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Shreekapilayatantirthmahatamya
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२६ वसाच्या प्रिय पाटकवृन्द आज तक जितने प्राचीन ग्रन्थकार, निबन्धकार, (काकार और अनुवादकों ने जो अपनी २ रचना द्वारा अपनी द्धि पारय दर्शये हैं उनकी रचनाओं का एक विशेष कारण अवश्य राया गया है। क्योकि "कारण विनामन्दोपि न प्रवर्तते" यद्यपि उन अगाध विद्वानों के गम्भीर और विद्वधापूर्ण लेखों तथा उत्तमोत्तम रचनाओं से और इस तुच्छातितुच्यानुवाद से पृथ्वी और आकाश जैसा अन्तर है क्योंकि में ही उन महापुरुषों के सन्मुख " कोरिस्तु कोटायते" के सदृश है तो मेरी कृति का भी वैसाही अथवा उस से भी अधिक अन्तरित होना साधा है। दूसरा कारण एक और भी है कि यह मेरा प्रथम साइस है कि "पिपीलिकाचुम्बविचन्द्रविन्वम् " इस वाक्य को परितार्थ किया है । तो भी भाग करता है कि सुजन पाठकवृन्द इस अनुवाद को भी इसकी कोई विशेष आवश्यकता सम- मार और नहीं तो मेरी भयभीत पाराको भविष्य के लिए निर बनाने के हेतु अपनायेंगे। इस अन्य अनुवाद का हेतु यह है कि सन् १९२१ ईस्वी में नर कोलायत तक रेल का मार्ग निम्मित होगया और यह भी सूचना होनुही कि इस वर्ष की कार्तिकी पूर्णिमा से पहिले ही यात्रियों के मुभीते के लिये कोलायत तक रेल जाने लग जायगी तो मुझे जहांतच स्मरए भाता हैभाषाढ़ थावरा के महीनों में कभी हमारे जीवनापार श्री १०८ श्री अमदाताजी ने कोलायत के विषय में यह स्थान कैसे भोर करसे मसिद्ध हुमा तथा इसका नाम कोलायत क्यों रखा गया एवं इसका क्या माहात्म्य है और इसमें शास्त्री ममाय क्या है इत्यादि मभ उठाये। उपरोक्त मन से उस समय मेरा कोई सम्बन्ध नदी का ये मन रामपरिहों से हुए थे, जिसका उधर रामपंडित
भारतमा
भी और उग उयरपत्र में यया था? सो दरान
परन्तु इस प्रश्न को गुनते ही मेरी उत्कगटा हुई कि मैं में
का अन्यपण करू, यपि मैं ज्यानिमी हूं. मेरा
क्या कि पुरागण धर्मशाग यादि गान और अ
फे किनारे भी जागरू, इमी चिन्ना में निमा हो
तत्काल ही गोम्यागी श्रीगुलसीदासजी का एक दोदा
गया " नहि विद्या नहि बाहुबल, नहिं गाटी का दाग । मं
पतंग की, पति राखहु श्रीराम " इसके स्मरण पाते ही मेरे
शान्ति के साथ एक पाशा का संचार हो गया तदनन्तर ए.
घर पण्डित यमुनादासजी श्रीलालगढ़ में मिले और उनके ।
चीन और हस्तलिखित खुले पत्रों की एक पुस्तिका दीख पड़ी
विषय में पूछा तो उहोंने कपिलायतनमाहात्य उसका नाम बताय
१०८ अन्नदाताजी ने अमुकामुक प्रश्न किये हैं उन्ही के
के लिये यह पुस्तक लाया हूं, यह उत्तर दिया, तदनन्तर
को एक बार आद्योपान्त पढ़ने के लिये मैंने उन से प्रार्थना की औ
र्थना स्वीकार करके उन्होंने पुस्तक देदिया पुस्तक पदनाने
हुई कि इस पुस्तक का सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद कर
सर्वसाधारण को श्रीकोलायतजी का विषय पूर्णतया अवगत हो
अपने दो एक मित्रों की सम्मति भी ली तो उन्होंने हिन्-
वाद के वास्ते पूरा जोर दिया और मैंने लितना भी प्रारम्भ
जय लगभग दो अध्याय तक लिख चुका तो एक रोज उसका
ही कर रहा था इतने में मेरे परमहितेपी श्रायुर्वेदभूपण पगि
जीवनरामजी हप का अकस्मात् शुभागमन होगया और उन्हें
कर पृषा और इसकी समस्त कथा समझाने पर दुवारा उन
को देखा तथा अपनी हार्दिक प्रसन्नता प्रगट कर तावमात्र है
कुछ रदबदल करने [ग] वाद की समालोचना उन्होंने की और स्थल २ में की भी अपनी सम्मत्ति प्रकट की और वैसा ही मैने कर भी दिया फिर उन्होंने संस्कृत का लिखने की भी सम्मति दी तब से जब २ संयोगवश वह मिलते थे तब तब इस का समाचार पूछते और मेरी सुस्ती पर मुझे बहुत लजित किया करते थे तो भी इस ग्रन्थ की परि समासि में बहुत विलम्ब हुआ और मित्रों ने समय २ पर अतिशय भर्त्सना की तो भी मेरे सहचर और बालसखा पालस्यदेव ने कुछ परवाह न कर अपनी ही गति से मुझे चलाता रहा एवं "दिनभर चले अदाई कोरा" की कहावत को मैं चरितार्थ करता हुआ इसी विक्रमी सम्वत् १९८१ के श्रावण शुमा एकादशी सोमवार के प्रातःकाल में इस पुस्तक की समाप्ति लगभग दो वर्षों में करसका और समाप्त होते ही मेरे परमप्रेमभाजन बन्धुकर श्रीकृष्णदासजी हर्ष ने इसको पवादने के लिए प्रेरणा की और उक्त मेरे परमहितैषी श्रीमान् श्रायुर्वेदभूषण पण्डित जीवनरामजी हर्ष ने अपने श्री केवल जीवनानन्द प्रेस में छपाने की भी अनुमति देदी । मैं उक्त सजनों की कृपा पूर्ण सम्मति से प्रेरित एवं सदुत्माहित होकर उक्त कार्य का प्रारंभ या उसके प्रायोपान्त सम्पादन कर सकने में साहसवान हुआ ई यस यही मेरा वक्तव्य है यह भी आशा करता हूं कि सभी परमादार सजन इसी प्रकार अपनी महत्वपूर्ण सालिकवृत्ति से मेरी इस तुच्छ भेंट को धार्मिक एवं विद्याप्रेम के नाते अपनाकर कृतार्थ करेंगे। किमधिकबिज्ञप्विति । -- बीकानर, विष्णुदत्तः। सं०१६८१ कार्तिक शुक्ला ११ पं यगुनातागजी नगा गोमामी प.नम नामदन मनी नहि भी और उग उचगर में समा गागागनगम मिाही: परन्तु उग प्रभ की गुना है। गंग उरगटा हुई कि में भी हम nिe का अन्यषण कर, गगी म मा हं. मंग अधिकार है। का कि पुगमा धायाम श्रादि गान और भगाय FE फे किनारे भी जागा, दगी बिना में निमम हो रहा था। तत्काल ही गोम्यागी धातुलगीदागनी का एक दोहा मिरर गया " नदि विद्या नहि बाहुवन, गढि गाटी का दाग । मो सो पनि पतंग की, पति रासाहु श्रीराग" इसके मरण पाते ही मेरे मन में अपूर्ण शान्ति के साथ एक पाशा का संचार हो गया तदनन्तर एक रोज मित्र चर पगिडत यमुनादासगी श्रीलालगढ़ में मिले और उनके हाथ में प्रा. चीन और हस्तलिखित खुले पत्रों की एक पुस्तिका दीख पड़ी मैंने उसके विषय में पूछा तो उहोंने फपिलायतनमाहात्य उसका नाम बताया और श्री १०८ अन्नदाताजी ने अमुकामुक प्रश्न किये हैं उन्हीं के उचर हूंदने के लिये.यह पुस्तक लाया हं, यह उत्तर दिया, तदनन्तर उस पुस्तक को एक बार अायोपान्त पढ़ने के लिये मने उन से प्रार्थना की और मेरी प्रा-. र्थना स्वीकार करके उन्होंने पुस्तक देदिया पुस्तक पद्नाने पर इच्छा हुई कि इस पुस्तक का सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद करूं जिस में सर्वसाधारण को श्रीकोलायतजी का विषय पूर्णतया अवगत होजाय और अपने दो एक मित्रों की सम्मति भी ली तो उन्होंने हिन्दी अनु- वाद के वास्ते पूरा जोर दिया और मैंने लिखना भी आरम्भ करदिया. जब लगभग दो अध्याय तक लिख चुका तो एक रोज उसका अनुवाद हा कर रहा था इतने में मेरे परमहितैपी आयुर्वेदभूपग' जीवनरामजी हर का अस्मात् शुभागमन : कर पूछा और इसकी समस्त कथा ... ने देखा तथा अपनी हार्दिक , शुद्धाऽशुद्धपतयः। अशुद्धयः शुद्धयः पंक्ति १ महात्म्य तमोमतम् किंचिरगोप्यम् श्लोका वशिष्ठ माहात्म्य तमोत्तमम् স্কিয়িকা श्लोकाः वसिष्ठ ५ ५. ३ ७ ७ " यहुःख १० २० साहसः २२ " ७ यदुःख म्रा साहस्त्र स्व धुो रु मकरम्मि गृहानान्तु गृहायोन्ति प्राप्तानन्तरम् स्तत्कल एवं सघात कारिणि महापाक महांश्वासी नागृहाना ३ ३ धो 7 मेकम्म गृहाणान्तु गृहायान्ति प्राप्त्यनन्तरम् स्तत्काल एवं सधात कारिण महापातक महान्तश्चते नामगृहाना " २४ ७२ ७३
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शुद्धा ऽशुद्धपतयः। श्रशुद्धयः शुद्धय: पृष्ट पंक्ति १ महात्म्य तमोमतम् किंचित्तोप्यम् लोका वशिष्ठ माहात्म्य तमोत्तमम् किश्चिद्गोप्यम् १३ १८ ४ श्लोकाः ५ वसिष्ठ ३ ७ ७ . " यदुःख ना साहस्र यहुँ खं ना साहस्रः २० २१ २२ ४ धो " ७ ." १२ धुो रु मकरम्मि गृद्दानान्तु गृहायोन्ति प्रासानन्तरम् स्तत्फल एवं सघात कारिणि महापाक महांचासो नागृहाना ३ १६ मेम्मि गृहाणान्तु गृहायान्ति प्राप्त्यनन्तरम् स्तत्काल एवं सघात कारिणे महापातक महान्तश्चते नामगृहाना ७० ७२ : CA ? cf 射 中華 ? * ht 名之 23 市 了 4 至 भरायः शुद्धयः पंकि ૨૨ १ २ ५ ५ श्रमन्ना अमला: धर्मपल्या धर्मपन्यां १२२ तीफनक्तं तीर्थफलमुक्तं सस्तुवतः संस्तुवतः १२८ ध्वान्तनाशन ध्वान्तनाशनः प्रसादत्त प्रसादतो १२८ हृदयान्धकोनष्ट हृदयांधकारानष्टः जिसको शास्त्रोमेलिसाहियह इसमें “वह" नहीं चाहिए १२६ स्वाश श्वास विपरूप विषयरूप १३८ योगिन योगिजन मनकाः मनश्शक्षा शुमदेवने शम्भुदेवने तत्राशु तस्याशु प्रीत्यर्थ प्रात्यध कोटि कोटि १३ २३ ४ 20 22 पृष्ठ १०६ श्लोक ४० में " पादाधानः श्लिष्टपादः" यह पादाधानश्लिष्टपादः " ऐमा होना चाहिए, जिसका अर्थ रकाब (पांबडे ) में पैर लगाया हुआ। पण्डित जयराम शास्त्री, स०प्र० अध्यापक, श्री डूंगरकालेज, वकिानेर।
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ स्कन्द पुराणान्तर्गत रेवाखएडीए कपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं लिख्यते । तत्रतावन्मंगलाचरणम् ।। महेशानं महेशानतमूज मनुजार्चितम् । नमामि विवहारं कर्तारं सर्वसम्पदाम् ॥ १ श्रीकपिलायतगमाहात्म्यरचयिता पुराणकर्ता व्यासदेवः म गणेशं स्तौति महेशानमिति- महेशानतनूज भहेशानश्शङ्करस्तम्यतनूज महादेवा मनुमानितम्मनुजैरचितम्पूजितं विशहतीरं विनविनाशनं सर्वस फार महेशानं गणेशं नमामि नमकरोमि ॥ १ ॥ श्री कपिलायतन महारम्य के रचयिता पुराणकर्ता ज्या "प्रथम गणेराजी की स्तुति करते हैं "-- महेशन शंकरजी के पुत्र, मनुष्यों से पूजित, विनों के हता सर्यसम्पत्तियों के कती महेशान गणेशजी को नमस्कार करता है ।। (मून उवाच) गंगामाहात्म्प मतुलं सर्वतीर्थात्तमोमत्तम्। श्रुत्वा प्रहर्पमगमदगस्त्योमुनिसत्तमः ॥२॥ सून रशीनकादीन् स्वोतन्यतिवदति यन्- मुनिश्रेष्ठोऽगस्त्यम्सर्वतायोत्तमोत्तममतुलमनुपमं गंगामाहात्म्य महर्षमगमन् ॥२॥ मुनिमा श्रीकपिलायतनायगाहाम्य । सूतजी शौनकादि प्रापियों से कहते हैं कि मुनि अगस्त्यमुनि पूर्वकथा में अनुपग और सब तीयों से उत्तम माहात्म्य को स्कन्ददेव से सुनकर बहुत प्रसन्न हुए ॥२॥ पुनः पप्रच्छ विनयात्तनयं मण्यान्वित शूलिनस्सर्वतत्वझं स्कन्दं देवारिकंदनम् ।। प्रणयान्वितोधिनयाननीमूनोऽगत्या तत्वज्ञ देवारिकन्दनं शलिनशंकरस्य तनयं फन्दाम्पिनयासुनः पप्रच्छ अगस्तजी ने विनीत भाव के साथ ना होकर सर्व जाननेवाले तथा देवारिकन्दन (तारकासुर के वध करनेवाले) के पुत्र स्कन्ददेव रो पुनः प्रम किया ॥३॥ भगवन्सर्वधर्मज्ञ! सर्वज्ञसुत! मत्प्रभो ! गंगामाहात्म्यकथनात्पापितोहं न संशयः।। अम्मिन्पये पूर्वाद्धस्य पदचतुष्टयं स्कन्दस्य भगवनित्यादितोमरसमो! पर्यन्तम् उत्तरार्द्धनागम्त्यः किंकि कथयनि यत्तव गंगामाहत्म्यकथनादह पावितः पनि मिन संशयः ॥४॥ अगरत्यजी ने कहा कि हे भारन ! हे सब धर्म के चाले! हे शंकरजी के पुत्र! और मेरे प्रभु! आपके गंगा । के फया मे में पवित्र होगया इस में रान्देह नहीं है ॥ ५॥ गंगा तु संर्यतो पंदपुन महामते ! ॥ प्रसिद्धिमागता नित्यं मय जानन्ति मत्तमा:1 हे महामा! गंगा नु स लोक देणु वेदाष्टयपुच rapaनिमामसिं रालमा निपुणा नियं निरन्तरजानन्ति !!! EHINA RAM कारकिर मन-- श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । हे महामते ! गंगा तो सब लोकों में और येदों में प्रसिद्ध चुकी है यह सभी सत्पुरुष जानते हैं ।।५।। श्रान्त्री बालकगोपालंगंगामाहात्म्यमुत्तमम्।। प्रकटं सुरसेनानीजागर्ति भुवनत्रये ॥६॥ हे सुरसेनानीः । यास्त्रीवात्तकगोपालं सियमारभ्यवार गोपालपर्यन्तम् । उचगंगगामाहात्म्यं भुवनत्रयेप्रकटं प्रत्यर्स जार स्त्रियोबालका गोपालाश्च सर्वे जानन्तीतिभावः अत्र गोपालशया भागीर पावकः ग्वालाइति भाषायां । भामारस्तु शगवणश्यति । एते ऽपि जानन्ति किमन्येयामिति ॥६॥ हे स्पन्ददेव ! इस त्रिभुवन में स्त्री, बालक तथा गोपाल पर्यः मभी इस उत्तम गंगा माहात्म्य को प्रत्यक्षम्प से जानते हैं। यह इस बात को सभी जानते हैं कि शास्त्रों में नियों को, बालकों और शूद्रों को किसी तीर्थ या नदी के माहात्म्य जानने का अधिः नहीं है, तथापि इस कथन से गंगा माहाल्य की प्रधानता विशेष से सूचित हो रही है ॥६॥ अनन्तचरणाम्भोजप्रतामा भवच्छिदः ।। रिगन्तुगतरंगायाः श्रीकपर्दे कपादनः ॥७॥ महापापौघविध्वंसपीपस्याः परन्तप । कोन जानाति गंगाया माहात्म्यम्परमाद्भुतम् ॥ हे परन्तप ! कपर्दिनरशंकरस्य श्रीकपर्दे जटाजूटे रिशन्तीय शुहतरक्षार शिलमतरता, तम्याः अनन्नचरणाम्भोजपमून महापापोपपिध्वंसपीयस्याः भवच्छिदोगहायाः परमाद्भुनापरमाश्च फरम्माहात्म्य को न जानाति ।। ७, ८॥
-- For Rastri Writ trimti माना मिजामिनि मनम || गा!ि ममाति परमानय ६॥ मा मkuTI || मम ममम दिनकर मेरे जोर NAREA कोई मनांगा गुममा दो तो दिये. महीनने । हमा होता है॥ किन्नु भीर्य भयेइन मनायफलप्रदम् ।। जनरमयपिज्ञानं स्यारीतमेयहि ।।१०।। मर्यपापहरं पुण्यं सर्ययज्ञफलमदम् ।। सर्वन गुग्यद ईय! भोगिभोगप्रदं शुचि ॥११॥ मकामानान्तथान्नृणां कामनापरिपरकम् ।। निष्कामानाम्पुनर्विद्वन् ! ज्ञान मुत्पाथ मुसिदम् ॥१२॥ स्वर्गदं सुष्टुवुद्धीनां पापिनां पापनाशनन् । सद्यः प्रत्ययलोके मानांस्यूल चनुपाम् ॥ १३ ॥ प्रेतयोनिगतानां यन्मुस्तिदं भवसागरे ।। दिव्य लोक प्रदं दिव्यं दिव्यमाहात्म्यमुतमम् ॥१४॥ दिव्यदेवाधिष्टितं ततीर्थ तीर्थपरंपरम् ॥ यया कयाऽपि क्रियया मोचकं शोकनायकम् ।। १५ ।।
५
श्रीकषिलायत्तनतीर्थमाहात्म्यं ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुवात्सुरसत्तम ।।
नाज्ञातं विद्यते किश्चित्सर्वज्ञाननिधेस्तव ॥ १६ ॥
(सरलार्थाइमे श्लोकाः)
हे देव ! हे विद्वन् ! हे सुरसत्तम ! इस संसार में ऐसा कोई
तीर्थ हो जो सब तीर्थों का फल देनेवाला हो, मनुष्यों से अज्ञात हो,
आप सदृश महात्मा ही उसको जानते हो, वह सब पापों का हारक
तथा पवित्र और सब यज्ञों का फल देनेवाला हो, सकाम सेवन
करनेवाले मनुष्यों की कामनाओं को परिपूर्ण करता हो, और निष्काम
सेवन करनेवालो को ज्ञान देकर मुक्त करता हो, मुबुद्धियों को
स्वर्ग देता हो, पापियों के पाप नाश करता हो, और स्थूल टि से
देखनेवाले मनुष्यों को इस लोक में तत्काल परिचय देनेवाला हो
तभा प्रेतयोनि में गये मनुष्य को भी भवसागर से मुक्त करनेवाला
एवं दिव्य लोक देनेवाला, दिव्य महात्म्य से युक्त, और दिव्य
देवताओं से सेवित हो और सर्व तीयों में श्रेष्ठ हो एवं जिस किसी
क्रिया से भी संसार बन्धन का मोचक और शोकनाशक हो उस
तीर्थ को श्रापके मुख से सुनना चाहता हूं। श्राप सम्पूर्ण ज्ञान के
निधि हैं आप से कोई पातु अज्ञात नहीं है ॥ १०, ११, १२, १३,
यद्यस्ति मपि से पूर्ण करणा करणानिधे ! ॥
प्रवृहि प्रविणाशाय, महासेन ! महेनमाम् ॥१७॥
हे करूणानिधे ! महासेन ! यदि, ते तय, मयि विषये,
पूर्णाकरणस्ति, तदा महैनसां महापापानां प्रविणाशाय, प्रद,
कथय, गंगामाहात्म्यमिति, पूर्व श्लोकान्संगधः ॥ १७ ॥
श्रीकपिनायतननाथमादाग्य।
हे करणानिधि ! महामेन ! यदि आपकी मेरे पर पूर्ण का
नो महापापों के विनायक हेतु गंगामाहास्य को कहिये ॥१७॥
(मूत उवाच)
ति प्रोन संहृष्टः पार्यतीनन्दनस्सदा ।
याच वचनं घाम प्रहस्य
यनामिनि ॥ १८॥
मूतः गौनकादीकथयति यदेवमगम्त्यादिनपभेन स दृष्टः
ताप्राप्तः पार्वतीनन्दनम्तदातरिमन्थालेपहम्य विइम्य श्रूयनामिति
वचनमुवाच ॥ १८॥
मनी ने शौनकादिक ऋपियों से कहा, कि इस तरह
नजी के प्रश्न को सुन पार्वतीनन्दन स्कन्दजी प्रसन्न हुवे और
म् (मुनो) हम रुचिर रेचन को बोले ॥ १८ ॥
जगद्वितं पृष्टं तदिदैकमना भए॥
याम्पहं तब मीत्यानान्यधानकायंधन ॥१६॥
हे मुने! लया जगद्धितं पृष्टं नलम्माकारग्यादिकमना-
चिचामर, तय प्रीत्यायदहं वक्ष्यामि तथपनान्यभाननि ॥ १९ ॥
हे मुनि ! तुम सावधान होकर मुनो नुगने जो संगार के हित
1 से मा किया है उसका उत्तर तुम्हारे प्रेम के कारण जो
दह कभी अन्यथा नहीं हो सकना ॥१९॥
यं पन्न प्रकारपलदिगि पदायिदाम्मतम् ।।
पि यमि लखिन सय शीलाहरायद ॥२०॥
यावर! पिय यादिन ! यहोय गोपनीयम्पातु नन्न प्रकारय.
হিৰাগৰম লগাবি না মানা নি িযথাযথ
कदानि॥२०॥
७ श्रीकपिलायतमतीर्थमाहात्म्यं । हे वशंवद ! जो गोप्य वस्तु है उसको कभी प्रकाश नहीं करना काहिये यह वेद जाननेवालों का सम्प्रदाय है, तो भी तुम्हारे सौजन्यवश न्दरता से उस गुप्त कथा को कहता हूं।॥ २० ॥ संभवेदिहसंप्रीतियक्तुः श्रोतरिसत्तमे ।। अरुन्धतीधवस्येय जानकीपतिभूपती १२१ ।। दहास्मिन् गुप्तकथासंभाषणे जानकीपतिभूपती श्रीरामचन्द्र, हल्धतीधवस्य वसिष्ठस्य इव श्रोतरि सत्तमे वक्तुस्संप्रीतिः संभवेत् 'कांक्षितास्ति ॥२१॥ इस गुप्त कथा के संभाषण में श्रोता और चकता का प्रेम वैसाही चाहिये जैसा राजा श्रीरामचन्द्रजी में पसिनी का था ॥२१॥ यं भागयतीरष्टियस्याः पारोनवियते ।। न कुन्नाऽपि बहुधा तत्तद्रलधरा धरा ॥२२॥ इयं भागवती सधिः यस्याः पारः अन्तं न विद्यते, अस्मां सृष्टी पृथ्वी यत्रत्राऽपि तपस्यमाणरत्नधरास्ति नानि तानि रत्नानि ति तसदलथरेति ॥ २२॥ यह वैष्णवी सृष्टि है जिसका अन्न नहीं है इस सृष्टि में पृथ्वी तहां जिन जिन रली को धारण करनी है उनके नाम भागे ये है १२२॥ पि नारीरत्नानि नररत्नानि पुनचित् ।। चिद्वाजिरत्नानि गजरत्नानि मुत्रचित् ॥ २३ ॥ थिव्यां शुत्रापि नारीरमानि मीरत्नानि सन्नि कुत्रापि नररत्नानि कुत्रचिनाजिरत्नानि अश्वालानि सन्ति हुप्रनिद्रजानानि १२३ ॥
१३. TETRACHER माता नामानि गिरा सरा गाना गाम !॥ २४ ॥ परगनायो uneमानानि गनि मनः पारे ठाम में नुम्ममइयागामि ॥२५॥ ॥ पाहुना सी रन भी कार में भी सनी को गुमसे कहना ॥२॥ प्रयागादीनि तीर्थानि रत्नभूमानि भाले । संप्यपाह परं ररनं सार्थमंकं प्रशस्यते ॥ २५ ॥ २६ गतले जगतीनने प्रयागादीनि वीर्यानि रनमूनानि सन्ति तेषु शपि पागलाष्टं रत्नोफतीय प्रशासन प्रशस्तमस्ति यमेवमति ।। २५ ।। इस पृथ्वी में प्रयाग धादि तीर्थ तीयों में रल है उनमें मी परम उत्कृष्ट एसना गम है जो प्रागे कहगे ॥ २५ ॥ पञ्चाशत्कोटिविस्तारं भूमण्डलामिदस्मतम् ।। तत्रापि लोकविस्तीर्णन्तम एय प्रवर्तते ॥२६॥ इह भूमण्डलं पंचाशकोटिविस्तारमात्यंचाशरकोटि योजनायत- मस्ति, एतदर्थ श्रीमद्भागवतस्य पञ्चमस्कन्धे भूगोल वर्णनं द्रष्टव्यम् । तत्रापि एतापद्विस्तृते लोकेपि विस्तीर्ण अधिकं तम अन्धकार एवं प्रवर्तते ॥ २६॥ इस भूमण्डल का पचास कोटि योजन का विस्तार है, उसमें भी सार के अधिक भाग में अन्धकार ही है पौराणिक भूगोल का वर्णन श्रीमद्भागवत के पंचम स्तव ने पूर्ण रात व्यासजी ने किया है ।। २६ ॥
१ " श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । लोके प्रकाश यहुली यत्र सृष्टिः प्रवर्तिता ।। तत्रापि महतीभूमिमहास्वर्णमयी स्थिता ॥ २७ ॥ लोके यत्र सृष्टिः प्रवर्तिता यावन्मानं सृष्टिवर्तते । तत्र सूर्याचन्द्र मसोनिरन्तरगमनेन यहुलः प्रकाशस्ति तत्रापि प्रकाशभूमावपि महती भूमिहास्वर्णमयी स्थिताऽस्ति ।। २७ ।। संसार में जहांतक सृष्टि है वहां तक पूर्ण प्रकाश है उसमें भी अधिकतम भूमि भाग अनेक रलों से भरा है, जिसको महास्वर्णमयी । भूमि कहते है ॥ २७॥ तन मध्यप्रदेशेषु सप्तद्वीपयनी मही ।। तेपुडीपपुच महान् जम्बूद्वीपो विशिष्यते ॥२॥ तत्र तस्यां महास्वर्णमय्याम्भूमौ मध्यप्रदेशेषु सप्तद्वीपवती सप्तदीपाधिष्टाना मास्ति तेषु द्वीपेषु सुमहान् जम्द्वीपो विशिष्यते समबुद्वीप्पु जम्बूद्वीपी विशिष्ट इति ॥ २० ॥ उस स्वर्णमयी गृमि के मध्यप्रदेशों में द्वीपारगक सात विभागों से पृषी विमला है, उन विभागों में सब से प्रधान और वृहदाकार जम्बूदीप है ॥२८॥ तद्वीपे नवखण्डानि भारतादीनि सत्तम । भारतं पुण्यमेतेषु कर्मक्षेनं यतस्स्गतम् ॥ २६ ॥ हे सत्तम ! तजम्बूद्वीप भारतादीनि नर खण्डानि वसन्ते एतेषु नवसु खरडेपु गारतं यतः पुग्यम्पवित्रमम्ति यतः फर्मक्षेत्रं स्मृतम् कथितम् ॥ २६॥ हे मुनि सत्ता ! उस जम्बूद्वीप में भी भारतादि नवखंड है उन न वगरे में भारत सब से पवित्र है इसलिये कर्मज्ञने कहा गया है।॥२१॥ ।
गानि नामानि नाना पदरात पार मिनितानि महामभिः सmarriamनि नान हासीन मलिभा पार Trism ॥ ३ ॥ उम कर्मोन में मकान मानावा कई भोक परनाम॥३०॥ कामिनिटिरिम्पाणि मरोम्पाणि कामिनि ।। इदमरायम्पापि नदीम्पाणि कानिमिय॥३१॥ पनारपस्यरूपाणि पुरीरूपाणि कानिमित् ।। पुरापस्मृतिसंगीतमाहात्म्यानि महामुन ॥ ३२ ॥ है महागुन ! पुगगम्मतिमंगीतमाहात्म्यानि कानिनिर्णय गिरिसपाणि फानिवित्सरीरूपाणि कानिचिन्दप्रसवरूपा कानिचिनदीपाणि कानिचिनारगर्यस्यरूपाणि पुरीरूपापि सन्ति ।। ३१, ३२॥ हे महामुनि ! पुराणों में और स्मृतियों में जिन २ तीर्थों महात्म्य वर्णन किया गया है उन में कितने तो गिरिपर्वतों के र में हैं, कितने सरोवरों के रूप में हैं, कितने झरनों के रूप में हैं. कित नदी के रूप में हैं, कितने बन तथा अरण्य के रूप में हैं में कितने पुरियों के रूप में हैं ।। ३१, ३२ ।। सम्रापिरत्नभूतानि विरलान्येव भूतले॥ महामाहात्म्ययुतानि सद्यः पाप हराणि वै ॥३३॥ १)हिमगिरी, कैलाशगिरी प्रभृति । (५) वृन्दावन, बदरीबन प्रभृति । २) पुकर, कपिल प्रभृति। (६) दण्डकारण्य, नैमिषारण्य प्रभृति। ३)हरद्वार। (५) काशी, वैद्यनाथ, जगन्नाथ इत्यादि ४) गंगा, यमुना, सरस्वती प्रभृति ।
श्रीशपिलायतनतीर्थमाहात्म्य । ११ तत्र तेवपि पूर्वोक्तानेकरूपतीयेषु भूतलेमहामाहात्म्ययुक्तानि सद्यः पापहराणि रत्नभूनान विरलान्येव तीर्थानि सन्ति अत्रापि वै पाद पूरकोव्ययः ॥ ३३ ॥ उन ऊपर लिख हुवे अनेक रूप ताथों में महामाहास्य से युक्त तत्काल पापों के नाश करनेवाले और रन स्वरूप इस भूतल में कोई २ तार्थ हैं ॥ ३३ ॥ गंगा घ यमुनाचैव तथा भाची सरस्वती ॥ नर्मदा प पयोगी घ कृष्णा वेणी सवेदिका । ३४॥ सप्तपुरयाँ गयसिरः कुरुक्षेत्रं त्रिपुष्करम् ।। सेतुबन्धेश्वरादीनि तीर्थरत्नानि सुव्रत ॥ ३५ ॥ हे मुन्नत ! गंगाधा एता नद्यस्तथा, अयोध्या, मथुरा, माया, फाशी, कांची, अवन्तिकापुरी, द्वारावती एताः सप्तपूर्यः गशिरो गया, कुरुक्षेत्र, त्रिपुष्करम् सेतुबन्धेश्वरादीनि च ताणेषु तीर्थ रत्नानि स्युः ॥ ३४, ३५॥ हे सुग्रत ! नदी रूप तीर्थों में गंगा, यमुना, प्राची, सरस्वती, नर्मदा, पयोप्पी, कृष्णा, और वेदिका; एवं पुरी रूप सीमों में अयोध्या, मधुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिकापुरी, द्वारावतीपुरी तथा गया एवं कुरुक्षेत्र, त्रिपुष्कर, सेतुबन्धेश्वर (रामेश्वर ) ये सब तीर्थ रन है॥३४, ३५ ॥ एषु सर्यपु तीर्थ स्नानदानजपादिभिः॥ भवन्ति प्रत्यया लोक पपाकामं पपा प्रतम् ॥ ३६॥ (स्पा?यम् )- इन सब तीथों में जैसी कामना तथा मत से स्नान, दान और अादि किये जाते हैं, तदनुकूल फल प्राप्ति होने से विश्वास होता है।
गगनाginner! LETTE390 4 #ii Hit MATRE india1 मीर: Trr: स्मै frint0 नगर सामागमायकराल समसं. नामर भा, मदागिनमान बने हैं।॥ ३ समपि सपना तारतम्यं प्रयास ॥ पियकन माहाभाग फलांशादिमभवतः ॥३८॥ है महाभाग ! तथापि सर्वती पियन कलांगादिपभेदनः सारतम्यं न्यूनाधिश्यं मयतते ।। ३ ।। दे महाभाग ! यद्यपि सर्वतीर्थमय संवरपर सब तीयों में विराजमान है, तो भी विचार दृष्टि से देखने पर परमेश्वर के कला और अंगों के पद से सब तीर्थों में फलों का न्यूनाधिक है ॥ ३८ ॥ इदं तीर्थमयं वर्ष भारतंत्र्यपदिश्यते ॥ फर्मनेत्रं परंपुण्यं सर्वन सुखदायकम् ॥ ३६॥ इदं भारतं वर्ष तीर्थमयं परंपुण्यं सर्वत्र सुखदायकम् कर्मक्षेत्रं पपदिश्यते ॥ ३१॥ इस तीर्थमय परम पवित्र सर जगह सुख देनेवाले भारतवर्ष को मक्षेत्र कहा जाता है ।। ३६ ॥ तंत्र जन्माप्यमानुप्यं योनरः सर्वसिद्धिदम् ॥ नात्नाति सर्वतीर्थेपु तेनात्मा वंचितो ध्रुवम् ॥ ४० ॥ "
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
तत्र कर्मक्षेत्रे योनरः सर्वसिद्धिदं मानुप्यं जन्माप्य जन्म-
संप्राप्य सर्वतीर्थेषु ना स्नाति तेन नरेण ध्रुवं निश्चयेनात्मा वंचित'
स अात्मानं वंचितवानिति ॥ ४०॥
उस कर्मक्षेत्र में सर्व सिद्धि दायक मनुष्य जन्म को पाकर जिसने
सब तीथों में स्नान नहीं किया उसने श्रात्मा को धोखा दिया ।। ४० ॥
यज्ञदानादिक कर्म निर्धननैवसाध्यते ।।
तीर्थ स्नानादिकं पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितैः ॥ ४१ ॥
देहमानायशेपैश्च निर्धनैरपिसाध्यते ।।
तस्मात्तीर्थ वरं लोके सर्वपुण्ययु मानद ॥ ४२ ॥
हे मानद ! निधनजनैज्ञदानादिकं नैव साध्यने । तीर्थ स्नानादिक
पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितदेहमानावगेचैनिधनरपि साध्यते तस्माल्लोके
सर्वपुण्येषु तीर्थ वरम् ॥ ४१, ४२ ॥
हे मुनि ! धनरहित दरिद्रमनुष्यों से यज्ञ दागादिक कर्म का साधन
नहीं हो सकता क्योंकि इस में प्रचुर धन की प्रावश्यकत्ता रहती है और
तीर्थस्नानादिक पुण्य कार्य को भक्ति तथा श्रद्धा जिसको होती है
यह महादरिद्र मनुष्य जिसको देहमात्र ही शेष धन है वह भी साधन
कर सकता है, इसलिये इस संसार में सभी पुण्यों में तीर्थ ही उवम
है क्योंकि यह सब के वास्ते मुलभ है ।। ४१, ४२॥
सदा तीर्थपरैर्भाव्यं सर्वलोक रिद स्फुटम् ।।
तीर्थस्नानसमं पुण्यं न भूतं नभविष्यति ।। ४३ ॥
सर्व लोकसयजनस्तदा तीर्थपरगाव्यम् भवितव्यमिताह सुष्टं
स्पष्टं भवति तीर्थ स्नानसमं पुण्यं नमूतं न मविप्यतीति ॥४३॥
इसलिये निश्चय होताहे कि सभीमनुष्यों को सदा तायंसेवी होना चाहिये
क्योंकि नीनान समान पुज्य श्रीरकोई यज्ञादि नहुआहे,नहोगा ॥१३॥
siyायान गणु मातगि मात्र पाहाये ।। सरवर मर्यरूपः मयंतीयमावभी॥७॥ १ पुसी संग माहानये पापनाशाम सर्वनाथ ताधांवन्यथा नातियस्य स सभाः सरगरः परमेधाः विराजते ॥ ३७॥ इन राम तीया में सब के पास का नाश करने के लिये सब तायो स्वला सर्वस्वरूप सर्वेश्वर, परमेश्वर, सदा विराजमान रहते हैं।। ३८ तथापि सर्वतीपु तारतम्यं मवर्तते ॥ विवेकन महामाग कलाशादिपमेदतः ॥३८॥ हे महाभाग ! तथापि सर्वतीर्थपु विवकेन कलांगादिप्रभेदः तारतम्यं न्यूनाधिश्यं प्रवर्तते ॥ ३८ ॥ हे महाभाग ! यद्यपि सर्वतीर्थमय सर्वेश्वर सब तीयों में विराजमा है, तो भी विचार दृष्टि से देखने पर परमेश्वर के कला और अंशों भेद से सत्र तीर्थों में फलों का न्यूनाधिक है ।। ३८ ॥ इद तीर्थमयं वयं भारतंत्र्यपदिश्यते ॥ कर्मक्षेत्रं परंपुण्यं सर्वत्र सुखदायकम् ॥ ३६॥ इदं भारतं वर्ष तीर्थमयं परंपुण्यं सर्वत्र सुखदायकम् कर्मने व्यपदिश्यते ॥ ३९॥ इस तीर्थमय परम पविन सब जगह सुख देनेवाले भारतवर्ष को फर्मान वहा जाता है ॥ ३६॥ नाम गोमिनिट
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
सत्र कर्मक्षेत्रे योनरः सर्वसिद्धिदं मानुष्यं जन्माप्य जन्म-
संमाप्य सर्वतीर्थयु ना स्नाति तेन नरेण ध्रुवं निश्चयेनात्मा यंचितः
स आत्मानं पंचितवानिति ॥ १०॥
उस कर्मक्षेत्र में सर्व सिद्धि दायक मनुष्य जन्म को पाकर जिसने
सब तीथों में स्नान नहीं किया उसने श्रात्मा को धोखा दिया ॥ ४० ॥
यज्ञदानादिकं कर्म निर्धनैनवसाध्यते ।।
तीर्थ स्नानादिकं पुण्यं भक्तिधद्धासमन्वितैः ॥४१॥
देहमानावशेपैश्च निर्धनैरपिसाध्यते ।।
तस्मातीर्थ वरं लोके सर्वपुण्यपु मानद ॥४२॥
हे मानद ! निधनजनैज्ञदानादिकं नैव साध्यते । तीर्थ स्नानाविक
पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितदेहमानावशेषनिधनरपि साध्यते तस्मालीके
सर्वपुण्येपु तीर्थ परम् ॥ ४१, ४२ ॥
हे मुनि ! धनरहित दरिद्रमनुप्यों से यज्ञ दामादिक कर्म का साधन
नहीं हो सकता क्योंकि इस में प्रचुर धन की आवश्यकता रहती है और
ताथानानादिक पुण्यकार्य को भक्ति तथा श्रद्धा जिसको होता है.
वह महादरिद्र मनुष्य जिसको देहमात्र ही शेष धन है वह भी साधन
कर सकता है, इसलिये इस संसार में सभी पुरयों में तीर्थ ही उत्तम
है क्योंकि यह सब के वास्ते सुलभ है ।। ४१, ४२ ।।
सदा तीर्थपरभीत्र्यं सर्वलोके रिद स्फुटम् ।।
तीर्थस्नानसमं पुण्यं न भूतं नपिप्यति ॥४३॥
सर्व लोकरसवनम्सदा तोपरभाध्यन् भवितव्यमितीह कुष्टं
स्पष्टं भवति तीर्थ स्नानसमं पुण्यं नमतं न भविष्यतीति ॥४३॥
इसलिये निम्धय होता है कि सभीमनुयोको सदा तसिवा होनाचाहिये
क्योंकि तीर्थग्नान केसमान पुण्य भोरकाई मजादिनहुआहे,नहोगा ॥४३॥
HITTEनी inal गीर्थ गाना महागणा पूर्य: पूर्वगरे मृगा ॥ स्लामशादिमिरा रागप्रियरः पुनः॥४४॥ : :: पानीनानिमानाननमियानिमिर्माभिः पुनाथ viiiiविधीमत्रादिमागमा सीयात्रा का ||१|| प्राचीनातिमानीन लोगणादि महर्षियों ने और राजर्षितवर विधानि- प्रादि ने तीर्थ यात्रा को महायुगय मनाया है ॥ १५ ॥ स्मारकर्ममयीम्माप्प भूमि भारतमंजिकाम् ।। पस्नातं सामु तस्प जन्म तार्थकम् ॥ ४५ ॥ (पाटा)- इसलिये मारतीम अगी फर्मगमि पाकर जिसने सब ताथों स्नान किया उसका जन्म सार्थक हे ॥४॥ तीर्थ ती प्रतिस्नातुं फथं शक्यं तपोधन ।। तस्माद्रहस्य पत्तीर्य सर्यनीर्यफलप्रदम् ॥ ४६॥ रत्नभूतेषु तीधेपु रत्नभूतं पत्रुच्यते ।। ततेहं संप्रयच्यामि त्वमिहकमनाः शृणु ॥४७॥ है तपोधन ! तीर्थ तीर्थ प्रतिस्नातुं मनुष्यः कथं शस्यं तस्मार्क्सव जीर्थफलप्रद रत्नभूतेषु तीर्थेषु रत्नभूतं रहस्यं गोप्यं यची तदहं ते तुभ्यं संप्रवक्ष्यामि स्वमिहैकमनाः शृणु ॥ ४६, १७ ॥ हे तपोधन ! सभी में स्नान करलेना मनुष्य शक्तिसे पास है इस लये सभी तीकि फल देनेवाला, रल तीघों में भी परमरत्न और गोप्य जो तीर्थकहागयाहै उसकोमैं तुमसे कहताहूं सावधानहोकर सुनो ॥४६,४७॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये ताधवर्णन नाम प्रथमोयायः। +
हितीयाध्यायकथारंभः।
(सूत उवाच)
एतनिशम्य पचनं स्कन्दस्य कलशोद्भवः ।।
भूयोविज्ञापयामास मुदा परमया युतः ॥१॥
सूतस्यौनकादीन् कथयति यत् कलशोभूयोऽगस्त्यम्स्यन्दस्यै
तद्वचनं निशम्य श्रुत्वा परमयात्यन्तया मुदा हर्षेण युतः भूयः
पुनर्विज्ञापयामास ॥१॥
सूतजी शौनकादि ऋषियों से बोले कि अगस्त्यजी ने स्कन्दजी
के यह बचन सुनकर परम हर्प के साथ फिर निवेदन किया ॥ १ ॥
स्वामिस्ते वचनादन महती मे प्रसन्नता ।।
संजाता मनसोऽत्यर्थ वारिणरशरदायथा ॥२॥
हे स्वामिन् । तेतववचनादत्र मे मनसः शरदः शरस्तुतीमारिणो .
जलस्य यथा प्रसन्नता भवति तथा अत्यर्थ अतिशय प्रसन्नता जाता ॥२॥
हे स्वामिन् ! जैसे शरत्काल से जल की प्रसन्नता होती है
वैसे आपके बचनों से मेरे मन को अत्यन्त प्रसनता पास हुई है।
(यहाँ प्रसलत्ता का तात्पर्य स्वच्छता से है)।२॥
भगवन्तं पुनः प्रष्टुं समीहे हरनन्दन ।।
भूपो ममेनं सन्देहमपा फुरु दयानिधे ॥३॥
है हरनन्दन ! पुनर्भगवन्तं प्रष्टुं समोहे दयानिधे ! भूयो ममैनं
सन्देई अपाकुरु ॥ ३॥
है हरनन्दन मापसे पुनः पन करने की इच्छा फरता हूं, हे
दयानिधे ! एक बार और मेरे सन्देह को दूर कीजिये ॥३॥
१६
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहास्य ।
यत्वयोहम्महातीर्थ गुह्यं गुह्यं महीतले ॥
तस्य तीर्थस्य यन्नाम तन्मे वद विदाम्बर ॥४॥
हे विदाम्बर ! महीतले गुह्यं गुह्यं यन्महातीर्थ त्वया उक्तम् त
तीर्थस्य यन्नाम तन्मे बद ॥ ४ ॥
है ज्ञानियों में श्रेष्ठ ! इस पृथ्वीतल में गोप्यगोप्य अर्थात् अत्या
गुप्त महातीर्थ जो आपने कहा है उस तीर्थ का जो नाम है वह मुम
बतलाइये ।। ४ ।।
किन्ततीर्थ किम्प्रमाणं किम्फलं किंसमीपगम् ।।
किम्माहात्म्यं किमाधिक्यं किंदेशस्थं किमात्मकम् ॥५-
(स्पष्टार्थीयम् )
यह कौन तीर्थ है, उसका क्या प्रमाण है, क्या फल है, किसके
समीप है, क्या माहात्म्य है, उस तीर्थ में क्या विशेषता है, किस देश-
में है और उसका कैसा रूप है ? ॥ ५ ॥
एतत्सर्व समाचक्ष्व विचक्षणशिरोमणे ॥
तृणां निरयसार्थाय तय सूक्तं प्रवर्तते ॥६॥
विचक्षणाविद्वान्सस्तेषां शिरस्म मणिरिव तत्सम्बुद्धी हे विचक्षण
गिगमरो नानिशिरोमणे! एतत्सर्व समाचत्य कथय यतस्तय सूत्र
(मुटुशोभनं उक्त कथनं सूक्तं भवति ) तब मुवचनं नृणाम्मनुष्याणा
निरयेयसार्थाय निरपरल्याणलामाय मवर्तते मवति ॥ ६॥
है मानिशिगेगणि! ये सब विषय पूर्ण राति से मतलाइये,
क्योंकि मा मुख्यन मनुष्यों के परम फत्पारा के लिये है ॥६॥
(रान उत्रा)
इमि पृष्टः म भगवान्मुनिना मयोनिना।
उयाप गुरमेनानीस्मयनिय गनस्मयः ॥७॥
श्रीकागलायतनतीर्थमाहात्म्यं । इत्येवं कुंभयोनिना कुंभी घटो योनिर्जन्मस्थानं यस्य स तेन मुनिना अगस्त्येन पृष्टः स गतस्मयो निस्हो भगवान् सुराणा सेनानी स्कन्दः सयन् स्वचितोदेकं प्रकटयन्निवोवाच चिचोकः स्मयोमद इत्यमरः ॥ ७॥ सूतजी बोले कि जब कुंभयोनि अगस्त्य मुनि ने इसप्रकार प्रभ किया तो निरहंकारी भगवान् स्कन्दजी ने अपने हृदय में जो तथिों के भेद भरे थे उनको प्रकट करते हुवे कहा ॥ ७ ॥ शृणुविजेन्द्र पदयामि गोप्यं तीर्थमनुत्तमम् ॥ ঘন্নান স্বা पापराशिः प्रलीयते ॥८॥ हे विप्रेन्द्र ! अनुत्तम गोप्य तीर्थ प्रवक्ष्यामि शृणु । यसमिति स्पष्टम् ।। || हे विपेन्द्र ! एक उत्तम और गोप्य तीर्थ को कहता हूं, मुनो ! जिसके नाम श्रवण करने से पापराशि नष्ट हो जाता है।॥ ८ ॥ अस्ति देशास विपुलस्तमुद्री पातुकामयः ।। महिष्ठी मेदिनीएठे निसर्गादेय पावनः १६ अस्तिस मेदिनीपृष्ठे पृथ्वीपृष्ठ महिष्ठः अतिरायेन महान् महिछः पूज्यतमः निसर्गात्स्वभावादेव पायनः पवित्रः वालुकामयः समुद्रः विपुलो देशः ॥ ६॥ पृथ्वी पर अतिशय पूज्य स्वभाव से ही पवित्र मालुकामय समुद्र एक विपुल (बहुत बहा) प्रदेश है ॥२॥ यघोराको नाम मुनि लुकामयसागरे।। चिरकालं यारोस्लपस्तीस तपोधनः ॥१०॥ यत्र देरो वालुकामयसागरे तपोधन उत्तो नाम मुनिश्वरताल - भारपिनायरमनीगा। जिम देश के यानुसार मागोवन उजमान ने बहु दिनी नागनिया की।॥ १०॥ तस्पेयं प्यमानग सपना गुइयरम् ॥ धुन्धुनीममहाविन्याचगवाश्रमममिया ॥ ११ ॥ मुनुधा ती नपानप्यमानाय नम्या कायाप्रमसकिनी महा देत्या गुन्भुनांगवय ॥ ११॥ इस प्रकार अन्यन्त होगमाध्य कठिन तप को जाने व उरांक मुनि आश्रम के पाम में धुंधु नाम का एक महादन्य उसन हुवा ।। ११॥ घालुकान्तातिरशरयच्छतेऽसौ फानुपारायः॥ तपोविनफरो नित्यं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ भावितात्मनां भावितः सानारकारनीतः आत्मायः ते माविनामा- नम्तेषां मुनीनां नित्यं तपोविनकरः असो कनुपाशयः पापात्मा महादेत्यः बालुकान्तर्हितः यालु कान्तर्गतश्शश्व निरन्तरं रोते ।। १२ ।। श्रात्मदर्शी मुनियों की तपस्या में निरन्तर विन्न करताहुवा वर पापात्मा धुंधु बालुका में छिपकर सदा सोया रहता था ॥ १२ ॥ कदाचिन्मुखतो यहि वायुं वापिसमुत्सृजन् ।। उत्तकस्य तपोविनं च स दुष्टदानयः ॥१३॥ स दुष्टदानवः मुखतः कदाचिद्वह्निमगि कदाचिद्वायु समुत्सृजन्न द्विरन्नुत्तकस्य तपोविजं चक्रे ॥ १३ ॥ (१) रास मायावी होते हैं, उनके वास्ते मुख से अमि उत्तन करना अथवा प्रचार मार उपस करना कोई कठिन समस्या नहीं है। नाल्मीकिरामायर में लसपनी के साथ मेघनादने युद्ध करने हुए अपनी सारी सेना को लसए के ही रूप कनाडाला था। दंगा में रान के देह जो रसपान होता सारिशमानसरोजाना श्रीकपिलामतनतीर्थमाहात्म्यं । यह दुष्ट दानव मुख से कभी अमि को कमी वायु को यमन रता हुवा उत्तंकमुनि की तपस्या में वित करता रहता था ॥ १३ ॥ इत्यन्तमपणं हष्ट्या विप्रः स तापसः ।। कथर्मपभर्वध्धश्चिन्तयामास चेतसि ।। १४ ।। इत्थं पूर्वीतामिवगळवायूद्भिरणादिव्यापारणापकुर्वाणंतदैत्यं दृष्ट्या प दैत्यः कथं वध्योभवेदिति स तापसोविप्रः उत्तंकश्चेतसि चिन्तयामास सद्ध विचारयामास ।। १४ ॥ इस प्रकार मुख से अमेि और वायु को उसन्न करके अपकार करनेवाले दैत्य को देख कर यह तपस्वी ब्राह्मण उतकमुनि अपने मन में विचारने लगे कि किसप्रकार से वह माराजाय ।। १४ ॥ स्वतः सामर्थ्ययुक्तोऽपि प्रलयानलसनिमः ॥ क्षमावान स्वतपोभंगभिया ना कुरुत स्वयम् ॥ १५॥ क्रोधसमये प्रलयानलसन्निभः प्रलयामिसमः क्षमावान् शान्तचेताः स मुनिः स्वतः सामर्थ्ययुक्तोऽपि दैत्यवपकरणे स्वयं समर्थोऽपि स्वतपोभंगभिया भयेन स्वयं न अकुरुत दैत्यवधाय स्वयं नोयत । अत्र स्वयम् इति स्थले ध्रुवमपिपाठः ॥ १५ ॥ क्रोध के समय में प्रलयकाल के श्रमि के सदृश उस क्षमावान् मुनि ने निज के सामध्यं होते हुए भी अपनी तपस्या के भंग होने के भय से स्वयं उसका वध नहीं किया ॥ १५ ॥ ततो युद्ध-या विचार्यासौ नृपं कुवलयारथकम् ।। धुंधोधाय धर्मात्मा गृहे गत्या व्यजिज्ञपत् ॥ १६ ॥ ततस्तदनन्तरमसौ महात्मा धुंधोवधाय कुवलयाश्वर कुवलयाश्व- नामानं नृपं बुद्धया विचार्य तस्य गृहेगल्ला व्यनिपत विज्ञापयागास ॥१६
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य ।
इस
के
अनन्तर उस महात्मा ने धुंधुनामक दैत्य को वध करने
य अपनी बुद्धि में राजा कुबलयाश्व को विचारकर उनके घर
कर उनसे कहा ।। १६ ॥
जन्मे झिपतां कर्म फिश्चिद्यते निवेदये ॥
पिस्थिनिदयां कृत्वा तपो विघ्नं विनाशय ॥१७॥
हे राजन् ! किविकर्म क्रियतां यचे तुभ्यं निवेदये तपस्विनि
मे दयां कृत्वा तो विनं विनाशय ।। १७॥
हे राजन् ! जिस काम को आपसे निवेदन करता हूं उसको
जिये । काम यह है कि तपस्वियों के ऊपर दया करके तप के विघ्न
विनारा कीजिये ॥ १७॥
जानो हि महाराज विष्णोरंशसमुद्भयाः॥
पाच श्रूयतो लोके नायिष्णुः पृथिवीपतिः ॥ १८ ॥
हे गहाराज ! राजानः विष्णोरंशसमुद्भया भवन्ति तथाच पृथ्वीपतिः
विष्णुः ना गगुप्या अर्थान्मनुष्य रूपो विष्णुरिति लोके थ्यते ॥ १०
हे महाराज ! राजा लोग विष्णुमगवान के अंग से उत्पन्न
हैं। और संसार में भी मही कपन प्रसिद्ध है ॥ १८ ॥
पदुःखं ममराजेन्द्र भूपतां श्रुतिदानतः॥
परोपकारकरणे यूपं धात्रा यिनिर्मिताः ॥ १६ ॥
दे राजेन्द्र ! गमयदुःस तनिधानतः श्रूयतां यूयं परोपकार
रो पात्र मनपा विनिम्मता ॥
गजेन्द्र मेरा जो दुःम्न है तो कार देकर मुनिये, मापलोग
र कानमनही विधाता से निमांग किये गये हैं।॥१५॥
भोपिलायतनतीमाहात्म्य ।
धुन्धर्नाम महादुटो मधुसूनुर्महाबलः ।
नित्यं रजस्सु स्वपिति मदाश्रमसमीपगः ॥२०॥
महावलो भीषणपराक्रमो महादुष्टो मधुसूनुः मधुनामको दानका
पूर्वमभूत् यद्वधं भगवता विष्णुनाकारि येन तदारभ्य भगवतो मधुसूदन
इति भगवान् मधुसूदनेन नाम्रा प्रसिद्धिगतः तरकथाविस्तारं पुराणेषु
प्रसिद्धं तस्य मयोः पुत्रः महादुष्टः धुधुर्नागक: मदाश्रमसमीपगः मदीया-
श्रमनिकटे वसन् नित्यं रजस्सु वालुकास्वन्तर्हितः स्वपिति शेते ॥ २० ॥
एक मधुनामक दैत्य था ( जिस मधु को विष्णु भगवान ने वध
किया जिस कारण भगवान का नाम मधुसूदन पड़ा जिस की कथा
पुराणों में प्रसिद्ध है। जिसका पुत्र महावली और महादुष्ट धुन्धु
नाम का दैत्य है जो मेरे पाश्रम के निकट ही वालुकाओं में छिपकर
सदा सोता है।॥२०॥
स मे विप्नं करोत्युचैः सदा पर्वणि पर्वणि।
तं ध्वंसय महाबाहो विष्णोरंशोऽसि भूनले ॥२१॥
स धुन्धुम मम पर्वणि पणि सदा उच्चैर्विनमुपद्रवं करोति हे
महावाह! ! सं ध्वंसय नाशय यतस्त्वं भूतले विगोरंशोऽसि ।। २१ ।।
बह धुन्धु नामक दानव मेरे प्रत्येक पों में अत्यन्त वित करता है।
हे महाबाहु ! तुम पृथ्वी में विष्णु भगवान का अंश हो इसलिये
उसका नाश करो।। २१॥
स एव मुसोनृपतिब्रमण्यः सत्यसंगरः ।।
साहाय्यं मनसा कतुं प्रारमपार्थे समुथतः ॥ २२ ॥
सत्यसंगरः सत्यवतः ब्राण्यः ब्रह्मनिष्ठः बाझएप्रिय इतिया स
नृपतिः राजा एवं उक्तः उत्तंकमुनिना कथितो ब्रामणा साहाय्य
कर्तुं मनसा समुद्यतः ॥२२॥
.. श्रापिलायननाथगादाभ्यं । सत्य का पालन करनेवाले ग्रामगी के भक्त उस राजा (कुबलकारः । पतंक मुनि ने जर मा पहा तब उनक गनि की सहार के लिये गजा ने मनमा मंगल्प किया ॥ २२॥ एकविंशतिसाहनः मंख्याः पुत्रयुनः॥ गत्वा धुंधुं जघानाशु विष्णुधीरयोपहितः ॥२३॥ विष्णुचीयोपहितः विष्णुतुल्यपराक्रमः बिगारंशत्वादिति । राजा स्वकीपरेकविंशतिमहरः संख्याः पुत्रयुत उत्तकमुनेराश्रमममी त्विा श्राशु शीघ्रं धुंधुं जघान ।। २३॥ विष्णुभगवान के तुल्यवली उम राजा ने अपने इपीस हजार वों के साथ उत्तक मुनि के आश्रम के समीप जाकर उस धुंधु दानव से मारडाला ॥२३॥ धुंधोमुखामिना दग्यास्नयेते राजसूनयः ।। देवेन दुर्वितक्येण प्रय एवावशेपिताः ॥२४॥ ते सय राजमूनवः राजपुत्राः धुंधोमुरगामिना दग्या मामीमलाः वितक्येण देवेन तेपु त्रय एका वशपिताः ॥२४॥ इस युद्ध में राजा कुवलयाश्व के सभी पुत्रों को धुंधुदानव ने सपने मुख से अमि प्रगट करके जलादिया, भाग्य से तीन लड़के च गपे ॥ २४ ॥ धुन्धुमार इतिख्यातः कमर्णा तेन स द्विज। सोयं शुद्ध देशास्ति समुद्रो वालुकामयः ॥ २५ ॥ (1) मी रामचन्द्रनी ने समुद्र के तट पर जाकर सागर से सामुद्रिक पय मांगने के से पूर्वाभिमुख हो हाय जोड दुशाशन लगा प्रार्थना करते तीन दिन उपवास त सरा परन्तु सरिन्पनि प्रकट नहीं हुए। तब कुद रोकर धनुषवाण उठाया धीर अवद्ध नों से समुद्र को सौवा दिया, सादिक मर जन्तु व्याकुल होगये, समुद्र से भयंकर रहने लगा और चारारा, पानात, मन, पति सरकांपने लगे । तर सागर सन श्रीकापिलायतनतीर्थमाझाम्या हे द्विज ! तेन कर्मणा स राजा कुबलयाश्वः धुंधुमार इतिख्यातो नाम संज्ञांगतः मघोन मधुसूदनवत् । सोयं वालुकामयः समुदरशुद्ध पदेशो स्ति ।। २५ ॥ हे विम ! उस कर्म को करने (धुंधु को मारने) से उस कुवलयाश्व नाम के राजा का नाम धुंधुमार हुवा, और वही यह वालुकामय शुद्ध प्रदेश है ।। २५ ॥ के मध्य में निकले ततक रामचन्द्रभी ने उस ब्रह्मास्त्र से समूह को शोर कर पैदल सनरी सेना को पार लगाने की प्रतिज्ञा की, तर समुद्र को मानहानि देत देवतात्रों ने भाकाशवाणी द्वारा मना किया और समुद्रदेर सम्मुख पाकर प्रार्थना र बोले कि हे राजकुमार हम काम से, लोभ से, भय से, बिसविरार उस जल को रोक नहीं सकते हैं थापकी जैसी इच्छा है वही हम भी करने को तैयार है और नो पाप करेगे उम को हम सहन करेंगे। पापी सना पार जायगी उस समय कोई जीव उत्त को नहीं सा समता किन्तु यह जन शिबीच २ में उत्तम उत्तम सत्त दिखावेगा। हेमा सुनकर रामचन्द्रजी ने कहा कि इस यमोष शस्त्र की किस देश में दोहूँ? तर सपद ने कहा कि उत्तर के देशों में एक दुभास्य नाम का मेरा पुगएरथान है वहांपर बहुत चौर डाकू समारादि पापी या था कर मेरे जल शेरपर्श करते चोर पाते हैं। हे राम! इस उत्तर शर को बहाही दाहिए। क्योंकि उन पापियों के सौ से जो पाप होता है उस को में नहीं सदन कर सकता। यह सुनकर धीरामचदाने उसी देश में शरदोषा। तब से वहदेश सरकान्तार (मरुनांगल) नाम से प्रसिद्ध या और जिस स्थान में शर गिरा वहां पातास से पानी उपर पाने लगा, पृधाम चित होगा जितको मणकप कहते हैं। इसरार अपने प्रयास से समुद्र के कुरिगत जल को शोर लिया और सर्वत्र तिम् दीपने सगे जासे इस देश समरजांगल नाम दीनो लोक में विख्यात हुना। "विष्यातं त्रिषु लोकेषु मा कान्तार मेयया शापयित्वातुतं कुतिरामी दशरथात्मजः परं तरी ददी विदाम्मरपेऽमरविक्रमः॥"पाये रामचनी ने उम महदेश मदान दिया कि इस देश में पशुओं के चरन वारने हा बहन होंगे चार रोगीमारी उस देश में नहीं होगी फल मूल चीर रस नेक औषधियों से दुल स्नेहार पोरमदिन सुगन्धित वृक्षों से १६ स्थान पर हेगा।" वमभिध संयुक्तो पशुभि संयुत्तामाः। रामस्य परदानाश शितः पंधा पभूवइ ।"श्री रामचन्द्रना सा सरदान पार पद पार पनेक रौंका प्राधार हया पर उसके समयमा माया सायास्मीनार रामार युद्धमा २१-११ हो।
TAAREEFitrator भयो निधनानिमारगुतामि॥२६॥ परेश सके मनमान: - रहिन महामहीद | मी treet गुरमादिनः । निभंग निनः मी ftya तिकगुणा ॥२६॥ संसार में यह देयमारगुना निन सामना मुली गयः सबभोर निभग पनि गुरज से है॥२६॥ प्रापा मानमाः सय मरमा शुद्धमानसाः। पव्यकोर्पतास्कर्वपक्षिताः प्रापयस्पिताः॥२७॥ तत्रस्याम्तहेरासमुलमाः म मानवाः सरलाः शुदमानमः मानसाः पवित्रान्तःकरणाः मायरा काटा कार्य तामहर्जिताः ताः सन्ति ॥२७॥ उस देश के सभी मनुष्य सीधे और शुदचिव तया कपट, जा एवं चोरी इत्यादि दुर्गुणों से बहुधा यनित होते हैं ।। २७ ।। याचारविनिर्मुस्ता युक्लावारिधिपूजने ॥ देशीयालयाभूपाः सर्वथा पापभीरवः ॥२८॥ ते मानवा वाद्याचारेण वामशुद्धिरुपस्पास्परांशीचाचारादिना- मुक्ता रहिता अतिथिपूजने अतिथिसत्कारे युक्ताश्च भवन्तीति । · तद्देशीया भूपा रागानः सर्वथा पापभीरयो भवन्ति ।। २८ ॥ वे मनुष्य बाहरी आचार-विचार से रहित और अतिथि सेवा में रत हैं और उस देश के राजा सर्वथा पाप रो टरते रहते हैं ।। २८॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
विमाश्च वेदरहिताः प्रतिग्रहविवर्जिताः।
सुशीला: साधवःसौम्पास्तपा निपोजजीवनाः॥२६॥
विभा मामणःश्व चेदरहिताः प्रतिग्रहविजिताः सुशीलाः साधवः
सौम्यातया नियाजजीवनाश्च भवन्ति ॥२९॥
उस देश के नामथ चेद शाम को नहीं जानते और दान नहीं
लेते एवं सुशील साधु और शान्त तथा निष्कपट जीवन व्यतीत करने
घाले होते हैं ।॥ २६॥
तद्देशीयाः स्त्रिपरशुद्धा चतिचांचल्पार्जिताः ।
जुस्वभाषशालिन्पो देवतातिधिपूजिकाः ॥३०॥
तद्देशीयास्तदेशप्रसूताः प्रिया शुद्धाः शुद्धाचाराः अनिचांचल्य
वर्जिताः ऋजुस्वभावशालिन्यः कोमलप्रकृतयो देवतातिथिपूजिकाच
भवन्तीति ॥३०॥
उस देश को सिमां शुद्धावरण वाली और पति चंचलता से रहित,
कोमल स्वभाव की एवं देवता तथा अतिथि की सेवा करनेवाली
होती हैं।॥ ३०॥
सस्मिन्देश महामाग! कचिसिनो भविष्यनि ।
सोप्पेनां पृथिवीं पूनां पायपन संचरिष्यति ।।३१।।
है महाभाग ! तस्मिन्दरो फमिसिदो भविष्यति सोप्येनों पूनों
पवित्रां पृथिवी पाययन्नतिरायेन पवित्रीकुर्वन्संचरिष्यति ॥ ३१ ॥
हे महाभाग ! उस देश में कोई सिद्ध होगा जो इस पवित्र पृथिवी
को पतिय पवित्र करता हुवा विचरेगा ॥ ११ ॥
प्रजास्तहरायासिन्यो देशाचारकृतादराः॥
उप्दाराहाधर्मवारिपायिन्यः स्पृष्टभोजनाः ॥३२॥
यतन
संदेश प्रा. देगा
का प्रादगंगागिन नागनादग: TE: गांना या
ममादिगामी मंगानं निवि ममामा: बका
सोरा समी नगंगानियः नाग समेत
গালাগালাগাযালীমৰিয়মান কি
गायक भगामे दलित न तापि नानि माननाः ॥३१॥
उस देश के रहने वाली मा भान देगानार का बहुत मा
फरती की गवारी करना जलतरकिगीकर
लगाया शमादि गोगन करना है ।। ३२ ।।
(ऊंट की सवारी मंजल पान पर विचार या
भोजन इत्यादि धर्मग्रन्थों के अनुसार मायभित सूना होता है इसनिक
श्रावणीकर्म के संकला में इन मों को घुद्र पापों में परिगारीव विष
गया है परन्तु एतहण प्रजा को देशाचारवरा करना ही पड़ता है।
तथापि तदोपर्गपरस्पष्टातत्यमायन:॥
तथापि अधारपूर्वोक्तपापाचरणादपितम्य सिद्धम्प प्रभात
तोपगणेरुक्तदोषसमहरस्पृष्टा निर्लेपाः प्रजा मवन्तीतिरोपः।
तथापि उस सिद्ध के मभावसे वे उपरोक्लदोप मजावाको नहीं ल
ईदृग्गुषविशिष्टेऽस्मिन्विषये द्विपदाम्बर ॥ ३३ ॥
सर्व तीर्थ शिरोरत्नं महातीर्थ विराजते ।।
ख्यातं यत्सर्यलोकेषु कपिलायतनन्विति ॥ ३४॥
हे द्विपदाम्बर ! ईगुणविशिष्टेऽस्मिन्विषये दे
सर्वतीर्थललामभूत महातीर्थ विराजते यत्तु सर्वलोकेषु
स्यातं प्रसिद्धमस्ताति ॥ ३४ ॥
श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यं । हे मनुष्य श्रेष्ठ ! ऐसे गुणों से युक्त उस देश में सब तीर्थों का मुकुट * एक महातीर्थ है । जो सब लोकों में कपिलायतन इस नामसे प्रसिद्ध है।३५ समुद्रे वालुकापूर्णे महाद्वीपइय स्थितम् ॥ तत्कपिलायतनम् वालुकापूर्णे समुद्रे महाद्वीपक स्थितमस्ति । वह कपिलायतन घालुकामय समुद्र में एक महाद्वीप के सदृश । यलगान है। निर्जलेषु जलप्रायद्वीपोयं शर्करामयः ॥ ३५ ॥ नाना मृगगणाकीर्णः सर्वकालनिरामयः ।। निर्जला निर्जलदेशेषु शर्करामयः सिकतामयः नानामृगगणाकीण विविसमगजातिव्यासः सर्वकालीनरामयायं जलपायद्वीपः अर्थादस्मिन्म- हापदेश जलमग भवत्येव ।। इन निर्जल प्रदेश में भी यह वालुकामय द्वाप अनेक मृगगणे। से युक्त सर्वदा निरामय और जलयुक्त है, अर्थात् निर्जलदेश होने पर भी यहां जल हो ही जाता है। प्रसिद्धात्पुष्करातीर्थात्मत्यग्दिशि तपोधन ॥ ३६॥ घसते कापिलं तीर्थमे कविंशतियोजने।। कृष्णसारमयी भूमिवर्तते यत्र पावनी ।। ३७ ।। हे तपोधन ! प्रसिद्धासुम्कराचीन पुष्करक्षेत्रात्मत्यदिशि पश्चिमा गयां एक विशति योजने कापिलं ताधवर्तते पत्र कृष्णसारमयी पावनी पविया भूमिर्वतते ।।३६,३७॥ हे तपोधन ! इस प्रसिद्ध पुकारतीय से पश्चिम दिशामें इकोम योजन पर एक कपिलतीर्थ है जहॉकी पावनभूमि कृष्ण-सार मगासे युक्त ॥३६,३७ पजचना पात्र विप्रेन्द्र सदा सदापिका ।। हे विप्रेन्द्र पत्र कपिल तीर्थ या पूर्वसोकोक्ता कृर-मारमयी ममिः सा यवनां यजरुणां सदा स्वर्गदायिका भवतीति ।
२० श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य हे विप्रवर ! वह कृष्ण-सारमयी पवित्र भूमि यह करने वालों को सदा स्वर्ग देती है। सर्वतीर्थयरं घेतत्सर्वक्षेत्रवरं तथा ॥ ३८॥ सारात्प्तारतरं स्थानं पुण्यात्पुण्पतरं पुनः ।। (स्पष्टार्थः)- यह स्थान सब तीयों से तथा सब क्षेत्रों से श्रेष्ठ है और टर से उत्चम तथा पवित्र से भी पवित्र है ।। निपु लोकेषु भूलोंकों मूलोंके लोक एचहि ॥३६॥ लोके द्वीपवती पृथ्वी जम्बूद्वीपस्ततोऽधिक। तदर्पनवके विप्र श्रेष्ठं भारतमुच्यते 1.४० ।। (इस भूलों में संदेप से जम्बूदीपादि सातों द्वीपों तथा उनमें में केवल जम्बू के दी बनर्गत नो खण्डों को दिखाते हैं। भूगोल के बाधा उत्तर कामाा ना है, और जम्बूद्वीप की दक्षिणी सीमा पर सारममुद्र है, और इसके उत्तर तीर के दै को निरपदेश कहते हैं, १० निरददेश में लंका (स.लोग), इससे पत्रिम रोमक (रूप इसमै पश्यि सिद्धपुर (अमेरिका), उससे प्राग यमगर ये चार स्थान है, अर्थात् सः मे पू यमकोटि, पशिम रोमक और ठीक नीचे सिद्धपुर है । ये चारों स्थान भूगोल पागांश परलपारा स्पानों से कार्यत निवर दास पर वही उत्तर सलिग लंका से उत्तर मिला है जो पूर्व-पभिम समुद्र तक गया है। पीर मिमि में उतर गटात है, वह भी पूर्व-पभिम सपुर तक गया है, एवं इससे उन नियन समुद्र पर्थन गया पानसों में पाच में नौकाकार के देश में निन में प्रविश करते है। उनमें पला भारत उत्तर देश है, उससे उत्तर दरिया है एमाले नोEिT मानाल के अमेरिका ! उससे उत्तर भावानात भिम स उसके उरार सही मार। पर मो नाaanाच में भी देश है। सिमपुर और गंगान वार को मांगवान श्री सलमान के गोप में मया हा र बार मन में ITIES aunrifa को भी पूर्व में बनाया एक मालवान सिधार मेलिना मारिना पीना है, उसके और मार
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श्रीगरिलायतमतीर्थमाहास्य । त्रिषु भूर्भुवस्वलोके प्वयंमू कः अस्मिन् भूलॊके हि यतः लोको एष भत्र लोक शब्दो भुवन जन वाचकः लोकन्तु भुवनेजने रोक्त्या अतोऽस्मिलोके भुवने पृथ्वी द्वीपवती द्वारा विद्यमानाः स्या अभ्याम्चेति द्वीपक्ती ततम्नेषु द्वीपेषु जम्बूद्रीपोऽधिको नेति । वर्षाणां नवकानां समहारो वर्ष नवकम् तस्य जम्बूद्वीपस्य व तद्वनवकं तस्मिन् हे विष ! भई भारतं उच्यते ॥३६,४०॥ भूलोक, भुवोक, खोक ये तीन लोक हैं इन तीनों लोकों में भूलोक है इस भूलोक में ही मनुष्य रहते हैं इसलिये इस लोक सातद्वी वाली पृथ्वी नव देशों में बंटी हुई है उन सात द्वीपों में अद्वीप सब से बड़ा द्वीप है इस जम्बूद्वीप के नव खण्ड हैं उन में 1 से श्रेष्ठ भारतवर्ष है ।। ३२, ४०॥ च में भद्रात सा देश है, चार पास में रोमदेश से पपादन नाम का एक द निकलकर निगम से मिलता हुआ नाल तक गया है। उसके और समुद्र बाद माल पाठवां देश है एवं निया, नाल, माल्यवान और गन्धमादन इन महानों से विस हा दलान नाम का Tी का नामपए है। इसको Mलोग देवनाको काश-भवन अर्थात् स्वर्गभूमि कहते हैं । इसतरह पृषी के लाई रूप जम्बूद्वीप में, भारतवर्ष, फिभरवां, हरिया, रम्पकवर्ष, हिमवर्ष र दुर्ग सोलोन से अमेरिका तक और संसद के निारे भावर्ग, भीसमुद्र के द्वार पर केतुलमाल एवं च में मेसर्वत है, जिसके चारों दशि निस, पूर्व भारतमान, उता नालागार, पत्रिम गंधमादन से घिराहुया लाइन नववर्ष स्वर्गभूमि है ये नव सएड है। - इस भारत में भी ना सर और सात साचल है, निमकी भी स्थिति लेखता है। भारतमा भरतनी के नाम से है या कथापुराणों में प्रसिद्ध है इसके नाच में पहला ऐन्द्रसरडा दूसरा कशम, तीसरा नामपर्ण, चौपा गभस्लि, पाँचदा कुमारिकालएड, छम नागसएड, साता सम्य, आठवां वारण धीर नवां गन्धर्व संज्ञक-सण्ड है। पन्यास्था चार प्राथम-धर्म, केवल इस कुमारिका के निवासियों में ही है। शेष देशों में पार्याचाराधमादिका विचार नहीं है। इस { भारत में माहेन्द्र, शक्ति, मलय, ऋक्षा, पारिमाल, सा और विश्य ये सात कुलपत्रत हैं। इन पर्वतों के देश २ में मित्र र नाम है।
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श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य ।
विकलः स्त्री पुत्रादि परिवारेभ्य अद्विमचिचोजनः महत्वामहत्त्वं
च न वेति न जानाति लोकोजनागतानुगतिकः येनास्मलितरोयाना
येन याताः पितामहास्तेनमार्गेश गन्तन्ममितिमागविलम्बीति पारमाथिकः
ईश्वर प्रणिधान रूप परमार्थसाधको लोकोजनानति ।। १५ ।।
सी, पुरुष, धन परिवारादि की अभिलाषाओं में विवल चित्त
मनुष्य गतानुगतिक होते हैं अर्थान् एक दूसरे के पीछे चलनेवाले होते हैं
ये ईश्वर सम्बन्धी परमाथी ज्ञान के साधक नहीं होते, इसलिये वे
इमके महत्व व अमहत्व को नहीं जान सकते क्योंकि उन्हें अन्य विषय
के मनन करने का अवकाश ही नहीं मिलता ॥ ११ ॥
सारंच पदसारंच शास्नादेय हि मन्यते ॥
यस्य शास्त्रमयं चतुः सचनमान्नचतरः ॥ ४५ ॥
यत्सारं यदसारं च पातु तच्छायादेव हि यतो मन्यते । अतः
यस्य चतुः शाम्ममयं भवति स चक्षुष्मान् नचेतरः ॥ ४५ ॥
जो सार वस्तु है और जो असार वस्तु है यह शास्त्र से ही
जाना जाता है जिसका गानमय नेत्र है वही नेत्रवान् है
दूसरा नहीं ॥ १५ ॥
सारात्सारतरं विदि तीर्थ कापिल देविकम् ॥
मा संराप महाभाग ! मदु त्वं फदापन ॥४६॥
है महाभाग ! कपिलोदेशीयस्य तत्कापिलदैविकम् ती सारा.
सारतरं विदि जानीहि मदुले मदीय कयने कहारन मा संगय संद
हे महाभाग ! म पनि वीर्य को उत्तम में उरुम जानो, मेरे
इस कथन में कमी सन्देह गान करो ॥६॥
aff Ta, irriti Trirat नागा राम"!" karnerrain Terrrrr karatiyarthi titafa malini Th: Trnान TARAHIM मा मन है ॥११॥ ATIOनरिममिजानमः ॥ मागारं प्रात: पापिनुरामम् ॥ ४२ ॥ कामगाराला मि.नपेन गनुपात सेवी सदा प्रम गास्मान्तरमाणार पिनानगालणारः ॥ १२॥ विदेशी गाने ने मह उन सई सनों में सागवाना हम लिनप काही काम। पततीर्थस्य माहात्म्यं करली जाननि कंपन । गनाः सय नजानन्नि महामोहागपचुपः ॥ ४ ॥ फली कलियुग पगली मग माहान्थ्य केचनजना जानन्नि महा. मोहान्भरदुषः दारा पुष मित्र धन पुटुम्य परिकारविरोऽवं मंमार एवमहामोहः भस्मिन्निमो चतुपयेषान्ते गहा महापरतुपामवन्ति से सर्व न जानन्तीति ॥ १३ ॥ कलियुग में इस तीर्थ के माहात्म्य को कोई कोई मनुष्य जानने हे स्त्री पुत्र मिन धन कुटुम्ब परियारादि रूप संसार के महामोह से अन्धपतु हैं जिनको वे नहीं जानते ॥ १३ ॥ महत्वं चामहत्वंच नयेत्ति विकलोजनः॥ गतानुगनिकोलोकोनलोकः पारमार्षिक: ।। ४४ ॥
श्रीकृषिलायतनाथमाहात्म्य।
विकलः स्त्री पुत्रादि परिवारेभ्य उद्विमचियोजनः महापंचामहत्त्वं
च न वेस्ति न जानाति लोकजनःगतानुगतिकः येनारमस्तिरोयाना
येन याताः पितामहास्तेनमार्गेण गन्तव्यमितिमागावलम्बीते पारमार्थिक
ईश्वर प्रणिधान रूप परमार्थसाधको लोकोजनानति ॥ १४ ॥
स्त्री, पुरुष, धन परिवारादि की अभिलाषाओं में विठ्ठल मित्त
मनुष्य गतानुगतिक होते हैं अर्थात् एक दूसरे के पीछे चलनेवाले होते हैं
चे ईश्वर सम्बन्धी परमार्थ ज्ञान के साधक नहीं होते, इसलिये दे
इसके महत्व व अमहत्व को नहीं जान सकते क्योंकि उन्हें अन्य विषय
फे मनन करने का अवकाश ही नहीं मिलता || १४ ॥
सारंच पदसारंच शास्त्रादेच हि मन्यते ।।
पत्य शास्त्रमयं पनुः सचक्षुप्मानचेतरः ॥ ४५ ॥
यत्सारं यदसारं च पातु तच्छायादेव हि यतो मन्यते । अतः
याय चतुः शास्त्रमयं भवति स चक्षुष्मान् नचेतरः ॥ ४५ ॥
जो सार वस्तु है और जो असार वस्तु है वह शास्त्र से ही
जाना जाता है जिसका शास्त्रमय नेत्र है वही नेत्रवान् है
दूसरा नहीं ॥ ५ ॥
सारा स्मारतरं विद्धि तीर्थ कपिल दैविकम् ॥
मा संशय महाभाग ! मदुत्वं कदाचन ॥४६११
हे महाभाग ! कपिलादयोसस्य तत्कापिलदेविका साथ सारा.
रसारतरे विदि जानीहि मदुफे मदीय कथने कदाचन मा संगय सदेई
मारु॥१६॥
हे महाभाग ! इस गपिन सौर्य को उसम में उत्तम जानो, मेरे
इस कथन में कभी रन्दन मन कगे ॥ १६॥
#TTARA
माम मामंगु गतीनी राद।
मानक पिशाप गागिता सुरेः किल ||४||
मागे दादा मागाना गायाना मिनि भगा.
मांग इस समनामयागादिपु म कपिनाथमातागर नाभंगतः
इम मसिहं निहाय हिल गरेसंगोषिनः ॥ १७ ॥
प्रालि भारदा मागों में सबसे मठ से माग गर है मे
ही प्रयागादि राम नाम में भर यह तीराज करितामम है, देवताओं
ने गोल माति का निदान इसी को सममा, इसलिये गुम करदिया ॥१७॥
नास्प साप माहात्म्यं यातुं शक्यास्मिपमुखैः ।।
शेपोप्यरोपं स्वमुख निरशेपं यस्तुमचमः॥४८॥
अस्मिन्पये अरोपमेकर पुनरगन्दान्तरे निरोपं एका वारिषदद्वयं
युक्तंनभाति मन्मतेतु यथा पड्मुखेः कार्तिकेयो वतुमराक्यास्तथैव पोषि
स्वकीय सहस मुखैर्ववतुमरामय इतिमावद्योतना निरगेमितिस्यलेसही,
रितिपाठोमवेत्तदा साधु पाठ इनि तेन ।
अस्प तीर्थस्य माहात्म्यमहं षड्मुखवस्तुंनराक्यो स्मि मम का का
शेषोपि सहसरस्व मुखैररोष वस्तुमक्षम इति स्कन्दोक्ति समर्माचीना ॥ १८
स्कन्दनी कहते हैं कि मैं अपने ६ मुखों से इस तीर्थ के माहारू
को नहीं कह सकता, तो मेरी क्या गिन्ती है जबकि साक्षात शेप भी माने
हजार मुखों से इस के पूर्ण माहात्म्य को कहने में असमर्थ है ||४||
तथापि शंसती कतुं जिला मामाभिधासति ॥
तीपरत्नस्य माहात्म्पं प्रवक्ष्यामि यथामति ॥४॥
तथापि शंसती रोसित जिता मां अभिपासति प्रेरयति अतः
नि तीर्थरत्नस्य महात्म्यं प्रवक्ष्यामि कथयिष्यामि ॥ १९॥
श्रीकपिलायनतार्थमाहास्य। तथापि कथन करने के लिए मेरी जिहा मुझे प्रेरणा करती है इसलिए जैसी मेरी बुद्धि है तदनुकूल इस तीर्थ के माहात्म्य को मैं कहूँगा || १६ एवं महाभाग! महीतले मलं विनाशयत्तीर्धवरं महो- ज्ज्वलम् ॥ विभाति यदर्शनतोऽपिमानवाः परम्पदं यान्ति विमान मानवाः ॥५०॥ हे महाभाग ! महीतले एवं एतादृशं महोज्ज्वलं महादी तीर्थ- बरं मलं पापं विनाशपन विभाति राजत्ते यद्दर्शनतो यस्यदर्शनमात्रेश मानवाः साधारण मनुष्या अपि विमानमानवास्सन्तः अर्थाद्विमानमा रुर परम्पद स्वर्गति यान्ति ॥ ५० ॥ हे महाभाग ! इस पृथ्वीतल में इस प्रकार पाप को विनारा करता हुआ महोग्यल यह तीर्थराज विराजमान है जिसके दर्शन मात्र से साधारण मनुष्य भी विमान पर थारूढ़ होकर परमधाम को चले जाते हैं ॥ ५० ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्बादे कपिलायतनमाहात्म्ये ताथवर्णन नाम द्वितीयोभ्यायः।
तृतीयाध्यायकथारंभः।
(मूत उवाच)
इत्युक्त्वा पुनरेवाह महिमानमथादिनः॥
कपिलायततीर्थस्य पार्वतीनन्दनोमुनिः ॥ १॥
अथ पार्वतीनन्दनो मुनिः स्कन्द इत्येवमुक्त्वा कपिलायन
तीर्थस्य महिमागमादितः पुनरेवाह कथयामास ॥१॥
इस प्रकार पार्वतीनन्दन स्कन्दजी ने पूर्वाध्याय की कथा कहकर
पुनः कपिलायत (कोलायत ) तीर्थ की महिमा को श्रादि से कहना
श्रारंभ किया ॥१॥
शृणु द्विज! यथैवेदं तीर्थ कापिलसंज्ञकम् ॥
उद्धारं पातकारण्यदावानलसमप्रभम् ॥२॥
हे द्विज ! पातकारण्य दायरानलसमप्रभम् यथैवेदं कापिलसंज्ञ
फम् तीर्थमस्ति वथैवास्योद्धारमपिलं शृणु ॥२॥
हे द्विज ! पापरूपी वन को भस्म करनेवाले दावानल (बनामि)
के समान जैसा यह कपिलतीर्थ है उसी प्रकार इसका उद्धार भी मैं
कहता है, सुनो ! ॥२॥
दृष्ट्यादौ ब्रह्मणः पुत्रः कर्दमोऽभूत्प्रजापतिः ।।
तस्य स्वायंमुयमुना पन्यासीनियतग्रता ॥३॥
(सृष्टयादापितिस्पटाय पद्यम् )
मष्टि के अादि में अन्ना के पुत्र कर्दमपि प्रजापति हुए उनकी
मी म्यां मनु की पुत्री हुई जो नियतमता अर्थात् पियों के जो
पनियता धर्म उमापरली थी॥ ३ ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य ।
तस्यां पुनः समभवत् कर्दमस्य प्रजापतेः॥
श्रीविष्णोरंशसम्भूतः कपिलास्या पर पुमान् ॥ ४॥
तस्यां स्वायंभुवसुनायां श्रीविष्पोरंशसम्भूतः परः पुमान्
परमपुरुषः कपिलाल्या भगवान्कपिलः प्रजापतेः कर्दमस्य पुत्रः
समभवत् ॥४॥
उस स्वायंभुव मनु की पुत्री से प्रजापति कर्दमपी के पुत्र
श्रीविष्णुभगवान् का अंश परमपुरुष भगवान् कपिल उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥
स्व मात्रे देवहत्यैयः सांख्य योग सविस्तरम् ।।
प्रोवाच जगबुन्द्वारकारक करुणाकरः ॥५॥
यः कल्यावर कृपालु भगवान्कपिलः स्वकीये अत्यल्पे-
वयसि स्वमात्र देवहूत्यै जगदुद्धारकारक सांख्ययोगं च सविस्त-
रं प्रोवाच उपदिष्टवान् ।। ५ ।।
जो करुणाकर भगवान् रुपिलजी ने भएनी थोड़ी अवस्था में
ही अपनी माता देवहूती को संसारोद्धारकारक सांख्य और योग
का उपदेश दिया ॥ ५ ॥
गुणांस्तस्य संख्येयान्नवाङ्मनसगोचरान् ।।
वेदोन वक्तुं शतः स्यास्किमुतान्येविपश्चितः ॥ ६॥
हि यतस्तस्य कपिलस्य वाङ्मनसगोचरानसंख्येयान्
गुणान वेदो चक्तुं न शम: स्पाद अतोन्ये विपश्चितोविद्वान्सः
किमुत कथं वक्तुं समर्था भविष्यन्ति " यत्रयाचां गति नास्ति
मनसरचापि तादशी एवं भूतान् गुणान्वक्तुं वेदोपिनभवेदलम्"
इति ॥ ६॥
उस महात्मा कपिल ने मनवचनातीत असंख्य गुणों को बेन्द्र
भी नहीं कह सकता तो और विद्वानों की क्या कथा है भाव दे
कसे वर्णन कर सकेंगे ॥ ६॥
Lifraननामा
मान पायास्मिानियां दायानुमाय मागरं ।।
सन्छन्वं गदनुगामाप्रागुवानीविशंगयौ ॥७॥
मगतान कपिल मा दवन्य भाष्यामि सांख्ययोग
मपिनी पिया दरवा चारान पुनमानरं मनुवाप्य राया-
गस्या शिपायां निपुग्न्य सदनुमान: मानुगमगा सन्दन्दं प्रागुः
दाची दिशं यया गयान् ।। ७ ।।
भगवान् पिन मामा दयाहती को अध्यात्म-विधा का हद
বায় বুক বনী খা না যনাে লাল জাম, ঈম,
लोम, मोह, मद, मात्रादि से निवृष होमाया माहादि सर सांसारिक
पन्धनों को तोड़कर पूर्व उपर की दिशा में चले गये ।। ७ ॥
गच्छपधिददर्शाग्रे समुद्रं वालुकामयम् ॥
तीर्धभूतं परंधाम घरिभ्याननसंनिभम् ॥८॥
पथि मार्ग गच्छन् अग्रे तीर्थभूतं परंधाम उत्कृष्टं स्थान
धरियाः मानन सन्निभम् सदशम् वालुकामयं समुद्रं ददर्श ॥८॥
मार्ग में जाते हुए कपिलजी ने आगे परमोत्तम स्थान, पृथ्वी
के मुख के सदृश वालुकामय समुद्र को देखा ।।।
नाना मृगगणाकीणं नाना वृक्षलतायुतम् ।।
नाना विहगसंघुष्टं नाना मुनि निपेवितम् ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा विचारयामास कपिलः श्रीनिकेतनः॥
इदं स्थान परं दिव्यं तपसः सिद्धिदायकम् ।। १०॥
इत्युक्त्या संचकारेह तन्मनोहरतागुणात् ।।
लोकानुग्रहकाम्याथ कल्पान्तं तप आस्थितः ॥ ११ ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहाल्यं । (सरलाधीनीमानि पद्यानि) श्रीनिकेतन भगवान् कपिलजी अनेक प्रकार के मृगों से व्याप्त, अनेक प्रकार के वृक्ष लताओं से युक्त, विविध पनियों से कृजित और मुनिगणों से मेक्ति उस वालुकामय सामुद्रिक प्रदेश को देख कर विचारने लगे और तपस्या की सिद्धि देनेवाला परमरम्य यह स्थान है ऐसा कह कर उसकी मनोहरताई से आकर्षित होकर संसार के अनुग्रह की कामना से कल्पान्त तपस्या करने के लिए बैठ गये ॥ ६, १०, ११ ।। एकया चायमूर्याच प्रागुदीची दिशं ययौ । अतस्तद्धनेख्यातं कपिलालपनामकम् ॥ १२ ॥ महात्मा कपिलो नहि पूशिन तापसिस्टर अंरोग तत्र कल्पान्तं तपरिस्थितः प्रशनकामन्यांमतिम्बिधाम यस्यामा पूर्वसंकल्पिता प्रागुदीची दिश यो वा भुबने लोके पन् स्थानं कपिलालपनामकं ख्यानं प्रमिद्धम् ॥ १२ ॥ भगवान् कपिलजी अपनी पूर्ण माना से उस वालुकामय प्रदेश में भाकल्पान्त सपन्या करने नहीं बेटे किन्नु एक मूर्ति से यहाँ कान्त तप करने के लिये बेटे और दूसरी मूर्ति अंशामिका भारण फर अपने पूर्व संकरित पूतिर दिशा को गये इसलिए तयमे यह स्थान फपिलालय नाग से संगार में विख्यात हुथा ॥ १२ ॥ सस्य तस्य माहात्म्यं कर्य परमहंचमः ।। सिद्धशाधिष्ठितं परमात्कालिकालमापहम् ॥ १३ ॥ यस्मारकरपालिदेशन भगरता कपिसनाधिष्टितं वर्ष कालिकालमलापहमस्ति मनस्ताप साधस्य पाहायं पातुं पर्णपितुमई कथं पम: मम नि ।। १३ ॥
.
पिश (ATTAR PRICERT गिविंग
से कलिकाल
कामाला महान को
गमान गगन करने में ॥१३॥
नारायणाग पुगपंगा परिकानमन ।।
भरगरिमामाहागणं गई कविताश्रमम् ॥ १४॥
(पष्टार्थः)
जस नारायणाया वकिायम पवित्रमा तमे इस जागतिक
प्रदेश में यह फपिता महापनि म्यान ॥११॥
अस्य तीर्थस्य माहात्म्यं यतुं नालं पितामम ॥
तथापि वर्णयहते किंचित्किषित्समासतः ॥ १५॥
अस्मिन्नय कपिलाश्रमम्पवर्णनातीतं महत्वंयनपनि पपा-
अस्य तीर्थस्य माहात्म्यं ममपिता शंकरोषि वस्तुनालं नहिममर्थः
तथाप्यहं वे तुभ्यं समासत: संपतः विश्चिक्किभिवर्णय ।। १५॥
इस तीर्थ के माहात्म्य को मेरे पिता भी वर्णन करने में समर्थ
नहीं हैं तथापि मैं तुम्हारे लिये संक्षेत्र से कुछ र वर्णन करता हूँ॥१५.!!
अत्र तीर्थ गन्तुमना यदाभवति मानवः॥
तदैव तस्य पापानि मूर्छिनानि भवन्तिहि ॥ १६ ॥
मानवः अस्मिन्तीर्थे यदा गंतुमना भवति तदैव तस्य पापानि
मूर्षितानि भवन्ति हि निश्चयार्थकोऽव्ययः ॥१६॥
मनुष्य जब इस पवित्र तीर्थ में जाने की इच्छा करता है उसी
समय उस की इच्छामात्र ही से उसके सकल संचित पाप मूर्षित हो
जाते हैं ॥ १६॥
श्रीकपिलायतनतीथमाहात्म्यं ।
विनियति यदाहाल
मृतानि पापजातानिराधारयेय नसंशयः॥ १७ ॥
(स्पष्टार्थः)
हे तपोधन ! जर प्रेमपूर्वक तीर्थ स्नान करने जाने के लिये
मनुष्य अपने गृह से बाहर होता है तब उसके सब पाप-समूह मृत
(नष्ट हो जाते हैं इस में संशय नहीं ॥ १७ ॥
एनत्तीर्थस्य सीमायां नविशेत्यापपूरुषः ।।
ततोयं निर्मलो भूत्वा तीर्थ सीमां प्रपश्यति ॥१८॥
(स्पष्टम् )
पापी पुरुष इस तीर्थ की सीमा में न प्रवेश करे इसलिये सीमा से
पहले ही उस के पाप नष्ट हो जाते है और यह निष्पाप होकर तीर्थ
सीमा को देखता है ॥१८॥
मासंशयिष्ठां मनसि सिद्धेशाधिष्ठितांभुवम् ।
सिद्धशाधिष्ठितां भुवम् मनसि मा संशयिष्टाः ।
सिद्धेश भगवान् कपिल मुनि की यह तपोभूमि है इस में किसी
मकार का सन्देह नहीं करना ।
गोयं कर्तुमकालुम्या धन्यथा कर्तुमीश्वरः ॥१६॥
तस्येग तपसोभूमिः सर्वदेवाधिष्ठिता।
भाहात्म्य श्रवणे चास्या नैव कार्या विचारणा ॥२०॥
योयं भगवान्कपिलः हाति निथयेन कर्तुमकर्तुम्यान्यथा
कर्तुमीरवरः समर्थः तस्येयं सर्वदेवैरधिष्टिता तपसोभूमिः अस्या
माहात्म्यश्रवणे च विचारया नैर कार्या यतश्भवणेपि पुण्या
तिशय्यमितिमात्रः ॥२०॥
श्रीकपिलायनननीयमाहात्म्य । जो भगवान कपिल संभव को मंगव और असंभव को संभव अथवा अन्य प्रकार से ही कोई विशेष रचना कर सकने में समर्थ है उसी सिदश्वर की यह तपागृमि है जो सब देवताओं से सविन है इस के माहात्म्य गुनने में कमी श्राताम्य नहीं करना चाहिये अर्थात् पापिलाश्रम तीर्थ पर जाना और स्नान ध्यान करना तो अनियुश्य कार्य है ही परन्तु इसकी कथा के श्रवण मात्र से भी अनन्न पुग्य का लाभ होना है ।। २० ॥ कलिकालविमूहि विमायाविमाहितः ।। सर्वतीर्थललामं तन्तुं नवाप्रशक्यते ॥ २१ ॥ पूर्वश्लोके माहात्म्यश्रवणगृतद्वतं दर्शयति कलिकालेति हि यतः विनगुमायाविमोहितः फलिकालविमुदनरः सर्वतीर्थललाम सर्वतीर्थशिरोरत्न तलीय गन्तुं नैवशक्यने अतस्तन्माहात्म्पय- गमेयतः कर्तव्यमितिमारः ॥ २१ ॥ (१) पिजायननन बार राज्य का राजाना में इस राज्य के पार हाल में पूरी प्राचीनकाल में विद्यमान पता धारा निस स्थान पर इसकी पाशुभ पति यह उपन रान की राजधानी के पहले एक एमा मर्पकर दरग में पारियर रायमागर-जन का ना सम्ना पति म या या एक नियनिनननथान था। इनकट में न तो कोई मामला पोरन খ না পশল্পী আশা খা নঃ বাণী ক শ বধিঃ fাগ था की वह भी मामगामी प्रतासोमानिनग्राने पर नान-मरप का यूभीमार नही रातापायदा पाने का साहस । जा र रामरान पानी नामी-मान ! गयमियम पदानु, तामेराRITERो र पुण्यशीन शाम मरेशाने बात EिTTE सपरिवरिपायान गुमा सभी Rinाम समपान मेंनी परयामा Lat, tra, RRE-m. Tea: माEि FXTARAT मनाम महाराजा श्री. श्री Part AVALENT............. ...t: "EE. MAHARAarmagar ।
श्रीकपिलायतनंतीर्थमाहात्म्य इम तीर्थ के महात्म्य को श्रवण करने में भी आलस्य नहीं करना चाहिये इसका हेतु कहते हैं कि श्रीविष्णुमगवान् की माया से भोहित मुद्नर इस कलिकाल में सब तीर्थो के शिरोरत्न कपिलाश्चम को नहीं जा सकते है। इसलिये उनको इसका माहात्म्य श्रवण ही लाभकारी होगा ॥२१॥ तीर्थस्य नामनदणाद्वचनाचारणादपि ।। विलयं यान्ति पापानि हिमानीय तपोन्तिके ॥२२॥ अस्मिन्पये महात्म्यश्रवणफलं दर्शयति यथा तीर्थस्य कपि- लायतनस्य नामशरणात् वचनेन तन्नामोचार गादपि तपोन्ति के हिमानिः हिमसंहतिरिव पापानि पिलयं नाशं यान्ति प्रथा केवल नामश्रवणाचारणाद्वा पापानां नाशस्तदा समग्र महात्म्यश्रवणस्य का कथीत तात्पर्य्यम् ।। २२ ।। इस लोक में भगवान् स्कन्ददेव माहात्मश्रवण का फल बताते है कि जिस तीर्थ के नाम श्रवण से या नामोच्चारण से ही ग्रीष्म ऋतु में हिमसंघति के समान पापराशि विलय को प्राप्त होती है । जब नाम श्रवण और नामोच्चारण में यह फल होता है तो समा माहात्म्य श्रवण करने की क्या बात है ॥ २२ ॥ *से उ पुरुषस्थान का महा पूर्णरूप में प्रकट होगरा है। वहां पर यात्रियों के लिये अनेक प्रकार के मन्दिर कई राज की भोर ते धौर की एक देशवासी धनान्य पक्तियों की ओर से स्थापित किये गये हैं और यात्रियों के सभीने के लिये धर्मशालाएं निर्माण होनी प्रारंभ होगई है। और साथ में यह एक बड़ा ही परोपकार का विषय है किसी अन्नदानानी ने यात्रियों के स्नान लिये अमोघ परिश्रम व अधिकतर धनव्यय करके वानर से कपिलायतन तीर्थस्थान तक एक रेलवे लाइन भी खोलदी है कि निसस सांप्रतिकाल में देश देशान्तरी के सभी यात्रियों को तार्य स्नानादि पुएर माहि की बड़ी भुगमता हो गयी है। ६ १२ --- ---+- Narine मर्यपाहणं गनीम ॥ गाई गज्ञान महायानाम॥२॥ (मायानगम) मह मांगा गरयोग फलना है, का मान, श्री.गरमदानों का पान देगाना ॥२॥ ६ सत्ययुगे मगात गानदियः सुगारितम् ।। प्रेतागान्युमपागाम्यं न ग्यानं घरातलं ॥ २४ ॥ भापरे पुष्करं नाम कली गावस्वतम् ॥ इत्थं युगानुरोधन सन्ति तीर्थानि भूगले ॥२५॥ इदं कपिला सत्ययुग त्यात प्रसिद्धमामीन् कली दकः मुगापितम् मुगोप्परपितम् ॥ कला कायमेशादिकठिनतपसामा- चरयेऽसमर्थाजनाः स्वस्पायासेन बहुपएपलामादय गत्वास्नादा देवं ध्यात्या स्वांस्वामभीप्सितां गति यास्यन्त्यतोऽन्येषां दीर्धानां देवानांच प्रमावोल्पतमोगविष्यतीतियुद्धधवदेयः मुगापितमिति- भारः॥ पुनः कलियुगे गुप्तमपिवत्तीयं परमकाररिकन लोकानुग्रहकारिणा भगवता स्कन्दन प्रकटीकृतमिति । एवं सत्ययुगे कपिलतीर्थस्य प्रसिद्धयनन्तरं तापान्तु प्रयागाख्यं तीर्थ ख्यातं स्वांग्रसिद्धिमगारतो द्वापरे पुष्करन्नाम तीर्थ प्रसिद्धम् ।। कलौतु कपिलतीर्थस्य गुप्तत्वाकवलं गव स्वांग्रख्यातिंगता । इत्थं युगानुरोधेन भूतले तीर्थानि सन्ति ।। २४, २५ ॥ यह फपिलाश्रम सत्ययुग में प्रसिद्ध हुआ था परन्तु कलियुग में देवताओं ने गुप्त कर दिया इनका प्राशय यही हो सकता है कि कलियुग गें गनुष्य शरीर को लेश देकर कठिन तपस्याओं को करने में असमर्थ श्री कपिलायतनतीमाहात्म्यं । हांग धीर थोड़े परिश्रम से ही भात्यधिक पुण्य का लाभ होने से इसी तीर्थ में स्नान कर और इस तीर्थ के देवता का ध्यान कर अपनी र यभीप्सित गति को प्राप्त करलेंगे इपलिए और तीर्थ तथा देवतानी का प्रभाव कम हो जायगा। परन्तु परमकरणाकर लोकानुग्रहकारी भगवान् कन्ददेव ने कलियुग के वास्ते इस गुम तीर्थ को प्रकट कर दिया। इसी प्रकार अर्थान जैसे कि सत्ययुग में कपिलाभम प्रसिद्ध था वैसाही नेता में प्रयाग प्रसिद्ध हुन्ना और द्वापर में पुन्तरराज की प्रसिद्धि हुई परन्तु कलियुग में कपिलतीर्थ गुम होने से गंगा ही का केवल महात्म्य रहा इस प्रकार युगरुम से पृथ्वी में ताथों की प्रसिद्धि हुई ।। २४, २५ ५ सर्थतीर्थफलायाप्तिकारणं परमत्विदम् ।। तावत्ममा तारकाणां यावत्सयों न हरयते ॥२६॥ तापन्ति सर्वतीर्थानि यापनन्नमन्यते ।। মুদি গলায় গলাব্যতাঃ थत्र दृष्टान्तीयधा यायमूर्पोनश्यने भावदियानभवति ব্যাংকায্যামনগমারাযা নয়া মমা জাৰি খণ यापदणीधनमन्पा तान्ति सर्वतीय नीति, प्रधामन्यमानेऽम्मि न्ती शेषाणां सपा तीर्थानाम्प्रभावोल्पनागीभवतीति ।। यह उगता गर तीमाल प्राप्ति या हेतु है. यहां एक रान्त कि जमना सूर्योदय न होना तक्ता ही चला मागक लघु मारों की उम्रनता मागार में व्याप्त ली है और सूर्योदय होनेही सर तारागार मन्द हो जाने वाले ही जय तक हम तीर्थ का ज्ञान नहीं होता तभी ना धीर गर तीघा फा मात्र प्रचना रहना है महाराजा मान दोन मनाका महल मार होजाना श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । श्रथ किश्चित्तु महिमा तवाग्रेवरायी गया ॥ २७ ॥ सकलो वेदविदुषां यतोवाचामगोचरः॥ अथ राबागेतु मया किंचिन्महिमा पर्यते ॥ २७ ॥ यतः सकलः सम्पूर्ण महिमा वेदविदुषां वेदविदामपिवाचामगोचरः वेदविदोपिवक्तुमसमर्श इति भावः ।। अब तुम्हारे सन्मुख इस तीर्थ की महिमा का कुछ वर्णन मैं करता हूं ॥ २७ ॥ क्योंकि समय वर्णन वेदविज्ञाता भी नहीं कर सकते ।। अन्यत्र दशभिर्वर्यत्पुण्यं जायते नृणाम् ॥१८॥ तदेकन दिनेनैव जायते वसतामिह ।। अन्यत्रान्यस्मिन्तीर्थे नृणां दशभिर्वपर्यत्पुण्यं जायते ॥२८॥ इहवसतां तेषां तदेकेनैव दिनेन जायते ॥ और सब तीथों का १० वर्ष सेवन करने से जो फल मनुष्य प्राप्त करते है वह यहां एक दिन के सेवन से ही प्राप्त होजाता है । अविमुक्त ज्ञानदान्मुक्तिः पुंसां भजायते ॥२६॥ ज्ञानम्बिनाप्यन मुक्ति प्राप्यते निपतं नरः ॥ अविमुक्त पाराणस्यां शानदानात्युमा मुशिः प्रजायते ।।२।। भय कपिल तार्थ ज्ञानम्मिनापि नरनियनं निश्चयन मुष्टिःप्राप्यते ।। अविगुप्त वाराणसी क्षेत्र में श्रीविश्वनाथ फे ज्ञानोपदेश से मनु-प की मुक्ति होनी है " फारयाम्मरणान्मुक्ति:" यह जो प्रख्यात याश्य है इगा भाव यह है कि काशी में मरनेवाले को भगवान शंकर जी भान देकर गुप्त फर देने हे गोस्वामी तुलसीदागनी भी अपने गगरिन. माना में निम्न है कि मात्र जद जया महसू । कारी: मरण पनि उदेन " अन्यथा मागान मुति" अर्थात् ज्ञान
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य ।
बेना मुक्ति नहीं होती इस श्रुति का व्यभिचार होना : परन्तु इस
पिलतीर्थ में ज्ञान बिना ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है ।।
मुस्लिभूमिरियं नित्या यज्ञभूमिरियं परा ॥३०॥
योगभूमिरियं शुद्धा कामिना भोगभूमिका ।।
महापातकयुक्तानां पापिनां पापमोचिका ॥ ३१ ॥
सदाचारयतां पुंसां परमास्वर्गभूमिका ।।
जपानुष्ठाननिष्ठानां जपसिद्धिकरी सदा ॥३२॥
तपस्विनां महाभाग ! तपस्सिद्धिप्रदायिनी ॥
भगवद्भक्तिकामानां महाभक्तिकरीपरा ॥ ३३ ॥
कासाहो कामाना लोके यान न प्राप्यते नरः ।।
सांख्ययोगमपीभूमिः सांस्पाचार्याश्रितायतः ॥३४॥
(स्पष्टार्था इमे श्लोकाः)
हे महामाग ! इस कपिलतीर्थ की यह भूमि नित्या अर्थात्
मनपायिनी मुक्ति को नेपाली परा उत्तमा यज्ञभूमि शुद्धा योगभूमि और
बिलासियों की भोगभूमि है एवं महापातकियों के पापों का नाश करने
चाली है तथा सदाचारियों की परमा स्वर्गभूमि है जपानुष्ठान में निष्ठ
मनुष्यों के जप यज्ञ की सिद्धि करनेवाली, तपस्वियों के तप की सिद्धि
देनेवाली है, और भगवद्भक्तिकामनावालों को परा भवित देने
वाली है कौन सी ऐसी कामना है जिसको यहां मनुष्य नहीं प्राप्त कर
सकता। यह साल्याचार्य कपिलमुनि की भाभयमूमि है इसलिये
सांख्ययोगमयी है ॥ ३०, ३१, ३२, ३३, ३४ ॥
अत्र सद्गुरुणा प्रो विना ज्ञानमयाप्पते ।।
नित्या नित्यविषकोहि तीर्धस्यास्य प्रसादतः ॥३५॥
श्रीमपितायतनतीमाहात्म्य
किम्यक्त्या मुनिश्रेष्ठ ! मिथुपामप्रतः सदा॥
एतारक पाप छत्तीर्थ नभूतं न भविष्यति ॥ ३६॥
(स्पष्टाविमांश्लोकी)
इस तीर्थ में गुरु के उपदेश दिनाही सज्ञान की प्राप्ति होती है
और इस तीर्थ के प्रसाद से संसार में क्या नित्य है ? क्या अनित्य है।
इसका भी विवेक हो जाता है । हे मुनिश्रेष्ठ ! विद्वानों के सम्मुन्न बहुत
कहने की आवश्यकता नहीं होती, सारांश यह है कि ऐसा पापहारी
तीर्थ यातक न हुआ न भविष्य में होगा ।। ३५, ३६ ।।
समीरणोपि संमृज्य कपिलायतनाम्बुभिः।।
नाधन्यं स्पृशते लोके नरं मूई सकल्मषम् ॥३०॥
कपिलालय संयोगाद्यतोऽसौ पापहामतः ।।
तस्माद्विहाय पाप्मानं याति वायुस्त्वरान्वितः॥ ३८॥
(सष्टार्थाविमा)
वायु भी इस कपिलायतन के जल से समार्जित होकर निन्दित
तथा मूर्ख और पापयुक्त मनुष्य को स्पर्श नहीं करती ॥ ३७॥ क्योंकि
फपिलालय के संयोग से वह पापनाशक हो जाता है इसलिए पापी
मनुष्य को छोड़कर वेग से आगे चली जाती है ।। ३८॥
कपिलालय संस्था ये प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः॥
सर्वे मुक्तिमवाप्स्पति सत्यं जानीहि सत्तम ।। ३६ ।।
(स्पष्टार्थः)
हे सत्तम ! कापिलालय में रहनेवाले जितने स्थिर और जंगम
प्राणी है ये सर मुक्त हो जाते हैं इस बात को सत्य जानो ॥ ३९॥
६ई गोप्यं मृतं तीर्थ दिपीकोभिः पुरातने ।।
ततः फेपिन जानन्ति बिनाधिष्णा ममावतः ॥४०॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । इदं वीर्य पुरावने पूर्वस्मिन्काले दियोकोभिः दिवमेवाकोगृह येपान्तः " धादियों द्वस्त्रियामित्यमरः" मोकरमनिचाश्रयेचे- त्यमरः गोप्यं कृतं गोपितमित्यर्थः । ततश्यारभ्य दिणी प्रसादता पिनार्यानगरपापिरहेण कपिनहि जानन्ति || ४ || इस तीर्थ को पूर्व समय में देवताओं ने गुप्त कर रखा था तब से बिना विष्णुभगवान की कृपा के कोई नहीं जानता है ॥ १० ॥ अस्मिस्थान कृतं पुण्यं पराईगुपितं भवेत् ।। बिना पापं हि विप्रेन्द्र ! त्वयि शुखमयोदितम् ।। ४१॥ हे विप्रेन्द्र अस्मिन् स्थाने तीर्थे कृतं पुण्यं विना पापं पापरहित्यं पराईगुणितमरोस्पमिति भावः भवेत् । वधि मयदं गुरं गुप्तमुदितम् ॥४१॥ हे विश्वर ! इस स्थान में जो पुण्य किया जाता है वह निष्पाप पराई गुणित होता है अर्थात् असंख्य होता है यह बहुत गुप्त वस्तु है जिसको मैं तुमस कहता है ।। सपापि नहि फर्नपं जानता पातकंपवचित् ।। अदया पापकरपं नहि वेदानुशासनम् ॥ ४२ ॥ (सप्टाः तथाशि जान कर कभी पाप नहीं करना चाहिये क्योंकि श्रा से पाप करना येदाज्ञा से विस्त ॥१२॥ परिगन्ती मृतं पापमलानं न संशयः उसे शाम पुदगुरक साल लीनं यथा भवेत् ।। ४३॥ (साई) अंगे निकला हुमा युसर (न)ल में ही सर होनाना मी र म में दिया पर मी हधि में सय होगा हम it -- HTTARATHI एमाग 1 सम्मा मामगंग: गाममन्याम् ॥ १४ ॥ (गा :) इस माही महिमा नना भी गया है तर नागा साना बनात पुगय मना सहिचारपालों की सदा रोषन करता मारप४४॥ सर्यकाण पुगपमिदं नानुम्मारी विशेषतः ॥ तप्रापि कानिमामि सप्रमान्तमुपाम् ।। ४५ ॥ दिनंपु सुमहायुगपं कार्मिश्यां यत्पुनर्युवे ।। (मपमपिसमायः सादरलोकः) ऐसे तो सदाही इस तीर्थ के सेपन का पुण्य है परन्तु चौमासे में सेवन करने का विशेप माहात्म्य है उनमें से भी कार्तिकमास में सेवन का फल अधिक होता है कार्तिक में भी अन्त्य के पांच दिनों ( भाप्मपंचक ) में बहुत ही अधिक पुण्य होता है |॥ १५ ॥ एवं कार्तिकी अर्थात् कार्तिक की पूर्णिमा को जो फल होता है उसे पुनः कहता है ।। कार्तिक्यां पौर्णमास्यांयास्नाति श्रीकपिलालये ॥४६॥ तस्य पुण्यस्य माहात्म्यं नालं वस्तुं शिवः स्वयम् ॥ (स्पष्टम् ) कार्तिक की पूर्णिमा के दिन श्री कपिलालयधाम में जो स्नान करता है उस पवित्र पुरुष के माहास्य को साक्षात् शिव भी नहीं कह सकते और किसको कहूं ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । किम्मोक्तन महोदेव ! पुनरुसतया भृशम् ॥४७॥ कापिलस्नानमात्रेण सर्वपापैः समुच्यते ॥ (पष्टम्) हे महादेव ! भारपार कही हुई पात को ही दुहराने से कुछ लाभ नहीं, मेरा कथन यही है कि कपिलालय में स्नान मात्र से ही मनुष्य सब पापा से मुक्त होजाता है ।। ४७॥ इदं मया ते किपदेव चर्षितं तीर्थस्य माहात्म्य- मनुत्तममुने ।। शेषोपिनिश्शेषतयास्य वर्णने विशेषशक्ति- नहिलातुसंभवेत् ॥४७॥ है सुन ! इदमनुत्तम तीर्थस्य माहात्म्य कियदेव किंचिदेव ते तुभ्यं मया वर्णितम् अन्यथा शेपेापि जातु कदाचित् अस्य तीर्थमाहात्म्यस्य निरशेपतया वर्णने विशपशक्ति हिसंभवेत् यदि शेषाप्यसमर्थस्तदेत्तरस्यका कति ॥ १८॥ हे मुने ! इस सोचम तीर्थ माहात्म्य को तुमसे मैंने कुछ ही वर्णन किया है क्योंकि गाड़ी की मी गधिक उक्ति नहीं कि कभी इसको पूर्ण रीति से वर्णन कर सकें तो धारों की क्या कथा है ।। ५८ । इति भास्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये तधिचनं नाम तुनीयोऽध्यायः चतुर्थाध्यायकथारंभः। (गून) हम्पुरत्या सीमाहात्म्यं स्कन्दः कुंमोदय पुनः !! प्रत्युपाप फारिगमारतीर्थमाहात्म्यमूयिकाः ॥१॥ यतरशानकादीन श्रोतृन यदति-पत् स्कन्दः इतितांच माहात्म्यमुक्त्या पुनातीर्थमाहात्म्याचिकाथिया: कयाः पुनः कुंभोदयमगन्याप्रत्युवाच ॥१॥ रसून प्रापि अपने थोता गौनकादि ऋपियों से बोले कि भगवान् स्कन्द ने इस प्रकार तीर्थ माहात्म्य को फह कर पुनः इस फी माहात्म्यसूनक विचित्र फयानों को अगस्त्य ऋषि से कहा।" पुनर्मनः प्रत्ययामितिहासानिमान्मुने । शृणु त्वं सावधानः सन् श्रद्दधानोविधानतः ॥२॥ हे मुने ! पुनर्मनः प्रत्ययार्थ मनसः प्रतीतिलाभाय श्रद्दधानः सावधानः सन्निमानितिहासान्विधानतस्त्वं शृणु ॥२॥ हे मुनि ! पुनः अपने मन की प्रतीति वास्ते श्रद्धायुक्त सावधान होकर इन इतिहास को जिनको मैं आगे कहूंगा विधिपूर्वक तुम सुनो ॥ २ ॥ पुराकल्पे महाभाग तपस्थिवरसमसु॥ पदकन्याः किलसंजाता रूपमाधुर्यसंयुता ॥३॥ हे महाभाग ! पुराकल्पे अस्माकल्पात्पूर्वस्मिन्कल्प तपस्त्रि घरममगु रूपमाधुर्यसंयुताः किल पकन्याः संजाताः ॥३॥ और श्रीपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । है महाभाग ! प्राचीन समय में तपस्वियों के गृह में रूप और माधुर्य गुणों से युक्नु ६ कन्याएं उसन्न हुई ।। ३ ।। सर्यास्तमानपयसः परस्परहितेरताः ।। चन्द्राननास्मुकेशान्ताः पोत्पलसुगन्धयः ॥४॥ (सष्टार्थः) ये ६ कन्या समान अयम् की थी परम्पर प्रेमभाव से रहती थी उनके पूर्ण चन्द्रमा के समान मुन्दर और उगारल मुल ये सुन्दर फेग थे और शरीर को स्यामाविक मुगन्ध कमल के पुष R1॥ मर्यास्ता गमावादयः कोमलालयः पिकस्वराः ।। फलाफलापयशला: मयालमृदुलादयः ॥५॥ (स्पटा:) उन फन्मानों पालमूगों के नेत्र के सदर थे, अह कोमल भार पर कोकिन के गरम एवं अनेक कनाघों में पुगत थी, उनके मन मग मृदुल मनोहर में ॥५॥ गामा ममीयागुयनीषियरामांयजन् ।। at mदनार न भी कि माम सार एपम्पिमाफमार्णमा लिमयमागताः ॥ ६॥ मिधासनि भारमियोपानिहामिपः। विधानिया परममा भुगनासनिए विधारणालयानिमिय: मानिनल ।। मिधापन विहर पुगियर = !!
५२
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
मियोगायन्ति गीतानि सन्निधौशेरतेमियः ।।
एवं तासां प्रीतिरभूत् पूर्वजन्मप्रभावतः ॥ ६॥
(स्पष्टार्था इमे श्लोकाः)
इस प्रकार रूप माधुर्यादि गुणों से युक्त वे कुमारिका
परस्पर सखिल भाव को प्राप्त हुई । साथ साथ खेलती, सार
साथ बात करती, एक साथ घर को जाती, परस्पर प्रेम के साथ एक
दुसरी को खिलाती और खाती थी एवं साथ साथ देवदर्शन को जानी
थीं, साथ साथ नदी के जल में स्नान करने जाती थी, एक साथ मिलकर
सुन्दर २ मधुर गीतों को गाती थी और एक साथ सोती थी । इस प्रकार
का परस्पर प्रेम उनको पूर्वजन्म के प्रभाव से हुआ था॥ ६,७,८,१॥
सुरम्यं रममाणास्तास्नपस्विधरकन्यकाः।।
मुग्धभावं परित्यज्य किश्चिद्वैदग्ध्यमागताः ।।१०॥
तास्तपस्थिवरकन्यका एवं सुरम्यं रममाणा मुन्धमा
परित्यज्य किंदिग्ध्यं विदग्धभावमागताः प्राप्ताः ॥ १० ॥
ये तपस्यियों की कन्याएं इस प्रकार मुरम्य बाल क्रीड़ा वाली
दुई अपने मुग्ध भाव अर्थात् कैशोर अवस्या को त्याग कर विदग्धा
यम्या अर्थान् तरूणावस्या को प्राप्त हुई॥ १० ॥
नामां नामानि यक्ष्यामि शृणुमे द्विजसला ॥
मन्दा मन्दाकिनी मादा नर्मदा शुभवा विदा ॥११॥
(पटम् )
दिनमान ! उन कन्यानों में क्या नाम सी बताटा
" गुना पा का नाम मादा, मरी का नाम मन्दाकिनी, होमरी
का नाम मोर पारी पारसी नाम ऋग से नर्वदा शुरक्षा
भाइटी का नाम विदा था॥११॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
तामाम्बुद्धिरभूहान् संस्कारात्पूर्वजन्मनः ।।
इन्द्रियाणां हिदमने नत्मचर्यस्य पालने ४१२॥
श्रष्टाङ्गयोगविमले प्राणायामादिसाधने ।।
वैराग्यभाचविभये रागद्वेषविवर्जिते ॥ १३ ॥
(स्पष्टार्थाः)
हे ब्रह्मन् पूर्वजन्म के सद्वासना से इन्द्रियों के दमन करने में,
ब्रह्मचर्य के पालन करने में, विमल अष्टागयोग के साधन और
प्राणायामादि योगक्रिया के साधन में एवं रागद्वेष से रहित शुद्ध
राग्य भाव में उन कन्याओं की प्रवृत्ति हुई ।। १२, १३ ॥
एवं पुत्ताश्चिरं कालं गमयामासुरंजसा ।।
सुशीलारशुद्धमनसः पूर्वकर्मविपाकतः ॥१४॥
पूर्वकर्मविपाकतस्तास्तुशालाश्शुद्धमनमो मुनिकन्या एवं
वियतन धृत्ता अंजसा चिरंकालं गमयामासुः ॥ १४ ॥
उन सुशील और शुद्ध चरित्रवाली मुनिकन्याओं ने इसप्रकार
मनों के आचरण में बहुत दिन व्यतीत कर दिये ॥१४॥
फरिमश्चित्कालपर्याय समाजोऽभून्महात्मनाम् ॥
प्रपागे मतिने माघे मकरगरवी ॥१५॥
कस्मिविकालपर्याये महति प्रपा मकरगरवी मांघमासि
महात्मनांसमाजोऽभूत् ॥ १५॥
किसी समय माप मास में जब मकर के सूर्य हुए तो तीर्थराज
प्रयाग में देश देशान्तरों से थाये हुए ऋषि मुनि महर्षि और तपस्वी
इत्यादि महात्माभों का समाज एकत्र हुभा ॥ १५ ॥
।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
तत्र प्रैलोक्यसंस्थानास्सर्व लोकास्समागताः ॥
देवा देवर्पयो देव्यो प्रधान ! ब्रह्मर्षयोऽमला ॥ १६ ॥
राजानश्च तथा माः सर्व सत्पुण्यमानसाः॥
तमागत्य यथा काले सस्नुः प्रीता: सितासिते ॥१७॥
(स्पष्टार्थी)
हे ब्रह्मन् ! त्रैलोक्य में रहनेवाले सभी देवता, देवर्षि, देवियां
और ब्रह्मर्षि एवं राजालोग तथा साधारण मनुष्य सत्य और पवित्र
मन से उस समाज में एकत्रित होकर सम्पूर्ण माघ मासभर उचित
समय से प्रसन्नतापूर्वक स्नान करते रहे ।। १६, १७ ॥
तत्रताः पूर्वमुदिता मुने! पड्मुनिकन्यकाः ॥
स्नानार्थ समुपायाता स्तीर्थराजे जितेन्द्रियाः ॥ १८ ॥
हे मुने ! तत्र नस्मिस्तीर्थराजे प्रयागे पूर्वमुदिताः पूर्वानाः
जितेन्द्रियास्ता पमुनिकन्यकाः स्नानार्थ समुपायाता भागतवत्यः
॥१८॥
हे मुनि ! अपनी इन्द्रियों को घर में रखनेवाली ६ मुनिकन्यारं
जिनकी चर्चा पहले कर पाया हूं ये भी उस तीर्थराज प्रयाग में स्नान
करने के लिए आई ॥१८॥
यागत्य विधिना सस्नुमाघ मासि सितासिते॥
सदा समाजम्परपन्त्ययक मौलितखोपनाः ॥१६॥
मागत्य तय सितासित शुक्र परीकृष्ण पदेय समस्त मात्र
मामि विधिना स्नाता एवं विषयादिमागीलप्साहिताः परममाणि
मन सीनवान्मीलितलायनास्मदा समाज परसन्त्यः ॥१६॥
५५ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । वहां आकर समस्त माघमासभर विधिपूर्वक स्नान करती रही और सतत परब्रह्म की चिन्तना करती हुई तथा समाज को देखती हुई भ्रमण करती रहती थीं ॥१५॥ दान जाप्य व्रत स्नान ध्यान योगादि तत्पराः॥ मासमेकंजना सव्वं तत्र स्थितिमरोचयन् ॥२०॥ (स्पष्टम् ) उस समाज में आये हुए सभी लोगों ने दान जप बत स्नान और ध्यान आदि कार्यों में तत्पर होकर एक मास पर्यन्त वहां रहने की इच्छा प्रकट की।॥ २०॥ कदाचिद्वरकन्यास्तास्समाजे महदन्तिके ॥ विष्णुगायाः प्रगायन्तं प्रीत्यासुस्वरमुच्चकैः ॥ २१ ॥ श्रालिल्-धमहतीम्बीणां सप्तस्वरविभूपिताम् ।। पादयन्तम्मुदायुतं स्वरम्ब्रमसुखालयम् ।। २२ ॥ धुन्यान निजमुर्दानं किशोरवयसान्वितम् ।। दहशुनारदं विप्र ! गानविद्या-विशारदम् ॥ २३ ॥ हे विप्र ! महदन्ति के तस्मिन्समाजे विचरन्त्यस्ता वरकन्या: कदाचित् कस्मिंश्चित्समये प्रीत्या उच्चकैः उच्चस्वरेण सुस्वरं यथा भवति तथा विष्णुगाथा: भगवतीविष्णोर्गुणानुवादान् प्रगायन्तं नसस्वरविभूषिताम् सप्तभिर्निपादर्पभगान्धार खट्ज मध्यम, धैवत, चश्मेतिस्त्र विभूषिताम् स्वकीयाम्महतीम्बीणामालिङ्याङ्केनिधाय नमसुखालयम्ब्रह्मानन्दप्राप्तिकरं सुस्वरं सुलयम्यादयन्तं ताला- बरपाये गानस्य काल क्रियामाने समागते निज भूर्भानं धुन्यानं मानविद्या विशारदं किशोरवयसान्वितम्मुदायुनं होनासितविग्रह नारदं दशुः ॥२१, २२, २३ ॥
, 11:17:43:14 : उग महागमा में निम्ती iउन कम्पनी ने गगम में प्रेम मी गार गुगतान के गानादों को गले मा. प्राम. गाभार. मदन, ममत नमान मग मत मान लगा। था में प्रधाननगमान भानदायालय कामजान तमा ना. के समग पाने गिरको एसियस, मन पर नारद मुनि को देसा ॥ २१, २२, २३ ॥ रप्दया ग ममुहस्साः कामयायसंगताः ॥ योग मार्गम्यिनिन्दन्त्यः स्तुवन्त्यांभोगभूमिकाम्॥२१ एयम्भूतं मुनि नारदं या नकाराझिन्द्रिया अपिताः पर्या कन्यकाः कामयाणयशंगता योगमार्गम्पिनिन्दन्योमोग भूमिका स्तुवन्त्यः मुमुहः मोहम्प्राप्ताः ॥ २४ ॥ ऐसे मुन्दर स्वरूप नारदजी को देखकर काम के पीभूत होकर वे मुनिकन्याएं मोहित होगई और योग-मार्ग की निन्दा तथा विषय भोग की स्तुति करने लगी ॥ २१ ॥ एवं योगम्परित्यज्य भ्रष्टास्ता मुनिकन्यकाः।। विष्णु माया हुतात्मानः पतितायोग भूमित ः॥२५॥ - महाकामग्रहास्ता विह्वला ग्रहली कृताः॥ काम वासनाया विद्धा मृताः स्वायुष्य संक्षये ॥ २६ ॥ (स्पष्टायों) इस प्रकार वे मनिकन्याएं योगमार्ग से भ्रष्ट हो गई विशु भगवान की माया ने उनकी आत्मा को हरण कर योग भूमि से गिरा दिया और महाकामरूपी ग्रह से ग्रस्त होकर वे विहल और उन्मत्त होगई एवं कामवासनासे विद्ध होकर सबकीसब कन्याएं मरगई ।।२५,२६
कपिलायतमतीमाहात्म्य
योगभ्रष्टास्ततो जाता महतांभीमतांकुले !!
विप्राणां कुलजानान्ताः याः पूर्व सख्यमश्रिताः ॥२
योगभ्रमाता कन्यकाः यतः पूर्व पूर्वस्मिन्भवे सख्य
श्रेताः पारस्परिक प्रेम भागताबासन अतस्ततोऽर्थान्मुनि
मृत्युस्याप्य कुलजानाम्महतां श्रीमताम्बियाणां कुले जाता
पुनर्जन्मसम्प्रासाः । उकंचापि "शुचीनां श्रीमतां गेहे
उजनस्पया अथवा श्रीमतांगहे योगभ्रष्टोहि जायते" ॥
वे कन्याएं जो पूर्व जन्म में परस्पर प्रेम भाव
रहा करत
योग से भ्रष्ट होकर मर जाने पर उन्हों ने महाकुलीन एवं श्री
श्रामणों के कुल में एक साथ ही पुनर्जन्म ग्रहण किया ।। २७ ।।
जामदग्न्यप्रदत्ता, या, धरा, विमेपुमंस्थिता ।।
सद्धरास्वामिनांगेहे जातास्तामुनिकन्यकाः ॥ २८ ।"
जमदः अपत्यं जामदग्न्यस्तेन प्रदत्ता या धरा ।
मंस्थिता। जामदग्न्यः परशुरामः एक विंशतिवारं निःक्षत्रां
इत्या सर्वाधिवाम्बामणेभ्योददापितिकथा पुराणप्रसिद्धारत
स्वीमनामजामदग्न्यप्रदगधरानायकानांगहता मुनिक-
जाता जन्म प्राप्ताः ॥२०॥
जमदमि प्रापि के पुत्र परशुराम ने इकोमवार क्षत्रिय रा
को मारकर पृथ्वी नि:नत्र करदी। पृथ्वी पर कही क्षत्रियों का
निशान तक नहीं रहा तो मामणों को पृथ्वी दान करके
यह कथा पुराणों में विस्तारपूर्वक है। उसी जामदम्य (परशु
की दी हुई पृथ्वी के स्वामी ये प्रामण थे जिनक गृह में
फन्याधी ने पुनर्जन्म मरण किया ॥२८॥
५८ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । यत्र वै कपिलंयंत्रं महापुण्यं महीतले ।। एक योजन विस्तारं मध्यतः पादयोजनम् २६ ।। जामदग्न्यः सर्वा पृथ्वीमकस्मिन्यैकदेशनिवामित्राह्मणम्य एव नादात् किन्तु यस्मिन्यस्मिन्देशेयंयंराजानमवीन् तस्य भुवन्तद्देशवासिब्राह्मणेभ्यः प्रादात्तथैवास्मिन्मरुकान्तारशासित णाम्भूमिमेतदेशनिवासिभ्योददौ यत्र ते ब्राह्मणा निवासया मासुस्तकयोजनविस्तार मध्यतः पाद योजन मानं महा पुएवं पवित्रं कापिलं कपिलसम्बन्धितेत्रं महीतले अस्ति ।। २६ ।। परशुराम ने जीती हुई समग्र पृथ्वी एक ही किसी ब्राह्मण को अथवा एकही किसी देश के निवासी ब्राह्मणों को नहीं दी, क्योंकि ऐसा किया होता तो पुराणों में अवश्य इसकी कोई कथा मिलती। इसलिये यह अनुमान होता है कि जिस देश अथवा राजधानी को जीता वहां की पृथ्वी उसी देश के निवासी ब्राह्मणों को दान कर दी, इसी प्रकार इस मरकान्तार प्रदेश को जीतकर यहां की भूमि इसी देश के अर्थात् कपिलक्षेत्र के निवासी ब्राह्मणों को ही दान कर दी जो कपिलक्षेत्र पृथ्वी पर महापवित्र परिगणित किया गया है जिसकी सीमा चारोंतरफ एक योजन की लम्बाई चौड़ाई पर है और मध्य में चतुर्थश योजन अर्थात कोस भर के दीर्घ विस्तार में वह धाम है ॥२६॥ मध्यनः फ्रोशमाअंतज्योति रूपं सनातनम् ।। मृगास्तप्रयिमुच्यन्ते सद्यः प्रक्षीणयन्धनाः॥३०॥ १)पासनपतिर्म मदानुमार चन्य तीर्थरपानी की भाति पर १प में परीत २१३. लोक में इस पुरवत RrN मायनशागारमरान, मन्दिरममना की भूमि पान ही माना या उममें भागेर १ मा पनी या पाना पर पूर्णानन कर्म पर श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य मध्यतः क्रांशमामिति सटम् ॥ ३० ॥ योजन के चतुर्थीश परिमित मध्य में कपिलमुनि का धाम है और योजन ४ कोस को कहते हैं इसका चतुर्थांश एक कोस हुआ। अतः इस श्लोक में उसी पूर्वोक्त मध्यवर्ती धाम का वर्णन करते हैं कि गध्य में कोसमात्र का जो क्षेत्र है वह कपिलधाम है, ज्योतिरूप है, और सनातन है । उस धाम में देह त्याग करनेवाले उसी समय अपने संसारी फर्मवन्धनी को त्याग कर मुक्त हो जाते हैं ॥ ३०॥ नद्राममीम सामीप्ये विप्रनत्राणि सन्ति ।। तपु क्षेत्रेपु तषिमाः स्वदासः शूद्रजस्साह ॥ ३१ ॥ चापयन्ति सदाधान्यं स्वदम्बस्य पुष्टये ।। भाट् काले माहामेधजलमालासमाकुले ॥ ३२ ॥ (स्पटायी) उस धाम की सीमा के समीपही में उन मामलों के ग्वेन द वे भामण जर बरसात के दिनों में पूरी वर्षा होने लगती है भार चाकार सपन एवं समल मे से गाच्छादित हो जाता है तो अपने पुटुम्बा Imix पाने से मृक हर पुरुष के भागा हवी घने गुर चा सेवा पापर मानेमा से सभी भाग नांवर धार in भावी मागे ४HER मामालिस।निमम रेरा में "धरन "गमे Arithm net मामानिमारमा REARREntuit कर RE tो नमन ART कोसिसमा RATrant.my time (नाम पर PRni भ शाप्य तराता: स्नेहनानुगताः कौतुकाः क्रीडनायं प्रत्व सर्वजन मनोहर विगल कार्तिक मास में जर खता में प्रचुर धान्य की कर पौवन की प्रारंभिक अवस्था में प्राम रूप सौन्दर्य को पानि वे गाचं गंगापमा कामिन मिनिमम॥३३॥ गाना गाता गणरा॥ पपरमधिमा मारमाधम्मानमः ॥३१॥ रगान गान रिगुनगुमाग कारनाम कौतुकाः ।। पंपरामिपारंग प्रत्य जग्मुरादनाः ॥३५॥ गर्व लोक मनाम कानमामि यदा संपु धान्यान অনুগলঃনানানানা ম্যানশাষনা याँपनारंभिकायस्थाप्रामारीदर्यमानःपामरूपयसो ग्राम सुकन्याः परजामिपीजन्य रयाम्यान स्वान् स्वान् पितृनन जग्मुः ॥३३, ३४, ३५॥ सम्पति हो जाती थी तो सताका रखवाली के लिए परम उत्सुक हो ब्राह्मण कन्याएं खेत की रखवाली का बहाना करके अपने अपने रिताओं से श्राज्ञा लेकर और उनसे आदृत होकर कौतुक के साथ प्रतिदिन खेलने के लिए जाती थीं ।। ३३, ३४, ३५ ।। चटकादि विहंगेभ्यो मृगादिभ्यो दिने दिने । धाग्यरक्षां प्रकुर्वन्त्यः क्रीडन्त्यः कौतुकान्विताः ॥३६॥ दिने दिने चटकादिविहंगेभ्योमृगादिपशुभ्यो धान्यरक्षा प्रकुर्वन्त्यः कौतुकान्विताः सन्त्यः खेलन्तिस्म ।। ३६ ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
वे कन्याएं प्रतिदिन पशु-पक्षियों से धान्य की रक्षा करती हुई
बड़े कुतूहल के साथ खेलती थीं ।। ३६ ।।
सायम्पुन ग्रहानान्तु यदेच्छाजायसहदि ।
स्वतंत्रेभ्यः परावर्त्य समायुक्ताः श्रमान्विताः ॥ ३७॥
समागत्य स्ववासांसि तीरेन्यस्यसुमध्यमाः ॥
प्रत्यहं स्नान्ति विप्रेन्द्र ! कापिलेथे सरोवरे ।।३।।
है विप्रेन्द्र ! पुनः सायं सदा हदि गृहणामिच्छा जायते तदा
समायुक्ताः सहैवगमनशीला श्रमान्विताः समरतीदवसकोडनात्
स्थगितास्सुमध्यमास्ताः स्वक्षेत्रेभ्यः पगवर्य कापिलये मरोवरे
समागत्य तारे स्वयामासिन्यम्प प्रत्यहं स्नान्ति स्नान कुन्तिम
।। ३७, ३८॥
हे विप्रेन्द्र ! सायंकाल में जब घर जाने की इच्छा होती तो
दिन भर की क्षेत्ररक्षा और खेल से थक कर वे कन्याएं अपने २ इंत्री
से परावर्तित हो (लौर) कर कपिल सरोवर पर पाती और अपने बम्घों
को सरोवर फे तौर पर रखकर प्रतिदिन स्नान करती थीं ।। ३७, ३० ।
तुधाविष्टा भक्षयित्वा क्षेत्रानीतं फलादिकम् ॥
तन्न प्रक्षिप्यचौच्छिष्ट गृहायोन्ति स्वकान स्वकात् ॥३६॥
समस्त दिन परिश्रमारसुधाविधानाः कन्याः क्षेत्रानी
फलादिकं भवपित्वा तत्राष्ट्रिय प्रक्षिप्य स्खकान् २ गृहान्या-
न्तिस्म ॥३६॥
दिन भर के परिश्रम से भूखी और थकी हुई कन्याएं स्नान करने
; অথবা ধন ম লাৰ ? ত্বর মূল্যাধি * অন্ধ স্কা তছি
को वहां ही छोड़कर अपने २ पर को चली जाती थी ॥ ३६॥
से हतुना गयनकरागसताः पश्ययमागता अथान्गतायभूयः॥४२॥ श्रीकपिलायतनतार्थमाहात्म्य । एवं तासांर्वतीनां व्यतीता द्वित्रहापनाः ।। तद्वारिस्नानपुण्येन परां शुदिमुपागताः ॥ ४० ॥ (स्पष्टम्) इस प्रकार प्रतिदिन स्नान करते हुए कन्याओं को दो तीन व्यतीत हो गए उस सरोवर के जल में स्नान करने के पुण्य परमशुद्धि को प्राप्त हो गई।॥ ४० ॥ सनस्सर्व स्मृतीजा पूर्व जन्म विचेष्टिनम् ॥ स्वसखित्वंपरंप्रेम योग_रान्तथैवच ॥४१॥ ततोऽर्थात्कापिलेयस्नानपुण्याच्छुद्धिप्राप्तानन्तरं पूर्व जर विचेष्टितम् स्वसखित्वं परंप्रेम तथैव योग ग्रंशत्वं चकारान्मुनीन गृहेजन्म, योगादिसाधनं, प्रयागगमनं, नारदे क्षणमित्यादिच संर्वतासां स्मृतीजातम् ॥४१॥ तदनन्तर अर्थात् कपिलसरोवर में नित्य स्नान करने से जो शुद्धि प्राप्त हुई उसके अनन्तर उन कन्याओं को अपने पूर्वजन्म की सब फथा (अर्थात् मुनियों के गृह में जन्म लेकर अष्टांग योग की साधना, परस्पर की मैत्री तथा पनिष्ठ प्रेम, प्रयागराज की यात्रा, यहां नारदजी फा सौन्दर्य देख मोहित होना, विषय भोग की उत्कटेच्छा से योगमार्ग की निन्दा करते शरीर को त्याग करना और पुनः पवित्र और बुलीन प्रामगों के घर में जन्म लेना)दत्यादि एक एक करके ज्ञात होगई ।।४।। एवं स्मृती प्रवृत्तायां पूर्वस्यांतास्तपोधन!! देवेन दुर्यितस्य सद्यः पंचत्यमागताः ॥४॥ है गोधन ! एवं पूर्वाश प्रमेय पूर्वस्या स्मृती प्रान्तायो पूर्वजन्म स्मृती संज्ञातायां दृषितरणामिचिन्या देवन भाग्येन श्रीकपिलायतनतीर्थगाहात्म्य । ६३ हे तपोधन ! जब इस प्रकार पूर्व जन्म की स्मृति प्राप्त हो गई तो अविचिन्त्य दैवसंयोग से तत्काल ही सब कन्याओं ने एक साथ अपने शरीर का त्याग करदिया॥४२॥ तत्तीर्थस्य प्रभायेण योग भ्रष्टा दिवंगताः । पुनरेव मुनीनान्ताः फुलेजाता महात्मनाम् ।। ४३ ॥ पूर्व भवे योगभ्रष्टा अपितास्तस्य तीर्थस्य कपिलापतनस्थ प्रभावेण दिवं स्वर्गगताः पुनः कियत्कालं स्वर्ग सुखं भुक्त्वा महात्मनां मुनीनां कुले एव जाताः॥४३॥ वे ब्राह्मण कन्याएं पूर्व जन्म में योग से भ्रष्ट हो गई थी अब उत्तरोत्तर अधोगति को ही प्राप्त होती, परन्तु उस कपिलतीर्थ के प्रभाव से स्वर्ग को गई और वहां कुछ दिनों तक स्वर्ग मुख का भोग करके पुनः महात्मा मुनियों के कुल में उन्हों ने जन्म ग्रहण किया॥१३॥ महा मुनिभिरूढाश्च पुनदेवर्पिमनिर्भः ॥ कियत्कालं परंभोग भुजानाः सहमभिः॥४५॥ स्थितादिव्येषु लोकेषु मोदमानाः प्रभान्विताः।। तद्वामनि तदुच्छिष्ट प्रक्षेपोभूतदोपतः ॥ ४५ ॥ किञ्चित्कारणमुद्दिश्य पुनस्पताः स्वभर्तृभिः। पडेव कृत्तिका जाता भूय संभूयभूरिशः ।। ४६ ।। पुनः अर्थान्मुनिगृहे जन्म ग्रहणानन्तरं देवपिसानिहा मुनिभिरुढा विवाहितायताः भतेभिस्सह कियकाल पर भोग भुंजानाः मोदमाना: प्रमान्विता: दिपु लोकपु स्थिता. निवासमापुःअनन्तरं वदामानि तदुन्छिए प्रपदोपतः अर्थात् पूर्व स्मिन्भये मामय गृह जन्म संप्राप्य पिरामिपीकृत्य क्रीडनार्थ xx भोगविलास किया और पूर्ण प्रमा एवं हप के साथ दिव्यलोक में से आकाश में तारा होकर छयों कन्याएं विकास करने लगी जिनको गना या पनादि गंगानगरमागल PATI RTI गगरिया सगवनिति पादादिमो मुनीमनममिः किमिनारमनी पदीय स्मा। मनमा गाए पर कन्याः भूयःमभूग स्पितिभिरागानन्तरं देशीगृगाकाशे भरिशांचाहुयनाः कृतिका कृतिका नया गाना संजाताः ॥४४,४५,४६ ।। पुनः उन मुनि फम्यागों का विवाद देवानुल्य मुनिओं से हुमा और उन फगामी ने प्रान यामियों के साथ गुव दिनों तक उन जहां उन मुनियों के रहने का नियासस्थान या वहां निवास दिया, तदनन्तर पूर्वजन्म में जो कपिल सरोवर के तौर पर फल मून साकार उच्छिष्ट प्रक्षेपण किया करती थी उसके दोष से इस योनि में दिनी कारण स्वामियों ने उन को त्याग कर दिया। पति से त्यक्त होकर उन्होंने पुनः अपने शरीर को त्यागकर दिया । तीम उच्छिष्ट त्याग करने का इतना ही फल उनको भोगना पड़ा कि पति से त्यक्त हुई। अनन्तर कई जन्मों के सुकृत वश तथा कपिलाश्रम के शुद्धसरोवर में स्नान करने कारण जो उनके असंख्य पुण्य संचित हो गये थे उन पुण्यों के प्रभाव कृत्तिका के तारे कहते हैं। ज्योतिपशास्त्र में छुरा के आकार में इन तारों की स्थिति बर्ताई गई है ।। ४४, ४५, ४६ ॥ धाकल्पान्तं स्थिता ब्रह्मन्दिविभान्ति महाप्रभाः । महायोगि प्रभावेण महायोगिन्यएचताः॥४७॥ तीर्थ स्नानज माहात्म्यं सूचयन्ति निरन्तरम् । हे ब्रमन् महायोगिप्रमाण यहायोगिनः कपिलमुनेः प्रसादाद । 1 महायोगिन्यो महप्रमा महाचमत्कार विशिष्ट आइल्पान्वं श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । दिपि थाकाश स्थिता विभान्ति ॥४७॥ तथाच निरन्तरं वीर्थस्नानजमाहात्म्यं सूचयन्ति ॥ हे ब्रमन् ! महायोगी कपिलमुनि के प्रभाव से महायोगिनी कन्याएं महोज्दल तारा रूप धारण कर कल्पान्त तक के लिए आकाश में प्रकाश कर रही हैं ॥४७॥ और निरन्तर तीर्थस्नान के महात्म्यों की सूचना दे रही हैं। यासां कार्तिकमासस्य सारासार विवेकिनः ॥४८॥ नाम निर्वचनं चक्रुनरा नैरुत दिनः॥ तासांस्तन्यं मयापीतं षड्मुखैघटजोत्तम ।। ४६ ॥ यासांपएमां कन्यकानां कार्तिक मासस्य सारसार विवेकिन: कार्तिकमासमाहात्म्पवेत्तारोनरकवादिनोनिरुतशास्त्रज्ञा नरा एकैच कृत्तिकेति नाम निर्वचनं चकत्तासापरस्परमतिप्रेमदर्शना दितिभावः हे घटोत्तमागस्त्य तासांस्तन्यं दुग्धमया पभिखैः पीतम् ।। ४८, ४६॥ ET पृष्ठ ६४ के ४४, ४५, ४६ ये गलौकी पर विशेष वक्तव्य (१) बरपुर ना ये कन्याए योग से *पुर होकर साह्मणों के घर में स्पक्ष हु। चौर नित्य से पाकर सांयकाल के समय कपिल सरोवर में स्नान कर के अपने र गृह को जानी थी निस स्नान के पुरश से पूर्व जन्म की रसूति हुई चोर तत्काल है। ६यों ने देहत्याग कर दिया और वर्गलोक को गया, वही समय इनकी पहे. काषा परन्तु उस तार्य में उम्विट त्याग करना ही एक अपरार था जिससे पुनः एक बार शनि कम्पा होकर पतियागरूप दएट भोगना पड़ा और इसके यन्ता जन्म-मरण है रहित हो भाकाश में तारा रूप देकर चालान्त वास करने लगी। लिसा भी है कि "नाभुक्त जायते कर्म कल्प कोटिशौषि" पर्थात् शतशः बार वा स्यात माएं पान्तु फों का नाश भोग करने से संवा है। चार " नामनांक फलोपभागः कायादिना" अधीन कर्म का भोग भी रागर पार करने हौस होता है। इसी सिद्ध होता है कि जर को पाना जाता है तो शरीर धारण करने की भी कोई पावश्याना नहीं है और शरीर धारण र मरना ही मुकि है।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।। हे अगस्त्य ! कार्तिक मास के वास्तव तयों के ज्ञाता और नित 'शास्त्र के मर्मवेदी विद्वानों ने उन कन्याओं के लगातार कई जन्हें के परस्पर प्रेम को देखकर छत्रों का एक ही नाम (कृत्तिका ) सत्य उन्हीं कृत्तिकाओं का दुग्ध मैं ने अपने ६ मुखों से पिया है ।। ४८,१६॥ नोट-किसी कला की कथा है कि शंकरजी का विवाह दक्षप्रजापत की कन्या से हुआ था इसलिये शंकरजी सर्वदेव शिरोमणि होने पर भी दक्षप्रजापति के जामाता ही थे। एक समय ब्रह्मलोक में देव सभा हुई जिसमें सभी देवता पहले ही से श्राप हुए थे, दक्ष प्रजापति कुन पीछे पाए उनको सभा में उपस्थित देख सभी देवताओं ने उठकर अभिवादन और स्वागत किया परन्तु श्रादिदेव शंकरजी ने कुछ भी नहीं किया । अग्ने जामता की ऐमी धृष्टता देख दक्षप्रजापति बहुत क्रुद्ध हुए और उस सभा से चलेगए, तर से शंकरजी से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते थे। कुछ काल के बाद दक्षप्रजापति ने एक वा किया जिसमें शंकरजी को निमंत्रित करके नहीं बुलाया परत पिना के यज्ञ करने का समाचार सुनकर दसपुत्री पिना निमन्त्रण ही पिता के घर जाने को उद्यत होगई और शंकरजी रो प्राज्ञा मांगी शंकरजी भाग समुर के क्रुद्ध होने की गुल कथा कहकर दए मुना को पहुन समझाया परन्तु दापुत्रा ने एक न माना और पिता के पर गई वहां जाकर यश में राय देवताओं का अंग देखा परन्तु सा: या भाग कही नही देखा और सब किसी ने कुशलमंगल पूजा मन्नु दप्तप्रजापति ने अपनी कन्या को देखा तक नहीं, इमनिर में पति का भार थाना अपमान देगा के बरा हो। यो भन्म होगई। यही दागुता पुनः हिमाचल के परमार ५. र नाम्दजी उमसीहालोमा देव "शंकरजी से विका ...... लोकरानी का नया नामादेश दिया गया है।
लोकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । पारमातुर इतिरुपातो हृष्ट पुष्टश्च सर्वदा।। नैष्ठिको नामचार्यस्मि तामां योग प्रभावतः ।।५।। सेनानीः सर्वदेवानां सासुरनिकन्दनः॥ सर्वदा तासामवस्तन्यपानेनाहं हृष्टः पुष्टः पाइमातुर इतिख्यातश्व तथा तासां योगप्रभावतः सर्वदेवानां सेनानीः सर्वासुर निकन्दनी नष्ठिको निष्ठावान्नाचार्यस्मि ।। ५० ।। "पार्वती शंकरजी से विवाह होने के निमित्त तपस्या कर रही थी और इधर तारकासुर एक दानव महामतापशाली ब्रह्मा, विष्णु और महादेव सब से श्रवध्य होकर महाउपद्रव मचा रहा था तम सभी देवता मिलकर ब्रह्मा के साथ विष्णु भगवान के पास गये और उम देस्य के बध का उपाय पूछा मगवान ने कहा कि यह दैत्य .. और किसी से नहीं मरेगा यदि शंकरजी का पुत्र सेनापति हो और देवता की सेना तयार हो तो इस दैत्य का वध होगा अाजकल दक्षमुना हिमालय की कन्या होकर शंकरजी से विवाह होने के निमित्त तपस्या कर रही है और तपस्या की सिद्धि का समय भी आगया है तुम लोग सप्तगियों की सहायता से शंकरजी को विवाह करने के लिए उचन करो इस विशाह से पुत्र उत्पन्न होगा वही तारकासुर को मारेगा। hी ..
सीपिलायनननायगानाम्यम्। है अगाय कार्तिक मास के वास्तव तयों के माता और नि ग्राम के मयी विद्वानों ने उन कन्याओं के लगातार कर ज के परस्पर प्रेग को देखकर पी का एक ही नाम (कृतिका) स्त्र उन्ही पिकामों का दुप मैंने अपने ६ गुमों मे पिया है ॥ १,११ नोट-किसी का की कथा है कि शंकरजी का विवाह दामनाए की कन्या से हुआ था इसलिये शंकरजी सर्वदेव शिरोमणि होने भी दक्षप्रजापति के जामाता ही थे। एक समय ब्रह्मलोक में देव स. दुई जिसमें सभी देवता पहले ही से श्राप हुए थे, दक्ष प्रजापति कु पोदे पाए उनको समा में उपस्थित देख सभी देवताओं ने उठा अभिवादन और स्वागत किया परन्तु आदिदेव शंकरजी ने कु: भी नहीं किया। थाने जामता की ऐमी घृष्टता देख दक्षमजापा बहुत क्रुद्ध हुए और उस समा से चलेगए, तब से शंकरजी से कुछ भी सम्बध नहीं रखते थे । कुछ काल के बाद दक्षप्रजापति ने एक यज्ञ किया जिसमें शंकरनी को निमंत्रित करके नहीं बुलाया परन्तु पिता के यज्ञ करने का समाचार सुनकर दतपुत्री विना निमन्त्रण के ही पिता के घर जाने को उद्यत होगई और शंकरजी से श्राज्ञा मांगी शंकरजी अपने श्वसुर के क्रुद्ध होने की कुल कथा कहकर दक्ष मुता को बहुत समझाया परन्तु दक्षपुत्री ने एक न माना और पिता के घर गई वहां जाकर यज्ञ में सब देवताओं का अंग देखा परन्तु शंकरजी का भाग कहीं नहीं देखा और सब किसी ने कुशलमंगल पूछा परन्तु दक्षप्रजापति ने अपनी कन्या को देखा तक नहीं, इसलिए पीहर में पति का और अपना अपमान देख इर्षा के वश होकर योगामि से भस्म होगई । वही दक्षता पुनः हिमाचल के घर जाकर अवतरित हुई और नारदजी उसकी हस्तरेखा देख " शंकरजी से विवाह होगा" इतना कहकर पार्वती को तपस्या करने का आदेश दिया था सो* शोकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । पागातुर इतिरुपातो हृष्ट पुष्टश्च सर्वदा।। मैष्ठिको प्राचार्यस्मि तासां योग प्रभावतः ॥५० सेनानीः सर्वदेवानां सर्वासुरनिकन्दनः । सर्वदा तासामेवस्तन्यपानेनाहं हटः पुष्टः पाइमातुर इविरुपातच तथा तासां योग प्रभावतः सर्वदेवानां सेनानी: सीपुर निकन्दनो नाष्ठको निष्ठावान्ब्रह्मवास्मि ॥ ५० ॥ पार्वती शंकरजी से विवाह होने के निमित्त तपस्या कर रही थी और इधर सारकापुर एक दानव महाप्रतापशाली बमा, विष्णु श्रीर महादेव सब से अवध्य होकर महाउपद्रव मचा.रहा था तब । বুরা সিল স্থা साथ विष्णु भगवान् के पास गये और उस देश के पथ का उपाय पूधा भगवान ने कहा कि यह दैत्य और किसी से नहीं मोगा यदि शंकरजी का पुत्र सेनापति हो और देवनानी को सेना तैयार हो तो इस दैत्य का बध होगा आजकल दक्षसुना हिमालय की कन्या होकर शंकरजी से विवाह होने के निमित्त सान्या कर रही है और तपस्या की सिद्धि का समय भी आगया है तुम लोग सप्तपियों की सहायता से शंकरजी को विवाह करने के लिए उपन से इस विवाह से पुत्र उत्पन्न होगा पही तारकासुर को मारेगा। अनन्तर सप्तर्षियाने शंकरजी का विवाह पारती से कराया परन्तु कई कोटि व विहार में ही बीत गये पुति की कोई अशा ही नही दीख पड़ी और इपर दानवों के घोर उपना से देवलोक मर्य लोक और पानान परयन्त हाहाकार मच गया था तब ब्रह्माजी को आगेकर सभी देवता शंकरजी से पुत्र उत्पन्न करने की प्रार्थना करने के लिए नाश पर गये वही ऐमा प्रबन्ध था कि शंकरजी का दर्शन हो दुर्लभ था तो मिदेव को कन्नर का रूप धारण करा इन्द्रादि सभी यताओं ने गुफा के मदर भेजा इस प्रोवशी अमिदेव को देखते ही शंकरजी देवताओं को में पारामातुर कहते हैं । जिमका विग्रह वाक्य पराणां मातृणामपत्य पाएमातुरः ऐसा होता है। और हम पुस्तक में स्कन्दी उनका दुग्ध गैने अपने ६ मुग्यों से पीया है। एवं धागे कहा समापदनामयम् 13 मामी के दुगान करके में हराया। ग नाम में मिरमान दुमा र उनको योग सरना नागा भाभी समस निदुपा है ... || सरिता टालने का काम गरीर माग पर अमाप को मन्दिन पर दिया ये नु में उठा लिया और मप के मार गदाग माग देना दी। आए जय यात को उस मार्य का जनल सबनी मार तो एक सरकगडे के मन में उगन दिया यही सन्द हु के सन्दित वार्य से उरान हुए इमनिए उनका नागर अशि के मुख से उतन र दनिए उनका नाम भागमा सरकण्डों में उत्सन हुए इमलि र उनको सरजमा, मी करती। जगद्द सरकण्डों में इन की उचि हुई उमक समार दी पर जाने के लिए रास्ता था उनी राम्ने से प्रतिदिन ये ही ६६ याएं जो मुनि पनी हुई थी स्नान के निप जाया कर रोज उन्होंने एक अद्भुत बालक सरकाडे के यन में सेना । र उठा लिया तथा इस वला को में रखूगी मैं रसुंगी कहा तनों से दूध पिलाने के लिए लड़ने लगी उस समय स्कन्दजी ने . को धारण कर छनों का दुग्ध पान किया तब से इनका नाम पर हुआ ६ माताओं का भाग एक बालक में बराबर हो उसको । Ma कहा है कि " तामा स्तन्यं मयापीतं मुखैःषभिद्धिजोलम" .. पाण्मातुर इति ख्यातः " अर्थत् तब से मेरा नाम पाणनातुर श्रीकपिलायतमतीर्थमाहात्म्यम् । :प्रत्यदं कार्ति के मासिस्नानवेलामवाप्यताः॥५१॥ थवलम्ब्यावतिष्ठन्ति पुनः स्नानोत्सुकाइय।। ताः कृत्तिका आकाशस्थापि कार्तिकमासि स्नानवेलामवाप्य पुनःस्नानोत्सुकाइव प्रत्पन्दं प्रतिवर्ष अवलम्च्याकाशादयतरन्त्य- इत्र पश्चिमाशायां क्षितिजामन्नेतिष्ठन्ति एतदुक्तं भवति वस्तुतस्तु स्नान वेला अरुणोदय झालः तस्मिन्समये प्रायः कार्तिकान्त कृत्तिकाताराः पश्चिमनितिजेदृश्यन्ते तत्र कारणम् सूर्यो यस्मिन्नृक्षे मवति तदृक्षमेव सूर्योदयोलायाम्पूर्वस्मिन्नितिज दृश्यते । इति ज्योतिष शास्त्रे स्पष्ट एवं तस्मादृक्षाचतुर्दश नक्षत्रम् तस्मिन्नेवकाले पश्चिमक्षितिजेलग्नं दृश्यते कार्तिक मासे पूर्णिमासम्भ- काले पदार्यः क्रान्तिवृत्ते तुलान्ते पृश्चिकादौवोदेति तदा विशाखान्ते चा अनुराधादौ सूर्यो भवति । विशाखानुराधयोः नोट- कृस्तिकायें श्राकाश से स्नान के लिये कार्तिक मास में ही उतरती हुई दौख पहनी है क्यों इसका उत्तर ज्योतिष शास्त्र से स्पष्ट होता है। क्योंकि ज्योतिष के सिद्धान्त अन्धों में भूगोल खगोल गोल के पारदशी विद्वान् लिखते है कि जिस समय सूर्य जित नक्षत्र में होकर पूर्व की दिशा में उदित होता है उसी समय सूर्य नक्षत्र का चौदहवां नएत्र पशिम दिशा में पृथ्वी से लगाया दस पाता है यह सिदान्त हैं इसमें न्यूनाधिक कमी नहीं होता और राशिचक्र महों के साथ सदा पृथ्वी के चारों तरफ परिभ्रमण किया करता है सायन भेष के प्रातःकाल में अश्विनी पूर्व दिशा में और चित्रा पश्रिम में रहती है चोर तुलादि में चित्रा पूर्व में और अश्विनी पत्रिम तितिन में दास्वपडता है चित्रा के सूर्य कार्निवादि में होते हैं और कार्तिको पूर्णिमा के लगभग विशाखया धगधा में सूर्य उदित होता है तो पधिम दिशा में मात.काल के समय पृथ्वी में सीई मरथी धार कृतिका दसती है मानों पर कृन्तिा भी कार्तिक की पूर्णिमा के स्नान दास ही थाकाश से उतररही है और प्रत्यक्ष पंचासों में देखिये तो मानिकी पूर्णिमा में कृतिका नहर का योग मा रहता है और पसी योगाश महाना का नाम कार्तिक क्योंकि कृन्तिका में इसकी समाप्ति होती है। चन्द्र पार यश इस्तिका नपत्र कार्तिकी पूर्णिमा को पानी है इसलिए मूल में "कार्तिक कृतिमा छाये" ऐसा पद दिया। यही नहीं बल्के समी महीनों.
श्रीकरिनामभिमादाग। वर्गायदादगि तदा पग्रिनाशायी चितिजाम कदानित्यः फदाचिदमाएरः ऋगितामापिरयन्त मननाः कृन्तिकाः पुनः स्नानागुकारवालम्गावनिहन्त इति कयनं ज्योतिष मिदान गत्यापि यक्रियति । पुनः प्रायः कार्तिक पूर्णिमा कस्तिका नयमपि चन्द्रचारशन भयनानि पंचामट नापिस्सन्दी- नियटते। मानव जप कार्तिक माम में स्नान का समय आता है तो वे कृलिकाएं श्राफारा मे उनरती हुई दीस परती है मानो फिर भी स्नान करने के लिए उत्सुक हुई है। तस्मात्पातक सघानकारिणि स्नान्सि चारिणि ।। ५२॥ फार्तिक कृत्तिकालाये यान्ति विमलांगतिम् ।। ये पुनः स्नान्ति तन्मासि कपिलायनने मुने ॥ ५३ ।। तेषां किम्बयेतेभाग्यं महाभागवना मुवि ॥ * की पूर्णिमात्रों में एक एक साम नतर का याग होता ह निमसे प्रचलित महीनों के नाम है जिसका प्रसंग वश यहां लिखता ज्योतिषशास्त्र में मास गणना सौर सावन नादत्र ग्रार चान्द्र के भेद से चार प्रकार की है और जिस गणना से जो काम करने को कहा गया है उसमें वही कार्य कियाजाता है परन्तु चन्द्रमान दो प्रकार से प्रसिद्ध है हम खोग शास्त्र में दोनोंदी के जगह २ विषय उपस्थित देखते है उनमें एक को अमान्त कहत है जिसका उपयोग गणित में प्रायः हुआ करता है दूसरा पूर्णत है जिसका उपयोग बहुधा व्यवहार में होता है और पूर्णिमा को जो नक्षत्र पाता है उससे ज्योतिषियों ने महीनों के नाम बनाये हैं जैसे चित्रा युक्त पूर्णिमा होने से चैत्र (त्र) विशाखा युक्त पूर्णिमा होने से वैशास ज्येष्ठा युक्त पूर्णिमा होने से ज्येष्ठ एवं उत्तगपाद से प्रासाद श्रवण से भावण उत्तर भाद्रपदा से भाद्रपद अश्विनी से पाश्विन मारवाड में घासोज कृतिका युक्त पूर्णिमा को कार्तिकी कहते हैं उससे कार्तिक मास होता है, एवं मार्गशीर्ष, पाप, माघ, फाल्गुण इत्यादि । संस्कृत में चित्र या युक्ता पार्णमासी चैदी तस्यां भवोयमासः चैत्रः विशाखया युक्ता पौर्णमासी वैशासी तत्र भवायमासा शास्त: मोटा-माम नाम मिद्ध होते हैं।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । यतः पुनर्जननमरणादि संसारबन्धनमुनाः कृनिकाताराः कापिलये कार्तिकस्नानवमवेनैवातास्तस्मात्पातकसंघात कारिणि पारिणि कार्तिकमासे कृत्तिकाचाये अर्थात्पूर्णिमायां ये स्नान्ति ते विमलांगति यान्ति॥ यतः पूर्णिमायां कृत्तिका योगो मत्येवेति ॥५२, ५३ ।। कार्तिक मास में कपिलतीर्थ के स्नान का ही यह विभव है कि वे मुनि कन्याएं पुनर्जन्म-मरणादि सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर तारों के रूप में आकाश की शोभा बढ़ा रही हैं इसलिए महापातकों का नाश करनेवाला जो कपिलसरोवर है इस में जो कार्तिकी पूर्णिमा के दिन स्नान करते हैं उन की विमल गति होती है और जो कार्तिक मासभर स्नान करते हैं उन महाभागवतों के भाग्य का वर्णन कौन कर सकता है ॥ ५२, ५.३ ।। . इति से सर्वमाख्यातं घानीयां मे विचेष्टितम् ॥ ५४॥ कपिलालपस्नानपुण्याज्जातं लोकैक सादिकम् ।। ( स्पष्टम् ) है अगस्त्य । इस प्रकार कपिलालय का स्नान के पुण्य से संसार में साक्षिरुप जो मेरी धारयों के कृत्य हैं उनको तुम से मैने कहा है ॥ : इति भोरफनपुराण भन्दागस्त्यसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये तपिंधर्षन माम पापः।
पंचमाध्यायविवृतिः।
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(गून उसन)
इत्युक्त्या पुनरप्या, महासेनी महाभुतम् ।।
फपिलालग माहात्म्यं सतिहासं महागुने ॥ १॥
अस्मिन्वयमाणे पंचमाध्याय स्कन्दःपुनरगस्त्य कपिलालय
माहात्म्यं सेतिहासं वर्णयति इत्युक्त्वंति हे महामुन शौनक ! इत्यु-
पत्वार्थात् सधान्तणां तारारुपाणां कृतिकानां चरितमुक्त्वा महासेनः
समन्दः महाद्भुतं महाचर्यकर सतिहासं कपिलालय माहात्म्य
पुनरप्या ॥१॥
सूतजी कहते है कि हे मुनि शौनक ! महासेन स्कन्द देव ने .
चतुर्थाध्याय में इस प्रकार अपनी धात्री कृतिकाओं का चरित्र वर्मन
करने के अनन्तर महाश्चर्यकर इतिहास के साथ कपिलालय माहात्य
को फिर भी इस पांचवें अध्याय में कहा था सो सुनो ॥१॥
महापाक संघात विधातक पढीयसीम् ।।
कपिलायतींगाथां मन्मैत्रा वरुणे शृणु ॥२॥
हे मैत्रावरुणे ! अगस्त्य ! महांधासोपातकावः महापातका
महापातकानां संघातः समूहो महापातकसंघातः तस्य विधातके
विध्वंसने पटीयसी समर्थतरा ताम् महापातकसंघातविघातक
पटीयसीम् महामहापातकजाल विनाशदचा कपिलायतनी गायां'
कथां मत् कोर्थः मत्तः शृणु ॥२॥
हे मैत्रावरुणि ! बड़े २ पातकों के समूहों को विनाय करने में
समर्थ जो कपिलायतन की कथा है उसको सुनो ॥ २ ॥
७३ धोकपिलायतनतीर्थगाहात्म्यम् । फदाचित्यानिके मालिकान्त गन्न दिनपुच ।। समाजामन्महास्तत्र देशदेशनिवासिनाम् ॥ ३॥ कदाचित् पूरस्मिन्ममये एकदा कार्तिक अर्थात्कानिकमामे मागियानादिन चात्र पादपूरकाऽव्ययाधिमानि । मासे मयानि मामिकानि प्रान यानि दिनानि-शुनकादशीमारम्प पूर्णिमा पर्यन्तानि तानि मामिस्मान्तदिनानि तेषु देशदेशनिवामिना मनुप्या समाजाभून् ॥ ३॥ एक समय में फार्मिक माम के भन्न के पांच दिनों में देश देश के निवासी मनुष्यों का एक समान एकत्र या ।। ३ ॥ फस्मिमिहियपुर मत्ममासम्ममुगनः ।। सीप्रदक्षिणीकन्तुं पानापलसमीपा ।। ४॥ फरिमवित्पुएपे दिरमे पाया पड समाहया यामा फल प्रामि कामनपाशी प्रापिषीकान्त मन ममात्र: मां माना ममालग- एपनः तीर्थप्रदक्षिणायामुपनारभूर ।। ४ ॥ किमा पुरयान दिन में यात्रा से पूर्णपानासन: संगीरामाननीय भीमसिनाकाम. पानgn गये प्रदविण पाचया पुदम्पिनः ।। 'मगसागाना नानादानारमारायः ॥ परिमन्नुपी गमागे मगरमाया मां भगममी. पारा: नानादानारमाया: भारतमा प्रायः मनिसानीपत नानासान:- दामामामाममनोरया: AIRRH गरे दिन पर भारगिलायतननाममाया उमी गमग अनेक दानों में शुमगिक लोग पार बदन्त्री (गृह) लोगों ने भी भगवान के नाग को जान हुये माना hit सन फभिङ्गिनुरमा स्यगुमा महिनावी ॥ सोपि प्रदचिणं पुगपंच मर्यजनः सह ॥३॥ ता गमाज सशुनासदिनः अवशी अहमिशं स्वइंदुम्म परिपोषणाय बोदरपूरणायच मिनाथ सुब्धचितः कमिशिनुग्भूत् गतवानिनिमावः सापि सर्वजनःसह प्रदगिरी च॥६॥ उस समाज में अपने कुत्ते को साथ लेकर कोई लुचिच मितुक घुस गया और उसने भी सब लोगों के साथ उस पुनय प्रदक्षिणा को किया ॥६॥ तस्यानुयायी तच्छापिचके तीर्थ प्रदक्षिणां । नानाभाव युतो लोको दृष्ट्वातं विस्मिताऽभवत् ॥७॥ तस्य भित्तोरनुयायी सहानुगन्ता तत्तस्यश्या इतिविग्रहात् तच्चापि तीर्थप्रदक्षिणां चक्रं कृतवान् । नानाभावयुतोलोक स्तंश्यानं प्रदक्षिणांकुर्वन्तं दृष्ट्या विस्मितोऽभवत् ।। ७ ।। उस भिक्षुक के पीछे पीछे चलनेवाले कुते ने भी तीर्थ की प्रदक्षिणा की, यह देख अनेक भाव से युत समाज के सभी लोग अाश्चर्यान्वित हो गये ॥७॥ केचित्तं भर्सयन्तिस्म धिक्क्र्यन्तिस्मकेचन ।। तथापि भिक्षोः पारच स न चिमुंचति वै मनाक् ॥८॥ केचित्तश्यानं भर्तसयन्तिस्म भर्त्सनां दण्डग्रहाररूपवाड़नां कुर्वन्तिस्म पश्यर्थे भत्र्सना लगुडमहाररुपैयभवति । केचन तं धिरु श्रीकपिलायतमतीर्थमाहात्म्यम् । कुन्तिम अर्थात् दुत्कारशब्देन स्वसामाप्यात्पृथक् कुर्वन्तिस्म लोके विक्शब्दस्य पश्वर्थे दुरदुर शब्दः दूर करणे उपयुक्तोभवति । तथापि स वा कुबसुरः भिक्षोः पार्श्व सामिप्यं मनाक् स्तोकमपि न विमुंघतिस्म लोक दुग्दुरादिशब्दन लगुडादिप्रहारेणच पीड्यमा- नोपि स्वस्वामिनः मिझोरनुगच्छन्नेवासीत् ॥८॥ कोई उस कुत्ते को भसना करते थे लकड़ियों से मारते थे कोई दुरदुराते थे तोभी वह अपने मालिक (उस भिन्नुक) के पास से नहीं हटता था ||८|| केचित्तत्र वदन्तिस्मजना अाचार तत्पराः ।। स्चायं स्पृशति सर्वान्तः प्रगृह्योद्वास्यतां चाहिः ॥६॥ केचिजना प्राचारतत्सराः सदा शौचाचारयुक्तास्तत्र समाज वदन्तिस्म यदयं वा नः सर्वान् स्पृशति एनं हठात् प्रगृह्य यहिरुद्वास्यतां निष्काश्यताम् ।। ६ ।। उस समाज में जो बडे याचार-विचार की विडम्बना करनेवाले मनुष्य थे ये पहते थे कि यह कुला हमलोगों को स्पर्श करेगा इसको पकड़कर बाहर निकाल दो।।।। थन्ये पुनः शान्ति पराः नैवं कार्य कदाचन ॥ एवं तान् प्रवदन्तिस्म सांत्वधाना:स्मिनाननाः ॥१०॥ पुनरन्ये शोति पराः शांतिप्रिया : : सततमिप- दास्यमुसा जनाः पदाचनए कुरकुरस्य ចូរទៅ प्रपदा 1 । श्रीकीपलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । फिर उस समाज के और लोग जो हमेशः शान्ति को प्यार करने वाले और सब से थोड़ी हंसी के साथ प्रिय वचन बोलने वाले राग द्वेष रहित महात्मा थे। जो प्राणीमात्र को एक सा देसते थे वे उन लोगों (जो कुत्ते को पकड़कर समाज से बाहर करने को उद्यत थे) से, उस भिन्तुक (जिसका वह कुत्ता था) के साथ कहीं विवाद न बढ़ जाय इस विचार से समझाते हुवे कहने लगे कि ऐसा काम की नहीं करना चाहिये अर्थात् उस कुत्ते को बाहर कभी नहीं निकालना चाहिये ॥१०॥ तान्प्रत्यूचुः पुनस्तेतु स्वाचाराग्रह फारिएः॥ भयतां निवसाव्यं यूयं ब्रमधिदाक्षिती ॥ ११ ॥ शुनिचैवश्वपाकेच परं नाहीच परपथ ।। एवं वचनयमाच्या विविधुत्तास्लमोयुताः ॥१२॥ सर्वत्रच समाने सर्व विधा मनुष्या एकनीभयन्ति तथैवापिय! प्रदचिणां कुर्वति शुनि, प्रदक्षिणं कृतांजनानां मध्यतो दलद्वपं गुत्पमम् तत्र राजसनाममानामेकंदलग् गायिकाना द्वितीयम् प्रदक्षिणकर्मणिरतश्यानं हप्ता उन्नदलद्वये विवादस्ममुपस्थिा प्रतिगपये शुनौगमनं राजातामानां याहसदाचारप्रदर्शिता गोऽनगर्नगामीदतस्ते तं यदि कर्तुगुपताः सालिकाम्नु भो । मेर कार्यगिरि अधिन्या तान् मान्ययान्तरमा एवं परम पिाद क्रमामाने | गाममान पापम् गान्प्रत्यरिल्यापार भाऽभयन् ॥ सागाराग्रह कारिणः मागाराभिमानिनस्तमायुः নামঃমাননা। নানু খান: স্নাথ বিঃ परशुवा, पुनरहितियांतिनामावदः मता यानि नधा निशाचा परपरसय पान पायावामान मादियामागुः ॥ ११, १२॥
श्रीशपिलायनतीश्रमाहात्म्यम् । जहां कही या मनुष्य एकत्र हो जायं उसके ममात्र या मना कहते हैं पार पमे समान में सब प्रकार के मनुष्यों का रहना स्वाभाविक है और उनमें धनेश मघर का ममंग भी उठाना म्यामाविक, यहां पर जो समाज एकत्र या उसमें भी मनीगुण रजोगुण और नमागुण समा प्रकृति के मनुष्य थे और प्रसंग उमा मिनुको कुन का पापड़ा। भिक्षुक के युत्त को समाज के साथ मनिशा कति देय ममाज में दो दल होगये। दल तो रजोगुण तमोगुणवाली का धनगया, दसरा मनागुशियों का, पर तमोगुणी जो बाहर से भागने मदानार मागे भारम्बर पलाये थे वे कहते थे कि युने को बाहर निकालदेना पाहिये हम लोगों को छूकर अपवित्र करेगा। और साविक कहने । पिमान करना चाहिये । यही से विवाद प्रारंभ हुआ। सभा बावा र मयुपर साचला मी पहने है । सालिका के मन करने पर तमः महातपान पान, शिपापका क्या करना है? या मोहमशका में न मानी गाने में KRI देगल से एक गुणे और एक भागमान में भी परंस कोदर मा मध्यगान पानी में उनका ने नगे ॥११,
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्।
पुनः प्रीमिमाश्रित्य तान् प्रत्याहुस्मराजसाः ॥१४॥
विमानमस्य मोक्षाय गगनादागमिष्यति ॥
पुनः राजसाः गोझिसमाश्रित्य रोपणातिरौद्ररूपमाश्रित्य
तान् सात्विकानूचुः यदस्य शुनोमोक्षाप गंगनाद्विमानमाग
मिप्यति ।। १४ ॥
फिर राजस प्रकृतिवाले बडे उत्तेजित होकर सात्विकों से बोले
कि आपलोग इसका इतना पक्ष कर रहे हैं मानो इसके मोक्ष के वास्ते
आकाश से विमान आयेगा ॥१४॥
स्मित्वा ते प्रवदन्तिस्म पुनस्तान्मत्सरावृतान् ॥१५॥
विमानं भवतां पूर्वमागमिष्यति निश्चितम् ।।
येपामाचारनैपुण्यमेतादृक् संप्रवर्तते ॥ १६ ॥
ते सात्विकाः पुन स्तान् मत्मरान्वितान् प्रौदिमुपागतान् जनान्
स्मित्वा प्रयदन्तिस्म यत्पूर्वभवतामेव विमानं निश्चितम् भाग
मिप्यति । येषां भवतामाचारनैपुण्यमेतादृक् संप्रवर्तते ।। १६ ।।
वे साविक लोग उन मत्सरियों से थोड़ा हंसते हुवे फिर बोले
कि इस कुत्ते के वास्ते विमान क्यों आयेगा ? यदि विमान भावेगा तो
पहले आप लोगों के वास्ते ही, क्योंकि आप लोगों का भाचार
विचार इस प्रकार बढ़ा-चढ़ा है।॥ १६॥
पायं तत्र जना ग्रामप्रयदन्ते परस्परम् ॥
स्वस्वभावानुरोधन रजःसत्यनमायुनाः ॥ १७ ॥
हे प्रलान् एवं तय रजःसन्वतगोयुता जनाः स्वस्त्र मारानु
राधन पापरं प्रपदन्तम्म ॥ १७॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
हेमन्मन् अगस्त्यजी! उस समाज के राजस तामस और साविक
प्रकृति वाले मनुष्य अपनी २ प्रकृति के अनुकूल इस प्रकार परम्पर
वादविवाद कर रहे थे।॥ १७ ॥
तथा विपदमानेपु नानाजल्पेषु चन्षु ।।
स्वस्वामी सस्मितास्यासन् प्रदक्षिणमवर्तत ।। १८ ॥
तथा पूनियन नानाइल्पपु अल्पं निरर्थक वचनम् नेषु
अनेक निरर्थकालापेषु विवदमानेषु परस्परं विवादयन्गु नृषु मनुष्येषु
पइति निरर्थकमव्ययमिति केवल पादपूरणे योध्यम् । स वम्यामी
मिलुक स्मितास्यः मन परस्परं निष्प्रयोजनमेष विषदन्तं दलद्वयं
परयन् दलदयस्थमनुजान् मन् तिमायः प्रदक्षिणमरतेत
प्रदक्षिणासमाप्तिमकरोत् ॥१८॥
इम सरद दोनों पक्षवाले मनुष्यों में परम्पर निप्पयोजन विवाद
हो रहा था तबतक उस कुचे के म्यामी भिक्षुक ने ममनना पूर्वक
अपनी प्रदक्षिणा को समास करलिया ॥ १० ॥
म मामानियात्रुस्नान प्रदक्षिणम् ।।
स्यापि स्पस्वामिना साद्ध पत्रे पार प्रवधिषम् ॥१६॥
पर सीधे स सामाजिका मगाजम्या मनुष्याः प्रदक्षिणं
: ব্যাধি না মিয়া বাৰিাষাবিব
प्रदापि ॥१॥
सभी समान मनुष्यों ने रस मी कामदासपी मीर उम
मुर में भी पाने वाली माता करनी ॥ १५ ॥
पारपानात्मम्यगारम्प प्रदजियमपर्यन।।
पुनस्सस्स्थानमागाराग विभांतिमागताः ॥२०॥
infमानाARITAL मन पाणान् गम्यगारमोगानं कृत्वा प्रदधिमन पुलंन पुनलम्यानमागाय गागलय शाीितिमागताः विश्राममातुनि ॥ २०॥ उन मनुनी ने निगान में प्रानिग करना परम किया कर फिर उसी मामा भाडर गुमान विभाग किया।॥२०॥ माम्य विधियद्वारि चणमान स्थिताः क्षिती॥ स्थापि सन समागत्य किनिधीत्या जलं गुचि ॥२१॥ समासाथ सरस्तीरं निजनेप्रेन्यमीलयत् ॥ विश्रांतिस्थाने समागताः मामाजिकाः वारिजले विधिवद्विधि- पूर्कमाचम्प हितां घणमा स्थिताः घणमात्र तत्रयावसन् तावत् स्यापि तत्र समागत्य शुचि पवित्र जलं किश्चित्पीत्वा पुनः सरस्तीरं समासाद्योपविश्य निजनो न्यमीलयत् ।। विश्राम स्थान पर आये हुए सभी मनुष्य जल में विधिवत् आचमन करके सरोवर के तट की भूमि पर कुछ काल तक टहर गये तबतक वह कुत्ता भी वहां आकर उस सरोवर का पवित्र जल पुनः तीर पर था बैठा और अपने नेत्रों को बन्द करलिया । पश्यतां सर्वलोकानां विस्मयाविष्टचेतसाम् ॥२२॥ अकस्मादेव विप्रेन्द्र ! सद्यः प्राणानवारजत् ।। हे विपन्द्र । विस्मयाविष्टचैतसाम् सर्वलोकानां पश्यताम् अकस्मादेव सवा सद्यः तत्कालं माणान् भवासन त्त्यक्तवान् । है विप्रेन्द्र । अाश्चर्य के साथ सब लोगों के देखते २ उस कुले ने एकाएक अपने प्राणों को परित्याग कर दिया ।। पीकर किपिलायतनतथिमाहात्म्यम् । ८१ ततः क्षणात् समायान्तं पिमान भास्वरं दिवः ॥२३॥ तत्रास्थाय स्थिरं दिव्यं तेजोरूपं समाश्रितः॥ थयौ पश्यत्सु सर्वेयु परंधामदिवौकसाम् ॥ २४ ॥ ततस्तदनन्तरं क्षणान्मुहूर्तेनैव भास्वरं द्युतिमन्तं विमान दिवः स्वर्गाद समायान्तं प्रागतवन्तं दृष्ट्वा तत्र विमाने स्थिरमास्थाय स्थित्या दिध्यं भास्वरं तेजोरूपमाश्रितः तेजोरूपंदधार ।। सर्वेषु जनेषु पश्यत्सु दिवौकसाम् देवानां परंधाम स्थानं देवलोकं यया गतवान् ।। २४ ॥ इसके बाद क्षणभर में सुन्दर चमकता हुवा विमान आकाश से आया उसको देख उस पर सुन्दर तेजोमय रूप धारण कर दृढ़ता से बैठ गया और सब ल.गों के देखते २ देवलोक को चला गया ।। २४ ॥ उन्मुखाः केचिदासन्यै केचिदामनवाङ्मुखाः ।। तदृष्ट्वा महदाश्चर्य तत्र तीर्थे द्विजोत्तम ॥ २५ ॥ हे द्विजोत्तम! केचित् ये वपक्षवादिनः सात्विकास्ते तत्र तीर्थे तन्महदाथर्य दृष्ट्या उन्मुसाः विमानोन्मुखाः सन्तः विमानं पश्यन्नासन् । तथा येकेचित् स्वहिनिष्काशनतत्पराः तमोयुतास्ते लअया असामुसा अरनिम्पश्यन् श्रासन् ॥ २५ ॥ जो लोग समदर्शी और कुत्ते के पक्ष में विशद करनेवाले सात्विक मनुष्य में ये तो उर्द्धमुख होकर इस एक अद्भुत घटना को देख रहे थे और जो राजस तामस प्रकृतिकाले कुत्ते को समाज से बाहर निकाल देने में तत्पर हुए थे उन्होंने लग्नावश नीचे मुख कर लिये ।। २५ ।।
--------- देशोऽस्ति यत्रत्या यत्रभया: सोः प्रजाः सदाचारपरापणाः निर: पागनदनार प्रकट शुगः मयि पुगात अगम्यगि पुगा जातं पुए परि मनानं पुनः प्राह मान ||३॥ गानी गाने नाम कर सगन्यजीने र माग गे प्रभाव पानीनन्दन मगान मन्दनी ने पुगगन पुराना भारत र मान गिदाग को मुनाया ॥३॥ ( यान) शृणु विम प्रयदयामि पुरायत्तं कथानकम् ।। एकस्मिन्दियमपलं देश गुर्जरसंज्ञके ॥४॥ हे विष ! पुगवृतं पूर्वजातं कथानकं प्रवक्ष्यामि कथयामि श्रेणु ॥ यदेकस्मिन् समये गुर्जरमंसक देशे पुरतं मर्यात् घटितम् 11४॥ हे विप्र! एक पूर्वकालिक पृतान्त कहता हूं, सुनो (जो गुर्जर देश में एक समय में हुआ था )॥४॥ यस्ति गौरिकोदेशोधनिनामाश्रयः परः॥ यत्रत्याहिप्रजाः सर्वाः सदाचारपरायणाः ॥ ५ ॥ धनिमाश्रयोनिवासस्थानम् यत्र स गोर्जरिकः गुर्जरनामको सन्तीति अन्न वर्तमान कालिकी क्रिया भूतकाल योध्या यथा कुमारस भो। अस्त्युनरस्पां दिशि देवताभिहिमालयोनाम नगाधिराज इति ॥ ५ ॥ गुर्जर देश (गुजरात) में धनियों के निवास योग्य एक परन सस्कृष्ट स्थान था जहां की प्रजा सदाचार सर्द्धम में सदा परायण रहती थी 11 ५ ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । ८५ पुरंजयति सद्देशे नाना हर्यसमाफुले ॥ सर्व देशशिरोरत्नभूतं सदलकोपमम् ।। तद्देशे अर्थात् गुर्जरे देश नाना हर्यसमाकुलम् अनेक धनि भवनेन सुशोभितम् " हयंतु धनिनां वासः इत्यमरोक्त्या" सर्वदेशशिरोरत्नभूतं लक्ष्मीनिवासकारणादिति अलकोपमंगलका- पुरी कुबेरनगरी तदृशं सत् पुरं ग्रामं जगति सर्वोत्कण विराजते ।।६ उस मुर्जर देश में अनेकानेक उत्तम उत्तम गृहों से सुशोभित सब देशों का मुकुट अलकापुरी सदृश एक ग्राम था॥६॥ यस्य हर्म्यस्थलेप्वद्धा गौरांग्यः संचरन्तिहि । शारदाम्रप्रविष्टानां क्षिपंत्योविद्युतां गुतिम् ॥७॥ यस्य पुरस्य हर्म्यस्थलेषु हर्म्यप्रदेशपु अद्धा साक्षात् शार- दाभ्रप्रविष्टानां विद्युतां शारदीयमेघसन्निकोग्दतानां सौदामिनीनां द्युति या क्षिपन्त्यः सर्वतः प्रसारयन्त्यो गौराग्यस्सुन्दर्यः सचरन्ति इततस्तोत्रमन्तिस्म हीत्ति पादपुरकः । श्रस्यायंभाषः यथाशुभ्रवणेशारदायाने इत उतः स्त्रकान्तिमुद्धिरत्याशश्वलायाः परिभ्रणं सम्पयते तथैवास्यग्रामस्थ शारदीयाघ्रसंनिम श्वेतहर्य- प्रदेशेषु विशुद्विकाशसशीनां कामिनीनामपि गमनमासीत् ॥७ जिस माम के धनिक गृहों में सुंदर २ स्त्रियां शरत्काल के मेघ में प्रविष्ट विजली की तरह अपनी प्रकाशमयी सुन्दरता से चमकती हुई फिरती थीं ॥ ७॥ :नरादेवप्रभा यत्र नायादेवीसमानभाः। गृहा अनंलिहा यत्र स्वारामा नन्दनमभाः॥॥
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८७
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
ग्रंशेन तेन स्ववसोपीकृपसरांसिच ।।
दिव्यान्देवालयांश्चापि कारयामास वैरयजः॥११॥
स्ववसोः स्वकीयधनस्य तेन अंशन धनपष्ठांशेन वैश्यजः
चापीकृपसरोसि चापीकूपतडागादीन् दिव्यान् मनोहरान्देवा-
लयान् देवमन्दिराणिच कारयामास ॥११॥
उस श्रीकृष्णार्पित धन के पष्ठांश से वह वैश्य वापी कूप तडाग
और सुन्दर सुन्दर देवालयों को बनवाता था ॥११॥
नाना विधानि दानानि चक्रे शास्त्रोमामार्गता।
तथान्नसत्रं विदधे क्षुधितेभ्योदिवानिशम् ॥१२॥
शास्त्रोकमार्गतोनानाविधानि दानानि चक्रे तथा शुधितम्यो
दिवानिशम् अन्नसत्र अन्नमयंयज्ञं विदधे ॥ १२ ॥
वह वैश्य शास्त्रोक्त विधान से अनेक प्रकार के दान करता था
और क्षुधितों के लिये दिनरात अन्न दान करता रहता था ॥ १२ ॥
एवं प्रवर्तमानस्य पणिजस्तस्य सत्तम ।
पुघाः पंचाऽभवन्भव्याः यहुदाक्षिण्यसंयुताः॥१३॥
है सत्तम! एवं प्रवर्तमानस्य सुकृतरतस्य तस्य वणिजः!
भन्याः मनोहराः अतिमुचतुराः पंच पुत्रा अभवन् ॥१३॥
इस तरह सुक्रम में तत्पर रहनेवाले उस वैश्य के उत्तम २
गुणों से संयुक्त मुन्दर २ पांच पुत्र हुए ॥१३॥
पोपा ज्येष्ठ शासचिः सजन्मान्धस्वकर्मणा।
बुद्धिमान सुविवेकय सप्वपु सुन्दरः ॥ १४ ॥
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८१ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । (स्पष्टम्) भगवान की कृपा और उसके पुण्य कर्म के बल से उस स्त्री के उस अन्धे से भी बहुत गुणवान पुत्र उत्पन्न हुए। एवं प्रयततस्तस्य सत्पुनस्यच सत्पितुः ॥२८॥ कालोमहान्व्यतीयाय बहुभोगभुजोभुवि ।। एवं प्रवर्ततः गार्हस्थ्यधर्म धर्तयतोबहुभोग जस्तस्य सत्पुत्रस्य सत्पितुश्च महाकालोव्यतीयाय ।। इम तरह गार्हस्थ्य धर्म का परिपालन करते हुए और अनेक उत्तम भोगों को भोगते हुए उन पिता पुत्रों को बहुत दिन बीत गये ।। महामौल्येन यस्क्रीतं नाना देशसमुद्भयम् ॥ १६ ॥ धनं घान्यं फलं पत्रं भुक्तासाचुरुजोत्तमः॥ महामौल्येन महार्येण नाना देशसमुद्भवम् नाना देश जातं धनं धान्धं फलं वयं यन्त्रीतम् तदसावुरुजोत्तमः भुंक भुक्वानिति पत्र वैरयार्थे उरुजः शब्दोवैदिकः ब्राह्मणोऽस्य मुघमासोदित्यूचायास्सष्टम् ।। महगे भाव में उस वैश्य ने जो अनेक देशों से धन, धान्य, फल और वस्त्रादि खरीदे थे उसका वह स्वयं भोग करता था। कस्मिचिकालपर्याय मुगाः काच प्रभानवाः ।। २०॥ चणिजा केन ते विप्र तद्वैश्योपायनीकृताः । हे विप्र! कस्मिंश्चिकालपर्याये कस्मित्समये काचप्रभाः काय साशप्रगावन्तो ना मुद्राः फेन पपिजा रथेन रियोपा- पनीकना अर्धात्तस्मै श्यापोपहारे दन्ताः ।।
te परा जन्मांध था परन्तु सर अंगी से मुन्दर और सद्विचार सददि से श्रीजीलायनगतामाहाम्यम् । एवं पुत्राणां मध्ये यः ज्येष्टः पुत्रः स स्वकर्मणा स्वकीच जन्मापरिमाणा जन्मान्धोऽपि सर्वेषु अंगेषु सुन्दरः कमनीय मुधियेकः गुशानी युद्धिमांचासीन् ॥ १४ ॥ उन पांचों पुत्रों में जो ज्येष्ठ था यह अपने पूर्व जन्म के कनों के युक्त था ॥१४॥ पंचपुत्रेण धणिजा यसता तत्पुरोत्तमे ।। अन्धोऽपिनिजपुत्रोऽसौ धनयोगेन भूरिणा ॥ १५ ॥ विवाहितोपरां कन्यां स्व सम्बन्धिकुलोङ्गवाम् ॥ स्वकीयेन पंचपुत्रेणसह तत्पुरोत्तमे घसता तेन वसिजावश्येन भूरिणा धनयोगेन भूरिद्रव्यदानेन स्व सम्बन्धिकुलोद्भवांवर श्रेष्ठां कन्यां अन्धोप्यसौ निजपुत्रोविवाहितः॥ अपने पांचों पुत्रों के साथ उस उत्तम नगर में रहनेवाले उस वैश्य ने बहुत धन देकर अपने सम्बन्धी की एक सुन्दरी कन्या से अन्धे पुत्र का भी विवाह कर दिया। • सा सती तं स्वभर्तारं सिपेवे शुद्धमानसा ॥१६॥ : वैचित्रवीर्यराजानं गांधारीव पतिव्रता। (स्पष्टम् ) वह पतिव्रता कन्या अपने अन्धे पति की सेवा शुद्ध मन से करती थी जैसे राजा विचित्रवीर्य की पवित्रता गान्धारी ने सेवा की थी। तस्यां तस्यापि सत्पुना यम्युहुदक्षिणाः ॥१७॥ ईरयरस्प प्रसादेन स्वेन पुगंपेन कर्मणा ॥ .
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । (स्पष्टम् ) भगवान की कृपा और उसके पुण्य कर्म के बल से उस स्त्री के उस अन्धे से भी बहुत गुणवान् पुत्र उत्पन्न हुए । एवं प्रयततस्तस्य सत्पुनस्यच सपितुः ॥१८॥ कालोमहात्म्पतीयाय बहुभोगभुजोभुवि ।। एवं प्रवर्ततः गार्हस्थ्य वर्तपत्तोबहुभोगभुजस्तस्य सत्पुत्रस्य सपितुध महाकालोन्यत्तीयाय ।। इस तरह गार्हस्थ्य धर्म का परिपालन करते हुए और अनेक उत्तम भोगों को भोगते हुए उन पिता पुत्रों को बहुत दिन बीत गये । महामौल्येन यस्क्रीतं नाना देशसमुद्भयम् ॥ १६ ॥ धनं धान्यं फल घरनं भुक्तोऽसाघुरुजोत्तमः॥ महामायेन महायण नाना देशसमुद्भवम् नाना देश जातं धनं धान्धं फलं वस्त्र पक्रीतम् तदसावुरुजोत्तमः मुंद भुकवानिति अत्र वैश्याथै उरुजः शब्दोवैदिकः प्राह्मणोऽस्य मुखमासीदित्युचायास्पष्टम् ।। महंगे भाव में उस वैश्य ने जो अनेक देशों से धन, धान्य, फल और वस्त्रादि खरीदे थे उसका वह स्वयं भोग करता था। कस्मिमित्कालपर्यापे मुगाः काप प्रभानयाः ॥२०॥ चणिजा फेन ते विम तद्वैश्योपायनीकृताः॥ हे विष! कस्मिंश्चितकालपराये कस्मित्समये काचप्रमाः काच सदशप्रगावन्ती गवा गुदाः केन पणिजा वैश्येन तश्योपा- यनीकमा अर्धात्तस्मै वश्यापोपहारे दत्ताः।।
१० **ীগণনায়াশ। एक समय की पान किसी वश्य ने कान के सदृश चन्दन मुवे नये गूंग उस वश्य को भंट किये ।। ये जाताः शर्करावत्यां पापनार्ग धुयं भुवि ॥ २१ ॥ सोपितान्निकटीकृत्य स्वहस्तेनैव परपृशे ।। तेषां स्पर्शनमात्रेण माइस्मृतिः समजायत ।। २२॥ ये मुग्दाः पापनायां पवित्रायां शर्करावत्या पालुकामय्यान वि ध्रुवं निधयेन जाताः उत्पमायभूयुः अन्धोपिसवेश्यस्तान मुद्रा न्निकटीकृत्य स्वासननीवास्वहस्तेन पस्पृशे स्पर्शचकार तेषां- मुद्गानां स्पर्शमात्रेण वस्य प्राक् (पूर्व जन्म समुद्भवा) स्मृतिः स्मरणं समजायत सकीय पूर्व जन्मनो ज्ञानमभूत् ।। २२ ॥ जो मूंग उपहार में आये थे वे पवित्र वालुकामयी भूमि से उत्पन्न थे। उस अन्धे ने मूंगों की प्रशंसा सुनने के कारण उन मुंग को अपने समीप मंगाकर निज हाथों से स्पर्श किया और स्पर्श करते ही उसको पूर्व जन्म का ज्ञान होगया ॥ २२ ॥ यालिलिंगसतान मुग्दान जातायां स्वस्मृतौ मुहुः॥ महाप्रेमसमाविष्टोधुन्वन्मूर्धानमात्मनः ॥२३॥ एवं स्वस्मृती जातायां सोन्धोवणिक् महाप्रेमसमाविष्टो मुहुरात्मनोमूर्टानं मस्तकं धुन्नन्कंपयन्तान्मुद्गानालिलिंग हदा स्पर्शचकार ॥ २३॥ पूर्वजन्म की स्मृति हो पर उस अन्धे वणिक् ने अत्यन्त प्रेम से गद्गद् हो अपने मस्तक को बारम्बार कंपता हुवा उन मूंगों फो हृदय से लगा लिया ।। २३ ।।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
एवं विचेष्टमानं तं दृष्ट्वासर्वसमीपगाः॥
महिलत्वंमन्यमाना भासन सर्वे सुविस्मिताः ॥२४॥
एवं विचेष्टमानं विचेश्यन्तं तमन्धं वणिजं दृष्ट्या समीपगा
सर्वे मनुष्याः तं हिलत्वं मन्यमानाः सुविस्मिता पाचर्ययुका
भासन् ॥२४॥
ऐसे आचरण करते हुए उस अंधे वणिक को देख समीप के
रहनेवाले सभी मनुष्य उसे विक्षिप्त समझ आश्चर्य में पड़ गये ॥२४॥
पमच्छुस्त विशांश्रेष्ठं किंत्वया क्रियतेत्विदम् ।।
पाकरं कृपणयत् कणानां स्पर्शनं हृदा ॥ २५ ॥
ते समीपगा जनाः विशांश्रेष्ठ पणिग्बर तमन्धं पप्रच्छुः यत्
कृपणनदरिद्रयदिदम् कणानां मुगानां हृदा स्पर्शनं त्रपाकर
लजास्पदं कर्म त्वया कि क्रियते ॥ २५॥
उन मनुष्यों ने उस वणिग्वर से पूछा कि दरिद्रियों की भांति इन
खुदकों को हृदय से लगाना तुम्हारे सदृश लक्ष्मीपात्रों के लिये
लज्जा की बात है, यह क्या कर रहे हो ॥ २५ ॥
ऐवं तेषां गचः श्रुत्वा प्रहस्य वणिजां पतिः ॥
तान्प्रत्यूचे पचः श्लक्षणं संशयं नाशनिय ॥२६॥
एवं तेषां समीपवर्तिमनुष्याणां वचः बचनं श्रुत्वा वणिजां
पतिस्सोन्धः प्रहस्य विहस्य तेषां संशयं नाशयग्निव सणं
स्निग्धं पचस्तान्प्रत्यूचे उन्नधान् ॥ २६ ॥
इस प्रकार अपने भासपास बैठे हुए मनुष्यों के वचन मुन विहमकर
उस वणिर ने उनके सन्देहों को मानो मिटाता हुआ सुमधुर बचन
घोला ॥२६॥
मुभमन्यात
विर भी मानागा कपिरगाव
श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यम्।
श्रूयतां पचनं मेय अहिलोनास्मिसत्तमाः॥'
यदेशीया इमे मुन्दास्तदेशे जन्म मेऽभवत् ।। २७ ।।
हे सत्तमाः सत्पुरुषाः अद्य मे बचनं युष्माभिः पताम्
पहिलोनासि इमे मुम्दा यद्वेशीयास्तदेशे में मम जन्माऽभवद ॥२७॥
हे मन्तम सज्जन ! मेरी बाल आर लोग सुने, मैं पागल नहीं है
जिस देश के ये मूंग हैं उसी देश में मेरा जन्म हुवा था ॥२७॥
स्वादज्ञोस्म्यहमेतेपां भ्रामं श्रामन्यतोऽशिताः॥
क्षेत्रेपु परकीयेपु सस्यसम्पत्तिशालिए ।। २८॥
एते मुग्दाः सस्य सम्पत्तिशालिपु सस्यस्य सम्पत्त्या
शालन्ते इति सस्यसम्पत्तिशालीनि क्षत्राणि तेषु यह सर
समृद्धिशालिपु परकीयेषु षंत्रपुयतो भ्रामन् भ्रामन् मया मसिगा
भविताः शवोहमतेषां मुग्दाता स्वादशोस्मि ॥२८॥
धान्य की सम्पाल से शोभित गृहस्थों के खेतों में धूमधूम फर मैंग
इन मंगों को साया था इसलिय में इनके स्वादों को जानना है ॥ २८॥
पैर पुष्टिमगर्म सेन मेऽतिप्रियाइमे ॥
पुनर्भयत्नत्यपाय पनि पत्तन्निशम्पनाम् ॥ २६ ॥
येन तुना यमुग्दर पृष्टिमगमम् तेन फारणेन । इस में
मा प्रविधियाः सन्ति मवत्प्रत्यया रिमा मन् पुननि
कथयामि तन्निगम्यताम् ॥ २६॥
विस हेतु इन मूंगोंग में पाता पोरा गया था ये मंग
दान मेनिये ॥ २९॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । सागरोयालुकापूर्णामहानस्ति महीतले ॥ उत्तंकस्याश्रमः पूर्व यवासीद्वै महामुनेः ॥ ३०॥ सबैश्यः स्वनिकटस्थितान्मनुप्यान्यदकथयत् । तदेयस्कन्दोऽ- गस्त्यं कथयति | महीतले पृथ्वीतले घालुकापूर्णोमहान् सागरोस्ति या पूर्व उत्तकस्य महामुनेराश्रमासीत् ।। ३०॥ इस पृथ्वी तल में बालू से भरा हुवा एक बहुत बड़ा सागर था जहाँ पर महामुनि उत्तंक का पाश्रम था ॥ ३० ॥ तशेस्ति महातीर्थ वारुण्यां दिशि सप्तमाः ।। कपिलायतनं नाम महापातकनाशनम् ॥ ३१॥ तईरो तत्पदेशे अत्रदेशशब्दस्तरस्थानवाचः । अर्थात् वरस्थाने महर्परुर्तकस्याप्रमाद्वारएयां वरुणस्यदिशा पारणी तम्या दिशि मत्तमाः सजनाः महापातक नाशनं कपिलायन नाम महातीर्थमासीत् ॥ ३१॥ हे साजन ! उस प्रदेश में उसंक मुनि के भायम से पश्चिम दिशा में महापापों के नारा करनेवाला कपिलायतन नाम का एक महातीर्थ है ।।३.१ भी पिलायनतामा गुणानि भरतोरग मृगामि माहिराम ।। जन्तुवंशीयाः सः शिरःशुल्गारजाया ॥ ३३ ॥ भरपये पने गृगीमिः सहित तृणानि परवाम शि- ध्रुत्योः मस्तके कर्णयोन जन्तुदंशोडया-जन्तुदंगनजात परजायत ॥ ३३ ॥ यन में मुगियों के साथ मृगों को नाता था तब मेरे शिरो कानों में किसी जन्तु के काटने से खाज उत्पदा होगई ॥ ३३॥ तनः कण्डनिवृत्त्यर्थ नियमे न कोटरे।। यारं वारं शिरोघर्ष घनत्ययुद्वितः॥३४॥ ततस्तदनन्तरं कण्वनिकृत्यर्थ विपके घृतकोटरे वृवशाल पशुयुद्धितः अज्ञानात् वारं वारं शिरोघर्ष शिरस्संघर्पयं च ॥३४॥ तिसके बाद वृक्ष की त्रियांक फोटर में अज्ञानवर खान मिटाने के हेतु पारपार मस्तक को रगड़ा ॥ ३४ ॥ ततः शिरोमे संसर्स वफ्रेतवृक्षकोटरे । अत्यर्थ चकितोद्विग्नोवलानिस्सारयन् शिरः ॥ ३५ ॥ श्वासोच्लासकृतायासः सहसा पतितोमुवि ॥ . ततश्शरीमत्यक्षं विलुठन् सनितस्ततः॥३६॥ तस्तदनन्तरं पक्के तत्वृत्तकोटरे तवृक्षीयवशाखायां मे मम शिरः संसक सलमंजातं । तच्छिरोवलानिस्सारयमत्यर्थमतिशयन चकित पाकस्मिकघटनांप्राप्त उद्विपश्च एवं श्वासोच्छासंकृतायासः उद्वेगवशाद श्वासोच्छासश्वसंजातस्तस्मादायासः संजावस्तेन सहसा भुपिपतितः शिरोमे पक्रकोटरे लममेवासीदतइतस्तविलुठन् शरीरमत्यवम् शरीरत्यागमकरवम् ॥ ३५, ३६ ॥ - श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । सतः सर्व विस्मितास्ते तस्पिने संन्यवेदयन् ।। पिता सर्वान् संदिदेश सत्वरं गम्यतामिति ॥४३॥ ततस्तदनन्तरम्विस्मिता पायर्यङ्गतास्ते सर्वे तत्समीपवर्तिनो जनाः तरिपत्रे संन्यवेदयन् पिताच सत्वरं शीघ्र गम्यतामिति सर्वा- न्संदिदेश याज्ञप्तवान् ।। ४३ ।। इसके बाद उस अन्धे वाणिक के निकटवर्ती सभी मनुष्यों ने भाश्चर्य माना और इन सब बातों को उसके पिता से कहा, पिता ने उसी समय सब को उस तीर्थ में आने की प्राज्ञा दी ।। १३॥ पियाघ्रस्तानभिमेत्य पुनरन्धोऽनधीदिदम् ॥ निष्कास्य मच्छिरासद्भिस्तस्मादृष्टक्षस्य कोटरात् ॥४४॥ प्रक्षेप्यं शलिले शुद्ध ततीर्थीये महादभुते ।। ससोयाविरापमागता प्रत्यय इतम् ॥ ४५ ॥ तान् पित्रामप्तान मनुष्यान् विपासनभिप्रेत्यार्थादिमेऽवश्यं गमिप्यन्तीति बुद्धान्धःपुनरप्रयोदयोचत् यत्तस्यवृषस्य कोटग मच्चिरोनिष्काश्य सहिस्साधुभिर्भवद्भिर्महाइसुने तत्ताधाये शुद्ध शलिले जलं प्रधिप्य ततोपदावि तदनागदा यूयं टुतम् शीघं ट्रपथ ॥ ४४, ४५॥ पिता से आज्ञा पाकर उस तीर्थ पर जाने के लिये उपत उन मनुष्यों को जान, उस पन्ध ने फिर कहा कि मेरा शिर जी भवनक उस इस के कोटर में फंसा हुवा है उमे निकाल कर उम महान् पाश्चर्यकारी तीर्थ के गुर जल में गल देना तर जो होगा सा यहाँ माने पर भार लोग शादी देखना ॥ ११, १५ ॥ तमस्ने तयनुनामा इष्टास्तं देगमागमन !! तरनपिपरमामाय पृवं पमत...॥
शाकपिलायतमनार्थमाहाण्या। मेग मंगर पान हाद जो हुया ना कहना है सावधान होकर मुनिय! उस ती म च और गालों ने मेरे मृतशरीर में भजन किया ॥ १९॥ जल प्रवाह हुसैः मादकाले घनाकुले । मक्षिसानितदधीनि कापिलीये सरोवर ।। ४०॥ घनाकुले सर्वतोमेधाविष्टे प्रामुकाले वर्पती पहुलैजल प्रया है स्वदस्थीनि मम मृतदेहस्य कापिलाय सरोवरे प्रतिमानि ॥ ४० ॥ सर्वतो मेघाच्छन्न वकाल में जब अति वेग से जल का प्रवाह चला तो मेरे शरीर की हड्डियां बहकर कपिल सरोवर में पड़ गई ॥ १० ॥ तत्तीर्थवरमाहात्म्यानातोहं यणिजांकुले ॥ धनीनां पुण्यकतणां महाभोगभुजांभुधि ।। ४१॥ उत्तीर्धवरमाहात्म्यादई भुवि महामोगधुनों पुण्यकर्तृया धनीनां वणिनां कुले जात उत्पन्नः ।। ४१॥ उस उत्तम तीर्थ के माहात्म्य से इस पृथ्वी में महाभोगशाली पुण्यकर्मा और धनी वैश्य के कुल में मेरा जन्म हुवा ॥४१॥ एतत्सर्व समाख्यातं भवतां प्रीतयेऽनघाः ॥ मदुक्तंचेन्नमन्यध्वं गत्वा पश्यथ सत्वरम् ॥४२॥ हे अनधाः पुण्यजनाः एतरसर्व भवतां प्रीतये मया समा- ख्यात चेन्मदुक्तं न मन्यध्वं तदा सत्वरं गत्वा पश्यथ ।। ४२।। ऐ पुण्यशाली निकटवर्चियो ! यह कथा आपलोगों की प्रसनता और प्रतीति के लिये मैं ने कही है यदि मेरे कहने पर विश्वास नहीं है तो इसी समय जाकर देख लीजिये कि मेरा शिर अस्तफ उस वृक्षकोटर में पड़ा है ।। १२ ।
श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यम् । तनीधीय महाजले प्रविप्तमात्रे शिरसित्वंधोगृहे स्वतः सपमेव पयोजः कमलं तस्य पत्रं तद्वदिषी यस्य स कमलसदृश नेत्रः सधस्तरकालंजातः ॥४८॥ उस तीर्थ के महोत्तम जल में उसका मस्तक पड़ते ही यहां अपने घर पर उस अन्धे के दोनों नेत्र अपनेआप उसी समय कमल के पत्रों के सहरा स्वच्छ होगए ॥ ४६॥ तत्र तत्पश्यतां नृणां रोमाचं समजायत ।। वैश्योनिपेव्य तत्तीर्थ देहं त्यक्त्वादिवं ययौ ॥ ५० ॥ तत्र तत्पश्यतां नृणां मनुष्याणां रोमांचं समजायत । अर्थात्ती- र्थभक्त्या सर्वे विहलायभूवुरितिभायः अन्धस्यपिता स वैश्य- स्तदनन्तरं तत्तीर्थ निपव्य ततीर्थे वासं कृत्वा तत्र देहं त्यका दिवं स्वर्ग ययौ ॥ ५० ॥ इस महान आश्चर्यकारी दृश्य को देख सबको समांच होगया और उस अन्धे का पिता उसी समय गृह त्याग कर कपिल तीर्थ का याम करने चला गया । वहीं कुछ दिन तीर्थ सेवन पर स्वर्गधाम को गया ॥५०॥ एताइनिर्मलं तीर्थ सद्यः प्रत्ययकारकम् ।। महीछे महाभाग! किश्चिदेव भविष्यति ॥२१॥ हे महाभाग! महीपृष्ठे पृथिव्यां सबः प्रत्यप कारकम् एनाइनिर्मलं तीर्थ किनिदेव भविष्यति ।। ५१॥ हे महाभाग ! इस पृथ्वी में तत्काल विश्वास करानेवाला ऐमा निर्मल तीर्थ चिरलाही कोई होगा ।। ५१ ॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
वतस्तदनन्तरं तदनुज्ञातास्तपित्रानुज्ञातास्वे हृष्टाः प्रनमः
मानसास्तं देशं प्रागमन तत्तीर्थवरमासाद्य प्राप्त्वा धृवं परं
अलोकयन् ।। ४६ ।।
तदनन्तर उसके पिता की आज्ञा पा प्रसन्न होकर वे मनुष्य
उस देश में गये और उस तीर्थ के प्रत्येक वृक्ष में उस का सिर
ढूंढने लगे।॥ १६॥
कस्मिाँश्चदृचहरे मार्गयशिस्त्वरान्वितैः ।।
दृष्टं मागं शिरः शुष्कं सशृङ्गं हष्टमानसाः॥४॥
गृहीत्वातच्छिरशीघं तस्य वैश्यस्य वाक्यतः॥
माक्षिपन्तीशलिल भिवेदिति विस्मिताः ॥ ८ ॥
स्वरान्वितर्दुनंदुनं मार्गनिरन्पपद्भिस्तमः करिमधि
वाहरे वृक्षकाटेर सशृङ्गं शुष्कं मागं शिरोमगमस्त स्टम् ।
एटमानसास्ते तस्य पश्यस्य यायतस्तचनप्रमाणान्ट्रीय
तच्छिरोगृहीत्या शिलिले प्रातिपत् ततः किंमदित्यक्तांक-
नामिस्मिता पभूयः॥४७, ४ ।।
अनिता से मृग मानक कोने हुए उन मनुष्यों ने किमान
कोपर (पोन) में नमामा मृग का रिमा महिल देखा भार हात
तो उसे नित उम नजन में हर दिया। इसके बाद क्या
संता है पर देखने के निय, निमित होगये ॥ १७, ४० ।
सिरमिधिसमानुततीपमहानले ।।
अंधः पनपनादः गोजागी गई स्वतः ॥१॥
श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यम् । ततीर्थाय महाजले प्रदिप्तमाये शिरसित्वंधोगृहे स्वतः स्वयमेव पयोजः कमलं तस्य पत्रं तदक्षिणी यस्य स कमलसदृश नेत्रः सद्यस्तरकालंजातः ॥४८॥ उस तीर्थ के महोत्तम जल में उसका मस्तक पड़ते ही यहां अपने घर पर उस अन्धे के दोनों नेत्र अपनेआप उसी समय कमल के पत्रों के सदृश स्वच्छ होगए ॥ १६ ॥ तत्र तत्पश्यतां नृणां रोमाचं समजायत । वैश्योनिपव्य तत्तीर्थ देहं त्यक्त्वादिवं ययौ ॥ ५० ॥ तत्र तत्पश्यतां नृणां मनुष्याणां रोमांचं समजायत । अर्थात्ती- र्थभक्त्या सर्वे विडलाबभूवुरितिभावः अन्धस्यपिता स पैश्य- स्तदनन्तरं तत्तीर्थ निपव्य ततीर्थे वासं कृत्वा तत्र देहं त्यक्ता दिवं स्वर्ग ययौ ।। ५०॥ इस महान आश्चर्यकारी दृश्य को देख सबको रामांच होगया और उस अन्धे का पिता उसी समय गृह त्याग कर कपिल तीर्थ का वास करने चला गया। वहीं कुछ दिन तीर्थ सेवन कर स्वर्गधाम फो गया ॥५०॥ एतादृनिर्मलं तीर्थ सद्यः प्रत्ययकारकम् ।। महीपृष्ठे महाभाग! किश्चिदेय भविष्यति ॥५१॥ है महाभाग! महीष्ठ पृथिव्यां सयः प्रत्यर कारकम् एनाहनिर्मलं तीर्थ किश्चिदेव भविष्यति ॥ ५१॥ हे महाभाग ! इस पृथ्वी में तत्काल विश्वास करानेवाला ऐमा निर्मल तीर्थ बिरलाही कोई होगा ।। ५१ ।।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। इतिहासाममं श्रुत्वा तापमाहात्म्पसूचकम् ।। नरश्शुद्धेन मनसा ज्ञानचक्षुरवामुपांत् ॥ ५२ ।। तीर्थमाहात्म्यसूचकमिममितिहास शुद्धन मनमा श्रुवा नरोज्ञानचनुरयाप्नुयात्प्राप्मोतीत्यर्थः ।। ५२ ।। इस तीर्थ माहात्म-सूचक इतिहास को शुद्ध मन से प्रवण करने से मनुष्यों की ज्ञान दृष्टि होती है ।। ५२॥ इति धीरकन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्वादे कपिलायतनमाहात्म्ये तीर्थवर्णन नाम पष्ठोऽध्यायः।
प्रथसप्तमाध्यायकथारम्भः। (सूत उवाच) एवमुक्त्या पुनः प्राह स्कन्दः कुंभोड्यंतदा॥ शृणु तीर्शयमाहात्म्यं मुने किंचिन्मयोदितम् ॥ १ ॥ (म्पयार्थः) सूतजी शौनकादि ऋपियों से बोले कि इस प्रकार तीर्थ का हात्म्य कहकर कन्दजी अगस्त्य से बोले कि हे मुनि ! मैं पुनः स तीर्थ का माहात्म्य कुछ कहता हूं, मुनो ॥ १ ॥ पुरा कदाचिदेतस्मिस्तीर्थे स्नानं करिष्यताम् ।। कार्तिकमान्तघस्रेषु वर्षयस्रवरेपुवै ॥२॥ समाजोऽभून्मनुष्याणां नाना देशनिवासिनाम् ।। तस्मिन्समाजे पयस्समायाता दिदृक्षयः ॥ ३ ॥ कौटुम्मिका भिक्षवश्व साधयोऽसाधयोजनाः ।।
श्राकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । नरकोलाहलाकीणं तस्मिन्काले तपोधन ॥४॥ इतस्नतीभ्रमन्तीहनराः कौतुकमाश्रिताः॥ (स्पष्टार्थम्) हे तपोधन ! इस प्रकार कई देशों से आयेहुए अनेक मनुष्यों के कोलाहल से परिपूरित उस समाज में केवल समाजदर्शक जितने लोग थे वे इधर उधर घूम रहे थे । नाना पण्याः पदार्थास्तत्समाजे समुपागताः॥५॥ वस्त्राणि वृषभा उष्ट्राः क्रयविक्रयकारणात् ॥ क्रेतारः केचिदायता विक्रेतारश्च केचन ॥ ६॥ (स्पष्टार्थम्) उस मेले में कई प्रकार के पदार्थ, कपड़े, पैल, ऊंट बेचने के निमित्त लाये गये थे और कई खरीदने और बेचनेवाले গাং एवं सम्मिलिते लोके कोलाहलसमाकुले ॥ दर्शन्तीह पण्यानि विक्रेतारो नरान् नरान् ॥७॥ (स्पष्टम् ) इस प्रकार कोलाहलपूर्ण जन समाज में बेचनेवाले अपने २ विक्रेयपदार्थ प्रत्येक ग्राहक को दिखाते और पसन्द कराते थे ॥७॥ सप्रेफः करमः कश्चिदुर्दान्तः पर्वतोपमः ॥ गुरुगारयंकुर्वन् सर्यमाणि भयंकरः॥८॥ (स्पष्टम् ) उस मेले में एक बारने के लिये पाया था जो महादुर्दान्त और सबमारियों के दमन में महामयंकर एवं दो जोर से गर्जना हुवा था netf
श्रीकपिलायतनतथिमाहात्म्यम् ।
तत्रैकदा स करभः तृभिः परिचारितः ।।
क्रेतारः सम्पग्युस्ते सांस्तानुष्ट्रनायकान् ॥ ६ ॥
(स्पष्टार्थम्)
उस मेले में जब एक बार उस ऊंट के चारों तरफ उसको
खरीदनेवाले माहक जमा हुए तो उन्होंने उसके मालिक से कहा ॥२॥
वयमेनं ग्रहियामो यदि यूयं प्रदास्यथ ।।
परन्तु सकृदस्मभ्यं परिभ्राम्प प्रर्दश्यताम् ॥ १० ॥
(स्पष्टम्)
यदि तुम लोग इस ऊंट को बेंचो तो हम लोग लेने को तैयार हैं
परन्तु एक बार इस पर चढ़कर और थोड़ा चलाकर हम लोगों को
दिखादो ॥१०॥
एवं तद्वचनं श्रुत्वा तन्न सामाजिको जनः ।
न को प्येनं समारोढुं मनश्च भयान्धितः ।।११।।
(स्पष्टार्थः)
इस प्रकार प्राहकों की बात सुनकर उस समाज के किसी मनुष्य
ने भी भय के वश उस ऊंट पर चढ़ना स्वीकार नहीं किया ॥११॥
फस्य चिद्वाहु जातस्य तत्रासीगोलकस्थितः॥
स आरोमनश्चमे तमुष्टं मदगर्वितः॥ १२ ॥
(स्पष्टम् )
उस समाज में एक किसी राजपूत का गोलकपुत्र था उसने
जाति के अभिमान से मदगर्षित हो उस पाना स्वीकार
करलिया ॥ १२॥
धौगिनायनानगाहा! भागत्य स्वयमूगवान ममाहय क्रमेलकं॥ भहमेनं समारोपर पदि यूपं यस्य ॥१३॥ (स्पष्टार्थम् ) चा मालक समाज से निस्ल उन माहकों के सन्मुस भी फहने लगा कि यदि गालोग कहें तो में हम ऊंट पर चहूंगा ।। १३ ततः संवैग्नुशालः समारोह यथेच्छया ।। कुर्यस्मत्करणीयं त्वं मपीणस्युप्द्ररोहणे ।।१४।। (सप्टार्य: तर सब लोगों ने कहा कि खुशी से चदो, तुम ऊंट पर सब करने में सुचतुर हो, चदना तो हम लोग खरीददारों का कर्तव्य परन्तु यह हमारा काम तुम्ही करदो ॥१४॥ सावधानतया स्थैयमुष्ट्रोस्ति मदगर्वितः। निर्दीपास्मोवयं तन स्वेच्छयारोदुमिच्छसि ।। १५ ।। (स्पष्टार्थोयम् ) संभाल कर इस ऊंट पर भैठना यह ऊंट मदवित. है ह लोगों को दोष न देना तुम अपनी इच्छा से चढ़ना चाहते हो। १५ भवद्भिव चिन्त्यं तन्मद्गृहे तादृशोष्ट्रकाः ।। मया दृष्टाः समारूढाः कोयं स्यादुष्ट्रशावकः ॥१६॥ (पष्टम् ) तुम लोग इसकी कुछ भी चिन्ता न करो मेरे घर ऐसे ऐसे ऊ बहुत हैं जिनको मैंने देखा है और सवारी भी की है यह ऊंट का बच्चा क्या चीज है ॥ १५ ॥ .
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १०५ एवं सस्मयमागत्य समारोढुं तमुष्ट्रकम् ।। सँस्थाप्याकर्पयन् पृष्ठ भाससाद स सत्वरः ॥१७॥ (स्पष्टाथी) ऐसा कह और थोड़ा हंसता हुआ वह गोलक उस ऊंट के पास आया और चढ़ने के लिये ऊंट को खींच कर बैठाया तथा अति शीघ्रता से उसकी पीठ पर बैठ गया ॥ १७ ॥ विनोदशीपबंधं युवाजातिमदोद्वतः ।। सकौतुकैः सर्वजनदृष्ट श्रारुढ़एवमः ॥ १८ ॥ सो युवा जातिमदोद्धतः वक्रोणीपवंधं विभ्रन् सकौतुक स्मर्वजन रारूढ़ एव दृष्टः १८॥ जाति के मद से उद्धत बद्ध युवा टेदी पगड़ी को धारण किये हुये जब ऊंट पर बैठ गया तब सब लोग फौतुक के साथ देखने लगे ॥१८ यनुत्यापित पयोष्ट्रो घायने ध्यपलोफिनः॥ हप्वालपुत्वमुष्ट्रस्य तददेवोष्ट्रिय पुनः ॥१६॥ सर्व सामाजिका लाफा पिस्मपं प्रतिपदिर ।। मनुस्थापितएरोप्दीधारने परलोकिनः उपस्यलपुत्वं हिरकारित्वं तददयोष्ट्रिणापि दिधारोहरदसवां रदगा सर्व सामाजिक लोका समानस्थाजना विस्मयमाश्रय प्रतिपदिर प्रायः॥ भी को उठाया भी नहीं गया कि यह ऊंट दादा दिखने लगा, इस साह रागिन सपा उंट पर पाने की घरता देखार मले के सभी मनुष्य पाच भागय ।।
पावापान: विटावा मिनिमिताननः ॥ २० ॥
गांसामिगंममरमिरगगनः॥
निहारा भार प्रदरम्मुहुः ॥२१॥
प्रचशामानावनात्यागृत्पात्यनारायण ॥
पादालाना गुरुपादनमा सिटमादः उपिनाना-
भपादः सिमिदुन्नमिताननः भागासास्तरियापारा
मुरिगलरहिमं गगन गगन्धितः पाणिप्रहागभ्यां दी
निगन गाउपन् पशासाप्रमोदन पभालं मरन् माइन्या-
प्रत्यापाययत् ॥
उन्नागहण कला में निपुग युगा ने अपने पैरों या न्यास उठन
रीति से किया था, अलग २ र रससं था, एवं बुर कार के तरफ
गुख उठाकर टी ऊंट के मातक की मार देस रहा था और पाने पैर की
एड़ीयों से ऊंट के पेट में मारता हुवा एवं वृक्ष की माला से पाये की तरह
ऊंट फो मारता हुवा नफेल को खींच २ कर अति वेग से दौड़ा रहा था।
त उष्ट्रं स्वयशी कर्तुमनश्चक्र मदोद्धतः॥२२॥
तुदंति करभोप्यन पिपातयिपुरेवसः॥
स मदोद्धतीयुवा उष्; स्वयशीकतुमनश्चक । पिपातयिपुरेष
सः करभोप्यनं तुदंति ॥
उस मदोन्मत युवा ने ऊंट को अपने वश में करने का ठानलिया
और यह ऊंट भी उसको अपनी पीठ से गिराने की इच्छा से
उच्छालने लगा।
प्रशशंसुः केचनो; शशंसुः केचनोष्ट्रिणम् ॥ २३ ॥
'अहो ! एप महानुष्ट्री सम्यञ्चालयतोद्ययम् ॥
दृश्यने करभः फरः किंकर पातयिष्यति ॥ २४॥
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । केचन उष्ट्र प्रशशंसुः कंचन उष्ट्रिणमुप्दवाहं शशंसुः यो । इति आश्चर्ये । एपमहान् उष्ट्री उष्ट्रचालकः । अयं सम्यक् उ, पासपने मयं फरः करमः स्वाधीनं किंकरं युवानं मातयिष्यति ।। २३, २४ ॥ कोई ऊंट की प्रशंसा करते थे कोई ऊंट के सवार की प्रशंसा करते थे और कहते थे कि अहा ! यह महाचतुर उष्ट्रारोही है अच्छी तरह ऊंट को चला रहा है । दीख पड़ता है कि यह क्रूर करम उस बेचारे को कहीं अवश्य पटकदेगा ॥ २३, २४ ।। शृण्वन्नेयं स्वकर्णाभ्यामुष्ट्रारोहणपाध्वं ॥ पुनः संचोदयामास समुष्ट्ररोषयन् मदात् ॥ २५ ॥ एवं स्वर्णाभ्यामुष्ट्रारोहणपाट पाण्डित्यं जनैः कथ्यमानं एषन् स युवा मदात् रोपयन् सुद्धयन्तमुष्दम्पुनः संचोदमास गरितवान् ॥ २५॥ उस युवा ने इस तरह से अपनी प्रशंसा सुनते हुवे गवं ऊंट को उत्तेजित कर यति शीघ्र चलने को प्रेरित किया ॥ २५ ॥ उप्ट्रोपि रोपमापन्नोचिकृनां गतिमास्थितः ।। चतुर्भिश्वररुचैरत्पफाल पुनः पुनः ॥ २६॥ उष्ट्रोपि उदिणः कपायातेन पाणिपातेन च रांपमापनो विकृतां कुटिलांगति गमनमस्थितः चतुर्मिधरणः पुनः पुनारं पारमुचरुत्पफाल || २६॥ ऊंट भी डालियों के आपात और पैरों की टोकर से क्रुद्ध होकर अपने चारों पैर उठा २ कर जोर से कूदने लगा ॥२६॥ उस
१०८
थाकापलायतननायमाहार
दर्द को न जाननेवाले हाम्यरम के प्रेमी केवल तमागा देगाने
स उष्ट्रयलसंक्षिस स्यपृष्ठासनसंस्थितिः।।
च्युतरस्मिप्रतोदोऽभूत् भयश्वेतीकृताननः ॥ २७ ॥
उष्ट्रयलसक्षिप्तसपृष्ठासनसँस्थितिः उष्ट्रवलेन संक्षिमा
उत्तिप्ता स्वपृष्ठामनस्य संस्थितिः संस्थानं यस्य स उष्ट्रवलसचि-
सस्वपृष्ठासनसँस्थितिः करभवलोरिक्षास्वपृष्ठास्तरणः स युवा
भयश्वेतीकृताननः भयेन खेतीकृतमाननं यस्य स व्युतरस्मि
प्रतोदः रस्मिय प्रतोदय तौ च्युता यस्य स तयाभूतोऽभूत् ॥ २७ ॥
ऊंट के वेग से पीठ का आसन दीला होगया, युवक के हाथ
से मोहरी गिरगई और उसका मुंह भय के मारे सफेद होगया ॥२७
उष्ट्रोपिदुष्टोरष्टस्सन् एनं द्वित्रकमान्तरे ॥
तुदुष्टं पातयामास पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥२८॥
दुष्टउप्ट्रोपिरुष्टः क्रुद्धस्मन् पूर्ववैरं जन्मान्तरीयरमनुस्मरन्
सुदुष्टं तं युवानं द्विवक्रमान्तरद्विवपाविप पातयामास ॥२॥
उस दुष्ट ऊंट ने क्रोधित होकर पहले के पैर को याद करते हुरे
दो तीन ही उच्चाल में उस दुष्ट युवा को गिरा दिया ॥ २८ ॥
एवं तस्मिन्निपतिते कौतुकाकुलचेतसः ।।
परपीडानभिज्ञानाः सर्वे संजहसुर्मुदा ॥२६ ।।
एवं तस्मिन् युनि निपतितसति परपीदानभिज्ञाना परस्प
स्वतरस्य पीडा तस्सामनभिज्ञानं येषां ते अननुभूतपरप्ययाः कातु
फेन यालानि चेतांसि पान्ट तथानाः समुदाहण संजहगुः ।।
इस तरह ऊंट की पीट से उम युग के गिरजानेपर दूसरों के
सब बड़े गोद से हमने लगे ॥ २६॥
श्रीकपिलायतनतार्थमाहात्म्यम् ।
तं तदा विकली भूतं शकलीकृतकीकसं ।।
उधृत्य वेष्टयामासुस्तदीया येच केचन ॥ ३०॥
तदा तस्मिन्काले विकलीभूतं व्याकुलीभूतं मर्म व्यथये ति
तथा शकलीकृतकीकसं सएहशोजाताशिरसं तं युवानं तदीयास्तत्र
पंच केचन आसँस्ते उदृत्योत्थाप्य वेष्टयागासुः वखणतिशेपः ।।
जब वह युवा गिरकर मम वेदना से अचेत होगया तथा उसके
शिर के टुकड़े टुकड़े होगये तब उसके आत्मीय जो लोग वहां थे
उन्होंने उसको उठाकर कपड़े में लपेट लिया ॥ ३० ॥
वाच्यमानापिनवते मूलांतुमहतीगतः॥
स क्षणप्राप्य सुप्राणानुत्ससर्जायुपाक्षये ॥ ३१ ॥
महतीमकथनीयाम्मूोङ्गतः स युपायाच्यमानोपि किंचि-
स्वव्यथां कथयेत्युक्तोपि नघूते नायदत् क्षणप्राप्य पणमात्रंस्थित्या
प्रापःक्षये भायुपोहासे मुपायानुत्ससर्ज तत्याज |॥ ३१ ॥
महामी को भाप्त वह गुया बुलाने से भी नहीं बोलता था,
क्षणभर जाकर घायु के नष्ट होजाने पर अपने प्राणों को त्यागदिया ॥३१॥
ऋरा यमभटास्तम मृतं तं नेतुमागताः ।।
पध्या स्वनागपाचैस्तु सद्यः संपमनी ययुः ॥३२॥
रा निर्दयायमभटायमदूता स्तत्र तं मृतं मृतशरीरं नेतु
मागताः पुनः सनागपाशेरविशरिग्जुरुपस्तं मृत्रमशरीर
पापा सस्तकालं संयमनी यमपुरी ययुः ॥ ३२॥
ये निर्दयी यमदूत उसके मृत शरीर को अपनी नागफम में
पाधि कर यमपुरी में लेगये ॥ ३२॥
-- ---- -------- हे प्रभो ! भुषि मर्त्यलोके श्यनेन जन्मारम्य कदापि सत्कर्म 2. मान गाया नियंगामामुगदाभिनन्दन । परस्यामाप्दया गिगुप्तमपदिया ॥ ३३ ॥ ग गगदना गदा गाना गा यमग्यांगना रविनन्दनं गमगरियामागुः पातTARIET ताप्दा चित्रगुतन पांदगन् ।॥३३॥ उन यमदनी ने 3ग मा को यमगर के सम्मुत उपस्थित किया यमगन में उसके विषय में नित्रगुम में पता ॥ ३३ ॥ परयास्य पुण्यं पापानि फिगनेन नं मुधि । शिप्रगुप्तस्तस्य लैंग्वं दृष्ट्या सम्याग्विचारतः ॥ ३४॥ . यमं निवेदयामास तस्यकर्म शुभाशुभम् ।। हे चित्रगुप्त ! अस्य पुण्यं पापानिच स्वपश्य भनेन भुविकि कृतम् । चित्र गुप्तस्तस्य लेख विचारतोविचारपूर्वकं सम्यग्दृष्ट्या तस्य शुभाशुभं कर्म यमं निवेदयामास ।। यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके पुण्य और पापों को देखो कि इसने मर्त्यलोक में क्या २ किया है ! चित्रगुम ने उसकी दिनचर्या विचारपूर्वक देखी और उसके शुभाशुभ कर्मों को यमराज से निवेदन किया। कृतं नानेन सत्कर्म जन्मारभ्य प्रभो भुवि ॥ ३५॥ पापमेवकृतंनूनं सर्वदा मरणावधि । नकृतं नूनं निययेन भरणावधि पापमेव कृतम् ।। हे प्रभु ! इसने मर्त्यलोकमें जाकर जन्म से मरण तक कभी सुकृत किया, मरण पर्यन्त सर्वदा पाप ही पाप किये हैं ।।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहाल्यम् । १११ एकंतु कृतमेतस्प मनः संशयतीयमे ॥ ३६॥ पस्मादेय महापुण्यपांना गाग्रफितः ।। कपिणक्षेत्रजेनासु मृत्युमाप महेश्वर ॥ ३७॥ हे महेश्वर ! एतस्यतु एकं कृतं कायं मे मनः संशयति मन्द- इपयन्येय पस्मान् कारणत् कपिलनेनजेन कपिलक्षेत्रमभूतेन महापुण्यपांशुना अनिपवितरजमा गात्रफितः गुंफितशरीरः पाशु शो मृत्युमाप ॥ ३६, ३७ ।। हे महेश्वर ! यह फरिलक्षेत्र की धून से धूमरित होकर मृत्यु को मात्र हुआ है यही इसका एक कृत्य मेरे मन में सन्देहयन् पनीन होता है ।। ३६, ३७॥ हनि पाक्यं यमः श्रुत्वा कंपयानोनिशं शिरः॥ मोयाच पधनं सर्यान्गालोयं नात्र संशयः ॥ ३८॥ यमोयमराज इति चित्रगुप्त पापयं श्रुत्या निज गिरः कंपयानः माजमानापन्धनेना मुमो नात्र संशय इति पाग्यं सर्वान्दः सान्नीशप ॥ ३८॥ त्रिगुम का यह याश्य गुनकर भाना मानक दिलाते हुए समंदर में पाने सभी पूना से कहा कि यह गुप्त हो गया भरने का जन्म यि हुए पारों से संत हो गया सन्द नही भोलाः भषगां हस्तस्पायगु विगतोगुना ।। नापं मारपिगुंशोभापदापन ॥ ६ ॥ (परम्) सायपरममा in mmsीमार' 1 श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तथा रजांसि त्रीण्येव पवित्राणीह भूतले ॥ एकं नजरजः पुण्पं चित्रकूटरजस्तथा ॥ ४०॥ कपिलालय तद्वत्पवित्रं सर्वमुक्तिदम् ॥ इह भूतले त्रीण्येवरजांसि तथापवित्राणि एकं प्रजरमः पुण्यं तथा चित्रकूटरजः पवित्रं तद्वत्सर्वमुक्किदकपिलालयजरजः पवित्रमस्ति ॥ इस पृथ्वी में तीन ही रज पवित्र हैं एक तो मरज, दूमरा चित्रकूट का रज और तीसरा सब को मुक्ति देनेवाला कपिलालय का रज ।। तस्मात्पुण्यतरेदेशे पुरं पुण्यकुलतथा ॥४१॥ पुण्ये गृहे पुण्यवति जन्मतस्यप्रदीयताम् ।। (स्पष्टम्) इस कारण से पवित्र देश, पवित्र ग्राम, पवित्र कुल और पवित्र घर में इसका जन्म दो॥ एवमुक्ते यमेनाशु सदासौगतपातकः ॥ ४२ ॥ विदर्भदेशेपूत्पन्नः तुहिने नगरे परे । तथा पुण्ययताम्वंशे वणिजां पुण्यपूजिते ॥४३॥ महाशीलगृहेजातः सुशीलागर्भसंभवः ।। धारशील इतिख्यातोऽभवत् सार्धाभिधानयान् ॥४४॥ माशु शीनं यमनमुरेमति सदा सर्वस्मिन्काले गनपातको विगत पापोऽमा विदर्मदेशेषु वरे उत्तम इपिटने नगर वया पृएपवता परिमाणां परिजा वरपना पुएपजिन मारित्र शे महागीलनाम्नावरपम्प गूगशीलापा स्तपन्या गर्भमा पारगीच निष्प्यात अमिदनामा मार्थाभिधान गन् नामानुपः गए उत्पाऽभवत् ।। ४३, ४४ ।।
जरवह चारुशील यौवनावस्था को प्राप्तहुवा तो बडानामी श्रीर दानाहुया॥ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । यमराज के कहने पर उसी समय निष्पाप होकर वह मृत युवा विदर्भ देश के पवित्र कुण्डिन नगर में और पवित्र वैश्य वंश में महाशील नामक वैश्य के गृह में उसकी स्त्री सुशीला के गर्भ से उत्पन्न हुआ जिनका नाम चारुशाल रखागया और नामानुरूप उसके गुण हुए ।। दगवान दानशीलश्व सुन्दरोवृद्धसेवकः ।। पिता विवाहयामास सारशीलांविशःसुताम् ॥ ४५ ॥ स चारुशीलनामा वैश्यसुतोदयायान् दानशीलः उदार प्रकृ. तिकः सुन्दरोरूपसम्पत्तिसम्पन्नोवृद्धसेयकश्वसंजातः तस्य पिता सारशीला सारशीलानाम्नीम्मिशः सुतां वणिकन्यां विवाहया वह चारुशील नाम का वैश्यपुत्र दयावान दानशील सुन्दर और वृद्धों की सेवा करने वाला हुवा। उसके पिता ने उसका विवाह सारशीला नाम की एक वैश्य कन्या से करदिया ।। सापि पतिव्रताह्यासीत्तस्य पुण्यप्रभावनः ॥ यदा सौ यौवनावस्थः संजातो भुधि भूरिदः ।। ४६ ।। (स्पष्टम् ) वह भी सारशीला अपने पति के पुण्य प्रभाव से पतिव्रता हुई। मास ॥४५॥ विदर्भदेशज विक्रयायंग तदास्य बुद्धिरुत्पन्ना धनस्योत्पादने मुने ।। चस्तु क्रीत्वा स चणिजां पतिः॥४७॥ -----Tra."
११४ श्रीकपिलायतगनीमाहास्यम्। (सष्टम्) तर धनोपार्जन करने की उसकी इच्छा हुई इसलिये विदर्भ देश में जो व्यापारिक वस्तुएँ भी उन को सरीद पुष्पल धन ग्राथ में ले पेचने के लिये यह सिन्धुदेश में गया । तद्वस्तु तत्र विक्रीय तज्जं वस्तु गृहीतवान् ॥४॥ तद्वस्तुनः स्वदेशेषु विक्रय कृतवान पुनः ।। एवं गतागतस्तेन संलब्ध बहुलं धनम् ।। ४६ ।। तद्विदर्भदेशजम्बस्तु तत्र सिन्धुदेशे विक्रीय प्राप्तमूल्येन निजधनेनच तजं सिन्धुदेशज वस्तु गृहीतवान् तत्पुनः स्वदेश आगत्य विक्रीतवान् एवं गतागापारकर्मणा गमनागमनस्तेन चणिजा बहुलं धनं संलब्धम् ॥ ४८, ४६॥ सिन्धदेश में अपने देश की व्यापारिक वस्तुओं को बनकर जो धन प्राप्त किया उससे, और अपने साथ में जो धन लेगया था उससे सिन्धुदेश की व्यापारिक वस्तुओं को जिनकी अपने देश में आवश्यक्ता थी संग्रह किया और उनको अपने देश में आकर चां एवं पारम्बार आने जाने और व्यापार करने से अल काल में ही प्रचुर धन का उपार्जन कर लिया ॥ ४८, ४९ ॥ गच्छतागच्छना तेन पूर्वसँस्कार योगतः॥ कपिलायतने पुण्ये निवासाः सततंकृताः॥५०॥ एवं गच्छतागन्छना तेन व्यापारिणा स्वकीय पूर्वसंस्कार योगतः सततं प्रति यात्रायां पुण्ये पविने कपिलायतने कपिलचो मार्गविश्रान्तियः कृताः।।
थीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । इस प्रकार व्यापार के काम में आते जाते अपने पूर्वजन्म के कार से प्रत्येक यात्रा में यह पवित्र कपिल मुनि के आश्रम में ही वास रिया करता था॥१०॥ तन स्नातंचदरतंच सदानिवसतासता॥ प्रदायुक्तेनमनसा जानं पुण्यमन्तकं ।। ५१ ॥ तत्र कपिलायतने सदा निवसता यासं कृतवता सता तेन व्यापारिणा श्रद्धायुनेन मनसा शुद्धचेतसा स्नानंकृतं दत्तं नंचकृतं देनानन्तकमसंख्याकं पुण्यं जातम् ।। ५१॥ उस कपिलायतन तीर्थ सदा निवास करताहुया वह व्यापारी हा के साथ स्नान और दान भी किया करता था जिसका अनन्त उश्य उसको प्राप्त हुआ ॥ ५१ ॥ गच्छतोवागच्छनोवा तीर्थ निघसतः कदा ।। युतस्य भ्रातृभिः पुत्रैर्विद्विद्वरैस्तथा ॥ ५२ ।। शीतवातनिमित्तेन रोगोजातः कलेवरे ।। दिवसे दिवसे तस्य रोगः समधिकोऽभवत् ॥ ५३ ॥ सरयस्तु पूर्वसंस्कारत इहजन्मनिच सदा कपिलायतन निवासाचातिसंस्कारवान्विचारवांव बभूवा तः परिणतेवगसि व्यापारे स्वपुरोहितपुत्रभावगैस्तथान्यविवरैस्सहव्यापारार्थ परदेश गमनागमने प्रवृत्तोऽभवद् एवं परिवारातस्य तस्यपणिजः गच्छत थागच्छतो वा कदा कस्मिन्नपिकाले कपिलायतने तीर्थे निवसतः निवासंकुर्वतस्तस्प कलेवरे शीतवातानिमित्तेन हेतुना रोगसंजातः तस्य ५... समधिकोऽभवत् ।। ५२, ५३ ।।
श्रीकपिलायननतीमाहात्म्यम् । वह वैश्य पूर्वजन्म के संस्कार स तथा इस जन्म में व्यापार है, अर्ध पारयार विदेश जाने थाने के समय उस पवित्रतीय में निवा करने से अत्यन्त उज्वल संस्कार और विचार का होगया था इसलिये अपनी वृद्धावस्था में सदा के मांति केवल दस पांच नीर और यन्तुरक्षक तथा क्रय-विक्रय का हिसाब-किताब रखनवानी फे साथ अब नहीं पाता जाता था किन्तु इस अवस्था में पावरस । कीय मृत्यों के अतिरिक्त अपने गुरु पुरोहित स्त्री पुत्र माई इत्यादि सब : कुटुम्बियों के साथ व्यापार करने के लिये श्राने जाने लगा। एवं सहा. आने और जाने तथा उस तीर्थ में निवास करने की दशा में किसी समय शर्दी और वायु के विकार से उसके शरीर में रोग उसन्न हुआ और उसकी निवृत्ति के अनेक प्रयल करने पर भी रोग दिन दिन चढ़ता ही गया ।। ५२, ५३॥ ततः संचित्य मनसि विवेकी स यणिपतिः॥ चमे यहनि दानानि शास्त्रक्तानि विधानतः ॥ ५४ !! • (स्पटम्) तदनन्तर उस विचारवान् यणिपति ने अपनी भावी दशा अपने मन में विचार कर अपने साथ के परिडतों के शासक्त उपदेशानुसार अनेक दान पुण्य उस तीर्थ में किये ॥ ५४॥ पूर्व तामनुलां कृत्वा कृत्वा रुप्यतुला ततः।। बावर्षतुलां चने श्रीविष्णुप्रीतये वणिक् ॥ ५५ ॥ (सष्टम्) पहिले ताम्रमय तुलादान, तदनन्तर चान्दी का तुलादान, और र सोने का तुलादान किया। यह वैश्य जितना दान करता था सो गाना-विहान और श्रीविष्णुभगवान् के प्रत्यर्थ करता था ।। ५५ ।। को से श्रीकपिलायसनतीर्थमाहात्म्यम् । सथा धान्यानि दानानि श्रद्धाभसियुतीमुदा॥ चनोऽसौ यणिजां श्रेष्ठो विद्वबाह्मणवाक्यतः ॥५६॥ (स्पटम् ) एवं उस श्रेष्ठी ने अपने विद्वानों के आदेशानुसार श्रद्धा और भक्ति युक्त होकर प्रसन्नता के साथ और भी अनेक दानों को किया ॥५६॥ पुनरन्त्येष्टिदानानि च साङ्ख्यमुपाश्रितम् ॥ एवं सर्वविधिकृत्वा मनसाध्यानमास्थितः ॥ ५७ ।। पुनरन्त्यप्टेिदानानि मरणानन्तरं पुत्रधात्रादिविहित दाना निच स्वयं चक्रे एवं सर्वविधिकृत्या साख्यमुपाश्रितम् साङ्ख्य- वर्णितमानसध्यानं मानसिकदेवार्चनमास्थितः॥ ५७ ॥ फिर अन्त्येष्टि दान जो मृत्यु के पश्चात् पुत्र भ्रात्रादि विहित दान हैं वह भी कर लिया इस प्रकार सब विधि करने के अनन्तर सांख्यशास्त्रानुकूल मानसध्यान में निमग्न हो एकाग्र चित्त करके बैठ गया ।। ५७ ।। तस्यक्षेत्रस्य योदयस्तं देवंशरणगतः ॥ एवं प्रर्वतमानस्य वणिजस्तस्य सत्तमः ॥ ५ ॥ बुद्धिः कापिप्समुत्पन्ना नित्यानित्यविकिनी ।। शरण्यस्य प्रसादेन मांज्याचार्यस्य सत्तमा || ५ || (स्पटम् ) हे अगस्त्य ! इस प्रकार ध्यानावस्थित हो उस तार्थ के देवता श्रीकपिलाचार्य का शरण्य हुआ और सतत ध्यान यज्ञ करने से जब शुद्ध अन्तःकरण होगया तो श्रीकपिलमुनि की प्रसन्नता से नित्यानित्य विवेचिनी सद्बुद्धि उत्पन्न हुई अर्थात् ब्रह्मज्ञान हो गया ॥ ५.८, ५६ ।। ..
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । वह वैश्य पूर्वजन्म के संस्कार से तथा इस जन्म में व्यापार के अर्थ वारवार विदेश जाने थाने के समय उस पवित्रतीय में निवास करने से अत्यन्त उज्ज्वल संस्कार और विचार का होगया था इसलिये अपनी पृद्धावस्था में सदा के भांति केवल दस पांच नौकर और वस्नुरक्षक तथा क्रय-विक्रय का हिसाब-किताब रखनेवालाही के साथ अब नहीं पाता जाता था किन्तु इस अवस्था में आवश्य- कीय भृत्यों के अतिरिक्त अपने गुरु पुरोहित स्त्री पुत्र भाई इत्यादि सत्र कुटुम्बियों के साथ व्यापार करने के लिये याने जाने लगा! एवं सदा. आने और जाने तथा उस तीर्थ में निवास करने की दशा में किसी समय शर्दी और वायु के विकार से उसके शरीर में रोग उत्पन्न हुआ और उसकी निवृति के अनेक प्रयल करने पर भी रोग दिन दिन बढ़ता ही गया ।। ५२, ५३॥ ततः संचित्य मनसि विवेकी स पणिपतिः॥ चक्रे वहूनि दानानि शास्त्रोकानि विधानतः॥ ५४॥ - (स्पष्टम्) तदनन्तर उस विचारवान् वणिपति ने अपनी भावी दशा को अपने मन में विचार कर अपने साथ के परिडतों के शास्त्रोक्त उपदेशानुसार अनेक दान पुण्य उस तीर्य में किये ।। ५४ ॥ पूर्व तामनुलां कृत्वा कृत्वा मप्यतुलां ततः।। परात्वर्णतुला चफे श्रीविष्णुप्रीतये वणिक् ।। ५५ ।। (स्पटम् ) पहिले ताग्रमय तुलादान, तदनन्तर चान्दी का तुलादान, और कर सोने का तुलादान किया। यह वैश्य जितना दाग करता था सो भगना-विहान और श्रीविष्णुभगवान के प्रीत्यर्थ करता था ।। ५.५।। , *- श्रीकपिलायतमतीर्थमाहात्म्यम् । ११७ तथा चान्यानि दानानि श्रद्धाभरित्युतोमुदा।। चक्रेऽसौ वणिज श्रेष्ठो विद्वबाह्मणवाक्यतः ॥५६॥ (सष्टम् ) एवं उस श्रेष्ठी ने अपने विद्वानों के आदेशानुमार श्रद्धा और भक्ति से युक्त होकर प्रसन्नता के साथ और भी अनेक दानों को किया ॥५६|| पुनरन्त्येष्टिदानानि च साङ्ख्यमुपाश्रितम् ।। एवं सर्वविधिकृत्वा मनसाध्यानमास्थितः ॥ ५७ ।। पुनरन्त्यष्टिदानानि मरणानन्तरं पुत्रप्रात्रादिविहित दाना निच स्वयं चक्के एवं सर्वविधिकृत्वा साख्यमुपाश्रितम् साङ्ख्य- वर्णितमानसध्यानं मानसिकदेवार्चनमास्थितः ॥ ५७ ।। फिर अन्त्येष्टि दान जो मृत्यु के पश्चात् पुत्र प्रात्रादि विहित दान हैं वह भी कर लिया इस प्रकार सब विधि करने के अनन्तर सांख्यशास्त्रानुकूल मानसध्यान में निमम हो एकाग्र चित्त करके बैठ गया ॥ ५७ ॥ तस्यदेवस्य योदेवस्तं देवंशरणगतः ।। एवं प्रर्वतमानस्य वाणिजस्तस्य सत्तमः ।। ५८ बुद्धिः कापिसमुत्पन्ना नित्यानित्यधिवेकिनी ॥ शरण्यस्य प्रसादेन सांख्याचार्यस्य सत्तमा ।। ५ ।। (पष्टम् ) हे अगस्त्य ! इस प्रकार ध्यानावस्थित हो उस तीर्थ के देवता श्रीकपिलाचार्य का शरण्य हुआ और सतत ध्यान यज्ञ करने से जब शुद्ध अन्तःकरण होगया तो श्रीकपिलमुनि की प्रसन्नता से नित्यानित्य विवेचिनी सद्बुद्धि उत्पन्न हुई अर्थात् ब्रसज्ञान हो गया ॥ ५८, ५६ ॥
भान मन में विचार कर अपने मायक पनि श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यन् । वह वैश्य पूर्वजन्म के संस्कार से तथा इस जन्म में भाग अर्थ वारपार विदेश जाने आने के समय उस पवित्रतीय में निरत करने से अत्यन्त उज्ज्वल संस्कार और विचार का होगा इसलिये अपनी वृद्धावस्था में सदा के भांति केवल दस पांच कर और वस्नुरक्षक तथा क्रय-विक्रय का हिसार-रितास रहनेवारी के साथ अब नहीं पाता जाता था किन्तु इस साल में कर कीय मृत्यों के अतिरिक्त अपने गुरु पुरोहित सी पुत्र माई इल्ली सर कुटुम्बियों के साथ व्यापार करने के लिये माने जाने लगा। आने और जाने तथा उस तीर्थ में निवास करने की दशा में समय शर्दी और वायु के विकार से उसके शरीर में रोग उसका और उसकी निवृत्ति के अनेक प्रयत्न करने पर भी रोगनिति चढ़ता ही गया ।। ५२, ५१॥ ततः संचित्य मनसि वियकी स पणिपतिः॥ पझे पनि यानानिशानानि विधानतः॥४४॥ (स्पटम) सदनन्नर उम पिचारान् पनिहानि ने पानी भागी ॥ ५४॥ शानुसार अनेक दान पुगय उम नी में दिये। पूर्व गागागा ग माया माया तमः ॥ गुशांक श्रीविधीमा पनिर ॥ ५५ ॥ 21 11111 श्रीकारिलायतनाथमाहात्म्यम् । एवं तदासी पापात्मा तत्तीर्घस्य प्रसादतः ॥ प्राप दुम्माप्यमन्यैर्यत्तद्विष्णोः परमपदम् ॥ ६२ ॥ एवं तदा तस्मिन्समये तत्तथिस्य प्रसादतो महत्त्वतोऽसौ पापारमा अन्योगिमिस्तपस्विभिर्दुःप्राप्य दुर्लभंयद्विष्णोः परम पदन्तत्माप ॥६२॥ इस प्रकार उस तीर्थ के प्रसाद से उस पापात्मा ने, योगी और तपस्वि को अलभ्य जो विष्णुभगवान् का परम धाम है उसको पाया॥६२ स सखा चारुशीलोऽभूत्पुण्यशीलसुशीलयोः रमतेद्यापि वैठे लोके दिव्यप्रभामये ॥६३ ।। अस्मिश्लोके वैकुण्ठलाके तस्य समवस्थानम्वर्णयति । स चारुशीलः पुण्यशीलसुशीलयोः विष्णुपादयोः सखा मित्रमभूयो ऽद्यापि दिव्यप्रमामये वैकुंठे रमते ॥ ६३॥ वह वैकुंठधाम में जाकर भगवान के पार्षद पुण्यशील और सुशील का मित्र होगया जो आजतक चैकुंठ में बिहार कर रहे हैं। ६३ ॥ इत्थंभूतानुभावीयं दृष्टोदिव्यप्रभाववान् ।। यस्य माहात्म्यकथने शक्तोनाहं न मे पिता ॥६॥ इत्थंभूतानुभावः इत्थंभूतप्रभावः । अनुभावः प्रभावेचत्यमरः । दिव्यप्रभाववान् दिव्यप्रतापवान् अयं तीर्थराजोदृष्टः दृष्टिविपर्य- गतः । यस्य माहात्म्य कपने नाहं शनोनमपिता शक्तः ॥६४॥ (भनस्कन्दस्तीर्थमाहात्म्पस्पपरा कजिनयति) (१)पुण्यशील और सुशील रितु भगवान् के दोनों पार्षद थे जो निरन्तर भगवान की सेवा में रहते थे।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तस्याःप्रादुर्भवादेवजीवन्मुसतोऽभवत्तदा । पश्यतां सर्वयन्धूनां ततः स्वंद्रेहमत्यजत् ।। ६० ॥ तस्याः झानयत्या युद्ध्या प्रादुर्भवादुदयादेव स जीन्सु क्लोऽभवत् । ब्रह्मसाक्षात्कारेणीवन्मुस्वोभवतीति सांख्योः । तदन्तरमिदंपांचभौतिकमनित्यं शरीरं रक्षतु जहातुवैतिब्रह्मज्ञा निनामिच्छाधीनमस्त्यतः स इदमनित्यं देहं स्वस्त्रीपुत्रमात्रादि सर्वबन्धूनां पश्यतामेवात्यजदास्परलोक जगाम ॥ ६ ॥ - उस ज्ञानवुद्धि के उत्पन्न होतेही वह वैश्य जीवनमुक्त हो गया। क्योंकि ब्रह्म साक्षात्कार जिसको हो जाता है वह जीवन्मुक्त कहाही जाता है, यह सांख्य का मत है । अब रहा मरना जीना सोनम ज्ञानियों की इच्छा पर है वह चाहे इस अनित्य पांचभौतिक शरीर को रक्खे या परित्याग कर दे, उतम ज्ञानी बहुधा त्यागही करते हैं इसलिए अपने बन्धु बान्धव स्त्री पुत्रादि के देखते देखते उसने अपने इस अनित्य शरीर को त्याग दिया ॥६॥ लोकं कुठमगमगास्वरं तमसः परम् ॥ पगत्वा न निवर्तन्ने शान्ताःसंन्यासिनोमला ॥६॥ शरीरत्यागान्तरं तममान्य कारस्य परम् पारं मारतरं देदीप मानं लक्ष्मीपनिरासस्थानम्बएठलीकमगमत् पर्गत्या शान्ताः रागादिरहिताः ममन्नाः शुद्धाः सन्यासिनो रियाः न निवर्तन्ते जननमरवायां सीना भन्ति ।। ६१ ।। इस खून सरीर को त्याग करने के मनन्तर शुक्ष्म गरको धारएर इस सांसारिक मोहन्यधार से अलग हो कोटि सूर्य के समान परमामा भानामानिनिसमायान (टपाम) को पना मार पाल और विशुद्ध मन्यागी उन किरनी माते ॥६१ श्रीकापिलायतनामाहात्म्यम् । एवं तदासी पापात्मा तत्तीर्थस्य प्रसादतः ॥ माप दुःमाप्यमन्यैर्यत्तद्विष्णोः परमंपदम् ।। ६२ ।। एवं तदा तस्मिन्समये तत्तार्थस्य प्रसादतो महत्वतोऽसौ पापात्मा अन्योगिमिस्तपस्विभिर्दुःप्राप्यं दुर्लभंयद्विप्णोः परमं पदन्तत्याप ।। ६२॥ इस प्रकार उस तीर्थ के प्रसाद से उस पापात्मा ने, योगी और तपस्वि को अलभ्य जो विष्णुभगवान् का परम धाम है उसको पाया ॥६२ स सखा चारुरिलोऽभूत्पुण्यशीलसुशीलयोः ।। रमतेचापि वैकुंठे लोके दिव्यप्रभामये ।। ६३ ।। अस्मिश्लोके चैकुण्ठलोके तस्य समवस्थानम्वर्णयति । स चारुशीलः पुण्यशीलसुशीलयोः विष्णुपार्षदयोः सखा मित्रमभूयो ऽद्यापि दिव्यप्रमामय वैकुंठे रमते ॥ ६३॥ वह बैकुंठधाम में जाकर भगवान के पार्षद पुण्यशील और सुशील का मित्र होगया जो आजतक वैकुंठ में बिहार कर रहे हैं ॥ १३॥ इत्थंभूतानुभावीयं दृष्टोदिव्यमभाववान् ।। यस्य माहात्म्यकथने शतोनाहं न मे पिता ॥६॥ इत्थंभूतानुभावः इत्थंभूतप्रभावः (अनुभाषः प्रमावेचत्यमरः । दिव्यप्रभाववान् दिव्यप्रतापवान् श्रयं तीर्थराजोदृष्टः दृष्टिविपर्य- गतः । यस्य माहात्म्य कथने नाहं शनोनमपिता शनः ।। ६४॥ (अयस्कन्दस्तीर्थमाहात्म्यस्यपरा कठोजनपति) (1) पुरपशील और एशील शिशु भगवान के दोनों पार्षद थे जो निन्दा भगवान् की सेवा में रहते थे।
কপিলাবণাময়। इस तरह के प्रभाव वाला मी मनाप से युक्त यही तीर्थगन दशगया जिसका माहात्म्य वर्णन करने में न मैं समर्ग हूँ न मेरे ता गिनी मम ॥६॥ इतिहासमिमं पुण्यं शृणुपाच्छा ययययः ॥ स्वस्पदेहांतमासाद्य पछुटे यास्यति ध्रुवम् ॥६५॥ (अरमध्यायोपसंहारपत्र) इमं पुएवं पवित्रमिति हामं यःशृणुयात् पवभावयेत् । स स्वस्वदेहान्तमासायानि पुर्णायुः पर्यन्त्रमोगमुस्वान्चे ध्रुवं चकुंठे यास्पति गमिष्यति । पारम्पारं श्रवणाच्छावणाचप्राप्तबद्वर्या ततीर्थसेवनेन मुनिर्भविष्यतीति तात्पर्यम् ॥ ६५ ॥ इस पवित्र इतिहास को जो सुनेगा और सुनावेगा वे दोनों पूर्ण आयु पर्यन्त सांसारिक भोगों को भोगकर देहान्त होने पर वैकुंठधाम, को जायंगे । इसका भाव यह है कि वारवार इस इतिहास को सुनने सुनाने से तीर्थ में श्रद्धा होगी पीचे तीर्थस्नान तीर्थवासादि के द्वारा मुक्ति होगी ।। ६५॥ इति धीस्कन्दपुराण स्कन्दागस्त्यसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये. वैश्यमाक्षी नाम सप्तमोऽध्यायः।
अथाटमाध्यायकथारम्भः।
(सूत उवाच)
इत्युक्त्वा पुनरप्या श्रद्धाभक्तिपतं मुनिम् ।।
ततीर्थमहिमोपेतं भगवानग्निभूर्वचः ॥ १ ॥
सूतः स्वशिष्यान् कथयति यदित्युक्त्वार्थात्सप्तमाध्यायकथां
कथित्या पुनरप्यग्निभूभगवान्स्कन्दः श्रद्धाभाकयुतं मुनिमगस्त्यं
ततीर्थमहिमापतंवच आइ ॥१॥
सूतजी अपने शिष्यों से बोले कि स्कन्द भगवान् ने इस प्रकार
सक्षमाध्याय की कथा सुनाने के पश्चात् श्रद्धा भक्ति से संयुक्त अगस्त्य
मुनि से फिर भी उस तीर्थ की महिमा से संयुक्त वचन कहना प्रारंभ
किया ॥१॥
(स्कन्दोबाच)
पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि तीर्थस्यास्य महाद्भुतम् ॥
महिमानं मुनीशान ! सावधानतया शृणु ॥२॥
स्कन्दोऽगस्त्यं कथयति यत् हे मुनीशान! अगस्त्य !
पुनरन्यन्महाद्भुतं महाचर्यकरमस्य तीर्थस्य महिमानं यक्ष्यामि
कथयामि तत्सावधानतया सावधानेन मनसाभृणु ॥ २॥
स्कन्दजी ने अगस्त्य मुनि से कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ ! फिर उसी
तीर्थ की महाश्चर्यकारिणी दूमरी महिमा फहना हूं, सावधान होकर
सुनो ॥२॥
१२२
নিশানান।
महायुलीनायिपोन्मुन्मद्रदेश कार ।।
धम्मात्मा पिकाच दगायान्द्रीनयात्सलः ॥३॥
मुशीलः साधुसंसगी दानशीलः क्षमान्दिनः ।।
महाधनी गुदभागी भाग्ययांव जितेन्द्रियः॥४॥
मानदोमानहीनेभ्यो दिनभ्यानप्रदायकः।।
विष्णु माहात्म्य सुनीता विष्णुमतिपरायणः॥५॥.
धर्मात्मा कृषिका दयावान् दीनवत्सलः मुशीलः माधु:
संसर्गी दानशीलः घमागन् महाधनी शुद्धोगी। धनवता
व्यसनयाहुल्याच्छुद्ध मोगामावोऽत उक्तम् शुदोगः । विद्यमानो-
पकरणेष्वपि सात्विकमोगकर्ता । भाग्यवान जितेन्द्रियोमानहीने-
भ्योमानदोमानदाता
दीनेम्योदरिद्रेभ्योऽन्नप्रदायकोऽन्नदाता
विष्णोर्माहात्म्यस्य सुश्रोता विष्णुमालपरापणोमहाकुलीनः
कश्चन विप्रोमद्रदेशेष्वभूदभवत् ॥ ३, ४, ५॥
मद्रदेश में महाकुलीन धर्मात्मा, खेती का काम करनेवाला,
दयावान्, दोनों का प्रतिपालक, सुशील, साधुओं की संगति करनेवाला,
दानशील, क्षमाशील, महाधनी, सात्विक भोग करनेवाला, माग्यवान्,
जितेन्द्रिय, मानहीनों को मान देनेवाला, दरिद्रियों को धन देनेवाला,
विष्णुमाहात्म्य का श्रोता, विष्णु भगवान की भक्ति में परायण एक
ब्राझणं रहता था ॥३, ४, ५ ॥
इन्गुणविशिष्टस्य ब्राह्मणस्य तपोधन ।
धर्मपत्न्यां तदातस्य सूनवोयहवोऽभवन् ॥ ६॥
हे तपोधन ! इदृग्गुणविशिष्टस्य तस्य प्रामणस्य धर्मपल्या
बहवः मुनयोऽभवन् बभूवुः ॥६॥
भोकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १२३ हे अगस्त्य ! इस प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न उस ब्राह्मण के उसको धर्म पनी से अनेक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ६॥ तेपि धर्मपराः सर्व पितृधर्मपरायणाः ॥ महात्मानाधर्मलब्धा बभूवुधनवर्धिनः ॥ ७ ॥ ते सर्वे पुत्रा अपि धर्मपराः धर्मनिष्ठाः पितृधर्मपरायणा महात्मानोधर्मलब्धाधर्मोपार्जनाःधनवर्द्धिनाधनधृद्धिकारश्च बभूवुः ॥७॥ उप्तके वे पुत्र भी पिता के सदृश धर्मिष्ठ माहात्मा तथा धर्मपूर्वक धन लाभ करने और धन को बढ़ानेवाले हुए।। ७ ।। जातेषु तेषु पुत्रेषु गृहभारवहेपुच॥ गानार्ध सर्वतीर्थाणां ताननुज्ञाप्पनियौ ॥८॥ स ब्राह्मणोगृहमारवहेषु तेषु पुत्रेषु जातेषु तान् पुत्रान- नुज्ञाप्य गृहमारं समर्प्य सर्व तीर्थानां यात्रार्थ निर्ययो मतवान् ॥८॥ जब उसके सभी पुत्र गृह का भार संभालने योग्य हो गये तो उनको गृह कार्य में नियुक्त कर वह ब्राह्मण तीर्थों की यात्रा करने को चला गया ।।। तदातीर्थप्रसंगेन चक्र पृथ्वीप्रदक्षिणम् ।। तेपु तेपुच तीर्थेषु सस्नो स प्रमुदान्वितः॥६॥ तदा तदनन्तरं तीर्थप्रसंगेन तीर्थव्याजेन स विप्रः पृथ्वी प्रदक्षिणं चक्रे कृतवान् । येषु येषु तीर्थेषु गतस्तेषुतेपुच प्रमुदा- वितो हर्पण संयुक्तः सस्नौ स्नानं कृतवान् ॥ ६ ॥ तिसके बाद उसी तीर्थयात्रा के प्रसंग में पृथ्वी की प्रदक्षिणा की। वह जिन तीथों में गया उन २ तीर्थों में बड़े हर्ष के साथ स्नान किया।
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श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यम् । १२५
यत्पयः यस्य सरसः पयमादुग्धेनसमम् तुल्यं पयोजलं
पशोपिनिपीय पीत्वा मानव योनिमाताध सद्यतत्कालं शुद्धि
समन्विता भवन्तीति शेषः ॥१३॥
जिस कपिलसर का दूध के समान जल पीकर पशु भी तत्काल
मनुष्य योनि पाकर शुद्ध होजाते हैं ।। १३ ॥
तत्सर समनुप्राप्य सविआन्तमना अभूत् ।।
तत्रैव क्षेत्रप्रवरे क्षेत्रसंन्यासमाश्रितः ॥१४॥
तत्सरस्समनुप्राप्य तत्कपिलसरोवरमागत्यतीर्थयात्रयापरि-
श्रान्त स मामणोविश्रान्तमना अभूत् । तत्रैव क्षेत्रप्रवरे स क्षेत्र
सन्यासमाश्रितः क्षेत्रसंन्यासं धृतवान् ॥ १४ ॥
उस कपिलसर पर अाकर समस्त तीर्थों के परिभ्रमण से परिश्रान्त
उस ब्राह्मण ने विश्राम करने की इच्छा की और उसी उत्तम क्षेत्र
में क्षत्र-सन्यास लेलिया ॥१४॥
यावज्जीवमिदंक्षेत्रं नत्यक्षामि कदाचन ।
इतियोनिश्चयश्चित्ते सक्षेत्रन्यास उच्यते॥१५॥
यावज्जीवं जीवनपर्यन्तमिदंचत्रं कदाचन नत्यक्षामि न
त्यजामीति यश्चिचे निश्श्यस क्षेत्रन्पास उच्यते ॥ १५ ॥
जबतक जीवन रहेगा तबतक इस क्षेत्र को कभी त्याग नहीं
फरूंगा इस मानसिक निश्चय को क्षेत्र सन्न्यास कहा जाता है ।। १५ ॥
तथा स मद्रदेशीयोविमस्तशिरोमणी।।
ततीर्थदैवतं चक्रे शरणं मरणावधि ॥ १६॥
zলননা। गया सदनन्तरं म मद्रदेशागोपिनासपाताशिरामशा वापराने तपादियां कपिलमुनि भरगारधि मरणपर्य्यन्वं शरणं पके कृतवान् ॥ १६ ॥ उगमे अनन्तर २६ मददगी मानद उस सार्थ शिरोमणि कपिल क्षेत्र में मरणापधि तीय देव कीपन भगवान् का शरण्य हो गया॥१६॥ वयं नियसतन्तस्य नामांतीर्थ सरोवरे।। व्यतीयुः शरदः पंच स्नातन्त्रिपवणं सदा ।। १७॥ एवं तस्मिन्तीर्थसरोवरे निवसतानियामकुर्वतश्रिावध स्नात स्तस्य विप्रस्य पंचशरदः पंचवाणि व्यवीयुः ।। १७ ।। एवं कपिलतीर्थ में निवास करते और त्रिकाल स्नान करते उस ब्राह्मण को ५ वर्ष चीतगये ॥ १७॥ सम्प्राप्ते पंचमे व शुद्धभावेन सत्तम ।। तुष्टाय तं तीर्थवरं सांख्यबुद्धिप्रवर्तकम् ॥१८॥ पंचमे वर्षे सम्प्राप्ते सांख्ययुद्धिप्रवर्तकं सांख्यबुद्धिप्रदावार तं तीर्थवरं शुद्धभावेन तुष्टाव स्तुतिनकार ॥१०॥ पांचवां वर्ष जब प्राप्त हुआ तो शुद्ध भाव से उस ब्राझंग ने सांख्यबुद्धि के प्रवर्तक उस तीर्थवर की स्तुति की ॥ १० ॥ * तीर्थराजस्तुतिः * संकीर्णा करणं पापं नाना वरणकारणं ॥ यदि स्नातं कापिलीये किंतपातकतोभयम् ॥१६॥ अजातीय तथा पापं जाताजातक्षयं करम् ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २०॥ -1 श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १२७ मलिनीकरणं पापं महामलफलप्रदम् ॥ यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ।। २१ ॥ जाति मंशकरं पापं कृतंदुर्योनिदंभवे ।। पदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २२ ॥ उपपातक संझयत् फूटशाल्मलिदायकम् ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २३ ।। प्रतिपापफलंपूयकुंडेऽधोमुखपातनं ।। यदिस्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २४ ॥ महापापं महापीडकुंभीपाकफलप्रदम् ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्लातकतोभयम् ॥२५॥ यानिकानिच पापानि भवन्तु भुवननये ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २६ ॥ सर्वाण्यघानि नश्यन्ति तीर्थराद् ते प्रसादतः॥ इति संचिन्त्य मनसा त्यामहं शरणं गतः ॥ २७॥ नोट-यद्यपि तीर्थराज स्तुति का अर्थ नहीं लिखा गया है तथापि स्तुति में बहुत से पापों के नाम लिख गए हैं उनके लक्षण लिखना अवश्य है अतः उनका विवरण और उनसे अतिरिक्त पापों की नामावली सान वर्ग में विरक्त करके लिखता हूं क्योंकि स्तुति में जितने पाप परिगणित हैं उनसे अतिरिक्त पापों की भी गणना पृथक रूप में उनके उनके नामों से नहीं लेकर एकत्रही स्तुति के अन्त में " यानि कानि च पापानि " इस श्लोक में अरोग विशेष कुल पापों को लेही लिया गया है अतः नीचे को नामावली महापातक, पातक, उपपातक इन तीन भेदों से है फिर उपपातकों के भी दो भेद हैं जिनमें कितनों से बचना १२८ श्रीकपिलायतनतर्थिमाहात्म्यम् । इति सत्तुचत स्तस्य विप्रस्य कलशोद्भव ।। हृदि कोपि प्रकाशोऽभूद ज्ञान ध्यांतनाशन ॥२८॥ हे कलसोय! इति एवं संस्तुपत स्तुति कुर्वतस्तस्य विप्रस्त हृदि हृदये श्रज्ञान घांतनाशनः कोपिप्रकाशोऽभूत् । तीर्थराज प्रसादत्त हृदयान्धक रोनष्ट ॥ २८॥ हे अगस्त्य ! इस प्रकार स्तुति करता हुआ उस ब्रामण का हृदय में अज्ञानरूपी अस्वकार को नाश करनेवाला एक प्रकार उत्पन हुवा ॥२८ *संभव है और कितनों से बचना गृहस्थाश्रम महामसम्भव है जिनका बोध नामावली देखने से स्वतः पाठक और श्रोताओं को होजायगा अतः उनको पृथक् नहीं किया है। महापातकनामानि सोपपातकानि महापातक तो पांच ही हैं । ब्रह्महत्या २ मधपान ३ सुवर्ण की चोरी ४ गुरुपत्नीगमन ५ इनके संसर्गी। और जितने १ छुन पासून फा अविचार २ संकरीकरण ३ मलिनी करण अपात्री करण ५ जातिअंगकरण ६ अविहित कार्य का करना ७ कर्म का लोप करना - रसवेचना र कन्याविक्रय करना १० मस किय ११ गोषिकय १२ सर विक्रय १३ उष्ट्र विक्रय ११ शासी विक्रय १५ करे आदि पशुओं का विक्रय १६ माना घरचना १७ नीली विक्रय १८ विस वनु को सादने की सामर्थ नई। उसको चना ११ सौदा किमी तरह का बनना २० जल में रहने वाले जानवर का सय २१ मत जन्नु यि २२ आकार में रहनेवाले जन्तु साविकय २३ व्ययं पूजा काटना २१ शाकानदेना २५ सय काय करना २६ देवम्ब का हरा करना २७ रामहाप परा २० पदयामादाय करना २५ तेन, पी मार वानमा t श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १२१ तदायं सुतपाविमस्तुरीयज्ञानभूमितः ।। दृश्यमानं जगज्जातं ददर्श हृदि चित्रवत् ॥ २६ ॥ तदा तस्मिन्काले यदा विषस्य हदि प्रकाशाजातस्तदायं सुतपा विप्रोग्रामणस्तुरीयां ज्ञानभूमिङ्गतः ज्ञानस्यसप्त भूमयो. भवन्ति ततवर्णनंपातजलियोगसूत्रे । तस्य सप्तधाप्रान्तभूमिः अपहरण करना ३२ अवस्तु का हरण करना ३३ ब्राह्मणनिन्दा ३४ गुरुनिन्दा ३५ वदनिन्दा ३६ शाखनिन्दा ३७ परनिन्दा ३८ अभक्ष्यभक्षण ३९ अभोज्यभोजन ४० अचोप्यचोषण ४१ अलेहलेहन ४२ अपेयपान १३ अछूत को छूना ४४ जो भात सुनने के योग्य नहीं वह सुनना १५ जो हिंसा के योग्य नहीं उसको हिंसन करना ४६ जिसकी स्तुति नहीं करना चाहिये उसकी स्तुति करना ४७ जो अचिन्त्य है उसकी चिन्ता करना “ यहांपर अचिन्त्य शब्द का अर्थ परब्रह्म (जो शास्त्रों में लिखा है वह ) समझकर ईश्वर चिन्तन पाप है एसा न समझ लेना चाहिये नहीं तो अर्थ का अनर्थ होजायगा शास्त्रों में 'अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने समस्तजगदाधारमूर्त ये ब्रह्मणे नमः' वाक्य में ब्रह्म को अचिन्त्य अव्यक्त निर्गुण गुणात्मा और समस्तजगत् का आधार मानकर प्रणाम किया गया है इसलिये अचिन्त्य शब्द से जिस बात के स्मरण करने से चित्त में प्रसन्नता हो वह ईश्वर बोधक अचिन्त्य शब्द को छोड़ बाकी जगह में जहां कि किसी वातको स्मरण करने से चित्त में ग्लानि पैदा होती हो उस अचिन्त्य का चिन्तन पाप समझना" ४८ अयाज्य जो यज्ञ करने का अधिकारी नहीं उससे यज्ञ कराना या जो यज्ञ नहीं करना चाहिये वह यज्ञ करना ४९ अपूज्य का पूजन करना ५० माता पिता का तिरस्कार करना ५१ सी पुरुष के परस्पर की प्रीति को छुड़ाना भेद लगादेना’ १२८ श्रीकपिलायतनतार्थमाहात्म्यम् । इति सन्तुषत स्तस्य विप्रत्य कलशोद्भव ॥ हृदि कोपि प्रकाशोऽभूद ज्ञान ध्यांतनाशन ॥ २८ ॥ हे कलतोद्भव ! इति एवं संस्तुवत स्तुति कुर्वतस्तस्य विनर हृदि हृदये अज्ञान वातनाशनः कोपिप्रकाशोऽभूत् । तीर्थराव प्रसादत्त हृदयान्धक रोनष्ट ॥२८॥ हे अगस्त्य ! इस प्रकार स्तुति करता हुआ उस ब्राह्मण का हृदय में अनानरूपी अत्यकार को नाश करनेवाला एक प्रकार उत्पन हुवा ॥२८ *संभव है और कितनों से बचना गृहस्थाश्रम महाभसम्भव है जिनका चोध नामावली देखने से स्वतः पाठक भौर श्रोतामों को होजायगा अतः उनको पृथक् नहीं किया है । महापातकनामानि सोपपातकानि । महापातक तो पांच ही है । बमहत्या २ मद्यपान ३ मुवर्ण की चोरी ४ गुरुपत्नीगमन ५ इनके संसर्गी। और जितने १ धून मधून फा अविचार २ संकरी करण ३ मलिनी करण १ भात्री कार ५ जानिराकरर ६ प्रशिक्षित कार्य का करना कर्म का लोर पाना : रसवेचना र कन्याविषय करना १० अरव विक्रय ११ गोषिक्रय १२ सर विक्रय १३ उष्ट्र विक्रय १४ दासी किय १५ कार आदि पशुओं का विकय १६ माना परचना १७ नानी विक्रय १८ विस वनु को मरीदने की सामर्थ नही उसकी बरा १९ सौदा किमी ताद का पंचना २० जल में रहने वाले जानवर का विकर २१ स्थत जन्नु का किय २२ प्राकारा में रहनेवाले जनु शाविक्रय २३ व्यर्थ वृक्ष का काटना २१ ऋण कान देना २ सय का दार काना २६ देवम्ब हल करना २७ रात्रात का हर माना २० पदमा मादा काना २न, घाव काल साना नोहा परिया * श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तदायं सुतपाधिप्रस्तुरीयज्ञानभूमितः।। दृश्यमानं जगज्जातं ददर्श हृदि चित्रवत् ।। २६ ।। तदा तस्मिन्काले यदा विप्रस्य हृदि प्रकाशाजातस्तदायं सुतपा विप्रोत्राह्मणस्तुरीयां ज्ञानभूमिङ्गतः ज्ञानस्यसप्त भूमयो- भवन्ति ततवर्णनंपातलियोगसूत्र । तस्य सप्तधाप्रान्तभूमिः अिपहरण करना ३२ अवस्तु का हरण करना ३३ ब्राह्मयनिन्दा ३४ गुरुनिन्दा ३५ वदनिन्दा ३६ शास्त्रीनन्दा ३७ परनिन्दा ३८ अभक्ष्यभक्षण ३६ अभोज्यभोजन ४० अचोप्यचोषण ४१ अलेखलेहन ४२ अपेयपान ४३ अछूत को छूना ४४ जो बात सुनने के योग्य नहीं वह सुनना १५ जो हिंसा के योग्य नहीं उसको हिंसन करना ४६ जिसकी स्तुति नहीं करना चाहिये उसकी स्तुति करना ४७ जो अचिन्त्य है उसकी चिन्ता करना “ यहांपर श्रचिन्त्य शब्द का अर्थ परब्रह्म (जो शास्त्रों में लिखा है वह ) समझकर ईश्वर चिन्तन पाप है ऐसा न समझ लेना चाहिये नहीं तो अर्थ का अनर्थ होजायगा शास्त्रों में 'अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने समस्तजगदाधारमूर्त ये ब्रह्मणे नमः वाक्य में ब्रह्म को अचिन्त्य अध्यक्त निर्गुण गुणात्मा और समस्तजगत् का आधार मानकर प्रणाम किया गया है इसलिये अचिन्त्य शब्द से जिस बात के स्मरण करने से चित्त में प्रसन्नता हो वह ईश्वर बोधक अचिन्त्य शन्द को छोड़ पाकी जगह में जहां कि किसी बातो स्मरण करने से चित्त में ग्लानि पैदा होती हो उस अचिन्त्य का चिन्तन पाप समझना" ४८ अयाज्य जो यज्ञ करने का अधिकारी नहीं उससे यज्ञ कराना या जो यज्ञ नहीं करना चाहिये वह यज्ञ करना १२ अपूज्य का पूजन करना ५० माता पिता का तिरस्कार करना ५१ वी पुरुष के परस्पर की प्रीति को दुहाना भेद धारितापनगनीमा ! mar ॥ राम्य विकरमानिससम्म हानापारम्पप्रान्तभूमिमा रूपीगी प्रया गोगजमावारकारुपिणी समप्रकाग। तयया दयन्तुःसम्मया परिमातमतानमनिमपिशातव्यमित्यकामना। तथा विकरयाविरुपाहानोपायोमपानिमादितांनास्य निमा दनमशिप्पत सकलानुभशादिनि हिनीया । तया रंग :५२ परम्बी गगन ५.३ पश्या गनन ५४ दासी गमन ५५ चाण्डानादि गगन ५६ अयोनि गमग ५७ रजस्वला गमन ५८ परवादि मनन ५२ कुट सातो (मटी गवाही) ६० पैशून्यवाद (चुगली करना) ६१ मूठ बोलना ६२ ग्लेच्छ संभाषण ६३ बन्न द्वेष ६४ प्रवृत्ति हरण ६५. चि घेदन चिच्छेदोहितद्वधः (वृत्ति का बुडाना उसको वर्ष करने के बराबर होता है) ६६ परवृत्ति को ले लेना ६७ मित्र को ठगना ६८ गुरु को ठगना ६६ स्वामी को ठगना ७० गर्भपात करना ७१ रास्ते चलते ताम्बूल चारना ७२ हीन जाति की सेवा करना ७३ परान्न भोजन करना ७४ लसुन, कान्दा, गाजर और तालफल आदि फलों का भक्षण करना ७५ झूठा साना ७६ मार्जारोच्चिष्ट खाना ७७ वासी अन्न खाना ७८ पंक्ति भेद करना ७५ ए हिंसा ८० पशु हिंसा ८१ बाल हिंसा ८२ और किसी भी प्रकार की हिंसा ८३ अपवित्र रहना ८१ स्नान नहीं करना ८५ सन्ध्या को त्याग । करना ८६ अमिहोत्र छोडदेना ८७ वलि वैश्वदेव ८८ निपिद्ध आचरण करना ८९ कुमाम में वास करना २० ब्रह्मद्रोह २१ गुरु द्रोह १२ पितृ मातृ द्रोह २३ पर द्रोह २४ भात्मस्तुति. २५ दुष्टजन संसग २६ गौ की सवारी १७ दृपम की सवारी २८ भैंसे की सवारी २९ गधे की सवारी १०० ऊंट की सवारी १०१ बकरे की सवारी १०२ मृत्याभरण १०३ अपने ग्राम को त्याग करना १०४ गोत्र त्याग करना १०५ कुल का त्याग करना त्याग करदेना.
श्रीकपिलायतनार्थमाहात्म्यम् । नोऽविद्याकामकर्मादयोममारोपतः क्षीगाः । नतेषांक्षनव्यमय- शिष्यते इति तृतीया । तथा दुःरा हानरूपमोपाख्यफलं तद्गोचराऽ- सम्प्रभातयोगेन सापारनं न पुरुषार्थस्यापिज्ञातव्यमवशिष्यत- इति चतुर्षी प्रना िवदेम्वस्वकृत्यसमाप्त्यनुभयरूपम्प्रहाचतुष्टयम् । 5१०६ दूर से सलाइदेना १०७ ब्राह्मणों की लाश भेदन करन १०८ अपग्य का आशीर्वाद लेना और १०१ पतित से बात चीत करना इत्यादि उसातक है। इन में व्यर्थ के मनोरथ वान्धना भी शामिल है। इन सब उपपातकों के नाश के विषय में कपिलसरोवर की स्तुति उस प्रामण देव ने की है । मनुना जातिभ्रशंकरसंकरीकरणापात्री करण- मलिनीकरणसंज्ञानि पातकानि परिगणितानि यथा ब्राह्मणम्य रूजः कृत्या प्रातिरप्रेयमदयोः। जैम्यं पुंसिच मैथुन्यं जाति अंशकरं स्मृतम् । खराश्वो- एमृगेभानामजाविकवधस्तथा ॥ संकरीकरणजेयंमीनाहिमहिपस्यच ॥ निन्दितेभ्योधनादानं वाणिज्यशदसेवनम् । अपात्रीकरणंज्ञेयमसत्यस्य- चभापणम् ॥ कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् । फलैधः कुसुम- स्तयमधेयंच मलावहम् इति ॥ महापातकंपुच स्वर्णस्तेयी, ब्राह्मण सुवर्णस्तेयी, महाशतकी भवति । सुरापान जो महापातक कहा गया है वहां विचार है सुग के ११ भेद हैं उन में मुख्य गौडी माध्वी और पेष्ठी ३ हैं इस में प्रथम पक्ष तो यह है कि निषिद्धसुरा का पान नहीं करना तदनन्तर गौणी माध्वी और पैष्ठी में पैष्ठी का पान महापातक है। अन्त में धर्मशास्त्रकारों का वचन है कि ब्राह्मण किसी तरह के मद्य या सुरा का पान न करे और क्षत्रिय वैश्य यदि करे तो महापातकी नहीं। इस प्रकार यहां साधारण विचार दिखाया है विशेष धर्मशास्त्रों में वर्णित है। पांचवाँ जो संसर्गी है वह यदि महापातकियों का लगातार वर्ष भर संसर्ग करे तो पातकी होता है वह भी ज्ञानावस्था में शेर जो उपपातकादि लघुपातकादि हैं उनका नाम सहशही साधारण प्रायश्चित है कितने सन्ध्यावन्दन और गायत्री जप से ही नष्ट होते हैं कितने श्रावण्यादि कर्मों द्वारा निन हो जाते हैं।
मानिविदेहकपन्यकालीनावस्यानुमवरूपवान्पदयस्थावर्य स्वयम- नारे पनपतीनिसप्त शानभूमगस्तत्र विप्रस्य कपिलमुनि प्रमादानांत इन्धकारो यदनकामनन्धप्राणायामप्रत्याहारादिनाभूमस्सि- प्यनिन नामु मित्रयं जातप्रकाशमानगंवामिदनानम् लन्ध काशं म तुरीयमानभूमितो दृश्यमा जगजातमात्म जगदृद्धि चित्रवत्पश्यति ॥ २६ ॥ जब उस मामण को कपिलमुनि की प्रसन्नता से एकाएक हृदय में प्रकाश उत्सन्न होने से तुरीयावस्या आगई तो यह तुरीया जान भूमि में आकर समस्त जगत को अपने हृदय में ही देखने लगा था पातंजलि योग सूत्र में ज्ञान की सात भूमि वर्णन की गई है जो यन नियम के साथ क्रम से प्रासन यंघ प्राणायाम प्रत्याहार घ्यान धारणा और समाधि द्वारा घोर परिश्रम करने पर योगियों को कम से प्राप्त होती हैं जिनमें प्रथम ममि यह है कि मैं ने दुःस को जान लिया अब इसके विषय में कुछ नहीं जानना है उसको त्याग करना चाहिये । और मिथ्या ज्ञान वासना से रहित अन्तरात्मा को विवेकस्याति कहते हैं या हानोपाय कहते हैं इसलिये मिथ्या वासना से रहित अन्तराला को कर लिया अब इसमें कुछ रोप नहीं है ऐसी स्थिति को दूसरी ज्ञान भूमि कहते हैं । तथा त्याग करने के योग्य जो अविद्या काम कर्म आदि इनके विशेष नारा होने को ज्ञान की तीसरी ममि कहते हैं। और योगियों का पुरुष-साक्षात्कार-रुप मोक्षप्राप्ति पुरुषार्य है इस पुरुषार्थ का ज्ञान कर लिया अब इसके ज्ञान में कुछ शेष नहीं है इसको ज्ञान की चौथी ममि कहते हैं। इस तरह महापरिथम-साध्य और योगियों से भी दुःप्राप्य चार ममिका को जीतकर चतुर्थ भूमि से वह ब्रामण वाम इश्य पदार्थ को अपने हृदयपट खोलकर चित्रवत् देखने लगा। अब राप की तीन भूमिकाओं का वर्णन पागे के श्लोकों में करते हैं ।। २ ।।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १३३ सुप्तिवस्वमचैव कालेन कियता पनः ।। हरपाहश्यमभूदेतत्पंचमीभूमिकास्थितेः ॥ ३० ॥ एवं चर्तुभ्यां भूम्यां सर्वजगजात हृदिभाश्यन् कियता कालेनैवं कुर्वन् पंचमीभूमिमाश्रितः पातंजलियोगसूत्रे पंचमी- लक्षणमुक्तं यथा समाप्त भोगाप वर्गामे बुद्धिर्भविष्यतीत्येवमाकारा पश्चमाभूमिः यद्गत्वा भोगापवर्गाभ्यामपि योगी निवृत्तो भवति । तत्रगतस्य विप्रस्यैतदृश्यादृश्यं सर्व सुप्तिवत्स्वप्नवच्चैवाभूत् । स्वप्नवदयंसंसारोजातः । सर्वमिथ्या मयमभूत् ।। ३० ।। इस तरह जब चतुर्थी भूमि में प्राकर उस ब्राह्मण को सम्पूर्ण जगत् हृदय में ही दीखते कुछ दिन बीत गये तो अब पांचवीं शान भूमि में प्रवेश किया जहां समस्त संसार के वाद्य दृश्य और अहरय पदार्थ स्वप्न के ऐसे मालूम देने लगे और मन केवल परब्रह्म में लीन होने लगा ॥ ३० ॥ पुनः पष्टीमित: माज्ञः स्वतोदृश्यं न पश्यति । परैरुत्थापितः कापि स्वप्नवदृश्यमीक्षते ॥ ३१ ॥ प्राशः शानवान् स माझषः पुनरितोत्संचमीभूमिकातः पप्टीगतः भस्पालपणं पातजालियोगसूत्रे । यथा बुद्धिरूपेण परिणताः सत्वादयोगुणाः स्वकारणे लयमेप्यन्तीत्येवमाकारा पप्टी शानभूमिः । एवं सत्वादिष्वपिलयंगतेषु उन्मनीमा- प्राप्तः । स्ववः सोष्टतोयं किमापन पश्यति मुषुप्ति मावं. प्राप्तव कारि करिमक्षिकालेपि पररन्यजनरत्यापित रोधित: स्वप्नवहरसमीपते परयवि उपश योगशाने समाधि प्रकर। प्रनप्टः स्वाशनिश्वासः प्रसस्तविषयग्रहः निरपंप्टोनिर्विकार.
१३४ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहाम्यम । श्चलयोजयति योगिनाम् ।। उच्छिन्नसर्वसंकल्पोनिः शेषाशपचे- ष्टितः । स्वावगम्यालयः कश्चिज्जावते यामगोचरः ॥३१॥ वह ब्राह्मण पंचमी भूमिका में कुछ दिन रह कर तब ज्ञान की छठी भूमि में पाया और इस भूमि में अपनी आंखों से कुछ नहीं देखता था और सोए हुर मनुष्य के ऐसा दीखन लगा तथा जब दूसरे आकर जगाते थे तो दृश्यवस्तु को स्वमवत् देखता था। पांतजलि योग सूत्र में पष्ठी भूमिका का लक्षण यह कहा गया है कि जिस अवस्था में अविद्या रूप से परिणत सत्वादि गुण अपने २ कारण में लय हो जाते हैं उसको छठी भूमि कहते हैं । इस मम्मि में योगी पूर्ण समाधि का अधिकारी हो जाता है और परना में लीन होने लगता है जिसका लक्षण हठ योग में ऐसा लिखा है कि श्वास और प्रश्वास दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् इडा पिंगला दोनों नाड़ियां बन्द होजाती हैं और इन्द्रियों द्वारा विपयों को ग्रहण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है साधक निधेष्ट अथात् निर्जीव सा और निर्विकार हो जाता है उस समय पण नाभी से कंठ तक सुपुया की गति से चलता रहता है इसको लगावस्या कहते हैं इसमें सभी संकला विकला उच्चिन हो जाते हैं मौर एकाएक मूछों तो नही हो जाती परन्तु फरवरणादि का व्यापार बन्द हो जाता है शरीर पर यदि कोई कदादि च जाय या मदर और गरिसयां भी काट सायं तो इसका कुछ शान नहीं होता परन्तु अन्तरगत सचेष्ट माय प्रमा करता रहता है इसको असंघज्ञात समाधि कहते हैं इस बानोवाला वही पुल होना है जो उस भवनमा यो पंहुचा है दूसरा नहीं जान सकताको टि देख नहीं सकती पारी वरन नहीं मानी पमी दिनमा लप मोमिनों को है। उत्पन्न होती है॥३१ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहास्यम् । सप्तमी भूमिकां प्रातः पुनः पूर्णतपोबलात् ॥ चिदानन्दसलेलीनोहश्यन्नापश्यदेकदक् ॥ ३२ ॥ पुनः पूर्णतपोबलाद सप्तमीन्भूमिकाम्प्राप्तस्स विधिदा- नन्दजले परब्रह्मकरसेनिमग्न प्रात्मपरमात्मनोरेकी भावन्तः। तदैकदृ- ग्भूत्वा परयन्नपिनापश्यत् ॥ इयं पूर्ण समाधिः । अत्र पूर्यालयावस्थामवति तत्तणम् । यत्र दृष्टिलयस्तत्र भूतेन्द्रिय सनातनी ! साशक्तिीवभूतानां द्वे अलक्ष्ये लपंगते ॥ समाधि- स्तुयथा । सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्यं भजति योगतस्तथात्ममन सोरेक्यं समाधिरभिधीयते ।। यदा संघीयते प्राणोमानसंच प्रली- यते ॥ तदा समरसत्वंच समाधिरमिधीयते ॥ तत्समंच द्वयोरक्यं जीवात्मपरमात्मनोः । प्रनष्टः सर्वसंकल्पः समाधिः सो मिधीयते। राजयोगस्य माहात्म्यं कोवा जानाति तत्वतः ॥ ज्ञानं मुक्तिः स्थितिः सिद्धिर्गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ दुर्लभौविषयत्यागो दुर्लभ- न्तत्वदर्शनम् । दुर्लभासहजावस्था सद्गुरोः करुणाम्विना ।। अन्मिीलितलोचनःस्थिरमनाम्नासाग्रदत्तेक्षणचन्द्रार्कावपि ली. नतामुपनयन्निष्पन्दभावनयः ज्योतीरूपमशेषत्रीजमखिलन्देदीप्य- मानम्परन्तत्वन्तत्पदमैतिवस्तु परमं वाच्यं किमत्राधिकम् ।। इति- हठयोगे । पातञ्जलियोगसूत्रेतु सप्तमी भूमिकालक्षणं यथा- प्रलीनानां तेषां न पुनर्बुद्धिरूपेणपरिणामोभविष्यतीत्येवमा- कारा सप्तमी भूमिः एवं सप्तप्रकाराऽनुभवोयस्य विदुपोजायते तस्य ज्ञाननिष्ठा सद्योमुनिदेति ज्ञातव्या ।। ३२ ॥ इस तरह छठी भूमि को पार कर वह तपस्वी सातवीं योग भूमि में आया और निश्चल नेत्र से देखता भी था तो कुछ नहीं समझता कि क्या देख रहा है । अपने पूर्ण तपो बल से परब्रह्म रूपी जल में डूब गया अर्थात् पूर्ण लय भाव के साथ असंप्रज्ञात श्रीधरिलायतनतीयमाहात्म्यम् । पर होगया पूर्ण सय का लक्षण योगग्राम में लिखा है रीर के अन्दर मूलाधार म्याधिष्ठान नाभिचक हृदयस्यान कमट- माटी और सहमदल इन स्थानों में जहां कही प्रत्रय के न में दृष्टि रहे यहां दो लय दो जाय और पृथिव्यादि पंचम्न मांस कान नाक इत्यादि पांचों कमान्द्रयों के सनातन ध्यागर जो अविद्या एवं प्राणियों की जो वायगालियां हैं ये सब अष्ट परमात्मा में लय हो जायं इसको लय कहते हैं। जलि योग सूत्र में भी सप्तमी भूमिका का वर्णन इस तरह है कि जहां पर छठी भूमि में सत्यादि का तय हुवा है का बुद्धिरूप से फिर कुछ परिणाम न हो उसको सप्तमी भूमि हैं इस तरह सातों भूमिका का अनुभव जिस विद्वान को हो ग है उसकी ज्ञाननिष्ठा तत्काल मुक्ति देनेवाली होती है। समाधि लक्षण योगशास्त्र में लिखे हैं कि जैसे जल में नमक मिलकर हो जाता है फिर अलग नहीं हो सकता वैसे आत्मा और परमत्मा एकता हो तो उसको समाधि कहते हैं। जब प्राण और मन दोनों हो जाते हैं तब आत्मा परमात्मा का एकरस होता है उसको घि कहते हैं। जब जीवात्मा परमात्मा की एकता होती है तब सब ल्प विकल्प नष्ट हो जाते हैं उसको समाधि कहते हैं। हठ योग केवल प्राण को जीतना होता है और उससे कोई काम नहीं चलता नने प्रासन मुद्रा नेति धौती वस्ती कापालकिया नौली और विविध नर के प्राणायाम की सिद्धि प्रत्याहार ध्यान धारणा इत्यादि हैं ये प्राण जो इडा पिंगला नाडी हैं इनको जीतने के लिये है इनके नने पर राजयोगे आरंभ होता है समाधि के अधिकारी हठयोगी गयामादि साधन द्वारा हो जाता है, परन्तु राजयोग के बिना सब -फल है। एक कलावाजों के खेल के ऐसा है । यह परिश्रम राज योग के रा सफल होता है इसलिये साधक राजयोग का अभ्यास भी साथ , .
श्रीकापलायतनतर्थमाहात्म्यम् । १३७
ही प्रारंभ करते हैं राजयोग के बिना लया वस्था नहीं होती जीवात्मा
परमात्मा की एकता नहीं होती तो भी कोई २ भाग्यवान हठयोग बिना ही
राजयोगकी सिद्धि अपने पूर्वपुण्यों के वलसे पालेते है जैसे इसब्राह्मणने पाया
है राजयोग का वर्णन योगशास्त्र में किया गया है कि राजयोग के माहात्म्य
को यथार्थरूप से कोई नहीं जानता ज्ञान मुक्ति,स्थिति और सिद्धि गुरुवाक्य
से प्राप्त जो राजयोग उसी से होती है इस राजयोग के लिये तीन वस्तु
अलभ्य हैं एक तो विपय का त्याग करना, दूसरा तत्वों का
दर्शन तथा तीसरा सहजावस्था तुरीयावस्था अर्थात् योग की
चतुर्थभूमि, ये तीनों पदार्थ गुरु की कृष बिना नहीं मिलते,
तुरीयावस्था के बाद निजशक्ति द्वारा भी काम चल जाता
है
इस तपस्वी को भी तुरीयावस्था तक आने के लिये सांख्याचार्य
कपिलमुनि को ही ध्यानस्थ गुरु बनाना पड़ा था इति ।। और समाधिस्थ
योगी का रूप ऐसा होता है। जो योगी परमसमाधिगत होता है उसकी
दृष्टि नासिका के भागे १२ अंगुल पर प्रकाश में स्थिर रहती है
और सूर्य चन्द्र से मतलब इडा पिंगला से है इन दोनों नाडियों के
व्यापार को लय करके निष्पन्द भाव से अर्थात् निश्चल रूप से अपना
सिद्ध किया हुवा आसन से बैठा रहता है ऐसी अवस्था में
जब काष्ट या पाषाण सदृश स्थिर हो जाता है तब सम्पूर्ण संसार के
नादि चीज पूर्ण सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा के ज्योति रूप जो चमकता
हुवा तत्व है उस पद को देखता है वशिष्ट जी ने कहा है कि अब इससे
अधिक क्या कह सकता हूं जय परम तस का दर्शन हो गया तो अब
इसके बाद कुछ चाकी ही नहीं है ।। १२ ।।
यानिशा सर्व भूतानां तस्यां जागति संयमी।
यस्यां जागर्ति भूतानि सानिशा पश्यतोनुनेः॥३३॥
श्राकापलायतनताथमाहात्यम् । १३८ जो निशा अर्थात् यानिशा अविद्यारूप रात्रि है जिसमें तमाम जगत् सोया हुआ रहता है उसमें इन्द्रिय-निग्रहकारी माहात्मा जागते हैं अर्थात् अविद्या का नाश करके परब्रल की चिन्तना करते हैं। और जिसमें सब जगत जागता है उस शब्दादि विपरूप रात्रि में योगिन सोते हैं अर्थात् यह उनकी रात्रि है ॥ ३३ ॥ देहंच नश्वरमवस्थितमुत्थितंवा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् । देयादुपेनमधदेवयशादपेत- म्बासोयथा परिघुनं मदिरामदान्धः॥३४॥ जो माहात्मा परब्रस को साक्षात्कार कर चुके हैं वे यह नारावान् शरीर रहे या न रहे इसको नहीं देखते । जैसे मदिरा के मद से कोई व्यक्ति अपने पहने हुए दस को नहीं जानता कि उसके शरीर पर है या नहीं ।। ३४ ॥ इनि संजात विज्ञानं मद्रदेशोगवं द्विजम् ॥ दृष्ट्वा मनोनयस्थावान संजानः कपिलोमुनिः॥३५॥ इस प्रकार पोर तपस्या से विज्ञान प्राप्त किया हुआ उस मद्रदेश मानव को देस कपिलमुनि के मन की अनाया हो गई अथात् अय इनके साथ क्या करना चाहिये इस रिचार सचिव चंचल हो गया ॥३॥ स्थानानुत्याय गच्चन्तं शनमीलितापनम् ।। पत्नं मयः नमूनेय गोलमन्यनगरः॥३६॥ मानिनलोयनं ध्यानारस्थं मस्थानान्यापशनगंटन मगुवनं मय प्राता गौरिहरिमंगवान् करिनानमन्वय काशिनायागार गवारियाद' करिनोवाति!३९॥
धीकपिलायनगतीमाहात्म्यम् । नामिका रष्टि को किये हुए थपने स्थान से उटकर धीरे धीरे जाते हुए उस मामय को देस भगवान् कपिलजी ने नयप्रसूता गी बसे अपने रपे के पीछे पीछे चलती है पैसे पीछे २ चलने लगे।३६ निमोन्नतप्रदेशपु गच्छन्तं तं यदृच्छया ।। घावं धावं द्विजस्याग्रेस समं देशमानयत् ॥ ३७॥ जब अपनी इच्छा से परिग्रमण करता हुवा यह ब्राह्मण कहीं नीचे सट्टे की तरफ जा पड़ता था या कहीं ऊंची जगह पर चढ़ने लगता था तो उसके आगे दौड़ दौड़ कर उसका हाथ पकड परावर जमीन पर लातेथे क्योंकि अपने ध्यान में निमम वह प्रालय भागे कुया हो या पहाड सीधाही चलता था और श्रांखें ईश्वर को ही देखने में लगी रहती थी उससे संसारी काम तो लेता था ही नहीं इसलिये भक्तवत्सल भगवान् को उसे संभालना पड़ता था ॥ ३७॥ भुनानं कापि तं विप्रं सदा मीलितलोचनम् ।। मक्षिकारक्षणं कुर्वन् भोजयामास भृत्यवत् ॥ ३८ ॥ भगवान् भक्तों के खरीदे हुए दास हैं जो ईश्वर के सच्चे दास वनजाते हैं वे वास्तव में ईश्वर पनते हैं दास तो ईश्वर को ही बनना पड़ता है अब यहां ही देखिये जब कभी वह ब्राह्मण अांखों को बन्द किये हुवे भोजन करने बैठता था तो भगवान दासों की तरह उसकी थाली से मक्खियों को हटाते हुए मोजन कराते थे ॥३०॥ पानीयं पिवतः कापि तनिष्टं यत्तृणादिकम् ॥ प्रहृत्य दूरीकुरुते हरिः सद्वत्सलः स्वयम् ।। ३६ ।। कभी पानी पीने लगता था तो जलपात्र में कोई घास फूस पड़ जाता था उसको निकालकर दूर करते थे क्योंकि भगवान् श्रीकापिलायतनतीर्थमाहात्म्यन् । मक्तवत्सल हैं और जिसकी इतनी सावधानी से सेवा कर यह जानना भी नहीं कि मेरे सामने कौन है ? क्योंकि श्रांखें तो चन्द होकर और ही कुछ देखरही हैं इतना अवकाश कि इनको पहचाने। हजार सेवा करते रहें यह माने य मम समझता क्या है ! वेतन तो पहले ही चुका दिया है ।। ३३ कदाचित्तिष्ठतिकापि सनिः स्वस्थमानसः॥ परमात्मारमाकान्तस्तदा पिश्रम मनाक् ॥ ४० ॥ जबरदमुनि कमी दिसी जगह परमात्मा का ध्यान करता खग दोकर बैठना था तो भगवान् रमाकान्त भी मोदी करते थे नोकरी साधारण नही थी दिनरात पहरा देना था ना- एकही थी मगर मे ही दो भार मगगन और दोले सो कुन म की नोकरी करने के बाद मामलोपमा विश भोर नोहर मिल दिन पा॥१०॥ पयं यतः मषिमागी निर्ममानिरहं गृतिः। ग्राममतः ग्यतः काल गंजदीपालेयरग ॥४१॥ पर मान्को मामिला क्या मार ने मामर भोर fortant any मे अपने मान का मय पर होगा पर माना॥ নামাঃ খ না। নামলাে সাধাৰঃ শাখাসা । चार साम? MF १६५/ १rmara!! TET या ४१ ।।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहाल्यम् । तदेहं श्वशृगालाद्या भक्षयामा सुरोजसाः॥ ते प्रापुरुत्तमं जन्म विमुक्ताः पापयोनितः॥४३॥ उसके मृत देह को कुत्ते शृगाल गृध काकादि नर मांसभक्षी जानवर खा गये और इस पवित्र मांस को खाने से वे भी पापयोनि से हुक्त होकर उत्तम जन्म पा गये ।। १३ ।। विमानयानस्सङ्गच्छन् गोकर्णशियदर्शने ॥ उल्ललङ्घतदान कदाचितुलझापतिः॥४४॥ उस ब्राझण के देहावसानानन्तर किसी समय अलकापति कुबेर अपने पुष्पकविमान पर बैठे हुए मोकर्णनाथ महादेव का दर्शन करने को आकाशमार्ग से जा रहे थे सो मार्ग में उस ब्राह्मण के देह की हड्डियां पड़ी थीं उसको उल्लंघन करदिया ॥१४॥ सविमानः पपाताशु पृथिव्यां नरवाहनः।। तदस्थिलंघनोद्भूतदोषादुल्तमदैवतम् ॥ ४५ ॥ कुबेर का वाहन पालकी भी है जिसको नरवाहन कहते हैं इसलिये यह विशेषण कुबेर का है। नरवाहन कुबेर उस अस्थि को लंघन करने के दोष से विमानसहित उसी समय पृथ्वी पर गिरगये क्योंकि .वह अस्थि उत्तम दैवत थी अर्थात् एक परमतपस्वी की थी॥ ४५ ॥ पतितश्चिन्तयामास तदापतनकारणम् ।। पतनं येन संजातं तत्स्वयंनायवुदवान् ॥॥४६ ।। जर कुबेर विमान के साथ जमीन पर यागये तो अपने गिरने का कारण सोचने लगे परन्तु जिस कारण से गिरे थे सो नहीं जान सके ।। १६॥
ना? -- ब + - क . की फठि. R एक तरह भ श्रेष्ठ ग्रह पर अप नामरू नामरूं जेसे: মৰা ই मा हुभा श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । सरोवर में डाला । और मांस खानेवाले जानवरों ने अपनी पाफ्यानि से मुक्त होकर उत्तम जन्म पाया ॥ ५० ॥ गत्या गोकर्णनिकटं दृष्ट्वा तचरणद्वयम् ॥ सर्व वृत्तांतजातं स शंभुं पप्रच्छ विस्मयात् ।। ५१॥ कुबेर ने गोकर्णनाथ के निकट जा उनके चरणों को वन्दना कर रास्ते की सब कथा श्राश्चर्य के साथ भगवान् शंकरजी से कही और इसका कारण पूछा ॥ ५१॥ शंभु स्तस्मै यथावृत्तं कथयामास विस्तरात् ॥ सोपि श्रुत्वा मुद्रा युक्तचाययौ स्यालय पुनः ।। ५२ ।। भगवान् शुभदेव ने उस तीर्थ की और तपस्वी ब्राह्मण की सब कथा कह सुनाई सुनकर बड़े हर्ष के साथ अलकाधिपति अपने भवन को थाये ॥५२॥ थागच्छत् स्वगृहं देवः सस्नो तस्मिन्सरोवरे ॥ स्नात मात्रस्य तत्राशु फुष्टं नष्टमभूक्षणात् ।। ५३ ॥ कुबेरदेव ने भी अपने घर को श्राते हुवे उस सरोवरे में स्नान किया और स्नान करने के साथ ही बहुत दिनों से उनके शरीर में लनी हुई फुटव्याधि थी सो नष्ट हो गई और दिव्य देव हो गया ।। ५३ ।। इयं पंचेतिहासी मे पंचानानमुवाच्लुना ।। प्रीत्यर्थ फाधिता तुभ्यं स्पसीपैः पंचभिमुग्दैः ।।५४ ॥ ये पांच इतिहास से संयुका कथा मैं ने भरने पिना पंचानन शिवजी के पांचों मरों से मुनी थी सो तुम्हारी प्रीति के कारण तुमसे कही है ।। ५४॥
१५५ शिपिनायतन माहात्म्यम् । यां श्रुत्या श्रद्धया घोरी नगेयाति कृतार्यताम् ।। किंपुनः मेयमानः मन् सदासिदः सरोवरः॥ १५॥ निस कथा को बुद्धिमान मनुष्य प्रतापूर्वक मुनकर ही कृतार्य होनाते हैं उस सिद्र सरोवर का यदि सदा सेवन किया जाय तो फिर क्या ! अर्थात् सर मनोरय सफल होनायं ॥ २५ ॥ श्रग्रयदपिते मत्यैः स्वल्पंतन्मेन्ताम्बजेत् ।। यत्र पत्क्रियते किश्चित्तदक्षयफलंभवेत् ।। ५६ ॥ भगवान् स्कन्ददेव की कथा अगत्य ऋषि के प्रति समाप्त हुई। श्रय स्तजी शौनकादिकों से अन्योपसंहार में कहते हैं कि इस तीर्थ में रेणु तुल्य भी दान किया जाय तो मेरु के समान होता है और यहां जो तपस्यादि किये जाते हैं उनके अक्षय फल होते हैं ।। ५६ ॥ कृत्वाताम्रतुलामत्र दद्याद्रनतुलाफलम् ॥ अत्र समान्पपेनोर्यद्दानं प्रकुरुते सुधीः ॥ ७ ॥ फलंतूमयतोमुख्यास्तस्पस्या दाशुनिश्चितम्॥ एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोठिर्भवति भोजितः॥५॥ इस तीर्थ में यदि ताम्रतुला का दान किया जाय तो रत्न के तुलादा का फल हो और यदि साधारण गौदान करे तो उभय मुखी गौदा करने का फल निश्चयपूर्वक और तत्काल ही मिले। तया इस ती में एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाय तो कोटि ब्राह्मणों के मारे कराने का फल होता है।। ५७, ५८ ॥ एवं सर्वमपि स्वल्पं भूरी भवति भेदतः ॥ यस्ययस्येह देवस्य प्रासादं कारयेत्सुधीः ॥ ६ ॥ तस्य तस्यैव देवस्य समानत्वं समाप्नुयात् ।। , -- श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । इसी प्रकार सभी दान व्रत आदि थोड़ा भी यहां किया जाय ता तीर्थ के प्रबल माहात्म्य के वश बहुत होजाते है और विचारवान् मनुष्य यहां पर जिस जिस देवता के मन्दिर बनवाते हैं वह उसी उसी देवता की समानता को प्राप्त हो जाते हैं ।। ५ ।। शिलाभिः सेनुयन्धं यः कारयेद्धनधान्नरः॥ सत्तीर्थतुल्यमाहात्म्योजायते सध्रुवंभुवि ।। ६० ॥ जो धनी पुरुष इस तीर्थ में प्रस्तर के शिलाओं से सेतु बन्धावे और सरोवर में सुख से स्नान करने वास्ते घाट बनवावे वह पृथ्वी में निश्चय रूप से तीर्थ के बराबर पूज्य हो जाता है ।। ६० ॥ इति ते सर्वमाख्यातं मया शौनक पावनम् ॥ तीर्थ रत्नस्य माहात्म्यं यतोनास्तिवरंपरम् ।। ६१ ॥ हे शौनक ! यह पवित्र तीर्थमाहात्म्य मैने तुझ से कहा है। इसके उपरान्त इससे श्रेष्ठ और किसी तीर्थ के माहात्म्य नहीं है ॥६॥ इति कार्तिककापिलेययोमहिमानं महनीयभापितम्।। प्रदहेदिह पातकं क्षणाच्छृणुते आययतेच भसितः ॥६२ यह कार्तिक मास और कापिलेय वार्थ की महिमा पूज्य जनों की कही हुई है जो मनुष्य भक्ति पूर्वक सुनता है और सुनाता है वह सण मात्र में अपने पातकों को जला देता है ।। ६२ ।। ति भीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्पसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये श्यमाको नाम मारमोयायः।
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