्त घोडौंको रथ १० विश्पतिः [१०२३] प्रजापालक । जोड और किसको मारना है और फिराको धन देना है ११ ज्योतिषस्पति- १०२३]-तेजस्पियोंका पालक । इसका विचार कर। हमें धन दे। १२ हव्यवाट् [ १०२३]-हषन किए गए पदाको ठीक स्थानपर पहुंचानेवाला। १५ सुन्वते यजमानाय शिक्षसि, ते भूरियसु [१००३]- सोमयज्ञ करनेवाले पनमानको तू पन देता १३ शुकः[१०२३]- स, पोर्षयान् । है, तेरे पास बहुतसा धन है। १४ शयसस्पतिः [१०२४]- बलवान्, सामर्यवान् । १६ अस्य ताः पृशतायुवः पृश्नयः सोमं श्रीणन्ति १५ घशन ९८३]-जलानेवाला, शत्रुओंको जलानेवाला [१००६]- उस इन्द्रकी उत्तम पायें अपना धूप सोमरसमें १६ हविः आहयते [ १०२३]- अग्निमें हवियों हवन होता है। १७ घाजी सोम इन्द्रे सहः इन्वन् मदाय पयते १७ उभेदी आसनि श्रीणीपे [ १०२४] - दोनों [१०१९]- मलवान् सोम इन्द्रका सामर्य बढाकर उसका ही जहू आदि धर्तनोको अपने मुख के पास ले जाते हो, आहुतिका आनन्द बढाता है। हवन करने के लिए पात्रको अग्निके पास पहुंचाते है। १८हेन्द्र!त्वं सूर्यः अरोचय , विश्वकर्मा १८ स्तोतृभ्यः इपं याभर [ १०२२]- स्तुति रन- विश्वदेयः महान् असि [ १०२६ ]-हेन्द्र बने सूर्पको बालोंको अन्न भरपूर दे। प्रकाशित किया, तू सब कर्म करनेवाला है, तू सर्वोका देव १९ वा इत् अर्भस्य हविषः, त्यां इत् महः, है और तू महान है। समानं पृणुते त्यत् मन्यं न [९८४ ]- तुसे ही भोगेसी १९ यिम वृहत् ग्रलरन् विपश्चित् [ १०२५]- और बहुतसी हवि देने के लिए असाया जाता है, तेरे सिवाय जाती, महान्, प्रानका प्रसार करनेवाला और विद्वान् है। और किमी दूसरेको नहीं बुलाया जाता। २० इन्द्रस्य सरयं जुषाणा देश दुः[ १०२० ] २० हे अने। यत् मोपधिः धनानि च मभिएष्टा, -दन्को मित्रतारोमा करनेवाला यह तेजस्वी सोमररा है। स्वयं भासन् , अनं परिचिनुपे, तव श्रियः, वर्गस्य मिलाती है।
पष्ठ अध्याय सामवेदका सुयोध अनुवाद इन्द्र और अनि मोमके गुण आओ। विद्युतः च, चिकि[ ९८२]- जब तू औषधी, वनस्पति ६ वां पुरुरणा अर नूनं अस्ति [ ९८५ ]- तुम और वनोंको जलानेको इच्छा करता है, तब तेरे मुखमें मस दोनों बहनसे सरक्षण हमें प्राप्त हों। पडता है और उस समय तेरी किरणे वर्षा में बिजली के समान ७ वां सुमति चंसि [९८५]- तुम्हारी उत्तम ओर धमकने लगती है। अनुक्त यदि हमें प्राप्त हो। इस प्रकार इस अध्यापम अग्निका वर्णन है। इस प्रकार मित्र और यरुण इन दोनोकी सहापताका वर्णन इस अध्यायमें आया है। इन्द्र और अग्निको मिलीजुलो स्तुति भो इस मध्याय है-- १ इन्द्राग्नी शंभुवा { ९९१ - इन्द्र और अग्नि में अब इस अध्याय में आये हुए सोमके गषोंको देखिए- कल्याण करनेवाले हैं। १ इन्दुः [ १५५]-तेजस्वी, चन्द्र के समान प्रकाशमान् । २ सोमपीतये भागन्छ [९९३ - मोमपान करने के २ गोवित् [ १५५]- गायोसे युक्त, गायका दूप जिनमें लिए आओ। मिलाया जाता है। ३ नरा इन्द्रनी! शां पृरुस्पृहा वाशुपे या नियुतः ३ वसुवित् [ ९५५) घनसे युक्त, नियासक शक्तिसे सन्ति, ताभिः आगतं (९९२ ]- हे नेतृत्व करनेवाले युक्त । इन्द्र और भग्निदेवो । तुम्हारे बहुतो द्वारा प्रशंसाक योग्य, ४ हिरण्यवित् [९५५ ]- सोने से युक्त । तथा दानशीलोको सहायता करनेवाले जो घोडे है, उन्हें ५ रेतोधाः १९५५]- वीर्य बढानेवाला, वीर्यको धारण जोडकर तुम करनेवाला। इस प्रकार इन्द्र और अग्निके मिलेजुले वर्णन है। ये देय ६ सु-धीरः [९५५ - उत्तम पोर। सबका कल्याण करते रहते है। सबका हित करना ही इनया ७ विश्य-वित् [९५५]- राब जाननेवाला। स्वभाव है, इस कारण ये हमेशा नेतृत्व करते हैं। ये उदार ८ वृपभः९५६]- बलवान् । चित्तवाले मनुष्योंकी सहायता करते है। इसलिए सब यज्ञ ९ पवमानः { ९५६ - शुद्ध होनेवाला। करनेवाले इनको यज्ञ में बुलाते है। १० विध्यत' नृचक्षा' [९५६]- सब तरफसे मनुष्योंको देखनेवाला। मित्र और वरुण ११ ईशानः [ १५७ ?- स्वामी, शासक । मित्र और परगको भो सयुषत स्तुति इस अध्यायमें आई १२ नृमादनः [९६५ ]-मनुष्योका आनन्द पढानेवाला। है। उनके वर्णन यहा इस प्रकार है- १३ चर्षणी-भृति [१६५]- मनुष्योंको धारण १६ मिना ! नपायुभिः पातं [ ९८७ ]- है मित्र करनेवाला। और धरणो। तुम हमारे मित्र हो, इसलिए सरमणके सापनोंसे १४ सस्निः [ १५- शुद्ध, जीतनेवाला । हमारी रक्षा करो। १५ अनुमाधः [ १६५]-प्रशसनीय। २ सुमात्रा नायथां [ ९८७ - उत्तम सरक्षण करने १६ अद्भुतः [ १६६]- ममत, विलक्षण । याने तुम हमारी अच्छी तरह रक्षा करो। १७ पावकः [१६६- शुद्ध होनेवाला। ३ तनूभिः दस्यून साधाम [९८५] - अपने शारीरिक १८ वृत्रहन्तम [ ९६६] - शत्रुको मारनेवाला। मामयंसे हम शत्रुओंको हराये । १९ शुचिः [९६६] शुद्ध । २० मधुमान [९६७]- मोठा, मधुर । ४ अगुहाणा याँ सम्यक् मित्रा स्याम [ ९८६]- सम दोनो आपस में दोहन करनेवाले हो, अन हम तुम्हारे २१ देवावीः [ ९६७] - दंचोंको मिलन योग्य । मित्र होकर रहें। २२ थप.-शंस-हा [९६७]- पापियों का नाश ५पंचधाम भक्ष्यामः ९८६]- अन्न और घर करनेवाला । तुम्हारे द्वारा हमें प्राप्त हो। २३ कवि [९६७ ]-मानी, कान्तदर्शी, दूर।
(२२०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिक: जाते है। २४ साहान् [ ९६७ ]- शत्रुको हरानेवाला। सोमका पानी में मिलाया जाना २५ क्रीडुः [ ९७४ ]- खेलने में कुशल । सोमका रस निकालने के बाद उसे पानी में मिसाया २६ मंयुः [ ९७४ ]- महत्व युक्त, दान देनेवाला। जाता है- २७ सुवीयं दधत् [ ९७४ ]- उत्तम वीर्यसे युक्त, १ अप्सु दुष्टरः गभस्त्योः मृग्यमानः चमूपु उतम शुर। सीदति [९७३]- पानीम मिलाया गया सोम हाथोंसे साफ २८ स्वादिष्टः [९८१]- स्वादयुक्त, रुचिकर । किये जाने के बाद धर्तनमें गिरता है। २९ परियोयित् [ ९८१]- धनयुक्त, दान देनेवाला। २ अप्सा सोमाः इन्द्राय वायवे अर्पन्तु । ९९५ ] ३० शुमत्तम [ ९९४ ]- अति तेजस्वी। पानी मिलाये जाने के बाद सोमरस इन्द्रादि देवोकोरिया पे सोमके गुण इस अध्याय में आए हैं। सोमरस पोर्न के जाता बाव उत्साह बढता है। इसलिए ये गुण मानों सोमकै हो ३ ता. ते मधुमत् घृतं पयः क्षरन्तु [ ९५७ ]- मेरे है ऐसा कहा है। • ये रस मोठे जल और दूध मिलाये जाते है। स्वर्गमें सोम ४ मधोरसंसघमादे अमृताय अशुशुमन [१०१० - मोठे सोसके रस यज्ञमें पानी के साथ मिलकर शोभा पाते हैं। सोमकी बेल स्वर्गमें उगती है। स्वर्ग हिमालयको ऊची इस प्रकार पानी में सोमरस मिलाये जाने के बाद ये छाने घोटी पर है। यहां पर यह घेल उगती है। इसलिए सोम स्वर्गसे लाया जाता है, ऐसा वर्णन वेदोंमें है। १हे सोम ! दिवस्परि चिश्या रूपा अभ्यसि सोमरसका छाना जाना [९५९-हे सोम! सू स्वर्ग पर अनेक हप धारण करके १ देववीतये अव्या धारेभिः पव्यत [९६८-रेनोंको देने के लिए भेडके बालोंको बनी हुई छलनीरो सोमरस ाना २ गिरिष्ठाः अंशुःमदाय असाचि [१००८]- पर्यंत जाता है । पर उगनेवाले सोमके रसको आनन्दके लिए निकालते हैं। २ हे सोम ! मु-वीर्यं दधत् पवित्रं गच्छसि ३ इयेनः न योनि भासदत् [१००८]- बाज पसीके [९७४]- हे सोम ! उत्तम सामयं धारण करके तु छनने के समान ( पर्वतसे आकर ) यज्ञमें बैठता है। लिए छलनीके पास जाता है। ३ ते मधुपचुतः धाराःमरनन्, ताभिः पवित्र मा सोमका पत्थरोंसे कूटा जाना सदः[९०९]- तेरी मोठी पारा निकलने लगी, उन सोम पापरोसे कूटा जाता है- धाराओंसे युक्त होकर तू छलनी पर जाकर बैठ गया है। १ अद्रिभिः सुतः पवित्रं परि दीयसे, इन्द्रस्य ४ सः अव्यया वाराणि तिरः इन्द्राय पातचे अर्थ धाने मरं [२४]- पत्थरों कूटकर निकाले गए [९८० ]- यह तू भोके पालोको धनी हुई छलनीसे इनके पाको छलनोसे छाना है और जब बाद में इन्द्रको देने योग्य पीने के लिए धनता जा। होता है। ५ सुतः देवेभ्यः मधुमत्तरः परि धारया पयस्य २. सोमः द्रः च । यूयं स्वपती स्थ । गोपती [१०१६]- रस निकाले जातक याद देवोंको देनेरे लिए शाना धियं पिप्यस [ १००11- सोम और इन्द्र। भपिक मोग होकर पार पनाकर उसनोसे छनता ना। तुम निश्चयसे सबके स्वामी हो, तुम दोनों गायके पालन ६ भ-द्रुहः पीतयः हरि रयां पवित्र रिहन्ति करनेवाले हो, तुम सब पर मरिता करते हो, यत. तुम । १०१७]-द्रोह न करनेपाली भंगुलिपा हरे रंग के तुम हमारी बुधि पुष्ट रो। सोमरो छसनी पर रखकर बाती है। सोमरस पीने के बाद अदि महान् उत्साह उत्पन्न होता ७ मदिदुग्धः रोम तिरः पवते [१०२०]- परपरसि है,मोर महान महान् नार्य करनेका सामप्यं भर पा र बिरामनेरे बार दे सोमरस बालोंकी पलनीसे छाने होता है। रहता है। जाते है।
पष्ट मायाय] सामवेदका सुरोध अनुवाद ८ देवः स्वेन रसेन देवान पश्चन सा नो भव्ये ३ हे सोम! स्तोतृभ्यः गृहद् यशः ध्रुवं रयिं इये सव्यत (१०२१]- दिव्य सोम अपने रसते देवोंको सन्तोष मा भर [९७१/- है सोम स्तुति करनेवालोंको महान् पश, देते हुए चे स्थान पर रखे हुए भंडके बालोंकी उसनोसे पिर पन और मन भरपूर दे। छाना जाता है। ४ असार्क तोकाय पं दधत् [९९६]- हमारे पुन- इसप्रकार तोमरसको निकालकर उसे पानी मिलाकर पौत्राशे मन्न दे। भेटको पालोको एलनौसे वह छाता जाता है, बाद में वह ५ हे पस्पते देव ! धुम्नं वृहत् यशः देक्यु भनि गायके दूएमें मिलाया जाता है। दिदीहि । १०११]- हे पनपते सोमदेव । तेनरी युक्त सोमरसको गायके धमें मिलाना विपुल अर, जो देवोंको दिया जाता है। हमें भी दे। १ देवयातं शुभ्रं गन्धः नृभिः सुतं, अप्सु धोतं, इसप्रकार सोम भरपूर अन्न देता है। गावः पयोमिः स्वदयन्ति [१००९]- देशोंको देने के लिए सोमका शत्रुओंको दूर करना स्वका सुन्दर बन्न ऋविजों द्वारा प्यार किए गए है, इस प्रकार तैय्यार किए गए तथा पानी मिलाये गए उन गोम- १ सालान् विश्वाः स्पृधः९८]- सम स्पर्धा करने- रसोंको गायें अपने दूयसे स्वादिष्ट बनाती है। वाले शनुमोको हरानेवाला सोम है । २ श्रीणानः अप्सु पृज्यते [ ९६१ ]- सोमरस गायके २ महन्नजित्, यःजिनाति, न जीयते, शघ्रं अभीत्य हन्ति [९७८]- हगारों ओंको सोम जोतता है, पर कभी दूध और पानी में मिलाया जाता है । ३ सोमः अनूपे गोभिः अक्षरः [ ९९८ ]- सोमास स्वयं पराजित नहीं होता। पत्र पर आक्रमण करके उन्हें कलशमें गायके दूधके साम टपकता है। जानसे मारता है। ४ सोमा दुग्धाभिः अक्षाः [ ९९८ ]- सोमास दूधके प्रगति पर बापत १०१९ - यह सौम बलका राजन ३ वृजनस्य राजा परिवः कृण्वन, रक्षः हन्ति, मिलाये जाने पर टपकता है। इसप्रकार सोमरसमें गायका दूध मिलानेसे वह स्वादिष्ट है, वह उपासकोंको धन देता है, राक्षसोंको मारता है, और मनता है, ऐरो वर्णन भनेक मंत्रोंमें माए है। दाधुओंको दूर करता है। इसप्रकार इस अध्यायमें इन देयोंके गुणोंका वर्णन है। सोमका धन देना प्रत्येक व्यक्ति इन गुणोंसे मुक्त हो, मह मायापक है। १६ सोम! न विश्वासौभगा, पुटं यषं परिसर [९७५]- हे सोम। हम सब सौभाग्य और पुष्टिकारक २हे सोम! चित्र उपथ्यं दिव्यं पार्थिवं वसुः नः आमर [१९९]-हे सोम! विलक्षण, प्रशंसनीय, दिव्य १ गोवित् वसुयित् हिरण्यवित् रेतोधाः भुवनेषु और पापिय पन हमें भरपूर दे। अर्पितः। १५५]- गाय, धन, सोना और पराक्रमको दीर्घजीवन प्राप्त होना अपने पास रखनेवाला तू भुवनोंका कल्याण करनेके लिए समपित हुआ है। १ सोम ! भुवनेषु जीवसे स्याम [ १५६]- हे २ हे सोम सुवीर विश्ववित् असि [९५५ - है सोम ! इस भवन में हम दीर्घनीयन प्राप्त कर सके, ऐसा कर। सोम! तू उतम दौर और सर्वज्ञ है। सोमका अन्न देना ३ हे पृषभः विश्वतः नृयक्षाः असि [९५६ ]- १ सः गोमन्तै सहस्रिणं वाजं माइन्वति [९६९]- हे बलवर्धक सोम ! सब प्रकारसे मनुष्योंका निरीक्षण यह सोम हमें गायोंसे युक्त अनेक प्रकारके मात देता है। करनेवाला है। २नः विश्यानि श्रवः विदः [९७० ]- हमें सब ४ ताः विधावसि [ १५६ - उन प्रजामों के पास तू प्रकारके अन्न दे। जाता है। १६ [साम. हिन्दी मा.२] सुभाषित [गिक विमएँ। (१२२) सामोपा पोध मनुगात ५पर विपरपर मुपपु गाणे गाम माय: गोर एरियान -m । २५६ - Tऔर गोगे पारा सा गापाको प्राप्त परापागे हम। २० मा पर पाया किमगा. ६शान. इति: गुरयः पुमानः इमा भुगनानि सपा पोषण मन्त्र और शाम । ९५७-यागो सा मांगी मार घोरे भोरन भगौम रिला है। २. गोपिय मावि पापपमा ..] ७ मशुमा पूर्ण पयः सरन्तु [९५७].at में मार पो और प्रत। freी मोग। २२ महीजन जिनामापसे, कार्य ८ एप. ते मते तिष्ठन्तु [९५. 1- पाप्य तो ममापनि १७८ - पोर्न धारजान को नहीं मा ९तुंएण्या पिकः परि मायानि [९५९ - मोघेरकर मारता है. पर पौर।। प्रायपोर पर माता! २३ गारगोषित पृा या परिश्रम { ९८५/- १० देयः गर्पः नाना प्रन्दन पारपनि मनमा पार पारे। [९. 1- गरेर प्रर हो रहर २५ जाग धरानः समि, प. पा. नि प्राप्त होता है। पर मापतन्ने । १८31- मरण और ११ नृमान गली-तिः मनुमापा [९९५]- मायो भातर नेपाला और गावापानमा भोटो नगागो गामा पोकोमा मांगा पोप है। पुपारनेर लिने। २२ असा शुचिः पापरः प्रहातमा भनुमाया भनि [Rer रोमानेगा, मपाली १९ मेगा नियमापन परिमना मनि [९६८]- मरमान, गर भोर पवित्र मानवासातपात होयागा, विमान, मानो मान तेनायो ऐगा जो होता मासा पीर प्रसार योग्य होता है। १ गागाती।। १३ शुचिः पायक देवाची: भरमहा [९८७/- निष, पशि और गो प्राप्त पशा शेर राणे २६ यो पुरुग्णा भरनं मस्निा९८५/- गुमरे दुर्गेश ना पाता। या प्रसार संरक्षण प्राप्त होते है। १४ पायः देयर्यातये किया स्पृधः माहान् [९५८) २७ पांमुमति यगि ९८५) तुहारी उसम पति -जानी चाय प्राश पररे वि पि वाले हमारे भारत। दावोसो एता है। २८ अ-दाणा सम्य मिशापयं मामधाम १५ सा पयमानः जरिहस्यः गोमन्तं महान व बदाम ( ९८६]- हमारलंदा तुम्हारे हम सप्तम पाज आल्यति [१९९1-पह पोम लोतामाको गायोंसे मित्र होता मन मोर परोप्राप्त । उत्पन्न होने वाले हजारों प्रवाररे पन देता है। २१ मित्रा! पायुभिः नः पात, मुत्रामा प्रापेथा, १६ स.नः चेतसा विभ्यानि थप यिदः [१०] ननूभिः दस्यून साधाम १९८७- हे मित्रो! तुग -यह सूहमें क्षिपूर्वर मनेर मारेपन व अन्न है। संरक्षणो शाप! हमारी रक्षा रो, उत्तम रहा करते. १७ स्तोतृभ्यः वृहद् यशः भुव रवि अभ्यप, पं पासे तुम हमारा पाला रो, उगोप्रशार अपने पारीरिक आभर [९७१ - स्तुति करनेवालोरो महा मा, पिर सामने गा परामय हम मरे, ऐसा रो। धन योर भरपूर यन्न है। १० देन्द्र! सोमं पोरा मोजसा साह उत्तिष्ठन् १८ मुमत पुरातनः राजा इवगिरः यायियेशिथ [९८८]- हैद ! गोम पौर अपने सामग्री - [९७२ 1- उत्तम निपकि पलानयाले राजारे समान तगहो। हमारी स्तुति गुन। ३१ हे स्पर्धमान न्द्र ! यत् दस्युहा भया, त्या (१२३) सामवेदया सुयोघ अनुवाद पष्ट अध्याय] उभे रोदसी अनुमदेताम् [९८९]- हे स्पर्धा करनेवाले ४५ के इना, कं बसौ दधः [ १००४ ]- किसको इन्द्र ! जब तू दुष्टोंको मारनेवाला होता है, तय दोनों द्युलोक मारना है और किसको पोंमें स्थापित करना है, इसका और पृथ्वीलोक यानन्दसे तेरे अनुकूल होते है। विचार पर। ३२ अशापदी नय-नति मतावृधं तन्वं वाच अहं ४६ अस्मान् वसो दधः [ १००४]- हमें पनमें परिममे [ ९९०]- आठ पद मुक्त, नयो कल्पनाओंसे युक्त स्थापित कर। तथा सत्यको बढानेवाली छोटी छोटी वाणियोंको में बोलता हूँ। ४७ अस्य पुरुणि व्रतानि सश्चिरे । १००७]- इसके ३३ इन्द्राग्नी शं भुवा [९९१]- इन्द्र और अनि बढ़तसे काम स्मरणमें लाते हैं। १८ हे इपस्पते देय! द्युम्नं वृहद् यश देवयु अभि कल्याण करनेवाते हैं। ३४ अस्माकं वोकाय इपं दधत्.महनिणं अम्मभ्यं दिदीहि [ १०११- हे अनपते देय ! तेजस्वी महान् या अयया अन्न, जिसको देवगण इच्छा करते है, हमें दे । विश्वतः आ पवस्व [९९६]- हमारे लड़कों के लिए अन्न ४२ वृजनस्य राजा वरिवः रुपन्, रक्षा हन्ति, दे और हजारो प्रकारके धन चारो ओरसे हमें दे। सराति परिवायते [१०१८]- बलमा राजा पन देता ३५ यत् चित्रं उक्थ्यं दिन्यं पार्थि वसुः पुनानः है, राक्षसोको मारता है और शत्रुओंको पष्ट देता है। या भर [ ९९९]- जो विलक्षण, प्रशसनीय, दिव्य और ५० युमन्तं अजरं आ धीमहि [१०२२-तेजस्वी पापिद धन है, उन पनोंको शुद्ध होकर हमें दे। और जरारहित ऐसे तुझे हम अधिक प्रदीप्त करते हैं। ३६ आयूंपि पुनानः स्तनयन् , हरिः सन् अधि ५१ स्तोतभ्यः इप आ भर [१०२२]- स्तुति पारने. यहिपि, योनि आ सदः [ १००० ] - अपना जीवन बालों को भरपूर अप्न दे। पवित्र करते हुए, बलवान होकर भाषण करते हुए, लोगोंक ५२. सुश्चन्द्र, दस, विश्पते, ज्योतिषस्पते, हव्य- दुख दूर करते हुए अपने स्थान पर माकर याप्सन पर बैठ। वाट् अग्ने इपं या भर [१०२३]- उत्तम आनन्द देनेपाले, ३७ युवं सत्पती शिाना गोपती चियं पिप्यतं शत्रुको मारनेवाले, प्रजापालक, तेजत्दी, हविको यथास्थान [१००१]- उत्तम स्वामी, ऐश्वर्य अधिकारी, गाय पालन पहुचानेवाले अग्ने ! हमें भरपूर मन्न । करनेवाले तुम बुद्धियों को पुष्ट करो। ५३ त्वं विश्वकर्मा विश्वदेवः महान् असि [१०२३] ३८ त महत्तु आजिपु, अर्मे अतिं हवामहे, स: -तू सब कोरी करनेवाला, सवका देव और महान् है। वाजेपुनःप्राविशत् । १००२]- उसे महान् रामामों में ५४ ज्योतिषः रोचनं स्वः विभ्राजन् यागच्छ उसी प्रकार सोर्ट युद्धोंमें अपने सरक्षणके लिए बुलाते हैं। वह [१९२७ ] - तू तेजस्वी सूर्यमा प्रकाशक और घुलोकको युद्ध में हमारा सरक्षण करे। प्रकाशित करनेवाला है, ऐसा तू यहां आ। ३९ हे धीर। मेन्या असि, भूरि पराददि असि ५५ शविष्ठ घृप्णोः! आ गाह [१०२८]- हे बलवान् [१००३ ]- हे पीर । हू सेनासे युक्त है, शत्रुके बहुतसे और शत्रुको हरानेवाले वोर! तू यहा मा । पनको हरण करनेवाला है। ५६ त्वं अभिभूः असि [१०२६]- शत्रुको हराने- ४० दभ्रस्य चित् वृधः [१००३]- छोझेको यडा वाला है करनेवाला है। ५७ अप्रतिवृष्ट-शयसं इन्द्रं ऋषीणां मानुपाणां ४१ सुन्वते यजमानाय शिक्षति [१००३ ]- सोम यज्ञ हरी उप यहतः [१०३०]-अपराजित घोर इन्द्रको पज करनेवालेको द धन देता है। ऋषि और मनुष्योंके यज्ञमें घोटे रय वटाकर लाते है। ४२ ते भूरि वासु [१००३]- तेरे पात बहुत धन है। ४३ यत् भाजपा उदीरते, धृप्णवे घना घीयते उपमा [१००४ जव युद्ध होते है तब विजयी वोरोंको धन इस अध्यापमें जो उपमा है. उन्हें यब देखिए- ४. मदच्युता हरी युव[१००४]- मद चुभानेदाले १ सूर्यस्य रश्मयः इव [९५८- सूर्यको किरणोके पोरथ जोर। समान (ते सर्गाः प्राहक्षत ) सोमकी पारामें फैलती है। मिलता है। * (१२४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिका २ देवः सूर्यःन [ ९६० ]- दिव्य सूर्यके समान सूसोम ११ श्येनः न [ १००८]- बाज जिसप्रकार अपने (विधर्मणि जशानः ) यज्ञमें प्रकट होता है। घोंसलेमें आता है, उसीप्रकार यह सोम ( योनि भासदर) ३ आपःन [१६२]- पानीके प्रवाहके समान (इन्दवः अपने कलशमें आता है। अभि अधन्धिपुर) सोमरस छलनीसे छनते हैं। १२ अश्वं न [१०१. जैसे संग्राममें जानेवाले ४ सुव्रतः पुरातनः राजा इव [ ९६२ - उत्तम घोरको सजाते है, उसी प्रकार (मघोः रम सधमादे नियमोंके पालन करनेवाले पुराने राजाके समान (सोम! अशुशुभन ) मी सोमरसको यज्ञमें सुशोभित करते है, दूध गिरः आधिवेशिय) हे सोम ! तू स्तुतिको स्वीकार कर। आदि मिलाकर अच्छा बनाते हैं। ५ मयः न [ ९७४ ]- यज्ञके समान ( मंयुः) दान १३ वह्निः न [ १०१२]- सब प्रजाओंका पालक असे रेनेकी इच्छा करता है। तेजस्वी राजा होता है, उप्तीप्रकार है सोम तू ! (विश्पतिः ६ वर्पस्य विद्युतः इव [९८२]- वर्षाकालमें बिजलोके आ यच्यस्व ) प्रजाया पालक मनकर पालशमें जाता है। समान (तव श्रियः 1) तेरी किरणें धमकती है। १४ गावःजातं वरन [१०१७)-गाय जिस प्रकार- ७ उपसां ऊतयः इव [९८२]- उथ फालको किरणोंके नये उत्पन्न हुए बछरेको पाटनी है, उसोप्रकार (धीतयः समान तेरी किरणें चमकती है। ८ रथ्यः यथा [९८३ ]- रथी कोरफे समान (ते हरि रिहन्ति ) अंगुलियां हरे रंगके सोमको दवाती है, शासि दबाकर रस निकालती है। पृथक् आयतन्ते) तेरे सामर्थ्य बढते हैं। अश्वया इथ [ १९७१- घोडोके समान (हरिता १५ सूर्यः रश्मिभिः रजा न [ १०२८]- सूर्य जिस- धारया यातिहरे रगकी धारासे सोम जाता है। प्रकार किरणोंसे अन्तरिक्षको भर देता है, उप्तो प्रकार (त्वा १० समुद्रं न [९९८]- समुद्र जैसे जलप्रवाह जाकर इन्द्रियं मा पृणस्व ) तुझे सोमपानसे महतो इन्द्रियशक्ति मिल जाते हैं, उसोप्रकार (संवरणानि अग्मन् ) सोमरस भर देती हैं । रूपी अन्नप्रवाह कलशमें जाते है । इसप्रकार इस अध्यायमें उपमायें है। पष्ठाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋग्वेवस्थान ऋषिः देवता ९५५ पवमानः सोम. जगती " 1 " ९५८ गायत्री " ९८६१३८ ९।८३७ ९६४७ ९१६४८ ९१६४९ ९॥२४॥ ९२४० ९।२४३ ९२४५ [मकृष्टा माषादयः ] य. ऋषयः [अकृष्टा माषादयः] त्रयः ऋषयः [अकृष्टा माषादप] त्रयः ऋषयः कश्यपो मारीच. कश्यपो मारीच. कश्यपो मारीचः मसित काश्यपो देवलो वा असित. फाश्पयो देवलो या असित. काश्यपो देवलो पा असितः काश्यपो देवलो वा " " ९६० " " " सामवेदका सुयोध अनुवाद पष्ठ अध्याय छन्दः मंत्रसंख्या देवता पवमानः सोमः गायत्री ऋग्वेदस्थान ९.५४४ १२४६ ९।२४७ ऋषिः असितः काश्यपो देवलो था असितः काश्यपो देवलो वा भासितः काश्यपो देवलो वा " " " । " " " " " ९७० ९७१ " " " " " ९।२०११ ९/२०१२ ९२०१३ ९।२०१४ ९।२०५ ९२० ९५२०१७ ९।५५१ ९५५२ ९५५३ ९.५५४ ९०६२७ ९१६२२८ ९।६।९ " 7 " ९७६ ९७७ " " . " " " " M अग्निः जगती ९८२ असितः काश्यपो देवलो वा असितः काश्यपो देवलो या असितः काश्यपो रैवलो या मसितः कश्यपो देवलोवा अप्सितः कश्यपो दलो वा असितः काश्यपो देवलो दा असितः काश्यपो देयलो वा अवत्सार काश्यपः अवत्सारः काश्यपः अवत्सारः काश्यपः अवत्सार: काश्यपः जमदग्निर्भागवः जमदग्निपिः जमदग्निर्भार्गव (३) मरणो तहल्यः अरुणोपेतहव्यः अरुणो बतायः उश्चकिरायः उचकिरायः उष्चक्रिरात्रेयः कुरुसुतिः कावः कुरसुतिः काण्वः कुरुमुतिः कावः भरद्वाजो बाहत्पत्यः भरद्वाजो बार्हस्पत्यः भरद्वाजो बाईस्परमः (४) भगवाणिजमदग्निर्भागदोवा भूगर्वाणिजमदग्निर्भागको वा भारुणिर्जमदग्निर्भागवो वा मप्तर्षयः " " मित्रावरणी गायत्री " " . १०॥९शर १०९१७ १०९१८ ५७०९ ५७०१२ કારે ८६१० ८1७६११ ૮દ્દાર ६दि०७ ६६०८ ६६०९ " 1. " 1 ९९० इन्द्राग्नी " पवमानः सोम ९९४ " " " ९।६५१९ ९१६५४२० ९१६५।११ ९१०७ मूती " -- (१२६) सामवेदका सुवोध अनुवाद । उत्तरार्चिकः मैत्रसंख्या ऋग्वेवस्थान ९.१०७९ ९।१९।१ ९।१९।३ देवता पवमानः सोमः ऋषिः सप्तर्षयः असितः काश्यपो देवलो या असितः काश्यपो देवलो वा असितः काश्यपो देवलो या बहती गायत्री " " १००१ H " १५८१ पंक्तिः " " , १००२ २००३ २००४ २००५ १००६ १००७ गोतमो राहमणः गोतमो राहगणः गोतमो राहूगणः गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः गोतमो राहूगणः १।८।३ १1८1१० १५८सार १८४१२ " " " " " " १००८ पवमानः सोमः गायत्री जमदग्निर्गिवः जमदग्निर्भागवः जमदग्निर्भार्गवः उध्वंसया आंगिरसः " ९।६।४ ९१६०५ ९।६।६ ९।१०८९ १०१० " " काफुभः प्रागायः(विषमा कम्प, समा रातो बहती) १०१० कृतयशा आंगिरसः 36 उणिक " १०१४ त्रित आप्त्यः वित आप्रयः त्रित आप्त्यः " १०१५ आ अनुष्टुप ९.१०८०१० २११००१ ९।१०।२ ९.१०१३ ९।१०।६ ९.१००७ ९।१००९ ९९७१० ९९७११ ९।१७.१२ २०१७ r " १०१८ रेभसून काश्यपो रेभसूनू काश्यपो रेभसूनू काश्यपी मन्युसिष्ठः मन्युसिष्ठः मन्पर्वासिष्ठः " " विष्टप २०२० " " २०२१ " " मग्निः पंक्तिः वसुधृत आत्रेयः वसुमृत आत्रेयः वसुधृत आत्रेयः " M १०२४ " " उशिक पा६४ ५६५ ५६९ ८1९८१ ८.९८२ ८९८३ १५८४१ १८३ शः४ार नुमेय आशिरम- नमेप आदिरमः नमेष आंगिरसः " " " गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः Ir " .
सप्तम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद (१२७) अध सप्तमोऽध्यायः अथ चतुर्थमपाठके प्रथमोऽधः ॥४॥ (१-२४) १(अकृष्टमायावयः) त्रयः २, ११ कश्यपो मारीचः ३ मेवातिथिः काण्वः ४ हिरण्यस्तुप मागिरसः; ५ अवन्सारः काश्यपः, जमदग्निर्भार्गव, २१ कुरस आगिरसः, ८ वसिष्ठो मंत्रावरणि, १ त्रिशोकः काण्यः; १० श्यागश्न आग्रेयः, १२ सप्तर्षयः (१ भरद्वाजो बार्हस्पत्य, २ साश्यपो मारोच; ३ गोतमो राहपणा, ४ अप्रिमिः, ५ विश्वामित्रो गापिनः, ६ जमदग्निर्गिव, ७ पसिष्ठी मंत्रापरुणिः ), १३ अमहीपुरागिरसः; १४ शुनःशेप आजोगतिः, १५ मपृच्छन्दा दवामित्रः, १६ ( १, ३, २-पूर्वाः) मान्याता यौवनाश्वः, १६ (२ उत्तराधः) गोधा ऋषिका; १७ असितः काश्यपो देवलो वा; १८(१) ऋगंधयो राजपिः, १८५२) स्तिर्वासिष्ठः, ११ पर्वननारदो काण्वो; २. मनुः सावरण, २२ बन्धः सुबन्धु. श्रुतधन्युर्विप्रबन्याच क्रमेण गोपापना लोपायना वा; २३ भुवन याप्त्यः साधनो वा भौवनः ।। १-६, ११-१३, १७-२१ पवमानः सौम.; ७, २२ अग्निः, ८ आदित्यः, ९, १४-१६ इन्द्रः १०इन्द्राग्नी; २३ विश्वे देवाः, २४ ॥ १, ७ जगती; २-६, ८-११, १३-१५, १७ गायनो १२ प्रयायः - विषमा बृहतो, रामा सतोबहतो), १६ महापंक्तिः, १८(१) मवमध्या गापी, १८९२) सतो महतो; १९ उणिक, २० अनुष्दपः २१ त्रिष्टुप२२ द्विपदा विराट, २३ द्विपदा मिष्टुप २४ ॥ २३.१ १ 3.85109 ३३२.1 3 २३.क.३२ १.३१ ज्योतिर्यज्ञस्य परते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः । दधाति रत्नर स्वधपोरपीच्य मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रमः ॥१॥ (श ९२८६११० ) १०३२ अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यपति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिमित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मुजानोऽविभिः सिन्धुभिषा ॥२॥ ९६१) [१] प्रथमः खण्डः। [१०३१ ] ( यज्ञस्य ज्योतिः ) यज्ञका प्रकाश करनेवाला सोम ( देवानां प्रियं मधु पवते । देयोको प्रिय लगने- घाले मोठे रसको देता है । यह (पिता) पालन करनेवाला (जनिता) उत्पादक (विभू-वसुः) बहुत सारा पन अपने पास रखनेवाला (मदिन्तमः ) अत्यन्त आनन्द धढानेवाला (मत्सरः) उत्साह चढानेवाला (इन्द्रियः ) इन्द्रको प्रिय लगनेवाला (रस:) मोमरस (स्पधयोः) द्यावामियोम (यपीच्यं रत्नं दधाति) छिरे हुए धन यनमानको देता है ॥१॥ [१०३२] (दिवः पतिः ) पुलोकका स्यामी (शतधारः ) संको पारामेति माना जानेवाला (विवक्षपाः बाजी) इद्धिमान और बलवान् (हरि) हरे रंगका सोमरस ( अभिनन्दन फलशं अर्पति ) शम्द करता हा कता जाता है। (सिन्धुभिः जल मिश्रित होकर ( अविभिः मर्मजानः ) बालोंको धनी छलनीसे शुरू होता हमा यह (पृषा) बसवान् सोम (मित्रस्य सदनेषु सीदति ) मित्रके यनके पात्र में जाकर रहता है ॥ २ ॥ ~ (१२८) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्सराचिका 30 १ ३२ ३३ 3 १ ३११ १०३३ अग्रे मिन्धूनां परमानो अर्पस्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छसि । अग्रे वाजस्य मजसे महद्धन सायुषः सातृभिः सोम म्यसे ॥३॥ १ (लु)॥ [ घा० २९ । उ० नास्ति । २०५(प्र. ९८६१२ ) १०३४ अक्षत प्रवाजिनी गन्या सोमासो अश्वया । शुक्रासो पोरयाशरः॥१॥ (ऋ. ९६४।४ ) १०३५ शुम्ममाना ममतायुमिर्मज्यमाना गभस्त्योः । पान्ने धारे अव्यये ॥ २ ॥ ( अ ९६४।३) १०३६ ते विश्वा दाशुषे वसु सोमा दिव्यानि पार्थिवा । पवन्तामान्तरिक्ष्या ॥३॥२ (वी) । [धा० २० । उ० नास्ति । ख. ४ ( १८६४।६) १०३७ पर्वस्त्र देववीरति पवित्र सोम र ह्या । इन्द्रमिन्दो वृपा विश ॥१॥ ( ९२ ) १०३८ आ वरूपस्व महि सरौ पेन्दो घुम्नवचमः । आ योनि वर्णासः सदः ॥२॥ (ऋ ९२।२ ) १०३९ अघुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः । अप ॥३॥ (ऋ. ९।२।३) 3 २१.१ २ 7 3.1 २ 3 अपो वसिष्ट मुक्रतुः . [१०३३ ] हे सोम! (सिन्धूनां अप्रे ) जल मिलाने के पहले (पयमानः अर्षसि ) गुट होने के लिए जाता है। (याचा ममे गच्छसि )स्तुतिके लिए पूग्य होकर जाता है । ( गोषु अग्रियः गच्छसि ) गायोंके आगे मागे घसता है। (पाजस्य स्यायुधः ) इतके लिए उत्तम शास्त्रोंसे सात होकर (महत् धनं भजसे) योग एन प्राप्त करता है। (सोम सोसामः स्पसे) हे सोम ! तू ऋविनों द्वारा निचोडा जाता है । ३ ॥ [१०३४ ] (पानिनः । बसवान, (गुफ्रासः आशव सोमासः ) तेजस्वी और गतिमान् गोप (गन्या, अध्यया, पीरया ) गाय, घोरे और पुत्र यजमानको प्राप्त हो इसलिए (प्र अक्षत ) अपना रस छोडते ॥ २ ॥ [१०३५ ] ( मानायुमिः) पन करने वाले ऋयिनों दारा (गुंममानाः ) मुशोभित हुए और (गमस्यो। मृत्यमाना ) हामि शुरू किए जानेवाले तोमरस (अव्यये वारे) भेइके बालोंको उत्तनोसे (पयन्ते ) शुट जाते है ॥ २॥ [१०१६] (ते सोमा ) ये सोमरस ( दाशुषे) दान देनेवाले यजमानको (दिव्यानि पान्तरिक्षया पाथिया) दुलोक, मन्तरिक्ष मोर प्योपरके (चिया पस) सब पन (मा पयन्तां ) देवें ॥ ३ ॥ [१७] है (म) सोम! | देवयोः) देवयोको प्राप्त होने को हल करनेवाला (रया पवित्र अति पपस्य ) बेगपूर्णक छातनीसे उनता जा। है (इन्दो) सोम! (वृपा ) यस बहानेवासा (पदं विस) श्य प्रषिर हो। १॥ [१०३८ ] है (यो ) सोम! (गा धुमपत्ताधतिः) बरुवात् तेजावो और सबका पारण करनेपाता महिप्सर) बहुत मन और जल ( मा पपस्य) हमें दे और (योनि आ सदः) अपने स्थान पर ॥२॥ [१०३९(सुवस्य पेधसः धारा) रस निचोरे गए लोमको पारा { मिय मा मधुसत) मा सगर्नेवारी मोठे रसको गर्म का करती है । (सु-अनुः ) उत्तम पर नेपाला मोम (मपः यमिय) मलमें मिसापा - . २३ १ ३. १ ३ ३ 2 १ १२ 3 १ 3 २ सप्तम अध्याय सामवेदका सुयोध अनुवाद (१२९) १०४० महान्तं त्वा महौरन्वापो अन्ति सिन्धयः । यद्गोभिर्वा सपिज्यसे ॥४॥(*. ९।२।४ ) १०४१ समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो घरुणो दिवः । सोमः पवित्र अस्मयुः ।। ५ ।। (ऋ ९।२४६ ) १२. १०४२ अचिक्रदृपा हरिमहान्मित्रो न दर्शतः । सरसूर्येण दिद्युते ॥६॥(* ९रा६) १०४३ गिरस्त इन्द ओजसा मर्मज्यन्ते अपस्युयः । यामिर्मदाय शुम्मसे ॥७॥ (ऋ १।२१७) १०४४ च त्वा मदाय ष्वय उ लोकहनुमीमहे । तव प्रशस्तये महे ॥८॥(. ९२८) १०४५ गोपा इन्दो नृपा अस्पश्चसा वाजसा उत । आत्मा यज्ञस्य पूर्वः ॥ ९॥ (ऋ ९।२।१०) १०४६ अस्मन्पमिन्दविन्द्रियं मधोः पवस्व धारया । पर्जन्यो वृष्टिमारव ॥ १० ॥ ३ (के)। [धा०५१। उ०१। स्व०८] ( ९।२।९) इति प्रथमः सण ॥ [२] १०४७ सना च सोम नेपि च पर्वमान महि श्रवः । अथा नौ वस्पसस्कृधि ॥१॥ ९४१) [१०४०] हे सोम ! ( यत् गोभिः वासयिष्यसे ) जब तू गायके दुधर्म मिलाया जाता है, तब ( महान्तं त्या) महरवसे युक्त तुझमे ( सिन्धव मही अप. ) नदीका मातमा पानी भी (अनु अर्पति) मिलाया जाता है ॥ ४॥ [२०४१] (समुद्रः) जलमय ( दियः विएम्भः) पुलोकको धारण करनेवाला और (धरणः ) आपार वेने. वाला और ( अस्मयुः सोमः ) हम चाहनेवाला सोम (पवित्रे अप्सु मामृजे) वर्तनके पानी में बारबार धोया जाता है ॥४॥ [१०४२] (पा महान् हरिः) बलवर्षक, महान् और हरे रगका तया (मित्रान दर्शतः ) मित्र मान बर्शनीय सोम ( अचिमदद ) शरद परता है और (सूर्येण सं दियुते ) सूर्यके समान धमक्ता है ॥ ६ ॥ [ १०४३] है इन्दो) सोम! (ते ओजसा ) तेरे सामध्यंसे (अपस्यवः गिर ) कर्मकी इच्छा करनेवाले स्तोता स्तुतिके मर मर्मज्यन्ते ) कहते हैं और (याभिः मवाय शुम्मसे ) इन स्तुतियोंसे मानव मनाने के लिए तू पतात किया जाता है॥७॥ [१०४४] हे सोम! (तब महे प्रशस्तये) तेरो महान स्तुतिके लिए (लोकररनु त स्या) सोगोश हित करनेको छावारी हुने (पृप्यये मदाय ) शमा नाश करने के लिए और आनन पटाने के लिए (महे } Rer [ १०४५] (दो) सोम। (यशस्य पूयः मारमा } यज्ञकी मुत्य मात्मा तू { गोश नृपा ) गाय को. पाला, पुर्व देनेवाला तपा (अपवता उतीया) पोरे और मन्न देनेवाला (मसि ) है ॥९॥ [१०४६ ] हे (इन्दो) तोम! (पृष्टिमान् पर्जन्य इव ) वर्षा करनेयाने गेयके समान {मस्मभ्यं ) हमको (इन्द्रियं बलपक सामर्ष (मधो पारया पपस्य) मपूर रसको पारासे है। १०॥ ॥ यहां पहला सण्ड समाप्त हुआ। २] द्वितीया सण्डः। [10] (महिभयः पयमान सोम ) है बहुत प्रसनीप गुम होनेवाले सोम (सन) देवीको प्राप्त हो सभा (जेपि) तामाको बोल (अय) गारमें (माघस्यसः कृधि हमें यादवो कर। १७ (साम. हिन्दी भा २] ३३१३४ ११ 3 361 १ ३१३ (१३० सामवेदका सुवोध अनुवाद [ उत्तरात्रिका १०४८ सना ज्योतिः सना व विश्वा च सोम सौभगा। अथा नौ वस्यसस्कृषि ॥२॥ (ऋ. ९४ार) १०४९ सना दक्षत ऋतुमप सोम मृधो जहि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥३॥ ( ९।५।३ ) १०५० पीतारा पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥४॥ (ऋ ९४४ ) १०५१ व सूर्य में भी मज तव वा योतिभिः । अथा नो वस्यप्तस्कृधि ॥५॥ १।४।५) १०५२ तब क्रत्वा तवोतिमियोपश्येम सूर्यम् । अथा नो वस्पसस्कृधि ॥६॥ ( ९।४६) १०५३ अभ्यर्प स्वायुध सोम द्विचईस रयिम् । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥७॥ (ऋ. ९।४७) १०५४ अश्यानपच्युतो वाजिन्समत्सु सासहिः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥ ८ ॥ (व ९५४१८) १०५५ त्वा यज्ञैरवीवृधन्यवमान विधर्मणि । अथा नो वस्यसंस्कृधि ॥९॥(ऋ. ११४९) १०५६ रवि नचित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥ १० ॥ ४ (चा)। [धा० २२ । उ०११ स्व०२] (. ९।४।१०) E१०४८ हे (सोम) सोम! (ज्योतिः सन ) हमें तेज , (स्यः च विश्वा सौभगा सन ) पुस और मन सौभाग्य दे, (अथ) बादमे (नः यस्यसः कृधि ) कल्याणयुक्त कर ॥२॥ [१०४९] हे (सोम) सोम! (दक्ष ऋतुं सन) बल और यज्ञ करनेका सामप्यं थे, (मृधः अपजहि ) ओको हरा, (अध न. वस्यसः कृषि ) और हमें कल्याणयुक्त कर ॥ ३ ॥ [ १०५० ] हे (पवीतारः) तोमरस तप्पार करनेवाले ऋत्विजो । (इन्द्राय पावरे) इन्द्र के पोनेके लिए (सोमं पुनीतन ) सोमरसको पवित्र करो। (अथ नः वस्यसा कृधि ) हमें कल्याणसे मुक्त करो ॥ ४ ॥ [ ०५१ ] हे सोम ! (त्वं) (तव त्या) अपने कार्यसे और (तच ऊतिमि ) अपने सरसोंसे ('ना सूर्य आ भज) हमें सूर्यको उपासना पारित कर।(अथ नावस्यस कृधि) और हमें कल्याण प्राप्त करा॥५॥ [२०५२ ] है (सोम ) सोम ! (तब ऋचा ) तेरे द्वारा दिए गए शानसे ( तव ऊतिमि ) तेरो रक्षामें रहकर हम(ज्योत सूर्यं पश्येम) महत समयतक सूर्यको देस, (मथ नः घस्यसः धि) और हमें कल्याण प्राप्त करा ॥६॥ [१०५३ ] है (स्वायुध सोम) उतम शास्त्रोंको धारण करनेवाले सोम! (द्वि-यईसं रयिं अभ्यर्ष) तो स्थानोंके धन हम दे। (यथा नः घस्यसः पृषि) और हमें ससी कर ॥७॥ [१०५:] है। याजिन् ! बलवान् सोम (समासु गनपश्युतः) पदम न हारनेवाला और (सासहित) को हरानेवाला तू (शमि अर्प) कलसेमें छनता जा (मथ) मौर (नः यस्यस: फपि) हमें कल्याण प्राप्त करा॥८॥ [१०५५] है (पयमान ) ड होनेवाले सोम | सोग (विधर्मणि) विविध फल देनेशा पाने (पत्या गयीवृधन ) पूजनीय स्तोत्रंसि तेरे महत्वको बढाते हैं। (अय नः परपसा कृषि) अत हमें पल्याण प्राप्त करा |॥९॥ [१०५६ . है (इन्दो) सोम! (म) हमें (चित्रं मयिनं ) विलक्षण, घोसे युक्त और ( विश्वायु, सब लोगोश हित करनेवाले (रवि) पनको (मामर) भरपूर है । ( मथः न यस्यसः पृधि) और हमें कल्याण प्राप्त सप्तम मध्याय ] सामवेदका सुपोध अनुवाद १७३३ रे २५ ३१.3 १ २ १२ २ १०५७ वरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरस मन्दी घावति ॥१॥ (ऋ, ९।२८।१ ) १०५८ उमा घेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः। वरस मन्दी धावति ॥२॥ (ऋ ९५८१) १०५९ ध्वस्त्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दाई । रत्स मन्दी धावति ॥३॥ (ऋ. ९।१८१२ ) १०६० आ पयोनिश तना सहस्राणि च दद्महे । तरस मन्दी धावति ॥३॥५(हा ) [धा०६ 1 ३० नास्ति । स्व०२] ( ९८०४) १०६१ एते सोमा असृक्षत गृणाना: शबसे महे । मदिन्तमस्य धारमा ॥१॥ (रु. ९६६२०२२ ) १०६२ अभि गव्यानि पीतये नम्णा पुनानो असि । सनद्वाज परि स्रव ॥२॥ (स ९।६२।२३) १०६३ उस नो गोमतीरिषो विश्वा अर्प परिष्टुमः । शृंगानो जमदमिना ॥३॥ ६ (वि)॥ [धा०14 1 उ० नास्ति । ०३] (ऋ. १६२१२४) १०६४ हमरस्तोममह जातवेदसे स्थमिव से महमा मनीषया । मद्रा हि न प्रमतिरस्य संसपी संख्पे मा रिपामा क्य तय ।। १ ।। ( ११९४१) ६१०५७ 1 (मन्दीस ) माय देनेवाला वह सोम (तरत् घायति ) सीन हो छल्नोसे नीचे गिरता है, (सुतस्य अन्धसः घारा) इस सोमरसरूपी अन्नको पारा ( धापलि ) दोडती है। ( मन्दी सः तरत् धापति) आनन्द देनेवाला वह सोम छनता हुआ धौड़ता है ॥१॥ [१०५८] ( वसूनां उसा) पन देनेवाली (देवी) चमकती हुई धारा (मर्तस्य मयसा देव) मनमानको रक्षाके प्रकारको मानती है, (स मन्दी तरत् धापति) यह आनन्द देनेवाली पारा शोभतासे बहती है ॥ २॥ [१०५९] ( वनायोः पुरुषन्त्योः) ध्वस्त्र और पुरुषन्तिके (सहस्राणि आदमहे) हजारों प्रकारके धनोंको हम पहण करते हैं। (मन्दी सः) मानव वेनेवाला वह सोम (तरत् घावति ) शीघ्रतासे दौड़ता है ॥३॥ ११०६०] (ययोः । जिस कारण ध्यत्र और पुरुषन्तिके ( त्रिंशतं सहस्राणि ) तीन सौ और हजार ( तना भादद्महे ) बसोंको हम स्वीकार करते मन्दी सा तरत् धावति ) मानन्द देनेवाला वह सोम शोध नीचेके यसनम गिरता है ॥ ४॥ [१०६१] (मदिन्तमस्य पत्तै सोमा) परम बानन्द देनेवाले सोमके पै रस (गृणानाः) स्तुतिके धार (महे रायसे । हमें उत्तम बल परान करने के लिए (धारया असूक्षत ) एक पारसे फलसमें गिरते है ॥ १ ॥ [१०६२] हे सोम ! तु (वीतये ) बेयोंके पौनेको देने के लिए (म्णा गव्यानि ) मनुष्योंको आनन्द देनेवाले झूम मावियोंसे (पुमानः अलि ) पवित्र हगाहमा कलशमें जाता है । (याजः सनत् परित्रय ) अम बेता हुआ कलशमें उतरता है ॥२॥ [१०६३] (उत) और हे सोम ! (जमदामिना गृणानः) जमदग्निके वारा प्रसित हुमा हुमा त (न:) हमे (गोमतीः ) गासि युक्त (परिएभः) प्रशंसनीय (विश्वाः इपः ) सब मा (अर्प) २॥३॥ [ १०६४ ] (भहते जातवेदसे ) पूज्यनीय मीनके लिए (मनीषया) बुद्धिपूर्वक किए गए {इम स्तोम) इस स्तोत्रको ( रथं इव) रपके समान (सं महेम) हम पूज्यनीय करते हैं । (मस्य संसदि) इसकी मारायनामें (नः प्रमतिः ) हमारो भुति (मदा हि) उत्तम पलती है ।(असो ) अग्निदेव । (सव सख्ये ) तेरी मित्रता (वयं मा रिपाम) हम दुखोपा पीमित न हो। १॥
(१३२)
सामपेट्या सुयोध भनुयाद
[ उत्तरार्षिक:
31
1
१
1
३.
१०६५ भराममं कृणवामा वीरपि ते चितयन्ता पर्वणापर्यणा ययम् |
जीवातवे प्रतरा साधयां धियो ने सख्ये मा रिपामा वयं तर ॥२॥ (ऋ. १९४५)
१९६६ शकेम त्वा समिभर साधया धियस्त्वे देवा इपिरदन्याहुतम् ।
त्वमादित्यारा यह वादाश्मस्य सख्ये मा रिपामा वयं व ॥ ३॥७.छो)।
[धा० ३७ । उ०२।२०१०] (ऋ. ११९४३)
॥इति द्वितीय पण्ड' ॥२॥
[३]
१.६७ प्रति वारसूर उदिते मित्रं गृणीपे घरुणम् । अर्यमणर रिशादसम् ।। १ ।। (ऋ. ७६६६७ )
१०६८ गया हिरण्पया मतिरियमकाय गयसे । इयं विणा मेधसातये ॥२॥ (ऋ ७१६६८ )
१०६९ स्याम देव वरुण
ने मित्र यूरिभिः सह। परस्य धीमहि ॥३॥ ८ (हा)।
[धा० ११ । उ० नास्ति । २०२] (२.६६।९)
१०७० मिन्धि विश्वा अप द्विषः परि माधो जही मृधः । वसु पाई वदा भर ॥ १ ॥
(ऋ८४१४०)
[१०६५] हे ( अमे) अग्नि देव! (रम भराम) हम तेरे लिए समिपा एकत्रित करते है (घ) हम
( पर्वणा पणा) प्रत्येक पर्यमे ( चितयन्तः) तुमे प्रदीप्त करते हए (ते हवींषि ऋणयाम । तेरे लिए हवि संप्यार
करते हैं। यह लू (जीवातये ) हमारे दोघजीवनके लिए (घिय प्रतरां साधय ) हमारे याकर्मको पूर्ण कर । है (मने।
अग्निवेय '(तर सण्ये ) तेरी रिता रहकर ( घय मारियम) हम कभी दुखी न हो ॥ २॥
[१०] हे अग्ने ! (त्या समिधं शकेम) मुझे हम उतम रोतिसे जलाते हैं। (घिय। साधय) हमारे यतारि
कर्म उत्तम रीतिरो शिख कर।(त्वे आहुत हतिः) तुम में आहुति के द्वारा की गई हॉपको (देयाः अदन्ति ) देवगण खाते
हा(त्यं आदित्यान् आ यह ) तू अनितिके पुोंको बुलाकर ला (तान् हि उश्मसि) यहाँ हम उनकी इच्छा करते है
(बग्ने) हे अग्ने ! (तय सपये घय मा रिपाम) तेरो मित्रता हम नष्ट न हो ॥ ३ ॥
॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[३] तृतीय. सण्ड ।
[१०६७] हे मित्र और बरण शेयो ! (सूरे उदिते) सूर्पने उरय होने पर (चौ मित्र धरण) सुम दोनों मित्र
और वरुणको तथा (रिसादल मर्यमण) नादाक अर्थमाकी तथा (प्रति ) प्रत्येक देवताओंकी (गृणीपे) स्तुति
करता हूँ॥1॥
[१०६८] हे (चिमा)शानियो। (श्य मति ) पह स्तुति (हिरण्यया राया) हितकारक और रमणीय
धनके साथ ( अवृफाय शवले ) क्रूरतारहित पलको प्राप्तिके लिए और (मेघ-सातये ) यजको सिद्धि के लिए तुम्हें
स्वीकार हो।।२॥
[१०६९] हे (देव यरुण ) वरुणदेव 1 (सूरिभिः सह) विद्वानोंक साप (ते) सेरी भी स्तुति कारनेवाले
हम धनवान (स्याम ) होजे । हे { मित्र ) मित्र । तेरी भी स्तुति करनेवाले हम पनवान् हो तपा (पं च स्व.
धीमहि ) मन और स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करनेवाले हों ॥३॥
[१०६०] हे इन्द्र! तू (विश्वा द्विषः अप भिन्धि ) सब शत्रुओका नाश कर (याधः मृध परि जाहि)
वाधा परनेवाले शत्रुओं का नाश कर । (स्पाई तत् वसु आमर ) और पाहने योग्य पन हमें दे॥१॥
सप्तम भध्याय]
सामवेदका सुबोध मनुवाद
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१२
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॥३॥ ९ (५।।
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१०७१ यस्य ते विधमानुपग्रेर्दत्तम्य वेदति । बसु पाई वदामर ॥२॥ (ऋ. १४२४२)
१०७२ पीडाविन्द्र यतिस्पर यत्पनि परामृतम् । वसु पाहं तदा
[था० १२ । उ०१ । स्व०६ ] ( १५४१)
१०७३ यशस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेपु कर्मसु । इन्द्रानी तस्य पौधताम् ॥१॥
(ऋ. १३८१)
१०७४ तोशासा रथयावाना वृत्रहणापराजिता । इन्द्राग्नी तस्प योधताम् ।। २ ।। (ऋ. १३८।२ )
१०७५ इदं वा मदिरं मन्नधुक्षनदिमिर्नर। । इन्द्राग्री तस्य योधतम् ॥३॥१० (टा )।
[धा० ८ । उ० १ । २०२] ( ८॥३८॥३)
॥ इति तुतीयः खण्डः ॥ ३॥
[४]
१०७६ इन्द्रायेन्दो मरुत्यठे पवस्व मधुमत्तमः । अस्य योनिमासदम् ॥१॥(ऋ. ९।६४।२२ )
१०७७ तं त्वा विप्रा वचोविदः परिष्कृण्वन्ति धासम् ।
स्वा मृजन्त्यायका ॥२॥
(ऋ. १।६।२३)
[ १०७१ ] हे इन्द्र ! (ते दत्तस्य ) तेरे द्वारा दिए गए ( भूरे. यस्य ) बहुतसे जिस पनको (विश्य आनुपक्
पदति) सब मनुष्य क्रमसे जानते है ( तत् स्पाहं वह ना आभर) उस चाहने योग्य पनको हमें भरपूर दे ॥ २ ॥
[५०७२ ] है (न्द्र) इन्द्र ! (यत् वीडी) नो पन मजबूत बनाने में रखा हुमा है, ( यत् स्थिरे ) और लो
जमोनमें स्थिर स्थानपर रखा हुआ है ( यत् पर्शाने ) जो छनके योग्य जगहमें रखा हुमा है, तया जो (पराभूत)
से छोनकर लाया गया धन है ( तत् पाहं घसु नः आभर ) वह चाहने योग्य पन हमें दे ॥३॥
[१०७३) हे (इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्ने ! सुम हो (ही) निश्चयसे ( यज्ञस्य ऋत्विज्ञा स्थ) पतके दिन
हो । (घाजेषु कर्मसु) यसके समान कर्मोमें भी नुम ( सस्नी) शुद्ध रहते हो इसलिए ( तस्य बोधतं ) इस स्तुतिको
तुम जानकर स्वीकार करो॥१॥
[२०७४ ] है ( तोशासा) शत्रुको मारनेवाले (रथ-पावाना) रपसे जानेवाले (पुत्र-हणा) घेरनेवाले
माधुओंके नाश करनेवाले (अ पराजिता) पराजित न होनेवाले ( इन्द्राग्नी ) इद और आने । (तस्य योधत ) उस
मेरों स्तुतिको सुनकरके स्वीकार करो ॥ २ ॥
। १०७५] हे (इन्द्राग्नी) इम्र और भग्ने ! (वा) सम्हारे लिए (नस) स्विजोंने (अद्रिभिः) पत्थरोंसे
(मदिरं मधु अधुक्षन् ) आनन्द देनेवाला मीठा सोमरस निकालकर तप्पार किया गया है (तस्य योधतं) उस सम्बन्धी
मेरी स्तुति तुम जानो ॥ ३॥
। यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुभा ॥
[४] चतुर्थः खण्डः।
[२०७६ ] है (इन्दो ) सोम! ( मधुमत्तमः } अत्यन्त मोठा ऐमा तू (अस्य योनि भासद) पूग्य यशके
स्थान में बैठने के लिए तया (महत्वते इन्द्राय पवस्व ) मौके साथ जानेवाले इनके लिए तू शुर हो ॥१॥
[१०] हे (इन्दो) सोम !( पर्णसिं त्वां ) उस धारणशक्तिसे पुक्त तो (धचोविदः विप्राः ) वाक्यमा
अर्थ जाननेवाले ज्ञानी ( परिष्कृण्यन्ति ) सुशोभित करते हैं। (आययः) ऋत्विजलोग ( त्या सं सृजान्ति ) तुझे उता
प्रकारसे गुट करते है ॥ २॥
(१३)
सामवेदना सुयोघ भनुपाद
[उत्तरार्चिकः
३1२
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२३
२३ ३११
१०७८ स त मित्रो अर्यमा पिपन्तु वरुणः कवे । पयमानस्य मरुतः
[पा. १४ । उ० नास्ति । स०१] (ऋ. १६४।२४)
१०७९ मृज्यमानः सुहस्त्या समुद्रे याचमिन्यसि ।
रयि पिशॉ बहुलं पुरुस्पृह परमानाम्यसि ॥१॥ (१.९।१०४१२१)
१०८० पुनानो पारे पर्वमानो अव्यये वृपो अचिक्रददने
देवाना सोम परमान निष्कृत गोभिरखानो असि
॥२॥१२ (वि)।
[धा० २४ । उ० ११ स्व० ३) (२.९।१०।२२)
१०८१ एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम् । समादित्येभिरख्यत ।। १ ।। ( ९।६११७ )
१०८२ समिन्द्रेणीत वायुना सुत एति पवित्र आ सिर सूर्यस्य रश्मिमिः॥ २ ॥ (अ.९६६११८ )
१०८३ स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान् । चारुमित्र वरुणे च ॥३॥ १३ (टि) ॥
[धा०८।०१।१०३] (ऋ. ९१६११९)
॥ इति चतुपंः खण्डः ॥ ४॥
[५]
१०८४ रेवतीनः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविधाजा: । क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥१॥ (ऋ. ११३०१३)
॥ १०७८] हे ( फो) क्रान्ती सोम । (परमानस्य ते रस) पवित्र होनेवाले तेरे रसको ( मित्रः वरुणः
अर्थमा मरतः पिबन्तु ) मित्र, घरुण, अर्पमा और महत् पौवें ॥ ३ ॥
[१०७२] (सु-हस्त्या ) सुन्दर अगुलियोसे (मृज्यमानः ) शुद्ध किया जानेवाला सोम (समुद्रे पावं
इन्वसि ) फलशमें शन्द करता हुमा गिरता है । हे ( पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम! ( पिशंग पुरुस्पृशं ) सोनेके
रंगके तथा अनेकों द्वारा चाहने योग्य ( बहुलं रयि अभ्यर्षसि ) बहुत घन सू देता है ॥१॥
[१०८] (घृषः पुनान.) बल बढानेवाला, शुद्ध होनेवाला ( अव्यये घारे पवमानः) भेंडके पालोको
छलनीसे छननेवाला ( चने मचिक्रदत ) पानीमें शरद करते हुए गिरता है। है ( पवमान ) शुस होनेवाले सौर!
तू ( देवानां देवताओंके लिए (गोभि अंजान ) मायके दूधके माय मिलाया जाता है और ( निष्कृतं असि ) गुद
किए हुए स्थानपर तू जाता है ॥२॥
[१०८१] (सिन्धु-मातरं त्यं पतं ) सिन्य जिसकी माता है ऐसे इस सोमको ( दशक्षिपः) बस अंगुरिया
( मृजन्ति ) शुद्ध करती है। वह मोम ( आदित्येभिः समण्यत ) आदित्योंको प्राप्त होता है ॥ १॥
[१०८२ ] (सुतः ) सोमरस ( पचित्रे ) कलशमें ( इन्द्रेण सं पति } इन्द्रको प्राप्त होता है । ( उत वायुना
आ) और वायुको भी प्राप्त होता है।हया (सूर्यस्य रश्मिमि सं) सूर्यको किरणोके साप मिलता है ॥२॥
[१०८३] हे सोम' { मधुमान चाहः सः) मीठा और सुन्दर यह (नः) हमारे यज्ञमें ( भगाय, यायचे,
पूष्णे, मित्रे, धरणे ध पवस्व ) भग, वायु, पूषा, मित्र और वरुणके लिए पवित्र हो ॥३॥
॥ यहां चौथा खण्ड समाप्त हुमा ॥
[५] पञ्चमः खण्डः।
[१०८८ (सुमन्तः ) अनके पास रहनेवाले हम (यामिः) जिन गायोंके माय रहकर ( मदेम ) आमग्दका
उपभोग करते है. (इन्द्रे सघमादे) उस इन्द्र के साथ एक स्थानपर रहकर (न:) हमारो वे ( रेवती) वृष
और घी देनेवाली और (तुविवाजाः सन्तु ) पलसे मुक्त हो ॥१॥
सप्तम अध्याय
मामयेदका सुयोघ अनुवाद
१०८५ आप त्वावान् मना युक्तः स्तोम्यो भृष्णवीयानः । ऋणोरक्ष न चक्रया ॥२॥
१०८६ आ यद् दु: शतक्रतवा कामं जरितॄणाम् । ऋणोरक्षं न शचीभिः ।। ३ ।। १४ (ठी ) ।।
[धा० १८ । उ०२।१०४ } (ऋ. १।३०।१५)
१०८७ सुरूपकृत्नुमूतये सुदुपामिव गोदु है । जुहूमसि यद्यिपि ॥१॥ (१४१)
१०८८ उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिच । गोदा इंद्रेवतो मदः ॥२ ।। ( ४ )
१०८९ अया ते अन्वमानां विद्याम सुमतीनाम् । मा नौ अति रूप आ गहि ॥३॥ १५ (फी)।
[पा० ११ । उ० । स्व. नास्ति ] ( ३ )
१०९० उमे यदिन्द्र रोदसी आपप्रायोषा इव । महान्तं त्या महीना सम्राजं चर्षणीनाम् ।
देवी जनिपजीजनद्रा अनिपजीजनत्
११॥ (ऋ. १०।१३४१)
१.९१ दीर्घ र हाकुशं यथा शक्ति विमर्षि मन्तमः । पूर्वण मघवन्पदा क्यामजी यथा यमः ।
देवी जनियजीजनद्रा जनित्यजीजनद
॥२॥ (ऋ. १०११३४६)
८१०८५] है ( पृष्णो ) पैर्यवान् इन्द्र ! (त्यावान् ) तेरे समान { रमना युफ्तः ) मरिसे युक्त होकर
(ईयानः ) प्रार्थना करने के बाद ( स्तोस्तृभ्यः ) स्तोताओंके लिए इष्ट पदार्थ ( य आ णो. ) अवश्य दे, (चयो
मक्षन) जिस प्रकार दोनों पकोंको रथको पुरा मिलाती है या सयुक्त करती है उसीप्रकार स्तोताओंको मनसे
संयुक्त कर ॥२॥
[ १०८६ ] हे ( शत-तो) सेसडो कर्म करनेशले हन्द ! ( २५ दुव कामं ) उपाराकोका जो इच्छित पर
है यह (जरितॄणां आ ऋणो ) स्तुति करनेवालोंत्री दिला ( शचीमि. अक्षं न ) जिस प्रकार रयको उत्तम अवस्थासे
उसके हालको भी गति मिलती है, उसीप्रकार स्तुति करनेवालोंको धन मिले ॥ ३ ॥
[१०८७ ] ( सुरूपातुं ) सुदाप करनेवाले इन्द्रको (ऊतये ) अपने सरमणके लिए ( घधि धपि जुहमति)
प्रतिदिन हम बुलाते हैं। (गोदुहे सुदुघ इव ) दूध दुहने के समय ग्बाले जिस प्रकार दुधारू गायोंको भुलाते हैं, उसी
प्रकार हम इन्द्रको बुलाते हैं ॥१॥
[१०८८ ] है ( सोमशः) सोमरस होनेवाले इन सोमरस पीने के लिए (नः सपना उप मागति) हमारे
पत्तोंके सपनों आ। (सोमस्य पिध ) सोम पो, और तू (रेवत मद. गोदा ९ पनवानोको आनन्द और गाय
देनेवाला हो ॥२॥
[१०८९1 (अध ) सोम पीने के बाद (ते अन्तमानां सुमतीनां विद्याम ) तेरे पास रहनेवालो उत्तम बुद्धियोंको
हम जान, दू भी हमारे पास ( मा गहि ) आ।(नः मा अति रुपः ) हमें छोकर दूसरोको उस हानको मत बता ॥३॥
[१०९० है (इन्द्र ) इन। (उभे रोदसी ) दोनों ही चुलोक और एम्बोलोकको ( उपाइच ) उया जिस
प्रकार अपने प्रकाशसे सब जगतको भर देती है, उसीफार तू भी ( यत् आपमाथ) जर भर देता है तब ( महीनों
महान्तं ) महान्से महान ( चर्पणीनां सम्राजं स्वा) मनुष्यों के सम्राट तुझे ( देवी जनिधी ) देश्माता अदिति । मजी-
जनम् ) उत्पन्न करती है, (भद्रा जनिधी अजीजनत् ) कल्याण करने वाली माता उत्पन्न करती है।॥ १॥
[१०९१] हे (मन्तुम ) ज्ञानवान् इन्द्र! (दीर्घ अंकुशं यथा) महान् शस्त्रको धारण करने के समान
(शक्ति मितिमापितको पारण करता है, है (मथान् ) इन्द्र । (यथा अजः पूर्वेण पदा) जैसे मकरा मागेके
परसे { घयां यमः लोको नियंत्रित करता है उसीप्रकार तू शत्रुको निमंत्रित करता है, तुने ( देवी जनित्री अजी-
जनत् ) मरिनिरेपौने जन्म दिया है. भद्रा जनित्री अजीजनत् ) करपाण करवानी मावाने तुम्न प्रकट किया है ॥ २॥
(२३६) सामवेदका मुयोध अनुयाद [उत्तरार्चिकः २ 3. कर 3 १ 3 २ - २ २४ 3" २ ३१२ ३३.३३" १०९२ अब स दुहणायतो मर्तस्य तनुहि स्थिरम् । अघस्पदं तमी कृषि यो असार अमिदासति । देवी जनियजीजनद्भद्रा जनित्यजीजन ॥३॥ १६ (यो)॥ [ धा० ४२ । उ० नास्ति । स्व०१० (ऋ १०११३४२) ॥ इति पचमः सण्डः ॥ ५॥ [६] १०९३ परि स्यानो गिरिष्टा पचित्र सोमो अक्षरत् । मदेषु सर्वधा असि ॥ १॥ (ऋ.९।१८।१ ) १०९४ त्वं विप्रस्त्वं कविर्मधु म जातमन्धसः । मदेषु सर्वधा असि ॥ २॥ (ऋ. ९।१८०२) १०९५ त्ये विश्वे सजोषसो देवासा पीतिमाशत । मदेपु सर्वधा असि ॥३॥ १७ (खा)॥ [धा०११। उ० २ । स्व०२1 (ऋ.९।१८३) १०९६ स सुन्य यो वरना यो रायामानेवा य इडानाम् । सोमो या सुक्षितीनाम् ॥१॥ (ऋ.९।१०८।१३) १०९७ यस्य त इन्द्रः पिपाद्यस्य मरुतो यस्य वार्यमणा भगः । आ येन मित्रावरुणा करामह एन्द्रमवसे महे ॥ २ ॥१८ (ली) [धा०९ । उ० नास्ति । ५० ४ ] (ऋ.९१०८०१४) [ १०९२ ] ( दुई गायतः मर्तस्य ) दुष्ट मात्रफे स्थिर अव तनुहि ) स्थायी पलको क्षीण कर, (या अस्मान अभिदासति ) नो हमें दास बनाना चाहता है (अधस्पदं कृधि ) उसे नीचे दबा । (देवी जनिधी अर्जी. जनत् ).अदिति माताने तुझे उत्पन्न किया है, (भद्रा जनित्री अजीजनत् ) कल्याण करनेवाली माताने तुझे प्रकट किया है ॥ ३ ॥ । यहां पांचयां खण्ड समाप्त हुआ ॥ ६] षष्ठः खण्डः। [१०९३] (गिरिष्ठ स्वानः सोम ) पर्वतपर रहनेशामा, रस निकाला गया सोम ( पवित्रे परि अक्षर छलनीसे टपकता है । हे सोम! ( मदेषु सर्वधा असि ) आनन्ददायक पदार्थोमे सू सबसे अधिक श्रेष्ठ ह ॥ १ ॥ [१०९४Jहे सोम! (स्वं विप्रः)सू ज्ञानी है, (वं कविः) तू दूरदर्शी है, तू (अन्धसा जातं मधुम) अनसे उत्पन्न मधुर रसको देता है। (मदेषु सर्वधा असि ) मानन्द देनेवाले रसोंमें त सबसे उत्तमहं ॥२॥ [ १०९५] हे सोम ! (सजोपसः विश्वेदेवासः) एक कापं जुटकर करनेवाले सब देव ( त्वे पीति माशत) सेरा रस पानेको इच्छा करते हैं। ( मदेषु सर्वधा अलि ) मानन्द देनेगालोमें सबको अपेक्षा तू हो अधिक श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥ ८१०९६] (यः सोमः ) जो सोम (वसूनां मा नेता) धनोंको लानेवाला (या रायां )जोगायोंको लानेवाला (यः रडाजो अन्न लानेवाला, (यः सुमितीनां )ो उत्तम पुत्रोंको और नौकरोंको देनेवाला है, (सामन्ये) उस सोमके रसको निकाला जाता है ।। १०२७] हे सोम! ( यस्य ते इन्द्रः पियात् । जिप्स सेरे रसको इस पोता है, (यस्य मरुतः) जिाका रस महत् पीते हैं (वा) अयषा (यस्य अर्यमणा भग.) जिसके रसको मर्पमाके साथ भग पपीते है, ( येन महे अवसे) नित सोमके द्वारा महान् संरक्षणके लिए ( मित्रावरुणा मा) मित्र और वरुणको बुलाया जाता है, उसोप्रकार (इन्द्रः भा)को मुलाया है ॥२॥ - सप्तम अध्याय] सामवेदका सुपोध अनुवाद (१३७) १३१ ३. ... , "१२ ३१ 7 ३२ १०९८ तवा मखापो मदाय पुनानममि गायत । शिशु न हव्यैः सदयन्त गतिमिः ॥ १॥ (ऋ ९१०११) १०९९ सं वत्स इव मातभिरिन्दुहिन्यानो अज्यते । देवाचार्मदी मतिभिः परिष्कता ॥ २॥ (९३१०५।२) ११०० अयं दक्षाय साधनोऽपर शर्धाय वीतये । अयं देवेभ्यो मधुमत्तरः सुतः ।। ३ ॥ १९ (पि)॥ [फा० १७ । उ० नास्ति । २०३](ऋ. ९१.२॥३) ११०१ सोम सोमाः पवन्त इन्दवोऽसभ्यं गातुवित्तमाः । मित्राः स्वाना अरेपसा वाष्पा स्वर्विदः ॥१॥ (१.९।१०१११०) १००२ ते पूतासो विपश्चितः सोमासो दयाशिरः । खरासो न दर्शतासो जिगलको ध्रुव घृते ॥२॥ ( ९/१०१०१२) ११०३ मुयाणासो व्यद्रिभिधिताना गौरधि त्याच हपमस्मभ्यममिता समस्वरन्यसुविदा ॥३॥ २० (पा)॥ [घा० १0 1 3० नास्ति । २०२ (*. ९/१०११११) [ १०९८ ] है ( सखाय ) विनरूपी मित्रो ! ( या महाय } तुम देवताओंको आनन्द देने के लिए (पुनान तं अभि गायत ) छाने जानेवाले उस सोमके स्तोत्रोंका गापन करो। (शिन ) निसप्रकार मानाय भालकको मुशोभित करती है. उसोप्रकार सोमको ( हन्यः गृतिभिः स्वदयन्त ) हवि और स्तुतियोंके द्वारा और स्वादिष्ट वनाओ ॥ १॥ [ १०९९] ( देवाची मदः ) देवोंका रक्षक और मानन्ददायक, ( मतिभिः परिष्कृतः ) स्तुतियोंसे शुद्ध किया गया और ( हिन्धानः इन्दुः) पालकों को प्रेरणा देनेवाला सोम ( सं अश्यते ) पानी मिलाया जाता है। ( मातृभिः यत्सः च ) माताले द्वारा बच्चा निराप्रकार नहलाया, पृतमया जाता है, उसोप्रकार सोम पानी के द्वारा साफ किया जाता है॥२॥ [११०० ] ( अप दक्षाय साधनः ) यह सोम सल यहानेका सायन है, ( अयं शर्घाय ) मह सोममल बहाने लिए और ( पीतये । पोनेके लिए है. (अयं सुतः ) इसका रस निकालनेके बाद (देवेभ्यः मधुमत्तरः ) वह देवकि लिए अधिक मोठा होता है ॥ ३ ॥ [१९०१ ] (मित्राा स्वाना ) मित्रके ममान हितकारक, निधो गए ( अरेपसः स्थायः निष्पाप और उत्तम लक्ष्य बेने योग्य (स्वाविदः) मात्मवशी ( गातु वित्तमाः इन्दवः सोमाः ) प्रशसनीय, बमकवाले सोमरस (अस्मभ्यं पवन्ते ) हमारे लिए कलशमें छाने जाते हैं॥१॥ [११०२] पुतासः विपश्चित पवित्र और ज्ञानी (अत्याशिर ) दहीके साथ मिले हुए { धृते जिगत्नयः ) जलमें मिलाये जानेवाले (धुवा. ते सोमासः) कलशमें रहनेगले के सोमरस (सूरासः न ) सुयके समान (दर्शतास) दर्शनीय है ॥२॥ [११०३] (गो अधि त्वचि ) मलके चमडेपर (विताना.) रहनेवाले (वि अद्विभिः सुप्यानास.) अनेक पत्थरोसे कट जानेवाले ( वसुषिदः) धन देनेवाले ये सोम ( अस्मभ्यं अभितः हर समस्वरन् हमें चारो औरसे पन देते है।। ३॥ १८ [सान हिन्दी मा.२] (
(१३८)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
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११.४ अपा पवा पवस्वैना वसूनि माश्वत्व इन्दो सरसि प्र पन्त ।
बनवियस्य वातो न जूति पुरुमेधावित्तकवे नरं धात्
॥१॥ (प्र. ९९७/१२)
११०५ उत न एना पाया पधाधि श्रुते श्रवाथ्यस्य तीर्थे
पष्टिय सहस्रा नैगुतो पनि वृक्षं न पकं धूनषद्णाय ॥२॥ (ऋ. १९७६३)
११०६ महीमे अस्य वृप नाम शूपे माश्यत्वे वा पृशन वा पत्रे
१२.१३३३३
अस्वापयनिगुतः हयचापामित्रार अपाचितो अचेत
॥ ३ ॥ २१ (कि)॥
[पा०१६ । उ० १ । स्थ० ३ ] ( ९९७५४)
॥इति षष्ठः खण्डः ॥६॥
[७]
११०७ अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भुवो वरूध्या ॥१॥ (ऋ १।२४।१)
११०८ पसुरनिर्वसुश्रया अच्छा नाक्षि धुमत्तमो रयिं दार
॥२॥ (ऋ. १२४२)
[ ११०४ ] हे सोम! ( अया पवा ) इस पवित्र पारासे ( एना वसूनि ) इन पनोंको हमें (पयस्व ) वे । हे
दो) सोम (मांश्चत्वे सरसि प्रधन्य ) इस पूजाके योग्य पानी में तू जाकर मिल जा, ( यस्य) जिसके
रसको पीकर ( ग्रनः चित् ) सूर्य भी ( वातान ) वायुके समान (जूर्ति ) वेगको प्राप्त होता है, और ( पुरुमेधाः
चित्) अत्यधिक बुद्धिमान् इन्द्र (तपवे मां ) सोम प्राप्त करनेवाले मुझे (नरं धात् ) नेता होने के योग्य पुषको
देता है ॥३॥
[११०५] है सोम ! (उत याय्यस्य तीर्थे ) और स्तुतिके योग्य ऐसे तेरे स्थानपर (नःश्रुते ) हमारे यश में
(एना पचया) इस पवित्र पारसे (पवम्व) तू छनता जा । ( नगुतः) शओंका नाश करनेवाला सोम (पष्टिं
सहसा वसूनि ) साठ हजार घन ( रणाय ) शत्रुके साथ युद्ध करने के लिए (धूनवत् । हमें देघे, (पक्वं वृक्षं न)
पके हुए फल देते हैं, उसीप्रकार हमें पन दे ॥ २॥
[ ११०६ ] ( मही घृप, नाम ) बहुत सारे बाणों को मारना और शत्रुको मुकाना ( इमे अस्य शपे ) ये दोनों
हो सोमके कार्य सुखकारी है। ये काम (मांश्चत्वे) घोके साथ होनेवाले पुलमें किए जाते है ( या पृशने) अथवा
बाहुओंके युद्ध में ( घा वचत्रे ) अथवा हापोंसे शत्रुओंके करल करनेके समय किए जाते है, ( निगुतः अस्यापयन् ) को
शमोके सोते हुए अपवा ( स्नेहयत् ) शत्रुके भागते समय किए जाते है, हे सोम! ( अमित्रान् ) तय शत्रुओंको दूर कर
(इतः अपाचितः ) यहाँसे शत्रुओंको तू दूर कर, ( अप अच) उन्हें बहुत दूर कर ॥ ३॥
॥ यहां छठा खण्ड समाप्त हुआ ॥
[७] सप्तमः खण्डः।
[११०७] हे माने । (घरूष्यः स्य) सेवा करने के योग्य तू (नः अम्तमः) हमारे पास रह (उत ) और
(त्राता) हमारा रक्षक हो, तथा हमारा (शिवः भव ) कल्याण करनेवाला हो ॥१॥
[११०८ ] ( वसुः यसुश्रवाः आगः ) निवासक और पनो के लिए प्रसिद्ध अपनी तू (अच्छ नक्षि) सीधे
हमारे पाप्त आ, और (घुमचम रयिं दा.) तेजस्वी होकर हमें धन दे ॥२॥
सप्तम भध्याय) सामवेदका सुयोध अनुवाद ३११ १३ 2- ३ १ स्वा शोचिष्ट दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे ससिभ्यः ॥३॥२२ (चा)॥ { घा०१५। ३० नास्ति । २०२] ( ५१२४१३ ) १११० मा नु के भुवना सीपधमेन्द्रश्च विश्वे च देवाः 1॥ १ ॥ (इ. १०११५७१) ११११ यज्ञ च नस च मजा चादित्यैरिन्द्रा सह सौषधातु ॥२॥ (ऋ १११५७१२) १११२ आदित्यैरिन्द्रः सगणो मदिरस्मभ्यं मेषजा करत ॥३॥ २३ (छा)॥ [धा० १२ 1 उ० २१ २०२] ( 9 10१५७१३) १११३ म व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विभाय गार्थ गायता य जुजोपते ॥१॥ १११४ अर्चन्य मरुतः स्वकी आ स्तोमति श्रुतो युवा स इन्द्र। ॥२॥ १११५ उप प्रक्षे मधुमति क्षिपन्तः पुष्पम रयि धीमहे त इन्द्र ॥३॥ [धा०२ । ३० नास्ति । व१] ॥इति सप्तम. सड॥७॥ ॥ इति धतुर्थप्रपाठफस्य प्रथमोऽर्थ ॥४॥ ॥ इति सप्तमोऽध्याय ॥ ६ ॥ [१०९ है ( शोचिष्ठ दीदिय ) तेजस्वी और प्रकाशनेवाले अग्निोम | { सुम्नाय सखिभ्यः ) सुखके लिए और मित्र तपा पुत्रादिको प्राप्ति के लिए (नूनं ईमहे । निश्वयसे हम प्रार्थना करते हैं ।। ३ ।। [१११०] (हमा भुवना ) ये भुवन (नु क सीपधेम ) हमारे सुझके साधन यनें । ( इन्द्रः च विश्वेदेवा. च) इन्द्र और सब देव हमें सुख देवें ॥१॥ [११११ ] (आदित्यैः सह इन्द्रः) आदिस्योंके साप इन्द्र (नः यज्ञ ) हमारे पतको (तन्यं च ) और हमारे दारीरको ( प्रज्ञा च) और पुत्रपौत्रोंको { सीपधातु ) उत्तम सफल करे ॥ २॥ [१११२१ (आदित्यैः मरुद्भिः ) आदित्य और मरतोंके तपा ( सगणः इन्द्रा ) पोंके साथ रहनेवाला इन्द्र (भस्मभ्यं । हमारे लिए (भेषजा करत् ) औषधं तम्यार करे, रोग दूर करे ॥ ३॥ [ १११३ ] हे मनुष्यो। विसाय वृत्रहन्तमाय) शानो और पत्रको मारने वाले (इन्द्राय ) इसके लिए) तुम (गाथं प्रगायत ) स्तोत्रोंका गान एरो, ( य जुजोषते ) जिन्हें यह सुनता है ॥ १ ॥ [१११५ ] (मु-अर्का. मस्ता) उत्तम तेनायो महत (अई अन्ति) पूजमीर इनकी पूजा करते है। (श्रुत गुवा आस्तोमति ) नानी युवा प्रशसित होता है, (स. इन्द्र ) वही मन्त्र है ॥ २ ॥ [१९१५] है ( इन्द्र)! (ते मधुमति प्रक्षे) तेरे उतम निरीक्षण (उपक्षियात) रहनेवाले हम (पुष्पेम) पुष्ट हो और (गय धीमहे । धनीको धारण करें ॥ ३ ॥ ॥ यहां सातवा खण्ठ समाप्त हुआ। ॥ इति सप्तमोऽध्यायः॥
सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः सप्तम अध्याय इस सातवें अध्याय में अन्य देवताओंका वर्णन करनेवाले ३ याधः परिजहि, स्पार्ह तद् भाभर [ १०५० ] कुछ ही मत्र हं । जय कि सोनके वर्णन करनेवाले महत -पापा डालनेवाले शोंको जीत और पाहने योग्य पोंको मारा है। पहले हम अन्य देवोशा वर्णन देखेंगे, क्योंकि हमें भरपूर थे। रामपानके पार इन्द्र यह राम करता है। रेवोरे लिए हो सोम है। प्रथम इन्द्र के वर्णन देखिए- इन्द्रका धन देना १ हे इन्द्र ! ते दत्तस्य भूरेः यस्य विश्व-मानुपः १ सुरूपरतुं ऊतये घविधान जुठुमसि [ १०८७] आनुष वेदति [१०७१]- हे इन्न ! तेरे द्वारा दिए गए -सुन्दर रुप मनानेवाले इन्द्रको अपने सरक्षणके लिए हम धनको सब मनुष्य एक साथ जानते है । प्रतिस्नि मुलाते हैं। जात्में जो सौन्दर्य है, वह इन्द्रकाही २६ इन्द्र । यत् घोडी, यस्थिरे, यत् विपर्शाने, मनापाहमा है ऐसे उस इन्द्रको अपने संरक्षणके लिए हम यत् पराभृनं तत् स्पाई यतु ना आभर [ १०७२/-है बुलाते है। इन्द्र । जो धन मजबूत सजानेमें है, जो पिर जगहमें रखा २ आगदि नामा अतिरयः [ १०८९]-हमारे पाग हुआ है, न छुनै योग्य जगहमें रखा हुआ है अपवा जो पात्रः भा, हम पर हमारी रात किसी दूसरेको न यता। ओंको पराजित ररपे लाया गया है, उस पाहने योग्य पनको ३ हे मन्तुमः! दीर्घ अंपुशंशतिविर्षि [१०९१] हमें भरपूर वे । -महान् मात्र समान वाली शक्तिरीतपारण परता इस प्रकार इस धन देता है। है। इन शासि सोसाय सागर उसको हरा। अग्नि सोमपा:!नःसवना आगदि सोमस्थपिय अग्नि देवतारे सम्बंध में पयामहा है, भय उस पर विधार ग्यतः मदः गोता [१०८८]-हे गोम पोनेषासेम! परते भूरमारे यहमें मा, गोम पी। मनवानोंको प्रसपता गाय देनेशानी होती है। १३ अग्ने ! ते मण्ये व्यं मारिपामा १०६४- हे मग्ने ! तेरे साप मित्रता होनेवे याद हमारा माल होने वाला इन्द्र शत्रुओंको दूर करता है नहीं है। हमारा मित्र हो गया है स मतमा ही यह । दुईणायतः मतस्य स्थिरं भरतनुदि [ १०१२ [ है कि हमारी हर प्रकार रक्षा निस्स देह होगी। -दुष्ट पत्रके रिपर बलरी भीगर २. हे भग्ने । मं भराम, ते हयापि एणयाम, • य. अरमान मभिदासति तं अघस्पदं दृषि जीयातये धिपः प्रतरां साधय [ 1.113- हे भग्ने । १०९२)-को हमें रास बनाना चाहता है, उसे वारे। हम सेरे लिए समिपा एरति रते हैं. सेरे लिए हवन परे हो ये सराप है, इसलिए चारों भोरगे इनको मारी गरि श्रेष्ठ पर, हमारे मोरो पदारे साप पूर्ण । सापनी एकदिन परसे ई, हर्षे दीपा प्राप्त हो इसलिए मासा रोती है। इन्द्रको सोम दिया जाना ३ त्यं मादित्यान् गा पा [१०६१]- तु मारियों पा से मा। १न्द्राप पात सोम पुनीतन [१.५० ]- हमारे पथग्ने ! स्यं नः अन्तमा, पाता शिषभप पोनो लिए तुम मोम मानरापार रो। [१७] भान हमारे पासा मित्र है, मान हद पिया शिषः मप भिन्धि{ ..] मारा सामनेगला मोर पम्याण मा हो। Prमारे सब प्रसार गोरो मारमनीमरार ५ पनुः यमुश्रया मातः पुमत्तमः गाना पीता है और उसमे गमाहित होर गे पुरता म [११.८-१मने 1 प्रत्वमा गएर है. मापार सेवामी है, ऐगा पन।
सप्तम अध्याय) सामवेदना सुबोध अनुवाद (१४१) प्रशरी मारमा कहा । सोमक गुण ६ हे शोचिष्ठ दीदियः । त्या सुम्नाय सखिभ्यः ३ हे सोम! यस्य ते हन्छ। पिपाद, मरुतः, अर्य. ईमहे (१९०९- है सेनस्थी और प्रकाशित होनेवाले मणा, भगः, मिनावस्था [१०९७ 1- हे सरेम ! तेरा मग्निरेध ! हमें सुख और पुत्रपौत्र मिले इसलिए हम तेरी रस इन्द्र पोता है, और महत, अर्थमा, भग, मित्र और वरुण प्रार्थना करते हैं। भी पीते हैं। इस प्रकार अग्निके सम्बन्ध इस अध्याय मन्त्रालय इस प्रकार यन सर देव सोमरस होते हैं। और अग्निके मात्र देखिए- पर्वत पर सोम होता है इन्द्र और अग्नि १ गिरिष्टाः स्थानः सोमः पवित्र परि अक्षरस्, १ सोशासारथयानावहणा अपराजिताइवानी। भदेषु सर्वधा असि [ १०९३ ]- पर्वतपर होनेवाला सोम, तस्य योधत [ १०७४ }- हे इन्द्र और अग्ने । तुम शधुको रस निकालने के बाद छलनीसे छाना जाता है। वह आगार मारनेवाले वीर हो, तुम रयसे जाते हो, पुत्रादि भसोरोमारते बनानेवाले पदार्योंमें सबसे अधिक आनन्द बढानेवाला है। हो, तुम्हारो कभी भी पराजय नहीं होती। हम तुम्हागे स्तुति सोम यज्ञकी आत्मा है करते हैं, उन्हें गुम जानो। १ हे इन्दो | यशस्य पूर्यः आत्मा { १०४५]-हे २ वां अद्रिभिः मदिरं मधु अधुक्षन् । १०७५ - सोम त यहको पहलेसे ही आत्मा है। तुम्हारे लिए परपरोंसे कूटफर यह आनादायक रस निकाला सोमन हो तो पज्ञ भी नहीं हो सकता। इसलिए इसरो गया है-इस रसरो स्वीकार करो। मित्र, वरुण और अन्य देव हे विप्रा.! इयं मति। हिरण्ययाराया, अवृकाय १ यत्रस्य ज्योतिः [१०३१]- मशका तेज । नावसे मेधसातये । १०६८]-हे ज्ञानी मित्र और वरुणो! २ मियं मधु। १०३१ ]- प्रिय और मोठा । हितकारक और रमणीय धनको प्राप्ति के लिए करतारहित ३ पिता [ १०३१/- पिता, पालक । मलको प्राप्तिके लिए मोर मुद्धिको प्राप्ति के लिए हम तुम्हारी ४ जनिता [ १०३१ 1- उत्पप्रकर्ता, नाना प्रकाएकी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम स्वीकार करो। शान्ति उत्पन्न पलेवाला। २१ च स्वः धीमहि [१०६९]- हम अत्र और ५ पिभु यसुः [१०३१]-बहुतसा वैभव जिसके पास है। आनन्द प्राप्त करनेवाले होवे। ६ मदिन्तमः । १०३१] -मत्यन्त मानन्द देनेवाला । ३ भादित्यैः सह इन्द्रः नः यज्ञ, तन्वं प्रजांच ७ मत्सर, (१०३१/- आनन्द देनेवाला। सीपधातु [ ११११]-बारह आदित्यो साथ इन्द्र हमारे ८ इन्द्रियः [१०३१ - इन्द्रियोंको सक्ति बढानेवाला, पसमें भाये तथा हमारे शरीरको और हमारे पुत्रपौत्रोंको इनकी शक्ति बढानेवाला। उत्तम सहायता देवे। ९दिवः पतिः [१०३२]- लोकका स्वामी, घुलोकत इस प्रकार मित्र, पण और अन्य देवोश वर्णन माया है। पर रहनेवाला। भब हम सोमवा वर्णन, जिसका शिम अध्याय विशेष १० विचक्षण:१०३२- विशेष मानी। महत्व है, देखते हैं। ११ वाजी [ १०३२ - बलवान, अनवान् । १२ हरितः [१०३२- हरे रगका। देवोंके लिए सोम १३ शुक्रः[ १०३४]-स्वच्छ, वीर्यवान्, मल बहाने [पुत: मादित्येभिः समग्यत [ १०८१]- सोम वाला, बलवान् । आदित्योंग प्राप्त होता है। १४ भाशु. [ १०३४ ] - शीताले कार्य करनेवाला। २ इन्द्रे वायुना सूर्यस्य रश्मिभिः स [१.८२ ] १५ सोम [ १.३४ - सोमलता, तोमरस । इन्द्र, पाय और सूर्य किरणको भी प्राप्त होता है। १६ दुः[१०३८] तैमस्यो, बस्नेवाला।
सामवेदका सुवाध अनुवाद [ उत्तराचिका १७ पा [ १०३८]- बलशाली, कामनाओको सप्ति २ सिन्धूनां अग्रे पवमानः असि [ १०३३ ]- करनेवाला। नदियों के पानी के पास वह भुट होने के लिए जाता है। १८ घुम्नवत्तम [१०३८]- वहुन चमकनेवाला। १९ वर्णसि[१०३८]-धारकशक्ति बढानेवाला । ३.सुहस्त्या मृज्यमान समुद्रे वाचं त्यति २० स्वायुध. [ १०५३ ]- उत्तम शस्त्रास्त्रोसे परत । सोमरस पानीके बर्तनम शब्द करता आ जाता है । [१०७९]-उत्तम हायोको अगुलियोंसे शुद्ध किया जाने वाला २१ मित्र. [ ११०१]- मित्र के समान हित करनेवाला। २२ अरेपा. [ ११०१ निर्दोष, निष्कलक। ४ मांश्चत्ये सरति प्रधय[११०४] इस उत्तम पानोम मिलन २३ स्वाध्यः ११०१ - उत्तम निरीक्षण करनेवाला। २४ स्वर्विदः ११०१-स्थाको जानेयाला, आत्मज्ञानी। ५ वृपा मित्रस्य सदनेषु सीदति [ १०३२]- यह मल ययामेवाला सोम मित्ररूपी यसमें जाकर मंठता है, भात २५ गातुवित्तमः [११०१]-पतममार्ग जाननेवाला। पानीके बर्तन में रखा जाता है। २६ पूतः । ११०२ ]- पवित्र, छना हुआ। २७ विपश्चितः [ ११०२]-गानो। इस प्रकार सोमरसको पानीमें मिलाया जाता है। २८ दध्याशिरः {११०२]-वही जिसमें मिलाया सोमका छाना जाना जाता है। सोमरस पानी मिलाकर उसे भरके यालोंबीवनी एलसीसे २९ जूते जिगरनुः [११०२]- पानीमें मिलनेरी इच्छा जानते हैं। गरनेवाला। १ गभस्त्योः मृज्यमानः अव्ये यारे पयते [१०३५] ३० धुवः [११०२]- जिसका परिणाम स्थिर रहता है। -हायोंसे दार किया जानेवाला सोमरस भेडके मालकी बनी ३१ दर्शता [ ११०२]- दांनोय, सुन्दर, देसने योग्य। इतनीसे छाना जाता है। ३२. यसुविद अस्मभ्यं प समस्यरन् । ११०३] २देवधी रह्या पवित्रं अति पयस्थ [ १०३७ )- पनको पासमें रखनवाला हमें उत्तम पन देखें। देवों के पास जानेवाला सोम धेगसे छलनीसे छाना जाता है। ३३ रसः स्वघयोः अपाच्य रत्न दधाति [१०३१] ३ समुद्रदिया पिष्टम्भः धरणः सोमः पवित्र सोमरस इस पुलोक और पुग्योलोकके उत्तम धनोंको देता है। अनु मामृजे । १०४१ ]- जलमय चुलोको पारण इस प्रकार इस सोमका वर्णन इस अध्यायमें है। सोमरस धरनेवाला सोम छलनीसे छानकर पानी में शुरू किया जाता है। पीने के पार जो गुण बोरों में मपया पोवालोंमें दिखाई देते है, वे सोपरे ही हं ऐसा समाना चाहिए। उपासक अपनेमें उत्तम प्रकाररो गुट परते है। ४ आयय त्या सं मृजन्ति [ १०७७]- ऋविन सुरे मो गुण माने योग्य हों उन्हें यदावे । ५ पृपा पुनानः अव्यये घारे पयमानः बने भवि. पैलफे आमडे पर कूटते है प्रदत् [१०८०]- यल पानेवासा सोम भरे गालोरी उतनीसे जाना जाता मा पानीमें शम करताहमा १ गो. अधि त्यचि चिताना यि अद्विमिः पिरता। शुप्याणास [११०३]- गा अर्थात एक चमरेपर अपात धमाको फंसाकर उस पर सोमशे परधरोसे पटते सोमका सन्द करते हुए छाना जाना है। वापर सतारे पटले रबर उसपर सोमटर १ अभिनन्दन फ्लश भति [१०१२]- दाम रस निकालने हैं। परता आला जाता सोमका पानी में मिलाया जाना २रा महान, हरिः मित्रान शंतामचित्रमा [१४]-बार नेवासा, महान् पररनेवाला, मोमरा रम निरामनरेबार यह मानों पर पानी में मित्रो समान नमोप, होम परसा हा सनम मिनाया जाता- १ भुिमि मणिमिा मशान [१.१२]-मरोग पौधोनमें पानी एता है, उस पर सीमे पानी मिना पतीसे वह सटाना जाता है। रस मिलेमे तार होना।
सप्तम मायाप] सामवेदका सुबोध अनुवाद । सोमरस चमकता है सोम दीर्घायु देता है १ मामा सूर्यण सं दियुते [ १०४२]- सोम मूरे १ तब कात्या, तर ऊतिभिः ज्योफ सूर्य पश्येम समान धमता [१०५२]- हे सोग ! तेरो कर्तृत्वमाक्ति और तेरे सरक्षणोंसे हम निरकालतक सूर्यको देखते रहे । मर्यात हर रो मायु- सोमका गायके दूधमे मिलाया जाना काले हो । सोम यदि ठीक रोतिसे पिया जाए तो आयु वीर्य सोमको पानी मिलानेके याद उसे दूपमें मिलाते हैं। होती है । १ गोषु अग्नं गच्छति [ १०३३ ]- गायके आगेफे सोम संरक्षण करता है भागमें गिरता है। गायके दूध सोमरस मिलाया जाता है। १ वसनां उमा देवी मर्तस्य अवसः वेद । १०५८) २ यत् गोभिावासयिष्णसे, महान्तं त्या सिन्धः - धन देनेयाली, चमकनेवाली सोमको धारा सरक्षण करने के महीः अपा भनु अपरन्त [१०४० ]- जिस समय तुझमें हर प्रकारको जानती है। गायका दूप मिलाया जाता है, उससे पहेले नदीका पानी २ सोमाः महे अयसे धारया असूक्षत [ १०६१]- अथवा दूसरा पानी लेकर मिलाया जाता है। सोमरस महान् रक्षणके लिए पारपाकर फलशम गिरता है। ३ पीतये नम्णा गव्यानि पुनानः असि [१०६२] इस प्रकार सोमरस अपने सरक्षणको शक्ति बढ़ाता है - सोमरसको पाने के पहले उत्तम गायका दूष स्वच्छ सोममें और वोरोंको अपनी रक्षा करने में समय बनाता है। मिलाया जाता है। सोम लोकसेवा करता है सोमरस पीना १ लोक मनुं त्वा धृष्णवे मदाय ईमहे (१०४४]- १ सजोषसः विश्वेदेवासः त्वे पति आशत लोगोका हित करनेवाले तुझ सोमको शत्रुके नाश करने के लिए [१०९५१- एक साथ कार्य करनेवाले सब देव सोमको तपा आनन्द बढानेके लिए हम स्वीकार करते हैं। होम पोनको इच्छा करते हैं। पोनेसे वोरोंके शरीरोमें उत्साह बढाता है, उसके कारण लोक- सोम जन्म देता है सेवाके महान महान कार्य किये जा सकते हैं। महिप्सर आ च्यवस्व [१०३८]- महत सारा सोम शत्रुओंको दूर करता है अन्न हमें है। १ हे सोम! दक्ष ऋतुं सन । मृधः अपजहि ।ना २. गोमतीचिश्या इपःअब १०६३]-हमें गापोंसे रस्पस कधि [ १०४९)- है सोम ! हमें बल और कर्म उत्पश होनेवाले सब प्रकारके पन दे । सोमरसमें गायके दूध, करनेके सामये दे। शत्रुओको दूर कर और हमारा कल्याण रहो आदि पदार्थ मिलाये जाते है, इसलिए सोमरस पीनेसे गार्यो मिलनेवाले धन प्राप्त होते हैं, ऐसा होता है । इस २ हे वाजिन् । समासु अनपच्युत सासहिः अभि प्रकार सोम यस देता है। यह बस भी रहता है- अर्ष १०४-हे बलवान् सोम तू युद्ध में न हारनेवाला सोम बल बढ़ाता है तथा शत्रुओका हरानेवाला होकर आणे शा। १हे इन्यो । अस्माक इन्द्रियं मधो, धारया ३ मही वृष-नाम इमे अस्य शुषे [११०६]- महुतसे पयस्व [१०४६]- हे सोम! हमारी इन्द्रियाक्ति अपनी बागोंको शवपर दर्षा करना और शत्रुको मृकाना ये सोमके मोठी चारासे यदा। दो सामथ्र्य है। २ दक्ष फतुं सन [१०४१]- इस और कर्मशक्ति ४ मांश्चत्वे, प्रशने, वध, निगुतः असापयन्, स्नेहयन्, अमियान , अपचित', इतः अपचितः ३ अयं दक्षाय, शर्याय, पीतये साधनः [ ११००] [११०६]- घोडोंके युद्धोंमें, बाहुओक युद्धोम, हायोंके युटोंमें - यह सोम बाल, सामप्पं और यानोका साधन है, अर्थात वह शत्रुको सुत्तानेके समय अथवा शमोको भगानके समय तु रल और सामध्यं खानेमाला है। शाको दूर कर और यहाँसे भी शत्रुओंको दूर कर । कर। - सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराविक वाता, इस प्रकार सोम शोको दूर करता है । मोमरत पोनरो इस प्रकार यह सोम अनेक प्रकारके धन और ऐश्वर्मका पोरों में इस प्रकारसे युद्ध करनेको शरित उत्पन्न होती है। देनेवाला है । सोम यदि शरीरम वीरता लाता है, तो वह सोम धन देता है शत्रुको हराकर बहुतसा धन दे सकता है, इसमें कोई शंका नहीं । इस प्रकार विचार करने से यह आसानीसे समसमें मा १ सोमाः दाशुषे दिव्यानि आन्तरिक्ष्या पार्थिवाः सकता है कि सोमसे किस प्रकार धन प्राप्त होता है। विश्या वसु आ पयतां । १०३६ ]- सोमरस दाताको स्वर्गाप, अन्तरिक्षीय और पाथिष अर्थात् सभी प्रकारके पन देखे। २हे सोम! गोग, नृपा, अश्वसा उत याजसा सुभाषित असि [ १०४५ ]- हे सोम! तू गाय देनेवाला, पुत्र देने घोडे देनेवाला, और अन्न देनेवाला है। १ यज्ञस्य ज्योतिः प्रियं मधु पयते [१०३१/- पराको ३ महिश्रयः सोम ! जेपि, नः वस्यसः कृधि ज्योति प्रिप और मधुर भाव उत्पन्न करती है। [ १०४७ ]- हे प्रशंसित सोम! तू विजय प्राप्त करता है। २ विभूवसुः मदिन्तमः मत्सरः अपीच्यं रलं हमें यशस्वी कर। दधाति [१०३:]- बहुतसा पन पासमें रखनेवाला और ४ ज्योतिः सन ! स्यः च विश्वा सौभगा सन आनन्द बहानेवासा गुप्त स्थानमें रत्न धारण करता है, गुप्त [१०४८]- हमें तेज दे। मुख तथा सब सौभाग्य दें। स्थानमें धन रखता है। ५ द्वियहसं रयिं अभ्यर्प [१०५३]- दोनों ही स्थानो ३ वाजस्य स्वायुधः महत् धन भनसे [ १०३३]- पर उपयोगी होनेवाले पन दे । युद्धके लिए उत्तम शास्त्रोंसे तैयार हुआ हजाधीर ही धन ६ नाचित्रं, अश्विनं,विश्यायुरयिं मा भर[१०५६] प्राप्त करता है। - हमें विलक्षण, घोडोंसे पुस्त, सब लोगोंका हित करनेवाले ४ ते दाशुषे दिव्यानि आन्तरिक्ष्या पार्थिया विध्या धन भरपूर है। यसु आ पयन्तां [१०३६] - यह दाताको दिप, भगत- ७ सहस्राणि भादगाहे [ १०५९]- राहय प्रकारके रिसीय और पाणिय घन देता है। पन हम प्राप्त करते है। ५ पृषा द्युम्नवत्तमः धर्णसिामहिप्सरा यच्यस्व ८ त्रिशतं साहनाणि तना गादआहे [ १०६० ]- [१०३८]- तू बलवान् तेजस्वी और सबोंका पारण करने तोनसौ और हजारों वस्त्रोंको हम लेते हैं। वाला होकर बहुत अन्न हमें है। ९ पिशंगे पुरस्पृहं याहुलं रपि अभ्यर्षसि [१०७९) ६ पृषा महान् हरिः, मित्रःना दर्शतः [१०४२]- - मुनहरे रंगले गतसे पन हमें है। बसवान, महान, दुःसोका हरण करनेवाला और मित्रके १० सोमः पसूना मानेता, रायो, डा, मुक्षितीनां समान दर्शनीय है। [१.९६]- होम हमें धन, ऐश्वर्य, अन्न, तपा उत्तम पुत्रका ७ लोकटरमुं त्वा धृष्णये मदाय महे [१०]- लोगोंका रल्याण करनेवासे, तुर्ग शत्रुओंका नाश करने के १५ भया पया पना यसनि पयस्य [११०४]-इन लिए और आनन्द प्राप्त करने के लिए हम प्राप्त है। पाराोस ही वहमें धन दे। ८ जेथि, अथ नः घम्सप्सः गधि [100)- विनय १२ नेयुतः पष्टिं सहस्रा यमुनि रणाय धूनयात् प्राण करता है, इसलिए हमें यारयो कर। [१५०५/- मोहा मारा करनेराला सोम साठहजार ९ ज्योतिः सन, विश्या सौभगा सन[toral- पन के मार पुरनके लिए रखे। हमें तेगरिकता और सब सौभाग्य-ऐश्वर्ष। १३ यागम्य स्यायुधः महत् धनं मजसे [१०२३] १. दक्षं मनु मन [1.४९]-बालमोर कामारित। जात पाने के लिए उत्तम मारों परतूसोम! महान पन ११ मृधः गप जहि [...]- भानुमोको हरा। प्राप्तकरता है। १२ तय त्या तय अतिभिःना मा मन [१०५1] रेनवाता है।
ससम पायायी सामवेदका सुयोघ अनुवाद अपने पुरुषार्थसे और अपने संरक्षणके साधनोंसे हमारी पनको सब मनुष्य एकदम जानेंगे । अतः पाहने योग्य सहायता कर। पन हमें थे। १३ ज्योक् सूर्य परयेम { ०५२ ]- बहुत दयोंतक २४ यत योडौ, यत् स्थिरे, यत् विपर्शाने पराभृतं हम सूर्यको देखें । हमें दीर्घायु दें। तत् स्पाई वस्तु नः आभर [ १०७२ 1- जो धन मजबूत १४ हे स्वायुधः द्वियहसं रयि अभ्यर्प [१०५३ 1- खजाने में रखा हुआ है, जो पिर स्थानपर है तमा को किसीसे हे उत्तम शस्त्रास्त्र पलानेवाले वीर ! हमें दोनों ही जगहके न ये जाने योग्य स्थानमें रखा हुआ है तथा जो शोसे छीनकर ताया गया है, ये चाहने योग्य धन हमें भरपूर दे। १५ हे याजिन् ! समत्सु अनपच्युतः सासहिः २९ तोशासा, रथयावाना, पृधहणा, अपराजिता आमे वर्ष ( १०५४ - हे बलवान थोर । पोंमें अपनी [२०७४]- शत्रुओंको मारनेपाते, रयोंसे नानेवाले, ओंका लाह पर स्थिर रहनेवाला नया शत्रुओंको हरानेवाला होकर नाश करनेवाले और पराजित न होनेवाले धोर है। भाजा। ३० पिशंगं पुरुस्यहं बहुलं रयि अभ्यसि [१०७९] १६ नः चित्रं विश्वायु राय आ भर [ ३०५६- सुनहरा, बहुतों द्वारा चाहने योग्य बहुत सारा धन हमें दे। हमें विलक्षण, और पूर्ण बाय देनेवाले धन भरपूर दे। ३१ ऊनये सुरूपरुनु धविद्यवि जुहूमसि [10४७] १७ वसूनां उम्ना देवी मर्तस्य भवसायेद [१०५८] हमारे संरक्षण के लिए उतम रूप मनानेवाले इन्द्रको हम प्रति -धम नेपाली देवी मनुष्य के संरग सारे कार्य जानती है। दिन बुलाते हैं। १८ नः गोमती विभ्याः इपः अर्प[ 10६३ ]- हमें ३२ मा नः अति ख्यः [१०८९]- हमें दूर मत कर। गास उत्पम होनेवाले सब प्रकारके अन्न दे। ३३ हेमन्तुमा दीप अंकुशं शक्ति विपि [१०९१] १९ अस्य संसदिनाप्रमतिः भद्रा (१०६४]- इस -है शानवान् घोर । तू महान् दशक्रियाले शास्त्रोंको धारण सभामें हमारी मुद्धि उत्तम कल्याण करनेवाली हो । २० हे अमे तव सख्ये वयं मा रिपाम [ १०६४] ३४ मदेषु सर्वधा मसि [१०९४]- मानन्द देनेवालोमें -हे माने } तेरो मित्रता रहकर हम नियसे मष्ट होने त सबसे श्रेष्ठ है। पाले नहीं। ३५ वएना, गया, इडा मुक्षितीनां मा नेता २१ जीवातवे धियः प्रतरां साधय 11०६५J• दोध. (1०९६ ]- यह धन, ऐश्वर्य, अन्न और उत्तम पुओंका नोवन प्राप्त करने के लिए हमारी बुद्धिको पूर्णता कर। देनेवाला है। २२ इयं मतिः हिरण्यया राया, अवृक्षाय शवसे ३६ नगुतः परि सहस्रा यमुनि रणाय धृतवत् मेघसातये । 1०६८ यह बुद्धि हितकारक और रमणीय [१०५J- शत्रुका नाश करनेवासा दौर हमार धन पन, करतारहित बत, पति और भयको प्राप्ति करने हमारे मानरदके लिए देये । ३७ मही वृप नाम इमे अस्य शूरे [11०६J- बहुत २३ पंचस्थ धीमहि [1०६९]- अन्न और स्वर्गीय सारे गाण मारकर शवको मुकानेवाला हो वोर है। भानन्द हमें प्राप्त हो। ३८ मांश्चत्वे, पशने,घधरे, निगुतः अस्थापयन, २५ विश्याः द्विपः अपमिन्धि[1०७०]- सब पाओं. स्नेहयत् [ १०६]- यह कार्य योग मुदी, माही पुरमें, शोक पवमें, शोंको सुलाने के समय अपवा २५ याचा मृध परिमहि [10]-बापा हाने- शत्रुओंको भगाने के समय ही दिया जाना है। पाले मौर हिंसा करनेवाले शत्रुओं को दूर कर। ३९ ममित्रान् अपचिता इतः अपाचितः १०६) २६ स्पाई तम् पसु थामर [10]- चाहने पोप दामोको दूरकर, माओको यहाँगे भगा। पाको हमें है। ३० अग्ने। नः अन्तमः प्राता शिया भय [100) २७ ते यत्तस्य भूरेः विध्यमानुरः भानुपए मेति है अपणो हमारे पास रह और हमारा समोर तत् पाई पसु ना भामर तेरे द्वारा दिए गए स्पागर। १९ [ साप.हिदी मा.२] बाली हो। बामाकर । (१४६) सामवेदका सुयोध मनुघाद [ उत्तराचिका ४१ झुमत्तमः रयिं दाः [11०८]- तू तेजस्वी है, गतिसे उसको पुराको गति मिलती है, उसोप्रकार ( जरि- इसलिए हमें धन दे। तृणां आ ऋणोः) स्तोताओंको प्रार्थनाके बारा तू उन्हें ४२ शोचिष्ठः दीदिवः ! स्या सुम्नाय सखिभ्यः प्राप्त हो । ईमहे [१०९]- हे तेजस्यो और प्रकाशमान् वैवसुखके ६ गो दुहे सुदुधां इव [१०४७]- गाय दुहने के समय जिसप्रकार सरलतासे दूध वेनेपाली गार्योको बुलाया जाता है, लिए और मित्र प्राप्तिके लिए तेरी प्रार्थना करते हैं। उसोप्रकार (सुरूप कत्तुं ऊतये घवि धचि जुहूमासि) ४३ मा भुवना के सीपधेम [ १११० ]- ये भूवन उत्तम रूपयाले इन्द्रको अपने संरक्षणके लिए हम प्रतिदिन सुखके साधन बनें। युलाते हैं। ५४ इन्द्रः तन्यं प्रजा च सीपधातु [11]- ७ उपाइय१०१०]- उषा जिसप्रकार अपने प्रकाशसे गहमारे शरीर और पुत्रोंको सुखी करे। सब जगत्को भर देती है, उसीप्रकार (हे इन्द्र ! उभे ४५ इन्द्र अस्मभ्यं भेषजा करत् [१२]-इन्द्र रोदसी आ पप्राथ ) हे इग्न! तू अपने प्रकाशसे प और हमें औषधि प्रदान करे। पृथ्वी धोनों लोकोंको भर दे ५६ या उप म अर्च [13]- तुम इन्द्रको पाससे ८ यथा दीर्घ अंकुश [ १०९१]-जिसप्रकार घोर उपासना करो। हाथोंमें प्रखर शस्नोको धारण करते है, उसोप्रकार (शक्ति यिर्षि) शक्तिको धारण करता है। ९ यथा मजा पूर्वेण पदा क्या यम [१०९१]-जित उपमा प्रकार बकरा अपने अगले पररो हातीको शुकरता है, उसी. प्रकार तू शत्रुओंका नाश करता है अथवा (देवी जनित्री इस सास अध्याय, उपमा निम्न प्रकार है- अजीजनत् ) अवितिदेवीने तुझे पहले उत्पन्न किया। १ मित्रान [१०४२]-मित्र के समान (हरिदर्शतः) सोम देखने योग्य है। १० शिशुं न [१०९८]- जिसप्रकार छोटे मालकको सजाते हैं, उसीप्रकार (हव्यः गुर्तिमिः स्पदयात) हति २ पृष्टिमान् पर्जन्या इय [ १०४६ ]- वर्षा करनेवाले और स्तुतियोंसे इस सोमको और स्वादिष्ट बनाते हैं। मेएक समान ( मरमा शन्द्रियं मधो धारया परस्य) हमारा इन्द्रियसामध्ये मोठे रसको धारासे पवित्र हो! मेपको भपने सच्चेको पानीसे साफ करती है, उसीप्रकार (दुः ११ मातृभिः यत्सः इव १०९९]-जिसप्रकार मा धारा और सोमरसको पाराको समानता यहां दिखाई है। सं अज्यते ) सोम पानी में धोया जाता है। ३ रपंच १०६४]- रप जिस प्रकार बनाते है, १२ सूरासान [११०२]- सूर्पके समान (मोमास: उसोप्रकार (इमं स्तोमं सं महेमइन स्तोत्रोंको हम दर्शतासः) सोमरस दर्शनीय है। कहते हैं, इन स्तोत्रोंकी महिमाका वर्णन करते हैं। १३ वातान [११०४}- पायुके समान (प्रधाजूर्ति) ४ वयोः अक्षं न [ १०८५]- रपके दोनों ही सूर्य घेगका आश्रय लेता है। पहियोंको जिसप्रकार हाल मिलाता है या संयुक्त करता १४ पुरतं पश्यं न [ ११०५]- वृक्ष निसप्रकार पो है, है ! उसीप्रकार हमसे पोंको संयुक्त कर। हुए फोको देता है, उसीप्रकार (नेगुतः घसूनि धून. ५ शचीभिः अक्षं न [१०८६] - जिसप्रकार गोको यत् ) सोम पन देता है।
(१४७) सप्तम मध्याय सामवेदका सुयोध अनुवाद सप्तमाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋग्वेदस्पानं विः पवमानः सोमः जगतो १०२१ " " " " गायत्री " ९८६१० ९८६११ ९८६०१२ ९१६ १६४५ ९।६४ ९०१ " १०३४ १०३५ १०३६ १०३७ " " " 11 " १ २०३९ ॥ " " 11 " ९.२४ ९।२०५ ९०६ ९।२७ ९।२८ २०१० २१९ " १०४१ २०१२ १०४३ १०४४ २०४५ १०४३ " " " (१) [अकृष्ट माघारयःप्रयः ऋषयः [अकृष्ट माषादयः ] त्रयः ऋषयः [अकृष्ट मापादयः] अयः ऋषयः कश्यपो मारीचः कश्यपो मारीषः कश्यपो मारोच. मेधातिपिः काश्य: मेधातिथिः काकः मेधातिषिः काण्वः मेधातिथिः काया मेधातिथि:काय. मेधातिपिः काकः मेधातिथिः काण्या मेधातिथिः काव्यः मेषातिथिः काकः मेधातिथिः काव: (२) हिरण्यस्तूप आगिरसः हिरण्यस्तुप आंगिरसः हिरण्यस्तूप आंगिरसः हिरण्यस्तूप मांगिरस. हिरण्यस्तूप आंगिरसः हिरण्यस्तूप आंगिरसः हिरण्यरतूप आगिरत हिरण्यस्तूप भागिरस- हिरण्यस्तूप आपिरतः हिरण्यस्तपः मागिरसः अवस्सार.काश्यपः अवस्सार:काश्यप नवरतारःकाश्यपः भवरसाएकाश्यपः जमदग्नि गंव. जमदग्निनिय. जमवनिर्गिवः " " " " " " १०४७ २०४८ १०४१ १०५० 1 " 1" १०५२ 11 " ९।४।१ ९.९ કાર ९1818 ९४५ ९४६ ९४७ २०४८ ९९ ९।४।१० ९.५८१ ९१५८०३ ९५८ार ९.५८४ " . २०५४ " . " " " " १०५६ १०५७ २०५८ १०१२ १०६० " . " . ॥ १०६. ११म१० ९।२४ (१४८) सामवेदका सुवोध अनुवाद । उत्तरात्रिका मनसत्या छन्वः देवता अग्निः १०६४ जगती ऋग्वेवस्थान ६२४॥ श९४२ १९४०३ " १०६ " " आरित्यः गायत्री " " १०६७ १०६८ २०६९ १०७० २०७१ M " ७६६७ ७१६६८ ७६६९ ८४५/४० ८४५३२ ८184182 દ્વારા ८३८२ ८३८३ ऋषिः कुत्स भोगिरसः फुरस आगिरसः कुताः आंगिरसः (३) पसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मैत्रावरुणिः यसिष्टो मंत्रावणिः प्रिपोकः काण्वः त्रिशोक पाण्यः त्रिशोक काण्यः प्यावाश्व आत्रेयः क्यावाश्य आत्रयः पवावाश्य मात्रेयः (४) कदयपी मारीच कश्यपो मारोघः कायरो मारी मप्तर्षयः " " " इन्द्राग्नी २०७४ २०७५ " " " १०७६ १०७७ पवमानः सोमः " " ९६४१२२ ९६४२३ १२६१२४ ९२१०७.९१ १०७९ प्रगाप. ( विषमा हती, समा सतो बहती) " ९।१०७७१२ ९.६१७ गायत्री " १८१ १०८ सप्तर्षयः यमहीयुरोगिरसः बमहीपुरागिता अमहोपरागिरमः " ९।६१९ " " २०८५ १०८३ भ " " " " २२३०१३ १।३०।१४ २१३०१५ शश पार કાર १०११३४१ १५४६ " १०८८ शुनशेष आजीगतिः शुनःोप भाजीगतिः शुनःोप आजीगतिः मष्यदा वैश्वामित्र मपुच्छन्दरा श्वामित्रः मधुण्यन्वा वामित्रः मान्याता यौवनावः मान्धाता पोषनाश्यः पूपिंप) गोपावित (उत्तरापाप) मान्धाता पौवनावः " " " " स महापरित ॥ १०१ 17 " २०१३ अमितः रायपोरेवतोपा परमातः सोमः सप्तम अध्याय) सामवेदका सुबोध अनुवाद (१३९) मंत्र संख्या देवता छन्द: १०९४ पवमानः सोमः गायत्री " ॥ ऋषिः असितः काश्यपो देवलो वा असितः काश्यपो देवलो वा ऋषयो राजरि- भाषितर्वासिष्ठः पर्दतनारदो फायौ पवंतनादौ काष्चों पर्वतनारदो काया " पवमध्या गायत्री ऋग्वेवस्थान ९१२८१२ ૧૮ ९।१०।१३ ९।१०८।१४ ९।१०५।१ १।१०५९ ९।१०५।३ ९१०१।१० ९।१०१।१२ " १०९७ १०२८ १०९९ १९०० सतो महती " उणिक " " " " मनुष्टुप " " 11 " ११०३ ११०४ १९०५ मन. सरदरणः मनुः सावरण. मनुः सांवरणः कुत्स मागिरसः कुत्स आगिरमः कुत्स आगिरस: " ९९७५२ ९९७१५३ ९१९७५४ विष्ट . " 11 (७) ११०७ पार अतिः दिएका विराट १ " ११०८ ५.२३ 11 " " ११०९ ५॥२४॥ बन्य, सुबन्य, श्रुतयाधुरिप्रवाः क्रमेण गोपायना लीपापना वा अन्यः सुबत्यु श्रुतमन्यविप्रनाथ अमेण गोपायना लोपायना या बन्धुः सुमन्यु. श्रुतबन्धविप्रवन्धः क्रमेण गोपापना लोपायनापा भवन भारयः सापनो वा भौवनः भुवन मापत्य. साधनोवा वनः भुवन माश्य. सापनो वा भोपन, " " " " १९९० १०११५७१ विश्वेदेवाः विपदा त्रिष्टप १०.१५७१३ " सामवेदका सुयोध भनुवाद । उत्तराचिका अध अछमोऽध्यायः अप चतुर्थप्रपाटके द्वितीयोऽर्धः॥ ४॥ , [१] (१-१४) १ (२-३ ) वृषगणो पासिष्ठ , १ (४-१२), २ (१-५) असित काश्यपो देवलो पा; २(१०-१२), ११ भूगरगिर्जमदग्निर्भार्गवो या; ३, ६ भरद्वाजो बार्हस्पत्य ; ४ पजत आत्रेय , ५ मधुच्छन्वा वैश्वामित्र. ७ सिंकता निवावरी, ८ पुरहम्मा आपिरस , ९ पर्वतनारदो काग्यो शिखण्डिन्यावप्सरती काश्यपी वा; १० अग्नये घियो ऐश्वरा १२ वा काय , १३ नुमेय आगिरस ; १४ अप्रिमीमः ॥ १-२, ७, ९-११ पयमान. सोमः २, १२ अग्नि , ४ मिग्रायणी, ५,८,१३-१४ इन्द्र , ६ इन्द्राग्नी ॥ (१-३,) ३ विष्टः १(४-१२), २, ४-६ ११-१२ गायत्री, ७ जगती, ८प्रणाप % (विषमा बहती, समा सतो हती ); १ उष्णिया: १० द्विपदा विराट, १३ (१-२) ककुप १३ (३) पुर उणिक, १४ अनुष्टुप् ॥ ११.१२३ . २र . ३१२ ३२३ 3 ११ १ . 3" २ १११६ प्रकाध्यमुशनेव ग्रुषाणो देयो देवानां जनिमा विवक्ति । महिवतः शुचिबन्धुः पावका पदा वराहो अभ्येति रेभन् ॥१॥ (ऋ ९९७) १११७ प्र हसासस्तृपला वग्नुमच्छामादस्तं वृषगणा अयासुः । अङ्गोपिणं पवमान सखायो दुर्भप वाणं प्र वदन्ति साकम् ॥२॥ ( ऋ.९।९७८) १११८ स योजत उरुगायस्य जूति वृथा क्रीडन्तं मिमते न गावः । परीणसं कृणुते तिग्मशृङ्गो दिवा हरिददृशे नक्तमृजः ॥३॥ (ऋ.९।९७९) [६] प्रथमः खण्डः। [१११६ ] ( उशना इच ) उशा ऋषिके समान (काध्यं घुयाणः ) काव्य बोलनेवाला ( देवः) स्तुति करने पाला ( देवानां जनिमा वियक्ति ) देवोंको जीवन-कथाभोंको उत्तम प्रकारसे कहता है । ( महि-यतः) महान कार्य परनेवासा ( शुचि:-यन्धुः पावका चराहः) शुद्ध बन्युके समान पवित्र होनेवाला और उसमरिनोंमें तैयार किया गया सोम (रेभन् पदा अभि-पनि ) सम्म करते हुए पानमें जाता है ॥ १ ॥ [१७] ( हसासः धृपगणा- जानी वृषगण मामक ऋषि ( ममात् ) के सामध्यंसे डरकर (रुपला यग्नु अच्छ मस्तं अयानुः) सोम कूटनका धम्म जहां हो रहा था, उस भानपर उसी समय गए। ( सखायः ) वे मित्र उप वि { अगाषिणं ) स्तुतिके योग्य, (दुर्म ) गोरे द्वारा न सहने योग्य तपा ( पयमानं ) गुर होते हुए सोमो लिए ( पाणं साकं प्रयदन्ति) वाण नामर पाको सजाने लगे ॥२॥ १८] ( उगायस्प जूति ) अनेकों द्वारा की गई स्तुतिसे प्राप्त होनेवासी गति (सः योमते) मह मोम प्राप्त परता है। वृथा श्रीहन्तं गायः न मिमते ) सहन हो जो परमेवारी गतिको दूसरे गति करनेवाले मार नहीं सकते। (तिग्मभंगः ) तोरण नसे मुहत सोम ( परीणसं रणुते )प्रभाशलाता है ( वियाहरिः ददृशे ) मिने हरा बीनना है और (नर्तः सत्रा) रातमें प्रकाशपुश्त रोहता है ॥३
अमम अध्याय ]
सामधेदका सुयोध अगुधार
31.३
१११९ : स्वानासो रथा पार्वती ने श्रास्यवः । सोमासो राये अक्रमः॥४॥(*. ९।१०।१)
११२० हिन्वानासौरपा इव दधन्विरे गस्त्योः । परासः कारिणामि ॥५॥ (ऋ. ९।१०।२ )
११२१ राजानो न प्रशस्तिभिः सोमासो गोभिाजते । यज्ञो न सप्त धातृभिः ॥ ६ ॥
(ऋ ९९३)
११२२ परि स्थानास इन्दो मदाय वर्हणा गिरा । मधो अपन्ति धारया ॥ ७॥ ( ९।१०१४)
११२३ आपानासो विवस्वती जिन्यन्त उपसौ भगम् । सूरा अयं वि तन्मते ॥ ८॥
(ऋ. ९।१०१२)
११२४ अप द्वारा मतीनों प्रना ऋण्वन्ति कारवः । वृष्णो हरस आयः ॥ ९॥ ( ५१०१६)
११२५ समीचीनास आशत होता समजानया । पदमेकस्य पितः ॥१०॥ ( ९:१०७ )
११२६ नामा नाभि न आ ददे चक्षुपा सूर्य दृशे । कवेरपत्यमा दुहे ॥११॥ ( ९।१०८)
8
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[१११९] रथाः हय ) रप और ( अर्वन्तः न ) घोडे निसप्रकार ( श्रवस्यवः ) पशहोछा करते हुए
(राये प्राक्रमः ) पण माप्तिके लिए पराक्रम करते हैं, उसीप्रकार (सानासः सोमासः ) छाने गाते हए सोम शम्य
अपरा पराक्रम करते है॥४॥
[ ११२०३ युद्ध में जानेवाले (रयाइव) रपये समान ( हिन्धानासा) गतिमान सोमको (भरास: कारिणी
इस ) भार बोकर गानेपाले मजदूरके हाथोंपर निसप्रकार योग रहते हैं, उसीतकार लोग ( गभस्त्यो दधन्धिरे)
हापोंमें धारण करते है॥५॥
[ १९२१] (सोमासः) सोम (प्रशस्तिभिः राजाना न ) स्तुतियो द्वारा राजा सपा ( सत्तधारभिः यशः
म) सात ऋत्विजोंके द्वारा मा जिसप्रकार सुशोभित होता है, उसीप्रकार (गोभिः मंजते ) गायके घी भाबियोरी
एशोभित किये जाते हैं ॥ ६॥
[ १९२२] (स्वानासः इम्बया ) निचोडे गए सोम (यहणा गिरा) महान् स्तोत्रोरो प्रशसित होनेके बार
(मधो धारया ) मीठे रसको पारासे (मदाय) मानन घडान लिए (परि अर्पनि रसद गिरते हं॥ ७॥
[११२३] (विवस्वतः अपानासः) इन्द्रपे पोनेके लिए (उपसः भगं जिन्वन्तः ) उपाका तेग बहाते हए
(सूराः) सोमरस ( अण्वं पितरते ) पार करते है ॥८॥
[१९२४] (मतीनां कारया ) स्तुति करनेवाले (प्रत्नाः ) प्राचीन ( पृष्णः हरसमलवा सोमको सानपार
(माया) मनुष्य शखिन ( द्वारा अप मापयन्ति ) पजकै बरवाने शोलते हैं॥९॥
[ ११२५ 1 (समीचीनासः) श्रेष्ठ ( जातयः ) भातिके ( एकस्य पदं पिप्रतः ) भवेसे सोमके स्थानको पूर्ण
काते ए (सप्त भाशत) सात होतापण पन करने के लिए मंठते है ॥ १०॥
११२६] (चक्षुषा सूर्य दृशे मातरो सूर्यको देखने के लिए ( नाभिः पशको नाभिप सोमको (नानामा
माद। अपनी नाभिके पास अति फैटो समीप रखता हूँ (कर्षः अन्य ) इसप्रकार करनेसे सोमके पुत्रहरी तेजको में
(मा दुहे) पूर्ण तेगावो करता ॥ १० ॥
(१५२)
साममेश सुबोध अनुवाद
[उत्तराचिंका
१३१२३२...
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२
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३१३३ ३१२
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१३
१३
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३.२
११२७ अमि प्रियं दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम् । पूरः पश्यति चक्षसा ॥१२॥ १ (झै)।
[धा० ५७। उ० ४ । स्व. ८ ] (ऋ.२।१०६९)
॥ इति प्रथम खण्ड ॥५॥
[२]
११२८ असृग्रमिन्दवः पया धर्मन्नृतस्य सुश्रियः । विदाना अस्य योजना ॥ १ ॥(ऋ. १७१)
११२९ प्र धारा मधो अग्रियो महीरपो वि गाहते । हविहविपु वन्या ॥२॥ (ऋ. १/७२)
११३० प्र युजा बाचो अग्रियो वृपो अचिक्रदद्वने । सगामि सत्यो अधरः ॥ ३ ॥ (ऋ. ९७३ )
११३१ परि यरकाव्या कविनम्णा पुनानो अर्पति । स्वर्याजी सिपासति ॥ ४ ॥ (ऋ. ९।७।४ )
११३२ पर्वमानो अभि स्पृधी विशो राजेब सीदति । यदीमृण्वन्ति वैधसः ॥ ५ ॥ (ऋ ९॥२)
११३३ अव्या बारे परि प्रियो हरिवनेषु सीदति । रेभो वनुष्यते मती
॥६ ।। ((ऋ ९७६)
[१२७] ) सूरः) इन (चक्षसा) नेत्रोंसे (दिपः प्रिय पद) लोक प्रिय और (गुहाहित ) हषयमें रखे
हए सोगको ( भभि पश्यति ) देखता है ॥ १२ ॥
॥ यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ।
[२] द्वितीयः खण्डः।
[११९८ ] ( अस्य योजना विदानाः) इस यजमानके द्वारा बनाये गए देवता सम्बन्धी योजनाओंको जानकर
(सुधियः इन्दव ) उत्तम सुशोभित हुए हए सोम (धर्मन् ) पमंके समान (ऋतस्य पथा ) पतके मार्गसे { असूनं)
सम्यार किए जाते है ॥१॥
[ १९२९(इवि पु पन्धः हयि ) हवियों में प्रशसनीय सोम ( महीः अप बिगाइते) बहुत सारे जलोंमें
म्नान करता है। (मधो। अप्रियः धाराम ) मोठे रसको मुख्य पार कलशमें गिरती है ॥२॥
[११३० ] ( अनियः युजा वायः) हषियोंमें मुख्य यह सोम स्त्रोको प्रकट करता है ।। वृषा सत्यः
अध्वरः ) बलवान, सत्यस्वरूप और हिंसा न करनेवाला सोम ( सभ अभि ) यज्ञशाला (पने अविवत् ) जलमें
शान करता हुआ पाता है ॥ ३ ॥
८.१९३१ ] ( कवि नुम्णा पुनाना ) यह चूरदर्शी सोम अपने बोरी मनुष्योंको भूर करते हुए (फाम्या यह
परि अर्षति ) जब स्तुतिको प्राप्त होता है तब (स वाजी सिषासति ) स्वर्गसे बलवान् इन्द्र याम मानेकी Ter
करता है ॥४॥
[ ११३२ ] ( यत् ) जब इस सोमको ( वेधस. ऋण्यन्ति ) ऋत्विज प्रेरणा देते हैं तब ( पधमानः ) र
होनेवाला सोम (स्पृध भमिसीदति | शत्रुओंको नष्ट करने के लिए तैयार होता है । विशा राजा इय) प्रमाकि
शत्रुओंको दूर करने के लिए जिसप्रकार राजा जाता है, उसीप्रकार यह सोम भी जाता है ॥ ५॥
[११३३ ] (हरि मियः हरे रंगका प्रिय सोम ( बनेषु ) पानीमें मिलापा गाकर जब ( भन्याः पारे परि-
सीदति ) बालोंकी बनी छलनीसे छाना जाता है, तब {रेभः मसी यनुष्यते) शम्द करते हुए स्तुतिको वह स्वीकार
करता है ॥६॥
अधम अध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद १७1 . ३ १३ ३ ११३४ स वायुमिन्द्रमश्विना साकं मदेन गच्छति । रमा यो अस्य धर्मणा ॥७॥ (ऋ. ९५७१७ ) ११३५ आ मित्रे वरुणे भगे मोः परन्त उर्मयः । विदाना अस्प शरममिः ।।८।। (ऋ. ९१८) ११३६ अमपर रोदसी रेपि मध्वो पाजस्य सातये । श्रेयो पनि सजितम् ॥९॥ (* ९३९ । ११३७ आ ते दक्ष मपोभुवं वद्विमद्या वृणीमहे । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥१०॥(ऋ.९०६१।२८) ११३८ आ मन्द्रमा वरेण्यमा विनमा मनीषिणम् । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥११॥ ( ऋ ९।६।२९) ११३९ आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनुम्घा । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥१२॥ २ (क) ॥ [.३८ । उ०५ । ख०११ ( ११६५४३ 131 . १३१७३ ॥ इति वितीयः सः॥२॥ [१९३४ ] ( या अस्य धर्मगारणा) नो यममान इस मोमके निचोाने भारि कार्यो में व्यस्त रहता है, (स. पायुं इन्द्र अश्विना) वह वायु, इस और मश्विनो देवॉक पास ( मदेन साफै गच्छति ) आनन्द देनेवाले सोमके साप पहुंचता है ॥ ७ ॥ [ ११३५ जिन पलमानोंके ( मधोः ऊर्मयः ) मोटे सोमको लहरें (मित्रे घरुणे मगे परन्ते । मित्र, पण और भगके लिए बहती है, वे यजमान ( अस्य [ सोमस्य] विदानास सोमके महरपरले जानकर ( शक्ममिः) मुख पृषत होते है। " १५३६ ] है ( रोदसी) घुलोक और पृथियो देवो! तुम ( मध्यः याजस्य सातये ) इम मपुर सोमरारूपी अत्रको प्राप्तिरे लिए (भस्माकं हमें (रवि भय पनि) पन, अझ और सम्पत्ति ( संजित) तपाजप प्राप्त कराओ॥९॥ [११३७ ] हे सोम ! या करनेवाले हम ( मयो भुषं ) सुस देनेवाले ( यदि ) पन देनेवासे ( पान्तं ) सरमण कालपाले (पुरु-स्पृहं ) अनेकों द्वारा चाहने योग्य ( से दक्षं अन या पृणीमहे) तेरे दलको आज अपने पारा चाहते हैं॥१०॥ [११३८ हे सोम ! (मन्द्रं आ ) मानाद देनेवासे तेरी हम आराधना करते है। (घरेण्यं आ) श्रेष्ठ पा वाहने योग्य तेरो हम सेवा करते हैं । (विषं या ) हानयुक्त सेरो हम उपासना करते है । ( मनीषिणं आ ) बुद्धिसे युक्त हम स्तुति करते है { पातं पुषस्पृहं भा) रक्षण करनेवाले और अनेकों द्वारा स्तुति करने योग्य तेरी हम भक्ति करते है।। ११॥ [ ११३९] है { मुफतो ) उत्तम यह हरनेवाले मोम ! (गयिं या ) धनके लिए हम भार्थना करते हैं. ( सुचेतुन मा) उत्तम मानके लिए हम प्रार्थना करते हैं, (तनुपु मा) पुत्रपौत्रों के लिए हम प्रार्थना करते हैं। यान्तं पुरस्पदं भा) रमण करनेवास भार बहनों द्वारा संसनीय सेरी हम पाराधना करते है ॥ १२ ॥ । यहां दूसरा सण्ह समास हुआ । २० [साम.हिन्दी भा.२]
सामयेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराचिंकः
१७
"
१
३२३९
२३१
१२
१
१३
३.a २१२
३२३"
३१
११२
३२
२
[३]
११४० मूर्धानं दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरमत आ जातमग्निम् ।
कविसम्राजमविधि जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः ॥१॥ (.६७१)
११४१ त्यां विश्व अमृतं जायमान शिशु न देवा अमि सं नवन्ते ।
तय ऋतुभिरमृतत्वमायन् वैश्वानर यपित्रोरदीदेः
॥२॥ ऋ. ६७४)
११४२ नाभिं यज्ञानारसदनाश्रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त ।
वैश्वानर सध्यमवराणां यशश्य केतुं जनयन्त देवाः ॥३॥ ३ (कु)॥
[धा० २६ । उ०१। स्व०५] (ऋ. ६७२ )
११४३ प्र यो मित्राय गायत वरुणाय चिपा गिरा । महिक्षनात वृहत् ॥ १॥ ( ५६८।१ )
११४४ सम्राजा या धृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च । देवा देवेषु प्रशस्ता ।। २ ।। (ऋ. १६८२)
११४५ ता ना शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य । महि वां क्षेत्रं देवेषु ॥ ३॥ ४ (र)।
[धा० १३ । उ० नास्ति । स्व०१] (ऋ. ५।६८)
[३] तृतीयः सण्डः।
[११४० ] ( दिया मूर्धान ) धुलोको मस्तक, (पृथिव्याः अरति ) भूमिमें जानेवाले, (वैश्वानरं ) सब
मनुष्यों के हितकारक, (ऋते आ जान ) यज्ञके लिए उत्पन्न हर हुए, ( कवि सम्राज) शानो और समाद, ( जनानां
यतिथि ) लोगो द्वारा पूजनीय, और (आसन् ) देवताओं के सषयी ( नपा अग्निं । हमारे संरक्षक अग्निको ( देवाः
आ जनयन्त ) ऋत्विज यश मरणियोंसे उत्पन्न करते हैं ॥१॥
[१९४१] है (अमृत) अमर आने ! (विश्वे देवाः ) सब देव सब ऋत्विज (जायमानं त्यां प्रकट होते हो
सुरे (शिशुन अभि सं नवन्ते ) यालकके समान सम्मानित करते हैं। हे ( वैश्यानर विश्यके नेता अग्ने । (यत्
पित्रोः अदीदेः ) जय पासन करनेवासे सोश और पृथ्वीलोकके धोध सू प्रदीप्त दमा, सय यजमान ( तव क्रतुभिः)
तेरे गाले पारण ( अमृतत्यं आयन् ) देवत्वको प्राप्त हुए ॥ २ ॥
[११४२(यशानां नामि) यज्ञको नाभि ( रयीणां सदन) घनके भण्डार ( महां आहार्य) जिसमें वरी
यही आहुति दी जाती है ऐसी अग्निको ( अभि संनयन्ते ) लिनलोष स्तुति करते हैं। (यश्वानरं सब विस्यक
गंगा ( अपराणां रथ्य ) हिंसारहित यातके पालक { यास्य फेतुं ) पतके पग ऐसे अग्निको ( देवाः जनयन्त)
हरियोंने गप करके उत्पन्न किया ॥३॥
[११४३ ] हे विमो ! (यः मिथाय धरणाय ) तुम मित्र और वरणरे लिए ( विपा गिरा गायत ) मोटी
आवाजमे गायन रो। (महि-क्षत्री) महान् क्षात्रतेजसे मुक्त मित्र और वरणो! ( मातं गृहत् ) परके स्थानपर बसी
स्तुति सुनने के लिए पात्रो ॥२॥
[४] (या मित्रः पाणः च )जो मित्र भौर परग(उमा सघ्राजा) दोनों ही सपाट है, (घृत योनी
देया ) गल पन करनेवाले तपा प्रमाामान ( देवेपु प्रशस्ता) देवोम प्रासनीय है ॥ २॥
[११४५] (ता) मित्र भोर वण (ना) हमें (दिव्यस्य, पार्थियस्य ) सोपपर और पृषीदार
(महः गयः शत) महान धन रेने समर्प है। हे देवी! (यां) तुम दोनोरे (माहि क्षयं) महान मात्रबल (देयेषु)
वैवाने प्रगित ॥४॥
अष्टम अध्याप] सामवेदका सुबोध अनुवाद १] r ३२.३ ३१२ १ २ 3 २ १ 33 ३ ३२ १ १ ३.१०.१ २ १ 3 २ २ ३ र ११४६ इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमै वायवः । अण्वीमिस्तना पूतास। ॥१॥ (ऋ. १॥३३४ ) ११४७ इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतायतः । उप ब्रह्माणि वाचता ॥२॥ ऋ. १॥३॥६) ११४८ इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्य नश्वनः ॥३॥ ५ (दी)॥ [ धा० १६ । ३० नास्ति । स्व०१] (ऋ. १॥२॥६) ११४९ तमीडिष्य यो अर्चिपा बना विश्वा परिष्वजत् । कृष्णा कणोति जिह्वा ॥१॥ (६।६०१०) ११५० य इद्ध आविवासति सुझमिन्द्रस्य मर्त्यः । घुम्नाय सुतरा अपः ॥२॥(६६०११) ११५१ ता नो वाजयतीरिप आशून् पिपृतमर्थतः । एन्द्रममिं च घोढवे ॥३॥ ६ (य)॥ { धा० ७ ! उ० नास्ति । स्व० १] (.६६०।१२ । ॥ इति तृतीयः सः || ३ ॥ [४] ११५२ प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृत सखा सख्युन प्र मिनाति सङ्गिरम् । मर्य इव युवतिमिः समर्पति सोमः कलशे शतयामना पथा ॥१॥ (ऋ ९८६१६) [१५४६ ] है (चित्रभानो इन्द्र ) विशेष प्रकाशमान इन्द्र (भायाहि ) माI(अपवर्वामि सुता. ) अंगुलियोंसे निचोडे गए (तना पूतासः) उत्तम शुद्ध फरके रखे गए ( इमे) ये सोमरस (त्यायर.) तेरे लिए हैं ॥ ५ ॥ [११४७ ] है (इन्द्र) इन्द्र ! (धिया इपितः) बुद्धिसे प्रेरित होकर (विप्रतः ) स्विों द्वारा बुलाया गया (सुतावाता पाघत:) सोमरस तैयार करके स्तुति करनेवालों के द्वारा घोले जानेवाले ( प्रमाणि) स्तोत्रको सुनने के लिए ( उप आपाहि ) गजके पास आ ॥ २ ॥ [१९५८] हे (हरिव.) घोडे पालनेवाले इन्द्र । न तूतुजानः ) शौन हो (प्रमाणि उप) स्तोत्र मुननेरे लिए पास आ और (सुने मा चनः दधिष्य ) इस यसमें हमारी हपियों को ग्रहण कर ॥ २ ॥ [ ११४९] (यः भर्चिपा ) जो अपने तेजसे ( विश्वा धना ) सब धर्मोको (परिप्वजत् ) पर लेता है, और (जिया कृष्णा रुणोति । वालासे सबको करता कर देता है।(इंडिय) उस अनिको स्तुति कर ॥२॥ १९५० ] (यः मयः ) जो ऋत्विन (इद्धे ) प्रदीप्त हई अग्निमें (इन्दस्य सुम्ने ) इन्द्रको सुखदायक हदि (आ विवासति) अर्पण करता है, उसके (युम्नाय ) तेजके लिए ( सुतपः अपः) उत्तम दौर सरलतासे पार करने योग्य पानी इन्द्र देता है।॥ २॥ [१५१] हे और अग्नि! (ar) वे हुग ( इन्द्र च अग्नि आ योदये) और अग्निको देवताओंको और पाहुंचाने के लिए (नः) हमें ( वाजवतीः ) पल यानेवाले अन्न और ( आशन पर्यतः ) मौन चलनेवाले घोडे (पिपृतं ) को ॥३॥ ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ। [४] चतुर्थः खण्डः। [१९५२ ] (इन्दु । सोम (इन्द्रस्य निष्टतं ) इनके पेट में (मो अयासीत् । या । (सखा) मित्रहपी यह सोम ( सण्यु.न) अपने मित्ररूरी इन्दके ( सं गिरं न मिनानि ) पेटमें कोई पर नहीं देता, ( मया युवतिमिः ब) पुरुष जैसे तदण स्त्रियो मिलता है, उसीप्रकार (सोमः समर्पति) सोम पानी के साथ मिलाया जाता है, राम यह सोम (शतयामना पया) को तरहसे जाने योग्य मापसे ( कलशेकला जाता है ॥१॥ - (१५६) सामवेवका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्विका ३१३ २ ७.३० 3. 3 ३३१७ २३३२ १ . २ 8 २७४१२ " २१७१३ १९५३ प्र वो धियो मन्द्रयुवा विपन्यवः पनस्युवः संवरणेष्वक्रमुः। हरि क्रीडन्तमम्यनपत स्तु मोऽभि धेनवः पयमेदशिययुः ।।२।। (ऋ. ९।८६।१७) ११५४ आ नः सोम संयत पिप्युपीमिपमिन्दो पवस्व पवमान ऊर्मिणा । या नो दोहते बिरहम्नसश्चुषी क्षुमद्वाजवन्मधुमत्सुवीर्यम् ।। ३ ।। ७ (ठि)॥ [घा० २८ । उ०२१ १०३ 1( ९८६।१८ ) ११५५ न किष्टं कर्मणा नशचकार सदावृधम् । इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगत मुम्बसमधृष्टं धृष्णुमोजसा ॥१॥ (७०३) ११५६ अपाढमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुजयः। सं धेनवो जायमाने अनोनर्याव। क्षामीरनोन: ॥२॥८(ही)। [धा० १६ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] . ८1७०४) ॥ इति धनुर्पः खण्डः ॥४॥ २३ ३३३३३३३३३१३ ३" २९ १२ २६३"३३.३ ३ 323 ३२७ , २ [११५३ ] हे सोम ! (वः धियः } तुम्हारी बुद्धि का ध्यान करनेवाले (मन्द्रयुवा) आनन्दवर्षक (पनस्युवः) स्तुति करने की इच्छा करनेवाले (विपन्युवः ) स्तोताजन (संवरणेषु प्राक्रमुः) यनमण्डपम यज्ञकर्म करने लगते है, तब ( स्तुभः ) स्तुति करनेवाले (हरि क्रीडन्तं ) हरे रमके तथा खेलनेवाले तुझ सोमको ( अभ्यनूपत ) स्तुति करते है, उस समय (धेनव ) गायें ( पयमा इत् अभिशिनयुः) अपने दूषसे इस सोमको सेवा करती है ॥ २ ॥ [११५४] (पवमान इन्दो सोम) हे शुद्ध होनेशले तेजस्वी सोम ! (या[]) जो अन्त ( नः अहन त्रिः अचुपी) हमारे एकदिनके तीनों सवनोंमें बाधा न गलते हुए (क्षुमत् वाजवत् ) प्रसिद्ध बलवर्षक (मधुमत् सुवीर्य दोहवे ) उत्तमतासे युक्त उत्तम वीरपुत्र देता है । उस (नः संयुतं पिप्युपी इप) हमारे द्वारा लाये गए पोषक अन्नको ( ऊर्मिणा पयस्त्र) अपनी लहसेि शुद्ध कर॥३॥ [१९५५] (य.) वो यतकर्ता (सदावृधं विश्वगूर्त) सदा वढानेवाले, सर्बोके द्वारा स्तुति करनेके योग्य, ( अम्बसं) महान ( ओजसा अपृष्टं) अपनी शक्तिसे अपराभूत अर्थात् शत्रुसे न हारनेवाले (धृष्j) पर शोको हरानेवाले (न इन्द्रं ) प्रशसित इन्दका ( यज्ञैः चकार ) पोंसे सरकार करता है, (त) उसको (कर्मणा न कि' नशत् ) अपने कर्मसि कोई नष्ट नहीं कर सकता ॥१॥ [११५६] ( यस्मिन् जायमाने ) जिस हफे प्रकट होते ही ( मही। उरुनयः धनव:) महान वेगवान गायें (समनोनयुः ) उसे प्रणाम करती है, उसोपकार (पायाः क्षामी- समनोनघु ) तोक और पृथ्वीलोक भी जिसके आगे गुरुते है उस ( मपादं उग्रं ) शगो हरानेवाले, भयकर और ( पृतनासु सासहि ) युद्ध में साहस दिखानेवाले इसकी में स्तुति करता हूँ ॥२॥ ॥ यहाँ चौधा खण्ट समाप्त हुभा ॥
अएम अध्याय सामवेदफा सुवोध अनुवाद ( १५७) पर २०.१५१ ३१२ २ ३२३११ ३१२ ३१३२४ २ 350 31 ३१२ ३२ -- 1351 १९५७ सखाय आनि पादत पुनानाय प्रगायत । शिशु नः यो परि भूपत श्रियै ॥१॥ (ऋ.९।१०४१) ११५८ समी वस न मातृभिः सुजता गयसाधनम् । देवाव्यश्मदमभि द्विशत्रसम् ॥२॥ (* ९।०४।२) ११५९ पुनाता दक्षसाधनं यथा शर्घाय वीतये । यथा मित्राय वरुणाय शन्तमम् ॥३॥९(पि)। [धा० १५ १३० १ । स्व० ३ ] (८.९।१०४।३) ११६० प्रवाज्यक्षा सहस्रधारस्ति पवित्रं विधारमव्यम् ॥१॥ (फ ९।१०९।१६) ११६१ ४ वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मुजानो गोमि श्रीणाना ॥२॥ (ऋ ९११०९।१५ ) ११६२ प्र सोम याहीन्द्रस्य कुक्षा नृभिमानो अद्रिभिः सुतः ॥ ३ ॥ १० (पु)॥ [धा० १५ । उ० १ । १०५] (ऋ. ९।१०९।१८) ११६३ ये सोमासा परावति ये पिति सुन्धिर । ये वादा शर्यणावति ॥ १ ॥ (ऋ.९।६६।२२ ) ११६४ ५ आजोकेषु कृत्वम् ये मध्ये पस्त्यानाम् । ये वा जनेषु पञ्चम् ॥ २ ॥ १ . ९६६।२३) [५] पञ्चमः खण्डः। [ १९५७ ] हे ( मखाय ) विजो 1 (भा निपोदत) बैठो, (पुनानाय मगायत) शुद्ध होनेयासे सोमशे लिए गान करो, (शिन) मालकको जिसप्रकार पिता आभूषणोंने सभाता है, उसीप्रकार ( यह श्रिय परिभूपत ) यति इसकी शोभा बढामो ॥१॥ [११५८] हे ऋत्यिनो । ( गय-माधनं ) परके साधनरूप ( देवाव्यं मदं ) कोंके रक्षक भौर आनन्द माने. थाले (द्वि-शवम ई) दोनों प्रकारके सत बढानेवाले इस सोमको ( मातृमि क्सन) मातामों के साथ निसरकार परथे मिलकर रहते है, उसीप्रकार ( अभि रजत ) जलोंके साथ मिलामो ॥ २ ॥ [१५९ ] ( शर्धाय) वेगके लिए ( वीतये ) देयोंको देने के लिए ( मिवाय, घरणाय) मिम और वरुणके लिए (यथा शंतमें जिस प्रकार मधिया सुख हो उसप्रकार { दक्ष-साधन पुनाता ) बल बानेशले सोमको मुख परो॥३॥ [१९६०] (बाजी सहनधारः ) बलवान और अनेक धाराओंसे छाना जानवाला सोम ( अन्य पार पवित्र तिरःप्राक्षा) बालोको बनो छलनोसे धाना जाता है ॥ १॥ [११६१] हे (सहन रेता) अनेक योसे वृषत ( भन्दिा मृजानः ) पलसे भोया जानेवासा ( गोभिः श्रीणानः सः याजी) गाय के दूध मिलाया जानेवाला यह बलवान् सोम (अक्षा. ) छाना जाता है ॥ २॥ [ १९६२ ] हे ( सोम } सोम! ( नृभिः येमानः ! ऋत्विों के द्वारा नियममें रखा गया { भद्रिभिः सुतः) पापरति फूटकर निघोड़ा गया तू (इन्द्रस्य कुक्षा ) इन्द्र के पेट में (प्रयाहि । भर ना ॥ ३ ॥ [११६३ ] (ये सोमास ) जो सोम ( परावति ) पूरके देश तथा (ये अविति सुधिरे जो पासके देश बहाने जाते है, (या अदा शर्यणावति ) अपवा मो इस गणारत् नामक सरोबर पास जाने लाते हैं ॥१॥ [ ११६४ ] (ये आजीकेषु ) मो सोम ऋलोक देशमैं (ये रत्वसु ) जो धर्म भरनेवालंकि बैदामें ( पस्त्यानां माये जो नदी किनारे ( या ये पंचमु जनेपु) अपवा नो पपगोर योधर्म डाना माता है, यह हमें तुम ये ॥२॥ - .
सामवेदका सुयोध अनुवाद ( उत्सराविकः ' 9 , . 3 स २ १. ३ २ ३२३७२ १ ११६५ ते नो वृष्टिं दिवपरि पन्तामा सुवीर्यम् । स्वाना देवास इन्दवः ॥ ३ ॥ ११ (चि)॥ [धा०७ 13०। स्व०३] (ऋ. ९६६५।२४) ॥ इति पचम खण्डः॥५॥ [६] ११६६ आ ते वत्सो मनो यमत्परमाचिसधस्यात् । अग्ने त्वां कामये गिरा ॥१॥( (१९९७) ११६७ पुरुषा हि सहप्ति दिशो विधा अनु प्रभुः । समत्सु त्वा हवामहे ॥२॥(ऋ. १११८) ११६८ समत्स्सनिमवसे गाजयन्तो हवामहे । वाजेषु चित्रराधसम् ॥३॥ १२ ठा)॥ [धा० १३ । उ०२ । स्व०२]( ८१११९) ११६९ त्वं न इन्द्रा भर ओजो नृम्ण ५ शतक्रतो विचर्पणे । आ वौर पृतनासहम् ॥ १ ॥ (ऋ १९८९०) ११७० वर हि ना पिता वसो त्वं माता शतक्रतो यभूविध । अथा ते सुनमीमहे ॥ २ ॥ (ऋ.८१९८११) १९७१ त्वा शुष्मिन्पुरुहत याजयन्तमुप वे सहस्कृत । स नो रास्त्र सुवीर्यम् ।।३।।१३(ल)। [घा १४ । उ० नास्ति । स्व० १] (ऋ. ८९८।१२) [११६५] ( स्वानाः देवासः इन्दवः ) निचोडे गए वे चमकने वाले सोमरस (नः दिवस्परि ) हमें पुलोकसे ( वृष्टिं सुवीर्यं आ पवन्ताम् । घृष्टि और उत्तम पराक्रम युक्त अन्न देवें ॥ ३ ॥ ॥ यहां पांचवां खण्ड समाप्त हुआ । [६] पठाखण्ड । [१९६६] हे (मो) भग्ने ! ( वत्सः) दत्स ऋषि (गिरा त्वां फामये) तेरी स्तुति करके मांगता है, कि (ते मनः ) तेरा मन (परमात् चित् सधस्थात् ) बहुत स्पानसे भी (भा यमत् । यही आवे ॥१॥ [११६७] हे भग्ने ! (तू (पुरथा हि सह असि ) सब जगह एक जसो वृष्टि रखनेवाला है, इस कारण तू (विश्या दिशः अनु प्रभु ) सब दिशाओं के अनुकूल प्रभू है, इसलिए (समत्सु त्या हवामहे) सग्राममें तुझे सहायताके लिए हम बुलाते है ॥२॥ [१९६८] (समत्सु पाजयन्तः ) सप्राममें बलका उपयोग करनेवाले म (अवखे ) संरक्षणके लिए (वाजेपु) संपाम (चित्र-राधस ) विलक्षण पराक्रम करनेवाले (अग्निं हवामहे ) अग्निको सहायताके लिए बुलाते है ॥३॥ [११६९ शतक्रतो पिचर्पणे इन्द्र) हे सैकड़ों कर्म करनेवाले विशेष ज्ञानी इन्द्रद (न नृष्ण ओजः था भर ) हमें पोषयुक्त बल भरपूर वे, उसोप्रकार ( पृतना-सहं धीरं या ) यूटमें शत्रुको हरानेवाले थोर पुत्र है ॥१॥ [११७०] हे (यसो शतक्रतो) निवासक और सैकड़ों कर्म करनेवाले इन्द! (त्वं न पिता बभूविथ) हमारा पिता है। (त्यं माता) तू माता है । (अथ ते सुम्नं ईमहे) इसलिए तेरे पास हम सुख मांगते हुए आते है ॥ २॥ [१९७१हे ( सहस्कृत) बलके लिए प्रसिद्ध (शुध्मिन् ) सामपंवान् और (पुरहूत) यौन द्वारा गुप्ता जानेवाले इय! (पाजयन्तं षा उपग्रुबे) बलवान सेरी हम स्तुति करते है । सः नः सुधीय राव ! यह हमें उत्तम अधम अध्याय सामधे का सुयोध अनुवाद (१५९) ३३३३३ .३ ३३ . ११७२ यदिन्द्र चिन्न म इह नास्ति त्वादातमद्रिवः । राधस्तमो विदवस उभयाहस्त्या भर ( ५॥३९॥१) ११७३ पमन्यसे वरेण्यमिन्द्र यक्षं तदा भर । विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावनः ॥ २ ॥ ( १९३९।२) ११७४ यत्ते दिक्षु प्राध्यं मनो अस्ति श्रुतं वृहत् । तेन दृढा चिदद्रिय आचार्ज दपि सातये ॥३॥ १४ (पी)। [धा० २५ । उ० ११ १०४ (ऋ. ५.३९।६) ॥ इति षष्ट सण्ड ॥६॥ ॥ इति चतुषंप्रपातपय विसोमोऽयं ॥ २॥ चतुपंप्रपाठश्च समाप्त ॥४॥ ॥ इति सप्तमोऽध्याय ॥६॥ [१९७२ ] हे (अद्रिवः चिध इन्द) वनधारी विलक्षण बलवान् इन्द्र ! (स्वादातं यत् मे रह नास्ति ) मेरे द्वारा दिए गए नोधन मेरे पास यहां नहीं है। है (रिददसो) धनयुक्त इन्द्र ! उन धनोंको (तत् उमयाहस्ती) दोनों ही हासि (न: आमर) हमें भरपूर ॥१॥ [११७३ ] है (इन्द्र) इन्द्र ! ( यत् क्षं वरेण्य मन्यसे ) जिसे तू तेजस्वी और पेष्ट मानता है ( तत् माभर ) वह पन हमें भरपूर है। (ते घपं ) पे हम ( तस्स अपारस्य ) उस गाम घनके ( दापनः ) बान सेनेवाले होवें ॥२॥ १ ११७४ 7 है। अद्रिया) पयपारी इन्द्र ! (ते दिक्षु प्रराध्यं ) रा नाना दिशाओंमें प्रशसनीय (युत गृहत् यत् मनः अस्ति ) तथा सुप्रसिद्ध महान् जो मन है, (तेन हढा चित् । इस मनाते दृरसे धनको भी ( या सातये आदर्षि ) बल बहानेके लिए हमें दे ॥ ३ ॥ ॥ यहां उठा खण्ड समाप्त हुआ ॥ पति भएमोऽध्यायः॥ अष्टम अध्याय देवोका राजार है। उसके दुल इस माडवें अध्याप ५ ओजसा अ-धृष्ट. [११५५]- अपनो विनय इसप्रकार है- शक्ति के कारण भी भी हारनेवासा नहीं है हमेशा विषयी। १ चित्र-भानु ११४]-विलक्षण प्रकरनेवा। ६ अपादः । १९५६ - राजुको हरालयाला, स्वप २ सदा-वृधः । ११५५]-हमेशा दाते रहने वाला । तमोम हारनेवा। ३ विश्व-गतः [१५५५- मबारे द्वारा स्तुति करने ७ उन्न. १९५६ - उपयोग, शूर। पोग्य, प्रशंसनीय। ८ पृतनासु सासहि. [ ११५६ - परम शत्रुमोको सभ्यसा [१९५५]- महाना। हरामवाला, संग्राममें विजयो।
(१६०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तराचिका ९ शतकतुः [ ११६९]- संकडों महान् पार्य उत्तम हो, (२) राष्ट्रमें सघटन हो, (३) सत्पात्रको दान देकर रीतिसे करनेवाला। लोक कल्याण करें, ऐसे तीन प्रकारके कार्य यज्ञमें करने १० विचर्षणिः [११६९- विशेष ज्ञानी। होते हैं। ये कार्य राष्ट्रहितको दृष्टिसे जो करता है उसका ११ वसु. [ ११६९]- धनवान्, निवास करानेवाला। सामर्य उसको इस लोकसेवाके कारण पढता है, इसलिए १२ सहस्कृतः [ ११७१]- बलके लिए प्रसिद्ध । उसका कोई नाश नहीं कर सकता। २३ पुरहत [ १९७१ - बहुत लोग जिसे सहायताके ४ हे इन्द्र ! नृष्णं भोजः पृतनासदं योर नामर लिए बुलाते हैं। [११६९]- हे इन्द्र । हमें पौरषयुक्त बल दे, और पुराने ११ वाजयन [ १९७१]- बलशाली, सामर्यवान् । शत्रुका नाश करनेवाला पुत्र भी दे। १५ अद्रिय [११७२]-बच हापोंमें धारण करनेवाला। ५ हे शुस्मिन् ! त्वां उपग्रुये, नः सुवीय रास्व पहाइपर किलेमें रहनेवाला । [११७१ ]. है बलवान् इन्द्र | तेरी में प्रार्थना करता हूँ। १६ चित्र [ ११७२ ]- विलक्षण, बलशाली । दू हमें सामर्थ्य दे । १७ विदद्वसुः [११७२ - धनयुक्त, धनका दान ६ हे इन्द्र' यत् धुरं वरेण्यं मन्यसे तत् आ भर करनेवाला। १८ विवस्वान् [ १५७३ ]- विशेष तेजस्थी । तस्य अकूपारस्य दावनः विधाम [ ११७३ ]- तेरे विचारमें नो पन तेजस्वी और भ्रष्ट है, ये धन हमें भरपूर पे गुण इस अध्यायमें वर्णित है। ये गुण यदि उपाराक थे। उस उत्तम और श्रेष्ठ घनके लेनेवाले हम हो। अपने अन्दर बढाले तो उनको चारों ओर प्रशसा होगी । मनुष्य इस रोतिसे उन्नत हों, इसीलिए ये वैवोंके गुण यहा उभयाहस्ती नः आ भर [ ११७२ ]- तेरे द्वारा रिए ७ हे इन्द्र ! त्या दातं यत् मे इदं नास्ति, तत् कहे है। अब इन्द्र के दूसरे वर्णन देखें- १ धिया इपित विप्रजूत सुतायतः पावतः प्रामाणि गए जो पन मेरे पास नहीं हैं, उन्हें न हमें दोनों हाथोंस भरपूर दे। उप आयाहि [११४७]- हे इन्द्र ! द्धिपूर्वक प्रार्थना ८ हे वसो शतक्रतो! स्वं न पिता, वं माता करके बुलाया गया, बाह्मणों के द्वारा निमश्रित, सोमरा यभूविथ ' अथ ते सुम्नं ईमहे [ ११७० ]- हे निवासक जिसके लिए तैयार किया गया है, जिसकी स्तुति चलती है और सकड़ों कार्य उत्तम रीतिरो करनेवाले इन्द्र ! तू हमारा ऐसा तू स्तोत्रीको सुनने के लिए यतके पास आ । पिता और तू ही हमारी माता है, इसलिए सुप्तसे हम सुख २ यःमर्त्यः इद्धे इन्द्रस्य सम्नं हविः आ विया मागते है । सति, घुम्नाय सुतरा अप. [११५० ]- जो मनुष्य प्रदीप्त मग्निमें इन्द्रको प्रिय लानेवाले हवि इम्पोंका अर्पण मन अस्ति, तेन दृढा चित् घाज सातये आवर्षि ९ हे अद्रिवः ! ते दिक्षु प्रसाध्यं श्रुतं वृहत् यत् करता है उसके लेनके लिए इन्द्र वृष्टि करके उत्तम तैरने [११७४] - हे वशधारी इन्न ! तेरा सब दिशाओं में प्रशसनीय योग्य पानी देता है। जो विशाल मन है । उस अपने मनसे जो पन दूर हो गए है इन्द्र देवताके प्रेमके लिए कुछ विशेष हवनीय द्रव्य है। उनको भी हमारे बल ठानेके लिए हमें दे। सग्नि जलाकर उन द्रप्योंका हवन करनेसे मनी वर्षा होती इस प्रकार इनका वर्णन इस अध्यापमें आया है। है, और उससे बहुत पानी होता है। ये हषन द्रव्य कौनसे है उनकी खोज आवश्यक है। अनि ३ ओजसाभ-प्रधृष्ट इन्द्र यक्षः चकार, तं न कि १ तव क्रतुभिः अमृतत्वं आयन् [११४१]-पजमान कर्मणा नशत् । ११५५/- अपने सामयंसे नित्य विजयो यज्ञोंके द्वारा अमृतत्वको प्राप्त होगया । इसका पसि जो सत्कार करता है, उसे अपने कमि कोई २ वैश्वानरं अध्नराणां रग यश्चस्य केतुं देयाः भी नष्ट नहीं कर सकता। इतना उस प्रशकताका सामजनयन्त [ ११४२]- विश्वका नेता, हिसारहित यतकर्मका बढ़ता है । यत मरनेका अर्थ रेघल सत्कार करना ही नहीं सचालक, पत्तकै ध्वज ऐसे सुभ अग्निको देषोंने उत्पन्न किया। है, अपितु (१) सरकारके योग्य सम्मनोंका राष्ट्रमें साकार ३ यः भर्चिा विश्वा यना परिप्यजत्, जिन्हया मएम गध्याय) सामवेदका सुत्रोध अनुवाद शुद्ध करो। रुपणा फरोति ते डिव [११४९]- जो अपनो श्वालासे ये गल उत्पन्न करनेवाले देव है इसलिए वे राय देवों में अत्यधिक सब जगलोंको जला डालता है, और अपनी ज्वालासे सव प्रशसित है। काला करता है, उस मस्निको स्तुति कर। ३ तान. दिव्याय पार्थिवस्य महः पयः शफ्नं, अग्नि अपनी शालासे जगलको भस्म कर देता है, और यां देषु महि क्षत्रम् [ ११४५] वे मित्र और वरुण जिस मार्गसे वह धनको जला देता है, वहाँ बहो काला कर घुलोक और पृथिवीपरके सब महान् पन देने में समर्थ है। देता है । ऐसा यह अनिदेव स्तुति करने के योग्य है। तुम दोनोंके महान् क्षात्रवल देवोंमें भी प्रसिद्ध है। ४ असे चित्र-राघम अनि हवामहे । ११६८]- ४ शर्धाय पीतये मिघाय चरणाय यथार्शतम अपने सरक्षगके लिए विलक्षण पराक्रम करनेवाले निको दक्षसाधनं पुनाता [ ११५९]- मल पढाने के लिए और अपनी सहायताके लिए बुलाते है। देवोंको देने के लिए तथा मित्र और वरुणको जिसप्रकार ५ दिव मूर्धानं पृथिव्याः भरति वैश्वानरं कते आनन्द हो, उसप्रकार बल बढानेके साधनरुप सोमको आजातं, फर्षि समाज जनानां अतिथि आसन् , मः पानं देवा. मा जनयन्त [ ११४०]-लोकके मस्तकके देवोंके लिए सोमरस स्पानपर रहनेयाले, पृथीपर फिरनेवाले, विश्वक नेता, महके सोमरस यज्ञमें निचोडते है, वह देवोंको दिया जाता है, लिए उत्पन हुए, ज्ञानी और सम्राट, लोगोंकी ओर अतिपिके बादम या करनेवाले पोते हैं । इस विषपमें पोडासा वर्णन रूपमें जानेपासे, बेयोंकि मुख और हमारे सरक्षक ऐसे अग्निको इस प्रकार है- बौन उत्पन्न किया। १ स वायुं, इन्द्रं, अश्विना मदेन साकं गच्छति इस प्रकार अग्निका वर्णन इस अध्याय साया है। [११३४ ] - यह सोमरस याय, इन्त्र, अश्विनो आदि देवोंके इन्द्र और अग्नि पाप्त अपने स्वाभाविक मानन्द के साथ पहुंचता है। २ मघोऊमयः मित्रे घराणे भये पबन्ते [११३५] १न्द्र मग्निं च मा वोदये नः वाजयतीभाषा, -इस सोमरसको लहरें मित्र, दवण और भग मारि देवक भाशनु अतः पिपृतं । १९५१ - इद और मग्निको षोंकी और पहचान के लिए हम एस मदानेवाले अन्य और पास पहचती है। ३ हे सोम! नृभिः यमानः अद्रिभिः सुमन पपन घोडेको। ऐसे बसे अन्न हमें नहीं चाहिए, अपितु यस यतानेवाले स्थ कुक्षा प्र यादि [ ११६२ - हे सोम ! ऋयिओं द्वारा निचोडा गया तू इनर पेटमें जाता है। चाहिए । पोडे भी ऐसे पैसे नहीं, अपितु सेज शेग्नेवाले मौर यत्यन्त चपष्ठ चाहिए। यह धार योगना यहा देखने सोम स्वर्गमें रहता है पोप है। १ इन्दया न दियस्पार वृष्टिं मुवीय आ uni मिन और वरुण ११५J- सोम हमारे लिए स्वर्गलोकसे दृष्टि और उत्तम पराक्रम करनेको शक्ति साता है। इस भायाप मित्र और पक्षणको भी पोजीसो स्तुति पाई हैलोसप्रकार है- १ मित्राय ययणाय यि गिरा गायत । महि १ देषः [ ११९५]- भरनेवाला, स्वर्ग में रहनेवाला । सत्री ऋतं पृहत् ( १९४३ - मित्र और पलके लिए २ महिमतः ११५]-महान् रायं करनेपाला । स्तोत्रोंको सही मावाजसे पायो । महान् इलोको धारण करने ३ शुचि-याधुः [ १११६]- गुर वायुके समान । कामे मित्रावरुणो! पहने हुम्हारी ही मुति हो रही है। ४ पायका [१११६-१, पवित्र करनेवासा। से सुनने के लिए मानो। ५ यराहः (१९१८)- बलवान्, जिसपर साधारमा २ उभा सम्राजा पृतयोनी देया देयेषु प्रशस्ता रिमोरे पर हैं। [११-मित्र मौरबह से शेनों ही महान सम्राट है। ६ दुः[११५२]- सेवायो। २१ [साम हिदी भा २] परवरतिकूटर सोमके गुण (१६२) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ मराचिका मोमके पल ७ सखा [११५२]-मित्र, मित्रके समान हित करनेवाला। अत्यन्त बन्दनीय सोग बहुत सारे पानीमें स्नान करता है। ८ गयसाधनः [ ११५८ - पश स्थानका मुख्य साधन, अर्थात् बहुतसे पानी में वह मिलाया जाता है। घरका मुख्य साधन। २ वृपः सत्यः अध्यरः सन अभि वने अचिक्रदर ९ देवाव्यः [११५८]- देयों के देवत्वको रक्षा करनेवाला। [११३०]- बलवान् सत्यस्वरूप, हिंसारहित सोम यज्ञ. १० द्विशवम् [ ११५८ ]- दो प्रकारके बल जिसके गालामे पानीमें शब्द करता हुभा मिलाया जाता है। पास है । दिग्य और पापिय बल जिसके पास है। ३ हरिः प्रियः वनेषु अव्या बारे परिसीदति इसप्रकार इस सोमके गुण इस अध्यायमें वर्णित है। [११३३]- हरे रगका प्रिय सोमरस पानी मिसाये जानके सोमका चमकना बार भेडके बालोंकी छलनीसे छाना जाता है। ऐसा यह सोम पानी में मिलाकर छाना जाता हुआ नीचे के १ तिग्मशंगः परीणसं कृणुते, दिया हरिः ददृशे यतनमें गिरता है, तब उसका शब्द होता है । नमान. [१११८]- वह सोग तीक्ष्ण किरणोंसे प्रकाश करता है, दिनमें हरा चोखता है और रातमें चमकता है। छानते समय सोमका शब्द १ रेभन् पदा अभ्योति [ १११६ ]- सोम शम्ब करते हए पात्रमें गिरता है। सोमरसमें सामध्य बढाने का गुण है। इसीलिए उस रराको २ सूराः भवं चितम्यते [११२३] सोमरस शरद देव पीते है, और राक्षसोंका सहार करते है। सोमके ये यल करते है। वेदमत्रों में अनेक प्रकारसे वर्णित है। उनमेंसे कुछ स ३ वाजी सहस्रधारः अध्यं वारं तिरः प्राश्नाः प्रकार है- [११६०] - बलवान् सोम हजारों धाराओंसे भेष्ठके बालोंकी १ ते मयोभुवं चन्हि पान्तं पुरुस्पृहं दक्ष अद्य छलनीसे नीचे गिरता है। आवृणीमहे ॥ ११३७ ]- हे सौम ! तेरे सुखदायो, इष्ट- एक कलशमें जलमिश्रित सोमरस भरा जाता है । दूसरे स्थानपर पहुंचानेवाले, संरक्षण करनेवाले, यहतों द्वारा कलशमें मुद्ध पाती रहता है । उस दूसरे कलशके मुहपर प्रशसित ऐसे बलोंको आज हम प्राप्त करनेकी इच्छा करते है। भंडके वालोंको छलनी रखी जाती है और उस पर जल २ मन्द्र घरेण्यं विमं मनीपिणं पान्तं पुरुस्पृहं आ मिश्रित सोमरस डाला जाता है । इस पर यह सोमरस छन तृणीमहे । ११३८ ]- आनन्द बढानेवाले, श्रेष्ठ ज्ञानपूर्ण, छनकर नीचे वर्तनमें गिरता है। गिरते समय उसकी बुद्धियुक्त, सरक्षण करनेवाले, बहुतों द्वारा चाहने योग्य ऐसे आवाज होती है, यह मालकारिक वर्णन है। जो तेरे बल है उन्हें हम पानेको इच्छा करते है । गायके दूधमें सोमरस मिलाना ३ हे सुफतो । रयिं सुचेतुनं तनूपु पान्तं पुरुस्पृह आ वृणीमहे [ १९३९]- हे उत्तम कर्म करनेवाले सोम ! छाने हुए सोमको गायके दूधर्मे मिलाया जाता है-- पन, उत्तम शान, उत्तम पुत्रपौत्र, उत्तम सरक्षण और १ धेनवः पयसा इत् अभि शिश्रयुः हरि फ्रीडन्त प्रशसनीय यल हम गारो प्राप्त करें ऐसी इच्छा करते है। अभ्यनूषत [ ११.३]- गायें अपने दूधका मिश्रण इस. सोमरसमें ये गुण है।धे गुण हमारे अन्दर आवें और हम सोमरसके साथ करती है । खेलनेवाले हरे रंगके सोमको ये उन गुणोंसे मुक्त हो ऐसो हमारी इच्छा है । हर एक उन्नति सुशोभित करती है। करनेवालको ऐसी ही इच्छा करनी चाहिए। २ सइनरेताः अद्भिः मृजानः गोभिः श्रीणानः सोमको पत्थरोंसे कूटकर उसका रस निकालते है । उस अक्षाः [११६१]-हजारों प्रकारचे बलसे युक्त सोमसमें रसमें पानी मिलाकर छानते हैं। इस सम्बधी वर्णन इस है। फिर यह रस बर्तनम छाना जाता है। पहले पानी मिलाया जाता है, फिर गायका दूध मिलापा जाता प्रकार है- ३ सोमास. गोभिः अंजते [११]- सोमरर सोमका पानी में मिलाया जाना गायके दूध से सुदाोभित होते हैं। १ चन्धः हविः मही अपः विगाइते [१९२९] इन स्पलोंमें "गायका दूध" न कहकर फेवल " गाय" ( सामवेदका सुबोध अनुवाद अष्टम अध्याय] जाते है- कहा है, यह वेदको आलंकारिक भाषा है। सोम गायके साय मिलाया जाता है इसका अर्थ है कि सोमरस गायके दूधके सुभाषित साथ मिलाया जाता है। १ काव्यं घुवाणः देवः देवानां जनिमा विवक्ति सोमके लिए पाजे [19१६-कायोंका कहनवाला सोमदेव अन्य देवोंके जरमके वृत्तान्त कहता है। सोमरस निकालनेके समय जैसे मत्र बोले जाते हैं, जैसे २ सखाया दुर्मर्ष पवमानं पाणं साफ प्रवदन्ति मामका गान किया जाता है, उसीप्रकार बामे भी बजाय [12]- वे मित्र शत्रुओंको असह्य तथा सुख होनेवाले सोमके लिए वाण नामक माना बजाते है । अनेक लोग १ सखायः दुर्मर्ष पवमानं वाणं साकं प्रवदन्ति मिलकर बाजे वजाते है। [१११७ ] वे ऋषि मित्र शत्रुओंके लिए असहा ऐसे शुद्ध ३ दिवा हरि। ददृशे, नपतं ऋजः [ 2010]- होनेवाले सोमके लिए " वाण " नामक याने बजाते हैं। सोम दिनम हरे रंगका दीखता है और रातमें चमकता है। सामगानके समय ये बाजे बजाये जाते है। "वाण" सम्भयतः ४ रथाः इव, अर्वन्तः न श्रवस्यन्तः राये प्रामुः एक चमवाद्य पा। और अनेक ऋषि उस वाद्यको सोमरस [1]- रथ और धोरे यशकी इच्छा करते हुए पन तैयार करने के समय बजाते थे, ऐसा प्रतीत होता है। प्राप्ति के लिए पराकम करते है। जयके द्वारा सम्पत्तिकी प्राप्ति ५ प्रशस्तिभिः राजानःन गोमिः अञ्जते [१:२१] -स्तुतियोंसे जिसप्रकार राजागण शोभित होते है, उसीप्रकार १ हे रोदसी । मध्यः याजस्य सातये असाफ रयिं गापके दूधमे सोमरस सुशोभित होते हैं । थवा यसृनि संजितं [ ११३६ ]- हे धावापृथियो ! सोम. ६ धर्मन ऋतस्य पथा यसृग्रम् [२८]- धर्मके रूपी अानको प्राप्तिके लिए हमें धन, अन्न और ऐश्वर्य, विजयको समान सत्यके मार्गसे वे जाते है। प्राप्तिके बाद मिले । अर्थात् पहले हमारो विजय हो उसके ७ पयमानः स्पृधा विशः राजा व अमिसीदति पाव हमें ऐश्वर्य भी प्राप्त हो। [११३२]- सोमरस स्पर्धा करनेवाली प्रजाओंके राजाओ सोम अन्न देता है समान शोको नष्ट करता है। १ नः संयतं पिप्युपी पं अर्मिणा पवस्व, या ८ रोदसी अस्मभ्यं रवि व वसूनि संजित [इद् ] क्षुमद, वाजयत् , मधुमन् सुवीर्य दोहते [३६]- धुलोक और पृथ्वीलोक हमारे लिए धन, यश, [११५४ 1- हमारे द्वारा लाये गए पोषक अन्नको है सोम! ऐश्वर्य तया जप प्राप्त करावें। तू अपनी लहरों शुसकर, जो बन्न प्रसिद्ध यसवर्षक और हे सोम 1 ते मयोभुवं पान्तं पुरुस्पृहं दक्ष अध मधुरतायुक्त उत्तम बल देता है। जिससे पीर पुत्र उत्पन्न आवृणीमहे [ १३७]- है सोम । तेरे मुखवायो, संरक्षण हो सकते हैं। ऐसा यह सोमात्र दूर करता है। करने में समर्थ तथा यहुतों द्वारा प्रशंसाके योग्य, बलशी हम इच्छा करते हैं। सोम शत्रु दूर करता है १० हे सोम मिन्द्रं वरेण्यं, विप्रं मनीपिणं पान्तं १ पयमानः स्पृधः अमिसीदति विशः राजा इय पुरस्परं आ [ ११३८]- हे सोम ! आनन्द देनेवाले, श्रेष्ठ, [११३२ - यह सोम प्रजाओं के पालन करनेवाले राजाके गानी, मननशील, संरक्षक और बलों द्वारा चाहने योग्य समान भकोहराता है। ऐसे तेरी हम भक्ति करते है। २ विध्याः दिशः अनु प्रभुः समासु त्या हवामहे १९ हे सुक्रतो! रवि सुचेतनं तनुषु पान्तं पुम- [११६७]- हे सोम । न सब दिशाओं के अनुकूल रहनेपाला स्पृहा (1- हे उत्तम कर्म करनेवाले गोम । मन है। इसलिए पुरमें सहायतारे लिए हम तुप्ते युलाते हैं। धन, उत्तम हान, पुत्रपौत्र तथा संरक्षणको प्राप्तिरे लिए इस प्रकार सोनरा वर्णन इम अध्याय है। बहुनों द्वारा निसको स्तुति होती है ऐसे इस सोमरी प्रार्थना हमरते है।
सामयेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिका । हरा सकता। १२ वां देवेषु महि क्षत्र [ ११४५] - तुम्हारी देवों में २५ सहम्मत शुस्मिन् पुरुहता वाजयन्तं त्यां महान् शूरपोरता है। उपावे। नः सुवीर्य रास [ 11७]- हे पलके लिए १३ नः याजवतीः इस आशन् अर्यतः पिपृतं प्रसिद्ध और सामर्थ्यवान् तथा सभोके द्वारा प्रशसित इन्द्र। 1५1]- हमें पल बढानेयाले अन्न भौरवचस घोडे हो। बससे युक्त तेरी हम स्तुति करते हैं, तु हमें उत्तम पराक्रम १४ सखा सख्यु. संगिरं न प्रमिनाति [ 11५२]- करनेका सामध्ये दे। मित्र मित्रको कष्ट नहीं देता। २६ ६ विदरसो! हे अद्रियः चित्र इन्द्र ! तत् १५ मर्यः युयतिभिः [११५२]- पुरुष स्त्रियों के साथ उभया हस्ती नः आभर [११७२१-हे पनवान्, पधारो, मानवसे रहता है। विलक्षण और बलवान् इन्द्र ! वे धन दोनों ही हासे हमें १६ नः संयतं पिप्युपी पंऊर्मिणा पवस्व [११५४] भरपूर दे । -हमें पोपर अन्न अपनी छहरोंसे दे । भरपूर दे। २७ हे इन्द्र । यत् धुक्षं घरेण्य मन्यसे तत् भाभर १७ क्षुमत् याजवत् मधुमत् सुवीर्य दोहते १५४] [१२]- हे इन्न ! जिसे तू सेजस्वी और चाहने योग्य मोम प्रसिद्ध, बलवर्षक तथा मधुरतायुक्त धन देता है। मानता है, उसे हमें भरपूर दे। १८ सदा, विश्वमूर्त अन्नसं ओजसा मधृष्टं २८ ते वयं तस्य अफपारस्य दावनः विधाम धृष्णु इन्द्र पर्मणा नकिः नशत् [१५५]- रावा [१३] ये हम उस उतम धनके वानको सेनेको या रवानेवाले, प्रसंसनीय, महान्, अपनी शक्तिसे न हारनेवाले करते हैं। पर शत्रु को हरानेवाले इन्त्रको अपने प्रयत्नसे कोई भी नहीं २९ हे अद्विः! ते दिक्षु प्रराध्यं श्रुतं वृहत् मनः भस्ति, तेन दृढा चित् पाजे सातये आदर्षि [11७४) १९ अपाळई उमं पृतनासु सासहि न्दं [11५६] हे वनपारो हुन्छ । सेरा माना विशाओं जानेवाला प्रसिद्ध -दाको हगोपाले, उपयोर मोर पुढमें विनयी इदगी में और विशाल मन है । उस मनसे कठिनतासे मिलने वाले रतुति परता। पनौको भी बल बहाने के लिए हमें है। २० ससाया था निपीदत, पुनानाय मगायत [१७]-रे मित्रो । आरो, बैठो मौर शुर होनेवालेकी प्रशंसा करो। उपमा २१ विश्वा: दिशा अनु प्रभुः, समत्सु त्या दया- अब इस मप्यायमें भायी हुई उपमाओंरो देखिए- महे [ 11६७]- सय दिशाओंमें सू योग्यशासक है, इसलिए मुझे पुरमें सहायता के लिए हम बताते हैं। १उशना व १११६]- उशना ऋषिो समान १५ समानु याजयन्तः अपसे पाजेपु चित्रराघसं (काम्यं ग्रयाणाः ) कवि काग्योंको योलता है। भनि हयामहे ||१६८]-पुरमै मलका उपयोग करने वाले २ रथाः इय अर्यन्तः न [१११९]-रप और योरे हम सपाममें अपने संरक्षणरे लिए विलक्षण पराकम परने. समान (प्रयस्या सोमासः राये प्रारमुः) परी पाले अणोरो हायतारे लिए बुलाते हैं। च्छिा करनेवाले सोमरस पर पानरे लिए प्रमरा ररते हैं। २३ हे शतपतो विचर्षणेन गुम्णं भोज ३ रया च [ १९२०- युटमे जानेवाले के समान भाभर, पृतनासई चीर मा [९]. हे सतोमं (हिन्यानाम. गभस्योः दधिरे) प्रेरित ए ए सोमर करनेवाले गानोमा में पौरुपयुक्त सात भरपूर दे और हायोंमें पारण लिए जाते हैं। पोरे लिए सोमपात्र हापसे परम करो हरानेवाला पुत्र है। परो जाते है। २४ पमो वातानो । स्यं न. पिना. त्यं माता ४ भरामः कारिणांय [१९२०]-भार सारर परिशा यय ते सुम्न मई। 10 सिर भानेश महारों हापौर सिर करता ग! हमारा पिता भौर नही हमारी माता है, रमाला जाता है, उमौषमा सोमपात्र मोम पोमेरे लिए हार्गाने मेरे पाप मुलांपते है। सहाये जाते है। ---- अएम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद ५प्रशस्तिभिः राजानः न [११२१ ]- स्तुतियारी ९ मर्यः युवतिभिः इव [११५२१-पुरुष असे स्त्रियोंकि जैसे राजा खुश होते है, उसोप्रकार सोमरस (गोभिः साप आनन्दसे रहता है, उसीप्रकार (सोमः समर्पति) अंजते ) गायके दूघसे सुशोभित होते है। सोम पानोंके साथ रहता है। ६ सात धादभिः यश न[११२१]- सात विनों १० इन्द्र न [ ११५५]- इन्द्रका जैसे लोग (यह द्वारा जैसे यश सिद्ध होता है, उसीप्रकार सोम गाय के दूधसे घकार) यतोंसे सत्कार परते हैं, उसीप्रकार सोमका भी सिम होता है। सरकार पनोंसे करते है। ७ शिगुन ११४१]- लाकेको जैसे उसकी माता ११ मातृभि. कसं न [११५८]- माताओं के साथ देखभाल करती है, उसोमकार ( जायमान त्वां सिं) जिसप्रकार लडका रहता है, उसीप्रकार (भि सं. मये जलाये गए उस अग्निको ऋत्विज देखभाल करते है। एजत) इस सोमको जलों के साप मिलायो। ८ शिशुन [११५७]- मालकको जैसे पिता आभूषणोंरो १२ पिश रामाय [११३२]-प्रभामरेका रागा भजाता है, उसीप्रकार ऋरियम ( यो श्रिये परिभूषत । जैसे शत्रुओको दूर करता है। उसोप्रपार ( पयमानः स्पृध' या अनिकी शोभा बढ़ाते है। ममि सीदति) सोम शत्रुओंको दूर करता है। अप्टमाध्यायान्तर्गत ऋपि-देवता-छन्द सूची मैत्रसपा ऋग्वेदस्पान ऋषि देयता छत्दा पवमान सोम निष्ट " " " " गायत्री " " " " 11 २।९७७ १९७८ ९१९७९ ter? ९।१०२ ९२२०६३ ९।१०।४ ९.१०१५ २।१०१६ ९.२०१७ ९.१८ १५१००१ वृक्षगणो वासिष्ट वृषपणो यासिष्ठ वृषपणो वासिष्ठ असित काश्यपो देवलो पा असित काश्यपो देवलो वा असित काश्यपो देवलेवा असित काश्यपो रेवलो वा असित काश्यपो देवली या असित काश्पयो देवलो दा असित काश्यपो देवलोवा यसित कारपो देवलो बा असित काश्यणे देवलोवा " " " " " " " P " " १२७११ ९.90 ९७३ १४ १114 समित काश्यपो देवसो वा अमित काश्यपो देवमाया सित गारपयो देयनोवा अमित माश्यपो देखलोवा मसिन'काश्यपो देवलो वा " " " ॥ " (१६६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उसचिव ममतस्या ऋषि देवता छन्द पवमान सोमा বাহী ११२४ "" 11 " आवेदस्थान ९७६ ९७७ ૬૭૮ Rાકાર ९१६५।२८ ११.५।२९ ९६५० असित काश्यपो देवलो वा असित काश्यपो देवलो वा असित काश्य देखलो वा असित काश्यपो देवलोदा भगारपिर्जमदग्निभागधो वा भृगुहिणिजमदग्निर्भागको वा भगुवणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा , " " " " " 1 १५४० अग्नि त्रिष्टुप " 10 ६७१ ६७४ ६७२ ५६८०१ ५६ ५.६८।३ বিলাল गायत्री ११४५ " " " " ११४६ १९४७ " " भरद्वाजो बाहत्पत्य भरद्वाजो बाहत्परम भरद्वाजो बाहत्पत्य यजत आत्रेय यजत आत्रेय मजत भत्रिय मधुच्छन्दा वैश्वामित्र मथुरादा श्वामित्र मपुण्यदा वैश्वामित्र भरद्वाजो याहस्पत्य भरदायो वार्हस्पत्य भरद्वाजो माईस्परप (४) सिरता निवाबरी सिकता निवावरी सिरता निवावरी ॥ ६११०१० ६।१०।११ ६६०१० " पवमान सोम जगती " ९८६१६ ९२८२०१७ ૮૮ ૮૭૫ " पुरमा मागिरम मगाय- (विषमा बहती, समा सतो पहनी ८13018 पुदहम्मा मौगिरस " २।१०४॥ पवमान सोम उरिणा १११०४ पवंतनारसमाग्यो, सिपिपाप प्सरसौपायपोथा। पवतनारदोबायो, नियिणियाव मरसोरायसेवा पदमनारसपायो, गिलगियाप सरसीपाश्यपोश भनय पियो एश्वरा स ९.१०॥ " का पिंपरा चिरा अम अन्याय सामवेदका पुत्रोध मनुवाद मंराध्या १९६९ देवता छ पधमाना सोमः पिया विराट गायत्री " भावपार १०९।१७ मग्नमें पिटण्यो ऐश्वराः ९०८ मान धिण्यो ऐश्वरा. ९६९ भृगुणिर्जमदग्निर्गियो वा भयुधिगिर्जमदनिर्गिवो पा Vie भगवधिमिर्जमयनिर्गिवो था (६) ८१७ ८1१1८ पास. काय ८९९ ८९० नमेय आगिरसः ८1८1११ अमेप गिरत ९८ नमेष मागिरस. मानिमाम प्रतिमा मग्नि N " वास.कावः " " १९७० M " पुर उरिगाह " १९७२ " t ११७४ भनिनाम: "
(१६८)
सामवेका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिकः
अनमोऽध्यायः
अथ पक्षममपाठक प्रथमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
[१]
। १-२०) १ प्रतर्दनो बयोदासि., २, ३, ४ असितः काश्यपो देवलो वा; ५, ११ उचभ्य आगिरस'; ६, ७ अमही.
पुरागिरसः, ८, १५ निभूतिः काश्यप, ९वसिष्ठो मैत्रावरुणिः, १० सुकत यांगिरसः; १२ कविर्भार्गषः, १३ देवातिथि:
काग्वः, १४ भागः प्रागाथः; १६ अम्बरीषो वागिरः ऋजिया भारद्वाजश्व १७ अग्नयो पिण्या ऐश्वरा, १८ जना
काव्यः १९ नमेष आगिरसः, २०जेता माधुन्छन्दसः ॥ १-८, ११-१२, १५-१७ पवमानः सोमः, ९, १८
अग्नि.; १०, १३, १४, १९-२० इन्द्रः॥ १-९ विष्टपः २-८, १०-११४-१५, १८ गायत्री; जगतो १३,
१४ प्रगाय = (विषमा बृहती, समा सतोवृहती ); १६-२० अनुष्युपः १७ विपदा विराट् १९ उष्णिव ।।
१३
२
३१
3
१
.
31.
३
स
११७५ शिशु जन्नानर हर्पत मृजन्ति शुम्भन्ति विप्रं मरुतो गणेन ।
कविगोभिः काव्येना कविः सन्सोमा पवित्रमत्यति भन्न ॥१॥ (ऋ. ९।९६।१७ )
११७६ प्रापिमना य सपिकरस्वाः महसनीथा पदयी. कवीनाम् ।
तसीय धाम महिपः सिपासन्सोमा विराजमनु राजति ष्टुप् ॥ २ ॥ (ऋ. ९।९६।१८ )
११७७ चमूपच्छथेना शकुनो विभृन्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि विभ्रन् ।
अपामूर्मिर सचमानः समुद्र तुरीयं धाम महिपो विवक्ति
॥ ३ ॥१(ल)॥
[ धा०२४ । उ मास्ति । स्व०१/(*.९।९६।१९)
[१]प्रथमः खण्डः।
[१२] (जशान शि) अभी अभी उत्पन्न होने के कारण बालक्के समान रहनेपाले (हर्यत) रायों मारा
पुग्ध म सोमको (मरातः मृजन्ति ) मदन पुर मे है। (गणेन विनं गुम्भन्ति ) सात संख्या के इसझानपर्थक गोमो
गुमोभित करते है, उसके बाद (कायिः सोमः काव्येन ) यह कानी सोम स्तोत्रके कार्योसे (कविः गीर्भिः) मोस्तुति
प्रारम्भ हुई है, उमे मुनते हुए (रेमन पयित्रं अत्येनि) शरद परते हुए छलनीसे छाना जाता है॥ १ ॥
८ ११७६] (यापि -मना) ऋपिरे समान मनवाला (ऋपि-कृत् ) ऋषियोंको पनानेवाला ( स्पसदन.
नीपा) सबका सेवन करनेवाला, हजारों स्तुतिमि प्रमित (कवीनां पदची) रविको योग्यताको प्रारमा मा
(पः सोम ) को सोम है वह ( महिषः) अत्यन्त प्राय (तृतीयं धाम लिपामन्) तीसरे प्राममें रहनेवासे और
(स्तुप) स्तुत्य होकर (विराज अनु विगाति ) विशेष सेमरको बने हुए इसरो और अधिक प्रमाशित मरता है ॥२॥
[११५७] (चम्पद्येना) ला रहनेपामा प्रशंसनीय(पुनः )तिमान् (शिमृन्या )गति करणेकामा
(गो-पिरतुः गाप प्राप्त पलेवाला, गापरु पूपमें मिलाया जानेवाला (द्रप्सः) पहनेवासा (अपां ऊर्मि समुद्र
मयमानः मनो लहरोसिमा मिमापा जानेदामा (मायुधानि पित्) मात्र धारण परवाला (महिला)
पह बलबानु गौम (नुरीयं धामयियषित) पतुर्थ शाम एता है, मये स्पानमें विरामता है ॥३॥
नषम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद 91 । 3 २ , २ ३३ 3 १३. ३ ११७८ एते सोमा आमि प्रियमिन्द्रस्य काममक्षरन् । वर्धन्तो अस्प वीर्यम् ॥ १ ॥ (ऋ. ९।८।१ ) ११७९ पुनानासचम्पदो गच्छन्तो वायुमश्विना । ते नो धत्त सुवीर्यम् ॥२॥ (ऋ. ९।८।२ ) ११८० इन्द्रस्य सोम राधसे पुनानो हादि चोदय । देवानां योनिमासदम् ।। ३ ।। (ऋ. ९८६३ ) १९८१ मजन्ति ला दश क्षिपो हिन्धान्ति साधीतयः । अनु विप्रा अमादिषु: HTEE (5. ९८१४ ) ११८२ देवेभ्यस्त्वा मदाय कर सृजानमति मध्यः । सं गोमिमियामसि ॥५॥१३. ९८५) १९८३ पुनानः कलशेष्वा यखाण्यरुपो हरिः । परि न्यान्यव्यत ॥६॥ (. ९८०६) ११८४ मघोन आ पवस्व नो जहि विश्वा अप द्विपः । इन्दो ससायमा विश ||७]] (ऋ. १।६७ ) ११८५ नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतर स्वर्विदम् । भक्षीमहि प्रजामिपम् ॥८॥ (३ ९८९) ११८६ वृष्टि दिवः परि सव द्युम्नं पृथिव्या अधि । सहो ना सोम पृत्सु धाः ॥९॥ २ (वि)। [धा० ३९ । उ०१। ख०१३] (नड ९८1८) ॥ति प्रथम खण्ड ॥१॥ [१९७८३ (पते सोमा' ) ये सोमरत ( अस्य वीर्य वर्धन्तः ) इस इन्त्रका सामयं यढाते हुए (इन्द्रस्य कामं प्रियं) इन्द्रको प्रिय लगनेवाले रसको ( सं अभि अक्षरन ) वृष्टि करते है. रस नीचेके वर्तममै छनफर गिरता है ॥ १॥ १९४२ हे (पुनानासा चमूपदा ) छने हुए और बर्तन में रखे हुए सोमरसो1 (घायु अश्विना गच्छन्तः) वायु और अश्विोको प्राप्त होकर (ते) ये तुम (न सुपीर्य धत्त) हमें उत्तम बोरता को ॥ २ ॥ [ १९८०] हे (सोम ) सोम ! (पुनान ) छाना जाता हुआ तू (इन्द्रस्य राधसे ) इन्द्रको आरापना के लिए (हार्दि चोदय ) हदयोंको प्रेरित कर । में (देवानां योनि आ सदं ) देयोके पजस्थानमें भाकर मंठ गया हूँ ॥ ३ ॥ [११८२ ] हे सोम (त्या दशक्षिप मृजन्ति ) तुझे दस अंगुलिपा शुद्ध करती है।( सत्तधीतयः हिन्वन्ति) मात होतागण तुमे सन्तुष्ट करते है, (विप्राः अनु अमादिषु ) ज्ञानी तेरा अनुसरण करके तुझे प्रसन्न करते हैं ।। ४ ॥ [११८२] हे सोम ! (मेष्या मति एजानं ) बालोंको छलनीसे ना आनेवाले ( के त्या) सुख बढानेवाले मुझे ( देवेभ्यः मदाय ) देयोंको आनन्द देने के लिए ( गोभिः संवासयामसि ) गायके दूध मिलाते है ॥ ५ ॥ [१९८३] (युनाना ) शुद्ध होकर { कलशेपु था) कलशोंमें भाकर रहनेवाला ( अरुपः हरिः) चमकनेवाला हरे रगका सोम (गव्यानि वस्त्राणि परि मन्यत ) गायके वस्त्रोको पहनता है। अर्थात् गापके दूध मिलाया जाता है ॥६॥ [ १९८४ ] है ( इन्दो ) सोन' (मघोनः नः ) घनसे युक्त हमारे लिए (आ पवस्व ) छनता जा । ( विश्वा। द्विपः अप जहि ) सब शत्रुओंको नष्ट कर (सखायं आ विश) और अपने मित्र इनके पेट में प्रविष्ट हो जा ॥ ७॥ [११८५] हे सोम! (नृ-वक्षस ) मनुष्यका निरीक्षण करनेवाले (इन्द्र-पीतं ) इन्द्र के द्वारा पिय जाने योग्य तथा (स्वदि त्यां) सबको जाननेवाले तुझे प्राप्त करके (वयं प्रजा पं भक्षीमहि ) सन्तान और अन्य प्राप्त करें ॥८॥ E११८६] हे ( सोम ) सोम! तू ( दिवः पृष्टि परिनच) घुलोको वृष्टि कर। (पृथिया अघि घुस) पषिती पर अन्न उत्पन कर।(सुनः सहः धाः) सग्राममें उपयोग होनेवाले सामर्म हमें वे ॥ ९॥ । यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ। २२ [साम हिन्दी भा २]
सामवेदका सुयोध गनुवाद
[ उत्तरार्चिका
२
.
[२]
११८७ सोमः पुनानो अति सहस्रधारी अत्यविः । वायोरिन्द्रस्य निष्कृतः ॥१॥ (ऋ ९।१६।१ )
११८८ पवमानमवस्पयो विप्रममि प्र गायत । सुष्वाणं देववीतये
॥२॥ (ऋ ९।१२)
११८९ परन्ते वाजसातय सोमाः सहस्रपाजसः । गुणाना देववीतये
॥३॥ (२.९।१३।३)
११९० उत नो वाजसातये पवस्व वृहतीरिपः । घुमदिन्दो सुवीर्यम् ॥४॥ (शु. ९/१२)
११९१ अत्या हियाना न हैतभिरसून वाजसातये । वि वारमन्यमाशवः ॥५॥ (ऋ. ९।१३६)
११९२ ते ना सहस्रिण रयिं पवन्तामा सुवीर्यम् । स्वाना देवास इन्दवः ॥६॥(ऋ. ९।१३।५)
११९३ वाया अन्तिीन्दवोऽभि वत्सं न मातरा । दधन्विरे गभस्त्योः ॥७॥( ९।१३१७)
११९४ जुष्ट इन्द्राय मत्सरः पर्वमानः कनिकदत् । विश्वा अप द्विषो जहि ॥८॥(ऋ. ९।१३।८ )
१
३३.३३
२
३.१
३२३ २३.२
3
,
3
१
२१
[२] द्वितीयः खण्डः।
८. ११८७ (सहस्रधारः) हजारों पाराभोंसे ( अति अयिः) वालोंको छलतीसे (पुनानः सोमः) छाना
जानेवाला सोम ( यायोन्द्रस्य) थाम और इग्द्रके पीने के लिए ( निष्कृतं अर्पति ) बर्तन में जाता है ।। १॥
[११८८] (अवस्यवा) अपने रारक्षणको इच्छा करनेवाले उद्गाता आदि पालको ! तुम (परमानं विनं)
शुद्ध होनेवाले, मानी (देववीतये सुप्याण ) देवोंके पोन के लिए छाने जानेवाले सोमके सिए ( अभि प्र गायत) पोंका
गान करो॥२॥
८११८९] (घाजसातये ) अन्नदान करने के लिए (गृणानाः) प्रशसित होनेवाले (सहस्र-पाजसः सोमाः)
हगारों प्रकारके पल बतानेवाले ये सोमरस ( पपाते ) शुरू किए जाते है ॥ ३ ॥
[ १९९० ] हे (इन्दो) सोम! (द्युमन सुवीर्य परस्य ) तेजस्वी और उसम सामर्थ्य हमें थे । ( उत ) मौर
(घाजसातये ) अन्नदान करने के लिए (गृहती। इपा) बहुतसा अम हमें दे ॥ ४ ॥
[११९१ ] (जसातये हियानाः ) सनामके लिए प्रेरित हुए हुए सोमरस (आशयान) शीघ्रगामी घोडेसे
समान (भिः) ऋत्विों द्वारा ( अन्य चार विमति भएनं ) यालोको भनी छलनीसे छाने जाते हैं ॥ ५॥
[१९९२] (ते स्याना देवासः इन्दवः) निधोडे गए दिव्य सोमरस (नः सहस्रिणं रयिं सुयीय मा
पयन्ता ) हमें हजारों प्रकारके धन और उतम सामष्य देखें ॥६॥
१९९३(पाथा इन्दवः) शरद भरनेवाले सोम (मातर। परसन) गाय जैसी मोके पास जाती है, उसी
प्रकार (ममि अपन्ति कला जाते हैं और ( गभस्त्यो दधन्विरे ) हायोमे धारण किए जाते है ॥ ७ ॥
[१९९४ ] सोम (इन्द्राय जुष्ट. ) इको दिपा जाता है, हे मोम ! यह तू (मत्सरः पयमाग ) मानन्द ने.
वाला और छाता जानेवाला ( कनिमद भामरते हुए (विश्याः दिपः अप जाद) मय मधुओंको नष्ट कर ॥६॥
नयम अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद (१७) 3 1 ११ ३१ 2 २४ ३ २३१४ ". १३ ३३" . १३. १३५२११३ " 4 १ 8 ११९५ अपशन्तो अराणा पयमानाः स्वदेशः । योनावृतस्य सीदत [धा० ३९।३०३ । १०६) (२.९।१३९) ॥ इति द्वितीय, खण्ड ॥२॥ ३] ११९६ सोमा असममिन्दवः सुता भवस्य धारया । इन्द्राय मधुमत्तमाः ॥ १॥ (ऋ. ९।१२।१ ) ११९७ अभि विप्रा अनूपत गावो यत्सं न धेनवः । इन्द्र ५ सोमस्य पीतये ॥२॥ (ऋ.९१२।१) ११९८ मदच्युरक्षेति सादने सिन्धोरूमा विषश्चित् । सोमो गौरी अपि श्रितः ।। ३ ।। (ऋ.९।१२।३) ११९९ दिवो नाभा विचक्षणोऽव्या बारे महीयते । सोमो यः सुक्रतुः कविः ॥५॥ स. ९।१२।४ ) १२०० या सोमः कलशेषा अन्ता पवित्र आहितः । तमिन्दुः परि षस्वजे ॥५॥ ( ९।१२४५) १२०१ वाचमिन्दुरिष्पति समुद्रस्याधि विष्टपि । जिन्दकोश मधुश्रुतम् ॥६॥ ऋ. ९।१२।६ ) १२.२ नित्यस्तोत्रो वनस्पतिनामन्त। सपर्दुघाम् । हिन्यानो मानुपा युजा ||७}} ( ९।१२१७ ) [१९९५] है (गवमानाः ) सोमो ! (म-रायः अपनन्तः) दान न देनेवाले शोंका मारा करते हए तथा { स्य:-शः) भपने लेनसे चमकते हुए तुम { भरतस्य योनी सीदत) पर स्थानपर पंटो॥९॥ । यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ। [३] तृतीयः खण्डः। [ १९९६] ( ऋतस्य मुताः ) यज्ञके लिए संप्यार किये गए ( मधुमत्तमाः न्दयः ) बहुत मीठे और सेनायी (सोमा) सोमरस (इन्द्राय पारया अस् ) इन्द्र के लिए पारासे उनले जाते है।।१॥ [१९९७ ] हे (रिशE ) ऋत्पिनो! ( सोमस्य पीतये ) सोम पोनेके लिए [ इन्द्र अभि भनूपत) को सेवा करो। { धेनवः गायः यासं न ) दुधारू गायें जिसप्रकार अपने पछाको सैदा परती हैं, उसीप्रकार तुमको सेवा करो॥२ [१९८3 ( मदच्युत् सोमः ) मानन्द गगनेवाला सोम ( सदने क्षेति ) याला गिवारा परता है, (सिन्घो ऊर्मा विपश्चित् ) से नदोके तरणोंमें पह ज्ञानी सोम रहता है, उसी प्रकार मह (गौरी अधियितः) पापन भी रहता है। इनमें शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ (१९९९(य) जो (सुमातु कवि विचक्षणा ) उत्तम पा करनेवाला, महान शानी यह (सोमा सोम है, यह ( दिया नामा) अन्तरिक्षको नाभिवे समान ( उदया वारे महीयते वालो एलनोके ऊपर महत्वशाली होता है ॥४॥ । १२००१ (या सोमा) मोसोम { फ्लशेषु मा) कलशोंमें ( पवित्रे मन्ना भाहिता) पलनीके धौधौं रखा हुमा है। इन्दुः परिपस्बजे ) उस सोमरी जल स्पर्श करे ॥ ५॥ [१२०१३दुः) सोम ( मधुश्चुत पोशं जिन्मन् मोठारत जिसमें टपकता है उस वतनको पूरा भर देता है।यह समुहस्य आधि विधपि जलके आश्रय स्थान पर ( याचं प्ररस्यति ) दाम करता हुशा भाता है। [१२०२] (नित्यः स्तोत्रः वनस्पतिः ) निरजिसरी स्तुति को जागो है ऐसा पनाकर स्वामी सोम (मानुपा युजा हिन्पान। ) मनुष्यों मंगटन करने के लिए प्रेरित करता हुआ { मपqधां ) सबसे मोटे बचा बोलनेपाल अन्त' घेना ) मरत करणमें रहनेवाली स्तुतिरो स्वीकार करे॥७॥ ~ . ३१ १२" ३३ (१७२) सामवेदका सुबोध अनुवाद उत्तराचिका १२०३ आ पवमान धारया रयि सहस्रवर्चसम् । अस्मे इन्दो स्वासयम् ॥८॥ (ऋ. ९।१२१९ ) १२०४ अभि प्रिया दिवः कविविप्रः स धारया सुतः । सोमो हिन्चे परावति ।। ९॥ ४ ( में)॥ [ धा० ४० । उ०४ । स्व०७] (म. ९।१२।८) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥३॥ [४] १२०५ उत्त शुष्मास ईरते सिन्धोरूमैरिव स्वनः । वाणस्य चोदया पविम् ॥१॥ (ऋ ९।१०।१ ) १२०६ प्रसये त उदारते तिम्रो वाचो मखस्युवः । यदव्य एपि सानवि ॥२॥ (ऋ. १।१०।२ ) १२०७ अव्या वारैः परि प्रियर हरि हिन्वन्त्यद्रिभिः । पर्वमानं मधुश्चुतम् ।। ३ ।। ( १/५०।३) १२०८ आ पवस्त्र मदिन्तम पवित्रं धारया को । अर्कस्य योनिमासदम् ॥ ४॥ (ऋ ९९०४ ) १२०९ स पवस्त्र मदिन्तम गोमिरजानो अक्तुभिः । एन्द्रस्य जठरं विश ॥५॥ ५ (का)॥ [घा० ३१ । उ० १ । स्व०२] (ऋ.९।१०।५) ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ [१२०३ ] हे ( पयमान इन्दो । शुष्ट होनेवाले मोम! ( सहस्रपर्चसं स्थाभुवं ) सहस्र तेजोंसे युक्त अपना घर तथा (गाय) धन ( अस्मे धारय ) हमें दे॥८॥ [ १२०४ ] ( कविः सुतः) ज्ञानी शोमरम (परावति विप्रः सः भेष्ठ स्थानमें रहनेवाले शानीके समान (धारया ) अपनी पारसे ( दियः प्रिया ) लोकसे प्रिय स्थानको और ( अभि हिन्धे ) प्रेरणा करता है ॥ ९ ॥ । यहां तीसरा सण्ड समाप्त हुआ ॥ [४] चतुर्थः खण्डः। [१२०५] हे सोम ! (सिग्यो ऊः म्यनाइव ) समाको लहरोंके शाम के समान ( ते शुष्मासः उतारते) तेरे येगसे यहलेगी आवाज निकलती है । ऐसा तू (पणस्य पवि चोदय ) वाण नामक बाजे के समान शरद कर ॥१॥ [१२०६] (ते प्रसथे ) तेरी उत्पत्ति होने के घाव ( मखस्युवः तिक्षः यायः उत्ररते ) पत करनेवाले ऋरिवन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मंत्र बोलने लगते हैं । ( यत् सानावि अव्ये पापि ) ता तू अंधे स्थानपर रखे हुए पालोको मनो उसनीमें जाता है ॥२॥ [१२०७ ] ( प्रियं हरि) प्रिय और हरे रंग के ( अद्रिभिः ) पपरों द्वाराकटे गए (मधुश्चुतं-पयमान मो मोमरसको छाननेवाले शरिवन ( अय्या यारः परि हिन्बनित ) भेटके बालोंकी सनी लनोसे छानते है ॥३॥ १२०८ (मदिन्तम कथे) हे परम हर्ष बढानेवाले सोम ! (मस्य योनि मास ) के पेट में जाने लिए (पवित्र धारया आ पयस्व )एसनो पार बांधकर बनता जा ॥४॥ [ १२०९] है ( मदिन्तम ) मानस रेनेवाले मोग! ( मरतुभिः गोभिः मंशानः) स्वी, गायके दूप मारि परायरे साथ मिलार(पश्च)नता जा मोर (इन्द्रस्य जटरंमा विश) के पेट में जा ॥५॥ ॥ यहा चौथा सण्ड समाप्त हुया ॥ )
नवम अध्याय]
सामग्दका सुबोध अनुवाद
२९
3
१
317
३३३३३
३३३३१२
३२३.
३१
२१३१२
.
३२ श
३
२
३३3
श
-
[५]
१२१० अया, वीती परि सव यस्त इन्दो मदेवा । अशहनवतीर्नर ॥१॥ (ऋ ९।६११)
१२११ पुरा सद्य इस्थाधिपे दिवोदासाय शंबरम् । अध त्यं तुर्वशं यदुम् ॥ २॥ (ऋ. ९६१।२)
१२१२ परि पो अश्वमश्वविद्रोमदिन्दी हिरण्यवत् । क्षरा सहस्रिणीरिषः ॥३॥ ६ (हि) ।
[घा० ११ । उ० नास्ति । २०३] (ऋ.९।६१॥३)
१२१३ अपप्तन्यक्ते मृघोऽप सोमो अरागः । गच्छन्निन्द्रस्य निकतम् ॥ १॥ (ऋ ९६६१।२५)
१२१४ महा नौ राय आ भर पवमान जही मृधः । रास्पेन्दो पौरपद्यशः ॥ २॥ (ऋ. ९०६१।२६ )
१२१५ न त्वा शर्त च न हुतो
राधो दिसन्तमा मिनन् । यत्पुनानो मनस्य से ॥ ३॥ ७ (खा)।
[धा० ११ । उ०९। स्व० २] (.९६१।२७)
१२१६ अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचया । हिन्वानो मानुषीरपा ॥१॥ (ऋ ९८६१७)
१२१७ अयुक्त सूर एतर्श पर्वमानो मनाया । अन्तरिक्षण यावे
॥२॥ (ऋ.९।६३८)
[५] पञ्चमः खण्डः।
[१२१० 7 हे (दो) सोम ! ( अया वीनि परिस्रव । इस रोनिसे इनके पोतेके लिए पूछनता जाते
या मवेषु तेरा यह रस सामने (नव-नवतीः अवाहन ) निन्यानवे शत्रुओंको नष्ट करता है ॥ १॥
[१२११ ] (सद्यः पुरः ) उसी समय दात्रुके नगरोंका नारा मह सोम करता है । ( इत्या ) इस प्रकार ( धिये
दियोदासाय ) यज्ञ करनेयाले दिवोदास के लिए (शयरं ) माम्बरामुरको ( वय त्वं तुर्व) और उमम तुषाको ( यदुं)
और यदुको ( अवाहन ) इन्द्रने मारा ॥ २ ॥
[१२१२] हे ( इन्दो) सोम! ( अश्वयित् ) पोडे प्राप्त करनेवाला तू (ना) हमें ( गोमत् हिरण्यवत्
अश्य ) गाय और सोने से युक्त पोडेको और (सहस्रिणीः इषः अनेक प्रकारचे मनको (परि क्षर ॥३॥
[ १२१३ ] (सोमः मृधः अपनन् । सोम को मारकर ( भागः अप ) दान न देनेवाले चुप्टोको दूर करने
(इन्द्रस्यः निष्पतं गच्छन् । इन्द्र स्थानके पास जाने के लिए ( पचते ) छाना जाना है ॥१॥
[१२१४ ] हे (पवमान इन्दो) छाने जानेवाले मोय! (न मदः राय. या भर में बहुतसा पर भापुर में।
(मृधः जाहि ) शत्रुभोंको मार और (चीरवत् यशः रास्व ) पुसि युक्त या दे ॥ २ ॥
[ १२१५) हे सोम! ( यत् पुनान. ) जव ाना जानेवाला तू ( मखस्यसे ) यत परनेवालोको धन रेनेगौडा
गरता है, तब ( राधा दिसन्त स्या) पन देनेको इच्छा परनेवाले तुम ( शतं चन-दुतः ) संको पत्र भी (न
भामिनन ) रोक नहीं सरते ॥३॥
[१२१६ ] हे गोम! (मानुपीः अपः दिन्शनः ) मनुष्योले हिनाक जल देनेवाले सूने ( यया पाण्यामय
भरोचयः ) जिस धमस्यालो धारास सूर्यको प्रकाशित किया, ( अपा पम्प) उसो धाराम घनता जा १ ॥
[१७] ( पयमान गुट होनहाता सोम [ मनापधि ) मनुष्योर (अन्तरिमेण यातये ) अरिमरे
मार्गसे जाने के लिए (गूरः एत भयुक्तः ) मूरे एता नामर पोरो उप्तरे प जोरता है ॥ २ ॥
(१७)
सामवंदफा सुरोध अनुवाद
[ उत्तराचिंकः
.
33
३।२३ १३
२३.
३१
न
२
3
२७२"
.
११
२ ३३
१२१८ उरी त्या हरितो रथे सूरो अयुक्त यातये । इन्दुरिन्द्र इति ब्रुवन् ॥ ३॥ ८ (का)।
[धा० ११ । उ० १ । स्व.२] (ऋ. १।६९)
पइति पञ्चमः खण्ड ॥५॥
[६]
११"
१२१९ अपि वो देवममिभिः सजोषा यजिष्ठं दतमध्वरे कृणुध्वम् ।
मर्येषु निषि प्रस्तावा तपुर्घा घृतानः पावकः
॥ १॥ (*. ७३१)
१२२० प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महा संवरणाद्वथस्थाव ।
आदस्य बातो अनु वाति शोचिर स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति ॥२॥ (ऋ. ७/१२)
१२२१ उद्यस्य ते नवजासस्य वृष्णोऽने चरन्त्यजरा इधानाः ।
अच्छा यामरुपो धूम एपि सं दूतो अन ईयसे हि देवान ॥३॥९ (टी)॥
[धा० १८ । उ० १ । स्व०४) (३)
१२२२ तमिन्द्र पाजयामसि महे चुनाय हन्तवे । स वृपो चूपमो संवत् ॥ १ ॥ (ऋ. ८१९३।७ )
८१२१८] (उत इन्द्रः) और सोम ( इन्द्रः इति ध्रुवत् । इन्द्र इन कहता हुभा ( स्वा परितः ) तेरे पोको
(सूरररथे) सूर्यके रथम ( यात अयुक्त ) जाने के लिए जोडता है ॥ ३ ॥
॥ यहां पांचवां खण्ड समाप्त हुआ ॥
६] पठः खण्डः।
१२१९देवो' (वः } तुम ( यः मत्र्येषु निधुविः) नो मानवोम रहता है, जो (ऋताया ) यज्ञकरनेवाला
(तपुद्र्धा ) तथा शोको कष्ट देनेवाला तेज है (पृतानः) पो हो जिसका मन है तथा (पावकः ) नो पवित्रता
करनेवाला है, ऐसे ( अग्निभि सजोषाः) अनेक अग्नियोंके साय (यजिष्ठं अग्निं देवं ) परम पूज्य अग्निको (अध्वरे
दूतं कृणुध्वं ) हिंसारहित पत दूत करो ॥१॥
[ १२२०१ ( यवत अविष्यन् ) घास खाते हुए ( प्रोथत् अभ्यः न) हिनहिनानेवाले घोडेके समान ( महः
संवरणात् ) महान् वेगसे फैलनेवाला दावानल ( यदा व्यस्थात् ) जय पतके बीच पाता है, तय (आत् अस्यशोचिः)
इसकी ज्यालाय ( अनुवातः पाति ) वायुके मनुकुल होकर चलती है, { अघ ) और हे भग्ने । (ते प्रजनं कृष्णं
अस्ति) तेरा मार्ग काला है ॥ २॥
[१२११ 7 है ( अग्ने ) अग्ने ! ( नव-जातस्य वृष्णः ) नये उत्पन्न हुए हुए और सृष्टि करनेवाले ( यस्य ते)
निस तेरी ( गजराःधानाः उच्चरन्ति ) न नष्ट होनेपाली जलती हुई उवाला पर आती है, तब है ( अग्ने । अग्ने ।
(अरुपा धूमः दूता) प्रकाश करनेवाला धुभारमो दूतवाला तू (चां अच्छ समेपि) लोरमें जाता है, और वहाँ
(देषान् हि ईयसे ) देवोंको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
[१२२२] (महे वृत्राय हन्तये। महान् इत्रको मारने के लिए (तन्नं याजयामसि ) राइनको हम
बलवान् मनाते हैं। (भृपा सपना भुषत् ) वह पहलेसे पलवार होता हुआ भी और अधिक बलवान होता है ॥१॥
भषम अध्याय सामवेदका सुबोध मनुवाद (१७५) २ १२ 31 ३२ . 9 २ 3 19 . २ १२२३ इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्टः स चले हितः । धुन्नी श्लोको स सौम्यः ॥ २ ॥ ( १९३८) १२२४ गिरावजी ने सम्भृतः सबलो अनपच्युतः । ववक्ष उग्रो अस्तृतः ॥ ३ ॥ १० (छ) ।। [ धा० १७ ( उ०२ । स्व. ७ (प्र. ८९.९) ॥ति पष्ठः खण्ड.॥६॥ [७] १२२५ अध्ययों अद्रिभिः सुतसोम पवित्र आनय । पुनाहान्द्राय पातये ॥१॥ (ऋ. ९।५।१ । १२२६ तव त्य इन्दो अन्धसो देया मधोशित | पवमानस्य मरुतः ॥२॥ (ऋ ९५१२) १२२७ दिषा पापमुत्तम सोममिन्द्राय वजिणे । सुनौता मधुमत्तमम् ॥ ३॥ ११(खा) ।। [धा० ११ 1 उ० २। स्व. २] (ऋ. ९।५९॥३) १२२८ धर्ता दियः पवते कत्ल्यो रसो दक्षो देवानामनुमायो नृभिः । २४३३३२ हरि सृजानो अस्यो न सत्वमिवृथा पाजारसि कृणुषे नदीपा ॥ १॥ ( ९७६।१ ) [ १२२३ ] (सरन्द्रः दामने कृतः ) वह इन्द्र दान देने के लिए ही पैदा हुआ। (स ओजिष्ठा पले हितः) पह प्रभावशाली इन्द्र बल बढ़ाने के लिए और सोमको पाने के लिए हुआ है ( द्युम्नीः श्लोकी स सोम्पः) तेजस्वी प्रशसित ऐसा वह इन सोम पौनके योग्य है ॥२॥ [१२२४ (गिरा संभृतः } स्तुतियों द्वारा प्रशासित ( यजान ) वनके समान (सरल: अनपच्युतः । बलवान् इसीलिए दूसरोंसे न दयाये जानेवाला ( उग्रःअ-स्तृत. 1 उप्रवीर और अपराजित र (वक्षे) धन देनेकी पछा करता है। ॥ यहां छठा खण्ड समाप्त हुआ। [७] सप्तमः खण्डः। [ १२२५ ] है ( अध्ययों) मष्पर्य । ( अदिभिः सुतं सोमं ) पत्यो द्वारा कूटकर निकाले गए पोमरणको (पयिन मानय ) छलनी में लाकर रख और ( इन्द्राय पातये पुनाहि । इनके पोनेरे लिए जन ॥१॥ [ १२९६] (त्ये देवाः मरता दे देय और महत, हे । इन्दो ) सोम ! (तच मधोः पपमानस्य अन्धसः) सेरे मधुर और पवित्र अनरुपी रसको (घि आशत ) लाते हैं ॥ २॥ ६ १२२७१ हे ऋश्विनी (मधुमत्तम दिवः पीयूषं) बहुत मोठे हलोहके अमृत ( उत्तमं सोम) इस सम सोमको (पत्रिणेन्द्राय सुनोत ) वपारी इनके लिए तम्पार करो ॥ ३ ॥ [१२२८] (कृत्य रसः) कर्तव्य करनेवाला यह रस ( देवानां दक्षः) देवोंका यस मानेवाला (नृभिः भनु मायः ) ऋत्यिक द्वारा प्रशंसनीय (घा) सयोंको धारण करनेवाला ( दियः पयते) अन्तरिममें रत एमनोरो छाना जाता है। (हरिः) यह हरे रंगवाला और ( सत्वमिः सुजाना) बलवान् ऋषि द्वारा छाता जानेवाला यह रस (अत्यः न ) धोके समान (नदी) पानीमें ( पृथा ) सरलतासे । (पाजांसि रुणुने ) अपने बलोंको प्रस्ट परता॥१॥ )
सामयेदका सुबोध अनुवाद
[उत्तराचिकः
3
३१3"
१
२
3.
२१३
२
3.
३११
१२२९ शूरो न पत्त आयुधा गभस्त्योः स्वई। सिपासबाथरो गविष्टिषु ।
इन्द्रस्य शुष्ममोरयनपस्युभिरिन्दुहिन्यानो अज्यते मनीषिभिः ॥२॥ (९७६२)
१२३० इन्द्रस्य सोम मान ऊमिणा तयिष्यमाणो जठरेया विश ।
प्रना पिन्न विद्युद व रोदसी धिया नौ बाजार उप माहि शश्वतः ॥ ३॥ १२ (चा) ।।
[धा० २७ । उ०१। स्व.२] (ऋ. ९७६।३)
१२३१ पदिन्द्र प्रागपागुदड्यग्वा हयसे नृभिः ।
सिमा पुरू नृपूतो अस्यानवेऽस्त्रि प्रशर्ध तुपशे
॥१॥(ऋ. ८111)
१२३२ यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा ।
कण्यासस्वा स्तोमेभिगवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि ॥२॥ १३ (कि) ।।
[धा० ११ 1 उ०१।१०३] (ऋ. ८४१२)
१२३३ उभय शणवच न इन्द्रो अर्वागिदं वचः ।
संत्राच्या मधयान्सोमपीतये धिया शविष्ठ आगमद
॥१॥ ( ८६११)
E१९२९ ] यह सोम ! (शूरः न ) शूरके समान ( गभस्त्योः आयुधा धत्ते) हार्थोमें शास्त्र धारण करता है।
(स्वः सिपासन ) यज्ञ करने की इच्छा करनेवाला (रथिरः गविष्टिपु) रथ मंठनेवाले घोरको गायोंकी इच्छा करनेवाला
(इन्द्रस्य शुष्मं ईरयन् ) इन्द्रका बल बढाते हुए यह (इन्दुः) सोम (अपस्युभिः मनीषिमिः) यज्ञ करनेवाले विधान
ऋविजों के द्वारा (हिन्यानः अग्यते ) प्रेरित हुआ हुआ गाय के दूध मिलाया जाता है ॥ २॥
[ १२३०] हे (सोम पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम! (तविप्यमाणः ) बढाया जानेवाला तू ( इन्द्रस्य जठरेषु)
मन के पेट में ( उर्मिणा आ विश ) धार बंधकर जा। (विपुत् अभ्रा इच) बिजलो जिसप्रकार मेघोंको बरसाती है।
उसीप्रकार (नः रोदसी प्र पिन्च ) हमारे लिए घुलोक और भूलोकको फलयुक्त कर। ( धिया नः) कमके द्वारा हमारे
संलए { शश्वमायामान उप माहि सारवत अर्शत की क्षरेण न होनेशले अन्न दे ॥ ३॥
[१२२१] है (इन्द्र ) इन्द्र ! ( यत् ) पद्यपि तु (प्राया, अपाक्, उदा बान्या ) पूर्व, पश्चिम, उत्तर और
नोचेको विशामें (नृभिः हूयसे) ऋत्विों के द्वारा सहायतार्थ बुलाया जाता है, तो भी (सिम ) हे श्रेष्ठ इन्द्र ! (अनये)
अनुराजाके लिए (पुरु नृपूतः असि ) तेरी बहुत स्तुति की गई है। हे (प्रश) शत्रुको हरानेवाले इन्द्र ! (तुर्य)
सुर्वशके लिए भी उसीप्रकार तेरी स्तुति की गई है ॥ १॥
१२३२ ] हे ( इन्द्र) इन्द्र ! ( यद् या ) अथवा ( रमे, रुशमे, श्यावके, ऋपे ) रुम, रुशाम, श्यावक और
कृपके लिए ( सचामादयसे)एक साय प्रसन्न किया जाता है। उसीप्रकार (ग्रह्मा-पाहस.) स्तुति करनेवाले (कण्यासः)
कण्व ( स्तोमेभिः) स्तोत्रोंसे तुझे यश करनेकी इच्छा करते हैं । इसलिए (इन्द्र) हे इन्द्र ! ( आगहि ) आ ॥ २॥
[१२३३ ] ( उभयंदं वचः) दोनों ही प्रकारके स्तुतिके वचन (नः अर्वा ) हमारे सामने (इन्द्रः शृणषद)
इन्द्र सुने । ( मघवान् शविट; ) वह धनवान् और बलवान् इन्द्र (मत्राच्या धिया)हमारो स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर
{ सोमपीतये भागमत् ) सोमपान पर लिए हमारे पास आवे ॥१॥
नयम मध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद (१७७) a ३ । 3.२०१२ " १३२ 3१२ १२३४ तर हि स्वराज पुपर्म तमोजसा पिणे निस्तक्षतः । उसोपमानों प्रथमो नि पदसि सोमकामरहि ते मना ॥२॥१४ (ची)॥ [धा० १७१ ३० । स्व० ४] (३.८६१२) इति सप्तम खण्ड ॥७॥ [८] २४ १२३५ परस्य देव आयुपगिन्द्रं गच्छतु ते मदः । वायुमा रोह धर्मणा ॥१॥ ( ९।६३२२) १२३६ पवमान नि तोशसे रयिर सौम अवाप्पम् । इन्दो समुद्रमा विश ॥२॥ ( ९।६३।२३ ) १२३७ अपान्पवसे मृधा ऋतपित्सोम मत्सरः । नुदस्वादेव' जनम् ॥३॥ १५ (लि)॥ {धा० १४ । उ० नास्ति । स्त्र०३ ) (इ. ९।६३१२४) १२३८ अभी नौ वाजसातमं रयिमर्प शनस्पृहम् । इन्दो सहस्रमणसं तुविद्युम्नं विभासहम् ।। १ ।। (ऋ ९९१) १२३९ वयं ते अस्य राघसा घसौर्वसो पुरुस्पृहा । नि नेदिष्ठतमा इपा स्याम सुन ते अधिगो ॥२॥ (ऋ. १९८५) ८१२३४ (धिपणे घलोक और भूलोक ( स्वराज प त हि ) स्यय प्रकाशवान् गौर यसवान् उस इन्द्रको ( ओजसा निक्षतुः ) अपने पससे प्रकट करते हैं। ( उत) और है इन्छ ! ( उपमानों प्रथम. ) उपमा देने के पोयों में प्रथम तू ( निवीदसि ) अपने स्थानपर बैठता है। (हिते मन. सोमकार्म) क्योंकि तेरा मन सोमरी दण करता है।॥ २॥ ॥ यह सातयां खण्ड समाप्त हुआ। [८] अमः खण्डः। [१२३५] हे सोम ! (देवः पयस्थ ) धमकनेवाला छमता जागते मदः आयुषफन्द्रं गच्छतु ) तेरा मानवशायक रस इन्द्र के पास भावे । (धर्भणा वायु मारोह ) अपनी शक्तिसे तू वायुको प्राप्त हो ॥ १ ॥ ६ १२३६ 1 है (यमान इन्दो शुरु होनेवाले सोम (भवाप्य रयि नि तोशसे ) प्रशसनीय धनके लिए गनुओंको पोग देता है, ऐसा तु ( समुद्र माविश ) कताके पानोम प्रवेश कर ॥२॥ [१२३७ हे सोम! { मत्सरः) मानन्द देनेवाला तया { फ्रतुपित् ! पर मंको जाननेवाला र ( पपसे) पुरा होता है। शुरु हुआ हुआ (मृधा अपनन् । आधुओंको दूर करके (अदेव जनं नुदस्व ) नास्तिक मनुष्योको ६.१२३८(इन्दो | तेजस्वी सोम! (नः ) हमें ( घाजसातम ) बस बहानेयाले (तस्पृहं ) संकों लोगों द्वारा प्रशंसित ( सहसमर्णसं ) हजारों मनुष्योंका भरण पोषण करनेवाले ( तुबिधुम्न ) अति तशाली (विमासद विशेष प्रकाशमान ऐसे (रधि ममि मर्प) धन रे ॥१॥ [२२३९है ( यसो) निवातक सोप ! (पुरुस्पृहः घसोः) अनेकों द्वारा प्राप्ति और सी घसानेवाले ( अस्य से राधसः) ऐसे इस सेरे मनके पात नेदिष्ठतमाः स्याम ) हम एनेपाल हो। यधि-गो) गार पा रहनेगले सोम! (ते पा सुम्ने ) से हरा दिए गए भन्नके मानन्दसे हम गुती हो ॥ २॥ २३ [ माम हिगो मा २०
(१७८)
सामवेदफा सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिकः
39
१२४० परि स्य स्वानो अक्षरदिन्दुरव्ये मदच्युतः ।
पारा य ऊर्बो अध्वरे भाजा न याति
गन्ययुः
॥३॥ १६ (ली)॥
[धा०१४ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ. ९९८॥३)
१२४१ पवस्व सोम महान्समुद्रः पिता देवानां विश्वामि धाम ।।१।। (ऋ ९।१०९६४)
१२४२ शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजाम्पः
॥२॥( १।१०९।५)
१२४३ दियो धर्तासि शुक्रः पीयूपः सत्ये विधर्मवाजी पयस्व
॥३॥ १७ (हि)॥
[धा० ११ : उ० नास्ति । २०३(ऋ.९।१०९।६)
॥ इत्यष्टमः खण्डः ॥ ८॥
[९]
१२४५ प्रेष्ठं वो अतिथि स्तुपे मित्रमित प्रियम् । अमे रथं न बेयम् ॥१॥ (ऋ. ८1८४१)
१२४५ कविमिव प्रशस्य यं देवास इति द्विता । नि मत्र्येवादधुः
।।२॥ (१८८४)
१२४६ स्यं यविष्ठ दाशुषो न पाहि शृणुही गिरः । रक्षा तोकमुत रमना ॥३॥१८ (यी)॥
[धा० १२ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ.८८४)
[१२१०] (गव्ययुः ) गायके दूधको इच्छा करनेवाला (ऊर्ध्वः यः) धेष्ठ पह सोम (भाजा न ) सेजसे
जिसप्रकार चमकना चाहिए उसप्रकार चमकता है और (अध्वरे धारा याति) हिसफ यसमें पारासे पहचता है।
(स्थानः स्यः इन्दु ) छाना जानेयाला यह सोम ( मदच्युतः अन्ये परि अक्षरत् ) आनन्द बढाने के लिए बार्लोकी
छलनीमो टपकता है ॥३॥
१२४१३ हे ( सोम ) सोम! (महान् समुद्रः) महान् रससे युक्त ( पिता ) पालन करनेवासा व ( देयानां
विश्या धाम) के सब स्थान अपने रसते ( अमि परस्त्र) भर वे ॥१॥
[ १२४२ ] है { सोम ) मोम | (शुफा ) चमकनैयाला तू (देवेभ्यः पयस्व ) देवों के लिए छमता जा । दिये
पृधिन्य ) पुलोको, पृथ्वीलोकको तया ( मजाभ्यः श) प्रजामोंको मुल मिले ॥२॥
८१२४३] हे सोम ! (शुक्रः पीयूपः ) तैनस्वी और पीने के योग्य ( दिया धर्ता असि ) गुलोकका पारण
करलपाला है । ( पाजी ) बलवान । (सत्ये ) यतमें ( विधर्मन् पयस्व ) विविध कर्म करने के समय छनता जा ॥ ३ ॥
॥ यहां आठवां खण्ड समाप्त हुआ।
[९] नयमः एण्डः।
[१२४८ ] हे ( अन्ने भन्ने । (प्रे; अतिधि) प्रिप अतिपिहप ( मित्रं रय प्रियं ) मित्रले समान प्रिय
(यं न घे) रपके समान पर प्राप्तिका हेतु (या स्तुपे) रोमं स्तुति करता हूँ॥१॥
[१२५५ ] ( देवाला) तर देवोन (परि य प्रशस्यं विमान प्रशसनीय (जिस अग्निको (माये
पति) मनुष्योंमें ( द्विता) गाईपाय और मावनीय इन रोनार दपम (म्पादधुः) स्थापित रिया ॥ २॥
[१२४६] है ( पपिष्ठ ) सरा तदन रहनेवाले (स्य) व दाशुपानन पाक्षिदान परमेयाले मनुष्योहा
र(गि ति मुन (उत मना सो रक्ष मारमपने प्रपरम पुत्र रमणर॥३॥
नयम अध्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद (१२) २ २१. । . २ ३१ २२ ३३ ३३.३ र १२४७ एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोश | गिनि विद्यतः पृथुः पतिर्दिवः ॥२॥(ऋ (1९८४) १२४८ अमि हि सत्य सोमपा उमे बभ्य रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः ॥२॥ (ऋ. ८९८६) १२४९ वरहि भवतीनामिन्द्र धर्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोधा पनिर्दिवः ॥३॥ १९(क)। [पा०२० 1 उ०१। स्व०७] (ऋ. १९८६) १२५० पुरा भिन्दुर्युवा कविमितीजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता यज्री पुरुष्टुतः ॥१॥ (प्र.) १२५१ त्वं बलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो दिलम् । त्वा देवा अभ्युिपस्तुज्यमानासा आविपुः ॥२॥ (ऋ. १६९९३) १२५२ इन्द्रमीशानमोजसामि स्तोमरन्एत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसी। ॥३॥ २० (ही)। [धा० ११ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ. १३११८ ) ॥ इति मयमः झडः॥९॥ ॥ इति पञ्चमप्रपाठके प्रथमोऽर्थः ॥५-१॥ ॥ इति भवमोऽध्यायः॥९॥ [१२४७ ] है ( प्रिय ) हित करनेवाले, ( सत्राजित् ) मय प्राओंको जीतनेवाले सपा ( अ-गोख) किसी द्वारा न दयाये जानेयाने ( इन्द्र) इन्द्र ! (गिरिः न ) पर्वतके समान ( विश्वतः पृथः) सब तरहसे पा र ( दियः पतिः) पुलोफका स्वामी (नागधि) हमारे पास आ॥१॥ [१२४८ ] ( सत्य सोमपा इन्द्र) हे सापके पालक और सोम पोनेवाले इन्द्र उभे रोदसी) दोनों प्रलोक और पुम्वीलोकको (( अभि यभूय ) अपने प्रमावसेवक देता है। ऐसातू (सुन्वता वृधः सोमपाल करनेवालेको मानेवाला और (दियः पतिः असि चुलोक्का स्वामी है ॥ २॥ [२२०९] है ( इन्द्र)! (स्वं हि ) तू (शश्यतीनां पुराधर्ता) भुओंके महतो नगरोंको तोग्नेवाला, (दूस्यो इन्ता ) शत्रुका नाश करनेवाला ( मनोवृधः ) पत करनेवाला, मनुष्यो मर्नोको बवानवाला और (दियः पतिः असि) लोकशास्वामी है ॥ ३ ॥ १२५०] (पुरा भिन्दुः) शत्रके मारोंका नाश करनेवाला, (युवा ) सदा ताण, ( कविः यमितीमा) पानी और अपरिमित पराकम्पाला, (विन्यस्य कर्मणा धर्ता ) सब मर कोका पोषण कर मेवाला, ( यो पुष्टतः) वन्द्रमारो और महतोदारा सित ऐसा इन्द्रः मजायत) रुद्र भाट हुआ है ॥१॥ [१२.१ (अद्रिवः । यद्यपारी इन्द्र ! (त्ये) सूने (गोमतः वलस्य ) पापको पुराकर ले मानेवाले अगुरको ( पिलं अपायः ) गुफाको कोहरा, सब (तुज्यमानासः देयाः) हारे हुए वेध (अ-विम्युगः ) न घबराते हुए ( आविपुः) दुसरी आकर मिले ॥२॥ [१२५२] रतुति करनेवाले ( योजसा शान इन्द) सामयसे सयके स्थानी होनेवासे इनकी (स्तोमेः अम्पनूपत) स्तोरस्तुति करने ल।(याप रातयः साहनं जिसके दान हमारों है। उत पा) अपमा भूपसी सन्तिा मत ग्यारा ॥३॥ यहां नयां पण्य समाप्त हुआ। ॥रति नयमोऽध्यायः ॥
(१८०) सामवेदका सुपोध अनुवाद [ उत्तराचिंका नवम अध्याय इस अध्यायमें इन्द्र के गुण इसप्रकार है- २८ पुरुष्टुता १२५०]- अनेक जिसको स्तुति करते है। १ वृपा [ १२२२ ]- बलवान् । २९ भोजसा ईशानः [१२५२]- अपने सामसे २ घृपभः [ १२२२]- सामर्थ्यवान् । शासक बननेवाला। ३ ओजिष्ठ [ १२२३ ]- सामर्थ्यवान् । ३० महे पुत्राय हन्तपे इन्द्र वाजयामसि [ १२२२] ४ यले-हितः। १२२३ - बलप्से पुक्त, बलोसे हित -महान् पत्रको मारनेके लिए उस इन्द्रफे पलका हम वर्णन परनेवाला। ५ सयल: [ १२२४]- बलवान सामयंयुक्त । ३१ हे इन्द्र ! प्राक्, अपार, उपन्य या नृभिः ६ उग्रः[१२२४]- उपधीर। यसे [ १२३१]- हे इन्द्र ! तुझे पूर्व, पश्चिम, उत्तर और ७ अस्तृतः [ १२२४ ] - पराजित न होनेवाला, न दक्षिणसे घोर नेता सहायताके लिए बुलाते है। हारनेदाला। ३२ त्वं दाशुष नृन् पाहि ( १२४६ ]-सू पानशील ८ अनपच्युतः [१२२४]- अन्य किसीसे न दबनेवाला। नेताको व उसके पुत्रपौत्रोंकी रमा कर। ९ वज्रःन [१२२४] - वज्रके समान कठिन, बलशाली। ३३ त्मना तोकं रक्ष [ १२४६]- अपने पुत्रपौत्रोंकी १० घी १२५०]-वनका उपयोग करनेवाला। ११ प्रशर्ध [ १२३१]- शत्रुको हरानेवाला। ३४ हे अद्रिवः । त्व गोमतः पलस्य बिलं अपाय: १२ शविष्ठः १२३३]- सामथ्र्यवान् । [ १२५१]-हे इन्द्र तूने गायोंको चुराकर ले जानेवाले राक्षसकी गुफाको तोड़ा। १३ स्वराद [१२३४]- तेजस्वी,स्वयं राज्य करनेवाला। १४ सोम्यः [१२२३ - उत्तम मनवाला। ३५ तुज्यमानासः देवाः अयिभ्युपा स्वां आविशुः १५ श्लोकी [ १२२३ ] - निराको प्रशंसा होती है, [ १२५१ ]- हारे हुए सय देव न उरते हुए तेरे माधयम आ गए। प्रशसनीय। १६ उपमानां प्रथमा (१२३४]- उपमा देनके योग्यॉमें ३६ यस्य रातयः सहनं, उत या भूपसीः सन्ति [ १२५२ ]- इन्द्र के वान हजारों अयया उनसे भी अधिक है। सर्वप्रथम। १७ प्रियः [१२४७ ]- सबको प्रिय । ३७ इन्द्रः उभे रोदसी अमि यभूथ [ १२४८ ]- १८ सघाजित् । १२४७ ]- अनेक शत्रुओको एकदम इन्द्रने दोनों ही लोक अपने तेजसे भर दिए । भीतनेवाला। इन्द्रको सोम देना २९ अगोधः [१२४७]-जो सिपा नहीं रह सकता, पत करनेवाले इस इन्द्रको सोमरस निचोडकर दिया अपने सामने प्रसिद्ध होनेवाला। करते थे। इस विषपक वर्णन इस अध्यायमें इसप्रकार है- २० विश्वतः पृथुः [ १२४८]- सब प्रकारसे महान् । १ अद्रिभिः सुतं सोमं पवित्रे आनय, इन्द्राय २१ दियः पतिः[ १२४८]- धुलोकका स्वामी। २२ दामने रतः [ १२२३ ]-दान देने के लिए प्रसिद्ध। सोमरस इलनीके पास सा और इनके पीने के लिए छातका पातचे पुनाहि ! १२२५/- परपरोसे टकर निचोडे गए २३ पुरा मिन्दुः[१२५०-बुके नगरोंको तोडनेवाला। सम्मार कर। २४ युवा [ १२५०]- तरुण, चाहे कितनी भी उम्र २ मधुमत्तमं दिवः पीयूपं सोमं दाय मुनोत सम्यो हो नाए फिर भी हमेशा तरुण रहनेवासा । [ १२२७ ]- मायन्त मोठे पुलोरके पे ममत अर्थात् सोमरस २५ पवि। [१२५०]- ज्ञानी, दूरदर्शी इसके लिए तैयार रो। २६ अमितीजाः [१२५०]- अपरिमित दारितसे युक्त । ३ तयिष्यमाणः इन्द्रस्य जटरेषु अर्मिणा आयिश २७ विश्वस्य कर्मणः धर्ता [ १२५० ]- सब घट [१२३०- महापा जानेवाला यह सोमरस हमारे पेटम पौरापरवाला। लहरोंसे जाये । एयरा पेट उस रसते माछो तहमर माये ।
नयम अश्याय] सामवेद का सुयाध अनुवाद (१८) ४ ते मनः सोमकामं [ १२३४ ] है इन्न ! तेरा मन ३ हयतः [११७५]- पूज्य । सोमरस पीनको इच्छा करता है। ४ ऋषिमनाः [११७६ ]-ऋषिके समान मुद मनसे ५ ते मद: आयुपक् इन्द्रं गच्छतु 1 १२३५]-हे युक्त । सोम! तेरा आनन्द मदानेवाला रस इन्द्र के पास जाये। ५ ऋपिकृत् [११७६] - ऋपि बनानेहारा । ६ सखायं आ विश [ १९८४]- हे सोम! मित्ररूपी ६ स्थाः ११७६ - सबका तत्व जाननेवासा । इनमें प्रविष्ट हो। ७ सहननीथः [१९७६]-हजारों रास्तोंको जाननेवाला। ७ इन्द्राय जुष्टः मत्सरः पवमानः [११९४]-इन्द्रको ८ महिपः [ ११७६ ]- बल बढानेवाला। दिया जानेवाला आनन्दवर्यक मोमरम शुरु किया जाता है । ९ कवीनां पदयी [११७६]- ज्ञानीको पदयी जिसे र सुता सोपाः इन्द्राय धारया असू [ ११९६] प्राप्त हो गई है। -सोमरस इन्टको देने के लिए पार बांधकर छाने जाते हैं। १० स्तुम् । ११७६ ]- स्तुत्य । ११ विराट् [११७६] - विशेष तेजस्वी । २ इन्द्रस्य जठर आ विश [ १२०९]-हे सोम! १२ श्येनः [११७६]-प्रसंसनीय करके समान तुलौकमें इतके पेट में भर जा। रहनेहारा। १० इन्द्रस्य नितं गच्छन् पयते [ १२१३]- १३ शकुनः [११७६ ]-शक्ति प्रदानेवाला। इसके स्थानपर पहुंचने के लिए सोमरस शुद्ध किया जाता है। १४ गोविन्दुः । ११७६ )- गाय प्राप्त करनेवाला। इसप्रकार इन्द्रको सोमररा दिए जानेका वर्णन है। १५द्रात १९७६- रसरूप। देवोंके लिए सोमरस १६ नृचक्षाः [१९८५]-मानपोंका निरीक्षण करनेवाला। १७ स्वर्विद् [ ११८५ ]- स्वर्गमें रहनेवाला, स्वर्गको जिसप्रकार इन्द्रको सोमरम दिया जाता है, उसीप्रकार जानोवाला। दूसरे देवोंको भी दिया जाता है। १८ सोमाः इन्द्रस्य वीर्य वर्धन्तः [ ११७८ - १ महान् समुदः पिता देवानां विश्वा धाम अभि सोमरस इधका रल मडरता है। पवस्व [ १२४१]- महान् समुद्र के समान रससे भरा हुमा सोमरसके ये गुण है । इनसे कुछ गुण इन्द्र के गुणके सोम, सभीके पालक देषोंके सब स्थानोंतक जाता है। सब समान ही है । देव सोमरस पीते है, उससे उनका उत्साह देवोंको वह प्राप्त होता है। बहता है और इससे अनेक महत्यके कार्य करते हैं । यह २ शुक्रः देवेभ्यः पवस्व [ १२४२ ]- चमकर्नथाला देवोंका सामर्थ्य सोमरसके पीने से बढ़ता है, इसलिए ये गुण सोमरस देयोंके लिए छाना जाता है । सोमके ही है, ऐसा वर्णन किया है। ३ दिये पृथिव्यै मजाभ्यः शं [ १२४२- घुलोक, सोम यज्ञ स्थानमें पैठता है पृथ्वीलोक और प्रजाओंको सुख मिले, इसलिए है सोम । यज्ञ करनेवाले हिमालयके शिखरपरसे सोम लाते हैं और तू शुद्ध हो। सोमयाग करते है। उस समय सोमपल्लीको भी यज्ञमण्डपमें धुलोकमें सोम रखते है। इसलिए कहा है- सोम स्वर्ग, अर्थात् हिमालयके ऊचे शिखर पर पैदा १ स्वदृशा ऋतस्य योनौ लादत [११९५]- स्वर्गमें होता है- रहनेपाले सोम यत स्थानमें आते है। १ शुक्षः पीयूपः दियः घर्ती असि [ १२४३]- हे ११९८- आनन्द और उत्साह बढानयाला सोम, पन- २ मदव्युतः सोमः सादते क्षेति, गोरी अधिधिता सोम । न तेजस्वी और अमृतरे समान तमा युलोक शालान रहता है । गान-सामगानोंके द्वारा यह शुख होता है । रहने वाला है। उसे शुद्ध करते हए सामका गायन शुरु होता है। ३ पाजी सत्ये विधर्मन् पयस्व [१२४३ मा १विप्रः [११७५]-शानी। पडानेवाला सोम यज्ञशालामें शुद्ध होता है। २ कविः [११७५]-दुरदशी। इसप्रकार सोमका पगशाला के साथ सराय है। सोमके गुण (९८२) सामचंदया सुयोध अनुवाद उत्तराविका सोम संगठन करनेवाला है ४ होमिः अन्यं यारं वि अति भएनं [१९] रिपोंके द्वारा सोमरस भेाके बालोंको एलनोसे छाना १ नित्य-स्तोत्र. बनस्पतिः मानुपा युजा हिन्यान. जाता है। [१२०१]- नित्य प्रशसित होनेवाली सोमवल्ली मनुष्योको ५ सुमातुः कविः सोमः दियः नाभा अन्या पारे संगठित करती है । मानवोंको पज्ञके कारण एकत्रित करती है। महीयते । १९९]- उत्तम यत करनेवाला ज्ञानी सौम सोमरसका पानी मिलाना स्वांके नाभिस्थान अर्थात् ऊपरके कलशसे मालोंकी उसनी सोममा रस निचोडने के बाद पानी मिलाया जाता है । पर शोभित होता है अर्थात् छाना जाता है। ६ सोमः पवित्रे अन्तः आहितः [ १२००]- सोम- ६ अत्य. न नदीपु सृथा पाजांसि कृणुते [ १२२८] - घोडेके समान यह सोम नदीने अनायास ही अपने बलोंको रप्त छलनी पर रखा जाता है। प्रकट करता है । घोडा जिसप्रशर यानी में अपना बल दिखाता ७ इन्दुः मधुश्चुतं कोशं जिन्वन् समुद्रस्य अधि है, उसीप्रकार सोम जलमें मिलकर उत्साह वधानेकी अपनी विष्टपि याचं प्रेष्यति [१२०१]- सोमरस रखनेके बर्तन में शक्ति दिखाता है। गिरता है,तब जलके कलशमें वह शब्द करता हुआ गिरता है। २ हे सोम । समुद्रं यानिश [१२३६]- हे सोम । ८ अदिमिः प्रियं हरि मधुरधुतं पयमानं अन्या कलशमें रखे हुए पानी में प्रवेश कर । पानी में मिल । चारेः परि हि वति [ १२०७]- पत्परेसे फूटकर नियो गए प्रिय और हरे रगके मोठे सोम रसको भेडके वालोंकी इसप्रकार सोम पानी मिलाया जाता है। छलनीसे छानते है । सोमक लिए सामगान ९ पवितं धारया आ पवस्व [१२०८]- छलनीसे सोमरस छामने समम सामगान किया जाना है। इस पार पापकर उनता जा। विषयमें पर्णग इसप्रकार है- १० स्थानःन्दुः अव्ये परि अक्षरत् [ १२४० - निकाला गया सोमरस भेडके वासोको छलनीसे पता १ हे अयस्यय ! पवमान गिन देववीतये सुपाणं जाता है। अभि प्रगायत [ ११८८]- हे अपनी रक्षाको इच्छा करने- वाले पाजको । शुद्ध होनेवाले, ज्ञानी, देवोंके पीने के लिए सोमरसको मायके दूध में मिलाना जिसका रस निकाला गया है, ऐसे सौमको लक्ष्य करके सोमरस निकालनेके बाद उसे पानी मिलाकर छानते वेदमत्रों-सामों का गान करो। है। बाद, उसमें गापका दूध मिलाते है- सोमरसके निकालने और छाने जाने तक सामवेदकापान १ मदिन्तम अक्तुभिः गोभिः अआनः पवस्य यतमण्डपमें होता रहता था। एक तरफ उद्गाता साम गान [१२०९]- हे आनन्दवर्धक सोम! तेजस्वी गायके दूषके परते और दूसरी तरफ मोमरस छाना जाता था। साथ मिलकर शुद्ध हो। सोमका छाना जाना गव्ययुः ऊर्भः यः भ्राजा न अचरे धारा याति सोमका रस निकालने के बाद उसमें पानी मिलाकर वह सोम तेजसे चमकता है और यज्ञमें पारासे छनता है। [ १२४०- गाय के दूधसे मिलाया जानेवाला, श्रेष्ठ यह एलनोसे छाना जाता था। इस विषयमें वर्णन इसप्रकार है- १ कपिः पवितं अत्येति । ११७५ ]- मानो मोम सं यासयामसि [ ११८२]- हे सोम ! भेडके वालोंको ३ मेप्यः अति सृजानं त्या देवेभ्य मदाय गोभिः छलनोसे जाना जाता है। छलनीसे धाना जानेके यार को आनन्द देने के लिए तुम्ने २ वा दशक्षिप मृजन्ति [११८१]- हे सोम ! तुम्ने गायके दूपमें हम मिलाते है। प्रथम यह छाना जाता है। रम अंगुलियो शुद्ध करती है। उसके बाद वह देवोंको अच्छा लगे इसलिए उसमें गायका ३ साहनधारः अत्यावे. पुनान. सोमः [ १९८७]- दूध मिलाते है। हमा धाराओंसे भेषरे वासोको इलनीसे सोम छाना ४ पुनानः फलशेपु आ, मरूप हरि गव्यानि जाता है। घस्राणि परि अध्यत [११८३]- सोमरसको छानकर नयम अध्याय ] सामवेदका सुबोध अनुवाद सोमका शब्द पत्तशाम भरनेके यार यह हरे रणका घमानयाता सोम ५ हे अधिगो! ते इपः सुमे । १२३९ -हे गायको गायक यके पात्रों को पहनता है। गायके दूपमें मिलापा मागे करनेवाले सोम तेरे मन्न गुस वदानेवाले हैं। गायको जाता है। आमे करनेवाला सोम अपति गायफा दूध जिसमें मिलाया इसप्रकार सोमरसको गाय के दूध मिलानेका वर्णन है। जाता है वह सोम । गायके वस्त्रोको सोम पहनता है यह आलकारिक वर्णन है। मोमका रस दूध, मिलनेसे यह एक उत्तम प्रकार मम सोममें गाय के दूधको मिलानेका मतलब ही गापका घरत्र होता है । पहनना है ।" गापरे साप मिलता है" यह भाव भी कई सोम चल बढाता है मत्रोंमें नाया है, उसका भी भर्ष गापणे दूपमें मिरगना है। "भंश लिए पूर्णका उपयोग " बंदिर अलफारमें कई सोमरसको छानकर उसमें मिलानसे यह पुष्टिकारस जगह दिखाई पड़ता है।" दूष " मशह और "गाय" अप्त होता है- पूर्ण है इसलिए दूपके लिए गायका प्रयोग किया है। यह १ सहस्र-पाजसः सोमा. पवन्ते (११८९-हगारो रकी ली है। प्रकारको माक्ति बढानेवाले सोमरस छाने जाते है। २ घुमत् सुचीय पवस्व [११९०- तेजाची धाम पराक्रम करनेके सामन्यं हमें दे। सोमरस छानकर कलाम भरा माता है, सय उरालशमें सोमरसरूपी जो अन्न है उसमें एमा विलक्षण सामप्य है भरनेका उसका भाव होता है। इसमें पारा नहीं। १ सिन्धो स्वनः इयते शुष्मासः उदारते [१२०५] -जिसप्रकार नरो सपया समुद्रको लहरोका शव होता है सोम धन और उत्तम वीर्य देता है उसीप्रकार सोमका सन्द सुना जाता है। सोमको पता १ ते स्वाना. देवासः इन्दव.न. सहस्रिणं रवि बालते समय उसका शव होता है। सुधीर्य आ पचन्ताम् [.१९२ [-वे निचोडे गए विष्य २ घाणस्य पनि चोदय [ १२०५]- वाण नामक सोम हमें हजारो प्रकारके उत्तम वीर्य और पन थे। पापा जैसा शम्द होता है वैसा शब्द कर। हे पचमान । सहवर्चत स्थाभुव रयिं अस्मे यह बाद कलशमें डालते समय यसबारेका मेसा होता धारय ।।२०- हे शुद्ध होनेवाले लोग रहला सेनाले है, पंसा होता है। युक्त ऐसे अपने स्वयं पर हमें दे। सोम अन्न देता है ३ हे इन्दो! न. मह. रायः आभर, वीरवत् यश: सोमरस एक प्रकारका पौष्टिक और यल बढानेवाला रात्व {१२१४]- हे सोप 'हमें बड़े यो पर है और पुत्र. पौत्रोंसे युक्त यश दे। अन्त है। १ सोमा स्ववित्यो, षय प्रजाइ भक्षीमहि ४ मसस्यसे राधा दिरसम्त त्या शव चन हतः १८५]- हे सोम ! स्वको जाननेराले मुझे प्राप्त करके न भामिनन [ १२१५]- पश करनेवालोंको त जय पर सपा सन्तति सम प्रान्त करके हम आनन्दसे रहें। देनको इच्छा करता है, तब कहो कुटिल शत्रु भी तेराप्रति है इन्दो ! घाजसातये गृहती इपा परस्य वन्य नहीं कर सकते। [1९०-हे सोम' हम अन्न दान ररें इसलिए बहुत ५ हे इन्दो! नवाजसातम शतस्पृह, सहस्र- सारा अन्न हमें दे। भर्णसं तुरिधुम्न विभासई रवि भभि अर्थ [१२३८ ३ न. गोमत् हिरण्यवत् अभ्यचित् सहनिणी हे सोम ! हमें बल देनेवाले, बहुतों द्वारा प्रशसित, हजारोंका इयः परिक्षर [२२]- हे सोम! हमें गाय, सोना, भरणपोषण करनेवाले तेजाबी, विशेष बोस्नियाले भन । घोडा और हजारों प्रकारका अत। ६ पुरुस्पृहः घसो ते राधसः नेदिष्ठतमा स्याम, ४ घिया मः शश्वतः चाजान उपमाहे [१२३०]- [१२३९]- बहुत सारे लोग तैरे घनको प्रशसा करते है गर्म करके हमें हमेशा रहनेवाले यसवर्षद अन्न दे। अल उम धारे पास हम पहुचें।
(१८४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तराचिंकः शत्रुको दूर कर ४ शापिसना ऋषिकृत, सहननीथा, कवीनां पदवी महिपः तृतीयं धाम सिपासन् विराज भनु १ घिश्याः द्विषः अप जहि [ ११८४-१९४]- राच विराजति [६]- ऋषिके समान जिसका पवित्र मन माओंको हरा। है, जो ऋषियोका निर्माण करता है, जो अनेक मागोंसे उत्तम २ पृत्सु नः सहः धाः [11८६]- युद्ध में अपने शव कार्य करता है, जो ज्ञानीको पदयोको प्राप्त हुआ है, ऐसा जो ओको जीतनका सामर्थ्य हममें बढा। महान् और शक्तिमान होने के कारण सर्वोच्च तृतीय स्थानमें ३ पवमान ! अराणः अपनन्तः [ १९४ ]- हे रहता है वह विशेष तेजस्वी होनेके समान घिराजमान सोमरस ! तू दान न देनेवाले कजूसोंको दूर करनेवाला है। होता है । ४ ते य. मदेषु नवन यतीः अवाहन [ १२१० ] ५ चमूपद् शकुनः गोविन्दुः महिपः तुरीयं धाम तेरा यह रस सग्राममें ९९ शत्रुओको हराता है। वियक्ति [१७]- समूहमें सन्मानपूर्वक रहनेवाला, ५ सद्यः पुरः [ १२11]- उसी समय शत्रुके नगरोंका गाय पालनेवाला, चतुर्थ स्थानमें अर्थात् सर्वोत्तम स्थानमें यह नाम करता है। विराजता है। ६ दिवोदासाय शम्बरं तुर्वशं यदुं भवाहन [१२] ६ एने यस्य चीर्य वर्धन्तः [ ११७८]- ये वोर -दिवोरासके कल्याण करने के लिए शम्बर, तुर्यश और यदु- इसका पराक्रम बढाते है। औको इन्द्रने मारा ७ पुनानासः चमूपदा ते नः सुवीर्य धत्त [11] ७ सोम मृधः अपनन् , अराणः अप [ १२१३] -वे पवित्र होनेवाले समूहमें सन्मानसे रहनेवाले तुम हमें उत्तम पराक्रम करनेका सामध्ये दो। सोम साधुओंको मारता है और दान न देनेवालोंको भी दूर ८ पुनान. राधसे हार्दि चोदय, देवानां योनि परता है। ८ मृधः जहि [ १२१४]- शत्रुओको हरा। आसदं। 11८०]- शुख होकर सिति प्राप्त करने के लिए लोगोंरे हत्यमें शुद्ध प्रेरणा कर । देवोंके स्थान में मंठा ९ शूरः न गभस्त्योः आयुधा धत्ते [ १२२९]- पूरो समान यह सोम हायोंमें शानको धारण करता है। ९ विप्राः त्या अनु अमादिषुः १८.] मानी तुम २० मत्सरा तुयित् मृध अपघ्नन् [ १२३७ ]- आनन्द देते हैं। पह आनन्द देनेवाला सोम कर्म करने के सपमानको जानता १० विध्याः द्विपः अप जहि [11८४]- समवेष है और ओंको मारता है। करनेवाले शत्रुओंको पराजित कर । २१ हे इन्द्र! त्वं शश्वतीमा पुगं धर्ता, दस्यो। ११ सखायं मा विश[11८४]-मित्रके पास मंठ । हन्ता असि [१२४९ 1- हे सातशत्रुओंको शास्वत १२ नृचक्षसंस्पर्यिदं त्वां ययं प्रजा पं भशीमहि मारियोंका और दुष्टोंगा नाश करनेवाला है। [11८५]- मनुष्यों के निरीक्षण करनेवाले तुम मारमशानीको प्राप्त करके सुसन्तान और मम प्राप्त करके आनन्दसे रहें। १३ पृथिव्याः अधि शुम्नं [11]- पियो पर सुभाषित तेजस्वी यन्त्र उत्पन्न कर। २४ पृत्स्युनः सहः धाः [11८६]- संग्राममें उपयोगी १ अशानं इर्यत शिशु मृजन्ति [ 11७५]- मभी हो ऐमे शत्रुको हरानेवाले सामर्ष हमें है। सभी मन्मे हर उस पूग्य बासहरो शुत पर हं, साफ १५ अपस्ययः । पयमानं पिमं देययीतये सुप्यार्ण ममि मगायत [१९]- अपनी रणारी ठाकरले. ५ गणेन यि गुम्भत्ति [ 11७५]- राह समूहमें वासो । पुख, मानो, देवोंके पाने के लिए निचोरे गए सोम. मिसार शानको पूजा करते हैं। सरकार करते हैं। रसको लक्ष्य करके स्तोत्रौरा गान करो। ३ वषिः गीमिः पवित्र भरपेति [11७५]- कवि १६ घुमत् सुर्याय पयस्य [ 11९.]-तेमाची उत्तम भाषणोद्वारा पवित्रमारे पास पाच गया है। मामय में है।
नवम अध्याय] सामवेदका सुपांध अनुपाद (१८५) १७ नः साहस्त्रिण राय उपौर्य पयत्ताम् (११९२] होने के कारण अपने कर्तव्यो विभुत न होनेयास्त, उप्रयोर - हमें हजारों प्रकार के पन और उत्तम परारम करने और कभी न हारनेवाला ऐसा यह इन्द्र धन देशको माया मामय दो। करता है। १८ पवमानः फनिप्रदत् विश्वाः द्विषः अप जाहि ३२ शुरुनः गभस्त्योः आयुधं धत्ते [ १२२९]- 1९४] शुर होते हुए तपा सररते हए राम शूरके समान पह हार्योंमें शस्त्र धारण करता है। शऑको दूर कर। ३३ प्राफ, भपा, उदफ् या न्यम् नृभिः हयसे १९ परायणः अपनन्तः स्वदेशः तस्य योगी [१२३:/- पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा में लोग सीदत [३१९५]- अनुदार शत्रुओंको मार कर, अपने तेजसे तुझे सहायतारे लिए बुलाते है। युक्त होकर पसके स्थान पर मंठो। ३४ उपमानां प्रथमः निधीदसि [१२३४]. उपमा २० सहनपर्चसं स्वाभुवं रयिं अस्मे रास्व देने योग्य मनापरेमें सबसे मुख्य होकर तू यठता है। ६२२०३]-हजारों प्रकार हेजो पुक्त पर और पन हमें ।। ३५ शय्यं रयिं नितीशसे [१२३६]-प्रशसनीय २१ कपिः विप्रः दियः प्रिया भभि हिन्ध [१२०४] धनके लिए तू भागोंको पोश देता है । मानी, बुद्धिमान् घुसोको प्रिय स्थानको ओर प्रेरणा ३६ पुरस्पृहस्थ बसोः राधसा नेदिष्ठतमाः स्याम करता है। २२ ते मदेषु नव-नवतीः अधाहन [1210]- तेरा १२३९]- यहतोके द्वारा चाहने योग्य, सिद्धि देनेपाले धनक उत्साह पुट निन्यानवे शओंको मारहा है। पहन हो गास रहनयाले हम होये । ३७ प्रजाभ्यः शं [१२४२]- प्रजा का पल्याण हो। २३ सद्यः पुर[अपादन] १२017- उसी समय मामो मारोंको इसने तोग। ३८ शुक्राचाजी सत्ये विधर्मन [१२४३]- सेजस्वी, २४ ना गोमत् हिरण्यवत् अश्ययित् सहक्षिणी. असयान थोर सत्यमार्गले भनेक काम करनेवाला तू है। पा परिक्षर [१२१२-हमें गाप, सोना गोर पोसे ३९ स्वं दाशुषे गन पाहि { १२४६ ]- तू दान देने पुक्त हजारों प्रकारके मानदे। वाले मनुष्यको रक्षा कर। २५ सोमः मृधः अपनन् अराण अप [ १२१३- ४. रमना लोकं रक्ष [१२४६ ]- अपने प्रयत्नरो है सोम हिंमक और वान न देनेवाले शओंका नाश कर। अपनो सन्तानोंकी रक्षा कर। २६ ना महरायः आ भर, मृघः जहि, धीरपत् ४१ सत्राजित गोधः विश्वतः पृथु [ १२४७ ]- पशा रास्य (१२१४]- हमें बहुत सारा धन भरपूर दे। मध शत्रुओंको जीतनेवाला, किसी के सारो स्यनवाला, शत्रुओंको मार और पुत्रों के साथ मिलनेवाले यश और सबसे बड़ा पोरसू है। अन्न। ४२ शश्वत्तीनां पुरां धर्ता, दस्यो. हरता, मनी. २७ राधा विरसन्तं त्या शतं चन हतः नमामि धः असि [ १२४९- तू शत्रुओंकी शाषित नगरियोको नन् [ १२१५]- पन देने को इच्छापाने सुदो शंकडों शा भी तोडनेवाला, शत्रुको मारनेवाला और मनको इलवान् करने पनवे से नहीं रोक सकते। वाला है। २८ सा वृषा वृषभः भुषत् (१२२२]- यह मलवान ४३ पुरा भि-दुः युवा परि अमितीजा विश्वस्य और अधिक मलवान हो गया है। फर्मजः धावत्री पुरुष्टुतः अजायत [ १२५० ] - २१ स दामने एत' [१२२३)- वह देने के लिए ही शत्रुके नगरोंको तोडनेवाला ताण, ज्ञानी, अपरिमित दाक्ति- उत्पन्न हुआ है। शाली, सब कर्मोको धारण करनेवाला, बनधारी और ३० स ओजिष्टः चले हितः [ १२२३ ]- वह दस बहुतोंके द्वारा स्तुति करने के योग्य हू उत्पन्न हुमा है । शाली बोर यसके कार्याने ही स्थापित किया गया है। ४वं गोमता क्लस्य विल अपाः [१२.1]- ३१ गिरा सम्भृतः स्यला मनपच्युतः उमा हुने गायोंको पुरानेवाले वल राशसकी गुफाको फोडा। अस्थता वषक्षे [ १२२४]- पानी प्रशसित, बलवान् ४५ तुज्यमानासः देगः भविम्युषः त्या गाविपुः २४ [साम हिन्दी भा.
सामवेदका सुबोध अनुवाद उत्तरार्चिका [१२५१ - हारे हुए देयोंने फिर न घबराते हुए तेरा हो ७ परावति कविः विप्रः [१२०४]-- जैसे श्रेष्ठ आसरा लिया। स्थानमें कवि और ज्ञानी रहता है, उसीप्रकार (धारया ४६ यस्य रातयः सहस्र, उत वा भूयसी सन्ति, दिवः प्रिया अभि हिम्ये) पारसे युक्त होकर घुलोक तं मोजसा ईशानं इन्द्रं स्तोमः अभ्यनूपत [१२५२]- प्रिय स्थानके पास सोम रहता है। जिसके वान हजारों अयवा उससे भी अधिक है, उस ८ सिन्धोः ऊमें स्वनः इच [१२०५]- समुद्रको सामन्यसे युफ्त इन्द्रको स्तोत्रोंसे स्तुति करते है। लहरोंके शब्दके समान ( ते शुष्मासः उदीरते) तेरी. सोमरसको -तीनताके शब्द सुनाई देते है। ९ प्रोथत् अश्वः न [१२२०]-हिनहिनानेवाले घोडेके उपमा समान ( महः संवरणास् यदा व्यस्थात् ) महान् धेगसे जगलकी अग्नि फैलती है। १ जवानं शिशुं न [ ११७५ ]- नये नये जन्मे हुए १० वजन [१२२४]-वथके समान (सबलः मन- बच्चैको जिसप्रकार साफ रखते हैं, उसीप्रकार र हर्यतं मरुतः पच्युतः ) बलवान् और न दवनेषाला इन्द्र है। मृजन्ति) सोमको महत् साफ करते हैं। ११ भत्यः न [ १२२८ ]- घोडेके समान (नदीपु २ वाजसातये हियानाः आशवः न [ ११९१]- वृथा पाजांसि कृणुते ) नदीके पानीम सोम अनायास ही मुखके लिए तैयार हुए हुए चघल घोके समान (हेसभिः अपने बल दिखाता है। सोम पानोमें मिलाया जाता है। भव्यं चार मति मसून) ऋत्विों के द्वारा सोमरस एलनोले घाना जाता है। १२ शून [ १२२९ ]- पूरके समान (गभस्त्योः ३ मातरम् घरस न [ ११९३]- गायें जिप्तप्रकार अपने भायुधा पत्ते ) सोम हापों में शास्त्र धारण करता है। या के पास जाती है, उसीप्रकार (इन्दव. अमि अन्ति) १३ विद्युत् अभाव १२३० ] - विशली से सोमरर पलामें जाते हैं। बादलोंसे पानी बरसाती है, उसीप्रकार (रोदसी प्रपिन्ये) ४ धेनय गार वत्स न । ११९७ ]- दुपाए गायें घलोक और भूलोक फल देते हैं । अपने यारो पास जिसप्रकार जाती है, उसीप्रकार (विप्राः १४ भ्राजा न [१२४०]-तेजसे जैसे कोई चमकता इन्द्र अभि अनूषत ) शक्विज इन्द्र के पास जाते है। है, वैसे ही सोम (अध्वरे धारा याति) यशमें अपनी पारासे जाता है । वहां जाकर पमकता है। ५ मदच्युत् सोमः सादने क्षेति [ १९९८]- मानद १५ प्रिय मित्रं च [१२४४-प्रिय मित्र के समान देनेगला सोम जिसप्रकार यज्ञशालाम रहता है, उसीप्रकार (भेष्ट अतिथि स्तुपे) सर्व प्रिय अग्निको स्तुति करता है। (मिन्धोः ऊर्मा विपश्चित् ) नदी के पानीमें सोम रहता है, और उसीप्रकार (गौरी अधिधितः) गानोंके शोध करानेवाले अथितिको में स्तुति करता हूँ। १६ रथं न घेछ । १२४ ]- एपके समान धन प्राप्त सोम शुद्ध होता है। १७ पवि इय प्रशस्य [१२१५]-नायिके समान ६ शुभतुः ययिः विचक्षणः ११९९ - उत्तम पक्ष प्रशासनीय। करनेवाला जितप्रसार मानी और महान् विद्वान् होता है, १८ गिरिःन [ १२४७ ]- पर्वतके समान (विश्यतः सांप्रकार ( सोमः दिषा नामा ) सोम पसोकरें मचे पृथः) चारों ओरसे महान् ऐसा ( दियः पति।) तोकका रपानपर रहता है। शासका है।
(१८७) सामवेदका सुवोध अनुवाद नवम अध्याय) नवमाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची देवता छन्द मंत्रसंख्या ग्देवस्थान पवमान सोमः त्रिष्टुप " " गायत्री " " ९९६।१७ ९।९६।१८ ९१९६११९ ઉદાર ९८ा ઉતારે ९८४ ९८५ " " प्रतर्दनो देवोवासि प्रतर्दनो वयोवाति प्रतर्दनो देवोदासि असित काश्यप देवलो वा असित काश्यपो देयलोषा असित काश्यपो देवलो वा असित काश्यपो देवलो वा असित कारपो देवलो वा असित कायपो देयलोया असित काश्यपो देवलोवा असित काश्यपो देवलो वा थसित काश्यपो देवलोवा " । " १९८१ ११८२ " 1 १९८४ 11 " શ૮૭ ९८९ ९८८ १९८२ ११८३ " " 11 1" ९३१३१२ ११८८ " , 0 " १९९० ९।१३।४ ९११६ 1 11 " " ९११३७ ११३८ ९।१३२९ " १९९४ असित वाश्यपो देवलोधा असितः काश्यपो देवलो वा मसिताश्यपो देवलो वा असित काश्यपो देवलोपा असित काश्यपो रेवलो दा असित राश्यपो देवलोदा असित काश्यपो देवलोपा असित राश्यपोदेवलो वा मसित श्यपो देवलोवा (३) असित कास्य देवलोवा मसित रायपो देवलो वा अमित रायपोरंदतोवा असित काश्यपो देवलोवा असितारापोवनोवा असित काश्यपोदेवलोया असित रायपो देवतोवा अमिन पायपो देवसोवा असित शायपो देवलोवा " " ९।११ ९।१२ " . १९९८ . " " " ९।१२।४ ९।१२।५ ९१६ ९१७ ९।११९ ९।१२। . " " १०, (१८८) सामवेदका सुयोध अनुवाद t उत्तराधिका मत्रसंख्या ऋग्वेवस्थान देवता छन्द: पयमानः सोमः गायत्री 11 ऋषिः (४) उपध्य आंगिरसः उधथ्य मांगिरसः उपथ्य आंगिरसः उचण्य आंगिरसः उपभ्य आंगिरसः ९.९०१ ९५०१२ ९५० ९।५०४ ११५०५ १९०६ १२०७ २२०८ १२०९ " t . " " ९।६११ " 1. 17 " 11 १२१३ " अमहीपुरागिरसः अमहीपरागिरसः अमहीयुरागिरसः अमहीमुरागिरमः अमहीपुर्रागिरसः अमहीपुरागिरसः तिध्रुविः काश्यपः निषिः काश्यपः निभूयिः कारपपः " २३२३ ९६११२५ ९६११२६ ९।६।२७ ९६७ ९१६३८ ९।६३९ " " " " " " ७१ গনি। त्रिष्टा वसिष्ठी मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावरणिः " " गायत्री ७३३३ ८९३७ ८.९३८ ८९२ सुकम आगिरसः सुकक्ष आंगिरसः मुकक्ष आंगिरसः " " " पवमानः सोमः . " १२२७ (७) उचग्य आंगिरसः उचय आंगिरसः उपम्य आगिरसः कविर्भागवः कविर्भागवः कविर्भागषः देवातिपिः काण्वः ९८५११ ९५१२ ९५१॥३ ९७६१ ९७६१ ९७६३ दाया? " जगती १०५९ " " 11 11 प्रगाय:-(विषमा बृहती समा सतो महती) 1 " દ્રાર दा६११ दिश रेवातिथिः काश्यः भगःप्राणाय: सर्गःप्रागाय: " .
सामवेदपा सुयाध अनुवाद नपर्म मायाय] मंत्रसंख्या भावास्थान परमान सोम गायत्रो " " १९३७ एपि (८) निषि पाश्यप निवि काश्यप निवि काश्यप अम्बरीषो पाागिर ऋमिश्या भारतानश्च ।। अम्बरीयो पार्थागिर निश्वा भारसागर, अम्बरीषो पागिर जिया भावाच । मानय पिण्या ऐश्वरा मानये पिटण्या ऐश्वरा आनये पिण्या ऐश्वरा अनुष्ट . ॥ ९६६३१०३ ९९८१ १९८५ १९८३ ९।१०१४ ९३१०१५ ९।१०९।६ १२३९ १९४० १९४१ १२४२ हिपदा विराट " " " " १२४३ अग्नि गायत्री १२४४ १९.५ उदाना काय उदानाराम " " " उदाना काव्य दार હેલા ८८३ ૮૬૮ टाटा ९८६ अगर " " १९४७ १२१८ १५४९ नमय सांगिरस नमेप आगिरस नमेघ मागिरस " " अनुष्टुप १५० " २११५ ११८ नेता माधुच्य इस गोता माधुच्छन्दस पता मानस " "
(१९०)
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[ उत्तराचिकः
अफ दशमोऽध्यायः
17"
मथ पञ्चमप्रपाठकस्य द्वितीयोऽध्यायः ॥५॥
[१]
(१-२३) १ पराारः शारयः, २ शुन शेप आजीगति. स देवरातः कृत्रिमो पंवामित्र ३ असितः कारपपो रेवलो काम
४,७, राहगण आंगिरसः ५/१-४),५/प्रपम पादः) प्रियमेष भागिरसः५ (शेपास्त्रयः पादाः) ६{प्रयमः पाल)
१४ नमेघ आगिरराः६ (शेषास्त्रयः पाराः ) इध्मवाहो बाईच्यतः, ८ पवित्र मागिरसो वा यसिष्टो या उभौ वा;
९ वसिष्ठी मंत्रावणि १० वरस. कावः, ११ शतं खानस ; १२ सप्तर्षयः (१ भरद्वाजो मार्हस्पत्यः; २ कश्यपो
मारीधः; ३ गोलमो राहगणः, ४ अप्रिमीमः ५ विश्वामित्रो गापिनः, ६ जमदग्नि र्गयः; ७ वसिष्ठो
मंत्रावरणिः); १३ चसुरिवाजः; १५ भाः प्रागाथः; १६ भरवाजो बाईस्पत्पा, १७ मनु राप्रपा
१८ अम्बरीषो पापांगिरः ऋजिया भारद्वाजश्च १९ भानयो पिण्या ऐश्वराः; २० अमहीपुरागिरः
२१ पिशोकः करण्यः, २२ गोतमो राहगणः, २३ मधुच्छन्दा बंश्वामित्रः ॥ १-७, ११-१३,
१६-२० पवमानः सोमः, ८ पवमानाध्यता, १०, १४-१५, २१ (२-३), २२-२३ इन्द्रः
९ अग्निः, २१ (१) अग्नीन्द्रौ ॥ १, २ विष्टपः २-७, १०-११, १६, २०-२१ गायत्री;
, २५, २३ अनुष्टपः १२ (१-२), १४, १५ प्रगाथ:- (बहतो, सतो बहती );
१३ (३), १९ द्विपदा विरादः १३ जगती, १७, २२ उरिगर ॥
१७"
१२५३ अक्रान्समुद्रा प्रथमे विधर्मन् जनयन्प्रजा सुवनस्य गोपाः ।
वृपा पवित्र अधि सानो अव्ये बृहस्सोमा वायुधे स्वानो अद्रिः ॥ १॥ ( ९,९७४४० )
१२५४ मसि वायुमिष्टये राधसे नौ मसि मित्रावरुणा पूर्यमानः ।
मसि शो मारुतं मसि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम ॥२॥ (ऋ. ९।९७४२ ।
E१]प्रथमः खण्डः।
[१२५३ ] ( समुद्रः गो-पा ) पानी परसानेवाला, रक्षक सोम (प्रथमे भुवनस्य यिधर्मन् ) सबसे पहले
भुवनोको धारण करनेवाले अन्तरिक्षमें (प्रजाः जनयन् अमान ) प्रजाओंको उत्पन्न करके समशी अपेक्षा श्रेष्ठ हुआ। (धूपा
म्यानः ) बलवर्धक सोमके रसको निकालने के बाद (अद्रिः सोमः ) आदरणीय वह सोम (मधिसानी अव्ये पवित्र )
अधिक ऊंचे रखे गए बालोको छलनीमें ( बृहत् वावृधे ) अधिक पता है ॥ १ ॥
[ १२५४] है ( देव सोम) विम्प सोम! (नाइष्टये राधसे । हमें अन्न और धन प्राप्त हो इसलिए ( घायुं
मसि ) वायुको प्रसन्न कर ।। पूयमानः ) छाना जानेवाला तु ( मित्रापरणा मत्सिा मित्र और वरुणको सन्तुष्ट कर।
(मारुतं शर्द्धः मरिस ) मरतोंके बलको आनन्दित कर । ( देवान् मस्ति गोको सन्तुष्ट कर (पापाथिषी
मरिस) धुलोक और पृषिधीको प्रसन्न कर ॥२॥
दशम अध्याय
सामषा सुबोध अनुपाद
L
२७...
3.
.
१३
१३.
।
१२५५ महत्तसोमो महिपचकारापा यद्गोऽवणीत देवान् ।
अदधादिन्द्र पवमान ओजोऽजनयत्सर्वं ज्योतिरिन्दुः ॥३॥ १(ट)॥
धा०२८ । उ० १ १०८ 1 ( ९।९७१)
१२५६ एष देवो अमर्त्यः पर्णवीरिख दीयते । अभि द्रोणान्यासदस् ॥ १ ॥ ( ९३१)
१२५७ एप विगैरमिष्टुतोऽपो देवो वि गाइते । दधद्रतानि दाशुषे ॥२॥ (१.९।२६)
१२५८ एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्त्वभिः । पवमानः सिफामसि ॥ ३ ॥ ( १।३३४)
१२५९ एप
देवो रथयति पर्वमानो दियस्पति । आविष्कृणोति यग्यतुम् ॥ ४ ॥ ( स. ९।३।५ )
१२६० एष देवो विपन्युमिः पवमान अताभिः । हरिर्वाजाय मृज्यते ॥ ५ ॥ (ऋ. ९।३।२ )
१२६१ एष देवो विया कृतोऽति हराऽसि धावति । परमानी अदाभ्यः ॥ ६ ॥ ( ९४२२)
१२६२ एप दिवं विधापति विरोरारसि धारया । पत्रमानः कनिकदद ॥७॥ ( ९।३७ )
[ १२५५] (महिपः सोमः) महान् पूज्य सोम ( महत् तत् चकार ) उस महान कार्यको करता है । (यत्)
को कार्य (अपां गर्भः) पानीके गर्भवाला यह सोम ( देवान् मायनीत ) रेयोको सेवा करने के लिए करता है ।(प.
मानः ) छनकर इस सोमन ( इन्द्रे भोजा अदधात ) इनमें अल बढापा, उसोप्रकार इस ( इन्दुः ) सोमने ( सूर्ये
ज्योति मदधात् । पूर्व में तेज स्थापित किया ॥ ३ ॥
[१२५६१ (एषः अमर्त्य देवः) यह अमर देव सोम (द्रोणानि अभि भासद) कलशमें बेठनेके लिए
(पर्णयोः इय) पक्षीके समान ( बीयते ) वेगसे जाता है ॥ १॥
[ १२५७ ] (विनः अभिष्टुतः ) ज्ञानियों के द्वारा प्रशसित ( एषः देव ) यह रेव सोम ( दाशुषे रत्नानि
दधत् ) साताको रत्न देताहमा ( अपर विगाहते ) नलीम माता है ॥ २ ॥
[१२५८ ] (पघमानः एषः शूरः) आना जानेवाला यह शूर पोर सोम । विभ्यानि वार्या )मय धन (सरपामः
यनिय ) अपने मलको सहायतासे प्राप्त करते हुए। सिपासति) हमें देनेको इच्छा करता है ॥ ३ ॥
६.९२५१ (पपः पवमानः देव । यह खाना जानेवाला दिग्य सोम (शति ।यनमें जाने के लिए, रएको
इच्छा करता है । ( दिशस्यति ) और हमें इष्ट पार्ष निकी इच्छा करता है और ( चग्यतुं आविष्कृणोति ) शम्म
करता है॥४॥
[१२६० ] ( एषः पवमानः देव ) यह छाना जानेवाला शिव्य सोम (स्तायुभिः विपम्युभिः) यन करनेवाले
शस्विनों के द्वारा, लोग (हरि) घोडको जिसप्रकार ( पाजाय मृज्यते । सग्राममें जाने के लिए समाते है, उसीप्रकार
शनाया जाता है॥५॥
[१२६१०(विपा कता) मंगुलियों द्वारा निघोडा गया, ( अ-दाभ्यः) सयान रवाया मानेवाला ( एप
पवमानः देवः ) यह शुद्ध होनेवाला विष्य सोम (रांसि अति घायति ) शत्रुओंको कुचलता हुआ माला है ॥ ६॥
[१९६२7 (धारया पवमानः एषः ) धारसे छाना जानेवाला यह सोम (कनिक्रदत् । शम्द करता हुआ
(रजांसि तिरस) शत्रुके लोकोंको हराता हुमा पनमानसे ( दियं विघापति ) स्वर्गलोकको माताहमा प्रतीत
होता है ॥७॥
सामवेदका सुरोध अनुपाद
[ उत्तराधिः
37
32
३.१.३.२
--
३२.१२
११३११
३
३
13.3
२१२
३
२
३१ श
३२१
वर
a
3
१२६३ एष दिय व्यासरत्तिरी रजायस्वतः । पयमानः स्वधरा ॥८॥ ( ९३८)
१२६४ एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः । हरिः पवित्र अति
।।९।। (ऋ. ९:३२९)
१२६५ ऐप उस्य पुस्यतो ज्ञानो जनयन्निपः । धारया पयते सुतः ॥१०॥ २ (द)।
[ धा० ३४ । उ०३ । स्व०६(ऋ. २०१०)
॥ इति प्रथम खण्ड ॥१॥
[२]
१२६६ एप धिगा यात्पण्या शूरो रथेमिराशुभिः । गच्छनिन्द्रस्य निष्कृतम् ॥१॥ (१ ९।१५।१)
१२६७ एप पुरू प्रियायते बृहते देवतातये । यत्रामृतास आशत
॥२॥ (३.९.१५।२)
१२६८ एतं मृजन्ति मय॑मुप द्रोणेपाययः । प्रचक्राणं महीरिपः ॥३॥ ( ९।१५७)
१२६९ एप हितो वि नीयतेऽन्तः शुन्ध्यावता पथा । यदी तुञ्जन्ति भूर्णया ॥४॥( ९।१५१३)
१२७० एष रुक्मिभिरीयते बाजी शुभ्रमिरशुभिः । पतिः सिन्धूनां भवन् ॥५॥२ ९।१५।५)
[१२६३ ] ( सु-अध्यरा पवमानः एपः ) उत्तम यश करनेवाला तथा छाना जानेवाला यह सोम ( अस्ता)
अपराजित अर्थात् विजयी होकर ( रजांसि तिरा) शत्रुसे लोकोंको नष्ट करके ( दियं व्यासरत् ) स्वर्गको जाता हमासा
प्रतीत होता है ॥८॥
[ २२६४ ] ( हरि पपा देवः ) हरे रगका यह विष्य सोम ( प्रत्नेन जन्मना ) प्राचीन जन्मसे ही (देवेभ्यः
मुतः ) देवकि लिए निवड कर { पवित्र अति ) छलनोसे जाना जाता है ॥ ९ ॥
८ १२६५ ( एप उ स्यः ) यही वह सोम ( पुरवता जशानः ) बहुत फर्म करनेके लिए उत्पात हुआ हमा और
(इषः जनयन् ) मा उत्पन्न करता हआ ( सुतः धारया पवते । रसको पारारो छनता माता है ॥१०॥
यहां पहला सण्ड समाप्त हुआ।
[२] द्वितीयः खण्डः।
१२६६1 (शूरः ) शूरवीर तया ( अण्व्या) अगलियोरो दबाकर निकाला गया ( एषः) पह सोम (इन्द्रस्य
निष्कृतं ) इन्द्र के स्थानके पास ( आशुभिः रथेमिः) शीघ्रगामी रथयोंसे ( गच्छन् ) मानेको मशा करता आ{ पिया
याति) द्धिपूर्वक जाता है ॥१॥
[२२६७] (एषः ) यह सोम ( पृहते देयतातये ) महान् यज्ञके लिए ( पुरूधियायते ) बहुतसे कर्म करनेकी
पसा करता है। ( यत्र ) जिस पझमें ( गमृतासः आशत) अमर रेव बैठते है ।। २॥
[ १२६८] (आयय ) ऋविन (महीप प्रघकाणं ) बहुत अन्न उत्पन्न करनेवासे (पतं मयासार
होने के योग्य सोमको (दोणेषु उप मृजन्ति ) कलशम छानकर रखते है ॥३॥
[ १२६९ (हितः एप. हवियों में रखा हुआ यह सौम (चिनीयते । माहवनीय स्पानको भोर लेनाया जाता
है । ( अन्त' शुभ्यावता पथा) यहाँ पर होने के मार्गसे ( यदि भूर्णय' अव मारि ( तुजन्ति ) उसे देवोंको भोर
[ १२७०] (याजी) बलवान और ( शुभेभिः अंशुभिः ) शुध किरणोंसे पुरत ( पप.) मह सोम (सिन्धूनां
पतिः मयन ) प्रवाहित होनेवाले रसोंका स्वामी होकर ( सक्मिभिः रयते ) याजोंके साप माता है॥६॥
ले जाते हैं ॥५॥
दशम अध्याय सामयेद्या सुबोध मनुवार ११० १२७१ एप शृङ्गाणि दोधुपच्छिशीते युध्यो३ वृषा । नम्णा दधान ओजसा ॥६॥ (ऋ. ९।१२।१ ) १२७२ एप पनि किन्दनः परुपा ययिका अति । अब शादेषु गच्छति ॥७॥ ९११५४६) १२७३ एतमु त्यं दशक्षिपो हरिरहिन्यन्ति यातये । साय मदिन्तमम् ।। ८ ॥ ३ (के) ॥ [धा० ३1 1 3011 स्व० ७ ] ( मा ९।१५१८) ॥ इति द्वितीय. पण, ॥२॥ [३] १२७४ एप । स्य वृपा रथोऽव्या परिभिरण्यत । गच्छन्याज सहस्रिणम् ॥१॥ १४ ९।३८।१ । १२७५ एतं प्रितस्य योपणो हरि हिन्वन्त्यद्रिमिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥२॥ (ऋ. ९।३८।२ ) १२७६ एप स्य मानुपाचा स्पेनो न विक्षु सीदति । गच्छं आरो न योपितम् ॥३॥ (ऋ ११३८१४ ) १२७७ एप स्य मद्यो रसोऽय चष्टे दिवा शिशु: । य इन्दुरिमाविशत् ॥४॥(ऋ.९।३८२ ) 213 ३. ३७ १३ 4 [१२७१1 (ओजपा नृम्मा दधान ) अपने सामध्यंसे पोंको धारण करते हुए (एषः ) यह सोमरस (यूथ्यः घृपा शिशीते ) जिसप्रकार झुप में चल अपने सौगोको हिलाता है, उसीप्रकार (अंगाणि दोधुवत् ) अपनो किरणोंको हिलाता ॥६॥ [ १२७२ ] ( वसूनि पिग्दनः मंठनेवाले राक्षसों को पोशा देनेवाला ( एपः ) यह सोम (परपा अति यायवान् । अपनी शविरसे शनपर मारपण करता है, और ( शादेषु अव गच्छति ) मारने योग्य राक्षसोको कुचलता हुआ चला जस्ता है [ १२७३ (सु-आयुधं ) उत्तम शास्त्रोंका उपयोग करनेवाले तपा (मदिन्तमं । अत्यन्त मानन्ददायक (त्यं हरि पतं ) उस हरे रंगके तोमको ( यातये ) देवोंके पास ले जाने के लिए ( दश क्षिप हिन्यन्ति ) बसों अगलिया राकर रस निकालती है ॥ ८॥ । यहां दूसरा सण्ड समाप्त हुआ || ३तृतीयः खण्डः। [१२७८1 (एप) यह (रथ) रयके समान वेगवान तमा (पा स्यः) बलवान् सोम (सहस्रिण पाज) हनारों प्रकारके भन्न देने के लिए (गच्छन् ) कलशमें लाते हुए ( अव्या चारेमि.) यालोरी छलनीके द्वारा अन्यता छाना जाता है ॥१॥ [ १२७५] (वितस्य योषणा ) त्रितको मालियो (इन्द्राय पीतये ) इन्द्रको पोके वास्ते वो लिए (एन हरि इन्द) इस हरे रगके सोमको ( अद्रिभिः हिन्यन्ति ) परपस कूटतो है ॥ २ ॥ [१२७६ ] ( म्यः एपः ) यह यह सोम (मानुपीपु विक्षु ) मनुष्यको प्रशाओंम (इयेनान पेत पक्षी समाम तथा ( योषितं गच्छन् जारःन) स्त्रीके पास जाते हुए चार समान ( आ सीदति ) जाकर बैठता है ॥ ३॥ [ १२७७ ] (दिव शिशु.) लोषका यह पुत्र ( यः इन्दुः) जो सौम है वह (पारं मा विशत् ) छलनीम प्रवेश करता है. (पष. स्या) यह यह ( मध रसः अव चष्टे आनन्द पढानेवाला सोमरस सबरी देखता है॥४॥ २५ [साम हिन्दी भा २] (१९४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिका १२ ३३ १२ उ १ २ १ २ १२७८ एप स्य पीतये सुतो हरिरपति धर्णसि।। कन्दन्यौनिमभि प्रियम् ॥५॥(ऋ. ११३८६) १२७९ एपं त्यर हरितो दश मर्मुज्यन्ते अपस्युवः । याभिर्मदाय शुम्भते ॥ ६॥ ४ (पी) ।। [ धा० २९ । उ० ८ । स्व० ४ ] ( ९।३८३) ॥ इति तृतीय. सण्ट ॥ ३ ॥ [४] १२८० एष वाजी हितो नमिश्विविन्मनसस्पतिः । अव्य पार वि धावति ॥ १।। (ऋ ९।२८।१) १२८१ एप पवित्रे अक्षरसोमो देवेभ्यः सुतः । विश्वा धामान्याविशन् ॥ २॥ ( ऋ ९२६२ ) १२८२ एष देवा शुभायतेऽधि योनावमर्त्यः । वृत्रहा देववीतमा ॥३॥ (ऋ ९२३) १२८३ एप वृपा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः । अमि द्रोणानि धावति ॥४॥। क्र. ९/२४) १२८४ एप सूर्यमरोचयत्परमानो अघि वि । पवित्र मत्सरो मदः ॥५॥ (ऋ. ९२२८५ [ प्रथम पाद' ], ऋ. ९।२७। [प्रयः पादा) [१२७८] (पीतये सुतः ) देवोंके पीने के लिए निचोग गपा (हरिः धर्णसिः) हरे रगका मोर सयको धारण करनेवाला (स्य एपा) वह यह सोम ( प्रियं योनि ) अपने प्रिय स्थान बलशमें (अन्वन अभि अति ) दाद करता हमा जाता है॥५॥ [ १२७९ ] (त्यं एतत् ) उस इस सोमको ( दशः हरितः ) दो अंगुलिया ( अपस्युयः मर्मज्यन्ने ) पश करनंको पछा करती हुई साफ करती है । ( पाभिः) जिन अलिपोसे ( मदाय गुम्भते ) इन्द्रमा आनन्द पाने के लिए सोम टाना भाता है ॥६॥ ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुमा ।। [४] चतुर्थः खण्डः। [१२८० ] (पानी) बसवान सोम (नृभिः हितः) पाजोंके द्वारा सामें रखा गया है। (यिभ्ययित् मनसः पतिः ) सवंश और मनका स्वामी (एषः) यह सोम (अन्य चार विधानति ) बालोंको सनीही और रोहता है॥ [१२८१] { देवेभ्यः सुतः एषः) देवोंको देने के लिए निराला गया यह सोम (पवित्रे अक्षरस् ) उसनोसे जाना जाता । ( यिभ्या घामानि मायिशन ) वह सब पामों में -देवों के द्वारो - प्रवेश करता है.२॥ [१९८२] (ममा पृष-हा ) अमर और सामोरा मारपरलेगला ( देव-धी-तमः देवः एषः) देशको मत अच्छा लानेवासा यह रिप मोम ( अघि योनी गुमायते ) अपने समा गुशोभित होता ॥३॥ [१२८३ ] ( पृष्ण पर) बल बहानंदासायह सोम ( कनिद्र) शाररते हुए शाभिः जामिमि यता) रमो भगतियों द्वारा कराने के बाद (द्रोणानि ममि घायति ) सा दौरताना पहुंचता हूँ॥४॥ [१२] (परिये ) धमनीमें रहनेशला { मरमरा मदः) मानद पानेवासा तथा प्रसनमा देनेवासा ( एप पयमानः ) यह पररिया जानेवामा होमरम (पवि सूर्य मधि भरोचयत् ) पोर प्रोप्रमाणित करता है !
देशम भन्याय] सामदका सुयोध मनुवाद २ १२८५ एप सूर्पण हासते संवमानो विवस्वता । पतिर्याची अदाम्प: ॥६॥ ५ ( के ) {था० २६ उ.१०७ र २१२१२ [ प्रथमः पादः ९२६४ । श्रय पादाः ॥ इति पसुपः खण्डः ॥ ४ ॥ । . " 37 ar.२ १ १२८६ एर फविरमिदुतः पवित्र अधि तोशते । पुनानो मम द्विपः ॥ १॥ (ऋ. ९।२७१ ) १२८७ एप इन्द्राय वापय स्वजिपरि पिच्यते । पवित्रे दक्षमापना ॥२॥ (3. ९/२०१२) १२८८ एष नृभिर्वि नीयते दिवो मर्या वृपा सुतः । सोमा वनेषु विश्ववित् ।। ३ ।। (ऋ ९।२७३ ) १२८९ एष गव्युरचिक्रदत्परमानो हिरण्ययुः । इन्दुः समाजिदस्कृतः ॥४॥ ( ९।२७४) १२९० एप शुम्यसिप्पददन्तरिक्षे वृपा हरिए । पुनान इन्दुरिन्द्रमा 11५।। (ऋ९।२७१६) १२९१ एष शुष्म्पदाम्पः सोमः पुनानी अर्पति । देवावीरवारस सहा 11६11६ (गु)॥ [धा० ३१ । उ०३ । स्व.५] (ऋ.९८६) २ ४ ॥ इति पञ्चम, स॥५॥ [१२८५J (याचः पतिः) स्तुतिया स्वामी (भदाभ्यः एय: } और न बवाया जानेवाला ग्रह सोम (सं वसानः ) जलादियोंमें गिलाये जाने के लिए ( विवस्यता सूर्येण } प्रकाशमान सूर्यके द्वारा (हासते ) छोरा जाता है। पतंनमें छाना जाता है ॥६॥ "यहां चौथा खण्ड समाप्त हुया। [५]पशमः खण्डः [१२८६ (कविः अभितः ) कवियों -गानियों के द्वारा प्रशंसित होनेवाला ( पुनानः ) छाना पानेयाला {द्विषः अपघ्नन् । शत्रुओंको मारनपाला ( एप. ) यह सोम ( अधि तोशने ) काले हिरण के चमरेपर कटा जाता है ॥१॥ [१२८७ ] ( दक्ष-साधनः स्वर्जित् एप: यल मगन सापनोंको और स्वर्ग सुष को जीतनेवाला यह सोम (इन्द्राय पायये । इन और वायुके लिए । पवित्रे परि पिच्यते । पलनीसे टपकता हुआ नीचे कलशमें गिरता है ॥२॥ {१२८८(दियः मूर्धा ) लोकका सिर । वृपा सुनः ) बलवान् और रतरूप ( विश्वाचित पप सोमः ) सर्व सोम बनेपु नृभिः नीयते) लकडोके यनिमें विजों द्वारा ले जाया जाता है ॥ ३ ॥ [१२८२(गन्युः हिरण्ययुः ) गौ दूधर्मे मिलाया जानेवाला, सोनका स्पर्श गिसमें होता है ऐसा ( इन्दुः सत्राजित् ) धमकानेवाला और जीतनेवाला (अस्वतः) अपराजित (पः पवमानः ) यह एट होनेवाला सोम (अचि. प्रवत् ) शम्द करता हुआ टपकता है ॥४॥ [१२९०11वृषा हरिः ) यल यानेवाला हरे रंगका ( पुनानः इन्दुः ) पवित्र होनेवाला और धमानेवाला (गुष्मी पपा ) सामर्यवान् यह सोम ( अन्तरिक्षे आसप्पदत् । लनोसे टपकता और (इन्द्रं आ ) इन्द्र के पास पहुचता है ।५॥ [१२९१] (देवारी अघशंसहा } देवोंका रक्षक और पारी शोका नाश करनेवाला ( अ-दाभ्या पुनानः ) नवयनेवाला और शाम होनेवाला (शुष्मी एषः अर्पति ) बलदान यह मोम कलशमें जाना है ॥ ६ ॥ । यहां पांचवां खण्ड समास हुआ ॥
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[ उत्साचिका
३२७१३
१२
३
३
[६]
१२९२ स सुतः पीतये पा सोमः पवित्र अर्पति । विपन्नवासि देवयुः ॥१॥ (ऋ९॥३७॥१)
१२९३ स पवित्र विचक्षणो हरिरपति वर्णसिः । अभि योनि कनिक्रदत् ॥२॥ (ऋ ९।३७२)
१२९४ सवाजी रोचनं दिवः पर्वमानो वि धावति । रक्षाहा वारमव्ययम् ॥ ३॥ (ऋ. ९॥३७॥३)
१२९५ स त्रितस्याधि सानवि पवमानो अगेचयत् । जामिभिः सूर्य सह ॥ ४ ॥( २।३७४)
१२९६ स चूनही वृपा सुनो परियाविददाम्पः । सोमो वामित्रासरत् ॥५॥ (ऋ ९३७१)
१२९७ स देवः कविनेपितोईऽभि द्रोणानि धावति । इन्दुरिन्द्राय महयन् ॥६॥ ७ (खे) ।।
[ धा० २१ । उ०२। स्व० ७ ] ऋ.९।३०१६)
२
१४
३
॥ इति षष्ठः खण्ड. ॥ ६॥
[७]
१२३१२
१२९८ यः पापमानारध्येत्पपिभिः संभृतरसम् ।
सर्वस पूतमश्नाति स्वदितं मातरिश्वना
२३
॥१॥ (ऋ. ९।६॥३१)
.
[६] पठः खण्डः।
६ १२९२ ] देययुः ) देयोको प्राप्त होनेवाला ( पीतये सुतः ) इनादि देवोंक पीने के लिए तय्यार किया गया
तथा ( वृषा) बल बढानेवाला (सः सोमः ) वह सोम (रक्षांसि निघ्नन् ) राक्षसोंका नाश करता हुआ (पवित्रे
अर्पति) छलनी से नीचे उतरता है॥ १ ॥
[१२९३ ] (विचक्षण हरिः) सबोंको देखने वाला, हरे रंगका ( धर्णप्तिः सः) सबोंको धारण करनेवाला यह
सोम ( पयित्रे) चलनीसे (कनिमदत् योनि अभि अर्पति ) शान करता हुआ कलशमें जाता है ॥ २ ॥
६१२९४ ] (याजी दिवः रोचनं ) बलवान्, हुलोकौ चमकनेवाला { रक्षोदा पवमानःमः ) राक्षसोका नाश
करनेवाला, शुद्ध होनेवाला वह सोम ( अव्ययं वारं विधावति ) बालोंको छलनीसे छाना जाता है ।। ३ ।
[१२९५] (स) वह सोम ( त्रितस्य अधि सानवि ) त्रितके महान् यज्ञमें (पवमानः) छाना जाता हुआ
(जामिभिः सह ) महान् तेजोंसे (मूर्य अरोचयत् । मूर्यको प्रकाशित करता है ॥ ४ ॥
[१२९६] ( वृत्रहा वृपा ) शत्रुको मारनेशाला बलवान् ( सुतः) रस निचोडने के बाद (परियोवित् ) धन
येनेवाला ( अदाभ्य सः सोमः ) न दवनेवाला वह सोम ( वाजं इव असरत् ) घोडेके समान कलशमें जाता है ॥ ५ ॥
[१२९७ ] (देवः इन्दुः सः) [ घुलोक ] प्रकाशित होनेवाला यह सोम ( कविना इपिता ) अध्वपके द्वारा
प्रेरित (इन्द्राय महयन् ) इन्द्रको महानता देकर (द्रोणानि भभि धावति ) कलशमें जाता है ।। ६॥
।। यहां छठा खण्ड समाप्त हुआ ॥
[७] सप्तमः खण्डः।
[१२९८] (यः) जो ( ऋषिभिः सम्भृतं रसं ऋषियों के द्वारा एकत्रित किए गर राका तथा (पायमानी)
पवमान मंत्रो। (अध्योते) अध्ययन करता है । (सः) यह (मातरिश्वना स्वदितं सर्व) वायुरे बारा वर्षे
हुए सारे (पूतं अनाति ) पवित्र मनरा भजप करता है ॥ १ ॥
दशम अध्याय) सामवेदका सुशंध मनुवाद (१९७) 3 3.३३ १२ ३१ 31 ॥ ३३ १२९९ पायमानीयों अध्येत्यपिभिः संभृतरसम् । तस्मे सरस्वती दुहे क्षीर सर्विमेघदकम् ॥२॥ (३.९६७३२) १३०० पैमानीः स्वस्त्ययनीः सुदुघा हि घृतश्चुता । पिमिः संभृतो रसो बामणेप्रमृतरहितम् १३०१ पारमानार्दधन्तु न इम लोकमथो अमुम् । कामासमर्धयन्तु नो देवीदेवः समाहृताः १३०२ येन देवा पवित्रेणात्मानं पुनते सदा । तेन सहस्रधारेण पायमानीः पुनन्तु नः ॥५॥ १३०३ पायमानीः स्वस्त्ययनास्तामिर्गच्छति नान्दनम् । पुण्याइव भक्षान्मक्षयत्यमृतत्वं च गच्छति ॥६॥८ (ती)॥ [पा०४४ । उ०१ । स०४] ३२३२ ॥४॥ ३१ ३. २ ॥ इति सप्तमः खण्डः ॥७॥ [१२९९J (य: ऋषिभिः संभृतं गम ) जो ऋषियों द्वारा एकत्र किए गए साररूपी (पावमानीः अध्येति) शुद्ध करनेवाले मत्रोंका अध्ययन करता है, ( तस्मे सरस्वती ! उसे विद्यादेयो ( क्षीरं सर्पिः मधु उदकं दुहे ) दूध, पो, नाहर और पानी देती है ॥२॥ १३०० ] ( पायमानी । शुस करनेवाले ( स्वस्त्ययनी ) कल्याण करनेवाले (सु-दुघा ) उत्तम फल देनेवाले (पृतश्चुतः ) घीको वृष्टि करनेवाले में मय (दि कापभिः संभृतः रसः ) ऋषियों के द्वारा एस्त्र किए गये सारदप है।( ब्राह्मणेपु अमृतं हितं वेदपाठी ब्राह्मणोंमें मानों यह अमृत ही रख दिया है ॥ ३ ॥ [१३०१] (देवै समाहृताः पायमानीः देवीः ) देयो द्वारा तैयार की गई पवित्रता करनेवाली यह देवताहपी ऋचा (ना) हमें । हम अथो अमुं लोकं ) इस और उरा लोकको ( दधन्तु ) देवें । और उस लोकमें (नः कामान् समर्थ यन्तु ) हमारा मनोरप सफल करें ॥ ४॥ [.१३०२ ] (देगाः । देव (येन पवित्रण ) जिस पवित्र साधनसे ( सदा आत्मानं पुनते) हमेशा अपनेको पवित्र करते है। (तेन सहयधारेण ) उन हजारों तहो साधनोंसे ( पारमानी न पुनरंतु ) पवित्र करनेवाली पह ऋचायें हमें पवित्र करें ॥५॥ [१३०३ ] (पायमानी ) पवित्र करनेवाली और ( स्वस्ययनीः ) सत्याप करनेवालो जो ऋचार्य है (ताभिः नान्दने गच्छति ) उनके सहयोगी मनुष्यको आनन्दपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। यह (पुण्यान् मसान् च भक्षयति ) पवित्र भन्न साता है (अमृतत्यं गच्छति) और अमरत्वको प्राप्त होता है।" ॥ यहां सातवा खण्ट समास हुमा।
( १९८)
सामवेदका सुराध अनुवाद
[ उत्तपत्रिका
१२
73
३२
"
२
३१३"
२
-
३३१३१
[८]
१३०४ अगन्म महा नमसा यविष्ठ यो दीदाय समिद्धः स्व दुरोणे ।
चित्रमानुर रोदसी अन्तरुनी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम् ॥१॥ (ऋ. ७/१२)
१३०५ स महा विश्वा दुरितानि साहाननिः एवे दम आ जातवेदाः ।
स नो रक्षिषदुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोना ॥२॥ ( ७१२)
१३०६ त्वं वरुण उत मित्रो अमे त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः ।
त्वे वसु सुपणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिमिः सदा नः ॥३॥ ९ (ही)
[धा० २१ । उ० नास्ति । स०४] (ऋ.७१२१३)
१३०७ महार इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाइव । स्तोमर्वत्सस्य वावृधे ।। १ ।। (ऋ ८६।१ )
१३०८ कण्वा इन्द्र पदक्रत स्तोमर्यज्ञस्य साधनम् । जामि भुवत आयुधा ॥२॥(ऋ ८६५)
.
373"
३१ ३
१
२
२
[८] अष्टमः सण्डः ।
[१३०४ ] ( या स्वे दुरोणे ) जो अपने पास्थानमें (समिद दीदाय ) अग्निको उत्तम रीतिसे प्रदीप्त करता
है । उस ( यविष्र्ट) तरण ( ऊस रोदसी अन्तः चित्रमा ) इस विशाल पावापृथिवीरे बोधर्म विशेष प्राशमान
(स्थाहुत ) उत्तम रीतिसे माहुति दिये गये ( विश्वता प्रत्यचं ) सर्वत्र गमन करपाले अग्निके पास (महा नमसा
भगन्म ) हम महान् नमस्कार करते हुए जाते है
[१३०५ ] ( महा ) अपने महान् प्रभादसे । विश्वा दुरितानि सादान ) सम पापोंको दूर करनेवाला (जात.
पेशा सामाग्नि ) II प्रसार करनेवासा अग्नि ( दमे मा स्तये ) पाशाला में प्रशसित होता है, ( मा गृणताना)
यह स्तुति करनेवाले हमें (दुरितास् अयद्यात् रक्षिपत् ) पापोसे मोर निन्दित पौम सुरक्षित रखता है, ( उत मघोनः
आलान् । और हविको पासमें रपनेवाले हमारा रक्षण करता है ॥२॥
[१५०६ ] है ( भने आने ! (त्य यरुण उत मित्रः सूयम और मित्र है। (यमिष्ठात्यां मतिमि
पन्ति ) जिनेगिए रवि गे परिपूर्वक हो गई स्तुतिशत संवपित रते है, (स्ये पसु ) तेरे पास जो 'पन हरे
(मुषणनानि सन्तु ) हमारे द्वारा योगाने योग्य हो। ( यूय } दुम (न हमें ( सदा स्पस्तिभिः पात) हमेगा
पायानेपाने सापनोंमे सुरक्षित रो॥
[१३०] (यात्रा) जो इन (पृष्टिमान् पर्जन्याय वृष्टि ररनेवाले मेपरे समान ( तेजमा महान )
भारने हे प्रमे महान है, यह एण ( परमम्प स्तोमे यावृधे वमो रतोगि याता है, माता ॥
१३०८] ( ब (पपया मोने {E IN (स्तोम याम्य माधन मात) तोत्रोरे
पारा सार बनाया, तर(भायुधा जामि पुवत) मापुष-पम-
जागरण रक्षा नहीं ऐमा लोग पाइने लगे ॥२॥
शम अध्याय ] सामधेवघा सुबोध मनुवाद १२ ३ . 30 १ 3 .... 3. १३०९ प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्धान्त बद्धयः । विप्रा प्रत्तस्प वाहसा ॥३॥ १० (टि)। [ धा० ८ । उ०।०३] ( ०६२ । ॥इरयष्टम. सण्डः ॥4॥ [१] १३१० पवमानस्य जिनती हरेश्चन्द्रा अमृक्षत । जीरा अजिरयोचियः ॥१॥ (ऋ. ९६६।२५ ) १३११ पवमानो रथीतमा शुभि शुभ्रशस्तमा । हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः ॥ २ ॥(ऋ. ९।१६।२६ ) १३१२ पवमान ज्यानुहि रश्मिभिर्वाजसातमा । दक्षरस्तोत्रे सुवीर्यम् ॥३॥११ (६)॥ [२० ११ । उ० नास्ति स्व० १] (२.९।६६।२७) १३१३ पाती पिश्चता सुतर सोमो य उत्तम हविः । दधन्वा यो नयाँ अप्स्वन्तरा सुपाय सोममद्रिभिः (ऋ ९।१०।१) . १३१४ नं पुनानोऽविमिः परि वादग्धः सुरमितरः । सुते चित्वाप्सु मदामो अंधसा श्रीणन्ता गोभिरुत्तरम् 1॥२॥ (९।१०७२) [१३०९] (यत् ) जव ( पिप्रतः वह्नयः ) आकाशको अपने धेगसे भरनेवाले वाहनरूपी घोडे, (मतस्य प्रजा ) यश में जाने के लिए तैयार हुए इए इन्द्रको (प्र भरत ) बेगसे लेकर जाते है, तब (विशा) ऋस्विज (प्रातस्य चाइसा) यज्ञको प्रेरणा देनेवाले स्तोत्रों से उसको स्तुति करने लगते है ॥ ३ ॥ ॥ यहां आठवां खण्ड समाप्त हुआ। [९] नवमः खण्डः। [१३] (जिन्नतः शत्रुका नाश करनेवाले (हरे अजिरशोचिषः ) हरे रगके और सब जगह अपना सेज फैलानेवाले ( पयमानस्य ) छाने जानेवाले सोमको ( चन्द्रा जीयः असूक्षत ) तेजस्वी पारा महने लगी है ॥१॥ [१३११ ] ( रथीतमः ) उत्तम रयमें अंदने वाला, (शुभ्रेभिः शुभशस्तमः ) अपने तेनरो अधिक तेजायो (हरिः चन्द्रः हरे रसके. देउवाला (महारः पवमानः } मतको सहायता प्राप्त करनेमा सपर पाना हा यह सोम है"२॥ । १३१२] हे (पवमान ) शुद्ध होनेवाले सोम! ( वाजमातमा ) बहुत अन्न और बल देनेपासात (स्तोत्रे सुवीर्य दधत् ) स्तुति करनेवालेको उत्तम योरपुत्र अपवा उत्तम पराकम करनेका सामण्यं देता है ॥ ३ ॥ [१३१३] ( यः सोम.) सोम ( उत्तम हविः ) उत्तम हविरूप है और (य नर्यः आ ) जो मानयोको हित करनेवाला है यह ( असु अन्तः दधन्वान ) पानी में मिलाया जाता है । (सोमः अद्रिभिः सुपाय ) उस सोमको सवर्पओने पत्यरोसे कटकर उसका रस निकाला है । उस ( सुतं ) सोमरसको (इतः परि पिंचत) यहाँसे ऊपर लाकर साँचो॥१॥ [१३१४ ] हे सोम ! (म-दन्धः ) न दबनेवाला ( सुरभिन्तः) अत्यन्त समर्थित नूनं पुनान ) अप शुर होता हुआ (अविभिः परित्रवाद पालोकी छलनीसे छन्ता जा । (मुते चित् । छननेके बाद (मन्धसा गोभिः श्रीणत ) अन्न और गौदुग्यसे मिलाकर ! उत्तरं धतु त्या मदामः ) फिर तुदो पानीमें मिलाकर प्रसन्न करते है |
(२००)
सामवेदया सुमेध भनुवार
[उनरानिक
3
३३
र
१७५१
३२
२
३२३".
१३१५ परि स्वानश्वक्षमे देवमादाः ऋतुरिन्दुविचक्षणः ॥३॥ १२ (खा)॥
[धा०१६ । उ०२ । २७ ] ( ९।१०७।३)
१३१६ अमावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेय दस्मो अभि गा अचिक्रदत् ।
पुनानो वारमत्येष्यव्यय पेनो न योनि घृतवन्तमासदत ॥१॥ ( ९८२।१)
१३१७ पर्जन्यः पिता महिपस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिपु क्षयं दधे ।
स्वसार आपो अभि
गा उदासरन्सं नाव भिर्वमते पीते अध्वरे
॥२॥ (ऋ ९।८।)
१३१८ कविधस्या पर्यपि माहिनमत्यो न मृष्टो अभि वाजमर्पसि ।
अपसेधन दुरिता सौम नो मुड घृता वसानः परि यासि निर्णिजम् ॥३॥ १३ (गू) ।
[ धा० २६ । उ. ३ । २०६] (. ९८२१२)
॥ इति नयम. सन्॥९॥
[१०]
१३१९ श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत ।
वसूनि जातो जनिमायोजसा प्रति मागे न दौधिमः
॥१॥ (ऋ. १९९।३)
१३१५ ] ( देवमादनः क्रतुः ) देयोंको मानन्द देनेयाले परका साधन (इन्दुः विचक्षणः) तेजस्वी और
शानी ( स्थानः) सोम ( चक्षसे परि) सबका निरीक्षण करनेके लिए कलशमें उतरे ॥ ३ ॥
[१३१६] ( भरपः धृपा ) तेजस्यो और बल बढानेवाला (हरिः सोमः असावि ) हरे रगका सोम पर
किया है, यह ( राजा इय दस्मः) रामा समान दर्शनीय है। ( गाः अभि अचिक्रदत् । गायोंको देखकर शाम करने
साता है, गापके दूध में मिलने के बाद शाम करता है तथा (पुनानः भन्ययं यारं भत्येषि) पवित्र होनेवाला यह सोम भेगो
बालों को पलनीसे छाना भाता है। (श्येनान ) याम पक्षोके समान (नवन्तं योनि भासदत् । पानीसे भरे हुए
पसेमें जापर पहुचता है॥१॥
१७] (महिपस्य पणिनः पर्जन्यः पिता ) बरे वो पतवाले सोमका उत्पन्न करनेवाला पर्जन्य- मेघ है।
बाह ( पृयिायाः नामा गिरिपु क्षयं दधे)पियोके नाभिस्यान में रहनेवाले पर्वतों में निवासस्थान बनाता है। (स्वसार:
भाषा गाः ) अंगुलियां, जल और गायें (अभि उदासरन् ) उसके सामने आती है, (बीते अपरे) श्रेष्ठ यो
(प्रायमिः सं चमते) पापरकि साय वह मिलकर रहता है ॥२॥
[१३१८] है। सोम) सोम ! (कवि) यह मानी सोम (येधस्या माहिन पर्येपि ) यश करनेको यारो एलनी
पर माता है (मृष्टः) गुर करने के भाव ( अत्यान) पोरके समान ( याज भायर्षसि ) सप्राममें जाता है । हे सोम ।
(दुरिता भपसेपन ) पापोको दूर करते हए (नामृष्ट हमें पुक्षी कर । (पृता पसानः निणि परि यासि )
बलम मिपरेवार इसनीम वाता है ! ३॥
॥ यहां नायां सण्ड समात हुआ।
[१० दशम सण्डः।
[ १३१९] हे पुरषो। थायग्नः सूर्य इय) मूर्यके मात्रयगे रहनेवाली रिणे जिगप्रकार पूर्या मापार सेतो
है, गो (भ्यिा त्न्दस्य भक्षन) सम धन इन्द्र के मात्रयमे रहते हैं । ( जाता) प्रमट हुमा हुमा
(पनि मोजमा जनिमानि । जिन पोंगे अपने गामध्यमे प्रस्ट पाता है उन धर्नार (मागं न प्रनि दीधिमा)
भागरोहम पितामे प्राप्त होनेरे सपान भारतले ॥१॥
पशम अध्याप] सामघेका सुयोध मनुवाद (२०१) ३ २४ 11 3 - . ३१ . ३४ १ "2 १९ १ ११ १३२० अलपिराति वसुदामुप स्तुहि मद्रा इन्द्रस्य रातया । यो अस्य कामं विधता न रोपति मनो दानाय चोदयन ॥२॥१४ (लू)। [षा १२ । ७० नास्ति । २०६] (ऋ९९४) १३२१ पत इन्द्र भयामह तसो नो अमयं कृषि। मघवन् छन्धि तव तन्त्र ऊतये वि द्विपो वि मृधौ जहि ॥१॥( ८६१।११) १३२२ वरहि राघसस्पते राधसो महा क्षयस्यासि विधा त त्या वयं मघवनिन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे ॥२॥१५ (या)॥ [घा० २०१3०३१ स्व.२] ( . ०६१४१५) ॥ इति वशमा सड, ॥१०॥ [११] १३२३ वर सोमासि धारयुमन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे । पवस्व मध्यदयिः॥१॥' ९।६७।१ ) १३२४ स्वर सुने मदिन्तमो दधन्वान्मत्सरिन्तमा । इन्दुः सत्राजिदस्तृतः ॥२॥ ९।६७२) ६१३२०] ( अलर्विशति परतुदो उप स्तुहि ) निष्पाप पुरुषों को और भक्तोंको पन देनेवाले इन्द्रको स्तुति कर। क्योकि (इन्द्रस्य रातयः भद्राः) इन्द्र के वान कल्याणकारी होते है। ( यःमन. दानाय चोदयन् ) जोइन्द्र अपने मनको बान देने के लिए प्रेरित करता है ( विधतः अस्य कामं न रोपति) वह उपासना करनेवाले इस यजमानको इच्छा नष्ट नहीं करता ॥२॥ १३२१7 हे (इन्द्र) इन्द्र ! (यतः भयामहे ) निन दृष्टोसे हम डरते है (तता नः समयं कृधि ) उनसे हमें निर्भप कर रहे (मघवन् ) धनवान् ! (नः तत् तप ऊतये शन्धि ) उस अपने रक्षणसे सुरक्षित करने के लिए तू समर्थ हो । (हिषः विजहि / द्वेष करनेवालोंका परामय कर तथा { भृधः वि) हमारे शत्रु को हरा॥१॥ [१३२२ ] हे ( राघसस्पते) पनपते इन्द्र ! (त्वं हि ) तूही ( महा राघसाक्षयस्य ) महान धनके स्थानका (विधा मसि ) विशेष रोतिसे धारण करनेवाला है । हे (गिर्वणः ) स्तुत्य और (मघयन इन्द्र) धनवान् इन्द्र (तं स्या) उस मुझे ( सुतावन्तः वयं हवामहे ) सोमपत करनेवाले हम बुलाते हैं ॥ २ ॥ ॥ यहां दसयां खण्ड समाप्त हुया॥ [११] एकादशः खण्डः। [१३२३] है (सोम) सोम! (मन्द्रः ओजिष्ठः) मानव यवानेवाला और पहत सामग्यवाला तू (अध्वरे धारयुः मसि) हिंसारहित मा सोमरसको पारासे मुक्त होकर रहता है। इसलिए ( मंहयर रथिः त्वं पयस्थ) धन देनेवाला शुम हो ॥१॥ ८ १३२४ हे सोम ! (सुतः निघोजा गया (वं मदिन्तम ) दूसरयन्त मानन्द बढानेवाला ( दधन्वान्) यज्ञको धारण करनेवाला (मत्सरितमः इन्दुः) परम उत्साह बढानेवाला और धमकनेवाला (सत्राजित् प्रस्तुतः) सब शत्रुओंको मोतनपाला और पराजित न होनेवाला है ॥ २॥ २६ [साम हिन्दी भा.२] 1
(२०२)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराचिंका
१
९९३
३३"
३१२
२
१३२५ वसुबाणो अद्रिभिरम्यर्थ कनिकदद । घुमन्त गुम्ममा मर ॥ ३॥ १६ (ली) ॥
[धा० १४ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] ( . ९६७३)
१३२६ पवस्व देववीतय इन्दो धारामिरोजसा । आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदा ॥ १ ॥
(ऋ. १।१०६७)
१३२७ तव द्रप्सा उदगुत इन्द्र मदाप वावृधुः । त्या देवासो अमृताय कं पपुः ॥२॥
(3. ९/१०६८)
१३२८ आ ना सुवास इन्दवः पुनाना धावता रपिम् ।
वृष्टियानो रीत्यापा स्वर्विदः
॥३।। १७ (वौ)॥
[घा० १५ । उ० नास्ति । ख. नास्ति ] ( ९।१०६९)
१३२९ परि त्यरहर्यत रहरि पद्म पुनन्ति वारेण ।
यो देवान्विश्वार इत्परि मदन सह गच्छति
॥१॥ ( ९।९८७)
१३३० द्विप पश्च स्वयशसरसखायो अद्रिसरहतम् ।
प्रियमिन्द्रस्य काम्यं प्रस्नापपन्त
कर्मया
।। २।। (ऋ. १९८६)
3
१४.
.
[१३२५] हे सोम ! (मद्रिभिः सुप्याण त्य) परपरोसे कूटकर रस निकाला गपासू (कनिमदत् सम्पर्ष)
पार करता हुआ रसपाने जा । (घुमन्तं शुष्मं आमर) तेजस्वी सामH हमें दे ॥ ३ ॥
[ १३२६ ] है (इन्दो) सोम ! ( देवयीतये ) देवोंको देने के लिए (योजसा धाराभिः पयस्य ) वेगरी धार
अपार छनता जाहे ( सोम) सोम! (मधुमान् ) ) मोगा त (नः कलशं आ सदा)हमारे कलशम भाकर रह ॥१॥
[११२७ ] (उदभुतः तप द्रप्सा') पानी के साप मिसनेवाले हेरे रस (मदाय इन्द्रं यावृधुः) भानायके
लिए वरा या यशाते है । बादमें (देयासः कं या अमृताय पपुः ) रेवगण मुलस्वरूप तुमे अमर होने के लिए
पोते है.२॥
[१३२८१ (पृष्टि-पापः) सोरसे दृष्टि रानेवाले (चा-पिदः) स्वर्गरोजाननेवाले (रीत्यापा सुतासा)
पम्पोपर पानीको वृष्टिरनेवाले ये मोमरस (पुनाना इन्दयः) स्वच्छ होनेवाले और तेजस्वी है। है सोमरसो । तुम
(न.रपि मा पायत) हमें धन प्राप्त हो ऐसा करो ॥३॥
[१२२१(दर्यतं दरि) पूग्य मोर पाप करनेवाले (पभ्र रयं ) उ भूरे रंगरे गोमको (पारेण परि
पुनम्ति ) प्रसनो धानकर शुद्ध करते है। (यायिभ्यान देयान् ) जो सब रेयोप पास (मन सात) मानमरारक
गोरे साप (परि गच्छति) माता है ।
[१३३०३ (दिपंच सतापा) रस मंगुमिपा ( स्वयशसं अद्विमहतं) पर्व पात्यो मोर पापरसिरे गए
(एस्प प्रिय पाम्यं 4)रो प्रिय भौराट ऐगे मिस सोमरो (ऊमया) मोर हारा (मस्नापपरते) नान
बाली है ॥२॥
दशम मायाय] सामयेइका सुयोध भनुयाद (२०३) २ 3 १३३१ इन्द्राय सोम पानने प्रने परि पिच्यसे । नो च दक्षिणावते वीराय सदनासदे ॥३॥ १८ (जी)॥ [धा० २२ । ३०३।स्व०१] (ऋ. ९१९८१०) १३३२ पक्रस सोम है दायाचो न निको बाजी माय ॥१॥ (३.९१०९।१०) १३३३ प्र ते सोता रस मदाय पुनन्ति सोम महे घुम्नाय ॥२॥ (ऋ ९१०९।११) १३३४ जिशान रहार मृजन्ति पवित्र सोमं देवैम्प इन्दुश् ॥३॥ १९ (का)॥ [धा० ११ । उ० । स्व०२J (ऋ. १०९।११) १३३५ उपो जातमातरं गोमिभङ्ग परिष्कृतम् । इन्दं देवा अयासिपुः ॥१॥ ( . ९।६।१३) १३३६ तमिद्वर्धन्तु नो गिरो बस रस शिश्वरीरित्र । य इन्द्रस्य हृदर सनि। ॥२॥ (ऋ९।६।१४) १३३७ अओ ना सोम शं गरे पक्षस्व पियुषीमिषम् । वर्षा समुद्रमुक्थ्य ॥ ३ ॥ २० (ही) । [घा० १३ 1 उ० नास्ति । स्व० ४ ] ( ९५६१५१५ ) ॥ इति एकादश खण्ड ॥११॥ 3313 ३३१ 10 . . a.३ ११३३१ 7 है (सोम) सोम 1 (वृत्रने इन्द्राय पातवे ) को मारनेवाले इनको देनेके किए (दक्षिणा- पते पाराय) पशम रक्षिणा देनेपाल पोरके लिए मौर (सदना-सदे नरे) पक्षमें बैठनेवाले यजमानके लिए (परि- पिज्यसे) कलामें टपकता है ॥ ३॥ [१३३२ ] हे (सोम ) सोम ! (सध्यान ) पोरके समान (निषतः ) धोकर शुद्ध किया गया (याजी) वेगवान् तू (महे दक्षाय धनाय पयर) शवरो हरानेवाली शक्ति, मल और धनके लिए शुरु हो ॥१॥ १३३३ ) हे सोम । ( सोतारः) रस निकालनेवाले ऋत्विज ( ते रसं ) तेरे रसको (मदाय पुनन्ति ) आनन्द प्राप्तिके लिए शुद्ध करते हैं, तथा (महे घुम्नाय सोम ) महान् तेजस्वी सोमरसोंको छानते है ॥ २॥ [ १३३४ 1 (शिशु जशाने ) नये पैदा हुए बच्चेको जसे शुद्ध करते है उसीप्रकार ऋदिगण (देवेभ्यः ) देवोंको देने के लिए (हरि इन्दु सोम) हरे रसके धमकनेवाले सोमको (पधिने मृजन्ति ) छलनीसे शुद्ध करते हैं ॥३॥ [१३३५] (जातं आप्तुर ) तयार हुए हुए तथा पानी में मिलाये गए ( मंग) शत्रुका नाश करनेवाले (गोभि' सुपरिष्कृतं ) गापके दूपमें मिलाये गए ( इन्दं देवाः उप अयासिपु।) सोमरसको देय प्राप्त करते है ॥ १॥ [१३६] (यःन्द्रस्य हृदं सनिः ) जो इन्द्र के हुक्पका श्रेष्ठ सेवक है (तं इव ना गिरः सं वर्धन्तु ऐसे उस सोमका वर्णन हमारी वाणी उत्तम रोतते रे। (वरसं शिश्वरीय) निमप्रकार यालरको उसको माता प्रहाती है, सीमकार हमारी पाणी सोमके यशको पदावे ॥ २॥ १३३७ 1 हे सोम! (मः गयेश अर्प) हमारो गायोंके सुखके लिए लाने का । (पिप्युपी इप धुक्ष. सपीष्टिक अन्न हमें भरपूर दे । है ( उपथ्य ) स्तुत्य सोम 1 (समुद्रं वर्ध) कलशम पानीको बढा ॥ ३ ॥ ॥ यहां ग्यारह खण्ड समात हुआ ।
(२०४) सामवेदका सुयोध अनुवाद ( उत्तरार्चि ३ 9 १३१ २३१ ३२. ३ [१२] १३३८ आ या ये अमिमिन्यते स्तृणन्ति पहिरानुपक् । येपामिन्द्रो युवा सखा ॥१॥ (81811) १३३९ हनिदिध्म एपा भूरि शख पृथुः स्वहो । यपामिन्द्रो युवा सखा ।।२।। (ऋ. ८१४५३२) १३४० अयुद्ध युधा वृतर शूर आजति सत्वभिः । येपामिन्द्रो युवा सखा ॥३॥२१ (8) ।। [धा०३ । उ०२। स्त्र.१] (.८1११।३) १३४१ य एक इदिदयते वसु माय दाशुपे । ईशानो अप्रतिप्कृत इन्द्रो अङ्ग ॥ १ ॥ (8. १८४७) १३४२ ययिदि त्वा बहुम्य आ सुतावा माविवासति । उग्न तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग ॥२॥ (ऋ १८९) १३४३ कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत् । कदा ना शुश्रवद्रि इन्द्रो अज ।। ३ ॥ २२ (कि)॥ [धा० ११ । उ० १ । स्व० ३ (शु. ११८५८) ... [१२] दादापण्डः। [१३३८ ](ये जो ऋषि ( आ घा) सामने बैठपा (अग्निं यते ) अग्निरो प्रदीप्त करते है । ( युवा पद येषां ससा) ताण इन मिना मित्र है, वे ( आनुपर् यहि स्वणन्ति ) कमसे देषोंके लिए भारसन फैलाते ९ ॥१॥ [१३३९] (युवा द्रा येषां सखा ) तयण जिनरा मित्र है ऐसे ( एषां नमः पृहत् रस्) न अपियोरी समिया बहुत है । (शत्रं भूरि) मोत्र भी बहतर (स्यकः पृथुः) प्र भी गो.गा है।॥२॥ [१३४० ] (युया इन्दः येषां सखा ) तण जिसका मित्र है, ह (भयुद्धः इत् ) पुरा करने रस हर भी (युधा वृतं ) पोशासि पुरत मो(सत्यमिाण) भरने वाली सहायता से शूरवीर होने प (मामति) हराना है। [१३५] (प.पमा इत्) को अरेसा हो हा (दाशुषे माप पसु घिदयते) पान रेनेवाले मागरमो पर देता है, वह ( मप्रतिशतमलापमित न होनेवाला (अंगईशाना) उसोममय इस सम मात्रा स्वामी होता है.. [१३४२ ] (पाटुम्यः यः चित् हि) मनुष्यों से हो परमान ( सुताशान ) सोमाण करणे (त्या) तेरी (मा पिपामति) मारापना परता है, (सत् । स (मः) ( उमं सपा ) Vल ( भंग भापरयते) परमानना॥२॥ [१४](E)य (पदा(म-आपसं मतं) पानेवाले मध्यरो (पाशुपत्य) रोग निरोरो पाते . मगर ( स्शुग ) मए करेगा ? है (भंग) निय! (न.गिरा पता शुभवा हमारी भूमिगत दशम अध्याय] सामनेदका सुर्याधे अनुवाद (२०५) १२.३ ३ ma. २४ . १३४४ गायन्ति वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमणिः । ब्रह्माणस्त्वा शतकात उदरशमिव येमिरे ॥ १ ॥ (ऋ ११११) १३४५ यत्सानो सान्चारुहो भर्यस्पष्ट कर्वम् । तदिन्द्रो अर्थ चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥२॥ (१२) १३४६ युवा हि कैशिना हरी वृषणा कक्ष्यमा । अधा न इन्द्र सोमपा गिरामपश्रुति चर ॥ ३ ॥ २३ (पी)॥ धा० २२ । उ०३ । स्व०४ ] (* १११०१३) ॥ इति द्वादश सड ॥१२॥ ॥ इति पञ्समप्रपाठके द्वितीयोऽधं ॥२॥ पञ्चमप्रपाठकरच समाप्त |॥५॥ ॥ इति दशमोऽध्याय ॥१०॥ [१३४४ ] हे ( शतक्रतो ) सकयों कर्म करनेवाले इन्द्र । (गायत्रिण त्या गायन्ति ) उद्गाता तेरो स्तुतिका गान करते हैं। ( अणिः अर्के अर्चन्ति ) अर्चना करनेवाले पूजनीय इन्त्रको अर्चना करते हैं । (प्रमाण. स्वा) अन्य ऋत्विज भी तेरी महिमा गाते हैं। लोग ( वंश इय) जिसप्रकार घाँसको ऊपर उठाते हैं, उसीप्रकार तेरा महत्व वर्णन करके तुझो ( उत् येमिरे) उठाते है ॥ १ ॥ [१३४५] (यत् । जब यजमान (सानोः सानु मारुहः) समिमा मादि लाने के लिए पहाडको घोटीपर पता है, तब यह (भूरि पर अस्पष्ट) यहुत प्रयत्न करता है। (तस् इन्द्र ) उस समय इन्द्र (अर्थ चेतति ) यजमानका उद्देश्य जानता है और (पृष्णि यूथेन ) मनोरपको पुष्टि करनेवाला यह इन्द्र देवों के साथ पराभूमिमें ( पजति) आता है॥२॥ [ १३४६१ (सोमपा ) सोम पौनेवाला इन्द (फेशिना पृषणा ) उसम अपालवाले, बलवान् (कक्ष्या दरी पुष्ट शारीरवाले अपने घोडौंको । युश्व हि ) अवश्य मोडता है । ( अथ ) बाबमें है (इन्द्र) इन्द्र ! (नः गिरी उपभूति चर)हमारी स्तुति सुनने के लिए पास ॥३॥ । यहां यारहवां खण्ड समाप्त हुभा ॥ ॥ इनि दशमोऽध्यायः॥ दशम अध्याय स्फुरत् । १३४३]- कब, पावोंसे पूतोंको रोइनके इस दशम अध्याय सोमका वर्णन, विशेष रूपसे है। पर समान, कमूसान न देनेवाले मनुष्यको रोंदेगा? उसके साथ अन्य देवोंदा भी वर्णन है। उनमे से इन्द्र देवताका उदार मनुष्प हो समाजमें रहें। मनुवार मनुष्य समाजको वर्णन अपम देखिए- परेशान करता है। यह भाव पहा है। १ इन्द्रः कदा म-राधसं मत, पदा क्षुम्प इय, २न्द्र उप्र शव भापत्यते । १३४२]- इसस (२०६) सामवेदफा सुग्रोध अनुवाद 1 उत्तरार्चिकः परता। पल देता है। यह पत्र अपने उपासवोरोयलवार यनाता है। इन्द्रका सोम पीना ३ इन्द्र ओजमा महान् [ १३०५]- इन्द्र अपने १ शूरः एपः भण्-या इन्द्रस्य निरुतं आशुभिः जमे महान है। रथेभि. धिया याति १२६६]- यह शूर सोम अगुलियप्ति ४ विश्वातन्द्रस्यभक्षत [१३१९]- सय प्रकारचे दवाकर निकालने के बाद इन्द्र के स्थानो पास दोन जानेपाले धन निश्चयमे इन्द्र के आश्रयसे रहते है। रयसे युद्धिपूर्वव जाता है। ५ जात. भोजसा वामनि जनिमानि [१३१९]- पहले सोमको फूटते है, गादमें अगुलियोंसे रमाकर उसका इन उत्पन्न होते ही अपनी शाक्तिमे सब पन उत्पन्न भरता है। रस निकालते हैं, फिर उरो इन्द्र के रहने के पानपर ले जाते ६ अलपिराति यसुदा उप स्तुहि । इन्द्रस्य रातयः है। उसका रपसे जाना मालपारिक है। भद्रा-(१३२०]-पापरहित तयादान परनेवाले पुरुषोंको धन २ इन्द्राय पातये नितस्य योपणः हरि इन्दु अदि. देनेवाले इसी स्तुति करो। इन्द्र दान पत्याग करनेवाले हैं। भिहिन्यन्ति [ १२७५ 1- इन्द्रको सोमरस बनेरे लिए ७ य मन. दानाय चोदयन् , विधतः अस्य काम न त्रित ऋपिरो भगुलियां इस हरे गये सोमको परघरोंसे रोपति । १३२० ] - जो इन्द अपो मनशो दान देनेरे लिए फूटती है। प्रेरित करता है तथा जो दान देनेवालेको इच्छाका नष्ट नहीं ३ वृपा हरि पुनान इन्दुः हामी एपः अन्तरिक्ष इन्द्रं था असिष्यदत् [ १२९० - यस सडानेवाला, हरे ८ दे रन्ट ! यत. भयामहे तत न अभय एधि रगया गुट होनेवाला और धमरनेवाला यह सोम पलनीसे ११३२१] - है इन्द्र ! जहांगे हमें भय हो यहाँमे हमें निर्भयकर। होकर इन्द्रके पास पहुचता है। ९नाता तत् ऊतये शाग्धिा द्विप विशाह । मृधा ४ देया इन्दु, पशिना पितः, इन्द्राप महयन्। वि{१३२१]- मैं अपने संस्थानों में सुरक्षित करने में समर्थ द्रोणानि अभि धापति [१२९७]- (पलोरसे ) प्रराशित है। टेप करने वालोंको हरा और हिंसक ओंको दूर कर। होनेवाला यह सोम विके द्वारा प्ररित होने पार पारी १० पत् परन् स्तोम' यमस्य साधन अप्रत। महत्व देकर क्लामें जाता है। भायुधा जामि गुयत [ १३०८]- जब पनि इन्द्रको ५ उदान तय ट्रप्सः मदाय न्दं घावृधुः हलोत्रवि बारा परा साधन पनापा, तय सरबति उपयोग [१३२७)- पानोरे साप मिन्नेवाले सेरे एरा भानावरे परनेरासरण महीं बघा, ऐसा लोग यहां लगे । इतनी लिए इसका या पाते हैं। पाति स्थापित हो मारित्रोंमे सम्जेरा कोई कारण होगही पवा ऐसा सोर्गोरो प्रतीत हुआ। ६ देयासः फ रयां अमृताय पपु [१३२७ ]-रप- गण आन द रेमेषाने तुम सोमरसको अमरता प्राप्त करने के १५ राघस. पते ! रय माह. राधसः यस्य लिए पोरों है। विषमति [१३२२]-हे पनपने प्रियगे ७ पृषप्ने दक्षिणायने इन्द्राय पानये सदनासद इमरान पॉमन मोर मापत स्वामी है। दो पास नरे परिपिच्यमे [ १३३१]- परो मारने वाले तपा बहुत सारे पन भीर मौर बनने पर भो। रान देनेपाले रे पोरे लिए मौरमा मापदर १२ ये युपा हा सारा, नरः अयुरः इत् पगमारे लिए पर सोगरस ना नाता है। युपा पृतं सायमि: माजी १४० - निरामित्र. इसप्रकार रोपीने तिर मोमरण रेमेलवर्गम है। जण है, हर पुरसगन होने प भी योपागि पुरो मरने गामध्यराते हैं। সাদ १३ या वागुरे गाय चमु पिटगो। मग्नि विषपर मत्र भी पोरंग रग मप्पाप है- प्रविणतामान - मो मे पुरोने या ममिका दीदाय, पयि उपा MR शो मनुरी पर रंगा, ऐमान एगमा गंदगी प्रात: चित्रमा म्पादयिताप्रपंच महा मिर मरारि मममा अगम्म!11.४]- मात्र पान मसानको Tोरो मार गिराना- गाम निगे प्रोजरिया नाt, न हरण, form दशम अध्याय] सामवेदफा सुबोध अनुवाद (२०७) पास प्रलोक और एग्योतोको धोनमें विशेष प्रशसामरन्, उत्तम नाद करनेवाला तमा न बनेवाग यह सोम हाना जाता है। रोतिरो दी गई आहुतिय कारण सयंत्र प्रकाशमान लिये धनकर यननमें गिरता है। पार हम ममस्कार करते इए जाते हैं। ६ देवाःपीतये सुतः वृषारक्षालि यिनन पवित्रे २ महा विश्या दुरितानि साहा जातवेदाः भग्निः अति [ १२९२ ] - देयोंक वेनेके लिए निचोदा गया यह दमे मा स्तवे । सः गृणतः नः दुरितात् अपद्यात् यस यहानेवाला सोमरस रासको मारकर छत्तनोगे छाना रक्षियत् । उत मघोनः अस्मान रक्षिपत् । १३०५]- जाता है। अपने महान् प्रभाव सप पापोंको दूर करनेवाला, मानपा ७ यः विश्चात् देवान् मदेन सह इत् परि गच्छति प्रमाक अग्नि पगशाला प्रशंसित होता है। वह स्तुति [१३२१]- यह सोमरस सब देवाको मानन्द देनको इच्छासे करतराते हमें पापोंसे निन्दित कोस दूर करता है और देयोंके पास जाता है। हविको पासमें रखनेवाले हमारी रक्षा करता है। ८ जातं भन्तुरं भंग गोभिः सुपरिष्कृतं इन्दु देवाः ३ हे अने! त्ये वसु सुपणनानि सन्तु। १३०६]- उप अयासिपुः । १३३५ ]- संम्पार किए गए, पानी हे अग्ने । तेरे पन हमारे द्वारा स्वीपार करने योग्य हो। मिलाये गए पापा नाश करनेवासे तथा गाय के दूध मिश्रित सोमके देव जाते है। यहाँ पजशाला अग्नि प्रयोप्त पिया जाता है, उसकी स्तुति की जाती है, उत्तम हयनीय पदायाँका उसमें हयन किया ९ इन्द्रस्य हुदं सनिः तं नः गिरः संघर्धन्तु जाता है, इसप्रकार प्रदीप्त हुई हुई अग्नि भनेक प्रकारले { १३३६ ]- इन्द्र के हृदयको आनन्द देनेवाला यह सोम है, लोगोंकी रक्षा करती है, इत्यादि वर्णन यहां माये हैं। हमारे पाणी उराको स्तुति करफे चराके यशको महाये। यह मोमररा तंम्पार करके सर्व प्रथम देवोंको समर्पित देवोंको सोमरस पिया गाता है । यादगें उसे मात्विग्गण पीते हैं, ऐसा मह इन्द्रको सोमरस देनेका वर्णन पीछे आया है। अब देवोंको सोम पर्यंतपर हिमालय के ऊँचे शिवरपर मिलता है। सोमरस दिये जानेका वर्णन देखते है- पर्वतपर सोम १ हे सोम! ना एये राघसे घायु मित्रावरणा यह सोम हिमालय पर्वतको ऊची घोटीपर उगता है। इस मारतंर्घः देवान् चायापृथिवीमत्सि [१२५४]- हे विषय मंत्रों में वर्णन इस प्रकार है- मोग! हमें अस और धन प्राप्त हो इसलिए वाय, मित्र, यण, मदत्, सवयों तया धुलोफ और पृथिवीको सन्तुष्ट कर। १ गिरिपु क्षयं दधे [ १३१७ ]- पपंतपर यह सोम अपना पर बनाता है। २ पवमानः सोमः इन्द्रे मोजः, सूर्य ज्योतिः, अपा गर्भः देवान आवृणीत [१२५५/- सने हुए मोमने इन्द्रमें २ दिवः शिशुः इन्दुः । १२७७ - गुलोकमें जन्मा सामर्थ्य तपा मूर्यमें तेज घटाकर सौरपानीम मिलकर हुआ यह सौम है | धुलोकका अर्थ है हिमालयकी ऊंची चोटी। सेवा की। ३ दिया मूर्धा वृपा ११२८८] - चुलोकमे अंचे स्थान पर ३ देवेभ्यः सुतः पवित्रे अक्षरत् विश्या घामाने यह यल बढानेवाला सोम रहता है । आविशन् । १२८१] - देवोको देने के लिए यह सोमरसर ४ दृष्टिद्यावः स्वर्विदः सुतासः इन्दयः । १३२८] छनोसे जाना जाता है। यह देयोंके सव स्थानों में पहुंचता है। स्वर्गलोकसे वृष्टि करनेवाले, स्वर्गको जाननेवाले ये सोमरस ४ दक्षसाधनः स्वर्जित् एपाइन्द्राय वायचे पवित्र है। सोम पर्वतपर ऊंचे स्थानपर रहता है। यहाँसे यष्टि होतो परि पिच्यते [१२८७] - बलबान मानता है। वह सोम स्वर्गमें रहता है, इसलिए वह स्वर्गको जानता है में वर्णन सोमजता हिमालपके ने शिवरपर उगती है स्वर्गको जीतनेवाला यह सोम इन्द्र और पापुरते देने के लिए छलनीसे छाना जाता है। यह यात दिखाते है। ५ देयाघीः अघशंसहा अदाभ्यः पुनानः शुष्मी सोमका पत्थरोंसे कूटा जाना एप गति [१२११]- देवोंके वेनेके लिए पापियोंको १ चीते अध्वरे ग्रायभिः सं घसते [१३१७ ]- (२०८) सामवेदना सुयोघ मनुवाद [अपरार्चिः म पामें सोम पापरसेि कहा जाता है और बादमें उसका रस ६ हयंत हरि पारेण परि पुनन्ति [ १३२९]-पवित्र भगृत्तियोंसे याकर निकाला जाता है। और हरे रगका सोम छलनी छाना जाता है। दस अंगुलियां ७ शि{ जझान इय, देवेभ्यः हरि इन्दु सोमें अस्विोंको हम अगुलिया उस फूटे हुए सोमको दयाकर पायत्रे मृजन्ति । १३३४ ]- नो जन्मे हुए बन्देको मिस- रा निकासती है। इस विपरमें वर्णन इस प्रकार है- प्रकार स्वच्छ करते हैं, उसीप्रकार देवोंको देने के लिए निचोग १.त्यं दश हरितः मर्मज्यन्ते (१२७९]-उस सोमको गया हा सोमरस पवित्र करनेवाली छलनोसे गत किया परा अगुलियां शुरू करती है। जाता है। एर वृपा कनिमरत् दशमिः जामिभिः यतः इसप्रकार सोमरस शानमेके वर्णन अनेक ममि है। भेरके द्रोणानि अभि धायति । १२८३-Comml यालोंकी टलनी बनाते हैं। उस इलनीको एक कला मह सोम पर करता है और इस बहिनों अर्थात् अंगुलियों पर रखते है और उस पर दूसरे बलससे सोमरस उरोला रायर पलामें जाता है। जाता है, तब वह घनकर नीचे कलशम टपकता है। उसके ३ द्विपंच सखाय स्वयमासं भाद्विसंहत इन्द्रस्य टपरनका दाम्द होता है। उसके भाग्य होने का वर्णन इस प्रिय काम्य ऊर्मय प्रस्नापयन्ति [ १३३०-सी प्रकार है- मगुलिया स्यवं पारयो तपा परथरोंमे कटे हुए तथा इनको सोम शब्द करता है प्रिय औरट लगनेवासे सोमको पानोरो नहलाती है। १ ग्यनु आविष्णोति [१२५९]- सोम Em ४ स्यायुध मदिन्तमं हरि यातये दक्षतिपाहिन्यन्ति प्रकट करता है। [ १२७३ - उत्तम दारोरा उपयोग करनेवाले, आनन- गापर और हरे रगके सोमको देवकि पास सैजाने के लिए यह ना मानेवाला सोमरस पारासे शरद परता है। २ एपः पवमानः धारया पनिप्रदत् । १२६२]- बसों मेंगुलिया रस निकालती है। इस प्रशर बसों अंगुलियों द्वारा गार रस निकालनका हरि सापयि वनिप्रदत् योनि अमि अर्पति पर्गन म मम्यापमें हैं। ऐसा यह सोमरस मे बालोरी [१२९३]- वह हरे रंगरा सोमरस उसनोसे शामरता शासनौसेडाना जाता है, उस दियरा वर्णन मासिए- हुआ नीचे के रसभमें जाता है। सोम छाना जाता है ४ मद्विभिः सुप्याण: र पनिप्रदा सभ्यर्ष [१३२५- पापरोस टपर निकाला गया भारता १ अघि सानी मध्ये पायो पृहत् यावृधे [१२५३] हमा मोधरे बर्तन में भा। यपि धार रते हुए बालोंको सनीमे सोमरा ५ पीतये सुतः हरिः एषः प्रदन यो गमि मपिहाता है. ना नाता है। भर्पति [ १२७८]-पोतके लिए निकाला गया या सोमरण २ हरिपा देय देयेभ्यः सुन पयित्रे मर्पति अपने प्रिया समशता हुमा जाता है। 1१२४-महहरे रंगरावरवालाको लिए रियोग ६ बन्दुः एषः पयमाना अधिदर । १२८९/- ग्या सोमालनीगे जाना जाता है। समरनेवामा यह गर होना या संमरा दायरता हमा एषः माया यारेमि भापत १२७४ 1- यह डामा मारा है। पोपरम भोगासी सतीगे जाना जाता है। हम प्रसासोमरण माना है मौरसराता है। ५ पानी मिः हिता मापं चार विधायति [१८] परे तमगे मौधेरे में पिपरा गिराया -परशाला तथा पारों का मा मोपरा भारत का ऐसा तो होगा ही। हो पर पर है। बालोजी एनीमे पौषे त्रमें गिरता। मरामानशशिवर्णन मर्म, ५ याजी रसोदा मापवमानः सय पार पिया पनि १२९४]- परम और राममोही पारनेवाला, मामका नमयना बाराबारेशना गोमरमा गौरी मनीगे काना सोमत प्रापती अपाय चमाना। समागम गोपाप मोर नोमानणारा .. ।
दशम अध्याय ] सामवेदका सुयोध अनुवाद (२०९) तेजस्वी है। यहां पर भी यह पमपती है, पर रा अधिक पमता है। २ पवमानः एप: रजासि तिर., दियं विधागति इसका वर्णन घेदमें इस प्रकार है- [१२६२]- शुद्ध होनेवाला यह सोमरस शत्रुओंको दूर १ देव सोम (१२५४ - चमकनेयाला सौम । करते हुए पुलोक में मानों दौडता जाता है। २ हरे अजिरशांत्रिप पवमानस्य चन्द्राः जीरा ३ एषः पवमानः अस्तृत. रजासि तिर, दिवं भरक्षः । १३१० ]- हरे रश्के, सर्वत्र सेन फैलानेवाले, व्यासरत [ १२६३ - यह सुख होनेवरला मरालित सोम शुस होनेवाले सोमरसको तेगस्वो पारा महती है। राओं को दूर रता हुमा स्वरी ओर जाता है। ३ पवमानः हरि चन्द्रः [१३९१]- शुस होनेवाला ४ एप पुनाना द्विषः अपघ्नन् पवित्र अधितो. सोमरस हरे रममा न फैलाता है। शते [ १२८६] - यह एपित्र होनेगला सोम गनुओंको दूर ४ हे पवमान ! रश्मिभि व्यहि [१३१२ 1-हे करते हुए पवित्र स्थानपर फूटा जाता है। सोमरस ! तू अपनी फिरों व्याप्त हो। माको दूर करतेसा मर्द है. युद्ध में जाना और जनुओं के ५ अस्यः वृषा { १३१६ }- यह यसवान् सोम साथ लडना । यह वोरोंका कार्य है । वीर सोम पोते हैं उस कारण वे उत्साहित होकर शत्रुओंको दूर करते है। यह इसप्रकार सोमरस घमरता है । सोमलताको फूटकर होमके उताहसे होता है, इसलिए सोग हो पह सय करता उसका रस निकालते हैं। उसमें पानी मिलाकर छानते है है ऐसा वर्णन यहाँ दिया है। यावमै उसमें गायका रूप मिलाया जाता है। इस विषयम निम्न वर्णन है- सोमको पानी में मिलाना गायके दूध में मिलाना १ पपा देव अप विगाहते [ १२५७]- यह विष्य सोम पानी मिलाया जाता है। १ गोपा. [ १२५३ ]- सोम गा पालता है । गायके दूपमें वह मिलाया जाता है। २ याजी सिन्धूना पति भवन [ १२७० ]- यह २ गाः अभि अचिमदत् (१३१६]- गायके पास घलयान सोम नदीका स्वामी हो गया है। पानी में मिलाया पाद करता हुआ जाता है। गया है। ३ स्सार: आप, गा अभि उदासरन् । १३१७] ३ घृता वसान निर्णिज परियासि [१३१८]- -अगुली, पानी और गाय सोमके पास आती हैं। मलिया पानी मिलाये जाने के बाद छलनीमें जाता है। वापर रस निफालती है, फिर उसमें पानी और पायका राप्रकार सोमरसको पानी मिलाया जाता है। दूध मिलाया जाता है। सोम धन देता है इसप्रकार सोममें गामका दुम मिलाया जाता 1पानी और गाये उसके सामने आती है, इसका अर्थ है कि उसमें १ एपः देव दाशुषे रलानि वचत् [१२५७]- पानी और गायका दूध मिलाया जाता सशके लिए यह सोम दाताको रतन देता है। पूर्णका उपयोग, पके लिए गायका प्रयोग यह पेदोंकी २ एपः शूरः विश्वानि चार्या सिपासति [५२५८] पद्धति हो है। -यह पूर सोम सबके द्वारा स्वीकार करने योग्य मन देता है। सोम युद्ध में जाता है ३ पप ओजसा नृम्णा दधानः [ १९७१ /- यह सोम अपने सामर्यरो धन देता है। आदि देव सोमरस पीते है। इसकारण उनका उत्साह बढता है। बादमें ये युद्धमै आकर दायको मारते हैं। यह हमें धनके पारा पतुमा । ४ नरपि आधारत [१३२८]- हे सोमरस 1 सोमरसका कार्य है, ऐसा वर्णन वेद करता है- सोम उत्तम वीर्य देता है १ पयमान देवः सदाभ्या हरांसि अति धावति [१२६१J-यह शुद्ध होनेवाला, न वाया जानेवाला सोम १ वाजसातम स्तोत्रे सुधीर्य दधत [ १३१२ ]- शत्रुओंको कुचलता जाता है। मल घढानेवाला यह सोम स्तुति करनेवालेको उत्तम वीर्य २७ [साम हि दो भा २] (२१०) सामवेदका सुबोध भनुवाद [उत्तरार्चिका देता है। सोमरस पीनरो शरीर उत्तम बसवत होता है, करके अर्थात् गृहस्थधर्मका विशेष रोतिसे पालन करके इस कारण उत्तम सन्तान होती है। सबसे घेष्ठ होता है। पवित्र करनेवाली वेदवाणी २ वृपा अद्रिः अधिसानो पवित्रे वृहत् वावृधे [१२५३] - बलवान् वह पर्वतके समान विशाल होकर, ऊचे येदमत्रोंमें परमानसूक्तका महत्व इसप्रकार णित है- स्थान पर रहकर, पवित्र होकर अधिक श्रेष्ठ होता है। १ यः ऋपिभिः संभृतं रसं पायमानी: अध्येति, ३ हे देव नः इष्टये राधसे मत्सि [ १२५४ ]- हे मास पूतं अनाति [१२९८]- जो ऋषियों द्वारा एकत्रित देव ! हमारी इष्टसिद्धि और धनको प्राप्ति के लिए मानन्दसे किए गए पविमानी मप्रसपहस्पो ज्ञान - रसका अध्ययन सहायता कर। करता है, वह सब प्रकार पवित्र अम खाता है। ४ माहिपः तत् महत् चकार {१२५५]- उस महा २ तस्मै सरस्वती क्षीरं सर्पिः मधु उदकं दुहे बलवान्ने उस महान कार्यको किया है । [ १२९९]- जो पायमानी मत्रका अध्ययन करता है, उसे ५ पवमानः इन्द्रे ओजः अद्धात् [१२५० ]- सरस्वती दूध, घी, शहद और जल देती है। सोमके कारण इन्द्र में सामथ्र्य बढ़ा। ३ पाचमानीः स्वम्त्ययनी सुदुधा [ १३०० ] ६ इन्दुः सूर्य ज्योतिः अजनयत् [१२५५]- सोमने पवमानसूक्त कल्याण करनेवाले और उत्तम अध देनेवाले है। सूर्यमें प्रकाश स्थापित किया। ४ देवैः समाहताः पायमानीः देवीः नः इन भयो ७ रिप्रेः अभितः एपः देवः दाशुपे रत्नानि अमुं लोकं दधन्तु, नः पामान समर्धयन्तु [१३०१]- दधत् [ १२५७ ]- ग्राहाणो द्वारा प्रकासित यह देव दान. देवों द्वारा एत्रित की गई पावमानी देवी हमें इस लोकमें शीलको रन देता है। और उस लोकमें उत्तम स्थान देये, और हमारी सब रहा ८ पपःशुरः विश्यानि वार्या सत्यमिः यन् इय पूर्ण करे। सिपासति १२५८)- पहर सब पनों को अपने सामय से ५ देयाः येन पवित्रेण सदा आत्मानं पुनते, तेन प्राप्त करके उसका उपभोग करता है। पायमानीन:पुनन्तु [१३०२]- देव जिस पवित्रता ९एपः देवा रधर्यति, विशस्थति, यग्य माविष्ट करने सापनों से अपनी पवित्रता करते हैं, उन सापनोस पोति { १२५९]- यह विद्वान् देय रपमें बैठनेवी या ही पवमानमूक्त हमारी पवित्रता करे। करता है, लोगोंको उन्नतिका मार्ग दिखाता और उत्तम उप- ६ पायमानीः स्वस्थानी तामिानान्दनं गच्छति देशके शम्दोका पात्यान करता है। पुण्यान् भक्षान् भक्षयति, अमृतत्वं च गच्छति १० एका देवः हरिः शतायुभिः विपम्युभिः पाजाय [ १३०३]- ये पवमा मुक्त कल्याण करने वाले हैं. इनकी मृज्यते [१२६० - यह दुसोका हरण परनेवासा माती महापतागे भानन्द मिलता है, पुण्यराएक अन्य साने के लिए वीर सायके लिए अपनी सम्पूर्ण पायको पानेवाले तपा मिलते है भोर अमरता प्राप्त होती है। हितकारक मि बरनवालोंरे द्वारा, पदम विभप प्राप्ति पेदमंत्रार विशेपार पवमान सूपोंकि अध्यपनसे मनुष्यको लिए तैयार किया जाता है। उत्सम उन्नति होती है। सोमके गुण परि मनुष्य अपने अन्दर प्रतायुः (ऋत-मायुः)- मायके लियेष्ठ मौके महाये तो मनुष्यरो बन्नति होगी। इसकारण पाटर इस पर लिए जिसरी आय वर्ष होती है। पिपन्युः (चि-पन्युः)- प्यान। विशेष हितारोपमं परनेशला हरित-दुसरा हरण परमेयाला । देयः- प्रकाशमान, पोर, विनयो l परनेवाला । मृज्यते-भर पिया जाता है, नियपि बनाया सुभापित १ गोपाः प्रयमे भुपनस्य विधर्मन् प्रजाः जनयन् ११. सदाभ्यःदरासि मति धापति[11-1 मवान [१५]- साप मोर नियोस पासनाने सारा गनेवारण धीर सत्र पर मारपण रले मारा है। पापा, भुवना तिच पर्मसे पालन गरे, समान उम्पन्न २ पयमान ग्जांनि नि:, विधं विधायति . वाइय, दशम अध्याय ] सामवेदया मुबोध अनुवाद [१२६२-गड होनेवाला मनुष्य रजोगुणको दूर करके २४ एपः धावे सूर्य अरोचयत् [ १२८४ ]- यह स्वर्गको जानके मार्ग पर जाता है। गुलोको पूपको प्रकाशित करता है। १३ स्वध्यरः, अस्कृतः रजांसि तिरः दिवं व्यास २५ दक्षसाधना पप. स्वर्जित् । १२८७ ]- पल रत् ।२६३]- उत्तम हिंसारहित कार्य करनेवाला, पराजित यहानेका साधनस्य यह सुखोको जीतकर प्राप्त करनेवाला है। न होनेवाला, रजोगुणोंको दूर परपे स्वगरे रास्तेसे आगे २६ गन्युः हिरण्ययुः सत्राजित् अस्तृतः अच- जाता है। प्रादव [ १२८९] - पाय पालनेयाला, सोना पास में रखने- १४ पपा हरि यत्नेन जन्मना देवेभ्यः सुतः पवित्रे वाला, एकदम सथ समोको नोतनेवाला, अपराजित योर अपति (१२६४]- यह दुख दूर करनेको इच्छा करनेवाला प्राध्द करता है। जन्मसे हो देवों के लिए निमित हुआ है, इसप्रकार पवित्रताके २७ देवावी. अशंसहा अदाभ्यः शुप्मी एपः मार्ग पा जाता है। अर्षति [ १२९. 1- देवोका राक, पापियोंका सहारक, न १५ एपः शूरः भानुभिः रथेभिः गच्छन् , धिया रवाया जानेवाला यह बलवान् मागे जाता है । याति [ १२९६ - यह शूर पुरुष शीघ्रगामी रमोरी जाकर २८ धृषा रक्षांसि विनम् अति [१२९२- बल. परिपूर्वक उन्नतिके मार्गसे मागे जाता है । पाला यह रादासोको मारता माना जाता है। १६ अमृतासः आशन, वृहते देवतातये, पुरु धिपायते [ १२६७ ]- नहा अमरदेव रहते हैं, उस महान् २९ पृघहा वृपा परियोवित् अ-दाभ्यः, पसमें यह बहुत से काम करनेकी इच्छा करता है । सरत् (१२९६]- साधुको मारनेवाला बलवान् वीर, पन १७ एपः दितः अन्तः शुन्ध्यावता पथा विनीयते देनेशाला तया किसीसे न दबनेवाला होकर घोडेके समान आगे जाता है। [१२६९]- इस हितकारक सायकको अन्तर्यामोरे शुद्ध होनेके मार्गसे आगे ले जाया जाता है। ३० यः फायभिः संभृतं रसं अध्योति, सरस्वती १८ ओजसानृम्णा दधानः एषः गाणि दोधुयत् तस्मै क्षीरं सर्पिः मधु उदकं दुहे (१२९९]- जो ऋपियों [१२७१ - अपने सामम्मो पनों को पारण करनेवाला यह द्वारा इफ्ठे किए हुए शानका अध्ययन करता है उसे अपने साग हिलाता है। सरस्वती दूध, घो, हद और जल देती है। १९ चमूनि पिस्दनः एषः परुषा अति ययिवान् , ३१ अपिमि संभृतः रस ब्राह्मणेपु अमृतं हितं शादेपु अव गच्छति [ १२७२ ]-निवास करके रहने [ १३०० - ऋषियों द्वारा इकट्ठा किया गया पह मानरस पाले दुष्टोंको कष्ट देता हूमा अपनी शक्तिसे उसके आगे माह्मणोमें अमृतके रूपमें स्थित है। जाकर, मारनेके योग्य उस दुष्टको कुचलता हुआ चला ३२ देवैः समाहता पानमानी देवी मा इम अयो जाता है। अमुं लोकं दधन्तु, म कामान् समर्थयन्तु [१३०१]- २० एपः सहस्रिण वाजं गच्छन् [ १२७४ ]- यह देवोंके द्वारा सम्पादित, ये पवित्रता करनेवाली देवियां हमें इस हगारों प्रकारको अन्न देने के लिए जाता है। और उस लोकमें सुख देवें और हमारी कामनायें पूर्ण करें। २१ एप: मानुपी विक्षु श्येनः नया सीदति ३३ देवा येन पवित्रेण आत्मानं पुनते, तेन नः (१२७६ - यह मानदीय प्रजामोंमें, श्येन पोके समान, पुनन्तु । १३०२]- देवगण जिस पवित्र करनेके साधनसे ऊचे स्पान पर जाकर बैठता है। अपनेको पवित्र करते है, उन साधनों से वे हमें पवित्र करें २२ वाजी विश्ववित् मनसः पतिः नृभिः हित [ १२८०]- बलवान् यह सर्वज्ञ और मनका स्वामी होकर ३४ पावमानी. स्वस्थयनी, ताभिः नान्दनं मनुष्यों द्वारा सन्मान योग्य स्थानमें रखा जाता है। गच्छति, पुण्यान् भक्षान् भन्नति, ममृताव गच्छति २३ अमर्त्यः वृत्रहा देववीतमा देवः अधि यांनी [१३०३]- पवित्रता करनेवाली और कल्याण करनेवाली शुभायते । १२८२]- अमर, ओंको मारनेवाला और ऋचार्य है। इससे आनन्द प्राप्त होता है, पवित्र भन्न षोंको बन आनन्द देनेवाला ऐसा यह देव अपने स्थानमें पानेको मिलता है तथा अमृतावको प्राप्ति होती है। सुशोभित होता है। ३५ स्याहुतं चित्रभानुं नमला मगाम [ १३०४ ]- १ (२१२) सामवेदफा सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिक: 1 पोग्य हो। जिसमें उत्तम हवन किया गया है, उस प्रकाशसे युक्त अग्निके ५१ हे मघवन् ! . तब ऊतये शन्धि, द्विपः जाह, पास नमस्कार करते हुए हम जावे।' मृधः वि [१३२३]- हे धनवान् इन्द्र ! हमें अपने रक्षणोंसे ३६ मन्हा विश्वा दुरितानि साहान् अग्निः दमे सुरक्षित कर, द्वेष करनेवालोका पराभव कर, शत्रुओंको आस्तो [१३०५]- अपने महान प्रभावसे सब पापोंको दूर दूर कर । करनेवाले अग्निकी यज्ञशाला स्तुति को जाती है। ५२ हे राधसः पते व महः राधसा क्षयस्य ३७ स. ना दुरितात् अवद्यात रक्षिपत् [१३०५]- विधा असि [ १३२२ ]- है पनपते । तू महान् धनोंक वह हमारी पापोसे और निन्दित कोसे रक्षा करता है । स्थानोंको धारण करनेवाला है। ३८ हे अने! त्वे पसु सुपणनानि सन्तु [१३०६] - ५३ त्वं मदिन्तमा सत्राजित् अम्तृतः । १३२४]- हे अग्ने । तेरे पासके पन हमारे द्वारा स्वीकार करने व आनन्द देनेयाला सब शत्रुओंको एक साथ जीतनेपाला और अपराजित है। ३९ न. स्वस्तिमि पात [.३०६ - हमें कल्याण ' छुमन्तं शुष्मं आभर [ १३२५ ]- तेजस्वी पल करनेवाले साधनोंसे सुरक्षित कर । हमें भरपूर दे। १० इन्द्रः भोजप्ता महान् [१३०७ -इन्द्र भपने ५५ महे दक्षाय धनाय पवस्व [ १३३२]- शत्रुको तेजसे महान है। हरानंदाले बलके लिए और घनके लिए शुद्ध हो। ४१ भायुधा जामि गुम [ १३०८]- शस्त्र अय ५६ नः गये शं [ १३३७ ]- हमारी गार्योफर कल्याण होये। निरुपयोगी हो गर, ऐसा लोग कहने लगे। ५७ पिप्युर्षी इव धुक्षस्व [ १३३७ ]- पोषण करने ४२ वाजसातम सुवीर्य दधत् रश्मिभि. व्यदनु- पाले मन हि [१३१२]-बत बढानेवाला तू उत्तम वीर्य धारण करके ५८ युवा न्द्रः येषा सखा, भयुद्धः इव युधा अपने तेजसे सब जगको व्याप्त कर दे । वृतं सत्त्वमिः शूर आजति [१३४० - तरुण इन्न ४३ यः नयः [ १३१३ - जो सब मनुष्योंका हित जिनका मित्र है, वे वोर युद्धको इच्छा न होते हुए भी अनेक करनेवाला है। पोसाओंसे पुरत शत्रुको अपने बलोंसे शूरवीर होकर पूर ४४ मृपा हरिण, या इय, दस्म १३.६]- यह करते है। यल पानवाला तया दुर्योका हरण करनेवाला, राजाके ५९ दाशुपे माय बसु विदयते [१३४१]- दान समान, दर्शनीय है। देनेपाले मनुष्यको पह इन धन देता है। ४. दुरिमा अपसेधन नः मृड [१३१८]- पापोंको ६० अ-प्रतिप्कुतः इन्द्रः ईशान [१३४१] जिसका दूर फरसे हमें सुखी कर। पराभव नहीं होता ऐसा इन्द्र सबका ईश्वर है। ४६ वसनि मोजसा जनिमानि भाग प्रतिदीधिमः ६१ या आधिवासति, तत् उमं शयः इन्द्रः मा [१३९- पन अपने मामय से उत्पन्न करके उसका ठीक पत्यते [ १३४२]- जो उपासना करता है, इन्द्र उसे उप भाग हम लेते है। पल देता है। ४७.दस्य रातय भद्राः [१३२०]-मके दान ६२ इन्द्रः अराधसं मत, पदा क्षुम्स्फुरत् पायाणकारी है। [१३४३]- इन्द्र दान न देनेवाले मनुप्यको, असे परसे ४८ या मन चोदयत् [१३२०]- लो मनोको उत्तम फूलो कुचलते हैं, उसीप्रकार नष्ट कर बैसा है। प्रेरणा देता है। ४९ पिपता फार्मन रोपति [१६२०]- उपासपती एस्सा यह नष्ट नहीं रता। उपमा ५०द्र ! यतःभयामदे ततः मा अभयं धि १पर्णवी [१२५६]- पक्षीरे समान (एप [१२२11- हे महति हमें भय उत्पन्न हो, वहति देया झोणानि अमि भासदम् ) यह सोम मतनम बेगसे हमें भयरहित पर। . गिरता है।
दशम अध्याय सामवेदका सुवोध अनुयाद (२१३) २ हरि घालाय मृज्यते [ १२६. 1- जिसप्रकार १० मत्या न [१३१८]- घोडेके समान (पार्ज पोडेको पुर में जाने के लिए समाते हैं, उसीप्रकार ( पपः मध्यपति ) युदर्भ जाता है। पयमानः विपन्युभिः मृज्यते । पह मोम पर करनेवालोंके १९ थायन्तः सूर्य च [१३१९, किरणे जिस- द्वारा शुद्ध किया जाता है। प्रकार सूर्यके साथपसे रहती है, उसीप्रकार (विश्वा इत् ३ यूथ्यः वृपा शिशीते [१२७१] - निसप्रकारशुद्ध में इन्द्रस्य भक्षत ) सय थन इन्द्र के भाभपसे रहते हैं। बल अपने सींग हिलाता है, उसीप्रकार ( पपः शृंगाणि १२ भाग न प्रतिदीधिः १३१९]-पिता धनका दोधुवत् । यह गोम अपने सौंग हिलाता है। भाग जिसप्रकार भाई टिमसे मिलता है. उसीप्रकार हमें पनका भाग मिले। ४ श्येनः न [१२७६ ]-माजके समान यह सोम (मा सौदति ) कर मेडता है। १३ अक्ष्यः न [ १३३२]- घोरे के समान (निषतः पाजी ) घोकर शुद्ध किया गया यह पलवान् सोम है। ५ योपितं गच्छन् जारः न [ १२७६ ]- स्त्री के पास जैसे उसका भार जाता है,उसीधकार (एप: मानुपीपुषिभु) करते हैं, उसी कार ( सो पवित्रे मृजन्ति ) सोमको १४ शिशुं जशानं [१३३४ - ग पञ्चेको जसे साफ यह सोम मनुष्यों में जाकर पता है। छलनीपर शुद्ध करते है। ६ या च [१२९६]- घोडेके समान (सः सोमः) १५ वसं शिश्वरी: इच। १३३६]- बनेको जिल- वह सोम कलसमें वासे नाता है। प्रकार मासा पदाती है, उसीप्रकार (तं न:गिरस से ७ पृष्टिमान पर्जन्याच {१३०७]- वृष्टि करनेवाले वर्धन्तु । उस सोमका वर्णन हमारी स्तुति करती हैं। मेयके समान (तेजला महान् ) यह सोम तेगले महान् १६ परा चम्प इव [ १३४३ - पावसे जैसे फूलको दोसता है। रोदते है, उसीप्रकार (म-राघसं मत स्फुरत् । रान न ८ राजा इव वस्मा [१३१६]- राजाके समान देखने वाले मनुप्पका इन्द्र नाश करता है। वाला यह (सोमः) सोम है। १७ शव [ १३४४ - बोसको से ऊपर करते ९ येनः न ! १३१६ !- बालपक्षीके समान (घृत- है, उसीप्रकार ( ग्रहाणः स्वा उधेमिरे ) बाह्मण तुम चन्तं योनि भासदत् । पानीके कलशम लाता है। इन्द्रको धेष्ठ कहकर सनत करते है. रा प बढाते हैं। . दशमाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋषेशस्थान ऋषिः देवता पराशरसशक्रियः पवमानः सोमः विष्ट १९५३ १२५ १२५५ ९१९७३० ९२९७११२ ९।९७४१ " गायत्री ए पराशरःशास्त्पः शुनाशेष भाजीगतिः सः देवरातः कृषिमो श्वामित्रः भुन शेप भाजीगतिः सः देवरातः कृत्रिमी पश्वामित्रः शुन शेप मानोगतिः सः देवरातः कृषिमा श्वामित्रः " २॥ " 1" (२१४) सामवेदका सुघोध अनुवाद [ उत्तराचिकः मनसंख्या देवता छन्दः -- पवमानः सोमः गायत्री १९६० . " " म " १९६४ " " १२६६ । " ९.१५॥ १२६८ ऋग्वेवस्थान प्राषिः ९1१५ शुन.शेप आजोगति. रा. देवरात. कृत्रिमो वैश्वामित्रः शुन.शेप आजोगतिः स. देवरातः कृत्रिमोश्वामित्रः ९.१२ शुन शेप माजीगतिः स. देवरातः कृग्रिमोवश्वामित्रः ९ ।२७ शुन.शेप आजोगतिः स. वेवरात. कृषिमो श्वामित्रः ५४३८ शुनःशेप आजीगति स. देवरात. कृत्रिमो वैश्वामित्रः न शेष आजोगति सः देवरात. कृषिमो वैश्यामित्रः सुन शेप आजोगतिः स देवरात. कृत्रिमो दवामित्र: (२) असित. काश्यपो देवलो वा असित. काश्ययो देवलो वा असितः काश्यपो देवलो वा ९१३ असितः काश्यपो देवलो था ९.१५५ असितः काश्यपो देवलो वा ९.१५॥४ असित. काश्यपो देवलोदा ९।१५।६ अप्सित काश्यपो देवली वा ९१५८ असित. काश्यपो देवलो वा (३) ९।३८१ राहगण आंगिरस'.. ९।३८२ राहगण आंगिरस- ११३८।४ राहगण आगिरसः ९।३८५ राहगण मागिरस. ९०२८६ राहूगण बागिरस राहगण सांगिरस (४) २१२८१ प्रियमेध आंगिरस. શારદાર प्रियमेध आंगिरस. ९९८३ प्रियमेष आगिरसः ९१८४ प्रियमेय आंगिरसः ९।२८५ [प्रथम पाव.] प्रियमेध आंगिरस.? ९।२७४ [प्रप. पारा ] नमेष आंगिरसः " " " " " " १९७१ १२७२ , " " 2 " . " १२७६ १२७७ १२७८ १९७९ 1 " " 1- " . " " " १९८३ " " (२१५) सामवेदका सुरोध अनुयाद दशम आपाय] देवता छन्व: मंत्रतंल्या ऋषिः १९८५ ऋग्वेवस्थान । ९१९७५ [ प्रथमः पादः] नमेप आंगिरसः ९२२६४ः पादाः] इध्मवाहो बाध्यतः पवमानः सोमः गायत्री r (५) " 11 . " १२८६ १२८७ " । ९।२७१ ९॥२७॥ ९२४ा३ १९७४ ९१२७६ १९८६ नमेष आपिरसः नमेष आंगिरसः तुमेध आंगिरसः गमेघ मागिरसः नमेघ आगिरसः प्रियमेध आगिरस. " " " " " " " १२९३ ९७१ ९७२ ९३७१३ ९२३७४ ९३७५ ९३७ राहगण मागिरसः राहगण आगिरसः राहगण आंगिरसः राहगण आंगिरस राहगण बांगिरसः राहगण मागिरसः " " १२९६ " अनुष्टुप " . ९६७३१ ९।२७ . " . 1 " १३०१ १३०२ (७) पवित्र आंगिरसोपा वसिष्ठो वा उभौा पवमानाध्यता पवित्र मागिरसोदा वसिष्ठो वा उभौथा पवित्र आंगिरसो वा वसिष्ठो या उभौ या पवित्र मागिरसोया वसिष्ठो वा उभौथा पवित्र आंगिरसो था वसिष्ठो वा उभी वा पवित्र आंगिरसो वा वसिष्ठो वा उभौया (८) वसिष्ठो मंत्रावणिः अग्नि पसिष्ठो मंत्रावरणि. दसिप्ठो मंत्रावणिः वतःकाण्वः इन्द्रः १३०३ बिष्ट । " ३२१ १२ ७१२३ " " ' . . गायत्री १३०४ १३०५ १३०६ १३०७ १३०८ १३०९ ॥ वत्सःकाण्वः वत्साकाण्यः " सा ८६९ " पवमानः सोमः " ९६५ । m मातं वैखानसः हात वखानसः शतं वैखानसः सप्तर्षयः 12 " १३१० " ९१६९० ९९०७११ प्रगापः (महतो. सतो वृहती) " ९५१०७९ सप्तापः (२१६) सामवका सुवोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः मंत्रसंपा देवता पवमानः सोमः ऋग्वेवस्थान ९।१७३ ९८२१९ રાકે ९८१ विपदा विराद् जगती " सप्तर्षयः वसुर्भारद्वाजः वसुर्भारद्वाजः वमुर्भारद्वाजः " २११८ " " ८.९९३ नुमेय आगिरसः प्रगाथा ( पहतो सतो मूहती) नमेष आंगिरसः " ८०९९ ८६१०१३ टा६१।१४ " भगःप्रागापः भगः प्रागापः गायत्री . १३४ " " " " उष्णिक " " " - M " " अनुष्ट १३१० ९६७॥ ९।२७२ ९६७३ ९.१०६७ ९१०६८ ९।१०६९ १९८७ ९.९८६ ९१९८०१० ११०१।१० १।१०९।११ ९।१०९।१२ ९।३१।१३ ९६९।१४ ९।६।१५ " भरवाजो बाहरपरयः पवमानः सोमः भरद्वाजो बार्हस्पत्यः भरतानो माईस्परयः मनुराप्सया मनुराप्सवः मनुराप्सवः अम्बरीपो दागिरः जिरवा भारद्वाज अम्बरीषो वागिर ऋजिरवा भावानश्च । अम्बरीषो बापांगिरा जिरवा भारद्वाजश्च । अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः अग्नयो पिण्या ऐश्वराः अग्नयो पिरण्या ऐश्वराः अमहीपुरागिरसः प्रमहोपरागिरसः अमहीपुरीगिरसः (१२) त्रिशोककावः मानोगो जिमोकःकाण्वः त्रिशोककावः द्विपदा विराद " गायत्री " " " M " " १५४० १६३१ " सध्यार दाया ૮૪માં ११८४७ १८९ ११८१८ " " ११४१ गोतमो राहगना गोतमो राहगः गोतमो राष्ट्रगगः If उगिर ११३ ११०४ मनुष्य २१ १३१० मपुग्छदावामित्रः पपुच्छया श्वामित्रः मपुण्डरावामित्रः १५॥ " 1 एकादश अध्याय] (२१७) सामवेदका सुबोध अनुपाद अथ एकादशोऽध्यायः अथ पटमपाटके प्रथमोऽधः ॥ ६ ॥ [१] ( १-११) मेधातिथि: काण्वः, २, १० पसिष्ठो मंत्रायणिः, ३ प्रायः काका ४ पराशा: शाक्त्यः, ५ प्रगायो घोर: भावः ६ मेध्यातिथिः काण्वः, ७ उपमस्त्रवृष्णः, सदस्यः पौवकुरस्य; ८ अग्नपो थिष्प्या ऐश्वरा, ९ हिरण्यस्तप आगिरसः; १० सार्पराजी ॥ १ आप्रीसूक्तं-( १ इध्म. सपिद्धोऽग्निर्वा, २ सन्नपात, ३ भराशंसा )२ आदित्यः ३,५-६ इन्द्रः, ४, ७-९ पषमानः सोमः, १० मग्निः ११ मात्मा, पूर्वो था। १-३, ११ पापत्री ४ प्रिष्टप, ५-६ प्रगायः- (विपमा बहती, समा सतोमूहती); पिपीलिकमाया अनुप्पर, ८ द्विपदा विराट ९ जगतो; १० विराष्ट्र ।। २37 " २ २१ २. ३. ११ १३४७ सुपमिद्धो न आ वह देवार अग्ने हविष्मते । होतः पावक यक्षि च ॥१॥ ( ऋ. १३।१ ) १३४८ मधुमन्तं सनूनपायज्ञं देवेषु ना करे । अद्या कृणुयूतये ।। २ ।। ( १।१३।२) १३४९ नराशसमिह प्रियमस्सिन्यज्ञ उप हुये । मधुजित हविकृतम् ॥ ३ ॥ (रु. १।१३।३ ) १३५० अमे सुखतमे रथे देवार ईडित आ वह । असि होता मनुतिः ॥ ४॥ १ (रा)॥ [धा० १८ । उ० नास्ति । स्व०२](ऋ. १३१३१४ ) [१] प्रथमः खण्डः। [ १३४७ 7 हे आने ! (मु समिद्धः ) अच्छी तरह प्रज्वलित होकर (नः हविष्मते ) हमारी हविको अपने पास रखनेयाले पजमान के लिए ( देवान भा यह ) देवोंको बुलाकर ला । है ( होतः पावक) हवन करनेवाले तमा पवित्रता करनेवाले अग्ने। (यक्षिच ) उन देवताओंको लक्ष्य करके यत कर।१॥ ६१३४८) हे ( कचे) दूरी मग्ने ! (ननू-न-पात ) शरीरको न गिरानेवासा पू( अद्य ) माज ( ऊतये) हमारे संरक्षण के लिए ( ना मधुमन्तं यहाँ ) हमारी अत्यन्त मोठगे हरिको (देवेषु कृणुहि ) देवोंको ओर पहुंचा ॥ २ ॥ [ १३४९ ] { इह गलिन् यो । यहाँ इस यज्ञमें (प्रिय मधु-जिन्ह) प्रिप और मोठा बोलनेवाले (हविप्कृतं नराशंसं ) हरिको देवोंको मोर पहुंचानेवाले और मनुष्य जिसको स्तुति करते हैं, ऐसे उस अग्निको ( उप ये मं युलाता हूँ।॥३॥ १ मधुजिव्हः-मोटा भाषण करनेवाला । २प्रियः-प्रिय आचरण करनेवाला । ३ नराशंसा- मनुष्य जिसकी प्रशंसा करते हैं। ४ हविष्यत्-हवि पार करके यजन करनेवाला। [१३५०है ( भन्ने ) सार्ने ! (ईडितः) प्रशंसित हुआ हुआ तू (मुखतमे रथे ) अत्यन्त सुख देनेवाले रपसे (देवान या यह ) योको लेकर मा। मनु:-हिता) मनुष्यों - यजमानों द्वारा स्थापित किया गया होता असि) तू देर्योको बुलाकर सानेवासा ॥४॥ १ सुख-तमा रथा- अत्यन्त सुख देनेवाला । २८ साम हिन्दी मा.२ (२१८) सामयेदका सुयोघ अनुवाद [ उत्तरार्चिका ३३३ १ ११ ३ २२ - ३३ ३१२ वर १३५१ यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा । सुवाति सविता भगः ॥१॥ (ऋ. ७६६।४ ) १३५२ सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्सुदानवः । ये नौ अरहोऽतिपिप्रति ॥ २ ॥ ( ७६६५) १३५३ उत स्वराजो अदितिरदब्धस्स बस ये । महो राजान ईशते ॥ ३ ॥ २ (खि) ।। [धा० ११1 उ०२।१०३ ] ( ७६६६) १३५४ उ त्वा मदन्त सोमाः कृणुध राघो अद्वियः । अब ब्रह्माद्विषो जहि ॥१॥ (ऋ. ८६४।१ ) १३५५ पदा पीनराधसो नि बोधस्य महार आसि । न हि त्वा कश्चन प्रति ॥१॥ (फ ६४२) १३५६ स्वीशिप सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम् । स्वर राजा जनानाम् ॥ ३ ॥ ३ (ठि) ।। [धा० १३ 1 उ०२ । स्व. ३J (८६४३) ३.१७३३ वर 3३३२ ॥ इति प्रथम खण्ड ॥१॥ [१३५१ 3 ( यत् ) उन धनोंको ( अध सूरे उदिते ) आज सूर्यके उदय होने के बाद सर्वरे ( अनागा ) निण्याप (मिधः अर्यमा भगः सविता) मित्र, अर्पमा, भग और सविता देव ( सुवाति ) हमारी ओर प्रेरित करें॥१॥ १मित्र:-मित्रके समान आचरण करनेवाला। २ अर्य-मा-श्रेष्ठ पुरुषका निर्णय करनेवाला। ३ भग:- भाग्यवान् । ४ सविता-(सर्वस्य प्रसविता ) सब जगत्को उत्पन्न करनेवाला- सूर्य । [१३५२] (सु-दानय.) हे उत्तम धान देनेवाले देवो! (प्र नु यामन् ) तुम्हारे आगमनके बाद ( सः क्षय.) तुम्हारा यज्ञमें होनेवाला निवास (सु-भ-अवी अस्तु) हमारा अच्छी तरह रक्षण करनेवाला हो। (ये नः महर अति पिप्रति ) जो तुम हमें पापसे दूर करते हो ॥ २ ॥ [१३५३ ] ( उत ये ) और जो वेद तया ( अदिति.) देयोंको माता अदिति है, ये सब ( अ-दधस्य प्रतस्य स्वराजः ) न दबाये जानेवाले यतके राजा है, वे (महः राजानः) वे महान् राजा है, और (शते ) सब पर शासन पारनेवाले है|॥३॥ [१३५४ ] है इन्द्र! { सोमा त्या) सोमरस तसे ( उत् मदन्तु ) उत्तम मानन्द देवे । हे ( अद्रि-व. ) वा- पारी इन्द्र ! (राध कृणुष्प) हमें ऐश्वर्य दे और (ब्रह्म-द्वियः अवजहि ) शानसे द्वेष करनेवालोको हरा ॥१॥ [१३५५] हेतू (महान् असि ) बडा है। (स्वा प्रति कश्चन न हि तेरे समान दूसरा कोई भी नहीं है, ( अ-राघस पणीन् ) दान न देने वाले लोभी लोगोंको तू (पदा नि याधस्त्र ) परोसे कुचल डाल ॥२॥ [१३५६ ] हे [इन्द) इन्द्र ! (त्व सुतानां ) तु रस निकाले गए और (त्वं अमुतानां) रस न निकाले गए सोर्मोका (रेशिप) स्वामी है। (त्वं जनाना राजा) तू लोगोंका भी राजा है ॥३॥ ॥ यही पहला खण्ड समाप्त टुआ॥
एकादश अध्याय]
सामवेदका सुवोध अनुवाद
(२१९)
1
३.२
१
३२१.२३.
3
3.
[२]
१३५७ आ जागविविन ऋतं मीना सोमः पुनानो असदधमूषु ।
संपन्ति यं मिघुनासो निकामा अचर्यचो रविरासः सुहता। ॥१॥ (ऋ.९।९७१३७)
१३५८ स पुनान उप सूरे दधान ओमे अमा रोदसी पीप आवः ।
प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती साधनं कारिणे न प्र यसत् ॥२॥(ऋ. ९।९७।३८ )
१३५९ स यर्षिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वार आमि नो ज्योतिपावित ।
यत्र नः पूर्व पितरः पदशा स्वर्विदो अभि गा अद्रिमिष्णन् ।। ३ ॥ ४ (ते)।
[धा• १९ । उ० १ । स्व०८1(ा ९९७३९ )
१३६० मा चिदन्यद्वि शसत सखायो मा रिपण्यद ।
इन्द्रमित्स्तोता वृषण सचा सुते मुहुरुक्या च शसव ॥१॥ (३.८1१1१)
१
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१
9
१
३
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२
२८
१
२१
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[३] द्वितीयः खण्डः।
८१३५७ ] ( जागृचिः ) जापत रहनेवाला ( ऋतं मतीनां विप्रः) सच्ची स्तुतियोंका ज्ञाता (सोमः) सोम
{ पुनानः ) छनकर (चमूपु आलदत् ) कलशमें मंठता है । ( मिथुनासः) एकत्र रहनेवाले ( निकामाः ष्ट-
कामना करनेवाले (रथिरासा सुहस्ताः ) यस करनेवाले और उत्तम हायवाले { अध्वर्यः) अध्ययं । यसपन्ति )
गिसे स्पर्श करते है, ऐसा यह सोम है ॥ १ ॥
[१३५८ ] (पुनानः दधानः सः) पवित्र होतेवाला, यतकर्मोको सिद्ध करनेवाला यह सोम (सूरे उप
गच्छति ]) के पास जाता है । ( उभे रोदसी ) दोनों हो धु और पृथिवीको (आ अप्राः ) यह भर देता है।
([सोमः ] आवः) यह सोम तेजसे हमें आच्छादित करता है । ( प्रियाः) प्रिय पदार्थ देनेवाली ( यस्य सतः। जिसके
रसकी (प्रियतासः ) अत्यन्त प्रिय धारा (ऊती) हमारा सरक्षण करती है और (कारिणे न ) यज्ञ करनेवालेको
मे धन मिलता है, उसीप्रकार (धनं प्र य॑सत् ) पन हमें देती है ॥२॥
[१५९ ] ( वर्धिता ) सवर्धन करनेवाला (वर्धनः ) तथा स्वयं भी घटनेवाला ( पूयमानः छाना जानेवाला
और ( मोदवान् ) कामनाओंको पूर्ण करनेवाला ( सः सोम ) वह सोम (नः ज्योतिषा अभि आवित्) अपने मो
हमारी रक्षा करे। (पदशाः स्वर्विदः । पदोंका अर्थ जाननेशले, आत्मज्ञानी (नः पूर्वेः पितरा) हमारे पूर्वकालके
पितर ( गाः ) गायोंको ( यत्र आद्र अभि इणन् ) पर्वतके पास ले जानेको इच्छा करते थे ॥ ३॥
जहां सोमलता होती थी, यहां वे गायें ले जाते थे।
१३६.] है। सखायः) मित्रो ! (अन्यत् मा चित् वि शंसत ) इसके स्तोत्रके सिगय दूसरे स्तोत्र मत्त
सोलो और ( मा रिवायत ) दूसरेके स्तोत्र बोलकर व्ययं ही अपनी शक्ति कोण मत करो। सुते । सोमरस निकालनेके
भार (धूपर्ण इन्द्रं इत् । बलवान् इन्द्रको ही ( सचा स्तोत) एक नगह बंदकर स्तुति करो। ( उपथा च मुहासत)
इन्द्र के स्तोत्र पारयार कहो ॥ १॥
(२२०)
सामधेषफा सुयोध अनुवाद
उत्तरार्चिकः
१२३
393
२१
२
३२.
३२" २
२
७१
-
अवक्राक्षणं वृपमं यथा जुर्व गां न चर्षणीसहम् ।
विद्वेषण५ संवननमुभयङ्करं महिष्ठमुभयाविनम् ॥२॥ ५ (घी)॥
[धा १७ । उ० नास्ति । स्व० ४ } ( ८०११२)
१३६२ उदु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते ।
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तौ स्था इत्र ॥१॥ (३१५)
१३६३ कण्या इव भृगव। सूर्य इस विश्वमिद्धीतमाशत ।
इन्द्रय स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन् ॥२॥ ६ (ला)॥
[ धा० १४ । उ० मास्ति । स्व०९] (ऋ २०१६)
१३६४ पर्यु पु धन्य वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः । द्विपस्तरध्या ऋणया न ईरसे ॥१॥
(ऋ.९।११०)
१३६५ अजीजनौ हि पयमान सूर्य विधारे शक्मना पयः । गोजीरया र रहमाणः पुरन्ध्या ॥२॥
(ऋ ९।११०१३)
[१३६१ ] ( वृपमं यथा अवझक्षिणं ) बलके समान शत्रुओंसे टक्कर लेनेवाले ( गां न जुयं ) बैलके समान
सीम्रता करके (चर्षणीसह ) शत्रुओंको ह्रानेवाले (विद्वेपणं) शत्रुओंसे द्वेष करनेवाले (संवननं ) उपासकोंके द्वारा
सेवा करने योग्य (अभय-करं मंहिष्ठं निभंय करनेवाले, महान् तथा ( उभयाविनं) दोनों प्रकारके ऐश्वर्य देनेवाले
इन्द्रको स्तुति करो ॥२॥
[ १३६२ ] ( त्ये मधुमत्तमाः ) वे अत्यन्त मीठे ( गिरः स्तोमास.) चाणोके स्त्रोत्र ( उत् ईरते ) कहे जाते
है। (सनाजिता ) बहुतसे शत्रुओंको एक साथ जीतनेवाले (धनसा) धन देनेवाले ( अ-क्षित-ऊतयः ) न नष्ट
होनेवाले रखाके साधनोंसे युक्त ये स्तोत्र (घाजयन्त रथाः इव ) युद्ध में जानेघाले रपके समान, कहे जाते है ॥ १॥
[ १३६३ ] ( फण्या इव ) कण्वकै समान (भृगवः) भूगोंने (धीतं विश्वं इत् ) ध्यान किए गए और सर्वत्र
रहनेवाले इन्द्रको ( आशत ) प्राप्त किया। { सूर्या इव) सूर्य जैसे प्रकाशसे व्यापता है, उसीप्रकार उसने उन्हें देखा ।
(प्रियमेधाला आयवः) प्रेमसे यज्ञ करनेवाले हस्विजोंके समान ( इन्द्रं महयन्त ) इन्द्रका महत्व प्रकट करते हुए
(स्तोमेभिः अस्वरन् ) वेस्तोत्रपाठ करने लपे ॥२॥
[१३६४] है सोम 1 (सुशमलातये) उत्तम प्रकारसे भान देने के लिए( प्र धन्य ) तू मागे जा । (सक्षणिः
पुत्राणि परि) साहस करनेवाला पौर जिसप्रकार वृत्र जैसे बलशाली शत्रुओं पर चढता चला जाता है, वैसे ही तू शाओं
पर आक्रमण कर । (नः ऋणया) हमारे ऋण दूर करनेवाला तू (द्विप तरभ्य। भोको मारने के लिए (ईरसे )
आगे जाता है॥१॥
[१३६५] हे ( पयमान ) सोम। (पया विधारहि) जल वारण करनेवाले अन्तरिक्षमें ( शक्मना सूर्य
भजीजना ) अपनी शाक्तिसे तूने सूर्यको उत्पन्न किया । (गो-जीरया पुरंध्या) स्तुति करनेवालोंको गाय देनेको वृद्धिसै
(रंदमाणः)तू प्रगतिवालाहमा है ॥२॥
एकादश अध्याय सामवेदका सुरोध अनुवाद (२२१) २३ १ २ २ २ ३ । २ ३२५ १२ ३२१ ३" स 3". .२३ ३ १३६६ अनु हि त्वा सुतर सोम मदामसि महे समर्थराज्ये । बाजार अमि पवमान प्रगाइसे ॥३॥ ७ (ल)॥ [धा०९ । उनास्ति । स्व. १ (१.९११०२) १३६७ परि प्र धन्येन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय (ऋ.९.१०९) १३६८ एवामृताय महे क्षयाय से शुक्रो अर्घ दिव्यः पीयूषः ॥२॥ (ऋ.९।१०९।३। १३६९ इन्द्रस्त सोम सुतस्य पेयात्मत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः ॥३॥ ८ (ला)॥ [पा०९ । उ० नास्ति । स्त्र०२] (३.२।१०९।२) ॥ इति द्वितीयः खण्डः॥२॥ [३] १३७० पर्यस्येव रश्मयो द्रावपित्ननो मत्सरासा प्रसुतः साकमारते । तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किंचन ॥१॥ ( ९/६९।६) १३७१ उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरासान । पवमानः सन्तनिः सुन्वतामिव मधुमान् द्रप्सः परि वारमति ॥ २॥ (ऋ. ९ ६९।२ ) [ १३६६ ] है ( सोम ) सोम! (महे अर्यराज्ये ) महान आर्य राज्यमें ( त्या सुतं अनु ) तेरे अनुकूल होकर हो (स मदामसि) हम मानेदसे रहते हैं। हे ( पयमान ) सोम! ( बाजान अभिप्रगाहसे) तू बससे होनेवाले पार्वमें जाता है ॥ ३ ॥ [१३६७ ] हे सोम! तू (स्वादुः } मधुर होकर ( मित्राय पूष्णे मगाय इन्द्राय ) मित्र, पूषा, भग और इन्द्रको ओर जाने के लिए (धम्च) आगे जा ॥१॥ ८.१३६८ ] हे सोम! (शुक्रः दिव्यः ) तेजस्मो और स्वर्गमें उत्पन्न हुआ हुआ ( पीयूषः सः । पोनेके योग्य तू (भमृताय ) अमर होने के लिए ( महे क्षयाय एक ) महान् स्थानको प्राप्त करनेको इच्छासे ( अर्प) आर्गे जा ॥२॥ ॥ १३६९ ] हे सोग! (प्रात्वे दक्षाय } ज्ञान और बल प्राप्त करने के लिए (मुतस्य ते } तेरा रस (इन्द्रः पेयात् ) इन्द्र पिये भोर ( विश्वे च देवा ) राव देव भी पियें ॥ ३ ॥ ॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ। [३] तृतीया खण्ड। [१३७०] (सूर्यस्य रश्मयः इव ) सूर्यको किरणोंके समान (द्रावयित्नवः मत्सरासः ) प्रेरणा करनेवाले और आनन्द देनेवाले, (प्रसुतः बाशयः सर्गासः) शुद्ध किए गए, पात्रमें रहनेवाले सोमरस (ततं तन्तुं साफ परि रिते ) फलो हुई छलनीमसे एकदम नीचे गिरते हैं। वे (इग्दात् ऋते । इन्द्रके सियाप ( किंचन धाम ) और किसी स्थानको न पवते) पसन्द नहीं करते ॥१॥ [१३७१ ] इन्द्रको ( मतिः पृच्यते । स्तुति की जाती है ( मधु सिच्यते ) मपुर सोमरस इसको दिया जाता है। {मन्द्रा-जनी भासाने अन्तः उपचोदते ) आनन्द देनेवाली रसको पारा इन्द्र के मुहम छोटो जाती है। (सन्तनिः) हमेशा (मुन्वता ) सोमरसको निकालनेवाले यजमानोंका ( पवमानः मधुमान् द्प्सः) अटरिया जानेवाला मोश सोमरस (पारंपरि अति ) छल्नोसे नौरे पडता है !! २॥
(२२६) सामचंदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराचिका ३३ १ ३३३३३ ३ ३ २ ३"३३ ३१.३ २७२६३१३कर 3.9११३१२ १९३१२ 3 ३ २० ११३२ ३१२ " २ । १३७२ उक्षा मिमेति प्रति पन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम् । अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यस ॥३॥ ९ (ग)॥ [पा० २६ । उ० ३ । स्व. १] (ऋ. १६९१४) १३७३ अनि नरो दीधितिभिररण्योहस्तच्युतं जनयत प्रसस्तम् । दुरेशं गृहपतिमथव्युम् (ऋ." १३७४ तमणिमस्तै वसयो न्यूवरसुप्रतिचक्षमवसे कुतश्वित् । दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः ॥२॥ (ऋ. १२) १३७५ प्रेसो अग्ने दीदिहि पुरी नोऽजस्रया सा पविष्ठ । त्याशश्वन्त उप यन्ति वाजाः ॥३॥ १० (डी)॥ [धा० २८ । उ०३ । स्व०४1(ऋ७११५) १३७६ आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥ १॥ (ऋ. १०।१८९।१ ) १३७७ अन्तश्चरति रोचनास्प प्राणादपानती । व्यख्यन्महिषो दियम् ॥ २ ॥(ऋ. १०।१८९।२ ) [ १३७२ ] ( उक्षा मिति ) मोमरस शद करता है। (धेनयः प्रति यन्ति ) गायें उसके पीछे जाती है (देयस्य निष्कृतं दची उप यन्ति } चमकनेवाले सोमको दिव्य स्तुतिया प्राप्त होती है। ( अर्जुनं अव्यय बार अत्यकामीत् । सफेद रसके मारेको छत्तीसे छनकर सोमरस मोवे उतरता है। अकं न कवच समान ( नितं सोमः परि अव्यत) साफ पदार्थोपो यह नोम अपने ऊपर मोढता है ॥ ३॥ [ १३७३ ] हे (नर.) ऋत्विजो। तुम (प्रशस्तं दूरेशे ) प्रशसित और दूरसे दोखनेवाले ( गृह-पति अथव्यु ) गृहके रक्षक और अगम्य । हस्तच्युतं ) हार्थोके द्वारा चलाये जानेवाले { अग्नि ) अग्निको ( अरण्योः) अरनियसि ( दीधितिभि जनयन्तः ) अगुलियों द्वारा उत्पान करो ॥ १ ॥ [१३७४ ] ( यः दमे ) जो घरमें { दक्षाय्यः ) हवियों द्वारा प्रज्वलित करने योग्य है, ऐसे (नित्यः मास ) हमेशा रहनेवाले (त) उस ( सुप्रतिचक्षं अनि ) दर्शनीय अग्निको [ कुतः चित् ) को भी लाका [ अरसे) अपने रक्षणके लिए ( वसवः स्तुति करनेवालोने ( अस्ते नि ऋण्वन् ) यज्ञशालाम स्थापित किया ॥२॥ [१३७५] है ( यविष्ठ अग्ने ) हे बलवान् अग्ने ! (प्रेद्धः) पूर्ण रीतिसे प्रज्वलित हुआ हुआ तू ( अजस्रया मा) बड़ी-बड़ी ज्वालाओंसे (ना) हमारे लिए (पुरः दीदिहि ) हमारे मागे - आहयनोय पानमें प्रदीप्त हो, अच्छी तरह जल, (शश्वन्त. वाजाः ) बहुतसी विया ( त्वां उप यन्ति ) तेरे पास जाती है। [१३७६] ( आयं गौः पश्निः अफ्रमीत् ) यह सूर्य निरय गतियाला होकर अपने व्यापक तेजसे उदयाचल पर जासा है । बादमें वह ( पुर. मातर असदन ) पूर्व दिशामें भूमिमाताके ऊपर माकर ( च पितरं स्वामयन् ) अपने चुलोकपी पिताको शीघ्र प्राप्त करता है ॥ १ ॥ [१३७७ ] ( अतः ) लोक और पृम्दोके बीचमें (अस्य रोचना) इसका प्रकाश (प्राणात् अपानती ) उपके यार भरतको (चरति प्राप्त होता है (महिपः ऐसा यह महान् सूर्य (दिवं व्यस्यत् ) घुलोकको प्रकाशित करता है ॥२॥ - पकास मायाय] साममेका सुयोध अनुवाद (२२३) ३ 1 . १. है १३७८ निवदाम वि राजवि वापतङ्गाय धीयते । प्रति यस्तारह घुमिः ॥३॥ ११(छ)। [धा० १७।३०२। स्व. १)(3.101१८९३) ॥ इति सनीय सर ॥ ३ ॥ हिपाठरं प्रथमोध ॥६-१॥ "एकाम्याय समाप्त ॥१९॥ [१३७८ ] ( पस्तोः शिशाम मह दिन तोमपटो तक पह पूर्व (घुमि. पिराजति । किरणोंगे विशेष गुशोभित होना है। उम समय (पाप) पेरवाशी ( पतगाय ) म सूर्यमगे ( प्रति घीयते । स्तुति करती है ॥ ३॥ ॥ यहां तीसरा सण्ड ममात हुमा ॥ ॥ रति एकादशोऽध्यायः ॥ एकादश अध्याय इस ग्यारहदे मायाम कुछ देवतामोरे मार सोमा १ सोमा. त्या मदन्तु [ १३५४ -हे ! सोमरस गुण गान है। इसलिए प्रपम हम मन्य देवोरापन देगे। तुगे आनर देखें । सर्व प्रम या स्थान २ हे अद्रिय । राध एणुष्य । १३५४ ]- हे वन- पारी इन्द्र । हमें धन दे। ३ प्रहाद्विप अयजदि। १३५४ ]- शानसे व करी. १ यादि-ग. [ १३५४]- पत्रधारी, पहाटो हिसमें बालोबानागर रहनेवामा। महान् । १३५५/- रायकी अपेक्षा बहा। ४ हे इन्द्र! महान् असि, त्या प्रति कश्चन नहि ३ जनानां राजा[१३५६ - लोगोंका भार, लोगोंका १३५५]- हे महान है । तेरे समान दूसरा कोई राग्य घस्नेवाला। नहीं। ४ पृपा [ १३६० ]- बलवान, सामथ्र्ययुक्त । ५ अराघस. पणीन पदा नि पाघस्थ [ १३५५ 7- ५ चर्पणीसह. [१३६१]- शत्रु को हरानेवाला। कान म देनेवाले लोगोंपो परोंमे कुषाल अत। उन्हें कष्ट ६ पिढेपी । १३६१]- सति द्वेष करनेवाला । ७ सयनन·। १३११-सेश करने योग्य । हे इन्द। स्य सुतानां अतुतानां शि॥१३५६] ८ अभयकरः (१३९१-मोगोंको निर्भय करनेवासा - हे पन्द्र ! दूरस निकाले गार और न निकाले गए सोमोका ९ महिष्ठ [१३६१]-महान, बड़ा । स्वामी है। १० उमयायी [१६]- दोनों प्रकारके ऐश्वर्य देने. ७ ससाय अन्य चित् मा विशलता१३६.] वाला, मौतिक और माध्यात्मिक ऐश्वर्य देनेवाला। - हे निरो! तुम और पुरान करो। ११ मवरक्षी [१९- शत्रुओंको दबकर देनेवाला। ८ मा रिषण्यत [ १३६० ]- व्ययं ही दूसरे कामों में इस प्रकार इन्द्र के गुण इस अध्याय में है। मब उसके लिए अपनी शक्ति पचं मत करो। भौर भी को कुछ रहा है, उसे देखें- ९ सुते पण इत् सचा स्तोत उक्धा च मुटु पहचा।
(२२४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्विका . शंसन [१३६०J- सोमयागबलवान् उस इन्द्रके हो निवास इस शरीरमें होता है। देहके उड़े होनेपर सव देव स्तोत्र कहो, और बारबार उसके स्तोत्र कहो। शरीर छोड़ जाते हैं। तब " अत्यन्त सुखदायक रथसे १० वृषभं यथा अवक्राक्षिणं [१३६१ ]- देवकर देवोको यहां ला " इसका अर्थ है कि शरीररूपी रयसे " मारनेवाले बेलफे समान सामयशाली इन्द्रको स्तुति करो। ११ कण्वा भृगकधीतं विश्व इत् आशत [१३६३] ४ यः दमे दक्षाय्यः नित्यः आस [ १३७४ ]- यह - कण्व और भगुने प्यान द्वारा उस सबंध्यापक इन्द्रको अग्नि प्रत्येक स्थानमें बल बढ़ानेवाला होकर हमेशा रहता उपासना की है। ( दक्षाय्यः- बल बढानेवाला) इस प्रकार इन्द्र का वर्णन इस अध्यायमें है । ५ अवसे वसवः अस्ते न्यृण्वन् [१३७४]-सरक्षण- के लिए इसे वसुदेव प्रत्येक स्थानमें रखते है । अग्निके रहने अग्नि तक हो देहमें देवोंका निवास रहता है। यह सभीके अनुभवमें १ अग्निः [१३४७]- अप्रणो, आगे ले जानेवाला, नेता। मा सकता है। २ पायफः [१३४७ ]- पवित्रता करनेवाला, शुद्धता देवोंका दर्शन करनेवाला। अनेक देवोके नाम इस अध्यायमें आए है- ३ होता । १३४७ ]- हवन करनेवाला। १ तत् मित्रः अर्यमा भगः सविता सुधाति [१३५१] ४ कविः [ १३४८]-जानी, दूरदर्शी. अतीन्द्रियार्थदशी। • उन धनोंको मित्र अर्यमा, भग और सविता हमारी ओर ५ तनू-न-पात् [ १३४८ ]- शरीरका पतन न होने प्रेरित करें। देनेवाला। २ सुदानयः ! प्रनु यामन् साक्षयः सु-प्राची ६ मधुजिव्हः [ १३४९]- मधुर भाषण करनेवाला। अस्तु [ १३५२ ]- हे उत्तम दान देनेपाले देवो! तुम्हारा ७प्रियः[१३४९]- सर्वोको प्रिय । आगमन होने पर तुम्हारा यज्ञमें निवास हमारा उत्तम ८ नराशंसः [१३४९ ]- मनुष्यों द्वारा प्रकासित । संरक्षण करनेवाला होवे। २ मनुर्हितः [ १३५० ]- मनुष्यका हित करनेवाला, ३ ये ना अंहः अति पिप्रति [ १३५२ ]-जो तुम हमें मनुष्योंके द्वारा स्थापित। पापसे दूर करते हो। १० होता[ १३५० ]- हवन करने वाला, बुलानेवाला। ४ उत ये आदतिः अ-दब्धस्य व्रतस्य स्वराजः ११ प्रशस्तः [१३७३]-प्रशसित, स्तुत्य । महः राजानः ईशते [ १३५३ ]- और वे देष तथा देव. १२ दूरेटर [ १३७३ ] दूरसे दीखनेवाला। माता अदिति सब मिलकर न दबाये जानेवाले व्रतके समान १३ गृहपतिः [१३७३ ]- गृहत्प, घरका स्वामी । है। वे महान् राजा और सबके ईश्वर है। २४ अथव्युः [१३७३]-प्रगतिशील, गति करनेवाला। सोम! स्वादुः मित्राय,भगाय, पूष्णे इन्द्राय १५ सुप्रतिचक्षः [१३७४ ]- अत्यन्त दर्शनीय । मधन्ध [ १९६७ ]- हे सोम! तू मोठा होकर मित्र, भग, १६ यविष्ठः [१३७५]- तरुण, नौजवान । पूषा और इंटकी ओर जा। इन गुणवर्णनोंके अलावा और भी वर्णन इस मध्यायमें इसप्रकार अनेक देवोंके नाम इस अध्यायमें है। कितने १ हे अग्ने ! देवान् म यह [१३४७ ]- हे आने ! हो देव पन देते हैं। कितने ही संरक्षण करते हैं। कितने ही देवोंको बुलाकर ला। देव सापकोंको पार्कोसे दूर करते है। कितने ही सब संसार २ यक्षि [ १३४७]- पमन कर। पर शासन करते है।यतम सब देवोंकोसोमरस दिया जाता है। ३ सुखतमे रथे देवान् था यह [ १३५० ]- उत्तम सुखदायक रपमें देवोको यहाँ घुलाकर ला। शरीर ही सुख १ जागृविः ऋतं मतीनां विप्रः सोमः पुनानः दायक रप है। जितने हैद विश्वमें है, वे सभी देव वंशरूपसे चमूपु आसदर [ १५५७ ]- जाप्रत रहनेवाला, सत्य इस वेहमें है। अग्नि मर्यात उष्णताके रहनेतपर सब देवोंका स्तुतियोंका हाता यह सोम छानेके बाद कलशमें जाता है। सोम एकादश अध्याय) सामवेदका सुशोध मनुषाद (२२५) बसा सोम भरकर रखते हैं। मह सोम (जागयिः) २प्रियसास: ऊती। १५५८ - प्रिय लगनेवाले में गाणता रहता है, अर्थात् इसके पीने के बाद इसना उत्साह सोमके रस हमारी रक्षा करनेवाले हैं। बसा है कि उसके पोनेवासेरो मालस्य नहीं माता। ३ घर्धिता वर्धनः मीयान् सोमः नः ज्योतिरा २ पाजसातये धन्य १३६४]- अ धान करनेके भभि आवित् ११३५१ - सयन करनेवाला, अडानेवाला, लिए आगे हो । सोमरस एक अन्न है । उसे पाने के लिए सामनाओं को तृपित करनपाला यह सोम अपने तेजसे हमारे रेना एक प्रकारसे अनवान ही है। रक्षा करे। पल शारीशक्ति जिसके पास है, वह संरक्षण ३ सक्षणि वृत्राणि परि [ १३६४ ]- हा काने- कर सकता है । वाला बोरामो पर पता चला जाता है, उसीप्रकार सोम धन देता है "दिपा तर इरसे" देष करते रहनेवाले दाभोंको मारनेके लिए आगे जाता है । सोमरस पोकर उत्साहित हुए कारीगरको, यह करनेवासोको जसे धन दिया जाता है, उसो १ सोमः कारिणे न, धनं प्र यसत् [ १३५८]- हर वीर शत्रुओं पर घड़ते चले जाते है। प्रकार यह सोम फूिनी मानेवाला होने के कारण पोने के । हे सोम! महे मर्य-राज्ये संमदामसि [११६६] स्फूर्ती बढाता है, इस कारण बहुत सारा काम करके धन प्राप्त -हे मोम! महान् यापं रापोंमें हम सपठित पसे मानवित किया जा सकता है। होकर रहें। ५ सोम शुक्रः दिव्या पीयूपः सः अमृताय वैदिक-स्तोत्र महे क्षयाय पप अप ( १६६८ ]- हे सोमा र तेजस्यो, वधिक स्तोत्रोंका महत्व इस ममायमें निम्न है । वह प्यान- मसवान् और स्वर्ग उत्पन हुआआ अमृतरूपी रस है। पूर्वक देखने योग्य है-- ऐसा तू भमर होनेरे लिए तपा या बडे निवारा पान १ मधुमत्तमाः गिर स्तोमासा उदारते, सत्रा- प्राप्त करने के लिए आगे होकर प्रगति कर। जित: घनसा अक्षितोतय. वाजयन्तः रथाः इव ६ हे सोम ! फवे दक्षाय सुतस्यते इन्द्रः पेयात्, [ १९६२ ]- उन मत्यन्त मीठे स्तोत्रोंका उन्चारण किया विश्वे च देयाः [१५६९-हे सोम! कर्म और यल प्राप्त जाता है । वे स्तोत्र शत्रुओंको एक साप जीतनेवाले, पन करने के लिए तेरा रस इन्द्र और सब दूसरे देव पीड़ें। देनेवाले, अक्षय सरक्षण करनेवाले, युद्ध में जानेवाले रपके ७ सूर्यस्प रदमयः च, छावयित्नया मसरासः समान विजय देनेवाले है। प्रमुत बाशयः सर्गाला सर्व तन्तुं सार्क ईरते, मात् वैवमत्रके स्तोत्रका यह वर्णन बिलकुल ठीक है । इन्द्र भाते किंचन घाम न पचने । ११७० - सूर्यको किरणकि और तोमो स्तोत्र शौर्य और पराक्रम बढानेको पाक्ति- समान फैसलवाल और मा दैनवाले सोमरस फैली ई वाले हैं। अग्निके स्तोत्र शान मदानेवाले है। अन्य देवोंके सूरत उसनोसे मोचे गिरते हैं। ये इसके सिवाय और कोई स्थान भी इसीप्रकार विजयका मार्ग दिखाते है। मत्रमें वणित पसन्द नहीं करते। देवताकि गुण उपासकोंको अपने भररसाने पाहिए । यह इसप्रकार सोमरस इस अध्याय वर्णित है। यह सोम विज्ञपका निश्वस भाग है। उत्साह बढानेवाला, बालस्य कम करनेवाला, अनके समान उपयोग, मानेकाला, शोकोदूर करनेवाला, महान् राष्ट्रम संगठित होकर रहनेको म्यपाल्या करनेवाला, कर्मशक्ति मोर सुभाषित बस बहानेशाला है। १ सुसमिक्षा हविष्मते देवान आघह [१३४७] सोम रक्षण करता है -प्रदीप्त होकर पन करनेवाले देवोंको ले आ। १ सोमा आवा[ ११५८]- सोम हमारा रक्षण करता २ हे पायक! यक्षि [ १४७ 1- हे पवित्र करनेवाले है। सोमसे जो उत्साह रखता है, उससे पोरता पडती है, देवो! यह करो। फिर बोरतासे रक्षा होती है। ३ हे कये। तनु-न-पात् [ १३४८ - हे शानो २९ [ साम हिन्दी (२२६) सामवेदका सुरोध अनुवाद [ उत्तराचियः अग्ने ! तू शरीरका पतन नहीं होने देता | शरीरम जबतक १८ सोमा आवः [१९५८]- सोम हमारा रक्षण गी रहती है, तबतक मृत्य नहीं होती। करता है। ४ अध ना ऊतये :मधुमन्तं यशं देवेषु ऋणुहि १९ कारिणे न, धनं भयंसत् [ १३५८ ]- यश [ १३४८ ]- आज हमारे सरक्षणके लिए हमारे मपर करनेवालोंको जैसे धन मिलता है, घसे हो हमें भी दे । हवनोंसे होनेवाले यतको देवोंको ओर पहुंचा। २० वर्धिता यर्धनः पूयमानः मीट्वान् सोमः नः ५ प्रियं मधुजिहं नयशंसं उपद्ध्ये [१३४९]- ज्योतिपा अमि आवित् १३५९]- दूसरोंको बढानेयाला, प्रिय, मधुरभाषी लोगों द्वारा प्रकासित उस मीनको में अपने स्वय भी बढनेवाला, स्वच्छ होनेवाला, कामनाओंको पूर्ण पास बुलाता हूं। करनेवाला सौम अपने तेजसे हमारी रक्षा करे । ६ ईडितः सुखतमे रथे देवान् आवद [ १३५०]- २१ यत्र पदशा- स्वर्विद नः पूर्वं पितरः गा अमि स्तुतिके बाद अत्यन्त सुख देनेवाले रपसे देवोंको ले । इप्णन् । १३५९ ]- जिस सोमके स्थानके पास पदोका ७ मनु-हितः असि [ १३५० ]- तू मनुष्योंका हित थे। गायें चरानेके लिए वहा ले जाते थे जहा सोमवाली अर्थ जाननेवाले, यात्मज्ञानी हमारे पूर्वज अपनी गायें लेजाते करनेवाला है। उगती थी। ८ हे सुदानवः ! सक्षया छ-प्रायीः अस्तु [१३५२] २२ हे सखायः । अन्यत्' मा चित् विशंसत, - हे उतम दान देनेयाले देयो ! तुम्हारा यहाँका निवास मा रिषण्यत, सते वृषणं इन्द्रं सचा स्तोत, उपथा हमारा उत्तम रक्षण करनेवाला होवे । च मुहुः शंसत [ १३६० ]-हे मित्रो इनको छोडकर ९ नः अंहः अति पिप्रति [ १३५२ ]- है देखो ! हमें और किसीको स्तुति मत करो। निरर्थक अपनी शक्ति पार्कोसे दूर करो। खर्च मत करो। सोमयत में एक जगह बैठकर बलवान १० ये अदग्धस्य व्रतस्य स्वराजा महा राजाना इन्द्रको ही स्तुति करो। इन्द्र के स्तोत्र वारवार कहो। ईशते । १५३- जो न दबनेवाले वोंके राजा और २३ धृपमं यथा अयक्षिणं, गां न जुध, चर्पणी- स्वयं महान् शासक है, वे देव सनीपर शासन करते है। सह, विद्वेपिणं, संवननं अभयंकर मंहिष्ट्र उभयायिनं ११ हे अद्रिवः ! राधा कृणुष्य[३३५४]- हे वज्रपारी मुहुः शंसत [ १२६१ ]- बैलके समान शत्रुको टक्कर इन्द्र ! हमें ऐश्वर्य है। देनेवाले, बोलके समाम शीव्रता करके शत्रुको हरानेवाले, १२ ब्रह्मद्विषः अवजाह [१३५४ ]. मानसे देष शनुसे द्वेप करनेवाले, उपासकोंके द्वारा सेवा करने योग्य, पारनेवालों को मार। निर्भय करनेवाले, महान् और दोनों तरहके ऐश्वर्य देनेवाले १३ हे इन्द्र ! महान असि, त्या प्रति कश्चन नहि इग्नको बारबार स्तुति करो। [३५५ 1- हे इन्द्र ! तू महान् है, तेरे समान दूसरा कोई रथाः इव गिरः उदीरते [ १३६२ ]- एक साथ २५ सत्राजितः धनसा, अक्षितोतयः, घाजयन्तः भी नहीं है। १४ अ-रायसः पणीन् पदा नि याधस्व [१३५५]- जानेवाले रपके समान स्तोत्र कहे जाते है। शत्रुओंको जीतनेवाले, पन देनेवाले, रक्षण करनेवाले, युद्ध बान न देनेवाले लालचियोंको परसे कुचल गल। १५ हे इन्द्र ! त्वं जनानां राजा [ ३३५६ ]- हे [११६३]- कण्य और भृगु प्यानके द्वारा सर्वथापक इन्द्रको २५ कण्याः भृगवा धीत विश्वं इत् इन्द्रं भाशत इन्द्र! तू मनुष्योंका राजा है। प्राप्त हुए। १६ जागृविः ऋतं मतीनां विप्रः सोमः पुनानः २६ आयकः महयन्ता रसोमेभिः अस्वरन् [१३६३] [ ११५७ १- सदा जापत रहनेपाला, यमरेमें स्तुतियोरो -उपासक इन्द्र के महत्व गाते हुए स्तोत्र घोलने लगे। प्रशंसित यह मानो सोम छाना जाता है। २७ मु याजसातये प्रधाघ १३६४]-उत्तम रीतिसे १७ पुनानः उभे रोदसी मा अमाः [११५८]- ममदान करने के लिए तू मागे हो। शुख होनेवाला तोम पुलोक और भूलोक दोनोंको हो अपने २८ सक्षणिः वृत्राणि परि[१३६४ ]- साहस करने तेजसे भर देता है। वाला वीर शपर जैसा आक्रमण करता है, वैसा ही तू कर ।
(२२७) सामवेदका सुपाध अनुवाद एकादश अध्याय पला २९ द्विष तरध्य रसे [ १५६४ ]- पात्रुओंको मार ३६ महिषः दिध व्यख्यत् [ १३७७]- यह महान् मके लिए आगे जाता है। सूप घुसोकको प्राशित करता है। ३० न भणया (३६४]- हमारे प्राण उतारनवाला ३७ यस्तो त्रिंशत् धाम धुमि विराजति [१३७८] - दिनको होस घोतक यह विशेष प्रराशिव होता है। ३१ महे अर्थराज्ये स मदामसि [ १३६६]- महाग माय राज्यमें रहार हम मानदित होते है। उपमा ३२ स्वादु प्रपन्च (11६७]-तू मोठा बनवर भागे १कारिणेन [१३५८]- कारीगर, कवि स्तोता इयादिकोंको जैसे धन मिलता है, उसीप्रकार ( घन म ३३ गुन दिव्य पीयूष स अमृताय महे क्षयाय यसत् । पन हमें मिले। भ[१६८]- तेजस्यो त्यगमें उत्पन्न हुआ हुआ ममृतके २ वाजयन्त रथा च [१३६२]- युद्ध में जानवाले समान व्ह सोम ममर होनके लिए और महान स्थान प्राप्त रपके समान विजय देनवाले (स्तोमास सत्राजित ) करन लिए एनता है। स्तोत्र शत्रुओंको जीतनवाले ह । ३४ सूर्यस्य रमय इव द्वापयित्नव मत्सरास ३ कण्या इय [ १३६३ ]- कोंक समान (भृगवः प्रसुत आशव सर्गास तत तन्तु साक ईरते, इन्द्रात् करह। विश्व इत् इन्द्र आशत) भृगु सबम्यापक ईश्वरको प्राप्त ऋने किंचन घाम न पयत [11७०]- सूयकी फिरणों के समान प्ररणा करनवाले और मानद देनवाले शुख किए दिखाई दिया। ४ सूर्या इघ १३६३]- सूपके समान वह ई-घर उन्हें गए और बतन में रख गए सोमरस फलो हुई छलनीमसे एक ५ सूर्यस्य रश्मय इव [१३७०]- सूपकी फिरणोंकि दम नोचे रस हुए बतनम गिरते ह । वे इद्रके सिवाय और समान (मत्सराम परि हरते ) सोमरस नीचे आत ह । कोई स्थान पसद नहीं करते। ६ अत्क न[१३७२ कवचके समान (निक परि ३५ भय गो पृश्नि। मनमीत् । १३७६ 1- यह सूप अन्यत ) दूधका आवरण • मिश्रण सौम पर पड़ गया है । अपन तेजसे आकागमें उदय हो गया। इस प्रकार इस अध्यायमें उपमा आई है। एकादशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची बवता ऋग्वेवस्थान मत्रसत्या मेधातिथि कारव १२४७ माप्री-एक्स-[1] समिम गापत्री अग्नि, [२] तनूनपात [३] नराशंस [४]ळा १३४८ १३४९ ११५० १२१३२ श१३३३ श९३४ ७६४ प्राद६१ मेधातिथि काय मेधातिथि काय मेधातिथि काद वसिष्ठो मवाधरण वसिष्ठो मन्त्रावणि आदित्य " ( २२८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तराधिका मंत्रसंख्या देवता ऋषिः पसिष्ठो मंचावरणिः " ऋग्वेवस्थान ६६६ ८६१ दा ८१६४।३ प्रगायः काव: 10 " " प्रगापः काण्वः प्रगापः काकः " " १३५७ पवमानः सोमः " ९।२७३७ १९७१८ ९।९७५३९ दाश ८११२ " 1" (२) पराशरःशाक्त्यः मिष्टुप पराशरशाश्त्यः पराशरःशाक्त्यः प्रगाय: घोरःकावः प्रगाय:-(विषमा बृहती, समा सतो बहती) प्रगापः धौरः काण्यः मेध्यातिथिः काण्वः मेध्यातिथिः काव ध्यरुणस्त्रंवृष्णः प्रसदस्पः पोषकुरस्यः पवमानः सोमः पिपीलिका मध्या अतुष्टप ध्यरुणरत्रवृष्णः प्रसदस्यः पौरकुस्स्य: ध्यक्ष्णस्त्रदृष्णः त्रसदस्यः पौवारस्यः अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा. द्विपदा विराट अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः मानयो पिटण्या ऐश्वराः " १३६३ १३६४ १३६५ ८१६ ९।११०१ ९।११०१३ ९।११०१२ ९३१०९१ " " 1" " १३६७ " . " ९।१०९।२ " जगती १३७१ १३७२ ९।९।२ ९।२९।४ ७११ ७२ " " अग्निः विराट १३७४ हिरण्यस्दप गिर हिरण्यस्तूप आंगिरसः हिरण्यस्तूप आंगिरसः घसिष्ठी मैत्रावरणिः घसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावरगिः सापरासी सापरासी सापराशी " ॥ " भारमा सूर्यो वा गायत्री २०१८९१ २०११८९९ १०।१८९३ " " द्वादश अध्याय ] सामरदका सुगाध अनुवाद (२.१) अप द्वादशोऽध्यायः। अथ पठनपाठके द्वितीयोऽधं ॥६-२॥ [१] (१-२०) १ (१-२) गोतमो राहगण , १(३), ८, ११ वसिष्फो मंत्रायणि , २, ७ भादाजो याहस्परप , ३ मजा पतिवामित्रो वाच्यो या, ४, १३ सोभरि वार, ५ मेधातिथि-मेध्यातियो काग्यो, ६ (१) ऋनिश्वा भारद्वाश ६ (२) अतथा मौगिरस , ९ तिरश्चोरागिरस , १० मुतभर आत्रेय , १२, १९ नुमेघ-पुरुमेघावागिरसौ, १४ शुन-शेप आजोगति , १५ भोपा गौतम , १६ मेध्यातिथि काव , १७ रेणुश्वामिन , १८ पुत्स आगि रस , २० अगस्त्यो मंत्रावरुण ॥१२, ७, १०, १३-१४ अग्नि , ३, ६, ८, ११, १५, १७-१८ पधमान सोम, ४, ५, ९, १२, १६, १९, २०॥ १-२,७,१०१४, गायत्री, ३.९१९(१-२)२० (२-३ ) अनुष्टुप, ४, ६-१३ काकुम प्रगाय = (विषमा कनुप समा सतोहनी), ५, १५ (३) यहतो, ८, ११, १५, १८ शिष्टप, १२ १६ प्रगाय - (विपमा बहती रामा रातोबहतो), १७ जगती, २०(१) र घोग्रीवो मरती । २ २3"१ १२ १३७९ उपप्रयन्तो अघर मन्त्र वोचमामये । और अस्मे च शृण्वते ॥१॥(ऋ ११७४१) १३८० या स्त्रीहितीपु पूर्वः संजम्मानासु कृष्टिषु । अक्षदाशुषे गयम् ।। २ ।। ( १६७४२ ) १३८१ स नो वेदो अमात्यमनी रक्षतु शन्तमः । उनासान्पात्यहमः ॥ ३ ॥ (श्व ७।१५।३ ) १३८२ उत ब्रुवन्तु जन्तव उदमियबहाननि । धनञ्जयो रणेरणे ॥४॥ १ (ति)। [धार १९१ उ० १ । २०३१ (११७४१३ ) ३४ ३३३३३३३३ क २१ ॥ इति प्रयम खण्ड ॥१॥ - [१]प्रथम खण्ड । [ १३७९ ] ( अध्नर उप प्रय-त ) हिमाहित यज्ञ करनवाले हम (आरे च असे प्यते । दूरसे हो हमारी स्तुतियोंको सुननेवाले ( भग्नये ) अग्निके लिए (मत्र बोचेम ) मत्र बोलते है ॥ १॥ [१३८० [ (य पूर्य जो पहले से हो जापत है, वह मणि (स्नीहितीपु राष्ट्रिय सम्मानासु हिंसक ओर एकत्रित होने पर भी (दासुपे । दाताके लिए ( गय भरक्षत् ) परकी रक्षा करता है ॥२॥ [ १३८१] ( शन्तम स अग्नि ) अत्यन्त सुख देनेवाला वह अग्नि ( न चेद ) हमारे धन (अमा-स्य रक्षतु) पासमें सुरक्षित रख, ( उत् मरमान । और हमें ( अहस पातु ) पापोंसे सुरक्षित रख ॥ ३ ॥ [१३८२] (जून-हा ) शत्रुको पारनवाला (रणे रणे धनजय ) प्रत्येक युरमें शत्रुओंको हराकर धन जोतने- पाला ( माती उदजनि) आन प्रस्ट हुआ है, ( उत ) और अब (जन्तय वन्तु ) ऋविन उसकी स्तुति ॥४॥ है यहा पहला खण्ड समाप्त हुमा॥
(२२०)
सामवेदका सुबोध अनुयाद
[ उत्तराधिका
१
३
स३३३ । १31 र
१३
३२३
२२
२१
३
.. २३२३ २४
प
२२१२
१३८३ अग्ने युवा हि ये तवाचासो देव साधवः । अब वहन्त्याशवः ॥१॥ ( ६।१६।४३ )
१३८४ अच्छा नो याह्या बहामि प्रयासि वीतये । आ देवान्त्सोमपीतये ॥२॥(ऋ.६।१६।४४ )
१३८५ उदो भारत धुमदजस्रेण दविद्युतत् । शौचा वि भावजर ॥३॥ २ (यी)॥
[ धा० १७ । उ० नास्ति । स्व. ४ ] ( ६।१६।४५)
१३८६ प्र सुन्यानायान्धसो मतों न वष्ट तद्वचः ।
अप श्वानमराधस हता मखं न भृमय:
॥१॥ (१।१०१।१३)
१३८७ आ जामिरकै अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः ।
सरजारो न योपर्णा वरो न योनिमासदम्
॥२॥ (ऋ.९।१.१॥१४॥
१३८८ स पीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्म रोदसी ।
हरिः पवित्र अन्यत वैधा न योनिमासदम्
॥ ३ ॥३ (खै)॥
[ धा० २१ । उ० २। स्व०८ ] . ९।१०।१५)
[२] द्वितीयः खण्डः।
[१३८३ ] हे ( अग्ने देव ) अग्निदेव । (ये तव साधवः अश्वासः ) जो तेरे उत्तम और सुशील घोडे
(माशय रं वहन्ति ) शीघ्रतासे तुझे पहुचाते हैं, उनको (युंक्ष्य हि ) तू अपने रपमें जोड़ ॥ १ ॥
[ १३८४ ] है अग्ने ! ( नः अच्छ याहि ) हमारे पास तू सोधे आ (चीतये सोमपीतये ) अन्न भक्षणके बाद
सोम पीने के लिए (प्रयांसि अभि) हविरूप अनके पास ( देवान् आ वह ) देवोंको ले आ ॥ २ ॥
[१३८५ ] है ( भारत अमे) पोषण करनेवाले अग्ने । (उत शोच) तू प्रज्वलित हो। हे ( अ-जर) जरारहित
( दविद्युतत् ) तेजस्वी और ( द्युमत् । प्रकाशमान आने । (अ-अनेण विभाहि ) कम न होनेवाले तेजसे
प्रकाशित हो ॥३॥
[१३८६ ] ( सुग्धानाय अन्धसः ) रस निकाले गए सोमके विषय में ( तत् वचः) उन प्रसिद्ध शब्दोको (मतः
न चष्ट ) नोच मनुष्य न सुने । हे स्तुति करनेवालो। ( अ-राधसं श्वानं अप हत) विप्न करनेवाले पुत्तोंको मारो,
(भृगव मखं न ) निसप्रकार भृगुने दुष्ट मक्षको मारा ॥ १ ॥
[१३८७ ] ( जामि ) भाईके समान सोम (अरके आ अव्यत ) छलनीसे छाना जाता है । (ओपयो भुजे
पुषः न ) रक्षण करने वाले माता पिताको भनाओ में जैसे पुत्र रहता है, उसीप्रकार यह ( योनि आलदम् ) अपने कलशमें
जाने के लिए ( सरत् ) नीचे गिरता है (जारः योषणां न } जिसप्रकार जार होकी ओर जाता है, भथया ( यरन )
घर पति-कन्याकी ओर जाता है उत्तीप्रकार सोमरस कलाको ओर जाता है ॥२॥
१३८८ (दक्ष-साधन. सः वीरः ) बल बढाने के साधनसे युक्त वह वीर सोम (य. रोदसी वितस्तम्भ)
जिसने धुलोक और पुप्पोको अपने तेजले भर दिया है । ( येथाः न ) जिसप्तकार यजमान अपने घर आता है, उसीप्रकार
यह सोम (हरिः योनि आपदम् । हरे रगवाला होकर कलशमें आया है, वह ( पवित्रे अस्पत) छलनीमसे जना
जाता है ॥३॥
द्वादश मायाय] सामवेदफा सुयोध अनुवाद (२३१) ३१२ ३३३३३ ३१२ 25 ३३३३३ २१३३ ३३३ , २३११ १३३ 31 3 ३.२ ३1३3 १२३"३३३ 13153 3" २ " १३८९ अनाच्या अना वमनापिरिन्द्र जनुपा सनादसि । युघेदापित्यमिछमें ॥ १ ॥ (क. ८१९१११३) १३९० न की रेवन्त संख्याय विन्दरी पीयन्ति ते सुराधः । पदा कोपि नदनु समूहास्यादित्पितेव हयसे ॥२॥ ४ (पि)) [धा०१५ 1 उ०१। स्व० ₹ 1 (ऋ. २११४) १३९१ आ त्वा सहसमा श युक्ता रथे हिरण्यये। बझयुजो हरय इन्द्र कैशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥१॥ (ऋ. ८११२४) १३९२ आ त्या रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या । जितिष्ठा वहता मध्यौ अन्धसो विवक्षणस्य पीतये ॥२॥ (AIR२५) १३९३ पिया २३स्य गिर्वणः सुतस्य पूर्वपा इव । परिष्कृतस्य रसिन इयमासुतियाहर्मदाय पत्यते ॥३॥ ५ (प)॥ [धा १० । उ-1| ०१ (ऋ. १२६) [१३८९] हे (न्द्र) इन्द्र ! (स्य जनुपा अ-भ्रातयः तू जन्ममे हो शयरहित है । ( सनात् अ-ना। हमेशा नेसारहित और ( मनापिः असि ) भाईरहित है। जब { भापित्यं इच्छाले) तू भाईको इच्छा करता है, तम (युधा इत्) पुरसे हो वह चाहता है ॥ १॥ १. अ-श्राव्या- भाईरहित, शवरहित । २ अ-ना- जिसपर नियंत्रण रखनवाला कोई नहीं। ३ युधा इत्- युद्ध करके हो-शत्रुओं को दूर करके हो उपासकों को अपना मित्र बनाता है। १३९(रेवन्तं ) केवल धन उसके पास है, इसीलिए किसी मनुष्यको (सण्याय न किः विन्दसे ) तू अपना मित्र नहीं बनाता । (सुराभ्यः ते पीयन्ति ! शराब पीनेवाले नास्तिक तुझे दुख देते हैं। ( यदा नदनुं कृणोपि) जय ज्ञान प्राप्त करनेवालेको न अपना मिम बनाता है, तब (समूहसि ) उसे उत्तम मार्ग पर चलाता है। ( आदित् । तब (पिता व पसे । पिताके समान तू उनके द्वारा पुकारा जाता है ।। २ । ८१३९१ 1 हे । इन्द्र) इन्द्र! ( प्रह-युजः फेशिनः) मारेमे रथ जुड़ जानेवाले, मुन्धर मयालयासे, (हिरण्यये रये युक्ता.) सोनेके रपमें गोरे गए (सहस्रं शतं हरयः हजारों व संकों पोरे (सोम-पीतये त्या आहवन्तु ) सोम पोमे के लिए तुते यज्ञके स्थानपर ले आवें ॥१॥ १३९२] हे इन्द्र ! (मध्वः विवक्षणस्य अधिसः पीतये मोठे रससे युक्त तया स्तुत्य सोमो पाने के लिए (हिरण्यये रथे ) सुनहरे रपमें (मयूर-शेप्या शितिपृष्ठा हरी ) भोरके समान रंगवाले, सर पीयाले हो पोई (स्वा आवहतां) तुझे यहमें पहुंचावें ॥ २॥ ६ १३९३ 1 है ( गिर्वणः) तनीय इन्ट ! (परिष्कृतस्य पिनः अस्य सुतस्प) स्वच्छ किए गए रम युक्त इस सोमरसका (पिय) निसय पान कराती पूर्व-पाः इव ) प्रथम पोमेवाला है। (चारा इयं पातुतिः । सुपर पह सोमरस ( मदाय पस्यते । भानन्द देने के पोप है।"
(२३२)
सामवेदका सुवोध अनुवाद
[ उत्तरार्चियार
२२३
8
२
३१२ १२
२३1३
१३९४ आ सौता परि पिञ्चताश्वं न स्तोममातुर जस्तुरम् । वनप्रक्षमुदतम् ॥ १ ॥
(ऋ ९१५८७)
१३९५ सहस्रधारं वृषभं पयोदुई प्रियं देवाय जन्मने ।
ऋतन य मतजातो वियावृधे राजा देव पानं वृहत ॥ २॥ ६ (या)॥
[धा० १२ । उ० नास्ति । स०२] (ऋ.९।१०८1८)
इति द्वितीय खण्ड ॥२॥
[३]
१३९६ अग्निप्राणि जनविणस्युपिन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥ १ ॥ ( ६।१६।३४ )
१३९७ ग# मातुः पितुः पिता विदिद्युतानो अक्षरे । सदिन्नृतस्य योनिमा ।।२।। (ऋ ६।१६।३५ )
१३९८ ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्पणे । अग्ने यदीदयहिति ॥३॥ ७ (4)॥
[धा० १०( उ० नास्ति । स्व० १] (*.३१६३६ )
१३९९ अस्य प्रेपा हेमना पूयमानो देवा देवभिः समपृक्त रसम् ।
सुतः पचिन पर्येति रेभन्मितेव सद्म पशुमन्ति होता ॥१॥ (ऋ ९९७१)
[१३९४ है ऋत्विजो । (अश्च न } पोडेके समान { अन्तुर स्तोम ) जलाकरे वेगसे वहानेवाले प्रशमनीय
( रजस्तुरं धनप्रक्षं ) तेजको तेजीसे फैलाने वाले और पानीके समान गति करनेवाले ( उदपुतं आसोत) पानीमें
तरमेवाले सोमका रस निकालो और परि पिंचत) उसे पानीमें मिलाओ ॥ १ ॥
[ १३९५] ( सहस्र-धारं वृषभं) हजारों धाराओंसे छाना जानेवाला, बलवर्षक (पयो-दुई मियं) दूधर्म
मिलाये गए प्रिय सोमको ( देवाय जन्मने ) देषोंको देने के लिए शुद्ध करो। (देवः ऋतं) दिव्य और पक्षरूप ( गृहत्
ऋतजातः) महान् और यज्ञमें लाया गया ( यः राजा) जो राजा सोम है, वह ( ऋतेन वि घावृधे ) जलसे पढाया
जाता है ।। २॥
॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुआ ।
[३] तृतीयः खण्डः।
[१३९६ ] ( समिद्धः शुक्र ) प्रज्वलित और तेजस्वी ( आहुतः विपन्यया) आहुति दिया गया और स्तुति
किया गया ऐसा वह ( द्रविणस्युः भाग्नः ) पन देनेवाला अग्नि (पुत्राणि जघनत् । शत्रुओंको मारता है ॥१॥
[१३९७ ] ( मातुः गर्ने ) मातृभूमिमें ( अ-क्षरे ) अविनाशी यज्ञवेदीके स्थान पर (विदिद्युताना ) विशेष
प्रीप्त हुआ हुआ ( पितुः पिना चलोकका रक्षक अग्नि ( ऋतस्य योनि यज्ञकी वेदीमें (सासीदन् ) मंठा हुआ है ॥२॥
[१३९८ ] हे ( जातवेदः विचर्पणे अग्ने ) सर्वज्ञ, विशेष दृष्टा अग्ने । (प्रजावत् ब्रह्म आ भर ) पुत्रपौत्रोंसे
पुषत मन्न हमें है। ( यत् दिचि दीदयत् ) जो धुलोकमें देवताओंको दिया जाता है ॥ ३॥
[१३९९.] ( अस्य प्रेपा ) इस मोमका प्रेरणा देनेवाला और । हेमनाप्यमान देव । सोनेसे पवित्र होनेवाला
तेजस्वी ( रम देयेभिः समपन ) रस देवोंसे मिलता है। ( सुतारेभन् पवित्रं पति ) सोमरस शाद करता हुआ
छलनी धारा घनता है। (दोना मिना पशुमक्ति सन्नच ) जिराप्रकार हवन करनेवाला पगमान स्वयके द्वारा मनाये
गए पात मेिं जाता है, उसीप्रकार सोम लशमें जाता है॥१॥
-- স্নাহ ব্যাব? सामवेदफा सुबोध अनुवाद (२२३) ३९१३ ७१.३.११ ३ १ १ . य 3३ १२3 १४०० भद्रा यस्ता समन्या३ वसानो महान्कविर्निवचनानि शरसन् । आ वच्यस्य चम्पो पूयमानो विचक्षणी जागृविदैवीती ॥२॥ (३.९।९७२) १४.१ समुप्रियो मृज्य सानो अन्य यशस्वरो यस क्षेती अस्मै । अभि पर पन्या मानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा ना ३॥ ८ (रि)॥ (धा० १८१ ० नास्ति । स्व०३] (ऋ. ९।९७३) १४०२ एतो विन्द्ररस्तवाम शुद्ध शुद्धन साम्ना । शुद्धैरुक्थै ध्वारस शुद्धराशीर्वान्ममत्तु ॥१॥ (.८९९७ १४०३ इन्द्र शुद्धौ न आ गहि शुद्धः शुद्धामिरूतिमिः । शुद्धौ यि नि धारय शुद्धो माद्ध सौम्य ॥२॥ (भा. ८९५) १४०४ इन्द्र शुद्धौ हि नौ पिरशुद्धौ रत्नानि दाशुषे । शुद्धो वृत्राणि जिनसे शुद्धो पार सिपासास ॥३॥९ (पी)॥ [धा० १२ १३० नास्ति । स्व०४] ( . १९५१९) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥३॥ [१४०० (भद्रा समन्या यस्ता वसानः ) कल्याणकारक पुरके पोप ऐसे पात्रोको - तेजोंको धारप करनेवाला (महान् कविः) महान् शानी (नि वचनानि शंसन् ) स्तुति और स्तोत्रोंका कहनेवाला (विचक्षणः जागृचिः। गानी और भारत रहनेवाला यह सोम है, हे सोम! यह त (प्यमानः पवित्र होकर (देवाती मतमें (चम्यो मा पच्यस्थ) बर्तन में प्रविष्ट हो ॥२॥ [१४०१] 1 यशसा यशस्तर) पशायी होनेवालोंमें श्रेष्ठ पशवो ( क्षेतः प्रियः) भूमिपर उत्पन्न होकर सपको प्यारा लामेपाला ( सानी भव्ये ) पालोको श्रेष्ठ सनीमें ( असे सं मृज्यते हमारे लिए प्रशस्विनों द्वारा धाना गाता है। (पूरमान) पवित्र होरेवाला न मी (पन्या यमि स्नर) सानो धर्तन शप करते हए जा। (यूयं नः स्वस्तिभिः सदा पात ) तुम कल्याण करनेवाले सायनोसे हमारो हमेगा रक्षा करो ॥३॥ [१४०२] (नु पत उ ) तुम दो माओ । (शुद्धन साम्ना) हम गुर सामगायनरो और सुद्धः उपयो) दास मंत्रोस । गुर्च इन्त्र स्तवाम ) शुद्ध इसको स्तुति करते हैं। (धाभ्यास) सामासे यूनिको प्राप्त होनेराले पत्रको (शुद्धः आशीर्षान ) गुर और गाय के दूध के साथ मिला हुआ सोम { ममनु) प्रम पारे ॥१॥ [१४०३] हे ! (शुद्धान भागदि ) शुभ रहनेवाले हमारे पास मा शुखामिः अतिभिःगुदा) प्रय सण सापोंसे पुस्त, पद पवित्र तू (शुदा यि नि धारय) एकहकर हमें धन है ( सोम्य ) तोम पो. पास इन्त्र 1 (सुद्धा ममधि शुख होकर हम मानन्द प्राप्त करा ॥ २॥ [१४०४] है। इन्द्र) (गुरुः हिना रयि) एक है इसलिए तू हमें धन है । (शुद्धः दाशुषे रानानि पर रहकर दाताको रन है। (शुदा माणि जिनसेतु पर एकर सभोंको मारता है। (शुद्धः या सिपालसिपुर एकर मन्न देता है।।॥३॥ । यहां तीसरा सण्ड समाप्त हुम्य ।। ३० साम हिन्दी भा.२० .
(२३४)
सामका सुवोध अनुवाद
[उत्तरार्चिकः
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३२३ २७
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[४]
१४०५ अग्ने स्तोम मनामहे सिद्धमद्य दिविस्पृशः । देवस्य द्रविणस्यवः ॥ १॥ (ऋ. १।१३।२ )
१४०६ अगिर्जुषत नो गिरो होता यो मानुपेष्वा । स यक्षईव्यं जनम् ॥२॥ (ऋ. १।१३।३)
१४०७ त्वमग्ने सप्रथा असि जुटो होता वरेण्यः । त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥ ३ ॥ १० (रि)॥
[धा० १३ । उ० नास्ति । स्त्र. ३] (ऋ. १।१४)
१४०८ आभि त्रिपृष्ठं बृपणं वयोधामङ्गोपिणमवावर्शत वाणी ।
वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नपा दयते वार्याणि ॥१॥ (ऋ. ९९२)
१४०९ शूरपामा सर्ववीर। सहावान् जेता पवस्व सनिता धनानि ।
तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वपाढः साहान्पृतनासु शत्रून्
॥२॥ (ऋ ९९०३)
१४१० उरुगन्यतिरभयानि कृण्वन्समीचीने आ पयस्वा पुरन्धी ।
अप: सिपासन्नुषसः स्वऽ३र्गाः सं चिक्रदो महो असभ्यं वाजान् ॥३॥ ११ (५)॥
[घा० ३० । उ०१। स्व०६] (ऋ. १९०४)
[४] चतुर्थः खण्डः।
[१४०५] ( द्रषिणस्यवः ) पनकी इच्छा करनेवाले हम (दिवि-स्पृश. देवस्य मोः) भाकाशमें व्याप्त
होनेवाले तेजस्वी अग्निके ( सिद्धं स्तोमं ) सिद्धि देनेवाले स्तोत्रको ( अघ ) आज (मनामहे ) करते है ॥ १ ॥
[१४०६ ] ( होता यः अप्तिः ) हवन करनेवाला जो अग्नि ( मानुषेषु आ ) मनुष्योंके घरों में रहता है । (सा
नगिर जुपत ) यह हमारी स्तुतियोंको सुने, और ( दैव्यं जनं यक्षत् ) दिव्य जनोंको पूज्य पारे ॥ २॥
[ १४०५ ] है ( भने ) अग्ने ! ( जुष्टः घरेण्या होता त्वं ) प्रसन्न, थेष्ठ और हयन करनेवाला तू ( स-प्रथाः
असि ) सबसे श्रेष्ठ है । सब मनमान {त्यया) तेरे द्वारा हो ( यज्ञं वितन्वते ) यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥३॥
१०८] (त्रिपृष्ठं वृषणं ) तीनों सदनों में रहनेवाले बलवान् ( वयोघां) अन्न देनेवाले और ( अंगोपिणं )
पारद करनेवाले सोमकी (वाणी: अम्यवावशन्त) हमारी वाणियां स्तुति करती है ( यरुणः न) धरुणके समान ( वना
घसानः ) जलमें मिला हुमा (सिन्धुः रत्नधाः) गमनशील और रन देनेवाला सोम ( धार्याणि दयते ) स्वीकार
करने योग्य पन स्तुति करनेवालोको देता है ॥ ६॥
१४०९] हे सोम 1(शूरग्रामः सर्ववीरः) शूरोंके समूह और अनेक धोरोंसे युक्त (सदावानजेता) समन्यवान्
और विजयी (धनानि सनिता) घन देनेवाला (तिग्मायुधः क्षिप्रघन्या) तोरण शास्त्र पासमें रखनेवाला और शोमतासे
धनुष घलानेवाला (समरसु अपशब्दः) संग्राममें असह्य (पृतनासु शत्रून् साद्वान् ) युद्ध में पात्रुको हरानेवासान
सोम (पवस्व) कलशम उनता जा ॥२॥
[ १५२०] हे सोम ! (उर-गन्यूति. ) विस्तीर्ण मागवाला ( अभयानि कृण्यन ) निर्भय करनेवाला (पुररुधी
समीचीने पुर्वन् । पावापृपियोको जोडनेवासा ( आ पयस्व) तछनता जाऔर (अपः उपतः स्वःगा। सिपासन्)
जप्त, उपा सूर्य, किरणे मोर गार्यों का अपनी पुष्टि के लिए सेवन करता हमा (सं चिदातथा शब्द करता हुआ
(महा यासान् बहुत सारा पान (अरमन्यं) हमें दे ॥३॥
बादश अध्याय
सामवेदका सुयोध अनुवाद
(२३५)
३
३
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११
२११२
२
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"३"३
१४११ त्वमिन्द्र यमा अस्पृजीपी शसस्पति।।
त्वं वृप्राणि हस्पतीन्येक इत्पुर्वनुत्तचर्षणीधृतिः ॥ १॥ (3.८९०५)
१४१२ तम् त्वा नूनमसुर प्रचतसर राषो भागीमहे ।
महीव कत्तिा शरणा त इन्द्र न ते सुम्ना नो
अश्नवन् ॥२॥१२ ()॥
[ धार १४ । उ०१ । २०१] (ऋ. १९०६)
१४१३ यजिष्ठं त्वा वृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम् । अस्य यज्ञस सुक्रतुम् ।।१।। ( ८॥१९॥३)
१४१४ अपां नपातर सुभगर सुदीदितिममिम श्रेष्ठशोचिपम् ।
स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि ॥२॥१३ (वा)॥
[धा० १४ । उ०१३ स्व०२] (ऋ ॥१९१४)
॥ इति चतुर्थ, सण्डा ॥ ४ ॥
[५]
१४१५ यमग्ने पृत्सु मर्पमवा वाजेषु पं जुना । स यन्ता शश्वतीरिषा ॥१॥ (ऋ. १२२७१७ )
१४१६ न किरस्य सहन्त्य पर्यंता कर्यस्य चित् । वाजो अस्ति श्रायः ॥ २॥ 8. १२७८)
८ १११] हे { इन्द्र) इन्द्र ! (त्वं )तु (शवस. पतिः ऋोपी ) पलका स्वामी और सोमको इच्छा करने
पाला तया ( यशाः असि ) यशस्वी हैं। ( अनुत्त. चर्पणी-धृतिः त्वं ) अपराजित और सब मनुष्योंका आपार तू
( एक इत) अकेला ही ( अप्रतीनि प्राणि) बलवान् शत्रुओंको ( पुरु इसि ) बहुत सख्या मारता है ॥ १॥
[२११२] है (मसुर इन्द्र बलवान् इन्द्र ! (ते प्रनेनसं स्वार) उस ज्ञानसे युक्त तेरे याससे (भागंइव ।
पितासे निसप्रकार पनका भाग मागते हैं, उसीधकार ( राधा नूनं ईमहे ) हम घन मांगते हैं। (कृत्तिःच्च ) पडे घोगेके
समान (ते मही शरणा ) तेरे विस्तृत स्थान हमें बाधय देने वाले हैं, ( ते सुम्ना ) तेरे उत्तम मन मनानेमाले सुख (मः
प्राश्नुवन् ) हमें प्राप्त हो ॥२॥
२४१३] हे अग्ने ! ( देवना देखें ) पेयोंमें अधिक दिग्य ( होतार अमत्यै ) हपन करनेवाले, अमर ( अस्य
यक्षम्य सुझर्नु ) इस यशको उत्तम रोतिसे करनेवाले ( यजिष्ठं त्या धमहे ) पशके कर्ता तेरी हम भक्ति करते हैं ॥१॥
[१४१४ 7(अपात-पात जलाशो न गिरानेयाले (सुभग सु-दीदिति उत्तम माण्यवान और उत्तम तेनसे
तेजस्वी (श्रेष्ठ-शोचिप अग्नि) तया श्रेष्ठ ज्वालाओंसे युक्त अग्निको हम प्रार्थना करते हैं । ( साना) वह हमें (दिवि
मिन्नस्य वरुणस्य ) यज्ञस्थानमें रहनेवाले भित्र मौर वरुणके द्वारा मिलनेवाले (सुम्न यक्षते ) सुख देवे, (सः गपां)
यह हमें जलोंसे मिलनेकाले मुख देवे ॥२॥
। यहाँ चौथा खण्ड समास हुमा ।
[५] पञ्चमः खण्डः।
[ १४१५] है (अग्ने ) अग्ने । (पृत्सु यं मयै सवा ) संग्राम जिस मनुष्यको तू रक्षा करता है, (वाजेपुयं
शुना) स्पर्षामें जिस पुरुषको तु प्रेरणा देता है (स। वह (शश्वतीयः यन्ता) हमेशा अम प्राप्त करता है ॥ १ ॥
(१४१६३ हे (सहन्त्य ) शझुओंको हरातेवाले भग्ने ! (अस्य कयस्य पर्येता न कि चिद) स तेरे
भरतका पराभव करनेवाला कोई भी नहीं, मयोंकि इसका (श्रयाय्य. वाजः अस्ति) यास्यो पल प्रसिब है ॥२॥
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्षिका
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१४१७ स वाजं विश्वचर्षणिरवद्भिरस्तु तरुता । विप्रेभिरस्तु सनिसा ॥३॥ १४ (ठा)॥
[धा०१८ । उ० २ । स्व०२] ( ऋ. १२९)
१४१८ साकमुशो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य पीतयो धनुत्री।
हरि पर्यद्रवः सूर्यस्य द्रोण ननक्षे अस्पो न बाजी
॥१॥ (व. ९९२१)
१४१९ सं मातृभिर्न शिशुर्वावशानो वृषा दधन्ये पुरुवारो अद्भिः ।
मयों न योपामभिः निष्कृतं यन्सं गच्छठे कलश उनियाभिः ॥२॥ (ऋ. ९।९।२ )
१४२० उत प्र पिप्प जघरघ्न्याया इन्दुर्धारामिा सचते सुमेधाः ।
मूर्धानं गावः पयसा चम्घमि श्रीणन्ति वसुभिर्न निक्तः ॥३॥ १५ (पू) ।।
[धा ३० । उ० नास्ति । १०६] (ऋ ९९२३)
१४२१ पिना सुतस्य रसिनो मरस्वा न इन्द्र गोमतः ।
आपिनों योधि सधमाये वृधे ऽसाथ अवन्तु ते धियः ॥१॥ (ऋ.श)
[१४१७] (विश्व-चर्षणिः सः) सव मनुष्योंका कल्याण करनेवाला यह अग्नि ( अर्वद्भिः वाजं तरुता
अस्तु ) घोडके द्वारा युद्ध जय प्राप्त कराने वाला होवे, (विमेभिः सनिता मस्तु ) तया शानियों द्वारा प्रसन्न किया
गया यह अग्नि हर्ने फल देनेवाला हो . ३ ॥
[१४२८1 (सा उक्षा स्ससार) एक साथ कार्य करनेवाली मे अंगुलियां (मर्जयन्त सोमरसको शुद्ध करती
है । (दश धीतयः ) ये दो अगुलियो (धीरस्य धनुनीः ) इस धैर्यधारी सोममें हलचल पैदा करती है। बादमें (हरिः
सूर्यस्य जा. पर्यवत् ) यह हरे रगका सोम सूर्यको दिशाले छाना जाता है । ( वाजीम अत्यः ) घोडेके समान पह
धचल सोम (द्रोणं ननक्षे) कलशमें जाता है ॥ १॥
[ १४१९] (यायशानः) देवता जिसको इच्छा करते है (पुरुयारः) भनेक जिसे प्राप्त करनेको पछा करते है
ऐसा मह (पा) मलवान् सोम (अद्भिः सं दधन्वे) पानीके साथ मिलाया जाता है, (मातृभिः शिशुःन ) मातासे
जैसे पुत्र मिलाया नाता है, अपवा (मर्यः योपांन) पुरुष जवान स्त्रीसे नैरो मिलता है उसीप्रकार सोम पानी में मिलाया
जाता है। (निस्तं अभियन् ) अपने संस्कार किये जानेवाले स्थान पर जाने के लिए (कलशे)कलशमें (उशियामि
संगच्छते) गापकै दूधके साथ सोमरस मिलाया जाता है।॥ २॥
[१४२० ] (उत अध्यायाः ऊधः प्रपिप्ये) और गायके दुग्धाशयको यह सोम अधिक पूर्ण करता है। (सु.
मेघा दुः) उत्तम मुद्धिमान् यह सोम (धाराभिः सचते) पाराओंसे मिलाया जाता है । (गायः चमूषु मूर्धाने)
गायें यतनमें रहनेवाले श्रेष्ठ सौमको (निकै वसुभिःन) जिसप्रकार लोग स्वच्छ से अपने आपको बाच्छादित करते
है, उसोपवार (पयसा अभि धीणन्ति ) अपने दूघसे आध्यादित करती है ॥३॥
[१४२१] हे (इन्द्र) इन्द्र। (गोमतः नारसिनः सुतस्य) मायके दूपसे युक्त, हमारे द्वारा निचोरे गए
सोमाराको (पिथ, मत्स्व ) पो बोर मानन्दित हो।(सघमाः मापितमा वृधे घोषि) एक जगह बैठकर पीने समय
भाकि समान हमें माना है। यह जान । (तेरिया ममान गरन्तु) तेरी बुटिया हमारी रक्षा करें ॥१॥
द्वादश मण्याय] सामवेदका सुबोध मनुवाद (२७) 1 - २. १ १५२२ भूयाम ते सुमतौ याजिनो वयं मा न स्तरभिमातये । असा चित्राभिरवतादमिष्टिमिरा ना सुनेषु यामय ॥२॥ १६ (ल)॥ [धा०1४1 30 नास्ति । स.17(२) १४२३ शिरस्मै सप्त धेनवो दुहिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि । चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिज चारूणि चक्रे पडतरवर्षत ॥१॥ ( १७०१) १४२४ स भक्षमाणो अमृतस्य धारुण उमे चाचा कोपेना विश्रये । तेजिष्ठा अपो मरहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः ॥२॥(ऋ.९।७०।१ ) १४२५ ते अस्य सन्तु केवोऽमृत्यवोऽदाभ्यासो जनुपी उमे अनु । येभिर्नेम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगम्णत ॥ ३ ॥ १७ (चे ।। [धा ३२ 11०11०७] ( ९७०१३) ११३ १२३ . २६९ 31 र घ ॥ इति पश्चम खण्ड ॥५॥ ( १९२२] हे ! (घयं ते सुमती) हम तेरे अनुकूल उत्तम भुखिम रहकर (वाजिनः भूयाम ) मलयात् हो । ( अभिमातये) शत्रुओंके लिए(नः मास्त.) हमारा नाश मकर । अपितु ( अभिष्टिभिः चिगमिः ऊतिमि.]) छित और सामयं युक्त सरक्षसि (अस्मान अयतात) हमारा सरक्षण कर और ( सुनेषु नः आयामय ) सुख समुनियोंमें हमें बढा ॥२॥ [१५२३ ] (परमे व्योमनि असी ] अन्तरिक्ष में रहनेवाले इस सोमको । (निस धेनवः) कोस गाय (सत्यां आशिरं दुहिरे) उत्तम दूध देती है। और यह सोम (पत्) जय ( ते अवत) पोंसे बताया जाता है, तब (मन्या चत्वारि भुवनानि ) अन्य पार प्रकारके पानीको (निर्णिजे धारूणि चक्रे ) छानने में सहायक होता है ॥ १॥ (१४२४ ३ (चार ममृता) रतम जलश (मक्षमाण, सः) इयर करनेवाला यह सरेम (उभे धाया) धोनों और पृथ्योलोरुको (काव्येन विशथे) स्तुतिस्तोत्रों के द्वारा जलसे परिपूर्ण करता है । (तेजिष्ठा. अप.) तेजस्वी पानीको (महना परिष्यत ) अपने महत्वसे ढक देता है (यदि ) इस समय ऋरिया (देयस्य सदः) इस विष्य सोमके स्थानको (श्रवसा विदुः। यतके लिए हविसे युक्त करते हैं ॥ २॥ [१४२५] (अमृत्यव. सदाभ्यास.) भमर और न ददामे जानेवाली (अस्प ते फेतयः)स सोमको किरणे (उभे जनुपी मनु सन्तु) दोनों प्राणियोको सुरक्षित एसतो है। (येभिः) जिन किरणोंस सोम (नम्णा च देण्याच) अपने सामयोंको और देवोहो देने योग्य मन्त्रोको (पुतते) देयोंको भोर प्रेरित करता है। (भात् इत् ) यादमें (राजानं ) सोग रामाको ( मनना भगृम्णत) स्तुतियां प्राप्त होती है ॥ ३॥ "यहां पायर्या सण्ड समाप्त हुमा॥
(२३८)
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिका
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२९३३
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१ १
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[६]
१४२६ अमि वा वीयर्या गृणानोऽमि मित्रावरुणा पूयमानः ।
अभी नर धीजवन५ रथेष्ठाममीन्द्र वृपणं वज्रबाहुम्
॥१॥ ( ९९७१४९)
१४२७ अमि वसा सुवसनान्यर्षामि धेनूः सुदुधाः पूयमानः ।
अमि चन्द्रा भर्तये नो हिरण्याभ्यश्वात्रथिनो देव सोम
॥२॥ (ऋ. ९।९७४५०)
१४२८ अभी नो अर्ष दिव्या षन्यामि विश्वा पार्थिवा पूयमानः ।
अभि येन द्रविणमनवामाभ्यापर्य जमदमिवनः
।। ३॥ १८ (से)॥
[धा० २१ । उ० २ । स्व०७] (ऋ. ९९७५१ )
१४२९ यज्जायथा अपूर्व मघवन्वृत्रहत्याप ।
तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तम्ना उतो दिवम्
॥१॥ (३.९५)
१४३० तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः।
तदिवमिभ्रसि यज्जातं यय जन्त्वम्
॥२॥ ( ८1८९६)
[६] षष्ठः खण्डः।
[४२६] हे सोम! (गृणानः )स्तुति किए जाने के बाद दू (वीति घायु अनि अर्प) पौनके लिए यायुके पास
गा।(पूयमानः मित्रावरुणी अभि) साफ होके मार मित्र मोर घणवे पाता।(नरं-धी-जयनं) तोंके नेता
भौर भूमिको देनेवाले (रयेष्ठा अभि) रथमें हुए अश्विनीकुमारों के पास जा, तपा (धूपणं पस-याई इन्द्र अमि)
पलवान्, पसरे समान जिसरी भुजायें है, ऐसे इन्द्ररे पास भी जा॥ १ ॥
[१४२७ ] है (देय सोम ) दिव्य सोम! तू हमें ((सु पसनानि पत्रा मभ्यर्प ) उसग पहनने योग्य वस्त्र
है। (पूयमानः) साफ होनेवाला तू (सुदुघाः धेनूः अभि) उतम रूप देनेवाली गाम है। (भर्तये) भरण पोषणके
लिए (मःचन्द्रा हिरण्या अभि) हमें सैजम्यो सोना दे और (रथिनः अश्यान् ममि) रपके साथ पोरे थे ॥२॥
[२४२८] हे सोम 1 (पूयमान:) ना जानेवाला तू (नादिश्या यनि मभ्यर्प)हमें विष्य पन रे ।
(पापिया विभ्या अमि) पावो पर राम ऐश्वर दे। (येन द्रविणं अनुयाम अभि) जिससे हमें पन मिले वह
सामर्म हमें। (जमदनियत् भाये नः) जमदग्निके समान ऋषियोंकि पन भो हमें रे ॥ ३ ॥
[१४२९1 (गपूळ मघपन् । हे अपूर्व ! (त्रहत्याप यत् जायथा ) शत्रुओरा नाश करनेरे लिए
गरतू प्रकट होता है, तब (सत् पियर्थी अप्रथपा) तूने पावोसो दूर रिया (उत् उ तत् दिवं अस्तम्नाः) मोर
धुनोपरी मपर स्ताप किया ॥३॥
१४३०] हे ! (तत् ते याः मजायत ) उप्त समप तेरे लिए यह हए (उत तत् इति भक। )
तब निरोपनाराका पूर्व उत्पन्न हुमा । ( यत् जातं यत् जनयं) नोहा मोर होनेवाला है(तत् यिश्य मभिमः
अति) नसोकोतुहरानेवाला है ॥२॥
मावश अध्याय) सामवेदका सुयोध अनुवाद (२३९) ३"".03 t ३१३३७.२ ३१ २३३३ १३ १२ ३३.१ ३४३ १४३१ आमासु पफमैश्य आ सूर्य रोहयो दिषि धर्म न साम पता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे वृहत् ॥३॥१९ (ये)॥ [धा० ३० । २०१।२०७] (प्र. ८०८९७) १४३२ मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरियो मत्सरो मदः । वृषा ते वृष्ण इन्दुजी सहस्रसातमा ॥१॥(ऋ ११७५/१) १४३३ आनस्ते गन्तु मत्सरो वृषा मदो वरेण्यः । सहावार इन्द्र सानसि पृतनापाडमर्त्यः ॥२॥ (१११७२) १४३४ व हि शूरः सनिता चोदयो मनुपो रथम् । सहावान्दस्युमनतमोपा पात्र न शोचिपा ॥३॥ २० (वि)॥ [धा० २६ । १०६ । स्व० ३ (११७॥३) ।। इति षष्ठ सपा ॥६॥ ति पठनपाठके द्वितीयोय ||६-२॥ वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १२॥ [ १४३१] हे इन्द्र ! ( आमासु पक्वं ऐरय ) अपक्व गायोंमें परिपक्व दूधको तूने उत्पन्न किया। (दिवि सूर्य अरोहया) लोकमें सूर्यको पढापा । (धर्म सामं न ) जिसप्रकार प्रवर्ग पलको जलाते हैं, उसोप्रकार (सु तिमि तपत) उत्तम स्तुतियोंग इन्द्रको तपाओ, उत्साहित करो। (गिर्वणसे जुष्टं वृहत् ) स्तुत्य हनको आनन देने के लिए महत् सामका गान करो॥३॥ [ १३३२ ] हे (हरिव ) घोडे पास रखनेवाले इन्द्र ! (महः पात्रस्य इय ते ) घड़े बर्तनके समान महान है। (कृष्णः ते) बलयुक्त तेरे लिए (मरसर मदः पा) आनन्ददायक, हर्षवर्धक, मल मनानेवाला (बाजी सहल. सातमा इन्दु.) स्लान मोर हजारों दान देनेवाला जो सोमरस है, उसे ( अयायि मस्सि) पो और आनन्दित हो ॥१॥ १४३३J है (इन्द्रः)! (ते) तेरे लिए तैय्यार किया गया यह (धूपा मदः) बलवर्धक, आन यदायक (घरेण्या सहायान्) श्रेष्ठ, सामर्यवान् ( सानसिः पृतनापाट्) पीने योग्य, शशुओंको हानेवाला ( अमय मत्सर. आगन्तु ) ममर और आनन्द देनेवाला सोमरस तुझे प्राप्त होवे ॥ २॥ [१४३४ ] हे इन्द्र ! (त्वं हि भारः सनिता) तशूर और वानका देनेवाला है, (मनुपः रथं धोदय ) मनुष्पके मनोरपोंको उत्तम प्रकारले प्रेरित कर। (सहावान) सहायता करनेवाला होकर ( मनिशोचिषा पान ) जिस प्रकार अग्नि अपनी प्रवासासे बर्तन मला डालता है, उसीप्रकार (दस्यु अमतं भोप ) दुष्ट और वत पारून न करनेवालेको जलाल।।३॥ ॥ रति द्वादशोऽध्यायः (२४०) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तराचिका द्वादश अध्याय . इस अध्यारमें इन देवताका वर्णन इस प्रकार है सब मनुष्योंका धारण करनेवाला अकेला होतु महत परवान् १ हे इन्द्र ! त्वं जनुपा अ-धान्यः [१३८९]- है शत्रुओंको हराता है । पर! तू जन्मसे शहित है। तेरा कोई शत्र नहीं । यहा ९ ते धियः अस्मान् अवन्तु [१४२१]- तेरो बुखियां भ्रासृत्य "शग्य भाईचन्युका भाव दिखाता है। भाई,माईमें हमारी रक्षा करें। वर होना स्वाभाविक है, ऐसा प्रतीत होता है। वैदिककालमें १० वयं ते सुमतो घाजिनः भूयाम [ १४२२ 1- हम भी " भ्रातृव्य" पद वैरभावका द्योतक था। जन्मसे ही तेरो अनुकुलतासे बलवान हों। उनका कोई भाई नहीं, जिससे देष हो सके। ११ नामा स्त। [१४२२]- हमारा ना मत कर। २ सनात् अन्मा [१३८९]- तुझ पर नेतृत्व करने १२ अभिष्टिभिः चित्राभिः [ऊतिभिः) भस्मान् पाला कोई नहीं। यवतास् [१४२२]-इष्ट और सामर्यगन् तपा विलक्षण ३ अनापिः अलि [ १३८९]- तू भाईरहित है । तेरा सरक्षणके सापनोंसे हमारी रक्षा कर। कोई भाई नहीं, सेरा सहायक कोई नहीं। १३ सुसेपु नः आयामय [ १४२२]- सुख समसिमें ४ आपित्वाच्छसे युधा इत् [ ११८९]- जव हमें यदा। २४ हे इन्द्र ! शुद्धः नः रयि, शुशा दाशुषे रत्नानि भाई चाहता है, तब युद्ध करके शत्रुओंको दूर करता है मौर लोगोंको अपना मित्र बनाता है। [ १४०४]-हे इन्द्र । सुर और पवित्रत हमें धन दे, शुद्ध तू दाताको रत्न दे। इन्द्रका भाई नहीं, नेता नहीं, मित्र नहीं, ऐसा यह मन्त्र १५ शुद्धा त्राणि जिनसे [ १४०४ ]- ब. भला ही है। पर वह अपनी अपार शक्तिसे सबसे अधिक को मारता है। सामर्यवान है। और अकेला हो जो कुछ करना होता है १६ शुद्ध वाजं सिषाससि [ १४०४ ]- शुभ व मम करके दिखाता है । जिसका मेता, भाई, मित्र कोई दूसरा देता है। नहीं, फिर भी यह सब कुछ करता है। इससे उसकी अपार पाक्तिका शान होता है । वह अकेला ही सबसे अधिक दारित. [१४३०)जो उपहुए या होनेवाले है उन सबको त १७ यत् जातं यत् जन्वं तत् विश्यं अभिभूः मसि भाली है, इसलिए वह मकेला ही सब कुछ करता है। हरानेवाला है। ५ रेषन्तं सख्याय न फिर बिन्दसे [१३९०)- केवल १८ है मपूर्वी ! मघयन् ! यत् पृत्रहस्याय त्य कोई पनपान है, इसलिए उसे अपना मित्र नहीं बनाता। जायथा, तत् पृथिर्थी अप्रथया, उत दिपं अस्तम्नाः उसमें कौनसे अब गुग है, यह न देवता है और जो गुण. [१४२९]- है अपूर्व इन ! शत्रुका नाश करने के लिए जब मान है उसे हो सपना मित्र बनाता है। सप्यार हुआ, तब तूने पृथ्वीको त दिया और दुलोकको ६ यदा नदनुं कृणोपि, समूहसि, मादित् पिता ऊपर ताप किया। इप इयसे । १३९० -अब मान प्राप्त करनेवालेको १९ हे इन्द्रः ! त्वं शूरः सनिताxy-हेगा। मित्र बनाता है, तब उसे सन्मार्गसे चलाकर समव बनता है। तू शूर है मौर बाता है! तर लोग तेरी पिताके समान स्तुति करते हैं। क्योंकि पिता २० मनुपा रयं चोदय [१४३४]- मनुष्योत मनोप अपने बाघोंको उत्तम मार्ग पर चलाता है, मौर उनरी उन्नति सिट हो ऐसी प्रेरणा कर। हेन्द्र शपसः पतिः यशाः असि[१४१0 सामथान होकर नियम न पाहन परनेवाले शुष्टोको नष्ट २१ सहायान् भनतं दस्युं भोपः [v]. -हमालया है और उम कारण यदास्वी मी है। कर दे। ८ भनुपः घर्षणापति पं एका इस मप्रतानि, २२ देगसरमा प्रचेतसं त्या भागापरापा पुर पुत्राणि सिrit]- पराजित न होनेदाला और नूनं मदे । १४१२]-हे पलान् ! मारा ऐसे द्वादश अध्याय) सामवेदका सुबोध यनुवाद (२४१) तेरे पास हम धनका भाग मांगते है । अपने पिताते जैसे इन्न ! तू गड होकर हमारे पास आ। सरदाग मांगते है, वैसे ही यतका माग हम मांगते है। सायनोंसे मृद्ध होकर हमें पन दे और शुद्ध होकर सोम २२ ते मही शरणा [ १४१२ ]- तेरा महान् स्थान पौकर मानन्दित हो। भाभय लेने योग्य है। ६ हे इन्द्र नः रसिनः गोमतः सुतस्य पिर, २४ ते सुम्ना नः प्रानुक्न [ १४१२]- तुमसे उत्तम मत्स्य । सधमाघे यापिः न घे योधि [ १४२१]- मन मांगते हैं। है इस! गायक धूपसे मिश्रित तया हमारे द्वारा निचोडे २५ आमासु पक्वं ऐरयः [ १४३१ ]- गापोंमें पका गए सोमरस पी और मानन्दित हो । एकत्र घटकर पोनको दूध उत्पन्न करता है। जाह- यशस्थान-में मित्रो समान हमारा संवर्धन करना है, २६ दिवि सूर्य अरोहय. (१४३१]- भाषाशामें सूर्यको यह जान । ऊपर बताया। ब्रह्मयुजः केशिनः हिरण्यये रथे २७ तत् ते यशः अजायत [ १४३० -तब तेरे लिए युफ्ता सहस्रं शतं हरयः सोमपीतये त्वा यहन्तु पा एहए। तू महान् प्रतापी होने के कारण प्रज्ञके द्वारा [ १३९१ 1- है इन्द्र ! शब्दोंके इशारेसे जुड जानेवाले, रा सन्मान लोग करते है। उत्तम अयालवाले, सोनेके त्यमें जुड़े हुए हगारों और सैकड़ों २८ गिर्वणसे जुएं गृहत् [१४११]- प्रशंसनीय घोडे सोम पीने के लिए तुझे टो कर ले जाते है। इन्द्रको मानन्द देने के लिए बहत् सागका गायन किया ८ मध्यः विवक्षणस्य अन्धसः पीतये हिरण्यये जाता है। रथे मयूर-शेप्या शितिपृष्ठा हरी त्या आ पहताम् इस प्रकार इन्द्रका वर्णन मंत्रों द्वारा किया गया है। इस [ १३९२ - मधुर रस युक्त, मर्शसनीय सोमरस पीने के इसके लिए पर करते हैं और उनमें उसको पो के लिए लिए सोनेके रथसे मोरपत्रके समान सुन्दर रंगके अयालयाले सोमरस देते हैं। तथा सफेद पौठवाले दोनों घोडे सुझै पहुचाएँ । इन्द्रको सोम इस प्रकार इनके सोम पीने के लिए यज्ञमें जानेका वर्णन है। १ वाजी सहरसातमः अपायि मत्सि[१४३२] अमि -बलवान् और हजारों प्रकारके वान देनेवाला इन्द्र सोमरस पोता है और आनन्दित होता है। अग्निदेवका वर्णन इस अध्यायमें इस प्रकार आया है। २ हे इन्द्र तेघुपामा वरेण्या सहायान सानसिः १ आरे असे ते अग्नये मंत्रं योचेम [१३७९] पृतनागद, अमर्त्यः मत्सरः गन्तु [१४२३]- है इन्द्र ! -दूर रहकर भी हमारी प्रार्थनाओंको सुननेवाले अग्निके तेरे लिए तैयार किया गया यह बलवान और आनन्द देने- लिए हम मात्र योलते हैं। मत्रों के द्वारा उसको स्तुति करते हैं। बाला, श्रेष्ठ और सामथ्र्य युक्त, सेवन करने के योग्य, शत्रुओं २ पूर्यः स्मीहिता'कृष्टिषु संजग्मानासु दाशुषे गये मोहरानेवाला, अमर मल्हाददायक सोमरस तुझे प्राप्त हो । अरक्षत् [ १३८० ]- पहले हो हिसक शत्रु सन्यय इको ३ त्य पूर्वपाः असि । इयं चारुः आसुतिः मदाय होनेपर भी वानो मनुष्यके घरको पह मग्नि रक्षा करता है। पत्यते [१३९३]- तू प्रथम पीनेवाला है। यह सुन्दर ३ शंतमः सः भग्निानः वेद, अमा-त्यं रक्षतु उत सोमरस तो मानन्द देने योग्य है। अस्मान् अंहसः पातु [ १३८१]- सायन्त सुखमय शान्ति शुद्धेन सान्ता, शुद्धः उक्थैः, शुद्धं इन्दं स्तयाम। देनेवाला यह अग्नि हमारा पन अश्या जो कुछ हमारे पास पाध्वांस शुद्धः आशीर्यान् ममन्तु [ १४०२]- शुद्ध है उस सवको सुरक्षित रखे, तथा हमें पापोंसे बचाये । सामगायनसे, शुद्ध स्तोत्रोसे, शुद्ध इन्द्रकी हम स्तुति करते ४ दृत्रहा रणे धनंजयः अग्निः उपजनि [ १३८२ ] है। भारम-सामसे बहनेवाले इन्त्रको शुद्ध गायके दूपये का नाश करनेवाला और प्रत्येक युद्ध में धन देनेवाला मिलकर सोमरस प्रसन्न करे। अग्नि प्रकट हो गया है। ५ हे इन्द्र ! शुद्धः नः आगहि ।शुद्धामिः ऊतिभिः ५ हे भारत अग्ने ! उत् शोच! हे अजर! ददि- शुद्धः राय नि धारय । शुद्धः ममाद्ध [ १४.३]- है, यतत् द्युमम् अजन्त्रेण विभाहि[१३८५J-हे भाणोपण ३१ [साम. हिन्दी भा..]
(२४२) सामवेदका सुयोध अनुयाद [उत्तराचिका वर्णन है। करनेवाले माने । प्रज्वलित हो। हे जरारहित । तेजस्वी देवोंके लिए सोम औरप्रकारामात मग्ने ! कम होनेवाले तेजसे तू प्रकाशित हो। १ गृणानः बीति वायु अनि अर्ष [१४२६]- हे सोम! ६ समिद्धा शुक्रः आहुतः द्रविणस्युः आग्निः नाणि जंघनत् । १३९६]- प्रज्वलित, तेजस्वी, आहुति स्तुतिके बाद पीनेके लिए वायुके पास जा। युक्त, पन देनेवाला अनि शत्रुओंको मारता है। २ पूयमानः मित्रावरुणौ अमि अर्ष [१४२६/- स्वच्छ किए जाने के बाद मित्र और वरुणके पास जा। ७ हे अग्ने ! पृत्सु य मत्य अया, वाजेषु यं जुनार, ३ नरं धीजवनं रथेष्ठां अभि अप[१४२६J- नेताको सः शश्वतीः इषः यन्ता (१४१५]- हे अग्ने ! तू सम्राममें मुद्धिको गति देनेवाले और रथमें ऐठनेवाले अश्विनोको जिसको रक्षा करता है, स्पर्धाम जिसको तू प्रेरणा देता है, मोर जा। यह सदा अन्न प्राप्त करता है। ८ हे सहन्त्य ! अस्य कयस्य पर्यंता न किः । ४ वृपणं वज्रयाटुं इन्द्रं अमि वर्ष [१४२६]- वाग्यः याजः अस्ति [१४१६ ]- है शत्रुओंको हराने बलवान् और वनके समान वाटओंयाले इन्द्र के पास जा । बाले अग्ने ! इस तेरे भक्तको कोई भी नहीं हरा सकता। इस प्रकार देवोंको सोमरस दिये जाने के सम्बन्धमें इसका यशस्वी बल प्रसिद्ध है। ९ सः विश्वचर्षणिः अर्वद्भिः चा तक्ता अस्तु, सोम विप्रेभिः सनिता अस्तु [ १४१७]- यह सब मनुयोका १ दक्षसाधनः सः धीः रोदसी यि तस्तम्भ कल्याण करनेवाला अग्नि घोडके युद्ध में विजय प्राप्त कराने- १३८८]- बल मदानेका साधन यह शूर सोम अपने तेजसे वाला और शानिरों द्वारा प्ररान किया गया है। घावापूर्षियीको भर देता है। १० हे भने । प्रजावत् ग्रह मा भर [ १३९८]-हे २ हरिः योनि आसदम् [१२८८-हरे रगका सोम अग्ने ! पुत्रपौत्रकि साय होनेवाले मन्त्र हमें भरपूर दे। १५ होता माग्नि मानुषेषु साना गिरःजुषत। ३ पवित्र अभ्यत [ १३८८ ]- सोम छसनोरो छाना दैव्यं जनं यक्षत् [ १४०६ - हयन जिसमें होता है ऐसा जाता है। अग्नि मानो घरमें रहता है। वह हमारी स्तुति सुने और ४ अप्तुरं स्तोमं रजस्तुरं घनप्रक्षं उदभुतं आसोत, दिव्य जनको अधिक पवित्र करे। परि पिञ्चत [१३९४]- पानी में शोमतासे मिलने कीरच्या १२ अपां न सुभगं सुदीदिति श्रेष्ठशोचिप करनेवाले तेजस्वी तया पाश्रमें रहनेवाले सोगरराको निकाल कर उसमें पानी मिला। थग्नि १४१४]- कर्मों का पालन करनेवाला, उत्तम भाग्यवान् तेजस्वी, प्रकाशमान अग्निको हम प्रार्थना करते हैं। ५ सहस्रधार पृषभं पयोदुह प्रियं देवाय जन्मने १३९५- हजारों धारामोसे छानेजानेकाले यसवर्थक दूध १३ सः नः युम्नं यक्षते [१४१४४- वह हमें गुप्त देवे। मिलाये हुए प्रिय मोमको देवोंको देने के लिए शुद्ध कर। १४ अग्ने ! अष्टः परेण्या होता त्यं सप्रथा ६ अस्य प्रेपा हेमना पूयमानः देवः रसं देयमित असि, त्यया यर्श यितन्यते [१४.७]- हे अग्ने ! प्रसनः समपृक्त । सुतः रेमन पवित्रं पर्येति [ १३१]. इस श्रेष्ठ और हवन करनेवाला सबसे महान् है । तेरी सहायतासे समप्रेरणा देनेवाला मौर सोनेसे पवित्र होनेवाला तेजावी यतका अनुष्ठान होता है। १५ हे भने । ये तय साधयः माशयः अश्यासः छलनी छाना जाता है। रस देयोंसे मिलता है। यह सोमरस शाद करता हमा मर पदन्ति, युंक्ष्य हि [ १३८३ ]- हे माने! नो सेरे नाम मुशिक्षित योनमामो पोरे शोप्रतासे तुझे से नाते हैं, मोमरासे उस कोनारप होने पर सोमरस शुर होता तोप छाननेशले दिन हायोंमें सोनेरी अंगूठी पहनते गरें अपने रप जोर। १६ हे अने। देयान् प्रपांसि अभिभापही १४] अपना मोर पिसी प्रहारसे भी सोमरसके साथ होनेरा पा। ऐसा " हेमना पूपमानः" शम्दो प्रतीत होता है। - हे बग्ने । बोरो पार्म मुला सा । सम्बन्य होता होगा। पर सोमरसके सिए सोनेरा पण इस प्रारग्निरावर्णन इस सम्याप है। आवायर समझा जाता था, यह बात निश्चित है। कलशमें जाता है।
द्वादश अध्याय सामयेदका सुयोध अनुवाद ७ भद्रा समन्या घना वसान महान फपिनि १६ परमे व्योमनि अस्मे नि सप्त धेनवः सस्यां पचनानि शंसन् पिचक्षणा जागृषिः पूयमानः देव- आशिरं दुहिरे [ १४२३ ]- अन्तरिममें - पर्वतपर ऊ पीती चम्चो आवच्यस्य ११.०-कल्याणकारक, पान पर रहनेवाले इस सोमफे लिए इकतीस गाय उत्तम दूप युबके योग्य वस्त्रों को तेजोंको धारण करनेवाला, महान् मिलाने के लिए देती है। कानी, स्तुति लोग कहते हुए मानो होकर साग्रत रहनेवाला १७ चारुणः अमृतस्य भक्षमाणः सः उभे द्यावा सोम पवित्र होकर - छाना जाफर - यस स्थान पर रखे हुए फाव्येन विशथे । १४२४ - उत्तम जलकी इच्छा कलशमें एनके शव पिरता है। करनेगला यह सोम दोनों हो धावापृथियोको अपनी स्तुति ८ पिपृष्ठं प्रपर्ण बयोधा अंगोपिणं चाणी: अभि परिपूर्ण करता है। अयावशन्त [ १४०८]-तीन पवनों में रहनेवाले, पलवान १८ तेजिष्ठाः सपः मंहना परिव्यत [१४२४]-- और अन देनेवाले और भारद करनेवाले सोमको हमारी घाणी तेजस्यो पानीको अपने महत्वसे एक देता है । पानी में सोम- स्तुति करती है। रस मिलाया जाता है। ९ बना यसान सिन्धुः रत्नपा. वार्याणि दयते १९ हे सोम देव! तु वसनानि घना अभ्यर्प [१४०८]- जालमें मिलाया गया, प्रगतिशील और न [१४२७]- हे सोम देव । उतम पहनने के योग्य परम रे। रेनेवाला सोम स्वीकार गरने योग्य धन देता है। २० पूयमानः सुदुघा धेनू अभि अप[१४२७ ]- १० शूरग्राम', सर्धवीरः, सहावान् , जेता, धनानि स्वस्य होने के बाद उतम दूय देनेवाली गायोंको प्राप्त हो। सनिता, तिग्मायुधः क्षिप्र-धन्या, समत्सु अपाल्दः, गापके दूध मिल जा। पृतनासु शनून साद्वान् परख [ १४०९]- शूरकि २१ न. चन्द्रा हिरण्या अभि १४२७)- हमें घमकने समूहको पाममें रखनेवाला, अनेक बोरोसे युक्त, सामध्ययुक्त पाले सोने के सिक्के थे। और विजयी, पन देनेवाला, तीक्ष्ण शास्त्र पासमें रखनेवाला, २२ रथिना अभ्वान् अमि [ १४२५- रथ जोपने शीघ्र धनुष चलानेवाला, सपाममें शोको असा, युद्ध में योग्य पोर है। शत्रुओंको हरानेयाला सोम छाना जाता है । सव देव और वोर सोम पीकर लडाई घर जाते है और धीरताके काम २३ पूयमानः नः दिव्या वसूनि अभ्यर्प । १४२८] करते है, इसलिए कोरताके वाम सोम ही करता है, यह -छाने जानेके यार हर्षे विम्य भन दे। आलकारिक वर्णन यहाँ किया गया है। २४ पार्थिवा विश्वा ममि [ १५२८ - सब पापिय ११ यायशानः कृपा पुरुगरः आदि संदधन्वे धन दे। [१४१९]- वैव जिप्सकी इच्छा करते है, ऐसा यह बलवान् २५ येन घयं द्रविणं अभि अश्नुबाम [१४२८]- सोम बहुतों द्वारा चाहने योग्य है और पानी के साथ मिलाया जिसकी सहायताते हम धन मिले ऐसा सामय हमें दे । जाता है। २६ माय नः [ १४२८]- ऋषियों के पास होनेवाले १२ निष्पत अभियन् कलशे उनियाभिः सं धन हमें रे। गच्छत १४१९]- अपने संस्कार करने के स्थान पर जाने के २७ यशसा यशस्तरः तः प्रियः सानो अव्ये सं लिए कलश पायके दूधके साथ मिलकर रहता है। मृश्यते [ १४.१]- पास्वी होनेवालोंमें प्रिय हुआ हुआ १३ अन्याया अघा प्रपिप्ये { १४२० - गायक सोम बालोंको पलनीसे छाना लाता है। बुग्धाशयको यह सोम मपिक पूर्ण करता है। इस प्रकार सोमरसको छानने और उसे पीनेका वर्णन इस १४ सुमेघाः इन्दुः धागभिः सचते [ १४२०]- अध्याय है। इसमें प्रत्येक स्थान पर मालंकारिक वर्णन है। उत्तम भुद्धिमान यह सोम पारामोसे मिलाया जाता है। जैसे "सोमास गाणके साथ बर्तन में जाता है " इसका अर्थ १५ गाव चमूषु मूर्धान पयला भभि श्रीणन्ति है कि सोमरस गाय दूध मिलाकर कलशमें रखा जा [१५२०-गायें बर्तनों में इसथम सोमको दूधसे दकती है। है । ऐसे अनेक अलकार इस अध्यायमें है। सोमरसमें दूम मिलाया जाता है।
(२४४) सामवेदका सुबोध अनुवाद (उत्तराचिका सुभापित १५ युघा इत् आपित्वं इच्छसे [१६८९]- जब तू भाईको इच्छा करता है, तब साघुभोंको मारकर उपासकों को १ मारे च मस्सेशृपते यग्नये मेयोचेम[१३७९] मित्र बनाता है। -दूर एकर भी हमारी प्रार्थनाओंको सुनर्नवाले मनिकी १६ रेवन्तं सरयाय न कि चिन्दसे १९० हम स्तुति करते हैं। देवल धनवान्को अपना मित्र नहीं यनता । २ या पूर्यः नाहितीपुष्टिपुसंजामानासु दाशुषे १७ सुराभ्यः ते पीयन्ति [१३९०]- शराब पीनेवाले गयं भरक्षत् [ १३८० - जो पूर्वसे हिंसक शत्रुओंके एए• नास्तिक तुझे दुख देते हैं। वित होनेपर भी बाताके घरको रक्षा करता है। १८ यदा नदनुं कृणापि, समूहसि, मादिन पिता ३ शन्तमः स. अग्नि नः अमा-त्यं वेदः रक्षतु इव हूयसे [ १३९० ]- जब स्तुति करनेवालोंको अपना [ ३८.] - अत्यन्त मुख देनेवाला यह अनि हमारे पासके मित्र बनाता है, सब तू उन्हें धन देता है, उस समय घे अपने पनको गुरक्षित रहे। पिताके रामान तेरी स्तुति करते है। ४ उत अस्मान् अंहसः पातु [१३८1]- और वह १९ हे इन्द्र ! ब्रह्मयुज येशिनः, हिरण्यये रथे हमारी पार्कोसे रक्षा बरे। युक्ताः, सहनातं हरया सोमपीतये त्या रहन्तु ५ वृनदारणे रणे धनंजयः अग्नि. उदजनि [१३८२] [१३९13- हे इन्द्र ! शब्द के इशारेसे जुड़ जाने वाले, उत्तम गनुओंको मारनेवाला, प्रायर युद्ध में गोंगे हरानेयाला अपालवाले, तेरे होनेके रयम जुड़े हुए हजारों अथवा समजा तया धन जीतनेयाला अग्नि प्रस्ट हो गया है। घोडे सोम पीने के लिए तुझे यज्ञम पहुचाते हैं। यहाँ (सहस्रं ६ हे अप्ने देव ये तर साधर आशया अभ्यास शतं हरयः) हजार अयवा सौ घोरे ये वास्तविक पोरम अरं यहन्ति युंक्य हि [१३८३]- हे अग्निदेव ! जो तेरे होपर मालकारिक है। रथके घोडे वो अयया पार हो हो उत्तम तपा वेगवान् पो है उन्हें अपने स्वमें जोर। है। यहां हनार पता है ये हिरण है। पयोंकि किरणे हजारों ७ न मच्छ चीतये आयाहि !:३८४]- हमारे पास हो सकती है। रपके हजारों घोर्ड नहीं हो सरते। रपम को मन्न सापर मोम पोनेके सिए था। घोशनोउनेरा भी वनस्पोपर मापा है । मागवे ८ मयांसि अभि देयान् मा यह [ १३८४]- अरि मत्र देखए- पारा देवोंशपरमा। २० हिरण्यपे रये मयूर-शेया शितिपृष्ठा दरीत्या ९ हे भारत अग्ने ! उत् शोर [१३८५]- हे भरण मा पहता [ १३९२ ]- सोनेके रपत्ते मोरपे पसके समान पोषण रीयोपाने ! जल। गयाले तया सफेद पोठयाले यो घोर तुझे दोरर से भाते । १० हे यजर 1 दरिएतत् घुमत् अजनेण २१ राजा करोन पियाधे [ १३९५ ]- रामा सत्यमे चिमादि [१८५]-हजरारहित ! जापी और प्रकाश विशेष महता है। मान् त एमन गोवाले सेमी प्रमागित हो । २२ द्ररिणस्युः अग्नि प्राणि जंयनम् [९] ११ सुम्यानाय मापसः सत् पच मतः न यष्ट धन देनेवाला अग्नि गोगो मारता है। [११८६]- रस निकाले गए सोमको सुति नौष मनुष्य २३ प्रजायत् प्रल या भर [ १९८]-पुत्रपौत्रोक सपने। साय होवाले धान वा मान हमें भरपूर । १२ मरापमानं मपदत [11८६]- विन्नर. २३ यशमां यशस्सरः [१४017- यावालों में सबसे पापे सोररो। अधिक पायी हो। समाजनुपा मधावन्या [ १८९]- २५ गुद इन्द्रं स्तयाम (१४०२/- परोहम हैराममे ही पावरहित है। तिरते हैं। १४ सनान मगा, मनापि पसि CJ १६ दे इन्द्र गुदा ना भाग 1.11- एर गरा तेरा मेना महा मोर कोई महापर माई भी होवाला हमारे पारा। महीना पर नियंत्रण करनेवाला दुसरा गामही गुलामि तिमि तुल: [ 1013-re मरेमा हो गारमा है। मुर सापनि शुख ऐगा है। - सामवेदका सुपोध अनुवाद (२४५) द्वादश अध्याय २८ शुद्धः रपि नि धारय [१४०३]-हू शुद्ध होकर [१४१३]- देयोंमें श्रेष्ठ भमर दैय, या उत्तम रीतिसे करने हमें धन । वाले, धेष्ठ ऐसे तुझे हम उपास्य मानकर स्वीकार करते हैं। २९ शुद्धः ममद्धि [ १४०३ ]- तू भूस होकर मानन्द ४४ अपां-न-पातं सुभगं सुदीदितं श्रेष्ठशोचिषं प्राप्त कर। थाग्निं [१४१४]- कोको न गिरानेवाला, उत्तम भाग्यवान, ३० शुद्धः नः रयिं [ १४०४ ]- शुद्ध होकर सू हमें उत्तम तेजस्वी और श्रेष्ठ प्रकाशसे युक्त अग्निको हम स्तुति धन दे। करते है। ३१ शुद्धा दाशुषे रत्नानि [१३०४]- शुद्ध रहकर ४५ सः नः द्युम्नं यक्षते [१४१४ ]- वह हमें सुख दाताओंको घन दे। देवे। ३९ शुद्रः पुत्राणि जिनसे [ १४०४ ]- तू शुद्ध रह- ४६ हे अग्ने पृत्सु यं मत्यै अवाः,वाजेपुर्य जुनाः, कर भोंको मारता है। सः शश्यतीः इप, यन्ता [१४१५]- हे मग्ने । मुखम ३३ शुद्धा नाजं सिपाससि [१४०४]-तू शुद्ध रहकर जिस मनुष्यको सू रक्षा करता है, स्पर्धा, जिसे तू उत्तम भन देता है। प्रेरणा देता है, उसे हमेशा अन्न प्राप्त होता है। ३६ दिव्यं जनं यक्षत् [ १४०६ ]- दिव्यजनों ४७ सहत्या भस्य कयस्य पर्येता न कि,श्रयाय्य। पूज्य कर। याज. अस्ति [१६]- हे शत्रु को हरानेवाले I स तेरे ३५ जुटः परेण्यः होता सप्रथा रवं असि[१४०७] भक्तफो हरानेवाला कोई भी नहीं है, क्योंकि उसका यशस्वी -प्रसन, थेष्ठ और हवन करनेवाला तू सबसे थेष्ठ है। दल प्रसिद्ध है। ३६ रत्नपा वार्याणि दयते [१४०८]- रत्नोंको ४८ विश्वचर्षणि स. अर्यद्भिः पाजंतरता अस्तु, धारण करनेवाला पन देता है। विपेमिः सनिता अस्तु [1४1७- सब लोगोंका कस्याण ३७ शूरमामः सर्यवीरः सहावान् जेता, धनानि करनेवाला यह घोझेबाले युद्ध में विजय प्राप्त करावे सपा सनिता, तिग्मायुध क्षिम-घन्या, समत्सु अपाल्हा, शानियों के द्वारा यह प्रसन्न किया जाये। ४९ ने घियः अस्मान् अवन्तु [२]- तेरी पृतनासु शत्रून् मावान् [१४०९]- शूरों समूहसे तथा भनेफ पोरोसे युक्त, सामयसंपन्न यौर विजयो, घन देनेवाला, बुद्धिया हमारा रक्षण करें। ५० सघमाघे आपिः न. वृधे घोधि [ 1४२. 1- तीक्ष्ण शास्त्र रखनेवाला, धनुष सीन चलानेवाला, सपार्मोमें पराओंको असहा, पुसमें शत्रुओंको हरानेवाला ( सोम ) है। एक जगह मेटकर आनन्द प्राप्त करने के समय मित्रके समान ३८ उम्-गब्यूतिः अभपानि कृण्यन् [ 1४1०1- हमारा सवपन करना है, यह तू जान । ५५ वयं ते सुमती वाजिनः भूयाम १४२२]- हम जिसका मार्ग विस्तीर्ण है, यह हमें निर्भय करता है। तेरे अनुकूल उत्तम विचारोंसे घुमत होकर मलवान् हो। ३९ हे इन्द्र ! शवसा पतिः अनुत्ताचपणी-धृतिः ५२ अभिमातये नः मा स्त [१४२२]- के एका इत्, अप्रतीनि पुत्राणि पुरु हसि [१४]- हे हितके लिए हमारा नाश मत कर । इग्न! तू बलका स्वामी,प्रजाओंकाधारण पोषण करनेवाला, ५३ अभिष्टिभिः चित्राभिः ऊतिभिः अस्मान् भव- अकेला ही यलवान् शत्रुओंको बहुत बड़ी संख्या मारता है । तात् [ १४२२]- इन्ट सामHसे पुरत संशति हमारी ४० हे भसुरइन्द्र प्रचेतसं त्या भागय राधः मदे [१४१२-हे बलवान् इन्द्र ! सेरे समान मानियोर ५४ सुम्नेषु नः मायामय [ १४२२ ]- मुस समलिम पाससे घनका भाग हम मांगते हैं। हमें बढ़ा। ४५ ते मही शरणा[१२]- तेरा महान् स्थान ५५ अमृत्यय अदाभ्यासः अस्य केतवा उमे जनुषी शारणके योग्य है। अनु सन्तु [४२५]- अमर और नबनेवाली इसी ४२ ते सुना न' मारनुयन [1]- तुरासे हमें किरणे दोनों ही प्रकारले प्राणियोंको सुरक्षित रखती हैं। उत्तम मुल मिलें। ५६ राजानं मनना अगृभ्णत [१४२५] - रामागे ४३ देयं ममाय पठस्प सुक्रतु यजिष्ठं त्या धमहे स्तुतियां प्राप्त होती है।
(२४६) सामवेदफा सुबोध अनुवाद उत्तरार्चिक मिले। ५७ नः दिव्या वसूनि अभ्यर्प [ १४२८]- हमें हायमें जैसे पुत्र रहता है, उसीप्रकार ( जामिः भत्के भा दिध्य पन दे। अन्यत् ) सोमरस छलनीमें शुद्ध होता है। ५८ पार्थिवा विश्वा अभि अप [ १४२२] 'हमें ३ जारस योपणो न [१३८७] - जिसप्रकार जार स्त्रीके पाषष धन दे। पाम जाता है, उसोप्रकार सोम (योनि भासदत्) कलशमें ५९ येन वयं द्रविणं अमि अनुयाम [ १४२२ ]- जाता है । जिससे हमें धन प्राप्त हो सके ऐसा सामय हमें थे। ४ घन [१३८७]- जिसप्रकार पति पत्नीके पास ६० भायं नः [१४२२ ]- ऋषिके समान धन हमें जाता है. उसीप्रकार सोम कलशमें जाता है । ५ वेधाः न [ १३८८]- ज्ञाती जिसप्रकार अपने घर ६१ हे मघवन् ! वृत्रहत्याय यत् जायथाः तत् आता है, उसीप्रकार ( हरिः योनि आसदम् ) हरे रंगका पृथिवीं अप्रथयः उत दिवं अस्तम्नाः [१४२९ ]-हे सोम कलशमें जाता है। पर तू चमका वध करने के लिए जब गया, तव तूने ६ पिता इव हुयसे [ १३९० जैसे पिताको प्रार्थना पृथ्वीको सुदृढ किया और घुलोकको स्तन्ध किया । करते है से ही लोग तेरी • इन्द्रको - प्रार्थना करते हैं। ६२ यत् जातं यत् जन्यं तत् विश्व अभिभूः ७ अश्यं न [१३९४]- धोडेके समान ( अस्तुरं सोमं असि [ १४३० ] -जो हो गये और जो होनेवाले है उन परि पिंचत)-पानी में मिलाये जानेवाले सोमको मिलाओ। सयको तू हरानेवाला है। घोडा जिसप्रकार पानी में स्नान करता है, उसीप्रकार तोमरस ६३ आमासु पक्वं ऐरयः [ १४३१ ]- गायमें पके पानीमें मिलता है । यूपको तूने रखा है। ८ होता पशुमन्ति साध [१३९९]- हयन करने १४ दियि सूर्य परोहयः ४३:]- लोकमें सूर्यको पाला जसे गायोसे युक्त घरमें जाता है, उसीप्रकार ( सुता पढाया। रेभन् पवित्रं पयति ) सोमरस शब्द करता हुमा छलनीमें ६५ गिर्वणसे जुष्टं गृहत् [ १४३१]- स्तुत्य इन्द्रके जाता है। लिए बृहत् सामषा गान करो। ९ वरुणः न [ १४०८ 1- घणवे समान (पना ६६ हे इन्द्र! ते वरेण्यः सहायान् पृतनापाद् यसानः) सोम जलम रहता है। अमर्त्यः मत्सरः गन्तु [ १४३३ ]- है इन्ध ! तुप्रै यह १० भाग घ[ १४१२-पिताके पास अपने पनका श्रेष्ठ सामग्यवान, ओंको हरानेवाला अमर और मानन्द हिस्सा जिस प्रकार भागते है, उसीप्रकार इन्द्र से ( राधः देनेवासा सोम प्राप्त हो। महे) हम पन मांगते है। ६७ हे इन्द्र ! पशूरः सनिमा मनुष्यः रथ चोदय [१४३४]-हे इन्द्र ! नशूर और दाता है। ११ कृत्तिः इय [ १४१२]-बडे घोगेके समान (से मनुष्योंके मनोरयोंको उत्तम रीतिसे प्रेरित कर । मही शरणा ) तेरा विशाल आश्रय स्थान हमारे योग्य है। ६८ सहायान दस्युं य-मतं मोगः [१४३४ ]- तू १२ वाजी अत्यः [१४१८)-शीघ्र भागनेवाले सामर्थ्यवान् है, इसलिए व्रतोंका पालन न करनेवाले दुष्टोंका घोडेके समान सोम (द्रोणं ननक्षे) यतनमें पेगमे जाता है। मार १३ मातृभिः शिान [१४१९]- माताले जैसे पुत्र मिलकर एहता है, उसीप्रकार सोम (मद्भिः सं धन्ये ) पानीसे मिलकर रहता है। उपमा १४ मा योग न [१४१९]-जिसप्रशर पुरुष स्त्रीको १ भृगयः मयं न [१३८६ - भगुओंने जिसप्रकार ओर जाता है, उसीधकार सोम पानीकी तरफ जाता है। मनमो दूर रिया, उसीप्रसार (अ-राधसंश्वान अपहत) १५ निती वासुभिःन [१४२०/- भरोसर वात्रसि विनासोरो मारो। शारीरको तपते है, उसीप्रकार (गायः पयसा चमपु २ प्रोग्योः भुजे पुषः न [ १३८७ ]- माता पिता मूर्धान अभि श्रीणन्ति ) गायें अपने पसे गर्तममें रहते।
सामवेदका मुबोध अनुवाद (२४७) द्वादश अध्याय] वाले श्रेष्ठ सोमको माच्छादित करती है। सोमरसमें गायका उत्तम स्तुतियोस इन्द्रको उत्साहित करो। दूध मिलाया जाता है। १८ महः पात्रस्य इव [ १४३२ 1- महान् बर्तनके रामान तू ( घृष्णः ते) महान् बलवान है। ९६ जमदग्निवत् आयं नः [ १४२८]- समदग्निरे १८ मग्निः] शोचिषापात्रं न [१४३४-से अग्नि समान शर्षिक योग्य दान हमें दे। अपनी शालासे वर्तनको मला देतो है, उसीप्रकार (दस्यु १७ धर्म सामं न {१४३१]-जिप्सप्रकार प्रवर्ग नामक भमतं ओप) है इन्द्र! तू नियम न पालनेवाले दुष्टोका यसको प्रज्वलित करते है, उसीतभार (सुवृक्तिभिःतपत) नाश कर। द्वादशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची देवता मंत्रसंस्था सम्वेवस्थान ऋषि. मग्निः गायत्री गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः " , १७४ार १७४२ ७.१५॥३ ११७४३ " १३७९ १३८० १३८२ १३८९ " धसिष्ठो मैत्रावणिः गोतमो राहमणः " ॥ १२८३ १३८४ " " (२) भरवानो बार्हस्पत्यः भरद्वाजो वाहस्पत्यः भरद्वाजो माहस्पत्यः प्रजापतिवश्वामित्रो वाच्यो वा प्रजापतिवश्वामित्रो वाच्यो वा प्रजापतिषश्वामित्रो वाच्यो वा सोभरिकाः पवमानः सोम. अनुष्टुप ६१६४३ ६१६४४ ६१६४५ ९।१०१०१३ ९.१०१।१४ ९.१०१।१५ ८२१११३ १३८६ " 11 १३८८ १३८९ काकुभःप्रगाम (विवमा ककुप्, समासतोबृहती) " 11 महती M ८२०१४ दा१।२४ दा१२५ दा॥२६ ર૦૮૭ सोभरिकावः मेधातिथि-मेध्यातियो काग्यो मेधातिथि मेध्यातिषी काण्वी मैषातिथि मेध्यातियो काग्यो ऋजिश्वा भारद्वाजः " पवमानःप्लोमा काभः प्रगाथा-(विषमा कप समा सतोमूहती) १३९५ શs૮૮ मीन: गायत्री . " ६१मा३४ ६१६३५ ऊसचा आंगिरसः (३) भरद्वाजो याहस्पायः भरद्वाजो वाहपश्यः भरद्वाजो पार्हस्पत्यः वसिष्ठो मंत्रावणि वसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावरणि. १३२७ " पवमानः सोमः त्रिष्ट्रा " ९।९७१ ९९७११ १९७३ " 11 १४०१ (२४८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः देवता मत्रसंख्या १४०२ २४०३ ऋग्वेवस्थान ८९५७ ર૮િ ९।१५।९ पिः तिरश्चोरागिरमः सिरस्चीरागिरसः तिरश्चीरागिरसः अतुष्टप " " " (४) ५।१३।२ अग्निः गायत्री १३०५ १४०६ " " " " सुतंभर आय. सुतभर आत्रेयः सुतंमर आत्रेयः वतिष्ठो मैत्रावणि. वसिष्ठो मंत्रावणिः वसिष्ठो मंत्रावणिः नमेप-पुश्मेपावागिरसो पवमानः सोमः त्रिष्टा पा९३४ ९४९०१२ ९।९०१३ ९९०४ दा२०१५ १४०९ १५१० १४११ " " प्रगापः- (विषमा बृहती, समा सतोवृहती) ८९०६ ८॥१९॥३ नुमेध-पुरुमेघावागिरसौ " सोभरिकावा अग्निः काकुभ:प्रगाथ-%D(विषमा कप समा सतोयहती) २४४ ८९९४ सोभरिकाम्यः गायत्री " " 11 १४१७ " २७७ ११९७८ १६२७९ ९/९११ १९३३२ ९।९३३ ८०१ शुन.शेप आजोगतिः पान शेप माजोगतिः गुनःोप आजोगति. मोथा गौतमः नोपा गौतम नोपा गौतमः " पवमानः सोमः त्रिष्ट्रप " " " २४२० २४११ मेध्यातिथिः काण्वः प्रगाप:-(विषमा चहतो, समा सतोयहती) १४. " " पक्षमामः सोमः जगनी दार ९७१ ९७० ९।७०१३ १४२४ १४१५ मेष्यातिषिकाद रेणुश्वामित्रः रेएवंावामित्रः रेणर्वश्वामित्रः " 17 " " विष्टप १४१७ कुरत मागिर दुरस मागिरतः पुसमांगिरस. . " " " ९।९७४१ ९।२७१० ९।९७५१ ८1८९५ ८.८९०६ ८1८९७ मनुष्ट " मुमेष-पुरमेघावागिरसो नमेप-पुष्मेपावापिरसौ नमेप-परमेपारागिरतो अगस्यो मंत्रावरणः अगायो मंत्रावदनः अगस्पो मंत्रापरणः " १४० २४॥ बहती कभोपीयो महतो मनुष्प ११७५९ " " प्रयोदश अध्याय] सामवेदका सुबांध अनुवाद (२४९) अधयोदशोऽध्यायः - अथ पठनपाठके तृतीयोऽधः ॥६-३॥ [१J (१-२०) १ कविर्गिवः, २, ९, १६ भरद्वाजी बार्हस्पत्य. ३ तितः काश्यपो देवलो वा ४ सुकल आंगिरसः, ५ रिभ्राट् सौर्य, ६, ८ पसिष्ठो मंत्रावणिः ७ भर्ग प्रागाय , १०,१७ विश्वामित्रो गाथिना११ मेधातिपिः कायः, १२ शतं पैखानसाः१३ यजल आत्रेय, १४मधुश्छन्दावश्वामित्रः १५ उमाना कायम १८हर्यतः प्राणायः १९ सदिय मायण, २० गसमयः शौनकः ॥ १, ३, १५ पवमान सोमः २, ४, ६,७,१४,१९, २० इन्द्रः; 4 सरस्थान, ९ सरस्वती; १० सविता, ११ झणस्पति. १२ अग्निः पवमानः, १३ मित्रावरणौ; १६-१८ मग्निः १८ हबोंधिया ५ सूर्य ॥ १, ३-४, ८-१४,१६ (२-३) १७, १८यामत्रो। २ (१३) अनुष्टुपः २(४) गृहती; ६,७ प्रगाथा (दिपमा बृहती,समा सतोषहतो ); १६(१) वर्षमाना; १५ १५ विष्टुप। २०(१) अष्टिः; २०(२-३) अतिशयरी, ५ जगती ।। 3 र 9 . १४३५ पवस्व वृष्टिमा सु नोऽपामूर्मि दिवस्परि । अपक्षमा वृहतारिणः ॥ १॥ ( ९४९१) १४३६ दया पवस्व धारया यया गाव इहागमन् । जन्यास उप नो गृहम् ॥२॥ (ऋ. ९४९२ ) १४३७ घृतं पवस्व धारया यज्ञेषु देवगीतमः । असम्यं वृष्टिमा पत्र ।।३।। ( ९४४९३) १४३८ सन में न्प३व्ययं पवित्र धाप धारया । देवासः मृणवन् हि कम् ।।४।। (ऋ. ९।१९।४ ) १४३९ परमानो असिम्पदद्रक्षास्यपजश्नद । प्रत्लबद्रोचयत्रु [धा०२२ 1 उ० ११० ४] ( ९११९१५) 320s...." ३" २७ ३ 3 [प्रथमः खण्डः। [१४३५] हे सोमव (विषः पृष्टिं ) पुलोकसे पष्टिको (नासु भा पयस्य ) हमारे लिए उतम रोतिसे मोरे सामा अमि परि ) पानीको ठहरें उछ, तथा ( अ-यक्षमा पृहतीः इषः) रोगरहित पात सारा मन [१३३६] हे सोमवतया धारया पय ) उप्त धारात यहा पवित्र हो । यया सन्यासः गायः ) जिरको सहायताले मात्र गायें (हना गृहं उप भागमन ) यहाँ हमारे घर मायें ॥२॥ [१४३७] हे सोम ! ( योपु देश-पीतमः ) पहमें देवों द्वारा बाहा गया त ( मस्मभ्यं धृतं धारया परम्प ! हम पारारूप दृष्टिापसे पानी हे अत् । पृष्टिं आ पर ) बरसात पिरा || [१८] हे सोम! (सोम ) वह तू (मऊ) हमारे अन्न के लिए (अव्ययं पवित्र धारया पि धाय । पोको उनी पारा कप नीधेके बर्तन में गिर। देवासः हि केशृणघन बसेरा बह राम सने ॥४॥ [१४३९] (रक्षांसि यप जघनत् लोंका मारा करते हुए (रुचः प्रलय रोचयन् ) मपर्ने सेतो पहले के समान ही प्रकाशित करते पए ( पयमानः मासिष्यदर जना भानेवाला सोम नोयो मला पाता ॥५॥ १२ (साम. हिम्मी मा २] .
(२५२) सामवेदका सुयोध मनुवाद उत्तराचिका [३] १३१३३.. . ३ १ १ . ३ प्रवता १४५३ विभाड् बृहत्पिरतु सोम्यं मध्वायुर्दधयज्ञपतावविहृतम् । बावजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपति बहुधा वि रामति ॥१॥( १०/१७०।१ ) १४५४ विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातम धर्म दिवो घरुणे सत्यमर्पितम् । अमित्रहा वृत्रह। दस्युहन्तम ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपनहा ॥२॥( १०1१७१२) १४५५ इदर श्रेष्ठ ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धनाजियते बृहत् । विश्वभ्राड् भ्राजो महि यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम् ।। ३ ।। ५ (जि) । [धा० २७ । उ० ३ । स्व०३] (ऋ १०।१७०१३) १४५६ इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥१॥ ७३२।२६) १४५७ मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३ माशिवासोऽव क्रमुः। त्वया चर्य शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि ।। २ ॥ ६ (ल)। [धा०९। उ० नास्ति । स्व० १ ३२।२७) [३] तृतीयः खण्डन [१४५३ ] ( विधान ) विशेष प्रकाशनवाला सूर्य ( यक्षपती ) पश करनेवालेको ( अ-वि-हुतं मायुः धत्, मारोग्यपूर्ण दीर्घायु देता है । ( यः धातजूता ) जो वायुको गति देनेवाला (स्मना अभि रक्षति ) स्व सयका रकण काता है, (प्रजाः पिपति) प्रजाओंका अच्छी तरह पालन करता है और (यहुधा विराजति) भनेक प्रकारेति सुशो- भित होता है, ऐसा वह इन्न ( पृद्धत् सोम्य मधु पियतु ) बहुत सोमरसरूपी मोटा पैय पिये ॥ १ ॥ १४५४ ] (विधा वृहत् । विशेष प्रकाशमान और महान्, (सुमृतं घाजसातम ) उत्तम पोषण करनेवाला तथा मन्त्र देनेवाला, ( धर्म दिया धरणे मर्पित ) अपने पर्मसे पलोकको धारण करने के लिए नियुक्त किया गया, ( सत्य म-मित्र-हा) निश्चयरोसोका ना करनेवाला,(पुत्र-हा) पत्रको मारनेवाला, दस्यु-हन्तम) दुष्टोको मारनेवाला (असुर-हा) राक्षसोंका विनाशक, (सपत्न-हासको मारनेवाला सूर्य (ज्योति जसे अपना प्रकाश फैलाता है ॥२॥ [१५५५] (द श्रेष्ठ ज्योतिषां ज्योतिः ) यह सूर्यका ते अनेक सेजोंका प्रकाशक ( उत्तम विश्यजिद) उत्तम रिपविजयी ( धनजित् पृष्ठस् उच्यते ) पनोंको बीतनेवाला सया महान् कहा जाता है, (विश्यभ्रात् भ्राज।) दिदिको प्रकाशित करनेवाला मोर स्वर्य प्रकाशमय (महि सूर्य.) यह महान् सूर्य (दशे उा सह ) शेखने में महात् सामर्पवान (अच्युत मोजा पप्रथे। अविनाशी तेनरूपी यसको प्रसारित करता है ॥३॥ [१४२६] है (इन्द्र) इन्न । (नाम भामर ) हमारा यह पूर्ण कर।(यथा पिता पुत्रेभ्यः) से पिता पुत्रोंको पन रेता है, उसीप्रकार (म: शिक्ष) हम है। है । पुम्हत ) नेरों द्वारा सहायताके लिए इलाये गए । ( यामनि ) पाहमें हम (जीया ) मनुष्य (ज्योतिः प्रशामाद) सेन प्राप्त ॥ १॥ [१४९७ ] हे! (अ-शाता) मशात (पृजना. अ-शियासा दुराप्यः) एटिल पापी भोर मर्मगल पार (नामा मयममुहम परमारमण न करें। (शूर ) पूर!(स्यया यपं प्रयन' मेरे पारण सुरक्षित एप हम (राश्यतीः सपा मारी तरामसि ) मनसे संपर प्रबाहमि पार हो ॥ २ ॥ -
प्रयोदश अध्याय ]
सामर्यदया सुयोध अनुवाद
(२५)
३, २
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२
13.
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1
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२१ २ ३३
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२
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.
3"
3.
१
२
99
२
१४५८ अद्याया वाचइन्द्र शास्त्र परे चना।
विश्वा च नो बस्ति संपत्ते अहा दिवा नक्तं च रक्षिषः ॥१॥ (८१६१९१७)
१४५९ प्रमही सूरी मघवा तुधीमघा सम्मिश्लो वीर्याय कम् ।
उमा ते वाह वृषणा शतक्रतो नि या वर्ज मिमिक्षतः ॥ २ ॥ ७ (वी)॥
[धा० १२ । उ० नास्ति । स्थ०१] (८६१८)
॥ इति तृतीय. सग. ॥ ३ ॥
[४]
१४६० जनीयन्तो न्वारः पुत्रीयन्तः सुदानवः । सरम्बन्त हवामहे ॥१॥ ८ (री)॥
{ धा० ३ । ३० नास्ति । स्व. नास्ति ) ( ७१९६४)
१४६१ उत ना प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा । सरस्वती स्तोम्घा भूव ॥१॥ ९ (दो)
[धा० उ. नास्ति । १० नास्ति । (ऋ.६।६१।१०)
१४६२ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥१॥ (ऋ १६१०)
१४६३ सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजा ॥२॥ (ऋ. १९८१)
E१४५८] है (इन्द्र ) इन्द्र ! { अध मद्य ) माज {:) फल ( परे च नः ) और परसो वर्षात हमेशा
हमारी (प्रास्त्र ) रक्षा कर । हे (सत्पते । सरजर्नाकि पालक इन्द्र ! (विश्या च अहा) सब दिन (नः अस्तिन )
हम स्तुति करनेवालोदी ( दिया नक्तं घ रक्षिपः ) दिन और रात रक्षा कर ॥ १॥
[१४५९J(अयं मया ) यह इन्द्र (वीर्याय के) सुखसे पराक्रम करने के लिए (प्र-मंगी शूर: नाओंको
सोडनेवाला, शूर (नुवा-मघः संमिश्लः ) बहुत धनवान और सबसे मिलकर रहनेवाला है। हे (शतक्रतो ) सकारों
कर्म करनेवाले इन्ट (या बनि मिमिक्षतुः) जो पजको धारण करती है। ऐसो (ते उभा राह पणा) तेरी
वे दोनों भुगायें बहुत बलवान है ॥ २॥
। यहां तीसरा पण्ड समाप्त हुआ।
[४] चतुर्थः खण्डः।
[१४६०] (जनीयन्तः) नोवाले { पुत्रीयन्तः) पुत्रपाले ( सुदाना अपयः) उत्तम भन देनेवाले और आगे
रहनेवाले हम ( सरस्चन्त हवामहे ) सरस्वतीको सहायताके लिए बुलाते है ॥ १॥
१५६१) (उत नः पिया पिया) और हमें प्रिय वस्तु अत्यन्त प्रिय ( सप्तस्वसा) सात नदोस्पी पहिने
जिससे मिलती है, ऐसी ( सुजुष्टा सरस्स्ती ) भन्यो तहमै सेधित सरस्दनी नदी (स्तोम्या भूत् । स्तुति काने
योग्य हो गई है।
[१४६१) (यमपिता देवः ) जो सविता देव (न.घिय प्रचोदयात् । हमारो बदियों को प्रेरित करता
१. उस { देयस्य सचितुः) सविता देवरे ( तत् वरेण्यं भर्गः ) उस श्रेष्ठ का ( धीमहि हम पान करते हैं ॥१॥
६१४६३ ] है (प्राण पते ) मानपते ! (मोमानां गोप माह जानरो प्राप्त योग सापनके अनुमबरो (कक्षी-
घ) मातीमें रहने वाले मागको (सरण-दु-मरण ) उतम प्रचारसे माने जानेवाला (पति) करा (या
ओशिन जो प्राण मा मा गया है, उसे भी बलवान् कर ॥२॥
सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ उत्तराफिः १ ३.२ 1323 9 " २ ३२ . .g"" २११ १४६४ अम आयूपि पवस आ सुवोर्जमिपं च नः । आरे बाधस्व दुच्छनाम् ।।३॥ १० (य)॥ [धा०२। उ० नास्ति । ३०१ (. ९६६१९१ १४६५ ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य । महि वा क्षत्रं देवेषु ॥२।। (ऋ. १६६८३) १४६६ ऋतमृतेन सपन्तेपिर दक्षमाशाते । अद्रुहा देवी वर्धते ॥२॥ (ऋ. १६८१४) १४६७ वृष्टियावा रीत्यापेषरुपती दानुमत्याः । गृहन्तं गतमाशावे ॥३॥ ११ (पा)॥ [ धा०५. उ०१५ ख०२ ] ( ५/६८०५) १४६८ पुअन्ति भ्रमरुपं चरन्त परि तस्थुः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥१॥ (8 ६१ ) १४६९ युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे । शोणा धृष्ण नृवाहसा ॥ २ ॥ (ऋ. १६२ ) १४७० केतु कण्वमकेतवे पेशी मर्या अपेशसे । समुपद्धिरजायथाः ॥३॥ १२ (य)॥ [धा०७। उ० नास्ति । स्व०१] (ऋ. ११६१) ॥ इति मतुपं. खण्ड ॥४॥ [१४६४ ] है (भो ) प्रकाशस्वरूप ! (नः यूंषि पवसे ) हमें दीर्घाय थे। (नः अर्ज ) हमें बाल और (पं) मन्न , (दुच्चुनां आरे याधस्व ) दुष्टोंको दूर कर ॥३॥ [१४६५] (ता) पे मित्र और पदण देष (नः) हम (पार्थिवस्य दिव्यस्य) पृथ्वीपरके और पुलोरफे (महः रायः शतं ) महान् पन देने के लिए समय हो । हे मित्रावण ! (यो महि क्षत्रं ) तुम्हारा महान् क्षारपल (देवेषु) देषोंने प्रसिद्ध है ॥१॥ (१४६६ १ (कतेन ऋतं सपम्ता) पजसे यज्ञ पूर्ण करते हुए (पपिरं दक्ष माशाते ) वाहने योग्य बलको प्राप्त करते हैं। ऐसे ( अ-गुहा देवी वर्धते ) मोह न करनेवाले मित्र और वरुण अपने सामसे बढते है ॥ २॥ [१४६७१ (पृष्टि-धावा ) अप्टिके लिए जिसकी स्तुति होती है, (रीत्यापा ) योग्य रीतिसे जिसे वस्तुयें प्राप्त होती है. ऐसे ( दानुमस्याः इषः पती ) हान देने के योग्य अनके स्वामी वे मित्र और पपण (गृहन्त गर्ने भाशाते) महान् रपपर बैठते है॥३॥ [१४६८ ] लोग (प्रघ्नं ) आदिस्यके इपमें रहनेवाले, (अय) तेजस्वी अग्नि के रूपवासे (परन्तं ) चलते एक समान शीखनेवाले पर (परि तस्थुषः ) स्थिर रहनेपाले सूर्यका (युति ) उपासना के लिए उपयोग करते है । उस इनकी (रोचमा दिवि रोचन्ते ) प्रकाशको किरणें घुलोकमें प्रकाशित होती हैं. १॥ [१४६९ ] ( अस्य रपे इस इमरे रपम (पाम्पा विपक्षता ) मुहर ओर शेनों तरफ बुरे हुए (शोणा सृष्ण) माल रंगके और गोरो हरनेवासा तपा (नृपाइसा हरी) को खोकर सेगाने वाले पोरे (मुजम्ति ) हो जाते है॥२॥ [१४७० ] है (मर्याः ) मनुष्यो ! (म-तये ) मगानीको (केतुं कृण्यन् ) मान देते हुए और (अपेशसे पेशा पहिलोप शेते हुए ( उपनिर समजायथाः) उपरात बार पूरा प होता है ॥ ३॥ यहां पीपा पण समाप्त हुमा ।
प्रयोदश अध्याय]
सामवेदका सुबोध मनुवाद
(२५५)
.
२ta
३११ २३११
913
૨
3
[५]
१४७१ अयं सोम इन्द्र तुम्य सुन्वे तुम्यं पवते स्वमस्य पाहि ।
है। वह यं चकपे त्वं ववृष इन्दु मदाय युज्याय सोमम् ॥5॥,(१.९८
१४७२ स ईश्थो न भुरिपाडयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि ।
आदी विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्चा नवन्त ॥२॥(*. ९८२)
१४७३ शुष्मी शो न मारुतं पवस्वानमिशस्ता दिव्या यया विट् ।
आपो न मा सुमतिमवा ना सहस्राप्ताः पृतनापान यज्ञा ॥३॥ १३ (घी)॥
1 धा० २६ । उ०४ । १० ४ ] (ऋ.९८३)
१४७४ त्वममे यवाना होता विश्वपादितः । देवेभिर्मानुप जने
॥ १।। (६३९६१)
१४७५ से नौ मन्द्राभिरध्वरे जिहामिर्मजा मह।। आ देवान्वक्षि यक्षि च ॥२॥(ऋ. ६।१६।२ )
१31
३.
3
3
२३
२
३१
3१३
[५] पञ्चमः खण्डः।
[१७] {न्द्र ) इन्द्र ! ( अयं सोमा तुभ्यं सुन्ये ) यह सोमरस तेरे लिए निरासा लाता है। (तुभ्यं
पवते ) सेरे लिए हो छाना जाता है, (त्वं मस्य पाद) तू इसका पान कर, (त्य ह ये चहरे) तूने हो इसे बनाया है,
(न्, सोमं ) इस धमकनेवाले सोमको ( मदाय युज्याय ) मानन्दके लिए और सहापताके लिए (त्वं घपे)
स्वीकार करता है।
[१४७२] (साई महः ) वह इन्द्र महान् हैं। (भूरि-पाइ रयान) महतमा योर से जानेवाले के समान
(पुरुणि वसूनि सातये ) बहुत सारा धन बनेके लिए ( अयोजि ) यशमें इसकी नियुक्ति की गई है, (बाद इसके
बार (विश्या नहुण्याणि जाता। सब मनुष्योंका विरोध करनेवाले शव उत्पन्न हो गए है, घे (ऊर्धा ) ऊपर मल करके
(घने स्वर्णता नपन्त ) वनमें होनेवाले पुर जावें और वहां मष्ट हो जायें ॥२॥
[१४७३३ हे सोम! (शुप्पी ) हुबलपान है। ( मारुतं शन) मोके पलके समान असशाली होने के लिए
र पपस्या होरक्या दिव्या विद कर लिया निशता/गति पर प्रात होतो
है, सीप्रकार ( बापान ) पानीके समान पवित्र होकर ( मच नः सुमतिः भव ) उसी समय हमारे लिए उत्तम नि
देनेवासा हो। (सहस्राप्सा ) अनेक रूपों में रहनेवासा तथा ( पृतनापाट ) बानुको हरानेवाला (यशन) पाके
समान पूजनीय है।॥३॥
E१४ (मझे) माने । (त्वं पिश्येषां यशाना होता) सध यतों हवन करनेवाला है, और (देयेमित
मानुषे जने हितः ) देवों के द्वारा मानवी प्रजाओंमें तू स्थापित दिया गया है ॥१॥
[१३७५] हे मन्ने । (साना मध्वरे ) वह हमारे पा (मन्द्रामिः जिहामि मानद बढानेवाली
स्वालाकि द्वारा ( महापज ) देवों का यजन कर। (देयान मा पनि ) देवोंको इलाका सा ( यक्षिष) और उन्हें
हरि मर्पण कर ॥२॥
(२५६)
सामवेदका सुरोध अनुवाद
[उत्तरानिका
१३१२
१४७६ वेत्था हि धौ अनः पधच देवाचसा । अमै यज्ञेषु सुक्रतो ॥३॥ १४ (हौ)
[धा०६ । उ नास्ति । स्व. नास्ति ] (ऋ. ६१६३)
१४७७ होता देवी अमर्त्यः पुरस्तादेति मायया । विदयानि प्रचोदयन् ॥ १॥ (ऋ ३१२७७ )
१४७८ वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वरेषु प्रणीयते । चिनो यज्ञस साधना ॥२॥। ऋ ३।२०१८)
१४७९ घिया चके वरेण्यो भूतानां गर्भमा दधे । दक्षस्प पितरं तना ॥३॥ १५ (रा) ।
[ धा० १३ । उ० नास्ति । स्व०२] ऋ २२७९)
॥ इति पञ्चम सड. ॥ ५॥
3x
१४८० आ सुते सिञ्चत श्रिय रोदस्योरमिश्रियम् । रसा दधीत वृषभम् ॥१॥ ( ना ८३७२।१३ )
१४८१ ते जानत स्वमोक्यं संवत्सासौ मामिः । मियो नसन्त जामिभिः ॥२॥
(ऋ८१७२११४)
१४८२ उप सकपु चप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि । इन्द्र अग्ना नमः स्वः ॥३॥ १६ (च) ॥
[घा० १२ । उ० ११ १०१ ] ( ८७२।१५)
[१४७६] (वेध सुफतो देव अग्ने ) हे विधाता, उत्तम कर्म करने वाले देव अग्ने ! तू ( यज्ञेषु ) या
( मध्यन पथ. अजसा च येत्थ ) पतके पासके और दूरक मार्ग तू जानता है, इसलिए यजमानको मार्ग दिखा ॥ ३ ॥
[१४७७ ] (होता अमर्त्य देव. ) हवन करनेवाला अमर देव अग्नि ( विदथानि प्रचोदयन् )कर्माको प्रेरित
करता हुआ (मायया) कुशलतासे ( पुरस्तात् पति ) मागे आता है ॥ १॥
[१४७८ 1 (बानी याजेपु धीयते ) बलवान् अग्नि युद्धर्म शत्रुषा नाग करनके लिए स्थापित किया जाता है,
( माचरेषु प्रणीयते } यसमें वह से मापा जाता है, इसलिए ( विप्रा ) यह नानी अग्नि ( यस्य साधन ) पाका
राधन है ॥२॥
[ १४४९] अग्नि ( चिया चमे) कोम प्रश्चालित किया गया है, इसलिए वह ( घरेण्यः । श्रेष्ठ है और वह
(भूतानां गर्भ आददे ) सब प्राणियोंमें व्याप्त है । ( पितर दक्षस्य तना ) जगतके पालक मग्निको गाकी पेरोलपी मह
पुत्री पारणपरती है ॥३॥
॥ यहा पाचयां खण्ड समाप्त हुभा ॥
[६] पष्ठ. पण्डा ।
[१४८०] हे भावप्रो ! (सुते ) सोमरसमें (रोदस्यो. अमिश्रिय ) लोक थोर पुप्पोलोसमें शोभा याने
बासे (भिय पासिंचत) दूपको मिसायो । मारमें ( रसा खुपम दधीत ) ये दूप बलवान् सोमको अपने अन्दर धारण
भारते ॥१॥
[१८] (ते स्व ओषय ) वे गा अपने स्थानको (जानत ) जानती है, ( यरसास. मातृभिः )
रिसप्रकार अपनी माता पाप्त जाते हैं उसीप्रकार वे गावे (जामिभिः मिथ नमस्त) अपने पापोंके साथ
मिलती है ॥२॥
गायरो दूपरे पान [पर सोमरे बना है, यह रहें मालूम है।
[१४८२] (म्रपयेषु यप्रातः ) मालाओंगे भक्षण करनेवाले अग्निक (नमा) अन्नाप गौ पो (धर्ण)
भारणसमेवारो (दिपि उप ण्यते । मानरिममें स्यापित रते हैं। पार, (एडे मा म नमः) एग और
माविको बार लेह ॥३॥
प्रयोदश अध्याय सामवेदका सुबोध मनुवाद 3 २३ १२ 3 ३२ १३ ७२a" ३६ १४८३ तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठ यतो जा उग्रस्त्वपम्णः । सयी जवानो नि रिगाति ननु में विश्व मदनस्पूमा ॥१॥ (१०११२१) १४८४ वावृधानः शवसा भूयोजाः शत्रुर्दासाय भियसं दधाति । अपनच व्यनच सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेष ॥२॥ (मर १०१२०१२) १४८५ त्वै ऋतुमपि वृञ्जन्ति विश्व द्विर्यदेते निभवन्त्यूमाः । स्वादोः स्यादीया स्वादुना सृजा समदा सु मधु मघुनामि योधीः ॥३॥१७ (णी)। धा० २३ । उ५ । स. ४ ] (शु. १०१२०१३) १४८६ त्रिकद्रुकेषु महिपो याशिर तुविशुष्मस्तम्पद सोममपिवद्विष्णुमा सुतं यथावशम् । सई ममाद महि कर्म कौवे महामुरु४ सैन समयो देवर सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥१॥ (ऋ २२११) [१४८३ ] ( तत् ज्ये इत् ) वह ज्येष्ठ ग्रह्म ही ( भुवनेषु मास ) सय भुवनोंमें व्याप्त होता है, ( यतः ) जिससे ( उग्नः त्वेषनम्णः जो जप और तेजस्यो बलसे मुक्त सूर्य प्रकट हश (जशानः सधः शन निरिणाति) उत्पन्न होते ही उसने उसी समग सव शत्रुओंको नष्ट किया । (यं विश्वे ऊमाः अनुमदन्ति ) जिसे देखकर सय प्राणी प्रसन्न होते है ॥ १॥ [ १४८४] (शयसा वापृधानः ) यसकै कारण धनवाला तपा ( भूयोंजा शत्रुः) अनन्तशक्ति पुस्तदुष्टोंका शत्रु इन दासाय भियसं दधाति ) के अन्तःकरण भय उत्पन्न करता है, (अध्यनत् च ध्यनव च सस्ति) प्राण सेनेवाले और भाप न लेने वाले दोनोंका हित करता है, हे इन्न ! (ते मदेपु) सेरे मानन्धर्म (मभृता संनयन्त) पहुए सब लोग सेरी भक्ति करनेके लिए एकत्रित होते है ॥ २॥ [१४८५] हे ! (विश्वे अपि से क्रतुं यूऑति ) रुब यममान तेरे लिए हो या करते हैं, (पत् पते जमा) जिस समय ये यात करनेवाले यजमान (दि त्रिः भवन्ति ) शादी करके दो अपया पुत्र होनेके यार तीन होते हैं, उस समय है इयर (स्वादो स्नादीयः) प्रियसे भी प्रिय लगनेवाले सन्तान को ( स्वादुना संगज ) प्रियसगन याले माता पिता से संयुनकर। ( महा मधु) बादमें इस प्रिय रामानको (मधुना सु अभि योधी) पौत्रयी मापुरताले युक्त कर [११८६] (महिपः तुविशुष्मा) महान् मोर मषिक सामप्पंपान (एस) तप्त माहमा (नि- फकेषु सुत ) तीन यतनमें निकाले गए (ययाशिर सोम) सतके मागे मिमित सोमरस ( विष्णुना यथाय अपियत् विष्णु साप इच्छानुसार पोता है । ( सा ) वह सोमरस । महां अरं है) महान् विस्त वेगावो इस प्रको (मदि कर्म कर्तये) महान् काम करने के लिए (ममाद) मान्दित करता है। (सत्याः) सपा और चमहगला ( देवः सविधगुग मुशा यह सोम (सत्यं देवं ) अविनाशी तथा रोगस्यो ( एन एनं सध्यत् । एमको प्राप्त होता है ॥१॥ ३३ [म. हिन्दी भा.२] (२५८) सामवेदका सुयोध मनुवाद [उत्तरार्चिका २ १३3" १॥ १४८७ साकं जाती ऋतुना साकमोजसा ववक्षिय साक वृद्धो धीः सासहिर्मुधो विचणिः दाता राध स्तुवते काम्यं वसु प्रचैतन सैन सश्चदेवी देवर सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥२॥ (२।२३) १४८८ अध विपीमाअम्योजसा कवि युधामवदा रोदसी आपणदस्य मज्मना प्र वावृधे । अधत्तान्य जठरे प्रेमरिच्यत तय सैन सचदेवो देवर सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥३॥ १८ (थि)॥ [घा० ५४ । उ०२ । २०१३] (. २।२२६२) ॥ इति षष्ठ खण्ड ॥६॥ ॥इति षष्ठप्रपाठके तृतीयोऽयं. ॥ ३ ॥ षष्ठ प्रपाकरच समारत ॥ ६ ॥ ॥इति त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ २१ ३१ 7 [१३८७ ] हे इन्न ! तू (तुना साकं जातः ) यज्ञके साय प्रकट हुआ है, (ओजसा साफ चयक्षिथ) अपने सामसे विश्वका भार उगनेको तू इच्छा करता है । है । प्रचेतन ) श्रेष्ठ ज्ञानी इन्द्र (वीर्यैः साकं वृद्धः ) अपने पराक्रम तू महान् हुमा है, (मृधः सासहिः ) सग्राममें शत्रुओंको तू हराता है । (विचर्षणिः स्तुवते) विशेष शानी तू स्तुति करनेवालोको (राधः काम्य वसु दाता) पन और इप्ट ऐश्वयं देता है। (सस्य इन्दुः । सत्य सोमरस (देव' सः) चमकते हुए ( सत्यं देवं ) सत्य देव ( एनं इन्द्र सश्चत् ) इस इन्द्रको प्राप्त होता है ॥ २ ॥ [१४८८ ] हे इन्द्र ! ( अध) पादौ ( स्थिपीमान् ) तेजस्वी तूने ( ओजसा कवि युधा अभ्यभवत् ) अपने सामथ्र्यसे युद्ध में कृषिको जीता मौर (रोदसी आ पृणास् ) द्यावापप्पोको अपने तेजरो भर दिया । (अस्य मज्मनाभ चावृधे) इस सोमके बलसे तू और अधिक बडा हुआ है, उस इन्नने (अन्य जठरे अधत्त) सोमरसका एक भाग अपने पेटमें और दूसरा भाग ( प्रारिच्यत) देवोंके लिए रख दिया है। है इन्द्र ! स् वूसरे देवोंको (प्रचेतय ) सोम पोनेके लिए प्रेरित कर । (सत्य इन्दुः) सत्य तया (देव. स. ) दिव्य गुणोंवाला यह सोम ( सत्य देवं एन इन्द्रं सम्पत्) सय वेव इस इन्द्रको प्राप्त होता है॥३॥ ॥ यहां छठा खण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति प्रयोदशोऽध्यायः॥
प्रयोदश अध्याय ] सामवका सुयोध अनुवाद त्रयोदश अध्याय इन्द्र देवता मारा। वाले इन वनको धारण करनेवाली तेरी शेनों भुजाये इस अध्यायमै इन्द्र देवताका वर्णन इस प्रकार है- बलवान है। १ या नव नवति पुरः वादोजसा विभेद । घृत्रहा सातये अयोजि। आत् । विश्वा नहुप्याणि जाता, १० सई महः, भूरिया रथ इच, पुरुणि वसूनि महिं अवधीत् [१४५१/- इन्डने अपने याहू बलसे शत्रुके अर्धा वने स्वर्षाता नवन्त [ १४७२ 1- वह निःसंशय १९ नगरोंको तोडाऔर इस वृत्रको मारनेवाले हन्दने अहिको महान् इन्ध है। बहुत सारा वजन होकर ले जाने वाले रसके २ समस्य जैन्यस्य शर्धतः अभिशस्तेः कुवित् को है । है दन्न ! सब मनुष्योंका विरोध करनेवाले शत्रुओं के समान बहुत सारा धन देने के लिए उस रपमें उसने योजना अवस्वरत् १४४३]- सब जीतने योग्य तथा स्पर्धा करने. पाले सर शत्रुओंको नष्ट करके यह इन्द्र तुम्हारा मापक उत्पन्न होनेपर उनका नाश वनमें होनेवाले युद्धमें हो, और मुख ऊपर करके वे नष्ट हो जाएं। सरक्षण करेगा। ३ शयसा वावृधानः भूर्योजा शक्रः दासाय ११ विपीमान् ओजसा कृषि युघा अभ्यमवत् । भियसं दधाति । १४८r ]- अपने बलसे भनेवाला, अस्य मजमना प्र वावृधे [१४८८]- उस तेजस्वी बनने मनन्त सामसे गात, दुष्टोंका शत्रु शत्रुः दिल भय अपने सामपंसे शत्रुको युद्ध जीत लिया है। वह अपने उत्पन्न करता है। बलसे यहत महान हो गया है। इस प्रकार इन्द्र के सामर्यका वर्णन है । अब उसके विषय में ४ मतुना साफ जाता। मोजसा साफ पक्षिय। पीय साकं पृद्धः । मृधः सासहि Teace, दूसरे वर्णन देखिए- करने के लिए यह प्रसिद्ध है । अपने सामर्थ्यसे वह सब मेधिरः विश्वस्य वेद, धृषत् इत् एषते [ १४२] १२ सुतेभिः इन्दुभिः सोमेभिः यदि प्रतिभूपथ, काका भार उठाता है । अपने पराक्रमते वह महान् छमा सोमरसके साथ यदि तुम इन्द्र के पास गए, सो वह दुद्धिमान है। यह सब शोंको हराता है। इग्र तुम्हारे सब मनोरथ जानेगा और तुम्हारी सर कामना. ५ अशात पूजवा अशियात दुराध्या ना मा मोंको पूर्ण करेगा। अवमामुः[१४५७] - अतात, कुटिल, पापो और अमल १३ असा इत् अन्धसः मुतं प्रभर [१४]- उस पाच हम पर हमला न करें। इधको सोमरस भरपूर को। ६देपूर चिया पयं प्रपतः शश्वती अपा अति १४ सा शिया इन्द्रः नः ससा, मश्वायत् गोमत् तरामसि [ १४५५ ३- हे शूर इन ! तेरो सहापतासे सुर- यवमत् उर घारा इव दोहते [ १४५२ ]- यह कल्याण शित ए प हम बहुत सकटोकि प्रवाहसे पार हो। करनेवाला इन इसारा मित्र है। इहो पातमा दश हेते. ७हेन्द्र ! मध व परे च नः प्रास्व (१४५८]- पालो पापोंके समान, पोडे, गाय और पान्य बात देता है। माज, कल और परसों अर्थात हमेशा हमारा तू सरक्षण पर। १५ हे इन्द्रनामतु मा मर । यथा पुत्रेभ्यः ८ विश्वा च महानादिया मक्तं चराक्षपः१४५८] पिता, न शिक्षा पुराहत! यामनि जीवा ज्योतिः - सय दिन और रानिमें हमारा संरक्षण कर। अशीमहि ! १४५६ ]- हे इन्। हमारा मन पूर्ण कर । ९ अयं मयना धीर्याप कं, मभंगी शूरः, तुर्यामा से पिता अपने पुत्रोंको धन देता है, उसीप्रकार त हमें मन संमिश्ल.हेन्द्र शतमतो! ते उभा या पृषणाया है। है प्रशंसनीर इन ! मनमें हम मनुष्य तेजस्दी गर्ने । पनि मिमिक्षतुः [१४५९]- यह इन्च सुतसे पराक्रम १६हेन्द्र मयं सोमः तुम्य सुन्थे। तुभ्यं पाते। परनेवाला, शनुका नाश करनेवाला शूर, बहन पनवान् और त्वमस्य पाहि [१७]- हे इन्द्र ! यह सोमरस मेरे सबसे मिल मिलाकर एनेवाला है। हे संगों कार्य करने लिए नियोगा गया है । तो लिए जाना पाता है। उसे यो।
(२६०) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तरार्चिा १७ विचर्षणिः स्तुवते राधा काभ्यं पसु दाता ५ इदं श्रेष्ठं ज्योतिपां उत्तम ज्योतिः, विश्वजित, [ १४८७ ] - विशेष ज्ञानी तु स्तुति करनेवालेको पन और धनजित् वृहत् उच्यते। विश्वभ्राद् भ्राजः महि सूर्यः चाहे हए ऐश्वर्य देता है। दृशे, उस सहः अच्युतं ओजः पप्रथे [ १४५५ ]- यह । १८ अन्यनत् च व्यनत् च सरिन [ १४८४ - श्रेष्ठ और उत्तम सूपंका तेज अनेक तेजोंका प्रकाशक है। यह श्वासोच्छ्वास पारनेवाले और न करनेवाले दोनोंका हित तेज उत्तम विश्वयिजपी, पन जीतनेवाला और बहुत महान् करनेवाला है। है ऐसा कहते है। विश्वको प्रकाशित करतेयाला, स्वयं १९ विश्वे त्ये क्रतुं जन्ति [ १४८५]- सब यन- प्रकाशी यह महान् सूर्य दिनमें महान् सामथ्र्यवान अविनाशी कर्ता तेरे लिए ही यज्ञ करते है। और तेजप्पी मलको प्रकाशित करता है। २० महिपः तुविशुप्मः तृम्पत् यवाशिरं सोम ६ मध्नं भरूपं चरन्तं परि तस्थुषः युअन्ति । विष्णुना यथायर्श अपिवत् । सामहां ऊत माहि कर्म रोचना दिवि रोचन्ते [ १४६८ ]- आदित्यरूपी तेजस्वी, फर्तये ममाद [ १४८६ ]- महान और अत्यधिक सामयं. घलनेके समान दिखाई देनेवाले, पर स्थिर रहनेवाले सूर्यका वान तुप्त हुआ हुआ इन्न सत्तूसे मिले हए सोमको विष्णुके उपयोग सापक उपासना करते है । उसको प्रकामा पिरणे साप इच्छानुसार पीता है । यह सोमरस उस महान् इन्द्रको भाकाशमें प्रकाशित होती है। महान कार्य करनेके लिए हर्षित करता है। ७ तत् ज्येष्ठं भुवनेषु आस, यतः उन्नः स्येपनम्णः २१ मस्य रथे काम्या विपक्षमा शोणा, धृष्णू जसे । जशानः सघ शन निरिणाति। यं विश्वे ऊमाः नृयाहसा हरी गुंजन्ति [ १४६९ ]- इस इन्द्र के रपमै अनुमदन्ति [ १४८३ ]- यह ज्येष्ठ ब्रह्म सद भवोंमें सुदर, दोनों तरफ जोडे जानेवाले, लाल रंगके, शत्रुओंको व्याप्त है, जिससे बहुत तेजस्वी सूर्य उत्पार हुआ। उत्पन्न हरानेवाले, इन्द्रको टोकर ले जानेयाले दो घोडे जोडे जाते हैं। होते ही उसने उसी समय सब शत्रुओंको नष्ट किया, उसे इस प्रकार इन्द्र और इन्द्र के रथका वर्णन है। देखकर सम प्राणी प्रसन्न होते है। ८ मर्याः ! अकेतये केतुं कृण्वन् , अपेशसे पेश , उपद्भिः समजायथाः [ १४७० ]-हे मनुष्यो । मशा- सूर्यके रूप इन्द्र और सूर्यका भी वर्णन इस अध्यायम नियोंको ज्ञान देते हुए, रूपरहितोंको रूप देते हुए उप फालके आया है- बाद यह सूर्य उदय होता है। १ हे सूर्य ! श्रुतामयं वृपमं नर्यापसं अस्तारं ९ सवितु देवस्य तत् वरेण्यं भर्ग। धीमहि, याना अभि उदेपि [१४५०]- हे सूर्य ! प्रसिद्ध धनवान्, बलवान्, धियः प्रचोदयात् [ १४६२ ]- सविता देवके उस श्रेष्ठ मनुष्योंका हित करनेवाले बाताके सामने तू उदय होता है। तेजका हम ध्यान करते है, जो सविता-सूर्य • हमारी बुनियोको २ विभ्राट् यक्षपती भयि हुतं आयु दधत् [१४५३] उत्तम प्रेरणा दे । -विशेष प्रकाश करनेवाला सूर्य पन करनेवालेको आरोग्य पूर्ण दीर्घायुष्य देता है। इस प्रकार सूर्यका वर्णन इस अध्यायमें है। अन्तका मत्र ३ रमना अभिरक्षति [१४५३]-वह स्वयंका सरक्षण गायत्री मन्त्र है, और यह प्रसिद्ध होने के कारण सबको पता है। अब अग्निका वर्णन देखें- करता है। अमि ४ विभ्राट् वृहत् सुभृतं याजलातम, धर्मन् दिघः धरणे अर्पित, सत्यं अमित्र-हा, चम्युहन्तमं असुर- -हे अग्ने ! हमें दीर्घायु पल और अग्न दे। १ हे अग्ने। नः भायपि ऊर्जइपंच परसे १४६४] हा सपत्न-हा ज्योतिः अझे [१४५४]-विशेष प्रकाशमान् और महान, उत्तम भरणपोषण करनेवाला और अन्न रेनेवाला, २ दुगुनां आरे घाघस्व [१४६४]- दुष्टोको दूर कर। अपनी शक्तिसे घुलोकको धारण करने के लिए नियुक्त किया ३ हे अने! त्वं विश्वेषां यज्ञानां होता, देवेभिः गया, निश्चयसे शोंका नाश करनेवाला, दुष्टों को मारने. मानुपे जने हिता[१४४४]- है अग्ने ! तू सय यशोंका थाला, और राक्षोंका विनाशक, सपनोंको मारनेवाला सर्म होता, देवों द्वारा मनुष्यों में स्थापित किया गया है। भपना प्रकाश फैलाता है। ५ साना अचरे मन्दामि: जिल्हाभिा महा यज, सूर्य इन्द्र प्रयोदश अध्याय ] सामवेदका सुयोध अनुवाद (२६१) देवान मा वक्षि यक्षिच [१७] - वह तू हमारे यसमें इन मंत्रोंमें मित्र और वरुण देवताहापापिय और विवप आनन्द बहाने के लिए ज्वालाप्रोसे प्रदीप्त हो, और देवकि ऐश्वर्य ये देते हैं ।क्षाकर्ममें कुशल होने के कारण ये शाओंको लिए पनन कर । देवोंको बुलाकर ला और उनके लिए हटाकर दूर करते हैं। ये बलवान है। एक काम समाप्त हमा यर कर। कि दूसरा शुरु कर देते हैं। मालस्य समय नष्ट नहीं करते। ५ वैधः सुक्रतो देव अग्ने ! यशेषु अध्यनः पथा भापसमें शगडते नहीं । प्रगति करनेके सब शार्य करते है। अंजसा घेथ [ १४७६ 1- हे विधाता और उत्तम कर्म में इनके अच्छे गुण प्रण करने योग्य है। करनेवाले अग्नि देव ! तू यज्ञके पासके और दूरके मागको सरस्वती जानता है, इसलिए उत्तम मार्ग दिखा। ६होता अमयः देयः चिदथानि प्रचोदयन् मायया सरस्वती देवीके सम्यन्य भी इस अप्याममें वर्णन है- पुरस्तात् एति [ १४७७ }- होता अमर देव काँकी १ उत नः प्रियाहु प्रिया, सप्त-स्वसा सुजुरा प्रेरणा करते हुए पुशलतासे आगे जाता है। सरस्वती स्तोम्या भूत् [ १४६१]- हमें प्रिय वस्तुओं में ७ सरी कामु धीयते । अपरेसु मरिस्तेविसा प्रिय, सात बहिनों धारा सेवित सरस्वती स्तुतिके योग्य हो यशस्य साधनः [१४७८]- बलवान् अग्नि पुरमें स्थापित किया जाता है। दोनो पोंमें जब अग्निके समान देष सरस्वती विद्या और सस्कृतिको देवी है। अपने देशको प्रज्वलित होता है, तभी युद्ध होता है। यत्त अनि से जाया संस्कृति सबको प्रिप होनी चाहिए। यह सस्कृति सबसे अधिक जाता है। यह जानो अग्नि यतका साधन है। प्रिय है राव प्रशसनीयों में यह सर्वाधिक प्रशसनीय है। इसकी अनिमो वर्णनमें यज्ञ करना हो अग्निका मुख्य काम है। सात महिनें है। धर्म भावना, भाषा, सभ्यता, सत्कर्म भारोग्यसाधन और दो इस पहल है। रोम करने की इच्छा, शक्ति, संस्कृति और माभूमि में अग्निको उष्णताके रहनतक शरीररूपी यज्ञशालामें सूर्यादि सरस्वतीको सात महिने हैं। इनको सेवा प्रापेकको करती देवोंके अंश रहते हैं। और उटपाताके नष्ट होते हो सब देव चाहिए। निकल जाते है, यह अनुभव सबको है। ऊपरके मोंकि वर्णन २ जनीयन्तः पुत्रीयन्ता सुदानवा अप्रयासरस्वन्तं मानवारीरमें होनेवाले शतसवत्सरीय यज्ञमें देखें । उससे हवामहे । १४६०]- त्रीपाले पहपी, पुवाले, उत्तम मंगको मालंकारिक भाषा स्पष्ट रूपसे समझमें आ जाएगी दान देनेवाले, सबके आगे रहनेवाले, ऐसे हम सय सरस्वतोपरी और सय मंत्रोंका अपं स्पष्ट हो जाएगा। सहायताके लिए प्रार्थना करते हैं। मित्र और वरुण सम प्रकारकेशोगोंको इस विद्यादेवको उपासना करनी चाहिए। सब प्रकारको प्रगतिरे लिए विद्यामा उपपोग होता १ ताना पार्थियस्य दिव्यस्य महः रायः शक्तं, है । मियामें आगे रहनेवाला ही सममें भागे रहा है। देयेपु चां माहि क्षत्रं {१४६५/- वे दो मित्र और वह देव पापिय और विष्य ऐसे दोनों प्रकारके धन देने में समय है। प्राणकी उपासना सथ देवों इनका महान् बल प्रसिद्ध है। दोर्षापुण्य प्राप्त करने के एि प्राणरी उपासना अत्यन्त २ ऋतन ऋतं सपरता इपिरं दक्ष आशाते, भद्दा आवश्यक है- देवी यते ॥ १४६९]- यशसे पर पूर्ण करते हुए पाहने १६ प्राणस्पते । सोमानां कक्षीय स्थरर्ण पोग्य मल प्राप्त करते हैं । द्रोह न करनेवाले मित्र और वरुण कृणुहि या मोशिजः [१४९२]- हे शान स्वामी । है बोगों देव अपने सामायो पाते हैं। मानपते! {स-उमानां) ह्मादिमा हो उमा है, इसा- ३ पृष्टिवाया गेल्यापावानुमत्या पः पती, महन्तं विद्यासे मुक्त ब्रह्मनानी हो सोम है। उन हानियोंमें पोग गते भाशाते [ १४६७]- बुष्टि के लिए मिनको स्तुति सापनके अनुभमसे जिन प्राणों मान होता है, उन मतीमें होती है, मगति लिएको कर्म करते हैं, रान देगेको मोर रहनेवाले प्राहो (स्परणं सु-अरणे ) उत्तम एक और गिनतरी हि जातो है ऐसे अपके स्वामी ये मित्र मोर ग रेबरु उत्तम माने जाने-वाला सरो। यह माग म्पने बाये महान् रप बहते है। होगा, तो महान सिदि मिलेगी।
(२६२) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः ज्ञान प्राप्त करे, फिर प्राणोंको वशमें करें। पूरक और १३ हे सोम | अ-मित्र-हा विश्वचर्षणिः देवेश्या रेचक इनका अभ्यास करें। इस छाती में रहने वाला प्राण यदि अनुकामकृत् गघे शं पवस्व [१४४७ ]- हे तोमा वश हो गया तो दीर्घजीवन प्राप्त हो जाएगा। निरोगी रहा शओंको मारनेवाला, सब मनुष्योका कल्याण करनेवाला, जा सकेगा। स्वास्थ्य सुख मिलेगा। देवोंके लिए अनुवल फर्म करनेवाला न गायोंके कल्याण इस प्रकार इस अध्यायमें ही नहत्यको साधना यताई है। करने के लिए शुद्ध हो । गायका दूध सोममें मिलाया जाता है, भो इसका अनुष्ठान करेगा, उसको स्वास्थ्य, आरोग्य और इस कारण गायोको मानन्द होता है। दीर्घजीवनका सुख प्राप्त होगा। १४ हे सोम! इन्द्राय पासवे मदाय परिपिच्यसे [१४४८-हे सोम! इन्द्र के पीने के लिए और उसे आनन्द सोम देने के लिए तू यौनमें गिरता है । छाना जाता है । अब इस अध्यायमें सोमका यर्शन इस प्रकार है- १५ हे इन्दो पवमान ! सुवीर्य रयिं नः युजा इन्द्रेण नारिरीहि [ १४४९]- हे शुद्ध होनेवाले सोम ! १ बभ्रुः[ १४४४]- भूरे रगवा । उत्तम वीर्यसे युक्त धन हमारी सहायता करने के लिए इनसे २ स्वतवाः[१४४४ ]- अपनी शक्तिसे यहोवाला। लेकर हमें थे। ३ अरुणः। १४४९ - चमकनेवाला। १६ यथा दिव्या विट् अनभिशस्ता [ १४७५]- ४ दिविस्पुक [ १४४४ ]- स्वर्गमें रहनेवाला, हिमा- जिस रीतिसे दिव्य प्रजायें आनन्दित रहें ऐसा कर । लयको अची चोटी पर उगनेवाला। १७ नः मक्षु सुपतिः भय । सहस्रासाः पृतनापाइ ५ मनस पति [१४४८]- मनका स्वामी, यनका [१४७३ - हमारी मुसि शीघ्र ही उत्तम हो ऐसा कर। उत्साह बढानेवाला। अनेक कर्म करनेवाला और शधुसेनाको हरानेवाला हो । ६ गुप्मी [ १४७१ - सामर्थ्यवान्, बरुषान् । १८ सुते धियं आसिंचत । रसा वृषभं दधीत ७ सुमतिः [ १४७३ ] - उत्तम युधि देनेवाला, मनको [१४८०]- सोमरसमें दूध मिलाभो, ताकि उस दूषसे यलपान् उत्तेजित करनेवाला। सोमका धारण हो। ८ दिवः पृर्षि नः आ पवस्थ, अपां मि परि, १९ ते स्वं ओफ्यं जानत, वत्सासा मातृभिः न, अयक्ष्माः वृहतीः इय. [ १४३५]- धुलोकसे वृष्टि कर जामिभिः मिथः नसन्त [१४८१]. वे गायें अपना घर ताकि पानीको लहरें उछलें और रोगरहित अन्न मिले। जानें । जिसप्रकार बछडे अपनी माताओंसे मिलकर रहते है ९ तया धारया पवस्व, यया जन्यासः गावः इह उसोप्रकार अपने बाधुओंसे वे मिलकर रहें। नः गृहं उप आगमन् [१४३६] • उस पारासे छनता जा, गायोंका घर सोम है इसका अर्थ है कि सोममें गम्यका जिसके कारण दुधार और बछडे सहित गायें हमारे घरके पास दूध मिलाया जाता है । गायका दूध अपने घर जाता है अर्थात था और उनका दूम सोमरसमें मिलाया जावे । सोममें दूध मिलाया जाता है। यह आलफारिक वर्णन है। १० नः ऊर्जे भव्ययं पवित्र धारया विधाय[१४१८] -हमारे बल बढाने के लिए भंडके बालोंको छलनीमले पार १ हस्तच्युतेमिः अदिभिः सुतं सोमं पुनीतन, बनाकर नीचे अनिमें जल्दी जा। मघौ मधु माधावत [ १४४५]- हाथों से फूटे जानेवाले ११ रक्षांसि अपजंघनत् , रुचः प्रलयत् रोचयन् पत्थरों के द्वारा कूटकर निचोड़ा गया सोमरस शुद्ध करो और पवमानः असिप्यदत् [ १४३९ ]- राममोको मारकर इस मधुर सोमरसो दूध मिलायो । पहले के समान तेजको किरगोंको प्रकाशित करते हुए छाकर २ नमसा उपसीदत, दध्ना अमिश्रीणीत, इन्द्रे अनिमें जा। इन्दुं दधातन, [ १४४६] - नमस्कार करते हुए सोमके १२ विश्वानि विदुपे अरंगमाय जग्मये अपश्चाद् पास जा घठो और उस सोमरसमें वही या दूध मिलाको सधते विपीपते अस्मै प्रति भर [१४४०]- सबको और यह सोमरस इन्द्रको वो। लानमेवाले, बहुत प्रगति करनेवाले यज्ञमें जानेवाले, भागे इस प्रकार सोमको इनके लिए देनेका वर्णन है।अन्य रहनेवाले, सोम पीनेको इच्छा करनेवाले इस इन्द्र के लिए देवोंको भी इसप्रकार सोमरस पीनेके लिए दिया जाता है। सोमरस बो। सोममें दूध प्रयोदश अध्याय ] सामवेदफा सुग्रोध अनुवाद (२६३) सुभाषित ११ वृन-हा अहिं अबधीत् [ १४५। 3- बत्रको मारनेयाले इन्द्रने अहिको मार दिया। १ दियः वृष्टिं ना सु आ पवस्व, अयक्षमाः वृहतीः १५ सः शिवः इन्द्रानः मखा, अध्यायत्, गोमत् इपः १४३५- आकासे वर्षा अच्छी तरह गिरा और यवमत् उरधारा इव दोदते [१४५२ ] - वह कल्याण रोगरहित बहुत सारा मन हमें दे। करनेवाला इन्द्र हमारा मित्र है, यह घोडे, गाय और को २ तया धारया पयस्थ, यया जन्यास: गाय। इह इनके साथ मिलनेवाला अन्न, बहुत दूध देनेवाली गायोके नः गृह उपागमन [ १४३६ ]-तू मूसलाधार बरसात समान, हमें देता है। गिरा, जिसके कारण दूध देनेवाली गामे यहां हमारे घर आयें। १६ विभ्राट् यापतो अ-विहुतं आयुः दधत् ३ देवासः कं शृणयन् [१४३८]- देव आनन्दसे [१४५३] • सूर्य यज्ञ करनेवालेको आरोग्यमप दीर्घायु देता है। पार सर्ने । १७ बृहत् सोम्यं मधु पियतु [ १४५३ ]- बहुत ४ रक्षांसि अपजधनत्, रचः प्रलयत् रोचयन् सोमरसके मोठे पेय यह पीये। ११४३९ ]- रादासानो मारकर, पहले के समान अपने तेजरो १८ यातजूतः त्मना अभि रक्षति [१४५३]- वायुमे तेजस्वी हो। मेरित किए गए स्वयको हर तरहसे रक्षा करता है। ५ विश्वानि निदुपे, अरंगमाय जग्मये, अपश्चात् १९ मजा पिपर्ति १४५३]-प्रजामोसा उत्तम पोषण अध्यने प्रतिभर[१४४०]- सब जाननेवाले, ग्रहुत प्रगति करता है। परनेवाले, सबसे आगे रहनेवालेको भरपूर मनरे। २० बहुधा विराजति [ १४५३- अनेक रीतियोंमे ६ मेधिर. विश्वस्य चेद, धृपत्, तं इत् परते वह विशेष तेजस्वी होता है । Hin४२]- पुद्धिमान् इन्द्र तुम्हारे सारे मनोरयोंको जानता २१ पिभ्राट् वृहत् सत्यं अमित्रहा दस्युहन्तम है, वह माधुओंको हराता है, और तुम्हारी सब कामनामको असुरहा सपलहा, ज्योति। जो [१४५४]- विरेय पूरा करता है। तेजस्वी और विशाल, निश्चयते शऑरा नाशक, वृष्टोंको ७ समस्य शेन्यस्य शर्धतः अभिशस्तेः कुवित मारनेवाला, अमुरोशे मारनेवाला, सपनों [ शत्रुओं को अवस्वरत् ! 1४४३]- सब जोतने योग्य और पर्षा मारनेवाला तेजस्वी योर उत्पन्न हुआ है। करनेवालोंका नाश करके वह इन्द्र तुम्हारा नि सशय मरक्षण २२ इद श्रेष्ठ ज्योतिषां उत्तम ज्योति विश्वचित् , करेगा। धनजित् वृदन् उच्यते [ १४५५१- ये तेजस्वी पायाने ८ अमिनहा विश्वचर्षणिः देवेभ्यः अनुकामरुत् उत्तम तेजस्यो, सब जगह विजय करनेवाले, धन जीतनेवारी [1४४७]-तशत्रुओका नाश करनेवाला, सब मनुष्योंका महान और प्रसिद्ध तेज है। कल्याण करनेवाला और देवकि मनुकूत कार्य करनेवाला है। २३ विश्वभ्राद, भ्राजः महि सूर्य दृशे उर. सह ९ गयेश पवस्व [१४४७]- गार्यो मुख है। अच्युतं मोज पप्रधे [१४५५]- सवको प्रकाशित करतं. १० मनः चित् मनसा पतिः [am८)- मदशी घाला, स्वय प्रकाशमान यह महान् सूर्य देखने में बड़ा सामां- शाक्तिको जाने और मन पर शासन करें। वान्, अविनाशी और तेजावी सामर्यको फैलाता है। ११ हार्य रयिं नारिरीहि [१४४५]- उत्तम पराक्रम २४ कतुं या मर [४५६- यात उत्तम रीतिगे करने के सामप्पी युक्त पन हमें है। १२ श्रुतामधं वृपमं नर्यापस मस्तार अमि उदेषि २५ यथा पुत्रेभ्य पिता, न. शिक्ष{ १४.६ 3-मे [१५० - प्रसिद्ध पनपानों, बसपानों तपा मनुष्यों अपने पुत्रोंको पिता धन देता है, उसोप्रकार हमें है। हित करनेवालकि तथा दान देनवालकि सामने तू प्रकट २६ यामनि जीवा ज्योतिः अशीमहि । ३४५६ - होता है। यहमें हम मनुष्य प्रकाश प्राप्त करें। १३ यः नय नयति पुरः यालोजसा विमेद १५ २७ यमाता पृजनाः यशियामा दुराप्याः नामा -सि दन्द्रमे साधुओंको निन्दानये मारियों को अपने वाहु- अवगुः । १४५७/- अनाल, रिस, पक्षी मोर समान बालोतरराला। सा हमपर माक्रमण नरें। समाप्त (२६४) सामवेषका सुयोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः २८ हे शूर । त्वया वयं प्रवतः शश्वती अपः ४० ऋतेन ऋतं सपन्ता इपिर दक्ष आशाते, अति तरामति [ १४५७ 1- हे शूर! तेरो सहायतासे सुर- अनुहा देवी वर्धेते [ १४६६ ]- सत्यसे सत्यका पालन पित हुए हुए हम बहुत से सकटोंके प्रवाहसे पार हो। करते हुए बाहर्नेके योग्य बल प्राप्त करते हैं, ये आपसमें ग्रोह २९ अद्य श्वः परे च नःप्रास्व [१४५८]- माज, म करनेवाले दोनो देव बढ़ते है। फल और परसो अर्थात् हमेशा हमारी रक्षा कर । ४१ दानुमत्या इपस्पती युहन्तं गत आशाते ३० हे तत्पते ! विभ्या च महा ना दिवा नकं च [४६७]- दान देनेवाले मारके स्वामी महान् रथमें बैठते है। ४२ प्रघ्नं अरुपंचरतं परितस्थुप, युति [१४६८] रक्षिपः [१४५८]-हे सज्जनोंके सरक्षक! हमेशा हमें - ध्यान करनेवाले उपासक सूर्य के तेजस्वी और चलायमान दिन और रात्री में सुरक्षित कर। रूपका उपासनाके लिए उपयोग करते हैं। ३१ अयं मधया वीर्याय के प्रभंगी भर तुवी-मघ। संमिश्लः [ १४५९ ]- यह धनवान् इन्न सुखसे पराक्रम आकाशमें प्रकाशित होती है । ४३ रोचना दिवि रोचन्ते [१४६८]- उसकी किरणें करने के लिए शत्रुको नष्ट करनेवाला, शूर, अत्यधिक ऐश्वर्य- ४४ अस्य रथे काम्या विपक्षसा शोणा कृष्णू बान् (और मिलमिलाकर रहनेवाला है। नृवाहसा हरी युंजन्ति { ४६९- इसके रथम सुन्दर, ३२ या यजं नि मिमिक्षतुः ते उभा यात वृषणा बोनो तरफ जोडे जानेवाले, लाल रग, शत्रुओंको हरानेवाले [१४५९]- जो वञको धारण करते हैं वे तेरे दोनों पाहू तथा वीरोंको ढोकर ले जानेवाले दो घोडे जोडे जाते है। बलवान है। ४५ अकेतवे केतुं रुण्यन् , अपेशसे पेशः, उद्भिः ३३ जनीयन्तः पुत्रीयन्तः सुदानवः अग्रवः सर समजायथाः[ १७० ]- अज्ञानीको शान देनेवाले, रूप. स्वन्तं हवामहे । १४६० ]- स्त्रीके साप रहनेवाले अति रहितको सुन्दर रूप देनेवाले सूयका उपाके आनेके बाद उदय विवाहित, पुनयाले, उत्तम दान देनेवाले, आगे रहनेवाले हम होता है। विद्यादेवीको सहायताके लिए बुलाते ४६ स. महः पुरुणि वसूनि सातये अयोजि [१४७२] सरस्वान्-विद्याका उपासक, विद्वान्, सानी। -इस महान् इन्द्रते बहुत सारा धन देने की योजना बनाई है। ३४ सरस्वती स्तोम्या भूत् [१४६: ]- विद्यादेवी ५७ विश्वा नहुप्याणि जाता, ऊना घने स्वता स्तुतिके योग्य है। नयन्त [ १४७२]- सवका विरोध करनेवाले शत्रु उत्पन्न ३५ सवितुः देवस्य तत् वरेण्य भर्ग धीमहि, य हो गये है, वे अपर सिर करके वन में होनेवाले युद्ध में नष्ट हो। न धियः प्रचोदयात् [१४६२- सविता देवके उस श्रेष्ठ १८ सहवाप्सा. पृतनापाट् [४७३ - अनेक रूपोरो तेजका हम ध्यान करते है, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरणा सेनाको हरानेवाला वह वीर है। देता है। १९ अमत्यः देवः पिदयानि प्रचोदयन् मायया ३६ हे ब्रह्मणस्पते ! सोमानां कक्षीवन्तं स्वरण पुरस्तात् पति [ ३४७७ ] - अमर देव सब उत्तम कर्मोको शाहि [१४६३]- हे शानपते । शानसे और योगसे छातीमें प्रोत्साहन देता हम कुशलतासे भागे जाता है । रहनेवाले प्राणको अच्छी तरहसे आने और जानेवाला कर। ५० वाजी वाजेपु धीयते [ १७८]- बलवान् वीर मुखौ माता है। ३७ ना आयूंपि पवसे, न अर्ज इषं च [१४६४] ५१ विप्रः यशस्य साधनः [१४७८ जानी यतको हमें दीर्घायुष्य दे तथा हमें बल और अन्न भी । सिद्ध करता है। ३८ दुष्ठुना आरे याघस्थ [४६४]- दुष्टोंको ५२ ते स्व ओक्यं जानत [ १४८11- अपने घर जानते हैं। १९ तानः दिव्यस्य पार्थिवस्य महा रायः शक्तं, ५३ घत्सास: मासूमिः [१४८.]- रुडके माताके चां वेधेषु माहि क्षत्रं [१४६५ ]- वे तुम हमें प्रलोक और साथ जाते है। पुच्चीपरके महान् ऐश्पयाँको यो, पोंकि तुम्हारा देवोंमें महाम् ५४ जामिमिः मिथ नसत [१४८1]- अपने बल प्रसिद्ध है। भाईयोंके साथ वे मिलकर रहते है। प्राणायामका अभ्यास कर।
(२६५) प्रयोदश मध्याय] सामवेदका सुयोध मनुवाद ५५ तत् ज्येष्ठं इत् मुवनेषु पास [ ४८३ ]- यह ६६ मृधः सासहि[४८७ ] शत्रुको हरा। श्रेष्ठ ब्रह्म निश्चयसे भवनों में व्याप्त रहता है। ६७ विचर्षणिः स्तुवते राघः काम्य यसु दाता ५६ यतः उन्ना त्वेष-नृम्णः जज्ञे [१४४३]- जिससे [१४८७ ] - विशेष ज्ञानी तू स्तुति करनेवालेको यन और उप्र तेजस्वी सूर्य प्रगट हुआ है। चाहे हए ऐश्वर्यको देता है। ५७ जशानः सद्यः शनून् निरिणाति [ १४८३]- ६८ विपीमान् ओजला कृषि युधा अभि अभवत् उत्पन्न होते ही वह मानुओंको नष्ट करता है। [१४८८]- तेजस्वी तूने अपने सामयंसे हिंसक शनको ५८ यं विश्वे ऊमाः अनु मदन्ति [ १४८३] - जिसे युसमें जीत लिया है। देखकर सब प्राणी मानबित होते है। ६९ रोदसी मा पृणात् [१४८८]- घावाविषीरो तेजसे भर दिया। ५९ शवसा वावृधानः भूर्योजाः शत्रुः दासाय भियसं दधाति [ १४८४ ]- सामयंसे यउनेदाला तथा सामर्थ्यसे तू बढा। ७० अस्य मज्मना प्र यावृधे [१४८८]- इसके मनन्त शक्तियोरी युक्त ऐसा वह दुष्टोका पत्र र शत्रुके ७१ न घेतय [ १४८८]-दूसरोंको उत्तम प्रेरणा दे। दिलमें भय उत्पन्न करता है। ६० अव्यनत् च व्यनत् च सस्नि [१४८४]- स्वासोच्छ्वास करनेवाले और न करनेवाले दोनोंका हित उपमा करता है। १ उरुधाराय [ १४५२]- तसा दूध वेनेवाली ६१ ते मदेषु प्रभृता सं नयन्त [४८४]- तेरे गायोंके समान (सः इन्द्रः दोहते ) यह इन्द्र धन देता है। मानन्दमें यः हुए सब लोग तेरो भक्ति करने के लिए एक २ यथा पिता पुत्रेभ्यः, नः शिक्ष [ १४५६]- जैसे जगह पकट्ठे होते है। पिता पुत्रोंको धन देता है, उसीप्रकार हे इन्द्र ! सूहमें धन दें। ६२ महां उ6 माह फर्म कर्तवे ममाद [१४८६]- ३ यथा दिव्या विद् मनभिशस्ता[१४७३ ]-जिस- महान, अधिक और सामर्मवान् वीरको महान् कर्म करनेके प्रकार विष्य प्रशासन मानन्दसे पवित्र रहते हैं, उसीप्रकार लिए उरसाहित कर। सोम पवित्र रहता है। ६३ ऋतुना सार्क जातः[१४८७ ]- फर्म परनेको ४ आपः न [१३]- पानीके समाग शुद्ध बुद्धि पातिके साप तू उत्पन्न हुआ है। ६४ भोजसा साकं पक्षिय [४८७] - अपने ५ पक्षान [ १४०३]- यज्ञके समान तू पूग्य है। सामसे काम करनेको तेरी इच्छा है। ६ घत्सासः मातृमि न [१४८१]- जिसप्रकार ६५ हे प्रचेतन ! वी। साकं पृक्षः [१४८७1- हे यहो माताशे पास जाते हैं, उसोप्रकार भपने यान्यो साथ उत्साही पोर । अपने पराक्रमसे तु महान् हमा है। पे सोमरस जाते है। सोमरस यतंनमें गिरता है। त्रयोदशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची देखता मंत्रसंस्था हादेवस्थान ऋषिः पवमानः सोमः गायत्री " " ॥ " २४१६ २४१७ ९४७९१ कविर्षियः ९०९९ विर्भार्गवः ९४९३ कविर्भावः ३० [साम. हिन्दी मा.२] (२६६) सामवेरका सुघोष अनुयाद [उत्तरार्षिक: छन्दा मनसंख्या १४३८ देवता पवमानः सोमः गायत्री " ऋग्वेदस्थान ९४२१४ ९८४९५ ६४१ ६४२९ ६१४३३ ६४२॥ अनुष्टुप " १४४० १४४१ १४४२ २४४३ " " हती पिः कविर्भार्गवः कविर्भागवः भखाजो वार्हस्पत्यः भरद्वाजो बार्हस्पत्यः भरद्वाजो बार्हस्पत्यः भरद्वाजो ग्राहस्पत्यः (२) असितः काश्यपो देवलो वा असितः काश्यपो देवलो वा असितःकाश्यपो देवलोवा असितः काश्यपो देवलो वा मसितः काश्यपो बंवतो या असितः काश्यपणे देवलो वा पवमानः सोमः गायत्री " १४४५ २४४६ १४४७ " " " " ९।११०४ ९।१२।५ ९११६ ९५१७ ९०११८ ९।१०९ दा२११ ८९३३१ ८1९३३ 17 " " ॥ रा: " १४४९ १४५० १४५१ १४५२ सुकत मांगिरस. सुकक्ष मागिरसः मुका आंगिरसः " " " (३) सूर्यः जगती २४२३ १४५४ १४५५ १०।१७० २०१७ १०११७०१३ १३०२६ विप्राट् सौर्य: विभ्राट् सौर्य: विभ्राट् सौर्यः . " " १४५६ वसिष्ठो मंत्रावणिः प्रगाथ-(विषमा बहती रामा रातोयहती) १६५७ " " ७॥३२॥२७ दा६१।१७ दा६१८ ". वसिष्ठो मंत्रावणिः भर्गःप्रागापः भग: प्रागापः (४) " " १९६० गायत्री अ१६२४ ६६१।१० बा२।१० २०१८ार सरस्वती सविता ब्रह्मणस्पति- " " अग्निः पवमानः- २४६२ १४६३ ५४६४ १४६५ २०६६ १४६७ " भरद्वाजो बार्हस्पत्यः विश्वामित्रो पापिन: मेधातिथिः काकः शतं खानसः यजत यात्रेयः यजत मात्रय पजत वापर मधुच्छन्दा वैश्वामित्र. मधुच्छन्वाश्वामित्र मथुष्ठन्दा वैश्वामित्रः मित्रावरुणौ " " પાદરા પત્રક ५.६८५ १११ १०वार " 1 १४६८ " " १५७० " " अपोदश अध्याय ] सामवेदका सुबोध मनुवाद मंत्रमंत्पा भाषेवस्थान ऋषिः देवता उशना काम्पः पवमानः सोमः त्रिष्टुप उसना काव्यः " H मानः શ૮૮ રદાર ९१८८७ ६१६१ ६१९६२ ६१६३ ३२२७७ ३१२७८ ३१९७९ वर्षमाना गायत्री १४७२ १४७३ १४७४ १४७५ १३७ १४७७ १४५८ १४७९ " उशनाकाव्यः भरवाजो बार्हस्पत्यः भरद्वाजो वाहस्पत्यः भरद्वाजो बार्हस्पत्यः विश्वामित्रो गापिनः विश्वामित्रो गापिनः विश्वामित्रो पापितः " " " " १४८० मग्निः, बोंधिया H ८७२।११ हर्यता प्रामायः 41518 यंतः प्रागापः हर्पतः प्राणाया १००१२०१ यहदिय माप १०१२०१२ पहद्दिव आपणः १०।१२००३ बहदिय भाषणः १४८३ २४८४ " " " " मष्टिः पतिमायरी १४८७ समयः निक मासमायोनका गृत्समदा घाना २३ २२२ " (२६८) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [उत्तरार्चिक अथ सतुर्दशोऽध्यायः। -- अथ सप्तमप्रपाठके प्रथमोऽधः ॥ ७-१॥ [१ (१-१६ ) १, ९ प्रियमेध आंगिरसः; २ नुमेध-पुरुमेधावागिरसौ; ३,७ पदणस्नवृष्णा, प्रसवस्युः पौषकुरसः; ४ शुनःोप आजीगतिः, ५ वत्सः काम्वः ६ अग्निस्तरपसः; ८ विश्वमता यश्वः, १० वसिष्ठो मंत्रायणिः सौभरिः फायः १२ शतं पंखानराः, १३ घरपव मात्रेयः; १४ गोतमो राहगणः, १५ फेतरानेयः, १६ विरुप आंगिरसः ॥ १-२, ५, ८-१ इन्द्रः, ३, ७ पवमानः सोमः, ४, १०-११, १३-१६ अग्निः ६ विश्वे देवाः, १२ अग्निः पयमानः ॥ १, ४-५, १२-१६ गायत्री; २, १० प्रगाय:-(रिपमा यहतो, रामा सतोयहती); ३, ७ मा बहती; ६ अनुष्टुप, ८-९ उष्णिकः ११ बहती ॥ 9. २१ ३५१ रै १४८९ अभि प्र गोपति गिरेन्द्रमर्च यथा विदे । सुनु५ सत्यस्य सत्पतिम् ॥१॥ १ . ८।६९।४) १४९० आ हरयः ससृजिरेऽरुपीरधि वहिपि । यनामि संनवामहे ॥२॥ (ऋ. १६९।५) १४९१ इन्द्राय गाव आशिर वजिर्ण मधु । यत्सीमुपहरे विदव ॥३॥ १ (वा) ॥ [धा० ११ । उ० नास्ति । स्व०२] (ऋ. १६९।६) १४९२ आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्र र समत्सु भूपत । उप शामिण सक्नानि महन्परमज्या चीपम (म.८९०11) २ , १ ३३३.. [१] प्रथमः खण्डः। [१४८९) हे स्तुति करनेवालो ! (सत्यस्य सुनु) सत्य यज्ञके पालक ( सत्पति गोपति) सोंकि Cam और गार्योक पालक इस (इन्द्रं ) इन्द्रको (यिद यथा गिरा ) निराप्रकार तुम जानते हो, उसीप्रकार स्तुति (अभिम अर्च) उत्तम स्तुति एरो॥१॥ [ १४९०१ (हरयः) इनके पोरे ( भरपी) पमकनेवासे ( अघि यदिपि) मान पर उसे ( भाससमिरे) सायें। ( यत्र ममि सप्नयामहे) जिस स्थानपर बैठे हुए पदको हम स्तुति करते हैं ॥ २ ॥ [१४९१] (यत् ) भब र ( उपदरे) पास हो (मधु सी घिदस्) मोठा रस पीता है तब ( गायः) गाये (यमिणे दाय) व्यपारी इसके लिए (मशु माशिरं दुदुहे) मोटाप रेती ॥३॥ [१४९२] हे ऋदिनो । (विश्या समरमु ) सर पुढोर ( इम्यं रन्द्रं ) महायता लिए पुलाये जाने योग्य सरो माय करके गाये गए (नः प्राहाणि सयनानि उप याभूत ) हमारे स्तोत्र तथा पर उसकी गोमा जाते है। (पृहन् परमश्याः शचीपम) हे पत्रको मारनेमाले, उत्तम गरीसे युक्त धनृपवास तथा प्रसनीपण! हमें vिen मा.
चतुर्दश अध्याय ]
सामवेदका सुबोध मनुवाद
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१४९३ स्वं दाता प्रथमो गधामस्यसि सत्य ईशान कर ।
तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महो ॥२॥२ (पा)॥
[धा०१७। उ० नास्ति । २०२] (९०१२ )
१४९४ प्रलं पीयूपं पूर्व यदुक्थ्यं महो गाहाहि आ निरधुक्षठ ।
इन्द्रममि जायमान समस्वरन
(ऋ ९।११०८)
१४९५ आदी के चित्पश्यमानास आय वसुरुचो दिव्या अम्पन्पत ।
दिवो न बार सविता म्पूर्णते
॥२॥ (ऋ ९१११०१६)
१४९६ अध यदि पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनामि मन्मना ।
यूथै न निष्ठा वृपमो घि राजसि
॥३॥ ३ (खू)॥
[धा०१६ । ३०२ । स्व०६1( ९।११०१९)
१४९७ इममू पुत्वमस्माकर सनि गायनं नपारसम् । अग्ने देवेषु न चोचः ॥ १॥
(. १२७११)
१४९८ विमक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ । सयो दायुरे क्षरसि ॥२॥( १॥२७॥६)
६. १४९३ 7 हे इन्द्र । (प्रथमः त्वं राधसा दाना असि ) सबमें प्रथम तू घरमा बाता है (शामकृत् सत्यः
अलि ) ऐश्वर्ययुक्त करनेवाला तू सत्य है, (तुविद्युम्नस्य शयसः पुत्रस्य मह.) बहुत तेजस्वी बालके पुत्रके समान
सुशो (युज्या वृणीमहे) धनको प्रार्थना हम करते है ॥ २ ॥
[१४२४१ ( यत् परनं ) जो पहलेसे मिलता आ रहा है, वह (पीयूषं उक्थ्य ) ममत प्रशसनीय है, वह
(पूर्य ) पहलेसे मिलनेवाला अमृत (मदा गाहात् दिवः) महान् और भगाय लोकसे ( या निरघुप्तत) निकाला
गया है। उसके बाद (हन्द्रं अभि । इनके आगे (जायमान ) उत्पन्न हुए हए सोमकी (समस्परन ) पशकर्ता स्तुति
करते है॥१॥
[१४९५] (आत् ) याव ( पश्यमानास: दिव्या वसुरुचः) इसको देखनेवाले दिव्य वसुध, अबतक (दिघः
सविता ) घुलोकसे सूर्य ( पार न व्यूर्तुते ) सयको टकनेवाले अधिकारको दूर नहीं करता, सवतक (याप्यं सम्प-
नूषत ) भाई के समान इस सोमको स्तुति करते है ॥ २॥
[१४९६] है ( पयमान ) लोम | (अघ) बादमें (यत् हमे रोदसी) जब इस ए और पृपियो (हमा
विश्वा भुवना च) और इन सभी प्राणियोंम (मज्मना यूये निष्ठा पृपभ' न) अपने पलसे गायकि मुगके पोचमें
रहनेवाले पलके समान (विराजसि विराजमान होता है। ३॥
. १४९७ 7 है ( अ ) बग्ने ! (त्व अस्माकं ) हमारे द्वारा (इम 5) बोले जानेवाले इन (सनि)
हवन युक्त (नवसं गायत्रं) नवीन स्तृतिके मत्रोंको (देवेषु प्रयोचा) देवोंके पास जाकर उन्हें बता ॥१॥
[e.] है (चित्रभानो विलक्षण तेजावी अग्ने ! (निमक्का असि) धन देनेवाला है। (सिन्धोः
उपाके ऊर्मा मा) निसप्रकार नौके पास पानीकी सहरें आती है उसीप्रकार ( दाशुषे सच सरस ) तारो उसी
समप कौत पत्र देता है॥२॥
३
३
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१.३१५३११
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(२७०)
सामवेदका सुबोध अनुयाद
उत्तचिका
१४९९ आ
नो मज परमेष्वा वाजेपु मध्यमेषु । शिक्षा वस्त्रो अन्तमस्य ॥३॥ ४ (टा)॥
[ धा० १३ । उ०१. स्व०२] (ऋ. १२७९)
१५०० अहमिद्धि पितुष्परि मेघामृतस्य जग्रह । अहसूर्य इवाजनि ॥१॥ (ऋ. १०)
१५०१ अई प्रसेन जन्मना गिरः शुम्भामि कण्यत् । यनेन्द्र शुष्ममिधे ॥२॥' ऋ. ८।६।११)
१५०२ स्वामिन्द्र न तुष्टुवुषियों ये च तुष्टुवुः । ममेद्वर्धस्त्र सुष्टुतः ॥ ३॥ ५ (थु)॥
[धा० १४ । उ०२। स्व० ५] (4६१२)
॥ इति प्रथम खण्ड. |॥ १॥
[२]
१५०३ अग्ने विश्वेभिरमिमिजापि ब्रह्म सहस्कृत । ये देवत्रा य आयुपु तेभिन! महया गिरः ॥१॥
१५०४ स विश्वेभिरनिभिरग्निः स यस्य वाजिनः ।
नये तोके असदा सम्यड्वाजैः परीवृतः
|॥२॥
१५०५ त्वं नो अमे अग्निमित्रक्ष यनं च वर्धय ।
त्वं नो देवतातये गयो दानाय चोदय
॥३॥६ (डि)॥
[धा०१८ । उ० ३ । स्व० ३] (ऋ. १०११४१६)
[१४९९) हे मग्ने ! (नः) हमें ( परमेषु घाजेपु) श्रेष्ठ भोगोंमें ( आ भज ) पढ़या, तथा (मध्यमेपु मा)
मप्यन भोगोंमें हमें पहुंचा और ( अन्तमस्य वस्तः शिक्ष ) कनिष्ठ पन भी हमें दे ॥ ३ ॥
[ १५०० ] (पितुः ऋतस्य मेधां) पालक तथा अमर इन्द्रको अनुकूल युद्धिको ( मह इत् परि जग्रह ) मैंने
प्राप्त दिया है, इस कारण ( अहं सूर्य इव भजनि) में सूर्घके समान हो गया
१५०१ ] (कण्यवत् यह ) पयरे रामान (प्रत्नेन जन्मना ) प्राचीन वाणीसे (
गिम्भामि ) स्तोत्र
कहर में एमको सुशोभित करता हूँ, (येन इन्द्रः शुष्मं दधे इत् ) जिसकी सहायतासे इन्द्र बलको धारण करता है ॥२॥
[१५०२ ] है (न्द्र) इन्द्र 1 (थे त्यां न तुष्टुयुः) जिन्होंने तेरो स्तुति नहीं की, तथा (ये रुपयः च तुएषुः)
जिन ऋषियोंने स्तुति की, उनमें से ( मम इस्) मेरे स्तोत्रोंमे हो (सुपुतः पर्पस्च ) उत्तमतासे प्रशशित होने के कारण
सषित हो॥३॥
॥ यहां पहला सण्ड समास टुभा॥
[२] द्वितीयः सण्डः।
[१५०३ ] हे (सहस्तृत अने)बल प्रकट करनेवाले बग्ने ! (विश्वमि अतिभिः) राय मग्नियों के साथ - साप
भी ( प्रत्म जोषि) हमारे सोत्र सुन। (ये देवत्रा ) जो अग्निया देषोंमें है, और (पे आयुपु) जो मनप्पोमें है।
(सेमिना गिरः मध्य ) उमरे द्वारा हमारी स्तुतियदि भहत्यको या॥
[१५०४] (यम्य याजिनः) निरा बलयान अग्निमें हवन पनेवाले यहत है, (स: अगि) यह अनि
(पिश्येमि अग्निभिः ) सब दूसरी अनियोंकि साप (घाजेःपरीगृत ) हविष्यानसे पिरा हमा (सम्पर भस्मत् प्र
मा) उसम सिम हमारे पाम भावे, तथा ( सातनये तोके) बरहमारे पुत्र, पौत्रोती तरफ भी गाये ॥२॥
[१५०५ ] हे (ओ) पाने ! (त्य ममिभिः) मय अग्निोरे साप (ना प्रल यमं च षधं) हमारे
तोर मोर पा । ( न) में (रायः दानाय) मन रेनेरे लिए (देयतातये) देश (पोरय)
मेरि॥३॥
चतुर्दश मध्याय) सामवेदका सुशोघ अनुवाद (२७१) २२ 35 25 २७ है १५०६ स्यै सोम प्रथमा वृक्तवहिपो महे वाजाय श्रवसे घियं दधुः । स स्वं नो वीर वीर्याय चोदय ( १९९०७) १५०७ अम्पमि हि श्रवसा ततर्दियोत्सं न के चिजनपानमक्षितम् । शोभिर्न भरमाणो गभस्त्योः ॥ २॥ (२.९।११०५) १५०८ अजीजनो अमृत माप कहतस्य धर्मन्नमृतस्स चारुणः । सदासरा बाजमच्छा सनिष्यदन ॥३॥ ७ (ले)॥ [घा० १०। उ० नास्ति । स्व०७] (भ. ९।११।४ ) १५०९ एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पियाति सौम्यं मधु । प्र राधारति चोदयते महिरपना ।। १ ।। (ऋ. ८।२४११) १५१० उपो हरीणां पति राधा श्चन्तमप्रयम् । नून श्रुधि स्तुम्तो अव्यस्य ॥२॥ (ऋ. ०२४।१४) १५११ न घशेग पुरा च न जने वीरतरस्त्वत् । न को राया नवथा ने भन्दना ॥३॥८(चा)। [धा० १७ । उ० १ । स्व०१] (ऋ. ८।२४।१५) "१ a 3 २ ३२३113 १ १ [१५०६] (सोम ) हे सोम! (प्रथमाः यूक-बर्हिपः) ससि प्रथम भारत फैलानेवाले पजमान (महे वाजाय यसे ) विशेष बल और अनके लिए (त्ये घियं दधुः ) तेरे विषय उत्तम विचार रखते है। (सास्य ) वह मू. (वीर) हे थोर सोम! (नः पार्याय चौदय ) हमें पोर होनेरे लिए प्रेरित कर ॥ १॥ [१५०७ ] हे सोम! (श्रयसा) मनसे युक्त होकर (अमि-अमि ततर्दिय ) तू उसनोसे मोपे गिरता है, (म) जिसप्रकार (जनपानं ) मनुष्यो पोन के लिए (गभस्त्योः शामिः ) हायोंकी अंगुलियोंसे (फ चित् अमितं उत्सं) पिसी न चूनेवाले हौजको (भरमाणः) पानीसे भरते हैं, उसीप्रकार तू कलमामे भरता है ॥२॥ ८१५०८ ] है (गमृत ) अमृतरपी सोम ! तूने ( ऋतस्य चारणः अमृतस्य ) सत्य और मगलकारक पानीको पारण करनेवाले अन्तरिक्षम (फे माय अजीजाः) गूर्यको मनुष्य के लिए उत्पन्न किया, (सनिप्यरत् ) सोंगो सेया को। (वाज मच्छ)तू युद्ध के लिए सीधे ही ( सदा असरा) हमेशा जाता है | ३ ॥ [१५०९(इन्दु ) मोमरस (इन्द्राय ा सिंचत ) इनको दो । वह इन्द्र (सोम्यं मधु पियाति ) तोमर मोठा रस पीता है और (महित्वना राघसि प्रचोदयते ) अपने महादसे पनोंको प्रेरित करता है । [१५१ (हरीणां पति) घोडके स्वामी और ( राधावन्तं ) मक्तोंको धन देनेवाले इन्दको (उपगमध) में स्तुति करता हूँ। (अन्यसा स्तुवतः नूनं थुधि) मा शपि स्तुति करता है, उस स्तुतिको है ! अवश्य सुन॥२॥ [१५११ ] हे इन्द्र ! (वय पुरा न जसे ) तसे पहले तेरे समान कोई भी नहीं हुअर, हे ( अंग ) सामर्थ्यवान् ! (पीरतरा न हि तुमसे महकर पोर भी कोई दूसरा नहीं हमा, (गया नाक) पन देनेवाला भी कोई दूसरा महाँ हसा (पययान) पदर्भ रातो कुचलनेवाला भी धूसरा कोई नहीं हुमा तपा (मन्दनाम) स्तुतिके लायक भी दुसरा कोई नहीं हुआ।
(२७२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तराचिका १२ ३१ १५१२ नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम् । पति वो अघ्न्यानां धेनुनामिपुष्यमि ॥ १ ॥ ९ (ब)। [धा०५ । उ० नास्ति । स्व० १] (ऋ ८६९।२) ॥ इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥ [३] 3. २ 3२ २ २१ २३" ३३२ २ 91. १३३" ३३ ॥ १५१३ देवो वो द्रविणोदा। पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उदा सिञ्चयमुप चा पुणधमादिद्वौ देव ओहते ।॥१॥ ( ७१६११) १५१४ तोतारमध्यरस्य प्रवस चाहि देवा अकृण्यत । दधाति र विधते सुवीर्यममिर्जनाय दाशुषे ॥२॥१० (लि)॥ [ धा० १४ । उ० नास्ति । स० ३] (ऋ ७१६।१२) १५१५ अदर्शि मातुवित्तमा यसिन्नतान्यादधुः । उपो पु जातमार्यस्य वर्धनमनि नक्षन्तु नो गिरः ॥१॥ (ऋ. ८॥१०॥ १५१६ यस्माद्रेजन्त कृष्यवईत्यानि कृपतः । सहस्रसा मेघसाताविव मनागिन धीभिर्नमस्पत ॥२॥ (ऋ. १०२३ [१५१२ ] हे यजमानो ! (घ) तुम्हारे लिए (ओदतीनां नदं) उषाभाषी उत्पन्न करनयाले मारित्यरूपी इन्द्रको हम थुलाते हैं। ( योयुक्तीना नदं । पन्द्र किरणोंको उत्पन्न करनेवाले इन्द्रको तुम्हारे हितके लिए बुलाते है, ( भन्न्यानां पति यः ) गायोंके पासन करनेवाले इन्द्रको हम तुम्हारे लिए मुलाते हैं, (धेनूनों पुष्यसि ) हे यजमान ! तू पाप दूधका मारके रूपमें उपयोग करनेको इछा करता है॥१॥ ॥ यहां दूसरा सण्ड समाप्त हुमा । [३] तृतीयः खण्डः। [१५१३] (प्रविणोदा देवः) धन देनेवाला अग्निदेव (वः पूर्ण मासिचं पिपिए ) तुम्हारो घोसे भरी हुई बामचोको पा करे । और छम (उत् सिंचयं या ) सोमो मतंन भरो, (पृणाय घा) पतनों को हमिसे पूरी तरह भरो, (गात् इस देयः यः मोहते ) बारम भग्नि देव तुम्हारा पोषण करेंगे ॥१॥ ८१५१४] (देया.) देवोंने (प्रचेतसं ) श्रेष्ठ बुद्धिमान् (अध्वरस्य यदि होतारं संहितापूर्ण यशके कर्ता, हथिको डोनेवाले और हवन करनेवाले उस अग्निको (अपयत ) अपना सहायक बनाया है, यह (अग्निः) अग्नि (पिपते पाशुपे जनाय ) या करनेवाले तपा दान देने वाले मनुष्यको (-धोयें पल दधाति) उत्तम धोरता मानेपासे पत्र देता है॥२॥ [१५१५] (यस्मिन् मतानि मादधुः) जहाँ मिस मग्निमें पत्रमान पाकर्म भरते हैं, यहाँ ( गातुवित्तमः मदारी) मागकोंमें सधैष्ठ यह अग्नि उत्पन्न होता है। सुभात मार्यस्य पर्धन) उत्तम रोहिरो प्राप्त हुएइए और बायोगानेवाले (अनि) अग्निरो (नः गिरा उपो नक्षातु) हमारी स्तुतिपा प्राप्त होnt. [१५१६] (यस्मात् चरस्पानि एप्पतः ) मिस समय पम्प परनेवाले मनुष्योरो (एयः रेजते । गरे मनुष्य कंपानराप्रपान करते है, उस समय हे मनुष्यो ! ( महन्नमा अनि) हमारी मारके पर वाले भगिनी (मेघसानी ) यात ( पीभिः रमना ममस्पन) स्पूिन त्या प्रगाम २॥ प मतुवंश मध्याय सामवेदका सुबोध मनुपाद (२७३) . । ३. ३१. 3. . . २ 4.1 २३१२ .z १५१७ प्रदेवोदातो अमिदेव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि चावृते तस्थौ नाकस शणि ॥३॥ ११ (हा)॥ । पा० १६ । उ० नास्ति । स्व.२]) 1१०१२) १५१८ अम आयूपि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे वापस दुन्छनाम् ॥१॥ (क्र. ९६६।९९) १५१९ अपिपिः पवमानः पानन्या पुरोहितः । तमीमहे महागयम् ।।२।। (ऋ ९।६६।२०) १५२० अग्ने पवस्व स्वपा असे वची सुवीर्यम् । दपद्रयि मपि पापम् ॥३॥ १२ (क) [धा० १० 1 उ०२ । स्व०१] (ऋ.९६६२१) १५२१ अमे पावक रौचिपा मन्द्रया देव जिह्वया । आ देवावक्षि यक्षि च ॥१॥ १।२६।१) १५२२ तं त्या घृतस्नवीमहे चित्रमानो स्वदेशम् । देवा आ वीतये वह ॥२॥ (ऋ. १।२६।२ ) १५२३ वौतिहोत्रं त्या को घुमन्तर समिधीमहि । अप्रै यहन्तमधरे ॥ ३ ॥ १३ (टौ)॥ {धा०१८ | 3० | २० नास्ति ] (ऋ. १।२६३) ॥ इति सुतीय खण्ड ॥३॥ [१५१७ ] (देयोदासः अप्ति देवः ) घलोको रहनेवाला अग्निदेव (इन्द्रःन) इनके समान ( मज्मना) यलपूर्वक (मातरं पृथिवीं अनु ) मातृभूमि पर (प्रवि यादृते ) अनेक प्रकार के कार्य करता है, और (नाकस्य शर्मणि तस्थौ) अन्तरिक्षके मात्रयसे रहता है ॥ ३ ॥ [ १५१८ 7 है । अग्ने भन्ने ! (म. आयूपि परसे) हमें सम्यो आयु प्रदान कर । ( म ऊर्जपं च मा सुपा हमें यस और सन्न है। (दुच्छूनां दुष्टोतो (आरे याघस्य ) दूर करके उन्हें पोडित कर ॥१॥ [१५१९ (पांचजन्यः ऋपि.) पचन का हित करनेवाला और सम देखनेवाला (परमानः अग्निः शुरु अग्नि ( पुरोहित ) मागे स्थापित किया गया है । (तं महागये ईमहे । उस महान् यज्ञशालामें रहने वाले अग्निको हम पापना करते है ॥२॥ [ १५२०Jहे अग्ने ! टू (स्वपा ) उत्तम कर्म करनेवाला है, ( अस्से यर्चः सुवीय पवख ) हमें तेज तथा पराक्रम करनेको शक्ति दे और ( मयि रयिं पोपं यत् । मुम्नै धन और पोषण हे ॥ ३ ॥ [१५२१] (पावक अग्ने देव ) हे पवित्र करनेशले अग्निदेव । (शोचिषा मन्द्रया जिलया) अपने तेप्रमे और मानन्द वेनेशलो ज्यालासे ( देवान आ चक्षि यक्षिक ) देवोंको बुला और उनके लिए यश कर ॥१॥ [१५२२] हे (पृत-स्नो चित्र-भानो) घोसे उत्पन्न होनेवाले तथा विलक्षण तेजस्वी अग्ने ! ( स्वर्टशत त्या ईमहे । सयको बेलनेवाले तेरो हम प्रार्थना करते हैं। यह प्रार्थना यह है कि (पीतये देवान् मा यह ) हवि भक्षण करने के लिए देवोंको यहां मुलाकर सा ॥२॥ [ १५२३ ] है ( क भने ) मानो अग्ने ! (घीति-होनं घुमन्तं ) हवन पर प्रेग करनेवाले, सेनस्वी तथा (पहन्तं स्या) महान पुझे ( सम्परे समिधीमहि ) यामें हम प्रावलित करते है ॥३॥ ॥ यहां सीसरा खण्ड समाप्त हुआ। ३५ [ साम. हिदी भा २] (२७४) सामवेदका सुयोध मनुवाद [उत्तरार्चिक - . . १ . ११ [४] १५२४ अवा नो अम ऊतिमिर्गायत्रस्य प्रभमणि । विश्वास धोपु वन्य ॥१ (ऋ. १७९/७) १५२५ आ नो अग्ने पि मर सत्रासाहं वरेण्यम् । विश्वासु पृत्सु दुष्टरम् ॥ २ ॥ (*. १७९५८ ) १५२६ आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम् । माडीक घेहि जीवसे ॥३॥ १४ (पौ) ।। [घा० १५ । उ० नास्ति । स्व. नास्ति ] (ऋ. ११७९९ ) १५२७ अमिर हिन्वन्तु नो धिपः सप्तिमाशुमियाजिषु । तेन जेम्म धनंधनम् ॥१॥ (ऋ. १०११५६१) १५२८ पयागा आरामहै सेनयाम तवोत्या । तां नो हिन्व मघत्तये ॥२॥ (ऋ. १०।१५६।२ ) १५२९ आमे स्थूर रयिं मर पृथु गोमन्तमश्विनम् । अशिखं वर्तया पविम् ॥३॥ (२.१०।१५६३) १५३० अमे नक्षत्रमजरमा सर्प रोहयो दिवि । दपज्योतिजनेभ्यः ॥ ४॥ (*. १०।१५६।४ ) १५३१ अमे कविशामसि प्रेष्ठः श्रेष्ठ उपस्यसत् । योधा स्तोत्रे वयो दधत् ॥५॥ १५ (या)॥ [धा० १९ । उ० २१ २० २१(ऋ. १०।१५६।५ ) [४] चतुर्थः खण्डः। [३५२४] (पिभ्यासु पीपु घन्छ भने ) सम यतोंमें धन्दनीय भग्ने ! (गायत्रस्य प्रमर्मणि गायत्री छन्द पाने सामगानों शुरू होनेपर (ऊतिमिःमः भव ) संरक्षणके साधनोंसे हमारी रक्षा कर ॥ १॥ [ १५२५] है ( अ ) अग्ने ! (सत्रा-साई) सय दात्रुओंको हरानेवाले (वरेण्यं ) थष्ठ ( विश्वासु पृत्सु गुएरं सब मुनि दुस्तर (गर्व नः आभर ) पन हमें वे ॥ २ ॥ [ १५२६है (अग्ने ) अग्ने । (नः जीपसे) हमारे रोपंगीवन के लिए (सु-चेतुना ) उसम मानस पुल (विश्व-मायु-पोरस सब आप तक पोदन करनेवाले (माडौंक रयि ) मुगराया धन (नः पहि) हमें ये ॥३॥ [१५२७ ] (माजिपु मायुं सति त्य) मिसप्रकार मुरमें सोन घासनेपाले घोडेको प्रेरित करते हैं, उसी (मः पिया हमारी भूरिया (भाति हिस्यानु ) ममिको प्रेरित करें। (तेन धनं पनं जेप्य ) उसमें हम प्रामपुर बीते ॥ [१५२८ ] है { भन्ने माने ! (यया सेनया) मिस सेनारो तया (तय ऊत्पा) सि हेरे संरक्षलरी ( गाः मकरामहै। गाय हमें मिले (तारा संरक्षणको शक्ति (नामघत्तये दिया हमारे धनरी प्राप्तिके लिए [१५२९] (म) माने । (स्परं पृथु ) गहत महान् ता ( गोमन्तं अधिन रयिंगाप मोर पोरगे पुरष पन ( मा भर ) हमें भरपूर है। (संधि ) भाग अपने तेन सा मोर (पयिं पतंय ) मात्र हम [१५३०Jहामने) मग्ने 1 ( जनेभ्या ज्योति यत् ) मोर्णो लिए प्रकार करते हुए गारं नक्षत्र एवं विविध राहत मोरनिरनर गतिमान् परोपमोरम (मारोहया) पूरा ४॥ [१५३१] है (भो) माने । (विशां केतुः मेष्ठः येष्ठः) मामा हान रेनेशाला, शिव मौर थेठ (मसि)(उप-स्य मन् । पासामा रहनेगमा (स्तोत्रे घयावया) स्तुति परवानगी माना (पोप) मी नुनि मान ५३ प्रतिकर।२॥
चतुर्दश अध्याय सामवेदका सुयोष मनुवाद (२५) १२ १ घर २ " १५३२ अग्निपो दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपार रेवासि जिन्नति (ऋ. १४४१६) १५३३ इशिप वार्यस्य हि दावस्याग्ने स्वा पतिः । स्तोता स्यां तव शमणि ॥२॥ (*. ८1४४१८) १५३४ उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा माजन्त ईरते । तव ज्योतीपयर्चयः ॥ ३ ॥ १६ (ली) ॥ {घा० ५। उ० नास्ति ! स्व० ५ ] ( १४४४१७) ।। इति पतुः खण्डः ॥४॥ ॥ इति सप्तमप्रपाठके प्रथमोऽभः ।।७-१॥ ॥ इति चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ (१५३२ (मूर्या । सबमें येष्ठ (दिवः ककुत् ) लोकम ऊंचे स्थान पर रहनेवाला ( पृधिन्याः पतिः अयं असिस) पृथ्वीका पालक यह अग्नि (भपा रेतांसि जिन्यति ) जलाका सार तत्त्व अपने रखता है ॥१॥ ॥ १५३३ ] है ( भन्ने ) आने ! (स्वः पतिः । स्वर्गका स्वामी रा ( वार्यस्य दानस्य ईशिये स्वीकार करने योग्य मार दान देने योग्य धनका स्वामी है । (तब शर्मणि ) तेरे द्वारा दिए गए गुलमें रहकर (स्तोता स्याम् ) में तेरी स्तुति करनेवाला होऊ ॥२॥ ९५३४ ] हे अग्ने ! मेरो (शुचयः शुक्राः ) गुरु, स्वच्छ और ( भाजन्तः मर्चया ) देवीप्यमान ज्वालाय (तब ज्योतीपि ) सेरे तैजोको ( उदीरते ) प्रेरणा देती है ॥ २॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ । ॥ इति चतुर्दशोऽध्यायः॥ चतुर्दश अध्याय इस मौदहवे अध्याय में इन्द्र, अग्नि और सोम देयताओंका शूरवीर है कि उसे सब प्रकार के एसों में मरने संरक्षण के लिए वर्णन है। उनमें इन देवताका वर्णन इस प्रकार है लोग मुलाते हैं। ३ वृत्रहन परमज्या। ऋचीपम [१४९२]-हे शनको मारनेयाले और मनुष्पको उत्तम डोरोवाले हमें इच्छित १ सत्यस्य सूनुं सत्पति गोपति इन्द्रं यथा विदे, पन है। गिरा अभिप्रअर्व १४८९]- सत्यके प्रचारक, सत्यके ४ स्वरपुपन जये। धीरतरान किराया म कि । पालक और नायौके पालक इनको अपने मानके अनुसार पवथा न । भन्दना न [१५११]- तुमसे पहले तेरे समान स्तुति करो। कोई नहीं हमारी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ योर कोई भी उत्पन्न २ विश्वास समासु हन्यं न. प्राणि सपनानि नहीं हमा। धनसे भी तुमसे अधिक सामर्थ्यवान् कोई नहीं है। उप मामूपत [ १४९२ ]- राय मुकि सहायताके लिए युसुम शत्रुओंको कुचलनेवाला भी तेरे समान दूसरा कोई नहीं बुलाने योग्य इन्द्रको हमारे सोत्र शोभा बढाते हैं । इन्द ऐसा है । इसलिए तेरे समान प्रशासनोप भी कोई नहीं है। * (२७६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उचराचिका ५ सयानां पति वः [१५१२]- अवध्य गायोंके २ हे चित्रभानो 1 विभका असि, दाशुपे सघः पालन फरनेवालेको तुम्हारे लिए मै बुलाता हूँ। क्षरसि [ १४९८]- हे विलक्षण प्रकाशमान् अग्ने तूपन ६ त्वं प्रथमःराधसा दाता मसि, ईशानकुत् सत्यः देनेवाला है । दाताको उसके कर्मका फाल तत्काल तू देता है। असि, तुविद्युम्नस्य शयमः पुत्रस्य महः गुज्या वृणी. ३ नः परमेषु वाजेपु,मध्यमेपुमा मज । अन्तमस्य महे । १४९३ -दू समोसे प्रथम धन देनेवाला है। तू हमें वस्खः शिक्ष [ १४११]- हमें श्रेष्ठ भोगोंमें और मध्यम निश्चयसे ऐश्वर्पयूषत करनेवाला है। बहुत तेजस्वी मलके भोगोंमें स्थापित कर । सथा निकृष्ट पन भी दे । लिए प्रसिद्ध तुमसे हम पन पानेको इच्छा करते हैं । ४ महस्यत अग्ने ! ब्रह्म जुषस्व, ये देवत्रा,ये आयुपु, ७ पितुः सत्यस्य मेधां अहं परि जग्रह, महं सूर्यः तेभिः नः गिर महय [ १५०३ - हे वल प्रकट करने- श्य अजनि [ १५०० ]- सत्यके पालक, सबके पिता और पाले आने ! ये स्तोत्र सुन, जो देवो और जो मनुष्योंमें देव पूज्य इन्द्रको बुद्धिको मैने अपने अनुकूल बना लिया है । इस है, उनकी सहायतासे हमारी स्तुतिके महत्वको, यहा। कारण में सूर्यके समान तेजस्वी हो गया हूँ। ५ अग्ने ! त्वं अग्निभिः नः ब्रह्म यज्ञं च वर्धय विं ८ हे इन्द्र । ये त्वां न तुष्टुयुः, ये च तुष्टुवुः, मम नारायः दानाय देवतालये चोदय [१५०५] हे भग्ने ! इत् सुष्टुतः वर्धस्व [ १५०२ ]- हे इन्द्र जो तेरी स्तुति त अन्य अग्नियोंकी सहायतासे हमारा ज्ञान और यज्ञकर्म नहीं करते और जो तेरी स्तुति करते हैं, उनमें मेरो हो स्तुतिसे बड़ा । हमें धन देनेके लिए देयोंको प्रेरित कर। पशमैं तू अच्छी तरह यक्ष। अनेक अग्निया रहती है, ये पक्षका अनुष्ठात पदाती है। ९ हरीणां पति, राघः पृञ्चतं, उप अनचं, अश्व्यस्य ६ देवाः प्रचेतसं ते अध्वरस्य चन्हि होतारं अक- स्तुक्तः नूनं श्रुचि १५१० - घोडोंके स्वामी और धन पवत । विधते दाशुषे जनाय सुवीर्य रत्नं दधाति देनेवाले इन्द्रकी में स्तुति करता हूँ 1 अश्वऋषिकी इस [१५१४] - देवोंने शानी, हिंसारहित यज्ञके कर्ता और हविको स्तुतिको तू सुन। १० हरयः अरुधीः अधि बहिपि आ ससृजिरे पहुंचानेवाले अग्निको उत्पन्न किया। यज्ञ करनेवाले वाता [१४९०]- इन्द्र के घोडे घमकनेवाले आसन पर उसे लायें। मनुष्यको उत्तम वीरता बढानेवाले थन वह देता है। यज्ञशालामें आकर छठे। ७ यस्मिन् प्रतानि आदधुः गातुवित्तमः मदर्शि, ११ गाया यसिणे इन्द्राय मधु आशिरं दुदुहे, सु-जातं आर्यस्य वर्धन अग्निं नः गिर उपो नक्षन्तु उपरे सी मधु विदत् [१४९१]- गा पानपारो इन्द्र के समाग दिनानेवाला अग्नि प्रकट होता है। उत्तम रीतिसे [ १५१५ ] - जिस अग्निमें यजमान बत करते है, यहाँ लिए मीठा दूध देती है। यह इन्द्र पास ही बैठकर मधुर प्रकट हुए हुए और आर्योका संवर्धन करनदास भग्निको सोमरस पीता है । सोमरसमें गायका पूष मिलाकर इन्द्र हमारी स्तुति प्राप्त हो । पीता है। ८ यस्मात् चरीत्यानि कृण्वनः रुष्टयः रेजन्ते १२ इन्द्रायहन्तुं आसिंचत ।सोम्यं मधुपियाति। सहरसा मेघसाती पीभिः मना नमस्थत [ १५१६] महित्वना राधांसि प्रचोदयते [१५०९ - इन्द्रको सोम- -जिस समय कर्तव्य करनेवाले मनुष्योंको शत्रुके मनुष्य ससे मोटर सोमरस पीला है, और सपने महत्वले यह कंपानेका प्रपल करते है, उस समय हे मनुष्यो। हजारों पन देता है। प्रकारके घर देनेवाले अतिको पक्षम बुद्धिपूर्वक स्यय प्रणाम इस प्रकार इनका वर्णन इस अध्यायमें आया है । इसमें करो।वह तुम्हारा भय दूर करेगा। इन्द्रको शूरता, वीरता, उदारता, पनके दान करनेको प्रवृत्ति ९ देवोदासो अग्निः, इन्द्रः न, मज्मना भातर और सोमरस पीने की प्रवृत्ति दिसाई गई है। इनके घोका पृथिवीं मनु प्र विवावृते [१५१७]- पलोकमै रहनेवाला भी यहां वर्णन है। अनि इनके समान बलपूर्वक मातृभूमि पर बनेक प्रकारको अग्नि प्रवृत्ति करता है । अग्निको सहायतासे अनेक पा किए जाते हैं। १२ अलाक नन्यांसं गायत्रं देवेषु प्रयोचः १० हे अग्ने! नः मायूषि, नः अ इ च पयसे । [१४९७]- हे भन्ने । हमारे अपूर्व गायत्री मंत्र स्तोत्र दुगुना भारे यापस्य [१५१८]- हे भाने ! हमें भापुष्प देवो पास जाकर कह । बल और अन्न है। इष्टॉो दूर कर चतुर्दश भापाय] सामवेदका सुयोघ भनुवाद (२७) - ११ पांचजन्य प्रापिः परमाना अमिः पुरोहितः। यो गायों और पोडेसे युक्त यन 'हमें भरपूर है कर तं महागय ईमहे । १५१९]-पंचजनोंका हित करनेवाला अपने तेन फैला और शत्रुओक शास्त्र हमसे दूर कर । मानो मुदग्नि आणे स्थापित किया गया है। उस महान् २. हे अमेजनेभ्यः ज्योति' दधत्, मजरं नक्षत्र पक्षमालामें रहनेवाली अग्निको हम प्रार्थना करते हैं। सूर्य दिपि आरोहयः [ १५३० ।- हे भग्ने ! तू लोगों १२ भन्ने! स्वपा अस्मे पर्चः परस्य, माय रयिं लिए प्रकाश देता है और पूने क्षोण न होने वाले प्रकाशमान पोषं वधस् [१५२०]- हे भग्ने ! तू उत्तम पम करनेवाला सूर्यको बाराश घटाया । है, हमें तेज दे, तथा यन और पोषण है। २२ हे भन्ने विशां केतुः प्रेष्ठः श्रेष्ठः असि, उपस्थ. १३ हे पायक माझे देय ! शोचिषा मन्द्रया जिन्दया सन स्तोत्र ययः दयत् । योध { १५३१ - हे भग्ने ! तू देषान् आवक्षि यक्षि च । १५२१ - हे पवित्र करनेवाले प्रजाओंको शान देनेपाला प्रिय और श्रेष्ठ है। यताला अग्निदेव ! अपने तेजसे और आनन्द देनेवाली ज्वालासे रहनेवाला प्रस्तुति करनेवालेको अन्न देता है और म्युति पेपोंको जानता है। पुसा और उनके लिए मशकर। २३ मूर्धा दियः ककुत् पृथिव्याः पतिः अयं अनिः १४ हे घृतस्नो चित्रमानो ! स्वदेश त्या ईमहे । अपां रेतांसि जिन्वति [ १५३२ - सबमें श्रेष्ठ और यीतये देवान् आ यह [ १५२२ }- है घोसे उत्पन्न हुए दुलोकमें श्रेष्ठ स्थान पर रहनेवाला पृथ्वीका पालक अग्नि हुए और विलक्षण सेजरया मग्न ! सबोंको देखनेवाले तुझसे अलके तत्वको अपने में धारण करता है। हम प्रापना करते है। यह प्रार्थना यह है कि हवि भक्षण १४ हे अग्ने । स्वः पति वार्यस्प दासस्य इशिष, करनेके लिए देयोको यहाँ गुलाकर ला । तव शमणि स्तोता स्याम् [१५३३]- हे माने दरवर्षका १५ हे करे अो! घीतिहोत्रं शुमन्तं वृहन्तं त्या स्वामी, स्योकार करने योग्य और दान देने योय ऐसे धनोंका अध्वरे समिधीमहि (१५२२ - हे शानी आने । हन पर भी स्वामी है । तेरे द्वारा दिए गए मुखमें रहकर में तेरी प्रेम करनेवाले तेजस्वी और महान् तु से पहमें हम जलाते हैं। स्तुति करनेवाला हो । १६ हे अग्ने ! सत्रासाई वरेण्यं विश्वासु पृत्सु २५ हे भग्ने शुचयः शुकाः भ्राजन्तः अर्चयः दुपर रयिं नः आभर [९५२५]- हे भग्ने । सय शओंको तब ज्योतीपि उदीरते [१५३४]- हे मग्ने ! शुद्ध, स्वछ एक साथ हरानेवाले, श्रेष्ठ और सब पुओं में शत्रुको दुस्तर और देवीप्यमान ज्वालायें तेरे तेजको प्रेरणा देती है। इस प्रकार अग्निका वर्णन इस अध्याय में है। अग्नि पशमें ऐसे धन हमें भरपूर है। प्रदीप्त होता है। स्विज उसको स्तुति करते हैं। यश सप १७ हे भो । जीवसे सुचेतुना विश्वायुपापसं देवोंको वह घुलाकर लाता है । उन देवोंको सोमरस दिया माडीक रयिं नः हि [१५२६ - हे भग्ने । हमारे बीर्घ- जाता है। यह सब अग्निके वर्णनमें हमें मिलता है । अब जोधनके लिए उत्तम जानरो युक्त, सम्पूर्ण आयु तक भरण सोमका वर्णन देखिए- पोषण करने में समय और सुखदायक पन । सोम १८ ना धिक अनि हिन्वन्तु, माजिपु आसुं सात इव, तेन धनं धनं जेम्म १५२७-हमारो लि अग्निको १ यत्मत्नं पीयूपं पूय उपथ्यं महः गाहात् दियः हमारे अनुकूल करे। जिराप्रकार में घोडेको शीघ्र दौडाते या निरधुक्षत् [ १४९४]- पहलेसे मिलनेवाला अमृत है, उसीप्रकार शीघ्र जाकर हम प्रत्येक युद्ध में विजय प्राप्त करें। प्रशसनीय है । महान् अगाध पुलोकसे यह निकाला गया है। हिमालयके ऊचे शिखर पर यह सोम उगता है और वहाँले १९. हे अग्ने ! यया सेनया तब ऊत्या गा पाकरा- यह यज्ञके लिए लाया जाता है । मई,तांना मघत्तये हिन्ध [ १५२८]- हे भग्ने ! जिस २ पश्यमानासः दिव्या चमुचः लाप्य अभ्य. सेनासे तथा जिस तेरे सरमाणसे हमें गाय प्राप्त हो, उस नूषत [ १४९५]- इस सोमको दोवनेधाले विध्य धमुक्त संरक्षणशक्तिको, हमारा महत्व व तपा वे हमारे अनुकूल भाईके समान इस सोमको स्तुति करते है। हो. इसलिए प्रेरित कर। ३ हे पचमान ! यद इमे रोदसीमा विश्वाभुचना २. हे भने । स्रं पृथु गोमन्तं आश्विन गर्य भा व पिराजसि [ १४९६ -हे सोम । इस यु और पप्पी भर। मंग्धि पाचे पतंय [ १५२९ -हे अग्ने । बहुत पर और इन सब भुवनों पर दू विराजमान होता है।
- - (२७८) सामवेदका सुवीध अनुवाद उत्तराधिका ४ प्रथमः वृक्त-यहि पः महे वाजाय श्रासे ते धियं ६ ईशानकृत् सस्य अमि [१४९३J-न ऐश्वर्ययुक्त दधुः । सः त्वं नः वीर्याय चोदय [ १५०६]- तू सबसे करनेवाला और सत्य है । मुख्य है, आसन फैलानेवाले यजमान, विशेष बल और अन्न ७ तुविद्युम्नस्य शवसः पुत्रस्य महः युज्या वृणी. प्राप्त हो, इसलिए तेरे विषय में उत्तम आदर बुद्धि धारण महे [ १४९३ ]- बहुत तेजस्वी, बलवान्के पुत्रके समान करते है। यह तू हे सोम! हम धौर हों ऐसी हमें प्रेरणा दे। तुझसे बहुत सारा धन प्राप्त करने की इच्छा हम करते है। ५ श्रवसा अभ्यभि ततर्दिथ [१५०७]- अनसे युक्त जो बलवान होता है, उसे बहुतसा धन मिलता है और यह होकर यह सोम छलनीसे नीचे वर्तनमें छाना जाता है । बहुतसा धन देता भी है । उसी तरह बहुतसा धन प्राप्त करें ६ हे अमृत ! ऋतस्य चारुणः समृतस्य के माय और दें। अजीजनः सनिष्यदत् बाजथच्छ सदाअसर [१५०८] ८ दिव्याः पश्यमानासः आप्य अभ्यनूपत [१४९५] - है अमृतरूपी सोम! सत्य और मगल करनेवाले, पानीको - दिव्य दृष्टिवाले उत्तम भाईकी स्तुति करते हैं । धारण करनेवाले आकाशमें सूर्यको तूने मनुष्योके हित के लिए ९ विवः सविता चार नव्यूर्णते [१४९५]- दुलोकसे धारण किया। तुने देवोंकी सेवा को । तू हमेशा युद्ध में सीधा सूर्य जब तक अन्धकार दूर नहीं करता तब तक उसकी स्तुति जाता है। कोई नहीं करना मह आकार दूर करने, या, कि रमकी. इस प्रकार इरा अध्यायमें सोमका वर्णन है । सोम ऊचे स्तुति शुरू हो जाती है । पर्वत शिखर पर उत्पन्न होता है । वहासे यह यज्ञके लिए १० इमे रोदसी,मा विश्वा भुवना,मज्मना विरा. लाया जाता है। कूटकर उनका रस निकाला जाता है । उसमें जसि {१४९६]- इस ग्रुप पृथ्यो और इन सब भुवोंमें पानी मिलाकर यह छाना जाता है। उसमें गायका दूध अपने सामर्थ्यसे । सुशोभित होता है। मिलाते है । यह इन्द्रादि देवोंको दिया जाता है, पादमें उसे ११ हे चित्रभानो ! विभक्ता असि [१४९८]-हे सब पीते है। तेजस्यो देव । तू धन देनेवाला है। यह सब आलंकारिक भाषा पणित है। १२ दाशुषे सद्यःक्षरसि [१४९८] - यासारो कर्मरे फस तत्काल देता है। १३ नः परमेषु मध्यमेषु पाजेषु भामज ! १४९९] सुभापित -हमें श्रेष्ठ और मध्यम भोगोंमें पहुंचा। १ सत्यस्य सून गोपति सापति मगि प्र अर्च १४ अन्तमस्य पस्पः शिक्ष [१४९९]- हमें निकृष्ट भोग भी मिले। [१४८९]- सत्य के प्रचार करनेवाले, गार्योंके रक्षक और सत्यके रक्षकका सत्कार करो। १५ पितुः अमृतस्य मेघां आई व परि जगह [१५००]- पालन करनेवालेको सत्यति मैने प्राप्त की है। २ गाया यक्षिणेन्द्राय मधु आशिरं दुदुद्दे [१४९१] १६ भदं सूर्यः व अजनि [ १५०० ]- में सूर्यके • गाय वचपारी इन्दको मीठा दूध देती है। योगे समान तैमस्या हो गया हूँ। पापका दूध पीना चाहिए। १७ येन इन्द्रः शुष्मं दधे [१५०१ ]- जिससे ग ३ विश्वासु समत्सु हव्यं नः प्रहाणि सवनानि उप पलको पारण परता है। भाभूपत [ १४९२] सरपुम बताने योग्य पीरोरी १८ त्यं नारायः दानाय देयतातये चोदय १५०५] सोभा हमारे स्तोत्र बनाते हैं। - हमें धन देने के लिए देवोंको प्रेरित गर। ४वृत्रहन् परमज्या कचीपम! [१४९२-है १९ प्रथमः महे पाजाय ध्यसे धियं दधुः [१५०६] शत्रुको मारनेवाले और महान् मनपरी गेरीवाले वीर! -मुल्य होकर वे महान बल और यश प्राप्त परकी यदि एम तेरी स्तुति परते है। धारणपरते हैं। गधसमयमा दाता असि{१४९३]-दूपोंगा २० सःपिं नः पीय योदय । १५०६]- पात्र सबसे पहिला राता। हमें धोर होनेरे लिए प्रेरित र।
चतुर्दश अध्याय ] सामवेदका सुयोघ अनुवाद (२२) - २१ या अच्छ सदा असर. { १५०८]- युद्ध के नामा भर । १५२२ - सब माओको हरानेवाले, श्रेष्ठ लिए आगे हो। और युद्ध में शत्रुमोंके लिए दुस्तर धन हमें है। २२ महित्वना राधांसि प्रचोदयते [१५०९ - अपनी ३६ न. जीवसे सुचेतुना विश्वायुपोपसं मा के महानतासे वह धनोंको प्रेरित करता है। रपि नः धेहि [१५२६J- हमारे दीर्घ जीवन के लिए उत्तम २३ त्यत् पुरा चौरतरः न जो [ १५११ ]- तुझसे ज्ञानसे युक्त, सब आयु पर्यन्त पोषण करनेवाले सुखदायक पहले तुझसे बढकर महान् वीर और कोई नहीं हुआ। २४ रापान कि, पवधान, मादनान(१५११] ३७ तेत धनं धनं जप्म [ १५२७]- उस सामन्यसे -धनसे भी दुशसे पढकर कोई नहीं हुआ,शत्रुओको कुचलन- हम प्रत्येक युद्ध जीते। वाला भी कोई नहीं हुमा गौर स्तुतिके योग्य मो दूसरा कोई ३८ यया सेनया तय ऊत्या गाः आकरामह, तां नहीं हुआ। न. मघत्तये हिन्ध [१५२८]- जिप्त संन्यसे और जिस तेरे २५ वियते दाशुषे जनाय सुवीर्य रत्नं दधाति सरक्षणसे हमें गाय मिले उस सरक्षणशक्तिको हमें धन मिले १५१४]- यज्ञ करनेवाले, दाता मनुष्यको उत्तम योरता इसलिए प्रेरित कर। बढानेवाले पन देता है। ३१ स्यूरं पृथु गोमन्त अभिनं रथ अाभर ११५२१? २६ गातुवित्तमः अदर्शि { १९१५] - वह उत्तम बहुत महाम् गाय और घोडेसे युफ्त धन हमें है। मार्गदर्शक प्रतीत होता है। ४० खं अग्धि, पवि घर्तय [ ११२९]- आकाशमें अपने तेज फैला और शस्त्रोको दूर कर। २७ सुजातं आर्यस्य वर्धनं मा गिरा यो नक्षन्तु [ १५१५]- उत्तम रीतिसे उत्पन्न हुए तथा आर्योंके सवर्धन ४१ जनेभ्य. ज्योतिः दपत् । १५३० ]- लोगों करनेवालेको हमारी पाणिया स्तुति करती है। लिए प्रकाश दे। २८ यस्मात् चईत्यानि कृण्वतः रुष्टयः रेजन्ते, प्रजाओंको भान देनेवाला प्रिय और श्रेष्ठ है। ४२ त्वं विशां केतु: प्रेष्ठः श्रेष्ठ [ १५३१ - सहरसा मेघसाती घीमि त्मना नमस्यत [१५१६] - जब कर्म करनेवाले मनुष्यको दान कपाते हैं, तब हजारों ३३ स्वपति वार्यस्य दावस्य इशिषे [ १५३३ ]- प्रकारसे सहायता करनेवाले अग्निको हे मनुष्यो ! थुद्धिपूर्वक न स्वामी है । स्योकार करने योग्य और दान देने योग्य धनका स्वामी है। तुम स्वय प्रणाम करो। २९ नः आयूपि ऊर्ज इषं च पवसे { १५१८ }- उदारते ।।५३४ - शर, स्याल, तेजरयो और प्रकाशमान ४४ शुचयः शुक्राः भ्राजन्ता अर्चय तब ज्योतीपि हमें दीर्घाय, बल और भन्न थे। तेरी प्रकाशको किरणे चारों भोर फैलती है। ३० दुच्छुनां भारे याचस्व {१५१८- दुष्टोंको दूर करके उन्हें कष्ट दे। ३. पांचजन्यः ऋषिः पुरोहितः । १५१९- पच. जनका हित करनेवाला ऋषि मागे रहकर कार्य करता है। उपमा ३२ ते महागयं ईमहे ।।५१९]- उसको सहायतासे १ मामना यूथे निष्ठा वृषमान [१४९८]- अपनी हम बड़े परमें रहनको इच्छा करते है। शाषितगे मुगामें से चल रहता है, उसोप्रकार हे सोम तू २३ स्यपार असे चर्चः पयस्व, मयिरयि पोषं दधम् (विराजसि) यहां विराजमान होता है। १५२०/- उत्तम कार्य करनेवाला दू हमें फेज दे और हमें २सिन्यो। उपाके जमा आ[१४९८- असे गमा पन और पोषण भी। पानीकी लहरें जाती है. उनोप्रभार (दामुपे साक्षरसि) ३४ अतिभिः न भव [१५२४]- सरक्षणके साधनोंसे दाताको धन देता है। हमारा सरक्षण कर। ३ मई मर्यः दर अनि [ १५०० }- मे सूर्यके समान ३५ सपासाहं परेण्यं यिभ्यासु मृत्यु दुष्टर रयिं तेजावी हो गया हूँ।
(२७८) सामदका सुबोध अनुवाद उत्तराचिका - ४प्रथमः वृक-यहि पः महे वाजाय श्रासे ते धिय ६ ईशानकृत् सत्य अमि [१४१३]- तू ऐश्वर्ययुक्त दधुः । सः त्व नः वीर्याय चोदय [ १५०६]- तू सबसे करनेवाला और सत्य है । मुख्प है, आसन फैलानेवाले यजमान, विशेष बल और अन्न ७ तुविद्युम्नस्य शवसा पुत्रस्य महः युज्या वृणी. प्राप्त हो, इसलिए तेरे विषय उत्तम आइर बुद्धि धारण महे [१४९३ ]- बहुत तेजस्वी, बलवान्के पुत्रके समान परते है । वह तू हे सोम। हम वीर हों ऐसी हमें प्रेरणादै। तुमसे बहुत सारा धन प्राप्त करने की इच्छा हम करते है। ५ श्रवसा मध्यभि ततर्दिय [ १५०७ ]- अनसे पुक्त जो बलवान होता है, उसे यहतसा पन मिलता है और वह होकर यह सोम छलनीसे नीचे वर्तनमें छाना जाता है। बहुतसा धन देता भी है । उसी तरह बहुतसा धन प्राप्त करें ६ हे अमृतसतस्य चारण. अमृतस्य के माय और दें। अजीजनासनिप्यादत् चाज अच्छसदाअसर [१५०८] ८ दिव्याम्पश्यमानास: आप्यं अभ्यनूपत [१४९५] -हे अमृतरूपी सोम! सत्य और मपल करनेवाले, पानीको - दिव्य दृष्टिवाले उत्तम भाईको स्तुति करते हैं । पारण करोयाले आकाशमें सूर्यको तूने मनुष्योके हित के लिए ९ दिव. सविता घारं नव्यूर्णते [१४९५]- पुलोकसे पारण किया। तूने देवोंकी सेवा को । तू हमेशा युद्ध में सीधा सूर्य जब तक अन्धकार दूर नहीं करता तब तक उसकी स्तुति जाता है। कोई नहीं करता। वह अन्धकार दूर करने लगा कि उसकी इस प्रकार इस अध्यापमें सोमका वर्णन है । सोम ऊचे स्तुति शुरू हो जाती है । पर्वत शिखर पर उत्पन्न होता है । वहासे यह यज्ञके लिए १० इमे रोदसी, इमा विश्याभुघना, मज्मना पिरा. लाया जाता है। फूटकर उनका रस निकाला जाता है । उममें जसि [१४९६]- इस पर पृथ्वीम और इन सब भुवन में पानी मिलाकर दह छाना जाता है। उसमें गायका दूध अपने सामर्थ्यसे तू मुशोभित होता है। मिलाते है। यह इन्द्रादि देवोंको दिया जाता है, पादमें उसे ११ चित्रभानो ! विभता ससि [ १४९८ ]-है सब पीते हैं। तेजस्यी देव 1 तू धन देनेवाला है। यह सब मालशारिक भाषामें वर्णित है। १२ दाशुषे सद्यःक्षरसि [१४९८]- वातारो कमरे फ्लापाल देता है। १३ नः परमेषु मध्यमेयु घाजेषु मामज { ४११) सुभाषित -हमें श्रेष्ठ और मप्पम भोगोंमें पहुंचा। १ मस्यस्य मून गोपति सरपति अभि म भर्च १४ अन्तमस धस्वः शिक्ष [१४९९3- हमें निकृष्ट {१४८९]- सरपरे प्रचार करनेवारे, गायोके रक्षा और भोग भी मिले । मरपरे रक्षा सत्कारबरो। १५ पितुः अमृतम्य मेघां यह इत् परि अग्रह [१५०० ]- पालम करोपालेको सत्पति भने प्राप्त की है। • गावनि इन्द्रायमधु आशिर दुदुहे [१४९१] - गायें पारो को मोडा दूध देती है। चोरों न गावी हो गया है। १६ भदं सूर्य इप अनि [१५०० ]- सूर्यो गापरा प पोना चाहिए। ३ विध्यासु ममन्सु हायं नः प्रामाणि सयनानि उप यस्तो पारण करता है। १७ येन इन्द्रःगुष्मं दधे [ १५०१]- हिमसे भाभूपत [१४९२] सब म बुलाने योग्य पोरोंरी १८ स्यं नः राय दानाय देयतातये चोदय [१५०५1 गोभा हमारे स्तोत्र पाते है। यह पन देनेरे लिए रेयॉरो प्रेरित कर। ४ पृषान् परमाया चीपम! [१४९२ }-है १९ प्रथम मदे पाजाय अपसे धियं दधुः (१५०६] रामो मारमेवाते और महान् पन्त रीवाले वीर। -मध्य होपर वे महान बल और या प्राप्त गरी मितेरी निररते हैं। धारण पाते हैं। ५ स्यै गपमा प्रथम दाता भनि[१५९३०-दूपोंग २० मा स्यं नः यीर्याप योदय [ १५०१ - मरसे परिना । एमबीर होरे लिए प्रेरित ।
चतुर्दश अध्याय सामवेदका सुपोध अनुवाद (२७२) महीं हुआ। २१ वाजं अच्छ सदा असरः [१५०८]- युके न आ भर [ १५२५]- सर शत्रुओंको हरानेवाले, श्रेष्ठ लिए आगे हो। और युद्ध में शत्रुओंके लिए दुस्तर धन हमें दे । २२ महित्वना राधांसि प्रचोदयते (१५०२४- अपनी ३६ नः जीवसे सुचेतुना विश्वायुपोषसं मार्डीक महानतासे यह धनोंको प्रेरित करता है। यि नः धेहि [१५२६]- हमारे दीर्घ जीवन के लिए उत्तम २३ त्वत् पुरा वीरतरः न जक्षे [ १५११ ]- तुझसे ज्ञान से युक्त, सम आयु पर्यन्त पोषण करनेवाले सुखदायक पहले तुमसे बढकर महान पोर और कोई नहीं हुआ। पन हमें दे। ३७ तन धनं धन जम [१५२७]- उस साममेरो २५ राया न फि, एयथा न, भन्दना न [ १५११] -धनसे भी तुझसे पढकर कोई महीं हमा, शाओंको सुचलने. हम प्रत्येक युद्ध जीतें। वाला भी कोई नहीं हुमा और स्तुतिके शेग्म भी दूसरा कोई ३८ यया सेनया तय ऊत्या गाः आकरामहै, तां नामघत्तये हिन्व [१५२८]- जिस संग्यसे और जिस तेरे २५ स्थते दाशुषे जनाय सुवीर्य रत्नं दधाति संरक्षणले हमें गाय मिलें उस संरक्षणशक्तिको हमें धन मिले ६.१५१४ - यत करनेवाले, दाता मनुष्य को उत्तम कोरता इसलिए प्रेरित कर । बढानेवाले धन देता है। ३९ स्थूर पृथु गोमन्तं अधिनरपि आभर [१५२९] २६ गावित्तमः अदर्शि [ १.१५ ] - वह उत्तम बहुत महान् गाय और घोडेसे युक्त धन हमें है। मार्गदर्शक प्रतीत होता है। ४० खं ग्धि, पवि वर्तय [ ११२९]- आकाशमें अपने तेज फैला और शस्त्रों को दूर कर । २७ सुजातं आर्यस्य वर्धन ना गिर। उपो नक्षन्तु ४१ जनेभ्यः ज्योतिः दधत् [ १५३० ।- लोगोके १५१५]- उतम रीतिसे उत्पन्न हुए तथा आर्योंके संवर्धन करनेवालेकी हमारी वाणियां स्तुति करती है। लिए प्रकाश दे। ४२ त्वं विशां केतुः प्रेष्ठः श्रेष्ठः । १५३१ 7-सू २८ यस्मात् चरीत्यानि कृण्वतः कृष्यः रेजन्ते, प्रजाओंको शान देनेवाला प्रिय और अंण्ड है। सहस्रसां मधलाती धीमि. रमना नमस्यत [१५१६] ४३ स्वपतिः वार्यस्य दात्रस्य इशिप । १.३३ 1- -- जब कर्म करनेवाले मनुष्यको शत्रु कंपाते हैं, तब हजारों न स्वामी है । स्योकार करने योग्य और दान देने योग्य प्रकारसे सहायता करनेवाले अग्निको है मनुष्यो । बुद्धिपूर्वक धनका स्वामी है। तुम स्वयं प्रणाम करो। २९ नः आयूंपि ऊर्जे इपं च पवसे [ १५१८]- उदीरते १५३४]- शुद्ध, स्वच्छ, तेजस्वी और प्रकाशमान ४९ शुचयः गुफा भ्राजन्ता अर्चयः तप ज्योतीपि हमें वीर्याय, बल और मन्न । तेरी प्रकाशकी किरणे चारों ओर फैलती है। ३० दुच्छुनां आर याघस्थ [१५१८] - दुष्टोंको दूर करके उन्हें फष्ट दे। ३१ पांचजन्यः ऋषिः पुरोहितः [ १५१९ - पंस. जोका हित करनेवाला शपि आगे रहकर कार्य करता है। उपमा ३२ ते महागपं ईमहे [१५१९]- उसकी सहायतासे १ मज्मना यूथे निष्ठा युपमान [१४९६]- अपनी हम पई घरमें रहनेकी इच्छा करते है। शक्लिसे मुण्डमें जैसे जैस रहता है, उसोप्रकार हे सोम 11 ३३ स्थप असे वर्चः पयस्थ, मयिरयि पोपं दधत् (विराजसि) यहां विराजमान होता है। (१५२०]- उत्तम कार्य करनेवाला तू हम तेज दे और हमें २ सिन्धोः उपाके ऊर्मा आ{ १४९८ - जैसे समुद्र में धन और पोषण भी दे। पानीको लहरें जाती है, उसीप्रकार (दामुपे सद्यःक्षरसि) ३४ अतिमिनः मय १५२५]- संरक्षणके साधनसि दाताको त धन देता है। हमारा संरक्षण कर। ३ अहं सूर्यः इव भजनि [ १५०० ]- ममूर्यके समान ३५ सत्रासाई यरेण्यं विश्वास पृत्सु दुष्टरं रयिं तेजस्वी हो गया है।
(२८०) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [ उत्तरार्षिक ४ कण्ववत् अह प्रत्नेन जन्मना गिरः शुम्भामि है, उसोप्रकार ( गभस्त्योः शर्यामिः) हायकी अंगुलियो [ १५०१ कण्वके समान में प्राचीन वाणोसे इन्द्रको स्तुति सोमरस वर्ततमें भरा जाता है। करके उसे सुशोभित करता हूँ। ७ इन्द्रःन [१५१७] - इन्द्र के समान ( अप्तिःमातरं ५ न कंचित् जनपानं अक्षितं उरसे [ १५०७]- पृथिर्वी यनु प्रवि यावृते ) अग्नि मातृभूमिपर अनेक मनुष्योंके पानी पीने के लिए जैसे होज भरा जाता है, उसो- प्रति करता है। प्रकार हे सोम ! ( अभ्यभि ततर्दिथ ) छाना जाफर तू ८ आजिषु आशुं सप्ति इव [१५२७] - युद्ध में बेगवान् बर्तनमें भरा जाता है। घोडको जिसप्रकार दौडाते है, उसीप्रकार (नः धियः मानि ६ भरमाण. न [ १५०७ - जिसप्रकार हौज भरते हिन्धन्तु) हमारी बुद्धियां अग्निको प्रेरित करें । चतुर्दशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मनसंख्या ऋग्वेवस्थान देवता छरक: गायत्रो १४९० " ८६९४ ८९५ दा६९६ दा९०१ प्रिय मेप आगिरसा प्रियमेष आंगिरस: प्रियमेध आगिरसः नमेष-पुरुमेघापांगिरसो प्रगाप-(विषमा बृहतो, समा सतोपहती) " पवमानः सोमः का बहती १४९३ १४९४ १४९५ १४९६ २४९७ " . नमेष-पुरुमेघावागिरसो यहणस्त्रंवृष्ण, सदस्यः पौरकुरतः व्यरुणस्त्रवृष्णःसदस्य पोषकुरसः वरणस्त्रदृष्ण , वरावर पोहकुस्स. सुनःोप बाजोगतिः सन शेप यात्रीपतिः शुन शेप आजोगति- वरसाद वासः काकः अग्नि, टारा ९।११०1८ ९।११०१६ ९।११०९ १९७४ २१२७४६ १।२७५ दादा ८६११ ६१२ गायत्री " " " " " १५०० १५०१ १२०० T ॥ वासराव: " १५०३ १५०४ विवेका मनुष्टुप W " मंग्मिसापरा. अमितापस: मग्निस्तार परगावष्ण, समस्यः पौडहास परणादणा, नारायः पोषकुरम, " पवमान. सोम. १०१९०७ ९४११०५ माहती १५०७ " " चतुर्दश मायाय] सामवेदका सुयोध अनुवाद (२८१) देवता मंत्रसंख्या पवमानः सोमः अर्वा यहती उरिणक १५० १५०. ऋग्वेरस्थान ९.११०३ ८॥२४॥१३ દાદા ८॥२४॥१५ ८/६९२ ऋषिः अपहणावृष्णः, सदस्यः पौरकुरसः विश्वमना यंपश्वः. विवमना पापः विश्वमना वयश्व: प्रियमेव भागिरतः " " " शग्निः ७११६३११ वसिष्ठो मंत्रावणिः प्रगाथा (विषमा यहती, समा सतोव्हती) " " बृहती १५९४ १५१५ १५१६ " ७.१६१५ १०३१ दा१०१३ १०॥ ९।६६११९ ९।६६०२० " वसिष्ठो मंचावणिः सौमतिका सौभरिःकावः सौमरिः काप शतं वखानसः शतं वलानसः जातं खानसः मग्निः पवमानः गायत्री " " मन्तिः १५१९ १५२० १५२१ १५२२ " ५२६१ पारदार " पसूपर मात्रयः पायद बापः वापय आत्रेयः 11 " (४) " " " १५२४ १५१५ गौतमोराहूपणः गोतमोराहून गोतमोराहगणः " " " " " " १५.७ १५.८ " ११७९७ १७९५८ १७९।९ १०११५६१ केतुराग्नेयः २०१५६२ केतुराग्नेयः १०।१५६३ केतुराग्नेयः २०११५६४ केतुरानेपः १०।१५६५ केतुराग्नयः C1B४१६ विज्ञप आंगिरसः ८४८ दिरूप आंगिरसः 4188१७ विरूप आंगिरसः " " " " १५.१ " " " " " ३६ [साम. हिन्दी भा.२] (२८२) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः अप पञ्चदशोऽध्यायः अध सप्तमप्रपाठके द्वितीयोऽधी ॥७-२॥ [१] (१-१४) १, ११ गोतमो राहगणः; २९ विश्वामित्रो गायिनः; ३ विरूप आंगिरसः ४, ७ भर्गः प्रागाथा, ५त्रित भाप्त्यः, ६ उशना काव्यः, ८ सुदीति- पुरमीळहावागिरसो १० सौभरिः काभ्यः, १२ गोपवन आत्रेयः, १३ भर- दाजो याहस्परयो, पोतहग्य आंगिरसो था; १४ प्रयोगो भार्गव पावफोऽग्निर्हिस्पत्यो घा, गृहपति-यविष्ठी सहस- पुत्राबाग्यतरो या ॥ अग्निः ॥ १-३, ६, ९, १४ गायत्री; ४,७,८प्रगाय:- ( विषमा महतो, समा सतीगृहती,); ५ विष्टप १० काकुभः प्रगायः- (विषमा ककुप, समा सप्तोवृहती ); ११ उणिवा १२ अनुष्टुम्मुखःप्रगाय:- (मनुष्टप् + गायम्यो); १३ जगतो।। १बर ३ ३ २ १ 3 ३ १५३५ फस्ते जामिर्जनानामने को दाश्वध्वरः । को ह फसिनसि नितः ॥१॥ (र. ११७५३) १५३६ त्वं जामिर्जनानामने मित्रो असि प्रियः । सखा सखिम्य ईड्या ॥२॥ (ऋ. १७११४ ) १५३७ यजा नो मित्रावरुणा यजा देवारमा वृहत् । अमे यक्षि स्वं दमम् ॥३॥ १ (रु) । [घा०८ । उ० नास्ति । स०५] ऋ. १७१११) १५३८ ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमारंसि दर्शत।। सममिरिष्यते वृषा ।।१।। (ऋ. २०१३) १५३९ वृपो अनिः समिध्यवेऽयो न देववाहनः । स हविष्मन्त ईडते ॥२॥ (ऋ. ३॥२०१४) . २४.. ३." ( [१] प्रथमः खण्डः। [ १५३५] हे माने ! ( जनानां ते जामिः का ) मनुष्योंमें तेरा भाई कौन है ? (बाशु-अपर फा) बानो तेरा यश करनेवाला कौन है ? ( काह) कैसा है यह कौन जानता है ? (कस्मिन् थितः असि ) व कहाँ मात्रय संकररहता है? ॥१॥ [१५३६ ] हे माने । (स्य जनानां जामि मिया मित्रा मसि ) तु मनुष्योका भाई मार रिय मित्र है।यः सपिभ्या सखा तू राय मौर अस्विजरूपी मित्रोंका मित्र है ॥२॥ [१५३७ ] हे भग्ने ! ( ना हमारे लिए (मित्रापरणा यज) मित्र और पका यमन कर । (देयान यत्र) रेयोंका यमन कर।(प्रात पृहत् सं दम यक्षि) यश कर और महान् परशालामे पूग्य होकर रह॥३॥ [१५३८ ] (डेन्या ) स्तुप मोर नमरकार करने योग्य (तमामि तिरः ) आपको दूर करने पाला (वर्शता पृषा भनिः) मनीष मौर पतवान् अग्नि (संध्यते ) भातिके द्वारा रातमतामे प्राप्त मिया माना है ॥१॥ [१५३९] (पाउ) बत्तपान ( अभ्यः न देययाहनः ) योग को रामारो ओर से माता सीतार अग्नि पनि पाम हरि माता है, ऐसा यह (मानः समिध्यते । मनि मानिके द्वारा प्राप्त रिया माता दयिमन्तः ते ) हमलवाने यजमान उस मग्निही स्तुति करते हैं। २ ॥
पञ्चदश अध्याय] सामवेदका सुयाध मनुवाद (२८३) . . 3. .३३ १५४० वृषणं त्वा वयं वपन्वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीयत यहद ॥३॥२ (लि) [धा०९/३० नास्ति । स्व. ३] (ऋ. ३।२०१५) १५४१ उत्ते वृहन्तो अर्चया समिधानस्य दीदिया । अमे शुक्रास ईरवे ॥१॥ (ऋ ८३४४१४ ) १५४२ उप त्वा जुह्वो मम घृताचीर्यन्तु हर्यत । अग्ने हन्या जुपस्व नः ॥२॥ (ऋ ८१५१५) १५४३ मन्द्र होतारमृत्विज चिनमानु विमायसम् । अप्रिमीडे स उ श्रवत् ॥३॥ ३ (ह)॥ [२०६। उ. नास्ति । स्व.] 15 ८१५४६) १५४४ पाहि नो अग्न एकया पात द्वितीयया । पाहि गोमिस्तिसभिरूजां पते पाहि चतसर्विसो (*. ८६०६९) १५४५ पाहि विश्वसाक्षसो अराध्या प्रस्म वाजेषु नोऽव । स्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतालय आपि नक्षामहे वृधे ॥२॥ ४ (मि) [ धा० १७१ 3० नास्ति । स्व०३] (व. १६०११) ॥ इति प्रथम बण्डः॥१॥ ३३SS. ६१५४० है (वृषन् अग्ने ) बलवान् अग्ने ! ( वृषण वयं ) आहुति देनेवाले हम (वृषणं दीयतं वृहत् । बयान, तेजस्वी और महान तुस अग्निको ( समिधीमहि ) प्रवलित करते हैं ॥ ३ ॥ १५४१] है ( दीदिव ) तेजस्वी अग्ने । समिधानस्य ते ) प्राप्त होनेवाले तेरो ( बृहन्तः शुझासः) महान शुद्ध ( अर्धयः ) ज्वासाय ( उदीरते ) निकलती हैं॥१॥ [१५४२ ] है ( हर्यत अग्ने) पूज्य अग्ने । ( मम घृताची जुर ) मेरे घोसे पूर्ण भरे हुए चमचे ( त्या उप. यन्तु । सेरे पास जावें, (नान्या जुषस्व ) हमारो हविका र सेवन कर ॥२॥ [१५:३] (मन्द्रं होतारं ) मानव वेनेवाले, देयोंको बुलाकर लानेवाले (ऋत्विजं चित्रमानु) के अनुसार पर करनेवाले तेजस्यो (विमायसु मारी रहे) प्रकाशमान् अग्निको मै टुति करता । (सः श्रवत् ३) वह उमे सुने ॥ ३॥ [१५४३ ) है ( बजे ) अग्ने ! (नः एकया पाहि ) त हमारा एक प्रचासे रमण कर ! (उत द्वितीयया पाहि) और दूसरी मयासे रणा कर। हे (मो पते) बोके पाता। (निसृमि गीर्मिः पाहि तीन मंत्रोम हमारा संरक्षण कर। है । वमो) नियामक! (तभिः पाहि ) चार मंत्रोंत रमण र ॥१॥ ६.१५४५] हे अग्ने ! (विश्यमा राक्षसा अ-गणः) सब राक्षसोने और शान न देनेवाले शत्रुओंम (नः पाहि । हमारी रक्षा करता ( याजेषु प्राय स्म) पदमें हमारी रक्षा र हि ! गोंकि (नेदिष्ठं आर्पित इव हि । हमारा पासका भाई तू ही है । ( देवतातये धूधे नक्षामहे ) यज्ञको मिहिके लिए और अपने संवर्धन लिए तेरी शरण शाते है ॥२॥ ॥ यहां पहला खण्ठ समाप्त हुमा ।
(२८४)
सामयेदका सुयोध अनुवाद
उत्तरार्विका
र.३७
.
.
॥२॥
[२]
१५४६ इनो राजभरति समिझो रौद्रो दक्षाय सुपुमार प्रदर्शि ।
चिकिदि भाति भासा बृहतासिक्रीमति रुतीमपाजन्
॥१॥ (ऋ. १.३३१)
१५४७ कृष्णां पदेनीमभि वर्पसा जनयन्योपा वृहतः पितुर्जाम् ।
ऊर्च मानु५ पूर्यस्य स्तमायन् दियो बमुमिररविवि माति (ऋ. १३)
१५४८ भद्रो भद्रया संचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात् ।
सुप्रकेतैर्दुमिरगिवितिष्ठन्नुशद्भिर्वर्णैरमि राममस्थात् ॥३॥ ५ (पो)॥
[धा०२७। उ० नास्ति । स्व०९(१०१३)
१५४९ कया ते अग्ने अङ्गिर ऊर्जा नपादुपस्तुतिम् । वराय देव मन्पर्व ॥ १॥( ८1८४४ )
१५५० दाशेम कस्य मनसा यज्ञस्य सहसो यहो । कद बोच इदं नमः ॥ २॥ (ऋ ८८४)
३
.
१३.......
[२] द्वितीयः खण्डः।
[१५४६ ] हे भाने (इनः ) सवका स्वामी है, ( भरतिः ) बेयोंके पास जानेवाला (समिद्धः) प्रवलित
किया गया (रौद्रः ) शत्रुओंको भय दिखानेवाला (सुपुमान् } उपासकोंको इष्ट पदार्य देनेवाला ( दक्षाय अदर्शि ) व
बल बढानेवाला है यह देख लिया है। (चिकित् विभाति ) सर्वज्ञ तू प्रदीप्त होता है । ( रुशती अपाजन ) तेजस्वी
मालाओंको फैलाते हुए वृहता माला) महात् सेजसे { असिफ्नी एति) रात्री जाता है ॥ १॥
[१५४७ ] यह मग्नि ( यत् ) नब (पृहतः पितुः जा योपां ) महान् पितासे उत्पन्न हुई हुई स्त्रीरूपी उषाको
( जनयन ) प्रकट करके ( कृष्णा पनी वर्पसा अमिभूत् ) कालो रात्रीको अपनी ज्वालाओंसे हराता है। तब (अरतिः)
यह गतिमान् अग्नि (दिवः वसुभिः पलोफमें अपने तेजसे ( सूर्यस्य भानु ) पूर्यके सेनको (ऊर्व स्तभायन ) ऊपर
ही पामकर ( विभाति ) स्वयं प्रकाशित होता है ॥२॥
[३५४८ ] ( भद्रः) कल्याण करनेवाला अग्नि ( मद्रया सचमानः आगात् ) कल्याण करनेवाली उषाके द्वारा
सेषित होता हुआ प्रचलित होता है । ( पश्चात् जार. स्यसारं अभ्येति ) तम शफा नाश करनेवाला अग्नि अपनी
बहिन उषाको प्राप्त होता है। ( सुमकेतैः घुमि वितिष्ठिन् ) अपने तेजोंसे सर्वत्र रहनेवाला यह ( अग्निः) अनि
( उशद्भिः वर्णः ) तेजस्वी रगोको ज्वालामोस (रामं अभ्यस्थात् ) रात्रीके अपकारको हराकर स्थिर रहता है ॥ ३॥
१५४९ ] है ( भगिरः ) मोके प्रकाशक और (ऊर्जन-पात् । मल कम न करनेवाले (देव भमे) अनि
देव ! (बराय ) सयोंके द्वारा स्वीकरणीय और (मन्यवे ते शत्रु पर क्रोध करनेवाले तेरे लिए { फया उप स्तुति)
कौनसी रीतिसे में स्तुति कहें ॥१॥
[१५५० ] ( सहसा यहो) हे दलसे उत्पन्न होनेवाले अग्ने ! (कस्य यशस्य मनसा दाशेम ) किस यन
करनेवालेके मनके समान हम हवि अर्पण करें ? (इदं नमः कम वोचे उ ) ये हरि अथवा यह नमस्कार से प्राप्त हों,
यह हम सब रहें ॥२॥
सामवेदका मुयोध अनुयाद पञ्चदश अध्याय ] १ १५५१ अश्वा त्वर हि नस्करो विश्वा अस्मभ्यर सुक्षिती । चाजद्रविणसो गिरः ॥३॥६(ट)॥ [धा. १८13०१। स्व० १ (ऋ. १६) १५५२ अन्ना याद्यामिभिहोतारं त्या पृणीमहे । आ स्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं पहिरासद ॥१॥ (८६०१) १५५३ अच्छा हि त्वा सहसः सूनो आङ्करः चपरन्त्यध्वरे । ऊजो नपान घृतकशमीमहेऽमि पत्रेषु पूर्यम् ॥२॥ ७ (या)॥ (धा० १० उ० नास्ति । स . १) (ऋ. १६०२) १५५४ अच्छा नः शीरशोचिप गिरो यन्तु दर्शतम् । अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुषशस्तम्तये ॥१॥ (स. १९०) १५५५ अनि सूनु सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम् । द्विता यो भूदमृतो मस्येचा होता मन्द्रतमो विशि ॥२॥ ८ (टा)॥ [धा० ८. उ०१। ख०२] (ऋ. १९१) 3 १६ "२ ३१ ।। इति हितोय. सण्टः॥२॥ [ १५५१] हे ( भन्ने ) अग्ने ! ( अध) इसके बाद ( स्वं हि असभ्यं करः ) त हो हमारे लिए ऐसा पर कि (न: विश्वाः गिर हमारी मब स्तुतियों ( सु-क्षितीः ) हमें सय घेष्ठ स्थानों के स्वामी मौर (याजद्राषिणसः) अन्न मयया धनसे युक्त करें ॥३॥ [५५२ ] हे ( अग्ने ) अग्ने ! (स्य होतारं पृणीमहे ) त देवोको बनानेवाला है। ऐसा समसार सेरो प्रार्थना हम करते हैं। न ( अग्निमिः आयाहि । अग्नियोंके माय यहां आ । ( यजिष्ट त्यां ) पूजनीय युशे (प्रयता हविष्मती) संपार हवियुक्त आहुति ( यहि भासदे। आसन पर बेठने के यार ( अनस्तु } प्राप्त हो ॥ १॥ [१५५३ ] हे ( सहसः सूनो अंगिरः ) इसके पुत्र और सब जगह गमन करनेवाले आने । ( त्या अध्यरे अच्छ । तुझे पत्तम प्राप्त ररनेके लिए ( मुचः चरन्ति ) घमचे हलचल करते हैं। (ऊर्जः नपातं घृतके ) बल कम न करनेवाले और प्रपर ग्वालामे पुश्त ( पूज्य अग्निं ) मनोरथ पूर्ण करनेवाले निको हम ( यधेपु महे ) यन स्तुति करते है॥२॥ [१५५४] (न. गिरः) हमारी स्तुतियां (शीरशोधिपं दर्शतं ) प्रदलित ज्यालानोसे पुरुष और दर्शनीय अनिके पास (अच्छा यन्तु ) सीपी पावें। (ऊतये) हमारो सारे लिए ( नमसा यज्ञासः) पोमे पुल होनेगाले हमारे पा [ पुग-यमुं पुरु-प्रशस्तं भन्छ ) बहन घनमे युन मोर बहुत प्रसनोप मग्निको प्राप्त हो. [१५५५] ( मन्येषु मनुष्यों ( या अमृतः नो भमत है, (द्विता अमूद ) वह देशों में भी अमर है, अर्थात् सेतो पात्रों में यह अमर है, (विशि होता मन्द्रतमः ) यह मनुष्योंने हरन करवाना और प्रानन्द देनेवाला है। । सहसः सून जलमे उत्पन्न होनेशाने ( जान-येदम मार ) म शानो अग्निी ( मार्गणां दानाय ) धनके रानके लिए हम प्रार्थना पले ॥२॥ । यह दूसरा पण्ड समात हुमा ।
सामवदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः " १२ ३१२ १ १ " 33 [३] १५५६ अदाभ्यः पुरएता पिशामग्रिर्मानुषीणाम् । तूणी रथा सदा नः ॥ १॥ (ऋ. ३।११।१ ) १५५७ अमि प्रयारसि वाहसा दावाअनोति मर्त्यः । क्षयं पावकशोचिपः ॥२॥(ऋ. ३।११।० ) १५५८ साहान्विश्वा अभियुजा तुर्देवानाममृतः । अग्निस्तुविश्रवस्तमः ॥ ३ ॥ ९ (वि) ॥ [धा०१० । उ० नास्ति । स्व. ३ । (ऋ. ३१११॥६) १५५९ भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुमग भद्रो अधरः । भद्रा उत प्रशस्तया ॥ १ ॥ (ऋ. १९/१९) १५६० भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहिः । अब स्थिरा तनुहि भूरि शर्यतां यनेमा ते अमिष्टये ॥ २ ॥ १० (लि)) [धा० ४ । ३० नास्ति । स्व०३ ) (ऋ ।२०) १५६१ अग्रे वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो । अमे देहि जातवेदो महि श्रषः ॥१॥ ( १७९४४) . 3"३ 3 २ [३] तृतीयः खण्डः। [१५५६ ] (मानुपीणां विशां पुर-एता ) मानवी प्रजाओं में भागे रहनेवाला ( तूणीः ) शोप्रतासे कार्य करने वाला ( रथा) रपके समान प्रगतिशील (सदा नवः अग्निः) सबा नयोन पह अग्नि (म-वाभ्या) किसीके द्वारा न वाए जानेवाला है ॥ १ ॥ [१५५७ ] (दाभ्वान् मर्त्य ) दाता मनुष्य ( वाहसा ) हवि पहुंचानेवाले अग्निसे । प्रयांसि अभि अप्नोति ) भन्नको प्राप्त करता है, तया ( पावकशोचिषः) पवित्र प्रकाशवाले अग्निसे (क्षयं) निवास योग्य घर प्राप्त करता है ॥२॥ [ १५५८ ] ( अभियुजः विश्वाः साद्वान् ) चढाई करनेवाले सब शत्रुको सेनाओंको हरानेवाला ( देवानां फतु। पतिः) देवोंका यज्ञ करनेवाला अग्नि (तुवि-श्रयस्तमः ) बहुतसा अन्न देनेवाला है ॥ ३ ॥ ११५५९ 1 (माइतः अग्नि नः भदः ) आहुलियोंसे तृप्त हुआ हुआ अग्ति हमारा कल्यान करनेवाला हो । हे (सु-भग ) उत्तम भाग्यवान् आने ! (भद्रा रातिः) तेरे कल्याण करनेवाले दान हमें प्राप्त हो । ( अभ्घरभद्रा) हमारा या कल्याण करनेवाला हो। ( उत्तः प्रशस्तयः भद्राः ) और हमारे द्वारा की गई स्तुतियो हमारा कल्याण करने बाली हो ॥१॥ [१५६० ] हे माने ! (वृत्र-तू मनः भद्रं वृणुप्य ) युद्ध में हमारे मनको कल्याणमय विचार मरनेवाला कर। (येन समन्सु सासहिः ) जिससे युद्धमें शत्रुस पराभव तू परता है। (शर्यता भूरि स्थिरा भयतनुहि ) पुट करने. पाले शत्रुकी सुद्ध सेनाका भी तू पराभवकर,(मभिष्टये वनेम ) हम अपने पल्याणरे लिए तेरी आरापना करते हैं ॥२॥ [१५६१ ] हे (सहारः यहो) हलके पुत्र अग्ने ! ( गोमतः घाजस्य ईशानः ) गायोरे साथ होनेवाले अन्नका तू स्वामी है । हे (जातवेदः) सर्वश! ( अस्मे महि श्रवा देहि । हमें बहुत सारा अन्न १॥
पञ्चदश अध्याय] सामवेदका सुबोध मनुवाद (२८७) १९३७३३ देर १५६२ स धानो वसुफविरागिरीडन्यो गिरा । विदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि ॥२॥ (ऋ. १७९५) १५६३ क्षपो राजन्नत त्मनाम वस्तारुतोपसः । स निगमजम्भ रक्षसो दह प्रति ॥३॥११(टा)।। [घा० १३ । उ० ११३०२] (ऋ. ११७९६ ) ॥ इति ततीय. सण्डः॥३॥ ३२४ ३२४१२ १२३." १ १. . ३२ 3.१२ १ ३३.३ १३१ १५६४ विशोविशो वो अतिथि वाजयन्तः पुरुप्रियम् । अग्निं यो दुर्य वचा स्तुपे शूपस्य मन्ममिः ॥ १॥ प्र. ८1७४१) १५६५ ये जनासो हविष्मन्तो मित्र न सर्विरासुतिम् । प्रशसन्ति प्रशस्तिभिः ॥२॥ (ऋ. ८१७१२) १५६६ पन्यासं जातवेदसं यो देयतास्युद्यता । हव्यान्यरयादवि ॥३॥ १२ (टा) | [धा० १३ । उ० १ । स्व० २] . ०३) १५६७ समिद्धमनि समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरी अघरे ध्रुवम् । विप्र होतारं पुरुषारमगुहं कवि सुम्मरीमद्दे जातवेदसम् ॥१॥ (प्र.६१५७) [१५६२ ] ( सः अमिः ) यह मनि धानः यसुः । प्रदीप्त हुआ हुमा और निवास करनेवाला ( कविः । मानो (गिरा डेन्यः । वाणोके द्वारा स्तुति करने योग्य है । हे (पुर-अनीक ) भनेक पाला युक्त भग्ने ! ( असभ्य रेषत् दीदिहि ) हमें समकनेवाले धन दे॥ २॥ (१५६३ ] (राजन् अग्ने हे प्रकाशमान - भाग्ने ! ( वस्तो उत उपतः ) सर दिन और राशीमें (क्षपः) शाओंका नाश कर। ( उत त्मना) और स्वय तू है (तिम्म जम्म) तो मतवाले अग्ने ! रिक्षमा प्रति यह ) रासोको जलादे॥३॥ । यहां तीसरा सण्ड समाप्त हुआ। [8] चतुर्थः खण्डः । [१५६४ ] हे पाजको! (याजयन्तः यः अन्न व यसको छारपाले तुम (यिशः यिशः मातिथि। भयेक प्रशाननोंक परम अतिथिके समान पूजनीय और पुरुप्रिय भनि । महतोको प्रिय लगनेवासे निको हदि अरित करो। (शुपस्य मम्ममिः) पुम्हारे यसमानेवाले तोचोंके ( दुर्य पचः स्तु) स्पण्डिसमें रहनेवाले प्रतिको हम तुति करते ॥१॥ [ १५६५ ] ( जिसको ( हरिमन्तः शनासा) हदि रखनेवाले लोग (मिन पिक समान ( साप- रामुर्ति ) घोके हवारे साप ( प्रशस्तिभिः प्रशंसन्ति) स्तोत्रंसि प्रससा र ॥ २॥ ६५५६६] (पन्यासं जातमेस अपन्त स्तुतिके योग्य बतानी मनिको हम स्तुति करते है, (यानो (देयताति) देव यज्ञमें ( उपहाव्यानि ) विए जानेवाले हविष्य { दियि पेरयत् । पुमोकर्म पहुचाता हैnn [१५६७ ] ( समिधा समिदं यति समिपाभोस प्रबलित ए ए मणिरो में (गिरा गणे) पानीमे स्तुति करता(शुचि भुर्य पापर्क मध्यरे पुरा), सिर और पवित्र कालेवाले मनिको पार्म में भाणे स्थापित करता हूँ। (विभं होतारं । सानो तपा हान रमेश (पुरधार मदं ) मनकों द्वारा स्वीकार करने योग्य, मोहम नेपाले (कषि ज्ञानपेदसं ) मानो और गगानी अग्नि (मुम्नामद ) पके लिए एम प्रार्थना करणे हा ?t (२८८) सामयेदया सुयोध अनुयाद उत्तरार्चिका १ 3. श ३३.३३३ 38 १२.२३" 3. २१ १५६८ स्वां दतमने अमृतं युगयुगे हव्यवाहं दधिरे पायमोड्यम् । देवासश्च मर्तासच जागृषि विभुं विश्पति नमसा नि पेदिरे ॥२॥ (ऋ. ६.५1८) १५६९ विभूपनग्न उभयार अनु व्रता दूतो देवाना रजसी समीपसे । यस धीतिर सुमतिमावृणीमहेऽघ म नत्रिवरुधः शियो भव ॥ ३ ॥ १३ (या)। [धा. २२ । ३० नास्ति । स्व०२] (अ.६१५९) १५७० उप त्या जामयौ गिरी दैदिशतीहविष्कृतः । वायोरनीक अस्थिरन् ॥१॥ . ८1१०२।१३) १५७१ यस्य विधात्ववृतं पहिस्तस्थावसन्दिनम् । आपश्चिन्नि दधा पदम् ॥२॥(ऋ. १०२॥१४ ) १५७२ पदं देवस्य मीटुपोऽनावृष्टामिरूतिभिः । मद्रा सूर्य इवोपडक् ॥ ३॥ १४ (हु)॥ । धा० १६ । उ० नास्ति । स्व०५] (ऋ. ११०२।१५) ॥ इति चतुर्यः खण्डः ॥४॥ ॥ इति राप्तमपाठके द्वितीयोऽधः ॥७-२॥ ॥ इति पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥ [१५६८ ] हे ( अग्ने) मग्ने ! (देवासः च मर्तासः च ) देव और मनुष्य { अमृतं युगे युगे हन्यवाई ) समर और प्रत्येक यसमें हरिको देवोंको और पहचानेवाले (पायुं ईडयं त्वां) रक्षक और स्तुतिके योग्य तुझे (दुतं दधिरे ) दूत बनाते हैं, तथा (जागृषि विभु विति ) जागृत, ग्यापक और प्रनाके रक्षक अग्निकी ( नमसा निपेदिरे) नमन करते हुए उपासना करते हैं ॥२॥ [ १५६९] हे भग्ने । (उभयान् विभूपन् ) देव और मनुष्य इन दोनोको सुशोभित करनेवाला न ( अनुप्रता देवानां दूतः } अनुकूत नियमके समान घलनेवाले देयों। दूत होकर ( रजसी समीयले ) घुओक व इस लोकमें हदि पहुंचाने के लिए जाता है । ( यत् ते ) इसलिए तेरी तरफ (पीर्ति सुमति आवृणीमहे) उत्तम कर्ममें की गई स्तुति भेजते है, (अध) इसके बाद (त्रि-चरूथ:) तीन स्थानों में रहनेवाला तू (अस्मान् शिवः भय) हमें सुख देनेवाला हो ॥३॥ [१५७० ] हे अग्ने ! (हविष्कृतः ) यन करनेवाले के लिए ( गिरः कामयः ) स्तुतिया महिनके समान (देदि. शती) तेरा गुणगान करती हुई (चायोः अनीके) वायुके पास ( त्वां उपास्थिरन् ) तजे प्रदीप्त करके स्थापित करती है ॥ १॥ १५७१ ] ( यस्य ) जिस अग्निके विधातु अवृतं ) तीन पर्योदाले, मुले हुए ( अघसं दिन यहि तस्थौ) भोर न बंधे हुए बासन रखे हुए है। उस अनिमें ( आपः चित् । जल भी ( पदं निद्धा ) अपना स्थान रखता है ॥२॥ जलका स्थान अन्तरिम है। वहां अग्नि भी विद्युत् रूपमें है । ६१५७२ ] ( मीढपा देवस्य पदं । स्तुत्य और तेजस्वी अग्नि देवके स्थान ( अनाधृष्याभिः ऊतिभिः) श. भोंक द्वारा मापा न पहुंचानेवाले संरक्षोंसे युक्त है, उसको ( उपटप ) दृष्टि भी ( सूर्यः इव भद्रा ) सूर्यके समान कल्याण करनेवाली है।।३॥ ॥ यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ। ॥ इति पञ्चदशोऽध्यायः॥
पञ्चदश अध्याय सामवेदफा सुयोध अनुवाद ( २८९ पञ्चदश अध्याय अग्नि देवता रामिधामोरी प्रबोपाई हुई मग्निफो में अपनी पाणोरो स्तुति करता हूँ। अग्नि देवको उपासमा हवन से होती है । इस सम्बन्धम इसमें समिधा डालपर मग्नि प्रज्वलित किया जाला है, १ वृपः अभ्यः न, देववाहन भनि समिध्यते, तं यह कहा है। हविष्मन्तः इंडते [ १५३९ ]- दलवान् घोडा जिसप्रकार ८ शुचि धुचं पावक अध्वरे पुरः [१५६७ - पद्ध, राजाको दोकर से जाता है, उसीप्रकार मनि माइतिके द्वारा स्थिर और पवित्र करनेवाले अग्निको यज्ञमें मागे स्थापित भरवलित किया जाता है । उस अग्निको स्तुति हवन करने किया नाता है। वाले करते है। ९ होतारं पुरुवार अदुहं पाप जातवेदसं सुम्नः ईमहे । १५६७]- हदन करनेवाले, महतों द्वारा स्वीकार अनि देयोंको अपने रयो यतको जगह पर ठोकर लाता करने योग्य, द्रोह न करनेवाले, शानी और रावत सनिकी है और हघि अर्पण करनेवाले पनमा उसको स्तुति करते हैं। उत्तम मनसे हम स्तुति करते हैं। २. धृपणः वय वृषणं दीघतं यहत् समिधीमदि [१५४० 1- माहुति देनेवाले हम यसवान और संजस्यी पाडयं त्या जागृवि विभुं विदपति नमसा निषे- १० देवास मासःच अमृतं युगे युगे हव्यवाह निको समियासि प्रज्वलित करते है। दिरे। १५६८]- देव और मनुष्य अमर, प्रत्येक यज्ञमें साले ३ समिधानस्य ते गृहन्त गुमासः अर्चयः उदीरने गए हवनीय द्रव्योंको वैकि पास पहुचानेवाले, सरक्षक और [ १५४५ 1- हे अग्ने ! प्रदीप्त होनेवाली तेरी बड़ी • मडो स्तस्य, जागृत, व्यापक और प्रजारक्षक ऐसे निको नमरकार सफेद प्रमाला निकलती है। पूर्वक उपासना करते है। ४ हविष्मन्तः जनासः विप्रं न सपिरासुति प्रश ११ भने उभयान विभूपन अनुबता देवानां दूतः स्तिभिः प्रशंसन्ति { १५६५ 7- हविगो पासमें रखनेवाले रजसी समीयसे [ १५६९ ]- है आने ! वेप और मनुष्य यजमान मित्रके समान घीके हवनके साय अग्निको स्तुति इन दोनोंको ही सुशोभित करनेवाला दू नियमानुसार चलने- करते है। थाले देयोंका दूत होकर धूलोकमें और इस लोकमें हवि पर- ५पन्यांसं जातवेदसं या देवताति उद्यता हव्यानि पान लिए जाता है। दिवि प्रयत् (१५६६]- अत्यन्त स्तुति करने योग्य सवंश १२ यत् ते धीति सुमति पृणीमहे [ १५६९]- अनिको हम स्तुति करते हैं, यह पज्ञमें डाले जानेवाले हवि इसलिए री ओर उत्तम यज्ञकर्ममें की गई स्तुति भेजते है। योको धुलोक देोके पास पट्टयाला है । ६ विशः विशा अतिथि पुरु-प्रियं अग्नि, य रूप- १३ त्रिवरूथः अस्मान् शिव भव [ १५६९-तीन स्य मन्मथः दुर्य वचः स्तुप [१५६४]- प्ररमेक प्रजा- स्थानोंमें रहनेवाला तू हम सुख देनेवाला हो। जनके घरमें अतिपिके समान पूजनीय और बहुतसे लोगोंको १४वं जनानां जामि मिनः प्रियः ईड्या सखि- प्रिय लगनेवाले अग्निको हवि मपित करो। तुम्हारे बल भ्यः सखा असि[१५३६ ]-पू लोर्गोका माई, स्तुत्य, वाने वाले स्तोत्रति कुममें रखे गए मग्निकी हम स्तुति मिश्र प्रिय मित्र है। करते है। १५ देवान् यजामात वृहत् स्वं दमं यक्षि १५३०) प्रत्येक घरमें अग्नि स्थापित की हुई होती है और उसमें - तू देयोंके लिए यज्ञ कर । यज्ञोंके लिए महान् यज्ञशालामें हवन होता है। सूरय होकर तू रह। ७ समिधा समिद्धं नि गिरा गुणे । १५६० - १६ तमाप्ति तिर. दर्शतः वृषा आग्निः इष्यते ३७ [साम हिग्यो भा.२1 (२९०) सामवेदका सुयोध अनुवाद [उनर्चिकः - [१५३८]- अन्धकार दूर करनेवाला, दर्शनीम और बलवान् प्रजाओंमें यह अग्नि अमर है, यह प्रजाभोंमें हवन करनेवाला अग्नि आहुति देकर प्रदीप्त किया जाता है। और आनन्द बहानेवाला है। हवनसे रोगों के दूर होने के कारण १७ मन्द्रं होतारं ऋत्विज चित्रभानु विभावसु लोगोंका आनन्द बढता है। अग्नि ईडे [ १५४३ F भानन्द देनेवाले, देवोंको बुलाकर २६ मानुषीणां विशां पुर-पता तृणां रथः सदा लानेवाले, ऋतुओंके अनुसार यज्ञ करनेवाले, विशेष तेजस्वी नवः भाग्निः अदाभ्यः [ १५५६ ]- मानवी प्रजाओंका प्रकाशमान् अग्निको हम स्तुति करते हैं। यह नेता, शीघ्रतासे सब कार्य करनेवाला, रपके समान १८ विश्वस्मात् भराष्णः रक्षसाना पाहि [१५४५] प्रगतिशील, हमेशा तरुणोंके समान कार्य करनेवाला अग्नि -सब कजूस राक्षसोंसे हमारी रक्षा कर । अनि रोगदोजौंका किसीके द्वारा दवाया नहीं जा सकता। नाश करता है । रोगबीज, रोगजन्तु राक्षस हैं। क्योंकि वे २७ दाश्वान् मर्त्यः वाहसानयासि अमि अश्नोति, प्राणियोंका नाश करते है। पायकशोचिपा क्षयं [१५५७ ]- राता मनुष्य अग्निसे १९ इन अतिः समिद्धा रौदः सुपुमान् , दक्षाय बहुत अन्न और उत्तम पर पाने की इच्छा करता है। अदर्शि [१५४६]- अग्नि सर्योका स्वामी, देवकि पास जाने. २८ अभियुजः विश्वाः साद्वान् अमृतः देवानां वाला, प्रदीप्त, शत्रुओको भय दिखानेवाला, उपासकोंको इष्ट पराय देनेवाला और वल मटानेवाला है. ऐसा दिखाई दिया है। शत्रुओंको हरानेवाला, किसीसे भीन हारनेवाला, देवों के लिए अग्निः तुयिश्रवस्तमः [१५५८]- चढाई करनेवाले २० चिकित् विभाति [ १५४६ ]-- यह ज्ञान बटाते यश करनेवाला अग्नि बहुत सारा अन्न देनेवाला है। हए प्रकाशता है। २१ रुशती अपाजन् पृहता भाला असिफ्नी एति भद्रः । प्रशस्तय. भद्राः [ १५५९ - आहुति दिया गया २९ आहुतः अग्निः भद्रः । रातिः भद्रा। अध्वरा [ १५४६ ]- तेजस्वी यालाओंको बाहर फेंकते हुए महान् अग्नि कल्याण करनेवाला है।तेरे दान कल्याण करनेवाले हैं। प्रकाशसे रातमें यह प्रकाशाता है । प्रकाशित होकर आगे यज्ञ कल्याण करनेवाला है। स्तुतियां कल्याण करनेवाली है । जाता है। ३० वृत्रतूर्ये मनः भद्रं कृणुष्व, येन समत्सु २२ भद्रः भदयाः सचमानः पश्चात् जारःखसारं अभ्येति [ १५४८ ]- कल्याण करनेवाला अग्नि या सासहिः [१५६०- शत्रुके साथ युद्ध करने के समय मनको द्वारा सेवित होता है। बादमें शत्रुओं का नाश करनेवाला यह कल्याणकारक विचारसे भरपूर कर, जिससे युद्ध में विजय मिल सके। अग्नि अपनी बहिन उपाके पास जाता है। यज्ञशालामें उप कालमें अग्नि जलाई जाती है। थोडी ३१ शर्धतो भूरि स्थिरा अब तनुहि [ १५६० ] - देरके याद दिन हो जाता है और उषाका नाश होता है। स्पर्धा करनेवाले शत्रुके महान् और सुदृढ सेनाका तू पराभव अग्नि हो उपाका नाश करता है। क्योंकि अग्निके प्रदीप्त होने थोड़ी देरफे बाद ही उप काल समाप्त हो जाता है। ३२ गोमतः घाजस्या ईशान्नः [ १५६१ ]- गायके उषा बहिन और अग्नि उपाश भाई है । पर यह अग्नि ही धके साथ होनेवाले अन्नका तू स्वामी है । उषाका जार अर्थात् नाश करनेवाता है। ३३ हे जातवेदः । अस्मे महिश्श्रयः देहि । १५६१ ] २३ न विश्याः गिर। सुक्षितीः याजद्रविणसः हे सर्वज्ञ ! हमें बहुत अन्न दे । [१५५१]- हमारी सभी स्तुतिय हमें उत्तम परका स्वामी ३४ यः कविः गिरा ईडेन्यः, अस्मभ्यं रेवत् बनाकर मन और घनसे मुक्त करें। दीदिहि [१५६२]- निवास करानेवाला, शानी और २४ ऊतये यनासः पुरुवहुं पुरुप्रशस्तं अच्छ वाणीसे स्तुत्य तू चमकनेवाले पन हमें दे। [१५५४ ]-हमारे सरमणके लिए पे पत बहुत सारा धन ३५ हे राजन् अग्ने ! यस्तो उपसा क्षपः [१५] रखनेवाले, बहुतों द्वारा प्रशसनीय अग्निके पास पहुचायें । -हे यग्नि राजन् । तू दिन रात शत्रुओंका नाश कर। अग्निमें यज्ञ करने के कारण हमारा सरक्षण हो। ३६ हे तिग्मजम्भ ! रक्षसः प्रतिदक्षा १५६३]- २५ अमृत मस्येपु.विशि होतामन्द्रतमः १५५५] हे तीक्षण प्रकाशयुक्न अग्ने । राक्षसोंको जसा बाल।
पञ्चदश अध्याय] सामवेदफा सुयोच अनुवाद (२९१) यज्ञशालाका चित्र मोदी य 0 सनि0 चिम Gi TimD bala पली साम ० निषाद इस प्रकार इस अग्निका वर्णन इस अध्यायमें माया है। सय राक्षसोंका, जो रोग फैलाते हैं, यह नाश करता है। गरे किसीका वर्णन यहां नहीं है । सिर्फ अकेले अग्निका ही पह सब प्राणीमात्रका कल्याण करता है। यह प्रज्वलित होने वर्णन है। पर बहुत भयंकर दिखाई देता है। पर यह बारोपके शत्रु- अग्नि समिधामोसे और धीको आहुतियोंसे प्रदीप्त किया मौका ही नाश करता है और मनुष्योंका बल बढाता है। जाता है । यह पो गायका ही होना चाहिए । गायके धोका मनुष्यको वहम सब देवमग्निके साथ ही आपर रहते हैं। कोयला हवाकै अन्दर रहनेवाले विषको सोख लेता है और हवा मनुष्य शरीर एक दिव्य यज्ञशाला है । सब देव मशरूपले शुद्ध करता है । अग्णि आहुति में डाले गए हपियोंको जहाँ आकर इस यशालामें शतसांवत्सरिक प्रश करते हैं। शरीरमें पहुंचना चाहिए वहाँ पहुचा देता है। समिधाओंसे प्रज्वलित गर्मी खत्म हुई कि मब अन्य देव भी यहांसे निकल जाते हैं । यह अग्नि हवियोंको अतिसूक्ष्म करपे हवामें चारों ओर परोररपी पर हमें प्राप्त हो, ऐसोडा जो करते हैं. उन्हें कला देता है। उसके कारण धाप शुद्ध होती है और मनुष्योंको इस शरीररूपी यज्ञशालामें अग्नि नाप्रत रखनी चाहिए। निरोग और दीर्घजीवी बनाती है। मस्यं पारीरमें यह अमार्य अग्नि रहता है और उसके साथ अग्नि हवन के लिए घर परम प्रदीप्त किया जाता है । सब देव मह जीवन पर पलाते है। उसमें ऋतुके अनुसार हविष्य डालनेसे यह मनुष्योंका पल बढाता है और उन्हें दौर्याय करता है। यह अग्नि दोष दूर इसलिए यज्ञाग्नि उत्तम अवस्था रहे.ऐसा प्रयत्न प्रत्येक करनेवाला और पवित्रता करनेवाला है। उसकी उपासना को करना चाहिए। शरमें या फिराप्रकार पड रहा है, दिन रात हवनीय पदार्थ देकर पारनो चाहिए। उसे यसको प्रक्रियासे दिखाया है। यह अध्यात्मशान मजरे यह भग्निमनुष्यको और पाप आदि देवोंको पवित्रताकरने- वर्णनये यहां बताया है। उसे पाठक समझें और इस माल. कारिफार्मनका ठीक अर्थ समझकर उसे अपने जीवन में देखें। पाला है, इसलिए यह प्रिय मित्र है। यह मनुष्योंका सला है । वह उत्तम रीतिसे पूजित होने पर सबका कल्याण करता हैं। कभी भी अकल्याण नहीं करता।
(२९२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्षिक: । सुभापित १६ नः गिरः सुक्षिती घाजद्रविणसः [.५५१]- हमारी स्तुति हमें उतम घरका स्वामी सया अन्न व धनते १ जनानां ते काजामिः [ १५३५ ]- लोगों से तेरा युक्त करे भाई कौन है ? १७ नः गिरः शीरशोचिषं दर्शतं अच्छ यन्तु ९ दाशु अध्वरस का [ १५३५ ]- कौन भला तुझे [१५५४]• हमारी स्तुतियां प्रज्वलित और दर्शनीय अग्निको देकर यश फरनेको इच्छा करता है। पहुंचे। ३ कस्मिन् श्रितः असि [ १५३५ ]- तू किसके १८ जातवेदसं अग्निं पार्याणां दानाप [१५५५]- आध्यरो रहता है? ज्ञान जिससे उत्पन्न हुआ है, ऐसे अग्निको धनके दानके लिए ४ हे अग्ने ! त्वं जनानां जामिः मिशः प्रियः असि हम प्रार्थना करते है [१५३६]-हे आने ! तू मनुष्योंका भाई और प्रिय मित्र १९ मानुपीणां विशां पुर-एता, तूणीः रथः सदा है। मनुष्यों के शरीरके अन्दर उष्णता रूपसे रहता है। नयः अदाभ्यः [१५५६ ]- मानवी प्रजाओंमें अग्रगामी, ५ ईज्य सखिभ्यः सखा [ १५३६ ]- तू प्रशसनीय बीघ्रतासे काम करनेवाला, रपके समान मागे जानेवाला, और मिकिा मिय है। सहा नया होकर काम परनेवाला अग्नि कभी दवाया नहीं ६ ईडे या नमस्यः तमांसि तिर दर्शतः घृषा सं जा सकता। ध्यते [१५३८]- जो प्रशसनीय, नमस्कार करने के योग्य, २० दाभ्यान् मर्त्यः वाहसा प्रियांसि अभिप्रश्नोति भापकार दूर करनेवाला, रर्शनीय भौर बलवान् है उसका [१५५८]- दाता मनुष्य अग्निते प्रिय मत प्राप्त करता है । तेज बढ़ता है। ७ वृपणः वयं वृषणं दीयतं बृहत् समिधीमहि २१ पायक-शोचिषः क्षयं [१५५७)- पवित्र प्रकाश• [ १५४० ]- बलयान हम मलबान तेजस्यो महान् अग्निको बालोरो पर प्राप्त करता है। प्रज्वलित करते २२ अभियुजा विश्वाः साहान अमृता देवानां ८ समिधानस्यते बृहन्ता शुक्रासः अर्चय उदीरते ऋतु अनि तुविश्रवस्तम [१५५८]- चदाई करनेवाले [१५४१]-प्रदीप्त होनेवाले तेरी बडी और सफेव ज्वालायें शत्रुको सब सेनाओंको हरानेवाला, किसीसे न हारनेवाला, निकलती है। देवोंका पश करनेवाला अग्नि बहुत अन्न देनेवाला है । ९ विश्वस्मात् अराण रक्षस नः पाहि [१५४५] २३ आहुत अग्मि ना भद्[१५५९]- आहुतियाँस -सब अनुदार राक्षसोंसे हमारी रक्षा कर। तप्त हुआ हमा अग्नि हमारा कल्याण करनेवाला है। १० पाजेषु प्राय स्म [ १५४५ ]- सुद्धोंमें हमारी २४ गतिः भद्रा [ १५५९-दान कल्याण करने रक्षा कर। ११ नेदिष्ठं आपि त्यां इत् हि [ १५४५]- हमारे २५ अध्वरसमद्रः [१५५९]- कल्याण करमे- समीपका भाई तू ही है। वाला हो। १२ देवतातये घृधे नक्षामहे [ १५४५]- पाकी सिद्धि और हमारे संवर्धन के लिए हम तेरा सहारा लेते है। २६ प्रशस्तयः भद्राः [ १५५९]- स्तुतियां कल्याण करनेवाली हों। १३ इनः परतिः समिद्धः रौद्र दक्षाय अदर्शि २७ वृत्रतूर्य मनः भद्रं राणुप्य [ १५६० ]- पुखर्म [१५४५] तू स्यामो, प्रगतिशील, प्रदीप्त, शत्रुओंको भम मनको कल्याणमय विचार करनेवाला कर । दिखानेवाला गौर बल बढानेवाला दिखाई देता है। २८ समत्सु सासहिः {१५६०- मुदमें शत्रुका परा- १४ चिकित् विभाति [१५४६]- ज्ञानयुक्त तू प्रदीप्त भप करनेवाला हो। होता है। २९ शधतां भूरिस्थिरा अपतनुहि [१५६०]- पुड १५ रुशर्ती अपाजन्, यहता भासा अलिफ्नी करनेवाले सुदृढ शत्रुसेनाको तू हरानेवाला हो। पति! १५४६ ]- तेजस्वी प्रकाश गिराते हुए अपने महान् ३० अमिष्टये ते वनेम [ १५६०]-कल्याणके लिए तेजसे रात्री वह आपे जाता है। तेरी भक्ति करते है। वाले हो।
पश्चदश मायाय सामयेदका सुबोध अनुपाद - ३१ गोमतः पाजस्य ईशानः अरसे महि या देहि ३७ मौदुषः देवस्य पद अनाधृष्यामिः अतिमिः [१५६१] गायोरे साप मिलनेवाले अन्नका तु मामी है। [१५७२ ]- स्ताय और विध्य अग्निमा स्थान मनुओं द्वारा हमें बहुत सम है। माधान पहपाने के योग्य मरक्षण साधनों से पुक्त रहता है। ३२ मत्लभ्य रेयत् दीदिदि [१५६२१- हमें घमरने ३८ उपट सूर्यः च भद्रा [१५७२ - उसकी वाले धन थे। दृष्टि सूपरे समान ल्याण परनेवाली है। ३३ राजन् । यस्तो. उत्त उपस क्षपा, रक्षसा मति दह [१५]- हे राजन् । रात्री और दिन में त्रुओंका नार, राक्षसोरो जला दे। उपमा ३४ शुचि धुर्घ पापक मध्यरे पुर. पुरुषार, मद्रुह कपि जातवेदस सुम्नः ईमहे [ १५६७ - शुल, स्थिर, { अभ्यान देववाहन [१५३९]- पोर समान पवित्र करनेवाला, हिसारहित पन भागे यापित रिय योषा पाहन यह अग्नि है । गये, अनेकषि द्वारा स्वीकार परने योग्य, द्रो नपरनेवाले, २ मानुषीणां विशा पुर एता ती रथ अग्नि शानी सवंग अग्निको धनके लिए स्तोत्रौरी प्रार्पना करते हैं। [१५५६ - मानवी प्रजाओंका नेता तथा शोधताने दोने- ३५ देवासः मर्तास अमृत, पायु, स्य त्या दूत वाले रथवे समान यह अग्नि है। दधिरे, जागवियिभु विश्पति नमसानिपेदिरे [१५६७) ३ मित्र न [१५:५]-मित्र समान इस अग्नि -रेव और मनुष्य अमर, रक्षक और स्तुतिके योग्य ऐसे तुम (प्रशसन्ति ) प्रशंसा करते हैं । अग्निको हविको योगी और पहुंचानेवाले दूसरे रूप में स्वीकार ४ जामया देदिशतीः [ १५७० ]- बहिने जिसप्रकार करते है तथा जागृत, व्यापक और प्रजारक्षक अग्निकी स्तुति करती है, उसीप्रकार : गिरा) हमारी वाणिपो तेरी नमस्कार करके उपाराना करते है। स्तुति करती है। ३६ अरमान शिधः मर ५६९]- हमारा कल्याण ५ सूर्य इव मद्रा उपहा १५७२7-मर्म के समान परनेवाला हो। पल्याण करनेवाली रसकी दृष्टि है। पञ्चदशाध्यायान्तर्गत प्रापि-देवता-छन्द सूची संख्या ऋग्वेदस्मान देवता (१) १५३५ अग्नि गायत्री गोतमो राहगण गोतमोराहग गोतमो राहगण " " " १५१७ १५३८ " " १७॥३ १७॥४ १७५५ ३१२७१३ ३१२७११४ ३७४१५ ८४४४ ८४१५ दाद ८६०९ M " १५४० १५४१ १५४६ विश्वामित्रोमापिन विश्वामित्रो गापिन विश्वामित्रो गाचिन दिस्य आंगिरस विरूप बांगिरस विहप मागिरस भगं प्रागाप " 11 १५४४ प्रगाप-(विषमा बहती, समा सतोहती) ६५४५ ६०१० भर्ग प्राणाय 12 सामवेदका सुधोध अनुपाद [ उत्तराचिका वेक्षता मंत्रसइया ऋषिः छन्दः ऋग्वेदस्पान (२) मग्निः त्रिष्टुप ૨en? १०।३।२ 11 १५१७ त्रित आफ्य त्रित आप्त्यः त्रित आएपः उदाना काय. उशना काध्य: " गायत्री 11 १५४९ १५५० " ८८४ ८1८४१५ ८८६ ८॥६०११ " " उशना काय्य. भर्गः प्रागायः " १५५२ प्रगाथ.- (विषमा बहती समा सतोव्हती) १५५४ दागर ८७११० ८७१११ भर्गःप्रागापः मुदीति • पुश्मीळ हावांगिरसौ सुदीति • पुरमीळ्हावागिरसौ (३) विश्वामित्रो पापिन: विश्वामित्रो गाधिनः विश्वामित्रो गाधिनः सोभरि-काव्य. गायत्री " " १५५७ " १५५९ ८.१९१९ काभःप्रगापः-(विषमा ककुप, समा रातोयहतो) १५६० " " अणिक ८१९०१० १७९४ १७२।५ १७१६ सोभरिः काण्वः गोतमो राहगणः गोतमो राहगण. गोतमो राहूपणः 1 " " (४) १५६४ ८७४ार गोपवन आत्रेय अनुष्टुम्मुख प्रगाथ- (अनुष्टुप शापश्या) ८७४ार ८ ६१५७ जयती १५६८ " " १५७० 1001 गोपयन आय: गोपवन आत्रेयः भरद्वाजो बाहंस्पायो, वोतहत्य मागिरमोथा भवाजो वाहपरयो, वोतहम्प मागिरसो वा भरद्वाली बाई स्परयो, वोतहम्म आंगिरसो या प्रयोगो भार्गव, पावकोग्निहिपायो पा, गृहपतिपरिष्दो सहसः पुत्रो वापतरोया प्रयोगो भार्गव, पादरोग्निहि पायो था, गृहपतियविष्ठौ सहसः पुत्रो वाग्यतरोदा प्रयोगो मार्गव, पादकोनिहित्पत्यो वा, गएपतिपविष्टौ सहस' पुत्रो याम्पतरो या गायत्री दाम " २५३ ८1१०।१५ " "
पोडश मध्याय
सामवेदका अयोध अनुवाद
(२९५)
अथ फोडशोऽध्यायः
अथ सक्षमप्रपाटके तृतीयोऽधः ॥ ७-३ ।।
[१]
(१-२१) १८, १८, मेप्यातिथिः काण्वः २ विश्वामित्रो गापिनः; ३-४ भर्गः प्रागापः ५ सोभरिः कायः
६.१५ शुन.शेप आजोगति: ७ सुका आंगिरसः विश्वकर्मा भौवनः; १० अनानतः पारछपिः, ११ भरतामो
बार्हस्पत्यः; १२ गोलमो राहगणः, १३ मजिश्वा भारदामा १४ वामदेको गौतमः १० हयंतः प्रागायः: १५
देवातिपिः काय; १९ पालखिल्यः (ष्टिगुः कावः); २० पर्यंतनारदौ २१ अत्रिमाम.॥ १, ३-४, ७-८,
१५१७-११, २ इनानी; ५ अग्निः ६ वरुणः ९ विश्वकर्मा, १०, २०,२१ पवमानः सोमः ११
पूषा १२ मतः। १३ विश्वे देवाः। १४ धावामिती १६ अग्निः हवोंविदा ॥ १, ३-५,८,१७-१९
प्राय:- (विषमा बृहतो, समा सतोहती ); २, ६-७, ११-१६ गायत्री विष्टपः १०
अरष्टि, २० वणिक, २१ जगती।
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१५७३ अभि त्या पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः ।
समीचीनास कमवा समस्वरद्रा गृणन्त पून्यम् ॥१॥
(ऋ.८३७)
१५७४ असैदिन्द्रो वावृधै घृष्ण्यशयों मदे सुतस्य विष्णवि ।
अद्या तमस महिमानमायबोऽनु टुबन्ति पूर्वथा ॥२॥ १ (रि)"
[घा० १८ । उ० नास्ति । स्व ३] 19 ३८ )
१५७५ प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरिता । इन्द्रामा इष आ वृणे ॥१॥(ऋ. ३।१२।५ )
१५७६ इन्द्रानी नयति पुरो दासपत्नीरधनुतम् । साकमेकेन कर्मणा ॥२(३११२१६)
[१]प्रथमः खण्डः।
[१५७३ ] है (इन्द्र) 1 ( माययः ) उपासक मनुष्य ( पूर्वपीतये । प्रथम रसपान करने के लिए ( त्या
स्तोमेभिः भगि) सेरी स्तोत्रोंसे स्तुति करते है। ( समीचीनासः अभवः) गोय वृष्टिवाले ऋभु ( समस्वरन् ) सेरो
स्तुति करते हैं, ( रुद्राः पूटा गृणन्तः ) व पुराण पुरुष ऐसे तेरी स्तुति करते हैं ॥१॥
पातिक सोण, शुभ और कार में सब इनके ही गुण गाते हैं।
[ १५७४ ] (न्दः) इन्द्र ( सुवस्य विष्णाय मदे । सोमका व्यापक आनन्द प्राप्त होनेपर ( अस्य हत्
वृष्ण्यं शव ) इस यजमान वीर्य और बलको यदाता है। इसलिए ( आयकः अद्य ) मनुष्य माज भो (पूर्वथा ) पहलेले
समान ही ( अस्य तं महिमानं अनुष्टुयन्ति ) इस इन्द्रको वस महिमाका वर्णन करते हैं ॥ २ ॥
[१५७५ ] हे (दानी ) इन्द्र भोर माग्न ! ( उपियनः या मार्चन्ति ) वेदपाठी तुम्हारी मना करते हैं,
(नीथाविदा जरितारः ] सामगायक तेरो स्तुति करते है, (एप आपूणे) अनके लिए मै तुम्हारी प्रार्थना करता हूँ॥१॥
[१५७६ ] है (इन्द्राग्नी इन और अग्नि ! तुम( दासपली नयति पुरा) शशुओंको नम्वे मगरियोको पफेन
कर्मणा साक) एक ही प्रयत्नसे एक ही समय ( अधमुतं ) हिला देते हो ॥ २॥
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिक
१३ ११३८.३,
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२
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३.
१५७७ इन्द्राग्नी अपसम्पर्युप प्र यन्ति धीतयः 1 ऋतस्य पथ्या३ अनु ॥ ३ ॥ (ऋ. ३।१२।७)
१५७८ इन्द्राग्नी तविषाणि वारसघस्थानि प्रयासि च । युवोरप्तुर्य रहितम् ॥ ४ ॥ २ (टा)।
[धा० १३ । उ० १ । ख० २] (ऋ. १२८)
१५७९ शग्भ्यू३ पु शचीपत इन्द्र विश्वामिरूतिमिः ।
मग न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि
॥१॥ (१८६१५)
१५८० पौरो अश्वस्य पुरुरुद्वामस्युसो देव हिरण्ययः ।
न किहि दानं परि मधिपचे ययद्यामि तदा भर ॥२॥ ३ (चु)॥
[धा• १७ / उ० १ । स्व०५(६६)
१५८१ स्वरोहि चरवे पिदा भगं सुत्तये ।
उद्धावृपस्व मघवनाविष्टय उदिन्द्रावमिष्टये
॥१॥ ( १६९१७)
१५८२ त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय महमे
आ पुरंदरं चकम विप्रवचस इन्द्रं गोपन्तोऽवसे
॥२॥ ४ ( फौ)॥
[धा० १५ । उ० २ । स्व. नास्ति ] (ऋ. ८६८)
[ १५७७ ] (इन्द्राग्नी ) हे इन्द मौर आने ! (धीतयः ) होता मावि स्विज (भातस्य पथ्या अनु) यज्ञके
मागसे ( अपस परि ) हमारे यज्ञमें ( उप प्रयन्ति) माकर बैठते हैं ॥३॥
८ १५७८ ] हे (इन्द्राग्नी ) इन्द्र और अग्ने ! (बां तविपाणि प्रयांसि सघस्थानि ) तुम्हारे बल और मन
एकत्र हो रहते हैं । ( युवो हितं ) तुम्हारे बल ( अप्तूर्य ) शुभ कर्मोको प्रेरणा देनेवाले है ॥४॥
[ १५७९ ] हे (शचीपते इन्द्र ) वाक्तिमान् इन्द्र ! { विश्वामिःऊनिभिः) सब प्रकारको सरक्षणको शक्तिसि
(उसु शग्धि ) तू उत्तम रीतिसे तमर्य है । हे (शूर) शूर इन्द्र । ( वसुविद ) धन सम्पन्न ( यशसं ) पशस्वी ( भर्ग
म ) भाग्यवान्के समान ( त्या हि अनुचरामसि ) तेरे अनुकूल होकर हम चलते हैं ॥१॥
[१५८०] हे इन्छ । तू (अध्वस्य पौरः) घोणेदो पुष्ट करनेवाला और ( गया पुरुकृत् असि ) गायोंका
पोषण करनेवाला है । है (देव) देव ! (हिरण्ययः उत्सः ) सोने के समान जलका होज जैसे होता है, वैसा ही तू तपित
करनेवाला है ।हे (न्द्रल! (वे दानं ) तेरे दान (न कि हि परमधिपत् ) कोई भी नष्ट नहीं कर सकता,
(यस् या यामि ) जो जो में मांगता हूँ (तत् आ भर ) वह मुझे भरपूर है ॥ २॥
[१५८१] (त्यं यमुत्तये हि पाहि ) तू धन देने के लिए अवश्य ना, (चेरवे मग विदाः) सवाधरण करने
पालेको भाग्य दे। हे ( मघयन् ) घनदान एद ! (गविष्टये उत् वावृषस्व ) गायोंको इच्छा करनेवाले मुझे गा दे, तथा
है (इन्द्र) इन्द्र ! (अश्व इष्टये ) घोकी इच्छा करनेवाले मुझे ( उत्) घोरे ॥१॥
[१५८२ ] हे इन्त्र ! (स्य ) तू (पुरु सहस्राणि शतानि च ) बहुत हजार अयथा संकों (यूया दानाय
मंहसे ) गायोंके गण दान देनेवालेको देता है। ( पुरंदरं इन्द्रं ) के नगरोंको तोडनेपाल इन्द्रको ( अयसे ) अपने
रणरे लिए (गायातः विप्र-पचसः ) शाम करनेवाले शानसात पात पारनेपाले हम (भा चम) बुलाते है ॥२॥
पोडश अध्याय ] सामवेदका सुबोध अनुवाद (२९७ ) 3 31. २५१ ३ चक ३. २ २३११ 35२९ ३३ १५८३ यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् । मधोन पात्रा प्रथमान्यस्म प्रस्तोमा यन्त्वनये ॥१॥ (ऋ. ११०३६) १५८४ अश्वं न गीी रमसुदानको मर्मूज्यन्ते देवयवः । उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्पि राघो मघोनाम् ॥२॥ ५ (पु)॥ [धा० १५ । उ० १ । स्व०५J(म. १०३१७) ॥इति प्रथमः खा॥१॥ [२] १५८५ इम में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्यामवस्युरा ॥१॥६ (प)॥ [धा० ५ | १० नास्ति । ०१] (ऋ १।२१।१९) १५८६ कया स्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृपन् । कया स्तोत्रम्य आ भर ॥ १ ॥ ७ (१) ।। [धा०२।३० नास्ति । स्व०१] (ऋ. १९३३१९ ) १५८७ इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्र प्रयत्यध्वरे । इन्द्रसमाके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये (प्र. 41३14) [ १५८३] ( होना मन्द्रः यः ) यज्ञमें देवोंको बुलानेवालर और भानन्द देनेयाला जो अग्नि है, यह ( विश्वा वसु) सब प्रकार के पन ( जनानां दयते ) लोगोंको देता है । ( अस्मै अग्नये ) इस अग्निको ( मघोन) सोमरराके (प्रथमाति पात्रा) मुख्य पात्र और (स्तोमाः प्रयन्तु ) स्तोत्र प्राप्त हों । १॥ [१५८४ ] ( दस्म विश्पते हे सुन्दर और प्रजापालक अग्ने ! तेरी ( सुदानपः देयययः ) उत्तम दान देनयाले मौर बेवत्व प्राप्त करनेवाले यजमान ( रथ्य अश्यं न ) रथमें जोडे जानेवाले घोडे के समान ( गीर्भिः मर्गज्यन्ते ) अपनी पाणीसे स्तुति करते है। ऐसा तु यज्ञ करनेवालोंके ( तनये तोके उभे ) पुत्र और पौत्र इन दोनों को भी ( मघोनों राधा पर्पि) धनवानोंक धन वे ॥२॥ रथ जोडे जानेयाले घोका उत्साह बढाने के लिए रथको हॉफनेवाले उनकी स्तुति करते हैं, उसी प्रकार पर करनेवाले लोग अग्निकी स्तुति करते है। यहां पहला खण्ड समात हुआ। [२] द्वितीयः खण्डा । १५८५] (घरुण ) पण ! ( मे इमं हवं श्रुधि मेरी यह प्रार्थना सुन ( अध मृडय च ) और आग हमें सुखी कर। (अघस्युःन्यां आ चके ) अपने संरक्षणको परछा करनेवाले हम तेरो स्तुति करते हैं। १॥ १५८६] हे (पुषन् इष्ट फल देनेवाले इन्द्र ! ( या ऊत्या) कौनसे रक्षणसामयंसे (त्वं नः अभिप्रमन्दसे। तू हमें अधिक अनन्त देता है ? (फया स्तोदभ्यः याभर )कौनसी रक्षणशक्तिसे तू स्तोताओंको भरपूर अन्न देता है ? ॥१॥ [१५८७] (देवतातये ) यशके लिए ( इन्द्रं इत् हवामहे ) इन्द्रको ही हम पुलाते हैं ( अध्वरे प्रयति इन्द्र) महिमामय यज्ञके शुरू होते ही हम इन्द्रको मुलाते है। ( समीके वनिनः ) युद्धर्म भक्तलोग { इन्द्रं ) इन्द्रको ही युलाते है और ( घनस्य सातये) मा वान करने के राम (इन्द्रं इसको हो बुलाते हैं ॥ १॥ ३८ (साम. हिन्दी भा.२]
(२९८)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराधिका
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३२.२
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२
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३१.१२
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१५८८ इन्द्रो महा रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत् ।
इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिरे इन्द्रे स्वानास इन्दवः ॥२॥ ८ (वा)॥
[धा० १५ । उ० नास्ति । स्व०२](ऋ. १६)
१५८९ विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजख तन्व३१ वा हि ते ।
मुहन्त्वन्ये अभितो जनास इहासार्क मघवा मरिग्स्तु ॥१॥ ९ (ला)॥
[धा०९। उ० नास्ति । स्व०२] (ऋ. ११८१६)
१५९० अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेपारसि वरति सयुमगिः सूरो न संयुग्मभिः ।
धारा पृष्ठप रोचते पुनानो अरुषो हरिः ।
विश्वा यद्रूपा परियास्य॒क्वभिः सप्तास्यमिकमिः ॥१॥
(ऋ. १।१९९१)
१५९१ प्राचीमनु प्रदिशं याति चेकितत्स रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः ।
अग्मन्नुस्थानि पारस्येन्द्र जैत्राय हर्पयन् ।
वजश्च यद्भवयो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता ॥२॥ (ऋ. ९।१११॥३)
[१५८८ ] ( इन्द्रः शय महा ) इन्दने अपनी शक्तिको महिमासे (रोदसी पप्रथत् ) द्युलोक और पुषिवीका
विस्तार किया। (इन्द्रः सूर्य अरोचयत् ) इन्नने सूर्यको प्रकाशित किया, ( इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि ) इन्द्र में ही सारे
भुवन ( येमिरे ) रहते हैं। स्वानासः इन्दयः इन्द्र छने हुए सोमरस इन्द्रको दिए जाते हैं ॥ २ ॥
[१५८९] हे (विश्वकर्मन् ) सब कर्म करनेवाले ईश्वर ! ( हविषा वावृधानः) हविसे बढ़नेवाला ( स्वयं)
स्वयं तू ही ( तन्वं स्वा हि ते यजस्व ) अपने शरीरको स्वयं द्वारा किए जानेवाले विश्वरूपो यश अर्पण कर । ( अन्ये
जनासः अभितः मुह्यन्तु ) अन्य पर न करनेवाले जन धारों दिशाओं में मूच्छित होकर गिर जाएं । (ह) यहां वह
(मघया ) पनवान् इन्द्र (सूरि अस्माकं अस्तु) तथा सब ज्ञानी हमारे होकर रहें ॥१॥
[१५९०] (पुनानः ) छाने जानेवाला सोम ( हरिण्या मया रचा) हरे रंग के तेजसे ( सूरः सयुग्वमिः।)
जिसप्रफार सूर्य अपनी किरणों से अन्य कारका नाश करता है, उसोप्रकार विश्वा द्वेषांसि तरति ) सब शत्रुओंका नाश
करता है। (पुनानः हरिः अरुष ) पवित्र होनेवाला हरे रंगका सोम चमकता है तया { पृष्ठस्यधारा रोचते) छलनीकी
पोठपर इसको धारा भी चमकती है हे सोम तू ( सप्तास्येभिः) सात मुखोसे-तेजोसे (समिः ) और किराँस
(विश्वा रूपा परिपालि ) सव तेनस्यो पदार्चाको अपेक्षा श्रेष्ठ होकर जाता है ॥ १ ॥
[१५९१] (चेफितत् प्राची प्रदिर्श अनुयाति ) सर्वज्ञानी सोम पूर्व विशाको जाता है, तब (देव्य- दर्शता
रथः रदिममि सं यतते विष्य और सुन्दर ऐसा तेरा र किरणों के कारण ते गस्वो दीखता है। ( पौस्या उफ्यानि
यग्मन् ) पौरुषका वर्णन करनेवाले स्तोत्र इन्द्रको प्राप्त होते हैं। स्तोता उनसे ( जैत्राय इन्द्रं हर्षयन् ) विजयके लिए
इन्द्रको प्रपन्न करते है ( घनाच) पन भी इन्द्रको प्राप्त होता है, है सोम और इन्द्र! (यत् समरसु अनपच्युता
भवधः ) तब तुम दोनों पुसमें नहीं हारते ॥२॥
पोडश अध्याय ] सामवेदका सुपोध अनुवाद 3 १ १ २९.२ ११ ३१ 3 १३ १२ २३२१२ ११ ३१२ 9२३ १ ३३.३३१ २ १५९२ वरह त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृमिर्मर्जयास स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिदा पराबतो न साम तयत्रा रणन्ति धीतयः । त्रिधातुभिररुपीमिर्वयो दधे रोचमानो क्यो दधे ॥३॥१० (२)॥ [धा० ४१ । उ०५१ २०७] ( ९।१११।२) ॥ इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥ [३] १५९३ उत नौ गोपणि धियमश्वसो वाजसामुत । यत्कृणुतये ॥१॥ ११ (यौ)॥ [धा०२ । उ० नास्ति। नास्ति ] ( . ६१५३।१०) १५९४ शशमानस्य वा न स्वेदस्य सत्पशवतः । विदा कामस्य वैनतः ॥१॥ १२ (4)॥ [ धा० ५। उ० नास्ति । स्व० १ ] (ऋ. ११८६८ ) १५९५ उप ना मनमो गिरः शृण्वन्त्यमृतस्य ये । सुमृडीका भवन्तु नः ॥ १॥ १३ (से)। [धा०३ । उ० नास्ति । १० नास्ति ] (ऋ ६।१२।९) १५९६ को महि घी अभ्युपस्तुति भरामहे । शुची उप प्रशस्तये ॥ १ ॥ (३४५६५) १५९७ पुनाने सन्वा मियः स्वन दक्षण राजथः । उह्याथै सनातम् ॥ २ ॥ (5. ४५६९) [१५९२ 1 हे सोम! (त्यं इ) तूने (पणीनां त्यत् पतु) पणिोंसे उत्त पनको । विदः) प्राप्त किया। (मत्तस्य घीतिमि मातमिः ) पज्ञके आधार भूत जलों से (स्वे दमे सं मर्जयसि ) अपने यज्ञो स्थानमें उत्तम प्रकारसे प्रमुख होता है। ( पगवतान साम तत् ) दूरसे यह सामगान सुनने में आता है ( यम धातया रणन्ति ) नही पर करनेवाले यजमान मानन्दित हुए हुए दोखते हैं, त्रिधातुभिः मरीमिः तीन स्थान पर प्रकारनेवाले तेजोसे ( रोच. मान: ) मकवाला सोम (चयः दधे चयः दधे ) अन्न देता है, निश्चयसे अम देता है ॥ ३ ॥ । यहां दूसरा सण्ड समाप्त हुआ। [३] तृतीयः खण्डः। [१५९३ ] हे पूपा देय ! (उत ) और (गो-पणि अभ्य-सां याजसा ] गाप, पोडे और जान देनेपाली सया (नृवत पत्र अपया सेयक देनेवाली ( घियं ) परिको ( ना ऊतये कृणुहि ) हमारे सरक्षण के लिए उपयोगी बना ॥१॥ [ १५९० 3 हे (सत्य-शपसा नरः) सत्य बलसे मुक्त योर मरतो । (शशमानस्य स्वेदस्य) तुम्हारी स्तुति करने के कारण पसीनसे तर - य-तर और (चेनतः ) फलको इच्छा करनेवालोंको (कामस्य विदः) इष्ट फल ॥१॥ [१५९५] (ये अमृतस्य सूतयः ) जो अमर प्रजापतिके पुत्र है, ये (नागिरा उप यन्तु ) मारो स्तुति मुनें और (नः सुमृटीकाः भवन्तु ) हमें उत्तम मुरा देनशाले हो ॥ १॥ [ १५९६ ] है (शुची ) पवित्र पायाधिविशे! ( मशस्वये उप) स्तुति करने के लिए तुम्हारे पास शहर (ची पां गयी तुम दोनोवो ( उपस्तुति महि गमि भरामहे स्तुति और स्तोत्र यडे प्रमापन गपित करते है ॥ १॥ [१५१४] हे देखियो । (सन्या दक्षेण ) अपने शरीरसे और मतो तुम (मिया पुनाने } मत मौर यमनाल हम दोनोंको गुदरते हए (राजपा) प्रभाशित होते हो और (सनात् ऋतं उद्याचे) हमेशा या ररते हो ॥ २ ॥ १ - * सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्चिका 9 U 2 1 ३ १ ३ . २ ३७१३ ३२ ३ " र ३ १ 9 १५९८ मही मित्रस्य साधधस्तान्ती पिनती ऋतम् । परि यज्ञं निदधुः ॥ ३॥ १४ (का) ॥ [धा०६ | उ०१ । स्व० २] (ऋ. ४५६७) १५९९ अपगु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तचिन्न ओहसे ॥ १॥ (ऋ. १६३०४ ) १६०० स्वोत्र र राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते । विभूतिरस्तु सूनृता ।।२।। (ऋ. १।३०१५ ) १६०१ उपस्तिष्ठा न ऊतयेऽसिन्धान शतक्रतो । समन्येपु वावहै ॥ ३ ॥ १५ (ह)॥ [धा० १६ । उ• नास्ति । स्व०१] (ऋ. ११३०६) १६०२ गाव उप चदावटे मही यज्ञस्य रसुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥१॥ ऋ. १७२।१२ ) १६०३ अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु । अघटस्य विसर्जने ॥२॥ (ऋ. ८७२।११) १६०४ सिञ्चन्ति नमसावटमुच्चाचक्र परिज्मानम् । नीचीनयारमक्षितम् ॥ ३॥ १६ (रा) । [धा० ८ 1 3० नास्ति । स्व०२] (ऋ. ८७२।१०) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ [१५९८] (मही) हे बडी धावापृथिवियो! तुम (मित्रस्य साघथा ) अपने मित्रको, जो वम्हारी स्तुति करता है, अभिलषित फल देती हो । (ऋतं तरन्ती) यज्ञका रक्षण करती हुई और ( पिप्रती) यशको पूर्ण करती हुई ( यज्ञ परि निषेदथुः ) यतको आभय देती हो ॥ ३॥ १५९९ ] हे इन्द्र ! ( अयं कपोतः ) यह कबूतर जिसप्रकार (गर्भधि इव ) अपनी कबूतरीके पास जाता है, उसीप्रकार (ते समतसि ) यह तेरे पास आता है, इसलिए (नः तत् वचः ) हमारी यह प्रार्थना (मोहसे ) व विधार- पूर्वक सुनता है ॥ १॥ [१६०० ] है ( राधानां पते ) पोंके स्वामी और ( गिर्वाहः) स्तुतिके योग्य ( वीर भूर इन्द्र ! (यस्य ते स्तोमं ) जिस तैरे वै स्तोत्र है, उस तेरी ( विभूतिः सुनृता भस्तु ) वैभवसम्पन्न और सत्यस्वरूप वाणी सत्य हो ॥ २ ॥ [१६०१ ] हे ( शतकतो ) सैकड़ों कार्य करनेगले इन्द्र ! ( अस्मिन् वाजे ) इस युद्ध में (नः ऊतये ) हमारे सरक्षणके लिए तू (ऊर्वः तिष्ठ ) तय्यार रह । हम तुझसे (अन्येषु ) अन्य कार्योंके विषयमें ( संबवावहै ) मिलकर विचार करें ॥३॥ [ १६०२ ] है ( गायः) गायो ! (अवटे उप वद ) यशके स्थान पर आओ और अपना शद करो, तुम ( मही यशम्य रप्सुदा) महान् पशके फल देनेवाली हो। ( उभा कर्णा हिरण्यया) तुम्हारे दोनों कान सोनेके आभूषणोंसे अलकृत है ॥१॥ [१६०३] (भद्रय } आदरणीय अध्वर्य ( अभ्यारमित् ) यशके पास आ गए है। (निषिक्तं मधु) पपे हुए इस मीठे सोमरसपो ( अयटस्य विसर्जने ) महावीरके विसर्जन करनेके समय ( पुष्करे ) कलशमें रखा जाता है ॥ २ ॥ [ १६०४ ] (उशा-चक्रं ) जिसके ऊपरके भागमें चक्र है (परिज्मान नीचीनयार अक्षितम् ) और चारों ओरसे नीचे झुके हुए नीचे हारकै पारा जो शोग नहीं हुआ है, ऐसे (अयटं नमसा सिंचन्ति ) महावीरको नमस्कार करके यज्ञ करनेवाले हवन करते हैं ॥३॥ "यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ।
पोडश अध्याय 11
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(३०१०
-
[४]
२१
तव ।
333
323
,
२
3"
३
.
१
२४.5
२
२
३२१ २३२
१६०५ मा भैम मा श्रमिष्मोगस्य संख्य
महत्ते वृष्णो अभिचक्ष्यं कृतं पश्येम तुर्वशं यदुम्
॥१॥ (ऋ. १४७)
१६.६ सन्यामनु स्फिग्यं पावसे पा न दानो अस्य रोपति ।
मध्या संपृक्ताः सारपेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पित्र ॥ २॥ १७ (ची)॥
[धा० १० । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ. १८)
१६०७ इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम ।
पायकवर्णाः शुचयो विपथितोऽमि स्तोमरन्पत
(१)
१६०८ अय सहसमृपिमिी सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे ।
सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विराज्य ॥२॥१८(रि)।
[ धा० १८ 1 उ० नास्ति । १०२] (*. श)
१६०९ यस्यायें विश्व आर्यो दास शेवधिपा अरिः ।
विरचिदय रेशम पवीरमि तम्पेत्सो अन्यते रथिः
॥१॥ (३.८५१०९)
१
२३१३
[४] चतुर्थः खण्डः।
६१६०५ ] है इन्द्र ! ( उप्रस्य तब सख्ये मा भेम ) महान् वीर ऐसे तेरी मित्रताम रहकर हम किसीसे न करे ।
( मा श्रमिप्म ) हम न थके । वृष्णः ते ) उपासकोको कामना तृप्त करनेवाले तेरे { महत् कृतं अभि चक्ष्य ) महान्
कार्य वर्णनीय हो गए है। तुर्वशं यदं पश्येम ) हम तुर्दश और पदुको आनन्दित अवस्थामें देखें ॥ १ ॥
[१६०६ ] ( वृपा) पलान् इन्द्र ! ( सां स्फिग्य अनु ) अपने माय हायके भागसे ( यावसे ) सोपी
आधार देता है । ( दानः अस्प न रोपति ) काटनेवाला हिसक शत्र इसे कष्ट नहीं दे सकता। ( सारण संग्रताः
धेनवः) शहदको भाखों के शहद के समान मोठे दूधसे युक्त गायोंकि समान आनददायक सोम ! ( तूय एहि ) न पहा
शीन मा। (य) यज्ञमें शीघ्र पहुच और हे इन्द्र 1 (पिय ) सोम पो॥ २॥
६१६०७] हे (पुरू-घसो) बहुत घनवान् इन्द्र 1 ( मम या मागिरः) मैरी जो ये स्तुतियां हैं, वे (त्वा
वर्धातु ) तुमे बढायें । ( पाक-पर्णाः शुचयः विपश्चितः) अग्नि समान तेजस्वी और पुरशानी ( स्तोमः अभ्य.
नूपत ) स्तोत्रोंसे तेरो स्तुति करते हैं ॥ १॥
[१६०८] ( अयं) यह इन्द्र (सदनं ऋपिभिः सहस्रुतः) हमारों ऋषिक द्वारा मलवानो रूप प्रसिट
किया गया है । वह (समुद्र इच पप्रथे ) समुरके समान विस्तृत है । ( अस्य सत्यः सः महिमा शपः) इस इन्द्ररी
वह सत्य महिमा और वह बल प्रसिद्ध है. (यझेपु धिनराम्ये गृणे) यशोंमें और बाह्मकि राम्यमें उसको स्तुति
रोती है ॥२॥
[१६०९(चिभ्यः मरिः भायी अयं ) सब लोकोवा स्वामो तथा श्रेष्ठ पह इन भो (दासः अस्य शेय
घिपा) वातके समान मिस प्रशके खजानेको लाता है.(स.) वह मा ( भय रशमे पीरधि तिर चित्) मर्य,
राम और पवि इनमें गुप्त एकर भी ( तुभ्या इत् मन्यते ) तसे ही हपि प्रदान करता है॥१॥
(३०२)
सामघेदका सुचोध अनुवाद
[उत्तपचिकः
9
3
.
"
१
१६१० तुरण्यवो मधुमन्तं धृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः ।
असे यः पप्रथे वृष्ण्य योऽसे स्वानास इन्दवः ॥२॥ १९ (व)॥
[पा०१४ । उ०१। २०१] (ऋ. ८।११।१०)
१६११ गोमन्न इन्दो अथवत्सुतः सुदक्ष धनिव । शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय ॥१॥
(ऋ. १।१०५४)
१६१२ स नो हरीणां पत इन्दो देव सरस्तमः । ससव सख्ये नो रुचे भव ॥ २ ॥
( ९/१०५1५)
१६१३ पनमि त्वमस्मदा अदेव कं चिदक्षिणम् ।
साहार इन्दो परि बाधा अप द्वयुस्
॥३॥२० (ल)॥
[धा०९ । उन्नास्ति । स्व० १४ ] (ऋ. ९।१०५६)
१६१४ अञ्जते व्यञ्जते समजते ऋतु५ रिहन्ति मध्वाम्यञ्जते ।
सिन्धोरुच्छ्यास पतयन्तमुक्षण हिरण्यपावाः पशुमप्सु गुम्णते ॥ १॥ (. ९८६।४३ )
३२.३१
३३१८ २९
२३१३
३१२
[१६१०] ( तुरण्ययो विप्रास.) यज्ञ करनेमें शीघ्रता करनेवाले ज्ञानी (मधुमन्तं घृतश्चुतं) मपुर दूध और
पीको आहुति जिसके लिए दी जाती है, ऐसे (अर्फ भानृचुः) पूज्य इन्द्रको अर्चना करते है। (अले रयिः पप्रथे)
हमारा हविरुपी पन प्रसिद्ध हो । ( वृष्ण्यं शवः ) मोम बेनेवाले बल प्रसिद्ध हों भोर ( भस्मे स्वानासः इन्दयः ) हमारे
द्वारा शुद्ध किए गए सोमरस प्रसिद्ध हो ॥२॥
[१६९१ ] हे (इन्दो ) सोम! (नः गोमत् भश्चयत् ) हमें गाय भोर मोडोंसे युक्त घन (धनिय ) है । हे
(सु-दक्ष ) उत्तम पल सम्पन्न सोम (सुतः) रस निकालनेके याद (गोषु शुचिं वर्णे च धारय) गाय के दूपसे शुद्ध
वर्णकोपारण कर ॥१॥
गायका धूध सोममें मिला
[१६१२J (हरीणां पते देव इन्दो) हे हरे रगकै धनस्पतिक स्वामी सोम देव (प्रस्तम. नर्यः सः)
मत्यन्त तेजस्यी और मानवोंका हित करनेवाला यह त (नःस्चे भय )हमारा तेज बढानेवाला हो । (ससा सण्ये इष)
जिप्सप्रकार एक मित्र दूसरे मित्रकी सहायता करता है, उसीप्रकार तू हमारी सहायता कर ॥ २॥
[ १६१३] हे सोम ! (त्य सनेमि फ भस्मत् आ ) व प्राचीनकालसे चले आनेवाले सुखको हमसे प्रकट कर, हे
(साहान् इन्दो) शत्रुको हरानेवाले सोम! (याध. परि) बापा गलनेवाले शत्रुओंका नाश कर, तथा (इयु अप)
बुहरा व्यवहार करनेवाले शत्रुको मार तया ( अ-देव अत्रिणं चित् ) विव्यगुणोंसे रहित और खाऊ शत्रुको भी मार ॥ ३॥
[१६१४ ] सोमको ऋत्विजलोग ( अञ्जते ) गाय के दूधके साथ मिलाते हैं, (व्यञ्जते ) ओक रीतिसे मिलाते है,
(समजते ) उत्तम रोतिसे मिलाते है (प्रातुं रिहन्ति ) फिर इस मोठे सोमका स्वाद लेते है, (मध्वा अभ्यञ्जते मोठे
दूधके साथ मिलाते हैं (सिंधो. उच्छ्वासे ) पानीके ऊचे भागसे (पतयन्तं उक्षण ) गिरनेवाले सोमको एव (प)
सबरो देखनेवाले सोमको (हिरण्यपावा. अप्सु गृभ्णते) सोनेसे पानी में पवित्र करके पिर पानी में मिलाते है ॥ १ ॥
पोश अध्याय सामवेदका मुबोध अनुशद (३०३) 31 १६१५ विपश्चित पपमानाय गायत मही न धारात्यभो अति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति स्वचमत्या न कोडनसरदृपा हरिः ॥२॥ (ऋ. ९।८६१४४ ) १६१६ अंग्रेगो राजाप्पस्तविभ्यते विमानो अहां भुवनेम्वपितः । हरिकृतस्नुः सुदृशीको अर्णयो ज्योतीरथः पवते राय ओक्यः ॥ ३ ॥ २१ (ले) ।। { घा० ३९। उ० नारित । स्व ७] (.९१८६४५) ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४॥ ॥ इति सप्तमप्रपातस्य तृतीयोऽधः ॥ ३ ॥ सप्तम. प्रपाठकश्च समाप्तः ॥ ७॥ 3" ३१२ २३६१ ॥ इति पोडशोऽध्यायः ॥१६॥ [१६१५] हे ऋत्विको ! (विपश्चिते पवमानाय गायत) शनी और छानेजानेवाले सोमकी स्तुतिका गान फरो। (माह धारा न अन्धः अत्यति ) यह सोम बड़ी पाराके समान प्रवाहसे अत्र देता है । (आहे.न)सापक समान (जूणां त्वचं पति सर्पति ) गली हुई चमडीको यह छोडता है । (वृया हारिः ) मलवान् और हरे रंगका यह सोगररा (अत्यः न ) घोडेके समान ( क्रीडन् असरत् ) क्रीडा करता हुआ फलशमें गिरता है ॥ २॥ १६१६J (अग्रेग राजा) प्रगति करनेवाला राजा सोम ( याप्य-स्तरिष्यते) जल मिलाया जाता हमा प्रशसित होता है । ( अह्नां विमानः) दिनको मापनेवाला सोम (भुवनेषु धर्पितः) जलमें रखा हुआ है। (हरिः धूतस्नुः ) हरे रंगमा मोर पानी में मिलाया गया (सु-दशीका अर्णवः ) मुन्दर दर्शनीय और पानीमें रहनेवाला (ज्योति. रथा ) तेजस्वी रप जिसका है, ऐसा (राय: ओक्या ) यह गोम पनके घरको रखनेवाला है ॥ ३ ॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुया । ॥ति पोडशोऽध्यायः॥ षोडश अध्याय -- इन्द्र देवता ३ हे शचीपत इन्द्र विश्वाभि अतिभिः सुशग्ध [ १५७९ }-हे शक्तिमान PA संरक्षण के सामनसेतू - इस गोलपे अभ्यापर्ने अनेक देवताओंकी स्तुति है। समर्थ हुआ है। उनमें इन देवताको वडी स्तुति है। वह इसप्रकार है- ४ हेर ! पसुपिदं यशसं, भगं न, त्या अनु १ इन्द्रा मुतस्य विप्मावि मदे अस्य राज्यं शयः चरामसि ( १९७९ ]- हे शूर इन्न । पनरो पुक्त, पायो घायुधे [५४]- इन्द्र सोमा पोन बार विशेष मानन्द भौर भाग्यवान्फो समान रहनेवाले तेरे अनुकूल होरही माप्त परत पगमामा वीर्य और इस बाता है। हम आचरण पर। २ माययः भय पूर्वथा मस्य तं महिमानं मनुष्टु- ५ मध्यस्य पार गयां पुरसह मसि [१५८०-ग यन्ति [ १५७४ }- मनुष्य माग पहले समान इस इन्दको घोपुष्ट करनयाता मोर पापोका पोषण करना है। महिमा वर्णन पर है। ६ देइन्द्राये दानं नाकिः परमधिरा यत् यामि (३०४) सामवेदका सुयोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः तत् आभर [ १५८०-हे इन्द्र ! तेरे दान कोई भी नष्ट २२ पावकवर्णाः शुचयः विपश्चितः स्तोमै अभ्य. नहीं कर सकता । जो में मागता हूँ, वह मुझे भरपूर दे। नूपत [ १६०७ ] - अग्निके समान तेजस्वी ऐसे शुद्ध शानी ७ हे देव । हिरण्ययः उत्सः [ १५८० ]- हे इन्द्र स्तोत्रोंसे तेरी स्तुति करते हैं। देव ! जैसे सोनेसे होज भरा हुआ हो, वैसे ही तू सम्पत्तिसे २३ अयं सहस्रं ऋषिभिः सहस्कृतः समुद्रः इय भरा हुआ है। पमधे [१६०८]- यह हजारो ऋषियों द्वारा बलवानके ८ सुत्तये एहि [ १५८० ]- घन देने के लिए तू आ। रूपमें प्रशसित किया गया इन्द्र समुद्र के समान विस्तृत है। ९ चेरवे भगं विदाः [१५८० ]- उत्तम आचरण २४ तुरण्ययो विनासः अर्क आनृयुः [ १६१०]- करनेवालेको भाग्य दे। शौनता करनेयाले शानी इन्द्रकी अर्चना करते है। १० हे मघवन् । गविष्टये वावृषस्व [ १५८० - हे इसप्रकार इन्द्रका वर्णन यहा किया गया है। इन्द्र यल- धनवाम् इन्द्र गायको इच्छा करनेवाले मुझे गायें दे । यात् है, उसकी महिमा शानी विद्वान् वर्णन करते है। सब १९ अश्व एये उत् [१५८० - घोडको इच्छा सरक्षणके साधन उसके पास संप्यार रहते हैं । यह इन्द्र सव करनेवालेको घोडे । प्रकारके धन अपने पास रखता है। यह यशस्वी और भाग्य- १२. त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय यान् है । घोडे और गायोका यह उतम पालन करता है । जैसे महसे [ १५८२ ]- तू अनेक अर्थात् हजारों और सैकडों होज सोतसे भरा हुआ हो, वैसे ही यह इन्द्र पनसे भरपूर है। गायोंकि शुण्ड दान करने के लिए पासमें रखता है। सदाचारी मनुष्यको यह पन देता है। उसके पास देने के लिए हजारों पा और घोडे है। उसके शौर्य इस धुलोक और १३ हे पन् ' कया ऊत्या त्यं नः अभि प्रमन्दसे भूलोकमें चारों ओर फैले हुए है। उसने पूर्वको तेजस्वी बना [१५८६]- है इन्द्र 'तू कौनसे सरक्षण सामथ्र्यसे हमें अपिफ कर आकाशमें स्थापित किया। भूमि भी उसीके आधार पर भानन्य देता है। है। यह सब पुद्धोंमें हमारी रक्षाके लिए तैयार और स्थिर ५४ इन्द्रा महा रोदसी पप्रधत् [ १५८८ ]- इन्नने रहे और चारों ओरसे हमारी रक्षा करे । इसके मरक्षणमें अपनी पाक्तिसे युलोक मौर पृथ्योलोकको विस्तृत किया। यदि हम रहें तो हम किसी से भी डर नहीं रहेगा। ऐसा यह १५ इन्द्रः सूर्य अरोचयत् [ १५८८ ]-इन्द्र ने सूर्यको इन्द्र है। प्रकाशित किया। १६ इन्द्रे विश्वा भुवनानि येमिरे [१५८८]- इन्द्रमें सब भुवन रहते है। इन्द्र और अग्निका वर्णन इसप्रकार है- १७ हे राधानां पते। गिर्वणः चीर ! यस्य तेस्तोत्र १ इन्द्राग्नी दासपत्नीः नवति पुरः एकेन कर्मपा विभूतिः स्मृता अस्तु [१६..]- है धनके अधिपते। हे साकं अधूनुत [ १५७६ ]- इन्द्र और भनिन शासके नाबे स्तुत्य चोर इन्द्र ! जो तेरे ये स्तोत्र हम गाते हैं, वह तेरी यह नगरोंको एक मात्रमणसे हिला दिया। विभूति सत्य हो । २ इन्द्राग्नी !यां तविपाणि प्रयांसि सघस्थानि १८ हे शतक्रतो । अस्मिन्याजे नः उत्तये ऊर्ध्वः [१५७८ ]- हे इन्द्र और अग्नि ! सुम्हारे बल और अन्न तिष्ठ [१६०१]- हे संकडों कर्म करनेवाले इन्द्र ! इस युद्धमें एकत्र है, अर्थात् तुम मिलकर जो करना होता है, करते हो। हमारी रक्षा करने के लिए न उठकर तैयार हो और स्थिर ३ अप्य युवो हितम् । १५७८ ]- उत्तम कर्माको प्रेरणा देनेवाले तुम्हारे मल तुममें ही है। १९ उग्रस्प तय सख्येमाभेम,माश्रमिप्म[१६०५] दासलोगोंको नम्वे नगरियोंको एक ही भाक्रमणसे हिला -तेरे ममान शूरकी मित्रताम हम न डरें और न पके। डासा, ऐसा युद्ध कौशल्य इनका है। २० पृष्णः ते महत् कृतं अभिवक्ष्य [१६०५] बल मुक्त तूने महान् प्रशस्तनीय कार्य किए है। अमि २१ दानः अस्य न रोहति [ १६०६]- काटनेवाला अग्निका वर्णन इस अध्यापमें इस प्रकार है- मात्र इसे कष्ट नहीं सकता। १ होता मन्द्रः यः विश्वा यसु जनानां दयते इन्द्र और आणि घोडश अध्याय] सामनदवा सुवोध अनुवाद ( ३०५) - देता है। सोम और इन्द्र [ १५८३J- देवोंको बुलाकर लानेवाला और यानन्द बढाने महि, अभि भरामहे [१५९६]- हे पविग्र द्यागाधिवियो। वाला जो अग्नि है, वह हरप्रकारके धन लोगों को देता है। तुम्हारी स्तुति करने लिए तुम्हारे पास आकर, तेज युक्त २ दस विश्पते ! सुदानचः देवयुचः गीर्भि मर्मू- तुम दोनोंको स्तुति स्तोत्र घडे प्रयाण अर्पण करते हैं। ज्यन्ते, तनये तोके च मनोनां राधः पर्षि [ १५८४ ] यहां शु और पृषिधी देवता " शुची" शुद्ध है और " धो" है सुन्दर प्रजापालक अग्ने ! इतम दान देनेवाले और देवत्व तेजस्यो है, ऐसा कहा है। प्राप्त करनेगाने अपनी वाणीस तेरी स्तुति करते हैं। ऐसा २ तन्वा दक्षेण मिथः पुनाने राजया। सनात् कर्त तू पुत्रपौत्रोको धनवानों के पास रहनेवाला पन दे। अर्थात् ऊद्याथे । १५९७ ]- तुम अपने शारीरसे गौर अपने सामध्यम स्तुति करनेवालोंको धन मिलता है और वह धन उन्हें अग्नि दोनों घुलोक और पृथ्वीलोकको शुद्धि करके प्रकाशिन होते हो और हमेशा सत्य - पत-को सिद्ध करते हो। ३ महीं । मित्रस्य साधया, प्रस्तं तरन्ती, पिप्रती, यशं परि निषेदधुः [ १५९८]-है महान द्यायामिवियो! १ समत्सु अनपच्युता भवथः [ १५९१ ]- तुम तुम अपने मित्रका कार्य करती हो, सत्या सरमण करतो दोनों मुलमें नहीं हारते, ऐसे में दोनों शूरोर है। हो, कार्य पूर्ण करती हो और यज्ञको सिद्ध करती हो। पूपा तुम्हारे अनुकूल व्यवहार करनेवालोंका तुग सरन करतो १ गोपाण अवसांचाजसांनृपत् पियं नः ऊतये हो । सत्यका तारण करके उनका पोषण परती हो, और विश्वयज्ञ पूर्ण करती हो । विश्वमें एक प्रकारका महापज्ञ चालू कृणुहि [ १५९३ J- गाय देनेपाली, घोडे देनेवाली, अन्न देनेवाली और पुत्र देनेवाली बुद्धिको हमारे संरक्षणके लिए इस यज्ञसे सोका कल्याण होता है। है । उसे मयायोग्य रीतिरी पे च और पुरियो परनी है। उपयोगी मगा। गी वरुण १ हे गायः अवटे उपवदामही यशस्य रसुदा। १ हे वरुण । मे इमं हवं शुधि। अध मृडय । स्यां माचके । १५८५]-हे पण ! मह मेरी उमा फर्णा हिरण्यया (१६०२ - हे गायो । यस अवस्युः स्थानपर बायो और शरद करो। तुम महान् परके वाय स्तुति मुन । माज मुझे मुखी कर! अपने सरक्षणको इच्छा करनेवाली हो । तुम्हारे दोनों कानों सोनेके आपकार है। करनेवाले हर तेरी स्तुति करते है। यत जिप्त जगह होता है, यहाँ गायें हों और उनका माना बरुण सोगोंको मुग्षी मोर सुरक्षित करता है। सुनाई दे। गायें अपने दूध व घोसे या उत्तम रोतिसे सिद्ध करती है । गायके वृष मोर घीके अभावमै यज्ञ सिद्ध होनेवासा १ सत्यशवसा न शशमानस्य स्वेदस्य देनतः ही नहीं है । कामस्य विद [ १५९४]- हे उत्तम पलसे यात महतो। २ सारण मंकाः धेनवः [१६०६ - महदो संनिको ! तुम्हारी स्तुति करने के कारण पसीने से नहाये हुए समान मोठा दूध पायें भरपूर देती है। उनसे उत्तम पो तपा फतकी या करनेवाले स्तोतामोंको इष्ट फल दो। मिलता है । (हय्यंगवीनं घृतं ) परके दूपसे मान तयार २ अमृतस्य सूनयः नः गिर. उपश्यन्तु, नः दिये गये पुतका पनने आहुति देने के लिए उपयोग करना सुमृटीकाः भवन्तु [ १५९५]- पं अमर प्रजापतिक चाहिए । पुत्र मात् पोर हमारी स्तुति सुनें और हमें सुप देनेवाले हों। मोम मएन पोर सैनिक है, ये सबकी रक्षाओं को नष्ट के १ पुतानः हरिण्या अया रचा, सूरः मयुग्पमिान, करते हैं। विध्या पासि तरति [१५९०]- गर होने वाला तोमरस अपने हरे गले तेजसे, सूर्य जप्ते अपनी किरणोंगे यापहारका यावापृथिवी नाश करता है, उसोप्रकार सरचारात समास सुधी प्रशस्तये उप, घी यां, उपन्तुनि परता है। ३१ [पाम. हिन्दी भा.२] मरुत (३०६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः - २ पुनानः हरिः भरपः [१५९०]- स्वच्छ होनेवासा सूर्य से अपनी फिरणोंसे घमकता है, उसीप्रकार यह सोम. सोम चमकता है। रस चमकता है, उस समय वह छाना जाता है, उस समय ३ पणीनां वन विदः [१५९२]- पणि-व्यापारियों से सामगान शुरू होता है । यह सामगान बडी आधाजसे किए धनको तूने प्राप्त किया। जाने के कारण दूरसे ही सुनाई देता है। ४ ऋतस्य धीतिभिः मातृमि: स्येदमे संमर्जयसि बाद उसमें गायका दूध मिलाकर उसका हवन करते है, [ १५९२ ]- यज्ञको आधार देनेवाले पानीसे तू अपने स्थान फिर उसे पिया जाता है । इसप्रकार सोमका वर्णन है। पर छाना जाता है। इम देवताओंका इस अध्यायमें वर्णन है। सोमरसमें पानी मिलाकर उसे छानकर शुद्ध किया जाता है। ५ परावतः साम तत् [१५९२]- पज्ञम दूरसे हो सामगायन सुननेमें आता है । उसी कारण वहां प्रज्ञ चालू है, और सोमरस जाना जाता है, यह जाना जा सकता है। सुभाषित ६ हे इन्दो! नः गोमत् अश्वमत् धनिव [१६११] १ आयवः अस्य महिमानं अनुष्टुयन्ति [ १५७४ ] -हे सोम ! हमें गायों और घोडोंसे युक्त धन दे। मनुष्य इस इन्द्रको महिमाका वर्णन करते हैं। ७ हे सुदक्ष ! सुतः गोपु शुचि वर्णे धारय २ इषः आवृणे [ १५७५]- अन्न प्राप्तिके लिए में [१६११]- हे उत्तम बल बढानेवाले सोम ! रस नियोडे प्रार्थना करता हूँ। जानेके याद गौदुग्धके उत्तम रगको धारण कर । गायके दूध ३ हे इन्द्राग्नी ! दासपत्नीः नतिं पुरः एकेन मिल जा कर्मणा साकं अधूनुतम् [२५७६]- हे इन्द्र और आने । ८ हे हरीणां पते देव इन्दो ! सरस्तमः नर्यः नः तुम शत्रुको नम्बे नगरियोको एक ही प्रयत्न • आक्रमण - से रुचे भव [१६१२- हे हरे रंगके बनस्पतिके स्गमी हिला डालते हो। सोमदेव । अत्यन्त तेजस्वी और मनुष्योंका हित करनेवाला ४ धीतय ऋतस्य पथ्या अनु अपसः परि उप तू हमारे तेज बढा। प्रयन्ति [१५७७]- बुद्धिमान् मानिक सत्यफे मार्गसे यजके ९ सालान् ! बाधा परि,न्युं अप [ १६१३ ]-हे पास आकर बैठते हैं। शत्रुको हरानेवाले सोम ! बाधा करनेवाले शओका नाश ५ या तविषाणि प्रयांसि सधस्थानि, अप्तूर्य युवो कर मार दुहरा व्यवहार करनेवाले दुष्टोका नाश कर । हितम् [ १५७८ ]- तुम्हारे बल और अन एक जगह रहते १० अहिः न, जीर्णा त्याचे पति सर्पति [१६१५] है। तुम्हारे बल शुभ कर्माको प्रेरणा देनेवाले है। -- साप जैसे अपनी फेचुली उतार देता है, उसीप्रकार सोम ६ हे शचीपते इन्द्र ! विश्वाभि ऊतिभिः सुशग्धि अपनी छालको दूर करता है । सोम कटने के बाद उसको छाल [१५७९] - हे शक्तिमान् इन्द्र ! सब सरक्षणको शक्तियोंसे असग हो जाती है। युक्त होने के कारण नू सामर्थ्यवान है। ११ अग्रेगः राजा आप्यः स्तावप्यते [१६१६] ७ घसुचिदं यशसं भगं न त्या अगु चरामसि प्रगति करनेवाला, राजा कर्तव्य करनेवालोंके द्वारा प्रशमित [१५७९)- धनवान् और यशस्वी तेरे, जिसप्रकार भाग्यवानके होता है । राजा सोम पानीमें मिलते समय प्रशसित होता है। पीछे सब चलते हैं, उसीप्रकार हम अनुकूल हों ऐसा आचरण १२ हतिघृतस्नुः सुखशीक: अर्णवः ज्योतीरथः करते है। रायः ओफ्यः [१६१६]- हरे का पानी में मिलाया गया ८ अश्वस्य पारः गवां पुरुकृत् असि [५८०]- मुन्दर दर्शनीय और तेजस्वी रथ निसका है, ऐसा यह तोम घोडेको पुष्ट करनेवाला और गायोंका पोषण करनेवाला है। मानों तेजोंका पर ही है ऐसा दिखाई देता है। ९ हिरण्ययः उत्सः [१५८० [-दूसोनका स्रोत है। सोमका रस निकालने के बाद उसमें पानी मिलाया जाता १० त्ये दानं न किः परिमधिपत् [१५८१]- तेरे है और उसे जाना जाता है। तब वह सोम चमकने साता है। दान कोई भी नष्ट नहीं करता।
पोशायाय] सामवेदका सुयोघ अनुवाद (३०७) ११ यत् यत् यामि तत् माभर १५८३ ]- में जो २६ इन्द्रे ह चिश्या भुवनानि येमिरे [१५८८]-इनमें जो मागता हूँ वह यह मुझे दे। ही सय भवन रहते हैं। १२ स्वं पसुत्तय पहि [१५८१]- तू पन देने के २७ विश्वकर्मन् ! हविषा यावृधानः स्वयं तन्वं लिए भा। स्था हि ते यजस्व [ १५८९]- है सब कर्म करनेवाले १३ चेम्वे भगं चिदा [ १५८१]- सदाचरण करने. इन्द्र । हषिसे बढनेवाला तू स्वयं करनेवाले विश्वरूपी यह वालेको भाग्य दे। लिए स्वयको अपित पर। १४ हे मघवन् ! गविष्टये उत् घायुपस्व [ १५८) २८ अन्ये जनासः अमितः मुहन्तु [१५८९) अन्य पापको इच्छा करनेवालेषो गायें दे यज्ञ न करनेवाले लोग चारों मोरसे मूछित होकर गिर जायें। १५ हे इन्दअश्व इप्पये उत्[ १५८.]- हे इन्द्र ! २९ इह मघश सरिः अस्तु [ १५८९] - पहा इन्द्र घोडेकी इच्छा करनेवालेको घोडे दे। सब जाननेवाला हो। १६ त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूया दानाय ३० पुनान विश्वा यांसि तरति {१५९०- पवित्र मंहसे [१५८२ ]- तू बहुतसे हजारों और मैकडों गाकि पोर शत्रुओंका नाश करता है। शुण्ड दान के लिए देता है। ३१ सूरः सयुग्वभिः [१५९०]- सूर्य अपनी किरणोंग १७ पुरं इन्द्रं अब से गायन्तः विप्रवचस. माचतम अन्पकारका नाश करता है। {१५८२- शत्रुकै नारोंको तोरनेवाले इनको अपने रक्षण ३२ दैव्या दर्शत रयारदिभिः संयसते ५९॥ करने के लिए शानयुक्त भाषण करनेवाले हम बुलाते है। -दिथ्य और दर्शनीय ऐसा यह रप किरणोंसे तेजस्यो हमा १८ होता मन्द्रः या विध्या पसु जनानां दयते हुआ दीखता है। [१५८३]-देवोंको बुलानेवाला और आनन्द देमेयाला अग्नि ३३ जत्राय इन्द्र हर्पयन् ( १५९५ ]- पियरे लिए सब पर लोगोंको देता है। इन्द्रको प्रसन्न करते हैं। २९ दस विश्पते । सुदानवः देवयन्त , रथ्यं अश्व ३४ समत्सु अनपच्युता भवधः [१५९ -पों में न, गीर्भिः मर्मज्यन्ते [१५८४]- हे बानीय प्रजापालक | तुम दोनों नहीं हारते । उत्तमदान नेशले और देवत्व प्राप्त करनेवाले याजक, ३५ गोपणि अश्वसांचाजसांनृयत् धियं नः ऊतये रथम नरेहए घोडे समान, अपनी वाणीसे तेरो स्तुति कृणुधि [ १५९३]- गाय, घोरे, अन्न और पुत्र देनेवाली करते है। मुहिको हमारे संरक्षण के लिए उपयोगी मना। २० तनये तोके उभे मघोनां राधा पर्षि [१०८४]- ३६ तथा दोण मिथः पुनाने राजथः [१५९७ ] -दारोर और इससे तुम दोनों परस्परको शुट करते पर पुत्र और पौत्र दोनोंदो पनपार्लोरे पास रहनेवाले पन दे । तेजस्वी होते हो। २१ अवस्यु. त्यां मा चके। हेयगण ! मे महवं ३० मित्रभ्य साधध:३५१८]-तुम दोनों मिकी श्रुषि, राय मृदय च ॥५८५/- अपना सरक्षण हो ऐसो इच्छा करनेवाले हम सेरी स्तुति करते है। ३८ ऋतं नरम्ती पिमती [१५९८-यारी पूर्ण करते २२ हे चूपन् । फया ऊत्या त्वं ना अभि प्रमन्दसे और पाको पूर्ण कराते हो। [१५८६-हे बलवान् इन्द्रीनसे सरक्षक सामग्यसे ३९ नः तत् पचः मोहसे [१५९९]- हमारी प्रार्थना तु हमें अपिए आनन्दित करता है ? २३ कया स्तोसभ्य मा भर 11-कोनमी प्यार देर तू सुनता है। १. राधानां पते गियोहावीर ते स्नाय विभूतिः सारितरो तू तोतामणि भरपूर मन्न रेता है। मनृता मस्तु [१६००-हे पोरे स्वामी तुस्पोर! २४ इन्द्रः शया मला रोदसी पप्रयत् { १५८८]- तेरे स्तोत्र या दिवानेयाले और शरय हो। अपनो क्लिो पुलोर भोर पोलोर मर देता है। ४१६ शतपतो! यस्मिन् या ना ऊतये कार्य ५५ इन्द्राम्य भरोचरत् १५८८ - इन परो तिष्ठ [१६013-हे संतापाई करनेवाले इस तेजाची लाया। मुदमें हमारे सारे लिए तैयार होकर रिपर रहे। सहायता करते हो। .
{ ३०८) सामवेदका सुबोध भनुवाद [उत्तरार्षिक: . ४२ उग्रस्य तव सरये मा भेम [१६०५]- उपयोर उपमा ऐसे तेरी मित्रता हमें कोई भय नहीं हो। १ भगन [१५७९]- भाग्यके समान तेरे (अनु ४३ मा भ्रमिप्म [ १६०५]- हम न थके । चरामसि) अनुकूल हम चलते हैं। जैसे भाग्य अनुकूल होता ४४ वृष्णः ते महत् कृतं अभिचक्ष्य [१६०५]- है, उसीप्रकार तेरे अनुकूल हम व्यवहार करते है। भक्तोको इच्छा तृप्त करनेवाले तेरे महान् वर्णनके योग्य २ हिरण्यया उत्सः [१५८० ]- जिसप्रकार सोनेसे भरा हुआ हौज होता है, उसीप्रकार तु धनसे भरा हुआ है। ४५ वृपा सन्यां स्फिग्यं अनु वायसे [ १६०६] ३ मधोन प्रथमानि पामा [१५८३ ]-मोठे सोम- चलवान इन्द्र अपने बायें हायसे सबको आधार देता है। रसके मुख्य पात्र के समान इस मनिको ( स्तोमाः प्रयन्तु) ४६ दानः अस्य न रोपति [ १६०६ ]- काटनवाला स्तुतियां प्राप्त हों। शत्रु इसे कष्ट नहीं दे सकता। (दान:- 'दा'- काटना, ४ रथ्यं मध्यन [१५८४ ]- रथमें जुड़े हुए घोडेके दान -काटनेवाला) समान (गीमिः मर्मज्यन्ते) अपनी वापीते अग्निको स्तुति ४७ सारण संपृक्ताः धेनवः [ १६०६ ]- मधुर करते हैं। दूधसे युक्त ये गायें है। ५ सूरः सयुग्चभिः न {१५९०]- सूर्य अपनी किरणोंसे ४८ पावकवर्णाः शुचया विपश्चित. स्तोमैः अभ्य- जैसे अन्धकार दूर करता है, उसीप्रकार (पुनानः राचा नूपत [ १६०७]- अग्नि के समान तेजस्वी शुद्ध विद्वान् विश्या देसि तरति) स्वच्छ होनेवाला सोम अपने स्तोत्रीरो तेरी स्तुति करते है। प्रकाशसे सब शत्रुओं को दूर करता है। ४९. अयं सहस्र ऋषिभिः सहस्कृतः समुद्रः इव वह सामगान सुनाई देता है ( यत्र धीतयः रणन्ति ) जहां ६ परावतः तत् सामन [१५९२]- दूरसे जिसप्रकार पप्रथे [१६०८]- यह इन्द्र हजारों पियों के द्वारा बलवान के रूपमें प्रसिद्ध किया गया है । वह समुद्र के समान महान हो ऋत्विज गाते हैं । पत्नशालामें ऋत्विज सामगान करते हैं। गया है। यह दूरसे हो सुनाई देता है, और उससे यहां यज्ञ चल रहा है, ऐसा ज्ञात होता है। ५० अस्य सत्यः महिमा शवा यज्ञेषु विप्रराज्ये रणे { १६०८ )- इसकी वह सत्य महिमा और सामभ्यं अपनी पाबूतरोकी तरफ जाता है, उसीप्रकार (ते समतसि ) ७ कपोत: गर्भधि इव [१५९९] - कयूतर जिसप्रकार बाह्मगोंके यज्ञ के राज्य में प्रशसित होता है। वह तेरे पास आता है। ५१ अयं अस्य विश्वः आर्यः शेवधिपा अरिः [१६०९] ८ समुदः इव पप्रथे । १६०८]- समुद्रते समान वह - यह इस यनका और सब आर्योका निधि रक्षक है। इन्द्र महान् है। ५२ देवः सोमः सरस्तमः नर्यः सः नः रचे भव ९ सखा सख्ये इच [ १६१२]- मित्र जिसतरह [ १६१२ ] है सोमदेव ! अत्यन्त तेजस्वी और मनुष्योंका अपने मित्रकी सहायता करता है, उसीतरह (सः नः रचे हित करनेवाला तू हमारे तेज बढानेवाला हो। भव) व हमारा तेज बढानेवाला हो । ५३ इन्दो सामान् ! याधः परि, न्यु अप [१६२३] १. सिन्धोः उच्च्यासे पतयन्तं उक्षणं [१६१४]- - हे भानुको हराने वाले शोम! गपा डालनेवाले और दुहरा नदीके पानीमें जिसप्रकार बल डुबकी लगाता है, उत्तीतरह ध्यवहार करने वाले शत्रुभोको दूर कर। पानीमें सोमरस मिलाया जाता है। ५४ अहिः न, जीर्णा त्यचे भति सपंति [१६१५]- धारासे बन जैसे छाना आता है, उसीप्रकार अन्नरूपी सोम ११ महि धारा न अन्धः अत्यति ।१६१५]-मोटो सापके समान वह गली हुई चमडीको निकाल फेंपता है। धारासे छाना जाता है। १२ अग्नेगः राजा [१६१६]- प्रगति करनेवाला राजा जिसप्रकार प्रशसित होता है, उसीप्रकार (आप्यः स्तविष्यते) जलम मिलाया जानेवाला मोम प्रशसित होता है।
पोडश अध्याय सामवेदका सुबोध अनुवाद पोडशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची देषता मंत्रसंख्या ऋग्वेदस्यान धिः (१) मेध्यातिथिः काण्वः इन्तः प्रगापः- ( विषमा बृहनी, समा सतोबरती) १५७३ दाश " दा३८ इमानी गायत्री " १६ १५७४ १५७५ १५७६ १५७७ १५७८ १५७९ मेध्यातिथिः काण्वः विश्वामित्रो गाथिनः विश्वामित्रो गायिनः विश्वामित्रोमाथिनः विश्वामिगोगायिनः भर्गःप्रागाथ: " " " दाक्षिर प्रगापः- (विषमा बृहतो, ममा मनोव्हती) " " १५८० " " " दाय॥६ दा६७ दा६१८ ८1१०३६६ ८.१०३७ भग: प्राणायः भगः प्रागाय: भगःप्राणाय: मोभरि कास्यः मोभरिःपाधः १५८१ १५८२ १५८३ १५८४ अग्नि. " . " गायत्री यणः " गुनःोप भाजोगतिः मुका मांगिरराः २५८६ ८1९३११९ ८३१५ मेध्यातिधिः काण्वः प्रगाय - { विषमा यहनी, समा सनोरहती। विश्वकर्मा पवमानः गोम मिन्टुप भयदि १०८॥ १११११११ " मेष्यातिथि: वाव विश्वकर्मा भीवनः अनानतः पादच्छेपिः अनानतः पागोपिः अनानतः पादपिः (३) भाद्राजो याम्पत्य " १९५९ मारत्री गोतमो राहगणः १५९४ पूषा मप्तः विश्वेदेवाः चावापियो " ६५३३१० १५८६८ पार१९ ६९ ४०६६ ५६७ ११३०४ १०५ १५९७ जिवा भारदाजः यामदेवो गौतमः वामदेव गौतमः वामदेव गौतमः मन.पानीपतिः शुन पातोगनिः . .
- (३०८) सामचंदका सुबोध अनुवाद उत्तरार्चिक ३०९ ग्वेदस्पान देवता गायत्री अग्नि हौषि या " ८५१२ ७२।११ ८७२।१० शुन गेप आजोगति हपत प्रागाय हपत प्रागाय हपत प्राणाय " " १६०१ " (४) १६०५ ८110 देवातिथि कान बरन प्रगापा- (विषमा बहती, समा सतोहतो) " " વશર श १०६ १६०७ १६०८ १६०१ १६१० १६२१ " " " " " देवातिथि काय मेष्यातिथि काण्व मेध्यातिथिः काण्य वालालल्य {ष्टिा भाग्य ) पालखिल्य (अप्टिग पाय ) पपतनारदो पयंतनारदो पवतनारदो अतिमाम अधिभाम भविभौम पयमान सोम उणिक . दा५११० ९१०५४ ९।१०५।५ ९१०५३ ९८६४३ ९८४ રાવ " " जाती " १६१६ "
सप्तदश मध्याय]
सामवेदका सुबोध जनुवार
(३११)
अथ प्लादशोऽध्यायः
अथाटमप्रपादफे प्रथमोऽर्थः ॥६-१॥
.
(१-१४) १, ७, १४ शुन शेप माजोगति । २ मपुज्छ वा श्वामित्र , ३ शर्हिस्पत्य , (तणपाणि) ४ पसिष्ठो मंत्रा-
मणि , ५ वामदेयो गौतम, ६ रेमसूतू काश्यपी, ८ नृमेघ आगिरस , ९, ११ गोपूक्त्यश्यमूक्तिनो काण्डायनो, १०
धुतकक्ष मुकको वा मागिरस , १२ विरुप आंगिरस , १३ वरस काण्व ॥ १, ३, ७, १२ अग्नि , २,८-११,
१३, १४ इन्द्र।, विष्णु , ५(१) वायु, ५(२-३) इन्द्रवायू, ६ पवमान सोम ॥ १-२,७,९,१०, १२, १३,
१४ गायत्री, ३, ८ प्रगाय (विषमा बृहतो, समा सतोबहती ), ४ विष्ट, ५, ६ अनुष्टप, ११ उष्णिक ।
१६१७ विश्वेभिरमे अग्निमिरिमं यक्षमिदं वच! । चनौ पा सहसो यहो ॥१॥ (ऋ ११२६।१०)
१६१८ शश्वता तना देवदेयं यजामहे । स्वे हद्धूयते हविः ॥२॥ (ऋ ११२६६)
१६१९ प्रियो नो अस्तु विश्पतिहोता मन्द्रो वरेण्या 1 प्रियाः स्वमयो वयम् ॥ ३॥ १ (ही) ।।
1 धा० ११ । उ० नास्ति । ६० ४ ] (ऋ १२६७)
१६२० इन्द्र यो विश्वतरपरि हवामहे जनम्या । अस्माकमस्तु केवलः ॥ १॥ (ऋ (१०)
१६२१ स नौ वपन्न चरुप सत्रादापत्रमा वृधि । अस्मभ्यमप्रतिकृतः ॥ २॥ (ऋ ११६ )
-
..
[१]प्रथम खण्ड
[१६१७ ] है ( सहसः यहो ) बलके पुत्र! (विश्वेभि अग्निमि ) सब अग्नियो के साथ तू (इम या ) इस
यहमें आ और (इद बचः) यह स्तुति मुन और (चन• धा ) हमें अन्न है ॥१॥
६१६१८ ! यत् चित् हि ) पद्यपि { शश्वता तनानिय और विस्तृत हवि प्राण करके ( देव देय यजा-
म) प्रत्येक देवता के लिए हम यजन करते हैं, तो भी ( हविः त्ये इत्यते ) हवि तुममें हो ही जाती है ॥ २॥
[ १६१९ ] (विपतिः होता)प्रजामोका पालप हवन करनेवाला (मन्द्र परेण्य ) मानर वानेवाला पाठ
अग्नि (नप्रिय अस्तु ) हमें प्रिय हो, सभा ( स्वग्नयः चय प्रिया ) उत्तम रीतिसे अग्निहोरखनवाले हम उम अग्नि
प्रिप हो ॥३॥
(१६२० 7 हे ऋस्विनो । (विश्वत जनेभ्य परि ) सब लोकोम श्रेष्ठ ऐसे ( इन्द्र य हवामहे । इन्द्रको तुम
समके हित के लिए हम बुलाते है. महार ( भस्मा केरल अस्तु सिर्फ हन हो को मधिक लाभ देनेवाला होये ॥१॥
१६२१] है ( समा-दावन वृथन् । एकदम सब फल देनेवाले और बलवान् इन्न ! (स) बहन (न अमु
घर मपाधि हमारे लिए इस साफ अप्ठको स्वीकार कर और असभ्य अप्रतिष्ठान ) हमारा प्रतीकार करनेवाला
मत हो ॥२॥
(२१२)
सामवेदफा सुयोध अनुवाद
[उत्तराचिका
१
3
२२
३३३. १३११
१६२२ वृषा यूथेव व रसगः कृष्टीरिययोजसा । ईशानो अप्रति फुतः ॥३॥ २ (२)॥
[धा०८ । उ० नास्ति । १० १] (७८)
१६२३ व नभित्र ऊन्या वमा राधारसि चोदय ।
अस्प रायस्त्वमग्ने रथोरसि विदा गाधं तुचे तु नः
॥१॥ ( ६१४८९)
१६२४ पर्षि तोक तनय पर्तृभिष्वमदव्धैरनयुत्वभिः ।
अम हडारसि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि हरामि च
॥ २ ॥ ३ (की)॥
धा०११ । उ०१। स्व. ४ ] ( ६४।१०)
१६२५ किमित विष्णो परिचाक्ष नाम प्र यद्वक्षे शिपिविष्टो अस्मि ।
मा वो अस्मदप गृह एतद्यदन्यरूपः समिथै बभूथ
(१७१००१६)
१६२६ प्र सत्ते अद्य शिपिविष्ट हव्यमर्यः शरसामि वयुनानि विद्वान् ।
त त्या गृणामि तासमतव्याश्यन्तमस्य रजसः पराके (*७११००५)
३२१
३.२३१२
२
१
२११
.
.
॥२॥
)
[ १६२२ ] ( ईशान अप्रतिप्फुत ) सबया ईश्वर और हमारा निषप न करनवाता तया (वृपा ) बलवान
इ- (भोजसा दृष्टी इयति ) अपने बलसे अनुपह करनके लिए मनुष्यों के पास जाता है ( वसग यूथा इय ) जैसे बैल
गायोंफे झुण्डमें जाता है |॥ ३ ॥
। १६२३ ] है । वसा ) निवासक अग्न ! ( चिन त्व) सुदर दशनीय एसा तु (ऊत्या राधासि न चौदय)
रक्षणसे युक्त पन हमें दे। हे ( अने) अग्न (त्व अस्य राय रथी भसि ) तू इन धनोंको रथरो ले जानेवाला है।
(न तुचे गाध नु विद । हमारे पुत्रोंको प्रतिष्ठाका स्थान प्राप्त
[ १६२४ ] हे ( अग्ने ) अग्न' (त्व । तू ( अ प्रयुत्यमि ) अविरोधी भावनाओं से मुक्त और ( अ दब्ध )
किसीके द्वारा न दबाये जानमाल { पर्वभि ) सरक्षणके साधनोंके द्वारा ( तोक तनय पर्षि) हमारे पुत्र और पौत्रोंका
पालन कर । (दैव्या हेडासि न युयोधि ) देवोंके क्रोधको हमसे दूर कर ! ( अ देवानि द्वरासि च ) मनुष्यों और
राक्षसोंके क्रोधको भी हमसे दूर रख ।
[१६२५ ] हे (विष्णो) व्यापक देव ! (ते तत् नाम ) वह तेरा नाम ( कि परिचति) क्या प्रसिद्ध होने
योग्य है (या नाम ) जो नाम (शिपि-विष्ट अस्मि इति प्र ववक्षे ) किरणों से व्याप्त में ऐसा अर्य दिखाता
है। इसलिए ( एतद् वर्ष अस्मत् मा अपगृह ! यह रूप हमसे दूर मत कर ( यत्) क्योंकि ( समिथे । संग्राममें
( अन्यरूप इत् ) दूसरा रूप धारण करके ही तू हमारा सहायक (यभूध ) होता है ॥ १॥
[१६.६ ] हे (शिपि-विध किरणोंस व्याप्त हुए विष्ण! (ते हव्य तत् ) तेरे उस पुजनीय नामको (अर्य
वयुनानि विद्वान् ) आय और सब कोको जाननवाला विद्वान म ( अद्य प्रशसामि ) आज प्रशसा करता हूँ। (त
तवत ) उस बलवान तया ( अस्य रजप्त परारे क्षयन्त ) इस रजोलोकसे दूर रहनवाले (त्या) तेरा (अन्तव्यान्)
छोटा भाई म (गृणामि ) तेरी स्तुति करता हूँ॥२॥
सप्तदश अध्याय] सामनेका सुरोध अनुवाद - ३०. है 3. १६२७ वषट् ते विष्णयास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम् । वर्धन्तु त्या सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः 11३1४ (ते)॥ Lधा० १४ 11०1१०७) (ऋ. ७१००७) १ ॥ इति प्रथः सः॥१॥ . [२] १६२८ वायो शुको अयामि ते मध्यो अग्नं दिविटिपु । आ याहि सोमपीतये स्पाही देव नियुत्वता ॥१॥ (३४१४११) १६२९ इन्द्रश्च यायवेषा सामानां पतिमहथः । युवा हि यन्तीन्दवो निम्नमायो न सध्यक् (४१४७) १६३० वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथशवसस्पती । नियुत्वन्ता न ऊतय आयात सोमपीतये ॥३॥ ५ (ता)। [ धा० १९ । उ० १ । २०२] (ऋ. ११४१३) " ३३ . ॥२॥ २३. 9 ३ ॥ १६२७ ] है (विष्णो ) विष्णुदेव ! (ते आस: आ ) तेरे मुहके पास आकर ( वपद् ऋणोमि ) वपट्कार- पूर्वक हथ्य पदार्गाका में हवन करता हूँ। हे (शिपिविष्ट } फिरणों से व्याप्त हुए हुए देव । (तत् मे हन्यं जुषस्व ) तू मेरी उस हविशे स्वीकार कर । सुष्टुतयः मे गिरः) उत्तम स्तुति करनेवाली मेरो पापियो ( त्या वर्धन्तु ) तेरी महिमा मदाये । है विष्णो ! (पूर्व ) तेरे साथ सब देवता ( स्पस्तिभिः न सदा पात ) कल्याण करनेवाली शक्तियोंसे हमारी सरा रक्षा करें।।३।। । यहां पहला खण्ड समाप्त हुआ। [२] द्वितीया खण्डः। [१६२८ ] है । यायो ) बायो ! (सुकर) निरोप में दिविश्व यश (ते । स ( मध्यः ) सोमरस (मनं अयामि सबसे प्रथम अर्पण करता हूँ। हे (देव) देव ! (स्पाईः ) प्रशंसनीय ऐसा तू (नियुत्यता } नियुक्त मामक घोडेसे (सोमपीतये मा याहि ) सोपान कानो लिए या ॥१॥ [ १६२९ ] है (पायों) वाय। (इन्द्रः च ) और इन्द्र (एप सोमाना पीति भईथः ) दोनों हा सोमके पोतके योग्य हो।हि) इसीलिए (निक्षं आपन) निराकार मोचेको सरस पानोरा प्रवाह यहता है, उसमकार {सम्यक् एषरम (युवा इन्दका यन्ति ) तुम्हारे पास सोमके प्रवाह जाते हैं ॥२॥ [ १६३० 1 है (यायो वायु । (द्रः च ) और इन्द्र ( शवसा पती ) बलके स्वामी और (शुरिमणा। पापा हो। (नियुचन्ता) नियत नामक घोडे रखनेवाले तुम दोनों ना ऊतये) हमारे रसके लिए मौर (सोम- पीतये । सोम पो लिए (सत्यं मायातं एक रपो मानो ॥३॥ ४० [साम हिन्दी मा.२]
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[ उत्तराधिका
13"
र
3.1
२३ । २१२
३. १३२
३१३१ २ ३१२
३३२१
24.
33
२
१
३
,
१६३१ अघ क्षपा परिष्कृतो बाजारअमिप्र गाइसे ।
यदी विवस्तो थियो हरि हिन्वन्ति यानवे
॥१॥ ( ९/९९२)
१६३२ तमस्य मर्जयामसि मदो य इन्द्रपातमा
यं गाव आसमिर्दधुः पुरा नूनं च सूरपा
॥२॥ ( १९९)
१६३३ गाथया पुराण्या पुनानमम्पन्पत ।
ਚੰਗੇ
कपन्त धीतयो देवाना नाम विनंती
{ धा०१४ । उ० नास्ति । स्व०५] + ९९९।४)
१६३४ अर्थ न त्वा पारवन्तं वन्दध्या अनि नमोभिः । सम्राजन्तमध्यराणाम् ॥ १ ॥
(ऋ. १२२७१)
१६३५ सपा ना सनुः शवसा पृथुप्रगामा मुशेषः । मौवा र अस्माकं पभूगात् ॥ २ ॥
(ऋ. १२१२)
१६३६ स नो दुराचासाच नि मर्यादपायो । पाहि सदामिविश्वायुः ॥३॥ ७ (टि)॥
[धा० १३ 1 1० १ । स्व० ३ ] (ऋ. १॥२७१३)
१६३१) (क्षपा अध) रात बीत जाने पर प्रात काल (परिणत.) जलका मिश्रण करके शोभायमान हुमा
हमा सोम प्यार होता है, ऐसा हे सोम! तू ( याजान् अभि प्रगाहसे ) अन्नको ओर जाता है। (वियस्वतः धियः
सस्कार करने वालोंकी अगुलियो ( हरि यातये ) हरे रंगके सोमको कलशमें जाने के लिए (यदि हिन्यन्ति ) जय प्रेरणा
करती है, तब तू सवनमें जाता है॥१॥
[१६३२ ] ('अस्य तं मर्जयामसि ) इस सोमके उस रसको हम धानते हैं। (यः मद. इन्द्रपातमः) भो
भानर बानेवासा सोमरस इन्द्र के पोने के योग्य है । इयं सूरय' पुरा च नूनं ) जिस सोमराको विज्ञान लोग पहले मौर
मग भी पीते है। (गायः आसमिः दधुः ) पायें अपने मुहसे उस सोमका भक्षण करती है ॥ २॥
[१६३३ ] (पुनानं ) छाने जानेवाले सोमको (पुराण्या गाथया अभ्पनूपत ) पुराने स्तोत्रसे स्तुति की जाती
है। (उत उ) और (नाम यिभ्रती धीतयः ) हविको पारण करनेवाली अंगुलिया (देवानां एपन्त) देवति लिए
सोमण करमें समर्थ होतो है॥३॥
[१९३४] (मध्यपणां समासन्त त्या मझिं ) पोंके सम्राट तुत भग्निको ( नमोभिः चन्दध्ये ) हरि
मपंग करके हम ममाकार करते हैं। पारयन्तं अश्वन) जिसप्रारमपासवाले घोसे उस पर बंटनेवासे प्रेम करते हैं ॥१॥
[१६५] (साघनः मुशेयः ) यह मग्नि हमारे द्वारा उत्तम रीतिसे रोबित होता है। (शयसा सा
प्रथुमगामा ) यह बमका पुत्र शोर गमन करनेराला अग्नि (अस्माकं मीदद्यान् यभूपात्) हम मुख नेपाला हो॥२॥
( १६३६] हे माने ! (यिभ्यायुः । सब मनुष्यो। हित करनेवाला सू (दूरात् च मासात् च )और
पास (भमायोः मर्याद) पालो मनुति ( नः सदात् निपाहि) हमारी हमेशा मार ॥३॥
सप्तदर्श अध्याय] सामवेदका सुशोध अनुवाद (३१५) २१ ३ २३ १३1३3' १६३७ त्वमिन्द्र प्रतार्तिधाम विश्वा असि स्या। अशस्तिहा जानता त्रतरसि त्वं तूर्य वरुण्यतः ॥१॥ (ऋ. १९९१५) १६३८ अनु ने शुष्म तुस्यन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मावरा ! विश्वास्त स्पृधः श्नधयन्त मन्यत्र वृत्रं यदिन्द्र पूर्वसि ॥२॥ ८ (टा)॥ [धा० १८ । उ०१।ख०२] (R. ८९९६६) ॥ इति द्वितीयः खण्डः॥२॥ . १२१ १ 3 1 . १२ १ १६३९ यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यमि व्यवर्तयत् । चक्राण ओपी दिवि (ऋ८४५) १६६० व्यतिरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना । इन्द्रो पदमिनदलम् ॥ २ ॥ (ऋ. १४१६) १६४१ उद्गा आजदगिरोभ्य आविष्कृप्यन्गुहा सतीः । अर्याचं नुनुदे क्लम् ॥ ३॥ ९ (पी)। [घा० २० उ०१ । १० ४ ] ( ११४८) १६४२ त्यमु सत्रासाई विश्वातु पी यवम् । आ ज्याश्यस्यूतपे ॥१॥ (ऋ. १९२७) [१६३७] हे (इन्द्र) इन्द्र ! तू (प्रतार्तिपु ) युद्धोम (विश्वाः स्पृधः अभि असि ) सव स्पर्धा करनवाले पाशुओंको हराता है । है ( तूर्य ) पालोको सोश हो दूर करनेवाले इन्द्र ! (त्वं अ-शस्तिहा ) विपत्तियोंको दूर करनेवाला ( जनिता ) सम्पत्तियोंका उत्पारक और (पुत्र-तः) ओंका नाश करनेवाला तपा (तमभ्यतः असि) पापा करनेवालोंको दूर करनेवाला है ॥१॥ ६. १६३८] हे इन्द्र ! ( तुरयात ते शुम ) शत्रुका नाश करनेवाले सेरे यल हैं।। झोणी.) पापियो लोक {मासरा शिशुं न ) जिसप्रकार मातापिता अपने बच्चों के पीछे जाते हैं, उसोप्रकार हैरे पोछे चालते है। है (इन्द) छ ! ( यत् पृथं तूर्यसि ) जब व वृत्रका वष करता है, इस कारण ( ते मन्यये ) तेरे कोपके भागे ( विश्या स्पृधः) सब मुकापला करनेवाले शत्रु (अधयन्त ) ढोले पर जाते हैं. २॥ ॥ यहां दूसरा खण्ड समास हुआ । [३] सूतीयः खण्डः। [१६३९ 3 ( यशा इन्द्रं अवघंयस् ) यत इन्दको याता है, इसका कारण (यत्) यह है कि यह (दिषि छोपशं चमाणः ) अन्तरिम में मेपको किता देता है और उसकी परमातसे ( भूमि व्ययर्तपए भूमिको पोपण करनेवाली मनाता है॥१॥ ERY] (सोमस्य मदे । सोमपान करके हरित होने के बाद ( इन्द्रः) मन (रोचना भन्सारसं मस्ती मन्तरिमरी (वि मातरम् ) विशेष सेजस्वी करता (यत् । क्योंकि वह (पलं अभिनत् ) बादलोंको पाता है ॥२॥ [१६४१] (गुहा सती गहागुप्त रसोई (गाः) गाणेको इन (आविष्कृण्वन् ) बाहर माता है और ( अगिरोभ्यः उदाजत् ) गिरा ऋषियोंको वह देता है, और (घलं अर्याचं नुबुदे । उन पापोंको परार से जानेवाले बलारको नीचे मह करके भागना पडता है ॥ ३ ॥ [१६४२] (समा-साह । अनेक समाको हरानेवाले ( या विश्वासु गीषु मायत ) मुम्हारे सव स्तोत्र गित (43) सदरो (ऊतये) हमारे संरक्षण के लिए (माच्यापयसि) हमारे पास माने है | * (३१६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उनुरार्चिका १९ ३२ 93 १२ २ २ ३१ १३" २१ २३१२ ३१२ ३३ 9 १ . २ १६४३ युध्मसन्तमनर्वाण सोमपामनपच्युतम् । नरमवार्यक्रतम् (ऋ. १९२८) १६४४ शिक्षा ण इन्द्र राय आ पुरु विद्वारचीपम । अवा ना पायें धने ॥३॥१० (वा) ॥ [धा० १४ । उ०१। स्व०२।। ९२९) १६४५ तब त्यदिन्द्रियं वृहत्तव दधम्मत ऋतुम् । बज रशिशाति धिषणा वरेण्यम् ॥१॥ (ऋ ८३१५७) १६४६ तव द्यौरिन्द्र पौरस्यं पृथिवी वर्धति श्रयः । त्वामापा पर्वतासश्च हिन्विरे ॥२॥ ( ८1१५८) १६४७ त्या विष्णुप॑हन्क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः । स्वार शर्डी मदत्यनु मारुतम् ॥३॥ ११ (ठी)॥ | धा० १३ । उ०२ । स्व ० ४ ] (ऋ ३१५९) ॥ इति तृतीय खण्डः ॥ ३॥ [४] १६४८ नमस्ते अन ओजसे गृणन्ति देव कष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥ १ ॥ (ऋ ८७॥१०) १६४९ कुचित्सु नो गविष्टयेऽमै संवेषिपो रयिम् । उस्कदरु णस्कृधि ॥ २ ।। (ऋ ८७॥११) [ १६४३ ](युध्म सन्तं ) युद्ध करनेवाले होनेपर भी ( अनर्वाण ) कभी न हारनेवाले (अनपच्युतं सोमपां) न दबनेवाले और सोम पानवाले { भार्यक्रतुं नर) निसका कार्यक्रम कोई ववल नहीं सकता, ऐसे नेता इन्द्रको सहापताके लिए हम बुलाते है॥२॥ [१६४४ ] (चीपम इन्द्र ) हे दर्शनीय इन्द्र ! ( विद्वान् ) सब कुछ जाननेवाला तू ( राय आ) धन लेकर (ना पुरु शिक्ष) हमें वह बहुत दे । (पायें धने न अय) शके पाससे धन साकर उससे हमारा संरक्षण कर ॥ ३॥ [ १६४५ ] हे इ. ! तेरो (धिपणा ) मुद्धि तव त्यत् वृहत् इन्द्रियं ) तेरे उस महान् वलको, ( तव दक्ष) तेरो दासताको ( उत मतुं ) और तेरे पराक्रमको और ( घरेण्यं यजं) तेरे श्रेष्ठ वज्रको (शिशातितोषण करती है ॥१॥ [ १६४६] है (इन्द्र ) इन्द्र ! (पोतच पास्य ) लोक तेरे पौरुषको (पृथिवी श्रवा यति ) और पृथ्यो मेरे यशको पढाती है । (त्यां आप.) तेरे पास जलप्रवाह और (पर्वतासः घ) पर्वत (हिन्विरे ) तुझे स्यामो मानकर [१६४७ ] हे इन ! (सहर क्षय' ) महान पर देनेवाला कह करके (विष्णुः मित्रायराण. ) विष्णु मित्र और पण (त्यां गृणाति ) तेरी स्तुति करते है। (मारुतं शी.) महतोयल ( त्या अनुमदात) तु मानन्दित करता है ||३|| ॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुभा ॥ [४] चतुर्थ खण्डः। [१६८] हे ( अमे देय ) अग्नि देव ! (पृष्टया) पश परनेवाले लोग (ओज तेनम गृणन्ति ) म प्राप्त पारनेरे लिए तुझे नमामार परके सेरो स्तुति करते हैं । (अमे. अमिश्र अर्दय ) अपने बलसे तू शत्रुओंका नाश कर ॥१॥ [१६४९] है ( भने) मग्ने ! (न. गरिएये) हमें पायें मिले इसलिए सू (पुयित् सुरपि संधेषिषः ) महत तारा पन हमें दे ।(उचरत् ) महिमा थानेवाला तू (मः उप प्रधि) हमें महान् कर॥ २॥ पाते है॥२॥ -- सहदश अध्याय सामवेदका सुयोध अनुवाद (३१७) १ १ १ ३१ १ ३१३ २ ! - २ . २१३२ 7 २४ २३ १२ 31२१ १६५० मा नो अग्ने महाधने परा वर्मारभृयथा 1 संवर्गर सर रयिं जय ॥ ३ ॥ १२ (प)॥ 1 धा० १५ । उ० १ ! स्व० १J (ऋ ८७९/१२) १६५१ समस्य मन्य विशो विश्वा नमन्त कृष्टया । समुद्रायेव सिन्धवः ॥१॥ ( ८६४) १६५२ चि चित्रस्य दोघता शिरो मिभेद वृष्णिना । बजेण शवपर्वणा ॥ २ ॥ (ऋ. ८६६) १६५३ ओजस्तदस्य तित्विष उमे यत्समवर्तयत् । इन्द्रश्वमेव रोदसी 11३ ॥ १३ (ती)॥ [धा० १४ । उ० १ । स्त्र० नास्ति ] (ऋ. १६५) १६५४ सुमन्मा वस्वी रन्ती सनरी १६५५ सरूप वपना गहीमो मद्रौ घुर्यावमि । ताविमा उप सर्पतः ॥२॥ १६५६ नीव शीर्षाणि मृट्वं मध्य आपस्य तिष्ठति । शृङ्गेमिर्दशमिर्दिशन् ॥३॥ १४ (वि)। [धा. ७ । उ० नास्ति । २०३ ॥ इति चतुर्य घण्टु ॥४॥ इत्यष्टम-प्रपाठकस्य प्रथमोऽधः ॥८-१॥ ॥ इति सप्तदशोऽध्याय ॥१७॥ [ १६५० ] हे ( अग्ने) अग्ने ! (नः महाधने हमें सग्राममें ( मा पराव ) दूर मत कर । (यथा भारभृत् । जिसप्रकार बोम दोनेवाला भार पहपाता है, उसीप्रकार (संवर्ग रयि संजय) एकत्र किए गये धन जीत कर ला, और चाहें हमें ॥३॥ । १६५१ ] ( विश्वाः मिशः कृष्टयः) सब प्रजाजन ( अस्य मन्यये ) इस इन्द्रक क्रोषके आगे (सं नमन्त ) शुरू कर रहते हैं, (समुद्राय सिन्धान ) राम्रके आगे जैसे नदियां झुकती है ॥ १॥ १९५२ ] (दोयतः त्रस्य शिरः चित् ) नगको कपाने वाले के सिरको (सृष्णिना) बलवान् इन्धन (शत. पर्वणा पत्रेण चिनिभेद ) संकटों पारवाले वनसे फोड डाला ॥२॥ [१५३ (अस्य तत् ओजः तित्विरे ) इसका वह सामर्थ्य चमकने लग गया। (यत् इन्द्रः) जिस मलसे इन ने (उभे रोदसी) दोनों भूलोक और गुलौकको (चर्म इव ममार्तयत्) चमके समान लपेटकर अपने मायौन दिया है। ३॥ [१६५४है इन्द्र | रे पोरे (सुमन्मा धवी) उत्तम समसवार और धनमुक्त तया वै । रम्ती सनरी) रमणोप और सुन्दर भी है ॥ १॥ [१६५५] हे । सरूप वृपन ) सुरूप और महशन ! (भद्री रमौ धुयौं ) उतम कल्याण करनेयाले प्रस रप गोगानेवाले दोनों घोडौंको जोरकर (अभि आगहि ) हमारे याम मा । (तो दमौ उप सर्पतः) तेरे ये दोनों घोरी उत्तम सेवा करते है।॥२॥ [१६५६] हे ऋखिमो! (दशभिः शृंगेभिः ) दसों अगुलियोम (इच विशन् ) हमारे पाहे इए पनको देता हमा इन्त्र (आपस्य मध्ये तिष्ठनि) हमारे पासा हुआ है। (शीर्षाणि नि मृवं) अपने मिर सुशार उसे 1 यहां चोधा मुण्ड समास दृमा । ॥ इति ससदशोऽध्यायः ।।
(३२८) सामवेदका सुवोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः सप्तदश अध्याय ! इस अध्यायमें इन्द्र, अग्नि, विष्णु, वायु और सोम इन १० गुहा सती गाः आविष्कृण्यन् अंगिरोग्य पाच देवताओंका वर्णन है। उनमें इन्द्रका वर्णन बड़ा है, इस- उदाजत् । सर्वांचं वलं नुनुवे [१६४१] गुफामें छिपाकर लिए उसे पहले देखें- रखी गई गायोंको इन्द्र ने निकाला और अगिरा ऋषियोंको वे इन्द्र गायें दीं। तब उन गायोंको चुराकर ले जानेवाले घल राक्षसको नोचे मुह करके भागना पड़ा। १ विश्वतः जनेभ्यः परि इन्द्रं हवामहे [ १६२० ] -सब लोगोको अपेक्षा श्रेष्ठ इन्द्रको तुम सबोंके हितके लिए आच्यावयसि [ १६४२ ]- अनेक शत्रुओंको एक साथ ११ सत्रासाहवा विश्वासु गौघु आयतं त्यं मतये हम बुलाते हैं। २ असा केवलः अस्तु [ १६२० ]- इन्द्र सिर्फ हमें अपने सरक्षण के लिए हम अपने पास बुलाते हैं। हराने तथा तुम्हारे सभी स्तोत्रों में वर्णित उस इन्द्रको ही अधिक लाभ देनेवाला हो। ३ सना-दावन वृपन सान. अमुं चरुं अपावृधि, १२ युन्म सन्त मनर्वाणं अनपच्युतं अवार्यक्रतुं •अस्मभ्यं अप्रतिप्कुत [ १६२१]- है एक साप फल नरं [१६४३]- युद्ध करनेवाले, पर कभी भी न हारनेवाले, येनेवाले बलवान् इन्द्र ! वह तू हमारे अन्नोको स्वीकार कर, नहीं सकता ऐसे नेता इन्द्रको सरक्षणके लिए हम अपने पास किसीके भी आगे न झुकनेवाले, जिसका कार्यक्रम कोई बदल हमसे बदला न ले, अपितु हमारा सहापक हो। बुलाते है। ४ ईशान अप्रतिकुतः वृषाओजसा कृष्टीयति वंसगः यूथा इब [ १६२२ ]- सर्वोका स्वामी, हमारे शिक्ष, पार्ये धने ना अव [१६४४]- हे दर्शनीय इन्द्र ! १३ हे प्राचीपम इन्द्र! विद्वान् रायः आ नः पुरु विष कार्य न करनेवाला बलवान् इन्द्र अपने सामयंसे सब जाननेयाला तू धन लेकर आ और हमें बहुत सारा धन उपकार करने के लिए मनुष्योंके पास भाता है, जैसे कि बैल । शके पाससे पन लाकर उनसे हमारा सरक्षण कर । शुण्डमें जाता है। ५ हे इन्द्र । प्रतिषु विश्वा स्पृधः अमि असि १४ धिषणा तव वृहत् इन्द्रियं दक्ष कतुं घरेण्यं [ १६३७ ]- हे इन्द्रत युद्ध में सब मुकाबला करनेवाले धनं शिशाति ( १६४५ - तेरो पुद्धि तेरे महान् बल, माधुओंको हराता है। दक्षता, पराक्रम और श्रेष्ठ पत्रको तीक्ष्ण करती है। ६ हे तृर्य । त्य अशस्ति-हा, जनिता वृप्रतू १५ चौ तव पास्य, पृथिवी श्रयः वर्धति [१६४६ ] तर यतः यसि [ १६३७ ]• गीघ्रतासे शत्रुओंको दूर घुलोक तेरे पौरपको और पुग्यो तेरे पशको बढ़ाती है । करनेवाले हे इन्द्र 'द विपत्तिपोको दूर करनेवाला, सम्पत्तियो. १६ वृहत् क्षयः गृणाति [१६४७]- तू महान् भाश्रय का निर्माता, शत्रुप्मों का नाश करनवाला बाधा डालनेवाल देनेवाला है. इसलिए तेरी स्तुति होती है। भानुभोंको दूर करनेवाला है। १७ विभ्या रुष्टयः विधः अस्य मन्य सं नमन्त ७ तुरयन्त ते गुप्म [ १६३८ ]- दाओंको नष्ट [ १६५१]- सारी प्रनायें इसके कोपके भागे मुकतो हैं। परनेवाले तेरे सामथ्र्य है। १८ दोधतः वृषस्य शिरः पृप्णिना शतपणा ८ यत् वृनं तृर्वमि, ते मन्यये विश्वाः स्पृधः वनेण विभेद [१६५२]- सब जगतको कंपानेवाले पत्रमा अथयन्त [ १५३८ ]- हे इन्त्र ! जब तू पत्रका वप करता सिर इग्दने बलयुक्त तथा हजारों धारवाले वनसे काट डाला। है, तब सेरे कोपरे मागे तम पर्या परनेवाले शत्र टोले पड १९ अस्य मोज. तित्यिपे [१६५३]- इस इनका सामप्यं चमकने लग गया। ९पत् पलं अमिनत्, इन्द्रः रोचना भातरिक्षं यि २० सुमन्मा पस्वी रन्ती सुनरी [१६५४]-हे! अतिरत् [ १६४० - इग्मने जब पतामुरको फारा, सब तेरे दोनों पोटे बहन ममतार, पनयुक्त, रमगोप और उसने तेगावी अन्तरिक्षको और अधिक तेजस्वी बनाया। मुररहे। - - सप्तदश अध्याय सामवेदका सुवोध अनुवाद भेज। २१ सरूप पृषन् ! भद्रो इमो धुर्यो, तो इमो उप- होता है ऐमा मानन्द देनेवासा मौष्ठ अनि हमें प्रिय हो और सर्पता, अमि आगाहे (१६५५- हे सुरुष और बलवान् उत्तम रोतिरो भग्निको रखनेवाले हम उस अग्निके प्रिय हो । ये उत्तम कल्याण करनेवाले दोनो घोडे रथ जोड अग्नि " विश-पतिः " मनामोका पालन करनेवाला कर उत्तम प्रकारसे आगे गाते हैं। उन्हे ओहकर हमारे है, उन्हें नीरोगी बनाता है। यतम भा। ४ हे घसो ! चित्रः त्वं ऊत्या राधांसि ना चोदय २२ दशभिागेमिः दिशन् आपस्यमध्ये तिष्ठति, [ १६२३ ]- है नियासक माने ! तू विलक्षण शक्तिवाला शीर्गणिनि मृवं [१६५६]- बसों अगुलियोंसे धन देता है. हमारी रक्षा कर और उसके साप पन भी हमारे पास हमा हमारे यश इन्द्र लडा मा है। अपने सिर झुकाकर उसे देश ५ हे अग्ने ! त्वं अस्य रायः रथीः असि [१६२५]. इन्द्र सबसे श्रेष्ठ है, उससे बढकर सामान दूसरा कोई हे अग्ने । वदन पनोंको रथसे ले जानेवाला है। नहीं । यह हमारी सहायता करनेवाला है। यह एक ही साथ ६ ना तुचे गाधं विदः ४१६२३]- हमारे पुत्रपौत्रोको शशुओंको हाता है। यह हमारे द्वारा दिए गए अन्नको प्रतिष्ठाका स्थान मिले। स्वीकार करके हमपर प्रसार हो । वह कभी भी हारनेवाला ७ हे असे । त्वं अप्रयुत्यमिः अदब्धः पतभिः भन्न यज्ञमें हमारे बीच में माकर पेठ । पूद्धमें यह सम शत्रुओंको तोकं तनयं पर्षि [ १६२४ ]- है भग्ने । न भविरोषी हराये। इन्त्र सम विपत्तियोको दूर करनेवाला, सम्पत्ति उत्पन्न भावनामोंसे युक्त और किसीसे न दबनेवाला अपने संरक्षणके करनेवाला और शत्रुओंको दूर करनेवाला है। साधनोंसे हमारे पुत्रपौत्रोंका पालन कर । जय इन्द्र वृत्रको मारता है, उस समय सब शत्रु दोसै पह ८ दैश्या हेडांसि नायुयोधि:१६२४]-बेधो प्रकोपों- जाते है । जब मस राक्षसको उसने मारा तम अन्तरिक्षम को हमसे दूर कर। महान् प्रकार पैदा हुमायलने गायोंको धुराकर गुफामें ९ भदेवानि व्हरांसि च [ १३२४ ]- मनुष्यों और बाद कर दिया था। इन्द्रने उस गुफाको फोडकर उन मायाँको राशसोने श्रोपोको भी हमसे दूर कर। बाहर निकाला लथा उन्हें अंगिरा ऋषियोंको दे दी। १० अध्यराणां सम्राजन्तं स्या आग्नं नमोभिः वह सब शUओको एकदम हराता है ऐसा यह इन्द्र है। बन्दध्यै [१६३४ ]- एसके सम्राट् सुश अग्निको हविष्यात उसको कोई भी नहीं हरा सकता और उसके कार्यक्रममें कोई अपित करके वन्दन करते है ! भी फेर बदल नहीं कर सकता । इन्द्र शत्रुमसे पन छीनकर न. सुशेवः शयसा मनुः पृथुप्रगामा, भस्माकं हमें बांटता है। उसका सामग्र्य बल, पोल्य इत्यादि सब . मोद्यान भूयात् (१६३५] - वह अग्नि हमारे द्वारा उतम सामयं युक्त है । सब लोग उसके मागे सिर झुकाते हैं। प्रने रीतिसे सेवित होता है । वह बलका पुत्र, बहुत प्रगति करने सब जगतको भयभीत किया, पर मन्तमें इन्दने वृक्षको मार बाला हमें बहुत मुख देने वाला होवे । डाला। इस कारण इन्द्र का तेज सब जगह फैल गया। १२ हे अग्ने विश्वायुः दुरात आसात् च अघायोः इन्द्र के शे घोडे रथमें जोरे जाने के लिए है। ये घोडे उत्तम मात् नः सर्व इत् पाहि ! १६३६ ]- है भाने सब मुशिक्षित, समझदार, धतुर और देखने में सुन्दर है। उन्हें मनुष्योंका हित करनेवाला व दरके और पासके पापी मनुष्योंते रय जोडकर वह यज्ञके स्थान पर जाता है। हमारी रक्षा हमेशा कर। १३ हे अग्ने देव ! कृपयः ओजसे ते नमः गृणन्ति । अनि अमे: अमित्रं मर्दय [१६४८] - हे अग्नि देव राय प्रमा १ इयिः स्येत् हयते । १९१८ ?- हे भग्ने ! तुसमें बल प्राप्त करने के लिए नमस्कार करके तेरी स्तुति करती हपियोंका हवन किया जाता है । है। अपने बलसे तू शत्रुओंका नाश कर। २ देवं देवं यजामहे । १६१८)- प्रत्येक देवके लिए १४ हे अग्ने गविष्टये कुवित् सुराय संवेषिषः । हम पान करते हैं। उत् नि: उरु छाधि [ १६४९]- हे भग्ने । हमें गाय ३ विश्पति होता मन्द्रः वरेण्यः नः प्रियः अस्तु, मिले इसलिए हमें बहुत पन दे। हे बहुत कार्य करनेवाले स्यमया घयं प्रिया: {१६१९]-प्रमापालक, जिसमें हवन अग्ने त हमें महान कर।
[उत्तराचेंका - योग्य हो। । (३२०) सामवेदका सुबोध अनुवाद १५ हे अग्ने । नः महाधने मा पराय । संग राय और पृप्योपर अग्नि है। इस अग्निमें हवन किया जाता है। संजय [ १६५० ]- हे आने । हमें सप्राममें दूर मत कर। उन हवनीय पदार्योको सूक्ष्म करके यह चारों दिशाओंमें इकटठे किए हुए धन जीत कर ला। फैलाता है, इस कारण चारों ओर आरोग्यका वातावरण अग्निमें हविद्रव्योका हवन ऋतु के अनुसार किया जाता उत्पन्न होता है। राब सोगोंका जीवन इस कारण सुख और है, इस कारण यायु आदि देव प्रसन्न होते हैं। यह अग्नि प्रजाका आरोग्यका जीवन होता है। पालन उत्तम रोतिसे करनेवाला है। अत. लोगोंको ऋतुके वायु अनुसार यज्ञ करके अग्निको प्रसन्न करना चाहिए। यह अग्नि १ हे यायो ! शुक्र दिविष्टिपु तेमध्वः अग्रं गयामि तब रोगबीजोको दूर करता है और सब मनुष्याँका आरोग्य बढाता है । पुत्रपौत्रोंका यह कल्याण करता है । देवी, मानुषिक [ १६२८ ]- हे पायो' में निर्दोष होकर यत करता हूँ। और राक्षसोंका प्रकोप यह दूर करता है। रोगादि वो उस यश तुझे राबसे प्रथम सोमरस देने के लिए अर्पण प्रकोप है। चोरी, लूट और युद्ध आदि मानुषिक प्रकोप है। करता हूँ। इन सभी भयोंको अग्नि दूर करता है। और लोगोंको सुखी स्पाईः सोमपीतये आयाहि [१६२८]- प्रशंसनीय तु सोम पीने के लिए आ। करता है । पापी लोगोंका कष्ट यह दूर करता है । बल पदाता ३ हे वायो! इन्द्रःच एषां सोमानां पीति मईथ: है । इस कारण वह युद्ध में यश प्राप्त करता है। [१६२९ )- हे वायो ! तू और इन्द्र दोनों सोम पौनके विष्णु १ हे विष्णो । ते तत् नाम कि परिचशि [१६२५] ४ युयां इन्दवः यन्ति [१३२९]- तुम्हारे पास सोम है विष्णो 'सेरा यह नाम कितना उत्तम है। रस बहता २ यत् नाम “शिपि-विष्टः अस्मि" इति वयक्षे ५ हे यायो इन्द्रःच शयसापती शुष्मिणा । नः [ १६२५ ]- जो नाम " किरणों से व्याप्त है" ऐसा भाव ऊतये भायातं [ १६३० 1- हे वायो ! तू और इन्द्र दोनों दिखाता है। बलके स्वामी और वीर्यवान् हो ।हमारी रक्षाके लिए आओ। ३ एतत् वर्पः अस्मत् मा अप गृह [ १६२५ ] यह वायुको प्रशसा सब जगह होती है ।वायु और इन्द्र दोनो स्पत हमसे दूर मत रख । देव बहुत सामग्येयान है, इसलिए उन्हें सर्वप्रथम सोमरस ४ यत् समिथे अन्यरूपः इत् बभूय [ १६२५ - दिया जाता है । लोगोंकी रक्षा वायु करता है। वायु यदि युद्धम तू अन्यरूप धारण करके ही हमारी सहायता करता है। न हो, तो कोई भी प्राणी जोदित नहीं रह सकता । श्वासो ५ हे शिपि-विष्ट ! ते तत् अर्यः ययुनानि विद्वान् जीवन वायु पर अपलम्बित है । इसलिए सब यसमें पाय पछ्यास करके हो मनुष्य जीवित रहता है । मत मनुष्योका अद्य प्रशंसामि १६२६]-हे किरणोंसे सबको व्यापनेवाले विष्णो तेरे उस नामका महत्व जाननेवाला विद्वान् मै आज वाय शुद्ध हो तो प्राणियोंका जीना लम्बे समयतक हो सकता प्रथम स्थान दिया जाता है और उसकी पूजा प्रथम होनी है। तेरी प्रशसा करता हूँ। ६ हे निष्णोते आसः आ पपद् कृणोमि के होती है। यह आवश्यकता मनुष्योंतो हो नहीं अपितु सभी है । अन्न और पानीको अपेक्षा वायुको आवश्यकता ज्यादा शिपिविष्ट तत् मे हव्ये जुषस्व ! मे सुष्टुतय गिरः प्राणियों और वनस्पतियोंको भी होती है। यह वायुका महत्व त्या वर्धन्तु [१६२७]-हे विष्णो ! तेरे मुखमें मै वषट्कारः ऊपरके मॉमें उत्तम प्रकारसे दिखाया है । पूर्वक हवि अर्पण करता हूँ। हे प्रकाशसे व्याप्त देव | मेरी हविको तू स्वीकार कर । मेगे उत्तम स्तुति तेरो महिमा सोम बढाये। १ विवस्वत धियः हरि यातवे हिन्वन्ति [१६३१] विष्णुका नाम शिपिविष्ट है । पयोंकि वह चारों ओरके - सस्कार करनेवालोंकी अगुलियां हरे रगके सोमको कलशमें किरणोंसे व्याप्त करता है। चारो मोर उसकी किरणें फैलती जाने के लिए प्रेरित करती है। है। पर यह अपने अनेक रूपोंसे मनुष्योंका हित करता है। २ अस्य तं मर्जयामसि [१६३२]- इस सोमके उत्त किरणोंमे च्यापनेवाला आकाशमें पूर्ण है, मेघोंग विद्युत है रसको हम शुद्धरते हैं।
सातदश अध्याय] सामवेदका सुबोध अनुवाद (३२१) 1 ३ ये सूरया पुरा व नूनं गायः आसभिः दधुः ५ ईशानः अप्रतिप्फुतः वृषा मोजसा इष्टीयति [ १६३२ - जिस तोमरसको विद्वान् लोग जैसे पहले पोते [१६२२]- यह सबका ईश्वर और हमारा प्रतिकार न करने थे, वैसे ही अब भी पीते हैं। गायें भी अपने मुखसे सोमका बाला बलवान् इन्द्र अपने सामन्मंसे मनु मह करने के लिए भक्षण करती है। मनुष्पके पास जाता है। ४ पुनानं पुराण्या गायथा यभ्यनूपत [१६३३] - ६ हे सो चिना ऊत्या राधांसि नः चोदय जाने जानेवाले सोमको पुराने स्तोत्रसि स्तुति की जाती है। [१६२३- हे निवासक अग्ने ! सुन्दर और वर्शनीय ऐसा ५ नाम विभ्रती धोतया देवाना रुपन्त १६३३]- तू संरक्षणसे युक्त धन हमारी तरफ भेन। हपि धारण करनेवाली अंगुलियां देवोंको सोमरस अर्पण ७ त्वं अस्य रायः रथी मसि [१६२३]-तू इस करने में समर्थ होती है। घमको रपसे सानवाला है। मोम कूटा जाता है। अंगलियोंसे दबाकर उसका रस ८ना तुचे गाघ विदः । १९२३ ]- हमारे पुत्रोंको निकाला जाता है और उसका रस कसा भरकर रखा प्रतिष्ठाका स्थान मिले। जाता है। बादमें उसमें पानी मिलाकर वह छाना जाता है। ९ अने! त्वं अप्रयुत्पभिः अदम्य पदृभिः तोफ विद्वान् लोग इस रसको पहलेके समान पीते है । सोमरसके तनयं पार्षे [ १६२४]-हे अग्ने । अविरोधी भावनाति छनते समय घेवोंके स्तोत्र बडी आवाजमें घोले जाते है । यादम युक्त और किसी के द्वारान दवाया जानेवालात अपने संरक्षणके यह देयोको दिया जाता है, किर सारमें पत करनेवाले से साधनोंसे हमारे पुत्रपौत्रोंका पालन कर। सोमरस पीते हैं। १० दैव्या हेडांसि नः युयोधि [ १६२४]- देवके इस प्रकार सोमका वर्णन इस अध्याप माया है। प्रोपको हमसे दूर कर। ११ अदेयानि बर्रासि च [ १६२४]- मनुष्यों मौर राक्षसों के क्रोधको दूर कर। १२ शिपि-विए! ते तर अर्यः ययुनानि विद्वान् अद्य प्रशंसामि१६२६-हे किराँस प्यापनेवासे विष्णो। १ हे सहसा यहो । विश्वमिः मम्मिभिः इमं यई उस सेरे नामकी, श्रेष्ठ और सब पर्म जाननेवाला , IA प्रशा करता हूँ। ६५ वचा, चताधार[१९७]-हे यलो पुत्र । सय मनियों के साथ इस पजमें आ, वह स्तुति मुन औरहम मनरे। १३ सुष्टुतया मे गिरः त्या धर्धन्तु [१६२७)- मेरी उतम स्तुतियां तेरी महिमा बढ़ा। २ यत् चित् हि शश्वता तना देवं देवं यजामहे यित्वे शत् हयते [10]- जो कुछ भी हमेशा हषि १४ यूर्य स्वस्तिभिः ना सदा पात १६२७ - तुम अर्पण करके प्रत्येक देवताका पतन हम करते हैं, ये हवन कल्याण करनेवाले साधनोप्से हमारी सदा रमा करो। खुम किए जाते है। १५ शयता पती शुष्मिणा [१६३०]- तुम दोनों ३ विपतिः होता मन्दः परेण्यःना प्रियः अस्तु, बसके स्वामी और मामध्यद्वान् हो। स्पापा घयं प्रिया: १६९-प्रजाओंका पाला, हवन १६ नः ऊतये आयातं [ १९३०-मारी राके करनेवाला और सुपो ऐसा श्रेष्ठ पनि हमें प्रिय हो। लिए आनो। तपा उत्तम रोति अग्निको अपने घरमें रसनेवाले हम भी १७ शयसा सूनुः अस्माकं मीयान् यभूगास् उसे प्रिय हो। [१६३५-वह बलका पुत्र सुम देनेवासा हो। ४ शिवत: जनेभ्यापरि इन्द्र या हवामहे, असाफ १८ विश्यायु दूरात च वासात् च भगायो कैपलः अस्तु । १६२० ]- सब लोगोंमें श्रेष्ठ ऐसे एपको मर्याद नः सदाद निपाहि [1]- सब मनुष्योंका तुम्हारे हित के लिए हम समाते हैं, यह इस रेयस हमें ही हित करनेवाला हरके और पासके पापी मनप्यारी हमेशा काम देनेवाला हो। हमारी रक्षा कर। ४१ [साम हिशोभा १) सुभाषित ( ३२२) सामवेदन सुबोध अनुवाद [ उतरार्षिक: । १९ हे न्द्र ! प्रदर्तिपु विभ्याः स्पृधः अभि असि [ १६४६ ]- हे इन ! लोक तेरे पौरुषको और पृथ्यो तेरे {१६३७] - हे पन्द्र । तू सब मुद्धोंमें सब मुकाबला करनेवाले यसको बढाती है। दाधुओंको हरा। ३० वृहत् क्षय गृणाति [ १६४७]- घरे-गोपा २० तूर्य । त्वं अशस्तिहाणनिता पुत्र-तू तरुप्यतः देनेवालेके रूपमें सेरो स्तुति होती है। असि [ १६३७]- हे दोप्रतासे शत्रुओंको पूर करनेवाले ३१ हे मने देव । कृपया ओजसे ते नमः गृणन्ति, ! तू विपत्तिपोंको पूर करनेवाला, सम्पत्तिका उत्पन्न अमेः अमिनं अर्दय [१६४८]-हे अग्नि देव! मनुष्य करनेवासा, शत्रुओंका विनाशक मौर बापा मालनेवाले शव• यल प्राप्त करनेके लिए तुझे नमन करके सेरो स्तुति करते ओंको दूर करनेवाला है। है, अपने बलसे तू शत्रुओंका माशकर। २१ तुरय-तं ते शुष्मं [१६३८]- सानुओंको नष्ट २२ हे अग्ने ! ना गषिष्टये कुषित् सु-रयिं सं. करनेवाला तेरा यस है। वेषिपः उरकृत् नः उरुकृधि [१६] हे माने ! २२ यत् पुत्रं तूसि, ते मन्य विश्वाः स्पृधः हमें बहुतसो गायें मिले इसलिए तू हमें कात तारा पन है। भथयन्त [१६३८]- जब तू त्रका वध करता है, सब तेरे तू यश पदानेवाला हमें महान् कर। कोषक मागे सब मुकाबला करनेवाले यात्रु शिथिल हो जाते हैं। ३३ हे मसेनः महाधने मा परावर्ष । सवर्ग २३ इन्दः यत् पलं अभिनत् रोचना अन्तरिक्ष वि रपि संजय [ १६५० ]- हे माने । हमें संग्राममें दूर मत मतिरत् [१६४०]-इनने जब दल रामसको फार डाला, कर। इकट्ठा करके और जीतकर पन ला। सब उसने तेजस्वी सन्तरिक्षको और अधिक तेजस्वी बनाया। ३४ विश्वाः विशः कृष्टयः अस्य मन्यये सनमन्त २४ गुहा सती गाः आविष्कृण्वन् पलं अयांचं [१६५१]- सम प्रमाणन इसके कोषके आगे झुककर रहते हैं। नुनुदे । १९१]- गृहामें रसोई गायोंको इखने बाहर ३५ दोघतः प॒त्रस्य शिरः दृष्णिना शतपणा निकाला, सय गुहामें उनको रखनेवाले दल राक्षसको नीचे घनेण वि विभेद । १६५२ ]- जगतको कपानेवाले पत्रके मुह करके भागना परा। सिरको इखने सेंकडों पारवाले पजसे फोर डाला। २५ समासाहं विभ्यासु गी' भापत त्यं ऊतये आ घ्याययसि [१६४२]- अनन्त शत्रुओंको एकदम रोदसी धर्म स्व समघर्तपत् १९५३ - इसका यह ३६ अस्य तत् ओज तित्विषे, यत् न्द्रः उभे मारनेवाले सम स्तोत्रों द्वारा पणित किए गए उस इनको सामन्य चमकने लग गया, जिसके बलसेने और पृथ्वीको हमारे रक्षण के लिए हमारे पास आने दे। चमके समान लपेटकर रख रिया । २६ युष्मं सन्त मनर्याण मनपच्युतं अयार्यक्रतुं नरं [ ६४]- मुख करने पर भी कभी भी न हारनेवाले, तिष्ठति, शीर्षाणि निमृद्यम् (१६५६]- बसों अंगुप्तिति ३७ दशभिः गेमि पर दिशन् आपस्य मध्ये न दयनेपाते, जिसरे राक्रमको कोई वदत नहीं सडताऐसे हमारे चाहे इए पनको देते हुए हमारे यज्ञमें इन्द्र साहमा चोर नेतान्द्रको हम सहायता के लिए इसाते हैं। है।हे लोगो | उसके मागे अपने सिरको मोपे करो। २७ हे ऋचीचमाद विद्वान् रायानःपुसशिक्ष, पायें घने मामय [१६].हे सरला राब जाननेवाला दू पन लेकर उसमें से हमें बहुत सारारे और उपमा गारो पन लाकर उससे हमारी रक्षा कर। १ घंसगः यूया इय [२२]- से बस मुड २८ धिषणा त्यत् वृहत् इन्द्रियं तप दर्श उत्तक जाता है, उसीप्रकार (पृपा बोजसा कृष्टी यति। यरेण्यं पन शिशाति [1]-तेरो बुदिरे बसको, बलवान् ममपने सामथ्र्य से मानो समूह-पह-ममा है। मेरीरमताको, हरेरापंरोमोरोरे पेष्ठ पत्रको तीन २ निम्न मापः न [ १९२९- निराकार मोमो माहपर पानीका प्रवाह यसता है, उसीप्रकार(युषो दिषा २९.हेन्द्र पौतय पीस्पं राषियी अपापति पन्ति ) तुम्हारी तरफ शोमरस जाते है। काली है।
सप्तश भण्याप] सामयेदका मुपांघ अनुवाद (३२३) ३ धारयन्तं यर्थ न [ १६३४ - जैसे अयातदाले मजदूर बोताको पपास्यान पहुंचा है, बसे हो. ( पोडो उसपर बैठशाल मोग प्रेम करते है, सीप्रकार संजय ) एन जोतारा। (मति नमोमिा धन्दाय निको पता हदि मपंग ६ समुद्राय सिन्यान६५11 से समय में करणे प्रेम करते है। नदिया नग्न होकर मिलती है। वैसे हो (पिया पिता ४ मातरा शिन[१६३८]- जिसप्रसार माताएँ अस्य मन्यये सं नमन्त ) सर प्रजा पर अपने बायो पीछे चलती है. उसोर (क्षोणी ) चावा. मागे नम्र होकर एती है। ७ चर्म इव (१६५1- पमीले समान (उमे पषियो के मनुकूल पाते हैं। रोदसी समयतयत् । मोर पुत्रो गीतोदो ने सपेट ५ पया मारभृत् । १६५० ]- जैसे बोझ उठानेवाला ram सप्तदशाध्यायान्तर्गत अपि-देवता-छन्द सूची मंत्रया देशपात्र रेषता 5: मग्निः गायत्री १९१७ १५१८ ग ग . " १६९० १२१६१० ११२६६ १११६७ 1010 १७ १८ 4188 गुन शेप मात्रागतिक गुन र मानीपतिः पुनरोप यात्रीगति मपुण्डावामित्रः मपुण्ठावामित्रः पएण्यासमिरः पुहिपत्यः (पानि " " भनि प्रणाप:-(दिपमा पती पमा मोगरनी) २६११ " nिg: विस 194010 180018 ७.१००५ १०० " " ११४१ ४18 BIBAR दोपहियाका मानि) दरिष्ठो प्रारमिः बलिप्ने मंत्रापभिः बगियोमंडावरजित (२) बाम गौतमः बामरीजोरम भावोगानमः पातमा मन मायरो रासी गुमरमानात Thi मामी बाप Pr - परपान + बलिर " H (३२४) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्सर्चिकः भषमस्या देवता ऋग्वेवस्थान ८।२१।५ ऋषिः नमेष मागिरसः १६३७ प्रगाय -( विषमा बहतो समा सतोयहतो) १६८ नमेष आंगिरसः " गापनी " १६३९ १६४० १६४१ १६४३ १६४३ 17 " " दार४५ दा१४७ દ્વારકા, १९९७ ८९२८ ८९९ ८०१५७ टा१५८ दा१५९ " " उष्णि " १६४५ १६४२ १६४७ गोपुषस्यश्वसूक्तिनौ काण्यायनी गोपूरमध्यसूक्तिनो काण्वायनी गोषूक्त्यश्वसूक्तिनी कायायनी श्रुतकस. सुकलो या मोपिरस. ध्रुवकसः सुकक्षो वा अगिरस. श्रुतकक्षः सुकलो या आंगिरस विरूप आंगिरसः विरूप बांगिरस. विप मागिरसः (४) विरुप आंगिरस विरुप आंगिरसा विरूप मागिरस वास. काका 11 " " अग्निः गायत्री १६१८ १६४९ १६० " ८७१० ८७५।११ ८1७५।१२ 18 दा ॥ " बासकाव " " १६५२ १६५३ १६५४ १६५५ ॥ " परसा काया पुनशेप मागीयति शुतोष माजोगतिः मनोपः भाजीपतिः " भादश अध्याय सामवेदका सुघोष अनुवाद अफाटादशोऽध्यायः अथाटमप्रपाठके द्वितीयोऽधः ॥८-२॥ १] (108) मेयातिथिः काम्यः प्रियमेषश्चागिरसः, २ श्रुतकक्षः सुकलो या आंगिरसः; ३ शुन:शेष भाजीगतिः, ४ शयुर्हिस्पत्यः ५ मेधातियिः काम्यः, ६, ९ वसिष्ठी मंत्रावरुणः; ७ वालखिल्यम् ( आयुः काण्वः ); ८ अम्ब- रिपो बागिरः, जिश्या भारतानाच १० विश्वमना यस्य ।। सोभरिस काग्वा २ सप्तर्षपः। भरवालो बाहेस्पत्या, २ काश्यपो मारोधः, ३ गोतमो राहगणः, ४ अधिनमः, ५ विश्वामित्रो गाथिना, ६ जमदग्निर्भागधा, ७ वसिष्ठी मनावरणिः); 1३ कलिः प्राणाया, १४, १७ विश्वामिनः प्राणाय:: १५ मेध्यातिथिः काण्वः, निभूति: काश्यपः, १८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ १-२, ४, ६.७, ९-10, १३, १५ इन्द्रः ", १८, १९ भग्निः ५ विष्णः, ५ (६) देवो घा; ८, १२, १६ पवमानः सोमः, !,१७ इन्द्राग्नी ।। 1-५, १४, १५-1८, १९ गायत्रीः ६, ७, ९, १२, १३ प्रमाप:- 1 विषमा बृहती, समा सतीबहतो } ८ अनुष्टप १० उणिक, 11 काकुमा प्रगापः (विषमा कमुप, समा स्नोव्हतो ); १५ बहती ॥ १६५७ पन्यपन्यमित्सोनार आ धावत मद्याय । सोम वीराप शूराय ॥१॥ (ऋ. १२२५) १६५८ रह हरी ममयुजा शम्मा वक्षतः सखायम् ! इन्द्रं गीर्मिनिर्पणसम् ॥२॥ ( स. ८।२।२७) १६५९ पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे असत् । नि यमते शतमूतिः ॥३॥ १ (दि) [धा० १४ । उ ११ स० ३] (. २०२६ ) १६६० आ त्वा विशन्विन्दवा समुद्रमिय सिन्भवः । न त्वामिन्द्रावि रिन्पो (8.८।१२।२१) 12 २ [१]मयमा खण्डः। १६५७ ] है ( सोतारा )सोमरस निकासनेदाते एनसानो' (मचाय पीराप) प्रम और पराकमो (राय) पूरपके पास (पन्यं पन्यं इत् सोम ) अत्यन्त प्रशासकीय सोमरसको ( आ धावत ) पहुंधाको ॥ १॥ [१६५८ ] (महायुजा शरमा) मा शारेसे ना जानेवाले, पुल बनेपाले (हरी ) बाके से पोरे (द) इस ममें (सखायं गीमिः गिर्यणसं नं) मित्र और मागियों माय इसको ( आवक्षतः) मेकर मारें ॥२॥ १६५९.१ (पाता पृष-हा) सोम पोनेवाला और पुत्रको मारनेवाला इन्द्र ( यस्मत् आरे) हमारे पास (घमागम ) अवश्य मावे। (शत अतिः) को मापनोस रमण रनेदासा ह (नियमते ) गोरो र [१६६०] (इन्द्र)! (इन्दयः त्या मा विशन्तु ) सोमरस तुझे प्राप्त हो। (सिन्धयः समुप) जैसे मरिया समुसले प्राप्त होती है, उसोप्रकारको मोम प्राप्त हो । हे ! (स्वांग भतिरिप्यते) तेरी अपेक्षा और कोई अपिल नहीं है।"
[उसराचिका (३२६) सामवेदका सुयोध मनुवाद १६६१ विव्यस्थ महिना पन्मक्षर सोमस्य जागृवे । य इन्द्र जठरेषु ते ॥२॥ (ऋ. ८६२।२३) १६६२ अरे त इन्द्र कुक्षय सोमो भवतु वृत्रहन् । अर धामभ्य इन्दवः ॥३॥२ (क)॥ [धा०१३ | ३० ख०१] (ऋ. १९२।१४) १६६३ जराबोध तद्विविड्डि विशेषिशे यशियाय । स्तोम रुद्राय दृशीकम् ॥१॥ (इ. १।२७१-) १६६४ स नो महा५ अनिमानो धूमकेतुः पुरुचन्द्रः । धिये वाजाय हिन्वतु ॥२॥ (ऋ १।२७।११) १६६५ स रेवा इव विश्पतिर्देव्यः केतुः शृणोतु नः । उक्थैरमिहदानुः ॥ ३ ।। ३ (ह) ॥ [धा० १११ उ. नास्ति | स्व० १] (ऋ. १२१२) १६६६ तद्वो गाय सुते सा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्वे न शाकिन ॥ १ ॥ ( ६४५२२ ) १६६७ न घा वसुनि यमते दोन वाजस्य गोमतः । यत्सीमुपश्रवद्भिः ॥२॥ ( ६।४।२३ ) १६६८ कुवित्सत्य प्र हि बच गोमन्तं दस्युहा गमत् । चीमिरप नो वरत् ॥३॥ ४ (फी)। धा०१५। २ । २०४ ) (ऋ ६४१।२४) ॥ इति प्रथम सप्त ॥१॥ १६६१] है (वृपन जावे ) बलवान् और जाप्रत रहनेवाले इन्द्र ! तु (सोमस्य भक्षं) सोम पीने के लिए ( महिना बिध्यक्य ) अपनी महिमासे सर्वत्र व्याप्त होकर रहता है । है (द) इन्द्र ! ( यः ते जठरेषु) जो सोम मेरे पेट में जाता है, वह महान् है ॥ २॥ [ १६६२ ] हे (घृत्रहन् इन्द्र ) वषनाशक इन्द्र ! ( सोम ते कुक्षये भरं भवतु ) हमारे द्वारा दिए गए मोम तेरे पेट में भर जाए, (इन्दवः धामभ्यः भरं ) सोमरस सब देवताओंको भरपूर हो ॥ ३ ॥ [१६६३ ] है (जरायोध) स्तुतिसे जानत होनेवासे माते ! ( विशे विशे) प्रत्येक प्रजाजनके हितार्प (याठियाय) पज सिद्ध करने के लिए (सत् विविदि ) उस यज्ञशाला में प्रवेश कर ।(रुद्राय दृशीकं स्तोमं ) एद्र स्यरूपी अग्निके लिए सुन्दर स्तोत्र बोलो ॥१॥ [१६६४ ] (महान् अनिमान:) महान् और न मापने योग्य (धूमकेतुः पुरश्चन्द्रः सः) को ध्वजावाला और बहुत आमन्द देनेवाला यह अग्नि (न.धिये घाजाय हिन्यतु ) हमें ज्ञान और अन्न प्राप्त करने के लिए प्रेरित करे ॥२॥ ( १६६५ ] (दैव्यः विश्पति. ) दिव्य प्रजापालक (वृहद्भानु केतु सः) महान् प्रकाशमान और वगके समान यह भनि (रेवान् इव) परवान् राजाके समान (न उक्थैः शृणोतु ) हमारे स्तोत्र सुने ॥ ३ ॥ [१६६६ ] हे स्तुति करनेवालो।( मुते ) सोमका रस निकालने के बाद (1) तुम (पुरु-हताय सत्यने) पहतोके मारा प्रशसित और घलयान ऐसे इसके लिए (तत् सचा गाय ) उन स्तोत्रोंको एक जगह मंठकर पायो। (यत् गये न) भिसप्रकार पापोंको घास सुख देती है, उसीप्रकार (शाकिने श) शक्तिमान् इनको थे स्तोत्र भानायक होते है॥१॥ [१६६७ ] ( यत् सी) परि यह इन्द्र (गिरा उप श्रवत् ) हमारी स्तुति मुनेगा तो ( वसुः ) सोंके निवासक इन्द्रको ( गोमत याजस्य दान ) हमें गायोंसे युक्त अन्नका दान करनेसे (न घनियमते)कोई भी रोक नहीं सकता ॥२॥ [ १६६८ ] ( वस्यु-हा) शोको मारनेयाला इन्द्र ( कुवित्सस्य ) बहुत हिंसा करनेवाले भसुरके (गोमन्त प्रज प्रागमत् ) गापोंसे भरे हुए पाई पर अधिकार करता है, तब (दि शचीभिः) अपनी शक्तियाँस (ना[गा ] अपघात ) यह हमारी गार्योको प्राप्त करने देता है ॥३॥ । यहां पहला खण्ड समाप्त हुभा ॥
महादश मायाय]
सामवेवधा सुयोग अनुपार
(३२७)
म
११
धारयन्
.
,
1३
3
१६६९ इदं विष्णाय चक्रमे श्रेया नि दधे पदम् । समूढमय पारसुले ।। १ ।। (प्र. १॥२२॥१७ )
१६७० श्रीणि पदा वि चक्रमे विरुणुगोपी अदाम्या । अतो धर्माणि
(रु.१।२२।१८)
१६७१ विष्णो कर्माणि पश्यत यतो प्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा
(ऋ १२२६१९)
१६७२ तद्विष्णोः परमं पद सदा पश्यन्ति यः । दिवीव चक्षुराततम् ॥४।। (ऋ. १।२१।१०)
१६७३ वदिनासो विपन्युवो जागृया सा समिन्यते । विष्णोर्यस्परमं पदम् ।।५।। (ऋ. ११२२।२१)
१६७४ असो देवा अवन्तु नौ यतो विष्णुविचक्रमे । पृथिव्या अघि सानपि ॥ ६ ॥ ५ () ||
[ धा० ३३ । उ०२ । २०६] (ऋ. १२२०१६)
१६७५
मो
पु त्वा वायतश्च नारे अस्मभिरमन् ।
आरात्ताद्वा सधमाद न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि
( ७१।१)
.
.
.
३१.११
,
,
२१
[२] द्वितीयः खण्डः।
[१६६९ ] (विष्णुः इदं विचक्रमे) विष्णुने जब इस जगमे पराक्रम किमा, तब उसने (धा पदं निदधे) तीन
प्रकार अपने पार्योको वहां रखा ।(अस्य पांसुले समूढम् ) इसके धूलियुक्त पावोंके स्थान पर सम्र जगत् रह रहा है ।
६ १६७० १ (अ-दाभ्यः गोपाः विष्णुः ) न बनेवाला रक्षक विष्णु ( यता धर्माणि धारयन् ) बहासे सनके
कर्तव्यों का पोषण करता हुआ (प्रीणि पदा विचक्रमे ) अपने तीन पार्योंसे सब जगत्को घेरता है ।। २ ।।
[१६७१ ] हे मनुष्यो ! (विष्णोः कर्माणि पश्यत ) विष्णुके पुरुषापोतो देखो, (यतः प्रतानि पस्प
जिसके कारण सब पत-कर्म चलते हैं। यह विष्णु (इन्द्रस्य युज्यः सखा) इन्द्रका योग्य मित्र है। ॥ ३॥
[ १६७२ ] (सरया ) विद्वान् (विष्णोः तत् परमं पदं ) विष्णुके उस श्रेष्ठ त्यानको ( सदा पश्यन्ति )
हमेगा देखते हैं। दिवि भातर्त रक्षाब) माकाशमें फैले हुए नेत्ररूपी सूर्यको वेलने के समान इस पेष्ठ मानको
विद्वान् लोग देखते है ॥ ४ ॥
१६७३ (विष्णोः नत् परमं पदं) विष्णुके उस भेष्ठ स्थानको (विप्रासा जागृवांसः धिपन्यवः ) मानो,
लागुत और स्तुति करनेवाले ( यत् समिन्यते ) प्रयोप्त करते हैं॥५॥
[१६७३ ] (विष्णुः पृथिव्याः अघिसानवि) विष्णु पृथ्वीपरके यन्त उच्च स्थानमें (यतः विवक्रमे।
जहाँसे अपना विक्रम करता है, (अतः ) उस पानसे (देघा ना अवन्तु ) सब देव हमारी रमा करें ॥ ६ ॥
(१६७५] है इन्द्र । (त्या) तसे (याधता य न ) स्तुति करनेवाले (अस्मत् मारे) हमसे पूर (मा नि
रीरमन ) मरमा । इसलिए आरासार पा) दूर हो तो भी [ न सधमादं मागाह) हमारे पाके स्थानपर मा,
सौर (हपा सन् ) पहा रहते हुए भो ( उपभ्रुषि ) हमारी स्तुति मुन ॥ १॥
(३२८) सामघेदका सुबोध मनुवाद [ उत्तरार्चिकः र 3 79 ३३३३३३ १ 13 ए स ३१३१२ २ २२ १२ 3" 3 २ म 9 १६७६ इमे हि ते ब्रह्मकृता सुते सचा मधौ न मक्ष आसते । इन्द्रे कामं जरितारो वसूयघो रथे न पादमा दधु। ॥ २॥ ६ (डी)। [धा• १३ । उ० ४ । स्व०४ । ( ७३२।२ । १६७७ अस्तावि मन्म पूर्य ब्रह्मेन्द्राय वोचत । पूर्वीर्मतस्य वृहतीरनपत स्तोतुर्मेधा असृक्षत ॥१॥ (8. ८५२९) १६७८ समिन्द्रो रायो चूहसीरधूनुत सं क्षोणी समु सूर्यम् । सशुक्रासः शुचयः सं गवाशिरः सोमा इन्द्रममन्दिपु! ॥२॥७(ठा)॥ [धा० १३ । उ०२ 1 व. २ ] ( ८।१२।१०) १६७९ इन्द्राय सोम पातवे वृत्रमे परि पिच्यसे । नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे ॥ १ ॥ (ऋ ९।९।१०) १६८० तसखायः पुरुरुचं वयं यूपं च सूरयः । अश्याम वाजगन्ध्यरसनेम वाजस्पत्यम् ॥२॥ (र. ९९८।१२) १२ २311 [१६७६ ] हे इन्द्र ! (ते सुते ) तेरे लिए सोमरस निधोने के बाद (ब्रह्म-मृतः ) स्तोत्र कहनेवाले ऋत्विज (मधौ मक्षा म) शहद के लिए मक्खियां जिसप्रकार एक जगह जमा होती है, उसीप्रकार (सचा आसते) एक जगह पैठते हैं। ( वसूयव जरितार ) घनको इच्छा करनेवाले स्तोता ( कामं ) अपने इष्ट फलको (रये पादं न) जिस प्रकार रथम पांच रखते हैं, उसीप्रकार (आधुः ) पारण करते है ॥ २॥ [१६७७ ] हमने ( अस्तावि) इन्द्रकी स्तुति को, हे ऋत्विजो ! उस (इन्द्राय ) इनके लिए (पूर्व्य मन्म ब्रह्म योचत) पहले के मननीय स्तोत्र कहो। तथा ( पूर्वीः ऋतस्य पृहतीः अनूपत) पहलेय पकि बृहतो छन्दर्भ सामगान करो, (स्तोतुः मेघा. असूक्षत ) स्तुति करनेवालोंको ऐसी बुद्धियां दो ॥१॥ [१६७८ (इन्द्रः) इन्द्र (पहती. रायः) बहुत धन (सं अधूनुत ) हमें देवे । (क्षोणीः सं) भूमि हमें दे, (सूर्य सं ) सूर्यप्रकाश हमें प्राप्त हो, (शुचयः शुक्रासः रन्द्रं सं शुद्ध किए गए सोम इनको प्राप्त हो । (गयाशियः सोमाः इन्दं अमन्दिषु ) गो दुग्धमें मिलाये गए सोमरस इन्टको प्रसन्न करें ॥ २॥ [१६७२ ] हे (सोम) मोम ! (वृत्रने इन्द्राय पातवे) वृत्रको मारनेवाले इन्सको पोनेको देने के लिए ( परि. पिण्यसे तू कसा भरता जाता है । (दक्षिणावते) दक्षिणा देनेवाले (घोराय) वीर इन्सको रेनके लिए (सदना- सदे) यशालामें बैठनेवाले (नरे ) नेता पजमानको प्राप्त होने के लिए कलशमें भरा जाता है ॥ १ ॥ [ १६८० ] है ( सखायः ) स्तुति करनेवालो ! (यूयं सूरयः ) तुम विद्वान् (वयं च ) और हम (तं पुरूषचं याजगभ्य भश्याम ) उस अति सेमस्वी घेष्ठ मुगन्धसे युक्त लोमको पीयें, ( याजस्पत्यं सनेम ) यल बहानेवाले सोमको म गाव मायाय] सामवेदका सुयोध अनुयाद (३२९) 3 "" .. 31 . 3 7 १r . ११ १३ 3 . ३" ३ १६८१ परि त्य५ हयेत हार पर्बु पुनन्ति वारेण । यो देवान् विचार इद परि मदन सह गच्छति ॥३॥ ८(हा)॥ [धा० १६ । उ० नास्ति । २०२] (२.९१९८७) १६८२ कस्तमिन्द्र त्या वसवो मया दर्पति । श्रद्धा इन ते मघवन् पाय दिवि वाजी वार्ज सिपासति ॥१॥ 1. ७१३२०१४) १६८३ मघोनः स्म चुत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तब प्रणीती हर्यश्व परिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ।। २ ।। ९ (यि)। [धा० १७ । उ० नास्ति । २०३] (ऋ७३।१५) ॥ इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥ [३] १६८४ एदु मघोर्मदिन्तरसिमावर्षो अन्धसः । एवा हि वीर स्तवते सदावृधः ॥१॥ (ऋ. ८२४६१६) १६८५ इन्द्र स्थातहरीणां न किष्टे पूर्व्यग्तुतिम् । उदानश शयसा न भन्दना ॥२॥ (भ. २४१७) ॥ १६८१ ] (हयंत हरि ष, त्य) मनोहर, दुराहरण करनेवाले और भरणपोषण करनेवाले उस सोमको (पारेण परि पुनन्ति ) शनीसे वे जानते है । १ या विश्वान देवान ) नो सर रेयरेको (मदेन सह ) मानन्दके साप हो (परि गच्छति ) प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ [९६८२ ] है ( पलोहन्द्र) निवासक इन्द्र ! (तं त्या ) उस तुझे ( का मादधति ) कौन भला धमकी देता है ? है ( मययन् ) 1 (ते श्रद्धा ) तुझपर जो बद्धा रखता है, वह (पाली) बलवान् हरि लेकर (पायें दिपि) सोमरस निकालने के दिन ( वाजं सिपासात) मनका दान करने की इच्छा करता है।" [१६८३ ] है इन्द्र ! (मोना) पनवान ऐसे तेरे लिए (प्रिया यस ये ददति ) प्रिय पन - हनि -जो देते है उन्हें (बहत्येपु चोदय ) युद्धम जानेका उत्साह है। है (इयेच ) उत्तम पोडे रखनेवाले इन्द्र ! ( तव प्रती ) मेरो प्रेरणासे ( सूरिभिः) विद्वानोंके साप ( विश्वा दुरिता तरेम) सय पापोंसे हम मुक्त हो ॥ ५॥ ॥ यहां दूसरा खण्ड समान हुआ। [३] तृतीयः खण्डः। १६८४ ] है (अध्वयों ) अध्वर्यु ! (मघोः अन्धसः) मोठे सोमका बानन्ददायक रस (मदिन्तरं ) अत्यन्त हर्षको प्राप्त होनेवाले इनके पास ( मासिब ) रख । ( सदावृधः धीरः एव हि स्तयते ) अपने बलसे सदा बहते रहो. शाला दौर इन्न ही स्तुत होता है ॥ १॥ ६. १६८५ है ( हरीणां स्यातः इन्द्र) पोडे पास रखनेवाले इन्द्र ! (ते पूज्य स्तुति तेरी पहले की गई स्तुति (यसा न कि उदाश) अपने बससे दूसरा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता तथा (भन्दना न) सेज से भी कोई पा नहीं सकता ॥ २॥ ४२ [ साम. हिन्दी भा.२]
(३३०)
सामवदका सुवोध अनुवाद
उत्तरार्चिका
२
2
र ३३१
२
२१
३.१३ १३१
388
२१
"
१३
२३ २३
११२
२९३.३...
31".
१६८६ तं वो वाजानां पविमहमहि अवसवः । अप्रायुभिर्यज्ञेगिर्वावृधेन्यम् ॥३॥ १०
[घा० १६ । उ०१। स्व०१] (. ८०२४१८)
१६८७ ते गया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे । देवत्रा हन्यमूहिपे ॥ १॥ ऋ १९।१ )
१६८८ विभूतराति विप्र चित्रशोचिपमग्निमीडिव यन्तुरम् ।
अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोमरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम् ॥२॥११ (या)॥
[ धा० १७१ उ. नास्ति । स्व०२]( ८1१९।२)
१६८९ औ सोम स्वानो अद्रिमिस्तिरो वाराण्यव्यया ।
जनौ न पुरि चम्बोशिद्धरिः सदो वनेषु दधिषे
॥१॥ (ऋ ९।१०७१)
१६९० स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीवात्सतिर्न वाजयुः ।
अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेमिकभिः ॥२॥१२ (त)॥
[धा० १४ । उ० १ । स्व०५] (ऋ. ९।१०७/११)
१६९१ षयमनमिदा घोपीपेमेह वजिणम् । तस्मा उ अद्य सबने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते ॥१॥
(ऋ. ८६६७)
[१६८६ ] ( श्रवस्यवः ) यशको इच्छा करनेवाले हम ( वाजानां पति) यलोंके स्वामी ( अपायुभिः यशेभि
घाघेन्यं ) प्रमावरहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले यनोंसे बढनेवाले (व.) तुम्हारे उस इन्द्रको ( अहूमहि ) हम
सहायताके लिए बुलाते हैं ॥३॥
[१६८७ ] (स्व-नरं तं गूर्धय ) स्वर्गके नेता उस अग्निकी स्तुति कर । (देवासः देवं भरतिं दधन्धिरे)
स्तुति करनेवाले ऋत्विज दिम्य पनको प्राप्त करते हैं । हे अग्ने ! तु (हय्यं देवत्रा अहिपे ) हविको वेवोंको मोर
पहुचाता है ॥ १॥
६१६८८] हे ( सोमरे विप्र ) सोभरे ऋषि । (विभूतराति चित्रशोचिष ) बहुत दान देनेवाले विशेष
प्रकाशमान (सोम्यस्य अस्य यन्तुरं) इस सोमयागके पालक ऐसे ( पूर्य अग्निं ) प्राचीन अग्निको (अध्यराय।
ईडिय) यश करने के लिए स्तुति कर ॥२॥
६१६८९हे (मोम ) सोम 1 (बद्रिभिः स्वाना ) पत्थरोंसे कूटकर रस निचोडा गया ( अन्यया चाराणि
तिर. ) भैडके वालोंकी छलनीसै छनकर ( हरिः चम्योः विशत् ) हरे रगका सोम कलशम जाता है । (पुरि जन.
न) नगरमें गिसप्रकार कोई मनुष्य जाता है, उत्सप्रकार यह सोम ( वनेषु सदः दधिपे ) लकडीके पात्रमें अपना स्थान
बताता है॥१॥
[१६९० ] ( याजयु' ) बल बतानेवाला ( मीड्वान् सप्तिः न अनुमाधः ) वीर्यवान् घोडेके समान प्रेम करने
योग्य (स: पयमान सोम ) वह छाना जानेवाला सोम (मनीषिभिः मेष्यः अण्वानि तिरः) विद्वानों द्वारा भेउके-
मालोको पनी छलनी से छाना जाता हुआ (ऋषिभिः विप्रेमिः मामृजे) ऋविन विनों द्वारा स्तुत व प्रशसित
होता है ॥२॥
[१६९१ (वयं पन यनिणं) हमने इस वनधारी इन्द्रको (इदा ह्या इह ) इस समय भौर पहिले भी इस
यज्ञमें ( अपीपेम) सोमसे तृप्त किया, (तमा उ ) उसो इन्द्र के लिए (अध सपने) माजभी इस पाने ( सुतं भर)
सोमरस मपंप करो।(नूनं धुते आभूपत) निश्चयसे स्तोत्रपाठ सुनने के लिए वह यहां आवे ॥ १॥
अष्टादश अध्याय
सामवेदका सुपोध अनुवाद
(३३१)
११
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32
३१
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१६९२ कश्चिदस्य वारण उरामधिरा वयुनेषु भूपति ।
समन
स्तोम
जुजुपाण आ गहीन्द्र प्रचिनया पिया
॥२॥ १३ (सा)॥
[घा०१६ । उ०२ । स्व०१] (ऋ. १६६८)
१६९३ इन्द्रामी रोचना दिवः परि वाजेषु भूपया । तवां चेति प्र वीर्यम् ॥ १॥ ( ३।१२।९)
१६९४ इन्द्रामी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः । तस्य पथ्या३ अनु ॥२॥ (ऋ. ११२१७ )
१६९५ इन्द्रामी तविषाणि वा सधस्थानि प्रयोसि च । युधोरस्तू हितम् ॥३॥ १४ (क)॥
[धा०६ । उ. १६ स्व०१] ( ३११२१८)
१६९६ क ई वेद सुत सा पिपन्त कद् पयो दधे ।
अयं यः पुरी विभिनरपोजसा मन्दानः शिष्पन्धसा ॥१॥ (३८६३३७)
१६९७ दाना मृगो न वारणा पुरुषा च रथं दधे ।
न किष्टानि यमदा सुते गमो महाश्वरस्योजसा ॥२॥ ( ८१३२८)
. १६९२ ] ( अ ययुनेषु) इस इन्द्र के मार्ग में { उरामयिः धारणः कश्चित् ) कष्ट देनेवाला और विघ्न
डालनेवाला
शत्रु भंडिये के समान कर भी हो तो भी (आभूपाते ) अनुकूल होकर उसकी सेवा करने लगता है। (सः
इन्द्र वह न हे इन्द्र ! (न. इमं स्तोम जुजुपाणः ) हमारे इस स्तोत्रको स्वीकार करके (चिश्या घिया म आगहि )
फल देनेवाली बुद्धि के साथ यहां मा ॥२॥
[ १६९३ ] है ( इन्द्राग्नी ) इन और मग्ने ! (दिवः रोवना) घुलोरुको प्रकाशित करनेवाले तुम (घानेषु
परिभूपथः ) युद्ध में विजय प्राप्त करके सुशोभित होते हो। (वां तत् वीर्य प्र वेति ) तुम्हारा यह वीर्य इस प्रकार प्रकट
होता है ॥१॥
[ १६९४ ] है (इन्द्रानी ) इन्द्र और अग्ने ! (धातयः ) ज्ञानी लोग (मनस्य पथ्या मनु ) सरय मार्गरो
सरकार (अपसा परि उप प्रयन्ति) कर्मको सिद्धिको प्राप्त करते है॥२॥
बानी लोग सत्यके मार्ग से जाकर कर्मको सिद्धि प्राप्त करते हैं।
[१६९५] है (इन्द्रामी ) इन्द्र और माने । (वो तविषाणि ) तुम्हारे इस मौर (मयांसि) शान (सघ-
स्थानि) एक साथ रहते है। ( युवोः अस्तूर्य हितं ) तुममें शोमतामे काम करनेका सामये स्पापित किमा गया है ॥३॥
६१६९६] (सुते सचा पिरन्त । कः वेद ) मोमयज्ञमें सबके साप बैठकर मोमरस पीनेवाले इस इन्द्रको भला
कौन जानता है। (कद्वयः दधे) उसको कितनी आय है, यह भी भला कौन मानता है ? (भयं यः शिमी। जो पह
सिरसर शिरस्त्राण धारण करनेवाला इन है, यह (अन्यसा मन्दाना ) सोमरससे मानन्वित होकर ( मोजला ) अपने
सामसे शत्रुके (पुरः विभिनत्ति) नगरोंको तोह गसता है ॥ १ ॥
[१६९७३ (मृग. यारणः दाना न) शत्रुर शोध करनेवाले मदोन्मत हायोके समान(पुरुत्रा च रथं दधे)
भनेक योन तू अपना रपसे जाता है । ( त्या न कि नियम तुझे कोई भी रोक नहीं सकता है इन्द्र ! (सुते मागमः ।
सोम पनाने सू माना महान ) हमारे लिए दू महान् भाररपोय है, और तु (भोजला चरसि) अपने सामापसे
सर्वत्र संभार करताहे॥२॥
(३३२)
सामवेदका सुयोध अनुवाद
उत्तरार्चिकः
२
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२
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१
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२१३१
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१११
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२.g १२
१६९८ य उग्रः सन्ननिष्टतः स्थिरो रणाय सरस्कृतः ।
यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योपल्या गमत ॥३॥ १५ (ही)।
[धा० ११ । उ० नास्ति । स्५० ४ ] ( ८।३३।९)
॥ इति तृतीय. सण्ड ॥ ३॥
[४]
१६९९ परमाना असूक्षत सोमाः शुक्रास इन्दवा । अभि विश्वानि काम्पा ॥१॥( ९।६३६२५)
१७०० पचमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसूक्षत । पृथिव्या अघि सानधि ॥।। (ऋ ९।६।२७)
१७०१ पवमानास आशवा शुभ्रा असृग्रमिन्दवः । मन्तो विश्वा अप दिपा ॥३॥ १६ (फ ) ॥
धा. १५ । उ०२ । २०१] ( ९/६३।२६)
१७०२ तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता । इन्द्रामी वाजसातमा ॥ १ ॥ (ऋ ३।१२।४ )
१७०३ प्रधामन्युक्थिनो नीथाविदो जरिताः । इन्द्रामा इष आ वृणे ॥ २ ॥ (ऋ ३।१२।५ )
१७०४ इन्द्राग्नी नाति पुरो दासपनीरधूनुतम् । साकमेकेन कर्मणा ॥३॥१७ (र)॥
[ धा०८। उ० नास्ति । १] ( ३।१२१६)
[१६९८] (य उन सन् ) जो उग्रवीर होने के कारण ( अनिष्टतः) शत्रुओंसे न हारते हुए (स्थिरः ) स्थिर
रहता है, और ( रणाय संस्कृतः ) युद्ध के लिए शस्त्रोंसे भूषित हुआ रहता है ऐसा वह (मध इन्द्र ) धनवान् इन्द्र
( यदि स्तोतुः हवं णवत् ) यदि स्तोताको प्रार्थना सुन ले सो यह (न योपति ) दूसरी तरफ जाएगा नहीं और
(आगमत् । यहीं यज्ञमें आएगा ॥ ३ ॥
॥ यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[४] चतुर्थः खण्डः।
[ १६९९] (गुमासः इन्दव , स्वच्छ और चमकनेवाले ( पयमाना' सोमाः छाने जानेवाले सोमरस
(विश्वानि काच्या) सब वेदमत्रों की स्तुति के चलनेपर ( अमि असक्षत ) शुद्ध किए जाते है ॥१॥
१७०० (परमाना ) शुद्ध होनेवाले सोमरस ( दिय अन्तरिक्षात् ) लोकसे और अन्तरिक्षसे (पृथिव्या
अधि सानवि) भूमिपरके ऊचे यज्ञ स्थानमें ( पर्यसूक्षत) बहते है ॥ २ ॥
[१०] (आशय शुभ्रा ) वेगवान और शुभ्र ऐसे ( पवमानासः इन्दय ) शुद्ध होनेवाले सोमरस ( विश्वा'
द्विप अपघ्नन्त ) सब शत्रुओंको विनष्ट करते हुए (असूग्रम् ) कलशमें जाते है ।। ३॥
[१७.२ ] ( तोशा) शत्रुओं पर विघ्न डालनेवाले, (वृत्रहणा) शत्रुओं का नाश करनेवाले (सजित्वाना
अपराजिता) शत्रुओंको जीतने वाले और स्वय अपराजित ऐसे ( पाजसातमा इन्द्राग्नी हुरे) अन्न देनेवाले इन्द्र और
अग्निकी में प्रार्थना करता हूँ॥१॥
[ १७०३ ] हे (इन्द्राग्नी ) इन मौर मग्ने ! ( उक्थिनः चा भर्चन्ति ) देवपाठी तुम्हारी अर्धना करते है।
(नीथाविदः जरितार. ) सामगायक सुम्हारी स्तुति करते है (इप, आवृणे ) मान प्राप्तिके लिए मै भी तुम्हारी स्तुति
करता हूँ॥२॥
१७०४ ] है (दानी न्द्र और अग्ने । (दास पनी नयति पुरा) वासकिशारा रक्षित मग्ने नगरोंको
(एफेन कर्मणा साय अधूनुत) एक प्रयत्नसे एक साथ तुमने हिला दिया ॥ ३ ॥
भादश अध्याप] सामवेदका सुयोघ अनुवाद (३३३) ३. . २१३" . ३. ११३". । १३३३ . २१ १७.५ उप वा रण्यसदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत । अमे समुज्म गिरा ॥ १ ] ( ६।१६।३७) १७०६ उप च्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते क्यम् । अमे हिरण्यसंशः ॥ २॥ (क्र. ६।१६।३८ ) १७०७ प उग्र इव शर्यहा तिम्मशृङ्गो न वरसगः । अमे पुरो रोजिथ ॥ ३॥ १८ (य)॥ [धा० ७ । उ० नास्ति । स्व. १ (क्र. ६/१६३६९) १७०८ मावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिपस्पतिम् । अजसं धर्ममीमहे ॥ १ ॥ ( अर्य. ६।१६।१ ) १७०९ य इदं प्रतिपप्रधे यज्ञस्य स्वरुतिरन् । अनुत्सृजते वशी 1॥२॥ १७१० अग्निः नियेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य । सम्राटेको विराजति ॥३॥ १९ ( का)। [ धा० ११ । उ० १ । १०१) ॥ इति चतुर्थ सण्डः ॥ ४॥ ॥ इत्यष्टगरपाठके द्वितीयोऽध. 11८-२॥ इत्यष्टादशोभ्याम. १८ ॥ [१७०५ Jहे ( सहस्कृत अग्ने ) मलसे उत्पन्न दिए गए आने ! (प्रयस्वन्तः) हवि लेपर आनेवाले हम ( रण्वसंदृशं त्या उप ) रमणीय और दर्शनीय ऐसे तेरे पास रहकर ( गिरः समुज्महे ) अपनो धागोसे तेरी स्तुति करते है ॥१॥ [१७०६] है ( अग्ने ) मग्ने ! (हिरण्यसंरशः पृणेते ) सुरके समान तेजस्वी वीखनेवाले तेरे (शर्म ) भाषय भाकर (चर्य उप अगम्म) हम सुख प्राप्त करें (छायां य) निसप्रकार कोई धूपसे भाकर छामा गुख पाता है, सीप्रकार हम भी तेरे साधयमें मुख प्राप्त करें ॥२॥ ८१७०७] (य: उन इव) जो अग्नि उप्रवीर पनुर्धारी भूरवीरके समान है, (सगान निम्मभंगा) पेशवान् बैल जैसे न होंगोंसे मुक्त रहता है, घेरो हो यह भपनी सीण ज्यालाओंसे पुक्त रहता है । है ( भन्ने ) अग्ने । (पुरः रोगिध ) तूने शत्रुके नगर तोटे है ॥ ३ ॥ [१७२८Jहे भने । (ऋतावानं वैश्वानरं ) यज्ञ करनेवाला, मनुष्योंका हित करनेवाला (नातस्य ज्योतिष पति यतकी वपने ते असे रक्षा करनेवाला (अजस्र धर्म ईमहे ) निरन्तर प्रदीप्त होनेवाले अग्निको हम उपासना [५७०९ (य)जो भनि (द) इस जगत्को सुलो करने के लिए ( यशस्य स्पः उत्तिरन् ) यज्ञके सब विघ्नोंको दूर करता है, ऐसी ( प्रति पप्रथे ) जिसकी प्रसिद्धि है । वह (पशी ) सबको अपने अधीन करके (मागून उत्एजते तुओंको उत्सम करता है ॥ २॥ [ १७१०] ( भूतस्य भव्यस्य कामः ) उत्पन्न हुए और आगे अस्पत होनेवाले गिसको इशा परते है. ऐसा (पका मम्राट मनिअरेला सन्माद अग्नि (प्रियेषु धाममु विराजति) प्रिय यह मानो विरामता है। । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुभा ॥ ॥ इत्यादशोऽध्यायः॥
(३३४) सामवेदका सुवांध अनुवाद [उत्तराचिका अष्टादश अध्याय । इस अठारहवे अध्यायमें इन्द्र, अग्नि, इन्द्राग्नी, विष्णु और ९ पूर्वी। ऋतस्य वृहती अनूपत् ॥११७७]- पहलेके सोम इन पांच देवताओंका वर्णन है। इसमें इन्द्र देवताका पज्ञमें बोले जाने योग्य ग्रहती व सामगान करो। विस्तृत वर्णन है- १० इन्द्र. वृहती रायः सं अधूनुत [१६५९]- हाय महुत पन हमें देखें। १ मद्याय धीराय शूराय पन्यं सोमं आधावत ११ क्षोणी सं [ १६७९ ]- भूमि भी हमें थे। [ १६५७ ]- प्रसन्नचित्त और पराक्रमी शूर इन्द्रके पास १२ गवाशिरः सोमाः ममन्दिपुः [ १६७९ ]- गो. प्रशंसनीय सोम शीघ्र पहुंचाओ। इन्द्र पराक्रमी और शूर है। दुप्पम मिलाये गए सोमरस इन्द्रको आनंद देखें। सोम पोकर वह और अधिक पराक्रम करनेवाला हो जाता है। १३ वृत्रने इन्द्राय पातवे परिपिच्यसे । १६७९]- २ वृत्रहा अस्सत् आरे आगमत् , शतं ऊतिः धत्रका बप करनेवाले इन्द्रको पीनेको देनेके लिए हे सोम ! नियमते । १६५९] -को मारनेवाला इन्द्र हमारे पास तुझे कलशम भरा जाता है । आवे । संकों संरक्षणके साधनों से युक्त इन्द्र यात्रुओंको दूर १४ हे मघवन् ! ते श्रद्धा बाजी पायें दिवि वाज करता है। सिपासति [१६८२]- हे धनवान् इन्द्र ! तुम पर पक्षा ३ हे इन्द्र ! त्यां न अतिरिच्यते [ १६६० ]- हे रखनेवाला बलवान् होकर सोमरस निकालनेके दिन अन्न इन्द्र ! तेरी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ और कोई नहीं है । तू ही दान करनेको इच्छा करता है। सबसे श्रेष्ठ है। १५ मघोनः तव प्रिया वसु ये ददति, वृत्र-हत्येषु ४ पुरुद्वताय सत्वने सचा गाय, शाकिने शं चोदय [ १६८३ ]- धनवान् हन्द्रको प्रिय वस्तु नो देता है, [ १६६६ )- जिसे बहुत से लोग सहायताके लिए बुलाते है, युद्ध में जानेका उसका उत्साह है इन्द्र ! तू बढा। उस सत्ववान् इन्द्र के लिए एकर बैठकर स्तोत्रोका गान करो। १६ हे हर्यश्व! तवप्रणीति सूरिभिः विश्या दुरिता शक्तिमान् इन्द्र के लिए ये आनन्ददायक हो। तरेम [ १६८३ - हे उत्तम घोडे पालनेवाले इन्द्र । तेरी ५ वसुः गोमतः 'चाजस्य दानं न ध नियमते प्रेरणासे विद्वानोंके साथ रहकर हम सय पापोंसे मुक्त हो जायें। [१६६७ ] - सयोंको बसानेवाले, गाय और अन्नका वान १७ सदा वृधः वीरः स्तवते [१६८४]- अपने बलसे करनेवाले इन्द्रको उसके दान करनेसे कोई रोक नहीं सकता। सदा बननेवाला वीर इन्द्र प्रशसित होता है। ६ दस्युहा फुवित्सस्य गोमन्तं बज प्रागमत्, १८ हे हरीणां स्थातः इन्द्र ! ते पूर्य-स्तुति शचीभिःमः [गा: ] अपवरत् १६६८]- शत्रुको मारते. शवसा न कि उदानंश[१९८५]- हे घोडे पास रखने याला इन्द्र बहुत हिंसा करनेवाले असुरोंको गायोंके पाडौं पर वाले इन्द्र ! तेरी पहले की गई स्तुतिको अपने वलसे दूसरा अपना अधिकार करता है, तब अपनी शक्तिसे वह हमें गा कोई प्राप्त नहीं कर सकता। न ही ऐसा सामन्यवान है कि जिसकी ऐसी प्रशंसा होती है। ७ वाघता असत् आरे त्वा मा निरीरमत् । ना १९ श्रवस्यवः याजानां पति अ-प्रायुभिः यज्ञेभिः सधमाद आगहि इह उप श्रुधि [ १६७५ ]- वे स्तुति वावृधेयं पातं अहुमहि [१६८६] - यशको इच्छा करने करनेवाले मनुष्य तुझे हमसे दूर न करें। हमारे यज्ञके वाले हम बलके स्वामी और वोयरहित योंसे बहानेवाले स्थान पर मा और पहाँ स्तुति सुन । तुम्हारे उस इन्द्रको सहायताके लिए बुलाते है । ८ ते सुते ब्रह्मकृतः सचा आसते [ १६७६ ]- तेरे २० वयं पनं वधिर्ण पदमपीपेम [ १६९१]- हम लिए सोमरस निकालने के बार स्तोत्र पाठ करनेवाले एकत्र इस पनपारी इन्द्र को इस यज्ञमें सोमरससे तृप्त करते हैं। बैठते हैं और स्तोत्र बोलते हैं। २१ अस्य वयुनेपु उरामाथिः वारणः घूका चित् देता है।
अादश अध्याय ] सामवेदका सुयोध अनुवाद (३३५) सकता। भाभूपति [ १६९२ - इस इन्दके कस्यमें कष्ट देनेवाला यज्ञशाला ममि पलाकर उस विशेष धातुओंकाहपन और प्रतियप करनेयाला व भले ही भेडियके समान तर या जाता है और उस यससे सब मनुष्यों का कल्याण होता है। हो तो भी वह उसके अनुकूल होकर सुशोभित होने लगता है। २ महान् अनिमानः धूमकेतुः पुरश्चन्द्रः साना २२ शिनी अन्धसः मन्दानः ओजसा पुरः विभि- धिये पाजाय हिन्वतु [१६६४]- महान् इसीलिए मापनेके नत्ति [ १९९६ - इन्द्र तोमपानसे यातरित होकर अपने अयोग्य, धुर्वा ही ध्वज है जिसका ऐसा बहुत भानन्द देनेवाला सामसे के नगरोंको तोडता है। मह अग्नि हमें ज्ञान, पाठ और भारको प्राप्तिके लिए प्रेरणा २३ पुरुषा रथं दधे, त्या न कि नियमत् [१६९७J- देवे । उस रास्तेसे हमें से जाए कि जिस मार्गसे हमें गान है इन्द्र अपना रप आगे पला । तो कोई भी रोशनहीं और यह प्राप्त हो । ३ देव्यः विश्पति वृहद् भानुः सारेचान स्व नः २४ यसोइन्द्र ! त्या का मादधति [१६८२]- उपयैःणोतु [ १६६५/- यह दिग्प शक्तिसे युक्त है निपासक इन्च ! तुझो भय दिखानेमें भला कौन समर्थ है ? नाका पालन करनेवाला, महान् तेजस्वी यह अग्नि धनवान २५ या उनः सन् मनिष्टता, स्थिरारणाय संस्थतः राजाके रामान हमारे स्तोत्र सुनें । अनिमें दिव्य शर्षित है। मधमा इन्द्रः यदि स्तोतु: हवं रणवत्, न योपनि, अग्निमें जो पश होता है, उससे प्रजा नोरोगी होती है, और आगमत् । १९९८ !- जो उनवोर होने के कारण कभी भी रोगोंसे रक्षा होती है। ऐसी यह अग्नि हमारी स्तुतिके नहीं हारता, युद्धभूमि पर स्थिर रहकर युद्ध करने के लिए स्तोत्र सुने । तयार रहता है, वह धनवान् इन्द्र यदि स्तुति करनेवालेकी ४ विभूतराति चित्रशोचिषं पूर्य माग्न ध्वराप प्रार्पना सुन ले, तो दूसरी तरफ जायेगा ही नहीं, निश्चयसे इंडिच [ १९८८]- यकृत दान देनेवाले, विशेष प्रकाशमाम् यहाँ यसमें आएगा। प्राचीन अग्निकी पत करने के लिए स्तुति कर । २६ प्रायुजा शरमा हरी इह सखायं इन्द्रं आव. ५ हे सहस्थत अने। मयस्वन्तः रण्यसंशं त्या क्षतः [ १६५८ - शव कहते ही जुट जानेवाले और सुख उप गिरा ससमाहे [१७०५]- हे मलसे उत्पन्न होनेवासे देनेवाले इन्द्रपे घोडे यहा पतमें मिन्न और स्तुतिके पोय मग्ने ! अन्न लेकर जानेवासे हम रगणीय बोलनेवाले तेरे इन्द्रको लेकर आते है। पास आकर अपनी वाणोसे तेरो स्तुति करते है। इन्द्र हमेशा मानन्दित, उत्साहित और शूरवीर है। उसके ६ हे अमे। हिरण्यसंटा घृणेः ते शर्म, छायां पास संरक्षणके अनेक साधन है, उसके समान शूरवीर दूसरा इव चयं उप अगम [ १७०६ ] है अरने ! सोने के समान कोई नहीं। वह जब पनादिका दान करता है तब उसे कोई तेजस्वी दीखनेवाले सेरे माश्रयम आकर, जैसे कोई धूपसे रोक नहीं सकता । गायें चुरानेवाले असुरोको हराकर वह माफर छाराम मुख प्राप्त करता है, उसीप्रकार हम गुरु गायें वापिस प्राप्त करता है । फिर उन पायोको भक्तों में शाट प्राप्त करें। देता है । इस इन्द्र के रास्ते पर चलनेवाले सब पापोंसे मुक्त ७ य उग्न इच, सगः न तिग्मभंगा, पुर) हो जाते हैं। सब लोग इस इन्द्रको अपनी सहायता के लिए रोजिथ [ १७०७ ] - वह अग्नि महान् पनुर्धारीके समान मुलाते हैं, और वह इन्द्र उनकी मदद के लिए नाता । वह बोर है, वेगवान् से सींगोवाले पंसके समान भपार पह इतना बलवान है कि एक हो आक्रमणसे शत्रुके संकडों नगरोंको अग्नि कि नगरोंको तोडता है । सोडकर विजयी होकर यशस्यी होता है। ऐसा इन्द्र सभौके ८ मातायानं वैश्वानरं, ऋतस्य ज्योतिषा पति द्वारा प्रशसित होने योग्य है। अजनं घम ईमहे [१७०८]- सत्य • या मार्गसे जानेवाला सब मनुष्यों का हित करनेवाला, यशके तेजसे रक्षा फरमेपाला, हे अगोध! विशे विशे जनाय यशियाय तत् भग्नि है । उस गाभारहित प्रप्त भाग्नको हम आराधना तत् विविदित [ १९६३ ]- हे स्तुतिसे भागृत होनेवाले करते हैं। अग्ने ! प्रत्येक मनुष्य के हितके लिए जो या किया जाता है, ९ यावं यस्य स्पः उत्तिर, प्रति परथे, उसे सिद्ध करने के लिए सूपशाला मा। वशी यातून उत्पमते {१७०११- जो भग्नि इस जगत्को अनि (३३६) सामवेदशा सुयोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः गुली करने के लिए यह सब विघ्नोरो दूर करता है, ऐसी सरक्षण करनेवाला विष्ण, सब धर्म-कर्तव्यका पालन करके उसकी प्रसिद्धि है। वह सबको अपने भाषोन करके ऋतुओंको अपने तीन पार्योसे सव जगत् व्यापता है। उत्पन्न करता है और उसके कारण सबको सुख देता है। ३ विष्णोः कर्माणि पश्यत, यतः प्रतानि परपशे, १० भूतस्य भन्यस्य काम समाय एक अग्नि. इन्द्रस्य युज्या सखा [ १६७१]- विष्णु के पराक्रमके प्रियेषु धामसु विराजति [ १७१० ]- पहलेके सथा आगे दर्शनपरो, जिसके कारण सबके काम उत्तम रीतिसे चलते होनेयाले जिसकी इच्छा करते है ऐसा अकेला ही सम्राट् है। यह विष्णु उत्तम मित्र है। अग्नि अपने यज्ञके प्रिय स्थान- यमकुण्ड- में विराजमान इन्द्र और विष्णु ये दो देव है। विष्णु यह उपेन्द्र है। जैरो होता है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते है, उसीप्रकार ये " इन्द्र और अग्निका ऐसा वणन इस अध्यायमें है। अग्निमें योग उपेन्द्र " है । पदार्थोका हपन करनेसे सब लोग रोगरहित होकर सुखी होते है। ४ सूरयः विष्णो तत् परम पद, दिवि आतते इन्द्र और अमि चक्षुःश्य, सदा पश्यन्ति [१६७२]- ज्ञानी लोग विष्णुके १ हे इन्द्राग्नी ! दिव रोचना याजेषु परिभूषथः, सगान, देखते हैं। उस परम पदको, द्युलोकमें जगत्को आख सूर्पको देखने के या तत् वीर्य प्रचेति [ १६९३ ]- हे इन्द्र और आने । ५ विष्णो तत् परमं पदं विप्रास विपन्यवः जाट- धुलोकको प्रकाशित करमेषाले तुम युद्ध में विजय प्राप्त करके वांसः समिन्धते । १६७३ ]- विष्णुके उस परम पदको सुशोभित होते हो, तुम्हारा सामर्थ्य ऐसे प्रकट होता है। ज्ञानी और जागृत लोग प्रदीप्त करके स्वय देखते हैं। २ हे इन्द्रामी! यो तविपाणि प्रयासि सपस्थानि युवा अप्प हितम् [ १६९५]- हे इन्द्र और भग्ने ! ६ विष्णुः पृथिव्या अधि सानवि, यता विचकमे, तुम्हारे वल भोर नान एक साथ रहते हैं। तम प्रतासे अत देयाः ना अवन्तु [ १६०४ ] विष्ण पृथ्वीके ऊचे स्थान पर जहारो वह पराक्रम करता रहता | उस कार्य करनेका सामथ्र्य है। स्पातसे सब देव हमारी रक्षा करें। ३ तोशा, तृषहणा, सजित्याना, अपराजिता विष्णु " उपेन्द्र " ( उप+इन्द्र ) है, वह इन्द्रकी सहा- चाजसातमा इन्द्राग्नी हुवे [ १७०२ ]- शत्रुओको बाधा यता करता है। अध्यक्ष उपाध्यक्षके समान ये दोनों एक पडुनानेवाले, शत्रुओंको मारनेवाले, विजयो, पराजित ने दूसरेको सहायता करते है । सर्वत्र विदयमें विष्णुका पराक्रम होनेवाले, अग्नका बान करनेवाले इन्द्र और अग्नि है, उनको दीखता है । ज्ञानी मनुष्य इसके पराक्रमको देखते है । लोग अपनी सहायता लिए मै मुलाता हूँ। इसके पराक्रमको देखें और स्वय भी पराक्रमी बनें। ४ इन्द्राग्नी! दासपत्नी नयति पुरः एकेन फर्मणा साक अधूनुतम् [ १७०४]-हे इन्द्र और जाने | दासोंके द्वारा दिन नये नगतको एक ही आक्रमगसे तुमने १ हे सखाय ! यूय सूरयः वयं च त पुरुरच हिला दिया। घाजगंध्यं यश्याम,बाजस्पत्यंसनेम[१६८०]-हे मित्रो इस प्रकार इन्द्र और अग्निको शूरवीरता और पराक्रमका ! तुम विद्वान् और हम मिलकर उस बहुत चमकनेवाले वर्णन इस अध्यापमें हैं। ये शूर कुशलतासे युद्ध करनेवाले, तथा उतम सुगन्धसे युक्त सोमको पोये, दल बढानेवाले कभी भी न हरनेवाले होनेके कारण हमेशा विजयी हो सोमको पौवे। रहते हैं। २ हयंत हरि यछु त्य वारेण परि पुनन्ति, विष्णु विश्वान देवान् गच्छति [१६८१]- मनोहर, दुखहरण करनेवाले, भरण पोषण करनेवाले उस सोमको छलनीसे १ विष्णु द विचक्रमे [ १६६९ - विष्णुका यह छानते हैं। उसके बाद यह सोम देयोंको ओर जाता है। पराक्रम । ३ अद्रिभि स्वान. अन्यया वाराणि तिरः मा. २ अदाम्पा गोपा विष्णु , धर्माणि धारयन् , हरि चम्बोः विशत् धनेषु सदा दधिरे [ १६0017 श्रीणि पदा विचामे [ १६७० ]- मदवनेवासा, समका परयोंसे छूटकर निचोरी गया रस भेडवे बालोंको छलनीसे सोम य मावश अध्याय] सामयेदका सुयोध अनुवाद (३३७) हाना जाता है । यह हरे रंगका सोमरस कसा उतरता है। ३ शतं अतिः घृमहा नियमते [ १६५९/- संकरो सकसी बर्तन में अपना स्पान बनाता है। साधनोंसे संरक्षण करनेवाला, पत्रका थप करनेवाला इन्च ४ वाजयुः माद्यान् पवमानः सोम मेप्यः भन्यानि भोको दूर करता है। तिरः विप्रेमि मामूजे [१६९०] - यल यदानेगला, चोर्य ४ स्थान अतिरिच्यते [ १६६०]-है इन। तेरी बसनेवाला, घोडेके समान प्रेम करने के योग्य, ऐसा बहाना अपेक्षा मोर कोई अंत नहीं। जानेवाला सोम भै मालाको छलनोसे जाना जाता है, सया ५ हे वृषन् जागृथे । महिना विन्यस्थ [ १६६1] शानियों द्वारा प्रसित होता है। हे मलपान और लागत रहनेवाले अपने महत्वस सपको व्यापता है। ५ शुमासः इन्दवः पयमानाः सोमाः विश्वानि पाच्या अभि असूक्षत! १६९९ -स्वच्छ और धमकने -हे जागृत रहकर सब जाननेवाले माने प्रत्येक मनुष्यक ६ हे जरायोध! विशे विशे रुद्राय दृशीक (१६६३] वाले माने जानेवाले सोमरस येदमंत्रों द्वारा प्रशसित होते हित करनेवाले रद्र देवताके लिए सुन्दर सोन घोले। हुए शुद्ध पिए जाते है। ७मः धिये पाजाय हिन्धतु [ १६६४ ]- हम बुद्धि ६ पयमानाः दियः पृथिव्याः अघि सानपि पर्य. यशने व अन्न प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर। सूक्षत [१५००J- स होनेवाला सोमरस चुलोको पायौके ८ पैन्याः विश्पतिः पृष्झानुः केतुः सारेवान हव ऊचे भाग संप्यार दिया जाता है। मा उपयैः शृणोतु [१६६५]- विम्य प्रजापालक महान् ७ माशयातुधाः पयमानासा इन्दया विश्वादिषा प्रकाशमान और प्वजाके समान रोभित होनेवाला पनवल अपमन्तः अस्यम् । १७०१ - वेगवान्, शुभ्र और शुद्ध अग्नि राजाके समान हमारे स्तोत्र सुने। होनेवाले सोमरस सब शत्रुओंको मष्ट करते हुए कलशमें ९ पुरुहताय सत्यने तत् सचा गाय, तत् शाकिने जरते हैं। शं[१६६६ 1- यहुत लोग जिसे सहायताके लिए बुलाते सोमलता परमसि फूटी जाती है। पारमें उसका रस, उरा अत्तथान् इन्द्र के लिए स्तोत्र एक जगह बैककर गावो, निकाला जाता है, फिर उसमें पानी मिलाकर भोके पालोशी से शक्तिमान इन्द्रको मानन्द मिलता है। एलनीसे छाना जाता है। यह जाना गया सोमरस कलशमें १० यसुः गोमतः वाजस्य दान न घ नियमने भरकर रखते है। इस समय वेदपाठ उच्च स्यरसे किया जाता [११६७]- सबको बसानेवाले इन्डको गायके पसे होनेवाले है। यह सोम हिम पर्वत पर ऊंचाई पर होता 1बहासे वह बाके रात करनेसे कोई रोक नहीं सकता। यज्ञ करनेफे स्थान पर लापा जाता है, और उससे रमतप्यार ११ वस्यु-हा फुधिरतस्य गोमन्त बजना गमद, किया जाता है । छानकर इस रसके तयार होने के बाद उसे हि शचीभिः [गा: अपवरत् [१६६८]-शत्रुओंको देवों के लिए अपित किया जाता है, फिर यन करनेवाले स्वय मारनेवाला इन्द्र जब बहुत हिंसा करनेवाले ससुरोको गार्योसे इरा सोमरसको पीते हैं। इसके पीने से शरीरम शक्ति बढ़ती भरे हुए बाडेपर अपना अधिकार करता है, तब वह अपनी है और मनका उत्साह घठता है, तया सब भोंको हरानेका शक्ति हमारो गार्योको दृढकर हमें देता है। सामर्थ मनके अपर पैदा होता है। १२ विष्णुः इदं विवफमे [ १९६९]- विष्णुने यहां गराकम किया। १३ भदाभ्यः गोपाः विष्णुः भर्माणि धारयन पदा सुभाषित विचक्रमे १६७०]-1 बननेवाला सरक्षक विष्णु सके १ पाराय शराय पन्यं सोमं माधावत [ १६५७ ] करने योग्य मार्मका पोपण वारता हुआयने परिसे सब जगत् गरपोर ते प्रशंसनीय सोमरस पहुंचाओ। पर मात्रमण फरता है। २मायुजा शग्मा हरी इह सखायं गिर्यणसं १४ विध्यो कर्माणि पश्यत, यत प्रतानि पस्पशे इन्द्रभावक्षतः[१६५८]- शम्दके कहते हो रथ जुड़ इन्द्रस्य युज्यः ससा [ १६७1]- विष्णुके कामोको देखो। आनेवाले, सुखदायी दो घोडे इस पज, मित्र और स्तुत्य जिसके कारण सबके कार्य उत्तम रीतिसे चलते हैं। यह विष्ण पनको लेकर भा। इन्द्रका योग्य मित्र है। ४३ [ साम हिन्दी मा २] (३३८) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः १५ सूरयः विष्णोः तत् परमं पद, दियि साततं २८ धीतया मतस्य पथ्या मनु अपसः परि उप चक्षुः इव, सदा पश्यन्ति [१६७२]-शानी लोग विष्णुके प्रयन्ति [१६९४]- मानी सत्य मार्गसे जाकर कर्मको सिधि- उस श्रेष्ठ स्थानको, जिराप्रकार याकाशमें प्रकाशको फलामे- को प्राप्त करते है। वाले विश्वके नेत्ररूपी सूर्यको लोग देखते हैं, उसोप्रकार २९ यां तविपाणि प्रयांसि सदस्थानि, युवो हमेशा देखते हैं। अस्तूय हितम् [ १६९५ ]- धुम्हारे बल और ज्ञान एक १६ विष्णोः तत् परम पद विप्रासः जागृवांस. साथ रहते हैं। तुममें शीघ्रतासे कार्यको समाप्त करनेका विपन्यवः यत् समिन्यते [ १६७३ ]-विष्णुके उस श्रेष्ठ सामर्थ है। स्थानको मानी जाग्रत रहकर स्तुति करनेवाले प्रदीप्त करते है। ३० य शिमी ओजसा पुर। विभिनत्ति [१६९६]- १७ हे इन्द्रः । थापतः त्वा असत् भारे मा जो इन्द्र अपने सामथ्र्यसे शत्रुके नगरोंको तोड़ता है। निरीरमन् [१६७५]- हे इन्द्र। स्तुति करनेवाले मनुष्य २१ त्या न कि नियमत् [ १९७]- सुने कोई भी तुझे हमसे दूर ले जाकर मानन्दित न करें। रोक नहीं सकता। १८ आरात्तात् नः सधमादं आगाह [ १६७५ ]- लिए सू महान् है, और अपने सामथ्र्यसे तू सय जगह ३२ नः महान् योजसा चरसि [ १६९७]- हमारे भले ही सू दूर हो फिर भी वहांसे हमारे यसमें भा। विचरता है। १९ इह सन् उपश्रुधि [१६७५]- यहाँ रहकर हमारी स्तुति सुन । ३३ या उग्रः सन् अनिष्टत. स्थिरारणाय संस्कृतः २० इन्द्रः वृहतीः रायः सं अधूत [ १६७८ - [१६९८] भो उप्रवीर है, और न हारता हुआ यसमें जो इन्द्र बहुत सारा धन हमें देखें। स्थिर रहता है और युद्ध के लिए सदा मैय्यार रहता है। २१ इन्द्रः क्षोणी सं अधूनुत [ १६७८ ]- इन ३४ आशवः विश्वा. द्विपा अपन-त:10.11- हमें भूमि देवे। घेगवान् वीर सब शत्रुओंका नाश करते हैं। २२ वृत्र-हत्येषु चोदय [ १६८३ ]- अपने भक्तोंको ३५ तोशा वृत्रहणा सजित्याना अपराजिता याज शत्रुके वधको प्रेरणा कर। सातमा इन्द्रानी हुवे [ १७०२ - शत्रुओंका नाश करने २३ हे हर्यश्य ! तव प्रणीती सरिभिः विभ्या दुरिता वाले, पुत्रको मारनेवाले, शओको जोहनेपाले, त्यप भरा तरेम [१६८३]- हे उत्तम घोडे रखनेवाले इन्द्र । तेरी जित, भन्न देनेवाले इन्च और अग्निको मे भुलाता हूँ। प्रेरणासे विद्वानों के साथ हम सब पापोंसे मुक्त हों। ३६ इपः आपूणे [ १७०३ ]- भान प्राप्तिके लिए में २४ हे हरीणांस्थातः इन्द्र ! ते पूर्व्यस्तुति शवसा उनको स्तुति करता हूँ। न फि. उदानंश, भन्वना न [ १६८५ ]- हे घोडे रखने. वाले इन्द्र ! तेरो स्तुतिको अपने घलसे कोई प्राप्त नहीं कर कर्मणा सा अधनुतम् [१७०४]- हे इन्द्र और आने । ३७ हे इन्द्राग्नी ! दासपत्नी नवति पुर. एकेन २५ अस्य वयुनेषु उरामथिः पारण. वृकश्चित् नष्ट कर दिया। पासोंके द्वारा रक्षित नम्बे नगरौंको तुमने एक आक्रमणसे ही आभूपति । १६९२ ]- इस इन्द्र के मार्गमें कष्ट देनेवाला और विन डालनेवाला कोई फर भी हुआ तो वह भी इसके ३८ हे भने । पुरः रोजिथ [ १७०३ J- हे अग्ने । अनुकूल होकर इसकी सेवा करने लगता है। तूने शत्रुओंके नगरोंको सोगा। २६ हे इन्दी चिश्या धिया मागाह १६९२] ३९ नातावानं वैश्वानर ऋतस्य ज्योतिषः पर्ति है इन्द्र ! अपनी उत्तम पद्धिक साय तू यहाँ था। अजन धर्म महे [१७०८]- यज्ञ करनेवाले, सब लोगोंका २७ हे इन्द्राग्नी । दिय रोचमा पाजेषु परिभूपया पल्याण करनेवाले, यज्ञको तेजसे रक्षा करनेवाले, जिसे कोई धीर्य तत् प्रचेति १६९३]-है इन्द्र और आने ! पुलोकको बाधा नहीं पहुंचा सकता ऐसे प्रश्वलित अग्निकी हम आराधना प्रकाशित करनेवाले तुम मुतमें विजयी होकर शोभित होते करते हैं। हो । तुम्हारा साम इस प्रकार प्रकट होता है। ४० य इदं यक्षस्य स्वः उत्तिरम् प्रति पप्रथे १७०९) सकता।
अष्टादश अध्याय सामवेदका सुशेष अनुपाद (३३९) - होती है। जो पाके स्वत्वका रक्षण करता है, यज्ञके विघ्नोंको दूर ५ मधी मक्षान [१६७६ - दाहड़की मधुमविषपा करता है, ऐसा यह अग्नि प्रसिद्ध है। जिसप्रकार इकट्ठी होती है, उसीप्रकार (प्रास्ता सचा ४१ भूतस्य मन्यस्य कामः एकः सम्राट् अग्निः आसते) सुति करनेवाले एकत्र ठकर स्तुति करते हैं। प्रियेपुधामसु विराजति [1७1०]-पूर्व उत्पन्न ए और मागे होनेवाले गितको इच्छा करते है, ऐसा अतितीय सम्राट् जाता है, उसीप्रकार( घनेपुः सदः दधिो) लक्जीके ६ पुरि. जनन [१६८९]- नगरमें से मनुष्य अग्नि अपने प्रिय देसे यमके स्थान विरामता है। बर्तन में सोम अपना स्थान प्राप्त करता है। वन- लकडोके बर्तन, सारी गंगलमें पैदा होती है, और लकडोसे सोमपान बनता है मतः लकडीके गर्तनको 'धन' उपमा -जगल कह दिया । अंशके लिए पूर्णका प्रयोग करना येवकी १ सिन्धवा समुद्र इव [ १६६० - जैसे नदियाँ ७ सतिन [१६९.1- पोरके समान प्रेम करने समुद्र में मिलता है, (इन्दया त्या भाविशन्तु ) से हो में सोमरस है इन्द्र ! सुशमें प्रविष्ट हों। लायक (सः सोमः यह सोम है। २ रेयान् च [ १६६५- पनवान् राजाके समान ८ मृगा वारणा दाना न [१६९५ ]-शत्रुको लोजरे- (वृहद् भानुः नः उक्थेभिः शृणोतु) विशेष प्रकाशमान वाले मदोन्मत्त हापौके समान ( पुरुषा रथं दधे) अपने रयको तू अग्गे स्थापित करता है। अग्नि हमागे स्तुति सन । ३ तत् गरेन । १६६६ ]- गायोंको जैसे पास प्रिय ९ छायां इव [१७०६ - नैसे पूपसे तपाहुआ मनुष्य होती है,उसीप्रकार (शाकिने ) शक्तिमान् इन्द्रको ये छापा माकर मानन्वित होता है, उसोप्रकार (ते शर्म स्तोत्र प्रिय लगते है। वयं उप गन्म ) केरे आश्य, हम आनन्दित हों। ४ दिवि आततं चक्षुः इव [१६७२ - आकाश, १० घन्बीय [ १७०७ ]- धनुर्धारी पोरके समान जिसप्रकार प्रकाशमान सूर्य दोसता है, उसोरमार (विष्णोः (यः उग्रः) जो उग्रवीर है। परमं पदं सरयः पश्यन्ति) विष्णुके श्रेष्ठ स्थानको ज्ञानी ११ तिरमगधंसगान (१७००/- तेज सींगोवाले देखते है। बलके समान वह इन्द्र पराक्रमी है। अष्टादशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मधसंख्या ऋग्वेवस्थान देवता गायत्री " १६५८ ६६५९ १६६० . मेधातिपिः काण्यः प्रियमेयश्चागिरसः मेघातिषिः काग्यः प्रियमेयश्चागिरतर मेधातिथि काण्वः प्रियमेषश्चागिरप्त, श्रुतकक्षः सुकलो वा आंगिरसः शुतकक्ष मुकओ का मागिरसः भुतकक्षः सुकमो वा मौगिरसः शुन शेष आजीतिः दा२७ २३ दा९१२२ दा९३२३ ८१९२१९४ १७२० " " । " अग्नि U (३५०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्षिक: मंत्रसंध्या " " १६६६ १६६७ १६१८ " " " " " " १६७० १६७१ १६७१ " " " " १६७३ " 1 १६७६ १६७७ " " " ग्वेरस्यान ऋषिः वधता छन्दः १२२७११ शुन.शेप बाजीगतिः अग्नि गायत्री श२७।१२ सन-शेप आजीगतिः ઉપાશે शंपुर्वार्हस्पत्यः ६४पार शंयुबर्हिस्पत्यः ६४५२४ बांपूर्हिस्पत्यः (२) मेधातिथिः काण्वः विष्णुः श२०१८ मेधातिथिः काण्वः १२२२११९ मेधातिथि: कायः श२२० मेधातिथिः काग्वा १२२२२१ मेधातिथिः काका ११२।१६ मेधातिथिः काण्वः देवा वा ७३२११ घसिष्ठो मंत्रावरणिः प्रगापः- (विषमा महतो, समा सतोहती) ७.३०२ वसिष्ठो मंत्रावगिः ८.२०११ दालखिल्यम् ( आपः काण्वः) ५।५।१० बालखिल्यम् (वायुः काण्वः) ९९८।१० अम्बरीषो धागिरः ऋजिश्वा भारद्वाजश्च पवमानः सोमः अनुष्टप ९।१८।१२ अम्बरीयो यागिर ऋजिश्वा भारद्वाजाच ૧૬૮૭, अम्बरीषो वागिरः सनिश्वा भारद्वाजश्च ७.३२११४ वसिष्ठो मंत्रावरणिः प्रगाथ:-(विषमा यहती, सफा सलोदहली) ७१३२।१५ वरिष्ठो मंत्रावणिः (३) ८२४।१६ विश्वमना श्य उरिणा दाहा विश्वममा वेयरका ८२४१८ विश्वमता वयश्व: १९.१ सोभरी काण्वः अग्तिः काकुभा प्रगाप:-(विषमा सप्समा सतोमूहती) ८१९ सोभरी: काग्य. ९११००१० सप्तर्षयः पवमानः सोमः प्रगाप-1 विषमा बहती, समा सतोयहती) ९.१०७७११ सप्तर्षयः ८६६७ बलिः प्रागाथ: ८६६ कति प्रागाथा विश्वामित्र:प्राणायः गायत्री विश्वामित्रा प्रायाय. ११३८ विश्वामित्रः प्रागामः " १६७९ १६८० १६८१ १६८२ " 19 ६६८३ " १६८५ " " . " १६८७ १६८८ 11 " " " " " १६९४ " " " सामवेदफा सुयोध अनुयाद (३४१) अष्टादश अध्याय] देवता मनसंख्या १६९६ पहली " " " 11 गायत्री पवमानः सोमः " " १६९९ १७०० १७०१ ॥ आयेवस्थान साश मेध्यातिथिः काया साशा मेध्यातिपिः काव्यः ८३३९ मेष्यातिपिशायः (४) ९।६।५ निषिः काम्यपः ९७ निषिः कास्यपः १६३ निधि पाश्यपः २०१२ विश्वामित्रः प्रागाप, १९२१५ विश्वामिनः प्रागापः विश्वामित्रः प्रागापः ६१६७ मरवाजो बार्हस्पत्यः Se भरद्वाजो वाहस्पत्य भरवाजो बार्हस्पत्यः अपर्व, ६३मा अपर्वा ( स्वस्थपनकामा) इमानी " " " १७०३ । " " १७०४ अग्निः " १७०५ 11 " " " ॥ १७७६ १७०७ १७०८ १७०१ ॥ ॥
(३४२)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तराचिका
अधेकोनविंशोऽध्यायः
।
भयाटममपाठके तृतीयोऽधः ॥ ८-३॥
[१]
(१-१८) १ विरुप आंगिरसः, २, १८ अवत्सारः काश्यपः; ३ विश्वामित्रो गापिनः; ४ देवातिथिः काकः ५,८,
१. १६ गोतमो राहगणः; ६ वामदेवो गौतमः, ७ प्रस्कण्यः काण्यः, १० पसुश्रुत मात्रेयः, ११ सरपथका थानेमा
१२ अवस्युरात्रेयः; १३ पुषविष्ठिरायायो१४ बुरस आंगिरसः, १५ अविभीमः, १७ दोघेतमा औचम्यः॥ १,
१०, १३ अग्नि, २, १८ पवमानः सोमः, ३-५ इनः ६,८,११,१४ (१ उत्तरार्धः रात्रिश्च ), १६ उषाः
७, ९, १२, १५, १७ अश्विनौ ॥ १-२, ६-७, १८ गायत्रो; ३, १३-१५ त्रिष्टपः ४-५ प्रगापः- (विषमा
हती, समा सतोबहतो); ८-९ उरिणका १०-१२ पक्तिः, १६, १७ जगती ।।
१७११ अमि प्रनेन जन्मना शुम्भानस्तन्व२५ स्वाम् । कविविप्रेण वावृधे ॥१॥ (ऋ. ८१४४।१२)
१७१२ ऊओं नपातमा हुवेऽमि पावकशोचिपम् । असिन्यो स्वघरे ॥२॥ (ऋ. ८।१४।१३)
१७१३ नो मित्रमहस्त्वममे शुक्रेण शोचिषा । देवैरा मरिस पहिपि ॥३॥ १ (लो)।
[धा०९। उ० नास्ति । स्थ० ४] (ऋ. १४४।१४)
१७१४ उन शुमासो अस्थू रक्षो मिन्दन्तो अद्रिवः । नुदस्व या परिस्पृधः ॥१॥ (ऋ. ९।१३४१)
१७१५ अयो निजमिरोजसा रथसड़े धने हित । स्तवा अबिभ्युपा हदा
॥२॥ १।३३।२)
[१] प्रथमः खण्डः।
[११] (कविः अग्निः ) शानी अग्नि (प्रत्नेन जन्मना ) प्राचीन स्तोत्ररो (स्यां तवं गुम्मानः ) अपने
तेजोमय चारोरो मुशोमित परते हए (विप्रेण घाघे) बाएगों के द्वारा प्रदीप्त किया जाता है ॥ १॥
[१७१२] (ऊर्जान-पातं ) बालशे कम न करनेवाले ( पावक-शोचिप ) पवित्रता करनेवाले प्रकाशसे मुक्त
( मति अग्निरो ( अस्मिन् स्वघरे यो ) इस उत्तम हिसारहित पनमें ( पाहुये ) हम बुलाते हैं ॥ २ ॥
[ १७१३] ( मित्र-महः अग्ने ) हे मित्रों के द्वारा पूग्य भग्ने ! (सः त्य) वह (शुफेण शोचिण) गुरु
मासि पुरत होकर (देयः यहिरि आससि ) देवकि साप इस यश प्रापर बैठ ॥३॥
(१७१४] है ( अद्रियः सोम ) पत्य रोम पूरी जानेवाले सोम ! (ते गुप्मासः ) सेरे यस (रक्षः भिम्दरताः
रासमोरा नारा ते दर ( उदम्शुः ) ऊपर आने है। (याः परिस्पः ) गो मुभावमा परनेवाले सत्र है, चाहे
(नुदस्यपुर
[१७१५] हे मोम! ( भया ओजसा निजप्निा ) इम बलमे दामोरो मष्ट परता है, ऐसे तेरी म
(भषिम्युगदा ) निर्मय अन्तररणमे (रपसंगे हिते) वर पर्भ गरि नष्ट होनेपर (धने स्त) भनी
माप्तिो सिए नुति करते हे ॥२॥
एकोनरिश अध्याय
सामवेदका सुबोध अनुवाद
(३४३)
.
13
२
१७१६ अस्य प्रतानि नाणे पवमानस्य दूदया । हज यात्या पृतन्यति ॥३॥ ( अ ९८६३६३ )
१७१७ ७४ हिन्वति मदव्युतर हार नदीषु वाजिनम् । इन्दुमिन्द्राय मत्सरम् ।।४।। २ (पी)।
(पा० २० उ०१।१०४ ] (म. ९५३६४ )
१७१८ आ मन्द्ररिन्द्र हरिमिर्याहि मयूसोमभिः ।
मात्या के चिनि यमुरिन पाशिनोऽति पन्वेष तार इहि
॥१॥11४५६१)
१७१९ घुत्ररादो बलं रुजः पुरा दो अपामजा!
स्थाता रथस्य होरमियर इन्द्रो दृढा चिदारुजः
॥ २॥ (१९४२)
१७२० गम्भीरा उदधीरिव ऋतु पुष्यसि गा इव ।
प्र मुगोपा यस धेनवो यथा हदं कुल्या इवाशत || ३ || ३ (छा)॥
(धा० १७ । उ०२१ स्व० २] (श ३।११।३ )
१७२१ यथा गौरो अपा कृतं दृष्यन्नेत्यवेरिणम् ।
आपित्ये ना पित्य तूपमा गहि कत्रेषु सु सची पिच ॥ १ ॥ (ऋ. 11३)
(१७१६ ] ( पवमानस्य अस्य प्रतानि ) छाने जानेयाले इस सोमके कसे ( दूकान आवृषे ) दुष्ट राक्षस
प्राति नहीं कर सकते। सोम । (य. त्या पृतन्यति ) जो तुझ पर सेना भेजनको इच्छा करता है, उसे (
[ १७१७ ] ( मदुव्युतं हरि ) आनन्द देनेवाले हरे रगफे ( वाजिनं मत्सरं ) बल और उत्साह बढानेवाले (तं
इन्टुं) इस सोमको ( नदीपु ) पानी ( इन्द्राय ) इन्द्र के लिए ( दिन्यन्ति ) मिलाते हैं ॥४॥
८ १७२८३ है ( इन्द्र) इन्द्र । ( मन्दैः मयूर रोममिः हरिभिः ) यानन्द देनेवाले, मोरके पोंके समान बालो.
पाले घोसे (आयाहि ) यहा यत्तमें या। (फेचित् त्वा ) कोई भी तुझे ( पाशिनःन) जाल डालनेवाले शिकारी
निसप्रकार पक्षियों को पकड़ते हैं, उसीप्रकार ( मानियेमु न पकटे । (धन्येव तान् अति हि । रेगिस्तानके समान
उन्हें छोडकर यहा मा॥१॥
[ १७१९ (इन्द्रः) यह इन्द्र (वृत्र-खादः ) वृत्रका नाश करनेवाला (वलं रुज.) वल राक्षसको छिन्न भिन्न
करनेवाला (पुरां दर्मः ) शत्रुके नगर तोडनेवाला ( अयो अजा) पानीको वृष्टि करनेवाला ( हयाः अभिस्वरे रथस्य
स्थाता) घोडौँके रयमें पंठनेवाला ( दृढाचित् आरुजः ) बलवान् शत्रुको भी हरानेवाला है ॥ २ ॥
[१७९० ] हे इन्द्र ! तू ( (गंभीरान् उदधीन् इव ) गभीर समुदको पुष्ट करने के समान ( फतु पुप्यसि ।
पशका पोषण करता है । जिमप्रकार ( सु-गोशः) उत्तम गोपालक ( गाः इच) गापोंको उत्तम धास आदि देकर पुष्ट
करता है, (यथा धेनवः यवसं प्र) जिसप्रकार गाय घास साती है, अपवा ( फुल्या हदं च आशते ) मदिया जिस-
प्रकार सालायमें मिलती है उमीप्रकार सोम तुझे प्राप्त होता है और पुष्ट करता है ॥ ३ ॥
[ १७२१ ] ( गौरा तुप्यन् ) जैसे हिरण प्यासा होकर( यथा सपारतं हरिण पति) पानीसे भरे हुए तालाबको
ओर जाता है, उसीप्रकार हे इन्द्र! तू (नः न्य) हमारे पास शीग्रही (आपित्वे प्रपित्वे आगहि ) मित्र भावनासे
आ और ( फग्वेपु सचा सु पिय) कयोंके या मंठकर सोम पो॥१॥
सामवेदका सुशोध अनुधार
[ उत्तराधिका
3
३.६
२
३
११
३२
२
१७२२ मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दयो राघोदेयाय सुन्यते ।
आमच्या सोममपिचवम् सुत ज्येष्ठं तदधिप सहा
॥२॥४ (घ)॥
| धा०२१ । उ०४ । स्व०१] (ऋ ८४१४ )
१७२३ स्वमङ्ग प्रशसिपो देवः शविष्ठ मय॑म् ।
न त्वदन्यो मपयनस्ति माईतेन्द्र ब्रवीमि ते वचः ॥१॥ (ऋ १८४१९)
१७२४ मा ते राधासि मा त ऊतयो वसाऽसान्कदा चना दमन् ।
विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वमनि चर्मणिम्य आ ॥२॥ ५ (का)॥
[ धा० २१ । उ० १ । स्त्र. २ ] (11८४।२०)
॥ इति प्रथम खा ॥१॥
[२]
१७२५ प्रति या सनरी जनी व्युच्छन्ती परि त्यमुः । दियो अदर्शि दुहिता ॥१॥( ऋ ४१५२।१ )
१७२६ अधेव चित्रारुपी माता गवामृतावरी । सखा भूदश्चिनोरुषा।
॥२॥ ( ४१५।२)
१७२७ उत सखास्यविनोहत माता गवामसि । उतोषी षस्व ईशिप ॥३॥ ६ (लि)॥
[ धा०९। उ० नास्ति । २. ३ ] ( ४.५२१३)
[ १७२२] हे ( मघवन् इन्द्र ) धनवान् इन्द्र ' ( सुन्वते राधः देयाय ) सोम याग करीवालेको धन देने के
लिए ( इन्दवः त्या मन्दन्नु ) सोमरस तुझे प्रसन्न करें। (चमूतं सोमं आमुष्य अपिवः ) कलशमें रखे गए सोम-
रसको अस्वीरो लेकर पीता है । (तत् ज्येष्ठं सहादधिपे क्योंकि त विशेष बल धारण करता है ॥२॥
[१७२३ ] ( संग शविष्ठ ) हे प्रिय और बलवान् इन्द्र ! (देवः) तेजस्वी ऐसा तू (म] प्रशंसिपः ) स्तुति
करनेवाले मनुष्यकी प्रशंसा करता है । हे (मययन इन्द्र ) धनवान् इन्द्र ! ( त्वद् अन्यः मर्दिता न अस्ति) तेरे सिवाय
दूसरा कोई सुख देनेवाला नहीं, इसलिए ( ते वा अधीमि) में तेरो स्तुति करता हूँ ॥१॥
[ १७२४ ] है ( वसो ) निवासक इन्द्र 1 ( ते राधांसि ) तेरे घन (मलान कदाचन मा दमन ) हमें कभी
नष्ट न करें। (ते ऊतय मा) तेरे सरक्षणके सायन हमारा नाश न करें। (मानुप) मनुष्योंका हित करनेवाले इन्द्र !
(नः चर्षणिभ्यः हम प्रजाजनोंको (विश्या वसाने आ उप मिमीहि ) सब धन लाफर ॥२॥
॥यहां पहला खण्ड समाप्त हुमा ।
[२] द्वितीयः खण्ड ।
[१७२५3 (स्या सूमरी) उस उत्तम प्रेरणा देनेवासी ( जनी ) फल देनेवाली (स्वसुः परि व्युच्छन्ती)
मपनी बहिनके समान रात्री के उत्तरभागमें प्रकाशित होनेपाली ( दियः दुहिता) सूर्यको पुत्री उपा (प्रत्यदर्शि) दोपने
॥ १७२६] (अश्या व चिना) घोडीके समान सुन्दर (यस्पी गया माता) चमकनेवाली किरणोंको माता
(तापरी उषा ) यज्ञ करनेवाली उषा ( अश्विनोः सखा प्रभूत् ) अश्विनो देवोंकी मित्र हो गई है ॥२॥
[१७२७ ] (उत अश्विनोः सखा असि ) और तमश्विनी कुमारोंकी मित्र है । (उत गयां माता मसि)
मौर हिरणोंकी माता है { उत ) इसलिए तू है। उपः) उपे ! (षस्यः शिषे )तू धन पर प्रमुतारती है॥३॥
एकोनयिश मायाय] सामवफा सुबोध अनुवाद (३४५) " M . 13 २३" २ 8.91 . ३ . २४ 3 २ tr १७२८ एपो उपा अपूर्णा म्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुपे वामधिना पृहत् ॥१॥(ऋ. १४६१) १७२९ या दसा सिन्धुमावरा मनोरा रयीणाम् । धिया देवा वसुचिदा ॥२।। (ऋ. ११४६२) १७३० पच्यन्ते को ककुहासो जूायामधि विष्टपि । यद्वार स्यो विमिष्पवाद ॥३॥७(लि)। [N० १४१३० नास्ति । ९०३] (ऋ. १४६३) १७३१ उपस्तचित्रमा भरामभ्यं याजिनीवति । येन तोके च तनयं च धामहे (ऋ. १९२११३) १७३२ उपो अयेह गोमत्यवायति विभावरि । रेवदस्मे व्युच्छ स्तृतावति ॥२॥ ऋ. १९२।१५) १७३३ युवा हि वाजिनीवत्पश्चा५ अवारुणा उपः । अथा नो विश्वा सौमगान्या वह ॥३॥८(हि)॥ [धा०६ (उ० नास्ति । स्व. ३ ) ( १९२०१५) १७३४ अश्विना परिसदा गोमहवा हिरण्यवत् । अप्रिय समनसा नि यच्छतम् ॥ १ ॥ (ऋ. ११९२१६) १७३५ एह देवा मयोभा देखा हिरण्यवर्तनी । उप-धो यहन्तु सोमपीतये ॥२॥ (स. १९२।१८) [ १७२८ (एपा प्रिया अपूा उपाः ) यह प्रिय अपूर्व उषा ( दिया व्युच्छति) घुलोकको प्रकाशित करती है । है ( अश्विनी ) मश्विनीकुमारो यां वृहत् स्तुपे ) तम्हारो बहुतसो स्तुति में करता हूँ ॥ १॥ [१७२९ {या देवा ) को अस्विको देश । दसा शुरू ना करतेमाले सिन्धुमातरा नरियरेको उत्तर करनेवाले ( रयीणां मनोतरा ) पन देनेवासे (चिया पसुविदा ) मुधिपूर्वक कर्म करनेवालोको पन देने वाले हैं ॥ २॥ [ १७३० ] है अभियनौ देषो। (यो रय ) तुम्हारा रप ( जूयां अधि विपि ) प्रशसनीय स्वर्गलोकरें (यत् घिमिः पतास् ) नव पक्षिोंसे ले जाया जाता है, उस समय (घां) म्हारे लिए (फकुहासः वन्यन्ते ) स्तोत्र योले जाते है। [१७११] हे ( वाजिनीति उपः ) पनोंको प्रारम्भ करनेवाली उपे 1 (मस्मभ्यं तत् चिनाभर )हमें यह विलक्षण धन भरपर रे, (येन तोके तनयं च धामहे । जिसको सहायतासे पुत्रपौत्रोंका रसग हम कर सके ॥ १ ॥ ६ १७३२ ] (गोमति ) गासि युक्त, (अध्यायति । घोडोंसे मुक्त, ( मुन्तावति विभाधार उपः ) पशो पुक्त और सेनस्विनी उपे (अद्य) आज यहाँ (असे रेवत् व्युच्छ) हम तु धनमुक्त कर ॥ २ ॥ [१७३३ ] हे ( वाजिनीवति उपः ) पोंको शुरू करानेवाली उपे । ( अरुणान् अभ्यान ) लाल रगके घोडौंको { गघ मुंश्च हि अपने रघमें माज भोज और ( विश्वा सौभगानि न: आवह ) सय सौभाग्य हमें दे ॥३॥ [१७३४] हे । अश्विना ) मश्विदेवो! (दमा) शत्रुका नाश करनेवाले तुम ( अस्मत् पात्रं आ) हमारे परको तरफ मामो - पशालाको ओर मामो । (गोमत् हिरण्यवत् रथ ) गाय और मुवर्णसे युक्त रयको (समनसा अर्याक नियच्छतम् ) मन पूर्वक हमारे पास लामो ॥ १ ॥ ८ १७३५] (उपध.) उप काल में जगनेवाले घोडे (इह सोमपीतये ) यहा सोमपोने के लिए ( दसा मयोभुस) शका नाश करनेवाले और मुख वेनेवाले { हिरण्यवर्तनी देवा ) सोने के रोंवाले अश्विदेवोंको ( भावहन्तु) लावें ॥२॥ ४ (साम हिन्दी भा २]
(३४६)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[उत्तरार्चिकः
१ १२४
२
३३२
१७३६ यावित्या श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रधुः।
आनऊ वहतमश्विना युवम्
॥३॥९ (मा)॥
[घा. २०1 उ०पस्व०१] (ऋ. ११९२।१७)
॥ इति द्वितीयः खण्डः ॥२॥
[३]
१७३७ अमित मन्ये यो वसुरस्त यं यन्ति धेनवः ।
अस्तमर्वन्त आशवोऽस्त नित्यासो वाजिन इप५ स्तोढभ्य आ भर ॥१॥ (ऋ. १।६।१ )
१७३८ अग्रिहि याजिनं विशे ददाति विश्वचर्षणिः ।
अग्नी राये स्वाभुवर सप्रीतो याति पार्यमिपर स्तोतभ्य आ भर ॥२।। (ऋ. ५/६३)
१७३९ सो अमियों वसुणे सं यमायन्ति धेनवः ।
समर्वन्तो रघुगुवा ससुजातासः सूरय इपर स्तोत्र्भ्य आ भर ॥ ३ ॥ १० (घु) ॥
[घा० १६ । उ०४ । स्व.५] (ऋ. १६२)
३२४
8
.
४११०
२
१२
"
रा
३१७
११११
.
२
[ १७३६ ] है ( अश्विना ) अश्विनीकुमारो ! ( यो ) जो तुम ( दिवः श्लोकं ज्योतिः) लोकसे प्रशसनीय
प्रकाश (इत्या जनाय धक्रयः) इस तरह लोगोंके हितके लिए लाते हो, (युवं) ऐसे तुम (नः ऊर्जे आ यहतं)
हमें बल दो ॥३॥
॥ यहां दूसरा खण्ड समाप्त हुमा ॥
[३] तृतीयः खण्डः।
१७३७ 3 (से सि मन्ये ) उस अग्निको में स्तुति करता हूँ (यः वसुः ) नो समको यसानेवाला है। (भस्तं
यं धेनवः यन्ति ) जिसके बाश्रयमें गा जाती है. ( अस्तं आशयः अर्वन्तः ) जिसके मात्रयमें पोडे जाते है ( अस्तं
नित्यासः याजिनः ) जिसके माधयमें नित्यकर्म करनेवाले, हरि पासमें रखनेयाले यजमान जाते है, ऐसा तू (स्तोसुभ्यः
हर्ष आमर) स्तुति करनेवाले हमें भरपूर अन्न दे॥१॥
१७३८] ( अग्निः हि ) अग्नि निश्चपसे ( विशे वाजिनं ददाति) यजमानको पुत्र देता है। (विश्वचर्षणिः
स: अग्निः ) सब मनुप्पोका हल्याण करनेवाला यह अरित (प्रीतः ) प्रसन्न होकर (स्वाभुच पार्य स्वयं सखगनेवाले
(राये याति) पन देने के लिए पशमें माता है। हे आने (स्तोतृभ्यः पं आमर) स्तुति करनेवालोंको भरपूर
बार ॥२॥
[ १७३९ ] ( य. यसुः) जो सबको बसानेवाला है, (यं धेनवः समायन्ति ) जिसके पास गायें मिलकर जाती
है। (रघुद्रुयः यन्तः सं) शीम धाउनेवाले घोडे जिसके पास जाते है। (सु-जातासः सूरयः सं) उतम प्रसिल
विद्वान् जिसके पास जाते हैं, ऐसा ( सा आदिः) वह अग्नि ( गृणे) प्रशसित होता है । हे अन्ने । (स्तोतभ्यः
पं आमर) स्तुति करनेवालों को भरपूर भन्न दे ॥३॥
एकोनविंश मध्याय] सामवेदका सुबोध भनुपाद १ १ ३.31395 ३१३ ३ ३ . १७४० महे नो अद्य बोधयोपो रायै दिविमती । यथा निनो अयोधयः सत्यवसि वाय्ये सुजाते अश्वसनृते ॥१॥ (३.५१७९१) १७४१ या सुनीधे शौचद्रथे व्याँच्छो दुहितर्दिवः । सा व्युन्छ सहीयसि सत्यश्रवति वाय्ये सुजाने अचानवे ॥२॥(. १/७९२) १७४२ सा नो अद्याभरद्वसुर्युच्छा दुहितर्दिवः । यो योण्डा सहीपसि सत्ययवसि वालपे सुजावे अबस्नवे ॥३॥ ११ (१) [धा० १९ व० ११ स्व०५] (१९७९३) १७४३ प्रति प्रियतम र पृषणं वसुवाहनम् । स्तोता वामश्विनागपि स्तोमेभिभूपति प्रति माध्वी मम श्रुत५ हवम् ।।१।। (ऋ. १९७६६१) १७४४ अत्यायोतमश्विना तिरो विश्वा अहसना । दखा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा मावी मम श्रुत५ इयम् ।।२।। (ऋ ५।७।२ ) [१७४०१ (अध ) आज है ( उप ) उपे ! दिविरमती ) प्रकाशयुक्त तू (नामाई राये वोधय ) हमें बहुत धन प्राप्तिके लिए ज्ञानयुक्त कर । ( यथा चिट नो अयोधयः ) जिसप्रकार पहले ज्ञानयुक्त करती थी, उसीप्रकार सत्र भी कर । है (सुजाते अ-श्व सुन्ते ) कुलीन और हमेशा सत्य बोलनेवाली च (पाय्ये सत्यभयसि ) पम्पके पुत्र मत्यषवापर कृपा कर।।१॥ [१७४१३ हे (दिवः दुहित.) चुलोकको काये ! (या)ीत (सुनीधेशौचदथे ब्यौच्छ• ] सुनीप नामक शुचायके पुत्रके लिए प्रकाशित हई, (सा) वह (सहीयसी वाव्ये सुजाते सत्यवसि ब्युच्छ } मति। बलवान् वय्यके सत्य यया नामक कुलीन पुत्र पर अपने प्रकाशरूपी मनुग्रहको फर ॥२॥ { १७३२] है (दिवा दुहितः लोककी पुत्री ! ( सा बसु आमाद् ) वह न हमें धन भरपूर दे, तपा (म: अध व्युच्छ ) हमारे लिए माज प्रकाशित हो। हे (सहीयसि । अत्यन्त दलवालो (या व्योच्छ । जिस तूने अन्ध- तारको पूर किया है, ऐसी हे (सुजाते म-दरसूनृते ) कुलीन और सरा सत्य शोलनेवाली उथे । बाय्ये सत्यभवति) पायके पुत्र सत्या पर मनुग्रह कर॥ ३ ॥ .१७४३ ] ( अश्विनौ । विदेको । (स्तोता झाप ) स्तुति करनेवाला ऋषि ( वां ) तुम्हारे पण वसु- वाहनं ) बलवान और धन दोकर ले जानेवाले (प्रियतम त्य) अत्यन्त प्रिप रषको ( स्तोमेभिः प्रतिभूपति स्तोत्रोंसे सुसोभित करता है । इस कारण है (माधी) मधुविधाको जानने वालो ! (मम हवं श्रुतं ) हमारी प्रार्थना सनो ॥१॥ [१७५४ ] है (मश्विना ) अस्विदेवो! ( प्रत्यायातं ) तुम अन्य यजमानोंको पार करके हमारी तरफ आओ। (आई विश्वाः सना तिर) में अपने सब शमओंको हराम । है (दमा हिरण्यवर्तनी) शका माश करनेवाले और मोनेके रथदाले (सुपुम्मा सिन्धुवाहसा) उत्तम धनसे युक्त और नदियोंमें भी जानेवाले तथा (माध्धी) मधुविधाको माननेवाले मरिषदेवो । मम हय धुत) हमारी प्रार्थना सुनी ॥२॥ * (३४८) सामवेवफा सुयोघ अनुषाद [ उत्तरार्चिकः 198 १७ १३३ १२ ३१३1३ . १ . ११ १७४५ आ नो रत्नानि विभ्रतावश्विना गच्छतं युवम् । रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माघी मम श्रुत५ हवम् ॥ ३ ॥ १२ (वा) ॥ [धा० ३० | उ० नास्ति । स्व०२ ] ( . ५/७५३) ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३॥ [] १७४६ अयोध्यमिः समिधा जनानी प्रति धेनुमिवायतीमुपासम् । यह्वा इव प्र पयामुजिहानाः मानका सस्रते नाकमच्छ ॥१॥ (ऋ. १११) १७४७ अबोधि होता यजधाय देवानों अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात् । समिद्धस्य रुशददाश पाजो महान् देवस्तमसो निरमोचि ॥२॥ (ऋ. १।११२) १७४८ यदी गणस्य रशनामजीगः शुचिरते शुचिभिगोभिरमिः । आदक्षिणा युज्यते वाजयंत्युत्तानामू! अधयज्जुहूमिः ॥३॥ १३ (लि)॥ [धा० १९ । उ० नास्ति । स्व०३] (ऋ. ११॥३) . [ १७४५] हे (अश्विना ) अश्विदेवो ! ( रुद्रा हिरण्यवर्तनी ) तुम शत्रुओंको रुलाने हारे तथा सोने के रथमें बैठनेवाले ( रत्नानि विभ्रता) रनों को धारण करनेवाले { वाजिनीवसू जुषाणा) अन्न और धनोंसे युक्त तथा यज्ञ मानवाले ( युवं भागछतं ) तुम हमारे पास माओ। (मावी । मम हवं श्रुतं ) हे मविद्याके जाननेवालो ! मेरी प्रार्थना सुनो ॥३॥ । यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ । [४] चतुर्थः खण्डः। [१७४६] (आग्न जनाना समिधा अयोधि) अग्नि याजकोंकी समिधासे प्रज्वलित हुआ है। (धेनु इय) गायोंको जिसप्रकार प्रात काल उठाते है, उप्तीप्रकार अग्नि जागृत हुआ है। (आयती उपासे प्रति) मानेवाले उप कालम ( भानवः ) अग्निको ज्यालायें ( वयाँ प्रोज्जिहानाः यहाः इव ) अपनी डालियोंको फैलानेवाले एमके समान (मार्फ अच्छ प्रसन्नते ) अन्तरिक्षको और फैलती है॥१॥ [१७] ( होता अग्निः ) हवन करनेवाला अग्नि ( देवान् यजथाय अयोधि ) देवों द्वारा यज्ञ किए जाने के लिए प्रज्वलित gा है । यह अग्नि (प्रात सुमना ) प्रात काल उतम मनसे (अर्वः अस्यात् ) ऊपर उठ गया है। र समिद्धस्य शत् ) प्रज्वलित हुए हुए अग्निका (पाज अदर्शि) तेजस्वी वल वीखने लगा है। यह (महान दे। तमलः निरमोचि) महान् देव जगत्को अधिकारसे गता है ॥२॥ [१७४८] (यत् है ) अब यह अग्नि (गणस्य रशनां बजीगः ) जन समजायके कार्योम विप्न झाल्नेवाल अधकाररूपी प्रतियपगो निगल जाता है. तम (शुचिः अग्निः ) शुद्ध तेजस्वी अगि (मुचिभिः गामिः ) शुस किरोस (अंयते ) जगतको प्रकट करता है । ( मात् ) उसके बाद (घाजयन्ती दक्षिणा ) यल देनेको इटा करती हुई घोकी मोटो धारा (जुभिः युज्यते ) पक्षपात्रसे संयुक्त होती है । तव (उत्तानां ऊर्मः अधयत् ) ऊपरसे थानेवाली धोकी उस धाराणो यह मग्नि ऊपर उठकर पोता है।" -
.
२९
3.
१
१७५१ समाना
.
३
१
२.
२
3"
२
पर
एकोनपिश अध्याय ]
सामवेदका सुयोघ अनुवाद
(३४९)
१७४९ इदर श्रेष्ठ ज्योतिषां ज्योविरामचिन्ना को अजनिष्ट विम्या।
यथा प्रसूता सवितुः सवाया राज्युपसे गोनिमारैक् ॥१॥(ऋ. ११)
१७५० रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्पस्या !
समानचन्धू अमृते अनूची धावा वर्ण
चरत आमिमाने
॥२॥ (ऋ. ११९२२)
अध्वा स्वस्रोरनतस्तमन्यान्या चरतो देवरिटे।
न
मेधे
न तस्थतः सुमेके नक्तोपासा समनसा विरूपे
॥३॥ १४ (म)॥
[धा० ३० । उ०५ । प०१३ (क्र.१११३॥३)
१७५२ आमात्यनिरुषसामनीकमुद्विषाणां देवया वाची
अस्थुः।
अर्वाचा नून रथ्येह यातं पीपिवारसमश्विना धर्मगन्छ ॥१॥(ऋ. १७६१)
१७५३ न संस्कृतं मिमीतो गमिष्ठान्ति ननमविनोएस्तुतेह ।
दिवामिपित्येऽवसागमिष्ठा प्रत्यात दाशुषे धम्मविष्ठा ॥२॥ (ऋ. १/७६२)
[ १७३९] (ज्योतिषां इदं थेष्ठं ज्योतिः ) तेजावो परायदि सबसे अधिक तेजवाली यह उषा (आगार)
उदय हुई है। (विषः प्रकेत। उसका प्रकाश विलक्ष तेजस्वी ( विभ्या अजनिष्ट) और चारों ओर फैला हुआ है।
( यथा सवितुः प्रसूता रानिः) सूर्यसे उत्पन्न हुई हुई मर्यात सूर्यके डूब जानेसे उत्पन्न हुई हुई रात्री (उपसे सपाय)
उषाको उत्पन्न करने के लिए (योनि आरक् ) अपने बीच में उसके लिए स्थान बनाती है ॥ १ ॥
[१७५० ] ( रशती श्वेत्या ) प्रकाशित होनेवाली श्वेत रगको उपा (मावस्ता भागात ) तेजस्यो सूर्यहर
पुत्रको लेकर बागई है। ( अस्याः कृष्णा सदनानि आरेक्) इस रात्री के काले रगके स्थान है। उपाय रात्री दोनोंका
(समान-यम्धू) के साथ समान बन्धुत्व प्रेम है, (अमृते अनूची ) अमर और क्रमसे एकके पीछे दूसरे आनेवाले है
और (वर्ण मामिमाने ) बोनों एक दूसरेके रंगको नष्ट करनेवाले है, समा (घास चरतः) रोनों हो पुलोल्में
विचरनेवाले है॥ २॥
[१७५१] (स्योः अध्या समानः ) रात्री और उषा वोनों हो बहिनोंका मार्ग एक ही है, और वह मार्ग
(अनन्तः) अन्तरहित है। (तं देवशिष्टे अन्यान्या चरता) उस मार्ग से गुपके द्वारा कहे एके अनुसार एकके पीछे
इसी क्रम चलती है। (सुमेके नफ्तोपासा) उतम कार्य करनेवाली में उपा और रात्री (विरूपे समनसा) पिराद्ध
पचालो होतो हुई भी एक विचारवाली हैं तया कभी भी (न मेयेते) आपसमें झगडा नहीं करतो सपा (म तस्थतुः)
मिर भी नहीं रहवीं । अपने अपने कापोंको करती रहती है ॥ ३ ॥
[१७५२ ] (उपसा अनीकं अनि आमाति) उपाका मुघल्पो पह अग्नि प्रदीप्त हो गया है। इस समय
(विप्राणां देवया वाचः उदस्युः ) शानियों को दिव्य स्तुतिक्ष्य थाणियां शुरू हो गई है। इस कारण (रच्या अश्विना
है रप पठनेपाल पश्यिदेदो! ( अर्थाचा नूनं रह) हमारे पास यहाँ माओ या पपियांसं धर्म अच्छ) पीने
योग्य सोमरसके पास (आयात) आओ।१॥
L१७५३ 7 है मश्विनीकुमारो! (संस्कृतं न ममिमीतः) संस्कार किए गए पदार्थों को लेने से मना मत ।
(अन्ति नूनं इह गमिष्ठा) पास होनेवाले इस पतमें जाओ। (अश्विना उपस्तुता) मश्विनीदेवों की स्तुति की जाती
है। (दिवामिपिरचे) दिनके मात पाल होते ही (अवसा अवर्ति प्रत्यागमिष्ठा) रक्षा करनेवाले मनके साप तुम माते
हो। इस सर वारे शंभाठा) बान रेनेशालेको मुख देनेहाले होतो ॥२॥
(३५) सामवेद्का सुवोध अनुवाद [ उत्तराचिका १3 १३.१२ 3 २ "" ३.२ ३.. ३ 12 १ " १३३ ". १७५४ उता यातरसंगवे प्रावरहो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नतमसा भन्तमेन नैदानी पीतिरश्विना ततान ॥३॥१५ (लो)॥ [धा०२४ । उ० नास्ति । स्व०९] (ऋ.५/७६१२) ॥ इति धतुर्य खण्ड ॥४॥ [५] १७५५ एता उ त्या उपसा केतुमकत पूर्व अर्धे रजसो भानुमञ्जते । निष्कृण्वाना आयुधानीव कृष्णया प्रति गावोऽरुपीर्यन्ति मातरः ॥ १ ॥ ( ऋ ११९२।१ ) १७५६ उदपप्तमरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुपीर्गा अयुक्षत । अनुपासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्त मानमरुपीराशिययुः ॥२॥ (ऋ. १९२२) १७५७ अर्बन्ति नारीरपसो न पिष्टिमिः समानेन योजनेना परावतः । इष पहन्ती सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते ॥ ३ ॥ १६ कि)॥ [धा० २६ । उ० १६ स्व० ३] (ऋ. १९२।३) [ १७५४ ] है (अश्विना) अश्विदेवो! ( अहः संगचे) दिनमें गाय दुहने के समय ( प्रातः ) सोरे (सूर्यस्य) उदिता) सूर्यके उदय होनेपर ( मध्यन्दिने) मध्यान्हमें ( दिया ) दिनमें (नक्तं ) रात्री अर्थात् हमेशा (शंतमेन अयसा) सुसदायर रक्षणाचे साधनोरे साप ( आयातं ) आभो । ( उत) वर्णोकि (इदानी पीतिः न नतान ) मभी सोम पीनापुर नहीं हुआ है। ३ ॥ ॥ यहां चौथा सण्ड समाश हुमा । [५] पशम. पण्डः। [१७५५] (स्या एता उपसः ) वे ये उपाय (पेतु गमत) पराश परती है। (रजसा पूर्व अर्धे मार्नु अंजते ) अन्तरिक्षरे पूर्व में प्रयास हो गया है। (धृष्णव. आयुधानि स्य) वीर लोग जैसे दास्त्र तोषण करते है, उसीप्रसार (निएण्यानाः) अपने प्रकासे जगतको प्रकाशित करते हुए (गायः) गमन परनेवासों तया (माव। अपी: ) जगतो माता परत उपाएँ (प्रति यन्ति । प्रतिदिन भाती हैं। [१७५६] (HI भानय' ) अरण गरी किरणे (पृथा उदपप्तन् ) सरलतासे ही ऊपर भाई है। (स्यायुजः मरूपी: गाः मयुक्षत) त्वय ही गुग्णानेपाले यसरिरण-रपर्मे जोरे गए हैं। (उपासा पूर्वथा ययु नानि मप्र ) उपार्षे पहले मानरा प्रसार करती हैं। बारम ( अदपी. नसतं भानु अभियुः) प्रथा परनेवाली ग्या तेजस्वी पूर्वकी सेवा करने लगी। २॥ [ १७५७] (सरते सुदान) करनेवाले और उत्तम रान देनेवाले ( सुग्यते यजमानाय ) सोमरस निसासनेवाले पम्मानको ( विभ्या व माह यादन्ती.) पात मान देनेगमी (नारी उपास्पोरित्र (विरिमिा) मनो किराँस (समानेन योजनेन)समान पोजनासे (परायन' आ मर्यन्ति ) दूर देगरी मागायो पुपरमाती है।(मपसम) मिगार पर करनेवाले और अपने शोरो रणभूमिमें मुगार मनाते हैं. मोरार पायें मानाशाली मुगामाती
एकोनविंश अध्याय ]
सामवेदका सुयोघ अनुवाद
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१७५८ अयोध्यामिम उदेति स्यों व्यूपाश्चन्द्रा मद्यायो अचिंपा।
आयुक्षावामश्विना यावचे स्यं प्रासादिवः सविता जगत्पृथक् ॥ १॥ (5. १३१९७१)
१७५९ पद्युञ्जाथै वृषणमधिना रथ घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम् ।
अस्माकं मम पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसावा मजेमहि ॥२॥ (ऋ. ११११७२ )
१७६० अर्वाङ् विचको मधुवाहनो रथो जीरायो अश्विनोर्यातु सुष्टुतः ।
त्रिवन्धुरो मघवा विश्वसौभगाशं न आ पक्षद्विपदे चतुष्पदे ॥३॥ १७ (छा) ॥
[ध० ११ १२ १३०२ (ऋ. १११५१३ ।
१७६१ प्र है धारा असवतो दिवो न यन्ति वृष्टया । अच्छा पाजप सहस्रिणम् ॥१॥
(१९१७)
१७६२ अभिप्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्पति । हरिस्तान आयुषा
(ऋ.९१५७१२)
१७६३ स मर्मजान आयुमिरिमी राजेव सुनतः । श्येनो न परसु पीदति ।। ३ ।। (ऋ. ९१५७१३ )
[ १७५८] (अमिज्मा अयोधि) अग्नि अपनी वेदीमें प्रदीप्त हुआ है। (मही उपाः अर्चिपा चन्द्रा वि
भायः मही उषा अपने तैनसे लोगोंको भानन्द देती हुई प्रकट हुई है। हे (यश्विना ) अश्विदेवो! (यातवे रथ
मायुक्षातां ) पगमें जानेके लिए अपने रथको जोडो । ( सविता देवः) सर्य देव ( जगत् पृथक् प्रासापीत् ) जगत्के
सम प्राणियों को अपने अपने पतंय लगता है ॥ १ ॥
६ १७५९ हे ( अश्विना ) अश्विनीकुमारों। (यत् वृषण रथं युम्जाथे) जर तुम अपने बमवान् रथको
जोडते हो, तर नक्षत्रं ) हमारे क्षत्रियोंको (मधुना एतेन उक्षतं ) मोठे घोसे पुष्ट करो। ( अस्माकं पृतनासु
ब्रह्म जिन्वत) हमारी प्रजाओंने भानको वृद्धि करो। (घयं शूरसातौ धना भजेमहि ) और हम मुद्ध, पनको प्राप्त
[१७६० ] ( भश्विनो रथः अर्याक् यातु ) अयिनीका रय हमारे पास आये । (विचक्रः मधुपाहनः तीन
पाहियोंवाला मौर मीठे ममतको धारण करनेवाला (जीराश्वः सुपुतः) जल्दी चलनेवाले घोडे जिसमें जुते ४ए है, और
जिसको उत्तम स्तुति होती है, ऐसा (त्रिवन्धुरः मघवा विश्वसौभगः ) तोन मेठको पालम, मनसे भरा मा तपार
सौभाग्यसे युक्त रथ (नः द्विपदे चतुष्पदेशं धायक्षत्) हमारे दुपाय और चोपार्योंके लिए सुख लेकरमावे ॥ ३ ॥
[ १७६१ ] हे सोगा (ते असश्चता धाराः) तेरी न बन्द होनेवाली पाराम (सहक्षिण पाज अच्छ
प्रयन्ति) हजारों तरहरे अन्न हमें देती है। ( दिवः पृष्टय न) नेते एलोकसे पुष्टि होती है, उसीप्रकार तेरी पाराय हम
पर मालकी पुष्टि करती है॥१॥
[५७६२1 (हरि) हरे रगका सोम (विश्वा प्रियाणि काव्या पक्षाणा ) सब प्रिय कोको देखते हुए
(आयुधा तुंजानः) आयुधोंको शत्रुओंपर फेंकते हुए ( अभ्यर्पति) आगे नाता है॥२॥
[ १७६१ 3 (सुमतः सः) उत्तम कर्म करनेवाला वह सोम (आयुभिः मर्मुजानः मा राजा इव ) ऋत्विों
are शुद्ध होता हुआ निर्भीक राजाके समान धौलता है और (इयेनः म ) श्येन पोके समान (पंसु सीदति । सानोमे
मिलाया जाता है॥३॥
(३५२) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तराचिंका १७६४ स नो विश्वा दिवो वरतो पृथिव्या अघि । पुनान इन्दवा भर ॥ ४ ॥ १८ (ती) ॥ [धा० १४ । उ०१। स्व०४ ] ( ९।५७१४) ॥ इति पञ्चम खण्ड, ॥५॥ ।। इति अष्टमप्रपाठके तृतीयोऽयं ॥ ३ ॥ अष्टम प्रपाठकरप समाप्त ॥८॥ ॥ इस्यकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥ १७६४ ] है (इन्दो ) सोम । (पुनानः) शुद्ध होनेवाला (सः) यह तू (दिवः अधि) घुलोकमें ( उत पृथिग्या' ) और पपियोपर रहकर (विश्या वसु नः आभर ) सब धन हमें भरपूर दे ॥ ४ ॥ ॥ यहां पांच सण्ड समाप्त हुआ। इत्येकोनविंशोऽध्यायः॥ । एकोनविंश अध्याय अध्यायमें उथा, सविनो, इस सौर सोम देवताओंका रखनेवाली उप ! हमें वह धंष्ठ पन दे, जिसको सहायताले वर्णन है। उनमेसे उपादेयतारा वर्णन इस प्रकार है हम पुत्रपौत्रोंका उत्तम पोषण कर सकें। उपा देवता ७ अभ्यापति गोमति सन्तायति विमापरि उपः । १ स्या सूनरी दिया दुहिता प्रस्पदशि, जनी गायोसे एकत, पक्ष परनेपाली प्रकाशमान गर्थे । भान महो अद्य इह असे रेवत् व्युच्छ [ १७३२]- हे घोरे और स्यमुः परिम्युच्छन्ती (१७२५/- वह उपा उत्तम प्रेरणा हमें पनसे मुक्त करके प्रकाशित कर। करनेवाली सूर्यको पुत्री दोसने लग गई है, उसके प्रको ८ हे याजिनीयति उपः ! अरुणान् सध्यान अप शाहरवाली रात्रीपो बहिन बादमें चारों ओर से प्रकाशित युन, विश्या सीमगानि नः मा यह [ १७५५) हे होती है। भासको अपने पास एसनेपाली उप अपने पास गरे २ मश्या प चित्रा, भरूपी गयां माता, प्रतापरी पोरे मोर और सब सौभाग्य हमें है। उपा अश्विनो सखा भभूत् [१२]- घोडीरे समान ९ हे सुजाते अ-य सूनुते ! दिपिमती नामदे मुम्बर, चमहनेवाली रिरणारी माना, यहको प्रेरक रपा राये पोधय यथा चित् नः अयोधपः [ १७४० ]-है मसिनो मित्ररे समान हो गई है। अश्विनी प्रात राल उत्तम गुसमें जन्म लेनेवाली, माग पतको परनेवाली पोलते है, समिए पा रनको मित्र है। उप्रमामायुक्त होगर मन पन प्राप्तरका ३६ उपः । यस्य शिरे १७२७ 1- है ! मागं बता, ताकि तूने पहले भी बताया था। परती स्वामितीहै। १०दे दिपा दुहिता ! सा भामरद पसु ना भय ४ गो माता मपि [ १७२७ - प्रकाश किरणोरो युग्छ {१७४२]- है प्रलोरी पुत्री उपे ! भरपूर पर उतरावी उनकी माता है। बनवाली होकर हमारे लिए प्रमा ५ पगनिया मापी उपादिया प्युपाति (१७२८] १ज्योनि द ग्रेट ज्योमिः थागार यह कि पूर्व मा मोरको प्रकाशित करती है ! प्रोन विम्या भमनिष्ट १७11-रवी पायाम ६ यामिनीपति! मम्मम्या चित्र भामर निप यानी सा सप होगा। सा xex mm पेन नोसन च धामद शमन्न पाम नारा है।
एकोनपिंश मण्याय] सामघदया सुबोध मनुवाद (३५३) १२ उपसां मनीक असिमामाति, यिमाणां देयथा ४ हे अश्यिना ! यी दियः लोके ज्योतिः इत्था पाच- उदस्थ [१७५२]- उपापा मुषल्पो भनि प्राप्त जनाय चमतुः, युधं न कर्जे मावहतम् [१७३६]-है हो गया है, बाह्मणोंका विष्य मंत्र घोष शुरू हो गया है। अश्विनी ! जो तुम आकाशसे प्रशंसनीय प्रकाशको इस प्रकार १३ स्या पता: उपसः केतुंफन, रजसः पूर्ये अर्धे लोगोंकि हिसके लिए साते हो, ऐते तुम हमें यल यानेयाले मार्नु अंजते, निप्पधानाः मातरा उपस प्रति यन्ति हो। । १७५५ - यह यह उपाका प्रकाश फलाहा है अन्तरिक्षको ५ हे दना हिरण्यवर्तमी सुपुला सिन्धुवाहसा पूर्व दिशा अपमें प्रकाश हो गया है। अपने प्रकाशसे जगत्को माघी ! मम इयं श्रुतं [ १७४४]- हे शके नारने- प्रकाशित करते हुए यह माता उपा प्रतिदिन जाती है। पाले, सोनेके रपमें चंदनवाले, उत्तम धन पासमें रखनेवाले, उषा सूर्यको अपवा पुलोमकी पुत्री है। उसकी पहिन देशो! हमारी प्रार्थना मुनो। मवियोंसे जानेवाले और मधु विधाको जाननेवाले अविषनौ रानी है। वे दोनों क्रमश: एकके पीछे दूसरो भाती है। उपा रोखने में सुन्दर है, क्योंकि वह प्रकाशवाली है। प्रकाशके ६ मश्विना । मुद्रा हिरण्यवर्तनी चाजिनीवसू किरणोंको यह माता है। उपारो हौ प्रकाशको किरणे निकलती जुपाणा युयं मागच्छतम् [१७४५] - हे मश्विना देयो! है। आकासको पूर्व विशाके माय भापमें उसका लाल प्रकाश तुम शत्रुको इलानेवाले, सोने के रप पर ठनेयाले, मार और रोमने मगता है । वह उपा ही होती है। यह करनेवाले हदि. धन पासमें रखनेवाले और पशमें आनेवाले हो । तुम हमारे प और मन्न लेकर मीनकी सेवा करने के लिए संप्पार यतम माओ। होते हैं, उस समय उप काल होता है। ७ दियामिपित्वे अवसा अयति प्रत्यागमिष्ठा, दाशुषे उपकास होते ही गाय और घोरे घर के लिए छोड दिए शंभविष्ठा { १७५३ ]- दिनके प्रारम्भ होते ही अनके साथ जाते हैं। यनशालामें पाक पश करनेकी पारी करते हैं, तुम माते हो। इसलिए पान देनेवालोंको सुत्य देनेवाले वेदपाठियोंका वेदपाठ शुरू हो जाता है। मान प्रदीप्त किया तुम होयो । माता है और न प्रारम्भ होते है। ८हे अश्विना । महा सम्भव प्रातः दिवा नक्तं यह सुन्दर वर्णन उषाका इन मंत्रो माया है। उप काही शंतमेन मवसा पायातं ( १७५४ - हे अश्विदेवो । मश्विनी (नक्षत्र)चस्प होते हैं, इसलिए उपाको अश्विनोको दिनमें गाय दुहने के समय प्रात काल दिनरात सुख देनेवाले संरक्षण सापक साप माओ। सहेली बताया है। ९ भविनोः रथः सर्वा यातु, विचमाः मधु- अश्विनी चाहनः जीराश्वः सुष्टुता, त्रिवन्धुरा, मथचा, १ उन्ना सिन्धु मातरा त्यांना मनोतरा चिया विश्वसौभग नः द्विपदे चतुष्पदे शं आयक्षत् [१७६०] घमुधिदर [ १७२९]- में अश्विनी वेप सफा नाश - अश्विनौका रप हमारे पास आधे । तीन पहियोवाला, मोठे करनेवाले, मरियोंको उत्पन्न करनेवाले और परिपूर्वक कार्य राको धारण करनेवाला, तेज दौडनेवाले घोडोंसे युक्त, करनेवालोंको पन देनेवाले है। जियको उत्तम प्रशमा होती है, ऐसे तीन कोवाला, धनरो २ या रया पूर्णायां अधि विष्टपि, यत् विभिः भरा हमा, सब सौभाग्यसे मुक्त रप हमारे विपाद और चौपायाको पतात पां ककुहासा पच्यन्ते [ १७३० ]- तुम्हारे रथ प्रशंसनीय अन्तरिक्षम जब पक्षियों द्वारा ले जाये जाते है, अश्विनौ शत्रुओं का वध करते है, पन देते है, मन लगाकर उस समप तुम्हारे लिए स्तोत्र पहे जाते हैं। कार्य करनेवालों को ऐश्वर्य देते है। उनका विमान अन्तरियामें ३ हे अश्विना । दना अस्मत् चर्ति आ। गोमत् भी भाता है, उस समय उस रप पक्षो जोडे जाते है। हिरण्यवत् स्यं समनसा अर्वाफ् नि पच्छतम् गोरस-घी और दूधप्तश सोना इनके रथ में होता है। लोगों के [१७]-हे अश्विनो ! शत्रुका नाश करनेवाले तुम हमारी यल यकानेवाले पदार्थ इनके रपमें होते हैं । इनका यह एप यशालाको ओर भामो गाय और सोनेसे युक्त अपते रथको सोनेका अर्थात् सोनसे महा हुना है। अपने पराक्रमसे शत्र- रिपूर्वक हमारे पास से यायो। ओंको इलाते है, अन मोर घनको अपने रथम रखते है । ये ४५ साम हिन्दी भा.२] (३५४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उतपर्चिक राघरे गाय दुहने के समय दिनरात अपने कल्याण बारनेके नि यस कम न करनेवाला है । शरीरमें अग्नि उष्णताके साधनों के साथ रोगियोंके पास जाते है और उनका इलाज स्पर्म रहता है । उसके रहने तक हो शरीरमें बल बढाता करते है । इनके रयम तोन पहिए और तीन मैठनके स्थान है। जीवन एक यज्ञ है उस जीवन यज्ञका आधार शारीरको है। इनके पाप्त सबके मारोग्य पाने के सापन है। उष्णता है। सब इन्द्रियोंमें देवोंके अश रहते हैं। उन देके अग्नि साप अग्नि यहाँ रहता है, और पारीर चलता है । परीरमें १ ऊजों-न-पातं पाकशोचिषं अग्निं अस्मिन् असमर्थ हो जाता है । गर्मी कम हुई कि देव निकल जाते हैं और पारीर कार्य करनेमें स्वध्वरे यो माटुथे [ १७१२ ]- बल कम न करनेवाले, प्रकाशसे युक्त अग्निको उत्तम हिंसारहित यत्तमें हम बुलाते हैं। यह मग्नि सशस्तियोंका नियासक है । उसमें गापका २ मित्रमह. अग्ने ! शुक्रेण शोचिषा देवैः यहिपि दूध और पोका हदन होता है । दूसरे हवनीय पदार्थ भी आससि [ १७१३ 1- हे मित्रों द्वारा पूज्म आने ! वह वाला अनि है । हवनके लिए साये जाते हैं। सब मनुष्योंका कल्याण करने तू शुद्ध ज्वालामोंसे युक्त होकर देवोंको अपने साथ लेकर यह मग्नि समिधाओसे जलाया जाता है और गारमें उसमें वासन पर मेह ३ यः वसुः । अस्तं यं धेनपः यन्ति, मस्तंभाशयः सबेरे अग्नि प्रदीप्त किया जाता है। वह प्ररोप्त होते ही हष्य पदार्थोंका हवन किया जाता है। यज्ञ स्थानमें समरे थर्वन्तः [ १७३७ ]- अग्नि सबको बसानेवाला है, उसके अपनी ज्वाला अन्तरिक्षमें फैलने लगता है। साश्रयमें गायें रहती है और उसके याधयमें पोडे भी रहते हैं। ४ विश्ववर्षणिः अग्निः प्रीतः स्वाभुवं वार्य राये अग्नि महान् देष है । यह बन्धकार दूर करता है और याति [ १७३८ ]- सब लोगोंका कल्याण करनवा प्रकाश फैलाता है। अपने प्रकाशसे सब जगह शुद्धता करके प्रसन्न होकर सनसन करनेवाले पर देने के लिए पशमें सब मनुष्योंका कल्याण करता है। जाता है। ५ अग्निः जनानां समिधा अयोधि [१७४६]- अग्नि १ हे इन्द्र ! मन्द्रः मयूररोमभिः हारभिः आयादि वानरोगी रामियामंसि प्रदीप्तहमा है। [१७१८]- हे इन्द्र मानन्द देनेवाले मोरके पसके समान ६ आयी उपासं प्रति भानया वयां प्रजिहाना गदाले यालोरे युक्त पोति द्वारा पहा सा यहाइय नाकं मच्छ प्रसन्नते [१४]- आनेवाले २ फेचित् त्यामा नियेमुः धन्वेष तान पति रहि उप वालमें अग्नि,जिसप्रकारपेड अपनी गलियोंको भाकाम [१७१८]- कोई भी तुझे योच, न रोके, जैसे मनुष्य रेगि. फैलाता है उसीप्रकार अपनी व्यासामोंको अन्तरिम फैलाता स्तानको जल्दीसे पार कर जाता है, उसीबार भी उन्हें है। मणिके जलते ही उसकी ज्याला, बृदाको शाखाक सीनता पारो बा। समान, मतरिम फैलती है। ३ इन्द्रः प्रसादः, यलं राजा, पुरां पा रहा- ७ अग्निः देवान पजाय अयोधिमातः सुमनाः चित् मारना, हयो अभिस्परे रथस्यस्थाता१९] ऊपी अस्थात् । समिरस्य शत् पाजः अदर्शि। - वृत्रका नायर, यस राक्षसका विनाशक, पत्रके मारों- महान देयः तमसः निरमोचि [१७४५]- अग्नि देयोंकी को तोडनेवाला, मजबूत रानोको हरानेवासा मोर पोकि पूजा करने के लिए प्रदीप्त हुभा है । सबैरे सवरे उत्तम मनसे रपमें बैठनेवाला है। उपर उठा है। प्रबलित हुए हए अग्निहा तेजस्वी बाप्त ४ ऋतुं पुष्यसि, सुगोणः [ १७२० - यतका पोतने लग गया है। यह महान रेव भगतणे अपकारसे पोषण करता है और त पापोवा उत्तम पालन करनेवाला है। ५हे मघवन् ! हेन्द्र! स्वस् अन्यः मरिता ८ शुचिः निशुचिभिः गोभिः भक्ते (१७४८]- नास्ति । १७२३ - हे पमवान् ! रेटिना रात पर यनिमुर किरणसि जगतको प्रभावित करता है। पाला दूसरा और कोई नहीं है। ९ मत मा अपोधि [ १७५८]- मान देवी, ६हे यसो! हे राधांसि मस्मान् पदाचन मा प्रालित हो गया है। नमन । १७२४]- हैरे पन हमें भी भी नष्टमार।
एकोनविंश अध्याय सामवेदका मुयोध मनुयाव ७ ते ऊतयः मा दभन् { १७२४]-तेरे सरक्षणके ७ सुयतः सामायुविक मर्मज्ञानः हमा राजा श्व साधन हमारा नाश न करें। वंतु सीदति [ १७६३ - उत्तम कर्म करनेवाला पह सोम ८ नः चर्षणिभ्यः विश्वा यस्नि आ उप मिमीहि ऋत्विक द्वारा शुद्ध होता हुआ राजाके समान दोषता है, [ १७२४ ]- हमारी प्रजामको सवयन भरपूर लाकर रे। पादमें यह पानीमें मिलाया जाता है। इन्द्र सुन्दर सपालसे पुक्त घोडोंवाले रपमें बैठकर यशके ८ हे इन्दो! पुनानः दियः अधि उत पृथिव्याः स्थान पर माता है । इन्न अत्रका वध करता है, बल रावासको विश्वा पसु नः आभर [ १७६४ ]- हे सौम ! शुद्ध होता मारता है । शत्रुके नगरों को तोडता है । जो सामथ्र्यवान् गा हा तू घुलोक मोर पग्वीलोक पर रहकर सब मन हमें है उन्हें वह हराता है । गाय और घोडौंका पालन करता है। भरपर दे। इनके सिवाय दूसरा कोई भी सप बेवाला नहीं। इन्द्र सोम पत्यसे कूटा जाता है, फिर उसका रस निकाला लोगोंको अनेक प्रकारके धत देता है और उन्हें पडा बनाता जाता है । उस समय उसका प्रकाश बाहर पडता है और है । सबका यह संरक्षण करता है और सबको निर्भय बनाता उससे अषकार दूर होता है। यह सोम अपने सामयंसे योरोंमें है। इस प्रकार वह सब लोगोंका कल्याण करता है। अपरिमित उत्साह उत्पन्न करता है। उसके द्वारा सब शोशो सोम दूर करता है। द्वेष करनेकार्लोका नाश करता है। १ हे अद्रिवः सोम ते शुष्मासः रक्षः भिन्दन्तः सोमरसको पानी मिलाते हैं। इसकी धारा अनेक प्रकारसे उदस्युः, याः स्पृधः मुदस्स [१७१४]- हे पत्थरोंसे पाटे थान देती है । सोमरस अन्नका काम देता है । क्षप्रिय योर इसे जानेवाले सोम तेरे सामथ्र्य राक्षसोंका नाश करते हुए पोते है और उत्साहित होकर शव पुट करते हैं और मन्तमें अपर प्रकट होते है । मुकाबला करनेवाले नो पाम है उन्हें विजयी होते हैं। सोमरसको पानी मिलाने के बाद मानते हैं। ऐसा तैम्पार किया गया रस पायोपरके सम ऐश्वर्य देने में २ अया ओजसा निजन्निा, अयिभ्युपा हदा रथ- समर्थ है। संगे हिते धने स्तवै [ १७१५]- जिस अपने बलसेतु "सोम स्वयं शत्रुपर शास्त्र फेकता है"ऐसा वर्णन माल- माओंका नाश करता है, उस वलको निर्भप हदपसे रपके कारिक है। बोर सोमरस पोकर उत्साहित होकर सत्र पर मुरमें को नष्ट करने के बाद प्राप्त करनेके लिए मै तेरी शस्त्र फेरते है और विजय प्राप्त करते है । सोमफा यह बाल. स्तुति करता हूँ। पारिक वर्णन समझना चाहिए, नहीं तो पर्यका अनर्थ होना ३ पवमानस्य अस्य प्रतानि दूज्या न आधृषे, यः सम्भव है। त्या पृतन्यति, राज [१७१६]- छाने जानेवाले सोमके फर्मोसे दुष्ट राक्षस प्राति नहीं कर सकते। हे सोम! जो तुझ पर सेना भेजने की इच्छा करता है उसका नाश कर। ४ मदच्युतं हरि वाजिनं मत्सरं त इन्दु नदी सुभापित इन्दाय [ १५१७]-आनन्द देनेवाले हरे रंगके, बल बढाने- पाले और उत्साह बतानेवाले, प्रमानेयाले सोमको नबोके १ कविः अग्निःप्रत्नन जन्मगावां सन्नं शुम्भाना पानी में मिलामो और यह इस इनको दो। विप्रेण वावृधे 31- ज्ञानी अग्नि पुराने स्तोत्रों ५ ते असश्चत धाराः सहस्रिणं घाज भन्छ अपने शरीरको शोभा यातामा मोके धारा मई प्रयन्ति [ १७६१ - तेरी न पमलो हुई महनेवाली पारा सुनियोंसे यहता है। बाह्मण यन्निको प्रदीप्त करते हैं और स्तोत्र घोलकर हवन के द्वारा उसे बढाते है। हमा प्रकारके अन्न हमें देती है। ६परिविभ्या प्रियाणि काश्या यक्षाण, बायुधा शानी पुरुष सपने शरीरको सुन्दर बनायर मानसे अपनेको तुजानः सम्यति { १७१२-हरे रंगका सोम सर्व प्रिय माता है। यात कर्मको देशमा हुआ, स्तुति सुनता हा मौर शास्त्रोको २ ऊर्जा नपातं पापकशोचिषं अनि अस्मिन् स्व. शत्रु पर फेंकता हुमा मागे जाता है। दरे यो माहुये [२]- बाल कम न करनेवाले, - * (३५४) सामवेरफा सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिकः - सबेरे गाय दुहने के समय दिनरात अपने कल्याण करने के साग्नि बल कमन करनेवाला है । शरीरमें अग्नि उष्णताके सापनोंके साथ रोगियोंके पास जाते है और उनका इलाज रूपमें रहता है। उसके रहने तक ही दारीरमें बल बढाता करते हैं । इनके रपमें तीन पहिए और तीन ठनके स्थान है। जीवन एक यत है उस जीवन यज्ञका आधार शरीरको है। इनके पास सबके बारोग्य बढ़ाने के साथन है । उष्णता है । सब इन्द्रियोंमें देदोंके मश रहते हैं। उन देयोंके अमि साय अग्नि यहाँ रहता है, और शरीर चलता है। रोरमें १ ऊों-न-पात पावकशोचिषं अग्निं अस्मिन् असमर्थ हो जाता है। गर्मी कम हुई कि देव निकल जाते है और शरीर कार्य करने में स्वध्वरे यज्ञे बाहुये [ १७१२ - दल फम न करनेवाले, प्रकाशसे युक्त अनिको उत्तम हिसारहित यज्ञमें हम भुलाते हैं। यह अग्नि सद शक्तियों का निवासक है । उसमें गायका २ मित्रमह अमे। शुक्रेण शोचिषा देवैः वहिषि दूध और घीका हवन होता है। दूसरे हयनीय पार्ष भी आसत्सि [ १७१३ ]- हे मिौके द्वारा पूज्य मग्ने ! यह बाला अग्नि है। हवन के लिए लाये जाते हैं। सब मनुष्योंका कल्याण करने तू व ज्वालाओंसे युक्त होकर देवोंको अपने साथ लेकर आसन पर यह अग्नि समिधामोंसे मलाया जाता है और बाद में उसमें ३ य. यसु. । मस्तं यं धेनवः यन्ति, अस्तंभाशयः सबेरे अग्नि प्रदीप्त किया जाता है। यह प्रदीप्त होते हो हय पदापोंका हवन किया जाता है। पर स्थानमें सबेरे अब-त. [ १७३७ ]- अग्नि सबको बसानेवाला है, उसके अपनो ज्यालायें अन्तरिसमें फैलाने लगता है। आप्रय गा रहती है और उसके आश्रयम घोडे भी रहते हैं। ४ विश्वचर्षणिः अग्निः प्रीतः स्थाभुवं वार्य राये अग्नि महान् देव है । यह अन्धकार दूर करता है और प्रकाश फैलाता । अपने प्रकाशसे सब जगह सुखता सके याति [१७२८]- सब लोगोंका कल्याण करनेवाला अग्नि प्रसन्न होकर सनसन करनेवाले घन देने के लिए यह सब मनुष्योका कल्याण करता है। जाता है। ५ अग्निः जनानां समिधा अयोधि [१७४६]- अग्नि १हेन्द्र ! मन्द्रःमयूर रोमभिः हरिभिःआयाहि याजकोही समिपार्योरी प्रदीप्त हुआ है। [१७१८]- हे इन्द्र । आनन्द देनेवाले मोर पखके समान ६ आयती उपासं प्रति मानयः रयां प्रोजिहाना रगवाले यार्लोस युक्त घोडके द्वारा यहाँ मा। यहाइय नाकं गच्छ सनते । १७४६]-भानेवाले २ केचित् त्या मा नियेमुः धन्वेव तान् अति दहि उप पालमें अग्नि,जिसप्रकार पे अपनी गलियोंको भाकामे [१७१८)- कोई भी दुप्से घोचमें न रोके, जैसे मनुष्य रेगि फलाता है उसीप्रसार अपनी ज्वालाओंको अन्तरिक्षम फंसाता स्तानको जल्दीसे पार कर जाता है, उसोप्रकार : भी उन्हें है। अग्निरे जलते हो उसको पालाये, वृक्षको शाखाक चोप्रतासे पार करके आ। समान, मतरिक्ष पलती है। ३ इन्द्रः पृप्रसादः, पलं रजा, पुर वर्मा, एटा ७ अमित देयान् यजथाय अयोधिसभातः सुमना. चित् आज, हयो. अमिरे रथस्य स्याता ऊर्च अस्थात् । समिक्षस्य रुशद पाया अदर्शि। व वृधका नाशक, बल राक्षसका बिनाक, पात्रुके मारों- महान देवः तमसः निरमोचि [१७१७]- अग्नि देवोंको को तोडनेवाला, मजबूत शाओं को हरानेयाला और घोगकि पूजा परने के लिए प्रदीप्तहमा है। सबेरे सवरे उत्तम मनसे रपमें बैठनेवाला है। कार टा है। प्रवलित हए हर मनिरा तेजस्वी यल ४ ऋतुं पुप्यास, सुगोपाः [ १७२० ]- सू पाका शीखने लग गया है। यह महान देव जगत्को अन्धकारसे पोषण करता है और गायोंराउतम पासन करनेवाला है। मुग्नता है। ८ शुचिः अग्निः शुचिभिः गोमिः मंपते १५४८- नास्ति [१३]है पनवान् दम् । मेरे बिना गुप्त ने ५ हे मययन् ! हेन्द्र | स्वत् अन्यः मड़िता मुर याग्नि शुद्ध किरणोंसे जगतको प्रकाशित करता है। बासा दूसरा और कोई नहीं है। ९ अतिर जमा अयोधि [ १७५८]- अग्नि देवीमें ६दे यसो ते राधांसि अस्मान् कदाचन मा प्रायतित हो गश है। रमन [ १७२४]- तेरे पन हमें कभी भी नष्ट करें।
एकोनविंश अभ्याय ] सामवेदका मुयोध अनुयाद ७ ते ऊतयः मा दमन् [ १७२४ ]- सेरे संरक्षणके ७ सुयतः सा आयुमित मर्मजान दमा राजा इव सायन हमारा नाश न परें। बंतु सीदति [ १७६५- उत्तम कर्म करनेवाला यह सोम ८ना चर्षणिम्यः विध्या वसूनि भा उप मिमीदि विनोंक द्वारा शुद्ध होता मा रानाके समान वोखता है, [ १७२४ ]- हमारी प्रगाओं को सम धन भरपूर लाकर दे। बारमें वह पानीम मिलाया जाता है। इन्द्र सुन्दर अयालसे युक्त पोदाले स्व मंठकर यज्ञके ८ हे इन्दो! पुनान दियः अधि उत पृथिन्याः स्थान पर आता है। इन्द्र पत्रका वध करता है, यल राक्षसको विश्या घनु नः आभर [ १७६४]- हे सोम ! शुद्ध होता मारता है । बाबुके नगरोंको तोडता है । जो सामर्यवान् शनु हुआ तू घलोप और पायोलोक पर रहकर सब पन हमें है उन्हें यह हराता है। गाय और घोडोंका पालन करता है। भरपूर है। इन्द्र के सिवाम दूसरा रोई भी सुख देनेवाला महीं। इन्द्र सोम पस्परोसे कूटा जाता है, फिर उसका रस निकाला लोगोंको मनेर प्रकार धन देता है और उन्हें पडा बनाता जाता है। उस समय उसका प्रकाश बाहर पडता है मौर है। सपा वह संरक्षण करता है और सयको निर्भप बनाता उससे अषकार दूर होता है। यह सोम अपने सामयंसे वीरोंमें है। इस प्रकार यह सब लोगोशा कल्याण करता है। अपरिमित उत्साह उत्पन्न करता है। उसके द्वारा सब दायुओंको सोम दूर करता है ।प करनेवालोंशा नाश करता है। १ हे मद्रिवः सोम । ते शुष्मासः रक्षः भिन्दन्तः सोमरसको पानी में मिलाते है। इसकी पारा अनेक प्रकारसे उदस्युः, याः स्पृधः नुदस्स [१७१४]- हे परयरोंसे कटे भन्न देती है। सोमरस यनका काम देता है। क्षप्रिय वीर इसे जानेवाले सोम । तेरे सामप्य रासोका माश पर ए पीते हैं और उत्साहित होकर शभुसे युद्ध करते हैं और यन्तमें कार प्रकट होते हैं । मुकायला करनेवाले मोशन है उन्हे विजयी होते है। सोमरसको पानीमें मिलाने के बाव छानते है। ऐसा तय्यार किया गया रस पृथ्वीपरके सब ऐश्वर्य देने में २ अया ओजसा निम्निा, मयिभ्युपा हदा रथ. समर्प है। संगे हिते धने स्तवै। १७१५]- जिरा मपने बलते तू "सोम स्वय शानुपर शास्त्र फेंकता है "ऐसा वर्णन आल. भानुमोका नाश करता है, उस मलको निर्भय हदयसे रपके कारिक है। पोर सोमरस पीकर उत्साहित होकर दानु पर युद्ध में शत्रुको नष्ट करने के पार प्राप्त करने के लिए मैं तेरी शस्त्र वन्ते है और विजय प्राप्त करते हैं। सोमका यह माल. स्तुति करता हूँ। कारिक वर्णन समाना चाहिए, नहीं तो अर्थका अनर्थ होना ३ पवमानस्य अस्य प्रतानि दूदया न माधृपे, यः त्या पृतन्यति, रज [११६]- इस छाने जानेवाले सोमके काँसे दुष्ट राक्षस प्राति नहीं कर सकते। हे सोमा जो तुझ पर सेना भेजनको इच्छा करता है उसका नाश कर। ४ मदच्युतं हरि वाजिनं मत्सरं तं इन्दुं नदीपु सुभाषित इन्द्राय [ १७१७]- मानन्द देनेवाले हरे रगके, बल बढाने- १ कविः अग्निः प्रत्लेन जन्मनास्वां तन्वं शुम्भाना पाले और उत्साह पढानेवाले, चमकनेवाले सोमको नदीके पानीमें मिलामो यौर यह इस इन्द्रको दो। विप्रेण धावृधे [ 1011]- ज्ञानी अग्नि पुराने स्तोत्रसि अपने शरीरको शोभा बढ़ाता हुआ ब्राह्मणोंके द्वारा की गई ५ ते मसश्चत धारा सहनिणं वाजं अच्छ प्रयन्ति [ १७६१ - तेरो न थमती हुई यहनेवाली पारा स्तुतियोरो बढ़ता है। बामण अग्निको प्रदीप्त करते है और हजारों प्रफारके रात हमें देती है। स्तोत्र बोलकर हवनके द्वारा उसे बढाते है। ६ ६रित विध्या प्रियाणि काव्या चक्षाणा, आयुधा मानो पुरुष अपने शरीरको सुन्दर बनाकर जामसे अपनेको तुजान अभ्यर्पति [ १७९२]- हरे रंगका मोम सर्व प्रिय पढाता है। पा कर्मको देखता हया, स्तुति सुनता हुआ और शास्त्रोंको २ ऊर्ज नपातं पापकशोचिषं अनि अस्मिन् स्व. पात्र पर फेंपता हुमा मागे जाता है। घरे यज्ञे आह्व [२]- बल कम न करनेवाले, सम्भव * एकोनर्षिश सघ्याय] सामवेदका सुयोध अनुवाद - फैला है। २५ हे अश्विना!ना ऊर्ज आवहतं [ १७३६ ]-हे ३८ यत् गणस्य रशनां अजीगः, गुचिः अनि., मश्विदेवो ! हम यल बढानेवाले अन्न दो शुचिभिः गोभिः संपते [1७४८]- जब समुदायमें विप्न २६ तं अग्निं मन्ये यः वसु, मक्तं यं धेनवः यन्ति, डालनेवाला अन्धेरा दूर हो गया, तब तेजस्पो शुद्ध अग्नि अस्तं यं आशवः अन्तः [ १७३७ ]- उस अग्निको में शुद्ध किरणोंसे जगतको प्रकाशित करने लगा। स्तुति करता हूँ. जिसके माधयमें गायें जाती है, जिसरे ३९ ज्योतिषां इदं श्रेष्ठ ज्योतिः भागात, वित्रः मात्रयमें घोड़े जाने है। प्रकेतः विश्वा अजनिष्ट [ १७४९]- तेजस्वी पापोंमें २७ अग्निः हि विशे चाजिनं ददाति [ १७३८]- यह उपा सर्वाधिक तेजस्वी है, उसका प्रकाश चारों ओर अग्नि निश्चयते मनुष्योंको पुत्र देता है । २८ विश्वचर्षणिः आनः प्रीतः स्वाभुवं वार्य राये ४० अलाक पृतनासु ब्रह्म जिन्यतं [ १७५९]- पाति [३७३८]- सब मनुष्योंका कल्याण करनेवाला अग्नि हममें ज्ञान बड़ा । ४१ वयं शूरसातो धना भजेमहि [ १७५९]- हम सतुष्ट होनेपर स्वय हो सनसन करनेवाले पन देने के लिए जाता है। मुसमें धन प्राप्त करें। २९ सः अग्निः वसुः [ १७३९]- यह अग्नि सदको वीर शस्त्र शत्रपर फेंकता हुआ आगे जाता है। ४२ आयुधा तुझानः अभ्यर्षति [ १७६२]- यह बसानेवाला है। ३० हे उपः । दिवित्मती न. महे राये बोधय पवित्र होकर सब धन हमें भरपूर ४३ पुनानः विश्वावसु ना आभर [१७६४]- थे। [१७४०]- हे उपे । द प्रकाश युक्त होकर हमें बढ़त धन मिले इसलिए हमें जापत कर। ३१ सु-जाते । अश्वसूनृते! यथा वित् नो अबो- उपमा घया १७४०]-हे उत्तम कुलीन और आज सत्य बोलनेवाली च। जिसप्रकार पहले भी तूने जगाया बसा ही अब जगा। जरो पतिको पकाते है, उसप्रकार इनको कोई पकड नहीं १ पाशिनन [१७१८]-लाल सानेपासे शिकारी ३२ हेदियः दुहितः सा अमरद्वसु नः अधन्युच्छ सकता। [१७४२]-हे लोककी पुत्री और भरपूर पन देनेपाली २ सुगोपा गाइव [१७२०]-उत्तम गोपाल गार्योरा उपे हमारे लिए मान प्रकाशित हो। मिसप्रकार पालन करता है, उसीप्रकार पत्र (फर्नु ३३ अहं विश्वा सना तिर. [10]- में सप पुष्यसि ) यज्ञका पोषण करता है। विरोपियोका परामय करता हूँ। ३ यथा घेनवः ययसंप्र[१७२०)- जिसप्रकार गाय ३४ अग्निः जनानां समिधा अबोधि [१७४५/- पास खाती है, उसीप्रकार इन्द्र सोमरस प्राप्त करता है। अग्नि लोगोंको समिपास प्रदीप्त हुआ है। ४ कुल्या इदं च [१७२०]-जैसे नारेया सालावर ३५ मायती उपासं प्रति मानय नाकं मच्छ सपा में जाकर मिलती है, वैसे ही सोमरस इदको मिस्ते हैं। प्रसनते [१७४६]- आनेवाली आय कासको किरणें अन्त ५ गोर' सृप्यात् यथा भपारत इरिणं । १७२१/- रिममें उतम रोतिसे पलती है। असे प्यासा मग पानीसे भरे तासाद पास जाता है, वैसे ही ३६ होता अग्निः प्रात' सुमना अर्घः अस्थात् (तूयं आगहि पप्पु समासु पिन । हे जल्दी [10]-हवन जिसमें होते है ऐसा अग्नि प्रात काल आ और कम्बके मनमें बंपर सबके साप सोम पो। उत्तम मनसे ऊपर उठने लगता है, जलने लगता है। ६ अन्वाय चित्रा (१७२६- घोडके ममान मुखर ३७ समिदस्य रुशत् पाजः अदर्शि, महान देय. (अरुपी उपा) तेमायो उपा है। तमसा निरमोचि [ १७४७)-प्रोत हएहए भग्नित ७ धेनुं स [ १७४६ ]- गाय से सरे भागती है, बल बोलने लगा है, उस महान् देवने जगतो मयकारसे से हो (माग्नः जनानांसमिधा अपोधि) अग्नि लोगोरी पूरिया है। समियामोसे सही प्रोप्त रिमा गया है।
(३५८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तचिका फैलाता है। ८ नाकं यहाः धयां प्रोजिहानाः इव [ १७४६ ] १० दिवः वृष्टयः न [१७६१] - जिसप्रकार लोकसे अन्तरिक्ष से वृक्षको शाखा फैलती है, उसीप्रकार वृष्टि होती है, (धाराः वाजप्रयन्ति) उसीप्रकार सोमरसती ( अमिः भानवा ) अग्नि अपनी ज्वालाओंको आकाश पारा अन्न देता है। ११ राजा इव [ १७६३ ]- रामाके समान (म. ९ अपमान [ १७५७ ]- युद्ध करनेवाले पोर जिस- जाना) शुरु होनेवाला सोम दीखता है। प्रकार शस्त्रोंसे रणभूमिको सुशोभित करते है, उसीप्रकार १२ श्येन न [ १७६३ ]- येन पक्षीके समान (चंसु (विटिभिः नारी: मा अर्चन्ति ) किरणोंसे उपारूपी सीदति ) सोम पानीमें बैठता है, छुवको मारता है । पानीमें स्त्रिया बाकायको सुन्दर बनाती है। मिलाया जाता है। एकोनविंशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची मंत्रसंख्या ऋग्वेदस्मान कृषिः देवता उपा अग्निः गायत्री " " " पवमानः सोमः " १७१० १७१५ " " ८11१२ ८18१३ अष्टा१७ २५३११ ९।५३११ ९।५३३३ ९॥५॥ श:५१ 184 २४५२ दा४३ विरूप आंगिरसः विरूप आंगिरसः विरूप आंगिरस अवस्सार: काश्यपः अवरसार:काश्यपः भवत्साररकाश्यप. अवत्सारकास्पप. विश्वामित्रो गापितः विश्वामित्रो गापिन- विश्वामित्रो पापिन देवातिषिःकाण्य " " १७१७ " " . विष्ट्रप " " " " " प्रगापः (विषमा वृहती समा सतोबहतो) " २०१३ ८1813 १८४१९ १1८४२० देवातिथि: काण्व: गौतमो राहगणः गोतमो राहगण. " " " [२] उदा: गायत्री ४।५।१ B.५० " वामदेवो गौतमः वामदेव गौतमः वामदेव गौतमः प्रस्व:कावः . १७७ १७२८ " " अश्विनी " शा २०४२१ १।२६॥ प्रस्तावाद " एकोनविंश अध्याय ] सामवेदफा सुबोध अनुषाद मंत्र संख्या देवता नविः Ek - उपाः उरिणा " " २७३२ १७३३ १७३४ १७३५ ग्वेदस्थान १६९२।१३ ११९२०१४ १९२११५ १९२०१६ ११९२१८ ११९२०१७ गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः गोतमोराहूगणः गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः गोतमो राहगणः अश्विनी " " " " " (३) मग्निः पंक्तिः ५६१ " १७१८ 11 " उपाः " बसुश्रुत मात्रेया वसुधुत आत्रेयः वसुभुत आत्रेयः सत्यश्रवा मात्रेयः सत्यभवा यात्रेयः सत्यश्रया आत्रेयः अवस्युरात्रेयः " " " ५७९१ ५७१। ५७९३ ५1५1१ ५७५२ ५७५३ अश्विनी " १७४२ १७४२ २७४३ १७४४ १७४५ " " अवस्कुरायः जयस्परात्रेयः " (४) अणिः त्रिष्ट्रप JU " उचा " " २७४६ (89 १७३८ १७४९ १७५० २७५१ १७५० १७५३ पा९१ ५।११ ५.१३ १४११३३१ २१११३२ २१११३ ५७६१ ५७६१ ५७६३ युपगविष्ठिरावात्रेयो पुषणविष्ठिरावानेयो मुषगविष्ठिरावायो कुत्स आंगिरसः कुरस बांगिरसः कुरस मागिरसः मत्रिीमः अनिभामः अत्रिभौमः [५] " अश्विनी " " " " लगनी उधाः 11 1 गोतमो राहगणः पोतमो राष्ट्रपणा गोतमो राहगणः " ११९२११ ।९ १।९१३ २१५७११ १२१५७२ P रश्विमो 12 " " " १७५९ १७६० बोतमा मोरया दीर्घतमा औषभ्यः हीतमा मोवम्पः यवरसारःकाश्यपः अवरसार काश्यपः अवस्सारकापपः पवमानः सोमः गायत्री " ९.७१ ९.५७२ ११५७१३ ९१५७४ " सवस्तारःकाश्यपः १७६१ (३६०) सामवेदका सुयोध अनुवाद [उत्तराचिका अब किशोऽध्यायः भथ नयममपाठके प्रथमोऽधः॥९-१॥ [१] 1१-१८) १ मेप आंगिरसः २..३ प्रियमेध मागिरस. ४ दीर्घतमा औचथ्यः; ५ वामदेवो गौतमः, ६ प्रकावः काण्वः ७ बृहदुक्यो वामदेव्याः; ८ बिन्दुः पूतदक्षो या मांगिरसः, ९, १७ जमदग्निनियः, १० सुका आंगिरसः; ११-१३ वसिष्ठो मंत्रावणिः १४ सुदास: पंजवनः १५ मेधातिथि: कावः १६ नोपातिषिः काण्वः, १८ पच्छेपो बोरासिः ॥ १, १७ पवमानः सोमः, ३, ७, १०-१६ इन्द्रः, ४-६, १८ अग्निः; ८ मातः ९ सूर्य २.......१,८,१०, १५-१७ गायत्री; (१७ नित्यपदा ) २....... ३ अनुष्टम्मुखः प्रगाथ:- ( १ मनुष्टुप्+णापत्र्यो । ४, ११, १३ विराः ५ पदपक्तिः, ६, ९, १२ प्रगाभः= ( विषमा बहती, समा सतोहतो ); ७ निष्ट्रपः १४ शपयारी; १८ अस्यष्टिः ।। २१.१ .. . ३. ३१२ १३ १७६५ प्रास्य धारा अक्षरन्वृष्णः सुतस्योजसः । देवा अनु प्रभूपतः ॥१॥ (अ. ९।२९।१) १७६६ सप्ति मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरी । ज्योति ज्ञानमुक्थ्यम् ॥ २ ॥ (३.९/२९।२) १७६७ सुपहा सोम सानि ते पुनानाय प्रभूवसो । वर्धा समुद्रमुक्थ्य ॥३॥१(यि)॥ | धा० १२ । उ० नास्ति । स्व. ३ (ऋ. १।२९।३) १७६८ एष ब्रमा य प्रविय इन्द्रो नाम श्रुतो गृणे ॥१॥ १७६९ स्वामिच्छवसस्पते यन्ति गिरो न संयता ॥२॥ १७७० सुतयों यथा पथः इन्द्र स्ववन्तु रातयः ॥३॥ २ (प)॥ [धा० ५ । उ० १ । स्व० १] [१] प्रथमः खण्डः। [१७६५] ( देयान् अनु प्रभूपतः ) देवों पर अपना अनुकूल प्रभाव डालनेसी इरडा करनेवाले, ( वृष्णा बल बानेवाले (अस्य सुतस्य धापः) इस सोमरसकी धारायें ( ओजसम्म अक्षरन् ) वेगसे बर्तन में गिरने लग गयी ॥१॥ १७६६(मेघसा कारयः ) शानी अध्वर्य ( गिरा गृणन्तः) अपनी वाणी स्तुति करते हुए (ज्योतिः जहानं ) तेग प्रकट करनेवासे (उपध्ये सति स्तुप और योडेके समान वेगवान् सोमको ( मृजन्ति ) मुख करते है॥२॥ [ १७६७३ (प्रभूयसो उपथ्य सोम ) हे बहुत धनवान और प्रदासनीय सोम ! (पुनानाय ते मने लानेवाले तो (तानि पहा ) ये तेज तेरो उत्तम रक्षा करते हैं । समुद्रं पर्ध) समुद्रके समान उस वर्तनको भर है. ॥३॥ [१७६८] (य:एमा नाम भुतः ) मो इन्द्र के नाम से प्रतिर है, (एषः ऋषियः प्रत्मा ) यह ऋतु के अनुसार गधालाह-नो- है, इसकी (गणे ) में स्तुति करता हूँ।१॥ [१७६९ ] (हेशपसा पते ) हे बलवान I (संयतः म ) तिप्रकार लोग यमी पुष्पको प्राप्त होते है। उससे पास जाते हैं, उसीप्रकार गिरः) स्तुतिया (त्यां इत् यन्ति ) से ही प्राप्त होती हैं ॥ २ ॥ [१७] (द्र)हण! (यपा पया मुनयः भिमवार को रास्ते से भनेक प्रोटे-छोटे राहत मिलने है, उपोषार (स्यात् रासपः पि पातु) तुमसे अनेक प्रकारे सात उपासरोरी भोर आते है॥॥
विश मध्याय] सामवेदफा सुयोध अनुवाद (३६१) ३ ३ १ श 2 २३ १ १ २१ २३२४' १७७१ आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वयामसि । तुविकूर्मिमृतीपहमिन्द्रं शविष्ठं सरपतिम् ।।१।। (*६(1) १७७२ तुविशुष्म तुपिकतो चीयो विश्वया मते । आ पप्राय महित्वना ॥ २॥ ६८२ ) १७७३ यम्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः । इस्ता बनर हिरण्ययम् ॥ ३॥३(३)॥ [ धा० १० । उ० नास्ति । स्व० १ ) ( ८६८४३) १७७४ आ या पुरं नामिणीमदीदेदत्यः कविनमन्यो३ नार्वा । सूरो न रुरुक्का तात्मा ॥१॥ (ऋ. ११४९९३) १७७५ अभि द्विजन्मात्री रोचनानि विश्वा रजारसि शुशुचानो अस्थात् । होवा यजिष्ठो अपार सत्य (ऋ. १३१४९४) १७७६ अय स होता यो द्विजन्मा विशश दो चार्याणि श्रवस्या । मनों को असै सुतुको ददाश ॥३॥ ४ (छ)॥ [ धा० १२ । उ०२ । स्व० }] (१३१४९५) , २ ३१ ॥२॥ २ २ 9 . ६ १७७१J हे इन्द्र ! हम ( ऊतये सुम्नाय ) स्वसरक्षण और सुखकी प्राप्ति के लिए (तुविकूर्मि ) अनेक गर्म करनेवाले और (माती-पई) हिसक दामोंको नष्ट करनेवाले ( शविष्ठं सत्पति ) बलवान् और सज्जनों के पालन करीवाले (या इन्द) युगको (रयं यथा )जिसप्रकार लोग रपको उपासना करते है. उसीप्रकारावर्तयामसि) प्रदक्षिणा करते है, तेरी उपासना करते हैं । [१७७२ ] (तुषि-शुष्म तुषि-क्रतो । महान् पसवान् मोर बहुत कम करनेवाले (शचीयः मने ) पाक्तिमान् और पूमनोम र विश्वया महित्वना ) सब प्रकार के महायरो मुक्त होकर ( था पाथ) व्याप्त होता है ॥२॥ ८१७७३ (यस्य महः ते हस्ता) मिस महान् पुरुषके - तेरे हाए (ज्मायन्तं हिरण्ययं यज्ञ) पयो पर सब जगह संचार करनेवाले सोने के यन्त्रको ( महिना परियितुः ) शक्तिपूर्वक धारण करते हैं ॥३॥ [ १७७४] (य)जो भनि ( नामिणों पुरं) पनमानों के द्वारा बनाये गए वेदोरुपो स्थानको (मदी) प्रदीप्त करता है । (यः प्रर्या नमन्यः न ) जो गतिमान् घोरे और पाएके समान ( अस्य कविः । गति परनेवाला पौर दूरदर्शी है । वह (शतात्मा सूरन ) भनेक रूपोंमें रहनेवाला अग्नि के समान ( रुपयान ) तेजस्वी है ॥ १ ॥ [ १७७५] (वि-जन्मा) को मरणियसि उत्पन्न हुआ हुआ, (त्रि-चनानि ) गाईपस्य मावि तीन पानीको और विभ्या रजालि गुशुधानः ) सर लोकोको प्रकाशित करते ए { होता यजिष्ठा देवोको मार गनेशला, पूग्य पह मान (अपां सधस्थे ) जलो स्थानमें यातशालाम ( अस्यात् ) रहता है ॥२॥ E१७७६] (याPिRT)मो हो मरणियाँस उत्पष्ट माहमा ( म होता) रेवोंको इसाकर लानेमाला (भयं) यह अग्नि (विभ्या धानिस स्वीकार करने योग्य पतको मौर (श्रयस्था दपे) मायो रातभारण का है। ( म यः मनः ददाश) मे जो मनुष्य हदि देता है, यह ( मुन्नुका) उाम पुनि पुल होता है।" ४६/प्तान हिन्दी भा.२०
(३६२)
सामवेदका सुबोध अनुवाद
[ उत्तरार्चिकः
३१
.
9
१.पुर
१
3
२
१२
१
३
सर
2
1
२११
१७७७ अग्ने तमद्यावं न स्तोमः क्रतुं न भद्र हृदिस्पृशम् । प्राध्यामा त ओह! ॥१॥
(ऋ. ४१०१)
१७७८ अधा घने क्रतोर्मेद्रस्य दक्षश्य साघोः । रथीतस्प वृहतो भ्थ ॥२॥ (ऋ ४१०२)
१७७९ एमिनों अर्मया नो अर्वाकस्वर्ण ज्योतिः ।
अ विश्वमिा सुमना अनीको
॥३॥ ५ (चि)॥
[धा०७। उ० । स्व०३] (ऋ. १०१३)
॥ इति प्रपनः खण्डः ॥ १ ॥
[२]
१७८० अमे विवस्वदुपसचित्र राघो अमर्त्य ।
आ दाशुपे जातवेदो वहा त्वमधा देवा उपर्बुधः ॥१॥ (इ. ११४४१)
१७८१ जुष्टौ हि दठो असि हव्यवाहनोऽमै रथोर घराणाम् ।
सजूर विम्यामुपसा सुवीर्यमस्मे घेहि भवो वृहत ॥२॥ ६ (ला)॥
[ धा०९। उ० नास्ति । १०२ (ऋ. ११४४।२)
[ १७७७ ] है (ओ) याने ! ( भय ) आज (ोहै ते स्तोमैः) इन्द्रादि देवोंके पाप्त पहुंचने वाले मेरे स्तोत्रसि
( मयं न ) घोडके समान हदियो ठीक स्थानपर पचानेवाले (तुं न भद्रं ) यज्ञक समान कल्याणकारक ( दि.
स्पृशं ते अभ्याम ) हृदयको प्रिय ऐसे उस तम मग्निको हम बताते हैं ॥ १॥
[१७७८] हे ( अ ) मग्ने ! ( अधा हि) सभी (भद्रस्य दशस्य) कल्याणकारक गौर यस मानेवाले (सापोः
प्रातस्य ) इप्ट फलको सिद्ध करनेवासे मोर सस्पस्वरप ऐसे (पृहतः कतो.) गहान् पशका तू ( रथीः यभूथ ) चालक
होता है ॥२॥
[ १७७१ ] हे (बग्ने ) आने ! (ज्योतिः स्यः न ) ज्योतिरूप सूर्यबै समान (विभ्येमिः अनीकः सुमनाः)
राय नोरी पुरत और उत्तम मन धारण करनेवाला (नः पभिः ।) हमारे इन पूज्य देवोश साप (नः मर्याक
भव) हमारे पास मा ॥३॥
॥ यहां पहला खण्ट समाप्त हुमा॥
[२] द्वितीयः खण्डः।
[ १७८० है ( ममय जातवेदः अग्ने ) अमर वंश भग्न 1 (त्यंत (उपस:) उषा देवतासे (वाशुपे)
ताको देने के लिए (विपस्पद चित्रं राधा) उत्तम पर जिसके पास है ऐसे अनेक प्रकारके पन ( आयह ) मेकर मा
और ( ग उपर्युपा देयान् ) माग उप कालमें उठनेवाले देशको भी या सेपरमा १॥
[१७४५ ] है (यो) आने । (जुएः ) सेपरने योग्य (हन्ययाहनः दूता) देवोरो हवि पहुंचानेपाता
डून मोर। अध्यराणा रयीः भनि । पाम योको सानेवाले रपके समान है । (मश्विभ्या उपसा सज्') महिनी
और उपाको गापमें सेरर (मले सुपी पृहत् धयः दि) में पत्तम बीर्यसे युक्त गहुल या॥२॥
विस अध्याय ]
सामवेदका सुयोघ अनुवाद
१११
३१२
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१
३१
र.
सर
३२३१४
२१
३
२
३
२
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१२
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३२
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१३१313
१७८२ विधू दद्राण समने बहूना युवानर सन्त पलितो जगार ।
काव्यं महित्वाचा ममार स य समान
॥१॥ (ऋ. १०१९५५)
१७८३ शामना शाको अरुणः सुपर्ण आ यो महा शूर सनादनीडः।
यश्चिकेत सत्यमित्तन्न मोघं वसु स्पाईसत जेतीत दाता ॥२॥ (१०१५५६)
१७८४ ऐमिददै वृष्ण्या पौरस्यानि येभिरौक्षत्रहत्याय जी ।
ये कर्मण! क्रियमाणस्य म ऋते कर्मादजायन्त देवा: ॥३॥ ७ (प)॥
[4]. ३१ 13०४१ २०७१ ( . १०,५५७)
१७८५ अस्ति सोमो अयर सुतः पिबन्त्यस्य मरुतः । उत स्वराजो अश्विना ॥ १ ॥
(ऋ. १९४६)
१७८६ पिबन्ति मित्रो अर्पमा तना पूतस्य वरुणः । त्रिपघस्थस्य जायता ॥२॥ (प्र. ८९४५)
१७८७ उतो न्यस्य जोपमा इन्द्रः सुतस्य गोमतः । प्रातहतिव मत्सति ॥ ३ ।। ८ (ली)।
[धा०९ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ १९४६)
[१७८२] (विg समने वहूनां दद्राणं ) अनेक कार्य करनेवाले और पूनम महतसे गनुओंको मारनेवाले
(युवानं सन्तं पलितः जगार ) तरुणको भी युद्धावस्या निगल जाती है । (देवस्य महित्वा काव्यं पश्य ) देवों के
महत्योंसे परिपूर्ण इस काम्पको देख (अध ममार) जो आज भरता है ( साना समान) मह हो कर प्रकट
होता है ॥१॥
[ १७८३ 3 (शाबमना शाकः ) हरितसे सामर्थ्यवान् ( अरुणः सुपर्णः मा) पण रंगका कोई पक्षी माता है,
(या महाशा) जो पडा पूरबोर है पर ( सनात्म-नीडा) अनन्तकालसे पोसला-पर-रहित है, ऐसा बह इन्द्र
(पत् चिकेत ) नो कर्तव्य रूपमें निश्चित करता है (तत् सत्य इत् ) उसे सत्य करके दिखाता है । (मोधन) यह
कभी भी धर्म काम नहीं करता। (उत स्पाई यस जेता) वह मुन्बा पाहने योग्य पनको गोतकर कार ( उस
दाता) और स्तुति करनेवालेको पन देनेवाला है ॥२॥
tvcs ] यह इन्द्र (पभिः सृष्ण्या पोस्यानि बाददे इन मरतों के साथ रहकर पल युक्त पुरुषार्यक कार्य
करता है। (येमिः पुत्रदत्याए वमी औक्षद ) जिसके साथ रहकर शत्रुको मारने के लिए ययधारी इन युष्टि करता
है। (ये देवाः । जो महत देव (मना क्रियमाणस्य कर्मणा ) महान् किये जानेवाले कर्मको (ऋते कम उदजायन्त)
सत्य कर्म करके रिझाते है॥३॥
[१७८५] ( अयं सोमः सुतः अति ) यह सोमरस निचोड कर सम्मार किया गया है, ( अस्य म्यगजः
मरात.) इसके स्वयके सेगसे तेजस्वी हुए इए मात (उत अधिना)और अश्विनो हसे (पिरन्ति ) पीते हैं ॥ १ ॥
[ १७८६ (मित्र ) मित्र (अर्यमा परुणा) अर्ममा मौर वरुण देव (तना पूतस्य ) नीते गुर ए ए
(निपघस्यस्य जायतः पियन्ति ) सीन यतन रखे हए स्तुत्य सोमको पोते हैं॥२॥
[१७८७ ] ( उत उ इन्द्रा) और इस (सुतस्य गोमतः अस्य जोर) रस निकाले गए पा पापके यूप
मिलाये गए इस सोमको पौनेको (प्रातः नु मत्सति ) प्रात काल करता है, (होताप) निसप्रकार होता स्तुति
पनेरी मठर करता है, उसीप्रकार हर मोम पौनेको बा करता है ॥ ३ ॥
(३६४) सामवेदका सुबोध मनुवाद [उत्तराचिका २ . २ ३.२ ३.र... 927 ३. १ १७८८ वग्महार असि सूर्य बडादित्य महा असि । महस्ते सतो महिमा पनिटम महा देव महा असि ॥ १॥ (ऋ १०१०११) १७८९ वट् सूर्य श्रवसा महार असि सत्रा देव महा असि । महा देवानाममूर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाम्यम् ॥२॥ ९ (व)॥ { धा० १५ १ १०१। स्व० १] (ऋ. १०१।१२) ति दितीय. खः॥२॥ [३] १७९० उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते । उप नो हरिभिः सुतम् ॥१॥ (ऋ. ८।१३।३१ ) १७९१ द्विता यो प्रदन्तमो विद इन्द्रा शतक्रतुः । उप नो हरिभिः सुतम् ।।२॥ (ऋ ८॥९॥३२) १७९२ स्वर हि वृत्रहनेषां पाता सोमानामसि । उप नौ हरिभिः सुतम् ॥ ३ ॥ १० (री) । । धा० १३ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ. १९२३३) १७९३ प्र वो महे महेवृषे भरचं प्रचेतसे प्र सुमति कणुध्वम् । विधः पूर्वी प्रचर चर्षणिः ॥१॥ (ऋ ७१११।१०) [१७८८] हे (सूर्य) सूर्य । (महान् असि यद् ) निश्चपसे महान है, ( आदित्य ! महान् असि पद) हे आदित्य ! तू महान है यह सत्य है । हे ( पनिष्टम ) स्तुतिके पोप ! (ते महः सतः महिमा) तुन जैसे महान्की महिमा स्तुति की जाती है। (पनिटम ! मद्रा महान् असि) हे प्रामनीय । तू अपने महत्वके कारण यहा है ॥ १॥ [१७४९] है (सूर्य) सूर्य ! तू (यसा महान् असि यद् ) तू अपने यशके कारण महान है । है ( देव) सूर्य देव । तू (देवानां माहा महान् असि सत्रा) देवोंके मोघमें महत्व के कारण महान है, यह सत्य है । (यसुर्य: पुरोहितः ) अमरोहा नाश करनेवाला है. इसलिए देवोंने तुझे आगे स्थापित किया है । (ज्योतिः विभुः भवाम्य ) तो सेन प्यार और किसीसे न बनेवाले हैं ॥२॥ । यहां दूसरा खण्ड समात दुमा ॥ [३] तृतीयः खण्डः। [१७१०] है (मदानां पते) मोमके स्वामी ( हरिभिः नः सुतं उप यादि) धोके द्वारा हमारे सोम- पामें आ । (हरिमिः नः सुतं उप) पोडसे हमारे सोमपा मा [ १७११J (वृत्रहन्तमा शतक्रतुः पान्द्र)ोरो मारनेवाला और कौरवालासोर यह (दिनासि) कर्मशाला है, यह सरसो मालूम है । (हरिमिः नः सुतं उप) पोसि हमारे सोमपागरे पास मा ॥२॥ भारो मारना और आर्य रक्षगरला दोनों राम वरररता है। [१७९२] हे (पृत्रहन ) को मारनेवाले (हिन्यपर्णा सोमानो पातामसिल सोमरसोंगो पोनेवाला है। रातिए (परिमिान गुप्त उप) पोरे बोगहमारे मोमपारे पाप्त मा३॥ [ १७१३ ] हे मनुष्यो! (या मधे ) तुम अपने पो बसानेरे लिए (महे प्र भरण्य) महान महको मोम मगरसे। (पेतसे मुमति प्रणुये ) माती परी स्तुति करो ! (घर्षणि-माः) प्रमाणात पोषण रा(पूर्ण विशाप्रपर)हमे तुणे पूरलेपाली प्रमानो पाग मा १॥
विश अध्याय सामवेदका मुबोध मनुवाद (३६५) ३११ 9 २ ११२३ १७९४ उरुष्पचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय नम जनयन्त विशाः । तस्य यानि न मिनन्ति धीराः ।।२।। (ऋ.७।३१।११) १७९५ इन्द्र वाणीरनुत्तमन्युमैव मत्रा राजानं दधिरे सहध्य । हर्यश्वाय दईया समापीन् ॥३॥ ११ (हि)। [धा० २६ । उ० नास्ति । स्व० ३] (ऋ. ७५३१११२) १७९६ यदिन्द्र यावतत्त्वमेतावदहमांशीय । स्तोतारमिदधिषे रदाक्सो न पापवाय रसिपम् ॥१॥ (ऋ.७१३२।१८) १७९७ शिक्षयमिन्महयो दिवदिये राय आ कुहचिद्विदै । न हि त्वदन्यन्मययन आप्य वस्या अस्ति पिता ने ॥२॥ १२ (वा) {धा. १४ । ३०१ । स्व०२] ( ७१३२०१९) १७९८ श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेयोधा विप्रस्यार्चतो मनीपाम् । 5षा दुवारस्यन्तमा सर्चमा ॥१॥ (ऋ ७२२।४) २२ ३३ २.२ T २ ३३ [१७९४ ] हे (विप्राः) ब्राह्मणो ! ( उपन्यचसे महिने इन्द्राय) विशेष म्यापर ऐसे महान् इन्द्रको (सुवृति मह जनयन्त ) उत्तम स्तुति और अन तुम अर्पण करते हो, (तस्य प्रतानि ) उस इन्द्र के प्रतोंको ( धीराः न मिनन्ति) प्रद्धिमान् लोग नहीं तोड़ते ॥ २ ॥ [ १७९५ ] (सत्रा राजानं ) सबके ईश्वर (अनुत्तमन्यु इन्द्र एव ) जिसके क्रोधके भागे कोई टिप नहीं माता ऐम इन्द्ररो हो (वाणीः सहध्ये दधिरे )तुतिया पात्रके पराभव करने के लिए आगे स्थापित परती है। इसलिए हे स्तुति परनेवालो। (हर्षवाय मापीन सं बाहय ) इन्द्रको स्तुति करनेके लिए अपने मित्रोंको उत्तेजित करो ॥ ३॥ [ १७९६ ] हे (इन्द्रः ) इन्द्र । ( यत् यावतः ) जितने धनका तू स्वामी है, (एतावत् अहं शिीय) उतने हो पनका में भी स्वामी होऊ 1 है ( रदायसो) पन देनेवाले इन्द्र ! (स्तोतारं इत् दधिषे) अपने स्तोताको पन देकर उसफा पोषण मं कर सर्फ इतना ही धन में दूंगा । (पापत्याय न रमि) पापी होने के लिए उसे ज्यादा पन नहीं बंगा। में निधन हो जाऊं इतना दान नहीं दूंगा ॥१॥ [ १७९७ ] (फुहचित् यिदे महयते ) कहाँ भी रहकर स्तुति करनेवालेने ( दिये दिये रायः शिक्षेयं इत्) प्रतिदिन धन देता है। इन्द्रको यह बात सुनकर उपासक कहता है (मघवन् त्यत् अन्यत् प्राप्यं नहि ) हे इन्द्र 1 तेरे सिवाय और कोई मेरा भाई नहीं, बोर (वस्यः पिता वन अस्ति ) प्रासनीय रक्षक भी कोई दूसरा नहीं है. ॥ २॥ ८१७९८ ] हे 21 (विपिपानस्य अद्वेः हवं श्रुधि) सोम कूटनेवाले मेरे पापको आवाज मुन, (अर्चसः विमस्य मनीगं योध) स्तुति करनेवाले विद्वानोंको बार्ने सुन, (इमा दुघालि ) इन मेवाओरो (अन्तमा सचा राय) मरने समीप मित्रको मेवा है। ऐसा मानकर वोin
(३६६)
सामवेदका सुवाध अनुवाद
उत्तराचिंका
३
३
३३३, ३२
१७९९ न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान् ।
सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि
॥२॥ (ऋ. ७२२१५)
१८०० भरि हि ते सवना मानुपेषु भूरि मनीपी हयते त्वामित् ।
मारे असन्मपर्व ज्योक
॥३॥ १३ (वा)॥
[घा०१५ । उ०३ । स्व०२ ] (ऋ. ७२२।६)
॥ इति सूतीप. पण्ड ॥ ३॥
[४]
१८०१ प्रो ध्वस्मै पुरोस्थमिन्द्राय शूपमर्चत । अभीके चिदु लोककत्सन्ने समत्सु वृत्रहो ।
असा बोधि चोदिता नमन्तामन्यकेषां न्याका अधि धन्वसु ॥ १॥ (ऋ१०।१३।१)
१८०२ त्वर सिंधू५ रवासजोऽधराचो अहनहिम् । अशत्रुरिन्द्र जज्ञिपे विश्वं पुष्यसि वार्यम् ।
तं त्वा परि ध्वजामहे नमन्तामन्यकेपा ज्याका अधि धन्यसु ॥२॥ ऋ 10११३३२)
पर
२४
३
१०१२
2
.
-
[ १७९९] हे इन्द्र ! (तुरस्य ते गिरः ) शवको शोप्रतासे नष्ट करनेवाले तेरी स्तुतिको ( अनुर्यस्य विद्वान्)
शेरे घलको जानने के कारण (न अपि मृप्ये) में छोज नहीं सकता।। स्वयश ते नाम सदा विवक्मि) अपने पर
रडानेवाले तेरे स्तोत्रोंको हो मै हमेशा घोलता रहता हूँ ॥२॥
[१८०० ] है (मघवन् ) ऐश्वयंयान इन्द्र ! (मानुपेषु ते भूरि सपना) मनुष्योंमें तेरे लिए सोमया हुत
होते है । ( मनीपी त्या र भूरि हयते ) बुद्धिमान् तेरे लिए बहुत हवन करते है, ( अस्मत् आरे ) हमसे दूर (ज्योक्
मा का) बहुत समय मत रह ॥३॥
। यहां तीसरा खण्ड समाप्त हुआ।
[४] चतुर्थः खण्डः।
[ १८०१ ] हे स्तोत्र पाठको ! ( अस्मै इन्द्राय } इस इन्द्र के (पुरो रयं शूर्प) रपके आगे रहनेवाले बलको
(मुम मर्चत 7 } उत्तम प्रकारसे पूजा करो।{ समत्सु सगे अभीके चित् ) युद्ध में शत्रुको रोना हम पर आक्रमण
करती हुई हमारे पास माजाप, तो (लोककृत् धृत्रहा) लोकपालक और शत्रुको मारनेवाला इन्त्र (अस्माकं चोदिता
घोधि) हमारा प्रेरक है यह तुम जानो । ( अन्यकेषां धायसु अघि ज्याका' नभन्तां ) माय शत्रुओंके धनुषकोडोरिया
टूट जाएं ॥१॥
[१८०२] है (इन्द्र ) इन्द्र (स्य ) (सिन्धून् भघरावा अवास्त) नदियोंको नीची जगह पर बहाकर
सानेवाले मेघोंको गिराता है, उन्हें बरसाता है। (भार्ह अहन् ) मेघोंको फोडता है, इसलिए है इन्द्र ! तू ( अशत्रुः
जशिप ) भावरहित होता है, न ( विश्व वार्य पुप्यसि ) सब स्वीकार करने योग्य धन बढाता है । (त त्या परिष्व
जामहे । उस तुझे हम हवि देकर वार्म करते है। (अन्यकेपा धन्वनु अघि ज्याका नमन्तां) शत्रुओंके धनुषकी
गोरिया टूट जाएं ॥२॥
विश भायाय]
सामवेदका सुयोध अनुवाद
(३६७)
"
१
३२४१३
३४
3
३१
३
२
1
२
3
३२५
१"
१८०३ विपु विश्वा अरातयोऽयो नशन्त ना धियः ।
अस्तासि शत्रय वर्ष यो न इन्द्र जियारसति ।
या ते रातिर्ददिर्वसु नमन्तामन्यको ज्याका अधि धन्वसु ॥३॥ १४ (टि)"
[धा० ४३ । उ० ६। स्व० ३ (११३६१३)
१८०४ रेवार इंद्रवत स्तोता सायावतो मघोनः । प्रेदु हरिवः सुतस्य ॥ १॥ ( ऋ ८॥२॥१३ )
१८०५ उक्थं च न शसमान नागो रयिरा निकेत । न गापत्रं गापमानम् ॥२॥ १. ८॥२॥१५)
१८०६ मा न इन्द्र पीयत्नवे मा धर्धते परा दा: । शिक्षा शनीया शचीमिः ॥३॥ १५ (ति)।
[धा०१४ 1 उ०१।१० ३ ] (*. २०१५)
१८०७ एन्द्रः याहि हांगमिरुष कण्यस्य सुष्टुतिम् ।
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवाष सो
॥१॥ (8. 21५४१)
१८०८ अत्रा वि नैमिरेपामुरा ने धूनुते वृको ।
दियो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो
॥२॥ (१८३४१३)
[ १८०३] (नः विश्वाः रातयः मर्यः ) हमारे सय शनु जो हमार चढाई करते हुए आते हैं, ये (सु विन-
शन्व) उत्तम रीतिसे नष्ट हो जाएं। हे इन्द्र ! (याना जियोसति ) जो हमारा वध करनेको इच्छा करता है, उस्त
( शनये यचं अस्ता असि ) शत्पर तु मास्त्र फेकता है। हे इन्द्र ! मेरे पास ( धियः ) हमारे बुद्धिपूर्वक किए गए कर्म
पहुंचे। (ते या रातिः वस्तु ददिः ) तेरे जो दान है, वे हने पन दें । ( अन्यकेषां धन्वसु अघि ज्याका: नमन्तां)
शनुके धनुषको डोरिया टूट जाएं ॥३॥
[१८०४] हे (हरिवः) धोरे रखनेवाले इन् । (रेवतः स्तोता रेवान इत् स्यात् । तैरे समान धनवान्को
स्तुति करनेवाला मवश्य एनी होगा। (त्वावता मयोनः सुतस्य प्रेदु ) तेरे समान धनधानको स्तुति करनेवाला भय
ऐश्वर्पवान होता है ॥१॥
[१८०५7 है इन्द्र ! (न)स समय ( म-गो रयिः मा चिकेत ) भुति न करनेशनोंका पन व जानता है।
(म) प ( शस्यमान उपयं च ) मोले जानेवाले स्तोत्रको भी न जानता है । ( न ) अ (गीयमानं गाय) गाये
जानेवाले गायत्र सामको भी तू जानता है ॥२॥
[ १८०६] है (इन्द्र न! (पीयत्नवे ना मा परादाः ) हिंसक शत्रुओंके आधीन हम मत कर शर्यते
मा। हमारा नाश करनेवाले के स्वाधीन हमें यत कर। है (शची-पा) शक्तिमान् इन्द्र (शचीमिः शिक्षा अपनी
शाक्तिसि हमें धन वै ॥ ३ ॥
.[१८०४ हे (इन्द्र इन्द्र ! ( हरिभिः) घोगेको सहायतासे ( कण्वस्य सुषुति उप याहि ) कण्वको उत्तम
स्तुतिके पास पढेच ( अमुष्य दिय शासतः ) इस युलोरके शासन में हम मुलसे रहते हैं. है (विधायमो पुलोकरें
रहनेवाले इन्द्र (दिवं यय) लोकमें जा ॥१॥
[१८०८] {मत्र पेषां नेमिः ) अब इन मोम कूटनेवाले पपरोको पारें ( उरां का न ) भेडको निराप्रकार
भेरिया रुपाता है, उसीप्रकार सोमको ( विधनुते ) सूटते हुए कराती है। अमुख्य दिवासतः सबके चुलोक
पर शासन रते हुए हम इसके शासन ] मुखसे रहते हैं। है ( दियायलो) लगत्तो धनपान पद (विर्ष पय )
सोक ना॥२॥
(३६८) सामवेदका सुयोघ अनुवाद [उत्सरााचकः ३१२ १८०९ आ त्वा ग्रावा वदनिह सौमी घोपण वक्षतु । दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो ॥३॥ १६ (व)॥ [पा०५ । ३० नास्ति । स्व०१] (प्र. ८।३४२) १८१० पवस्व सोम मन्दयन्निन्द्राय मधुमत्तमः ॥१॥ऋ. ९/६७१६) १८११ ते सुतासो विपश्चिता शुक्रा वायुमसक्षत ॥२॥ (३.९/६७१८) १८१२ असून देववीतये वाजयन्तो रथा इव ॥ ३ ॥१७ (रौं)॥ [धा० ८ । उ० नास्ति । स० नास्ति ] (ऋ ९२६७१७) ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४॥ [५] १८१३ अमिर होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः मनु सहसो जातवेदसं विषं न जातवेदसम् । य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुशोचिप आजुबानस्य सर्पित। ॥१।। (ऋ. १।१२७१) 8. ( [ १८०९] हे इन्द्र ! ( इह सोमी बदन आया । यह इस यज्ञमें सोम कटने के शब्द करनेवाला पत्थर (घोपेण आवक्षतु शब्द करते हुए सोमको तेरे पास पहुंचावे । ( अमुल्य दिवः शासतः ) इस इन्द्र के लोकपर शासन करते हुए [ इसके शासनमें | हम मुखले रहते हैं। (दिवावसो) हे तेजस्वी धनयान् इन्द्र ! (दियं यय ) तू घुलोकमें गा ॥३॥ [ १८१०] है ( सोम ) सोम ! (मधुमत्तमा मन्दयन् ) भरयन्त मधुर ऐसा तू हर्ष उत्पन्न करताहमा ( इन्द्राय पवस्व ) इन्द्र के लिए शुद्ध हो ॥ १॥ [ १८११ ] (विपश्चितः ) बुद्धिवर्धक ( सुतासः ) सोमरस (शुमाः ते ) शुद्ध होने के बाद वे सोमरस (वायु असक्षत ) वायुके लिए तैयार होते हैं ॥ २॥ ( १८१२ ] ये सोमरस ( पाजयन्तः देवधीतये ) अन्न प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले यजमान देवोंको वेनेके लिए ( मसूम ) तयार करते हैं। ( रथाः इव) जिसप्रकार रथ तम्यार करते हैं, उसोप्रशार सोमको तय्यार करते हैं ॥३॥ । यहां चौथा खण्ड समाप्त हुआ । [५] पञ्चमः खण्डः। [१८१३] ( दास्वन्तं यसोः) दान देनेवाला, सदको बसानेवाला ( सहसः सूनुं जातवेदसं ) बलसे उत्पन्न होनेवासा, सब जाननेवाला, ( विमं न जातवेदसं ) बाह्मणके समान ज्ञानी ( यः देयः स्वध्वरः) जो प्रकाशमान और उत्तम यज्ञ करनेवाला है, ऐसे (ऊर्षया देवाच्या कृपा ) उच्च अर्थात् श्रेष्ठ देवी सामन्यसे युक्त, (शुशोचिप. आजुबानस्य ) उत्तम तेजस्वी और हवन किए जानेवाले ( सर्पिपः घृतस्य विभ्राष्टिं अनु ) धोके तेजके अनुकूल (अभि होतारं मन्ये) ऐसे अग्निको में देवोंको बुलानेवाला मानता हूँ ॥ १॥ --- ( ३६९) पिंश मायाय] सामयेवफा सुयोघ मनुवाद २.स .१ ३.. ३, ३२. १८१४ यजिष्ठ स्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमनिरसा पिम मन्ममिविप्रेमिः शुक्र मन्ममिः । परिजमानमिव यार होतारं चर्षणीनाम् । शोचिष्क पण याममा विश प्रावन्तु जूतये विशः ॥२॥ (ऋ. १११२७२) १८१५ स हि पुरु चिदोजसा विरुक्मता दोघानो मति द्रुहन्तरः परशुन द्रुहन्तः । चीड चिद्यस्य समृती श्रवदनैव परिस्थरम् । निप्पडमाणो यम नायते धन्वासहा नायते ॥३॥ १८ (ठी)। [धा०४३ 1 उ० २ । स्व० ४ ] (ऋ. १।१२७३) ॥ इति मवमप्रपाठक अपमोऽर्षः ॥ १-१॥ अथ नवमप्रपाठफे द्वितीयोऽधः ॥९-२॥ (१-१३) १ मग्निः पावकः २ सोभरिकाम्यः ३ अरणो तहल्यः, ४ अग्निः प्रजापतिः, ५-६,८ अवरसारः काश्यप ; ७ मृगः; ९ गोत्यश्वसूक्तिनी काभ्यापन: १० त्रिशिरास्त्याप्टः, सिमुद्वीप आम्बरोपो वा; ११ उलो वातायनः; १३ नो भावः ४,७,८,१२१-४, ७-८, १२ अग्निः ५-६ विश्वे देवाः ९इन्द्र, १० आप.; ११ वायु, १३ वेनः । १(१-२) विष्टारपंक्तिः १(३-५) सतोयहतो, १ (६) उपरिष्टायोतिः, २ काकुभः प्रगाप-- (विषमा कुप, समा सतोहती); ३ जागती; ५-६, १३ त्रिष्टप ७-११, गायत्री ४,७,८,१२। १८१६ अप्ने तय भयो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो । पृहदानो शवसा याजमुक्थ्या५३ दधासि दाशुषे कवे ॥१॥ (११४.१) [१८१४ ] हे (विप्र शुक्र ) ज्ञानी और तेजस्वी भग्ने ! ( यजमानाः हम मनमान (विप्रेभिः मम्मभिः) शानी विचारकोंक और ( भन्ममिः) मननीय मंत्रोंके कारण ( अंगिरसा ज्येष्ठं } तेजस्वो लोगोंमें श्रेष्ठ हए हुए । यजिएं न्या दुधेम } पूजनीय तुझे हवन अर्पण करते हैं। उसके बाद (यां इव परिज्मानं ) सर्पके समान धूमनेवाले (चर्षणीनां होतारं ) लोगोंके लिए हवन करनेवाले (शोचिष्केशं धृपणं ये ) प्रदीप्त किरणोंसे पुश्त अग्निका (इमाः विश. ये प्रजायें (नूतये म अवन्तु ) इप्ट फसको प्राप्तिके लिए मंरक्षण करती हैं ॥२॥ [८१५) (सः हि ) वह मग्नि ( विरुक्मता मोजसा) तेजायी बससे ( पुरुचिद् दीयानः ) आयधिक प्रकाशमान (दुहन्तरः परशुः न ) गनुओंको कंपानेवाले फरसेके समान ( गुहन्ता भधाते ) द्रोह करनेवालोंका नाश करनेवाला होता है। (यस्य समृती ) जिसके साथ - साथ रहनसे ( बीड चित् श्रुवत् ) बलवान् शत्रु भी हार जाने है।। यत् स्थिरं घनाइच ) जो स्थिर होता है वह भी जलके समान छिन्नभिन्न हो जाता है। इस कारण यह अग्नि (निः पहमाण यमते ) शत्रुओंको हराकर सबका नियमन करता है। (न भयते ) अपनी जगहसे भागता नहीं। घन्वासहा न मयते ) धनुषको धारण करनेवाले बोरके समान अपनी जगहसे दूर नहीं होता ॥३॥ [१८१६] है ( अ ) माने ! (तप पयः प्रयः) तेरे आम प्रशंसनीय है। हे (विभावसो) मति सेमस्वी माने । (अया महि भ्राजन्ते ) तेरी शालायें बहुत प्रदीप्त हो गई है। है । यह भानो कवे) अत्यधिक तेनायो जानी देव ! (शवसा) अपने दलसे ( उपध्यां पाज) प्रशंसनीय अन्नको त (दाशुषे दधाति) प्रत्येक दान देनेवाले यसमाकोरेता है। १॥ ४० [साम. हिन्दी भा.२] - (३७) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्विक 3. ३२.३ २७ 9 १ २. . ३ " २१ १२ ३ १२३ ३ १८१७ पायकपर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदिया भानुना । पुनो मातरा विचरनुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे ॥२॥ (फ १०१४०२) १८१८ ऊों नपाजातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिगिर्हितः । वे इषा सं दधुभूरिवर्पसश्चित्रीतयो वामजाता। ॥३॥ (ऋ १०११४०११) १८१९ इरल्यनमे प्रथयस्व जन्तुभिरस्म रायो अमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजमि पृणक्षि दर्शतं क्रतुम् ।। ४ ।। ( १०११४०१४) १८२० इकारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्त र राधप्तो महः । गति वामस्य सुभगा महोमिष दधासि सानसिप रयिम् ॥५॥(ऋ १०।१४०।१ ) १८२१ प्रतापानं महिपं विश्वदर्शवमग्निर सुम्नाय दधिरे पुरी जनाः । श्रुस्कार सप्रथस्तम त्वा गिरा दैव्यं मानुपा युगा ॥६॥ १ (दि)॥ [ धा० ५९ । उ०३ । स्व०३] ( ऋ ११४०१६) ॥ इति पञ्चम सण्ड.॥५॥ [ १८१७] हे माने ! (पावकवर्चाः ) पवित्रता करनेवाली किरणसि युक्त (शुमया ) निर्मल तेजसे युक्त (अनूनवर्चा ) पूर्ण तेजस्वी तू (भानुना उदियर्षि ) अपने तेजसे उदय होता है । ( पुत्र ) पुत्ररूप अग्नि । मातरा विचरन् । मातारूपी दो मरणियोंसे उत्पन्न होनेके बाद ( उपावसि ) समीप रहकर पज्ञ करनेवालोंकी रक्षा करता है। (उभे रोदसी पृणाक्ष ) दोनों पुलोक और पृथ्वीलोकको वह नोडता है भर्यात हपिसे स्वर्गको और वृष्टिरो पृथ्वीको यह पूर्ण करता है।॥२॥ [ १८१८] है ( ऊर्ज नपात् ) बलके पुत्र ! ( जातवेद.) सबको जाननेवाले अग्नि देष । । सुशास्तिमि मन्दस्व) उत्तम स्तुतियोरी तू मानन्वित हो । (घीतिभि हित ) हमारे द्वारा किए गए फर्मोसे तू तृप्त हो । ( भूरि चर्पस चित्रोतयः) अनेक रूपोंसे युक्त और विलवाण सरक्षण करनेवाले (वामजाताइपः) उत्तम रीतिसे उत्पन्न हुए. मका (त्वे सदधु ) तुझमें यजमान हवन करते है ॥ ३॥ [१८१९] है ( अमर्त्य अग्ने ) अमर अग्ने । (जन्तुभि इरज्यन् ) अपने ते नसे प्रकाशित होनेवाला तू (अस्मे राय प्रथयस्व ) हमारे धनको बना । । सः) वह तू ( दर्शतस्य यपुर ) दर्शनीय शरीरसे (विराजसि) विशेष शोभायमान होता है और ( दर्शत ऋतु पृणक्षि) दर्शनीय यज्ञ कर्मको उत्तम फल देता है ॥ ४॥ [ १८२० (अधरस्य इष्कार ) यसके सस्कार करनेवाले (प्रचेतस । विशेष ज्ञानी (महः राधस. क्षयन्त) बहुतसा पन पासमें रहनेवाले मोर (चामस्य राति , उत्तम धन देनेवाले ऐसे सुम्हारी स्तुति हम करते है। तू (सुभगां महींप) उत्तम भाय युक्त बहुत अन्न और ( सानसिं रयिं) सेवन करने योग्य पन (दधासि) देता है॥५॥ [ १८२१ ] (जनाः) पा करनेवाले लोग ( ऋतायान महिप) यज्ञ करनेवाले और पूज्य (विश्व दर्शत अनि) यंत्र कनीय अग्निको ( सुम्नाय पुरा दधिरे । सुख प्राप्त करने के लिए अपने सामने स्थापित करते हैं। हे भग्ने ! (धुत्कणे) उत्तम प्रकारसे प्रार्थना सुननेवाले (सप्रथस्तम) अत्यन्त प्रसिद्ध (दैव्य त्वा) दिगुण युक्त सेरी (युगा मानुपा) पति और पत्नी मिलकर रोनों ही (गिरा) मपनी वाणोरो स्तुति करते हैं ॥ ६ ॥ ॥ यहां पाचवां खण्ड समाप्त हुया ॥
विशमण्याय ] सामवेदका सुयोध अनुवाद 11 . . ए २ 11 " . र 33 २५ .. ११ ३.3 ३. - २५ २ १८२२ प्र सो अनयोतिमि सुयोरामिस्तरति बाजकर्मभिः । यस्य स्व५ संख्यमायिय ॥ १ ॥ (ऋ. ८।१९।३०) १८२३ तव द्रप्सो नीलवान्नाश ऋत्विय इन्धान सिष्णवा दंदै । त्वं महीनागुषसाममि प्रियः षा वस्तषु राजसि ॥ २ ॥ २(यो)॥ । धा० १२ । उ० नास्ति । स्व० ४](र. ८९।९।३१) 31 १८२४ तमोषधीदधिरे गर्भमृत्वियं तमापो अग्निं जनयन्त मात। नमिन्समान बनिनश्च वीरुधोऽन्तर्वतीश्च मुबवे च विश्वहा ॥१॥३(क)॥ [ धा० १३ । उ० नास्ति । स्व० ३ (क्र. १०१९॥६) १८२५ अमिरिन्द्रीय पवते दिवि शुको वि राजति । महिपीक यि जायते ॥ १॥ ४ (या)। [धा ७ / उ० नास्ति । स्व.२ । १८२६ यो जागार तमृचः कामयन्तै यो जागार तमु सामानि यन्ति । यो जागार तमय सोम आह वाहमामि संख्ये न्योकाः ॥१॥५(या)॥ { था० ७ । उ० नास्ति । स्व० १ १ (ऋ ५१४।१४) ६] पठः खण्ड ( १८२२ ] है ( अ ) अग्ने । (त्वं यस्य सत्यं आ विथ) ३ जिसके साथ मित्रता करता है. (स) वह मजमान (सुयोराभिः) उत्तम पोर पुसि युक्त (पाज-कर्मभिः) और बलवर्षक कमसि युक्त (तव ऊतिमिः) ऐसे तेरे सरक्षणको सहायताते (प्रतरति) संकटोसे पार जाता है ॥२॥ [१८२३ ] है (सिष्णो । सोमको साहुति जिसे दी जाती है ऐसे सने ! द्रप्सः नीलयान ) प्रवाह रूप और समें रखनेवाला (वाशः ऋत्यियः) स्तुत्य और ऋतुझे अनुकूल ऐसा (इन्धान: भारदे । नेजस्वी सौर हवन करने के लिए प्राप्त किया जाता है । ( स्वं महीनां उपक्षां नियः अस्मि) तू महान उपाओंको प्रिय है ।(क्षपः यस्तुपुराजसि) रात्रीके समय हवनीय पदार्थोसे तू प्रकाशित होता है ॥२॥ [९८२४] (ऋत्यियं गर्म तं ओपीः दधिरे ) ऋतुरे अनुरुल प्रदीप्त ऐसे निको गर्भ रूपले बरणियाधारण करती है। (तै अनि ) उस अश्लिको ( मातरः आयः जनयन्त । पानीको माताये उत्पन्न करती है। वनिनः । समान तरत) वनस्पतियां गर्भ रूपमें रहनेवाले उस अग्निको उत्पन्न करती है । ( अन्तर्वतीः धीरुधा च ) गर्भ धारण करनेवाली औषधि उसे (विश्वहा मुवते । हमेशा उत्पन्न करती है ॥ १ ॥ [५] (या इन्द्राय पवते ) अग्नि इन्द्र के लिए प्रदीप्त होता है, वह (शुक्रः दिवि विराजति प्राप्त होकर अन्तरिक्ष प्रकाशित होता है । (महिषी इव विजायते ) रानी के समान यह विशेष रूपसे सुशोभित होता है ॥१॥ ६१८२६] (2 जागा) जो नाता है (तं ऋचः कामयन्ते) उसकी ऋपा हा करती है, ( यः जागार:) जो गागत रहता है, (तं उ सामानि यन्ति ) उमे सान प्राप्त होते हैं, (या जागार | जो बाता है, (तं भयं मोम माह) उत्तरे पह मोम कहता है, कि तब सख्ये भई अस्मि ) तेरी मित्रता में हैं। (अहं योकाः मस्मि ) म पारो परत हूँ॥ १॥ ।
३" २ . ३ . - २ 3" (३७२) सामवेदका सुयोध अनुवाद [ उत्तराधिका १८२७ अग्निर्जागार तमची कामयन्तेऽमिर्जागार तम्म सामानि पन्ति । अनिर्जागार तमय सोम आह तपाइममि सख्ये न्योकाः ॥१॥६(वा)॥ [धा० १० | उ. नास्ति । स्व०२(ऋ. १४४४११५) १८२८ नमः सखिम्यः पूर्वसद्यो नमः साकनिषेभ्यः । युञ्ज वाच शतपदीम् | ॥१॥ १८२९ युञ्ज वाच शतपदी गाये सहस्रबर्वनि । गायत्रं त्रैष्टुभ जगद ॥ २ ॥ १८३० गायत्रं श्रेष्दुभं जगदिश्वा रूपाणि सम्भृता । देवा ओकासि चक्रिरे ॥ ३ ॥ ७(यु)॥ [धा० ११ । उ० नास्ति । स्व. ५ १८३१ अग्निज्योतिज्योतिरमिरिन्द्रो ज्योतिज्योतिरिन्द्रः । सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः ॥ १ ॥ १८३२ पुनर्जा नि वर्तस्व पुनरम इपायुपा । पुनर्नः पाघ रहसः ॥२॥ १८३३ मह रय्या निवर्सवाम पिन्वस्त्र धारया । विश्वस्या विश्वतस्परि ॥ ३॥ ८ (ठा) ॥ [ धा० ८। उ०११ स्व०२) इति पष्ठा ॥६॥ १८२५] ( आग्न जागार) अग्नि जापता है (तचः कामयन्ते) इसलिए पायें उसकी कामना करती है। ( अग्नि जागार ) अग्नि जागृत रहता है. इसलिए (तं उ सामानि यन्ति उसके पास साम जाते है (अग्निः जागार ) मान जागृत रहता है, इसलिए ( सं भयं सोम माह ) उससे यह सोम कहता है कि (सब सख्ये मिनरा (महन्योकर अस्मि ) में गृहयुलर रहूपर १ ॥ [ १८२८ 1 (पूर्व-सद्यः सखिभ्यः नमः ) पहलेसे पहमें बैठनेवाले मित्ररूपी देषोंको नमस्कार करता हूँ। ( माफनिषेभ्यः नमः ) पास पात बनेगाले देवोंडो नमस्कार करता हूँ (शतपदी पाच युजे ) मसंख्य प्रकारसे स्तुतियों में करता हूँ॥१॥ [ १८६९] (शतपदी पाच युजे) असहप प्रकार बनाई गई स्तुतियों में बोलता है। गायत्रं श्रेष्टुमै जगत् ) गायत्री विष्टप, जगनी इन छसि मुफ्त सामोंको (सहवर्तनि ) हमारों प्रकारसे ( गाये ) में गाता हूँ ॥२॥ [१८३० ] ( गायत्र ग्रंष्टुभं जगत् ) पापत्री, रिटप और भगती पन्नोंमें ( संभृता ) मोहादको की गई है, ऐगे ( पिभ्या रूपाणि)अनेक रूपोवाले उन सामोरी ( देवाः भोकांसि पकिरे ) देयोने मरने रहनेतपान बनाया है, [उन सारोको में गाता हूँ]॥३॥ [ १८३१ ] ( भाग्ने ज्योतिः ) मग्नि ग्याप्ता हप है। (ज्योतिः भामिः ) और वाला भी मग्नि ही है। (Ig: ज्योतिः। प्रारूप है (ज्योतिः नः) और प्रकाश भी हम ही है। (सूर्य: ज्योति।) पूर्व प्र- प है (ज्योतिः सूर्यः) ज्योति. सूपं है ॥ १॥ [१८२] (अग्ने माने! { ऊर्जा पुनः नियर्तस्य ) बासके साथ फिर हमारे पास मा।(भायुषण पुत्र ) अन मोर मापरे साप हमारो तरफ मा। (संहसः नः पुनः पाहि पापो हमारी पुन पुर जा कर २॥ [१८३३ ) हे प्रा! (रण सह निपर्तस्प) पत्र साप लेरर हमारे पास भा।(विभ्यतः परि) समे मेमोर(विभ्यारण्या धारया मोरे लिए उपभोगरे योग्य पारामे हमे (निन्यस्य ) पुक्त कर ॥ यह पटापण्ट समान मा।
(३७३)
पिंश भाया
सामवेदका सुबोध अनुवाद
३२
२
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[७]
१८३४ यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इन् । स्तोता मै गोसखा स्यात् ॥१॥ (ऋ. ८।१४।१ )
१८३५ शिक्षेपमस्मै दित्सेय शचीपते मनीषिणे । यदहं गोपतिः
स्वाम् ||२।। (ऋ. १४१२)
१८३६ धनुष्ट इन्द्र सन्ता यजमानाय सुन्वते । गामश्च पिप्युपी दुहे ॥३॥ ९ (पि)॥
[11०१५ । उ०१। स्व०३) ( ८1१४३)
१८३७ आपोहि ठा मयोभुवस्ता न ऊजे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥ १॥ (इ. १०।२।१ )
१८३८ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उग्रतीरिव मातरः ॥ २ ॥ (ऋ. १०।९.२ )
१८३९ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वय । आपो जनयथा च नः ॥३॥१० (वा) ॥
[धा० १०० नास्ति । स०२(ऋ. १०९।३)
१८४० वात आपातु भेज शम्भ मयो नो हृदे । प्रन आयूपि तारिपद
(ऋ. १०११८६१)
१८४१ उत वात पितासि न उत भ्रातात ना सखा । स नो जीवातव कृधि
॥२॥
(ऋ. १०१८६२)
[७]सतमः खण्डः।
[१८३४ ] हे इन्द्र ! ( यथा त्वं वस्या एक इन ) जैसा सू धनका भकेला हो स्यामो है, ( यत् अहंशीय )
पैसा ही पदि में भी पनका स्वामी हो गया तो ( में स्तोता गोसखा स्यात् ) मेरो स्तुति करनेवाला गार्योका मित्र हो,
तो फिर तेरो स्तुति करनेवाला गायोंका मित्र भला क्यों न होगा? ॥१॥
[ १८३५ ] है ( शचीपते ) शारितमान् इन्द्र ! ( यत् अह गोपतिः स्याम् । यदि मै गायका स्वामी मन जाऊ तो
में ( अस्मै मनीपिणे दित्सेधे ) इस बुद्धिमान्को में धन देनेको इच्छा कर और उसे ( शिक्षेयं ) धन भी दू ॥२॥
[१८३६ ] है इन्द्र ! (ते सूनृता धेनु ) तेरी स्तुतिरूपी वाणी गायका रूप पारण करके (पिप्युपी ) पोषण
करनेको इच्छा करते हुए (सुन्वते यजमानाय ) सोम यज्ञ करनेवाले मजमानके लिए ( गां अध्यं दुहे ) गाय भोर पोडे
[ १८३७ ] ( मापः हि मयोभुवः स्थ) जल निसन्देह सुख देनेवाले हैं । ( ता न. ऊजें दघातन ) वे हमारे
भान और बलवानेवाले हो । तया (महे रणाय चक्षसे) महान रमणीय ज्ञान प्राप्त करके देनेवाले हो ॥१॥
[ १८३८] हे जलो (हपः यः रसः शिवतमा ) यहाँ ओ तुम्हारा रस अत्यन्त सुख देनेवाला है, (तस्प न.
भाजयत ) उसे हमें सेवन करने के लिए दो। ( उशती मातरः दय ) बच्चे के पोषण करनेको इच्छा कानेशप्ती माता
जिसतरह अपना पल्पी रस अपने बच्चेको देती है, उसी तरह तुम हमें अपना रस हो ॥ २॥
[ ८३९ ] है ( आपः ) जलो। (यस्य क्षयाय जिन्यथ । जिसके निवास के लिए तुम प्रेरणा करते हो, तर
भर नः गमाम ) उसके लिए पूर्णरुपसे हम तुम्हारा उपयोग कर सकें ऐसा सुम करो। (नः जनयथ च ) हम पुत्रपौत्र
उपस कर सके ऐसा हमें सामर्थ्यशाली बनाओ ॥३॥
Cice] (यात नः) पाय हमारी तरफ ( हदे शंभु मयोभु भेषज) हरपको आनन्द देनेवाले मौर
मुहारर भौवय ( आ पातु ) लेकर आधे और ( नः वायूपि प्रतारिपत् । हमारी माय पदावे ॥१॥
[ १८४१] है (वात ) पापो! ( उत नः पिता असि हमारा पिता है, ( उत धाता } और भाई है, (जत
मा सखा) और हमारा मित्र भी है। ( सानाजीवातये रुधि } बह व हमारा जीवन दीर्घ कर॥२॥
देती है ॥३॥
(३७४) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उर्चिका २ 3 . . ३3३3 १८४२ यददो वात ते गृहेऽमृतं निहितं गुहा । तस्य नो धेहि जीवसे ॥३॥ ११ (पौ) ॥ [ धा० १० । उ०१। स्व. नास्ति ] (ऋ १०।१८६३) १८४३ अभि वाजी विश्वरूपो जनित्र हिरण्ययं विभ्रदत्क५ सुपर्णः । सूर्यस्य भानुमृतथा बसाना परि स्वयं मेधमृजो जजान १८४४ अप्सु रेतः शिश्रिये विश्वरूप तेजः पृथिव्यामधि यत्सबभूव । अन्तरिक्ष स्वं महिमानं मिमानः कनिन्ति वृष्णो अश्वस्य रेतः ॥२॥ १८४५ अयं सहस्रा परि युक्ता वसाना सूर्यस्य भानुं यज्ञो दाधार । सहस्रदाः शतदा भूरिदाबा धर्ना दिवो भुवनस्य विश्पतिः ॥३॥ १२ (पू)॥ [धा०२० । उ०१। स्व० १८४६ नाके सुपर्णमुप यत्पतन्त५ हृदा येनन्तो अभ्यचक्षत त्वा । हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूत यमस्य योनी शकुन भरण्यम् ॥१।। (ऋ. १०।१२३१६) ३२५ ] ३२ 10 २२ २२ -- [१८४२ ] हे ( वात ) वायो ! (ते गृहे ) सेरे घरमें ( यत् गदः गुहा अमृतं निहितं ) जो गुप्त स्थानमें यह भमत रखा हुआ है । हे ( विभावसो ) तेजस्वी धन पासमें रखनेवाले वायो ! (तस्य न घेहि ) यह अमृत हमें दे ॥३॥ [१८४३ ] ( सुपर्णः बाजी ) गरडके समान बलवान् (विश्वरूपः ऋतः ) अनेक रूपोंसे पुक्त और पापनाशक अग्नि ( जनित्रं अक्क ) अपने उत्पति स्थान • अरणियों - को अपने तेजसे व्याप्त करता है और (हिरण्ययं अभि विनत् ) सोनेके समान तेज पारण करता है। सूर्यस्य भानु सूर्यके तेजको ( ऋतुथा यसानः ) ऋतुके अनुसार पारण करके (मेघ परि स्वयं जजान ) यज्ञको स्वयं सम्पन्न करता है ॥ १ ॥ [१८४४ ] ( रेतः विश्वरूपं यत्तेज ) वीर्षके समान अनन्त रूपयाले वे तेज ( अप्सु शिधिये ) जलके माधपसे रहते है।। यत् पृधियां अघि सं यभूव ) जो पृश्यो पर है और ( अन्तरिक्षम्य महिमानं मिमानः ) मो अन्तरिक्षम अपनी महिमाको फैलाता है, (कृष्णः अश्वस्य रेतः फनिफन्ति ) बलवान् सोमका वीर्य पार करता हुआ तुसे प्राप्त होता है ॥२॥ [२८४५] ( दियः भुवनस्य घर्ता ) धुलोर और पृयोलोको पारण परनेवाला (विपतिः ) प्रजाता पालन करनेवाला ( सहस्रदाः शतदा भूरिदाया) यज्ञ करनेवालोंहो हमारों, सैकडों तरह के बहुतसा धन देनेवाला ( यक्षा मय) या परनेवाला यह माग्न ( युक्ता सहस्रा परि घलान. ) अपने पास रखी हुई हजारों किरणोंको फैलाता हमा ( सूर्यस्य भानुं वधार ) सूर्पके तेजको धारण करता है ॥ ३ ॥ [१८४६) हे येन 1 ( सुपर्ण पतन्तं ) गहरे समान उडनेयाले (हिरण्यपक्षं यगणस्य दूतं ) सोनेके समान सावधाले वरुणके दूतको ( यमस्य योनी शकुनं भुरण्यु) नियमन करनेवाले विद्युत रूप अग्नि के स्थान तरिक्ष में पक्षीय समान उसनेवाले मर जगत्का पोषण करनेवाले (त्या हुदा बेनन्तः) तुझे अन्त करणसे प्राप्त गरनेको इच्छा करते हुए स्तोता (नाके यत् भग्यचक्षत ) अन्तरिक्षम जय देखते हैं, तब ( उप ) मेरे पास आते हैं ॥२॥ 1 ( ३७५) विंश मध्याय] सामवेदका सुरोध अनुवाद 31 र र 32 ३ 13 १८४७ ऊधो गन्धः अधि नाके प्रस्थापत्यचित्रा विनदस्यायुधानि । वसानो अस्कर सुरमि दृशे कर स्वाक्षर्ण नाम जनत प्रियाणि ॥२॥ (ऋ. १०।१२३१७ ) १८४८ हुप्सा समुद्रममि यजिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षमा विधर्मन् । भानु शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीय चक्र रजसि प्रियाणि ॥ ३ ॥ १३ (सु)॥ [धा०२६ । उ०२० स्व०५] ऋ. १०१२३८) ॥ इति सप्तमः खण्डः ॥७॥ ॥ इति नवमप्रपाठकस्य द्वितीयोऽध ॥ १-२ ॥ ।। इति विशोऽध्याय ॥२०॥ [१८.७] (ऊधः गन्धर्वः प्रत्य ) ऊपर रहनेवाला जलोको धारण करनेवाला येन जब हमारे सामने आकर (माके अघि अस्यात् ) मन्तरिक्षम स्थिर होता है, तय यह ( अस्य चित्रा आयुधानि रिभ्रत् अपने विलक्षण शस्त्रोंको पारण करके ( दृशे सुरमि भत्कं वसानः ) देखने के लिए मुन्दर रूप धारण करते हुर ( स्थान ) सूर्य के समान ( नाम पियाणि जनत) प्रिय जलोको उत्पन्न करता है ॥ २ ॥ [१८३८(विधर्मन् द्रप्स.) विशेष गुणोंसे युक्त, प्रयाह युक्त (गृध्रस्य चक्षसा पश्यन् ) ध्र-सूर्य के जो तेजस्वी होकर देखनेवाला बेन ( यत् समुद्रं अभि जिगाति ) जब पानीसे भरे हुए मेपके पास जाता है. सम (भानुः शुक्रेण शोचिपा ) सूर्य स्वच्छ सेजसे (तृतीये रजसि चकान ) तीसरे चुलोकमें प्रकाशित होकर ( प्रियाणि चके) प्रिय जलोंको उत्पन्न करता है ॥ १॥ । यहां सातवां खण्ड समाप्त हुआ। । विंशोऽध्यायः॥ विंश अध्याय इस बीसवें अध्यायमें इस सग्नि, सूर्य, आप मौर सोम ३ इन्द्र! यथा पथा घुतया त्यत् रातयः घि देवतामोका वर्णन है, उन्हें अब कससे देखिए- यन्तु । १७७०]-हे हाद। जिसप्रकार बरे माग अनेक भेटे मार्ग निरलते हैं, उसीप्रकार तुमसे अनेक प्रकारकहान उपासकोंको गोर निकलते हैं। इन्द्रा नाम श्रुता, मात्यियः प्रामा १७५८]- यह ऊतये सुम्नाय तुविकृमि प्रतीपई शषिष्ठं बिके नामसे विख्यात है, यह ऋतुओं के अनुसार कार्य करने सत्पति वा इन्द्रं आपर्तयामसि [१७७१]- स्वसंरक्षण और सुख प्राप्ति के लिए मनेक उपयोगी राम करनेवाले,हिसा २२ शयसः पते ! त्यां इत् संयत र गिरः राओंको नष्ट करनेवाले, मलवान मानो पाहन करमे. यन्ति । १७१९]- है इसके स्वामी या संयमा पुरुषको वाले सुप्त इनको हम भपने पास बुलाते हैं। सो स्तुति होती है, उसप्रकार री स्तुति होती है। ५ विगुप्म नुपियानो शचीचा मसे ! विषया पाता और उत्तम रानी है।
( ३७१) सामवेदका सुगेध अनुवाद [उत्तरार्चिका टूट जायें। महित्वना आ पनाथ [१७७२]- महा बलवान, बहुत कार्य १८ पापत्वाय न रंसिपम् [ १७९६ ]- पापी होने करनेवाले शक्तिमान और बुद्धिमान् इन्द्र ! तू सब प्रकारको लिए में किसोको धन नहीं दूगा। महत्वपूर्ण शक्तियोगे युक्त होकर व्याप्त होता है । १९ हे मघवन् । त्वत् अन्यत् आप्य नहि, [१७९७] ६ यस्य महः ते हस्ता उमा-यन्तं हिरण्ययं वज़ -हे धनवान् इन्द्र ! तेरे सिवाय हमारा कोई दूसरा भाई परियितुः [ १७७३ ]- जिस महान् पुरुषके - तेरे - हाय नहीं है । पृथ्वी पर संचार करनेवाले पजको धारण करते हैं, परफा २० यस्यः पिता चन अस्ति [१७९७]- तेरे प्रयोग करते है। सिवाय प्रशसनीय सरक्षक भी दूसरा कोई नहीं । ७ शाक्मना शाकः महः शूरः यद चिकेत, तत् २१ अस्सै इन्द्राय पुगे रथं शूषं सुप्रभर्चत [१८०१] सत्य इत् मोघं न [ १७८३ ]- अपनी शक्तिसे सामर्थ्य - इस इन्द्र के रथके आगे जानेवाले बलको स्तुति करो। सम्पर ऐसा महान् शूर इन्द्र जो करनेका निश्चय करता है, वह निश्चयसे करके दिखाता है, वह निष्फल नहीं होता। २२ समत्तु संगे अभीके चित् लोकशात् पृषक्षा अस्माकं चोदिता बोधि [ १८०१ ]- युद्ध में शत्रुके सेनाके ८ स्पाई यम जेता, उत दाता [१७८३]- स्पृहणीय अपने ऊपर चढते हुए घलेआने पर, लोगोका कल्याण करने पन वह जीतकर लाता है और उसका दान करता है। वाला और शत्रु का नाश करनेयाला इन हमारा प्रेरक है, १. एभिः वृष्ण्या पास्यानि या ददे [ १७४४]-इन यह तू जान। गपतोंके साप रहकर यह इन्द्र सामयंसे होनेवाले कार्य २३ अन्यकेषां धाचसु अधि ज्याकानमन्ताम् करता है। [ १८०१]- शत्रुफे धनुषको डोरिया १० येभिः वृत्रहत्याय घसी औक्षत् [ १७८४] २४ हे इन्द्र ! अहिं अहन , अश: जसिणे, विध्यं इन महतों के साथ रहकर वह पधारो इन्द्र शत्रुको मारनेके यार्य पुष्यसि [ १८०२ 1- हे इन्न । न यहिको मारकर लिए वृष्टि करता है, माणोंकी वर्षा करता है। शत्रुरहित हो गया है। तू सय स्वीकार करने योग्य धम अपने २१ वृत्रहन्तमः शतक्रतुः इन्द्रः द्विताबिदे [१७९१] पास बनाता है। - पात्रुको मारनेवाला, संकों कर्म करनेवाला इन दोनों हो २५ नः विश्वा अरातय. अर्यः सु विनशन्त, यः तरह काम करता है। न जिघांसति, शनये वर्ष अस्ता अति [ १८०३ :- १२ महेधे महे प्रभर यम् [ १७९३]- महान् वृद्धि हमारे सब शत्र जो हम पर चढाई करते हं मष्ट हो जाये। हो, इसलिए महान इन्द्रको भरपूर हवि अर्पण करो। जो हमें मारना चाहता है, उस पर शास्त्र क। १३ प्रचेतसे सुमति प्ररणुपं [ १७९३]- ज्ञानी इम मुप्रसिद्ध है। वह महान शानी ओर टोक समय पर इसके बारे में उत्तम भावना हुदयमें धारण करो। काम करनेवाला है। यह मी है । भनेक उपयोगी कार्य ५ चर्पणि-प्रा. यिशामचर [ १७९३] प्रशाऔर यह करता है । यह अत्यन्त सामावान है। यह सम्मनोका पोषण करनेवाला तू प्रजाओंकी सहायता कर। अच्छी तरह पालन करता है। वह हाघों वद्य पारण करता १५ हे विप्राः! उरम्यचसे महिने इन्द्राय मुक्ति औरका निश्चय करता है, वह कार्य वह परता ही है। है और उनका उपयोग शत्रुके माश ने लिए करता है। महल अनयन्त, तस्य यतानि धीराः न मिनन्ति !१७९४० सामन्यसे होनेवासे महान महान कार्य वह मरता है पर है विगतो ! दिदोष सापक महातको उत्तम स्तुति करो। सका नाश करके मायोकी रक्षा रता है। यह दोनों ही १६ सा राजानं मनुत्तमन्यु नं एप याणी नाम करता है। वह प्रजामोश पालन मच्छो सरह करता सहध्ये दधिरे । १७९५ - सबका रामा, निराके कोपरे है। इसलिए उस इनके बारे उतम विचार धारण करने मागे कोई भी टिक नहीं सकता, ऐरो उरा को पारो चाहिए। बहस का राजा है । उसरा कोप निरा पर हराने के लिए स्तुति मागे करती है। परता है यह मष्ट हो जाता है । इसलिए उसे परम रतना १७ हे इन्द्र। पर यायतः, पतायत् अहंशीय पाहिए। तो मिशा दूसरा कोई भी शामिल नहीं है। [ १७१५]-RR! मिलने पनका स्वामी है, उतने बह ही कास्पायरमेवाला है । पुटमें वह ही मा ना में भी स्वामी होई। मरमर है। उसने राक्षमागे मापारण उममा को ( ३७७) विश अध्याय] सामवेदफा सुबोध मनुवाद देता है। भी शवना नहीं । हमारे शत्रुओं को भी इन्द्र मार दे और ९ सुभगां महीं इपं सानसि रयिं दधासि [१८२० हम भी सवरहित करे। -अधिक भाग्ययुक्त अन्न और सेवन करने योग्य घन अग्नि अमि अब अनिका वर्णन देखिये- १० जनाः ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतं या १ या द्विजन्मा सः होता अयं विश्या वार्याणि सुम्नाय पुरः दघिरे । १८२१]- लोग मत करनेवाले, पूश्य, सर्वत्र दर्शनीय अग्निको अपने सुखकी प्राप्तिके लिए अवस्था दधे [१७७६]- दो अरणिमोसे उत्पन्न हुआ हमा, अपने आगे स्थापित करते है। रेदोंको बुलाकर यज्ञस्यानमें लानेवाला यह अग्नि सब चाहने योग्य धनोंको मोर यशस्वी कर्माको धारण करता है। ११ हे अग्ने ! त्वं यस्य सख्यं आविथ, सः मु. चौराभिः याजकर्मभिः तव ऊतिमिः प्रनराति [१८२२] २ हे अग्ने ! भद्रस्य दक्षस्य साघोःतस्य गृहतः -हे अग्ने । तू जिसके साथ मित्रता करता है, वह उत्तम वीर ऋतोः रथीः बभूथ [ १७७८ 1- हे अग्ने ! कल्याणकारक पुर्वास और दल वढानेवाले कर्मोसे युक्त तेरे सराणोंमें और मल बढानेवाले उत्तम सत्य ऐसे महान् यसका तू संचा- संकटोसे पार हो जाता है। सक होता है। यश कल्याण करता है, मल बढाता है ऐसा यह यज्ञ अग्निमें होता है। २ हे अग्ने ! ऊर्जा इथाभायुपा निवर्तख । अंहसः ३ हे मम्मे । हव्यवाहनः दूतः अध्यराणां रथीः साप हमारे पास आ। पापसे हमारी रक्षा कर । नः पाहि [ १८३२]-हे अग्ने ! तू बल, अन्न और आयुके असि । अस्मे सुवीर्य गृहत् श्रवा घेहि [ १७८१1-हे १३ हे अग्ने ! रय्या सह निवर्तस्व [ १८३३]- बग्ने ! तू हपनीय द्रम्म देयक पास पहुंचानेवाला दूत मौर हे अग्ने । तू पनके साथ हमारे पाप्त मा। अहिंसापूर्ण पक्षका संचालक है । हमें उत्तम वीर्यसे पुरत महान् पश दे। अग्नि, हवन किए गए पदार्थ अति गुम हो यह भग्नि दो अरणियोंको रगडसे उत्पन्न होता है । यह माते हैं और अग्नि उन्हे जहां पहुंचाना होता है वहां पहुंधा कल्याण करनेवाले बल बाता है। यह हवनमें डाले गए देता है। यह अग्नि हिंसाके बिना यश करता है। इस यम पदार्योको महां पहुंचाना होता है वहां पहुंचाता है और उत्तम हिंसा नहीं होती। इन पोसे वीर्य बढ़ता है और यश भी वोर्य यदाता है। जिसमकार फरसा सकडीको काटता है, पाता है। उसीप्रकार यह अग्नि रोगबीजोंको नष्ट करती है। इसरी ४ विरुक्मता ओजसा पुरुचित् दीधान दुहन्तरः सहायताले यसवान् रोगयोग भी नष्ट हो जाते हैं । इराका परशुःन दुहन्तरः भवति । १८१५]- विशेष गरषो प्रकाश पवित्रता करनेवाला है । यह मनि उत्तम यल याने- और इससे अधिक प्रकाशमान होकर, गनुभोको काटनेवासे याले अन्न और धन देता है । सुख और मारोग्यके लिए मानो फरसेके समान, ग्रोह करनेवालोका नाश करनेवाला होता है। लोग इस मग्निको स्थापना करते है। इस अग्निमें हवा ५ यस्य समृती पीड चित् थुपत् [१८१५- करना बल मानवाला कर्म है । अग्निसे संम्पार रिए गए मन्त्र मनुष्यकि मल, बारोग्य और सामुदाते है। जिसके साथ रहनेसे शत्रुको भी हराना मामान हो जाता है। आपा (जल) ६ निापहमाणः यमते (१८१५] शत्रुको हराकर उसका नियमन करता है। १ गापः मयोभुयः, ताः ना ऊर्जे दधातन, महे ७ पायकपः शुरुवर्याः अनूनपर्धाः मानुना रणाय चक्षसे । १८३७ ]- गम निसग्देह सुख मानेवासे उदिया । १८१७]- शुद्धता करनेवाली किरणोंसे परन, हे। ये हमारे बल यानेवास हो तपा ये महान मोर सुन्दर निर्मल किरणोंस मुक्त, पूर्ण तेगी, ऐसा तु अपने तेजमे वर्णन करानेवासे हों। उरमको प्राप्त होता है। २६द पाशियतमा रस: तस्य न: भाजपा ८ मापरस्य इकर्तारं प्रचेतसं महः राघातः 11८३८]- पहा तुममें मत्यन्त सापान पलेवामा रस क्षयन्तं पामस्य राति [ १८२० 1- म करनेवाले, सानी, है, उसका सेवन हमारे द्वारा हो, ऐसार। बहुत मन पारमें रत्तनेवाले ऐगे भनिरोहम स्तुति करते हैं। ३ हे आप! यम्य क्षयाय जिन्यश, तम भरं यः ४८ [सामाहिती - (३७८) सामवेदका सुबोध भनुवाद [ उत्तरार्चिकः गमाम [१७३९]- हे जलो! जिसको सुखसे निवास करानेके २ पुनानाय ते तानि सुपहा [ १७६७ ]- शुद्ध होने लिए तुम प्रयत्न करते हो, वे कार्य हम तुमसे पूर्णरूपसे वाले सुने घे उत्तम प्रकारसे रक्षा करनेवाले बल प्राप्त होते है। करवायें। ३ एपा ऋत्वियः ब्रह्मा गृणे [१७६८]- यह ऋतुओंके पानी आरोग्य बढ़ानेवाले और मुख देनेवाले है । उससे अनुसार कार्य करनेवाला ज्ञानी प्रशसित होता है। भारीरफा बल बढता है, और शरीरको सुन्दरता बढ़ती है। ४ हे शवसः पते ! संयतः न त्वां गिरः यन्ति पानीमें जो रस है.वह कल्याण करनेवाला है। उसे पानेवाला [ १७६९ - हे बलफे स्वामी इन्द्र ! जरो मनुष्य सयमी मनुष्य निरोगी होकर सुखी होता है। इन मंत्रों जल पुरुषको प्राप्त होते हैं, उसीप्रकार स्तुतियां तुझे प्राप्त होती है। चिकित्साका वर्णन है । पानी एक उत्तम औषधि है । जल- ५ हे इन्द्र ! यथा पथा सुतयः, त्वत् रातयः वि चिकित्सासे रोग दूर हो सकते है। इस प्रकार शुद्ध जल बहुत यन्तु [ १७७०]-है इन्द्र । जैसे बड़े रारतेसे छोटे-छोटे अत्यन्त उपयोगी है। रास्ते निकलते है, उसीप्रकार तुशसे अनेक प्रकारके दान वायु निकलते है। १ वातः नः हदे शंभु मयोभु मेष आधातु, न ६ ऊतये सुनायतुविकृमि मातीपदं शविष्ठं सत्पति आyपि प्रतारिषत् [ १८४०]- वाप हमारे हृदयका वा इन्द्रं आवर्तयामसि [१७७१]- स्वसंरक्षण मोर मुख मानन्द बढानेवाला और आरोग्य बढानेवाला होकर बहे और प्राप्तिके लिए अनेक कर्म करनेवाले हिंसफ शत्रुओंका नाश हमारी आय बढावे। करनेवाले इन्द्रको हम उपासना करते है। २ हे वात! ते गृहे यत् अदा गुहा अमृतं निहितं, तस्स नः घेहि [१८४२]- हे वापो ! तेरे घरमें जो अमृत महित्वना आ पप्राथ [ १७७२ ]- हे महा बलवान् भनेक ७ तुविशुप्म तुविकतो शचीयः मते ! विश्वया रखा हुआ है, उसे हमें दे। कर्म करनेवाले, शक्तिमान् और युद्धिमान इन्ट ! सब प्रकारके ३ हे घात! नः गिता, भ्राता, सखा असि, नः महत्वपूर्ण शक्तियोंके साथ तू सर्वत्र व्याप्त है। जीपातये कृधि [१८४१]- हे वायो । तू ही हमारा पिता, ८ भद्रस्य दक्षस्य साधोः सतस्य गृहतः क्रतोः भाई और मित्र है, इसलिए तू हमारा जीवन दीर्घ कर। रथीः बभूथ [ १७७८]- कल्याण करनेवाले, बल बहाने वायुमें औषधिका गुण है, वायु उन गुणोंको लेकर हमारे बाले, उत्तम, सत्य और बडे बडे काँका तू सचालक है । पास आये और हमारी उमर बकावे । वायुमें अमृत है । इस लिए धायुका ठीक तरह सेवन करनेसे मृत्यु दूर होकर आए अर्याक् भव [ १७७९ ]- ज्योति स्वरूप सूर्यफे समान, सब ९ ज्योतिः स्वः न, विश्वेभिः अनीकै सुमनाना सोम सेजोंसे युक्त उत्तम मन धारण करनेवालात हमारे पास आ । १० विवस्वत् चित्रं पधः आ वह, अद्य उपर्युधः १ यः जागार ते अय सोम आह, तय सस्ये महं देषान् आ वह [ १७८० ]- तेजस्वी और विलक्षण धन अस्मि [ १८२९]-जो जागता रहता है, उससे यह सोम लेकर आ और आज सवेरे प्रातःकाल उठनेवाले विद्वानोंको कहता है कि तेरी मित्रताम में हूं। तेरा में मित्र हूँ। सेकर इस यज्ञमें मा। जागत रहनेवाले लोगोरी सोम मित्रता करनेवाला है। वह ११ अध्वराणां रथी असि [ १७८१]- हिंसारहित उसका कल्याण करनेवाला है। सोमका उपयोग जागृत कोका न सघालक है। रहरूर करना चाहिए। १२ अस्मे सुर्याय पृहत् श्रयः धेहि [ १७८1]- हमें उत्तम पराक्रम करनेके सामप्यं और महान् या है। सुभाषित १३ विधु समने यहना दद्राणं युवानं सन्त पलित जगार [ 1७८२/- अनेक कार्य करनेवाले, पढमें बहसमे १ वेधसः कारपः ज्योति जलानं मृजन्ति [१७६६] सोको मारनेवाले ताणको भी वृद्धावस्या निगल जाती है। पाय करनेवाले शानो तेजस्विता प्रकट करनेवालेको मुख १४ देयस्य मदित्यनाकाम्यं पश्य [१७८२]- देवके परते। महिमासे मरे हए इरा रायको रेखो। बहती है।
विश अध्याय] करता है। तू निश्चपसे महान है। सामवेदकी सुयोघ अनुवाद (३७०) १५ अद्य ममार सहाः समान [१७८२]- आज जो ३० प्रचेतसे सुमति प्रकृणुध्वं [ १७९३ ]- विशेष भर गया यही कल प्रकट होता है । ' समान ' (सं-मान ) बुद्धिमानके विषय अपने उत्तम विचार बना। उत्तम रोतिसे प्राण धारण करता है। ३१ वर्षणिमाः विश प्रचर [ १७९३ - प्रजाओंका १६ यत् चिकेत, तत् सत्यं इत् , मोघंन [१७८३] पोषण करनेवाला तू सम प्रजाओंका पोषण कर। - इन्द्र नो कर्तव्य करने का निश्चय करता है, उसे सत्य करके ३२ हे विमाः ! उरुव्यचसे महिने इन्द्राय मुक्ति रिसाता है, उसे प्यर्थ नहीं जाने देता। ब्रह्म जनयन्त, तस्य प्रतानिधीग-नामिनन्ति[७९४] १७ स्पाई यसुजेता उत दाता । १७८३] - वह हे पाह्मणो ! विशेष ध्यापक इनके लिए जाम स्तुतिके स्तोत्र चाहने योग्य धनको जीतकर लाता है और उसका दान कहो । उसके कार्य बुद्धिमान लोग विनष्ट नहीं कर सकते। ३३ सत्रा राजानं अनुत्तमन्यु इन्द्र एव पाणी २८ वृष्ण्या पोस्यानि या ददे । १७८४ ]- वह यल सहध्ये दधिरे [ १७९५]- सबका एक ही समयमै राजा पकानेवाले पौरपके काम करता है। होनेवाले, जिसके कोषके आगे कोई ठहर नहीं सकता, ऐसे १९ ये देयाः महः क्रियमाणस्य कर्मणः जाने कर्म इन्द्रको ही हमारी पाणी शोको हराने के लिए आगे उदजायन्त [ १७८४ ]- नो देव महत्वके करने योग्य करती है। कार्योंमें सत्य कर्म ही करके दिखाते हैं। ३४ हर्यध्वाय आपीन् सं वर्धय [ १७९५]-इन्द्रको २० हे सूर्य ! महान् असि यर् [१७८८]- हे सूर्य। स्तुति करने के लिए मित्रको प्रोत्साहन हो। ३५ हे इन्द्र! यत् यायतः, पतारत् महशीय २१ आदित्य ! महान् असि पट् [ १७८८ - है (१९७६ ]- हे इन्द्र ! जितने घनका तू स्यामी है, उतनेका सूर्प । तू महान् है, यह सत्य है। ही में स्वामी होऊ। २२ ते सतः महा महिमा [१७८८]-तेरे जैसे महान्- ३६ स्तोतारं इत् दधिषे, पापत्वाय न रसिपम् [१७८६ ]- स्तोताको म पन देकर उसका पारण क्हंगा, पर उसे पाप प्रदत नहीं होने दूगा। पाप करनेमें पर २३ पनिष्टम 1 महा महान् असि [ १७८८ 1-है आनन्द माने ऐसा उसे अवनत महीं होने दूगा। स्तुत्य ! तू अपनी महिमासे महान है। २४ हे सूर्य! श्रवसा महान् असि यद् [ १७८९] ३७ कुहचिद् विदे महयते दिये दिये राया शिक्षेयं - हे पूर्व ! तू अपने महान् यशसे महान् है । यह सत्य है। काय करनेवालेको में धन देता हूँ। इत् [१७९७]- इन्द्र कहता है को कहीं पर भी रहकर महत्वरे २५ देवानां मना महान् असि [१७८९}-टू देयक ३८ हे मघवन् ! त्यत् अन्यत् आप्यं नदि, यस्या पिता चन अस्ति [१७९७ इन्द्र! तेरे सिवाय २६ असुर्यः पुरोहितः [ १७८९]- तु असुरोंका नाश परनेवाला है इसलिए सुशे पा स्थापित किया है। हमारा दूसरा कोई भाई नहीं है, और प्रशंसनीय पिता भी २७ ज्योतिः विभुः अदाम्यं [ १७८९ - तेरे सेज ३९ मर्चतः चिप्रस्य मनीषां योध( १७९७]- पापा और मधवाले है। अपना करनेवाले साह्मणकि मन जान । २८ वहन्तमः शतफतः इन्द्रः निता विदे ४० अन्तमा सचाइमा दुपांसि प्य [ १७९८ ] [ 1 ]- बनको मारनेवाला, सको कर्म परशाला में बहुत निष्टका मित्र है ऐसी भावनासे इन सेवामाको पर दोनों प्रकारके कार्य करता है। मायोका संरक्षण और स्वीकार कर। दुष्टोंका नाश ये दोर्जी उसके काम है। ४१ तुरस्य ते गिरः मसुर्यस्य विद्वान् न अपि २९.पा महेवृधे महे प्रभरण्यम् [ १७१३ ]- अपने मृप्ये ७९]--शोप्रतास होता माग परमेयासे महान संवनके लिए महान् वीरका विशेष सम्मान करो। तेरी स्तुतियोंको तेरे बालो जाननेगाला में हर महीं पर समातेरी स्तुति में अपना को महिमा भी महान है। महत्व के कारण मला है। दूसराई महीं। मेमो देना हो, भरपूर यो। + करो। (३८०) सामवेदका सुबोध मनुवाद [उत्तर्षिक: ४२ सयशः ते नाम सदा विवकिम [ १७९९ - ५८ शर्धते मा [1८०६]- नाश करनेवालोंके सीन अपने पदाको बढानेवाले तेरे नामको में सा लेता रहूगा। हमें मत कर। ४३ मनीरी वा इत् भूरि हयते [१८००]- बुद्धिमान ५१ हे शचर्चाव. । शचीमिः शिक्ष [ 16.1] है तेरे लिए बहुत हवन करता है। साक्तिमान् इन्द्र ! अपनी शक्तिसे हमें धन दे। ४४ अस्मत् आरे ज्योक् मा कः [ १८०० ]- हमसे ६० सा विषमता ओजसा पुरचित् दीधाना दूर तू बहुत ज्यादा समय तक मरह। दुहन्तराभवात [ १८१५] यह अपने तेजस्वी बलसे ४५ अस्मे इन्द्राय पुरोरयशुपं सुप्र अचंत [१८०1] अत्यन्त तेजस्वी होकर का नाश करनेवाला होता है। इस इन्द्रो रथफे आगे रहनेवारो सामर्यका अच्छी तरह ६१ पन्य समृतौ बीड चित् ध्रुवत् [ १८१५]- पूजन जिसके साथ रहनेसे बलवान शनु भी हार जाता है। ४६ समत्सु संगे अभीके चित् लोकत् त्रज्ञा ६२ धन्यासहा न अयते [ 1८1५]- यनुषधारी गेर अस्माक चोदिता घोधि [ १८013- यदि त्रुको अपनी जगहसे नहीं हटता । सेना हम पर पद्धती हुई पास आ जावे, तो लोगोंग पालन ६३ निम्पहमाणः यमते [1८.५]- शत्रुको हराने- करनेवाला और पत्रको मारनेवाला इन्द्र हमारा उत्साह वाला सबका नियमन करता है। पढानेवाला है, यह तुम जानो। ६४ तय घयः श्रव [१८१६]-तेरा अन्न प्रशसनीय है। १७ अन्य केपो धन्यसु थधिज्याका नभन्तां [१८०१] ६५ हे विमावसो| अर्चयः महि भ्राजन्ते [१८१६] -अन्य पाकि धनुयको डोरिया टूट जायें। -हे तेजस्वी भग्ने ! तेगे ज्यालायें बहुत प्रदीप्त हो चुकी हैं। ४८ आहि आइन अशः जक्षिपे [ १८०२ ]- महिको मारकर शायरहित होता है। ६६ पायकपर्चाः, शुक्रवाः, अनूनवाः भानुना ४९ बिश्य या पुप्यसि [१८०२]- सद पाहने योग्प मिल जसे मुक्त, पूर्ण तेजस्वी ऐसा तू अपने सेनसे उदयको उदियपि [१८]- शुद्ध करनेवाली फिरोसि युगत, धनको तू पदाता है। ५० ते त्या परिप्वजामहे । १८०२]- उस तुझे हम प्राप्त होता है। यदाम करते हैं। ६७ हे अमर्त्य अग्ने | जन्तुभिः परज्यन् भस्मे ५१ नःविभ्यामरातया गर्यः सुविनशन्त८०३) रायः प्रथयस्व ( १८.९- हे अमर अग्ने ! अपने तेजसे -हम पर घटकर चले आनेवाले सब मात्र उत्तम रोतिसे नट तेजस्वी हुआ हुआ तू हमारे पन बदा। ६८ दर्शतस्य वपुषः विराजसि [1८1९] व सुन्दर ५२ यः नः जिघांसति शप्रये चर्घ अस्ता अति रोरसे सुशोभित होता है। [1८०३ - तो हमारा यपरको रक्षा करता है, उस ६९ पर्शतं फतुं पृणक्षि [1८1९]- दर्शनोप सादर पर सू मारप अस्त्र फेंकता है। पसकर्मको उत्तम फल देता है। ५३ ते या रातिः घम् ददिः [ १८०३]- सेरे ये ७० थायरस्य करि प्रचेतसं, महः राधसः दान हमें पन देवें। क्षयन्तं, पामस्य राति सुमगां मही हर्ष, सानसिराय -हे घोरे पास रखनेवाले इन्द्र ! मेरे समान धनवान्को देनेवाले हैरी में स्तुति करता हूँ। तू उत्तम भाप मुक्त बहुत ५५ देहारय 'रेवतःस्तोता रेयान स्यात् [१८०४] दधासि [ १८२० 3- यहिसापूर्ण माके संस्कार करनेवाले, विशोष शानी, बहुत पन पासमें रखनेवाले और उत्तम धन स्तुति करनेवाला धनवान होगा ही। ५. त्यावत मघोनः सुतस्य मेदुः[१८०४ }-तेरे बन और सेवनीम पन हमें रेता है। जो पनबालेकी स्तुति परनेवाला अवश्य धनवान होगा ही। ७१ जनाः शतायानं महिष विश्वदर्श मनि ५६ अ-गोरपिः आचिर्वत [१८०५-गायन मुम्नाय पुरः दधिरे (1८३11-- यामर या करनेवाले पारवाला पन हू जानना है। पूर, सब प्रहारसे दर्शनीय मीनको सुष हो, इसलिए अपने पोयत्नये नः मा परा दा ! १८०६-हमर भागे स्थापित करते हैं। गारो बाधीन एम म पर। ७२ स्यं यस्य समापिथ, ससुरामि थान (३८१) विश अध्याय ] सामवेदका सुरोध अनुवाद नहीं रहता। कमिः तव ऊतिमिःमतरत [१८२२]- तु जिप्तरे ८६ इह वः य शिवतमा रस , तस्य ना भाजयत साप मित्रता करता है, वह वीर पुत्रोंसे और बलवर्थक [१८३८]- हे जलो ! यहाँ जो तुम्हारा अत्यन्त सुख देने. कमोसे युक्त होता है और तेरे सरसों से युक्त होकर सकटोंसे घाला रस है, उसे हमें सेवन करने के लिए दो। पार हो जाता है। ८७ हे मापा ! यस्य क्षयाय जिन्वय, तस्मै अरं ७३ शुक्र दिवि विराजति, महिषीय विजायते गमाम [ १८३९ ]- हे जलो। जिसका यहाँ निवास हो, [ १८२५] - अग्नि प्रदीप्त होकर आकाशमें प्रकाशित होता ऐसी इच्छा करते हो, उसके लिए हम पूर्ण रूपसे उपयोगी है, रानीके समान यह सुशोभित होता है । हों, ऐसा तुम करो। ७४ यो जागार तं ऋचः कामयन्ते । १८२६ 1-जो ८८ घातः ना हदे शभु मयोभु भपज मा यातु, नः जागता है, उसको इच्छा ऋचायें करती । मायूपि प्रतारिनन् [१८४०]- बापु हमारी तरफ हदयको ७५ यो जागार त उ सामानि यन्ति [ १८२६ ]- आनन्द दैनवाले और सुखकारक औषध लेकर आये, और जो जागता रहता है उसे साम प्राप्त होता है। हमारी आम बढाये। ७६ या जागार तं भयं सोम साह, तपसण्ये भई हे वात ! ना पिता, भ्राता, सखा असि, स. अस्मि [ १८२६ ]- जो जागृत रहता है, उससे यह सोम न जीयातये कधि [१८४१]- हे यायो ! तू हमारा पिता, पहता है कि मै तेरा मित्र होकर रहता हूँ। भाई और मित्र है, वह तू हमारी आप दीर्घ कर। ७७ अहं न्योकाः अस्मि [ १८२६ ]- मै घर बनाकर सो। तस्य न. धेहि [ १८४२ ]- हे पापो ! तेरे परमे ९० हे वात ते गृहे गुहा अमृतं निहितं, हे विभा- ७. पूर्वसद्यः सखिभ्यः नमः [१८२८]- पहलेसे गुप्त स्थान पर अमृत रसा हुआ है । है धन पासमें रखने- यहमें बैठनेवाले मित्रोंको में नमस्कार करता हूँ। वाले वायो! ये पन हमें दे । ७१ सानिषेभ्यः नमः [ १८२८]- पास पास पैठनेवालोको नमस्कार करता ८० विश्वा रूपाणि भोकांसि देवाः चक्रिरे [१८३०] उपमा - अनेक रूपोति पर देवोंने बनाये है। ८१ हे अगे! ऊर्जाइपा भायुषा पुनः निवर्तस्य १ समुद्र वर्ध [ १७६७ ]- समुदाय समान पात्रोको [१८३२]- तू बल, अन्न और आपके साथ हमारे पास मा। ८२ मंहसान:पुनः पाहि [1८३२]- पापसे हमारी २ संपतान [१७६१)- यमी युपके समान (गिरः यन्तिः) स्तुतियो तुझे प्राप्त होती है। ८३ अग्ने। रय्या सह निवर्तस्य [ १८३३]- है ३ यया पथा तयः [ १७७.-मैसे परे रास्तेसे माने । पनके साय तू हमारे पारा था। अनेक छोटे रास्ते फूटते हैं, (स्वत रातय वियन्तु) उसी. रहे इन्द् ! यथा यस्वः एकः इत् , यत् अहं प्रकार तुझसे अनेक दान निकला है। ईशीय, मे स्तोता गोसखा स्यात् [१८३४]- हे इन्न । ४ या अर्या नमन्यः न [ १७७४ ]-बो [ भग्नि ] सासू मकेला हो धनका स्वामी है, बसा ही में पनका गतिमान् वायुके समान वेगवाला होता है। तो मेरो स्तुति करनेवाला पार्योरा ५ मध्वं न [ १७७७ - जिसप्रकार घोडा मनुष्यको पचारपान पहुचाता है, उसीप्रकार यह अग्नि (मद्रं प्रतुं) ८५ भाप। मयोभुवः स्थ, तान ऊों दधातन, कल्याण करनेगले पक्षको बाता है। महे रणाय चल vs- मलनिस्सन्देह मुह ने ६ होता त्य [ १७८७]-निमप्रसार होना स्तुति करता पाले है. हमारे बल मानेगले हों, ये महान और हुनर है, उसीभरार(प्रातःमत्सति)बह प्रात माम सोमाणी शानको देनेवाले हों। डा करता। बारबार रक्षाकर। स्वामी परिहो जाऊ, मित्र हो।
(३८) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः ७ उरां घृकान [१८०८]- भेडको जिप्तप्रकार भेडिया ११ दुहन्तरः परशुन [१८१५]- लकडीको काटने- कंपाता है, उसी प्रकार ( एपां नेमिः विधनुते ) ये पत्थरोंको वाले फरसके समान यह अग्नि ( द्रुहन्तरः भवति) शत्रुओंको धारें सोमलताको कूटते हुए कंपाती है। काटनेवाला होता है। ८रथाः इव [ १८१२]- जिसप्रकार रोंको तय्यार करते हैं, उसीप्रकार (अस्मन् । अन्न तय्यार करते हैं। १२ महिपी इव विजायते [१८२५]- रानीके समान यह भग्नि सुशोभित होता है। ९ विन न जातवेदसं [१८१३ ]- विपके समान शानी अग्निके समान तेजस्वी होता है। १३ स्वः न [ १८४७]- सूर्यके समान ( दृशे सुरभि १० धां च परिमाने [ १८१४ ]- सूर्य के समान भत्कं बसाना ) दोसने में सुन्दर लगनेवाले रुपको धारण पूमनेवाला। विशाध्यायान्तर्गत ऋपि-देवता-छन्द सूची मनसंख्या ऋग्वेदस्पानं ऋषिः देवता पवमानः सोमः गायत्री " १७६६ १७६७ १७६८ ९.२९/३ " दिपवा पक्तिः " " " १७५० १७७१ " नमेष आंगिरस. नमेष आपिरसः नमेष आंगिरसः नमेषः वामदेवो वा नमेषः वामदेवो वा नमेषः वामवेयो वा प्रियमेष: आगिरस: प्रियमेघः आंगिरसः प्रियमेध: आंगिरसः दीर्घतमा औचथ्यः दीर्घतमा औधध्य दीर्घतमा औचयः वामदेवो गौतमः वामदेवो गौतमः वामदेव गौतमः अनुष्टुप गायत्री " १७७४ मानित ૮૬૮૨ दादा દ્વારે श१४९३ १११४९४ श१४९३५ ४१०१ ।१०१ ४११०३ विराट " १७७६ पदपंक्तिः १७७८ " " " " १७८० शा प्रकरवः काण्वः " प्रगाप:-(विषमा हती, समा सतोरहती १७८ " शार १०॥५५॥५ " प्रहकण्वः काकः बहदुपयों वामदेण्यः बहुवयो वामदेव्यः बहदुरपो पामदेव्यः निष्टप १७८३ " १०५५७ " " (३८३) विश अध्याय सामवेदका सुयोध मनुवाद देवता मरत. गायत्री मंघसंल्पा १७८५ १५८६ " " ऋग्वेदस्थान ८९४४ ८1९४५ दा९४६ दा१०१।११ ऋषिः चिन्ः पूतदक्षो धा आगिरसः बिन्दुः पूतदक्षो वा आगिरसः बिन्दुः पूतदक्षो वा आगिरतः जमदग्निर्गिवः " " मूर्यः प्रगापः- ( विषमा बहती, समा सतोयहती) १७८९ ८/१०१११२ जमदग्निर्भागवः गायत्री " गुकक्ष आगिरसः सुकम आंगिरसः सुक्क्ष आगिर १७९१ १७९२ " विराट " ८.९३१३१ ८९३२३२ ८९॥३३ ७३१०१० ७.३२११ ३१३१२ ७३२११८ " " १७९४ वसिष्ठो मैत्रावणि. वसिष्ठो मैत्रावणि पसिष्ठो मंत्रावणिः यसिष्ठो मंत्रावणिः " प्रगाथा (विषमा पहती, समा सतोमूहती) १७९६ १७९७ विराट " ३२११९ ७।२५।४ ७१२२३५ ७२राक्ष १७९९ १८०० पसिष्ठो मंत्रावणिः बसिप्ठो मंत्रावरणिः बसिष्ठो मंत्रावणिः यमिठो मैत्रावणिः (४) वापदरी " १८०१ " " सुवासः पंजवनः सुदासः पंजवनः सुबाराः पंजवनः . गायत्री १८०३ १८०० १८०५ १०११३३३१ १०११३३।२ १०११३०३ ८।१३ ८।१४ દાશ? ८३१ 1 " " " " " १८०७ ૧૮૦૮ ૯૦૨ १८९० मेधातिथिः काग्वः मेधातिथिः काग्वः मेधातिथिः काण्वः नोपातिथि: काण्वः नोपातिथिः काग्वः नोपातिथिःकाग्वः जमदग्निगिंव. जमदग्निभांगवः जमदग्निर्भार्गवः पवमानः सोम. ॥ " " ३४२ ९१६७४१६ ९।१७११८ ९।६७१७ " २८१२ भग्निः मात्पष्टिः १८१३ ॥ " " १११९७१ १।१२७ २०१२७१३ १०1१1१ १०111 परापोवदोदासिः पाछपी देवोबामिः परस्पो वोससिः अमिः पावकः अग्निः पाचहा सग्निः विष्टारपंक्लिा " " १८१७ ( ३८४) सामवेदका सुबोध अनुबाद [उत्तरार्चिका मनसंख्या ऋषिः वेषता अग्निः सतोयहतो १८१९ ऋग्वेदस्थान १०११४०३ १०।१४018 १०।१४५ १०११४०६ " अग्निः पावकः अग्तिः पावकः अग्निः पावक. अग्निः पावकः " " उपरिष्टाज्योतिः १८२२ ८१९१० सोमरिः काष्यः " काकुभः प्रगाथ:-(विषमा ककुप, समा सतोपहती ॥ ॥ दा१९॥३१ १०।९।३ ॥ १८२५ जगती गायत्री त्रिष्टुप् विश्वे देवाः ५।४।१४ ५४४१५ " " १८२७ १८२८ १८९९ सोभरिः काण्वः अरुणो वैतहभ्यः अग्निः प्रजापतिः अवत्सारः काम्पपः अपत्सार:वाश्यपः मुगः मुगः मुगः अवासार-काश्यपः अयासार:काश्यपः अवासार-काश्यपः अग्निः মখী " " " " " १८२१ १८३२ " " १८३४ ॥१४॥१ ८1१२ ८॥१४॥३ १०९।१ " " १८३८ गोषूपत्यश्वसूक्तिनो काण्वायनों गोधूपस्यश्यसूपितनी कापवायनी गोधूक्त्यश्वसूषितनो काण्वायनो विशिरारत्वाष्ट्रः, सिन्धद्वीपों माम्बरोपों का भाप: विशिरास्त्याप्दः, सिन्पुटीयो भाग्यरीषो या त्रिशिरास्स्वाष्ट्रः, सिन्युद्वीपो आम्बरोपो वा उलो यातायन: बायुः उलो वातायन: उलो धातायन: सुपर्ण. अनिः " ११९१३ १०११८६१ १०११८६२ १०११८६३ १८४० १८४१ १८४२ १८४३ १८४४ " " त्रिष्टुप सुपर्ण " " " सुपर्णः बेनो भागवः नो भार्गव नो भार्गव " १०१२३६ १०११३७ २०२३८ " १८४७ १८१८ " " " (३८५) एकविंश अध्याय सामवेदका सुबोध मनुवाद अथैकक्शिोऽध्यायः . २१३ ४ १३ 1 . र. अथ नवमप्रपाठके तृतीयोऽर्धः ॥९-३॥ (१-९) १-४, ५ (१-२) अप्रतिरथ ऐ४ ५ (३), ६(३), ८ (१, ३) पायाराज। ७ (१-२) नासो भारद्वाजः (१) जय ऐन्द्र (२-३) गोतमो राहूगग; ४ (३) ६ (१-२-१ ७ (३)..८ (२),.. ॥ १.२ (२-३), ३-४,५ (२), ६,५९ (१) इन्द्र ५ (२) इन्द्रो महतो वा; २ (१) वृहस्पति ; ५ (१) अप्या देवी, ५ (३) इषवः । ६ (३) (संग्रामाशिष ) युद्धभूमि - कवच - ब्रह्मणस्परयादितप । ८(१.३ [ संग्रामाशिषः १ वर्ग - सोम - यरुणा, ३ देवब्रह्माणि ]; ९ सोमावरुणौ। (२-३ ) विश्व देवा', ८(३)... ॥ ३ ॥ १-४, ५ (१), (३)८(1)९ (१-२) त्रिष्टप, ५ (२३). ६ (२) (१-२), ८(२) अनुष्टपः ६ ( ३ ) पक्ति ९ (३)दिरादायाना, ७ (३) विराट् जगती ८(३)...॥ १८४९ आशु शिानो वृपभो न भीमो धनाधनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । सङ्कन्दनोऽनिमिष एकवीर शतर सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥ १ ॥ (शु. १०।१०३।१ ) १८५० सङ्कन्दनेनानिमिपेण जिष्णुना युस्कारेण दुश्च्यवन धष्णुना । तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इपुहस्तेन वृष्णा ॥ २॥ (१०।१०३२) १८५१ स इपुहस्त। स निपगिभिर्वशी सरस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन । सर सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्युग्रपन्या प्रतिहितामिररता ॥३॥ १ (फे)॥ [पा० १० । उ० २। स्व०७] (ऋ. १०१०३३) ९८४९] (बागुः भीमः ) गोग्रता करनेवाला और भयंकर (वृषभान शिशानः) बंतके समान को मारनेवाला (घनाधना ) शका नाश करनेवाला ( चर्षणीनां क्षोमणः) देष कारनेवाले दुष्टोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला (संक्रन्दनः अनिमिषः) पशुओंको इलानेवाला और आलस्य न करनेवाला (एकचीरन्द्रः) ऐसा अद्वितीय पोर (शतं सेनाः साकं अजयत् ) संकडों शनुभोंकी सेनाको एक हो साप जीतकर हसता है ॥१॥ [१८५७ ] (युधः नरः) हे युद्ध करनेवाले नेसाभो ! (सं कन्दनेन) धुनोंको इसानेवाले ( अ-निमिण) मासस्य न करनेवाले (जिष्णुना) जय प्राप्त करनेवाले ( युत्कारेण ) पर करनमें निपुण ( दुश्च्यवनेन) अपने स्यान पर स्थिर रहनेवाले (कृष्णुना) मधुओंको पराजित करनेवाले (रपु-हस्तेन वृष्णा इन्द्रेण ) याण आपमें पारण करनेवाले बलवान् इन्द्रको सहायतासे ( तत् जयत) यह मुद मोतो, मोर (तत् सहय) नाम सारो हरायो !! २ ॥ [ १८५१ 1 (साइघुहस्तः पशी ) वह इन पाप हापो धारण करनेवाले योपाओरी महायमासे सरदामो परमपना अधिकार रखता है, (सः निषनिमिः ) वह तलवारपारो मोपाओंको सहायतामे गव नोशी याला है। (सान्द्रः) बहर (युधः ) यह करने में प्रयोग (गणेन संस्रष्टा) पत्र समुराप साप माता (सं. पष्टजित् ) नीतनेवाला (सोमपाः ) लोग पीनेवाला, पाहु-शी बाहुदलसे पुल (उप-धन्या) मनुष पकार- में कुशल (प्रहिताभिः मस्ता) हुए भागोंसे शभोको मारनेयाला है। ४९ (साम हिगी भा..] 3" १ १ ३ १ (३८६) सामवेदका सुबोध अनुवाद [ उत्तरार्चिका 3 १ वर. " , १३ १r ३२ . 3 ". २ २३"३३१ २ उ १ 97 ३३३३३ 3 १८५२ हस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्रा अपपाधमानः । प्रमअन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयनस्माकमेध्यविता रयानाम् ॥१॥ (प्र. १ ० ० ५।४ ) १८५३ बलविज्ञायः स्थविर प्रवीरः सहस्वान्बाजी सहमान उग्रः । अभिवोरो अभिसन्या सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोविद ॥ २ ।। (ऋ १०।१०३१५ ) १८५४ गौत्रमिदं गोविद बजवाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा । इमर सजाता अनु वीरयभामिन्द्र५ सखायो अनु स५ रमनम् । ३ ।। २ (हे)। [घा० ३६ । उ० नास्ति । स्व० ०] (ऋ. १०१०३।६) १८५५ अमि गौत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः । दुइच्यवनः पृतनापाडयु युध्यो३ऽस्माकर सेना अवतु प्र युत्सु ॥१॥ ( १०/१०३१७) १८५६ इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञा पुर एतु सोमः । देवसेनानाममिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वनम् ॥२॥ (ऋ १०१०३६८) [ १८५२ ] है ( गृहस्पते ) बहुतोंका पालन करनेवाले इन्द्र ! ( रथेन परिदीय) रथसे यहाँ मा । ( रक्षो-हा) राक्षसोको मारनेवाला और ( अमित्रान् अपराधमानः) शत्रुओंको बाधा पहुंचानेवाला ( सेनाः प्रभंजन प्रमृण) शत्रुको रोनाको छिन्नभिन्न करके उनका नाश कर । ( युधा जयत् ) युद्ध में जप प्राप्त कर, ( अस्माकं स्थानां भविता एघि ) हमारे रोंका रक्षक होकर तू वढ ॥ १ ॥ [ १८५३ ] हे (इन्द्र ) इन्द्र ! ( यल-विझायः) सबके बल जाननेवाला ( स्थविरः) बड़ा (प्र-धीरः सह- स्वान ) विशेष वीरता दिखानेवाला, शर को हरानेमें समर्भ (घाजी सहमातः) बलवान् और साहस दिखानेवासा (उन्ना अभिधीरः ) उप्र, महायोर ( अभि सत्वा सहोजाः) वलयान और बलके साथ उत्पाहुमा हुआ (गोषित्) गायोंका पालन करनेवाला त (जैत्रं रथं मा तिष्ठ) विजयी रथ पर बैठ ॥ २ ॥ [ १८५५ ] हे (सजाताः) एक स्थानमें रहनेवाले योद्धाओ । (गोत्रभिदं ) शत्रुके फिलोको तोउनेवाले (गो विदं ) गाय पालनेवाले (वजयाई) पथके समान मजबूत भुजाओंवाले ( अन्म जयन्तं ) युद्ध जीतनेवाले ( ओजसा प्रमृणन्तं ) यससे शत्रुका नाश करनेवाले ( इमं) इस इन्द्रको आगे करके ( अनुवीरयचं ) उसके अनुकूल रहकर धीरता दिखाओ। हे ( सखाय ) मित्रो । ( अनु संरभभ्यम् । इप्स इन्द्र के अनुकूल रहकर शत्रु पर क्रोध करो ॥३॥ E१८५५] (गोत्राणि सहसा अभि गाहमानः ) के किलोंमें अपनी शक्तिसे प्रवेश करनेवाला ( अ-दयः चीर.) शत्रु पर दया न दिखाने वाला वीर ( शत-मन्युः) बहुत शत्रुओं पर कोष करनेवाला (दुइच्यवनः ) को अपने स्थानसे हिलाया नहीं जा सकता (पृतना-पाद ) पात्रुको सेनाको हामेयाला, (अयुध्यः इन्द्रः) जिसके साथ कोई भी मात्र युद्ध नहीं कर सकता, ऐसा इन (युस्सु ) पढौ ( अस्माकं सेनाः अपतु ) हमारी सेनाका सरक्षण फरे॥१॥ [१८५६ ] (आसां नेता इन्द्रः) हमारी इन सेनाओंका नेता इन्द्र है । (गृहस्पतिः पुरा पतु ) यहस्पति सवर्षे आगे जावे । ( दक्षिणा यक्षा सोमः ) धतुरतासे यदक्ष्य यत चलानेवाला सोम भी भागे जावे, (मरुत ) भरती (अभिभंजतीनां ) शत्रु को मारनेवाले (जयन्तीनां देवसेनानां ) विजयो वेदोंको सेनाफे आगे चले ॥ २॥ 1
(३८७)
एकत्रिंश अध्याय]
सामदका सुबोध अनुवाद
१३३
3
१८५७ इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुता शर्ष उग्रम् ।
महामनसां भुवनच्यवाना धोपो देवानां जपतामुदस्थाव ॥३॥३॥(च)॥
धा० २७ । उ १1१०१ १०१००९)
१८५८, उद्धर्षय मयाम्नायुधान्युत्मत्यनां मामकानों मनासि ।
उद्वहन्याजिनां वाजिनान्द्रयानां जयतां यन्तु घोपा ॥१॥ (१०11०३।१०)
१८५९ अस्माकमिन्द्रः समृतेषु धजेध्वस्माकं या इपवस्ता जयन्तु ।
असा चौरी उत्तर भवन्त्वमा ५ उ देवा अवता हवे ॥२॥ १०॥१२॥११)
१८६० असौ या सेना मरुतः परेपामभ्येति न ओजसा स्पर्धमाना ।
at गहत तमसापतन यथैतेपामन्यो अन्य न जानाद ॥३॥४(चु)।
[धा ३२ । उ० १ । स्थ० ५ ] ( अर्व ३।०६)
१८६१ अमीषा चित प्रतिलोमपन्ती गृहाणाझान्यप्पे परहि ।
अभि प्रेहि निर्दह हत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ १॥ (ऋ १०।१०३।१३ )
[१८५७ ] ( वृष्णः इन्द्रस्य ) बलवान् इन्दके ( राक्षः यरुणस्य) राजा वरुणके ( आदित्याना महता)
धावियोंके भौर महतोंके ( उन शर्धः) उस पल हमारे सहायक हो। ( महामनसां) विशाल हायवाले ( भुषनच्य
पाना यात्रुके लोगोंको हिला देने वाले (जयतां देवानां घोषः) विजयो रेवोंकी अयजयकार ( उदस्थात् ) गुनाई
1
३ १३१२
.
3"
१९७१३ १४१
3
देती है॥३॥
-
[१८५८ ] हे (मघयन् ) धनवान् इन्द्र ! हमारे ( आयुधानि उद् हर्पय) पास्त्रपारी पोरोका उत्साह पया,
(मामकाना सत्यनां मनांसि उत् ) हमारे पलवान् संनिकों का मन उत्साहित कर । हे (यूनान् ) को मारनेवाले
इट! (याजिना याजिनानि उत् । हमारे घोडोंकी गति मडा, तथा ( जयतां रयानां घोपाः उत् यन्तु ) विभयो
होकर मानेवाले हमारे रयों शद मनाई रे ॥ १ ॥
[१८५९] (अस्माकं समृतेषु ध्यपु) हमारे यथारो सैनिकोंगरलप (न्द्रः) इन्द्र बरे (अस्माकं याः
रुपयः जयन्तु ) हमारे जो माग है, वे विजयी हो। ( अस्माकं धीराः उत्तरे भवन्तु ) हमारे वीर भेष्ठ हो। है (देवा )
देवो! (अस्मान् उ हवेपु मयत ) उमें हमारी रक्षा करो ॥ २ ॥
[१८६०] है (मरतः ) महतो ! (या असी) गो यह (ओजसा स्पर्धमाना ) अपने सामरी हमारे साय.
मुगायला करती हुई परेषां सेना नः अभ्येति ) शो सेना हम पर भाकमण करती हुई भाती है । (तां अप-
पतेन तमसा गहत ) उस सेनाको, जिसमें कुछ भी काग नहीं रिया जा सकता ऐसे, गहरे मन्य कारसे दर, (यथा
पतेषां अन्या भन्यं न जानात् ) शिससे जिस सेना होग गबु-मिरोम पहचान सकें और मापसमें होरर मरें ॥२॥
[१८] है ( अप्वे) पापके देवते । (परा इदि ) द मासे दूर हो मा, (ममी चित्तं प्रतिलोमयन्ती)
भरि पित्तको मोहित कर और (भगानि गृहाण, उनले भगोको जला। (मभि प्र रहि ) न शनों पर
माशमण । ( हरसु शोक निर्दछ । उनले हडर्योको गोरसे जाला हे । ( ममित्राः भग्न नमसा मचता हमारे
मात्र गहरे प्रभार कारण माणुस हो जायें ॥१॥
(३८८)
सामवेदका सुयोध अनुवाद
[उत्तचिका
३
३
8
3.
२
१
२
.
१२३१३१२३
3
११.
२
१८६२ प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु ।
उग्रा वा सन्तु बाहयोऽनाधृष्या यथासय
॥२।। (ऋ.१०।१०।१३)
१८६३ अवस्था परा पत गरव्ये ब्रह्मास शिते ।
गच्छामित्रान् पयस्व मामीपा च नाछिपः ॥३॥ ५(ठा)॥
{धा०१८ 1 उ०२.व.२] ( ६७२।१६)
१८६४ का सुपणी अनु पनत्वेनान गृधाणामन्नमसावस्तु सेना ।
मेषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र बयारस्येनाननुमंयन्तु सर्वान
१८६५ अमित्रसेना मघवन्नमा छत्रुयतीमभि । उभौ तामिन्द्र वृत्रहन्न मिश्च दहसं प्रति ॥ २ ॥
१८६६ यत्र बाणा संपतन्ति कुमारा विशिखा इव ।
तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदिति शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥३॥ ६ (या)।
धा० २७ । उ० नास्ति । स्व०२] . ६.७५/१७)
१८६७ वि रक्षो वि मृो जहि वि त्रस्य हुन् रुज ।
वि मन्युमिन्द्र ग्रह नमित्रस्यामिदासता
॥१॥ (ऋ. १०१५२१३)
[ १८६२ ] है ( नरः ) वीरो । (मरत, जयत }शन पर पढ़ाई करो और विनय प्राप्त करो।(इन्द्रः वा
शर्म यच्छतु ) इन्द्र सुम्हे सुख देवे । (यः थाहब उप्राः सन्तु ) तुम्हारी भुजाएं वोरता मुक्त हो । (यथा अनाधृष्या।
सासथ) जिसके कारण तुम पर शत्रु आक्रमण न कर सके ॥ २॥
[ १८६३ 1 हे (ब्रह्मसंशिते शरव्ये ) ज्ञानसे प्रेरित किये गए माण! (भवसृष्टा पर पत) छोडे पाने के
भार तू दूर जाकर गिर और ( अमित्रान् ) शत्रु पर (म पयस्व ) जाकर गिर ।(अमीषां कंचन माउपिः) उनमेसे
कोई भी जीवित रहे॥३॥
[१८६४ ](सुपर्णाः कंकाः ) उत्तम पखवाले मांस भक्षक पसी [वाण] (पनान् अनु यन्तु ) इन शत्रुओका पीछा
करे। (असौ सेना) वह शत्रुकी सेना (गृध्राणां अन्न अस्तु ) गिोंका अन्न यने । (पप मा भमोवि) इनमें से
कोई भी न बचे। हे (इन्द्र ) इन्द्र( अयहारः चन) जो अधिक पापो न हो वह शत्रु भी न छूटे, ( वांसि पनान
सनि अनु संयन्तु ) मांसभक्षक पक्षी इन सबका पीछा करें ॥१॥
१८१५] है ( मघवन् वृनहन् इन्द्र ) धनवान् और शके घप करनेवाले इन्द्रत (अग्निः च ) और अग्नि
( उभौ ) बोनो ( अस्मान तां अभि शत्रुपती हमले शत्रुता करनेवाले ( अमित्रसेना प्रति दहतं) शत्रुको सेनाको
जला डालो ॥२॥
[१८६६] ( यत्र । जिस सग्राम (विशिखाः कुमाराव) शिलारहित लडकोके समान (याणाः तं
पतन्ति ) वाण गिरते हैं, (तत्र नः) वहाँ हमें (ब्रह्मणस्पतिः अदितिः ) ब्रह्मणस्पति और अदिति ( शर्म यच्छतु)
सुख देवें । ( विश्वाहा शर्म यच्छतु ) हमेशा सुख देवें ॥ ३ ॥
[१८६७ ] है (इन्द्र) इन्द्र ! ( रक्षः पिजहि ) राक्षसोका नाश कर, (मधः विजाहि) हिंसक शत्रुओंका
ना कर । (वृत्रस्य इनू मज दृश्को ठोदी सोड रे।हे { वृत्रहन् ) का नाश करनेवाले इन्द्र ! (अभिदासता
अमिनस्य मन्यु । हमारी हानि करनेवाले शत्रुके क्रोधको समाप्त कर ॥१॥
एकविश अध्याय सामवेद सुरोध अनुपाद ( १ ३ २ १ . २ ३ २ १८६८ वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः । यो अस्मार अमिदासत्यधरं गमया तमः ॥ २॥ (ऋ. १०११५२४) १८६९ इन्द्रस्य बाहू स्थविरी युवानाक्नाथ्यो सुप्रतीकाव सहा । तो पुञ्जीत प्रथमी योग आगते याम्यां जितमसुराणार सहो महद ॥३॥७(थि) ।। [धा० २९ । उ०२ । स्व०३ । १८५० मर्माणि ने वर्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु यस्ताम् । उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्त त्वानु देवा मदन्तु ।। १ ।। (ऋ. ६/७५/१८) १८७१ अन्धा अमित्रा भवताशीणोऽय इव । पां वो अमिनुन्नानामिन्द्रो हन्तु वरवरम् ॥२॥ (अपी. ६।६७२) १८७२ यो नः स्योऽरणा या निष्ठयो जिघामति । देवास्त ५ सर्वे पूर्वन्तु ब्रह्म धर्म ममान्तरण शर्म वर्म ममान्तरम् ॥ ३ ॥ ८(वी)। [ धा० २५ । उ० नास्ति । स्व० ४ ] (ऋ.६।०९।१९) ३. २ २ श 13 . . २२३ र 3" [१८६८] है (न्द्र ) इन्द्र ! (नः मृधः विजहि ) हमारे शत्रुओं का नाश कर, ( पृतम्यतः नीचा यच्छ) हम पर सेना भेननेवाले शत्रुओंको नीचे गिरा। (य. अस्मान् अभिदासति ) जो हमें दास बनाने की इच्छा करता है, उसे (अधरं तमः गमय) गहरे अन्धेरे में डाल दे ॥ २॥ [ १८६९ ] (याभ्या असुराणां महत् सहः जितं )जिनके द्वारा असुरोंके महान् बलको जोता, (ती इन्द्रस्य) वे इन्द्र के ( स्थगिरी युवानो ) बड़े और तरुण (अनाधृप्यो सु प्रतीकी ) जिनपर किमीका भाकमण नहीं हो सकता, ऐसे हायोको सूडके समान (असो वाह ) न रहने योग्य भुजा ( योगे आगते ) पुरुष समपर्मे ( प्रथमा युजीत ) सबसे पहले उपयोगमें आती है ॥ ३ ॥ [१८७० ] हे राजन् । (ते मर्माणि ) तेरे ममस्यानोंको ( वर्मणा छादयामि ) कवचसे ढक देता है। उसके बाद (सोम राजा त्वा ) सोम राजा तुप्ते (अमृतेन अनु यस्ता ) अमृतसे दावे। इधरण ते उरोवरीयः गृणोतु ) वरण तुमे अधिक सुप देवे। ( देवाः जयन्तं त्या अनु मदन्तु ) सब देव विजय प्राप्त करनेवाले तुमे मानन्दित करें॥१॥ [१८७१] अमित्रा) मनु ( अशीर्गणः श्रयः इय, कटे हुए सिरवाले सपिकि समान ( भन्घा गया। माधे हो जाए। (तेषा अग्निनुन्नानां य.) अग्निसे जलनेसे पपे हए तुम शत्रुओं में से (वरं परं इन्द्रावत) घेष्ठ शत्रुको इन्द्र मारे ॥२॥ [ १८७२ ] ( यः नः मरणः) को अपना होते ए भी शत्रुना करता है, ( यः च निष्टपा) जो गुन (नः जियांसति) हमें मारना चाहता है. (त सर्व देवाः धृयन्तु । उसे संच देव गष्ट करें। ( शान मेरे भारत स्यच है । (शर्म धर्म मम मन्तरं अस्तु ) रत्याग भी मेरा भारतरित यह (३९०) सामवेदका सुबोध अनुवाद [उत्तराचिकः 38 399 २३१ ३ २ ३" २३ २४ 3 १ ३१२ १८७३ मगों न मीमा कुचरो गिरिठाः परावत आ जगन्था परस्याः । सकर सरशाय परिमिन्द्र तिग्मं वि शत्रू ताढि विमृधो नुदस्व ॥ १ ॥ ( १७१८०२) १८७४ भद्रं कर्णेभिा भृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवार सस्तनूभिपशेमहि देवहितं यदायुः ॥२॥ (१८९८) १८७५ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।। ॐ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥३॥९ (क)॥ [धा०२६ । उ०१।०६।१४८१६) ।। इति नबमप्रपाटके तृतीयोऽयं ॥ १-३॥ नवमप्रपाठकश्च समाप्त ॥ ९ ॥ । इरयेकदिशोऽध्याय ॥ २१ ॥ ॥ इत्युत्तराचिक समाप्त ॥ ॥ इति सामवेदसहिता समाप्ता ॥ [ १८७३ 1 हे (इन्द्र ) इद्रातू ( कुचर: गिरिष्ठाः मृगः न भीम ) पर्वतपर रहनेवाले हिंसक सिंहके समान भयकर है । (परस्याः परावत आ जगन्ध ) बहुत दूरके स्थानसे भी तु यहाँ आ (सूकं तिग्म पवि संशाय) दूर पहुचनेवाले तीक्ष्ण वनको और अधिक तीक्षण करके (शधून चिताढि ) शत्रुओंको नष्ट कर । (पि मृघ' नुदस्य) सग्राम करनेवाले शत्रुओंको दूर कर ॥१॥ [ १८७५] हे ( देवा ) देवो । ( कर्णेभिः भद्र शृणुयाम) कानोंसे हम कल्याण करनेवाली बातें सुनें । है ( यजत्राः) याजको ! ( अक्षभि भद्र पश्येम ) आखोंसे हितकारो दृश्य ही देखें, (स्थिरै. अगैः तनूमिः ) मजबूत 'भषयबोवाले शरोरसे (तुष्टुवास ) तम्हारो स्तुति करते हुए ( पत् देवहितं आयु') देवोंके द्वारा नियत की गई भायुको (व्यशेमहि ) हम प्राप्त करके अन्त तक हम कार्य करते रहे ॥ २॥ [ १८७५] (वृद्धश्रया इन्द्र न स्वस्ति) बहुत प्रशासित इन्द्र हमारा फल्पाण करनेवाला हो, (विश्ववेदा. पूपा न स्वरिन ) सवज्ञ पूषा हमारा कल्याण करनेवाला हो (अरिष्टनेमि ताय न स्वस्ति ) हिसित शस्नोंको पासमें रखनेवाला सुपण हमारा हित करनेवाला हो। (वृहस्पति न स्वस्ति विधातु ) शानका स्वामी हमारा कल्याण करे ॥३॥ ॥ इति पकविंशोऽध्यायः॥
( ३९१) एकविंश आयाय] सामवेदका सुबोध अनुवाद एकविंश अध्याय सुभापित सहोजाः गोषित् , जैत्रं रथं आतिष्ठ [ १८५३ ] है इन्द्र ! तू सबका बल जागता है । महान् विष सामर्थ्यवान् १ भानुः भीमः वृपभः न शिशानः घनाधनः चर्ष- वोर, शत्रुको हरानेवाला, वलयान और साहस दिखानेवाला, नानां क्षोभणः, संफन्दनः अनिमिषः एकवीरः इन्द्रः उन महावीर, प्रभाष हासनेवाले तामध्यरो युक्त, गार्योको शतं सेनाः साफ अजयत् [ १८४९ ]- शोध कार्य पालनेवाला दू विजयी रथ पर बैठ। करनेवाला, भयंकर शूर, यंलके समान शत्रुको मारनेवाला, ६हे सजाता: 1 गोत्रभिदंगोविदं वजयाहुं अज्म शत्रुका समूल नाश करनेवाला, द्वेप करनेशले उष्टोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला, शत्रुओंको चलानेवाला, आलस्य न करने जयन्तं ओजसाममृणन्त इमं इन्द्रं अनुवीरयध्य अनु- याला अद्वितीय पोर इन्द्र सैकडों शत्रुओंको रोनाप्रोको जोतकर तोडनेवाले, गाय पालनेयासे, यस्रके समान कठोर संरभध्यम् [१८५४]- हे युद्ध करनेवाले वीरो ! शत्रुओंके हराता है। २ हे युधः नरः ! संक्रन्दनेन अनिमिषेण जिष्णुना करनेवाले इस इन्द्रको भागे करके योरता दिखाओ, मात्र वाहुऔवाले, पुद्ध जीतनेघाले, अपने वलसे शत्रुओंको नष्ट युत्कारेण दुइच्ययनेन धृष्णुना इपुहस्तेन सृष्णा परकोप दियाओ। इन्द्रेण तत् जयत, सहध्वं १८५०]- हे युद्ध करनेवाले नेतामो ! शशुओंको लानेवाले, आलस्य न करनेवाले, विजयो, ७ गोत्राणि सहसा अभिगाहमानः पदयः धीरः पुरमें प्रवीण, युद्ध में अपने स्थानपर स्थिर रहनेवाले, शत्र- शतमन्युः दुश्च्यवनः, पृतनापाद् अयुध्यः इन्द्रः ओंको हरानेवाले, बाणोंको हापोंमें धारण करनेवाले मलवान् युन्सु अस्माकं सेनाः अयतु [१८५५]- शत्रुके फिलेमें इन्द्रको सहायताले युद्ध जोतो और शत्रुओंको हटाभो। अपनी शक्तिसे प्रवेश करनेवाला, शत्रु पर दयान करनेवाला, ३ साइपुहस्तैः वशी, सः निपक्षिमिः सः इन्द्रः हिलाया नहीं जाता, शत्रुको सेनाको हरानेवाला, जिराफे संकड़ों प्रकारसे शवपर क्रोष करनेवाला, जो अपने स्थानसे युधः गणेन संनष्टा, संसृजित् , यादृशीं उप्रधन्या प्रहिताभिः अस्ता [ १८५१ ]- वह इन्द्र वाण हायमें साथ कोई भी युद्ध नहीं कर सकता ऐसा इन्द्र हमारी सेनाको रक्षा करे। पारण करनेवाले योषाओंकी राहायताले सर शत्रुओंको अपने अधिकारमें रखता है । वह तलवार हाथमें रखनेवाले योषाओं ८ मरतः अभिभंजतीनां जयन्तीनां देघ-सेनानां की सहायतासे शत्रुओंको वशमें करता है । वह इन्द्र युद्ध अप्रे यन्तु [ १८५६] मरुत वीर शत्रुओंको मारनेवाले करनेमें प्रवीण शत्रुओंके समूहके साथ एकदम युद्ध करता है। विजयो देवसेनाके आगे चले। वह युद्ध जीतनेवाला, बाहुबलसे सामर्यपान, धनुष पलानमें २ उग्नं शर्घः महामनमा भुवनच्यवानां जयतां कुशल और छोटे हुए बाणोंसे शाओंका यप करनेवाला है। देवानां घोष, उदस्यात् [१८५७]- उबार मनके, शत्रुके ४ हे गृहस्पते । रयेन परिदीय, रक्षोहा, अमित्रान् धोरोंको स्थान भ्रष्ट करनेवाले विजयी बेयोंके उस बालके अपवाधमानः, सेना प्रभंजन प्रमृण, युधा जयन्, कारण होनेवाले जयघोष सुनाई देते हैं। अस्माकं रचानां अविता पधि १८५२]-हे बहुतोंका १० हे मययन ! आयुधानि उवर्षय [ १८५८ ] पालन करनेवाले इन्द्र ! रथसे यहां मा, राक्षसोंको मारने- हे इन्द्र । हमारे शस्त्रपारो बोरोंका उत्साह बढ़ा। वाला, शत्रुओंको रोकनेवाला, दशभुको सेनाको छिन्नभिन्न १५ मामकानां सत्वनां मनांसि उव हर्षय करके उनको नष्ट कर । युद्ध में जय प्राप्त कर और हमारे [ १८५८- हमारे बलवान् वीरोंका मन हषित कर। रथका रक्षक हो। १२ वाजिनां धाजिनानि उद जयतां रथानां बलविज्ञाया स्थविरः प्रवीरः सह घोपाः उत् पन्तु [ १८५८]- हमारे घोडकि वेगा। स्वान घाजी सहमानः उप्र अमिवीरः ममिमत्या, हमारे विजयो रपोका सम सुनाई दे (३९२) सामवेद का सुयोध अनुवाद [उत्तरार्चिकः विजयी हो। १३ अस्माकं समृतेपु ध्वजेपु इन्द्रः [ १८५९ २९ असो सेना गृध्राणां मन्नं अस्तु [ १८६४]- हमारे ध्वजाचारो तैनिकोंकी इन्द्र रक्षा करे । यह शत्रुको सेना गिद्धोंका अन्न बने । १४ अस्माकं इषक: जयन्तु [१८५९]-हमारे माण २६ एषां मा अमोचि, अघहारः च न, चयांसि एनान् सर्वान् अनु संयन्तु । १८६४ ]- इन शामस १५ अस्माकं पौरा. उत्तरे भवन्तु [ १८५९]- कोई भी न बचे । अत्यधिक पापी न होनेवाला पत्र भी न हमारे धीर विनयो हो। बचे, मासभनक पक्षी इन शुओंका पीछा करें। १६ देनाः अस्मान हवेषु यत्रत [१८५९- हे देवो! २७ अस्मान तां अभि शत्रुपती अमित्रसेनां प्रति. हमें युद्ध में सुरक्षित रखो। दहतं [ १८६५ 1- हम पर घसकर मानेवाले उस शत्रकी १७ या असौ ओजसा स्पर्धमाना परेपी सेना नः सेनाको जला दे। अभ्येति, तां अपनतेन तमसा गहत, यथा एतेषां २८ यत्र याणा सम्पनन्ति, तत्र नः शर्म यछतु अन्यः भायं न जानात् [ १८६०]- जो यह अपने [ १८६५]- जहा बाण शत्रुफी भोरसे आकर हम पर गिरते सामप्यते हमारे मुकाबला करती हुई को सेना हम पर है, उस युद्ध में हमें सुख मिते । चढाई करती हुई पाती है, उस शत्रुकी सेना पर अन्धकार २९ हे इन्द्र ! रक्षः मृधः विजहि, अमिदासतः छा नाए ऐसा कर, जिससे कि वे एक दूसरेको पहचान न सके। अमित्रस्य मन्यु [ १८६७]- हे इन्द्र ! राक्षसों और " अपव्रत तमसास्त्र" नामका अस्त्र प्रयोग युद्ध, हिंसकोंको मार, हमारी हानि करनेवाले शत्रुओंके क्रोधको होता था, उससे शके धीर अन्धेरेके कारण अन्धेसे हो जाते समाप्त कर । थे और मापसमें एक दूसरेको पहचान भी नहीं सकते थे। ३० हे न्द्र ! न मृधः विजहि, पृतन्यतः तीचा १८ अप्वे । परा रहि, अर्मापां वित्तं प्रतिलो- यच्छ, या अस्मान् अभिदासति, अधरं तमः गमय भयन्ती अंगानि गृहाण [ १८६१ ]- हे पाप ! हमरो [१८६८]- है इ! हमारे हिंसक ओंको हरा, हस पर दूर हो, इन शोके चितोंको मोहित कर और उनके सेना भेजनेवालोंको नीचे गिरा। जो हमें दास बनानेको दारोरके भग जकड दे। इच्छा करता है उसे गहरे अन्धकारमं डाल है। १९ अमि प्रेहि, इत्सु शोकैः निर्दह । १८६१]- ३१ पाभ्यां असुराणां महत् सहः जिते. तोइन्द्रस्य शत्रु पर माक्रमण पर, उनके हृदय शोकसे जला है। स्थविरौ युवानी अनाधृप्यो सुप्रतीको असधा याहू योगे आसते प्रथमो युंजीत [१८६९)- जिनसे असुरकि २० अमित्राः अन्धेन तमसा सचन्ताम् [ १८६१] महान् यलको जोता, उन इन्द्रको वडी, तरुण, आक्रमण किए -हमारे शत्रु घोर अन्धकारसे ध्याकुल हों। जानेके अयोग्य, उत्तम प्रतीक, शत्रुके लिए असहा ऐसी दोनों २९ नरसन इत, जयत, न्द्रः वः शर्म यच्छतु ही भुजाए युद्ध के समय उपयोग आती है। [ १८६२ ]- हे वीरो! शत्रु पर माफमग रो, विजय ३२ है राजन् ! ते मर्माणि वर्मणा छादयामि प्राप्त करो, इन्द्र सुम्हारा कल्याण करें। [१८७०]- हे राजन् ! तेरे मर्म स्थान कवचसे में ढकता हूँ। २२. चावायः उग्राः सन्तु, यथा अनाधृष्याः ३३ देवाः जयन्तं त्या अनुमब-तु [ १८७० 1- देष आसथ [१८६२] तुम्हारी भुजायें वोरभाव दिखानेवाली भीतनेवाले तुझे आनन्दित करें हों, जिनके कारण तुम पर शत्रु आक्रमण न कर सके। ३४ अमित्रा. अशीण: अहयः इव अन्धाः भवत २३ हे मलसंशिते शरव्ये। भवएष्टा परा पत, [१८७१ )- शत्रु कटे हुए सिरयाले सपिके समान अन्य हो अमित्रान् प्र पयस्व अमीपां कंचन मा उच्छिषः जाए। [ १८६५ - हे ज्ञानपूर्वक छोडे गए वाण! तू दूर जाकर ३५ तेषां वरं वरं द्रा हन्तु[ १८७१]-शमोके मधुपर गिर | उनमें कोई भी जिन्दा न रहे। मुख्य - मुख्य धोरोंको इन्द्र मारे। २४ सुपर्णाः कंकाः पनान् मनु यन्तु [१८६४]- उत्तम ३६ यः स्वः अरणः यः च निष्ठप.नःजिघांसति पखवाले मांसभक्षक पक्षी ( घाग) इन शनाका पीडा करें। तं सर्च देयाः धूर्यन्तु [१८७२]- जो अपना होते हुए भी .
(३९३) सामवेद का सुपोध अनुपाद एकर्षिश मायाय] द्वेष करता है और जो गुप्त रह करके हम मारला पाहता आयु। व्यशेमहि १८७४]- सुस्थिर अंगात घुस शरीरोरो है। उसे सब देय नष्ट करें। ईश्वरको स्तुति करते हुए देवों द्वारा दोभायुका उपभोग ३७ प्रल मम भातरं चर्ग [ १८७२ ]-शान मेरे करें। सन्दरका कवच है। ४४ इन्द्रः पूषा पृहस्पतिः । स्वस्ति दधातु ३८ हे द्र! कुचरः गिरिष्ठाः मृगः न भीमः [ १८७५ ] - इ, पूषा, प्रहस्पति मावि देय हमारा कल्याण [ १८७३ ]-हे इन पर्वत पर रहनषाले सिंहले समान तू पाकि लिए भयंकर है। ३९ परस्या परावतः आजगन्थ [१८७३]- बहुत उपमा दूरके स्थानसे भी हमारे पास भा। १ पमः शिशानः न [१८४९]- अलके समान ४० स्कं तिग्मं पवि संशाय शत्रून् पितादि, मृधा दात्रुको टक्कर देनेवाला । पि नुवस्व [ १८७३ ]- दूर पहुंचनेवाले सोण शस्त्रको २ विशियाः कुमारा व [१८६६]-शिलासे रहित मौर मधिक सोषण करके शत्रु पर फेंक व दुष्टोको मार। सुमारोंके समान तीषण (याणा) माण होते है। ४१हे देवा! कर्णेभिः भद्रं गृणुयाम [ १८७४]- ३ अशीणः अहयः इय [१८७१]- कटे हुए सिर- है देवो । कानों से हम कल्याण करनेवाली बात सुनें। वाले सांपोंके समान (ममित्राः अन्धाःमवत) मधे ४२ अक्षभिःभन्नं पश्येम [१८७४]- आसोंसे कल्याण हो जाएं। कारक दृश्य देखें। ४ कुचर: गिरिष्ठाः मृगान [ १८७३ ]- पर्वत पर ४३ स्थिरैः अंगैः तनूभिः तुष्टुवांसः यत् देवहितं रहनेवाले सिंहके समान ( इन्द्रः भीम ) इन्त्र भयकर है। एकविंशाध्यायान्तर्गत ऋषि-देवता-छन्द सूची देवता धरव. मत्रसंस्था त्रिप्ट " १८४९ १८५० " बृहस्पति " १८५२ १८५३ १८५४ ऋषिः मप्रतिरप ऐवः अप्रतिरप ऐना अप्रतिरय ऐन्त्रः अप्रतिरण ऐनः अप्रतिरप ऐवः मत्रतिरप ऐनः मप्रतिरप ऐग्द. मनतिरप ऐन्द्रः मप्रतिरप ऐवः अप्रतिरप ऐसा अप्रतिरप ऐनद्रः अपर्चा अप्रतिरप ऐन्द्र प्रादेवस्थान १११००१ १०॥१० १०११०३३ २०११०३३ १०१०३१५ १०१०३६ १०।१०३१७ १०1१०18 १०1१०13 १०।१०३।१० १०१०३११ अपरा १०॥१०॥१२ ५० [सामहिनेभा 11 " " " " ht १८५६ १८५७ १८५८ " " अप्वा " १८६० सामका सुयोध मनुवाद [उत्तराधिक मस्या देवता भादेवस्थान Poit०३ मप्रतिरप ऐव व७ पायुभावान शो मरतो या मादा ॥ १८५३ १८६४ १८३५ " पारितामा राप्रामाशिषः विष्ट मतदा पवित मनुष्य 41७110 २०१५।३ १०१५९४ मासो भारत शासो भारसाज १८६८ " विराद नगती 1 १८७० ||७५१८ १०७१ अप.६ १८७२ ६१७॥१९ पायापाश अपर्वा पापांपामः जय ऐप धर्मसोमबाणाः विष्ट अनुप बसोमपणा त्रिष्टा विशेषाः विराट्रम्पाना E- - १८९८ गोतमो राहगण गोतमो पूण , १८७१ ।
सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक्रमसूची। ६२४ २०५८ माप्ति प्रियेषु धामा अमित मन्य भाग को पुषन्तम् अकारसमुदा प्रथम ५९९ (२३ अमेजरिततिति अन्नमापदन्त बने तमघाश्य ४३४, १७७७ अगम मनम १३०४ समेत प्रयोक्यो १८१६ भगन्म यहन्तम अमेवं नो बन्तम ४४८ ११०७ माम आ याहि वीतये ११६६० अन देश हा ७९९ भाभा याहाममिहतार १५५२ प्रेममारमा मा भाषि पवम ६२७, १४६४ अपवस्वस २५१० १५१८ आरे पाव चिया १५२१ भो मृट महा अस्यय अनमोजिटमा भर ८१ भयो अध्वरे अमित प्रश्ने र जन्मता भने का हि ये ता १५, १३८३ १७१० । मोरक्षा को इस २४ ४९५: १७३७ मे बाजरयामत ९९१५६१ अमित गुमीमहे अविवस्वा १० अमिनोसाधनभिः ७२,१३७३ ममें विवस्वदुषः ४०, १७८० RAदेशमनभा भने विश्वमिरमिमिपि १५०३ १७९४३ अ मुखतमे ये १३५० अनि सूनुं सहयो १५५५ मे स्तोमं मनामहे १४०५ बहिन्वन्तु नो १५२७ भनगो राजाप्यसविष्य थति होना मन्ये ४६५,१८१३ भमे सिन्भूना पवमानो १०३३ भमिनामित मिप्यते 488 बरका हरिः ४९७ १०४२ अमिममि दवीमभिः ७११ अचात्य मिधिकिाता ४४७ अभिनिधानो मनमा अनौदसोमो धन्वनिषदः ५५५ मामीरिज्वापसे अच्छा कोश मधुरचुत अग्निमी पुरोहित ६०५ १५५४ अनिरिम जम्मना बन्नो याह्या भनिरिन्दाय ते अण्डावइन्द्रमतयः ३७५ बहिये पुरोहितो ४८ अच्छा समुद्रमिन्दवो अनशपिः परमाना: भरछा हिवा. १५५३ अपांग र तमवः अनीजनो अमृत १५०८ भवीजनौ हि पवमान अग्नि पत नो गिरी भजते पते समंजते ५६४१६१४ भामग्यातिजयोतिरमि अतचिदिन्द्र न उपा भमिमा दिव: अतस्त्वाायिक प्रांत्राणि बंधन १७३८ भतीहि मन्युपाविणं पनि पाजिनविशे भतो देवा अवन्तु नो १६७४ भमिस्तिरमेन शेचिया भरवायातमाविना तिरो १७४४ भने केतुर्विशामि आवाहवाना अत्रा वि नेमिरेपानुरी सत्रह गोरमावत १४७,९९५ अषा ते अनमनी १०८९ पर्दसमहो ३१५ प्रदश पावतो 89% १५१५ भदाभ्यः पुरएता १५५६ अनस्य केतवो अथााव इन्द्र अद्या को देव सविता अधक्षा परिष्कृती अध जोपवादिवो ५२ अधषीमा योजना अपधारया मावा १०१० भय यदि पवमान १४९६ अधावदिनकरी १५५१ भषा दिवान इन्द्रिय श्रधा हीन्द्र गिर्वण ४०६७१० अधापने को अधि गरिमन्वामिनी अधुशत प्रियं मधु वयों अद्रिभि ४९९१ १०५५ प्रवाया मनवाते र 880 अनु ते शुष्मं तुरन्नमस्तिः १६३८ मनुस्मा रादसी उभे अनु नषोडसी ७४४ अनुप्रस्नास भाषन ५०० अनु हिरवा सुतं ४३२६१३६० अन्य गौमान गोभि भन्तवरतिरोचनाम्य ६३९. १३७७ या भमिता भवता १८७१ अनन्तो भराम्पाः अपनवते मृधी ५१०११२१३ अपनसे मृपः ४९७१२३७ अपत्यं जिनं रि अपत्यै तायको ३०८ अच्छा न. शीशोचिष १४०६ (३९६) सामवेदका सुपाघ अनुवाद अपांपात सुभग सपादुनियाधमः अपूष्यां पुरतमा अभ्यर्ष स्वायुध १०५३ भाद्वारा मतीन ११२४ । अभि वनानि पते १०११ १४१४ माम मामास भायवः ५१८१८५६ अपी फनेन नमुः अभि हिमत्य सोमपा १४५ भभी मयन्ते अहः ५५० अपामाधामपक्षिय भमी नोअप दिया: १४२८ अपाविर्मयस्ततुराणा ५४४ अभी नोवारसातम ५४९॥ १२५८ अपिबत्कार अभीपतस्तदा अभी पुजा सीमाम् ६८४ असा इन्द्राय वायर अभ्यभि विधवा १५०७ अप्स रेतःशिये १८४४ भन्ष वृहयो बोधि हाता यजयाय १७४७ १०५३ अमाप्यति समिया ७३, १७१६ अभ्यनियुतो सोध्यमिर उदेति १७५८ सम्यारमिददयो अभिमन्दनकर १०३९ मनातृभ्यो अनी ३९९, १३८१ अमिगव्यानि वीतये १०६२ लमित्र सेन मघवन १८६५ भभि गारो भाम्पिपुराणे अमित्रा विचर्षणिक १४४७ भभिगोनाणि er १८५५ अमी वेदेवाः ३६८ अभिते मधुना श्रमोषां चित्तं प्रति अभिन्य देव सविता ४६४ अत इन्द्र सोमो १५९,७२५ भमि स्पर अर्य दक्षाय साधने ११०० अमि त्रिपषणे ५२८० १४०८ अयं पुनान उष) अभि या पूर्वपीतय २५३, १५७३ भय पूषा रयिम ५४६१८१८ अभिस्वा पमा सवे १६९६७३१ अयं भराय मानसिक अगिर नोनुमो २३३% ६८० अयं यथा नामुक्त ९४७ अभि द्युम्न मुद्या ५७१1१०११ सो मधुमत्तमः अभिमानिस मर्या मित्रावरुणा ९१० ७६५ ५०८ भयं विचर्षनिर्हितः भभि द्विजन्मात्री ९४८ अयं विधा अमि अभि प्रगोपति १६८ १४८९ भम प्रमाशिवाहा भय विधानि विमान १५१७ भमि प्रय: राष अयं यो दिवस ०३५१८११ अमि प्रिय विपक्ष भयं समभाना ४५८ अमिध्यिाणिया अयं सहलमूपिभिः १६०८ मामि दियी परमे ५५४,७०० अयं मया पर युका अभिप्रिया दिए १२०४ भोपयो १७७६ अभीर नषत भयं पर्योपस्य भविमा सुवन भि २४६७ मयं नम इन्द्र भी वागवितो १८४३ भयम मुबारक ६० भाभवयु यिषों जयम ते समान १८१५९९ भाभ विगत भावित पानया ८०५ भभिकारी भया पिपामा भया निजनित्रा ६७१५ अया पयस्य देवयु भया पवस्व पारया ४९३ १९१६ श्रया पव। पर्वता ५४१४११०४ अया सवा हरिण्या ४६३॥ १५९० अया वा देवहितं भयावीती परिक्षा ४९५॥ १२१० या सौम मुकृत्यया अयुफ सप्त शुलप्युष. अयुक सुर एवशं १२१७ अयुर इयुधात १२४० भरे इन्द्र कुक्षये भरत इन्द्र धवसे अयोनिहितो जातवदा ७९ भरमवाय गायत ११८ अशाच दुषमः निः ५९६,८७७ अवंत प्राचत भविनासरसो १७५७ ४४५; १९९४ अर्वाह विवको १७६० अषों नः सोम शंगवे ५०३१९९४ १२२० भवकक्षिणं वृषभ भषयुताना कलशा भासो गमती अपयशपापन भस्म दुईणायतो १०९२ भानो भग्न अतिभिः १५२४ अन्या पारे परि या पार परि १२०० अधनगर १५८४ भयमस्या बारा भधिना करिश्मदा १७२० सवा स्थी मुरूप अचिनाषी १७२६ अश्वानदोषवा भवामुम पूवनाश अायक मस्ता अर्षा सोम पुमातमी अलर्षिाति बसुदामुप ८७० બ િsci મિ अमायो गया भी मारण्ये ४९० ५४३ सामवेदमन्यानो वानुक्रमसूची। (३९७) घामामु परमेश्य माया सेना मस्त असावि देवं षमावि सोम इन्द्र ३४७, १०२८ समावि सोमो भषो ५६२, १३१६ असायं शुभदायाप्सु ४७३, १००८ असिदि वीर सेन्यो १००१ अमक्षत वाजिनो ४८९ १०३४ अमृप्रदेशवीतये भसप्रमिन्दवः पया भसप्रमिन्द्र ते गिरः १८६० भस्तवि मन्म पूर्व १६७७ मस्ति सोमो अयं सुतः १७४; १७८५ भातु श्रीषट् पुरो ४६१ भस्मभ्य वा सुविदामि ५७१ अस्मभ्पेरोदसी भस्मभ्यमिन्दमिन्द्रिय १०४६ भरमाभरमा इन्धमा १४४ भरमाकमिन्द्रः समृतेषु १८५९ भस्य प्रानामनुत ७५५ अश्य रेषा हेमना ५२६, १३९९ अपमानि पूरे बायेदिन्दो मदेवा भस्पेदिन्द्रो पार १५७४ अप्रानेन मनमना १५०१ अहमस्मि प्रथमजा अहमितिपितुपरि १५२,१५०० था गन्ता मारिवण्यन 80१ धामिन व तिमि ४२० मानस्थूर यि १५२९ भापागमयदिधदत् ७४५ या पायावान् एमना १०८५ भाशये प्रिमियते १३३४१३२८ मा जाटविविध मिरम्मत था जुरोता इविका भारियन धातू नन्द मन्तं १९७७२८ आतून इन्द्रमान भाभान पीपरि ४१९, १०२१ मामानवाधि. आते दक्षं मयोभुव ४९८, ११३७ आपानासो विवस्वतो ११२३ क्षा ते वस्तो मनो आरोदिया मयोभुवः भा वा गिरो ३०९ मा प्रागाद्दा भावा प्रावा वदामिद १८०९ या बु.दंदा ददे आ स्वा३य सावधा २९५ मा भात्यनिषा भाता प्रायुना ही ६६७ भाभिष्ट्वमभिष्टिमि ६४२ या स्वार यो ३५४, १७७१ मा मन्द्रमा वरेण्यमा ११३८ मा त्वा रथे हिरण्यये समन्दरिन्द्र हरिभिः २४६,२७१८ था वा विशनिबन्दवः १९७, १६६० १४१२ आस्वा सखाय. ३४० आ मित्र वरुणे मगे भास्वामहलमा २४५,१२९१ मा यः पुनामिगीम् ९७७४ भावा सोमस्य ३०७ भाय गोः पृश्निरकर्मात् ६३०,१३७६ भाविता निषादते १६४,७४० भा यददुः शनवा भादह स्वधामनु श्रा क्या बशत १०६० आदिनस्य रेतमो आ याहि वनया ४४३ बादित्य रिन्द्र. सगो ११११ भा या सुपुमा दित आदी हां यथा गा ७७० थामायमिन्दवे ४०२ भादी वैचित्पश्यमानास १४१५ था यायुपनः मृत भादी त्रित पोषणको ७७१ भायोनिममो आदीमधन १०१० भारयिमा सुचनमा आन इन्दो पातरिन ८२५ था वन्दपुर्वि यथा ११४ भान:मुतास १३२८ मासमपरा ८७९ भानामत १९५४ मायाव महि २०१८ ८१४ भाध्यस्व सुरक्ष मानस्ते पद मा १४३३ आविमर्श आवा ५२५ आमोसने रवि आविवाहपरावती भयो ९०० सानो भने मोर ४३ अविशनलश मृतो ४८५ मा नो म सुचना भाबोराजानTRER भानो भत्र परमब्या माशुशिशानो पुषमा १८८९ मानो मित्रावरुणा पाशुर पहम्मते मा नो सनानि विधी मुने भित श्रिय १४८० भानोवपाव पारि ५८०११३१४ मा नो विधामु स्यमिद६९,१४९२ बायोमस्सानो भा १ मदिन भारपसरजिरे भावमान घाय भाइर्साय पृष्णवे श्री पवमान सुधनि भाइयो म का पसी यन्ति देवाः पुन का परमविनतम ११०८ चश्म्य यष्ठिरः मापस महानि PERIA पुरा मा सचिन ५०१ इस अनो मान होमस १८१ (९८) सामवेशका सुबोध अनुचाई। २०३० । इन्द्रामेहरी चहतो इन्द्रमीशानमीजमामि इन्द वाजेपु नोऽत्र इन्द शुद्धो न भागह इन्द्र खोहिनी ५९८७९८ २४०३ १४०० इन्द्रच पाया इस एत उदाता स्था दिसोम ४१० दं एक पर उत दंबो मतमधः १२४७३४ का मदिर विश्णुपंच कमे २२२:१६६९ इस गाविषय १७४९ ज्योतिष १४५५ बन्योनसामु १६५,७३७ इनो राजनराति समिती १५४६ ४३१ ४८१ इन्दुरिन्दाय परत ८७३ दुर्याजी ठे ५००:१०१९ इन्दो गया तव इन्दो यदिमिा ९६४ E NET नेता १८५६ पदयाचा ५२७७९७ इमको महोगन ७१५ द्र ददातुन इम्समिमन्दिष्ठी इन्दुः पवित्र दुपविष्ट चेतना इन्दी मत्स्यन्धतो इन्द्रो अग महद्भयम् २०० इन्द्रो दधीची अस्थमिः १७९,९१३ इन्द्रोडीय चक्ष इन्छ। मदाय वावृधे ४११०१००१ इन्दो महारादती इन्दो राजा बमतः ५८७ इन्द्रो विश्वस्य इन्धेरामा समय ७० इम इन्द्रमदाय से २९४ इम इन्वय मुस्विरे इमा 3 या पुरुषसो १४६ मा विवक्षत इमं स्तोममईते ६६:१०६४ इममिन्द्र सुतं पित्र ३४४, ९४९ इमम् पुसमस्माकं २८७ १४९७ इमं मे पक्षण ध्रुधी इमपर्ण वृणुत कमिन्माम् ५९१ हमारस्वा पुनही मिरी१५०:१६०७ इमा उवा मुमुते २०१ इमा सपा दिविटप २०४७५३ इमान भुगना १५२११११० इमास्त इग्य प्रमयो १८७ मतदते वयं इमेत इन्द्रमोमा से १६७६ इयं धामस्य मन इसण्यप्रग्ने पवस्व इतोकाय नोवत् इथे ११५५ पारया ५०५५८४१ तारमा १८.० यात्रा प्रम समीपरीण हेवश्व एषा इरिया दिली वीरस्युर मी ममस्यास्तास्तमामि १५२८ शन मुनानि ९७ शिवपाध्यहि सदामने इन्द्र सुत्रेषु सोमेषु २८१७४६ इन्द्रस्तराषामित्रो ९५४ इन्द्रस्ते सोम सुतस्य इन्द्र स्थातरीमा १६८५ इन्द्रस्य नु दीणि इन्दस्य पाहू स्थविरा १८६९ इन्दस्य वृष्णो पदणस्य १८५७ इन्द्रस्य सोम पवमान १२३० इन्द्रस्य सौम राघवे इन्द्रामी अपस्पर्युष १५७७४१६९४ इन्द्राणी अपादिय २८१ इन्द्राग्नी भागतं एतं ६६९ इन्द्राग्नी रितुः सचा ६७० इन्द्राग्नी सविधानिक १५७८.१६९५ इन्वारनी मसति पुरी १५७६।१७०४ इन्द्राग्नी युवामिमे इदानी रोवना AT: १६९३ न्दिानु पूषणावं २०२ इन्दापवंता माता १०य गाय सहित २४९९ इन्द्राय गिरो भनिति इन्द्राय नमत हदाय पबहे पदा ५९० इमाय मने मुन १५८1900 इन्द्राय मगन ३८८१०१५ इन्दाय मम पुतः इन्दाय मोम नातवे मदाय १८४८ पदायमपालवे पत्र ११:१६७१ इन्दा यात्रभानो १६४६ इन्द्रायाहिनुमाना १९४८ इन्द्रा पारि पिपितो इन्दारोमा ५७.1035 हम मा मोहात इम्पेरिमे ८९० १६९० २५९:१४५६ ९५२ यं महापन 5 बाणार नुत्तमन्यु पवियानी इन्दयो Nak मममा भर जठम: ५१सपा पटना दमयमिता मनिषा पदीय एदिदि Iम्म पुन इम नेमभिता पतये दमा करिना मुता यमितोमर पदमिनाय - १८ ६४७ १०३ १९४७ ५३३६९४ ४९.१५८० to मम् सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक सूची। वेन पाताधा पिन पुरएता एतमस्य दश हितो उपयं चनस्यमानं २२५, १८०५ उपचमिन्द्राय शस्यम् उदा मिमेति प्रति १३७१ उपा विधनिना मृष .८५४ बचाते जातमन्यसो ४६७,६७२ उतरया हरितो रथे उतनएना पा ११०५ उतनः प्रिया प्रियास १४६१ उत नौगोमतीरिषो उतनो गोविश्ववित् उतनो गोपणि १५९३ उतनो वाजसातये उत प्रपिय उपरभ्यामा १४२० उतएवम्त जन्तवः १३८२ उसमात पितासिन उत एखास्यश्विनीपत १७२७ उत स्थानो दिवा १०३ रानो अदिविरदयस्य १३५३ बतायातं संग १७५४ तो स्वस्य जीपमा तिमोजयासह उत यहन्तो अर्चयः उत्ते शुमार १२०५ नरो शुष्मामो अस्थ १७१४ सत्ता मदन्तु सोमाः १९४, १३५० एदु मधोर्मदिन्ता २७८७ अला कर्मन्नूतये नौ ७०९ तावान वैश्वानर उप लाग्ने दिवेदिवे १४ ऋदेन मित्रावरुणा ४८ उपमा जामयोगियो १३, १५७० ७२४ उपता जुड़े मम १५४३ धक्सोम स्वस्तये उपवारण्य १७०५ ऋषिमना य ऋपिहायशी ११७ उप. सकना पहि १०८८ ६७९ उप नः सूनबो गिरः एतय हरितो दश १९७९ उप नोहरिभिः १५०११७९० एत रितस्य पोगो १९७५ उप प्रक्षे मधुमति ६४४, १११५ एल्मुत्य दश १०८१ उपभयन्तो यावर १३७९ उपशिक्षापतरपुषो ७६१ एतमुस्स पदव्युत ५८ उा सवेषु सता १४८२ एवं गान्ति मध्यमुग उपहरे गिरीणाम् १४३ एमा उस्या उपा उपास्मै गायता न एत असूममिन्दव तपो मति: पृथ्यते एते खोमा गमि पोपु मातमतुरं४८७१७६२१३३५ एसेमा असक्षत २०६१ सोयु माहि ४१६ एसोभिन्न स्तवाम शुरम्३५७१४०१ उपो हरीण पति १५१० एकोविन्द राम सहायः २८७ उमय शृणक्य न २९०,१२३३ २८५,१६८४ मयत: पतमानस्य ८८७ एना विश्वान्या ५२३१६७४ उभे मदिन्द दसी ३७९, १०९० एनाबी अमिनो ४५३७४९ उगम्यूतिरभयानि १४१० एन्दुमिन्द्रय चित ३८६, १५०२ उहव्यच महिने १७९४ एन्द्रनी गधि श्रिम १९३० १९४७ उरुशंसा नमोपा ६६४ एन्द्रका उपस्त यन्त्रमा मा १७३१ एकदादि हरिमि. सपा भए स्वरमा ४५१ एचयापुपन. ४५९ सपो भागोरस एक मानसि रवि साद सुना एमिनों का ऊर्ग मित्रो वरुणः ४५५ एमने प्रत्येतन २०४१ कामपामास्वेद १८१८ एशानः होम परि कानपातमा एवापासमति COG कोपाम मक पुगतये ५७ एरातिविश्व ८१५ करिना न करने ६६०१ एस पीरपुरेशा २३१८२४ ऊया गन्ध मधि एपहियको ६४३ माम प्रजामो एम कानुनौती नो पागो एक इनदाय वापर १९८७ सुगठन पन्डैपित एष टस्य पुत्रो बिहान ७०१ स्था मारा मावि १५४२ । उदाने भारत घुमत उदाने शुचयस्तव १७७१ एवमतामहे १५३४ उपतरुणा मानो १७५६ उदुमवरण पाशमस्मद उवाय भावेश्य सदुये मधुमत्तमा उये सूनको गिर २२१ उदु प्रसाध्यरत १२० दुपिया. एमते सूर्य ७५२ नामाप्रतिरोम्या १६४१ उदमि ताम १९५३ १४५० सर्पयामपन् उपरपातम्य पायपि र सवण्यायामिव ः {ប पत्रितम्य पापा १०४ (१००) सामवेदका सुयोध अनुवाद । का प्रचेतसे महे एष गम्युरचिकदव १०८९ और्वभृगुवाछुचिम् एप दिवं विधापति क इमं माहुपीच्या एष दिवं व्यासातिरों कई वेद मते सवा १९७१ १६९६ एप देवा शुभायत १२८२ कस्यता ना ४३३ एप देवो भमर्य. १२५६ कहाः सुपर्णा अनु १८६४ एर देवो रथयति घण्वा इन्दं यदकत एप देवो विपन्युभिः कृण्वा भृगवा १३६३ एष देवो विपा कृतो १२६१ कृण्वेभिर्वृष्णवा धृषद् एप पिया यास्यामा १२६६ कदाचन स्तरीरसि ३०० एष भूमि नीयते १२८८ कदा मर्टमराप २३४३ एप पवित्रे पक्षासोमो १२८१ पदा वसो स्तोत्रं हर्यत एष पुरुधियायते १२६७ एष प्रकोशे मधुमाँ कनिक्रन्ति हरिरा एप प्रानेन जम्मना ७५८१ १९६४ या ते भग्ने अभिर एक प्रमेन मन्मना कयौरव न उस्यामि १५८६ एष प्रदाय ऋविय १३८,१७६८ कया नविन १६९, ६८२ एप किममियत कविमग्निमुप स्वाहि एपनि पिन्दनः १२७२ कविमिव प्रशंस्य १२४५ एप माजी हितो १२८० कनिर्वेधस्थ पषि १३१८ एष विप्रेमिष्टुतो कची मी मित्रावरुणा ८४९ एष विश्वानि वार्या १२५८ कश्यपश्य स्वर्विदो एष पूषा कनिषद करतमिन्द्र वा वसका २८० १६८९ एक्शुष्प्याच्या १२९१ करते अमिर्जनानामग्ने ( হাবিব १२९० करवा सत्यो मदाना ६८३ एकभागि दोधुरच्छिशी १२७१ कराव नून परीणसि ३४ पा मरोचयत् १९८४ कायमानो बनावं एप वेग दासते १२८५ निमित्त विडयो रियधि १६२५ एष स्य ते मधुर्मों ५३१ कुरिरसस्य प्रवि एप सपारपा कुश्मिनोगविश्ये १६४९ एपस्य पीतये सुरो १२७८ सेवामधिना ३०५ एष स्य मयो रोड १९७७ कृण्वन्द्र परिवो गये एष स्य मानुषोत्रा कृष्णा देनीममि १५४० एप हितोपनीयते मे दिवसरि ९५९ एतो रामपुरमा १७८१०२८ ! कृपयात १४७० एस देवा मयोभुरा १७१५ । कोषय युक्त १४१ एरीमयुमा २६५८ छायामा अनुवर एप प्रमाणिasa ०५ कोमेसो न मायुः ९७४ पेमिदे या शय भी मोबस्तदस्य सिरियर १८१६१६५३ कांप मि माम पर किराले धणे गजानु मनाने गम्भीरा उदधीरिक १७२० गर्ने माता पितुपिता गयी धुको पथ पुरा गायनं शुभं जगत गायन्ति मागायत्रिणं ३४११३४४ गाव उप वदावटे ११७१६०९ गावधिद्धा समन्यवः ४०४ गिरवइन्द्र ओजसा गिरावो न सम्भूतः १२२४- गिर्नगः पाहि नः सुत गृणाना जमदमिना गृणे तदिन्द्र ते शर ३९१ गोत्रभिद मोविद २८५४ गोमन इन्द्री अश्वत् ५७४११६११ योधिपस्थ वप्नुपिन् ९५२ गोपा इन्द्रो नृवा १०४५ गोधयति महतो घृत पपस्त धारया १४३७ घृतवती भुवनानाम् चक्रं यदस्यता चन्दमा अरवो ४१७ चमूषानः शकुनो १९७७ चर्पणीधृत मपानं वि देवानामुपादनी चित्र हरिशोस्त रणस्य ६४ जमाते पणि अनिममित्रिम जहानः मातृमिः १०१ जहामी पाच मिप्यति जनस्य गोपा अजनिष्ट ९०७ जनीमन्तोन्य १४६० जरावोध हदिबिन जाता परे पर्मणा सुन्दाय मास: शुशोशिदूतो गणि तस्य पवने १०१ संपवाये। महाप ५६९४१०९८ तो दाताई २२११६८५ बाबाजानी पति प्रचारापुर १९८० (४०) सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक्रमसूची स्यमूपुवाधिन ८०४ हिन्वन्ति मद युस तरणिरिस्सियाति २२८.८६७ हैमवत प्रथम तं हि स्वराश्य वृषभ १२३४ तरणिविश्वदर्शतो से शिया दाम्प १०१६ सोलारमध्वरस्य १५१४ सत्य मन्दी पावति ५००१०१७ से मुतासो विपश्चिता १८९९ तक्षयरी मनमो ५०७ तासमुदं परमान वेस्याम देवरुण १०६९ धमा पुराण्या तरोमिय विदद्वसुमिन्द २३७,६८. तोशा त्रामा हुने १७०९ त गर्षया स्वर्णरं १०९ १६८७ तबकाता तयोविलित १०५२ तोशासा रषयाशना २०७४ ततो विराडजायत तव त्यान्दो अन्य वत्त या अजायत ग्यमुवा पत्रासह २४२० १७११६४२ तब यदिन्द्रिय बृहत्तर १४५ तत्सवितुर्वरेण्यं स्यमुको माग १४६२ तब स्यन्वय नमोऽस ४६६ तदरने घुम्नमा मर तर पोरिन्द्र पौस्य १६४६ व स मेवं महया ३७७ तचा चित उक्यिनी तव दम्या तिन प्रातारमिन्द्र २३३ सदिदास भुवनेषु ११८३ तवसनीलवान् १८९३ शिक्षामा विरप्रति सतिप्राप्त विपन्यको तक श्रियो वयस्ये विदुरेषु चेतम ७२४ तदिगो परम पदं १६७२ सवाई मकमुत प्रोम त्रिका महियो ४५७, १४८६ द्वा गाय सुते राचा ११५, १६६६ तवा गोमं शरण ५१६० १२१ त्रिपाद सदरपुरुषा ६१८ संते मदं गृणीमसि ३८३१८८० तवेदिन्द्रावम वसु २७० विहम सप्त धनयो ५६०, १४१३ तसे यवं यथा गोभि. ७३३ तस्मा भुरंगमामी १८३९ प्रोणि त्रितस्य धारया तवा गौपवनो २९ ता बस्य नामखासदा २००७ शशिपदाबिक १६७० त वा पृतस्नयामहे १५२२ तास्य धनायुवा १००६ यविध दामापी १९४३ तत्वाधारमोम्यो सान प्रक पार्थिवस्य ११४५,१४६५ सरात्र प्रता संवा मृष्णानि रित ८३६ ताको वाजवतीरिष १९५१ व वाय उत मिनो १०४४ ताभिरा गाउत ९९३ तं वा विप्रा वचोविदा १०७७ ताको सम्पगहाण लविश्व विर्म स्वायोचिदिवा ताको गीमिपिन्युब ८०१ त्वं समुपायो ७७ तसा घमिरिंगिरी तावानस्य मरिमा स्वं जिरवासमो तदुरषमभी नर. ता समाजा घृतामुही स्वं सता मन्तिमो १२४ सपोपवित्र तित ताहिशवन्तत स्व सपणो महिम समनिमस्ते वो १२७४ स्पोरिद वनमा मा तमस्य मर्जयामसि निवारयति ५२५४८५९ तमिहर्षन्तु नो गिरो aataपीर १८६९ 1ोम परिसा तमि जोहवीमि ४६० तु नाय सुभी वं पोमछि पारयुभव विजयामसि तुम् गुमायः सोमा मीना नमारिका पोथिया तुभ्यमा भुवना रखे वंतभ्यो वम भामे प्रगायत तुपयो मधुमत पहिरो ८३ तमुवा नूनमा विमरेका मापियो ८८५ माप सन्तु केतको २०१५ समान ७४८ १४१ से जानत समोरया fe Tatil तमुहुरे वात्रमाता तमोरपीवी १८२४ नामा ARTVानित हैमोरी HRA सरिता १४१५ तबाराशाया निना 108 वे पूलामो पिपिता १९०१ AR ५८३.९१८ ५५ (म. R.0 मा... सबलस्य गोमा सस्वा मदाय धृपय ९८६ २८०२ ९११ ८७६ का संयम मृावना १४१२ मुकामगिर (४०२) सामवेदश सुबोध अनुवाद २४५२ दुहान घर्दिम्य स्वं हि नरवे २४०, १५८१ । स्वमपि जन्ति १४८५ । न सस्य मायया र मजामिर्जनानामाने त्वं विष्व ओषसो नते गिरी अपि मृध्ये १७९९ स्व दाला प्रथम राषel १४९३ । यस्ते धूम ऋदति ૮રે न वा युहन्तो अयो २९६ Katमहिवन २०१८ वि सोम प्रथमा नरवावी भन्यो स्वर इन्द्र पाजयुवं दधन्व वा यहीमनु नवा हातं चन त्वंनइन्दा भर ४०५१९६९ दधिकाष्णी मारिष ३५८ मदं श्रीदतीन वंचित त्या विद्युतस्या रचा ६५४ न दृष्टठिवणोदेषु ८६८ मृचक्षा अति सोम ९५६ दाना मुगीन पारण: १६२७ ममा पसिभ्यः १८२८ वंनो अमिभियंत दाशेम काम मनसा १५५० नमसेदुप सीदत १९४६ वंनो मरने महाभिः ६ दिवः पीयपमुत्तम ममस्ते अन घोषसे १९६१६४८ समग्ने गृहपतित्व ६१ दिवो पास शुका १२४३ नयं दुधावरन्ते न स्थिर स्खमाने यशानी हता २११४७४ दिवो मामा विचक्षणों नराशंसमिह १२४९ स्वमन वारिह ही बाकुशं यथा नव यो नवति पुरे यस धमि २००७ म संस्कृतं प्रमिमीतो १७५३ समसियो देवः १४७, १७१३ दुहाना प्रत्नमित्ययः ७१० न बीमदेव भाप स्वमिपास्यमे १२ पूर्त को विश्व नदि से पूर्तमक्षिपशुपानेमानो ७०७ स्वमिन्द्र प्रतिप्यमि ३११, १६३७ शदिद सतो महि त्या दूर देवा न ७१० स्वमिद पलादधि देवानामिदयो महत् हिवरमंचन २४१ मिन्द्र मशा माजी २३८९१४११ देवेभ्यस्त्वा मदाय १९८२ नयंग पुरा चम स्वमिन्द्राभिभूमि २०१६ देवो वो दविणोदार ५५:१५१३ नाकै मुर्णिमुप ३१०१ १८४६ मिमा पपी। ६०० दोपो भागद दादाम मामानाभिनभा दे पीनानामिन्द्र एई पुदान तविषभिः नामि यशाना सदर्न एवं सहयाणि १५८२ दृष्या समुद्रमभि यत् ૧૮૩૮ स्यमवरपारयः कृष्णा नित्यस्तोत्री वनस्पति ५९५ निता पोपत्रान्तमो १७११ निसा मश्य विप पाक्य मानन ५९० दिर्य पर स्वयशस स्वास्थिता नियमन मनुर्दधे ५४ पता दिवः पवते ५५८,१२२८ पटानोदय पर: घानापन्त रम्मिणम् निबन्दायका गाय ६०० २१० वो पोरदीपन् १०५५ पिस प परेको मीन शीर्षाणि गृड्य २४७१ वा Rन्ति पीयो १०१७ श्रीमान्त वाजिन १३१५ नूनं पुनानोऽवैमिः ९४१ वावि भगृत पायमान १९४१ घेनुर बनता नमोरपि महामिनी वा विम्यो १६४७ समयोः पुषन्स्योरा २०५९ मृवसं सायमिन्द्रपी स्व! मरत न कि इन्द्रवार १०३ नीमपातः मुतो प्रश्नरम्या ७३५ स्वासन महि देनीमसि भिगाको हत) ८५८ माने जाना २रस्य सदस्य १४१६ मिममन्ति वसा समग्वे पुमा ९ नमो ५४५१५५ पर परस्य मी परे सापिसाप महातरी ९५० पापणीशो सामिदाबोगरी बतं स्या १३९० पापमानारः १२११६५३ मिसमो १३१८०९ मना पूनियम पया वापस बापु परिपुरधु 103 सेमाने राम समोन दुरित ४१६ परि य ह ५५९॥ ११५११९८१ ममयदा परन (20) सामवेदमन्त्राणां धानुकास्थी ४७५१०९३ ६१८ परि पुध मनायि ४९६ परि नः शर्मयनस्या ८९७ परिणो अश्वमवविद् परिपनन्द्राय ४२७, १३६७ परि प्रासिष्यदाकवि ૪૮૬ परि प्रिया दिव ४७,९३५ परि यस्काध्या १३३१ परिमापतिःकवि ३० परि विधानि चतमा ९७० परिष्कृग्वानितं परिस स्वानो १२४० परि. स्वान वक्षसे १३१५ परिस्वानासन्दवो ४८५११२२२ परि स्वानो गिरिष्ठा परातो चियता मुर्त ५१२,१३१३ पापिता महिपस्स पए पु प्रधान ४०८,१३६४ पर्षि सोतन १६२४ पपते हर्यतो हरिरति ५७६,७७३ पानसे पात्रातये पवमान लिया हितो माननितोश पवमानमवस्या पवमान रसस्त ८९० पवमान चाचा ९०५ पषमान यदि १३१० परमान सुवीर्य रवि १४४९ पवमानस्य जिननी परमानस्य करे ६५७ परमानस हे रमों पवमानस्यते पवमानक विश्वपित पषमाना अपक्षत पवित्रमावि पक्ष्माना भयसनीमा परमानादिपर्यन्तरिया 1000 मानाभाट परमानीमद ४८11८८९ परमानना समानो मसिन १४११ परमागेवीAR पाय दक्षसापनी ४७४९१९ पुनान: सोम धारयाग ५११६७२ पवस्व देव भायुष ४८३॥ १९३५ पुनानावयपदी पवस्व देववीतय पुनाने तन्दा मिय पषस्व देववीरति १०३७ पुनानो आक्रमी समि ४८८,९२४ पवस्व मधुमत्तम ५७८,६१२ पुनानो देववीतय ८४० पवस्व वादो अप्रिया ७७५ पुनानो वरिवस्कृधि पवस्व पामसातमो पुनानीबारे पवमानो १०८० पवस्व वाजवातये १०१६ पुरावयाधिये पवस्व विश्वचर्षण पुरा मि दुवा २५९१.५० पवस्व पत्रहन्तम पुरमा दिवासि ११६७ पवस्व समा मुनो १४३५ पुरुत्वादाशिवावाचे पवस्व खोप युम्नी ४३६ पुरुष एद पवस्व सोम मधुमा पुण्हत पुन ७१४ परस सोम मन्दयन् १८१० पहन में पुरणामीशान ७४१ पक्ष सोम महान् ४२९.१२४१ पुरुसगा पिपरायो पवस्व सोमामहे ४३०, १३१२ पुरोजिनी कोमामा ५५५,६९० पवावन्दी पूषा पुन ४७९, पूर्वस्य यो भनेको पचित्र ते वितत ५६५,८७९ पुति दरख रातो पीतापुनीतन १०५० पराय १५८० पातं नो मित्रा पायुभिः प्रसविरवदीत ९६८ पाता पूत्रहत पुतमा प्राय मुमने ५२४६११६ पास्यनिपीम ६१४ |तुमा पान्तमा पो भन्य प्रास्यपूणोमपत्य १५५१७१३ ६०१ पावस्या एका गायनयम ५३५ प्रअमृतस्प पिता पारका मा सरस्पती प्राधिनी परमान पायमानीभन्तुन पायमानीमा देत इससे शिपिवित पवमानी स्वास्थपनी प्रतिमा पावसानो सत्यपनी मिति ११०३ प्रति विमरव ४१८,१७३३ पाहिया भरमसोमर पारी १०७ पाहिना एडया ६६.१५४३ पानी जमी १७६५ पाहि पम्मको RER शित मित्रो अर्बमा १७८३ हो। ७११ पिरामि पारामग्री १७६१ पिता मतस्य रविनी २१९२४२१ परामपुर ५.४ पिताममिन्द्र प्रते पुमानित बSAT THE Server १९५९ परे Art पुराम RICA ३.२३ । २०१४ १७०१ अपरा १११२ पुनामा dar (80) सामवेदका सुवोध अनुवाई प्राणादिन्द्र राघस भूयाम ते सुमती प्रायु अस्वायत् ३०३,७५१ प्रय यस्य प्रथम ५९९ प्रदेवमा मधुम-त प्रदेवोदासो प्र भन्दा साम जागृषि ५६७ प्रपारा मो अप्रियो प्रन इन्द्रो मई तुम ५०९ पवमान पन्वति प्रपुनानाय वेधसे ५७३ प्रप्रयाय न्यसे प्रप्र पत्रिष्टुभ मेष ३६० प्रमाा शरो मघवा १४५९ प्रभूयात महो ७४ प्रमोबनस्य वृनहन प्रमहसयमायत २०६८७८ प्रमदिने पितुमदर्चता १८० प्र मित्राय प्रायम्णे प्र यदावो न भूर्ण १९११८२२ प्रयुगायचो अप्रियो १९३० प्रौशये निनीपति प्रया RRोmar प्रददाय पुरते २५७ प्रपइन्द्रमादन प्रदाय इतमाय ४४२१११३ प्रयायु क्यनो १५७५, १७०३ बामहिएदी १५९६ प्रवामिन्दुरिष्यति १२०९ प्रामास्तिर १९६० प्रविणे आयुषो सोमदे मतमो ४६२ प्रवामहे मह प्रवामित्राय गायत प्रहपुरुणम् प्रमामध्य ७८ प्रमाल पर्षणीन प्रप विधा मराभि १५०४ प्रीत गुवन यारो५५२,७७४१५८३ असमाना पूरी प्रो श्रमे तालिमे १०८,१८१९ सोम देववीतये ५१४७६७ मास्त्वा युजा वय प्रमोम याहीन्द्रस्य कुक्षा १९६२ २२९ प्र सोमासो अघन्विषु। ९६१ । भगोत्री ४४९ प्र सोमाटो मदच्युतः ४७७७६९ भद्र कर्णेभिः भृणुयाम देवा १८७१ प्रमोमासो विरचितो १७८,७६४ भद्रनो अपि पातय १२२ प्रस्वानारथा इव मदभादं न मा मरे प्रहसावस्तृपला १११७ भद्रं मनः कृणुष्व १५६० प्रन्यिानोनिता भदावना समन्या३ सानो १४०० प्र होता जातो महान ७७ मदो ना बनिराहुतो १९९६१५५९ प्र होने पूर्ण बनो भदो भद्रया समान १५४८ प्राचीमनु प्रादिश याति भराम कृणवामा प्राणा शिशुमहीनी ५७०६१०१३ मिन्धि विश्वा अप द्विष १५४३१०७० प्रातरामि पुरुप्रियो २४१२ प्रावी विपदाच कमि ९४५ भूरि हि ते पवना १८०० प्रास्य धारा अक्षरन् १७६५ प्रजान्स्यग्ने समिधान प्रियो नो मस्त विश्पति १६१९ मपान मा पवस्व १९८४ प्रेता जयता नर १८६९ मनास्म पत्रहत्येषु १६८३ प्रेशो भगदी १३७१ मरिस वायुमिष्टये १.५४ प्रेट पो भात ५६१२४४ मस्यपायि ते मह १४२२ प्रेमभीहि घृष्णह ४१३ मस्या निमित ८४ तु मह्मणस्पतिः ५६ मयुरक्षति पादने बासी देन्दुरिन्द्रस्य ५५७, ११५२ मधुमन्त तनूनपाधज्ञ प्रोथदश्वोम यवसे मनीषिभिः पते ८२२ १८०१ मन्दन्तु वा मपन् बद सूर्य प्रवसा मही महेसारमा वह असि सूर्य मन्द्रया सेम धारया अभ्रद मुस्वावी १४४४ म.प्यावाधिषी ६२२ पलवितायः स्यचिरा १८५३ मधिवा अपर्चा यशो ६०१ यूष हसायहे माणिते वर्मणा १८७० हारदाय गायन २५८ महत्सामा महिषयताराप/५४२११५५५ सादाम मर्षिमिः ३७ महापुरधनी पादयति मानवा महामो यात्रसा पादिम एक माहवामहीरनु १०४० मृत परियार १८५२ महिणामवरस्तु बामना सुना १४० मही मित्रस्य पापा १५९८ महीमपनाम मनमाने प्रथम मनवार मपत्रावदा मर मोमोमध बोधगया४२११,१७१० ९४४ मोमी राय भामर माणE मारियदि शमन १२२० प्रोग्राम पुरोरप २४४ धामपन् (१०५) सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक्रमसूची १५२८ यस्ते मदो पुज्यथा ६९३ माते राधोसिमात २७२४ माथा मूरा भविष्यको ७२२ मानन्द पररा गग २६० यान इन्द्र पीयानवे २८०६ मा न इन्द्राभ्या ३ दिशः १०८ मा नो भग्ने महाधने १६५० मानो माता जना १४५७ मा नो हणीचा अतिथि मा पापस्वाय नो मा मेम मा श्रमिमानस्य १६०५ मित्रं वय हवामई ७१३ मित्रं हुवे पूतदक्षं ८४७ मूनि दियो भरति ६७.११४० मृगो न भीम कुचरो १८७३ मृमन्ति स्वादश क्षिरी मृग्यमान। हत्या ५१७३१०७१ मेनिस्वा पनिण मेधाका विदयस्य मोपुत्वा वाचतव २८४.१६७५ म युनाव तन्द्रयुः यामपरपरापता य आजाकेषु फलम् यदे प्रतिपप्रथे २७०९ यदाविदासति १९५० पन्द्रमसेवा य इन्द्र बोमपातमी र उन इव शर्यहा १७०७ य उप. सनानगृतः यनिया बपिया ५८५ पाने नियमिधिषः २४४ यऐक द्विदयते ३८९:१३५१ योजितमा मर ८२० या पावमानौरपति या पत्राहा विवणिः यः सोमः नशेष्या या नाहिती : १३८० परक्षन्ति प्रतिसा १८५ घुक्षितय यदिखापता परछकाशिवराति यत्रानो मित्रावरुणा १५३७ यद्धा कमै रुश्मे यजामह इन्द्र व दक्षिण ३३४ यवादिष्ट तवाय यजिरवा यजमाना १८१४ यदीविन्द्र यरिस्परे २०७,१०७० यहि त्वा महे १९२१४१३ यमन्यसे वरेण्यमिन्द्र यग्मायया अपूर्य ६०११४२९ सममे पूरा मामला १४१५ यज्ञ इन्दमवर्षय १२१:१६३९ यदा या मारहराम यज्ञेच नस्तन्वं व ययनो भन्घमा यस्य के प्रथम यशोमा द्यावापृथिवी यज्ञसहि स्थरिवत्रा यधिदि वा बहुम्म आ १३४२ यज्ञायशा वो अप्रये यस्त इद नवीयसी 8 यंजनासो हविष्मन्तो पस्ते मनु स्वधाममद यत इन्द्र भयामहे २७३,१३२१ यस्ठे नूनं शतकाविद्र यो दिक्ष प्राध्य मनो १९७४ ९९८ यत्र वचते मनी यस्ते मा परेका ४७०८१५ या पागा संपतन्ति १८६६ यस्ते भृताय नपात् ७२७ यरानो सान्दाको १३४५ यस्वाममे इविपतिः यस्सोम विमुक्भ्यं यस्मदेशन्त कृष्टयश्वस्यानि १५१६ यरमोममिन्द्र विष्णवि ३८० गरिमन्विधा अधि पथा गोरोभपा कृतं २५९,१७२१ पत्य तदन्यः पिबायस्य १०९७ यददी बात ते गृहे १८४३ यस्य ते पी- बारी यदद्भिः परिषिष्यो ७८५ पत्य ते महिनामा १७७१ यदय कश्यपत्रान् १२६ वरष से विश्वमानुषाभूरेदंतस्स १०७१ पदद्य पुरविते १३५१ यस्य सरये ७७९ पदा कदा च मोपे ૧૮૮ यस्मयर यदिध चित्र म ६ ३३५३११७२ । पस्य त्रिधावित १५७१ यदिन्द्र माहुपाया १६२ । स्पा विधाय १६०९ यदिन्द्र प्रागपागुदाम्यबा२७२:१२३१ यस्दमा रजोखा यदिन्द यावतस्वमता ३१०३१७९६ इन्द भुजमार २५४ यदिन्द हासोबत या ते मामान्यायुधा यमिन्दार यथा स्वं १२९1१८२४ या दमा सिन्धुमातरा १०२९ पदिन्द्रो भयवितो २४८ या शसन्ति यदि वीरो अनुभपाद याविण्याकमा दियो से गरम रशनाम् या पुनी पौष १७११ दीवानयारी पासे धारा मवानो मी समिरिन्दुभिः १४४२ १३४६ ४१४११००४ १०३ २७८१८६२ शुस्ता हितम २०१ गुणाये पगम् १७५९ । दुहान प्रमा १४६८ भूया हिरण्यस्य ६२४ गुरासेपिरस्प ११४ उसनवस्यकाम्या | १७१८ पुश्या हिरवा दुपहिवाजिनीती दुदीत मात्रयो पर पारद शतं पदा विति (१०४) सामवेदका सुयोध अनुवाद १४१२ प्रत्युषवायद ३०३७११ प्रथय यस्यप्रपच ५९९ प्रदेवमा मधुमन्त प्रदेवोदासो ५१४१५१७ प्रधन्वा सोम जाविः प्रधारा मधी अप्रियो प्रन इन्द्रो महेतुम ५०९ प्रवमान चन्दसि प्रपुनानाय वेधसे प्राध्याय पन्यसे प्रप्रपत्रिष्टुभमिर्प प्रमशीशरामघवा ११५९ प्रभूयन्तं महो ७४ प्रभो जनस्य वृत्रहन प्रमंहिष्ठाय गायत १०६०८७८ प्रमदिने पितुमदर्चता ३८० प्रमित्राय प्रायम् प्र यद्गावो न भूर्णयः ४९१३८९२ प्रयुगा साचो अप्रियो प्रयोगये निनीपति प्रमों निरिक्ष मोजमा प्रवन्द्रिाय हवे २५७ प्रप इन्द्राय मादन १५६७१६ प्रप इन्द्राय पन्तमाय ४४६,१११३ प्रमर्चयुक्थिनी १५७५, ६७०३ प्रामहि द्यावी प्रवान मिन्दुविधयति प्रचारावधाास्तिर. १६० घो थियो मन्द्रयुवो ११५३ प्राममतयों ४६२ प्रवामहे महे ३१८०२७९३ प्रवौ मित्राय गायत प्रो यह पुषणाम् प्र समाजमरस्य प्रसम्राजर्षणीनाम् १४४ प्रविमिरमिनिरा १५०० अमवेत उरीरो १०३ प्रसन्मानाया घो५५२/७७४११३८६ प्र सेनानी शुरो प्रसोधभेसवातिमिः १०८ १८२२ सोम देववीतये ५१४७६७ प्रमोम याहीवस्य कुक्षा प्र सोमासो अधन्विषु प्रमोमासो मदन्युतः ४७७१७६९ प्र सोमासोवियतो १७८ ७६४ प्रस्यानासौरथा व प्रसासरूपला प्रन्यिानो जनिता ५३६ प्रहाता जातो महान् ७७ प्र होने पूर्ण बची प्राचीमनु प्रर्दिशं याति १५९१ प्राणा शिशुमहीना ५७०१ १०१३ प्रातररामिः पुरुपियो प्राधी विद्याप कमि ९४५ प्रास्य धारा अक्षरन् ३७६५ प्रियो नो मत विपतिः प्रेता जयतामर १८६२ प्रेखो अनदीदिदि १३७५ प्रेष्ठको भात ५.१५४४ प्रेझमीदि घृष्णुहि ४१३ तुप्राणस्पति ५६ भवासीदिन्दुरिन्दस्य ५५७ १९५२ प्रोथदश्वी यवसे १२२० १८०१ वर्य श्रवसा महाँ २७८९ वामड़ा प्रसि सूर्य १७६ १७८८ बभ्रवे मुस्वतव १४४४ बलविनायः स्यचिरा १८५३ देवदुक्य हवामहे वृदन्द्राय गायन घाम भर्विभिः वृहत्या हि मानवी ८८ बृहनादेम एषो पृहस्त परि दीया रपैन १८५२ बोधामना यस्तु नो ९४० बोधा मु मे मपन् ब्रह्मानं प्रथम मन पत्रावदा मर अक्षा देवान पदवी ९४४ प्रमाण इन्द्र १२९ प्रमाणस्त्वा युशा वयं ६६८ माझयादिन्द्र राष भगोन चित्री ४४९ मदं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः १८७१ मद्र मो अपि पातय १२२ मदन भरे भदंमनः कृणुष १५६० भावना पमन्या३ धानो १४०० मदो नो अमिराहतो १२१३१५५९ मदो भद्धा पचमान भरामध्ये कृणवामा २०६५ मिपि विधा भप द्विषः १३४६१०७० भूयाम ते सुमतौ १४२१ भरि हि ते सपना १८०० प्रजान्यग्ने समिधान भपोन भा पवस्व मघोनः स्म घरयेषु मरिः कामिष्टये १२५४ मास्यपायि ते महा मत्स्या शिप्रिह ८१४ प्रदच्युत्ति लादने १९९८ मधुमन्तं तन्नपाद्य १३४८ मनीषिभिः परते ८२२ मन्दन्तु वा मघवन् मन्दं होतारमूरिवण मन्द्रमा से.म धारया मन्ये वो यावापृथिवी ६२९ मपि वा अथो यशो ६०२ माणि ते धर्मणा महत्सोमो महिषश्चकारापा५४२११९५५ महाँ इन्दः पुरस्वनी महा इन्द्रो योजना १३०७ महान्त वा महीरनु महि त्रीणामवरस्तु मही मित्रस्य साधया १५९८ महीमे सस्य पुष नाम महेच नवाब महेनी अद्य बोधयोषोष्ट२२१:१७४० महोमी राय या भर मा चिदन्यद्विशंसन प्रो ध्वस्म पुरोरयं . ५०६ २४२११३६० सामवेदमन्त्राणां धानुकमसूची (१०५) १५२८ यस्ते मदो युज्यथा १८४० । मा ते राधाधिमा १७४ यत्रानो मित्रावरुणा १५३७ पदा कमे शमे १९३२ मावा मूरा भविष्यको ७३२ यजामह इन्द्र वा दक्षिण यहि समय मान इन्द्र राणा यजियस्वा यजमाना याविन्द परिषरे १०७,१०७७ मान इन्द्र पीयरनवे २८०६ यजिवा महे ११२,१४१३ यन्मन्यसे दोश्यमिन्द्र मान इन्द्राभ्या दिशः यायथा अपूम्यं ६०१।१४२९ यम पृश्न मार्यमा १४१५ मानो साने महाधने १६५० यज्ञ इन्द्रमपर्धयन् १२१६१६९ यया या माररामद मा नो अज्ञाता पूजना १४५७ यच नस्तन्वं व यवर्ष नौ अन्धमा ९७२ मानो हणीया अतिथि यस्य के प्रथम ९०९ অ আ ব্যাধিৰী ६११ मा पापरवाय नो ९२८ यज्ञस्य हि स्थावित्रा २०७३ यधिद्धि वा बहुभ्य आ १३४२ मा मेम मा श्रमिष्मीप्राप १६०५ ३५,७०३ यज्ञायज्ञायो अप्रये यस्त इन्द्र नवीयसी मित्र वयं हवामह ७९३ यजनासो हविष्मन्तो १५६५ यस्ते मनु स्वधामसत मित्रं हुवे पूत ८४७ यत इन्द्र भयामहे २७४,१३२१ यर नून शतकनविद मूर्षान दियो भरति ६७.११४० यत्ते दिक्ष प्रराय मनो ११०४ मृगी न मी कुचरो १८७३ यत्र वचते मनो ७०६ याते मदो वरेण्यः ४७०८१५ मृजन्ति स्वादश क्षिरी १९८१ यत्र वाणाः संपतन्ति यह पो नपात् ७२७ मृग्यमानः हत्या ५१७,२०७१ यस्थानी सान्याकहो १३४५ परवामी हविपति ८४५ मेनिया पत्रिण ३२७ यासोम विमुक्थ्य यस्मदेवन्त पृष्टय यानि १५९६ मेधाका विदयस्य योगमिन्द विष्णवि ३८४ यस्मिविश्वा भपि ७२३ मोपुत्वा यापतय ०८.१६७५ यथा गोरो अाकृत १५२,१७२१ यस्य त इन्द्रापिमावस्य १०९७ ८२६ पददो बात से पहे यस्प हे पीसी यभानयस्परावता यदद्धि परिषिथ्यसे ७८५ बायते महिना महा म आजीकेषु कृत्वमु १९६४ यदय करवपत्रान यस्य ते विधमानुषाभूरेदत्तस्म १७१ पइस प्रतिषप्रये २७०९ यदय र उदिते १३५१ यस्यते सत्ये वय २८८ य इस आविवासति सदा या चौदुपे १९५० यस्य पर पादपमसेवा १६२ यदिन्द चित्रमा ३४५१९७२ । यस्य त्रिधात्वात मन्दिोमपासमो ३९४ यदिन्द माहुपीया पस्याय विधवा १६०९ १७०७ य सम व शहा यदिन्दमागपागुदाम्यवा२७२:१२१ ५८९ मस्येदमा रजोबस्तु १६९८ यम पनि यदिन्द्र यावतस्पमेला ११७१६ २५४ पादभुतमाम यनियर पिया यदिन्द पासो मत या ममान्यायुमा ७८० घाने विदभिभिषा २४४ मनिन्द्रा रथाव १२१,१८३४ या दशा सिन्धुमातरा १७२९ पासवन्ति यदिन्दो भयरितो य ऐक इन्दियते टर | पापिया मोसा दियो योजितमाम यदि वारी भनुम्याद ८१० परी परस्पानाम् या पायमानीरयेति १७३१ १७३८ कासनीय बोरये पन्यासको पाले पारा मधुरतो २. सत्रामा विगिः या सोमालीच्या १२०० परी मुठे भिन्दुभिा १४२ गुंता दिना २१४६ या स्नाहिनीषु पू १३८० गौरत भाजयो ४१५,१००४ रसन्ति प्रता दराम २७८३८६२ पुस्तालिम १७ युवन्ति म्युपाये परम् सेक्षित १४६८ ६२४ या दिसण्यस्म पुनरिएक पारदशता पुजनयस काम्या te. पक्कासि परापति मी माझा तन्द्रयु १५०१ १९९८ पुश हिवाजिनीती (४०) सामवेदका सुयोघ मनुघाद वषट् ते विष्णवा १८०३ १६७१ युज पाच शतपदी वयापुरी उप युग्म सन्तममणि १६४३ वयं प त्या सुतावन्तः १६१८६४ युवं चित्र दस्युभोजन ७५४ वयंपा हे अपि स्मसि युवे हि स्था स्वापस १००१ वय ते अस्प राघमो ये ते त्या अधो दिवो १७२ वयमिन्द वाक्यो १३२ ये ते पवित्रभूमयो ७८८ वयम् सामर्य. ३०८७०८ गे त्वामिन्द्र नतुए १५०१ वयम् त्वा तस्दिा १५७,७१९ येन ज्योतिष्यायचे वयमेनामिक्षा २७२१६९१ येन देवाः पवित्रणात्मान १३०२ वधित्ते पतत्रिणी ३६७ येना नश्वा दप्यम परिवोधातमो भुवा येना पादक चक्षमा ६३७ वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो ७९५ ये बोमास. परावति १६२७ यो भनि देववीतये ૮૪૬ वसन्त इग्नु रन्त्यो योगेयोगे तवस्तर १६३ ७४३ सुरभिर्वसुश्रदा ११०८ यो भागार तमृचः १८२६ वल्या इन्दासि मे यो जिनातिन जीयते ९७८ वाचमष्टापदीमदं यो धारया पवस्या वासी वाजेषु धीयते १४७८ योन इदमिदं पुरा बात आ पातु भेषजं १८४१८४० यौन स्वोऽरणी पश्च षातोपजूत इपितो योनिष्ट इन्द्र सदने ३१४ वायविन्द्रय शुक्मिणा वायो शुक्रो भयामि १६२८ ६४५ बावा यष्यामिवयन्ति योरपि को रयिमतमो घाधान। शवसा १४८४ यो राजा वर्षमान २७३०९३३ । पाश्रा अर्षन्तीन्दयो यो वः शिवतमोरम: १८३८ वास्तोपते ध्रुवा २७५ यो विश्वा दयते वसु दिनन्तो दुरिता रक्षोहा विश्वचर्षणिरमि ६९० विचिद् त्रस्य दोधता १६५२ रवि नश्चित्रमश्विनम् वि स्वदापी न पर्वतस्य रसं ते मित्रो अर्थमा २०७८ विदा मयवन् विदा ६४१ समः पयसा ८७ विक्ष राये सुवी ६४४ रामानारनभिदा विद्या हिस्सा दुविकूर्मि ७२९ राजानीन प्रशस्तिभिः विभु ददा समने ३२१,१७८२ सपा मेघाभिरीयते विन इन्द मुधोजद १८६८ रायः समुचित विपषिते पवमानाय १६१५ राया हिरण्यया १०६८ विमलामि चिनमानो १४९८ साने महे विभूततिविध रुशदूरसारशती १७१० विभूषप्रम मयाँ स्वती सधमाद १५३, १०८४ विभोट इद राघमो बावत स्तोतो १८०१ विम्राज ज्योतिषा १०१७ पच्यते पायो शिप्राइ हस्तिवतु ६१८, १४५३ १६३० विभान हरसुमृत १४५४ वि रक्षो विमृधो जहि १८६७ विम्यषध महिना विश। विशो को अतिथि ८७.१५६३ विश्वमन्हविधा वावृधानः १५८९ विधतोदावविधतो ४७ विधस्मा सश ८४० विश्वस्य प्रस्तोम पुरी 810 विधाः पृतना अभिभूत ३७०,९३० विश्वा धामानि विपक्ष ८८८ विधानरस्प वस्पतिम ३६४ विश्वे देवा मम भृण्वन्तु विश्वमिरने मिभिरिम पिपुविधा भरातयो विष्णोः कर्माणि पश्यत वि सुतयो यथा पया ४५३, १७७० बीड विदारयुभिः ८५२ वीविहोखा कवे १५९३ पृकृषिदस्य वारण १६९२ खादो वलं का १७१९ वृत्रस्य माअषया ३२४ पूषण वा वयं १५४० वृषा पवस्वधारया ४६९.८०३ यूषा पुनान आयुषि १००० वृषा मतीन पवते ५५९,८२१ वृषा यूपेवर्षसगः वृषा चौगो अभि ८०६ धुषा सोम घुमा 408,७८१ पूपा कि भानुना वृषो अग्निः समिप्यते वृधि दिवा परिव दृष्टिद्यावा रीत्यापेपस्पती १४७ वृष्णस्ते पृण्यावी ७८२ वेथा हि निवीन देवा हि धो १९७६ ध्यक्षमतरिक्षमतिन्मदे १६४० शसेदुक्थं मुदानव ७१७ मो देवीरमिष्ये पदं म ४४१ शकेमामि यो मो मनुध्यन मो महिछो मघोनाम् ४८०,७८४ १०६६ सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक्रमसूची (४०७) शरापूरघु शचीपत २५३, १५७९ शचीमिनावाचीवसू १२४२ हातानीदेव प्रजिगाति ૮૪૨ शशमानस्थान १५९४ शाकमना को अरुण १७८३ शाचिगो शाचिपूजनाय शिक्षा न इन्द्र राय १६४४ शिक्षयमस्मै दिसेय शिक्षकमिन्मयते १७९७ शिशुं अज्ञान हरि १३३४ शिशु बज्ञानं दर्यत शुकः पवस्व देवेभ्यः शुकं ते मन्पच जत शुदि. पावक उच्यते शुन हुम मघवान शुनमन्छ। देवबातमप्मु १००९ शुम्ममाना ऋतायुभिः १०३५ शुष्मी शों न मारत १४७३ शूरमामा पदी १४०९ शूरों न पत्त प्रायुधा १२२९ शृणुतं जरिता भृण्य घटेरिव स्वनः शेषे वनेषु मात्पु ४६ श्रते दधामि प्रथमाय प्रायन्त इव सुर्य २६७,१३१९ युतं पो पुत्रहन्तम श्रुषि धुरकर्ण वहिभिा ५० श्रुषी हवं तिरदच्या ३४६,८८ धुधी हवं विपिपानस्थ १७९८ भ्रष्टपमे मनस्य मै स दधनी वफविः १५६२ पहपुहस्तैः च निपनिमि रथोन से हे पयाति समु घरस इस मावृमि: संजष्णुमुवम्यं ससायमा नि ५६८.१९५७ बवाय मा त्रिपामो अमिगोत वायुना स पषित्रे विवक्षणी १२९३ रापुनान उप सूरे पुण्यों महोना यस वा रिसोरण ६४० मा मुगन्ति वेधसो १७६६ प्रय योमनि देवाही ७४७ सभक्षमाणो भमृतस्य १४२४ समास्वमिमासे १९६८ समन्या यन्त्युश्यन्त्यन्याः ६०७ समजान आयुगि १७६३ समस्य मन्यव विशो १३७, १६५१ समहा दिया १२०५ भूमानो ममा स्वा १७५१ समामृजेवारी १६९० समिदमप्ति समिधा १५६७ ૧૯૮૪ समिद्रो रायो वृहती. १६७८ समौ रनमातृभिः समीचीना भनषत मीचीनाय आशत समुद्रो मामु मामृजे १०४१ समु प्रिया बनूषत एमु प्रियो मृश्यते सानो २४०१ समुरेमा अस्वरन् ९३२ समेत विद्या योजना सं मातृमिन शिशुक्शानो २४१९ सम्मिश्लो अस्पो भुवः सम्राजा या मृतयोनी ११४४ सयोत्रत उपायस्य १९९८ स योजते अश्या ७२० १६५५ सखापरत्वा वनमहे सल्ये त इन्द्र वाजिनी ८२८ मपात वृषणं ४२४ पानसून सानो योग आ ७४२ घायस्ते दियो स्कंदनेनानिमिपेण १८५० सत्यमित्या वृषेदसि सत्राहणं दापि ३३५ सनितस्याधि सानवि पवनविन वजहस्त ८९० सदरपतिद्रुत १७१ सदा गाव: शुभयो ४४२ सदा व इन्द्रवपदा १९६ प्रदेव कविनैपितो १२९७ सन इन्द्रः शिवः २०५२ सन इन्द्राय ज्यवे ५१२,६७३ हम जें व्यपव्यय १४३८ सना परवशंगवे सन. पुनाना सर सन: पृथु वाथ्यमन्छा सना च सोमजेषि १०४७ सना ज्योति मग २०४८ सता दक्षमुत २०४२ सनादमै मृणसि सनेमि कमरमदा सनो दराचायच १६२६ सनो भयाम वायदे १०८३ नो मन्दामिायो १४७५ सनो महाँ अनिमानो १६६४ सनो मित्रमहा १७१३ सनो विवादियो स नो पर मुंवर १६२१ एनो वदो अमात्यममी १३८१ घनो हरीगो पत १६१२ स देव छोमते पपवस्व मदिन्तम १९०९ स पवस्व य आदियेन्द्र ४९४ ८९४ घ अरूप अपना गहामी सवाव विश्पतिदेण्या गधितापर्धन छ बहिरम दुष्ट ७ वाज विश्वचर्षणिरनिरस्तु १५१७ सावजीरोचन पाज्यक्षा. हसरेता. १९६१ वायुमिरमविना १९५४ (४०६) सामवेदका सुघोष मनुवाद येना नवग्वा दया योगयोगे स्वस्तर १८०३ ४०० युजवाच शतपदी १८२९ वय तुम उप युध्मयन्तममर्वाण १६४३ वयप वा सुतावन्त: २६१,८६४ युव चित्र दस्थुोजन ७५४ बयपा ते अपि स्मसि युव हिस्थ स्वप १००१ वय ते अस्य राधयो ये ते पन्या अधो दियो १७२ वयमिन्द वाक्यो ये ते पवित्रमूर्मयों ७८८ वयम स्वामपूमे. ४०८,७०८ ये स्वामिन्द्र न तुर १५०२ क्यमु या तदिदा १५७,७१९ येन ज्यातिष्यायो वयमेनमिदा २७२,१६९१ पेन देस पवित्रेणारमान १३०२ वयधिते पतत्रिणो परिवोधातमो भुवो ६९१ येना पावक चक्षा वरुण प्राषिता भुवन्मित्रो ७९५ ये सोमास परावति पषट् ते विष्णवास यो ममिं देववीतये ८४६ वसन्त इन्नु र त्यो १६३,७४३ परमिर्षसुश्रया ११०८ योजागार मच पत्यो इन्द्राति मे २९२ यो जिनातिन जीयते वाचमापदीमह पोधारया प वकया पाजी बाजेषु धीयते १४७८ योन इदमिद पुरा बात आपातु भेषन १८४, १८४० योन स्वोऽरणी यश्च । धातोपजूत इपितो १८७१ योनिष्ट ददने ३२४ वायविन्द्रश्च शुष्मिणा पायो शुक्रो अयामि १६२८ यो महिठी मघामाम् ६४५ वार्ण वा यष्यामिदन्ति ७११ यो रबि वो रयिन्तमो वावृधान। शवसा १४८४ पो राजा चर्षणीना २७३, ९३३ वाथा भौ-तीन्दवो यो व शिवतमो रस २७५ यो विश्वा दयते यु ४४.१५८३ । विघ्नन्तो दुरिता ८३१ रक्षोहा विश्वचर्षणिाभि विचिद् त्रस्य दोषतः १६५२ रवि नधित्रमविनम् १०५६ वि स्वदापो न पर्वतस्य बस ते मित्रो अर्यमा १०७० विदा परन् विदा ६४१ रसग्य पयसा विराये मुवी ६४४ राजामाबनभिदुद्दा विद्या हि रका तुधिर्मि ७२९ राजानीन प्रशस्तिभि विधु ददा समने ३९१६ १७८२ राजा मेधामिरीयवे विन इन्द्र मृधा नदि १८६८ राय समुदायतुरो राया हिरण्यया १०६८ विभकामि चित्रमानो १४९८ राये अपने महे विभूतराति १६८८ शासा हशती २७१० विभूषभन्न ठमयाँ रेवतीने राधमाद १५३, १०८४ विभा र राधमा देवा देवत स्तोता १८०४ पिनाज ज्योतिषा १०७ एण्यन्ते पो १७३० विनाट् सहस्पियत ६९८७ १३५३ १६९२ विभ्राट् हाम्भूत २४५४ विरक्षी विमृधी जदि विषय महिना विशो विशो पो भनिषि ८७७१५६४ विश्वम्म हविधा पावृधान विश्वतोदावन्विश्वतो ४३७ विश्वस्माइशे ८४० विश्वात्य प्रस्तोम पुरी ४५० विश्वा पृतना अभिभूतर ३७०,९३० विधापामानि विश्वय ८८८ विधानरस्य वस्पतिम् ३६४ विश्वे देवा मम भृण्वन्त विश्वमिरमें समिभिरिम १६५७ वि.पु विश्वा भरातयो विष्णोः कर्माणि पश्यत १६७१ विमुतयो यया पया ४५३॥ १७७० दीडु चिदाहजनुमि ८५२ वीतिहीन वा कवे २५२३ पुरुधिदस्य वारण वादो वल रु. १७१९ वृनस्पषाचण्या वृषणस्वायय १५४० वृषा पवस्व धारया वृषा पुनान मायपि १००० वृषा मतीना पक्ते ५५९,८२१ पृषा यूपेव पसग १६२२ धृषा श्रेणो अभि ८०६ वृषा सोम शुमा 40४,७८१ वृषा द्यपि भानुना पृषो अनि समिष्यते वृष्टिं दिवा परिक्षर वृष्टिद्यावा त्यापेषस्पती १४६७ वृष्यत् ण्य शवो ७८२ वेथा हि नितीन देवा हि धो १४७६ व्यतिरिक्षमतिरन्मदे शसेदुक्थं मुदानव ७१७ सानो देवीरभिष्टये धपदमघ शम या मिथ यो नो वनुष्यन् बास्तोपते ध्रुवा ४८०, ७८४ विपबिते पवमानाय १६४० ३१ ४४१ १०६६ (१०७) सामवेदमन्त्राणां वर्णानुक्रमसूची शचीमिनः शचीवसू २८७ समिंद्रणोत वायुना सामन्यू राचीपत २५३, १५७९ सखायस्त्वा वनमहे म पवित्र विचक्षणी ख्य त इन्द्र वाजिनी ८२८ स पुनान उप रे शतानी केव प्रजिगाति सघात पण ४२४ पपुग्यों महीना शशमानस्थान। समास स्तवा रिता र ६४० शाक्मना शाको अक्षण. १७८३ सपानो मोगमा ७४९ पहिं गृति वेधली १७६६ शादिगो शाचिपूजनार्य ७२६ घा यस्ते दियो स प्रथम म्योमनि देवाना ७४७ शिक्षा राय १६४४ सैकदननानिमिपंग १८५० स भक्षमाणो अमृतस्य १४२४ शिक्षेयमस्मदिसेयं समित्या दृषेदास समास्वनिमवसे शिक्षयमि-मस्यते १७९७ सनादर्ण दाभृषि समन्या यन्युश्यनयन्या. ६०७ शिशुं जवान हरि १३३४ स त्रितस्याधि मानव १२९५ समजान मायुभि १७६३ शिशु अज्ञान यंत १९७५ पवनधित्र वजहस्त समस्य मन्यव विशे १७, १६५१ शुभ- पवरव देवेभ्य म.महा विधा १७१ सदसस्पतिद्वत १३०५ शुक्र हे वन्यजतं ७५ भमानोसपा स्वना सदा गावा शुभयो ४४२ शुचि. पावक उच्यते समामूजे जारी सदा य इन्द्रश्च पदा शुन हुम मधवानं देवा कविनेपितो १९९७ ममिदमनि समिधा शुधमन्थे। देवातमसु १००१ सन इन्द्र। शिवा १९५२ १०८० शुम्भमाना ऋतायुभिः १०३५ न इन्द्राय ज्य ५९२,६७३ समिदो रायो वृहती. १६७८ गुम्मी प्रों नमारत १९७३ न म्याग्य १४३८ मी वरसन मातृमिा शरमामा एर्वचारः १४०९ सना पवश गरें ६५३ उमीचीना अनूषत शरीन पत्तायुधा १२२९ सन. पुनाना भर समीचीनास आशत ११२५ शृणुतं जरिता सन-पृथु श्राप्यमन्छा समुद्री बसु मामृजे १०४१ गये पटेरिव स्वन ८९४ सना च सोम मेषि १०४७ समु प्रिया भन्न शेषे बनेषु मा ४६ समा ज्योतिएग १०४८ समु पियो मृश्य साग १४०१ श्रले दधामि प्रथमाय ३७१ सता दक्षत १०४१ समु रेमासो अस्थरम् धायन्त शर्य माद मृणसि . समेत रिमा मोजमा भुतं वो प्रान्तम २०८ पने मिस्वमस्मदा १६१३ अमानुमि शिगुर्वावशानी १४१९ धुधि भुरकर्ण पहिभिः ५० एमो दूराचासच समियो भरपोभुत धुपी हवं तिरसच्या ३४६८८३ सनो भपाय वायो १०८३ अप्रामा यामृतमीनी १२.४ धुधी हवं विपिपानस्प १७९८ सबो मन्दामिरपो १९७५ सोजत मायय शुष्टपोनस्य में सोमा भनिमानो १६६४ एमात्र सध्या ७५० सक्षमीषाकविः १५६२ समो मित्रमद एकपरला पामो पुस्ता पनिहिमि १८५१ समवादियो १७४ सवारशिपतिदेय परयौन २०७१ मोहममें यह पर्षिता वर्धन यालिम ६०. प नो दोभमरयममी १९८१ सरि दुष्टरों ९७३ बरस मातृभिः सनो हरीया पत १६१२ पराज विधानिरहिरव १४१७ कामुकम्म पदेशशोमते ९२० सा बाजीरावन ५६८.१९५७ पवरष मदिन्तम ORI पसरटा। पपय माविष भिरक्षिता पचायभा शिवामहे . ससाय मानि (०८) सामवका सुयोध मनुवाद धमा पूधाच स सुतः पीतये १३९१४६३ खुमन्मा परवी सहर्षमाः सहसा स ची दक्षमापनो १९८८ सुत एति पवित्र मा सनहा धा १२९६ । सुता इन्द्राय पायो ७६६ सोम गावो धेनवो ८६० अभ्यामनु स्फिार्म पर १६०६ सुताम्रो मधुमतमाः ५४७१८७२ सोम रामानं वर्ण ९१ १९९२ . सुनीयो या व मरयों २०६ सोमा असममिन्दवः स सुग्वे यो सूना ५८९, १०९६ । सुनौता सोमपाउने २८५ सोमाः पवन्त इन्दयो ५४८० ११०१ म सुनुमातरा ९३६ सुहावीत क्षयः सोमानो स्वरण यह रम्या निवर्तव १६५६ स्वो राधानी पसे १६०० ६२६ सुस्पकरमतये १६०, १०८७ स्वरन्ति वा सुते ८६५ सहस्रधारः परते ८७४ सुवितस्य पनामहे स्वस्ति न इन्द्रो पराः १८७५ सदसधा भं १३९५ । सुपमियो न आ पद १३४७ स्वादिष्टया मदिछया ४६८६६८९ ६२५ | सुपहा सोम तानि ते १७६७ स्वादोरिया विषयसो ४०९, १००५ ६१७ । सुवाणास इन्द्र ६८ स हि पुरु चिदोजसा १८१५ । सुष्वाणाधो ध्यानमिपिताना ११०३ सदिच्या प्रतिम ९६९ सूर्यस्येव रश्मयो १३७० हयो पत्राण्यार्या ८५५ साकं जाता ऋतुना १९८७ । यो अग्मियों वसुणे १७३९ । हरीन इन्द्र स्मश्रूण्युतो ६२३ सामुमो मजयंत ५३८, १४१८ को अपन्द्राय पीतये ९८० इतन्युटेभिर दिमित १४४१ १७४३ सोम वास सोतृभिरधि ५१५१९९७ যুদ্ধষিস্থা মিঃ १५५८ सोमः पयते अनिता ५९७, ९४३ हिन्यानाडो रया १९२० सिञ्चति नमसावटमुच्चापकं १६०४ सोमः पुनान कमिंगाध्य ५७२; १४० | हिवानी देतृभिः सीदन्ताते क्यो १०७ सोमः पुनानो अति ११८७ होता देवो अमरया सहनशीपाः पुस स्व युधः पयते देव मा नो अदाभरद्वसुः हिस्यन्ति सूरमतयः