Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Kshaydarsha

Hari Shankar · 2012/08

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Front matter

amanandHANIAC-Mant.
नयादर्श
अर्धान्
क्षयरोग और उसकी चिकित्सा
लेसा
पं० हरिशंकर शर्मा वैद्यराज
गर
राधावल्लभ वैद्यराज
4.COMAAMTIGAT THEAmawgutetnELCurta

BHAVAN'S LIBRARY
This book is valuable and
NOT to be ISSUED
out of the Library
without cial Permission

श्रीधन्वन्तरि ग्रन्यावली न
সবি।
सयरोग और उस की चिकित्सा
जिस में क्षय सम्बन्धी नवीन और प्राचीन
विचारों का सविस्तार वर्णन है ।
लेखक:-
पंडित हरिशंकर जी शर्मा वैद्यराज
हरदुभागंज।
नयपादक प्रकाशक :-
वैद्यराज राधावल्लस
सम्पादक आरोग्यसिन्धु ।
मास्टर रघुनन्दनलाल गुप्त के प्रबन्ध से
यू०पी० आर्ट मिटिंग वर्म कासगंज में
छपकर प्रकाशित हुया ।
प्रथमवार
cpo 4o
-जनवरी सन् १९१७.
मूल्य प्रति
पु
oj
इस पुस्तक का सर्वाधिकार प्रकाशक ने स्वाशन रक्खा है।

रक्त- इस पुस्तक में रक्त की उपयोगिता, रक्त की बनावट, रक्त वैसे बनता है ! रक्त का संचालन, और रक्त सम्बन्धी अग मत्यंग का वर्णन है मूल्य प्रति। पता-मैनेजर धन्वन्तरि पुस्तकात नं. १ पोस्ट विजयगढ़ जिला अलीगढ़ भूमिका हिन्दी भाषा में केवल नवीन पश्चिमीय विचारों को ही पत- जाने वाली क्षयरोग, सम्बन्धी दो एक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। नवीन और प्राचीन उभय विचारों को स्पष्ट समझाने वाली क्षय सम्बन्धी पुस्तकों का प्रभाव हमारे चित्त में बहुत दिनों से सट- कता था कानपुर के धैद्यसम्मेलन में क्षय रोग पर उत्तम नियन्ध लिनने पाले को पुरस्कार देने का पचन भी इस ही लिये दिया था और प्रारोग्यसिन्धु मासिक पत्र में तप सम्पन्धी लेख माला निकाली थी । लेस माला को गुण नाही वैद्यों और पत्र सम्पा- दकों ने सामयिक उपयोगी और विचार पूर्ण बतलाया, तब से स्वयं इस विषय पर स्वतन्त्र नियन्ध लिखने का विचार किया। हमने क्षय रोग और उस की चिकित्सा-नामक निपन्ध लिखा और उसदीयवसर पर हमारे मित्रपं० हरिशंकर जी शर्मा वैद्यराज ने वैध सम्मेलन मथुरा के लिये क्षयादर्श नामनियन्ध लिखा । सम्मेलन के पश्चात् वैद्यराज जी ने हमारे पास उसे प्रशशित होने के लिये भेजा " एक और एक ग्यारह " वाली सहावत चरितार्थ दुई। दोनों पुस्तकों के विचार उत्तम समझे गये । इस लिये उपर्युल वैद्यराज जी के निबन्ध की प्रधानता रख हम इस क्षयादर्श नामक निपन्ध को प्रकाशित परते है और पै- घराज जी को इस परिश्रम के लिये धन्यवाद देते हैं। .

हिन्दीसाहित्य में ऐसी पुस्तकों की कैसी प्रावश्यक्ता है इसे वैद्य महाशय अच्छी तरह जानते हुये भी अपनी उदासीनता दिखाते है । हिन्दी भाषा में मवीन शैली से लिखी हुई पुस्तकों की मांग बहुत कम होती है हममे छोटी २ पेसी पुस्तके प्रका- शित कर इस बात पर अच्छी प्रकार अनुमय पर लिया है तो भी हम अपने पाठकों के सामने इस निबन्ध को रखते हैं और पाशा करते हैं कि बेंच महाराय इसे अपना हम को उत्तसा. हित करेंगे। इस पुस्तक में उप रोग के कारण, स्वरूपभेद, कीटविज्ञान, दोपविमान, चिकित्सा प्रादि सभी उपयोगी विषयों का समावेश किया गया है। धैध और सर्व साधारण दोनों इसे पढ़कर जाम उठा सकते हैं। यदि गुण प्राई वैद्य इसे स्वीकार करेंगे तो हिन्दी भाषा में वैधक सम्बन्धी अन्य उपयोगी पुस्तकें प्रकाशित की जायेंगी। क्षमा प्रार्थना-तयादर्श में यत्र तत्र कार्यकर्ताओं की । सायधानी से प्रशुशियां रदगई है जिन का दम को पश्चाताप है। पाठक सुधार कर पढ़ें। राधावल्लभ वैद्यराज ।

क्षयादशै
अर्थात्
सयरोग उसकी चिकित्सा
मंगला चरणम् ।
यः प्रागादं गदशमार्थ मर्थववेदो।
पाङ्गं स्वयं निगममायुपतवान ॥
भाविप्रजा कुशल कामनया पुरेव ।
तं वेधसं परम कारुणिक नमामि ।।
क्षयरोग की अयंकरता
और चैद्यों का कर्तव्य
क्षयरोग कैसाभयंकर है ! जनसमुदाय का नाश करने वाली
कैसी महाव्याधि है ! बड़े धेर्य शालियों के धैय्यको तय करने
.

पाली, अभिमानियों के मान को मर्दन करने वाली कैसी घोर पातना है । इस रोग से प्रति यर्प३० जाश मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यहुसंख्य युग विना पिजे पुष्पों के समान इस विश्व वाटिका में अपने यशरूपी सौरभ के फैजाये बिना ही चज पसते हैं। तय ही तो इसे रोगराष्ट्र कहते हैं राज यक्ष्मा कह फर पुकारते हैं । इस रोग का आधिपत्य भारत वर्ष में ही नहीं किन्तु संसार में चमकले हुए अमेरिका, जापान, जर्मनी, और गलेर प्रादि । देशों में भी है। परन्तु यहां के पुरुष भारत वासियों के समान पजहदय नहीं है जो अपने देश पालियों की अकाल मृत्युनों की मोर किञ्चिन्मात्र ध्यान न देकर घोर निद्रा में पड़े सोते रहते हों। शोक है कि महर्षियों के दिव्य ज्ञान से निकले हुए सदुपयों के विद्यमान रहते हुए भी हम कुछ भी उद्योग नहीं करते। प. मीय देशों में इस रोग पर विचार पारने पाली अनेक सभायें स्थापित है। यहां के विद्वान अपने मस्तिक बल से इस विषय की खोज में पूर्ण उद्योग करते हैं। प्रति वर्ष बड़े २ डाक्टर एक स्थान पर सम्मिलित हो इस महारोग के सम्पन्ध में अपना २ मत और अनुसन्धान प्रकाशित करते हैं। इस रोग पर विचार करने के लिये कई समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। इस रोग पर एतम नियन्ध लिखने वालों को हजारों रुपयो का इनाम दिया साता थोड़ा ही समय यतीत हुआ कि अमेरिका के धाशिंगटन् शहर में क्षयरोग पर विचार करने के लिये एक महासभा हुई थी। शिप में समस्त देशों से ४४० नामी २ डापटर डेलीगेट बनकर पधारे थे और इस रोग के विषय में यथा सम्भव विचार कर अपने कर्तव्य का पालन किया था। हम को अपने प्रिय वैद्य भाइयो की दशा देखकर पड़ा शोक होता है। हम लोग संसार में मान चाहते है । विदेशी चिकित्सकों को अपनी चिकित्सा के सदगुणों ।

से परास्त करना चाहते है, संसारभरके चिकित्सकों में उश्वासन चाहते हैं, राजाधय चाहते हैं चाहते सब कुछ है परन्तु करते कुछ मोनही केवल अपने पूर्वज विद्यादिगानों को कोतिपर ही अभिमान करते हुए अकड़े जाते हैं। हे अश्विनी कुमार, प्रात्रेय, धन्वन्तरि श्रादि दयपि, महर्पियों के पथानुगामियो! यदि तुम संसार में कीर्ति चाहते हो तो संसार के सामने अपना प्रभाव दिखाइये। देशभक्ति का अञ्जन लगाकर ज्ञानरूपी नेत्रों को निर्मल बनाइये। तुम्हारा कर्तव्य है कि विदेशी डाक्टरो का अनुकरण फर इस रोग के विषय में पूर्ण विचार करो । प्राचीन भूपियों का क्या मत है ? वर्तमान संसार के डाक्टर लोगो को क्या २ सम्मतियां है ? क्षयरोग की चिकित्सा प्रणाली क्या है ? इत्यादि यातों का विचार करौ । क्षय रोग के कारणो से सर्वसाधारण को परिचिन करौ। जिस से वे अपनी प्रात्मरक्षा कर सकें। रोग उत्पन्न होते ही सावधान होकर योग्य वैद्य से चिकित्सा करा सके। ॥ क्षय रोग का नाम करण । वैद्यो व्याधिमता यस्माद् व्याधेयत्नेन यक्ष्यते सयक्ष्मा प्रोन्यते,लोके शब्दशास्त्र विशारदः॥११॥ राज्ञश्चन्द्रमसो यस्मादभृदेप किलामयः तस्मात्तं राजयदमेति प्रवदन्ति मनीपिणः॥२॥ क्रियाक्षयकरत्वात्तु क्षय इत्युच्यते बुधः संशोषणासादीनां शोष इत्यभिधीयते।।शा पु० क्षयरोग के यदमा, राजयक्ष्मा, क्षय, शोप, प्रादि कई नाम साइन नामों से ही जाना जाता है कि यह रोगपड़ा कटिन है। और इस का प्रादुर्भाव प्रति प्राचीन काल से है 1 तथा इस रोग में धातुओं का तय होता है। जिस रोग के कारण वैद्य रोगी द्वारा अधिक सत्कार पाये ( यजन किया जाये ) उसे शब्द शास्त्रज्ञ यस्मा कहते हैं। पहले यह रोग चन्द्रमा को हुआ था इस से इस का नाम राजयक्ष्मा पड़ा। शारीरिक क्रियाओं का तय करता है इस से क्षय, और रसादिक धातुओं के सुपाने से शोप कहा जाता है।मग्रजी में इसे फॉन्जम्पशन (Consumption) अथवा (Phthisis) थाइसिस कहते हैं जिन का मर्थ भी निन्तर तय करने पाला ही है । फारसी में इसे दिन था सिल रहते हैं। . क्षय रोग का सामान्य विवरण जिस रोग में शारीरिक धातुओं की कमी होने से शरीर प्रति दिन निर्बल होना जावे उसे क्षय कहते हैं । यह रोग मनम्मा- दिकों के धेगो को रोश्ने, मैयुनादि विषयों से शारीरिक धातुओं 'के क्षय होने, शक्ति से विपरीत साहस करने, और विषमासन से उत्पन्न होता है। इस रोग के पजे में युवा अवस्था पाले तथा सुकुमार स्त्री पुरुप प्रायः प्रधिकता से फँसते हैं। जिन मनुष्यों को दिमारा से अधिक काम पड़ता है, अथवा जोधनिक मादक पदार्थों को सेवन करते हुए विषयासक्त रहते हैं. उनको मायः इस रोग का शिकार बनना पड़ता है। यह रोग शनैः२ रीति से बढ़ता है कि रोगी को तथा उसके घर वालों को मकर रूप से रोग बढ़ा हुमा मालूम नहीं पड़ता । जब रोगी चजो फिरने में प्रशक्त होमाता है और रोग प्रसाध्य होकर उसे मृत्युशया पर सुनाना चाहता है तब कहीं इस की खबर पड़ती है । डाक्टर जी.डाल्य, विलसन ने ठीक कहा है कि- "Like a serpont in the grass or among stones lying in ambush for its prey; Consumption often bogins to do ito destroying work before it manifests itself openly. " पर्यात अपनी शिकार पी टोह में घास या पत्थर के नीचे छिपे हुए सर्प के समान क्षयरोग भी प्रगट होने से पूर्व ही (शरीर में छिपा हुम्रा भीतर ही भीतर) शरीर को नाश करने का काम प्रारम्भ कर देता है । जो मनुप्प रोग की प्रथमावस्था में ही सावधान होकर अपनी पूरी चिकित्सा कराते है पेहीप्रायः घच जाने हैं। रक्तमांसादिको के क्षीण होने पर कोई रोगी नहीं बचता। क्षयरोग के सामान्य लक्षण ये हैं-रोगी को जल्दी २ जुकाम हो मांसी का उसका बना रहे, फैफड़े निर्बल होते जायें, तथा उन में शूल या धाय हो,कन्धों या पसघाड़ों में खिंचाव हो, हाय पायों में जलन हो, यदुत प्रांसने पर थोड़ा कफ निकले किती २को कफी अधिकता हो । कफ के साथ रुधिर की जालिमा अथवा पीय प्राये, ज्वर की मन्द गर्मी तो सर्वदा पनी रहे, पाभी २ वर वेग से चलाये, रक्तमांसादि धातु पल प्रति दिन क्षीण होते जायें। थोड़े दिन रोगी को पारामसा प्रतीत होकर फिर दौरा होने से पूर्ववत् स्थिति हो जाये । चहरे पर तो रौनक मालूम दे किन्तु शरीर दुर्यज होता जाये । विचार. शक्ति कम हो। ।

क्षय सम्बन्धी कुछ डाक्टरी सिद्धान्त (१) यी अथवा राजयक्ष्मा एक पुरानी बीमारी है जोकि फेफड़ों में सूक्ष्म दानों च परमाणु की स्थिति से उत्पन्न होती है। ये परमाणु गोलाकार होते है और कभी कभी नंगी प्रांज मे मी देख पड़ते हैं तथा असंख्य होते हैं। यहां तक कि किसी २ रोगपीडित अग में तो करोडो पाये जाते है और नहीं की वजह से इस रोग को (Tuberculosis ) " टयूवायूलोसिस् कहते हैं। ये कीटाणु टवर्किल्स कहाते हैं। यह छोटासापर घन जीची कीटाणु राजदमा का प्रधान कारण समझा जाता है। यह दुष्ट घाव डाल २ करन कवा फेंफड़े ही को शनैः शनैः नष्ठ करता है पलिक साथ ही में "टोक्सिन्" नामी एक विषले पदार्थ कोमी उत्पन्न करता है जो प्रति बिकराल चिन्हों का जन्म दायक है। (२) सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों मे आय के कीटाणु प्रधिानर थूक में पाये जाते हैं वे गोल इथियो के से स्वरूप पाले होते है। (३) क्षयी के परमाणु श्वास के साथ फैफड़ों में या भोजन के साथ प्रामाशय में पहुंच कर रोग उत्पन्न करते हैं। (४) विसी प्रण द्वारा कीटाणु रधिर में पहुंच कर क्षयरोग पैदा करते हैं। {५) मादक पदार्थों के इस्तेमाल मे या अन्य किसी मुगुणा से निर्वन हुआ शरीर शोप कीटाणुओं की उपयुक्त भूमि है। (६) क्षयरोगी का धूक पेपरवाही मे पड़ा न रहना चाहिये । क्योकि एक में प्रसंस्य कोटा रहते हैं जो दूसरे मनुष्यों पर प्राक्रमण करते हैं। यूक या कफ को सूत्र ने से पहले ही न कर देना चाहिये।

(७) कल कारस्वानो तथा अन्य बड़े २ स्थानों में थूक दान रखदेने चाहिये जिस में ही लप लोग थूकें और घह थूक जना दिया जाये । क्षयरोगो एकर जेयी थूक दान रखे । और जरूरत * समय उस में धूक कर जेप में रखले और पीछेलाफ काडालें। (८) पशुओं को भी क्षयरोग होजाता है वे भी प्रायः क्षय- रोगियों के धूक चाटने से योमार हो जाते हैं। इस से शूकदानों को हिफाजत से रक्यो। (६) तयपीडित गाय भैसों के दूधपीने से क्षयरोग हो जाता है। इसलिये दुध को परीक्षा करके काम में जाना चाहिये। (२०१ क्षयरोग संक्रामक है तथा पुश्तैनी है। (११) कच्चे दुग्ध में तय के असंख्य कोटाश रहते हैं दुग्ध को भौटा कर पीना चाहिये। (१२) बहुत से ऐसे रोग है जिन से शरीर दुल हो जाता है चोर पीछे उस मे कीटाणु प्रवेश कर जाते हैं, जैसे न्यूमोनिया, पेचक, खसरा, खांसी, भातशक। (१३) कुछ ऐसे पेशे हैं जिन से क्षय पैदा होता है जैसे छपाई सिलाई, पत्थर, लोहे उठाने का काम, पिसाई, हलवाईगीरी, कल फारम्बानो में धूल का काम । (१५) राजयक्ष्मा के प्रधान लक्षण, सांसी कफ, मन्दज्वर शास लेने में तकलीफ, दय में दर्द, रात्रिम पसीना, भूब की कमी, धिर, यमन, और तीराता है। (१५) क्षयरोग की कई किस्म हैं जैसे कंटको क्षयी, हदियों की शायी, यच्चो की क्षयी, प्रांतो की त्रयो, काठमाला क्षयीमादि। (१६) क्षयरोग यदि नवीन हो तौबड़े प्रयत्न करने से प्राराम भी हो सकता है।

5 क्षय रोग कैसे उत्पन्न होता है ? (डाक्टरी सिद्धान्तों का खंडन मडन) क्षय रोग के कारण प्रायुदीय प्रन्यों में बड़े विस्तार से लिखे गये है। डाक्टर लोगों ने भी इस रोग के कारण ढूंढने में पड़ा परिश्रम किया है। उनके विचारों से भनेक मनुष्य सहमत हो या न हो परन्तु उन के उद्योग की प्रशंसा सब ही विचार पान करते हैं। इन्दी ने जो कारण ढूंढे ये पर्याप्त नही है। और प्रायुर्वेदीय शास्त्रों में जितना निश्चित हो चुका है उन का अनुसन्धान अभी यहां तक भी नहीं पहुंचा है। डाक्टर लोग पक दूसरे के विचार से परस्पर सहमत भी नहीं हैं। एक के निश्चय को दूसरा प्रवन युक्तियों से नयन करता है। जयरोग के सम्बन्ध में जो नई शोध दुई है उसे हमारे विचार शील पैदयों को जानना एक प्रावश्कीय पात है। तथा अपने मदपियों के पुराने सिमान्तों को संसार के सामने उपस्थित करना भी उचित कर्म है। हम इस लेख द्वारा पहले पश्चिमीय डाक्टरों के मत तथा उन का खण्डन मंडन दिखलाकर पीछे प्रायुर्वेदीय सिद्धान्तों को दिखायेंगे । जिस से पाठक जान सकेंगे कि दोनों मतों में कौन उत्तम है । और प्राचीन ऋषियों का दिव्य ज्ञान कितना कंचे दर्जे का दे। साक्टर लोगों की नई शोध यह है कि यह रोग"ट्याक्स' नामक कीटाणुओं से उत्पन्न होता है।ये कोटा गोलाकार होतेहैं। वास के साथ पेफड़ों में, अथवा प्राहार के साथ प्रा. माशय में या किसी घाव के साथ रुधिर में प्रविष्ट दोकर तयको उत्पन्न करते हैं । क्षय रोग पाले मनुष्य के थूक और कफ में प्रसंख्य पीटाणु रहते हैं। धूल और कफ के सूखने परवे कीटाणु हषा और धूल में मिल रोगी के समीप में रहने पाले पुरुषों के शरीरों में प्रवेश कर जाते हैं। इससे यह रोग संक्रामक भी है। -- पह रोग पुरतनी भी मालूम पड़ता है। क्योंकि प्रतेक स्थानों में पैसा देखा गया है कि पिता के बीमार होने पर कालान्तर में एस के पुत्र को भी यह रोगहुप्रा है। गायों के कच्चे दूध में भी इस रोग के कीटाण होते हैं। पशुओं को भी तय रोग होता है। तय पाली गौ के दूध पीने से वे पीटातु मनुष्य के ग्रामाशय में पहुंच क्षय रोग उत्पन्न करते हैं। कीटाणुओं से क्षय रोग होता है इस पात की नवीन शोध करने वाले जर्मनी के मलिक विज्ञान वेता डाक्टर रॉबर्ट फाक ( D. Roboert Koch) हुप, किन्तु इन शोध से यहां के सप डाक्टर सक्षम नहीं हैं यहां के अनेक विद्वान् डाक्टर की- टासाग (थियारी) से प्रपात विरोध रखते हैं। इन विरोध पक्ष वाले डाक्टरों का कथन भी युकि सिद्ध प्रतीत होता है। इस प्रक्ष की मीमांसा में क्षयरोग के " स्पेशलिए । विद्वान साफ्टर देविट पार्क एम. डी ने कहा है कि- " When Koch discovered the bacillus tho medical profession concluded that these germs were the sole and original cause of tuberculosis."......But this idea has been found to be practically a complete failure.'' जय से प्रोफेसर काक ने क्षय के कीटाणुओं को हुंदा तय से डाक्टरों ने इस पर ऐसा निश्चय किया कि ये जन्तु ही क्षय के मूल और मुख्य कारण हैं परन्तु उन का ऐसा मानना घल निष्फलता रूप ही है, इस ही प्रकार द्वाक्टर जे. टी. रोबिन्सन, एम.डी. ने कहा है These so lled deadly germs that the political doctors prate so much about are our .

friends, ther are nature's scarengers, It is a
natural method of elimintion the throwing
out of decayed putrid matter from the system.
Theso gerns are i prodnct of disease and
not the cause They produce metamorphosis
of tissue a form of dead matter, which can
be eliminated Of all the trild absurd theories
that have ever been emposed upon an
intelligent public, the germ theory is most
infart ous and false
खटपटी और बदमागड पटर जो कीटाणुओं की भयकरता के
मम्स में पाते फिरते हैं वे "जर्म" अथवा जन्तु तो हमारे
मित्र हैं, प्रकृति ने उन्हें गन्दगी को साफ करने के लिये धनाया
है। क्योकि मलोत्सर्ग करना एक सामाविक है अर्थात् दुर्गन्धि
युक मल निसाना एक प्राकृत नियम है। ये जन्तु रोग के कारमा
नहीं है किन्तु रोग से उत्पन्न होते हैं (जन्तु राग को उत्पन्न नहीं
करने किन्तु रोग स जन्तु पेदा होते हैं शरीर के स्नायु और
शिरानों को रूरान्तर कर के उन में से निर्धार जन्तुओं का जुदा
करने हैं, म स कीटाणु सरलता से शरीर के बाहर निकाले
माते हैं। दुद्धिमान प्रजा का भरीत करने के लिये जो जगली.
मिथ्या और मूर्खता से भरे हुए सिद्धान्त निकाले गये है उन सब
A सम्पन्धी विचार प्रर्थात् थियारी सब से अधिक घिद्वारे
सा' योय।
अमेरिका के दादर वसं राईटेल, एम, डी, का मत
The world appears to have gone microbe mad
And yet upto the prescut timo in spite of the
Tasto amount of research that has been going

on it has never been satisfactorily demonatrated that the germ is the cause of digcase. It is true that there are certain diseases in which a specific germ is in variably present but in view of the fact that the said germa aro present in countless milions of people rho never develope the disease. जन्तुओं के पीछे संसार मूर्ती होगया है ऐसा हान होता है। अब तक इस के सम्बन्ध में यड़ा विवार होने पर भी सन्तोष जना रीति से यह सिद्ध नहीं किया गया कि रोग के कारण मन्तु ही होते हैं । यह यात ठीक है कि किसी रोग में एक विशेष ये जन्तु शरीर में रहते हैं, परन्तु सस्थ मनुष्यों के शरीरों में भी वैसे ही प्रसंख्यजन्तु शरीर देखने में आते हैं, उन कोबर व्याधि क्यो नहीं सताती । इस सत्य दाल को विचारने से या पान जानी जाती है कि रोग से जन्तु पात होत ६ जन्तु से रोग महा-उपर्युक्त डाक्टरों के अतिरिक्त प्रौर भी अनेक विद्वान शक्टर इस के विरुद्ध है। दुग्ध के साथ या अन्य किती प्रशर के प्राहार के साथ ये परमाणु शरीर में प्रवेश कर तय को उत्पन्न करते है इसकी मित कुलता भी कम नहीं है। इसके सपन्ध में ओ द्वाक्टरों का मत है उस का सारांश यह हैं:-संसार में प्रायः सप वस्तु कोकि खाने पीने में प्राती हैं (जैसे पानी छ, श्राहार ) उनक साप तय के जन्तु या विष मनुष्यों में प्रवेश करता है, यह कहना भी ठीक न है। न इसके सम्बन्ध में कोई प्रभाटप युक्ति है। यह सम्पूर्ण विश्व जन्तुमय है ऐसा सप धर्मयादो मागते हैं। जैन- शालों में तो आजकल कहे जानेवाने जन्तुओं ले भी प्रमंशप सूक्ष्म सन्तुभो का मीन है। शुष से शुद्ध जल और वायु में भी 1 ये रहते हैं। दुग्ध भौरमासन में भी हाकी स्थिति है। एक छोटे धमचे मर दूध में कम से कम तीसजास और अधिक से अधिक एक करोड़ जन्तु रहते हैं। गाय के यिना प्रौटायेदुग्ध में जो जन्तु रहते हैं उनसे तय उत्पन्न नहीं होना । यदि उस दूध में क्षयरो- लोत्पादक तथा मापनाशक अन्तु रहते हैं, तो कहिये प्रसंग्य कीटाणुनों पाले दुग्ध को पैदा करनेवाली गाय ही कैसे जीवित रहसकती है। और दूध के प्रौटाने से क्या सब कीटाणु नष्ट नहीं हो ताते हैं । यदि थोड़े बहुत शेप रहजाते हैं तो क्या ये पुनः नहीं पढ़ सकते। क्योंकि इन कीटाणुओं में पाहुन शीघ्र पढ़ने की शक्ति होती है । जन्तुओं को प्रसिद्ध करनवाले डाक्टर राबर्ट कॉक का मी इस विषय में मत यदल गया और ये अन्त में प६ गये कि कैतीही क्षय घाली गाय का दूध पीने से क्षय रोग उत्पन्न नहीं होता। अतः जो डाक्टर इस मिथ्या भय को दिखाते है ये प्रता पोनिन पनाते हैं। और वेवारी गायों को निरर्थक हानि पहुंचाते है। प्राधार के साथ गये हुए भी ये कीटाणु तय उत्पन्न नहीं पर सकते। क्योंकि भामाशय के “गस्ट्रोकजुस,,में हाईड्रोक्लोरिक एसिड रहता है जिस से अथवा प्राहार को पचानेवाले अन्य रस से घे नाश हो जाते हैं। यदि प्रामाशय या अन्तड़ियों में कोई प्रण न हो तो चे जन्तु कोई हानि नहीं पहुंचासक्ते । सय रोग पुश्तैनी भी नहीं है, जैसा कि फिरंग या उपदेश का विप नई पीढ़ी तक रहता है पैसा तयरोग का नहीं। किसी कुटुम्भ में जो यह देखा जाता है कि पिता को तय होने पर कालान्तर में उसके पुत्र को भी तयरोग हुआ है, इसका कारण अन्य ही है। जिस प्रकार प्रायः जम्वे मनुष्य का पुत्र लम्या, ठिंगने का लिंगना, स्वरूपवान का स्वरूपवान होता है, उस ही प्रकारप्राय निर्वल फैफैडयाले पिनाकापुरभी नियंत फेफड़ोंवाला होत है। और प्राय युटुम्ब मरके माहार विहार भी समान ही 1 होते हैं। इस से जिन कारणों से पिता को क्षय रोग पैदा हुआ था उनही कारगो से पुत्र को भी क्षयरोग होजाता है। यदि यह पुन सापधान होकर पथ्य से रहे दुराचार और व्यसनों से बचे तो यह रोग कदापि उत्पन्न न हो। - * कीटाणु कारण वाद और आयुर्वेदीय शास्त्र सफल जित विज्ञान की पायत्य देशों में धूम मच रही है, जिस जन्तु विज्ञान के प्राविकता श्रा पाके इस घीसीं शताब्दि में पश्चिमीय साक्टर अपनी शोध और उन्नति पर अभि. मान करते हैं, जिस जन्तु विज्ञान को प्राधुनिक विद्वान पड़ी पाश्चर्य भरी दृष्टि से देखते हैं, जिस जन्तुविज्ञान को देख पु- गनी चाफे रोगों की जांच ढकोसला यताई जाती है, उस जन्तु विधान से क्या हमारे प्रायुर्वेदीय शास्त्र शून्य है ? क्या सचमुच इस शान के प्राचिफर्ता पश्चिमीय डाक्टर ही हैं ? क्या हमारे पूज्यपाद ऋपियों का ज्ञान हमारी प्रधानता और अपहेलना से विदेशी विद्वानों के गृहों को, हदय कमलों को, प्रकाशित नहीं करता ? हम अभिमान पूर्वक कह सकते हैं कि वर्तवान समय का " जन्तुविज्ञान, भारतीय वैद्यकशान का प्रतु मात्र ही है। श्राज नदी कितनी ही शताब्दियों पहले हमारे महर्षि इसे उत्तम रीतिसे जानते थे। ये केवल जानते ही न थे प्रत्युत इस विषय को उन्हों ने अच्छी प्रकार उहा पोइ कार के अपने ग्रन्थों में बड़ी उत्तम रीति से प्रदर्शिव भी किया है। जिसके प्रमाण भनेक संहितामों में प्राज कल भी पाये जाते हैं। जय वेदों में भी "जन्तु विज्ञान, का विस्तृत वर्णन पाया जाता है तथा मालूम विदेशी लोग किस मुंह से अपने लिये इस शान के टत्पन्न करने वाले प्रक्षा बतलाते हैं । अब भारतीय वैद्यों ने अपने प्रायुर्वेदीय मंदिर की सेमाल करनी प्रारम्भ करदी है। उस टूटे फूटे जीर्ण मंदिर में मी बहुतसी सामियो यची है। इस से इस निरपेत समय में हम अपनी सम्पत्ति को दूसरों की न यताने देंगे। यह हम मानते हैं कि प्रचीन विज्ञान विना संस्कार किया होग था और पत मान समय में उसे छीनकर विदेशी विद्वानों ने प्रकाश युक्त धनाया है। परन्तु उसे खान से निकालने पाले हमारे पूर्वज ऋषि ही थे। मायुर्वेद के प्राचार्य थनेक स्थानों पर जीवारण कारण वाद विषयक ऐसे सुन्दर हेतु सूत्र और लिंग सूत्र लिख गये हैं जिन्हें ऐन कर कोई भी यह नहीं कह सकता कि प्रायुर्वेदीय चिकित्सा में इस विषय के प्रमाण नहीं हैं। नीचे लिखेटुए शास्त्रीय विचार से विहान लोग जान सकेंगे कि आयुर्वेदश कीटाणु कारया पाद से कैसे परिचित थे। वेदों में क्रिमिवर्णन है। उस प्रथर्व वेद में कीट विज्ञान हमारा आयुर्वेद,अथर्व घेद का उपांग विस्तार पूर्वक वर्णित है उस में लिखा है कि अनेक प्रकार को कृमियां होती है जिन से अनेक रोग उप्तन्न होते हैं, बहुतसी क. मियां दीखती हैं और बहुतसी सूक्ष्म होने से नहीं दीखतीं, वे कृमियां मनुष्यों के अन्तड़ियां शिर, पीठ आदि स्थानों में रहती हैं। "दृष्टमटमतहम्, "अन्याय शीर्पदयमथो पायसमीन,, स्वादि भनेक मन्त्रों में कीट विक्षन भरा पड़ा है।

क्रिमियों के भेद और
प्रिमिपाल और पाम्यस्तर
भेदसे दो प्रकार के होते हैं।
पाहों में तिन के बरायर, याल, और यत्रो में रहने वाले का
लोन आदि हैं। प्राभ्यन्तरों में, कफज रक्त और पुरीएस हैं।
जिन के स्वरूपादि के विषय में प्राचार्यों ने लिखा है।
कफादामाशये जाता वृद्धाः सर्पन्ति सर्वतः
पृथुवृत निभाः केचित् केचिद्राङ्पदोपमाः
रूढ़ धान्यांकसकारास्तनु दीस्तिथाणवः
श्वेतास्ताम्रावभासाश्च नामतः सप्तधातु ते
अन्नादा उदरावेष्वा हृदयादा महागुहाः
चुरवो दर्भकुसुमाः सुगन्धास्ते च कुर्वते
रक्तवाहि शिगस्थान रक्तजा जन्तबोणवः
प्रपादावृत्त ताम्राश्च सौक्ष्म्यात केचिददर्शनाः
केशादा लोमविध्वंसा रोमदीपा उदम्बराः
पद ते कुठेककर्माणाः सहसौरस मातरः ।।
इन श्लोकों का संक्षेप से यह अर्थ है कि कफ से भामाशय
में उत्पन्न हुए मिमि कोई मोटे धर्मजता के समान, कोई गेंहुए
के समान, कोई धान्पाकुर के सदृश कोई लम्चे और कोई सूदम होते
होये मिमि श्वेत और लाजरंगपाले हैं। अंबाद हदद्यावेत,महागुद

घुरव, दर्भकुसुम, और सुगन्ध इन के नाम है । इस ही प्रकार
रूज मिमि रक्तवाहिनी शिराओं में रहने है, यह बहुत बारीक
नई परवाले गोल तथा लाल होते हैं। कोई २ इतने बारीक होते
है जो दीख नहीं पड़ते। केशाद, लोमविध्वंसक, रोमहीप,
उदम्पर सौरस, और मातर इन नामों से छः प्रकार के है। इन
मिमियों से दुष्ठ एत्पन्न होता है। इस ही प्रकार पुरीपज
क्रिमियां है।
प्पय विचारिये किनिमियों का वर्णन सा सट है। श्य
मदृश्य, सूक्ष्म, स्यूजादि सब प्रकार के वोटों की गणना कर दी
है। नाम कल्पना भी किम ढंग से की है अदृश्य और सूक्ष्म
मिमियों को अपियो ने किस प्रकार दृष्टि गत किया है। देवाही
महीं किन्तु तज्जन्य रोगों का वर्णन तथा उन के रंग प्रादि का
पान कैसा विशद रूप से किया है। रंग के सम्पन्ध में प्रयादा
वृत्त ताम्रा मादिकपर लिया गया है। निमिजन्य रोगों को यक्षों
दर्षन करते हैं।
ज्वरो विवर्णता शुलं होगः सदनं भ्रमः
भक्त देपोतिसारश्च संजात किमि लक्षणम्
हृल्ला समास्य स्रवणम विपाकमरोचकम्
मूळ छर्दिवरानाह कास क्षवथु पीनसान
कुठो ज्वरश्च शोपश्च नेत्राभिष्यन्दि एवच
औपसर्गिक रोगाश्च संज्ञामन्तिनरान्नरम् ।।
भावार्य-यर वर्ण का पदनना, शूज, हमोग, जानि, श्रम,
भोजन में प्ररचि, भतिसार इतने लतण प्रिमि इत्पन्न होने पर
।
.
.

. धाते ६ ॥ जी मिच जागा, मुग में लार मिrat, घन्न काने परना, अमचि,मी, ददि, ये रोग क्रिमियों से हो जाते है । कुष्ठ ज्वर शोप, नगामिभ्यन्दि और शीतला धादि संशामक रोग दर झिायों के कारण ही एक से दूसरे मनुष्य के लग जाते हैं। आयुर्वेदीय शास्त्रो मे रोगो के कारण प्रधानता से दोप माने हैं। कोटाणुगो को कार साधारण सा माना है। रक्कयाही सोन भामाशय, दय, फुलादि के पिगड़ने से कीटाणु अवश्य उत्पन्न होने है। और शरीर के भीतर घाइए अनेक रोग उत्पन्न करते है। किन्तु हमारे यहाँ एलोपेथो बालों के समान रोग के कारण एक मात्र कीटाणु टी नदी माने गये। दोपों का ज्ञान दुर्नय और प्रतीन्द्रिय होने के कारण वे लोग यहाँ तकनी पहुंचे। आप सोच सकते है कि संसार की कोई यस्तु विना यायु के उन्पन्न नहीं होनी । तय ये जीवाणा विना वायु के कैसे उत्पना हो सकते है । इसी प्रकार जीवाणुओं में घनिष्टता प्रादिविना लामा और पित के नहीं हो सकते । अतएव यह प्रयश्य मानना पड़ेगा कि रोगोत्पादक सुपित जीवाणु दुष्ट हुए घातादिकों में पैदा होते है। प्रापप्रच्छी तरह समझ लेंगे कि जब घायु द्वारा सोमगुण विशिष्ठ शुरु और प्राग्नेय गुण विशिष्ठ शोणित के संयोग से दी मांस पिण्ड उत्पन्न होता है तरसीवाणुओं की उत्पत्ति में वायु तथा सोमगुण युक्त कफ, और अग्गिगुण युक्त पित्त को मानना क्या टोक नहीं है। इसलिये हमारे शास्त्र इन जीवाणुओ को रोगोत्पा- दक मानते हुए भी प्रधानता से दोपों को दो कारण मानते हैं। झा इतना अवश्य कहना पड़ेगा कि कहीं दुष्ट दोषों से और पड़ी दुष्टोद्भव कीटों से, पही दोनों के सयोग से, रोग की अत्यन्त वृद्धि होती है। २

आयुर्वेद मतानुसार जय रोग में
जीपासुमो की सत्ता ।
.
उपर्युक जीवाणु बाद में यह जाना जाता है शोप ज्वर,
श्रदय रोग मे निमियों का होता आयुर्वेद शारर भी मानते है।
क्षय रोग में ये रिमियां इस प्रकार उत्पाती है।
(१) कफ की वृद्धि, और प्रामागय का बिगड़ना ये तयरोगक
प्रारम्भिक चिन्ह है । इममे भामाशय में कामियां हो
जाती है और वे पाहार के सारभाग दो विगाड देनी है।
(२) क्षय रोग में रस दिगढ़ता है । रस से रस पिन होना
प्रतः "रकपाहिशिरा स्थान" इस प्रमाणानुसार रक्तयाही
नलियों में भी सूक्ष्म रतन निमियां होती है। इस से
जगेक यल करने पर भी रोगको निश्लता है।
(३) रदय मे निदोरों के बिगड़ने से यक्ष्मा दोना है और
हृदय में भी कीटाणुओं का होना लिया है इस से क्षय राग
में हृदय के विगड़ने पर कीटाणु उत्पन्न होते है।
(४) प्रतिध्याय के बिगड़ने और बढ़ने से यरमा शीव्र रुपन्न
होजाता है। और प्रतिभ्याययधिक विगढ़ने पर क्रिमियां
उत्पन्न होती है जैसा दिलिया है "मूर्धन्ति ऋमयश्चात्र
वतास्तिऽधास्तथाणव" इस से जयरोप म मरितकको
और कीटाणुगों का होना सम्भन है।
(1) "कुष्टो, रश्च शीपश्य " के अनुसार जर शोपरोग
सन्तमझ है तो इस में निमियो का होना शास्त्र सम्मन है।

क्षयरोग के प्राचीन मतानुसार
कारण
क्षयरोग के इन पक्षिमीय नवीन कारणों की तरफ से ध्यान
इटाकर श्रय आयुर्वेदीय प्राचीन कारणों की श्योर अपने पाठको
का ध्यान खींचते है। प्राचीन महर्षियों और अर्वाचीन विद्वानों
के विचारों में पृथ्वी प्राकारा पा सा अन्तर है। प्राचीन महर्षि
माध्यात्मिक शान सम्पादन करते थे और प्राज के विद्वान्
सांसारिक कार्य में दक्ष हैं। उन को पि प्रत्येक विचार में
भीतरी जाती थी और भाजकल के विद्वानों की बारी ही रह
जाती है। उग का शान निर्मत था और पाज का बनावटी उन
का दश २ वाफ्य सारमय या और माजाव के बड़े २ पोथे
निरर्थक । उपर्युक्त जय सम्बन्धी नई विवेचना भी इस ही ढंग
की है। हम कीटाणु शान को मानते हुए भी यह कहते हैं कि ये
कारण मुख्य या पर्याप्त नहीं है। इस बात का विचार करता
चाहिये कि ये कीटाणु सब प्रकार के शरीपेमें प्रवेश कर सके
है या किसी विशेष प्रकार के शरीरो में, जिस प्रकार किसी खेत
में बोया हुआ धीज तब ही आता है जब उस के अनुकून भूमि
तो विपरीत या ऊसर भूमि में विगर उगे ही पड़ा रहता है।
उस प्रकार ये कीटाणु भी पदने तथा रोगोत्पत करने लिये
अनुकून शरीरों को दी चाहते है ऐसा क्षीटागा-गत-वाले
मी मानते हैं।
उपयुंच पातें होता. २४-४-१४ को अफ्टर पी० एन०
शम्मी ने "रिफाइमाम मन्दिर में व्यारयान देते समय
पदा पी" यक्ष्मा रोग की उत्पत्ति के दो प्रधान कारण है एक
अपने

( २० ) भूमि, दूसरा योज। भूमि मनुष्य का शरीर, और योज रोग के कीटाणु । यदि भूमि अनुहाल नहीं है तो वोज नदी उगेगा । अर्थात् यदि मनुष्य शरीर में अवरोध पारक शक्ति है तो पीटा. शुओं से क्याधि नहीं होगी। साधारण रीति से सामान्य श्रयस्था में यदि शरीर अच्छी तरह रचस्थ हो तो कीटाणु चाद हमारे भ्यास के साथ भीतर ही क्यों न च जायें तो भी मरजाते है । हमें निश्चय है कि जितने लोग प्राज्ञ इस समय यहां उपस्थित है उनमें से कोई एक भी ऐसा नहीं है जिन पर उन कीटा. शुओं ने आक्रमण न किया होगा। ये विश्वव्याक है। ये मकानो, वस्ती की सड़कों और रेल की गाड़ियों को वा में रहते हैं। और ऐसी कोई भी जगह नहीं दे जहां वे न होते हों। हम सब भ्यास द्वारा शरीर में इन्हें ग्रहण कर लेते है और तो भी सय प्रकार स्वस्थ रहते है। ? यहां पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि फोटोगुरूपी शत्रु का क्या हुआ ? वह वेमौत मारागया। बीज एक ऐसी भूमि में पड़ा जहां उस का पौधा लग न सका, केवज वे प्रारब्धहीन लोग जिन का स्वास्थ्य पहुत निर्बल है या जिन की छाती बहुत कम- जोर जो मैजी गर्द से भरी हुई और स्वच्छ हवा से रहित कोठरियों में काम करते हैं या दुःसाध्य रोगों से ग्रसित हैं या शक्ति से अधिक काम करते हैं उन के शरीर इन कीटाणुओं के लिये उर्वप भूमि का पाम देने हैं" ॥

आयुर्वेदीय तत्वविद् विद्वानो ने ऐसे निरर्थक वाद्य कारणों की तरफ ध्यान न दिया, उन का लक्ष्य इस बात की और रक्षा कि किन कारणो से शरीर ऐसा यनता है जिसमें क्षय रोग उत्पना होसके, प्रथया यों फाहिये कि उस में कीटाणु प्रवेश कर के सकें तथा रोग उत्पन्न कर सकें। उन्हो ने ऐसे पारणो फो मुग्थ्य समझ फर बाह्य परतन्न कारणों की तरफ ध्यान नहीं दिया ॥ पायुर्वेदीय प्रसिप अन्य चरकसदिता में इस रोग का बड़ा भायपूर्ण विवेचन किया गया है । इस रोग के सम्पूर्ण ४ फारणों को एक छोटे से वाक्य में लिख कर मानो सागर को गागर में भर दिया है। उस में लिखा है." इह खलु चत्वारि शोपस्या- यतनानि" तद्यथा.-साहस, सन्धारणे, यो, विपमासममिति, शोपरोग के निश्चय चार कारण है-साइस, वेगोंको राना, तये और विपाशन ॥

साहस का व्याख्यान साहत एक पेली शक्ति है जिस के द्वारा साधन शून्य पु. रुप भी पटिन से कठिन पार्य करने को पटिनर हो जाता है और उन कार्यों को पूर्ण मी दर लेता है पर ऐसा साहस जिस से और फुपुरतो यो घाधा पहुचे यह तय, उरक्षन मे भयकर रोगों का उत्पन्न करने वाला है जो पुरुष यनधीन है यह साहस का समाश्रय लेकर दुसह मल्जयुर में प्रवृत्त हो जाये अथवा अत्यन्त भारी बोझ को उठाने जगप्रया प्रति गमे धनुप द्वारा घाण फेंकने लगे अपना अति उघ स्वर से वेदादि का पाठ करने लगे अवथा उछलने कूदने प्रादि व्यायाम को प्रत्यन्त करने लगे अपना श्री गगादि महा नदियों में अत्यन्त तैरने लग अथवा गिरपड़ने से अकस्मात् जिन के यत्त स्थल में चोट लग जावे, ऐसे अपनी शक्ति से अधिक परिश्रम करने वाले र कर्मा पुरपों के पक्ष स्थल में तत हो जाता है उस तन पर पायु पात्रमण घरता है और यहां के कफ को मुखा इधर उधर नीचे तिरछा जाता हुघा फुप्फुस आदि स्थानों में पहुंच प्रक रोगों को उत्पन्न कर देता है।

दुष्ट वायु के कर्म इस वायु का जो ग्रंश शरीर की संधियों में पहुंचता है उसी से सम्मा, अग शैथिल्य और जर उत्पन्न हो जाते हैं। इस वायु का दूषितांश जब भामाशय में पहुंचता है तप पर, हृदय रोग अरवि और अगाबादन हो जाते हैं। जप फुस्फुस और मा- वाहो सातों में पहुंचता है तब प्रतिश्याय, कास, श्यास उत्पा हो जाते है । जय शिरोभूमि में पहुंचता है तय शिरो रोग, उत्पन्न हो जाते है । जय धाराठ में पहुंचता है तब रवर भंग यादि उत्पन्न हो जाते है । इस प्रकार पक्षास्थल, फरठ, अफसों में पहुंच जान से माल उत्पन्न हो जाता है। और काम में वक्षस्थल के क्षत के कारण के साथ विर भी थूकने जगता है। राम प- फादि दोष और रधिर के पित हो जाने से फुजस दुर्गन्ध युक्त हो जाते हैं। ऐसे प्रयासर में वायु प्रादि के संघात से पर- मारण समान प्रदेश कोटारय उत्पन्न हो जाते हैं। और शनैः २ मनुष्यों के धात्वादि को घरने लगते हैं जिस से मनुष्य सूत्रता जाता दे इस मंकार शक्ति से अधिक कार्य लेने पाले साहसी पुरपो को शोप उरत उत्पन्न हो जाते और युनः उसमक्षय' के अन्य पदिकमा घसावधानी से हो जाते हैं। जिससे शीघ्र ही यह मनुष्य मृत्यु का ग्राल बनजाता है। सोई २ विद्वान पक मानीटाणों को ही तय रोग का पारण सानते है पर यह उन की दामगिकता की परदर्शिता है। इस विषय स्पष्ट- तया वर्णन भागे किया जायगा। ।

( २२ ) साहस का व्याख्यान साहस एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा साधन शून्य पु. रुप भी कठिन से कठिन कार्य करने को पटिचर हो जाता है और उन कार्यों को पूर्ण भी पर लेता है पर ऐसा साहस जिस से हृदय और फुप्पुरतो को पाधा पहुंचे यह तय, उरत जैसे भयंकर रोगों का उत्पन्न करने वाला है जो पुरुष यनही है वह साहस का समाश्रय लेकर दुरुह मल्जयुर में प्रवृत्त हो जायें अथवा अत्यन्त भारी चोम को उठाने लगे अथवा अति गरे धनुप द्वारा पाए फेंकने लगें प्रथया प्रति उच्च स्वर मे वेदादि का पाठ करने लगें अयथा उछलने कूदने प्रादि व्यायाम को अत्यन्त करने लगे अथवा श्री गंगादि महा नदियों में प्रत्यन्त तैरने जग प्रथना गिरपड़ने से अकस्मात् जिन के पत्तस्था में चोट लग जावे, ऐसे अपनी शक्ति से अधिक परिश्रम करने वाले फ़र कर्मा पुरुषों के वक्षःस्थल में क्षत हो जाता उस तन पर पायु माफमण धरता है और यहां के कफ को सुखा इधर उधर नोचे तिरछा जाता टुना फुप्फुस आदि स्थानों में पहुंच अनेक रोगों को उत्पन्न कर देता है।

( २३ ) दुष्ट वायु के कर्म इस वायु का जो 'ग्रंश शरीर की संधियो में पहुंचता है उसी से अम्मा, अग शैथिल्य और यर उत्पन्न हो जाते हैं। इस धायु का दूपिताश जर थामाशय में पहुंचता है तर घर, हक्य रोग प्रचि और प्रमाबादन हो जाते है। र फुपुर और माया चादी मोनो म पढुंचता दे तप प्रतिश्याय, पास, श्वास उत्पक हो जाते हैं। जर शिरोभूमि में पहुंचता है तथ शिरो रोग, उत्पन्न हो जाते है। जब काठ में पहुंचता है जब स्वरमंगादि उत्पन्न हो जाते है । इस प्रकार सत्तास्थल, कपट, फुप्फनो में पहुंच जान से माल उत्पन्न हो जाता है। और फास में वक्षस्थल के सत के कारसा कफ वे साध सविर भी थूकने लगता है। कादि दोप और सबिर के दूषित हो जाने से पुकुस दुर्गन्ध युक्त हो जाते हैं। ऐसे अपसर में वायु प्रादि के संघात से पर- गातु समान प्रदा पीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं। और शनैः २ मनुष्यों के धात्वादि को चरने लगते हैं जिस से मनुष्य सूपता जाता है इस प्रकार शक्ति से अधिक कार्य लेगे पाले साहली पुरापो को शोष उतत उत्पन्न हो जाते हैं।और पुनः उस में क्षय के अन्य ज्दरादिरूप प्रसावधानी से हो जाते हैं। जिससे शीघ्र ही यह मनुष्य मृत्यु का ग्रास बनजाना है। कोई २ विद्वान एक मात्र कीटायो को ही क्षय रोग का कारण मानते हैं पर यह उन की दाजनिता की अदूरदर्शिता है। इस विषय का स्पष्ट तयापर्णगभागे किया जायगा।

(P); ॥ सन्धारण का व्याख्यान । सन्धारण का अर्थ है धारण करना, प्रश्न होता है दिने धारण करना? कहना पडेगा, अधारणीय प्रातिफमल मून वायु के प्रागत वेग को धारण कर लेगा अर्थात् जो पुरुष राजा गुरु स्वामी पिता पितामहादि वृद्धों की सेवा में बैठा हो पा लिखने पढ़ने में संजग्न हो या स्त्रियों में बैठा हो वा ऊची नीची सवारी मे चल रहा हो, ऐसे समय भय लज्ञा मात्स्यादि पिसी यारा से वा प्रसंग की अपूर्णावस्था के कारण जो पुरुष अधोवायु, मूत्र, पुरीप, के अंगों को रोकता है, उन वेगों के रोने से घायु कुपित हो जाता है और यह प्रकुपित वायु कफ और पित्त को भी प्रकुपित कर शरीर में ऊपर नीचे तिरछा गमन करना है। और शरीर की सधियों में पहुंच मागों को प्रवरुद्ध पर पीडा उत्पन्न कर देता है, यह व यु अनमण्डल और गनाशय में पहुच, पिचानुवन्धी हो अतिसारादिक उत्पन्न कर देता है अयमा नय इन ही स्थानों में स्वतंत्र रूप से पचना है तय मलावरोध, पानाह, उदायर्त पैदा कर देता है। दोनों पसलियों और कन्धों में पहुय शूल उत्पन्न कर देता है । इसी प्रकार प्रामाशय दृश्य, शिर फुफुस में पहुंच ज्वर, कास, सास, रच पित्त हृदय रोग, प्रतिश्याय, स्वरभंग और शिरोरोगो को पैदा कर देता है । और दुष्ट रस को अनेक रूपों में मुख से निकालता है। इस प्रकार नवीन रसादि क न घनने और यने हुयों के विगहने से मनुष्य सूखता जाता है और क्षय रोग युक्त पुकारा जाता है। दराठी

--
( २५ )
ध्यान रखना चाहिये जप यातादि दीप उर लो भामाशय के
प्राथच से ज्याटिका उत्पन्न कर देते हैं तो मनुप्यो को यदी यर
सात दिन सताये रहता है और पुनः वही जर चिकित्सा क
परीत्य से विषम या जीर्ण हो जाता है। इसीजर में फिर क्षास
उत्पन्न हो जाता है और पुनः यही कास यक्ष्मातक पहुंचाना है।
इसी प्रकार जर यानादि दोष पकाशय ग्रहयो मादिरापाथय
लेते हैं तो प्रथम संग्रहणी अतिसारादि उत्पन्न हो जाते नय
इन ही रोगो में प्रमावधानी रखो से फासादि भी उपहा
यक्षमा होजाता है। इसी पास में रक्त सभी दर्शन हो जाता है।
पर यह मार्य कालिक और सार्बनिक नियम नहीं, दालों के
मार्ग पर दा कार की गति निति निर्भर होती है। इस प्रकार
दाप दुष्टि होने से अन्य रोग होवार भी यदना उत्पन्न हो जाता
दयमा भाइस प्रकार उत्पन्न होगा जय क्षय शिपमानादि
हेनुमो मे भी शान्तीय रूप से परिगणन पर लेगा योग्य छ।

|| क्षय का व्याख्यान । पुत्प नोक और चिन्तामों से दुपितंदृदय रहते है अथवा जिन के मन को ईपी, उत्कएठा, मय, कोव, भादि सताते रहो हेमधया स्निग्ध पदार्थों की तो क्या यह जिन को मर पेट रोटी भी नहीं मिलेता और तिस पर भी अनेक पोटी चिन्ता सुट सुटाती रहती हैं ऐसे पुरुषों का रस दुष्ट दापों से क्षीण हो जाता है और पुनः रक्त न बनने के कारण पेसे पुरप सुनते जाते हैं। इस प्रकार मा मालिन्य पुरगों को तय हो जाता है, इस के अतिरिक स्निग्ध भोजी पानाधारण स्थिति पाले पुरुष जय शक्ति से अधिक मैथुन करते हैं, रमणियों में जो इस प्रकार मदान्ध हो रमण परते ६ जिन को न दिन का ध्यान न रानि का ध्यान, मैथुन मन एक पार की गिनती न अनेक धार की गिनती, ऐसे पुरषों के बोर्य और पोज होगा हो जाती है। वीर्य के तो हो जाने से मैथुन न वीर्य के स्थान पर रक्त निकलने कगता है, तब वीर्य होन वीर्य पाहिनी नाड़ियों में दुष्ट पायु घुरा मा पा सुखाता, अस्थि प्रादि रस पर्यन्त धातुओ फो दिलोम क्षय प्रक्रिया से सुसा देता है ऐस समय यह वायु, वित्त और पप को भी उदीर्ण कर दोनो पसीजयों और कन्या म वेदना और फ्ट का विकृत पर देता है। पफपी इलेशित कर सिर में मा प्रतिश्यायादि उत्पन पर देना है, संधियो को पोडित कर अंग शेधिल्प, प्राचि दत्पन्न करना है । इस प्रकार दोष त्रय को दुष्टि से ज्वर, प्रतिश्याय, काम, श्वास, स्वरभगा- दिक उत्पन्न हो जाते हैं, नय यह पुरुष इन शोपर-कारक उपद्रों उपद्रुत हो. गुम होता चला जाता है, इसी का नाम पुन. सय युक कहा जाता है।

( २७ ) ॥ विपमाशन का व्याख्यान ॥ ऐसे भक्ष्म, भोज्य, लेधादि पदार्थों का सेवन, जो प्रकृति, २ करण, ३ संयोग, ४ राशि, ५ देश, ६ पाल और ७ उप- योग संस्था के विरुद्ध हो, विपमाशन बहाता है। (१) प्रकृति का अथ है-स्वभाव, भोजन के समय खाने योन्य द्रव्य प्रकृति का रिचार करना, यशा उर्द स्वाभाविक गुरऔर मुद्र स्वाभाविक लघु है, इन में से यथा प्रसूति सेवन रना। (२) करण-कहते हैं स्वाभाविक द्रव्यों क संस्कार को, यथाशीतल जना घर में सेवा किया हुभा निडोष दुपित करता और यही शीतलजल अग्नि द्वारा पीड़शांश अष्टमांश प्रादि पपाकर सेवन किया हुआ,निदापन है और रणायक है। (३) संयोग-दो द्रव्यो के मिलने को संयोग कहते है, यथा-समा न माग में मधु और वृत साये हुए विप समान है घोर वेदी विदा भाग से स्याये हुए अनेक रोगो के नशा है। (४) राशि-इस फा पर्थ है सर्वग्रह और परिग्रह । पर्यनदया अर्थ है सय यन्तुनो को इक्ट्ठा फर समझ लेना, परिग्रहदा अर्थ है पृथक २ पस्तुमो का प्रमाण निधय पर लेना। यथा-भोजन प्राधसेर सा लेना इस पा नाम साग्रह और इसी में निश्चय करना इतना चून और इतनी दाल साने म भाई है इसका नाम है परिन । राशि के विचार से ना लाम हैं, प्रत्येक विषय में राशि सम्बन्धी विचार पसायोग्य (७) देश-अर्थ स्पष्ट है, विचार करना- यहां पिग २ द्रव्यो की उत्पत्ति होती है, दिन २ वस्तुओ का प्रचार यहां अधिकता से है, यया-गोधूम सानेवाले देशवासी को निरन्तर तडुल सेवन और तनुज मती देशवासी को प्रतिदिन गाधूम चूगा साना ध्वहितकारी है। (६) काल-प्रर्थ स्पष्ट है, यह दो प्रकार का होता है (१) नित्या

( २८ )
(२) प्रारस्थिका नित्यग ऋतु सात्म्यापेक्षी, ओर आवस्थित
शिकारपेती होता है। पर्या। माहारादि में ऋतु और विचारक
अवसर को देखना योग्य है, यथा- ग्रीष्म मृतु में दाता मेवन
चतु साम्य होने के कारण नित्यग है ओर ग्रोप्न ऋतु के घर
म मृतु वेपम्य उप्पादकपान आपस्थिक है।
(७) उपयोगसस्था-सा अर्थ है प्राधारादि के उपयोग का
नियम पूषक हाना । यथा-याहार की अधिकता अजीर्ण प्रद
है, घेसान परना,अधचा अजीण में स्वापा हुआ,
रोगप्रद है
ऐसा न करना इत्यादि।
(८) उपयाचा उपयोग करने गले को कहते हैं, किया हुना भोजा
अच्छी तरह पच गया है इसे जानोगाला दोना योग्य है।
विपमान से अन्न ठीद २ नहीं पचता । वान पित्त कफ
विषम हो नीर मरने र स्रोतो क मुप को रोक स्थित ही
जाते है और पावकाग्नि का विकृत पादते हैं। तय पाचन न दान
कारए रसातादि नहीं बनते । मनुष्य जो कुछ खाता दे उस
था प्रधिकतया मजमा होजाता है, तत्पश्चात् सुपित वायु पत्र
रात्र पाच प्रगमई, पटनाश, पार्भ वेदना, परभेद, प्रसिश्या
यादि दा उत्पन परदेना ह । इसी प्रकार प्रापित पित्त दोषानु-
उन्धा हा दह,तिमामाटिया पेदार देता हे । पोर पुपित
सुधारनेमा दोषानुवन्धी ६ प्रतिश्याय, सिर में भारापन,
शाल, शास, अरुचि, प्रतिमाद्यादि को उत्पन्न कर देता है।
इस प्रकार दापमय को दुटिम पुास और हृदय विस्त हा
जाते है और कास साथ रघर का भी दर्शन होने लगता है।
इस प्रकार रसादि के नवीन न पनने और यने हुओं के तीग
Bाने में क्षय हाजाता है। यहां यह भी देना याग्य समझते
हदि अपने २ लातों क योग मे धातु धातु द्वारापुर होने हैं और
अपने खातों के रकजाने मे रसादि धातु तोग हो जाते हैं।

भारत में जयरोग क्यों बढरहा है
(देशव्यापी कारग)
वीर्य नाग
माज भारत में जो क्षय का दौर दौग है इसके देशव्यापी
प्रधान कारण, धीर्य्यनाश, दुर्व्यसन, दरिद्रता, नई सभ्यता
अपधिनता और नित्य कर्मों का त्याग भादि है।
क्षय रोग और / वीर्यरशा की ओर भारत वासियो का यहुत
कम ध्यान है। छोटे २ यच्चों का विवाह कर
बचपन म ही पानों में बेड़ियां डाल देते हैं। इसंग में पद सेकड़ो
चचे वीर्यनाश करते हैं। प्राज लामों युवा नपुंसक पर अपने
जीवन को मार रुप समझते हैं । येसे थोड़े ही पुरुष होगे जिन्हें
वीर्य विकार न हो, दुर्घल धीर्य पाले पुरषो को क्षय के उत्पा
होने में देरी नहीं लगती । यदि पुष्ट वीच हो, मनुष्य बलवान
हो बचपन से ग्रहाचारी हो तो कभी तयरोग नहीं हो सका।
यह बात गिर्विचाद सिद्ध है कि जय से भारतवासी दुर्घल,
क्षीणयोर्य होने लगे तय ही से भारत में क्षयरोग मानवों का
निर्दयता से क्षय कर रहा है।
महर्षि यात्रिय ने क्षयरोग से बचने के लिये चार बातें सिद्धांत
रूप से पतलाई है उन के वाक्य बड़े मजबूत हैं और चार २ मनग
करने योग्य हैं। उन चार उपदेशों में एक उपदेश यह है।
आहारस्य परं धाम शुक्र तद्रक्ष्यमात्मनः ।
नयेयस्य वहूनरोगान्मरणं वा नियच्छति ॥

प्राझारका अन्तिम परिणामस्मी तेज वीर्य है उस वीर्य को सय को रत्सा करनी चाहिये । वीर्य फे तय होने पर बहुत से रोग उत्पन्न होते है और मृत्यु तक गात होती है। प्राज पन्त के नवयुवकों को चादिये कि अपने २ पामरों में इस उपदेश पूर्ण घाश्य को मोटे मोटे अक्षरों में लिपबर टॉग ले और श्रद्धा से इमे पढ़ें और अपने सहयोगियो को सुनाये । पढ़ें और सुना ही नहीं भिन्तु ऋषियों द्वारा बनाई इस देवी कानून के ऊपर चले इनना भी ध्यान रक् किवीर्य संरक्षण प्रारोग्य दीर्घायुष्य की बुजी है। जीवनरूपी महज का प्राधारभूत स्तम्भ है। प्रधश सुन पूर्वक जीवन पल्लरो को ऊंचा लेजानेवाला सुशोभित वृत है। अनेक रोग रूपी पवन के झपाटे से डगमगाती हुई शरीर रूपी नौका को कालरूपी समुद्र में अपने से बचाने और स्थिर रखनेयाजा मजबूत लंगर (Sheet Anchor) है, वीर्य सापक विन्दु गधिर के ४० विन्दुओं के घरावर है। जो मनुष्य रित्ती वस्तु का मुख्य नहीं जानता वह उसे व्यर्थ पर्च कर डालता है। मणि हो असता से कांच समझ देता है। भारत पासी नवयुवकों को वीर्य संरक्षण के जामनहीं 'समभाये जाते । उनको वीर्य रक्षा करने और ब्रह्मचारी पननेवा 'उपदेश नहीं दिया जाता । इस से अधिश भारतवासी युवा वीर्य नाश करते है, मेथुन में फमे रहकर दुर्वल धनते है किसी अंग्रेजी विद्वान् ने यह ठीक कहा है। The greatest enemy to the health of man, is Tioman the worst cnemy to the health of woman, is man. ३ अर्धार पुरुष को प्रारोग्या का बड़े से बड़ा शत्रु स्त्री, और सो सास्थ्य को नाश करने वाला कट्टर बैरी पुरुष है।

जठ
(३१ )
दिसी विद्वान ने कहा है कि मनुष्य शरीर में दिमाग, शान
का भगडार होने मे राजा है। और वीरय राजकोप, इन्द्रियां
उस को सलाह देनयाली पार्लीनर की मेम्बर है । जिस पुरुष
सो इन्द्रिया असायदान होती हैं। दुष्ट छायं में फलने की
सलाह देती हैं। ये अपने स्वामी को घोगा दे राजकाप का
व्यथ लुटया देती है। राजकीय म कमी होने से दिमाग भी बन
जारदाता हैं। तथा शरीर अंग प्रत्यग भी निवल रहते हैं।
रक्त का फोप हृदय और फेफडे भी दुर्वल हा निकलते हैं,
राति मन्द पड़ जाती है ज्ञान तन्तु निर्बल हो जाते हैं । इस से
मनुष्य म इतना घल नई रहता ा बाहरी रागात्पादक गयो
काराम सके।
भाजपाचे से अधिक क्षयरोगी ऐसे देपने में प्राते है
जिन्हें पदलो वीर्य विकार था। फिन्तु उस की चिन्ता न पर
मेरपर्म में फसे रहते थे। जिस से शरीर और फेफड़े दुबल
दान जगे। पीछे सहसा प्रतिप्याय शेगया, प्रतिष्याय (जुयाम)
म भी मेथुन करना न छोड़ा। इस से खासी भी प्राई । साथ
में चर की मन्द गरमी भी रहो लगी इस अवस्था में भी वीर्य
का अपव्यय बन्द न किया गया जिस से अन्त में उन्ह क्षय फा
गिटार याना पड़ा। प्रायुर्वेदीय प्रन्थों में लिखा है.
प्रतिप्यायादयो बात दासात्सजायते क्षय "
मर्थात्
जुमाम से खांसी और पासी से क्षयरोग उत्पन्न हो जाता है।
यह यात भाजपज फे नवयुपशे में प्रन्यात देखी जारी है।
यदि भारत म जयरोग से होनेवाली शोचनीय मृत्यु सरया
को हम करना चाहते धा। वो मययुवक्षों की वीर्य रक्षा की
और ध्यान दो उग को ग्रह्मचारी यनानो यदि आज के समान
चोर्य नाश रहेगा तो तय फा इसी प्रकार डझा यजता रहेगा
और उस के सगाम को रोने में किसी की चीत्रपड़ चलेगी।

(३२)
मादक पदाया का मेग्न | मी आज यही अधिकता से हो रहा
६, पटे २ धनि दिए शिदर या प्रगटरुप से शराय कप्पाल
गट गटाते हुए भारत का गला घोड़ते हैं। कोकन दो सावर
अने८ युवा अपना फाला मुइर गरीरो का सत्यानाश परते
हैं। नमाखू का पीना तो भाजल रन्द्रभान दा मुस सममा
जाता है, जेन्टिलमेन पनने के लिये तो इस की परमावश्यकता
६, घड़ी घडी पर चुस्त र बिना काम नहीं चकना, अपने बरा.
घर वाले इष्ट मिना या धादर न होता, पण्डितो को भी इस
की पारश्यकता होती है। क्योंकि कम से कम ६ माशे दुलाल
को नाक म तृसे विना पोइ दाशी का परिडत नहीं हा
समता।
यदि रईस, उमराव, ताल्लुकेदार पान में तमारवू न पावे नों
सपीकटान बनानेवालों की फिरतरूरत ही न रहे । स्वदेशी
कारीगरी का महती हानि पहुचे । भग, घरस गाजा ये चीज
तो योगियों के भूपण हैं, शिवजी की प्यारी है, इन्हें छोडना तो
एक प्रकार का पाप है, चह, मदर, अफीम ये राजा ननाचा का
सुशकरने वाले हैं। जिस देश म ऐसे विचार पाले पुस्प हों,
सय श्रेणी के पुरुष दुर्व्यसन में पस रहने हों, यहां तय था डका
बजे तो पाश्चर्य ही क्या है। इन मादिक पदार्थों के सेवन से
भारत पासियों के पपड़े निज होगये हैं. जिस से तत्वाल यह
पीमारी असर परजाती है। इन कारणों के बिना मिटाये क्षय
रोग का प्राधिपत्य कम नहीं हासत्ता।
--

। ३३ ) दरिद्रता दरिद्रता भी क्षय का प्रधान देशव्यापी कारण है। आज बड़े २ धनिकों का पेट खाली है। ऊपर से टीमटिमायन रहा है, मोटरें दौड़ रही है, परन्तु भीतर ही भीतर चिन्ता, शोक की अनि धधक रही है, ऐसे पुरुषो को अवश्य तय होगा चाहें धे कैसी ही हिफाजत करें, इन कीटाणुनो से बचने के लिये. कितने ही धूपदान रपये परन्तु वे पच न सकेंगे। जिन पुरुषो को पेट भर थान स्त्राने को नहीं मिलता ऐसे पुरुषों की भी यहां कमी नहीं है, प्रतिवर्ष किसी न किसी प्रदेश में अकाल की कृपा हो जाती है, ऐसे पुरुषों के निराहार रहने मे रक्तादि धातु नहीं बनते जिस से क्षयरोग उन पर आक्रमण कर और भी दुःख क्षयरोग और नई सभ्यता भी भारतवर्ष में तय का बाजार नई सभ्यता गर्म कर रही है। जिससभ्यता के रंग में प्रतिशत मध्ये भारतवासी रंगते चले जा रहे हैं, वह ही इस दुष्ट रोग का पालन पोषण कर तिल का पहाड़ ना कर दिखा रही है यह नई सभ्यता क्या है ? बनावटी सुधार, पश्चिमीय गुणों को छोड़ दुर्गुण दुर्भप का प्रचार । हा! प्राचीन काल के मेधावी, तेजस्वी, ब्रह्मचारियों की छटा तीस कोटि भारतवासियो में ले सीन सौ नवयुवकों में भी दिखाई नहीं देती । प्राजकज कौन सम्प शिरोमणि है? जो अपने शरीर को परिश्रम नहीं देता, एक फलांग भी पार्यों चजना पसन्द नहीं करता, चार बातें करते ही मुखमण्डल पर मुक्ता समान स्वेद विन्दुओं को चमका कर अपनी कोमलता दिखाता है, चार सीढ़ी चढ़कर ही सार वर्ष के बूढ़े के समान दांपने लगता है, घंटों साधुन के फैन से अपने शरीर को रिगड़ता है और फेन समान मुलायम शय्या पर सोना पसन्द करता है। जिसे बालों के काढ़ने और सूनों की सफाई कराने में अपने बहु - ( ३४) मूल्य समय का अधिक भाग देना पडता है। तात्पर्य यह कि नये नायुवकों के मस्तियों में यह बात समाई हुई है कि शरीर को बहुत नाजुक, सुकुमार बनाना और इस ढंग से रहना कि जिस से सहयोगी मित्र मण्डली को कहीं अपने में पुराना गवार- पन न मालूम देवे, नई सभ्यता है। इस नई सभ्यता में नई शिता से भूपित कोई विरलाही माई का लाल होगा जो न फंसे। पैसे नई रोशनी वाले की क्षयरोग की चधाको शान्त पारने के लिये प्राधार यनजाते है। जो मनुप्य कुद परिश्रम करते हैं, ध्यायाम रते हैं, शरीर को कुछ परिश्रमशीन और दुःख सहने योग्य यनाते हैं, ऐसे पुरुषों क इस रोग के कराटे में पाने में घार घड़ी लगती हैं। नपयुवकों को धार्मिक और स्वास्थ शिक्षा न मिजने से वे घीर्य रक्षा की तरफ भी विञ्चिन्माष ध्यान नहीं देते, जिस से दूषित वीर्यवालों को क्षयरोग होने में देरी नहीं लगती। त्रियों में भी यह नई सभ्यता घुम पडी है। पानी लाने के लिये बर्तन मांजने के लिये कहार; रसाई पकाने के लिये रसोई- दार जिस के घर न हो वह ही घस घटिया, निर्धन और मदा पुरुष है। नई सभ्यता स्त्रियों को इस बात के लिये मजबूर कर रही है कि ये हायपर हाथ रस्म के धैठी रहें या दूटी फूटो हिन्दी पढ़ उपन्यासों की उपासना करें और कमल को भी जिवित करनेवाला अपना कोमल शरीर पनाफर अपने प्रवता नामको चरितार्थ करें। फोन ऐसा नया सभ्य होगा जो अपनी खियो को भही पुरानी चाल में पड़ी रस्नना पसन्द क्षरता दो, गांवों के देसे नहरों में नई सभ्यता का अधिक प्रभाव है। बदा पर अधिकतर युवा इस के भक्त दमी एक शा में नये सभ्य मिले, और उन्होंने कहा कि वैद्य- थोड़ा ही समय हुधा जी! चार महीने से मेरे शिर में पड़े ओर से दर्द हुमा फरता था और इस दर्द का कारण बहुत खोजने पर यह निकला कि पहले मैं अपने सिर के नीचे "सुरखाव के परों का तक्षिया " लगाया करता था उसे न जगाकर ईश तकिया लगाने लगा, ऐसे २ सुकुमार युवकों की शदरों में कमी नही । शहरों के देये गायों में क्षयरोग से कम रोगी होते हैं, इसके कई कारणों में एक कारण यह भी है कि वहां नई सभ्यता का ग कम जमा इस विषय में डाक्टर विलसन ने कहा है। In towns three times as many people die from consumption than is the case in the country. The explanation of this fact is to be found in the difterence in the habits of town and country dwellers. अर्यात गायों के देखे शहरों में आय ले जो तिगुने प्रादमी मरते हैं इस विषय का मुख्य कारण यह है कि गांव और शहरों फे रहनेवलि पुरुषों के रहग सदन में बहुत बड़ा अन्तर होता है। गांव वाले सम्पूर्ण दिन पुजी हुई पवित्र हवा में श्वास ले सकते हैं, यहां मकान इतने ऊंचे और यने नहीं होते जिन में शुद्ध हया और रोशनी न जासई । किसी दूसरे गांप या किसी मित्रसे मिलने को जाने के लिये रेलवे, ट्राम, मोटर की सवारी नहीं मिजती जिससे उन्हें पुर परिश्रम कर के जाना पड़ता है, खुली हवा और सूर्य का प्रकाश भी साथ ही साथ मिलता है। वे अपने जीवन को सादगी के साथ ध्यतीत करते हैं, रोकड़ा पैसा पास न होने से गांजा, भांग. दाम, ताड़ी श्रादि पीने की लालसा भी कम होती है। कपड़ा मोटा पहनते हैं ।

चौर साना सादा खाते है जिससे उनका शरीर बलिष्ट रहता है फेफड़े मजबूत होते हैं। शहर वाले ऐसी गलियों में, जहां धनें ऊंचे मकान, नास्ता चोर दाजे पर ही पाखाने होत , रहते हैं। मकान का किराया मंहगा होने से थोड़ी जगह में बहुत से प्रादमियों को रहना पड़ता है रात्रि में मकान को बन्द कर के सोते हैं । मिन, जीन, प्रेस, प्रादि कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को खुली हया नहीं मिलती प्रत्युत तेल, ग्यास का धूघा कोयला के रजस्य, ई का रुग्रां उन के श्वास के साथ आता रहता है। इस से फेफड़ों और प्रयास नलिका में गर्द जम जाती है। मजदूर लोग अपनी पाई दुई मजदूरी को दुरागारों में सर्व करते हैं। बड़े भादमी अपना वैभव और रईसोपन दिखाने के , लिये पड़े २ ठाठ से रहते हैं। सैकड़ों स तौ ऐसी नयावी , सभ्यता दिखाते हैं कि पखाने से माने पर अपने हाथों से पैरों को भी नहीं धोते, 'जुधि तक नौकर ही पहनाते हैं। अपना जीवन धेश्या सध्यास से सार्थक सममते हैं। माटक पदायों को सेवन कर दिन में प्रोसें मोचे हुए योगियों का स्वांग दिखाते है। इन कारणों से शहर पातों के शरीर" बताशे के महल" कहाने पाले होते हैं। और फैफई निज होते हैं श्रतएव क्षय रोग लोगों को इन के शिये का फल चसाता है । पहले समय में खियों को अपने २ घर में अनेक काम करने पहने थे। पानी खींचना, चून पोजना, रोटी पकाना भादि,जिस सेन का शरीर पुष्ट और फेफड़े मजबूत रदते थे। जिन देशों में प्राज्ञ भी इन कामों के करने का रिवाज है उन देशों की स्त्रियां, बहुत मजबूत है तथा उन की सन्तति भी अच्छी होती है, डाक्टर ऐन्दूस्टोन, एम. डी. लिखता है कि "There is a great -- - - advantage of carrying burdens on the head to prevent consumption" अर्थात् शिर के ऊपर उच- काकर ओझा रखना जय रोग के न होने देने के लिये बहुत लाभ दायक है। किन्तु अाजकल शहरों की तथा ऊंची जाति की स्त्रियां शारीरिक परिश्रम करने में अपना अनादर समझत्यागती जाती हैं। इस से अब स्त्रियां भी क्षयरोग से अधिक पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त होती हैं। सारांश यह है कि क्षयरोग फैफड़े की बीमारी है, और उस से बचने के लिये फेफड़ों का बलिष्ट रखना परमावश्यक है फेफड़े विना परिश्रम तथा उचित व्यायाम किये टोक नहीं रह सकते धाज कल की सभ्यता हमको दीर्घ सूत्री मालसी बनाती है इस से भारत के नवयुवकों को अपनी पुरानी सभ्यता न छोड़ कर परिश्रमशील बनना चाहिये। भारत के सुपूतो! भारत को पूर्ण सुनी, सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान करने की कामना करनेवाले कमनीय कान्ति नव- युवको ! यदि आपलोगों में सच्चे सुधारों की, और भारत को पूर्ण निरोगी रमने को कांता है तो अपनी इस नई सभ्यता की जांच करो अपने मुखों को दर्पण में देखकर प्राचीन समय के एक छात्र के मुख समिजान करो, प्रोफेसरवीकमैन के शिक्षाप्रद इस लेस को ध्यान से याद रसना:- "My advice is do not to make the foolish mistake of taking it for granted that your lungs aro in perfect condition, and that it is not necessary to give them any special care. In reality you are walking on the edge of - ( ३ ) precipice. Bear this in mind. It is utterly impossible that yonr lungs should be in good condition unless you give them abundent exercise. Remember it is the one organ in the body that demands continual exercise in order that it may remain healthy. Remember tlatitis the organ that would show the result of the lack of exercise first, even in the best siecimen of manhood that ever lived.Therefore f you do not practise breathing regularly,you may bo positive that your breathing power 18 deficient even though your chest mily be as large as that of : Somson and your bealth every-thing that you might desire. If more people realized the truth of the foregoing statement the death rate from pneumonia and consumption would bo reduced one half in less than a year, अर्थात् मेरी सम्मति ऐसी है " कि हमारा फेंफड़ा ठीक धात में है और उनके विषय में विशेष ध्यान देने की आवश्य- कटा नहीं है" ऐसी मूर्खता भरी भूल तुम को नहीं करनी चाहिये । सच पूछो तो पक ऊंचे स्थान के किनारे पर (जिसपर से थोड़ी सी भूल से मनुष्य गिरजाता है) तुम चलते हो ऐमा ध्यान रक्खो। फेफड़ों को पूरी कसरत दिये बिना उन कोस्वास्थ दशा में रपना बिल्कुल असम्भव है। याद रखो कि सम्पूर्ण शरीर में फेंफडा मरण का यह पेमा mir जिसे निगेग रखने के लिये कसरत देने की विशेष प्रावश्यक्ता है। ध्यान रक्खो कि अयत्तक अच्छी से अच्छी स्थितिवाले पुरुष के शरीर में भी कसरत न करने के दुष्ट परिणाम को सव से पहले घसानेपाना यह फेंफड़ा ही है । इल से जो तुम्हारी छाती सैम- सन पहलवान के समान भी विशाल हो और तुम्हें अपनी प्रारो- ग्यता में कोई सुटिन मालूम पड़ती हो तो भी जोतुम नियमानु- कूल प्रतिदिन दीर्घ स्वास लेने की क्रिया नहीं करते तो यह ठीक मानना कि तुम्हारे फलों को किया दोष भरी हुई है। ऊपर कहा हुधा उपदेश प्रजावर्ग का घडा समूद कर निकले तोनिमो- निया और क्षयरोग से होने वाती मृत्यु एक ही वर्ष में आधी रदजाये। - । क्षयरोग और । पश्चिमीय विद्या के प्रभाव भारत पासियों अपवित्रता छूतछात, और नित्य कर्म एक ढकोसला समझे जाने लगे है। खाने पीने में चौका चूल्हे का विचार बहुत भद्दा गिना जाता है । होटलों, और तन्दूरगानों का रिवाज पढ़ रहा है नन्दूरखानों में सामान उत्तम नहीं यनता। चून के साथ सुरैरी, मच्छर, कंकड़ी और रेती भादि मिले रहते है। पानी साफ नहीं होता। चून माडगा रोटी मेकना प्रादि सपछी विधि हीन कार्य होते हैं । चौककास्थान अति संवीर्ण दुर्गन्धित होता है। चौके की मोरी प्रति गन्दी होती है । इस प्रकार सब प्रभार में दुर्गन्धित वायु होजाता है। अनेक मनुष्यों का समा. गम से मोजन होता है। और उन में घनी २ ऐसे मनुष्य भी प्रा मिलते हैं, जिन्हें दाद, पाजापुर, कफविकार प्रादि संमा. मशरोग होते हैं। जिन के संसर्ग से एक से दूसरे को रोग जग जाता। F

(४०)
धन्य है उन मदपियो को जो भोजन विधि इस प्रकार से
यतला गये हैं कि मनुष्य को स्वयं पाकी होना चाहिये, अथवा
गृह की स्त्री के हाथ से ही पनामा भोजन खना चाहिये । इस
नियम में फैली दूरदर्शिता है। शरीर ही लो का साधन है उस
शरीर का पोषण भोजन से होता है। अतव भोजन जहांतक
हो सके उत्तम और पवित्र होना चाहिये । उत्तम भोजन से शरीर
और मन दोनों स्वस्थ और सतोगुणी होंगे । विकार युक्त
अस्वच्छ भोजन शरीर को रोगी और मन को मैला बना देगा।
इस ही सिद्धान्त को लेकर पहले मृपियों ने चौका की
रोति निकाली है। यदि भोजन घर में वनगा तो चौका की शुद्धि,
अन्न की शुद्धि, और अपने शरीर की शुद्धि प्रादि सप अनुकूल
शेगा। साथ में भोजन करने वाले भी प्रायः समान स्वभावधाले
मिलेंगे। चौका होने से एक दूसरे में संक्रामत्ता न होगी । शुद्ध
जन घायु की प्राप्ति होगी।
क्षयरोग और पियों ने नित्य कर्मों की सृष्टि मी बढ़े
नित्य कर्म का नाश । प्रन्य रोगों के समान क्षय रोग भी
विचार में की थी, जिसका पालन करने
अधिक नहीं होता था ! सदाचार का पालन करते हुए पूर्वज
मनुष्य थलथान और सुखी रहते थे। किन्तु इस समय भारत
गासियों का नत्यक कर्म प्रायः नष्ट हो चुहा। अरः काल
गौ सेवा करना, मातः सायं ध्यान करना, वलिवैश्य देव,
श्वर का स्मरण, घन शुद्धि, स्नान, अद्दत जातियो का अस्पर्श,
दूषित पुरषों की छाया से भी बचना प्रत्येक व्यवहार में स्पर्शा-
स्पर्श का विचार, स्वच्छजजपान, सत्य भापण, ब्रह्मचर्यद्रत,
पायाम प्रादि कर्म भारत से विदा होकर न मालूम किस
कन्दरा में पड़े हुए है । ये ढकोसला भी गाते नहीं है किन्तु इन
बातों में परमतत्व मरा हुमा है। ऊपः काल उठने से निद्रा
-

युक्त चीजों से (४१) यथा प्रमाण होगी, पालस्य न होगा, प्रातः काल की सर्वांग पुष्टिकारी वायु मिलेगी, गो सेवा मे शारीरिक दुष्ट वायु का हास शेगा। गौ के गोबर और नृत्र से मकान शुद्ध रहेगा, शुद्ध दुग्धघृत दघि खाने को मिलेंगे, जिस से शरीर पुष्ट होगा। बाजारू विकार छुटकारा मिलेगा श्वर भक्ति से, मन पवित्र, और आध्यात्मिक शक्ति की वृद्धि होगी, लोभ इर्षा प्रादि दुर्गुण दूर होंगे, घस्रो की शुद्धि और स्नानादिकों से शारीरिक स्वच्छता रहेगी। शरीर के भीतर स्रोतों द्वारा शुद्ध घायु प्रविष्ट होगा । छूत अछूत के विचार से संक्रामक रोग एक से दुसरे पर अाक्रमण न करेंगे । वन वलिवैश्वदेव प्रादि से श्रौत स्मात कम्मों के साथ २ गृहशुद्धि भी होगी । प्राणायाम संध्या में भीतरी दुग्न घायु पाहर निकल जायगी । अधिक क्या कह महर्षियों के प्राचीन नियम पूर्ण विज्ञान से भरे हैं, उन के नाम होने से ही प्राजक्षय के समान संक्रामक रोगों की अधिकता होरही ।

( ४४ ) (५) मैं पहले फ्रीज में नौकर या-परिश्रम खूष करता घोड़े पर मीलों दौड़ता-घोड़े के पीछे भागar | एक समय मुझे, सर्दी होगई और मैंने उसकी परवा नकी, और घोड़े से फिर भी काम करता रहा, अव मेरी छाती दुखती है, और गले में धृवांसा उठकर खांसी आती है, जिस के साथ खून प्राता है, शरीर दिन पर दिन सूखता है छाती का दर्द चैन नहीं लेने देता। (8) मुझे प्रमेह होगया था-जो यरसों रहा-चीच २ में जुकाम होने लगे। पेशाब के साथ सुफेदी जाने लगी चहरा मेरा सुफेंद पड़गया-पोहे खांसी होगई। खांसी कमी २ उठती है परन्तु ज्वर की गरमी हो पाती है, इस से हाथ पांव और प्रांतों में जलन रहती है । भूख दिन प्रति दिन गिरती जाती है। (७) मैं बहुत भोजन करता है परन्तु तो भी रहता हुँदुग्ला हो-दो मुझे स्वप्नदोपतो है। चदरा पीला पड़गया है। रात्रिकी दो एक दस्त भी होजाते हैं-खांसी भी रहने लगी है ॥ (८) मुझे प्रदर हो गया था-स की चर्चा मने गुप्त रपती सागर मेरा गिरा पड़ा रहता परन्तु पाम करना मैंने नहीं छोड़ा, पीदे ज्या भागा। अयनांसी भी है मुझ ६ महीने होगये। (6) मेरे एक बचा हुआ-उस समय न्हाने धोने से सदी होगई, जिस में ज्यर प्रागया-मैंने कुछ ध्यान न दिया,बीच बीच में ज्वर रहा, अब में उठ दैठ नहीं सकती; ज्यर, खांसी, श्वास मताते नnaari- .

(४५ )
क्षय के पूर्वरूप
-na
क्षय के पूर्वरूप- छोक पाना, जुकाम ज्यादा होना, घार
कफ निकलना, मुख मोटा २ रहना, अरचि, निर्दोष पदार्थों में
दोष दर्शन, भोजन के पश्चात् हल्लास अथवा धमन, मुख का
सूखना, दार्थों का यार २ देना, नेत्रों का वित होना, भुजामों
मुटाई जानने की इच्छा करना, स्त्रियों से रमण करने की, नित
की होने पर भी, अधिक इच्छा होना, घृणा होना, शरीर का भयंकर
दीखना, स्वप्न में सूखे जलाशय, शून्य नगर और शुष्क बन
दीपना तथा टूटे गृत्त, और मयूर पन्दर, सर्प, फौभा, घुम्यू
आदि दीखना; याल, हड़ी और अंगारों के ढेर, दीखना; ये सब
राज पक्ष्मा के पूर्व रूप शास्त्रों में पणित हैं।
पूर्व रूप में ऐसे लक्षण क्यों होते हैं
.
(१) प्रतिष्याय 'द-मस्तिक शक्ति के विगहने से तथा यीर्व
विकार अनित निवजता से।
(२) अन्न में अरचि आदि -आमाशय के बिगड़ जाने से ॥
(३) हायों का वार २ निगनण - मनोवृत्ति के बिगड़ने
से, तथा नागरिक दुजता का मन के ऊपर सहसा
मभाव पड़ने से
(४) दुःस्वप्नों का दीखना- धातुओं की कमी के कारण
भावी भयंकरसा प्रतीत होने से।
तथा

त्रिदोपवाद मायुर्वेदीय शास्त्रों में प्रत्येक रोग के प्रधान कारण
दाप माने हैं। दोषों को दुष्टि से रोग और यथा प्रकृति होने में
स्वाथ्य होता है। त्रिदोष विज्ञान बड़ा महत्व पूर्ण विषय है और
हमारी चिकित्सा का गौरव स्वरूप है।
साक्टरखोगों के समान हमारे यहाँ प्रधान कीटादि अनेक
कारणों को न मानकर सब रोगों के कारणों को तीन दोषों में
शेबीन कर दिया है। इस विज्ञान तफ प्रमो द्वापर लोग
नहीं पहुंचे हैं। निरपेक्ष पश्चिमीय विद्वान अप इस दोष विहान
को बड़ी प्रशसा करते है। दोप विष्ठान सम्बन्धी एक अध्याय
इस के पीछे दो पाठ पढ़ेंगे इस से प्रायुषदीय दीप
विकी
गोरखता और विना मान सकेंगे।
दोप मेद से स्वर भेदो निला शूल
लक्षण | संकोचश्वांस पश्वियोः ।।
भवरी दाहो तिसारश्च पित्ताद रक्तस्यचागंमः ।
शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तश्चछन्दरेश्च ।।
कासः कण्ठस्य चोद्धसो विज्ञेयः कफ कोपतः।
पदमाग के ग्यारह लक्षण है धन में बात की अधिकता से
घरभेद, कंधे और पसबाड़ों में सिंचाप,शूल, पित्तकी अधिकता
से ज्वर, शाह, प्रतिक्षार और खून प्राना, कफ की अधिकता से
शिर मारी रहना, प्रदवि, खांसी और कण्ठ में फांसेसी पदमा

कारण भेद से | कारण भारजनों के भेद से शेष के व्यपाय
शोष भेद और शेप, शोक शोष मादि कई मेद शाओं में
पन के लक्षण, कहेगये है। इन में त्रिदोष के समस्त लक्षय
नहीं होते तो भी ये धातुओं को तय करने वाले होने से क्षय
हो कहे जाते है पृथक र लक्षण ये हैं।
(१) व्यवाय शोए के लक्षण
व्यवाय शोपी शुक्रस्य क्षलिंगरुपद्रुतः ।
पाण्डु देहो यथापूर्व क्षीयन्ते चास्य धातवः ।
पाय ( मैथुन) करने से जो शोर होता है उस में शुक
तप के लक्षण अर्थात् लिंग और अगर कोपों में पीड़ा, मधुन में
प्रशनि, मैथुन में प्रा तथा अनेक पारधीयं निकलना, धादि
होते हैं शरीर पीना पड़जाता दै पोई यायु द्वारा मजादि पया
पूषं पातुओं का इय होता है।
(२) शोक शोप
प्रध्यान शीलः सस्तांग-शोकथोष्यपि तादृशः
शांक शोपी पुरुष जिस पस्तु का होता. उसके
ध्यान में रहता है। इससे भंग शियन हो जाते है शोर
में पौनापन प्रादि म्यवाय शोषी के समान बसण भी है।

(४)
8 वार्षिक्य शोष
जरा शोपी कंथो मन्दवीर्य बुद्धि वलेन्द्रियः ।
कम्पनो रुचिमान भिन्नकांस्य पात्र हतस्वरः ।।
छीवति श्लष्मणा हीनं गौरवारतिपीडितः ।
संप्रसुतास्यनासान्तः शुष्करूतमलच्छविः ॥
प्रसुप्तगात्रावयवः शुष्कक्लोमगलाननः ।।
जो मनुष्य बुढ़ापे के कारण सूत्रता है उसके ये लक्षण होने
है- शरीर का और वीर्य, बुद्धि, पळ, इन्द्रिय ये मन्द हो जाने
है, कम्प, और अरुचि होते हैं कांसे के फूटे पात्र के समान
पायाज दोशाती है, बिना कफ के
शरीर में हड़कल होती है, मुस, नासिका, और आंख से
पानी गिरता है दस्त सुखा, और शरीर रूसा होता है - गात्र
घ अवयव सो जाते हैं, मुख फ्लोम, गला ये सूम्वा करते हैं ।
॥ अध्व शोष -
मध्य प्रशोपीवस्ताङ्ग संभृष्ट परुपच्छविः ।
अधिक मार्ग के चजने सजो क्षय होता है इस में भाग शियन है।
जाते हैं तथा शरीर को कान्ति पनि में भुने पदार्थ के समान
प्रर्थात् शामता लिये हो जाती है।
थूकता
। भारापन और
-
"

--
॥ व्यायाम शोष ॥
व्यायाम शोपी भूयिष्ट मेभिखे सिमन्वितः।
लिंगै रक्षततः संयुक्तश्च क्षतं विना॥
व्यायाम शोप में प्राय अन शोष के समान लक्षण होते है
था बिना तते के भी उर.तत के लक्षण हो जाते हैं
॥ शोष ॥
M
॥
-
रक्तक्षयादेदनाभिस्तथैवाहारयन्त्रणाद् ।
वागतस्य अवेच्छोपः सचासाध्य तमोमतः ।।
मग पाले का शोप- रक के.क्षय होने से, प्रण को पीड़ा
से, तथा पाहार घट जाने से उत्पन्न होता है और यह असाध्य है।
॥ उरःक्षत ॥----
।
है
उरो विरुज्यते ऽ त्यर्थ भिद्यतेथ विभज्यते ।
प्रपीब्यते च तथा पाश् शुष्यत्यंग प्रवेपते ।।
क्रमात् बीर्यवलं वर्णो रुचिरग्निश्चहीयते ।
ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधस्तथा

दुष्टः श्याच • सदुर्गन्धः पीतो विप्रथतो बहु । कास मानस्य चाभीक्ष्णं कफाः सास्टक प्रवर्तत सक्षीयते ततोऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसो क्षयम् ।। अत्यन्त साहसजन्य कार्यों से उरुक्षत होता है जिसमें रोगी को छाती बड़ी दूखती है, ऐसा मालूम होता है कि छाती को कोई विदीर्ण करता है अथवा दो टुकटे किये दानता है । पस- लियों में दर्द, सम्पूर्ण अंगों का सूखमा, तथा रुप होता है। क्रम से वीर्य, घन, घा, रुचि, और जठराग्नि महोते जाते है। स्वर की व्यथा, मनकी दीनता, दस्त का पतलापन, अनि का नाश ये होते हैं, खांसी के साथ, इषित, कानापन लिये, दुर्ग- धित, पीला, गांठदार बहुतसा रुधिर युक्त कफ पाता है। रोगी वीर्य और भोज के तय हो जाने से निरन्तर तीण होता जाता है- सर्वे र? स्त्रिभिर्वापि । साध्यासाध्य लक्षण लिंगासवलक्षये ॥ युक्तो वर्ण्य चिकित्स्यस्तु सर्व रूपोप्यतोन्यथा ।। महाशनं ज्ञीयमाणु मतीसार निपीडितम् । शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ॥ शुक्ला क्षमन्न देष्टारमूर्चश्वास निपीडितम् । ऋच्छया बहुमेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥ ज्ञय के प्रधान

-
जिस रोगी के मांस और पल क्षीण होगये हों इस के सम्
पूर्ण प्राधे या तीन ही लक्षण क्यों न हों परन्तु यह असाध्य है।
और मांस और पल मौजूद होने पर चाइँ सम्पूर्ण लक्षण हो परन्तु
चिकित्सा के योग्य है। (१) जो तय रोगी अधिक भोजन करने
पा भी क्षीण होता जावे जो अहिसार से पीड़ित हो, जिसके
भगत कोष और उदर पर सूजन हो उस को चिकित्सा न करो।
जिस क्षय रोगी के मेन मुफेद हों, अन्न में अरवि, श्वास,
मुत्रमान हों पर प्रसाध्य है।
ज्वरानुबन्ध रहित बलवन्तं क्रियासहम् ।
उपक्रमेदात्मवन्तं दीप्ताग्निमकृशं नरम् ।।
जोगी जारसहित, पलपान, क्रियाश्रो को सहने पाला,
दीप्ताग्नि और जटा हुआन हो उसे साध्य जान चिकित्सा
क
• अवधि परि दिनं सहस्रंतु यदि जीवतिमानवः ।
सुभिपरिभरुपक्रान्त स्तरुणाः शोधपीडितः।।
ओ सपरोगी हजार दिन तकमी जोता रहे तो जानो कि रोगी
सरा है और इस को अच्छे बैद्यों से चिकित्सा की गई है। मा.
पार्य यह है कि अधिक से अधिक हजार दिन क्षयरोगी यदि
बीच में माराम न हुआ हो तो जीवित रह साना॥

दोष विज्ञान के पायुर्वेद का दोष विज्ञान बड़ा महत्व पूर्ण विषय है इसे स. मझ लेना वैद्यों का प्रावश्यीय पर्तव्य है,। सम्पूर्ण संसार पश्चात्वमय है। और पन्चतत्वों क गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धमी सवत्र दीख पड़ते हैं। पञ्चतत्व शम्दादितन्मात्रामों से और तमाया महकार से ग्रहकार प्रकृति से उत्पन्न होते है। वास्तव में ये सा प्रति क कायरूप है। प्रकृति सत्व, रज,सम, इन तीन गुगो पालो है। ये तीन गुण ही रूपान्तर से तीन दोष कदाते हैं। इन का चिन पष्ठा कठिन है हम यहा पर तृतीय घेद्य सम्मेलन के समा पति श्रीमान् गणनाप सेन जी के भाषण स त्रिदाय विश्वान सम्बन्धी तात्विक विवेचन उद्धत करते है। शारीर क्रिया विनान में त्रिदोषतत्व प्रायुर्वेदका एक अमूल रत्न मानसिक हिरा विज्ञान क लिये सत्व रज तम ये त्रिगुण हैं बसे ही शारीर प्रिया विज्ञान क लिये वातादि तीन दाब है। इस विषय कमों का न समझ ना समझ लाग आयुर्वेद पर मिथ्या प्रादेप किया करते हैं। परन्तु हमको प्राशा है कि कभी यह दिन प्रायेगा जबकि आयुर्वेद के इन तत्वों के विषय में सूत्म हधि जगत के सब ही विद्वानों के वित में सत्य कल्पना प्रस्फुरित होगी। इस समय घायु का अर्थ (Wind) विंड (हवा) पित का अर्थ वाइल अर्थात पीले रंग का का तरल पदार्थ विशेष, 'और कफ कामर्थ लंगम समझ कर ही लोग प्रायुर्वेद की आप व्याख्या करते है । वास्तव में त्रिदोष तत्वों से शरीर को स्वामा- विक क्रियाओं के तथा शरीर को विस्त अवस्था की क्रियामों के पर्व विकित्सों में भेषज प्रयोग करने के जो अपूर्व नियम मंधि देउन नियमों के एक बार समझने से महर्षियों का दिव्य ज्ञान देख कर सभी को विस्मित एवं मुग्ध होना पड़ता है। प्रथमतः स्मरण रखना चाहिये यातादि दोष शरीर में टी रूप से अवस्थित है। धातुरूप, और मलरूप । धातुप तीनों दोष, सूदम मोर इन्द्रियों के अगोचर है कवन कियाओं को देन कर इनका अनुमान हो सकता है। इनकी स्वाभाविक घोर घि. कृन क्रियायों के लत्तण ऐसे स्पष्ट है कि जिन्हें देखकर सूक्ष्म दशी मनुष्य को धातुरुप दोषों की सत्ता अवश्य माननी पड़ेगी। और मनरूप पातादि स्थूल पर इन्द्रिय गोचर हैं जिनकी सत्ता सभी स्थूलदर्शियों को भी स्पष्ट प्रतीत होती है। सक्षेप से कहा जासका है कि "गति गन्धनया इस धातु से वायु शन्द धना है गति रूपी जितनी क्रियाये पद वायु की हैं गति रूपी किया .रीर में क्या है प्रधानतः गई स्पर्श रूप रस गन्ध को मन के पास पहुंचाना और पेशियों में ग उत्पन्न करके चेष्टानों का करना हो गतिरूप क्रिया है जो कि पाश्चात्य मत में " सेम्पेगा " Sensation" मस्क्युलर पान AMuscular Action कहे जाते हैं । पित में जो कुछ संक्रदर विकल्पादि गृतियां होती हैं वे भी मनकी गतिरूप किगा. है अतः वेमी वायु के कार्य है। पाश्चात्य मन मेहसे 'इनट्रलेशन' Intrellection कहागया है। महर्षि चरक रहते हैं। "

दायुस्तन्त्र यन्त्रधरः प्राणोदान समानं
व्यानापान प्रवर्तक श्रेष्टाना मुचावचाना,
नियन्ता प्रणेता व मनस: सेर्वेन्द्रियाणामु
द्योतक सर्वोन्द्रियाणामभिवोढा । च.सू.अ. १२
अर्थात् वायु शरीर के सप भाशय, और पात्रों को धारण
करता है, इन को क्रियाओं को चलाता है, इस घायु के प्राय
दान प्रादि पांच स्वरूप है. उदय, कयठ, उदर, स्व और गुण
प्रादि स्थानों में इन के कार्य पृथा २ स्पट का से देखे जाते
है। पायु ही पड़ी और छोटी सर फिवामों का प्रवर्तक है, पर
मनकी पत्तियों का निर्माणकर्ता तथा पालक है, पायु सप.
न्दियों में चतन्य देने वाला है और शम्दाप,रस.गन्ध इन
क्रिपात्रों का पहन करता है यादि । घरक के इस पचन को
देख किस को न प्रतीत होगा कि पाश्चात्य पगिटर जोग जिसे
"मर्थफोर्स" "Kerve force" कहते है। हमारे भाचर्म्य, इस
दुमय वस्तु को "घायु" रहते है। पट् बम और नाही मण्डल
अग्रजी शास्त्र का प्रसिद्ध मर्यस सिम् ही Nerrous
srstem ही है। बिजली का पंखा और बिजली की गाड़ी
प्रादि वक कोगों ने नहीं देखी थी जब तक कहने से विश्वास
नहीं हो सकता कि विज्ञली द्वारा ऐसे २ अपूर्व कार्य
हो सकते है। बरयन धार्य को देखकर मुटिया मजूर जोग
भी विशजी की अपूर्ण शक्ति को मर रहे है। ऐसे ही मागायों
का कहाभापायु का प्रमाण भी मदर है । शवड
पर कमसिक मुषुम्नादिको दबने से और मोदित प्राण
परवाना विधि परीक्षा करने में यह देखने में माता कि
विजजी समान कोई एक अपूर्व सभ्यापिनी कि हर
-

में है जिसके प्रभाव से शरीर के लपवल काटे चल रहे हैं। परन्तु अंग्रेजी मत से महपियों क मत का प्रमेद इतना ही कि अंग्रेजी मतवालों ने नईफार्स Nerve force को स्वीकार कर के उस का प्रक्षेय कहकर छाड़ दिया है, और हमारे महर्षि मेयों ने भनीन्द्रिय धाम से इस का स्वरूप वणन कर दिया है। रूक्ष शीतोलघुः सूक्ष्मश्चगेष विशद खर विपरीत गुणैर्द्रव्येारुत सम्पशाम्यति ॥ अर्थात् "पायु" मन, शीत, लघु, सूरम, चल, विशद, और बार गुणों वाला है, इम के विपरीत गुण सम्पन्न द्रक्ष्यों से पायु की शान्ति होती है । मूर्ख लोग समझते हैं कि घायु के गुण वर्णन स्व कपोत कल्पना है, किन्तु वेतनक विचार कर नहीं देखते है कि विपरीत गुण द्रक्ष्यों से जो पायु की शान्ति हो रही है, केवल इस बात से ही मषियों के दिव्य भाग की सत्वना प्रमाणित हो रही है। प्रतिक्ष्य घायु के विषय पर स्पष्ट कह के विकृत घायु के चिपप में चरक पुन लिखते है । “कुपितस्तुखलु शरीरं नानाविधैर्विकार रुपत पति, वत्तवर्ण सुखायुपामुपघातम्य भवति, मनो व्यावर्त्तयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहति” इत्यादि पर्यात् कुपित वायु शरीर में धाम्मान, स्तम्भ, रोदय मादि माना विध विकारों को उत्पन्न करता है, मनुष्य का पल, वर्ण सुख और भायु को नष्ट करता है । मन की विकृति उपनाता है इन्द्रियों की शक्ति को नष्ट करता है। यादि ।

इसी कारण प्रग्रेजी में जिन रोगों Nerrons Debrhty. Neuros thenia, प्रादि नाम में निर्देशकरते है घिद्य लोग उन सप राणों को पायु ही सममते । और घाग्रेजी में जिस मनुभ्य को Nervons eurotic या Hysterical कहते ही हम लोग उन को पात प्रकृति कहते है। जिस बात प्रति का स्वरूप प्राचार्य लोग स्पष्ट जिया गये "प्रधृतिरद्ध सोहद कृता दश पुरुषो धमनी तत प्रजापो द्रुतगति रटनो नयस्थितारमा" इत्यादि (सु. शा० ४ प्रहन सब बातों को देख कर कौन स्वीकार न करेंगा कि पि लाग समप्र नाड़ी मंगटज की क्रिया का करामलक समान समझते थे दौर धायु इन दो अक्षरों में सब का भयरोष फर चुरूथे। अत एव सुधत पर कहता है कि "प्रस्पन्द नौवहन पुरण विवेक धारण लक्षणों वायु पधा प्रविभक्त शरीर धार यति" (सु०सू०प०१५ अत स्पट प्रतीत होता है कि घायु का अर्थ हवा नहीं है, शरी मेंदगार, अधो घायु मादि धानुभूत नहीं है यह मत भूत पार, रूप दे इन के विषय में घायु का प्रसग नहीं चला है :- पित्त- "तप सन्तापे” इस धातु से पित शब्द प्रना। शरीर में सन्ताप का मूल भूत जो कुछ सूक्ष्म अतीन्द्रिय प्रस्तु "पिच" उसी का नाम है। शरीर में जो कुछ तेसो गुण क कार्य होते है पित.ही उन का परिचालक है। तेजो गुणांक कार्य शरीर में कौन है? शरीर के स्वाभाविक सन्ताप रक्षा रजिससे शरीरकासन्ताप से डिगरी तक बना रहता है) और त्वर को शोषण शक्ति पत्र का विपाक, मन की तेजस्विता, घधिको उज्वलता और रक का उज्वल जालघर्ष, ये होतेओ गुण के प्रधान कार्य-शरीर में है। इन कार्यों को मूल भूत तत्वों को प्राचार्य लोगों ने अतीन्द्रिय धान से प्रत्यक्ष कर दिया। 4 -- अब अग्रेज लोग इसको कोई एक शेय(Heat prodneing mechanism) सताप देने वाला प्रतीन्द्रिय वस्तु कहक पुकारते है । पाश्चात्य विद्वान कहते हैं कि निरन्तर शरीर में जा धातु जय हो रहा है। इसी धातु सय च धातु दाह से ( Com bstion ) अग्नि गुण उत्पन्न हा कर शरीर का सन्ताप रक्षित होता है। चरक भी कहते हैं "अग्नि रेवदि पितान्तगत पिता कुपित शुभाशुभानि फराति स यदा नेन्धन युक्त लभते तदा देवज रस हिनस्ति' इस पचन का अभिप्राय यह है कि अग्निक प्रभाव से शरीर के सय धातुओं का निरन्तर क्षय होता जाता है। उस तय की पूर्ति के लिये पाहार रूप इन्धन पहुंचना चाहिये। अग्नजी मत के साथ पियो के मत का इतना सादृश्य रहने पर भी म्मरण रखना चाहिये कि अग्नि घल प्राहार रूप इन्धन सही शरीर में अग्नि गुण सम्पन्न सर्व व्यापी पित्त की सता का सूक्ष्मदर्शी महर्षि लोग स्वीकार करते है और कहते है "पात पित श्लप्माण पत्र देह सम्मव हेतव परन्तु अंग्रेजी मत चाल अभी तक उतनी सूक्ष्मता को नहीं पहुंचे हैं। इस धातु भूत पित्त का गुण क्या है। जिस पर प्राचार्य लोग अंतीन्दिय प्रत्यक्ष करक कर३॥ सस्नेह मुष्णं तीक्ष्णां च द्रवमम्लं सरं कट। विपरीत गुणैः पित्तं द्रव्यैराशु विशाम्यति ।। "प्रतीन्द्रिय प्रत्यक्ष कहने का अभिप्राय यह है कि यहत से निस्तृत पीत वर्ण तरल पदार्थ पित्त के विषय में यह लेन न है। क्योंकि इस में यह सगुणधर्तमान नहीं दीस पड़ते पियों के अतीन्द्रिय धान की सत्यता का अनुमान प्रड भी इस.प्रमाण से हो सकता है। परि जिलित गुणों के विपरीत गुण सम्पत्र m 7 न १

बन्यों के उपयोग से निरात ही पित्त की शान्ति है । कुपित पित्त
के लक्षण प्रायुर्वेद में जिस प्रकार कहे गये हैं यथा विस्फोटक,
भ्रमोदगार, ऊपमा प्रादि आप भी पिता को शान्ति से शान्त होने
हैं। प्रेज़ी में जिसे माइल कहते हैं यह मल्ल रूप पा किद रूप
पित है। धातु रूप पिन के साथ इस का अर्थ मिलाना बहुत
भूख है इस मज भूत पित का लक्षण प्रायुर्वेद में इस प्रकार है-
पित्तं तीक्ष्णं वं प्रति नील पीतं तथैव च ।
उष्ण कटुरसञ्चच विदग्ध चाम्ल मेवच।।
(मु० सू० अ० २१)
लाम"सिप मालिंगन " इस धातु से सम्मा शप्त पता
हैमा सोमगुणारमक बस्तु है, पित के समान धातुभूतलप्मा
भी प्रतीन्द्रिय पदार्थ है। शरीर में तर्पण (तराषट रखना)
मेषण (संयोजित रखना) पोपण प्रादि सोमधातु के सब
कार्य प्मा का ही है। पित यदि अग्नि रूप तो लप्मा
जल कराकेषज अग्नि से दाह मात्र होता है। जल से इस
अग्नि की तीक्ष्णता दूर होती है । सब स्थानों पर तरावट पहुँ.
चती है प्रतएव मुभुताचार्य कहते हैं।.
सन्धिसंश्लपण स्नेहन रोपण पूरण वृंहण
तर्पण वलस्थैर्यकृत् श्लेष्मा पंचधा पुनि भक्त
उदक कर्मणानुग्रहं करोति॥
अर्थात-सन्धियों का संलेषण (तेल के सदृश पदार्थ से
दिजा रखना) स्नेहन ( कण्ठ जिवादि स्थानों कोतररखना)

अस का लंदन, धातुषों का पूरण भोर पोषणादि अल के कार्य
से कफ शरीर को तर रखता है । यदि शरीर में इस हामी की
तराघट न रहे तो शरीर थोड़े ही दिनों में दग्ध हो मावे ।
प्रतीन्द्रिय श्लम्मा यद्यपि सही है, तथापि कार्य के अनुसार
पित क सदंश इल के भी पांच घिभिन्न रूप हैं जिन के नाम
श्लेषक (Synovia ) लंदक (Salivi) धादि, परन्ने गये
हैं धातु रूप श्लेमा के प्रतीनिय रूप का प्रत्यक्ष कर के भाचा.
र्य कहते हैं कि:-
गुरुशीत मृदुः स्निग्ध मधुर स्थिर पिच्छिता
श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीत गुगार्गः ॥
महर्षियो के इस उपदेश की सत्यता चिकित्सा के समय :
सभी को प्रत्यक्ष प्रतीत दोती है, परन्तु स्मरण रखना चाहिये
कि नासिका और मुन से जो श्लम्मा गिरती है पद कि या मल
रूप है और उसके विषय में श्लप्मा का शरीर धारकत्व नी.,
कहा गया है, सुतसं धातुभूत कफ पिच वायु के ही विषय में
.
कहा गया है:
विसर्गादान विक्षपैः सोम सूर्या निला यथा ।
धारणन्ति, जगद्देहं कफ. पित्तानिलस्तथा ॥
अर्थात पिसर्ग, प्रादान और विक्षेप से ( तर्पण, शोर,
संधारण) चन्द्र, सूर्य और वायु जिस प्रकार जगत को धारद
५
--

करते हैं उसी प्रकार कफ पित भौर पायु भी शरीर को पारण
करते हैं मल, मूत्र घायु, पित, कफ के विषय में पर ही निर्देश
पक्काशयन्तु प्राप्तस्य शोपमानस्य विहिना।
:परि पिरिडत पकस्य वायुःस्यात्कद्धभावतः॥'
किट्टमन्यस्य विरामूत्र रसस्य चकफोऽसृजः।
पितं मांसस्यच मलो मतः स्वेदस्तु मेदसः॥
(चरक)
"
पायु पिच कफ के विषय में शेष का यतदए कहते हैं कि
पायु पित कफ केवल शरीर के हो तीन स्तम्भ रूप है यही नहीं
किन्तु समम प्रायुर्वेद में हेतु लक्षण, प्रौषध के तीन
समय खरूर दें।मनुष्य का क्या नाम अहोरात्रं, पद ऋतु अभ
विपाक प्रादि सभी में पात पित्त कफ का प्रभाव महर्षियों ने
स्पर प्रतिपन किया है। जिस से कार्य में पूरी २. सहायता
मिलती है

क्षयरोग की चिकित्सा
स्वास्थभवनों की आवश्यकता
१
यरोग जैसा कठिन है यही इस की चिकित्सा
भी दिन है। क्षयरोग की चिकित्सा ऐसी नहीं.
है, सिसे साधारण पैच कर सके । क्षयरोग की
चिकित्सा करने में ही वैधों की कार्य कुशलता
और मस्तिष्कशक्ति देखी जाती है । क्षयराग की प्रादि अवस्था
में अच्छे वैद्य द्वारा चिकित्सा हो और उपचारक प्रादि शेष चि-
किरला के तीन पाद भी उत्तम हो तो रोगी कदाचित् बच सकता
है। रोगी के दुर्चत होने पर रोग से मुक्त पाना कठिन नहीं किंतु
असम्भव है, लोक में यह बात प्रसिद्ध है, कि तपेदिक और राज
पदमा से रोपी पच जाये तो यह समझो किरोगी को यह रोगही
नथे । प्रायुर्वेदीय ग्रन्थों में लिखा है:-
परिदिनसहनु यदि जीवति मानवः ।।
मुनिपामिरुप फ्रान्तः तरुण शोपपीडितः।।
अर्थात् --यदि शोप याना रोगी सहन दिन तक जीता रहे
तो यह जानो किरोगी तरुण है और उसकी चिन्तिा अण्डे
अंग द्वारा की गई है।
इस से भावार्थ यह निकलेता है पिसवान रोगो सय रोग
ही प्रादि प्रयस्था में मच्छी यिविरसा होने पर घर सस्ता

(६८) है। भारत यामी शारीरिक शानदीन और प्राय दरिदी होते हैं। उनका यष्टुन दिनों तक यह मालुम ही नहीं पड़ता कि हम को तयराग है और साधन होग हान से आय की प्रादि पवस्था मे ठीक विधिरता भी नहीं पाते। इस ही से अधिकांश भारत पासी क्षय रोग मे मृयु पाते है। सयरोग में यहुत सी श्रौषधिया सने से ही लाभ नहीं होता जय तक रोगी को उत्तम वायु माफ पानी, घलिष्ट धादार और मानसिक सुख न हों तब तक हजार अच्छी २ औषधि खाने • परमी क्षयरोगी नहीं बच सकता। पर्तमान समय में साधारण प्रयस्था धाले मनुप्यों दो उप- रोच्च पाते पहुधा नहीं मिलती। उन क रहन सहने का मकान अपवित्र होते हैं तथा उत्तम आहार विहार कलिये धन न होने से अपनी चिरित्सा का प्रबन्ध ठोक २ नहीं पर सश्ते । इस घी से पहुधा क्षयरोग से अधिक अकाल मृत्युए होती है । अमे. रिका, जर्मनी, गजेंड प्रादि देशों क्षयरोगियों के लिये राजा और प्रजा की तरफ से अच्छे २ चिकित्सालय स्थापित है। जिन में क्षयरोगियों के लिये उत्तम पायु, साफ पानी और भो- जन मिलता है चिकित्सा भी बड़ी सारधानी से की जाती है रस से बहुत से क्षयरोगी घच जाते है। भारतवर्ष में भी स्वर्ग पासी भारत सन्नाट श्रीमान् सप्तम पड्पाई महाराज के स्मारक में धर्यपुर (शिमला 1 में प्रयरोगियों के लिये ऐसा ही शफाखाना स्थापित दुमा किन्तु इतने पड़े देश में एक शफाखाने से काम न बन सकता प्रायः सम्मति शाली धनी लोगही चि- विरसा के लिये जाते हैं साधारण मनुष्य यहां पहुंच मी नहीं सस्ते ऐसे शफास्थानों को देश में पड़ीपावश्यकता भारत वर्ष के राजा महाराजा और दानी लोग यदि ऐसे काय्या में अपने धन का उपयोग किया करें तो भारत पासियों को बड़ा लाभ पहुचे ।

यदि मारत वर्ष में एयरोग से नौ जशनों और निधनों की रक्षा करनी है तो प्रत्येक प्रान्त में अथवा पहाड़ी स्थानों या सामुरा के समीप ऐमे पारोग्य भवन स्थापित होने चाहिये । जिन में निधनों के लिये उत्तम स्पान अच्छा खाना पीना और औषधियां गिना मूल्य मिल सकें।पयोंकि जिन मनुष्यों को भर पेट भोजन को नहीं मिलता,सोने के लिये चार बांस फी झोपड़ी नहीं मिलती, रात दिन पेट भरने की चिन्ता ही सताती रहती है, ये अपने जीवन को इस दुष्ट रोग से कैसे यचा हा • देश के वाशियों ? यदि भार प्रमो धन से उत्तम पुराय सच्चय करना चाहते है तो ऐसे सार्वदेशिक उपयोगी कारयों में अपना हाथ लगाईये । भारत वर्ष में दान अब भी यहुत होता है किन्तु पद मास मीच पर केवल नाम के लिये होता है पात्र फुपार और घायश्यक्षता की ओर दानियों का पहुँत कम ध्यान जाता है। जहां दश धर्मशाला पनी हैं यहांधीपारधी धनती है। भारतवर्ष के दानियों को प्रोर से कितने प्रारोग्य मयन स्थापित हुये हैं ? देशवासियों को अपनी आवश्यकताओं का ध्यान रख कर दान करना चाहिये । दोग और निधन क्षयरोगियों कीरता यही हो सकती है जय कि उनके लिये क्षयरोग मिटाने पाले मारोग्य भयन स्थापितों क्यों कि पिना धन के साधन रहित होने से ऐमे लोगों की क्षय की पहली मयस्था में भी चिश्तिा नहीं हो सकती इस से उन विचारों को प्रायः अकाल मृत्यु होती हैं। विदेश में स्थापित हुये जयरोग के मालेग्यालयों का लेना देखने से जाना जाता है कि प्रतिशतपचीस रोगी पिनकुल निरोगी और पचास प्रतिशत बहुत अच्छे होकर निरखते हैं।

जोरोगी ऐमे स्वास्थ्य भपनों में रोग की प्रथमावस्था में ही बने
खाते है उन में प्रतिशत ७०७५ रोग मुक्त हो जाते है।
बहुत से लोग यह सन्देह करते है कि प्रारोग्य मदन मे
निकलने के पश्चात थोडे दिन पीछे रोग मुक पुरुष पिर रोगी
हो जाता है, किन्तु विदेशी प्रारोग्य भवनों का निम्न लिखित
लेखा इस सन्देह को भी टिकने नहीं देता।
(१) फाँकनस्टीम पारोग्यालय से- रोगीसास्य होकर निकले
और निकलने के पश्चान ३ वर्ष से लगाकर घर्ष कोष
जांच करने पर ७२ मनुष्य निरोग पाये, शेप १५ कुरा
रोगाझान्त हुये। परन्तु इन में से भी १२ फिर पय गये और
१५ रोगी मरगये।
(२) प्रेसर के स्वास्थ भवन में रोगी रोगहतहार निकले
उन में से पांच २१ पर्प से २६ वर्ष पर्यन यामन, १२ से
२१ घर्ष पर्यन्त ३८, सात से चारह वर्ष पर्यन्त निरोगी
और जीवित रहे।
इन लेखों के विचार करने से यह पात टपकती किम
दुःसाध्य रोग से अधिश रोगी प्रारोग्य मानों में र
कर चिकित्सा कराने पर बच सकते हैं, क्षयरोग से मनुष्यों
को बचाने के लिये अमेरिका में २०० से अधिक मेवा
समितियां स्थापित है, पेसी समितियां व्याख्यान देका ननगे
दिखाकर तय सम्बन्धी छोरी २ पुस्तकें बांटकर, मिट्टी क फड़े
पना कर और अन्य उपार्यों से सर्व साधाररा मनुष्यों को सम.
माते हैं कि-
यह रोग (तय) षड़ा कठिन है, इस से हम जिस तरह पव
सकते हैं, क्षयरोगियों को किस प्रकार रहना चाहिये प्रादि, ऐसी

समिविया भयरोगियों को मारोग्य भवनों में पहुंचाती है और दीग क्षयरोगियों को सब प्रकार का खर्च देकर उन्हें प्रारोग्य अपनों में भेजती है। अर्मनी, स्विट्जरलेन्ड, फ्रान्स पोर इंगलिस्तान में भी प्रय रोगियों के लिये स्पसन्न प्रारोग्यभवन स्थापित है और इन से प्रति वर्ष सहन २रोगी स्वास्थ्य रूपी सुधा को प्राप्त करते हैं। बड़े माय की धात है कि जो भारतवर्ष जनसंख्या तथा भूमि- माप में लप देशों से पड़ा है जिस में सर्वोत्तम असा वायु और स्थान प्राप्त होते हैं। जहां पर दीन घन हीन सयरोगियों की दुःख भरी पाहवारों प्रोर से सुनाई पड़ती है यहाँ ऐसे पारो. ग्यभवन क्यों स्थापित नहीं होते ? जप तक देशवासियों का ध्यान इस भोर न जायगा भारतवर्ष में क्षयरोग का का इस ही प्रकार पिटता रहेगा और हमारी चीचपड कुछ भी मपलेगी।

१७२" प्रारोच्य भवन कैसे होने चाहिये Pravaridadegरोग्य भवन ऊंचे स्थान पर, पनाये लाप, जो समुद्र की सितह से कम से कम ३॥ हजार आ और अधिक से अधिक ७ हजार फीट RARRANATE ऊंचा। १(१) भारोग्य भवन का कुल काम एक योग्य अनुभवी पौर द- याल वैए को माधीनता में हो। (२) मकाम साफ सुथरे और धादार हो। (३) स्त्री और पुरुषों के लिये अलग २ स्थान हो । (४) प्रत्येक रोगी अलग २ कमरे में रफ्सा आये। (५) क्षयरोगी के कमरे में दूसरा मनुष्य न सोये और मरिसी प्रकार की रोशनी ही की जावे । शरदऋतु में भी ताजी हवा भाने के लिये सम्पूर्ण खिड़कियां खुली रपी जायें। (६)रसोई घर,भोजनालय, मित्रों के लिये स्थन, पास्नाना, घोषी खाना प्रादि सब स्थान प्रारोग्यालय से दूर बनाये जा । (७) मकान को अधिक ससाने की प्रावश्यकता नहीं है सामान और फीचर जितना थोड़ा होवे उतना ही अच्छा। (5) वैद्य का यंगला एक ऊवे स्थान पर छो,जह से यह रोगियों की स्थिति प्रति समय देख सके। (६) मायोग्य भवन की सड़कें मुख्य प्रबन्ध से उतार चढ़ाव की बनाई जाये।

क्षयरोग की प्राकृत
चिकित्सा
Foरोममे
airaय रोग में प्रौषधिया सेवन करने से रतमा भ
नहीं होता जितना कि प्राकृत चिदिरता से। याजा
क्ष रहेर हाक्टरों का मत है।
प्रौषधिया सेवन करने से पुछ भी काम नहीं होता
घे फइसे कि :-
Nature, a lMother, kind alike to all, still
grants her blicss at Elybours carinest call.
अर्थात् सम्पुर्ण प्राणियों पर एक समान प्रेकरमने पानी पर
प्रति मायावी विध्य माता के समान प्रकृति, उधोग-शील पुरुषो
को सदेव प्रमोघ मुम्न प्रदान करती है । प्रश्यान सफ्टा टरगर
इस विषय में कहते है शि:-
प्रिय क्षय रोगो! दि तुझे ऐसी घाणा हो कि
कोई चमत्कारिक प्रोवधि निकल पाये कि जिस मेधन करने
में शीघ्र सयरोग मध हो जाये तो पेसी भाशा दुपा है।
रोग नष्ट करना तुम्हारे ही हाथ में है, अपना साधम, पहारिक
विवेक बुधि, मोर निरन्तर सायधानी इन्दी के कार रोग निदान
का प्राधार है । यदप पास तुम्हारे हदय में जितनी अल्बी
हद हो जाये, उस में हो तुम्हारा हित है। इस ही प्रकार प्रोमी
.

(७) बहुत मे साफ्टरों का मत सयरोग में भौषधियोन जिलाने पक्ष में है 1 वे कालियरबायज, एक्त ट्रफ्त औफगीर, ट्यूध- निम, दयुपरफ्युलोजायन, भादि भौषधियों को सयरोग में देना वाहियात बतजारी है। और मन का मत क्षयरोग में किसी प्रकार के मांस रस या मांस सिद्ध प्रौषधियां खिलाने का है। तात्पर्य यह है कि सदरोगी अप उसे मालूम हो कि मुझ में तवा मंकुर जम गया तपही से उत्सम यायु, साफ पानी, योग्य आहार विहार और मानसिक सुख पाने का सर में पाहिजे मान्य करें। यदि साहतिक उपायों के साथ किसी प्रच्छे वैद्य की पौर. धियां मेयन की जाये तो सयरोग में प्रति लाम मुच सकता है। अन्यथा क्यल पौषधियां ही खिजाते रहना फूहे में डालने के सना है। रापटरों का ही पर मत नहीं, किन्तु प्रायुर्वेदीय प्रन्यों का भी है। सरोग हो नहीं किन्तु सम्पूर्ण रोगों में पथ्य में रहना प्रारोग्यता प्रदान करता है। पायुमेंदीय प्रन्य वयं कहा कि पथ्येसति गदार्तस्य किमौषधिनिपवरोः । अर्थात-विना पौषधि सेवन किये यज पथ्य करने से ही गंग नए हो जाता है । ये लोग मतिशत पादिरों में बहुत दिनों नमोरधिर्वा न पिताकर रोगो को महतक कर ही द्वार दो है । कबज गरम पानी पीकर प पूर्वक रहने मे मेड़ों रोगो मारोग्य लाम करने है। इसलिये रोगियों को दाहिने कि ये सयरोग मिराने के जिये प्राकृत माधनों की ओर ममेहरोयान रखें और उन्हें काग में लायें। --

शुद्ध वायु
,
.
सयरोग फैफड़ों की बीमारी है और 4.फडों की दुगर शुद्ध
घायु है। यदि रोगी को ताजी घायु नहीं मिलती तो मानों कि
इस का प्रारोग होना दुर्लभ है। ताजी घायु रहेर शहरों और
पनी प्राथादी में नहीं मिल सकती। इसलिये छोटेर गाँव, पहाड,या
समुद्र किनारे पर रहना घावश्यकी है। इन स्थानों पर घने
जाने में ही साजी पायु नहीं मिल सकती किन्तु यह ऐसे मकानो
में रहना चाहिये कि ताजी वायु का पूरा लाभ रोगी को मिस्त
। सिम मकान में क्षय रोगी र उन में छोटीर शिकिया ग
हो । क्योंकि सायु के झोंके ऐसे रोगियों को नुकसान पहुंचाने
हैं। मकान के सब दाँजे य९२६ो जिम से ताजी पायु भासागो
से पा सके और खराय यायु यादर निकल साय ।
यदि रोगी में यज हो तो शुद्ध पायु शो के लिये मशाग में
घुमान रह कर बाहर मैदान में टदला कर । तब रोगी को साजी
आयु में रहना सहना उठना पैठना चाहिये। लोगों में एकी
पुरी परिपाटी चल गई है कि पे एयर पा राधा भय रोगी यो
ताजी पायु, नहीं लगने घेते । ताजी वायु रोगी र लिये भार
समझो जाती है ,यहुत से येद्य कंधेरी कोटरियों में हिमानार
समझरो है) रोगियों को मार मार मानते , यह उन गो
को मूज ॥
क्षय रोगयाले के लिये शाद वायु और पदी का मोमम
मथा समुद्री यायु बड़ी साम दायक नीत तु में पिना
चिकिता किये भी रोगी की तौज पहली जाती है। परमार
घरलेथम लिनते है कि-

साफ पानी जिस प्रकार पम्प रोगों में साफ पानी पीने की प्रायश्यकता है पैसे ही क्षयरोग में भी साफ पानी पीना चाहिये । सातानी का मनुष्य के स्वास्थ में धनिए समयन्ध है। क्षयरोग की मित्र भवस्थानों में विशेष रीति से अज पिलाये । (१) यदि सयरोगी को ज्यर पाता हो तो पामी को गरम करके छानकर पिलावे । पहुन से साक्टर गरम पानी पिलाने से सहमत नहीं है ये कहते है कि पानी को गरम करने से पानी की नीवनीय शक्ति नष्ट हो जाती है परन्तु यह उन का आम है। गरम पानी ज्वरनाशक प्रयोगों में प्रधान है। पानी की गरम करने से उस में मिले पार्थिव परमाणु दूर होजाते है । दायरो के लिये पानी इतना प्रौटाया जाये जिस से उस में दो तीन उफान प्राजाप । पीछे साफ़ करके किसी मिट्टी के घरवन मरकर शीतज करके रोगी को पिना:- (२) यदि रोगी को दाह अधिक हो और न्यर न हो । मच्दे कूप का पानी (जिस कुए में फूड़ा करकट या वृक्ष के पत्तेम पड़ते हों, पानी ज्यादा खिंचता हो, परसात का पानी न जाता हो) बिना प्रौटा हुआ केस सा.करके दी पिलावे-टिकटियों पर घड़े रखकर और उनसे पानी टपकाकर अथवा पानी को साफ़ करने वाली बोतलों से पानी साफ करके (ये घोतळे विलायत रो मसाले की पनी प्राती पानी में डालने से बोतक्षा के भीतर चूयूमर साफ पानी भर जाता है) या भभ से स्वीच करफिराटा करकेपीदे-

(३) यदि रोगी को कांसी ज्यादा ती धोरामह
निकलता हो । भूख कम हो तो बद से फर्धा को जमा कर
इसके कोयलों से पानी साफ़ करके (टिकरियों द्वारा) nी को
पिता यह पानी किञ्चित नुरपरा होता है पर सात रोज़ पोगे
से का मासानी से निकलने लगता है गला साफ होता,
सिस रोगी का मंत्र के साथ वीर्य माता हो वह इस जल की
न पीये।
(४) मजायरोघरहने वाले क्षयरोगी को प्रामा (मुमकों)
का जल पड़ा जाम देना है बीस सेर पानी में एक सेर मुसक्के
या अमूर राज कर दो दिन भिगोवे पीछे भमके से बीच
इस पानी को कूप के साफ पानी में मिलाकर रोगी को पिजाये।
(५) जिस रोगी को दस्त पतले होते हों उसे पाय के
फूकों का पके साफ पानी में मिला कर पिलाने से पास नाम
होता है।

(२०)
नाहार
हार ही मनुष्य का जीवन है। क्या को
म माहार की योजना वरना मीटिन
श्रा
काम है । पदों कि प्राय आय या दुर्धज,
और चीचल स्वभाघ याने हो जाते है और
खाने में उनकी स्वाभाविक प्ररुचि रहती है मार २ पाने से
घयदाते है। इसलिये तयरोगियों को ऐसा प्राधार चिलाये
जिससे यह रुचि से खा सके हम यह नहीं कहते कि क्षयरोगियों
को विना लाम हानि देने स्वादिष्ट माजन भर पेट खिला दिया
जाये जिसे वे न पचा सौर उलटे लेने के देने पर सांय
तात्पर्य यह है कि चिकित्सक को चाहिये कि हितरस्तुभों पा
सुस्वादु थाहार पनाकर थाही मात्रा से रोगी को खिजाचें सब
पहले वैध को रोगीको भूक और रुचि को और विशेष ध्यान
देना चाहिये रुचि बढ़ाने के लिये सब से उत्तम उपाय ताजी
स्वतघायु का सेवन करना है यदि रोगो में पल हो तो थोड़ी
सो कसरत यानी मात' साय यायु सेवन करे ऐसा करने से भूल
पढ़ने लगती है।
भूक लगने के लिये कोई साधारण औषधि सेवन करते
रहनाभी अच्श है, बहुत से हकीम जयरोगो की भूक पढ़ाने के
लिये लहसन का पाना लाम दायक बताते है किन्तु जिन की
पफ प्रति हो और तीक्षण घस्तुओं का सेवन कर सकते हो
पही इसे थोड़ी मात्रा में सेवन करें। डाक्टर लोगदुर्वल रोगियों
को भूख बढ़ाने के लिये शराय देना अच्छा समझते है, परन्तु

हम प्रेमी युग जिल में केवल नशादी हो चयमियों को देना पसन्द नहीं करते। हो सयरोग मरित, दासर धादिरिष्ट, पास गंगी के लिये मध के स्थान दिये जावे तो कोई हानि नहीं है। सिरिता के लिय पद प्रापश्गीप वाम है कि रोगी को कमजोर न होने दे। जो देश कारागी का गनैः २ एज बढ़ाता दे घर से प्रारोग्यमा की तरफ जाता है। रोगी का धन बिना थाहार से नहीं पढ़ an | योहा २ पार २ आहार खिलामा तोगी यह जाभ पहुंचा है। बहुत से लाग 48 प्राचर ररते हैं कि पापुदीय चिकित्सा कयल जंघनयामूग की दाज अथासूसी रोटी ही प्राधार देने में पढ़े है। परन्तु यह बात शास्त्रीय प्रक्रिया को छोड़ अरपटांग इलाज करने पन्नों की है। शाशों में, सय रोगियों को अनेक प्रकार क घृत, दुग्ध, मांस रस, यूप, शाक, फल श्रादि देने लिखे हैं और विद्वान वैद्य इन्हें देते भी हैं। ऐसे ग्राहार से रोगी का पज क्षीण नहीं होने पाता प्रत्युत धीरे २रोगगे, स्वास्थ्य लाभ करता हम इन पाहारों की प्रक्रिया यक्ष यतलाते हैं। शास्त्रों में पकरी का दुग्ध, घृत, मांसरस देना पड़ा जाम दायक लिखा है। गाय का दुग्ध भी लाभप्रद है परन्तु चकरी का सर्वोसम । यदि पकरी या गाय को गिलोय, असा, सिजा कर दुग्ध लिया जाये तो और भी विशेष लाभ देता है। रोगी को जिस विकार की अधिकता हो उसकी नाशक यनस्पत्ति मिला कर दुग्ध लेना चाहिये यहि यत्त बढ़ाना हो तो गोक्षुरादि या अश्यग- न्धादि चूर्ण,जौकेचून के सामिला रोटी बनाकर गौ यावकरीको खिलाकर दुग्ध लेना चाहिये। यदि रोगी कोदाह अधिक हो और धातुरूमती जाती हों तो साचे दुग्ध के फेनपाधारण दुग्ध पिलाना ६ यड़ा जाम दायक है । दुध का तोर पार [परापर या द्विगुण जल मिला मन्द अग्नि से पकाकर दुग्य मात्र शेष पाने ] पना कर पिलाना भी बहुत गुणदायक है, तीर पाक बनाते समय औषधियां भी डाली जाती है। तोरपाक प्रायः राधि पिलाते. हैं। दिन में भी याडार पिजाया जाये तो और अच्छा ।। ज्वरघ्न क्षीरपाक यदि तयवाले को घरको अधिना हो तो शोर पाक बनाते समय गिलोय, पीपल, मुनक्का, डालकर दुग्ध भौटाये । बुर्दमान पीपन में धातुों में प्रयि हुमा घर निकल जाता है। पर पीपन निन्य घढ़ा कर २१ पीपन तक यदाये और फिर एक२ घटाता जावे। पहले समय में पांच २ पीपल बढ़ाकर सौ सौ पोपल तक लिन्य दुग्ध मडाल कर और औटाकर पिजाते थे। अब भी दम ने यहुत से रागियों को पचासर पीपल तक पिलाया है। पीपलों का प्रयोग र नाश करने में अद्वितीय है। रोगी की प्रकृति यो पल देख कर पोपों का प्रयास करे । खांसी को अधिक्षता में कासघ्न क्षीर पाक- साथ, मुना, गिलोय फपटवारी, प्रादि श्रौषधियां सातकर प्रौटाये । अमेकी जड़ का पाल भी डालना अच्छा है । मुलेठी का चूर्ण जय खांसी सूखीही तप डाने । यदि पांसी के साथ, पार्श्व शूल हो तो दशभूज या, पम्य भूज डाले । यदि पपी क साथ खून प्राता हो तो पीपल की जाप में उल बलिउतीर पाक घन पाने निो शीरपाक म, धशतोषन, हाय, मुना, हा, सपा विचूर्ण को तोरपा के साथ कार्य- मांस meere जोग दुर्भत रोगियों की चया बढ़ाने के लिये मध भोगम क साथ थोड़ो २ सुरा पिताना अच्छा स- Sorror orm मझा है परन्तु अच्छे २ गैद्य प्रोर हकीम इसे हा- निकारक पर नाका पीने को भाशा नहीं देते । हां प्रायुमेंदीय माया में मोरसकर दादाम, दामारिए, उशीरासय, दश. मूना प्रादिपरोगियों को समान करने के लिये वर्णन किये है और इन को प्रहार न समझकर श्रोधि सेवन करना चादिये । ये अनसय शराम की तरह दुर्गुण नहीं करते किन्तु रोगी को पड़ा लाभ पशुचाते है। arrey दायर लोग मछजी के तेज को इस में परम लाम दाय समझते है। घायुदाय अन्यों में भी SUS इस रोग पर यकरे का मांस पाहार और प्रौषधि दोनों में हित माना गया है। क्षय रागियों को जोकि मांसाहारी इस से नाम भी पवना देखा है। हम मांस साने क पक्षपाती नहीं हैं, दुध, घृत, मक्खन यादि पदार्थ भी ममि से कम मा दायक नहीं हैं। पान्तु आयुर्वेदीय शास्त्र सार्य भौमिक चिकित्सा मान हैं। संसार में सय प्रकार के मनुष्प , इस ही लिये आयुर्वेदीय प्रन्यो ने सब लोगों को प्रकृति को विचार कर आधार की योजना की है। नो मांसाहारी पुरष है जिन्हें मांस खाने में ग्लानि नहीं है ये अपनी इच्छानुसार पकर के मांस का रस, सत्तू, प्रादि सा- सकते हैं। परन्तु फलाहारी पुरुषों को उस से लाश के स्थान में छाति होगी। उन्हे जानि होकर अन्य उत्तम भोजना में मोगा. रचि हो जायगी । जहाँ तक हो सा मनुष्यों को दुग्धादि सेना फर अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिये ।

( २ )
घड़ा लाभ दायक है। दुग्म का तोर पा [यराबर या द्विगुगए
जल मिला मन्द अग्नि से पकाकर दुग मान शेष रक्ने] घना
कर पिलाना भी बहुत गुणदायक हैं, तीर पाक पनाते समय
औषधियां भी डाली जाती है। तोरपाक प्रायः रात्रि पिलाते.
हैं। दिन में भी थाहार पिलाया जाये तो योर अच्छा ।।
ज्वरघ्न नीरपाक- यदि तय पाले को ज्याकी अधिकता
हो तो क्षौर पाक बनाते समय गिलोय,
पीपल, मुनधा, डालकर दुग्ध भौटाये । बुर्दमान पीपल से
धानुमों में प्रविष्ट हुमा र निकल जाता है। एकर पीपल
निन्य बढ़ा कर २१ पोरन तक पढ़ापे और फिर एकर घटाता
जाये। पहले समय में पांव पीपल बढ़ाकर सौ सौ पीपन तक
निस्य दुग्ध मे डाल कर और औटाकर पिजाते थे। अब भी हम ने
बहुत से रोगियों को पचासर पीपल तक पिलाया है। पीपल
का प्रयोग या नाश करने में अद्वितीय है। रोगी की प्रकृति
और पल देख कर पोपों का प्रयोग करे।
कासन्न क्षीर पाक
खांसी को अधिक्ता में दुग्ध के
साथ, मुनझा, गिलोय करटकारी,
प्रादि प्रोपधियां डालकर प्रौटाघे । अइसकी जड़ का घपाल
भी डालना अच्छा है । मुलेहठी का चूर्ण जय खांसी सूखी हो
तप डाले । यदि मांसी के साथ, पार्श्व शूल हो तो दशमूल या,
पश्य मूज साले । यदि सांपी के साथ खून प्राता दो तो पीपल
पीलाप दुम उले।
बलिष्ठ शीर पान
पज पर कनिये क्षीरपाक
म, शशीधन, माय, मुनधाा
दाले, पारिवृर्ष को तोरपात
पादे-
साथ

मांस 2 Porroreर लोग दुर्य त रोगियों की चुधा बढ़ाने के लिये मद्य मोसन क साथ थोड़ी २ सुप पिताना अच्छा स- Goronorm मगर है परन्तु अच्छे २ नेय पोर हकीम इसे हा. निकारक तताकर पीने को प्राक्षा नहीं देते । हां प्रायुर्वेदीय अन्या में प्रोरवस्तर द्राक्षालय, द्राक्षारिट, उशीरासय, दश- मूनालय भादि आपरागियों को सेवन करने के लिये वर्णन किये है और इन को प्रहार न समझ कर प्रौषधिस्या सेवन करना चाहिये। ये प्रसय शराम की तरह दुर्गुण नहीं करते किन्तु रामो को बड़ा लाभ पहुचाते है। POKS डाक्टर लोग मछली के येन को इस में परम लाम दाय समझते हैं। यायुर्वेदीय ग्रन्थों में भी इस रोग पर बकरे का मांस घाहार और औषधि दोनों में दित माना गया है । क्षय रोगियों को जोकि मांसाहारी में इस से नाम भी पहुंचता देखा है। हम मांस साने क पक्षपाती नहीं हैं, दुध, घृत, मक्यन प्रादि पदार्थ भी मांस से कम लाम दायक नहीं है। पान्तु आयुर्मेंदीय शास्त्र सार्वभौमिक चिकिता गान हैं। संसार में लय प्रकार के मनुष्य है इस हो लिये आयुर्वेदीय प्रन्यो ने सब लोगो को प्रकृति को विचार कर बाहर की योजना की है। जो मांसाहारी पुरुष हैं जिन्हें मांस खाने में जानिये अपनी इच्छानुसार बकरे के मांस का रस, सन् र सकते हैं । परन्तु फलाहारी पुरुषों को इस मेल हानि होगी। उन्हें जानि होकर R रुचि होजायगी। जहां तक फर अपने जीवन की रक्षा करनी चारिता सा मनुमति ( ४ धारोष्ण दुग्ध मिन रोगियों को दाइ पधिक रहता हो धानु निग्गर सूखती भाती हों, निजता और रूचता बढ़ती हो उन्हें भारोपड दुग्ध बड़ा लाभ दायक है। यद्यपिकच्चे दुग्ध में डाक्टर खोग पोरामुमों का होना मानमे है। परन्तु हमने भनेक रोगियों को इससे बडा जाम होता देना है। एक रोगी जो पट्टा दुस्खी था प्रोस्टनेशय का र मीन बार महीने से ही उत्पन हुघा या इस पागे दुग्ध से ही घोड़े दिनो में चंगा हो गया । पिस रीति में रसरोगीशीतपा प्राय रोगियों को हमने धारोष्य सुग्ध पिलाया है उसकी विधिलिनरो हैं। । जिम गाय का दुग्धजिया जाये इमे निम्न लिखित मौषधियों का मोटा २ चूर्ण - गौका चून । सेर, घोऽ- PERS- मिला कर रोटी बना कर और अग्नि परमेक कर खिलाये और थोड़ार सेंधा नमक भी गौ को चटाता रहे। असगंध, सिताबर, मूमनो सुफ़ेद, समुद्र सोस, ताजमखाना, मुलेहटो, खिरैटी के बीज, समान भाग लेकर फूटशर चूरी करे इस रोटी को पांच सात दिन खिलाने के पश्चात्-पहले उस गाय के दुग्ध का घोनिकाल कर रक्से । एकतोला घृत, शहद माशे, पीपल दाने घुटे हुये चार रती मिजाकर चाटे और कपर से उसी गाय का धारोप्स दुग्ध पाव भरसे लेकर पाधसेर तक पी- गौ के दुग्ध को दुहते समय दोहनी से एक मुफ़ेद पत्र का छन्ना घांघ दे और उस छम्ने पर भिधी भनुमान की पिसी हुई रखदे पश्चात् दुग्ध को उसके ऊपर दुहे और उसे तत्काल ही तय नक फेग शान्त न होने पाये पीछे।- १

.
माखन चय रोमी को मक्यम अाना भी पटा उपयोगी है।
मिनको रक्षा दाह शुष्क कास, या धातु नाश
हो गई रिसोपवादि चूर्ण माणे दो मक्खन तोले एक या दो
शहद माशे मिलाकर खाना चाहिये । पाजारू, या कुछ दिन
रक्खा हुमा मान काम नहीं देता- गौ या परीके पवित्र दुग्ध
का नित्य प्रति ताजा मखम निकाल कर स्वाना चाहिये ।।
घृत धुत के गाम से यहून से रोगी और पैप यहे उरते हैं।
पैचों में सूली रोटी खिलाना ही पथ्यापथ्य का निचोड़
समझा बाता है। परन्तु यह प्रणाली शास्त्रीय सिद्धान्त से
विपरीस है। पुराने ज्या और इस चय में जिस में घर से
धातु निरन्तर सूपती जाती हो घृत देना चरकादि ऋषि पड़ा
काम दायक यतजाते है। जिस प्रकार मलते हुए मकान को
मनुष्य जस्त से बुझा देते हैं येसे ही ध्वर से सूखते हुए प्राणियो
को वैध घृत से बुझाता है ऐसा चरक में लिया है । क्षयरोग पर
पाण थालीस प्रकार के घृत पनाने के प्रयोग शास्त्रों में पाये
जाते हैं। जिन में से कुछ भागे चिकित्सा प्राय में लिगेंगे)
हमने अगवा तयरोगियो पर अनेक सर प्रयोग किया और
नाम भी देखा है ।यो को निभय होकर घृत को सिद्ध कर
उपयोग करना चाहिये जयरोग में धातुश्रो का तय होने से नि-
माता विशेष होती है और दुग्य घृतादि बल बढ़ाने वाले
प्रधाग पदार्थ हैं।
फल, इस रोग में फम्नों का स्वाना भी बहुत अच्छा है । यि-
लायतो अनार, अंगूर, मुनक्षा, किशमिश, फाजसे,
केला, छुहारे, श्राममोठा, इन फलों को थोडे २ खाना चाहिये,
श्रमार के रक्ष के साथ पकाये हुए अन्न भी दाहनाशक तृप्ति
कारक और पल देने वाले होते हैं। भोजन काल अन्य समय
।

में भूख लगने पर फलों को वाथे । एक हकीम मुगमकों का प्र.
धिक खाना इस रोग में पडा हित पतलाते हैं। सन्निलिये
सूखे झरये का चूर्ण मिश्री और नमक मिला कर खाते रहना
अच्छा है
अन्ना
गैहू, मिस्तुप जौ, मूंग, पुराने साडी वांज, इस रोगम
हितकारी माने जाते हैं गोधूमसत्त, पप, मूग, या
जौकायूष, गेहूं का दलिया, घना कर पाना चाहिये । इन पदायों
में यदि खटार की माघश्यकता हो तो घामले या सप्रनार की
पढाई डाले । रूत प्रल, उडद, प्रादि इस में धर्मित है पिदार्थों
में तीक्ष्ण मसाला नहीं डालना। हींग, लाल मिर्च, लहलम प्रादि
हानिकारक है।
(१) गोधूमसत्व प्रथया यवासय पनामे की विधि। पहतो मेह
या पुराने जौ को झूट कर और मिगो कर सात निकाले पीछे
उन्हें पकरी के घी में भून ( भूनने में एक मिनिट भी नहीं
लगती, कलही क तेज पक हुए घी में सत छोडते ही भुगमरते हैं)
तथा भतार और प्रामो का जल पहले में निकालतगारदर।
फिर एक बर्तन में थोडा धीरान जोर का शेक लगा अनार
का और मामले का रस तथा यवादि क सात को छोड दे। रमः
में सेंधानमक, इलायची, पीपर, और थोड़ी सी सोट को कूर
कर साल दे। जय एक उफान मानावे सप इस एप को मार
तय पीडित रोगी को पिजाधे । अथवा मुने हुए सर को मिश्री
के जल में भौटा एक उफान देने, इम में सितोपलादि चरनी
और मामले का चूर्ण भी थोड़ा साल दे, इस यूप से घनिष्टता
प्राना ठीक नहीं, यूप के पादी का प्रमाण अच्छी तरह कर लेना
योग्य।

। ८७ (२) जौ का यूप-इस यूप में ययों को पका कर प निकाला जाता है, परन्तु इसका अनाना अति कठिन है अतएव इस की प्रक्रिया तिस्सो जाती है। पुराने हिले ठुऐ यों को सोजच गुने पानी में पकाये तथा दूसरे एक बर्तन में गरम पानी और भी रम्बारहने देव, जय चौधाई पानी रह जाय तय उसे फेंक देवे, और उन में इम दूसरे पर्तन का गरम पानी उतना ही साल देव और फिर पकाये, इस प्रकार यब दूसरे या तीसरे बार में अघ- श्य गल जायेंगे तब उस मन्निम पानी को सीने हुए जो सहित उतार लेये और फिर एक गाढ़े पड़े में छाने और सुफेद और गाहे सत्यं को निकालले । तानन्तर इग्य सत्य को घृत, जीरा तेजपात का छोक देकर छोरू और इस में सेंधानमक, प्रामना, पीपर, सोडात एक उफान प्राने पर उतार लेवे और रोगी की सेवन कराधे । श्रामने की जगह मामले का रस मी डाला जामा है। इस यूरो मोटा यनानो तो मोठा भी #० १ की निधि मे बना सकते हो! पानी बार २ फेंकने का अभिप्राय यह है कि जो यदुत देर में गतते है एक बार के पानी में नहीं गलेंगे जो को भुनायर यूप बनाना उत्तम नहीं है। शाक, लौकी, तोरई, मधुश्रा, कमल की जडला, पर, जभेडे, इन के शादा यना कर रोगी को खिजाने वातिये । तम्यूम, सरसों, करेला, मैथी, फाही, सेम, के शाफ हानिकारक है । गरम और तेज ममाळे शाफों में न डाले जायें। आहार विधि क्षय रोगी को थोड़ा २ खाना थार २ खाना चाहिये । ऊपरी उपचारक, समझा युझाकर रोगी के पेट में थोड़ा बहुत पाहार व्यवश्य पहुंचाता रहे । जिस चीज़ के साने से लाभ पहुँचे उसे पाता रहे अन्यथा तत्काल छोड़ दे।

( ८८ )
।। विहार॥
जयरोगी को सदैव पविन, चिन्ता रहित, प्रौर शुश मिनाज
रहना चाहिये । क्षयरोगी को यह अतलाना कि तुम्हाराजीधन स.
कट मय है पला हानिकारक है। शरीर दो जितना भागम
दिया सासके देवे गीतबाघ सुनना, जो बहलाने लिये मित्रों
से हास्य करना, चन्दन लगागा, मन्द २ वायु का धन धादि
रोगी का स्वास्थ्य पढ़ाते हैं । मिस नाम था परिश्रम मे शरीर म
थकान मालूम दे उसे कभी न करे । ऐला खेल जिस में जोश या
गरमी बढ़े दापि ग खेले । यदि रोगी एलिष्ठ हो तो शुद्ध पाय,
के मेधम क निये किती गीचे में टहलकार फूलों को स्यता रहे।
क्षय रोगी क उपचारक ठमे शान्ति मेते रहें। यद्यपि यी याने
रोगियों का माय चोयह और प्राधा हो जाता है रतु
धीरज तथा शान्ति देते रहमा योग्य है।
स्नान
पारछ दिन पछि रोपी को गुन गुने या माझी पानी
से हिलाया जाये। मेज मिट्टी १६ तौलिया मे
माफकाले । सान मायाज दरमा चाहिये । इससे जुकाम
पैदा नहीं होता।
तया
रोगी से प्रेम रय्यने वाले, गोगी को प्राभ्वास्न
देते रहे । और रोगी कोषदुत मुनाने की कोशिश
न करें। ऐसा करने से गगी का दिमाग कम और हो जाता है।
किसी विचारणीय विषय पर बहस करना भी अच्छा नहीं
है। जहां तक हो सक रोगी के पास मनुष्य कम जाया कर ।
इष्ट मित्र,

-
( ८६)
पढ़ना लिखना | भय रोगी को पेली पुस्तकें जिन में
दिमाश को लोर लगाना पड़े, और ऐस
उपन्यास जिन से मन में ग्लानि या फुभाघ पथ हो पढ़ने के
लिये न दिये जायें। हां जिन पुस्तकों के पढ़ा से विध शान्ति
मसनता और हर्ष पैदा हो इन्हें वे समय पर सबसे है, जय
रोगी को पहने चाहिये। रामाचा महाभारतादि पुस्तकें पढ़ने
के लिये अच्छी हैं। विचारपूर्ण नेय लिखने से भी पन्हें गेसना
शादिये । पपने इष्ट मित्रों को प्रमादि जिलने का समय दिया
हा।
व्यायाम
थाडी२ पेशी व्यायाम शिबसे शरीर में थकान
न मायूम पड़े ध रोगियों को करते रहना
चाहिये । को अधिक खरमा परिश्रम भी रागियों क
जिये प्रच्छर नहीं है। स्योपों क्षयरोगी स्वास्थ्य लाभत आय
दुल २ स्थायाम भी बढ़ाया जाये । जव मल पत्रिक प्रामाचे तम
युद्ध परिश्रम करने वाली परारत भी हानिमा देशी किन्तु इससे
नांद मायाशी है । श्राहार फ पचाने में व्यायाम यही सहायता
देती है। और तय धानों का थाहार पचमा एक आयश्यीय
यात है ! इस के स्वास्थ्य पढ़ने के साथ इसे मी पहाये ॥
।

हिमायतियों ये शोर में कितनी ही सती बोल साध यात अभी प्राचीन पियो को चिकित्साप्रणाली में घगवरी करने वायक नहीं हुए । हमारे शास्त्रो में तय रोगका कारण कोटगानो को भी माना है परन्तु असे सफ्टर लोग इसके पीछे पड़े है थैमे उन्हों ने इन का वर्णन और परमाद नहीं पी क्योंकि हम की चिकित्सा प्रणाली स्थिरता रपती थी। ये जानते थे कि यिना उपयुक्त भूमि मिले कीटार स्पान नहीं सकते, और उत्पन्न हो भी जायें तो रोग पैदा नही कर सकते इसलिये जो कार गा शरीर को विभाड़ने वाले या कीटों के लिये उपरा भूमि थे उनकी और को नक्ष्य रहा और इस प्री से क्षय रोग में उन्हो ने फीट नाशक प्रयोगो को नहीं लिखा ! यदि उत्तम स्वास्थ्य गृलो में श्रायुर्वेदीय प्रणाली से प्राकृतिक या धातु यतिमी चिकित्सा की जावे तो यास्तयिक लाभ पहुचे । उत्तम चिपिता ग होने क कारण प्राज क्ला स्वास्थ्य गृहो मे रह घर पधिक धन व्यय बहुत में रागी स्वास्थ्य लाभ नहीं कर सकरो । पटुन से अच्छेर डाक्टर इस कीट नाशिनी चिकित्सा के पक्ष में नहा। कर भी + कीटाणुना का नाश डापटा जोग ध्यरोग का मुख्य कारमा कीटाणुओं को मा. मभोग उन नाश करने कोही चिकित्सा का प्रधान सि- धान्त समझते हैं। इसके लिये प्रायः पिजी योपधियां देने है, परन्तु इस चिकित्सा में स्थिर नाम नहीं थे सकता । मूल मितिमी घोर तपन हरक ऊपरी निरिक्षा करना कभी स्थिर लाभ नहीं देना । जैने किसी मरे म कूडा परकर भरा पड़ा है और उन्म में अनेक पीट पैदा होगये है जिन पे कि स्वास्थ्य यि. गहता है ऐसी भषस्था में उनकीटोंको नाश करने जिये विषता छिड़काव या धृपा प्रादि करमा उत्तम या टिकाऊपाय नहीं है क्योकि कीटों को उत्पन्न करने वाला पूष्टा करकर शकि कोटों को पुतः इसन्न कर देगा अभी दूर नहीं किया गया, श- गैर में कीट शुनों को नाश करने क लिये जिन कारणों से कीट उत्पन्न होने हैं उनमें मूर परमारी सर्वोतम पाय। पित्ती औषधियों से कीटों का बीत माश तो होता aff प्रत्युत रसाट धातु और भी fong जाते है। याज ले यस प्रकार पी चिकित्सा से दार ला काम ले रहे हैं पातु जारी सापा अच्छे हो पर भी ये इस प्रणाली से पन्छा लाभ नहीं टिवा स..दि सम प्रहार पिदार की योजना का रोगी हिमोपधि की पखा जाये तो भी हम इसे इस विवली शिविरमा से रामभगे हैं। हमने पटत से धनाढय गेगी समे देने को काटनानी पिचकारी प्रादि जगपाने पर कुछ दिन मम दीख है. एस्तु पीछे की परफिस ! टापटर लांग पाह तिनी ही शेखी मारें और धिमीय चिकित्सा की

हिमायतियों के शोर मे दिसनी ही नती पोल थे पर अभी
घे प्राचीन ऋषियों को चिकित्साशाली मेवरायरी करने बायक
नहीं हुए। हमारे शास्त्रों में तय रोग का कारण कीटाणयो की
भी माना है परन्तु जैसे साफ्टर स्लोग इस पी पदे में
उन्हों ने इस का घीन और परमाद नहीं की योफिस की
चिकित्सा प्रगानी स्थिरता रखती थी। साल कि बिना
उपयुक्त भूमि मिले कीटार पसरते, और पन्न
हो भी जायें तो रोग पैदा न कर मते पसलिये कोकण
शो को विपाइने वाले या कीटों के लिये सर्वा भृमि थे उनकी
कोरीय रक्षा और इसमें सय रोग में दो ने पीट
नाशक प्रयोगों को नहीं लिया । यदि यसमा स्वास्थ्य गृहों में
प्रायुर्वेदीय प्रणाली से प्राकृतिक या धातु यझिनो जिकिरला की
जावे तो बास्तविक लाभ पहुचे । उत्तम सिदिता मक
कारण घास कस स्वास्थ्य ग्रहों में रहकर प्रधियय
यन
में रोगी स्वास्थ्य लाभ ही कर रामरो । यहुन
से मच्छे२ वापर इस कीट नागिनी चिरिसा के पक्ष में नहीं है।
कर भी

(१२)
यायुर्वेदीयमत से
चिकित्सा क्रम
जिन काग्यो से सो रोग उत्पन्न हो उन कारयों को दूर
करमाक्षेप से एस रोगी को चिविरमा है। पहले क्षेत्रों में
यक्ष्मा कारणों का विस्तार वर्णन किया है अतः उन्हें दूर
दरमाही प्रयगंग की पिरिया सम्पयो पहली सीढ़ी। थरका
चार्य में पूछ रोगकारकाप लाइन सधाग्यादि पतताये हैं
सिनहा कि पहले एस्तघा गया है। इन कारणों को दूर करने
के लिये पियरकको उदेष यत्नवाग रहना चाहिये। रोगी,
साइधिक कर्म, और गणेशमा त्याग दे यथा समय जिस भाजन
करे, पोर पाहुघों की वृद्धिदर प्रयोगों का सेवन करे। देद्यक
शाला में पेश जिय नासा हो कि २८मी युदर की मल और
मन की रह arar है जो बैंप का मेदन, या धातुम्रो
कोरला न रागी निर्यल बनाता है वह घिहित्सक नहीं
पहा Asaयोंकि
।
मलाय बलं पुंसां शुक्रायत्त तु जीवनम् ।
तस्माद्यत्नेन संरक्षेत् यक्ष्मिणो मल रेतसी ।।
मनुष्यो का पन मला क, और जीवन बीर्य के प्राधीन है।
इस में यक्ष्मा पाले रोगी को इन दोनों की रक्षा यल से करनी
चदिये।

वैद्यों की चाहिये कि उपयों की विधिया को हुए भी
इन दोनों को सावधानी से देखता रहे किवहीं गगी निरय प्रति
दुर्यल तो नहीं होता, और मन भाय तो महीं है। पल की शांच
कलियरो का प्रति माह रसम राता रहेको मा.
नसिक शक्ति की जांच करता रहे। तो दे दिया टियारे कट
पटांग दया देकर राणी को सुनार राई या कममार -
नाते हैं ये रोगी को मृत्यु के पुल में रखते हैं। पाय गरेगी की
जीबना तय ही तक रहती है जबतक कि यह होता फिरता
और कुछ खा लेता है। पट्याशायां क्षयरोगी बनी ये शाय.
देख्ने नहीं जाते । पचकर्म जो प्रायुर्वेदीय चिरिया का मुरय
अंग यक्ष्मा पालेको तय ही कराया जा सकता है मन तफ
कि यक्ष तियानो को सहलको पाला और यनिष्ठ हो ।

( ४ )
। लाक्षणिक चिकित्सा॥
प्रतिप्याय (जुकाम)
इस राग में अधिश रोगियों को जुकाम ज्यादा होता है
इसलिये प्रतिमाय नाशक मुरुप २ अनुमय में प्राय प्रयागों को
लियते है।
प्रतिष्याप होने पर रोगी ऐप्ती नगद छोपे पा पठे जा वर्षा
का शीतल घायुन चल रहा बाशिरपर गरम कपड़ायाध ले ।
शरीर पर भी प्ण पत्र धारण करे प्रतिध्याय रोकने के लिय
कोई तीपण पोर गरम पस्तु म खावे, पहले ऐसी साधारण
ओपधिपाये जिससे यह प्रासानी से मह जाये ।।
(१) मिमी २yat लीमिरच पन्द्रह दाने ( २)पदारस
२) ताल मिमी) ता. (३) मिश्री ३)ता मुजघटी ६ मा०
कालीमिरच १० दास (४) हं वी भूती २) तो० मिधी)
ता. कालीमिरच १. दाने (५) गुलयनप्ता ३ मा० उपाय
४ दाने मुनक्षा ७दाने मुजेदठी २ मा रतमी ५ पोज २ मा ।
इनमें से किसी प्रयोग को पाप भर पानी में मोटापे जय प्राधा
रह जाये नय छागर पीये। खांसने मे कफन निकलने पर
में० २६गठ म सरास होने पर नं०४ साथ में मुगी खांसी प्राने
पर २०३-- प्रयोगम में लाये यदि मनपा
नाही वाम तो इस शोमी दुनाम पो सूघे-
वर्ग निरन, उसार गुनास, इलायची चिकिये सब
ROR - (२)माजमी, सदाने के पीज,

धाइपिरंग, काली मिरच, इनको बारीक पोस कर राहुन घोड़ो
मात्रा सूई (३)भाग के एसों का स्वास निभान हर तीन
बुंदै नासिका में साले शिर दर्द होता हो तो (१) जून को
बहुत माहीग पीस कर गाद कपड़े में छान ने पीछे उस में थोडा
धो मिलाकर खूब धोटे जय मलहमा घर जाधे सब इसका
मस्तक पर लेप और मालिश करें (२) फेशर १ मा० कपूर
२ मा बादाम को मिमी ३ मा० मिश्री १ मा० इन को पानी में
पीस दो तोले घी डाल अग्नि पर गरम करे जय पानी जल
जावे तब धी को छान कर उस को मस्तक पर मालिश करे और
मासिका द्वारा ऊपर को बढ़ावे ( ३) नौसादर और चना इन
दोनो को मिलाकर शीशी में भरदे पीछे उस में पानी भर कर
मुंह में डाट लगा दे डार खोज कर शीशी के मुंह को नासिका
से जर पार संघे (४) ana कनेर के पुरुषों को घी में घोट कर
मस्तक पर मले (५) रेसुका, सगर, पापा मेद योधा, छोटी
इसायी अगर, देवदार, पालछड़ पएस की मिगी, इन को
पानी में पीसकर लेप करे।
यदि जुकाम से जयर प्रा जावे तो ( १ ) मुनक्का ६ माशे
मुलेठी माशे ६ कटेहरी की जड़ माशे ६ (२) घांस की जड़
६ मा फरहरी की जद म०६ गिलोइ माशे ६।३ मिलाइ
कुटकी, नीम की छाल पटोज पत्र, मोथा, लाल चन्दन, सोंठ,
जो तीन माशे इन में से किसी काय को पाप भर पानी
में औटावे जब इटांक भर रदै तप छान कर पिलाये ।।
जिन मनुष्यो को जुनाम वार २ हो या बना है वे श्रायुबै.
दोष प्रतित प्रयोग जैसे, जातीतादि, लवगादि चूर्ण, च्यवन
माश्य, निकलादि लेद, द्राक्षाय दशमूलाधन भादि किसी
औषधि का सेवन परापर करता रहे।

खांसी
रगेप में सीवपश्य होने और प्रायः सूर्या स्वामी
प्राया परती मी लिये गरम श्रोषधियां नहीं
पानी धादिये । क्योंकि गामबापों से सुन प्रानिक माना है।
तर गरम दवाइयां की प्रतिम लाम नोस्निग्ध पदार्थ
ऐली सांसी में खाम.टिपा एम। यो मे होटप्रयोग गौच
लिजिम सांखी कम हो जाये और प्राप्ताभी से
मिषकी।
वत्लादिकाथ रियरैरो, मुमपका, परेसरी को नए, प्रमे
की अड़ इस चारों औषधियों को छ:
मा मेघर कुचलकर पापभर पानी में औरावे सय टांक भर
रहे सप छान कर शहद माशे' डालकर पीये।
इलायची छोटी, तेजपात, दायमचीनी, मुनका
एलादिवटी
पीपल छोटी, मागे मिधी, मुलेठी,
सरा, किममिग एक २ तोले इन को शहद डालकर भरचेर
परापर गोली पनाने और दिन रात में दर पार पार मुंह में
डाल कर चूसता रहे।
मिर्चादिवटी | गोंद घधून, मुलेहटी का सप्त, मिर्च कागे,
मिश्री इन को कपर न कर पानी सालकर
गोली पनावे और मुह में डाला करे।

यवानादिवटी जगाये को बह पोशर छोटी के चीज, मु.
नका, पाकडालीगी इनको पोस कर
शहद के साथ गोली पनाये और मुंद में डाले।
खरसारादि । पपरिया पात्या ) तोला, नतमो के योज
२)तोला, गोंद ययूल तोला, कतीरातो,
बहे का पान ) तोला, मुलेडी २) तोजा, कपुर माशे ६,
इन फो यारीक पील विटीदाने के माय में घोट कर गोली
बनाये यह नांसी के लिये पड़ा अच्छा प्रयोग है।
शुष्क कासारि चूर्ण कतीरा गोद नाला गोंद यपूर
१) तोला मुलेही १ तोला
यशालाधन तोला १) जोशी की निंगी) तोला इन को पीस
कर दो दी माशे शद में मिलाकर चाटी-
कफावतेह- Jहंसराज तो० १७ मुलेठी नो०१७ यतमी
के पीज माशे ८ उन्नाय तोले ११) जूफा
माशे ६ इन द्याभों को कुचल कर माघ सेर पानी में औटाय
जप प्राय पाव रहे तब प्राध पाय मिनी बात कर चाशनी ले
और शर्यत पना कर चाटता दे।
इसी प्रकार यांसावजेद, यांसाकूष्माण्डावले. मागडा-
पजेह, दासासय, पम्यूलारिट, मृगांक पोटजीरस, सितोपलादि
चूर्ण मान के साथ, लोकनायरस, श्रृंगाराघाटी, प्रादिप्रसिद्ध
भोपधियां भी पढ़ी लाम दायक है।

॥ रक्तागम ॥
क्षय, रक्तपित, उरः हतादि रोगों में बाम के पाय रक
प्राता है। उस से रोगी निर्वज हो भातारक को एक साय
पद करने के लिये कोई एपाय 7 फरे । सहसा रक्त पद परने
से भी दानिशेती है।
(१) स्यूल की कॉल, धनार के पत्ते, प्राग्ले, धनियां, इन
तीतीन माशे लेकर रात पो-बटर भर पानी में
भिगोदे सधेरे मल छान पर मिश्री मा०६ मिना कर
पीये।
(२) लारा पीपला पी दुग्ध में प्रौटा फर या पीस कर शहद में
मिलाकर चाटे-
(३) कच्चे गलर का स्वरस तोले १) शहद माशे ३ मिलाकर
चाटे ।
(४) सितोपलादि चटनी माशे २ नागरेशर माशे २ चोनों
कामिनाकर माखन याजौनी, मिलाकर चटाये।
५) नेप्रधाजा, दमा, धनिया, चन्दन, मुलेहडी, गिला,
पस, प्रहप्ता, एनका छाथ पनाकर पीच ।
६) इयरी पगोजी, कमल को जड़, पमल केशर, मोचरस,
मुनेदठो, पद्माण, घड़की कोपन, मुनक्का, सपना
काढ़ा बनाकर पीये।

७) मुगटी, और दुग्ध प्रौटा कर मिश्री और शहद मिला कर पीये। ८) नेप्रधामा, ससूरा, मुनधा, मुलेठी, फारसा, इनभोपों के काढ़े में मिश्री मिलाय पर पीये। पोस्त के दाने, मादाम की मिरी, इको भिगोकर शीश कर मिश्री मिजाफर पीथे। . १०) नासिका से मधिर गिरता हो तो दूष, अनार की पली, कपूर इनको पीस लेप करे या मासिका से चूचे (२) शिर पर फिटकिरी के पानी से भीगे हुए कपड़े को रखे। इन के अतिरिक्त, उशीरादि चूर्ण, उशीरालय, खंडकाव- तेह, दुर्वादि घृत, गुम्माडांस, जोइभस्म, प्रादि प्रयोग मी ( १०४ ) यदमा के विशेष २ प्रयोगों का वर्णन धनहीन यक्ष्मियों के लिये कुछ प्रयोग * प्रयोग पंचदशी - (१) लघु लोकनाथरस (२) अमृतेश्वररस ३) तय दे. सरी (४) यक्ष्मानक लोह (५) वृहत् वासावलेह (६) जीवल्या दि घृत (७) द्राक्षारिष्ट (८) यत्रूलारिए (पिपल्यालय (१.) मितोपलादि चूर्ण (११) जातिफलादि चूरा (१२) तालीसादि घटिका (१३) ययानो खांडव (१४) चन्दनादि तैल (१५) प्रशो- कारिए। * उपयोग (१) लघुलोकनाथरस) ये थारों प्रयोग पिप्पली और (२) अमृतेश्वर काली मिरों के चूर्ण क (३) क्षय केशरी साथ मधु या मक्खन अथ- था जोमयादि घृत में मिजा (४) यक्ष्मांतक लोह पर घलानुसार महोरात्र में तीन चार बार का न्यूनाधिक जैसा पद्य योग्य समझे सेवन कराना उत्तम है, ये प्रयोग शर, काम, ग्यास अग्निमांद्यादि पदमा के सम्पूर्ण रोगों में उपयोग दराने योग्य है, इनसे पदमा के सय रोगों को लाम होना है।

. (५) वृ० वासावलेह -यह प्रक्लेद प्रहोरात्र में तीन, चार वा अधिकार जैसा वैद्य योग्य समझे सेवन करावे,यह यदमा के चतज क्षयज्ञादि सम्पूर्ण कासों के लिये प्रायुर्वेद में एक प्रमोघ यौषधि है। इस के सिवाय वमन, रक्तपिस, प्रणतय, उर क्षत, दाणश्वास दृदयशूल, पावशूल, प्रावि, ज्वर इन सय रोगों म यह, अवलेह, अपश्य प्रयोग में लाना चाहिये, यक्ष्मा के लिये यह पावलह जीवन स्वरूप है। (६) जीवन्त्यादि घृत-यह घृत यक्ष्मा के पकादशरूपों में सेवन करना योग्य है। इसे भी अहोरात्र में तीन चार घार देना चाहिये । यह घृत यदमा के ज्यर और काम और पाव शूलादि को शीघ्र दूर करता है। और पल को धड़ाता है। (७) द्राक्षारिष्ट-में डालत, दारोग, क्षयज्ञादि सम्पूर्ण कामवाल, काठरोगों में सेवन कराना योग्य है फुफ्फुरुमादि को शुद्ध करने के लिये तथा उनी पलवान बनाने के लिये गह दुसरा अमृत है। इसका प्रयोग अहोरात्र में तीन चार चार कराना योग्य है, यक्ष्मी बुध पथ्य ले चुके तो उस के अनन्तर यह प्रय, श्य पिलाना चाहिये। यह पाचक और रोचक भी है। (८) बबूलारिष्ट -या शुष्क कास को प्राई करता है, पुम्सादि के लिपटे हुए वफ को पादिर निकालता है। तथा प्रतीसार को दूर करता है। प्रमेह को नए करता है । इट को मष्ट करता है। स्त्रियों के प्रदर में लामझारी है । धातु क्षय को म: कारी है। मतपत्र तय, अतिसार, प्रमेह, शुष्क पास वाम में इस का प्रयोग करना योग्य है । यद भी दोशनुमार दो तान चार पार सेवन कराना योग्य है। ।

(१) पिपल्यासव-इसका उपयोग तय की ऐसी प्रास्था मेंकरना चहिये जरक गिरोषतया निकल रहा हो कफ निक- लने से रोगी दुर्वज होगया हो, यह उदर रोग, प्रदणी, पांड, पर्श में भी यथा समय दिया जाता है। चौर यदि साधारण फक निज्जो में १ पार देने से कोई हानि दीखे तो प्रयोग करना योग्य है। इसको परीक्षा कर देतो, यह अग्नि की शक्ति को बहुत शीन तीन करता है। यदि यह सात्म्य दो गरे तीरोगी कोमल पर शीघ्र विघाती है। - (१०) सितोपलादि चूर्ण -यह शइट प्रथमा शहद और घृत में मिलारतीनचारधार चाटनाचाहिये यक्ष्मा के पास श्वास को लाभ पहुंचाता है । रुचि का शीघ्र अन्न पर लाता है। दार हा को सूरदरता है, अग्नि को पल देता है । जबर को शरीर से निकालना है। घत रख इन रोगों में इस का प्रयोग कराना योग्य । (११) जातीफलादि -यह चूर्ण प्रतिसार, संग्रहको प्रालि, प्रतिस्याय, अग्नि मांध, कास, भ्वाक्षादि यदमाके रोगों में उन्Y औरय है। यदमा के दस्तों मेंयकरी के दूध के साथ इसे देमा खमारी है। (१२) ताप्तीसादि बटिका-यद घटी मुझ में प्रत्या समय एस.' से मुन्न पैरस्य, कासादि नष्ट होते हैं।

.(१३) यवानी साराडव-मुख वैस्य, होग, प्लीहा,
पार्श्वशूल, विवन्ध, प्रानाह, फारू, भ्यास में देना परम उपयोगी
है, भोजन रचि उत्पन्न करता है। और साये में सुस्वादु भी है।
(१४) चन्दनादि तैल-शरीर पर गर्दन किया मुसा
पुराने जबर, पुराने फास को लाभ पहुंचाता है । पल और वर्ण
सौन्दर्य को यहाता है । यक्ष्मा में इस तेल का मर्दन कराना योग्य
है। अदना के लिये यह तैल परम प्रौषधि है।
(१५) अशोकारिष्ट-त्रियों की चिकित्मा में उपयोगी
होगा, यदि किसी को प्रदर रोग हो तो यह परिष्ट स्वतंत्र पा
द्रामारिष्टादि में मिजार पिजाना योग्य है।

सामर्थ्यवन्तों के प्रयोगों का
वर्णन
प्रयोग पंचविंशतिश

( १०६ )
।
(३) राज मृगांक-क्षय गेग को सुप्रसिद्ध महौषध है।
तय सम्बन्धी सब विकारों में दी जाती है, अनुपान-पीपल और.
कालीमिचों के चूर्ण के साथ । विषम भाग प्राप्त मधु
और में
मेला ऐना योग्य है-प्रथवा पीपर और कालीमिचों की संख्या
दोर पलानुसार निणींत करत, प्रातः सायं दो समय तो देना
ही चाहिये । रोगी सह सके तो पाधितया ४ यार तक दी वा
मरती है। इसका प्रयोग शल्प मात्रा में करे। प्रारम्भिक मात्रा
१ रती होना योग्य है । पीई रोगी के वला नुसार इस की मात्रा
पढ़ा देना योग्य है।
(४) महा मृगांक-- (५) हेम गर्म पोटली ( ६ ) रत्न
गर्भ पोटली । ७) वृः कांचनाभ्र रस यादि भी क्षय रोग की
सुसिद्ध महौषध हैं। इन का उपयोग राजमृगांकवत् फरना
चाहिये । इन की मात्रा ४ चा० से प्रारंभ करना अच्छा है।
पर देम गर्भ पोटली की विधि इस के प्रयोग में देखो ॥
(८) वृ० वासावलेह -इसके उपयोग के विषय में
जिन चुके हैं।
(१) च्यवन प्राश- (१० ) अमृत प्राशावलेहों का
उपयोग पृ. वासावलेह के समान होता है । पृ. वामावलेह की
अपेक्षा यह अवलेह कुछ शीघ्र फल दिखाते हैं, यह अघलेह
मत्र कृच्छ और प्रमेह को भी अत्यंत लाभ पहुंचाते है।
(११) जीवन्त्यादि घृत- इस के सेवा के विषय में-
-
लिम चुके हैं।

। ( १९० ) (१२) सुश्रुनोक्त एलादि घृत-- यह घृत जीवन नपादि की अपेक्षा शीघ्र ताम करता। इसके सेवन में इतनी विशेषता है कि इस सेवन,पर के दूध अपश्य पीया यह दूध का अनुमान जीवन्त्यादि अन्य धृतों में भी मा प्रशस्ततम है, यह स्त्रियों के मदर के लिये भी उत्तम है। पुरुषों के प्रमेह को भी लाभ करता है । यदमा के लिये एक नगन्यता औपर है। सुचना धार्य इसे रेत प्रातः फाल देने को कहा है। मृगांसादि रम इस घृत फे भनुपान से सेवन किये जाय तो शीघ्र ही बाभकारी . (१३) द्राक्षादि घृत- उरः पात, पास, रास, ज्वर, दाह, पांड, पदर और रक्त पित्त रोगों में इसे सेवन करना योग्य है, यह घतमी सीमत्यादि घृतोदीभांति सेनन पियाजासकता है। सूतो में मुकादि चूर्ण और सुवर्णमस्म डाल देना भी अच्छा है। (१४) द्राक्षारिष्ट (१५) मन्नूलारिष्ट (१६) पिप्प- ल्यास -इन के सेघन की विधि लिसी जाचुकी है। (१७) दशमूलारिष्ट धातु पुष्टि परता है। स्त्रियों फोगी सेवन कराना योग्य है, यी के घर को शीघ्र निकालता है। यह भी [१८] एलादिगुटिका [११] तालीसादिगुटिका- दनों को मुख में रसने से कासमुख परस्प, ज्यर, मचि मादि दूर हो जाते हैं।

[२०] सितोपलादि चूर्म, [२१] जातीफल्लादि
चूर्ण, [२२] यवानी खाण्डव [२३] चन्दनादि
तैल--- इन सब के मेयन की विधि लिनी जा चुकी है।
[२४] लाक्षादि तैल-- चन्दनादि के समान इस का
भी उपयोग
[२५] अशोकारिष्ट-- इस को भी विधि मिल चुके

प्रयोगावली आटरूपादिकाथ-प्रमा, सिग्मको हाळ, प्यरुगंध, मांठ का जड़, इनका हाथ तयरोग में उस अवस्था में लाभ देता है जब कि खांसी, शरीर में दर्द और किसी स्थान में सूजन हो। त्रयोदशांग काथ-धनियां, पीपल, सॉट, 5 मूल, इत्या कथ पार्श्वशुल, भ्यास जुग्राम पौर ज्वरको दूर करता है वात और की प्राधिकता में देना चाहिये । दशमूलादिकाथ-दशमूल, खिरेटी, रायसन, पोहकरमूल, देवदार मोथा, इनका काय पम्पवाड़ा, कन्धा, मस्तिष्क इन के शूल को और तरसत खांसी श्वास को दूर करता है। वत्तादि काथ- सिरेटी, विदारीकंद, स्त्रम्मारी, सेवती के फज, सितावर,सांठकोजड़ान औषधियों को दूध में प्रौटाकर छानकर और शहतमिलाकर पीने से तय शोपादि से दुल रोगी का बल बढ़ता है तथा स्वांसो को नष्ट करता है। दितीयवत्तादिक्काथ-सिरेटो, दोनों कटेरी की जड़, मु. नका, असे के पत्ता, इनक काप में शहद डाल कर और मिश्री डालकर पीने से तय जन्य शुफकास दूर होता है। उपरोक कायों की प्रौषधियां समान भाग लेनी चाहिये। और १ मात्रा दो तोले की यनानी चाहिये । उसे पावभर पानी में प्रौटायो अप घटाफ भर रहे जय हानना चाहिये । मिश्री शहत जो प्रकोप में है उन्हें एक खुराक में चार २ माशे डाजने चाहिये।

१३
मुक्तादि चूर्ण-मोती तोले १, अन्यर ३ माशे, सोने के घर्फ
३ माशे, चांदी के पर्व ६ माशे, फस्तूरी
१॥मागे, पसलोचन ६ माशे छोटी इलायची के बीज ३ माशे पी-
पर के दाने ३ माशे प्रथम मोतियों को गुलाब जया में मरजकर
इस में स्वर्ण और चांदी के वर्क परत करने, पश्चात् सूपने पर
अन्य पौषधियों को दूसरे पारन में घोटकर मिलाले और रसी
चूर्ण को ? तो मसग और ४ माशे शहत में मिला कर क्षय
रोगी उस अवस्था में देवे जब कि यर की मन्द उप्मा हो
रोगी निर्वल हो और कफ की प्रधिरता दो।
सितोपलादि चूर्ण-मिश्री २६ मागे बसलोचन ८ माने
पीपर छोटी ४माशे, छोटी इलायची
फे दाने २ मागे दाताचीनी १ माशे, न सय पो झूट पर चूर्ण
पना ये, इस में से २ मा चूर्ण को एक तोले मन पौर
माशे शपत में मिला फर सय रोग की उस अवस्था में जप
शिशुष्मयांसी, दाह, पाद दाइ, ज्वर अथवा अपचि, दो देये ।
जातीफलादि चूर्ण-जायफल, पायविडंग,चीतको धान
तगर, तिज, तालीसपत्र, चन्दन
सफेद, सोंठ, लोग, कानाजीरा, भीमसेनीपूर, दग्द, घांमने,
पोपन छोटी, घंसलाचन, दालचीनी, तेजपात, इलायचीडोटी,
नागकेशर, यह सय औषधियां तीन २ तोले से मोर मांग २८
तोले जे और सप की परामर मिश्री मिला सप को मूट कपड़
छनकर चूर्ण पगाये। जय पपरोगी को दस्त होते हों या भूक
न लगती हो प्रगति दो घांसी हो उस अवस्था में २ माशे चूर्ण
को६,६ मारो शहत में मिलाकर चाटना चाहिये।
८

( ११४ )
यवानी खांडव-अजमोद अनार दाना, सोंठ, ततडीक,
अमलती,येरखं ये प्रोपथियां वाररमाश
काली मिर्च ढाई माशे, पोपर छोटी १० माशे, दालचीनी, काला
नोंन, धनियों, जीरा सफेद, ये प्रत्येक दो दो माशे और मिश्री
६४ माशे ले सब काचूर्ण करले । यहचूर्ण २ माने जल क साथ,
वय के साथ जप अर्सच हो, दे।
लवंगादि चूर्ण-जोग, कंपोज मिर्च, नस, सफेद चन्दन,
तगर, फमलगट्टा,काला जीरा,छोटीइला-
यची कालानगर, नागकेशर, छोटी पीपल, सोठ, बालवड, नेत्र
घाला, कपूर,गायफल, पंसलोचन.ये सप औपधियां पराबर २जेवे
और सष की प्राधी मिश्री मिलावे। यह चूर्ण १० माशे से
२माशे तक शहत के साथ दे । यह चूर्ण दाह, अवि, घर को
दूर करता है । वीर्य पदक और जठराग्नि प्रदीपक है।
द्राक्षादि चूर्ण- मनका, खोज, मिश्री, मुलेठी, अजूग,
सारिवा, घंसलोचन, नेत्र घाला, प्रमिले,
मोपा, चन्दन सफेद, पालछड़, कोल, जायफल, दालचीनी,
तेजपात इलायची छोरी, नाग केशर, पीपल छोटी, धनियों ये
सप मोवधियां समानमागले और सवदीगर मिश्री मिला।
इस दी मात्रा २ माशे से ६ माशे तरुई, अनुपान जल ष दुग्ध
क साय पित्त, पित्तदाद, मूळ, चमन, प्रचि, क्षय, वर,
रफपित्त, और रक विकार के लिये देना चाहिये।
करादि चूर्ण-पूर, दादाचीगी, कोल, जायफले,
तेजरात यद समागभाग लेये,लोंग १ जटामांसी २ कालीमिर्च
पीपल ४ सोउ भाग ले और सय भौषधियों क घराघर मित्री
मिका पड़ इन पर चूर्ण बनाये इस की मात्रा १ माशे से

माशे तक अनुपान शहद घ दूध के साथ | यह चूर्य उदय को
हितकारी, क्षय, बांसी,न्यास और ठ रोग नाशक है।
रास्नादि चूर्ण---गस्ना, कपूर, ताजीसपत्र, मजीठ, शिक्षा
जीत, त्रिकुटा, त्रिफता, मोथा, पाय
रिंग, चीतेकी छाल, ये अौषधि समान भागो और जोहमस्प
१४ भाग ले सय को कपड़छन कर चूर्ण करले। इस चूर्ण की एक
माशेमात्रा शत माशे ४ मोर धीमाशे में मिला कर क्षय की उस
अवस्था में दे जब कि शुक बांसी और रोगी बन हीन दो।
यकृत, तिल्ली. बढ़ गई हो पेट में दर्द और अग्नि मन्द हो कफ के
साथ रक्त जाता हो।
उशीरादि चूर्ण ...पस, तगर,सोट, फंकोल, चन्दन, दोनों.
लोंग, पीपरामूल, पीपल छोटी, इलायची
छोटो, नाग केशर, मोथा, प्रविला, कपूर, तबाखीर, तेजपात,
काला भगर, ये समान भाग लेवे तथा इन सयका प्रहमांश
मिश्री मिजायचूर्ण करे । यह रक्त पांति (खून की धमन) और
दय का संताप इन कोनर करता है। मामा २मागे से ६ माशे
तक अनुपान जल घदूध।
तालीसादि चूर्गा--ताजीमपत्र १ साली मिर्च २ सोंठ
३ पोरज छोटी ४ धंस तोचा
* दाज चीनी प्रर्य भाग, इलायची छोटी प्रभाग और मिश्री
३२ भाग ले चूर्ण करे यह सूर्ण यांनी यास, अचि, हदयरोग,
शोर, ज्वर का नाश और अग्नि पर्धा
एलादि गुटिका-इलायची होती ई मागे तेजगत ६ मा
दावाचीनी ६ मा मुनाका पार पा
मोटी दो दो तोले मिधीर ताज्ञे मुलेठी ४ तोले सजूर

किशमिश तोले इन को पीसकर शहन में गोली मार के पायर बनाये । हम गोलियों से उनसत, शोप, घर, हुक सांप्ती, तृपा, अरचि, सरभंग ये सप नष्ट होते हैं। सूर्यप्रभा गुटिका-दारहल्दी, मोंठ, काल मिर्च, पोपल छोटी, वायविहंग, चीतेकीहाल,यच, हल्दी, पंगा, गिलोइ, देवदार,प्रतोस, निसीप, मुटशी, धनियों, अजमायन, जराधार, सुदागो, सेंधानमक, कालानमक, कच- सोना, गलपीपल, चव्य, मिलाये, ताजीसपत्र, पीपरान्ल, पोहकरमून, चिरागता, भारंगी, पदमास, जीरा सफेद,जायफज, पुढ़ा छाल, दंती, मोथा, ये प्रौषधियां एक एक तोला ले और विफल्ता २० तोला शिलाजीत २० तोला गूगुन ३२.तोले कोहभस्म २८ तोले स्वर्ग माक्षिकमस्म ८ तोला निधी २०तीजा यंसलोचन, दालचीनी, तेजपात जायची छोटी ये औषधियां चार चार तोले से, और सय पा चूर्ण एना घी, शहत में पीस गोली मारवेर के पराएर यमावे। जित रोगी पो तय के साय घीय विकार भी हो उस के लिये यद अतिबास दायर और खांसी उरतात शोप मंदाग्नि को दूर करती हैं। च्यवनप्राश्यावलेह-मालपर्णी, प्रष्टपी, फटेरी दोनों को जड़,गोखरू की जड़,बेल की जड़ की छाल, अग्निमय, श्योनांक नम्मारी, पाठा, खिरेटी, मुग्दपर्णी, भापपणी काकड़ासिंगो, भूमिधामला, मुनका, जीयन्ती, पोदकर. मूल, अगर, हरड, गिलोर जीवा, ऋषभक, ऋद्धि, कचर, मोथा, सांठ को जड़, मेदा, इलायची छोटी, कमलगा चन्दन- सफेद, विदारीकंद, बांसे की जड़, काकोली, काकनालायें प्रत्येक चार चार तोला, प्रांरले ५०. मग, जज १ द्रोण ( १६ सेर) शेषजज एक मादक घृत २० तोला, तेज सरसों का २० तोले, .

मिश्री २०० तोले, शहत २० तोले, घसलोचन १६ तोला, पीपल- छोटी ८ तोला दालचीनी, इलायची छोटी, नागकेशर, ये सब ४ तोला लेये ॥ बनाने की विधि शहत प्रथम शासपा से फापनासा तक औषधियों को जौटकर मामले पानी के साथ एक गागर (मदका) से भर फर प्रौटाओ बब चौथा शेष रहे जय श्यामले निशात अक्षम ने धौर दया मं से पानी (हाथ) अलग निकाल ले । उन उचाळे हुये मामलों दो मथ और गुठनी निकाल कपड़ा में धान ले, और घृत, तेल, दाल चीनी दी पढ़ाई में प्रांमते के गूदे भून फिर काय (जो भांमले के साथ औपधियां औटाई गई थी) में मिश्री डाल चासनी करे जय चासनी होजाये तय पंखलोचन से नाग केशर तक औषधियो को कूट कपड़छन कर मिलादे तथा और भूना मामले का गूदा आर अवलेह तैयार करे । यह प्रयलेह पर एक तोजे दूध के साथ राय रोग की उस अयस्था में दे जब कि रोगी दुर्यज हो, बात पित्त की खांसी घी, दाद हो, वीर्य विकार हो, पफ साध रक जाता हो, कंठ का स्वरशीय दोगया। वामृत प्राश्यावलेह -गाय पाउन्ध, घामले, वि- सरोद, ईश, और क्षीर वृक्षों पारा एक २ सेर घी, एक प्र; मुजेठी, ग, मुनका, दोनों चरन, सस, मिधी, कमलगट्टा, मामा प्रत, पदमाख, व्यासपीजड़, यम्भारी, रोहिपतृण, येसर औषधियां कार्य डेदर तोने ले, घृत पाफ निधि से यो सिर पग्ले, पीछे इस घी में माघ सेरशात भोर मिधी सेर सपा दालचीनी, इलायची छोटी, तेजपात, नाग देशर दो दो गोले को चूर्ण घर मिळाले, इसे अमृतमाश्यापोह रहते है।

( ११८ ) एक तोने अवलेह दुग्यशे साथ पिलावे। इससे रक्त पित्त, सत क्षय, वास, खांसी, अरुचि,दिचकी,मूत्ररुच्छ और स्वर दूर होते हैं, और पलवर्मक है। वृ० वासावलेह- -बांता ४०० तोले को एक द्रोण (१६ सेर) पानी में पकावे चतुर्थाश शेष रहने पर उमार कर छानले । पुनः इस जज में ४०० तोले मिश्री मिलाकर मन्द अग्नि को चासनी अग्लेह को करले। और सोंठ, मिर्चवारी, पी- पाछोटी, इलायची, दालचीनी, तेजरात, कायफज, मोधा, फूट, जीरे दोनों निशोथ, पीपरा मूत, चव्य फुटकी, घामले, ताली- सपत्र, धनियां, यसलोचन, ये सय प्रोरधियां दो २ तोलेले चूर्ण कर मिलाले और शीतज होने पर ३२ तोला गहन मिना कर अवलेह तैयार करे । इस अवलेह को रोगी का बलावला विचार १ तोले से २ तोले तक गरम (गुनगुने ) जल के लाय तय- रोगी को दे। यह अवलेह उस अरस्था में प्रति लाभ देना है, जबकि फांसी की अधिना हो, दस्त साफ न होता हो, सोर प्रतिमन्द हो। बलादिकृत-सिरेटी, गोपा, कटेरी दो जह, पृष्ठ- पर्णी, शालपणी, नीम की छाल, पित्तपापड़ा, मोथा, श्रायमाण, अवासेकोजड़, बड़ी पटेरी, हरड, पा, मुगावा, पोहकरमल,. मेदा प्रांवना ये मय प्रौरधियां दश २ तोले लेकर ६॥ मेर पानी में घोटामो जप सेर रहे तव धान कर उसमें दूध गाय का २= सेर और धो १-सेर डाले और भूमि प्रांवला, कचूर मुनक्का, पोदकरमूज, मेदा, मामले साढ़े तीन तीन तोलत कल्क बना घृत सिर करे । इस घृत के सेवन से उबर, जय, कास शिर और पसगाड़े का दर्द दूर होता है।

जीवत्यादिधृत-जीती,मुलेठी, मुनक्का, इन्द्रजौ, कचूर, पोहकरमूल, कटेरी की जड़, गोमर, खिरेटी, नीलोफर, भूमिप्रायला, प्रायमाय, जवासेसीजड़, पीपलछोटी ये सब औ. पधियां पांच २ तोलाले चार सेर जल में प्रोटावे जमसेर रहे तप छानकर बकरी का दूप२ सेर दही सेरधी पक सेर मिलाकर पकावे जब घृतमात्र शेष रहे तम छान कर पख्ने । यद धृत तय रोग के ११ उपद्रवों को दूर करता है तथा नस्प लेने से शिर रोग दूर करता है। कोलाद्य घृत-वेरपी लास का रस १ सेर,घृत एक सेर, दूध प्राधसेर, और वायविडंग, दारुमल्दी, दालचीनी, भलरोटे, पजूग, फाजसे, मुनका, मुलेठी, पीपल छोटी आप दो २ तोले ले कलक बनाकर मिला पदावे जप घृत मान शेप रहे तप छान कर रक्ने । इस में खांसी कफ के सायरक का भाना स्वाभेद, श्याल, ज्या नष्ट होते हैं। गोक्षुरादिवृत-गोश, जयातो, शातपर्णी,पृष्टपी,गुद्गपर्णी मापपणी लिऔटी, पिरापापड़ा, पर एक छाकपानी ५ सेर में प्रौटाओ। जन प्राधसेर पानी शेष रहे तप छान फर फचूर. पोद- करमल, पीपल, बापमाण, भूमिमांधला, विरायता, कुटकी, सारिघा, ये सब तोजाले। इन औषधियों का फल पाये। और घृन एक सेर दूध २ सेर डाल कर पचावे जय घृत मात्र शेप रहे तष छान कर रपये। इस घृत से ज्वर, दाह, श्वास, पसलो और मस्तक का शूलधादित्य के उपदय दूर होते है। नोट- कोजायत में बैर की जाय का रस निखादै उस के बनाने की विधि यह है कि एक सेर लाक्ष को चार सेर पानी में मोटामो जव १ सेर रहे तव लान लो। और प्रौटाते समय सम्जी, सुहागा लोध दोर तोले डालना चाहिये।

( १२० ) एलादिघृत-जायची छोटी, अजमोद,भामजे, हरह,पदेड़ा, खैर, नीम, विजे शाल, (बर से शाल तक चारों का सार लेना चाहिये सार न मिजे तो छाज लेना) वायग, भिजाये, चित्रक, त्रिगुटा, मोथा, गोपीचन्दन, ये सब भाउ पाठ पन ले सोनह गुने जल में पचावे । जप सोलयां भाग शेप रहे तप छान कर एक सेर घी डाल कर पचाये शव घी मात्र शेप रहे तंद शान कर २ सेर शइत, इटांकसलोचन का चूर्ण, और एक सेर चौदह छटांकरिधी, मिलाकर ई से अच्छी प्रकार मथ कर एक रस परले । यह घी दो तोले दूध के साथ खिलाये इसके सेवन करने से यक्ष्मा रोग दूर होता है। इससे वल, वीर्य बढ़ता है। मुश्रुतीत यह घृत परम रसायन । द्राक्षादिघृत-मुनधा कालो एक सेर, मुलेठी प्राध सेर, जो फुट कर ६ लेर पानी में प्रौटामो जप १॥ सेर रहे छानकर उसमें नुलेठी ४ तोला मुनक्का ४ तोला पोपल छोटी ८ तोला का पल्क बना घी १ सेर दूध ४ सेराज पचावे। जब धी मागेर रहे तब छान कर मिश्री प्राध सेर को पीसकर छने भये यो में मिलाये यह द्राक्षादि घृत क्षय, क्षत, सांसी, फ. नाशक पोर पल वर्धक है। लागलाद्यघृत -पकरे का मांस (सस्सी बकरा)। सेर १६ सेर जल में पाये जब ४ सेर याकी रहे तश एक सेर धी जीवनीयगय को प्रोरधियां इटांझ२ भरले फरक बना कर, पकावे जय घृत मात्र शेप रहे तय छान कर शत पाय भर, मिलाये यथा शनि मात्रा देवे । इस से आय, उरातत, का श्वास, पार्श्वशून, घरचि, सरभंग, हृदयरोग दूर होते है जोलोग

(११)
पिलायती मछली का तैल सेवन करना पसन्द फरसे है ये इस
मायुर्वेदीय घृत को सेवन करें अनुभव से जानागया है कि यह
घृत मछली के तेल से अधिक पल वर्धक और क्षयरोग
माशा।
चन्दनादि तैल- चन्दन सफेद, नेत्रवाला, नस्य, कुद,
मुलेठी, मोर, पदमार, छार छोला, रहस, देवदार, कायफल
गंधेल घास (पूत झेशर) तेजपात, इलायची छोटी, वानछड़कको
ज, फूलप्रयंगु, मोथा, हल्दी, दामहल्दी, सारिवा दोनो, फुदकी,
लोग, फरार अगर, दालचीनी, रेनुका, ये प्रत्येक तीन २ तोना
पौर दही का तोड़ दीस सेर तेल ५ सेर लाख का रस ५ सेर,
सय को पत्र पर पचावे अब तेज मात्र शेष रहे तय छान ले
इस तेल के मर्दन से चल चढ़ना है शरीर कान्तिवान होता है
क्षय रक्त पिछ नए होते है। धातुमा में प्रविष्ठ हुमा ज्वर बाहर
निना।
चन्दनादि तैल-में जो लास्त का रख लिया है वह इस
प्रकार बनाना चाहिये कि लास २॥ सेर मज्जी आधपाव सुझगा
भाध पाव लोध प्राय पाच बेरकी पत्ती 5 सप हो जौकुट पर
पोममेर पानी में भौटाम्रो जय ५ सेर रहे छान जो यही प्लस
पारस।
क्षागताघवृत-में जोजीनीया ई सी घोपधियां याद
जीवक, सभा, मैदा, काजी, मुलेटो मापनी, मुह
पण, जीवन्ती, औषक, अपभ के प्रभाय म गिलो वंशा-
चन मेदा के प्रभाव में प्रसगंभ और हांकोजी प्रभाव
में सितायरनी चाहिये।

( १२२ ) अश्वगन्धादि तेल- -सांध, खिरेटी,लाख, ये तीनों एक२ सेरळे जौफुट कर एक द्रोण (१६ सेर) पानी में भौटाये। अब चौधाई पानी शेष रहे तब छान कर तैल तिलका १॥ सेर द होका तोड़ ६ सेर और पसगंध, हल्दी, दारुहन्दी, रेनुका, कूट, मोथा, चन्दन, देवदार, कुटकी, सिताघर, लाख मर्या, पीपरामल मजीठ, मुळेठी, खस, सारिका, ये प्रत्येक प्रौषधियां पौने दो दो तोळेळे पक्षक पनाकर सबको अग्नि पाय पचावे जब तेल मात्र शेष रह जाये दान। इस तेल की मालिश से यक्ष्मा, ज्वर, पास, श्वास, दूर होत हैं धातुओं की वृद्धि होती है। लक्ष्मी विलास तेल-ळायची,चन्दन,रास्ना,लाल, न- स्त्र, पूर, कंकोल,मोथा, खिरेटी. दालचीनी, हल्दी, पोपळ हो. टी, मगर, तगर, जटामांगी, फूट ये प्रत्येक प्रौषधियां एक २तो- ला और काली र ३ तोला ले,समरू यन्त्र से तेल निकाल ले। यह तैन मुगंधयुक्त है पान में जगाकर सेवन करने से कफ को दूर कर जठराग्नि सो दीप्त करे और शरीर से मालिश काने पर सय,वषासीर को नए कर स्त्रीपुरुषों में प्रीति उत्या करे। दानारिष्ट-मुनक्का २००तोले ले ३२ सेर पानी में औटावे जब ८ सेर पानी शेष रहे तप छान कर १२॥ मेर गुड़ डाले और दालचीनी, इलायची छोटी, तेजपात, नागरेशर, फूल प्रयगु, काली मिर्च, पोपर छोटी, वायविडग, ये पाठ औषधियां चार २ तोले डाल कर चिकने शासन में भर मुख बन्द कर एक मास रफ्षा रहने दे। १मात पश्चात साफ करबोतलोंमेंमरते। पद अरिफ को निकालने घाला, फेफड़ो को साफ, और पुष्ट करने वाला, कान नाशक, वन वर्धक, और तय नाशक है। द्राक्षारिष्ट-में अनेक पैच धाय के ज़, मुनकों से चौधाई भाग डालते है बबलारिष्ट-प्रयूज को छाल २ तुजा ( अर्थात् १२॥ सेर) को जोकुट का ६४ लेर पानी में औरो, जब १६ से रहे छान कर १८॥। सेर गुड़ डाले और धाब के फूल ६४ तोले पोपल मोटी ८ तोले, तथा जाय फस, ककोल, लोंग, इलायची छोटी, दालचीनी, तेजपात नागकेशर, काली मिर्च, ये सोपधियां वार २ तोले ले सब को चिकने चासन में भर कर मुख बन्द कर कमाल रक्खा रहने दे।१ मास पश्चात साफ़ कर बोतलो में भरले यह छारि-फफ को निकालने पाला, दस्त को बांधने पाला कास नाशक है। दशमूलारिष्ट-दशमूगा २०० तोले चीते पी छात १०० तोते पोहकर मूल १०० तोजे जोध ८० तोले, गिलोर ८० तोले, अामले ६४ तोले, जयासे की जड़ ४८ तोले खैरसार ३२ तोले, विजेसार ३२ तो हड़कायकात ३२ तोला स्ट, मजीठ देवदार, वायविडंग, मुलेठी, भारंगी, फैथ, बहेड़े का यकज, सांठोकीजष्ट्र, वालछड़, प्रियंगु, सारिवा, कालाजीरा, निशोथ, रेनुका, बाय सुरई, पीपज छोटी, सुपारी, कचूर, हल्दी, सोंफ, पदमाख, नागरफेशर, मोथा, इन्द्रजो, कार हासिंगी, ये औषधियां पाठ २ तोले और प्रवर्ग ६४ तोले ते, सय को जौ पुटकर ठगुने जला में काथ करे जब चतुर्थाश रहे। तय छानले, फिर मुन २५६ तोले जे चौगुने जल में पचावे जय चतुर्थाश शेष रहे तय छान का कार के कार्य में मिजादे । और धाय के फुल १२० तो० शी- सालचीनी, प्रस, चन्दन सफेद, जायफत, लोग दालचानी,इला पची छोटी, तेजपात, नागसर, पीपल छोटी, ये कप मठ पाठ तोले और कस्तूरी ४ माशे बाजकर चिको शासन में भर मुख रन्दका एक महागाधरारहने दे पधात् छानकर निर्मली राज साफ कर बोतलों में मरने यह भरिट मात प्रधान दयफ लिये तथा न- मा प्रतिश्याय के लिये प्रति लाभ दायक तथा रख पर्धक है। चम्प, ( १२५ ) वांसारिष्ट से के पतों का स्वरस १०० तोजा मन- संजीवनी सुरा १०० तोले मुलेठीकासन्य २ तोला कपुर १ तोला प्रफोम १ तोला भारगी १ तोला बहरेपायकल २ तोला लोग २ तोला जायफन १ तोला इलायची छोटी २ तोजा मिचकारी १ ताजा तालीसपन)काकड़ासिंगो १)मिश्री ४० तोजा इन सब भोपधियों को जो इट पर चिकने पास में पर मुजचन्दकर १ महीना रमसा रहने दे। पश्चात् छाग कर साफ करने बद अरिष्ट बढ़े हुये क्फ को नष्ट कर सांमी को दूर करता है तथा सय, ज्वर, प्रतिश्याय को नए करता है। चित्तचन्दरासव-मोथा, मिचकारी, घन्य, चीते को की छान, हल्दी, पायविङग, प्रामरे, पप, छारदयीला, सुपारी, सोध, तेजपान, धर्षतिकात, चन्दन सफेद, तार, पालछह, पदाल, दरवीनी, गोटी, नागर, ये प्रत्यक मौरधिको प्रहर माने ले भौर धायज ४० तोला मुगमा ८० तोला गुड़पुरानो १५ मेर जल २६ र डर चिकने वासन में भर मुस बन्दकर पक मास रखा रहने दे पश्चात झन रगफ कर दोनों में भर रक्ने । पद चिश चन्दामर सिसभपज्यमणिमाला में मुद्रित है और कफकाश य नाश और घजयक। बांसारिष्ट-भैषज्यालायली में लिया है। किन्तु उप में मृतसजीवनी गुरा और घांसेरास्य रस आदि २-३. श्री बधियां है पर हमारे प्रौषधालय म पराच विंशप प्रोषधियों भाग पनाया जाता है यदी सर्घ साधारण के नाम लिये प्रका शिा कर दिया है पेच महानुभावों से प्रार्थना है कि वह बांस रिएधना अपने रोगियों को दे इस रे खाम दो देने । मृतसजी- मानि N वी सुरासिय भ (१२) नृगांकपोटलीरस -पारा १ भाग स्वर्ण केपर्क माग माती २ भाग गंधित शुद्ध २ भाग, सुहागा चौधाई भगा प्रथम पारा चौर स्वर्ण के धर्क घोटे जवस के कगा न चमचमोती साल पर चोटे जश्च सूब पारीक हो जाये तय गंधिक सुहागा बार बार घोटे और पसर एक हो जाये तब कांजी डाल दो पर चोट कर टिकिया बना सुयानापश्चात् सरार सम्पुट कर लवण से पूर्ण किये हुये पतन के बीच में रस ८ पहा की अग्निदे मांग शीतज छोन पर निकाले। यह गांक पोटलीरस उस अवस्था में देना चाहिये जब कि जय, ज्वर, पासमन्दाग्नि, मशी, के साथ में रियलमा अधिक हो । यस समय देने से पहा लाभ देता थे। स्वर्णमालतीवसंत-स्या के पर्ष, १ मामा मोती २ माशा काली मिर्च धुली भर ३ माशा शुद्ध सिंदफ ४ माशा पर शुद्ध ८माशा (अभाव में पराद गहर) गाय की लोनी ६ माशा सब यो परत कर पारीक परले पश्चात नीबूचा रस डाळ परत करे। अय तक गाय की लोनी की चिनाई न न हो जाने तप तक की का प्प डाज घोटवारहे। जय चिकनाई न रहे तब टिकिया समा सुबाले । यह सर्व प्रकार के स्वर कोक्षय को खास कफ को नष्ट कर थल बढ़ाती है। वसंत कुसुमाकर-प्रजमस्म, रससिन्दूर, मोती, पवन मस्म चार चार माशे, रौप्यमल्म, स्वाभिरम, दोदो मारो, लोह- मस्म, नामस्म, पंगभस्म तीन तीन माशे ले । सा को मिला परतफर भट्टले के पतोंकासास, हल्दी काकाथ, ईस का सरस स्वर्णमालती बसंत में माज कल अनेक घेद्य अच्छाप माजी पर न मिलने से शुय यशद भस्म पालते हैं।

कमल के फूलों का खास, मालती के फूलों का स्वरस, केला
पी जास्वरस, अगर का काथ, चन्दन सफेद का काथ इन
मोपधियों की प्रजग २ सात २ भावना देवे । यह बसंत कुसु.
मावर रस उस अवस्था में प्रति लाभ देता है जबकि क्षय के
साथ वीर्य विकार हो, कास के साथ कफ की अधिस्ता हो,
घलहीन हो।
A
राजमृगाङ्करस-पारे की भस्म ( रससिन्दूर )३भाग स्वर्ण
भस्म १ भाप तानभस्म १ भाग मनसिज २ भाग शुद्धधिक
२ भाग हरताल २ भाग सा पो पारीक चूर्ण कर पीली पड़ी
पौड़ियों में भर, बकरीझादूध और सुहागा पीस कौष्टियों का
मुस पन्दकर सुखाये। सुखाने क पश्चात् मट्टी के बर्तन में रम्ब
उस का मुख बन्द कर गजपुर में फूकदे स्वांग शीतल होने पर
मट्टी के बर्तन को अलग कर कौड़ियों सहित रस को पीसने
यही रागमृगांकरस है। अनुपान कालीमिर्च पीपल, घी, शहद,
यह रस कफरमान तय के लिये प्रति लाभदायक है।
अमृतेश्वर रस-पारे की भस्म ( रस सिन्दूर ) गिलोर का.
समाळोदारमान तीन औषधियों को समान भाग मिळाने से ही
अमृश्यर रस पाना है यह रस उम अवस्था में जय कि क्षयक
साथ परम विगारो लाभ देता है।
हमगर्भ पोटली रस-गुर पारा पा तोळा स्वयं के वक
३माशा गधिक शुद२॥ तोला ले। क्यमार के रस में सरल
घरगोजा घनाय सरारसम्पुट में बन्दर कपड़ मिट्टी पर सुखा-
घर भूधर यन्त्र में पचावे स्यांग भीतज होने पर निकाल उसके
समान जुधिक मिला अद्को स्वरस मोर विश्क की जर

के काथ में म बना देकर सुखाकर पोसळे फिर पीळी घड़ी कौड़ियों में भर सब प्रौषधियोंसे प्राधा भागमुहागो और चौथाई भाग सा- गिया के दोनों को शूबर के दूध में पीस कौड़ियों के मुखों को वन्द कर दे। और पाहाडी जे उस में प्राधा चूना (कलई ) भर कौडियों का रख फिर चूना भर हांडी का भर दे और हांडी का मुख यन्दकरगजपुट की अग्निदेजर शीतल हो जावेतव सावधानी से हांडी में से कौड़ियों को निकाल बरळकर शीशी में भर रखे। यह हेम गर्भ पोटली रस कफ प्रधान रूप में दे। हम गर्ग पोटटी रस की सेवन विधि व पथ्य पृ. लोकनाथ रस के समान है। तथा इस में भी विशेषता यह है कि ३ दिन अधिक निमक न पाय जब इस औषधि से उलटी (IT) होने लगे तय गिलोड का काथ शहत डाल के देवे इस से उलटी पाना यन्द हो जाती देकफ का अधिक प्रकोप हो तोशहत और अद्रक का रस मिला करदे दस्त होने लगे तो भांग को घी में भून दही मिलाकर देवे, तोदस्त पन्द हो । यह रस कफ प्रधान तथा घायु प्रधान क्षय को नएर मनि को प्रदीप्त करता है। वृ० लोकनाथरस-युमुक्षित पारा २ भाग शुद्धगंधिक २ भाग ले पनी फर पारे से चौगुनी पीली कौड़ियों को ने इस में पानी भर दे। और सुहागा १ भागले गौकिदूध में पीस कौड़ियों के को बन्द करदे फिर शंप हुड़े ८ भागले और मिट्टी के दो सवा ले पक में चूना भर के उस के अगर शंख के टुकड़ा ररत कौड़ी रप कार ले फिर शंस के ट्रक र फिर चूमा दायर के भर लत्वा इस कपड़ मिट्टीकर एक हाय के गड्ढे में पारणे एसा भर धीच में सम्पुट को रन प्रग्नि । स्वांग शीतल हो ने पर चूना से हौटियो को प शेराको निशन परत में घोटकर ( १२८ ) शोशी में भरले। इस दृ० लोक नाथास की मात्रा १एक रची से ६ रत्तो राक है।१९ फालीमिच के पूर्ण में मिला यात प्रधान तथ में धोखाध पित्त प्रधान सय मजन के साथ और एक प्रधान क्षय में शहन के साथ देश तथा प्रतिसार,जय,प्ररचि,संप्रदयी मन्दाग्निस्तांसी,भ्वास,गोला, इतने रोगों में भी इस रस को दे।इस दोसेवन दरघी मात के ३ ग्रास साय फिर शय्या पर विना विदया के एकतर मात्र चित्त लेट जाये। हे पदार्थ त्याग पर घृत में मोशन करे । तथा उराम मोठा दही भोजन में साय । सायंकाल में जब भूख लगे तब दूध भात खाय। तिज घामळे इनका पदक करके शरीर में माळिरा कर के रनान करे । स्नान को सळसुहाता २ गरम रे। तेळ का परी भी न करे । पप से रहे । शुम दिन शुभ पार पूर्ण तिधि गुल्ल पत्त और जिस दिन रोगी को भन्दा चन्द्रमा को उस दिन लोक नाथ रेसकी पूजा करे । न्या को भोजन करा,स्वर्ण प्रादिकादान दे,लोकगाथरस का सेवन करे। और विशेष विवरण वृहन्नियटुरत्नाकर, शारंगधर मादि प्रन्यों में देखिये। समाप्त O श्रीमान् लाल नारायणदास राधावल्लभ जी वैद्यराज के श्रीधन्वन्तरि औषधालय की नाम औषधि मूल्य १४) .." खं सिन्दुर तसिन्दूर ... ... ४) २५) तोक्ष करध्वज वर्णघटित परगुण पनजारित १ तोला १तोला २॥ तोता सिन्दूर १ तोला गोमम (मोती को मिश्रित भER) माशे .... यस्म (पारटयोग से निपथ) ३माथे प्य महप-पारद योग से १सोला हरिलाल योग से छापर्ण २ तोजा समस्म-पारद योग से २ तोला धियो से छपरा पर्य * तीक्षा दन्ती एरिनाल सम्म तोता दमरम (दरदयोगेम) साधारण १.तीजा ... ... २) .. २) ... " P.

... ... ५ तोला १० तोला तोता १.तोला ... ... ... १० तोला ... ع ع ع ع ع ع ع ع ع ع عی ... ... ... अमूक भस्म (ल्युटी) (२५ पुटी) चंगेश्वरलहरिताल योग से छप्पापर्य) चंगमस्म श्वत नागेश्वर-(मशिल योग से हमाण)- ५ तोला नागमस्म-पीतवर्ष नियंगमस्म-(नाग, बशद, पंग की मिश्रित भस्म) ५ तोजा स्वी वंगमस्म १ तोला यशभस्म १ तोला प्रयालमस्म (मूंगाकी भस्म) ५ तोला मांडूर (कीट) भस्म (रतवर्ण) तोला कृपा १० तोता मालतीवरूंत-परादभस्ममित्रित १ तोला वसंत कुशुमाकर ३ मा चन्द्रप्रभावटी (लोइमरमशिलाजीत मिश्रित) २० तोला पृ० योगराजगुग्गुल (सतधातुमिश्रित) २० तोजा ५०.गोजी प्रदात पचामृतरस ५ तोला उपरोक भोपधियों के अतिरिक्ष और मी धातु उपधातु पी भस्म, रस, गुटिका उपरत्न मादि भी तैयार है। अवलेह 0 च्यवनप्राश्य (काल, प्रय, रक पिस,नाशक) १सेर" ३ फुशाषक्षेद, यांसाष मासापोए कंटकायापलेह बाद दापले, प्रादेतीम २ रुपये मेर। ... ... ... योगजगुग्गुल ... ... ...

(७)
-अरिष्ट और पासव
पारमेर ॥
मृगमदासय (सन्निपात-विधिमा रोग नाशक) पापसेर ।।
लोहालय (पांडु-शाय गुल्न गादि गाशक)
। दसैर ३॥
कर्पूरासष ( विशूचिका शूज-त्रादि गाशक),
এছফনামায় (মাহি-বাৰ যিসূঙ্কিা
धादि नाशक)
युमारी प्रासथ (गुल्म, दीयों के प्रस्तुदोगदि ना०) पांचमेर २॥
पनकासच (फाल,श्वास,रफ यादि नाशक)
५ र २)
पसोराप्तय (रक्त पिस-क्षययादि नाशक)
२७
दशमूलाराम (मसूतदोष नाना-सवर्ध)
२रोग
चन्दनासप (भूविकार, मुरगाश )
पांसारिट (पास, श्वास, व्यगक )
प्रमोशारिध प्रदर स्त्री रोग नाण)
सारस्वतारिश (सटित) मस्तिपाकि
स्मृतिप्रति वर्ष और धार्य दोष नाशक
द्राक्षारित (साय-कास-दिस र नाराष)
उपरोक्ष प्रासप पारियों के प्रतिरिफ और भी प्रापयरिए
सैयार रहते है जमे अमृतारिए, कुटजारिश, प्रसपाट प्राधि
परिए पासपों साप जी बोतल सारोन के सिम्पादिमागे
जनपा मुत्र प्रादों को प्रधान देना होगा।
५ सेर २७
वाघर)

... ... ... ... " ... ... ... ... अमूक भस्म (शतपुटी) ५ तोला (२५ पुटी) १० तोला चगेश्वर-हरिताल योग से छप्णवर्ण) ५ तोला बंगमरम वित १० बोला नागेश्यर-(मशिल योग से छपापर्ण)- ५ तोला नागमस्म-पीतवर्ष १० तोला २१) निवेगमस्म-(नाग, बशर, घंग की मिधिन भस्म) ५ तोला सर्व वंगभस्म १ तोला यदभस्म १ तोला प्रधानमरम (मूंगाकी मस्म) तोला मांडूर (कोट) भस्म (रकपर्ण) तोना ব १० तोला मालतीवसंत-परामभस्ममिभित १ तोला ३ मारो चन्द्रममावटी-(लोहमस्मशिजाजीत मिश्रित) २.सोजा पृ० योगराजगुग्गुल (सतधातुमिश्रित) २० तोजा योगरानगुग्गुष ५०.गोली प्रदात पंचामृबरस ५ तोला उपरोक औपधियों के अतिरिक और भी धातु उपधातुओं फो भस्म, रस, गुटिका परल मादि भी तैयार है। RO अवलेह की च्यवनप्राश्य (कास, प्रय, रक पित्तनाशक) १सेर" फुशारजेद, यांसापले माटायो करकापोषलेह माद- दापोए, मन्येतीन २६पये मेर। Sex Eeeeeeeeee घसंत कुशुमादार ... ... ... ... ... ...

अरिष्ट और पासव
प्रादि नाश)
२ सेर
मृगमदासच (तमिपात विशूधिया रोग नाशक) पावसेर ५
लाहास्य (पाड शाय गुल्म प्रादि नाशक) दसौर ३)
कपूरासन (विशूचिक्षा शून प्रादि माशक ) १ सेर ५)
श्रष्फेनाशय (प्रवादिका प्रतीसार विचिका
पावसेर ३०
फुमारी पासव (गुल्म, स्त्रीयों के मुतुशेषादि ना०) पाचमेर २||)
स्नकासव (कास,श्वास,फ आदि नाशक)
२)
सीरासप (रक पित्त-क्षय मादि नाशक)
५ सेर २)
दशमूलासव (प्रसृतदोष नाशक-यजवधक)
चन्दनासघ ( भू-विकार, मूत्ररचनामा )
सेर २३
बालारिष्ट (कास, श्याम, जय शक )
१ सेर ५)
प्रसाशरिष्ट प्रदर स्त्री रोग नाशक)
सारस्वतारिष्ट (सारं घटित ) मस्तिप्वशक्ति
स्मृतिमफिचफ और वीर्य दाप नाशक
प्राधसेर ५)
दाचारिष्ट (क्षय दासत्तापित करना)
उपरोक्ष प्रासप अरिष्टोकप्रतिरिक और भी नासय परिष्ट
यार रहते हैं असे असुनारिष्ट, फुटजारिष्ट, प्रभयान्टि प्राधि
परिष्ट यासयों के साथ जा बोतले बाटोन के डिप्रादि जागे
उनका मूल्य प्रायों का प्रथम देना होगा।
३सर

।
तैल और घृत के
पापसेर २)
२सेर
माघसेर ४)
.
नारायण तेल-(सर्व प्रकार के पात रोग नाशक) १ सेट
विषगर्भ तेत (वायु विकार नाशक)
२सेर
चन्दनादि तेल(क्षय कास-ज्वर नाशक १सेर
मोम का तेल (केवल मोम का प्रसिद्ध तेल)
जातादितल (जीर्णज्वर, विषम ज्वर नाशक
४)
त्रिफलादिघून (नेत्ररोग नाशक )
भाधलेर )
सारस्वतघृत (बुद्धिवर्धक)
उपरोक तेजें घृनों के अतिरिक्त और भी तेज तैयार है
जैसे कुमारी तैन, पड्दिन्दु तैन, किरातादि तैल, मिर्चादितन,
मामोघृत, अग्निघृत, पालघृत श्रादि ।
चूर्ण
सुदर्सत चूर्ण (ज्यर नाशक)
१ सेर
নিকষা ি {ষং নামা)
१मेर ३)
पृः गगाधर चूर्ण (मनीमार-प्रदमो नाशक)
१सेर
जातोफ नादि चूर्ण(भय प्रहणी मादि नारा) पावसर १)
लवण भास्कर चूर्ण(मन्दाग्नि प्रजी भादि ना०) प्राघसेर २)
उपरोक चूगों के अतिरिक्त भार भी चूर्ण तैयार है।

सत्व-क्षारन्द्राव ... ... ... ५ तोला २०तोता २० तोला २०तोला बोला २ तोला ... गिलोह का सच अपामार्ग चार यघतार २) इमली का क्षार ३) संखद्रायः २0 इनके अतिरिक्त फाटेरी, ढाक, पाक,तमासू, तिल, कादली, चित्रक मादि के क्षार तैयार रहते हैं। बनौषधियां 280 ... ... ५ सेर ... ... एक शेर, ... दशमूल ७) मापपर्णी घाघसेर ब्रह्मी प्रान्तमूल (गारिया) २॥ सर ", २) इसके अतिरिक्ष धौर भी पनौषधियां मिलती है। नोट-जिस तौल का मूल्य लिला है उससे कम थोक भाव में नहीं भेजी जाती हैं। पता-मैनेजर श्रीधन्वन्तरि औषधालय नं०१५ पो० बिजयगढ़ (अलीगढ़) श्रीमान्लानारायणदास राधावल्लभजायद्यराज सम्पादक आरोग्य सिन्धु की अनुभूत औषधि है। क्षयगज केशरी-पद क्षय रोग की प्रधान औषधि है। यह अनुपान्भेद से क्षयरोग की प्रत्येक अवस्था के लिये प्रतिलाम- दायक है । कफ, खांसी, ज्वर, रक्तस्राव फेफड़े की निचलता नाशक और घलवर्धक है। हम इस की विशेष प्रशंसा न कर क्षय रोगियों से तथाघोंसे अनुरोध करते है कि इसे व्यवहार में ला इस के चमित्कारिक गुणों की परीक्षा करें। १५ रोज के सेवन योग्य औषधि का मूल्य ५) नोट:-प्रौषधि मगाते समय रोगी क सम्पूर्ण लक्षण (हान) व्योरेपार लिसिये। . सब प्रकार की ओपधियों के मिलने का पता- बांकेलाल गुप्त। श्रीधन्वन्तरि अपिधालय नं० १५ पोस्ट विजयगढ़ जि०अलीगढ़।

Kshaydarsha

Author
Hari Shankar
Title
Kshaydarsha
File name
Kshaydarsha
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2012/08
Publisher
Calcutta,.the Narsingh Press
Language
Sanskrit
Pages
133
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405919
Barcode
99999990292943.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
fuKsVdw5a8i
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