Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jaintatvy Kaleika Vikash
Front matter
प्रस्तावना । जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को याहार, निद्रा भय, मधुन और परिग्रह की आशा लगी रहती है और उनकी खोज के लिए दत्तचित्त होकर क्रियाओं में प्रशत्ति की जाती है। ठीक उसी प्रकार दर्शन विषय में भी खोज की प्रत्ति होनी चाहिए । यावत्काल पर्यन्त दार्शनिक विषय में खोज नहीं की जाती तावत्कालपर्यन्त आत्मा स्वानुभव से भी वंचित ही रहता है। इस स्थान पर दर्शन नाम सिद्धान्त तथा विश्वास का है। जब तक किसी सिद्धान्त पर दृढ़ विश्वास नहीं होता तबतक आत्मा अभीष्ट कियात्री की सिद्धि में फलीभूत नहीं होता। अव यहा यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, किस स्थान (सिद्धात ) पर दृढ विश्वास किया जाए, क्योंकि, इस समय अनेक दर्शन दृष्टिगोचर हो रहे हैं । इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि, यद्यपि वर्तमान काल में पूर्वकालवत् अनेक दर्शनों की सृष्टि उत्पन्न हो गई है वा हो रही है, तथापि सब दर्शनों का समवतार दो दर्शनों के अन्तर्गत हो जाता है। जैसे, प्रास्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन । यदि इस स्थान पर ये शंका उत्पन्न की जाए कि, नास्तिक मत को दर्शन क्यों कहते हो ? तव इस शंका के समाधान में कहा जाता है दर्शन शब्द का अर्थ है विश्वास (दृढता) सो जिस प्रात्मा का मिथ्याविश्वास है अर्थात् जो श्रात्मा पदार्थों के स्वरूप को यथार्थ दृष्टि से नहीं देखता है, उसीका नाम नास्तिक दर्शन है, क्योंकि, नास्तिक दर्शन आत्मा के अस्तित्वभाव को नहीं मानता है सो जय प्रात्मा का अस्तित्वभाव ही नहीं तो फिर भला पुण्य और पाप किस को तथा उसके फल भोगनेरूप नरक, तिर्यक् , मनुष्य और देव योनि कहाँ ? अत एव निष्कर्ष यह निकला कि नास्तिक मत का मुख्य सिद्धान्त ऐहलौकिक सुखों का अनुभव करना ही है । यद्यपि इस मत विषय बहुत कुछ लिखा जा सकता है तथापि प्रस्तावना में इस विषय में अधिक लिसना समुचित प्रतीत नहीं होता। सो यह मत आर्य पुरुषों के लिये त्याज्य है, क्योंकि, यह मत युक्ति बाधित और प्रमाणशून्य है। अतएव आस्तिकमत सर्वथा उपादेय है, इस लिये नास्तिक मत के आश्रित होना आर्य पुरुपों का परमोद्देश्य है । क्योंकि, आस्तिक मत का मुख्योद्देश्य अनुक्रमतापूर्वक निर्वाण प्राप्ति करना है। यदि इस स्थान पर यह शंका उत्पन्न की जाए कि, आस्तिक किसे कहते है। तव इस शका के उत्तर में कहा जाता है कि, जो पदार्थों के अस्तित्वभाव को मानता है तथा यों कहिये कि, जो पदार्थ अपने द्रव्य गुण और पर्याय में अस्तित्व रखते है, उनको उसी प्रकार माना जाए वा उनको उसी प्रकार से मानने वाला आस्तिक कहलाता व्याकरण शास्त्र मे आस्तिक शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार से कथन की गई है, जैसे कि- दैष्टिकास्तिकनास्तिकाः (शाकटायन व्याकरण अ. ३ पा २ सू० ६१) दैष्टिकादयस्तदस्येति षष्टपर्थे ठणन्ता निपात्यन्ते । दिष्टा प्रमाणानुपातिनी मतिरस्य दिष्टं देव प्रमाणमिव मतिरस्थति दैष्टिक । अस्ति परलोक पुण्य पापमिति च मतिरस्येत्यास्तिक । एव नास्तीति नास्तिक । - .
समर्पण। HERE -- श्रीमद् गणावच्छेदक वा स्थविरपदवि- भूषित स्वर्गीय श्रीश्रीश्री स्वामी गणपति राय जी महाराज! आप की महती कृपा से इस दास को जैन धर्म की प्राप्ति हुई है, आपने ही इस दास को जैनतत्त्वों का अभ्यास कराया था। अतः आप के सद्गुणों में मुग्ध होता हुआ और आप के अपार उपकारों का स्मरण करता हुआ इस ग्रन्थ को आप के कर- कमलों में सादर समर्पण करता हूँ। मैं का है उपाध्याय जैनमुनि आत्माराम ।
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राय साहिव लाला रघुवीरसिंह जैन
धन्यवाद। जैन तत्त्व कलिका विकास के प्रकाशन का कुल व्यय श्रीमान् राय साहिब लाला रघुवीर सिंह जी ने प्रदान किया है जिसके लिये हम समस्त जैन जाति की ओर से उनका हार्दिक धन्यवाद करते है । आपका जन्म २३ जनवरी सन् १८८४ को हुआ था । आप एक सुप्रसिद्ध खानदान कानूनगोयां कस्वा हांसी के है । आपके पिता लाला शेरसिंह जी हांसी के प्रसिद्ध माल- गुजार थे और बहुत समय म्युनिसिपल कमेटी हांसी के उपप्रधान (घायस प्रेजीडेंट) रहे । श्राप एक अच्छे जैलदार गिने जाते थे। अापके पितामह (दादा) ला० रणजीत सिंह जी भी चिरकाल तक कस्टम डिपार्टमेंट में अच्छे अच्छे पदों पर नियुक्त रहे । पिछले दार ताजपोशी के समय आप देहली में नायब तहसीलदार थे और तत्पश्चात् अम्बाले में बहुत दिनों तक श्राप SVO रहे । अम्बाला दिगम्बर जैन सभा के श्राप प्रधान भी रहे । वहां पर श्रापको जैनधर्म वा स्वधर्मी भाइयों की सेवा का अच्छा अवसर मिला । आप हर एक की उन्नति का विशेष ध्यान रखते थे । श्रापकी योग्यता का लक्ष्य रखकर गवर्नमेंट ने श्रापको शिमला के निकटवर्ती अर्की रयासत का मैनेजर बनाकर भेजा । प्रजा के हितार्थ अापने वहा अनेक कार्य किए और अच्छी प्रशंसा प्राप्त की। तत्पश्चात् गवर्नमेंट ने आपको नालागढ़ रियासत का वज़ीर बनाकर भेजा। वहां के शासन को दृढ़ता के साथ न्याय पूर्वक चलाकर प्रजा को सन्तुष्ट किया और रियासत की माली हालत को अच्छा बनाया। जनता के हित के लिये आपने नालागढ़ में बहुत सारे कार्य किए। और उनके लाभ के लिए बड़ी बड़ी इमारते वनवाई। जैनधर्म के मुख्य सिद्धान्त 'अहिंसा' का श्राप सदैव सुचारू रूप से पालन करवाते थे । जैनियों के सर्व प्रधान संव- न्सरी पर्व के आठ दिनों मे आपने राजाशा से उक्त रियासत में शिकार खेलना और मांस भक्षणादि करना तथा कसावखाना वगैरह सव वन्द करा दिए थे। आप के कार्य से सन्तुष्ट होकर सन् १६२४ में सरकार ने श्रापको राय साहिव के टाइटिल (पदवी) से विभूपित किया। तत्पश्चात् मिंटगुमरी, रोहतक, मियांवाली व लुधियाने मे आप अफसर माल रहे । जव श्राप लुधियाने में थे तव आपको श्रीश्रीश्री १००८ गणारच्छे- ।
श्रीः विषयानुक्रमणिका प्रथमा कलिका ३ विपय पृष्ठसंख्या विपय पृष्ठसंख्या मङ्गलाचरण भगवान के पञ्चांस नामो की सर्वशात्मा त्रिकालदर्शी होता है व्याख्या ३६ तीर्थदर गोत्र बांधने के वीस बोल ८ जैनमत की श्रास्तिकता का वर्णन ४१ चौतीस अतिशयों का वर्णन १८ सिद्ध परमात्मा का वर्णन पैतीस वचनातिशयों का वर्णन २६ चौवीस तीर्थङ्करों का सविस्तर अठारह दोपी का वर्णन वर्णन अष्ट महाप्रातिहार्यों का वर्णन ३६ | तीर्थदरो के नगर मातापिता श्रा- भगवान के बारह गुणों का वर्णन ३७ दि के कोष्ठक ५६ ३० द्वितीया कालका धर्मदेव का वर्णन पूर्वक प्राचार्य छह आवश्यकों का वर्णन १३३ के छत्तीस गुणो का वर्णन ६२ श्राहार के ४२ वयालीस दोपों का सात नयो की व्याख्या ७३ वर्णन १३४ पद् दर्शनो का वर्णन ८५ साधु के सत्रहवें (१७)गुण से लेकर प्राचार्य के छत्तीस गुणो की समाप्ति ८८ छव्वीस गुणों तक का वर्णन १३७ प्राचार्य की पाठ संपदाएँ सूत्र साधु के वाईस परीपहों का वर्णन १४० पाठ युक्त तथा उपाध्याय साधु के सत्ताईसवे गुण का वर्णन १४३ पच्चीस गुणों का वर्णन ८८ | साधु की लब्धिऍ आदि का वर्णन १४४ वारह अंगो की व्याख्या ११२ सतरह (१७)भेद संयम का वर्णन१४६ साधु के सत्ताईस गुणो मे सेसोलह दस यति-धर्मों का वर्णन १५१ गुणों का वर्णन १२३ के Dram- TAMIUILERYTIMEXICROIRIREDIRE (imml जिस महात्मा के चित्र का दर्शन करके पाठक जन अपने हृदय तथा नेत्रो को पवित्र कर रहे हैं उन का शुभ नाम है "श्री १००८ गणावच्छेदक वा स्थविरपद-विभूपित श्रीमद् गणपतिरायजी महाराज श्रापका जन्म स्यालकोट जिला के अन्तर्गत पसरूर नामक शहर में श्रीविक्रमाद १६०६ भाद्रपद कृष्ण तृतीया मंगलवार के दिन त्रिपंखिया गोत्रीय (काश्यपगोनान्तर्गत) लाला गुरुदास मह श्रीमाल की धर्मपत्नी श्रीमती गोर्या की कुरि से हुआ था श्रापके निहालचन्द्र १ लालचन्द्र २ पालामल ३ पंजुमल चार नाता थे और निहालदेवी : पाली देवी २ और तोती देवी ३ ये तीन भगिनियां थीं। भापका शैशव काल बड़े ही भानन्दपूर्वक व्यतीत हुधा और युवावस्या प्राप्त होने पर नूनार ग्राम में वि संवत् १६२४ में श्रापका विवाह संस्कार हुमा । श्राप सराफ़ी की दुकान करने nir... HParaane ----" TODoraemonxx । ३ ) अपने नानाके घर पसरूर में ही रहते थे। यह और अन्य कतिपय गृहस्थ वैराग्य भाव को धारण कर अपने जीवन को पवित्र बनाने के लिये धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगे। फिर परस्पर के ससर्ग से सय का ही वैराग्य भाव यस्ता चला गया । जय सव ने यह ही क्रिया धारण करली तय सयको प्राज्ञा मिल गई । दीक्षाविपय । कुटुम्पियों से आज्ञा प्राप्त होते ही प्रसनता पूर्वक सबके सब दीक्षा के लिए शहर से चल पडे, उन दिनों में श्री श्री श्री १००८ श्राचार्य वर्य श्री पूज्य अमरसिंह जी महा- राज अमृतसर में विराजमान थे । श्री दूलोराय जी १ श्री शिवदयाल जी २ श्री सोहन- लाल जी ३ श्री गणपतिराग जी ४ ये पारों वैरागी पुरुप धी पूज्य अमरसिह जी महाराज के चरण कमलों में उपस्थित होगए । तर श्री पूज्य ( थाचार्य ) महाराज ने चारों को अपने श्रमूल्य उपदेश द्वारा और भी वैराग्य भाव में हर किया । सांसारिक पदार्थों की अनित्यता दिखलाई । जब उन चारों महापुरुषों का वैराग्य भाव उच्च कोटि पर पहुच गया तब श्री पूज्य महाराज ने उन चारो महापुरुषो को १६३३ मार्गशीर्ष शुका ५ चन्द्रवार के दिन बडे समारोह के साथ दीक्षित किया। उन दिनों में श्री पूज्य मोतीराम जी महाराज नालागढ़ में विराजमान थे। तव श्री पूज्य अमरसिह जी महाराज ने श्री गणपतिराय जी महाराज को श्री पूज्य मोतीराम जी महाराज की निश्रीय कर दिया । तय श्रापने उसी दिन से अपना पवित्र समय ज्ञान और ध्यान में लगाना प्रारम्भ किया। जब आप श्री पूज्य मोतीराम जी महाराज के चरणों में उपस्थित हुए तब श्राप - साधु किया और श्रुताध्ययन विशेष रूप से करने लगे। विशेष ध्यान प्रापका साधु क्रिया और वैयावृत्य वा गुरु भक्रि पर था जिस कारण शीघ्र ही गच्छ वा श्री संघ में श्राप सुप्रसिद्ध होगए। श्राप की सौम्याकृति, नम्रता, साधुभकि प्रत्येक व्यक्ति के मन को मुग्ध करती थी । दीर्घदर्शिता और समयानुसार वर्ताव ये दोनों बात आप की अनुपम थी। तत्पश्चात् आपने निम्नलिखित अनुसार चातुर्मास किये जैसे कि-- १९३४ का चतुर्मास आपने श्री पूज्य मोतीराम जी के साथ अम्बाला जिले के अन्तर्गत खरड़ शहर में किया। १९३५ का चतुर्मास आपने बहुत से क्षेत्रो में विचर कर स्यालकोट में किया । १६३६ का चतुर्मास मापने श्री पूज्य महाराज के साथ जम्बू शहर मे किया । १६३७ का चतुर्मास पसरूर शहर में किया। १६३८ का चतुर्मास लुधियाना शहर में किया। 8-सम्बत् ११३८ में श्रीमदाचार्य श्री १००८ पूज्य भमरसिह जी महाराज का अमृतसर में स्वर्गवास हो गया था तब भी सपने १९३६ में मालेरकोटला म श्री मोतीराम जी । KEEXXCAREKODAMADXEXCriwariwwxxx TAX 11 --- ODI - दी । उस समय श्री श्री श्री १००८ स्वामी लालचन्द्र जी महाराज भी पटियाले में ही विराजमान थे। श्राप प्राचार्य पद देने के पश्चात् अम्याला और साढौरा की मोर विहार कर गये। फिर आप साढौरा, श्रम्याला, पटियाला, नाभा, मलेरकोटला, रामदेकोट, फीरोज़पुर, कसूर, लाहौर होते हुए गुजरांवाले में पधार गए । यहां पर रावलपिंटी वाले श्रावकों की अत्यन्त विज्ञप्ति होने से फिर मापने रावलपिंडी की ओर विहार कर दिया । मार्ग में वज़ीरायाद, कुंजाह, जेहलम, रोहतास, कल्लर, में धर्मोपदेश देते हुए भाप रावलपिंडी में विराजमान होगये । १६५८ का चतुर्मास पापने अपने मुनि- परिवार के साथ रावलपिंदी शहर में ही किया। इस चतुर्मास में धर्मप्रचार बहुत ही हुधा । इसके अनन्तर श्राप धनुफम से धर्मप्रचार करते हुए स्यालकोट मे पधार गए । वहां पर भी अत्यन्त धर्मप्रचार होने लगा, वहां के श्रावकवर्ग ने प्रापको चातु- मांस विषयक विज्ञप्ति की। फिर भाप श्री जी ने श्रावकवर्ग का अत्यन्त भाग्रह देख. कर उनकी विज्ञप्ति को स्वीकार कर १६६० का चतुर्मास स्यालकोट का मान लिया। बीच का शेप काल अमृतसर, जम्यू प्रादि क्षेत्रों में धर्मप्रचार करके १९६० का चतुर्मास स्यालकोट में आपने किया। चतुर्मास में बहुत से धर्मकार्य हुए। धतुर्मास के पश्चात् श्राप थमृतसर पधारे। यहां पर थी पूजप सोहनलाल जी महाराज वा मारवाड़ी साधु श्री देवीलाल जी महाराज वा अन्य साधु वा आर्यिकाये भी एकत्र हुए थे। उन दिनों में बहुत सी उपाधिये भी वितीर्ण हुई थी, । उसी समय आपको "गणावच्छे- दक" वा "स्थविर" पद से विभूपित किया गया था। इसके पीछे श्रापने वहां से विहार कर दिया। किंतु आपको श्वास रोग (दमा) प्रादुर्भूत होगया । जिस कारण बहुत दूर विहार करने में बाधा उत्पन्न होगई। तब मापने १९६ का चतुर्मास फरीद. कोट शहर मे कर दिया। १६६२ का चतुर्मास आपने पटियाले में किया। १९६३ का अम्बाला शहर में किया । तब आपके साथ चतुर्मास से पूर्व मारवाड़ी साधु भी कितना काल विचरते रहे। १६६४ का चतुर्मास मापने रोपड शहर में किया। इस चतुर्मास मे जैनेतर लोगो को धर्म का बहुत सा लाभ पहुंचा । नागरिक लोग भापकी सेवा में दत्तचित्त होकर धर्म का लाभ विशेष उठाने लग गये। किंतु श्वासरोग (दमा) का कई प्रकार से प्रतिकार किये जाने पर भी वह शान्त न हुभा। श्रतएव आपको कई नगरो के लोग स्थिरवास रहने की विज्ञप्ति करने लगे, कितु धापने उनकी विज्ञप्ति को स्वीकृत नहीं किया। अपने प्रारमचल से विचरते ही रहे। कई बार आपको मार्ग मे वा प्रामो में श्वासरोग का प्रबल पेग (दौरा) होगया, जिस कारण आपकी शिप्य मंडली को परन की डोली RamixCODAAMREKATREEKCORDI) मे गच्छ ADDEDICAPHYADRI ICCORDIXOAD CXROM COM LuN NAAM IMA 1) am- . - XXX ने कहा (Ruta Town ( ७ ) श्री म०-इस समय तो प्रचंड वायु आदि का भी कोई उत्पात नही तो फिर पयो कर गिर जायगा? पुरुप-यूं भी गिर जाया करता है तब श्री महाराज वा अन्य साधु उठ कर अन्यत्र गये । तब उस पुरुष फि-आप शीघ्रता न करें, पहले अपना उपकरण उठाले, फिर यह गिरेगा। तब साधुयो ने शान्तिपूर्वक उपकरण उठाकर अन्य स्थान पर रख दिये और श्राप शान्ति- पूर्वक बैठ गये । इतना कह कर वह पुरुप अरश्य होगया, और उसी समय उस वृत की महती (बडी) शाखा जो उस पुल पर फैली हुई थी अकस्मात् गिरी, जिस से पुल का मार्ग ही पद होगया। शासा के गिरते (टूटते) समय इतना भयंकर शब्द हुआ कि जो श्रावकवर्ग दर्शन करके सराय की श्रोर जा रहा था, उनको भी सुनाई पडा । तब वे लोग बहुत ही शीघ्र श्रीमहाराज के दर्शनों के लिये फिर उसी स्थान पर गए । दर्शन करके बहुत ही धानदित हुए। जब उन्होंने उक्न वृत्तान्त को सुना तव उनके हर्ष का पारावार न रहा फिर वे धन्य २ करते और आपकी स्तुति करते हुए पुन. वापिस चले गये। एक समय आप नाभा से विहार कर पटियाले की ओर जा रहे थे, तब श्राप को एक जंगल में चीता (शेर की प्राकृति का हिसक पशु) मिला, श्राप उस को देखकर निर्भीक खड़े हो गए । तब वह थाप को देसकर शान्ति-पूर्वक श्राप के पास से गुजर कर जगल की ओर ही चला गया। यह सब श्राप के सयम और शान्ति का ही माहात्म्य था क्योंकि प्रत्येक प्राणी के साथ आप को निवैरता थी, उसी का यह माहाम्य था । निवरता के ही कारण हिंसक जीव भी श्रापके प्रति निर्वैरता का ही परिचय देते थे । अग्यालर के चतुर्मास का वृत्तान्त है कि-एक समय वर्षा होने के पश्चात् मध्याह काल में शहर से बहुत दूरी पर श्राप मुनियो के साथ वाहिर गए । जब आप अपनी नत्यिक क्रियाओं से निवृत्त होकर शहर की और पधार रहे थे, तब मार्ग मे श्राप,को साप मिला। वह भी आप के साथ ही साथ चलने लगा। इस प्रकार आपके सा चलता था, जिस प्रकार आप का शिष्यवर्ग शाप के साथ गमन करता था। जब आप मार्ग परिवर्तन करने लगे, तव श्रापने फरमाया कि-ऐसे न हो इसे कोई मार डाले। इतना वाक्य आप के मुख से सुनते ही वह सांप आप के देखते ही देखते एक झाड मे प्रविष्ट होगया। पश्चात् नाप शहर में पधार गए । यह सब शान्ति, काही माहात्म्य था कि जो हिसक जीव भी आप के साथ भगता का ही परिचय देते थे । फीरोजपुर शहर में भी ऐसी ही एक घटना,हुई थीं। जब भाप नैत्यिक क्रियाओं से निवृत्त होने Town Tama . XXXIO KICKoinx + (0 । (. - A.Am mARNA Az EXNIXE - -RAN . A -- (६) Xxxxxxxxx DynamaARAKOOKIOKIG ROO मथुरा दास जी मोगानियासी की सम्मस्यनुसार श्राप श्रीको साधु वसा की डोली बना कर मोगा मंडी में लेगए। डाक्टर साहय ने बड़े प्रमे से श्राप की शाखा का प्रतिकार किया श्राप श्री जी की दोनों श्राखों से मोतिया निकाला गया। श्रापकी दृष्टि ठीक होगई, फिर श्रापली जी को उसी प्रकार साधु वस की टोली में बैठा कर लुध्याना में ही ले आए । श्राप श्री जी के लुध्याना में विराजने से नगरनियासी प्राय., प्रत्येक जन को प्रसन्नता थी। जिस प्रकार जैन संघ पाप की भात्रि में दत्तचित्त था उसी प्रकार जनेतर लोग भी श्रापकी भक्ति करके अपने जविन को सफल मानते थे। पाप का प्रेमभाव प्रत्येक जन के साथ था। इसी कारण प्रत्येक अन्यमतावलम्बी भी श्रापको पूज्य दृष्टि से देखता था और दर्शन करके अपने आप को कृतकृत्य समझता था । यह आपके सत्योपदेश का ही फल है जो लुध्याना में 'जैनकन्या पाठशाला' नाम की संस्था भली प्रकार से चलरही है। श्रनुमान सवा दोसौ २२५ कन्याएं शिक्षा पारही हैं। इस पाठशाला मे सां. सारिक शिक्षा के अतिरिक्ष कन्याओं को धार्मिक शिक्षा भी भली प्रकार से दी जारही है। पन्जाव प्रान्त में, स्थानकवासी जैनसमाज में यह एक ही पाठशाला है । इस का सुप्र- बन्ध और नियमपूर्वक संचालन इस के कर्मचारी भली प्रकार से कर रहे हैं। श्रापके वचन में एक ऐसी थलौकिक शनि थी, जो प्रत्येक जन को हितशिक्षा प्रदान करती थी। श्राप के मधुर वाक्य स्वल्पायर और गभीरार्थ होते थे । सदैवकाल थाप पारमविचार तथा मौनवृत्ति से समय विशेष व्यतीत करते थे । आपकी प्रत्येक वार्ता शिक्षा प्रद थी। कालगति बडी विचित्र है। यह किसी का ध्यान नहीं करती कि-यह धर्मात्मा है या पा- पिष्ट । यही गति स्वामी जी के साथ हुई । १६८८ ज्येष्ट कृष्ण २५. शुक्रवार के दिन स्वामी जी ने पातिक प्रत किया। वृद्धावस्था के कारण आप को खेद तो रहा ही करताथा, किन्तु पारने के दिन शनि- वार को श्राप को वमन और विरेचन लग गए, जिस से श्राप अत्यन्त निर्बल होगए, तब सायकाल श्राप ने अन्य साधुओं से कहा कि मुझे अनशन करादो, उस समय साधुओं ने श्राप को सागारी अनशन करा दिया । उस समय आप ने पालोचना द्वारा भली प्रकार श्रात्मविशुदि की और सब जीवों के प्रति अन्तःकरण से धमापन किया । रविवार के दिन आपने औपध को छोड़ कर फिर सागारी अनशन कर दिया । रविवार को १२ बजे के पश्चात् श्राप की दशा चिताजनक होगई । सायकाल फिर आपने चार श्राहार का त्याग करदिया। सोमवार प्रात काल जब डाक्टर और वैद्य ने श्राप को देखा तो निश्चय हुआ कि-नव दशा विशेष चिताजनक होगई है, तब श्रापको निरागार यावजीव पर्यन्त अनशन कराया गया । श्राप शान्ति से लेटे हुए थे, और आप के पास साधुवर्ग या भावकवर्ग बैठा हुआ था जो आपको सूत्रपाठ सुना रहे थे । जब YCARDXYamuDAY atma रम HD * जैनतत्त्वकलिकाविकास-पूर्वार्द्ध * नमोत्थुणं समणस्स भगवत्रो महावीरस्स । से केपट्टेणं भंते ? एवं बुच्चइ देवाधिदेवा देवाधिदेवा ! गोयमा ! जे इमे अरिहंना भगवतो उप्पन्ननाणदंसणधरा तीयपडापन्न मणगया जाणया रहा जिणा केवली सव्वएणू सव्वदरिसी से तेणठेणं जाव देवाधिदेवा २ ॥ भगवती सूत्र-शतक १२-उद्देश ६ । अंधयारे तमे घोरे चिठन्ति पाणिणो बहू । को करिस्सइ उज्जोयं सव्वलोयम्मि पाणिणं ।। उग्गो विमलो भाणू सन्चलोय पभंकरो । सो करिस्सइ उज्जोयं सचलायम्मि पाणिणं ।। भाणूय इ इ के बुत्ते केसीगोयममव्यवी । केसिमेवं बुवंतं तु गोयमो इणमव्ववी ॥ उग्गो खीणसंसारो सव्वन्नू जिणभक्खरो। सो करिस्सइ उज्जोयं सच लोयम्मि पाणिणं ।। उत्तराध्ययन सृन-अध्ययन २३ भावार्थ-श्रीगौतम स्वामी श्री भगवान् महावीर स्वामी से विनय पूर्वक प्रश्न करते है कि हे भगवन् ! देवाधिदेव किस कारण से कहे जाते है इस प्रश्न के उत्तर में श्रीभगवान् प्रतिपादन करते है कि-हे गौतम ! जो यह अर्हन्त भगवन्त उत्पन्न ज्ञान दर्शन के धरने वाले है अतीत काल और वर्तमान तथा भविष्यत् काल के जानने वाले है अर्हन्त रागद्वेप के जीतने वाले सर्पूण शान के धरने वाले जो सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है इसी कारण से उन्हें देवाधिदेव कहा जाता है । तथा केशी कुमार श्रमण श्री गौतम गणधर से प्रश्न पूछते है कि-हे गौतम ! इस भयंकर घोर अंधकार मे बहुत से प्राणी ठहर रहे है सो कौन सर्वलोक में उक्त प्राणियों को उद्योत करेगा? इस के प्रतिवचन में गौतम स्वामी कहने लगे कि हे भगवन् ! उदय हुश्रा निर्मल सूर्य सर्वलोक में प्रकाश करने वाला सो सर्वलोक में उक्त प्रकार के प्राणियों को उद्योत करेगा। इस प्रहेलिका रूप प्रश्न को स्पष्ट करते हुए फिर श्रीकशी कुमार श्रमण ( ३ ) वे सर्व श्रीभगवान् के शान से बाहिर नहीं अपितु वे तीनों काल के पर्यायों को हस्तामलकवत् जानते और देखते है । यदि ऐसे कहा जाए कि-"सर्वज्ञ" शब्द तोमानना युक्तिसंगत सिद्ध होता है किन्तु त्रिकालवेत्ता मानना युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि-त्रिकालवेत्ता मानने मे दो आपत्तियां उपस्थित होजाती है ! जैसे कि-पक तो यह है कि-जब कोई वस्तु उत्पन्न ही नहीं हुई तो भला फिर उसका देखना वा जानना किस प्रकार सिद्ध हो सकता है ? द्वितीय जव सर्वज्ञ ही मान लिया तब फिर उस को त्रिकाल- वेत्तामानना परस्पर विरोध रखता है क्योंकि-सर्वश को एक रसमय का ज्ञान होता है वह ज्ञान परिवर्तनशील नहीं होता किन्तु त्रिकालवेत्ता का ज्ञान परि- वर्तनशील मानना पहेगा जैसे--पदार्थ परिवर्तनशील हैं और वे क्षण २ में नूतन वा पुरातन पर्यायों के धारण करने वाले हैं सो जव पदार्थों की इस प्रकार की स्थिति है तव ज्ञान भी उसी प्रकार का मानना पड़ेगा क्योंकि-शान पदार्थों का ही होता है अतएव सर्वज्ञ के साथ त्रिकालवेत्ता शब्द का विशेपण लगाना युक्तिसंगत सिद्ध नहीं होता है। इस शंका का समाधान इस प्रकार से किया जाता है कि-जैसे "नीलो- त्पल" शब्द मे 'नील' शब्द 'उत्पल' शब्द का विशेषण माना जाता है तथा "सम्यग्ज्ञान" शब्दमें शान शब्दका सम्यग् शब्द विशेपण माना गया है ठीक तद्वत् सर्वज्ञ शब्द का त्रिकालवेत्ता शब्द विशेषण रूप है इस लिये इसमें कोई भी आपत्ति उपस्थित नहीं होती है क्योंकि-सर्वज्ञ प्रभु का ज्ञान तो सर्व काल में एक ही रसमय होता है किन्तु जिस व्यक्ति की अपेक्षा से वह शान मे उस व्यक्ति की दशा को जानते और देखते हैं उसकी अपेक्षा से ही उन्हें त्रिकालदर्शी कहा जाता है जैसे कि-व्याकरण शास्त्र मे कालद्रव्य एक होने पर भी उस के दशों लकारों द्वारा भूत भविष्यत् और वर्तमान रूप तीन विभाग किये गए है। इस में कोई भी संदेह नहीं है कि-जो व्यक्ति जिस समय जिस देश में विद्यमान होता है उसका तो वह वर्तमान काल ही होता है परन्तु उस व्यक्ति को भूत काल में होनेवाले जीव भविष्यत् काल में रखते हैं और भविष्यत् काल में होने वाले जीव उस को भूत काल में रखेंगे। परंच काल द्रव्य तीनों विभागों में एक रसमय होता है सो जिस प्रकार काल द्रव्य एक होने पर व्यक्तियों की अपेक्षा तीन विभागों में किया गया है ठीक उसी प्रकार सर्वज्ञ प्रभु के ज्ञानविषय में भी जानना चाहिए अर्थात् शान में किसी प्रकार से भी विसंवाद नहीं हो सकता किन्तु जिस प्रकार वह मान में पदार्थों के स्वरूप को देखते है वे पदार्थ उसी प्रकार होते रहते है। जो यह शंका उत्पादन की गई थी कि-जो वस्तु अभी तक हुई नहीं।
( ५ ) "इमं कम्मं श्रयं जीवे" ति अनेन द्वयोरपि प्रत्यक्षतामाह केवलित्वादहत , "अझोवगमियाए 'त्ति 'प्राकृतत्वादभ्युपगमः-प्रमज्याप्रतिपत्तितो ब्रह्मचर्य- भूमिशयनकेशनुचनादीनामङ्गीकारस्तेन निर्वृता प्राभ्युपगमिकीतया "वेय- इस्सइ" त्ति भविष्यकालनिर्देशः भविष्यत् पदार्थों विशिष्टशानवतामेव ज्ञेयः अतीतो वर्तमानश्च पुनरनुभवद्वारेणान्यस्यापि शेयः संभवतीति मापनार्थः "उव- कमियाए" त्ति उपक्रम्यतेऽनेनेत्युपक्रमः-कर्मवेदनोपायस्तत्रभवा औपक्रमि- की -स्वयमुदोर्णस्योदोरणाकरणेन वोदयमुपनीतस्य कर्मणोऽनुभवस्तया औपक्रमिक्या वेदनया वेदयिष्यति, तथाच 'अहा कम्म' ति यथाकर्म-बद्धमा- नतिक्रमेण 'हा निगरण ति निकरणानां-नियतानां देशकालादीनां करणानां- विपरिणामहेतूनामनतिक्रमेण यथायथा तत्कर्म भगवता दृष्टं तथा तथा विपरि- स्यतीति, इति शब्दो वाक्यार्थसमाप्ताविति ॥ इस पाठ का यह सारॉश है कि-श्रीभगवान् अपने शान में यह भली प्रकार से जानते और देखते हैं कि यह जीव वाहिर के निमित्तो द्वारा कर्म वेदेगा और यह जीव स्वयं उदय होने योग्य कर्मों की उदीरणा करने से कर्मों का अनुभव करेगा कारण कि-कर्म दो प्रकार से वर्णन किये गए है जैसे कि-एक तो प्रदेश कर्म और द्वितीय अनुभाग कर्म सो जो प्रदेश कर्म होते हैं वे श्रात्म प्रदेशों के साथ क्षीर नीरवत् श्रोत प्रोतरूप होकर पक रूप से रहते है वह तो अवश्यमेव भोगने मे आते है किन्तु जो अनुभाग कर्म हैं वे अनुभव करने में प्रा भी सकते है नही भी प्रासकते जैसे-मिथ्यात्व के क्षयोपशमकाल मे अनुभाग कर्म से फल नहीं अनुभव किया जाता अपितु प्रदेश कर्म अवश्य- मेव भोगने में आते है सो जिस प्रकार श्रात्म प्रदेशों द्वारा कमाँ का बंध हो चुका है फिर जिस देश कालादि में उन कर्मों के रस का अनुभव करना है वा जिस प्रकार से जिस निमित्त से कमों के फल भोगने हैं सो जिस प्रकार अर्हन भगवान् ने अपने ज्ञान में देखा है वह उसी प्रकार परिणत होवेगा अर्थात् तीनों काल के भाव जिस प्रकार ज्ञान मे देखे गए है वे भाव उसी प्रकार होते रहेगे क्योंकि- केवल ज्ञान विशद शान होता है सो इस सूत्र पाठ से सर्वज्ञ प्रभु को त्रिकाल- दर्शी युक्तिपूर्वक सिद्ध किया गया है। अतएव त्रिकालदर्शी शब्द किसी अमुक पदार्थ की अपेक्षा से ही कथन किया गया है जैसे—यह अमुक जीव अमुक देश काल मे अमुक कर्मो के फल का अनुभव करेगा किन्तु श्री भगवान् का केवलशान तीनो काल में एक रसमय रहता है। यदि ऐसे कहा जाए कि- ज्ञानात्मा रूप सर्वज्ञ प्रभु जव तीनो काल के भावो को हस्तामलकवत् अघ- लोकन करते है तो फिर जीव की स्वतंत्रता जाती रही और पुरुपार्थ करना भी व्यर्थ ही सिद्ध होगा क्योकि-जो भिगवान् ने ज्ञान में देखा हुआ है ( ७ ) मेव भोगने हैं। श्रतएव उन कमाँ के फलादेश के समय दोनों नयों का अवल- म्वन करना चाहिये । जैसे कि-जव अशुभ कर्म उदय में श्राजाएं तव निश्चय के अवलम्बन से चित्त मे शांति उत्पन्न करनी चाहिये । और व्यवहार नय के आश्रित होकर शुभ कर्मों की ओर प्रवृत्ति करनी चाहिए तथा कर्मक्षय करने के लिये चेष्टाएँ करनी चाहिए। सर्वश प्रात्मा का शान सर स्थानों पर व्याप्त हो रहा है अर्थात् वे अपने ज्ञान द्वारा तीनों काल के भावों को यथावत् हस्तामलकवत् देखते हैं इस बात पर पूर्ण विश्वास रखकर निकृष्ट कर्मों से बचना चाहिए । क्योंकि-लोक- व्यवहार में देखा जाता है कि-यावन्मात्र अशुभ कर्म है उनको प्रायः लोग गुप्त ही रखने की चेष्टा करते है और अपने अन्तःकरण में यह भाव भी उत्पन्न करते है कि हमारी-अनुचित क्रिया को कोई देख न ले तथा जान न ले यदि अनुचित क्रियाएँ करते समय कोई अन्य व्यक्ति अकस्मात् उस स्थान पर श्रा भी जावे तब वे अनुचित क्रियाएँ करने वाले व्यक्ति उस स्थान से भाग निकलते है अर्थात् वे अनुचित क्रियाएँ गुप्त ही करने की इच्छा रखते है । इसी न्याय से जब अर्हन् प्रभु वा सिद्ध भगवान् अपने ज्ञान द्वारा तीनो काल के भावों को जानते और देखते है तो फिर किसी स्थान पर भी अनुचित क्रियाएँ न करनी चाहिए। वास्तव में-सर्वज्ञात्मा के मानने का यही मुख्य प्रयोजन है जब उसको मानते हुए भी अनुचित प्रवृत्ति की जा रही है तो फिर इससे सिद्ध हुआ कि-नाम- मात्र से ही उसको सर्वज्ञ और सर्वदर्शी माना गया है परंच अन्तःकरण अनु- चित क्रियाओं की ओर ही झुका हुआ है। विचार करने की बात है जव चर्म-चतुओं का इतना भय माना जाता है तो फिर सर्वज्ञात्मा का अन्तःकरण में भय क्यों नहीं माना जाता । अतएव सिद्ध हुश्रा कि-अर्हन् वा सिद्ध भगवान् का ज्ञान सर्व स्थानों को यथावत् भाव से देख रहा है इस बात को ठीक मान कर पाप कर्मों से निवृत्ति कर लेनी चाहिए । क्योंकि-सूर्यवत् ज्ञान द्वारा प्रकाश करने वाले सर्वज प्रभु ही है उन्हीं के सत्योपदेश द्वारा भव्यात्मा अपना कल्याण कर सकते है । अतएव उन्हीं के उपदेश द्वारा भव्य प्राणियों को सुमार्ग मे स्थापन करना चाहिए जिससे कि-वे मोक्षसाधन के पात्र बने । इतना ही नहीं किन्तु अनेक आत्माओं को भी सुमार्ग में लाएँ। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-किन २ क्रियाओं द्वारा अहन पद की प्राप्ति हो सकती है । इस के उत्तर में कहा जा सकता है कि-शास्त्रों में उक्ल पदकी प्राप्ति के लिये बीस स्थान वर्णन किये गए हैं अर्थात् वीस प्रकार की । - (६) सर्वलोकालोक को हस्तामलकवत् देख रहे हैं जिनको आत्मिक अनंत सुख की प्राप्ति हो रही है इसी कारण से वे अात्मिक सुख में निमग्न है यदि तीनों काल के देवों के सुख के समूह को एकत्र किया जाए तो वह सुख मोक्षा- त्मा के सुख के सन्मुख अनंतवे भाग मात्र भी नहीं है क्योंकि-सांसारिक सुस पुद्गल-जन्य है: और मोक्ष का सुख अात्मिक सुख है सो जब पौद्गलिक सुख को मोक्ष के सुख के साथ तुलना की जाती है तब वह सुख उस सुख के सामने अनंत भाग मात्र भी प्रतीत नहीं होता जैसे-दो बालक अपनी कक्षाओं में परीक्षा देकर चले आए और वे दोनों अपनी परीक्षा के फल की प्रतीक्षा किये जा रहे हैं। एक समय की बात है कि उन दोनों वालकों में से एक बालक अति स्वादिष्ट और मन को प्रसन्न करने वाला सुन्दर भोजन कर रहा है, और दूसरा वालक उसके पास बैठा हुआ है परंच भोजन करने वाला बालक अपने सुन्दर भोजन में श्रानन्द मानता हुश्रा अपने सहचर का उपहास भी करता जाता है । इस प्रकार की क्रियाएं करते समय दोनों के फलादेश के पत्र उसी समय श्रागए परन्तु जो बालक भोजन में श्रानन्द मान रहा था उसके पत्र में यह लिखा हुआ था कि-तुम इस वार्षिक परीक्षा मे श्रव की वार उत्तीर्णता प्राप्त न करसके सो शोक है इत्यादि । किन्तु द्वितीय पत्र मे यह लिखा हुआ था कि हे प्रियवर! श्रापको कोटिशः धन्यवाद है आपको शुभ समाचार दिया जाता है कि आप अपनी कक्षा में प्रथमांक में उत्तीर्ण होगए है इत्यादि।जव पहिले पत्र के लेख को भोजन करने वाले वालक ने पढ़ावह भोजन के श्रानन्द को सर्वथा भूल कर शोक दशा को प्राप्त हो गया इतना ही नही किन्तु अपमृत्यु के कारणों को ढूंढने लग गया। जब दूसरे वालक ने अपने पत्र को पढ़ा वह श्रानन्द की सीमा को भी उल्लंघन करने लगा। अब हम पोद्गलिक सुख वा ज्ञान के सुख की तुलना करसकते हैं कि-दोनों का परस्पर कितना अन्तर है, सो सिद्धात्मा अात्मिक सुख मे निमग्न है सो सिद्ध प्रभुके गुणों में अनुराग करने से तथा गुणोत्कीर्तन करने से जीव तीर्थकर नाम की उपार्जना कर लेता है। ३ प्रवचन-श्रीभगवत् के उपदेशों का जो संग्रह है उसी का नाम प्रवचन है सो उस प्रवचन की भक्ति करना अर्थात् ज्ञान का सत्कार करना जो नास्तिक आत्मा सर्वशोक्न उपदेश की आशातनाएं करने वाले है उन को हित-शिक्षाओं द्वारा शिक्षित करना जिससे वे श्राशातना फिर न कर सकें तथा जिनवाणी के सदैव गुणोत्कीर्तन करते रहना, जैसे कि हे श्रार्यो ! यही परमार्थ है, शेप यावन्मात्र संसारी कार्य है वे अनों के ही उत्पादन करने वाले हैं, अतः प्रवचन प्रभावना करने से आत्मा उक्त कर्म की उपार्जना कर लेता है। ४ गुरु-सत्योपदेष्टा श्रीभगवत् के प्रतिपादन किये हुए धर्म के अनुकूल कर्म की उपार्जना करलेता है, क्योंकि-जव मति ज्ञानादि में पुनः २ उपयोग दिया जायगा तव पदार्थों का यथावत् स्वरूप जाना जायगा जिस का परिणाम यह होगा कि- प्रात्मा शान समाधि मे निमग्न हो जायगा । समाधि का फल उक्त लिखित स्वाभाविक होता ही है, अतएव स्त्री-भक्त-राज्य-देश-विकथादि छोड़ कर सदैव काल शान में ही उपयोग लगाना चाहिए, क्योंकि-जो आत्मा ज्ञान में उपयोग लगाने वाले होते है उनके श्रगान का क्षय होने से साथ ही क्लेशों का भी क्षय हो जाता है, जैसे-वायु के होने पर ही जल में वुवुदों के उत्पन्न होने की सम्भावना की जा सकती है ठीक तद्वत् फ्लेश के क्षय होने से चित्तसमाधि सदा के लिये स्थिरता पकड़ जाती है सो चित्त समाधि के लिये पुनः २ शान में उपयोग देना चाहिए तथा समाधि के ही माहात्म्य से उक्त कर्म की उपार्जना की जा सकती है। ६ दर्शन-सम्यक्त्व का धारण करना, क्योंकि-यावत्काल सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होती तावत्काल संसार के छूटने का उपाय भी नहीं कियाजाता सम्यक्त्व का अर्थ पदार्थों के स्वरूप को ठीक २ जानना ही है तथा देव गुरु और धर्म पर पूर्ण निश्चय करना मिथ्यात्व सम्बन्धी क्रियाओं से पीछे हटजाना इतना ही नहीं किन्तु सम्यग्दर्शन द्वारा अनेक प्रात्माओं को संसार पथ से विमुक्त कर मोक्ष पथ में लगादेना तथा यावत्काल-पर्यन्त सम्यक्त्व धारण नहीं किया जायगा तावत्कालपर्यन्त प्राणी संसार चक्र के बन्धन से पृथक् नहीं हो सकता जैसे एक अंक विना यावन्मात्र विंदु होते हैं वे शून्य ही कह जाते हैं ठीक उसी प्रकार सम्यक्त्व के विना यावन्मात्र क्रिया-कलाप है वह मोक्ष-पथ के लिये शून्य रूप है । अतएव सिद्ध हुआ कि सम्यक्त्व का धारण करना आवश्यकीय है यदि एक मुहूर्त मात्र भी सम्यक्त्व का प्रात्म-प्रदेशों के साथ स्पर्श होजाए तव आत्मा उत्कृष्टता से देशोनअर्द्धपुद्गल परावर्त्त करके मोक्ष पासकता है। वा यावन्मात्र आत्मा मुक्त हुए है वे सर्व इसी के माहात्म्य का फल है। सो सम्यक्त्व के शुद्ध पालने से आत्मा तीर्थकर नाम गोत्र की उपार्जना कर लेता है। १० विनय---मति ज्ञान १ श्रुतज्ञान २ अवधिज्ञान ३ मनःपर्यवशान ४ और केवल ज्ञान ५ इन पांचों ज्ञानों की विनय भक्ति करना तथा गुरु आदि की विनय करना और अर्हन्तादि की अाशातना न करना कारण कि-विनय करने से आत्म विशुद्धि होती है और अहंकार के भावों का क्षय हो जाता है जव अहंकार भाव जाता रहा तव श्रात्मा समाधि के मार्ग में लग जाता है तथा " विनय शब्द कर्त्तव्य परायणता का भी वाची है जिसने व्रतों को धारण किया हुआ है उन व्रतों (नियमों) को निरतिचार पालन करना वास्तव में उसी का नाम (१३) । की शक्ति उत्पादन कर लेता है अतएव शीलवतों को निरतिचार ही पालना चाहिए। १३ क्षणलव-क्षण और लव यह दोनों शब्द काल के वाचक है, सो क्षणलय में संवेगभावना ध्यानासेवन के द्वारा भी उन कर्म बांधा जासकता है। इसका सारांश यह है कि-क्षण २ में संवेगभाव धारण करना चाहिये तथा अनित्यादि भावनात्रों द्वारा अपना समय व्यतीत करना चाहिए । इतना ही नहीं किन्तु धर्मध्यान चा शुक्लध्यान द्वारा पूर्वोपार्जित कर्मों की निर्जरा कर देनी चाहिये । कारण कि-पुरातन कर्मों के क्षय करने के यही पूर्वोक्त उत्तम मार्ग है । सो इन्हीं के सेवन से अपना पवित्र समय व्यतीत करना चाहिये, सो जब श्रात्मा में सवेगभाव उत्पन्न हो जायगा तव अनित्यादि भावनाएं और शुभ ध्यान सहज में ही प्राप्त किये जा सकते है। श्रतएव यदि क्षणलव शुभ क्रियाओं द्वारा व्यतीत किए जायेगे तव क्षयोपशम-भाव द्वारा तीर्थकर नाम गोत्र कर्म के बन्ध की प्राप्ति हो जाती है। इस कथन से यह भी सिद्ध हुए विना नहीं रह सकता कि-समय व्यर्थ न खोना चाहिये अपितु धर्मक्रियाओ द्वारा समय सफल करना चाहिये । जैसे वैतनिक पुरुप का समय वेतन के साथ वृद्धि पाता रहता है, ठीक तद्वत् धर्मी पुरुष का समय धर्म क्रियाओं द्वारा सफल हो जाता है। १४ तपः-जिस प्रकार अग्नि श्राई इंधन वा शुष्क इंधन को भस्म कर देती है ठीक उसी प्रकार यावन्मात्र कर्म किये हुए हैं, वे सर्व तपकर्म द्वारा क्षय किये जा सकते है । अतएव प्रत्येक प्राणी को तप कर्म के आश्रित होना चाहिए, और फिर इसी तप क्रिया से अनेक प्रकार की प्राौपधि नामक ऋद्धिएं उत्पन्न हो जाती है, और आत्मा का तेज विशाल हो जाता है वा आत्म-तेज द्वारा जीव सर्वज्ञ और सर्वदर्शी बन जाता है, अतएव तप करना अत्याव- श्यकीय है। तथा बहुत से शारीरिक रोग भी तप कर्म से उपशान्त हो जाते है, जब आत्मा नीरोगावस्था में होता है, तव समाधि श्रादि की कियाए भी सुखपूर्वक साधन की जा सकती है तथा अनेक प्रकार के भयकर कष्टों से तपकर्म द्वारा जीव रक्षा पाते है। सो वाह्य और श्राभ्यन्तर दोनों प्रकार के तप-कर्म द्वारा उक्त कर्म का निवन्ध किया जा सकता है, सो यथाशक्ति तपकर्म करने का अवश्यमेव अभ्यास करना चाहिए। १५ त्याग-दान-क्रियाओं से उक्त कर्म का निवन्धन किया जा सकता है सो यति आदि को उचित दान देने से उन कम करने का निवन्धन करना चाहिए । यद्यपि-दान के अनेक प्रकार से भेद वर्णन किए गए है, तथापि सब से बढ़ कर श्रुतविद्या का दान माना जाता है। क्योंकि- और दानों से तो ऐहलौकिक वा ( १५ ) . को समाधि में मानने लग जाता है, किन्तु यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो वह समाधि क्षणस्थायी सिद्ध होती है क्योंकि-द्वितीय क्षण में उस व्यक्ति की फिर वही दशा हो जाती है ठीक उसी प्रकार पदार्थों के विषय में भी जानना चाहिए। जैसे कि-जव अभीष्ट पदार्थ की उपलब्धि हो जाती है तब उस समय वह अपने श्रात्मा को समाधि में मानने लग जाता है और जब फिर उसकी इच्छा उत्पन्न हो जाती है तब फिर उसके पास जो विद्यमान पदार्थ है वह उसके श्रात्मा को समाधि-प्रदान करने समर्थ नहीं रहता। अतएव द्रव्य समाधि क्षणस्थायी कथन की गई है द्वितीय भाव- समाधि है जो तीन प्रकार से प्रतिपादन की गई है। जैसे कि ज्ञानसमाधि, दर्शन- समाधि और चारित्रसमाधि।सो ज्ञानसमाधि उसका नाम है जो ज्ञान में श्रात्मा को निमग्न कर देता है। क्योंकि जिस समय ज्ञान में पदार्थों का यथावत् अनुभव किया जाता है, तव श्रात्मा में एक प्रकार का अलौकिक आनन्द उत्पन्न हो जाता है। सोवह प्रानन्द का समय समाधिरूप ही कहा जाता है। इसी प्रकार दर्शन- विषय में भी जानना चाहिए । क्योंकि-जय पदार्थों के जानने में वा जिनवाणी में दृढ़ विश्वास किया जाता है, तव शंकादि के उत्पन्न न होने से चित्त में सदैव समाधि बनी रहती है। यदि उस को कोई देव विशेप भी धर्मक्रियानों से चा धर्मसिद्धान्त से विचलित करना चाहे तो उसका श्रात्मा इस प्रकार-दृढ़ होता है, जैसे कि सुमेरु पर्वत है। अर्थात् उसका अात्माधर्म पथ से विचलित हो ही नहीं सकता है। तृतीय चारित्रसमाधि उस का नाम है जो श्रुतानुसार क्रियाएं करनी है तथा गुरु आदि की यथावत् श्राज्ञा पालन करनी हैं । जव स्थविरादि की यथावत् श्राशा पालन की जाती है, तब अपने चित्त तथा स्थविरादि के चित्त को शांति होने से प्रात्मा में समाधि की उत्पत्ति हो जाती है, अतएव भावसमाधि उत्पन्न करके उक्त नाम गोत्रकर्म की उपार्जना कर लेनी चाहिए, क्योंकि-जव आत्मा में क्लेशादि के भाव उत्पन्न हो जाते है तव प्रात्मा में असमाधि की उत्पत्ति होने लग जाती है, जिस के माहात्म्य से अशुभ प्रकृतियों का बंध पड़ता जाता है फिर उसका अंतिम परिणाम दुःखप्रद होता है। १८ अपूर्वज्ञानग्रहण-अपूर्व ज्ञान के ग्रहण से भी उक्त कर्म का निबंधन किया जा सकता है-इस अंक कातात्पर्य यह है कि हेय शेय-और उपादेय के यथावत् स्वरूप को जो जानता है, उसी का नाम अपूर्व ज्ञान ग्रहण है तथा उक्त अंकों को हृदय में ठीक स्थापन करके फिर स्वसमय और परसमय के सिद्धान्तों का अवलोकन करना है उस समय यथार्थ ज्ञान के प्राप्त होने पर जो श्रात्मा में एक प्रकार का अलौकिक आनन्द रस उत्पन्न होता है वह अकथनीय होता है तथा नूतन २ ज्ञान के सीखने का अभ्यास निरंतर करते रहना उसी का नाम अपूर्व पवित्र करने के लिये चेष्टा करने लग जाती है। इसी वास्ते सूत्र में लिखा है कि- श्रुत की श्राराधना करने से अज्ञान और क्लेश दोनों का ही नाश हो जाता है क्यों- कि-लेश का होना अज्ञानता का ही माहात्म्य है, जव अशान नष्ट हो गया तव क्लेश साथ ही जाता रहा । अतएव सिद्ध हुश्रा कि-श्रुतभक्ति द्वारा उक्त कर्म के बन्धन से अनेक प्रात्माओं का कल्याण करके प्राणी मोन-गमन कर लेता - , २० प्रवचन प्रभावना-शास्त्र की प्रभावना करने से उक्त प्रकारका कर्म- बंधन किया जा सकता है, परंच शास्त्रप्रभावना यथाशक्ति सत्पथ के उपदेश करने से ही हो सकती है। क्योंकि-जव भव्य श्रात्माओं को पुन पुनः शास्त्र पढ़ाया वा सुनाया जाता है, तब वे भव्यात्मा शास्त्र में कथन किये हुए सत्य पदार्थों का अपने शुद्ध हृदय में अनुभव करते है अर्थात् अनुप्रेक्षा करते हैं; और उनके हृदय में उस शास्त्र की प्रभावना बैठ जाती है। अतएव श्रालस्य वा प्रमाद को छोड़ कर केवल भव्यात्माओं को शास्त्र-विहित उपदेश सुना कर प्रवचनप्रभावना करनी चाहिए। यह बात अनिवार्य मानी जासकती है, कि-जो बात अपने हृदय में निश्चय कर बैठाई जावे; यावन्मात्र उसका फल होता है तावन्मान किसी अन्य बलवान् के आदेश के द्वारा कार्य किये जाने पर नहीं हो सकता। जैसे-एक हिंसक पुरुप हिंसा के फल को ठीक समझ कर हिंसा-कर्म का परित्याग करता है, और एक पुरुष संवत्सरी श्रादि पवा में राजाज्ञा द्वारा उक्त कर्म से निवृत होता है। उन में यावन्मात्र फल स्वयं हिंसा के फल को जान कर त्यागने वाले को उपलब्ध हो सकता है तावन्मात्र फल जो राजाशा द्वारा कुछ समय के लिये हिंसा से निवृत्त होता है, उस व्यक्ति को नहीं हो सकता । कारण कि- उसका अन्तःकरण स्वयं निवृत्त नहीं है । अत. शास्त्रों द्वारा हर एक पदार्थ का फलाफल जान कर उससे निवृत्ति करनी चाहिए । सो इस प्रकार का बोध शास्त्र सुनने से ही प्राप्त हो सकता है, इसी लिये शास्त्रों का पठनपाठन श्रावश्यकीय प्रतिपादन किया गया है। सच्ची प्रभावना इसी प्रकार से हो सकती है । यद्यपि अाधुनिक समय में अनेक प्रकार से प्रभावना करने की प्रथाएं प्रचलित हो रही है, तथापि चे प्रभावनाएं प्रभावना का जैसा फल होना चाहिए था उस प्रकार का फल देने में असमर्थ सिद्ध होती हैं। प्रवचनप्रभावना जिस प्रकार हो सके, और जिस के माहात्म्य से जीव मोक्ष साधन के अधिकारी चन जावं, उस प्रभावना के द्वारा जीव तीर्थकर नाम गोत्र की उपार्जना करके फिर अनेक भव्यात्माओं को मोक्षाधि- कारी बना कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । जव जीव उक्त कारणों से तीर्थ- कर नाम गोत्र कर्म का निवन्धन कर लेता है तब वह स्वर्गादि में जाकर - । ( १६ ) रुधिर और मांस गो-दुग्ध के समान श्वेतवर्ण का होता है । यद्यपि रुधिर का वर्णन प्रायः रत ही कथन किया गया है, परन्तु उनके अतिशय के माहात्म्य से रुधिर वा मांस श्वेत वर्ण का होजाता है। यदि ऐसे कहा जाय कि यह प्रकृ- ति-विरुद्ध नियम किस प्रकार हो सकता है ? इसका समाधान यह किया जाता है कि यह प्रकृति-विरुद्ध नियम नहीं है, किन्तु यह एक पुण्यकर्म का उत्कृष्ट फलादेश है। क्योंकि-पुद्गल पांचवों में परिणत होता रहता है। जैसे जन्त्वागार में शुक वा मयूर श्वेतवर्ण के देखे जाते है किन्तु प्रायः मयूर नील वर्ण के ही होते हैं तथा उनकी पिच्छ अनेक प्रकार के वर्षों से चित्रित होती है, और ( तोते) प्रायः हरे वर्ण के होते है, परन्तु जव मयूर वा शुक श्वेतवर्ण के देखने में आते हैं तव उनमे पूर्वोक्त वाते नहीं पाई जातीं, तो क्या इन जीवों को प्रकृति-विरुद्ध माना जायगा? नहीं। इसी प्रकार महापुण्योदय से वा प्रकाशमय प्रात्मा होने सेतीर्थकर प्रभु के शरीर का रुधिर और मांस श्वेत प्रभा का धारण करने वाला होता है। क्योंकि-पुद्गल द्रव्य अनन्त पर्याओं का धारण करने वाला होता है। तथा कुछ २ व्यक्तियों में दुग्ध विषय में भी विवाद चलता रहता है। उनका कथन है कि-शरीरज होने से दुग्धभी एक प्रकार का रुधिर ही है, सो यह पक्ष नाड़ियों के पृथक् २ होने से अमान्य है, अतएव सिद्ध हुआ कि श्रीतीर्थफर देव के शरीर का रुधिर और मांस श्वेत वर्ण वाला ही होता है। साथ ही इसमें यह भी जानना उचित है कि यह कथन सापेक्ष है, और पुण्य कर्म की एक विलक्षणता दिखलाई गई है। ४ पउमुप्पलगंधिए उस्सासनिस्सासे । जिस प्रकार सुगंधमय द्रव्यों का तथा नीलोत्पल कमल का सुगंध होता है, उसी प्रकार का सुगंध उच्छ्वास और निश्वास द्वारा श्री भगवान् के वायु से श्राता है अर्थात् श्रीभगवान् का उच्छ्वास नीलोत्पल कमलवत् तथा सुगन्ध मय द्रव्यों के समान होता है। इस का कारण यह है कि उनके पुण्योदय से उनके शरीर का वायु प्रायः दुर्गन्धमय नहीं होता। यह उपमालंकार से कथन किया गया है। यदि ऐसे कहा जाय कि जब उनका शरीर अन्न के श्राधार पर ठहरा हुआ है, तो फिर उश्वास चा निश्वास उक्त प्रकार से किस प्रकार शुद्ध हो सकता है ? इस के उत्तर में कहा जाता है कि-प्रायः तैजस शरीर के मन्द पड़ जाने से उच्छ्वास और निश्वास में विकृति विशेप हो जाती है; उस से उन का तैजस शरीर मंदता का धारण करने वाला नहीं होता है, तथा समाधिस्थ आत्मा प्रकाशमय हो जाने से उसके अशुभ पुद्गल शुभ भाव के धारण करने चाले हो जाते है।
(२२) चलती है, जो श्रीभगवान् की सर्वमता को सूचित करने वाली है। ११ जत्थ जत्थ वियणं अरहंता भगवंता चिट्ठति चा निसीयंति वा तत्थ तत्थ वियणं तक्खणादेव (जक्खादेवा) संछन्न पत्त पुप्फ पल्लव समाउलो सछत्तो सज्झयो सघंटो सयडागो असोगवर पायवे अभिसंजायइ ॥ जिस २ स्थान पर श्रीभगवान् खड़े होते है वा बैठते है उसी २ स्थान पर तत्क्षण ही पत्र और पुप्पों से संच्छन्न और अंकुर युक्त तथा छत्र और ध्वजावा घंटा अथवा पताका संयुक्त प्रधान अशोक नामी वृक्ष उत्पन्न हो जाता है अर्थात् फल पुप्पों से युक्त तथा यावन्मात्र प्रधान वृक्षों की लक्ष्मी होती है उस लक्ष्मी से युक्त छत्र ध्वजा वा घंटा और पताका-संयुक्त अशोक नाम वाला वृक्ष भी उत्पन्न हो जाता है. जिससे श्रीभगवान् के ऊपर छाया हो जाती है। यह सव अतिशय कर्म-क्षय होने से ही उत्पन्न हो सकती है। कारण कि-जो तीर्थकर नाम गोत्र कर्म बांधा हुआ होता है; उसके भोगने के लिये उक्त क्रियाएं स्वाभाविक हो जाती है। यह सब धातिए कर्मों के क्षय करने का ही माहात्म्य है । १२ ईसिं पिठो मउडहाणंमि तेयमंडलं अभिसंजायइ अंधकारे वियणं । दस दिसाओ पभासेइ । पृष्ट के पिछले भाग में एक तेजोमंडल होता है, जो दसों दिशाओं में विस्तृत अंधकार का नाश करता है अर्थात् उस प्रभास मंडल के द्वारा श्री भगवान के समीप सदैव काल उद्योत रहता है। यह एक प्रकार की प्रात्म- शक्ति का ही माहात्म्य है, जिस के कारण से अंधकार का सर्वथा नाश हो जाता है १३ वहुसमरमणिज्जे भूमिभागे। जहां पर श्री भगवान् विचरते हैं वह भूमि भाग अत्यन्त सम और रमणीय हो जाता है। भूमि भाग की विषमता दूर हो जाती है, उसका सौदर्य अत्यन्त्य बढ़ जाता है। १४ - अहोसिरा कंटया जायन्ति ( भवंति)। और कंटक अधोसिर हो जाते हैं अर्थात् यदि मार्ग में कंटक भी पड़े हों तो वे भी अधोशिर हो जाते है । जिस कारण से वे पथ के चलने वालों को अपने तीपण स्वभाव से पीडित करने में समर्थ नहीं रहते । १५-उऊ विवरीया सुहफासा भवति । ऋतु के विपरीत होने पर भी सुखकारी स्पर्श रहता है अर्थात् अतु - वहां पर प्रगट हो जाते हैं। २१ पच्चाहरयो वियणं हिययगमणीयो जोयणणीहासिरो। श्रीभगवान् का व्याख्यान करते समय हृदय मे गमनीय और अति मधुर एक योजन प्रमाण स्वर (वाणी ) होता है अर्थात् श्री भगवान् का स्वर एक योजन प्रमाण होता है, जिस से श्रोताओं को उस स्वर द्वारा सुख पूर्वक ज्ञान हो जाता है। २२ भगवंचणं अद्धमागहीएं भासाए धम्ममाइक्खा । श्रीभगवान् श्रर्द्धमागधी भाषा में धर्म कथा करते हैं। प्राकृत र संस्कृत २ शौरसेनी ३ मागधी ४ पैशाची५और अपभ्रंश ६ यह पद भाषाएं है, इन में जो रसोलसीमागध्याम्" इत्यादि सूत्र मागधी भा । के वर्णन करने में श्राते है। उन लक्षणों से युक्त और प्राकृतादि से युक्त अर्द्धमागधी नाम वाली भाषा में श्रीभगवान् धर्म-कथा करते है २३ सावियणं अद्धमागही भासा भासिज्जमाणी तेसिं सव्योर्सि आरिय मणारियाणं दुप्पए-चउप्पय-मिय-पसु-पक्खि सरीसिवाणं अप्पणोहिय सिवसुहयभासत्ताए परिणमइ । वह श्रर्द्धमागधी भापा भाषण की हुई उन सर्व आर्य अनार्य द्विपद ( मनुष्य ) चतुप्पद ( गवादयः ) मृग (अटवी के पशु ) पशु ( ग्राम्य के पशु) पक्षी और सांप इन की आत्मीय भाषा में परिणत (तबदील) हो जाती है तथा वह अर्द्धमागधी भाषा अभ्युदय करने वाली मोक्ष सुख को देने वाली और अानन्द को देने वाली होती है। जिस प्रकार मेघ का जल एक रसमय होने पर भी भिन्न २ प्रकार के वृक्षों के फलों में भिन्न २ प्रकार से परिणत हो जाता है ठीक उसी प्रकार अर्द्धमागधी भाषा के विषय में भी जानना चाहिए । इस से यह भी सिद्ध किया गया है कि-श्रीभगवान् के अतिशय के माहात्म्य से आर्य अनार्य पशु पक्षी श्रादि श्री भगवान् के सत्योपदेश से लाभ उठाते थे तथा इस से यह भी ध्वनि निकल आती है कि-प्रत्येक प्राणी को उनकी भाषा मे ही शिक्षा का प्रवन्ध करना चाहिए; जिस से,वे शीघ्रता से चोध पासके २४ पुव्यवद्धवेरा वियणं देवासुरनागसुवएणजक्खरक्खसकिनर किंपुरिसगरुलगंधव्यमहोरगा अरहोपायमूले पसंतचित्तमाणसा धम्म नि- सामंति। श्रीभगवान् के समीप बैठे हुए देव, असुर, नाग, सुवर्ण, यक्ष ,राक्षस, किंनर, क्रिपुरुप, गरुड, गंधर्व महोरग इत्यादि देव गण पूर्वरद्ध वैर होने पर भी ( २५ ) का न होना अर्थात् राजा की ओर से प्रजा को किसी प्रकार से भी भय नहीं होता। ३० परचक्कं न भवइ । पर-राजाओं की ओर से भी कोई उपद्रव नहीं होता। क्योंकि-जिस समय स्वकीय और परकीय राजाओं की ओर से किसी उपद्रव होने की प्राशंका नही होती. उस समय प्रजा प्रसन्नता पूर्वक अपनी वृद्धि की ओर झुक सकती है। इतना ही नहीं किन्तु स्वेच्छानुसार वृद्धि कर सकती है। ३१ अइबुष्टि न भवइ । जिस देश में श्री भगवान् विचरते है उस देश में हानिकारक वृष्टि नहीं होती, क्योकि अतिवृष्टि होने से जन धन और कुलों का भी क्षय हो जाता है। लोक अति कष्ट में पड़जाते हैं। जनता प्राणों की रक्षा के लिये भी व्याकुल हो उठती है । सो श्रीभगवान् के पुण्योदय से देश में अतिवृष्टि होती ही नहीं। ३२ अणावुष्ठि न भवइ । अनावृष्टि भी नहीं होती। क्योंकि जिस प्रकार अतिवृष्टि से जनता को कष्ट सहन करने पड़ते है. ठीक उसी प्रकार वर्षा के प्रभाव से भी वे ही कष्ट उपस्थित हो जाते हैं। जिससे जन धन और कुल-क्षय होने की सम्भावना की जा सकती है । अतएव श्रीभगवान् के अतिशय के माहात्म्य से अनावृष्टि भी नहीं होती। अपितु धान्यों के वृद्धि करने वाली प्रमाण पूर्वक ही वृष्टि होती है। ३३ दुभिक्खं न भवइ । दुर्भिक्ष नहीं होता। क्योंकि-टुप्काल के पड़ जाने से अनेक प्रकार की विपत्तियों का जनता को सामना करना पड़ता है जिससे विद्या, बुद्धि तथा वल धर्मादि की गति ये सव मंद पड़जाते है, और सदैव काल भूख के सहन करने से प्राणों के रहने का भी सशय रहता है, और यावन्मात्र हानियां तथा उपद्रव उपस्थित होते हैं, उनका मुख्य कारण दुर्भिक्ष ही होता है तथा दुर्भित के कारण धर्म की गति अति मन्द पड़ जाती है। ३४ पुबुप्पण्णावियणं उप्पाइया वाही खिप्पमिव उपसमंति । पूर्व-उत्पन्न ज्वरादि रोग वा व्याधियों तथा अनिष्ट सूचक उत्पातों के द्वारा जो प्रजा को अशान्ति के उत्पन्न होने के लक्षण दीखते है, वे सब श्री भगवान् के अतिशय के माहात्म्य से उपशम होजाते है अर्थात् देश में सर्वथा शान्ति विराजमान रहती है । इसमे कतिपय अतिशय जन्म से ही होते हैं, और कतिपय दीक्षा के पश्चात् केवल ज्ञान होने पर प्रगट होते है, तथा कतिपय अतिशय भव-प्रत्यय और कतिपय देवकृत माने जाते हैं। परंच सव .
( २७ ) की प्राप्तता का घातक हो जाता है । अतएव सवर्श प्रभु के वाक्य पूर्वापर विरोध के प्रकट करने वाले नहीं होते, किन्तु स्याद्वाद सिद्धान्त के प्रकट करने वाले होते है अर्थात् सापेक्षिक वाक्य होते हैं। जैसे एक व्यक्ति को उसके पिताकी अपेक्षा पुत्र भी कह सकते हैं, और उसके पुत्र की अपेक्षा पिता भी कह सकते हैं। १० शिष्टत्वं-अभिप्रेत सिद्धान्तोन की शिष्टता का सूचक वाक्य अर्थात् जिस पक्ष को स्वीकार किया हुश्रा है उस सिद्धान्त की योग्यता का सूचक वाक्य होता है। ११ असंदिग्धत्वम्-श्रोताजनों के संदेह को दूर करने वाला वाक्य होता है तथा श्रोताजनों को किसी प्रकार से भीथी भगवत् की वाणी में संशय उत्पन्न नहीं हो सकता वा वाणी भ्रम युफ्त नहीं होती कि इन्होंने क्या प्रतिपादन किया है ? अतएव संदेह रहित वाक्य होता है। १२ अपहृतान्योत्तरत्वम्-वाणी में किसी के दूपणों का प्रकाश नहीं पाया जाता अर्थात् वाणी में किसी की निन्दा नहीं होती अपितु हेय-शेय- और उपादेय रूप विपयों का ही वर्णन होता है। नतु किसी की निन्दा का। १३ हृदयग्राहित्वम्-श्रोताओं के हृदयों को प्रिय लगने वाले वाक्य होते हैं। इसी कारण वे प्रसन्नता पूर्वक श्रीभगवान की वाणी का अमृतपान करते हैं। १४ देशकालाव्यतीतत्वम्-देश काल के अनुसार वाक्य होता है अर्थात् प्रस्तावोचितता उस वाक्य में पाई जाती है। क्योंकि जो वाक्य देश काल की सीमा को उल्लंघन नहीं करता, वह अवश्य हृदय ग्राही होजाता है। १५ तत्त्वानुरूपत्वम्-जिस पदार्थ के वर्णन का प्रारम्भ किया हुश्रा है, उसी कथन की पुष्टि करने वाले आगे के वाक्य होते हैं। जैसे-अहिंसा का प्रकरण चला हुआ है, तो यावन्मात्र वाक्य कहे जावेंगे, वे सब अहिंसा के सम्बन्ध में होंगे। न कि हिंसा सम्बन्धी। १६ अप्रकीर्णप्रस्तत्वम्-जिस प्रकरण की व्याख्या की जारही है, उसके अतिरिक्त अप्रस्तुत विषय का फिर उसमें वर्णन नहीं होता अर्थात् स्वपक्ष को छोड़कर अप्रस्तुत प्रकरण का वर्णन करना अपनी योग्यता सिद्ध करना है । सो प्रभु के वाक्य के वाक्य में इस प्रकार प्रस्तुत विषय का प्रकरण नितांत (विलकुल) नहीं होता।न श्रति सम्बन्ध रहित विस्तार ही होता है। १७ अन्योऽन्यप्रगृहीतत्वम्-परस्पर पदों की सापेक्षता रहती है। क्यों कि-यदि परस्पर पदों की सापेक्षता न रहे तो उस वाक्य से अभीष्ट सिद्धि की उपलब्धि नहीं हो सकती, श्रतएव पद परस्पर सापेक्षता रखने वाले ( २६ ) की शैली श्रीभगवान की प्रतिपादन की गई है। २६ विभ्रमविनेपकिलकिञ्चितादिविमुक्तत्वम्-यह वाक्य मनोदोष के दोपों से भी रहित होता है। जैसे-वक्ता के मन में भ्रांतता, और चित्त का विक्षेप रोप भयादि के भाव तथा प्रत्यनासलता इत्यादि मन के दोपों से वह वाक्य रहित होता है। क्योंकि- यदि उक्त मन के दोषों के साथ वाक्य उच्चारण किया जायगा तो वह वाक्य प्राप्त वाक्य नहीं कहा जा सकता । नाहीं उस वाक्य से यथार्थता से पदार्थों का वोध हो सकता है। ३० अनेकजातिसंश्रयाद्विचित्रत्वम्-वस्तु का स्वरूप विचित्रतासे वर्णन किया हुश्रा उस वाक्य से सिद्ध होता है। क्योंकि-श्रीभगवान् जिस पदार्थ का वर्णन करते है, उस पदार्थ का वर्णन नय और प्रमाण द्वारा वर्णन किये जाने पर अनेक प्रकार की विचित्रता उस वाक्य में पाई जाती है। ३१ अाहितविशेषत्वम्-वचनान्तर की अपेक्षा से ढौकिनता (हित शिक्षा का समुदाय ) विशपता से होती है अर्थात् श्रीभगवान् का परम पवित्र वाक्य प्राणी मात्र के हित का प्रकाशक होता है। ३२ साकारत्वम्-विच्छिन्नवर्ण पद वाक्य होने से उस वाक्य में श्राकारता पाई जाती है अर्थात् साकार वाक्य सौंदर्य का धारण करने वाला होता है। ३३ सत्वपरिगृहीतत्वम्--साहस भाव से युक्त अर्थात् निर्भयता का मुचक वाक्य होता है। ३४ अपरिखेदितत्वम्--श्रीभगवान् अनंत चल होने से धर्म कथा करते हुए खेद नहीं पाते, क्योकि-पोडश प्रहर पर्यन्त देशना करने पर भी श्रीभगवान् परिश्रम को प्राप्त नहीं होते अतएव धर्म कथा करते हुए उनको खेद कदापि नहीं होता। ३५ श्रव्युच्छेदित्वम्-यावत्काल पर्यन्त विवक्षित अर्थों की सम्यग् प्रकार से सिद्धि न हो जाए, तावत्काल पर्यन्त अनवच्छिन्न वचन प्रमेय होता है अर्थात् श्रीभगवान् जिस पदार्थ का वर्णन करने लगते हैं, उस की सिद्धि सर्व-नय और प्रमाणो द्वारा सर्व प्रकार से योग्यता पूर्वक कर देते है । सो यह सब अतिशय चार मूलातिशयों में ही अन्तर्भूत हो जाती है, जैसे कि-ज्ञानातिशय र पूजातिशय २ वागतिशय ३ और अपायापगमातिशय ४ किन्तु ये सब अतिशय उसी समय प्राप्त होती है जब कि-ज्ञानावरणीय कर्म १ दर्शनावरणीय कर्म २ मोहनी कर्म ३ और अन्तराय कर्म ये चारों धातिक संज्ञक कर्म क्षय होजाते है, इन्हीं के क्षय हो जाने से अनन्तज्ञान १ अनंतदर्शन २ क्षायिकसम्यक्त्वभाव ३ और अनंत वल वीर्य प्रकट हो जाता है । तथा इन्हीं कमाँ के क्षय होजाने से श्रीभग- वान् अष्टादश दोषों से रहित कहे जाते है। जैसे कि- - - । ( ३१ ) काम लेते ही नहीं। इस के समाधान में कहा जाता है कि क्या उनचेष्टानों के करने से ही लाभ लिया जा सकता है ? जैसे-किसी व्यक्ति को अत्यन्त लक्ष्मी की प्राप्ति हो गई तो फिर क्या मदिरा-पान, मांस-भक्षण, वेश्या संग, धत कर्म इत्यादि कृत्यों के करने से ही उस मिली हुई लक्ष्मी का लाभ लिया जा सकता है। नहीं । इसी प्रकार श्रीभगवान् के जव अंतराय कर्म का क्षय होता है तब उक्त पांचों प्रकृतियों के क्षय होने से अात्मिक पांचों शक्तियां उत्पन्न हो जाती है; परन्तु वे शक्तियां मोहनीय कर्म के क्षय हो जाने से किसी प्रकार से भी विकार को प्राप्त नहीं हो सकतीं । जैसे-लोगों का माना हुश्रा ईश्वर सर्व-व्यापक वेश्यादि के अंगोपांगों में रहने पर भी विकार को प्राप्त नहीं होता तथा अंनत शक्ति होने पर भी विषय में अंनत शक्ति का उपयोग नहीं करता। यदि इस में ऐसे कहा जाय कि-जब वह अनन्त शक्ति युक्त तथा सर्वव्यापक है तो फिर विपय क्यो नहीं करता तथा जय लोग विषयादिक कृत्यों में प्रवृत्त होते हैं, तब वह उसी स्थान में व्यापक होता है, और इस कृत्य को भली प्रकार से देखता भी है तो फिर उसे देखने से और उस में व्यापक होने से क्या लाभ हुश्रा? इन सब प्रश्नों का यही उत्तर बन पड़ेगा कि-ईश्वर सर्व शक्तिमान होने पर भी विकारी नहीं है ठीक उसी प्रकार अन्तराय कर्म के सर्वथा क्षय हो जाने पर भी श्रीभगवान् मोहनीय कर्म के क्षय होजाने से सदैव काल अविकारी भाव में रहते है, परन्तु अन्तराय कर्म के क्षय होजाने के कारण से उनमें अनन्त शक्तिका प्रगट होजाना स्वाभाविकता से माना जा सकता है तथा यदि उन शक्तियों का व्यवहृत होना स्वीकार किया जायगा तो उनमें अनेक प्रकार के अन्य दोषों का भी सद्भाव मानना पड़ेगा । जिससे उन पर अनेक दोषों का समूह एकत्र होजाने से उनको निर्विकार स्वीकार करने में संकुचित भाव रखना पड़ेगा । श्रतएव श्रीभगवान् अनन्त शक्तियों के प्रकट होजाने पर भी निर्विकार अवस्था में सदैव काल रहते हैं। ६श्रीभगवान् हास्य रूप दोप से भी रहित होते हैं क्योंकि-चार कारणों से हास्य उत्पन्न होता है। जैसे कि-हास्य पूर्वक वात करने से १ हंसते को देखने से २ हास्य-कारी बात के सुनने से ३ और हास्य उत्पन्न करने वाली बात की स्मृति करने से ४ सो हास्य के उत्पन्न होजाने से सर्वज्ञता का अभाव अवश्य मानना पड़ेगा। क्योंकि-हास्य अपूर्व यात के कारण से उत्पन्न होता है, जब वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हे तव उनके शान में अप्रूव कौनसी बात हो सकती है। अतः वीतराग प्रभु हास्य रूप दोष से भी रहित होते हैं। ७ रति-पदार्थों पर रतिभाव उत्पन्न करना । यह भी एक मोहनीय कर्म का मुख्य कारण है । सो श्रीभगवान् पदार्थों पर प्रीतिभाव रखना इस दोष से - . ( ३३ ) जा रहे हैं, और उसी में जीव निमग्न हो रहे हैं। सो यावत्काल सम्यक्त्व रूपी सूर्य का हृदय में प्रकाश नहीं होता तावत्काल पर्यन्त मिथ्यात्व रूपी तिमिर नष्ट नहीं हो सकता । सो भगवान् उग्न दोप से भी रहित हैं। क्योंकि-दर्शन मोहनीय फर्म के क्षय होजाने से मिथ्यात्व की सर्व प्रकृतियां क्षय होजाती हैं। १४ अशान-सम्यग् ज्ञान होने से अशान उनका नष्ट होगया है-जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार भाग जाता है ठीक तद्वत् जव केवलशान प्रकट होता है तब उसी समय अज्ञानरूपी तिमिर भाग जाता है। सो भगवान् मोढ्यभाव से रहित होते है और सर्वज्ञ और सर्वदर्शी पद के धारण करने वाले होते है । अतः उनमें अशानभाव का लेश भी नहीं होता। १५ निद्रा-श्रीभगवान् निद्रागत भी नहीं होते क्योंकि-निद्रा का प्राना दर्शनावरणीय कर्म के कारण होता है, सो वह कर्म पहिले ही क्षय किया जाता है जय निद्रा का कारण ही नष्ट होगया तो फिर निद्रारूप कार्य की प्राप्ति किस प्रकार हो सके ? क्योंकि-जो सर्वश प्रभु होते हैं वे ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय कर्म से रहित होते हैं अतएव वे सदैव काल जाग्रता- वस्था में ही रहते हैं. तथा यदि ऐसे कहा जाय कि-निद्रा का मुख्य हेतु श्राहारादि क्रियाएं है इसलिये जैसा-गरिष्ठादि श्राहार किया जाता है उसी प्रकार निद्रा का श्रावेश होता है । सो यह युक्ति संगत नहीं है, क्योंकि-निद्रा का श्राना दर्शना- वरणीय कर्म का उदय है और क्षुधा का लगना यह वेदनीय कर्म का उदय है सो केवली भगवान् के वेदनीय कर्म का तो उदय रहता है परन्तु दर्शनावरणीय कर्म उनका सर्वथा क्षय होता है। सो जब निद्रा का कारणीभूत कर्म ही नष्ट होगया तो फिर श्राहारादि द्वारा निद्रादि कार्यों की कल्पना करना यह कथन युक्ति संगत नहीं है तात्पर्य यह कि-श्रीभगवान् निद्रा के दोप से रहित हैं। १६ अविरति-श्रीभगवान् विरति युक्त होते हैं अर्थात् वे अप्रत्याख्यानी नहीं है किन्तु प्रत्याख्यानी है अप्रमत्त संयत पद के धारण करने वाले हैं। १७ राग-राग रूप दोप से भी श्रीभगवान् रहित होते है क्योंकि-जव पदार्थों पर राग भाव बना रहा तव सुख की स्मृति और उस पौद्गलिक सुख के लिये फिर नाना प्रकार के परिश्रम किये जाते हैं जब पुरुपार्थ में असफलता दीख पड़ती है तब चित्त उदासीन वृत्ति में प्रवेश किये विना नहीं रह सकता । सो जिस श्रात्मा की उक्त वृत्ति हो जाए, फिर उस श्रात्मा को सर्वश स्वीकार करना नितान्त भूल भरी वात सिद्ध होती है, अतः श्रीभगवान् राग रूपी दोप से भी रहित हैं। अन्यथा जव सर्वज्ञ प्रभु भीरागयुक्त स्वीकार किये जायेंगे तब अस्मदादि व्यक्तियों में और उनमें विशेषता ही क्या रही? तथा यावन्मात्र संसार में प्रकृत्य कर्म हैं; रागी पुरुष उन सब को कर डालता है । जव अकृत्य कार्य में रागी ( ३५ ) हो जाता है। क्योंकि जैसे कोई व्यक्ति जव दीपक के द्वारा प्रकाश करने की इच्छा रखता है तो उसको उस प्रकाश के सहकारी कतिपय अन्य पदार्थों के पकत्र करने में प्रयत्न करना पड़ता है। इतना किए जाने पर भी वह दीपक का प्रकाश मादि सान्त पद वाला होता है, वा हस्व वा दीर्घ तथा अल्प वा महत्प्रकाश का करने वाला होता है, परन्तु सूर्य कोप्रकाश के लिये किसी भी सहकरी पदार्थों की आवश्यकता नहीं पड़ती है और ना ही वह प्रकाश द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से सादि सान्त पद को धारण करने वाला होता है। नांही वह प्रकाश अल्प चा महत्. ह्रस्व वा दीर्घ होता है। किन्तु एक रसमय होता है, ठीक उसी प्रकार जो रागादि द्वारा जीवों की रक्षा की जाती है, वह तो दीपक के प्रकाश के तुल्य होती है; परन्तु जो वीतराग भाव से जीवों की रक्षा होती है, वह सूर्य के प्रकाश के तुल्य एक रसमय होती है। क्योंकि-श्रीवीतराग प्रभुतोएकेंद्रिय जीव से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों के लिये सामान्यतया रक्षा का उपदेश करते है, परन्तु रागी आत्मा अपने स्वार्थ को मुख्य लेकर रक्षा करने में कटिवद्ध होते है। अतएव श्रीभगवान् का रक्षा करना स्वाभाविक गुण होता है, इस लिये वे कर्मों का बंधन नहीं करते. अपितु उन क्रियाओं से नामादि कर्मों की प्रकृतियां क्षय हो जाती है । यदि ऐसा कहा जाय कि-जव उनका रक्षा करना स्वाभा- विक गुण है, तो फिर वे अव जगत् वासी दुःखित जीवों की अपनी शक्ति द्वारा रक्षा क्यों नहीं करते ? इस शंका का समाधान यह है कि-चे तो शास्त्रों द्वारा प्राणीमात्र की सदैव रक्षा करते रहते हैं। यावन्मात्र अहिंसा का सिद्धान्त है वह सब प्राणी मात्र की रक्षा कर रहा है, और उक्त सिद्धान्त के प्रकाशक श्री अर्हन् देव ही है । अतएव वे सदैव उपकार करते रहते है, तथा जो श्रीभगवान् ने कमाँ के फल प्रतिपादन किये है, यही उनका परमोपकार है। क्योंकि उनकमा के फलों को सुनकर अनेक श्रात्माएं अपना कल्याण कर सकती हैं, और कर रही हैं यह सिद्धान्त विद्वानों द्वारा माना गया है कि-जैन धर्म के संदेश से ही जगत् में शान्ति की स्थापना हो सकती है। यद्यपि अन्य मतावलम्बियों ने भी दया का कुछ प्रचार किया है, परन्तु जिस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से जैन धर्म ने दयाका प्रचार किया है उस प्रकार वादियों ने दया के स्वरूपको कभी सुना भी नहीं तथा जैन धर्म ने एकेन्द्रिय जीवों से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों तक सम भाव से दया का उपदेश किया है। वादियों ने उस स्वरूप को समझा भी नहीं । सो धर्म-प्रचार द्वारा श्रीभगवान् ने अनन्त प्राणियों पर उपकार किया है और इसी उपकार से भव्य प्राणी अपना कल्याण किये जा रहे हैं सो श्रीभगवान् अपने पवित्र उपदेश द्वारा सदैव उपकार करते रहते हैं। श्रीभगवान ऊपर ३४ अतिशय ३५ वचना- तिशय और १८ श्रष्टादश टोपों से रहित होते हुए मुख्य १२ द्वादश गुणों के . - ( ३७ ) लाभ उठाते हैं। क्योंकि-जय श्रीभगवान् के आगमन का पता उक्त वादित्र द्वारा लग जाता है तब अनेक भव्य प्राणी श्रीभगवान् की वाणी के द्वारा अपना कल्याण करते हैं। ८ श्रातपत्र-देवते आकाश में खड़े हुए श्रीभगवत् के शिर पर तीन छत्र करते है । जिस से भव्य प्राणियों को यह सूचित किया जाता है कि- श्रीभगवान् त्रैलोक्य के स्वामी है। यह पाठ प्रातिहार्य श्रीभगवान् के पुण्योदय से प्रकट होते है और शानातिशय पूजातिशय २ वागतिशय ३ तथा अपायागमातिशय ४ यह चारों अतिशय मिला कर श्रीभगवान् के मुख्यतया द्वादश गुण होते है तथा अनंत- शान, १ अनंतदर्शन, २ अनंत चारित्र, ३ और अनंत बलवीर्य ४ यह चारों गुण मिला कर श्रीभगवान् के मुख्यतया द्वादश गुण होते है। इस पृथ्वी मंडल में श्रीभगवान् अपने पवित्र उपदेशों द्वारा प्राणी मात्र का कल्याण करते रहते है, और जिन के अनंत गुण होने से अनंत नाम कहे जा सकते है तथा जिनसहस्रादि स्तोत्रों में श्रीभगवान् के १००० नाम वर्णन किये गए है। भव्य प्राणी श्रीभगवान् के अनेक शुभ नामों से अपना कल्याण कर सकते है, और वे शुभ नाम श्राध्यात्मिक प्रकाश के लिये एक मुख्य साधन बन जाते है । जैसे " जिन ध्यान" करते हुए फिर वर्ण-विपर्यय के करने से "निज ध्यान ' हो जाता है, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक नाम प्राध्यात्मिक प्रकाश के लिये कार्य साधक हो जाता है । जब उन नामों के कारण श्राध्यात्मिक प्रकाश ठीक हो गया, तब व्यवहार की अपेक्षा से उनका किया हुआ प्रकाश ही कहा जाता है । जैसे चरिंद्रिय के होने पर भी वस्तु के देखने के लिये प्रकाश सहकारी कारण किसी अपेक्षा से माना जा सकता है, ठीक उसी प्रकार श्रीभगवान् के गुणानुवाद के कारण से जो प्रकाश हुआ है, वह निमित्त कारण होने से उन्हीं का उपकार माना जा सकता है। क्योंकि यह वात स्वाभाविक सिद्ध है कि-जिस आत्मा का जिस प्रकार का "ध्येय" होगा प्रायः उस श्रात्मा में फिर उसी प्रकार के गुण प्रगट होने लग जाते है। जैसे कि-किसी विषयी आत्मा का "ध्येय' एक युवती होती है, तो फिर वह विषयी आत्मा उस 'ध्येय के माहात्म्य से विषय वासना में उत्कट भाव रखने लग जाता है। इतना ही नहीं किन्तु फिर वह अपनी इच्छा पूर्ति करने के लिये नाना प्रकार की योग्य और अयोग्य क्रियाओं में प्रवृत्ति करने लग जाता है. ठीक उसी प्रकार जिस आत्मा का " ध्येय" वीतराग प्रभु होते है उस आत्मा के प्रात्म- प्रदेशों से राग और द्वेष के भाव हट कर समता भाव में आने लग जाते हैं। क्योंकि-फिर वह श्रात्मा वीतराग पद के प्राप्त करने की चेष्टाएं करने लग . - (३६) १ अर्हन् -पु. चतुस्चिदतिशयान् सुरेन्द्रादिकृतां पूजां वा अर्हति इति अईन मुगद्विपाहः सन्निशतुस्तुत्य इति शप्रत्ययः अरिहननात् रजो हननात् रहस्याभावाच्चेति पृषोदरादित्वात् अर्हन् "-अद्भुत रूप आदि चौतीस अतिशयों के योग्य होने से और सुरेन्द्र निर्मित पूजा के योग्य होने से तीर्थंकर का नाम अर्हन् है मुगद्विपादि जैनेन्द्र व्याकरण के सूत्र से यह अर्हन शब्द सिद्ध होता है। अव दूसरी रीति से भी अर्हन शब्द का अर्थ दिखलाते है। जैसे कि-श्रष्ट कर्म रूप चैरियों के हनने से और इस जगत् में उन के शान के श्राग कुछ भी गुप्त नहीं रहने से उस ईश्वर परमात्मा तीर्थंकर का नाम अर्हन है। २ जिनः-पु. जयति रागद्धेपमोहादिशत्रन् इति जिनः,-राग द्वेप महामोह आदि शत्रुत्रों को जीतने से उस परमात्मा का नाम जिन है। ३ पारगतः-पु. संसारस्य प्रयोजनजातस्य पारं कोऽर्थः अंत अगमत् इति पारगतः"--संसार समुद्र के पार जाने से और सब प्रयोजनों का अन्त करने से उस परमात्मा का नाम पारगत है। त्रिकालवित्-पु. श्रीन कालान् वेत्ति इति त्रिकालवित् भविष्य, वर्तमान, इन तीन कालों में होने वाले पदार्थों का जानने वाला होने से उस ईश्वर परमात्मा का नाम त्रिकालवित् है। ५ वीणाष्टकर्मा-पु. क्षीणानि अष्टौ ज्ञानावरणीयादीनि कर्माणि यस्य इति क्षीणाष्टकर्मा-जिसके ज्ञानावरणीयादि श्रष्ट कर्म क्षीण होगये है उस परमात्मा का नाम क्षीणाष्टकर्मा है। ६ परमेष्ठी-पु. परमे पदे तिष्ठति इति परमेष्ठी परमात् तिकिदिति इनि प्रत्यये भीरूटानादित्वात् पत्वं सप्तम्या अलुर च,-परम उत्कृष्ट झान दर्शन चारित्र में स्थित होने से ईश्वर परमात्मा का नाम परमेष्ठी है। ७ अधीश्वरः-पु. जगतामधीप्टे इत्येवं शीलोऽधीश्वरः स्थेशभासपिस- कसोवरच्" इतिवरच्-जगज्जनों को प्राश्रय भूत होने से उस परमात्मा का नाम अधीश्वर है। ८ शम्भुः-पु. शं शाश्वतं सुखं भावयति इति शम्भुः” शंसंस्वयंविप्रोदुवो द्रुरिति द्रुः सनातन सुख के समुदाय में होने से ईश्वर परमात्मा का नाम - शम्भु है। ६ स्वयंभूः-पु. स्वयं श्रात्मना तथा भव्यत्वादिसामग्री-परिपाकात् नतु परोपदेशात् भवति इति स्वयंभूः -अपनी भन्यत्व की स्थिति पूर्ण होने से स्वयमेव उत्पन्न होता है । इसलिये उस ईश्वर परमात्मा का नाम स्वयंभू है। १० भगवान्-पु भग. कोऽर्थः जगदैश्वर्यशानं वास्ति श्रस्य इति भगवान्" - ( ४१ ) २२. देवाधिदेवः-पु. देवानामप्यधिदेवो देवाधिदेवः-देवताओं का भी देव होने से ईश्वर का नाम देवाधिदेव है। २२ वोधिदः-पु. बोधि. जिनप्रणीतधर्मप्राप्तिस्तां ददाति इति वोधिदः- जिनप्रणीत शुद्ध धर्मरूप बोधि वीज का देने वाला होने से ईश्वर का नाम चोधिद है। २३ पुरुषोत्तमः-पु. पुरुपाणां उत्तमः पुरुपोत्तमः-पुरुषों के बीच सर्वोत्तम- ता को धारण करने वाला होने से ईश्वर का नाम पुरुषोत्तम है २४ वीतरागः-पु. चीतो गतोरागोऽस्मात् इति वीतरागः-अंगनादि के राग से रहित होने के कारण परमात्मा का नाम वीतराग है। २५ श्राप्तः । पु. जीवानां हितोपदेशदातृत्वात् श्राप्त इव श्राप्तः-जीवों के प्रति हितोपदेश करने वाला होने से ईश्वर का नाम प्राप्त है, इस प्रकार श्रीअर्हन् देव के सार्थक अनेक नाम भव्य जनों के पाठ के लिये कथन किए गए हैं तथा इन नामों के द्वारा श्रात्म-विकाश करने के लिये भक्त जनों को परम सहायता प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार जीवन्मुक्त श्रीअर्हन् देवों का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार सिद्ध परमात्मा भी देव पद मे गर्मित है । क्योंकि- सिद्ध परमात्मा अजर, अमर, पारंगत, सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, ज्ञानस्वरूप, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है, वे जानात्मा द्वारा सर्व-व्यापक हो रहे है । यद्यपि द्रव्यात्मा उनका लोकाग्र भाग में स्थित है, परन्तु ज्ञानात्मा, दर्शनात्मा और उपयोगात्मा द्वारा वे लोकालोक में व्यापक है अतः सर्व पदार्थ उन के ज्ञान में व्याप्य हो रहे है । वे अनंत गुणों के धारी है केवल अर्हन् देव शरीरधारी होते है परन्तु सिद्ध भगवान् अशरीरी है । यदि ऐसे कहा जाय कि-सिद्ध परमात्मा और अहंन् देवों मे जब उक्त गुणों की साम्यता है तो फिर उनको अर्हन् देवों से पृथक् क्यों स्वीकार किया गया है ? इस के उत्तर में कहा जाताहै कि-अर्हन् देव तो शानावरणीय १, दर्शनावरणीय २, मोहनीय ३, और ४ अन्तराय इन चार कमी से मुक्त होकर केवल ज्ञान और केवल दर्शन अर्थात् सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होते हैं, परन्तु सिद्ध भगवान् ज्ञानावरणीय १, दर्शनावरणीय २, वेदनीय ३, मोहनीय ४, आयुष्य ५, नामकर्म ६, गोत्र कर्म ७ और अन्तराय कर्म ८, उक्त आठों कर्मों से रहित होते है। वे सदा निजानंद में निमग्न रहते हैं। योगीजन जव अंतिम श्रेणी पर पहुंचते हैं, तव उन्हीं को ध्येय बना कर अपने प्रात्मा की शुद्धि करते है। कारण कि-अरूपी आत्मा अपने ज्ञान द्वारा ही अरूपी पदार्थों को देख वा जान सकता है। अतएव सिद्ध भात्मा परम सुख की राशि हैं। प्रश्न-हमने तो यह सुना हुआ है कि-जैन मत मे जो चौवीस तीर्थकर देव हुए हैं, वे ही जैनों के ईश्वर परमात्मा है । इन के अतिरिक्त कोई भी ईश्वर - ( ४३ ) - . इस लिये जीव और अजीव यह दोनों पदार्थ भी अनादि अनन्त हैं प्रश्न- हे भगवन् ! फ्या पहिले भवसिद्धिक (मोक्ष जाने वाले ) जीव हैं या अभवसिद्धिक (मोक्ष गमन के अयोग्य ) जीव है ? उत्तर-हे रोह ! भवसिद्धिक और अभवसिद्धिक ये दोनों प्रकार के जीव भी अनादि काल से चले आते है; कारणकि भव्य और श्रभव्य ये स्वाभा- विक भाव वाले है, परन्तु विभाव परिणाम वाले नहीं है। प्रश्न-हे भगवन् ! क्या पहिले सिद्धि है या असिद्धि ? उत्तर-हे रोह ! अकृत्रिम होने से मुक्ति और अमुक्ति ये भी अनादि है। प्रश्न- हे भगवन् ! पहिले सिद्धात्माएं हैं, या असिद्धात्माएं अर्थात् पहिले सिद्ध परमात्मा है या संसारी आत्माएं है ? उत्तर-हे रोह ! सिद्ध और ससारी श्रात्माएं ये दोनों ही अनादि भाव से चले आरहे हैं; अतः इनको पूर्व या पश्चात् भावी कदापि नहीं कहा जा सफता। सो जव जैन मत संसार और मोक्ष पद को अनादि स्वीकार करता है तव यह किस प्रकार कहा जासकता है कि उक्त चौवीस तीर्थकर ही जैनों के परमात्मा, है अन्य कोई भी जैन मत में सिद्ध ( ईश्वर) नहीं माना गया है। हां जैन मत यह अवश्य मानता है कि- रागत्तेण साईया अपज्जवसियाविय पुहुत्तेण अणाईया अपज्जव- सिया विय। उत्तराध्ययन सूत्र श्र. ३६ गाथा-६६ अर्थ-एक सिद्ध की अपेक्षा मोक्ष पद सादि अनन्त कहा जाता है और बहुतों की अपेक्षा अनादि अनन्त है अर्थात् जब हम किसी एक मोक्ष गत जीव की अपेक्षा विचार करते हैं। तव हमको मोक्ष-विपय सादि अनन्त पद मानना पड़ता है । कारण कि-जिस काल में वह अमुक व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त हुश्रा उस काल की अपेक्षा उसकी आदि तो है परन्तु अपुनरावृत्ति होने से उसे फिर अनन्त कहा जाता है, परंच जव सिद्ध पद को देखते है अर्थात् बहुत से सिद्धों की अपेक्षा से जव विचार किया जाता है तब सिद्ध पद अनादि अनन्त माना जाता है। कारण कि-जिस प्रकार संसार अनादि है उसी प्रकार सिद्ध पद भी अनादि है तथा अनन्त सिद्ध होने से गुणों की अपेक्षा किसी नय के मत से एक सिद्ध भी कहा जासकता है क्योंकि-भेद भाव नहीं होता। " जत्थ एगो सिद्धो तत्थ अणन्त खय भवविमुक्को" इत्यादि । अर्थ-जहां पर एक सिद्ध है वहां पर अनंत सिद्ध विराजमान हैं। जिस प्रकार एक पुरुप के अन्तर्गत नाना प्रकार की भाषाएं निवास करती हैं जैसे . । . . - , . - की अपेक्षा से ३१ गुण उन में विशपतया होते है । प्रात्मा गानस्वरूप और अनन्त गुणों का समुदाय रूप है. परन्तु कर्म उपाधि भेद से वे गुण उसके प्रावरण युक्त हो रहे है. जैसे कि सूर्य प्रकाशरूप होने पर भी वादलों के प्रयोग से श्रावरणीय हो जाता है, ठीक तत् श्रात्म-प्रकाश की भी यही दशा है, जब वे श्रावरण दूर हो जाते है तब गुण रूप समुदाय प्रकट हो जाता है, जिस कारण से फिर उसे सिद्ध, वुद्ध, अजर, अमर, सर्वन और सर्वदशी अनंत शक्ति-संपन्न इत्यादि शुभ नामों से कीर्तन किया जाता है । सो वे गुण निम्न प्रकार से वर्णन किये गए हैं, जैसे कि-ज्ञानावरणीय कर्म की पांच प्रकृतियां है वे सब सिद्ध पर- मात्मा के क्षय रूप है यथा प्राभिनिवोधिक ज्ञान के २८ भेद है; सो उन पर जो कर्म- परमाणुओं का प्रावरण श्राया हुया होता है, वह सिद्ध परमात्मा के क्षय रूप है । १ श्रुतज्ञान के १४ भेद है उनका प्रावरण भी क्षय है २ । अवधि ज्ञान के ६ भेद है, उनका श्रावरण भी क्षय रूप है ३ । मन पर्यवज्ञान के २ भेद है, उन के भी यावरण क्षय रूप ही है ४ । केवलज्ञान का केवल एक ही भेद है, उस का भी प्राधरण क्षय हो गया है ५ । जव ज्ञानावरणीय कर्म की पांचों प्रकृतियों के प्रावरण दूर हो गए तव उस जीव को सर्वज्ञ कहा जाता है। फिर दर्शनावरणीय कर्म की प्रकृतियां है । उन के प्रावरणों के क्षय हो जाने से जीव सर्वदर्शी बन जाता है । जैसे कि-चनुदर्शन का जो आवरण है वह भी सिद्ध परमात्मा के क्षय है ६ । चक्षुवर्जित श्रोत्रेन्द्रियादि इन्द्रियों के जो श्रावरण है वे भी क्षय है । इसलिये अचनुदर्शन भी उन का निर्मल है ७।अवधि- दर्शन का जो आवरण है, वह भी निर्मूल हो गया है ८ । फिर केवलदर्शन का श्रावरण भी सर्वथा जाता रहा है । । सुख पूर्वक शयन करना इस प्रकार की निद्राभी जाती रही है १० । सुख पूर्वक शयन करने के पश्चात् फिर दुःख पूर्वक जाग्रत अवस्था मे पाना वह दशा भी जाती रही है ११ । बैठे बैठे ही निद्रागत हो जाना इस प्रकार की भी दशा उन की नहीं है १२ । तथा जिस प्रकार प्रायः बहुत सा पशुवर्ग चलता हुआ निद्रागत हो जाता है, वह दशा भी सिद्ध परमात्मा की नहीं है १३ । वा अत्यन्त घोर निद्रा जिस के प्रबल उदय से वासुदेव का अर्द्धवल उस दशा मे प्राप्त हो जावे तथा अत्यन्त भयानक दशा जीव की निद्रा की दशा में ही हो जावे वह दशा भी सिद्ध परमात्मा की नहीं है १४। सोइस कार्य के न होने से उहे सर्वदर्शी कहा जाता है, कारण कि-वह सर्वथा जाग्रतावस्था मे ही होते है जिस प्रकार सूर्य किसी भी दशा मे अंधकार देने वाला नहीं माना जा सकता, ठीक तद्वत् सिद्ध परमात्मा भी सर्व काल मे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी रहता है। जब वेदनीय कर्म की दोनों प्रकृतियां क्षय हो गई तब सिद्ध परमात्मा अक्षय सुख के अनुभव करने वाले कहे जाते है । क्योंकि-वेदनीय कर्म .
( ६ ) सन्मुख दीपक श्रादि पदार्थों का प्रकाश तुलना करने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार सिद्धों के सुख के सामने अन्य सुख चुद्र प्रतीत होते है, तथा जिस प्रकार एक अपूर्व अर्थ के धारण करने से जो श्रानन्द अनुभव होने लगता है उस प्रकार का अानन्द खाद्य पदार्थों में नहीं देखा जाता । अतः सिद्ध भगवान् अनंत सुखों के धनी कथन किए गए है। सिद्ध पद की प्राप्ति के लिये प्रत्येक प्राणी को प्रयत्नशील होना चाहिए, जिस से श्रात्मा कर्म-कलंक से रहित सिद्ध पद की प्राप्ति कर सके। अतएव सिद्ध-स्तुति और सिद्ध-भक्ति अवश्यमेव करनी चाहिए। प्रश्न-सिद्ध स्तुति करने से क्या लाभ होता है ? उत्तर-उनके पवित्र गुणों में अनुराग उत्पन्न होता है। प्रश्न-गुणों में अनुराग करने से क्या फल होता है ? उत्तर-गुणानुराग करने से निज श्रात्मा भी उन्हीं गुणों के ग्रहण करने के योग्य हो जाती है, जिस से यात्म-कल्याण होता हैं। प्रश्न-फ्या सिद्ध परमात्मा की स्तुति करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं ? उत्तर-सिद्ध परमात्मा वीतराग पद के धारण करने वाले है, वह सर्वश और सर्वदर्शी तथा निज गुण में निमग्न होने से सदा सुख स्वरूप है । अतः वह किसी पर प्रसन्न और अप्रसन्न कभी नहीं होते । उनकी स्तुति और गुणों में अनुराग करने से अवगुण दूर होकर श्रात्मीय गुणों का प्रकाश होता है। प्रश्न-स्तुति करने से चित्त-शुद्धि किस प्रकार हो सकती है ? उत्तर-जव उनके गुणों मे अनुराग किया जायगा, तव चित्त की प्रसन्न- ता अवश्यमेव हो जायगी, जिस प्रकार वस्तु का स्वभाव होने से मंत्रादि- पद सादि के विप उतारने में समर्थता रखते हैं तथा जिस प्रकार चिन्तामणि रत्न इच्छुक की इच्छापूर्ति करने में सहायक होता है. ठीक उसी प्रकार सिद्ध परमात्मा की स्तुति भी आत्मा में शान्ति का संचार करने वाली होती है। प्रश्न-सिद्ध परमात्मा की स्तुति करने से जव आत्मा मे शान्ति का संचार हो गया तव क्या श्रात्मा सिद्ध परमात्मा को अपना ध्येय बना सकता है? उत्तर-सिद्ध परमात्मा जिस श्रात्मा का ध्येय रूप हो जायगा चह श्रात्मा भी सिद्ध पद की प्राप्ति के योग्य अवश्यमेव हो जायगा। प्रश्न-सिद्ध भगवान् की भक्ति करने से किस गुण की प्राप्ति होती है? उत्तर-परमात्मा की भक्ति करने से पूर्वसंचित कर्म क्षय हो जाते हैं, और वहुमान से गुण प्रकट होते हैं , फिर फर्म रूपी शत्रु भक्ति द्वारा दग्ध . ( ५१ ) उत्तर--जिस पोद्गलिक पदार्थ की जिस को इच्छा हो उसके मिल जाने से ही उस प्रात्मा को क्षण भर के लिये समाधि था सकती है । परंच वह समाधि क्षण स्थायी होने से त्याज्य है अतएव द्रव्यसमाधि की निवृत्ति करने के लिये ही प्रधान और वर पद दिये गए है, जिस से यह स्वतः ही सिद्ध हो जाता है कि-जो परम ज्ञान की समाधि है, उसी की ही मुझे प्राप्ति हो। प्रश्न-जब सिद्ध परमात्मा से श्रारोग्य बोधिलाभ और सब से बढ़ कर मान की समाधि की प्रार्थना की जाती है, तो क्या यह निदानकर्म नहीं है? उत्तर-इन पवित्र भावनाओं को निदान कर्म नहीं कहा जाता, कारण कि-यह प्रार्थना वा भावना कर्मवन्धन का कारण नहीं है, अतएव यह निदान- कर्म नहीं है, कर्मवन्धन के कारण-मिथ्यात्व. अविरत, कपाय, दुष्टयोग, वा प्रमादादि प्रतिपादन किये गए हैं। उक्त भावना में उक्त कारणों के न होने से इसे निदान कर्म नहीं कहा जाता। प्रश्नः यदि निदानकर्म नहीं है तो क्या इस प्रकार के पाठ करने से श्रारोग्यादि पदार्थों की प्राप्ति हो सकती है ? उत्तर-सिद्ध परमात्मा तो वीतराग पद में स्थित होने से और द्वेप से रहित है अतः वे तो फल प्रदाता हो ही नहीं सकते।तथा यदि प्रार्थना द्वारा ही वह शुभ कर्म के फल दे सकते है तो फिर कर्मा का फल क्या हुआ? श्रतएव उक्त प्रार्थना से चित्त शुद्धि होती है और असत्यामृपा भापा का वाक्य होने से ही उक्त पाठ युक्ति संगत माना जाता है। प्रश्न-क्या प्रार्थना करने से परमात्मा फल न देगा? उत्तर-परमात्मा सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होने से फल-प्रदाता नहीं है; अतएव वह फलप्रदाता नहीं माना जाता। प्रश्न-तो फिर प्रार्थना करने से ही क्या लाभ है ? उत्तर--चित्त की शुद्धि, श्रास्तिकता तथा अपने जीवन को पवित्र और पुरुपार्थी वनाना एवं धार्मिक बल उत्पादन करना, जिस से अपना कल्याण करते हुए अन्य अनेक भव्यात्माओं का कल्याण हो । प्रश्न-जब सिद्ध परमात्मा की भक्ति की जाती है तब क्या उस समय जीच को समाधि की प्राप्ति हो जाती है ? उत्तर-हां । उस आत्मा को भक्ति रस में निमग्न होने से उन के गुणों में अत्यन्त अनुराग होता है। उस अनुराग के कारण ही वह जीव भक्ति रस में -पदार्थों का समभाव द्वारा एकत्व हो जाना, उसे द्रव्य समाधि कहते हैं राग .
काल ( ५३ ) करते हैं। अपने जीवन को भी व्युत्सर्जन कर देते है, परन्तु परोपकार के मार्ग से वे किंचित् मात्र भी विचलित नहीं होने पाते, अतएव वे ही देव कहला सकते है। अनादि काल से पांच भारत वर्ष और पांच ऐरवर्त्त वर्प नेत्रों में दो प्रकार का काल चक वर्त्त रहा है, उत्सप्पिणी काल और अवसर्पिणीकाल । प्रत्येक काल दश कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण का होता है, तथा प्रत्येक के छः भाग होते हैं, सो दोनों कालों के मिलने से २० कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण का एक कालचक्र होता है । विशेष केवल इतना ही है कि-उत्सर्पिणी काल में प्रिय पदार्थों का प्रादुर्भाव और अप्रिय पदार्थों का शनै २ ह्रास होता जाता है, अन्त में जीवों को पौद्गलिक सुख की पूर्णतया प्राप्ति हो जाती है। इस से विपरीत भाव श्रवसर्पिणी काल का माना गया है, जिस मे पुद्गल सम्बन्धी सुख का ह्रास होता हुआ शनैः २ जीव परम दुःखमयी अवस्था में हो जाते है। इस प्रकार इस लोक मे काल चक्रों का चक्र लगा रहता है। अनादि नियम के अनुकूल प्रत्येक काल चक्र में २४ तीर्थंकर देव १२ चक्रवर्ती नव वलदेव नव वासुदेव और नव ही प्रतिवासुदेव ये महापुरुष उत्पन्न हुआ करते है । स्थानाग सूत्र में तीन प्रकार के उत्तम पुरुपों का विवरण किया गया है । जैसे कि-धर्मोत्तम पुरुष १ भोगोत्तम पुरुष २ और कर्मोत्तम पुरुष ३ । सो धर्मोत्तम पुरुष तो श्रीअर्हन देव होते है, जो धार्मिक क्रियाओं को प्रतिपादन करके सदैव काल जीवों का कल्याण करते रहते है। भोगोत्तम पुरुप चक्रवर्ती होते है, जिनके समान पौद्गलिक सुख के अनुभव करने वाली अन्य व्यक्तियां उस समय नहीं होतीं। कर्मोत्तम पुरुष राज्य धर्म के नानाप्रकार के नियमों के निर्माता होते है, वे वासुदेव की पदवी को धारण करके फिर साम, दाम, भेद और दण्ड इस प्रकार की नीति की स्थापना करके राज्य-धर्म को एक सूत्र में बांधते है । अर्द्ध भारत वर्ष मे उनका एक छत्रमय राज्य होता है, क्योंकि-यावत्काल पर्यन्त एक छत्रमय राज्य नहीं होता, तावत्काल पर्यन्त प्रजा सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिये असमर्थता रखती है। अतएव वासुदेवों को कर्मोत्तम पुरुप माना गया है। इस काल के पूर्व जो उत्सर्पिणी काल व्यतीत होचुका है, उसमे निम्न लिखितानुसार २४ तीर्थकर देव हुए है-उनके शुभ नाम ये हैं । केवलशानी १, निर्वाणी २, सागर ३, महायश ४, विमल ५, सर्वानुभूति ६, श्रीधर७, दत्ततीर्थकृत् ८, दामोदर , सुतेजाः १०, स्वामी ११, मुनिसुव्रत १२, सुमति १३, शिवगति १४, अस्ताग १५, निमीश्वर १६, अनिल १७, यशोधर १८, कृतार्थ १६, जिनेश्वर २० शुद्धमति २१ शिवकर २२ स्यन्दन २३ और संप्रति २४; परंच जो आगामी काल में पानेवाली उत्सर्पिणी मे भी २४ तीर्थकर देव होंगे, उनके शुभ नाम .
- उसी समय से माता की बुद्धि सुनिश्चित होगई थी. अत श्रीभगवान् का नाम सुमति हुश्रा । निपातामान्य पास्येव प्रभाऽस्यपद्मप्रभ यद्वा पद्मशयेन देहदा मातुर्देवतया परित इति, पद्मवर्णश्च भगवानिति वा पद्मप्रभ. विषय-वासना रूपी कीचड़ से रहित और पद्म के समान प्रभा है जिस की उसी का नाम पद्मप्रभ है । तथा पद्मशय्या मे शयन करने का दोहद उत्पन्न हो गया था वह देवता द्वारा पूर्ण कियागया तथा पदाकमल के समान जिन के शरीर का वर्ण था इसी से श्रीभगवान् का नाम पद्मप्रभ हुआ शोभनो पार्थावस्य सुपार्श्व यद्वा गर्भस्थे भगवति जनन्यपि मुपा भादति नपार्थ शोभनीय दोनों तरफ है जिन के वह सुपार्श्व है अथवा जय श्रीभगवान् गर्भ में थे, तब उसी समय से माता के दोनों तरफ शोभनीय हो गए थे अतः श्रीभगवान् का नाम सुपार्श्व हुश्रा । चन्द्रस्येव प्रभा ज्योत्स्ना सौम्य- लेण्यावीशपोऽस्य चन्द्रप्रभ तथा गर्भस्थ देव्या चन्द्रपानदोहदोऽभूदिति चन्द्रप्रभ चन्द्रमा के समान है सौम्यलेश्या जिन को वही चद्रप्रभ है तथा जव श्रीभगवान् गर्भ मे श्राए थे तब माता को चन्द्रपान करने का दोहद उत्पन्न हुआ था। अतएव श्रीभगवान् का नाम चन्द्रप्रभ हुआ। शोभनो विधिविधानमस्य सुविविर्यद्वा गर्भस्थ भगवति जनन्यऽप्येवमिति मुविधि सुन्दर है विधि विधान जिस का वह सुविधि तथा जव श्री भगवान् गर्भ में थे तव माताअत्यन्त सुन्दर विधि विधान करने वाली हो गई थी, अत. श्रीभगवान् का नाम सुविधि रक्खा गया । सक्लसत्वमतापहरणात शीतल तथा गर्भस्थे भगवति पितुः पूर्वोत्पन्नाचकित्स्यपित्तदाही जननीकरस्पर्शादुपशान्त इति शीतल सकल जीवों का सन्ताप हरने से शीतल तथा जव श्रीभगवान् गर्भ में स्थित थे, तव श्रीभगवान के पिता को पित्तदाह का रोग था, जो वैद्यों द्वारा भी शान्त न हो सका था, तब श्रीभगवान् की माता ने राजा के शरीर को स्पर्श किया, तव रोग शान्त हो गया । इस प्रकार गर्भस्थ जीव का माहात्म्य जान कर श्रीभगवान् का नाम शीतल रक्खा गया है । श्रेयासावसावस्य श्रेयास पृपादरादित्वात् यथा गर्भस्थेऽस्मिन् केनाप्यनामान्तपूर्वदेवताधिष्टितशग्या जनन्याक्रान्तति श्रेयो जातमिति श्रेयास । सर्व जगत्-वासी जीवों के हित करने से श्रीभगवान् का नाम श्रेयांस तथा जव श्रीभगवान् गर्भावास में थे, तव श्री भगवत् के पिता के घर मे एक देवाधिष्ठित शय्या थी, उस पर कोई भी चैठ नहीं सकताथा यदि बैठता था तो उसको असमा- धि उत्पन्न हो जाती थी, किन्तु गर्भ के प्रभाव से रानी जी को उस शय्या पर शयन करने का दोहद उत्पन्न हुआ, तब वह उस शय्या पर शयन कर गई । तब देवताने कोई भी उपसर्ग नही किया अतः श्रेयांस नाम स्थापित हुा । वसुपूज्यनृपतेरय वासुपूज्यः यद्वा गर्भस्थेऽस्मिन् वसु हिरण्य तेन वासवो राजकुल पूजितवानिति वसवो देवविशेपास्तेपा पूज्या वा वमुपूज्य प्रसाद्यणि वासुपूज्य. जो देवतों द्वारा पूजनीय है वही वासुपूज्य है तथा वसुपूज्य राजा का जो पुत्र है, उसी का नाम वासुपूज्य है तथा जव श्रीभगवान् गर्भ ( ५७ ) जगत् को मिति मुनि "मनेरदेता चास्य चा" । उरणा० ६ १२) रति इप्रत्यये उपान्त्यस्योत्वं शोभनानि वृत्तान्य- स्य नुव्रत मुनिचासो सुनतय मुनिसुव्रत तथा गर्भस्थे जननी नुनिवत् मुग्रता जातेति मुनिमुद्रत तीन काल में जो मानता है उसी का नाम मुनि है तथा सुन्दर है बत जिस के, सो दोनों पदों के एकत्र करने से मुनिसुव्रत शब्द बन गया तथा जव श्रीभगवान् गर्भावास में थे तब भगवन्त की माता मुनि के समान सुन्दर व्रत चाली हो गई थी इसी कारण से श्रीभगवान् का नाम सुव्रत रक्खा गया । परीपहोपसर्गादिनामनात् नमस्तु वा ( उणा-६१३) इति विकल्पनोपोन्त्यकारभाव पक्ष नमि. यदा गर्भस्थ भगवति परचकनपे. अपि प्रणतिः कृतेति नमि । परीपहादि वैरि- यों को नमन करने से नमि तथा जय श्रीभगवान् गर्भावास मे थे तब वैरी राजे भी श्राकर श्रीभगवान् के पिता को नमस्कार करने लग गये इसी कारण से नमिनाथ नाम संस्कार किया गया। धर्मचक्रस्य नेमिवन्नेमि. नेमीती-नन्तोऽपि दृश्यते यथा वन्दे मुव्रतनेमिनी इति । धर्म चक्र की धारा के समान वह नेमि है तथा जव श्री भगवान् गर्भावास में थे तब माता ने अरिएरत्नमय नेमि ( चक्र धारा) आकाश में उत्पन्न हुई देखी इसी लिये अरिएनेमिनाथ नाम संस्कार किया गया तथा च प्राकृतपाठ:- गम्भगए तस्स मायाए रिठरयणामउ महति महालउनेमि उप्पयमाणो सुमिणे दिठोत्ति तेण से रिछ नैमित्ति नाम कयंति" अर्थ प्राग् लिखा गया है स्पृशति ज्ञानेन सर्वभावानिति पार्श्व, तवा गर्भस्थे जनन्या निशि शयनीयस्थयाऽन्धकारे सौ दृष्ट इति गर्भानुभावोऽयम् इति मत्वा पश्यतीतिनिरुतात् पार्श्व पाऽिस्य वैयावृत्यकरो यक्षस्त- स्य नाथ पार्श्वनाथ भीमोभीमसेन इति न्यायाद् वा पार्थ सर्वभावों को जो ज्ञान से जानता है उसे ही पार्श्व कहते है, सो यह लक्षण तो सर्व तीर्थंकरों में संघटित होता है, परंच जव श्रीभगवान् गर्भावास में थे तव श्रीभगवान की माता ने अपनी शय्या पर बैठ अंधकार म जाते हुए सूर्य को देख लिया; तव माता ने विचार किया यह सब गर्भ का प्रभाव है तथा पार्श्व नाम वाला यक्ष श्रीभगवान् की अत्यन्त भक्ति करता था इसी कारण पार्श्वनाथ नाम हुआ । विशेषण इरयति प्रेरयति कर्माणीति वारः विशेपतया जो कर्मों को प्रेरते है इसी कारण उन्ह वीर कहा जाता है तथा महा उपसर्गों के सहन करने से श्रीभगवान् का नाम श्रीश्रमण भगवान महावीर प्रसिद्ध हुश्रा । इस प्रकार वर्तमान अवसर्पिणी काल मे मोक्ष को प्राप्त हुए २ चतुर्विंशति तीर्थकरों के व्युत्पत्ति युक्त नामो- कीर्तन कथन किये गए हैं। अव जिन २ तीर्थंकरों के अपर नाम भी है उन का विवरण किया जाता है । जैसे कि- ऋषभो वृषभ वृपम का लक्षण होने से ऋपभ देव को वृपभदेव ( नाथ) कहते है । श्रेयान् श्रेयास. सकल वन मे प्रशस्यतम होने से श्रेयांस को श्रेयान् " कहते है। स्यादनन्त जिदनन्तः अनन्त कमाँ के अंशों को जीतने से अथवा अनन्त ज्ञानादि के होने से ।
महा-जिता-[ सेना अश्व तीर्थ-/नगरी-/ जन्म / पिता | माता लक्षण दीक्षा | केवल केवल कुल कर तिथि | ज्ञान | ज्ञान 1 नाम नगरी तिथि श्रीऋ-विनीता चैत्र नाभि- मरु- वृषभ चैत्रयदि युरिम फा च इक्ष्वाकु पभदेव | नगरी वदी-कुलकर देवी ताल ११ अजित-श्रयो-माघ जित-विजया हस्ती महा व अयो-पोप व नाथ ध्या शु. মান্ত 8 ध्या ११ संभव थाव- मृग. श्राव-काचे नाथ स्ती शु.१४ रि शु. १५ स्ती अभिनं- अयो- माघ | संवर-सिद्धा- कपि माघ शु अयो- पो व ध्या शु. राजा थे ध्या १२ " नाथ ध्या राजा ध्या . , सुमति- अयो- वैशाख मेघ- मंगला क्रोच वैशाख अयो- चैत्र पक्षी शु.६ शु ११ 1. पद्मप्रभु कौशु- कार्ति श्रीधर सुसी- पद्म- कार्तिक कौसु | चैत्र म्ची-च.१२राजा 'मा कमल व.१३ सुपार्श्व वाराण- ज्येष्ट प्रतिष्ट पृथ्वी स्वस्ति- ज्येष्ट वाराण- फा व सी शु१२] राजा माता कलक्षण शु. १३/ सी स्वी शु १५ । नाथ " ७ चन्द्र-चन्द्र- पौप महासे-लक्ष्मणा चन्द्रल पौष व. चन्द्रपु फा व प्रभ । पुरी | च.१२ नराजा माता| क्षण १३ रीनगरी सुविधि काकंदी मृग सुग्रीव रामा मगरम- मृग. काकंदी को नाथ नगरी व.५ राजा राणी त्स्य का व ६ नगरी शु३ शीतल भदिल माघ दृढ़रथ | नंदा श्रीवत्समाधव |भदिल पौष नाथ व.१२ राजा माता व१४ 5 " । श्रेयांस सिंह फा. | विष्णु विष्णु गैडाका/फाल्गुन सिंह- माघ नाथ पुरी | व १२ | राजा | माता लक्षण | व. १३] पुरी व ३ चैत्र शुक्ला ५ चैत्र शुक्ला ५ वैशाख शुल्ला ८ चैत्र शुक्ला ६ " बैशाख कृष्णा २ , वासुपूज्य स्वामी ( ६१ ) अव नीचे श्री भगवन्तों की निर्वाण तिथियां वर्णन की जाती हैं यथाः- तीर्थकर देव निर्वाणकाल योपभदेव जी माघ कृप्या १३ अजितनाथ जी ,, संभवनाथ जी अभिनन्दन जी सुमतिनाथ जी " पम प्रभु स्वामी मार्गशीर्ष कृपणा ११ सुपार्श्वनाथ जी फाल्गुन कृष्णा ७ चन्द्रप्रभु जी भाद्रपद कृप्या ७ सुविधिनाथ जी भाद्रपद शुक्ला ६ , शीतलनाथ जी श्रेयांस नाथ जी श्रावण कृष्णा३ ग्रापाढ़ शुक्ला १४ विमलनाथ जी आपाढ़ कृपणा ७ अनंतनाथ जी धर्मनाथ जी ज्येष्ठशुक्ला ५ शान्ति नाथ जी ज्येष्टकृपणा १३ " कुंथुनाथ जी वैशाख कृष्णा १ अरनाथ जी मार्गशीर्प शुल्ला १० मल्लिनाथ जी फाल्गुन शुक्ला १२ , मुनिसुव्रत स्वामी ज्येष्ठकृप्या ६ नमिनाथ जी चैशाखकृष्णा १० अरिएनेमि नाथ जी आपाढ़ शुक्ला पार्श्वनाथ जी श्रावण शुक्ला महावीर स्वामी जी कार्तिक कृष्णा १५ सो तीर्थकरों के गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण ये पांचों ही कल्याण भव्य प्राणियों के लिये उपादेय हैं, और उक्न तिथियों मे धर्म-ध्यान विशेप करना चाहिए क्योंकि- जय देव का पूर्णतया स्वरूप जान लिया गया तव आत्म-शुद्धि के लिये देव की उपासना तथा देव को 'ध्येय' स्वरूप मे रख कर श्रात्म-विशुद्धि अवश्यमेव करनी चाहिए। चैत्र शुक्ला ५ " . ॥ इति श्री जैनतत्त्वकलिकाविकामे देवस्वरूपवर्णन नाम प्रथमा कलिका समाप्ता ।
( ६३ ) से धर्म की प्राप्ति हो सकती है। क्योंकि जब धार्मिक शास्त्रों को सुनता ही नहीं तो भला फिर धार्मिक विषयों पर विचार किस प्रकार कर सकता है ? श्रतएव धार्मिक विषयों को यदि विचार पूर्वक श्रवण किया जाय तब आत्मा को सद्- विचारों से धर्म की प्राप्ति हो सकती है। जिस प्रकार ज्ञान और क्रिया से मोक्ष प्रतिपादन किया गया है, ठीक उसी प्रकार श्रवण और मनन से भी धर्मादि पदार्थों की प्राप्ति हो जाती है । यदि ऐसे कहा जाय कि बहुत से आत्माओं ने भावनाओं द्वारा ही अपना कल्याण कर लिया है, इस लिये शास्त्र श्रवण की क्या आवश्यकता है ? इसके उत्तर मे कहा जाता है कि-भावना श्रवण किये हुए ही पदार्थों की होगी क्योंकि-जब तक उसने प्रथम कल्याणकारी वा पापमय मार्ग को सुना ही नहीं तव तक कल्याणकारी मार्ग में गमन करना और पापकारी मार्ग से निवृत्त होना यह भावना होही नहीं सकती। अतः सिद्ध हुआ कि- जिन श्रात्माओं ने पूर्व किसी धार्मिक विषयों को श्रवण किया हुआ है, वे उनकी अनुप्रेक्षा पूर्वक विचार करते हुए अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो जाते है। धर्म का श्रवण प्रायः धर्मदेवों के मुख से ही हो सकता है, इस लिये इस स्थान पर प्राचार्य उपध्याय और साधु ये तीनों धर्म देव है । इन के विषय में कहते हैं। श्री तीर्थकर देवों के प्रतिपादन किये हुए तत्वों के दिखलाने वाले, तथा उन के पद को सुशोभित करने वाले, गण के नायक, सम्यग् प्रकार से गण की रक्षा करने वाले, गण मे किसी प्रकार की शिथिलता आ गई हो तो उसको सम्यग् प्रकार से दूर करने वाले, इतना ही नहीं किन्तु मधुर वाक्यों से चतुर्विध श्रीसंघ को सुशिक्षित करने वाले, गच्छवासी साधु वर्ग वा आर्य वर्ग की सम्यग् प्रकार से रक्षा करने वाले श्री जिन-शासन के शृंगार स्तमरूप, जिस प्रकार प्रत्येक प्राणी को अपनी दोनों पाखों का आधार होता है, उसी प्रकार संघ मे प्राधार रूप, वाद लब्धि-सम्पन्न नाना प्रकार के सूक्ष्म ज्ञान के धारण करने वाले अलौकिक लक्ष्मी के धारण करने वाले, इस प्रकार के गुणों से विभूपित श्री प्राचार्य महाराज के शास्त्रों मे ३६ गुण कथन किये गए है । जो उन गुणों से युक्त होते है, वे ही प्राचार्य पद के योग्य प्रतिपादन किये गए है, सो वे गुरण निम्न लिखितानुसार है जैसे कि- १ देश-आर्य देश मे उत्पन्न होने वाला यद्यपि धर्म पक्ष में देश कुलादि की विशेष कोई आवश्यकता नहीं है, तथापि प्रायः प्रार्य देश में उत्पन्न होने वाला जीव सुलभ-चोधि वा गांभीर्यादिगुणों से सहज मे ही विभूपित हो सकता है. तथा परम्परागत श्रार्यता अात्मविकास मे एक मात्र कारण बन जाती है जैसे कि-भारतवर्ष मे ३२ सहस्र देश प्रतिपादन किये गए है, परन्तु उन में , .
( ६५ ) और अध्याप- जाति शुद्ध होनी चाहिए। ४ रूपवान्-शरीराकृति ठीक होने पर ही महाप्राभाविक पुरुष हो सकता है। क्योंकि-शरीर की लक्ष्मी दूसरों के मन को प्रफुल्लित करने वाली होती है। जैसे श्री केशीकुमार श्रमण के रूप को देख कर प्रदेशी राजा, और श्रीअनाथी मुनि के रूप को देख कर राजा श्रेणिक आश्चर्यमय हो गए। इतना ही नहीं किन्तु उन के मुख से वाणी को सुन कर धर्म पथ में श्रा गए । इस लिये प्राचार्य महाराज का शरीर अवश्यमेव सुडौल और सुन्दर होना चाहिए जिस से वादी और प्रतिवादी जन को विस्मय हो और वे धर्म पथ में शीघ्र श्रा सके। ५ दृढसंहनन-जिस प्रकार शरीराकृति की अत्यन्त आवश्यकता है, उसी प्रकार संहनन दृढ़ होना चाहिए। क्योंकि-यावत्काल पर्यन्त शरीर की समर्थता ठीक नहीं है, तावत्काल पर्यन्त भली प्रकार अध्ययन और नादि क्रियाएं ठीक नहीं हो सकतीं । अतएव गच्छाधिपति के करणीय क्रियाओं के लिये दृढ़संहनन की अत्यन्त आवश्यकता है तथा उक्त गुण के विना शीत वा उणादि परीपह भी भली प्रकार सहन नहीं किये जा सकते । अतएव श्राचार्य में उक्त गुण अवश्य होने चाहिएं । ६ धृतिसंपन्न-साथ ही प्राचार्य में धैर्य गुण पूर्णतया होना चाहिए। फ्योंकि-जव मन का साहस ठीक होगा तब गच्छ का भार भलो प्रकार वह उठा लेगें, कठोर प्रकृति वाले साधुओं का भी निर्वाह कर सकेंगे. क्योंकि-जब गच्छाधिपति न्याय मार्ग में स्थित होकर न्याय करने में उद्यत होता है, तव उस को पक्षी और प्रतिपक्षियों के नाना प्रकार के शब्द सुनने पड़ते हैं। सो यदि वे उक्त गुण युक्त होंगे तो उन शब्दों को सम्यक्तया सहन करके न्याय मार्ग से विचलित नहीं होंगे। यदि उन में धैर्यगुण स्वल्पतर होगा, तव लाभ के स्थान पर प्रायः हानि होगी। कारण कि-क्षणिक चित्त वाला श्रात्मा किसी कार्य के भी सिद्ध करने में समर्थ नहीं हो सकता । यद्यपि यह गुण प्रत्येक व्यक्ति में होना चाहिए, परन्तु जो गच्छाधिपति हों उन्हें तो यह गुण अवश्यमेव धारण करना चाहिए। ७ अनाशंसी-अशन पानादि वा सुंदर वस्त्रादि की आशंसा (श्राशा) म करे, क्योंकि-जिस स्थान पर लोभ संशा विशेष होती है वहां पर मोक्ष- मार्ग में विघ्न उपस्थित हो जाता है,तथा जव गणी लोभ के वश हो जायगा, तव अन्य भिक्षुओं को सन्मार्ग में लाना कठिन हो जायगा । यह नियम की बात है कि-जो श्राप भली प्रकार सुशिक्षित होगा वही अन्य व्यक्तियों को सुशिक्षित कर सकेगा । श्रतएव अनाशंस गुण प्राचार्य में अवश्यमेव होना चाहिए । -- - ( ६७ ) तथा - किये जासकें. उसी का नाम स्थिरपरिपाटि कहा जाता चरणकरणानुयोग के सिद्धान्त तो श्राचार्य के अस्खलित भाव से कण्ठस्थ होने चाहिये, कारण कि-गच्छ की सारणा और वारणादि क्रियाएं प्रायः इसी अनुयोग के सिद्धान्तों पर अवलम्बित होती है. तथा व्यवहारसूत्र, वृहत्कल्पसूत्र, दशाश्रुतस्कंधमूत्र तथा नशीथसूत्र इत्यादि क्रिया-विशुद्धि के सूत्रों का अभ्यास श्राचार्य को अस्खलित भाव से होना चाहिए । जो श्रुतज्ञान स्थिर- परिपाटि से ग्रहण किया जाता है, वह इस जन्म और परलोक में भी कल्याण करने वाला होता है। ११ गृहीतवाक्य-श्राचार्य के मुख से इस प्रकार के वचन निकलने चाहिएं कि-जो सव भव्य प्राणियों को उपादेय ( मनन करने योग्य ) हों, क्यों- कि-जो वचन पक्षपात रहित और भव्य जीवों का कल्याणकारी होता है, वह साक्षर लोक में अवश्य मानने योग्य हो जाता है । अतएव गणि का वाक्य राग द्वेप से रहित तथा सत्पथ का प्रदर्शक होना चाहिए। १२ जितपरिपत्-श्राचार्य सभा के समक्ष न्याय पूर्वक और सत्य कथन करने वाले हों। क्योंकि-जव परिपद् में अक्षोभ चित्त होकर बैठेंगे तय प्रत्येक विषय पर शांत चित्त से ईहा अपोह कर सकेगे, किन्तु जब चित्त भ्रम युक्त होगा, तव निर्णय तो दूर रहा स्वसिद्धान्त से भी स्खलित हो जाने की सम्भावना है, अतएव शांतचित्त, न्यायपक्षी, यहुश्रुत, समयज्ञ, पुरुप ही "जितपरिपद्" के गुण वाला हो सकता है। १३ जितनिद्रः-निद्रा के जीतने वाला हो । कारणकि-पालस्य युक्त वा अप्रमाण से निद्रा लेने वाला पुरुष अपूर्व ज्ञान के ग्रहण से वंचित ही रहता है इस के अतिरिक्त जो पूर्वपठित ज्ञान होता है, वह भी विस्मृत होने लग जाता है। क्योंकि-सदैव निद्रा मे रहने वाला जव अपने शरीर की भली प्रकार रक्षा नहीं कर सकता तो ज्ञान की रक्षा क्या करेगा? जव चह ज्ञान की रक्षा से शून्य चित्त हो गया तो फिर वह गच्छ की रक्षा में किस प्रकार उद्यत हो सकता है ? इसलिये "जितनिद्र" अवश्यमेव होना चाहिए। १४ मध्यस्थ-संसार पक्ष में बहुत से श्रात्मा राग द्वेष के वशीभूत होकर न्याय के स्थान पर अन्याय कर बैठते है, इसी कारण वे सत्पथ का अवलम्बन नहीं कर सकते, अतएव प्राचार्य प्रत्येक पदार्थ को माध्यस्थ भाव से देखने वाला हो, क्योंकि-जब समभाव से हर एक पदार्थ पर विचार किया जायगा, तव उस का निष्कर्ष शीघ्र उपलब्ध हो जायगा, इल लिये माध्यस्थता का गुण अवश्यमेव धारण करना चाहिए, जिस के द्वारा राग द्वेप न्यून होकर आत्म विकाश प्रकट हो। . .
- - ( ६६ ) उस से अनेक भव्यात्मानों को अपना कल्याण करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार महाराज प्रदेशी के किये हुए प्रश्नों का समाधान श्री केशी- कुमार श्रमण ने युक्ति पूर्वक किया है और उन प्रश्नोत्तरों को देख कर जीव- तत्व की परम श्रास्तिकता सिद्ध हो जाती है, एवं वद्ध और मुक्त का भी भली भांति शान हो जाता है। व्याख्याप्रशप्ति में निर्ग्रन्थी पुत्र प्रादि श्रमणों के प्रश्नोत्तर को पढ़ कर ' श्रासन्नलब्धप्रतिभ " का शीघ्र पता लग जाता है। अतएव सिद्ध हुआ कि-श्राचार्य में यह गुण अवश्य होना चाहिए, जिस के द्वारा संघ-रक्षा और श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामी के प्रतिपादन किये हुए सत्य सिद्धान्त का अतीव प्रचार हो, जिस से भव्य आत्माएं अपना कल्याण करने में समर्थ हो सकें। १६ नानाविधदेशमापाश -प्राचार्य महाराज को नाना प्रकार के देशों की भाषाओं का भी शाता होना चाहिए, ताकि वह प्रत्येक देश मे जाकर वहीं की भापा में भगवदुक्त धर्म का प्रचार भली भांति कर सकें। २० ज्ञानाचारयुक्त-ज्ञान के प्राचरण से युक्त अर्थात् मति, श्रुत, अवधि, मनापर्यव, और केवल यथासंभव इन पांचों शानों से संयुक्त होना चाहिए, ताकि ज्ञान की धाराधना हो सके और भव्य श्रात्माएं श्रुताध्ययन मे लग सकें। उदात्त अनुदात्त और स्वरित, इत्यादि घोष स्वरों की शुद्धता पूर्वक ज्ञान-वृद्धि की चेष्टा करता रहे. क्योंकि-स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म क्षय हो जाता है। २१ दर्शनाचारयुक्त-दर्शन के प्राचार से युक्त अर्थात् सम्यक्त्व मे पूर्ण- तया दृढ़ता तथा देव गुरु और धर्म मे सर्वथा प्रीति तथा जीवादि का यथार्थ ज्ञान हो जाने से दर्शनाचार की शुद्धि कही जाती है। जीवादि का यथार्थ ज्ञान होने पर उस मे फिर शङ्कादि न करनी चाहिए, तभी आत्मा दर्शनाचार से युक्त हो सकता है, क्योंकि-शङ्कादि के हो जाने से फिर दर्शनाचार की शुद्धि नहीं रह सकती। जव तक दृढ़ता मे किसी भी प्रकार का सन्देह उत्पन्न नहीं होता तव तक दर्शनाचार की विशुद्धि की सव क्रियाएं की जा सकती हैं। यदि यहां यह शङ्का की जाय कि-जव दृढ़ता ही फल श्रेष्ठ है तव प्रत्येक प्राणी स्वमत की दृढ़ता मे निपुण हो रहा है तो क्या उनको दर्शनाचारयुक्त कहा जा सकता है ? इस शंका का समाधान इस प्रकार है कि-जव पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हो गया है तब उस यथार्थ ज्ञान द्वारा देखे हुए पदार्थों में यथार्थ ही निश्चय है, उसी को सम्यग् दर्शन कहा जाता है। किन्तु जव अयथार्थ ज्ञान होगा तो उस मे अतद्रूप ही निश्चय होगा उसको मिथ्यादर्शन कहा जाता है। अतएव सिद्धान्त यह निकला कि-यथार्थ निश्चय का नाम सम्यग् . . .
( ७१ ) २४ वीर्याचार- मन वचन और काय के वीर्य से युक्त होना चाहिए अर्थात् मन में सदैव काल शुभ ध्यान और शुभ संकल्प ही होने चाहिएं, कारण कि-जव मन मे सत्य संकल्प और कुशल विचार उत्पन्न होते रहते हैं तब मन सम्यग् शान, दर्शन और चारित्र की ओर ही झुका रहता है, अन्य आत्माओं पर अशुभ विचार उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः जब मन में शुभ संकल्प उत्पन्न होगए तव प्रायः अशुभ वाक्य का भी प्रयोग नहीं होता, अपितु मित और मधुर वाक्य ही मुख से निकलता है । जब मन और वाणी की भली प्रकार विशुद्धि हो जाती है. तव कायिक अशुभ व्यापार प्रायः निरोध किया जा सकता है । अतः प्राचार्य के तीनों योग सदैव काल शुभ वर्त्तने चाहिएं। वल- वीर्य तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । जैसे कि-पंडितवलवीर्य १ वाल- बलवीर्य २ और वालपंडित-बलवीर्य ३ । जिन-श्राशा के अनुसार जो यावन्मात्र क्रिया कलाप किया जाता है, उसी का नाम पंडितवलवीर्य है. और यावन्मात्र मिथ्यात्ववल से क्रिया कलाप किया जाता है वह सब चालवीर्य होता है कारण कि-यालवीर्य के द्वारा कर्म क्षय नहीं होते, बल्कि' कमाँ का समुदाय विशेषतया एकत्र हो जाता है। इसी कारण उसे बालवीर्य कहा जाता है। जब श्रात्मा सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान से युक्त होता है किन्तु साथ ही वह देश- अति (श्रावक ) धर्म का पालन करने वाला भी हो जावे तो उस की क्रिया को बालपंडितवीर्य कहते है, कारण कि-याचन्मात्र संवरमार्ग में क्रियाएं करता है, वह पंडितवलवीर्य, और यावन्मात्र वह संसारी दशा में क्रियाएं करता है. चालवीर्य, सो दोनों के एकत्र करने से बालपंडितवीर्य कहलाता है। अतएव प्राचार्य पंडित वीर्याचार से युक्त हो, जिस से संघ की रक्षा और कर्म प्रकृतियों का क्षय होता रहे। जव पंडितबलवीर्य द्वारा शिक्षा पद्धति की जायगी, तव बहुत से भव्य आत्माएं संसार चक्र से अति शीघ्र पार होने के उद्योग मे लग जाएंगे। २६ अाहरणनिपुण-शाहरण दृष्टान्त का नाम है; सो न्याय शास्त्र के अनु- सार जब किसी विवादास्पद विषय की व्याख्या करने का समय उपलब्ध हो जावे तो अन्वय और व्यतिरेक दृष्टान्तों द्वारा उस विषय के स्फुट करने मे परिश्रम करे । कारण कि-यावत्काल युक्ति युक्त दृष्टान्तों से उस विषय को स्फुट न किया जायगा, तावत्काल पर्यन्त वह विषय अस्खलित भाव मे नहीं पा सकेगा, और ना ही श्रोतागण को उस से कुछ लाभ होगा। अतएव विषय के अनुसार दृष्टान्त होना चाहिए। जैसे कि- किसी ने कहा कि -" पाप दु साय भवति ब्रह्मदत्तवत् अर्थात् पाप दुःख के लिये होता है, जिस प्रकार ब्रह्मदत्त को हुआ, इस . वह - ( ७३ ) वर्द्धमान स्तुम• सर्वनयनवर्णवागमम् । सक्षेपतरतदुन्नीतनयभेदानुवादतः ॥ टीका-नीयन्ते प्राप्यन्ते सदंशाहीकारेणेतरांशीदासीन्येन वस्तु- चोधमार्गा यैस्ते नया नेगमादयः सर्वच ते नयाश्च सर्वनयास्त एव नद्यः सरितस्तासामर्णवस्समुद्रस्तत्तुल्य भागमो वाक्पथो यस्य स तथा तं वर्द्धमानं चरमजिनवरं वयं स्तुमः स्तुतिविषयीकुर्मः कुतः कस्मात् तदुन्नीतनयभेदानु- चादतः तत्तस्य थीवर्द्धमानस्य उत्प्रावल्येन नीता वचनरूपेण प्राप्ता ये नयानां भेदविशपास्तेपामनुवादतः कथितस्यैव यत्कथनं तदनुवादस्तस्मादनुवादतः कुर्मः, इति शेपः । कथं ? संक्षपतोऽल्पविस्तरत इति ॥ १ ॥ भावार्थ-अनंत धर्मात्मक वस्तुओं में से किसी एक विशिष्ट धर्म को लेकर अन्य धर्मों की ओर उदासीन भाव रखते हुए जो पदार्थों का वर्णन करना उसी का नाम नय है । वे नैगमादि सर्व नय ही नदियों के तुल्य है, उन नदी तुल्य नयों के समुद्र तुल्य भागम (वचनमार्ग) जिनका है उन चरम तीर्थ- कर महावीर भगवान् को स्तुति का विषय करते हैं-अर्थात् उनकी स्तुति फरते हैं। किस प्रकार स्तुति करते हैं ? सो ही दिखलात है-उस वर्द्धमान स्वामी के वचन रूप को प्राप्त हुए जो नय के भेद-उन के अनुवाद से-अर्थात् कथन किए को पुनः कथन करने से ही उन की स्तुति करते हैं। नैगमः सग्रहश्चैव व्यवहारजुसूत्रको शब्द समभिरूडेवभूती चेति नया स्मृता ॥२॥ टीका-नैगमेति । न एको गमो विकल्पो यस्य स नैगमः पृथक् पृथक् सामान्यविशेषयोग्रहणात् ॥ १॥ संगृह्णाति विशेषान् सामान्यतया सत्तायां क्रोडीकरोति यः स संग्रहः ॥२॥ वि विशेषतयैव सामान्यमवहरति मन्यते यो- ऽसो व्यवहारः ॥३॥ ऋजु वर्तमानमेवं सूचयति वस्तुतया विकल्पयति यः स जुसूत्रको द्वन्द्वे व्यवहारर्जुसूत्रको ४॥ काललिंगवचनैर्वाचकेन शब्देन समं तुल्यं पर्यायभेदेऽपि एकमेव वाच्यं मन्यमानः शब्दो नय ॥५॥ सं सम्यक् प्रकारेण यथापर्यायैरारूढ़मर्थ तथैव भिन्नवाच्यं मन्यमानः समभिरूढ़ो नयः ॥६॥ भूत शब्दोऽत्र तुल्यवाची एवं यथा वाचके शब्दे यो व्युत्पत्तिरूपो विद्य- मानोऽर्थोऽस्ति तथाभूततत्तुल्याऽर्थक्रियाकारिणमेव वस्तु वस्तुवन्मन्यमान एवं भूतो नयो द्वन्द्वे द्विवचनमित्यमुना प्रकारेण हे विभो ! त्वया नया स्मृताः स्वागमे कथिता इति शेपः ॥२॥ भा०-अनेक प्रकार से सामान्य और विशेष ग्रहण करने से नैगम कहा जाता है ॥१॥ विशेष पदार्थो को जो सामान्यतया ग्रहण करलेना है, उसी का नाम संग्रहनय है ॥२॥ जो सामान्य को विशेषतया ग्रहण करना है
( ७५ )
कार से देखा जाता है, ठीक उसी प्रकार विशेष रूप धर्म को छोड़ कर जीवा-
दि तत्त्वों को सामान्यतया एक रूप से देखा जाता है, परंच उक्त शत १०० घटो
को जव जन पृथक् २ भाव से ग्रहण करते है, तब वे अपने २ स्वीकार किये
हुए घट को पृथक् २ रूप से देखते है । जैसे कि-यह हमारा घट पीतवर्ण वाला
है तथा यह इस का घट कृष्ण रंग वाला है अर्थात् समुदाय मे भेदक
लक्षण द्वारा वे मूढ़ता को प्राप्त नहीं होते, यही श्राप का परम उपकार है, जो
पदार्थों का यथार्थ स्वरूप वर्णन किया है।
नैगमो मन्यते वस्तु तदेतदुभयात्मकम्
निर्विशेष न सामान्य विशेपोऽपि न तद्विना ॥५॥
तदेतत्त्वदुतपूर्वो नैगमो नैगमनामा नय उभयात्मकं वस्तु मन्यते उभी
द्वौ सामान्यविशेपो श्रवयवी श्रात्मा स्वरूपं यस्य वस्तुनस्तदुभयात्मकं
तत्तादृग्रूपं वस्तु पदार्थ मन्यते स्वीकरोति । कुतस्त्वदाशायां निर्विशेपं सामान्य
न निर्गतो दूरीभूतो विशेषो विशेपणं पर्यायो वा यस्य तन्निर्विशेषमीग्रूपं
सामान्य न विद्यते तद्विना सामान्यं विशेपं वा द्रव्यं विना रहितो विशेषो न
विद्यतेऽत उभयात्मकं गृह्णाति । यदि सम्यग्दृष्टिरयमितिचेन्न-श्रय हि द्रव्यं
पर्यायं च द्वयमपि सामान्यविशेषयुक्त मन्यते, ततो नायं सम्यग्दृष्टि-
रित्यर्थः ॥शा
भा०-नैगम नय पदार्थ के दोनों धर्म मानता है अर्थात् पदार्थ
सामान्यधर्म और विशेषधर्म दोनो धर्मों के धारण करने वाला होता है,
परन्तु सामान्य धर्म से विशेष धर्म पृथक् नहीं हो सकता और नाहीं विशेष-
धर्म सामान्यधर्म से पृथक् हो सकता है । अतएव नैगमनय के मत से
सर्व पदार्थ उक्त दोनों धमाँ के धारण करने वाले देखे जाते है. किन्तु द्रव्य
और पर्याय रूप प्रक्रियाओं को सम्यग्दृष्टि सामान्य और विशेष रूप धर्मों से
युक्त मानता है । तात्पर्य यह है कि-द्रव्य पयार्य युक्त तो होता ही है, अतएव
सर्व द्रव्य सामान्य और विशेष रूप धर्मों से
युक्त
प्रतिपादन किया गया है।
अव संग्रह नय का विपय कहते हैं।
सग्रही मन्यते वस्तु सामान्यात्मकमेव हि
सामान्गव्यतिरिक्तोऽस्ति न विशेष पुष्पवत् ॥६॥
संग्रहः-संग्रह नामा नयस्तु सामान्य द्रव्यसत्तामात्र जातिमात्रं वा य-
त्तत् सामान्यं तदेवात्मा स्वरूपं यस्य तत्तथा तद्वस्तु एव वस्तुतया मन्यते
कस्माद्धि यस्मात् सामान्यव्यतिरिक्तः सामान्यात् पृथक्भूतो विशपो नास्ति
न विद्यते तद्विना विशपः खपुष्पवद् श्राकाशकुसुमतुल्योऽस्तीति न वोप-
देशो वर्तते
तस्मात् ॥६॥
( ७७ ) पृथग्भूतं सामान्यमसद् नास्ति खरविपाणवत् रासभङ्गवत् तर्हि विशेपमात्र एव पदार्थः॥८॥ भा० व्यवहारनय विशेपात्मकरूप पर्यायस्वरूप वस्तु को स्वीकार करता है. उसका यह भी मन्तव्य है कि-विशेप से भिन्न सामान्यप- दार्थ खर के विपाणों (सींग) के समान असद् होता है । अब वह अपने सिद्धान्त को दृष्टान्त द्वारा सिद्ध करता है- वनस्पति गृहाणेति प्रोक्त गृहाति कोऽपि किम् विना विशेषान्नाम्रादींस्तन्निरर्थकमेव तत् ॥६॥ एनमेवोदाहरति-यदा केनचिद्वक्त्रा कश्चिदादिष्टः भो ! त्वं चनस्पतिं गृहाणेति प्रोले कथिते सति किं कोऽपि निम्बाम्रादीन् विशेपान विना गृह्णाति न कोऽपि गृह्णाति तत्तस्मात् कारणाद् ग्रहणाभावात्तत्सामान्य निरर्थक निष्फलमेवेति ॥६॥ भा०-जैसे किसी ने कहा कि-हे आर्य ! पुत्र ! वनस्पति लायो, तो क्या आम्र वा निम्बादि के नाम लिये विना वह किसी फल विशेप को ला सकता है ? कदापि नहीं, तव सिद्ध हुआ कि-विशेष के विना ग्रहण किये सामान्यभाव निर्थक ही होता है । अब उन ही विषय मे फिर कहते है- अणपिण्डीपादलेपादिके लोकप्रयोजने उपयोगो विशेपैः स्यात् सामान्ये नहि कर्हिचित् ॥ १० ॥ टीका-तथा च पिण्डीव्रणं मनुष्यादीनां शरीरे प्रहारादिजात- क्षतं तस्मै पिण्डी पट्टिकादिकरणं तथा पादलेपः पादलेपकरणं तयोर्द्वन्द्धे श्रादिपदाच्चरञ्जनादिके लोकानां जनानां प्रयोजन कार्य तस्मिन् विशेपै- पर्यायैरुपयोगः साधनं स्याद्भवति सामान्ये सत्तामात्रे सति कर्हिचित् कदाचिदपि न कार्यसिद्धिर्भवतीत्यतो विशेष एव वस्तु ॥ १० ॥ भा०-मनुष्यादि के शरीर में प्रहारादि के लग जाने से पट्टिकादि करना तथा पादलेप करना आदि शब्द से चजुरंजनादि करना इत्यादि प्रयो. जनों के उपस्थित हो जाने पर विशेष भाव से ही कार्य सिद्ध हो सकेगा। अर्थात् जिस रोग के लिये जिस औषध का प्रयोग किया जाता है उस औषध का नाम लेने से ही वह औषधि प्राप्त हो सकेगी । केवल औषधि ही दे दो इतने ही कथन मात्र से काम नहीं चलेगा । अतः सिद्ध हुआ कि विशेष ही कार्य साधक हो सकता है । नतु सामान्य पदार्थ । अव व्यवहार नय के प्रति ऋजुसूत्र नय कहता है- ।
( ७६ ) - टीका-अयमृजुसूत्रनय एप्वनन्तरं वक्ष्यमाणेपु चर्तुपु निक्षेपेषु एकं भावनिक्षेपमेव यास्तवं मन्यते, नामस्थापनाद्रव्याणि न मन्यते. तेषां परकीयत्वादनुत्पन्नविनटत्वाच्च, तत्र नाम वक्तुरुल्लापरूपं वा गोपालदार- कादिप गतमिन्द्राभिधानं परकीयं स्थापना चित्रपटादिरूपा परकीया द्रव्यं पुनर्भाविभावस्य कारणं तच्चानुत्पन्नं भूतभावस्य कारणं तु विनष्टम् एवमग्रेतनाः शब्दादयस्त्रयो नया भावनिक्षेपमेव स्वीकुर्वन्तीत्यर्थः॥ १३ ॥ भा-यह ऋजुसूत्रनय नाम स्थापना द्रव्य और भाव इन चारों निक्षेपों में से केवल भाव निक्षेप को ही स्वीकार करता है क्योंकि--उसका यह मन्तव्य है कि-परकीय वस्तु अनुत्पन्न और विनष्ट रूप है, अतः वह कार्य साधक नहीं हो सकती। गोपालदारकादि मे इन्द्रादि का नाम स्थापन किया हुश्रा कार्य साधक नहीं होता है। इसी प्रकार चित्र पटादि रूप भी परकीय पर्यायों के सिद्ध करने में असमर्थ देखे जाते हैं। जैसे-किसी ने किसी का चित्र किसी वस्तु पर अंकित करदिया, तव वह चित्र उस व्यक्ति की क्रियाओं के करने में असमर्थ है। केवल वह देखने रूप ही है । अतएव इस नय का मन्तव्य यही निकलता है। भाव निक्षेप ही जो वर्तमान काल में विद्यमान है वही अभीष्ट कार्य की सिद्धि करने में समर्थता रखता नतु प्रथम तीन निक्षेप कार्य साधक हो सकते है । इसी प्रकार अगले तीन नय भावनिक्षेप को ही स्वीकार करते हैं । तथा च अर्थ शब्द नयोऽनेकै पर्यायरेकमेव च मन्यते कुम्मालशघटाधेकार्थवाचका ॥ १४ ॥ टीका-शब्दनामा पुंस्त्री-नपुंसकाद्यभिधायकोल्लाप स्तत्प्रधानो नयः शब्दनयः स अनेकैः शब्दपर्यायैरुक्तोऽपि अर्थ वाच्यं पदार्थमेकमेव मन्यते, कुत. ? हि यस्मात् कुम्भः कलशो घटः एते शब्दाः सर्वदर्शिीभिर्जिनैरेकस्य घटाख्यपदार्थस्य वाचकाः कथितास्ततः सिद्ध- मनकै पर्यायैरुतोऽप्यभिधेय एक एवेत्यर्थः-- ॥१४॥ भा०-शब्दनय पुल्लिग स्त्री नपुंसकलिंग आदि अनेक प्रकार के शब्दों के अर्थों को जानकर जो अर्थों को प्रधान रखता है, उसी का नाम अर्थ है। जैसे कि-कुंभ कलश घट यह सब भिन्न शब्द होने पर भी घट शब्द के अर्थ के ही बोधक है, अतएव अनेक पर्यायों के शब्द अनेक होने पर भी अर्थनय अर्थ (अभिधेय) को ही मुख्य रख कर एक ही मानता है। व्रते समभिरुढोऽर्थ भिनपर्यायभेदत भिन्नार्थी कुंभकलशघटाघटपटादिवत् ॥ १५ ॥ tha नयः । . - ( ८१ ) एक ही पर्याय का वाची जो शब्द है; वही एक शब्द उस अभिधेय का वाची है, क्योंकि-विद्यमान भाव ही (ध्रव) निश्चय से श्रात्मीय कार्य के करने वाला देखा जाता है । अतएव तद्रप वही वस्तु है, अन्य नहीं तथा शास्त्र में स्वार्थक्रियाकारी वस्तु मानागया है । इस कारिका का सारांश केवल इतना ही है कि-एवंभूत नय केवल स्वार्थक्रियाकारी वस्तु को ही वस्तु मानता है, अन्य को नहीं अर्थात् जो अपने गुण में पूर्ण है घही वस्तु है, यही इस नय का तात्पर्य है। यदि कार्यमकुर्वाणोऽपाप्यते तत्तया स चेत् । तदा पटेऽपि न घटव्यपदेशः किमिप्यते ॥१८॥ वृत्तिः--यदि स पदार्थस्तदा तस्मिन् काले कार्यमकुर्वाणोऽपि स्वार्थ- क्रियामकुर्वन्नपि चेत् तत्तया वस्तुतया इप्यते अभ्युपगम्यते भवता ता/पटेऽपि घटव्यपदेशो घटशब्दवाच्यता कथं नेप्यते कस्मान्नच्छविषयीक्रियते । किम- त्रापराधः यथा स्वार्थक्रियामकुर्वाणो घटो घटत्वव्यपदेशभाग् भवति घटक्रियाऽभाववान् पटोऽपि घटो भवतु स्वकार्यकारणभावस्योभयत्रापि समानत्वादित्यर्थः ॥ १८ ॥ अर्थ-यदि वह पदार्थ उस काल में कार्य न करता हुआ भी अर्थात् स्वार्थ क्रिया न करने पर भी उस वस्तु को वस्तुतया मानता है अर्थात् वस्तु के भाव को स्वीकृत किया जाता है तो फिर पट में भी घट शब्द की वाच्यता क्यों नहीं स्वीकार की जाती? तथा क्यों उक्त पदार्थ को इच्छा विषयक नहीं किया जाता इस प्रकार मानने मे उक्त पदार्थ ने क्या अपराध किया है ? क्योंकि-जिस प्रकार स्वार्थ क्रिया न करने पर भी घट घटत्व के व्यपदेश का भागी वनता है उसी प्रकार घट क्रिया का अभाव वाला पट भी घट होजावे कारण कि स्वकार्य के प्रभाव होने से दोनों को ही समान होने से पक्षसमसिद्ध हो जाता है इस कारिका का सारांश इतना ही है कि-जव घट स्वक्रिया के न करने पर भी घटत्व का भागी बन जाता है तो फिर वटक्रिया के प्रभाव वाला पट भी स्वक्रिया के अभाव के सम होने से घट हो जाना चाहिए। कारण कि- यथोत्तरविशुद्धा स्यु के सप्ता प्यमी तथा । एकैक स्याच्छतं मेदस्तत. सप्तशतालमी ॥ १६॥ वृत्तिः-श्रमी साक्षादुक्तपूर्वाः सप्तापि सप्तसंख्याका अपि समुच्चयार्थः । नया यथोत्तरविशुद्धा यथा २ उत्तरा उपर्युपरि वर्तन्ते तथा २ विशुद्धा येऽन्ते यथोत्तरविशुद्धाः स्यर्भवन्ति । तथा एकैकः एकश्च एकश्च एकैको नयः शतं शतप्रमाणं भेदः प्रकारतः स्याद्भवति। ततो श्रमी नयाः सप्त इति संख्या- ( ८३ ) श्रव सूत्रकार उपसंहार करते हुए श्री भगवान् की स्तुति इस प्रकार से करते हैं सर्वे नया अपि विरोधभृतो मिथस्ते । सभूय साधु समयं भगवन् मजन्ते ॥ भूपा इव प्रतिभटा भुवि सार्वभौम- पादाम्बुज प्रधनयुक्तिपराजिता द्रार ॥२२॥ वृत्ति-हे भगवन् ! हे श्री वर्द्धमान स्वामिन् ! मिथः परस्परविरोध- भृतोऽपि विरोधो विरुद्धाऽभिप्रायस्तं विभ्रति धारयन्ति ये ते तथा विधा सर्वे समस्ता अपि नयाः सम्भूय एकीभूय साधु समीचीनं सुन्दरं ते तव समय सिद्धान्तं भजन्ते सेवन्ते, कं के इव भुवि प्रधनयुक्तिपराजिता भुवि पृथ्टयां प्रधनाय युद्धाय युक्ति प्रवलपुण्यवलेनापूर्वसैन्यरचना तया पराजिता पराजयं प्राप्ताः प्रतिभटा विपक्षजेतारो भूपा द्राक्शीघ्र सर्वा परिपूर्णपखण्ड- भूमी भोग्या यस्य स सार्वभौमश्चक्रवर्ती तस्य पादाम्बुज चरणकमलमिवे- त्यर्थः ॥२२॥ अर्थ-हे श्रीभगवान् वर्द्धमानस्वामिन् ! जिस प्रकार परस्पर विरोध रखने वाले राजा लोग सम्राट् चक्रवर्ती के चरण कमलों को सेवन करते हैं उसी प्रकार यह सातों नय परस्पर विरोध धारण करते हुए भी जब आप के पवित्र शासन को एकीभूत होकर सेवन करते है तब यह सातों नय शान्त भाव धारण करलेत है क्योंकि-श्रापकी वाणी 'स्यात् शब्द" परस्पर के विरोध को मिटाने वाली है श्रतएव जिस प्रकार विरोध छोड़ कर राजागण चक्रवर्ती के चरणकमलों की सेवा करते है उसी प्रकार सातों नय श्राप के शासन की सेवा करते है अर्थात् सातों नयों का समूहरूप श्रापका मुख्य सिद्धान्त है। इत्थ नयार्थकवच कुसुमर्जिनेन्दुवीरोऽर्चितः सविनयं विनयाभिधेन । श्रीद्वीपबन्दरवरे विजयादिदेवसूरी शितुर्विजयसिंह गुरोश्चतुष्टयै ॥२२॥ नयकर्णिका समाप्ता॥ वृत्तिः-इत्थं पूर्वोक्तप्रकारण नयानामों नयार्थाः सोऽस्ति येषां तानि नयार्थकानि, नयार्थकानि च तानि वचांसि चेति तान्येव कुसुमानि पुप्प- वृन्दं तैर्नयार्थकवच कुसुमैः, जिनश्चासौ इन्दुश्च जिनेन्दुर्जिनचन्द्रो वीरो वर्द्धमान- स्वामी विनयेन सहितो यथास्यात् तथा सविनयं भूत्वा विनयाभिधेन विनय- विजयेतिनामकेन मयाऽर्चित पूजित कुत्र कस्मै । श्रिया युक्ने द्वीपास्यवन्दरवरे जलधितटवर्ति नगर श्रेष्ठ यस्य नाम्नि विजयपदमादौ वर्तते स तथा विजय- देव सूरिस्तस्य सूरीशितु शिप्यो विजयसिंहो यो मद्गुरुस्तस्य तुष्टयै सन्तु- तव ( ८५ ) हैं परन्तु पर गुण की अपेक्षा असत्रूप है इसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ सत् और असत् इन दोनों धमों के धारण करने वाला होता है जिस प्रकार एक पुरुप पिता और पुत्र दोनों धर्मों को धारण करेलेता है यद्यपि यह दोनो धर्म परस्पर विरोधी भाव को उत्पादन करने वाल है तथापि सापेक्षिक होने से दोनों सत्रूप माने जासकते है क्योंकि वह पुरुष अपने पिता की अपेक्षा से पुत्रत्व भाव को प्राप्त है और अपने पुत्र की अपेक्षा से उसमे पितृत्व भाव भी ठहरा हुश्रा है इसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ स्वगुण मे सत्रूप और परगुण मे असत् रूप से माना जासकता है तथा अनेकान्त वाद मे जिस प्रकार सम्यग् शान, सम्यगदर्शन और सम्यक चरित्र का वर्णन किया गया है उसका उसी प्रकार परिचय होना चाहिए । इसी का नाम स्वसमयवित् है । ३२ पर समयवित्-पर समय का भी वेत्ता होना चाहिए, अर्थात् जैनमत के इलावा यावन्मात्र अन्यमत उनका भीभलीभांति वोध होना चाहिए, कारण कि-जवतक उस का श्रात्मा परगत से परिचित नहीं हुश्रा, तबतक वह स्वमत मे भी पूर्णतया दृढता धारण नहीं कर सकता श्रत स्वमत मे दृढ़ता ही हो सकती है जब कि परमतका भली भांति बोध प्राप्त किया जाए । श्रीसिद्धसेन दिवाकरने लिखा है कि-जावइया वयणपहा तावइया चेव इंति नयवाया तावतश्चैव परसमयाः परसमयाः १ इस कथन का यह सारांश है, कि यावन्मात्र वचन के मार्ग है, तावन्मात्र ही नयवाक्य है, सो यावन्मात्र नयवाक्य है, तावन्मात्र ही परसमय है, अर्थात् तावन्मात्र ही परसमय के वाक्य है । अतएव पर समय से अवश्यमेव परिचित होना चाहिए। एवं क्रियावादी १ अक्रियावादी २ अज्ञानवादी ३ और विनयवादी इन मतों का भी वोध होना चाहिए। क्रिया वादी के मत मे जीव की अस्ति मानी जाती है, क्योंकि-कर्ता की चेष्टा का ही नाम क्रिया है सो कर्त्ता सिद्ध होने पर ही क्रिया की सिद्धि की जा सकती है। अतएव क्रिया वादी के मत मे जीव की अस्ति मानी जाती है परन्तु इस मत के १८४ भेद है उन भेदों मे जीव की अस्ति कई प्रकार से वर्णन की गई है, जैसे कि-किसीने जीवकी अस्ति कालाधीन स्वीकार की है, और किसीने ईश्वराधीन ही मान ली है। अस्तु, परन्तु जीव की अस्ति अवश्य स्वीकार की है द्वितीय अक्रियावाद है उसका मन्तव्य है कि-जीव की अस्ति नहीं है जब जीव की ही अस्ति नही है तो फिर क्रिया की अस्ति उस के मत मे किस प्रकार हो सक्ती है अतएव यह प्रक्रियावाद नास्तिकवाद है अर्थात् इसका दूसरानाम नास्तिकवाद भी है तृतीय श्रज्ञान वादी है वह इस प्रकार से अपने मत का वर्णन कररहा है कि- आत्मा मे अज्ञानता ही श्रेयस्कर है क्योकि-यावन्मान जगत् में संक्लेश उत्पन्न ( ८७ ) भिन्न २ प्रकार से मानते हैं जैसे कि कोई २ तो पद् दर्शन इस प्रकार से मानता है कि पूर्वमीमांसा १ और उत्तरमीमांसा २ निरीश्वर सांख्य ३ और सेश्वरसांख्ययोडश पदार्थ के मानने वाला नैयायिक ५और सप्त पदार्थ के मानने वाला नैयायिक ६ इस प्रकार से दर्शन पट होते है। कोई इस प्रकार से मानता है कि-चौद्ध मत की चार शाखाएं हैं जैसे कि-सौत्रान्तिक १ वैभापिक २ योगा- चार ३ और माध्यमिक ४ जैन ५ और लोकायतिक ६ इस प्रकार पद् दर्शन होते हे तथा पूर्वोक्त और यह पट् दर्शन मिल कर सर्व दर्शन द्वादश होते हैं । अपितु कोई २ तो यह भी कहता है कि-मीमांसक १ सांख्य २ नैयायिक ३ वौद्ध ४ जैन ५और चार्वाक ६ इस प्रकार पट् दर्शन होते हैं। पर व प्रकृत निबंध- कार ने तो-बौद्ध, नैयायिक, सांख्य, जैन, वैशेषिक और जैमिनीय-इस प्र- कार पदर्शन प्रतिपादन किये है, किन्तु--सर्व दर्शन संग्रह और सर्व शिरो- माणि अादि निवधों में तो अनेक दर्शन कथन किये गए हैं अर्थात् यह नियम नहीं देखा जाता कि केवल दर्शन इतने ही होते हैं । इसी वास्ते प्राचार्य के लिये"परसमयवित्" शब्द लिखा गया है कि वह जैनमत के अतिरिक्त परमतके शास्त्रों का भी भलीप्रकार से परिचित हो, जैसे कि-पदर्शनों से वाहिर इसाई और मुसलमान श्रादि अनेक प्रकार के मत प्रचलित हो रहे हैं। उनके सिद्धान्तोंको भी जानना चाहिए तथा सूक्ष्म बाद्धिसे अन्वेपण करना चाहिए। अतएव यावन्मात्र परमत के सिद्धान्त हों या उनके सिद्धान्तों की शाखाएं वन गई हों सव का भलीभांति बोध होना चाहिए । पद् दर्शनों के विषय मे इसलिए नहीं लिखा गया है, कि-इन दर्शनों की पुस्तकें कतिपय भाषाओ मे मुद्रित हो चुकी है अतएव पाठकगण उन पुस्तको से वा सूयगडाङ्ग-सूत्र, स्याद्वाद मंजरी श्रादि जैनग्रथों से उक्लदर्शनों के सिद्धांतों का भली भांति वोध कर सकते है। इस स्थान पर तो केवल इतना ही विषय है कि प्राचार्य को उक्त मतोके सिद्धान्तों का भी जानकार होना चाहिए। ३३ गाभीर्य-इस गुण मे प्राचार्य की गंभीरता सिद्ध की गई है, क्योंकि जिसमे गांभीर्य गुण होता है, उसी मे अन्य गुण भी श्राश्रित होजाते है, वही आचार्य अन्य व्यक्तियों की आलोचनादि को सुनने के योग्य होता है वही श्राचार्य अन्य श्रात्मा की शुद्धि कराने की योग्यता रखता है जो उस प्रायश्चित्ती का दोष सुनकर किसी और के आगे प्रकाश नहीं करता यही उसकी गंभीरता है। कारण कि-जब वह स्वयं गंभीर होगा तभी वह कप्टो को सहन करता हुश्रा अन्य आत्माओं को धर्म पथ मे स्थापन कर सकेगा, और श्राप भी पवित्र गुणों का प्राश्रयीभूत बन जायगा। अतएव आचार्य को कैप बुद्धि से किसी का मर्म प्रकाशित न करना चाहिए ( ८६ ) सुयं मे पाउसं तेणं भगवया एवमक्खायं इह खलु थेरहिं भगवतेहि अठविहा गणि संपया पएणत्ता ॥ अर्थ-हे श्रायुप्मन् शिष्य ! मैने उस श्री भगवान को इस प्रकार प्रतिपादन करते हुए सुना है कि इस जिनशासन में स्थविर भगवंतों ने श्राठ प्रकार की गणि ( श्राचार्य ) संपत् प्रतिपादन की है। उक्त वचन को सुनकर शिप्यने प्रश्न किया । अब इस विषय में सूत्रकार कहते है। कयरा खलु अठविहा गणिसपया पएणत्ता । अर्थ--शिप्य ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! कौनसी आठ प्रकार की गणि संपत् प्रतिपादन की गई है ? शिप्य के प्रश्न का गुरु उत्तर देते हैं । श्रय सूत्रकार इस विपय में कहते है। इमा खलु अठविहा गणिसंपया पण्णत्ता तंजहा- अर्थ-गुरु कहते है कि हे शिष्य ! पाठ प्रकारकी गणिसंपत् इस प्रकार प्रतिपादन की गई है जैसे कि- अव सूत्रकार पाठ संपत् के नाम विषय मे कहते है। आयार संपया १ सुय संपया २ सरीर संपया ३ वयण संपया ४ चायणा संपया ५ मइ संपया ६ पयोग संपया ७ संगाह परिणाम अठमा ॥८॥ अर्थ-आचार संपत् १ श्रुतसंपत् २ शरीर संपत् ३ वचन संपत् ४ वाचना संपत् ५मति संपत् ६ प्रयोग संपत् ७ और संग्रह परिज्ञा ॥८॥ अब सूत्रकार आचार संपत् के विपय में कहते है। सेकिंतं आयार संपया? आयार संपया चउचिहा पएणत्ता तंजहा- संजम धुवजोग जुत्ते यावि भवइ १ असंप्पगाहिऽप्पा २ अणिययवत्ती ३ बुढि सीलयावि भवइ ४ । सेतं आयार संपया। अर्थ-शिप्यने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! श्राचार संपत् किसे कहते हैं ? इसके उत्तर में गुरु कहने लगे कि हे शिष्य! अाचार संपत् चार प्रकार की वर्णन की गई है जैसे कि-संयम मे निश्चल योग युक्त होवे १ प्राचार्य की श्रात्मा अभिमानरहित होवे २ अनियतविहारी होवे ३ चंचलता से रहित वृद्धों जैसा स्वभाव होवे ४ यही श्राचार संपत् के भेद हैं। सारॉश-प्रथम संपत् सदा- चार ही है। जो आत्मा आचार से पतित हो गया है वह आत्मिक गुणों से भी - ! ( १ ) उच्चारण का समय भाजावे तव उदात्त १ अनुदात्त २और स्वरित ३ इन तीन घोपों से युक्त और परम विशुद्ध श्रुत को उच्चारण करे अपितु यावन्मात्र श्रुत उच्चारण के दोप हे उनको सर्वथा छोड़कर केवल विशुद्ध घोप से ही श्रुत उच्चारण करे। श्रुत संपत् के पश्चात् अब सूत्रकारतृतीय शरीर संपत् विषय कहते है। सेकिंतं सरीर संपया ? सरीर संपया चउचिहा पणणत्ता तंजहा। आरोह परि- एणाय संपएणेयावि भवइ १ अणोत्तए सरीरो २ थिर संघयणे ३ बहु पडिपुन्निदिएयावि भवइ ४ सेतं सरीर संपया ॥ अर्थ-शिप्यने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! शरीर संपत् किसे कहते है ? गुरुने उत्तर में कहा कि-हे शिष्य ! शरीर संपत् चार प्रकार से प्रतिपादन की गर्द है जैसेकि-शरीर दीर्घ और विस्तार युक्त हो १ निर्मल और सुंदराकार शरीर हो २ शरीर का संगठन वलयुक्त हो ३ सर्व प्रकार से पंचेद्रिय वलयुक्त वा प्रतिपूर्ण हों ४ यही शरीर संपत् है। सारांश-द्वितीय सपत् के पश्चात् शिष्य ने तृतीय संपत् के विषयमे प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! शरीर संपत् किसे कहते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में गुरु ने प्रतिपादन किया कि हे शिष्य ! शरीर का सुंदराकार होना यही शरीर की सपत् है किन्तु वह सपत् चार प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि-शरीर दीर्घ और विस्तीर्ण होना चाहिए जो वर्तमान समय मे सौदर्य धारण करसके। साथ ही सभा में बैठा हुआ शरीर कांति को धारण करने वाला हो अपितु लज्जा युक्त भी न हो अर्थात् शरीर सुदराकार हो । इतना ही नहीं किन्तु शरीर का संहनन स्थिर होना चाहिए क्योंकि जिसके शरीर की अस्थिएं दृढ़ होंगी उस के शरीर का संहनन भी वलयुक्तही होता है । साथही पंचेंद्रिय प्रतिपूर्ण होवे। किसी इंद्रियमें भी किसी प्रकार की क्षति न हो जैसे कि-चतुओं मे निर्वलता, श्रुतेंद्रिय में निर्वलता वा शरीर रोगों के कारण विकृत होगया हो इत्यादि कारण शरीर संपत् के विघातक हो जाते है अतएव पांचों इंद्रिय प्रतिपूर्ण और वलयुक्त होनी चाहिए क्योंकि शरीर संपत् का प्रतिवादी पर परम प्रभाव पड़ जाता है तथा धर्म कथादि के समय शरीरसंपत् के द्वारा धर्म का महत्व वढ़ जाता है ॥४॥ शरीर संपत् के पश्चात् अव सूत्रकार चतुर्थ वचनसंपत् के विषय मे कहते है :- (६३) ! दिगुण युक्त पठन कराना चाहिए ३ यावन्मात्र अर्थ का निर्वाह कर सके ताव- मात्र ही योग्यतानुसार अर्थवाचना देनी चाहिए ४ यही वाचना संपत् के भेद हैं। सारांश-शिष्य ने प्रश्न किया हे भगवन् ! वाचना संपत् किसे कहते हैं ? इसके उत्तर में गुरु ने प्रतिपादन किया कि हे शिप्य ! जिस प्रकार शिष्य को सूत्र वा अर्थ का बोध होसके उसी प्रकार पठन व्यवस्था की जाए उसी का नाम वाचना संपत् है परन्तु इस संपत् के चार भेद है जैसे कि-शिष्य की योग्यता देखकर ही उस को सूत्र के पठन की आज्ञा देनी चाहिए जैसे कि यह शिष्य इस के योग्य है अत इसको यही सूत्र पढ़ाना चाहिए १ योग्यता देखकर ही वाचना देनी चाहिए जैसेकि-यह शिष्य इतनी वाचना सुखपूर्वक संभाल सकता है २ फिर योग्यता देखकर ही संहिता १ पद २ पदार्थ ३ पदविग्रह ४ शंका ५ और समाधानादि ६ विषय परिश्रम करना चाहिए ३ तथा यावन्मात्र वह अर्थका निर्वाह कर सके तावन्मात्र ही उसे अर्थ प्रदान करना चाहिए । कारण कि योग्यता पूर्वक पाठय व्यवस्था की हुई हो तो शिष्य के हृदय मे अर्थ अधिगत हो जाता है यदि योग्यता विना वाचना दीजायगी तो सूत्र की आशा- तना [अविनय होगी और पठन करने वाले के चित्त को विक्षेप उत्पन्न हो जायगा । पांचवीं वाचना संपत् के पश्चात् अब छठी मतिसंपत् के विषय मे सूत्रकार कहते है : किंतं मइ संपया? मइ संपया चउबिहा पण्णत्ता तंजहा-उग्गह मइ संपया १ ईहामइसंपया २ अवायमइ सपया ३ धारणामइ संपया ४ ॥ अर्थ-शिष्यने प्रश्न कियाकि-हेभगवन् ! मति संपत् किसे कहते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में गुरु ने कहा कि हे शिष्य ! मति संपत् चार प्रकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-अवग्रहमति १ ईहामति २ अवायमति ३ और धारणामति । साराश--सामान्य अवबोधका नाम अवग्रहमति है अर्थात् पदार्थों का सामान्य प्रकार से जो वोध होता है उसे अवग्रहमति कहते है परन्तु सामान्य वोधमे जो फिर विचार उत्पन्न होता है उस विचार से जो विशिष्ट बोधकी प्राप्ति होती है उसीका नाम ईहामति है फिर ईहामति से जो पदार्थों का भाव अवगत होता है उसी का नाम अवायमति है । अवगत होने के पश्चात् जो फिर उस ज्ञानकी धारणा कीजाती है उसी का नाम धारणामति है ।
(६५ ) पुनःशिप्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! धारणामति किसे कहते हैं ? गुरुने उत्तर में प्रतिपादन किया कि हे शिप्य ! धारणामति के भी छः भेद वर्णन किए गए है जैसे कि एकही वार बहुत से प्रश्नों को धारण करले । वहुत प्रकार से प्रश्नों के भावों को धारण करले २ पुरातन ज्ञान (प्राचीन। को धारण करे ३ नय और भंग तथा सप्तभंगी श्रादि के भावों को धारण कर । ४ परन्तु सूत्र वा शिप्यादि के निश्राय (श्राश्रय) विना शान को धारण करे ५ फिर विना सन्देह शान को धारण करे अथात् संशय रहित शान की धारण करे ६ सो इसी को धारणामति संपत् कहते है। साराश-जो सूत्र में मतिसपत् के मुख्य चार भेद किये गए थे अव शिष्य ने चार भेदों के उत्तर भेदों के विपय प्रश्न किया है कि हे भगवन् ! अवग्रहमति के कितने भेद किये गये हैं ? इस के उत्तर में गुरु ने कथन किया कि-हे शिष्य ! अवग्रह मति के छ भेद प्रतिपादन किये गये हैं जैसेकि- जब ही किसी ने कोई प्रश्न किया उसी समय उसके भावोंको जान लेना यह अवग्रहमति का प्रथम भेद है इसी प्रकार आगे भी जान लेना चाहिए जैसेकि-एक ही वार बहुत से प्रश्न कर दिये उनको एक ही बार सुनकर अवगत कर लेना २ किन्तु अपनी बुद्धि में उन प्रश्नों को भिन्न २ प्रकार से ही स्थापन करना अर्थात् विस्मृत न होने देना ३ अपितु दृढ़तापूर्वक उन प्रश्नों को धारण करना जिससे वे अस्खलित रूपसे बने रहे ४ फिर किसी की सहायता विना उन प्रश्नों को धारण करना जैसे-ऐसे न होकि-हे शिष्य ! तू ने इसको स्मृति रखना वा पत्र संचिकादि में स्मृति रूप लिख लेना तथा किसी ग्रथ के देखने की जिज्ञासा प्रगट करना ५ साथ ही जिस प्रश्नको स्मृति किया है उसमें किसी प्रकार से भी संशय न होवे जैसे कि उसने क्या कहा था? क्या यह था-वा कुछ और भी पूछा था? इसप्रकार के संशय न होने चाहिएं ६ यही अवग्रहमति संपत् के पद भेद है। परन्तु धारणामति संपत् के पद भेद निम्न प्रकार वर्णित है जैसेकि एक वार सुनकर बहुत ही धारण कर लेवे १ वा बहुत प्रकार से धारण करे २ जिस बात को हुए चिरकाल होगया हो उसे भी स्मृति पथ मे रखे कारण कि-पुरातन बातों के आधारपर ही नूतन नियमों की सृष्टि रची जासकती है पुरातन वातें ही नूतन क्रियाओं के करने में सहायक होती है जैसेकि-अमुक समय यह बात इस प्रकार की गई थी ३ तथा जो ज्ञान दुर्द्धरहो जैसेकि-भंग नय निक्षेपादि, उस ज्ञान को भी धारण कर रक्खे क्योकि भंगादिका ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति सहज मे ही धारण नहीं कर सकता श्रतएव प्राचार्य को अवश्यमेव उक्त प्रकार के ज्ञान को स्मृति मे रखना चाहिए ॥४॥ - - - ( ६७ ) ही कोलाहल करना चाहती है, यदि दर्शक उपहासादि के लिए ही एकत्र हुए हों तो केवल किसी समय स्खलित भावादि को देखकर उपहास ही करना चाहते है अतएव परिपत् भावो को देख कर ही वाद में प्रवृत्ति करनी चाहिए ॥ क्षेत्र को देखकर ही वाद करना चाहिए क्योंकि-यदि क्षेत्राधिपति धर्म का द्वेपी है वा उस समय उस क्षेत्र में जो माननीय पुरुप है वह अनार्य है अथवा धर्म चर्चा के उद्देश्य को नहीं जानता, एव उसको सभापति बनाने की संभावना हो तथा निर्णय उसके हाथ में हो इत्यादि सर्व भावों को देखकर ही वाद के लिए प्रवृत्ति करनी चाहिए । ३ । पद् द्रव्यों में से किस द्रव्य विषय वाद करना है, उस विषय में मेरा सत्व है या नहीं इसका अनुभव करके तथा द्रव्य क्षेत्र काल और भावरूप पदार्थों के स्वरूप को जानकर ही वाद करना चाहिए जैसाकि द्रव्य से धर्म अधर्म श्राकाश काल पुद्गल और जीव यह छै द्रव्य हैं ? क्षेत्र से ऊर्च १ अधो २ और तिर्यक् यह तीन लोक है २ काल से-भूत भविष्यत् और वर्तमान यह तीनों काल है ३ भाव से-औदयिक २ श्रीपशमिक २ क्षायिक ३ नयोपशमिक ४ पारिणामिक ५ और सन्निपात ६ यह भाव है तथा सात नय प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और श्रागम यह चार प्रमाण नाम स्थापना द्रव्य और भाव यही चारों निक्षेप वा निश्चय पक्ष वा व्यवहार पत्न सामान्य भाव वा विशेष भाव कारण और कार्य इस प्रकार अनेक शास्त्रोक्त भावों को जानकर और अपनी शक्ति को देखकर ही वाद विपय में उद्यत होना चाहिए क्योंकि इस प्रकार करने से किसी प्रकार की भी क्षति होने की संभावना नहीं है अपितु धर्मप्रभावना तो अवश्यमेव होजायगी इसी का नाम प्रयोगमतिसंपत् है अव सूत्रकार प्रयोगमति के पश्चात् संग्रहपरिना नामक आठवीं संपत् विषय कहते है:- सेकिंतं संग्गह परिणा नाम संपया ? संग्गहपरिणा नामं संपया चउविहा पएणत्ता तंजहा-बासा सुखत्ते पडिलेहित्ता भवइ, बहुजण पाउगत्ताए ? बहुजण पाउगत्ताए पाडिहारिय पीढ फलग सेज्जा संथारय उगिरिहत्ताभवइ२ कालणं कालं समाणइत्ता भवइ ३ आहागुरू संपूएत्ता भवइ ४ सेत संग्गह- परिणा नामं संपया ॥८॥ अर्थ-शिष्य ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! संग्रहपरिज्ञा नामक संपत् किसे कहते है ? तव गुरु ने उत्तर मे प्रतिपादन किया कि-हे शिप्य ! सग्रह परिज्ञा नामक संपत् के चार भेद है जैसेकि-श्राचार्य बहुत से भिक्षुओं के लिए वकाल में ठहरने के लिए क्षेत्रों को प्रतिलखन करनेवाला हो १ . -- (६६) हो जाने से प्राचार्य फिर गच्छ की सारणा वारणादि क्रियाएँ सुखपूर्वक कर सकेगा ३ फिर अहंकार भाव को छोड़ कर दीक्षा गुरु वा श्रुत गुरु तथा दीक्षा मे बड़ा उनकी विनय भक्ति करने वाला हो जैसे कि-जव उन का पधारणा होवे तब उनको भाते हुए देखकर अभ्युत्थानादि सम्यग् रीति से करना चाहिए फिर श्राहार वा औषधि तथा उनकी इच्छानुसार उपाधि आदि के द्वारा उनका सत्कार करना चाहिए । सारांश इस का इतना ही है कि-अंहकार भाव से सर्वथा रहित हों। गुरुओं की विधिपूर्वक पर्युपासना करनी चाहिये यदि ऐसे कहा जाए कि-गुरु पंचम साधु पदमे है और शिप्य तृतीय आचार्य पदमे है तो फिर वह तृतीय पवाला पचम पदकी पर्युपासना किस प्रकार करसकता है ? इसका समाधान यह है कि-जैनमत का मुख्य विनयधर्म है अतएव सिद्धान्त में लिखा है कि-जहाहि अग्गि जलणं नमसे । नाणाहुइमत्र पयाभिसित्तं एवायरिय उचिट्टइज्जा अणंत नाणोवगनोधिसतो ( दशवकालिक सूत्र० श्र. ६ उद्देश १ गाथा ११) अर्थ-जिस प्रकार अग्निहोत्री ब्राह्मण श्रग्नि को नमस्कार करता है तथा नाना प्रकार पाहुति, और मंत्र पदों से अग्नि को अभिसिक्त करता है उसी प्रकार शिष्य श्राचार्य (गुरु) की अनंत ज्ञानके उत्पन्न होजाने पर भी भक्ति और विनय करे तथा जिसप्रकार अग्निहोत्रीपुरुप सदैव अग्नि के ही पास रहता है उसी प्रकार शिष्य गुरुकुलबासी रहे, तथा जिस प्रकार राज्य अवस्था के मिलजाने पर फिर वह राजकुमार अपने मातापिता की विनय करता है ठीक उसीप्रकार प्राचार्य पदके मिलजाने पर दीक्षावृद्धों की पर्युपासना करता रहे क्योंकि प्राचार्य पद केवल गच्छवासी साधु-और साध्वियों की तथा श्रावक वा श्राविकाओं की रक्षा करनेके लिये ही होता है परन्तु विनय भक्ति के व्यवच्छिन्न करने के लिये नहीं क्योंकि-आचार्यका कर्तव्य है कि अपनी पवित्र आज्ञा द्वारा सघसेवा करता रहे और विनय धर्म को कदापि न छोड़े इसीलिये सूत्र में प्रतिपादन किया है कि प्राचार्य गुरु पर्युपासना करता रहे क्योंकि अाज्ञा प्रदान करना कुछ और वात है गुरु भक्ति करना कुछ और वात है सोयही सग्रहपरिज्ञा नामक संपत् का चतुर्थ भेद है इस प्रकार आठ प्रकार की संपत् का वर्णन किये जाने पर अव चार प्रकार की विनय प्रतिपत्ति विषय सूत्रकार प्रतिपादन करते हैं जिस का श्रादिम सूत्र निम्न प्रकार से है :-- आयरिश्रो अंतेवासीएमाए चउनिहाए विणयपडिवत्तीएविणइत्ता . - . है " H - । जैसेकि श्राचार्य श्राप शुद्धाचरण धारण करे और अपने शिष्य को संयम समा- चारी का ठीक २ बोध करावे यथा-पंचाश्रवाद्विरमणं पंचेंद्रियनिग्रहः कपायजयः दंडत्रयविरतश्च संयम सप्तदश विधः ॥ १॥ अर्थात् हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन और परिग्रह इन पांचों श्राश्रवों की विरति करना और श्रोतेन्द्रिय चक्षुरिन्द्रिय बाणेंद्रिय रसेन्द्रिय तथा स्पर्शेन्द्रिय इनका निग्रह करना फिर क्रोध, मान, माया और लोभ का जीतना तथा मन वचन और काया का वश मे करना यह सर्व १७ प्रकार के संयम के भेद हैं। प्राचार्य स्वयं इन भेदों पर प्राचरण करता हुआ फिर इनका पूर्ण बोध अपने शिप्य को करावे । इसी प्रकार १२ प्रकार के के भेदों को भी अपने शिष्य को सिखलाता हुआ आप भी यथाशक्ति तप धारण करे तथा जो व्यक्ति तप करने से हिचकिचाते हों उन को तपका माहात्म्य दिखलाकर तप में उत्साहित करे। सूत्रों में तप के १२ वारह भेद वर्णन किए गए है जैसे कि-अनशन १ ऊनोदरी २ भिक्षाचरी ३ रसपरित्याग ४ काय- क्लेश ५ और प्रतिसलीनता ६ प्रायश्चित्त ७ विनय = वैयावृत्त्य स्वाध्याय १० ध्यान ११ और कायोत्सर्ग १२ इनका सविस्तर स्वरूप औपपातिकादि सूत्रों से जानना चाहिये। सोश्राचार्य शिष्यको उक्त तपोके विधि विधानादि से परिचित कराए । तप समाचारी के पश्चात् फिर श्राचार्य गण समाचारी का शिप्य को वोध कराए जैसे कि-गण के उपाधिधारियो के क्या २ कर्तव्य है तथा अन्य गण के साथ किस प्रकार वर्ताव करना चाहिए किस प्रकार अन्य गणक साथ वंदनादिका संभोग जोड़ना चाहिए और किस प्रकार अन्यगण से पृथक् हो जाना चाहिए वा स्वगण मे जो मुनियों के कई कुल होते हैं उनके साथ किस प्रकार वीव करना चाहिए वा जो स्वगण मे क्रियाकांड की शिथिलता आगई हो उसे किस प्रकार दूर करना चाहिए अथवा अपनेही गण मे जो साधु प्रत्युपेक्षणादि मे शिथिल होजावे तो उनको किस प्रकार सावधान करना चाहिए। इसी प्रकार स्वगण मे जो वाल दुर्वल ग्लानादि युक्त साधु है उनकी किस प्रकार वैयावृत्य (सेवा ) करनी चाहिए इस प्रकार की गण सामाचारी को आचार्य श्राप धारण करता हुआ अपने शिष्य को यथाविधि शिक्षित करे जव गण समाचारी का पूर्ण वोध होजावे तो फिर एकाकि विहार प्रतिमा की समाचारी का शिष्य को ज्ञान कराए क्योंकि गणसे पृथक् होकर ही एकल- विहार प्रतिमाका ग्रहण हो सकता है वा साधु की १२ प्रतिमा [प्रतिज्ञाओं के धारण करने की यथाविधविधि का शिष्य को बोध कराए । इतनाहीं नहीं किन्तु उक्त समाचारी को श्राप धारण करे और अपने शिष्यों को धारण कराए, कारण कि सूत्रोक्त विधि से यदि एकल्लविहार प्रतिमा धारण कीजाए तो परमनिर्ज- राका कारण होता है अतएव प्राचार्य सर्व प्रकार से एकल्ल विहार प्रतिमा ( १०३ ) और विद्यार्थीकी श्रात्माका हित हो उसी प्रकार वाचना देनी चाहिए अर्थात् योग्यता देखकर ही सूत्रका अर्थदान करना चाहिए क्योंकि-जिस प्रकार मिट्टी के कचे (श्राम) घट (घड़े) में जल डालने से घट और जल दोनों का विध्वंस होजाता है ठीक उसी प्रकार अयोग्य व्यक्ति को योग्यता विना पठन कराने से उस व्यक्ति और ज्ञान दोनों का विनाश हो जाता है इसलिए जिस प्रकार उस विद्यार्थी का ज्ञान द्वारा हित हो सके वही क्रम ग्रहण करना उचित हैं। इस कथन का सारांश यह है कि-पठन इस लिए कराया जाता है कि- शान की प्राप्ति हो और चित्त की समाधि (शांति) उत्पन्न की जाए। जव अयोग्यता से पठन कराया गया तव उक्त दोनों कार्यों की सफलता पूर्णतया नहीं हो सकती श्रतएव हित वाचना द्वारा अपना और शिष्य का हित करना चाहिए जव हितवाचना की समाप्ति हो जावे तव फिर चौथी निशेषवाचना द्वारा सर्व प्रकार से शंका समाधान करना चाहिए तथा प्रारब्धसूत्र की समाप्ति के पश्चात् ही अन्य सूत्र का प्रारभ करना चाहिए अथवा प्रमाण निक्षेप नय और सप्तभंगादि के द्वारा सूत्र के भावों को जानना चाहिए क्योंकि-यावन्मात्र प्रश्न हैं उनके समाधान सर्व निशेप वाचना द्वारा किए जाते हैं अतः निशेप- वाचना अवश्यमेव पठन करानी चाहिए । इस प्रकार श्रुतविनय के कहे जाने के पश्चात् श्रव सूत्रकार विक्षेपणा विनय विषय कहते हैं:- सेकिंत विखेवणा विणए ? विखवणा विणय चउबिहे पणत्ता तंजहा- अदि धम्म दिह पुव्वगत्ताए विणसत्ता भवइ १ दिट्ठपुव्वगं साहम्मिय- ताए विणएत्ता भवइ २ चुय धम्माउ धम्मे ठावइत्ता भवइ ३ तस्सेव धम्मस्स हियाए सुहाए खमाए निसेस्साए अणुगामियत्ताए अम्भुठेत्ता भव- इ॥ ४ ॥ सेतं विखेवणा भवइ ।। अर्थ-(प्रश्न) हे भगवन् ! विक्षेपणा विनय किसे कहते है ? (उत्तर) हे शिष्य ! विक्षेपणा विनयके चार भेद प्रतिपादन किए गए हैं जैसे कि-जिन आत्माओंने पहिले सम्यक्त्वरूप धर्म का अनुभव नहीं किया उन श्रात्माओंको सम्य- क्त्वरूप धर्म मे स्थापन करना चाहिए १ जिन्होने सम्यक्त्वरूप धर्म प्राप्तकर लिया है उन जीवों को साधर्म्यतामे स्थापन करना चाहिए २ जो धर्म से पतित होते हों उन्हे धर्म मे स्थिर करना चाहिए ३ और सदैवकाल श्रुत और चारित्र धर्म का महत्व दिखलाना चाहिए जैसे कि हे भव्यजीवो ! थुत और चारित्र धर्म हितकारी है, सुखकारी है, समर्थ है, मोक्षके लिये मुख्य साधन है, जन्म २ मे साथ चलनेवाला है । अतएव इसको अवश्यमेव धारण करना चाहिए॥४॥ :-- ( १०५ ) अर्थ--(प्रश्न ) दोष निर्घातना विनय किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) हे शिप्य ! दोप निर्धातना विनय के चार भेद प्रतिपादन किए गए है जैसे कि- क्रोधी के क्रोध को दूर करना चाहिए १ दुष्ट की दुष्टता को दूर करना चाहिए। कांक्षित पुरुष की आकांक्षा पूरी करनी चाहिए ३ क्रोधादि से रहित शुद्ध और पवित्र आत्मा बनानी चाहिए अर्थात् सुप्रणिहितात्मा होना चाहिए इसी का नाम दोपनिर्घातना विनय है । साराश--शिष्य ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! दोष निग्र्यातना विनय किसे कहते हैं और इस के कितने भेद है ? इस प्रश्न के उत्तर में गुरु कहने लगे कि हे शिप्य ! दोप निर्घातना विनय उसी का नाम है जिस के द्वारा प्रात्मा से दोपों को निकाल बाहिर किया जाए इसके मुख्य चार भेद हैं जैसे कि-जिनको क्रोध करने का विशेष स्वभाव पड़ गया हो उनको क्रोधका कटुफल दिखलाकर तथा मृदु और प्रिय भापण द्वारा क्रोध को दूर कर देना चाहिए अर्थात् जिस प्रकार उनका क्रोध दूर हो सके उसी उपाय से उनका क्रोध दूर कर देना चाहिए। जिस प्रकार विप भी युक्तियों से औषधी के रूप को धारण करता हुआ अमृतरूप हो जाता है ठीक उसी प्रकार क्रोधरूपी विपको शास्त्रीय शिक्षाओं द्वारा शांत करना चाहिए तथा जिस प्रकार दावा- नल को महा मेघ अपनी धारा द्वारा शान्त कर देता है ठीक उसी प्रकार शास्त्रीय उपदेशों द्वारा क्रोध को शान्त कर देना चाहिए १ इसी प्रकार जो व्यक्ति क्रोध-मान, माया और लोभ द्वारा दुष्टता को धारण किये हुए हो उस की भी शास्त्रीय शिक्षाओं द्वारा दुष्टता दूर कर देनी चाहिए । इसका तात्पर्य यह है कि-जिस व्यक्ति को दुष्टता धारण करने का स्वभाव पड़ गया हो उस के स्वभाव को शान्त भावों से वा शिताओं द्वारा ठीक करना चाहिए २ । इसी प्रकार संयम निर्वाह के लिए जिसको जिस वस्तु की आकांक्षा हो उसकी आकांक्षा पूरी कर देनी चाहिए। अन्न, पानी. वस्त्र. पात्र या पुस्तक की आकांक्षा अथवा विहारादि की आकांक्षा सो जिस प्रकार की संयम विपयक आकांक्षा हो उसकी पूर्ति मे वरावर सहयोग देना चाहिए तथा यदि किसी के मन में प्रवचन के विपय शंका हो तो उसकी शंका का समाधान भली प्रकार से कर देना चाहिए क्योकि शास्त्र मे लिखा है कि-शंकायुक्त श्रात्मा को कभी भी समाधि की प्राप्ति नहीं हो सकती, अतएव शंका अवश्यमेव छेदन करनी चाहिए । शंका रहित होकर फिर वह आत्मा शास्त्रोक्त क्रियाओं मे निमग्न होता हुश्रा क्रोध. मान, माया और लोभरूप अंतरंग दोषों से विमुक्त होकर सुप्र- रिणहितात्मा हो जाता है अर्थात् उसका श्रात्मा सकल दोपों से रहित होकर शुद्ध और पवित्र होजाता है । इसीका नाम दोपनिर्धातना विनय है ॥
- ( १०७ ) उपकरण को उत्पन्न करना है और उसके मुख्य चार भेद है जैसे कि--जो उपकरण अपने गच्छ में न हो उसको उत्पन्न करना १ संयम के निर्वाह के लिए जिन पदार्थों की आवश्यकता रहती है उसे उपकरण कहते है। जैसे कि-वस्त्र, पात्र, पुस्तकादि जो वस्त्रादि अपने गच्छ में न हो उन्हें गच्छ- वासी साधुओंके लिये उत्पन्न करने चाहिएं । उक्त कार्य श्राचार्य स्वयं करे किन्तु यदि श्राचार्य श्रान्तहोगया हो वा उसकी स्वाध्यायादि क्रियाओं में विघ्न पड़ता हो तो शिष्य स्वयं गच्छवासी साधुओंके लिय अनुत्पन्न उपकरण को उत्पादन करे १ जो प्राचीन (पुराना ) उपकरण हो उसे संरक्षित रखना चाहिए यदि उपकरण जीर्ण हो तो उसे गुप्त रखना चाहिए क्योंकि पुराणा वा जीर्ण उपकरण संरक्षित किया हुआ फिर पहि- रने में आसकता है क्योंकि जीर्णादि उपकरण सोए हुए वर्षाकालादि के समय प्रयोग में श्रासकते है २ जिस साधु के पास अल्प उपकरण हों उसको अपनी निधाय का उपकरण देदेवे जिससे उसका प्रात्मा स्थिर होजावे कारण कि सुरक्षित होनेसे ही गच्छका महत्व बढ़ जाता है और ऐसे सुयोग्य प्राचार्य के गच्छ में निवास करते हुए साधु अपना कल्याण कर सकते हैं ३ जब कभी वस्त्रादि उपकरण के विभाग करने का समय उपस्थित हो तव यथायोग्य उप- करण देना चाहिए। बड़को बड़े के योग्य औरछोटे को उसके योग्य उपकरण देना उचित है । इसी का नाम उपकरण उत्पादन विनय है ॥ अब सूत्रकार इसके अनन्तर सहायता विनय विपय कहते हैं। सेकितं साहिल्लया ? साहिल्लया चउचिहा पएणत्ता तंजहा-अणुलोम- वइ सीहतेयावि भवइ १ अणुलोमकाय किरियत्ता २ पडिरूवकाय संफासण्या ३ सवत्थेसु अपडिलोया ४ सेतं साहिल्लया ॥ अर्थ-(प्रश्न) सहायता विनय किस कहते है ? ( उत्तर ) सहायता विनय के चार भेद है जैसेकि अनुकूल वचन घोलना वावुलाना चाहिए १ अनुकूल काय द्वारा अन्य व्यक्तियों की सेवा करनी चाहिए २ जिस प्रकार अन्य व्यक्तियों को अपने द्वारा सुख पहुचसके उसी प्रकार उनको यथाविधि सुख पहुंचाना चाहिए ३ सर्व कार्य करते हुए ऋजुता धारण करनी चाहिए अर्थात् मिथ्याभिनिवेश न करना चाहिए ॥ ४॥ सो इसे ही सहायता विनय सारांश-शिप्य ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! सहायताविनय किसे कहते है और उसके कितने भेद है ? इस के उत्तर में गुरु कहने लगे कि हे शि- प्य ! अन्य प्राणियों को सुख पहुंचाना और उनके दुःख की निवृत्ति करना उस- का नाम सहायताविनय है। इस विनय के चार भेद हैं जैसेकि-प्रत्येक प्राणी कहत PANE ( १०६ ) अर्थात् तिरस्कार वा उपालंभादि द्वारा उनको सुशिक्षित करना २ जो व्यक्ति श्राचार्यादि के यथार्थ गुणों का गान करते है उनका धन्यवाद वा उनके सद्गुणों का प्रकाश करना ३ जो महाव्यक्ति अात्मिक गुणों में पूर्ण है उनकी सेवा करना क्योंकि उनकी सेवा से आत्मिक गुणों की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार वर्णसज्वलनता का.वर्णन करते हुए अब सूत्रकार भारप्रत्यवतारणता विनय के विषय में कहते है.- सेकिंतं भारपच्चोरूहणया ? भारपच्चोरूहणया चउबिहा पएणत्ता तंजहा-असंगहीयं परिजण संगहित्ता भवइ १ सेहं पायारगोयरगाहि- त्ता भवइ २ साहम्मियस्सगिलायमाणम्स अहाथामं वेयावच्चे अभ्भुटित्ताभवइ ३ साहम्मियाणं अहिकरणंसि उप्पएणं स तत्थ अणिस्सितो वसिएवसितो अप्पक्खग्गाही मज्झत्थ भावभूए समंववहारमाणे तस्सवाहिकरणस्सखामण- विउ समणयाए सयासमियं अभ्भुठेत्ता भवइ कहंतुसाहम्म्यिा अप्पसद्दा अप्प झंझा अप्पकलहा अप्प कसाया अप्पतुमंतुमा संजम बहुला संवर बहुला समाहि बहुला अप्पमत्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणाणं एवंचणं विहरेज्जा।॥ ४॥ संत भारपच्चोरूहणया एस खलुसा थेरेहिं भगवंतेहिं अहविहा गणिसंपया पण्णत्ता तिमि योत्थिया दसा समत्ता । अर्थ--(प्रश्न) हे भगवन् ! भारप्रत्यवतारणताविनय किसे कहते हैं? (उत्तर) हे शिप्य ! यदि प्राचार्य गच्छ के भार को शिष्य के सपुर्द कर दे उसका नाम भारप्रत्यवतारणता विनय है। उसके चार भेद प्रतिपादन किए गए है जैसे कि-असगृहीत को सगृहीत करना १ शिप्य को प्राचार गोचार सिखाना २ ग्लानिक स्वधर्मी की यथाशक्ति वैयावृत्य करना ३ साधर्मिक व्यक्तियों में क्लेश उत्पन्न होजाने पर निपक्ष होकर माध्यस्थ भाव धारण करके सम्यग- प्रकार से श्रुतव्यवहार को प्रयोग मे लाकर क्लेश को शान्त करने के लिए सदैवकाल उद्यत रहना ताकि क्लेश के स्थान पर समाधि उपस्थित हो ४। फिर अप्रमत्त होकर संयम और तपके द्वारा अपनी श्रात्माकी भावना चिन्तन करता हुआ विचरे । इस प्रकार उक्त विनय का पालन करना भार- प्रत्यवतारणता विनय कहा जाता है। साराश--शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! भार प्रत्यवतारणता विनय किसे कहते है और उसके कितने भेद प्रतिपादन किये गए है ? इसके उत्तर में गुरु ने प्रतिपादन किया कि-हे शिष्य ! जिस प्रकार राजा अपने ( १११ ) है हैं - जैसेकि आठ संपदोंके चार २ भेद, सर्व भेद एकत्र करने से ३२ हुए और चार प्रकार की विनय प्रतिपत्ति के मिलाने से ३६ गुण होजाते परन्तु मन्तव्य यह है कि-श्राचार्य समग्र गुणो से संयुक्त हो ताकि गरण की सम्यगतया रक्षा कर सके क्योंकि गुणों में एक स्वा- भाविक शक्ति होती है जो अन्य व्यक्तियों को स्वयमेव श्राकर्पित करलेती है। जिसप्रकार गच्छमें प्राचार्य मुख्य माना जाता है ठीक उसी प्रकार द्वितीय अंकपर उपाध्याय का नाम है । गच्छ के मुनियोंको सुयोग्य बनाना नथा योग्यतापूर्वक उनको श्रुताध्ययन कराना यही उपाध्याय का मुख्य प्रयोजन है। क्योंकि-चैतपुरुपके ११ एकादशांग और १४ पूर्व अवयवांग है । उपाध्याय उन अंगों वा पूर्वोको आप पढ़े और परोपकारके लिये अन्य योग्य व्यक्तियो को पढाए । यही मुरय २५ गुण उपाध्याय जी के है । इसका मूल कारण यह है कि-स्थानांग सूत्र के द्वितीय स्थान मे लिखा है कि अनादि संसार चक्र से पार होने के लिए श्री भगवान् ने दो मार्ग बतलाए है अर्थात् दो स्थानो से जीव अनादि संसार चक्र से पार होजाते है जैसेकि- "विजाए चैव चरित्तेण चव" विद्या और चारित्र से। इस कथनकासारांश यह है कि- जवतक सद् वा आध्यात्मिक विद्या सम्यगतया उपलब्ध नहीं होती तवतक धार्मिक विषयों में भी पूर्णतया निपुणता नहीं मिल सकती । धार्मिक विषयों में निपुणता न होने पर फिर श्रात्मा और कौका जो परस्पर क्षीरनीरवत् सम्बन्ध होरहा है उसका वोध किस प्रकार होसकता है । यदि कर्म और श्रात्मा के विपय मे अनभिज्ञता है तो फिर उनके पृथक् २ करने के लिए यत्न किस प्रकार किया जायगा? अतएव प्रथम श्रुतविद्या के अध्ययन करने की अत्यन्त आवश्यकता है । जव श्रुताध्ययन भली प्रकार से होगया तो फिर उस श्रुत से निश्चित किये कर्मके सम्बन्ध को श्रात्मा से पृथक करने की आवश्यकता प्रतीत होने लगती है सो जो क्रियाएँ श्रात्मा से कर्मों को पृथक् करने के लिये धारण की जाती है, उन्हीं का नाम चारित्र है। इसीलिए शास्त्रकारने पहिले ही यह प्रतिपादन करदिया है कि-विद्या और चारित्र से आत्मा अनादि संसार चक्र से पार होजाते है। इस श्रत के अध्ययन कराने के अध्ययन कराने के लिये उपाध्याय पद नियुक्त किया गया है। उपाध्याय जी के २५ गुण कथन किए गए है जैसेकि-११ अंगशास्त्र और चतुर्दश १४ पूर्व । एवं श्रुतज्ञान के २५ मुख्य शास्त्रों को आप पढ़े और अन्य योग्य व्यक्तियों को पढ़ावे जिससे श्रुतज्ञान द्वारा अनेक भव्य प्राणियों का कल्याण होसके । अव भव्य जीवों के प्रतिवोध के लिये पहले अंगशास्त्री का किंचित् परिचय दिया जाता है।
( ११३ ) - २ सूत्रकृताह सूत्र-इस सूत्र के दोश्रुतस्कन्ध है । प्रथम श्रुत के १६ अध्ययन है । द्वितीय श्रुतस्कंधके सात अध्ययन है--और ३३ इस सूत्रके उद्देश है । इसमें इस लोक और अलोक की सूचना है । इतनाही नहीं किन्तु जैनमत के स्याद्वाद मतानुसार जीव वा श्राजीव की बड़ी विस्तार से व्याख्या की गई है। साथ ही परमत के माने हुए. अनेक मतोंका दिग्दर्शन कराया गया है। एवं उन मतों में जो त्रुटिये है उनका भी दिग्दर्शन कराया गया है। अन्त में निर्वाण प्राप्ति के लिये पडित पुरुषार्थ करना चाहिए, इस विषय का विपद उपदेश किया गया है । ३६ सहस्र (३६००० ) इस सूत्र के पद है इस सूत्र का उपांग राजप्रश्नीय सूत्र है। इस सूत्रमे महाराज प्रदेशी के माने हुए नारितक मत का स्वरूप कथन किया गया है और साथ ही भगवान् श्री- पार्श्वनाथ जी के शिप्यानुशिप्य श्री केशीकुमार श्रमण के साथ जो महाराज प्रदशी के नास्तिकमत सम्बन्धी प्रश्नोत्तर हुए है वे भी दिखलाए गए है। तदनन्तर महाराज प्रदेशी ने जव प्रास्तिकमत ग्रहण कर लिया और फिर सम्यग्तया श्रावक धर्म का पालन किया उसका फलादेश भी भली प्रकार से दिखलाया गया है। जैनमत वा परमतके स्वरूप को जानने के लिये मुमुक्षु जनों के हितार्थ यह सूत्र अत्यन्त उपयोगी है । ३ स्थानाङ्ग सूत्र-इस सूत्र मे पदार्थो के भावोंका दिग्दर्शन कराया गया है। एक स्थान से लेकर दश स्थानतक प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप को प्रतिपादन किया गया है। साथ ही सामान्य वा विशेप तथा पक्ष प्रतिपक्ष पदार्थों का स्वरूप दिखलाया गया है । संसार में यावन्मात्र पदार्थ है वे प्रतिपक्षी पदार्थो के होने स ही अपनी सत्यता सिद्ध करते है यथा-यदि जीव पदार्थ है तव उसी का प्रतिपक्ष अजीव पदार्थ भी है। अजीव पदार्थ के मानने परही जीव पदार्थ की सिद्धि की जासकेगी, जिस प्रकार किसीने कहा कि यह बड़ा विद्वान् है, ऐसा तभी कहा जायगा जव कहनेवालेको मूखौंका भी चोध होगा। इसी प्रकार जब किसी ने कहा कि अमुक पुरुष बड़ा धनी है तव विचार- णीय विपय यह है कि धनी तभी कहा जासकेगा जव कहने वाले को निर्धन काभी ज्ञान होगा । इसी क्रमसे प्रत्येक पदार्थ पक्ष और प्रतिपक्ष के कारण अपनी सत्यता रखता है जैसेकि-जीव-अजीव, लोक-अलोक पुण्य-पाप, आश्रव-संवर वेदना-निर्जरा, बंध-मोक्ष, तथा त्रस-स्थावर सिद्ध और ससार, इत्यादि क्रमसे दश स्थानोंतक पदार्थों सूत्र में वर्णन किया गया है। साथ ही स्वमत, परमत, कूट, नदी हृदादि का बड़ी विचित्र रचना से विवेचन किया गयाहै । इस सूत्र का केवल एक ही श्रुतस्कन्ध है और दश अध्ययन हैं किन्तु इसके उद्धेश २१ हैं। । का इस ( ११५ ) समाधान - उत्तर में श्री भगवान् ने प्रतिपादन किया, जयंती ! बहुत से श्रात्मा वलवान् और वहुत से आत्मा निर्बल ही अच्छे होते हैं। इस प्रकार कहे जाने के पश्चात् फिर जयंती ने शका उत्पन्न की कि-हे भगवन् ! यह बात किस प्रकार सिद्ध होसकती है? इस के में श्री भगवान् ने फिर प्रतिपादन किया कि हे जयंती! न्याय पक्षी वा न्याय करने वाले जो धर्मरूप आत्माएं है वे बलवान ही अच्छे होते हैं क्योंकि उनके बलयुक्त होने से पाप कर्म निर्बल होजायगा जिस से बहुत से प्राणियों को सुख प्राप्त हो सकेगा । जव अधर्मात्माओं का बल बढ़ जायगा तब पाप कर्म ही बढ़ता रहेगा। अतएव धर्मात्मा लोग बलवान् अच्छे होते हैं और इसके प्रतिकूल पापात्मा निर्वल ही अच्छे होते हैं क्योंकि उनके निर्वल होने से पापकर्म भी निर्वल होजायगा। इस प्रकार प्रत्येक प्रशोत्तर सरल- तया प्रतिपादन किया गयाहै। इस सूत्रके २८८०००पद है। प्रत्येक पदमे प्रश्नोत्तर भरे हुए हैं। प्रायः सर्व प्रकार के प्रश्नों के उत्तर श्री वीर भगवान् के मुखाविंद से निकले हुए है । इसलिये प्रत्येक प्रश्नोत्तर आत्मिक शांति का उद्योधक है और अलंकार से युक्त है। फिर इसी सूत्र का उपांग सूर्यप्राप्ति है । जिस मे सूर्य की गति आदि का वर्णन है । इसे ज्योतिपका शास्त्र माना जाता है । अतएव व्या- त्याप्रज्ञप्तिसूत्र योग्यतापूर्वक प्रत्येक प्राणी को पठन करना चाहिए । ६ ज्ञाताधर्मकथांगसूत्र--इस सूत्रमे शाता-दृष्टांतादि के द्वारा धर्मकथा का वर्णन किया गया है। इस सूत्र के दो श्रुत स्कंध है । प्रथम श्रुत के १६ अध्याय हैं। प्रत्येक अध्ययन शिक्षा से भरा हुआ है। साथही प्रत्येक अध्ययन का उपनय ठीक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि श्री भगवान महावीर स्वामी से श्रीगौतम स्वामी जी ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! जीव लघु । हल- का ) और गुरु ( भारी) किस प्रकार होता है ? इसके उत्तर में श्री भगवान् ने प्रतिपादन किया कि-हे गौतम ! पाप कर्मों के करने से जीव भारी हो जाता है फिर उन्हीं पापकर्मों से निवृत्त हो जाने से जीव हलका होजाता है । जिस प्रकार अलांबू ( तूंवा ) मिट्टी और रज्जु के यधनों से भारी होकर जल में डूब जाता है परंतु जब उस तूचे के बंधन टूट जाएँ तब वह निर्वधन होकर जल के ऊपर प्राजाता है ठीक इसी प्रकार हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन और परिग्रह, क्रोध, मान, माया और लोभ, राग तथा द्वेप, क्लेप, प्राभ्या- ख्यान (कलक ) परपरिवाद ( निंदा ) पिशुनता (चुगली) रति और रति, माया, मृपा और मिथ्यादर्शनशल्य इन पाप कर्मों के करने से जीव भारी होजाता है। जब उक्त पापकर्मों से निवृत्ति हो जाती है तब जीव तूबकवत् मुक्तबंधन होकर निर्वाणपदकी प्राप्ति करलेता है । इस प्रकार प्रथम शृत स्कध में १६ धार्मिक दृष्टान्त वर्णन किये गए हैं। ।
है ( ११७ ) केवलशान का प्रकाश न कर सके किन्तु निर्वाणपद की प्राप्ति कर ली जैसेकि- श्री गजसुकुमार आदि महर्षि हुए । इस प्रकार के महर्पियों के जीवन चरित इस सूत्र में दिये गए हैं । इस सूत्र का केवल एक ही श्रुतस्कन्ध है और पाठ वर्ग है । २३०४.०० इस के पदों की संख्या है और निरयावली सूत्र इसका उपांग है। इस उपांग में महाराजा कृणिक और चेटक राजा के संग्राम का वर्णन । साथ ही नवमल्ली जाति के नौ राजे और नवलच्छी जाति के महाराजे सर्व १८ गणराजों का भी वर्णन किया गया है । श्राजकल जो लोग नूतन से नूतन सांग्रामिक आविष्कारों को देखकर आश्चर्य प्रकट करते है । उक्त सूत्र का अध्ययन करने से उनको यह भली प्रकार सविदित हो जायगा कि-पहिले समय में भी यह भारतवर्ष प्रत्येक शिल्प- कला में बढ़ा चढ़ा हुआ था क्योंकि-उक्त सूत्र में एक रथमूशल संग्राम का वर्णन करते हुए कथन किया गया है कि महाराजा कणिक ने एक यंत्र ऐसा तय्यार किया था कि-जो रथाकार था परन्तु उसमे अश्वादि कुछ भी नहीं लगे हुए थे। जब वह शत्रु की सेना में छोड़ दिया गया वह अपने श्राप लाखों पुरुषों का संहार करता हुआ चारों ओर परिभ्रमण करता था। इसी प्रकार वज्रशिला कंटक संग्राम का भी वर्णन किया गया है। कई लोग कहते है कि भारत में पहिले लिपिनहीं थी। इस सूत्र के अध्ययन करने से यह बात भी निर्मूल सिद्ध होजाती है। ६ अनुत्तरोपपातिकदशाज्ञसूत्र-इस सूत्रमे जो व्यक्ति तप संयम के वल से विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्ध नामक पांच अनुत्तरविमानों में उत्पन्न हुए हैं उनके नगर, राज्य, माता पिता, वनखंडादि का वर्णन किया गया है। तथा जिस प्रकार उन अात्माओं ने परम समाधिरूप तपकर्म धारण किया उस तपकर्म का भी दिग्दर्शन कराया गया है । जैसे काकंदी नगरी के रहने वाले धन्नाकुमार जी के तप का विवरण है जो एक भव धारण कर मोक्ष गमन करेंगे। उस जन्म के भव का भी वर्णन किया गया है जैसेकि-आर्यकुलादि मे जन्म धारण, फिर महामुनियों की संगति द्वारा धर्मप्राप्ति, दीक्षाग्रहण और श्रुताध्ययन तथा तपोकर्म से केवलज्ञान, श्रत में निर्वाणपद की प्राप्ति का वर्णन किया गया है । इस सूत्र का एक श्रुत- स्कन्ध-और तीन वर्ग है। ४६ लक्ष पाठ हजार इसके पदो की संख्या है। इसका उपांग कल्पवत्तसिका सूत्र है। १०-प्रश्नव्याकरण सूत्र-इस सूत्र मे पृष्ट और अपृष्ट सैकड़ों प्रश्नों का तथा अनेक प्रकार की चमत्कारिक विद्याओं का दिग्दर्शन था जैसेकि-मन प्रश्न- विद्या तथा देवताओं के साथ वाद करने की विधि, अंगुष्ट प्रश्नादि विद्याओं का भी वर्णन था परन्तु आजकल उक्त सूत्र मे केवल पांच आश्रव, जैसे-हिसा, , ( ११६ ) है जैसेकि-संकलित १ व्यवकलित २ गुणाकार ३ भागकार ४ वर्ग ५ धन ६ वर्गमूल ७ घनमूल घसमच्छेदकरणं ९ समच्छेदमीलन १० भिन्नगुणाकार ११ भिन्नभागकार १२ भिन्नविचार १३ भिन्न धन १४ भिन्नवर्गमूल १५ भिन्नधन- मूल १६ इन सूत्रों के द्वारा फिर ७ प्रकार के परिक्रमों का विस्तारकर दृष्टिवा. दांग के प्रथम भेद की समाप्ति कीगई है। दृष्टिवादांग का द्वितीय भेद सूत्ररूप है-इस भेद मे सर्वद्रव्यपर्यायों. नयों चा भंगों के आश्रित होकर ८८ सूत्रोंका विस्तार किया गया है। दृष्टिवादांगसूत्र का-पूर्वनामक तृतीय भेद है क्योंकि जव तीर्थकर देव गण- धरादि को दीक्षा प्रदान करते हैं तब वे दीक्षा लेकर त्रिपदी मंत्र के (उत्पात्-व्यय- ध्रौव्य) पहिले चतुर्दश पूर्वी के ज्ञान का अनुभव करते हैं। इसलिये इनकी पूर्व संज्ञा है ।उन पूर्वी के नाम निम्न प्रकार से वर्णन किये गए है । जैसेकि-उत्पात्पूर्व-इस पूर्वमे सर्व द्रव्य और सर्व पर्यायों को अधिकृत्य करके सर्व पदार्थों का वर्णन किया गया है । १ करोड़ पद, दश वस्तु और चार चूलिका वस्तु इस के अध्ययन वि- शेप है । यदि इस पूर्व को लिखा जाय तो एक हाथी के प्रमाण मपी (स्याही) लगती है। यह अनुभवी शान होता है परन्तु लिखनेमे नहीं आसक्ता । इसी प्रकार श्रागे भी जान लेना चाहिए । हाथियो की संरया आगे दुगणी होती चली जायगी। २ साम्रायणीयपूर्व--इस पूर्व मे सर्व द्रव्य और पर्याय और जीव विशेष सर्व द्रव्यों का सविस्तर वर्णन किया गया है । (अग्र परिमाणं तस्य अयन गमन परिच्छेद इत्यर्थ. तस्मै हितं श्राग्रायणीयं) अर्थात् सर्च द्रव्यो और पर्यायों का भेद विस्तृत किया हुआ है । इस पूर्व के ९६ सहस्र पद है, १४ वस्तु और १२ चूलिका वस्तु है परन्तु लिखनेमे दो हस्तिपरिमाण मपी लग सकती है । 3 वीर्यप्रवाद पूर्व--इस पूर्व में सर्व द्रव्यो के वा सर्व पर्यायों के तथा सर्व जीवों के वीर्य की व्यारया की गई है और ६ वस्तु तथा ही चूलिकावस्तु है । सप्तति सहस्त्र (७० हजार ) इसके पदों की संख्या है। स्याही का परिमाण आगे से दुगुणा करते चले जाना चाहिए तथा अत मे सर्व परिमाण दिया जायगा। ४ अस्तिनास्ति प्रवाद पूर्व-इस पूर्व मे सर्व द्रव्यों के अस्ति वा नास्ति भावों का वर्णन किया गया है, क्योंकि-सर्व द्रव्य निज गुणों की अपेक्षा तो अस्ति भाव के धारण करने वाले है परन्तु पर गुणों की अपेक्षा देखा जाय तो इनमे नास्ति- भाव भी ठहर जाता है। अतएव इस पूर्व मे अस्तिभाव और नास्तिभाव का सविस्तर कथन किया गया है । १८ वस्तु और दश चूलिकावस्तु इस पूर्व के है। ६० लक्ष इसके पदो की संख्या है । ५ ज्ञान प्रवाद पूर्व-इस पूर्व मे ५ ज्ञानों की सविस्तर व्याख्या की गई है तथा ज्ञान वा अज्ञान के भेदो का पूर्ण स्वरूप प्रति- पादन किया गया है । १२ वस्तु है और एक करोड़ इस पूर्व के पदों की सरया है . - ne ( १२१ ) ही रेचक, पूरक और कुभक तथा द्रव्य और भाव प्राणायाम का वर्णन किया गया है । यावन्मात्र शरीर में वायु है उनकी गति वा उनका निरोध, साथ ही निरोध का शारीरिक वा आत्मिक फल इन सब बातों का विस्तार• पूर्वक वर्णन किया गया है। इस पूर्वके १३ वस्तु हैं और एक करोड ५६ लक्ष इस के पदों की संख्या है। १३ क्रियाविशालपूर्व-इस पूर्व में यावन्मान क्रियाएं है उन सब का सविस्तर स्वरूप वर्णन किया गयाहै जैसे कि-कायिकी क्रियादि तथा पद. क्रिया, छन्दक्रिया, सारांश इतना ही है कि--क्रिया शब्द की व्याख्या भली प्रकार से कीगई है और इस पूर्व के ३० वस्तु है तथा नव करोड़ इसके पदों की संख्या है । १६ लोकविन्दुसार पूर्व-लोक में विन्दुवत् सारभूत पदार्थों के वर्णन करनेवाला यह पूर्व है क्योंकि-जिसप्रकार अक्षर के मस्तक पर विन्दु सारभूत होता है ठीक उसी प्रकार जगत् में यह पूर्व सारभूतहै और इस पूर्व के २५ वस्तु है तथा साढे बारह करोड़ इस के पदों की संख्या है । इस प्रकार संक्षेप से १४ पूर्वी के समास विपय वर्णन किया गया है। सोलह हजार तीनसौ ८३ हाथियोंके प्रमाण मपीसे यह १४ पूर्व लिखे जाते परन्तु यह पूर्वी के ज्ञान विषय उपमा दी गई है परंच यह विद्या लिखने में नहीं आसक्ती । यह सब विद्या केवल अनुभव के विचार पर ही अवलम्वित है। इस प्रकार दृष्टिवादांग के तृतीय भेदका वर्णन किया गया है। चतुर्थ भेद अनुयोगरूप है । सो वह अनुयोग दो प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसाकि मूल प्रथमानुयोग, और गडिकानुयोग-१ मूल प्रथमानुयोग-मैं तीर्थंकरों के पूर्व जन्म का वृत्तान्त, जिस जन्म में उनको सम्यक्त्व का लाभ हुश्रा उस जन्म से लेकर उनके सर्व जन्मो का अधिकार, स्वर्गीय सुख, स्वर्ग की आयु का परि- माण, वहां से च्यवकर माता के गर्भ में थाना, फिर जन्म, देवों द्वारा जन्मो- त्सव किया जाना, फिर योग्य अवस्था होजाने पर दीक्षा, विहार, तपोविशप, केवलोत्पत्ति, जिनपद भोग, सिद्ध गमन इत्यादि विषयों का सविस्तर वर्णन पाया जाता है । इतना ही नहीं श्रीसंघ की स्थापनादि विपयों का भी उल्लेख है। २ गडिकानुयोग-इस अनुयोगमे कुलकरों, तीर्थकरों, वलदेवों, वासुदेवों, गणधरों, हरिवंश आदि कुलों की गंडिकाओंका वर्णन किया गया है । यह अनु- योग ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व का है क्योंकि-सव विपयों का बड़ी विचित्र रीति से वर्णन किया हुआ है । उक्त अनुयोग होनेसे यह दृष्टिवादांग का चतुर्थ भेद है । पांचवां भेद दृष्टिवादांग का चूलिकारूप है क्योकि-जो परिक्रम सूत्र और पूर्व तथा अनुयोग मे वर्णन किया गया है उन सबका सारांश चूलिका प्रकरण में प्रतिपादन किया हुआ होता है । सो यह सब प्रसंगवश लिखा गया है परन्तु ११ एकादशांगशास्त्र और चतुर्दश पूर्व यह सब मिलकर २५ होते है। । । ।
( १२३ ) सम्यगतया गच्छ की रक्षा करने से निर्वाणपद की निश्चय ही प्राप्ति कर लेते है। अतएव उक्त दोनों उपाधिधारियों को योग्य है कि वे अपने कर्तव्य को ठीक तौर पर पालन करें और अनेक भव्य श्रात्माओं को धर्म पथ में स्थापन करके कल्याण के भागी बने । सो गुरु पद में प्राचार्य और उपाध्याय का वर्णन किये जाने पर श्रव साधु विपय में कहा जाता है । यद्यपि साधु पद में प्राचार्य और उपाध्याय दोनों ही गर्भित है तथापि उपाधि के विशप होने से इनका पृथक वर्णन किया गया है। परन्तु साधुपद के गुण सव में एक समान ही होते है । सत्तावीसं अणगारगुणा पणत्ता तंजहा-पाणाइवायाो वेरमणं मुसावायायो वेरमणं अदिन्नादाणाओ वेरमणं मेहुणाओ वेरमणं परिग्गहा- ओवेरमणं सोइंद्रियनिग्गहे चक्विंदिय निग्गहे घाणिदियनिग्गहे जिभिदिय निग्गहे फासिंदिय निग्गहे कोहविवेगे माणविवेगे मायाविवेगे लोभाविवेगे भावसचे करणसच्चे जोगसच्चे खमा विरागया मणसमाहरणया वयसमाहर- णया कायसमाहरणया णाणसंपण्णया दंसण संपएणया चरित्त संपएणया वयेण अहियासणया मारणंतिय अहियासणया ।। समवायाग सूत्र स्थान २७ वो।। टीका-सप्तविंशति स्थानमपि व्यक्तमेव, केवलं पद सूत्राणि स्थितेराक्, तत्र अनगाराणां-साधूनां गुणाः चारित्र विशेष रूपाः अनगारगुणा तत्र महा- व्रतानि पञ्चन्द्रियनिग्रहाश्च पंच क्रोधादि विवेकाश्चत्वार सत्यानि त्रीणि तत्र भावसत्यं शुद्धान्तरात्मना करणसत्यं यत्प्रतिलेखनाक्रियां यथोक्तां सम्यगुप- युक्तः कुरुते योगसत्यं-योगानां-मनः प्रभृतीनाम वितथत्वं १७ क्षमा अनभिव्य. क्त क्रोधमानस्वरूपस्यद्वेषसजितस्याप्रीतिमात्रस्याभावः अथवा क्रोध मान- योरुदय निरोधः क्रोधमान विवेकशब्दाभ्यां तदुदयमाप्तयोस्तयोनिरोधः प्राग- वाभिहित इति न पुनरुक्तता । अप्रीतिः १८ विरागता अभिप्वग मात्रस्याभावः अथवा मायालोभयोरनुदयो माया लोभ विवेकशब्दाभ्यां तूदयप्राप्तयोस्तयोनि- रोधः प्रागभिहित-इतीहापि न पुनरुक्ततेति १६ मनोवाकायानां समाहरणता पाठान्तरतः समन्वाहरणता-अकुशलानां निरोधास्त्रयः २२ ज्ञानादिसंपन्नतास्ति- स्रः २५ चेदनातिसहनता-शीतादि-अतिसहन २६ मारणांतिकातिसहनता-- कल्याण बुद्धशा मारणांतिकोपसर्गसहनमिति २७ ॥ इति सप्तविंशतिगुणा भिक्षूणां कथिता वा प्रतिपादिताः ॥ भावार्थ-श्री भगवान्ने साधुके सत्ताईस गुण प्रतिपादन किये है क्योकि-गुणों से ही साधुत्व होता है नतु घेप धारण करने से यद्यपि मनुप्यत्व ( १२५ ) त्याग करे । जव उसकी प्राणीमात्र से मंत्री होगई तव उसके मन मे मालिन भाव किस प्रकार उत्पन्न हो सकेंगे ? जव मलिन भावों का निरोध किया गया तव उसको अशांति किस प्रकार हो सकती है अर्थात् कदापि नहीं । फिर यह यात सदा मानी हुई है कि-वैरसे वैर नही जाता किन्तु शांतिसे वैर मारा जास. कता है। अत. जय प्राणातिपात से सर्वथा निवृत्ति करली गई तव उस महापुरुप का प्राणीमात्र से विल्कुल वैर नष्ट हो गया। जिसका परिणाम यह निकला कि- उस महापुरुप का पवित्र आत्मा विश्व उपकार में प्रवृत्त होजायगा क्योंकि-वह स्वयं प्रेममूर्ति बनकर अन्य जीवों को प्रेममूर्ति बनाएगा। स्मृति रहे कि- अहिंसावत की पालना शूरवीर श्रात्माएं ही करसकती है न तु कातर आत्माएं। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-हिंसा कहते किस को है ? इस के उत्तर में तत्त्वार्थाधिगम शास्त्र में लिखा है कि-"प्रमत्तयोगात् प्राण व्यपरो- पणं हिंसा अर्थात् प्रमाद के योग से जो प्राणों का नाश करना है उसी का नाम हिंसा है। यदि साधु अप्रमत्त भाव से विचर रहा है तब वह हिंसा के दोप का भागी नहीं बनता है इस प्रकार जिस अात्मा ने करना, कराना, अनुमोदना तथा मन, वचन और काय के द्वारा पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजोकाय, वायुकाय और वनस्पति- काय इन पांचस्थावरों, दो इन्द्रिय वाले जीव जैसे सीप, शंख, जोक आदि है जिन के केवल स्पर्शेन्द्रिय और जिह्वेन्द्रिय है, तीन इन्द्रिय वाले जीव जैसे-जूं, लीख, ढोरा. सुरसली आदि है उनके केवल स्पर्श, जिला और घ्राणेन्द्रिय होती है, फिर चार इंद्रिय युक्त जीव जैसे मक्खी, मच्छर, पतंगिया, विच्छू इत्यादि है, इन जीवों के केवल स्पर्श, जिला, घ्राण और चचुरिन्द्रिय होती है, पचेन्द्रिय वाले जीव जैसे जलचर (मत्स्यादि स्थलचर (गवादि) खेचर (पक्षी) मनुष्य, देव, नारकीय इन के स्पर्श, जिला, प्राण, चनु और श्रोत्र यह पंचेन्द्रिय होती है इत्यादि सब जीवों की हिसा का परित्याग कर दिया है यही साधु है । इस व्रत की रक्षा करने के वास्ते श्री भगवान ने पांच भावनाएं प्रतिपादन की है क्योकि जिस प्रकार महोघ वाले जल को नावा द्वारा तथा समुद्र को मानपान द्वारा लोग पार कर लेते है ठीक उसी प्रकार ससार समुद्र से पार होने के लिये भावनाएं प्रतिपादन कीगई है। इन्हीं भावनाओं द्वारा आत्मा अपना कल्याण करसकता है। सोप्रथम महावत की ५ भावनाएं इस प्रकार कथन कीगई है जैसकि- पुरिम पच्छिम गाणं तित्थगराण पंच जामस्स पणवीसं भावणाओ पण्णत्ता तंजहा-ईरियासमिई मणगुत्ती वयगुत्ती आलोय भायण भोयणं आदाण भंडमत्त निक्खेवणासमिई ५ .
( १२७ ) और काय तथा करना, कराना और अनुमोदना अर्थात् तीनों योग और तीनों करणों से परित्याग करना चाहिए। इस व्रत की निम्नलिखित पांच भावनाएँ रक्षक हैं जैसे कि- अणुवीतिभासणया १ कोहविवेगे २ लोभविवेगे ३ भयविवेगे ४ हास- विवेगे ५ । १ अनुविचिन्त्यभापणसमिति--विना विचार किये कदापि भापण न करना चाहिए । शीघ्रता और चपलतासे भापण करना भी वर्जनीय है। कटु शब्दों का प्रयोग कदापि न करना चाहिए । तभी सत्य वचन की रक्षा हो सक- ती है। २ क्रोधविवेक-क्रोध नहीं करना चाहिए क्योंकि-क्रोधी मनुष्य असत्य, पिशुनता, कठिन वाक्य कलह, वैर इत्यादि अवगुणोको उत्पन्न कर लेता है और सत्य, शील तथा विनयादि सद्गुणों का नाश कर लेता है । क्रोधरूपी अग्नि को उपशान्त करने के लिये क्षमारूपी महामेघ की वर्षा होनी चाहिए। ३ लोभविवेक-प्राणी लोभके वशीभूत होकर भी सत्य का नाश कर बैठता है । यावन्मात्र संसार में मनोऽनुकूल पदार्थ है उनकी प्राप्ति की जब उत्कट इच्छा बढ़ जाती है तव सत्य की रक्षा कठिन होजाती है। अतएव सन्तोप द्वारा सत्य की रक्षा के लिए लोभ का परिहार कर देना चाहिए । भयविवेक-सत्यवादी को किसीका भी भय नहीं होना चाहिए क्योंकि- भययुक्त श्रात्मा सत्य की रक्षा करने में असमर्थ होजाता है। कहते है कि-भय- युक्त श्रात्मा को ही भूत प्रेत छला करते है । भययुक्त आत्मा सत्य कर्मों से पराड्- मुख होजाता है अतएव सत्यवादी धैर्य का अवलम्बन करता हुआ सत्यव्रत की रक्षा कर सकता है । भय के वशीभूत होकर कई बार झूठ बोला जाता है। इस लिये भय से विमुक्त होने की भावना उत्पन्न करनी चाहिए। ६ हास्यविवेक- सत्यवादी को किसी का उपहास भी न करना चाहिए कारण कि-हास्य रस का पूर्व भाग तो बड़ा प्रिय होता है परन्तु उत्तर भाग परम भयानक और नाना प्रकार के क्लेपों के उत्पन्न करनेवाला होजाता है। यावन्मात्र क्लेश है उन के उत्पन्न करने वाला हास्यरस ही है । अतएव सत्यव्रत की रक्षा के लिये हास्यरस का श्रासेवन कदापि न करना चाहिए । इस विधि से द्वितीय महाव्रत की पालना करनी चाहिए । ३ अदितादानविरमण -- तदनन्तर चौर्यकर्म से निवृत्तिरूप तृतीय महा- बत का यथोक्लरीति से पालन करना चाहिए । जितने सूक्ष्म वा स्थूल पदार्थ है चाहे वह अल्प हैं वा वहुत, जीव है वा अजीव, जिनके वे आश्रित होरहे है ।
( १२६ ) १ स्त्रीपशुपंडकसंसतशयणासनवर्जनता--ब्रह्मचारी को स्त्री, पशु और नपुंसकों से जो स्थान संसक्त होरहा हो उसे वर्जना चाहिए कारण कि-उस स्थान में रहने से कामोद्दीपन की संभावना है जिसका परिणाम ब्रह्मचारी के लिये परम भयानक होगा। २ स्त्रीकथाविवर्जनता-ब्राह्मचारी पुरुप काम के जागृत करनेहारी स्त्री कथा कदापि न करे और नांही स्त्रियों में बैठ कर उक्त प्रकार की कथाओं का प्रयोग करे क्योंकि-वार २ स्त्रीकथा कहने से उसका मन किसी समय विच- लित अवश्यमेव हो जायगा अतः ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्य की रक्षाके लिये काम- जन्य स्त्रीकथा कदापि न करनी चाहिए । ३ खी श्रालोकनवर्जनता-कामदृष्टि से स्त्रियों की इद्रियों को न देख- ना चाहिए क्योंकि स्त्रियों की कामजन्य चेप्टानों को देखते हुए उसके मन में कामविकार अवश्यमेव उत्पन्न होजायगा। स्त्री के शरीर का संस्थान, उस का वर्ण, उसके हाथ. पाद, अांखें, लावण्य, रूप, यौवनावस्थादि के देखने से संयम की समाधिका नाश हो जायगा ॥ ४ पूर्व क्रीडा अननुस्मरणता यदि पहिले गृहस्थपर्याय मे नाना प्रकार की कामचेष्टाएं की हों तो उनकी स्मृति न करे क्योंकि-उन चेप्टानों की स्मृति से काम अवश्यमेव जागृतावस्था में श्राजायगा तथा जो वालब्रह्मचारी है वे साहित्य ग्रंथों में पढ़े हुए स्त्री चरित्र की पुन २ स्मृति न करें क्योकि-श्रात्मा विकार दशा को प्राप्त होजाता है जिस कारण फिर ब्रह्मचर्य में बाधा उत्पन्न होने की संभावना रहती है। ५ प्रणीताहारवर्जनता-ब्रह्मचारी को स्निग्ध श्राहार न सेवन करना चाहिए जैसेकि तीर, दुग्ध, दधि, सर्पिस्, नवनीत, तेल, गुड़ मतस्यंडी प्रादि । तथा जिन पदार्थों के श्रासेवन करने से उन्माद वा विकार उत्पन्न होता हो उनका भी प्रासेवन करना उचित नहीं। कारणकि-मादक द्रव्य शरीर को पुष्टि देकर श्रात्मा में विकार उत्पन्न कर देते है जिसका परिणाम ब्रह्म- चारी के लिये हितकारी नहीं होता। अतएव इन पांच भावनाओं द्वारा ब्रह्म- चर्य व्रत की रक्षा करनी चाहिए । ५. परिग्रहावरमण-पंचम महावत जो अपरिग्रहरूप है उसका अन्तःकरण से पालन करना चाहिए । अल्प वा महत्, अणुरूप वा स्थूलरूप, चेतनायुक्त हो अथवा जड़ सबसे मूर्छा का परित्याग कर देना चाहिए । यदि कोई कहे कि-जो साधु के पास वस्त्र पात्रादि है क्या यह परिग्रह नहीं है। इस शंका का समाधान दशवैकालिक सूत्र के छठे अध्ययन में इस प्रकार किया गया है:- - ( १३१ ) प्रकार के सुंदर रम उत्पन्न करने वाले भोज्य पदार्थ श्रावे तव प्रसन्न न होना चाहिए एवं यदि मन के प्रतिकूल भोज्य पदार्थ खाने को मिलें तव द्वेष न करना चाहिए। पदार्थों का जिस प्रकार का स्वभाव है वे उसी प्रकार अपना रस दिखलायेंगे। इसलिए उनके मिलने पर राग द्वेप क्यों किया जाय ? ५ स्पर्शेन्द्रियरागोपरति-यदि मनके अनुकूल स्पर्श उपलब्ध हो तव उन पर राग उत्पन्न न करना चाहिए एवं यदि मन के प्रतिकूल स्पर्श मिले तब ढेप भी न करना चाहिए । इस कथन का सारांश इतना ही है कि-शय्या वस्त्रादि-मनोऽनुकूल मिल जाने पर प्रसन्नता एवं मार पीट वा अंगोपांग के छेदन करने वाले पर द्वेष यह दोनों भाव उत्पन्न न करने चाहिएं । जव आत्मा के अन्तःकरण से शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श इन पांचों विपयां पर राग और द्वेषके भाव उत्पन्न न होगे तव वह श्रात्मा दृढ़तापूर्वक उक्त पांचों महावतों का पालन कर सकेगा। अतएव पांचों महावतों को २५ भावनाओं द्वारा शुद्ध पालन करना चाहिए। यदि ऐसे कहा जाय कि-पांच महावतों की २५ भावनाएं तो कथन की गई है किन्तु छठा रात्रिभोजन विर- मणवत का कहीं भी वर्णन नही है और ना ही उसकी भावनाओं का कथन आया है । इस प्रश्न का उत्तर यह है कि-प्रथम तो प्रायः रात्रि को अति शी- नादि के पड़ने से बहुत से पदार्थों की सचित्त हो जाने की संभावना की जा- सकती है द्वितीय-तमस (अन्धकार) के सर्वत्र विस्तृत हो जाने से भली प्रकार जीव रक्षा भी नहीं हो सकती श्रतएव इस व्रत का प्रथम महाव्रत में ही समा- वेश हो जाता है अर्थात् जीवरक्षा सम्बन्धी यावन्मात्र कर्तव्य है वे सय पहले महाव्रत के ही अन्तर्गत होते है। तत्पश्चात् पांचों इन्द्रियों के जो शब्दादि विषय है मुनि उन पर राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाले भावो का परित्याग करे जैसे कि- श्रोतन्द्रिय निग्रह-श्रोतेन्द्रिय के तीन विषय है यथाजीव शब्द ? अजीव शब्द २और मिश्रित शब्द ३। मुखसे निकला हुआ जीव शब्द कहा जाता है। पुद्गल के स्कन्धादि के सयोग या विभाग के समय जो शब्द उत्पन्न होता है उसे अजीव शब्द कहते है । जो दोनों के मिलने से शब्द उत्पन्न होता है उसे मिश्रित शब्द कहते हैं जैसे शंखादि का बजना । ७ चतुरिन्द्रिय निग्रह-चक्षुरिन्द्रिय के पांच विषय है जैसेकि-श्वेतवर्ण १ रक्तवर्ण २ पीतवर्ण ३ नीलवर्ण ४ और कृष्णवर्ण ५ इन पांचो ही विषयों में जो प्रिय है उनपर राग न करना चाहिए और जो अप्रिय है उनपर द्वेष न करना चाहिए। ।
( १३३ ) आवश्यक में गुरु और उसके गुण तथा शिप्य की भक्ति का दिग्दर्शन कराया गया है। ४ प्रतिक्रमणावश्यक-अपने ग्रहण किये हुए व्रतों में जो कोई अतिचार लगगया हो तो उससे पीछे हटने की चेष्टा करना तथा पीछे हटना-इसे प्रतिक्रमणावश्यक कहते है। ५ कायोत्सर्गावश्यक-ज्ञान, दर्शन और चारित्र की शुद्धि के लिये कायो- त्सर्ग करना अर्थात् ध्यानस्थ हो जाना । ६प्रत्याख्यानावश्यक-अतिचारोंकी शुद्धि वा श्रात्मशुद्धि के लिये प्रत्या- ज्यान (किसी पदार्थ का त्याग ) करना । यह छै क्रियाएँ अवश्य करणीय है इसी लिये इन्हें पडावश्यक कहते है । द्रव्य और भाव रूप से यह छै प्रतिदिन अवश्यमेव करने चाहिएं। जब पडावश्यक शुद्धरूप से पालन किये जाएं तव फिर पाठही समिति और गुप्तियें जो प्रवचनमात है उन्हें अवश्यमेव क्रियारूप में लाना चाहिए अर्थात् आठ प्रवचन माता में नित्य ही प्रवृत्ति करनी चाहिए । जैसेकि-५ समिति और तीन गुप्ति । इनका विवरण संक्षेप से नीचे किया जाता है यथा-१ र्या- समिति-सम्यक्तया जिससे चारित्र की पालना की जावे उसे समिति कहते है । सो "ईरणं ईर्या काय चेष्टा इत्यर्थः तस्या समिति शुभोपयोगः" अर्थात् चलते हुए उपयोगपूर्वक चलना चाहिए जैसेकि-निज शरीर प्रमाण भूमि को श्रागे देखकर चलना चाहिए तथा प्रासन पर बैठते समय वा धर्मोपकरण पहिरते समय विशेप उपयोग होना चाहिए । इसी प्रकार शयन करते समय भी पाद- पसारणादि क्रियाएं कुर्कुटवत् होनी चाहिएं। सारांश इतना ही है कि यावन्मात्र चलना श्रादि कार्य है वे सब यत्नपूर्वक ही होने चाहिएं । २ भाषास- मिति-भापण करते समय क्रोध, मान, माया और लोभ तथा हास्यादि के वशीभूत होकर कदापि भापण न करना चाहिए । अपितु मधुर और स्तोक अक्षरो से युक्त प्राणीमात्रके लिए हितकर वचनो का प्रयोग करे एवं जिस के भाषण करने से किसी प्राणी को हानि पहुंचती हो अथवा भाषण से कोई सारांश न निकलता हो ऐसे व्यर्थ और विकथारूप भाषणों का प्रयोग न करे। एषणासमिति-शुद्ध और निर्दोश आहार पानी की गवेषणा करनी चाहिए अपरंच जो अन्न पानी सदोष अर्थात् साधुवृत्ति के अनुकूल नहीं है उसे कदापि ग्रहण न करे । श्राहार पानी के शास्त्रकारो ने ४२ दोष प्रतिपादन किये है जैसेकि-सोलह प्रकार के उद्गम दोष होते है जो साधु को दातार के द्वारा लगते है अतएव साधु को भिक्षाचरी के समय विशेष सावधान रहना चाहिए जिससे उक्त दोषों में से कोई दोप न लगसके जैसेकि- ( १३५ ) लोभे य लोभे य हवंति दसएए ३ पुब्बि-पच्छा संथवं विज्जा मंते य चू- एण जोगे य उप्पायणा इ दोसा सोलसमे मूलकम्मेय ४ अर्थ- धाई (धात्री) धाय का काम करके आहारादि लेवे तो दोप । २ दूई (दूती) दूनपना जैसे गृहस्थी का सन्देशा पहुंचा कर श्राहारादि लेवे तो दोष । ३ निमित्ते (निमित्त) भूत, भविष्य, वर्तमान काल के लाभालाभ, सुखदुःख, जीवन मरणादि बतलाकर आहारादि लेवे तो दोष । ४ श्राजीव- (श्राजीविका) अपना जाति कुल श्रादि प्रकाश कर श्राहारादि लेवे तो दोष । ५ वणीमगे ( वनीपकः) रांक भिखारी की तरह दीनपना से मांगकर श्राहा- रादि लेवे तो दोप। ६ तिगिच्छे (चिकित्सा) वैद्यक-चिकित्सा करके श्राहारा- दि लेवे तो दोष । ७ कोहे (क्रोध) क्रोध करके आहारादि लेवे तो दोप ८ माणे (मान) अहकार करके लेवे तो दोप । ६ माया (कपट) करके लेवे तो दोष । १० लोभे (लोभ) लोभ करके अधिक आहारादि लेवे अथवा लोभ बतला कर लेवे तो दोष । ११ पुचि पच्छा संथव (पूर्वपश्चात्- संस्तव) पहले या पीछे दातार की प्रशंसा करके श्राहारादि लेवे तो दोप । १२ विज्जा (विद्या) जिसकी अधिष्ठाता देवी हो अथवा जो साधना से सिद्ध की गई हो उसको विद्या कहते है ऐसी विद्या के प्रयोग से आहारादि लेवेतो दोप। १३ मंते (मंत्र ) जिसका अधिष्टाता देव हो अथवा विना साधना के अक्षर विन्यास मात्र हो उसको मंत्र कहते है ऐसे मंत्र का प्रयोग करके आहारादि लेवे तो दोष । १६ चुराण (चूर्ण) एक वस्तु के साथ दूसरी वस्तु मिलाने से अनेक प्रकार की सिद्धि हो ऐसा अदृष्ट अंजनादि के प्रयोग से आहारादि लेवे तो दोष । १५ जोगे (योग) पाद ( पग) लेपनादि सिद्धि बतलाकर आहारादि लेवे तथा वशीकरण मंत्रादि सिखलाकर वा स्त्रीपुरुष का संयोग मिलाकर आहारादि लेवे तो दोप । १६ मूल कम्मे ( मूल कर्म)-गर्भपातादि औषध बतलाकर श्राहारादि लेवे तो दोष अर्थात् किसी ने साधु के पास अपने गुप्त दोप का कारण यतला दिया फिर यह भी बतला दिया कि-श्रव गर्भ भी स्थिर रह गया है तब साधु उसको गर्भपातादि की औपध चतलावे को महत् दोप लगता है। इस प्रकार सोलह दोष उत्पाद के वर्णन किये गए हैं । अव १० दोप एपणा के कहे जाते है जो साधु और गृहस्थ दोनो के कारण लगते है। संकिय मक्खिय निक्खित्त पिहियसाहरियदाय गुम्मासे अपरिणय लित्त छड्डिय एसणा दोसादसहवंति ५। अर्थ-संकिय (शंकित ) गृहस्थी को तथा साधु को शंका पड़ जाने - तो उस साधु सद् और ( १३७ ) को व्युत्सृज करना चाहिए जिससे जीवहिंसा और घृणा उत्पन्न न हो। पांची समितियों के पश्चात् तीनों गुप्तियों का भी सम्यक्तया पालन करना चाहिए जैसेकि- १ मनोगुप्ति-मनमें श्रसद् विचार उत्पन्न ही न होने देना अर्थात् कुशल और अकुशल संकल्प इन दोनों का निरोध कर केवल उपयोग दशा में ही रहना । २ वाग्गुप्ति--जिस प्रकार मनोगुप्ति का अर्थ किया गया है ठीक उसी प्रकार वचनगुप्ति के विषय में भी जानना चाहिए । ३ कायगुप्ति- इसी प्रकार असत् काय-व्यापारादि से निवृत्ति करनी चाहिए। सो यह सब आठों प्रवचनमाता के अंक करणसत्य गुण के अन्तर्गत हो जाते है । शरीर, वस्त्र, पात्र, प्रतिलेखनादि सब क्रियाएं भी उक्त ही अंक के अन्तर्गत होती है । यही मुनि का सोलहवॉ करणसत्य नामक गुण है १७ योग सत्य-संग्रहनय के वशीभूत होकर कथन किया गया है कि- मन वचन और काय यह तीनों योग सत्यरूप में परिणत होने चाहिएं क्योंकि- इन के सत्य वर्तने से श्रात्मा सत्य स्वरूप में जा लीन होता है। १८ क्षमा-क्रोध के उत्पन्न होजाने पर भी आत्मस्वरूप में ही स्थित रहना उस का नाम क्षमा गुण है क्योंकि-क्रोध के श्राजाने पर प्रायः श्रात्मा अपने स्वरूप से विचलित होजाता है इस लिए सदा क्षमा भाव रखे। १६ विरागता--संसार के दुःखों को देखकर संसार चक्र के परिभ्रमण से निवृत्त होने की चेष्टा करे। २० मन समाहरणता-अकुशल मनको रोक कर कुशलता में स्थापन करे । यद्यपि यह गुण योग सत्य के अन्तर्गत है तदपि व्यवहार नय के मत से यह गुण पृथक् दिखलाया गया है। २१ वागसमाहरणता-स्वाध्यायादि के विना अन्यत्र वाग्योग का निरोध करे क्योकि यावन्मात्र धर्म से सम्बन्ध रखने वाले वाग् योग है वे सर्व वाग्समाहरणता के ही प्रतिवोधक है परन्तु इन के विना जो व्यर्थ वचन प्रयोग करना है वह आत्मसमाधि से पृथक् करने वाला है। २२ काय समाहरणता-अशुभ व्यापार से शरीर को पृथक् रखे। व्यवहा- रनय के वशीभूत होकर यह सव गुण पृथक्रूप से दिखलाए गए है। २३ ज्ञान संपन्नता-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यव और केवलज्ञान इन पांचों ज्ञानों से संपन्न होना उसे ज्ञानसंपन्नता कहते है। चार शान तो क्षयोपशम भाव के कारण विशदी भाव से प्रकट होते है किन्तु केवलज्ञान केवल क्षय भाव के प्रयोग से ही उत्पन्न होता है । सो जिस प्रकार क्षायिक -- । ( १३६ ) विशुद्धि तप की समाप्ति करते है सो इसीका नाम परिहार विशुद्ध चारित्र है ॥ सूक्ष्म संपराय चारित्र उस का नाम है जिसमें लोभ कपाय को सूक्ष्म किया जाता है। यह चारित्र उपशम श्रेणि वा क्षपक श्रेणि में देखा जाता है। उपशमणि १० वे गुणस्थान पर्यन्त रहती है। अपरंच यथाख्यात चारित्र उसे कहते है जिससे मोहकर्म उपशम वा क्षायिक होकर श्रात्मगुण प्रकट होजाते है। सो इन पांचों चारित्रों की सम्यग्तया आराधना करना उसे ही चारित्रसंपन्नता कहते हैं। २६ वेदनाध्यासना-वेदना के सहन करने वाला जैसेकि-मनुष्यकृत देवकृत तथा तिर्यग्कृत उपसर्गों में से किसी भी उपसर्ग के सहन करने का समय जव उपस्थित होजावे तव उस उपसर्ग को सहन करे । वेदना शब्द से २२ परीपह भी लिये जाते है सो उन परीपहों को सहन करे। इनके अतिरिक्त कोई अन्य वेदना सहन करने का समय उपस्थित होजावे तो उस को भी सम्यग्तया शास्त्रोक्त रीति से सहन करे जिससे कर्म निर्जरा होने के पश्चात् सम्यग् ज्ञान की प्राप्ति हो। (प्रश्न ) वे २२ परीपह कौन से हैं जिन के सहन करने से कर्मों की निर्जरा और सम्यग् ज्ञान की प्राप्ति होजाती है ? (उत्तर) वे २२ परीपह निम्न कथनानुसारं हैं जिन के सम्यग्तया सहन करने से श्रात्मा कर्मो की निर्जरा करके सम्यग् ज्ञान की प्राप्ति करलेता है जैसेकि- बावीस परीसहा प.-तं०-दिगिच्छा परीसहे १ पिवासा परीसहे २ सती परीसहे ३ उसिण परीसहे ४ दसमसग परीसहे ५ अचेल परीसहे ६ अरइ परीसहे ७ इत्थी परीसहे ८ चरिया परीसहे. निसीहिया परीसहे १० सिज्जा परीसहे ११ अक्कोस परीसहे १२ वह परीसहे १३ जायणा परीसहे १४ अलाभ परीसहे १५ रोग परीसहे १६ तणफास परीसहे १७ जल्ल परीसहे १८ सक्कार पुरक्कार परीसहे १६ पण्णा परीसहे २० अण्णाण परीसहे २१ दंसण परीसहे २२ समवायाग सूत्र-स्थान-२२ वृत्ति-द्वाविंशतितम तु स्थान प्रसिद्धार्यमेव नवरं सूत्राणि पद स्थितरर्वाक्, तत्र भागों च्यवन निर्जरार्थ परीपद्यन्ते इति परीपहा:--"दिगिंछ"त्ति बुभुक्षा व परीषही दिगिग्छ परीपह इति सहन चास्य मर्यादानुस्लनिन, एव मन्यत्रापि १ तथा पिपासा-तट शीतोष्ण प्रतीते ३-४ तथा दशाथ मशकाश्च दंशमशका उभयेऽप्येते चतुरिन्द्रिया महत्त्वा महत्कृतश्चैषा विशेषोऽथवा दशा- ( १४१ ) स्त्रीपरीपह-कामवासना से मनको हटाकर संयमरूपी श्राराम (वाग) में रमण करे किन्तु स्त्रियादि के विकारों में तनक भी मन न लगावे । ६ चर्यापरीपह-विहार के कष्ट को सहन करता हुश्रा प्रामादि मे अनि- यत विहारी होकर विचरे। १० नैपेधिकी परीपह-विना कारण भ्रमण न करना अपितु अपने आसन पर ही स्थित रहना । इतना ही नहीं किन्तु गिरि, कंदरा, वृक्ष के मूल, श्मशान वा शून्यागार मे ठहरकर सिंह व्याघ्र सर्प व्यन्तरादि देवों के किये हुए कष्टों को सहन करे । ११ शय्या परीपह-प्रिय वा अप्रिय वसति के मिल जाने पर हर्प शोक न करना अपितु उसी वसति में उत्पन्न हुए परीपह का सहन करना जैसेकि- वसति चाहिए थी शीतकाल की किन्तु मिल गई उपण काल के सुख देने वाली इसी प्रकार उप्णकाल के स्थान पर शीतकाल की वसति उपलब्ध होगई होवे तो रोप वा हर्प कदापि न करे। १२ श्राक्रोश परीपह-कोई अनभिज्ञ श्रात्मा साधु को देखकर क्रोध के श्रावेश मे श्राकर गाली श्रादि वकने लग जाए तो उस समय शांति भाव का अवलम्बन करे। उसके प्रति क्रोध न करे । नांही उसको बुरा भला कहे। १३ वधपरीपह-यदि कोई साधु को यष्टि प्रादि से ताड़े तो भी उस पर क्रोध न करे किन्तु इस बात को अनुभव से विचार करे कि यह व्यक्ति मेरे शरीर का तो भले ही वध करदे परन्तु मेरे आत्मा का तो नाश करही नहीं सकता। इस प्रकार के विचारो से वध परीपह को सहन करे। १४ याचना परीपह-तथाविध प्रयोजन के उत्पन्न हो जाने पर घर २ से भिक्षा मांगकर लाना और मांगते समय लज्जादि उत्पन्न न करना क्यो- कि-श्रमण भिक्षा धार्मिक वृत्ति कही जाती है । अतएव भिक्षावृत्ति मे लज्जा करनी उचित नहीं है। १५ अलाभ परीपह-मांगने पर यदि फिर भी कुछ नहीं मिला तो शोक न करना किन्तु इस बात का विचार करना कि-यदि आज नहीं मिला तो अच्छा हुआ । विना इच्छा ही आज तप कर्म होगया । अंतराय के क्षयोपशम हो जाने पर फिर श्राहार उपलब्ध हो जायगा । इस प्रकार के विचारो से अलाभ परीपह सहन करे किन्तु न मिलने पर शोक वा दीनमुख तथा दनि- वचनादि का उच्चारण न करे। १६ रोग परीपह-रोग के उत्पन्न हो जाने पर उस रोगकी वेदना को शांतिपूर्वक सहन करे । फिर इस बात का सदैव अनुभव करता रहे कि यह सर्व मेरे किये हुए कर्मों के फल है । मैं ने ही किये है और मैं ने ही इनका फल ( १४३ ) न करने चाहिएं क्योंकि-दर्शन (निश्चय) के ठीक होने पर ही सव क्रियाएँ सफल हो सकती हैं। यदि सम्यक्त्त्व में निश्चलता नहीं तो फिर व्रतों में भी अवश्यमेव शिथिलता पाजायगी। मुनि का २६ वां गुण यह है कि वह वेदना को शांति पूर्वक सहन करे । २७ मारणांतिकाध्यासनता-मारणांतिक कष्ट के श्राजाने पर भी अपनी सुगृहीत वृत्ति से विचलित न होना चाहिए अर्थात् यदि मरण पर्यन्त उपर्सग भी पाजावे तो भी अपने नियमों को न छोड़े कारणकि-साधुजनो के सखा कष्ट ही होते है जिनके श्राजाने से शीघ्र कार्य की सिद्धि होजाती है। इस लिये मुनि मारणांतिक कष्ट को भी भली प्रकार सहन करे। शास्त्र में इस प्रकार मुनि के २७ गुण वर्णन किये गए है किन्तु प्रकरण ग्रंथो मे २७ गुण इस प्रकार भी लिखे हैं जैसेकि-अहिंसा २ सत्य ३ दत्त ४ ब्रह्म- चर्य ५ अपरिग्रह व्रत ६ पृथ्वी ७ अप्काय ८ तेजोकाय ६ वायुकाय १० वनस्पतिकाय ११ प्रसकाय १२ श्रुतेन्द्रिय निग्रह १३ चनुरिन्द्रिय निग्रह १४ घ्राणेन्द्रिय निग्रह १५ जिहेन्द्रिय निग्रह १६ स्पर्शेन्द्रिय निग्रह १७ लोभ निग्रह १८ क्षमा १६ भाव विशुद्धि २० प्रतिलेखना विशुद्धि २१ संयम योग युक्ति २२ कुशल मन उदीरणा अकुशल मन निरोध २३ कुशल वचन उदी- रणा और अकुशल वचन निरोध २४ कुशल काय उदीरणा और अकुशल काय निरोध २५ शीतादि की पीड़ा सहन करना २६ मारणांतिक उपसर्ग का सहन करना २७ इस प्रकार से भी २७ गुण प्रकरण ग्रंथों में लिखे गए हैं परन्तु यह सब गुण पूर्वोक्त गुणों के अन्तर्गत हैं। उक्त गुणों से युक्त होकर मुनि नाना प्रकार के तपोकर्म से अपने अन्तः करण को शुद्ध करने के योग्य हो जाता है और नाना प्रकार की प्रात्मशक्तिये (लब्धिएं) उसमे प्रकट होजाती है। यथाः-मनोवल-मन का परम दृढ़ और अलौकिक साहस युक्त होना वाग्वल-प्रतिज्ञा निर्वाह करने की शक्ति का उत्पन्न होजाना कायवल-सुधादि के लग जाने पर शरीर की कांति का बने रहना "मनसाशापानुग्रहकरणसमर्थ" मनसे शाप और अनुग्रह करने में समर्थ 'वचसाशापानुग्रहकरणसमर्थ" वचन से शाप और अनुग्रह करने मे समर्थ- "कायनशापानुग्रहकरणसमर्थ"- काय द्वारा शापानुग्रह करने मे समर्थ- खेलौषधिप्राप्त-मुख का मल (निष्टीवन) सकल रोगो के उपशम करने में समर्थ "जल्लोपधिप्राप्त" शरीर का प्रस्वेद वा शरीर मल रोगो के उपशम करने में समर्थ-"विप्रोपधिप्राप्त"--मूत्रादि के विंदु तथा वि-विष्टा प्र-प्रश्रवण (मूत्र) यह सब तप के माहात्म्य से औषधिरुप हो रहे है "आमर्पणौषधि" हस्तादिका स्पर्श भी श्रौपधिरूप जिनका हो रहा है "सौषधिप्राप्त"-शरीर के सर्व ( १४५ ) सत् तथाविधलब्धिविशेपादत्रुटितं तचतन्महानसं च-भिक्षालन्धं भोजनम- क्षीणमहानसं तदस्ति येपां ते तथा" अर्थात् अक्षीण महानसशक्ति जिस से एक सामान्य भोजन द्वारा सहस्रों पुरुषों की तृप्ति की जा सकती है और, मूल के भोजन में त्रुटि नहीं होती ये तप के माहात्म्य से उत्पन्न होती है । इतना- ही नहीं किन्तु साथही वैफिय की लब्धिभी उत्पन्न होजाती है जिसके द्वारा मनो- कामनानुसार अनेक रूपों की रचना की जा सकती है। जैसा रूप बनाने की इच्छा हो वैसा ही रूप बनाने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है । एवं मुनि विद्या- चारण लब्धि भी उत्पन्न कर लेता है जिसके द्वारा श्राकाश में गमन करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है तथा जंघाचारण आकाशगामिनी इत्यादि शाक्तयां जो मुनि में उत्पन्न होती है वे सब तपःकर्म का ही माहात्म्य है। तात्पर्य इतना ही है कि-कर्म क्षय करने के लिए दो स्थान प्रतिपादन किये है स्वाध्याय और ध्यान । इन्हीं स्थानो से श्रात्मा निर्वाण पद की प्राप्ति कर लेता है। यद्यपि मुनि धर्म के क्रियाकाण्ड की सहस्रों गाथायें वा श्लोक पूर्वा- चार्यों ने प्रतिपादन किये है तथापि वे सव गद्य वा पद्य काव्य उक्त मुनि के २७ गुणों के ही अन्तर्भूत होजाते है। श्रीपपातिक सूत्र में श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के साथ रहनेवाले मुनि मण्डल का वर्णन करते हुए सोलहवें सूत्र में लिखा है। तथाच पाठः- तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवत्रो महावीरस्स अंतेवासी बहवे थेरा भगवंतो जातिसंपण्णा कुलसंपण्णा वलसंपण्णा ओअंसी तेअंसी बच्चंसी जसंसी जियकोहा जियमाणा जियमाया · जियलोभा जियइंदिया जिअणिद्दा जिअपसिहा जीवित्रास मरण भयविप्पमुक्का वयप्पहाणा गुण- प्पहाणा करणप्पहाणा चरणप्पहाणा णिग्गहप्पहाणा णिच्छ- यप्पहाणा अजवप्पहाणा मद्दवप्पहाणा लाघवप्पहाणा खतिप्पहाणा मुत्तिप्प- हाणा विजाप्पहाणा मंतप्पहाणा वेयप्पहाणा बंभप्पहाणा नयप्पहाणा निय- मप्पहाणा सच्चप्पहाणा सोमप्पहाणा चारुवएणा लज्जातवस्सी जिइंदिया सोही अणियाणा अप्पुस्सुत्रा अपहिल्लेसा अप्पडिलस्सा सुसामएणरयादंता इण मेव णिग्गंथं पावयणं पुरओ काउं विहरति । वृत्ति-"साधुवर्णक गमान्तरमेव-तत्र “जाइ संपन्न" त्ति उत्तममातृक- पक्षयुक्ता इत्यवसेयम् । अन्यथा मातृकपक्षसंपन्नत्वं पुरुषमात्रस्यापि स्यादिति ( १४७ ) त्ति गुरुभिर्दमं ग्राहिताः विनयिता इत्यर्थः-इदमेव नैर्ग्रन्थप्रवचनं "पुरो- काउं" त्ति पुरस्कृत्य-प्रमाणीकृत्य विहरंतीति, कचिदेवं च पठ्यते-"चहणं श्रापरिया" अर्थदायकत्वात् “वहणं उवज्झाया" सूत्रदायकत्वात् , वहनां गृहस्थानां प्रव्रजितानां च दीप इव दीपो मोहतम पटलपाटनपटुत्वात् द्वीप इव वा द्वीपः संसारसागरनिमग्नानामाश्वासभूतत्वात् "ताणं" त्ति त्राणमन- थेभ्यो रक्षकत्वात् “साणं" त्ति शाणमर्थसम्पादकत्वात् "गइ" ति गम्यत इति गतिरभिगमनीया इत्यर्थः-पइट्टत्ति प्रतिष्ठन्त्यस्यामिति प्रतिष्ठा श्राश्रय इत्यर्थः। भावार्थ यद्यपि उक्त सूत्र का अर्थ संस्कृत भाषा में वृत्तिकार ने स्फुट कर दिया है तथापि देशी भाषा मे उक्त सूत्र का अर्थ सामान्यतया दिखलाया जाता है । श्रीपपातिक सूत्र में श्रमण भगवान् श्रीमहावीर स्वामी और श्रीभ- गवान के मुनिसंघ का विस्तृत रूप से वर्णन किया है जिस के उपोद्घात के १६वें सूत्र का यहां पर उल्लेख है। इस सूत्र में श्री भगवान के साथ रहने वाले मुनियों के गुणों का वर्णन है जैसेकि-अवसर्पिणी काल के चतुर्थ दुषम- सुपम नामक काल में जव श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी विचरते थे तव श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के बहुत से शिष्य स्थविर भगवान्, माता पिता के पक्ष से निष्कलंक, वल, (उत्तमसंहननयुक्त) रूप, विनय, ज्ञान, दर्शन, चरित्र सम्पन्न, पाप कर्म से लज्जा करने वाले, अल्पोपधि के धारण से वा गौरव के परित्याग से लाघव सम्पन्न, ओजस्वी, तेजस्वी, वचन सौभाग्य से युक्त, इतना ही नही किन्तु परम ख्यात, क्रोध, मान, माया, लोभ, इन्द्रिय, निद्रा तथा परीपह जीतने वाले, जीवन श्राशा और मृत्यु भय से रहित, व्रत तथा व्रतप्रधान गुण,क्रियाकलाप, चरित्र,निग्रह,निश्चय,प्रार्जव, मार्दव,लाघव,शान्ति और मुक्ति प्रधान, प्रज्ञप्ति श्रादि विद्या के होने से विद्या प्रधान, हरिणगमेपि श्रादि देवों के आवाहन करने में समर्थ होने से मंत्र प्रधान, वेदों (आगमों) के शाता, तथा लौकिक शास्त्रों के जानने चाले, ब्रह्मचर्य (कुशलानुष्ठान ) में प्रधान, नीति में प्रधान, अभिग्रह (नियम विशेष) करने में प्रधान, सम्यग् वाद करने में प्रधान, द्रव्य से शारीरिक शौच, भाव से निदीप संयम क्रिया करनेवालों में प्रधान, सत्कीर्ति वा गौर शरीर वाले, तथा सत्प्रज्ञावाले, लजालु, तपस्वी और जितेन्द्रिय, प्राणीमात्र के प्रेमी, तीन योगों को शुद्ध करने वाले, 'निदान- कर्म रहित, औत्सुक्य भाव से वर्जित, संयम वृत्ति से मनको वाहिर न करने वाले और अतुल मनोवृत्ति, श्रामण्य भाव अनुरक्त, विनयी, निर्ग्रन्थ, प्रवचन के पठन पाठन करने वाले अतएव निर्ग्रन्थ, प्रवचन को प्रमाणभूत करके विच- रने वाले । (पुरस्कृत्य-प्रमाणीकृत्य विहरंति)। , - - ( १४६ ) अर्थ--चे स्थविर भगवान् जैनसिद्धान्त से पूर्ण परिचित थे, तथा वे स्वमत और परमत के पूर्णवेत्ता थे, । उन्होंने पुनः पुनः अभ्यास करने से श्रात्मवाद का परम परिचय प्राप्त करालिया था जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने नाम को किसी दशा में भी विस्मृत नहीं करता और मत्तहस्ती श्रानन्दपूर्वक एक सुन्दर श्राराम (वाग वा उद्यान ) में क्रीड़ा करता है, ठीक उसी प्रकार श्रात्मवाद को अवगत करके वे स्थविर भगवान् श्रात्मवाद में रमण करते थे। उनके प्रश्नोत्तर में किसी को तर्क करने का साहस नहीं होता था, क्योंकि प्रश्नोत्तर युक्तियुक्त होने से वादी को किसी प्रकार से भी उनमें प्राक्षप करने के लिये छिद्र नहीं मिलता था। जिस प्रकार एक धनाढय का रत्नों का करंडिया (डब्बा ) होता है जिसकी सहायता से यह व्यापारादि क्रियाएं कर सकता है, ठीक उसी प्रकार शान, दर्शन और चरित्ररुपी रत्न करंडियों को वे धारण करने वाले तथा कुत्रिकापण (हह) के समान थे । जिस प्रकार देवाधिष्ठित हट्ट से सर्व प्रकार की वस्तु उपलब्ध हो सकती है ठीक उसी प्रकार उन स्थविर भगवन्तों से सर्व प्रकार के ज्ञानादि पदार्थों की प्राप्ति होती थी तथा सर्व प्रकार के प्रश्नो के उत्तर जिज्ञासु जनों को उपलब्ध होते थे । इसी कारण वे परवादी का मान के मर्दन करने वाले तथा अकाट्य युक्तियों से स्वसिद्धान्त को सिद्ध करने वाले थे । द्वादशांग वाणी तथा समस्त गुणपिटक के धरने वाले, अर्थात् जिस प्रकार गृहस्थ लोगों का सर्व बहुमूल्य पदार्थ पिटक में रहा करता है ठीक उसी प्रकार समस्त श्रुतशान उनमें ठहरा हुअा है , अतः वे द्वादशाङ्ग प्राचार्य के पिटक समान है। इसी लिए लिखा है कि-यह द्वादशाह श्रत के पिटक हैं। वे स्थविर भगवान् समस्त गुण पिटक,सर्व प्रकार के अक्षर सन्निपात के वेत्ता थे।क्योंकि- सर्व प्रकार का अक्षरज्ञान शब्दागम (व्याकरण) द्वारा ही हो सकता है इतना ही नहीं किन्तु-स्वभापा वल से सर्व भाषाश्रो में बातचीत करने में शक्त थे । आर्य अनार्य देवभाषा इत्यादि समस्त भापात्रो के पूर्ण विद्वान् होने से वे जिन भगवान् तो नही किन्तु जिन भगवानवत् यथार्थ पदार्थों का वर्णन करने वाले थे। ऐसी शक्ति होने पर भी संयम और तप द्वारा श्रात्मा की शुद्धि करते हुए वे स्थाविर भगवान् श्री भगवान के साथ विचरते थे। इस सूत्र से यह भली भांति सिद्ध हो जाता है कि यावत्काल पर्यन्त श्रात्मा शान संपन्न नहीं होता तावत्काल पर्यन्त कोई भी संयम क्रियानों मे रमण नहीं कर सकता । क्योकि-जव ज्ञान द्वारा पदार्थों का स्वरूप भली प्रकार जान लिया जाता है तभी हेय-(त्यागने योग्य) शेय-(जानने योग्य ) वा उपादेय-(ग्रहण करने योग्य) पदार्थों का यथावत् शान हो जाने के पश्चात् .
+ ( १५१ ) भी उसकी उपेक्षा करने की चेष्टा करनी चाहिए । कारण कि-सांसारिक कर्तव्यों में भाग लेने से संयम मार्ग में शिथिलता पाजाती है। इसलिए पापमय कृत्यो के करने मे उपेक्षा करनी ही योग्य है। वस इसे ही उपेक्षा संयम कहते हैं। १३ प्रमार्जना संयम-जिस स्थान पर चैठना हो वा शयन करना हो उस स्थान की यत्न पूर्वक प्रमार्जना करलेनी चाहिए। कारण कि-प्रमार्जना करने से ही जीवरक्षा भले प्रकार की जा सकेगी। १४ परिष्ठापना संयम-जो वस्तु परिष्ठापन करने (गिराने ) योग्य हो जैसे-मल मूत्रादि तो उन पदार्थों को शुद्ध और निर्दोष भूमि में परिष्ठापन (गिरना) करना चाहिए जिससे फिर असंयम न होजावे । १५ मनःसंयम-मन में किसी जीव के प्रतिकूल वा हानि करने वाले भाव न उत्पन्न करने चाहिएं अपितु मनमें सदैव धार्मिक भाव ही उत्पन्न करने चाहिएं । इसी का नाम मनासंयम है॥ १६ वाक्सं- यम-वचनयोग को वश करना, तथा कुशल , वचन मुख से उच्चारण करना । जिनके बोलने से किसी जीव को पीड़ा उत्पन्न होती हो उस प्रकार के वचनों का निरोध करना, इसी का नाम वाक्-संयम है। १७ काय-संयम-गमनागमनादि क्रियाएं फिर विना यत्न न करना, इस का नाम काय-संयम है । जब मुनि ध्यानावस्था मे लवलीन रहेगा तव मन, वचन और काय-संयम भली प्रकार से साधन किया जा सकेगा। जिस के अन्तिम फलरूप निर्वाणपद की प्राप्ति उस संयमी आत्मा को अवश्यमेव हो जायगी क्योकि-जव उक्त प्रकार से संयम आराधन किया जायगा तव मुनि अपने धर्म मे अवश्य प्रविष्ट हो जायगा। श्रय प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-जब मुनि अपने धर्म में प्रविष्ट होता है. तब मुनि का निज धर्म क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि-शास्त्रकारो ने मुनि का धर्म दश प्रकार से प्रतिपादन किया है । तथाच पाठः- दसविहे समण धम्मे प. तं०-खंती १ मुत्ती २ अज्जवे ३ मद्दवे ४ लाघवे ५ सच्चे ६ संजमे ७ तवे ८ चियाए 8 वंभचरवासे १०॥ समवायागसूत्र समवायस्थान १० ॥ अर्थ-प्रत्येक व्यक्ति के कहे हुए दुर्वचनों का सहन करना, फिर उन पर मन से भी क्रोध के भाव उत्पन्न न करने, और इस बात पर सदैव विचार करते रहना कि-जिस प्रकार शब्दो का कर्णेन्द्रिय मे प्रविष्ट होने का स्वभाव है उसी प्रकार इन शब्दो के प्रहार को सहन करने की शक्ति मुझ में होनी चाहिए इत्यादि भावनाओं द्वारा क्षमा धारण करना ॥१॥-फिर वाह्याभ्यन्तर से परिग्रह का त्याग करना अर्थात् लोभ का परित्याग करना ॥२॥ मन, वचन और काय की कुटिलता का परित्याग करके ऋजु (सरल) भाव धारण ( १५३ ) अथ तृतीया कलिका। इसके पूर्व देवगुरु का स्वरूप किञ्चिन्मात्र प्रतिपादन किया गया है किन्तु अव धर्म के विषय में भी किञ्चिन्मात्र कहना उचित है। क्योंकि देव का प्रतिपादन कियाटुश्रा ही तात्विक रूप धर्म होता है, उसी को सम्यक्तया श्राराधना करने से श्रात्मा गुरु पद को प्राप्त कर निर्वाण पद पाता हैं। अतएव प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य है कि वह श्रात्म-कल्याण करने के लिए देव-गुरु और धर्म की सम्यग् भावों से परीक्षा करे । क्योंकि-जो सांसारिक पदार्थ ग्राह्य होता है, सर्व प्रकार से पूर्व में उसी की परीक्षा की जाती है। परन्तु जब पास्तिक बन कर परलोक की सम्यक्तया श्राराधना करनी है तो उक्त पदार्थों की भी सम्यक्तया परीक्षा अवश्यमेव करनी चाहिए । इस समय धर्म के नाम से यावन्मात्र मत सुप्रसिद्ध होरहे है, प्रायः वे सब सम्यग् मान से रहित होकर केवल पारस्परिक विवाद, जय, पराजय और पक्षापात में निमग्न हो रहे हैं। जिनके कारण बहुतसी भद्र श्रात्माएँ धर्म से पराड्मुख होगई है, और शंका सागर में गोते खाते है। इसका मूल कारण केवल इतना ही है कि- लोगों ने केवल धर्म शब्द का नाम ही सुना है, लेकिन उसके भेद तथा स्थानों को नहीं समझा है । इसीलिये परस्पर विवाद और जय पराजय का अखाड़ा खुला रहता है, जिसमें प्रतिदिन मल्लयुद्ध के भावों को लेकर प्रत्येक व्यक्ति उक्त अखाड़े में उतरती है। उनकी ऐसी अयोग्य क्रीड़ा को देख कर दर्शक जन उपहास की नालियां बजाते है। यही कारण है कि-धर्म और देशोन्नति अधोगति में गमन कर रहे हैं। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है कि-वाचालता की ही अत्यन्त उन्नति इस युग में हो रही है। परन्तु जैन-शास्त्रकारो ने धर्म शब्द की व्याख्या इस नीति से की है कि उसमें किसी को भी विवाद करने का नुक्श उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि जब धर्म शब्द के मर्म को जान लिया जाता है तो स्वयं पारस्परि- क विवाद तथा वैमनस्य भी अन्तःकरण से उठ जाता है। प्रायः देखा जाता है कि-बहुत से अनभिज्ञ वा हठयाही प्रात्माएँ केवल धृञ्-धारणे धातु के अर्थ को लेकर मान बैठे है किं-जिसने जिस वस्तु को धारण किया है वहीं उसका धर्म है, ऐसी वुद्धि रखने वाले संजनों के मत से कोई भी संसार में धर्म नहीं है, क्योकि जो कुछ उन्हो ने धारण किया है, उनके विचारानुकूल तो वह धर्म ही है। अव बतलाना चाहिए कि-अधर्म क्या चीज है ? और धर्म क्याचीज है ? उनके मतानुकूल तो एक व्याध (शिकारी) जो जीवों को मारता फिरता है, उसकी पाशविकक्रिया भी एक धर्म है, एवं चोर चोरी कर रहा है, वह भीधर्म है, श्रन्यायी अन्याय कर रहा है,वह भी धर्म है, व्यभिचारी व्यभिचार कर रहा है, वह ( १५५ ) कुलथेरा ५ गणथेरा ६ संघथेरा ७ जातिथेरा ८ सुयथेराह परिताय- थरो १०॥ ठाणागसूत्र स्थान १० ( सू०७६१) वृत्ति-दसेत्यादि, स्थापयन्ति-दुर्व्यवस्थितं जनं सन्मार्ग स्थिरीकुर्वन्तीति स्थविराः तत्र ये ग्रामा नगरास्तेपु व्यवस्थाकारिणो वुद्धिमन्त श्रादेयाः प्रभ- विष्णवस्ते तत्र स्थविरा इति ॥ १-२-३ ।। प्रशासति शिक्षयन्ति ये ते प्रशास्तारः धम्मोपदेशकास्ते च ते स्थिरीकरणात् स्थविराश्चेति प्रशास्तृस्थविराः ॥ ४ ॥ ये कुलस्य गणस्य सदस्य च लौकिकस्य लोकोत्तरस्य च व्यवस्थाकारिणः निग्राहकास्ते तथोच्यते ॥५-६-७।। जातिस्थविराः पष्टिवर्पप्रमाणायुष्मन्तः॥८॥ श्रुतस्थविराः समवायाद्यगधारिणः ॥६॥. पर्याय-स्थविरामर्वशतिवपप्रमाणप्रव- ज्यापर्यायवन्त इति ॥ १० ॥ भावार्थ-इन दोनों सूत्रों का परस्पर इस प्रकार सम्बन्ध है, जिस प्रकार रूप और रस का परस्पर सम्बन्ध होता है क्योंकि-जिस स्थान पर रूप है उसी स्थान पर रस भी साथ ही प्रतीत होने लगता है, इसी प्रकार जहां पर रस होता है रूप भी वहां पर अवश्य देखा जाता है । परन्तु इस तरह कभी भी देखने में नहीं पाता कि-पदार्थों में रूप तो भले प्रकार से निवास करे और रस न करे, और रस हो तो रूप न हो । जिस प्रकार इन दोनों का अविनाभाव सम्बन्ध है, ठीक उसी प्रकार वहुतसे धर्म और स्थविरों का भी परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध है। क्योंकि-धर्म से स्थविरों की उत्पत्ति है और स्थविर ही धर्म के नियमों को निश्चित करते है, अतः दोनों का परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध माना । बहुतसे धर्म इसलिये कथन किए गए है कि- अथिकाय ("अस्तिकाय धर्म") यह स्वाभाविक धर्म पदार्थों का स्वभाव) अनादि अनंत माना गया है। किन्तु किसी भी स्थविर ने पदार्थो काधर्म नियत नहीं किया है। इसीप्रकार पाखंडधर्म" के स्थविर भी वास्तव में नही माने जाते है ।स्थविर शब्द की व्युत्पत्ति यह नहीं दर्शाती है कि स्थविर ही पाखंड धर्म के प्रवर्तक होते हैं, वे तो पाखंडधर्म के विध्वंसक माने जाते है। लिखा भी है- न तेन थेरो सो होति, येनस्स फलितं सिरो। परिपको वयो तस्स, मोघजिएणोति बुचति ॥शा यम्हि सच्चं च धम्मो च, अहिंसा संजमो दमो। स वे वन्तमलो धीरो, सो थेरो ति पवुञ्चति ॥६॥ धम्मपद् धम्मळवगा १६ वा गा-५-६ ॥ अर्थ-जिस के मस्तक के केश श्वेत होगए है, वह स्थविर नहीं होता।
( १५७ ) । सपी ग्राम कदापि सुरक्षित नहीं रह सकता । प्रत्युत व्याधियुक्त होकर शीघ्र ही परलोक की यात्रा के लिये कटिवद्ध हो जाता है । सारांश यह है कि दोनों प्रकार के ग्रामो की व्यवस्था को ठीक करना उसी का नाम ग्रामधर्म है। ग्राम जिस प्रकार उन्नति के शिखर पर आरूढ़ होजाए और ग्रामवासी जन आनंद पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करसकें इस प्रकार के नियम जो स्थविरो ने वांधे हो उन्ही का नाम ग्रामधर्म है। २ नगरधर्म-प्रति नगर का भिन्न २ प्रकार से आचार व्यवहार होता है, परन्तु जिन नियमों से नगर वासीजन शांति और श्रानन्द पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके, ऐसे नियम जोस्थविरो द्वारा वांधे हो, उन्ही का नाम नगरधर्म है। क्योंकि स्थविरों को इस बात का भली भांति ज्ञान होता है कि-श्रव नगर इस व्यवस्था पर प्रारहा है, इस लिये अब देश या कालानुसार इन नियमों की योजना की आवश्यकता है । जैसे कि-जव नगर व्यवहार या व्या- पार की उन्नति के शिखर पर पहुंच जाता है और जिसके कारण व्यापारी वर्ग धर्म के लाभ के लिये सांसारिक उन्नति के शिखर पर पहुंचते है, उस समय लोग विवाह आदि शुभ क्रियाओ मे मनमाने धन का व्यय करने लग जाते है। उन्हें उस समय किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं होती, परन्तु जव व्यापार की क्रियाएं निर्वल पड़ जाएं और फिर भी उसी प्रकार विवाहादि क्रियाश्रो में धन व्यय किया जाए तो उन लोगो को अवश्यमेव कष्टों का मुंह देखना पड़े। परन्तु उस समय तो नगर के स्थविर उन नियमो को वांध लेते हैं जो द्रव्य क्षेत्र काल और भाव के अनुसार होते हैं, जिनके द्वारा नगरवासी जन धन के न्यून होजाने पर भी उक्त क्रियाश्रो के करते समय दुःखों का अनुभव नहीं करते । इसी का नाम नगर धर्म है। नगरधर्म उसको भी कहते है जिसमे कर न लगा हो । इस शब्द से निश्चित होता है कि-पूर्व काल मे जय राजे लोग नगर की स्थापना करते होंगे तब उस की वृद्धि के लिए कुछ समय तक कर नहीं लगाते होंगे। यह नियम आजकल भी कतिपय मंडियों में देखाजाता है। सारांश यह निकला कि प्रति नगर का खान, पान, वेप, भाषा, कला, कौशल इत्यादि प्रायः भिन्न २ होती है । अतः जो नगर स्थविरो द्वारा सुरक्षित होरहा हो उसी को नगरधर्म कहते है। ३ राष्ट्रधर्म-राष्ट्र शब्द देश का वाची है । जिस प्रकार देश की विगड़ी हुई व्यवस्था ठीक होसके उसी का नाम देशधर्म है । यद्यपि देश शब्द के साथ ही राज्य धर्म की सत्ता भी सिद्ध होती है, तथापि राज्य धर्म को सूत्र-कर्ता ने पृथक् नहीं माना है, क्योंकि-राजा का सम्बन्ध देश के ही साथ है राजा ही देश का संरक्षक होता है, इसलिये राजा वा राज्यधिकारी लोगो को सूत्र-कर्ता ( १५६ ) को राष्ट्रीय स्थविर भली प्रकार विचारा करते हैं। ४ पाखंडधर्म-जिन कार्यों में बाहरी आडम्बर तो विशेष हो, परन्तु धर्म का अंश सर्वथा न पायाजाय उसीको पाखंडधर्म कहते हैं। जैसे कि-सम्य- गदर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यग् चरित्र का तो लेशमात्र भी न हो, परन्तु काय- कष्ट तथा संन्यासी होकर हस्ती की सवारी, डेरा, तम्बू, वाग, वगीचे,आखाड़े आदि की योजना करनी तथा सहस्रो वा लाखों रूपयों पर अधिकार रख कर परिव्राजकाचार्य वा महंत तथा हंस परमहंस बन बैठना, ये सब उक्त क्रियाएँ मुनि धर्म से रहित करने वाली होती है। क्योंकि-ये ही उपाधियां तो गृहस्थाश्रम मे थी, फिर जब संन्यास धारण कर लिया तव भी अगर धन, भूमि और स्त्रियों की उपाधि पीछे लगी रही, तो चतुर्थाश्रम धारण करने की आवश्यकता हो क्या थी? शोक से लिखना पड़ता है ! यह आर्य- भूमि पूर्व काल मे ऋषि महर्पियो से सुशोभित होरही थी, परन्तु आजकल प्रायः इस भूमि में उक्त पदों की केवल संशाएँ मात्र रहगई है, और तो क्या कोई भी कुकृत्य ऐसा नहीं जो वे नामधारी मुनि (साधु) नहीं करते, अपितु सभी कुकृत्य वे कर बैठते हैं। न्यायालयों में उनके झगड़े विद्यमान रहते है, राज- कीय दण्ड वे भोगते है, भव्य अभक्ष्य पदार्थों के भक्षण करने मे उनका कोई भी विवेक नही, यावन्मात्र मादक द्रव्य है, प्रायः उनकी वे लोग आनन्द पूर्वक सेवन करते हैं। फिर भी वे शास्तिकों के शिरोमणि बनने का साहस रखते हैं, धर्मात्मा चनने का लोगों कोविज्ञापन पत्र देते रहते हैं अर्थात्-एवं विध कुकृत्य करते हुए भी वेधर्मात्मा कहाते है। अव बतलाइये यह पाखंड धर्म नहीं है तोऔर क्या है? जिस प्रकार संन्यासी लोग क्रिया से पतित होरहे है, उसी प्रकार उदासी वैरागी निर्मले श्रोघड़े पोप आदि लोग भीक्रिया का प्रायः नाम ही भूल गये हैं। देशो मे धर्मोन्नति के स्थान पर वे लोगधर्म कोअधोगामी वनारहे हैं। क्योंकि उक्त नाम धारियो की संगति से प्रायः धनी लोग व्यभिचार करना सीख जाते हैं, जिन्हें कोई व्यसन न लगा हो वे लोग भी उक्त महात्मायो की संगति से व्यसनसेवी बन जाते है। जैसे कि अगर कोई भद्र पुरुप इन के डेरे श्रादि स्थानो मे जाता है तो उस भक्त को भांग चरस श्रादि का स्वभाव तो स्वाभाविकता से पड़े हो जाता है। क्योंकि-प्रायः शिप्य सदा गुरु का अनुकरण करने वाला ही होता है। जब वे अपने गुरुओं की सत्कृपा से व्यसनी बन जाते है तब उनको धनके संग्रह करने की अत्यन्त उत्कट इच्छा होजाती है। परन्तु वे कोई काम करना नहीं चाहते जिससे उनको फिर जूए और चौर्य कर्म का सहारा लेना पड़ता है। जव वे उक्त क्रियाश्रो में लगगए तो फिर कौन सा दुष्कृत्य है जो उनको सेवन न करना पड़े। अतः ये सव पाखंड धर्म है तथा आजकल वहुत सी आत्माएं यदि एक गुरु के शिष्यों का परिवार विस्तृत होगया हो, तो उसे फुल कहते है फिर उनका जो परस्पर सम्बन्ध है, वा गच्छ समूहात्मक है. उसका धर्म अर्थात् समाचार जो है उसी का नाम कुलधर्म है । उस धर्म को ठीक पालन करने के लिए जो नियमों को निर्माण करना है यही फुलस्थविरो का कर्तव्य है । कुलस्थविर सदैव काल इसी बात के विचार में रहें, जिस से कुलधर्म भली प्रकार से चलता रहे। जिस प्रकार लौकिक कुलधर्म में यदि कोई त्रुटि श्रागई हो तो उसे कुलस्थविर दूर करते हैं, इसी प्रकार यदि धार्मिक फुल- धर्म में कोई व्यक्ति स्वच्छन्दवृत्ति होगया है, तो धार्मिक कुलस्थविर उस टि को दूर करने की चेष्टा करें साथ ही इस प्रकार की नियमावली निर्माण करें, जिस से कुलधर्म अच्छी प्रकार चलता रहे । जैसेकि-कुल- समाचार, परस्पर वन्दना, व्यवहारसूत्र, अर्थप्रदान, उपधान, तप, स्वाध्याय, ध्यान, व्युत्सर्ग इत्यादि क्रियाएँ जो कुल मे चली आती हों वे उसी प्रकार चलती रहें, इस प्रकार के धर्म के प्रवर्तक कुल स्थविर ही होते हैं। ६ गणधर्म-अनेक कुलो का जो समूह है, उनका जो परस्पर सम्बन्ध उस सम्बन्ध की व्यवस्था ठीक प्रकार से हो रही है तो उस को गण- धर्म कहते हैं । यद्यपि गण शब्द समूह का वाची है तथापि रूढि से यह शब्द अनेक स्थानों में व्यवहृत हो रहा है। प्राचारांग सूत्र के द्वितीय श्रुतस्कन्ध के पाठ से निश्चित होता है कि-पहिले समय में गणधर्म का प्रति प्रचार था। क्योंकि-वहांजिस स्थान पर जोराजाओं की गणना श्राती है उस स्थान पर साथ ही यह पद पढ़ा गया है कि-"गणराज" जो गण की सम्मति से राजा हुआ हो, उसे गणराज कहते है अर्थात् जिस प्रकार श्राज कल अमेरीकादि देशों में "गणराज" पद की स्थापना की जाती है उसी प्रकार पूर्व काल मे दाक्षिणात्य भारत मे भी बहुत से व्यक्ति गणराज पदारूढ़ होते थे । जैसेकि-निरया- वली सूत्र में लिखा है कि-नवमल्ली जाति के राजे और नवलच्छी जाति के राजे काशी और कोशल देश पर गणराज करते थे। प्रजा की सम्मति- पूर्वक उन व्यक्तियों को राजसिंहासनारूढ किया जाता था, फिर वे नियत समय तक प्रजा शासन करते थे, और उनकी प्राज्ञा प्रजा सम्यक्तया पालन करती थी। परन्तु वह आशा नियत समय तक ही रहती थी। गणराज प्रजा की सम्मति से इस प्रकार होते थे, जिस प्रकार आजकल मेम्बर चुने जाते है । तथा जब हम इस से छोटे पक्ष मे पाते है, तब गणराज एक छोटे से देश में पाते है, जैसेकि-जो छोटे २ कुलो का एक समूह होता है उसी को गण कहते है, फिर सव की सम्मति से जो उस गण का नेता चुना जाए उसी का नाम गणराज पड़ता है, जिसे आज कल लोग प्रधान (प्रेजीडेण्ट) कहते ( १६२ ) हैं । सारा गण उस प्रधान की आशा पालन करता रहता है। श्रीश्रमण भगवान महावीर स्वामी ने जव ानन्द गृहस्थ को श्रावक के १२ नियम धा- रण करवा दिये, तव श्रानन्द श्रावक ने श्री भगवान से प्रार्थना की कि-इन गृहीत नियमों को मैं छः कारणों के विना यत्न पूर्वक पालन करूंगा। उन्ही छः कारणों में एक कारण“गणाभियोगेणं" गणाभियोग लिखा है अर्थात् किसी कारण से मुझे यदि 'गण' कहे वागण पति'कहें तो मुझे वह कार्य करणीय होगा परन्तु मेरा गृहीत नियम खंडित नहीं समझा जायगा । कारण कि-उस कृत्य- को 'गण' करवा रहा है वा गणराज की आज्ञा से मै वह कार्य कर रहा है इत्यादि । इस कथन से यह भली भांति सिद्ध हो जाता है-कि पूर्व काल में गण वा गणराज का किस प्रकार चार प्रबन्ध चलता था? धार्मिक कृत्यों के धारण करते समय भी गणधर्म का अवश्य ध्यान रक्खा जाता था। साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रक्खा जाता था कि-हमारे गणमे किसी कारण से फट न पड़ जाय जिस के कारण गणधर्म का फिर सन्धान करना कठिन होजाए । कारणकि-गणधर्म में विघ्न उपस्थित करना तो सुगम है परन्तु- जब गण में फूट पड़ जाती है तव गण का सुधार होना अति कठिन हो जाता अत गण में परस्पर वैमनस्यभाव उत्पन्न नहीं करने चाहिएं। जिस प्रकार नियमों द्वारा गण सुरक्षित रह सके, प्रत्येक व्यक्ति को उसी विचार में रहना चाहिए । गण शब्द का ही अपभ्रंश आजकल बरादरी शब्द प्रचलित होरहा है, गणस्थविर के नाम पर चौधरी शब्द व्यवहृत होरहा है। श्रतएव वही वरा- दरी ठीक काम कर सकती है जिसके चौधरी दक्ष और वरादरी को उन्नति- शाली बनाने में दत्तचित्त होकर काम करें। क्योकि-जव गण ( वरादरी ) गण स्थविर (चोधरी) के वश में होगी वा माला के मणियों के समान एक सूत्र में श्रोतमोत होगी तय जो गण में आपत्तियां होगी स्वयमेव शान्त होजायेगी । जिस प्रकार माला की मणिये (मणके ) एक सूत्र में श्रोतप्रोत होकर स्मरण में सहायक होते हुए देवताओं का श्राद्वान कर लेती है वा परमात्म-पद की प्राप्ति करा देती है, उसी प्रकार गण का ठीक प्रकार से संगठन अनेक प्रकार के कष्टो से विमुक्त करके सुख और शांति की प्राप्ति कराने लग जाता है। व्यव- हार पक्ष मे संगठन को देखकर प्रतिकूल व्यक्तियां अपने आप वैरभाव को छोड़ कर उन से मेल करने लग जाती हैं। तथा जो काम राजकीय सम्बन्धी हो उन्हे गणस्थविर सुख पूर्वक करा सकते है । धार्मिक कार्य भी गण स्थविर बड़ी शांति पूर्वक कराते हुए नगर वा देश मे धर्म-उद्योत कर सकते है। अतएव सिद्ध हुआ कि कुल धर्म ठीक होजाने पर गण धर्म भी भलीप्रकार चलसकता है, गणधर्म ठीक होजाने से गण में शांति और परस्पर प्रेम का सर्वप्रकार से , , ( १६५ ) ही अवयव सुरक्षित न रह सके, परन्तु श्रांखो के सुरक्षित रहने पर उन अवयवो का भली प्रकार प्रतिकार किया जा सकता है । ठीक इसी प्रकार संघधर्म के स्थविरों के साथ यदि फुलधर्म के स्थविर और गणधर्म के स्थविर भली प्रकार सम्मिलित हो जायं तथा परस्पर तीनों स्थविरों की सम्मति मिल जाय या परस्पर नियमो में उनका चैमनस्यभाव उत्पन्न न हो या कुल धर्म के स्थ- विर और गण धर्म के स्थविर भली प्रकार अपना पक्ष त्यागकर संघ धर्म के स्थविरों की श्राक्षा पालन करें, तो दिनप्रतिदिन संघधर्म अभ्युदय को प्राप्त हो जाता है। क्योंकि-"संघधर्म" शब्द की वृत्ति करने वाले लिखते है “संघधर्मा- गोष्टीसमाचारा" अर्थात् संघ धर्म उसका नाम है जिस की उन्नति के उपायों का अन्वेपण ग्रामस्थविर, नगरस्थविर, राष्ट्रस्थविर, प्रशास्तस्थविर कुलस्थविर और गणस्थविर एकत्र होकर करें तथा उक्त धर्मों को सुरक्षित रखने के लिये देशकालानुसार नियमों की संयोजना करें। जिस प्रकार संघधर्म के मुख्य अवयव कुलस्थविर और गणस्थविर पूर्व लिखे जा चुके है, ठीक उसी प्रकार संघधर्म के मुख्य अवयवरूप राष्ट्रस्थविर तथा अन्य स्थ- विर भी है। कारणकि-यावन्मात्र धर्म ऊपर कथन किये जा चुके है, और याव- मात्र उनके स्थविर प्रतिपादन किये गये है, उन सबका एक नियत समय पर एकत्र होना फिर परस्पर देशकालानुसार उक्त धर्मों के नियमों पर विचार करना, इतना ही नहीं अपितु सर्वधर्मों की दशाओं का अन्तरंग दृष्टि से अवलोकन करना, उनकी वृद्धि और हानि की ओर ध्यान देना, सब की सम्मति के अनुसार वा बहुसम्मति पूर्वक प्रस्ताव पास करना, इत्यादि को भी संघधर्म कहते हैं। जिस प्रकार जैनमत में समयानुसार कुलकर जगत् की वा कर्मभूमियोंकी व्यवस्था ठीक बांधते आए हैं, उसी प्रकार परमत में स्मृतिकार भी देशकालानुसार नियम बांधते रहे है। परन्तु उन स्मृतिकारों ने विशेप दूरदर्शिता से काम नहीं लिया । क्योकि-प्रायः उनकी स्मृतियो मे भक्ष्याभक्ष्य पर विशेष विचार नहीं किया गया । कइयो ने तो अतिथिसत्कार में पशुवध भी लिख डाला है, तथा अन्य कई प्रकार से १ वशिष्टस्मृति के चतुर्थाध्याय मे लिखा है कि-पितृदेवतातिथि पूजाया पशु हिंस्यात् । मधुपके च यज्ञे च पितृदेवतकर्मणि । अत्रैव च पशु हिस्यानाम्येत्यनवी- न्मनु ॥ नाकृत्वा प्राणिना हिंसा मासमुत्पद्यते क्वचित् । न च प्राणिवध स्वय॑स्तस्माशगे वधोऽवध । अयापि ब्राह्मणाय वा राजन्याय वा अभ्यागताय वा महोक्ष वा महाज वा पचेदेवमस्या- तिथ्य कुर्वतीति ॥ पितर, देवता और अतिथि इनकी पूजा में पशु की हिसा करे । कारण कि-मनु का यह वचन है कि-मधुपर्क मे यज्ञ में पितर और देवताओं के निमित्त जो कर्म है, उन में पशु की हिसा करे, , -- ( १६७ ) से उपमा देकर अलंकृत किया गया है, जैसे कि- तव संजम मयलंछण अकिरियराहुमुहदुद्धरिसनिच्चं । जय संघचन्द ! निम्मल सम्मत्त विसुद्ध जोरहागा ॥ वृत्ति-तपश्च संयमश्च तपःसंयमं समाहारो द्वन्द्वः तपःसंयममेव मृग- लाञ्छनं-मृगरूपं चिद्रं यस्य तस्यामंत्रणं, हे तपःसंयममृगलाञ्छन ! तथा न विद्यतेऽनभ्युपगमात् परलोकविपया क्रिया येषां ते अक्रिया-नास्तिकाः त एव जिनप्रवचनशशाङ्कनसनपरायणत्वाद्राहुः तस्य मुखमिवाक्रियराहमुखं तेन दुष्प्रधृप्यः-अनभिभवनीयः तस्यामंत्रणं हे अक्रियराहुमुखदुष्प्रधृप्य ! संघश्चन्द्र इच सड़चन्द्रः तस्यामंत्रणं हे संद्धचन्द्र ! तथा निर्मलं-मिथ्यात्वमल- रहितं यत्सम्यक्त्वं तदेव विशुद्धा ज्योत्स्ना यस्य स तथा "शेपाढे" ति कः प्रत्ययः, तस्या मंत्रण हे निर्मलसम्यक्त्वविशुद्धज्योत्स्नाक ! दीर्घत्वं प्रागिव- प्राकृतलक्षणादवसेयम्, “निच्चं” “नित्यं" सर्वकालं "जय" सकलपर- दर्शनतारकेभ्योऽतिशयवान् भव, यद्यपि भगवान् सङ्घचन्द्रः सदैव जयन् वर्तते तथाऽपीत्थं स्तोतुरभिधानं कुशलमनोवाकायप्रवृत्तिकारणमित्य- दुष्टम् ॥ पुनरपि सदस्यैव प्रकाशकतया सूर्यरूपकेण स्तवमाह- भावार्थ-हे तपःसंयम मृगलाञ्छन वाले ! हे अक्रियराहुमुखदुष्प्रधृष्य ! हेसंघचन्द्र!हे निर्मल विशुद्ध ज्योत्स्ना केधारण करने वाले! तेरीसर्वदा जय हो। इस गाथा का सारांश इतना ही है कि-स्तुतिकार ने श्रीसंघ को चन्द्र की उपमा से संबोधित किया है । जैसेकि-हे संघचन्द्र ! जिस प्रकार चन्द्र को मृग का लाञ्छन होता है, ठीक उसी प्रकार श्रीसंघ रूपी चन्द्र को तपःसंयम रूपी मृग लाञ्छन है। इसी लिये इस का यह प्रामंत्रण किया गया है कि-हे तपः संयम रूप मृग के लाञ्छन वाले ! फिर जिन की परलोक विपय क्रिया नहीं रही ऐसे जो नास्तिक लोग है, वेही जिनप्रवचन रूप चन्द्र के प्रसनपरायण होने से राहु के समान है उन से जो पराभव करने योग्य नहीं है । अतः श्री संघ के लिये यह आमंत्रण किया गया है कि हे अक्रिय राहु मुखदुष्पधृप्य ! तथा जिस प्रकार चन्द्र निर्मल होता है ठीक उसी प्रकार मिथ्यात्वरूप मल से रहित जो सम्यक्त्व है, वही उस संघ रूप चन्द्र की विशुद्ध ज्योत्स्ना (चांदनी) है। इसीलिये यह प्रामंत्रण किया गया है कि हे निर्मल सम्यक्त्व विशुद्ध ज्योत्स्ना वाले संघ चन्द्र ! तू सदैव काल जय करने वाला हो। यद्यपि भगवान् संघ चन्द्र सदैव जय कर्ता होकर ही वर्त रहा है, तथापि यहां पर स्तुति करने वाले के मन वचन और कार्य कुशल प्रवृत्ति रूप होनेसे इस कथन से कोई आपत्ति रूप दोष नहीं है।
( १६६ ) करता रहता है, परन्तु इस बात को ठीक स्मरण रखना चाहिए कि-जव तक ग्रामस्थविर, नगरस्थविर, कुलस्थविर, वा गणस्थविर राष्ट्रीय स्थविरों के साथ सहमत न होंगे, तव तक संघस्थविरों के उत्तीर्ण किए हुए प्रस्ताव सर्वत्र कार्य-साधक नहीं हो सकते । इस कथन से यह तो स्वतः ही सिद्ध हो जाता है कि संघधर्म और संघस्थविरो की कितनी आवश्यकता है ? इस लिये संघधर्म की संयोजना भली प्रकार से होनी चाहिए। इसीलिये सूत्र- कर्ता ने दश स्थविरों की गणना मे एक तरह के "पसत्थारथेरा" "प्रशात. स्थविरा" लिखे हैं, उनका मुख्य कर्तव्य है कि वे उक्त धर्मों का अपने मनोहर उपदेशों द्वारा सर्वत्र प्रचार करते रहें। जैसे कि-"प्रशासति-शिक्षयन्ति येते प्रशास्तारः धर्मोपदेशकास्ते च ते स्थिरीकरणात् स्थविराश्चेति प्रशातृस्थविरा"क्यों कि-प्रशात- स्थविर प्राणीमात्र के शुभचिंतक होते है। इसीलिये वे अपने पवित्र उपदेशों द्वारा प्राणीमात्र को धर्म पक्ष में स्थिरीभूत करते रहते है । कारण कि- नियम पूर्वक की हुई क्रियाएँ सर्वत्र कार्य-साधक हो जाती है, किन्तु नियम रहित क्रियाएँ विपत्ति के लाने वाली बन जाती है, जिस प्रकार धूमशकटी (रेलगाड़ी)अपने मार्ग पर ठीक चलती हुई अभीष्ट स्थान पर निर्विघ्नता पूर्वक पहुंच जाती है, ठीक उसी प्रकार स्थाविरो के निर्माण किये हुए नियमो के पालन से श्रात्मा व्यभिचारादि दोपों से बचकर धर्म मार्ग में प्रविष्ट होजाता है, जिस का परिणाम उस आत्मा को उभय लोक में सुखरूप उपलब्ध होता है। क्योंकि- -यह बात भली प्रकार से मानी गई है कि-श्राहार की शुद्धि होने से व्य- वहार-शुद्धि होसकती है। सो यावत्काल पर्यन्त श्राहार की शुद्धि नहीं कीजाती तावत्कालपर्यन्त व्यावहारिक अन्य क्रियाएं भी शुद्धि को प्राप्त नहीं होसकतीं। अतएव इन सात स्थविरों का संक्षेप मात्र से स्वरूप कथन किया गया है, साथ ही सात ही प्रकार के धर्म भी बतला दिये गए हैं, सो स्थविरों को योग्य है कि- वे अपने ग्रहण किय हुए पवित्र नियमों का पालन करते हुए प्राणी मात्र के हि- तैपी बनकर जगत् के हितैषी बने। इतिश्री-जेनतत्त्वकालिकाविकास स्वरूपवर्णनात्मिका तृतीया कलिका समाप्ता। -- अथ चतुर्थी कलिका सुज्ञ पुरुपो! पिछले प्रकरणो में सात धर्मों का संक्षेपता से वर्णन किया गया जिसमें लौकिक वा लोकोत्तर दोनों प्रकार के धर्म और स्थविरों की संक्षेप रूप से व्याख्या की गई है क्योंकि-यदि उन धमों की विस्तार पूर्वक व्याख्या लिखी जाती तो कतिपय महत् पुस्तको की संयोजना करनी ( १७१ ) तो विद्वान् और अनुभवी पुरुषों के पास पहुंच कर सूत्र के अर्थी का श्रवण करे। क्योकि जिन प्रात्मानोने अक्षरशान संपादन नहीं किया है, वे श्रत के अर्थ- श्रवण से अपना वा पर का कल्याण कर सकते है। तथा च पाठः-- दुविहे धम्मे पं०-सुयधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेव, सुयधम्मे दुविहे पं० सुत्तसुयम्धमे चेव अत्थसुयधम्मे चेव ।। ठाणागसूत्र स्थान २ उद्देश्य १ ॥ वृत्ति-दुर्गतो प्रपतंतो जीवान् रुणद्धि सुगतौ च तान् धारयतीति धर्मः, श्रुतं द्वादशांगं तदेव धर्म श्रुतधर्मः । चर्यते आसेव्यते यत् तेन वा चर्यते. गम्यते मोक्ष इति चारित्रं-मूलोत्तरगुणकलापस्तदेव धर्मश्चारित्रधर्म इति । 'सुयधम्मे' इत्यादि सूत्र्यन्ते सूच्यन्तेवाऽर्था अनेनेति सूत्रम् सुस्थितत्वेन व्यापित्वेन च सुष्टूक्तत्वाहा सूतं, सुप्तमिव वा सुप्तम्, अव्याख्यानेनाप्रवुद्धावस्थ- त्वादिति. भाप्यवचन त्वेवं 'सिञ्चति खरइ जमत्थं तम्हासुत्तं निरुत्तविहिणा वा। सूएइ सवति सुब्बइ सिव्वइ सरए वजेणऽत्थं ॥ १॥ अविवरियं सुत्तविव सुछिय वा वित्तो सुवुत्तं त्ति ॥ अर्यतेऽधिगम्यतेऽर्थ्यते वा याच्यते बुभुत्सुभिरित्यर्थी- व्याख्यानमिति, श्राह च-जो सुत्ताभिप्पाश्रो सो अत्थो श्रजए य जम्हत्ति' ॥ भावार्थ-श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने धर्म दो प्रकार से प्रति- पादन किया है, जैसेकि-श्रतधर्म और चारित्रधर्म फिरथतधर्म भी दो प्रकार से वर्णन किया है, जैसेकि सूत्रश्रतधर्म और अर्थश्रतधर्म । दुर्गति मे पड़ते हुए प्राणी को जो उठाकर सुगति की ओर खींचता है, उसी का नाम धर्म है और द्वाद- शाङ्ग रूप श्रत का जो पठन पाठन करना वा कराना है उसे श्रतधर्म कहते है तथा जिस के प्रासेवन वा जिसके द्वारा मोक्ष प्राप्त किया जाए उसे चारित्र धर्म कहते हैं वही मुलोत्तरगुणक्रियाकलापरूप धर्म भी है। सूत्र शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती । जैसे सूत्र में माला के मणके परोये हुए होते है, उसी प्रकार जिस मे अनेक प्रकार के अर्थ श्रोतप्रोत होते है, उसे सूत्र कहते हैं तथा जिस के द्वारा अर्थों की सूचना की जाती है वह सूत्र है। जो भली प्रकार कहा हुआ है, उस का नाम सूक्त है, प्राकृत भाषा में सूक्त शब्द का रूप भी 'सुत्त' ही बनता है । जिस प्रकार सोया हुआ पुरुष वार्तालाप करने पर विना जागृत हुए उस वार्ता के भाव से अपरिचित रहता है ठीक उसी प्रकार विना व्याख्या पढ़े जिस का वोध न होसके उसे सूत्र कहते १ पततो रक्षति सुगतौ च धत्ते इति २ सिधति क्षरति यस्मादर्य तस्मात् सूत्रं निरुतविधिना वा सूचयति प्रवति भूयते सि- च्यते स्मयते वा येनार्थ ॥१॥ अविवृत मुप्तमिव भुस्थितव्यापित्वात् सूक्तमिति ॥ ३ य सूत्राभिप्रायः सोऽर्थोऽर्गते च यस्मादिति । ।
( १७३ ) अतएव सिद्ध हुआ कि-सम्यग् श्रुत का अध्ययन करना श्रुतधर्म कहा जाता है। इस धर्म का विस्तार पूर्वक कथन इस लिये नहीं किया गया है कि-सव सम्यग् शास्त्र इसी विषय के भरे हुए है । सो उन शास्त्रों का अध्ययन करना ही सम्यग् श्रुतधर्म है । ६ चारित्रधर्म-जिस धर्म के द्वारा कमों का उपचय दूर हो जाए, उसी को चारित्रधर्म कहते है । क्योंकि-" शाननियाभ्या मोक्ष " ज्ञान और क्रिया के द्वारा ही मोक्ष पद उपलब्ध हो सकता है । इस कथन से यह स्वतः ही सिद्ध है कि-केवल ज्ञान द्वारा मोक्ष उपलब्ध नहीं होता और नाहीं केवल क्रिया द्वारा मोक्षपद प्राप्त हो सकता है, किन्तु जव शानपूर्वक क्रियाएँ की जायेंगी, तव ही श्रात्मा निर्वाण पद की प्राप्ति कर सकेगा। इस प्रकार जव सम्यग् शान होगया तब फिर सम्यग् चारित्र के धारण करने की आवश्यकता होती है। श्री भगवान् ने ठाणांग सूत्रस्थान २ उद्देश मे प्रतिपादन किया है कि- चरित्तधम्मे दुविहे पं० तं०-आगारचरिचधम्मे अणगार-चरिचधम्मे । वृत्ति-चरितेत्यादि-श्रागारं-गृहं तद्योगादागाराः-गृहिणस्तेषां यश्च- रित्रधर्मः-सम्यक्त्वमूलाणुव्रतादिपालनरूपः स तथा एवमितरोऽपि नवरम गारं नास्ति येषां ते अना गाराः साधवः इति । भावार्थ-चरित्रधर्म दो प्रकार का है, जैसेकि-गृहस्थों का चरित्र और मुनियों का चरित्र । सो मुनियों के चरित्रधर्म का स्वरूप तो पूर्व संक्षेप से वर्णन कर चुके है, परन्तु गृहस्थों का जो चरित्रधर्म है उसका संक्षेप से इस स्थान पर वर्णन किया जाता है। क्योकि धर्म से ही प्राणी का जीवन पवित्र हो सकता है । अव धर्मविन्दुप्रकरण से कुछ सूत्र देकर गृहस्थ धर्म का स्वरूप लिखा जाता है। तत्र च गृहस्थधोऽपि द्विविध सामान्यतो विशेषश्चति । (धर्मबिन्दु अ १ । सू० २।) भावार्थ-गृहस्थ धर्म दो प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसेकि-एक सामान्य गृहस्थधर्म और दूसरा विशेष गृहस्थधर्म । श्रव शास्त्रकार सामान्य- धर्म के विषय में कहते हैं। तत्र सामान्यतो गृहस्थधर्म कुलझमागतमनिंद्य विभवाद्यपेक्षया न्यायतो ऽनुछानमिति । (धर्म० अ० १। सू०३) भावार्थ-कुलपरम्परा से जो अनिंदनीय और न्याययुक्त आचरण पा रहा हो तथा न्याय पूर्वक ही विभवादि उत्पन्न किए गए है, उन्हे सामान्यधर्म कहते है। गृहस्थ लोगों का यह सब से बढ़कर सामान्य धर्म है कि वे पवित्र कुलाचार . - ( १७५ ) तथा समानकुलशीलादिभिरगोत्रजैववाहामन्यत्र बहु विरुद्धेभ्य इति ॥ (धर्म० अ० १ । सू० १२) भावार्थ-जोदेशवाधर्म से विरोध नहीं रखता तथा जिसका परस्पर वैर नहीं है उस व्यक्ति के साथ विवाह आदि का सम्बन्ध हो जाय तो वह व्यवहार पक्ष में हानि कारक नहीं माना जाता । परन्तु विवाह-सम्बन्ध करते समय तीन बातों का ध्यान तो अवश्यमेव कर लेना चाहिए,जैसे कि कुल अपने समान हो,२ शीलाचार अपने समान हो और सम्बन्धी अपने से भिन्न गोत्री हो । क्योंकि-अपने समान कुल मे हुश्रा सम्बन्ध बहुत से कार्यों से बचाता है, जैसेकि-जव कन्या अपने से बड़े कुल में दीजाती है तब प्राय उरा कन्या का महत्व नहीं रहता। जिस प्रकार लोग दास और दासी को देखते हैं, उसी प्रकार प्रायः उस कन्या के साथ श्वसुरगृह वालों का वर्ताव होजाता है। इतना ही नहीं किन्तु बहुत से निर्दयी पति इस धुन में लगे रहते हैं कि-कव इस की मृत्यु हो और कव हम नूतन सम्बन्ध जोड़े। श्रय विचार किया जासकता है कि-जव पति के इस प्रकार के भाव उत्पन्न हो जाएं, तव उस विचारी श्रवला की रक्षा किस प्रकार हो सकेगी? यदि कन्या अपनी अपेक्षा विभवादि से न्यून कुल मे दीजाती है, तब वह पितृगृह के अभि- मान वश होकर पतिदेवता की अवज्ञा करने लगजाती है । सदैव काल उसके सम्बन्धियों को धिक्कारती रहती है, इतना ही नहीं किन्तु आप सदैव काल रूठी रहती है, जिसके कारण पति परम दुःख में पड़ जाता है तथा श्वसुर सम्बन्धी जन परम दुःखित हो जाते हैं। पति सदैव काल अपने जीवन को निरर्थक समझने लग जाता है ! भागने की अथवा अपमृत्यु की इच्छा रखता है इत्यादि अनेक दोप जन्य कार्य होने से शास्त्रकार ने समानकुल का विशेपण दे दिया है। जिस प्रकार कुल समान की व्याख्या की जाती है ठीक उसी प्रकार शील भी सम होना चाहिए। कारण कि-यदि कुल आचरण ठीक नहीं है तब उस में कन्या भी सुख नहीं पासकती । जैसेकि कुल तो सम ठीक है परन्तु उस कुल में मद्य मांसादि का प्रचार है तथा वर (पति) व्यभिचारी है ऐसी दशा में किसी प्रकार से भी विवाह सुखप्रद नहीं होसकता । क्योंकि- व्यभिचारी पुरुष कभी भी पत्नी के लिये सुखप्रद नहीं माना जा सकता। एवं यदि विद्या भी सम नहीं है तव भी प्रायः परस्पर वैमनस्य भाव उत्पन्न होने की संभावना होती है, क्योंकि-विद्या के न होने से या विषम होने से परस्पर किसी बात के विचार में अवश्यमेव विरोध हो जाता है। इसी वास्ते सूत्र कर्ता ने श्रादि शब्द ग्रहण किया है। आयु का भी अवश्य विचार किया जा सकता है, क्योंकि-अनमेल विवाह कभी भी सुखप्रद नहीं माने जासकते । जैसे.
( १७७ ) नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त स्त्री को स्वातंत्र्य नहीं मिलना चाहिए कारण कि स्वतंत्रता प्रायः स्वछन्दता की पोपक होजाती है, जिसका पीछे निरोध करना अति कठिन होजाता है । स्वतंत्रता कर लेनी तो सुगम है परन्तु पीछे दूसरे की भाशा में वर्त्तना कठिन होजाता है, इस लिये अपरिमित स्वतंत्रता कभी भी सुखप्रद नहीं हो सकती । साथ ही जो स्त्रियां कुल में वृद्ध हों और माता के समान हित शिक्षा देने में दक्ष हों कुलवधू को उनकी श्राशा में सदैव काल रहना चाहिए । कारण कि-उक्त स्त्रियों के वशवर्ती रहने से योग्यता तथा सदावार बढ़ेगा और पातिव्रत्य धर्म दृढ़ता से पालन हो सकेगा। उनकी हितशिक्षा के प्रभाव से वे सदैव काल कदाचार से बचती रहेंगी, सो उक्त नियमों को सहायता से कुल वधूत्रों की रक्षा होसकती है तथा उपप्लुतम्थानत्याग इति धर्मबिन्दु अ-१ ॥ १६॥ भावार्थ-जिस स्थान पर उपद्रव होने की संभावना हो या जहां वार २ उपद्रव होते हों वहां निवास न करना चाहिए। जिस स्थान पर अपने अथवा पर राजा के कारण उपद्रव उत्पन्न होने की आशंका हो तथा दुर्भिक्ष, मारी ईतिये ( अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूपक, टीड पतंगिये स्वचक्र वा परचक्र ) वा परस्पर जनों के साथ विरोध हो, ऐसे स्थानों में रहने से गृहस्थों के धर्म, अर्थ और काम रूप तीनों धर्मों की भली प्रकार से रक्षा न हो सकेगी, चित्त अशान्त रहेगा। इस लिये ऐसे स्थानों का परित्याग करना ही गृहस्थ के लिये श्रेयस्कर है, ताकि चित्त की समाधि भली प्रकार से बनी रहे । स्वयोग्यस्याश्रयणमिति- धर्म० अ-१ सू-१७ इस सूत्र का यह प्राशय है कि-सुयोग्य पुरुप का श्राश्रय लेना चाहिए । कारण कि-गृहस्थावास में रहते हुए पुरुप को नाना प्रकार के कप्टों का सामना करना पड़ता है, उसमे सुयोग्य व्यक्ति का आश्रय होने से वे कष्ट शांति पूर्वक भोगे जासकते है । जिस प्रकार महावायु और महामेघ की प्रचंड धारा से सुदृढ़ और सुरक्षित शालाएँ पुरुषों की रक्षक होती है, ठीक उसी प्रकार सुयोग्य व्यक्तियां विपत्ति काल मे दुःखी पुरुषों की रक्षा करने में समर्थ होती है । श्रतएव प्रत्येक गृहस्थ को योग्य है कि-महान् सुयोग्य व्यक्ति के प्राश्रित रहे । इस से एक और भी विशेष लाभ होता है वह यह कि-जय जनता को विदित होजाता है कि-अमुक व्यक्ति अमुक महान व्यक्ति के प्राश्रित है तव आने वाले अनेक विघ्न स्वयमेव उपशम होजाते है । कारण कि-सदाचारी पुरुषों का संसर्ग होने से श्रात्मा विना उपदेश ही सदाचार की ( १७६ ) जिस प्रकार स्वदेशी वेप के विषय में कहा गया है उसी प्रकार अन्य भोपादि स्वदेशी प्राचारो के विषय में भी जानना चाहिए । इसी वास्ते 'ऊपर कहा जा चुका है कि-प्रसिद्ध और प्रशंसनीय देशाचार के पालन करने वाला पुरुष सामान्यधर्म पालन करता हुआ विशेष धर्म के योग्य हो जाता है । क्यों कि-जो किसी को भी निंदा नहीं करता उसका श्रात्मा सदैव काल शांति में रहा करता है। यदि किसी अधिकारी व्यक्ति की निंदा की जावे तो उसका फल तत्काल उपलब्ध हो जाता है, यदि किसी सामान्य व्यक्ति की निंदा की जाए तो उसका परिणाम प्रायः कुछ समय के पश्चात् उपलब्ध जायगा । अतएच उक्त धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति किसी की भी निंदान करे । अपितु निंदादि व्यसनों को छोड़ कर सदैव काल सदाचारी पुरुषों की संगति करनी चाहिए । जव कुसंग का त्याग किया जायगा और सुसंगति सदा चित्तवृत्ति लगी रहेगी, तब आत्मा इस क्रिया के महत्व से विशेष मे प्रवृत्त हो सकेगा। आगे ग्रन्थकार ने लिखा है यथा- "तथा मातापितृपूजेति" इस सूत्र का आशय है कि-माता पिता की पूजा करनी चाहिए । कई लोग कह देते हैं कि-माता पिता की पूजा क्या पुष्पों और घंटाओं द्वारा होनी चाहिए ? इस प्रकार के कुहेतुश्रो के निराकरण के वास्ते उक्त सूत्र के वृत्ति करने वाले लिखते है कि- मातापित्रो जननीजनकयो पूजा विसध्य प्रणामकरणादि । यथोक्तम्- पूजन चाऽस्य विज्ञेयं विसध्य नमन किया । तस्यानवसरेऽप्युच्चैश्चैतस्यारोपितस्य तु ॥ अस्यैति-माता पिता कुलाचार्य एतेषा ज्ञातयस्तथा । वृद्धा धमापदेष्टारो गुरुवर्ग सता मंत ॥ इति श्लोकोतस्य गुरुवर्गस्य । अभ्युत्थानादियोगस्य तदन्ते निभृतासनम् । नामग्रहश्च नास्थाने नावर्णश्रवणे फचित् ॥३१॥ भावार्थ-मातापिता को पूजा से अंभिप्राय यह है कि-त्रिकाल प्रणा- मादि करके भक्ति करनी चाहिए। क्योंकि-कहा गया है कि-अवसर विना फिर ऊंच भावों से चित्त मे धारोपण किया हुआ गुरुजन (वृद्धवर्ग) वर्ग को त्रिकाल प्रणाम करना यही उन का पूजन है। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-गुरुजनवर्ग में किस २ को गिनना चाहिए ? इसके उत्तर में कहां है कि-माता, पिता, कुलाचार्य, (शिक्षागुरु), उनके सगे सम्बन्धी, वृद्ध और धर्म का उपदेश करने वाले । इन्ही को सत्पुरुषों ने गुरु माना है। गुरुवर्ग को किस प्रकार मान देना चाहिए ? श्रव इसी विषय मे कहते हैं-गुरु जन आवे तो खड़े हो जाना चाहिए, उनके सामने जाना चाहिए, श्रादि शब्द से सुखं साता पूछनी, उनके पास निश्चल होकर बैठना चाहिए, अस्थान में (अंघारीत स्थान) ?
( १८१ ) शाली बनगया तब रोगी के लिये उसका कितना भयानक परिणाम होगा और रोग को उपशम करने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ेगा? यह कहने की श्रावश्यकता नहीं । इसके अतिरिक्त भोजन करते समय रसों में मूर्छित न होना चाहिए । कारण कि-स्तोकमात्र रस के वशीभूत होकर फिर परिमाण से अधिक भोजन किये जाने पर रोगो का मुंह देखना पड़ता है। फल रूप फिर श्रात्मा असमाधि भी उत्पन्न होजाती है। इसलिये श्रात्मा को समाधि में रखने के लिये और धार्मिक क्रियाएँ पालन करने के लिये भोज्य पदार्थों में अवश्य विवेक होना चाहिए । कतिपय विद्वानों का मत है कि-जब भोजन करने का समय आए तव उदर (पेट) के तीन भाग कल्पना करलेने चाहिएं जैसेकि- -एक भाग अन्न से भर लिया. फिर दूसरा भाग पानी से भरे जाने पर उदर का एक भाग खाली रखा जाना चाहिए, ताकि जब किसी कारण से उक्त दोनों भागो में विकार उत्पन्न होजाए तव तीसरा भाग उस विकार को शान्त करले । इसलिये परिमाण से अधिक भोजन न करना सदैव काल पथ्यरूप माना गया है। "तथा श्रदेशकालचर्यापरिहार इति" इस सूत्र का मन्तव्य यह है कि देश और काल से प्रतिकूल होकर कदापि न चलना चाहिए । जैसेकि-जो पुरुप विना समय अर्थात् अकाल मे गमनागमन करता है, वह अवश्यमेव लोगो की दृष्टि मे शंका का पात्र बन जाता है। क्योंकि-श्रेष्ठ श्रात्माएँ कदापि समय गमनागमन नहीं करती। इसी प्रकार देश विषय में भी जानना चाहिए। तथा यावन्मात्र शंका के स्थान है, उन स्थानों पर कदापि न जाना चाहिए। जैसेकि-जिस स्थान पर वेश्यायो के गृह है, द्यत-स्थान मदिरास्थान, तथा मांसादि के विक्रय के स्थान । यदि उन स्थानो पर पुनः २ गमनागमन होगा तब सभ्य पुरुषों की दृष्टि में वह अवश्यमेव शंका का पात्र बन जायेगा । अतएव सामान्य गृहस्थधर्म के पालन करने वाले व्यक्ति को योग्य है कि-वह प्रत्येक कार्य सावधानता- पूर्वक करने की चेष्टा करे. कारण कि-जिस कार्य को करते समय अपने वल और निर्वलता की परीक्षा नहीं की जाती, उस कार्य की सफलता भी शंका- स्पद ही रहती है। अतएव सिद्ध हुआ कि-कार्य करते समय अपने वल और अवल का अवश्यमेव ध्यान होना चाहिए अर्थात् धर्म. अर्थ और काम जिस प्रकार निर्विघ्न पालन किये जासके, उसी प्रकार वर्त्तना चाहिए । साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि-जो ज्ञानादि से वृद्ध हैं उनकी संगति में हि विशेषतया समय व्यतीत किया जाए । यद्यपि कतिपय शास्त्रों का मत है कि-"तथा-अतिसगवर्जनमिति" किसी का भी अतिसंग न करना ।
( १८३ ) परन्तु वह शस्त्र (दण्डादि) और वाहन द्वारा सफल की जासकती है । परन्तु । "श्रादेहस्वेदं व्यायामकालमुशन्त्याचार्या यावत् काल पर्यन्त शरीर पर प्रस्वेद न पाजावे, तावत् काल पर्यन्त व्यायामाचार्य उसे व्यायाम नहीं कहते । सारांश यह निकला कि-जव शरीर प्रस्वेद युक्त होजाए तव ही उस क्रिया को व्यायाम क्रिया कहा जासकता है। नथा इस क्रिया के करने का मुख्य उद्देश्य क्या है ? अब इस विषय मे श्राचार्य कहते है। "व्यायामशीलेषु कुतोऽमिदीपनमुत्साही देहदायं च" विना व्यायाम किये अग्नि-दीपन, उत्साह और शरीर की दृढ़ता कहां स उपलब्ध होसकती है ? अर्थात् नहीं होसकती । उक्त तीनों कार्य व्यायाम- शील पुरुषों को सहज में प्राप्त होजाते है । जैसेकि-जव व्यायाम द्वारा शरीर मस्वेद युक्त होगया तब जठराग्नि प्रचंड होजाती है. जिस से भोजन के भस्म होने में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता। दूसरे उस आत्मा का उत्साह भी औरों की अपेक्षा अत्यन्त बढ़ा हुना होता है । वह अकस्मात् संकटो के श्राजाने से उत्साह-हीन नहीं होता। इस लिये व्यायामशील उत्साह युक्त माना गया है। तीसरे व्यायाम ठीक होने से शरीर का संगठन भी ठीक रहता है अर्थात् अंगोपांग की स्फुरणता और शरीर की पूर्णतया दृढ़ता ये सब बातें व्यायामशील पुरुषों को सहज मे ही प्राप्त होसकती है। पूर्व काल में इस क्रिया का प्रचार राजी महाराजों तक था। औपपातिक सूत्र में लिखा है कि-जव श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामी चंपा नगरी के वाहिर पूर्णभद्र उद्यान में पधारे तब कृणिक महाराज श्रीभगवान के दर्शनार्थ जव जाने लगे तय पहिले उन्होंने "श्रहणसाला" व्यायामशाला में प्रवेश किया फिर नाना प्रकार की व्यायाम क्रियाश्रो से शरीर को श्रान्त किया। इस प्रकार व्यायामशाला का उस स्थान पर विशेषतया वर्णन किया गया है। द्वादश तपों मे से वाहिर का कायक्लेश तप भी वास्तव में व्यायाम क्रिया का ही पोपक है, क्योंकि-चीरासनादि की जो क्रिया की जाती है वह शरीर को आयास (परिश्रम ) कराने वाली हुना करती है । अतएव निष्कर्ष, यह निकला कि-बलवीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम करने का मुख्य साधन व्यायाम क्रिया ही है। इन्द्रिय, मन और मरुत् (वायु) का सूक्ष्मावस्था में होजाना ही स्वाप है। इस का तात्पर्य यह है कि यावत काल पर्यन्त परिश्रम करने के पश्चात् विधिपूर्वक शयन न किया जाये तव तक इंद्रिय और मन स्वस्थ नहीं रह सकता, नाँही फिर शरीर नीरोग रह । ( १८५ ) विशेषधर्म में श्रानन्दपूर्वक प्रारोहण होसकता है। जिस प्रकार संतान का उत्पन्न करना ही धर्म नहीं है, परन्तु उसे विद्वान् और सदाचारी बनाना भी मुख्य प्रयोजन है, ठीक उसी प्रकार सामान्यधर्म से फिर विशेषधर्म में प्रविष्ट होना गृहस्थ का मुरय प्रयोजन है। सामान्यधर्म का फल प्रायः इस लोक में ही उपलब्ध होजाता है । जैसेकि-जो गृहस्थ सामान्यधर्म को पालन करने वाले हैं, उनका श्रासन सदाचारियों की पंक्ति में श्राजाता है, सभ्य पुरुप उनको ऊंची दृष्टि से देखते हैं, नाना प्रकार की पवित्र सम्मतियो के समय उनका नाम लिया जाता है और संसार पक्ष मे उन्हे योग्य पुरुप कहा जाता है। परन्तु जो विशेषधर्म है उसका परिणाम इस लोक और परलोक दोनों में सुखप्रद होजाता है। जैसेकि-इस लोक में वह पुरुप तो माननीय होता ही है, परन्तु परलोक में स्वर्ग मोक्ष के सुखों के अनुभव करने वाला होता है। क्योंकि-जव विशेषधर्म के आश्रित होगया तव उसका आत्मा पौगलिक सुख से निवृत्त होकर अात्मिक सुख की ओर मुकने लगता है । जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सूर्य के प्रकाश के सन्मुख कदापि समानता धारण नहीं कर सकता, ठीक उसी ठीक उसी प्रकार प्रकार पौद्ग- लिक सुख अात्मिक सुखों के सामने तुलना नहीं रखते । जिस प्रकार सूर्य के सन्मुख दीपक निस्तेज होजाता है, उसी प्रकार पौद्गलिक सुख अात्मिक सुखों के सामने नाम मात्र होते हैं। अतएव अात्मिक सुखों के उत्पादन के लिये विशेष धर्म की प्राप्ति अत्यन्त श्रावश्यक है । जव सुवर्ण को शुद्ध करना चाहते हो, तव सामान्य अग्नि से कार्य सिद्धि नहीं हो सकेगी, अपितु विशेष और प्रचण्ड अग्नि से कार्य-सिद्धि होगी। इसी प्रकार प्रात्म- शुद्धि के लिये विशेष क्रियाकलाप की आवश्यकता होती है । जव विशेष क्रियाओं से प्रात्म-शुद्धि हो जाती है तब आत्मा कर्मबंधन से विमुक्त हो कर निर्वाण पद की प्राप्ति कर लेता है, जिसके सिद्ध, बुद्ध, अजर, अमर, ईश्वर परमात्मा, पारंगत, अनन्तशक्ति,इत्यादि अनेक शुभ नाम प्रसिद्ध होरहे हैं। श्रतएव सामान्यधर्म को ठीक पालन करते हुए फिर विशेषधर्म की ओर मुक जाना चाहिए। ताकि आत्मा सादि अनन्त पद को प्राप्त हो सके और अन्य आत्माएं भी उस पवित्र आत्मा का अनुकरण करके उक्त पद पर आरूढ़ हों। इति श्रीजैनतत्त्वकालकाविकासे सामान्यगृहस्थधर्मस्वरूपवर्णनामिका चतुर्दा कलिका समाप्ता ।
( १८७ ) मार्ग में स्थित रक्खें और प्राणी मात्र के हित करने में उद्यत रहें । जव इस प्रकार के पवित्र श्रात्मानों से धर्म-श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होजाएगा तव शीघ्र कल्याण होजाएगा। जद मुनि वा उपासक के पास धर्म सुनने की जिज्ञासा से श्रोता उप- स्थित हो, तब वे उसकी योग्यतानुसार धर्म कथा सुनाएं । शास्त्रकारों ने चार प्रकार की विकथा वर्णन की है। जैसेकि-स्त्रीकथा, भातकथा, राजकथा और देशकथा । किन्तु इन कथाओं से अात्मिक लाभ नहीं होसकता धर्मकथा के कथन करने का मुरय प्रयोजन यही है कि-श्रोताजन को धर्म से प्रेम और संसार से निवृत्ति हो तथा उसके श्रवण करने से श्रात्मा निजस्वरूप में प्रविष्ट होजावे, मोहनीय कर्म क्षय वा क्षयोपशम भाव मे भाजावे, श्रात्मा संवेग और वैराग्य में रंगा जावे। जव श्रात्मा वैराग्य दशा में श्राजाता है, तब वह पदार्थों के तत्त्व के जानने की खोज में लगजाता है जिस से उस को सम्यक्त्व रत्न की प्राप्ति होजाती है। . "तत्त्वश्रद्धान सम्यग् दर्शनम्" तत्त्वो के ठीक स्वरूप को जानने का ही नाम सम्यग्दर्शन है। उत्तराध्ययन सूत्र के २८ वें अध्ययन में लिखा है कि- ना दंसणिस्स नाणं नाणेण विणान हुंति चरणगुणा । अगुणिस्स नत्थि मोक्खो नत्थि अमोक्खस्स निव्वाणं ।। भावार्थ-जय तक सम्यग्दर्शन नहीं होता तब तक ज्ञान भी प्राप्त नहीं होसकता । ज्ञान के विना चारित्र के गुण भी उत्पन्न नहीं होसकते अगुणी कामोक्ष नहीं है और विना मोक्ष से निर्वाणपद की प्राप्ति नही होसकती। श्रतएव सव से प्रथम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए यत्न करना चाहिए श्रमण महात्मा के प्रताप से सम्यक्त्व रत्न की प्राप्ति होजाने पर प्रत्येक भव्य आत्मा श्रावक के १२ व्रतों (नियम) के धारण करने योग्य होजाता है । जीव, अजीव, पुण्य, पाप, श्राश्रव, सम्वर, निर्जरा, बंध और मोक्ष इन नव तत्वों के स्वरूप को ठीक जानने का नाम सम्यक्त्व है तथा धर्म, अधर्म, आकाश, काल, जीव और पुद्गल जो उक्त ६ द्रव्यों के स्वरूप को भली प्रकार जानता है उसे सम्यग्दृष्टि कहा जाता है । अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-सम्यक्त्व रत्न प्राप्त होने के पीछे उस सम्यग्दृष्टि श्रात्मा के कौन २ लक्षण प्रतीत होते हैं ? जिन से जाना जाए कि इस पवित्र श्रात्मा को उक्त रत्न की प्राप्ति हो चुकी है। इस प्रश्न का उत्तर यह है जव किसी भव्य श्रात्मा को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होजाती है तब उस के अनं- तानुवंधि क्रोध, अनंतानुवंधि मान, अनंतानुवंधि माया और अनंतानुवन्धि , , ( १८६ ) जव उनके मत में श्रात्मा का ही प्रभाव माना जाता है तव पुण्य, पाप, श्राश्रव, सम्बर, बंध, मोक्ष, लोक, परलोक, जगत् और ईश्वर इत्यादि सव यातों का अभाव होजाता है, जिस कारण वे अर्थ और काम के ही उपासक होजाते है । प्रास्तिक लोगो का मुख्योद्देश्य निर्वाणपद की प्राप्ति करना है। क्योंकि उनके सिद्धान्तानुकूल उक्त तत्त्वों का अस्तिभाव सदा • बना रहता है । वास्तव में देखा जाय तो नास्तिक मत की युक्ति श्रास्तिक पक्ष की युक्ति को सहन नहीं कर सकती । इसी वास्ते आस्तिकों के चार पुरुषार्थ प्रतिपादन किये गए है । जैसे-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । जब तक वे संसारावस्था में रहते है, तब तक वे धर्म अर्थ और काम के द्वारा अपना निर्वाह करते रहते है, परन्तु जब वे संसारावस्था से पृथक् होते हैं तब वे धर्म और मोक्ष के ही उपासक बन जाते हैं। जब वे संसारावस्था में रहते है तब वे विशेषधर्म के आश्रित होजाते है । जैसेकि-चे सम्यक्त्वपूर्वक श्रावक के १२ व्रतों को निरतिचार पालन करते रहते है । यदि उन आत्माओं को विशेष समय उपलब्ध होता है, तब फिर चे श्रावक की ११ पडिमाएँ (प्रतिज्ञाएँ) धारण करलेते है जो कि-एक प्रकार से जैन-वानप्रस्थ के नियम रूप है । सम्यक्त्व के पांच अतिचार वर्णन किये गए है । सो उन दोपों से रहित होकर ही सम्यक्त्व को शुद्ध पालन करना चाहिए, जैसेकि- शंकाकाक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशसासस्तवा सम्यग्दृष्टेरतिचारा इति । (धर्मविन्दु अ ३ सू १२) वृत्ति-इह शंका कांक्षा विचिकित्सा च ज्ञानाद्याचारकथनमिति सूत्र- च्याख्या नोक्तलक्षणा एव । अन्यदृष्टीनां सर्वज्ञप्रणीतदर्शनव्यतिरिक्तानां शाक्यकपिलकणादाक्षपादादिमतवर्तिनां पाखंडिनां प्रशंसास्तयौ । तत्र "पुण्यभाज एते" सुलब्धमेपाञ्जन्म' दयालव एते, इत्यादि प्रशंसा। संस्तवश्चेह संवासजनितः परिचयः वसनभोजनदानालापादिलक्षणः परिगृह्यते न स्त- वरूपः । तथा च लोके प्रतीत एव संपूर्वः स्तोतिः परिचये ॥ असंस्तुतेपु प्रसभं भयेग्वित्यादाविवेति। ततः शंका च कांक्षा च विचिकित्सा च अन्यदृष्टिप्रशंसा- संस्तवौ चेति समासः । किमित्याह सम्यग्दृष्टेः सम्यग्दर्शनस्य अतिचारा विराधनाप्रकाराः संपद्यते शुद्धतत्त्वश्रद्धानवाधाविधायित्वादिति ॥ १२ ॥ भावार्थ-इस सूत्र मे यह कथन किया गया है कि-सम्यग्दृष्टि श्रात्मा को पांच अतिचार लगते है सो वे दूर करने चाहिएं । जैसेकि- १ शंका-जिन वाणी मे कदापि शंका उत्पन्न नहीं करनी चाहिए कारण कि-सर्वशोक्त वाणी मे असत्य का लेशमात्र भी नही होता । यदि भूगोल, खगोल, आयु तथा अवगाहन विपय आदि मे किसी प्रकार की शंका A- ( १६३ ) दो इंद्रियों वाले जिनके केवल शरीर और मुख ही होता है यथा शेख, जोक, गंडोयादि । त्रीन्द्रिय जीव, जैसे-जूं लीख, कीड़ी श्रादि । चतुरिन्द्रय जीव जैसे-मक्खी, मशक (मच्छर )श्रादि । पञ्चेन्द्रिय जीव जैसे नारकीय १ तिर्यग् २ मनुप्य और देवताः इन के स्पर्श, जिता, घ्राण,चतु और श्रोत्र ये पांचौ इन्द्रियां होती हैं। इन सब जीवों को जानकर और देख कर जो जीव निरपराध है उनके मारने का अवश्य त्याग होना चाहिए, किन्तु जो सापराध है उनके सम्बन्ध में कोई त्याग नहीं है । जैसेकि कोई दुष्ट किसी श्रावक की स्त्री से व्यभिचार करने की चेष्टा करता है अथवा उसका धन लूटने के ध्यान में लगा हुआ है या मारने के लिए कई प्रकार के उपाय सोच रहा है तो क्या वह श्रावक अपनी रक्षा के लिए उपाय न करे ? अर्थात् अवश्य करे, क्योकि यदि मौन धारण किया जाएगा तो संसार में व्यभिचार विशेष विस्तृत हो जाएगा। श्रतएव गृहस्थ को निरपराध जीवों का ही त्याग हो सकता है न कि सापराध काभी। यदि जैन धर्म के पालन करने वाला कोई राजा श्रावक के १२ व्रत धारण कर ले तो क्या वह अपराधियों को दंडित नहीं करेगा ? अवश्य करेगा। इस कथन से यह भली भांति सिद्ध हो रहा है कि-जैन-धर्म न्याय की पूर्ण । उसका मन्तव्य है कि-निरपराधी जीवो को हास्य, लोभ, धर्म, अर्थ, काम, मूढ़ता, दर्प, क्रोध, मोह, अज्ञानता इत्यादि कारणों से न मारा जाए और जोसापराध है उनको उनके कर्मानुसार शिक्षित किया जाय यह गृहस्थ का न्याय धर्म है गृहस्थ को इस प्रकार का नियम नहीं हो सकता कि वह अपराधी को भी शिक्षित न करे । यदि कोई कहे कि-जव घर के सब काम काज करने पड़ते है तथा दुकान पर अनेक प्रकार के पदार्थों का क्रय विक्रय होता है तो क्या उस समय कोई निरपराधी जीव नहीं मारा जाता ? जव उनका मरना सिद्ध है तो फिर 'निरपराधी जीव को नही मारना' यह नियम किस प्रकार पल सकता है ? इस शंका का उत्तर यह है कि-वादी ने जो उक्त प्रश्न किया है वह अक्षर २ सत्य है किन्तु जिस श्रात्मा ने अहिंसावत धारण कर लिया है उसको प्रत्येक कार्य करते समय यत्न होना चाहिए । तात्पर्य यह है कि वह विना देखे कोई भी कार्य न करे। घर के वा दुकान के यावन्मात्र कार्य हैं वह विना देखे न करने चाहिए और नाही खाने योग्य पदार्थ विना देखे खाने चाहिएं एवं यावन्मात्र गृह सम्बन्धी कार्य हैं उनको विना यत्न कभी न करनाचाहिए । यदि फिर भी जीव-हिंसाहोजाय तोश्रावक के त्याग में दोष नही है। क्योकि उसने पहिले ही इस बात की प्रतिज्ञा करती है कि-जान कर देख कर वामारने कासंकल्प कर निरपराधीजीव को नहीं मारूंगा । शास्त्र में लिखा है जैसेकि- है ( १६५ ) क्योंकि उनके संकल्प उसको शिक्षित करने के ही होते हैं नतु मारने के। एवं कोई वैद्य या डाक्टर किसी रोगी के अंगोपांग छेदन करता हो तो उसके बत में दोप नहीं है। क्योंकि उसके भाव उस रोगी को रोग से विमुक्त करने के हैं नतु मारने के । ऐसे अनेक दृष्टान्त विद्यमान है, जिनका सारांश भावों पर अवलम्बित है । सो गृहस्थ ने जो जानकर, देखकर वा संकल्प कर निरपराधी जीव के मारने का परित्याग किया हुश्रा है, वह अपने नियम को विवेक तथा सावधानता पूर्वक सुख से पालन कर सकता है । हां यह बात अवश्य मान- नी पड़ेगी कि उक्त नियम वाले गृहस्थ को प्रत्येक कार्य करते समय विवेक और यत्न रखना होगा। इस नियम को शुद्ध पालन करने के लिये श्रीभगवान् ने इस व्रत के पांच अतिचार प्रतिपादन किए है । जैसेकि- तयाणन्तरं चणं थूलगस्स पाणाइवाय वेरमणस्स समणोवासए णं पञ्च अड्यारा पेयाला जाणियव्वा न समायरियव्या तंजहा-पंधे वहे छविच्छेए अइ- भारे भत्तपाणवोछए ॥१॥ उपासकदशाङ्गसूत्र अ० १॥) भावार्थ-जव श्रमणोपासक सम्यक्त्व रत्न के पांच मुख्य अतिचारों को सम्यक्तया दूर कर दे तव उसको चाहिए कि स्थूल प्राणातिपात वेरमण जो प्रथम अनुव्रत धारण किया हुआ है, उसके भी पांच अतिचार समझे किन्तु उन पर आचरण न करे। क्योंकि-आचरण करने से उक्त नियम भंग होजाता है। वे अतिचार निम्न प्रकार वर्णन किये गये है । जैसे- वन्धअतिचार-पशु वा मनुष्यादि को निर्दयता से बांधने को वन्धअति- चार कहते हैं । उस कापाचरण करने से पशुश्रादि को परम दुःख पूर्वक समय व्यतीत करना पड़ता है और वान्धने वाले का प्रथम व्रतभंग हो जाता है। अतः यदि किसी कारण से किसी जीव को वांधनाभी पड़ जाय तो उसको कठिन बंधनों से न बांधना चाहिये । जैसे कि व्यवहार पक्ष में गो, वृपभ, अश्व, गज आदि पशु चांधने पड़ते है, परन्तु बंधन करते समय कठिन बंधन का अवश्यमेव ध्यान रखना चाहिये । ताकि ऐसा न हो इस अनाथ पशु श्रादि के प्राण ही । १ इह सलु प्राणदाइ समणे भगवं महावीरे पाणदं समणोवासग एव वयासी--एव खलु प्राणदा ! समणोवासए ण अभिगयजीवाजविण जावअणइकमणिज्जेगा सम्मत्तस्स पंच अइयारा पैयाला जाणियन्वा न समायरियन्वा तंजहा- सङ्का कड्सा विगिच्छा परपासडपसमा परपासंडसर्थवे ॥ यह पाठ उपासकदशाङ्गसूत्र के प्रथम अध्ययन मे आता है । इसके आगे व्रतो के अतिचारो का वर्णन कियागया है। इस सूत्र का अर्थ प्राग्वत् ही है ॥
है ( १६७ ) उनकी यथोचित रक्षा न करना ये क्रियाएं है इन से प्रथम व्रत में दोष लगता । अतएव उन पांचों प्रधान दोपों से रहित प्रथम अनुव्रत का पालन करना चाहिए। थूलाओ मुसावाआयो वेरमणं ठाणागसू-स्थान ५ उद्देश ॥ १ ॥ जय प्रथम अनुव्रत का पालन किया जाए फिर द्वितीय अनुव्रत को शुद्धतापूर्वक पालन करना चाहिए । कारणकि-सत्यव्रत सर्व व्रतों में परम प्रधान है, आत्मविशुद्धि का परमोत्कृष्ट मार्ग है, लोक में प्रत्येक गुण काभाजन है । परन्तु सत्यवत के भी दो भेद है, जैसेकि-द्रव्यसत्य और भावसत्य । दृढ़ प्रतिज्ञा का ही नाम द्रव्य सत्य है, और जो पद् द्रव्यों के गुण पर्यायों को भली भांति जानना है तथा उन्ही पर्यायों के अनुसार सत्य भाषण करना है उसे भावसत्य कहाजाता है। अतएव भाव सत्य के लिए ज्ञानाभ्यास वा शास्त्रश्रवण का अभ्यास अवश्यमेव करना चाहिए । सो श्रावक के सम्यक्त्व बत के होजाने से भावसत्य तो होता ही है, परन्तु द्रव्यसत्य के लिये शास्त्र- कार ने स्थूल शब्द दे दिया है । क्योंकि-गृहस्थावास में रहते हुए गृहस्थ से सर्वथा मृपावाद का त्याग तो हो ही नहीं सकता । अतएव वह स्थूल मृषा- वाद का तो त्याग अवश्य कर दे । जैसेकि- १ कन्यालीक-कन्याओं के लिये असत्य भापण न करे। २ गवालीक-गौ श्रादि पशु वर्ग के लिये असत्य न बोले। ३ भूम्यलीक-भूमि के लिये असत्य का भापण न करे। ४ न्यासापहार-किसी ने विश्वास-पात्र पुरुप जान कर विना साक्षियो के वा विनालिखत किये वस्तु को धरोहर रख दिया जब उसने वह वस्तु मांगी तो कह देना कि-मुझे तो उक्त पदार्थ की खबर ही नहीं है, न मैने उस पदार्थ को देखा है इत्यादि बातें करना । ५ कूटसाक्षी-असत्य साक्षी देना इत्यादि अनेक भेद स्थूल मृपावाद के है।सोदूसरे अनुव्रत के पालन करने वाला उक्त प्रकार के असत्य भापणो का परित्याग कर दे। फिर इस व्रत की शुद्धि के पांच अतिचारो (दोपो) का भी परिहार करदे । जैसेकि- तयाणन्तरं चणं थूलगस्स मुसावाय वेरमणस्स पञ्च अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा-सहसाअभक्खाणे रहसाअभक्खाणे सदारमंत- भेए मोसोवएसे कूडलेह करणे । उपासकदशाग सू अ. ॥१॥ भावार्थ-जब प्रथम अनुव्रत का स्वरूप अवगत हो जावे तव द्वितीय .
दिखाया । सो भाव चोरी उसका नाम है जो निज गुण से वाहिर के पुद्ग- लादि पदार्थ है उनके परित्याग होने के परिणाम होने है । इसके अतिरि- क्त शास्त्रकार ने द्रव्य चोरी की रक्षा के वास्ते पांच अतिचार प्रतिपादन किये है जो गृहस्थधर्म के पालने वाले व्यक्ति को कदापि प्रासेवन न करने चाहिएं। जैसेकि-- तयाणन्तरं चणं थूलगस्स अदिएणादाण वेरमणस्स पंच अइयारा जाणियव्या न समायरियव्या तंजहा -तेणाहडे तकरप्पोगे विरुद्धरजाइक्कमे कूडतुलकूडमाणे तप्पडिरूवगववहारे ॥३॥ भावार्थ-द्वितीय अणुव्रत के पश्चात् तृतीय अणुव्रत का वर्णन किया जाता है। जो कि-स्थूल अदत्तादानत्यागरूप व्रत है। उसके भी पांच अति- चार वर्णन किये गए है जो कि-जानने योग्य तो है परन्तु प्रासेवन करने योग्य नहीं है। जैसेकि- १ स्तेनाहत-लालच के वश होते हुए चोरी का बहुमूल्य पदार्थ अल्प मूल्य में लेना । परन्तु जब वहुमूल्य वाले पदार्थ को अल्प मूल्य में लिया जायगा तो अवश्यमेव संदेह होसकता है कि यह पदार्थ चोरी का है जिससे चोरों की जो दशा होती है जिसे लोग भली भांति जानते हैं, वही उसकी होती है। क्योंकि-चोरी का माल लेने वाला भी एक प्रकार का चोर है। २ तस्करप्रयोगातिचार-चोरों को प्रेरित करना कि-तुम आजकल व्यर्थ कालक्षेप क्यों कर रहे हो ? चोरी करो, तुम्हारी चोरी का माल हम विक्रय कर देंगे । इस प्रकार करने से तृतीय अणुव्रत में दोप लगता है। ३ विरुद्धराज्यातिकम-राजा की आज्ञा का पालन न करना । जैसे कि-राजा की आशा हुई कि-अमुक राजा के देश से व्यापार मत करो, परन्तु उसकी आज्ञा पर न रह कर उस देश से व्यापार करते रहना । सो जो राजा न्याय से राज्य शासन कर रहा है उसकी आज्ञा का उलंघन कर देना यह भी उक्त व्रत मे दोष का कारण ४ कूटतुलाकूटमानातिचार-तोलने और मापने मे न्यूनाधिक करना। क्योंकि इस प्रकार करने से व्यापार का नाश होजाता है। यदि यह विचार किया जाए कि--इस प्रकार से लक्ष्मी की वृद्धि होजाएगी तो यह विचार अतिनिकृष्ट है, क्योंकि लक्ष्मी की स्थिति न्याय से होती है नतु अन्याय से । अतएव धर्म और व्यापार की शुद्धि रखने के लिये व्यापारी वर्ग को उक्त दोप पर अवश्य विचार करना चाहिए। ५-तत्प्रतिरूपकव्यवहार-शुद्ध वस्तु मे उसके सदृश वा उसके असदृश वस्तु मिला कर वेचना । जैसेकि दुग्ध मे जल, केशर मे कसुवा, घृत ( २०१ ) है, । १ इत्वरकालपरिगृहीतागमन कामबुद्धि के वशीभूत होकर अगर इस प्रकार विचार करो कि मेरा तो केवल पर स्त्री के गमन करने का ही त्याग है इसलिये किसी स्त्री को विशेष लोभ देकर कुछ समय के लिये अपनी स्त्री बना कर रख लूं तो क्या दोप है ? तो उसका यह विचार सर्वथा अयुक्त क्योंकि इस प्रकार करने से वह स्वदारासंतोपत्रतअतिचार रूप दोष से कलंकित होजाता है। कतिपय प्राचार्य इस सूत्र का अर्थ इस प्रकार से भी करते है कि-यदि लघु अवस्था में ही विवाह संस्कार होगया हो तो यावत्काल पर्यन्त उस स्त्री की अवस्था उपयुक्त न होगई होतावत्कालपर्यन्त उसके साथ समागम नहीं करना चाहिए, नहीं तो व्रत कलंकित होजाता है। २ अपरिगृहीतागमन-जिस का विवाह संस्कार नहीं हुश्रा जैसे वेश्या, कुमारी कन्या, तथा अनाथ कन्या इत्यादि।उनके साथ गमन करते समय अगर विचार किया जाय कि-मेरा तो केवल परस्त्री के संग करने का नियम परन्तु ये तो किसी की भी स्त्री नहीं है। इसलिए इनके साथ गमन करने से दोष नहीं तो उसका यह विचार युक्त है। क्योंकि इस प्रकार के कुतर्क से उक्त व्रत को कलंकित किया जाता है । कतिपय प्राचार्य इस प्रकार से भी उक्त सूत्र का अर्थ करते है कि यदि किसी कन्या के साथ मंगनी होगई हो परन्तु विवाह संस्कार नहीं हुआ हो, और उसी कन्या का किसी एकान्त स्थान मे मिलना होगया हो तो भावी स्त्री जान कर यदि संग किया जाएगा तब भी उन नियम भंग हो जाता है। ३ अनंगक्रीड़ा-काम की वासना के वशीभूत होकर परस्त्री के साथ कामजन्य उपहास्यादि क्रियाएँ करनी तथा काम जागृत करने की आशा पर पर-स्त्री के शरीर को स्पर्श करना वा अन्य प्रकार से कुचेष्टाएँ करनी ये सब क्रियाएँ उक्त व्रत को मलीमस करने वाली मानी जाती हैं। अतः इनका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए । ४ परविवाहकरण-अपने सम्बन्धियों को छोड़ कर पुण्य प्रकृति जान कर वा लोभ के वशीभूत होकर परविवाह करने के लिए सदैव उद्यत रहना यह भी उक्त व्रत के लिये अतिचार रूप दोष है। क्योंकि-मैथुन प्रवृत्ति करना पुण्य रूप नहीं हुआ करता। वृत्ति मे भी लिखा है -"परविवाहकरणे''ति-परेपाम् श्रात्मन श्रात्मीयापत्येभ्यश्च व्यतिरिक्ताना विवाहकरण परविवाहकरणम् । अयमभिप्राय -स्वदार- मतोषिणो हि न युक्त परेषा विवाहादिकरणेन मैथुननियोगोऽनर्थको विशिष्टविरतियुक्तत्वादित्येव- भनाफलयतः परार्थकरणोद्यततया अतिचारोऽयमिति"- इसका अर्थ प्राग्वत् है । तथा कोई २ प्राचार्य इस सूत्र का अर्थ यह भी करते है कि-यदि किसी कन्या का सम्बन्ध विवाह संस्कार से पूर्व ही किसी अन्य पुरुष के साथ होगया है, , ( २०३ ) रत्न उपलब्ध होजाता है जिस के कारण से वह सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करसकता है । सो धन, धान्य, क्षेत्र,वाहन, गृह, दास, दासी आदि का यावन्मात्र परिमाण किया गया हो उस को फिर उसी प्रकार पालन करना चाहिए । क्योंकि इस अणुव्रत के भी पांच ही अतिचार रूप दोष वर्णन किये गए हैं जैसेकि- तयाणन्तरं चणं इच्छापरिमाणस्स समणोवासएणं पञ्च अइयारा जाणि- यव्वा न समायरियव्वा तंजहा खेत्तवत्थुपमाणाइक्कमे हिरएण सुवरण पमा- णाइकमे दुपयचउप्पय पमाणाइक्कमे धणधान्नपमाणाइक्कमे कुवियपमाणा- इक्कमे ॥ भावार्थ-चतुर्थ अणुव्रत के पश्चात् श्रमणोपासक को इच्छा परिमाण अनुव्रत के पांच अतिचार जानने चाहिएं किन्तु उन पर आचरण न करना चाहिए जैसेकि- १ क्षेत्रवास्तुकप्रमाणातिकम-क्षेत्र (भूमि) वा गृहादि का यावन्मात्र परिमाण किया गया हो जैसेकि-इयान्मात्र हलों की भूमि का मै परिमाण करता है तथा पारामादि का परिमाण करता हूं। इसी प्रकार हट्ट हवेली श्रादि का परिमाण करता हूं सो यावन्मात्र परिमाण किया हुआ हो उसे अतिक्रम न करना चाहिए। यदि वह परिमाण उल्लंघन किया जायगा तव उक्त अणुव्रत मे अतिचार रूप दोप लग जायगा अतएव परिमाण करते समय सर्व प्रकार से विचार लेना चाहिए जिस से फिर व्रत में दोप न लग जावे । २ हिरण्य सुवर्णप्रमाणातिक्रम-घटित और अघटित चॉदी और सुवर्ण का यावन्मात्र परिमाण किया गयाहो उस परिमाण को अतिक्रम न करना चाहिए । जव उक्त पदार्थ परिमाण से अधिक बढ़ जाएँ तब लोभ के वशीभूत होकर इस प्रकार का विचार उत्पन्न नहीं करना चाहिए कि-यह पदार्थ पुत्र की निधाय है, यह पदार्थ धर्मपत्नी की निश्राय किया गया है तथा यह पदार्थ जव पुत्र उत्पन्न होगा उसके जन्मोत्सव में लगा दिया जायगा । इन संकल्पो से उक्त व्रत दूषित होजाता । अतएव जिस प्रकार उक्त पदार्थों का परिमाण हुश्रा है उस परिमाण को उसी प्रकार पालन करना चाहिए यदि उक्त प्रकार पालन नहीं किया जायेगा तो उक्त व्रत मलिन होजायगा। ३ धनधान्य प्रमाणातिक्रम-यावन्मात्र धन और धान्यादि (अनाज) का परिमाण किया गया हो उसको अतिक्रम कर देना उक्त व्रत मे दोप का कारण है । अतएव उक्त परिमाण विधिपूर्वक पालन करना चाहिए । धन श्रादि की वृद्धि हो जाने पर कुतकों द्वारा व्रत को मलिन न करना चाहिए । जैसेकि-परिमाण मैं ने किया है इसलिये पदार्थ को मैं अपनी स्वाधीनता में है किया । । ( २०५ ) वा तंजहा-उबृदिसिपमाणाइक्कमे अहोदिसिपमाणाइक्कमे तिरिय दिसि पमाणाइक्कमे खत्तवुड्ढी सइअन्तरद्धा ॥ भावार्थ-पंचम अणुव्रत के पश्चात् छठे दिग्बत के पांच अतिचार जानने चाहिएं परन्तु पाचरण न करना चाहिए । जैसेकि- १ उर्ध्वदिशापरिमाणातिकमातिचार-यावन्मात्र ऊर्ध्व दिशामें जाने का परिमाण किया गया हो उसको अतिक्रम करना प्रथम अतिचार है। २ अधोदिग्परिमाणातिक्रम अतिचार-नीची दिशा में यावन्मात्र जाने का परिमाण किया गया हो, उस परिमाण को अतिक्रम करना इस व्रत का दूसरा अतिचार है। ३ तिर्यक् दिग् परिमाणातिकम अतिचार-यावन्मात्र तिर्यग् दिशा में गमन करने का परिमाण किया हो । जैसेकि-अपने नगर से चारों ओर हजार २योजन वा कोस तक जानेका परिमाण कर लिया हो परन्तु.फिर उस परि- माण का अतिक्रम फर जाना इस व्रत का तीसरा अतिचार है। ४ क्षेत्र वृद्धि-यावन्मात्र परिमाण किया गया हो उस परिमाण में पर- स्पर न्यूनाधिक कर लेना । जैसेकि-पूर्व दिशा में जाने का सौयोजन का परिमाण ‘किया गया हो और सौ ही योजन पश्चिम दिशा में जाने का परिमाण हो परन्तु पूर्व दिशा में विशेष काम जानकर उस के ड्योढ़े योजन कर लेने और 'पश्चिम में पच्चास ही योजन रख लेने । इस प्रकार करने से उक्त व्रत में दोप 'लगता है। क्योंकि यह एक प्रकार का कुतर्क है । ५ स्मृति अन्तर्धान अतिचार-यदि गमन करते समय स्मृति विस्मृत हो जाए और उस शंका मे श्रागे चला जावे तव भी उक्त व्रत मे दोप लगता है । क्योंकि स्मृति के विस्मृत होजाने पर भी आगे चलते जाना व्रत को मलिन करता है । अतएव उक्त पांचो दोपो के परिहार पूर्वक इस गुण- बत को शुद्धतापूर्वक पालन करना चाहिए। उपभोगपरिभोगगुणवत-इसगुणव्रत मे खान पान और व्यापारादि का वर्णन किया गया है। जहां तक वन पड़े गृहस्थ कोयोग्य है कि वह इस प्रकारका भोजन न करे जो सचित्त और बहु हिंसास्पद हो । क्योंकि-भोजन करने का वास्तव में यह उद्देश है कि-शरीर रहे । सो शरीर को भाटक देना तो एक प्रकार का सुयोग्य कर्तव्य है किन्तु शरीर का सेवक वन जाना और उसके लिए नाना प्रकार के पापोपार्जन करने तथा स्वादु पदार्थों का ही अन्वेपण करते रहना यह कदापि प्रशंसनीय नही है । अतएव प्रथम मद्य और मांस का सर्व- था परित्याग कर देना चाहिए क्योकि-मद्य और मांस के सेवन से प्रायः , 1 ।
- ( २०७ ) २ द्रव्यनियम-अपने मुस में अपनी अंगुली के विना यावन्मात्र पदार्थ खाने में आते हैं, उनकी द्रव्य संज्ञा है, सो इस बात का नित्यप्रति परिमाण कर लेना चाहिए कि-श्राज में इतने गव्य श्रासेवन करूंगा । जैसे कि-मूंग की दाल-एक द्रव्य, गेहूं की रोटी-दोद्रव्य, पानी-तीन द्रव्य । इसी प्रकार अनेक द्रव्यों की कल्पना कर लेनी चाहिए । परन्तु इस विषय मे दो प्रकार से परिमाण किया जाता है जैसे कि-एक तो सामान्यतया और दूसरे विशेषतया । यदि सामान्यतया परिमाण करना हो तो मूंग की दाल, उड़द की दाल, हरहर की दाल इत्यादि सर्व प्रकार की दालें एक द्रव्य मे. गिनी जायेंगी और विशेषतया परिमाण करना हो तो दालों के जितने नाम हैं ता- चन्मान ही द्रव्य गिने जायेंगे। इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्यों के विषय जानना । सो द्रव्यपरिमाण बांधते समय सामान्य विशेष का अवश्य ध्यान रखना चाहिए । इस नियम से तृष्णा का निरोध और संतोषवृत्ति की प्राप्ति होती है। साथ ही "परिणामान्तरापत द्रव्यमुन्यते' इस वाक्य का अर्थ जान लेना चाहिए अर्थात् द्रव्य उसको कहते है जो अपने परिणाम से अन्य परिणाम मे परिणत होगया हो। ३ विगयनियम-जो पदार्थ विकृत रूप से उत्पन्न हुआ है वह विगय कहलाता है। वह विगय नव है जैसे मद्य १ मांस २ मदिरा ३ नवनीत 2 दुग्ध ५ दही ६ घृत ७ तेल = गुड़ है । जिनमें गृहस्थ के लिये मद्य और मांस का तो सर्वथा त्याग होता ही है, परन्तु शेष विगयों का परिमाण अव- श्यमेव होना चाहिए। अतएव गृहस्थ को उचित है कि-शेप विगयो का नित्यं- प्रति परिमाण करता रहे। ४ उपानहनियम-जोड़ापगरखा--बूट आदि पदार्थ जो पात्रों के वेटन के काम पाते हैं उनका परिमाण करना चाहिए। यदि शक्ति हो तो सर्वथा ही धारण न करने का नियम करदे क्योकि ये सब आडम्बर जीवहिसा के कारणभूत है परन्तु यदि संसार मे रहते हुए उक्त क्रियाओं का परित्याग न होसके तो उनका परिमाण अवश्यमेव होना चाहिए । ५ तांबूलपरिमाण-जो पदार्थ मुख शुद्धि के लिये ग्रहण किये जाते है । जैसेकि-पान, सुपारी, लवंग, इलायची श्रादि। उनका परिमाण करना चाहिए। ६ वस्त्रविधिपरिमाण-वस्त्रो के धारण करने की संख्या नियत करनी चाहिए । जैसेकि-श्राज और इतनी संख्या मे पहनूंगा । अमुक २ वस्त्र पहरूंगा २ स्वदेशी वा विदेशी वस्त्र तथा कार्यास के इस प्रकार वस्त्रविधि में सर्व जाति के वस्त्रों का परिमाण होना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रहे कि- जिस वस्त्र में हिंसादिकृत्यो की विशेष संभावना हो वह वस्त्र त्याग देना चाहिए। ७ पुष्पविधि परिमाण-अपने भोगने के लिये पुष्पो का परिमाण करना .
-- ( २०६ ) माण करने की अत्यन्त आवश्यकता है। क्योंकि-परिमाण करने के पश्चात् आत्मा संतोप वृत्ति में श्राजाता है। यदि उक्त पदार्थों का सविस्तार स्वरूप देखना हो तो उपासकदशाङ्ग सून के प्रथमाध्याय और श्रावश्यक सूत्र का चतुर्थाध्याय को देखना चाहिए। उक्त दोनों सूत्रों मे "दंतणविहि" सूत्र से लेकर २६ अंकवर्णन किये गए हैं श्रर्थात् दांतून करने का परिमाण करे । जैसेकि-अमुक वृक्ष की दांतून करूंगा। उक्त सूत्र के पठन करने से यह भली भांति सिद्ध होजाता है कि- श्रावकवर्ग को प्रत्येक वस्तु का परिमाण करना चाहिए । किन्तु जो मांस और मद्य इत्यादि अभक्ष्य पदार्थ है उनका सर्वथा ही त्याग किया जाता है भोजन विधि का परिमाण करने के पश्चात् फिर १५ पंचदश कर्मा- दान-पाप कर्मों का परित्याग कर देना चाहिए जैसेकि कम्मो य समणोवासएणं पणदसकम्मादाणाई जाणियव्वाई न समायरियव्वाइं तंजहा इङ्गालकम्मे वणकम्मे साडीकम्मे भाडीकम्मे फोडी- कम्मे दंतवाणिजे लक्खवाणिजे रसवाणिजे विसवाणिज्जे केसवाणिजे जंतपीलणकम्मे निल्लञ्छणकम्मे दवग्गिदावणया सरदहतलावसोसण्या असईजणपोसणया। उपासकदशामसूत्र अ. १॥ भावार्थ-शास्त्रकारने १५ व्यापार इस प्रकार के वर्णन किये है, जिनके करने से हिंसा विशेष होती है। इसी वास्ते उन कर्मों के उत्पत्ति कारण को जानना तो योग्य है, परन्तु वे कर्म ग्रहण न करने चाहिएं। क्योकि जो धावक प्रास्तिक और निर्वाणगमन की अभिलापा रखता है उसको बहिंसक व्यापारी से पृथक् ही रहना चाहिए और जहाँ तक बन पड़े आर्य व्यापारी से ही अपने निर्वाह करने का उपाय सोचना चाहिए। यदि किसी कारण वश आर्य व्यापार उपलब्ध न होते हों तब वह दासकर्म आदि कृत्यो से तो अपना निर्वाह करले परन्तु मद्य और मांसादि अनार्य व्यापार कदापिन करे अय पंचदश कर्मादानो का नीचे संक्षेप से स्वरूप दिखलाते हैं। जैसेकि- १ अंगारकर्म-यावन्मात्र अग्नि के प्रयोग से व्यापार किये जाते हैं वे सब अंगारकर्म में ही ग्रहण किये जाते हैं। जैसे-कोयले का व्यापार, ईटो का पकाना. लुहार का काम , हलवाई का काम, धातु का काम इत्यादि । जो अपने वास्ते श्रावक कोअग्नि का प्रयोग करना पड़ता है उसका उसको परित्याग नहीं है। जैसेकि-भोजनादि के वास्ते अग्नि का श्रारंभ करना पड़ता है तथा -- ( २११ ) - । की जाती है अतएव श्रावक को उक्त प्रकार का वाणिज्य न करना चाहिए। पांच प्रकार के सामान्य कर्म प्रतिपादन किये गए है जैसेकि- ११ यंत्रपीडनकर्म-यंत्र (मशीन) द्वारा तिल और इच श्रादि का पीडना यह भी हिंसा का निमित्त कारण है। १२ निर्लाञ्छनकर्म-वृषभ आदि का नपुंसक (खस्सी) करना। १३ दावाग्निदानकर्म-वन को आग लगा देना। जैसेकि-कोई व्यक्ति जो धर्म से अनभिज्ञ हो उसके मन में यह संकल्प उत्पन्न हो जाता है कि-यदि मैं वन को अग्नि लगा दूंगा तव इस वन में नूतन घास उत्पन्न होजायगी जिससे प्रायः पशुवर्ग को बड़ा सुख प्राप्त होजायगा अतएव वन को अग्नि लगाना एक प्रकार का धर्मकृत्य है। परन्तु जो उस अग्नि द्वारा असंख्य जीवों का नाश होना है उस का उस को सर्वथा वोध नही है । अतएव यह कर्म भी न करना चाहिए। १४ सरोह्रदतडागपरिशोपणताकर्म-स्वभाव से जो जल भूमि से उत्पन्न होजाये उसे सर कहते हैं। नद्यादि का निम्नतर जो प्रदेश होता है. उस का नाम ह्रद है तथा जो जल भूमि-खनन से उत्पन्न किया गया हो उसका नाम तड़ाग है । उपलक्षण से यावन्मात्र कूपादि जलाशय है उन को अपने गोधूमा- दिखेतों को वपने के वास्ते सुखा देवे तथा अन्य किसी कारण को मुख्य रख कर जलाशयों को शुष्क करदेवे तो महाहिंसा होने की संभावना की जाती है। जैसेकि एक तो पानी के रहने वाले जीवों का विनाश दूसरे जो जल के श्राश्रय निर्वाह करने वाले जीव है उनका नाश । श्रतएव यह कर्म भी गृहस्थो को परित्याग करने योग्य है। १५ असतीजनपोषणताकर्म-हिंसा के भाव रख कर हिंसक जीवो की पालना करनी ।जैसेकि-शिकार के लिये कुत्ते पालने, मूपकों के मारने के लिये मार्जार की पालना तथा किसी अनाथ कन्या की वेश्या वृत्ति के लिये पालना करनी इत्यादि । इसी प्रकार हिंसक जीवों के साथ व्यापार करना, क्योंकि- उनके साथ व्यापार करने से हिसक कर्मों की विशेप वृद्धि होजाती है। इस कर्म में व्यापार सम्बन्धी उक्त क्रियाश्रो के करने का निषेध किया गया है, अनुकंपा के वास्ते नही । सो विवेकशील गृहस्थो को योग्य है कि-वे उक्त पंचदश कर्मा- दानों का परित्याग करदें । फिर उपभोग परिभोगगुणव्रत के पांच अतिचार भी छोड़दे । जो निम्नलिखितानुसार हैं। तत्थणं भोयणो समणोवासएणं पंचअइयारा जाणियव्या न समायरियव्या तंजहा-सचित्ताहारे सचित्तपदिवद्धहारे अप्पउलियो , ।
( २१३ ) स्वच्छ और सुखप्रद है, उसी मार्ग के समीप वनस्पति तथा घास से युक्त दूसरा उपमार्ग हो तो फिर वह गृहस्थ क्यों उस राजमार्ग को छोड़ कर उप- मार्ग में चलने लग पड़े ? कदापि नही । बस इसी का नाम अनर्थदंड है, क्योंकि उपमार्ग पर चलने से जो वनस्पतिकाय श्रादि जीवो की हिंसा हुई है यह हिंसा अनर्थ रूप ही है। इसी प्रकार अन्य विपयों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए। शास्त्रकार महर्पियो ने अनर्थदंड के मुख्यतया चार भेद प्रतिपादन किये हैं, जैसेकि-अपध्यान १ पापोपदेश २ हिंसाप्रदान ३ प्रमादाचरित ४ १ अपध्यान अनर्थदंड-बार्तध्यान और रौद्रध्यान न करना चाहिए क्योकि जब सुख वा दुःख कर्माधान माना जाता है तो फिर फल की असिद्धि में चिंता वा शोक क्यों? क्योंकि-जो कर्म बांधा गया है उस कर्म ने अवश्यमेव उदय होकर फल देना है । सो इस प्रकार की भावनाओं से चिंता चा रौद्रध्यान दूर कर देना चाहिए । २ पापोपदेश-अपने से भिन्न अन्य प्राणियों को पापकर्म का उपदेश करना । जैसे कि तुम अमुक हिंसक कर्म अमुक रीति से करो। ३ हिंसाप्रदान अनर्थदण्ड-जिन पदार्थों के देने से हिसक क्रियानों की निप्पत्ति होवे उन पदार्थों का दान करना, यह अनर्थदण्ड है । जैसेकि- शस्त्र और अस्त्रों का दान करना तथा मूशल वा वाहन अथवा यानादि पदार्थों का दान करना। ४ प्रमादाचरण अनर्थदण्ड-धर्म क्रियाओ के करने में तो आलस्य किया जाता है, परन्तु नृत्यकलादि के देखने में आलस्य का नाम मात्र भी नहीं इस का नाम प्रमादाचरण अनर्थ दण्ड है तथा यावन्मात्र धर्म से प्रतिकूल क्रियाएं है जिन से संसार चक्र में विशेष परिभ्रमण होता हो उसी का नाम प्रमादाचरण है । शब्द, रूप, गंध, रस, और स्पर्श इन के भोगने की अत्यन्त इच्छा और उन के (भोगने के लिये ही पुरुषार्थ करते रहना उसे प्रमादा- चरण दण्ड कहते है। इस गुण व्रत की रक्षा के लिये शास्त्रकारो ने पांच अतिचार प्रतिपा- दन किये है जैसेकि- तयाणान्तरं चणं अणट्ठादण्ड वेरमणस्स समणोवासएणं पंच- इयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा-कंदप्पे कुक्काइए मोहरिए संजुत्ता- हिंगरणे उपभोग परिभोगाइरित्ते ॥८॥ भावार्थ-सातवे उपभोग और परिभोग गुणवत के पश्चात् आठच ।
( २१५ )
'सम' भाव रखने से श्रात्मा को शान दर्शन और चारित्र का सम्यग्रतया 'श्राय'
लाभ होजायगा। जिस समय श्रात्मा सम्यगज्ञानदर्शन और चारित्र से 'इकरा'
पक रूप होकर ठहरेगा उस समय को विद्वान् 'सामायिक' काल कहते हैं ।
सो जबतक आत्मा को सामायिक के समय की प्राप्ति पूर्णतया नहीं होती तव
तक श्रात्मा निजानन्द का अनुभव भी नहीं कर सकता । सो निजानन्द को
प्रकट करने के लिये, समतारस का पान करने के लिये, अात्मविशुद्धि के लिये,
दैनिक चर्या के निरीक्षण के लिये, अात्मविकाश (स) के लिये प्रत्येक श्रावक
को दोनों समय सामायिक अवश्यमेव करनी चाहिए । सामायिक व्रत करने के
चास्ते चार विशुद्धियों का करना अत्यन्त आवश्यक है । जैसेकि-
१ द्रव्यशुद्ध-सामायिक द्रव्य (उपकरण) जैसे श्रासन, रजोहरणी, मुख
पत्रिका तथा अन्य शरीर वस्त्र शुद्ध और पवित्र होने चाहिएं । जहां तक
चन पड़े सामायिक का उपकरण सांसारिक क्रियाओं मे नही वर्तना चाहिए ।
२क्षेत्रशुद्धि-सामायिक करने का स्थान स्वच्छ और शांतिप्रदान करने
चाला हो । स्त्री पशु वा नपुंसक से युक्त तथा मन के भावों को विकृत करने
वाला न होना चाहिए। जिस स्थान पर कोलाहल होता हो और बहुतसे
लोगों का गमनागमन होता हो उस स्थान पर समाधि के योग स्थिर नहीं रह
सकते । श्रतएव सामायिक करने वालो के लिये क्षेत्रशुद्धि की अत्यन्त
श्रावश्यकता है।
३ कालशुद्धि-यद्यपि सामायिक व्रत प्रत्येक समय किया जा सकता
नथापि शास्त्रकारी तथा पूर्वाचार्यों ने दो समय आवश्यकीय प्रतिपादन किये है
लेकि-प्रातःकाल और सायंकाल । सो दोनो समय कम से कम दो दोघटिका
प्रमाण सामायिक व्रत अवश्यमेव करना चाहिए। क्योंकि-जो क्रियाएँ नियत
समय पर की जाती हैं, वे बहुत फलप्रद होती है।
४ भावशुद्धि-सामायिक करने के भाव अत्यन्त शुद्ध होने चाहिएं।
इस कथन का सारांश इतना ही है कि-लज्जा वा भय से सामायिक व्रत धारण
किया
মুম্বা
विशेष फलप्रद नहीं हुआ करता। अतः शुद्ध भावो से प्रेरित होकर
सामायिक व्रत धारण करना चाहिए।
उपरोक्त सामायिक व्रत के भी पांच अतिचार है, जिनका जानना तो
आवश्यक है किन्तु उन पर आचरण नहीं करना चाहिए यथा-
तयाणन्तरं चणं सामाइयस्स समणोवासएणं पश्चअइयारा जाणियव्या
न समायरियव्या तंजहा-मणदुप्पणिहाणे वयदुप्पणिहाणे कायदुप्पणिहाणे
सामाझ्यस्स सइ अकरणया सामाझ्यस्स अणवठियस्स करणया ॥३॥
. ( २१७ ) व्रत का मुख्योद्देश्य इच्छा का निरोध करना ही है। क्योंकि-इच्छाओं के निरोध से ही धात्मिक शॉति उपलब्ध हो सकती है। देशावकाशिक व्रत धारण कर लेने के पश्चात् श्रावक को इस व्रत के भी पांच अतिचार छोड़ने चाहिएं जैसेकि- तयाणन्तरं चणं देसावगासियस्स समणोवासएणं पञ्चअइयारा जाणियब्वा न समायरियव्या-तंजहा-आणवणप्पओगे पेसवणप्पओगे सद्दा- णुवाए रूवाणुवाए वहियापोग्गलपक्खेवे ॥१०॥ उपासरुदशामसूत्र अ०॥1॥ १श्रानयनप्रयोग आवश्यकीय काम पड़ जाने पर परिमाण से वाहिर भूमि से किसी पदार्थ का किसी के द्वारा मंगवाना, यह देशावकाशिक व्रत का प्रथम अतिचार है। क्योंकि-क्षेत्र का परिमाण हो जाने पर फिर परिमाण से वाहिर क्षेत्र से वस्तु का मंगवाना योग्य नहीं है। २ प्रेप्यप्रयोग-जिस प्रकार वाहिर के क्षेत्र से वस्तु मंगवाने का प्रति चार प्रतिपादन किया गया है । उसी प्रकार वस्तु के प्रेपण करने का भी अति- चार जानना चाहिये। ३ शब्दानुपात--परिमाण की भूमि से बाहिर कोई अन्य पुरुप जा रहा हो उस समय अावश्यकीय कार्य कराने के निमित्त मुख के शब्द से अर्थात् आवाज़ देकर उस पुरुष को अपना बोध करा देना। क्योंकि वह पुरुष जान लेगा कि-यह शब्द अमुक पुरुप का है। इस प्रकार करने से भी अतिचार लगता है। ४ रूपानुपात--जिस समय देशावकाशिक व्रत में बैठा हो उस समय किसी व्यक्ति से कोई काम कराना स्मृति प्रागया तव अपना रूप दिखला कर उस को वोधित करना उस का नाम रूपानुपात अतिचार है। जैसे कि-- गवाक्षादि में बैठकर अपना रूप दिखला देना । ५ पुद्गलाक्षेप अतिचार-परिमाण की हुई भूमि से बाहिर कोई वस्तु गिरा- कर अपने मन के भावों को औरों के प्रति प्रकाश करना यह भी अतिचार है। तदनन्तर एकादशवां पौषधोपवास व्रत है। उपवास करके आठ पहर विशेष धर्मध्यान में व्यतीत करना, 'पोषध कहलाता है। पर्व के दिनो में, जैसे कि-द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी और अमावस्या वा पौर्णमासी अादि तिथियों में शुद्ध वसति पोषधशालादि स्थान में सांसारिक कार्यों को छोड़कर पौषधोपवास करना चाहिए । जहां तक वन पड़े वह पवित्र समय ध्यानवृत्ति में ही लगाना चाहिए, क्योकि-विना ध्यान समाधि नहीं लग सक ती है । साथ ही पौपधोपवास में सांसारिक कार्य वा स्नानादि क्रियाएं त्याग ।
( २१६ ) प्रकार के खान पान सम्बन्धी संकल्प विकल्प उत्पन्न करना । इन पांच अति- चार रूप दोषों को छोड़कर शुद्ध पौषधोपवास धारण करना चाहिए। पौषधोपचास व्रत के पश्चात् द्वादशवॉ अतिथिसंविभाग व्रत विधि पूर्वक पालन करना चाहिए। क्योंकि साधु का नाम वास्तव में अतिथि है । उस ने सर्व प्रकार की सांसारिक तिथियों को छोड़ कर केवल श्रात्म-ध्यान में ही चित्त स्थिर करलिया है। अतएव जब वे भिक्षा के लिये गृहों में प्रविष्ट होते हैं तब किसी तिथि के आश्रित होकर घरों में नहीं जाते। नॉही वे प्रथम गृहपति को सूचित करते हैं कि-अमुक दिन हम आप के गृह में भिक्षा के लिये अवश्य श्राएँगे। अतः ऐसे भिनु जो अपनी वृत्ति में पूर्ण दृढ़ता रसते हुए मधुकरी भिक्षा वृत्ति से अपने जीवन को व्यतीत करते है, जब वे गृह में पधार जाएँ तव श्रानन्द पूर्वक प्रसन्न चित्त होकर उन की वृत्ति के अनुसार शुद्ध और निर्दोप पदार्थों की भिक्षा देकर लाभ उठाना चाहिए कारणकि-सुपात्र दान का महाफल इस लोक और परलोक दोनों में प्राप्त होता है । इस लिये सुपात्र दान कर के चित्त परम प्रसन्न करना चाहिए । जो स्वधर्मी भाई साधु मुनिराजों के दर्शनों के वास्ते पाते हैं, वे भी उक्त व्रत मे ही गर्भित किये जाते है। अतः उन की भी यथायोग्य प्रतिपत्ति करने से अतिथि संविभाग की ही श्राराधना होती है। साथ ही इस बात का भी शान रहे कि- जो द्रव्य न्यायपूर्वक उत्पादन किया गया है उसी को विद्वान् वर्ग ने अतिथि- संविभाग व्रत के उपयोगी प्रतिपादन किया है। सारांश केवल इतना ही है कि-चतुर्विध संघ की यथायोग्य प्रतिपत्ति करनी श्रावक वर्ग का मुख्य कर्तव्य है । सो जव मुनि महाराज निज गृह मे भिक्षा के लिये पधार जाएँ तव शुद्ध चित्त से उन की यथायोग्य आहारादि द्वारा सेवा करनी चाहिए। तयाणन्तरं चणं अहासंविभागस्स समणोवासएणं पञ्च अइयारा जाणियव्या न समायरियव्वा तंजहा-सचित्तनिक्खेवणया सचित्तपिहणिया कालाइक्कमे पखवदे से मच्छरिया ॥ उपासक्दशासून अ० ॥१॥ भावार्थ-एकादशवं व्रत के पश्चात् बारहवें अतिथिसंविभाग व्रत के भी पांच अतिचार जानने चाहिए, परन्तु श्रासेवन न करने चाहिएं । जैसेकि- १ सचित्तनिक्षेपण अतिचार-साधु को न देने की बुद्धि से निर्दोष पदार्थों को सचित्त पदों पर रखदेना अर्थात् जल पर वा अन्न पर तथा वनस्पति श्रादि पर निर्दोप पदार्थ रख दे, ताकि साधु अपनी वृत्ति के विप- रीत होने से उस पदार्थ को न ले सके ।
- ( २२१) मुंडे भवित्ता आगारातो अणगारितं पव्वइस्सामि २ कया णं अहं अपच्छिम- मारणंतिय संलेहणा असणा झूसिते भत्तपाणपडियातिक्खते पाओवगते कालं अणवकंखमाणे विहरस्सामि ३ एवं समणसा सवयसा सकायसा पागडेमाणे जागरेमाणे समणोवासते महानिजरे महापज्जवसाणे भवति । ठाणागसूत्रस्थान ३ उद्देश ४ सू ॥ २१०॥ भावार्थ-तीन प्रकार की शुभ भावनायो से श्रावक कर्मों की परम निर्जरा और संसार का अन्त कर देता है, परन्तु वे मन, वचन और काय द्वारा होनी चाहिएं । क्योंकि-अन्तःकरण की शुभ भावनाएँ कर्मों की प्रकृतियो की जड़ को निर्मूल करने में सामर्थ्य रखती है, जिस कारण प्रात्मा विकास मार्ग में श्राजाता है। जैसेकि- श्रमणोपासक सदैव काल अपने अन्तःकरण मे इस बात की भावना उत्पादन करता रहे कि-कव में अल्प वा बहुत परिग्रह का परित्याग (दान) करूँगा। क्योंकि -गृहस्था का मुख्य धर्म दान करना ही है । धार्मिक क्रियाओं में धन का सदुपयोग करना उन का मुख्य कर्तव्य है। २ कव में संसार पक्ष को छोड़कर अर्थात् गृहस्थावास को छोड़कर साधुवृत्ति धारण करूँगा। क्योंकि-संसार में शॉति का मार्ग प्राप्त करना सहज काम नहीं है। मुनिवृत्ति में शॉति की प्राप्ति शीघ्र हो सकती है । अतः मुनिवृत्ति धारण करने के भाव सदैव काल रहने चाहिएं। यह बात भली प्रकार से मानी हुई है कि जब प्राणी मात्र से वैर जाता रहा तो फिर शांति की प्राप्ति सहज में ही उपलब्ध होजाती है। ३ कव में शुद्ध अन्तःकरण के साथ सब जीवो से मैत्रीभाव धारण करके भत्त पानी को छोड़ कर पादोपगमन अनशनव्रत को धारण कर काल इच्छा न करता हुश्रा विचरूंगा अर्थात् शुद्ध भावों से समाधि पूर्वक पादोपगमन अनशन व्रत धारण करूंगा। यद्यपि यह वात निर्विवाद सिद्ध है कि-मृत्यु अवश्यमेव होनी है परन्तु जो पादोपगमन के साथ समाधियुक्त मृत्यु है वह संसार समुद्र से जीवो को पार कर देती है। अतएव जव मृत्यु का समय निकट आ जावे तव सव जीवों से वैरभाव छोड़कर अपने पूर्वकृत पापो का पश्चात्ताप करते हुए गुरु के पास शुद्ध आलोचना करके फिर यथा- शक्ति प्रमाण अनशन व्रत धारण कर लेना चाहिए। इस अनशन व्रत के शास्त्रकर्ता ने पांच अतिचार वर्णन किये हैं उन्हें छोड़ देना चाहिए जैसे कि- तयाणन्तरं चणं अपच्छिम मारणंतिय संलेहणा झूसणा राहणाए पंच १ - . ( २२३ ) मानता है। परन्तु पर्यायाधिक नय के मत से प्रत्येक द्रव्य अपनी वर्तमान की पर्याय क्षणभंगुर में रखता है । क्योंकि-"मन् द्रव्यलक्षणम्" द्रव्य का लक्षण सत् प्रतिपादन किया गया है, किन्तु "उत्पाद व्ययध्रौव्ययुक्त सत्" जो उत्पन्न व्यय और ध्रौव्य इन तीनों दशाओं से युक्त हो उसी की द्रव्य संज्ञा है। जैसे कि-मृत्ति का (मिट्टी) का पिंड कभी तो घटाकार होजाता है, कभी ईटाकार और कभी अन्य रूप में परिणत होजाता है। उसके श्राकारो में तो परिवर्तन होता ही रहता है, परन्तु यदि निश्चय नय के मत के आश्रित होकर विचार किया जाय तव मृत्तिका द्रव्य ध्रौव्य भाव मे निश्चित होगा । क्योकि चाहे उस द्रव्य से किसी पदार्थ की भी निप्पत्ति होजाए परन्तु प्रत्येक पर्याय मे मृत्तिका द्रव्य सद्रूप से विद्यमान रहता है । ठीक इसी प्रकार जैनमत भी प्रत्येक द्रव्य की यही दशा वर्णन करता है । द्रव्यों के समूह का नाम ही जगत् वा लोक है । अतएव यह स्वतः ही सिद्ध होजाता है कि जब द्रव्य अनादि अनन्त है तो भला फिर जगत् सादि सान्त कैसे सिद्ध होगा? कदापि नहीं। इसलिये द्रव्यार्थिक नय के मत से यह जगत् अनादि अनन्त है। परन्तु किसी पर्याय के श्राथित होकर उस क्षणस्थायी पर्याय के अवलम्बन से उस दव्य को क्षणविनश्वर कह सकते है जैसे-मनुष्य की पर्याय को लेकर मनुष्य की अस्थिरता का प्रतिपादन करना । क्योंकि मनुष्य पर्याय की अस्थिरता का वर्णन किया जा सकता है, नतु जीव की अस्थिरतावा जीव की अनित्यता का। अतएव निष्कर्ष यह निकला कि-इस जगत् में मूल तत्त्व दो ही हैं, एक जीय और दूसरा जड़ । सो दोनों के विस्तार का नाम जगत् है । दोनों द्रव्यो का जो अनादि स्वभाव (धर्म) है उसी को अस्तिकाय धर्म कहते हैं। जैनमत में छः द्रव्यात्मक जगत् माना गया है, जैसे कि-धर्म द्रव्य १ अधर्मद्रव्य २ प्राकाश द्रव्य ३ कालद्रव्य ४ पुद्गलद्रव्य ५ और जीव द्रव्य ६ इन छः द्रव्यों में केवल एक द्रव्य जो काल संशक है, उसको अप्रदेशी द्रव्य माना गया है, शेष पांच द्रव्य सप्रदेशी कथन किये गए है । क्योंकिकाल द्रव्य के प्रदेश नही होते हैं । केवल किसी अपेक्षा पूर्वक उसके भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह तीन विभाग हो जाते है । अपितु जो धर्मादि द्रव्य है वे सप्रदेशी होने से उनकी "पंचास्तिकाय" संज्ञा कथन की गई है। इन ६ द्रव्यो के लक्षण शास्त्रकार ने निम्न प्रकार से कथन किये है जैसे कि- गुणाणमासमो दव्वं रागदव्वस्सिया गुणा । लक्खण पजवाणं तु उभयो अस्सिया भवे ॥ उत्तराध्ययन सून्न २८ गा०६।
( २२५ ) जाय तय एक पक्ष नित्य अवश्यमेव सिद्ध हो जायगा। किन्तु इस प्रकार देखा नहीं जाता । अतएव द्रव्य को गुण पर्याय युक्त मानना ही युनियुक्त है। जैसे द्रव्य पुद्गल है उस के वर्ण, गंध,रस और स्पर्श गुण है । नाना प्रकार की प्राकृतियां नथा नव पुरातनादि व्यवस्थाएँ उस की पर्याय होती है । इस लिये द्रव्य उक्त गुण युक्त मानना युक्ति-संगत है । यद्यपि द्रव्य का लक्षण सत् प्रतिपादन किया गया है, तथापि "उत्पादव्ययाव्ययुक्त सत्" उत्पन्न व्यय और ध्रौव्य लक्षण वाला ही द्रव्य सत् माना गया है। जिस प्रकार एक सुवर्ण द्रव्य नाना प्रकार के श्राभूपणों की प्राकृतियां धारण करता है और फिर वे श्राकृतियां उत्पाद व्यय युक्त होने पर भी सुवर्ण द्रव्य को ध्रौव्यता से धारण करती है । सो इसी का नाम द्रव्य है। यदि ऐसे कहा जाय कि-एक द्रव्य उत्पाद और व्यय यह दोनो विरोधी गुण किस प्रकार धारण कर सकता है ? तो इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि-पर्याय क्षण चिनश्वर माना गया है। पूर्व क्षण से उत्तर क्षण विल- क्षणता सिद्ध करता है । जिस प्रकार कंकण से मुद्रिका की प्राकृति मे सुवर्ण चला गया है, परन्तु सुवर्ण दोनों रूपों में विद्यमान रहता है। हाँ पूर्व पर्याय उत्तर पर्याय की श्राकृति को देख नहीं सकता है । क्योंकि-जिस प्रकार अंधकार और प्रकाश एक समय एकत्व में नहीं रह सकते है उसी प्रकार पूर्व पर्याय और उत्तर पर्याय भी एक समय इकट्टे नहीं हो सकते है। युवावस्था वृद्धावस्था की श्राकृति को नहीं देख सकती, उसी प्रकार पूर्व पर्याय उत्तर पर्याय का दर्शन नहीं कर सकती; परन्तु शरीर दोनो अवस्थात्रो को धारण करता है, उसी प्रकार द्रव्य उत्पाद और व्यय दोनो पर्यायों के धारण करने वाला होता है। जिस प्रकार हम रात्रि और दिवस दोनो का भली भांति अवलोकन करते हुए धारण करते हैं, परन्तु रात्रि और दिवस वे दोनो युगपत् (इकट्ठे हुए) नहीं देखे जाते, ठीक उसी प्रकार द्रव्य दोनों पर्यायों को धारण करता हुश्रा अपनी सत्ता सिद्ध करता है। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-द्रव्यो की संख्या कितनी मानी गई है ? इसके उत्तर में सूत्रकार वर्णन करते हैं । जैसेकि- धम्मो अहम्मो आगासं कालो पुग्गलजंतवो । एस लोगोत्ति पएणत्तो जिणेहिं वरदसिहिं।। उत्तराध्यरान सन २८ गा० ॥७॥ त्ति--धर्म इति-धर्मास्तिकायः १ अधर्म इति-अधर्मास्तिकायः २ प्राकाशमिति प्रा- कागास्तिकायः ३ काल. समयादिरूप.-४ पुग्गलत्ति-पुलास्तिकाय ५ जन्नव इति जीवा : जैसे ।
॥ ( २२७ ) इस प्रकार लोक में अपनी सत्ता रखते हैं जैसेकि-धर्मद्रव्य १ अधर्मद्रव्य २ और प्रकाश द्रव्य ३ ये तीन द्रव्य असंख्यातप्रदेशप्रमाण लोक में एक एक संख्या के धारण करने वाले प्रतिपादन किये गए है । यद्यपि अाकाश द्रव्य भी अनंत है परन्तु लोक में वह असंख्यात प्रदेशों को धारण किये हुए ही रहता है । क्योंकि-लोक असंख्यात योजनों के श्रायाम और विष्कंभ के धारण करने वाला है । अतएव शास्त्रकार ने धर्म, अधर्म तथा श्राकाश ये तीनों द्रव्य लोक में एक २ ही प्रतिपादन किये हैं । यद्यपि धर्मद्रव्य के स्कन्ध, देश और प्रदेश रूप तीन भेद प्रतिपादन किये गए है तथापि भेद केवल जिज्ञासुत्रो के बोध के लिये ही दिखलाए गए है, किन्तु वास्तव में धर्मद्रव्य अविछिन्न भाव से एक रूप होकर ही लोक में स्थित है। इसी प्रकार अधर्म द्रव्य और आकाश- द्रव्य के विषय में जानना चाहिए । जिस प्रकार धर्मद्रव्य अविछिन्न भाव से लोक में स्थित है, ठीक उसी प्रकार अधर्म और श्राकाश द्रव्य भी लोक में स्थित हैं । किन्तु कालद्रव्य १, पुद्गलद्रव्य २ और जीवद्रव्य ३ ये तीनो लोक में अनंत प्रतिपादन किये गए हैं। क्योंकि तीनों काल की अपेक्षा काल- द्रव्य अनंत प्रतिपादन किया गया है। जैसेकि-जब द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से संसार अनादि अनंत है तव भूतकाल वा भविष्यत् काल भी अनंत सिद्ध हो जाता है। अतएव कालद्रव्य तीनों काल की अपेक्षा से अनंत प्रतिपादन किया गया है । ठीक उसी प्रकार पुद्गलद्रव्य भी अनंत कथन किया गया है । क्योंकि-एक परमाणु पुद्गल से लेकर अनंत प्रदेशी स्कन्ध पर्यन्त पुद्गलद्रव्य विद्यमान है । वह अनंत वर्गणाओं के समूह का उत्पादक भी है। इस लिये यह दव्य भी लोक में अपने द्रव्य की अनंत संख्या रखता है । जिस प्रकार पुद्गल- द्रव्य अनंत है, ठीक उसी प्रकार जीव द्रव्य भी अनंत है अर्थात् लोक में अनंत श्रात्माएँ निवास करती है। कतिपय वादियों ने एक श्रात्मा ही स्वीकार किया है। उनका मन्तव्य यह है कि-एक श्रात्मा का ही प्रतिविम्व रूप अनेक आत्माएँ है । वास्तव मे शुद्ध श्रात्मद्रव्य एक ही है । तथा किसी वादी ने आत्मद्रव्य भिन्न २माना है। एक श्रात्मा के मानने वालो का सिद्धान्त युक्तियो से वाध्य कर दिया है । परन्तु जैन-सिद्धान्तकारों ने श्रात्मदव्य द्रव्यरूप से अनंत स्वीकार किया है परन्तु ज्ञानात्मा के मत से आत्मद्रव्य एक भी है। जिस प्रकार सहन दीपक दव्यरूप से सहस्त्र रूप ही है परन्तु सहन दीपको का प्रकाश गुण एक ही है अक उसी प्रकार आत्मद्रव्य अनंत होने पर भी ज्ञानदृष्टि और गुण के सम होने पर एक ही है। परन्तु व्यवहार पक्ष में आत्मद्रव्य अनंत है । अतएव काल- न्य पुद्गलद्रव्य और जीवद्रव्य अनंत प्रतिपादन किये गए हैं। ।
। ( २२६ ) फिर सर्वद्रव्यों का भाजनरूप आकाशदव्य जो प्रतिपादन किया गया है, उस का अवकाशरूप लक्षण कथन किया है, क्योंकि आकाश का लक्षण वास्तव में अवकाशरूप ही है जिस प्रकार दुग्ध से भरे हुए कलश में शकरादि पदार्थ समवतार हो जाते है ठीक उसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ को अवकाश देने के लिये श्राकाशद्रव्य भाजनरूप माना गया है। तथा जिस प्रकार सहस्र दीपकों का प्रकाश परस्पर सम्मिलित होकर ठहर जाता है टीक उसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य श्राकाश में सम्मिलित होकर ठहरे हुए हैं। अतएव आकाश का अवकाशरूप लक्षण ही मानना युक्तियुक्त है । यद्यपि कतिपय वादियों ने "शब्दगुणस्माकाशम्" इस प्रकार से पाठ माना है, परन्तु उन का यह लक्षण युक्तियुक्त नहीं है क्योंकि यह बात स्वतः सिद्ध है कि- गुणी प्रत्यक्ष और गुण परोक्ष होता है परन्तु इस स्थान पर शब्दरूप गुण तो इन्द्रिय-ग्राहा है और प्राकाश इन्द्रिय-ग्राह्य पदार्थ नहीं माना गया है तथा च- कासाद शन्दसव चेन्नभागुणोऽतीन्द्रिय स्यात् परिमाणवत्कथम् ? गुणोऽपि चेत्तर्हि तदाश्रये च द्रव्ये गृहीते किम गृहातेऽसौ १ ॥ युक्तिप्रकाश श्लोक ॥ २२ ॥ टीका-अथ शब्दस्य गुणत्वं निषेधयति । काणाद-हे काणाद!तव मतचे- नभोगुणः शब्दोऽस्ति तदाऽतीन्द्रिय इन्द्रियाऽग्राह्यः कथं न स्यात् परिमाणवत् ? अधिकाराद् गगनपरिमाणमिव यथा गगनपरिमाणं तद्गुणत्वेनाऽतीन्द्रियं तथा शब्दो भवेदिति तस्मात् न गगनगुण शब्दः । ननु शब्दस्य गगनगुणत्वं माऽस्तु तथाऽपि कस्यचिद् द्रव्यान्तरस्य गुणोऽयं भविष्यति वैशेषिककदाशां निरा- करोति चेत् शब्दो गुणस्तर्हि तदाश्रये द्रव्येऽगृहीतेऽसौ कथं गृह्यते ? तस्मानाय गुणोऽपीति वृत्तार्थः- भावार्थ-इस कारिका का मन्तव्य यह है कि-जव आकाश इन्द्रिय अग्राह्य पदार्थ है तो भला उस का गुण जो शब्द माना गया है वह इन्द्रिय अग्राहा कैसे न होगा ? अपितु अवश्यमेव होना चाहिए । परन्तु शब्द श्रोत्रेन्द्रिय ग्राहा माना गया है अत एव शब्द आकाश का गुण युक्तिपूर्वक सिद्ध नहीं होता यदि ऐसे कहा जाय कि-आकाश में जो द्रव्य स्थित हैं उन द्रव्यो मे जच परस्पर संघर्षण होता है तव शब्द उत्पन्न होजाता है, अतएव श्राकाशस्थ दव्य होने से वह शब्द श्राकाश का ही मानना चाहिए। इस शंका का यह समा. धान किया जाता है कि जब द्रव्यो के संघर्षण से शब्द उत्पत्ति मान ली जाए तब श्राकाश का गुण शब्द तो सर्वथा निर्मूल सिद्ध होगया। क्योंकि-आकाश- एक अरूपी पदार्थ संघर्ष करता ही नहीं है । श्ररूपी पदार्थ एक रसमय होता । यदि आकाश में स्थित परस्पर द्रव्य संघर्षण करते हैं उन के कारण से शब्द ( २३१ ) उपलब्ध नहीं होता । यद्यपि पुद्गलद्रव्य के कतिपय स्कन्ध क्रिया करते हुए दृष्टिगोचर होते है. परन्तु उन क्रियानों मे विचार-शक्ति तथा सुख दुःखों का अनुभव करना सिद्ध नहीं होता । जिस प्रकार अनेक शाकों के भाजनो में दर्वी (कडछी) भ्रमण तो करती है परन्तु उन पदार्थों के रस के ज्ञान से वह चंचित ही रहती है, कारण कि-वह स्वयं जड़ है । इसी प्रकार घड़ी जनता को प्रत्येक समय का विभाग करके तो दिखलाती है, परन्तु स्वयं उस ज्ञान से वंचित होती है । अतएव जीव की सिद्धि जो सूत्रकार ने चार लक्षणो द्वारा प्रतिपा- दन की है वह युक्तियुक्त होने से सर्वथा उपादेय है। जैसेकि-जिस को प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान है, जिस की श्रद्धा दृढतर है, फिर जो सुख वा दुःख का अनु- भव करता दृष्टिगोचर होता है, उसी की जीव संशा है । इस से निष्कर्ष यह निकला कि-उपयोगलक्षण युक्त जीव प्रतिपादित है। अव सूत्रकार जीवद्रव्य के लक्षणान्तरविषय मे कहते हैं। नाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा । वीरियं उपयोगो य एम जीवस्स लक्खणं ।।११।। उत्तराव्ययनसूत्र अ २८ गा. ॥३१॥ वृत्ति-शानं ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं च पुनदृश्यतेऽनेनेति दर्शनं च पुनश्चरित्रं क्रिया चेप्यादिकं तथा तपो द्वादशविधं तथा वीर्य वीर्यान्तराय क्षयोपशमात् उत्पन्नं सामर्थ्य पुनरुपयोगोशानादिपु एकाग्रत्व एतत् सर्व जीवस्य लक्षणम् ॥ भावार्थ-जिस प्रकार १० वी गाथा मे जीव द्रव्य के लक्षण प्रतिपादन किये गए है, उसी प्रकार ११ वी गाथा मे भी जीव द्रव्य के ही लक्षण प्रतिपादित । जैसेकि-जिसके द्वारा पदार्थों का स्वरूप जाना जाय उस का नाम ज्ञान है तथा जिसके द्वारा पदार्थों के स्वरूप को सम्यगतया देखा जाय उस का नाम दर्शन है । सो जीव शान. दर्शन तथा काय की चेष्टादि की जो संज्ञा चारित्र है उस से तथा द्वादशविध तप से युक्त है। इतना ही नहीं किन्तु वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम भाव से जो भात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न हुआ है उस वीर्य से युक्त तथा शानादि मे एकाग्र अर्थात् ज्ञानादि में उपयोग युक्त है । ये सब जीव द्रव्य के लक्षण है। अर्थात् इन लक्षणों द्वारा ही जीव द्रव्य की सिद्धि होती है क्योंकि लक्षणों द्वारा ही पदार्थों का ठीक २ वोध हो सकता है । परन्तु इस वात का अवश्य ध्यान कर लेना चाहिए कि-एक श्रात्मभूत लक्षण होता है दृसरा अनात्मभूत लक्षण होता है । जिस प्रकार अग्नि की उपणता प्रात्मभूत लक्षण है, ठीक उसी प्रकार दण्ड पुरुष का अनात्मभूत लक्षण है। सा ज्ञान, दर्शन, वीर्य और उपयोग इत्यादि यह सब प्रात्मभूत जीव द्रव्य. के लक्षण प्रतिपादन किये गए हैं।
- ( २३३ ) उपण यह सब पुद्गलास्तिकाय के लक्षण जानने चाहिएं। सारॉश इस का इतना ही है कि उक्त लक्षणों द्वारा पुद्गल द्रव्य की सिद्धि की जाती है। यद्यपि कतिपय वादियों ने पुद्गल द्रव्य के लक्षणों को किसी अन्य द्रव्य के लक्षण वर्णन कर दिये हैं, परन्तु यथार्थ में वह लक्षण न होने से युक्ति को सहन नहीं कर सकते । जैसे कि-तमस् को कतिपय वादियों ने श्रभाव पदार्थ न्वीकार कर लिया है, किन्तु वह युक्तियुक्त कथन नहीं है । अतएव पुद्गलद्रव्य के ही उक्त लक्षण स्वीकार करने युक्तियुक्त है। यावन्मात्र पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं, वे सर्व पोद्गलिक है । क्योंकि- अरूपी पदार्थों को तो छद्मस्थ श्रात्मा चनुओं द्वारा देख ही नहीं सकता। अत- एव इन्द्रिय ग्राह्य पदार्थ रूपवान् हैं । रूपवान् ही होने से वे पौद्गलिक है। इस प्रकार पद् द्रव्यों के लक्षण वर्णन करने के अनन्तर अव सूत्रकार पर्याय विपय कहते है । जैसेकि- एगत्तं च पुहत्तं च संखा संठाणमेव य । संजोगाय विभागा य पज्जवाणं तु लक्खणं ॥ उत्तराध्ययनसन न.२८ गा ॥ १३ ॥ वृत्ति-एतत्पर्यायाणां लक्षणं एतत् किम्-एकत्वं भिन्नेप्वपि परमाएवा- दिपु यत् एकोऽयं इति बुद्धया घटोयं इति प्रतीतिहेतुः च पुनः पृथक्त्वं अयं अस्मात् पृथक् घटः पटाद् भिन्नः पटो घटाद्भिन्नः इति प्रतीतिहेतुः, संख्या एको द्वौ बहव इत्यादि प्रतीतिहेतुः च पुनः संस्थानं एव वस्तूनां संस्थानं श्रा- कारश्चतुरस्रवर्तुलतिनादि प्रतीतिहेतुः, च पुनः संयोगा अयं अंगुल्याः संयोग इत्यादि व्युपदेशहेतवो, विभागा अयं श्रतो विभक्त इति युद्धिहेतवः, एतत् पर्यायाण लक्षणं ज्ञेयं, संयोगा विभागा बहुवचनात् नवपुराणत्वाद्यवस्था शेया. लक्षणत्वं साधारणरूपं गुणानां लक्षणं रूपादि प्रतीतत्वान्नोक्तम् ॥ भावार्थ-पहले कहा जा चुका है कि-द्रव्य गुण और पर्याय युक्त होता । श्रत. इस गाथा में पर्याय का लक्षण प्रतिपादन किया गया है । अनंत पर- माणुओं का समूह जब एक घटादि पदार्थों के रूप मे श्राजाता है तब व्यवहारबुद्धि से कहा जाता है कि यह एक घट है । यद्यपि यह घट अनंत परमाणुओं का समूह रूप है तथापि भिन्न २ परमाणुओ के होने पर, भी व्यवहारवद्धि में घट एक पदार्थ माना गया है। इसी प्रकार यह इस से पृथक् है अर्थात् यह घट से पट पृथक् है वा यह वस्तु अमुक वस्तु से पृथक् है इस प्रकार की जो प्रतीति उसी का नाम पृथक्त्व है क्योंकि-पुद्गल द्रव्य एक होने पर भी यह इस पदार्थ से भिन्न पदार्थ है इस प्रकार की जो प्रतीति होती है यही पर्याय का लक्षण है। .
( २३५ ) भेद उक्त विषय में संक्षेप रूप से समवतार होजाते हैं जैसेकि- १ द्रव्य से धर्मास्तिकाय एक द्रव्य है १, क्षेत्र से लोकपरिमाण है २, काल से अनादि अनन्त है ३,भाव से अरूपी है ४, गुण से गति इस का लक्षण ५टान्त जैसे पानी में मत्स्य । २ द्रव्य से अधर्मास्तिकाय एक द्रव्य है १, क्षेत्र से लोकपरिमाण २, काल से अनादि अनंत ३, भाव से श्ररूपी४, गुण से स्थिति इस का लक्षण है ५ । दृष्टांत जैसे पथिक को वृक्ष का श्राधार । ३ द्रव्य से श्राकाशास्तिकाय एक १, क्षेत्र से लोकालोक परिमाण २,काल से अनादि अनंत ३, भाव से अरूपी ४, गुण से आकाश का अवकाश देने का स्वभाव ५। दृष्टान्त जैसे दुग्ध में शर्करा (मिट्टा)। ४ द्रव्य से फालद्रव्य अनंत १, क्षेत्र से अढ़ाई द्वीप परिमाण २, काल से अनादि अनंत ३, भाव से श्ररूपी, गुण से वर्तनालक्षण ५। दृष्टान्त-जैसे नूतन पदार्थ को कालद्रव्य पुराना करता है। ५ द्रव्य से जीवद्रव्य जीवास्तिकाय अनन्त १, क्षेत्र से चतुर्दशरज्जु परि- माण २ काल से अनादि अनन्त ३, भाव से अरूपी ४, गुण से चेतनालक्षण । द्रव्य से पुद्गलास्तिकाय अनंत १, क्षेत्र से लोक परिमाण२,काल से अनादि अनंत ३, भाव से रूपी, गुण से सड़ना, पड़ना, मिलना, गलना, विध्वंसन होना ही इसका लक्षण है ५। इस प्रकार उक्त द्रव्यों के स्वरूप को जाना जाता है। क्योंकि-प्रत्येक द्रव्य अपनी २, पर्यायों का कर्ता है। ६ अव इस स्थान पर श्रागमसार ग्रंथ के अनुसार षद् द्रव्यो के विषय में कहा जाता है। जैसेकि-पद अनादि हैं। उनमें पांच श्रजीव और चेतनालक्षण बाला जीव है। परन्तु पट् द्रव्यों के गुण निम्न प्रकार से है जैसेकि-धर्मास्ति- काय के चार गुण हैं, यथा-श्ररूपी १, अचेतन २, अक्रिय ३और गतिलक्षण ४। अधर्मास्तिकाय के भी चार गुण हैं-जैसेकि-अरूपी १, अचेतन २, अक्रिय ३ और स्थितिलक्षण । श्राकाशास्तिकाय के चार गुण-जैसोक-अरूपी १, २, अक्रिय ३ और अवगाहनगुण ४कालद्रव्य के चार गुण-अरूपी १. अचेतन २, अक्रिय ३ और नव पुराणादि वर्तनालक्षण ४ । पुद्गल द्रव्य के चार भेद रूपी, अचेतन २, सक्रिय ३, मिलना और विछुड़ना स्वभाव ४ा जीव द्रव्य ४गुण अनंतज्ञान १, अनंतदर्शन २, अनंतवारित्र ३, और अनंतवीर्य ।। ये छ द्रव्यों के गुण नित्य और ध्रुव है। किन्तु पद्व्यों के पर्याय निम्न प्रकार से है, जैसेकि-धर्मास्तिकाय के चार पर्याय हैं--स्कन्ध १, देश २, प्रदेश ३, और अगुरु लघु । अधर्मा- अचेतन के - । ( २३७ ) ७ निश्चय नय के मत से पट ही द्रव्य सक्रिय है, किन्तु व्यवहार नय के मत से जीवद्रव्य और पुद्गलद्रव्य ये दोनों ही द्रव्य सक्रिय है, शेष चार द्रव्य अक्रिय हैं। निश्चय नय के मत से पद द्रव्य नित्य भी है और अनित्य भी है, किन्तु व्यवहारनय के मत से जीव और पुद्गल की अपेक्षा से ये दोनों द्रव्य, अनित्य है. शेष चार द्रव्य नित्य हैं। छः ही द्रव्यों में केवल एक जीव द्रव्य कारण है,शेष पांच द्रव्य अकारण है। १० निश्चय नय के मत से छः ही द्रव्य कर्ता है किन्तु व्यवहार नय के मत से केवल एक जीव द्रव्य कर्ता है, शेष पांच द्रव्य अकर्ता है। ११ छः ही द्रव्यों में केवल एक श्राकाशद्रव्य सर्वव्यापी है, शेष पांच द्रव्य लोक मात्र व्यापी हैं। १२ एक क्षेत्र में पद्न्य एकत्व होकर ठहरे हुए है, किन्तु गुण सव का पृथक् २ है अर्थात् गुण का परस्पर संक्रमण नहीं होसकता। अव एक २ मे पाठ २ पक्ष कहते हैं। जैसेकि- नित्य १, अनित्य २, एक ३, अनेक ४, सत्य ५, असत्य ६, वक्तव्य ७, प्रवक्तव्य८।। अव नित्य अनित्य पक्ष विषय कहते है। धर्मास्तिकाय के चार गुण नित्य है। पर्याय मेधर्मास्तिकाय-स्कन्ध नित्य । देश, प्रदेश, गुरुलघु अनित्य है. इस प्रकार कहना चाहिए। श्रधर्मास्तिकाय के चार गुण-स्कंध लोक प्रमाण नित्य है, देश प्रदेश अगुरुलघु अनित्य है। अाकाशास्तिकाय के चार गुण-स्कन्ध लोकालोक प्रमाण नित्य है । देश, प्रदेश अगुरुलघु अनित्य है । कालद्रव्य के चार गुण नित्य है चार पर्याय अनित्य है। पुद्गलद्रव्य के चार गुण नित्य है, चार पर्याय अनित्य है, किन्तु जीव द्रव्य के चार गुण और पर्याय नित्य है किन्तु अगुरुलघु अनित्य है। अब एक और अनेक पक्ष विस्तार से कहा जाता है जैसेकि- धर्म १ और अधर्म२ द्रव्य इन का स्कन्ध लोक प्रमाण एक है, किन्तु गण, पर्याय और प्रदेश अनेक हैं । जैसेकि-गुण और पर्याय तो अनंत है, किन्तु प्रदेश असंख्यात है। श्राकाश द्रव्य का स्कन्ध लोकालोक प्रमाण एक है, गुण पर्याय और प्रदेश अनेक है । जैसेकि-गुण और पर्याय तो अनंत होते ही है किन्तु आकाशद्रव्य लोकालोक प्रमाण होने से उस के प्रदेश भी अनंत है । काल द्रव्य का वर्तनारूप गुण तो एक है, किन्तु गुण. पर्याय और समय अनेक है । जैसेकि-गुण अनंत और पर्याय अनन्त तथा समय अनंत।यथा-भृत काल के अनंत समय व्यतीत हो चुके और अनागत काल के अनंत समय व्यतीत और ( २३६ ) गुण पर्याय सदैव काल विद्यमान रहता है। जैसेकि-धर्म द्रव्य में स्वद्रव्य स्व- क्षेत्र स्वकाल और स्वभाव विद्यमान तो रहता है, किन्तु शेष पांच द्रव्यों का गुण पर्याय उस में नहीं रह सकता। इसी प्रकार अधर्म द्रव्य में स्वद्रव्यादि चारों भाव विद्यमान रहते हैं, किन्तु शेष पांच द्रव्यों के गुण पर्याय नहीं रह सकते। जिस प्रकार इन का वर्णन किया गया है ठीक उसी प्रकार श्राकाश द्रव्य में द्रव्यादि भाव रहते हैं; किन्तु शेष पांच द्रव्यों के गुण पर्याय नही रहते काल के भाव काल में रहते हैं पुद्गल के.भाव पुद्गल में रहते हैं। जीव के स्वद्रव्य स्वक्षेत्र स्वकाल और स्वभाव जीव में रहते है शेष पांच द्रव्यों के स्वभाव जीव द्रव्य में नहीं रह सकते। इसी प्रकार पद् द्रव्य स्वगुण की अपेक्षा से सत् रूप प्रतिपादन किये गए हैं। अय वक्तव्य और श्रवक्तव्य पक्ष कहते है। पद् द्रव्य में अनंत गुण पर्याय वक्तव्य है अर्थात् वचन से कहा जास. कता है और अनंत ही गुण पर्याय श्रवक्तव्य रूप है। जो वचन द्वारा नहीं कहा जास- कता, किन्तु श्री केवलीभगवान् ने सर्व भाव देखे हुए है, परन्तु दृष्ट भावो से भी वे अनंतवे भाग मात्र कह सकते हैं। इसी लिये वक्तव्यत्व और अवक्तव्यत्व ये दोनों भाव पद् द्रव्य में पड़ते है। किन्तु जव नित्य और अनित्य पक्ष माना जाता है तब इस पक्ष के मान ने से चतुर्भग उत्पन्न होजाते है। जैसेकि- १ अनादि अनंत-जिस की न तो प्रादि है नाँही अंत है। २ अनादि सान्त-श्रादि तो नहीं है किन्तु अन्त दीखता है। (मानाजा सकता है) ३ सादि अनंत-जिसकी आदि तो मानी जाती है परन्तु अन्त नहीं माना जासकता । ४ सादिसान्त-जिस की आदि अन्त दोनों माने जा सकें, उसी का नाम सादि है। परन्तु ये चारों भंग उदाहरण द्वारा इस प्रकार प्रतिपादन किये गए है जैसेकि-जीव में झानादि गुण अनादि अनंत है १, भव्य आत्माओं के साथ कर्मों का सम्बन्ध अगदि सान्त है २, जिस समय जीव कर्म क्षय करके मोक्षपद प्राप्त करता है, तब उसमें साद अंनत भंग माना जाता है । क्योंकि-कर्मक्षय करने के समय की श्रादिताहोगई, परन्तु मुक्ति पुनरावृति वाली नहीं है । अतएव सादि अनंत भंग सिद्ध होगया। चारों गतियों में जो जीव पुनः २ जन्म मरण कर रहा है, उसकी अपेक्षा संसारी जीवों मे सादिसान्त भंग सिद्ध हो जाता है मनुष्य मरकर देवयोनि में चलागया तब देवयोनि की अपेक्षामनुष्य भाव सादिसान्त पद वाला यनगया इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य के विषय जानना चाहिए। - जैसे कि ( २४१ ) गुग्ण श्रगुरुलघु अनादि अनंत है । अतीतकाल अनादि सान्त और वर्तमान काल सादि सान्त है, किन्नु अनागत काल सादि अनंत है। पुद्गल द्रव्य में द्रव्यत्व भाव से गलन मिलन धर्म अनादि अनंत है । क्षेत्र से परमाणु पुद्गल सादि- सान्त है । काल से अगुरुलघु गुण अनादि अनंत है, किन्तु पुद्गल द्रव्य मे उत्पाद और व्यय धर्म सादि सान्त है । स्वभाव गुण ४ अनादि अनन्त है। स्कन्ध देश प्रदेश अवगाहना मान सादि सान्त है। किन्तु वर्णादि पर्याय ४ सादि सान्त प्रति- पादन की गई हैं। इस प्रकार द्रव्यादि पदार्थों के चार भंग वर्णन किये गए है। अब पद् द्रव्य सम्बन्धी चार भंग दिखलाये जाते हैं। जब हम अाकाश द्रव्य पर विचार करते है तब यह भली भांति सिद्ध होजाता कि-जो श्रलोकाकाश है उसमें श्राकाश द्रव्य के विना अन्य कोई और द्रव्य नहीं है, किन्तु जो लोक का अाकाश है उसमें पद् द्रव्य ही सदैव विद्यमान रहते है । वे कदापि अाकाश द्रव्य से पृथक् नहीं होते । अतः वे अनादि अनंत है । अाकाश क्षेत्र में जीवद्रव्य अनादि अनंत है, परन्तु संसारी जीव कर्म सहित लोक के श्राकाश-प्रदेशो के साथ उन का जो सम्बन्ध है वह सादि सान्त है। जो सिद्ध श्रात्मानो के साथ अाकाश प्रदेशो का सम्बन्ध हो रहा है वह भी सादि अनंत है, अपितु लोक के आकाश के साथ जो पुद्गल द्रव्य का सम्बन्ध है वह अनादि अनंत है, किन्तु जो आकाश प्रदेश के साथ परमाणु पुद्गल का सम्बन्ध है. वह सादि सान्त है। इसी प्रकार धर्मास्तिकाय का सम्बन्ध सर्व जीवो के साथ जानना चाहिए । अपितु अभव्य आत्माओं के साथ पुद्गल द्रव्य का सम्बन्ध अनादि अनन्त है । क्योंकि-अभव्यात्मा कदापि कर्मक्षय नहीं कर सकता है अपितु भव्य श्रात्मा कर्म क्षय कर जव मोक्षपद प्राप्त करेगा तव उसके साथ कम्मों का सम्बन्ध अनादि सान्त कहा जाता है । तथा निश्चय नय के मत से पट द्रव्य स्वभाव परिणाम से परिणत है। इस करके ये परिणामी है अतः वे सदा नित्य हैं। इस लिये पद द्रव्य अनादि अनंत हैं । अपरं च जीव दव्य और पुद्गलद्रव्य का जो मिलने का परस्पर सम्बन्ध है, यह सम्बन्ध परि- रणामी है । सो वह परिणामिक भाव अभव्य जीव का अनादि अनंत है । भव्य जीव का अनादि सान्त है । किन्तु पुद्गलद्रव्य की परिणामिक सत्ता अनादि अनंत है। अपितु जो परस्पर मिलना और विछुड़ना भाव है वह सादि सान्त है। श्रतएव जब जीव और पुद्गल का परस्पर सम्बन्ध है तव ही जीव में सक्रियता होती है, परन्तु जिस समय जीव कर्मों से रहित हो जाता है, तब वह अक्रिय हो जाता है। परन्तु पुद्गलद्रव्य सदैव काल सक्रियत्व भाव में रहता है। परिणाम । ( २४३ ) ये पांच पर्याय सर्व द्रव्य में होते हैं किन्तु ६ विभावपर्याय जीव और पुद्गल में ही होती है-जैसे विभावपर्याय के वशीभूत होकर जीव चारों गति में नाना प्रकार के रूप धारण करता है और पुद्गल द्रव्य में विभाव पर्याय स्कन्ध रूप होती है । 'प्रपरंच पदपर्याय निम्न प्रकार से और भी रुथन किये गए हैं। जैसे कि- १ अनादिनित्य पर्याय-जैसे मेरु पर्वत प्रमुख २ सादिनित्य पर्याय-सिद्धभाव । ३ श्रनित्य पर्याय-समय २ पट् द्रव्य उत्पाद और व्यय धर्म युक्त ४ अशुद्धनित्यपर्याय-जैसे जीव के जन्म मरण । ५ उपाधिपर्याय-जैसे जीव के साथ कर्मों का सम्बन्ध । ६ शुद्ध पर्याय-जो द्रव्यों का मूल पर्याय है । वह सब एक समान ही होता है । इस प्रकार पर्याय का वर्णन किया गया है। सो पंचास्तिकाय रूप धर्म में सर्व द्रव्य और गुण पर्याय का वर्णन किया गया है । साथ ही शेय (जानने योग्य ) रूप पदार्थों का सविस्तर रूप वर्णन किया गया है। अतएव यह जगत् पट् द्रव्यात्मिकरूप स्वतः सिद्ध है । दश प्रकार के धर्म का स्वरूप संक्षेप से इस स्थान पर वर्णन किया है परन्तु उक्त धर्मों का सविस्तर स्वरूप यदि अवलोकन करना हो तो जैन- आगम तथा जैन-ग्रन्थों में देखना चाहिए । वहां पर बड़ी प्रवल युक्तियो से उक्त धर्मों का स्वरूप प्रतिपादन किया है, परन्तु इस स्थान पर तो केवल दिग्दर्शन मात्र कथन किया है। श्राशा है भव्य जन जैन-आगमो द्वारा उक्त धर्मों का स्वरूप देख कर फिर हेय (त्यागने योग्य ) शेय ( जानने योग्य ) और उपादेय (ग्रहण करने योग्य ) पदार्थों को भली भांति समझ तथा धारण कर निर्वाण पद के अधिकारी बनेगे। इति श्रीजेन-तत्त्वकालिकाविकामे अस्तिकाय एव दशविधधर्मवर्णनामिका पष्टी कलिका समाप्ता । । अथ सप्तमी कलिका। पूर्व कलिकाओं में दश प्रकार के धर्म का सनेपता से वर्णन किया गया । इस कलिका मे जैन-शास्त्रानुसार लोक (जगत्) के विषय मे कहा जाता है क्योकि बहुतसे भव्य श्रात्माओं को इस बात की शंका रहा करती है कि- जैन-मत वाले जगदुत्पत्ति किस प्रकार से मानते हैं ? तथा कतिपय तो शास्त्रीय ( २४५ ) ज्ञणविनश्वर वाद दोनो वाद ही युक्तियों के सहन करने में अशक्त है। अव इसी बात को शास्त्रकार वर्णन करते है जैसेकि- एएहि दोहिं ठाणेहि ववहारोण विज्जई एएहि दोहि ठाणेहिं अणायारं तु जाणए । सूत्रकृतागसूत्र द्वितीयश्रुतस्कन्ध थ, ५ गा. ॥ ३ ॥ दीपिका-(एएहिंति ) एताभ्या एकान्त नित्यं एकान्तमनित्यं चेति द्वाभ्या स्थानाभ्या प्यवहारो न विद्यते । एकान्तनित्ये एकान्तानित्ये च वस्तुनि व्यवहारी व्यवस्था न घटत इत्यर्थः । तस्मादेताभ्या स्थानाच्या स्वीकृताभ्यामनाचार जानीयात् ॥ ३॥ भावार्थ-उक्त दोनों पक्षों के एकान्त मानने से व्यवहार क्रियायो का सर्वथा उच्छेद हो जाता है क्योंकि जब सर्व पदार्थ एकान्त नित्यरूप स्वीकार किये जायें तव जो नूतन वा पुरातन पदार्थों का पर्याय देखने में आता है वह सर्वथा उच्छेद हो जायगा। तथा किसीभीपदार्थ को व्यवहार पक्ष में उत्पाद और व्यय धर्म वाला नहीं कहा जासकेगा । जव पदार्थों का उत्पाद और व्यय धर्म सर्वथा न रहा तव पदार्थ केवल अच्युतानुत्पन्नस्थिरैक स्वभाव वाले सिद्ध हो जायेंगे। परन्तु देखने मे ऐसे पाते नहीं है। अतएव एकान्त नित्य मानने पर व्यवहार पन का उच्छेद होजाता है। यदि एकान्त अनित्यता ग्रहण की जाए तब भी वह पक्ष युक्तियुक्त नहीं । क्योंकि जब पदार्थ एकान्त अनित्यता ही धारण किये हुए है, तव भवि- प्यत् काल के लिये जो घट, पट, धन धान्यादि का लोग संग्रह करते हैं वे अनर्थक सिद्ध होंगे। यदि पदार्थ क्षणविनश्वर धर्म वाले है तब वह किस प्रकार संगृहीत किये हुए स्थिर रह सकेगे? परन्तु व्यवहार पक्ष मे देखा जाता है कि-लोग व्यवहार पक्ष के प्राधित होकर उक्त पदार्थों का संग्रह अवश्यमेव करते हैं, अतएव एकान्त अनित्यता स्वीकार करने पर भी व्यवहार में विरोध आता है। इसलिये जैन-दर्शन ने एकान्त पक्ष के मानने का निषेध किया है । परन्तु जब हम स्याद्वाद के श्राथित होकर नित्य और अनित्य पर विचार करते हैं तब दोनों पक्ष युक्तियुक्त सिद्ध हो जाते है जैसे कि जब हम पदार्थों के सामान्य धर्म के आश्रित होकर विचार करते है तव पदार्थ नित्यरूपत्त्व धारण करलेते है अर्थात् पदार्थों के नित्य धर्म मानने मे कोई आपत्ति उपस्थित नहीं होती। क्योकि सामान्य धर्म पदार्थों मे नित्य रूप से रहता है तथा जव हम पदार्थों के विशेष रूप धर्म पर विचार करते हैं तव प्रत्येक पदार्थ की अनित्यता देखी जाती है क्यो कि विशेप अंश के ग्रहण करने से ? ( २४७ ) खंदयं कच्चाय० एवं वयासी से नणं तुम खंदया! सावत्थीए नयरीए पिंगल- एणं णियंठेणं वेसालिय सावएणं इणमक्खेवं पुच्छिए मागहा । किं सअंत लोए अणंते लोए एवं तं जेणेव मम अंतिए तेणेव हन्दमागए, से नूणं खं दया । अयमद्दे समझे? हंता अस्थि जे वियते खंदया। अयमेयारूचे अन्भत्थिए चित्तिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था-किं स अंते लोए अणंते लोए ? तस्स वियणं अयम-एवंखलु मए खंदया ! चउन्विहे लोए पन्नत्ते तंजहा-दबो खेत्तत्रो कालो भावो! दबोणं एगे लोए स अंते? खत्तमोणं लोए अंसंखेज्जाओ जोयण कोडाकोडीओ आयाम विक्खंभेणं असंखेज्जागोजोयण कोडा कोडीओ परिक्खेवेणं पत्थिपुणसे अंते२ काल- ओ लोएण कयाविण आसीन कयाविन भवति न कयाविन भावस्सति भविंसु य भवति य भाविस्सइ य धुवे णितिय सासए अक्खए अन्यए अवटिए णिचे णात्थिपुणसे अंते ॥३॥ भावो णं लोए अणंता वएण पज्जवा गंध० रस० फास पज्जवा अणंता संठाणपज्जवा अणंता गुरुयलहुय पज्जवा अणंता अगुरुयलहुय पज्जवा नत्थिपुण से अंते ४ सेतं खंदगा ! व्वो लोए स अंते खेत्तयो लोए स अंते कालो लोए अणंते भावो लोए अणंते । व्याख्याप्रज्ञप्तिसून शतक २ उद्देश ॥१॥ स्धंककचरित। भावार्थ-जिस समय स्कन्धक परिव्राजक श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामी के समीप प्रश्नो का समाधान करने के वास्ते आए, उस समय श्रीश्र- मण भगवान् महावीर स्वामी नित्यं भोजन करने वाले थे अर्थात् अनशनादि बतो से युक्त नहीं थे । अतः उस समय श्रमण भगवान् महावीर स्वामी नित्य आहार करने वालो का शरीर प्रधान जैसे शृंगारित होता है अतः शृंगारित कल्याण रूप. शिवरूप. धन्यकारी मंगलरूप शरीर की लक्ष्मी से युक्त विना अलंकारों से विभूषित लक्षण और व्यंजनों से उपेत लक्ष्मी द्वारा अतीव सौदर्यता प्राप्त कर रहा था अर्थात् सौदर्यता को प्राप्त हो रहा था। तदनन्तर वह कात्यायन गोत्रीय स्कन्धक श्रमण भगवान् नित्य आहार करने वालों के प्रधान यावत् अतीव उपशोभायमान शरीर को देख कर हर्पचित्त वा संतुष्ट १ 'विय भौहात्त' व्यापत्ते २ सूर्ये भुङ्क्ते चयई शालो व्यावतभोजी प्रतिदिनभोजीत्यर्थ । समयदेवीया वृति ॥
( २४६ ) सो उक्त सूत्रपाट के देखने से यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है कि- काल की अपेक्षा से यह लोक उत्पत्ति और नाश से रहित है क्योंकि- मागभाव के मानने से प्रध्वंसाभाव अवश्यमेव माना जा सकेगा । जिसका भाभगाव ही सिद्ध नहीं होता है उस का प्रध्वंसाभाव किस प्रकार माना जाए ? हाँ, यह बात भली भॉति मानी जासकती है कि प्रत्येक पर्याय उत्पत्ति और विनाश धर्म वाली है किन्तु पर्यायों ( दशाओं) के उत्पन्न और विनाश काल को देखकर द्रव्य पदार्थ उत्पत्ति और नाश धर्म वाला नहीं माना जा मकता । जैसे कि-जीव द्रव्य नित्य रूप से सदैव काल विद्यमान रहता है किन्तु जन्म और मरण रूप पर्यायों की अपेक्षा से एक योनि मे नित्यता नहीं रख सकता । इसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ के विषय में जानना चाहिए। यदि ऐसे कहा जाय कि-सर्व पदार्थ उत्पत्ति धर्म वाले है तो फिर भला कर्ता के बिना जगत् उत्पन्न कैसे होगया ? इस के उत्तर में कहा जा सकता हे कि-क्या प्रकृति परमात्मा और जीव पदार्थ भी कर्ता की आवश्यकता रखते हैं अर्थात् इन को भी उत्पत्ति माननी चाहिए ? यदि ऐसे कहा जाए कि ये तीनो पदार्थ अनादि है, अतः इन की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, तो इस के उत्तर में कहा जा सकता है कि इसी प्रकार काल से जगत् भी अनादि है, क्योंकि-जगत् भी 'पद्रव्यों का समूह रूप ही है । अपितु जो पर्याय है वह सादि सान्त है । इसलिये जगत् में नाना प्रकार की रचना दृष्टिगोचर हो रही है। जैन-शास्त्री ने एक लोक के तीन विभाग कर दिए हैं, जैसे कि-ऊर्ध्व- लोक १, मध्य लोक २. और अधोलोक ३। ऊर्ध्व लोक मे २६ देवलोक है, जिन का सविस्तर स्वरूप जैन सूत्रों से जानना चाहिए । वहाँ पर देवो के परम रमणीय विमान है। तिर्यक्लोक में असंख्यात द्वीप समुद्र है, जो एक से दूसरा पायाम विभ में दुगुणा २ विस्तार वाला है। उनमे प्रायः पशु और ( वानव्यन्तर) बानमंतर देवो के स्थान है, किन्तु तिर्यक् लोक के अढ़ाई द्वीप में प्रायः तिर्यञ्च और मनुष्यों की वस्ति है। इसी लिय इन्हे मनुप्यक्षेत्र तथा समयक्षेत्र भी कहते है। क्योंकि समय-विभाग इन्ही क्षेत्रों से किया जाता है मनुष्य और तिर्यंची का इस में विशेष निवास है। इन क्षेत्रो में दो प्रकार से मनुप्यो की वस्ति मानी जाती है। जैसे कि- कर्मभूमिक मनुष्य और अकर्मभृमिक मनुष्य । जो अकर्मभूमिक मनुष्य होते है वे तो केवल कल्प वृक्षों के सहारे पर ही अपनी श्रायु पूरी करते है । इन की सर्व प्रकार से खाद्य पदार्थों की इच्छा कल्पवृक्ष ही पूरी करदेते है, वे . । . - ( २५१ ) भावार्थ-कर्मों से ब्राह्मण होता है जैसेकि-"अंध्यापनं, याजनं प्रतिग्रहो बाह्मणानामेव" अध्यापनवृत्ति, याजनकर्म और प्रतिग्रह कर्म अर्थात् पढ़ाना, या करना, दान लेना, इत्यादि कर्म ब्राह्मणों के होते है । इस का सारॉश इतना ही है कि-पूजा के लिये शान्ति के उपायों का चिन्तन करना तथा संतोष वृत्ति द्वारा शान्त रहना. यही कर्म ब्राह्मणों के प्रतिपादन किये गये है, किन्तु "भूतसंरक्षणं शस्त्राजीवनं मत्पुरुपोपकारो दीनोदरण रणेऽपलायन चेति क्षत्रियाणाम्।' प्राणियों की रक्षा, शस्त्रद्वारा श्राजीवन व्यतीत करना, सत्पुरुषों पर उपकार करना, दोनों का उद्धार करना अर्थात् उनके निर्वाह के लिये कार्य-क्षेत्र नियत कर देना संग्राम से नभागना इत्यादि कार्य क्षत्रियों के होते हैं। "चातीजीवनमावशिकपूजनं सत्रप्रपापुण्यारामदयादानादिनिर्मापणं च विशाम्" कृषिकर्म और पशुओं का पालना, प्रार्जव भाव रखना, पुण्यादि के वास्ते अन्न दानादि यथा शक्ति करना प्रारामादि की रचना इत्यादि ये सब कर्म वैश्यो के होते है। "त्रिवर्णोपजीवनं कारुकुशीलवकर्मपुण्यपुटवाहन शूद्राणाम्" तीनो वर्गों की सेवा करनी, नर्तकादि कर्म, भिनुनों का उपसेवन इत्यादि कार्य शद्रों के होत है। जाति परिवर्तनशील नहीं होती, किन्तु कर्मों के आश्रित होने से वर्ण परिवर्तनशील माना जा सकता है। क्योंकि-जाति की प्रधानता जन्म से मानी जाती है और वर्ण की प्रधानता कर्म से मानी जाती है जैसे कि- एकेंद्रियादि चतुरिन्द्रिय जाति वाले जीव मोक्ष गमन नही कर सकते। केवल पंचेन्द्रिय मनुष्यजाति ही मोक्ष प्राप्त करने के योग्य है। अपरंच वर्ण की कोई व्यवस्था नही वांधी गई है। जैसे कि-अमुक वर्ण बाला ही मोक्ष जा सकता है अन्य नहीं। क्योंकि-मोक्ष तो केवल 'सम्यग्दर्शन- ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग " सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यग् चारित्र के ही श्राश्रित है, न तु वर्ण व्यवस्था के आश्रित । यदि कोई कहे कि-शास्त्रों में जाइमपन्ने कुलसपन्ने " इत्यादि पाठ पाते है जिन का यह अर्थ है कि जाति- संपन्न अर्थात् माता का पक्ष निर्मल और पिता का पक्ष फुल संपन्न । तय इनका क्या अर्थ माना जायेगा? इस का उत्तर यह है कि-ये सव कथन व्यवहारनय के आश्रित होकर ही प्रतिपादन किये गये है। किन्तु निश्चय नय के मत मे जो जीव सम्यग्दर्शनादि धारण कर लेता है वहीं मोक्ष गमन के योग्य होजाता है। श्रागे सम्यग्दर्शन में नव तत्त्व का सम्यग् प्रकार से विचार किया १ ये सब सूत्र, ७-८-६ और १० वा नीतिवाक्यामृत के यो ममुद्देश के है।
. ( २५३) २ श्रजीवतत्त्व-जिस में जीवतत्त्व के लक्षण न पाए जायें, उसी का नाम अजीवतत्व है अर्थात् वीर्य तोहो परन्तु उपयोग शक्ति जिस में न हो उसी का नाम अजीवतत्त्व है । जीवतत्व के गुणों से विवर्जित केवल जड़ता गुण सम्पन्न श्रजीवतत्त्व माना जाता है। क्योंकि-यद्यपि घटिकादि पदार्थ समय का ठीक २सान भी कराते हैं. परन्तु स्वयं वे उपयोग शून्य होते हैं । अतएव धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुल ये सब अजीवतत्त्व मे प्रतिपादन किये गए है, किन्तु धर्म, अधर्म, श्राकाश, काल ये सब श्ररूपी अजीव कथन किये गये हैं । अपितु जो पुद्गलद्रव्य है वह वर्ण, गंध, रस और स्पर्श युक्त होने से रूपी द्रव्य माना गया है। इस लिये यावन्मात्र पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं वे सब पुद्गलात्मक है । पुद्गल द्रव्य के ही रूध, देश, प्रदेश और परमाणुपुद्गल संसारी क्रियाएँ करते । इन्हीं का सव प्रपंच होरहा है क्योंकि पुद्गल द्रव्य का स्वभाव मिलना और बिछुड़ना माना गया है, इस लिये प्रायः पुद्गल द्रव्य ही उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य गुण युक्त प्रत्यक्ष देखने में आता है। सो इसी को रूपी अजीव द्रव्य कथन किया गया है। ३ पुण्यतत्त्व-जो संसारी जीवों को संसार में पवित्र और निर्मल करता रहता है उसी को पुण्यतत्त्व कहते हैं । क्योकि -शुभ क्रियाओं द्वारा शुभ कर्म प्रकृतियों का संचय किया जाता है। फिर जब वे प्रकृतियां उदय मे पाती हैं तब जीव को सब प्रकार से सुखों का अनुभव करना पड़ता है । सो उसी को पुण्यतत्त्व कहते है । किन्तु व पुण्यप्रकृतियां नव प्रकार से बांधी जाती wthd जैसेकि- अन्नपुण्य-अन्न के दान करने से ।। पानपुण्य-पानी (जल) के दान से ।२। लयनपुण्य-पर्वतादि में जो शिलादि के गृह बने हुए होते हैं तथा-पर्वत में कृत्रिम गुहादि के दान से । ३ । शयनपुण्य-शय्या वसति के दान से ।४। वस्त्रपुण्य-वस्त्र के दान से । ५। मनोपुण्य-शुभमनोयोग प्रवर्तीने से । ६। वचनपुण्य-शुभ वचन के भापण से । ७ । कायपुण्य-काम के वश करने से ।। नमस्कारपुण्य नमस्कार करने से,। ६ । सो उक्त नव प्रकार से जीव पुण्य प्रकृतियों का संचय करता है जिसके परिणाम में वह नाना प्रकार के सुखों का अनुभव करने लग जाता है और संसार पक्ष में वह सर्व प्रकार से प्रायः प्रतिष्ठित माना जाता है ।
। ( २५५ ) पादन किये गये है तथापि इस के मुख्य दो ही फारण माने जा सकते है एक योगसंक्रमण और दूसरा कपाय । क्योंकि-जब मनोयोग, वचनयोग और काययोग का संक्रमण होगा तथा क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय होगा तय अवश्यमेव कर्म प्रकृतियों का श्रात्मप्रदेशो के साथ परस्पर लोलीभाव हो जायगा । अपितु जब वे प्रकृतियां उदय भाव में श्राजाएँगी तब वे अवश्यमेव फल प्रदान करेंगी। इसी श्राश्रयतत्त्व मे पुण्य और पाप ये दोनो तत्त्व समव- तार हो जाते हैं । अतएव पुण्य प्रकृतियों को शुभ श्राश्रवतत्त्व कहते है और पाप प्रकृतियों को अशुभ प्राश्रवतत्त्व । सो दोनो प्रकृतियां अपने २ समय पर जब उदय भाव में आती है तब श्रात्मा को उन का अवश्यमेव अनुभव करना पड़ता है । सो इसी का नाम श्राश्रवतत्त्व है। ६ संवरतत्त्व-जिन २ मागों से प्राथव श्राता हो उन का निरोध करना अर्थात् कर्मों का जिस से प्रात्मा के साथ सम्बन्ध न हो सके उन क्रियाश्रो को संवरतत्त्व कहते हैं। पूर्व लिखा जा चुका है कि-पुण्य और पाप दोनो ही श्राश्रव है: सो इन दोनों के परमाणुओं का निषेध करना जिस से आत्मा के साथ लोलीभाव न हो सके, वही संवरतत्त्व कहा जाता है। यद्यपि नवतत्त्वप्रकरणादि ग्रंथों में इस तत्त्व के अनेक भेद प्रतिपादन किये गए है। तथापि मुख्य ५ ही वर्णन किये गए है जैसे कि-- १ सम्यक्त्वसंवर-अनादि काल से जीव मिथ्या दर्शन से युक्त है इसी कारण संसार चक्र में परिभ्रमण कर रहा है । जिस समय इस जीव को सम्यक्त्त्व रत्न की प्राप्ति होती है उसी समय संसारचक्र का चक्रदेशोन- अर्द्धपुद्गलपरावर्तन शेष रह जाता है । सम्यग्दर्शन द्वारा पादार्थों के स्व- रूप को ठीक जानकर श्रात्मा अपने निज-स्वरूप की ओर झुकने लग जाता है। मिथ्या दर्शन के दूर हो जाने से सम्यग् ज्ञान प्राप्त हो कर अज्ञान नष्ट हो जाता है । जव सम्यक्त्त्व रत्न जीव को उपलब्ध होता है तब उस की दशा संसार से निवृत्तिभाव और विषयो से अन्तःकरण मे उदासीनता प्राजाती है । पदार्थों के सत्यस्वरूप को जान कर तब वह श्रात्मा मोक्ष पद की प्राप्ति के लिये उत्सुकता धारण करने लग जाता है। अतएव जिस प्रकार श्रीजिनेन्द्र भगवान ने पदार्थों का स्वरूप प्रतिपादन किया है उस भावको अन्तः- करण से सत्य जानना यही सम्यक्त्व का वास्तविक स्वरूप है तथा पदार्थों के ठीक २ भावों को स्वमति वा गुरु श्रादि के उपदेश से जान लेना ही सम्यग् दर्शन कहा जाता है। सोयावकालपर्यन्त प्रात्मा को सम्यग् दर्शन प्राप्त नहीं होता, तावत्काल पर्यन्त मोक्षपद की प्राप्ति से वंचित ही रहता है । सम्यग्दर्शन माप्त होने के पश्चात् उसी समय जीव कोसम्यक्त्व संवर की प्राप्ति हो जाती है - ( २५७ ) कायलेश तप-केश लुंचन वा योग श्रासनादि लगाने ॥ ५ ॥ प्रति संलीनता तप-इंद्रियां वा कपायादि को वशीभूत करना ॥ ६॥ अभ्यन्तर तप प्रायश्चित्ततपकर्म-जय कोई पाप कर्म लग गया हो तव अपने गुरु के पास जाकर शुद्ध भावों से उस पाप की विशुद्धि के लिये प्रायश्चित्त धारण करना ॥१॥ विनय तप-गुरु श्रादि की यथायोग्य विनय भक्ति करना ॥२॥ वैयावृत्य-गुरु प्रादि की यथायोग्य सेवा भक्ति करना ॥ ३ ॥ स्वाध्यायतप-शास्त्रों का विधिपूर्वक पठन पाठन करना ॥ ४ ॥ ध्यानतप-श्रार्तध्यान और रौद्र ध्यान को छोड़ कर केवल धर्म- ध्यान वा शुक्ल ध्यान के श्रासेवन का अभ्यास करना ॥५॥ कायोत्सर्गतप-फाय का परित्याग कर समाधिस्थ हो जाना ॥६॥ इन तप कर्मों का सविस्तर स्वरूप उववाई श्रादि शास्त्रों से जानना चाहिए । सो इन तपों द्वारा कर्मों की निर्जरा की जा सकती है। अतएव इसी का नाम निर्जरातत्त्व है। ८ बंधतत्त्व-जिस समय प्रात्मा के प्रदेशों के साथ कर्मों की प्रकृतियों का सम्बन्ध होता है उसी को बंधतत्व कहते है । सोउस बंधतत्त्व के मुख्य चार भेद है जैसे कि- प्रकृतिबंध--पाठ कर्मों की १४८ प्रकृतियां है उनका श्रात्मप्रदेशों के माथ बंध हो जाना ॥१॥ स्थितिबंध--फिर उक्त प्रकृतियो की स्थिति का होना वही स्थिति- बंध होता है ॥२॥ अनुभागबंध- पाठो कर्मों की जो प्रकृतियां है उनके रसो का अनुभव करना ॥३॥ प्रदेशबंध--पाठ कर्मों के अनंत प्रदेश है तथा जीव के असंख्यात प्रदेशो पर कर्मों के अनंत प्रदेश ठहरे हुए हैं क्षीरनीरवत् तथा अग्नि- लोहपिण्डवत् ॥४॥ ६ मोक्षतत्त्व-जब आत्मा के सर्व कर्म क्षय होजाते है तव ही निर्वाणपद की प्राप्ति होती है। परन्तु स्मृति रहे कि-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यग् चा- रित्र द्वाराही सर्व कर्म क्षय किये जा सकते हैं। कर्मक्षय होने के अनन्तर यह आत्मा शुद्ध, वुद्ध, अजर, अमर, पारङ्गत, परम्परागत, निरंजन, सर्वज्ञ और सर्व- दर्शी तथा अनंत शक्ति युक्त होकर निज स्वरूप मे निमग्न होता हुआशाश्वत सुस में सदैव विराजमान होजाता है। अतएव प्रत्येक प्राणी को संसार के हैं ? ( २५६ ) अब यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि-जैनशास्त्र कर्म के फल से मोक्ष मानता है चा कर्म-क्षय से ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि-- जैनमत कर्म-फल से मोक्ष नहीं मानता किंतु कर्मक्षय से मोक्ष मानता है क्योंकि-मोक्ष पद सादि अनंत पद माना गया है । यदि कमां के फल से मोक्षपद माना जाता तव तो मोक्षपद सादि सांत हो जाता क्योंकि--ऐसा कोई भी कर्म नहीं है जिस का फल सादि अनंत हो । जब कर्म सादि सान्त नव उनका फल सादि अनंत किस प्रकार माना जा सकता है ? अतएव यह स्वतः सिद्ध होगया है कि-कर्म क्षय का ही अपर नाम मोक्ष यदि ऐसे कहा जाय कि-जव श्रात्मा किसी समय भी अक्रिय नहीं हो सकता तो भला फिर अकर्मक किस प्रकार बन जायगा ? इस शंका का उत्तर यह है कि-जिस प्रकार गीले इंधन के जलाने की अपेक्षा सूखा (शुष्क) इंधन शीघ्र भस्म होजाता है ठीक उसी प्रकार जव प्रथम चार घातिये संज्ञक कर्म क्षय हो जाते हैं फिर चार अघातिक संज्ञक कर्म सूखे इंधन के समान रह जाते हैं फिर उनके क्षय करने में विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता । जिस प्रकार जीर्ण वस्त्र के फाड़ने में विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता ठीक उसी प्रकार चार अघातिक संभक कर्मों के क्षय करने में विलम्ब नहीं होता। क्योंकि उस समय ध्यान अनि इतनी प्रचण्ड होती है कि-जिसके द्वारा महान् कमों की निर्जरा की जा सकती है। किन्तु वे कर्म तो जीर्ण काष्ट के समान अत्यन्त निर्बल और नाम मात्र ही शेष होते हैं । अतएव शनै २ योगो का निरोध करते हुए जव श्रात्मा अक्रिय होता है तब उसी समय वे चारो कर्म क्षय होजाते है यदि कोई कहे कि-जव क्रियाओं द्वारा कर्म किया गया तव फिर उन कर्मों की घातिक संगा और अघातिक संज्ञा क्यों बांधी जाती है तथा कर्मों की मूल ८ प्रकृतियां तो उत्तर १४८ प्रकृतिया क्यों मानी गई है ? इस शंका का समाधान इस प्रकार किया जाता है कि वास्तव में कर्म शब्द एक ही है, परन्तु पुण्य और पाप की प्रकृतियों के देखने से शुभ और अशुभ मुख्य दो कर्म प्रतिपा. दन किये गए है। फिर जिज्ञासुओ के बोध के लिये कमों के अनेक भेद वर्णन किये गए है । परन्तु मूल भेद उनके पाठ ही है अर्थात् जब कोई कर्म किया जाता है तय उस कर्म के परमाणु बाट स्थानों पर विभक्त हो जाते है। जिस प्रकार एक डाला हुआ शरीर मे रहने वाले सप्त धातुओं में परिणत हो जाता ठीक उसी प्रकार एक कर्म किया हुश्रा मूल प्रकृतियो वा उत्तर प्रकृतियों रूप में परिणत हो जाता है। उन अाठ मूल प्रकृतियों की 'घातिक' और 'अधातिक' संज्ञा दी गई है। जिन कमी के करने से आत्मा के निज गुणों पर ग्रास मुख में के ( २६१ ) ठीक उसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए। प्रश्न-पायुप्फर्म किसे कहते हैं ? उत्तर-जिसके द्वारा श्रात्मा चारों गतियो मे स्थिति करता है जैसेकि- नरक गति की श्रायु १, तिर्यग् गति की प्रायु २. मनुप्य गति की आयु ३ और देवगति की श्रायुः ।। प्रश्न-नाम कर्म किसे कहते है ? उत्तर-जिस कर्म के द्वारा शरीर की रचना होती है उसे नाम कर्म कहते है । श्रागे शुभ और अशुभ श्रादि इसके अनेक भेद है । प्रश्न-गोत्र कर्म किसे कहते है ? उत्तर--जिस कर्म के द्वारा जाति प्रादि की उच्चता और नीचता दीख पड़ती है, उसे गोत्र कहते है अर्थात् इस कर्म के द्वारा श्रात्मा संसार मे उच्च और नीच माना जाता है। प्रश्न-अंतराय कर्म किसे कहते है ? उत्तर--जिस फर्म के द्वारा नाना प्रकार के विघ्न उपस्थित होते तथा जो पदार्थ पास हैं वे छिन्न भिन्न हो जाएँ और जिन पदार्थों के मिलने की आशा हो. वे न मिल सके तव जानना चाहिए कि अब अंतराय कर्म का विशेप उदय हो रहा है । प्रश्न-ये पाठों ही कर्म किस समय बाँधे जाते हैं? उत्तर-प्रतिक्षण (समय २) पाठो ही कर्म वॉधे जाते हैं, परन्तु आयुप्फर्म प्रायः निज श्रायु के तृतीय भाग मे जीव वांधते हैं । अतः श्रायुप्कर्म को छोड़ कर सातो ही कर्म प्रतिसमय निरन्तर बाँधे जाते है। देव और नारकीय अपनी छ मास श्रायु शेष रहजाने पर परलोक का आयुष्कर्म वॉधते है। मनुष्य और तिर्थचों के सापकर्म वा निरुप कर्म आदि अनेक भेद है परन्तु यह वात निर्विवाद सिद्ध है कि-विना आयुष्कर्म के वॉधे कोई भी जीव परलोक की यात्रा के लिए प्रवृत्त नहीं होता। प्रश्न कर्मों के परमाणु कितने २ होते है ? उत्तर--प्रत्येक कर्म के अनंत २ परमाणु होते है । इतना ही नही किन्तु जीव के असंख्यात प्रदेशो पर कमों के अनंत २ परमाणुत्रो का समूह जमा हुश्रा है, उन्हें कर्मों की वर्गणाये भी कहते हैं । परन्तु स्थिति युक्त होने से अपने २ समय पर उन कर्मों के रस का अनुभव किया जाना है। प्रश्न-पाठ कर्म किस प्रकार जीव वॉधते है ? उत्तर- कट्टणं में ते जीवा अठकम्म पगडीओ बंधइ ? गोयमा 'नाणावरणि- - ( २६३ ) णिज्जकम्मा सरीरप्पयोगनामाए कम्मस्स' उदएणं णाणावराणिजकम्मा मरीरप्पयोगबंधे ॥ भगवतीमूत्रशतक ८ उद्देश ६ । टीका-कम्मासरीरेत्यादिः "णाणपरिणीययाए" ति ज्ञानस्य-शुतादेस्तदभेदात् मानवता या या पत्नीकता-मामान्येन प्रतिकूलता सा तथा तया, "पागनिरहवणयाए" त्ति मानस्य-श्रुतगुरुणा वा गा निखवता-अपलपनं सा तथा तया न्नाणतेराएग" ति ज्ञानस्य-- नस्यान्तराय --तग्राणादी विनो य. य तथा तेन "नारणपोसण"त्ति ज्ञाने---श्रुतादी ज्ञानवत्सु य प्रदेष ----अप्रीति स तय तेन 'नाणऽया सायणाए' त्ति--ज्ञानस्य ज्ञानिना वा याऽत्याशा- नना-हेलना सा तथा 'नाणविमवायणाजोगण" चि जानस्य ज्ञानिना वा विसंवादनयोगो- -यभिचारदर्शनाय व्यापारी य स तथा तेन एतानि च वाद्यानि कारणानि जानावरणीय कामण नरीरयन्धे श्रथाऽनन्तर कारणमाह--'णाणावरणिज्ब' भित्यादि जानावरणीय हेतुत्वेन ज्ञानावर- जयलक्षणे यत्कार्मणशरीरप्रयोग नाम तथा तस्य कर्मण उदयनेति" भावार्थ-श्री गौतम स्वामी श्रीश्रमण भगवान् महावीर प्रभु से पूछते है कि-हे भगवन् ! शानावरणीय कार्मण शरीरप्रयोगवंध किस कर्म के उदय मे होता है ? इस प्रश्न के उत्तर में श्री भगवान् प्रतिपादन करते है कि हे गौतम ! छः कारणों से श्रात्मा शानावरणीय कर्म को वांधते है और ज्ञानावर- गीय कार्मण शरीरप्रयोग नाम कर्म के उदय से ज्ञानावरणीय कार्मण शरीर प्रयोग का बंध कथन किया गया है। किन्तु जो मानावरणीय कर्म का बंध छः प्रकार स प्रतिपादन किया गया है वह निम्न प्रकार से जानना चाहिए जैसेकि- १ शान और ज्ञानवान् श्रात्मा की प्रतिकूलता करने से। २श्रुतज्ञान वा श्रुतगुरु उन का नाम छिपाने से अर्थात् ज्ञान को छिपाना और मन में यह भाव रखना कि-यदि अमुक व्यक्ति को श्रुत शान सिखला दिया तव उस का महत्व बढ़ जाएगा तथा जिस से मै पढ़ा है उसका नाम बतला दिया तो मेरी अपेक्षा से उस की कीर्ति बढ़ जाएगी वा अन्य व्यक्ति जाकर उस से पढ़ लेगे इत्यादि कुविचारो से ज्ञान को वा श्रुत गुरु के नाम को छिपाते । रहना। ३ श्रुतशान के पढ़ने वालो को सदैव काल विघ्न करते रहना जिससे कि वे पढ़ न सकें। मन में इस बात का विचार करते रहना कि-यदि ये पढ़ गए तो मेरी कीर्ति न्यून हो जायगी। ४ शान वा शानवालों से द्वेप करना अर्थात् जो मूढ़ हैं उन से प्रेम और जो ज्ञानवान् है उनके साथ देष । इस प्रकार के भावों से ज्ञानावरणीय कर्म का चंध किया जाता है।
( ०६५ ) अतिप्पणयाए अपिहणयाए अपरियावणयाए एवं खलु गोयमा! जीवाणं साया चेयणिज्जा कम्मा कजंति ॥ भगवती सूत्र शतक ८ उद्देश ६ । भावार्थ-(प्रश्न) हे भगवन् ! सातावेदनीय कार्मणशरीरप्रयोग बंध फिस कर्म के उदय से होता है ? ( उत्तर) हे गौतम ! प्राणियों की, भूतो की, जीवों की, सत्वों की अनुकंपा करने से, बहुत से प्राणी यावत् सत्वों को दुःस न देने से, दैन्य भाव उत्पन्न न करने से, शोक उत्पन्न न करने से, अधुपात न कराने से, यष्टयादि के न तादने से, शरीर को परिताप न देने से । इस प्रकार हे गौतम ! जीव साता वेदनीय कर्म को वांधते हैं । इस सूत्र का यह मन्तव्य है कि-सातावेदनीय कर्म प्राणी मात्र को साता देने से वांधा जाता है जिस का परिणाम जीव मुखरूप अनुभव करते हैं। प्रश्न-असाता वेदनीय कर्म किस कारण से बांधा जाता है ? उत्तर-जीवों को साता उत्पन्न करने से क्योकि-जिस प्रकार जीवो को दुःखों से पीड़ित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार असाता (दुःख ) वेदनीय कर्म का रस अनुभव करने में श्राता है। तथा च पाठः- अस्साया वेयणिजपुच्छा, गोयमा ! परदुक्खणयाए परसोयणयाए परजूरणयाए परतिप्पणयाए परपिहणयाए परपरियावणयाए वहूणं पाणाणं जाव सत्ताणं दुक्खणयाए सोयणयाए जाव परियावणयाए एवं 'सलु गोयमा ! जीवा अस्साया वेयणिज्जा जावप्पयोगबंधे । भगवती सू० शतक ८ उद्देश है। भावार्थ-जिस प्रकार जीवा को सुख देने से साता वेदनीय कर्म वाधा जाता है ठीक उसी प्रकार दुःख देने से, सोच कराने से, शरीर के अपचय (पीड़ा ) करने से, अश्रुपात कराने से, दंडादि द्वारा ताड़ने से, शरीर को परिताप न देने से असाता वेदनीय कर्म वाधा जाता है । जिस का परिणाम दु.ख रूप भोगना पड़ता है। प्रश्न--मोहनीय कर्म किस प्रकार से वांधा जाता है और मोहनीय जीव को फर्म किसे कहते है ? उत्तर-जिस कर्म के करने से श्रात्मा धर्ममार्ग से पराड्मुख रहे और सदैव काल पौगलिक सुखो की अभिलापा करता रहे उसे ही मोहनीय कर्म कहते है। जिस प्रकार मदिरापान करने वाला जीव तत्त्व विचार से पतित हो जाता है ठीक उसी प्रकार मोहनीय कर्मवाला जीव प्रायः धर्म क्रियानो से - , जाता है ? हे शिप्य ! देवभव की आयु चार कारणो से बांधी जाती है। जेसकि-राग भाव पूर्वक साधु वृत्ति पालन से गृहस्थ धर्म पालन करने से, अमानता पूर्वक कष्ट सहने से, अकामनिर्जरा (वस्तु के न मिलने से) ( २६७ ) तिरिक्ख जोणियाउयकम्मासरीरप्पयोग पुच्छा, गोयमा ! माइल्लि- याए नियडिल्लयाए अलियवयणेणं कूडतुलकूडमाणेणं तिरिक्खजोणिया उयकम्मासरीर जावप्पयोगबंधे। भग० श० ८ उद्देश : भावार्थ-हे भगवन् ! तिर्यग्योनिकायुप्कार्मण शरीर प्रयोग का बंध किस कारण से किया जाता है ? इसके उत्तर में श्री भगवान् कहते है कि- गौतम ! पर के वंचन (छलने) की बुद्धि से, वंचन के लिये जो चेष्टाएँ हैं उन में माया का प्रच्छादन करने से अर्थात् छल में छल करने से, असत्य भापण से और कूट तोलना और कृट ही मापना इस प्रकार की क्रियाश्रो के करने से जीव पशु योनि की आयु बांध लेता है । जिसका परिणाम यह होता कि वह मर कर पशु वन जाता है। प्रश्न-मनुष्य की श्रायु जीव किन २ कारणों से वांधते है ? उत्तर--भद्रादिक्रियाओं के करने से जीव मनुष्य की प्रायु को बांध मणुस्साउयकम्मा सरीर पुच्छा, गोयमा ! पगइभद्दयाए पगइ- विणीययाए साणुकोसयाए अमच्छरियाए मणुस्साउयकम्माजावप्पयोगबंधे । भावार्थ-हे भगवन् ! मनुष्य की आयु जीव किन २ कारणों से बांधने है ' हे शिष्य ! स्वभाव का भद्रता से, स्वभाव से ही विनयवान होने से, अनु- कपा के करने से और परगुणों मे असूया न करने से अर्थात् किसी पर ईर्ष्या न करने से । इन कारणों से मनुष्यायुष्कार्मण शरीर का बंध किया जाता है। प्रश्न -देव की श्रायु किन २ कारणो से वांधी जाती है ? उत्तर-सराग संयमादि क्रियात्रो से देवभव की आयु वांधी जाती है देवाउयकम्मासरीर पुच्छा, गोयमा ! सरागसंजमेणं संजमासंजमेणं बालतबोकम्मेणं अकामनिज्जराए देवाउयकम्मा सरीरजावप्पयोगबंधे ॥ भगवती, सू० शतक ८ उद्देश ॥६॥ भावार्थ-हे भगवन् ! देवायुष्कार्मण शरीर किन २ कारणों से वांधा लता है जैसेकि- . भग० श०० उ०६। जैसेकि- ( २६६ ) प्रश्न-ऊंचगोत्र नाम कार्मण शरीर प्रयोगवध किस प्रकार से किया जाता है ? उत्तर-किसी भी प्रकार से अहंकार न किया जाए अर्थात् किसी पदार्थ के मिलने पर यदि गर्व न किया जाए तव प्रात्मा ऊंचगोत्र कर्म की उपा- जना करलेता है । जैसेकि-- उच्चागोयकम्मासरीरपुच्छा, गोयमा ! जातिअमदेणं कुलअमदेणं बलअमदेणं रूवअमदणं तवरमदेणं सुयअमदेणं लाभअमदेणं इस्स- रिय अमदेणं उच्चागोयकम्मा सरीर जावप्पयोगवंधे, ॥ मग० शत० उ०६॥ भावार्थ-हे भगवन् ! ऊंचगोत्र नाम कार्मण शरीर प्रयोग का बंध किस प्रकार से किया जाता है ? हे शिष्य ! जाति, कुल, बल, रूप, तप, श्रुत, लाभ. और ऐश्वर्य कामद न करने से ऊंचगोत्र नाम कार्मण शरीर प्रयोग का बंध किया जाता है अर्थात् किसी भी पदार्थ का गर्व न करने से ऊंचगोत्र कर्म की उपार्जना की जाती है। प्रश्न-नीचगोत्र कर्म किस प्रकार से बांधा जाता है ? उत्तर-जिन २ कारणों से ऊच्च गोत्र कर्म का बंध माना गया है ठीक उसके विपरीत नीच गोत्र कर्म का बंध प्रतिपादन किया गया है। जैसेकि- नीया गोयकम्मासरीर पुच्छा, गोयमा ! जातिमदेणं कुलमदेणं चल- मदेणं जाव इस्सरियमदेणं णीयागोयकम्मासरीर जावप्पयोगवंधे । भग०सू०शतक - उदेश भावार्थ-हे भगवन् ! नीच गोत्र कर्म जीव किन २ कारणो से वांधते ? हे शिष्य ! जाति, कुल, वल, यावत् ऐश्वर्य का मद कर ने से जीव नीच गोत्र कर्म की उपार्जना कर लेते हैं, इस सूत्र का प्राशय यह है कि जिस पदार्थ का मद किया जाता है वास्तव मे वही पदार्थ उस आत्मा को फिर कठिनता से उपलब्ध होता है क्योकि--वास्तव मे जीव की ऊंच और नीच संना नहीं है. शुभ और अशुभ पदार्थों के मिलने से ही ऊंच और नीच कहा जा सकता है । सो आठ कारण स्फुट रूप से ऊपर वर्णन किये जाचुके हैं। प्रश्न--अंतरायकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर-जिस कर्म के उदय से कार्यों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित हो जावे. उसका नाम अंतराय कर्म है। क्योंकि--मन मे कार्य की सिद्धि के लिये अनेक प्रकार के संकल्प उत्पन किये गए थे परन्तु सफलता किसी कार्य की भीन होसकी । तव जान लेना चाहिए कि--अंतराय कर्म का उदय होरहा है।
। ( २७१ ) स्वभाव भी होना चाहिए, क्योंकि यदि वीज दग्ध है वा अन्य प्रकार से उसका स्वभाव अंकुर देने का नही रहा है तब वह वीज फलप्रद नहीं होगा । अतः वीज का शुद्ध स्वभाव होना चाहिए. फिर स्वभावानुसार नियति (होनहार ) होनी चाहिए जैसे कि-खेती की रक्षादि। फिर लाभप्रद कर्म होना चाहिए जिससे खेतीधान्या से निर्विघ्नता पूर्वक पूर्ण होजावे।जव ये कर्म अनुकूल हों तव फिर उस खेती की सफलता सर्वथा पुरुषार्थ पर ही निर्भर है क्योंकि-उक्त चारों कारों की सफलता केवल पुरुषार्थ पर ही अवलम्बित है। कल्पना करो कि-समय, स्वभाव, नियति भवितव्यता) और कर्म ये चारों अनुकूल भी हो जाएँ, परन्तु चारा की सिद्धि में पुरुषार्थ नहीं किया गया तब चारों ही निष्फल सिद्ध होगे । सिद्ध हुआ कि प्रत्येक कार्य में पूर्वोक्त पाँचों समवायों की अत्यन्त आवश्यकता है। सो जिस समय जीव कर्मों के फल को भोगने लगता है तब उस फल को भोगने के लिये पॉच ही समवाय एकत्र हो जाते हैं। यदि ऐसे कहा जाय कि-कर्म तो जड़ है, वे जीव को फल किस प्रकार दे सकते हैं ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि-ऋतु (काल) तो जड़ है यह पुष्पों वा वृक्षों को प्रफुल्लित किस प्रकार कर सकती है ? तथा मदिरा भी तो जड़ है यह पीने वाले को अचेत किस प्रकार करदेती है ? इसी प्रकार कर्म जड़ होने पर भी पाँचो समवायों के मिल जाने पर श्रात्मा को शुभाशुभ फलों से युक्त करदेते है । जिस समय जीव कर्म करता है उसी समय उसके उदय वा उपशमादि निमित्तों को भी बाँध लेता है। जिस प्रकार जब किसी व्यक्ति को किसी रोग का चक्र ( दौरा ) आने लगता है तब उसे रोकने के लिये वैद्य लोग अनेक प्रकार की औषधियो का उपचार करते है, और क्रमशः चेष्टायो से सफल मनोरथ हो जाते है। जिस प्रकार रोग चक्र का उदय और उपशम होना निश्चित है ठीक उसी प्रकार जो कर्म किये जा चुके है उन कर्मों का उदय वा उपशम होना भी प्रायः वॉधा हुश्रा होता है। साथ ही नूतन भी उपक्रम अात्मा निज भावो से उत्पन्न कर लेता है कारणकि- आत्मा वीर्ययुक्त माना गया है, वह अपने वीर्य द्वारा नूतन निमित्तादि भी उत्पन्न कर सकता है। सो आत्मा निज कर्मों के अनुसार ही सुख दुःख का अनुभव करता है। कर्मों का ठीक २ विज्ञान होने पर ही आत्मा फिर उनसे विमुक्त होने की चेष्टा करेगा। क्योकि-यदि शान ही नहीं तो भला फिर उनसे छूटने का उद्योग किस प्रकार किया जा सकता है ? सम्यग्ज्ञान होने से ही जीव चारित्रारूढ़ हो सकता है। श्री भगवान् ने भगवती सूत्र में निन्न प्रकार से जनता को दांत देकर समझाया है। जैसेकि- अत्थि णं भंते ! जीवाणं पावाकम्मा पावफलविवागसंजुत्ताकज्जति ? । । ।
है करने के पश्चात् जेसेकि-- ( २७३ ) चिप प्रथम तो कोई हानि उत्पन्न नहीं करता, किन्तु जब चिप परिणत होजाता है. तब शरीर की दशा को विगाद कर मृत्यु तक पहुंचाता है, उसी प्रकार पापकर्म जय किया जाता है तब तो प्रिय लगता परन्तु बहुत दुःसोत्पादक होजाता है। अतः जिस प्रकार विप ने काम किया ठीक उसी प्रकार पाप कर्म फल देता है। श्रय कालोदायी श्री भगवान् से शुभ कर्म विषय फिर प्रश्न करते है । अस्थिणं भंते ! जीवाणं कल्लाणाकम्मा कल्लाणफलविवाग संजुत्ता कजंति ! हता अत्थि,कहणं भंते ! जीवाणं कल्लाणाकम्मा जाव कजति ? कालो- दाई ! से जहा नामए केइ पुरिसे मणुन्नं थालीपागसुद्धं अहारस बंजणाकुलं ओसहमिस्सं भोयण भुजेजा ! तस्सणं भोयणस्स आवाए नो भद्दए भवइ,तो पच्छा परिणममाणे २ मुरूवत्ताए सुवन्नत्ताए जाव सुहत्ताए नो दुक्खत्ताए भुज्जो २ परिणमति, एवामेव कालोदायी ! जीवाणं पाणाइवाय वेरमणे जाव परिग्गह वेरमणे कोह विवेगे जाव मिच्छादसणसल्ल विवेगे तस्सणं आवाए नो भदए भवइ तो पच्छा परिणममाणे २ सुरूवत्ताए जाव नो दुक्खत्ताए भुज्जो २ परिणमइ एवं खलु कालोदाई ! जीवाणं कल्लाणा कम्मा जाव कज्जति ॥ भग०शतक ७ उद्देश १० ॥ भावार्थ- कालोटायी श्री श्रमण भगवान महावीर प्रभु से पूछते हैं कि- हे भगवन् ! क्या जीवों को कल्याणकारी कर्म कल्याण फल विपाक से युक्त करते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर मे श्री भगवान् ने प्रतिपादन किया कि हे कालो- दायिन् ! हॉ, कल्याणकारी कर्म जीवों को कल्याण फल से युक्त करते हैं। नव फिर उदायिन ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! किस प्रकार उक्त कर्म कल्याण फल से युक्त करते है ? उत्तर में श्री भगवान् ने कथन किया कि हे कालोदायिन् ! जैसे किसी पुरुप ने स्थालीपाक शुद्ध अष्टादश व्यंजनों से शुद्ध और पवित्र भोजन औषध से मिश्रित खा लिया । तब खाते समय वह भोजन उस पुरुष को प्रिय नहीं लगता है क्योंकि-औषध के कारण उस का रस कटुकादि होगया है। किन्तु जब उस भोजन का परिणमन होता है तब उस पुरुष के रोग दूर होजाने से उस की सुरूपता और सुवर्णता तथा सुखरूप भाव में वह भोजन परिणत होजाता है, ठीक उसी प्रकार हे कालोदायिन् ! जय जीव हिंसादि १८ पाप कर्मों को छोड़ता है तब उस समय तो उस जीव को कष्ट साप्रतीत होता है क्योकि-दुष्ट कर्मों का जव परित्याग करना पड़ता है तब मन श्रादि संकल्पो का निरोध करना अति कठिन सा प्रतीत होने लगता है, ।
। , ( २७५ ) सम्पन्ध होने पर शोक करना । (३) पीदाचिन्तवन-पीड़ा रोग होने पर दुःखी होना । (8) निदान -श्रागामी भोगों की चाह से जलना । रौद्रध्यान-चार तरह का होता है । (१) हिंमानन्द-हिंसा करने कराने में व हिंसा हुई सुनकर आनन्द मानना । (२) गृपानन्द-असत्य बोलकर, बुला- कर व बोला हुश्रा जान करानन्द मानना । (३) चीर्यानन्द-चोरी करके, कराके व चोरी हुई सुनकर अानन्द मानना । (४) परिमहानन्द-परिग्रह बढ़ाकर, बढ़- वाकर व बढ़ती हुई देखकर हर्ष मानना । धर्मध्यान-चार प्रकार का है। (१) आज्ञाविषय-जिनेन्द्र की आज्ञा- नुसार श्रागम के द्वारा तत्वों का विचार करना । (२) अपायविचय- अपने व अन्य जीवों के अज्ञान व कर्म के नाश का उपाय विचार करना (३) विपाकविचय-आपको व अन्य जीवो को सुखी या दुःखी देखकर कर्मों के फल का स्वरूप विचारना । (४) सस्थानविचय-इस लोक का तथा प्रात्मा का प्राकार वा स्वरूप का विचार करना । इसके चार भेद है: (१) पिंडस्थ (२) पदस्थ (३) रूपस्थ (४) रूपातीत । पिंडस्थध्यान ध्यान करने वाला मन, वचन, काय शुद्धकर एकान्त स्थान मे जाकर पद्मा- सन या खड़े श्रासन व अन्य किसी सिद्धादि श्रासन से तिष्ठकर अपने पिंड या शरीर में विराजित श्रात्मा का ध्यान करे। सो पिंडस्थ ध्यान है । इसकी पांच धारणाएं हैं: १ पार्थिवीधारणा-इस मध्यलोक को क्षीर समुद्र के समान निर्मल देख कर उसके मध्य में एक लाख योजन व्यास वाला जम्बूद्वीप के समान ताए हुए सुवर्ण के रंग का एक हज़ार पॉखड़ी का एक कमल विचारे । इस कमल के सुमेरु पर्वत समान पीत रंग की ऊँची किर्णिका विचारे । फिर इस पर्वत के ऊपर पारडुक वन में पाराहुक शिला पर एक स्फटिक मणी कासिंहासन विचारे और यह देखे कि मैं इसी पर अपने कर्मों को नाश करने के लिये बैठा है। इतना ध्यान वार वार करके जमावे और अभ्यास करे । जव अभ्यास होजावे तब दूसरी धारणा का मनन करे। २ अग्निधारणा-उसी सिंहासन पर बैठा हुश्रा ध्यान करने वाला यह सोचे कि मेरे नाभि के स्थान मे भीतर ऊपर मुख किये खिला हुवा एक १६ पॉखड़ी का श्वेत कमल है। उसके हर एक पत्ते पर श्रश्रा इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः ऐसे १६ स्वर क्रमसे पीले लिखे है व बीच में है पीला लिखा है। इसी कमल के ऊपर हृदय स्थान में एक कमल श्रोधा खिला हुअा अाठ पत्ते का उड़ते हुए काले रगं को विचारे जो ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय. मोहनीय, श्रायु, नाम, गोत्र, अन्तराय, ऐसे आठ कर्म रूप है ऐसा सोचे।
( २७७ ) ३ पवनधारणा-दूसरी धारणा का अभ्यास होने के पीछे यह सोचे कि मेरे चारों ओर पवन मंडल घूमकर राय को उदा रहा है । उस मंडल में सब ओर स्थाय स्वाय लिया है। ४ जलधारणा-तीसरी धारणा का अभ्यास होने पर फिर यह सोचे कि मेरे ऊपर काले मेघ श्रागये और खूब पानी बरसने लगा । यह पानी लगे हुए कर्म मैल को धोकर श्रात्मा को स्वच्छ कर रहा है। पपपप जल मंडल पर सब पोर लिखा है ।। ५तत्वरूपवती धारणा-चौथी का अभ्यास होजावे तव अपने को सर्व कर्म व शरीर रहित शुद्ध सिद्ध समान अमूर्तिक स्फटिकवत् निर्मल श्राकार देगना रहे: यह पिंडस्थ श्रात्मा का ध्यान है। पदस्थध्यान पदस्थ ध्यान भी एक भिन्न मार्ग है । साधक इच्छानुसार इस का भी अभ्यास कर सकता है। इसमें भिन्न पदार्थों को विराजमान कर ध्यान करना चाहिए । जैसे हृदय स्थान में श्राठ पांखड़ी का सुफेद कमल सोचकर उसके श्राट पत्तों पर क्रम से पाठ पद पीले लिखे। (१) णमो अरहंताणं (२) णमो सिद्धा- रणे (३) णमो भाइरीयाणं (४) णमो उवज्झायाणं (५) णमो लोएसव्वसाहणं (६) सम्यग्दर्शनाय नमः ७ सम्यग्शानाय नमः ८ सम्यश्चरित्राय नमः और एक एक पद पर रुकता हुश्रा उस का अर्थ विचारता रहे । अथवा अपने हृदय पर या मस्तक पर या दोनो भोहों के मध्य में या नाभि में है या ऊँ को चमकता सूर्य सम देखे व अरहंत सिद्ध का स्वरूप विचारे इत्यादि । रूपस्थध्यान ध्याता अपने चित्त मे यह सोचे कि मैं समवशरण मे साक्षात् तीर्थकर भगवान् को अन्तरिक्ष ध्यानमय परम वीतराग छत्र चामरादि पाठ प्रातिहार्य सहित देख रहा हूँ । १२ सभाएँ है जिनमें देव. देवी, मनुष्य, पशु, मुनि श्रादि बैठे है, भगवान् का उपदेश होरहा है - स्वाय -- N स्वाय ध्यानाकार स्वाय अग्नि पपपपपप पपपपपप पपपपपप पपपपपप . स्वाय एक पुरुष । ( २७६ ) के अन्तःकरण में नाना प्रकार की भाषाओं के वर्षों की श्राकृतियां परस्पर एक रूप होकर ठहरती है उसी प्रकार मुक्तात्मा भी परस्पर प्रात्मप्रदेशो द्वारा सम्मिलित होकर विराजमान है । यदि कोई शंका करे कि-जिस प्रकार के अन्तः करण में भापात्रों के वणों की प्राकृतियां स्थित है. उसी प्रकार एक ईश्वर के रूप में अनेक मुकात्माएँ भी विराजमान कह सकते है ? इस के उत्तर में कहा जासकता है कि-जव सिद्ध पद अनादि स्वीकार किया गया नव सर्व सिद्ध परस्पर एक रूप होकर ठहरते है क्योंकि- सद्धात्मा पुदल से रहित स्वगुण में विराजमान है। कर्म क्षय का नाम ही क्षपद है कर्मफल का नाम मोक्षपद नहीं है। इसी लिये किसी एक जीव की अपेक्षा से सिद्धपद सादि अनंत माना गया है और बहुत से सिद्धों की अपेक्षा न सिद्धपद अनादि अनन्त प्रतिपादन किया गया है । अत. सिद्ध नगवान् श्रपुनरावृत्ति वाले होते हैं-कारण कि-बद्ध अात्माएँ स्थिति युक्त जाते है, न तु मुक्तात्मा । लौकिक पक्ष में भी देखा जाता है कि जो प्रात्माएँ इष्ट कर्मों के प्रभाव से कारागृह में जाती है उनकी तो स्थिति बांधी जाती , परन्तु जब वह कारागृह का दंड भोग कर मुक्त होती है तव राजकीय पत्र मादि (गैज़ट ) में फिर यह नहीं लिखा जाता कि-अमुक श्रात्मा अमुक दिन रागृह से मुक्त की गई अथवा अमुक समय पर फिर कारागृह में श्राएगी। मतपच सिद्ध हुआ कि -मुक्तात्मा का फिर संसार मे श्रागमन युक्तियुक्त ही है," यदि कोई कहे कि-यदि मुस्तात्माएँ फिर संसार में नहीं आएँगी Tसंसारचक्र में जीवों का अस्तित्व भाव नहीं रहेगा। कारण कि जिस दार्थ का समय २ पर व्यय ही हो रहा है उस की समाप्ति अवश्य मानी येगी? इस शंका के उत्तर में कहा जासकता है कि-अात्मा (जीव ) अनंत और जो अनंत पदार्थ है उसका कदापि अंत नही होसकता, क्योकि- दि अनंत का भी अंत माना जायगा तव उस पदार्थ का अंत भाजाने से- नंत न कहना चाहिए। यदि तर्क किया जाए कि-काल द्रव्य भी तो अनंत क्योंकि-अनंत काल अनंत पदार्थ को लेलेगा? इसके उत्तर मे कहा जास- ता है कि-ईश्वरकर्तृत्ववादियों ने माना हुआ है कि-अनंतवार ईश्वर मान्मा ने सृष्टि उत्पादन की और अनंत ही वार सृष्टि का प्रलय किया ® नोट--जो लोग मोक्ष से पुनराचि मानते है, वास्तव में उन लोगों ने स्वर्ग को ही से समझा है। क्योंकि-स्वगीयात्मा पुनरावृत्ति करता रहता है और उन लोगो की मोक्षावधि मानी हुई है उम अवधि से जैनसूत्रकारों ने स्वर्ग की अवधि कई गुणा अधिक प्रति- दन की है।
१ ( २८१ ) पन्न करते हैं कि हे भगवन् ! क्या अकर्मक जीवों की भी गति स्वीकार की जाती है ? इस पर श्री भगवान् उत्तर प्रदान करते है कि-हॉ, गौतम ! अक- मक जीची को भी गति स्वीकार की जाती है। जय श्री भगवान् ने इस प्रकार से उत्तर प्रतिपादन किया तब श्री गौतम स्वामी ने फिर प्रश्न किया कि- हे भगवन् ! किस प्रकार अकर्मक जीवों की गति मानी जाती है ? तव श्री भगवान ने प्रतिपादन किया कि हे गौतम ! कर्ममल के दूर होने से, मोह के दूर करने से, गति स्वभाव से, बंधनछेदन से, कमन्धन के विमोचन से, पूर्व प्रयोग से, इन कारणों से अकर्मक जीवों की गति जानी जाती है। अब उक्त कारणो से दृष्टान्तों द्वारा स्फुट करते हुए शास्त्रकार वर्णन करते है । से जहानामए---केइ पुरिसे सुकं तुंवं निच्छिई निरुवहयति आणुपुच्चीए परिकम्मेमाणे २ दम्भेहिय कुसेहि य वेढेइ २ अहिं मट्टियालेवेहिं लिंपइ २ उण्हे दलयति भूर्ति २ सुकं समाणं अत्थाह मतारमपोरसियंसि उदगंसि पक्खिवेज्जा, से नूणं गोयमा ! से तुंवे तेसिं अट्ठण्हं मट्टियालेवेणं गुरुपत्ताए भारियत्ताए गुरुसंभारियत्ताए सलिलतलमतिवइत्ता अहे- धरणितल पइटाणे भवइ ?, हंता भवइ, अहेणं से तुंबे अट्ठएहं मट्टियालेवेणं परिक्खएणं धरणितलमतिवइत्ता उप्पि सलिलतलपइटाणे भवइ ?, हंता भवइ, एवं खलु गोयमा ! निस्संगयाए निरंगणयाए गइ परिणामेणं अकम्मस्स गई पन्नायति । भावार्थ- श्रीभगवान् गौतमस्वामी को उक्त विषय पर हटान्त देकर शिक्षित करते हैं, जैसे कि-हे गौतम ! कोई पुरुप शुष्क [सुक्का] तुंवा जो छिद्र से रहित, वातादि से अनुपहत उसको अनुक्रम से परिक्रम करता हुआ दर्भ कुशा से वेटन करता है फिर आठ बार मिट्टी के लेप से उसे लेपन देता है, फिर उसे वारम्वार धूप में सुखाता है । जव तुंचा सर्व प्रकार से सूख गया फिर अथाह और न तैरने योग्य जल में उस तुवे को प्रक्षेप करता है, फिर हे गौतम ! क्या वह तुंचा जो उन पाउ प्रकार के मिट्टी के लेप से गुरुत्वभाव को प्राप्त होगया है और भारी होगया है, अतः गुरुत्व के भार से पानी के तल को अतिक्रम करके नीचे धरती के तल में प्रतिष्ठान नहीं करता है ? भगवान् गौतम जी कहते हैं कि-हॉ. भगवन् ! करता है अर्थात् पानी के नीचे चला जाता है। पुन भगवान् बोले कि हे गौतम ! क्या वह तुंबा अाठ मिट्टी के लेपों को परिक्षय करके धरती के तल को अतिक्रम करके जल के ऊपर नहीं आजाता है ? इसके उनर में गौतम स्वामी जी कहते हैं कि-हाँ भगवन् !
. ( २८३ ) भावार्थ-हे भगवन् ! पूर्व प्रयोग के द्वारा अकर्मक जीव की गति किस प्रकार स्वीकार की जाती है। हे गौतम ! जिस प्रकार धनुष से तीर छूटकर फिर लन्याभिमुख होकर गति करता है ठीक उसी प्रकार-निसंगता से निरंगता से यावत् पूर्व प्रयोग से अकर्मक जीव की गति होती है क्योंकि- यावन्मात्र धनुप् वाण के चलाने वालों का बल होता है तावन्मात्र ही वह नीर लक्ष्य की ओर होकर गति की ओर प्रवृत्त हो जाता है, इसी प्रकार जव अात्मा तीनों योगों का सर्वथा निरोध कर शरीर से पृथक् होता है तब वह स्वाभाविक ही गति करता है, अतएव सिद्ध हुश्रा कि-अकर्मक जीव लोकाय पर्यन्त गति कर फिर वहॉ पर सादि अनंत पद वाला होकर विराजमान हो जाता है। अब यदि इस स्थान पर यह शंका हो कि-पहिले कर्म या पीछे जीव हुआ, तो इसका समाधान इस प्रकार है कि कर्म कर्ता के अधीन होता है क्योंकि-कर्ता की जो किया है उसका फलरूप कर्म है। सो जब कर्ता में क्रिया ही उत्पन्न नहीं हुई तो भला कर्म कर्ता से पहिले किस प्रकार वन सकता है, अतएव यह पक्ष किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं हो सकता कि कर्ता के पहिले कर्म उत्पन्न हो गया। यदि ऐसे कहा जाय कि-पहिले जीव मान लिया जाए फिर कर्म मान लेने चाहिये, सो यह पक्ष भी युक्ति क्षम नहीं क्योकि-फिर पहिले जीव को कमां से सर्वथा रहित मानना पड़ेगा जव जीय सर्वथा कर्मों से रहित सिद्ध होगा तो फिर इस आत्मा को कर्म लगे ही क्यो ? यदि ऐसे माना जाय कि-विना किए ही कर्म जीव को लग गये, तब यह शंका उपस्थित होती है कि-जव विना किये कर्म लग सकते हैं तो फिर जो सिद्धात्मा सर्वथा कर्मों से रहित है उन को क्यो नही कर्म लगते । अतएव यह पक्ष भी ठीक नहीं है। यदि ऐसे माना जाय कि-कर्म और आत्मा युगपत् समय उत्पन्न होगये तव इसमें यह शंका उत्पन्न होती है कि-जब कर्म और जीव की उत्पत्ति मानी जायेगी तब जीव और कर्म दोनो सादि सान्त हो जायेगे तथा फिर दोनो के कारण कौन कौन से माने जायँगे? क्योंकि-जब जीव और कर्म कार्य मानलिये गये तो फिर इन दोनो के कारण कौन २ से हुये । अतः यह पक्ष भी स्वीकृत नही हो सकता । यदि ऐसे माना जाय कि-जीव को से सदैव काल ही रहित है, तो इसमें यह शंका उपस्थित होती है कि-फिर इस संसार में यह जीव जन्म मरण दु.ख वा सुख क्यो उठा रहा है? क्योकि-विना कर्मों के उक्त कार्य नही हो सकते । क्यों कि यदि कर्मों के विना भी दुःख वा सुख प्राप्त हो सकता है तो फिर सिद्धात्मा भी सुख वा दुःख के भोगने वाले सिद्ध हो जायेंगे। श्रतएव यह मानना भी युक्ति संगत सिद्ध नही होता है ।
( २८५ ) माथ ( पुनल कर्मों का) सम्बन्ध है तब तक ही श्रात्मा मे फर्म आते जाते रहते है। क्योंकि-पुद्गल में परस्पर श्राफर्पण शक्ति विद्यमान है । पुद्गल को पुद्गल श्राकर्पण करता है । अतएव सिद्ध हुया कि-दोनों नयों का मानना युक्तियुक्त है स्योंकि-यदि इस प्रकार से न माना जायगा तब अत्मा के साथ कर्मों का तादात्म्य सम्बन्ध सिद्ध हो जायगा जिसे फिर इस श्रात्मा का निर्वाणपद प्राप्त करना असभव सिद्ध होगा। इसलिये संवर द्वारा नूतन कर्मों के श्राश्रय का निरोध कर प्राचीन कर्मों का ध्यानतप द्वारा क्षय करना चाहिए। यद्यपि जैनमूत्रों तथा कर्मग्रथों में अनक स्थलों पर कर्मों की विस्तृत व्याख्या की गई है तथापि इस स्थान पर केवल दिग्दर्शन के लिये श्राठों भूल प्रकृतियों के नामोल्लेख किये गए है ताकि जिज्ञासु जनों को इस विपय में अधिक रुचि उत्पन्न हो । यत् किंचित् मात्र इस स्थान पर लिखने का प्रयोजन इतना ही था कि-बद्ध को मोक्षपद होसकता है नतु मुक्त को । संसारी जीव उक्त बाठों प्रकार के कर्मों से लिप्त हैं। जव वे उक्त कर्मों के बंधनो से विमुक्त होजायेंगे तब ही मोक्षपद प्राप्त कर सकेंगे। अतएव प्रत्येक प्रास्तिक जिज्ञासु प्रात्मा को योग्य है कि-वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग् चारित्र द्वारा कर्मा से रहित होकर अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंतसुख और अनत बलवीर्य को निज श्रात्मा में विकास कर उस में फिर रमण करे। निर्वाण पद प्राप्त होने पर निश्चय नय के अनुसार अात्मा ही देव, श्रात्मा ही गुरु और श्रात्मा ही धर्म है। इति श्रीजनतत्त्वकालकाविकामे मोक्षखरूपवर्णनात्मिका अष्टमी कलिका ममाप्ता ॥ मे नवमी कलिका (जीच परिणाम विषय) इस द्रव्यात्मक जगत् में मुख्यतया दो ही तत्त्व प्रति पादन किये गए । जार्व और अजीव । इन्हीं दोनों तत्त्वो के अनंत भेद हो जाने से जगत् नाना प्रकार की विचित्रता दिखाई पड़ती है। कारण कि-"उत्पादव्यय- धौव्यसत्” द्रव्य का लक्षण जैनशास्त्रो ने उत्पाद व्यय और ध्रौव्य रूप स्वी- कार किया है। इस कथन से द्रव्यास्तिक नय और पर्यायास्तिक नय भी सिद्ध किये गए हैं। व्यास्तिक नय के आश्रित सर्व द्रव्य ध्रौव्य पद मे रहता है परन्तु उत्पाद और व्यय के देखने से सर्व द्रव्य पर्यायास्तिक नय के बाधित दीख पड़ता है। साथ ही इस बात का भी प्रकाश कर देना उचित प्रतीत जो । ( २८७ ) कतिविधेणं भंते परिणामे पन्नते ? गोयमा ! दुविहे परिणामे पन्नत्ते तंजहा जीव परिणामे य अजीव परिणामे य ॥१॥ अर्थ-श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी से भगवान् गौतम स्वामी प्रश्न करते है कि हे भगवन् ! परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया ह? इस प्रश्न के उत्तर में श्री भगवान् वर्णन करते हैं कि हे गौतम ! परिणाम दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-जीव परिणाम और अजीव परिणाम | जीव परिणाम सप्रायोगिक और श्रीव सवैधसिक होता मन, वचन. और काय द्वारा जब श्रात्मा पुद्गलों का आकर्पण करता है तव उसमें स्वयम् परिणत होजाता है । उसको प्रायोगिक परिणाम कहते हैं किन्तु जो पुद्गल स्वयमेच स्कन्धादि में परिणत होता रहता है उसको अजीव परिणाम कहते है। इस पद में सर्व वर्णन स्याहाद के आश्रित होकर किया इस लिये पाठकों को स्याहाद का भी सहज मे ही बोध हो सकेगा। अव जीव परिणाम के मुख्य २ भेदों के विषय पूछते हैं । जीव परिणामेणं भंते कतिविधे प. गोयमा ! दसविधे पन्नते, तंजहा- गतिपरिणामे इंदियपरिणामे कसायपरिणामे लेसापरिणामे जोगपरिणामे उपयोगपरिणामे णाणपरिणामे दंसणपरिणामे चरित्तपरिणामे वेदपरि- गया णामे ॥ अर्थ-हे भगवन् ! जीव परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गौतम ! जीव परिणाम दस प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि- गति १ इंन्द्रिय २ कपाय ३ लेश्या ४ योग ५ उपयोग ६ ज्ञान ७ दर्शन ८ चारित्र ६ और वेदपरिणाम १० । अर्थात् जव श्रात्मा अपने कर्मों द्वारा नरकादि गतियो में जाता है तव जीव गतिपरिणामयुक्त हो जाता है । अतएव सर्व भावो का अधिगम गतिपरिणाम के प्राप्त हुए विना प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए शास्त्रकर्ता ने गतिपरिणाम सर्व परिणामो से प्रथम उपन्यस्त किया है। जव गतिपरिणाम से युक्त होगया तो फिर "इदनादिन्द, अात्मा जानलक्षण परमैश्वर्ययोगात् तस्येदमिन्दियभिति' ज्ञान लक्षण श्रात्मा इन्द्रियो मे परिणत होने से इन्द्रिय परिणाम कथन किया गया है। इन्द्रियो द्वारा इष्टानिष्ट विषयो का सम्बन्ध होने से राग और द्वेप के परिणाम उत्पन्न हो जाते हैं। फिर कपाय परिणाम कथन किया गया है । सो कपाय परिणाम युक्त श्रात्मा लेश्या परि- णाम वाला होता ही है अतः कपायानंतर लेश्या परिणाम कथन किया गया है। कारण कि-कप नाम संसार का है सो जो संसार चक्र में आत्मा को परि- भ्रमण करावे उसे ही कपाय कहते हैं।
. -- ( २८६) दधि (कठिन जल ) फिर उसके ऊपर पृथ्वी। सो पृथ्वी के ऊपर बस और स्था- वर जीव रहते है, नरकों का पूर्ण सविस्तर स्वरूप देखना हो तो श्रीजीवाभि- गमादि सूत्रों से जानना चाहिए । सो जय जीवनरका में जाता है तव उस यात्मा का नरक गति परिणाम कहा जाता है । जव तिर्यग् गति में जीव गमन करता है तब वह तिर्यग् गति परिणामी कहा जाता है परन्तु पृथ्वीकायिक. अप्कायिक, तेजोकायिक, वायु कायिक, वनस्पतिकायिक ये पांचों स्थावर तिर्यग्गति में गिने जाते हैं । फिर दो इन्द्रिय वाले जीव जैसे सीप शंखादि, तीनों इन्द्रियो वाले जीव जैसे जू, लिक्षा, सुरसली, कीड़ी श्रादि, चतुरिन्द्रिय जीव जैसे मक्खी मच्छर विच्छु श्रादि, पांच इन्द्रियों वाले जीव जैसे गौ, अश्य हस्ती मूपकादि तथा जल मे रहने वाले मत्स्यादि जीव स्थल में रहने वाले जैसे-गौ अश्वादि, श्राकाश मे उड़ने वाले जैसे शुक, हस कागादि यह सर्व जीव तिर्यग्गति मे गिने जाते है। इनका पूर्ण विवरण देखना हो तो प्रज्ञापनादि सूत्रो से जानना चाहिए । सो जय जीव मर कर तिर्यग गति मे जाता है तब उस समय उस जीव का तिर्यग्गति परिणाम कहा जाता है । इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि तिर्यग् गति मे ही अनंत श्रात्मा निवास करते रहते है और अनंत काल पर्यन्त इसी गति में कायस्थिति करते हैं। यदि पाप कर्मों के प्रभाव से जीव इस गति में चला गया तो फिर उस का कोई ठिकाना नहीं है कि- यह यात्मा कब तक उस गति में निवास करेगा क्योंकि-अनंत काल पर्यन्त जीव उक्त गति में निवास कर सकता है । यदि मोक्षारूढ़ न हुआ तो उक्त गति में अवश्य गमन करना होगा अतएव मोक्षारूढ होने का प्रयत अवश्य करना चाहिए। जव प्रात्मा शुभाशुभ कर्मों द्वारा मनुष्य गति में प्रविष्ट होता है तव उस का मनुष्यगति परिणाम कहा जाता है । मुख्यतया मनुष्यो के दो भेद हैं और अकर्मभूमिज । असि ( खड्गविधि ) मपि (लेखन विधि ) कसि (कृषीविधि ) इत्यादि शिल्पो द्वारा जो अपना निर्वाह करते है उन्हें कर्मभूमिक मनुष्य कहते है। उनके फिर मुख्य दो भेद हैं आर्य और म्लेच्छ (अनार्य )। फिर उक्त दोनो के बहुतसे उपभेद हो जाते हैं। द्वितीय अकर्मभूमिक मनुष्य है जो अपना निर्वाह केवल कल्पवृक्षो द्वारा ही करते हैं अपितु कोई कर्म नहीं करते । उनके भी बहुतसे क्षेत्र प्रतिपादन किये गए है। तृतीय सम्मूछिम जाति के मनुष्य भी होते है जो केवल मनुष्यो के मल मूत्रादि में ही सन्म रूप से उत्पन्न होते रहते है। मनुष्य के मलमूत्रादि में होने से ही उनकी भी मनुष्य संबा हो जाती है। इस प्रकार मनुप्यो के जैसेकि-कर्मभूमिज ( २६१ ) जाता है तब उस जीव का देवगति परिणाम कहा जाता है। इस कथन करने का सारांश इतना ही है कि उक्त चारो गतियों में जीव का परिणत होना प्रतिपादन किया गया है श्रय इसके अनन्तर सूत्रकार इन्द्रिय परिणाम विपय कहते जैसेकि- इंदियपरिणामणं भंते कतिविध प. ? गोयमा ! पंचविधे प.त. सोति- दियपरिणामे चटुंदियपरिणामे घाणिदियपरिणामे जिभिदियपरिणामे फासिंदियपरिणामे। भावार्थ-हे भगवन् ! इन्द्रिय परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गौतम ! इन्द्रिय परिणाम पांच प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि-थुतेन्द्रिय परिणाम, चक्षुरिन्द्रिय परिणाम, घ्राणेन्द्रिय परिणाम, रसनेन्द्रिय परिणाम और स्पर्शेन्द्रिय परिणाम । उक्त पांची इन्द्रियों में जीव का ही परिणमन होता है। इसीलिये फिर जीव उक्त पांच इन्द्रियो द्वारा पदार्थों के बोध से वोधित हो जाता है। यदि ऐसे कहा जाए कि--जव श्रुतेन्द्रिय शब्दो को नहीं सुन सकता अर्थात् बधिर हो जाता है तो क्या उस समय उस इन्द्रिय में जीव का परिणमन नहीं होता। इसके उत्तर में कहा जाता है कि-जीव का परिणमन तो अवश्यमेव होता है, परन्तु श्रोत्रविज्ञानावरण विशेष उदय मे ब्राजाता है। इसी कारण वह वधिर होता है। क्योंकि-यदि जीव का परिण- मन न माना जाय तो क्या वह शस्त्रादि द्वारा छेदन किये जाने पर दुःख नहीं अनुभव करता है। अवश्यमेव अनुभव करता है। अतएव सिद्ध हुश्रा कि-इसी प्रकार पांचों इन्द्रियों में जैव परिणत हो रहा है। प्रात्मा असंख्यात प्रदेशी होने पर सर्व शरीर में व्यापक हो रहा है इसलिये उसका परिणत होना स्वा- भाचिक बात है। सारॉश इतना ही है कि-जो पांचो इंद्रियो द्वारा ज्ञान होता है वही जीव परिणाम कहा जाता है क्योंकि-जीव के परिणत हुए विना ज्ञान किस प्रकार प्रगट हो ? अतएव जीव परिणाम पांचों इंद्रियों द्वारा किया जाता है। अवसूत्रकार इंद्रिय परिणाम के पश्चात् कषाय परिणाम विपय कहते है:- कसाय परिणामेणं भंते कतिविधे प.? गोयमा! चउविहे प. तं.कोह- कसायपरिणामे माणकसायपरिणामे मायाकसायपरिणामे परिणामे। भावार्थ हे भगवन् ! कपाय परिणाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? हे गोतम ! कपाय परिणाम चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि-क्रोध कपाय परिणाम, मानकपाय परिणाम. मायाकपाय परिणाम ahe - ( २१३ ) और अन्यन्त विशुद्ध परिणाम वाले जीव का शुक्ललेश्या में परिणमन माना गया है । सो उक्त पद लेश्याश्री का पूर्ण विवरण प्रज्ञापन सूत्र के १७व लेश्या पद में बड़े विस्तार से कथन किया गया है वहां से देखना चाहिए। जीव पद लेश्याओं में ही परिणत होता है। इसी कारण से कमों का बंध जाव के प्रदेशों के साथ दोजाता है। जव चतुर्दशगुण स्थानासढ जीव होता है तव अलेश्यी होकर ही मोक्ष गमन करता है, पहली तीन अशुभ लेश्याएं है और तीन शुभ । श्रतएव अशुभ लेश्याओं से अन्तःकरण को शुद्ध कर शुभ- लश्याओं में ही परिणत होना चाहिए ताकि जीव को धर्म की प्राप्ति हो। जिस प्रकार स्निग्ध पदार्थ से वस्तु का बंध होना निश्चित है, उसी प्रकार लश्याओं द्वारा कर्मों का बंध होना स्वाभाविक वात अब सूत्रकार लेश्या के पश्चात् योगपरिणाम विषय कहते है जैसे कि- जोग परिणामेणं भंते कतिविधे पं. १ गोयमा ! तिविधे प.तं. मणजोग- परिणामे वयजोगपरिणामे कायजोगपरिणामे । भावार्थ-हे भगवन् ! योगपरिणाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? हे गौतम ! योग परिणाम तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-मनोयोगपरिणाम, वचनयोग परिणाम और काययोग परिणाम । इसका सारॉश यह है कि जब मन के द्वारा पदार्थों का निर्णय किया जाता है तर आत्मा का परिणाम मन में होता है क्यों कि-श्रात्मा के परिणाम (परिणत ) होजाने से ही मन की स्फुरणा सिद्ध होती है । इसी कारण श्रात्मा के भाव हीयमान, वर्द्धमान तथा अवस्थित माने जाते हैं। शास्त्रों में मन की करण संजा मानी गई है । करण वही होता है जो कर्ता की क्रिया में सहायक वन सके । जव प्रात्मा मनोयोग में प्रवृत्त होता है तव मन के मुख्यतया चार भेद माने जाते हैं। जैसेकि-सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, मिश्रितमनोयोग और व्यवहारिक मनोयोग । श्रात्मा का लक्षण वीर्य और उपयोग माना गया है। सो जव श्रात्मा का वल वीर्य मनोयोग में जाता है तव मनोयोग की निष्पत्ति मानी जाती है। अपितु पंडित वीर्य बाल वीर्य और बाल-पंडितवीर्य, इस प्रकार के वीर्यो के कारण से मनोयोग के असंख्यात संकल्प (स्थान) कथन किए गये है। वे संकल्प और अशुभ दोनो प्रकार से प्रतिपादन शुभ किये गए हैं। मन एक प्रकार से सूक्ष्म चतुःप्रदेशिक परमाणुओं का पिंड है । आत्मा के परिणत हो जाने से ही मनोयोग कहा जाता है। जिस प्रकार मनोयोग का वर्णन किया गया है ठीक इसी प्रकार वचनयोग और काययोग के विषय में भी जानना चाहिए । सारांश इतना ही है कि-तीन योगों मे आत्मा का परिणाम प्रतिपादन । ( २६५ ) घोधिकशान परिणाम युक्त कहा जाता है । यद्यपि श्रात्मा शानरूप ही है तथापि शानावरणीय कर्म के प्रभाव से पांच शानों में परिणत होजाता है। इन शानो का पूर्ण स्वरूप नंदी सिद्धान्त से जानना चाहिए। संक्षेप से यहां वर्णन किया जाता है। १ मतिज्ञान-बुद्धिपूर्वक पदार्थों का अनुभव करना अर्थात् मतिज्ञान से पदार्थों का शान प्राप्त करना । २ सुनकर पदार्थों का मतिपूर्वक विचार करना । ३ अपने शानद्वारा रूपी पदार्थों को जानना । इस ज्ञान को अवधि भान कहते हैं। इस शान के अनेक भेद प्रतिपादन किये गए हैं, । ४ मनःपर्यवमान संगो (मन वाले ) जीवा के जो मन के पर्याय है उनको जानलेना है। ५ केवलशान उस का नाम है जिसके द्वारा सर्व द्रव्य और पर्यायो को हस्तामलकवत् देखा जाए । इसा शान वाले को सर्वज्ञ और सर्वदर्शी कहा जाता है । इन्हीं शानो मे जीव का परिणत होना माना गया है। प्रथम चार झान छमस्थ के और पंचम ज्ञान सर्वज्ञ का कहा जाता श्रव शान के प्रतिपक्ष अशान परिणाम विपय कहते हैं, अणाणपरिणामेणं भंते कतिविधे प.? गोयमा! तिविहे प. तंजहा मइ- अणाणपरिणामे सुयप्रणाणपरिणामे विभंगणाणपरिणामे । भावार्थ-हे भगवन् ! अज्ञान परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गोतम! श्रज्ञान परिणाम तीन प्रकार से वर्णन किया गया है । जैसे कि-मतिअज्ञानपरिणाम, श्रुतश्रशानपरिणाम, विभंगज्ञानपरि- णाम । सदान से रहित पदार्थों का स्वरूप चिंतन करना अर्थात् जिस प्रकार द्रव्यों का स्वरूप श्री भगवान ने प्रतिपादन किया है उससे विपरीत पदार्थों का स्वरूप मति द्वारा अनुभव करना उसी का नाम मति अज्ञान परिणाम है। यद्यपि व्यवहार पक्ष में मति शान और मति अज्ञान का विशेष भेद प्रतीत नहीं होता, परन्तु द्रव्यों के भेदों के विषय मे ज्ञान और अज्ञान की परीक्षा पूर्णतया सहज में ही हो जाती है। जिस प्रकार मति अज्ञान पदार्थों के सद् रूप को असद् रूप से अनुभव करता है ठीक उसी प्रकार थुत अज्ञान के विषय में जानना चाहिए । मिथ्या श्रुत द्वारा ही लोक में अज्ञान अपना अंधकार विस्तृत करता है जिससे प्राणी उन्मार्गगामी बनते हैं। तृतीय का प्रतिपक्ष विभंगशान हैं, जिस का यह मन्तव्य है कि जो निज उपयोग द्वारा (योग द्वारा) पदार्थों का स्वरूप अनुभव करना है यदि वह स्वरूप अयथार्थता से अनुभव करने मे आवे उस को विभंग ज्ञान कहते है। . अवधिज्ञान ( २६७ ) भावार्थ-हे भगवन् ! चरित्रपरिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गौतम ! चारित्र परिणाम पांच प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि सामायिक चरित्र परिणाम, छेदोपस्थापनीय चरित्र परिणाम परिहार विशुद्धिक चरित्रपरिणाम, सूक्ष्म सांपगयिक चारित्रपरिणाम और यथाख्यात चारित्र परिणाम । शाखा में चारित्र शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है कि जिस से श्रात्मा के ऊपर से 'चय' कमों का उपचय दूर हो जावे उसका नाम चारित है । यद्यपि शास्त्रों में उक्त चारित्रो की विस्तार पूर्वक व्यारया लिखी हुई है तथापि उक्न चारित्रों के नामों का मूलार्थ इस प्रकार वर्णन किया गया है जैसेकि- १ सामायिक चारित्र-जिसके करने से प्रात्मा में समता भाव की प्राप्ति हो और सम्यक्तया योगों का निरोध किया जावे उस का नाम सामा- यिक चारित्र है। २ छेदोपस्थापनीयचारित्र-पूर्व पर्याय को छेद कर फिर पांच महाव्रत रूप पर्याय को धारण करना उस का नाम छेदोपस्थापनीय चारित्र है। ३ परिहारविशुद्धिक चारित्र-जिसके करने से पूर्व प्रायश्चित्तों से श्रात्म-विशुद्धि कर यात्म-कल्याण किया जाय उस कानाम परिहार विशुद्धिक चारित्र है । सम्प्रदाय मे यह बात चली आती है कि-नव साधु इस चारित्र को धारण कर गच्छ से वाहिर हो कर १८ मास पर्यन्त तप करते हैं जैसेकि- प्रथम चार साधु छः मास पर्यन्त तप करने लग जाते है और चार साधु उन की चैयावृत्यादि करते हैं । एक साधु व्याख्यानादि क्रियानो मे लगा रहता है । जब वे तपकर्म कर चुकें तब सेवा करने वाले चारो साधु तप करने लग जाते है और वे चारों उनकी सेवा करते रहते है. परन्तु व्याख्यानादि क्रियाएँ वही साधु करता रहता है । जब वे चारो साधु पट मास पर्यन्त तप कर चुकें तय वह व्याख्यानादि क्रियाएँ करने वाला साधु पट् मास पर्यन्त तप करता है और उन श्राठी साधुओं में एक साधु व्याख्यानादि क्रियाओं में प्रवृत्त हो जाता है शेप सात साधु उसकी सेवा करने लगते हैं । इस क्रम से ये नव साधु १८ मास पर्यन्त उक्त चारित्र की आराधना कर फिर गच्छ में श्राजाते है । सूक्ष्मसांपरायचारित्र-जिस चारित्र मे सून्म लोभ का अंश रहजावे । यह चारित्र दश गुणस्थानवी जीवो को होता है। यथाख्यातचारित्र-जिस प्रकार क्रियाश्रो का वर्णन करे उसी प्रकार क्रियाओं का करने वाला यथाख्यातचारित्र कहा जाता है । यह चारित्र सरागो और वीतरागी दोनों प्रकार के साधुश्री को होता है अर्थात् ११ वे, १२ वे, १३ चे, और १४ वे गुणस्थानवी जीवो को यथाख्यात चारित्र वेदपरिणामेणं इत्थिवेदगावि पुरिस वेदगावि नो नपुंसक वेदगा सेस तं चेव ( २६६ ) १ नरकगतिपरिणाम की अपेक्षा से नरकगति परिणाम में वे जीव परिणत हो रहे हैं। २ इंद्रियपरिणाम की अपेक्षा से वे जीव पंचेंद्रिय परिणाम से परिणत है। ३ करायपरिणाम की अपेना से वे जीव क्रोध, मान, माया और लोभ में भी परिणत हो रहे है। ४ लेश्यापरिणाम की अपेक्षा से वे जीव कृष्ण लेश्या, नीललेश्या और कपोत लेश्या में ही परिणत हो रहे है ५ योगपरिणाम की अपेक्षा से वे जीच मन, वचन और काय के योग से भी परिणत हो रहे है। ६ उपयोग परिणाम की अपेक्षा से–चे जीव साकारोपयुक्त और श्रना- कारोपयुक्त दोनों उपयोगों से उपयुक्त हो रहे है । ७ शानपरिणाम की अपेक्षा से आभिनिवोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान अवधि मान से परिणत है। अमान परिणाम की अपेक्षा से मति अशान श्रुत अशान नथा विभंग शान से परिणत हो रहे हैं। ८ दर्शनपरिणाम की अपेक्षा से वे जीव सम्यग्दृष्टि भी हैं, मिथ्या- दृष्टि भी है और सम्यग् और मिथ्यादृष्टि भी है । ६ चारित्र परिणाम की अपेक्षा से वे जीव साधुवृत्ति वाले नहीं हैं। नाँही चे गृहस्थ धर्म के पालन करने वाले ही है। किन्तु वे अचरित्री अर्थात् नियमादि से रहित ही हैं । ११ वेदपरिणाम की अपेक्षा से वे जीव स्त्रीवेदी नहीं है, नाही वे जीव पुरुषवेदी ही है किन्तु वे तो केवल नपुंसक वेद वाले ही है । इस प्रकार नरक में रहने वाले जीवो के दश प्रकार के परिणाम होते है। साथ मे यह भी किया गया व सदैव काल परिणत होता अतएव जीव को परिणामी माना गया है किन्तु द्रव्य का सर्वथा नाश नहीं माना जाता, केवल द्रव्य का द्रव्यान्तर होजाना ही परिणाम माना अव दश प्रकार के भवनपति देवो के परिणाम विषय मे सूत्रकार कहते असुर कुमारावि एवं चेव नवरं देवगतिया कएहलेसावि जाव तेउलेसावि रहता गया है। हैं। जैसेकि- एवं थणिय कुमारा। भावार्थ-जिस प्रकार नरक में रहने वाले जीवों का वर्णन किया गया । F- ( ३०१ ) भावार्थ-दीन्द्रिय जीवगति परिणाम की अपेक्षा से तिर्यग् गति परिणाम से परिणत हैं । इंद्रियपरिणाम से जीव द्वीन्द्रिय है क्योंकि मुग्य और शरीर ही इनको इंद्रियां है। किन्तु शेप वर्णन नारकीयवत् है। केवल योगपरिणाम की अपेक्षा से वचनयोग और काययोग ही होता है। शान परिणाम की अपेक्षा से आभिनियोधिक शान और श्रुतशान भी है तथा अशान परिणाम की अपेक्षा से मतिश्रशान और श्रुत श्रगान भी है। अपितु विभंगशान नहीं है । दर्शन परिणाम की अपेक्षा से सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि है किन्तु सम्यमिथ्या दृष्टि नहीं है । शेपवर्णन पूर्ववत् है । इसी प्रकार चतुरिन्द्रिय पर्यन्त जानना चाहिए । भेद केवल इतना ही है कि - इन्द्रियों की वृद्धि कर लेनी चाहिए जैसेकि-त्रीन्द्रिय जीवों की तीन ही इंद्रियां होती है पोर चतुरिन्द्रिय जीवों की चार इंद्रियां होती है । परन्तु शेप परिणामों का वर्णन प्राग्वत् जानना चाहिये । श्रय इनके अनन्तर सूत्रकार पचेन्द्रिय तिर्यविषय में कहते है। पंचेंदिय तिरिक्ख जोणिया, गतिपरिणामेणं तिरियगतिया, सेसं जहा नेरइयाणं णवरं लेसापरिणामेणं जाव सुकलेसावि चरित्तपरिणामेणं णो चरित्ती अचरित्तिवि चरित्ताचरित्तिवि वेदपरिणामेणं इत्थिवेदगावि पुरिसवेद- गावि णपुंसकवेदगाचि ॥ भावार्थ-पंचेंद्रिय तिर्यग्योनिक जीव गतिपरिणाम की अपेक्षा से तिर्यग्गति में परिणत है। किन्तु शेप वर्णन जैसे नारकियों का किया गया था उसी प्रकार जानना चाहिये। भेद इतना ही है कि-लेश्यापरिणाम की अपेक्षा से पंचेंद्रिय तिर्यग्योनिकों में कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पालेश्या और शुक्ललेश्या इन छः ही लेश्याओं में उक्त जीवों के परिणाम हो जाते है। यदि चारित्रपरिणाम की अपेक्षा से उनको देखते है तब वे जोव सर्वथा चारिनी नहीं होते किन्तु अचरित्री और चारित्राचरित्री होजाते हैं, परंच वेद परिणाम की अपेक्षा से वे जीव स्त्रीवेद, पुरुपवेद और नपुंसकवेद इस प्रकार तीनो चेदों में परिणत हो रहे है। अव इसके अनंतर मनुष्य परिणाम विषय कहते हैं- मगुस्साणं गतिपरिणामेणं मणुयगतिया इंदियपरिणामेणं पंचिंदिया अणिदियावि कसायपरिणामेणं कोहकसायीवि जाव अंकसाईवि लेसा परिणामेणं कराहलेसावि जाव अलेसावि जोगपरिणामेणं .. मणजोगीवि जाव अजोगीवि उवओगपरिणामेणं जहा नेरइया णाणपरिणामेणं आभिणि- वोहियणाणीवि जाव केवलनाणीवि अणाणपरिणामेणं तिरिण विश्रणाणा, -- - ( ३०३ ) तथा अवेदी (अविकारी ) भी हैं। इस प्रकार मनुष्यगति के जीवों के दश परिणामों का वर्णन किया गया है। श्रय इसके अनन्तर व्यन्तर देव ज्योतिषी नया वैमानिक देवों के परिणाम विषय कहते हैं- वाणमंतरा गतिपरिणामेणं देवगतिया जहा असुर कुमारा एवं जोइ- सियावि नवरं लेसापरिणामेणं तेउलेसा, चेमाणियावि एवं चेव नवरं लेसा परिणामेणं तेउलेसात्रि पम्हलेसावि सुकलेसावि सेतं जीवपरिणामे। भावार्थ-व्यन्तर देव गतिपरिणाम की अपेक्षा से देवगति परिणाम से परिणत हो रहे हैं। जिस प्रकार असुर, कुमार देवा का वर्णन पूर्य किया जा चुका है ठीक उसी प्रकार व्यन्तर और ज्योतिपी देवों के विषय में भी जानना चाहिये. भेद केवल इतना ही है कि-लेश्यापरिणाम के विषय केवल नेजा- लेश्या जाननी चाहिये। इसी प्रकार वैमानिक देवों के विषय में भी जानना चाहिये किन्तु विशेष इतना ही है कि-लेश्यापरिणाम की अपेक्षा से तेजोलेश्या, पालेश्या और शुक्ललेश्या से चे देव परिणत हो रहे हैं। सारांश इतना ही है कि--चैमानिक देव उक्त तीनों लेश्याओं के परिणाम से परिणत हो रहे है । शेष परिणामा का वर्णन प्राग्वत् है। इस प्रकार दश प्रकार के परिणामों में जीव परिणत हो रहा है। श्रतएव जीव को परिणामी कहा गया है । द्रव्य से द्रव्यान्तर हो जाना ही परिणाम का प्रथम लक्षण वर्णन कर चुके हैं । पर्याय नय उसको उत्पाद और व्ययरूप से मानता है किन्तु द्रव्य को ध्रौव्य रूप से स्वीकार करता है। किन्तु द्रव्यार्धिक नय केवल द्रव्यको द्रव्यान्तर होना ही स्वीकार करता है। सो इस प्रकार जीव परिणाम कथन करने के अनन्तर अब सूत्रकार अजीव परिणाम विषय में कहते है जैसेकि- अजीवपरिणामेणं भंते कतिविधे प.? गोयमा! दसविधे पएणत्ते तजहा- बंधणपरिणामे गातपरिणामे संठाणपरिणामे भेदपारणामे वरणपरिणामे गंधपरिणामे रसपरिणामे फासपरिणामे अगुरुयलहुयपरिणामे सद्दपरिणामे । भावार्थ-हे भगवन् ! अजीव परिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गौतम ! अजीवपरिणाम दश प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि- बंधनपरिणाम, गतिपरिणाम. संस्थानपरिणाम, भेदपरिणाम, वर्णपरिणाम, गंधपरिणाम, रसपरिणाम, स्पर्शपरिणाम, अगुरुकलघुकपरिणाम, शब्दपरि- १ . -- ( ३०५ ) त्वस्य रूक्षत्वस्य च विषममात्रा भवति तदा वधः स्कन्धानामुपजायते । इयमत्र भावना-समगुण- स्निग्धस्य परमारवादे. समगुण निग्धेन परमारवादिना सह सम्बन्धो न भवति तथा समगुणरुक्ष- स्यापि परमारवादेः समगुणरक्षण परमारवादिना सह संबंधो न भवति, किन्तु यदि निग्ध निरधेन रुक्षौरक्षण सह विषमगुणो भवति तदा विषममानत्वात् भवति तेषा परस्परं सम्बध । विषममानया चधी भवतीत्युक्तम्, ततो विषममामानिरूपणार्थमाह- निखस्स गिद्धेण दुहियाणेत्यादि' यदि निग्धस्य परमारवादेः सिग्धगुणनैव सह परमारवादिना बंधी भवितुमर्हति तदा नियमात् द्वयाधिका- धिरुगुणेनैव परम एवादिनेति भाव । रूक्षगुणस्यापि परमारवादेः रूक्षगुणेन परमारवादिना सह यदि वधो भवति तदा तस्यापि तेन द्वयायधिकगुणेनैव, नान्यथा । यदा पुन. निग्धस्क्षयोर्वधस्तदा कथमिति चेदत आह-निद्धस्स लुक्सेणेत्यादि' लिग्धस्य रूक्षेण सह बंधमुपैति उपपद्यते जघन्यवज्यों विषम समो वा किमुक्त भवति-एकगुणस्निग्ध एक गुणरुदं च मुक्त्वा रोषस्य द्विगुणासिग्धादेर्द्विगुणरूक्षादिना सर्वेण वधी भवतीति उक्लो बंधनपरिणामः । इसका अर्थ पूर्व लिखा जा चुका है । सर्वोक्त कथन का सारांश इतना ही है कि जब स्कंधों का परस्पर बंधन होता है तव उन स्कंधों के स्निग्धादि गुण वैमात्रिक होते है । तब ही उनका बंधन हो सकता है। अव बंधन परिणाम के अनन्तर गतिपरिणाम विषय कहते है:- गतिपरिणामेणं भंते कतिविहे प. १ गोयमा ! दुविहे पएणते तंजहा- फुसमाणगतिपरिणामे अफुसमाणगतिपरिणामे अहवादीहगतिपरिणामे रहस्सगतिपरिणामेय । भावार्थ-हे भगवन् ! गतिपरिणाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? हे गौतम ! गति परिणाम दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि- स्पर्शमान गति परिणाम और अस्पर्शमानगतिपरिणाम तथा दीर्धगतिपरिणाम वा हूस्वगतिपरिणाम । इस कथन का सारांश इतना ही है कि-जव पुद्गल गति परिणाम में परिणत होता है तब वह दो प्रकार से गति करता है। एक तो स्पर्शमानगति परिणाम । जैसे जो-पुद्गल गति में परिणत हुआ तब वह अपने क्षेत्र में आने वाले आकाश प्रदेशों को तथा खक्षेत्र से पृथक् आकाशप्रदेशो को स्पर्श करके ही गति करता है। जिस प्रकार एक शर्कर (कांकरी) जल पर किसी द्वारा प्रक्षिप्त की हुई जल को स्पर्श कर वा विना स्पर्श कर गति करता है ठीक उसी प्रकार पुद्गल भी श्राकाश प्रदेश अपने से जो पृथक् हैं उनको भी स्पर्श करके गति करता है। दूसरे भेद में जिस प्रकार पक्षी भूमि को न स्पर्श करता हुआ गति करता है उसी प्रकार पुद्गल भी अपने क्षेत्री प्रदेशों को छोड़ कर अन्य प्रदेशों को न स्पर्श करता हुआ गति करता है । सो इन्हीं को स्पर्शमान और अस्पर्शमान गतिपरिणाम कहते है। एवं दर्धिगति ।
किया है। पुद्गल का यह स्वभाव ही है कि वह रसों मे परिणत होता रहता है ( ३०७ ) रणाम और शुलवर्ण परिणाम, अर्थात् याचन्मान पुनल है वे सर्व कृष्ण, नील, पीत, रक्त और श्वेत वर्ण में ही परिणत होरहे हैं। क्योंकि ऐसा कोई भी पुद्गल नहीं है जो वर्ण से रहित हो । अतः सर्व पुद्गल पंचवर्णी है । वर्ण युक्त होने के कारण पुद्गल गंध धर्म वाला भी है। अतएव सूत्रकार गंध विषय कहते हैं-- गंध परिणामणं भंते कतिविधे प. १ गोयमा! दुविहे प. तंजहा सुम्भि- गंध परिणामे दुम्भिगंध परिणामे य । भावार्थ-हे भगवन् ! गंध परिणाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया ? हे गौतम ! दो प्रकार से, जैसेकि-सुगंध परिणाम और दुर्गन्ध परिणाम क्योकि यावन्मात्र पुद्गल है वह सब दोगे प्रकार के गंधों में परिणत होरहा है तथा गंधों में परिणत होना यह पुद्गल का स्वभाव ही है । श्रव सुत्रकार रस परिणाम विषय कहते हैं। जैसेकि- रसपरिणामेणं भंते कतिविहे प. ? गोयमा ! पंच विहे पएणत्ते तंजहा तित्तरसपरिणामे जाव महुररस परिणामे । भावार्थ-हे भगवन् ! रसपरिणाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? हे गौतम ! रस परिणाम पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि-तित रस परिणाम, कटुक रस परिणाम, कसायला रस परिणाम, खट्टा रस परिणाम और मधुर रस परिणाम अर्थात् यावन्मात्र पुद्गल है वह सब पांचो ही रसो मे परिणत होरहा है । यद्यपि छठा लोगों ने लवणरस भी कल्पन किया हुआ है किंतु वह रस संयोगजन्य है। इस लिये शास्त्रकर्ता ने पांचों ही रसो का विधान क्योंकि-पुद्गल द्रव्य मूर्तिमान् है । सो जो द्रव्य मूर्तिमान होता है वह वर्ण गंध रस और स्पर्श वाला होता है। अतएव सूत्रकार इसके अनन्तर स्पर्श विपय कहते हैं तथा रस धर्म अजीव का प्रतिपादन किया गया है नतु जीव का । क्योकि जीव तो एक अरूपी पदार्थ है। अव सूत्रकार स्पर्शविपय कहते हः- फासपरिणामेणं भंते कतिविधे प. ? गोयमा ! अहविधे प. तंजहा कक्खड़फासपरिणामे जाव लुक्खफासपरिणामे य ॥ भावार्थ- हे भगवन् ! स्पर्श परिणाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? हे गौतम ! स्पर्श परिणाम पाठ प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसेकि- कर्कशस्पर्शपरिणाम, मृदुस्पर्शपरिणाम, गुरुस्पर्शपरिणाम, लघुस्पर्शपरिणाम,
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