Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Rachna Ka Samajik Adhar
Front matter
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रचना का सामाजिक आधार
डॉ० सूरज पालीवाल
हिन्दी विभाग
जोधपुर विश्वविद्यालय, जोधपुर
M साहित्यागारजयपुर
साहित्य अकादमीउदयपुर
सा
राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के
आर्थिक सहयोग से प्रकाशित
प्रकाशक
प्रथम संस्करण
सर्वाधिकार
मूल्य
मुद्रक
साहित्यागार
एस एम.एस. हाईवे
जयपुर-302 003
1990
लेखक
साठ रुपये मात्र
अजमेरा प्रिंटिंग वसं,
जौहरी बाजार जयपुर।
पूज्य पिताजी के लिये सादर
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भूमिका रचना का स्रोत सामाजिक जीवन है। महान् रचना सामाजिक कार्य-कलापो से निरपेक्ष रखकर नहीं की जा सकती। लेखक का यह दायित्व है कि वह अपने समय के यथार्थ की गहरी छानबीन कर उसे कलात्मक रूप में प्रस्तुत करे। वे बहस अब निरर्थक हो गई है, जिनमे रचना के सौदर्य-पक्ष को ही प्रसिद्धि का कारण मानकर रचना की सामाजिक उपादेयता और उसके अनत लक्ष्य को मोथरा किया जाता था। परिवर्तित जीवन को रचना अपना विषय बनाती है। वह जीवन के प्रति न निराशा जगाती है और न उसको स्वणिम मान इठलाती ही है। सघर्पो मे ही वह जीवन की सार्थकता तलाशती है, उसे उपयोगी वनाती है । मनुष्य की अहम्जन्य कु ठित भावनामो को विस्तृत पटल पर खोलकर वह उसे सामाजिकता प्रदान करती है। रचना के इसी पक्ष को इस पुस्तक मे सग्रहीत चौदह निबन्ध पूरी तरह प्रस्तुत करते है । रचना, रचनाकार और आलोचक के परस्पर सम्बन्धो, उनके उत्तरदायित्यो का निर्धारण तथा आज के वातावरण मे उनकी सार्थकता की तलाश करने का प्रयास किया गया है। हिन्दी मे रचना का सामाजिक आधार और आलोचना को सामाजिक कसौटी देने वाले प्रेमचद और प्राचाय रामचद्र शुक्ल के बिना यह पुस्तक अधूरी रहती, इसलिये इन पुरोधा साहित्यकारो के महत्व को उनकी यथार्थ-जीवन की सूक्ष्म पकड के सदर्भ मे परखा गया है। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा आयोजित उपनिषदो मे पत्र-वाचन एव पत्रिकामो मे प्रकाशन के लिये लिखे गये ये निबन्ध मूल रूप मे सामाजिक सरोकारो की प्रतिष्ठा करते है। अपने उद्दश्य म यह पुस्तक कितनी सफल होगी, इसका निर्णय सुधी पाठक ही बरगे।
गुरुवर प्रो० कुवरपाल सिंह ने साहित्य को देसने-समझने की जो वैज्ञानिक दृष्टि दी है, उसी पर चलकर यहां तक पहुंचा हूं। उनकी अनवरत् कृपा के लिये कृतज्ञ हू । कथाकार टो० हेतु भारद्वाज से निरंतर ऊर्जा पाता रहा है, उनके सहज व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धानत् हूं। इन निबन्धो को पुस्तक के रूप में देसने या स्वप्न पत्नी शोभा ने पहली बार देखा। अपने स्वप्न को साकार करने में उन्होंने जितना श्रम किया, उसके लिये कुछ कहना मौपचारिकता ही होगी। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के प्रार्थिक सहयोग के लिये हार्दिक आभार प्रगट करता हूं। सुरुचि सम्पन्न और तत्पर प्रकाशन के लिये भाई श्री रमेश वर्मा हादिक साधुवाद के अधिकारी हैं । गणतत्र दिवस, 1990 हिन्दी विभाग, जोधपुर विश्वविद्यालय, जोधपुर। सूरज पालीवाल
अनुक्रम
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1. रचना और आलोचना का प्रत सम्बन्ध
2 ग्रामीण शोषण मे सरकारी कर्मचारियो की भूमिका
3 'गबन' मे अभिव्यक्त समसामयिक भारतीय परिदृश्य
4 निर्मल वर्मा की कहानियो का परिवेश
5 सतह से ऊपर उठते आदमी की त्रासदी
6 साम्प्रदायिकता और हिंदी-उपन्यास
7 साहित्यकार की राजनीतिक भूमिका
8 अतीत और वर्तमान की रोमानी व्याख्या
9 नागार्जुन के उपन्यासो मे राजनीतिक चेतना
10 लेखक और लोकतत्र
11. नारी शोपण और 'कब तक पुकारू'
12 रेणु की कहानियो मे अभिव्यक्त जाति-प्रथा
13 माक्सवाद और साहित्य
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आ० रामचद्र शुक्ल और उनकी इतिहास-दृष्टि
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रचना और आलोचना का अंतः सम्बन्ध जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है रचना पहले है और आलोचना वाद मे। रचना का आलोचना से क्या सम्बन्ध है और दोनो एक-दूसरे से कहाँ और किस प्रकार जुड़ी हैं, इसका विवेचन करना, रचना और आलोचना कर्म से जुडे संसार को देखना है-सम्पूर्णता में। लेकिन यह सम्बन्ध जितना साफ दिखता है, उतना है नहीं। जीवन की जिन बारीक उलझनो को रचना सुलझाती है, पालोचना उन्हे और स्पष्ट करती है। जीवन-यथार्थ को मानव-मर्म से देखने और अनुभव करने का काम रचना करती है तो आलोचना जीवन-यथार्थ के मानव-मर्म को बौद्धिक-दृष्टि से तलाशती है। इस प्रकार यह सम्बन्ध मानवीय सवेदना और जीवन- यथार्थ के ताने-बाने से बुने रहते हैं । रचना जीवन की व्याख्या है तो आलोचना रचना मे रचे जीवन और जीवन-यथार्थ की व्याख्या है। रचनाकार और पालोचक दोनो का कर्जा-स्रोत मानव जीवन ही है। मानव जीवन के यथार्थ से लेखक की जितनी निकटता होगी उसकी पकड उतनी ही गहरी होगी। जीवन अनेक रग रूपो वाला है, इन रगो की पहचान और रूपो के प्रति आस्था ही लेखक को सजीवता प्रदान करती है। उसके जगत के अतर-बाह्य पक्षो के अनुभव जितने तीव्र होगे, रचना उतनी ही सजीव होगी। आलोचक इस सजीवता से साक्षात्कार कर उसके यथार्थ के स्तरो से पाठक को परिचित कराता है। पहली बात तो यह कि रचना मे सृजित यथार्थ इकहरा नहीं होता। उसकी कई पर्ते होती है। आलोचक इन पों को खोलकर उनके भीतर छिपी मानव-सवेदनाओ और मानवीय मर्म को सामने लाता है। दूसरा यह कि रचनाकार के लिए जितनी शक्ति उसके अनुभव देते है, आलोचक के लिये भी यह उतना ही जरूरी है । पालोचक के पास यदि अनुभव नहीं होंगे, जीवन के मार्मिक प्रसंगों से उसका परिचय नही होगा, मनुष्य की कुटिलताओं, क्षुद्रताओं, योछाइयों और कमीनगियो के बीच मानवीय सम्बन्धों की टूटन की पहचान नही होगी, मनुष्य और मनुष्यता के प्रति आस्था नहीं होगी, तो वह रचना में छिपे मर्म तक नही पहुंच सकता। इसलिये आलोचक के लिये यह आवश्यक है कि वह जीवन यथार्थ से पूरी आस्था के साथ जुड़े। रचनाकार के दायित्व-बोध की अपेक्षा आलोचक की भूमिका अधिक जटिल एवं खतरों मे भरी भी है। रचनाकार-रचनाकर्म के पश्चात् मुक्त हो सकता है लेकिन पालोचना हमेशा उससे जुड़ी रहती है । पालोचक के पास रचना के मर्म तक पहुंचने की दृष्टि तो होनी ही चाहिये, साथ ही वह विवेक-सम्मत, तटस्थ और तुलनात्मक दृष्टि भी जारी है जिससे वह रचना के भीतर सृजित जीवन यथार्थ को समझकर उसकी प्रगतिशील अथवा प्रतिगामी, सामाजिक सरोकार एवं कलात्मक पक्षों से सम्बन्धित भूमिका का उद्घाटन कर सके । पालोचना कर्म उस वारीक छलनी की भूमिका के समान है जो रचना के भीतर छिपे मार्मिक जीवन-प्रसंगों और लेसकीय-मंतव्यों को उभार फर पाठक के सामने उन्हें गोलकर रसता है। मर्मी आलोचना से रचना जीवनदान ही नहीं पाती, अपनी भीतरी प्रसरता से पाठक को अभिभूत भी करती है। दूगरी मोर सतही मालोचना रचना के तेज को तो कम करती ही है, उगे इतिहास के गर्त में हुयो भी सकती है। प्राचार्य शुक्ल की कबीर यो पालोचना मे मवीर की महत्ता कुछ समय मोगल हो गई थी, लेकिन हजारी प्रगाद द्विवेदी ने अपनी मर्मी मालोचना से पचोर को प्रासगिक सोनी वलि पेट कवि केम्प में प्रतिष्ठित किया। रचना के लिये राष्ट पानोपना उम्री है तो पालोचना के लिये श्रेष्ठ एवं कलात्मक रगना भी जारी है, सनी दोनों का भविष्य उग्ग्यत हो सकता है। ग्गना पोर पानोपना के प्रस: गम्बन्धों पोपरगने पे यह मष्ट पर देना पापपररोगा कि दोनों के सम्यन्य मंत्रीपूर्ण हो। यदि ग्गनापरवा परमाने मोहिमालीपर उगा पिरोपोर पोर मन पामा पररपा शिपापर न उसके प्रति पोरन नगरी पनामार रागात पर पिनि दोहोगी।
हिन्दी मे ही नही अपितु विश्व-साहित्य मे यह स्थिति बनी हुई है कि रचनाकार आलोचक को द्वितीय श्रेणी का मानते हैं और यह पहले से ही मानकर चलते है कि आलोचक के पास वह दृष्टि नहीं है जिससे वह रचना का सही मूल्याकन कर सके । इसके मूल मे तथाकथित आलोचको द्वारा किये गये अविश्वसनीय आलोचना कर्म भी है। छोटे-मोटे समीक्षक दार्शनिक मुद्रा अपनाकर अालोचक बन बैठते है। उनकी दृष्टि मे रचना मे निहित जीवन नहीं बल्कि अपने सिद्धात प्रमुख होते है। ऐसी स्थिति मे पालोचना निश्चित ही द्वितीय कोटि का कर्म बन जाती है। लेकिन इस प्रकार की स्थिति को अतिम नही मान लेना चाहिये । हम मानते हैं कि इस प्रकार की आलोचना रचना के साथ न्याय नही कर सकती । उदाहरण के लिए प्राचार्य शुक्ल द्वारा की गई छायावाद की एकपक्षीय आलोचना ने छायावादी कवियो को अपनी रचना के मर्म और लेखकीय निष्ठा को स्पष्ट करने के लिये स्वय आलोचना कर्म अपनाना पड़ा। इस प्रकार की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब रचनाकार और आलोचक एक-दूसरे से प्रात्मीय सम्बन्ध स्थापित नही कर पाते । छायावादी-काल मे आलोचना के शिखर पर पहुंचे प्राचार्य शुक्ल की दष्टि मध्यकालीन कवि तुलसी-सूर के भक्ति पर आधारित जनरजन- कारी काव्य से अभिभूत थी। इसलिये वे प्रसाद और निराला के आधुनिक भाव-बोध और नवीन चेतना के काव्य का मूल्याकन न कर सके। फलत छायावाद के मानवीय सम्बन्धो के चितेरे कवि प्रसाद और जीवन-यथार्थ को प्रस्तुत करने वाले कवि निराला के काव्य की उन्होने या तो उपेक्षा की या एकागी आलोचना । आगे चलकर मुक्तिबोध और डॉ. राम विलास शर्मा ने अपनी प्रखर आलोचना दृष्टि से इन कवियो की सघर्षशील और प्रासगिक भूमिका को उद्घाटित किया। छायावाद के बाद प्रगतिवाद मे जिस प्रकार का सर्जन कर्म सामने आया उसमे भी रचना और आलोचना के परस्पर सम्बन्धो का पूर्णरूपेण निर्वाह नही किया गया। पालोचक के पास जीवन निरपेक्षता नहीं बल्कि आत्म-निरपेक्षता होनी चाहिये, तभी वह रचना मे आये जीवन- संघर्षों के सत्य से परिचित हो सकता है। प्रगतिवादी आलोचको ने जीवन-सापेक्षता के साथ आत्म-सापेक्षता को भी समान महत्व दिया, जिसके कारण भालोचना के जो मापदण्ड गढे गये वे नकली जीवन के 3 थे। इन आलोचकों ने प्रयोगवादी रचनाओं को भी इन्ही कसोटियों पर परखा । फलतः कुछ प्रयोगवादी कवि प्रारम्भ में जो समाज सापेक्ष और जीवन सवर्षों के यथार्थ को बारीकी के साय उभार रहे थे, वे कुंठित हो गये और अपनो दिशा बदल ली । उदाहरण के लिये गिरिजा कुमार माथुर को लिया जा सकता है। वे प्रारम्भ में अच्छी राजनीतिक कविताये लिख रहे थे। उन पर प्रगतिवादी आलोचकों ने इतने आक्रमण किये कि वे भी अज्ञेय के प्रयोगवादी ढाल में छिप गये । पालोचक अपनी विशाल अनुभव दृष्टि से रचना में आये जोवन के यथार्य को परखे, उभारे और उसको सवेदनात्मक व्याख्या करे, न कि अपने प्रात्म सापेक्ष और वोद्धिक आदर्शपूर्ण मानदण्डों पर रचना को परखे। आलोचक का यह चातुर्य ओर बौद्धिक व्यायाम आलोचना को हानि ही पहुंचाता है । आलोचक जब तक विस्तृत दृष्टिकोण से साहित्य को नही देखेगा, तब-तक वह न्याय नहीं कर सकता। खंड दृष्टि खंडित दृष्टि ही है। सम्पूर्णता में न देख पाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न होती है । सामाजिक स्थितियों के विकास से सम्बद्ध घटनामो के पालोक में ही साहित्यिक आंदोलनों को परख की जानी चाहिये । छायावाद पर काम करने वाले अधिकतर आलोचक प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी तक ही सीमित रहे है। भगवती चरण वर्मा, नवीन, माखन लाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान और गुरु भक्त सिंह जैसे प्रखर कवियों के साहित्य को पढ़ने तक का कष्ट नहीं करते। छायावाद का सम्पूर्ण अध्ययन तभी सभव होगा, जब छायावाद के समानांतर राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित कवियो का अध्ययन भी किया जाये और देखा जाये कि एक ओर यह राष्ट्रीय चेतना से सीधे-सीधे जुड़े कवि है जो आजादी के लिये संघर्ष कर रहे थे और दूसरी ओर प्रख्यात छायावादी कवि जो छाया- वादी शैली को अपना कर सर्जन कर रहे थे। एक ही युग में रचना की विषय-वस्तु और शिल्प के धरातल पर दिखाई पड़ने वाले इस अतर को स्पष्ट करना हो सार्थक आलोचना-कर्म है। रचनाकार जीवन की समस्यायों को गहराई से तभी उभार सकता है जन उसके सामने स्वस्य जोवन-दृष्टि हो और विशाल जीवन-अनुभव हो । वह जोवन से जितना गहरा जुड़ा होगा, उसके मन में उतनी ही छटपटाहट होगो, परिवर्तन के लिये मन में टीस होगो, लोगों के प्रति 4 अपार प्रेम होगा, और मानवता के लिये अटूट आस्था होगी। उसकी रचना मे यह सब आना ही चाहिये । वह इनसे बच नहीं सकता। यदि उसकी पकड जीवन के प्रति सतही है तो उसकी रचना मे जो जीवन व्यक्त होगा, वह सतही ही होगा। इस प्रकार के लेखको की रचनामो मे अभिव्यक्त सतही जीवन की व्याख्या आलोचक कैसे करे, यह उसके मर्म-विवेक पर निर्भर करता है । उसके लिये आवश्यक है कि वह जीवन के प्रश्नो को पूरी गहराई और प्राकुलता के साथ उठाये । रचनाकार भी जीवन के प्रश्नो को उठाते समय विवेक और सवेदना से परिपूर्ण हो । यदि ऐसा नहीं किया गया तो निराशा, कुठा, हताशा आदि व्यक्ति- वादी मूल्यो का ससार निर्मित हो जायेगा। जैसा कि प्रयोगवादी और नयी-कवितावादियो ने किया। इस प्रकार का साहित्य मानवता को दिशा नही दे सकता। यह स्थिति स्वय को समाज से अलग कर देखने के कारण उत्पन्न होती है। व्यक्तिवादी स्थितियो मे जकडा लेखक सामाजिक-जीवन के अतविरोधो को न समझ पाने के कारण उसके सामने आई परिस्थितियो के मूल को भी नहीं समझ पाता। उसे लगता है कि जो कुछ वह झेल रहा है, केवल वही झेल रहा है। उसका कोई साथी-सगी नही है। वह अकेला ही तिल-तिलकर टूट रहा है। और व्यक्तिवादी आलोचक उसके शब्दो पर रीझते है, उसके कौशल पर न्यौछावर होते है, उसकी रचना मे आये सामाजिक अवरोधो की तरफ सकेत भी नहीं करते, क्योकि वह स्वय भी सामाजिक अनुभव शून्य होते हैं। यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रचना और आलोचना अपनी ईमानदारी मे दोनो ही प्रथम-कोटि की हैं । आपसी सम्बन्धो के घनत्व इन्हे समानता प्रदान करते हैं। यह कहना कि रचनाकार की बराबरी आलोचक नही कर सकता, गलत है। दोनो के मार्ग अलग-अलग हैं, माध्यम अलग-अलग हैं-अक्ष्य तो एक ही है। प्रत्येक रचना आलोचक की राय चाहती है और प्रत्येक पालोचना के मूल मे रचना होती है। रचनाकार जिस अनुभव-जगत की व्याख्या अपनी रचनायो मे करता है, आलोचक उसे प्रामाणिकता प्रदान करता है। आलोचक का यह कर्म कठिन और आत्मनिरपेक्ष किन्तु जीवन-सापेक्ष कर्म है। रचना और आलोचना दोनों के मूल मे जीवन होता है, वह जीवन जिसे दोनो अच्छी प्रकार व्यक्त या स्पष्ट करती हैं और अपनी पूरी सवेदना के साथ 5 अनुभव करती है। जीवन के अतविरोधो को तलाशने और पकड़ने के प्रति उत्कट इच्छा तभी हो सकती है, जब रचनाकार के मन मे जीवन की बुराइयो को दूर करने और नया बेहतर समाज बनाने की इच्छा अकुला रही हो। यह अकुलाहट जितनी तीव्र होगी, रचनाकार की पकड उतनी ही गहरी होगी। आलोचना इस अकुलाहट की ईमानदारी की जाँच करती है और रचना मे आये जीवन एव मानव-सम्बन्धो की सूक्ष्म पडताल करती है। यह कार्य तभी सभव हो सकता है, जब पालोचक की जीवन के प्रति पकड गहरी और मजबूत हो। उसके मन मे जीवन को अच्छा बनाने की तडप हो। पालोचक रचना मे आये नकली जीवन को तभी पकड सकता है, जब वह जीवन को अच्छी प्रकार जानता हो। यदि उसकी दृष्टि वैज्ञानिक और विवेक सम्मत नहीं है, मानव-सम्बन्धो के द्वर को वह नही जानता, पूजीवादी-व्यवस्था के अतविरोधो को वह नही जानता तो यह काम उसके बस का नही है । जयशकर प्रसाद की कामायनी पर मुक्तिबोध द्वारा की गई पालोचना इस बात का प्रमाण है कि यदि पालोचक रचनाकार के स्वभाव, परिवेश और उसकी विचार-सारणियो से परिचित है, तो वह आलोचना को मौलिक योगदान देकर रचना को भी नया अर्थ प्रदान कर सकेगा। इस प्रकार रचना के समानातर आलोचना भी सर्जन है जो सृजित यथार्थ को नवीन दृष्टि से व्याख्यायित करके पाठक के लिये सुबोध, सुपाठ्य और ग्राह्य बनाती है। मूलत. आलोचना रचना को व्याख्या । सस्कृत से लेकर आज तक के साहित्य से यह बात साफ हो जाती है। यही कारण है कि बडी रचना ने बडे आलोचक तो दिये परन्तु किसी वडी आलोचना ने रचना- कार पैदा नहीं किये। अपवाद भले ही मिल जाये। आलोचना रचना की होती है। आलोचना पढकर रचना नहीं की जा सकती। इसके उदाहरण हिन्दी से ही दें तो अपनी वात और साफ हो सकती है। तुलसी ने प्राचार्य शुक्ल जैसे आलोचक दिये, जिन्होने अपनी आलोचना के केंद्र मे "जनता की चित्तवृत्तियो” को रखा । तुलसी की महानता का कारण धार्मिक नही, बल्कि लोक-जीवन की गहरी पकड है। लोक के प्रति अपनी आस्था के कारण तुलसी महान् है, यह सोने मे सुगध है कि कलात्मक दृष्टि से भी रामचरित मानस उत्कृष्ट रचना है । शुक्ल जी लोक-जीवन के प्रति आस्था को ही आधार बनाते है। यह तुलसीदास का योगदान है। लेकिन आलोचना पढकर किसी रचनाकार ने कोई वडी रचना की हो यह कम से कम हिन्दी मे तो देखने को नहीं मिलता। आलोचको ने अच्छी रचनाओ की जो व्याख्या की है, उससे रचना और रचनाकार प्रतिष्ठित अवश्य हुये है। अच्छी रचनात्रो के मूल तक पहुँचने के लिए जिस दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह आलोचक के पास नहीं होगी, तो वह रचना में व्यक्त जीवन और उसमे पिरोये गये विचार को देव-समझ नहीं सकता । वह दृष्टि जीवन से मिलती है, जीवन सवधो से मिलती है। आलोचक रचना मे छिपे अर्थों को वारणी देता है, उसमे वरिणत जीवन की व्याख्या के द्वारा नवीन सृजन करता है । एक वात और स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि रचनाकार के जीवन आदर्शों और जीवन-सघर्षों से जब-तक आलोचक पूर्णतया परिचित नहीं होगा, तब-तक वह रचना को अच्छी तरह समझ नही सकेगा। प्राचार्य शुक्ल द्वारा तुलसीदास और राम विलास शर्मा द्वारा निराला की आलोचनाओ से यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है। प्राचार्य शुक्ल ने मध्ययुगीन परिस्थितियो और तत्कालीन समाज को समझकर तुलसी के लोक-ग्राही सदेश की व्याख्या की है, डॉ शर्मा निराला के जीवन सबधो के आलोक मे उनकी रचनाओ की व्याख्या करते हैं । यह काम निश्चय ही महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की आलोचना, मालोचना कर्म को नये अर्थ देती है, रचना को प्रतिष्ठा देती है और रचनाकारो के सदेश से जन-जन को परिचित कराती है। रचना और मालोचना के अत सम्बन्धो पर तभी कुठाराघात होता है, जब पालोचक की आस्था जीवन-सघर्षो मे नहीं होती, जीवन के अतविरोधो की पकड नही होती एव मानवीय-मर्म को देखने की दृष्टि नहीं होती। ऐसा आलोचक आत्मनिरपेक्ष तो हो नही पाता, वह जीवन-निरपेक्ष हो जाता है। रचना मे अपने अह के दर्शन करता है, उन्ही की व्याख्या करता है। ऐसे आलोचक केवल स्वय को निहारते रहते हैं, रचना उनके लिये अपने अह प्रदर्शन का माध्यम है। जो उनके अपने है, वे महान् है और जो उनके खाचे मे फिट नही बैठते, वे घटिया हैं। शोतकालीन दौर मे ऐसी आलोचनाये खूब हुई और आज भी पत्र- पत्रिकामो मे समीक्षा के नाम पर ऐसी आलोचना अधिक हो रही है। 7 ऐसे आलोचक रचना, रचनाकार और पाठकों को कुछ नया नहीं दे पाते । निष्कर्यतः, जीवन-यथार्थ की गहरी पकड़ रचना और आलोचना का केंद्र है । रचनाकार के गहरे जीवन-अनुभव और स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टि ही सफल रचना का आधार होते है। आलोचना के लिये भी आलोचक के पास गहरे जीवन-अनुभवों और मानव-मर्म के वोध वाली दृष्टि का होना आवश्यक है। यही रचना और आलोचना के अंत:- सम्बन्ध का मूल है। सही आलोचना से रचना जीवनदान पाती है तो उत्कृष्ट रचना से आलोचना की बारीकियो को नया आयाम मिलता है। इस प्रकार आलोचना और रचना का अंत: सम्बन्ध इतना गहरा है कि एक के अभाव में दूसरी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा दिखाई देता है। , 0 ग्रामीण शोषण मे सरकारी कर्मचारियो की भूमिका फणीश्वरनाथ रेणु मूलत ग्राम जीवन के पहले लेखक है, जिन्होने भारतीय ग्राम को पूर्णता के साथ, वहा की तमाम सुन्दरता और असुन्दरता के साथ, वहा की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितियो के साथ चित्रित किया है। रेणु ने जिस दृष्टि से गाव को देखा- परखा है, वह अपने समय के किसी अन्य लेखक के पास नहीं है। ग्रामीण जीवन के जीवत अनुभवो से समृद्ध "मैला आँचल" को जो प्रसिद्धि मिली, उसके कारण कुछ शहराती लेखक भी ग्रामीण जीवन पर अपनी कलम आजमाने लगे, लेकिन अनुभवो के अभाव मे गाव की जटिल जिंदगी के ताने-बाने से अनजान ये लेखक कोई अच्छी कृति नही दे सके । रेणु के पारभिक दो उपन्यास “मैला आँचल" और "परती परि- कथा" ग्राम भित्तिक उपन्यास हैं। ग्रामीण जीवन के बारीक रेशो को जिस कलात्मकता के साथ सजाया गया है वह मात्र यथार्थ जीवन की अभिव्यक्ति ही नही बल्कि कथाकार की वस्तुगत जीवन की सम्पृक्ति का प्रतीक है। उपन्यासकार के लिये यह आवश्यक भी है कि उसका सम्बन्ध दैनन्दिन-जीवन की प्रत्येक घटना से जुड़ा हुआ हो। दैनन्दिन-जीवन की घटनाओ और उसके मूल मे पहुचने के लिये उसके मन मे जितनी छट- पटाहट होगी, वह उतना ही बडा लेखक होगा। इसीलिये उपन्यासकार व्यक्ति के भाग्य की कहानी उस समय तक नहीं लिख सकता, जब तक कि वह सम्पूर्ण वास्तविकता के इस सुस्पष्ट-सुस्थिर दर्शन से भी लैस न हो । उसमे यह समझ होनी चाहिये कि जीवन की वे विविध परिस्थितिया कौन-सी है, जिनकी बदौलत उन व्यक्तियो मे से प्रत्येक वैसा बना है, 9 मूल जैसा कि वह है 11 रेणु के इन दो प्रारम्भिक उपन्यासों में यह समझ स्पष्ट है । इन उपन्यासो में मात्र सतही वर्णन ही नही बल्कि परिलक्षित- परिणामो के में कौन-सी परिस्थितिया काम कर रही है, लेखक ने स्पष्ट किया है। रेणु के ये दो उपन्यास स्वातंत्र्योत्तर गांव के तीव्रता के साथ बदलते प्रतिमानो को वाणी देने में सक्षम है। गांव की सम्पूर्ण अच्छाई और बुराई के साथ रेणु साहित्य को देहलीज में प्रवेश करते हैं-"गांव जैसा भी है-सम्पूर्णता के साथ उसे चित्रित किया है। उसमें फूल भी हैं शूल भी, धूल भी है गुलाब भी, कीचड़ भी है चंदन भी, सुन्दरता भी है कुरूपता भी–मै किसी से भी दामन बचाकर निकल नही पाया।"2 इसका कारण उनकी जीवन के प्रति सूक्ष्म पकड़ और रचनाधर्मिता के प्रति आस्था है। "कथा की सारी अच्छाइयो और बुराइयों के साथ साहित्य की दहलीज पर आ खडा हूं, पता नही अच्छा किया या वुरा। जो भी हो, अपनी निष्ठा मे कमी महसूस नहीं करता ।"3 साहित्य की अन्य विधाओं और उपन्यास में अंतर भी लेखकीय आस्था और यथार्थ जीवन की सूक्ष्म पकड का ही है। उपन्यास यथार्थ से इतर होकर जीवंत नही रह सकता, जबकि अन्य साहित्यिक विधानों के साथ ऐसा नहीं है । उपन्यास मात्र कथात्मक गद्य नहीं है, वह मानव- जोवन का गद्य है-"ऐसी पहली कला है जो सम्पूर्ण मानव को लेकर उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने की चेष्टा करती है। उपन्यास को अन्य कलाओं से अलग करने वाली महान् विशेषता यह है कि उसमें गुप्त जीवन को प्रत्यक्ष करने की शक्ति है। इस प्रकार यह कला कविता या नाटक या सिनेमा, या चित्रकला या संगीत से यथार्थ का एक भिन्न दृश्य प्रस्तुत करती है।" "मला आचल" और "परती : परिकया" वास्तव मे दो ऐसे ही उपन्यास हैं, जिनमें सम्पूर्ण मानवीयता अपनी प्रास्था और अस्मिता के साथ विस्तृत फलक पर उद्घाटित होती है । हिंदी के प्रबुद्ध 1. रात्फ पाग-उपन्यास पोर लोक जीयन, पृ. 25 2. रेणु-मैना मांषत, भूमिरा 3. रेणु 4. रार पाग -उपन्याम पोर मोफ जीवन, पृ. 10 10 1 आचार्यों ने अब तक रेणु के इन दो उपन्यासो की समीक्षा करते समय उनकी अचलीय गध को सूचकर उन्हे "प्राचलिक उपन्यास" कहकर द्वितीय पक्ति मे बैठा दिया। यह रेणु के साथ अन्याय है। उनके ये दो उपन्यास मात्र अचल विशेप के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत के बदलते गाव का चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम है। अचल का सहारा तो मात्र लेखकीय ईमानदारी का प्रमाण है। इन उपन्यासो के सम्बन्ध मे यह मत अत्यधिक उपयुक्त है कि "ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओ को उजागर करने वाले इन महत्त्वपूर्ण उपन्यासो पर प्राचलिकता का लेबिल लगाकर उन्हे जानबूझकर एक ओर धकेलने का प्रयास किया गया है।"1 रेणु के ये दो उपन्यास प्रेमचद की समाजोन्मुख और सोद्देश्य परम्परा की आगे को मजबूत कडी हैं। "मैला प्राचल" का प्रशात पहला सरकारी कर्मचारी है, जो कि मेरीगज मे दिखाई पड़ता है। डॉ० प्रशात एक आस्थावान और परिश्रमी युवक है जो कि जन-सेवा को ही अपना उद्देश्य बनाकर गाव मे आता है। गांव में सरकारी कर्मचारी और रिश्वत एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं । महत से डाक्टर का प्रथम परिचय होता है और महत ग्रामीण मान- सिकता का उद्घाटन करते हुये कहते है-"डागडर साहेब आपको कितना मुसहरा मिलता है। दो सौ हाँ, यहा ऊपरी आमदनी भी होगी। असल आमदनी तो ऊपरी आमदनी है।"2 डॉ० प्रशात चेतना सम्पन्न है, अत उसका व्यवहार अन्य कर्मचारियो से अलग है। मेरीगज और उसके प्राचल मे व्याप्त कालाज्वार और मलेरिया के कीटाणुओ को समाप्त करने के लिये वह अथक परिश्रम करता है। अत मे जिस निष्कर्ष पर पहुचता है वह वास्तव मे यथार्थ है-"गरीबी और जहालत-इस रोग के दो कीटाणु है ।"3 ये दोनो कीटाणु व्यवस्था की देन है, इनमे प्रशात चाहते हुये भी कुछ नही कर सकता। हां, इतना अवश्य करता है कि निर्धन और प्रशिक्षित सथालो की भूमि को तहसीलदार द्वारा छीने जाने पर वह उन्हे उनके अधिकारो के बारे मे सचेत करता है । "डाक्टर ने कहा कि तुम लोग ही जमीन के असल मालिक हो । कानून है, जिसने डॉ कुवरपात सिंह -हिदी उप यास सामाजिक चेतना, पृ 168 2 रेणु -मला भाचल, पृ. 45 3 रेणु, पृ. 187 11 तीन साल तक जमीन को जोता-बोया है, जमीन उसी की होगी।"' और कालोचरन को वह सचेत करता हुया कहता है-"मत समझना कि संथालो की जमीन छुडाकर ही जमीदार सतोप कर लेगा। अब गांव के किसानो की वारी आयेगी।"2 कालीचरन इस बात पर चौंक उठता है। उसकी दृष्टि मे वह तहसीलदार का आदमी है, लेकिन चेतना सम्पन्न व्यक्ति गलत काम के लिये किसी का नही होता, वह अपने सिद्धातों का होता है। अपने सिद्धातो के लिये वह कैसा भी त्याग कर सकता है । डॉ० प्रशात कालीचरन से अपने तहसीलदार के साथ सम्बन्धो को स्पष्ट करता है-"तहसीलदार साहब गाव के रईस हैं । मुझसे उम्र में बडे हैं। कमला को बीमारी के चलते मुझे कुछ ज्यादा जाना पडता है । वे मुझसे बहुत प्यार करते हैं। मैं भी उन लोगा की इज्जत करता हूँ। लेकिन इसका यह मतलब नही कि मै तहसीलदार साहब के अन्याय का भी समर्थन करूगा अथवा पक्ष लूगा।"3 रेणु ने डॉ. प्रशात को एक आदर्श कर्म- चारो के रूप मे प्रस्तुत किया है, जिसके प्रत्येक कार्य के पीछे सिद्धात है। सरकारी कर्मचारियो को मिली-भगत से गाव मे शोपण होता है। मेरीगज गाव मे कपडा, तेल और चीनी को वुर्जी कमलदोहा के कमरुद्दी याबू बाटते हैं । कमलदीहा मेरीगंज से दस कोस है। इसीलिये कमरुद्दी बाबू सरकारी कर्मचारियों की सेवा-पूजा करके अपना घर भर रहे हैं । "कमरुद्दी बाबू कुजडा है, बैगन की बिक्री से ही जमीदार हुये हैं, मुस्लीग के लोडर है। कटिहार पूणिया मोटर रोड के किनारे पर ही घर है । हमेशा हाकिम-हुक्काम उनके यहा आते रहते हैं। महीने मे साठ मुगियों का खर्च है। लोग कहते हैं कि नये इसडियो जब आये तो सारे इलाके मे यह बात मशहूर हो गई कि बडे-हाकिम है, किसी के यहा न तो जाते हैं और न किसी का पान ही खाते हैं। लेकिन कमरुद्दी बाबू भी पीछा छोडने वाले अादमी नही । इसडियो का डलेवर मुसलमान है। उसको कुरान की कसम देकर पान-सुपारी खाने के लिये दिया। बस एक बार कटिहार से लौट रहे थे इसडियो साहव, ठीक कमरुद्दी बाबू के घर के सामने जाकर मोटरगाडी खराब हो गई। दस बजे रात को इसडियो 1. रेणु पृ० 201 2. रेणु १० 225 3. रेणु पृ० 225 साहब और कहा जाते। उसके बाद से ही कमरुद्दी बाबू अाँख मूदकर विलेक करने लगे।। रेणु के इस चित्रण से यह स्पष्ट है कि ग्रामीण जनता के शोपण के मूल में भूस्वामी-सरकारी कर्मचारियों की मिली- भगत ही है। सरकारी कर्मचारियो को गाव मे इसीलिये भेजा जाता है कि वे ग्रामीण जनता के शोपण को समाप्त कर उन्हे उत्थान के मार्ग पर लायें, वितु होता इसके विपरीत ही है। डॉ० प्रशात जैसे सरकारी कर्मचारी सभी हो जाये तो ग्रामीण विकास सभव है वरना यह परम्परा राष्ट्रीय विकास के स्रोत को ही नष्ट कर देगी। सरकारी-कर्मचारी भ्रष्टाचार के बल पर गरीब जनता का दोहन करने में लगे हुये हैं। परानपुर मे सर्वे के साथ इसीलिये भूस्वामी बटाई- दार कर्मचारियों को घेरे रहते है और सेवा में लगे रहते है ताकि उनसे लाभ उठाया जा सके। इसी लाभ की आशा में वे कर्मचारियो का घर भर रहे हैं-"कानूनगो के चपरासी जी को इलाके के बड़े से बडे जमीन वाले हाथ उठाकर जयहिंद करते हैं-~-जयहिंद चपरासी जी ........कहिये कानूनगो साहब को चावल पसद आया। असली बासमती चावल है, अपने खर्च के चावल से निकालकर भेजा था। जी, जी, जी हाँ ।... धी आ जायेगा।"2 बड़े से बड़ा भूस्वामी चपरासी को इसीलिये हाथ उठा- कर जयहिंद नही कर रहा कि वह उसका सम्मान कर रहा है। बल्कि उसके मूल मे व्यक्तिगत लाभ के कीड़े कुलबुला रहे है। कानूनगो को घी और चावल इसीलिये दिया जा रहा है कि वह अनैतिक रूप से उनका साथ दे और वे विशाल भूस्वामित्व के अधिकारी बने रहे। सरकारी कर्मचारियो को चंद टुकड़ो मे खरीदकर भूस्वामी मनमाना शोषण कर रहा है। यह बड़ी दुखद स्थिति है। भूमि पर जिनका अधिकार होना चाहिये, नवीन कानूनो के अनुसार वह नही हो पाता और इसीलिये अब तक किये गये समस्त भूमि सुधार भूस्वामी-वर्ग के हित मे हो गये हैं। इसका मूल कारण सरकारी कर्मचारियो का भ्रष्टाचार ही है। गरुड़धुज झा गाव का बिचौलिया है। सर्वे सेटलमेट के समय उसने गाव के महाजन रोशन बिस्वा और सरकारी कर्मचारियो से मिलकर 1. रेणु पृ० 80 2. रेणु-परती : परिकया, पृ. 28 । पैसा इकट्ठा किया है । इस त्रिकोण मे लाभ तीनो को ही हुआ। रोशन विस्वा तो इसी के आधार पर तीन सौ बीघे भूमि का स्वामी हो गया है। सरकारी कर्मचारी भी रोज मनीआर्डर कर रहे है और झा जी तो बिना कानून पढे ही वकीलो से अधिक कमा रहे हैं । "गरुडधुज झा आजकल बहुत व्यस्त हैं । सर्वे के समय उसको रात मे भी छुट्टी नही मिलती। दिन भर सोता है, अवेर मे उठकर भाग पीता है और अधेरा होते ही जैगडेस कहकर निकल पडता है ।..... काम ही ऐसा है कि दिन मे नही किया जा सकता। सर्वे कचहरी मे एक ही हाकिम नही चपरासियो को जोडा जाये तो तैतीस हाकिम है । तैतीसो हाकिमो से खूब पटती है गरुडधुज झा की। कानूनगो साहब के कान मे गरुडधुज ने ही मत्र फूककर बतलाया-वाइफ को मगा लीजिये कानूनगो साहय । हर तरह की सुविधा तो होगी ही। फिर, इतना रुपया घर कैसे भेजियेगा । वाइफ आयेगी तो . सभी हाकिम हँसकर बतियाते है उससे । अाँख की कनकी मूदकर सोने के कमरे मे ले जाते है । .. बिना वकालत पास किये ही गरुडधुज झा को सैकडो मुवक्किल घेरे रहते है। तव एक बात है । गरुडधुज झा अपने मुवक्किल से काम बनाने के पहले ही फीस ले लेता है। हाकिमो की पूजा मे जो हिस्सा मिलता है, उसका हिसाब अलग है । . गरुडधुज झा विगडा काम बनाने वाला आदमी है। दूसरी वात, गरुडधुज के मार्फत कोई काम बनवाना हो तो उससे सीधे बात मत कीजिये । काम खराब हो जायेगा। केयटटोली का रोशन विस्वा है न उससे कहिये ।... पैसा वाला आदमी है । गरुडधुज झा से काम बनवाना है तो रोशन विस्वा को सलाम करना होगा पहले ।" विचौलियो के माध्यम से हो रहे भ्रष्टाचार को रेणु ने स्पष्ट किया है। गाव हो या शहर प्रत्येक स्थान पर सरकारी कर्मचारी विचौलियो के माध्यम से धन खीच रहे है अनाप-शराप । सरकारी कर्मचारियो की यह भूमिका बहुत ही दुखद है । सरकारी कर्मचारियो के बारे मे रेणु और भी स्पष्ट कहते है- "लहरो को गिनकर मामदनी करने वाला आदमी ही सरकारी कर्मचारी हो सकता है ।"2 नये भूमि-सुधार कानून के अनुसार जिस भूमि पर हल 1. रेणु पृ. 113 2. रेणु पृ. 121 की रैक भी पड गई वह उसी की हो गई। परानपुर गाव मे पडी परती पर हल चलते है। भूस्वामी-वर्ग परती को तोडकर अपनी भूसम्पत्ति को बढाना चाहता है। इसके लिये वह सरकारी कर्मचारियो को रिश्वत दे रहा है-“एक हजार रुपया तो सिर्फ छित्तन बाबू दे रहे है जो रमई वाले बाबुओ का ट्रेक्टर भाडा पर लाने गये है। नये कानून की लहरे आती है-जाती है-चाँदी के रुपये मछलियो की तरह छटपटाते हैं। कागज के नोट पछियो की तरह फडफडाकर उडते है ।"1 भूमि सुधार कानून गरीव को भूमि देने और भूस्वामी से फालतू पडी भूमि छीनने को बनाये जाते है लेकिन धन के बल पर सरकारी कर्मचारियो को अपने पक्ष मे करके भूस्वामी वर्ग ने अब तक सभी भूमि सुधार कानूनो का दुरुपयोग ही किया है । गरीब बेचारा देखता रह जाता है और अमीर उसके सामने से उसका अधिकार छीन कर ले जाता है। यह स्थिति वास्तविक है। सरकारी कर्मचारी-वर्ग की इस राष्ट्रद्रोही नीति का अत कही दिखाई नही दे रहा । निरतर रिश्वत के बल पर यह वर्ग पैसा कमा रहा है । सर्वेक्षण करने पर पता चलता है कि यह अपनी आय से दस गुना खर्च करके भी बैंको में पैसा जमा किये रहता है। ऊपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट हैं, कौन किसको कहे। "मैला आंचल" के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद के तहसीलदारी छोडने पर हरगोरी सिंह को तहसीलदारी मिली। इसके लिये उसे चार सौ रुपये की रिश्वत देनी पड़ी। 2 जो तहसीलदार चार सौ रुपये रिश्वत देकर पद प्राप्त कर रहा है-वह जनता को कैसे छोड देगा। अत सर- कारी कर्मचारियो के इस भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव जनता पर ही पड़ता है। सथाल और गैर-सथाल सघर्ष में भी पुलिस को रिश्वत देकर भूस्वामी वर्ग छूट जाता है और गरीव सथाल गिरफ्तार हो जाते है और सथालो मे कोई गिरफ्तार नहीं हुआ। लेकिन यह मत समझो कि मुफ्त मे यह काम हुआ है । . दारोगा साहब कहने लगे कि खिलावनजी आपके बारे मे एस० पी० साहब को सदेह हो गया है कि आपने सभी यादवो को हसेरी मे जाने के लिये जरूर हुकुम दिया होगा। खिलावनजी की हालत खराब हो गई। वह तो 1 रेणु प 121 2 रेणु-मैला भाँचल, 4 145 तहसीलदार भाई थे, तो पाच हजार पर बात छूट गई। नही तो.... नही तो अभी बड़े घर की हवा खाते रहते खिलावनजी। सिंघजी घर मे नही थे, शिवशकर सिंघ भी नहीं। अब सिंघजी लोगो के मन मे क्या है सो कौन जाने । .. दारोगा भी तो राजपूत है। प्रादमी के मन का कुछ ठिकाना नही, कब क्या करे। मुफ्त मे सवकी गर्दन नही छूटी है। पाच हजार ।" सरकारी कर्मचारियो के भ्रष्टाचारी होने से निर्धन जनता को न्याय नहीं मिल पाता। स्वाधीन भारत मे आज सरकारी कर्मचारी भूस्वामी-पूंजीपति वर्ग का पालतू बनकर उनके शोपण के मार्गों को प्रशस्त कर रहा है और नये-नये हथियार गढ रहा है। आम जनता पहले से भी अधिक दुखी है। रेणु ने इन विवरणो के द्वारा ऐतिहासिक सदर्भ प्रस्तुत किये हैं। इस भयावह स्थिति मे ग्राम-सुधार के समस्त सरकारी कानून कर्मचारियो की मिली-भगत से भूस्वामी-वर्ग का हित साध रहे है और छोटे किसान लगातार भूमिहीन होकर सर्वहाराई स्थिति मे आते जा रहे है। इस सर्वहाराईकरण का विरोध न हुआ तो गाँव उजड़ जायेंगे। शहर मे जिस प्रकार पूंजी पर एकाधिकार बढ रहा है उसी तरह गाव मे भूमि पर। यह स्थिति निश्चय ही भयावह है, समय रहते इसका समाधान आवश्यक है। बिहार मे भूमि हडपो आदोलन और भूस्वामी-वर्ग द्वारा भूमि-सेना का निर्माण रेणु द्वारा व्यक्त यथार्थ का प्रत्यक्ष रूप है। 00 रेणु प 209 16 "गबन मे अभिव्यक्त समसामयिक भारतीय परिदृश्य हिन्दी साहित्य मे प्रेमचन्द अकेले ऐसे कथाकार हैं जो देश और राष्ट्रीयता की सकीर्ण सीमानो को लाधकर विश्व-साहित्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं । "तिलिस्मे होशरुवा" और अन्य ऐसी ही मनोरजन की हल्की-फुल्की सामग्री वाले उपन्यास पढकर प्रेमचद ने अपने मनोजगत को पुष्टि और सम्वर्द्धन तो किया, परन्तु उस धारा से एकदम अलग हटकर समाज की वास्तविकता को पहचाना और यथार्थ के माध्यम से जनता के दुख-दर्द, आशा निराशा, दमन-उत्पीडन, शोषण और मुक्ति संघर्ष को सशक्त वाणी प्रदान की । प्रमचद का साहित्य अपने युग की समस्त विभीपिकाओ का दस्तावेज और दीपक है । उनके हाथ मे ऐसी मशाल है, जिससे वे अपने आसपास की जिन्दगी को गहरे जाकर देखते हैं और परखते है। देश की नवे प्रतिशत ग्रामीण जनता के निकट बैठकर प्रेमचद ने जो कहानी सुनी और देखी वह अपने साहित्य मे रूपायित की। हिन्दी साहित्य मे कबीर के बाद प्रमचद का सबसे प्रखर व्यक्तित्व है, जिसने साहित्य को जन-सामान्य से जोडा । सामती ढाचे मे पिलते सघर्षरत मजदूर-किसानो की वाणी को जो स्वर प्रेमचद ने प्रदान किया वह हिन्दी साहित्य मे अनूठा है । अपने हृदय के खून और आँख के पानी से प्रमचद ने जो साहित्य रचा वह मात्र कल्पना नही, बल्कि तत्कालीन युग के पीडित मानव का सच्चा चित्र है । शरत, टैगोर और वकिम वाबू जैसे सुप्रसिद्ध वगला कथाकारो के युग मे रचना करने वाला यह कलाकार उनको प्रसिद्धि को पीछे छोडकर ऐसे साहित्य को आगे लेकर माता है, जो जन-जीवन से प्रतिवद्ध और सम्बद्ध है। प्रमचद का हाथ सदैव देश की जनता की 17 नब्ज पर रहा, उन्होने जहा कोई गडवडी देखो, वही उसको दूर करने का प्रयास किया। इसीलिए अपने युग की सामाजिक, राजनीतिक पार आर्थिक परिस्थितियो का जो यथार्थ चित्रण प्रेमचद मे मिलता है, वह अन्यय दुर्लभ है। कुछ लोग प्रेमचद पर गाधीवादी होने का आरोप लगाते है । परतु प्रमचद गाधीवादी विल्कुल नही थे। हां, प्रारम्भ मे गांधीजी के व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य थे। साथ ही गांधी जी को पूजीपति- समर्थक और जन-विरोधी नीतियो के कट्टर विरोधी भी थे। उनकी महानता यथार्थ की सूक्ष्म पकड के कारण है, जिससे उन्होने "सेवा- सदन"-से लेकर “गोदान" और अधूरे "मगलसूत्र" तक की एक लम्बी याना तय की। "मार्क्सवाद या गाँधीवाद किसी लेखक को कलाकार नही बना देता। कलाकार बनने के लिये जीवन-दर्शन से अधिक मार्मिक सहानुभूति आवश्यक है, दृष्टिकोण से अधिक वह दृष्टि आवश्यक है जो जीवन के हर पहलू को देख सके । सामाजिक जीवन की जानकारी न होगी तो दृष्टिकोण बेचारा क्या करेगा?" पीडित और दलित वर्ग के महासागर मे गहरे पैठकर प्रेमचद ने जो साहित्य रचा, वह उस युग का एक मार्मिक चिन उपस्थित करता है, उनके पास एक ऐसी सवेदन- शील दृष्टि है, जिसे उन्होने माक्र्सवादी विचारधारा से धार धराकर और पैना कर लिया। क्योकि रचनात्मक कलाकार के लिये मार्क्सवाद वास्तविकता को समझने की एक कुजी है। यह उसे जीवन की तरतीब को देखने मे मदद देता है और यह बताता है कि उसमे प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति क्या है ।"2 चूकि व्यक्ति ही समाज की इकाई है, अतः व्यक्ति को उसकी पूर्णता मे देखना आवश्यक है। "मार्क्सवाद मानव को अपने दर्शन को कद्र मानता है, कारण कि जहाँ वह दावा करता है कि भौतिक शक्तिया अादमी को बदल सकती है, वहा यह भी अत्यत स्पष्टता से घोपित करता है कि यह मानव ही है जो भौतिक शक्तियो को बदलता और ऐसा करने के दौरान अपनी भी कायापलट करता है।"3 माक्र्सवाद के विना उस मूल सच्चाई तक पहुंचा भी नही जा 1. 2 राल्फ फाक्स - उपन्यास और लोक जीवन, 7 राल्फ फाक्स --उपन्यास भौर लोक जीवन, पृ 25 राल्फ फाक्स -उपन्यास मोर लोक जीवन, 123 3. 18 सकता जो लेखक का उत्स होती है। इसी विचारधारा से लेस होकर प्रेमचद ने अपने साहित्य को शोपित और पीडित जनता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी साहित्य मे पहली बार दलितो और शोपितो का मार्मिक चित्रण पढकर सामती और पूजीपति-मानसिकता के समीक्षको ने उनके साहित्य को अपनी कुदृष्टि का शिकार बनाया, परन्तु प्रेमचद ने इसकी चिंता विल्कुल नहीं की और निरन्तर पीडित-जन की कराह को सशक्त स्वर प्रदान करते रहे। अपने सम्पूर्ण परिवेश को जिस ईमानदारी के साथ, प्रेमचद ने भोगा, उसी ईमानदारी और तल्खी के साथ चित्रित भी किया, क्योकि व्यक्तिगत ईमानदारी का यह बहुत बडा तकाजा है कि लेखक निर्भीकतापूर्वक अपने अतनिषेधो को सुधारे, उनका सामना कर ।"। इसीलिये प्रेमचद की परम्पग केवल ग्रामीण परिवेश तक ही सीमित नही रही, वरन् उनके कथानक नगर तथा ग्राम तक विस्तृत रूप से फैले है। किसान, जमीदार, महाजन, मिल मजदूर, पंजीपति, बड़े व्यापारी, पटवारी, पुलिस, कचहरी का अमला, मध्यवर्गीय नागरिक आदि विभिन्न वर्गो के पात्र उपन्यासो मे चित्रित हुये है ।"2 हर लेखक अपने युग की उपज होता है, वह अपने युग के ज्वलत प्रश्नो और अविरोधो से निरपेक्ष रहकर साहित्य की रचना नहीं कर सकता। कही न कही, किसी न किसी स्तर पर उसका अपने समाज से लगाव होता ही है और वही लगाव उसे अपनी पूर्णता के साथ सामाजिक प्रतिवद्धता का पाठ पढाता है। बदलते हुये हालातो को वह जिस कलात्मकता के साथ चित्रित करता है या करना चाहिये, उसका प्रमाण प्रेमवद का साहित्य है । परन्तु प्रेमचद पर यह मिथ्या आरोप भी लगाया जाता है कि उनका साहित्य राजनीतिक प्रचार मात्र है। यह आरोप ऐसे चेतनाहीन लोगो द्वारा लगाया जाता है जो साहित्य को राजनीति से दूर मानते हैं। परतु समझ मे नही आता कि एक ओर तो वे यह कहते हुये नहीं थकते कि साहित्य का कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य होना चाहिये और जब सोद्देश्य साहित्य की बात होती है, तो उनका यह 1 2 मुक्तिबोध -एक साहित्यिक की डायरी, पृ 129 डॉ कुवरपाल सिंह -हिंदी उपन्यास सामाजिक चेतना, ११ 19 दोगला विचार उन पर हावी हो जाता है । साहित्य कोई आसमानी या वायवी वस्तु नही है, वह ऐसा ठोस और काक्रीट प्रमाण है, जिसमे समाज के हर वर्ग और हर परिस्थिति का यथार्थ अकन होता है और होना चाहिये । इसी सदर्भ मे मुक्तिबोध का यह कथन हमारे विचारो की पुष्टि करता है-"साहित्य के प्रश्न मूलत जीवन के प्रश्न हैं। मनुष्य के अन्त करण मे अभिव्यक्ति की आकुलता होती है। वह जीवन-तत्वो को, जीवन-यथार्थ को, जीवन दृष्टि को अपनी कृतियो मे सवेदनात्मक रूप से प्रकट करता है । अतएव, लेखक के वास्तविक मनोवैज्ञानिक सवेदनात्मक जीवन और उसकी अभिव्यक्ति के प्रश्न, वस्तुत उसके जीवन के प्रश्न होते हैं । साहित्य के प्रश्नो को हल्के ढग से नहीं लिया जा सकता। उनका समुचित, विस्तृत-मनोवैज्ञानिक सूक्ष्म-दृष्टिपूर्ण उत्तर प्रदान करना अावश्यक है ।"। इसीलिये साहित्य को जीवन की समग्रता मे देखना चाहिये। और राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियां जो समाज की हर इकाई का अपने अनुरूप निर्माण करती हैं, का साहित्य में वर्णन अत्यन्त आवश्यक है। इस आधार पर प्रेमचद साहित्य पर राज- नीतिकरण का आरोप मात्र आरोप न रहकर विशेषता बन जाता है । क्योकि राजनीतिक घटनाग्रो को उन्होने ज्यो का त्यो नही उतारा है, उन्हे भाव-सवेदन के माध्यम के रूप मे ग्रहण किया है। राष्ट्रीय राज- नीतिक परिवेश की कलात्मक नियोजना मे उनके उपन्यास पर्याप्त सफल रहे हैं।" । उपर्युक्त विचारधारा के परिप्रेक्ष्य मे देखें तो "गबन" प्रमचद का एक ऐसा सशक्त उपन्यास है जिसमे ढहते सामतवाद-साम्राज्यवाद और बढते पूंजीवाद की टक्कर की स्पष्ट टकार है । देश म व्याप्त अराजक्ता, अत्याचार, पुलिस-दमन, रिश्वत और जमीदारो के शोपण का एक दस्तावेज है "गवन" | "गवन" का स्थानक 1905 से लेकर 1930 तक को प्रमुख घटनामा को समाहित किये हुये है जिसमे स्वदेशी आदोलन और मेरठ पडयत्र वेस प्रमुख हैं। इन दोनो प्रमुख घटनाग्रो को प्रेमचद ने सीधे-सीधे न लेकर क्लात्मक रूप मे चित्रित किया है। 1. मुक्तिबोप नई कविता का पात्म समपं तथा अन्य नियन्य, 145 में शिव कुमार मिय-साहित्य भोर सामाजिर सदम, पृ 191-92 2 "स्वदेशी आदोलन" की करुण गाथा देवीदीन नामक वह पात्र सुनाता है, जो निष्ठावान काग्रेसी था, जिसके दो जवान बेटे स्वदेशी आदोलन की भेंट चढ गये लेकिन देवीदीन को उसको चिता नही थी, वह प्रसन्न था कि 'जिस देश मे रहते हैं, जिसका अन्न जल खाते हैं उसके लिये इतना भी न करे तो जीने को धिक्कार है। दो जवान बेटे इसी सुदेसी की भट चढा चुका हू भया ।"1 परतु आज आजादी के वयालीस साल बाद भी बुर्जुवा नेताओ को देवीदीन जैसे कर्मठ और आस्थावान काग्रेसी कार्यकर्ताओ का योगदान नगण्य ही लगता है और देश की मुक्ति का ताज वे लोग अपने सिर पर उठाये घूम रहे है, जो मजदूर किसानो के द्वारा उठाई गई पूर्ण स्वतनता की माग का उपहास उडाया करते थे । "भारत के श्रमजीवी बहुत पहले इस निष्कर्ष पर पहुच गये थे कि अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिये सबसे पहले विदेशी हुकूमत को खत्म करना होगा। इसीलिये जब राष्ट्रीय बुर्जुवा-वर्ग और उसके नेता ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शासन को बनाये रखना चाहते थे और उसके अधीन रहकर सिर्फ होमरूल या औपनिवेषिक स्वराज्य की माग कर रहे थे उस वक्त मजदूर-वर्ग पूर्ण स्वाधीनता की माग कर रहा था। खुद इडियन नेशनल काग्रेस के मच से जब मजदूर-किसान पूर्ण स्वाधीनता की माग बुलद करते थे, वडे-बडे बुर्जुवा नेता उसका विरोध करते थे और उसे बचकानापन बताते थे ।"2 "और आज भी जव कि मजदुर किसानो की, क्रातिकारी भूमिका के बारे मे किसी को सदेह नही रह गया है, तब भी बुर्जुवा नेताप्रो को श्रमजीवी वर्ग के सगठित आदोलन पर आक्षेप करते सुना गया है कि मजदूर-किसान और उसके सगठन तो सिर्फ अपनी रोजी-रोटी के लिये लडते रहे है, स्वाधीनता की लडाई से उनका और उनके सगठन या पार्टी का कोई वास्ता नही रहा ।" यह कथन वैसे भी वास्तविकता से परे है क्योकि मुक्ति आदोलन कोई छोटा आदोलन तो था नही जिसे गाधीजी और उनके सुविधाजीवी शिष्यो ने अकेले ही चलाया हो, इसम सबसे बड़ा योगदान श्रमिक वर्ग और उसकी पार्टी का 1 2 प्रमचद बन, पृ 170 मयोध्या सिंह -भारत का मुक्ति सग्राम, भूमिका, 8-9 प्रयोध्या सिंह ---भारत वा मुक्ति सग्राम, भूमिका, 18 3 21 है।" स्वदेशी आदोलन के माध्यम से देश मे बढते विदेशी आयात को दृष्टि- गत रखकर यह निर्णय लिया गया कि कोई भी अब विदेशी कपडा नही पहन सकता-सव देश के उद्योगो को विकसित करने के लिये देशी कपडा पहनेगे-जिसका व्यापक अमर हुआ । सिर्फ जमीदारो ने ही नही, विद्या- थियो और नौजवानो ने, किसानो और दुकानदारो ने, यहा तक कि डाक्टरो और देशी सेना ने, ब्राह्मणो और पुरोहितो ने, नाइयो और घोबियो ने बायकाट और स्वदेशी आदोलन के प्रसार मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की 12 और जो इस आदोलन में भाग न लेता उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा-विदेशी वस्त्रो की होली जलाई जाने लगी, जिसका परिणाम यह हुआ कि विदेशी माल की खपत एकदम कम हो गई । सरकारी आकडो से पता चलता है कि अगस्त, 1905 और अगस्त 1906 के बीच कितना विदेशी सामान कम आया-"विदेशी नमक की खपत 48 हजार मन से बढकर 77 हजार मन हो गई । विदेशी कपडा 3 करोड गज कम मगाया गया और रुई बटे सूत और सूत के आयात मे जो कमी हुई वह लगभग एक करोड की थी। विदेशी जूतो का आयात 7 प्रतिशत और सीमेट का आयात लगभग 50 प्रतिशत कम हो गया।"3 यहा प्रेमचद एक बहुत बडी बात कह देते है कि स्वदेशी आदोलन के प्रभाव मे आये निम्न वर्ग के काग्रेस कार्यकर्ताओ ने अपना सब कुछ लुटाकर इस जन-आदोलन को सफल बनाने में कोई कसर न उठा रखी। परतु दूसरी ओर बडे-बडे काग्रेसी नेतानो ने इस आदोलन के साथ गद्दारी की। "दिखाने को दस बीस कुरते गाढे के बनवा लिये, घर का और सब सामान विलायती है। सब के सब भोग-विलास मे अधे हो रहे है, छोटे भी और बडे भी। उस पर दावा यह है कि देश का उद्धार करेंगे। अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे? पहले अपना उद्धार तो कर लो। गरीबो को लूटकर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है। इसीलिये तुम्हारा इस देश मे जन्म हुआ है। हा रोये जानो, विलायती शरा उडाओ, विलायती मोटरें दौडायो, विलायती मुरब्बे और प्रचार - 1 मयोध्या सिंह -भारत का मुक्ति सग्राम, भूमिका, पृ 180 2. भयोध्या सिंह-भारत का मुक्ति सग्राम भूमिका, 183 रमेशचद्र मजूमदार-हिस्ट्री प्राव फ्रीडम मूवमेट इन इण्डिया, भाग 2, 57 2 4 2 चखो, विलायती वर्तनो मे खायो, विलायती दवाइया पियो, पर देश के नाम को रोये जानो।" प्रेमचद बडे-बड़े काग्रेसी नेतानो की असलियत से जनता को परिचित कराना चाहते हैं जो ऊपर ही ऊपर देशभक्ति का छद्म बाना प्रोढे फिरते है। इसी दोगलेपन के कारण देवीदीन जैसा कर्मठ और आस्थावान काग्रेसी कार्यकर्ता आदोलन से विमुख हो जाता है । उसकी आस्था काग्रेस से ही नही, बड-बडे देशभक्तो से भी उठ जाती है । इसीलिये वह एक काग्रेसी नेता से पूछता है-"साहब, सच बताओ, जव तुम सुराज का नाम लेते हो, तो उसका कौन सा रूप तुम्हारी आखो के सामने आता है। तुम भी बडी-बडी तलब लोगे, तुम भी अग्रजो की तरह बडे-बड़े बगलो मे रहोगे, पहाडो की हवा खानोगे, अग्रेजी ठाठ बनाये धूमोगे, इस सुगज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-वदो की जिंदगी भले ही भाराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा। बस बगले झाकने लगे। तुम दिन मे पाच बेर खाना खाते ही और वह भी वढिया माल, गरीब किसान को एक जून सूखा चना भी नहीं मिलता। उसी का रक्त चूसकर तो सरकार तुम्हे हुद्दे देती है। तुम्हारा ध्यान कभी उसकी ओर जाता है ? अभी तुम्हारा सुराज नहीं है, तव तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरोबो को पीसकर पी जानोगे।" . 7 एक ओर तो प्रेमचद काग्रेसी कार्यकर्तामो की अवसरवादिता और निजी स्वार्थो के कारण जन-भादोलनो की उपेक्षामो का वर्णन करते हैं और दूमरी ओर ‘गवन" का विस्तार 1905 से लेकर 1930 ई० तक की प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक घटनाओ को लेकर करते हैं, जिसमे "गवन" का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह सब प्रेमवद की यथार्थवादी जीवन-दृष्टि का ही परिणाम है । चूकि प्रेमचद मान कथाकार ही नही थे, वरन् एक सफल पत्रकार भी थे और पत्रकार जीवन-जगत के प्रति अतिरिक्त जागरूक रहता है, इसीलिये उनके उपन्यासो मे घटनाओ का यथातथ्य वर्णन मिलता है। 1 प्रेमचद --गबन, पृ 171, प्रेमचद -गबन, 172 - 2 23 1928 ई० के आसपास निरतर बढते कम्युनिस्ट प्रभाव को देखकर और उसको अतुलनीय शक्ति को परख कर ब्रिटिश साम्राज्ञी बौखला उठे। सारे देश मे मजदूरो मे नई क्राति की भावना जागी, अपने अधिकारो की प्राप्ति के लिये वे कमर कसकर तैयार हो गये और उनकी इस नीति का विश्व के समस्त मजदूर सगठनो ने क्रातिकारी-अभिवादन किया। ब्रिटेन मे चलने वाले कम्युनिस्ट आदोलन के प्रमुख नेताओ ने ससद से लेकर सघर्ष के रास्ते तक भारतीय मजदूरो का साथ दिया। इस अभूतपूर्व एकता ने मानो मरे हुये मजदूरो मे प्राण प्रतिष्ठा ही कर दी, जिसका परिणाम उस समय अपने अधिकारो की प्राप्ति हेतु की गई हडतालो से निकाला जा सकता है-"1929 मे 141 हडताले हुई थी। 1930 मे 148 हडताल हुई और 1931 मे 166 1 हर साल । एक लाख से ज्यादा मजदूरो ने हडतालो मे भाग लिया।"1 और इस बढती हुई शक्ति मे सबसे बडा हाथ मजदूरो की ईमानदारी और परिश्रम का था, जिससे प्रभावित होकर पडित मोतीलाल नेहरू जैसे वुर्जुवा नेता को भी इस सगठन की कार्य क्षमता और ईमानदारी की प्रशसा करनी पडी-“वे लोग कम्युनिस्ट जिनसे मेरा परिचय हुआ है मतो के, निस्सदेह दृढ मतो के आदमी है। वे ऐसे आदमी है, जिनमे अपने विश्वास का साहस है । ऐसे आदमियो को, आप उनसे सहमत हो या न हो लेकिन अच्छी तरह सतुलित मस्तिष्क के प्रत्येक व्यक्ति से सम्मान मिलने का अधिकार अवश्य होना चाहिये ।"2 लेकिन मजदूर एकता से घबडाकर साम्राज्ञी-सरकार ने कम्युनिस्टो को दबाने और कुचलने के लिये "पब्लिक सेफ्टी बिल" लागू कर दिया, इतना ही नही 19 दिसम्बर, 1928 को भारत सचिव ने वाइसराय के नाम पत्र भेजकर कहा कि-'पब्लिक सेफ्टी विल ही काफी न होगा। उससे भी कडी कार्यवाही की जरूरत है । मेरा खयाल यह है कि उन सारी सस्थानो को जो कम्युनिस्ट मतवाद को पैरोकार है या भारत अथवा विदेश के कम्युनिस्टो से सम्बन्ध रखतो है, गैर कानूनी घोषित कर देना चाहिये और उनका सदस्य बनना दडनीय करार देना चाहिये ।"3 कम्युनिस्टो के दमन मे ब्रिटिश सरकार 2 रजनी पाम दत्त -भारत वर्तमान और भावी, 218-19 प्रयोध्यासिंह -भारत का मुक्ति सग्राम, 460 सुबोध राय -कम्युनिज्म इन इण्डिया, 1905-34,474 3 24 करने मे सारी शक्ति झोक दी, लेकिन सरकार अपने हर प्रकार के शर्मनाक तरीको से भी पिछले पादोलनो की तरह इन आदोलनो को न दवा मकी क्योकि पहले के सभी ऐतिहासिक आदोलन अल्पमत के आदोलन रहे हैं या अल्पमत के फायदे के लिये रहे हैं, किन्तु सर्वहारा आदोलन विशाल बहुमत का, विशाल बहुमत के फायदे के लिये होने वाला चेतन तथा स्वतत्र आदोलन है। किन्तु इस बीच इन समस्त आदोलनो का परिणाम यह निकला कि लोग धडाधड इन सगठनो के सदस्य बनने लगे और राष्ट्रीय आदोलन को एक नई दिशा प्राप्त हुई जिससे वह वर्ग-समन्वय एव समझौतापरस्त नीतियो से निकलकर विशाल और दीर्घ वर्ग सघर्ष की राह पर आया । इसी एकता और सघर्ष की राह पर चलने वाले मजदूर किसानो को एक भारी झटका लगा। 20 मार्च, 1929 को जब कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूर किसान पार्टी और ट्रेड यूनियन काग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये । और उन पर "मेरठ पड्यत्र केस" चलाया गया, जिसे प्रेमचद ने "गवन" मे चित्रित किया है । उस झूठे केस की झूठी गवाही के लिये रमानाथ की आवश्य- कता पडी। इसकी पुष्टि 13 सितम्बर, 1928 को वाइसराय के पत्र से हो जाती है, जो भारत सचिव के पास भेजा गया था-"हम इस वक्त सारे भारत के खास-खास कम्युनिस्ट नेतानो पर व्यापक पड्यत्र का मुकदमा चलाने की सभावना पर विचार कर रहे है ।"3 प्रेचचद ने न केवल इस पड्यत्र केस को ही चित्रित किया, वरन् उस समय की सारी परिस्थितियो और पुलिस के द्वारा निर्दोष लोगो की जबरन गवाही का भी भडाफोड किया है। उन 31 श्रमिक नेताओ को जिन्हे ब्रिटिश सरकार ने "मेरठ पड्यत्र केस" चलाने को गिरफ्तार किया था, को सजा दिलाने के लिये झूठी गवाही की आवश्यकता पडती है, जिसे रमानाथ पूरी करता है—"प्रापको महज एक मुकदमे मे शहादत देनी पडेगी ।" और रमानाथ जैसा भीरु फैशनपरस्त उसे भय और नौकरी के अदम्य लालच मे स्वीकार कर लेता है, परतु देवीदीन जैसा I माक्स-ए गेल्स –कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र, पृ. 50 2. अयोध्यासिंह -भारत का मुक्ति सग्राम, पृ. 460 3. सुबोध राय --कम्युनिज्म इन इण्डिया, पृ 34 4. प्रेमचदाबन, पृ. 219 25 कर्मठ मुक्ति सेनानी इसके प्रतविरोधो को समझते हुए कहता है- "अच्छा तो यह मुखबिर बन गये। यह बात है। इसमे तो जो पुलिस सिखायोगी वही तुम्हे कहना पडगा, भैया । मै छोटो समझ का आदमी हूँ, इन बातो का भरम क्या जानू पर मुझमे मुखविर बनने को कहा जाता तो मै न बनता चाहे कोई लाख रुपये देता। बाहर के आदमी को क्या मालूम कोन अपराधी है, कौन वेकसूर है। दो चार अपराधियो के साथ दो चार बेकसूर भी जरूर ही होगे।"। लेकिन पुलिस के चगुल मे जो एक वार फस गया वह निकलने वाला नहीं-वही नियति रमानाथ की भी हुई। समाज मे मुखबिरो के असम्मान को समझते हुये जालपा रमानाथ को समझाती है, तो जालपा पर भी पुलिस वालो का शक होता है कि- "स्वराज वालो ने उस औरत को मिला लिया है। यह सब एक ही शंतान हैं ।"2 जालपा पर यह प्रभाव वास्तव में उस समय के राज- नैतिक एव सामाजिक कार्यकर्तामो का ही था, जो इन निर्दोप अभियुक्तो को बचाने के लिये अपना सारा खून-पसीना एक कर रहे थे। सारे देश मे डिफेस कमेटियो का निर्माण किया गया और "ये डिफेस कमेटियां वकीलो की फीस तथा अभियुक्तो को खाने-पीने, पुस्तको, समाचार- पत्रो आदि के लिये पैसा इकट्ठा करती।"4 यही ऐतिहासिक तथ्य "गबन" मे भी पाया है-"यहा कुछ चदा भी किया गया।"5 और अत मे निर्णय होता है और सबको सजायें सुनाई जाती है । इस प्रकार "गवन" ह्रासोन्मुख सामन्ती एव साम्राज्ञी व्यवस्था का एक नगा चिन उपस्थित करता है। वास्तव मे प्रेमचन्द ने अपने जीवन के विशाल अनुभवो के द्वारा अपनी समझ निरतर सशोधित और 2 1 प्रेमचद -बन, पृ 219 वही, पृ287 3 प्रयोध्या सिंह -भारत का मुक्ति सप्राम, 565 4 यही, पृ 565 प्रेमपद -गवन, 274 6 मायोध्या सिंह -भारत का मुक्ति सप्राम, 4566 5 26 . सम्पादित की, क्योकि-जो लेखक अपने हृदय को निरतर सशोधित और सम्पादित नहीं करता है, उसका विकास रुक जाता है। यह सशोधन और सम्पादन, कवि की जीवन-दृष्टि के द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिये- स्वाग रचने के लिये नही ।। प्रेमचद मे यह वात स्पष्टता के साथ देखी जा सकती है कि उन्होने निरतर अपने को समृद्ध किया। आर्य समाज से लेकर मार्क्सवाद तक की एक लम्बी यात्रा प्रेमचद ने तय की, जो उन्हे विश्व के सर्वश्रेष्ठ जनवादी साहित्यकारो की श्रेणी मे बिठाती है। प्रेमचद के उपन्यास अपने युग के वास्तव मे दस्तावेज और दीपक है। उनके साहित्य मे शोधित और पीडित वर्ग के प्रति कोरी सहानुभूति ही नही है वरन् शोषक वर्ग के प्रति सक्रिय घृणा और आक्रोश का भाव भी उत्पन्न होता है और सघर्ष की भाव-भूमि तैयार होती है ।2 आज प्रेमचद साहित्य को निष्पक्ष मूल्याकन की आवश्यकता है जिससे उनमे छिपा आक्रोश और वर्ग-संघर्ष का रास्ता जनता-जनार्दन को मालूम हो सके । 1. मुक्तिबोध --एक साहित्यिक की डायरी, पृ. 129 2. डॉ. कुवर पाल सिंह -हिन्दी उपन्यास : सामाजिक चेतना, पृ.१ 27 निर्मल वर्मा की कहानियों का परिवेश प्रत्येक भापा को साहित्यिक प्रवृत्तियों का विकास सामान्यतः सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवेश मे होता है । ये विभिन्न धरातल और परिवेश बौद्धिक और संवेदनशील साहित्यकार मे उस नवीन प्रेरणा की प्रतिष्ठा करते हैं जिससे तत्कालीन वस्तुस्थिति को अभिव्यक्ति प्राप्त होती है और इस संदर्भ में समस्याओं के निदान सम्मुख आते हैं। वर्तमान पूंजीवादी युग में साहित्यकार की भूमिका अत्यत महत्वपूर्ण हो गई है। वह इन त्रासद स्थितियों से प्रांख चुराकर कोई बड़ी रचना नही कर सकता। आम आदमी के जीवन और उस पर हो रहे निरंतर अत्याचारो का वह जब तक जीवंत चित्रण नही करेगा, तब तक उसकी रचना आत्मालाप के अलावा और कुछ नहीं हो सकती। इसलिये मेहनतकश जनता के दुःख-सुख के बिना आज कोई भी रचना झूठी लगती है। जिसमें जीवन की धड़कन ही नही हो, वह रचना कैसी ? साहित्यकार की दृष्टि यथार्थमूलक होनी चाहिये । जब तक वह आदर्श मे संचरण करता रहेगा तब तक वह वास्तविक साहित्य की रचना नही कर सकता क्योकि अादर्श की स्थापना हेतु यथार्थ से पलायन कर अतीत की ओर जाना पड़ता है, यथार्थ परिस्थितियों की अपेक्षा काल्पनिक परिस्थितियों में से गुजरना पड़ता है। इस बात को समझने के लिये प्रसाद और प्रेमचंद के साहित्य को लिया जा सकता है । सम- सामयिक होते हुये भी दोनों मे दृष्टिगत अतर है । एक आदर्शवादी है तो दूसरा यथार्थवादी। एक का विषय अतीत की स्वरिणम, लुभावनी एवं पलायनवादी वीथियां है तो दूसरे का वर्ण्य-विषय जनता की आशा, आकांक्षाप्रो और संघर्षों को वारणी प्रदान करना है । प्रेमचद का साहित्य 28 यह बताता है कि जनता कला का स्रोत है और वही साहित्य की सार्थकता एव स्थायित्व का प्राधार है। डॉ रामविलास शर्मा ने इस बात को और स्पष्ट करते हुए लिखा है कि "प्रेमचद का साहित्य हमे सिखलाता है कि किस तरह कातिकारी लफ्फाजी से बचकर सीधे-सादे ढग से जनता की सेवा करने वाला साहित्य रचा जा सकता है। प्रेमचद का साहित्य साम्राज्यवादियो के फैलाये हुये भ्रमो को छिन्न-भिन्न कर देता है । समाज पीछे, व्यक्ति पहले, सोवियत रूस मे व्यक्ति की आजादी नहीं है, हत्या और लूट का साहित्य जनवादी है, साहित्य का कोई जातीय या राष्ट्रीय रूप नहीं होता, जिनाकारी का वर्णन मनोवैज्ञानिक साहित्य है, कलाकार को जीवन-सग्राग से तटस्थ रहना चाहिये-हिंदी के पत्रो मे इस तरह की धारणामो को जो प्रश्रय मिलता है, प्रेमचद का साहित्य उनका ध्वस करता है।" प्रेमचद के बाद यशपाल, रागेय राघव, भैरव प्रसाद गुप्त, राहुल साकृत्यायन एव नागार्जुन आदि साहित्यकार प्रेमचद की यथार्थ और समाजोन्मुख परम्परा को आगे बढाते रहे है। उन्होने सामाजिक अतविरोधो, जन-सघर्षों एव जन साधारण की आशा-आकाक्षाप्रो को वाणी प्रदान की है । परन्तु इसके साथ ही दूसरी ओर उच्च मध्यवर्ग के साहित्यकारो ने पूजीवाद से सहयोग कर व्यक्ति स्वातत्र्य, तटस्थता, मानवता आदि के नारे लगाने शुरू किये। इनमे से अनेक साहित्यकार जाने-अनजाने द्वितीय महायुद्ध के बाद की शीतयुद्धीय राजनीति के शिकार हो गये और देशकाल के सदर्भ से कटकर निराशा, कुठा, अनास्था, मूल्यहीनता एव सत्रास प्रादि पश्चिमी भाव-धारा से प्रेरित अवधारणात्मक यथार्थ के दलदल मे फस गये जिनके परिणामस्वरूप कुछ स्वातत्र्योत्तर कहानीकार प्रेमचद की स्वप्न सार्थक परम्परा को सिर्फ एक छाया और उसे "अप्रासगिक मानकर" कहानी की मृत्यु की घोषणा करते है। निर्मल वर्मा मे परम्परा एव सदर्भ से कटने का यह प्रयास सर्वाधिक है, जिसके कारण वे नवीनता और रूपवाद के प्रति सर्वाधिक आकर्षित होते है। वे सदर्भ से कटकर नितात निजी परिवेश वाली विदेशी वाता- -- डॉ राम विलास शर्मा-प्रेमचद और उनका युण, पृ. 8-9 29 वरण प्रधान कहानियां लिखते हैं। प्राकृतिक अथवा अग्रेजी वातावरण में एक मूड तथा एक मनःस्थिति का चित्रण करते हैं जो उनकी रूमानी प्रवृत्ति का परिचायक है और ययार्थबोध से कटाव का सूचक है । परन्तु कुछ प्रतिष्ठा प्राप्त समीक्षकों को उनमें युग बोध दिखाई पड़ता है, उनकी कहानियां आज के विभिन्न संदर्भो में मानव मुक्ति को परिमापित करती जान पड़ती है, उनमें शुद्ध गद्य का खाका दिखलाई पड़ता है, और उनमे नवजातक-सी ताजगी और सहजता दिखलाई पड़ती है। यह सब कलावाद का प्रभाव है और कुछ नहीं। समझ मे नही आता कि वे मानव स्थितियां कौन सी हैं ? सघर्षरत पात्र कौन से है ? "परिदे" की लतिका, "दहलीज" की रुनी, “अधेरे में" की मा अथवा "अंतर" की वह अथवा ऐसे ही अनेक पात्र जो लिजलिजी भावुकता में अपने मुर्दा अतीत को सोने से चिपटाये रखना चाहते है, क्या इससे मुक्ति ही मानव मुक्ति की सही परिभाषा है ? क्या निर्मल वर्मा के पात्रों में दैनदिन- जीवन का संघर्ष और उसकी ऊर्जा है ? अगर है तो भाषा में यह निष्प्राण चेतना कहां से आ गई? क्या भाषा की निष्प्राणता यथार्थ बोध की निष्प्राणता की सूचक नही है ? वह जो काव्यमयी निष्प्राण भाषा है जिसमें लॉन के कोने मे तीन पेड़ों का झुरमुट था, ऊपर की फुनगियां एक दूसरे से बार-बार उलझ जाती थी, हवा चलने से उनके बीच प्राकाश की नीली पलकें कभी मुद जाती थी, कभी खुल जाती थी। ग्रामोफोन के घूमते हुये तवे पर फूल पत्तियां उग जाती हैं-संगीत के सुर झाड़ियो में हवा से खेलते है, घास के नीचे सोई हुई भूरी मिट्टी पर तितली का नन्हा-सा दिल धड़कता है-मिट्टी और घास के बीच हवा का घोसला कापता है। इनका क्या औचित्य है ? आज के सदर्भ में क्या यह व्यर्थ और अनावश्यक नहीं लगता ? माज कहानीकार के सामने यथार्थ का प्रश्न सबसे बड़ा है, जो इससे कतराता है, वह पाठक के सामने अपनी विश्वसनीयता नही जमा पाता । ऐसी स्थिति में उसकी कहानी भी अविश्वसनीय बनी रहती है। पयोकि आज का पाठक केवल घटनामो को समझता, वातावरण को 1. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानियां, पृ. 11-12 2. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानिया, पृ. 13-14 30 देखता या चरिनो को पढता ही नही पात्रो की संवेदना को अपनाकर सिचुएशस और परिवेश को अपने भीतर घटते हुये देखता है। ऐसी स्थिति मे कथाकार यदि सचमुच जोवन का गहरा और व्यापक ज्ञान रखता है तो वह प्रसग स्थिति मे बधे मनुष्य की सवेदनात्मक प्रति- क्रियानो को ही महत्व नहीं देगा, वरन् उस स्थिति से सम्बन्ध रखने वाले जो वस्तु सत्य हैं उनको बनाने वाले तत्वों पर अर्थात् व्यक्ति स्वभाव की विशेषतामो, वास्तविकता की पेचीदगियो और अब तक चलते पाये इन सबके विकास क्रम पर, इन सब पर, अवश्य ही ध्यान देकर इस प्रयोग स्थिति के वस्तु सत्य के ताने-बाने को कलात्मक प्रभावशाली रूप मे, (भोडे ढग से नही) प्रस्तुत करेगा। और इस प्रकार व्यक्ति समस्या को मानव समस्या बनाकर एक व्यापक पार्श्वभूमि मे उसे उपस्थित करेगा। वैसा करना चाहिये । लेकिन यह मानव समस्या निर्मल के पात्रो मे कही नहीं मिलती। हर पात्र अपने निजी स्तर पर एक ऐसा बोझ उठाये घूम रहा है जिससे उसका कधा भी चरमराने लगा है, परतु पाठक को इसकी आहट भी सुनाई नही पडती। कहने का तात्पर्य यह है कि निर्मल वर्मा के पान एक ऐसे रहस्य को जन्म देते हैं जो न उनका ही है न हमारा और न किसी मानव समुदाय का -चाहे वह प्राग और यूरोप के किसी देश के निवासी क्यो न हो-वह निर्मल की चेतनाहीन दृष्टि की ही उपज हैं, जिसमे सिवाय मरने के और कोई रास्ता दिखाई नही पडता क्योकि यथार्थ से दूर हटकर कब तक भावना की अधेरी और चिपचिपी गली मे भटका जा सकता है ? इसीलिये तो "दहलीज" की स्त्री को इतने वरसो बाद लगा कि "वह बगले के सामने खडी है, और सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी बरसो पहले मार्च मे एक दिन --कुछ भी नहीं बदला, वही बगला है, मार्च की खुश्क, गर्म हवा साय साय करती चली आ रही है, सूनी सी दुपहर को परदे के रिंग धीमे-धीमे खनखना जाते हैं और वह घास पर लेटी है-बस, अब अगर मैं मर जाऊ -उसने उस घडी सोचा था।" अथवा "मेहरु बत्ती बुझा दे उसने सयत, निर्विकार स्वर मे कहा-देखती नही, मैं मर गई है।"4 यह सब था-- 1. राजेन्द्र यादव--एक दुनिया समानातर, पृ. 69 2 मुक्तिबोध--एक साहित्यिक की डायरी, प. 108 3. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिप कहानिया, पृ. 11 4. निर्मल वर्मा मेरो प्रिय कहानिया, पृ. 19 31 7 वर्तमान के यथार्थ से न टकराने से उत्पन्न लिजलिजी भावुकता को ही उपज है जिसमे हर पान प्रतीत को सोने से लिपटाये हुये जी रहा है- हर शनिवार की प्रतीक्षा हफ्ते भर की जाती है--वह जैली को अपने स्टाप एलबम के पन्ने खोलकर दिखलाती है और जैसे अपनी किताब से आखे उठाकर पूछती है-"अर्जे टाइना कहा है ? सुमात्रा कहा है। वह जैली के पीछे फैली हुई असीम दूरियो के धूमिल छोर पर प्रा खडी होती है।"1 और जब शम्मी भाई जैली के सग रिकार्ड बजाते हैं, ताश खेलते हैं-मेज के नीचे अपना पाव उसके पाव पर रख देते है तो वह अपने कमरे की खिडकी के परदे के परे चुपचाप उन्हे देखती रहती है-जहाँ एक सजीव-सी मायावी रहस्यमयता मे डूवा झिलमिल सा सपना है और परदे को पीछे खोलकर देखना यह क्या कभी नही हो पायेगा, कभी नही हो पायेगा।" अथवा "मेजपोश पर वे लकीरे अब भी अकित हैं, जो अनजाने मे उसने चम्मच से खीच दी थी। उन लकीरो के दोनो ओर दो प्याले है, जिनसे हमने कभी कॉफी पी थी।"3 इस प्रकार निर्मल के पात्र एक ऐसी चेतनाहीन दिशा मे भटक रहे है, जहा प्रकाश की एक भी किरण दूर की कौडी ही है, वहा उनमे निराशा, कुठा एव मृत्युबोध जन्म लेता है, जिसमे हर पात्र घुट-घुटकर ही मरता है। स्वातत्र्योत्तर कहानीकारो ने नारी को एक नया रूप दिया, जहा वह अपने पैरो पर खडी है। आर्थिक रूप से स्वतन होकर वह अपनी अस्मिता और इयत्ता को पूर्ण सुरक्षित रखती है। पहली नारी की भाति प्रेम मे असफल होकर वह कभी "कोयले वाले" के यहा और कभी "सेनिटोरियम" मे जीवन का त्याग-पत्र नहीं देती, सारी पारपरिक गरिमा को ठुकरा कर वह यथार्थ के बल पर जीती है और यौन सम्बन्धो को लेकर जो दुनिया भर के मानसिक पूर्वाग्रह थे, उन्हे साहस के साथ तोडती है। परन्तु निर्मल के यहा इसका एकदम उलटा है। निर्मल की नारिया इन्ही पूर्वाग्रहो और दुराग्रहो मे घुट-घुटकर मरती है, इन सबसे छुटकारा पाने की दृष्टि उनके पास नहीं है जब मै बहुत छोटी थी, तो उनको 1. निर्मल वर्मा--मेरी प्रिय कहानियां, पृ 12 2. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानिया, पृ. 14 निर्मल वर्मा--मेरी प्रिय कहानियां, पृ 32 3 32 था . रात को छत पर सोने से पहले एक सुन्दर-नन्हा-सा तारा चुन लेती थी लेकिन अगली रात बहुत खोजने पर भी तारा नहीं मिलता जब बहुत रोती थी तो बउआ किसी कोने में दूसरा तारा खोजकर मेरे लिये चुन देती थी 1 और इसी प्रकार बडी होने पर भी शादी न होने की कुंठा को पाले रहती है- "बब्बू, कभी-कभी मै सोचती हूँ कि लडकियाँ जब दुल्हन बनती है तो कैसा लगता होगा? '2 लतिका की यह कुंठा और भी भयावह रूप धारण कर लेती है, उसे इस कुंठा पर क्रोध तो आता है परतु इससे निकलने का कोई साधन नहीं तलाशती, 'अनजाने मे गिरीश का चेहरा धुंधला पडता जाता है, याद वह करती है। अब वैसा दर्द नही होता, सिर्फ उसकी याद करती है जो पहले कभी होता था, तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर (जान-बूझकर) उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, खुद-ब-खुद, उसकी कशिशो के बावजूद भरता जा रहा है ।"3 शम्मी भाई के प्रम के चक्कर मे फसी दोनो बहिन जैली एव रुनी भी कुंठा की पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है । परन्तु इससे बचने का उपाय इनके पास भी नही है । रुनी की कुंठा उसे हमेशा सत्रस्त किये रहती है । उसे लगता है-"उसकी गर्दन के नीचे झाक के भीतर से ऊपर उठती हुई कच्ची- सी गोलाइयो मे मीठी-मीठी सी सुइयाँ चुभ रही थी, मानो शम्मी भाई की आवाज ने उसकी नगी पसलियो को होले से उमेठ दिया हो।"4 इस प्रकार जहाँ स्वातत्र्योत्तर कहानीकारो ने नारी को स्वतन दर्जा प्रदान किया, वही निर्मल जैसे कुंठित एव चेतनाहीन कहानीकार ने नारी को रीतिकालीन विहारी की नायिका बना दिया। उसमे इतनी शक्ति और सामर्थ्य नही कि वह इन सब खोखले और कृत्रिम बधनो को तोडकर पुरुष के कधे से कंधा मिलाकर कार्य कर सके । पुरुप द्वारा बनाये गये तथाकथित स्वयसेवी सविधान की अवज्ञा कर सके और देवी और गृहलक्ष्मी से ऊपर उठकर वह एक साथ नारी का, स्वतन नारी का दर्जा प्राप्त कर सके। पुरुष के सामने घुट घुट कर मरने की निर्मल वर्मा-परिदे 21 2. निर्मल वर्मा-परिदे, पृ29 3 निर्मल वर्मा-परिदे, 4 166 4 निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानियां, 4 15 33 अब उसे कही कोई आवश्यकता नहीं है न उसको नियति ही। परन्तु निर्मल के यहाँ मानो उसको यहो नियति हो। इसलिये निर्मल को नारियां ऐसी नारियाँ हैं जो दबो-पिसी रहती हैं, पुरुप के सामने मुंह खोलने को हिम्मत हो मानो उनमें नहीं है। कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है कि निर्मल को प्रेमिकाये भो जनेन्द्र को "सुनोता" जैसी ही हैं, जो पर-पुरुष के मात्र कहने से (प्रेमानुभूति के कारण नही) नग्न हो जातो है, परन्तु श्रोकात जैसे नपुंसक पुरुष फिर भी वहां से भाग छूटते हैं । निर्मल को "अंतर" कहानो को वह ऐसो हो प्रेमिका है, जो अपने प्रेमी के सामने तो कृत्रिम प्रसन्नता का प्रदर्शन करतो है परन्तु प्रेमी के वहाँ से चले जाने के पश्चात एक भारी बोझ के उतर जाने का अहसास करती है । "कुछ देर तक वह पलंग पर आँखें मुंदे लेटी रहो। जब उसे निश्चय हो गया कि वह अस्पताल से दूर जा चुका है, तो वह धोरे से उठो । खिड़को खोल दो । वाहर अंधेरे में उस छोटे से शहर को वत्तियां जगमगा रही थी।"। प्रेमी के सामने जहां उसने उसके द्वारा लाई हुई चीजों को खाने को हामो भरी थी, वहीं उसने मेटनिटी वार्ड से जाने के बाद उस सामान को बाहर फेंक देती है-"वह चुपचाप बिस्तर के पास चली आई। अपने सूटकेस से एक पुराना तौलिया निकाला। फिर उसमें करीने से उन सब चीजों को लपेटा, जो वह उसके लिये छोड़ गया था। खिड़की के पास जाकर उसने उन्हे अंधेरे में फेंक दिया।"2 यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति है कि प्रेमी के सामने जहाँ वह उसके मना करने पर भी उसे प्रसन्न करने के लिये उसे अपना नग्न वक्ष दिखाती है-"उसने अपनी देह से चादर हटा दी और दोनों हाथों से उसका चेहरा अपने वक्ष पर खीच लिया"3 वही प्रेमी के चले जाने पर प्रसन्नता का अहसास करती है। ऐसी कौन सी मजबूरी है जहां वह घुटन और दब्यू वातावरण में भी प्रेम करने को विवश है, लेखक स्पष्ट तो क्या सकैत भी नही कर पाया। निर्मल के मुख्य पात्र भी यथार्थ जीवन से जुड़े न रहकर शराब पी-पीकर पलायन करते से दिखाई देते हैं। उनमें यथार्थ जीवन के 1. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानियां, पृ. 128 2. निमंन वर्मा-मेरी पिय कहानियाँ, पृ. 129 3. निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानियाँ, पृ. 128 34 कठोर पठार से न टकराने की हीनता भरी रहती है। वास्तविक जीवन क्या है, इसे वह समझने मे सर्वथा असमर्थ हैं। किसी नायक की तरह वह शिमला जाते हैं, स्नोफॉल देखते है, किसी फाइव स्टार होटल मे बैठकर सर्वश्रेष्ठ विदेशी शराब पीते है या प्राग अथवा यूरोप के किसी बडे शहर मे पर्यटक की भाति घूमते हैं-किसी बार की तलाश मे । प्रेम के नाम पर उन्हे साथ-साथ घूमना अच्छा लगता है, परतु यह साथ- साथ घूमना मन के किसी कोने पर अपना चिह्न नही डालता। केवल ऊपर ही ऊपर छलावे और दिखाने के लिये यह प्रेम चलता रहता है। तभी तो "लवसं" की वह जब उसके अनुरोध को टुक्रा देती है तो उसे लगता है-"नाट इज देट वे" ये चार शब्द बहुत ही छोटे है । आसान है और मैं अचानक खाली सा हो गया हूँ, और सोचता हूँ जिदगी कितनी हल्की है। मैं कल रात यही सोचता रहा था कि वह "न" कह देगी तो क्या होगा? जब उसने कह दिया है, और मै वैसा ही हूँ। कुछ भी नहीं बदला ।"। इस प्रकार निर्मल की प्रत्येक कहानी जहाँ रूमानियत के प्रभाव से बच नहीं पाती, वही अपना अक्षुण्ण प्रभाव भी नही छोड पाती। यह इनकी सबसे बड़ी कमजोरी है । और सही भी है नपुसक रूमानियत कब तक अकेली पड़ी रहकर जी सकती है ? ऊर्जा के अभाव मे उसे एक दिन सूखना ही है । निर्मल की कहानिया पढते हुये मुझे कभी-कभी यह लगा कि उनके पास एक टीस, एक कसक या एक दर्द अवश्य है जिसे वह अपनी हर कहानी मे शिल्प की नवीनता के प्रावरण मे लपेटकर पाठको तक पहुँचाने का उपक्रम करते हैं । परन्तु स्पष्ट वैचारिकता न होने के कारण "शिल्पवाद" उन पर हावी हो जाता है और कथ्य अनछुना रह जाता है। "सितम्बर को एक शाम" एक ऐसी ही सशक्त कथ्य की कहानी है जिसमे बेरोजगार युवक अपने घर की घुटन से उठकर भागता है और अपनी बहन के घर आ जाता है। वह न उसे जीवन से संघर्ष करने की शिक्षा देती है, उसे बताती है कि वह अब बडा हो गया है इसलिये अपने अह की रक्षा घर के वातावरण को बदलकर ही कर सकता है, चाहे उसके लिये संघर्ष ही क्यो न करना पड। इस तरह घर से भागना, निर्मल वर्मा-मेरी प्रिय कहानियां,129 35 - 2 - सडको पर एडिया घिसना, पलायन है-बडप्पन या अह की रक्षा नही- तुम बहुत बड़े बन गये हो, छि तुम्हे शर्म नही आती। अपनी तरफ देखो। सडको पर वेकार एडिया घिसने से तुममे वडप्पन आ गया है आया होगा, मुझे तो दिखता नही ।। परन्तु स्पष्ट वैचारिकता के अभाव मे आज के युग का जीवत प्रश्न दव गया है और उस पर निष्प्राण भाषा की परत जम गई है । वह सितम्बर 1955 की रात थी। एक रात जब चारो ओर शाति का रुपहला, स्निग्ध अ धकार नीली निस्तब्ध झील-सा फैला था, और चुपचाप प्रतीक्षा कर रहा था क्या कोई कभी जानेगा? जीने का एक झिलमिल क्षण, जिसकी कोई अनुभूति नही । कोई परिणति नही ।। स्वातत्र्योत्तर कहानीकार भापा के स्तर पर परम्पराजीवी नही है, उसने भाषा मे सप्रेपण की ताप और त्वरा भरने के लिये निरतर प्रयोग किये। इसीलिये भाषागत प्रयोग का पलक बहुत व्यापक हो गया। इसमे एक ओर परम्परागत प्रौढता को मद्देनजर रखकर किये गये प्रयोग हैं तो दूसरी ओर परम्परा से हटकर देश के समग्र भौगोलिक विस्तार को स्वायत्त करते हुये पजाबी, बगला, मराठी, भोजपुरी, कश्मीरी आदि भापाप्रो के नये प्रयोग हैं। इसमे एक ओर नवीन व्याकरण गढने का प्रयास है तो दूसरी भोर गहरी व्यजना शक्ति का विकास । यह भाषिक प्रयोग कहानी को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक एक भावात्मक एकता मे पिरो देते हैं। जिसका परिणाम यह हुआ कि कहानी की भाषा चद मुट्ठी भर लोगो की अभिजात्य भापा न रहकर आम आदमी को भाषा बन गई। स्वातत्र्योत्तर कहानी मे यह बदलाव प्रेमचद को सुदीर्घ एव समाजोन्मुख धारा का ही प्रभाव है । परन्तु निर्मल वर्मा इस महान् परम्परा से हटकर पाश्चात्य के रग मे रगी पव को महकती रम की कृत्रिम भाषा को ही प्राधार बनाते हैं, जिसके कारण वे भाषा के स्तर पर भी आम आदमी से कट जाते हैं। निर्मल वर्मा की कहानियां एक ऐसे चेतनाहीन कहानीकार की पहानियां हैं, जिनमे कथ्य के नाम पर एक लिजलिजी और नपुंसक 1 निर्मल वर्मा-परिदे, पृ. 127-28 2. निर्मल वर्मा-परिद, पृ 130 36 आवेगमयी भावुकता है। जिसे लेकर वे एक शिखडी को भाति हाथ पैर तो पटकते हैं परतु चिपचिपा शिल्प, नपुसक कथ्य एव निष्प्राण भाषा उन्हे बीच में ही छोड पलायन कर जाती है और उन पर नितात व्यक्तिवादी जार्गन हावी हो जाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप वे कुंठा, सनास, मृत्युवोध एव अनास्था आदि मृत भावो का प्रयोग कर कहानी की सरचना करते हैं। जिसकी प्रामाणिकता के लिये वे भारत से पलायन कर प्रयाग और यूरोप की अधेरी रातो मे (पव की खोज में विशेषकर)भटकते फिरते हैं । जो पाठक को ऊब और बोरियत का अहसास ही करा पाती है, अपना प्रभाव छोडने भर की सामर्थ्य उनमे नही है। और यही निर्मल जहां प्रेमचद जैसे महान कथाकार को आज की परिस्थितियो मे अप्रासगिक करार देने का असफल षड्यत्र करते हैं वही स्वय अपने द्वारा निर्मित पड्यन मे बुरी तरह फसकर सर्वधा अप्रासगिक हो जाते है । यह उनकी नियति है अथवा माया का मर्म इसे वे ही अच्छी तरह जान और समझ सकते है। 37 सतह से ऊपर उठते आदमी की त्रासदी मुक्तिबोध की कवितायें पढकर भी उनके कथा-ससार से अपरिचित नही रहा जा सकता। तनावभरी जिन्दगी के रेशे-रेशे को सुलझाते मुक्तिबोध पाठक से नजदीकी का रिश्ता जोडते है और उसको अपने साथ, अपने जैसे तनाव मे रखते है। प्रेमचद के अवसान से शुरू कर नेहरू-युगात तक साहित्य मे सक्रिय रहे मुक्तिबोध निरतर विकसित और सम्बर्द्धित होते रहे। वैज्ञानिक विचारधारा के आलोक मे रचना को सार्थक परिवर्तन का माध्यम बनाने के लिये बेचैन रहकर जीवन भर उन ताकतो से जूझते रहे जो जिन्दगी को अमानवीय और मनुष्य को सवेदनहीन करने पर तुली हुई है। इस तनाव और बेचैनी की दुनिया मे ही उन्हे समझा जा सकता है, पहचाना जा सकता है । मुक्तिबोध की साहित्य-यात्रा छायावादी-युग के धुधलके से प्रारम्भ होती है। इसीलिये उनकी प्रारम्भिक रचनामो मे रोमानियत और भावुकता पूरी तौर पर मिलती है। यह सयोग ही कहा जा सकता है कि प्रगतिवादी दौर मे भी मुक्तिबोध उसी प्रकार की कवितायें लिख रहे थे, जिनमे छायावादी तत्व अधिक थे। इसका प्रभाव उनकी "तार सप्तक" मे सकलित कवितामो मे भी देखा जा सकता है। कवितामो के साथ-साथ मुवितबोध कहानियो मे भी उसी ससार का सृजन कर रहे थे, जो भावुकता, आदर्श और रोमानियत से लबालव था। यह स्थिति और यह भावुकता मुक्तिबोध के जीवन को प्रतिविम्बित करती है। मुक्तिबोध की प्रारम्भिक कहानियो पर जयशकर प्रसाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्रसाद को वे बडा कवि मानते थे इसलिये प्रसाद के भावुक और दार्शनिक ससार से भी वे अछूते नही रहे । कहानियां भी उन्होंने प्रसाद जी की पढी ही होगी, अत. उस प्रभाव 8 से वे कैसे अझते रहते । लेकिन उनमे क्रमश विकास हुआ और बाद मे "तार सप्तक" की अपनी कविताये और वक्तव्य भी उन्हे बेगाने लगने लगे। इस विकास के मूल मे उनकी वैज्ञानिक विचारधारा और जीवन- सघर्प ही हैं। बीस वर्ष की उम्र मे मिडिल स्कूल में अध्यापन और उसके एक वर्ष बाद पारिवारिक असहमति और विरोध के बावजूद शाता से विवाह ने उन्हे जीवन मे अन्य अनेक दिशायें दी, जो कठोर थी, सघर्प- भरी थी। मुक्तिबोध हिम्मत के साथ उन दिशाम्रो पर चलते रहे, टकराते रहे और वह भावुकता, जिसने जिन्दगी को भटकाव दिया था, दूर होती गई । इस संघर्ष के दौरान उन्होने बहुत अध्ययन-मनन किया, नौकरियां छूटी, छोडी और स्थान परिवर्तन हुये । मनुष्य को परखा, उस पर विश्वास किया, विश्वास टूटे, लेकिन मुक्तिबोध नहीं टूटे और न किसी प्रकार का समझौता किया। नेहरू-युग के प्रारभिक दौर मे जहा पुराने सम्बन्ध टूट रहे थे और नये सम्बन्ध सूत के कच्चे धागे मे लपेटे जा रहे थे, जहाँ मनुष्य के विकास के स्थान पर मशीनो के विकास पर जोर दिया जा रहा था, जहां मानवीयता और मनुष्यता लाल-गुलाब से शरमाकर छिप गई थी और प्रगति के नाम पर क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता, भाई-भतीजावाद, भाषावाद एव अन्य अनेक सकीर्णतायें अमरबेल की तरह फैल रही थी, वहाँ मुक्तिबोध अपनी विचार-दृष्टि का विकास करते हैं। एक ठोस और वैज्ञानिक दृष्टि से वे अपने आस-पास को देखते हैं और स्वय के जीवन संघर्षों का विश्लेषण करते है। अपने सघर्षों के आधार पर निम्न-मध्य वर्ग को देखते हैं, और उनके सघर्षों मे अपने संघर्षों की छवि देखते हैं, इसीलिये वे "नयी कहानी" आदोलन के "सीमित" और "दया-माया" के वातावरण से अलग हटकर कहानी लिखते है । उनकी कहानियां "परिन्दे" की लतिका की तरह हताश हो "हम कहाँ जायेगे" नही कहती, न जनेद्र की तरह "स्व-पीडा" मे जगत का रहस्य खोजती है, न यशपाल की तरह विचार को घटनामो का चर्म पहनाती है और न अज्ञेय की तरह छद्म- सामाजिकता मे घुटती है । मुक्तिबोध इन सबसे अलग कहानी रच रहे थे, जो सतह के प्रादमी की कहानियां हैं । सतह पर सघर्षरत्, सतह के जीवन-मूल्यो के लिये जूझते आदमी की कहानियाँ हैं। हिन्दी कहानी मे भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता को महत्व प्रदान 39 कर, उसमे रोचकता और गभीरता बनाये रखने का कार्य मुक्तिबोध ने किया। यह कार्य दो नावो मे पर रखकर वाढग्रस्त नदी पार करने जैसा है, जिसमे हर समय सयम, सतुलन और विवेक की आवश्यकता होती है । यह चुनौती मुक्तिबोध ने सहर्ष स्वीकार की। "पालोचना" और कविता मे अलग स्थान बनाने के बाद उनके समक्ष यह चुनौती रही होगी कि कहानी मे वे कैसे अपनी अलग पहचान बनाये । गभीर अध्येता मुक्तिबोध के लिये यह सभव नही था कि वे "मध्य वर्ग" की कु ठा, हताशा एव घुटन को हो महिमा-मडित करते रहे। उन्होने निम्न-मध्य-वर्ग के टूटते-विखरते स्वप्नो की कहानियाँ लिखी, जिनमे वैविध्य और रचाव का वैशिष्ट्य है। । मुक्तिबोध अपनी कहानियो मे पात्रो के रूप मे स्कूल के अध्यापक या क्लर्क आदि को चुनते हैं, जो इस व्यवस्था मे चुनौतीपूर्ण जिन्दगी जी रहे है । पात्रो की विशेषता यह है कि वे खूब पढते है, चिंतन करतेहै, लेकिन समझौते नही करते, रिश्वत नही लेते, झूठ नहीं बोलते, दूसरे की गर्दन नही काटते, चापलूसी नही करते । इसीलिये सभ्य समाज के तथाकथित आधुनिक गुणो के अभाव मे वे उपेक्षित जीवन जीते है । अपनी बीमारी और पारिवारिक उत्तरदायित्वो के बीच भी वे अकेली जिंदगी जीते है । यह एक चुनौतीपूर्ण जिंदगी है, जिसे मुक्तिबोध ने स्वय जिया और अपने पात्रो को वैसा ही सृजित किया। प्राधुनिक सुख-सुविधानो से उन्हे चिढ है, जीवन मे किसी की कृपा और सहानुभूति से उन्हें नफरत है, वे अपनी जिंदगी को अपनी तरह जीना चाहते है। लेकिन इस प्रकार के जीने मे निरतर अवरोध आते है। समाज ऐसे व्यक्तियो को कुचलना चाहता है, दवाना चाहता है, उनकी उपेक्षा करता है। ईर्ष्या और द्वेष के घृणित वातावरण मे मुक्त-जीवन-विवेक कहां? वहाँ तो इसकी हत्या होती है। मुक्तिबोध लगभग प्रत्येक कहानी मे इस प्रकार के प्रश्न को कडवे मन से उठाते है और अत मे इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यह व्यवस्था टुच्चे और कमीने लोगो को है, अत यहाँ ईमानदार, निष्ठावान और विवेकी-जनो की कोई कीमत नही, इसलिये जैसे भी हो इस व्यवस्था को बदलना चाहिये। इस बारे में, वे "जलना" कहानी मे लिखते है--"उसके बच्चे बडे होगे। कॉलेज एजुकशन तो क्या ले सकेंगे। इतना पैसा ही नहीं है कि उनके लिये किताबें खरीदें। लेकिन हां, 40 ।
। में अपने सारे विचार, मेरी अपनी सारो कल्पनाये और धारणाये उन्हे बता दूगा । उनका बिल्कुल सिस्टेमेटिकली अध्ययन करा दूगा । मैं उन्हें बडे आदमियो की बैठको से दूर रसूगा और इस तरह घुट्टी दूगा कि वे उनके तौर-तरीको से घृणा करे, कि अपने जैसे गरीबो मे ही रहे, और उन्हे लिखाये-पढाये, उन्हे नये-नये विचार दे, उनकी भविष्य कल्पना तीव्र कर दें, उनकी जगत चेतना को विस्तृत और यथार्थवादी बना दे, और उनमे मरे और जिये। मैं उन्हे क्रातिकारी बनाऊंगा। मैं उन्हे समाज की तलछट बनने के लिये प्रेरित करूंगा, वे वहाँ बैठे-बैठे किताबें लिखेगे, पैम्पलेट छापेगे, और जो मिलेगा उसे सबके साथ खावर उन सब भडकीले दम्भो से घृणा करेगे जो शिक्षा और सस्कृति के नाम पर चलते हैं।" मुक्तिबोध भविष्य के लिये यह घोषणा करते है, यह व्रत लेते हैं जिससे यह स्पष्ट है कि वे इस क्रूर व्यवस्था को बदलने के लिये अपना सारा जीवन तो देगे ही अपने बच्चो को भी इस कार्य के लिये समर्पित कर दगे। "ब्रह्मराक्षस का शिष्य" कहानी में वे प्रकारान्तर से इसी तथ्य को उद्घाटित करते है। विना मुक्ति के जीवन व्यर्थ है और मुक्ति बिना ज्ञान के नही पा सकती। वह ज्ञान ऐसा हो जो सबको मिले, अपने तक ही सीमित नहीं रहे, अपनी ही मुक्ति का रास्ता नहीं खोजे, अपनी चिताप्रो और परेशानियो को दूर करने के लिये ही नहीं भटके, बल्कि सारे समाज की मुक्ति के लिये ज्ञान का प्रचार-प्रसार करे, उसके प्रति दृढता प्रकट करे। कहानी के प्रत मे "ब्रह्मराक्षस" अपने शिष्य से कहता है-"मैंने अज्ञान से तुम्हारी मुक्ति की । तुमने मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरी आत्मा को मुक्ति दिला दी। ज्ञान का लाया हुआ उत्तरदायित्व मैने पूरा किया। अब मेरा यह उत्तरदायित्व तुम पर पा गया। जब- तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब-तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।"2 यह प्रात्मा की मुक्ति प्राध्यात्मिक नहीं है, ठेठ सामाजिक है, जहाँ व्यक्ति ऐसे शिष्यों की तलाश मे रहता है जो उसके लक्ष्य को पूरा करने के लिये ज्ञान के आलोक को चलायेगे एव साहस और निष्ठा के साथ भागे बढ़ेंगे। 1. मुक्तिबोध रचनावली-स० नेमिचद जन, 167 2. मुक्तिबोध रचनावली 1- स. नेमिचद जैन,' 120 मनुष्य जीवन को सार्थकता इसमें है कि वह जीवन-मूल्यो की प्रतिष्ठा और सुरक्षा के लिये सघर्ष करे, न कि इस अघी स्वार्थ-भरी दौड में शामिल हो अमानवीय हो जाये । मुक्तिबोध बार-बार अंधी दौड़ से अलग होने के लिये जोर देते हैं। उनकी कई कहानियो के केंद्र में यही विचार निहित है, जिसमे वे अपने वर्ग और अपनी सतह से अलग होकर इस अमानवीय व्यवस्था का पुर्जा होने का विरोध करते हैं । यह व्यवस्था इस प्रकार के अनेक प्रलोभन और अवसर देती है, जिसमें व्यक्ति अपने स्थान मे डिग जाता है और फिर अपने ही लोगो का, अपने जैसो का ही शोपण करता है। इस प्रकार की स्थितियो से जसे मुक्तिबोध चौकस रहे, वैसे ही उनके पात्र भी। सतह पर रहकर, यानी कि अपनी जमीन पर रहकर अपने जीवन मूल्यों के लिये सवर्ष करते रहना, समाज को चैतन्य बनाना, व्यवस्था को क्रूरताओं से भली-भाति परिचित कराना एव उसको जटिलतानो को नियति बताना मुक्तिबोध जरूरो समझते है। "क्लॉड् ईथरली" एव "सतह से उठता आदमी" मे वे इस पर विशेष बल देते हैं । "क्लॉड् ईथरलो" प्रतोकात्मक कहानी है, जिसमे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिकी बमवर्षक विमान चालक क्लॉड ईथरली को प्रतीक रूप में प्रस्तुत कर कहा गया है कि अपने लोगो पर जघन्य अत्याचार करने वाले क्लाड ईथरली जैसे लोग जब अन्याय का अनुभव करते हैं, सत्य को स्वीकारते हैं, तव उन्हे पागल कहकर पागलखानो मे बद कर दिया जाता है। ये पागलखाने कही भी हो सकते है और क्लॉड ईथरली भी हर कही हो सकते हैं, जिन्हें अपने किये पर दुख है, वे पश्चाताप करना चाहते हैं, परन्तु व्यवस्था उनके घृणित काम को पुरस्कृत करती है, उन्हे महिमामडित करती है और वह व्यक्ति इसके विपरीत अपने पाप-कर्म का दण्ड चाहता है । दण्ड पागलखाने के अलावा और क्या हो। मुक्तिबोध इस घटना को विशाल मानव-सत्य से जोडते है-"हमारे अपने-अपने मन, हृदय, मस्तिष्क मे ऐसा ही एक पागलखाना है, जहां हम उन उच्च, पवित्र और विद्रोही विचारो और भावो को फेंक देते हैं जिससे कि धीरे-धीरे या तो वे खुद बदलकर समझौतावादो पोशाक पहन सभ्य, भद्र हो जायें, यानी दुरुस्त हो जायें या उमी पागलखाने मे पड़े रहे ।" यानी कि सम्य और भद्र प्राधुनिक युग मे वे हैं, जो समझौतावादी हैं, जिन्हें बुरा 1. मुक्तिबोध रचनावली - स० नेमीचद जैन, पृ. 160 42 कुछ भी नही लगता, अपने समाज और अपने वर्ग के लोगो पर हो रहे अत्याचार उन्हे वेचैन नहीं करते, पागल नही बनाते, ऐसे व्यक्ति ठाठ से समाज मे जीते है, आज के अनुरूप प्रगति की सीढियाँ चढते हैं, समझदार और व्यावहारिक होने का कोई अवसर नहीं चूक्ते, लेकिन जो ऐसा नहीं करते वे "क्लॉड ईथरली" की तरह घुटन अनुभव करते है । इसलिये मुक्तिबोध कहते है- "क्लॉड ईथरली हमारे यहाँ भले ही देह-रूप मे न रहे, लेकिन आत्मा की वैसी बेचैनी रखने वाले लोग तो यहाँ रह ही सकते है ।"1 इह प्रकार के प्रतीक चुनकर कहानियाँ गढना, विशाल मानव-सत्य का उद्घाटन करना मुक्तिबोध की विशेषता है । कलॉड ईथरली नेहरू युग के मानव-सत्य का यथार्थ है । देश और समाज की चिंता करने वाले, अपने वर्ग पर होने वाले शोषण का विरोध करने वाले लोगो की चितामो की उपेक्षा और समझौतावादी होने पर विशेष बल उस युग का यथार्थ है, आज का यथार्थ भी इतना ही जटिल और घृणित है, जिसे मुक्तिबोध की कहानियो मे पिरोये जीवन-अनुभवो से समझा जा सकता है। धन कमाने की अधी दौड़ में शामिल होकर अपना व्यक्तित्व खो देने को मुक्तिबोध अच्छा नही मानते। हर परिस्थिति से लाभ उठाने वाले व्यक्ति चाहे कितने ही पैसे वाले हो जायें लेकिन उनमे आत्म-बल नही रहता । आत्म-बल के बिना मनुष्य समाज मे किस प्रकार निरीह जोवन जीता है, इसे मुक्तिबोध "सतह से उठता आदमी" के कृष्ण स्वरूप के रूप मे चित्रित करते है। कृपण स्वरूप धन के आधार पर स्वय को बडा मानता है, लेकिन जिस व्यक्ति को वह सीढी की तरह प्रयोग करता रहा है, उसके सामने आते ही वह व्यर्थ हो जाता है। उसकी सूरत देखते ही कृष्ण स्वरूप को काठ मार गया। वह ज्यो का त्यो बुतनुमा खडा हो गया। उसकी आंखें फटी सी रह गई और मोठ कुछ बुदबुदाने से लगे।"2 मुक्तिबोध अत्यधिक धन से उत्पन्न विकृतियो, धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के कृत्सित साधनो का विरोध इसलिये नही करते हैं कि उन्हे धन और प्रतिष्ठा से घृणा है । घृणा है उन्हे उन स्थितियो' से जहां धन कमाने के पीछे दौड़ता आदमी गटर के कीड़े से 1. मुक्तिबोध रचनायली-स० नेमिचद जैन, 160 2 मुक्तिबोध रचनावली-स० नेमिचद जैन, पृ. 183 43 - भी गदा और हेय हो जाता है। प्रतिष्ठा एव पदो के लिये किस प्रकार प्रतिभा की हत्या की जाती है, उसे मुक्तिबोध ने जीवन मे स्वय भोगा- देखा है । अनैतिक रूप से पद प्राप्त कर उसकी झूठी शान मे जीते कृष्ण स्वरूप को सम्मान नहीं देते, आदरणीय दृष्टि से नही देखते, बल्कि कन्हैया के रूप मे वे स्वय या उपस्थित होते हैं और कहानी के अत मे कृष्ण स्वरूप द्वारा अजित धन और प्रतिष्ठा के लिए अपना अस्तित्व खो देने पर वे थूकते हैं-"कृष्ण स्वरूप को विदा करने जब कन्हैया नोचे पहुंचा तब न मालूम क्यो उसने गटर मे थूक दिया । क्यो । पता नही ।" "क्यो और पता नहीं" कहकर मुक्तिबोध प्रश्न छोडते हैं । पाठक को मानद विभोर नही करते, कृष्ण स्वरूप की स्थितियो पर दया नही उपजाते, बल्कि प्रश्न दागते हैं, पाठक को झकझोर कर चैतन्य करते हैं, क्या हुमा कृष्ण स्वरूप ऐसा, क्यो नही उसने सामान्य और सतह के आदमी की जिंदगी जो, क्यो वह अपने वर्ग से ऊँचा उठने के लिये अपने आस-पास के लोगो के सुख-दु ख को भूल गया, अपनी आत्मा को क्यो उसने गटर मे डुबो दिया, अपने जीवन-मूल्यो के लिये उसने सघर्प क्यो नही किया ? आदि प्रश्नो को खडा कर मुक्तिबोध इस स्थिति को बताते हैं, जहाँ कृष्ण स्वरूप जैसे हजारो-हजार मध्य-वर्ग के व्यक्ति पूंजीवादी चकाचौध मे अपनी जमीन और अपने विवेक तक को लावारिस छोड़ देते है। ऐसे व्यक्ति गटर के कीडो से क्या ज्यादा हैं ? नही- यह बात मुक्तिबोध बार-बार कहते हैं । मनुष्य के स्वाभिमान, एव समाज मे उसके अस्तित्व से बढकर और किसी वस्तु को मुक्तिबोध नही मानते। उनके पात्रो का यही सोच बार- बार कवितायो, कहानियो, डायरी और उपन्यास आदि मे उभरता है। जहाँ भी कोई पात्र विचलित हुआ कि मुक्तिबोध उस पर थूकते हैं, उसे घृणित ठहराते हैं । अपने वर्ग के जोवन-मूल्यो और उसके सुदर भविष्य के लिये संघर्ष करने को वे अच्छा मानते हैं एव अपने वर्ग से अकेले ऊपर उठकर कटने को हेय । यदि यह कहा जाय कि एक ही बात को वे बार-बार हजार-बार भी कहते हैं तो गलत नही होगा। मुक्तिबोध इस प्रकार की स्थितियो, घटनाप्रो और विवरणो के माध्यम से भारी जोखिम उठाते हैं, वे प्रेम कहानियां नही लिखते, परिवार के आपसी 7 1 मुक्तिदोष रचनावली-स नेमिचद जैन, पृ 195 44 सम्बन्धो को विश्लेपित नही परते, गरीबी और बेरोजगारी पर पासू नहीं बहाते, बल्कि मध्य-वर्ग के उस आदमी की कहानियाँ कहते हैं, जो पढ़ लिखकर, चिन्तनशील होकर भी समझौता न कर सकने के कारण इस समाज मे उपेक्षित हैं, परिवार और उसके अपने यानी कि उसकी पत्नी तक उसे समझ नहीं पा रहे हैं, उसकी ईमानदारी, उसके खरेपन और उसके जीवन मूल्यो के प्रति उनके मन मे कोई सम्मान नहीं है । इसीलिये उनकी कहानियो मे वेचैनी और अकुलाहट की ऊष्मा सर्वत्र मिलती है। यह एक पात्र की स्थिति नही है, बल्कि सारे मध्य-वर्ग की यह नियति है और इससे मुक्ति इस व्यवस्था के बदलने से ही सम्भव है और बदलाव अकेले नहीं आ सकता । बदलाव के लिये जिस चेतना की, आग की जरूरत है, उसे वे अनवरत् प्रज्वलित करते हैं, उसे न बुझने देने के लिये एक ही प्रकार की कहानियाँ लिखते है। फिर भी उनमे न दुहराव है और न जडता । जो ताजगी है, जो नवीनता है वह जीवन-अनुभवो की प्रखरता और अपने वर्ग के सुख-दुख की दुनिवार 'चिन्ता के कारण है। मुक्तिबोध के रचना-ससार का स्वर्ग-काल 1950 से 1964 तक माना जा सकता है। यानी कि पूरा नेहरू युग। यही वह काल है, जब "नयी कविता" के नाम पर मध्यवर्गीय पीडा, सनास और ऊब को पश्चिमी अस्तित्ववादी आवरण मे परोसा जा रहा था, जब "नयी कहानी" के नाम पर भोगे हुये यथार्थ को निरीह दुनिया सजित हो रही थी, यही वह काल है-जब आचलिक कथा-साहित्य के नाम पर गांव को शहर से अलगकर "मैनरिज्म" को प्रचारित किया जा रहा था और यही वह काल है जव स्वय मुक्तिबोध अपने ही प्रगतिशील लोगो से जूझ रहे थे । "किसान मजदूरो" के अलावा प्रगतिशील-साहित्य को मध्य-वर्ग की सीमित दुनिया से निकाल उसके विवेक को जागृत करने, उन परिस्थितियो से लडने को तैयार कर रहे थे, जो मनुष्यत्ता को वन्दी बनाये हुये हैं । अपने युग को घुटन और पीडा को उन्होने निराशा मे नहीं, प्राशा और आस्था के रूप मे चित्रित किया । इसीलिये वे प्राति- धर्मा और युग दृष्टा हैं । प्रतिवद्ध लेखको को मुक्तिबोध द्वारा बताई दिशा ही आगे ले जायेगी। यही असली मार्ग है-जहाँ आगे सहस्त्र पखुडियो वाला अरुण कमल खिल रहा है। 00 45 साम्प्रदायिकता और हिन्दी उपन्यास स्वाधीनता के बयालीस वर्ष बाद भी धर्म-निरपेक्ष भारत में साम्प्रदायिक-समस्या जिस भयावह रूप मे सामने खडी है, वह हमारी स्वाधीनता, समानता और सम्प्रभुता के लिये खतरा बन गई है। साम्प्र- दायिकता को आग मे राजनीतिक-रोटी सेकने का हर आदमी प्रयत्न कर रहा है। उसके सामने देश उसकी एकता और धर्म-निरपेक्षता अक्षुण्ण बनाये रखने की समस्या है ही नहीं। आज के समय मे यह तथ्य नही भूलना चाहिये कि हमारे जीवन के मूल मे राजनीति है। राजनीति ही वह चक्र है, जिसके चारो ओर हम-सब घूम रहे है। ऐसी स्थिति में राजनीतिज्ञो की भूमिका को नकारना, समस्या का सही समाधान खोजने का प्रयत्न नहीं हो सकता । राजनीतिज्ञो ने स्वाधीनता यादोलन के समय इस ओर ध्यान दिया होता तो आज यह स्थिति न होती। जब गाधीजी ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि-"भारत की स्वतत्रता से अधिक महत्व मेरे लिये अपनी मुक्ति का है, मैं पहले हिंदू हूँ और देश-भक्त बाद मे।" तब शायद यह नहीं सोचा होगा कि वे स्वय को हिन्दू मानकर मुसलमानो को अपने से अलग कर रहे हैं और इस प्रकार सार्वजनिक वक्तव्य देकर मुसलमानो का नेतृत्व उसे दे रहे है, जो इसी प्रकार की घोपणा कर मुसलमानो का एक्छन नेता बन जाये। जिन्ना ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुये वक्तव्य दिया कि "मेरे लिये सबसे पहले इस्लाम है। अदना से अदना मुसलमान मेरी नजर मे गाधी से अधिक पविन है ।"2 ये दोनो वक्तव्य हमारे राष्ट्रीय नेतानो की सोच का ज्वलत उदाहरण हैं। धर्म-निरपेक्ष भारत की प्रतिष्ठा की बात करने वाले गाधी दैनिक जीवन मे कितने धर्म-निरपेक्ष थे, यह तथ्य किसी से छिपा नही है । इसी 1. उद्धृत, यशपाल-बात-बात मे बात, पृ 102 2 उद्त, यशपाल-बात-बात मे बात, १ 70 46 का परिणाम है कि विधान-सभा मे जन-प्रतिनिधि स्वय को साम्प्रदायिक कहकर भी लज्जा अनुभव नहीं करते। 10 जुलाई, 1989 को राजस्थान विधान सभा में साम्प्रदायिकता की समस्या पर हो रही बहस के अवसर पर जब काग्रेस-इ० के रतनलाल ताम्बी ने भारतीय जनता पार्टी के सदस्यो से यह कहा कि "भाजपा राज्य मे अच्छा वातावरण बनाने मे सहयोग दे तथा सिद्ध करे कि आप साम्प्रदायिक नहीं है।" तब इस कथन पर भाजपा विधायक घनश्याम तिवाडी ने जोर देकर कहा, "मैं तो हिन्दू सम्प्रदाय मे विश्वास करता हूँ। पक्का साम्प्रदायिक हूँ। मेरा जन्म ब्राह्मण के घर मे हुआ। मैं पक्का पडित भी हूँ। अव वोलो आप क्या कहना चाहते हो।" साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल मे अग्रेजो ने अधिक पानी दिया। हमारे राष्ट्रीय नेता अग्रेजो को कुटिल चालो को समझ नही सके और वे भी उसी धारा मे बहने लगे। इसलिये इसके मूल तक पहुँचने के लिये उन कारणो और स्थितियो को देखना होगा, जहा से यह जन्मी और वडो हुई। अग्रेज इस तथ्य से सुपरिचित थे कि जब-तक हिंदू- मुसलमान आपस मे लडते रहेगे, तब-तक वे निर्विघ्न राज्य करते रहेंगे । उनकी समस्त कूटनीति का आधार "फूट डालो और राज्य करो" ही था। अपने इस सिद्धात का पालन कराने के लिये मुरादाबाद के कमाडर ले. कर्नल कोक ने कहा था कि हमारी कोशिश यह होनी चाहिये कि हम पूरी ताकत के साथ धर्मों और जातियो के बीच मौजूद भेद-भाव को बना रहने दें। हमे यह भेद-भाव समाप्त करने की कोशिश नहीं करनी चाहिये । फूट डालो और राज करो ही हमारा सिद्धात होना चाहिये ।"2 अग्रेजो के इस सिद्धात ने हिंदू-मुसलमानो को अलग-थलग कर उन्हे एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया। सामान्य हिंदू को इस्लाम से घृणा नही थी और न सामान्य मुसलमान को हिंदू धर्म से। यदि यह घृणा भाव विधर्मियो के प्रति होता तो अग्रेजो के प्रति क्यो नही हुमा, जो विधर्मी और विदेशी होते हुये भी दोनो धर्मों के अनुयायियो का उत्पीडन कर रहे थे, उनका शोषण कर रहे थे। इस नीति के चलते स्थिति यहा-तक पहुंची कि 4-4-1939 को दिल्ली में मुस्लिम लीग के 1 राजस्थान पत्रिका, 17, दिनाक 11-7-89 उद्धृत, रजनी पाम दत्त, माज का भारत, 1463 2 प्रातीय अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए मसूदावाद के राजा ने स्पष्ट घोषणा की कि "करोडो (वनिया) को यह जान लेना चाहिये कि वह समुदाय जिसने कभी पाठ सिपाहियो के बल पर भारत जीता था, आज भी अपनी शर्ते मनवा सकता है। विश्व इतिहास मे इस मुस्लिम समुदाय की आज भी एक भूमिका है और यदि शोर मचाने वाले कलम घसीटू, जैसे कि हिंदू है, हमारा विरोध करने का साहस करते हैं तो उनका नामोनिशान इस दुनिया से मिटा दिया जायेगा।" 1857 का प्रथम स्वतत्रता-सग्राम अग्रेजो के प्रति घृणा की अभि- व्यक्ति था। जिस प्रकार अग्रेजो को गाजर-मूली की तरह काटा गया, उससे उनके मन मे भारतीय इतिहास और सस्कृति को समझ कर अपने हित साधने का विचार प्राया। अग्रेज भारत को छोडना नही चाहते थे । दोहन का जो क्षेत्र उन्हे यहा मिला था, वह अन्यन कही सम्भव नही था । अत उन्होने अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये भारतीय इतिहास, दर्शन, धर्म, रीति-रिवाज आदि का गभीर अध्ययन किया ।" ब्रिटिश शासको ने महसूस किया कि यह विद्रोह भारतीय धर्म, रीति-रिवाज और इतिहास से उनकी अनभिज्ञता के कारण हुआ। उन्हे यह भी लगा कि कि जब-तक मिशनिरियो को भारतीय सामाजिक ढांचे की कमजोरियो का पता नहीं चलेगा, तब-तक यहा के लोगो के मन मे ईसाई धर्म के प्रति और उसके माध्यम से साम्राज्य के प्रति श्रद्धा नही जगाई जा सकती।"2 मैक्समूलर ने इस सदर्भ मे यह मत प्रकट किया कि "ईसाई धर्म प्रचारको के लिये धर्म-ग्रथो का सही ज्ञान प्राप्त करना उतना ही अनिवार्य है, जितना कि किसी सेनापति के लिये शत्रु देश की जानकारी हासिल करना।"3 अग्रेज शासक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मुसलमानो को विदेशी और विधर्मी करार देकर हिदुओ के मन मे उनके प्रति घृणा भर दे । अपनी सस्कृति और धर्म का प्रचार अग्रेजो सहृदय और विश्व- बधुत्व के रुप मे किया। जिससे ईसाई मिशनरिया सम्पूर्ण भारत मे फैल गई और अ ग्रेज शासको के प्रति प्रतिष्ठा-भाव जागृत करने लगी। 1. 2. प्रभा दीक्षित--साप्रदायिकता का ऐतिहासिक सदर्भ, पृ87 रामशरण शर्मा-प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचार एव सस्यायें, रामशरण शर्मा-प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचार एव सस्था, पृ । 3 8 1857 के स्वाधीनता-सग्राम मे हिंदू राजानो को स्वामिभक्ति से अग्रेज बहुत प्रसन्न थे। इसलिये उन्होने मुसलमानो को अपने अत्याचारो का केंद्र बनाया। इसके मूल मे दो कारण थे। पहला यह कि, भविष्य में मुसलमानो की दुर्दशा देखकर अन्य कोई धर्म अग्रेजो का विरोध करने का साहस नहीं बटोर सकेगा । दूसरा यह कि हिंदू उनके स्वामिभक्त बने रहेगे। परिणाम यह हुआ कि विद्रोह के तुरत बाद मुसलमानो को सताया जाने लगा, बड़े पैमाने पर उनकी जमीन-जायदादे छीनली और हिंदुओ को अपना प्रिय पात्र घोषित कर दिया।" मुसलमानो का भया- नक दमन किया गया। अकेले दिल्ली मे ही सत्ताईस हजार मुसलमानो को फासी पर लटका दिया गया। इस दमन और अत्याचार ने मुसलमानो को चूर-चूर कर दिया। उनके मन में अग्रेजो के प्रति कम व हिंदुप्रो के प्रति अधिक घृणा का भाव उत्पन्न हुआ। उन्हे साफ दिखाई पड गया कि जो हिंदू राजा अग्रेजो से मिलकर मुसलमानो पर अत्याचार करा सकते हैं, वे उनके सुहृदय कभी नही हो सकते। हिंदू राजा और उनके मनसबदारो के मन मे मुसलमानो के प्रति जो शत्रु-भाव था, उसी की परिणति इस समय साकार हुई। वे यह भूल गये कि मुसलमानो से अधिक अत्याचारी अग्रेज है, जिन्हे एक बार पैर जमाने के बाद उखाडना कठिन होगा । आपसी कलह और ईर्ष्या के वातावरण मे लडा गया-यह स्वाधीकता-सग्राम असफल हुआ, जिसका असीमित लाभ अग्रजो ने उठाया। अग्रजो के प्रिय पान बने हिंदुओ ने जब आर्थिक लाभ प्राप्त कर आगे बढना शुरू किया और एक शक्ति क रूप में उभरने लगे, तब अग्रेजो को पाखो मे खटकने लगे। उस शक्ति को कम करन के लिये उन्होने अवसर की तलाश मे बैठे मुसलमानो पर वरदहस्त रख दिया। अग्रेजो ने हिंदुनो पर इसलिये कृपा की थी कि वे कभी विद्रोह नही करेगे, इसलिये नहीं कि वे आगे बढने लगें। मुसलमानो का उपरी वर्ग भी, जिसका मुख्य आधार बडे जमीदारो मे था, व्यापारिक और प्रौद्योगिक पूजीपति-वर्ग को उन्नति देखकर खुश नहीं हुआ, क्योकि उसे ऐसा लगता था कि यह उन्नति हिंदुप्रो की या "हिंदू-बनियो की उन्नति । इसे वे बडी खतरनाक स्थिति मानते थे ।"2 राष्ट्रीय आदोलन मे साम्प्रदायिकता विपिन चद्र-~याधुनिक भारत, पृ. 128 रजनी पामदत्त-माज का भारत, पृ 465 2 40 के बीज बोने के लिये यह नीति अधिक कारगर हुई । "अग्रेजो का शासन कायम होने से पहले भारत मे उस तरह के हिंदू-मुस्लिम झगडे कभी नहीं दिखाई दिये जैसे झगडे अग्रेजी शासन काल में और खासतौर से इसके अन्तिम दिनो मे देखने को मिले। किसी एक रियासत के साथ किसी दूसरी रियासत का सघर्ष भी हुआ और कभी-कभी यह भी देखने में आया कि एक रियासत का शासक हिंदू है और दूसरी का मुसलमान । लेकिन ऐसा कभी नही हुआ कि इन सघर्पो ने हिंदू-मुसलमान सघर्ष का रूप लिया हो।" अग्रेज शासको ने इस आग को और अधिक फैलाया। लगातार हिंदू-मुसलमानो के बीच एक दीवार बनाये रखी, ताकि ये दोनो परस्पर मिल न सके। इसी सदर्भ मे गर्म-दल वालो की भूमिका भी कोई अच्छी नही रही। उनके उग्र राष्ट्रवाद ने साम्प्रदायिकता को उभारने मे कोई कमी नही छोडी। राजनीतिक दृष्टि से प्रगतिशील किन्तु सामाजिक दृष्टि से घोर प्रतिक्रियावादी गर्मदलियो ने पुनरुत्थान का जो बेतुका ढोल वजाया, उससे एक सम्प्रदाय भयकर नाराज हुआ। लाल-बाल-पाल तीनो ही कट्टर राष्ट्रवादी और भयकर-पुनरुत्थानवादी थे। लाला लाजपतराय आर्य समाज के नेता थे, वाल गगाधर तिलक पक्के सनातनी और विपिन चद्र पाल काली माँ के उपासक थे। इनका कहना था-' हमारी आकाक्षापो की पूर्ति कर सकता है। राष्ट्रीयता एक धर्म है और ईश्वर की देन है। उन्होने शिवाजी, गणपति, गोहत्या विरोध प्रादि के सामतवादी-सस्कृति के हथियारो से पूंजीवादी संस्कृति को पराजित करने को नाकामयाब कोशिश की।"2 इससे यह स्पष्ट है कि "अगर तिलक, विपिन चद्र पाल और लाला लाजपतराय वगैरह ने धार्मिक और सामाजिक मामलो मे वही रुख अपनाया होता जो नरम दल वालो ने अपनाया था, तो सैय्यद अहमद और शासको का किसी भी प्रकार का विरोध मुसलमानो को भारी संख्या में काग्रेस में शामिल होने से न रोक पाता।" इसी भूमिका के कारण लगातार मुसलमानो की संख्या काग्रेस मे घटती गई। प्रारभ मे मुसलमानो का झुकाव काग्रेस की ओर था "हिन्दू धर्म ही 1. 2 रजनी पामदत्त-माज का भारत, पृ. 462 मव्यसाची-भारत की स्वाधीनता का इतिहास, प 89 पयोध्यासिंह -भारत मा मुक्ति सग्राम, 115 3 50 लेकिन 1893 के बाद उसमे गिरावट आती गई। सुनिश्चित रूप से इसका एक खास कारण सर सैय्यद अहमद वगैरह का ब्रिटिश शासको की कृपा से 1890 के वाद होने वाले हिंदू-मुस्लिम दगो, गोवध विरोधी आदोलन, हिंदी-उर्दू विरोध आदि भी एक हद तक कानस से मुसलमानो को अलग रखने में सहायक हुये।" 1905 मे बग-भग विरोधी आदोलन के बगाल तक ही सीमित रहने के कारण अग्रेजो की शक्ति और साहस में बढोतरी हुई। लार्ड मिंटो की सह पर बग-भग आदोलन का विरोध करने के लिये ढाका के नवाब सलीमुल्ला को "भारत सरकार ने कम ब्याज की दर पर 13 लाख रुपये का कज दिया ।"2 बग-भग का जोरदार विरोध सारे भारत मे होता तो हिंदू-मुस्लिम एकता बढती। साम्प्रदायिकता का भयावह रूप नही आ पाता। लेकिन इस आदोलन के असफल हो जाने पर हिंदू- मुसलमान विरोध उभरकर सामने आये और 1906 मे "मुस्लिम लीग" की स्थापना ने साप्रदायिक विद्वप को भरपूर हवा दी। ज्यादातर मुसल- मानो की आस्था लीग के प्रति होने लगी। धीरे-धीरे यह आग जलती रही । दोनो धर्मों के नेता अपने नेतृत्व को बनाये रखने के लिये धर्म की पाड मे अपनी कुर्सी के स्वप्न बुनने लगे। यह कहने मे भी सकोच नहीं होना चाहिये कि साम्राज्यवादियो ने अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिये सारे हिंदुस्तान को दो धर्मो मे बाट दिया और दोनो धर्मों के नेता भी प्रतिष्ठित कर दिये ताकि उनकी सत्ता सुरक्षित रह सके । इस प्रकार साप्रदायिकता का विष-वृक्ष फलता-फूलता रहा । और अपनी परेशानियो से जूझ रही भारतीय जनता इस चालाक खेल से अनजान रहकर नेतायो के स्वर मे स्वर मिलाकर भारत के लिये नही, धर्म के लिये मरने-मिटने को तैयार हो गई। हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एव मुस्लिम लोग तथा जमाते इस्लामी इन्ही नीतियो के परिणाम हैं और साप्र- दायिक विद्वेष इस विप-वृक्ष के फल-फूल । यह साप्रदायिक विद्वप लगातार फैल रहा है, इसकी ज. स्वाधीनता के पश्चात् और अधिक गहरी हुई हैं। राम-जन्म भूमि, बाबरी मस्जिद, सालिस्तान एव अन्य इस - अयोध्यासिंह-~भारत या मुक्ति सनाम, १ 224 2 भयोध्यासिंह-मारत रा मुक्ति सप्राम, 1 224 - प्रकार के आदोलन साप्रदायिक विद्वेप को फैला रहे हैं। और सत्ता-वर्ग दलाल-महात्मानो को सरकारी सुविधा देकर उनसे आशीर्वाद लेकर मस्त हो रहा है। साप्रदायिकता के इस घृणित और कुत्सित स्वरूप को जन-सामान्य तक ले जाने के लिये साहित्य ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। उर्दू के प्रतिष्ठित कथाकार सहादत हसन मटो की श्रेष्ठ और प्रौढ कहानिया साप्रदायिक उन्माद और उससे उत्पन्न नारकीयता पर करारी चोट करती है। "खोल दो, एव टोबा टेकसिंह" अलग-अलग सवेदना की कहानी है। दोनो मे इस स्थिति को अमानवीय बताया गया है। हिंदी मे यह कार्य सर्वप्रथम प्रेमचद ने किया। प्रेमचद के समय मे जो साप्र- दायिकता थी, उसके लिये उन्होने सामजस्य का रास्ता पकड़ उसके समाधान खोजे और यह स्पष्ट किया कि सवाल हिंदू मुस्लिम का नही है, सवाल है आर्थिक स्वाधीनता का जो बिना राजनीतिक स्वाधीनता के सभव नही है। जब-तक आर्थिक स्वाधीनता नही मिलेगी, तब-तक हिंदू मुस्लिम आपस मे लडाये जाते रहेगे। अत: वे उपन्यास-कहानियो मे साप्रदायिक समस्या को उस तरह नही उभारते जिस तरह बाद मे कथाकारो न उभारा है । प्रेमचद हिंदू मुसलमानो को समानता की दृष्टि से देखते थे। प्रेमचद के बाद उभरे कथाकारो ने इस समस्या को यथार्थवादी ढग से चित्रित किया । वे साप्रदायिकता पर प्रहार करते हुये उन कारणो को भी स्पष्ट करते हैं, जिससे यह समस्या अपने भयावह रूप में उभर रही है। यशपाल ने वैज्ञानिक तरीके से इसे उभारा है। हत्या और प्रागजनी का सहारा लेकर धर्म जिस प्रकार फल-फूल रहा है, यशपाल उस पर प्रहार करते है । क्षुद्र राजनीतिज्ञ अपनी प्रतिष्ठा के लिये धर्म के जिस घिनौने रूप की वकालत कर रहे है, वह धर्म जनता का धर्म नहीं हो सकता। शासक-वर्ग धर्म का सहारा लेकर जनादोलन कुचल रहा था। अपने प्रसिद्ध उपन्यास "झूठा सच" मे वे कहते है--"क्यो कि अंग्रेज शासक इस बात को खूब अच्छी तरह से जानते थे कि सब प्रशासन व्यवस्थानो की नीव सामाजिक-भूमि व्यवस्था पर ही होती है, किसानो को पोर से सरकार पर प्राते सकट को टालने का फिलहाल यही उपाय हो सकता है कि वे अपनी समस्या को साप्रदायिक झगड़ो मे भूले । 52 रहे।" धर्म की शक्ति से शासक-वर्ग भी परिचित था और हमारे राष्ट्रीय नेता भी। इसलिये उन्होने अपने लाभ के लिये धर्म का भरपूर उपयोग किया। हिंदू महासभा और जमाते इस्लामी के अन्दर छुटभैये नेता नहीं थ, बल्कि बड और सम्माननीय नेता थे, जो जानते थे कि धर्म के नाम पर भीड इकट्ठी की जा सकती है, उस भीड को अपने लाभ के लिये सचालित और नियत्रित भी किया जा सकता है। ब्रिटिश-शासको ने इस स्थिति का लाभ उठाया। उन्होने राष्ट्रीय नेतृत्व मे दो भेद कर सदैव अन्तर बनाये रखा । हिंदू नेतृत्व और मुस्लिम नेतृत्व अग्रेजो की फूट-परस्त नीति का ही परिणाम था। यशपाल ने इसे यथार्थवादी रूप मे चित्रित किया है। स्वाधीनता पूर्व साप्रदायिक दगो के द्वारा स्वाधीन-भारत को "तमस" का चित्रण भीष्म साहनी ने अपने उपन्यास "तमस" मे किया है । उपन्यास मे व्यक्त साप्रदायिक उन्माद का केन्द्र-बिन्दु वह विचार है, जो डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड स अपनी पत्नी लीजा से कहता है- "हुकूमत करने वाले यह नही देखते कि प्रजा में कौन-सी समानता पाई जाती है। उनकी दिलचस्पी तो यह देखने में है कि वे किन-किन बातो मे एक दूसरे से अलग हैं 12 अग्रेज इस कोशिश में रहे कि हिन्दू- मुस्लिम एकता कभी न होने पाये। इसके लिये उन्होने भरसक प्रयत्न किये । "तमस" मे डिप्टी कमिश्नर का टोडी कुत्ता मुराद अली गरीब और सरल-चित्त नत्थू चमार को खरीद कर उससे सूपर कटवाता है और मस्जिद मे पटक देता है, ताकि दगे भडके । रिचर्ड्स इस व्यूह मे सफल होता है, जिसकी परिणति लगातार पांच दिन हुप्रा नरसहार है। इस नरसहार मे बेदम, बेसहारा तथा राजनीति और धर्म की आग से अनजान लोग भी जलकर मर गये। भीष्म साहनी "तमस" के माध्यम से उस अधकार को दूर करना चाहते है, जो अग्रजो ने इस देश में फैलाया था। हमारे देश के राजनीतिक दलो का चित्र भी वे प्रस्तुत करते है, जहाँ कांग्रेसी चर्खा कातने, झाडू देने और अपनी मेम्बरी की चिंता के अलावा और कुछ नहीं करते, लोगी मानते है कि काग्रेस हिन्दुओ की पार्टी है, उससे मुसलमानो का हित नहीं हो सकता, वानप्रस्थी यशपाल-झठा सच, पृ80 भोप्म साहनी–तमस, पृ 36 2 53 " आसपास खडे 1 जी हिन्दुओ को मुसलमानो के विरुद्ध भडकाते हैं और हथियार इकट्ठा करने का आह्वान करते है। किसी भी दल का जनता पर सीधा प्रभाव नहीं है । दगो को रोकने के लिये कोई दल सार्थक प्रयास नहीं करता। जरनेल सिंह जैसे ईमानदार आदमी की हत्या कर दी जाती है, भीष्म साहनी उस दृश्य को बडे मार्मिक ढग से उभारते है-"साहिवान, में आपसे कहता हूँ कि हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई है, शहर मे फिसाद हो रहा है, आगजनी हो रही है और उसे कोई रोकता नही। डिप्टी कमिश्नर अपनी मेम को बाहो मे लेकर बैठा है और मैं कहता हूँ कि हमारा दुश्मन अग्रेज है। गाधी जी कहते है कि वही हमे लडाता है और हम भाई-भाई है। हमे अग्रेज की बातो मे नही पाना चाहिये । और गाधी जी का फरमान है कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा। मै भी कहता हूँ पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा, हम एक है, हम भाई-भाई है । हम मिलकर रहेगे।" "तेरी माँ की लोगो मे से एक ने कहा और लाठी के एक ही भरपूर वार से जरनल की खोपडी फोड दी। छडी कहाँ गई, और फटी हुई मूंगिया पगडी कहाँ गई और फटे हुये चप्पल कहाँ गये और फिकरा खत्म किये बिना हो जहाँ जरनैल खडा था वही ढेर हो गया ।"1 हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करने वाला, देश का विभाजन रोकने वाला, तथा अग्रेजो की कुटिल-राजनीति को पहचानने वाला जरनैल उन्ही लोगो के द्वारा मार दिया गया जिन लोगो के द्वारा यह दगा हुआ। भीष्म साहनी "तमस" मे साप्रदायिक दगो का जो चित्र प्रस्तुत करते है, वह हृदय विदारक है। इस प्रकार के दृश्यो की पुनरावृत्ति अब देश के किसी भी कोने मे कही भी हो सकती है, होती रही है। शानी ने "काला जल" उपन्यास मे आजादी के बाद भारत में रह रहे मुसलमानो को आथिक दशा का चित्रण किया है। इस उपन्यास में साप्रदायिक्ता प्रकारातर से उभरकर पाई है, जहां मुस्लिम समाज अपनी ढियो मे जकडा रहकर अशिक्षा, गरीवी और असाध्य रोगो का शियार हो गया है । वस्तर ही नहीं इस प्रकार की स्थिति सम्पूर्ण भारत मे देसी जा सकती है। मुस्लिम नेतृत्व ने इतने लम्बे समय के याद भी अपने समाज को चौदहवी शताब्दी से मागे नही पाने दिया । म घ• - भीष्म साहनी-तमस, पृ. 128 54 विश्वासो, कुप्रथाप्रो और रूढिगत मान्यताप्रो का वितान तानकर मुस्लिम नेता आराम से सो रहे है । साप्रदायिक दगो मे जो मुसलमान मरते है, वे वही गरीव लोग होते है जिन्हे दो समय की रोटी भी नहीं मिल पाती। ऐसे लोगो के लिये पाकिस्तान बनने और न बनने से क्या फर्क पडता है ? इस उपन्यास का प्रतिनिधि पात्र मोहसिन अपने मोह भग के सदर्भ मे बब्बन से कहता है "अपने को अच्छी तरह टटोलकर देखो तो तुम खुद भी स्वीकार करोगे। क्या हम सब लोग यहाँ लादे हुये मुगालते मे नही जी रहे । और जिसे तुम राष्ट्रीयता और ईमानदारी समझ रहे हो, क्या वह सिर्फ मजबूरी नहीं है ।"1 शानी ने इस समस्या को आर्थिक रूप से प्रस्तुत कर महत्वपूर्ण कार्य किया है । -- हिन्दू-मुस्लिम राजनीति, पाकिस्तान का उदय तथा हिन्दुस्तान मे बचे मुसलमानो को आर्थिक स्थिति को राही मासूम रजा ने "प्राधा गाँव" उपन्यास मे चित्रित किया है । "प्राधा गाँव" मे वे स्थितियां भी वताई गई है, जिनके कारण पाकिस्तान बना । सदियो से साथ रह रहे लोगो को साप्रदायिक आधार पर बाँटकर हत्या और आगजनी की राजनीति के द्वारा पाकिस्तान बनाया गया। वास्तव मे, मुसलमानो की, विशेषकर साधारण किसान, मजदूर मुसलमानो की इच्छा के विपरीत पाकिस्तान बना । "प्राधा गाँव" का मिक्दाद कहता है--- "हम ना जाये वाले है कही। जाये उ लोग जिन्हे हल बैल से शरम प्राती है। हम तो किसान है, तन्नू भाई। जहाँ हमारा खेत, हमारी जमीन तहाँ हम ।"2 बावजूद इसके पाकिस्तान बना, हिन्दू-मुस्लिम सस्कृति पर प्रहार किये गये, धर्म के नाम पर बनने वाले पाकिस्तान के लिये अपने ही भाई-बहिनो का खून बहाया गया। अमीर पाकिस्तान मे भी अमीर ही रहे और गरीब जैसे यहाँ नारकीय जीवन जी रहे थे, वैसे ही वहाँ रहे । इस नर-सहार ने आपसी घृणा के अलावा और कुछ नहीं दिया। राष्ट्र-विभाजन और जमीदारी-उन्मूलन के बाद गगोली मे साप्रदायिक दगा हमारी धर्म-निरपेक्ष शासन-व्यवस्था का मजाक है। राही ने प्राधे गांव की कथा यानी मुसलमानो की मानसिक, आर्थिक - शानी-काला जल, पृ 301 राही मासूम रजा-माधा गांव, 4 355 2 15 और सामाजिक स्थिति को कथा कही है। प्राजादी के बाद प्रौद्योगी- करण के कारण गांव पर जो दवाव पडा, राही उसे गगोली के माध्यम से चित्रित करते है। रेणु ने "परती परिकथा", रामदरश मिश्र ने “जल टूटता हुआ" शिव प्रसाद सिंह ने "अलग-अलग वैतरणी" और भेरव प्रसाद गुप्त ने "सती मैया का चौरा" आदि उपन्यासो में इस समस्या के यथार्थ रूप को चित्रित किया है। एक प्रकार से उपन्यासकारो ने अपने उपन्यासो के द्वारा साप्रदायिक समस्या के कारणो को तलाश की है। एक सवेदनशील सर्जक को सार्थक पहल है यह, इसलिये महत्वपूर्ण भी है । लगातार बढती जा रही साप्रदायिकता के मूल मे आर्थिक शोषण से त्रस्त जन-समुदाय का प्राक्रोश है, जिसे सत्ताधारी अपने हित में धर्मान्ध बना देते है। राजनेता धर्म को इस गोली को उन्ही को देकर सुला देते हैं और फिर निश्चित हो शोपण करते हैं। जनता में व्याप्त प्रशिक्षा, अध-विश्वास एव निर्धनता के गढो को तोडे बिना इस समस्या पर नियत्रण नही किया जा सकता। आजादी के बाद के लेखको ने इस समस्या के पीछे की क्रूर स्थितियो को पहचाना और उन्हे बेनकाब करते हुये भविष्य के लिये समाप्त करने का आह्वान किया। 00 56 साहित्यकार की राजनीतिक भूमिका साहित्यकार की राजनीतिक भूमिका पर विचार करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिये कि साहित्यकार समाज का एक ऐसा प्राणी है, जो जीवन-जगत की विसगतियो को पूरी तरह देखता है, उन्हे जीता है और बिना किसी कटौती के ईमानदारी से उन्हे चित्रित करता है। आम आदमी से वह कही अलग है, तो सवेदनशील दृष्टि के कारण जो उसे आकुलता के साथ लिखाती है, जन-जीवन की बारीक स्थितियो को उभारती है और सम्बन्धो की सूक्ष्म और जटिल समस्याओ को सुलझाती है। अाम आदमी और साहित्यकार का अलगाव इस अर्थ मे नही है कि वह कोई विशिष्ट व्यक्ति है, समाज का अलग अग है, सर्वोच्च है या दैनन्दिन-जीवन की मारा मारी से ऊपर है। साहित्यकार को विशिष्ट दर्जा देने के प्रचार में उसे समाज से काटने का षड्यत्र छिपा हुअा है । इस पड्यन से पूरी तरह सावधान रहकर ही साहित्यकार समाज का अभिन्न अंग बना रह सकता है और अपनी अनुभूति की सघनता के द्वारा आम आदमी की परेशानियो का मार्मिक चित्रण कर अपने युग का प्रामाणिक साहित्य रच सकता है। इसलिये वह आम-आदमी होते हुये भी अपनी सवेदना के कारण उन चीजो को भली-प्रकार पहचान लेता है, जो हरेक के बस की बात नहीं है। साहित्यकार को समाज से काटने का उसे अलग थलग करने का जब पर्दाफाश हो गया, तब यह भी निश्चित हो गया कि सामाजिक परिवर्तन मे साहित्यकार की महत्वपूर्ण भूमिका है और सामाजिक परिवतन का अर्थ राजनीतिक सत्ता परिवर्तन ही होता है-यह बात विसी से छिपी हुई नही है। सत्ता पर जो लोग बैठे हैं, स्वाधीन भारत 57 के चालीस वर्षों मे शक्ले भले ही बदली हो, उनके क्रूर और हिंसक पजो मे कोई परिवर्तन नही हुआ। समय के साथ वे और भी हिंसक होते गये। भोली जनता को शिक्षा और रोजगार के मौलिक अधिकारो से वचित किया जाता रहा, ताकि वह इसी प्रकार वधुआ बनी मूक पशु की तरह हर पाच साल बाद अपने पेट की सलवटो को अनदेखा कर गिद्धो को मास खाने का अधिकार दे दे । इन भयावह स्थितियो मे साहित्यकार की राजनीतिक भूमिका तय होती है। वह तय करता है कि श्रीकात वर्मा की तरह आपात्काल की जननी के भाषण लिखे, उन्हे कुर्सी दिलाने के लिये पोस्टर तैयार करे, नारे लिखे और साहित्य के नाम भडेती करे या अज्ञेय की तरह अभि- जात्य मौन धारण कर ले या नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, धूमिल, केदार नाथ अग्रवाल, रागेय राघव, राम विलास शर्मा और रेणु की तरह अपनी राजनीतिक भूमिका का ईमानदारी से निर्वाह करते हुये समाज को बताये कि सत्ता के दलालो की घिनौनी चालें राजनीति नही हो सकती । साहित्यकार जनता के सुख-दुख मे भागीदारी कर उसके जनतात्रिक अधिकारो को दिलाने के लिये उसे सचेत बना शोषण- विहीन समाज के निर्माण के लिये ऐसी सरकार की स्थापना के लिये प्रयत्न करता है, जहाँ अन्याय, अत्याचार बिल्कुल नही हो । प्रोछे प्रलोभनो और दमन के भय से वह अपने मार्ग से विचलित नहीं होता। बल्कि जैसे-जैसे दमन वढते है, वह और जुझारू होता जाता है । इसलिये कि वह मानता है कि उसको राजनीति बहुजन को राजनीति है, असली राजनीति है। इसी वर्ष सपदर हाशमी की शहादत ने यह दिखा दिया है कि दमन और अत्याचार के बल पर आदोलनो को दबाया नही जा सकता। सपदर की हत्या के विरोध मे जिस प्रकार साहित्यकारो, राजनीतिज्ञो और जन-सगठनो ने हत्यारी सरकार के विरुद्ध प्राक्रोश व्यक्त किया है, उससे सावित हो गया है कि सरकारी-गुडे इस प्रकार की राजनीतिक हत्या करके बहुत दिनो तक सत्ता-भोग नहीं कर सकते। इन स्थितियो में साहित्यकार की भूमिका और भी ज्यादा महत्व पूर्ण हो गई है। सरकारी प्रचार-तत्र और सेठो की पत्र-पत्रिकाये जिस भाषा प्रौर मुहावरे का प्रयोग कर रही है, उनके मूल में छिपे मतव्यो 58 है पर प्रश्न मडराने लगे है। समाजवाद, प्रगति, धर्मनिरपेक्षता, परस्पर- स्नेह, देश की अखण्डता एव स्वच्छ समाज के निर्माण के नारे उन लोगो के द्वारा भी लगाये या लगवाये जा रहे है जो मूलत इनके विरोधी है और विरोध में ही अपनी सुरक्षा माने वैठे है। इस प्रकार यह जो स्थितियाँ हैं इनका विरोध सगठित राजनीति द्वारा ही सभव । वह सगठित राजनीति किसानो और सर्वहारा-वर्ग के अलावा किसी को नही हो सकती। यही वह वर्ग है जो परिवर्तन की इच्छा रखता है, उसके लिये हर बलिदान देने को तैयार रहता है। इसलिये साहित्यकार जब-तक इस वर्ग से नहीं जुडेगा तब-तक वह किसी प्रकार के परिवर्तन को अमलीजामा नहीं पहना सकता। केवल मध्य-वर्ग पर लिखकर, उसके दु ख और कुठायो को चित्रित कर हम अपनी राजनीतिक समझ को छिपाते । यह दुख और कुंठामो का जनक कौन है, बगैर उस ओर इशारा किये साहित्यकार अपनी जिम्मेदारियो से बच नहीं सकता। प्रयोगवाद तथा नयी कविता से लेकर आज तक ये साहित्यकार सस्कृति, नैतिकता और आदर्श का भ्रम उत्पन्न कर उन ताकतो को प्रश्रय दे रहे हैं, जो शोषक-सत्ता की जड़ें सोचती है। मुक्तिबोध ने बहादुरी के साथ इन शक्तियो का मुकाबला किया। कविता, कहानी, उपन्यास एव डायरी मे उन्होने प्रगतिशील शक्तियो को प्रतिष्ठित किया। मध्य-वर्ग के स्वकेद्रित ससार की ऊब, घुटन और पीडा का चित्रण करने वाले साहित्यकारो के अलावा दूसरी धारा भी थी जो छायावाद- काल मे भी आकाशचारी न होकर, धरती के यथार्थ और राष्ट्रीयता के गीत गाती रही। बाद मे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मजदूर-किसानो को सगठित होने और अत्याचारी सरकार को उखाड फेकने का आह्वान करती रही। यह काव्य-धारा भारतेंदु ने शुरू की थी, जिन्होने सामती- वैभव के गुणगान के विरोध मे साहित्य को जनता के बृहत्तर सुख-दुख से जोडा और अग्रेजी दासता के विरुद्ध जन-जागरण किया। यही काव्य-धारा "प्रगतिवाद" मे आकर फली-फ्ली। भारतेंदु से प्रारभ हुई यह काव्य-धारा जिस रूप में विकसित हुई, वह साहित्यकारो की राज- नीतिक भूमिका का ज्वलत उदाहरण है। इन साहित्यकारो के समक्ष एक निश्चित लक्ष्य था, अग्रेजी सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करना । राजनीतिक लाभ लेना या किसी प्रकार के समझौते करना इन्होने नही सीखा था, यही उनकी राजनीति थी, जो स्पष्ट थी। 59 इसलिये प्रेमचद ने चालीस वर्ष की चढती उम्र में लेखन कार्य को बधन मुक्त करने के लिये सरकारी नौकरी और बाद में "रायसाहवी" छोडी। इन्हे सरकारी रायसाहबी और उसके वैभव से जनता के बीच रहकर उनके सुख-दुख मे हाथ बटाना अधिक अच्छा लगा। आजादी के बाद भी यह धारा सूखी नही है। कविता और कथा-साहित्य दोनो मे यह पूर्ण रूप से उभरकर आयी है। जनता को अनदेखा कर अपने ही दुख मे डूवे साहित्यकारो के लिये यह साहित्य उस चुनौती के रूप मे रहा है । लघु-पत्रिकामो का प्रकाशन, नुक्कड नाटक, नुक्कड कवि-सम्मेलन, पोस्टर और अन्य अनेक जन-सुलभ साधनो से इन साहित्यकारो ने जनता के बीच अपनी पैठ कायम की है। और सकीर्ण एव साम्प्रदायिक राजनीति के विरुद्ध जनता को चैतन्य किया है। साहित्य का यह महत्वपूर्ण काम है, जिसे अनदेखा नही किया जा सकता। सुस्पष्ट राजनीतिक समझ के अभाव मे यह काम हो भी नहीं सकता। गोर्की, लू शुन, भारतेदु तथा प्रेमचद ने अपनी राजनीतिक समझ को जनता के बीच रहकर विकसित किया। गोर्की का "माँ" उपन्यास, लू शुन की कहानियाँ एव छोटे-छोटे अखवारो मे लिखे गये लेख, भारतेदु की मुकरियाँ और नाटक, प्रेमचद का कथा-साहित्य एव लेख जनता के निकट होने और उसे निकट लाकर असली राजनीति समझाने के सार्थक प्रयास है, जो साहित्यकारो की राजनीतिक भूमिका को रेखाकित करते है । यथार्थ को गहरी पकड ही इम सोपान तक ले जाती है। जो लेखक सामाजिक यथार्थ से मुह मोडकर व्यक्ति-यथार्थ का चित्रण करता है, वह बडा लेखक नही हो सकता । बडा लेखक वही होगा, जिसे सामाजिक यथार्थ की गहरी पकड होगो । प्रेमचद के बाद यह काम यशपाल, अमृतराय, रागेय राघव, रेणु, नागार्जुन, धूमिल, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध एव शमशेर वहादुर सिंह आदि ने पूरा किया। सही राजनीतिक समझ को इन्होने दुनिया के सामने रखा, सही और गलत राजनीति का अतर एव उसके परिणाम स्पष्ट किये। साथ ही यह भी बताया कि लेखक मे जब विचलन होता है, तब उसको रचना भी जवाब दे जाती है। रेणु ने अपने प्रारभिक उपन्यासो और कहानियो मे जिस दुनिया का निर्माण किया, वह यथार्थ रप्टि का परिणाम है, परन्तु म त में वे जिस प्रकार 60 रोमानीयत के शिकार हुये है उससे रचना का महत्व कम हुआ है। दूसरी और यशपाल, भैरव प्रसाद गुप्त, नागार्जुन आदि के उपन्यासो मे समस्या जिस रूप मे उठी है, समाधान भी उन्ही के अनुकूल है। ये लेखक चूकि वैज्ञानिक विचारधारा से लस है, अत विचलन भी नहीं है। साहित्यकार समाज का चित्र ही प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि वह भविष्य के लिये आशा का दीप भी जलाता है, इसलिये उसकी समझ और उसके द्वारा निर्मित ससार दूसरो के लिये प्रेरणास्त्रोत रहे-तभी उसकी सार्थकता है। रूसी क्राति मे "माँ" की जो भूमिका है, वह किसी से छिपी नही है, अत साहित्यकार अपनी रचनायो के द्वारा इस सामती- पूंजीवादी सरकार की क्रूरतानो का चित्रण कर साहित्य को परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाये--यही उसकी राजनीतिक परिपक्वता का प्रमारण होगा। साहित्य सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बने, मानवीय सम्बन्धो की सवेदनशील दुनिया का निर्माण हो, अमानवीयताये समाप्त हो- यही तो साहित्य का उद्देश्य है । जो लेखक इस प्रकार का साहित्य रचता है वह अपनी सही राजनीतिक भूमिका निभाता है। अत राजनीति के नाम पर डरने और गलतफहमी पालने की आवश्यकता कहाँ है 2 00 61 अतीत और वर्तमान की रोमानी व्याख्या खडी बोली के विकास मे जिन साहित्यकारो का विशेष योगदान है, उनमे जयशकर प्रसाद का नाम अद्वितीय है । खडी बोली के प्रथम महा- काव्य “साकेत" की भाषा को "कामायनी" मे लाक्षणिक और परिवद्धित कर उन्होने अनुपम कार्य किया। "कामायनी" की भाषा प्रौढ है जो प्रसादजी के गभीर अध्ययन और चिंतन का ही परिणाम है । खडी बोली की यह प्रौढता ही उसे आगे चलकर जन-भाषा का सम्मान देती है। जयशकर प्रसाद मूलत कवि थे, अगर इस बात को हम मानते हैं तो उनके नाटक, उपन्यास और कहानियो को हम निश्चित तौर पर द्वितीय कोटि मे रखने का जान-बूझकर प्रयास करते है। इसके साथ ही उनके निबन्ध, जो एक सधे आलोचक के साहित्य सम्बन्धी विचार है, उन्हे कहा और किस कोटि मे रखे--इस तथ्य को केवल कवि-स्वरूप के प्रति अभिभूत विद्वान भूल जाते है या भूलने का चालाक प्रयत्न करते है। शायद इसलिये कि काव्य के क्षेत्र मे उन्होने प्रसादजी की जो मूति तैयार की है, वह अन्य क्षेत्रो मे आकर स्वत ही ध्वस्त हो जाती है। प्रसादजी स्वय स्व-मूर्ति-भजन करते हुये कहते है "समाज से डरो मत। अत्याचारी समाज पाप कहकर कानो पर हाथ रखकर चिल्लाता है, वह पाप का शब्द दूसरो को सुनाई पडता है, पर वह स्वय नही सुनता । प्रानो चलो, हम उसे दिखा दे कि वह भ्रात है।" ऐतिहासिक घटनाग्रो के प्रति प्रसादजी का मोह अधिक है । उनके माध्यम से वे अतीत की व्याख्या कर वर्तमान के लिये प्रेरणा देते हैं । सामाजिक-सम्बन्धो के चित्रण मे भी उन पर वही ऐतिहासिक्ता और प्रसाद को सम्पूर्ण कहानिया-विजया, पृ241 62 उसका मृत-अादर्श हावी रहता है। इसलिये वे अपने समय के कठोर यथार्थ से आँखे मंद लेते है या पलायन कर उसे अनजान ही रहने देते है। जिस अतीत मे उन्हे गौरव दिखाई पड़ता है, उसी अतीत की व्याख्या के लिये यशपाल 'दिव्या" लिखते है, लेकिन उन्हे तो वहाँ नारी परतन्त्रता और क्रूर अत्याचार ही दिखाई पडते है। नारी की स्वतत्रता को कैद करने के लिये तमाम तरह के सामती षड्यत्र किये जाते है। धर्म और सस्कृति के नाम पर उसके साथ अत्याचार होते है। ब्राह्मणो को श्रष्ठता, क्षत्रियो की वीरता और धर्म की पवित्रता दिव्या" को वेश्या बना देती है। यह यथार्थ था, जिससे प्रसादजी आँखे चुराये शिखर-शोभा का वर्णन करते रहे । यह आदर्श के प्रति मोह के कारण है । जिस समय प्रसादजी लिख रहे थे, उसी समय, उसी नगर मे प्रमचद भी लिख थे। लेकिन दोनो मे जमीन-आसमान का अन्तर है। एक आदर्श की नकली दुनिया का चित्रण करते है और दूसरे यथार्थ का मार्मिक चित्रण ! यह अन्तर सामाजिक विसगतियो की सूक्ष्म पकड और सक्षम अभिव्यक्ति का अन्तर है। "ग्राम" (1911) प्रसादजी की पहली कहानी है। जिसमे एक महाजन जमीदार की सारी जमीन हडप जाता है । अन्त मे उस महाजन का बेटा मोहनलाल कई वर्षों बाद गाव आता है, तो उसी जमीदार की पत्नी से भेट होती है, जो अपनी गरीबी के दिन पास के गाव मे काट रही थी। जमीदार की पत्नी रात मे महाजन मोहनलाल को अपना अतीत बताती है, उसे नही मालूम कि मोहनलाल निदयी कुन्दनलाल का बेटा है। लेकिन प्रसाद का आदर्श मोहनलाल पर भूत की तरह चढ जाता है "एक स्त्री की कथा सुनकर मोहनलाल को बडा दुख हुआ। रात विशेष बीत चुकी थी, अत रात्रि यापन करके, प्रभात मे मलिन तथा पश्चिमगामी चद्र का अनुसरण करके, बताये हुये पथ से वह चले गये । पर उनके मुख पर विषाद तथा लज्जा ने अधिकार कर लिया था। कारण यह था कि स्त्री की जमीदारी हरण करने वाले, तथा उसके प्राणप्रिय पति से उसे विच्छेद कराकर इस भाति दुख देने वाले कुन्दनलाल मोहनलाल के पिता थ ।" यह कहानी यद्यपि प्रसादजी की पहली कहानी है, तथापि बाद की कहानिया का उत्स इस कहानी मे निहित । . 1 प्रसाद को सम्पूर्ण कहानिया विजया, 22 - ? है। उनमे जो अतीत के प्रति मोह है, वह भावुकता प्रदान करता है। इसी भावुक स्थिति मे कहानी का अन्त होता है । मोहनलाल नही जानता था कि जिस झोपडी मे रात्रि विश्राम के लिये प्राया है, वह उसके पिता द्वारा पीडित जमीदार-पत्नी की है और न जमीदार-पत्नी ही यह जानती थी कि उसका अतिथि कुन्दनलाल का बेटा है। लेकिन कहानी पर प्रसादजी हावी हुये और मोहनलाल की मन स्थिति के माध्यम से पिता के प्रति घृणा और जमीदार पत्नी के प्रति सहानुभूति प्रकट कर दी। जब मोहनलाल को पता चल ही गया, तव वह कैसे शात रहता प्रसादजी कहानी का अन्त अपनी तरह से कर आगे की कहानियो के लिये दिशा तय करते हैं । इसलिये 1929 ई० से पहले तक को ज्यादातर कहानिया इसी प्रकार "अतीत स्मृति" की कहानिया हैं, जो भावुकता के व्यामोह मे लिपटकर लिजलिजा और सतही वातावरण निर्मित करती है। अपने समय की परिस्थितियो से अनजान ये कहानिया प्रतिशोध, त्याग, बलिदान और प्रेम की दुनिया मे ले जाती हैं। यह वास्तविक दुनिया की झलक भर देती है, जहा अन्याय, अत्याचार है, स्त्री की दुर्दशा है, जगल राज है लेकिन प्रतीत ने इस प्रकार जकड रखा है कि उन्हे यथार्थ मे कहने का विवेक उत्पन्न नहीं होता। इसलिये वे जिस रूप में सामने आती है, वह रूप अपरिचित और दूसरी दुनिया का लगता है। उस पर विश्वास नही जमने पाता। "रसिया बालम", "मदन मृणालिनी", "गुदडी मे लाल", "अघोरी का मोह", "पत्थर की पुकार", "पाप की पराजय", "करुणा को विजय", "कलावती की शिक्षा" आदि कहा- नियो के नामो से ही लगता है जैसे "पचतत्र" और "हितोपदेश" की कहानियो के नाम पढ रहे हो । कहानिया पढकर लगता है जैसे किसी पेशेवर उपदेशक का भाषण सुना हो । “पत्थर की पुकार" कहानी मे वे साहित्य पर विचार करते हुये कहते है "अतीत और करुणा का जो अश साहित्य मे हो, वह मेरे हृदय को आकर्षित करता है। कहानिया पढकर उनके विचारो से साक्षात्कार होता ही है, जहा करुण-अतीत पर प्रसादजी क्ठ अवरुद्ध कर लेखनी चलाते हैं। एक ही समय और एक ही स्थान के दोनो लेखक विचारो में कितने भिन्न हैं, यह बडा दिलचस्प तथ्य है। प्रेमचद आर्य समाज से अपनी . . -- प्रसाद की सम्पूर्ण कहानियां-पत्थर की पुकार, पृ 88 64 साहित्य-यात्रा प्रारभ कर गाधीवाद और बोल्शेविक-क्राति से स्वय को जोडते हैं और साहित्य को परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाते है, लेकिन प्रसादजी 1930 के बाद भी पूर्णतया समाज से जुड नही पाते। इसलिये उनमे समाज की धडकन नहीं है। निम्न-वर्ग के पात्रो के चित्रण के समय उनकी यह कमजोरी विशेषत उभरकर आती है। उनके आभिजात्य- सस्कारो की जकडन निम्न-वर्ग के पात्रो के प्रति सिर्फ करुणा बिखेरती है, उनके साथ तादात्म्य स्थापित नही कर पाती। पात्रो की दयनीय स्थितियो की फेहरिश्त गिनाने के बाद भी वह विश्वसनीयता नहीं बन पाती, जो वास्तविक जगत के सूक्ष्म चितेरे प्रेमचद बनाते है । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि प्रसादजी अपने पात्रो की तरह स्वय भी द्वद्व और अनिर्णय की स्थिति मे जीते हो । वाराणसी के जिस परिवार मे वे पले-बडे हुये वह सामान्य परिवार नही था। उनके बडे भाई अपने सामने बैठाकर उन्हे जो खाना खिलाते वह इस दयनीय ससार की भूख और गरीबी की ओर देखने ही नही देता था। प्रसादजी के बेटे रत्नशकर प्रसाद ने उस खाने का वर्णन करते हुये लिखा है-"वह अधिक से अधिक घी खिलाते, पानी और चावल कम लेने देते थे। प्रात डेढ पाव बादाम, पाव भर घी और पाच सेर दूध का हरीरा, दिन मे पाव भर से डेढ पाव तक घी, तीसरे पहर दो ढाई सेर बेदाने का रस और सायकाल व्यायाम से पहले डेढ पाव वादाम की ठडाई और रात मे प्राध सेर-तीन पाव मलाई के साथ पूरिया खाने के बाद, पाच सेर दूध के अधावट से दैनिक भोजन सूत्र की समाप्ति करनी पडती। इसमे कमी होना उनके अग्रज को सह्य न था और डाट सुननी पडती ।" प्रसादजी के सदर्भ में इस प्रकार की बाते करना कुछ लोगो को बुरा लग सकता है, लेकिन यह उदाहरण जो एक तथ्य है, मैने जान- बूझकर दिया है ताकि प्रसादजी की सवेदना की खोज की जा सके। "कामायनी" और उनके नाटको की लोकप्रियता के बाद कहानिया पढने को मन होना स्वाभाविक है। लेकिन कहानिया पढकर वह प्रौढ-ससार नहीं मिलता जो कामायनी मे है, नाटको मे है। "कामायनी" का मनु और नाटको के राजे-महाराजे यहा रूप बदलकर आते हैं और प्रसादजी 1 रत्लशकर प्रसाद-पिताजी घर मे-"युग प्रवर्तक जयशकर प्रसाद", प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, 1966, पृ 41 65 सपूत, हिंदुओं को भाषा में बोलकर चले जाते हैं । "स्वर्ग के खण्डहर में", "सिकंदर की शपथ", "चितौर उद्धार", "जहांनारा" एवं "अशोक" जैसी कहानियों में देवताओं को पवित्र भूमि भारत और उसे अपवित्र करने वाले म्लेच्छों के विरुद्ध प्रसादजो हिंदू-हिंदुस्तान को जय-पताका लहराते हैं।-- ब्राह्मणो हूं, मुझे तो अपने धर्म-अतिथिदेव की उपासना का पालन करना चाहिये । परतु यहां ......नहीं-नहीं, ये सव विधर्मी दया के पात्र नही । परंतु यह दया तो नहीं-कर्तव्य करना है।"1 "भारत के के उज्ज्वल रत्न छत्रपति महाराज शिवाजी ने जो अध्यवसाय और परिश्रम किया, उसका परिणाम मराठों को अच्छा मिला ।"2 "हिंदुओं का सूर्य मेवाड़-गगन में एक बार फिर उदित हो।' ।"3 प्रसादजी को प्रौढ कहानियों को मूल बात यह है कि वे दो मनोभावों को टकराहट को बखूबी उभारते हैं। सधे हाथों से लेखनी पाठक के मन पर वेदना का इतिहास लिखती है। उनको प्रौढ़ कहानियों में ममता, व्रत भंग, आकाशदीप, पुरस्कार और गुडा के कथ्य मनोभावो के द्वंद्व को चित्रित करते है। ममता, राधा, चम्पा, मधूलिका का स्वतंत्र विकास हुना है, संवेदना की सघनता है, आत्म-सापेक्ष न होकर समाज सापेक्ष जोवन दर्शन है, किन्तु अनिर्णय को स्थिति और अत्यधिक भावुकता के कारण ये नारी पात्र जीवन में फूटे घड़े की तरह खाली होते रहते हैं । यह द्वद सुनने में अच्छा लगता है, प्रेम की पीड़ा का एक संसार रचता है, लेकिन उस संसार में नुकसान स्त्रियों को ही भुगतना पड़ता है। प्रेम जीवन के लिये अपरिहार्य है, परन्तु प्रेम से भी अधिक या कहें प्रेम के साथ किन्तु प्रेम से पहले राष्ट्र-प्रेम अपरिहार्य है। राष्ट्रप्रेम सामाजिक कर्तव्य को श्रेणी में आता है, जिसे प्रसादजो सर्वाधिक महत्व देते हैं । इसीलिये उनकी श्रेष्ठ और कालजयी कहानियों मे यही तथ्य बार-बार केंद्रीय भाव बनकर आता है। पुरस्कार की मधूलिका, आकाशदीप की चम्पा एव देवरथ को सुजाता के अतिरिक्त गुण्डा के नन्हकू सिंह भी आजीवन निश्च्छल एवं पवित्र प्रेम के लिये अपना जीवन देते हैं । आजीवन विषम परिस्थितियों में रहकर ये पात्र अपने प्रिय के प्रति दुःखकातर है। प्रेम की जिस प्रांतरिक कसक का वर्णन प्रसादजी करते 2. 3. प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, ममता, पृ. 117 प्रसाद को सम्पूर्ण कहानिया, गुलाम, पृ. 50 प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, चित्तौर उदार, पृ. 38 66 । - है, वह पात्रो को मनुष्येतर बनाती है। देवरथ की सुजाता का आर्यमित्र के प्रति प्रेम-"सुजाता, स्पष्ट कहो, क्या तुम मुझसे प्रेम नही करती हो।" "करती हू आर्यमित्र । इसी का दुख । नहीं तो भैरवी के लिये किस उपभोग की कमी है।" आकाशदीप की चम्पा का अपने पिता के हत्यारे बुधगुप्त के प्रति प्रेम-"मै तुम्हे घृणा करती हू, फिर भी तुम्हारे लिये मर सकती है। अधेर है जलदस्यु । मै तुम्हे प्यार करती हू।"2 पुरस्कार की मधूलिका द्वारा राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के बाद अपने प्रेम के लिये उत्सर्ग महत्वपूर्ण है—"राजा ने कहा- मेरी निज की जितनी खेती है, मै सब तुझे देता हू । मधूलिका ने एक बार बदी अरुण की ओर देखा। उसने कहा-मुझे न चाहिये । अरुण हस पडा । राजा ने कहा-नही, मै तुझ अवश्य दूगा । माग ले । तो मुझे भी प्राण दण्ड मिले ।- -कहती वह बदी अरुण के पास जा खडी हुई।" यह प्रेम का उत्कृष्ट रूप है, जो प्रसादजी की इन कहानियो के अलावा “गुण्डा" मे और ज्यादा गहराई के साथ व्यक्त हुआ है। स्त्री- पात्रो के लिये प्रेम की अथाह भावुकता मे डूबकर अपना जीवन-बलिदान कर देना सगत लगता है। लेकिन पुरुष द्वारा इस प्रकार के पवित्र प्रेम का निर्वाह कहानी को कालजयी और नन्हकू सिंह जैसे जीवत पान को जन-कठहार बनाता है । महारानी पन्ना के प्रति असीम स्नेह के बावजूद उनका महाराजा बलवत सिंह के साथ विवाह हो जाने पर नन्हकू सिंह के मन मे पीडा कसकती रही, जिसे वे दुलारी से कहते है--"दुलारी। जीवन मे आज यह पहला ही दिन है कि एकात रात में एक स्त्री मेरे पलग पर पाकर बैठ गई है। मै चिरकुमार। अपनी एक प्रतिज्ञा का निर्वाह करने के लिये सैकडो असत्य, अपराध करता फिर रहा हू और पन्ना !... किन्तु उसका क्या अपराध । अत्याचारी वलवत सिंह के कलेजे मे बिछुपा मैं न उतार सका।" काशी नरेश को अग्रेजो द्वारा 1. प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, देवरय, ५ 328 2. प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, भाकाशदीप, 112 3. प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, पुरस्कार, 4 260 प्रसाद की सम्पूर्ण कहानिया, गुण्डा, पृ. 321 4 । बंदी बनाये जाने को खवर सुनकर नन्हकू सिंह को पन्ना और अपने प्रेम की याद आई वह पागल हो उठा। पन्ना और राजा चेतसिंह को महल से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिये वह अपना जीवन दे देता है। "नन्हकू सिंह ने ललकारकर चेतसिंह से कहा"-आप क्या देखते है । उतरिये डोगा पर । उसके घावों से रक्त के फुहारे छूट रहे थे। उधर फाटक से तिलंगे भीतर जाने लगे थे। चेतसिंह ने खिड़की से उतरते हुये देखा कि बोसों तिलंगों को संगीनों में वह अविचलित होकर तलवार चला रहा है। नन्हकू के चट्टान सदृश शरीर से गैरिक की तरह रक्त को घारा बह रही है। गुण्डे का एक-एक अंग कटकर वही गिरने लगा। वह काशी का गुण्डा था।" प्रसादजो को सत्तर कहानियों में "गुण्डा" कहानो सर्वश्रेष्ठ कहानी है। नन्हकू बाबू का जो चरित्र-विकास हुआ है, वह अन्य कहानियों में नहीं है । देश-प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम के लिये उत्सर्ग पुरस्कार कहानी में भी है, लेकिन जो उत्कर्ष गुण्डा में है वह पुरस्कार में नही । पन्ना के बगैर कहे, पन्ना और उसके बेटे तथा उसके राज्य की रक्षा के लिये अपनी जान देने वाले नन्हकू सिंह बचपन को प्रोत का निर्वाह करते हैं । बहादुरी के साथ जीवन को प्रेम को बेदी पर चढाने वाले नन्हकू सिंह अमर व्यक्तित्व के रूप में कहानियों में सदैव अग्रणी हैं । प्रारभिक कहानी "ग्राम" से लेकर "सालवती" सक जयशंकर प्रसाद की कहानी-कला मे निरंतर प्रौढता पाई । मानवीय सम्बन्धों में त्याग, बलिदान और देश प्रेम के संदेश देतो ये कहानियां प्रेमचंद से अलग रास्ता बनाती है । यद्यपि यह रास्ता बहुत साफ नही है, लेकिन उस युग में कथा साहित्य के क्षेत्र में अपना व्यक्तित्व उभारने के लिये प्रसादजी को मजबूरी यो । उनमें मामाजिक-यथार्थ को सूक्ष्म पकड़ नहीं थी, इसलिये वे अलग हुये और व्यक्ति-सम्बन्धो में राष्ट्र-हित को महत्ता प्रदान कर उसे उत्कृष्ट स्थान दिया। कविता में जो छायावादी-मानदंड थे, उन्हें कहानी में अलग करने का प्रयत्न किया, लेकिन उससे मुक्ति उपन्यासों में ही मिली। उनके तीनो उपन्यास रोमानीपन के बावजूद यथार्थ को भूमि पर खड़े हैं। कविता को स्वच्छन्दता, नाटकों को ऐतिहासिकता, उपन्यासों को सामाजिकता और अपने कठोर जोवन अनुभवो के बल पर वे कहानियों का ससार सृजित करते हैं। इन चार स्तम्भों में ही उनकी क्षमता निहित है। यही सीमा भी हो सकती है। 00 68 नागार्जुन के उपन्यासो मे राजनीतिक चेतना स्वतत्रता-बाद के भारत की ग्रामीण स्थितियो को वैचारिक आधार पर विश्लेषित करने का महत्वपूर्ण कार्य नागार्जुन ने अपने उपन्यासो मे किया है। गाँव की सच्चाई और चालाकी, सघर्षपूर्ण जिन्दगी तया आरामतलबी के लिये कुटिल चालो को उन्होंने विश्वसनीय ढंग से उभारा है। जाति और धर्म से अलग हटकर गांव की गरीबी और अन्य समस्याओ का समन विश्लेषण किया है। उनसे कुछ छिपा नहीं रहता। सूक्ष्म दृष्टि जमीदार, किसान एव मजदूरो के साथ महाजन की बही को भी नही छोडती। शोषण और अन्याय के रेशे-रेशे को कलात्मक ढग से चित्रित कर वे उस गाँव की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जिसके बारे मे हमारे राजनेताओ और नगर की ठडी हवा खा रहे बाबू लोगो के मन मे स्वर्गिक गांव की छवि बसी हुई है । नागार्जुन के उपन्यास इस स्वर्गिक धारणा को ध्वस्त कर गांव को उसको सम्पूर्णता मे उभारते हैं, जहाँ नगर की चतुराई और कुटिलता ने उसकी सहज जिन्दगी को उस लिया है। 1950 के बाद यानी कि आजादी की जड़ें जमने के बाद हिन्दी कथा साहित्य में दो प्रकार की धारायें बहने लगी। एक पश्चिमी ऊब, घुटन और सत्रास से निकली थी तथा दूसरी भारतीय ग्रामीण जीवन की विषम परिस्थितियो से। नकली और असली दुनिया का पार्थक्य उस समय के साहित्य मे विशेष रूप से देखा जा सकता है। नागार्जुन का "वलचनमा" (1952) असली दुनिया, अपनी देखी, समझी और अनुभूत दुनिया की सच्ची कथा कहता है, जिसमे न परिस्थितियो की भयावहता से घबडाहट है, न भय, न सत्रास और न घुटन । सघर्ष की अजस्र धारा है, जो आजादी के बाद आई गदगी को साफ करती है । इसलिये "बलचनमा" का महत्व निविवाद है।
'बलचनमा" के बाद फणीश्वरनाथ रेणु का "मैला आंचल" (1954) इसी परम्परा की आगे की कडी है । अचल विशेप की सूक्ष्म एव व्योरेवार जानकारी के लिये यह परम्परा महत्वपूर्ण है । "मला आंचल" की लोकप्रियता ने उन लोगो का भी ध्यान आकर्षित किया, जो गांव से जुडे होने के बाद भी नगर की चकाचौंध मे खो गये थे। यश और प्रसिद्धि के लिये हिन्दी मे ग्रामीण-जीवन पर इसके बाद खूब लिखा गया। लेकिन जो स्थान "वलचनमा" और "मला अांचल" का है, उसे फिर कोई नही पा सका। "मैला यांचल" प्रसिद्धि मे "बलचनमा" से भी आगे निकल गया। लेकिन अब पानी थिरा गया है और पुन गभीर चिंतन के बाद विद्वानो की दृष्टि "वलचनमा" पर टिक गई है । रेणु रोमास और भावुकता के साथ घटनामो का समावेश करते है। इसलिये उनमे दृष्टि का वह पनापन नहीं है, जो नागार्जुन मे है। नागार्जुन उपन्यास को रोचक बनाने के लिये प्रेम आदि को नहीं लाते, वे किस्सा- गोई के लिये भाषा और पात्रो की शारीरिक बनावट की मजाक भी नही उडाते बल्कि अन्याय-अत्याचार के विरोध मे चेतना को झकझोरते है। पाठक को भरमाते नहीं है, वहकाते भी नही, पूरी तल्खी के साथ वर्ग-सघर्ष मे स्थितियो का विश्लेषण करते हैं। शोषको के वर्ग-चरित्र और उनके व्यक्तित्व के दुमुहेपन को उभारते है । रेणु मे जो रोमानियत है, उसके कारण भटकाव भी है। प्रेम सम्बन्धो मे वे रस लेते है, लम्बे- लम्बे वर्णनो मे उनका मन रमता है, ऐसा नागार्जुन मे नही है। यह अन्तर विचारधारा का अन्तर है, जिसे नजरअंदाज नही किया जा सकता। नागार्जुन की मार्क्सवादी विचारधारा किसी से छिपी नहीं है। मार्क्सवाद जीवन को समझने की कुजी है। अपने जीवन-अनुभवो को उन्होने वैज्ञानिक विचारधारा के आलोक मे देखा-परखा और लिखा। इसलिये उनके पात्र निम्न-वर्ग के पात्र है। स्वतत्रता-पूर्व गांव की जो स्थिति थी, उसका एक छोर "होरी" है तो दूसरा "बलचनमा" ! होरी द्वितीय विश्वयुद्ध के काले वादलो के नीचे फले अधकार से मौन-युद्ध करता मर जाता है, लेकिन बलचनमा स्वतत्रता से ठीक पूर्व का है, उसकी स्थितियां उसे मौन नही करती, मुखर करती है । उसका विकास होता है-"बलचनमा अनेक शोषण और अन्यायो को भोगता हुआ 70 अपने नगे, भूखे श्रम के बलबूते पर चरवाहे से बहिया (पुश्तैनी गुलाम वह्यिा से काँग्रेसी वालंटियर, स्वयं सेवक, नौकर से खेत मजदूर, मजदूर से किसान और किसान से किसान नेता बनता है। उसका ऐ रूपांतरण सोमित जीवन के तमाम खंडांशो को भोगने के साथ-साथ होता है। साथ-साथ वह सही और गलत सम्बन्धों की पहचान करता है यह पहचान ही उसकी राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना को जन्म दे है।"1 वलचनमा के इस गुरिगत विकास में ही नागार्जुन वर्ग-सघर्ष: विकास करते हैं, बलचनमा को मजबूत करते हैं । स्पष्ट विचारधारा के साथ लिखा गया "बलचनमा" उपन्य केवल बिहार ही नही सम्पूर्ण भारत के किसान-संघर्ष की कहानी कह है। जमीदारों के अत्याचारों को मूक-पशु की तरह सहते-सहते विरं के स्वर उभरते हैं। आजादी के लिये किया जा रहा संघर्ष और उस माल-उड़ाते भद्र-काँग्नेसी जमीदारों की असली स्थिति को देख लेने वाद "बलचनमा” की आखें खुलती हैं, चेतना विकसित होती है। जि आजादी की प्राप्ति के लिये सारा भारत संघर्ष कर रहा है, वलिदा हो रहा है, उससे गरीबों का भला नहीं हो सकता, यह बात उस समझ में आ जाती है, वह अपने फूलवाबू के पास रहकर सत्याग्न देश-प्रेम और गांधी-भक्ति का नंगा नाच देखता है। और इस निष्व पर पहुँचता है कि "स्वराज मिलने पर बाबू भैया लोग आपस में दही मछली बाँट लेंगे। ये लोग आज मालिक बने बैठे है, आगे : तर माल वही उड़ावेंगे। हम लोगों के हिस्से सीठी ही सीठी पड़ेगी।" बलचनमा का यह निष्कर्ष आज स्वाधीनता के चालीस वर्षब और भी अधिक सटीक हो गया है। सच्चा स्वराज्य उन्ही का है, अंग्रेज-राज में भी अंग्रेजों के कृपा-पात्र वनकर धनपति थे या स्वाधीना के बाद जिन्होंने नैतिकता, देश-प्रेम और स्वाभिमान को खूटी पर टां दोनो हाथो से गरीबों का खून पिया था। गांवों में बढ़ती खेतिह मजदूरों को पंक्तियाँ, गरीबी, बेकारी और बीमारी में प्रति-पल द तोड़ते ये लोग स्वराज्य का अर्थ क्या लें। यही कि फूलवाबू जैसे जमीद 1. रमेश क तल मेघ-क्योकि समय एक सन्द है, पृ. 281 2. नागार्ज न--चलचनमा, पृ. 155 काग्रेस में घुसकर और अधिक भ्रष्टाचारी बन गये है। जमीदार कभी- कभी थोड़ी-सी दया भी दिखलाता था ताकि गांव मे उसके प्रति घृणा न फैले, लेकिन काग्रेस मे जाने के बाद उन्हें मानो लूटने का लाइसेस ही मिल गया हो। फूलवाबू के प्रति अपनी श्रद्धा-भाव प्रगट करते हुये बलचनमा कहता है-"मुझे यह भी भरोसा था कि फूलबाबू जव महात्मा के चेला बन गये हैं, तो हमारे मालिक को इस जोर-जुलुम के लिये दो वात वह जरूर कहेगे। महात्मा गांधी न वडे लाट से डरते हैं न छोटे लाट से, न सरकार से न अमला से। गरीबो का पक्ष लेते हैं । फूलबाबू उन्ही गांधी महात्मा के चेला होकर मेरे लिये क्या इतना भी नही करेंगे कि अपने फूफा-फूफी को जरा समझा दे।"1 बलचनमा का यह विश्वास तुरत ढेर हो जाता है, जब वह फूलवावू के असली रूप को देवता है-“मगर फूलवावू ने यह कहकर यही वात खतम कर दी कि तुम्हारा तो आपस का झगडा है, बहिया-महतो का। इसका निवटारा भी तुम्ही दोनो कर लोगे । इसमे मेरी कोई जरुरत नही । जा, जाकर अपने मालिक के ही पैर पकड़। वह तुझे माफ कर देगा।"2 फूलबाबू यहां गांधी जी की उस बात को ही दुहराते है, जहाँ वे कहते है कि मजदूर को मिल मालिक का और किसान को जमीदार का हृदय जीतना चाहिये । गाँधी जी की इस चाल को फूलबाबू जैसे गाधीवादी समझ नही पाते, जबकि बलचनमा जैसे अनपढ खेतिहर-मजदूर को इस बात के अंदर छिपी चालाकी समझ में आ जाती है और वह हैरान रह जाता है कि मालिक लोगो के पर पकड़ने से क्या मिलेगा, सिवाय जूतो के । बलचनमा सघर्ष से सीधा जुड़ता है, इसलिये उसकी दृष्टि भी साफ है । वह अपने-पराये तथा मित्र और दुश्मन को अच्छी तरह समझता किसान सभा को स्थापना कर नागार्जुन भारतीय किसान मे चेतना का शखनाद करते हैं । सदियो से दबे-कुचले छोटे-छोटे किसान उठकर सीधे खड़े हो जाते हैं और कह उठते है-"जमीन किसकी-जोते बोये उसकी। इक्लाव जिंदाबाद-जिंदाबाद।" जमीन पर मजदूरो और छोटे किसानो का यह मालिकाना हक, उन्हे शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने की शक्ति देता है । नागार्जुन समझते है कि अपने अधिकार 1. नागार्जन-वलचनमा, पृ. 92 2. नागार्जन-चलचनमा, पृ 94 72 के लिये लडना होगा, लडने के लिये सगठन की आवश्यकता है और सगठन किसान-सभा ही हो सकती है। किसानो मे इस मत्र ने प्र फूंक दिये, वह लाल झडे के नीचे साहस और पराक्रम के साथ आ र हुआ। वलचनमा, ताराचरण, दयानाथ, कपिल और वीरभद्र सघर्षशील पात्र हर अन्याय और दमन के विरुद्ध खडे है, नागार्जुन उन्हे वैचारिक आधार दिया है। जीने के लिये लड़ने की शक्ति दी रेणु ने उसी अचल से कालीचरण, बालदेव, बाबनदास, विश्वन प्रसाद, जितेद्र मिश्र जैसे पात्र दिये हैं, जो बलचनमा, मधुरी, ताराच एव अन्य जीवत पात्रो की बराबरी नही कर पाते। नागार्जुन का स वैचारिक संघर्ष है, इसलिये उसमे विजय चाहे दूर क्यो न हो, आवश्यक । लेकिन रेणु की भावुकता विजय-यात्रा मे फिसलन । करती है। राजनीतिक दृष्टि से विचार सम्पन्न नागार्जुन के उपन्यासो के प हर जगह अटूट है। पुरुष और स्त्री पात्रो मे वे कोई अतर नहीं कर इसीलिये "वरुण के बेटे" की मधुरी का संघर्ष स्त्री-पुरुप मे नही ब जा सकता। वह अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करती है, उस गढ-पोखर बनाये रखने के लिये जी-जान से तैयार होती है, जो उनके जीवन-या का साधन है। जीवन से अधिक सुन्दर और महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है जब जीवन का आधार ही छिनने लगे, तब लडने के अलावा रह ही व जाता है । "पाने के लिये सारी दुनिया और खोने के लिये सिर्फ जजी कार्ल मार्क्स का यह सिद्धात वाक्य उसका प्ररक बनता है। गढपोर के लिये जो स्वप्न मछुआरो ने बुने थे, उनको साकार करते हुये नागार कहते हैं--' मोहन माझी के स्वप्न थे कि गढपोखर का जीर्णोद्धार हो प्रागे चलकर और तव मलाही गोढियारी के ये ग्रामाचल मछली पाल व्यवसाय का आधुनिकतम केंद्र हो जायेंगे। वैज्ञानिक प्रणाली से य मछलियां पाली जायेंगी। पूस से लेकर जेठ तक प्रति वर्ष अच्छी से पर मछलियां अधिक से अधिक परिणाम मे हम निकाल सकेंगे। एक- सीजन मे पचास-पचास हजार रुपयो तक की आमदनी होगी। मला गोढियारी का एक-एक परिवार गढपोखर की बदौलत सुखी-सम्पन्न जायेगा। विशाल जलाशय की इन कछारो में हम किस्म-किस्म कमलो और कुकुदिल्यो की खेती करेंगे। पक्की ऊँची भिडो पर इकतल सेनिटोरियम बनेगा, फिर दूर पास के विद्यार्थी आ-पाकर यहाँ छुट्टि ।
मनाया करेंगे।"1 लेकिन जमोदारी उन्मूलन के बाद जमीदारो ने बेईमानी से जिस प्रकार रातो-रात जमीन बेचो, उससे गढपोखर पर आश्रित मछुमारो का जीवन सकट में पड़ गया। ग्राम-विकास और खेतिहर-श्रमिको के लिये आजादो के बाद भी जो कुछ हुआ, उसे "वरुण के बेट' के मछुप्रारो के जीवन-सघर्ष से समझा जा सकता है । जमीदारो के लिये काँग्रेसो सरकार ने बेईमानो के लिये जमीदारी उन्मूलन कानून मे अनेक ऐसे छेद छोड दिये, जहाँ से वे हाथी तक निकाल ले गये। गरीबो को वहो शोषण मिला। "वरुण के बेटे" अपनी इस नियति को स्वीकार नहीं करते। "गढपोखर" पर कब्जा होते देख वे एकजुट हो किसान सभा के माध्यम से संघर्ष को राह पर चलते है। किसान सभा के अलावा उनका ओर कोई साथी नही था। अत वे हिम्मत के साथ प्रस्ताव पारित करते हैं- 'प्रस्ताव द्वारा गढपोखर के तथा कथित नये मालिको को यानी सतघरा के जमीदारो को सम्मेलन ने आगाह किया था कि वे युग की आवाज को अनसुनी न करे, मलाही गोढियारी के मछुप्रो को गढपोखर से मछलियां निकालने के पुश्तैनी हक से वचित करने को उनकी कोई साजिश कामयाब नही होगी। रोजो-रोटी के अपने साधनो की रक्षा के लिये सघर्ष करने वाले मछुये असहाय नहीं हैं, उन्हे आम किसानो और खेत मजदूरो का सक्रिय समर्थन प्राप्त होगा।" किसान सभा के नेतृत्व मे गाँव की प्रत्येक समस्या का समाधान निकले, यह नागार्जुन चाहते हैं। गांव-गांव में किसान-सभा की स्थापना से जमीदारो को कुटिल चालो को कुचला जा सकेगा, नागार्जुन के उपन्यास यह स्थापना करते है। गांव में रहने वाला निम्न-वर्ग सगठन के विना लड नहीं सकता। जमीदारो के शोषण के विरुद्ध यह एकजुट लडाई है, जिसकी मशाल सम्पूर्ण भारतवर्ष के शोपित सर्वहारा को गस्ता दिखायेगी। प्रश्न यहाँ हार-जीत का नहीं है, असली प्रश्न है, मुकाबला करने का, बहादुरी के साथ सघर्ष करने का। सदियो से चली आ रही यूर जमीदारी प्रथा को काग्रेसी नेतामो का प्राश्रय मिला तो वे और अधिक मजबूत हो गये, इस पहाह से टकराना हिम्मत का काम था। यलचनमा, वरुण के बेटे, रतिनाथ मी चाची एव यावा बटेसरनाय नागानं नवपण वे वेटे, 430 2. नागार्जन-यण के बेटे, 107 74 आदि उपन्यास संघर्ष की राह मे बेहतरी की ओर वढने वाले कदमो की प्रतिध्वनिया समेटे है। मछुपारो की यह दृढता दृष्टव्य है "यह पानी सदा से हमारा रहा है, किसी भी हालत मे हम इसे छोड नहीं सकते। पानी और माटी न कभी बिके हैं न कभी विकेंगे। गढपोखर का पानी मामूली पानी नही, वह तो हमारे शरीर का लहू है । जिन्दगी का निचोड है।" "वरुण के बेटो" के इस आत्म-विश्वास मे "बलचनमा" की वह वसीयत है, जिसे उसने मरते दम कहा था-"कमाने वाला खायेगा, इसके चलते जो कुछ हो-धरती किसकी--जोते बोये, उसकी । किसान की आजादी आसमान से उतरकर नही आयेगी वह परगट होगी नीचे जुती धरती के भुरभुरे ढेलो को फोडकर ।"2 - संघर्ष के प्रति यह एकजुटता और विश्वास आदोलनों को आगे बढाते हैं। गांव के निम्न-वर्ग के पात्र उठ खडे होते है, अपने अधिकारो को वे पाना चाहते है, बडी-से-बडी कुर्बानी देने को वे तैयार है, नागार्जुन इन उपेक्षित, दलित और नारकीय जीवन भोग रहे पात्रो को अपनी विचारधारा देते है, मार्ग बतलाते है, दिशा तय करते है। इसलिये नागार्जुन के उपन्यासो मे भूमि-सघर्ष जबर्दस्त है। प्राचलिकता के नाम पर लिखे गये अन्य उपन्यासो में गांव की समस्याओ का वर्णन, घबडाये हुये अकेले व्यक्ति का संघर्प है, लेकिन विचारधारा के अभाव मे वह सघर्ष अधूरा रह जाता है और पात्र टूट जाता है। लेकिन नागार्जुन के पाव अकेले नही लडते, अपनी अकेली समस्या या लाभ के लिये नही लड़ते, उनकी लडाई वृहद स्तर पर है । उनका सघर्ष सबके लाभ के लिये है, इसीलिये सामूहिक-एकजुटता है। नागार्जुन की इस विशेषता पर प्रकाश डालते हुये कवि विष्णु खरे लिखते हैं - "इसके अलावा एक और चीज मुझे जनता को देखकर नागार्जुन में दिखाई देती है और वह यह कि उनके यहाँ जनता सिर्फ करुणोत्पादक, लाचार, असहाय, शोपित नही है। सामान्य जन की भयावह हालत का चित्रण करना बुरी वात नही है । लेकिन भारतीय जनता मे जिन्दा रहने के लिये लड़ने का माद्दा भी जबरदस्त है-नागार्जुन के यहाँ जनता सिर्फ करुणा तथा दया 1. 2. नागार्जन-यरुण के बेटे, पृ. 31 नागार्ज नबलपनमा, पृ. 192 75 उपजाने वाली स्थिर, जड़, वहां रखी हुई चीज नही है, बल्कि इकट्ठा होती हुई, समूह वनतो चलती, कभी थककर बैठती, लेकिन फिर उठकर आगे बढती, हमला करती, डंडों गोलियों के प्रागे तितर-बितर होती, नारे लगाती, घिराव तथा हड़ताल करतो, जेल जाती और कभी-कभी जान देती जनता है।" नागार्जुन के उपन्यासों में राजनीतिक चेतना प्रखर रूप मे मिलती है। कही वह सगठनों की एकता के माध्यम से जमीदारों और पूंजीपतियो पर प्रहार करते हैं, उनके जन-विरोधो कार्यों को भर्त्सना करते हैं, सर्वहारा की चैतन्य बुद्धि से बड़ा आंदोलन खड़ा करते हैं, कही राज- नेतानो पर व्यग्ग करते हैं, उनके जमोदार-पूजीपति प्रेम पर करारा प्रहार करते है, स्थितियों को देखकर उनका राजनीतिक समाधान तलाशते हैं और इस आजादी का जो जमीदार-पूंजीपतियों ने मिलकर अग्रेजो से प्राप्त को, उसे जन-हित मे निरर्थक साबित कर आगे असली-आजादी के लिये संघर्ष को अनिवार्य बनाते हैं। यह नागार्जुन को अपनी विशेषता है, जनता से जुड़े रहकर, जन को प्रात्मा के प्रति आस्था बनाये रहकर, मुक्ति के मार्ग में विचारधारा को मशाल जलाकर संघर्ष को आगे बढ़ाना उनके उपन्यासो को जीवंतता का प्रमाण है। 1. विष्णु खरे–मालोचना, मंक 56-57, पृ. 22 लेखक और लोकतंत्र वीसवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध और इक्कीसवी शताब्दी मे पहुँचने की हडबडाहट मे "लेखक और लोकतत्र" विषय पर बात करना जोखिम भरा काम लग रहा है। कुछ लोग अब भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि लेखक एक सवेदनशील सामाजिक प्राणी है । वह इस ससार मे घुल- मिलकर जीना चाहता है और जीता भी है। इसीलिये वह अन्य लोगो की तरह अपने चारो ओर के परिवेश के प्रति चौकन्ना रहता है, सजग रहता है । यही सजगता उसे लेखन-कर्म से जोडती है । विस्तृत जन-समु- दाय से उसका नाता अटूट होता है, वह बाह्य प्रभावो को ईमानदारी के साथ महसूस करता है और अपनी रचना मे व्यक्त करता है। इस अतिरिक्त सजगता के कारण ही उसका चिंतनशील मस्तिष्क और सवेदनशील मन जीवन-जगत मे व्याप्त अमानवीयता को सहन नहीं कर पाता। वह ऐसे समाज की कल्पना को साकार करना चाहता है, जिसमे मानव-मात्र को जीने का अधिकार हो, 'जिसमे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण न कर सके, जिसमे जाति और धर्म के आधार पर अधिकार और सुविधाओ का बदरबाट न हो। घूमने-फिरने, लिखने-बोलने की स्वतत्रता हो, शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार हो, साप्रदायिकता और साम्राज्यवाद का नगा नाच न हो, ऐसे लोकतत्र की कल्पना को साकार करने के लिये लेखक कलम उठाता है। वह चाहता है कि जिस समाज मे वह रह रहा है, उसमे किसी प्रकार की अमानवीयता न रहे । इस प्रकार के रचना-कर्म से जुड़ने के लिये वह जिन प्रक्रियामो से गुजरता है, उसमे भी कम सकट नही हैं । इन समस्त सकटो को वह ईमानदारी के साथ स्वीकार करके आगे बढ़ता है और मार्ग प्रशस्त करता है । 77 लेखक को सबसे पहले एक सामाजिक प्राणी मानना चाहिये, भद्र और अलौकिक वस्तु नही बनाना चाहिये । जिस प्रकार की अवधारणा हमारे यहा प्रचलित है कि लेखक जब लिसता है, तब वह उसकी मधुमती भूमिका होती है, जीवन-जगत के संघर्षों से उसका कुछ लेना-देना नहीं होता। यदि कोई जीवन-जगत के सम्बन्धो की वात करता है तो वह सरस्वती के पवित्र मदिर को अपवित्र करता है । इस प्रकार की अन्ध-भक्ति के माध्यम से साहित्यकार को जीवन-जगत से काटने का चालाक और धूर्त पड्यत्र किया जाता रहा है । और अव भी कुछ लोग है जो इस प्रकार के पड्यनो मे ही अपनी सार्थकता समझते है। लेखक को इन सबसे जागरूक रहकर अपने समाज को बदलने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिये । वह जिस समाज व्यवस्था को चाहता है, वह सच्चे अर्थों में लोकतत्र मे ही सभव हो सकती है । हाँ, इतना अवश्य है कि वह इस प्रकार के अन्धे- लोकतन को नहीं चाहता, जिसमे चोर और कोतवाल दोनो को समान सुविधाये प्राप्त हो। एक को चोरी करने का अधिकार और दूसरे को आँखे बद कर टर्राने का अधिकार मिला हो। ऐसे लोकतत्र का या यूं कहे कि इस प्रकार जनता को गुमराह करने वाली शासन-व्यवस्था का सच्चा लेखक विरोध करता है। उसकी रचनाये इस बात का प्रमाण होती है कि वह लोकतत्र के लिये क्रूर मजाक या अश्लील-भापा का विरोध करता है। उसकी आवाज केवल अपनी ही नहीं होती, वरन् सम्पूर्ण पीडित मानवता की होती है । मै यहा अपनी बात कहते हुये लोकतत्र की परिभाषाओ के समुद्र मे गोते लगाना नहीं चाहता। लोकतय के बारे मे सभी अच्छी तरह जानते है। और यह भी जानते हैं कि लोकतत्र के नाम पर जो शासन-व्यवस्था आज हम पर थोपी गई है, वह कितनी अमानवीय और क्रूर है । सन् 1531 मे ग्रीक के चिंतक इलियट ने सबसे पहले लोकतत्र पर अपने विचार प्रगट करते हुये कहा था "लोकतत्र की पहली और आवश्यक शर्त है कि राष्ट्र मे रहने वाले मानव-मात्र मे समानता हो।"। उसके बाद अरस्तू, प्लेटो, हेमिल्टन, वेथम, जार्ज वाशिंगटन एव अन्य राजनीतिक विचारको ने लोकतत्र के लिये आवश्यक माना है कि उसमे रहने वाले मनुष्य मात्र को समान अधिकार हो, समान सुविधायें हो। 1. इलियट-की वहस-रेमण्ड विलियम्स, पृ 82 78 अग्रेजी साम्राज्यवादियो को भगाने और लोकत्तत्र की स्थापना का सपना भारतदु से लेकर अब-तक के लेखको ने पूरी शिद्दत के साथ साहित्य में प्रतिष्ठित किया है। आजादी से पहले लडाई सिर्फ अग्रेजो से थी और यह अनुभव किया जा रहा था कि भारत मे फैली अमानवीयता के लिये केवल अंग्रेज दोपी हैं। उस अग्रेजी-साम्राज्यवादी शासन मे मुक्ति के लिये लेखक लामवद हुये और भरसक चेतना जगाने वाला साहित्य लिखा। इस साहित्य में मूल बात यह है कि लेखक जनता की तकलीफो को बताकर उसी जनता को कहते हैं कि तुम स्वय जगो, अपने भीतर शक्ति का सचय करो और इस क्रूर शासन व्यवस्था को उसाड फेको। भारतेदु ने अपने ऐतिहासिक भाषण मे बलिया के मेले मे कहा था-"भाइयो, राजा-महाराजानो का मुंह मत देखो, यह मत प्राशा रखो कि पडितजी कथा मे कोई ऐसा उपाय भी बतलावेंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढे । तुम साज ही कमर कसो, आलस छोडो, कब-तक अपने को जगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोकने पुकरवाओगे। दौडो इस घुडदौड मे जो पीछे पड़े तो फिर कही ठिकाना नहीं है।"। इसी प्रकार प्रेमचद भी साहित्य का उद्देश्य बताते हुये कहते है-"अब साहित्य केवल मन बहलाव की चीज नहीं है। मनोरजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है। अब वह केवल नायक नायिका के सयोग-वियोग की कहानी नही सुनाता बल्कि जीवन की समस्यानो पर विचार करता है और उन्हे हल करता है। अब वह स्फूर्ति या प्रेरणा के लिये अद्भुत आश्चर्य- जनक घटनायें नही ढूढता और न अनुप्रास का अन्वेपण करता है । किन्तु उसे उन प्रश्नो से दिलचस्पी है जिनसे समाज और व्यक्ति प्रभावित होते है ।"2 जिन प्रश्नो की ओर प्रेमचद ने ध्यान आकृष्ट किया है, वे प्रश्न लोक्तन की स्थापना के है। ऐसे लोकतन की स्थापना के जिनमे प्रेमचद किसान-मजदूरो के शासन के स्वप्न देखते थे। जहा जॉन को हटाकर श्याम को सत्ता सौपने से ही समस्याओ की समाप्ति नहीं होती। प्रेमचद बडे-बड़े जमीदारो को समाप्त कर जमीन के समान वितरण के पक्षपाती थे, वे चाहते थे कि ऐसी आदर्श व्यवस्था स्थापित हो, जिसमे 1 भारतेन्दु हरिश्चद्रददरी मेला मे दिये भाषण से । शिवरानी देवी-प्रेमचद घर मे,88 2 79 सबके अधिकार वरावर हों। कोई जमोदार बनकर, कोई महाजन बनकर जनता पर रोब न जमा सके। ऊंच-नीच का भेद समाप्त होना चाहिये।" रूस में लोकतत्र की स्थापना होने पर वे भारत में भी इसी प्रकार की शासन व्यवस्था की इच्छा व्यक्त करते हैं । वे कहते है-"रूस है जहा बड़े-बड़ों को मार-मार कर दुरुस्त कर दिया है। अब वहां गरीबो का आनंद है, शायद यहा भी कुछ दिनो के बाद रूस जैसा ही हो।" भारतेदु, प्रेमचद, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, नवीन, यशपाल, नागार्जुन एवं रेणु ने जिस लोकतत्र की स्थापना के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन होम कर दिया, वह आज इस देश में कही भी देखने को नही मिलता। आज यह भयावह स्थिति ही है कि जितनी स्वतंत्रता सविधान में गिनाई गई थी, वे सब भूखे बच्चे के हाथ खिलौने की तरह बजती तो है, परन्तु उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति नही कर पा रही है। सता मे जो भी व्यक्ति आता है, उसकी चिंता जन-समस्याओं को सुलझाने मे कम, अपनी कुर्सी बचाने में अधिक रहती है। चालीस वर्ष की स्वतंत्रता को दुधारी गाय की तरह दोनो हाथो से सत्ताधारी-वर्ग ने अच्छी तरह दुहा है। जिधर देखें समस्या ही समस्या दिखाई पड़ती है। ऐसी स्थिति में लेखक देखता है कि चारों ओर भूख, गरीबी, शोपण, कुपोपण, बेरोजगारी साम्प्र- दायिकता, अत्याचार, सामाजिक कुरीतियो का नंगा नाच हो रहा है । इस वातावरण मे लेखक का दायित्व और भी बढ़ जाता है । वह जिस लोकतत्र की नीव रखना चाहता है, वह उसे पाने के लिये अपनी रचनाओं में और भी तीखेपन से लिखता है। अब प्रश्न यह उठता है कि लेखक लोकतंत्र की स्थापना के लिये किन प्रश्नों को और किस प्रकार अपनी रचना का आधार बनाये, ताकि जन-चेतना का अवलम्ब बन सके। इस संदर्भ मे मै सेजलो माइलोज द्वारा अड़तालीसवें अन्तर्राष्ट्रीय पेन कांग्रेस मे दिये गये भापण को उद्धृत करना चाहूंगा उन्होने लेखकों को सम्बोधित करते हुये कहा था-"लेखक का 1. शिवरानी देवी-प्रेमचंद घर मे, पृ. 110 2. शिवरानी देवी-प्रेमचद घर मे, पृ. 110 80 पहला काम है कि वह समाज को अमानवीय सरचना में पिसते-जूभते हुये मानव की परेशानियो और सघों का चित्रण करे और अपने समाज, देश और परिस्थितियो के प्रति जनता को जागरूक करे इस प्रकार काम करके लेखक कातिकारी परिवर्तनो के लिये दरवाजा खोलेगा, ताकि जन-समुदाय अपने-अपने सघर्ष के लिये मार्ग पा सके । परिवर्तन का मुख्य लक्ष्य सत्ता परिवर्तन ही होगा। सबसे पहले सत्ता बदले, तभी लोकतत्र कायम हो सकता है। इस बात को लोगो के मन मे भरना ही लेखक का दायित्व है। यदि इस प्रकार कार्य वही नहीं कर पाता तो यह लेखक की कमजोरी है।" यह आवश्यक है कि अपने स्वप्नो को साकार करने के लिये लेखक उन शक्तियो को पहचाने, जो उसके लक्ष्य मे बाधक है । लेखक के पास यदि कोई सुनिश्चित और वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है तो वह भटक जायेगा और पीडित-जन के लिये कोई मार्ग नही तलाश सकेगा । इसलिये यह आवश्यक है कि पहले लेखक वैज्ञानिक विचारधारा को आधार बनाकर अपनी परिस्थितियो का विश्लेषण करे । वह जितना गहराई मे जायेगा, उतना ही कारगर साहित्य दे सकता है। अधिकाश रचनायो में देखा जाता है कि समस्याग्रो को उथले रूप मे प्रस्तुत कर दिया जाता है। ऐसे मे न तो रचना का कोई महत्व होता है और न लेखक का । इसलिये लेखक को चाहिये कि वह अपने आसपास की समस्याओं को देखते हुये सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक परि- स्थितियो को भी भली-भाति परखे। लेखन कर्म आज और भी ज्यादा सकटमय इसलिये हो गया है क्योकि सत्ताधारी वर्ग भी आज वही भाषा बोल रहा है, जो लेखक और समाजवादी देशो का अगुमा वोलता है। समाजवाद आज भारतीय जनता पार्टी से लेकर काग्रेस तक बोल रही है। सब यही कह रहे है कि हमारा उद्देश्य समाजवाद की स्थापना है। पता नही कौन-सा समाजवाद इनका लक्ष्य है । अभी तक स्पष्ट नहीं है । यह अच्छा ही हुआ कि भाजपा एकात्मवाद में उतर आई, वरना धीरे-धीरे समाजवाद के प्रति भी लोगो का मन भर जाता। हमारे तथाकथित प्रगतिशील जवाहरलाल नेहरु मे जो लोग प्रगति की राह देखते थे, उन्हे आज शायद 1. पार्टीसन रिव्यू, प. 177-78 81 इस बात से मोहभंग हो गया होगा। समझदार वही जो समय रहते निष्कर्ष पर पहुँच जाये। लेखक चाहता है कि लोकतंत्र ऐसा हो जहां उसके ढोंग को प्राव- श्यकता न हो। वह वास्तविक अर्थों में हो । वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र तभी सभव होगा जब हर प्रादमी को उसका अधिकार मिलेगा। नही तो आज जो स्थिति है, वह भयानक रूप ले लेगी। इस कांग्रेसी लोकतंत्र के चालीस वर्षों बाद भी साठ प्रतिशत लोग एक समय को रोटी के लिये सुबह से रात तक जी-जान से जूझते हैं। कुपोषण के शिकार हो कुत्तों की तरह मर जाते है, लेकिन सत्ता-वर्ग उन्हे मात्र वोट समझ बगैर पांच वर्षों के पूछता ही नहीं है। यह अमानवीयता जिस लोकतंत्र में हो, उसे लेखक लोकतंत्र नहीं मानता। इसीलिये आजादी के कुछ वर्षों बाद ही हिंदी साहित्य मे मोहभंग की स्थिति साफ नजर आती है। फणीश्वरनाथ रेणु अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास "मैला आंचल" में एक समाजवादी कार्यकर्ता के द्वारा कहलाते है-"यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है।" और आगे एक पात्र कहता है-"जव तक जमींदार और मिल मालिकों को राह चलते लोग पागलों और कोढियों की तरह नही समझेगे, तब तक वास्तविक आजादी नहीं आ सकती।" रेणु के अतिरिक्त यशपाल, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, अमरकांत, शैलेश मटियानी, भैरव प्रसाद गुप्त, अमृतराय एवं रांगेय राघव आदि लेखकों में इस अात्मघाती-लोकघाती लोकतत्र के प्रति मोहभग आक्रोश के रूप मे आता है। वे चाहते है कि लोकतंत्र का आधार तो समानता पर आधारित होना है, और यहा ऐसा नहीं हो रहा । वे पूरी शिद्दत के साथ पीड़ित मानवता की आवाज को बुलद करते है। लोकतत्र मे साहित्यकार को लेखन की पूरी स्वतंत्रता चाहिये। यदि कोई सरकार ऐसा नही कर पाती, तो वह लोकतंत्र का गला घोंटती है। हमारे देश में 1975 मे लगी एमरजेसी और अब डाक पर सेसरशिप इस बात का प्रमाण है कि सरकार नहीं चाहती कि लेखक स्वतत्र रूप से लिखे-पढ़े। उसे लेखकों से खतरा नजर आता है, और लेखको से खतरा बेईमान आदमी को ही होता है, चाहे वह सत्ता मे ही क्यों न बैठा हो । आजादी की लड़ाई में लोग जेल में बंद होकर भी लिखते-पढते रहते थे, अंग्रेजो ने इस प्रकार की स्वतंत्रता दे रखी थी, यह कहना तो 82 भूल होगी पर कोई न कोई कारण तो थे ही कि शहीद भगतसिंह अन्तिम समय तक पढ़ते-लिखते रहे और माडले जेल में "गीता रहस्य" तक लिखा गया । पडित जवाहरलाल नेहरु ने बहुत कुछ जेलो मे ही पढा, यह बात वे सार्वजनिक रूप से कहते रहे । परन्तु आज स्वतत्र भारत मे यह सभव नहीं है। सरकार निरतर इस कोशिश मे है कि लोग जड हो जायें । सोचना विचारना बद कर दें। अभी हाल ही कागजो और पोस्ट वगैरह पर बढे चार्ज इस बात का प्रमाण है। सरकार के अतिरिक्त पूंजीपति समस्त प्रकाशन समूहो पर कब्जा किये हुये हैं और यह चाहते है कि एक जडता की स्थिति सदैव बनी रहे। इसीलिये लखटक्यिा पुरस्कार शुरू कर रखे है कि जो लेखक जनता को जितना लोभ-मोह मे फसाये रखेगा उसे ही लखपति बना दिया जायेगा। उसको पुस्तको को छापा जायेगा, उसी की खरीद होगी और उसी को अन्य सुविधायें दी जायेंगी। मसलन प्रेरा पर देश के चद पूंजीपतियो का कब्जा है, वह जैसा चाहते है, वैसा करते है। हमारे देखते ही देखते हिंदी को बड़ी-बडी पत्रिकायें धर्म, तत्र-मत्र, फिल्म, क्रिकेट और देह-कथा पर विशेषाक निकालने लगी। और जो पाठक वर्ग लेखक सपादको ने तैयार किया था, वह इन्होने नष्ट कर दिया। आज हिंदी की यह स्थिति है कि ईमानदार लेखको की पुस्तके या तो प्रकाशक छापते ही नही, और छापते भी है तो वह माल गोदामो मे पड़ी सडती रहती हैं। आज से बीस वर्ष पहले जो साहित्य रेलवे और बस स्टेडो की स्टालो पर मिलता था, वह अचानक उठ गया और उसकी जगह पीत-पत्रिकाओ ने ले ली। अधाधुंध अश्लील पत्रिकाओ का व्यवसाय शुरू हो गया और सरकार चुपचाप सूंघती रही कि चलो अच्छा है, कुछ समय प्राराम से कटेगा। समाचार-पत्रो मे राजनेताओ के चित्र, उनके थूबने से लेकर जुकाम तक की खबरें, धार्मिक जुलूसो की चित्रावलिया, महतो के परिचय, उनके प्रभाव क्षेत्र, उनके ऐसे भाषण जिनमे साप्रदायिक विद्वेप भरा हो, छपने लगे । सरकार ऐसे महतो की भक्त हो गई, सरकार पर ऐसे महात्मानो का आधिपत्य हो गया। मत्रियो और उनको पलियो ने इन महात्मानो को अपना आका मान लिया और देखते-देखते लोकतत्र की पूरी कल्पना को ही साप सूध गया। सस्कृति के नाम पर पुरस्कारो की राजनीति से लेकर भारत उत्सवो की एक अलग परम्परा शुरू हो गई, जो सामती ध्वसो को ही सस्कृति के नाम पर परोसने लगी और उसका ठेकेदार 83 ऐसे लोगों को बनाया गया जिनका संस्कृति से कोई दूर का भी सम्बन्ध नही था । करोड़ो रुपये खर्च करके स्वयं के अहं की तुष्टि के लिये ऐसे आयोजनों का जाल विछाये जाने की शुरुग्रात हो चुकी है, लेखक ऐसे दुष्कृत्यो का विरोध करते हैं। वे लोकतम में संस्कृति की अहमियत को समझते हुये इस प्रकार के फूहड़पन को नकारते हैं और ऐसे लोकतंत्र के लिये समर्पित हैं, जहां धर्म, सांप्रदायिकता और संस्कृति को वास्तविक जन के उपयोगी मान उसका उसी अर्थ में, प्रयोग किया जायेगा । सामंती ध्वंसो की राजनीति से अलग हटकर वे लोक संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर उसे अक्षुण्ण रखने के लिये साहित्य में स्थान दे रहे हैं । लेखक जिस लोकतत्र के लिये सर्जनरत हैं, उसमें जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और भाषा की सकीर्णतानों के लिये कोई स्थान नहीं होगा। लोकतत्र मे इस प्रकार के प्रोछे हथकंडों को जड़ से समाप्त कर दिया जायेगा । असल मे, यह सारी चीजें आर्थिक समानता से उत्पन्न आक्रोश को दूसरा मार्ग देने के लिये है। जनता जिस प्रकार से गरीबी में पिस रही है, उसके पास समय कहां है कि वह इस प्रकार झंझटो में फंसे लेकिन सरकारी-तत्र, पूंजीपति-वर्ग और उसके हिमायती इस प्रकार की करतूत करते रहते है और वे इसमें सफल भी होते हैं। इसी कारण उन्होने अशिक्षा को दूर नहीं होने दिया है। चीन हमारे पड़ोस में है, और हमसे दो वर्ष वाद आजाद हुआ था, परंतु वहां लगभग सबको शिक्षा दे दी गई, जबकि चोन की स्थिति सन् 1949 में बहुत खराब थी। अफीमचियो को इस प्रकार से सुधारने का कार्य एक योजना के तहत किया गया जिसका परिणाम हमारे सामने है। और अपने यहां जो कुछ किया गया उसका भी परिणाम निरक्षर भट्टाचार्यों की फौज के रूप में हमारे सामने है। रही-सही कसर टी० वी० निकाले दे रहा है। पिछले दिनो दिल्ली मे हुये एक सर्वेक्षण से इस बात का पता चला कि वहां के पब्लिक स्कूलो के विद्यार्थियों के परीक्षाफलो में टी० वी० के कारण गिरावट आई है । और रहा सवाल चुंगी के प्राइमरी स्कूलों का तो इनको हालत तो पहले ही खराब थी व अव और खराब हो गई, हो जाये, सरकार को क्या मतलव । टी० वी० का दूसरा दुष्परिणाम यह है कि इसने जिस प्रकार के कार्यक्रम बनाये है और बना रहे हैं, वह कही से भी हमारी चेतना को नही झकझोरते, न ज्ञान मे इजाफा करते हैं, कीमती समय नष्ट करने के लिये जसे मध्यवर्गीय परिवारों पर यह थोप दिया गया 84 हो । इस प्रकार का पड्यत्र सरकार जान-बूझकर करती है और जनता चुपचाप मस्ती में अपनी समस्याओ को कुछ समय के लिये भूलकर इसके सामने बैठी रहती है । लेखक ऐसे कुचक्रो का भडाफोड करके सच्चे लोकतत्र की स्थापना के लिये रचना करता है। वह अपने उद्देश्यो को बेबार तरीके से बताता है । हिंदी जगत मे सातवे दशक से लोकतत्र के लिये लडाई ठोस और साफ हो गई है। नये लेखको ने छोटी-छोटी पत्रिकायें निकालकर अपने साहित्य को छापा और उसके साथ लोकतत्र की स्थापना के लिये अपनी छटपटाहट को व्यक्त करने में किसी प्रकार की कटौती नही की । लम्बी- लम्बी बहसो के माध्यम से यह स्पष्ट करने की सार्थक कोशिश की गई कि लेखक की आस्था इस लोकतत्र मे नही है, जिसमे गरीब और गरीब होता जा रहा है, पूंजीपतियो को गरीबो का गला काटने की खुली छूट दे दी गई है, प्रेस पर कब्जा कर जनता की आवाज को दबाया जा रहा है। धर्म क्षेत्रीयता, भापा आदि ओछी बातो को उछाला जा रहा है, राजनीति मे बेईमानी को प्रमुखता दी जा रही है, सार्वजनिक क्षेत्र से नैतिकता का सफाया किया जा रहा है, शिक्षा मे जान-बूझकर ऐसे तत्त्वो को लाया जा रहा है जिनका चरित्र और नीयत सदेहास्पद है, टी० बी०, फिल्म, रेडियो और समाचार पत्र-पत्रिकाओ के माध्यम से जनता को जड बनाने का षड्यय किया जा रहा है, लेखक ऐसी व्यवस्था का विरोध करता है, उसका उद्देश्य उसके भेदो को खोलकर जनता को चैतन्य करना है, ताकि जनता अपनी दयनीय हालत के कारणो को जान सके और उनके उन्मूलन के लिये लामबद हो सके । लेखक जिन हालातो मे रचनारत् हैं, उससे उनकी ईमानदारी के प्रति सदेह नहीं किया जा सकता। सच्चे अर्थो म लोकतत्र की स्थापना का उद्देश्य सफल हो, इसके लिये लेखक प्रतिबद्ध हैं। OD 1 रेणु-मैला प्राचल, 300 85 नारी शोषण और 'कब तक पुकारूँ' "मनुष्य के लिए सर्वोत्तम सत्ता मनुष्य स्वय है। अत. प्रत्येक रूप मे उन सम्पूर्ण परिस्थितियो का प्रत कर देना ही अभीष्ट होना चाहिये, जिसके द्वारा मनुष्य प्रताडित, शोपित, हेय एव अपमानित होता रहता है ।"1 ये सम्पूर्ण परिस्थितियां पहले की अपेक्षा आज अधिक स्पष्ट और मुखर हैं, जो सम्पूर्ण मानव-जाति को पशुतर बना रही हैं। इस खुली धूप मे भी स्वार्थो का चश्मा यदि अपने सामने खडे हिंसक पशु को नहीं देखने दे रहा है, तो यह दोप हमारा और हमारे चश्मे का ही है, जिसकी हानि भी हमे ही उठानी पडेगी, यह निश्चित है। आज समाज मे जो भीषण परिस्थितियाँ गहराती जा रही है, वे किसी से छिपी नही है । तमाम मानवीय सवेदनाओ की दुहाई के बावजूद मानवीयता का अस्तित्व खतरे मे पड रहा है। नारी शोपण के विरुद्ध शिक्षा के प्रसार एव सब प्रकार की जागरुकताप्रो के भापणो के बाद खुली आँखो से देखे तो शोषण और भी अमानवीय तथा क्रूर होता जा रहा है। पिछले दशक ने दहेज प्रथा के विरोध मे आवाज बुलद की थी लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात । दहेज की मांग उसके बाद और ज्यादा बढी है, उसके न मिलने पर अब ज्यादा हत्यायें हो रही हैं। रोज समाचार-पत्रो मे बहू को जलाकर मारने की खबरे आ रही है। और हो यह रहा है कि पहले इस प्रकार की खबरे जहाँ जन को चौकाती थी, अब वह भी बद हो गया है। मानो हम सब पत्थर हो गये हो । हिन्दी उपन्यास साहित्य के लिये यह चिंता नई नही है। पहले उपन्यास "परीक्षा गुरू" से ही यह विषय हिंदी के सवेदनशील कथाकारो के लिये चिंता का रहा है। यह बात दूसरी है कि पहले-पहल इसके 1. मैक्सिम गोर्की-त्रियेटिव लेबर एण्ड कल्चर, पृ 50 86 निराकरण की जगह करुण-भाव अधिक मिलता है। इसका कारण यह था कि उन्नीसवी शती के उत्तरार्द्ध तक इस प्रकार की परिस्थितियाँ थी कि वहां नारी-स्वतंत्रता और मुक्ति जैसी बात कल्पना थी। कल्पना भी कुछेक के लिये ही। यह सयोग ही था कि धार्मिक कट्टरता के विरोध में शुरू हुये आर्य समाज, ब्रह्म समाज, थियोसोफिकल सोसायटी एव प्रार्थना-समाज आदि समाज-सुधारक सगठनो ने नारी पर हो रहे अत्याचार का भी विरोध किया। जन-मानस में व्याप्त जड़ता को तोडना उनका पहला काम था और वे इसमे सफल भी हुये। सती प्रथा, बाल- विवाह, अनमेल विवाह, विधवा विवाह एवं अन्य विवाहोपरात उत्पन्न समस्याओं के निराकरण के लिये उन्होने अपने-अपने सगठनो का सहारा लिया। परिणामतः एक जनमत बनना प्रारंभ हुआ, लोगों की जड़ता टूटने लगी, जो असम्भद था, वह सभव दिखाई पड़ने लगा। भारतेंदु काल के लेखको ने जिस तरह की प्रादर्श-गृहस्थी की कल्पना की थी वह निश्चय ही अपने आप मे एक उपलब्धि थी, जिसमें स्त्री-पुरुप को समानता पर विशेष महत्व दिया गया था। ये लेखक एक साथ दो स्तरों पर लड़ रहे थे-एक ओर तो अपने सामाजिक सस्कारों से और दूसरी ओर अंग्रेजी सभ्यता से उत्पन्न खतरो से। इसीलिये इन्होने पतिव्रता स्त्री और एक पत्नी-व्रत पति की नवीन व्याख्या करके सामती-सस्कारों मे घुटती विवश नारी को बचा लिया। जिसकी स्थिति के सम्बन्ध मे डॉ० रागेय राघव ने अपने पहले उपन्यास "घरौंदे" में लिखा है--"सामती राज्य की स्त्री एक वेश्या है, घर की बेजान चीजों की स्वामिनी और जीवित मनुष्यों की दासी। आर्थिक परतंत्रता से उसे बाध दिया गया था। वह क्या जीवन है, जब अपने पर नही, दूसरो पर गर्व किया जाये।" सामती जुये से निकलकर भारतीय नारी जब घरों में आई, तब उसकी स्थिति पहले से बेहतर हुई। वह अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिये सजग हुई, लेकिन उसका आर्थिक आधार चूकि कमजोर था, इसलिये वह संघर्ष करने की स्थिति में नहीं आ पाई । जैसी परिस्थितियाँ मिली उन्ही मे उसे संतोष करना पड़ा । तभी तो "सेवा सदन" की सुमन 1. रागेय राघव-घरौंदे, पृ. 177 ।
वेश्या बनती है। घर से निकाले जाने पर उसका दूसरा कोई आधार नहीं था। आधारहीन सुमन के सामने घृणित जीवन अपनाने के अलावा और कोई विकल्प भी नही था । यद्यपि प्रेमचद उसे अत मे "सेवा सदन" भेज देते हैं, लेकिन यह कोई उपाय नही है, इससे नारी का व्यक्तित्व और भी घुटता है। असल मे, यह दुर्भाग्य ही है कि नारी-समस्या पर जिसने भी कलम उठाई, वह थोडा चलकर ही भावुकता से लबालव हो गया और करुणा बिखेरने लगा। नारी को उन्होने कभी भी हाड-मास की स्त्री के रूप में स्वीकार नही किया। या तो उसे पूजा की वस्तु समझा या भोग की। प्रेमचद जैसे चेतना सम्पन्न लेखक का भी यही हाल था। वे सामाजिक परिस्थितियो की विकरालता को देखकर धीरे-धीरे यथार्थवादी रूप अपनाते है, लेकिन स्त्रियो के सम्बन्ध मे उनका प्रार्य-समाजी मन पीछा नही छोडता। डॉ० इद्रनाथ मदान को लिखे पत्र मे वह कहते हैं- "मेरा नारी का आदर्श एक ही स्थान पर त्याग, सेवा और पवित्रता का केद्रित होना है।" प्रेमचद को यह नारी विषयक मान्यता नारी को आर्थिक आधार प्रदान कर उसे स्वावलम्बी बनाने वाली न होकर उसे सजी-सवरी देवी बनाने की है, जिसमे दुनिया के सारे गुण हो । वह पुरुप की सेवा करे, हर विपत्ति मे अपने आदर्श के तहत त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुये "कफन" की बुधिया की तरह मरे और पुरुष उसकी मृत्यु पर उत्पन्न करुणा को भुनाते घूमे तथा कफन के लिये मिले रुपयो से मांस खा, शराब पी बेहोश हो "ठगनी क्यो नेना झपकावे" गाये । नारी के लिये यह कौन-सी सेवा, त्याग और आदर्श की कल्पना है। . प्रेमचन्द के सामने ही प्रसाद जी जिस आदर्शवादी नारी की वकालत कर इतिहास के पृष्ठो की धूल झाड रहे थे, उसका उत्तर यशपाल की दिव्या है। जिस प्रतीत को वह स्वर्णिम और स्वर्गिक बता रहे थे, वहां दिव्या पा उपस्थित होती है और सरे आम पूछती है कि बतायो आपके 1. डॉ इन्द्रनाथ मदान-प्रेमचद एक विवेचन, पृ 157 88 उस स्वगिक संसार में है नारी को कोई सम्मान । कहाँ है उसकी स्वतत्रता । सिर्फ वेश्या बनने मे । - प्रेमचन्दोत्तर उपन्यास साहित्य मे नारी का स्वरूप कई प्रकार का है, एक तरफ जैनेन्द्र की काम कुठा से प्रस्त, इलाचन्द्र जोशी की मनोरुरण, अजय की छद्म सामाजिकता को प्रोढ डरी सहमी सम्बन्धी को उत्सुक नारी है, तो दूसरी तरफ यशपाल की शैल और सोमा हैं, जिनके लिये सेक्स क्राति हो गई है। एक सहज स्वाभाविक रूप में वह नहीं आती, जिसकी आवश्यकता उसे थी। प्रेमचन्द और उसकी परम्परा के अन्य उपन्यासकारो ने यौन- प्रवृतियो के ऊपर वैवाहिक-बधन की पवित्रता को प्रधानता दी थी। द्वितीय महायुद्ध के पूर्व पढ़ा लिखा मध्य-वर्गीय समाज विवाह सस्था मे विश्वास रखते हुये भी इसमे माता-पिता की इच्छा को विशेष महत्व प्रदान करने को तैयार नहीं था । पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव के कारण वह अपने प्रम की चरम् परिणति विवाह मे देखना चाहता था, लेकिन समाज की विषम सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां उसके इस आदर्शवाद के मार्ग में व्यवधान उपस्थित कर रही थी। परिणामत , आदर्शवाद एक दिखावा बनकर रह गया। नारी को जो स्थान मिलना चाहिये था, वह नही मिल पाया। यही कारण है कि "1950 ई० तक हिन्दी उपन्यास मे एक भी ऐसी नारी नहीं है, जो कुछ नवीन परम्पराओ का निर्माण करती दिखाई दे, जो हर आंधी तूफान मे दृढ होकर निरतर प्रगति पथ पर बढती रही हो। जो हर संघर्ष के बाद और भी अधिक सुदृढ़ होकर निकली हो । अपने आदर्श, विश्वास और प्रम के लिये मर जाना आसान है, पर उन्हे व्यवहार मे लाना कठिन है। 1 डॉ० रागेय राघव का उपन्यास "कब तक पुकारूं नारी शोषण को उसके भयावह रूप मे उभारता है। यह एक विडम्बना ही है कि मालोचक वर्ग इसे करनटो के जीवन पर आधारित आचलिक उपन्यास कहकर एक ओर ढकेल देते हैं, जबकि डॉ० रागेय राघव ने जिस ईमानदारी के साथ इस तथ्य को उभारा है कि नैतिकता विहीन समाज 1 डॉ. कु वर पाल सिंह-हिन्दी उपन्यास सामाजिर चेतना, 137 .... में भी नारी न स्वतंत्र है और न सुखो। उसका मनमाना शोषण होता है, उसके लिये प्रेम, त्याग, करुणा और विश्वास अंधे की प्रांखें हैं। वह जिस नरक में रहती है, उसमें गंदे कीड़ों की कुलबुलाहट ही उसकी साथी हैं। उसका पिता, मां, पति, भाई, बहन, बेटा-बेटी सब जैसे कीड़े हैं, जब तक उसमें मांस है सभी अपना पेट भरते हैं। उस पर न कोई रहम खाता है न वह ऐसा सोचती ही है। करनटों के जीवन की नारकीयता के सम्बन्ध में डॉ. रांगेय राघव लिखते हैं-"इनकी कोई नैतिकता नही होती। इनमें मर्द औरत को वेश्या बनाकर उसके द्वारा धन कमाते हैं। वहाँ कोई बुराई "सेक्स" के आधार पर नहीं मानी जाती।" रांगेय राघव ने प्यारी, कजरी, धूपो, बंगा की बहू और रामा की बहू, चदा एव सूसन के माध्यम से उस सम्पूर्ण समाज की काम-पिपासु बासुरी प्रवृत्ति का नगा चित्र प्रस्तुत किया है । अपने जीवन की घृणित स्थिति से ऊबकर सुखराम कहता है- "नही कजरी। गाँव की ओर देख । किसान होता है। गरीव है, भूखा है, पर उसे भी बोहरा उधार देता है, उसकी भी इज्जत है। हम सबसे गये बीते कुत्तों से भी बदतर हैं। हम नट क्यो हैं, कजरी । मानुस देह पाई है हमने तो फिर हम पर इतने जुलम क्यों होते हैं ।"2 गरीबी और जहालत में जी रहे करनटों का अपना कोई सम्मान नहीं होता। पैसे वाले उन्हे घृणित समझते हैं, समाज का कोढ मान गांव से निकाल देते हैं, लेकिन उनकी लड़कियो और औरतों का यौन शोपण खूब करते है । "नट की छोरो पर जवानी आती है और गंदे आदमी उसे बेइज्जत करते है, फिर भी वह रंडी की तरह जिये जाती है । जिये जाती है। मर क्यो नहीं जाती। हम सब मर क्यो नही जाते ।"3 यह वक्तव्य सुखराम का है। वह सुखराम जो ठाकुर परिवार का है, लेकिन जन्म हुआ नटों में। उसका जीवन एक द्वद्व है-सारी जिंदगी वह इसी द्वंद्व मे रहता है-ठाकुर बन नही पाता और नट बनने में उसका ठाकुरत्व प्राड़े पाता है। लेकिन प्यारी इस तरह की नहीं है। - 1. डॉ० रांगेय राघव-कब तक पुकारू, पृ. 5 2. डॉ. रागेय राघव-कब तक पुकारूं, 3. डॉ. रागेय राघव-कब तक पुकारूं,पृ. 345 188 90 - वह अधिक यथार्थवादी है। करनटों पर जब रुस्तमखाँ पुलिसवाला ज्यादा अत्याचार करता है, तब वह उसकी रखैल बन जाती है, ताकि नट सुखी रह सकें। और वहाँ से वह सूजाक जैसी भयकर बीमारी लेकर लौटती है, जिसमे उसका प्राणात हो जाता है। बड़े लोग धन और सत्ता के बल पर प्यारी जैसी जवान औरत का शोपरण तो करते ही है, साथ ही उन्हे सूजाक जैसी मरणातक बीमारी भी देते है। प्यारी अच्छी तरह जानती है कि जबतक वह जवान है, तभी तक रुस्तमखाँ उसे अपने यहाँ रखेगा। जान-बूझकर किया गया यह कार्य उसकी विवशता है, और रुस्तमखां जैसे भ्रष्ट लोग उनकी इन्ही विवशताओ का लाभ उठाते है। प्यारी सुखराम से कहती है-"मैं जानती हूँ यह जवानी सदा नहीं रहेगी। जब यह चली जायेगी, तो रुस्तमखां भी मुझे छोड देगा, दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देगा। तब मेरा एक तू ही तो है । और मेरा कौन है ।" इसी सदर्भ मे रागेय राघव उच्च-वर्ग के सवर्ण लोगो की औरतो के यौन सम्बन्धो को उभारकर यह बताते है कि निम्न- वर्ग के लोगो मे यौन-शोषण है और सवर्णो मे विलासिता है । एक वर्ग अपना पेट भरने के लिये सारे अत्याचार सहता है, लेकिन दूसरा वर्ग भरे पेट को पचाने के लिये रगरेलियां मनाता है। पहली बार जब प्यारी दरोगा के साथ सोई थी, तब उसकी माँ समझाते हुये कहती है-- "तू अभी नादान है, पागल । दुनिया है। इसमे सब ऐसी ही होती हैं । बड़े घरो की बहू देखकर तू महलो का सुपना न देख । रात तेरे बाप ने तेरी वजह से कमाई की है। बौहरे चदी के घर संघ मार दी। मालूम था, दरोगा कुछ नही करेगा। और वहाँ बौहरे तो उगाही मे आज गाँव गया था, बोहरी अपने सिकलीगर यार के साथ सो रही थी। सब ऐसी ही है।" 1 मायिक स्थितियां किस प्रकार विश्व को नचा रही हैं, यह इस उपन्यास का हरेक पात्र स्वीकार करता है। प्यारी की याद माने पर सुखराम कहता है-~"गगा का पानी, सूरज की धूप और औरत की कोई जात नहीं है। यह तीनो सबके लिये समान हैं। ठाकुर के लिये धरती 1. सौ. रांगेय राघववव तर पुरारू,. 53 2 डॉ. रोगेय रापव~यब तक पुकारू,146 91 और औरत एक-सी। जिसे पांव के नीचे दबा लिया सो अपनो, अपनी जात को।" ठाकुर का अर्थ यहां धन और सत्ता के बल पर अपना अधिकार बनाये रखने वाले व्यक्ति से है, चाहे वह किसी जाति का हो । और यदि पास में पैसा नहो, तो सब जाति और खानदान घरा रह जाता है, कोई नही पूछता । चदा इसका उदाहरण है। वह अंग्रेज मालिक की बेटो मिसो बाबा को सतान है लेकिन सुखराम के डेरे पर पली-बढी है, इसलिये उसको भी वही हालत है, जो नटों को अन्य लड़कियों को होतो है। वह बेहद सुदर है, लेकिन हुआ करे। पैसों के बिना सुदरता एक कलक है। ऐसा कलंक जिसका पश्चाताप भी संभव नहीं है । ठाकुर के बेटे नरेश से वह प्रेम करती है, नरेश भी उसे प्राण-पण से चाहता है । ठाकुर नहीं चाहता, न ठकुराइन । नरेश से विवाह न होते देख चदा पागल हो उठती है, वह जानती है कि उसके पास पैसा होता तो नरेश जैसे तीन सौ साठ उसके दादा की प्रार्थना करते। इसीलिये वह अधूरे किले के तहखाने में पहुंच पागलों की तरह सामने बैठे उल्लू से कहती है-"बोले ! मुझे बता। खजाना कहाँ है। जानता है मैं कौन हूँ। में ठकुरानी हूँ। नरेश मेरा है। वे मुझे उसके पास नहीं जाने देते। वे नही जानते कि मै मैम को बेटो हूँ । वे नही जानते कि मै ठकुरानी हूँ। मुझे मेरा धन लौटा दे । वह मेरा हो जायेगा, मेरा हो जायेगा।"2 चदा का यह कथन इस समाज में व्याप्त अमानवीयता को अनावृत्त करता है। वह अच्छी तरह जानती है कि ठाकुर उसका विवाह नरेश से इसलिये नहीं होने दे रहा क्योकि उस पर धन, जायदाद नही है । अपने स्वप्नो की दुनिया को साकार करने के लिये वह खजाने में बैठे उन्लू से धन मांगती है। धन की कमी ही अच्छे इसान को पशु से गिरा बना देती है। सुखराम कहता है-"ये दुनिया नरक है। हम गदे कीड़े हैं । तूने यह ससार ऐसा क्यो बनाया, जहाँ आदमी कटता है तो उसके लिये दर्द तक नहीं होता । यहाँ पाप इतना बढ़ गया है कि गरीब और कमीना आदमी कोढी बन-बन कर अपने पेट के लिये अपनी अच्छी देही को गदा बना लेता है। यहां एक-एक आदमी दबता है, पर हम तो कमीन हैं । 1. डॉ० रागेय राघव-कब तक पुकारू, 116 2. डॉ० रागेय राघव-कब तक पुकारू, पृ. 572 92 वे बड़े लोग क्यो करते हैं ऐसा। क्या वे अपने धन और हुकूमत के लिये आदमी पर अत्याचार करने से नहीं कांपते।"१ इन विषम परिस्थितियों के सामने सुखराम स्वय को असमर्थ पाता है, इसीलिये चदा का गला घोटकर हत्या कर देता है। रागेय राघव आजादी के दस वर्ष वाद गुलाबी राजा के पंचशील राज्य मे भी चंदा जैसी लडकी का कोई भविष्य न देख उसे मार देते है यह लेखक की कमजोरी नहीं, बल्कि समाजगत परिस्थितियों का दोष है, जिसमे हर स्वाभिमानी व्यक्ति अकेला और असमर्थ है। प्यारी, कजरी, धूपो और चदा की मृत्यु कारुणिक है, जिन परिस्थितियों में वे मरती है, वे सब हमारे विकासशील और इक्कीसवी सदी की ओर जाने वाले समाज के लिये प्रश्न छोड़ती हैं कि कब-तक प्यारी जैसी सुदर स्त्री रुस्तमखाँ जैसे सिपाहियो की रखैल बनकर सूजाक जैसी बीमारी से मरती रहेगी, कजरी कब-तक सूसन को बलात्कारी से बचाने के लिये अपनी जान देती रहेगी, धूपो बलात्कार का कलंक न झेल पाने के कारण कब-तक सिर फोड़कर मरती रहेगी और चदा कब-तक इस प्रकार भटकती रहेगी, कब उन्हे अपने स्वप्नो को साकार करने का अवसर मिलेगा। रागेय राघव के ये प्रश्न आज भी उतने ही जटिल हैं, जितने 1958 मे थे। आर्थिक असमानता की बढती खाई इन प्रश्नो और समस्याग्रो को और भो गभीर बना रही है। नारी शोषण को आर्थिक परिप्रेक्ष्य मे रखकर रांगेय राघव इस तथाकथित विकासशील समाज की असलियत खोलते हैं, जहा गरीवी मे जी रही नारी का अर्थ कजरी, प्यारी, रामा की बहू और चदा के अलावा कुछ भी नहीं है। अन्याय और अत्याचार के प्रातक मे जीवन को नरक बना रही यह समाज व्यवस्था कैसे और कब बदलेगी। "कब तक पुकार" तलवार की तरह प्रश्नो की बौछार करता है । नारी को जब तक आर्थिक स्वतत्रता नहीं मिलेगी तब तक वह इसी प्रकार नरक के कीड़े-सी मरती रहेगी। नारी शोषण की भयावह तस्वीर प्रस्तुत कर रागेय राघव ने सभ्य समाज को उसी का चेहरा दिखाया है, जिसे वह छिपाता रहता है। DO 1. डॉ० रागेय राघव-कब तक पुकारूं, पृ. 345 रेणु की कहानियों में अभिव्यक्त जाति-प्रथा लेखन अपने युग की निरंतर परिवर्तित घटनाग्रो और उनके मूल मे कार्यरत व्यापारो का कलात्मक लेखा-जोखा है । कला एक अध्यवसाय है। जीवन की सातत्य-प्रक्रिया मे गहराई से उतरता लेखक मानवीय संवेदनाओं की खोज करता है। उसका उद्देश्य मात्र खोज करना ही नही, बल्कि उनकी स्थापना करना भी है। वह जिन मानव-मूल्यों की स्थापना करना चाहता है अथवा करता है वे सम्पूर्ण मानवता के लिये मंगलकारी होते हैं। इस बीच लेखक जिन अंतर्द्वन्द्रों में जीता है अथवा उन्हे भोगता है, उसकी अभिव्यक्ति करने की उत्कट इच्छा उसके मनोमस्तिष्क को बेचैन किये रहती है । वह यह भी चाहता है कि अच्छे जीवन की परिणति के लिये अपने अनुभवों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सके। और इस पहुचाने के लिये जो कलात्मक अभिव्यक्ति होती है, वह साहित्य है। लेखक के पास जितने गहरे अनुभव होगे, वह उतना ही सफल लेखक होगा। अनुभव जीवन की गहरी सम्पृक्ति से आते है । प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध और रेणु की जीवंतता और सहज-प्रासगिकता के मूल मे उनकी गहरी जीवन-सम्पृक्ति ही है। रेणु के "मैला आँचल" और "परती : परिकथा" विशाल और विस्तृत यथार्थ-दृष्टि के कारण ही महान् बन पड़े हैं। रेणु में जीवन के प्रति एक उद्दाम ललक थी । जीवन की छोटी से छोटी घटना भी उन्हे गहरे जाकर छूती थी, इसीलिये उनकी सवेदनाओं का आधार निरंतर फैलता और गहराता गया। रेणु की समाजोन्मुखी विचारधारा उन्हें जीवन-जगत से अलग नहीं हटने देती। यही कारण है कि उनके साहित्य और व्यक्तिगत जीवन में कही कोई अन्तर नही था। दोनों ही क्षेत्रों मे वे जुझारु बने रहे। 94 उपन्यासो के अतिरिक्त उनकी कहानियो मे जाति-प्रथा, धर्मान्धता, राजनीतिक-भ्रष्टाचार, शोपण और कुप्रथानो पर तीखे व्यग हुये हैं । समाजवादी विचारधारा को परिणति होती है, वह भी रेणु मे है और यही उनकी सीमा भी है। समाज में व्याप्त विभिन्न अन्तविरोधो और उनकी सूक्ष्मता के साथ पकड एव चित्रण के साथ-साथ अति-भावुकता रेणु को कही कमजोर बनाती है और कही और भी तीखा। राजेन्द्र यादव ने उनकी कहानियो के सदर्भ मे लिखा है-"अपनी कहानियो की योजना मे उसने वगला की सरलता और हिंदी के यथार्थ बोध का सुन्दरतम मिश्रण किया है. कभी लगता है रेणु मूलत. करुणा के कथाकार हैं और कभी लगता है वह कठोर वास्तविकता का निष्करुण, तटस्थ चितेरा है। बहरहाल यह सच है कि अन्य ग्रामीण अचल पर लिखने वालो की तरह न तो इसका यथार्थ जीवन-शून्य स्मृतियो का लेखा है और न शैली का दमनीय उलझाव अचल की हर सिकुडन और जटिलता को उसने बडी सुलझी निगाहो और महीन कलम से भाका है. .. लोक-गीत की मधुर कथात्मकता उसकी हर रेखा से बोलती है । नही, बोलती नही, पाठक उसे हमेशा अपने मन मे कही महसूस करता है। रेणु का पाठक कहानी पढता नहीं, देखता है एक-एक ध्वनि, एक-एक गध, एक-एक रग को महसूस करता हुआ उसे जीता है, उसके अर्थों को जानकर चकित होता है, जिंदगी मे जिन्हे बुरे लोग समझा था, सब उसकी कथा प्रक्रिया में गुजरकर हल्के व्यग्य के बावजूद "अच्छे आदमी" बन जाते हैं। उसके पुरुप और नारी दोनो "पुरुष नहीं हैं, मूलत अपने सारे यथार्थ के बावजूद उसका "सौफिस्टिकेशन" बताता है कि वह कोमलता का कथाकार है ।" रेणु की कहानियो के तीन सग्रह है-"ठुमरी” (1959), "प्रादिम राति की महक" (1967) और "अगिनखोर" (1971)-इन तीनो सग्रहो के पढने के बाद यदि एकाएक यह प्रश्न पूछा जाये कि मूलत. रेणु उपन्यासकार थे अथवा कहानीकार? इस प्रश्न की महत्ता और प्रासगिकता महज इसीलिये नही है कि उन्हे सर्वप्रथम प्रसिद्धि "मैला आचल" से मिली, बल्कि इसलिये भी कि कुछ कहानियो के अतिरिक्त वे अच्छी राजेन्द्र यादव -रेणु की श्रेष्ठ कहानिया, प 6-7 95 कहानिया न दे सके। इसका कारण तो यह है कि वे उपन्यासो मे जिस प्रकार से सूत्रो को फैलाते हैं और कथा का विकास करते है, कहानी मे ऐसा स्वच्छद रूप से करने का अवकाश नहीं होता । अत रेणु कुछ वधा- बधा-सा अनुभव करते हैं। इसका प्रमाण यह भी है कि उनकी लम्बी कहानिया अधिक सशक्त बन पड़ी है। लम्बी कहानियो मे वे उपन्यास विधा की रचना-प्रक्रिया का ही आश्रय लेते है। छोटी कहानियो मे वे निश्चय ही उखडे से रहते है और सब कुछ को थोडे मे ही समाप्त करने की मन स्थिति मे वे गहराई से किनारा कर उथले मे ही रह जाते है । रेणु की यह कमजोरी है। इस कमजोरी से कम से कम एक तो अर्थ निकलता ही है कि उन्होने "नयी कहानी" आदोलन के मध्य चलते एक मूड विशेष, क्षणवाद, अस्तित्ववाद और नकारवाद जैसे यूरोप से आयातित नारो को नकारकर शुद्ध भारतीय जीवन जगत की कहानिया दी और यही उनकी यह कमजोरी बहुत बड़ी सफलता बन जाती है । प्रस्तुत आलेख मे रेणु की कहानियो का विश्लेषण जाति-व्यवस्था जैसी मुख्य समस्या को लेकर किया जा रहा है। भारत मे जाति-व्यवस्था निरतर गहराती जा रही है और गहराई के साथ अपनी विषमय जडे भी फैला रही है। ज्यो-ज्यो इसके उन्मूलन की बात कही जा रही है, त्यो- त्यो यह और भी प्रभावकारी ढग से अपना शिकंजा कसती जा रही है। आज जाति इतनी प्रभावशाली बन गई है कि इसके उन्मूलन की बात भी अब कल्पित लगने लगी है। नीचे से लेकर ऊपर तक इसका प्रभाव है। भारतीय राजनीति तो कम से कम जाति के बिना कुछ है ही नहीं। आज योग्यता, प्रतिष्ठा और वैभव की प्रदाता जाति ही है। रेणु इस पतनकारी स्थिति को लेकर अत्यधिक चिंतित थे-पहले से लेकर अन्त तक । उनके प्रथम उपन्यास "मैला आचल" का परम गाधीवादी बलदेव इस सत्य को स्वीकार कर अन्त मे कहता है-"वह पुरनिया जायेगा, वही से चन्दन पट्टी चला जायेगा। वह अब अपने गाव मे रहेगा, अपने समाज मे, अपनी जाति मे रहेगा। जाति बडी चीज है। जाति की बात ऐसी है कि सभी बडे-बडे लीडर अपनी-अपनी जाति की पार्टी मे है ।" बावनदास और भी स्पष्ट करते हुये कहता है-"नही बालदेव, छोटन वाबू, जैसे छोटे लोगो की वात जाने दो। यह बेमारी ऊपर से पाई है। 1 रेणु-मैला पाचल, पृ 324 96 .अगले चुनाव यह पटनियां रोग है !...अब तो और धूमधाम से फैलेगा ....... भूमिहर, रजपूत, कैथ, जादव, हरजन सब लड़ रहे है ।...... में तिगुना मेले चुने जायेंगे। किसका आदमी ज्यादा चुना जाये, इसी की लड़ाई है । यदि रजपूत पार्टी के लोग ज्यादा आये तो सबसे बड़ा मंत्री भी राजपूत होगा।"। रेणु ने यह 1954 मे लिखा था और 1978 में चौधरी चरणसिंह इस बात की पुष्टि करते हुये लालकृष्ण अडवाणी से कहते हैं--"पाप सिंघ के है, इसलिये यहा के क्षेत्रों में प्रचलित जाति भावनाओं को नहीं समझ सकते । चरणसिंह को सरकार से निकाला जा सकता है, वाजपेयी को नहीं, क्योंकि वह ब्राह्मण है और मै जाट हूं।" चौधरी चरणसिंह का विरोध बड़ी और छोटी जातियों से था, इसलिये उन्होने बीच की जातियों को जनता सरकार में अत्यधिक महत्व दिया । प्रांतीय सरकारे बनते समय उन्होने इसी तथ्य पर विशेष बल दिया-- जिनमें श्री रामनरेश यादव, उ. प्र., देवीलाल, हरियाणा, नीलमणि राउतराय, उड़ीसा, और कर्पूरी ठाकुर, बिहार, प्रमुख है। चौधरीजी के भक्त श्री राजनारायण जनता पार्टी के अस्तित्व में आते ही चिल्लाते फिर रहे थे-"ब्राह्मण फिर से सत्तारूढ होने की योजना बना रहे है।" इस प्रकार, राजनीति एवं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ऊपर से नीचे तक जिस तरह जातिवाद ने अपनी जड़ें गहराई और फैलायी, उन पर रेणु ने अपनी कहानियों मे भी जमकर व्यग्य किये है । "रसप्रिया' कहानी मूलत: जातिवाद की संकीर्णता और कुरूपता को लेकर गहरे उतरती है। यह कहानी ऊपर से प्रेम-कथा जैसी लगती है, किन्तु मूल मे जातिवाद की परिणत अवस्था को उजागर करती है । उसका प्रमुख पात्र "मिरदगिया' बहरदार जाति का है, जो निम्न कोटि मे आती है और वह प्रेम करता है ब्राह्मण जोधन गुरु की लड़की रम- पतिया से । प्रेम करते समय मिरदगिया ने अपनी जाति छिपा ली थी, कारण कि वह अच्छी तरह जानता था कि जाति बताकर रमपतिया उससे प्रेम नहीं कर सकती। यह हिन्दुस्तान ही है, जहां पर प्रेम भी 1. रेणु-मैला माचल, पृ. 310 2. लालकृष्ण माडवानी-विश्वासघात, पृ. 28 3. लालकृष्ण माडवानी-विश्वासपात, प. 115 97 जाति को सकोर्ण गंदी गलियों में विचरण करता है। प्रेम जैसे पवित्र और भावात्मक सम्बन्ध के बीच में जाति कहां, लेकिन यहां तो है ही। यहा वह सब होता है जो कहीं नही होता और उसी का शिकार होता है मिरदगिया। आठ वरस दीक्षा लेने के बाद जोधन गुरु भी रमपतिया के विवाह की बात उससे करते है। जाति इसमें आड़े आतो है "आठ वरस तक तालीम पाने के बाद गुरुजो ने स्वजात पंचकोड़ी से रमपतिया के चुनौमा की बात चलाई तो मिरदगिया सभी ताल मात्रा भूल गया। जोधन गुरुजी से उसने अपनी "जात छिपा रखी थी।" मिरदगिया सच कहे तो जीवित न बचे और छिपाये रहे तो कब तक । अन्त में कोई समाधान न देख रात में वह भाग छूटता है। यह स्थिति निश्चित ही बुरो है। ग्रामीण जीवन में व्याप्त जाति व्यवस्था की दूसरी परत को उघाड़ते हुये रेणु "रसप्रिया" में ही बताते है कि छोटी जाति का वृद्ध भी गांव मे सम्माननीय नही होता। वह बडी जाति के लड़कों से बेटा नही कह सकता। एक बार भूल से मिरदंगिया ने ब्राह्मण के बेटे को बेटा कह दिया, फिर क्या था आकाश पाताल एक । “परमानपुर मे उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को प्यार से बेटा कह दिया था। सारे गांव के लडकों ने उसे घेर-कर मारपीट की तैयारी की थी-बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा। मारो साले बुड्ढे को घेरकर । ......मृदग फोड़ दो। मिरदगिया ने हसकर कहा था-अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार । अब से आप लोगो को बाप ही कहूगा ।"2 पूंजीवाद के उदय के साथ समस्त मानवीय और भावात्मक सम्बन्धों का मानो पतन ही हो गया। एक साथ मानव सम्बन्धों के मध्य में शोषण और स्वार्थ की नागफनी पैदा हो गई । व्यक्तिवाद की स्थापना हुई । यह कोई असामान्य और नयी अर्थात् सर्वथा नयो स्थिति नही थी, बल्कि सामाजिक परिवर्तन को अनिवार्य स्थिति थी। क्योकि, पूंजीपति वर्ग ने जहा पर भी उसका पलड़ा भारी हुआ, वहां सभी सामंती, पितृसत्ता- 1. रेणु-~-ठुमरी, पृ.9-10 2. रेणु-ठुमरी, पृ.१ 98 त्मक और काव्यात्मक सम्बन्धो को खत्म कर दिया। उसने मनुष्य को अपने स्वाभाविक बडो के साथ वाध रखने वाले नाना प्रकार के सामती सम्बन्धो को निर्ममता से तोड डाला, और नग्न-स्वार्थ के, नकद पैसे, कोही के हृदय शून्य व्यवहार के सिवा मनुष्यो के बीच और कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नही रहने दिया।..... जिन पेशो के सम्बन्ध मे अब तक लोगो के मन मे पादर और श्रद्धा की भावना थी, उन सवका प्रभामडल पूंजीपति वर्ग ने छीन लिया। डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि, और वैज्ञानिक सभी को उसने अपना उजरती मजदूर बना लिया है । इस ऐतिहासिक तथ्य की अोर रेणु ने भी भरपूर ध्यान खीचा है। धन के अभाव में मजदूर बने कलाकार को जातिवाद ने और चूसा है। वैसे कहा तो यह जाता है कि गरीव की कोई जाति नही होती और जिसकी कोई जाति नही होती उसका समाज मे कोई अस्तित्व नहीं होता, चाहे वह कलाकार ही क्यो न हो। “ठेस" कहानी का सिरचन भी एक ऐसा ही पात्र है, जो गरीव है। गरीबी के कारण उसकी कला तो विक ही चुकी है साथ ही छोटी जाति का होने के कारण उसकी हालत टहलुपा जैसी हो जाती है। इस अपमान को वह सारी जिंदगी झेलता है। सिरचन जैसे न जाने कितने कलाकार हैं जो अपनी छोटी जाति की विभीपिका को झेल रहे हैं-समस्त अमानवीयतामो के साथ। ग्रामीण जीवन में व्याप्त जातिवाद-ईर्ष्या "पचलाईट" कहानी में मुखर हुई है । सारा गाव जातियो मे वटा हुआ है और हर जाति के टोले मे एक पचलाइट भी है । पचलाइट सम्मान और प्रतिष्ठा की सूचक है। इस बार महतो टोले के लोग भी पचलाइट लाते है । ब्राह्मणो को यह बहुत बुरा लगता है। महतो टोले मे पचलाइट पाने का अर्थ ब्राह्मणो से बरावरी होगा, इसलिये वे इसे स्वीकार नही कर सकते। यह छोटी-सी घटना जातिगत ईर्ष्या और भेद-भाव को स्पष्ट करती है। रेणु बहुत ही सहजता के साथ इन समस्त अन्तविरोधो को अभिव्यक्त करते है। पच- लाइट लाते समय गाव के बाहर ही फुटगी झा मिल जाते है। उनकी जलन की परिणति यह कहकर होती है-"कितने मे लालटेन खरीद हुआ महतो ।"2 रेणु और भी स्पष्ट करते हुये कहते है-"बावन टोली कार्ल माक्स-फ्रेडरिक ए गेल्स-कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र, प 38-39 2 रेणु-ठुमरी, 183 1 99 के लोग ऐसे ही ताब करते हैं। अपने घर की ढिवरी को भी विजली- बत्ती कहेगे और दूसरों के पंचलेट को लालटेन।"1 यहां यह दृष्टव्य है कि गांव मे ईर्ष्या का भाव इतना प्रखर है कि एक व्यक्ति का अपमान पूरी जाति का अपमान बन जाता है। हर आदमी पहले जाति विशेष का सदस्य है, आदमी बाद में । ऐसी संकीर्णता में सारा गांव बंधा है । महतो टोले मे आये पंचलाइट के न जलने पर भी सारा गांव खुश होता है । यद्यपि इससे दूसरी जाति वालों को किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल रहा फिर भी जब दूसरे का काम बिगड़ रहा है तब हंसने से भी क्यों वंचित रहें। इसीलिये महतो टोली का पंचलाइट जलते न देख दूसरे टोलों में खुशी की लहर छा गई—"राजपूत टोली के लोग हंसते-हसते पागल हो रहे है। कहते है, कान पकड़कर पंचलेट के सामने पांच बार उठो-बैठो। तुरन्त जलने लगेगा ।........रुदल शाह बनिया भारी बतंगड़ आदमी है । कह रहा है पंचलेट का पम्पू जरा होशियारी से देना।" सम्पूर्ण गांव मे जिस प्रकार जातिवाद फैला है, और जन-जीवन को दूपित कर रहा है, रेणु इस ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित करते हैं । रेणु 1959 के बाद अपने निष्कर्षों में इतने तीखे नहीं रहे, जितने पहले । इसका एक कारण यह भी था कि बाद में उनका मोह भंग हो गया और उन्हे लगने लगा कि अब समाज में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की कामना करना बेईमानी है। और यदि कुछ संभव भी है तो वह बुलट के माध्यम से । यह उनकी भावुकता और अतिरिक्त-संवेदना की परिणति है। इसका प्रभाव 1959 के बाद कहानी-उपन्यासो में स्पष्ट है । “मैला आंचल", "परती : परिकथा" और "ठुमरी" जैसी सशक्त रचना वे अन्तिम दिनों तक फिर नही दे पाये। "आदिम रात्रि की महक"--1967 और "अगिनखोर"1971 में उनकी पच्चीस कहानियां हैं, लेकिन चार-पांच कहानियों को छोड़कर वे कहने में कुछ असमर्थ हो रहे हैं। जलवा", "प्रादिम रात्रि की महक","पुरानो कहानी : नया पाठ" और "अगिनखोर" कहानियों मे अवश्य ही उनके निज के अनुभव अभिव्यक्ति पा सके हैं, लेकिन अन्य कहानियों में उनको असफलता स्पष्ट है। जीवन के जिस मूल . । 1. रेणु-ठुमरी, पृ. 83-84 2. रेणु-हमरी, पृ. 87 100 उत्स पर रेणु की पकड थी, वह उनके हाथ से निकल गया और वे धीरे- धोरे अराजक होते गये। यह बड़ी विचित्र स्थिति है कि प्रेमचद जैसा लेसक "सेवा सदन" से लेकर "गोदान" तक की यात्रा करता है और रेणु "मैला प्राचल" से लेकर "पटू बाबू रोड" तक की। प्रेमचद जिस प्रकार निरतर प्रसर होते गये रेणु उसी प्रकार उथले और निस्तेज । यह अन्तर जीवन दृष्टि का अन्तर है। एक सही दृष्टि और विचारधारा के अभाव में लेखक किस प्रकार अपनी रचना की हत्या करता है, रेणु से यही समझा और सीखा जा सकता है। 101 मासंवाद और साहित्य "हमे चाहिये कि जो सुदर है, उसे सुरक्षित रखे । भावी विकास के लिये प्रारम्भ बिंदु बनाने से हम वास्तविक सौंदर्य का तिरस्कार क्या इसलिये कर दे कि वह पुराना है। नवीन को ऐसा मानकर जिसके प्रादेशो का पालन करना ही है, हम क्यो चले। सिर्फ इसलिये कि यह नवीन है, यह सरासर बेवकूफी है ।" लेनिन के ये विचार नये-पुराने के ग्राह्य- अग्राह्य के द्वद्व को समाप्त कर देते है। आज कम से कम हिन्दी मे विश्वविद्यालीय प्राध्यापको की जो बाढ आई है, उसने बगैर अध्ययन- मनन के जिस प्रकार नारे उछाले है, उससे आलोचना का वातावरण गदला हुआ है, गभीरता कम हुई है, चिन्तन की परम्परा का ह्रास हुआ है। निश्चय ही यह स्थिति घातक है। यह भारतीय बूर्वा राजनीति की कुटिल चालो का फल है, जिसका सबसे बुरा परिणाम यह निकला कि अपनी छपासी भूख के कारण इन लोगो ने बहुत कुछ लिखा लेकिन जो लिखा वह इतना गड़बड था कि उससे जो भ्रम फैले, उससे साहित्य का हित होने की अपेक्षा अहित ही हुआ। सैद्धातिक आलोचना मे हम अभी तक साधारणीकरण, अलकार एव छद आदि की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाये हैं, परिणामत. वर्तमान जीवन से निकले सघर्षरत्, साहित्य और उनके दिशागामी पात्रो की ईमानदारी को जाचने के लिये हमारे पास कोई कसौटी नही है । यह एक विडम्बना ही है कि हमारे पालोचक भारतीय थानेदार बन बैठे हैं । अपने कर्तव्यो की पालना की ओर उनका ध्यान ही नही जाता है । जबकि मालोचक के लिये यह आवश्यक है कि वह लेखक से अधिक गभीर और . बलारा जेटकिन-लेनिन के सस्मरण, पृ. 12 102 सूक्ष्म दृष्टि वाला हो, जीवन संघर्षों के प्रति उसका स्वस्थ सोच हो और ईमानदारी के साथ उनमे बगैर किसी समझौते के भाग लेता हो। आलोचक जब तक दूर की वस्तु बना बैठा रहेगा तब तक साहित्य भी उसके लिये दूर की कोडी ही रहेगा। इसलिये वह निरतर दमन और उत्पीडन के विरुद्ध लिखे जा रहे धारदार साहित्य को पहचाने और अन्य लोगो से उसका परिचय कराये। इधर पिछले कुछ वर्षों से 'मार्क्सवादी सौदर्यशास्त्र" को लेकर जनवादी पत्रिकामो में लगातार बहस होती रही है । मजे हुये आलोचको से लेकर नौसिखिया पालोचको तक ने लेख लिखे हैं, लेकिन यह विडम्बना ही है कि इस सबके बावजूद भूल विषय और भी अस्पष्ट होता गया । लम्बे-लम्बे लेखो ने सौंदर्यशास्त्र सम्बन्धी जो भ्रम के किले थे--उन्हे और भी मजबूत किया। लगातार चलती बहसो ने सामान्य पाठको के सामने इस तरह का पक्ष प्रस्तुत किया कि "मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र" जोवन की जटिलतामो से नहीं, बल्कि साहित्यिक गभीर बहसो के माध्यम से ही स्पष्ट हो सकता है। माक्र्सवाद-जीवन सघर्षों और उनमे अतनिहित कुटिलतानो को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि देता है, जो अध्ययन के साथ-साथ जीवन अनुभवो से परिपक्व होती जाती है। ठीक उसी तरह "मार्क्सवादी-सौदर्यशास्त्र" है जो निरतर अध्ययन-मनन और जीवनानुभवों से दृढ होता जाता है। इसके लिये हमारे पास जितनी ऐतिहासिक दृष्टि साफ होगी उतना ही हम वर्तमान और भविष्य के प्रति 'निष्कर्पो मे सफल होगे। निश्चय ही यह एक लम्बी प्रक्रिया है। माक्सवाद सौदर्यशास्त्र को आदर्शवादी परिभाषा को अमान्य ठहराता है । आदर्शवादी दृष्टिकोण के अतर्गत सौदर्य पूर्णरूप से एक ऐसी विषयीगत वस्तु समझी जाती है जिसकी जड़ें वास्तविकता के सामान्य विषयगत गुणो मे नही है। माक्र्सवाद मानता है कि प्रकृति और उसके अन्य उपकरण अपने आप मे न सुदर हो सकते है और न असुदर । सौंदर्य की भावना तो मनुष्य में ऐतिहासिक परिस्थितियो के फलस्वरूप पैदा होती है। विपयोगत आदर्शवाद के विपरीत माक्र्सवादी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्राकृतिक सौदर्य भावना शुद्ध रूप से चेतना की विषयीगत अवस्था ही नहीं बल्कि प्रकृति, वस्तुओ और मनुष्य के 103 सामाजिक जीवन में प्राप्त निश्चित विषयगत गुणो के कारण होती है। एक समस्या यह भी है कि हम विप्य-वस्तु और उसके स्प को विभिन्न दृष्टिकोणो से अलग-अलग रूप में देखने-परखने के आदी हैं। मार्क्सवाद का इस सम्बन्ध मे दृष्टिकोण यह है कि स्प विधान का अध्ययन करके वस्तु से निकटता स्थापित की जाये । जव वस्तु से हमारा नकट्य होगा तो उसके रूप को परस आसानी से की जा सकती है । सत्ता, पूंजीपतियो और विदेशी शोपणकारी प्रवृत्तियो के दम-सम पर चलने वाले लेखक-पालोचको ने इस विषय को ज्यादा उलझा दिया है । उनकी दृष्टि मे साहित्य का काम ऐसे सौदर्य सम्बन्धी प्रतिमानो की स्थापना करना है जिनसे हमारी मध्यवर्गीय वासनायें सतुष्ट हो सकें । आदि- काल से लेकर अब तक चली आ रही यह दृष्टि केवल नख-शिख वर्णन, विरह वर्णन मे ऊहापोह और मानसिक व्यभिचार देने के अलावा कुछ नही दे सकी । जब इस प्रतिगामी धारणा पर प्रहार किया गया तो सोये जागते सभी सापनाथ एकदम फुकार उठे और उन्होने भारतीय संस्कृति एवं परम्परा की रक्षा के लिये अमूर्त कला का नारा दिया। ये ऐसे लोग थे, जिन्हे जीवन से कुछ लेना-देना नहीं था। जनता की भावनाओ, उनके संघर्षों और निरतर चलती लडाई से उनका कोई वास्ता नहीं था। उनके लिये साहित्य जन-जीवन का सघर्प नही, मन के किसी कोने मे छिपी निजी प्राह का स्वर था। भला ऐसा साहित्यकार क्यो वस्तु- वादी आलोचना की वकालत करेगा। इसलिये उन्होने मार्क्सवादी साहित्य को राजनीतिक करार दिया और जनता की कृतियो को देखने- परखने के लिये राजनीतिक मूल्य से उसके सौदर्य मूल्य की तुलना की। कला के सौदर्य मूल्य को उसके रूप से जोड़ दिया। यह गैर-मार्क्सवादी दृष्टिकोण है । इस प्रकार की स्थिति साहित्य के लिये घातक है, साहित्यकार के लिये सौदर्य एव रूप की स्थितियो को समझना जरूरी है वरना वह वस्तु से निरपेक्ष सौदर्य के चक्कर में पड़कर रूपवाद का शिकार हो जायेगा जो उसके विकास के लिये घातक होगा। । 1. सोवियत एन्साइक्लोपीडिया ऑफ एस्थेटिक्स, मास्को, 1948, 112 104 १ रचना मे यथार्थ किस प्रकार व्यक्त होकर रचना को वडा और पाठक को सचेत करता है, इसकी परख होनी चाहिये । द्वितीय विश्वयुद्ध के दरम्यान लिखे गये साहित्य को यथार्थवादी कहे अथवा स्वातत्र्योत्तर साहित्य मे "नयी कहानी" और "नयी कविता" के नाम पर स्वानुभूति के साहित्य को। पहले मैं जहाँ विचार को अधिकता है, वही दूसरे में अतिशय भावुकता की। "भोगे हुये यथार्थ" के नाम पर जिस तरह अपनी सस्कारगत कुठानो को इन लेखको ने कलात्मक-ढग से प्रस्तुत किया है, क्या उसे हम यथार्थवादी साहित्य कह सकते है ? उन लोगो की मान्यता है कि लेखक जिस तरह चीजो को अनुभूत करता है, वह उसी रूप मे उसे रचनावद्ध कर दे, यही यथार्थ है। फिर तो गुलशन नदा, रजीत एव अन्य ऐसे ही घटिया उपन्यासकार एव "सत्यकथा", "मनोहर कहानियाँ", "गर्म कहानियाँ" आदि के लेखक सबसे बड़े कहानीकार कहलायेंगे। फिर अतर कहाँ है वह सूत्र कहाँ है, जिसकी पकड के अभाव मे अच्छे से अच्छा लेखक कवाडिया बन जाता है। "यथार्थवाद के मूल मे विवेक और तर्क होता है। जिस वस्तु की स्थूल सत्ता का प्रमाण हमारे पास नही, वह यथार्थ की श्रेणी मे नही आती। जासूसी, तिलिस्मी और अध्यात्मिक रचनाये यथार्थ की श्रेणी मे नही पाती। यथार्थवाद का प्रयोग आदर्शवाद और रोमाटिसिज्म के विरोध में किया जाता है ।... यथार्थ की प्रमुख विशेषता है, जहाँ लेखक बिना किसी भय अथवा पक्षपात के ईमानदारी के साथ जो कुछ भी अपने आस-पास देखता और अनुभव करता है उसका चित्रण करे। जिंदगी इतनी हसीन नहीं है, जितनी आदर्शवादी मानते है और उतनी भयानक और विकृत भी नहीं जितनी व्यक्तिवादी प्रस्तुत करते है। सामाजिक यथार्थ इन दोनो के बीच की सतुलित कडी है। यथार्थवाद वह साहित्यिक सयोग है जो चुनाव तथा रचना के माध्यम से अपने वास्तविक विचारो को समुन्नत रूप मे पाठको के सामने उपस्थित करता है।"१ यथार्थ लेखक को तर्कसगत और वैज्ञानिक दृष्टि का परिणाम है। यदि ऐसा नहीं है तो कितना भी जीवन अनुभव हो, उसकी परिणति अतर्मन की कुठानो की अभिव्यक्ति मे ही होगी। चेतनाहीन लेखक चाहे जिंदगी मे नित्यप्रति कितना ही सघर्ष क्यो न कर रहा हो, वह यथार्थ रचना नहीं दे सकता, उसकी रचना टूटन-घुटन और व्यक्तिगत त्रास से लबालब होगी ही। । 1. एव कास्ट---लिटरेचर एण्ड रियलिटी, 4 62 105 - साहित्य और राजनीति के सम्बन्धों को सामंती पूंजीवादी मानसिकता के लोगों ने जिस प्रकार उलझा दिया है और अपनी रंगीन पत्रिकाओं एवं मठों से जो घोषणायें को हैं, उसके अनुसार साहित्यकार एक अलोकिक प्रभा-मंडित व्यक्तित्व होता है। सामान्य जनता और उसके दुखद जीवन से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। साहित्यकार जो वर्णन करता है, वह इस युग का नही वरन् भविष्य का होता है । वह पुगदृष्टा ओर युगसृष्टा है। ये कुछ ऐसे कुविचार हैं जो साहित्यकार को अपने जोवन संघर्षों को मजबूत पकड़ को परिणति न मान उसे स्वयंभू मानते है । यह भोषण राजनीति साहित्य के पुरोधानों ने चलाई । इसके मूल में उनका एकमात्र उद्देश्य यही था कि साहित्य कही भी जोवन से न जुड पाये, यदि ऐसा हो गया तो उसमें राम और कृष्ण की जगह होरी ओर गोबर जैसे भुखमरे लोग छा जायेंगे। इस कुटिल चाल का विरोध हिन्दी में सबसे पहले प्रेमचंद ने किया। प्रेमचंद अपने युग की उपज थे, जैसा कि हर साहित्यकार होता है । "पंच परमेसर" और "सौत" जैसी कहानियाँ लिखने वाले प्रेमचद अंत में "ठाकुर का कुंप्रा", "पूम की रात" और "कफन" जैसी कहानियाँ देते हैं। "सेवा सदन" से अपनो उपन्यास यात्रा शुरू करके अंतिम अमर कृति गोदान देते हैं । यह उनको राजनीतिक समझ का ही परिणाम है। जीवन संघर्षों में लेखक जितना ईमानदारी से भाग लेगा, उसको पकड़ उतनी ही मजबूत होगी। विचारधारा तो लेखक के लिये जोवन संघर्षों को समझने की दृष्टि प्रदान करती है। केवल विचारधारा के आधार पर कोई भी बड़ा लेखक नही बनता । आज जैसे-जैसे सघर्ष बढ रहे है, वैसे-वैसे ही लेखक का काम दुरुह होता जा रहा है। वह प्रेमचद को तरह अपने युग को किस तरह जोवित रख पाता है, यह उसको विचारधारा पर निर्भर करता है । साहित्यकार विचारधारा को कहाँ तक अपनाये, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। वर्ग-संघर्प से जुड़ा लेखक अपनी रचना में किस प्रकार विचारधारा को स्थान देता है-देना चाहिये, यह उसको वर्गीय स्थिति को समझ पर निर्भर करता है। विचारधारा को बचाने को जितनी अधिक शक्ति लेखक में होगी, वह उतना हो बड़ा और जोवंत लेखक बन सकता है। स्वस्थ व्यक्ति वही कहलाता है, जो जितना खाये पोये उतना ही उसका रक्त, मांस, मज्जा बने । ज्यादा साकर ज्यादा निकालना स्वास्थ्य की पहचान नहीं है। पाचन शक्ति ही स्वास्थ्य को प्रतीक है। ठीक उसी 106 तरह लेखक है, वह जितना अनुभूत करता है, उतने को पचाकर कलात्मक स्तर पर अभिव्यक्त कर सकता है तो निश्चय ही बड़ा लेखक है । साहित्य और विचारधारा का सम्बन्ध दूध और चीनी की भाति होता है । इसमें एक अनुपात भी आवश्यक है। "प्रेमचंद ने गोदान में और यशपाल ने दिव्या में विचारधारा को उच्च कलात्मकता के स्तर पर प्रस्तुत किया है, वह हमारे लिये अनुकरणीय है।" मार्क्सवाद के संदर्भ में साहित्य का विश्लेषण जरूरी है । माक्र्सवाद केवल राजनीति नहीं है, वरन् वह जीवन को समझने की कुजी है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक विचारधारा है जो लेखक को जीवन और जीवन सघर्षो से जोड़ती है, उसे जुझारू बनाती है। विचारधारा के अभाव में व्यक्ति संघर्षों से बचता है, समझौते करता और लोभ के मोह मैं पड़कर टूटता है, कुंठित होता है, अपनी सीमित दुनिया का निर्माण करता है, लेकिन विचारधारा वाला लेखक सघर्षों में और ज्यादा मजबूत होता है। यह मजबूती उसके चिंतन और रचना मे भी आती है, जिससे रचना में ताजगी बनी रहती है, जीवंतता रहती है। इसलिये रचनाकार के लिये मार्क्सवादी विचारधारा आवश्यक है, क्योंकि माक्र्सवाद जीवन में व्याप्त विषमताप्रो के प्रति अाँसू नही बहाता बल्कि उन्हे बदलने का मजबूत सकल्प देता है। उसके लिये मनुष्य से बड़ा कुछ भी नही है । मनुष्य के सुदर भविष्य के लिये मार्क्सवाद संघर्ष करना सिखाता है, उसमें साहस और शक्ति देता है। मार्क्सवाद को लेकर जो भ्रम पैदा किये जाते रहे है, वह अब टूट रहे है। और साहित्य में आलोचना के लिये सामाजिक यथार्थ अब आवश्यक आधार बन गया है। रचना प्रखर हो, विषम परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति देती हो, सुदर भविष्य के प्रति प्रास्था जगाती हो, वही बड़ी रचना है, मार्क्सवाद यही सीख देता है । । 1. डॉ. कुपर पाल सिंह-मावसंवादी सौंदर्यशास्त्र और हिन्दी कथा साहित्य .52 107 आचार्य रामचंद्र शुक्ल और उनकी इतिहास-दृष्टि - । निर्विवाद रूप से प्राचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के इतिहास को लिखने वाले पहले मनीपी हैं, जिनकी दृष्टि एक हजार वर्ष के सुदीर्घ और विभिन्न मत-मतांतरों के झमेले में पड़े साहित्य को मात्र तिथिवार सजाने पर ही नही रही, बल्कि उसे समाज के विकास के इतिहास के साथ देखने परखने की भी रही। वे साहित्य को गंभीर और समाज- सापेक्ष मानते है। समाज से अलग हटकर साहित्य जिंदा रहे यह वे नहीं मानते। इसीलिये "अमरबेली साहित्य" का वे डटकर विरोध करते है। "हिन्दी साहित्य का इतिहास" के प्रारंभ मे वे अपने विचारो की घोषणा करते हुये कहते है--"जबकि प्रत्येक देश का इतिहास वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्ही चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुये साहित्य परम्परा के साथ उनका सामजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक-सामाजिक, साप्रदायिक तथा धार्मिक प्रवृत्ति के अनुसार होती है। अतः कारण स्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक भी होता है। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य का विवेचन करने में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि किसी विशेष समय में रुचि विशेष का संचार और पोपण किधर से और किस प्रकार हुआ।"1 इतिहास-लेखन में शुक्ल जी की मूल दृष्टि जनता की चित्तवृत्ति पर ही रही। जन-जीवन के परिवर्तन-परिवर्द्धन और अन्य आवश्यक रुझानों 1. भाचार्य रामचंद्र शुक्ल-हिन्दी साहित्य का इतिहास, काल विभाग 108 . का शुक्ल जी ने गहराई के साथ अध्ययन-मनन कर अपनी ऐतिहासिक रष्टि का निर्माण किया है। जहाँ भी उन्हें अपनी बात स्पष्ट करने का अवसर मिला, उसे सम्पूर्णता में ही कहने की कोशिश रही है। प्राचार्य शुक्ल की मान्यता थी कि किसी कवि या लेखक को समग्र रूप से जानो, देखो और परखो, टुकड़ो में नही । जीवन और जगत मे जब-तक गहरी रुचि नही होगी, तब-तक मूल्यांकन की कसौटी पर यथार्थवादी धारा नही रखी जा सकती। शुक्ल जी साहित्य की विकास प्रक्रिया को समाज के परिवर्तन और परम्परा के द्वंद्व की कसौटी पर कसते है। समाज के विकास का क्रम समझने के लिये उसके ऐतिहासिक संदर्भो से जुडकर उसकी द्वद्वात्मकता मे छिपे अंतर्सत्यो की खोज आवश्यक है। यह स्पष्ट है कि शुक्ल जी की दृष्टि इस प्रकार की वैचारिकता के अनुरूप नही बन पाई थी, फिर भी जो विशेषता है उसे नकारा भी नही जा सकता कि उन्होने भरसक कोशिश की कि अपने समय के स्वतत्रता आदोलन के मूल मे चल रहे पुनरुत्थानवादी-दृष्टिकोण को सामती विचारो के सड़े-गले पक्ष से अलग रखें, लेकिन यह किसी हद तक सफल नही हो पाया। यह कमी हमारे यहाँ के पूजीवादी नेतृत्व मे भी थी जो आगे बढ-चढकर राष्ट्रीयता की दुहाई दे रहा था। यही कारण था कि शुक्ल जी की दृष्टि एक ओर तो प्रगतिशील है और दूसरी ओर सामंतवाद के निर्मम ढाचे मे वे लोक- सत्तात्मक राज्य की प्रशसा करते है। जिस समय शुक्ल जी यह सब कह और लिख रहे थे उस समय तक पश्चिम मे बहुत बडे और सुलझे हुये विचारक अपनी ऐतिहासिक दृष्टि का उद्घोष कर चुके थे। शुक्ल जी उन विचारो से अछूते नही रहे । सैकडो वर्षों की घनघोर पराधीनता ने जिस अनास्था की नीव ढाली वह उन्नीसवी सदी के उत्तरार्द्ध मे कुछ-कुछ हिलने लगी। जन- जीवन मे एक क्रातिकारी बयार बहने लगी, यह बयार थके-मादे लोगो को आराम दिलाने वाली नहीं थी बल्कि शक्ति और सामर्थ्य दे रही थी। वहुत वर्षों के बाद ऐसा वातावरण बना जिसमे खुलकर सास ली जा सकती थी। परिणामतः एक से बढकर एक समाज सुधारक प्रकाश मे आये। साहित्य से लेकर सामाजिक, राजनीतिक एव आर्थिक क्षेत्र मे उस नयी वयार ने अपनी करामात दिखाई। विदेशी दासता, आर्थिक 109 विपन्नता, धार्मिक अध विश्वासो मे डूबी भारतीय जनता को आर्य समाज, ब्रह्म समाज, थियोसोफिकल सोसायटी एव प्रार्थना समाज ने शक्ति दी, उससे जड जीवन हिल गया। शिक्षा का प्रचार-प्रसार, रेल, सडक, मशीन एव जड पकडते पूजीवाद ने भी भारतीय जडता को तोडा, जिसकी प्रतिध्वनि उस समय के साहित्य मे भी देखने को मिलती है। अग्रेजो द्वारा प्रारभ की गई शिक्षा व्यवस्था के परिणामस्वरूप पढे-लिखे लोगो मे विदेशी चिंतन का प्रभाव अपनी जडे जमाने लगा। शुक्ल जी इसी युग एव परिस्थितियो की उपज थे। और यही हम बारीकी से देखे तो उनकी सीमा और सामर्थ्य भी स्पष्ट हो जाती है। जिस पुनरुत्थान- वादी युग की उपज शुक्ल जी थे, वही उनकी सीमा भी है । यही कारण है कि एक ओर उनमे आगे बढने और कुछ नया दे सकने की ललक है, तीव्र इच्छा है, अग्रेजी दासता की बेडिया खत्म करने की प्राकुलता है, शोषण और अधविश्वासो के प्रति आक्रोश है, वही दूसरी ओर विकास- वाद की सीमाये भी हैं। साहित्य के इतिहास को उन्होने लोक जीवन की चित्तवृत्ति के माध्यम से देखा है, लेकिन वर्ग-सघर्ष के आलोक मे देख सकने की शक्ति वे जुटा नही पाये थे। उनका विकासवाद डारविन के विकासवाद तक ही सीमित रहा। इसलिये शुक्लजी मे प्रगतिशील विचार तो हैं, लेकिन उन प्रगतिशील विचारो को धार धरने वाली, चमकाने वाली वैज्ञानिक विचारधारा नही है। पश्चिमी विचारधारा के आयात के सम्बन्ध मे वे दो वातो पर ध्यान दिलाना चाहते हैं, 1-हम जिन विदेशी विचारो को स्वीकार करें वे भारतीय जीवन और साहित्य के अनुकूल हो तथा, 2-विदेशी के नाम पर वहां के कूडे-करकट को स्वीकार करना अच्छी बात नही है। इसीलिये उन्होने वहाँ के अच्छे विचारको का स्वागत किया और जो उन्हे रुचा नही उसके विचारो की जमकर धुनाई की। उनकी इतिहास दृष्टि के पीछे ये विचार अपना प्रभाव छोडते है। हालाकि यह कहना कि विदेशी विचारको मे प्रमुखत आई० ए० रिचर्ड स एव मैथ्यू आर्नोल्ड का स्पष्ट प्रभाव शुक्ल जी पर है, सही नही है । वहुत पहले शची रानी गुर्टू ने अपने एक लेख "रामचद्र शुक्ल और मैथ्यू आर्नोल्ड" मे दोनो के विचारो की समानता की थी लेकिन यह समता किसी अधे आदमी द्वारा गाय और भैस की समता बताने जैसी ही है । शुक्ल जी पर इस तरह के आरोप उन लोगो ने लगाये जिनका काम चिंतन-मनन को गहराइयों में उतरना नहीं बल्कि ऊपर ही 110 बैठकर लाठी भाजना है। ऐसे लोग क्या नहीं कर सकते । शुक्लजी जैसे घभीर मनीषी और विस्तृत आयामो को छूती उनकी विचार शक्ति से किसी की भी तुलना की जा सकती है। जब तुलना ही करनी है तो कैसे भी कर सकते है। इसलिये यह सब बेकार की बाते है। शुक्ल जी पर जिनका प्रभाव है वह सीधे-सीधे नही है वह सब रच-पचकर ही अभिव्यक्त हुआ है। शुक्ल जी विदेशी विचारो की देन नही हैं, विदेशी विचारो ने तो उनके चितन को प्रखर बनाया है। वे भारतीय चिंतन परम्परा के स्वस्थ और प्रतिभावान समालोचक है। प्रथम इतिहासकार होने के नाते शुक्ल जी की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यन-तन छिपी हुई सामग्री की श्रमसाध्य और कष्ट साध्य खोज, उसका क्रमबद्ध विश्लेषण, युग प्रवृत्ति का मूल्याकन, साहित्य की मूल आत्मा की गहरी परख और पकड एव उपलब्ध सामग्री की प्रामा- णिकता निश्चित करना कम महत्त्वपूर्ण काम नहीं था। अपनी कालगत, परिस्थितिगत एव अन्य स्थितियो को सीमानो मे रहकर जितना काम किया जा सकता था आचार्य शुक्ल ने उससे अधिक ही किया। इसलिये उनका मूल्याकन करते समय हमारी दृष्टि उस समय की परिस्थितियो पर भी जानी चाहिये जिनसे शुक्ल जी जैसा आलोचक उत्पन्न हुआ, विकास हुआ और उन सीमानो मे सिमटकर भी रह गया। आचार्य शुक्ल "हिन्दी साहित्य का इतिहास" मे वैज्ञानिक और सटीक काल विभाजन के लिये उस समय की काव्य प्रवृत्तियो और जन- सामान्य की चित्तवृत्तियो को अपना आधार बनाते है--"शिक्षित जनता की जिन जिन प्रवृत्तियो के अनुसार हमारे साहित्य स्वरूप मे जो-जो परिवर्तन होते आये हैं, जिन-जिन प्रभावो की प्रेरणा से काव्य-धारा की भिन्न-भिन्न शाखाये फूटती रही हैं, उन सबके सम्यक् निरूपण तथा उनकी दृष्टि से किये हुये सुसगत काल विभाग के बिना साहित्य के इतिहास का सच्चा अध्ययन कठिन दिखाई पडता था।" अपनी बात को और स्पष्ट करते हुये वे आगे लिखते है-"नामकरण के सदर्भ मे दो प्रकार की पद्धति अपनाई गई है, 1-किसी विशेष ढग की रचनाओ के आधार पर और 2--रचनाओ की प्रसिद्धि के आधार पर क्योकि- 1 प्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रथम सस्करण वा वक्तव्य, स 1986 111 प्रसिद्धि भी किसी काल की लोक प्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है। प्राचार्य शुक्ल से पहले गार्सा द तासी, मिश्र वधु प्रादि ने जो हिन्दी साहित्य के इतिहास लिखे, वे इस प्रकार के वैज्ञानिक आधार और जन-जीवन की चित्तवृत्ति के आधार पर नही थे, बल्कि उन्होने आदि, मध्य, पूर्व एवं उत्तर इत्यादि खण्डो मे एक हजार वर्ष के इतिहास को वाधकर देखा था। इससे सुसगत तथा प्रवृत्यात्मक झलक नहीं मिल पाई। शुक्ल जी इस प्रकार काल विभाजन को उचित नही मानते । -"सारे रचनाकाल को केवल आदि, मध्य, पूर्व, उत्तर इत्यादि खण्डो मे आंख मूदकर वाट देना-यह भी न देखना कि खड के भीतर क्या प्राता है, क्या नहीं किसी वृत्तसग्रह को इतिहास नही बना सकता।"2 पाचर्य शुक्ल ने एक हजार वर्ष के विविधतानो से भरे सुदीर्घ साहित्य को विश्लेपित कर जिस सुसगत ढग से अपने इतिहास में लिखा है और काव्य प्रवृत्तियो एव जन- जीवन की चित्तवृत्ति के आधार पर जो नामकरण किया है, वह आज भी चुनौती बनी हुई है। बाद के विद्वानो ने यद्यपि उसमे कुछ सशोधन किया है तथापि मूल परिवर्तन की गुणाइश को उन्होने भी नकारा है। जॉर्ज ग्रियर्सन, महापडित राहुल साकृत्यायन, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्राचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ० नगेद्र एव डॉ० राम कुमार वर्मा आदि ने नामकरण मे सशोधन अवश्य किये हैं लेकिन शुक्ल जी के काल-विभाजन की प्रासगिकता पर वे प्रश्न-चिह्न नही लगा पाये है। नामकरण मे संशोधन का जहाँ तक प्रश्न है वह बाद मे उपलब्ध हुई सामग्री के आधार पर है, जो शुक्ल जी की अपनी विवशता थी। उन्हे अधिक से अधिक परिश्रम के बाद जो सामग्री उपलब्ध हो सकी उसी के आधार पर उन्होने नामकरण किया। इसलिये लम्बे समय बाद भी जबकि ज्ञान-विज्ञान के कारण आज बहुत-सी चीजे अधिक स्पष्ट हो गई है कही कोई सार्थक चुनौती नहीं दी जा सकी है। यह शुक्ल जी की अपनी आलोचना दृष्टि का परिणाम है। , आदिकाल के नामकरण को लेकर बाद मे अनेक विद्वानो ने अपने- अपने अनुसार अलग-अलग नामकरण किये। सिद्ध सामत काल, बीज 2 - भाचार्य रामचद्र शुक्ल प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स 1986,' माचार्य रामचंद्र शुक्ल-प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स. 1986, 2 2 112 वषण काल, चारण काल, प्रारभिक काल एव आदि काल इत्यादि नामो से शुक्ल जी के वीरगाथा काल नामकरण को नकारा गया। इस नकार- वाद मे ही किसी भी देश, साहित्य एव जन-जीवन की प्रगति का मत्र छिपा रहता है। इसलिये यह आवश्यक है लेकिन इसे शुक्ल जी की कमी बताना गलत है। उस समय उपलब्ध बारह पुस्तको मे से जब पाठ पुस्तको मे वीर रस की प्रधानता हो तब कैसे शुक्ल जी उसे नकार देते । आज, जबकि निरतर विलुप्त सामग्री प्रकाश मे आ रही है तब उसके नाम मे परिवर्तन करना हमारी स्वस्थ दृष्टि एव ईमानदार साहित्यिक लगाव का ही परिणाम है। उन बारह पुस्तको की प्रामाणिकता तथा ऐतिहासिकता का जहाँ तक प्रश्न है उनकी परख की कमी मे शुक्ल जी को अपनी समयगत सीमाये निहित है, जिसे कोई भी ईमानदार आलोचक नकार नहीं सकता। और ऐसी स्थिति मे प्राचार्य शुक्ल का महत्व भी कम नहीं हो जाता। अपनी सीमानो मे आबद्ध शुक्ल जी कहते है- "साराश यह कि जिस समय के हमारे हिन्दी साहित्य का अभ्युदय होता है, वह लडाई-भिडाई का समय था, वीरता के गौरव का समय था।" कबीर के मूल्याकन को लेकर आचार्य शुक्ल के समीक्षा सिद्धातो पर प्रश्न-चिह्न लगाये गये है और इसे उनकी दृष्टि का दोष माना गया है । कबीर दो अतिवादो के बीच हैं--पहला, शुक्ल जी कवीर को कटकारवाद के कारण तत्कालीन परिस्थितियो मे उनके महत्व को कम करके प्राकते है और दूसरे प्राचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी है जो कबीर को पहला मानववादी कवि बताते है। शुक्ल जी कबीर के फटकारवाद मे सामाजिक हित नही देखते और द्विवेदी जी, उन्हे प्रासगिक ही नही आवश्यक करार देते है। जैसा कि हम पहले कह चुके है, शुक्ल जी की कसौटी मानव समुदाय है । जो कवि मानव जीवन की छोटी से छोटी समस्या को उठाता है और उसके समाधान की खोज करता है वह शुक्ल जी को प्रिय है, उसकी तारीफ करते वे नही अघाते और जिसे जन-जीवन के सुख-दुख मे कुछ लेना-देना नही उसको वे पानी पी-पीकर कोसते है । अपनी इसी सामाजिक कसौटी पर वे कबीर और जायसी को परखते हुये कहते हैं-"कबीर ने अपनी झाड-फटकार के द्वारा हिन्दू और मुसलमानो प्राचार्य रामचंद्र शुक्ल-प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स 1986, पृ 22 113 का कट्टरपन दूर करने का जो प्रयत्न किया वह अधिकतम चिढाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नही । मनुष्य-मनुष्य के बीच जो रागात्मक सम्बन्ध है, वह उसके द्वारा व्यक्त न हुअा। अपने नित्य के जीवन मे जिस हृदय साम्य का अनुभव मनुष्य कभी-कभी किया करता है, उसकी अभिव्यजना उससे न हुई। कुतुबन, जायसी आदि इन प्रेम कहानी के कवियो ने प्रेम का शुद्ध मार्ग दिखाते हुये उन सामान्य जीवन दशाओ को सामने रखा, जिनका मनुष्य मात्र के हृदय पर एक-सा प्रभाव दिखाई पड़ता है। कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था। प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी। यह जायसी द्वारा पूरी हुई।"। कबीर जैसा फक्कड सत जिस अक्खडवानी मे समझाता है शुक्ल जी का वैष्णव मन इसे स्वीकार नहीं करता और जायसी हमारी प्रेम कहानियो को आध्यात्मिक रग देकर प्रस्तुत करते है, तब शुक्ल जी वाह-वाह कह उठते है । कबीर की झाड फटकार मे किसी प्रकार की द्वेष भावना नहीं है एक सीधे-सादे सत को मन स्थिति है। शुक्ल जी जिसे चिढ कहते हैं, वह तब उत्पन्न होती है, जब एक पक्ष से ही कहा जाये। कबीर तो दोनो से ही कहते है। रियायत की कही कोई गुजाइश नही है। हिन्दू हो या मुसलमान जिसे बुरा देखते हैं, फटकार लगाते है। इसमे चिढने वाली बात कहाँ है । इसी वक्तव्य मे शुक्ल जी का दूसरा आरोप है कि कबीर ने मात्र भिन्न प्रतीत होती परोक्ष सत्ता का प्राभास कराया, प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य प्रस्तुत नहीं किया। असल मे, शुक्ल जी की चिढ कवीर के झाड-फटकार से है वरना प्रत्यक्ष जीवन की एकता का जो दृश्य कवीर ने प्रस्तुत किया है वह जायसी से कम नही है। हिन्दू-मुसलमान जिस भक्ति-भाव कवीर के आश्रम मे जाते थे, उनके उपदेश सुनते थे और अत मे उनके शव को प्राप्त करने की जो होड थी वह क्या फटकार- वाद से उत्पन्न हो सकती थी? यदि कबीर दोनो को एक करने की बात नही कहते तो यह जो अपार श्रद्धा है, वह हो ही नही सकती थी। वबीर द्वारा प्रत्यक्ष जीवन की एक्ता का दृश्य उत्पन्न करने की क्षमता का इससे वडा प्रमाण क्या हो सकता है कि तब से लेकर अब तक कवीर के मानने वाले अधिक हैं। उनकी सखियां उत्तर भारत की जन-कठहार प्राचार्य रामचद्र शुका-प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स 1986,471 114 हैं । तुलसी अपने भक्ति-भाव के बल पर लोकप्रिय है तो कबीर अपने वल पर। यह कहना गलत है कि कवीर की भाषा चिढ़ाने वाली है। कबीर की पंठ प्रत्यक्ष जीवन में अधिक है, उन्होने उसे अदर तक झकझोरा है । फलतः कबीर पाठ्यक्रमो के साथ-साथ लोक जीवन में भी गुने-सराहे जाते हैं और जायसी आज भी पाठ्यक्रमो की ही शोभा बढा रहे हैं, लोक-जीवन के लिये वे एकदम अपरिचित हैं। अंतिम विवाद शुक्ल जी की छायावाद सम्बन्धी मान्यताओं को लेकर है । शुक्ल जी छायावाद के विरोध में भी प्रत्यक्ष जगत का न होना ही मानते है । यह तो तय है कि जहाँ कविता की बात आती है उसमें वे जन-जीवन की धड़कन पहले देखते हैं और यदि वह नही है तो उसे निरस्त करने में उन्हें किसी प्रकार का संकोच नही होता चाहे कविता शिल्प के आधार पर कितनी ही परिपक्व क्यों न हो। छायावाद के मूल्याकन में वे लिखते हैं-"कवि कल्पना को प्रत्यक्ष जगत से अलग एक स्मरणीय स्वप्न घोषित किया जाने लगा और कवि सौन्दर्य भावना के मद मे झूमने वाला एक. लोकातीत जीव । कला और काव्य की प्रेरणा का सम्बन्ध स्वप्न और काम-वासना से बताने वाला मत भी इधर-उधर उद्धृत हुआ। पर छायावाद और कलावाद के सहसा आ धमकने से वर्तमान काव्य का बहुत-सा अंश एक बंधी हुई लीक के भीतर सिमट गया, नाना अर्थभूमियों पर न जा पाया, यह अवश्य कहा जायेगा। उपर्युक्त मूल्याकन के लिये जिस प्रकार के तथ्य शुक्ल जी ने दिये हैं उन्हे नकारा नही जा सकता। यह बात दूसरी है कि वे छायावाद को समग्रता में नहीं देख सके। आगे चलकर "छायावादी कविता" की प्रवृत्तियों को और स्पष्ट करते हुये अपनी नाराजगी का कारण बताते हैं--"छायावाद नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुमा कि बहुत से कवि रहस्यात्मकता, अभिव्यजना के लाक्षणिक वैचित्र्य, वस्तु-विन्यास की विश्रृखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मान कर चले। शैली की इन विशेषताओ की दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि के विस्तार की ओर उनकी दृष्टि न रही। 1. भाचार्य रामचद्र शुक्ल--प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स. 1986, पृ. 445 115 विभाव पक्ष या तो शून्य अथवा अनिदिप्ट रह गया। इस प्रकार प्रणयोन्मुख काव्य क्षेत्र बहुत कुछ संकुचित हो गया। असीम और अज्ञात प्रियतम के प्रति अति चित्रमयी भाषा में अनेक प्रकार के प्रेमोद्गारों तक हो काव्य को गतिविधि प्रायः बंध गई। हृततंत्री की झंकार नीरव सदेश, अभिसार, अनत प्रतीक्षा, प्रियतम का दवे पांव पाना, आँख मिचौनी, मद में झूमना, विभोर होना इत्यादि के साथ-साथ शराब, प्याला, साकी प्रादि सूफी कवियो के पुराने सामान भी इकट्ठे किये गये, कुछ हेरफेर के साथ वही बंधी पदावली, वेदना का वही प्रकाड प्रदर्शन कुछ विश्रृखलता के साथ प्रायः सब कवितायो मे मिलने लगा।" इस प्रकार की रहस्यात्मकता के शुक्ल जी विरोधी हैं। कविता के साथ इस प्रकार ऐयाशी उन्हे नापसंद है। अलौकिक के प्रति जो प्रेम- निवेदन छायावादी कवियो ने किया है उसको शुक्ल जी गलत ही नही भारतीय परम्परा के विरुद्ध भी मानते है-"क्या वाल्मीकि से लेकर पडितराज जगन्नाथ तक कोई एक भी कवि ऐसा बताया जा सकता है जिसने अज्ञेय और अव्यक्त को अज्ञेय और अव्यक्त ही रखकर प्रियतम बनाया हो और उसके प्रति कामुकता के शब्दों में प्रेम व्यजना की हो।" ऐतिहासिक सदर्भो के माध्यम से उन्होंने अपने मत की पुष्टि की है । असल मे, यह शुक्ल जी की कमजोरी थी कि वे छायावाद को रहस्यवाद समझ बैठे। इसलिये सारा आक्रोश उबल पड़ा। रहस्यवाद के मूल मे जो जीवन-जगत से कटने की प्रवृत्ति है शुक्ल जी उसके घोर विरोधी है । पत और निराला के बदलते तेवरों की वे प्रशंसा करते हैं । निराला की "जुही की कली" और "शैफाली" जैसे मांसल सौदर्य वाली कविता एव "मैं और तुम" जैसी आध्यात्मिक दर्शन की कविता का वे विरोध करते हैं, वही आगे चलकर "इलाहाबाद के पथ पर" धूप मे पत्थर तोड़ती, श्रम सोकर बहाती श्रमिका के प्रति उमड़ी सवेदनाओं और भिखारी के प्रति उमड़े भाव प्रवाह की वे प्रशंसा करते हैं। वे कवितायें उनके लोक ग्राही मन को जीत लेती हैं-"बहुवस्तुस्पशिनी प्रतिभा निराला जी मे है। अज्ञात प्रिय की ओर इशारा करने के अतिरिक्त 1. प्राचार्य रामचद्र शुक्ल-~-प्रथम सस्करण का वक्तव्य, स 1986, पृ. 447 साक्षात्कार, शुक्ल विशेपाक, 1984, पृ 106 2. 116 उन्होंने जगत के अनेक प्रस्तुत रूपों और व्यापारों को भी अपनी सरल भावनाओं के रंग में देखा है। ऐसा ही परिवर्तन जब पंत जी की कविताओं में गांधीवाद और समाजवाद के माध्यम से नजर आता है तब वे उनकी तारीफ करते है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जिस तरह से छायावादी कवि-पंत और निराला-छायावाद से मुक्त हो कर यथार्थवादी हो रहे थे उसमें शुक्ल जी को अपनी मान्यता की सफलता दिखाई पड़ रही थी। यही कारण है कि वे पंत और निराला के बदलते तेवरों का गर्मजोशी के साथ स्वागत करते है। इससे यह भी साष्ट है कि शुक्ल जी कवियों को लेकर व्यक्तिगत राग द्वेष नही पालते, जैसा आज के छुटभैये आलोचक कर रहे हैं बल्कि उनके सामने रचना प्रमुख थी। रचना का ईमानदार मूल्यांकन ही उनका उद्देश्य था। ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि में हिंदी-साहित्य के इतिहास को देखने का पहला प्रयास शुक्ल जी ने किया था। यह उनका अनुपम योगदान है, जिसे कितने भी मतभेदों के बावजूद नकारा नहीं जा सकता । शुक्ल जी हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक हैं, उनकी परम्परा विभिन्न मोड़ों और अवरोधों को पारकर निरतर विकसित हो रही है। यह उनकी स्वस्थ मालोचना दृष्टि का ही परिणाम है। 00 1. भाचार्य रामचंद्र शुक्ल---हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 485
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