Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Meri Hajamat
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मेरी हजामत
लेसक
श्रीयुत अन्नपूर्णानन्द
३
प्रथम यार
मूल्य ॥
प्रकाशक- बलदेव मित्रमण्डल जालिपादेवी काशी मुद्रक- श्री अपूर्वकृष्ण बोस, इण्डियन प्रेस, लिमिटेड, बनारस-बाच
मिय बडे भाई
श्रद्धेय श्री सम्पूर्णानन्दजी
को
सादर समर्पित
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" आवश्यक निवेदन प्रस्तुत पुस्तक मेरी तीन कहानियों का सग्रह है जो समय- समय पर धारावाहिक रूप से प्रकाशित होती रही हैं। "ब्राह्मण- भोजन" मैंने केवल 'भोजन भट्ट' ब्राह्मणों को लक्ष्य करके लिसा था, ब्राह्मण जातिमात्र के प्रति मेरे ये भाव कदापि नहीं हैं। "मेरी हजामत" के एक परिच्छेद का कुछ दृश्य मैंने किसी अँगरेजी पत्रिका से लिया है, जिसे पढे मुझे बहुत दिन हो गये हैं और जिसका नाम भी मुझे अब याद नहीं है। "बडा दिन' में मैंने भूलकर भी किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं किया है-यह दूसरी बात है कि 'चोर की दाढी मे तिनका' वाली कहावत के अनुसार कुछ लोग इसे अपने ही पर लागू समझ ले। साहित्यिक खुर्दवीन की मदद लेने पर प्रस्तुत पुस्तक में अनेक दोषाणु दोस पडे गे, जिनके लिये मैं सहृदय पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ। जालिपादेवी काशी अन्नपूर्णानन्द
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प्रकाशक के दो शब्द "सीता-अन्ध-माला" का यह प्रथम पुष्प पाठकों की सेवा में अर्पित करते हमें अत्यन्त दर्द हो रहा है। इसकी छपाई, सफाई में हमने अपनी ओर से कोई कसर नहीं रक्सो है- यद्यपि चमकीले चित्र देकर, चित्र द्वारा ही पुस्तक को महत्ता प्रदान करनेवाले पाठकों की अभिरुचि की तृप्ति का प्रयास भी हम न कर सके। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के इस युग में, सरस तथा स-ओज साहित्य के साथ ही यदि उसमें जनता की नवीन कामुकता की परितुष्टि का साधन न हो-तो वह 'बाजार' में नहीं चलती। किन्तु हम सुरम के साथ ही सुन्दर तथा शील- युक्त साहित्य ही माला में प्रकाशित करेंगे। आशा है, उदार पाठक हमे इस प्रयत्न मे अपनी सहायता द्वारा सफलता दिलायेंगे। प्रस्तुत पुस्तक एक ऐसे लेसक की एक अनासी हास्यरस. पूर्ण तीन गल्पों को गुटिका का समह है जिसने कुछ समय तक मृत 'भूत' तथा 'मतवाले' में हलचल मचा रक्सा था। लेसक की रचना में प्रधानता इस बात की है कि वह अधिकांशत मौलिक, स्वतन्त्र तथा प्रत्येक वाक्य में मार्मिकता भरी हुई है। आशा है हिन्दी ससार अवश्य इसका आदर करेगा-इम साथ ( २ ) आपकी दूसरी रचना भी शीघ्र ही प्रकाशित करेंगे। ही, इस पुस्तिका के भूमिकालेसक महामना पं. पद्मसि हजी शर्मा के आदेशानुसार स्वर्गीय श्री रुद्रदत्तजी की भी हास्य रस- पूर्ण रचनाओं का सग्रह प्रकाशित करने का विचार है। अन्त में, हम ५० पद्मसिंहजी शर्मा के अत्यन्त कृतज्ञ हैं कि आपने समयाभाव होने पर भी पुस्तक पर अपनी अमूल्य सम्मति देने का कष्ट किया। विनीत प्रकाशक प्रस्तावना , हास्यरस को हँसी खेल समझकर कुछ लोगो ने आज कल इस गरीब की सासी छीछालेदर कर रक्सी है, असख्य स्वयम्भू कवियों की तरह हास्यरस के लेखकों को भी हिन्दी में एक बाढ़ सी आ गई है। जो एक फिकरा भी सजीदगी से चुस्त नहीं कर सकते वही यहाँ वीरवर और अकवर ( बाद- शाह नहीं, कवि ! ) बनने का दम भरते हैं। यार लोगों ने 'मजाक' को महज मजाक ही समझ लिया है, 'हास्य' की हँसी उडाई जा रही है, जराफ़त का मुंह चिढाया जा रहा है, नगी गालियो को व्यगय का नाम दिया जाता है, सभ्यता की साडी फाडी जाती है, मजाक की प्राड मे पनलिक का मजाक विगाडा जाता है, और नाम धरा जाता है 'हास्यरस' | अद्भुत उपहास है। 'प्रातिश' ने किसी ऐसे ही मौके पर कहा होगा "लगे हो मुंह चिढाने देते देते गालियाँ साह्य । जवाँ बिगडी तो विगडो थी सपर लीजो दहन विगडा ।' हास्यरस की कला वडी कठिन है, किसी विरले प्रतिभा- शाली लेखक को ही इसमे सच्ची सफलता प्राप्त होती है, ध्वनि और व्यगर की प्रधानता न हो फिर कहने का टङ्ग चुभता चमत्कृत और अनूठा न हो तो हास्य में जान ही नहीं आती, मदा और भीडा भडौमा होफर रह जाता है, इसी मजाफ का - ( स ) सारा मजा ही किरकिरा हो जाता है। मजाक का मजा जब है कि जिससे मजाक किया जाय वह भी सुनकर तडप जाय-सिलखिलाकर हँस पड-न कि चिढकर मारने दौड़े। यानी जिसे 'बनाया जाय वह 'बिगडे' नहीं, सुधर जाय । परिहास उपदेश का बडा हृदयग्राही प्रकार है। जो काम कभी कभी लम्बे लेकचरो से नहीं होता वह एक चुभते हुए फिकरे से हो जाता है जहाँ रोनाधोना बेकार जाता है-वेदर्द सुननेवाले पर कुछ अमर नहीं करता-वहाँ एक गुदगुदी करने- वाला लतीफा काम कर जाता है। महाकवि 'अकवर' की कविता इसका उदाहरण है, जराफत की चाशनी में डूबा हुआ अकवर का एक शेर सुनकर समझदार और सहृदय श्रोता लोट-पोट हो जाता है, मुँह से 'वाह' और दिल से 'आह' निकल पड़ती । हास्यरस के उद्देश्य की वास्तविक व्याख्या अकबर ने इस शेर में की है "कहकहों की मश्क से मैंने निकाला अपना काम, जब किसी ने कद्रे-ग्राहो नालाओ जारी न की।" रस में स्थायिता और प्रभाव होना आवश्यक है, क्षणिक और निरुद्देश्य मनोरखन ही किसी भी रस के लेख का प्रयोजन न होना चाहिए। जिसमें अस्वाभाविकता, उद्वेजकता, अनौचित्य और अश्ली लता हो वह हास्यरस' नहीं हो सकता और चाहे जो कुछ हो । प्रश्नीलता के विषय में एक भारी भ्रम फैला हुआ है। आज है कल प्राय. खुले शृङ्गार के वर्णन ही की गणना 'अश्लीलता' के देोप मे की जाती है, पर यह भूल है। किसी विषय की किसी रस की-चाहे कोई वात हो-जो अनुचित रीति से-भाँडे ढङ्ग से-भद्दी तरह से-कही जायगी, अश्लीलता की 'धारा' वहीं होकर बहने लगेगी-वहीं यह दफा प्रायद हो जायगी, हास्यरस इसका अपवाद नहीं हो सकता । कुछ लेसकों ने हास्य को इस दोपका-अश्लीलता का अपवाद समझ लिया है। उनके कानून मेहास्य के नाम पर जो चाहे गुजरे-सारे सन माफ हैं। हास्य की आड मे खुलेआम अश्लोलता का प्रचार हो रहा है, इस हम्माम ( स्नानागार ) में आकर सब नड्ड़े हो जाते हैं। लोहरुचि भ्रष्ट हो रही है, कोई कहने सुननेवाला नहीं । हिन्दी में मौलिक हास्यरस के आदर्श लेखकों का अभाव सा है। विशुद्ध हास्य की जो दो चार पुस्तकें-लोक-रहस्य- चौवे का चिट्ठा-गोलमाल प्रादि है, वह पराया माल है। 'मतवाले' की बहक मे अलवत्ता कभी-कभी हास्य की सुन्दर छटा देसने को मिल जाती है। 'पार्यमित्र' के 'विनोद निन्दु' भी कभी मजा दे जाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक हास्यरस को तीन कहानियों का संग्रह है, जो पत्रों में 'निसटू' के नाम से निकल चुकी हैं। 'निसटू जी' छिप रुस्तम निकले। सुप्रसिद्ध देशभक्त और साहित्यसेवी श्रीयुत सम्पूर्णानन्दजी के अनुज श्रीप्रमपूर्णानन्द जी ही इन कहानियों के 'निसद हैं। , .
. है . ' (घ ) कहानियॉ बडी मजेदार है, पढने में खव जी लगता है, वर्णनशैली रोचक है, भाषा में जान है, जगह-जगह मनोभावों का सुन्दर विश्लेपण है, अस्वाभाविकता और उद्वेजकता का जो ऐसी कल्पित कहानियो मे प्राय आ जाती हैं, अभाव यद्यपि कहीं-कही अत्यल्प मात्रा मे एकाध वात ऐसी आ गई है जो न होती तो अच्छा होता। "ब्राह्मण-भोजन के उपसहार में-"बाम्हन का पेट आके जरा नाप दीजिए।' खटकता है । "पेट-प्रधान जाति"-"ससार मे ईश्वर की माया के अतिरिक्त यदि और किसी चीज को अघाह कहे जाने का गौरव प्राप्त हो सकता है तो वह ब्राह्मण का पेट ही है" इत्यादि वाक्य जातिमात्र पर प्रत्यक्ष आक्रमण सा है, औचित्य की सीमा का अतिक्रमण है। भले ही लेसक ने भूस की झोंक मे लिख मारा हो, उनका अभिप्राय ऐमा न रहा हो, नीयत साफ हो, पर यह बात है सटकनेवाली जरूर । एक बात और भी है। कहानियों में बहुत से अँगरेजी वाक्य रोमन लिपि मे और अँगरेजी भाषा मे ज्यो के त्यो भापा- न्तर के विना दे दिये गये है। जो पाठक अँगरेजी नहीं जानते (और ऐसे बहुत हैं जो नहीं जानते ) वह ऐसे मौके पर बेरों मे गुठलियों या अगूरो में निमालियाँ मिली देसकर झवा उठते हैं, कथाप्रकरण का एक वाक्य भी पाठक की समझ मे न आवे तो रसविच्छेद होकर मजा किरकिरा हो जाता है। अँगरेजो के विद्वान् लेसक के लिए तो यह एक मामूली 'रोज- 1 , ( 1 ) मर्राह है पर अँगरेजी भाषानभिज्ञ पाठक की दृष्टि में विल पोट पहाड है। सैर नजर से बचाने के लिए यह 'दोप- दिठाने की चर्चा कर दी है। 'निसटू जी को अपने पहले ही प्रयास में अभिनन्दनीय सफलता प्राप्त हुई है, कहानियाँ बनावटी नाम से लिसी गई थी, लेसफ को शायद इनकी उपादेयता में स्वय सन्देह था, पर- "निगाहें कामिलों पर पढ ही जाती है जमाने की। कहीं छिपता है 'अकबर' फूल पनों मे निहाँ होफर ।" आसिर इस छिपे माल पर भी गुणज्ञ पारसी प्रकाशक की निगाह पड़ ही गई और ये मनोहर कहानियाँ पत्रो के पुराने फाइलों से निकलकर पुस्तक के नये रूप मे सवके मामने आ गई। इस गुणज्ञता के लिये प्रकाशक महोदय प्रशसा के पात्र है। मैं लेसफ को ऐसी सुन्दर रचना के लिए बधाई देता हूँ- स्वागत करता हूँ और पाशा करता हूँ ये कहानियाँ वडे चाव से पढी जायेंगी, इनका प्रचार और आदर होगा। गुरुकुल कॉगडी । रामनवमी, १८८६ पद्मसिंह शर्मा कोई ऐसे ही उदार और गुणग्राहक प्रकाशक यदि स्वर्गीय सम्पा- दकाचार्य ५० रददत्तजी के हास्यरस के अनूठे लेखों का सग्रह करके प्रकाशित कर दें तो क्या ही अच्छा हो, हिन्दी में एक चीज हो जाय । ५० रददत्तजी हास्यरस के द्वितीय लेखक थे, उनके पच तो बढे ही मार्के के और मार्मिक होते थे, पर वह सब पत्रों के पुराने चिघडी में ही छिपे पर है। प०सि० श. ५
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ब्राह्मण-भोजन नहीं मिल सकता। [१] सवेरे दतुअन कुल्ला से छुट्टी पाकर मै माता के पास जल- पान माँगने गया। वहाँ कोरा जवाब मिला कि आज जलपान कारण पूछने पर विदित हुआ कि एक ब्राह्मण देवता को भोजन करने के लिये बुलाया गया है, जब तक वे भोजन न कर लेगे तब तक घर के लोग अन्न-जल प्रहण नहीं कर सकते। क्या करता, एक लम्बी साँस भर- कर लौट आया और पित्त मारकर बैठ रहा । ब्राह्मण-देव को दस बजे का समय दिया गया था पर मैं यह बसबी जानता था कि बारह के पहिले उनका प्रेत भी न झाँक चलेगा। लोगों का ख्याल है कि ये पेट-प्रधान जाति है और निश्चित समय से घण्टे आधघण्टे पहले ही आ धमकते होंगे, पर ऐसा है नहीं। ये सदा दो-दो तीन-तीन घण्टे बाद आने की कृपा करते हैं। इसका रहस्य यह है कि मध्याह्न के उपरान्त भोजन करने से इन लोगों को दो लाभ होते हैं। एक तो भूस सब कडकडाकर लगी रहती है जिससे अधिक से अधिक खाद्य- २ ) पदार्थों का सहार किया जा सकता है, दूसरे देर करके खाने से सन्ध्या या रात्रि में फिर अपने लिये भोजन के प्रवन्ध करने की चिन्ता नहीं रह जाती। खैर, दस की कौन कहे ग्यारह भी वज गया और घड़ियाँ अब बारह बजने की धमकी देने लगी पर पण्डितजी की पर- छाई ने प्रभी तक मेरा चौकठ नहीं पार किया। यहाँ चूहों ने बडी मुन्तैदी से पेट में उण्ड पेलना शुरू कर दिया। रह-रहकर रसोई के घर से सुगन्ध की नदी उमड पडती थी। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि मेरी नाक के पास कोई मॅडरा-मॅडराकर अठखेलियाँ कर रहा है। लोग जितने उस समय तक पेट-पट पर ताला लगाये बैठे थे, सभी को यही दशा थी। महाकवि गङ्ग का एक हस्तलिखित काव्य-ग्रन्थ मेरे हाथ लग गया है जिसे बालिग होने पर मैं निज व्यय से छपवाऊँगा-अभी मैं सिर्फ ३५ वर्ष का हूँ। उस ग्रन्थ के एक कवित्त का उत्तरार्द्ध मैं यहाँ उद्धृत किये देता हूँ। पाक को परसि पौन गयो लै सुबास बाहर, लागत ही और गति भई घर भर की। बाल-वृद्ध-वनिता सवै की बुद्धि भोरी भई, चित चलि गयो, पेट पुलक्यो, जीभ फरकी ।। ठीक यही दशा उस समय हम लोगों की थी। इस सुगन्ध ने सभी को घेचैन बना रक्खा था . - मैंने रसोई के दरवाजे पर कई फेरे लगाये पर कोई तार नहीं जमा। इतने में पारद का घण्टा बजा। आखिर न रहा गया। मैंने माता से पूछा कि क्या करना चाहिये, पण्डितजी तो नहीं आये और बारह वज गये। माता ने कहा करना क्या है, इन्त- जार करो, आते ही होंगे। गोया अभी तक मैं इन्तजार नहीं कर रहा था, किसी हलवाई की दूकान में विहार कर रहा था। सवा वारह-साढे चारह-एक-अब क्या करूँ, किसी करवट चैन नहीं मिलता। इन चूहो का बुरा हो, पहले सव पेट में सिर्फ उण्ड लगा रहे थे, अव सबों ने मिलकर Long Jump और High Jump की कसरत शुरू कर दी। मेरी प्यारी अम्मा को भी बैठे बैठाये अच्छा मजाक सूझा, ब्राह्मय- भोजन कराने क्या चलों मेरे गले रोजा लेकर मढ दिया । एक ओर तो भोजन का विरह सताये हुए है, दूसरी ओर माता की आज्ञा कि पण्डितजी का और इन्तजार करो। बड़ी मुसीबत में जान पड़ी हुई है। डेढ वजने का वक्त हो पाया पर पण्डितजी का कहीं गन्ध वक नहीं मिला। यहाँ पेट ने Ultimatum देना शुरू कर दिया । सोचने लगा कि क्या करूँ कि समय कट जाय । एक चार इरादा हुआ कि कोई उपन्यास पढूँ पर तबीयत नहीं पढी। कहाँ तो पेट ने सधेरे से सन्यास ले लिया है और कहाँ मैं उप- न्यास पढने वैहूँ। तन क्या करूँ? ताश, शतरज, সঞ্জাদা सवमें कुछ न कुछ दिमाग लाने की जरूरत होती है पर भूख ( ४ ) ने यह हाल फर रक्सा है कि इस समय किसी औरत से आँख लडाने की भी ताब नहीं है, दिमाग कहाँ से लडाऊँ ? कोई ऐसा काम सोचना चाहिये जो भूसे पेट पर बिना दिमाग लगाये किया जा सके। श्राहा । अच्छा याद आया, लगे हाथ कुछ साहित्यसेवा क्या न कर डालूं । यह तो सास भूखे पेट पर करने की चीज ही है और इसमें भला दिमाग की कौन जरूरत ? बहुत से काम ससार में ऐसे हैं जो विना दिमाग के नहीं हो सकते जैसे भग घोटना, वटेर लडाना, कबड्डी खेलना, सडक पीटना, मशाल दिसाना, रेकना वगैर पर साहित्यसेवा के लिये दिमाग की जरूरत है यह मैंने चौरासी लास योनि भ्रमण करने पर भी आज तक नहीं सुना। अगर आपने ऐसी कोई बात सुनी है तो फौरन् नीम की पत्ती मगाइये और पानी मे उबाल- कर उसी पानी से कान धो डालिये। अब रह गयी मेरी यह उक्ति कि भूसे पेट पर ही घनी- चोसी साहित्यसेवा हो सकती है। इसे मान लेने मे तो शायद किसी को भी कोई आनाकानी न हो। सीधी बात है .
"namurt मैं अन एक वाक्य लिखता हूँ, जिसे आप ध्यानपूर्वक उकरूँ बैठकर पढिये इसलिये कि शायद वोच में कांसने की जरूरत पड जाय- "न जाने कितने भेडे मनुप्य साहित्य के घोड़े पर भूस के फोडे की मदद से दोडे और जो मडक पर रोडे बटोरते फिरते थे थोडं समय में रुपयों के तोड़े बटोरने लगे।" क्या ही सुन्दर वाक्य है। जान पडता है कि बडे दिन के उपलक्ष में किमी राजभक्त रायनहादुर ने कलक्टर साहन के पास अनुप्रास की डाली लगाकर भेजी है। मैं तो भाई, सच फरमाता हूँ मुझे यह वाक्य बहुत ही अँचा। इस वाक्य का ठोक-ठोक अर्थ क्या है यह मैं कभी फुरसत के वक्त सोचूंगा, अभी तो मैंने सिर्फ लिख मारा है और इसे लिखते ही मेरी आत्म-गरिमा वाँसों ऊपर उछल गयी है। छिद्रा. न्वेपी चाहे जो कहें पर मैं यह जानता हूँ कि महाकवि पद्मा- कर यदि बजाय हिन्दू के मुसलमान होते और वजाय जलाये जाने के दफन किये गये होते और फिर यदि उनकी कत्र में करवट मारने की काफी जगह होती तो वे इस अनुप्रासमय वाक्य की सुन्दरता पर मुग्ध होकर करसट बदल देते। कोई इस वाक्य को प० जगन्नायप्रसाद चतुर्वेदी के कानों तक पहुँचा दे तो मुझे विश्वास है कि वे 'अनुप्रास का अन्वेपण' करना भूल जायें । जो हो, मैंने निश्चय कर लिया कि जब तक ब्राह्मण देवता नहीं पाते तब तक समय बिताने के लिये साहित्यसेवा ही - करना उपयुक्त होगा। एक ही Phenomenon का भिन्न भिन्न लोगों पर क्या मानसिक प्रभाव पड़ता है यह मनो- विज्ञान का बडा महत्वपूर्ण और मजेदार विषय है। यह सब जानते हैं कि भूख भारत की सम्पदा है। इसी भूख के कारण भिन्न-भिन्न प्रकृति के भारतवासियों के हृदय में कैसे कैसे प्रान्त करणिक भाव-विकार उत्पन्न होते हैं- उनका समुच्चय हिन्दी साहित्य के लिये एक नयी चीज़ होगी। यह सोचकर मैंने अपने घर भर को-गुरुजनों को छोडकर-नौकर-चाकर सहित बुलवा भेजा। सवको इकट्ठा करके मैंने कहा-"इस समय तुम लोग सभी भूख की पोडा से व्यथित हो। इसके सम्बन्ध में तुम लोगों के हृदय मे नाना प्रकार के भाव उत्पन्न होते होगे। उन भावों को तुम लोग थोडे से थोडे शब्दों में व्यक्त करते जाओ। मैं नोट करता जाता हूँ।" इस पर एक धृष्ट बालक ने कहा कि आप हृदय के भावों की तहकीकात कर रहे हैं, पर मेरे तो सब भाव इस समय पेट ही में उत्पन्न हो रहे हैं, हृदय मे नहीं । मैंने उसे डाँटकर चुप कराया और एक-एक से अलग-अलग पूछना शुरू किया। जो उत्तर मिले उन्हें मैं नीचे दिये देता हूँ। छोटे भाई ने कहा-"मुझे ऐसा जान पडता है कि मेरे पेट में ज्वालामुसी पर्वत फूट पडा है।" दूसरे छोटे भाई ने कहा-"मुझे ऐसा जान पडता है कि पेट में चौरीचौरा काण्ड का अभिनय हो रहा है।"
( ७ ) छोटी बहिन ने कहा-"मुझे ऐसा जान पड़ता है कि पेट में भठियारिनों की सभा हो रही है।" भतीजे ने कहा- "मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मेरा पेट मानो तप्त रेगिस्तान है जिसमें रह-रहकर सिमूम का अन्धड वह रहा है।" मजदूरिन ने कहा- "हमके ऐसन बुझात हो कि जैसे कौनों चुडइल पेटे मे हबुधात है।" नौकर ने कहा-"हमके निरफुल ऐसन बुझात है। फि पेटवा में जैसे कौनो घसियारिन खुरपी चलावत होय ।" दूसरे नौकर ने कहा-"हम्मैं तो ऐसन जनात हा कि जैसे कौनों मिला पेटे में ब क छत्ता खोद दिहे होयँ ।" ड्योढीदार ने कहा-"हमका तो साहव ऐसा समुझ परत है कि देहियाँ के विचपटे में कौनों सरवा डिगरीदार कुडकी कराय रहा है।" ये तो हुए मेरे घर के आदमी और नौकर चाकर । इनके अलाव भाई साहब ने दो विद्यार्थी पाल रखे हैं जो मेरे यहाँ पडे रहते हैं, साना-कपडा पाते हैं और प्राज तेरह चार सत्रह वर्ष से लघुसिद्धान्तकौमुदी को मथ रहे हैं। इनसे भी मैंने वही प्रश्न किया जो सवसे किया था । पहिले विद्यार्थी ने कहा-"मुझे तो ऐसा भास रहा है कि मानों मेरे उदरगहर मे निराकार ब्रह्म प्रासन जमा . ( ८ ) दूसरे विद्यार्थी ने कहा--"मुझको तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रलय को निकट समझकर भगवान शकर मेरे पेट में ताण्डव नृत्य का अभ्यास कर रहे हैं।" देसा आपने, जितने आदमी उतनी राय। मैं इन सब सम्मतियों से सहमत हूँ, इनमे और मेरे निजी 'उदरगत' भावों मे वहुत कुछ सादृश्य है। भूस क्या वस्तु है इसको जान लेना हम भारतवासियो के लिये नितान्त आवश्यक है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ के किसान दिन में एक बार आधे पेट साने पर भी भूसे बने रहते हैं--यह उनकी शरारत नहीं तो क्या है | कौन कहता है कि आधे पेट खायें ? एक तो खुद अपने देश में इतना अन्न पैदा होता है और दूसरे विलायत से हरसाल हजारों जहाज गेहूँ और गन्ना और चावल और चना और मुश्क और हिना और राहू और पीना और मिन्नी और पिन्नी और सिन्नी और गिलट की चवन्नी भर- भरकर आते हैं अभी परसाल की बात है कि अकेले मैनचेस्टर ने सौ फम निन्नानबे जहाज कलाकन्द और गोल- गप्पे से लादकर भेजे थे। गरज यह कि इतना अन्न जो देश में पैदा होता है और जो विलायत से आता है वह क्या हो जाता है? एक अँगरेज विद्वान् का कहना है कि भारत- वासियों की दरिद्रता का मुख्य कारण यह है कि वे कीमती चीज़ों को जमीन में गाड रखते है और मरते वक्त घताना भूल जाते हैं कि कहाँ गडी हैं। इसी कारण से कीमती चीजों का देश से लोप होता जा रहा है और दरिद्रता वढती जा रही है। एक उदाहरण लीजिये। एक मक्सीचूस ने भाई-वन्द से छिपा कर दो कनस्टर घी जमीन मे कई पोरसे के नीचे गाड दिया कि गाढे-सॅकरे काम आवेगा। थोडे दिनो के बाद वह वीमार पडा। डाक्टरो ने उसकी जवान सोंच- कर और छाती में घूमा मारकर और पेट मे अंगुली कोच कर Bxamine किया। वैद्यों ने उसकी कलाई मे कच्चा सूत वाँधकर श्राध मील के फासले से उसकी नाड़ो की परीक्षा लो, हकीमो ने उसके पसीने को फाखरे की शीशी मे भरफर मर्ज की तसशीश की और अन्त मे सभों ने सर्व- सम्मति से यह प्रस्ताव पास किया कि इसे मौत की योमारी हो गयी है और अब यह वचेगा नहीं। आखिर ऐसा ही हुआ भी। परमात्मा का यह अटल नियम है कि मन्तो की, महात्माओं की, मती स्त्रियो की और डाक्टर-वैद्यों की बात कभी झूठो नहीं पडने पाती। उसके मर जाने पर घरवालों को यह फिना हुई कि उसके पास जो दो फनस्टर पी था वह क्या हो गया। ऊपर-नीचे सब जगह लोगों ने तलाश कर मारा और अन्त में यह स्थिर किया कि अगर जमीन के ऊपर नहीं मिलता है तो जमीन के भीतर सोजना चाहिये। यस मोदाई शुरू हो गयी और धीरे-धीरे करके सारा मकान खोद डाला गया। प्रासिर तन क्या ( १० ) बहुत खोदने पर घी के दोनों कनम्टर मिल गये। था, देखते-देखते घरवाले मालामाल हो गये, नया मकान बन गया, दाम दासी-नालकी पालकी-जोडी टमटम-रस- गुल्ला चमचम-घोड़ी कोतल-रण्डी बोतल-गरज यह कि अमीरी का सभी सामान इकट्ठा हो गया। इतना और कह देना चाहता हूँ कि उपर्युक्त वार्ता सवा सोलह आने सच है-और अगर सच नहीं है तो आज से पचास वर्ष वाद सच हो जायगी, जब घी रेडियम के मोल बिकने लगेगा। [२] डेढ बज गया पर ब्राह्मण देवता अभी तक नहीं पधारे । अब वास्तव मे भूख की समस्या बड़ी जटिल हो गयी थी। हम लोग बाहर बैठके मे लेटे हुए अपनी-अपनी साँस अगोर रहे थे । मेरा भतीजा धीमे स्वर से 'नमो सकठा कष्ट हरनी भवानी' का पाठ कर रहा था। पहिले विद्यार्थी ने दूसरे विद्यार्थी से कहा कि जरा देखना, मेरी नाडी चल रही है या नहीं? मेरा सबसे छोटा भाई गमले के पास बैठकर तुलसी का पेड चर रहा था। सामने कुएँ पर एक मजदूर को सत्तू सानते देख मैं 'चाह भरी, आह भरी और वाह भरी निगाहों से उसकी ओर निहारने लगा। कुछ लोगों का ख्याल है कि जब पेट की पोटरी खाली हो नावी है तो पेट और पीठ प्रापस मे सटने लगते हैं, और तव गारियों का नाम भूख है - ( १२ ) उनकी रगह से जो चिनगारियाँ पैदा होती हैं उन्ही चिन- इन उपोरसों से पूछना चाहिये कि अगर चिनगारियो का नाम भूस है तो मेरे पेट मे जो लड्कादहन हो रहा है उसका क्या नाम है ? उर्दू के एक अगडधत्त कवि ने मेरे पास कुछ शेर लिस भेजे हैं जो इस तरह है- आँस निकली, पेट पचका, मुँह खुला, निकलो जवान । क्या धजा हो जाती है, भूसे से पूछा चाहिये । भूस हो जब पेट में साने को सुशवू नाफ मे मुँह में पानी के मजे को मुँह से पूछा चाहिये । पूरी-तरकारी दही-शक्कर वो मूली और अचार । साने की मेकदार मरभुक्से से पूछा चाहिये ।। जब न गेहूँ हो तो भूसा ही गनीमत जानकर । चट्ट करने का मजा आत से पूछा चाहिये । पेट गो गो बोलता है जब बहुत लगती है भूख । इसकी हालत तो मियाँ 'घट' से पूछा चाहिये ।। कहा जाता है कि विपत्ति के समय राम नाम को सुमि- रना चाहिये। मैंने ऐसा ही किया पर कई बार 'हे राम' के बदले 'हाय भूख' मुँह से निकल गया। मेरी हालत तो ऐसी अवतर हो गयी थी कि यदि इस समय भगवान् बुद्ध एक मुट्ठी में चना और दूसरी मुट्ठी में निर्वाण लेकर मेरे सामने आते तो मैं बडे असमन्जस में पड़ जाता कि क्या लू और क्या , . ( १२ ) छोड दूं। खुद ही सोचिये कि कहाँ मैं दस बजे साना साफर साढे दस से साटे तीन तक योढा सो रहता था और कहाँ आज पौने दो का वक्त हो गया, पेट पर टाटी दिये बैठा हूँ और मुंह में मक्सियाँ पा जा रही है। मेरी इच्छा हुई कि माता से कहला भेजूं कि या तो कुछ साना मेरे लिये मेज दीजिये, और अगर यह न फर सकिये तो घोडा सा तुलसी सोना मेर मुँह में डाल जाइये। मुझे रह-रहकर यह फिक्र सताती थी कि प्रासिर यह पण्डित हो क्या गया ? फही रास्ते मे महामाई तो नहीं भिड गयौं, या पृथ्वी माता तो नहीं निगल गयी। किसी रॉड़ न फॉस वो नहीं लिया, किसी साँड ने सांग तो नहीं मार दिया, किसी सीढी से गिर तो नहीं पडा, किसी सन्यासी ने चेला तो नहीं मूड लिया, अाखिर अय तक पाया क्यों नहीं ? मुझे यह भी सन्देह हुआ कि उसे मोटा-ताजा देस- कर कहाँ मिरच के टापूवाले तो नहीं पकड ले गये। मेरा धैर्य जो भूख की आँच मे कभी पिघल चुका था, हर एक मॉस के साथ भाप बनकर उडने लगा। पास ही मेरा छोटा भाई पेट पर एक तकिया रसकर लेटा हुआ था। अगर यह मेरा भाई न होता तो मैं खुलेग्राम कहता कि अपनी शैतानी में यह शैतान का भाई है। मैं समझ रहा था कि लेटे-लेटे वह कोई शैतानी सोच रहा है। मेरा अनुमान ठोक ही निकला। एकाएक उसके बदन मे एक बिजली सी दौड , अब T में ढेला। ( १३ ) गयी, वह उठ बैठा और मुझसे वोला-"भैया, चलिये हम लोग सब मिलकर रसोईघर में डाका डाले ।" गो मैं उसका बडा था और मुझे चाहिये था कि उसको ऐसी बात कहने पर डॉटता पर मैं आपके कान मे कहता हूँ कि उसकी राय मेरे दिल में इस तरह धंस गयी जैसे कीचड तब भी कुछ देर तक अपने बडप्पन की लाज निगाहने के लिये मैंने उससे कहा-"नहीं-नहीं, डाका डालना उचित नहीं होगा।" उसने पूछा-"क्यो ? उचित क्या नहीं होगा? अपने घर में डाका डालते हैं, किसी दूसरे के घर में तो डालते नहीं हैं। और सो भी अपने सारे घर में तो डाका डालते नहीं है, सिर्फ रसोई के घर में डालते हैं।" मैंने कहा- "हाँ, यह तो ठीक है पर तब भी मैं सम- झता हूँ कि डाका डालना अनुचित ही होगा।" "वही तो पूछता हूँ कि क्यों अनुचित होगा? मेरी राय में तो डाका डालना ही इस समय हम लोगों का एकमात्र धर्म है।" "वह कैसे ?" "सव धर्मों का दादा है पापद्धर्म। रसोईघर में डाका डालना इस समय हम लोगो का मापद्धर्म हो गया है।" यात तो यार इसने पते की कही। भूस के नाम पर डाका डालना अनुचित होता पर आपद्धर्म के नाम पर डाका डालने में . ( १२ ) छोड़ दूं। खुद ही सोचिये कि कहाँ मैं दस बजे साना साकर साढे दम से साढे तीन तक थोड़ा सो रहता था और कहाँ श्राज पौने दो का वक्त हो गया, पेट पर टाटी दिये बैठा हूँ और मुंह मे मक्सियाँ आ जा रही है। मेरी इच्छा हुई कि माता से कहला भेजूं कि या तो कुछ साना मेरे लिये भेज दीजिये, और अगर यह न फर सकिये तो थोडा सा तुलसी सोना मेरे मुँह मे डाल जाइये । मुझे रह-रहकर यह फिक्र मताती थी कि आखिर यह पण्डित हो क्या गया? कही रास्ते मे महामाई तो नहीं भिड़ गयी, या पृथ्वी माता तो नहीं निगल गयीं। किसी रॉड ने फॉस तो नहीं लिया, किसी सॉड ने सीग तो नहीं मार दिया, किसी सीढीसे गिर तो नहीं पड़ा, किसी सन्यासी ने चेला तो नहीं मूड लिया, अाखिर अब तक आया क्ये नहीं १ मुझे यह भी सन्देह हुआ कि उसे मोटा-ताजा देख कर कहाँ मिरच के टापूवाले तो नहीं पकड ले गये । मेरा धैर्य जो भूस की आँच मे कभी पिघल चुका था, अट हर एक मॉल के माथ भाप बनकर उडने लगा। पास ही मेर छोटा भाई पेट पर एक तकिया रसकर लेटा हुआ था। अगर यह मेरा भाई न होता तो मैं खुलेश्राम कहता कि अपनी शैतानी में यह शैतान का भाई है। मैं समझ रहा था कि लेटे-लेटे वह कोई शैतानी सोच रहा है। मेरा अनुमान ठीक ही निकला। एकाएक उसके बदन में एक विजली सी दौर , गयी, वह उठ बैठा और मुझसे बोला-"भैया, चलिये हम लोग सब मिलकर रसोईघर में डाका डाले ।" गो मैं उसका बडा था और मुझे चाहिये था कि उसको ऐसी बात कहने पर डॉटता पर मैं आपके कान मे कहता हूँ कि उसकी राय मेरे दिल में इस तरह धंस गयी जैसे कीचड में ढेला। तब भी कुछ देर तक अपने वडप्पन की लाज निगाहने के लिये मैंने उससे कहा-"नहीं-नही, डाका डालना उचित नहीं होगा। उमने पूछा-"क्यो ? उचित क्या नहीं होगा ? अपने घर में डाका डालते हैं, किसी दूसरे के घर में तो डालते नहीं हैं। और सो भी अपने सारे घर में तो डाका डालते नहीं है, सिर्फ रसोई के घर में डालते हैं।" मैंने कहा-"हाँ, यह तो ठीक है पर तब भी मैं झता हूँ कि डाका डालना अनुचित ही होगा।" "वही तो पूछता हूँ कि क्यों अनुचित होगा? मेरी राय मे तो डाका डालना ही इस समय हम लोगों का एकमात्र - सम- धर्म है।" "वह कैसे " "सव धम्मों का दादा है प्रापद्धर्म । रसोईघर में डाका डालना इस समय हम लोगो का श्रापद्धर्म हो गया है।" बात तो यार इसने पते को कही। भूस के नाम पर साफा बालना अनुचित होता पर आपद्धर्म के नाम पर साफा सालने में ( १४ ) तो कोई बुराई नहीं थी। आपद्धर्म साधारण चीज नहीं है। इसकी उपयोगिता में अपने हृदय के रेशे-रेशे से मानता हूँ। जरा आप भी सोचिये कि आपद्धर्म से कितने काम निकलते हैं। मान लीजिये शाम के वक्त आप बन-उनकर दालमण्डी की पञ्च- क्रोशी करने के लिये निकले और एक पान की दूकान पर खडे होकर अपना हृदय टटोलने लगे कि चम्पा के कोठे पर चढ़ें कि चमेली के। इतने ही मे आपके पिताजी के परम मित्र वा० टकटोर सिंह कही से टपक पडे और पापसे पूछ बैठे कि यहाँ क्या कर रहे हो ? अब इस समय आपका यह प्रापद्धर्म होगा कि सच-झूठ का ख्याल छोड़कर जवाब दे कि "मैं यहाँ आ गया हूँ कुछ पतलून के बटन खरीदने ।" आपकी गाय बूढी हो गयी है, दूध नहीं देती और उसे बैठाकर सिलाने में आपका दिवाला खसक रहा है तो यह प्रापका प्रापद्धर्म है कि उसे कसाई के हाथ बेच डालिये। स्वराजिष्ट मेम्बर अगर बजट पास न करते हो तो लाट साहब का प्रापद्धर्म है कि अपने विशेषाधिकार के प्रयोग से खचा चलावें। आप हिन्दू हैं और मुसलमान मारने को घढ आरं तो आपका यह प्रापद्धर्म है कि आप दर्वाजा बन्द करके बैट आप धुवाँ घक्ड से प्रेम रखते हैं, सिगरेट पी रहे हैं, इतने में बडे भाई साहब आ जायें तो यह आपका प्रापद्धर्म है कि जलते हुए सिगरेट को अपने कोट की जेब में गिरा दे आप मसुराल गये हैं, ससुराल को प्रावहवा जरूरत से ज्याद रहें।
, अच्छी है, साना फौरन हजम हो जाता है और भूख हर वक्त लगी रहती है तो यह आपका प्रापद्धर्म है कि थोडा चना मुना- कर मकान से लेते जायें और जब ससुरालवाले सो जाये तो भर-भर मूठी गले के नीचे उतारे। जाडे का दिन है, सबेरा हो गया है, बिस्तरा छोडने से उत्तरी ध्रुव का अनुभव होता है तो यह आपका आपद्धर्म है कि रजाई सींचकर, समेटकर, लपेटकर और प्रास बन्दकर यह सोचे कि अभी सबेरा नहीं हुआ है। पाप गाहे-माहे मुंह का मजा बदलते हैं, बोतल में सोमरस लिये जा रहे हैं और कोई पूछ बैठे कि क्या लिये जा रहे हो तो यह आपका प्रापद्धर्म है कि कह दे कि प्रर्फ पोदीना लिये जा रहा हूँ। आप अँधेरी सीढी पर मजदूरिन को चूमाचाटी के पैतरे दिखला रहे हैं और बीवी पा जाय तो यह आपका आपद्धर्म है कि .. ..खैर अब कहाँ तक लिखू, इतने रटान्त दे डाले कि आपकी अह मेरी अनु की तरह यदि पत्थर और लकही के सयोग से भी पनी हो वन भो आप समझ जायेंगे कि प्रापद्धधर्म क्या चीज है। मैंने छोटे भाई से कहा-"अच्छा, यदि प्रापद्धर्म के नाम से रसोई घर में डाका डालना चाहते हो तो मुझे ऐसी कोई आपत्ति नहीं है, मैं भी साथ चलूँगा और कुछ मदद ही फरूँगा पर एक यही ख्याल है कि प्राशय येवारा भावेगा वो छोटे भाई ने निहायत सुशतमीजी के साथ मेरी पाव काटकर कहा-"अर धन भी माप इस मामय को येचाग ( १६ ) कह रहे हैं। दो वजा, यमराज हम लोगों के लिये अपने दूतों को कभी रवाना कर चुके पर यह ब्राह्मण अभी तक नहीं आया। ऐसे ब्राह्मण वेचारे को चार-चारे के लिये तरसा- कर मारना चाहिये। और अगर आपको इन बातों का ऐमा ज्याद ख्याल है वो किसी दूमरे मौके पर एक के बदले चार ब्राह्मण सिला दीजियेगा। "लेकिन इधर ऐसा कोई मौका भी तो नहीं पड़नेवाला है।" "क्यो, अभी तो दो-एक महीने में आपकी बरसी पडने- वाली है।" "मेरी बरसी पडनेवाली है" "जी हॉ। मैंने ऐसा ही सुना है।" मैं तो जोता जागता हूँ, मेरी बरसी अभी कैसे पडेगी" "आप भले ही जीते-जागते हों पर मैंने अम्मा से सुना है कि वैसाख मे आपकी बरसी पडेगी और हर साल पड़ती है। "धत्तेरे बेवकूफ की। अवे बरसी नहीं, वर्षगाँठ, वर्ष- गाँठ। वर्षगांठ को बरसी कहता है। वैमाख में मेरी वर्ष- गाँठ पढती है।" "Oh! I see, सैरतभी ब्राह्मण-देवता को सिलादीजियेगा।" "क्यों नहीं, साल में सिर्फ एक ही तो मेरी वर्षगाँठ पडती है सो उस दिन भी ब्राह्मण देवता को निमन्त्रित करके आज की तरह अपनी जान जोखिम में डालूं।" "अबे नालायक, "अच्छा सैर और किसी दिन । अभी तो आपको जल्दी ही लडका होनेवाला है. तब सिला दीजियेगा।" "मुझे तो नहीं लडका होनेवाला है, तुम्हारी छोटी भाभी को अलबत्ता होनेवाला है।" "आप तो वाल की साल खींचते हैं। एक ही बात है, चाहे आपको हुआ चाहे भाभी को हुआ। हाँ तो लडका होगा न ?" , "जरूर ही होगा। जब पेट में आया है तो साला कहाँ जायगा" “ऐं, आप अपने बच्चे को साला कहते हैं।" "तो क्या बुरा करता हूँ। हिन्दुस्तान मे ७५ सैकडे बाप ऐसे हैं जो अपने बेटों को दुलार मे या क्रोध में साला कहते है। अगर किसी हिन्दुस्तानी के बारे मे जानना चाहते हो कि वह पढा-लिखा है या नहीं तो उसके सामने उसके बेटे को सडा कर दो। अगर वह अपने बेटे को साला कहकर मम्बोधित करे तो जानो कि पढा-लिसा शख्स है, और अगर सरवा कहे तो जानो कि अपढ गँवार है। इसलिये यदि मैंने अपने बच्चे को साला कह दिया तो क्या उसकी देह में कहीं लासा लग गया? अपने देश की एक अच्छी प्रथा मैं क्यों छोड दूं" छोटे भाई ने कहा-"अच्छा खैर, जब लडका होगा तो उसी की तेरही पर एफ ब्राह्मण सिला दीजियेगा।"
( १८ ) "अजी कैसी तेरही " "वही जो छठी के बाद होती है।" "अरे पागल, वह वरही कही जाती है, तेरही नहीं।" आजकल की पढाई का यही दोप है। लडके किताबी विद्या खूब जान जाते हैं पर नित्य के जीवन की साधारण से साधारण बातों तक से अनभिज्ञ रहते हैं । । मेरा छोटा भाई मुझसे मजाफ नहीं कर रहा था, वह वास्तव मे नहीं जानता था कि वर्षों और वर्षगाँठ में, बरही और तेरही में कितना भयङ्कर भेद है। अन्त मे यही निश्चय रहा कि हम लोग फौरन चलकर रसोई के घर मे डाका डाले। मारे भूस के दम धंसता जा रहा था पर हम लोग किसी न किसी तरह बैठक के बाहर आये और सीढी चढने लगे। मवको यही धुन थी कि देसे डाके में कौन कौन सी साने की चीजें हाथ लगती हैं, सुना था कि ब्राह्मण-देवता के लिये कई तरह की मिठाइयों भी मॅगायी गयी थी। [३] इम लोग दवे पाच सीढो चढने लगे। मैं ही इस लूट पार्टी का नेता चुना गया था. इस लिये सबके आगे-आगे मैं चल रहा था। भूस की कमजोरी से मेरे पैरों को काँपते हुए देख मेरे छोटे भाई को सन्देह हुआ कि मैं डर रहा हूँ। उसने मुझसे ? ( १६ ) पूछा कि आप डर रहे हैं क्या ? मुझे उसके इस प्रा पर वडोसी आयी। भला रसोईघर डॉका डालने में कौन खतरा था कि मैं उरता, वहाँ सिवाय स्त्रियों के और रहता ही कौन है । किसी मर्द का सामना तो था नहीं। मैंने अपनी मूछों पर हाथ फेरते हुए कहा- 'क्यो रे वेवकूफ, मैं औरतों से डरूँगा ? तूने मुझे क्या समझ रक्सा है ? मैं-और डरूँ औरतों से । सबेरे मन्दिरो में दर्शन करने जाता हूँ तो सैकडो त्रियों की भीड रहता है और मैं सबकोधका देता हुआ निकल जाता हूँ किसी भी स्त्री की हिम्मत नहीं पड़ता कि चूं तक करे । इतना तपाक रखता हूँ तब अपने को मर्द कहता हूँ।" मेरी इस स्पीच ने सब पर मेरा सिक्का जमा दिया और सब मुझे सम्भ्रम की दृष्टि से देग्वने लगे। ज्यो-ज्यों हम लोग सीढी खतम करते जाते थे त्यों-त्यों हम लोगों की हिम्मत बढती जाती थी—पर हाय ! ऊपर पहुँचकर हम लोगो ने जो कुछ देखा उससे हम लोगों की सारी आशा का एकाएक गर्भस्राव हो गया। देसा कि रसोई के दरवाजे पर पहरा बैठ गया है। एक ओर रसोईदारिन और दूसरी ओर मजदूरिन सडी है, एक के हाथ मे करछुल और दूसरे के हाथ में चिमटा है मेरी मर्दानगी दो बराबर-बराबर हिस्सों में विभक्त हो गयी, रक हिस्सा आकाश मे विलीन हो गया और दूसरा पाताल । यह दृश्य देसकर में धस गया।
. ( १८ ) "अजी कैसी तेरही ?" "वही जो छठी के बाद होती है।" "अरे पागल, वह वरही कही जाती है, तेरही नहीं।" आजकल की पढाई का यही दोष है। लडके कितायी विद्या खूब जान जाते हैं पर नित्य के जीवन की साधारण से साधारण बातों तक से अनभिज्ञ रहते हैं। मेरा छोटा भाई मुझसे मजाक नहीं कर रहा था, वह वास्तव मे नही जानता था कि वर्षी और वर्षगांठ में, वरही और तेरहो मे कितना भयङ्कर भेद है। अन्त मे यही निश्चय रहा कि हम लोग फौरन चलकर रसोई के घर में डाका डाले। मारे भूख के दम धंसता जा रहा था पर हम लोग किसी न किसी तरह बैठके के बाहर आये और सीढी चढने लगे। सवको यही धुन थी कि देरो डाके में कौन कौन सी साने की चीजें हाथ लगती हैं, सुना था कि ब्राहाण-देवता के लिये कई तरह की मिठाइया भी मँगायी गयी थी। [३] । हम लोग दवे पाव सीढी चढने लगे। मैं ही इस लूट पार्टी क नेता चुना गया था इस लिये सबके आगे-आगे मैं चल रहा था भूरा की कमजोरी से मेरे पैरों को फॉपते हुए देस में छोटे भाई को सन्देह हुआ कि मैं डर रहा हूँ। उमने मुझर और दूसरे के हाथ में चिमटा है। यह दृश्य मेग्राफर मेरी मर्दानगी दो बराबर-बराबर हिस्सों में विमादी गयी, ( १६ ) पूछा कि आप डर रहे हैं क्या ? मुझे उसके इस प्रभ पर वडोसी आयी। भला रसोईघर में डॉका डालने में कौन खतरा था कि मैं डरता, वहाँ सिवाय स्त्रियों के और रहता ही कौन है। किसी मर्द का सामना तो था नहीं । मैंने अपनी मूछों पर हाथ फेरते हुए कहा- 'क्यो रे बेवकूफ, मैं औरतो से उरूँगा ? तूने मुझे क्या समझ रक्सा है ? मै-पार उरूँ औरतों से । सबेरे मन्दिरो मे दर्शन करने जाता हूँ तो सैकदी स्त्रियों की भीड रहती है और मैं ममको धका देता हुआ निकल जाता हूँ किसी भी स्त्री की हिम्मत नहीं पड़ता कि पॅराफ करे। इतना तपाक रखता हूँ तव अपने को मर्द कहता हूँ।" मेरी इस स्पीच ने सब पर मेरा सिक्का जमा दिया और माय मुझे सम्भ्रम की दृष्टि से देखने लगे। ज्यो-ज्यों हम लोग सीढी खतम करते जाते थे त्या-त्यो हम लोगो की हिम्मत बढती जाती थी-पर हाय पहुँचकर हम लोगो ने जो कुछ देखा उससे हम लोगों की सारी प्राशा का एकाएक गर्भस्राव हो गया। देखा कि रसोई के दरवाजे पर पहरा बैठ गया एक ओर रसोईदारिन दूसरी ओर मजदूरिन सडो है, एक के हाथ एक हिस्सा आफाश में विलीन हो गया ऊपर है और में करछुल और दूमग पाताल में धस गया।
( २० ) मैंने अब अच्छी तरह जान लिया है कि हमारे देश में राजनैतिक षड्यन्त्र क्यों नहीं सफल होते। षड्यन्त्र रचते समय सर्कार का एक प्रतिनिधि भेदिये के रूप में जरूर साथ ले लिया जाता है। यही दशा हम लोगों की भी हुई। मेरा भतीजा यह देसने के लिये पहिले हो से ऊपर भेज दिया गया था कि मैदान साफ है या नहीं। उसने माता के कानों में सारी भुगतान लगा दी, फलत रसोई के दरवाजे पर पहरा बैठ गया और उसे चार आने पैसे इनाम मिले जिनकी बाजार से मिठाइयाँ मँगाकर वह कूद-कूदकर और हम लोगों को दिसा-दिखाकर सा रहा था। मैंने छोटे भाई की ओर देखा और उसने मेरी ओर देखा। मैं पीछे ससकने लगा और वह मुझे आगे ढकेलने लगा। उसने कहा-"चलिये, चलिये, आगे बढिये, अब आये हैं तो कुछ लूट ले चले, दस ही पाँच कचौरियाँ ज्याद नहीं तो, एक-एक गाल मारने को तो हो जायगा।" मैंने कहा-"हाँ हाँ, चलो चलो, आगे बढो, मैं पीछे- पीछे प्राता हूँ।" "पाप बढे हैं, आप ही को आगे चलना चाहिये।" "अजी, ऐसे मामलों में मैं निहायत छोटा हूँ, तुम्ही आगे-आगे चलो" "पर आपके रहते हुए मेरा आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। दुनिया मुझे इसेगी।" , - . ( २१ ) "दुनिया की ऐसी-तैसी, मैं खुशी से इजाजत देता हूँ कि तुम आगे बढो। बल्कि मेरे चलने की जरूरत भी नहीं है, मैं यहीं से खडे-खडे तुम्हे सलाह दूंगा और उत्साहित करूँगा। तुम जाओ, रसोई मे पिल पड़ो और काफी सामान लूट लामो। हो सके तो एक अथरी दही भी उठाते आना, बैठक में बैठकर सडपा जायगा।" "यह सब झोल है। सुद तो आप डर रहे हैं, मुझे आगे झोंक रहे हैं आप तो कह रहे थे कि मैं औरतों से उरता ही नहीं, सो अव क्यो डर रहे हैं ?" "तुम समझते तो हो नहीं। मैं उन औरतों से नहीं उर रहा हूँ जो रसोई के द्वार पर सडी हैं, लेकिन उनके हाथ में जो करछुल और चिमटा है उनसे भला कौन मर्द-बच्चा न उरेगा" अन्त में बात यही पक्की रही कि न मैं आगे बढा और न मेरा छोटा भाई। सिर्फ हिम्मत का टोटा था जिसकी वजह से सारा गुड गोइँठा हो गया । जव प्रादमी पागे न बढेगा तो ख्वाहमख्वाह पीछे हटेगा। इसी लिये हम लोगों ने पीछे ससफना शुरू किया और सस- फते-ससकते फिर बैठक में लौट आये। उपाय सोचा गया था, वह भी 'दक्सिन' में मिल गया। भूख ने अब गजब ढाना शुरू किया। सोपडी में धनु- प्रकार सा होने लगा, हाथ पैर में सनसनाहट पैदा हो गयी, प्रायरता का एक ( २२ ) पेट मे गोलाबारी शुरू हो गयी और दिमाग के फुसडे-फुसडे अलग होने लगे। हालत और खराब होने की सम्भावना देखकर मैंने सोचा कि कोई ऐसी दवा मॅगाकर खा लूं जिससे ये आसार दब जायें। इसलिये मैंने नौकर को आवाज दी-"अरे लबेदुरा, यहाँ मा।" उमके आने पर मैंने उससे कहा-"जरा डाक्टर ईश्वरसहाय के यहाँ जा और--" उसने पूछा कि कौन डा. ईश्वर सहाय ? मैंने कहा- "वही जो दाढी रक्खे हुए हैं। इस पर मेरा छोटा भाई वोल उठा-“दाढी रक्खे नहीं है बल्कि रस रहे हैं, यो कहिये।" "नहीं-नही दाढी रक्खे हुए हैं।" "जी नहीं, दाढ़ी रस रहे हैं।" "मत फजूल बको, वे दाढी रक्खे हुए हैं।" "नहीं भाई साहब, वे अभी दाढो रख रहे हैं।" "अच्छा, दाढी रखे हुए हैं और दाढी रख रहे हैं में क्या फर्क है " छोटे भाई ने कहा--"सुनिये, दाढी रक्खे हुए हैं का अर्थ यह हुआ कि दाढी रख चुके हैं और बराबर रक्से रहेंगे तो दो एक वर्ष में एक अच्छी, सासी, लम्बी और धनी दाढी हो जायगी। और दाढी रस रहे हैं का अर्थ यह हुआ कि दाढी रखना शुरू कर दिया है और बीबी के हाथों से बचाये रहेंगे तो बढती जायगी और पकने पर बिल्कुल सन ( २३ ) की, अथवा सनकी, ऐसी हो जायगी। देसा आपने दोनो के अधों मे अन्तर है न?" "मेरा 'जरजर' पेट मुझे मना करता है कि इस समय इन बारीकियों के समझने मे मैं अपना दिमाग सर्च करूं। पर इतना कहूँगा कि हो तुम सख्त बदतमीज। इतने जरा से मतभेद के लिये मेरी बात क्यो काट दी ?" "वाह साहय वाह । हम और आप देश और कांग्रेस से बढकर हैं क्या ? दाढी रक्खे हुए हैं और रस रहे हैं में तो तब भी बडा फर्क है, इससे छोटी-छोटी बातों पर कांग्रेस में और देश में और नेताओं में डण्डे चल पडते हैं। अभी दो ही तीन महीने की बात है कि किसी सभा में यह तय हो रहा था कि कितने गज सूत हर एक कांग्रेस का मेम्बर प्रति मास कातकर दिया करे। एक पार्टी २००० गज के पक्ष मे थी, दूसरी पार्टी १८६६ गज के पक्ष में थी। इतनी ही बात पर आपस में जो-जो जूते चले कि उतने जूते अगर मुझे ख्वाब मे लगे तो मेरी चांद साफ हो जाय ।" "सैर जो कुछ भी हो पर यह तय है कि तुम हो बडे बेहदे। मैं अब भी कहूँगा कि डाक्टर ईश्वरसहाय दाढी रक्से हुए हैं।" "कभी नहीं । हरगिज नहीं ।। मैं मान नहीं सफवा ।।। वे दाढी रस रहे हैं।" मुझे गुस्सा आ गया, मैंने यगल में रक्सी हुई शीशे की दावात उठाकर फर्श पर दे पटकी और गरजकर पोला- घम . , ( २६ ) लोग ऊपर क्यों गुट बांधकर तशरीफ ले गये थे ?" मैंने कहा "जी, देखने गया था कि पण्डितजी के आने का समय हो हो गया है साने वाने का इन्तजाम सब ठीक है या नहीं।" भाई साहब ने फिर पूछा-"तो उपर क्या देसा आपने " मैंने कहा-"जी, मैंने यही देसा कि रसोई के द्वार पर महराजिन हाथ मे करछुल लिये खडी हैं। इससे मैंने यह नतीजा निकाला कि सब इन्तजाम ठीक है, सिर्फ पण्डितजी के आने की देर है।" सैर, भाई साहव गये। जब तक वे खडे थे, मैं मारे डर के दोनो फेफड़ों में एक साथ साँस नहीं ले सकता था। अभी तक लबेदुपा खडा ही था, उसने अब मुझसे पूछा---"हाँ तो डाक्टर साहब से का जायके कहर " मेरी तनीयत बिलकुल अँझला उठी थो। जीने की इच्छा अब बिल्कुल जाती रही। इसलिये मैंने इस ख्याल' को दिल से दूर कर दिया कि अपने लिये उनसे कोई दवा मगाऊँ। पण्डितजी के जल्दो पाने फी निराशा ने और भूस की पीड़ा ने कुछ दूसरा ही भाव हृदय में पैदा कर दिया। मैंने लवेदुआ से कहा-"तू डाक्टर साहब के यहाँ जा और उनसे कह कि आपके दवासाने में जितने तरह के जहर हो सबमे से थोडा थोडा वतार वानगी के दे दे, जो पसन्द होगा रस लिया जायगा और बाको लौटा दिये जायेंगे। युगफ पूछ लेना कि भूख से तीन-चौथाई मरे हुए आदमी को ( २७ ) बाको एक चौथाई मरने के लिये कितना काफी होगा। जल्दी पूछकर आना।" इसके बाद मैंने छोटे भाई से कहा-"जाकर अपनी छोटी भाभी से कह दो कि अगर सती होना चाहती हो तो जल्दी सवसे बिदा लेकर नीचे आवे" इतना कहकर मैं लेट गया और आँस बन्द करके अनुभव करने लगा कि दम कैसे निकलता है। मैं अपनी समझ में उस देश की सैर कर रहा था जहाँ जीवन और मृत्यु का सङ्गम होता है। मैं वैतरणी में गोता लगाने के लिये कपडे उतार हो रहा था कि बाहर से 'बम शकर' की आवाज आयो और पण्डितजी के की टाप चौतरे पर सुनाई पडो । पण्डितजी को देखकर हम लोगों को जो सुशी हुई उसे सी० 10 आइ० डी० के दारोगा लोग भी नहीं वर्णन कर सकते- हम आप क्या वर्णन करेंगे जो महा साधारण जीव है उनके प्राने की सबर घर मे बिजली की तरह फैल गयी। सभी को अतीव प्रसन्नवा हुई। मेरी स्त्री ने वाद को मुझसे अकेले में कहा कि मारे खुशी के उसकी अगिया छ टूक हो गई थी। और मैं अपना हाल क्या लिखू। यस यही समझिये कि मारे सुशी के मैं दुम हिलाने लगा। खुर [४] पण्डितजी को देखकर हम लोगों को जो खुशी हुई उसे वर्णन करने की इच्छा करूँ तो मफलता के लिये पहिले देवी सरस्वती के व्रत का अनुष्ठान करना होगा और अव व्रत का नाम सुनकर मैं मर्माहत हो उठता हूँ। मुझे तो ऐसा प्रतीत हुअा कि जीवन का टिमटिमाता हुआ दीपक फिर से जग- मगा उठा। सबके मुर्भाये हुए चेहरों पर एक नई प्राभा सी झलकने लगी। अपने शुभागमन में इतनी प्रसन्नता का स्रोत बहते देखकर पण्डितजी स्वय भी अत्यन्त प्राहादित हुए। पण्डितजी का संक्षिप्त परिचय यहाँ पर दे देना उचित होगा। इनका नाम है जङ्गम चौबे, जो इनके लिये बिल्कुल अनुपयुक्त है क्योंकि जगम महराज जव साने के लिये बैठ जाते हैं तो सोलही आने स्थावर हो जाते हैं। इनको सिलाने से चार ब्राह्मण खिलाने का फल होता है, क्योंकि ये करीब-करीब उतना ही खाते है जितना चार साधारण ब्राह्मण या आठ साधारण मनुष्य सा सकते हैं। जब ये खडे होते है तो इनको तोंद दो कदम आगे बढकर खडी होती है और चलते हैं तो दो कदम आगे आगे चलती है। बगल में एक विहङ्गम सी झोली ये सदा लटकाये रहते हैं जिसमें पोथी, पत्रा, रोरी, जनेऊ, अबीर, बुफा, चन्दन, तिल, धूपबत्ती, दियासलाई, गोमुसी, रामरज, कुशा, नारा, पचपात्र, आचमनी, सत्य- नारायण की बटिया, भग की पुडिया, सुरती, चूना, सुधनी " , - . (२९) और बहुत सी और अलाय-मलाय भरे रहते हैं, लेकिन अगर कोई पूछ बैठता है कि पण्डितजी, झोली मे क्या रक्खे हो, तो झट कहते हैं कि " ' इम झोली में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष भरा है, और का है।" पण्डितजो अकेले नहीं थे, उनके माघ एक पूँछ भी थे। मेरे पूछने पर कि ये कौन हैं पण्डितजी ने उनका परिचय इन शब्दो मे दिया-"भैया, इनके हमरे कुछ भवदी लागत है, ई गाँव से प्राय पडे रहे, इम कहा कि कहाँ चूल्हा सुलगइहैं, जजमान के दरबार बना रहै, इदा पूडी-कचौडो के घाट उतरि जैहै, हमका सुचित से बैठाय के खियाय दिदी, इनका परोसा देके विदा फरौ।" मैंने पण्डितजी से पूछा-"महाराज, इतनी देर क्यों लगायी, अब ढाई बजने चाहता है।" जगम महाराज ने बैठते-बैठते कहा-"भय्या । देर तो सच्ची होय गयी, आपो लोगन के बडी तकलीफ भई, पर का करें, ऐसे फेर मे फँस गये रहे कि कुछ कहै की वात नाहीं। एक ठो बूढ बङ्गाली मरे के अँटका रहा, हमके वोलाइस गऊ- दान देव के। हम लपक लपके पहुँचे और सब सराजाम ठीक करावा कि इतने में एक वैद आय पडा और बुढवा के कौनो दवाई घोटाय दिहेम। आप कहे न पतिऐहो, बुढवा ती फिर से आँस खोल दिहेस और लगा टुपुर टुपुर बोले । हमके रस्ता बताइस कि महाराज, आप जाव, अब आज गऊदान न । , , . . देव। हमके तो भैया, ई उमेद पावत है कि ई जान दयू के सँवारल वेद पावा है कि बुढवा के फिर से टपटेल के देई । का कही, बदा की वात, ऐसी नगद गऊ हाथ में प्राय के निकस गई। आखिर वुढवा एक दिन मरी जरूर पै प्राज नाहीं मरा ! पण्डिताइन से हाक आये हुई कि जात हैं तोहरे बद गैया लियावे, देसी अब उनका का जवाब देइत है." मैंने पण्डितजी को अपना पेट दिसाकर कहा-"महा राज, आप चिन्ता न करिये, गोदान देने की दशा मेरी भी हो चली है।" "अरे राम राम राम, ई कौन भाखा वोलत हो। भग- वान करै आप सदा सोहागिन बने रहो अरे भूल गयन, कहै क तातपरज ई कि सदा परसन्न बने रहो। बरवसै गोदान क नॉवलेत हौ, हम लोगन के आगे अभी छोकरा हो।" "महाराज, छोकरा जरूर थे पर भूख ने सुखा के छुहारा बना डाला।" "अच्छा वच्चा । अब ई सब बात राहे दो। सामग्री सव परस्तुत होय तो शुभस्य शीघ्रम् करा जाय,विलम्ब किये से कौन लाभ इसके बाद जिस तत्परता से हम लोगो ने पण्डितजी को भोजन कराने का प्रवन्ध किया, वह दृश्य देखते ही बनता था। सबको यही धुन थी कि पण्डितजी जल्दी खाने बैठे, सभी पीढा-पानी रखने में जी-जान से जुट गये, पलक भाँजते सब भोजन की (३१ ) इन्तजाम हो गया, मैं दौडकर पण्डितजी को अन्दर लिवा पाया और छोटे भाई ने खुद अपने हाथों से पण्डितजी के धूल- धूसरित पाद-पनों का प्रक्षालन किया। पण्डितजी पालथी मारकर आसनी पर बैठ गये और उनके सामने थाली रस दी गयी। उन्होंने थाली पर एफ तीन समालोचना की दृष्टि डाली और देखनेवालों को अनुमान हुआ कि जो कुछ देसा उससे सन्तुष्ट भी हुए, क्योकि उनके चेहर पर एक अपूर्व जुन्हाई सी छा गयी। कहा- "पण्डितजी अब लक्ष्मीनारायण करिये " बस कहने की देर थी, हाथ की अँगुलियो ने थिरक-थिरफकर थाली में नाचना शुरू किया और मुँह ने चपर-चपर से सुर भरना शुरू किया। कौर को तरकारी में लथेरने और फिर उसे गोलियाकर गाल में ठूसने के दृश्य कुछ अजीव कौतुझ पैदा कर रहे थे। कभी- कभी किसी बडे ग्रास को तर्जनी उँगली से गाल मे गुलेलते थे, और अगर कोई बहुत बडा ग्रास मुंह तक पहुँच गया तो उसे प्राधा काटकर खा लेते थे और प्राधा थाली में रस देते थे। पहले प्राधे को सतम करके दूसरे आधे को भी उठाकर मुँह में रस लेते थे एक निवाले को दहिने गाल से पाये गाल मे सदेडते हुए पण्डितजी ने कहा-"वच्चा,थोरा रामरस तो देव।" मैंने थोडा सा नमक थाली में डाल दिया। थोडी देर के बाद पण्डितजी ने फिर कहा-“वच्चा, दस-पाँच ठो रामभंवरी तो देव !" । । ।
, ( ३२ ) रामभंवरी? यह किस चीज़ का नाम है ? मैंने तो यह नाम कभी नहीं सुना था। मैंने लवेदुआ को अलग बुलाकर धीरे से पूछा-"अबे, रामभेवरी किस चीज को कहते हैं, जानता है ?" उसने कहा-"साहब, हमैं का मालूम कि रामभँवरी काव कहात है। जब आप पढ़ा-लिखा होय के नाहीं जानित तो हम गँवार मनई का जानी । आप तो भला बी० ए० फेल हैं, हम तो कुछट्ट नाही फेल हैं, मैंने छोटे भाई से भी पूछा-"क्योजी, जानते हो रामभंवरी किसे कहते हैं " उस नालायक ने कुछ उत्तर तो दिया नहीं, उल्टे मुझे ताना देना शुरू किया-"मैं कहता था कि आप विशारद परीक्षा पास कर लीजिये, पर आपने मेरा कहा न माना। विशारद होते तो रामभवरी शब्द के अर्थ जानते न होते।" इसने अच्छा याद दिलाया। मेरे घर के बगल ही में एक विशारद रहते थे। मैं दौडा हुआ उनके यहा रामभवरी का अर्थ पूछने गया। उन्होंने बताया कि रामभंवरी उस वस्तु को कहते हैं जिसके चारों ओर श्रीरामचन्द्रजी मोहित होकर भंवरी-अर्थात् चकार-लगावें। यह अर्थ मुझे ठीक नहीं जैचा, इसलिये मैंने उनसे कहा कि आपका बताया हुआ अर्थ कुछ गलत सा मालूम पडता है। मेरे मुख से इतनी बात सुनकर वे वडे लाल-पीले हुए और कहने लगे "मेरा यताया हुआ अर्थ यदि ठीक न होगा तो मैं हिन्दी भाषा की दुम मे पलीता लगा दूँगा और अपनी मूंछों को धक सुदर्शन - कृपा करके ( ३३ ) से मुडया डालँगा। चलिये, में आपके साथ चलता हूँ, मेरे सामने आप पण्डितजी से रामभँवरी का अर्थ पूछिये।" मैं इनको साथ लेकर लौट आया और पण्डितजी से पूछा कि-'महाराज, आपने रामभंवरी मुझसे माँगी, पर मैं तो जानता ही नहीं कि रामभंवरी किसे कहते है। बताइये तो मैं ले आऊँ।" पण्डितजी ने मेरी अज्ञानता पर मुस्कराते हुए कहा-"देखो ई का थरिया मे रामभंवरी रक्सी है। रामभंवरी कहत हैं जलेवी को, समझे ?" मैंने अपने विशारद पडोसी से कहा-“देसा आपने, राम- भंवरी माने जलेबो, और आप न जाने क्या अट-सट माने बता गये थे।" उन्होंने कहा-"अजी यही तो मैंने भी बताया था, रामभवरी उस वस्तु को कहते हैं जिस पर मोहित होकर श्रीरामचन्द्रजी जिसकी भंवरी लगावे, वा परिक्रमा करें। सिवाय जलेबी के, जो सुर-नर-मुनि सबको प्रिय है, ऐसी कौन सी चीज हो सकती है जो श्रीरामचन्द्रजी के मन को हर ले और जो उनसे अपनी परिक्रमा करावे? इमी लिये राम वरी के माने जलेबी है। इतनी साधारण बात भी न समझो तो तुमसे बढकर घनघोर घोंघा ससार में कोई न होगा।" विशारदो के मुँह लगने से 'जीते कछु शोभा नहीं श्री हारे निन्दा वाद । होता है इसी लिये मैंने बात का वतगड नहीं किया, चुप रह गया। पर जो कुछ भी हो मुझे एक ३ . - । , ३ . , ( ३४ ) ऐसा नया शब्द मालूम हो गया जिसे वा० श्यामसुन्दरदाता भी न जानते होंगे यद्यपि उन्हे डिक्शनरी लिखने और लिसाने काव्यसन सा होता जा रहा है। रामभंवरी माने जलेवी, राम |वरी माने जलेवी, मैं घोखने लगा। रामरस माने नमक तो मैं जानता था पर राममवरी माने जलेबी आज मालूम हुआ। बाद को मुझे पता चला कि पण्डितों में इस तरह के और भी कई शब्द धरते जाते हैं जैसे- रामलड्डू मोतीचूर रामचक्का-दही वडा रामलकुटी छडी रामपनहीं =खड़ाऊँ रामचरचा-भोजन रामकटोरा=पुरवा ( कुल्हड) रामघटघट बूटी रामफकी=सुरती चूना रामठिकरा-पैसा रामसलामी-दक्षिणा रामकिचकिच = पूजा पाठ इत्यादि । इन शब्दों को सुनकर ख्वाहमख्वाह यह चिन्त हृदय में उत्पन्न होती है कि जैसे ये लोग जलेबी को रामः भंवरी, पैसे को रामठिकरा, नमक को रामरस कहते हैं वैर ही जजमान को कहीं रामजना न कहते हो।
हुए बोले ( ३५ ) सैर, थोडी देर बाद पण्डितजी ने कुछ जल-शोपण किया। मैंने समझा कि पानी पी रहे है तो अब पेट भर गया होगा। इसलिये मैंने बडो प्रसन्नता के साथ नौकर से पुकारकर कहा-"अरे लवेदुआ, पण्डितजी का हाथ धुला, पण्डितजी भोजन कर चुके ।" लेकिन ऐसा कहो । पण्डितजी मेरे ऊपर भ्रूभङ्ग फरते "भैया की बात | अरे अवहिन भोजन कर चुके । भोजन न हुप्रा सेलवाड हुआ। वच्चा, अकुताव मति, प्रवहीं ती- अट तर गयो, घट तर नाही । नाहीं॥ यह सुनकर मेरा मुँह 'तोरडावत्' लटक गया और मैं भयभीत नेत्रों से पण्डितजी की मुखरूपी कन्दरा को निहारने लगा। - - बडे भडार से, 1 इसके बाद पण्डितजी ने बिल्कुल नये जोश के साथ थाली में हाथ झारना शुरू किया। चीजों के परसे जाने में और उनके लोप होने मे स्यात् ही कुछ समय लगता रहा हो। मैंने सोचा कि अब पूछ पूछकर दूं, नहीं तो शायद छूट जाय । इसलिये मैंने पूछा-"पण्डिवजी, और कचौरी दूं?" पण्डित- जी ने कहा-"देत चलौ बच्चा, जब अन्त करण तृम होइ । जायगा, तब मैं खुदै कहि दूंगा। न कहि मगा तो इसारा फरि दूंगा। अभी देव चली, हमार सिद्धा-अनन्त (सिद्धान्त) का है सो जानत हो? मुना- तू वेले जाव हम ठेले जाई वेलना टूट- तय है। कि दयू छुटा- तब छूटै।। पण्डितजी तो छिपे रुन्तम निकले। पेट में चारा पडते ही 'निराला' छद बनाने लगे। इसके बाद पण्डितजी ने धोती का फेंटा ढोला किया और लगे कटोरा भर-भरकर दही सोसने । फिलासफी की उपयोगिता ऐसे ही समय सावित होती है। पेट तो दम-दिलासा की सीमा पार कर चुका था, को समझाया कि हे मन । जिमका आदि है उसका अन्त अवश्य ही होगा। जब पण्डितजी साना शुरू कर चुके हैं तो कभी न कभी सतम करेंगे ही। पर मेरे मन ने मुझसे कहा कि ऐ मूर्स । सतम तो करेंगे पर तेरी जिन्दगी मे सतम करेंगे या नही, सवाल तो यह है। पण्डितजी ने अब 'सटीक' भोजन करना शुरू किया। खाते समय यदि साने की चीजों की तारीफ करता चले तो मैंने मन तो गजब है। ( ३७ ) 'भोजन-भट्ट' प्रामणों की भाषा में वह 'सटीक' भोजन कहाता है। पण्डितजी बोले-"भोजन पदो चमत्कारपूर्ण बनो है पच्चा, मब चीज प्रौव्वल है। रायता में सरसों की झार ऐसी सच्ची है कि सारी देह रोमाञ्चमान होय उठत है। और मिर्च का अचार तो वर्णनातीत है।" कुछ देर दिमाग घिसने परमैंने समझा कि जिस मिर्च के अचार की तिताई वर्णन के बाहर हो वह वर्णनातीत अचार फहाता है। पण्डितजी फिर बोले-"पूरी ऐसी नाजुक बनी है कि मासन की गोली की नाई गटई में सरक जात है। और कचौडी ऐसी कपोलकल्पित कचौडी तो देवता लोगन के दुर्लभ है।" मैंने बहुत देर तक माधापच्ची की पर कपोलकल्पित कचौडी का अर्थ किसी तरह नहीं समझ पाया । इसलिये मैंने पण्डितजी से बताने के लिये आग्रह किया। वे बोले-"जान पडत है कि आप लोग स्कूल मे कोदो देके पढत हैं। वडे अचरज की बात है कि कपोलकल्पित फचौडी का अर्थ आप लोग नहीं जानित । कपोल माने गाल होत है न ? बस, जौन कचौडो गाल के तरह फुली होय ऊ कपोलकल्पित कचौडी कहात है।" मैं अपने ज्ञान के इस अभूतपूर्व इजाफे पर अत्यन्त प्रसन्न हुमा। कविवर नाथूराम शकर शर्मा ने कहा है कि- गोल गुदकारे कपोलों की कडी उपमा न दी। पुलपुली मोयन पडी फूली कचौडी जान ली ।। - (३८) यहाँ उपमान और उपमेय के स्थान बदल दीजिये तो कोलकल्पित कचौडी का अर्थ स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि कचौड़ी ऐसे गाल, या गाल ऐसी कचौडी, दोनो एकही बात है। सैर, भूख ने अब बडा विकराल रूप धारण कर लिया था। मैंने सोचा कि पण्डितजी को किसी तरह इशारे से समझा देना चाहिये कि अव यदि बहुत जल्द आप खाने से मुँह न मोडेंगे तो हम लोगों के जान पर आ बनेगी। लिये मैंने पण्डितजी से पूछा--'क्या महाराज ! यह शरीर नौ द्वार का पोजरा है न?" "हाँ बच्चा, मास्तर मे तो ऐसने लिखा है।" "अच्छा तो यह वताइये कि जब कोई भूख के कारण मरता है तो उसका प्राण किस द्वार से निकलता है ? मालूम हो जाय तो उस द्वार की सास तरह से रखवारी करूँ" पर कौन किसे जवाब देता है। अरण्यरोदन का उत्तर प्रतिध्वनि से मिल भी जाता है लेकिन मेरे प्रश्न का उत्तर न मिला, न मिला, न मिला। यह मैं मानता हूँ कि एक तो मेरा प्रश्न बहुत टेढा था -स्वय आचार्य चरक को चकर में डाल देता-और दूसरे पण्डितजी को उस समय जवाव देने की फुरमत भी नहीं थी, क्योंकि भोजन को पेट में इस प्रकार तहियाना कि उसका कोई भी कोना कहीं से किसी तरह जरा भी साली न छूट जाय आसान काम नहीं है। ।
( ३६ ) आत्मरक्षा की दृष्टि से अब यह निवान्त आवश्यक हो गया था कि पण्डितजी को हमारी दयनीय अवस्था का वास्तविक ज्ञान करा दिया जाय। इसलिये मैंने एक थाली उठा ली और चम्मच से उसे बजाने लगा। पडितजी ने पूछा-"ई काहे टनटन-टनटन कर रहे हो वच्चा।" मैंने कहा-"पण्डितजी, मेरा प्राण कूच कर रहा है। उसी के कूच का डका वजा रहा हूँ।" गैंडे की पीठ पर सींक चुभाने का जितना असर होता है उससे कुछ कम ही असर पण्डितजी के हृदय पर मेरी इन बातों का हुआ। उनके जीमने की गति अभी रत्ती भर भी शिथिल नहीं हुई थी। दाहिना हाथ अब भी 'अप' और 'डाउन' ट्रेन की तरह थाली से मुँह और मुंह से थाली तक दौड रहा था । पण्डितजी हिमाचल की तरह अपने आसन पर अचल थे। थोडी देर में उन्होंने कहा-'बच्चा, आज हम कुछ ढेर खायेंगे।" "ईश्वर करै आप इतना ढेर खाइये कि खाते-साते डेर हो जाइये" 'नहीं बच्चा, हँसी मत करो। हम येह बदे आपके बताय दिहा कि जमें आप घजार से कौनो पाचक मॅगाय रक्स, के जाने काम पडी जाय ।" निमन्त्रित किये गये, सिला दिये गये अब साना हजम करने का भी प्रबन्ध कर दीजिये। यह सब यह एक रही।
मुझसे नहीं होने का। जो कुछ मैंने अभी तक किया वही बहुत है। जितनी देर मैंने भूस का सामना किया उतनी देर दुश्मन का सामना करने पर लोग Victoria CLOSs पा जाते हैं। मैंने साफ कह दिया-"महाराज, बुरा मानिये या भला मैं पाचक-वाचक लाने नहीं जा सकता।" "बजार कौन दूर है कि चार परग भुइयों के बदे इतनी भास्कत करत हो, राम राम । पैदल न जाय सको तो राम- फिरकी पर जाय के लेत प्रावो।" रामफिरकी कहते हैं बाइस्किल को। मैंने कहा-"मह- राज रामफिरकी नहीं उडन-सटोलना भी हो तो मैं नहीं जाने का। मुझे इस समय अपनी जगह से हिलना अपाढ है।" पण्डितजी बोले-"छि छि', जनम पाय के एक दिन कुछ देर भूखे रहना पडा तो मॉझा ढीला होय गवा । एतनै देर मे सूख के अमहर होय गयो ।" मुझे यह बात कुछ लगती सी जान पडी। मैंने कहा- "खैर, मैं सूख के अमहर हो गया हूँ तो आपको बला से, तो फूल के कटहर हो रहे हैं।" "अच्छा बच्चा | मिजाज जिन बिगाड़ो, घर ही में कौनो पाचक होय तो मॅगाय देव " 'मेरे घर मे जमालगोटे की वर्फी है, कहिये कितना -- " प्राप मॅगा दूं।"
( ४१ ) पण्डितजी मुझे गर्म देसकर चुप हो गये। मैंने समझा कि पाचक न मिलेगा तो पण्डितजो खाने से मुंह मोड लेंगे। पर कहाँ की बात, पण्डितजी 'भोजन-पध' पर अग्रसर होते ही चले गये। मुझे यह विकट चिन्ता होने लगी कि ब्राह्मण साते-साते कहीं प्राण न दे दे। इसलिये मैंने पण्डितजी से कहा--"महाराज, अब लगी-लिपटी से काम न चलेगा, आप साफ साफ कहिये कि अभी कितनी देर में आपके पेट पर पटाक्षेप होगा।" "ठहरौ भैया ठहरी, अधीर काहे होत हो, का सहजै में पुन्न बटोर लेइहो ।" "पुण्य तो जो कुछ इस जीवन में बटोरना था वह बटोर चुका, अब तो आपके साथ मरने के लिये तैयार हूँ-आप सुशी से साते-खाते दम तोडिये।" यह बात साफ जाहिर थी कि पण्डितजी न तो पराये अन्न पर दया करेंगे और न अपने पेट पर। दस मिनट जब दस बरस की तरह और बीत गये तब मैं फिर वोला--"कहिये महराज। अब कुछ पेट की थाह लगनी शुरू हुई या नही ?" ‘पण्डितजी ने उत्तर दिया-"बेटा, आप तो वही वतिया बार-बार ओटत हो। अबही कौन थाह बतावै ,न वौ अवही चुन्दो सडी भई और न जौन थोडा बहुत सावा है ओके पहुँच की रसीद आई" - मेरी हजामत [१] आपने सुना होगा कि कुछ लोग भाड झोंकने के लिये दिली जाते हैं, कोयला ढोने के लिये फलकत्ते जाते हैं और बीडी बेचने के लिये बम्बई जाते हैं। मैं अपनी हजामत बनवाने लसनऊ गया था। लसनऊ पहिले सिर्फ अवध की राजधानी थी, अब महात्मा बटलर की कृपा से सारे सयुक्त प्रान्त की राजधानी है। कई सुविधाओं का ख्याल करते हुए यह मानना पडता है कि राज- घानी होने के योग्य यह है भी। पहिले तो रेवडियों अच्छी मिलती हैं जो आसानी से जेब में भरकर कौसिल-चेम्बर में सायी जा सकती हैं, दूसरे नवाबजादियों का भाव सस्ता है जो बाहर से आये हुए कौंसिल के मेम्बरो को गृहस्थाश्रम बनाये रसने में मदद पहुँचाती हैं, तीसरे पाों की बहुतायत जिनमे कौंसिल की ताती-तातो स्पीचो के बाद माथा ठडा करने की जगह मिल जाती है। तब मला बताइये कि इन सुभीतों के आगे इलाहाबाद को कौन पूछेगा? वहाँ सिवाय अक्षयपट के धरा ही क्या है? गवन्नैण्ट की यह शर्त थी कि यदि ( ४६ ) अक्षयवट का नाम बदलकर बटलर-बट रस दिया जाय तो इलाहावाद को तलाक न दिया जाय, पर हिन्दुओं की धर्मा- न्धता के कारण ऐसा नहीं हो सका। हैली साहब के प्राने पर इलाहाबादियो ने उनके पास भी अपनी दुःख-गाधा पहुँ- चायी पर उन्होंने कहा कि अधिक से अधिक मैं यही वादा कर सकता हूँ कि साल में एक बार इलाहावाद प्राकर त्रिवेणी- सङ्गम पर सर मुडवा जाऊँ। खैर जाने दीजिये, अपने राम को क्या, एक राजधानी से मतलब, चाहे कहीं भी हो। इन्हीं सब झगडो से अलग रहने के लिये मैं बाबा विश्वनाथ की राज- धानी काशी में रहता हूँ। मैं तो इलाहाबाद का नाम भी न लेता पर क्या करूँ, उमका रँडापा देखफर दया आ ही जाती है। सच बात यह है किन लखनऊ मेरे ऊपर फिदा है और न मैं लखनऊ पर, जब से सिर गंजा होने लगा तभी से मैंने फिदा होने की आदत ही छोड़ दी। लखनऊ में कई बार गया हूँ। नगर ऐसा कोई बुरा नहीं है। सड़कें बहुत चौडी हैं जिन पर मोटरों को लडने मे कोई बाधा नहीं पहुँचती। हिन्दू होटल कई हैं जहाँ हिन्दू लोग कुशासन पर बैठकर हिन्दू विस्कुट और हिन्दू कलिया खाते हैं। स्कूल और कालिजो की भरमार जहाँ देश के नवयुवक दिन दहाडे अपना भविष्य सुधारते हैं। ताँगे और एक्के वेशुमार हैं जिन्हें अधिकतर नवाब-जादे ही हाँकते हैं। जूतों की दुकाने बहुत हैं जिनकी हिन्दू-मुस्लिम दङ्गों में अच्छी विक्री हो जाती है। भाँडों की पैदावार यहाँ है ( ४७ ) अच्छी होती है। जनानी दूकानें हर गली कूचे मे दिन रात खुली रहती है जहाँ प्रमेह का विनिमय बडे धडल्ले से होता रहता है। शादी-ब्याह के अवसर पर यहा के निवासी कचालू और ककडो का भोज देते हैं। अण्डा यहाँ की साग- भाजी है जिसे उबालने के लिये 'हरद्वार से गङ्गाजल मँगाया जाता है। सुना है कि यहां सीधी टोपी देकर सडक पर निकलना मना है। मकडी के जाले की पोशाक यहाँ के शौकीन अधिक पसन्द करते हैं पर्दे की रस्म सबको बहुत प्रिय है यहां तक कि हवाई जहाज अगर शहर के ऊपर से उड़कर जाता है तो उडानेवाले को ऑख पर पट्टी बाँध लेना होता है। शहर गोमती पर बसा हुआ है। स्यात् इसी कारण से गोमाता की रक्षा यहाँ प्रावश्यक नहीं समझी जाती। जगह की हुई गाओं की लाशों को ठेलों पर लादकर इधर-उधर लं जाना यहाँ का कोई असाधारण दृश्य नहीं है, लेकिन हिन्दुओं के अत्यन्त आग्रह पर मुसलमानों ने अपनी स्वाभाविक सहि. ष्णुता से इतना किया है कि 'गोबर का चौका लगाकर तब गोमास पकाते हैं। यहाँ की मुसलमान औरते पायजामा और हिन्दू औरतें अधिकतर घाँघरा पहिरती हैं। मेरी यह राय है कि सारे देश की हिन्दू औरते घोघरा पहिरा करें, इसलिये कि मुसल- मानों से कहीं मार पीट हो जाय तो हिन्दू मर्दो को छिपने की एक सुरक्षित जगह तो रहे ।
के ( ४८ ) नजाकत को वो यहाँ हद हो गयी है। रोज ही अख वारो मे खबर आती है कि अमुक बाग मे रात के समय कोई की कली चिटकी, जिसका परिणाम यह हुआ कि आस पास औरतों के कानों की झिल्लियाँ फट गयीं। जब ऐसी घटनाएँ अक्सर होने लगी तो सरकार को लाचार होकर यह घोषणा करानी पड़ी कि शहर के भीतर रात मे कोई 'गुल' न खिला करे । एक बार मेरे एक मित्र रेल से सफर कर रहे थे। उनके बगल में एक मुसलमान सज्जन भी बैठे हुए थे जो लखनऊ रहनेवाले थे और इसी लिये अवश्य ही कोई नवाब रहे होंगे। लखनऊ स्टेशन पर दोनों आदमिया ने ककड़ियाँ खरीदर्दी । मुसलमान मजन ने बडी नफासत से ककडियो को छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े किये और फिर एक-एक टुकडे को सूंघ- कर बाहर फेंकने लगे। मेरे मित्र से न देखा गया उन्होंने पूछा कि आप इन्हें साते क्यो नहीं, सूंघ-Vधकर बाहर फेक रहे हैं ? उन्होंने उत्तर दिया कि ककडियों के खाने में कोई मजा नहीं, उनकी सुशबू ही असल चीज है। इसके बाद मेरे मित्र ने भी मुसलमान सज्जन का अनुकरण किया, अन्तर इतना था कि वे सिडको के रास्ते वाहर फेंक रहे थे और मेरे मित्र मुंह के रास्ते अन्दर । अभी ज्याद दिन नहीं हुए फि लखनऊ के हिन्दू मुसल- मानों में एक अच्छी भिडन्त हो गयी। दोनों भाइयों ने प्रेम मे एक दूसरे का फस्त सोल दिया, आपस मे कुछ पटा बनेठी क्यो (४६) फा अभ्यास कर लिया गया और ककडों के कुमकुमे भो छोर्ड गये। मेरे एक मित्र को ठीक इसी अवसर पर किसी वर्ड जरूरी काम का स्मरण हो पाया और वे घर की रक्षा अपनी स्त्री पर बोडकर डाफ गाडी से हॉफते हुए बनारम चले आये। मैंने उनसे कुल ब्योरा पूछना चाहा पर दङ्गे को उन्होंने अपनी सिडको की चिक में से देना था, इसलिये ठीक हाल न उता सके। तब मैंने लसनऊ-स्थित निज सवाददाता को लिसा जो वहा के एक गण्य-मान्य सज्जन हैं और अखिल भारतवर्षीय अहिफेन-मण्डल के संस्थापक भी हैं। उन्होने तार द्वारा मुझे सूचित किया कि असवारवाले झगडे की तह तक नहीं पहुँच पाये है। वास्तविक कारण झगडे का यह था कि नित्य शाम को कुछ हिन्दू गोमती किनारे जाया करते थे और आटे की रामनामी गोलियों मछलियो को सिलाते थे। मुस- लमानों ने कहा कि ऐसा करना अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों को हिन्दू बनाने का प्रयत्न करना है, क्योंकि मछलियाँ रामनामी गोलियों सायेंगी और फिर उन्ही मछलियों को मुसलमान भी सायँगे और इसी तरह धीरे-धीरे उनमे राम नाम का । विलकुल ठीक है। इस सम्बन्ध में मुसल- मानों की दूरदर्शिता सराहनीय है, लोग उडती चिडिया पहिचानते हैं, ये तैरती मछली पहिचान गये। हिन्दू सदा के घेघा , सबसे हारे तो मछलियों के द्वारा शुद्धि के पैगाम भेजने चले। प्रचार वढेगा - -- करीय ३०० वर्ष हुए वेनी नाम के प्रसिद्ध कवि, घुडदौड देखने के लिये लखनऊ गये थे, उस समय वहाँ म्युनिसिपेलिटी फा इन्तजाम अच्छा नहीं था, सो उन्होने एक शिकायत म्युनि सिपलिटी की उस ममय के समाचारपत्रों मे छपवायी जो इस प्रकार है- गडि जात वाजी और गयन्दगन अडि जात सुतुर अकडि जात मुसकिल गऊ की। दामन उठाय पाँय धोखे जो धरत होत आप गरकाप रहि जात पाग मऊ की। बेनी कवि क देखि थरथर कॉपै गात रथन के पथ ना विपद बरदऊ की। बार वार कहत पुकार करतार तो सो मीच है कवूल न कीच लसनऊ की। अब लखनऊ के सडको की यह दशा नहीं रही। से लखनऊ यूनिवर्सिटी बन गयी है तब से सडको पर धूल रहने ही नहीं पाती, कीचड होगा कहाँ से ? मैकडों वकील और ग्रेजुएट पास होते हैं जो प्रारम्भ में ख्वाह थोडे दिनों तक धूल फॉकते हैं, इसी से अपने आप सडके माफ होती रहती हैं, म्यूनिसिपेलिटी को विशेष परिश्रम भी नहीं करना पडता। वर्तमान नगर तो वास्तव में अतीव सुन्दर है, और जव से प्रान्तीय सरकार का प्रसाडा यहाँ आ गया तब से तो सोने में सुगन्ध आ गयी है। पै हर साल खाहम- นะ इधर मुझे एक विशेष काम से लसनऊ जाना पड़ा। वहाँ मेरा एक बडा आवश्यक काम अँटका हुआ है। मैंने मनौती मानी है कि यदि मेरा काम हो गया तो देश भर के पण्डों को एक-एक लंगोट उपहारस्वरूप भेंट करूँगा। भाग्य ने यदि इस बार मेरे साथ प्रॉसमिचौनी न खेली तो शायद काम हो भी जाय, यों तो भाग्य से मेरी पैदायशी दुश्मनी है। मैं उसे छछूदर की तरह महकता हूँ। महात्मा गाँधी ने प्रछूतोद्धार के लिये इतना प्रयत्न किया पर भाग्य ने मुझे अभी तक अछूत ही समझ रक्सा है। मुझे शोक इस बात का रहता है कि किस्मत मुझे देसकर न जाने क्यों चूंघट काट लेती है, मैं यद्यपि न तो उसका ससुर हूँ न जेठ । यह भी नहीं होता कि घूघट के भीतर ही से कभी-कभी मुस्करा दिया करे, सैर । आप जानते होगे कि परसाल अवध के एक बहुत बडे तालुकेदार राजा गावदीसिंह का लखनऊ मे 'काशीवास' हो गया। राजा साहब मरे थे लसनऊ में, पर देश के कई दिग्गज पण्डितों ने यह व्यवस्था दी कि चूंकि मरते समय उनके मुस से 'फाशी' शब्द निकला था इसलिये उनके मरने को साधारण मरना न कहकर 'काशीवास' ही कहना उचित पता लगाने पर मालूम हुआ है कि राजा साहब ने मरते समय अपनी अन्तिम साँस को घटोरफर काशी नामक अपने पुराने सिदमतगार को पुकारा था-"प्रये कशिया, एल्लू का पट्ठा " .
। चल बसे। फलत कमिश्नर जण्ट ( ५२ ) खैर, राजा माहब को लेने के लिये जो यमदूत उस समय आये थे वे कुछ ऐसे उजड़ थे कि उन्होंने राजा साहब को फुर- सत के साथ मरने का मौका नहीं दिया। इतनी जल्दी मचाई कि वे अपने इस्टेट का कोई उचित प्रबन्ध भी न कर सके और लडका नाबालिग था और जमींदारी के जरूरी कामों में सिर्फ गाली वमना अभी तक सीस पाया था। ऐसी अवस्था मे यह आवश्यक हो गया कि स्टेट के सुप्रवन्ध के लिये एक अच्छा मैनेजर नियुक्त किया जाय । साहब की आज्ञा से, कलेक्टर साहब की मर्जी से, साहन की सलाह से, डिप्टी साहब की राय से और वैरिस्टर साहब की मदद से एक विज्ञापन का मसविदा तैयार कराया गया कि अमुक स्टेट के लिये एक मैनेजर की प्राव- श्यकता है। विज्ञापन प्रसगरों में छाप दिया गया । सिर्फ ऐसे लोगो की अर्जियाँ मांगी गयी थी जिन्हे नाच मुजरे का शोक हो और छठे-छमासे इलाकों के काम को देस लेने की फुरसत। विज्ञापन पढते ही मैंने निश्चय कर लिया कि यही मौका है अपने कर्म की रेस पर मेख मारने का । मैं इम स्थान के लिये सर्वथा उपयुक्त हूँ, मेरे अस्तित्व में यदि यह स्थान रिक्त रहे तो उस स्टेट का दुर्भाग्य । विज्ञापन में फुरसत की आवश्यकता बतायी गयी थी । भन्ला फुरमत की कौन सी की मुझे है। मेरे पाम फुरमत सिवा और है ही क्या ? मेरी पढायी लिसायी भी निहायत के นี้ - ( ५३ ) फुरसत के साथ हुई थी और जन से कालिज छोडा है तब से तो फुरसत के अथाह समुद्र में गोते लगा रहा हूँ। यो कहिये कि इस समय फुरसत ही मेरी चौहद्दी है। रहा नाच मुजरे का शौक। कुछ तो यह है भी, बाकी राज-काज के सिलसिले में हो ही जायगा। मेरा यह सदा से विश्वास रहा है कि नाच-मुजरा कोई बुरी चीज नहीं । भगवान् इन्द्र के यहाँ तो इसका एक Department ही अलग है। रईसो के धन के लिये यह एक बहुत जरूरी जुलाय है कोषबद्ध भी कोष्ठबद्ध की तरह एक भयानक रोग है। आसिर इतने रईस जो नाच-मुजरे से प्रेम रखते हैं वे सब के सब क्या जहन्नुम की सडक पीट रहे है ? देश के प्राय सभी बडे-बूढे, धनी-मानी, सेठ-साहूकार, राजे-महराजे और सन्त-महन्त जिस प्रथा को अभिनन्दनीय समझे उसकी तरफ हम श्राप कौन होते हैं कि अंगुली उठावें? एक मठाधीश ने मुझसे कहा कि यदि मङ्गलामुसी का नाच न हो तो कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ठाकुरजी का जन्म कैसे हो? ठोफ ही है, नवजात ठाकुरजी के फर्कश 'कहाँव, कहाँव' को कर्ण-मधुर बनाने के लिये आवश्यक है कि उसके साथ दो चार कोकिल-कण्ठ-वालियों की गिटकिरी फा पुट दे दिया जाय। पहिले तो नाच मुजरा किसी हालत से पाप नहीं कहा जा सकता और यदि पाप है भी तो क्या हम हिन्दू ऐसे डर. ।
। ( ५४ ) पोक हैं कि पाप के डर से परम्परा की प्रथा छोड देंगे ? पर- मात्मा भी कितना अन्यायी है । मुसलमानो के लिये मरने के बाद भी हूरो का प्रबन्ध है पर हम हिन्दू जीते जी जो कुछ कर ले वही बहुत है। उस पार कुछ अप्सरायें हैं जरूर, पर देवताओ ने पहिले ही से उन्हे अपने इत्थे चढा रक्सा है। सबसे बड़ी बात, इस सम्बन्ध मे, सोचने की यह है कि जिन विचारियो ने नाचना-गाना सीस लिया है वे अब कण्ठो लेकर कहाँ जायें ? कावुल जाकर सुखी कूट-या लङ्का जाकर रावण के वशजो का पता लगावे-या बगाल की खाड़ी में डुबकी मारे-या गले मे रस्सी बांधकर पालना झूल-या क्या करें ? आप इनको लेकर अपने घर बसाने पर राजी हो तो ये आज आपके साथ पानी मे मिश्री की तरह घुल-मिल जाय। आखिर इनके शरीर मे भी तो वही पेट-रूपी 'भूतो की हवेली' बनी हुई है। आपके फरहारी उपदेश से तो वह भरेगा नहीं ? उसके लिये कोई प्रवन्ध कीजिये। जैसे लाखों रुपये देवालय, चिकित्मालय, विद्यालय और अनाथालय बनवाने में लगाते हैं वैसे ही दम-पॉच लास एक पतुरियालय बनवाने में खर्च कर दीजिये। ईश्वर ने अगर मुझे धन दिया तो मैं अवश्य एक 'पतुरियालय' सोलफर समाजसेवा करूंगा। उसका पता प्रकाशित कर दूंगा। हो सके तो किसी वातील में आइयेगा हां, तो उस विज्ञापन को देसकर कितने फुरसत के सताये हुए नरयुवकों के मुंह में लार के चश्मे फूट पड़े। नियुक्ति में ( ५५ ) न जाने कैसे लसनऊ के कमिश्नर साहब के हाथ मे थी। विज्ञापन निकलने के कुछ ही घण्टो बाद से कमिश्नर साहब के ऊपर अर्जियों के ओले बरसने लगे। मैंने भी झट से एक बारह पेज की अर्जी लिसकर वैरंग रवाना कर दा। अर्जी भेज देने पर हृदय में इस बात की खलबली पड़ी कि देखें कोई उत्तर आता है या नहीं । चार पाँच दिन तक तो मारे चिन्ता के नीद नहीं आयी, मुश्किल सेदो घण्टे दिन में और सात घण्टे रात में सो सका। जब कभी डाकिये को देस पाता तो उसके गले से लिपटकर पूछता कि "प्यारे । कोई मेरी भी चिट्ठो है " देर होते देसफर मुझे यह भी चिन्ता हुई कि कही कमिश्नर साहब को लँगडे बुनार ने तो नहीं धर दवाया। एक बार इरादा हुआ कि उनको लिसें कि 'आशा करता हूँ आप सपरिवार कुशल से होगे' पर इसी चीच में उनका एक सत आही गया। सिर्फ इतना लिसा था कि personal intervicा के लिये कमिश्नर साहब आपको सलाम भेजते हैं। इस पत्र को मैंने बडे यत्न से रस छोडा है। यदि काम हो गया तो ठोक ही है, नहीं दिखाने के लिये रहेगा कि मुझे ऐसी अच्छी जगह मिल रही थी पर मैंने किया नहीं। [२] अब मैं इस उधेड-बुन मे लगा कि राहसर्च के वास्ते कुछ रोकड जुटानी चाहिये। जर से रुपयों ने मेरे जेब में है ? पान-पत्ता दोस्तों के - ( ५६ ) हडताल बोल दी तव से मैं अपने पास छदाम रखना भी हराम समझता हूँ, और जरूरत ही क्या यहॉ, नाश्ता-पानी ससुराल मे और भोजन सत्रों में कर लेता हूँ। यदि आपने पुराणों के पन्ने उलटे होंगे तो अवश्य जानते होंगे कि मेरे जेव की ऐसी शोचनीय दशा क्यों, कैसे और कव से हुई। भगवान् ने वामन रूप धारण करके दानवराज बलि से तीन पग भूमि माँगी, वलि ने विना वकीला की राय लिये उन्हे तीन पग भूमि सङ्कल्प कर दी। परिणाम यह हुआ कि दो ही पग मे वामन भगवान् ने स्वर्ग और मर्त्यलोक नाप डाला, तीसरा पग रखने के लिये कोई स्थान ही नहीं बचा। जव बलि ने देखा कि किसी प्रकार छुटकारा नहीं है तब चुपके से उन्होंने मेरे जेब की और इशारा कर दिया और वामन भगवान् सीसरे पग से उसे नापकर चलता हुए। बहुत दिनो के बाद यह एक ऐसी परिस्थिति या पडी थी, जो बिना कुछ रुपयों के हल होती नहीं दीख पडती थी। बहुत सोच विचार के बाद मैंने कुछ कर्ज लेने का निश्चय किया । अर्थशास्त्र का कई मन्वन्तर लगातार अध्ययन करके मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि कर्ज लेनासभ्य समाज की अनुकरणीय सुव्यवस्थाओं में है। खाना पोना, सोना और कर्ज लेना शरीर के धर्म है। जव इतनी बडी गवन्मेंन्ट फर्ज लेती है तो हम पाप उसकी प्रजा होकर क्यों न ले ? यूरोप में लोग ऋण . नायगा। ( ५७ ) के वल पर महासमर छेड देते हैं, मैं अपने देश मे ऋण के बल पर सफर भी न करूं। पर कही कर्ज मिले तब तो। कितने ही, दोस्त और माथियों के दरवाजे सटखटाये पर सव व्यर्थ । किसी का कोई मर गया चा, किसी का कोई मरनेवाला था, किसी के सेफ की ताली गा गयो थी और कोई वड लाट की जमानत मॉगता था । रक मित्र ने कहा कि मैं रुपये तुम्हें जरूर देता पर कल ही मेरी बिरादरी की पञ्चायत हुई जिसमे यह तय पाया कि अगर कोई किसी को रुपया उधार देगा तो जाति से बाहर कर दिया क्या ऐन वक्त से पञ्चायत हुई थी। कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कारों की जननी है। नब मैंने देखा कि ऋण-उधार पाने की कोई आशा नहीं है तब ने एक ऐसा उपाय सोच निकाला जो अत मे अचूक सावित आ। रात मे स्त्री को सोती हुई पाकर उसके एक हाथ का चदार कडा उतार लाया। पुराने जमाने में राजा नल ने स तरकीव की रजिस्टरी करायो थी,-दमयन्ती को सोती ई पाकर उसकी प्राधी साडी फाडकर चम्पत हो गये थे। फडे को बन्धक रसफर मैंने कुछ रुपयं सडे कर लिये और ट टिकट फटाकर रेल पर सवार हो गया। रास्ते में कोई । उल्लेखनीय घटना नहीं हुई, यहाँ तक कि एक बार भी मेरी डी ने किसी दूसरी गाड़ी से टपर नहीं ली। हाँ, एक त मैंने बडी विचित्र देखो, वह यह कि जय गाडी जोर से | इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर पाने के लिये आपको वैज्ञा किसी से भी परिचित नहीं था। होटल में ठहरता तो टोटन ( ५८ ) चलती थो तो ऐसा जान पड़ता था कि आस-पास के मकान और पेड भी सङ्ग-सङ्ग दौडते जा रहे हैं। इसका कारण मैंने देश के प्रमुस विज्ञानवेत्ता प्रो. श्रीरामदासजी गौड से पूछा। उन्हाने उत्तर दिया कि "अापका प्रश्न टेढ़ा है। मैं स्वय भी इसी विपय पर बहुत दिनों से गौर कर रहा हूँ। मेरी समझ निक अद्वैतवाद का सहारा लेना पडेगा। सुनिये-- "जिस प्रकार माया-ब्रह्म के सश्लेष-जन्य अन्योन्याश्रय के अनावच्छिन्न शक्यता के सम्बद्धधर्प और समवायोकरण से हेतु हेतुमद्भूतत्व का आविर्भाव होकर, विवेय-प्राधान्य और अनु भवगम्य इन्द्र-रूपता तथा उपवृहण विकल्पाभासो, मे अस्मद् युष्मद् का भ्रम होता है, ठीक उसी प्रकार रेल की सवारी आस पास की स्थावर चीजें जड्डम प्रतीत होती हैं।" कहने के आवश्यकता नहीं कि इस उत्तर ने मेरे मस्तिष्क के लिये ब्राह्मी घृत का काम किया। तीसरे पहर रेल ने मुझे लखनऊ स्टेशन पर उतार दिया कुली और ताँगेवालो की छाती पर मूंग दलता हुआ मैं पैद ही, गठरी बगल में दवाकर, वहाँ से चलता हुआ। मैं आज फल के छडी क सहारे चलनेवाले नौजवानोसा नहीं हूँ । एक छोटी सी गठरी ले चलने मे कमर की तीलियों सिसक जाती। मैं अब यह सोच रहा था कि ठहरु कहाँ, शहर में ख्याल एक राजभक्त को व्यप कर देने के लिय काफी था। मैंने तत्तण निश्चय किया कि दाढी साफ कराकर ही । . अपने मुंह पर एक तमाँचा लगाया त्योही ऐसा जान पडा जब मुद अपने हाथो को इतनी तकलीफ हुई तन अगर किसी वजह से कमिश्नर साहव एक चपत मार चैठ वा कहाँ से चुकाता, इतने रुपये पास थे नहीं। कुछ निश्चय में नहीं कर पाया। घूमते-घूमते सन्ध्या हो गयी और थोडी देर में समस्त नगर विजली की रोशनी से 'चमकायमान' हो - उठा। कुछ भूस-मिश्रित नींद भी मालूम पडने लगी, पेट को कुछ दे-दिलाकर शान्त किया और एक निर्जन सडक के किनारे पडकर "जह पडे मुमल, तहै छेम कुसल" को सुवह मेरी नीद खुली तो देखा कि छ वजा है। कमि- श्नर साहव से मुझे बजे मिलना था। मैंने सोचा कि अभी समय काफी है, दाढी बनवा लूँ क्योंकि अफसर-गण ऐसे लोगों से नहीं मिलना चाहते जो अपने मुँह पर कॉटों की सेती करते हैं। मुझे दाढी बनवाने का ख्याल भी न आता पर एक मक्सी ने बार-बार मेरे चेहरे पर बैठकर मुझे याद उसे मारने के लिये अँझलाकर ज्याही मैंने चरितार्थ करने लगा। . दिलायी। कि हथेली में कॉटे चुभ गये, दाढी इस कदर बढ आयो थी। उनकी कोमल हथेलियाँ छिदकर चलनी हो जायेंगी। यह साहब से मिलूँगा।
काम से बाहर गया था। कमरे में एक शुभ्र-वन-धारी सजन करते हो गया और नाई के दर्शन न हुए तो मैंने घबडाकर (६०) लखनऊ में गली-गली Sharing and Hairdressing Saloons हैं। मैं एक ऐसी ही दूकान मे पिल पडा और नाई की प्रतीक्षा करने लगा जो सम्भवत घोड़ी देर के लिये किसी भी बैठे थे, जो, शायद मेरी ही तरह दूकान के मालिक की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब मुझे करीब आधा घण्टा इन्तजार इन्हीं सजन से पूछा कि आप बता सकते हैं कि इस दूकान का मालिक कहाँ मर गया है ? आधे घण्टे से उसक इन्तजार मे बैठा हूँ पर उस कम्बख्त का कहीं पता तक नह उस शुभ्र वस्त्र-धारी सज्जन ने इसका जो उत्तर दिय उससे मैं वडा लज्जित हुआ, उन्होंने कहा--महाशय । मैं इस दूकान का मालिक हूँ और आपकी दाढ़ी बनाऊँगा । मैं ही बनाऊँगा। आपने आते ही अपना अभिप्राय है बताया नहीं, चुपके से बैठ रहे, मैंने जाना कि आप राह की थकावट दर कर रहे हैं। अब आपकी दाढो उसी हाल में बन सकती है जब आप उन वेजा अलफाज को वापस जिन्हे आपने अभी मेरी शान में कह डाले हैं। सुभान तेरी कुदरत । भला मैं ख्वाब देख रहा था सुन्दर वस्त्रों से आच्छादित, कुर्सी पर आसीन, मुअज्जिज जेन्टलमैन पेशे से हज्जाम हैं। हमारी काशी भी हज्जाम हैं, पर वे घिचारे तो काँस में किस्वत और से देखने मकान हा पर भूल आया था। यह सब किया तो पर समझ आइये ।" में उनके पास गया। . गुनाहों की माफी मांगना बहुत अच्छे काम है. लेकिन मौके से। दादी बनवाने के पूर्व इन फार्रवाइयों का क्या मौका घा में लुटिया लिये घूमते रहते हैं। मैंने अपनी गलती के लिये उनसे केवल क्षमा ही नहीं मांगी बल्कि यह भी वादा किया कि अब किसी Well-dressed Gentleman को देखूगा तो पहिले उन्हें हज्जाम समझकर तब दूसरा कुछ समदूंगा। इसके बाद नापितवर ने प्रसन्न होकर कहा-"यहा कुर्सी की ओर इशारा करके-"बैठ जाइये ।" मैं कुर्सी पर बैठ गया। "सर उठाइये" मैंने सर उठाया। "आँखें बन्द कीजिये।" मैने ऑसें बन्द की। "ईश्वर का ध्यान कीजिये ।" मैंने ईश्वर का ध्यान किया । "परमात्मा से अपने गुनाही की माफी मांग लीजिये।" मैंने ऐसा ही किया, गो अपने गुनाहों की फिहरिस्त में न पाया कि क्यों। ईश्वर का ध्यान करना और अपने यह मेरी ममझ में नहीं समाया। भासिर मैंने दयो जमान , में गया तो निश्चय जानिये कि आपका काम तमाम हो जायग, इसलिये आपकी आत्मा को हर तरह से तैयार रहना चाहिये ( ६२ ) उनसे पूछा कि आपने यह जो धार्मिक कवायद मुझसे करायी उमका क्या अर्थ है ? नापितवर ने उत्तर दिया-"दाढी वनवाना आग से खेलना है, मेरा तेज प्रस्तुरा वरावर अापके चेहरे पर नाचता रहेगा, कहीं वहककर आपके गले में लग कि कौन जाने ससार सं कूच करना ही पडे ।" नाहक पूछने गया। अनजाने जो कुछ हो जाता वह तो सहन करना ही पडता। पूछकर मुफ्त मे जडैया बुखार मोल लेने गया। घरवालों और घरवाली की सुध से आँखे उव- डबा उठीं। सोचने लगा कि देखू, अब इन आँखों से कार्श के 'वन-बाग-तडाग' निहारता हूँ या नही । [३] नापित-कुल-कमल-दिवाकर ने छप-छप ध्वनि के माथ दे चिल्लू पानी से मेरे मुख पर तर्पण किया, इसका अर्थ मैने य लगाया कि अब मेरी दाढी भिंगायी जा रही है। इसके पा उन्होंने एक छोटा मा झाड़ और एक बट्टी साबुन बरामद किया। हिन्दी व्याकरण के जाननेवाले छोटे से झा को झडु आइन कहेगे-जैसे साढ़, सदुअआइन-पर अँगरे जाननेवाले उसे Sharing Brash के नाम से पुकारेंगे खैर मावुन और शेविंग ब्रश के सयुक्त उद्योग से मेरा म कहीं मेर शरीर में भूकम्प सा पाने लगा। यदि थोडी देर के लिये मेरा मुस चन्द्रमा मान लिया जाय तो यह कहा जा मकवा है कि यह प्रस्तुरा राहु बनके मेरे मुखचन्द्र को प्रसने मैने अत्यन्त नम्रता के साथ उत्तर दिया कि दाढी तो तो उन्हें छोड दीजिये, और मूछों के बारे में जैसी आपकी राय ( ६३ ) थोडा देर में तोरमागर का मानचित्र बन गया। नापितवर ने कृपा करके थोडा सावुन मेरी आखो मे भी चले जाने दिया, जिससे मुझे दिव्य दृष्टि का आनन्द मिलने लगा। यह सब तो हो रहा था पर वोच-बीच मे नापितवर बडो कुरुचिपूर्ण निगाहों से मेरी ओर देखते जाते थे। उन्होंने ऐसा कहा तो नहीं पर अन्य तरीकों से यह भाव प्रकट कर दिया कि मेरे मुस की बनावट उनको विल्कुल नापसन्द थी। मुझे स्वय भी अपने मुस की बनावट के दुरुस्त होने में सन्देह है पर अब तो चाहे भला है या बुरा, है तो अपना मुँह । नापितवर ने अव प्रस्तुरे का प्रयोग प्रारम्भ किया। अस्तुरे की सूरत से यह साफ जाहिर होता था कि कभी उसने किसी पारी से प्राशनाई कर ली थी। उसे देसकर नापितवर ने पूछा-कहिये क्या साफ करूँ और क्या माफ हो कर दीजिये, भी और घरौनी यदि कोई अडचन न डालें प्रा रहा था। छोड हूँ? हो वैसा करिये।
- - करने लगता। कि में फाठ बन गया। चेहरे पर सर-सर-खरर-खरर इतना मुझे अच्छी तरह याद है कि नापितवर को जन जब मेरा मुँह दाहिने-बायें घुमाना होता था तो मेरी नाक पकड कर यद्यपि उनका ऐसा करना प्रकृति के नियमो के विरुद्ध नहीं था, क्योकि मुँह का यह स्वाभाविक धर्म है कि नापितवर से कहा--"आपको मेरा मुँह दाहिने-बाये घुमाना हो तो या तो आप Right Turn,Left Turn कह दिया तो मेरे दोनो कान हाजिर है जिनकी बचपन से पकडे जाने वायें जैसे चाहिये घुमा लीजिये, पर मेरी इकलौती नाक से यदि आप Handle का काम न ले तो में आपका वडा (६४ ) इसके बाद जो कुछ हुआ उमका ब्योरेवार वर्णन मैं नहीं कर सकता। अपनी जान को पडी थो, ब्योरा कहाँ से नोट करता। इतना याद है कि प्रस्तुरे ने वह-वह पैतरे दिसलाय खर-पर-पर का सगीत हो रहा था और मैं अपने सी- सी-उफ-उफ-सी-सी--उफ से ठेक भर रहा था। जब कभी इससे छुट्टी मिलती तो हनुमानचालीसा का पाठ जिधर जिधर नाक जाय उधर-उधर वह भी जाय, पर इस प्रकार की धर पकड से मेरी नाक चुटैली हो चली और मैंने करिये मैं स्वय अपना मुँह घुमा लिया करूँगा, और नहीं की आदत है, नाक के वजाय इनको पकड़कर दाहिने एहमान मानूं।" घुमा देते थे । - आज उसी पाप का फल भाग रहा था। छोल डाला गया। एक बार प्राणभिक्षा मांगने के लिये मैंने मुंह तुम्हारी मृत्यु किमी सुन्दर देवस्थान में होगी पर मुझे यह मुझे अपनी नाक ही की पडी थी पर यहाँ तो अस्तुरे के दुर्दान्त प्रलय-चक्र से मेरी मौसिक आकृति का सर्वाशत सहार होता दिखाई पडता था, और उसके रोकने का कोई उपाय भी न था। यदि नापितवर ने अपना काम अधूरे ही पर छोड दिया होता तो मैं उन्हे हार्दिक धन्यवाद देता और अपने बचे खुचे मुस से ही अपनी जिन्दगी काट लेता, पर इतने सस्ते छूटना भाग्य में नहीं लिसा था। अस्तुरे की लपलपाती जिह्वा सारे मुख को वाटती चलो जारही थी। देखते देखते मुँह का एक परत चमडा सोलना चाहा पर अस्तुरे ने मुख-विवर में घुसने की इच्छा प्रकट करके मुझे फौरन मुंह बन्द कर लेने के लिये वाध्य किया । अधिक क्या कहूँ, यही समझिये कि बडे सङ्कट में पड़ा हुआ था। सोचने लगा कि इतनी उमर अकारथ गयो । कुछ परमार्थ नहीं कमाया, अब चला-चली के समय हाथ एक व्योतिषी ने मुझे बताया था कि प्रामा मलना हाथ लगा। नहीं मालूम था कि देवस्थान का अर्थ हन्नाम की दूकान है। एफ वार मेरी स्त्री ने मुझे अपने पैर के नारसन बनाने का लिये कहा था पर मैंने मारे शान के नहीं बनाया । सम्भवत इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि जितने जख्म मुझे इस ममय मुंह पर लगे थे उतने गत यूरोपियन महासमर में लगे ५ होते तो मैं अब तक भारत का सिपहसालार बना दिया गया होता। इन विचारों ने मुझे और भी दुःसित कर दिया और मैं आँस बन्द करके सोचने लगा कि वैतरणी का पाट कुल कितना चौडा है। आखिर इस कृत्य का भी अन्त हुआ और नापितवर ने मुझे कुर्सी से उठने की अनुमति दी। इसमे कोई शक नहीं कि मेरी नई जिन्दगी हुई । उठकर मैंने अपनी नाक टोली। देखकर खुशी हुई कि नाक करीव करीब ज्यों की त्यों थी, पर जब मैंने अपने मुँह पर हाथ रक्सा तो ऐसा जान पड़ा कि मुँह पर खून की क्यारियाँ बन गयी हैं। नापितवर से मैंने आइना मॉगा पर उन्होंने देने से इनकार किया और कहा-"आपका मुँह इस काविल नहीं है कि आप आइना देखें।" मेरा अनुमान है कि किसी ऐसे ही नाई से काम पड़ने पर कबीर साहब ने लिखा था-"मुखडा क्या देखो दरपन मे।"
लौटकर फहूँ कि "तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना" पर लैट भी नहीं सकता था। फिर यह भी सयाल आया कि उपसंहार हजामत मेरी वनी और सूव वनी । ऐसी हजामत जिन्दगी में एक ही दो बार बनती है। नापितवर ने चार आने पैसे मुझसे ऐंठ लिये-जो जान घख्श देने के ख्याल से कम थे मैं उनकी दूकान से बाहर आया। मुँह पर जहाँ-तहाँ कुछ सूजन सी हो पायी थी। इच्छा हुई कि नापितवर से दूकान के अन्दर फिर कदम रखने की हिम्मत नहीं हुई। साढे आठ का समय हो गया था और नौ बजे साहब से मिलने की बात थी, पर फिक्र यह पैदा हो गयी थी कि अब क्या मुँह लेकर उनसे मिलूं , लेकिन लाचारी थी, बिना मिले मुंह तो विगडता बनता रहेगा पर कमिश्नर साहब से रोज मुलाकात कहाँ होगी। मैं लम्बे-लम्चे डग मारता हुआ ठीक समय से उनके अंगले बाहर किसी को न देसकर मैं 'महरिन, महरिन' पुकारने ही जा रहा था कि एक अर्दली मुझे गर्दनिया देने की नीयत से बाहर निकला ! साहब लोगों के अर्दलियों के प्रति मेरे हृदय में सदा से डी श्रद्धा रही है। उन्हें देखकर अनायास मेरे मन में . पर पहुँच गया।
आदर और भय का सञ्चार होता है। मैं जानता हूँ कि उनका ओहदा कितना ऊँचा है, उनका मान, उनका प्रभाव, उनका दबदवा कितना बड़ा है। उनकी चपरास पर कुछ ऐसा वशीकरण लिखा रहता है जिसे पढकर कितने रईसों की भी इच्छा होती है कि उनके पैरों के आगे अपने को पिछा दे । किसी कवि ने कहा है- भोजन में भट्ट वली लट्ठ बली हुज्जत में मूस बली प्लेग मे श्री घूस कचेहरी में। कानन मे केहरी, दुपहरी में भानु बली बली अर्दली बडे साहब की डेहरी मे ॥ अस्तु, अर्दली महोदय ने अपना फौलादी पजा मेरे गर्दन पर रख दिया और ढकेल फर मुझे फाटक बाहर करने लगे। मैंने उनकी कोटिश बलैयाँ लेकर उन्हें शान्त किया और तब उन्हे समझाया कि कमिश्नर साहब ने मुझे मिलने के लिये आज बुलाया है। इस पर उन्होंने मेरा कार्ड मुझसे,माँगा। कार्ड-वार्ड तो मेरे पास था नहीं, हाँ मेरे कमीज के कोने मे धोबी की स्याही से मेरा नाम लिसा हुआ था। मैंने उतना कोना कमीज से फाडकर चपरासी को दे दिया और कहा ले जाव यही मेरा कार्ड है एक वार तो उसने घृणा । विरस्कार की हलाहल दृष्टि से मेरी ओर देखा पर कमीज के टुकडे ही को गनीमत समझकर स पाम ले गया।
(६६) थोडी देर में चपरासी ने बाहर आकर मुस्कराते हुए कहा कि साहब आपको देसने के लिये बडे उत्सुक हैं, आप सीधे अन्दर चले चलिये। मुझे यह देसकर सुशी हुई कि टाइ- टिल के उम्मेदवारो की तरह मुझे ड्योढ़ीदारी नहीं करनी पड़ी पल्कि फौरन् मैं साहब के सामने पेश किया गया। कमरे में चार-पाँच अँगरेज बैठे हुए थे, इसलिये मैं पहले पहचान न सका कि कमिभर साहब कौन हैं। मैं सिर खुज लाते हुए सोचने लगा कि किसको प्रणाम करूँ और किसको न करूँ। अन्त में कुछ निश्चय न कर सकने के कारण मैंने वारी-बारी सनके पैर छूकर पालागन किया। कमरे में संयोग से सभी कुर्सियाँ फँसी हुई थीं। इस- लिये लाचार में पालथी मारकर पायदाज पर बैठ गया, और इन्तजार करने लगा कि कोई मुझसे बोले तो मैं भी बोलू। पर कई मिनट वीत गये कोई बोला नहीं और घोलता कैसे, सबले सब मुँह में रूमाल हँसकर हँस रहे थे। मैंने उनको मुँह में रुमाल ठूसे हुए देखा अवश्य, पर फौरन समझ न सका कि वे हँस रहे हैं पहले मैंने जाना कि यूरोपियन समाज का यह सदाचार है कि आपस में मिलते समय मुंह में रूमाल ठूम लेते हैं, मगर जब कई मिनट गुजर गये और कोई वोला नहीं तन मैंने सोचा कि मैं भी उन्हीं की तरह जब तक अपने मुँह में रूमाल न रख लूँगा तय तक वे . आदर और भय का सञ्चार होता है। मैं जानता हूँ कि उनका ओहदा कितना ऊँचा है, उनका मान, उनका प्रभाव, उनका दबदबा कितना बडा है। उनकी चपरास पर कुछ ऐसा वशीकरण लिखा रहता है जिसे पढ़कर कितने रईसों की भी इच्छा होती है कि उनके पैरों के आगे अपने को बिछा दें। किसी कवि ने कहा है- भोजन में भट्ट बली लट्ठ बली हुजत मे मूस बली प्लेग मे श्री घूस कचेहरी मे । कानन में केहरी, दुपहरी मे भानु बली वली अर्दली बडे साहब की डेहरी में ।। अस्तु, अर्दली महोदय ने अपना फौलादी पजा मेरे गर्दन पर रख दिया और ढकेल फर मुझे फाटक बाहर करने लगे। मैंने उनकी कोटिश, बलैयाँ लेकर उन्हें शान्त किया और तर उन्हे समझाया कि कमिश्नर माहब ने मुझे मिलने के लिये आज बुलाया है। इस पर उन्होंने मेरा कार्ड मुझसे माँगा। कार्ड-वार्ड तो मेरे पास था नहीं, हाँ मेरे कमीज़ के कोने मे धोबी की म्याही से मेरा नाम लिखा हुआ था मैंने उतना फोना कमीज मे फाडकर चपरासी को दे दिया और कहा कि ले जाच यही मेरा फार्ट है। एक बार तो उसने घृणा तिरस्कार की इलाहल दृष्टि से मेरी ओर देखा पर अन्त में कमौज के टुकडे ही को गनीमत समझकर साहब के पाम ले गया। और 1 अक्ल मुझे और दे दी होती तो क्यो ससार मे सब जगह अपनी हँसी कराता फिरता । आसिर बडे प्रयत्न से कमिश्नर साहब ने अपनी हमी रोककर पूछा-"आपही का नाम लाला मल्लूमल है।" मैंने कहा-"जी हाँ, हुजर।" "आप ही ने दस पेज की अर्जी लिखकर भेजी थी" "जी नहीं धर्मावतार। मेरी अर्जी पूरे बारह पेज की थी?" मैंने बडी व्यग्रता के साथ यह उत्तर दिया। सवा बारह पेज मैं मान सकता था पर पौने बारह तो किसी हालत से नहीं मान सकता था। इसके क्या माने कि मैं लिखू बारह पेज और बतलाये जायें दस । अधिक लिसने की क्षमता होते हुए भी मैंने केवल बारह पेज लिसकर सन्ताप कर लिया था पर जब उसमे भी कमी करके उन्होंने दस ही बतलाये तब आप यकान मानिये कि मेरे कान सडे हो गये। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि अन्त के दो पेज उन्होंने पढे ही नहीं। तब तो मेरी सारी मेहनत बेकार गयी क्योंकि वही अन्तिम दो पेज मेरे आवेदनपत्र के प्राण थे-शुरू के दस पेज वो महज प्रस्ता- वना मात्र थे। उन्हीं अन्तिम दो पन्नों में मैंने अपनी पात्रता सिद्ध की थी, अपनी सक्षिप्त जीवनी दी थी और अपने पूर्वजो की योग्यताओं का सविस्तर उल्लेख किया था-हो, अपनी याग्यताओं पर मैंने जान-बूझकर अधिक प्रकाश नहीं डाला और सोचने लगा कि परमात्मा ने अगर दो ही चार माशे ( ७० ) से मुझे गॅवार समझेगे और मुझसे न बोलेगे। इसी ख़याल मैंने भी अपने मुंह मे रुमाल भर लिया । मुझे ऐसा करते देस उन सभी की और भी विचित्र दशा हुई। दोनों हाथों से पेट दवाकर वे कुर्सी पर बैठे ही बैठे स्प्रिङ्गदार सिलौनो की भॉति हिलने लगे। ऐसा प्रतीत होता था कि उनके पेटों मे एलेक्ट्रिक डाइनेमो धक-धक धक-धक कर रहा है। पेट से कुछ अजब अर्द्ध-स्फुट खिल-खिल-खिल-सिल शब्द का प्रादुर्भाव होने लगा मानो हृदय के प्रवल आवेगो को गले मे ठेपी लगाकर रोकने का निष्फल प्रयत्न किया जा रहा हो। असीम हास्य से उनका सारा शरीर आन्दोलित होने लगा, यहाँ तक कि रूमाल मुँह में न टिक सका और छटक- कर दूर जा गिरा। अब तो वे ठहाके के साथ हँस पडे । मैंने भी अपने मुँह मे से रूमाल निकाल लिया पर उनको इस प्रकार वेतहाशा हँसते देस मैं ऐसा हक्का-बक्का हो गया कि बडा सा मुँह फैलाये उनकी ओर निहारता रह गया । मुझे मुँह फैलाये देख उनकी हँसी और भी बढी । यहाँ तक कि एक अँगरेज सोफा पर लोट-पोट होने लगा, ताली बजा-बजाकर पैर पटकने लगा और तीसरा अपने ही हैट पर सडा होकर नाचने लगा। जब इस प्रहसन ने अधिक जोर पकडा तब जाकर मेरी समझ में यह बात आयो कि हो न हो ये मेरे ही ऊपर हॅम रहे हैं। मैंने सिर झुका लिया दूसरा
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की जो धन (७२) था। फिर अपने जीवन की नून-तेल-सम्बन्धी आवश्यकताओं का और अपनी विकट परिस्थिति का जैसा नग्न चिन्न मेने खींचा था वैसा अब कोई नाक रगड़कर मर जाय पर नहीं खींच सकता। अन्त मे साधुवाद और धन्यवाद पक्तियाँ मैंने लिसी थी वे मेरे विचार से साहित्य में अमरत्व पाने के योग्य हैं । जहाँ तक मुझे स्मरण है मेरे अन्तिम शब्द ये थे-~-"ईश्वर करे आपको कबाब और केक की कभी कोई कमी न हो। आपका मोटर और आपका जाँगर सदा चलता रहे। आपका जेब और आपकी चोतल कभी साली न हो। ईश्वर आपको शक्ति दे कि आप नाम पैदा करें, पैदा करे, पुत्र पैदा करें और हमारे ऐसे बेकारों के लिये काम पाप से, श्राप से और त्रिताप से आपकी रक्षा हो। आपको लोग मघवा की तरह आदर दें और वधवा की तरह डरें। जीते जी आपको शिमला प्राप्त हो और मरने पर कैलास" अब आप समझ सकते हैं कि मैं अपनी अर्जी के अन्तिम दो पन्नो के लिये क्यों इतना चिन्तित था। कमिभर साहब मेरी चिन्ता दूर करते हुए बोले-"हाँ, हाँ, ठोक है, मैं भूल रहा था। आपको अर्जी पारह पेज की थी।" " आप उसे साधन्त पढ़ गये थे ?" कमिश्नर माहव ने अपने मित्रों को और सकेत करके कहा-"अकेले में दो ने नहीं पढ़ा था बल्कि इन लोगों को भी पैदा करें।
( ७३ ) पढाया था। उसी समय से ये लोग आपके दर्शन के लिये अत्यन्त लालायित थे।" मैं सोच ही रहा था कि किन शब्दो में कमिश्नर साहब के मित्रों को धन्यवाद दूं कि इतने में कमिश्नर साहव ने फिर कहा-"आपने कालिज में शिक्षा पायो है ?" "जी हाँ, सर्कार ।" "ची० ए० पास हैं" "दया सिन्धो। मैं बी० ए० पास होता तो अब तक वेकार बैठा रहता ? अगर डिप्टी कलक्टर नहीं तो किसी म्युनिसपलिटी मे बिल-कलक्टर तो अवश्य ही हो गया होता।" "आपने स्वर्गीय राजा गावदोसिंह के स्टेट को मनेजरी के लिये अर्जी भेजी है। उस जगह के लिये दो बातों की जरूरत है, एक तो नाच-मुजरे का शौक होना चाहिये, दूसरे छठे-छमासे इलाकों का काम देस लेने की फुरसत। आपने अपनी अर्जी मे लिसा है कि आप में ये दोनों बावे मौजूद हैं। आप इसको कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि आपको फुरसत काफी है?" "गरीवपरवर । अगर फुरसत न होती तो आपको वारद पेज की अर्जी कैसे लिखता " इस उत्तर का कमिश्नर साहय पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने फिर पछा--"और इसका क्या प्रमाण है कि पापको नाच-मुजरे का काफी शौक है?"
और धन्यवाद की जो हो। आपको लोग मघवा की तरह आदर दें और वधवा कमिश्नर साहब ने अपने मित्रों की ओर सकेत करके ( ७२ ) धा। फिर अपने जीवन की नून-तेल-सम्बन्धी आवश्यकताओं का और अपनी विकट परिस्थिति का जैसा नग्न चित्र मेंने सींचा था वैसा अब कोई नाक रगडकर मर जाय पर नहीं खींच सकता। अन्त में साधुवाद पक्तियाँ मैंने लिखी थी वे मेरे विचार से साहित्य मे अमरत्व पाने के योग्य हैं। जहाँ तक मुझे स्मरण है मेरे अन्तिम शद ये थे-"ईश्वर करे आपको कबाब और केक की कभी कोई कमी न हो। आपका मोटर और आपका जाँगर सदा चलता आपका जेब और आपकी बोतल कभी साली न हो। ईश्वर आपको शक्ति दे कि आप नाम पैदा करे, धन पैदा करे, पुत्र पैदा करें और हमारे ऐसे बेकारों के लिये काम पाप से, श्राप से और त्रिताप से आपकी रक्षा की तरह डरें। जीते जी आपको शिमला प्राप्त हो और मरने पर कैलास " अब आप समझ सकते हैं कि मैं अपनी अर्जी के अन्तिम दो पन्नो के लिये क्यों इतना चिन्तित था। मेरी चिन्ता दूर करते हुए बोले-"हॉ, हों, ठोक है, मैं भूल रहा था। आपकी अर्जी घारह पेज की थी।" "तो आप उसे माद्यन्त पढ गये थे" रहे। पैदा करें। कमिभर साहब , कक्षा-"अफेले में ही ने नहीं पहा था बल्कि इन लोगों को भी ( ७५ ) लेंगे आप मनेजरी के पचडे मे न पडिये। मनेजरी कुछ हो तो नौकरी ही है पर इस तरह आप सोलहो पाने के मालिक हो जाते हैं। कुबेरगढ बहुत बडी स्टेट है। मैं चाहता हूँ कि आप ही वहाँ के उत्तराधिकारी हो।" मैंने कमिश्नर साहब के पैर चूमकर इस ईश्वरोपम दया के लिये उन्हें धन्यवाद दिया और हँसी सुशी घर लौट आया। चार महीने बीत चुके हैं। अपनी सुराक मैंने बहुत कम कर दी है। मेरा वजन घरावर घटता जा रहा है यदि इस कमसोराकी ने जीता छोड दिया तो अन कुछ ही दिनो मे इतना हल्का हो जाऊँगा कि राजा कुवेरगढ को कौन कहे सुद मेरी बी ही मुझे गोद ले सकेगी। काशी लौटने पर लोगों ने पूछा कि लसनऊ क्यो गये थे मैंने कहा-'हजामत बनवाने' । प० मोतीलाल नेहरू के कपड़े किसी समय पैरिस में धुला करते थे। अगर मेरी हजामत बरावर लसनऊ में बना करे तो क्या हर्ज है।
उन्होंने कहा--"इतने गुणों के रहते हुए आप एक साधारण आपने राजा कुबेरगढ का नाम सुना होगा। उन्हें कोई आद-पोलाद नहीं है और वे शीघ्र ही किसी को गोद लेनेवाले ( ७४ ) "दीनबन्धी। आप पुलीस की रिपोर्ट मँगाकर देख लीजिये। एक बार एक महाजन के बाग में किसी मशहूर तवायफ का नाच हो रहा था। नौकरों ने मुझे फाटक से नहीं घुसने दिया, प्रत मुझे चहारदीवारी डॉककर भीवर जाना पड़ा। मैं छिपकर नाच देख रहा था कि पकडा गया, पुलीस के हवाले किया गया और दस रुपया जुर्माना देना पड़ा। इसी से माबित होता है कि मेरा नाच-मुजरे का शौक कितना बढ़ा-चढ़ा है।" मेरे इन उत्तरों से कमिश्नर साहव की आँखे खुल गयी। सी जगह के लिये अर्जी लगाये बैठे हैं। गय मानियेगा "प्रभो। आपकी राय न मानूंगा तो किसकी राय मानूंगा।" "अच्छा तो आप थोडे दिन - आप मेरी एक और सन्न कीजिये। पाप जरा भारी हैं, आपको वे गोद न ले सकेंगे। पाप माना-पीना बिल्कुल छोड दीजिये, या एक दम से कम कर दीजिए, जिसमे प्राप हल्के हो जाये और राजा साहब आपको आसानी से गोद में उठा सके । मिफारिश कर दूंगा और राजा कुबेरगढ श्राप ही को गोद ले - तब मैं आपकी . . ( ७७ ) के लिये सड़े हुए। हम लोगों ने फरतल-ध्वनि की। लाला मल्लूमल ने करतल ध्वनि के पर्याय में अपने जूवं सटसदार- इसलिये कि उनके हाथ फंसे हुए थे, ये मूंगफली छीलकर खा रहे थे। झाऊलाल ने कहना शुरू किया-"सबनो । मारत एक बहा देश है, और इस बहे देश में बहुत से बडे आदमी हैं। उन बडे आदमियों के बडे भाग से बडा दिन ऐसा वढा त्योहार पाता है। इसी बढे दिन की दुम में नया माल भी नत्वों (हता है, जिससे पठे दिन का बडप्पन और भी बढ़ जाता है। घडी-वडी उपाधियाँ मिलती है-बढे आदमियो फो। बही- पडी डालियाँ मिलती ई-वडे साहनों को। और, बहीन्यही छुट्टियाँ मिलती है-स्कूली लौंडों और सरकारी अहलकारों को। "इसी घड दिन का जिक्र है। सुबह छ बजे का बफ था। रजाई के भीतर अभी रात दी थी, पर बाहर सयंरा हो गया था। मैंने हिम्मत करके एक उँगली रजाई के यादर निकाली। पता चला कि बाहर साइनीरिया की सर्दी पड रही है। मैंने झट उँगली भीतर सींच ली, चदलकर फिर सो रहा। कुछ ही देर सो सका हूँगा कि मेरे होनेवाले वच्चों की माँ ने मेरे 'काकपक्ष' को पकडकर एक झटका दिया। मुझे जगाने के लिये वह असर यदी तरीका अरितयार करती है मैंने मनाकर पूछा-'श्रजी यह क्या फर रद्दी हो ? - । और फरवट वडा दिन [१] आज कुव मे लाला झाऊलाल के पधारने पर बडे मनुहार और आवभगत के साथ हम लोगों ने उनका स्वागव किया। छच के अध्यक्ष प० जोटबहादुर शर्मा ने टीन की डिविया में रखकर एक आँजन उन्हें Present किया, और कहा कि उल्ट की आँख जन्नाकर मैंने यह आँजन बनाया है, इसे लगाइयेगा तो अँधेरे में आपको सूझ पड़ेगा। लाला झाऊलाल हमारे क्लब के एक सम्मान्य सदस्य है. पर अव उन्हें सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ेगा। इसी बड़े दिन में उन्होंने न जाने किस तिकडम से स्थानीय कलेक्टर साह को प्रसन्न कर लिया। फलत उन्हे कोई नौकरी मिल और वे वेकारी के दलदल से निकल भागे। यही कारण कि अब वे कर के मदस्य नहीं रह सकते। हमारे क्लब सदस्य केवल वे ही हो सकते हैं, जिन्हे ससार मे को काम-धन्धा न हो। 'मुझे नौकरी कैसे मिली'-इस विषय पर भाऊलाल व आजहन में भाषण होगा। मागव-खागत के बाद वे बोल -- - . ( ७७ ) के लिये खड़े हुए। हम लोगों ने करतल-ध्वनि की। लाला मल्लूमल ने करतल-ध्वनि के पर्याय में अपने जूते खटखटाये-- इसलिये कि उनके हाय फंसे हुए थे, वे मूंगफली छीलकर खा रहे थे। झाऊलाल ने कहना शुरू किया-"सजनो ! भारत एक वहा देश है, और इस बडे देश में बहुत से बडे आदमी हैं। उन बडे आदमियों के बडे भाग से बडा दिन ऐसा बडा योहार आता है। इसी पढे दिन की मे नया साल भी नत्यो रहता है, जिससे पडे दिन का वडप्पन और भी बढ़ जाता है। पडी-बडी उपाधियाँ मिलती हैं--पडे आदमियों को। बडी- घडी डालियाँ मिलती ई-वडे साइनों को। और, बड़ी-बडी छुट्टियाँ मिलती हैं-स्कूली लौंडों और सरकारी अहलकारो को। "इसी बडे दिन का जिक्र है। सुबह छ बजे का वक्त था। रजाई के भीवर अभी रात ही थी, पर बाहर सवेरा हो गया था। मैंने हिम्मत करके एक उँगली रजाई के बाहर पता चला कि बाहर साइवीरिया की सर्दी पड रही है। मैंने झट उँगली भीतर सींच ली, बदलकर फिर सो रहा । कुछ ही देर सो सका ,गा कि मेरे होनेवाले बच्चों की माँ ने मेरे 'काकपक्ष' को पकडकर एक झटका दिया। मुझे जगाने के लिये वह अक्सर यही तरीका अख्तियार करती है। मैंने झल्लाकर पूछा-'अजी यह क्या कर रही हो , निकाली। और करवट वड़ा दिन और कहा कि उल्लू [१] आज हब मे लाला झाऊलाल के पधारने पर वडे मनुहार और आवभगत के साथ हम लोगो ने उनका स्वागत किया। रुव के अध्यक्ष प० जीटवहादुर शर्मा ने टीन की डिबिया में रखकर एक ऑजन उन्हें Present किया, की आँख जलाकर मैंने यह आँजन बनाया है, इसे लगाइयेगा तो अँधेरे में आपको सूझ पडेगा । लाला भाऊलाल हमारे छव के एक सम्मान्य सदस्य हैं, पर अब उन्हे सदस्यता से इस्तीफा देना पडेगा । इसी बडे दिन में उन्होंने न जाने किस तिकडम से स्थानीय कलेक्टर साहब को प्रसन्न कर लिया। फलत उन्हे कोई नौकरी मिल गई, और वे वेकारी के दलदल से निकल भागे। यही कारण है कि अब वे क्लब के मदस्य नहीं रह सकते। हमारे क्लब के सदस्य केवल वे ही हो सकते हैं, जिन्हे ससार में कोई काम-धन्धा न हो। 'मुझे नौकरी कैसे मिली'--इस विषय पर भाऊलाल का आज क्लब में भाषण होगा। आगत-खागत के बाद वे बोलने - ( ७७ ) के लिये खडे हुए। हम लोगों ने करतल-ध्वनि की लाला मल्लूमल ने फरतल-ध्वनि के पर्याय में अपने जूतं सटसटाय- इसलिये कि उनके हाथ फंसे हुए थे, वे मूंगफली छीलकर खा रहे थे। झाऊलाल ने कहना शुरू किया-"सलनो । भारत एक चहा देश है, और इस बड़े देश में बहुत से बडे आदमी हैं। उन बडे आदमियों के बडे भाग से बडा दिन ऐसा वडा त्योहार आता है । इसी बड़े दिन की दुम मे नया साल भी नत्यो रहता है, जिससे बडे दिन का बडप्पन और भी बढ जाता है। वडी-गडी उपाधियाँ मिलती है-बडे आदमियों को। बडी- रडी डालियां मिलती है-वडे साहवो को। और, वडी-बडी तुहियाँ मिलती हैं-स्कूली लौंडो और सरकारी अहलकारो को। "इसी बडे दिन का जिक्र है। सुबह छ बजे का वक्त था। रजाई के भीतर अभी रात ही थी, पर बाहर सवेरा मैंने हिम्मत करके एक उँगली रजाई के बाहर पता चला कि बाहर साइबीरिया की सर्दी पड रही है। मैंने झट उँगली भीतर सींच ली, और करवट दलकर फिर सो रहा। कुछ ही देर सो सका हूँगा कि मेरे होनेवाले बच्चों की माँ ने मेरे 'काकपच' को पकडकर एक झटका दिया। मुझे जगाने के लिये वह अक्सर यही तरीका अख्तियार करती है। मैंने झल्लाकर पूछा-'अजी यह क्या कर रही हो ? हो गया था। निकाली ( ७८ ) 'उठिये सबेरा हुआ ।' 'तङ्ग न करो, पडे रहने दो दनदाये हुए। 'नहीं, अब उठिये, लोग कहते हैं कि ईश्वर प्राणिमात्र को सवेरे चारा वाँटता है, आप नौ बजे सोकर उठते हैं, इसी से अभी तक न कोई राजी है न रोजगार ।' 'अभी रात में सोते वक्त लेक्चर दे चुकी हो। क्या सवेरे के लिये इतना कलेवा रस छोडा था ? रोजी-रोजगार तो चारहो महीने के लिये है, रजाई तो सिर्फ चार ही महीने के लिये है न 'मैं रजाई खींच लेती हूँ, तव तो उठियेगा।' 'चाहे मेरी खाल सींच लो पर मैं रजाई न खींचने दूंगा।' 'मैं आपको अब सोने न दूंगी, उठिये, आज वडा दिन है।' 'तो इसमें मेरा क्या कसूर है कि मुझे जाडे-पाले में सता रही हो?" 'अव आज से रात छोटी होने लगेगी। आपको अब कम सोने की आदत डालनी चाहिये। 'अच्छा, कल से प्रादत डालूंगा, प्राज ईश्वर के नाम पर पडे रहने दो। 'कल कभी नहीं पाता।" 'कल लेने दोगी, तव न कल आवेगा।" 'आप उठते हैं, या मैं गुदगुदाना शुरू करूँ ?' .
( ७६ ) 'गुदगुदामो, मैं हम लूँगा, "सने के बाद नींद अच्छी प्राती है। 'अच्छा मैं चिकोटी काटूंगी।" 'मैं ऊनी कमीज पहिरे हुए हूँ।' "इतना कहते देर न हुई कि मेरी जाँघ पर एक चिनगारी टपक पड़ी। उसने आसिर चिकोटी काट ही ली। 1-सिर्फ यह मावित करने के लिये कि ऊनी कमीज सारे शरीर की रक्षा नहीं कर सकती। मैंने आह-ऊह करते हुए कहा- 'अजी यह क्या कर रही हो ? कमर के नीचे तो दुश्मन भी चार नहीं करता। "उसने हंसते हुए कहा- मैं आपको उठा ही कर छो दूंगी। आपको नौ बजे दिन तक सोने की आदत छोडनी ही होगी।' 'सुद तो उठने का नाम नहीं ले रही हो, मुझे व्यर्थ उठा रही हो। 'मैं जल्दी उठकर क्या करूँगी? मुझे दरवाजे-दरवाजे ठोकर खाकर नौकरी तो तलाश करनी है नहीं।' "मेरी स्त्री छूने मे तो बडो मुलायम है, पर उसकी जीभ पर परमात्मा ने पैनी छुरी रख दी है। कभी-कभी ऐसी तीसी- कडवी बावे करती है कि ऍडी से चोटी तक लुत्ती लग जाती | लाचार, मुझे चारपाई से उठना पडा-'रई और दुई' का मोह छोडना पड़ा। पर कल न लेने दे, तो कोई क्या कर सकता है ? मैं रजाई خام जब अपना हम-विस्वर ही विस्तरे (८०) से निकलकर साट के सरहाने खडा हो गया, और विस्तरे की और हसरत भरी निगाहों से देखने लगा। गजब की सर्दी पड रही थी। थोड़ी ही देर मे मेरी नाक की नोक और कान के पल्ले सुर्स हो गये। मुझे क्रोध आ रहा था, पर मैं दाँत पीसने से भी लाचार था, क्योंकि दाँत तो मजीरा वजाने मे मशगल थे। जिस प्रकार मृत्यु के उपरान्त आत्मा को मृत देह का मोह छोडकर भूत-योनि में जाना पडता है, उसी प्रकार मुझे रजाई का मोह छोडकर स्नान गृह मे जाना पड़ा। "स्नान करते समय मुझे एक अमूल्य वात सूझी, जिसे मैं हिन्दूसभा को बिना मूल्य भेंट करता हूँ। मेरा सयाल है कि हिन्दूसभा यदि पता लगाये, तो यह सिद्ध हो जाय कि गर्मी की अपेक्षा जाडे मे अधिक हिन्दू-मुसलमान होते हैं, सिर्फ इसलिये कि मुसलमान हो जाने पर यदि जाडे-भर आप स्नान न करें, तो कोई आपकी ओर अँगुली नहीं उठा सकता। मुसलमान हो जाने पर यह आपकी इच्छा पर निर्भर रहेगा, और मानव-समाज पर एक प्रकार का एहसान होगा, तुर्की टोपी देने के पूर्व प्राप सिर्फ अपना मुँह और हाथ सावुन से माँज लें। हिन्दुओं में ईश्वर का नाम लेना हो, तो पहले स्नान कर लेना अत्यन्त आवश्यक समझा जाता है। वहाँ दो छटॉफ पानी से हाथ पाँव की अँगुलियों धोकर अल्लाह- ताला से निपटने के लिये खडे हो जाइये। जूतों के सो जाने का डर हो, तो उन्हें अचकन की जेबों में डाल लीजिये। यद्द यदि - लिये निकल पड़ा। एक याद रखने की बात है कि हिन्दू अगर स्नान-ध्यान के साथ ईश्वर की बाकायद पूजा करते हैं, तो हमारे मुसलमान भाई डण्ड-बैठक के साथ उसकी वाकवायद परस्तिश करते हैं "सुबह का उठना मुझे खल तो जरूर गया, पर एक बार उठ बैठा, तो यह इन्छा हुई कि चलो, थोडी देर वहरी वरफ रहल आऊँ। मैंने अपना ओवरकोट उठाया, और टहलने के सिविल लाइन्स की सदर सडक से होता हुआ मैं जाने लगा। घोड़ी ही दूर गया हूँगा कि पीछे से एक गाडी घडघडावी हुई आई। मैंने घूमकर देसा, वो उसमें चायू मेवाराम बैठे हुए थे। मेवारामजी शहर के एक महा- जन हैं। किसी समय ये मेरे सहपाठी थे। मुझे देसकर उन्होंने गाडी रोक दी, और पूछा-किधर जा रहे हो ? 'जिधर ही निकल जाऊँ, अपनी नकेल तो अपने हाथ में है।' 'तर पा जाव गाडी में, गप-शप होती चले " "सवारी के रहते हुए पैदल चलना घेवकफी में दाखिल । मैं झट गाडी पर सवार हो लिया, 'तुम कहा जात हो 'ठाकुरद्वार जा रहा हूँ।' 'ठाकुरद्वारे ? सिविल लाइन्स में तो कोई भी ठाकुर- द्वारा नही है। 'द कैसे नहीं ? शहर का सबसे वटा ठाकुरद्वारा तो इधर ही है। ठाकुरद्वार से मेगमतलब है कलेक्टर मोहन केगले से।' , है। और उनसे पूछा- -- कार? । , ( ८२ ) मैं हँसकर बोला-'तुम्हें कलेक्टर साहब से क्या सरो- क्या अब रायवहादुरी को चाट लगी है " 'अजी नहीं, मैं ऐसा बेवकूफ नहीं हूँ। योही जा रहा हूँ। आज बड़ा दिन है न, कभी-कभी साहब से मिलते रहना अच्छा होता है। मुहल्लेवालो पर राब बना रहता है। लोग ममझते हैं कि ये कलेक्टर साहब के मिलनेवालों में से हैं। मुझे भी जिस दिन उनसे मिलने आना होता है, उस दिन दो घण्टे पहले ही से कोठी के सामने गाडी खडी करा देता हूँ, साईस-कोचवान और नौकर-चाकर सब सिखाये-पढ़ाये रहते हैं, विना पूछे ही लोगों को बतलाते रहते हैं कि आज हमारे मालिक कलेक्टर साहब से मिलने जा रहे हैं।' "घोडी देर में गाडी बँगले पर पहुँच गई। मैं फाटफ पर खड़े सडे वाग और बंगले की सुन्दरता निरसने लगा। कैसा रमणीय स्थान था। सुन्दर-सुन्दर विलायती फूलों से क्यारियाँ फूली नहीं ममाती थीं--पैन्सी, नास्टर्शियम,पलोक्स, पेनियाँ इत्यादि से सारा बाग जगर-मगर कर रहा था। कानबुलबुली और बाग-नवेली आदि लताम्रा ने बँगले की दीवालों पर हरे मसमल का लिहाफ डाल दिया था, कोटन और फन्स के बोझ से बड़े-बडे गमले फटे पडते थे। 'लान' की सफाई और सुथराई देखते वनती थी। पोर्टिको के ठीक सामने एक फव्वारा था, जिसमें सङ्गमर्मर का राजहस चौच से पानी उछाल रहा था। यह सब देसफर एक महा गॅवार ( ८३ ) भी समझ सकता था कि जरूर इस बँगने में कोई गरीब सिविलियन रहता है, जो बेचारा केवन परार्थ और परमार्थ के विचार से, स्वार्थ और स्वदेश को त्यागकर, परदेश और पराये लोगों मे रहकर, अपवाद और अपकीर्ति सहकर, पदु- देश्य और सदाकाङ्क्षा से प्रेरित होकर, महज अ नरेरियम- स्वरूप स्वल्प वेतन पर, खुद्दा-चुन्नो खाकर, हम बर्वर भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये पाठो पहर और चीनीसो घण्टे जाँगर , तोड रहा है। - ऐसे "बंगले पर आज अच्छी चहल-पहल है। शहर के अधि- काश रईस गाडी, मोटर और ताँगो से उतरकर बॅगों के सामने गश्त लगा रहे हैं, या पोर्टिको के नीचे सडे हैं। इन सजे-रजे रईसों की भीड़ देखकर मेरी तबीयत फडक उठी- में रहना भी एक गर्व की बात है, जहाँ इस कदर बहुसख्यक रईस हों, सो शहर के सर रईस यहाँ घे भी नहीं। उन रईसों का कोई जिक्र ही नहा, जो किसी रईस के' सगे-सम्बन्धी होने के कारण, या उनके साथ मेल-मुसाफिकत रसने के कारण, या केवल उनके पडोस में वमने के कारण, रईस कहलाने का दावा रखते हैं। "इतने लोग जो साहब के मिलने के लिये एकत्र थे, समी फे चेहरे पर आतङ्क था, सभी चिन्वित, उद्विग्न और मराष्ट्र थे। मभी यह सोच रहे थे कि देसे साक्ष्य कर मिलते हैं, और मिलने पर बातें कैसी करते हैं। लोग पोटिंफो के नीचे , - ( ८४ ) जूते का चर्र-मर्र दवाकर हिलते-डोलते थे। किसी को ग्वाँसना होता था, तो वह बिना सॉसे ही सॉसने की हाजत दूर करने की विचित्र कोशिशें करता था। साहब के अर्दली को लोग देख लेते थे, तो बडे आदर से उसकी ओर अँगुली उठाते थे, और एक दूमरे से कहते थे-देखो, यही साहब का अर्दली है। उसको देसकर इन लोगो के दिल मे यह भाव पैदा होता था कि यह कितना भाग्यशाली आदमी है। जो कलेक्टर साहब हम लोगों से घण्टों प्रतीक्षा कराते हैं, घण्टों प्रतीक्षा कराने पर भी कभी-कभी नहीं मिलते, मिलने पर भी अक्सर बैठने के लिये कुर्सी नहीं देते, और इतना सब करने पर भी कभी-कभी डाँट बैठते हैं, वही कलेकर साहब इस शख्स को नाम लेकर पुकारते है, इसके हाथ से ग्रोवरकोट पहिरते हैं, और कब से शराब पीकर लौटने पर इसी के कन्धे पर हाथ रसकर गाडी से उतरते हैं। अर्दली भी अपनी गौरव-गरिमा से अनभिज्ञ न था। इतना वह जानता था कि वही साहब का पण्डा है-विना उसको प्रसन्न किये कोई भी साहब का दर्शन नहीं पा सकता, जब-जन वह बाहर आता था, तब तब कुछ लोग उसे बडे आदर से हाथ पकडकर अलग लिवा जाते थे, और उसके एक हाथ में अपना कार्ड और दूसरे मे कुछ गुप्त दान रसदेते थे" इसी अर्दली के जवानी यह पता चला कि साहब जब मोकर उठे थे, तब तो बडे सुश जान पड़ते थे, नौकरों को हँस- - - . (८५) इँसकर डाम-फल पुकारते थे, पर अभी कुछ ही देर हुई, उनका स्वभाव एकाएक पलट गया, यहाँ तक कि अपने सान- सामा फो उन्होंने शू हार्न फेंककर मारा, जो सयोग से उसे लगा नहीं। ममाचार-पत्रों की भाषा में इस सनसनी पैदा करनेवाली बात को सुनकर लोग दहल उठे। दहल उठने की बात भी थी। जो कलेक्टर अपने सानसामा पर शू-हार्न फेंक सकता है, वह शहर के किसी रईस पर 'शू' भी फेंक सकता है। एक सजन ने अर्दली से पूछा-'ठीक-ठीक बताओ, इस समय साहन के स्वभाव में क्या परिवर्तन पाते हो?" 'यही कि मिजाज में कुछ पोटासपन आ गया है।' 'पोटासपन क्या ? 'यात पात मे पोटास की तरह चिटखते हैं।' 'यानी कुछ झल्लाये हुए हैं ?" 'हाँ, बस यही समझिये। बातों में कुछ झनक-पटक है, और मिजाज मे कुछ किरकिरापन है। कुछ झलाये हुए हैं, और कुछ मिनाये हुए हैं। "जब इस प्रभोत्तर से साहब के स्वभाव का ताप-मान दश- मलव तक निर्धारित होगया, तब लोगों को स्वभावत इस पाक- स्मिक परिवर्तन का कारण जानने की उत्सुकता हुई। अली ने बहुत 'चिरौरी' कराने पर बतलाया कि साब गर्म पानी के व में से स्नान करके निकले, तो उनका पैर फर्श पर पडे हुए एक सातुन की धट्टी पर पड गया, और वे फिपलकर ठण्डे 1 -- पानी के टब मे जा गिरे। कहीं चोट-चपेट तो नहीं लगी पर कडकड़ाते जाडे में सुबह के वक्त बर्फ से ठण्डे पानी में अचानक डुबकी मार बैठना किस चोट से कम है। अगर इस घटना से उनके मिजाज मे, बकौल अर्दली के, कुछ 'पोटासपन' पा गया, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? [२] "किसी ने सच कहा है कि सयोगी बात योगी भी नहीं जानते। कौन जानता था कि आज ऐन क्रिसमस के दिन कलेक्टर साहब को स्नान करते समय एक भीगे हुए साबुन पर सवार होकर गर्म पानी के टब से ठण्डे पानी के टव तक बाम्बे मेल की तेजी से सफर करना पडेगा ? "कहाँ तो पचीस सजेधजे रईस पोटिको के नीचे साहब के दर्शन की लालसा से लिल्ली घोडी की तरह नाच रहे हैं, और कहाँ इस बदतमीज साबुन ने साहब के स्वभाव मे असमय पोटासपन का पुट डाल दिया। लोग एक स्वर से उस साबुन को कोसने लगे। एक सज्जन ने मेरे सुनने में कहा-'चुरा हो इस फम्बस्त सावुन का। ईश्वर करे उस जन्म में किसी के कुल मे इसे जन्म लेना पडे।' "कुछ लोगों ने इस समय साहब से मिलने में अपनी सैरियत न समझकर उल्टे पांव लौट जाने की ठान ली। जो अपने इष्टदेवों को स्मरण करके डटे रह गये, उनकी भी हिम्मत धाविया सावुन . ( ८७ ) अब धीरे-धीरे स्सलित होने लगी। वास्तव में साहव से इस समय मिलना हसी-खेल नहीं था। एक तो अँगरेज योही नकचढे होते हैं, फिर अँगरेज कैसा कि कलेक्टर। और वह भी अपने साधारण food मे नहीं, बल्कि बुरी तरह झलाया हुआ । न मिलना भी ठीक नहीं हे--मुमकिन है, साहब को यह सयाल हो कि फलाँ शख्स क्रिसमस के दिन मुझे सलाम फरने नहीं पाया, और मिलने में यह आफत है कि चिड- चिडाये तो हैं ही, न जाने कैसा सयोग आन पडे, कुछ कह- सुन दें, Stupnd ही पुफार चैलें, या यही हुक्म दे निकले कि फान पकडफर उठो बैठो, तो कोई उनका क्या कर लेगा ? 'लोग इसी उधेड-सुन में पड़े हुए थे कि रायबहादुर लाला मलूकदास जोडी से उतरकर पोटिको की ओर पाते हुए देस पडे। इनको देसफर लोगों की जान में जान आई। शहर में ऐसा मशहूर है कि कलेक्टर साहब रायबहादुर लाला मलूकदास को बहुत मानते हैं। अगर सबके पहिले यही माहय से मिलने के लिये चले जायें, तो बहुत सम्भव है कि साहब की सीझ, रीझ के रूप में, बदल जाय, और तब वाद में मिलने जानेवालों के लिये रास्ता भी साफ हो जाय, पर डर इस बात का था कि लाला मलूकदास को अगर मालूम हो जायगा कि साहब इस वक्त कुछ विगडे हुए हैं, तो शायद सबके पहिले उनके पास जाने में वे हिचकें , इसलिये उन पर किसी ने सावुनवाली दुर्घटना का हाल प्रकट ही नहीं किया, - , (८८) और उधर लोगों ने अर्दलीको सिसा दिया कि साहब receive करना शुरू करें, तो वह लाला मलूकदास ही से श्रीगणेश करे । "रायवहादुर लाला मलूकदास यहाँ के एक बहुत बड़े रईस, जमींदार और बैकर हैं। साथ ही, अँगरेजी फैशन के पक्के पुजारी भी हैं। नित्य टेवुल पर काँटे चम्मच से अपने को भोग लगाते हैं। सुबह जलपान नहीं माँगते, छोटा हाजरी मांगते हैं। मुँह में सिगार रसकर बात करने का अभ्यास भी इन्होंने कर लिया है। सदा सूट ही पहनते हैं, सो भी सिर्फ अँगरेज दर्जियों के सिले हुए। अपनी बीवी को 'डारलिङ्ग' पुकारते हैं। रोज सबेरे बडे साहयों की तरह लेटे-लेटे 'शेव' कराते हैं। हर साल सैकडों रुपये सिर्फ 'पोमेड' और 'लवेण्डर' में सर्च कर डालते हैं। एक बार रायवहादुर मलूकदासजी ने अपने इलाके मे किसी शिवालय का कॅगूरा कटवा डाला था, इसलिये कि किसी अँगरेज इखोनियर की राय में वह कँगूरा उनके बँगले का View खराब कर रहा था। जेनरल-डायर-फण्ड में पाँच हजार रुपये का दान देकर आपने रायबहादुरी खरीदो थी। महात्माजी के जेल जाने पर आपने वायसराय के पाम बधाई का तार भी भेजा था। "इस अन्तिम बात से ही आप जान गये होंगे कि लाला मलूकदासजी असहयोग के नाम से, और असहयोगियों की सूरत से, कितना चिढते हैं। उनके इसी एक गुण पर मुग्ध .
( ६ ) हाकर स्थानीय लिवरल-पार्टी ने उन्हें अपना नेता चुन लिया है। तीन वर्ष तक रायवहादुर लाला मलूकदासजी प्रान्तीय कौसिल के सदस्य भी रह चुके हैं, और तीन वर्ष में अापने सिर्फ यही एक प्रस्ताव कोसिल के सामने रक्सा कि प्रान्तीय सरकार सेन्द्रल-गवर्नमेण्ट से सिफारिश करती है कि रायवहादुरी का खिताब Hereditary (मौरूसी) वना दिया जाय। "सारी माडरेट-पार्टी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। एक माडरेट-सदस्य ने यहाँ तक कह डाला कि वैध उपायो द्वारा स्वराज्य-प्राप्ति की पहली सीढी यही होगी कि राय- बहादुरी की उपाधि पुश्त-दर-पुश्त के लिये टिकाऊ बना दी जाय, पर तव भी स्वराजी मेम्बरों के विरोध करने पर, जिसके लिये लिबरल-पत्रों ने गला फाडकर उन्हे देशद्रोही करार दिया, अन्त में प्रस्ताव बहुमत से गिर ही गया। सुना जाता है कि रायवहादुर लाला मलूकदास ने और उनके जेठे लडके ने इस अफसोस मे दो दिन तक अन्न-जल छोड दिया था। "खैर, साहव अपने भक्तों को दर्शन देने के लिये तैयार होकर जब बैठे, तर अर्दली ने सबके पहिले इन्हीं को उनके आगे पेश किया। रायबहादुर लाला मलूकदासजी ने फौरन भांप लिया कि आज मामला कुछ गडबड है क्योंकि और रोज तो साहव मुस्कराकर स्वागत करते थे, पर आज इस तरह ऐंठे रहे, मानों पोदा चमडा धूप में सूख रहा हो।
(६०) लाला मलूकदासजी बडे अदव के साथ साहब के सामने गड हुए-जैसे गॉगू तेली राजा भोज के सामने खडा हो । साहब ने अतीव कृपा करके इनकी ओर आंख उठाई, और इन्होने अतिशय नम्रता के साथ कहा-'Good Morning,Su! Wish you a very happy Obristmas' "साहब ने इसका कोई उत्तर न दिया। ऐसा जान पडा कि इस जन्म मे साहब इसका कोई उत्तर देंगे भी नहीं, पर कुछ देर मे शिष्टता और शालीनता के न जाने किस पुराने सस्कार ने उनके हृदय मे जोर मारा और उन्होंने फूटे हुए झञ्झर के स्वर मे कहा-'Thanks', पर इस 'थैक्स' के अस्तर मे वही भाव टॅका हुआ था जिस भाव से एक लसपती किसी भिसमड़े के आगे एक पैसा फेक देता है। "माहबने एक कुर्सी की ओर इशारा किया। लालामलूक- दासजी उस कुर्सी के एक-बटे-दसवे हिस्से पर बैठ गये, वाकी कुर्सी पर मानो उनके लिये खडी-खडी कीले जडी हुई थी । अपनी मबसे मीठो मुसकान को-जिसे खास-खास मौकों के लिये वे । 'रिजर्व रखते हैं-अपने चेहरे पर बटोर कर बोले-'Sr इस साल मैं एक नई बात देस रहा हूँ। बाहर प्रापसे मिलने के लिये बहुत लोग सडे हैं। उनमें कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो अभी पर- साल तक सदर पहिरकर शहर में असहयोगी नेता बने हुए घूमते थे। मुझे यह देखकर नेहायत सशी हुई कि ये लोग फिर रास्ते. पर आ गये। सुबह के भूले प्रासिर शाम को घर लौट ही आये।' - , (६१) "और किसी समय साहब से इस तरह की बात किसी ने को होती, तो वे बडे प्रसन्न हुए होते, पर इस समय तो उनका दिमाग दूसरे ही 'कोठे' मे था। उन्हे मलूकदास की गुपतर जरा भी न रुची। माथा सिकोडकर बोले-'इसमे आपके सुश होने की कौन सी बात है ? मैं अँगरेज हूँ, अगर मुझे इस बात से खुशी हो तो ठीक भी है।' लाला मलूकदास ने कहो-'मुझे सुशी इस बात की है Sur, कि अब इन्हीं बातो से हमारे माडरंट-पार्टी की नीति की जुद्धिमत्ता प्रमाणित होने लगी है। हम लोगों ने असहयोग को ठुकराकर गवर्नमेण्ट का साथ दिया, यह बड़ी समझदारी का काम किया। "लाला मलूकदास ने समझा था कि उनका आरारी जुमला साहब के दिमाग पर गुलाबजल का काम करेगा, पर साहब तो नाराज होने पर तुले बैठे थे। मसल मशहूर है कि किसी को मेहरी छोडना होता है, तो वह कहता है कि साग में हल्दी क्यों नहीं डाली गयी। यही हाल साहव का था। बोले-'आप मुझसे बार-बार यह क्यों कहा करते हैं कि आपने और आपकी पार्टी ने असहयोग के आपत्-काल में सरकार का साथ दिया? आप लोग सरकार का साधन देते वो और करते क्या ? जेल के पनदियाभदर' के लिये तैयार थे, या यही असहयोग का साथ देते ? जाँते में जीव दिये गये होते, मखमल का भगना उतरवा लिया गया होता, . , (१२) चक्की पोसते-पीसते रीढ दुहर गई होती। देह मे जूस होता, तब तो असहयोग का साथ देते " "रायबहादुर लाला मलूकदास ने देस लिया कि इस समय हवा उन्टी वह रही है-साहब तो आज छींकते नाक काट रहे है। यह हाल देखकर बेचारे सन्न मार गये, और टुकुर-टुकुर साहब का मुँह निहारने लगे। "साहव फिर वोले-'आप लोग समझते हैं कि असह- योग के जमाने मे सरकार की मदद करके अपने एहसान के वोझ से आपने उसे दवा लिया है, पर आपका सयाल गलत सरकार आप लोगों की नस-नस पहचानती है। बिना हाथ-पॉव डुलाये ही अगर स्वराज मिल जाय, और उस स्वराज मे आपकी पार्टीवालो को मिनिस्टर्स और गवर्नर्स के पद दे दिये जाय, तो आपको वडी प्रसन्नता हो, क्या यही बात न ? पर हम अँगरेज वेवकुफ नहीं है, वेवकूफ होते, तो अब से कभी आपके देशवाले हमारी हड्डियो का साथ चाट गये होते। हम लोगो को असहयोगियों का दमन करना पड़ा, पर हृदय से हम उनका आदर करते थे। लिग- रलों की हमें पीठ ठोकनी पडी, पर हृदय से हम उनसे घृणा करते थे। असहयोगी मार्गभ्रष्ट वा भ्रान्त भले ही रहे हों, पर आप लोगो की तरह वे कायर नहीं थे ।' "साहब ने यह सब अँगरेजी में कहा था, मेने हिन्दीभावार्थ आप लोगो को सुना दिया है। वे अभी और , . चूना बनाकर पान के . उसका कुछ फहनं जा रहे थे कि पीछे से किसी की आहट जान पडी। उन्होंने गर्दन मोडकर देखा, तो पीछे महामहोपाध्याय ५० धमध्वन शास्त्री को सहा पाया । [३] "दमार महामहोपाध्याय प० धर्म वजजी शास्त्री उन लोगों में से हैं जो अँगरेजों को देवलोक के जीव समझते हैं। किसी अंगरेज की दयादृष्टि को वे पूर्वजन्म की तपस्या का फल मानते हैं। बडे दिन में जिस प्रेम से शास्त्रीजी अँगरेजों को डालियाँ देते हैं उतने प्रेम से पितृ-पक्ष मे अपने पितरों को पिण्ड नहीं देते । साधारण से साधारण अँगरेज को भी दसकर शास्त्रीजी की बस उसके आगे पट पड जाने की इच्छा होती है। "कलेक्टर साहन तो शास्त्रीजी के आराध्य देव ही हैं उनसे यदि व्यवस्था मॉगी जाय तो शायद जिलाधीश का स्थान चे जगदीश से भी ऊँचा बतलाये। उनकी चले तो जहाँ-जहाँ कर्नस्टर साहव चरण रक्से तहाँ-तहाँ वे तीर्थ कायम कर द। यदि कलेक्टर माहन उनके मस्तक पर अपने खुर से सौर लगा दे तो निश्चय है कि शाघोजी उसे अपने भाग्योदय का लक्षण समझेगे "रायवहादुर लाला मलूकदास ने ज्योही साहब मे मिलने के लिये बंगले के बरामदे की और पयान किया त्योंही महा- महोपाध्याय प० धर्मध्वज शास्त्रो घराये हुए ताँगे से उतरे , (६४ ) और अर्दली से बोले 'भैया । मुझे फौरन साहब के पास ले चलो, कहो तो मैं तुम्हे सौ बार चाचा पुकारूँ, पर किसी तरह अभी-इसी मिनट-साहब से मेरी भेद करा दो।' "अर्दली ने कहा कि महाराज, आप जरा सब कीजिये, लाला मलूकदासजी अभी साहब के पास पहुँचे ही होंगे, उनको प्रा जाने दीजिये, तो मैं आपको लिवा चलूँ । पर हमारे शास्त्रीजी जरूरत से ज्याद उजलत मे थे। उन्होने कहा-'अरे नहीं अर्दली साहब । आपको लालै बेटवा हो, मुझे फौरन साहब से मिलाइये। मैं जरा भी नहीं ठहर सकता, माढे आठ ही बजे तक साहब से मिलने की सायत है, और अब साढे आठ में पॉच ही मिनट की देर है, साढे पाठ के बाद तो सूर्य के घर में शनि का प्रवेश हो जाता है, जो योग राजा या राजा-तुल्य अन्य व्यक्ति से मिलने के लिये सर्वथा वर्जित है।। "राजा-तुल्य अन्य व्यक्ति से पण्डितजी का अभिप्राय कले- क्टर साहब ही से था। अर्दली ने वहुत समझाया कि अभी साहब के पास न जाइये, पर महामहोपाध्यायजी वास्तव में महामहोपोंगा थे, उन्होंने एक न सुनी। सायत देसकर आये थे, साढे आठ के पहिले मिलना जरूरी था। अर्दली की मुट्ठी में कुछ चाँदी के छींटे मारकर वे आगे बढे। बरामदे फी मोड से उन्होंने देखा कि साहब ने मलूकदास को बैठने फा इशारा किया और वे बैठ गये। पण्डितजी यह देखकर भी आगे बढने से अपने को रोक न मके-सूर्य के घर मे शनि के प्रवेश का उर उन्हें सताये हुए था। वे आगे बढते- चढते साहब के विल्कुल करीब पहुँच गये। साहन लाला मल्फदाम को फटकारने में मस्त थे, उन्होंने पण्डितजी को नहीं देखा और भला मलूकदासजी उन्हें क्या देसते, वे तो मन ही मन सोच रहे थे कि आज सुबह मैं किसका मुह देसकर उठा था। पण्डितजी खडे-सडे सारी बाते सुनते रहे। थोडी देर बाद जन साहब ने एकाएक पीछे घूमकर देखा तो महामहोपाध्याय पण्डित धर्मध्वज शास्त्री को सडे पाया। उनको देखकर साहब का पित्त खाल उठा। दो सेकेण्ड के लिये तो ऐसा जान पडा कि वे तडपकर पण्डितजी पर छापा मारना ही चाहते हैं। अँगरेजी etiquette के अनुसार यह एक बहुत बडा अपराध माना जाता है और मानना ठोक भी है--कि जहाँ दो आदमी बाते कर रहे हों वहाँ तीसरा रिना बुलाये पहुँच जाय और पहुँचकर उनकी बाते सुन ले । साहन ने फडककर पूछा-'आप यहाँ कैसे आये। आपको किसने बुलाया था ? पण्डितजी की तो थरथरी हिल गई। सामने घडी में साढे आठ बज गया था, लास जल्दी करने पर भी प्रापिर सूर्य के घर में शनि का प्रवेश हो ही गया। ऐसे बुरे योग में राजा-तुल्य व्यक्ति से मिलना। मच है, होनी होके रहती है, पण्डितजो मन ही मन ईश्वर को पुकार कर 'त्राहि माम्, नाहि माम्' कहने लगे।
"लाहब ने फिर पूछा-'बोलिये, कुछ जवाब दीजिय, आप यहाँ क्यों आये ? किसने श्रापको यहाँ आने का हुक्म दिया था ? "पण्डितजो बेचार-एक चुप लाख चुप-क्या जवाब देते ? साहब से सायत का हाल कहते ? "उधर पण्डितजी की खामोशी से साहब और भी प्राग- बबूला हो रहे थे, दाँत पीसकर बोले-'आप कुछ जवाब देते है या मैं आपको कम्पौण्ड के बाहर निकलवा दूं?' "पण्डितजी ने जवाब देने की कोशिश की, पर जवान तो, ऐसा जान पडता था कि, तालू से सट गयी है। साहब का रौद्र रूप देखकर महामहोपाध्यायजी सोल हो पाने 'पिल-पिला- यमान हो गये थे "पण्डितजो फिर भी चुप रहे । अव साहब भी अपना क्रोध सवरण न कर सके। वे पण्डितजो की ओर वढे-एक कदम-दो कदम-तीन-~-प्ररे अब क्या किया जाय, मालूम नही साह्य क्या करेंगे, पण्डितजी का हृदय ढेंकी की तरह चलने लगा, ऐसे औघट घाट मे कौन सहायता करेगा। भागना भी व्यर्थ होगा, सर्वशक्तिमान् कलेक्टर से भला कोई भाग- कर फहाँ जा सकता है और फिर भागा कैसे जाय- पृथ्वी की सारी प्राकर्षण शक्ति तो इस समय पण्डितजा के पदतल का प्राश्रय ले रही है।
। भाँजते भर (६७) "साहब अव पण्डितजी के बिलकुल निकट आ गये थे गरुड-गामी को पुकारने के लिये गज को थोडा समय भी मिल गया था, बिचारे पण्डितजी को तो अब वह भी न था, साहब सामने दो हाथ के फासले पर आ गये थे। उनकी मुट्ठी बँधी हुई थी, चेहरा गुस्से से लाल था। "पण्डितजी से और न देखा गया, और देसने का समय भी न था, अब बिलम्ब करने से अनर्थ हो जाता। पण्डितजी पलक मे अपना ब्रह्मास्त्र चलाया—अर्थात् अपनी पगडी उतारकर साहब के पैरों पर फेंक दी। "पगडी उतर जाने से पण्डितजी के खोपडी फी बडो अपूर्व झॉकी प्राप्त हुई। ऐसी चिकनी सोपडी थी जैसे नई पिटी हुई गच । घुटी हुई चौद पर थक्केदार चुटिया शोभा दे रही थी। मानों काबुली सरदा पर थोडे से फसेरू रक्से हों। यह दृश्य देखकर साहब हँस पडे। हँसी के साथ क्रोध कहाँ टिफ सकता है ? देखते-देखते साहब के दिमाग काटेम्परेचर नार्मल पर पा गया। उन्होंने पण्डितजी की पगडी अपने पैरों पर से उठाकर उनके सर पर रस दी, उन्हें बैठने के लिये कहा, और फिर थोडी देर उनसे इधर उधर की बात करके उन्हें और रायबहादुर लाला मलूकदास को साथ ही विदा किया। प० जीट वहादुर शर्मा ने छव के अध्यक्ष के नाते लाला झाऊलाल को टोफकर पूछा-'पर आपको ये दावे मालूम कैसे हुई १ पाप तो वहाँ सडे-खडे यह सब देख नहीं रहे थे। - - (६८) लाला झाऊलाल ने कहा- मुझे क्या, सभी को ये बाते मालूम हो गयीं। रायबहादुर लाला मलूकदास और महा- महोपाध्याय पण्डित धर्मध्वज शास्त्री ने आपस में यह सलाह की कि देखो भाई, न तुम मेरी बेइज्जती का हाल किसी से कहना और न मैं तुम्हारी बेइज्जती का हाल किसी से कहूँगा, पर ऐसी दशा मे जो हमेशा होता आया है वही हुआ। बाहर आते ही मलूकदास ने अपने खास दोस्तो को बतलाया कि आज शास्त्रीजा ने इस तरह साहब के पैरे पर अपनी पगडी रख दी। शास्त्रीजी ने भी अपने खास दोस्तों को बत- लाया कि आज इस तरह मलूकदास साहव से फटकारे गये । इन खास दोस्तों ने अपने-अपने खास दोस्तों को सारा हाल कह सुनाया-करते-करते कोई भी ऐसा न रह गया जिसके कानो तक ये बाते न पहुँची हों। "खैर, यह सव तो हुआ, अव जरा प्रागे का हाल सुनिये। एक बडी मजेदार घटना हुई, जिसके फलस्वरूप मेरे ऐसे निठल्ले को-अर्थात् वेकारी महारोग के एक असाध्य रोगी को नौकरी मिल गयी। जब एक वार लोगों को यह मालूम हो गया कि माहव अब अपनी साधारण प्रकृति के अनुसार हँस-बोल रहे हैं, तब नि शव होकर लोग उनसे मिलने के लिये जाने लगे। मिलने में दो मिनट से अधिक समय नहीं लगता था, पर इतने हो देर की intervier से लोग निहाल हो जाते थे, मानो चारों धाम करके लौट रहे हों। जिसके + , -- साथ कलेक्टर साहब ने दो मिनट के बदले ढाई मिनट बाते कर लो वह तो भानन्द-गिरि के मोण्ट एवरेस्ट पर सवार हो जाता था। किसी कारण से साहब ने प्रसन्न हाकर खाँ साहब मौलवी इनायतुला सां की दाढी पर हाथ फेर दिया। नतीजा यह हुआ कि सौ साहब जन बाहर आये तो कुछ अजीव "वोंधे से बंधे से और विमोदित बिकाने से" दीख पडे । "ड्राइङ्ग रूम अभी से सजाया जा रहा है, उसमें आज शाम को साहब के चन्द नर और मादा मित्रो की पार्टी है। अच्छा जमघट रहेगा---गारों से गोरियाँ मिल बैठेंगी, मोरियाँ बहेगी शरान की, और चोरियाँ होंगी चुम्मो की, इसी से साहव इस समय बगल के बरामदे मे बैठ हुए हैं, और वहीं अपने भक्तों को 'लोचन-लाहु' दे रहे हैं। "एकाएक उसी वरामदे की और कुछ गलबली-सी पैदा हो गयी । साहन खुद घबराये हुए बाहर आ गये और अर्दलियां को इधर-उधर भेजने लगे। एक अर्दली वाइस्किल दौडाता हुआ फाटक से निकलकर बाहर जाने लगा। मैंने उससे इस हाबा- डावा का कारण पूछा। उसने कहा कि डाक्टर को बुलाने जा रहा हूँ, चौधरी वेलनसिंह को एकाएक फालिज मार गया है । [४] मुझे और मेवारामजी को यह हाल सुनकर दुस हुआ, यद्यपि चौधरी वेलनसिंहजी बजात-सुद ऐसे आदमी नहीं है 1 - 1 (१००) कि उनके दुख से कोई दुखी हो । विशाल सम्पत्ति के स्वामी होते हुए भी आप दया-धर्म या लोक-सेवा के नाम पर एक झझी कौडी नहीं खर्च करते पर अँगरेजों को भोज देना होता है, तो सेफ-का-सेफ साफ कर डालते हैं। एक मामूली किरण्टे का हमारे चौधरी साहब जितना आदर करते हैं उतना शायद अपने दीक्षा-गुरु का भी न करते होंगे। लोगो का खयाल है कि मरते समय राम के बदले किसी अँगरेज़ का नाम लेकर यं अपना दम तोडेंगे। ये उन महानुभावों में से हैं, जिन्होंने किसी समय असहयोग की बाढ को अमन सभा के तसलो से उलीचने का सदुद्योग किया था। "उनकी बुराइयों को जानते हुए भी इस समय उनका हाल सुनकर हम लोगो को अफ़सोस हुया। अभी तो बेचारे भले चले थे, बैठे-बिठाये यह क्या हो गया। अर्दली ने उनकी बीमारी का ब्योरा इस प्रकार दिया–वेलनसिहजी कलक्टर साहब से मिलने गये थे। मिलते समय उन्होंने साहब को प्लैटिनम की एक कीमती टाइ-पिन भेंट की। साहब इस भेंट से इतने प्रसन्न हुए कि उनके दोनों हाथ पकडकर हिलाने लगे। ठीक इसी समय बेलनसिंघ को एक छौंक बडे जोरों की आई, और साहब उनका हाथ पकडे ही रह गये, पर वे धम-से दरी पर बैठ गये। तब से उसी वरह पलथी मारे बैठे हुए हैं। लास कोशिशें हो रही हैं उठाने की, पर उठते ही नहीं हैं। इसी से खयाल हो रहा है कि शायद टाँगों में लकवा मार गया है। , ।
(१०१ ) "इस घटना से बंगले में आने-जाने की रुकावट कम हो गई थी। लोग चौधरी साहब को देसने के लिये बरामदे की पोर जा रहे थे। मेवारामजी को उधर जाते देसकर मैं भी उनके पीछे हो लिया। बरामदे में जाकर हम लोग कुछ दूरी पर सड़े हुए। सामने दरी पर चौधरी वेलनमिहजो मन-मारे बैठे थे पास ही माहब खडे-सड़े अपना सर खुजला रहे थे। हम लोगों के आगे कुँवर लाडिलीप्रसाद, राय बुलाकीदास इत्यादि कई सज्जन एक कतार में खडे थे, और चौधरी साहन की दशा पर तरस सा रहे थे। "चौधरी साहा का नाम मैं बहुत सुना करता था, पर यह पहला ही मौका था कि मैंने उन्हें साक्षात् देसा । अजीब गोल-मटोल मी सूरत उनकी है जितने नाटे है, उतने ही मोटे हैं। तोद शरीफ की ऊँचाई और गोलाई देखने ही से तअल्लुक रसती है। उनके सर और अधोभाग को किसी कपडे से मसलन कफन से-ढंक दीजिये, तो बाकी शरीर के स्थान मे एक विराट फुटबाल रसा हुआ जान पडेगा। भारत के उज्ज्वल अतीत में जन्म हुआ होता, तो हमारे हिन्दू-सम्राट् उनके पंट के दहे पर प्रशस्ति लिख मारते । नादी अचकन और ढीला पायजामा पहिने थे। काले मखमल को कश्तीनुमा टोपी थी। "मैं चौधरी साहब को कुछ देर तक बडे गौर से देसता रहा । मेरे देसने मे तो वे बिल्कुल स्वस्थ जान पडते थे, कम चौधरी साहब सर पर - . Y१०२) से कम यह नहीं प्रकट होता था कि एकाएक उन्हे लकवे का प्रारजा हो गया है। पर यदि ऐसी कोई बात न होती तो भला वे कलेक्टर साहब के सामने पालथी मारकर बैठे रहते—इतनी बडी बेअदबी करते। जो हो, पर देखने से यह नहीं जाहिर होता था, कि उनको किसी तरह की बीमारी है। हाँ एक बात जरूर थी, उनके चेहरे पर बौखलाहट हद दर्जे की थी, और न जाने क्यों बार-बार अचकन के पल्लों को समेटकर अपनी जापों और कमर से चिपका रहे थे। "इतने मे डाक्टर भी आ गया। उसने आगे पीछे से भली भाँति उनको निहारा नब्ज देसी--अॉखो के कोए देसे-छाती को थपथपाया-और सबको 'ठोकमठोक' पाया। उसने टाँगों को देखना चाहा, पर चौधरी साहब ने कतई इन- कार कर दिया कि मैं अपनी टॉग न दिखाऊँगा, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आपका यह ख्याल कि मेरी टॉगों मे लकवा मार गया है, बिलकुल गलत है। "आखिर माजरा क्या है! चौधरी माहव खुद ही तसलीम करते हैं कि मेरी टाँगें ठीक हैं पर तब भी दरी पर जमकर अगर पैरों में कुछ हुआ नहीं है तो एकाएक बैठ क्यों गये थे और अव उठते क्यों नहीं हैं ? कहा कि आपकी टॉगें ठोक हैं तो आप सडे क्यों नहीं हो जाते, यह कहाँ की तहजीब है कि कलेक्टर साहब के सामने बैठे हुए हैं। डाक्टर ने वास्तव मे (१०३ ) आप आसन जमाये बैठे हैं ? चौधरी साहब ने सिवा सर झुका लेने के इसका कोई उत्तर न दिया। "डाक्टर ने यह सलाह दी कि कुछ लोग चौधरी साहब को उनकी मरजी के सिलाफ उठाकर खडा कर दे , पर चौधरी साहब इस प्रस्ताव से बडे घबडाये, और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में सबको जता दिया कि यदि कोई मुझे अपनी जगह से हटाने की कोशिश करेगा तो उसे मैं बिना मारे न छो ढूँगा। "कलेक्टर साहव बड़ी परेशानी में पड गये। एक विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी। शहर के एक धनी-मानी सज्जन उनके बॅगले के बरामदे में बिना किसी सूचना या चेतावनी के अकस्मात् और अकारण पलथी मार- कर बैठ जाते हैं, खुद उठने का नाम नहीं लेते, लोग हाथ पकडकर उठाना चाहते हैं तो उन्हें मारने की धमकी देते हैं कलेक्टर साहब ने भी उनसे उठने के लिये कहा, पर नतीजा कुछ नहीं हुआ। चौधरी साहव अपने स्थान से दिले तक नहीं। "अन्त में सब लोगों ने एक मत से यह राय कायम की- जिससे डाक्टर भी सहमत हुा-कि हो-न हो उनके दिमाग का कोई पेंच ढीला हो गया है जिसकी वजह से वे साहय के सामने भी दुराग्रह और दिठाई पर कमर कसे हुए हैं, और अब सिवा इसके कोई चारा नहीं है कि उन्हें यलात् उठाकर मोटर पर सवार कराया जाय, और घर पहुंचा दिया जाय। -- । (१०४) "यह कह देना तो आसान था कि चौधरी साहब को उठा- कर मोटर पर सवार करा दिया जाय, पर ऐसा कर दिखाना साधारण काम न था। उनके शरीर की रचना मे विधाता ने तेल पेरने के कोल्हू को आदर्श माना है। तौल में किसी मकुनी हाथी से वे कम नहीं हैं। ऐसे 'भारी भरखम' मनुष्य को उठाकर मोटर मे बैठा देना कारेदारद था। चार पेशराज लगते तो चौधरी साहब को कहीं टस-से-मस कर सकते । "पर चौधरी साहब ऐसे प्रतिष्ठित रईस को पेशराजों से उठवाना कलेक्टर साहब ठीक नहीं समझते थे। नौकरो और अर्दलियों के सम्बन्ध में भी यही आपत्ति थो। बेलनसिंहजी कूडा तो थे नहीं कि नौकरों से कहते कि बुहारकर फेक तब पासिर उन्हें कौन उठावेगा। क्या क्रेन मँगाने की जरूरत पड़ेगी। "साव की इस परेशानी का इलाज कुँवर लाडिलीप्रसाद ने ढूंढ निकाला। उन्होंने बाबू मेवाराम-सरीसे नौजवान रईसों में से कुछ Volunteers माँगे। एहसान तो साहब के ऊपर होता, इसलिये फौरन कुछ लोग तैयार हो गये। मेवा- राम ने मुझे भी बेगार में पकड़ लिया। चौधरी साहव मारने की धमकी देते ही रहे पर हम लोगों ने हिम्मत करके उनके हाथ पाँव पकड लिये। "मैं सबसे तगड़ा था, इसलिये मुझे उनके शरीर के सबसे भारी हिस्से को, अर्थात् कमर और पेट को, पकडने के लिये दो।
(१०५ ) कहा गया। मैंने कमर उनकी पकड तो ली, पर मेरे ऐसा करते ही वे इस कदर बिगडे कि उन्होंने पूरी ताकत लगाकर लोगों से अपना एक हाथ छुडा ही लिया, और मुझे मारने के लिये "कुलिश समान मुष्टि सन्धाना"। जिस प्रकार वाज लवा पर टूटता है उसी प्रकार उनका हाथ मेरे सर पर टूटने के लिये उठा। मैंने हाथ को उठते हुए देखा और उसके वेग से समझ गया कि अगर यह मेरे मर पर बैठ जायगा तो मैं पटरा हो जाऊँगा, पर कमर छोडकर भागने की जगह भी न थी-लोग पीछे से इस तरह घेरकर खडे हो गये थे कि एक इञ्च भी टलना असम्भव था। एक क्षण के लिये वो मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया, पर फौरन ही अपने को सँभालकर आत्मरक्षा के एक मात्र उपाय का जो उस समय की घबराहट में मुझे सूझ पडा-अनुसरण किया। बडी फुर्ती से मैं नीचे झुका, और चौधरी माह की अचकन से अपना सर ढंककर जमीन से चिपक रहा। दूसरे ही क्षण चौधरी साहब का वार खाली गया और जर तक वे दूसरा वार करें तब तक लागों ने फिर उनका हाथ पकड लिया । "पहले मेरा यह सयाल हुआ कि अजननी समझकर चौधरी साहब मुझे मारने की कुचेष्टा कर रहे थे, पर नहीं यह बात नहीं थी। यहाँ तो मामला ही दूमरा घा, इस समय जो कोई चौधरी साहब की कमर छूने का साहस करता उसी के सर की कुन्दी हो जाती ।
(१०६ ) "मुशकिल से पाँच सेकेण्ड मैंने चौधरी साहब के अचकन का आश्रय लिया होगा, पर इतनी ही देर मे मैंने उसके नीचे जो कुछ देखा, उससे मेरी आँखें खुल गयीं। चौधरी साहब के यकायक पालथी मारकर बैठ जाने का और उठने से इनकार करने का सारा रहस्य खुल गया। चौधरी साहब की व्याधि (1) के सम्बन्ध में मैंने अनायास जो विशेषज्ञता प्राप्त कर ली, वह बिना उनकी अचकन के नीचे झाँके कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता था। "मैं अभी तक डर रहा था कि मैं न तीन में हूँ न तेरह में, कहीं कोई अर्दली कान पकडकर बँगले के बाहर न कर दे, पर अब मैं निडर हो गया। निघडक साहब के पास जाकर बोला-'बेलनसिंहजी को उठाकर मोटर पर लादने की जरूरत नहीं है। आपकी आज्ञा हो तो मैं उन्हे याही खडा कर दूं।' साहब को मेरे कहने पर विश्वास तो न आया, पर उन्होंने एक बार मुझे प्रयत्न करके देस लेने की अनुमति दे दी। मैंने उनसे कहा-'यहाँ पर और जो सज्जन खडे हैं, उनसे कहिये कि कृपा करके थोडी देर के लिये बाहर पोटिको में चले जाय, और आप भी उतनी ही देर के लिये चौधरी साहब की ओर पीठ करके खड़े हो जाइये।' "ऐसा ही हुआ, लोग पार्टिका में चले गये और साहब पीठ फेर कर सड़े हो गये यह मव हो जाने पर मैं चौधरी साहब के पास गया, और उनसे बोला-'अव आप खड़े हो ।
(१०७) जाइये। इस समय आपको कोई नहीं देख रहा है। मेरे कन्धों पर हाथ रसकर धीरे-धीरे खडे हूजिये। मैं पायजामा ऊपर खसकाता चलूंगा।' चौधरी साहब ने समझदारी सर्च की मेरी सलाह मानकर सडे हो गये, मैंने पायजामा अपर खींचकर इज़ारबन्द कस दिया। "वेलनसिंह को खडे देखकर साहब के विस्मय का कोई ठिकाना न रहा। मुझे उन्होंने कोई जादूगर समझा । मेरा हाथ पकडकर ड्राइगरूम मे लिया गये। बडे आदर से मुझे कुर्सी पर बिठाया और अँगरेजी में बात-चीत करने लगे । पहले उन्होंने यह जानना चाहा कि चौधरी साहन को यका- यक क्या सूझी थी कि वे दरी पर पालथी मारकर बैठ गये थे । [५] "मैं सारा भेद कह ले गया। घटनाक्रम पर ध्यान दीजिये, तो आप लोग भी सारा भेद समझ जायेंगे। वेलनसिहजी ने कलेकर साहय को प्लैटिनम की एक कीमती टाईपिन भेंट की। माय ने इस X'mes Present से सन्तुष्ट होकर उनके दोनों हाथ पकड लिये। ठीक इसी समय चौधरी साहब को धडल्ले की छोक पाई। छींक से पेट पर जोर जो पडा, तपायजामे का इजारबन्द-जो असावधानी से ढोला चंपा हुआ था-खुल गया। पायजामा प्रय नीचे ससक चला। उधर दोनों हाथ साहब पकडे हुए थे। उनसे झटफारफर , भा , (१०८) हाथ छुडा लेना अक्षम्य अपराध होता; पर निगोडा पायजा यह सब एक नहीं समझता था। उसने नीचे सरकना जा और सरकते-सरकते घुटनों तक पहुँच गया। प्र बिचारे चौधरी साहब करते तो क्या करते ? मोटे दर्जे के थे। अब हाथ छुडाना भी व्यर्थ था, क्योंकि पखा ऐसे पेट के मारे हाथ कभी घुटनो तक पहुँच भी न पाते थे सिवा इसके और कोई उपाय न था कि वे जमीन पर जायें, और अचकन से जो कुछ छिप मके, छिपा ले । चौधन साहब ने यही किया भी । अव अगर लोगों के आग्रह कर पर भी नहीं सडे होते थे, और जबरदस्ती खडा करानेवाले को मारने की धमकी देते थे, तो बिचारे का क्या कसूर था सबके सामने खासकर साहब के सामने खड़े होकर अपन असली हालत का विज्ञापन देते ? "हँसते-हँसते साहब का बुरा हाल हो गया। हर रोकते हुए उन्होंने मुझसे पूछा-'तुम्हारा नाम क्या है ?' 'मेरा नाम हे भाऊलाल' 'तुम करते क्या हो?' 'सोचा करता हूँ कि क्या करूँ।' 'कोई नौकरी क्यों नहीं करते?' 'नौकरी तलाश करने के लिये एक नौकर कहाँ से लाऊँ? कैसी नौकरी चाहते हो?'
(१०८) 'कोई भी नौकरी हो, पर हाँ तनख्वाह अच्छा हो, और काम कुछ न हो ? "साहब हँसे, शायद यह सोचकर कि एसी नौकरी पाने के लिये तो सिविल मर्विस की परीक्षा पास करना होता है, फिर कुछ सोचकर बोले-'अच्छा, मैं ऐसी नौकरी दिला दूं तो कर लोगे?' "साहव भी प्रजोव आदगो हैं। पूछते हैं कि मैं ऐसी नौकरी कर लूंगा? अभी तक मैंने अपनी जीवन-नौका को ससार-सागर में हवा के हर एक झकोरे के साथ क्यों बहने दिया था ? सिर्फ इसलिये कि मैं अपना व्यक्तित्व नहीं माना चाहता था। बेकारी का मेरे व्यक्तित्व से अङ्ग-अङ्गो का सम्बन्ध है। मैं ऐसी नौकरी चाहता था, जिसके साथ बेकारी की सगाई प्रासानी से निभ सके। मैं साहब के प्रश्न का उत्तर न दे सका, पर वे मेरे हृदय की बात समझ गये। मुझे साथ लेकर बाहर बरामदे में आये। "चौधरी बेलनसिंहजी अभी साहब से मिदा नहीं मांग सके थे । इसलिये बरामदे मे एक कुर्सी पर बैठे हुए उनके श्राने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनको देखकर फौरन Yours Most Obedientiy की मुद्रा से खडे हो गये। साहब ने उनसे अँगरेजी में पूछा-'वेल मिस्टर चौधरी । आज की घटना से क्या साबित हुआ ?'
(११०) "चौधरी साहब इसका क्या उत्तर देते ? उनकी समझ तो-गो उन्होंने कुछ कहा नहीं-आज की घटना से सि यही साबित होता था कि इजारबन्द पायजामे की जान है और बिला उसकी पूरी मदद पाये पायजामा महज अपनी जा से शरीर की लज्जा ढाँक रखने में समर्थ नहीं हो सकता। "उन्हें चुप देसकर माहब ने कहा -'सुनिये, आज क घटना से यह सावित हुआ कि आपको अक्ल के सिवा श्री एक चीज़ की कमी है , समझे आप ?' 'जी हुजूर । आपने फर्माया है कि अक्ल के सिवा मुर और एक चीज की कमी है।' वह एक चोज क्या है ?--एक प्राइवेट सेक्रेटरी। आपके एक प्राइवेट सेक्रेटरी की कमी है। समझे आप ?' 'जी हुजूर। आप ने फर्माया कि मुझे एक प्राइवेट सेक्रे टरी की कमी है। 'आपकी इजाजत हो तो मैं इस कमी को पूरा क सकता हूँ।' 'हुजर ऐसा क्यों कहते हैं ? मैं आपको इजाजत दूंगा हुजूर मालिक हैं, जो मुनासिब समझिये, कीजिये।' 'तो यह देखिये, आपके सामने लाला झाऊलाल राई हैं। बड़े योग्य और अनुभवी श्रादमी हैं। इनको में प्रार से आपका प्राइवेट सेक्रेटरी नियुक्त करता हूँ। ये आपर डेढ सौ रुपये मासिक लेंगे। मेरे बहुत कहने से ये इतने कर ( १११ ) पर राजी हुए हैं। इनका खास फाम होगा आपके इजार- धन्द का सदा सयाल रखना, जिसमे आज ऐसी घटना फिर कभी न हो। साथ ही, यह दो काम और करेंगे-आपका गुण-गान और आपके घर की शोभावृद्धि । इससे अधिक काम आप इनसे न लीजियेगा।' "मेरी इच्छा हुई कि साहब का चरणोदक ले लू, हा- तिरेक से मैं उन्हें धन्यवाद भी न दे सका। मन ही मन मैंने दोमा माँगी कि माहब 'जुल-जुल' अवस्था तक जिएँ। माराश यह कि मुझे नौकरी मिल गयी। चौधरी बेलनसिंहजी यद्यपि यह बराबर सोचते रहे कि साहब उनकी दुम में प्राइवेट सेक्रेटरी-रूपी पलीता क्यो लगा रहे हैं, पर तब भी उनके ऐसे राजभक्ति के कीडे में--जी-हुजरी जन्तु मे-इतनी हिम्मत कहाँ कि एक अँगरेज-और अँगरेज भी कैसा कि कले. कृर-की बात टाल सके मैं साहव का प्राइ- वेट सेक्रेटरी हूँ और रहूँगा-जब तक कि कोई दूसरा फले- कृर बदलकर यहाँ नहीं आता। तब तक तो अपने राम मूसर से ढोल बजायेंगे, फिर आगे देखा जायगा।" लाला झाऊलालजी ने इस प्रकार अपना ममाप्त किया। सारे कुन ने उनको एक स्वर से बधाई दी। प० जोट वहादुर शर्मा ने कहा--"मजनो। लाला झाऊलाल ने स्वय नौकरी तलाश करने की कोशिश नहीं की, और उनकी नौकरी वेकारी से यहुत कुछ मिलती-जुलती हुई है, इसलिये अब चौधरी वक्तव्य - (११२) मेरा प्रस्ताव है कि कब उन्हें सदस्य बने रहने की अनुमति प्रदान करे।" इसके कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रस्ताव सर्व- सम्मति से स्वीकृत हुआ। लाला मल्लूमल ने चलते-चलाते कहा--"ईश्वर भी बहा दिल्लगीवाज है। अभी तक छप्पर फाडकर धन दिया करता था, अब इजारबन्द सोलकर . - नौकरी देने लगा " श्री अन्नपूर्णानन्द की दूसरी रचना पं. विलवासी मिश्र शीघ्र ही प्रकाशित होगी साथ ही हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध हास्य-रस-लेखक श्री "वेढव " की 'कालिज के दिन' शीर्षक अत्यन्त रोचक, मजेदार पुस्तक छप रही है। 1) भेजकर शीघ्र ही हमारी "सीवाप्रन्य- माला" के ग्राहक बनिये। सभी पुस्तकें पाने मूल्य में मिलेंगी । बलदेव-मित्रमण्डल, जालिपादेवी, काशो।
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