Sanmati Library, Jaipur
Dhanurvedsanhita
Front matter
No text on this page.
श्रीः।
धनुर्वेदसंहिता.
श्रीमद्वसिष्ठमहर्षिप्रणोता..::
.
सरहस्या
खेतडीनरेशमहाराजसम्मानित पं० हरदयालु
स्वामिविरचितभाषाटीकासमेता
SHRI SA
सेयं
क्षेमराज श्रीकृष्णदासत्राष्टि
मुम्बय्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् यन्त्रालये-
मुद्रयित्वा प्रकाशिता.
शके १८२३, सं० १९५८..
जाति पुस्तकालय
IPLK.
सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर". यन्त्रालयाध्यक्षने
स्वाधीनरक्खाहै.
No text on this page.
भूमिका। पाठकगण ! यह "वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता" मूलमात्र मुझको इलाका जयपुरके सनथली बनथली कोढाके मोलकराम ब्राह्मणके पाससे लिखनेको संवत् १९३३ में चूरू रामगढ़में मिली जबसे यह धरीथी अब एक प्रति खड्गविलासयंत्रालयकी छपी हुई देखने में आई तथा एक पुस्तक अलीगढ़के जिलेमें छपी इसको देखकर हमनेभी अपनी पुस्तक पण्डित ईश्वरीप्रसादजी पाण्डेको दिखाई इनकी आज्ञानुसार इसकी भाषा अति परिश्रम करके बनाई परिश्रमका फल यथाशक्ति पण्डितजीसे पाया अब इस पुस्तकका सर्वाधिकार श्रीमान् खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयाधिपको समर्पण करदिया। पण्डित हरदयालु स्वामी, ग्राम कवाली निवासी रिवाडी-गुडगांव, श्रीः। धनुर्वेदसंहितास्थविषयानुक्रमणिका । E- पृष्टांक. ४५. ४६ ४९ ५० .... .... .... .... .... .... .... .... ९ काष्टछेदन ५२ .... .... ५.४ .... १३ शब्दवेधित्व ५५ .... .... .... .... ५.७ .... २५ स्वरवलयुद्धम् .... ७० विषय. पृष्ठांक.। विषय. विश्वामित्रजीका वसिष्टजीसे | हदभेद धनुर्विद्या माँगना १ हीनगति धनुर्वेदका अधिकार २ शुद्धगति धनुनविधिः दृढचतुष्क आचार्यलझण चित्रावधि वेषविधिः चापप्रमाण ११ धावल्लक्ष्य शुभचापलक्षणम् १३. उसकी विधि निषिद्ध धनू गुणलक्षण १८ प्रत्यागमन वाणलक्षण १९ अस्त्रविधि फललदाण २२ औषधि बाणोंके कर्म संग्रामविधि वाणोंके स्वरूप वाण पायन नाराचनालीकशतत्री वर्णन २६ राहुयोगिनी स्थानमुष्टया कर्षणलक्षणविधिः ३० व्यूहोंके आकार ३२ सेनानय व्याय धातुपाठ अथ लक्ष्यम् ३३ उदाहरण श्रमक्रिया ३५ धावनप्रकार शरप्रमाण ३७ पदातिक्रम नाराचप्रमाण उदाहरणम् अनध्याय ३८ । अथाश्वकम श्रमक्रिया ४. अपहस्तिकम लक्ष्यास्खलन ४३ रथक्रम शीघ्र संघान ४४ शिक्षा दूरपात ४५ हन्तव्याऽहन्तव्योपदेश इत्यनुक्रमणिका समाप्ता. २७ व्यूहाः ७७ .... .... ८२ गुण मुष्टि धनु मुष्टि संधान .... .... .... .... ९८ . .... .... " .... .... .... ....१०० ....१०१ ....१०३ ....१०५, .... .... .... .... .... .... .... ....१०६ ....१०७ श्री शनि पुस्त ॐसाम्बसदाशिवाय का अथ वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिताप्रारम्भः। अथैकदा विजिगीषुर्विश्वामित्रो राजर्षिर्गुरु वसिष्ठमभ्युपेत्य प्रणम्योवाच ब्रूहि भगवन्ध- नुर्विद्या श्रोत्रियाय दृढचेतसे शिष्याय दुष्ट शत्रुविनाशाय च। तमुवाच महर्षिब्रह्मर्षि प्रवरो वसिष्ठः शृणु भो राजन्विश्वामित्र यां सरहस्यधनुर्विद्या भगवान्सदाशिवः परशु- रामायोवाच तामेव सरहस्यां वच्मि तेहि- ताय गोब्राह्मणसाधुवेदरक्षणाय च यजुर्वेदा- थर्वसम्मितां संहिताम् ॥ अर्थ-एक समय जीतनेकी इच्छावालाराजर्षि विश्वामित्र वसिष्ठ गुरुजीके समीप जाके प्रणाम कर बोला हे भगवन् ! सुननेवाले दृचित्त शिष्य मेरे अर्थ बुरे स्वभाववाले शत्रुओंके नाशके निमित्त धनुर्विद्या कहो । उसको मह- र्षिब्रह्मऋषिया श्रेष्ठ वसिष्ठजी बोले हेराजन विश्वामित्र ! सुनो जिस इत्य धनुर्वेदविद्याको भगवान महादेवजीने : परशुरामजाकलिमित्त कहाथा।उसी यजर्वेद और अथर्ववेदसे --
(२) धनुर्वेदसंहिता।
मिली हुई रहस्यसहित धनुर्विद्याको में तुमसे गो तथा
ब्राह्मण, वेद और साधुओंकी रक्षाके अर्थ कहताहूं।
अथोवाच महादेवोभार्गवाय च धीमते।
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामियाथातथ्येन संशृणु॥१॥
अर्थ-इसके उपरांत महादेवजीने बुद्धिमान् परशुरामजीके
जो अर्थ कहा वही मैं तेरे अर्थ कहूंगा यथार्थतासे तुम सुनो।
तत्र चतुष्टयपादात्मको धनुर्वेदः यस्य
प्रथमे पादे दीक्षाप्रकारः। द्वितीये संग्रहः।
तृतीये सिद्धप्रयोगाः । चतुर्थं प्रयोग
विधयः ॥२॥
अर्थ-महादेवजीके कहेहुए धनुर्वेदमें चार पाद हैं। जिसके
पहिले पादमें धनुर्वेदके दीक्षा (उपदेश) की विधिहै । दूसरे
पादमें अभ्यास करनेकी विधि है । तीसरेमें प्रक्षेपणादि
प्रकार है । चौथे पादमें अस्त्रसंधानादिप्रयोगविधि है ॥२॥
अथ कस्य धनुर्वेदाधिकारः
इत्यपेक्षायामाह-
धनुर्वेदगुरुर्विप्रः प्राक्तो वर्णद्वा च ॥
युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादि-
शिक्षया ॥३॥
भाषाटीकासमेता। (३) अर्थ- धनुर्वेद शिखानेमें ब्राह्मण तो गुरु होताहै और धनुर्वेदसे युद्धका अधिकार दोही वर्गों के लिये कहाहै और शूद्रको तो अपने आपही शिकारआदि करनेका अधिकार है॥३॥ चतुर्विधमायुधम् । मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्रमुक्तंचेति ॥ ४॥ अर्थ-मुक्त अर्थात् चक्र आदि जो हाथसे छोड़े जायें उनको अस्त्र कहतेहैं । अमुक्त खड्ग आदि । मुक्ताऽमुक्त बरछी आदि। यंत्र मुक्त शर गोली आदि । ये चार प्रकार- के आयुध कहातेहैं ॥४॥ दुष्टदस्युचौरादिभ्यः साधु संरक्षणं धर्मतः प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम् ॥५॥ अर्थ-बुरे मनुष्य डाकू चोर आदिकोंसे श्रेष्ठोंकी रक्षा करना, धर्मसे प्रजाका पालन करना, यही धनुर्वेदका प्रयो- जनहै ॥५॥ एकोपि यत्र नगरे प्रसिद्धः स्याद्धनुर्धरः। ततो यान्त्यरयो दूरान्मृगाः सिंह- गृहादिव ॥६॥ अर्थ-जिस नगरमें एकभी प्रसिद्ध धनुर्धारी हो उस नगर ..
धनुर्वेदसंहिता।
से शत्रु दूरही चले जातेहैं जैसे सिंहके घरसे अरण्य पशु
दूर चले जाते हैं॥६॥
अथ धनुर्दानविधिः।
आचार्येण धनुर्देयं ब्राह्मणे सुपरीक्षिते ।
लुब्धे धूर्ते कृतघ्ने च मन्दबुद्धौ न
दापयेत्॥७॥
अर्थ-अब धनुर्विद्या देनेकी विधि यहहै कि, आचार्य
को चाहिये कि अच्छी परीक्षा किये हुए ब्राह्मणको धनु-
विद्यादें । लोभी और धूर्त और जो दी हुई विद्याका
अहसान न माने ऐसे पुरुषको तथा मन्द बुद्धिको धनु-
विद्या न दे॥७॥
ब्राह्मणाय धनुर्देयं खङ्गं वैक्षत्रियाय च॥
वैश्याय दापयेत्कुन्तं गदां शूद्राय
दापयेत् ॥८॥
अर्थ-ब्राह्मणको धनुषदे, क्षत्रियको तलवार, वैश्यको
भाला और शूद्रको गदायुद्ध शिखावे ॥ ८॥
धनुश्चक्रं च कुन्तं च. खडं च क्षुरिका
गदा । सप्तमं बाहु युद्ध स्यादेवं युद्धानि
सप्तधा॥९॥
भाषाटीकासमेता। (५) 'अर्थ-धनुष १ चक्र २ भाला ३ खड्ग ४ छुरी५ गदा६ सातवाँ हाथोंसे मल्ल युद्ध इस प्रकारसे सात प्रकारका युद्ध है ॥९॥ अथाचार्यलक्षणम्। आचार्यः सप्त युद्धः स्याच्चतुर्भिर्भागवः स्मृतः। द्वाभ्यां चैव भवेद्योधएकेन गण- को भवेत् ॥ १० ॥ अर्थ-अब आचार्यके लक्षण कहतेहैं । जो सातों प्रकार का युद्ध जानता है वह आचार्य होताहै । और चार प्रकार का युद्ध जो जाने वह भार्गव कहाताहै। और दो प्रकार के युद्धको जानने वाला योधा होताहै । और एकप्रकारके युद्धसे गणकसंज्ञा वाला होता है ॥१०॥ हस्तः पुनर्वसुः पुष्यो रोहिणी चोत्तरा- त्रयम्। अनुराधाश्विनी चैव रेवती दशमी तथा॥११॥ अर्थ-धनुर्विद्या का मुहूर्त हस्त, पुनवर्स, पुष्य, रोहिणी और तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और दशवीं रेवती॥११॥ जन्मस्थे च तृतीये च षष्ठे वै सप्तमे धनुर्वेदसंहिता। (६) तथा । दशमैकादशे चन्द्रे सर्वकार्याणि कारयेत् ॥ १२॥ अर्थ-प्रथम, तीसरे, छठे, सातवें दशवें, ग्यारहवें, चन्द्रमामें आचार्य धनुर्विद्याके सारे काम करवावे ॥ १२ ॥ तृतीया पंचमी चैव सप्तमीदशमी तथा। त्रयोदशी द्वादशी च तिथियस्तु शुभा मताः॥१३॥ अर्थ-तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी ये तिथि शुभ हैं ॥१३॥ रविवारः शुक्रवारो गुरुवारस्तथैव च। एतद्वारत्रयं धन्यं प्रारम्भ शस्त्र कर्मणाम् ॥ १४॥ अर्थ-आदित्य, शुक्र, गुरु, शस्त्रोंके प्रारम्भकर्ममें ये तीनवार सराहनेके योग्यहै ॥१४॥ एभिर्दिनैस्तु शिष्याय गुरुः शस्त्राणि दापयेत् । संतयं दानहोमाभ्यां सुरा- न्स्वाहाविधानतः॥१५॥ अर्थ-गुरु इनदिनोंमें दान और होमकरके देवताओंको तृप्तकर शिष्यको शस्त्रदे॥१५॥ ..
भाषाटीकासमेता। (७) ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र कुमारीश्चाप्यनेकशः॥ तापसानत्रयेद्भक्त्या ये चान्ये शिव- योगिनः॥१६॥ अर्थ-और वहां अनेक ब्राह्मण और कन्याओंकोजीमावे। और जो शिवके भक्त योगी हों उनको भक्तिसे अर्चन पूजन करै॥ १६॥ अन्नपानादिभिश्चैव वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गन्धमाल्यविचित्रैश्चगुरुतत्रप्रपूजयेत् १७॥ अर्थ-और पीछे गन्ध माला अन्नादि वस्त्र गहनेआदिसे गुरुजीको भूषितकर पूजनकरै॥ १७॥ कृतोपवासः शिष्यस्तु धृताजिनपरि ग्रहः । बद्धांजलिपुटस्तत्र याचयेदरुतो धनुः॥१८॥ अर्थ-उपवास कियाहुवा शिष्य मृगचर्म धारणकियेहुये हाथ जोड़कर गुरुसे धनुषकी याचनाकरै ॥ १८॥ अङ्गन्यासस्तवः . कार्यः शिवोक्तः सिद्धिमिच्छता आचार्येण च शिष्यस्य पापघ्नो विघ्ननाशनः ॥१९॥ अर्थ-फिर आचार्यको शिष्यकी सिद्धिकी इच्छासे
(८) धनुर्वेदसंहिता।
शिवजीका कहाहुआ पाप और विनोंका नाश करनेवाला
अङ्गन्यास करनाचाहिये ॥ १९॥
शिखास्थाने न्यसेदीशं बाहुयुग्मे च केश-
वम्। ब्रह्माणं नाभिमध्येतु जंघयोश्चग-
णाधिपम् ॥२०॥
अर्थ-चोटीके स्थानपर जहाँ ब्रह्मरन्ध्र है वहाँ श्रीमहादे-
वजीको स्थापनकरै और दोनों वाहुओंपर भगवानको
और नाभिके बीचमें ब्रह्माजी और जंघाओंपर गणेशजीको
स्थापन करै॥२०॥
रोह्रौं शिखास्थाने शंकराय नमः। उात्रा
बाह्वोः केशवाय नमः। डोह्रौं नाभि मध्ये
ब्रह्मणे नमः। डोह्रौं जंघयोगणपतये
नमः॥ २१ ॥.
अर्थ-इन पूर्वोक्त चार मंत्रोंसे चारों देवताओंका ध्यान
करता जाय और शिखादिको हाथसे छूता जाय ॥२१॥
ईदृशंकारयेन्यासं येन श्रेयो भविष्यति ।
अन्येपि दुष्ट मंत्रेण न हिंसन्ति कदाच न २२
अर्थ-ऐसा अङ्गन्यास करावे और शिष्य करै जिससे
कल्याण हो। और इस न्यासके करनेसे औरभी मारण
आदि दुष्ट मंत्रोंसे नहीं मारसक्ते ॥ २२॥
भाषाटीकासमेता।
शिष्याय मानुषं चापं धनुमत्राभिमंत्रि-
तम् । काण्डात्काण्डाभिमंत्रेण दद्यादे-
दविधानतः॥२३॥
अर्थ-गुरु जोहे सो शिष्यको “काण्डात्काण्डात्परोहन्ति
परुषः परुषः परि" इस वेदके मंत्र से वेदविधिके साथ
मनुष्य सम्बंधी धनुषको धनुषके मंत्रले मंत्रित करके
दे धनुमंत्र यह है ॥२३॥
प्रथमं पुष्पवेधंच फलहीनेनं पत्रिणाततः
- फलयुतेनैव मत्स्यवेधं च कारयेत्॥२४॥
मांसवेधं ततः कुर्यादेवं वेधो भवेत्रिधा॥
ऐतैविधैः कृतैः पुंसां शराः स्युः
: सर्वसाधकाः॥२५॥
अर्थ-इसके उपरांत पहिले फूलके उपर फल रहित
बाणसे वेध करावे पश्चात् फल सहित बाणसे मत्स्यका
छेदन करावे, इसके उपरान्त मांसपर निशाना लगवावे,
हे विश्वामित्र ! इसप्रकारसे तीनप्रकारका वेध होताहै इन
वेधोंके किये उपरान्त सर्वसाधक वाण होजातेहैं, अर्थात्
सवप्रकारका निशाना आजाताहै और संव वस्तुओंको
वेध सक्ताहै ॥२४॥२५॥
(१०) धनुर्वेदसंहिता।
वेधने चैवमांसस्यशरपातो यदा भवेत्।
पूर्वदिग्भागमाश्रित्य तदा स्याद्विजयी
सुखी ॥ २६ ॥ दक्षिणे कलहो घोरो
विदेशगमनं पुनः। पश्चिमे धनधान्यं
च सर्व चैवोत्तरे शुभम् ॥ २७॥
ऐशान्यां पवनं दुष्टं विदिशोऽन्यांश्च
शोभनाः।हर्षपुष्टिकराश्चैव सिद्धिदाःसर्व-
कर्मणि ॥२८॥
अर्थ-अब वेधका शकुन कहते हैं, यदि मांसका
वेध करतेसमय, वां शमीपूजामें पुतला वेध करतेसमय
वेध न होकर बाण पूर्वदिशामें गिरपड़े तो उस योद्धाकी
विजय हो और सुख हो, दक्षिण दिशा में गिरे तो बहुत क्लेश
हो और परदेशमें गमन हो, पश्चिममें बाण गिरे तो धन
और धान्य मिले और उत्तरमें गिरे तो सब काम उत्तम हों.
ईशानमें वाण गिरे तो बुरा वायु चले और सारी विदिशा
श्रेष्ठ हैं, आनंद और पुष्टिकी करने वाली और सब
कामोंमें सिद्धी देनेवाली है ॥ २६ ॥२७॥ २८॥
एवं वेधत्रयं कुर्यांच्छंखंदुंदुभिनिस्वनैः।
ततः . प्रणम्य गुरवे धनुर्बाणान्निवे-
दयेत् ॥ २९ ॥
भाषाटीकासमेता। (११) अर्थ-ऐसे वेधत्रयकर, शंख और नगारोंके शब्दके साथ, पीछे गुरुको प्रणामकरके धनुष और वाण उनके आगे रखदे फिर उनको गुरुदक्षिणा देकर लेले ॥२९॥ इति धनुर्दानविधिः । अथ चापप्रमाणम् । प्रथमं योगिकं चापं युद्धचापं द्वितीय कम् । निजबाहुबलोन्मानात्किंचिदूनंशु- भंधनुः॥३०॥ अर्थ-अब धनुषका प्रमाण कहतेहैं, पहिले तो अभ्यास करनेकेलिये (योगिक) धनुषू अर्थात् (लेजम) आदि जिससे बाहुबल बँधे और साधारणधनुषसे निशानाआदि सीखना चाहिये, जैसे (गुलेल) आदि, फिर दूसरा सींग आदिका (युद्धचाप ) अपने हाथोंके बलके उन्मानसे कुछ छोटा धनुष धारण करना श्रेष्ठ है ॥३०॥ वरं प्राणाधिको धन्वी नतु प्राणाधिक धनुः। धनुषा पीड्यमानस्तु धन्वी लक्ष्य न पश्यति॥३१॥ अर्थ-प्राणोंसेभी प्यारा धनुषधारी होता है, प्राणोंसे अधिक धनुष नहीं है, इसकारण ऐसे बलका धनुष धारण करै कि जिससे सुखपूर्वक बाण फेंकता रहै, ऐसा कैड़ा बलवान (१२) धनवदंसंहिता। बोझल धनुषन धारणकरै कि जिससे छाती फटजाय क्योंकि धनुषसे पीडित धनुषधारी निशानाको भली भाँति नहीं ताक सकता, उसके बँचने और भार उठानेकी चिन्तामें ही आरूढ रहकर हारजाताहै ॥३१॥ अतो निज बलोन्मानं चापं स्याच्छुभ कारकम् । देवानामुत्तमं चापं ततो न्यून च मानवम् ॥ ३२॥ अर्थ-इसवास्ते अपने बलके अनुमान चाप शुभकारक है देवताओंका चाप उत्तम होता है, उससे छोटा मनुष्यों का ॥३२॥ अर्द्धपञ्चमहस्तन्तु श्रेष्ठं चापं प्रकीर्तितम् ।। तद्विज्ञेयं धनुर्दिव्यंशंकरेण धृतं पुराम्॥३३॥ अर्थ-सापांच हाथका चाप श्रेष्ठ कहा है, उसको दिव्य धनुष्य जानना सो पहिले श्रीमहादेवजीने धारण कियाथा ॥३३॥ चतुर्विशांगुलो हस्तश्चतुर्हस्तं धनुः स्मृतम् तद्भवेन्मानवे चापं सर्वलक्षण- संयुतम् ॥ ३४॥ अर्थ-चौवीस अंगुलोंका एक हाथ होताहै और चार भाषाटीकासमेता। (१३) हाथोंका एक धनुष कहाहै, वही सारे लक्षणोंकरके सहित मनुष्योंका धनुष होता है ॥३४॥ अथ शुभचापलक्षणम्। त्रिपर्व पंचपर्ववा सप्तपर्व तथापुनः। नवपर्वच कोदण्डं सर्वदा शुभकारकम्॥३५॥ अर्थ-श्रेष्ठ धनुषके लक्षण, तीन पोरि वा पांच पोरि और फिर सात पोरी, नव पोरीका धनुष सदा शुभकारकहै ॥३५॥ चतुष्पर्व च षटपर्वमष्टपर्व विवर्जये त् ॥३६॥ अर्थ-चार पोरी छः पोरी और आठ पोरियोंका धनुष वर्जितहै ॥३६॥ केषांचिच्च भवेच्चापं वित्तस्तिनवसंमित- म् ॥३७॥ अर्थ-कितनोंहीके मतमें नौ विलांधका धनुषं होताहे३७ अथ वर्जितधनुः। अति जीर्णमपकंच ज्ञाति धृष्टं तथैवच । दग्धं छिद्रं नः कर्तव्यं बाह्याभ्यंतरह- स्तकम् ॥३८॥ गुणहीनं गुणाक्रांत काण्डदोषसमन्वि- (१४) धनुर्वेदसंहिता। तम्। गलग्रन्थि न कर्तव्यं तलमध्ये तथैवच ॥ ३९॥ अर्थ-वर्जित धनुषको न धारणकरै, बहुत पुराना कच्चा और जो जातिके बाँसका न हो जलाहुवा और छेदवाला बीघाहुआ और जिसके बैंचनेसे हाथ वाहर चलाजाय अथवा भीतर रहजाय, गुणरहित और गुणसे ढका हुआ अर्थात् बहुत मोटी चौड़ी गुणसे ढकाहुआ. कांडदोषके साथ अर्थात् अच्छे स्थानम उत्पन्न हुए बाँसका न हो जिसके गलमें गाँठ हो और वैसेही जिसके तलेमें गाँठ हो ऐसा धनुष वर्जित है ॥३८॥३९॥ अपकं भङ्गमायाति यतिजीर्णं तुक- कैशम् । ज्ञातिधृष्टं तु सोगं कलहो बां धवैः सह ॥ ४० ॥दग्धेन दह्यते वेश्म छिद्रं युद्धविनाशनम् । बाह्ये लक्ष्यं न लभ्येत तथैवाभ्यन्तरेपि च ॥४१ हीने तु संधिते बाणे संग्रामे भङ्गकार- कम् । आक्रान्ते तु पुनः क्वापि लक्ष्यं न प्राप्यते दृढम् ॥ ४२ ॥ गलग्रन्थि तल- ग्रन्थिधनहानिकरं धनुः ॥ भिदोषैर्वि-
भाषाटीकासमेता। (१५)
निर्मुक्तं सर्व कार्य करं स्मृतम् ॥ १३ ॥
अर्थ-विनापके बाँस वा सींग, सोना, चांदी, तांबा, लोहा
इस पातआदिका धनुष टूटजाताई, इसलिये पहिले
अजमायाहुआ धनुष न हो तो भंग होजाताहै और बहुत पुरा-
ना तो कैडा होजाताहै और जातिके बाँसकान हो तो मनमें
युद्ध के समय उद्वेग करताहै, अर्थात् मनको उलटपुलट
करदेताहै, और भाइयोंके साथ लड़ाई, जलेहुए धनुषके
धारण करनेसे घर जलजाताहै, छिद्रसहितसे युद्धका
नाश होजाताहै, क्योंकि मनमें यही चिंता लगी रहतीहै कि,
कभी टूट न जाय, युद्धसमय अन्य चिंता होनेसे शीघ्र बाण
नहीं चलसकते इसलिये हारजाताहै और जिस धनुषके बाहर
हाथ चला जाय तो निशाना नहीं दीखे और वेसेही भीतर
हाथ रहजाय तोभी निशाना नहीं दीखे, यदि ओछा बाण
चढ़ावे तो संग्राममें भंगकारक है और गुणासे टकाहु हो
तो फिर दृढ निशाना नहीं लगे और गलग्रंथि तथा तलग्रंथि
ये दोनों धनुष धनकी हानि करनेवाले हैं, इन दोषोंसे रहित
धनुष सब कामोंका करनेवालाहोताहै ॥४०॥४॥४२॥४३
शाङ्ग पुनर्धनुर्दिव्यं विष्णोः परममायुधम्।
वित्तस्तिसप्तमं मानं निर्मितविश्वकर्मणा॥४४
अर्थ-फिरः विष्णुभगवानका परमदिव्य आयुध शाङ्ग-
धनुष विश्वकर्माने सात बिलांधका बनायां ॥४४॥
(१६) धनुर्वेदसंहिता न स्वर्गे न च पाताले न भूमौ कस्य- चित्करे । तदनुवंशमायाति मुक्कैकं पुरुषोतमम् ॥४५॥ अर्थ-स्वर्गमें न पातालमें न पृथ्वीपर कसाक हाथमें वह है और ना वह किसीके वशमें आताहै, एक भगवानको छोड़कर ॥ ४६॥ पौरुषेयं तु यच्छा बहुवत्सरशोभितम् । वितस्तिभिःसाईषड्भिनिमितं चार्थसा- धनम् ॥४६॥ अर्थ-एक पुरुषका जो धनुषहै वह अच्छा बहुत वर्षोंका है और छः विलांध और छः अंगुलका बनायाहुआधनुष धनका साधन अर्थात् देनेवाला है॥१६॥ प्रायोयोज्यं धनुःशाङ्ग गजारोहाश्वसा दिनाम् । रथिनां च पदातीनां वांशं चाप "प्रकीर्तितम् ॥ १७॥ अर्थ-बहुतकरके शाङ्ग धनुषहाथ के सवार और घोडों- के सवारोंको योजना करना चाहिये अर्थात् धारण करना चाहिये, आररथियों और पैदलों का बाँसका चाप धारण करना योग्य है ॥४७॥.. विश्वामित्र शृणुष्वाथ धनुर्द्रव्यत्रयं क्र भाषाटोकासमेता। (१७) मात्। लोहं श्रृंगं च काष्ठंच गदितं शंभु ना पुरा॥१८॥ अर्थ-६ विश्वामित्र ! अब धनुषके तीन द्रव्य क्रमसे सुनो, एक तो लोह दूसरा सांग तीसरा काष्ठ का धनुष श्रीमहादेवजीने कहे हैं ॥४८॥ लोहानि स्वर्णरजतताम्रकृष्णायसानि ॥ श्रृंगाणि महिषशरभरोहितानाम्।शरभोऽ ष्टपात्चतुरूर्ध्वपादो महाविषाण उष्ट्र- मितो वनस्थः काश्मीरदेशप्रसिद्धो मृगा- ख्यः॥ दारूणि चन्दनवेतसधान्वन शालशाल्मलिसाकककुभवंशांजनानाम् ४९ अर्थ-लोहका अर्थ, सोना, चांदी, तांबा और काला लोहा इस्पात, सींग भैंसका शरभ (रोहि) मृगका जिसके. आठ पैर होतेहैं चार ऊपर को चार नीचे और बड़े२ सींग होतेहैं ऊंटके समान ऊंचा होताहै वनमें रहनेवाला काश्मीर- देशमें उसको सब जानते हैं और काठ ये ग्रहण करने चंदन, वेत, धान्वन, शाल, सेमल, साक, ककुभ और वांस तथा अंजन वृक्ष इतनी वस्तुओंका धनुष बनताहै ॥१९॥ २ (१८) धनुर्वेदसंहिता। अथ गुणलक्षणानि। गुणानां लक्षणं वक्ष्ये यादृशं कारयेद्ध- णम् । पट्टसूत्रो गुणः कार्यः कनिष्ठामान- संमितः॥५०॥ धनुःप्रमाणो निःसंधिः शुद्धस्त्रिगुणतन्तुभिः । वर्तितः स्याद्गुणः लक्ष्णः सर्वकर्मसहो युधि॥ ५१ ॥ अभावे पट्टसूत्रस्य हरिणीस्नायुरिष्यते। गुणार्थमपि च ग्राह्याः स्नायवो महिषी- भवाः॥५२॥ तत्कालहतच्छागस्य तन्तु- नावा गुणा शुभा । निर्लोमतन्तुसूत्रेण कुयोंदा गुणमुत्तमम् ॥५३॥ पक्ववंशत्वचः कार्यों गुणस्तु स्थावरो दृढः । पट्टसूत्रेण सन्नद्धः सर्वकर्मसहो युधि ॥ ५४॥ प्राप्त भाद्रपदे मासि त्वगर्कस्य प्रशस्यते । तस्यास्तत्र गुणः कार्यों नवित्र स्थावरो दृढः ॥ ५५ ॥ गुणा कार्या सुमुनानां भंगस्नायवर्कवर्मिणाम्॥ अर्थ-अब गुणाके लक्षण कहतेहैं हे विश्वामित्र ! अब
भाषाटीकासमेता। (१९)
जैसी गुणाकरनी चाहिये उस गुणाके लक्षण कहते हैं रेशम
के सूतकी गुणा करनी चाहिये छोटीअंगुलीके मान मोटी
धनुषके प्रमाणके अनुमान स्वच्छ साफ किये तिहराडोरों को
बांटकर चिकनी गुणा बनाईहुई युद्धमें सब कामोंकी सहनेवाली
होती है चाहे उसको कितनी ही खेंचो टूटती नहीं यदि
रेशमका डोरा न मिले तो हिरनकी स्नायु नाडियोंकी तांत
गुणाके लिये लेले वा भैसकी आंतोंकी तांतले अथवा उसी
समय मारेहुए बकरेकी तांतकी गुणा श्रेष्ठ होतीहै, रोम
रहित तांतके सूतसे गुणा उत्तम बनतीहै, अथवा पकेहुए
वांसकी छालकी दृढ गुणा करे रेशमके सूतसे बनीहुई गुणा
युद्धमें सब काम देती है, भादोका महीना आयेपर आंककी
त्वचाभी गुणाका काम देसकतीहै, उसका वहां नथा सूत बां-
टकर गुणाकरे, और क्षत्रियोंको कपास मुंज भंग नाडीआक
आदिकी बनानी चाहिये ॥५०॥५१॥५२॥५३॥५४॥५६॥
अथ शरलक्षणानि।
अतः परं प्रवक्ष्यामि शराणां लक्षणं
शुभम् । स्थूलं न चापि मुक्ष्म च नाऽ
पक्वं न कुभूमिजम् ॥५६॥
अर्थ-अब बाणोंके लक्षण कहतेहैं इससे आगेवाणोंके
शुभलक्षण कहतेहैं ना मोटे और न पतले न कचेन खोटी
भूमिके उत्पन्न हुए सरकंडे ग्रहण करे ॥५६॥
(२०) धनुर्वेदसंहिता। हीनग्रंथिविदीर्णं च वर्जयेदीदृशं शरम् । पूर्णग्रंथिसुपक्वं च पाण्डुरं समया- हृतम् ॥ ५७॥ अर्थ-हीनगांठवाला कुवला हुआ हो तो ऐसा शर नहीं ले पूरी गांठवाला अच्छा पकाहुआ पोलेरंगका समय पर ले ॥१७॥ शरवंशा गृहीतव्याशरत्काले च गाधिज५८॥ अर्थ-गाधिके पुत्र विश्वामित्र वृश्चिकराशिके सूर्य मार्गशीर्षमें शरके वांस वाण बनानेको लेनीचाहिये ॥१८॥ कठिनं वर्तुलं काण्डं गृह्णीयात्सुप्रदेश- जम् । द्वौ हस्तौ मुष्टिहीनौ च दैर्ये स्थौल्ये कनिष्ठिका ॥ ५९॥ अर्थ-कैडे गोल अच्छे देशमें उत्पन्नहुए शर लेके एक बाण दोहाथ लंबा हो, एक मुट्ठी कम अर्थात् पांच अंगुल न्यून दो हाथ लंबा एक बाण हो और कनिष्ठा छोटो अंगु- लीसा मोटा हो ॥२९॥ विधेया शरमानेषु यत्नेष्वाकर्षयेत्ततः। अर्थ-इतने अनुमानके वाण बनावे पीछे यंत्र अर्थात् धनुषपर चढ़ावे॥ , - भाषाटीकासमेता। (२१) काकहंसशशादानां मत्स्यादक्रौंचके- किनाम् । गृध्राणां कुरराणां च पक्षा एते सुशोभनाः॥६॥ अर्थ-कव्वे, इंस, शशाद, बगुले, कौंचपक्षी, मोर गोध, टटीहरी, इनके पर बाणके बांधने श्रेष्ठ हैं ॥६॥ षडंगुलप्रमाणेन पक्षच्छेदं च कारयेत् । दशांगुलमिताः पक्षाः शाईचापस्य- मार्गणे ॥६॥ योज्या दृढाश्चतुःसंख्याः सन्नद्धाःस्नायुतन्तुभिः। अर्थ-छःअंगुलके मान परोंको काटे, और शाङ्गधनुष- पर चढ़ानेके बाणकेलिये दश अंगुलके पर चार २ प्रत्येक बाणके खडे तांतके तारोंसे बांधे ॥६॥ जैसे:- शरश्च त्रिविधो ज्ञेयः स्त्री पुमाँश्च नपुं- सकः॥२॥अग्रस्थलोभवेन्नारी पश्चात्स्थूलो भवेत्पुमान ॥समो नपुंसको ज्ञेयस्वलक्ष्यार्थे प्रशस्यते ॥ दूरपातो युक्त्या च पुरुषो भेदयेदृढम् ॥६३॥ अर्थ-तीन प्रकारके बाण जानने चाहिये स्त्री पुरुष और नपुं- सक जो आगेसे भारी हो वह स्त्रीबाण कहाताहै, और पीछे जो (२२) धनुर्वेदसंहिता। भारी हो वह पुरुष, और जो एकसार हो वह नपुंसक होता है, वह नपुंसक बाण केवल निशाना सीखने के लियेही हे और जो स्त्रीवाण. आगेसे भारी होताहै, वह दूर जाकर मारताहै, और जो पुरुष बाण होताहै वह दृढ़ अर्थात् (मजबूत) पदार्थकोभी छेददेताऔर काटदेताई ॥२॥६॥ अथ फललक्षणम् । आरामुखं क्षुरपंच गोपुच्छं चार्द्धचन्द्र- कम् ॥ सूचीमुखं च भलं च वत्सदंतं द्वि- भल्लंकम् ॥६४॥कार्णकं काकतुण्डं च तथान्यान्यप्यनेकशः। फलानि देशभेदे- न भवन्ति बहुरूपतः॥६५॥ अर्थ-अब फलके लक्षण यह हैं,आरीकेसा मुखवाला खुरपेकासा २ गऊकी पूंछके समान आकारवाला ३ आधे चांदके आकार १ रुईकेसे मुखवालावरछीकेसे मुखवाला६ बछड़ेके दांतके आकारवाला ७.दोभालवाला ८ कर्णिक फूलकी खडीसा कौवेकीचोंचके आकारवाला ये दश प्रकार आकार वाणके लोहेकी भालके होतेहैं औरभी देशभेदसे अनेक प्रकारके होतेहैं ॥६४ ॥६५॥ अथैतेषां कर्माणि। आरामुखेन चमच्छेदनम् क्षुरप्रेण बाण- पाटीकासमेता। (२३) कर्तनम् . बाहुकतनम् गोपुच्छेन लक्ष्यसाधन अर्धचन्द्रेण ग्रीवाम- स्तकधनुरादीनी छेदनम् सूचीमुखेन कवचमेदम मल्लेन हृदयभेदनम् वत्स- दन्तेन गुणा ईशम् द्विभल्लेन बाणावरोध नम् कर्णिके लोहमयबाणानां छेदनम् काकतुण्डेन वेध्यानां वेधं कुर्यात् ॥ अथैषां स्वरूपाणि। क्षुरप गोपुच्छ आरामुख अर्द्धचन्द्र .- T - । सूचीमुख वत्सदन्त द्विभल्ल A I 1
(२४) धनुर्वेदसंहिता
कर्णिक काकतुण्ड
आर
तोमर
T
प्रास दीप्तान
नतपर्व
झिल्लम टोप-शिरस्त्राण
॥
अर्थ-आरामुखसे गलछेदन, क्षुरप्रसे हाथ काटना
गोधुच्छसे निशाना मारना, अर्द्धचन्द्रसे माथा गरदन
बाण काटना, धनुष काटना, सूचीमुखसे वख्तर छेदन,
भल्लसे हृदयको फोडना, वत्सदंतसे धनुषकी गुणा काटना,
द्विभल्लो वाण रोकना, कर्णिकसे लोहेके बाण काटना,
बाकतुण्डसे वेधनके योग्योंका वेध विचारसे करें।
अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्टविनिर्मि-
तम् । मुखे च लोहकंटेन विद्धं त्र्यंगुलसं-
मितम् ॥६७॥
अर्थ-और गोपुच्छ वाण जानना शुद्ध काष्टका बनाहुवा
उसके मुखपर तीन अंगुलका लोहका कांया विधा हुवा
होताहै ॥६७॥
--
भाषाटीकासमेवा। (२६)
बाणस्य फलकंस्थाने (सेह)कंटक-
योजनादोपुच्छबाणो भवति । अनेन
शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा
कर्तव्यः॥६८॥
अर्थ-बाणके फलकस्थानमें (साई)का कांटा लगाकर
गोपुच्छ वाण होताई, इसमें निशाना और बाणफेकनेका
अभ्यास करना चाहिये ॥६८॥
अथ पायनम् ।
इषुफले शरशरवंशामूललेपनाद्ब्रह्मणोऽसा-
द्वयोभवति। तच्चिन्हमेतत् । यस्मिञ्छर-
; वंशासमूहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीत-
वर्णों भवति तस्य मूले विषमुत्पद्यते
तन्मूलं ग्राह्यं सच सर्वदा पवनाभावेपि
कम्पते इदमेव तल्लक्ष्मेति ॥ ६९॥
अर्थ-अब फलोंका पायन लिखतेहैं, बाणके फलपर
सरकंडेकी जड़के लेपसे घाव असाध्य होताहै, उसकी
पहिचान यह है कि, जिस झुंडके समूहपर स्वातिकी बूंद
पडतीहै, वह पीले रंगका होजाताहै,उसकी जड़में विष उत्पन्न
होताहै, वह जड़ लेनी चाहिये, और वह सदा पवनभी न
चलताहोतोभी कांपतारहताहै, यही उसका चिह्न है॥६९॥
(२६) धनुर्वेदसंहिता।
फलस्यपायनं वक्ष्ये दिव्यौषधिविलेपनैः
येन दुर्भेद्यवाणि भेदयेत्तरुपर्णवत् ॥७०॥
अर्थ-फलोंका पायन कहेंगे, दिव्य औषधियोंके लेपनसे,
जो किसीसेभी न कटैं ऐसे कवचोंको वृक्षके पत्तोंकी नाई
काटदेवें ॥७॥
पिप्पली सैंधवं कुष्ठं गोमूत्रे तु सुपेषयेत्।
अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रता-
पयेत् ॥ ७१ ॥ शिखिग्रीवानुवर्णाभं
तप्तपीतं तथौषधम् । ततस्तु विमलं तोयं
पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥७२॥
अर्थ-पीपल सेंधानमक कूठ इन तीनोंको गोमूत्रमें
अच्छी पीसे, फिर इससे शस्त्रको लोपे पीछे उसको
अनिमें तपावे, वह मोरकी गरदनके सहश नीला होजाय
तपानेसे औषधिको पीजाय पीछे स्वच्छ जलमें
बुझाव दे ॥७१ ॥ ७२॥
अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां वणनम् ।
सर्वलोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकी-
विताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सि
द्वयंति कस्यचित् ॥७३॥
भाषाटीकासमेता। (२७)
' अर्थ-अथ नाराच और नालीक और शतन्त्रीका वर्णन
करतेहैं,जो बाण सब लोहके होते हैं, वे नाराच कहेहैं, वे
पांच मोटेपर बांधनेसे किसीको सिद्ध होते. ॥७३॥
नालीका लघवो बाणा नलयंत्रेण नो-
दिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते
मताः॥७४॥
अर्थ-जोकि नलयंत्रसे फेंके जातेहैं,वे लघु अर्थात् छोटे२
बाण कहातेहैं, उनका नाम नालोक है, अर्थात् गोलीका
नाम नालीक बाण है, और नलयंत्र नाम बंदूकका है, सो
बहुत ऊंचे और दूर फेंकनेमें तथा गढ़युद्धमें काम
भातेहैं।७४॥
सिंहासनस्य रक्षार्थ शतघ्नीः स्थापये-
गढ़े। रंजकं बहुलं तत्र स्थाप्यंच बहुधी-
मता॥७५॥
अर्थ-तक्तकी रक्षाके लिये गढ़में तोफें स्थापनकरें, और
बहुतसी वारूद और गोले गोलीभी स्थापनकरै ॥ ७ ॥
अथ स्थानमुष्टयाकर्षणलक्षण ।
स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नक-
मणाम् । मुष्टयः पंच समाख्याता व्या-
याः पञ्च प्रकीर्तिताः॥ ७६ ॥
(२८) धनुर्वेदसंहिता।
अर्थ-इनके अनंतर स्थान मुष्टि आकर्षणके लक्षण
कहतेहैं, जुदे जुदे काममें, बाणप्रयोग करनेकेलिये, स्थान
आठ प्रकारके करने और पांचप्रकारकी मुट्ठी कहीहैं, तथा
पांच प्रकारके व्याय कहेहैं ॥ ७६ ॥
अग्रतो वामपादश्च दक्षिणे चानुकुञ्चि-
तम् ॥ प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तव्यसवि-
स्तरम् ॥ ७७॥
अर्थ-बायां पैर आगे और दाहिना पीछे सुकड़ा हुआ यह
दोहाथकी प्रत्यालीढ़गति कहातीहै । ७७ ॥
आलीढ़े तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चि-
तम् । दक्षिणन्तु पुरस्तादादूरपाते विशि-
ष्यते॥७८॥
अर्थ-आलोढ़गतिमें धनुषधारीको वायां पैर सकोडना,
और दाहनी आगे कर बाणफके तो बाण दूर जाय ॥ ७८॥
पादौ सविस्तरौ कायौँ समौ हस्तप्र-
माणतः। विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्य-
स्य वेधने ॥७९॥
अर्थ-पैरोंको विस्तारके साथ करै एक हाथके प्रमाण,
उसका नाम विशाख गति है कूटलक्ष्यके वेधनमें इसका
उपयोग होताहै ॥७९॥
भाषाटीकासमेता। (२९)
समपादैःसमौ पादौ निष्कम्पौ च सुसंग-
तौ। असमे च पुरो वामे हस्तमात्रणतं
वपुः॥८॥
अर्थ-समपादोंसे बराबर दोनों पैर विनाहि लिये खड़ा हो
बाण फेंके, और असमगतिमें आगे वायां पैर एक हाथ
आगे रहै और शरीर झुकाहुवा ॥८॥
आकुंचितोरू द्रौ यत्र जानुभ्यां धरणी
गतौ । द१रक्रममित्याहुः स्थानकं दृदभे-
दने ॥ ८१ ॥
अर्थ-जहां दोनो उरू सकोड कर जानुओंको धरतीपर
टेके, वह द१रक्रम कहाहै, दृढस्थानको भेदनकरनेके-
लिये ॥ ८१ ॥
सव्यं जानु गतं भूमौ दक्षिणं च सुकुञ्चितम् ।
अग्रतो यत्र दातव्यं तं विद्याद्गरुड़क
मम् ॥ ८२॥
अर्थ-बायां तो पृथिवीपर हो और दाहनां सुकड़ा हुवा
हो, आगेसे जो दे उसको गरुड़क्रम जानना ।। ८२॥
पद्मासनं प्रसिद्धन्तु उपविश्य यथाक्र-
मम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानकं शुभ-
लक्षणम् ॥ ८३॥
(३०) धनुर्वेदसंहिता। अर्थ-पद्मासन प्रसिद्ध है, इसका जैसाक्रम हे वैसे बैठकर वाण मारे, धनुषधारीको जानना चाहिये, यह शुभलक्षण- वाला स्थानक है ॥८३॥ अथ गुणमुष्टयः। पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथा- क्रमम् ॥ ८४॥ अर्थ-अब गुणाकी मुष्टि कहतेहैं,पताका,वज्रमुष्टि,सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी ये पांच प्रकार गुणाके हैं ॥ ८४॥ दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रितोऽङ्गुष्ठमूल- कम् । पताका सा च विज्ञेया नलिका- दूरमोक्षणे ॥८५॥ अर्थ-जहां तर्जनी दीर्घ कीजाय और अंगठेकी जड़के पास हो, वह पताका जाननी इससे नालकानाम वाण जिसमें रंजक और लोहकण भरेहों, उसके छोड़नेके लिये है ॥ ८५ ॥ तर्जनीमध्यमामध्यमंगुष्ठो विशते यदि। , विशाख-समैपाद-असमेंपाद-दर्दुरक्रम-गरुडम-शुभल क्षण इनका चित्र पृथक् ह वहां देखलो.
भाषाटीकासमेता। (३१) वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थूले नाराच- मोक्षणे ॥८६॥ अर्थ-तर्जनी और मध्यमाके बीचमें यदि अंगूठा प्रवेश हो, वह वज्रमुष्टि जाननी, मोटा लोहका बाण छोड़ने- केलिये इसका उपयोग करना ॥ ८६॥ अंगुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं सुसंस्थि- तम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढ़लक्ष्यस्य वेधने ॥ ८॥ अर्थ-अँगूठेके बीचमें तर्जनीका अग्र रक्खे, वह सिंहकर्ण जानना दृढ़ लक्ष्यके वेधनेमें वह उपयोगी है।। ८७॥ अंगुष्टनखमूले तु तर्जन्यग्रंच संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥ ८८॥ अर्थ-अँगूठेके नखकी जड़में तर्जनीका अग्रभाग धरै, वह मत्सरी जाननी चित्रकारीके निशानेके वेधनेमें यह उपयोगी है ॥ ८८॥ अंगुष्ठाग्रे तु तजन्या मुखं यत्र निवे- शितम् । काकतुंडी च सा ज्ञेया सूक्ष्म- लक्ष्ये सुयोजिता ॥ ८९॥ अर्थ-जहाँ तर्जनीका मुख अँगूठेके आगे निवेशित (३२) धनुर्वेदसंहिता। कियाहो, वह काकतुण्डी जानना सूक्ष्म लक्ष्यमें यह मुद्रा करनी॥ ८९॥ अथ धनुर्मुष्टिसंधानम् । संधानं त्रिविधं प्रोक्तमधऊव समं सदा। योजयेत्रिप्रकारं हि कार्येष्वपि यथाक्र- मम् ॥ ९॥ अर्थ-अब धनुषको मुष्टीका प्रकार कहतेहैं, संधान तीन प्रकारका कहाह, अधःसंधान १ उर्वसंधान २ और समसंधान ३॥ ऊपर १ नीचे २ वरावर ३ इनको जैसा कार्य हो उसमें यथाक्रमसे ३ तीन प्रकारसे योजना करै ॥९॥ अधश्च दूरपातित्वे समे लक्ष्ये सुनिश्चले। दृढास्फोटं प्रकुर्वांत ऊर्वसंधानयो- गतः॥ ९१ ॥ अर्थ-दूर वाण फेकनेको अधःसंधान करना जो अचल वस्तु हो उस पर सम संधान करना, और वस्तुके तोड़ने- के लिये उर्वसंधान करना ॥९॥ अथ व्यायाः। कैशिकः केशमूले वै शरभुंगे च सात्वि- कः । श्रवणे वत्सकर्णश्च ग्रीवायां भाषाटीकासमेता। • (३३) भरतो भवेत् ॥९२॥ अंसके स्कंधनामा च व्यायाः पंच प्रकीर्तिताः॥ अर्थ-केशोंकी जड़में कैशिक और सात्विकशर शृंगतक और वत्सकर्ण कानतक, ग्रीवातक भरत और स्कन्धनाम व्याय कंधेतक, ये पांच व्याय अर्थात् बाणके बैंचनेके प्रकार कहेहैं ॥ ९२॥ कैशिकश्चित्रयुद्धेषुह्यधोलक्ष्येषु सात्विकः। वत्सकर्णः सदाज्ञेयो भरतो गूढभेदने ॥१३॥ दृढभेदे च दूरे चस्कंधनामानमुद्दिशेत्॥ अर्थ-कैशिक चित्रयुद्धमें और अघोलक्षोंमें सात्विक तथा वत्सकर्ण सदा जानना और गूढभेदमें भरत और हदभेदमें तथा दूर बाण फेंकनेको स्कंधनाम व्याय कहाहै ॥ ९३॥ अथलक्ष्यम्। लक्ष्यं चतुर्विधं ज्ञेयं स्थिरं चैव चलं तथा। चलाचलं द्रयचलं वेधनीयंक्रमेण तु ॥९॥ अर्थ-अब निशाना कहते हैं,चार प्रकारकालक्ष्य जानना एक स्थिर, दूसरा चल, तीसरा चलाचल, चौथा द्ववचल इनको क्रमसे वेधना चाहिये ॥ ९४॥ आत्मानं सुस्थिरं कृत्वा लक्ष्यं चैव 1.
(३४) . धनुर्वेदसंहिता। स्थिरं बुधः । वेधयेत्रिप्रकारं तु स्थिर- वेधी स उच्यते ॥ ९५॥ अर्थ-बुद्धिमान अपनेको स्थिर करके तीनों प्रकारके संधानोंसे लक्ष्यको वेधे वह स्थिरवेधी कहता है, तीन प्रकार पहिले कहचुके हैं ॥ ९५॥ चलन्तु वेधयेद्यस्तु आत्मस्थानेषु संस्थि- तः।चलंलक्ष्यंतु तत्प्रोक्तमाचार्येण शिवे- नवै॥९६॥ अर्थ-चलते हुएको जो अपने स्थानपर बैठाहुआ वेधे उसको युद्धके आचार्य शिवजी महाराज चललक्ष्य कहते हैं ॥९६॥ धन्वीतु चलते यत्र स्थिरलक्ष्ये समा हितः । चलाऽचलं भवेत्तच्च ह्यप्रेमयम चितितम्॥९७॥ अर्थ-जहाँधनुषधारी तो स्थिर लक्ष्यपर सावधानहोकर चलता है, उसका नाम चलाचलहै, जोचिंतनमें नहीं आताहै यह अत्यंत उत्तम लक्ष्य है॥९७॥ उभावेव चलौ यत्र लक्ष्यं चापिधनुर्द्धरः॥ तद्विज्ञेयं द्वयचलं श्रमेण बहुसाध्यते॥९८॥ अर्थ-जहाँ धनुषधारी और लक्ष्य दोनों चलतेहों,
भाषाटीकासमेता।
(३६)
उसको द्वयचल जानों, वह बड़ी मेहनतसे सिद्ध
होताहै ॥ ९८॥
श्रमेणास्खलितं लक्ष्यं दुरं च बहुभेदनम् ।
श्रमेणास्खलिता कृष्टिः शीघ्रसंधान
माप्यते ॥ ९९॥
अर्थ-श्रमसे छोडाहुआ निशाना, और बहुत दूरका
भेदन और श्रमसे मर्यादाके साथ खिंचाहुआ बाण शीघ्रसं-
धानको प्राप्त होताहै ॥ ९९॥
श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते
जयः। तस्माद्गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यों
विजानता ॥ १०॥
अर्थ-श्रमसे चित्रयोधा होताहै और श्रमसेही जय
प्राप्त होताहै इससे जाननेवालेको गुरुके सामनेही परिश्रम
करना चाहिये ।। १००॥
प्रथमं वामहस्तेन यः श्रमं कुरुते नरः।
तस्य चापक्रियासिद्धिरचिरादेव जाय
ते॥१॥.
अर्थ-पहले बाँयहाथसे जो मनुष्य श्रम करे, उसको
बनुषकी क्रियासिद्धि शीघ्रही होजातीहै ॥३॥
(३६) धनुर्वेदसंहिता। वामहस्ते सुसंसिद्धे पश्चादक्षिणमारभेत् । उभाभ्यां च श्रमं कुर्यान्नाराचैश्च शरै- स्तथा ॥२॥ अर्थ-चाँयाँ हाथ सिद्ध हुए पीछे दाहिनेसे आरंभ करें फिर दोनोंसे नाराच और बाणोंसे श्रमकरे ॥२॥ वामेनैव श्रमं कुर्यात्सुसिद्धे दक्षिणे करे । विशाखेनासमेनैव रथी व्याये च कैशि- के ॥३॥ अर्थ-जब दाहिना हाथ सिद्ध होजाय तव बायसेही श्रम करे, विशाखगति और असमपादगतिसे रथी कैशिक नाम व्यायसे ॥३॥ उदिते भास्करे लक्ष्यं पश्चिमायां निवे- शयेत्। अपराहेच कर्तव्य लक्ष्य पूर्वदि- गाश्रितम् ॥४॥ अर्थ-सूर्यके उदयसे दोपहर तक पश्चिमदिशामें निशा- ना करें और अपराह्न अर्थात् दोपहर टलेपीछे पूर्व दिशामें लक्ष्यसाधन करै॥४॥ उत्तरेण सदा कार्यमवश्यमवरोधि- भाषाटीकासमेता। (३७) कम् । संग्रामेण विना कार्य न लक्ष्य दक्षिणामुखम् ॥५॥ अर्थ-उत्तर दिशाको सदा अवश्यही अवरोधसे निशाना करना चाहिये, परन्तु संग्रामके विना दक्षिणके सामने मुख करके निशाना कभी न लगावे सिद्धान्त यह हुवा कि, सूर्य सदा पीठ पीछे वा दाहिनी ओर हो॥६॥ षष्टिधन्वंतरे लक्ष्यं ज्येष्ठं लक्ष्यं प्रकीर्ति- तम् । चत्वारिंशन्मध्यमंच विंशतिश्च कनिष्टकम् ॥६॥ अर्थ-६०साठ वाण धनुषके लिये रक्खें, वह श्रेष्ठ निशा- ना कहाताहै.४० चालीस बाणोंसे मध्यम और २० वीस वाणोंसे कनिष्ठ लक्ष्य कहाताहै ॥६॥ शरोंका यह प्रमाण कहदिया अब नाराचोंका कहतेहैं। चत्वारिंशच त्रिच्चश षोडशव भवेत्ततः॥७॥ अर्थ- चालीस तीस और पीछे सोला नाराचोंका अर्थात् समस्त लोहमयबाणोंका रखनेवाला क्रमसे उत्तम मध्यम कनिष्ट कहाता है॥७॥ चतुःशतैश्च काण्डानां योहि लक्ष्यं विस- (३८) धनुर्वेदसंहिता। जयेत् । सूर्योदये चास्तमाने स ज्येष्ठो धान्विनां भवेत् ॥८॥ अर्थ-सूर्यके उदयमें और अस्तमें चारसौ वाणोंका जो लक्ष्य छोड़े वह धनुषधारियोंमें बडाहोताहै ॥ ८॥ त्रिशतैर्मध्यमश्चैव द्विशताभ्यां कनि- ष्ठकः । लक्ष्यं च पुरुषोन्मानं कुर्याच्चन्द्र- कसंयुतम् ॥९॥ अर्थ--तीनसोसे मध्यम और दोसौसे कनिष्ठ इतना उन्मान मनुष्यका है, यह निशाना चन्द्रकके संयुत करै अर्थात चांदमारीसे करे॥९॥ उर्ध्वभेदी भवेज्ज्यष्टो नाभिभेदी च मध्यमः पादभेदी तु लक्ष्यस्य स कनिष्ठो मतो भृगो॥ ११०॥ अर्थ-दे परशुराम ऊर्यभेदी तो ज्येष्ट कहाताई और जो बीचमें वेधकरै, वह मध्यम, और निशानेका पादवेधी जो हो वह कनिष्ट कहाताहै ॥ ११०॥ अथाऽनध्यायः। अष्टमी चं ह्यमावास्या वर्जनीया चतु- भाषाटीकासमेता। (३९) दशी। पूर्णिमाईदिनं यावनिषिद्धं सर्व कर्मसु ॥११॥ अर्थ-अब अनध्यायोंका वर्णन करते हैं, अष्टमी और अमावस और चौदस ये तिथि वर्जित हैं, पूरणवासी आधे दिनतक सब कामोंमें निषेध की है ॥ ११ ॥ अकाले गर्जिते देवे दुर्दिनंचाथवा भवेत् पूर्वकांडहतं लक्ष्यमनध्यायेप्रचक्षते॥१२॥ अर्थ-विना समय बादल गर्ने वा बादलोंसे छाया हुआ आकाश हो, पहलाही बाण लक्ष्यपर न लगे तो धतुर्वेद विद्याका अनध्याय होता है ॥ १२॥ अनुराधक्षमारभ्य षोडशः दिवाकरः। यावच्चरति तं कालमकालं हि प्रचक्षते॥१३॥ अर्थ-अनुराधानक्षत्रसे आरंभ होकर सोलह नक्षत्रोंपर सूर्य इतने रहै, उस समयको असमय कहते हैं अर्थात् वृश्चिक राशिके सूर्यसे लेकर मार्गशीर्षके महीने ज्येष्ठतक धनुषका अभ्यास न करै, केवल आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, और आश्विन, कार्तिक इन पांचमासोंमेंही अभ्यास और पठनपाठन करै ॥ १३॥ अरुणोदयवेलायां वारिदो यदि गर्जति । वहिने स्यादनध्यायस्तमकालं प्रचक्षते॥१४
(४०) धनुर्वेदसंहिता।
अर्थ-जिससमय प्रातःकाल लाल बादल होसूर्य उदय
होते समय यदि बादल गजै, उस दिन अनध्याय होताहै
उसको असमय कहते हैं ॥१४॥
श्रमं च कुर्वतस्तत्रभुजंगो दृश्यते यदि।
अथवा भज्यते
चापं यदैव श्रम-
कर्मणि ॥ १५॥ त्रुट्यते वा गुणो यत्र
प्रथमे बाणमोक्षणे । श्रमं तत्र न कुर्वीत
शस्त्रे मतिमतां वरः ॥ १६॥
अर्थ-धनुष-अभ्यास करनेके आरम्भमें जो सर्प दीखै
अथवा धनुष टूटजाय और पहिलेही वाण छोडते समय
गुणा टूटजाय तो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ धनुर्द्धरको विचार
करना चाहिये कि, वह धनुषका वा किसी शास्त्रका भी
अभ्यास न करै ॥ १५॥१६॥
अथ श्रमक्रिया।
क्रियाकलापान्वक्ष्यामि श्रमसाध्याञ्छु-
चिष्मताम् ॥ येषां विज्ञानमात्रेण सिद्धि-
भवति नान्यथा ॥१७॥
अर्थ-अब श्रम क्रिया कहते हैं, पवित्रपुरुषोंके लिये
धनुषकी क्रिया कहते हैं, जो परिश्रमसे सिद्ध होसक्तीहै,
जिनके जाननेमात्रसेही सिद्ध होजातीहै यह अन्यथा
नहीं है।॥ १७॥
भाषाटीकासमेता। (४१)
प्रथमंचापमारोप्य चूलिकांवधयेत्ततः।
स्थानकं तु ततः कृत्वा बाणोपरिकर
न्यसेत् ॥१८॥
अर्थ-प्रथम धनुषको आरोपण करके पीछे चूलिको
बांधे, तत्पश्चात् स्थानक करके बाणपर हाथ
रक्खे ॥१८॥
तोलनं धनुषश्चैव कर्तव्यं वामपाणिना ।
आदानं च ततः कृत्वा संधानं च ततः
परम् ॥१९॥
अर्थ-धनुषका तोलन बाँये हाथसे करना चाहिये,
बोझ तोलकर पीछे उठावे, उसके उपरान्त बाण संधान
करै॥१९॥
सकृदाकृष्टचापेन भूमिवेधं न कारयेत्।
नमस्कुच्चि मां विनराज गुरुधनुः
शरान् ॥२०॥
अर्थ-पहले चढ़ाये धनुषसे धरतीका वेध न करे और
हे विश्वामित्र! शिवजी महाराज कहते हैं कि गणेशजीको और
मुझको गुरुको धनुषको वाणोंको नमस्कार करै ॥२०॥
*-
(४२)
धनुर्वेदसंहिता।
याचितव्या गुरोराज्ञा बाणस्याकर्षणं
प्रति। प्राणवायुं प्रयत्नेन प्राणेन सह
पूरयेत् ॥२१॥ कुमकेन स्थिरं कृत्वा
हुङ्कारेण विसर्जयेत् । इत्यभ्यासक्रिया
कार्यां धन्विना सिद्धि मिच्छता॥ २२
अर्थ-फिर गुरुसे वाण बचनेकीआज्ञा मांगे, प्राणवायु
को जतनसे प्राणके साथ पूरक करे, पीछे कुम्भकसे वायु-
को स्थिरकर हुंकारसे रेचक करै, सिद्धि चाहनेवाले धनुष-
धारीको यदि सिद्धिचाहै तो इस अभ्यासकी क्रिया करनी
चाहिये ॥२१॥२२॥
षण्मासात्सिध्यते मुष्टिः शराःसंवत्सरेण
तु। नाराचास्तस्य सिध्यंति यस्य तुष्टो
महेश्वरः॥ २३॥
अर्थ-छमहीने में मुट्ठी सिद्ध होतीहै और वाण एक व-
में सिद्ध होतेहैं, नाराच उसके सिद्ध होते हैं, जिसपर श्रीम-
हादेवजी प्रसन्नहों ॥२३॥
पुष्पवद्धारयेद्वाणं सर्पवत्पीडयेनुः ।
धनवञ्चितयलक्ष्यं यदीच्छेत्सिद्धि मा
त्मनः॥२४॥
भाषाटीकासमेता। (४३) अर्थ-यदि अपनी सिद्धिचाहै तो फूलकी नाई बाण धारण करे, साँपकीनाई धनुषको पीडनकरे, धनकी- नाई लक्ष्यको चिंतनकरै॥२४॥ क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः । राजानो दृढ़मिच्छन्ति लक्ष्य- मिच्छंति चेतरे॥२५॥ अर्थ-आचार्य तो क्रियाकी इच्छा करतेहैं और भृगुवंशी दूर बाणजाके पड़े यह इच्छा करते हैं, राजा अंग दृढ़ वस्तु कटजाय ऐसी इच्छा करतेहैं और लोग लक्ष्य (निशाना) अच्छा लगे, इसकी इच्छा करतेहैं ॥२६॥ जनानां रंजनं येन लक्ष्यपातात्प्रजायते। हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवे- धनम् ॥ २६॥ अर्थ-जिस लक्ष्यके मारनेसे मनुष्योंका चित प्रसन्तहो, तिससे छोटे बाणसेभी लक्ष्यका वींधना अच्छाहै छोटे बाणसे निशाना अच्छा विधताहै यह बात सिद्ध हुई ॥२६॥ . अथ लक्ष्यास्खलन विधिः। विशाखस्थानकं हित्वा समसंधान मा- चरेत् । गोपुच्छमुखबाणेन सिंहकर्णेन मुष्टिना ॥ २७॥ आकर्षेत्कौशिकव्याये -- - (४४) धनुर्वेदसंहिता। न शिखाश्चालयेत्ततः । पूर्वापरौ सम कार्यों समासौ निश्चलौ करौ ॥२८॥ चक्षुषी स्पंदयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् मुष्टिनाच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥ २९॥ मनो दृष्टिगतंकृत्वा ततःकाण्डं विसर्जयेत्॥स्खलत्येव कदा- चिन्न लक्ष्ये योधो जितश्रमः॥३०॥ अर्थ-अब निशान न चूकनेकी विधि,विशाखस्थानको छोड़कर समसंधान करें, समसंधानके लक्षण पहिले कह आयेहैं, गोपुच्छमुख वाणसे और सिंहकर्ण मुष्टिसे, कौशिकव्यायसे खेंचे और शिखाकोभी न चलावे, पूर्व और पर समान करे, दोनों कंधे बराबर करे और दोनों हाथोंको हिलाने नदे,आँखोंको किंचित्भी न चलावे निगाह- को निशानेपर जोड़े, मुट्ठीसे लक्ष्यको ढककर वाणके आगे करै, मनको दृष्टि से करके अर्थात् जहाँ निशानेपर दृष्टिको वहांही मनदेकर पीछे वाण छोडै, इस विधिसे जितश्रम योधा कभीभी निशानेसे नहीं चूकताहै, क्योंकि उसने श्रमसे लक्ष्यको जीतलियाहै ॥२७॥२८॥२९॥३०॥ अथ शीघ्रसंधानम् । आदानं चैव तूणीरात्संधानं कर्षणं तथा। क्षेपणं च त्वरायुक्तो बाणस्य कुरुते भाषाटीकासमेताः। (१५) तुयः ॥ ३१ ॥ नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसंधानता भवेत् । अर्थ-अब शीघ्र संधान कहतेहैं, जो पुरुष माथेमेसे बाण लेकर संधान करके कर्षण करे, फिर जल्दीही क्षेपणकरै वह ऐसे नित्यके अभ्याससे शीघ्र संधानता हो- जातीहै॥ अथ दूरपावित्वम्। मुष्टयापताकया बाणं स्त्रीचिह्न दूरपावनम् । अर्थ-पताका नाम मुष्टिसे स्त्रीचिह्नवाले वाणको फेंके तो दूरपडे ॥३२॥ अथ दढभेदिता। प्रत्यालीटे कृते स्थाने ह्यधः संधान- माचरेत् । द१रस्थानमास्थाय ावधारण- माचरेत् ॥ ३३ ॥ स्कंधव्यायेन वज्रस्य ट्यापुंमागंणेनच । अत्यन्तसौष्ठवावा- होर्जायते दृढभेदिता ॥ ३४॥ अर्थ-- प्रत्यालीढस्थान किये पीछे अधःसंधान करै और दर्दुर स्थानसे स्थित होकर ऊर्ध्वसंधान करै स्कंध- व्यायसे वज्रमुष्टि और पुरुष बाणसमसंधान करै, ऐसा कर
(१६) धनुर्वेदसंहिता।
नेसे बहुत अच्छी दृढ भेदिता हाथोंसेही वाणोंकी होजाती
॥३३॥३४॥
अथहीनगतयः।
सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृती-
यका॥शराणां गतयस्तिस्रः प्रशस्ताः
कथिता बुधैः ३५॥
अर्थ-अब हीन मतियोंका वर्णन करतेहैं । सूचीमुख १
मीनपुच्छ २ तीसरीभ्रमरी ३ ये बाणोंकी तीन चाल श्रेष्ठ
कहीहैं ॥३५॥
सूची मुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजा
पते । पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीन
पत्रकम् ३६॥
अर्थ-जिस वाणके पर देखेहों, अर्थात् परवाला हो, अथ-
वा पररहित हो, उस बाणकी सूचीमुख चाल होजातीहै ॥३६॥
कर्करीतन्तु चापेनयैः कृष्टो हीनमुष्टिना ।
मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य
प्रकीर्तिता ॥ ३७॥
अर्थ-जिस बाणको कठिन धनुष और पूर्वोक्त हीन
मुष्टिसे बैंचाजाय उसकी मत्स्य पुच्छा गति श्रीमहादेवजी
महाराजने कहीहै ॥३७॥
. भाषाटीकासमेता (४७) भ्रमरी कथिता ोषा शिवेन श्रमकर्मणि। ऋजुत्वेन विना याति क्षेप्यमाणस्तु साय- कः॥ ३८॥ अर्थ-फेंका हुआ जो वाण सीधापनके विनाही जाय, इसको शिवजी महाराजने श्रमकर्ममें भ्रमरी कहाहै पूर्वोक्त तिर्यग्गत लक्ष्य वेधनके लिये श्रेष्ठ हैं ॥ ३८॥ अथ बाणानां लक्ष्यस्खलन गतयः। वामगा दक्षिणा चैव ऊर्ध्वगाऽधोगमा तथा। चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलन हेतवः ॥३९॥ अर्थ-बाईओर जानेवाली, दाहिनीओर जानेवाली, ऊपर को और वैसेही नीचेको गति होजाय, ये चार गति श्रीमहा- देवजीने बाणोंके स्खलनके कारण कहीहैं ॥ ३९॥ अथैतासां क्रमेणोदाहरणानि ॥ कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्यतु पृष्ठतः॥ संमुखी स्यादनुर्मुष्टिस्तदा वामे गति- भवेत्॥४०॥ अर्थ-गुणाकी मुष्टि जो कि बाणकी पीठपरसे काँपे, और धनुषकी मुष्टि सामने होय तब बाण सीधा जाके (४८) धनुर्वेदसंहिता। नहींलगे, किंतु बांई ओरको उसकी चालहोजातीहै, इसलि- ये गुणाकी मुष्टिको काँपने न देवे॥४०॥ ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जि- तम् । पार्श्वतु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः॥११॥ अर्थ-जिस वाणका पकड़ना दीलाहो और सीधापन से भी रहित हो वह दाहिनी ओर चलाजाताहै, इसमें संदेह नहीं॥४१॥ ऊर्ध्वं भवेचापमुष्टिगुणमुष्टिरधो भवेत्। समुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्वयातिनसंश- यः॥४२॥ अर्थ--धनुषकी मुट्ठी ऊपर को हो और गुणाकी मुष्टि निशानसे नीचे को हो तोवह शर लक्ष्यवेधको छोड़कर ऊपर को चलाजाता है इसमें कुछ संशय नहीं ॥४२॥ मोक्षणे चैव बाणस्य चापेमुष्टिरधो भवेत् । गुणमुष्टिर्भवेदून तदाधोगामिनी गतिः॥४३॥ अर्थ-पाणके छोड़नेपर धनुषकी मुष्टि यदि निशानेसे नीचे हो और गुणाकी मुष्टि ऊपर हो, तब बाणकी गति भाषाटीकासमेता। (१९) नीचेको होजातीहै. सिद्धांत यह है कि, चापमुष्टि और गुणामुष्टिसे लक्ष्यको ढकलेना चाहिये तब लक्ष्यभेद होताहे अन्यथा नहीं होता ॥४३॥ अथ शुद्धगतयः। लक्ष्यवाणाग्रदृष्टीनां संगतिस्तु यदा भवेत् । तदानीं मुंचितो बाणोलक्ष्यान- स्खलति ध्रुवम् ॥४४॥ अर्थ-अब शुद्ध गतिका वर्णन ऐसा है कि, लक्ष्य और बाणका अग्रभाग तथा ये तीनों एकही होजाय, तब छोड़ाहुआवाण निशानेसे नहीं चूकता॥१४॥ निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्रयोज्झि- तः। भिनत्ति दृढवेध्यानिसायको नास्ति संशयः॥४५॥ अर्थ-दोषरहित और शब्दसे हीन गुणा और धनुष इनकी समान मुष्टिसे छोड़ाहुआ वाण कठिन वस्तुओंको विदारण करदेताहै, इसमें संदेह नहीं ॥४६॥ स्वाकृष्टस्ते जितो. यश्च सुशुद्धो गाढ- मुष्टितः । नरनागाश्व कायेषु न तिष्ठति स मार्गणः॥४६॥ अर्थ-मुंदर बैंचाहुना तेज कियाहुआ जो अच्छा -- - -- +- (4.) धनुर्वेदसंहिताः। स्वच्छ पक्ष आदि बँधाहो वह बाण गाढ़ी मुष्टिसे छोड़ाहुआ, मनुष्य हाथी घोडोंके शरीरोंमें नहीं ठहरता अर्थात् पार होजाताहै ॥१६॥ यस्य तृणसमा. बाणा यस्येधनसमं धनुः । यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः॥४७॥ अर्थ-जिसके तृणकेसमान बाण, और जिसके ईंधनके तुल्य धनुष और प्राणके समान मौर्वी (प्रत्यंचा) हो वह धनुषधारी धनुषधारियोंमें श्रेष्ठ है ॥४७॥ अथ दृढं चतुष्कम् । अयश्चर्मघटश्चैव मृत्पिडश्च चतुष्टयम् । योभनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदार्यते॥४८॥ अर्थ-अब दृढ़ चतुष्क कहतेहैं, लोह, चमड़ा, बड़ा, मिट्टीके पिण्ड, इन चारोंको जो बाण भेदनकर, उसका बाण : वज्रसेभील कटे॥१८॥ “सा ङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयत्। तानिमित्त्वैकबाणेन हृदयाती भवेन्नरः ॥ अर्थ-डेढ अंगुलके मान चौड़े लोहे पत्र करावे, उनको एक बाणसे जो वेध दे वह दृढ़पाती मनुष्य होताहै" ॥ चतुर्विंशतिचाणि यो भिनत्तीषुणा .
भाषाटीकासमेता। (५१) नरः। तस्य बाणो गजेन्द्रस्य कायं निर्भिद्य गच्छति॥४९॥ अर्थ-जो मनुष्य एक बाणसे २४ चौवीस चमडोंको वीधदे, उसका बाण बडे भारी हाथी के शरीरको भी भेदनकर चला जायगा ॥१९॥ भ्राम्यं जले घटो वेध्यश्चक्रेमपिंडकं तथा ।। भ्रमंतंवेधयेयो हिदभेदी स उच्यते॥५०॥ अर्थ-जलमें घुमाकर घड़ा वांधना चाहिये, और वैसेही कुम्हारके चाकके मट्टीके घूमतेहुए पिण्डेको, जो भ्रमण करतीहुई वस्तुको वेधे वह दृढ़भेदी कहाताहै ॥५०॥ अयस्तु काकतुण्डेन चर्म चारामुखेन हि । मृत्पिण्डं च घटं चैव विध्येत्सूची- मुखेन वै ॥५१॥ लोहेकी वस्तुको काकतुण्डसे, ढालको आरामुखसे, और मट्टीकेडलेको और घडेको सूचीमुख बाणसे वेधे ॥५॥ अथ चित्रविधिः। बाणभंगकरावर्तकाष्ठच्छेदनमेव च । बिंदुकं गोलकयुगं यो वेत्तिस जयी भवे- त् ॥५२॥....
(५२) धनुर्वेदसंहिता। बाणके तोड़नेकी विधि और काष्ठच्छेदन, तथा विंदी (चांदमारी)और दो गोलोंको जोवीधना जाने वह परसेनाको जितनेवाला होताहै ॥ १२॥ लक्ष्यस्थाने धृतं काण्ड सन्मुखं छेदये- ततः ॥ किंचिन्मुष्टिं विधाय स्वां ति- यग्विफलकेषुणा ॥ ५३ ॥ सन्मुखं बाणमायान्तं तिर्यग्बाणं न संचरेत् । प्राप्तं शरेण यश्छिद्याद्वाणच्छेदीसउ- च्यते ॥५४॥ निशानके स्थानमें धारण कियेहये वाणको सामने आते २ ही मार्ग में काट दे, कुछ अपनी मुष्टिको करके तिरछा हो, दोफलवाले बाणसे वा अर्धचन्द्रसे शत्रुके शिरको मध्यसे काटदे, सामने आते हुये बाणको तिरछा वाण न चलावे, किंतु आप तिरछा होजाय बाणसे बाणको जो काटदे, वह बाण छेदी कहाता है ॥५३॥५४॥ अब काष्ठच्छेदनम्। काष्ठे श्वकेशं संयम्य तत्र वध्वा वराटि काम् । हस्तेन भ्राम्यमाणं च यो हन्ति स धनुर्धरः॥५५॥ लक्ष्यस्थाने न्यसे- काष्ठं साई गोपुच्छसन्निभम् । यश्छि- भाषाटीकासमेता। (५३) द्यात्तत्क्षुरप्रेणकाष्ठच्छेदी सजायते ॥५६ ॥ अर्थ-अब काष्ठ छेदनको कहतेहैं, लकडीको घोडेका बाल बांधकर उसमें कौडी बांधकर भ्रमतीहुईको जो मारदे वह धनुषधारी है, निशानेकी जगह गीली लकडीको काली करके रक्खे, जो उसको क्षुरप्रवाणसे छेदन करदे वह सबकाष्ठोंको काटदेगा और ( काष्ठच्छेदी ) की पदवी मिलेगी।। ५५॥५६॥ लक्ष्ये बिंदुं न्यसेच्छुभ्रंशुभ्रबंधूकपुष्पवत् । हन्तितंबिन्दुकं यस्तु चित्रयोधास उच्यते५॥ अर्थ--लक्ष्यकी जगह सपेद बिंदी शुक्लकुन्दके फूलकी सदृश रक्खे उस विन्दुको जो वेधदे वह (चित्रयोधा) कह ताह ॥१७॥ काष्ठगोलयुगं - क्षिप्रं दूरमूर्व पुरा स्थितैः। असम्प्राप्तं शरं पृष्ठे तदोपुच्छ- मुखेन हि ॥५८॥ यो हन्ति शरयुग्मेन शीघ्रसंधानयोगतः॥ स स्यादनुभृतां श्रेष्ठः पूजितः सर्वपार्थिवैः ॥ ५९॥ अर्थ-दो काष्ठके गोलोंको शीघ्रतासे ऊपरको आकाशमें फेंकदे वे दोनों धरतीपर गिरने न पावे उनकी पीठको गोपुच्छमुखसे वेध देदो बाणोंसे शीघ्रसंधान के योगसे धनुर्वेदसंहिता वह धनुषधारियोंमें श्रेष्ठ है और सब- राजाओंसे पूजित है, अर्थात् सब राजाओंको उसका सत्कार करना चाहिये॥१८॥१९॥ अथ धावल्लक्ष्यम्। रथस्थेन गजस्थेन हयस्थेन च पत्तिना। धावता वै श्रमः कार्यो लक्ष्यं हन्तुंसनि- श्चितम् ॥६॥ अर्थ-रथी वागजी अथवा सवार वा पैदलको भागतेहुए परलक्ष्य मारनेका श्रम करना चाहिये ॥६॥ अथ विधिः। वामादायावियल्लक्ष्यं दक्षिणहिप्रधावति। तच्छिद्याच्चापमाकृष्य सव्येनैव च पाणिना ॥ ६१ ॥ तथैव दक्षिणायान्तु विध्यद्वाणानुर्धरः॥आलीढक्रममारोप्य त्वराहन्याच्च तं नरः॥६२ ॥ वायोरपि बलं दृष्ट्वा वामदक्षिणवाहतः। लक्ष्यं स साधयेदेवं गाधिपुत्र नृपात्मज ॥ ६३ ॥ वायुएष्ठे दक्षिणे च वहन्मूचयते बलम् ॥ सम्मुखीनश्च वामश्चमटानां भङ्गसूचकः६४ भाषाटीकासमेता। अर्थ-अब भागते हुएको मारनेकी विधि कहतेहैं, जो निशाना बायें हाथकी ओरसे. आताहुआं दाहिनी ओर भागता जाता हो, उसको बाँयें खेंचकर बाण हाथसे मारे, वैसे- ही दक्षिणकी ओरसे आताहो उसको धनुषधारी मनुष्य आ- लीटक्रम करके मार, आलीढक्रम पहले कह आये, बीईओ रसें चलताहुआ वा दाहिनी ओरसे वायु चलताहो तो उस- का बलभी देखले, यदि बांई ओरसे चलता हो तो धनुष- को दाहिनी ओर झुकादे और दाहिना वायु होतो बांई ओर वाण छोड़दे. हे गाधिके पुत्र ! हे राजाके पुत्र ! ऐसे निशाना साधन कर, जिसके पीठ पाछेका वा दाहिनीओरका वायु चलताहो, वही जीतता है और जिसके सामनेका व बाई ओर पवन चलताहै वह हारजाताहै, जोधाओंका भंग सूचकहै ॥.६१॥६२॥६३॥६४॥ अथ शब्दवेधित्वम् । लक्ष्यस्थाने न्यसेत्कांस्यपात्रं हस्तद्रया- न्तरे । ताडयेच्छर्कराभिस्तच्छन्दःसं- जायते यदा॥६५॥ यत्रचैवोद्यते शब्दस्तं सम्यक्तत्र चिंतयेत् । कर्णेन्द्रियमनो- योगालक्ष्यं निश्चयतां नयेत्॥६६॥ पुनः शर्करया तच्च ताडयेच्छब्दहेतवे। पुन- (५६) धनुर्वेदसंहिता। . निश्चयता नेयंशब्दस्थानानुसारतः॥६॥ ततः किंचित्कृतं दूरं नित्यं नित्यं विधा- नतः। लक्ष्यं समभ्यसेवांतेशब्दवेधनहे- तवे॥६८॥ ततोबाणेन हन्यात्तदवधानेन तीक्ष्णधीः। एतच्च दुष्करं कर्म भाग्ये कस्यापि सिध्यति ॥६९॥ अर्थ-निशानेके स्थानमें कांसेका पात्र दो हाथ परे रक्खे, फिर उसको वालूरेतसे ताड़नकरै, तब शन्द उत्पन्न हो जहाँसे शब्द उत्पन्न हो उसको भली भाँति चिंतन करै कान इन्द्रिय और मनके योगसे निशानेको निश्चय करे फिर उसको शब्द सुनके हेतु शब्दस्थानके अनुसार ताड़न करै, जब दो हाथ अंतरसे शब्द सुननेका अभ्यास होजाय, तब कुछ उस कांस्यपात्रको दूर धरे. नित्य बढ़ाता जाय, एसें शब्दवेधनकेलिये निशानेका अभ्यास अँधेरेमें करे, फिर वाणसे निशानेको सावधानचित्तसे हननकरे यह दुष्कर कर्म किसीके भाग्यमें हो उसको सिद्ध होताहै ॥६६॥६६॥ ॥६७॥ ६८॥१९॥ अथ प्रत्यागमनम्। खगं बाणन्तु राजेन्द्र प्रक्षिपेद्रायु सम्मु- भाषाटोकासमेता। (६७) खे।रंजकस्य च नालाभिरतो ह्यागमनं भवेत् ॥७॥ अर्थ-हेराजेन्द्र विश्वामित्र ! खगनाम बाणको वायुके सामने फेंके जिसमें रंजककी नलिका लगीहों, इससे उस बाणका फिर आगमन होजाताहै ॥ ७० ॥ अथास्त्रविधिः। एवं श्रमविधं कुर्याद्यावसिद्धिः प्रजा- यते। श्रमे सिद्धे च वर्षांसु नैव ग्राह्य धनुष्करे ॥७॥ पूर्वाभ्यासस्य शास्त्राणा- मविस्मरणहेतवे। मासद्यं श्रमं कुर्या- प्रतिवर्ष शरहतौ ॥ ७२ ॥ जाते वाऽश्व- युजे मासे नवमी देवतादिने । पूजये- दीश्वरी चण्डी गुरु शास्त्राणि वाजिनः ॥७३॥ विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारी- भॊजयेत्ततः । देव्यै पशुबलिंदद्याद्भुतो वादित्रमंगलैः ॥ ७४॥ ततस्तु साधये- न्मंत्रान्वेदोक्तान्वागमो दितान् । अस्त्राणां कर्मसिद्धयर्थं जपहोमविधानतः॥७५ ॥ अर्थ-ऐसे श्रमविधि करे, जबतक सिद्धिहो श्रम सिद्धि- (५८), धनुर्वेदसंहिता। हुए पीछे वर्षामें धनुषको करमें धारण न कर पूर्व अभ्यास किये हुए शास्त्रोंके न भूलनेके कारण दो महीना परि- श्रम करै, प्रत्येक वर्षके शरहतुम अथवा आश्विन महीने- में शुक्लपक्षको ९ नवमी देवीके दिन चण्डी ईश्वरी और गुरु तथा हथियार और घोड़ोंकी राजा वा अभ्यासी पूजा करे ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर पीछे क्वारी कन्याओंको जिमावै, देवीके लिये पशूकी बलिदे. बाजों और मंगलों- के साथ पीछे वेदोक्त हों वा शास्त्रोक्त हों अस्त्रोंकी कर्म सिद्धि के लिये जप और होमकी विधिसे मंत्रोंको साधन करें ॥७२॥ ७२ ॥७३॥ ७४।७५ ॥ ब्राझं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे। आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानिसाधयेत् ॥ ७६ ॥ मनोवाकर्मभिभाव्यं लब्धा- लेण शुचिष्मता। अपात्रमसमर्थं च दह- त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥७७॥ प्रयोगं चोप- संहार यो वेत्ति स धनुर्द्धरः । सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवात्राणि प्रयोजयेत्॥७॥ अर्थ-बाहय, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य वारुण,आग्नेय और गुरु के दियेहुये अस्त्रों को साधन करे, पवित्र पुरुष मन, वाणी, कर्मसे अनुभव करै अत्रोंको पाकर, अखोंका • .
भाषाटीकासमेता।
प्रयोग और संहार जो जाने वह धनुर्धरहै, सामान्य कामके-
लिये बुद्धिमान् अस्त्रोंका प्रयोग न करै ॥७६७७॥७८॥
अथास्त्राणि प्रवक्ष्यामि सावधानोऽवधा-
रय । ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्म-
दंडकम् ॥ ७९ ॥ ब्रह्मशिरस्तृतीयं च
तुर्य पाशुपतं मतम् । वायव्यं पञ्चमं प्रोक्त-
माग्नेयं षष्टकं स्मृतम् ॥ ८० ॥ नारसिंह
सप्तमञ्च तेषां भेदाह्यनन्तकाः। ससंहार
सुविज्ञेयं शृणु गाधे यथातथम् ॥ ८१ ॥
वेदमात्रा सर्व शस्त्रं गृह्यते दीप्यतेऽथवा ।
तत्प्रयोगं शृणु प्राज्ञ ब्रह्मास्त्रं प्रथम
शृणु ॥ ८२॥
अर्थ-हे विश्वामित्र ! अब तू सावधान होकर धारणकर
अब मैं अस्त्रोंको कहूंगा पहिला ब्रह्मास्त्र कहा, दूसरा ब्रह्मदण्ड,
तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा पाशुपतास्त्र, पांचवां वायव्यास्त्र,
छठा आग्नेयास्त्र, सातवाँ नारसिंह, इनके अनंत भेदहैं,
इनको संहारके साथ जानना योग्य है. हे गाघिवंशज !
तू जैसाहै वैसा सुन,ये सब वेदमातागायत्रीमंत्रसे ग्रहण करना
अथवा दीप्यमान. करना. हे प्राज्ञ। इनका प्रयोग सुन
इनमेंसे पहिला ब्रह्मास्त्र सुन ॥ ७९ ॥ ८०॥ ८ ॥८२॥
-- ... -- (६०) धनुर्वेदसंहिता। अथास्त्राणि। दादिदन्ताञ्च सावित्री विपरीतां जपेत्सु- धीजप्तापूर्वी निखर्वचाभिमंत्र्य विधिव- च्छरम्॥८३॥क्षिपेच्छत्रुषुसहसानश्यंति सर्वजातयः। बाला वृद्धाश्च गर्भस्था येच योद्धु समागताः॥ ८४॥ सर्वे ते नाशमा- यान्ति मम चैव प्रसादतः । यथातथं दादिदन्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥ ८५॥ अर्थ-अब अस्त्रविद्या कहते हैं, '६'को आदि ले 'द' के अन्ततक सावित्रीको विपरीत जप, पहिले एक निखर्व वि- घिसे जपकर पुनः बाणको मंत्रितकर शीघ्र शत्रुओंपर फेंके, सब जाति नष्ट हों, बालक वृद्ध गर्भस्थ और जो कोई युद्ध- करनेको आये हों वेसव नाशको प्राप्तहों, मेरी कृपासे और संहारकी सिद्धिको 'द' से आदि ले 'द' के अन्ततक जपै८५ ब्रह्मदण्डं प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् । ततः प्रचोदयाज्ञेयं ततो नो यो धियः क्रमात् ॥ ८६ ॥ ततो धीमहि देवस्य ततो भर्गों वरेणियम् । सवितुस्तच्च यो- क्तव्यममुकशत्रु तथैव च ॥ ८७॥ ततो
भाषाटीकासमेता।
(६१)
हनरहुंफट् जप्त्वा पूर्व द्विलक्षकम् । अभि
मंत्र्य शरं तद्वत्प्रक्षिपेच्छत्रुषु स्फुटम् ॥
॥८८॥ नश्यन्ति शत्रवः सर्वे यमतुल्या
अपि ध्रुवम् । एतदेव विपर्यस्तं जपेत्सं-
हारसिद्धये ॥ ८९॥
अर्थ-ब्रह्मदण्ड कहतेहैं पहिले प्रणव उच्चारण कर, पीछे
प्रचोदयात् पीछे नो योधियोक्रमसे पीछे धीमहि देवस्य, पीछे
भोंवरेणियम्,पीछे सवितुः जोड़कर(अमुकशत्रु) को वैसेही
जोड़े पीछे हनहन हुंफट् जपकर दो लाख बाणको
मंत्रितकर शत्रुओंपर फेंके, सारे शत्रु यदि यमराजके तुल्य
हो तोभी नाशहों इसीको संहारकी सिद्धकेलिये उलटा
जपै ॥ ८६॥ ८७॥ ८८॥ ८९ ॥
ब्रह्मशिरः प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
धियो यो नः प्रचोदयात।भगों देवस्य धीः
महि ॥ ९० ॥ तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे
हनहनेति च । हुंफट् चैव प्रयोक्तव्यं क्षि-
पेद्ब्रह्मशिरस्ततः ॥९१ ॥ पुरश्चर्या पुरः
कृत्वा त्रिलक्ष्यं नियतः शुचिः। नश्यन्ति
सर्वे रिपवः सर्वे देवाः सुरा अपि ॥ ९२॥
(६२) धनुर्वेदसंहिता। इदमेव प्रयोक्तव्यं विपर्यस्तं विकर्ष णे ॥९३॥ अर्थ-ब्रह्मशिर अस्त्रको कहते हैं, पहिले प्रणवउच्चारण करै पीछे तत्सवितुर्वरेण्यं शबन्मे हन २हुं फट् जोडना चा- हिये पीछे ब्रह्म शिरको फेंके, तीनलाखका पुरश्चरण करके पवित्र होके देवता वा असुर कोई शत्रु हो सब नाशको प्रा- तहों और इसीको संहारके निमित्त उलटा जपै ॥ ९३॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि चास्त्रं पाशुपतं . तव । यस्य विज्ञानमात्रेण नश्यन्ति सर्व- शत्रवः ॥ ९४ ॥ दादिदन्तां च सावित्री प्रोच्य प्रणवमेव च । श्लीं पशुं हुंफट् अ- मुकशत्रून् हनहन हुंफट् ॥ ९५॥ जवा पूर्व द्विलक्षं च ततः पाशुपतंक्षिपेत् ॥ पुन स्तदेव व्यस्तं स्यात्संहारे तां नियोजये- त् ॥ एतत्पाशुपतं चास्त्रं सर्वशस्त्रनिवार- णम् ॥ ९६.॥ अर्थ-इससे परे पाशुपतास्त्र तुम्हारेको कहतेहैं, जिसके जाननेसे सब शत्रु नष्ट होजाय, 'दु को आदि.ले 'द' के अंततक प्रणव कहकर इलीपशुं हुंफट्, फलाने शत्रुको (हुंफट) ऐसा दो लाख मंत्र जपकर पीछे पाशुपतास्त्र फेंके भाषाटीकासमता। (६३) फिर संहारके लिये (व्यस्त ) उलटा जपै, यह पाशुपतास्त्र सब शत्रुओंका निवारण करनेवालाहै ॥९॥९५॥९६ ॥ वच्मि वायव्यमांते येन नश्यन्ति शत्रवः। ॐवायव्यया वायव्ययान्यो यया वा तथा। अमुक शत्रूनू हन २ हुंफट् चैव प्रकीर्तयेत् । पूर्वमेव तथा जप्त्वा नियुतद्वितयं तथा॥ ९७॥ पुनः संहाररूपेण संहारं चप्रकल्पयेत् ॥ अस्त्रं वायव्यंकं नाम देवनामपि वारणम् ॥९८॥ अर्थ-तरेको वायव्य अस्त्र कहताहूं जिससे शत्रु नाशहों, "गेवायव्यय" आदिके पहिले दो लाख जपकर फिर संहार रूपसे संहार करे, यह वायव्यास्त्र देवताओंकोभी हटादे- ताहै ॥९७॥९८॥ आग्नेयं संप्रवक्ष्यामि यतः परभयं दहेत् ॥ अग्निस्त्यताहृदु चशिवंवना श्वाविणिच हगादशरूपनःसदवेति ततक मात् हादतितोयतिराम तथा मसोहिवावा न॥९९॥ सुसेदवेदया च वदेत्। अमुका दीस्ततो वदेत्। पूर्वोक्तांच पुरश्चर्या कृत्वा --- - . . ::- .
(६४) धनुर्वेदसंहिता। शस्त्रेऽभियोजयेत् । इमं मंत्रं पुनर्व्यस्तं संहारे चैव योजयेत् ॥ १०॥ अर्थ-अब आग्नेयास्त्र कहतेहैं, जिससे शत्रुका भय दूरहो “अग्नि” यहाँसे लेकर सुसेदवेद्या यहांतक मत्र पढ़ शत्रुका नाम जोड़े, दोलाख मंत्र जपे फिर शस्त्रपर योजना करै वा अस्त्र चलावे फिर संहारके लिये उलटा जपै ॥ ९९॥ १०॥ डोवज्रनखवज्रदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय हुंफट् । पूर्व जत्वा च लक्षं हि नरसिंह च योजयतासिंहरूपास्ततोबाणाः पतंति शात्रवे वने ॥१॥ पूर्वोक्तेन प्रकारेण संहारं च प्रकल्पयेत् । संक्षेपतो महा भागतवोक्तानिमहामते॥२॥भेदास्त्वेषां शिवेनैव ह्यनन्ताःपरिकीर्तिताः। इत्यस्त्रप्रकरणम्। अर्थ-पूर्वोक्तमंत्रको एकलाख जपकर श्रीनृसिंहजी महाराजका ध्यानकर योजना करे पीछे वाण सिंहरूपहो शत्रु- रूपी वनमें पड़कर उनको खाजातेहैं पूर्वोक्तप्रकारसे संहारकर, हेमहाभाग ! मैंने तेरे आगे संक्षेपसे अस्त्र कहे, इनके भेद तो श्रीशिवजी महाराजने परशुरामजीके प्रति अंनत कहेहैं।१।। इत्यस्त्रप्रकरणं समाप्तम्। ।
भाषाटीकासमेता। (६६) हस्ताकें लांगली कन्दो गृहीतस्तस्यले- पतः । शूरस्यापि रणे पुंसोदपै हरति का- • तरः॥३॥ अर्थ-दस्त नक्षत्रमें रविवारको जलपीपलका कन्दलें- कर लेप करनेसे कायर पुरुषभी शुरवीरके अभिमानको दूर करदेता है ॥३॥ गृहीत्वायोगनक्षत्रैरपामार्गस्य मूलकम्॥ लेपमात्रेण वीराणां सर्वशस्त्रनिवारणम् ॥४॥ अर्थ-पुष्य रविवार सिद्धयोगमें ऊँगा, जिसे चिरचिटा यो ताराभी कहतेहैं उसकी जड़ लेकर रखले जिस दिन किसीसे युद्धका काम पड़े, उसदिन शरीरके लेप करे तो वीरोंके सर्व शस्त्र न लगें ॥४॥ अधः पुष्पी शंखपुष्पी लज्जालुगिरिक- र्णिका । नलिनी सहदेवी च पत्रमौजा- कयोस्तथा ॥५॥ विष्णुकान्ता च सर्वा सांजटा ग्राह्यावेर्दिने।बध्वाभुजे विले- पाद्वा काये शस्त्रापवारकाः॥६॥सर्प- व्याघ्रादिसत्वानां भूतादीनां न जायते ।
धनुर्वेदसंहिता। भीतिस्तस्य स्थिता यस्य मातरोऽष्टौ शरीरके ॥७॥ अर्थ-अधःपुष्पी जिसको औंधाहूली कहतेहैं, शंखाहूली, छुईमुई, वनमोगरा, कमोदिनी, सहदेई मूंजका और आकका पत्र, विष्णुकांता इन सबोंकी जड़ रविवारको ग्रहणकरके हाथोंके बाँधे, वा शरीरके लेपन करें तो सब शस्त्र दूरहों, साँप वाघ आदि हिंस्रजीवोंकी वाधान हो और आठ भातृदेवि योसेभी रक्षा हो॥६॥६॥७॥ गृहीतं हस्तनक्षत्रे चूर्ण छुच्छुन्दरीभवम् । तत्प्रभावागजः पुंसः सन्मुख नेति निश्चि तम् ॥हरिमांसं गृहीत्वा च मार्गेऽश्वानां क्षिपद्धवि । तेन मार्गेण तेचाश्वा नायांति बाडनेन वै॥९॥ अर्थ-हस्त नक्षत्रमें छुच्हुंदरीअर्थात् (सुणसुणियाँ) को चूराले, उसके प्रभावसे पुरुषके सामने हाथी नहीं आवे, यह निश्चय किया हुआ है, शेरका मांसलेकर जहाँ घो- डोंका मार्ग हो, वहाँ पृथ्वीपर पटक दे तो उस मार्गसे वे घोड़े कोड़े मारनेसेभी नहीं आते हैं ॥८॥९॥ छुच्छुन्दरी श्रीफलपुष्पचूर्णैरालिप्तगात्रस्य भाषाटीकासमेता। (६७) नरस्य दूरात् ॥आघ्राय गन्धाद्विरदोऽतिम- तोमदं त्यजेत्केसरिणो यथोग्रम् ॥ ११०॥ अर्थ-छुच्छन्दर और नारियल के पुष्पका चूरा शरीरके लपेटे हुये, मनुष्यके शरीरकी गंधको सूंघकर मतवाला हाथीभी मदको छोड़ देता है जैसे शेरके शरीरेक गंधको -सूंघ कर छोड़ताहै ॥ ११०॥ श्वेताद्रिकर्णिका मूलं पाणिस्थं वारयेद्ग- जम् । श्वेतकंटारिकामूलं व्याघ्रादीनां भयं हरेत् ॥ ११ ॥ पुष्यार्कोत्पाटिते मूले पाठाया मुखसंस्थिते । देहं स्फुटति नो तीक्ष्णमंडलायै रणे नृणाम् ॥१२॥ गंधा- यां उत्तरं मूलं मुखस्थं सन्मुखागतम् । शस्त्रौघं वारयेत्तत्र पुष्या विधिनोद्ध- तम् ॥ १३॥ विधिरुपवासः। शुभ्रायाः शरपुङ्खा या जटानीलीजटा- थवा । भुजे शिरसि वक्के वा स्थिता शस्त्रनिवारिका ॥ १४॥ भूपा हि चोर- भीतिनी गृहीता पुष्यभास्करे।
(६८) धनुर्वेदसंहिता अर्थ-सफेद विष्णुकान्ताकी जड़ हाथमें . रखनेसे हाथीको दूर करदेतीहै,सफेद कटहलीकी जड़ व्याघ्रादिकोंके भयको हरतीहै, पुष्यरविवारको पाठरकी जड उखाड़कर मुखमें रक्खे तो देह नहीं फटै, तीन तल्वार वा. चक्रधारासे, गांधारीके उपारकी जड़ मुखमें होय तो सन्मुख आयेहुये शस्त्रोंके समूहको इटादेतीहै । विधिसे उपारीहुईहो, उसको उपवासकरिके लावे, सफेद झोझुरूकी जड़ हो अथवा नीलीकी जटाको, हाथ शिर मुखमें रखनेसे सब शत्रोंका निवारण करतीहै. राजा, चोर, साँपके डरका नाश करतीहै पुष्यार्कमें ग्रहण कीहुई हो ॥११॥१२॥ १३ ॥१४॥ अथ संग्रामविधिः। आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समा- चरेत् । सप्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धि- नं संशयः॥ १५॥ अर्थ-अब संग्राम करनेकी विधि लिखते, आदिम शत्रुकी सेनाके सन्मुख खड़ा होकर मुद्राकर, पीछे युद्धका आरम्भ करे, जिसने पहिले सप्पमुद्रा करीदो उसकी सिद्धि हो इसमें संदेह नहीं ॥१५॥ रुद्रं ध्यात्वा मन्त्र जपेत। डों नमःपरमात्मने सर्वशक्तिमते विरूपा- भाषाटीकासमेता। (६९) क्षायभालनेत्राय रं हुं फट् स्वाहा।ततो है मवती ध्यात्वा प्रणम्य युद्धमारभेत्॥ डों ह्रीं श्रीं हैमवतीश्वरीं ह्रीं स्वाहा ॥ डों ह्रीं वज्रयोगिन्यै स्वाहा । सिंहासनस्था रुद्धाणी ध्यायेत् ॥ १६॥ : अर्थ-रुद्धका ध्यान कारके मंत्र जपे, जो पहिले लिख आयेहैं. पीछे हैमवती भगवतीका ध्यानकर प्रणामकर युद्ध काआरम्भ करै,हेमवती मंत्र उच्चारणकारके,फिर वज्र योगि- नीका ध्यान करिके सिंहपर चढ़ीहुई रुद्राणीको ध्या- वै॥१६॥ अपूर्णे शूत्रसामग्री पूर्णे वैश्वबलं तथा । कुरुते पूर्णसत्वस्थो जयत्येको वसुंध- राम् ॥ १७॥ अर्थ-अपूर्ण स्वरमें शडकी सामग्री हो और पूर्णमें अपनी सेना तत्त्वसे पूर्ण करै. स्थित हो ऐसाएकभी योधा सारी वसुधाको जीते ॥ १७॥ पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्ता यस्यैकोयं शत्रुलक्षं निहन्ति ॥ अर्कः पृष्ठे दक्षिणे यस्य गाधे चन्द्रो वामे सन्मुखे वै निशा- (७०) धनुर्वेदसंहिता। याम् ॥२८॥ वायुं पृष्ठे दक्षिणे यो विद- ध्याद्योधा शत्रून्नाशेयत्तत्क्षणेन ॥ १९ ॥ अर्थ-जिसके पीछे और. दाहिने राहुसहित योगिनी हो . वह अकेला लाख शत्रुओंको मारता है. हे विश्वामित्र और ऐसेही सूर्य पीछे वा दाहिने हो और रातमें चन्द्रमा सामने अथवा बाँयें हो और वायुको पीछे वा दाहिने जो करै. वह योधा उस क्षणमें तत्काल शत्रुओंको नाशकरै ॥१८॥१९॥ या नाडी वहते चाड़े तस्यामेवाधिदे- वता। सन्मुखेपि दिशा तेषां सर्वकार्यफ- लप्रदा ॥ १२०॥ अर्थ-जो नाडी अंगमें बहती हो, उसका अधिदेवता सामने हो, उसकी दिशाके सामने मुखकर तो सबकार्यों- की फलदेनेवाली हो ॥ १२०॥ यां दिशं वहतेवायुयुद्धं तदिशिदापयेत् । जयत्येव न सन्देहः शक्रोपि यदि चाग्रतः॥२१॥ अर्थ-जिस दिशाका वायु देहमें चलताहो, उसी दिशामें युद्धदेतोयदिइन्द्रभीआगे होवे तोभी जीत होय ॥२१॥ सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च चन्द्रे पश्चिमदक्षिणे।
भाषाटीकासमेता। (७१)
सेनापतिबलं वेवं प्रेषयेन्नित्यमा-
दरात् ॥२२॥
अर्थ-सूर्य स्वर चलता हो तो पूर्व और उत्तर में यदि
चन्द्रमा होय तो पश्चिम दक्षिणमें, सेनापति आदरके साथ
सेनाको युद्धके लिये भेजे ॥२२॥
यत्र नाड्यां वहेद्वायुस्तदंगे प्राणमेव च ।
आकृण्य गच्छेत्कर्णान्ते. जयत्येव पुरं-
दरम् ॥ २३॥
अर्थ-जिस नाड़ी में वायु बहताहो, उसही अंगमें प्राण
होताहे उसको कानोंतक बैंचकर चले तो इन्द्रकोभी
जीतले ॥२३॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णागे योभिरक्षति ।
न तस्य रिपुभिः शक्तिबलिष्ठरपि
हन्यते ॥२४॥
अर्थ-शत्रुओंके प्रहारोंसे जो पूर्ण अंगोंकी रक्षा करते हैं
उनकी शक्तिको बलवान् शत्रुभी नहीं हनन कर-
सक्तेहैं॥२४॥
अंगुष्टतर्जनीवंशे पादाङष्ठे तथाध्वनिः।
युद्धकाले प्रकर्तव्या लक्षयोधो जयी
भवेत् ॥२५॥
(७२) धनुर्वेदसंहिता। अर्थ-अँगूठा तर्जनीके वाँसमें और पैरके अँगूठेमें वैसेही ध्वनि करनी चाहिये ऐसा करनेसे लाख योधाओंका जीतने वाला हो ॥२५॥ भूतत्वे युदरं रक्षेत्पादौ रक्षेन्जलेन च । उरू च वह्नितत्त्वेन करौ - रक्षेच्च वायुना ॥ व्योमतत्त्वे शिरो रक्षेदेवं योधो जयी भवेत् ॥ २६॥ अर्थ-जब पृथ्वीका तत्त्व हो, तब उदरमें चोट लगती है इससे चाहिये कि, जब पृथ्वीतत्त्व हो तब पेटकी रक्षागल आदिसे करै जलके वहनमें पादोंकी रक्षाकरे, अग्नितत्त्वके. समय ऊरुओंको वचावे, वायुसे हाथाको वचावे,आकाश हो जब शिरकी रक्षा करे तो ऐसा योधा जीतनेवाला होताहै ॥२६॥ सूर्यै पूर्वं चोत्तरे च मुखं कृत्वा जये- नरः । चन्द्रे मुखं सदा कुर्यादक्षिणे पश्चिमे सुधीः॥ २७॥ चिर युद्धे शुभ- श्चन्द्रः शीघ्रयुद्धे रविस्तथा ॥ दूरयुद्धे जयी चन्द्रःसमीपस्थेदिवाकरः॥२८॥ अर्थ-सूर्यमें पूर्व और उत्तर दिशामें मुखकरके जीते चन्द्रमामें सदा दक्षिण और पश्चिममें मुख करे तो जीते,
भाषाटीकासमेता। (७३).
बहुत देरतक युद्ध करना होय तो चन्द्रमाका स्वर अच्छा है,
और जल्दी युद्ध करना होय तो सूर्यका और दूरके युद्ध में
चन्द्र और समीपके , युद्धमें सूर्य जीतनेवाला
होताहै ॥ २७ ॥२८॥
आकृष्य प्राणपवनं समारोहेतु वाहनम् ।
समुत्तरेत्पदं दद्यात्सर्वकार्याणि साधयेत्॥२९
अर्थ-प्राणपवनको बैंचकर सवारीपर चढ़े, अर्थात्
कुम्भक करके चढ़े रेचक करता हुआ उतरे तो सब कामोंकी
सिद्धि करै॥२९॥
न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्न-
गाः । न शत्रुव्याधिचौराद्याः शून्यस्था-
नाशितुं क्षमाः॥३०॥
अर्थ-न तो काल न विविध प्रकारके शस्त्र न साँप, न
शत्रु न शरीरका रोग न चोर आदि क्रूरस्वभाववाले शून्य
स्वरमें स्थित हुए नाश करनेको समर्थ हो सकतेहैं ॥३०॥
अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्त्वेश्वयुक्तो
यदि वहति कदाचिर्दैवयोगेन पुंसाम् ॥
स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्रस्व-
रेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि
लोके॥३१॥
(७४) धनुर्वेदसंहिता। अर्थ-उत्तरायणसूर्यकी तिथि और सूर्यस्वर अग्नितत्त्व वा वायुतत्त्वसे युक्त होकर कदाचित् दाहिना स्वर अपने आप चले जिस किसीका वह स्वरके स्तम्भमात्रसेही शत्रु की सेनाको जीते और केशवके लोकमें भी विघ्न न हो॥३१॥ जीवन शस्त्रं बनीयाज्जीवेनैव विका- शयेद । जीवन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा ॥३२॥ अर्थ-स्वरसेही शस्त्र बाँधे और स्वरसेही निकासे तथा स्वरसेही फेंके तो युद्धमें सदा जीते ॥ ३२॥ वामनाड्युदये चन्द्रः कर्तव्यो वाम- सम्मुखः ॥ सूर्यचारे तथा सूर्यः पृष्ठे दक्षिणमो जयेत्॥३३॥ अर्थ-जब बायाँ स्वर चलताहो तब चन्द्रमा बायें वा सम्मुख करना चाहिये, सूर्यके चलतेसमय सूर्यको वैसेही पीठ पीछे वा दाहिनकरै॥३३॥ दीप्ते कार्य नाडी परदिशि जीविता सदा कुर्यात् ॥शान्ते च जीवसहिता त्वेवं सिद्धचन्ति कार्याणि ॥३४॥ अर्थ-क्रूर काममें दूसरेकी ओर सदा निर्जीव · नाडी । भाषाटीकासमेता। (७५) करे और शान्तकर्ममें चलतीहुई नाडी करै तो कार्य सिद्धहों ॥३४॥ तत्त्वबलान्नाडीबलमधिकं प्रोक्तं कप- दिना नियतम् । ज्ञात्वैनं स्वरचारं नरो भवत्कार्यनिपुणमतिः ॥ ३५॥ अर्थ--अब इस शंकाको दूर करतेहैं, कि तत्त्वज्ञान तो बड़ा कठिन है, किसी किसीको होताहै तो वशिष्टजी वेश्वामित्रसे कहतेहैं,कि तत्त्ववलसे नाड़ीवल अधिक है, यह बात श्रीजटाधारी महादेवजी महाराजने परशुरामजीसे निश्च- यही कहदीहै, नियतकरके इस स्वरकी गतिको जानकर मनुष्य अपने कार्य करनेमें चतुर बुद्धि होय॥ ३९ ॥ इति स्वरबलयुद्धम्। अथ राहुयुक्तायोगिनीबलयुद्धंव्या- ख्यास्यामः । न देयमिदं क्रूराय कुबुद्धयेऽशांताय गुरु- द्रोह्यभक्तायति । देयमिदं ब्रह्मचारिणे धर्मतः प्रजापालदुष्टदण्डविधारिणे साधु- रक्षकाय इत्येव प्रवचनमिति ॥३६॥३७॥ अर्थ-अब राहुयुक्त योगिनीबल युद्धको कहतेहैं यह बुद्धिप्रकार कूरबुद्धि शान्तिरहित गुरुद्रोही अभक्तको नदेना (७६) धनुर्वेदसंहिता! और ब्रह्मचारी जोहो और धर्मसे प्रजाका पालन जो करे (दुष्ट) खोटे पुरुषोंको जो दण्ड दे (साधु) अच्छे पुरुषोंको जोरक्षा करे ऐसेकोदे इतनाही वचन, २ ओर यह वीप्स वाक्यहै ॥३६॥ ३७॥ प्रतिपन्नवम्यां प्रथमेधयामे राहुयुक्ता योगिनी पूर्वस्यां दिशि स्थिता भवति । ॥ १ ॥ द्वितीया दशम्यां पञ्चमेर्धयामे राहुसहिता शिवा प्रतीच्यामुदेति ॥२॥. तृतीयैकादश्यां तृतीये,यामे तमः संमिलिता पार्वती याम्यां परिभ्रमति ॥ ॥३॥ चतुर्थी द्वादश्यां तु सप्तमेऽर्धयामे राहुणा सह नगजा चोत्तरे ज्ञेया ॥४॥ पञ्चम्यामथ त्रयोदश्यामष्टमेऽर्धयाम- स्वर्भानुयुता गौरी नैर्ऋत्यामटति ॥५॥ गुहतिथौ । चतुर्दश्यां च कात्या- यनी पवनालये चायाति॥६॥ सप्तमी पूर्णिमायां चतुर्थे प्रहरे विधुतुदेन साकं योगिनीमैशान्यां जानीयात् ॥७॥ अष्ट म्यमायां षष्ठेर्द्धयामेरुदाणीतमोयुक्ता- भोपाटीकासमेता। (७७) यामीक्ष्यते ॥ ८॥ इति. राहुयुक्ता योगिनी उपग्राह्या द्वितीयेऽर्द्धयामे सैहि- केययुता ॥९॥ अर्थ-पड़वा और नवमी को पहिले आधे प्रहर में राहु- सहित योगिनी पूर्व दिशा में स्थित होती है ॥ १॥ दोयज और दशमी पाँचवें आधे प्रहरमें राहुके साथ योगिनी पश्चि- ममें उदय होतीहै ॥२॥ तीज और एकादशी को तीसरे आधे याममें राहु के साथ योगिनी दक्षिण में घूमती है ॥३॥चौथ और द्वादशीके सातवें आधे याममें राहुके साथ योगिनी उत्तरमें जाननी॥४॥ पञ्चमी और त्रयोदशी के आठवें आधे प्रहरमें राहुके साथ योगिनी दूसरे नैर्ऋत्य कोणमें रहतीहै ॥६॥ षष्ठी और चौदशको राहुके साथ योगिनी दूसरे आधे याममें वायुकोणमें चलतीहे ॥६॥ सप्तमी और पूर्णिमामें चौथे आधे प्रहरमें राहु के साथ योगिनी ईशान कोणमें जाननी ॥७॥अष्टमी और अमावसको छठे आधे याममें योगिनी राहके साथ अग्निकोणमें दिखाईदेती है॥८॥ ऐसे राहुके साथ योगिनी ग्रहण करनी चाहिये ॥ ९॥ अथ व्यूहादिभिर्युद्धकथनम्। ये राजपुत्राःसामन्ता आप्ताः सेवकजातयः॥
(७८) धनुर्वेदसंहिता। तान्सर्वानात्मनः पार्थे रक्षायै स्थापये- न्नृपः॥३८॥परस्परानुरक्ता योधाः शाई- धनुर्धराः। युद्धज्ञास्तु रथारूढास्ते जय- न्ति रणे रिपून॥३९॥एकः कापुरुषो दीर्णो दारयेन्महतीं चमूम् । तदीर्णमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि ॥४०॥अतो वै का- तरं राजा बलेनैव नियोजयेत् । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमंडलभदिनौ ॥ ४१ ॥ परिबाड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः॥ यत्र यत्र हतः शूरःशत्रुभिः परि- वेष्टितः॥४२॥ अक्षयं लभते लोकं यदि क्लीबं न भाषते । मूच्छितं नैव विकलं ना- शस्त्रं नान्ययोधिन॥४३॥पलायमानं शरणं गतं चैव न हिंसयेत्॥भीरु पलायमानोपि नान्वेष्टव्यो बलीयसा ॥४४॥ कदाचि- च्छरतां याति शरणे कृतनिश्चयः ॥ संभृत्य महतीं सेनां चतुरंगां महीपतिः॥ ॥४५॥व्यूहयित्वाऽग्रतःशूरान्स्थापयेज्जय लिप्सया । पृष्टेन वायवो वांति पृष्टे भाषाटीकासमेता। (७९) भानुवयांसि च ॥४६॥ अनुप्लवन्ते मेघाश्च यस्य तस्य रणे जयः॥ अपूर्णे नैव मर्तव्यं संपूणनव जीवनम् ॥४७॥ तस्माद्धैर्य विधायैव हन्तव्या परवा- हिनी ॥ जिते लक्ष्मीमते स्वर्गः कीर्तिश्च धरणीवले ॥ तस्माद्वैर्य विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥४८॥ अर्थ-अब व्यूहादि उपायोंसे युद्ध कथन करते हैं, जो राजपुत्र (सामन्त)अर्थात् जो अपने भाई वेटे हों तथा अपने आधीन हों यथार्थ बात कहनेवाले नौकर उन सबोंको अपने पास चारों ओर राजा रक्खे और जो योधा आपसमें प्रेम रखतह, शाङ्ग धनुष धारण करनेवाले युद्धरीति जान- नेवाले घोड़ोंके सवार वे संग्राममें शत्रुओंको जीततेहैं, एक भी कायर भग्गू सेनामें होवे तो बड़ी भारी सेनाको हरवा देताहे, उस डरायेहुयेशूरवीरके योधाभी पीछे भागजातेहें, इस कारण राजा डरपोक सेनापति वा पदचरादि नौकर सनामें भरती न करे, दो पुरुष सूर्यके लोकसे उपर जातेहैं, योगयुक्त संन्यासी और जो संग्राममें सम्मुख होकर मरे, जहाँ २ शूर वीर शत्रुओंसे घिराहुआ माराजाय वह (अक्षय) स्वर्गलोकको पाताहै, यदि चेत् क्वीववचन अर्थात्
(८०) धनुर्वेदसंहिता।
हनिवचन न बोले तो जिस शत्रुको मूर्छा आगई हो और
घवरा रहाहो, हथियार पास न हो,वा दूसरेसे लड़ाई कर रहा
हो, भाग निकलाहो शरणागत आगया हो ऐसेको न मारे,
और डरपोक शत्रु भागचला हो तो बलवान उसको ढूँढ़े
नहीं, क्योंकि कभी वह शूरताको प्राप्त होजाय तो
संग्रामका निश्चयकर अर्थात् अपना. मरना ठानकर वह
मारदेवाहै, इस हेतु भागेहुए शत्रुको ढूँढना योग्य नहीं है।
बहुतसी सेना इकट्ठी करके चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, स्थी,
घोड़ोंके सवार, और पैदल एकत्र करके इनका व्यूह बनाकर
सबसे आगे शूरवीरोंको रक्खे जीतनेकी इच्छासे जिसकी
सेनाकी पीठ पाछे, सतर ३ का वायु चलताहो और
पीठपीछे सूर्यहो, तथा पक्षी पीछे उड़तेहों पीठपछिकी वर्षाहो
उसकीही रणमें जीत होतीहै यदि शत्रुओंको बन्धस्वरमें
राखे तो न मरे और चलते स्वरको राखेतो माराजाय
इसहेतु धैर्य करकेही शत्रकी सेना मारनी चाहिये, जीत जाय
तो धन मिले और रणमें माराजाय तो स्वर्ग.भिलै, पृथिवी
पर कीर्तिहो इससे धैर्य करकेही शत्रुको सेना भारनी चाहिये
॥३८॥३९॥४०॥४१॥४२॥४३॥४४॥४॥४६॥१७१४८
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यद्वयाधिमरणं
गृहे॥ यदाजौ निधनं याति सोऽस्य धर्मः
सनातनः॥४९॥
(८१) भापाटीकासमेता। अर्थ-वसिष्ठजी कहते हैं हेविश्वामित्र !जो रोगी होकर घरमें मरना वह क्षत्रियोंकेलिये अधर्मसे मरना है जो कि, संग्राम में मरना है वह इसका सनातन धर्म है ॥ १९ ॥ अथ व्यूहानाह। युवास्वरे मध्यसेना युद्धं कुर्यादतंद्रि ता। द्वे सेने पार्श्वयोश्चैका पृष्ठतो रक्षये- त्सदा ॥ एकां विकटसेनान्तु दूरस्था भ्रामयाधि ॥५०॥ अर्थ-युवाल्वरवाली मध्यसेना भ्रमतीहुई, सामनेके शत्रु से युद्धकरै, दो दोनों पछवाड़ोंमें हों, और एक पीठपीछे 'रक्षाकर, और एक विकटसेना दूर भ्रमतीरहै ॥१०॥ उसका चित्र आगे देखो- (८२) धनुर्वेदसंहिता। प्रथमारम्भव्यूह। यौद्धीसैना युवावर ooo राजा पृष्ठसेना. पावस्था. adin पावस्था. विकट सेना, दण्डव्यूहश्वशकटोवराहो मकरस्तथा । सूचीव्यूहोथ गरुडः पद्मव्यूहादयो मताः ॥५१ ॥ एतान्व्यूहान्परिव्यूह्य सेनापतिरयेत्सदा। बलाध्यक्षादिकान्स- वान्सर्वदिक्षुनियोजयेत् ॥५२॥ अर्थ-दण्डकार दण्डन्यूह, गाड़ीके आकार शकटव्यूह भापाटीकासमेता। (८३) सूवरके आकार वराहव्यूह, मच्छीकी सहश मकरव्यूह, सू- ईके आकार सूचीव्यूह, गरुड़पक्षीकेसा गरुड़व्यूह, कमलके आकार कमलव्यूह, इत्यादि जानने, इतने तथा और और व्यूह बनाकर सेनापति सदा चलै, बलाध्यक्षादिकोंको सब दिशाओंमें योजनाकर ॥५१॥५२॥ दण्डव्यूह। सर्वतोभये दण्डव्यूहरचना कार्या। अर्थ-चारों ओरसे जब घिरजावे तब दण्डव्यूह रचके युद्धकर. आगे इनके चित्र देखो- MAA RATNA
(८१)
धनुर्वेदसंहिता।
पनिकव्यूह
राजा
R
.
..
पृष्टतो भये शकटव्यूहः।
अर्थ-पाछेसे भय हो तब शकटव्यूह रचै ॥
पार्श्वभये वराहव्यूहो वा
गरुडव्यूहो
विधेयः ॥ ५३॥
अर्थ-दाहीनीओरसे और बाईओर भय उपस्थित
होनेपर वराहव्यूह वा गरुडव्यूह करना चाहिये ॥५३॥
भाषाटीकासमेता।
वराहव्यूह।
.....
.
L
.
ma
धनुर्वेदसंहिता।
गरुड़व्यूह।
२०७6882
१११११११
१११
११११
राजा
११११
११११
११११११
शिश
१११११११
११
600
भाषाटीकासमेता। (८७) अग्रतो भये पिपीलिकाव्यूहः। अर्थ-आगेसे भयहो जब पिपीलिका व्यूह रचे ॥१॥ पिपीलिकाव्यूह मकरव्यूह सूची: यह ...... .m.... ....... ...... राजा राजा LAALTH
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
००००००००००००००००००००००००००००००००
००००००००००००००००००००००००
०००००००००००००
wheel
००००००००००००००
००००००००००००००००००००००००
०००००००००००००००००००००००००००००००
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
पैदल
पैदल
घोडा
घोडा
घोडा
पैदल
Tale
11)
घोडा
Jalhe
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
192
Telebek
(22)
भाषाटीकासमेता। अईचन्द्र ०००० ०००००० चतुष्पथव्यूह ०००००००० 00000000000 . ०००००००००००००००००००००००००००० राजा . . ००००००००० ००००००००००० . 0000000000000000000000000 0000000 10०००००००० ००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० . . . 0 . . ००००००००००००० ००००००००००००००००००००००००००००००००००० . ००००००००००००००००००००० ०००००००००००० सर्वतोभद्र। ००००००००००००००० ००००००००००००००००००००० ००००००००००००००००००००००००० ०००००००००००००००००००००००००००००००० ००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००० . ०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
ई.
पदाति पदाति र पनात पदाति पदाति
ellsh ShTPleh.
(९०)
धनुर्वेदसंहिता ।
षष्ठेनत्यमुखः सप्तमेपश्चिममुखः अष्टमेवायव्यमुखः
चतुर्थेदक्षिणमुखः
यामा
प्रथमेउत्तरमुखः
दिनयुद्धचकम् ?
रात्रौ व्यलीका
तृतीयेनिमुखा
द्वितीयईशानमुखः
पंचमे पूर्वमुखः
सेनाशयनव्यूहम् ।
राजा
पदाति पदाति
बारपाल
द्वारपार
परिवक
सेनापति
पदाति पानि
अग्रज
A
पदानि
पनाति
ab
alh
Hale
.
भाषाटीकासमेता। (९१) स्वल्पा युद्धं कुर्याद्वह्वीसेना च सर्वतो भ्रमेत् समभूमौ चाश्ववारा युद्धं कुर्युः । जले करितुंबीहतिनौकाभियुद्धं विधे- यम् । पदातयो भुशंडिं गृहीत्वा वा धनूंषि चादाय बने वृक्षेष्वंतर्धाय वा- ऽऽरूढा भूत्वा युद्धयेरन् । स्थले चर्म- खगभल्लैयुध्येरन । युद्धाहंकारिणः स्तुंगा अग्रेस्थाप्या अन्ये पश्चात् ॥५१॥ अर्थ-थोड़ीसी सेना उड़तीरहे, और धनी सेना चारों ओर फिरतीरहै, इकसार भूमिमें सवार लडे. जलमें हाथी तूंची मसकं नावपर चढ़के युद्धकरना, पैदल बंदूक ले २ कर वा धनुष ले लेकर वनमें वृक्षोंकी आड़में हों, वा उनपर चढ़कर लड़ें, और थलहीमें जहाँ ऊँची नीची धरती हो वहाँ दाल तल्वार भाले बरछी आदिसे लड़ें, युद्धके अहं- कारियोंको सेनाके अग्रमें स्थापनकरे, औरोंको पीछे रक्खे ॥५१॥ अथ सेनानयः। तत्रादौ व्याकरणशिक्षां वक्ष्यामो राज्ञे । नृपतिर्लोट्लकारस्य कुर्यात्कंठ-
.
(९२) धनुर्वेदसंहिता।
स्थितानि च । रूपाणि कार्यसिद्धयर्थ
ह्याझैषा मम गाधिज ॥ मध्यमपुरुषस्यै-
व प्रयोगान्यो विचिन्तयेत् ॥५२॥
सेनानीः प्रतिदिनं सम्यङ्न केनापिस
हन्यते। मध्यमपुरुषोभृताःप्रयोगाः सर्व
सिद्धिदाः॥५३॥ तैरेव साधयेदाज्ञां पुरुषा
राजभृत्यकाः॥५४॥
अर्थ-अब सेना के कवायद का प्रकरण कहतेहैं, उसके
आदिमें व्याकरणकी शिक्षाको कहते हैं कि, राजाके लिये
कितनाव्याकरण पढ़ना चाहिये, राजा नव लकारों के
रूप छोडकर केवल लोट् लकार के रूपों को कार्यको सि-
द्धिके लिये कंठ करे, हे विश्वामित्र, मेरी यह आज्ञाहै और
जो सेनापति लोट् लकारके मध्यम पुरुषकेहीरूप याद करे,
वह किसीसे भीनमाराजाय,मध्यमपुरुषके बहुवचनके प्रयोग
ही सिद्धिके देनेवाले हैं छोटे २ ओहदेदार उनसे ही राजा
की वा.अपनी आज्ञाका पालन करें ॥५२॥५३॥५४॥
डुकृञ् करणे . भाषाटीकासमेता। ( ९३) अथोदाहरणसहितो धातुरूपपाठः।। भूसत्तायाम् पलपलने भव पत भवतम् पततम् कुरुतम् भवतः पतत कुरुत चलचलने चितीसंज्ञाने गम्लगती चेत गच्छ चलतम् चेततम् गच्छतम् चतत गच्छत ठा गतिनिवृत्तौ श्रु श्रवणे हशिरप्रेक्षणे तिष्ट शृणु पश्य तिष्ठतम शृणुतम् पश्यतम् शृणुत पश्यत दादाने ग्रह उपादाने देखि गृहाण पृच्छ गृहीतम् पृच्छत्तम् । दत्तम् दत्त गृहीत पृच्छत भव्यक्तायांवाचि। भक्ष भक्षणे बहि भक्षय पिब तिष्ठत पृच्छ झीप्सायाम् . . पापाने. he (९४) धनुर्वेदसंहिता। • - ब्रूतम् अक्षयतम् भक्षयत इषु इच्छायाम्। ज्ञाअवबोधने इच्छ जानीहि इच्छतम् जानीतम् इच्छत जानीत कुथि हिंसायाम् । त्यज त्यागे कुंथ त्यज कुन्यतम् त्यजतम् कुन्थत त्यजत शासुअनुशिष्टौ। इण् गतौ। शाषि इहि शिष्टम् इतम् शिष्ट इत अस् भुवि ।। रुधिरावरणे एधि रुन्धि स्तम् स्त रुन्ध अज् गतौक्षेपणेच। बजगती। वज पिवतम् पिवत आप्ल व्याप्ती आप्नुहि अनुतम् आमुत इन हिंसागत्योः। जाहि हतम् हत विद ज्ञाने वित्तम् वित्त शी स्वप्ने। शेष्व शयाथाम् शेध्वम् क्रमु पादविक्षेपे।. कास्य भाषाटीकासमता। (९५) काम्यतम् क्राम्यत णी प्रापणे। गे शब्दे। नयतम् नयत कृपविळेखने कृष कृषतम् कृषत भजतम् व्रजतम् अजत नजत दह भस्मीकरणे। मिह सेचने। दह मेह दहतम् मेहतम् दहत मेहत जि जये गाय जय गायतम् जयतम् गायत मुच्ल मोक्षणे। सिंच सिंचने। मुञ्च सिञ्च मुञ्चतम् सिञ्चतम् मुञ्चत सिञ्चत क्षिप प्रेरणे। क्षिप किर क्षिपतम् किरतम् क्षिपत किरत लिख लिखने। लिख मन्यस्व कृन्त कर्तने। कृन्ततम् कृन्तत मिल मिलने। कृ विकिरणे। मिलतम् मिलत मनु ज्ञाने व्य वेधने। विध्य रच रचने तनु. विस्तारे धनुर्वेदसंहिता। लिखतम् मन्प्याम् विध्यतम् लिखत मन्यध्वम् विध्यत गण संख्याने। रचय गणय रचयतम् गणयतम् तनुतम् रचयत गणयत भुजपालनाभ्यव- हारयोः। भिदिर विदारणे । या प्रापाणे. भिन्धि याहि भुधि भिन्तम् यातम् भुङ्क्तम् भिन्त यात मुक्त अद् भक्षणे। जागं निद्राक्षये। विश प्रवेशने आद्धि जागृहि विश अत्तम् जागृतम् विशतम् जागृत विशत उपसर्गयोगे प्रवेशनाथै विहायैवं रूपाणि उपविश उपविशतम् उपविशत, इति धातुपाठः।
भाषाटीकासमेता। (९७) अथैतेषामुदाहरणक्रमः। कोटं वेष्टयत कोटेप्रविशत,कोटमुपरि यात, अश्वानुपर्यारोहत, अश्वांश्चारयत, अश्वान् जलं पाययत, अश्वपतयो भल्लेनैव बाटिकाभोजनं पाचयत, जलं पिबत, द्विजातयश्चणकानं चर्व- यत, तथा जलं पिबत, जलाभावे शीतली- कुरुत, अश्वानारुह्य धावत, पदातयः समीकं परवाहिनीं यात, खरैः कृन्तत, भल्लैर्विध्यत, रंजकदंशितं दहत, कपाटे कुन्तैस्त्रोटयत, वटिका आयान्ति निपतत, दुष्टान् कुन्थत, डम- रंवादयत, गीतं गायत, वामपाधैं अयत, दक्षि- णपार्श्वे इत,सपदि व्रजत, शनैर्बजत, अनुव्रजत, अग्रे व्रजत, तूष्णी भवत, भीरूस्त्यजत, शू- रान विध्यत, चर्मणा वटिका स्न्ध,रंजकं दत्त, उपाऽऽगच्छत, दूरं गच्छत, शेध्वम्, जाग्रत, वस्त्राणि परिधापयत,कटिबधीति,शस्त्राणिधा- रयत, प्रधनाथै गच्छत,पदातयोऽग्रे,अश्वपतय, पश्चात्, गजारूढास्तदनु, रथिनोन्तिमस्थाः, (९८) धनुर्वेदसंहिता। पदातयस्तिष्ठत समीके, अश्ववाराः प्राच्यामि- त, गजपाः पश्चिमे चलत। धावनप्रकारः। अश्वेषु पल्याणमारोपयत, प्रग्रहम् प्रतिहत, अंकुशेन हस्तिनं रुन्ध,अश्वेष्वारोहयत,हस्तिप- का ध्वजान्गृहीत,अश्वपतयो युद्धयत, अनश्चै भारं वहत,उष्ट्रीरोद्रहनं विदधत, उष्ट्रपका उ- ष्ट्रान्नयत, अश्वपा मेहत, सारथिनः शकटेषु व- स्तूनि स्थापयत, वृषभान योजयत, चलत, दा- शाः कबंधान दोलासु क्षिपत, व्रणसहितानपि, सूर्यटष्टगाश्चलत, सूर्यदक्षिणगाश्चलत, वायु- पृष्ठगाश्चलत, वायुदक्षिणगाश्चलत, चन्द्राभिमु- खाश्चलत, चन्द्रवामगाश्चलत॥ अन्यच्च। ऋजवः संप्रयात आलीटम्, प्रत्यालीढम् चलत, तिष्ठत. प्राङ्मुखाः, प्रत्यङ्-मुखा, अवाङ्मुखाः, उत्तरा- स्याः,आग्रेय्याम्,वायव्याम,नैर्ऋत्याम,ऐशान्या भाषाटीकासमेता। (९९) म्,एकस्य प्रत्यकएको गच्छतु,पूर्ववत्,कमला- काराः,व्यलीककमलाकाराःधनुरारोपणम्, तो- लनलस्तकं गृहाण, प्रहारम्, अवहारम् भुशु- ण्डीलक्ष्यम्, अस्त्राघातं, संहारास्त्रम्, नृपाभि- मुखाः प्रणम्य गच्छत, श्वःश्वः शिविरम्, सन्ध्याकालो जातो युद्धेनालम् ॥१॥ अन्यः। धनुराकाराः, उत्तिष्ठत, चलत, निपतत, धावत, मारयत, शेध्वम्, भवत, पतत, कुस्त, चेतत, गच्छत, अयत, तिष्ठत,शृणुत, पश्यत, दत्त, गृहीत, पृच्छत, ब्रूत,भक्षयत,पिबत इच्छ- ताजानीत, आनुत, कुन्थत, त्यजत, हत, शिष्ट, इत, वित्त, स्त, दत्त, रुन्ध, अजत, व्रजत, क्रा- म्यत, दहत, मेहत, नयत, मायत, क्रीडत, ज- यत, कृषत, मुंचत, सिंचत, कृन्तत, क्षिपत, कि, रत, मिलत, लिखत, मन्यध्वम्, विध्यत, रच- यत, गणयत, तनुत, मुङ्क्त, भिन्त,यात, अत्त, जागृत, रोहत, उपविशत, इति सेनानीपाठः॥
(१००) धनुर्वेदसंहिता। अथावश्यकाऽव्ययानाम्पाठः। 'आङ्-मा, नो-आम्, बाढम्, अद्य, सायम्, प्रा- तः, श्वः, ह्यः, परश्वः, अन्येयुः, उभयद्युः, त्वम्, युवाम्, यूयम्, अहम्,आवाम, वयम्, संज्ञा,स:- तौ-ते अलम्, सपदि, तूर्णम्, उपरि, अधः,अ-प्र- अनु-उप-॥ पदातिक्रमः। समोच्चा द्विपदा ग्राह्या ह्यसमा न कदा- चन। कूदने धावने ये वै समास्ते कार्य- साधकाः॥ ५५ ॥ पश्चाद्मनं स्थिरी- करणं शयनं धावनं. तथा । चलनं परसेनायां पार्श्वदिक्षु च कारयेत् ॥ ५६ ॥ अर्थ-ऊँचाईमें एकसे हों ऊंचे नीचे न हों कूदने और भागनेमें समान जो हों वे कार्यसाधक हैं, इनको पश्चाद्- मन और स्थिरीकरण सिखाना अर्थात् पोछे को हटना और ठहरना, सोना,भागना,शत्रुकी सेनामें चलना पछवाड़ो में चलना करावे ॥५५॥५६॥ षष्ठस्थाने ग्रहा येषां क्रूराःपापाः पतन्ति हि.॥ ते. युद्धे युद्धयतां वीरानान्ये कार्यक- 1 - भाषाटीकासमेता। (१०१ रा यतः॥५७॥वभ धड छ क वर्णा ह्यादिमायां प्रकल्प्य तदनुहि अच अर्णा णादिकाः सर्वलेख्याः। उपरिगत भवां- स्वान्स्थाप्य सन्क्रिमेण भवति च युव- यस्या युध्यतां सा प्रसेना॥ अर्थ-जिनके छठे स्थानमें क्रूर रवि मंगल और पाप शनि राहु केतु ये पडेहों वे वीर युद्ध में लड़ें और कामके नहीं होते,. अथवा च-व-भ-ध-ड-छ-क-ये अक्षर पहिली सेनामें लिखे इसके पीछे स्वरवर्ण अकारादि सब लिखे पर व्यंजनों के स्वरों को क्रमसे स्थापित करे जिस सेना का युवास्वर हो वही प्रथम हो के लड़े ॥ उदाहरणम्। : यथा, विवस्वान्, भरत, धुन्धुमार,डित्थ, छत्रपति, कुक्षिा अर्थ-इन अक्षरों के नामवाले योषाओंको प्रथम सेना युवास्वरमें युद्ध ठानें तो जीते ॥ १॥ अस्या वस्त्राणि पीतानि ध्वजा पीता च तद्वति । युद्धयूपस्तथा प्रीतश्चर्तुरस्रांक संयुतः॥५८॥ ...
(१०२) धनुर्वेदसंहिता। अर्थ-इसके पीले वस्त्र, पीली झंडी-वैसाही युद्ध यज्ञका वडा झण्डा जहां गाडाजाय वहां सेना ठहरे। चौकोर चिन्हका ॥१८॥ श्वेतरक्तहरित्कृष्णा चान्यासेना हि त्वादि- वत् । कर्तव्या पार्थिवैर्नित्यं जयलाभ- सुखेच्छुभिः॥ ५९॥ अर्थ-हेविश्वामित्र! जय और लाभ सुखके वास्ते पहिली सेनाका जैसा क्रम है उसकी नाई चार सेना चाहनेवाले राजाओंको श्वेत, लाल, हरी, और काले रंगवाली करनी. चाहिये॥१९॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्यों यथा- क्रमम् । अधीशाः पंच सेनानां विज्ञयाः शृणु गाधिज ॥६॥ अर्थ-हे विश्वामित्र !ब्रह्मा विष्णु २ रुद्र ३ चन्द्र ४ सूर्य ५ ये पांच देवता पांच सेनाओंके स्वामी हैं॥६॥ ब्रह्मा रुद्रबले जीयाद्विष्णुश्चन्द्रबले जयेत्। रुद्रःसूर्यबलं प्राप्य चन्द्रो ब्रह्म- बलं युधि ॥६१॥ सूर्यों विष्णुबलं लव्ध्वा जयच्चैव न संशयः। अर्थ-ब्रह्माजी महादेवका बल पाकर जीतते, विष्णु चन्द्रमाके बलमें जीततेहैं, और रुद्रजी सूर्यका बल पाकर भाषाटीकासमेता। (१०३) जीततेहैं, चन्द्रमा ब्रह्माकेबलसे युद्धमें जीततेहैं, सूर्यनारायण विष्णुके बलको पाकर जीततेहैं, इसमें संदेह नहीं॥६॥ अब्रह्मा विष्णुरी रुद्र उश्चन्द्रस्त्वे च भास्करः। ओ ज्ञेयःपार्थिवैर्नित्यं जन्य- शास्त्रविचक्षणैः॥६॥ (अ) ब्रह्मा (इ) विष्णु (उ) रुद्र (ए) चन्द्र (ओ), सूर्य, युद्धशास्त्रके चतुर राजाओंने जानना ॥ १२ ॥ प्राप्य स्खं स्वं बलं सेनाःपूर्वोक्ता युद्धगा यदि । क्षणार्धन अरीन्सर्वान्मारयंतीति रुद्रवाक् ॥६३॥ अर्थ-पहिले कही हुई सेना यदि अपना २ बल पाकर युद्धको जाय तो आधी २ क्षणमें सब शत्रुओंको मारें, यह महादेवजीकी वाणी है ॥१३॥ इतिपदातिक्रमः। अथाश्वक्रमः। मण्डलं चतुरस्रं च गोमूत्रं चार्द्धचन्द्र- कम् । नागपाशक्रमेणैव भ्रामयेत्कटपंच- कम् ॥६॥ अर्थ-गोलाकार- चौकोर-गोमूत्राकार- अर्धचन्द्राकार ! (१०४) धनुर्वेदसंहिता। और नागपाश क्रमसे घोड़की कवायद करानेसे वह फिर कहीं नहीं अटकता भ्रमावे ॥६॥ ...RIED गोल चौकोर 1.MAHIla ............ गोमूत्राकार अर्दचन्द्र नागपाश इन पाँच गतियोंसे जो घोडोंको फिरा लेगा उसका घोड़ा कहीं नहीं अटकेगा॥६५॥ इत्यश्वक्रमः।
भाषाटीकासमेता। (१०५) अथहस्तिक्रमः। (कार्यम्) गजानां पर्वतारोहणम्, जलभ्रमणम्- धावनम्, उत्थानम्, उपविशनम्, अलातचक्रादिभिर्भीतिवारणम् कार्यम् । अर्थ-हाथियोंका, पहाडोंपर चढ़ाना, जलमें चलना भागना, उठना, बैठना, अग्निचकादिकोंसे भय दूरि करना सिखावे ॥६४॥ अलातचक्ररूपम्। - इति गजक्रमः। रथः। स्थाश्वसाधनंतु समादिस्थले विधेयम् ॥ अर्थ-रथके घोडोंको समआदि स्थल में अभ्यास करना चाहिये। इति रथक्रमः।
(१०६) धनुर्वेदसंहिता। अथ सेनापतिकरणविधि वक्ष्यामः । शृणु भो राजर्षे विश्वामित्र ! आकार- विद्याबलयुक्तं क्षत्रियं सेनापतिं विदध्यात् तस्यैते नियमाः समस्तवाहिनीमेकाकार दृष्टयावलोकयत् अन्यच्च सर्वान्पदातीन परिश्रमसदृशमधिकारं दद्यात् व्यूहरच- नायामतिनिपुणश्च भवेत् स एव सेना नीविधेय इति । अर्थ-अब सेनापति करनेकी विधि कहतेहैं. सुनो. हे राजऋषि विश्वामित्र ! आकारविद्या और बलसे जो युक्त हो ऐसे क्षत्रियको सेनाध्यक्ष करै, उसके ये नियम हैं सारी सेनाको एकसम दृष्टिसे देखे और सब पैदल आदि परिश्रमके सदृश अधिकार (ओहदा) दे, और व्यूहरचनामें अति- चतुर हो यही सेनानी करना चाहिये । अथ शिक्षा। तत्रादौ पठनपाठनविधिबूमः। आदौ क्षात्रकोश- व्याकरणसूत्राण्यध्येतव्यानि । द्रावध्यायौ सप्तमाष्टमौ मनोमिताक्षराव्यवहाराध्यायश्च जयार्णवविष्णुयामलविजयाख्यस्वरशास्त्रा भाषाटीकासमेता। (१०७) ण्यपराणिच पठितव्यानि ततः सरहस्य धनुर्वेदमापठेत्। अर्थ-अब पठनपाठनकी विधि कहते हैं, पहिले क्षात्रकोश व्याकरण सूत्र पढ़ने चाहिये दो अध्याय सातवां और आठव मनुका तथा व्यवहाराध्याय मिताक्षराधर्मशास्त्र, जयाणव, विष्णुयामल, विजयाख्यतंत्र और स्वरशास्त्र पढ़ने चाहिये, इनको पढकर रहस्यसहित धनुर्वेद गुरुसे पढ़े ॥ हन्तव्याऽहन्तव्योपदेशः। सुप्तं प्रसुप्तमुन्मत्तं ह्यकच्छं शस्त्रवर्जितम्। बालं स्त्रियं दीनवाक्यं धावन्तं नैव घात- येत् ॥६५॥ अर्थ-अब किसको मारना चाहिये, और किसको नहीं, सोये हुयेको, गादनिद्रामें सोतेहुएको और नशा पिये हुएको, जिसका धोती वा लंगोट खुलगया हो उसको, जिसके पास हथियार न होवे उसको, तथा बालक अ- र्थात् बारह वर्षसे कम अवस्थावालेको सजनस्त्रीको और जो दीन वचन बोले उसको, रण छोड़के भागतेहुएको, धर्मात्मा न मारे॥६५॥ धर्मार्थ यस्त्यजेत्प्राणान्कि तीर्थं श्वजपै- (१०८) धनुर्वेदसंहिता। श्व किम् । मुक्तिभागी भवेत्सोवै निरयं नाधिगच्छति ॥६६॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा स्त्रीणांबालवधेषु च। प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ६७ ॥ इति श्रीमहर्षिवसिष्ठप्रणीता वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता समाप्ता. अर्थ-देविश्वामित्र । धर्मके अर्थ जो प्राणोंको छोड़े उस- को तीर्थ और व्रतोंसे क्या है, वह स्वर्ग और मोक्ष पाताहै नरकमें नहीं जाता और जो ब्राह्मण गऊ स्त्री वालक इनके लिये प्राण देताहै, वह मोक्षका भागी होताहै ॥६६॥६७॥ - इति श्रीवासिष्टीधनुर्वेदसंहिताहरितगोत्रोद्भव स्वामि रामरक्षपालविरचित भाषाटीकासमेता संपूर्णतामयासीत् ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालय-वंबई. -4
No text on this page.