Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Teen Ekant

Nirmal Verma · 2011/03

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साहित्य की विभिन्न विधाएं परस्पर निरपेक्ष दिखते
हुए भी किसी न किसी स्तर पर सापेक्ष संबंधों का
निर्वाह करती हैं। यही कारण है कि किसी कहानी,
कथा-रिपोर्ताज या संस्मरण (यहाँ तक कि कविता
भी) आदि को एक अविस्मरणीय नाट्य-प्रस्तुति के
रूप में भी देखा और सुना जा सकता है। यह इसलिए
भी संभव है क्योंकि नाटकीयता प्रायः हर कला-विधा
की अतर्वस्तु में मौजूद रहती है। हिंदी-रंगमंच पर
ऐसी अनेक प्रस्तुतियाँ हुई हैं और यह कृति एक ऐसी
ही महत्त्वपूर्ण नाट्य-प्रस्तुति का उदाहरण है।
इसमें सुप्रतिष्ठ कथाकार निर्मल वर्मा की तीन
कहानियों-धूप का एक टुकड़ा, डेढ़ इंच ऊपर और
वीकएंड -का नाट्य-रूप संग्रहित है। राष्ट्रीय नाट्य
विद्यालय के रंगमंडल-कलाकारों द्वारा 1975 में इन
तीनों कहानियों का मंचन एक उपलब्धि की तरह
स्वीकार किया गया था। उपलब्धि इसलिए भी कि
तीनो कहानियाँ परंपरित रूप में नाट्यातरित नहीं हैं,
बल्कि कहानी के अपने मूल 'फार्म' मे निहित कथ्य,
शब्द और दृश्य को ही नाट्यानुकूल यनाया गया है,
ताकि कहानी की आत्यांतिक फार्म और लय को
अक्षुण्ण रखा जा सके। उल्लेखनीय है कि ये तीनो
कहानियाँ अपने मूल रूप में 'मोनोलॉग' हैं, यानी एक
अकेले व्यक्ति का अपने आप से वार्तालाप, जहाँ
उमका 'स्व' ही युद्ध-क्षेत्र में बदल जाता है।
निर्देशक के शब्दों मे कहे तो 'ये कहानियाँ अकेलेपन
के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की
कहानियाँ हैं।'
वस्तुतः यह कृति एक ऐसा रचनानुभव है, जिसे
देखना यदि 'पदना' था तो पढ़ना 'देखना' है।

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तीन एकान्त If only you do not try to utter what is unutterable, then nothing is lost. But the unutterable will be unutterably-contained in what has been uttered. -Ludvig Wilgenstein

तीन
एकान्त
निर्मल वर्मा
राजकमल प्रकारान
नदी दिल्ली पटना

इन मोनोलॉग्म के मचन, प्रमारण, अनुवाद आदि के लिए लेखक की लिर्जा
पूर्व अनुमति आवश्यक है । मपर्क का पता
निर्मल वर्मा
14-1/20 वम्टन एक्स्टशनग्मा मैल बाग, नई दिल्ली-110005
मूल्य रु.3500
निर्मल वर्मा
पह संस्करण: 1990
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रालि..
इ-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली-110002
टाइपसैटिंग : जोतासा एंटरप्राइजेज,
101-ए, सूफिरण, कस्तूरबा गाँधी मार्ग,
नई दिल्ली-110001
पुरक : गायत्री ऑफसेट प्रेस,
ए-66, सैस्टर-2, नौएडा-201301
आवरण :नरेंद्र श्रीवास्तव
:
TEEN EKANT
Three Monologues by Nirmal Verma
ISBN: 81-7178-128.4

7
लेखक का वक्तव्य :
एक अनुभव :
निर्मल वमो
निर्देशक का वक्तव्य
कहानियों का रंगमंचीय संसार
देवेन्द्र राज
प्रस्तुति विवरण : 17
धूप का एक टुकड़ा : 19
चित्र . 20, 25 से 28
डेढ़ इंच ऊपर : 37
चित्र : 38,41-42-43
वीकएंड 55
चित्र . 56,59-60-61
.

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लेखक का वक्तव्य एक अनुभवः निर्मल वर्मा - एक बार लिसी जाने पर किसी कृति की क्या नियति होती है, इसका रहस्य शायद कोई भी लेखक नहीं जानता। बहुत वर्ष पहले बेकारी के खाली दिनों में मैंने 'माया-दर्पण' कहानी लिखी थी। तब यह कल्पना असंभव थी कि एकदिन वह मेरी अन्य कहानियों को पीछे छोड़कर फिल्म के योग्य मानी जायेगी। इसी तरह जब हाल में मेरी इन तीन कहानियों (श्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड) को नाट्य-मंचन के लिए चुना गया तो इसलिए नहीं कि मैंने उन्हें सास स्टेज के लिए लिया था। उनके बीच एकमात्र समानता यह भी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गयी थीं, जब अकेले क्षणों में व्यक्ति अपने मे ही बोलने लगता है। यह वानांलाप बाहर की दनिया' से नहीं है, इसलिए परंपरागत अर्थ में इने नाटवीय संवाद नहीं कहा जा सकता । किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ 'स्व' ही लड़ाई का मैदान बन जाता है-अपनी भोगी हुई लाइना, पश्चाताप, विडंबनाओं में घिरा हुआ--और इसी में इन शब्दों की लावारिस-सी नाटकीयता निहित है। यह सोचना भामक होगा कि 'नाटकीयता' क्वल नाटक-विधा की मंति है-दरअसल चना की हर विधा अनग-अलग ढंग से नाटकीय होती है, कि वह अलग-अलग रूपों में अपने कोनिया से जोड़ती है (चाहे वह भीतर कोनित क्यों न हो) ।क्निी ने प्रति अन्यानमार हेनरी जेम्म मे कतारहस्य के बारे में पूजतो तीन एमाल उन्होंने केवल दो शब्दों में उत्तर दिया : 'Oniy dramatize' | जिस तरह नाटक परदा उठते ही प्रतीक्षा करने लगते हैं कि 'अब कुछ होगा, उसी तरह जब कोई अनुभूति अपने मूक अंधेरे से उठकर शब्दों के प्रदेश में रास्ता टटोलती है, तब अचानक कुछ होने लगता है। यह स्फुरण-बेलौस, गूंगे अस्तित्व में कुछ होने का कंपन-कुछ और नहीं, सिर्फ वह नाटकीय तत्त्व है, जिसके बिना नाटक ही नहीं, हर कला-विधा मृतप्राय हो जाती है। नाटकीयता हर कला-विधा में मौजूद रहती है, किन्तु हर विधा नाटक नहीं होती। इसलिए कहानी के 'नाटकीकरण' पर बहस एक हद तक निरर्थक है। कोई भी सार्थक कथा-प्रयोग अपने में नाटकीय होगा, यह मैं मानता हूँ। किन्तु वह मंचन के लिए भी उपयुक्त होगा, यह ज़रूरी नहीं है। नाट्य-मंचन के लिए एक कहानी की विषय-वस्तु निर्णयात्मक महत्त्व की नहीं, बल्कि वह फॉर्म, वह तंतुजाल महत्त्वपूर्ण है, जिसमें कहानी के नाटकीय तत्त्वों को बुना गया है। कहानी के फ़िल्मीकरण और नाटकीकरण के बीच यह मूलभूत अन्तर है। किसी भी कहानी का फ़िल्मीकरण महज़ उसकी विषय-वस्तु के आधार पर हो सकता है, क्योंकि फ़िल्म-निर्देशक के लिए वह 'कच्चे माल' से अधिक महत्त्व नहीं रखता। दूसरी ओर, नाट्य-मंचन में कहानी का टेक्स्ट उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना स्वयं नाट्य-कृति का टेक्स्ट होता है-उसमें दृश्य और शब्द दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, अन्योन्याश्रित हैं। मंच की रोशनी में दोनों ही एक-दूसरे को उगगर करते हैं। अतः कहानी को तोड़-मरोड़कर, उसके शब्दों को बदलकर, उसके फॉर्म को भंग करके नाट्य-मंचन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता-तब वह कहानी का नहीं, कहानी के बहाने एक नये' नाटक का मंचन होगा। न ही उसका मंच-पाठन (जब एक अभिनेता मंच पर किसी कहानी को अपने हाव-भाव,संकेतों,स्वर के उतार-चढ़ाव द्वारा नाटकीय ढंग से पढ़ता है) कहानी के नाटकीकरण की समस्या को सुलझा सकता है, क्योंकि समस्त नाटकीय संकेतों के बावजूद, वह मूल रूप से 'कया-पाठन' ही माना जायेगा। इससे कहानी के टेक्स्ट की रक्षा तो हो जायेगी, किन्तु उसके मंचन की समस्या नहीं सुलझ सकेगी। चुनौती कहीं इन दोनों के बीच है, जब कहानी के मूल स्वभाव को विकृत किये बिना उमे मंच पर इस तरह प्रस्तुत किया जाये. जहां वह एक ही समय में 8/तीन एकान्त नाटक का इल्यूज़न'देसके और दूसरी ओर, कहानी की आत्यन्तिक फ़ॉर्म और लय को अक्षुण्ण रख सके । यहाँ समस्या कहानी के नाटकीय तत्त्वो को चुन-चुनकर स्टेज पर सजाना नहीं है, बल्कि उस समूची नाटकीय लय को मंच पर.पुनर्जीवित करना है, जो कहानी के भीतर अदृश्य रूप से व्याप्त है। अतः कहानी के सार्थक मंचीकरण में अभिनेता (या अभिनेत्री) एक साथ कहानी को 'पढ़ते हैं और उसे जीते हैं। हर पाब्द- अपने में एक ऐक्ट है, महज़ ऐक्ट करने का माध्यम नहीं। शुद्ध नाटक के मधन म अभिनेता शब्दों से एक स्थिति पैदा करता है और फिर स्थिति को झेलता है; किंतु कहानी के मंचन में टेक्स्ट का हर शब्द अपने में एक स्थिति है, उसे बोलना ही स्पिति को मेलना है। यह शायद सिर्फ संयोग नहीं था कि जिन कहानियों को मंचन के लिए चुना गया, वे कमोवेश 'स्मृति' में आकार ग्रहण करती थीं। तीनों पात्र किसी-न-किसी ढंग से अपने अतीत को वर्तमान में जीते हैं, गुनते हैं, उसके साथ सुलह करना चाहते हैं। स्मृति की यह विशेषता है (और इसमें वह स्वप्न से मिलती-जुलती है) कि उसमें शब्द अन्त तक पहुंचने का महज़ रास्ता-भर नहीं हैं, वे घटना का अन्त जानते हैं, अतः वे उसे अपने भीतर लेकर चलते हैं। जो व्यक्ति याद करता है, वह समप्रता (totality) में याद करता है। जिस प्रकार एक बार पूरा चित्र देखने के बाद यदि हम उस चित्र का सिर्फ अंश या डिटेल देखें, तो उस अंश में भी हम चित्र की संपूर्णता देखते हैं (या उसकी झलक याद रखते हैं), उसी प्रकार स्मृति का हर शब्द अपने में संपूर्ण है, क्योंकि वह अन्त की संपूर्णता का ही अंश है। इसलिए स्मृति के शब्द एक साय अभिशप्त और मुक्त होते हैं-अभिशप्त इसलिए कि वे कहानी दुहराते मात्र हैं, उसे बदल नहीं सकते-मुक्त इसलिए कि वे उस कहानी के अन्त की अनिवार्यता जानते हैं-दुहराने के दौरान वे उसे मानते हुए भी उसकी खिल्ली-सी उड़ाते हैं। किसी आवाज़ की गूंज सिर्फ उसकी प्रतिवनि नहीं होती, पैरोडी भी होती है और इसी में गूंज की स्वतंत्रता निहित है। रहना असंभव है कि तीन एकान्त' उपर्युक्त चुनौती को झेलने में कितना सफल हुए हैं-यह निर्णय दर्शकों और आलोचकों पर ही छोड़ना होगा। स्वयं मेरे लिए यह बात कि कहानियों को सुनने-पढ़ने के अलावा देखा भी जा सकता है, एक विस्मयकारी अनुभव था। जिन कहानियों को अरसा पहले मैंने अपने अकेले कमरे में लिखा था, उन्हें खुले मंच तीन एकान्त/9 पर दर्शकों के बीच देखना कुछ वैसा ही था जैसे टेपरिकॉर्डर पर अपनी आवाज़ सुनना, जो अपनी होने पर भी अपनी नहीं जान पड़ती। कहानी लिखना बहुत अकेलेपन की चीज़ है। यह सौभाग्य बहुत कम प्राप्त होता है कि खुद अलगरहकर इस अनुभव को दूसरों के साथ बांटा जा सके। किन्तु जब कभी ऐसा होता है, तो वह अनुभव सुद हल्का-सा हो जाता है, अपने अकेलेपन के बोझ को उतार फेंकता है । वह उस दुःख की जगह ले लेता है जिसके बारे में 'वीकएंड' की नायिका कहती है-"बेटने पर वह छोटा नहीं होता, बड़ा भी नहीं होता। सिर्फ साफ हो जाता है-चमकीला और साफ़।" 10/तीन एकान्त निर्देशक का वक्तव्य कहानियों का रंगमंचीय संसार देवेन्द्र राज निर्मल वर्मा की तीन कहानियों ('धूप का एक टुकड़ा', 'डेढ़ इंच ऊपर' और 'वीकएंड') की मंच-प्रस्तुति के दौरान, एक निर्देशक के नाते यह बात शुरू से ही मेरे सामने साफ़ थी कि मुझे कहानियों के 'नाटकीय रूपांतरण' की ओर नहीं बढ़ना, वरन कहानी के अपने मूल फॉर्म में निहित कथ्य, शब्द और दृश्य को ही मंच पर स्थापित करना है। कहानी को सुनते हुए अथवा-उससे भी आगे-पढ़ते हुए श्रोता अथवा पाठक के सामने जो एक पूरा दृश्य-जगत बनता चलता है, उसे मंच पर कैसे प्रस्तुत किया जाये? इसीलिए यह प्रयोग कहानी को सुनने और पढ़ने से आगे की कड़ी तो है ही, लेकिन इसे नाटक अथवा फिल्म की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती। शायद यह अनुभव'कहानियों का रंगमंच' जैसी अपनी कोई संज्ञा उत्पन्न कर सके, इसका अभी मात्र एक संकेत ही दिया जा सकता है। इन तीनों कहानियों की मंच-प्रस्तुति जिस तरह से विकसित होती चली गयी-उस रचना-प्रक्रिया में से गुज़रते हुए उपर्युक्त प्रश्न, निष्कर्ष या धारणाएं सम्भवतः और भी स्पष्ट हो सकें। संयोग से तीनों कहानियों की भावभूमि और फार्म लगभग एक-जैसा लगा -तीनों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अंत तक एक लम्बा संवाद (मोनोलॉग)वोलता है, इसके साथ ही यह एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरुआत क्सिी दूसरे पात्र के साथ होती है, लेकिन यहां उसकी उपस्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता, क्योंकि न जाने तीन एकान्त/11 कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है। इस प्रकार ये कहानियों अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं-इस मूल थीम को रेखांकित करने के लिए ही प्रस्तुति को एक सम्मिलित नाम'ग्री टेक्स्ट्स इन सॉलीट्यूड' दिया गया था। प्रस्तुति विशेष रूप से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्टूडियो-थियेटरको ध्यान में रखते हुए तैयार की गयी थी। इस तथ्य ने प्रस्तुति के दृश्य-जगत को अपने ढंग से प्रभावित किया। इसके साथ ही तीनों कहानियों को एक ही संध्या को एक के बाद एक प्रस्तुत किया जाना था, अतः इस बात का भी ध्यान रखा गया कि बीच के अंतराल में बहुत थोड़े-से मंच-उपकरणों के हेर-फेर से ही दूसरी कहानी का मंच तैयार किया जा सके। ऐसी स्थिति में यह अनिवार्य हो गया कि अभिनेता के साथ-साथ प्रकाश-सज्जा और संगीत एवं ध्वनि-संयोजन को भी पूरा महत्त्व दिया जाये। इस प्रकार एक निश्चल चौखटे में कहानियों की मंच-प्रस्तुति एकफ़िल्म के 'चलायमान स्क्रीन' से बहुत अलग होती गयी। 'धूप का एक टुका' कहानी का दृश्य एक पब्लिक पार्क से शुरू होता है जहां कईबेंचें हैं, पृष्ठभूमि में एक चर्च है और जहां-तहां फैले धूप के कुछ टुकड़े हैं। लेकिन चर्च का अहसास केवल वहाँ से आते संगीत द्वारा कराया गया, मंच के नाम पर केवल आमने-सामने दो बेंचें, लेकिन बोलती हुई नायिका के विरोध में एक मौन पात्र को भी उपस्थित रखा गया। यह पात्र एक बूढ़ा है जो एक पैरेम्युलेटर के सामने बैठा है और संयोग से उसी बेंच पर आकर बैठ गया है जहाँ यह औरत रोज़ाना आकर बैठती रही है। इस प्रकार एक मौन, बढ़े और अपने में ही व्यस्त पाप की उपस्थिति ने इस औरत के अकेलेपन को और भी ज्यादा रेखांकित किया। लेकिन एक पार्क से शुरू होकर भी कहानी का दृश्य-जगत औरत के लम्बे संवाद में उसके अतीत के प्रसंगानुसार बदलता रहता है लेकिन उन दोनों बेंचों में किसी तरह का चेंज किये बिना ही मात्र प्रकाश द्वारा रेखांकित कुछ विशेष क्षेत्रों अथवा संगीत और अन्ततःस्वयं अभिनेत्री के दिये गये कुछ मूम' दाग ही कहानी की पूरी यात्रा को पकड़ने की कोशिश की गयी। । 12/तीन एगन्त डेढ़ इंच ऊपर 'धूप का एक टुकड़ा' जैसे फ्रेम की कहानी होते हुए भी अपने अतिम स्वरूप में यह उससे बिलकुल ही अलग होती गयी। इसमें भी दो पात्र है-एक बोलनेवाला और दूसरा सुननेवाला । शुरू में पहली कहानी की तरह यहाँ भी सुननेवाले पात्र की परिकल्पना की गयी, लेकिन ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती गयी, सुननेवाला पात्र बिलकुल ही अनुपस्थित हो गया-केवल शुरू में एक अलग मेज़-कुर्सी पर प्रकाश के एक वृत्त द्वारा ही उसकी उपस्थिति का अहसास करा दिया गया। कहानी एक छोटे-से पब में शुरू होती है, अतः दृश्य-बंध के नाम पर मंच के ऊपर-नीचे दो विभिन्न कोनों में रखी दो मेजें और चार कुर्सियां ही थीं-इन्हीं के बीच प्रकाश-सज्जा द्वारा बूढ़े पात्र का घर, जेल की सैल, सड़क और बचपन के खेल बनते-मिटते चलते हैं। संगीत एवं ध्वनि-प्रभाव को लेकर भी यह 'धूप का एक टुकड़ा' से काफी अलग थी-जहाँ उस कहानी में चर्च की घटियों, आती-जाती घोड़ा-गाड़ी अपवा ऑर्गन-संगीत यानी अलग-अलग तरह का ध्वनि-प्रभाव था, वहाँ इस कहानी में पब में बजते हुए एक लम्बे रिकॉर्ड द्वारा ही समय-समय पर उभरते संगीत एवं ध्वनियों का वैविध्य उत्पन्न किया गया। कहानी का बूढ़ा पात्र बीयर पीते हुए स्वयं खुलता चलता है। बीच-बीच में उसे बीयर'सर्व' करने के लिए एक बेयरा को रखा गया था जो उसकी आवाज़ पर जब-जब बीयर का मग रखने आता तो अनायास ही कहानी के दृश्य को पुनः पब से जोड़ देता। 'वीकएं। शायद इस सम्मिलित प्रस्तुति की यह सबसे मुश्किल कहानी थी। जहां पहली दो कहानियों किसी दूसरे पात्र से सम्बोधित बातचीत है जो स्वन्द्रित होती जाती हैं, वहां 'वीकएंड' में संवाद या बातचीत तो बिलकुल ही नहीं, पूरी-की-पूरी कहानी नायिका के 'स्वचिन्तन' से सम्बन्धित है। इसीलिए कहानी की शुरुआत सुबह के भरे आलोक में नायिका की 'टेपरिकॉर्ड पर आती आवाज से की गयी-"यह मैं यादरखंगी,येचिनार के तीन एकान्त/13 पेड़, यह सुबह का भूरा आलोक और क्या याद रहेगा? पेड़ों के बाद बदन में भागता यह हिरन, आइसक्रीम का कोन, घास पर धूप में चमकता हुआ, एक साफ़, धुली पीड़ा की फाँक जैसा, मानो अकेला अपने को टोह रहा हो।" फिर मुँह-अँधेरे में अलार्म की आवाज़ सुनकर ही उसके मुंह से पहले संवाद निकलते केवल इसी स्तर पर नहीं, स्वयं कहानी की यात्रा भी पहली दोनों कहानियों से बिलकुल अलग है-नायिका एक वीकएंड की समाप्ति पर सुबह-सुबह अपने कमरे पर जाने के लिए तैयार हो रही है, उसका प्रेमी अभी तक पलंग पर सोया हुआ है। इसी बीच वह पिछले दिन की घटनाओं पर पुनर्विचार करने लगती है और कहानी कमरे से निकलकर एक पार्क में पहुंच जाती है-जहाँ वह अकेली बैठी है और वह अपनी बच्ची से मिलने गया है। और इस दौरान वह कभी पार्क, कभी कमरे, कभी पुरुष, कभी उसकी बच्ची और कभी स्वयं में बिताये क्षणों के साथ जीती रहती है। अंत में वह अपने बैग के साथ कमरे की सीढ़ियाँ उतर रही है। इसलिए मंच पर दृश्य-योजना भी कहानी की इस अनवरत यात्रा के अनुसार ही की गयी। मंच के पिछले भाग में एक पलंग और तीन स्टूलों द्वारा ही कमरे को स्थापित किया गया और मंच का पूरा आधा अग्रभाग पार्क के लिए इस्तेमाल किया गया। एक क्षेत्र का प्रकाश मंद और दूसरे का तेज़ करते हुए ही उसके चिन्तन की सहज यात्रा को साकार किया गया। कहानी में किसी तरह का'मूड' अथवा भाव-संगीत नहीं था, वरन नायिका के व्यक्तिगत अनुभव से जुड़ी कुछ ध्वनियों को ही रखा गया था, जैसे अलार्म का बजना, रेलगाड़ी का धड़-से गुज़र जाना, मेरी-गो-राउंड पर बच्ची की चीखें और दूर कहीं घंटों कीटन-टन। कहानी में तीन पात्र आते हैं-नायिका, पुरुष और उसकी बच्ची । लेकिन कहानी की परिकल्पना केवल एक पात्र के माध्यम से ही की गयी-बाकी दोनों पात्रों की उपस्थिति पा तो गौण हो गयी अथवा जहां उसकी ज़रूरत भी पड़ी तो स्वयं नायिका के दिये 'मूव्स' या आवाज़ के उतार-चढ़ाव से ही उसका आभास होता गया। 14/तीन एकान्त १ ये तीनों कहानियां तो अपने मूल फॉर्म' में ही कुछ इस तरह से आ मिली जिसे 'नाटकीय स्वगत' के अन्तर्गत भी लिया जा सकता है। पूरी प्रस्तुति के दौरान मेरा यही प्रयास रहा कि स्वयं कहानियों के कथ्य के बीच से उभरते दृश्य-बिम्बों को ही एक निश्चित मंच के फ्रेम की सीमा में कितनी दूर तक पकड़ा जा सकता है किसी प्रकार के बाह्यारोपण को तनिक भी प्रश्रय दिये बिना । प्रस्तुति को एक सम्पूर्ण अनुभव या प्रयोग के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए जिसमें लेखक, निर्देशक, अभिनेता, अभिनेत्री, प्रकाश एवं संगीत-सभी तत्वों का बराबर सहयोग रहा है। लेकिन इस तरह के प्रयोग एक निर्देशक के साथ ही पूर्ण नहीं हो जाते-बार-बार नये-नये लोगों द्वारा इन्हें अपने-अपने ढंग से उद्घाटित करते रहना स्वयं अपनी यात्रा के लिए निहायत ज़रूरी है। और इससे भी आगे अलग-अलग फ़ॉर्म की कहानियाँ अपनी रंगमंचीय प्रस्तुति के लिए हर बार एक नयी चुनौती प्रस्तुत करती रहेंगी। तीन

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प्रस्तुति विवरण
इन कहानियों की पहली मंच-प्रस्तुति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रैपटरी
कम्पनी द्वारा विद्यालय के स्टूडियो-थियेटर में 1 मई से 6 मई, 1975 को
की गयी। प्रस्तुति से सम्बन्धित विवरण निम्न प्रकार है:
पात्रः
धूप का एक टुकड़ा
सबा जैदी
रतन थियम
डेढ़ इंच ऊपर
राजेश विवेक
विजय मोहन्ती
वीकएंड
सुरेखा मीकरी
नेपथ्य:
मंच-व्यवस्था : विजय मोहन्ती
संगीत-चयन : उत्तरा बॉवकर
आलोक-सज्जा : दीपक केजरीवाल
रंजीत कपूर
दृश्य-बंध और
परिकल्पना : देवेन्द्र राज
फोटोग्राफ्स : पी. एन. आहूजा

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धूप का एक टुकड़ा

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धूप का एक टुरा में रतन पियम

अंधेरा। मंच के बीचों-बीच बायीं ओर रखी बेंच पर प्रकाश। उस पर एक बूढ़ा व्यक्ति अखबार पढ़ने में व्यस्त । उसके आगे एक पैरेम्बुलेटर खड़ी है। पृष्ठभूमि में चर्च की घटियाँ। दायीं ओर से नायिका का प्रदेश । घटियों को सुनते-सुनते बायीं बेंच की ओर लौटती है। क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूँ ? (बूढ़ा उठने लगता है, लेकिन वह तेज़ी से बेंच के खाली कोने पर बैठ जाती है। बीच-बीच में अपना स्कार्फ, दस्ताने उतार लेती है, थर्मस को नीचे रख देती है और पत्रिका से खेलती रहती है।) नहीं, आप उठिये नहीं। मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क'चारों तरफ़ ख़ाली बेंचें-मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूँ ? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूँ-जिस बेंच पर आप बैठे हैं. वह मेरी है। जी हाँ, मैं यहाँ रोज़ बैठती हूँ। नहीं, आप गलत न समझें। इस बेंच पर कोई मेरा नाम नहीं लिखा है । भला म्युनिस्पैलिटी की बेंचों पर नाम कैसा? लोग आते हैं, घड़ी-दो घड़ी बैठते हैं, और फिर चले जाते हैं। किसी को याद भी नहीं रहता कि फलो दिन फ़लों आदमी यहाँ बैठा था। उसके जाने के बाद बेंच पहले की तरह ही खाली हो जाती है । जब कुछ देर बाद कोई नया आगंतुक आकर उस पर बैठता है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहाँ कोई स्कूल की बच्ची या अकेली बुढ़िया या नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा। नहीं जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहाँ आदमी टिक कर रहे-तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर कयों के हालाँकि कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि कत्रों पर नाम भीन तीन एकान्त /21 रहें, तो भी खास अन्तर नहीं पड़ता। कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझकर दूसरे की कब्र में घुसना पसन्द नहीं करेगा! (पृष्ठभूमि में एक घोड़ा-गाड़ी के आने और रुकने की आवाज़ । बूढ़ा मंच के पिछले हिस्से की ओर चला जाता । आप उधर देख रहे हैं-घोड़ा-गाड़ी की तरफ़ ? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। शादी-ब्याह के मौकों पर लोग अब भी घोड़ा-गाड़ी इस्तेमाल करते हैं-मैं तो हर रोज़ देखती हूँ। इसीलिए मैंने यह बेंच अपने लिए चुनी है। यहां बैठकर आँखें सीधी गिरजे पर जाती हैं-आपको अपनी गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती। बहुत पुराना गिरजा है। इस गिरजे में शादी करवाना बड़ा गौरव माना जाता है। लोग आठ-दस महीने पहले से अपना नाम दर्ज करवा लेते हैं। वैसे सगाई और शादी के बीच इतना लंबा अन्तराल ठीक नहीं। कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है। और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोई भी दिखायी नहीं देता। उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है। न कोई भीड़, न कोई घोड़ा-गाड़ी । भिखारी भी खाली हाथ लौट जाते हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने सामने वाली बेंच पर एक लड़की को देखा था। अकेली बैठी थी और सूनी आँखों से गिरजे को देख रही थी। (बूढ़ा सामनेवाली बेंच पर आकर बैठ गया है। कोट की जेब से पाइप निकालकर जलाने लगता है।) पार्क में यही एक मुश्किल है। इतने खुले में सब अपने-अपने में बंद बैठे रहते हैं। आप किसी के पास जाकर सांत्वना के दो शब्द नहीं कह सकते। आप दूसरों को देखते हैं, दूसरे आपको । शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी। यही कारण है, अकेले कमरे में जब तकलीफ़ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं-सड़कों पर । पब्लिक पार्क में। किसी पब में । वहाँ आपको कोई तसल्ली न भी दे,तो भी आपका दुःख एक जगह से मुड़कर दूसरी तरफ़ करवट ले लेता है। - । 22/तीन एकान्त उससे तकलीफ़ का बोल कम नहीं होता। लेकिन आपरेचसैफली के सामान की तरह एक कंधे से उठाकर दूसरे कंधे पर रख देते हैं। यह क्या कमराहत है ? मैं तो ऐसा ही करती हूँ-सुबह से ही अपने कमरे से बाहर निकल आती हूँ। (बूढा खांसता-सा पुनः उसके साथ आकर बैठ जाता है।) नहीं-नहीं- आप गलत न समझें-मुझे कोई तकलीफ़ नहीं। मैं धूप की खातिर यहाँ आती हूँ-आपने देखा होगा, सारे पार्क में सिर्फ यह एक बेंच है, जो पेड़ के नीचे नहीं है। इस बेंच पर एक पत्ता भी नहीं झरता-फिर उसका एक बडाफ़ायदा यह भी है कि यहाँ से मैं सीधेगिरजे की तरफ देख सकती हूँ-लेकिन यह शायद मैं आपसे पहले ही कह चुकी 11,218 Pा142 आप सचमुच सौभाग्यशाली है। पहले दिन यहाँ आये-और सामने घोड़ा-गाड़ी। आप देखते रहिये-कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमाहोजायेगी। उनमें से ज़्यादातर लोग ऐसे होते हैं, जो नवर को जानते हैं, न वधू को। लेकिन एक झलक पाने के लिए घंटों बाहर खड़े रहते हैं । आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन कुछ चीज़ों को देखने की उत्सुकताजीवन-भरखत्म नहीं होती। (उठकर पैरेम्बुलेटर के भीतर झांकने लगती है।) अब देखिये, आप इस पैरेम्बुलेटर के आगे बैठे थे। पहली इच्छा यह हुई, झांककर भीतर देखू, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा। अलग होता नहीं। इस उम्र में सारे बच्चे एक जैसे ही होते हैं-मुंह में चुसनी दबाये लेटे रहते हैं। फिर भी जब मैं किसी पैरेम्युलेटर के सामने से गुज़रती है, तो एक बार भीतर झांकने की जबरदस्त इच्छा होती है क्योंकि जो चीजें हमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे ऊबने की बजाय आदमी सबसे ज्यादा उन्हीं को देखना चाहता है, जैसे प्रेम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोडे की घोड़ा-गाड़ी या मुर्दो की अरथी । आपने देखा होगा, ऐसी चीज़ों के इर्द-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है। अपना बस हो या न हो, खुद-ब-खुद उनके पास खिंचे चले तीन एकान्त/23 आते हैं। मुझे कभी-कभी यह सोचकर बड़ा अचरज होता है कि जो चीजें हमें अपनी ज़िन्दगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीजें हमारी पकड़ के बाहर हैं। हमन उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं। मैं आपसे पूछती हूँ-क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाह के अनुभव को हू-ब-हू अपने भीतर दुहरा सकते हैं ? आप हँस रहे हैं-नहीं, मेरा मतलब कुछ और था। कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नहीं कर सकता? मैंने सुना है, कुछ देश ऐसे हैं, जहाँ जब तक लोग नशे में धुत नहीं हो जाते, तबतक विवाह करने का फैसला नहीं लेते और बाद में उन्हें उसके बारे में कुछ याद नहीं रहता। नहीं जी, मेरा मतलब ऐसे अनुभव से नहीं था। मेरा मतलब था, क्या आप उस क्षण को याद कर सकते हैं, जब आप एकाएक यह फैसला कर लेते हैं कि आप अलग न रहकर किसी दसरे के साथ रहेंगे-ज़िन्दगी-भर मेरा मतलब है, क्या सही-सही उस बिंदु पर अंगुली रख सकते हैं, जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा-सा सरकाकर किसी दूसरे को वहाँ आने देते हैं-जी हाँ-उसी तरह जैसे कुछ देर पहले आपने थोड़ा-सासरककर मुझे बेंच पर आने दिया था और अब मैं आपसे ऐसे बातें कर रही हैं, मानो आपको बरसों से जानती (चर्च की घटियो । नायिका मंच के पिछले हिस्से में घूमती हुई, जैसे कि चर्च के सामने पुनः उसी अनुभव से गुज़र रही हो।) लीजिये, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गये। अगर इसी तरह भीड़ जमा होती गयी, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जायेगा। आज तो खैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी के दिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं। मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूँ-कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पन्द्रह साल पहले मेरे विवाह के 24/तीन एकान्त -- धूप का एक टुकम में सबाली सबा जैदी एक दाम में रतन थियम और सबा जैदी सवाटी की एक मुद्रा । मौके पर जो लोग जमा हुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही-जैसे इस दौरान कुछ भी नहीं बदला है। जी हाँ-मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था । लेकिन यह मुद्दत पहले की बात है। तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के दरवाजे पर आकर ठहर सके। हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था और मैं अपने पिता के साथ पैदल चलकर यहाँ तक आयी थी। सड़क के दोनों तरफ़ लोगपड़े थे और मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पांव न फिसल पड़े। पता नहीं, वे लोग अब कहाँ होंगे, जो उस रोज़ भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे। आप क्या सोचते हैं-अगर उनमें से कोई आज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही लड़की है, जो सफेद पोशाक में पन्द्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी? सच बताइये, क्या पहचान सकेगा? (दूसरी बेंच पर जाकर बैठ जाती है।) आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वह घोड़ा मुझे ज़रूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींचकर लाया था--जी हाँ, घोड़ों को देखकर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूँ। कभी आपने उनकी आँखों में झांककर देखा है ? लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज़ से अलग हो गये हैं, लेकिन अभी तक अपने अलगाव के आदी नहीं हो सके हैं। इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदास रहते हैं। किसी चीज़ का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं । वे लोगजो आखिर तक आदी नहीं हो पाते या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धूप के एक टुकड़े की खोज में एक बेंच से से दूसरी बेंच का चक्कर लगाते रहते हैं। (वापस अपनी बेंच की तरफ आते हुए पैरेम्बलेटर में झांकने लगती है।) क्या कहा आपने? नहीं, आपने शायद मुझे गलत समझ लिया। मेरे कोई बच्चा नहीं-यह मेरा सौभाग्य है । बच्चा होता, तो शायद मैं कभी तीन एकान्त/29 अलग नहीं हो पाती। (थर्मस में से चाय लेती है।) आपने देखा होगा, आदमी और औरत में प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे की खातिर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। मेरे साथ कभी ऐसी रुकावट नहीं रही। इस लिहाज़ से मैं बहुत सुखी हूँ-अगर सुख का मतलब है, कि हम अकेलेपन को खुद चुन सके, लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिलकुल दूसरी बात । जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूँ। लेकिन जाने से पहले मैं कुछ देर उस पब में ज़रूर बैठती हूँ, जहाँ वह मेरी प्रतीक्षा करता था। जानते हैं, उस पब का नाम? बोनापार्ट-जी हाँ, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बार इस शहर में आया, तो उस पब में बैठा था-लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था। (भागती हुईमंच के दायें कोने की ओर जाती है। जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं सारी शाम शहर के दूसरे सिरे पर खड़ी रही, जहाँ नेपोलियन घोड़े पर बैठा है। आपने कभी अपनी पहली डेट इस तरह गुज़ारी है कि आप सारी शाम पब के सामने खड़े रहें और आपकी मंगेतर पब्लिक स्टेचू के नीचे ? बाद में जो उसका शौक था, वह मेरी आदत बन गयी। हम दोनों हर शाम कभी उस जगह जाते, जहाँ मुझे मिलने से पहले वह मैठता था, या उस शहर के उन इलाकों में घूमने निकल जाते, जहां मैंने पचपन गुजारा था । यह आपको कुछ अजीम नहीं लगता कि जय हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहना चाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जमवह हमारे साथ नहीं था।हम इतने सालची और ईप्यासु हो जाते है कि हमें यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभी ऐमा ममय रहा होगा, जय वह हमारे मगैर जीता था, प्यार करता था, मोता-जागता था। फिर अगर कुछ माल उसी एक आदमी के साथ गगार दें. तो यह कहना भी असम्भव हो जाता है कि कौन-सी आदत 30/तीन पत्तों की तरह वे इस तरह आपस में घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्ते को उठाकर नहीं कह सकते कि यह पत्ता आपका है और दूसरा किसी दूसरे का। . । (बूढ़े के सामने वाली बेंच पर बैठ जाती है और चाय पीती रहती है।) देखिये, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि मरने से पहले हममें से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें। अपने अतीत की तहों को प्याज़ के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जायें-आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुँचेंगे, मां-बाप, दोस्त, पति-सारे छिलके दूसरों के, आखीर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जायेगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है। देखिये, अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है। मैं यह नहीं मानती। वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था। वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया लेकर जाता है। इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुःख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी किस्म का दुःख है, क्योंकि हमें लगता है कि उसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है। (अपनी बेंच की ओर लौटती है, कप नीचे रखती है और पैरेम्बुलेटर के पास आ जाती है।) अरे देखिये-वह जाग गया । जरा पैरेम्बुलेटर हिलाइये. धीरे-धीरे हिलाते जाइये। अपने-आप चुप हो जायेगा-मुँह में चुसनी दबाकर इस तरह लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो । देखिये-कैसे ऊपर बादलों की तरफ टुकुर-टुकुर ताक रहा है। मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी लेकर बादलों की तरफ इस तरह घुमाती थी, जैसे वे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों-आप क्या सोचते हैं ? बच्चे इस उम्र में जो कुछ देखते हैं तीन एकान्त/31 या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है ? (बूढ़े से अलग हट आती है और धीरे-धीरे दूसरी बेंच पर जाकर बैठ जाती है।) रहता जरूर होगा' 'कोई आवाज़, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े होकर हम उम्र के जाले में खो देते हैं। लेकिन किसी अनजाने मौके पर, ज़रा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज़ को कहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है और फिर उसके साथ-साथ बहुत-सी चीजें अपने-आपखुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं, लेकिन रोज़मर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान जाता नहीं। लेकिन वे वहाँ हैं, घात लगाये कोने में खड़ी रहती हैं-मौके की तलाश में-और फिर किसी बड़ी सड़क पर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच में वे अचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितनाही हाथ-पाँव क्यों न मारें, कितना ही क्यों न छटपटायें, वे आपको छोड़ती नहीं। मेरे साथ एक रात ऐसा ही हुआ था- हम दोनों सो रहे थे और तब मुझे एक अजीब-सा घटका सुनायी दिया-बिलकुल वैसे ही, जैसे बचपन में मैं अपने अकेले कमरे में हड़बड़ा कर जाग उठती थी और सहसा यह भ्रम होता था कि दूसरे कमरे में माँ और बाबू नहीं हैं-और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देख सकूँगी और तब मैं चीखने लगती थी। (बेंच से उठकर मंच के दायें कोने में आ जाती है। लेकिन उस रात मैं चीखी-चिल्लायी नहीं, मैं बिस्तर से उठकर देहरी तक आयी, दरवाज़ा खोलकर बाहर झांका, बाहर कोई न था। वापस लौटकर उसकी तरफ देखा। वह दीवार की तरफ़ मुंह मोड़कर सो रहा था, जैसे वह हर रात सोता था। तब मुझे पता चला कि वह खटका कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर हुआ था। नहीं, मेरे भीतर भी नहीं, अँधेरे में एक चिमगादड़ की तरह वह मुझे छूता हुआ निकल गया था-न बाहर, न भीतर, फिर भी चारों तरफ़ फड़फड़ाता हुआ। (पुनः मेंच की ओर लौट आती है।) मैं पलंग पर आकर बैठ गयी, जहाँ वह । . 32/तीन एकान्त लेटा था और धीरे-धीरे उसकी देह को छूने लगी। उसकी देह के उन सब कोनों को छूने लगी, जो एक ज़माने में मुझे तसल्ली देते थे। मुझे यह अनीब-सा लगा कि मैं उसे छू रही हूँ और मेरे हाथ खाली-के-खाली वापस लौट आते हैं। बरसों पहले की गूंज,जो उसके अंगों से निकलकर मेरी आत्मा में बस जाती थी, अब कहीं न थी। मैं उसी तरह उसकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने खंडहरों पर अपने नाम खोजते हैं, जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारों परलिखे थे। लेकिन मेरा नाम वहाँ कहीं न था। मैं रात-भर उसके सिरहाने बैठी रही और मेरे हाथ मुर्दा होकर उसकी देह पर पड़े रहे"मुझे यह भयानक-सा लगा कि हम दोनों के बीच जो खालीपन आ गया था, वह मैं किसी से नहीं कह सकती। जी हाँ-अपने वकील से भी नहीं, जिन्हें मैं एक अरसे से जानती थी। (मंच के बीच में आकर खड़ी हो जाती है।) वे समझे, मैं सठिया गयी हूँ। कैसा खटका ! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के पास जाता था? क्या वह मेरे प्रति क्रूर था? जी हाँ-उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी और मैं थी कि एक ईडियट की तरह उनका मुँह ताकती रही। और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने के लिए कोई कोर्ट-कचहरी ज़रूरी नहीं है। (एक सिगरेट सुलगा लेती है और मंच के बायें कोने की ओर आती हुई।) अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दुःख दूसरे के साथ बाँटकर हस हल्के हो जाते हैं। मैं कभी हल्की नहीं होती। नहीं जी, लोग दुःख नहीं बाँटते, सिर्फ फैसला करते हैं-कौन दोषी है और कौन निर्दोष मुश्किल यह है, जो एक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही-सही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं-इसीलिए मैं अपने मुहल्ले को छोड़कर शहर के इस इलाके में आ गयी, जहाँ मुझे कोई नहीं जानता। यहाँ मुझे देखकर कोई यह नहीं कहता कि देखो, यह औरत अपने पति के साथ आठ वर्ष रही और फिर अलग हो गयी। पहले जब कोई इस तरह की बात कहता था, तो मैं बीच सड़क पर खड़ी हो जाती थी । इच्छा होती थी, उस आदमी को पकड़कर - तीन एकान्त / 33 । शुरू से आखिर तक सब-कुछ बताऊं-कैसे हम पहली शाम अलग-अलग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते रहे थे, वह पय के सामने, मैं मूर्ति के नीचे । कैसे उसने पहली बार मुझे पेड़ के तने से सटाकर चूमा था, कैसे मैंने पहली बार डरते-डरते उसके बालों को छुआ था। जी हाँ, मुझे यह लगता था कि जबतक मैं उन्हें यह सब नहीं बता दूँगी, तब तक उस रात के बारे कुछ नहीं बता सकूँगी, जब पहली बार मेरे भीतर खटका हुआ था और बरसों बाद यह इच्छा हुई थी कि मैं दूसरे कमरे में भाग जाऊं,जहाँ मेरे मां-बाप सोते थे लेकिन वह कमरा खाली था। जी, मैंने कहीं पढ़ा था कि बड़े होने का मतलब है कि अगर आप आधी-रात को जाग जायें और कितना ही क्यों न चीदें-चिल्लायें, दूसरे कमरे से कोई नहीं आयेगा। वह हमेशा खालीरहेगा। देखिये, उस रात के बाद मैं कितनी बड़ी हो गयी हूँ"! (मंच के दायें बढ़ने लगती है।) लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती। भूचाल या बमबारी की खबरें अखबारों में छपती हैं। दूसरे दिन सबको पता चल जाता है कि जहां बच्चों का स्कूल था, वहाँ खंडहर हैं, जहाँ खंडहर थे, वहाँ उड़ती धूल । लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई खबर नहीं होती -उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अकेली घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं-तब मैं पहली बार इस पार्क में आयी थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं। और जी हाँ, उस दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उसी गिरजे के सामने बैठी हूँ, जहाँ पर मेरा विवाह हुआ था ऑर्गन-संगीत) तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी घोड़ा-गाडी सीधे गिरजे के सामने आ सके। हम दोनों पैदल चलकर यहाँ आये थे। (वह मंच के पिछले हिस्से में पहुँच जाती है।) आप सुन रहे हैं, ऑर्गन पर संगीत ? देखिये, उन्होंने दरवाज़े खोल दिये हैं। संगीत की आवाज़ यहाँ तक आती है। इसे सुनते ही मुझे पता (पृष्ठभूमि में चर्च में । 34/तीन एकान्त ल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अगलियों की दिला-बदली की है। बस अब थोड़ी-सी देर और है वि अंबाबाहर नेवाले हैं। लोगों में अब इतना चैन कहाँ किंशाति से खड़े रहेंब वह रढ़े की ओर लौटती है।) अगर आप जाकर देखना चाहे तो निश्चिन्त कर चले जायें । मैं तो यहाँ बैठी ही हूँ। आपके बच्चे को देखती रहूंगी। या कहा आपने? जी हाँ, शाम होने तक यहीं रहती हूँ, फिर यहाँ सर्दी हो नाती है। दिन-भर मैं यह देखती रहती हूँ कि धूप का टुकड़ा किस बेंच र है-उसी बेंच पर जाकर बैठ जाती हूँ। (बूढ़ा पैरेम्बुलेटर लेकर वलने लगता है।) पार्क का कोई ऐसा कोना नहीं, जहाँ मैं घड़ी, आधा बड़ी नहीं बैठती। लेकिन यह बेंच मुझे सबसे अच्छी लगती है। एक तो इस पर पत्ते नहीं झरते और दूसरे अरे, आप जा रहे हैं ? (बूढ़ा दायीं ओर से बाहर निकल जाता है। वह बेंच पर आकर बैठ जाती है। आलोक केवल उसी बेंच पर- पृष्ठभूमि में ऑर्गन-संगीत । धीरे-धीरे अँधेरा।) तीन एकान्त/35

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निर्मल वर्मा डेढ़ इंच ऊपर इन ऊपर में राजेश विवेक अंधेरा। संगीत । मंच केपिछले हिस्से में दायें कोने में रखी मेज़-कुर्सी पर प्रकाश। मंच के अगले हिस्से में बायें कोने में रखी मेज़-कुर्सी पर प्रकाश-कहानी का नायक हाथों में सर दिये बैठा है। उसके आगे एक बीयर का मग और ऐश-ट्रे। दो-तीन चूंट बीयर पीता है, सिगार जलाता है और इधर-उधर देखकर खाली मेज़ की तरफ़ देखते हुए। "अगर आप चाहें तो इस मेज़ पर आ सकते हैं। जगह काफ़ी है। आखिर एक आदमी को कितनी जगह चाहिए? नहीं नहीं."मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी (अनुपस्थित श्रोता मानो उसके साथवाली कुर्सी पर आकर बैठ गया है।) बेशक, अगर आप चाहें, तो चुप रह सकते हैं । मैं खुद चुप रहना पसंद करता हूँ आदमी बात कर सकता है और चुप रह सकता है, एक ही वक्त में । इसे बहुत कम लोग समझते हैं। मैं बरसों से यह करता आ रहा हूँ । बेशक आप नहीं आप अभी जवान हैं । आपकी उम्र में चुप रहने का मतलब है चुप रहना और बात करने का मतलब है बात करना । दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। आप छोटे मग से पी रहे हैं? आपको शायद अभी लत नहीं पड़ी। मैं आपको देखते ही पहचान गया था कि आप इस जगह के नहीं हैं। इस घड़ी यहाँ जो लोग आते हैं, उन सबको मैं पहचानता हूँ। उनसे आप कोई बात नहीं कर सकते। उन्होंने पहले से ही बहुत पी रखी होती है। वे यहाँ आते हैं, अपनी आखिरी बीयर के लिए-दूसरे पब बंद हो जाते हैं। और वे कहीं और नहीं जा सकते । वे बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं-मेज़ पर, बाहर सड़क पर, ट्राम में। कई बार मुझे उन्हें उठाकर उनके घर पहुँचाना । । तीन एकान्त/39 पड़ता है । बेशक, अगले दिन वे मुझे पहचानते भी नहीं । आप गलतन समझें । मेरा इशारा आपकी तरफ़ नहीं था। आपको मैंने यहां पहली बार देखा है। आप आकर चुपचाप अलग मेज़ पर बैठ गये। मुझे यह बुरा-सा लगा । नहीं, आप घबराइये नहीं"मैं अपने को आप पर थोपूँगा नहीं । हम एक-दूसरे के साथ बैठकर भी अपनी-अपनी बीयर पर अकेले रह सकते हैं। (बीयर पीने लगता है।) मेरी उम्र में यह ज़रा मुश्किल है, क्योंकि हर बूढ़ा आदमी थोड़ा-बहुत डरा हुआ होता है धीरे-धीरे गरिमा के साथ बूढ़ा होना बहुत बड़ा 'ग्रेस' है, हर आदमी के बस का नहीं। वह अपने-आप नहीं आता, बूढ़ा होना एक कला है, जिसे काफ़ी मेहनत से सीखना पड़ता है। क्या कहा आपने? मेरी उम्र? ज़रा अन्दाज़ा तो लगाइये? अरे, नहीं साहब-आप मुझे नाहक खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। यों आपने मुझे खुश ज़रूर कर दिया है और अगर अपनी इस खुशी को मनाने के लिए मैं एक बीयर और लें, तो आपको कोई एतराज़ तो नहीं होगा (बेयरा भरा मगरख जाता है।) और आप? आप नहीं लेंगे? नहीं"मैं ज़िद नहीं करूंगा। हर आदमी को अपनी ज़िन्दगी और अपनी शराब चुनने की आज़ादी होनी चाहिए दोनों को सिर्फ एक बार चुना जा सकता है। बाद में हम सिर्फ उसे दुहराते रहते हैं, जो एक बार पी चुके हैं, या एक बार जी चुके हैं। आप दूसरी ज़िन्दगी को मानते हैं ? मेरा मतलब है, मौत के बाद भी? उम्मीद है, आप मुझे यह घिसा-पिटा जवाब नहीं देंगे कि आप किसी धर्म में विश्वास नहीं करते। मैं खुद कैथोलिक हूँ, लेकिन मुझे आप लोगों का यह विश्वास बेहद दिलचस्प लगता है कि मौत बाद भी आदमी पूरी तरह से मर नहीं जाता "हम पहले एक जिंदगी पूरी करते हैं, फिर दूसरी, फिर तीसरी । अक्सर रात के समय में इस समस्या के बारे में सोचता हूँ मेरी उम्र में नींद आसानी से नहीं आती। नींद के लिए छटॉक-भर लापरवाही चाहिए, आधी छटांक थकान । अगर आपके पास दोनों चीजें "आप जानते हैं, 40/तीन एकान्त डेढ़ इच ऊपर में राजेश विवेक

राजेशविवेक
की दो
और मुद्राएँ
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निर्मल वर्मा नही हैं, तो आप उसका मुआवजा डेढ़ छटाँक बीयर पीकर भर सकते - (संगीत। अपना ओवरकोट उतारकर कुर्सी की पीठ पर टांगते हुए।) । ,मैं इसीलिए मैं हर रोज़ आधी रात के वक्त यहाँ चला आता हूँ, पिछले पन्द्रह वर्षों से लगातार । मैं थोड़ा-बहुत सोता ज़रूर हूँ, लेकिन तीन बजे के आसपास मेरी नींद टूट जाती है उसके बाद मैं घर में अकेला नहीं रह सकता। रात के तीन बजे यह भयानक घड़ी है। दो बजे लगता है, अभी रात है और चार बजे सुबह होने लगती है, लेकिन तीन बजे आपको लगता है कि आप न इधर हैं, न उधर । मुझे हमेशा लगता है कि मृत्यु आने की कोई घड़ी है तो यही घड़ी है। क्या कहा आपने? नहीं जनाब, बिल्कुल अकेला नहीं रहता। (मेज़ से बीयर का मग उठा लेता है और बीच-बीच में घूट लेते हुए।) आप जानते हैं, पेंशनयाफ्ता लोगों के अपने शौक होते हैं। मेरे पास एक बिल्ली है-बरसों से मेरे पास रहती है, अब ज़रा देखिये, मैं यहाँ बीयर पीते हुए आपसे लम्बी-चौड़ी बातें कर रहा हूँ, उधर वह मेरे इंतज़ार में दरवाजे पर बैठी होगी। आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन मुझे यह ख़याल काफ़ी तसल्ली देता है कि कोई मेरे इंतज़ार में बाहर सड़क पर आँखें लगाये बैठा है । मैं ऐसे लोगों की कल्पना नहीं कर सकता जिनका इंतज़ार कोई नहीं कर रहा हो या जोसुद किसी का इंतज़ार नहीं कर रहे हो। जिस क्षण आप इंतज़ार करना छोड़ देते हैं, उस क्षण आप जीना भी छोड़ देते हैं। बिल्लियों काफी देर तक और सब के साथ इंतज़ार कर सकती हैं, इस लिहाज़ से वे औरतों की तरह हैं। लेकिन सिर्फ इस लिहाज़ से नहीं-औरतों की ही तरह उनमें अपनी तरफ खींचने और आकर्षित करने की असाधारण ताक़त रहती है। यों हर आपको कुत्तों या दूसरे जानवरों से भी लगता होगा। लेकिन वह निघले दर्जे का डर है। (किनारे की ओर जाकर) आप एक ओर किनारा करके चले जाते हैं, कुत्ता दूसरी ओर किनारा करके चला जाता है । उसे - 44/तीन एकान्त डर लगा रहता है कि कहीं आप उस पर बेईमानी न कर बैठे और आप इसलिए सहमे-से रहते हैं कि कहीं वह आँख बचाकर आप पर न झपट पड़े। लेकिन उस डर में कोई रहस्य, कोई रोमांच, कोई संभावना नहीं है"जैसी अक्सर बिल्ली या साँप को देखने से उत्पन्न होती है। (पुनः अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाता है।) सच बात यह है और यह मैं अनुभव से कह रहा हूँ कि बिल्ली को औरतों की तरह आप आखिर तक सही-सही नहीं पहचान सकते, चाहे आप उसके साथ वर्षों से ही क्यों न रहे हों ! इसलिए नहीं कि वे खुद जान-बूझकर कोई चीज़ छिपाये रहती हैं, बल्कि खुद आपमें ही इतना हौंसला नहीं रहता कि आप आखिर तक उनके भीतर लगे दरवाजे को खोल सकें। आपको यह बात ज़रा अजीब नहीं लगती कि ज्यादातर हमें वही चीजें अपनी तरफ खींचती हैं, जिनमें थोड़ा-सा आतंक छिपा रहता है। (उठकर दायीं ओर जाता है, बेयरा से एक भरा मग लेकर मेज़ की ओर लौटता है।) अगर आप बुरा न मानें तो मैं एक बीयर और लूंगा। कुछ देर में यह पब बन्द हो जायेगा और फिर सारे शहर में सुबह तक एक बूंद भी दिखायी नहीं देगी। आप डरिये नहीं मैं पीने की अपनी सीमा जानता हूँ "आदमी को ज़मीन से करीब डेढ़ इंच ऊपर उठ जाना चाहिए। इससे ज़्यादा नहीं, वरना वह ऊपर उठता जायेगा और फिर इस उड़ान का अन्त होगा पुलिस स्टेशन में या किसी नाली में जो ज़्यादा दिलचस्प चीज़ नहीं। लेकिन कुछ लोग डर के मारे ज़मीन पर ही पाँव जमाये रहते हैं ऐसे लोगों के लिए पीना-न-पीना बराबर है। जी हाँ-सही फ़ासला है डेढ़ इंच। (सिगार जलाता है और बैठ जाता है।) इतनी चेतना अवश्य रहनी चाहिए कि आप अपनी चेतना को माचिस की तीली की तरह बुझते हुए देख सकें जब लौ अंगुलियों के पास सरक आये तो उसे छोड़ देना चाहिए। उससे पहले नहीं । न बाद में ही। । तीन एकान्त/ तक पकड़े रहना और कब छोड़ना चाहिए, पीने का रहस्य इस पहचान छिपा है । मुश्किल यह है, हम उस समय तक नहीं पहचान पाते, तक डेढ इंच से ऊपर नहीं उठ जाते और फिर वह किसी काम नहीं। शायद यह बात सुनकर आप हँसेंगे कि पहचान तभी आती है,ज हम पहचान के परे चले जाते हैं। मुझे बुरा नहीं लगेगा अगर आ हँसकर मेरी बात को टाल दें "मैं खुद कभी-कभी कोशिश करता हूँ। इस आशा के साथ रहना सीख लूं कि कई चीज़ों को न जानना ही अपन को सुरक्षित रखने का रास्ता है। आप रफ्ता-रफ़्ता इस आशा के साथ रहना सीख लेते हैं जैसे आप अपनी पत्नी के साथ रहना सीख लेते हैं। एक ही घर में बरसो तक हालाँकि एक संशय बना रहता है कि वह भी आपका खेल खेल रही है। कभी-कभी आप इस संशय से छुटकारा पाने के लिए दूसरी या तीसरी स्त्री से प्रेम करने लगते हैं। यह निराश होने की शुरुआत है, क्योंकि दूसरी स्त्री का अपना रहस्य है और तीसरी स्त्री का अपना । यह शतरंज के खेल की तरह है 'आप एक चाल चलते हैं जिससे आपके विरोधी के सामने अन्तहीन संभावनाएं खुल जाती हैं । एक खेल हारने के बाद आप दूसरे खेल में जीतने की आशा करने लगते हैं। आप यह भूल जाते हैं कि दूसरी बाज़ी की अपनी संभावनाएं हैं, पहली बाज़ी की तरह अन्तहीन और रहस्यपूर्ण। देखिये इसीलिए मैं कहता हूँ कि आप ज़िन्दगी में चाहे कितनी औरतों के सम्पर्क में आयें, असल में आपका सम्पर्क सिर्फ एक औरत से ही होता है क्या कहा आपने ? जी नहीं, मैं आपको पहले ही कह चुका है, कि घर में मैं अकेला रहता हूँ, अगर आप मेरी बिल्ली को छोड़ दें। जी हां-मैं विवाहित हूँ"मेरी पत्नी अब जीवित नहीं है यह मेरा अनुमान है। आप कुछ हैरान-से हो रहे हैं। (उठकर मंच के बीच में आते हुए।) अनुमान मैं इसीलिए कह रहा है। क्योंकि मैंने उसे मरते हुए नहीं देखा। जब आपने किसी को आँखों से मरते नहीं देखा. अपने हाथों से दफनाया नहीं, तो आप सिर्फ अनुमान 46/तीन एकान्त

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- होंगे। मेरी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं थी और हालांकि लड़ाई के कारण सुबह से शाम तक काम में जुटना पड़ता था,मैं एक जवान मैल की तरह डटा रहता था। एक उम्र होती है, जब हर आदमी एक औसत सुख के दायरे में रहना सीस लेता है उसके परे देखने की फुरसत उसके पास नहीं होती, यानी उस क्षण तक महसूस नहीं होती जब तक सुद उसके दायरे में नहीं नहीं ‘आप गलत न समझें । मैंने अपनी पत्नी को कष्ट भोगते नहीं देखा। (मेज़ से अलग हटकर मंच के बायें कोने में कहीं बाहर देखते हुए। संगीत की शुरुआत।) मैं जब घर पहुंचा, वे उसे ले जा चुके थे। सात बरस की विवाहित ज़िन्दगी में यह पहला मौका था जब मैं खाली घर में घुसा था। दूसरे घरों के पड़ोसी ज़रूर अपनी-अपनी खिड़कियों से झांकते हुए मुझे देख रहे थे। यह स्वाभाविक भी था। मैं खुद ऐसे लोगों को खिड़की से झाँककर देखा करता था, जिनके रिश्तेदारों को गेस्टापो-पुलिस पकड़कर बन्द गाड़ी में ले जाती थी। लेकिन मैंने यह कभी कल्पना भी न की थी, एक दिन मैं घर लौटूंगा और मेरी पत्नी का कमरा खाली पड़ा होगा। (बायीं ओर से दायीं ओर बढ़ता हुआ, अन्ततः कोने में जाकर बैठ जाता है।) मेरी पत्नी की चीजें चारों तरफ बिखरी पड़ी थीं"कपड़े, किताबें, मुद्दत पुराने अख़बार । अलमारियों और मेज़ों के दराज़ खुले पड़े थे और उनके भीतर की हर छोटी-बड़ी चीज़ फर्श पर उलटी-सीधी पड़ी थी-क्रिसमस के सिलाई की मशीन, पुराने फोटो-एल्बम । आप जानते हैं, शादी के बाद कितनी चीजें खुद-ब-खुद इकट्ठा होती जाती हैं । लगता था, उन्होंने हर छोटी-से-छोटी चीज़ को उलट-पलटकर देखा था, कोने-कोने की तलाशी ली थी कोई चीज़ ऐसी नहीं थी, जो उनके हाथों से बची रह गयी हो। उस रात मैं अपने कमरे में बैठा रहा । मेरी पत्नी का बिस्तर खाली पडा था। तकिये के नीचे उसका रूमाल, माचिस और सिगरेट का पैकेट रखा था। सोने से पहले वह हमेशा सिगरेट पिया उपहार, 48/तीन एकान्त दिलचस्प जान पड़ेगी कि खुद मुझे उनके बारे में कुछ मालूम नहीं करती थी। शुरू में मुझे उसकी यह आदती असती थी ले धीरे-धीरे मैं उसका आदी हो गया था। पलंग कैस तिपाई भार उसकी किताब रखी थी, जिसे वह उन दिनों पढ़ा करती थी जिससन्न. उसने पिछली रात पढ़कर छोड़ दिया था, वहाँ निशानी कैलिए. अपना क्लिप दबा लिया था। क्लिप पर उसके बालों की गन्ध जुड़ी थी आप जानते हैं, किस तरह बरसों बाद भी हमें छोटी-छोटी तफसीलें याद रह जाती हैं। वह शायद ठीक भी है। विवाह से पहले हम हमेशा बड़ी और अनुभूतिपूर्ण चीजों के बारे में सोचते हैं, लेकिन विवाह के बाद अरसा साथ रहने के कारण ये बड़ी चीजें हाथ से फिसल जाती हैं, सिर्फ कुछ छोटी-छोटी आदतें, ऊपर से सतही दिखनेवाली दिनचर्याएँ, रोज़मर्रा के आपसी भेद बचे रह जाते हैं, जिन्हें हम शर्म के कारण दूसरों से कभी नहीं कहते, किन्तु जिनके बिना हर चीज़ सूनी-सी जान पड़ती है। उस रात मैं अकेले कमरे में अपनी पत्नी की चीजों के बीच बैठा रहा“आखिर मेरी पत्नी ही क्यों ? मैं उस रात बार-बार अपने से यह प्रश्न पूछता रहा। आपको तनिक आश्चर्य होगा कि सात वर्षों की वैवाहिक ज़िन्दगी में पहली बार मुझे अपनी पत्नी पर सन्देह हुआ था मानो उसने कोई चीज़ मुझसे छिपाकर रखी हो, कोई ऐसी चीज़ जिसका मुझसे कोई सरोकार नहीं था। (मेज़ की तरफ लौटते हुए। अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाता है।) पिता चला कि गेस्टापो-पुलिस बहुत दिनों से उसकी ताक में थी। उसके पास कुछ गैरकानूनी पैम्फलेट और पर्चियां पायी गयी थीं जो उन दिनों अज्ञात रूप से लोगों में बांटी जाती थीं। जर्मन अधिकारियों की आँखो में यह सबसे संगीन अपराध था। पुलिस ने ये सब चीजें खुद मेरी पत्नी के कमरे से बरामद की थीं और आपको शायद यह यात या बाद में मुझे । - उस रात से पहले तक मैं और वह एक ही कमरे में सोते थे, प्रेम . .

. । थे और इसी कमरे में कुछ ऐसी चीजें थीं जो उसका रहस्य थीं, जिसमें मेरा कोई साझा नहीं था। क्या आपको यह बात दिलचस्प नहीं लगती कि वे मेरी पत्नी को मुझसे कहीं अधिक अच्छी तरह जानते थे? ज़रा ठहरिये मैं अपना गिलास खत्म कर लेता हूँ, मैं फिर आपका साथ दूंगा । कुछ देर बाद वे बन्द कर देंगे और फिर नहीं, इतनी जल्दी नहीं। पीने का लुत्फ़ इत्मीनान से पीने में है। हमारी भाषा में एक कहावत है-हमें जी भरकर पीना चाहिए, क्योंकि सौ बरस बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। सौ बरस यह काफी लम्बा अरसा है, आप नहीं सोचते? हममें से कोई भी इतने अरसे तक ज़िन्दा रह सकेगा, मुझे शक है। आदमी जीता है"खाता है और पीता है और एक दिन अचानक फट । नहीं जनाब, भयानक चीज़ मरना नहीं है । लाखों लोग रोज़ मरते हैं और आप यूँ भी नहीं करते । भयानक चीज़ यह है कि मृत आदमी अपना भेद हमेशा के लिए अपने साथ ले जाता है और तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । एक तरह से वह हमसे मुक्त हो जाता है। (कुर्सी से उठकर मेज़ के अगले हिस्से पर आकर बैठ जाता उस रात मैं अपने घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में चक्कर लगाता रहा आपको शायद हँसी आयेगी कि पुलिस के बाद मैं दूसरा आदमी था जिसने अपनी पत्नी की चीजों की दुबारा तलाशी ली थी एक-एक चीज़ को उलट-पलटकर पूरी गहराई से उन्हें देखा परखा था। जैसे मैं उसका पति न होकर भेदिया पुलिस का कोई पेशेवर नौकर हूँ"मुझे रह-रहकर विश्वास नहीं हो पा रहा था कि अब मैं उससे कुछ नहीं पूछ सकूँगा। वह उनके हाथों से बच नहीं सकेगी, यह मैं जानता था। वेजिन लोगों को पकड़कर ले जाते थे, उनमें से मैंने एक को भी वापस लौटते नहीं देखा था। लेकिन उस रात मुझे इस चीज़ ने इतना भयभीत नहीं किया कि मृत्यु उसके बहुत नज़दीक है, जितना इस चीज़ ने कि मैं कभी उसके बारे में पूरा सत्य नहीं जान सकूँगा। मृत्यु हमेशा के लिए उसके . 50/तीन एकान्त - । भेद पर ताला लगा देगी और वह अपने पीछे एक भी ऐसा सूराख नहा छोड़ जायेगी जिसकी मदद से मैं उस ताले को खोल सकूँगा। दूसरे दिन रात के समय उन्होंने मेरा दरवाजा खटखटाया। मैं तैयार होकर उनकी प्रतीक्षा में बैठा था। मुझे मालूम था, वे आयेंगे। अगर मेरी पत्नी उनके सामने सब-कुछ कबूल कर लेती, तो शायद उन्हें मेरी ज़रूरत न पड़ती। किन्तु मुझे मालूम था कि मेरी पत्नी अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकालेगी। मैं उसके 'रहस्य' से अपरिचित रहा हूँ, उसकी आदतों से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। वह चुप रहना जानती थी"चाहे यातना कितनी ही भयंकर क्यों न हो। नहीं जनाब, मैंने अपनी आंखों से उसकी यातना को नहीं देखा, किंतु मैं थोड़ा-बहुत अनुमान लगा सकता हूँ। (मंच के बीचोंबीच आ जाता है।) पहला प्रश्न उन्होंने मुझसे जो पूछा, वह बिलकुल साफ़ था-क्या मैं का पति हूँ ? मैं सिर्फ उनके इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में दे सका । बाकी प्रश्न मेरी समझ के बाहर थे। किन्तु वे मुझे आसानी से छोड़नेवाले नहीं थे। उन्होंने मेरी इस बात को हँसी में उड़ा दिया जब मैंने उन्हें बताया कि मैं अपनी पत्नी की इन कार्यवाहियों के बारे में कुछ भी श्रीमती नहीं जानता। (मात्र एक आलोक-वृत्त । वह धीरे-धीरे वहाँ बैठ जाता है। पृष्ठभूमि में संगीत।) वे मुझे एक अलग सैल में ले गये। पूरे हफ्ते-भर दिन-रात वे मुझसे सिर्फ एक ही तरह के सवाल अलग-अलग ढंग से पूछते थे मैं अपनी पत्नी के बारे में क्या कुछ जानता हूँ ? वह कहाँ जाती थी ? किन लोगों से मिलती थी ? किस आदमी ने उसे लीफलेट दिये थे? मुझसे किसी तरह का भी उत्तरखींचने के लिए वे जो तरीके अपनाते थे, उनके बारे में आपको कुछ भी नहीं बता सकता । मैं चाहे कितनी तफ़सील के साथ आपको क्यों न बताऊं, आप उसका रत्ती भर भी अनुमान नहीं लगा सकेंगे वे मुझे उस समय तक पीटते थे, जब तक मैं चेतना नहीं खो देता था। किन्तु तीन एकान्त/51 उनमें असीम धैर्य था वे उस समय तक प्रतीक्षा करते थे जब तक मेरी चेतना वापस नहीं लौट आती थी और फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता था वही पुराने सवाल और अन्तहीन यातना। उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं होता था कि मैं जो अपनी पत्नी के साथ अनेक वर्षों तक एक ही घर में रहा हूँ-उसकी गुप्त कार्यवाहियों के बारे में कुछ नहीं जानता। वे समझते थे कि मैं उन्हें बेवकूफ बना रहा हूँ, उनकी आँखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रहा हूँ। नहीं जनाब, मुझे पीटते थे, मुझे इसकी पातना नहीं थी, मेरी यातना यह थी कि उनके प्रश्नों का जवाब देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि रोज़मर्रा दैनिक ज़िन्दगी के साथ-साथ वह एक दूसरी ज़िन्दगी जी रही थी 'मुझसे अलग, मुझसे बाहर, मुझसे अछूती एक ऐसी ज़िन्दगी जिसका मुझसे कोई वास्ता नहीं था। (मेज़ की तरफ़ आतै हुए, कुर्सी पर बैठ जाता है।) आपको यह बात कुछ हास्यास्पद-सी नहीं लगती कि अगर वे उसे न पकड़ते, तो मैं ज़िन्दगी-भर यही समझता कि मेरी पत्नी वही है, जिसे मैं जानता हूँ। आप जानते हैं, वे लड़ाई के अन्तिम दिन थे और गेस्टापो अपने शिकार को जल्दी हाथ से नहीं जाने देते थे मेरी पत्नी ने आखिर तक कुछ भी कबूल नहीं किया। आप जानते हैं, पहली रात जब मैंने अपनी पत्नी को कमरे में नहीं पाया था, तो मुझे काफ़ी खेद हुआ था। मुझे लगा था कि उसने मुझे अँधेरे में रखकर छलना की है। बार-बार यह खयाल मुझे कोंचता था कि स्वयं मेरी पत्नी ने मुझे अपना विश्वासपात्र बनाना उचित नहीं समझा। लेकिन बाद में गेस्टापो के सामने पीड़ा और कष्ट के असह्य क्षणों से गुज़रते हुए-मैं उसके प्रति कृतज्ञ-सा हो जाता था कि उसने मुझसे कुछ नहीं कहा । उसने एक तरह से मुझे बचा लिया था। मैं आज भी इस बात का निर्णय नहीं कर सका हूँ कि अगर मुझे अपनी पत्नी का भेद मालूम होता तो क्या मैं चुप रहने का हौसला बटोर सकता था? ज़रा सोचिये, मेरी यंत्रणा कितनी अधिक बढ़ 52/तीन एकान्त जिसे मैं जानता था और नहीं भी जानताथा"मैंने आपसे कहानकि जब जाती अगर मेरे सामने कबूल करने का रास्ता खुला होता ! आप मजबूरी में बड़ी-से-बड़ी यातना सह सकते हैं, लेकिन अगर आपको मालूम हो कि आप किसी भी क्षण उस यातना से छुटकारा पा सकते हैं, चाहे उसके लिए आपको अपनी पत्नी, अपने पिता, अपने भाई के साथ ही विश्वासघात क्यों न करना पड़े तब आप यातना की एक सीमा के बाद वह रास्ता नहीं चुन लेंगे, इसके बारे में कुछ भी कहना असम्भव है। चुनने की खुली छूट से बड़ी पीड़ा कोई दूसरी नहीं। मुझे कभी-कभी लगता है कि निर्णय की इस यातना से मुझे बचाने के लिए ही मेरी पत्नी ने अपना रहस्य कभी मुझे नहीं बताया। आप ऐसा नहीं सोचते ? सम्भव है, मैं गलत हूं लेकिन जब रात को मुझे नींद नहीं आती तो अक्सर मुझे यह सोचकर हल्की-सी तसल्ली मिलती है कि "छोड़िये, मैं समझा नहीं सकता। जब मैंने आपको अपनी मेज़ पर बुलाया था तो इस आशा से नहीं कि मैं आपको कुछ समझा सकूँगा। क्या कहा आपने? नहीं जनाब उसके बाद मैंने अपनी पत्नी को दुबारा नहीं देखा। (संगीत । वह कुर्सी से उठकर सामने आ जाता है, जैसे दर्शकों के पीछे कोई पोस्टर पढ़ रहा हो।) एक दुपहर जब मैं घर लौट रहा था, मेरी निगाहें उस पोस्टर पर जा पड़ी थीं। उन दिनों अक्सर वे पोस्टर तीसरे-चौथे दिन शहर की दीवारों पर चिपका दिये जाते थे हर पोस्टर पर तीस-चालीस नाम होते थे जिन्हें पिछली रात गोली से मार दिया गया था जब मेरी निगाह अपनी पत्नी के नाम पर पड़ी तो मुझे कुछ क्षणों तक यह काफी विचित्र-सा लगता रहा कि उस छोटे-से नाम के पीछे किसी ऐसी औरत का चेहरा हो सकता है, तक आप अपनी आँखों से किसी को मरते न देख लें, आपको विश्वास नहीं होता कि अब वह जीवित नहीं है एक धुंधली-सी आशा बनी रहती है कि आप दरवाज़ा खोलेंगे। तीन एकान्त/

(पुनः कुर्सी की तरफ़ लौटता है। ओवर-कोट
पहनता है।)
लेकिन देखिये, मैं अपनी बातें दुहराने लगा हूँ। बीयर पीने का या
कि आप एक ही दायरे के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं "राउ
राउण्ड ! आप जा रहे हैं ? जरा ठहरिये मैं 'सलामी' के कुर
अपनी बिल्ली के लिए खरीद लेता हूँ "बेचारी इस सर
भूखी-प्यासी मेरे इन्तज़ार में बैठी होगी। नहीं नहीं आपको
आने की जरूरत नही
। मेरा घर ज़्यादा दूर नहीं है और मैं
अपनी सीमा जानता हूँ। मैंने आपसे कहा था न-सिर्फ डेढ़ इंच
(अनुपस्थित पात्र के साथ-साथ बाहर निकल
सगीत के साथ ही सारा आलोक अंधेरे में डूबर
.
54/ तीन एकान्त

वीकएंड वीकएंड में सुरेखा सीकरी

(अंधेरा। मंच के बीचोंबीच उभरता एक आलोक-वृत्त।
कहानी की नायिका चाय का कप हाथ में लिये खड़ी है और
दूर कहीं देख रही है-टेप-रिकार्डर पर आती उसकी
आवाज़।)
"यह मैं याद रखूगी, ये चिनार के पेड़, यह सुबह का भूरा आलोक । और
क्या याद रहेगा? पेड़ों के बाद बदन में भागता यह हिरन, आइसक्रीम का
कोन, घास पर धूप में चमकता हुआ, एक साफ़, धुली पीड़ा की फाँक
जैमा, मानो अकेला अपने को टोह रहा हो।
(अलार्म की आवाज़ । पलंग और उसके पास रखा स्टूल
आलोकित हो उठता है। वह स्टूल पर रखा अलार्म उठा
लेती है और उसे बन्द कर देती है।)
सोते रहो, तो कुछ नहीं लेकिन अगर जागते में सुनायी पड़े, तो वह
सचमुच में अलार्म-सा सुनायी देता है, एक खतरा, एक चेतावनी-कमरे
के आधे अँधेरे में चीखता हुआ जंतु, जिसके मुंह पर अंगुली रखने से वह
चुप हो जायेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।
(चाय का कप स्टूल पर रखकर, पलंग के पैताने पड़ी पैंट
उठा लेती है।)
हम अगर अपने कमरे में हों, अपने बिस्तर पर रात गुज़ारी हो तो, तब
मुश्किल नहीं पड़ती, तब आँख खोलते ही हम वहाँ से शुरू होने लगते हैं,
जहाँ पिछली रात खत्म हुए थे, लेकिन पराये कमरे में हर चीज़ ठिठकी
रहती है, एक खाली फ्रेम, एक रफ़ ड्राफ्ट की तरह-अपने उतारे हुए
कपडे, आधे पानी का गिलास, उसकी नंगी बाँहें-सब कुछ पिछली रात
तीन एकान्त/57

जुड़े हुए, अपने-अपने बोझ के संग। (पैंट पहनने लगती है और नाइटी उतार देती है।) हर दिन के साथ एक नया साहस शुरू होता है। यह हमारा घर है-वह कहता था-तुम हमारी हो और मुझे सचमुच लगता, जैसे मैं उस 'हमारे' में शामिल हूँ। वह कहता था, मैं सुनती थी घर कहीं न था, इसीलिए घर की आवाज़ अच्छी लगती थी। इस आवाज़ में धूप होती थी और जब वह कहता था, तुम हमारी हो, तो वह धूप एक घने जंगल में चली जाती थी। (पृष्ठभूमि में कहीं दूर एक रेलगाड़ी के गुज़र जाने की आवाज़ । पलंग पर बैठकर सैंडिल पहनती है।) अपने 'वीकएंड' हम हमेशा दूसरे शहर में गुजारते थे, जो बहुत पास था लेकिन ट्रेन में बैठकर लगता था, जैसे हम दोनों अर्से से साथ रहते आये हैं वह अपना सिर मेरे कंधों पर रख देता, और मैं बाहर देखती। (पलंग के बायीं ओर रखे स्टूल की ओर आती है, उस पर पड़ा ब्रश उठाकर बाल संवारने लगती है।) ये हमारे दिन थे। जब मैं बाहर जाती,लोग समझते थे, मैं काफ़ी अकेली हूँ। मैं चलती जाती थी, अपनी दुनिया के हाशिये पर, धूप में ऊंघते हुए, और तब सहसा पाँव रुक जाते और मैं रात के बारे में सोचती, जो पिछली रात थी, जब हम साथ थे, अगली रात के बारे में, जो पूरे हफ्ते बाद आती, शनिवार, इतवार"जैसे नीचे रेल के पहिये केवल इन दो शब्दों को दुहराते हुए चक्कर काट रहे हों। कितना अजीब है, बचपन में रेल के पहिये जिन शब्दों को दुहराते थे, वे अब भी वैसे ही हैं, मरते हुए, ऊपर उठते हुए, फिर मरते हुए। (पलंग के नीचे रखे बैग में नाइटी, ब्रश इत्यादि समेटती . मरता कोई नहीं । आखिर तक जाकर सब लौट आते हैं। दिन भी खत्म नहीं होता। दूसरे दिन वही घड़ी लौट आती है, जो पिछली रात जंजीर 58/तीन एकान्त वीकएंड में सुरेखा सीकरी COM सुरेखा सीकरी की एक और मुद्रा वीकएड मे सुरेखा सीकरी तोड़कर बाहर अंधेरे में भाग गयी थी, पालतू कुत्ते की तरह पांव के पास आकर बैठ जाती है। हांफती हुई जैसे यह दिन रेल के डिब्बे में बन्द धूप में उनींदी आंखें, जिन्हें मैं अपने होंठों में मूंद लेती, अगर आसपास इतने लोग न होते। (पलंग के दायीं ओर रखे स्टूल पर से अपना पर्स उठाने आती है।) नही, मरता कोई नहीं। हवा में उठा हुआ संकेत भी नहीं, जो एक जगह उठा रहता है, अपनी तरफ़ बुलाता है और मैं भागती हुई उसके पास बैठ जाती हूँ। (अंधेरा और तुरंत मंच का अगला हिस्सा आलोकित हो उठता है। वह अपने पर्स और बैग के साथ जैसे पार्क में आ गयी है।) हम रेल से उतरकर स्टेडियम के मैदान में बैठ जाते थे। चारों तरफ घास थी, लम्बी, भूरी घास, तार के खम्भे थे, काफी दूर बोर्डिंग हाउस की इमारत थी मैं बैठी थी, जैसे यह मेरी इतवार की पिकनिक हो । (बैग में से एक चादर निकालकर घास पर बिछा देती है।) जब हम रेल में बैठे थे, मैंने उससे कहा था कि इस बार मैं अकेली बेंच पर नहीं बैलूंगी, वह अपनी बच्ची को बाहर मैदान में ला सकता है। मैं उसे देवूगी, खेलते हुए और वह जान भी न पायेगी कि मैं 'वह' हूँ जो उसके साथ आयी है । वह मैं हूँ, यह मेरे अलावा वहाँ कोई न जानेगा और तब उसे भी बुरा न लगेगा कि वह किसी 'परायी' लड़की के साथ अपनी बच्ची से मिलने आया है"मुझे तो बुरा नहीं लगेगा-उसने कहा था। बुरा क्यों लगेगा? मैं महीनों से उसकी बच्ची को देखने को उत्सुक रही । दूर पवेलियन की खाली बेंचें थीं, एक के ऊपर एक किसी पुराने रोमन एंफीथियेटर की तरह। लाल टिन की छत धूप में चमचमा रही थी। यह मार्च का दिन है, जो उठने के साथ-साथ चमकीला होता जाता 62/तीन 'एकान्त (उठ खड़ी होती है और मंच के दायें कोने की ओर बढ़ती । "यहाँ मैं हूँ। वह आदमी बच्ची से मिलने आया है। शाम तक वे खेलेंगे। मैं उन्हें देखूगी। रात को हम लौटेंगे। ये शब्द तसल्ली देते हैं, खुद खाली होकर भी मेरी खाली जगहों को ढक देते हैं। (मंच का अगला हिस्सा धीरे-धीरे मंद और पिछले हिस्से में पूरा आलोक, जैसे वह सोचती-सोचती पुनः कमरे में आ गयी है। पलंग पर बैठ जाती है।) यह मैं अब समझती हूँ। पहले मैं ऐसी नहीं थी-पहले मैं ज़बरदस्ती करती थी। पांच दिन काम के बाद जब मैं उसके कमरे में आती, मेरी तसल्ली खत्म हो जाती। क्या हम ऐसे ही मिलते रहेंगे, चोरों की तरह ? चौर भी बाहर निकलते हैं। तुम कोई फैसला लो। न इधर, न उधर ! मैं बच्चों की तरह कपड़े खींचने लगती। कमरे के चारों तरफ़ चक्कर काटने लगती। सब-कुछ काटने को दौड़ता। खुद सबको काटने दौड़ती। वह सुन्न-सा होकर मेरी तरफ़ देखने लगता। फिर मैं उसे देखती और रोने लगती । कुछ मुझे डर लगता, मुझे उसके सुन्न हो जाने मे बहुत डर लगता। मुझे डर लगता कि जैसे उसकी पत्नी ने उसे खो दिया है, मैं भी उसे खो दूंगी। नहीं, तुम ऐसे ही ठीक हो, मैं धीरे से फुसफुसाती और वह मुझे खींच लेता। हम दोनों एक-दूसरे को पकड़ लेते। हम छूने लगते, एक-दूसरे की खाली जगहों को, जहाँ भूत बसेरा करते थे। वे मेरे होंठों, मेरे कटकटाते दाँतों के नीचे कांपने लगते । मुझे लगता, जैसे मेरे होंठ पहली बार उसके अंगों की यात्रा कर रहे हों हम ऊपर चढ़ते जाते थे और जब वह शिखर को छू लेता, तो मैं भागती हुई उसे पकड़ लेती थी और कुछ देर तक हम एक-दूसरे की साँसों में ढके हुए वहीं लेटे रहते "वहीं शिखर पर वहां कोई न होता था-न भूत-प्रेत, न कोई शोर, सिर्फ एक सुख का सन्नाटा । फिर जब हम नीचे उतरते, मैं तौलिये से अपनी देह पोंछने लगती, जहाँ-जहाँ मैं उसकी चाहना के नीचे तीन एकान्त/63 । । भीगी थी। उसकी देह पोंछने लगती, बच्चों की-सी सफ़ेद निरीह देह, जो विवाहित होने के बावजूद कुँआरी जान पड़ती। यह सोचना असंभव लगता कि बहुत पहले कभी दूसरे हाथों ने उसे छुआ होगा, अपने में समेटा होगा । देह के जिन कोनों में मेरी पीड़ा फैसी है. वहाँ उसके प्रेत हैं। मैं उन्हें खोलती हूँ। वे आते हैं। (कमरा फिर अँधेरे में और पार्क आलोकित हो उठा है। वह पलंग से उठकर पुनः अपनी जगह पर, सामने की ओर देखती हुई।) वे आ रहे हैं मैं उन्हें दूर से देख सकती हूँ। उनकी आवाजें हवा पर उठती हैं और मेरा दिल बैठने लगता है। फिर सहसा बच्ची ठिठक गयी, जैसे ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे, उसने आदमी का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें काफी चौकन्नी होंगी। मैंने मुसकराने की कोशिश की। बच्ची मेरी कोशिश को देख रही थी। हमेशा से बच्चे मुझे आतंकित करते रहे हैं। और अगर वे लड़कियों हों, तो और भी ज़्यादा, क्योंकि तब मुझे लगता है, जैसे वे मेरा 'भेद' जानती हों! वह उसकी बच्ची है, उस आदमी की, जिसे मैं चाहती हैं, जिसे मैं बेहद चाहती हूँ। उसने बच्ची के कानों में कुछ कहा। शायद कहा कि बेंच पर बैठी लड़की को वह जानता है। वह अजनबी नहीं है, उसे उससे डरना नहीं चाहिए। बच्ची मुझे देखती रही तनी हुई रस्सी कुछ ढीली पड़ी, लेकिन जहाँ पहचान आनी चाहिए थी, वहाँ सिर्फ सलवटें थीं और तब मुझे हैरानी हुई कि बच्ची उम्र में चाहे छोटी हो, उसकी अपनी शते हैं और अपनी शर्तों में वह उतनी ही आत्मनिर्भर और अकेली है जितनी यहाँ मैं । हम दोनों एक मैदान में हैं और दोनों को किसी लिहाज़ की ज़रूरत नहीं। (नीचे लेट जाती है और एक सिगरेट सुलगा लेती है।) 64/तीन एकान्त मार्च की हवा ऊपर से गुज़र जाती है। उन्होंने मुझे अकेला छोड़ दिया है "वह अब उससे खेल रहा है । दोनों रेत के ढूहों के बीच भाग रहे हैं। तुम ऊब तो नहीं रहीं? नहीं, मैं नहीं, मैं ऊब नहीं रही। मैं मजे में । मैं सचमुच मजे में हूँ। यह कितना खुला दिन है ! मैं कितनी खुली हूँ! मैं कहीं भी जा सकती हूँ" (अधलेटी होकर सामने देखती है।) कितना आसान है ! उसने आइसक्रीम खरीदी है- एक बच्ची के लिए, दूसरी मेरे लिए । एक क्षण के लिए हम अपनी दूरी पाट जाते हैं, लगता है, वह मेरी साथिन है। पर वह मुझे अजीब कातर निगाहों से देखती है, जैसे पास आना चाहती हो, लेकिन डर छोड़ना नहीं चाहती। डरपोक लड़की "मैं अपना गुस्सा दबाकर उसके डर का काँटा बाहर निकालती हूँ, तब देखती हूँ, जैसे उसकी सारी आत्मा लहूलुहान है और मैं जल्दी से काँटे को वहीं दबा देती हूँ, जहाँ वह पहले था। वह लौट जाती है। मेरे पास उसे देने को कुछ नहीं है। (उठ खड़ी होती है।) कितना आसान है"मैं कहीं भी जा सकती हूँ। मेरे लिए सब कुछ खुला है। मेरे कोई बंधन नहीं, जैसे उसके हैं-एक छोड़ी हुई पत्नी, एक बंधी हुई बच्ची बीच में मैं "खाली जगह को भरती हुई, हवा की तरह, जो हरसूने कोने में बसेरा कर लेती है और जब फैलती हुई दुनिया उस खाली जगह को भरने का दावा करती है, तो मैं कुछ भी नहीं कहती, अपना बोरिया-बिस्तर उठाकर दूसरी तरफ चल देती हूँ। लेकिन मैं जाऊँगी कहीं नहीं, मैं यहाँ हूँ, पार्क के एक कोने में, खुली रोशनी के नीचे, उनकी आवाजें सुनती हुई। यह मेरा वीकएंड है । इसे कोई मुझसे नहीं छीन सकता। (मंच के बायें कोने में आकर दूर देखती हुई। टेपरिकार्डर , ।

पर मेरी-गो-राउंड और बच्ची की चीखें।) वे अब भी घूम रहे हैं-'मेरी-गो-राउंड' के चक्कर में, कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ पत्तों की सरसराहट के बीच चीखें सुनायी देती हैं । वह घोड़े पर है-लकड़ी के लाल-नीले घोड़े, मोटरें, ट्रेक्टर, ऊपर-नीचे उठते हुए। दूर से वे कठपुतलियाँ दिखायी देते हैं, एक-दूसरे के पीछे भागते हुए, हवा में तिरते हुए। वह किनारे पर खड़ा है, हल्के-से उसके घोडे को धक्का देता है, अपने से परे, फिर भी इतना परे नहीं, जहाँ सुरक्षा न हो"नहीं, बच्ची की चीखों में कोई डर नहीं, वे डर के हाशिये को छूकर लौट आती हैं, वे पंखों-सी हल्की हैं, हवा में बहती हुई, धूप में चमचमाती-वे एक बहाना हैं, जहाँ डर लगता है, होता नहीं। मुझे पहली बार ईर्ष्या हुई, एक सूखी-सी जलन, जिसे मैं पीछे छोड़ आयी थी। (सिगरेट घास पर मसल देती है और पुरुष व उसकी बच्ची को जाते हुए देखती रहती है।) तुम यहीं बैठो-मैं इसे छोड़कर अभी आता हूँ। बच्ची अलग खड़ी थी, अपने पिता के पीछे सिमटी हुई, बिस्कुट, केक, फलों के लाल फीतों से बँधेडिब्बे-जिन्हें पिछले दिन हमने खरीदा था-अब बच्ची के हाथों में थे। पूरे एक हफ्ते तक चलनेवाली चीजें । इस बार मैंने बच्ची को ध्यान से देखा, जैसे उसे पहली बार देख रही हूँ-छोटा चेहरा, हल्का-सा पीला, दोनों होंठ अधखुली डिबिया-से खुले, लेकिन आँखें बहुत बड़ी और काली, किनारे से देखो, तो बाप जैसी ही बीहड़। वह जान गयी थी, यह जाने की घड़ी है और किसी तरह का विरोध बेमानी है। बच्चे अपनी नियति को उसी तरह सँघ लेते हैं, जैसे कुत्ते आने वाली मौत को-एक सीमा के बाद वे छटपटाना छोड़ देते हैं। पर ठीक है, किसी दिन बड़ी उम्र में जब वह अपना चेहरा देखेगी, तो यह दुपहर शीशे के बाहर झोकेगी, उसकी तरफ़ ताकती हुई। वह सोचेगी. जब मैं छोटी थी, एक अजनबी लड़की मेरे पिता के साथ आयी - 6/तीन एकान्त थी,दिन-भर घास पर बैठी रही थी। वह कभी दुबारा नहीं आयी, लेकिन, हम दोनों ने एक साथ आइसक्रीम खायी थीं। कितना अजीब है बड़े होकर सिर्फ छोटी चीजें याद रह जाती हैं-धूप में चमकते मगलियों के छिलके, आइसक्रीम का कोन । (पर्स में से आइना लेकर मेक-अप ठीक करती. निकालकर लिखने लगती है और फिर सो जाती है। दूर कहीं घड़ी की टन-टन की आवाज़ सुनकर उठ बैठती है और चारों तरफ़ देखती हुई।) वह छाया, जो पैवेलियन की छत से पेड़ों पर, पेड़ों से पार्क पर उतर.आयी थी, अब शहर के स्क्वायर को घेरने लगी थी। लगता था, वह छोटा शहर दो हिस्सों में कट गया है-आधा घिरते अँधेरे में, आधा सिकुड़ती धूप में। छोटे शहर की अपनी दरानें होती हैं, एक खींचो तो सब कुछ बाहर निकल आता है, धुंधुआती बत्तियाँ, गिरजे पर उड़ते कबूतर, लड़कियों का बोर्डिंग-हाउस, लम्बे शीशोंवाली खिड़कियां । (जिधर से पुरुष आ रहा है, उस तरफ़ देखते हुए।) अब वह आ रहा है। मरती हुई धूप में चमकते पत्थर, उन पत्थरों पर चलते उसके पैर, और तब मुझे यह चमत्कार-सा जान पड़ा, कि यह आदमी मेरा है, मेरे पास आ रहा है-यह एक अद्भुत अविश्वसनीय घटना थी-सिनेमा के एक दृश्य की तरह-जब रील खोलो, तब वही एक घटना-खिड़की के स्क्वायर पार करता हुआ वह आदमी, धूप में चमकते पत्थर, पत्थरों पर चलती पैरों की छाया-ये शाश्वत चीजें हैं, जिन्हें कोई मुझसे नहीं छीन सकता, न वह बच्ची, न उसकी पत्नी। (पुरुष की उपस्थिति को अनुभव करती है।) उसकी साँस मेरी तरफ़ आयी थी। मैं आँख मूंदकर उसकी साँस पहचान सकती हूँ। उसके कपड़ों की गंध की तरह । सबसे पहले मैंने उसकी घबराहट को देखा,जब वह मेरे पास आया था। फिर उसकी सांस आयी तीन एकान्त/67 - थी। फिर उसने मेरे कंधों को छुआ, उसी जगह, जहाँ प्यार करते समय उसके भूखे होंठ होते थे। फिर वह धीरे से मुसकराया-हालाँकि चेहरे की खुश्की जैसी थी, वैसी जमी रही। मुझे देर तो नहीं हुई ? उसने मेरी तरफ़ झाँका, उसकी आवाज में हल्की-सी थरथराहट थी। जैसे हवा में बिजली का तार कांपता है। मैं चाहता था, उसे सुलाकर लौट सकूँ तब मैंने उसकी तरफ देखा, जैसे महज़ सीधा देखने से ही मैं उसकी पीड़ा बैंक लूंगी। वह सो गयी थी ? मैंने पूछा । वह हिचकिचाहट, झूठ और सच के बीच उसकी हिचकिचाहट, बहुत पुरानी थी। जब मैंने पहली बार उससे पूछा था कि वह विवाहित है, मुझे उसकी झिझक बहुत हास्यास्पद लगी थी, क्योंकि सच पूछो तो मुझेरती-भर परवाह नहीं थी कि वह विवाहित है या नही, जब तक वह मेरे पास है, हालाँकि उसकी बच्ची को देखने की उत्सुकता शुरू से ही थी। नही, जब मैं उसे छोड़कर आने लगा, तो वह रोने लगी। उसने अपने चेहरे को मेरी अंगुलियों से ढंक लिया। मैं वहीं खड़ारहावार्डन ने मुझे जाने के लिए कहा, क्योंकि जितनी देर मैं वहाँ खड़ा रहूँगा, उसकी उम्मीद बनी रहेगी कि मैं उसे छोड़कर जाऊंगा नहीं। जब मैं सीढ़ियाँ उतरने लगा, तब भी मुझे उसकी चीखें सुनायी दे रही थीं। चीखें "काफ़ी बीहड जंगल रहा होगा, वहाँ अकेली बच्ची रहती होगी। रात को जब वह मेरी देह को छुएगा, तो सीढ़ियों पर उतरती हुई चीखें ठिठक जायेंगी। अपने-आप उलटे पांव लौट जायेंगी। इस दुनिया में मुझे किसी पर उतना भरोसा नहीं, जितना अपनी देह में, देह की चाहना मे। उसके सहारे वह जहाँ भी हो, वहाँ से मैं उसे खींचकर ला सकती हूँ। उसमे जादू है-वह खुद अपने में जादू है। लेकिन इस क्षण नहीं। इस क्षण मेरा उससे कोई वास्ता नहीं। उसके हाथ मेरी देह से परे हैं। (अपना सामान समेटने लगती है। पार्क अंधेरे में और कमरे में प्रकाश। वह डायरी हाथ में लिये जैसे पढ़ रही है। । 68/तीन एकान्त . - टेपरिकार्डर पर उसकी आवाज़।) वह अलग समय था। मैं शुरू गर्मियों में उससे मिली थी। फिर सर्दियां आयी थीं और मैंने सोचा था, अब कोई फैसला होगा"वह यहाँ होगा, जहाँ मैं हूँ -या दूसरी तरफ, जहाँ हम चोरों की तरह मिलते हैं, जहाँ सुनसान वीकएंड हैं, बहुत दूर बच्ची है, आती-जाती रेलें हैं। फिर इन पेड़ों पर पत्ते आना शुरू हुए, जब हम प्यार करते, पेड़ों की तरह फ़ासले गुज़र जाते।"गर्मियों के दिन भी, सीढ़ियों पर उतरना-रोना भी। फिर वह दिन आया, जब मैंने सोचा था, अब उससे कभी नहीं मिलूंगी। मैं सड़क पर चलती रहूँगी और अगर वह कहीं दिखायी देगा, तो उसकी तरफ देखूगी भी नहीं, पीछे मुड़कर भी नहीं-जैसे वह हवा है, और मैं आँखें मूंदकर उसके बीच से गुज़र जाऊंगी। (डायरी पढ़ना बन्द कर देती है और पलंग पर बैठ जाती है। लेकिन जब मैं आँखें खोलती, वह वहीं होता, जहाँ वह पहले था, मैं उसके भीतर होती, एक सन्नाटे की तरह, और वह करवट बदलकर मेरी तरफ़ देखता, मैं ठीक हूँ, वह कहता, तुम अभी सोयीं नहीं। अभी सारी रात बाक़ी है "सुनो, तुम अब भी सोच रहे हो? किसके बारे में ? उसने आँखें खोली और हल्के कौतूहल से मेरी तरफ़ देखा। जब शाम हुई थी, मैंने कहा, तुम सीढ़ियाँ उतर रहे थे, वह रो रही थी। (मंच के दायें कोने में टेलीफ़ोन की ओर बढ़ती है।) मैं बाहर आयी और चलती गयी फिर रुक गयी"सब जगह अंधेरा था। सिर्फ गलियारे के बीच, सीढ़ियों के पास एक पीली बत्ती टिमटिमा रही थी। उसके नीचे टेलीफ़ोन था, मुझे अपनी ओर खींचता हुआ। (रिसीवर उठा लेती है।) जब रिसीवर उठाया, तो आपरेटर की आवाज़ सुनायी दी, कौन-सा शहर? कौन-सा नंबर? नंबर मिलते ही वह ठिठक गयी "मुझसे तीन एकान्त/69

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- टुथ-ब्रश में। तुम जा रही हो? उसकी सोयी आवाज़ में पिछली दोपहर की गन्ध थी-घास की, बीते हुए समय की मैं फिर आऊँगी, मुझे खुशी हुई कि मैं इन गंधों के बासी होने से पहले ही जा सकती हूँ। मैं फिर आऊंगी, अगले हफ्ते, लेकिन इस समय मैं जा सकती हूँ-अपने अकेले कमरे में, अपने ठंडे अनछुए बिस्तर पर। मुझे उन दंपतियों पर हमेशा हैरानी होती है जिन्हें एक दिन के बाद दूसरे दिन भी साथ रहना पड़ता है। वे कैसे उन भूरे रंग के खाली अन्तरालों को जोड़ पाते होंगे, जिनसे देह की उत्सुकता और पीड़ा उपजती है ? नहीं, सोये हुए बिस्तरों की आत्मीयता मेरे लिए नहीं है-वे उन फैसलों की तरह हैं, जिनसे परिवार बनते हैं । (अपने बैग और पर्स के साथ कमरे से बाहर निकल आती है। मंच का पिछला हिस्सा अंधेरे में डूब जाता है।) मेरे लिए वीकएंड हैं-अँधेरे में अलग-अलग लैंप-पोस्टों की तरह जलते हुए। सुबह होते ही वे बुझ जाते हैं और मैं अपना पर्स और लेकर बाहर आ जाती हूँ। मैं सुबह ही लौट आती हूँ-चोरों की तरह, ताकि दूसरे पड़ोसी मुझे एपार्टमेंट से बाहर आते हुए न देख सकें। जाने से पहले मैं एक बार-आखिरी बार उसके कमरे को देखती हूँ-दीवार की तरफ मुड़ा हुआ उसका सिर, आधे तकिये पर मेरे सिर का निशान, बच्ची के बहुत पुराने खिलौने, जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं, मेरी कुछ किताबें, जिन्हें मैं हर हफ़्ते वहीं छोड़ आती हूँ"और वे तीन चिनार के पेड़, जहाँ पहले पते थे, अब वे खाली हैं । फिर बसन्त के दिन आयेंगे और मैं अगली गर्मियों की प्रतीक्षा करूँगी, उसके बाद पतझर और फिर सर्दियों के छोटे, धुंधले दिन। (मंच के दायें कोने की ओर बढ़ आती है।) मैं सीढ़ियां उतरती हूँ और बाहर चली जाती हूँ। सड़कों का कोलाहल सहसा मुझे एक अजीब तसल्ली देता है-काम पर जाते हुए लोग, भरी हुई ट्रामें, स्कूल जाते हुए बच्चे-कभी-कभी उनमें से कोई मुझे उत्सुक आँखों से देखने लगता है । सोचता होगा,कितनी अकेली लड़की है, पता । । तीन एकान्त/71

नहीं, इत्तनी सवेरे कहाँ जा रही है ?
नहीं, मैं कहीं जा नहीं रही, सिर्फ सौट रही हूँ।
(वह सामने देराती हुई। धीरे-धीरे अंधेरा।)
72/तीन एकान्त

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HER
निर्मल वर्मा
जन्म . -1929 1 जन्मस्थान शमेला बचपन
पहाडों पर बीता डोंट स्टीफेंस कालजदिल्ली।
इतिहास में एम. ए. कुछ नि अध्यापन
1959 में प्राग, चेकोस्लोवाकिया, के प्राच्य विद्या
संस्थान और चेकोस्लोवाक लेखक संघ द्वारा
आमंत्रित। 7 वर्ष चेकोस्लोवाकिया में रहे और कई
चेक कथाकृतियों के अनुवाद किए। कुछ वर्ष लंदन
में यूरोपप्रवास के दौरान 'टाइम्स आफ इंडिया' के
लिए वहाँ की सांस्कृतिक-गजनीतिक समस्याओं पर
लेख और रिपोर्ताज लिसे। 1972 में वापसी ।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ (शिमला)
में फैलो रहे और मिथक-चेतना पर कार्य किया।
1977 में इंटरनेशनल राइटिंग प्रोग्राम, आयोवा
(अमेरिका), में हिस्मेदारी। 'मायादर्पण' कहानी पर
फिल्म बनी, जिमे 1973 का सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म
पुरस्कार प्राप्त हुआ। 'कव्वे और काला पानी'
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ।
प्रकाशित पुस्तकें : परिंदे, जलती झाडी, पिछली
गर्मियों में, बीच बहस में, कव्वे और काला पानी
(कहानी-संग्रह); वे दिन, लाल टीन की छत, एक
चिथड़ा सुख (उपन्यास); चीड़ों पर चाँदनी, शब्द
और स्मृति, हर बारिश में, कला का जोखिम, ढलान
से उतरते हुए (निबंध तथा संस्मरण); तीन एकांत
(नाटक): दूसरी दुनिया, मेरी प्रिय कहानियाँ
(संकलन)। अंग्रेजी में अनूदित · डेज ऑफ लागिग
(उपन्यास): हिल स्टेशन (कहानियाँ)।
.

Teen Ekant

Author
Nirmal Verma
Title
Teen Ekant
File name
Teen Ekant
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2011/03
Publisher
Rajkamal Prakashan Private Limitad New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
78
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551015
Barcode
4990010031798.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
fyzTaOUnodg
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Teen Ekant