Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Nandisutram Vol-x With Smiti
Front matter
प्रकाशक :- दलसुख मालणिया सेक्रेटरो, प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी, वाराणसी-५ मुद्रक :- जयंति दलाल पसंत प्रिन्टोग प्रेस पीकांटा, लाभाईकी पारी अहमदाबाद- - गंथसमप्पणं सव्वण्गुसस्थाथपयासगत्थं भवाण जीवाण विवोहणत्थं । गंथा अणेगा रझ्या महग्या जेहिं महत्था विधिहा विसुद्धा ॥१॥ 'भवविरहसूरि' इतिगुण्णणाम जेसिं जयम्मि सुपसिद्धं । जाइणिमहत्तराए धम्मसुयत्तं च जे पत्ता ॥२॥ अणुवकयपरोवकया अम्हारिसडणेयजणगणम्मि जे । महमाहणाण महसमणवराणं पुजपायाणं ॥३॥ सिरिहरिभदायरियाणऽणणुवमचरियाण महमईणं णं । ताणं ताणाणंऽयं तश्विरइयवित्तिसंजुयं एयं ॥४॥ पुण्णपवित्ते करकयकोसे अपेमि नंदिसुत्तं हं । भत्ति-बहुमाणगहिलो विणयणो अस्पयं धनं ॥५॥ मन्नमाणो वारं वारं सकयत्ययं च भावंतो । मुणिपुण्णविजयणामो णिग्गंथो चरणरयकम्पो ॥६॥उहिं कुलयं ।।
ग्रन्थसमर्पण भव्यजीवों के विवोध के लिए सर्वज्ञ के शास्त्रों के अर्थप्रकाशन के हेतु जिन्होंने विविध विशुद्ध और महार्थको प्रकट करनेवाले महा- मूल्यवान अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया है, जिनका उपनाम 'भवविरहसूरि' जगत में सुप्रसिद्ध है और जो याकिनीमहत्तरा के धर्मपुत्र थे, हमारे जैसे अनेक जनोंको जिन्होंने अनुपकृत होते हुए भी उपकार किया है, जो महाब्राह्मण महाश्रमणश्रेष्ठ और पूज्यपाद है, ऐसे महामति अनुपमचारित्रधर श्रीहरिभद्राचार्य के पुण्यपवित्र कर- कमलकोपमें उन्हींकी बनाई वृत्ति के साथ यह नन्दिसूत्र को भक्ति और बहुमान से विवश अपने का धन्य मानता हुआ-पुनः पुनः अपने को कृतार्थ समझता हुआ मैं उनकी चरणरजके समान निम्रन्थ मुनि पुण्यविजय समर्पित करता हूँ।
प्रकाशकीय निवेदन जैन आगम ग्रन्थों के प्रकाशनके लिए अब, तक अनेक व्यक्ति और संस्थाओंने प्रयत्न किया है। ई. १८४८ में सर्व प्रथम स्टिवेन्सन ने कल्पसूत्रका अनुवाद प्रकाशित किया किन्तु वह क्षतिपूर्ण था। वस्तुतः वेबर ही सर्वप्रथम विद्वान माने जायंगे जिन्होंने इस दिशामें नया प्रस्थान शुरू किया। उन्होंने ई. १८६५-६६ में भगवती सूत्रके कुछ अंशों का संपादन किया और उन पर टिप्पणीरूप अपना अध्ययन भी लिखा । राय धनपतसिंह वहादुरने आगमोंका प्रकाशन १८७४ में शुरू किया और कई आगम प्रकाशित किये किन्तु उनका मूल्य हस्तप्रतों की मुद्रित आवृत्तिसे कुछ अधिक था। फिर भी- विद्वानों को दुर्लभ वस्तु सुलभ बनानेका श्रेय उन्हें है ही। जेकोबीका कापसूत्र (ई. १८७९), और आचारांग (ई. १८८२ ), ल्युमनका औपपातिक (ई. १८८३ ) और आवश्यक (ई. १८९७ ), स्टेइन्थलका ज्ञाताधर्मकथा का कुछ अंश (ई. १८८१ ), होर्नलका उपासकदशा (ई. १८९०), शुत्रिंगके आचारांग (ई. १९१०) इत्यादि ग्रन्थ आगमों के संपादनकी कला में आधुनिक विद्वानों को संमत ऐसी पद्धति को अपनाकर प्रकाशित हुए थे। फिर भी लाला सुखदेव सहायद्वारा ऋषि अमोलककृत हिन्दी अनुवाद के साथ (ई. १९१४-२०) जो ३२ आगम प्रकाशित हुए तथा आगमोदय समिति द्वारा समग्र सटीक आगमों का ई. १९१५में जो मुद्रण प्रारंभ हुआ उनमें उस पद्धति की उपेक्षा ही हुई । आचार्य सागरानन्दसूरि द्वारा संपादिन संस्करण शुद्धिको और मुद्रण को दृष्टि से राय धनपतसिंहके संस्करणसे आगे बढा हुआ है और विद्वानोंके लिये उपयोगी भी सिद्ध हुआ है। इस संस्करगके प्रकाशनके बाद जैनधर्म और दर्शनके अध्ययन और संशोधन में जो प्रगति हुई उसका श्रेय आचार्य सागरानन्दमूरिको है। किन्तु इतना होने पर भी आगमों की आधुनिक पद्धतिसे समीक्षित वाचना की आवश्यकता तो बनी हो रही थी। पाटनमें ई.२९४३ में आगम प्रकाशनके लिए जिनागम प्रकाशिनी संसदको स्थापना की गई किन्तु उससे अब तक कुछ भी प्रकाशन हुआ नहीं। पू. पा. मुनिश्री पुण्यविजयजी लगातार चालीससे भी अधिक वर्ष से इस प्रयत्नमें हैं कि आगमोका नुसंपादित संस्करण प्रकाशित हो । उन्होंने इस दृष्टिसे प्राचीन प्रतों की शोध करके कई मूल आगमों और उनकी प्राकृत-संस्कृत टीकाओं के पाठ संशोधित किए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने टीकामों में या अन्य ग्रन्थों में आगमोंके जो अवतरण आये हैं उनका आधार लेकर भी पाठशुद्धिका प्रयत्न किया है । उनके इस प्रयत्नको ही नुख्यरूपसे नजर समक्ष रख कर स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्रप्रसादने ई. १९५३ में प्राकृत ग्रन्थ परिषद्की स्थापना की । अबतक इस परिषद् के द्वारा प्राकृत भाषाके कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मुसंपादित होकर प्रकाशित हुए हैं। तथा पं. हरगोविंददासका सुप्रसिद्ध पाइयसदमहग्णवो भी पुनः मुद्रित हुआ है । प्राकृत ग्रन्थपरिषद् के द्वारा सटीक आगमों का प्रकाशन होना है यह जान कर केवल मूल भागमों के प्रकाशनके लिए बंबईके महावीर जैन विद्या- लयने ई. १९६० में योजना बनाई और पू. मुनिश्री का सहकार मांगा जो सहर्प दिया गया । यह परम हर्पका विषय है कि प्राकृत ग्रन्थ परिपद् जब अपने मुख्य ध्येय के अनुसार आगमप्रकाशनके क्षेत्रमें भी प्रवेश कर रही है और समग्र आगरके मंगलभूत नन्दोमूत्र आ० जिनदास नहतर कृ3 चूर्णि और आचार्य हरिभद्रकृत वृत्ति मादिके साथ नवम और दशम ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित कर रही है । इसका श्रेय पू. पा. मुनिराज श्री पुण्यविजयजी को है जिन्होंने वहे परिश्रम से इनका संपादन दीर्घकालीन अध्यवसायसे अनेक हस्तातो और टीकाओंके आश्रयसे किया है। इसके लिए प्राकृत ग्रन्थ परिपद् और विद्वज्जगत उनका ऋणी रहेगा । ता. २९-६-६६ दलमुग्व मालवणिया मंत्री
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मसायनमानयनित्याने कलावासविदनाकवलालाका नित्यादिनाचिरमापवनिीतावईमानजिनभाइहसावणेसंसारिशासन नारकनिम्नगमगनिनिवेधूनानकशरीरमानसाअप्तितीजतरकारवारसबानपातित जानिजरामरणाशाकारागा पदयावानरहितनिरतिश यालाक मुख नानाअपनगनिसंतारसतिया डानिदिदात्यरित्यागाया निरनिशयालाकसरबासिलामानवाप्तायाग्रामयखलाविनासर्वधार) पागयकारायचवितव्यमितिशतवान्यपरिरचरणादिमापारापकारपूर्वक एवात्मिापकार शनिविदापतनासनापरोपकाराद्विमान्यानासावतश्व तत्रयातानाजनादिविविधविमवत्रदानजनिता अयेवाग्रानकानिकानात्यनिक श्वतावनमुसंहप्रदानजनित अयोनकरिकसहर्मवतवर मनारियर्मालदाशितदातशतधागाजिातववतमामायाद्वारियममुतङनथनगमर्मतक्ततामुराधाम्मासनावचरित्रयामांसमधाम्मान कतमलमपसमन्वितागवाजायमारिधम्म यहाणपरिपालनसम यतिववानितिल दानागवा दोन्यायमितिताविकतदानसत्यपिनाविज्ञाया। दवनम्मादृतिलपितावा निजामिना मित्यतः पारस्थानाधहर चनालायागमअयैयरमपदयातिउत्रादायावतो वीताश्रयासिबझवि मानिनवनियवाकाप्रयोसिवनविनानिसदेतिमहनाम विपश्येयसिवन्नानीछापियो निविनाटकाततिाताधारसाद विमधिनायाकाशाताय मैगलाधिकारनंदिवासातवार अवनविरिनिकाशदार्यमवकानाडुपदिसमहावित्य साधानारदिनाच्या नारिनिधिविहान वयाला वकानवणादिकाश्नपायचि धीयानाश्तःसर्वधावत्याशिवदनादनुधालापनलारामतिनंदिसुरुतिसही नागारनिनिदिनेदनेनमिनदत्यानाननिवानदयस्मिन्नितिवानंदयंतातिवातदातादापवाराबक्षिाप्रमोदश्यनयाँ तरंतरतात्यामन्यवोणाद यानिवचनावानयामितिसंपदामान्य ग्रन्यवनणादया प्रत्ययासवंतियानाउनदात्य निदधतिरिवादिनदितिश्चिात कृथादित्य इतिश्प्रत्ययः सायलादावलमितिकाजावकरणेवावगंतवातिाततार्दिकारादमिनासीता निवर्यादिन्यकतिम्रायत्यय अम्पलावाधार दिकासानायाशदकत्रजिनम्नसावनीप्रत्यायात्तवशिपारसीमानिनर्यादिकारक्षात्प्रत्यायासवनानिमन्धान सुबधालोपतकानयः। रायनाकारालायननंदीतिरूपतवनिनिंदननदानदत्यनायनिवासव्यापाणिनश्ननंदाइत्यलमपसनानिजागानप्रियंदनदिवविधात योनामदियायनानेदिदिव्यनेदितावनदिवसियनवनामम्छापानप्रकटायव्यनदिविधाागजातानाआगमस्थानबागमाना नदियदान -- . -- वाटगेवामा मान्यनिन प्रलेसहानश्यापरवासिधायामनाकानिमायावयमेतहिनिपिंचमेलामामाऊयामानमानामामांसाप्रमाणजिजागे महिनापति विशाय नमःमाट यातनागनरगप्रसंगवारगम यास्यत्तवनिममिनिष्टाससमप्रवणेलवानएनवनिरुपदवत्तापमपमशन श्रवणनित्यवंता वश्वाणविनिमकराना व्यारयानविभिमनिधिगराहावोगाहाव्यारव्या मित्राधमारपनि पाटनपर मचायाच्योगनिम्यानाखेलशक्षारचकाराधमास जावसमेत नवनिरिणामबार्यमावाशिमानललण एवषयमानायागःका माइलाधरुविनेयानामनिमोहस्यावाद्वितीया वायागःसूत्रस्यशिकनि पक्षिमित्रानाशाय शनोनिनि वादेशबारेण्टतायगानेरवाशाप्रसमाउसमयानाएवलयोनिश्वाशनकाशनाएपउसलतणाधिन नेशिया प्रकार श्यामलितातिपादितनातिनादितितकवस्थानाननानिध्येनसागरलोचोगमायागाबाबारव्यानमियातम्मिनबायागनि गागाभायस्पानिप्राममश्फकंवयवातायागप्रकारानादनकामि त्वाशनाविनेयगणविज्ञायचयाणामन्यतमप्रकाारणसमवार करणादविरासदि यावविनयविष्यंतावबाननम्मएचनियमविधिहाहिनशवि नियानीसमवणएवाशिष्यहणमादलवितारा सिमित्यादिानादतक नामिविभिगमनासमित्यादिातत्यारामिति निगमनाम नंधायनविवरणसमापा यदिहाश्वमज्ञानाध्यारणानंजय निसियनस्यमम्मालगाउम्पनजायानानध्ययन विवरणका वागदवामिहमयापुतिनखरुजावलोकौलततोजिनशासनेनदाता जमिनीवर वारनिनवादामयकस्पाचार्यहरिसस्पतिवाटा। नमातादवनायसगात्यालासगातानेदिटाकावावा२२३६ रिला . कार५१
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॥ जयन्तु वीतरागाः ॥ प्रस्तावना आज विद्वानों के करकमलोंमें नन्दीसूत्र, उसकी हरिभद्रसूरिकृत वृत्ति, हारिभद्री वृत्तिकी चन्द्रकुलीन आचार्य श्री श्रीचन्द्रसूरिकृत दुर्गपदव्याख्या, जिसका अपरनाम टिप्पनक है, और हारिभद्रीवृत्तिके पर्याय, ये चार ग्रन्थ उपहृत किये जाते हैं । इनका संशोधन मूल नन्दीसूत्रकी आठ प्रतियाँ, हारिभद्री वृत्तिकी चार प्रतियां, दुर्गपदव्याख्याको तीन प्रतियाँ और पर्याय या संक्षिप्त टिप्पनककी दो प्रतियां, इस प्रकार कुल सत्रह प्रतियों के आधारसे किया गया है । मूल नन्दीसूत्रकी आठ प्रतियोंका विस्तृत परिचय, इसी प्राकृत टेक्स्ट सोसायटो द्वारा प्रकाशित चूर्गीसहित नन्दीसूत्रकी प्रस्तावनामें दिया गया है, इसको न दुहरा कर, विद्वानोंसे विज्ञप्ति है कि इस परिचयको चूर्णीसहित नन्दीसूत्रकी प्रस्तावनासे ही देख लें । मूल नन्दीसूत्र के संख्याबन्ध पाठभेद आदिके विषयमें जो कुछ वक्तव्य और ज्ञातव्य था वह उसमें ही दिया है। इस ग्रन्थमें सिर्फ हरिभद्रप्रि महाराजने जिन पाठोंको लक्षित करके व्याख्या की है, वे पाठ सूत्रप्रतियोंमें मिले हों या न मिले हो, तथापि वृत्तिकारअभिमत सूत्रपाठ वृत्तिअनुसार मैंने दिये हैं। इन सब बातोंका सूचन चूर्णिसहित नन्दीसूत्र की पादटिप्पणीयोंमें स्थान स्थान पर किया है; चूणों, हारिभद्री वृत्ति और मलयगिरिवृत्तिमें पाठभेदोंके अलावा सूत्रोंकी और गाथाओंकी कमी-वेशी भी है, जिनका सूचन भी पाद टिप्पणीयोंमें किया हैं । अत एव सूत्रांक और सूत्रगत गाथांकमें फरक जरूर ही है, इस बातको गीतार्य मुनिगण और विद्वद्वर्ग ध्यानमें रखे । चूर्णीके अनुसार सूत्रांक ११८ और सूत्रगत गाथांक ८५ है, तब हारिभद्री वृत्ति अनुसार सूत्रांक १२० और सूत्रगत गाथांक ८७ हुआ है। मूल नन्दीसूत्रकी बहुतसी प्राचीन प्रतियोंमें पाई जाती गुणरयणुजलकडयं० नगर रह चक्क पउमे० वंदामि मज्जधम्म० वदामि अजरक्खिय० गोविंदाणं पि णमो० तत्तो य भूयदिन्नं० ये छह गाथायें चूर्णीकार जिनदासगणि महत्तर, लघुवृत्तिकार आचार्य श्रीहरिभद्रसूरि और बृहद्वृत्तिकार श्रीमलयगिरि आचार्य, इन तीनों ही व्याख्याकारोंकी व्याख्यामें नहीं हैं । इन छह गाथाओं के अतिरिक्त जिनशासनकी स्तुति- रूप णेञ्चुइ पहसासणयं० और नेरइय देव तिथंकरा० ये दो गाथायें भी चूर्णीमें नहीं हैं, जो हरिभद्रसूरि और मलयगिरि- रिकी व्याख्यामें पाई जाती हैं । इन सवका चूर्गीकी पादटिप्पणीयों में निर्देश किया गया है। सामान्यतया सूत्रपाठके मुद्रण- विषय में मेरा यह क्रम रहा है कि जो जो व्याख्या सम्पादित की जाय उसमें उस व्याख्याकारको अभिमत सूत्रपाठ दिये जायँ । नन्दीचर्णी और नन्दीहारिभद्री वृत्तिके साथ दिये सूत्रपाठोंमें विद्वद्वर्ग को इस कथनका साक्षात्कार होगा । हारिभद्री वृत्तिकी प्रतियाँ १. आ. प्रति-आगमोद्धारक पूज्यपाद श्रीसागरानन्दसूरिसम्पादित एवं संशोधित मुद्रित आवृत्ति । जिसका प्रकाशन वि. सं. १९८४ में श्रीऋपभदेवजी केशरीमलजी श्वेताम्बर संस्था-रतलामकी ओरसे हुआ है । २. दा. प्रति-पूज्यपाद आचार्य महाराज श्री विजयदानसूरीश्वरजी संशोधित । जो भाई श्री हीरालाटके द्वारा वि. सं. १९८८ में प्रकाशित हुई है। ३. सं. प्रति-पाटण श्री हेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमन्दिरस्थित श्रीसंबके ज्ञानभंडारकी कागज पर लिखित प्रति । ४. वा. प्रति--पाटण.श्रीहेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमंदिरस्थित दाडीपार्श्वनाथ जैन ज्ञानभंडारी कागज पर टिमिन प्रति । सं. और वा. ये दोनों प्रतियां विक्रमको पंद्रहवीं दातीक चतुर्य चाण, लिम्बित प्रतीत होता है । ररे अतिरिक्त २ और भी प्रतियाँ संशोधनके समय पासमें रक्खी गई थीं । किन्तु उनका उपयोग जहाँ मावश्यकता प्रतीत हुई वहाँ ही किया गया है। श्रीचन्द्रीयदुर्गपदव्याख्या-टिप्पनक की प्रतियाँ हारिभद्रीवृत्तिसमेत नन्दीसूत्रके बादमें चन्द्रकुलीन आचार्य श्रीधनेश्वरसूरिके शिष्य श्री श्रीचन्द्रसूरिविरनित हारिभद्री- वृत्तिका टिप्पनक छपा है, जिसका आचार्यने 'नन्दीटीकादुर्गपदव्याख्या ' नाम दिया है । इसके संशोधनके लिये तीन प्रतियाँ एकत्र की गई हैं- १. जे. प्रति-जेसलमेरके खरतरगच्छीय आचार्य श्रीजिनभद्रसूरिके ताडपत्रीय ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति, मूनिमें इस प्रतिका क्रमांक ७६ है । इस प्रतिके पत्र २२१ हैं । प्रति अति शुद्ध और उसमें कहीं कहीं किसी विद्वान् मुनिवरकी लिखी हुई महत्त्वकी टिप्पनीयाँ भी हैं । प्रतिके अंतमें इस प्रकार लेखककी पुष्पिका पाई जाती है- ॥ ग्रंथानम् ३३०० ॥ छ । मंगलमस्तु ।। छ । संवत् १२२६ वर्षे द्वितीयश्रावण शुदि ३ सोमेऽयेह मंडलीवास्तव्य श्रीजाल्योधरगच्छे मोढवंशे श्रावक श्री सदेवसुतेन ले० पल्हणेन लिखिता । लिखापिता च श्रीगुणभद्रसरिभिः ॥ छ ।। मंगलमस्तु ।। छ॥ सकलभुवनप्रकाशनभानुश्रीहेमचन्द्रसुगुरूणाम् । स्थापयिताऽऽसीद् भाण्डागारिकसोमाकसुश्राद्धः ॥१॥ मरुदेवागर्भजया तत्सुतया सोमिकाहया क्रीत्वा । नन्धध्ययनसुविवरणटिप्पितपुस्तकमिदमुदारम् ॥२॥ मुनिवालचन्द्रशिष्यश्रीमद्गुणभद्रसरिसुगुरुभ्यः । दत्तमुपलभ्य वयं फलममलं ज्ञानदानस्य ॥३॥ सं. १३१३ श्रीजिनपद्मरिगुरूपदेशेन सा० केलिपुत्र सा० किरता सुश्रावकेण सत्पुत्र सा० विजमल सा० फर्मसिंह पौत्र कीका सकलपरिवारेण ससूत्रा नन्दीटीका गृहीता । भगिनीनायकसुश्राविकाश्रेयोर्थम् । आचन्द्रार्क नन्दतात् ॥ श्रीः॥ दुर्गपदव्याख्याकी प्रतिके अन्तमें लिखित इस पुष्पिकासे ज्ञात होता है कि- यह प्रति गुणभद्र आचार्यने वि. सं. १२२६ में मंडलीवास्तव्य जाल्योधरगच्छीय मोढज्ञातीय पल्हण नामक श्रावक लेखकके पास लिखाई थी। जिसको भंडारी सोमाककी धर्मपत्नी मरुदेवाकी पुत्री सोमीने खरीद कर (? लेखनमूल्य दे कर) हेमचन्द्राचार्यके शिष्य वालचन्द्रमुनिके शिष्य गुणभद्रसूरिको उपहत की थी। पादमें अस्तव्यस्त हो जाने के कारण इस प्रतिको-वि. सं. १३१३ में श्रीजिनपद्मसरिके उपदेशसे किरतानामक श्रावकने अपनी बहिन नायक सुश्राविकाके श्रेयोनिमित्त खरीद की। इस पुप्पिकामें निर्दिष्ट श्रीहेमचन्द्राचार्य, वालचन्द्रमुनिके गुरु होनेके कारण सम्भव है कि- ये चालक्यराज कुमार- पालनृपप्रतियोधक हेमचन्द्राचार्य हो । पुष्पिकागत — सकलभुवनप्रकाशनभानु' यह विशेषग भी इस अनुमानको पुष्ट करता है । इस पुष्पिकासे यह भी सूचित होता है कि-प्राचीनकालमें भी ज्ञानभंडारको पुस्तकें अस्तव्यस्त हो जाती थी और इनको पुनः सरीद भी कर ली जाती थीं। इस प्रतिके मादिके दो पत्र प्राचीन कालसे ही गूम हो गए हैं । यही कारण है कि- आज इस दुर्गपदव्याख्याकी को प्राचीन अवांचीन हस्तप्रतियां देखने में आई है उन समीमें इस व्याख्याका मंगलाचरण आदि प्रारम्भिक अंश प्राप्त नहीं है। २. पा.- यह प्रति पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमंदिरस्थित श्रीसंपके ज्ञानभंडारकी प्रति है। यह प्रति अनुमान विक्रमको सम्झवीं शत में टिसिन है।
३ . ३. ई.- यह प्रति बडौदा श्रीआत्मारामजी जैन ज्ञानमंदिरस्थित पूज्यपाद श्रीहंसविजयजी महाराज संगृहीत ज्ञान- भंडारकी है और नई लिखी हुई है । नन्दीसूत्रकी हारिभद्रीवृत्ति एवं उसके ऊपरकी दुर्गपदव्याख्यामें कोई पाठमेद प्राप्त नहीं हैं। नन्दीसूत्रविपमपदटिप्पनककी प्रतियां नन्दीसूत्रविषमपदपर्याय या टिप्पनक, यह कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं है, किन्तु 'सर्वसिद्धान्तपर्याय ' नामक ग्रन्थमेंसे विभाजित अंशमात्र है । इसके संशोधनके लिये पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमन्दिरकी दो प्रतियोंका उपयोग किया गया है, जो अनुमान विक्रमकी सत्रहवीं शतीकी लिखित प्रतीत होती हैं । इस प्रकार इन सत्रह हत्तप्रतियोंके आधारसे इस ग्रन्थाङ्कका संशोधन एवं संपादन किया गया है। नन्दीसूत्रकार नन्दीसूत्रके प्रणेता स्थविर देव वाचक हैं। इनके सम्बन्धमें जो कुछ कहनेका था वह चूर्णि सहित नन्दीसूत्रकी प्रस्तावनामें कह दिया है। लघुकृत्तिकार श्रीहरिभद्रसरि इस ग्रन्थाङ्कमें प्रकाश्यमान वृत्तिके प्रणेता याकिनीमहत्तराधर्मसूनु आचार्य श्रीहरिभद्रसूरि महाराज हैं । इनके विषयमें विद्वानोंने अनेक दृष्टिसे विचार किया है और लिखा भी बहुत है । अतः यहाँ पर मुझे अधिक कुछ भी कहनेका नहीं है । जो कुछ कहनेका था, वह मैंने, श्री लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृतिविद्यामन्दिरग्रन्थावलीके चतुर्थ ग्रन्थाङ्करूपमें प्रसिद्ध किये गये 'सटीक योगशतक और ब्रह्मसिद्धान्तसमुच्चय'की प्रस्तावनामें कह दिया है । अतः विद्वानोंसे प्रार्थना है कि उस प्रस्तावनाको देखें। दुर्गपदव्याख्याकार श्री श्रीचन्द्रसरि इस ग्रन्थाङ्कमें सम्पादित नन्दीवृत्तिटिप्पनक, जिसका नाम ग्रन्थकारने दुर्गपदव्याख्या दिया है, इसके प्रणेता आचार्य श्रीश्रीचन्द्रसूरि हैं । ये अपनेको चन्द्रकुलीन आचार्य श्रीशीलभद्रसूरिके शिष्य श्रीधनेश्वराचार्य के शिष्य बतलाते हैं । इनका, आचार्यपदप्राप्तिकी पूर्वावस्थामें नाम पार्श्वदेवगणि था, ऐसा उल्लेख इन्हींकी रचित पाटन-खेत्रवसी पाडाको न्यायप्रवेशपझिकाकी ताडपत्रीय प्रतिकी पुप्पिकामें पाया जाता है । जो इस प्रकार है- न्यायप्रवेशशास्त्रस्य सवृत्तेरिह पञ्जिका । स्वपरा) दृष्टा(व्या ) स्पष्टा पार्षदेवगणिनाग्ना ॥१॥ प्रह९रसरुदै ११र्युक्ते विक्रमसंवत्सरेऽनुराधायाम् । कृष्णायां च नवयां फाल्गुनमासस्य नि पन्ना ॥२॥ न्यायप्रवेशविवृतेः कृत्वेमा पनिकां यन्मयाऽवाप्तम् । कुशलोऽस्तु तेन लोको लभतामवयोधालमतुलम् ॥३॥ यावल्वणोदन्वान् यावन्नक्षत्रमण्डितो मेरुः । खे यावचन्द्रार्की तावदियं पञ्जिका जयतु ॥४॥ शुभमस्तु सर्वजगतः परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । दोपाः प्रयान्तु नाझं सर्वत्र मुम्बी भवतु लोकः ॥५॥ इति श्रीशीलभद्रसूरिशिष्यनुगृहीतनामधेयश्रीमद्धनेश्वरदरिशिष्यः सामान्यावस्थाप्रसिद्धपण्डिनपार्षदेवगायनिधान- विदोपादरथादाप्तश्रीश्रीचन्द्रसरिनामभिः स्वपरोपकारार्थ दृधा दिपनपदभतिका न्यायमवेशकहनेः पञ्जिका परिममानि ।। पाचार्य श्री श्रीचन्द्रमूरि, जिनका पूर्वावस्था में पार्चदेवणि नाम था. उन्होंने माने गुरु श्रीनिंगचार्यको श्रीजिन- पसमगणिविरचित सार्धशतकाप्रकरण-अपरनाम-मार्थविचारसान्प्रकागका इन्तिको रचना और उमर, संयोधनदिमें साहाय्य " ट दिया था, ऐसा इस वृत्तिको प्रशस्तिमें खुद वृत्तिकार गुरुने सूचित किया है । इस प्रशस्तिमें श्री श्रीचन्द्रसूरिकी गुरु-गुरु आदि परम्पराका और वंशादिका उपयुक्त वर्णन होनेसे यह प्रशस्ति यहाँ दी जाती है- सम्पूर्ण निर्मलकलाकलितं सदैव जाड्येन वर्जितमखण्डितवृत्तभावम् । दोषानुषगरहितं नितरां समस्ति चान्द्रं कुलं स्थिरमपूर्वशशाङ्कतुल्यम् ॥१॥ तस्मिंश्चरित्रधनधामतया यथार्थाः संजज्ञिरे ननु धनेश्वरसूरिवर्याः । नीहारहारहरहारविकाशिकाशसंकाशकीर्तिनिवहैर्धवलीकृताशाः ॥२॥ ये निःसङ्गविहारिणोऽमलगुणा विश्रान्तविद्याधरव्याख्यातार इति क्षितौ प्रविदिता विद्वन्मनोमोदिनः । येऽनुष्ठानिजनेषु साम्प्रतमपि प्राप्तोपमाः सर्वतस्तेभ्यस्तेऽजितसिंहसरय इहाभूवन् सतां सम्मताः ॥३॥ उद्दामधामभवजन्तुनिकामवामकामेभकुम्भतटपाटनसिंहपोताः । श्रीवर्द्धमानमुनिपाः सुविशुद्धबोधास्तेभ्योऽभवन् विशदकीर्तिवितानभाजः ॥४॥ लोकानन्दपयोधिवर्द्धनवशात् सद्वृत्ततासङ्गतैः सौम्यत्वेन कलाकलापकलनाच्छ्लान्योदयत्वेन च । ध्वस्तध्वान्ततया ततः समभव॑श्चन्द्रान्वयं सान्वयं कुर्वाणाः शुचिशालिनोऽत्र मुनिपाः श्रीशीलभद्राभिधाः ॥५॥ निःसंख्यैरपि लब्धमुख्यगणनैराशाविकाशं सतां कुर्वाणैरपि सङ्कटीकृतदिगाभोगैर्गुणप्रीणिकैः । श्वेतैरप्यनुरजितत्रिभुवनैर्येषां विशालैर्गुणैश्चित्रं कोऽपि यशःपटः प्रकटितः श्वेतो विचित्ररपि ॥६॥ सत्तर्ककर्कशधियः सुविशुद्धबोधाः सुव्यक्तसूक्तशतमौक्तिकशुक्तिकल्पाः । तेषामुदारचरणाः प्रथमाः सुशिष्याः सद्योऽभवनजितसिंहमुनीन्द्रवर्याः ॥७॥ तेषां द्वितीयशिष्या जाताः श्रीमद्धनेश्वराचार्याः । सार्द्धशतकस्य वृत्तिं गुरुप्रसादेन ते चक्रुः ॥८॥ शशिमुनि पशुपति११समय वर्षे विक्रमनृपादतिक्रान्ते । चैत्रे सितसप्तम्यां समर्थितेयं गुरौ वारे ॥९॥ युक्तायुक्तविवेचन-संशोधन-लेखनैकदक्षस्य । निजशिष्यसुसाहाय्याद् विहिता श्रीपाश्र्यदेवगणेः॥१०॥ प्रथमादर्श वृत्ति समलिखतां प्रवचनानुसारेण । मुनिचन्द्र-विमलचन्द्रौ गणी विनीतौ सदोद्युक्तौ ॥११॥ श्री चक्रेश्वरमरिभिरतिपटुभिर्निपुणपण्डितोपेतैः । अणहिलपाटकनगरे विशोध्य नीता प्रमाणमियम् ॥१२॥ प्रशस्तिमें आचार्य श्री श्रीचन्द्रसूरिकी पूर्वजपरम्परा इस प्रकार है--- चन्दकुलीन श्रीधनेश्वराचार्य श्रीमजितसिंहसूरि श्रीवर्धमानसूरि श्रीशीलभद्रसूरि श्रीमजितसिंहसूरि श्रीधनेश्वरस्त्रि श्रीपादेवगणि-श्रीश्रीचन्द्रसूरि , ? न्यायप्रवेशपञ्जिकाकी प्रशस्तिका उपर जो उल्लेख किया है उसके अंतमें 'श्रीश्रीचन्द्रसरिका ही पूर्वावस्थामें पार्श्व- देवगणि नाम था ' ऐसा जो उल्लेख है वह खुद ग्रन्थप्रणेताका न होकर तत्कालीन किसी शिष्य-प्रशिष्यादिका लिखा हुमा प्रतीत होता है । अस्तु, कुछ भी हो, इस उल्लेखसे इतना तो प्रतीत होता ही है कि-श्रीचन्द्राचार्य ही पार्श्वदेव गणि हैं या पार्श्वदेवगणी ही श्री श्रीचन्द्रसूरि हैं, जिनका उल्लेख धनेश्वराचार्यने सार्धशतकप्रकरणकी वृत्तिमें किया है । श्रीश्रीचन्द्रसरि का आचार्यपद श्रीश्रीचन्द्रसूरिका आचार्यपद किस संवतमें हुआ ? इसका कोई उल्लेख नहीं मीलता है, फिर भी आचार्यपदप्राप्तिके वाद- की इनकी जो ग्रन्थरचनायें आज उपलब्ध हैं उनमें सबसे पहली रचना निशीथ चूर्णिविंशोदेशकव्याख्या है। जिसका रचना- काल वि. सं. ११७४ है । वह उल्लेख इसप्रकार है- सम्यक् तथाऽऽम्नायाभावात्रोक्तं यदुत्सूत्रम् (!) । मतिमान्द्याद्वा किञ्चित् क्षन्तव्यं श्रुतधरैः कृपाकलितैः ॥१॥ श्रीशीलभद्रसरीणां शिप्यैः श्रीचन्द्रसरिभिः । विशकोद्देशकव्याख्या दृब्धा स्वपरहेतवे ॥२॥ वेदावरुद्रसङ्ये ११७४ विक्रमसंवत्सरे तु मृगशीर्षे । नाघसितद्वादश्यां समर्थितेयं रवी वारे ॥३॥ निशीथचूर्णिविंशोदेशकव्याख्याप्रशस्तिके इस उल्लेखको और इनके गुरु श्री धनेश्वराचार्यकृत सार्धशतकप्रकरणवृत्तिकी प्रशस्तिके उल्लेखको देखते हुए, जिसकी रचना ११७१ में हुई है और जिसमें श्रीचन्द्राचार्य नाम न होकर इनकी पूर्वा- वस्थाका पार्श्वदेवगणि नाम ही उल्लिखित है, इतना ही नहीं, किन्तु प्रशस्ति के ७ वें पद्यमें जो विशेषण इनके लिये दिये हैं वे इनके लिये घटमान होनेसे, तथा खास कर पाटन-खेत्रवसी पाडाकी न्यायप्रवेशपञ्जिकाकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिके अंतमें उनके किसी विद्वान शिष्य-प्रशिष्यादिने- " सामान्यावस्थाप्रसिद्धपण्डितपार्थदेवगण्यभिधान-विशेषावस्थावाप्तश्रीश्रीचन्द्र- सरिनामभिः" ऐसा जो उल्लेख दाखिल किया है, इन सब का पूर्वापर अनुसन्धान करनेसे इतना निश्चित रूपसे प्रतीत होता है कि- इनका आचार्यपद वि. सं. ११७१ से ११७४ के बिचके किसी वर्षमें हुआ है। ग्रन्धरचना प्रन्थरचना करनेवाले श्रीश्रीचन्द्राचार्य मुख्यतया हुए । एक मलधारगन्छीय आचार्य श्रीहेमचन्द्रसूरिके शिष्य नौर दूसरे चन्द्रकुलीन श्री धनेश्वराचार्यके शिप्य, जिनका पूर्वावस्थामें पार्थदेवगणि नाम था । मलधारी धीधीचन्द्रसूरिके रचे हुए माज पर्यंतमें चार ग्रन्थ देखने में आये हैं-१ संग्रहणी प्रकरण २ क्षेत्रसमासप्रकरण ३ लघुप्रवचनसारोद्धारप्रकरण और ४ प्राकृत मुनिमुव्रतस्वामिचरित्र । प्रस्तुत नन्दीसूत्रवृत्तिदुर्गपदव्याख्याके प्रणेता चन्द्रकुलीन श्रीधीचन्द्राचार्य की अनेक कृतियां उपलब्ध होती हैं, जिनके नाम, उनके अन्तकी प्रशस्तियोंके साथ यहाँ दिये जाते हैं- (१) न्यायप्रवेशपञ्जिका भौर (२) निशीथचूर्णिविंशोद्देशकव्याख्याके नाम और प्रशस्तियोका उल्लेख उपर हो चूका हैं । (३) श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रवृत्ति । रचना संवत् १२२२ । प्रशस्ति- कुवलयसविकासप्रदस्तमःप्रतिपटुरमलबोधः । प्रस्तुततीर्थाधिपतिः श्रीधीरजिनेन्दुरिह जयति ॥१॥ विजयन्ते इतमोहाः श्रीगौतममुख्यगगधरादित्याः । सन्मार्गदीपिकाः कृतनुमानसाः जन्तुनाइयभिदः ॥२॥ नित्यं प्राप्तमहोदयत्रिभुवनक्षीरान्धिरत्नोत्तम, स्वग्योतिस्ततिपात्रकान्तकिरणैरन्त स्तमोमेदकन् । स्दष्ठातुप्रसिताम्दरैकतिलकं विझत् सदा कौमुदं श्रीमत् चन्द्रकुलं समस्ति दिनलं जाट्यविनिप्रत्यटन ॥३॥ तस्मिन् सूरिपरम्पराकमसमायाता बृहत्प्राभदाः. सन्यग्ज्ञानमुदनानिदिनलारम्बन्डोपमाः । सदारित्रदिभूपिताः रामधनाः सद्धर्मकल्याहिपा विख्याता नदि नून्यः सनमदन श्रीशीरभद्रानिकाः ॥2 दो हैं ६ : ( ततश्च तेषां पदपाहंसः, समग्रगच्छाभरणावतंसः । धनेश्वरः सूरिरभूत् प्रशस्यः, शिष्यः प्रभावप्रथितो यदीगः ।।५।। निःशेषागमतर्कशास्त्रसकलालझारसंविनिधेर्यस्येन्दोरिव दीवितीवितमसो वाचोऽगृतस्यन्दिनीः । मास्वाधामितभक्तिसाभविकाः स्वात्मानमस्ताशुभं मन्यन्ते स्म सुरापवर्गरुचिरश्रीपात्रमत्युत्तमम् ॥६॥ श्रीचन्द्रसरिनामा शिष्यस्तेषां वभूव गुरुभक्तः । तेन कृता स्पष्टार्था श्राद्धमतिक्रमणत्तिरियम् ॥७॥ करनयनसूर्यवर्षे १२२२ प्रातः पुण्यार्कमधुसितदशम्याम् । शृतियोगनवमकक्षे समर्थिता प्रकृतवृत्तिरियम् ॥८॥ उत्सूत्रं यद् रचितं मतिदौर्बल्यात् कथञ्चनापि मया । तच्छोधयन्तु कृतिनोऽनुग्रहबुद्धि मयि विधाय ॥९॥ यावत् सुमेरुशिखरी शिखरीकृतोऽत्र, नित्यैर्विभाति जिनविम्बगृहर्मनोः । श्रीचन्द्रसरिचिता भुवि तावदेपा, नन्यात् प्रतिक्रमणवृत्तिरधीयमाना ॥१०॥ प्रत्यक्षरं निरूप्यास्य ग्रन्थमानं विनिश्चितम् । श्लोकपञ्चाशदुत्तरशतान्येकोनविंशतिः ॥११॥ ।। ग्रन्थानम् १९५०॥ (४) जीतकल्पबृहच्चूर्णिदुर्गपदव्याख्यर । रचनासंवत् १२२७ । प्रशस्ति- इति जीतकल्पचूर्णिविषया व्याख्या समाप्ता । जीतकल्पवृडच्चूर्णी व्याख्या शास्त्रानुसारतः । श्रीचन्द्रसरिभिधा स्व-परोपकृतिहेतवे ॥१॥ मुनि-नयन-तरणिवर्षे १२२७ श्रीवीरजिनस्य जन्मकल्याणे । प्रकृतग्रन्थकृतिरियं निप्पत्तिमबाप रविवारे ॥२॥ सर-चैत्य-गुरूणां च सर्वार्थप्रविधायिनः । वशाऽभयकुमारस्य वसतौ दृब्धा मुबोधकृत् ॥३॥ एकादशशतविंशत्यधिक श्लोकप्रमाणग्रन्थानम् । ग्रन्थकृतिः प्रविवाच्या मुनिपुङ्गवसूरिभिः सततम् ।।४।। यदिहोरसूत्रं किञ्चिद् दृब्धं छमस्थबुदिभावनया । तन्मयि कृपानुकलितैः शोध्यं गीतार्थविद्वद्भिः ।।५।। समाप्ता चेयं श्रीशीलभद्रप्रभु-श्रीधनेश्वरस रिपादपद्मचम्चरीकश्रीश्रीचन्द्रहरिसंरचिता जीतकल्पबृहच्चूर्णिदुर्गपदविषया निशीथादिशास्त्रानुसारतः सम्प्रदायाच्च सुगमा व्याख्येति । यावल्लवणोदन्वान्, यावनक्षत्रमण्डितो मेरुः । खे यावच्चन्द्रार्की तावदियं वाच्यतां भव्यैः ॥१॥ (५) नन्दीसूत्रलघुत्तिदुर्गपदव्याख्या । प्रशस्ति- श्रीधनेश्वरसूरीणां पादपमोपजीविना । नन्दित्तौ कृता व्याख्या श्रीमच्छ्रीचन्द्रसरिणा ॥१॥ इति समासा श्रीशीलभद्रप्रभु-श्रीधनेश्वरसूरिशिष्यश्रीश्रीचन्द्रसरिविरचिता नन्दिटीकाया दुर्गपदव्याख्या ॥ नन्दिवृत्तिदुर्गपदव्याख्यान्ते । (६) मुखयोधा सामाचारी । प्रशस्ति- इथेसा गिथसाहुसस्थाणुद्वाणविहिपदरिसणपरा सिरिसीलभदसरि-धणेसरमरिसिस्ससिरिचंदररिसमुदरिया मुहबोहा सामायारी सम्मत्ता । इति बहुविधमतिष्ठाकल्पान् संवीक्ष्य समुद्भुतेयं श्रीश्रीचन्द्रसरिणा || समुच्चय ग्रन्थाग्रम् १३८६॥ कमलबने पाताले क्षीरोदे संस्थिता यदि स्वर्गे । भगवति ! कुरु सानिध्य विम्वे श्रीश्रमणस च ॥१॥ ।। इति श्रीमुबोधा सामाचारी समाप्ता । सं. १३०० माघ शुदि १० गुरौ श्रीचन्द्रगच्छे मण्डनीय शुद्धांकमरिभिलिम्यापिता ।
(७) निरयावलिकादिपञ्चोपागसूत्रवृत्ति । रचना सं. १२२८ । प्रशस्ति- इति श्रीश्रीचन्द्रसरिविरचितं निरयावलिकाश्रुतस्कन्धविवरणं समाप्तमिति । निरयावलिकादिपञ्चोपाङ्गसूत्रवृत्ति- ग्रन्थानम् ६३७ ॥ वसु-लोचन-रविवर्षे १२२८ श्रीमच्छीचन्द्रसरिभिर्दया । आभडवसाकवसतौ निरयावलिशास्त्रवृत्तिरियम् ॥१॥ (८) पिण्ड विशुद्धिप्रकरणवृत्ति । रचना संवत् ११७८ । प्रशस्ति- समाप्तेयं श्रीश्रीचंद्रसरिविरचिता सूक्ष्मपदार्थनिष्कनिष्कषणपट्टकसन्निभप्रतिभजिनवल्लभाभिधानाचार्यधपिण्डविशुद्धि- शास्त्रस्य वृत्तिः ॥ यच्चक्रे जिनवल्लभो दृढमतिः पिडैपणागोचरं, प्रज्ञावर्जितमानवोपकृतये प्राज्यार्थमल्पाक्षरम् । शास्त्रं पिण्डविशुद्धिसंज्ञितमिदं श्रीचन्द्रसरिः स्फुटां तदृत्तिं सुगमां चकार तनुधीः श्रीदेवतानुग्रहात् ॥१॥ वसु-मुनि-रुदैर्युक्ते विक्रमवर्षे ११७८ रवी समाप्येपा । कृष्णैकादश्यां कार्तिकस्य योगे प्रशस्ते च ॥२॥ अस्यां चतुःसहस्राणि शतानां च चतुष्टयम् । प्रत्यक्षरप्रमाणेन श्लोकमानं विनिश्चितम् ||३॥ ग्रं० ४४०० ।। उपर श्री श्रीचन्द्रसूरिकी जिन आठ कृतियोंके नाम् उनकी प्रशस्तियोंके साथ उल्लिखित किये हैं, उनको देखनेसे यह स्पष्ट होता है कि- प्रारम्भकी छ रचनायें चन्द्रकुलीन आचार्य श्रीधनेश्वरके शिष्य श्रीश्रीचन्द्रसूरिकी ही हैं । सातवीं निरया- वल्यादिपंचोपांगव्याख्या भी अनुमान इन्हीकी रचना मानी जाती है । आठवीं पिण्डविशुद्धिप्रकरणवृत्तिकी रचना इन्ही भाचार्य- की है या नहीं, यह कहना जरा कठिन है । क्यों कि इस रचनामें वृत्तिकारने " श्रीदेवतानुग्रहात् " ऐसा उल्लेख किया है, जो दूसरी कोई कृतिमें नहीं पाया जाता है । यद्यपि रचनाकाल ऐसा है, जो अपने को इन्ही भाचार्य की रचना होने की ओर माकर्पण करता है । फिर भी इस वातका वास्तविक निर्णय मैं तम्ज्ञ विद्वानोंके पर छोड़ देता है। उपर मैंने श्रीश्रीचन्द्राचार्य की रचनामोंके नाम और उनके अन्तकी प्रशस्तियों का उल्लेख किया है, उनको देखते ही विद्वानोंके दिलमें एक कल्पना जरूर ऊठेगी कि इन आचार्यकी विक्रमसंवत् ११६९. ११७४, ११७८, ११८०, १२२२, १२२७, १२२८ आदि संवतमें रची हुई जो कृतियां पाई गई हैं उनमें सं. ११८० बाद एकदम उनकी रचना सं. १२२२ में आ जाती है, तो क्या ये आचार्य चालीस वर्ष के अंतरमें निष्क्रिय बैठ रहे होंगे ! जरूर यह एक महत्वका प्रश्न है, किन्तु अन्य साधनोंके अभावमें इस समय में इतना ही जवाब दे सकता हूं कि- प्राचीन प्रयो की सूची वृहटिप्पनिकामें, जैनग्रन्थावली आदिमें १ श्रमणप्रतिकमणसूत्रवृत्ति २ जयदेवछन्दःशास्त्रवृत्तिटिपनक ३ सनकुमारचरित र. सं. १२१४ पं. ८१२७ आदि नाम पाये जाते हैं । इसी तरह इनकी और कृतियाँ जरूर होंगी, किन्तु जब तक ऐसी कृतियाँ कहीं भी देखने-सुननेमें न आयें तब तक इनके विषयमें कुछ कहना उचित प्रतीत नहीं होता है । परन्तु यह तो निर्विवाद है कि- विचके वर्षोंमें रची हुई इनकी अन्धकृतियाँ भवश्यमेव होनी चाहिए । पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्य जैनज्ञानमंदिरस्थित श्रीसंघजैनज्ञानभंडार क्रमांक १०२३ वाली प्रामपुस्तिकामें श्रीश्रीचन्द्रा- पार्यन्त अनागतचतुर्विशतिजिनस्तोत्र है, जो यहाँ उपयुक्त समझ कर दिया जाता है, किन्तु यह कृति कौनमे श्रीचन्द्रा- चार्यकी है यह कहना शक्य नहीं है । स्तोत्र- पीरपररस भगवो दोलियचुलसीयपरिससहसेहिं । पउमाई चा मह हुंति निमा नहा युनिको ।।। एटमं च परमनार सेणियजी जिससानिमो। दीयं चरण वंदे पाई सरासरल २|| ।
तइयं सुपासनामं उदायजीवं पणटुभववासं । वंदे सयंपभजिणं पुटिलजी नऊथमहं ॥३॥ सव्वाणुभूयनाम दढउजीवं च पंचमं वंदे । छ8 देवसुयजिणं वंदे जीवं च कित्तिस्स ॥१॥ सत्तमयं उदयजिणं वंदे जीवं च संखनामस्स ! पेढालं अट्ठमयं आणंदजियं नमसामि ।।५।। पुट्टिलजिणं च नवमं सुरकयसेवं सुनंदजीवस्स । सयकित्तिजिणं दसमं वंदे सयगस्स जीवं ति ॥६॥ एगारसमं मुणिसुव्वयं च वंदामि देवईजीव । वारसमं अममजिगं सच्चइजीयं जगपईवं ।।७।। निकसायं तेरसमं वंदे जीवं च वासुदेवस्स । बलदेवजियं वंदे चउदसमं निप्पुलाइजिणं ||८|| मुलसाजीवं वंदे पनरसमं निम्ममत्तनामाणं । रोहिणिजीव नमिमो सोलसगं चित्तगुत्तं ति ॥९॥ सत्तरसमं च वंदे रेवइजीवं समादिजिणनामं । संवरमट्ठारसमं सयालिजीवं पणिवयामि ॥१०॥ दीवायणस्स जीवं जसोहरं वंदिमो इगुणवीसं । कन्हजियं गयतन्हं वीसइमं विजयमभिवंदे ॥११॥ वंदे इगवीसइमं नारयजीवं च मल्लिनामाणं । देवजिणं वावीसं अंबडजीवस्स वंदे हैं ॥१२॥ अमरजियं तेवीसं अणतविरियाभिहं जिणं वंदे । तह साइबुद्धजीव चउवीसं भदजिणनामं ॥१२॥ उस्सप्पिणीए चउवीसजिणवरा कित्तिया सनामेहिं । सिरिचंदररिनामेहिं सुहयरा हुतु सयकालं ॥१४॥ ॥ इति अनागतचतुर्विशतिजिनस्तोत्रम् ।। यहाँ पर एक बातको स्पष्ट करना अति आवश्यक है कि- प्राकृत पृथ्वीचन्द्रचरितके प्रणेता चन्द्रकुलीन श्रीशान्ति- सरिजीने अपने इस चरितकी मंगलगाथामें सूचित किया है कि- “धनेश्वराचार्यकी अर्थगम्भीर वाणीका आपके उपर बडा प्रभाव पड़ा है' और इसी चरितकी प्रशस्तिमें आपने लिखा है कि-चन्द्रकुलीन श्रीसर्वदेवसूरिके स्वहस्तसे दीक्षा पाने वाले श्रीश्रीचन्द्राचार्यकी कृपासे आपको आचार्यपद प्राप्त हुआ है । वह मंगलगाथान्तर्गत गाथा और प्रशस्ति इस प्रकार हैं । मंगलगाथान्तर्गतगाथा--- जन्नाणधणलवेणं ववहरमाणा वयं मइदरिदा । करिमो परोवयारं तेसि नमो गुरु धणेसाणं ॥१०॥ प्रशस्ति- . आसी कुंदिंदुसुद्धे विउलससिकुले चारुचारित्तपत्तं सूरी सेयंवराणं वरतिलयसमो सचदेवाभिहाणो । नाणासूरिप्पसाहापहियसुमहिमो कप्परुक्खो ब्व गच्छो जाओ जत्तो पवित्तो गुणसुरसफलो सुप्पसिद्धो जयम्मि ॥१॥ तेसिं चाऽऽसी सुयजलनिही खंतदंतो पसंतो, सीसो वीसो सियगुणगणो नेमिचंदो मुणिंदो । जो विक्खाओ पुहइवलए सुग्गचारी विहारी, मन्ने नो से मिहिर-ससिणो तेय-कंतीहिं तुल्ला ॥२॥ तेसिं च सीसो पर्यईजडप्पा, अदिट्ठपुञ्चिल्लविसिट्ठसत्थो । परोचयारेकरसावियझो, जाओ निसग्गेण कइत्तकोडी ॥३॥ जो सचदेवमुणिपुंगवदिक्खिएहिं, साहित्त-तक-समएसु सुसिक्खिएहिं । संपाविओ वरपर्य सिरिचंदररिपुजेहिं पक्खमुवगम्म गुणेसु भूरि ॥४॥ संवेगवुनिवाणं एवं सिरिसंतिमरिणा तेणं । बजरियं वरचरियं मुणिचंदविणेयवयणाओ ॥५॥ नइ किंचि अजुत्तं वुत्तमेत्य मइजहनहसवित्तीहिं । तमणुग्गहवुद्धीए सोहेयव्वं छहल्लेहिं ॥६॥ इगतीसाहियसोलसमपहिं यासाण निव्वुए वीर । कत्तियचरिमतिहीए कित्तियरिक्खे परिसमत्तं ॥७॥ उपर दी गई पृथ्वीचन्द्रचरितकी मंगलगाथान्तर्गत दसर्वी गाथा और उसकी प्रशस्तिको देखनेसे यह प्रतीत होता है फि- प्राार पृथ्वीचन्द्रचरित के प्रणेता आचार्य श्रीशान्तिरिके हृदयपर श्रीधनेश्वराचार्यके अर्थगंभीर विचारोंका भारी प्रभाव पडा ९ है और श्र चन्द्राचार्य, जो साहित्य, तर्क और सिद्धान्तके पारंगत थे, उनकी कृपासे आपको आचार्यपद प्राप्त हुआ था। इस प्रकार यहाँ पर इस आचार्ययुगलके नामोंको सुनते ही यह भी संभावना हो आती है कि- ये दो आचार्य, सार्धशतक- प्रकरणवृत्ति आदिके प्रणेता श्रीधनेश्वराचार्य और न्यायप्रवेशपंजिका, निशीथविंशोदेशकव्याख्या आदिके प्रणेता पार्श्वदेवगणि अपरनाम श्रीश्रीचन्द्राचार्य, गुरु-शिष्यको जोडी हो ! । परन्तु पूर्वापर उल्लेखोंका अनुसंधान करनेसे प्रतीत होता है कि- पृथ्वीचन्द्रचरितमें निर्दिष्ट श्रीधनेश्वराचार्य और श्री श्रीचन्द्राचार्य जुदा हैं । इसका कारण यह है कि- यद्यपि पृथ्वीचन्द्र. चरितमें निर्दिष्ट धनेश्वराचार्य कौन थे ? किनके शिष्य थे ? यह स्पष्ट नहीं है, तो भी श्री श्रीचन्द्राचार्य, जिनकी सहायसे श्रीशान्तिसूरिको सूरिपद प्राप्त हुआ था, वे चन्द्रकुलीन श्रीसर्वदेवसूनिके हस्तसे दीक्षा पाये थे, ऐसा तो इस प्रशस्तिमें साफ उल्लेख है, इससे ज्ञात होता है कि- पार्श्वदेवगणि अपरनाम श्री श्रीचन्द्राचार्यसे पृथ्वीचन्द्रचरितनिर्दिष्ट श्रीचन्द्राचार्य भिन्न हैं । दूसरी बात यह भी है कि- पार्श्वदेवगणि अपरनाम श्री श्रीचन्द्राचार्यका आचार्यपद, मैं उपर लिख आया हूं तदनुसार वि. सं. ११७१ से ११७४ के बीच के किसी भी वर्षमें हुआ है; तब पृथ्वीचन्द्रचरितकी रचना वारसंवत् १६३१ अर्थात् विक्रम- संवत् ११६१ में हुई है, जिस समय शान्याचार्यको आचार्यपदप्रदानकरनेके लिये सहायभूत होनेवाले श्री श्रीचन्द्राचार्य प्रौढावस्थाको पा चुके थे । अतः ये धनेश्वराचार्य और श्रीचन्द्राचार्य प्रस्तुत नन्दीसूत्रवृत्तिदुर्गपदव्याख्याकार श्रीचन्द्राचार्य और उनके गुरु धनेश्वराचार्यसे भिन्न ही हो जाते हैं। इस प्रकार यहाँ नन्दिवृत्तिदुर्गपदव्याख्याकार चन्द्रकुलीन श्री श्रीचन्द्राचार्यका यथासाधनप्राप्त परिचय दिया गया है। मलधारी श्रीहेमचन्द्रसरिकृत नन्दिटिप्पनक इस नन्दिवृत्तिके उपर मलधारगच्छीय आचार्य श्रीहेमचन्द्रसूरिकृत टिप्पनक भी था, जो आज प्राप्त नहीं है । आज पर्य- तमें मैंने संख्यावन्ध ज्ञानभंडारों को देखे हैं, इनमेंसे कोई ज्ञानभंडारमें वह देखनेमें नहीं आया है । फिर भी आपने इस टिप्पनककी रचना की थी-इसमें कोई संशय नहीं है । खुद आपने ही विशेषावश्यकमहाभाष्यवृत्तिके प्रान्त भागमें अपनी ग्रन्थरचनाओंका उल्लेख करते हुए इस रचनाका भी निर्देश किया है । जो इस प्रकार है- इह संसारवारांनिधौ मां निमग्नं....अवलोक्य कोऽपि....महापुरुषः....चारित्रमयं महायानपात्रं समर्पयामास । भणित- वांच-भो महाभाग ! समधिरोह त्वमस्मिन् यानपात्रे । समारूढश्चात्र....भवजलधिमुनीर्य प्रास्यसि शिवरत्नद्वीपम् । समर्पित न मम तेन महापुरुषेण सद्भावनामनुपायां प्रक्षिप्य शुभमनोनामकं महारत्नम् । अभिहितं च मां प्रति-रक्षणीयमिदं प्रयानतो भद्र !......... एतदभावे तु समेतत् प्रलयमुपयाति । अत एव तब पृष्टनः सदिनगनदपहरणार्थ टुगिभ्यक्ति ने मोदराजादयो दुष्टतस्कराः ।........ रे रे तस्कराधमाः ! किमेतदारब्धम् ? स्थिरीभूय लगन गन सामना' इति बुवागो मोहनरटनक्रवनी ससैन्य एवाऽऽरब्धो युगपत् प्रहर्तम् । केचित्त्वतीवच्छलघातिनो मोहसैनिकाः.. जर्जरयन्नि मड़ावनामानि । ननो मया तस्य परमपुरपस्योपदेशं स्मृत्वा विरचय झटिति निवेशितमावश्याटिप्पनकानिधानं महावनामपायां नूतनाटकम् . नतो- ऽपरमपि शतकविवरण नामकम् . अन्यदप्यनुयोगद्वारत्तिसंज्ञितम् . ननोऽपरमप्रदेशमालामाभिधानम् , असं नु नद- वृनिनामकम् , अन्यत्र जीवसमासविवरणनामधेयम् , अन्यनु भवभावनात्रसंज्ञितम् . अपतृ नहिवरगनामकर, अन्य टिति विरचय तर याः सद्भावनामरूपाया अगभूतं निवेशितं नन्दिटिप्पनकनानच द्वननं दृष्टकारकम् । पतंग तारी निवेशित प्रमयीय साताऽसौ मरूपा तेषां पापानामगन्या । कान्लेरतीयटरमानितया मनमा हामार- सम्पुटम् । ननो मया समप्रमेण निपुणं नःप्रनिदिधानोताचं चिन्तविधा विनिमारब्ध नट्टायन नोः विपाया विवरणाभियान कमभिद मृतकपाटसन्युटन । धामपसमागणि-धनंदकगणिजिनभद्रगति नाम दिया चन्द्रादिनिप-श्रीमहानन्द-मातरादारमतीगणियादिनाशामाद विनिविदा न ६ योर . - ।
१० - -- ततो धावत धावत, गृह्णीत गृह्णीत, लगत लगत' इत्यादि पूत्कुर्वतां सर्वात्मशक्त्या युगपत् प्रहरता हाहारवं कुर्वतां च मोहादि- चरटानां चिरात् कथं कथमपि विरचय्य तवारे निवेशितमेतदिति । ततः शिरो हदयं च हस्ताभ्यां कुट्टयन विषण्णो मोहमहाचरटः, समस्तमपि विलक्षीभूतं तत्सैन्यम् , निलीनं च सनायकमेव । ततः क्षेमेण शिवरत्नदीपं प्रति गन्तुं प्रवृत्तं तद् यानपात्रमिति ॥ -~~-मलधारीयश्रीहेमचन्द्रसूरिकृतविशेषावश्यकवृत्तिप्रान्ते । इस उल्लेखको पढनेसे प्रतीत होता है कि आपने आवश्यकहारिभद्रीवृत्तिटिप्पनककी तरह नन्दिहारिभद्रीवृत्तिटिप्पनककी भी रचना की थी। यद्यपि श्रीहेमचन्द्राचार्य महारान इस टिप्पनकरचनाका उल्लेख आप करते ही हैं, फिर भी आश्चर्यकी बात यह है कि- इनके ही शिष्य श्री श्रीचन्द्रसरि महाराजने प्राकृत मुनिसुव्रतस्वामिचरित्रकी प्रशस्तिमें अपने दादागुरु और गुरुके, संक्षिप्त होते हुए भी महत्वके चरित्रका वर्णन करते हुए श्रीहेमचन्द्राचार्य की ग्रन्थकृतियों का उल्लेख किया है, उसमें सभी कृतियोंके नाम दृष्टिगोचर होते हैं, सिर्फ इस नन्दिटिप्पनकका नाम उसमें नहीं पाया जाता है । वह उल्लेख इस प्रकार है- जे तेण सयं रइया गंथा ते संपइ कहे मि || सुत्तमुवएसमाला-भवभावणपगरणाण काऊग । गंथसहस्सा चउदस तेरस वित्ती कया जेण || अणुओगद्दाराणं जीवसमासस्स तह य सयगस्स । जेणं छ सत्त चउरो गंथसहस्सा कया वित्ती ।। मूलावस्सयवित्तीए उवरि रइयं च टिप्पणं जेणं । पंचसहस्सपमाणं विसमट्ठाणावयोहयरं ।। जेण विसेसावस्सयसुत्तस्सुवरि सवित्थरा वित्ती । रइया परिप्फुडत्था अडवीससहस्सपरिमाणा ॥ मुनिसुव्रतस्वामिचरित्रप्रशस्ति । इस उल्लेखमें श्री श्रीचन्द्रसूरिने अपने गुरुकी सब कृतियोंके नाम दिये हैं। सिर्फ नन्दिटिप्पनकका नाम इसमें नहीं है, जिसका नामोल्लेख खुद मलधारी श्रीहेमचन्द्राचार्य महाराजने विशेपावश्यकवृत्तिके प्रान्तभागमें किया हैं । यद्यपि मुनि- सुक्तस्वामिचरितके इस उल्लेखको प्राचीन ताडपत्रीय प्रतियोंसे मीलाया गया है, तथापि सम्भव है कि प्राचीन कालसे ही नन्दिटिप्पनकके नामको निर्देश करनेवाली गाथा छूट गई हो । अस्तु, कुछ भी हो, फिर भी जब विशेषावश्यकत्तिके अंतमें खुद श्रीहेमचन्द्राचार्य महाराज आप ही नन्दिटिप्पनकरचनाका निर्देश करते हैं तो यह निर्विवाद ही है कि आपने नन्दिटिप्पनककी रचना अवश्यमेव की थी, जो आज नहीं पाई जाती है । नन्दीविपमपदटिप्पनक इस ग्रन्थाङमें पृ. १८२ से १८६में नन्दीसूत्रवृत्तिविषमपदटिप्पनक मुद्रित है । इस टिप्पनकको श्री चन्द्र पीर्तिमरिकी कृति बतलाया है, किन्तु यह रचना वास्तवमें उनकी रचना नहीं है । इस टिप्पनकके मुद्रण समय खंभातकी वि. सं. १२१२में लिखित ताडपत्रीय प्रतिको ध्यानमें रख कर, एवं पाटनके भंडारोंकी कुछ प्रतियों के अन्त भागमें निरया- पलिकादिपंचोपाङ्गपर्याय और नन्दीगृत्तिविपमपदपर्यायको इसी टिप्पनकके साथ देख कर 'श्रीचन्द्रकीतिमरिकृत ऐसा लिख तो दिया है, किन्तु खंभातके भंडारकी और जैसलमेरके भंडारकी प्राचीन ताडपत्रीय निःशेषसिद्धान्त- पर्याय और सर्वसिद्धान्तविपमपदपर्याय की प्रतियोंको गौरसे देखी तब यह समझ भ्रान्त प्रतीत हुई है । खंभातके भंडा- रको प्रतिमें और जैसलमेरभंडारकी प्रतिमें अलग अलग सिद्धान्तोके पर्याय होनेसे दोनों प्रतियाँ जुदी जुदी है । अतः इतना निक्षित होता है कि संभातकी निःशेपसिद्धान्तपर्याय की प्रति, जो जिस वर्षमें प्रन्थरचना हुई उसी वर्षमें लिखी हुई है- उसमें जितने सिद्धान्तोके पर्याय हैं, उतनी ही श्रीचन्द्रकीतिमूरिकी रचना है। शेष सिद्धान्तपर्यायोंकी रचना किसी अन्य गीतार्थ की रचना है. जिसका नाम ज्ञात नहीं है । खंभात भंडारको प्रतिमें नन्दीविषमपदपर्याय नहीं है, तव जैसलमेर भंडारकी ११ - - प्रतिका प्रारम्भ नन्दीविपमपदपर्यायसे ही होता है । अतः यह निर्विवाद ही है कि इस मुद्रित नन्दीविषमपदटिप्पनककी रचना श्रीचन्द्रकीर्तिहरिकी न हो कर किसी अन्य गीतार्घकी रचना है। नन्दीविपमपदपर्याय प्रायशः नन्दीवृत्तिदुर्गपदव्याख्यासे उद्धृत होनेके कारण, अज्ञातकर्तृक अन्य सर्वसिद्धान्त- विषमपदपर्याय ग्रन्थ अगर एककर्तृक ही है तो. यह रचना निर्विवादरूपसे श्री श्रीचन्द्राचार्यके बाद की ही है। यहां पर विद्वानोंकी जानकारीके लिये उपयुक्त समझ कर खंभातको प्रतिका पूर्ण परिचय दिया जाता है- क्रमाङ्क ८७ (१) निःशेपसिद्धान्तविचार (व्यवहार सप्तमोद्देशपर्यन्त) पत्र १२९वा +१ - २१० (२) निःशेषसिद्धान्तविचार (व्यवहार अष्टमोद्देशसे आगे) पत्र १ -- २० अन्तिम प्रशस्ति- शिष्याम्भोजदिवाकरस्य पुरतः श्रीधर्मयोपप्रभोः, सिद्धान्तं विमलाख्यम्ररिंगणभृच्छिम्येण संशृण्वता । स्मृत्यर्थ गणिचन्द्रकीतिकृतिनो केचिद् विचारा वराः, सन्त्येते परिपिण्डिताः परिलससिद्धान्तरत्नाकरात् ॥ (३) प्रतिष्ठाविधि पत्र २१-२२ (४) प्रायश्चित्तविचार पत्र २३ वा (५) निःशेपसिद्धान्तपर्याय पत्र २४-१११ दृढगालिधोयपोती सदसवथं ति भणियं होइ ५ । रालग कंगू ॥छ। संवत् १२१२ आपाढ वदि १२ गुरौ लिखितेयं सिद्धान्तोद्धारपुस्तिका लेखक देवप्रसादेनेति ॥छ। ग्रन्थानम् १६७०॥ द्वितीयस्खण्डम् ॥छ। शिप्याम्भोजवनप्रबोधनरवेः श्रीधर्मघोपप्रभोः वक्त्राम्भोजविनिर्गताः कतिपयाः सिद्धान्तसत्का अमी । पर्याया गणिचन्द्रकीतिकृतिना सञ्चिन्त्य सम्पिण्डिताः स्वस्य श्रीविमलाख्यवरिगगभृच्छिायेण चिन्ताकृते ॥छ। आरते श्रीमदखवपर्वततिभिः सर्वोदयः क्ष्मातले छायाछनदिगन्तरः परिलस पत्रावीसन्कुटः । सेवाकारिनृगां नवीनफलदोऽयश्रान्तसान्द्रद्युतिः निश्छिद्रः सरलम्वकोतुककरः प्राग्याटवंशः सताम् ।। मौक्तिकहारसकाशः समासीत् तत्र वीहिलः । श्रावको गुणसंयोगानगगां हदये स्थितः ।। समजनि धनदेवः श्रावकरतस्य सूनुः, प्रथितगुगसमुद्रो मनवाणीविलासः । गगनवलयरझकीर्तिचन्द्रोदयेऽस्मिन् , लगति न च कलकाः बजनं यस्य मकाः ।। तस्य च भार्या यशोमती, तयोश्च पुत्रो गुणरत्नकरोहणाचलो धर्मचन्दनदुमनलयः मानिसुधाधवलिनसमम्लपितवटयो यशोदेवश्रेष्ठी। तस्य च- आंबीति नाम्ना जनवसलाऽभूत् . भार्या यशोदेवगृहाधिपत्य । यरयाः सतीनां गुलदीनायामाय रखा क्रियो नुनी ।। तयोश्च पुत्रा उद्धरण-आम्बिग-बीरदेवाल्या बभूयः । नाली-लोली-सोखीनमान पुत्रिकाः महिो । अन्यदा च सिद्धान्तलेग्यनबहादरेण जिनशासनानुरञ्जितचित्तेन यगोदेवायोग सिद्धान्तविचार-पर्यायसुम्निका लेखयामाम । ध्य श्री विमलारख्यसूरिगणक्षिप्यस्य चारित्रिगो योग्याऽसौ नगिनन्द्रकीनिविद विन्दानन्दिनी ! शासातिहेतवे परिजसज्ञानप्रपा पुन्तिका नतिप्राजिलयानुपानकयशोदेवन निमन !! यापक-दी नमरतलजपी यावर देवाचलो चावत नः समुतिनही सवभनटन। यापन स्वर्गविमानमालनिनिय याद६ दिग्दन्तिनम्नायत पुस्तकमेनदन्तु मुनियां मानानं मु !! । इति मान्ति: मना !!! -- १२ . (६) कतिचित् सिद्धान्त विचार तथा पर्याय पत्र ११ यहाँ पर खंभातके श्रीशान्तिनाथ ताडपत्रीय जैन ज्ञानभंडारकी क्रमांक ८७ पुस्तिकाका जो विवरण और प्रशस्तियां दी गई हैं इससे ज्ञात होता है कि- यह प्रति दो खंडमें विभक्त है । प्रथम खंडके प्रारंभके १२८ पत्र इस समय प्राप्त नहीं हैं, जिनमें संभव है कि- आचार्य श्री चन्द्रकीर्तिसूरि की ही कोई कृति होगी। १२९ वा+१-२२०+१-२० पत्रोंमें अंग-उपांग-छेद-आगमगत उपयुक्त विचारोंका संग्रह है, जो आचार्य श्री चन्द्रकीर्तिने अपने विद्यागुरु श्री धर्मघोपसरिके पास जैन सिद्धान्तोंका श्रवण अध्ययन करते करते किया है, जिसका निर्देश आपने प्रशस्तिपद्यमें किया है। २१ से २३ पत्रों में प्रतिष्ठाविधि एवं प्रायश्चित्ताधिकारका संग्रह है। पत्र २४ से १११ में निःशेपसिद्धान्तपाय हैं । जिनमें आचार्य श्रीचन्द्रकीर्तिने पञ्चवस्तुक, आचाराग, सूत्र- कृताङ्ग, स्थानाङ्ग, समवायाङ्ग, भगवतीसूत्र, प्रश्नव्याकरण, जीवाभिगम, प्रज्ञापना, निशीथचूर्णि, कल्प, व्यवहार, पञ्चकल्प, दशा, जीतकल्प, पाक्षिकसूत्र, इन सोलह शास्त्रोंके पर्याय अर्थात् विषमपदके अर्थ दिये हैं। पाटन, जैसलमेर आदिके ज्ञानभंडारकी प्रतियोंमें नन्दीसूत्रवृत्ति, आवश्यकवृत्ति, दशवकालिकवृत्ति, ओघनियुक्ति, पिण्ड- नियुक्ति, पिण्डनियुक्तिगाथा, उत्तराध्ययनबृहवृत्ति, आचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग, स्थानाङ्ग, समवायाङ्ग, भगवतीसूत्र, जीवाभिगम, प्रज्ञापना, प्रज्ञापनाविवरण, जीतकल्प, इन सोलह शास्त्रोंके पर्याय हैं । यद्यपि इस सर्वसिद्धान्तविषमपदपर्याय ग्रन्थमें आचाराङ्गादि शास्त्रोंके पर्याय अवश्यमेव शामिल हैं, तथापि दोनों पर्याय अलग अलग हैं। कितनेक शास्त्रों के पर्याय श्रीचन्द्रकीर्ति- सूरिकी रचनामें विस्तृत हैं, तो कितनेक शास्त्रोंके पर्याय दूसरी रचनामें विस्तृत हैं । इसी तरह कितनेक शास्त्रोंके पर्याय परस्पर एक दूसरेमें नहीं भी हैं। यह दोनों विषमपदपर्यायकी दी हुई सूचीयोंको देखनेसे प्रतीत होगा। अतः दोनों विषम- पदपर्यायकारोंका प्रयत्न अलग अलग है, ग्रन्थ भी जुदे हैं, ग्रन्थकार भी भिन्न हैं । पाटनके भंडार आदिमें ऐसी प्रतियाँ भी नजर आती हैं, जिनमें दोनों विषमपदपर्याय ग्रन्थ साथमें लिखे हैं । किन्तु आचार्य चन्द्रकीतिर रिकी ग्रन्थरचनाप्रशस्ति खंभातकी प्रतिके सिवा और कोई-प्रतिमें नजर नहीं आती है, जो अनेक दृष्टिसे महत्त्वकी है। इस प्रशस्तिको देखनेसे पता चलता है कि- यह प्रति श्रावक यशोदेवने वि. सं. १२१२ आषाढमासमें खुद ग्रन्थ- कार श्रीचन्द्रकीर्तिरिके लिये लिखवाई है । साथमें इस प्रशस्तिको देखते हुए ग्रन्थरचनाका समय भी वि. सं. १२१२ संभावित किया जा सकता है। यह पुस्तिका खुद ग्रन्थकारके लिये लिखवाई होनेके कारण इस प्रतिको प्रथम प्रति कह सकते हैं, इस दृष्टि से इस प्रतिका और भी महत्त्व बढ जाता है । इन आचार्यको अन्य कोई कृति अभी तक देखनेमें नहीं आई है। इस पुस्तिकाके साथ कतिचित्सिद्धान्तविचार तथा पर्यायके जो ग्यारह पत्र जुडे हुए हैं, इनका इस ग्रन्थके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । ये विप्रकीर्ण पन्ने हैं। यहाँ पर गीतार्थ मुनिगण एवं विद्वद्वर्गसे निवेदन है कि इस ग्रन्थमें मेरे अनवधानसे नन्दीवृत्तिदुर्गपदव्याख्याके शार्पिकोंमें श्री श्रीचन्द्राचार्यनामके साथ जो मलधारि विशेषण छपा है उन सभी स्थानोंमें चन्द्रकुलीन ऐसा सुधार जाय । भौर नन्दीत्तिसंक्षिप्तटिप्पनकके साथ 'श्री चन्द्रकीर्तिमरिप्रणीत' छपा है उसको मिटा दिया जाय । यहाँ पर प्रन्धकारों के विषयमें जो वक्तव्य था, वह समाप्त हो जाता है । संशोधन और सम्पादन प्रस्तुत नन्दिसूत्र, हारिभद्रीवृत्ति, दुर्गपदव्याख्या और विषमपदटिप्पनकके संशोधन एवं सम्पादनके लिये मात्र उनकी प्रतियोका हो आधार लिया गया है, ऐसा नहीं है किन्तु मूलसूत्र, और हारिभद्रीवृत्ति के उद्धरण जो मलधारी आचार्य श्रीहेम- चन्द्र रि, भाचार्य श्रीमलयगिरि आदिने अपने अपने प्रन्थोंमें दिये हैं, उनका भी इस संशोधनमें उपयोग किया गया लिया १३ . । - हारिभद्रीवृत्ति के संशोधनमें इसकी प्रतियोंके अतिरिक्त इसकी श्रीचन्द्रीयदुर्गपदव्याख्याको भी लक्ष्यमें रक्खी है, इतना ही नहीं किन्तु आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिजीने अपनी वृत्तिमें जो जो उद्धरण दिये हैं, उन सबको, हो सका वहाँ तक,-मूल स्थानों के साथ तुलना कर, प्राचीन कालसे चली आती अशुद्धियोंका परिमार्जन करनेका प्रयत्न किया है । दुर्गपदव्याख्याका परि- मार्जन प्रतियों के अलावा विशेषावश्यककी मलधारी वृत्तिके आधारसे किया गया है। आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने विशेषावश्यक- महाभाप्य आदिके जो उद्धरण दिये हैं, उनके पाठोंकी ओर दुर्गपदव्याख्याकारने कोई खास ध्यान दिया प्रतीत नहीं होता है। यही कारण है कि आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिके उद्धरण और दुर्गपदव्याख्याकारने दी हुई गाथाओंमें पाठभेद पाये जाते हैं । दुर्गपदव्याख्याकारने हारिभद्रीवृत्तिमें उद्धृत विशेषावश्यकमहाभाष्यकी गाथाओंके उपर कोई स्वतंत्र व्याख्या नहीं की है, किन्तु उन गाथाओंकी मलधारी आचार्य श्रीहेमचन्द्रसूरिने जो व्याख्या की है उसीका अक्षरशः ऊतारा ही कर लिया है । अतः ऐसे पाठोंको तत्तत् स्थानके पाठोंके साथ मिलाया गया है । नन्दिमूलसूत्र के उपर आचार्य श्रीहरिभरिने जिस पाठको लक्ष्यमें रख कर व्याख्या की है, वही सूत्रपाठ मैने वृत्तिके माधारसे मूलमें दिया है । ऐसे स्थानोंमें आचार्य श्रीहरिभद्रको इष्ट सूत्रपाठ प्रतियोमें कहीं पाया गया है और कहीं नहीं भी पाया गया है । फिर भी आचार्यकी व्याख्याकी संगतिको लक्ष्यमें रख कर यह परिवर्तन मैंने उचित माना है । आज अपने सामने नन्दिसूत्रकी जो प्राचीन-अर्वाचीन प्रतियाँ विद्यमान हैं, उनमेंसे एक भी प्रति ऐसी नहीं है जो श्रीचूर्णि- कार. श्रीहरिभद्रसूरि या श्रीमलयगिरिकी व्याख्याके साथ पूर्णतया सहमत हो । इस दशामें तत्तद् वृनिके साथ तत्तत् सूत्रपाठोंका स्थापन या परावर्तन करना असंगत नहीं है। फिर भी मैंने नन्दीसूत्रको प्रतियों में पाये गये महत्त्वके कोई भी पाठभेद की उपेक्षा नहीं की है, इतना ही नहीं ग्रन्थान्तरोंमें नन्दीसूत्रके उद्धृत उदरणोंसे उपलब्ध पाठभेद भी मैंने दिये हैं। साथमें चूर्णिकार, हरिभद्रसूरि और श्रीमलयगिरि, ये तीन व्याख्याकार महर्षियोंमसे, किसको कोनसा या कैसा सूत्रपाठ अभिमत हैं ?- इसका भी सर्वत्र विवेक किया गया है । इन पाठभेदोंके जिज्ञासुओंसे विज्ञमि है कि- इस संस्थाकी ओरसे प्रकाशित चूर्णिसहित नन्दीसूत्रकी पादटिप्पणीओंको ध्यानसे देखें । परिशिष्ट इस ग्रन्थके साथ पांच परिशिष्ट एवं शुद्धिपत्र दिये गये हैं। प्रथम परिशिः में मूलनन्दोमूत्र की गाथाओंका कम दिया है। दूसरे परिशिष्ट में नन्दीहारिभद्रीयत्ति, दुर्गपदव्याख्या और अनुज्ञानन्दी या लघुनन्दीको निमें दिये उदरणीका क्रम दिया है। तीसरे परिशिष्टमें नन्दीसूत्रमूल, हारिभद्रावृत्ति, दुर्गपदव्याख्या, विषमपटिनका, अनुमानन्दी और योगनन्दीमें स्थित विशेषनामोका क्रम दिया है। चतुर्थ परिशिष्टमें नन्दीहारिभीतिगत पाटन-मतान्न व्याख्यान्न के स्थान दिये। पांचवें परिशिष्ट में नन्दीसूत्र और व्याख्याओंमें स्थित व्याख्यात, अव्यात्मात एवं विषययोतक हान्दोका अनुकम दिया। और जन्तमें मुनिवर श्रीजम्वृविजयजी, भाई श्रीदलसुखभाई मालबगिया जोर पंडिन मीनराम दोमीन नैयार किया शुद्धि- पत्रक है । विद्वानों से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थके पढनके पूर्व शुद्धिपत्रकका उपयोग करें। उपसंहार प्ररसायनाके प्रारम्भमें उल्लिखित प्रतियों के नाधार प्रन्तुन सन्धका संदोधन किया गया है। टम मुदर मुलाका निरीक्षण एवं परिशिष्ट भी पं. भाई जगतलाल मोहनलाल भोजक ने किया है । नाई छोदाम मालवीया माय भी लादिरसे अन्त तफमें रहा है। इतना होते हुए भी नगर इस संटोनमें कोई पति नंत हो तो विधान में प्रया पि,- ऐसी क्षतियोकी सूचना देनेकी कृपा करें। जिनका उपयोग कर काम ही किया गया। सं. २०२६ माघ शुक्ल पूर्णिमा मृति दिव्य - . जामदागद हारिभद्रि वृत्ति सहित नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम | पन्न पत्र १ १ ९ ३ २०-२१ २१ ४ १० २१-२२. २२ २२-२३ विपय वृत्तिकारका मंगल और उपक्रम नन्दिशब्दको व्युत्पत्ति, अर्थ और निक्षेप गाथा १-३ मंगलसूत्र गाथा १ सामान्यतः जिनस्तुति गा. २-३ महावीर परमात्माको स्तुति गाथा १-१७ संघस्तुतिसूत्र रथ, चक्र, नगर, पद्म, चन्द्र, सूर्य, समुद्र और मंदरगिरिके रूपकों द्वारा श्रीसद्धकी स्तुति गाथा १८-१९ तीर्थकरावलीसूत्र चोवीस तीर्थकरोंकी स्तुति गाथा २०-२१ गणधरावलीसूत्र भगवान् श्रीमहावीरके ग्यारह गणधरोंकी स्तुति गाथा २२ वीरशासनस्तुतिसूत्र भगवान् महावीरके शासनको-प्रवचनकी स्तुति गाथा २३-४३ स्थविरावलीसूत्र श्रुतस्थविरोंकी स्तुति-गा.. २३ सुधर्मा, जम्बूस्वामी, प्रभवस्वामी, शय्यम्भव- स्वामी; गा. २४ यशोमद, सम्भूताये, भद्रयाहु, स्थूलभदा गा. २५ महागिरि, मुदस्ती, बहुल, पलिस्सह; गा. २६ साति, श्यामार्य, शाण्डिल्य, जीवघर; गा. २७ आर्यसमुद्र; गा. २८ आय- पारगा. २९ आर्यनन्दिल; गा. ३० आयनागदस्ती यायक, गा ३१ रेवति. पिन वाचक; गा. ३२ सिंह वाचक; गा. ३३ स्कन्दिलाचार्य; गा ३१ हिमवन्त; गा. ३५-३६ नागार्जुनवाचक; गा. ३५-३९ भूतदिनाचार्य; गा १० दौदिम्य, गा. ११-४२ दुष्यगणी; गा. १३ मामान्यरूपगे गर्यस्थविरों की स्तुति गा. ४१ पर्पत्सम मसानदानके अधिकारि-अनधि- सहिदको परीक्षा लिये सेलफा, विपय फुट, चालनी, परिपूणक, हग आदिके लाक्षणिक उदाहरण और शपत् , अज्ञपपेत् एवं दुर्विदग्धपर्वतका निरूपण धानसून मत्यादि पांन ज्ञानके नाम, उनकी व्युत्पत्ति और ममसाफल्य आदिका निरूपण मत्यादिज्ञानोका प्रत्यक्ष परोक्ष रूपमें विभाजन प्रत्यक्षज्ञानके इन्द्रियप्रत्यक्ष नोइन्द्रिय- प्रत्यक्ष दो मेद ११ इन्द्रिय प्रत्यक्षके पांच मेद नोइन्द्रियप्रत्यक्षके तीन भेद १३ अवधिज्ञानके दो मेद- क्षायोपशमिक और भवप्रत्यायिक क्षायोपशमिक तथा गुणप्रत्ययिक अवधि- ज्ञानका स्वरूप १५ अवधिज्ञानके आनुगामिकादि छ मेद १६-२२ १, आनुगामिक अवधिज्ञानका स्वरूप, उनके अन्तगत और मध्यरात भेद तथा पुरतोअन्तगत, मार्गतोअन्तगत, पार्श्वतो- अन्तगतादि प्रमेदोंका स्वरूप, उनके प्रतिविशेषका-स्वरूपमेदका निरूपण २३ २ अनानुगामिक अवधिज्ञान २४ ३. वर्धमानक अवधिज्ञान गा. ४५-४६ अवधिज्ञानका जघन्य और उत्कृष्ठ अवधिक्षेत्र. गा. १७५० द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षासे अवधि- शानके विषयभूत द्रव्यादिकी वृद्धिका स्वरूप. गा. ५१-५२ द्रव्य-क्षेत्र-काल- भावकी पारस्परिक वृद्धिका स्वरूप आदि २५ १. हीयमानक अवधिज्ञान ૨૬ ५. प्रतिपाति अवधिज्ञान २७ ६. अप्रतिपाति अवधिज्ञान २८ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे अवधिशानका स्वरूप गा. ५३-५४ अवधिज्ञानके अभ्यन्तरा- वधि और वायायधि मेद और भयपि. शानका उपसंहार ६ १०-१५ २३-२१ २१-२५ २५-२८ २९ २९-३० ३. 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४८ ५७ हारिभद्रो वृत्ति सहित नन्दिसूत्रका विषयानुक्रम । १५ विपय विषय पत्र मनःपर्यवज्ञानका अधिकारी ३१-३१ कर्मजा बुद्धिका स्वरूप और उदाहरण; ३१ मनःपर्यवज्ञानके ऋजुमति विपुलमति ६८.७१ पारिणामिकी बुद्धिका स्वरूप दो भेद और उदाहरण द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव आधी मनःपर्यत्रज्ञा- श्रुतनिधित मतिज्ञानके अवग्रह ईहा नका स्वरूप आदि चार मेद १९ ३३ गा. ५५ मनःपर्यवज्ञानका स्वरूप और अवप्रहके अर्थावग्रह व्यजनावग्रह दो मेद उपसंहार व्यञ्जनावग्रहके मेद और स्वरूप ३१ केवलज्ञानके भवस्थकेवलज्ञान और सिद्ध- अर्थावग्रहके मेद, स्वरूप और एकाधिक केवलज्ञान दो भेद इहाके मेद, स्वरूप और एकाथिक ५०-५१ ३५-३७ भवस्थकेवलज्ञानके सयोगिभवस्थकेवल. अपायके भेद, स्वरूप और एकाथिक ज्ञान और अयोगिभवस्यकेवलज्ञान दो धारणाके मेद, स्वरूप और एकाधिक ५१-५२ मेद और उसका स्वरूप ३७-३८ अवाह आदिका कालप्रमाण ३८-१. सिद्ध केवलज्ञानके अनन्तरसिद्धकेवलज्ञान सवाह आदि नेदोसे २८ प्रकारके और परम्पर सिकेवलज्ञान दो नेद और मतिज्ञानका स्वरूप कथन करनेके लिये उसका स्वरूप ३८-१. प्रतियोधक और मटकके दृष्टान्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव आधी केवलज्ञानका प्रतियोधक दृष्टान्त द्वारा व्यजनावप्रहके स्वरूपका निरूपण ५२-५३ पृत्तिमें-फेवलज्ञान- केवलदर्शनविषयक ५८ मक दृष्टान्त द्वारा अवग्रह-दहा-अपाय- युगपटुपयोग-एकोपयोग-क्रमोपयोगमान्य- धारणाके स्वरूपका निरूपण ताओंकी चर्चा १०-१३ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव साश्री आभिनि- गा. ५६-५७ फेवलज्ञानका रवरूप और पोधिक मानका स्वरूप ५५-५६ उपसंहार ४३-४१ १. गा. ७२.३७ साभिनियोधिक ज्ञानके परोक्षज्ञानये. आभिनिबोधिक और श्रुत भेद , कानप्रमान शन्दयवनका शान दो मेद ग्दम्र, एकाधिक नाम-दाद और आभिनियोधिवशान और श्रुतशानको उपमंडार ५६-५८ सदैव सहभाविता मान, सौदह मेर पृत्तिमें-मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका (६-६५ : रे मार, पटनाशा पृथयारण-विवेक मतिशान और मतिभशान तथा श्रुत- शान और श्रुतअज्ञानया या सम्यग्मति- ७८.२ अनाना मा ज्ञान और मिध्यामतिज्ञानका एवं राम्यtv-r: जय माग्नु, देहरा यश्रुतगान और मिध्याभूतज्ञानका पिवेक १५-१६ मा: E, पर भामिनियोधिकज्ञानये. श्रुतनिध्रित अमृत- निधि दो भेद ५र:-" म तनिधित आभिनियोधिषशान के मेद, दिन-भर ,म:, रवरूप और उदाहरण गरम हो गा. ५८ तनिधित मलिशानदे. कार तो प्रतिभादि धार मेंद; गा. ५९-६६ गोपनिक दुरिदा स्वरप ४-०५-27 और स्वार; गा. (३.१५ मलिही र 7 स्पिा और स्वार..
१६ हारिभद्री वृत्ति सहित नन्दिसूत्रका विषयानुक्रम । विषय ७८ ८० ७० ७० विपय ७६-७७ पर्यवाग्राक्षरका निरूपण और अतिगाढ ज्ञानावरणीयकर्मावत दशामें भी जीवको अक्षरके अनन्तवे भाग जितने ज्ञानका शाश्वतिक सद्भाव ६७-६९ ११-१२ गमिक अगमिक श्रुतज्ञान १३-१४ अङ्गप्रविष्ट और आवाह्य श्रुतज्ञान अशवाय श्रुतज्ञानके दो मेद ८१ आवश्यक श्रुत ८२ आवश्यकव्यतिरिक्तश्रुतके कालिक उत्का- लिक दो प्रकार ८३ उत्कालिकश्रुतके २९ नाम ७०-७२ वृत्तिमे-२९ उत्कालिकसूत्रके नामोंका व्युत्पत्त्यर्थविवरण कालिकश्रुतके ३१ नाम ७२-७३ वृत्तिकालिकसूत्रके ३१ नामोका व्युत्पत्त्यर्थविवरण आवश्यकव्यतिरिक्त श्रुतज्ञानका उपसंहार ७३-७४ ८६ अप्रविष्ट श्रुतज्ञानके १२ नाम १ आचारागसूचका स्वरूप २ सूत्रकृतास्त्रका स्वरूप ७७-७९ ८९ ३ स्थानामसूत्रका स्वरूप ४ समवायागसूत्रका स्वरूप ७९-८० ५.व्याख्या प्रजातिसूत्रका स्वरूप ६ ज्ञाताधर्मकथाशस्त्रका स्वरूप ८०-८२ ७ उपासकदशामसूत्रका स्वरूप ८२ ८ अन्तकृशामसूत्रका स्वरूप ८२-८३ ९ अनुत्तरोपपातिकशास्त्रका स्वरूप ८३-८४ १० पनव्याकरणदशामसूत्रका स्वरूप ११ विपाकदनामसूत्रके दुःखविपाक मुख- विपाक दो प्रकार और उनका स्वरूप ८१-८५ १२ टिवादमंगके पांच भेद ८५ ९९-१०७ १ परिकमदृष्टिवादके मात प्रकार और मंद ८५-८७ २ सम्ररिवादके २२ प्रकार ३ पूर्वगतदृष्टिबाद-चौदद पूर्व ८८-८९ ".-१२ १ अनुयोगदरिवादके, मूलप्रपमानुयोग और गंटिक नुयोग दो भेद और इनका ११४ दृष्टिमादका परिमाण और विषय ११५ द्वादशाशीका विषय ११६-१७ द्वादशामोके निराधकों को हानि और भागवनोको लाभ ११८ द्वादशाको शाश्रतिकता ९४-९५ ११९ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव माश्री श्रुतज्ञानका स्वरूप १२० गा. ८३ श्रुतज्ञानके चौदह मेद, गा. ८४ श्रुतज्ञानका लाभ, गा. ८५ बुद्धिके आठ गुण, गा. ८६ सूत्रार्थश्रवणविधि, गा. ८७ सूत्रव्याख्यान विधि और नन्दी- सूत्रको समाप्ति चन्द्रकुलीन आचार्य श्रीश्रीचन्द्र- सूरिप्रणीत नन्दीसूत्रहारिभद्री- वृत्तिकी दुर्गपदव्याख्या चन्द्रकुलीन आचार्य श्रीश्रीचन्द्र- सूरिविरचितटीकासहित लघु- नन्दी-अनुमानन्दी १७०-१७८ जोगणंदी १७९-१८१ नन्दीसूत्रहारिभद्रीवृत्तिके विपम- पदपर्याय-विषमपदटिप्पनक १८२-१८६ १. प्रथम परिशिष्ट १८७-१८८ नन्दीसूत्रान्तर्गत सूत्रगाथाओंकी अकारा- दिकमसे अनुक्रमणिका २. द्वितोय परिशिष्ट १८९-१९५ नन्दीहारिभद्रोवृत्ति, दुर्गपदव्याख्या और लघुनन्द्यन्तर्गत उद्धरणोंकी अकारादि- क्रमसे अनुक्रमणिका ३. तृतिय परिशिष्ट १९५-२.३ नन्दीसूत्रमूल, हारिभद्रीवृत्ति, दुर्गपद- व्याख्या, लघुनन्दीमूल और उसकी वृत्ति, नन्दीहारिभद्रीयत्तिविषमपदपर्यायके अन्तर्गत विशेषनामोंको अनुक्रमणिका ४ चतुर्थ परिशिष्ट १०३ नन्दीसूत्रवृत्ति आदिमें स्थित पाठान्तर, मतान्तर और व्याख्यान्तरके स्थान ५. पञ्चम परिशिष्ट २०१-२१६ नन्दीसूत्र, हारिभद्रीयत्ति, दुर्गपदच्याख्या आदिमें स्थित शब्दोंका अनुक्रम বির २१५-२१८- ८८ ९१ ८० ८१ पृत्तिम-शिवगंटियाका सरूप ५ चलिरवाद ॥ णमो त्थु णं समणस्स भगवओ महइ-महावीर चद्धमाणसामिस्स ॥ णमो अणुओगधराणं थेरापं । श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम्। याकिनीमहत्तराधर्मसूनुना आचार्यश्रीहरिभद्रवरिणा सूत्रितया हत्या समलङ्कृतम् । 10 ॥ श्रीसर्वज्ञाय नमः॥ जयति भुवनेकभानुः सर्वत्रावितकेवलालोकः । नित्योदितः स्थिरस्तापवर्जितो वर्द्धमानजिनः ॥१॥ इह सर्वेणैव संसारिणा सत्त्वेन नारक तिर्यङ्-नरा-ऽमरगतिनिवन्धनानेकशारीर-मानसातितीव्रतरदुःखौघसजात- पीडितेन जाति-जरा-मरण-शोक-रोगाघुपचत्रातरस्ति-निरतिशयालोकमुखस्वभावापवर्गगतिसम्भवे सति पीडानिर्वे- 5 दात् तत्परित्यागाय, निरतिशयालोकनुखामिलापाच तदवाप्तये, आत्म-परतुल्यचित्तेन सर्वथा स्व-परोपकाराय प्रव- तितव्यमिति । तत्रान्यपरिरक्षणादिना परोपकारपूर्वक एवाऽऽत्मोपकार इति विगेपतस्तत्र । स पुनः परोपकारो दिया-द्रव्यतो भावतश्च । तत्र द्रव्यतो भोजनादिविचित्रविभवादानजनितः, अयं चानेकान्तिकोऽनात्यन्तिकश्च । भावतन्तु सद्धर्मप्रदानजनितः, अयं चैकान्तिकस्तथाऽऽत्यन्तिकच । सद्धर्मश्च श्रुतधर्म-चारित्रधर्मभेदाद् द्विभेदः । तत्र श्रुनधों जिनवचनस्वाध्यायः, चारित्रधर्मग्न तदुक्तः श्रमणधर्म इति । उनं च- नुयधम्मो सज्झायो चरिनधम्मो समणयम्मी । [ तत्र श्रुतधर्मसम्पत्समन्विता एव प्रायश्चारित्रधर्मग्रण-परिपालनतमयां भवन्तीति तन्मदानमेवाऽऽदौ न्याय्य. मिति । तत्रापि श्रुनप्रदाने सत्यपि नाविनातार्थादेव तस्मादभिन्नपिनाथांचामिः माणिनामिन्यतः मारभ्यतर्जद चनानुयोगः । अयं च परमपदप्राप्तिहेनुत्वाच्छ्योभूतो पर्तते । श्रेयांन्नि माविगनि भान्नि । योनम् - श्रेयांनि बहुविनानि भवन्ति महतामपि । अशेयन्नि प्रजानां कापि सनि विनायकाः ।।१।। दनि । अतोऽग्य प्रारम्भ एव विघ्नविनायकोपशान्याचे मङ्गलाधिकार नदिनाच्यः । अथ नन्दिरिति कः शब्दार्थः ?, उच्यते-"हुणदिसमली " ..... मन्य यानाः "दिनों नम धातोः" [पा. ७. १. ५८ इति नुमि विश्तेिऽनुबन्धलोपे च यत औपादियः नन्दयो विधीयते, "गपंचावन्य न" [पा. उ. ५६५ इति वचनात् . अनुसन्धलोपे च तं पनि ननिको र विमनीवति नन्दिः । नन्दनं :) नन्दिः। नन्दन्त्यनेनेति वा नन्दन्यम्मिमिति वा नन्दपन्नानि वा नददोदकागद नन्दिः सर्गः प्रमोट दयनी नरम् . "ताभ्यामन्यत्रोणादयः पा. ३. ५.७ इति वचनाद तायानिनि मन्दाना-माहादान्यामन्यात उणादयः प्रन्यया भवन्ति । "मी" इन्दनिवति. कत्रापि नन्दिर्मित विट " कृष्पादित ६.३.६.१०८ किया प्रत्ययः स च "पल्युटो बहल ....दि बननाद माद का ....॥२ - 11 [ M २ श्रीहरिभवमूरिमृत्रितया वृत्या सगलयातं [ सू. १ गा. १ वाऽवगन्तव्य इति, ततः “कृदिकारादक्तिनः" [पा. वार्तिकम् ४. १. ४५] "सर्वतोऽक्तिमादित्येके" [पा. वा. ४. १. ४५] इति श्रीप्रत्ययः; अस्य भावार्थः-कृदिकारान्तो यः शब्दः क्तिन्वर्जितस्तस्मात् स्त्रीप्रत्ययो भवति, अपरे तु सर्वतः अक्तिनादिकारान्तात् स्त्रीप्रत्ययो भवतीति मन्यन्ते; अनुवन्धलोपे च कृते “यस्य" [पा. ६. ४. १४८] इतीकारलोपे च नन्दी इति रूपं भवति । नन्दनं नन्दी। नन्दन्त्यनयेति वा भव्याः प्राणिन इति 5 नन्दी इत्यलमप्रस्तुतातिप्रसङ्गेनेति । अयं च नन्दिश्चतुर्विधः, तद्यथा-नामनन्दिः १ स्थापनानन्दिः २ द्रव्यनन्दिः ३ भावनन्दि ४ श्रेति । तत्र नाम-स्थापने प्रकटार्थे । द्रव्यनन्दिविधा-आगमतो नोआगमतश्च । तत्राऽऽगमतो नन्दिपदार्थज्ञः तत्र चाऽनुपयुक्तः, "अनुपयोगो द्रव्यम्" [अनुयोग. सू. १३] इति ववनात् । नोआगमतस्तु ज्ञशरीरद्रव्यनन्दिः भव्यशरीरद्रव्यनन्दिः ज्ञशरीर-भव्यशरीरव्यतिरिक्तश्च द्रव्यनन्दिः। तत्र ज्ञशरीरदव्यनन्दिः नन्दिपदार्थज्ञस्य शरीरं जीवविप्रमुक्तम् , अनु- 10 भूतनन्दिभावत्वात् , पश्चात्कृतभावस्य द्रव्यत्वात् । यथोक्तम्- भूतस्य भाविनो वा भावस्य हि कारणं तु यल्लोके । तद् द्रव्यं तत्त्वज्ञैः सचेतना-ऽचेतनं कथितम् ॥ १॥ - ] 15 भव्यशरीरद्रव्यनन्दिश्च नन्दिपदार्थपरिज्ञानभावयोग्यं वालादिशरीरम् , पुरस्कृतभावत्वादस्य । व्यतिरिक्तश्च पुनः क्रियाविष्टो द्वादशविधस्तूर्याङ्गसङ्घातः । अयं तद्यथा- भंभा १ मउंद २ मद्दल ३ कडंब ४ झल्लरि ५ हुडुक ६ कंसाला ७ । काहल ८ तलिमा ९ वंसो १० संखो ११ पणवो १२ य वारसमो ॥१॥ भावनन्दिरपि द्विविधैव-आगमतो नोआगमतश्च । तत्राऽऽगमतो भावनन्दिः नन्दिपदार्थज्ञस्तत्र चोपयुक्तः, उपयोगो भाव इति कृत्वा । नोआगमतस्तु भावनन्दिः पञ्चप्रकारज्ञानसमुदायः, नोशब्दो देशवचनः । अथवा पश्चप्रकारज्ञानखरूपप्रतिपादकोऽध्ययनविशेपः, नोशब्दो देशवचन एव, अयं चाध्ययनविशेषः श्रुतांशेन सर्वश्रुता- 20 भ्यन्तरभूतो वर्तते । अत एव सर्वश्रुतारम्भेष्वेव विनविनायकोपशान्तये मङ्गलार्थमभिधीयत इति । अस्य च मङ्गलस्थानावसरप्राप्तस्य सत आचार्या विनेयानां सूत्रा-ऽर्थगौरवोत्पादनार्थमविच्छेदेन सन्तानागत- सूत्रा-ऽर्थपददर्शनार्थ चाऽऽदावेवाऽऽवलिकामभिधाय व्याख्यानाय यतन्ते । सर्वे श्रुतार्थाश्च यतस्तीर्थकरप्रभवा अतः प्रज्ञापक-श्रावक-पाठकाः अभिलपितार्थसिद्धये प्रवर्त्तमानाः प्रधानोपायत्वाद् भगवत एव नमस्कारपूर्वकं प्रवर्त्तन्त इत्यत आह ग्रन्यकार: [सुत्तं १] जयइ जगजीवजोणीवियाणओ जगगुरू जगाणंदो। जगणाहो जगवंधू जयइ जगपियामहो भयवं ॥१॥ १. जयति० गाथा । च्याख्या-इन्द्रिय-विषय-कपाय-यातिकर्म-भवोपग्राहिकर्मशत्रुगणजयाज्जयतीत्युच्यते । किविशिष्टो जयति ? ' जगज्जीयोनिविज्ञायकः' इह जगच्छन्देन सकलधर्मा-ऽधर्मा-ऽऽकाश-पुद्गलास्तिकायपरिग्रहः, जीवगन्देन तु सकरनीवास्तिकायपरिग्रहः । उक्तं च- जगन्ति जगमान्याहुर्जगद् ज्ञेयं चराचरम् । [ मङ्गलम् ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिमूत्रम् । ३ 5 योनयः सचित्ताद्याः । उक्तं च---"सचित्त-शीत-संहतेतर-मिश्रास्तद्योनयः" [तत्वा. २. ३३] जीवोत्पत्ति- स्थानानीत्यर्थः। "यु मिश्रणे" [पा. धा. पा. १०३३] युवन्ति-तैजस-कार्मणशरीरवन्तः सन्त औदारिकादि- शरीरेण मिश्रीभवन्त्यस्यामिति योनिः । उक्तं च जोएण कम्मरणं आहारेई अणंतरं जीवो । तेण परं मीसेणं जाव सरीरस्स निष्फत्ती ॥ १ ॥ [सूत्रकृ. नि. गा. १७७] ततश्च जगच जीवाश्च योनयश्च जगज्जीव-योनयः, विविधम्-अनेकधा उत्पादाधनन्तधर्मात्मकं जानातीति विज्ञायकः, जगजीव-योनीनां विज्ञायको जगज्जीव-योनिविज्ञायक इति समासः, अनेन केवलज्ञानप्रतिपादनात् स्वार्थसम्पदमाह । तथा जगद् गृणातीति जगद्गुरुः, यथोपलव्धनगढक्तेति भावना, अनेनापि स्वार्थसम्पदमेवाह । तथा 'जगदानन्दः' इह जगच्छन्देन संक्षिपञ्चेन्द्रियपरिग्रहः, तेषां सद्धर्मदेशनाद्वारेणाऽऽनन्दहेतुत्वादेहिका-ऽऽमुप्मिक- प्रमोदकारणत्वाजगदानन्द इति, अनेन परार्थसम्पदमाह । तथा 'जगन्नाथः' इह जगच्छदेन सकलचराचरपरिग्रहः, तस्य 10 यथावस्थितन्वरूपप्ररूपणद्वारेण वितथमरूपणापायेभ्यः पालनाद नायवद् नाथ इति, अनेनापि परार्थसम्पदमिति । तथा 'जगदन्धुः' इह जगच्छन्देन सकलपाणिपरिग्रहः, तदव्यापादनोपदेशप्रणयनेन मुखस्थापकत्वाद् बन्धुवद् बन्धुः । तथा चोक्तम्- "सव्वे पाणा सव्वे भूया सव्वे जीवा सव्वे सना ण तव्या ण अजावयवा [ण परि- घेत्तवा] ण परितावेयव्या ण उववेयचा, एन धम्मे धुवे णितिए सासते, समेच लोयं खेदण्णेहिं पवेदिते" [आचा. श्रु. १ अ. ४ उ. १ स. १-२ ] इत्यादि, अनेनापि परार्थसम्पदमिति । तथा 'जयति जगत्पितामहः' इति, 15 इह जगच्छन्देन सकलसत्त्वपरिग्रह एव, तेषां च कुगतिगमनभयापायरक्षणान् पिता धर्मो वर्त्तते, तथोक्तम्- दुर्गतिप्रगतान् जीवान् यस्माद् धारयते ततः । धने चैतान शुभे न्याने नम्माद धर्म इति स्मृतः ॥१॥ " - [ 20 तन्यापि चार्थमणेतृत्वेन भगवान पिता वर्तते, अतो जगत्पितामा इनि । नवाधिकागज पुनः क्रियाभिधानमदुरम् । उत्तं च-- सज्झाय-झाण-तर-ओसहेर उवएस-इ-पयाणेनु । नंतगणकिलणेन च न नि पानीमा उ ।। १ ।। ..नि..??पर १८२~? अनेनापि परार्थसम्पदमाः । 'भगवान' ति भगः-गमर्यादिनाना. ना नीनाम- धर्यम्य समग्रम्य रुपग्य यशसः श्रियः । धर्मग्याच प्रमानन्द मां भर नीदना ॥१॥ ..... भगोऽग्याताति भगवानिति । अनेन चोभयसम्पदमात. न्य-परोपकालिसांदरिया माननि गायायः ॥१॥ व्याख्यानयन्नि केनित कृतिमनामन्यचापि विहांगः । तत्राप्यपीनस्यत्यं सूक्ष्मधिया चिन्तामनि !!! एवं नायद 'अनादिमन्तो मतान्तीर्थकराः पति कापनार्थ सामान मानवाद या. पयारियात मालवपरमौषधमनमवचनमणेनन्वाद वनमाननीय पिन नमार विमर- ! "f . it are ' - .:: ::- पणिहारा : शिपावसभी सहालियानादिकामगही मागे...: :::. :: ...
४ . . श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्या सगलतं [सू. १-२ गा. २-५ जयइ सुयाणं पसवो तित्थयराणं अपच्छिमो जयइ । जयइ गुरू लोगाणं जयइ महप्पा महावीरो ॥ २ ॥ जयति सु० गाहा । व्याख्या-'जयति' इति पूर्ववत् । श्रुतानां' आचारादिभेदभिन्नानां प्रभवः' प्रभवन्त्य- स्मादिति प्रभवः, तदर्थाभिधायकत्वात् कारणमित्यर्थः। ऋषभादयोऽप्येवम्भूता एव अत आह-तीर्थकराणाम- 5 पश्चिमो जयति' तत्र तीर्थकरणशीलास्तीर्थकरास्तेषां तीर्थकराणाम् , भरतेऽधिकृतावसर्पिण्यां पत्रिम एव अनिष्ट- शब्दपरिहारार्थमपश्चिम इत्युच्यते, पश्चानुपूर्व्या वाऽपश्चिम इति । 'जयति गुरुलॊकानां' गृणाति शास्त्रार्थमिति गुरुः, 'लोकानां' इति सत्त्वानाम् । 'जयति महात्मा' अनन्तज्ञान-चीर्ययुक्तत्वाद् महान् आत्मा यस्य स महात्मा । 'महावीरः' इति “शूर वीर विक्रान्तौ" [पा.धा. पा. १९०३ ] इति, कपायादिशत्रुजयाद् महाविक्रान्तो महावीरः । ईर् गति-प्रेरणयोः" इत्यस्य वा विपूर्वस्य विशेषेण ईरयति-कर्म गमयति, याति वा इह शिवमिति वीरः, महांश्चासौ 10 वीरश्च महावीर इति गाथार्थः ॥२॥ पुनरस्यैवातिशयप्रदर्शनद्वारेण स्तुतिमभिधित्सुराइ- भई सव्वजगुज्जोयगस्स भदं जिणस्स वीरस्स । भदं सुरा-ऽसुरणमंसियस्स भदं धुयरयस्स ॥ ३ ॥ भद्दे० गाहा। व्याख्या-'भद्रं' कल्याणं भवतु । कस्य ? 'सर्वजगदुद्योतकस्य' इति, अनेन ज्ञानातिशयमाह। इह च "चतुर्थी चाऽऽशिष्यायुष्य-मद्र-भद्र-कुशल-मुखाऽर्थ-हितैः" [पा. २. ३. ७३ ] इति वचनात् पष्ठयपि भवत्येव, यथा-आयुष्यं देवदत्ताय आयुष्यं देवदत्तस्येति, एवं मद्रादिष्वपि वक्तव्यमिति । 'भद्रं जिनस्य' "जि जये" अस्य औणादिकनकमत्ययान्तस्य जिन इति भवति, रागादिजयाद् जिन इति, अनेनापायातिशयमाह । अपाय:-विश्लेपः, रागादिभिः सार्द्धमात्यन्तिकवियोग इत्यर्थः । आह-अपायातिशये सति ज्ञानातिशयभावाद् व्यतिक्रमः किमर्थम् फलप्रधानाः समारम्भाः" इति ज्ञापनार्थम् । ‘भद्रं सुराऽसुरनमस्कृतस्य' इति, अनेन पूजातिशयमाह, न हि 20 विभवानुरूपां पूजामकृत्वैव सुरा-ऽमुरा नमस्कारक्रियायां प्रवर्त्तन्त इति । उक्तं च- अशोकटक्षः सुरपुष्पवृष्टिदिव्यो ध्वनिश्चामरमासनं च । भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्रं, सत्मातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥ १ ॥ ] इति । पूजातिशयान्यथानुपपत्यैव वागतिशयो गम्यते। 'भद्रं धुतरजसः' इति, अनेन सकलसंसारक्लेशविनिर्मुक्तां 25 सिद्धावस्थामेवाऽऽह, यतो वध्यमानकं कर्म रजो भण्यते, तदभावस्त्वयोगिसिद्धानामेव, न पुनरन्येपाम् । यत आहे- "जाय णं एस जीवे एयइ वेदति चलइ फंदइ० ताव णं अट्टविहवंधए वा सत्तविहवंधए वा छबिहवंधए वा एग- विधए या" [भग. श. ] इत्यादि । तत्थ-- सत्तवियंधगा होति पाणिणो आउवज्जगाणं तु । तह मुहुमसंपराया छविहबंधा विणिहिट्ठा ॥१॥ मोहा-ऽऽउगवज्जाणं पगडीणं ते उ बंधगा भणिया । उवसंत-खीणमोहा केवलिणो एगविहवंधा ॥२॥ ते उण दुसमयठिइतम्स बंधगा ण उण संपरायस्स । सेलेसि पडियन्ना अबंधगा होति विनेया ॥३॥" . 15 [ उ. सू. पत्र 32 [पञ्चा. १६ गा. ४०-४२] . मङ्गलं सबस्तुतिश्च] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । आह-भगवतः संसारातीततात् परमकल्याणरूपत्वात् किमेवमुच्यते 'भद्रं भवतु' ? न च स्तोत्रा भणितं सर्वमेव भवतीति, अत्रोच्यते, सत्यमेतत् , तथापि कुशलमनो-वाक्-कायप्रवृत्तिकारणखान्न दोप इत्यलं प्रसङ्गेनेति गाथार्थः ॥३॥ एवं तावत् तीर्थकरनमस्काराः प्रतिपादिताः । साम्प्रतं तीर्थकरानन्तरः सङ्घ इति कृता तीर्थान्तर- ग्रामव्युदासेन नगररूपकेण तत्संस्तवं कुर्वनाह- [सुत्तं २] गुणभवणगहण ! सुयस्यणभरिय ! दंसणविसुद्धरच्छागा!। संघणगर ! भदं ते अखंडवरितपागारा ! ॥४॥ २. गुण० गाहा । व्याख्या-'गुणभवनगहन !' इह गुणाः-पिण्डविशुद्धयादय उत्तरगुणा अभिगृद्यन्ते । यथोक्तम्- पिंडम्स जा विसोही समितीओ भावणा तवो दुविहो । पडिमा अभिग्गहा वि य उत्तरगुणमो वियाणाहि ॥१॥ 10 [व्यव. भा. पी. गा. २८९] एत एव भवनानि एभिर्गहनं-प्रचुरतादुत्तरगुणानाम् एभिः सकुलं सधनगरमभिगृह्यते, तस्याऽऽमन्त्रणं हे गुणभवनगहन ! । तथा 'श्रुतरत्नभृत !'श्रुतान्येव-आचारादीनि निरुपममुवतुत्वाद् रत्नानि तै तं-पूरितमित्यर्थः तम्याऽऽमन्त्रणम् । तथा 'दर्शनविशुद्धरथ्याक !' इह दर्शन-प्रशम-संवेग- निदाउनुकम्माऽऽस्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं सम्यग्दर्शनं गृह्यते । तचौपशमिकादिभेदात् पञ्चविधम् । तथा चोक्तम्- "तं च पंचया सम्भ। ओवसमं १ सासायण 15 खयोवसमिय ३ वेदयं ४ खइयं ५॥" [ विशेषा. गा. ५२८ ] नि । दर्गनमेव असारमिख्यातादिकववररहिता विशृद्धा रख्या यस्य नत् तथाविधं तस्याऽऽमन्त्रणम् । 'सहनगर !' सः चातुर्वणः श्रमणादिनझ्यातः ग नगरमित्र समय- नगरं नग्याऽऽमन्त्रणम् , यथा पुरुषोऽयं व्याघ्र इन पुरुरूपयात्रः। उनं. च-"उपमितं व्यागादिभिः सामान्यामयोगे." [पा. २. १. ५६] । 'भद्रं कल्याणं तव भवतु । 'अग्यण्ड चारित्रमाकार ! चारित्र-मूलगणाः. भवार्ट-अपिराधिनं चारित्रमेव प्राकारो यस्य तत् तथाविधं तम्याऽऽमन्त्रणमिनि नाचायः ॥ ४ ॥ संसारोच्छेदित्वात् समग्यैव चक्रारूपयेण स्तवं पुर्वकार--- संजम-तवतुंबा-ऽस्यस्स णमो सम्पत्तपारियन्टम्म । अप्पडिचकास्स जओ होउ सया संघवयस्म ॥ ५ ॥ संयम० गाटा । व्याख्या-'संयम-तपन्तबा-उरकाय नमः मंना पानि र समनतांमि. गायन अत्याध तम्या-ऽरयाः, तत्र यथासाचं संयम-तपारपेव नन्दा-ऽन्या कन्यन्ट दाविध दम नमः। नत्र गंग:-:; पञ्चाश्रयाद विरमणं पश्चेन्द्रियनिग्रहः कपाययः । दण्डात्रय यदि मंद महादः ।।१।। 21 सपो हादशमकारं पाहमभ्यन्तरं च । तत्र दाहं पड़ दिधम् । पोनर- अनशनमूनोदाला ते मापणं मलामः । सापति रानः !!
६ 5 - , 15 श्रीहरिगवसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगलतं [स. २ गा. ६-१२ अभ्यन्तरमपि पड्विधम् । उक्तं च- "प्रायश्चित्तं विनयो चैयारत्यं स्वाध्यायो ध्यानं व्युत्सर्ग" [ इति । “सम्मत्तपारियल्लस्स" ति पारियल्लं-वाहापुष्टकस्य वागा भ्रमिरुच्यते, ततश्र सम्यक्त्ववागभ्रमिणे नमः । व्याख्यातं गाथार्धम् । चरकादिभिरतुल्यत्वाद् नास्य प्रतिचक्र विद्यते इत्यप्रतिचक्रम् , तस्य जयो भवतु इति सुप्रणि- धानमेतत् । 'सदा' सर्वकालम् । सङ्घश्चक्रमिव सद्धचक्रं तस्येति गाथार्थः ॥ ५॥ इदानी सङ्घस्यैव मार्गगामित्वतो रथरूपकेण स्तवं कुर्वन्नाह- सई सीलपडागूसियस्स तव-णियमतुरगजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ सज्झायसुणंदिघोसस्स ॥ ६ ॥ भ६० गाहा । व्याख्या- 'भद्रं कल्याणं भवतु । कस्य ? सारथस्य भगवत इति योगः । किविशिष्टस्य ? शीलोच्छ्तिपताकस्य, प्राकृतशैल्याऽन्यथोपन्यासः, शीलग्रहणाद् अष्टादशशीलागसहस्रपरिग्रहः । तथा ' तपो-नियम- 10 तुरगयुक्तस्य' तपा-संयमाश्वयुक्तस्येत्यर्थः । स्वाध्यायः-वाचनादिः, यथोक्तम्-" वाचना प्रच्छना परावर्त्तना अनुप्रेक्षा धर्मकथा च" ] इति, तत्र स्वाध्याय एव शोभनो नन्दिघोपः-तूर्यरवः “सुनेमिघोसस्स" त्ति नेमिनि?पो वा यस्य स तथाविधस्तस्य । इह च शीलाङ्गनिरूपणे सत्यपि तपो-नियमनिरूपणं प्रधानपरलोकाङ्ग- त्वख्यापनार्थम् । अस्ति चायं न्यायो यदुत-"सामान्योक्तावपि प्राधान्यख्यापनार्थ विशेषाभिधानम्" इति, यथा ब्राह्मणा आयाता वशिष्ठोऽप्यायात इति, एवमन्यत्रापि योजनीयमित्यलं प्रसङ्गेनेति गाथार्थः ।। ६ ॥ सङ्घस्यैव लोकासंश्लिष्त्वतः पद्मरूपकेण स्तवं प्रतिपादयन्नाह- कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स सुयस्यणदीहणालस्स । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स गुणकेसरालस्स ।। ७॥ सावगजणमहुयरिपरिवुडस्स जिणसूरतेयबुद्धस्स । संघपउमस्स भदं समणगणसहस्सपत्तस्स ॥८॥ [ जुम्मं] कम्मरय० गाहा । सावय० गाहा । व्याख्या-सङ्घपद्मस्य 'भद्रं ' मङ्गलं भवत्विति क्रिया । किम्भूतस्य ? 'कर्मरजोजलौघविनिर्गतस्य' इह ज्ञानावरणादिलक्षणं कर्म, तदेव अनेकधा जीवगुण्डनाद् रजो भण्यते, तदेव भव- कारणत्वाद् जलौयवद् जलौघः, तस्माद् विनिर्गत इव विनिर्गतः, तथा चाविरतसम्यग्दृष्टेरप्युपार्दपुद्गलपरावर्तः परः संसार उक्त इत्यतो विनिर्गतस्तस्य । श्रुतरत्नमेव दीर्घनालं यस्य सः, तद्वलादेव निर्गत इति भावनीयम् । पञ्च महावतानि-प्राणातिपातादिविनिवृत्तिलक्षणानि तान्येव स्थिरा-दृढा कणिका-मध्यगण्डिका यस्य । गुणाः-उत्तर 25 गुणाः त एव तत्परिकरत्वात् केसराणि यस्य विद्यन्ते इति गुणकेसरवत् तस्य गुणकेसरवतः ॥ ७ ॥ 'श्रायकजनमधुकरीपरिटतस्य' इति प्रकटार्थम् । नवरमभ्युपेत्य सम्यक्त्वं प्रतिपन्नाणुव्रतोऽपि प्रतिदिवस यतिभ्यः सकाशात् साधूनामगारिणां च सामाचारी शृणोतीति श्रावकः । उक्तं च- यो ह्यभ्युपेनसम्यक्त्वो यतिभ्यः प्रत्यहं कथाम् । शृणोति धर्मसम्बद्धामसौ श्रावक उच्यते ॥ १ ॥ 'मिनार्यने नोयुद्धम्य' केवलज्ञानभास्करविशिष्टसंवेदनप्रभवधर्मदेशनायुद्धस्येति भावार्थः। श्रमणगणसहस्र- पत्रम्य' इति प्रकटार्थमेव । नवरं श्राम्यतीति श्रमणः, “कृत्यल्युटो बहुलम् " [पा. ३. ३. ११३.] इति वचनात् 20 ] सङ्घस्तुतिः ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । कर्तरि ल्युट् , श्राम्यतीति-तपस्यति, एतदुक्तं भवति-प्रव्रज्यादिवसादारभ्य सकलसावद्ययोगविरतो गुरूपदेशादन- शनादि यथाशक्ति आ प्राणोपरमात् तपश्चरतीति श्रमणः । उक्तं च- यः समः सर्वभूतेषु स्थावरेपु त्रसेषु च । तपश्चरति शुद्धात्मा श्रमणोऽसौ प्रकीर्तितः ॥ १ ॥ , 5 इति गाथाहयार्थः ।। ८ ॥ इदानीं सङ्ग्यस्यैव सौम्यतया चन्द्ररूपकेग स्तबमाह- तव-संजममयलंछण ! अकिरियराहुमुहदुद्धरिस ! णिचं । जय संघचंद ! णिम्मलसम्मत्तविसुद्धजुहागा ! ॥ ९ ॥ तवसंजम० गाहा । व्याख्या-'तपः-संयममृगलाञ्छन !' तयः-संयममृगचित्र! । 'अक्रियाराहुमुख- दुप्पधृप्य ! इह अक्रियाशब्देन नास्तिका गृयन्ते, अनभ्युपगमाद् अविद्यमानपरलोकक्रियाः अक्रियाः, त एव राहु- मुख तेन दुप्पधृष्यः-अनभिभवनीयः तस्याऽऽमन्त्रणम् । 'नित्यम्' इति सदा जय सक्षचन्द्र ! । 'निर्मलसम्यक्त्व- 10 विशुद्धज्योत्स्नाक!' इह मिथ्यात्वभावमलरहितं निर्मलं सम्यक्त्वमुच्यते, तदेव विशुद्धा-निर्मला ज्योत्स्ना चन्द्रिका यस्य स तथाविधः तस्याऽऽमन्त्रणमिति गाथार्थः ।। ९ ।। अधुना सङ्यस्यैत्र प्रकाशकतया पूर्यपकेश स्तवमाह- परतित्थियगहपहणासगस्स तवतेयदित्तलेसम्म । णाणुज्जोयस्स जए भदं दमसंघसरस्म ॥ १० ॥ परतित्थिय० गाहा । व्याख्या-'पराधिकग्रामभानागकन्य' इस परीथिकाः- कपिल कगमग-58- 15 पादादिमतावलम्बिनः त एव ग्रहारतेपां प्रभा-एकवर्णयानलक्षणा नां नानयनि-अनन्तनयमलप्रवचनसमुत्य- झानालांकन अपनयतीति समावस्तरम् । 'नपन्नजोदामपन्य नयन पत्र दामाः-उम्पन्ला लेण्याःदाधि- नयो यस्य । 'जानोद्योतन्य इति गतार्थम् । 'जगतिलोक म मा मात्र । का? 'दमगल्या म्य' दमः-उपशमो भण्यने, नत्प्रधानः सङ्ययः बालसन्धानपनि गायायः ।।१।। साम्पतं समस्यैव महनया समुद्रारूपकाण म्नमार- भदं धिइवेलापरिगयस्स सम्झायजोगमगा। अक्खोभस्म भगवओ संघनमुदर दन्न ।।१।। भ६० गाता । ज्याण्या-सामनारय भद्रं भवलिनि किया। विवाद: विवालियन:- आन्मपरिणामः सब पेला-पेदिका-जलान्तरमणलक्षणा मर्यादा का नया मनालाल ! सामान वर्मपिदारणमानियतत्यान् गदाध्याय एत्र भकारी मिः नगर नि:: याम्पग्य । 'भगवनः समग्रेधादियुत्तन्य । सन्मतिविनापरवाना !! यानी नायव निधनवान हम कमिसार-- समदंगणवइन्दददगानागापदम् । पम्मदररपणमंडिपत्रानीयसेहलानन्न !!::|| क.
८ 5 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या समलङ्कृतं [सु. २ गा. १३-१७ णियमूसियकणयसिलायलुज्जलजलंतचित्तकूडस्स । णंदणवणमणहरसुरभिसीलगंधद्धमायस्स ।। १३ ।। जीवदयासुंदरकंदरुद्दरियमुणिवरमइंदइण्णस्स । हेउसयधाउपगलंतरत्तदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवरवरजलपगलियउज्झरपविरायमाणहारस्स । सावगजणपउरवंतमोरणचंतकुहरस्स ।। १५ ॥ विणयणयपवरसुणिवरफरतविज्जुज्जलंतसिहरस्स । विविहगुणकप्परुक्खगफलभरकुसुमाउलवणस्स ॥ १६ ।। णाणवरस्यणदिप्पंतकंतवेरुलियविमलचूलस्स । वंदामि विणयपणओ संघमहामंदरगिरिस्स ॥ १७॥ [छहि कुलय ] सम्मइंसण० गाहा । व्याख्या सम्यग्-अविपरीतं दर्शनं सम्यग्दर्शनम्, तदेव प्रथममोक्षाङ्गत्वात् सार- त्वाद् वज्रं सम्यग्दर्शनवज्रम् , तदेव दृढ़ रूढं गाढं अवगाढं पीठं यस्य सङ्घमहामन्दरगिरेः स सम्यग्दर्शनवनदृढ- रूढगाढावगाढपीठस्तस्य वन्दे इति, द्वितीयार्थे पष्ठी प्राकृतशैल्या आपत्वाच, तं वन्दे इत्यर्थः । तत् सम्यग्दर्शन- वज्रपीटं दृढमिति-निष्पकम्पम् , शङ्कादिशल्यरहितत्वात् ; रूढमिति-वृद्धिगुपगतम् , प्रतिसमयं विशुध्यमानत्वात् 15 प्रशस्ताध्यवसायस्थानेषु वर्तनात्, गाढमिति-निविडम् , तीव्रतत्त्वरुचिरूपत्वात् मुष्ठुश्रद्धानरूपत्वादित्यर्थः, अवगाढ- मिति-निमग्नम् , जीवादिपदार्थेषु सम्यगवबोधरूपतया प्रविष्टमित्यर्थः। “धम्मवरे"त्यादि धारयतीति धर्मः, धर्म एव वररत्नमण्डिता-प्रधानरत्नमण्डिता चामीकरमेखला यस्य स धर्मवररत्नमण्डितचामीकरमेखलाकः। क्रियायोजना पूर्ववदेवाचसेया । इह धर्मो द्विविधः मूलगुणोत्तरगुणरूपः, तत्रोत्तरगुणधर्मो रत्नानि, मूलगुणधर्मस्तु चामीकरमेख- लेति । तथा च न राजते मूलगुणधर्मचामीकरमेखला उत्तरगुणधर्मरत्नभूपणविकलेति गाथार्थः ॥ १२ ॥ नियमूसिय० गाहा । व्याख्या-३होत्सृतशब्दस्य व्यवहितः प्रयोगो द्रष्टव्यः, ततथैवं भवति-नियम एव कनकशिलातलानि नियमकनकशिलातलानि, तेपूच्छ्रितानि उज्ज्वलानि ज्वलन्त चित्तान्येव प्राकृतशैल्या कूटानि यस्मिन् स तथाविधः । इह च नियमः इन्द्रिय-नोइन्द्रियनियमः परिगृह्यते । उत्सतानि अशुभाध्यवसायपरित्या- गात् । उज्ज्वलानि प्रतिसमयं कर्ममलविगमात् । ज्वलन्ति सदा सूत्रार्थानुस्मरणरूपत्वात् । चित्यते यैस्तानि चित्तानि । उक्तं च- चित्तरत्नमसंलिष्टमान्तरं धनमुच्यते । यस्य तन्मुपितं दोपैस्तस्य शिष्टा विपत्तयः ॥ १॥ चन-क्षसमुदायः, नन्दनं च तद् वनं च नन्दनवनम् , तत्र नन्दन्ति यत्र मुर-सिद्ध-दैत्य-विद्याधरादयस्तद् नन्दनम् , यनमिति-अशोक सहकारादिनालम् , मनो हरतीति मनोहरम् , लतावितान-विविधपुप्प-फल-प्रयालाधुप पेतत्वात् , नन्दनयनं च तद् मनोहरं चेति “विशेषणं विशेष्येण बहुलम्" [पा. २. १. ५७] इति समासः २१ तम्य गुरभिथामा गालगत्यश्च मुरभिशीलगन्धः तेनाSHTHE-या या स तथाविधस्तस्य । क्रिया पूर्ववत् । 20 25 ] इति । , सद्धस्तुतिः] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ९ . इह च सङ्घमन्दरगिरेः सन्तोप एव नन्दनवनम् , तथाहि-नन्दन्ति तत्र साधव इति, तदेव विविधामपौंपध्यादिलब्ध्यु- पपेतवान्मनोहरं तस्य सुरभिशीलगन्ध एवेति, अथवा मनोहरत्वं मुरभिशीलगन्धविशेषणमिति गाथार्थः॥ १३ ॥ जीवद्या० गाहा । व्याख्या-जीवदर्यव सुन्दराणि स्व-परनितिहेतुत्वात् कन्दराणि वस्तुतस्तपखिनिल- यत्वात् , तथाहि-"अहिंसाव्यवस्थितः तपस्वी" [ ] इति, मुनिवरा एव शाक्यादिमृगपराजया- न्मृगेन्द्राः मुनिवरमृगेन्द्राः, उत्-पावल्येन दर्पिताः उर्पिताः कर्मशत्रुजयं प्रति, उर्पिताश्च ते मुनिवरमृगेन्द्राश्चेति 5 विशेषणसमासः, नीवदयासुन्दरकन्दरेषु उद्दर्पितमुनिवरमृगेन्द्रास्तैः आकीर्णः-व्याप्तो यस्तस्येति। 'हेतुशत' इत्यादि, प्रगलन्ति च तानि रत्नानि च प्रगलद्रत्नानि, निस्यन्दवन्ति चन्द्रकान्तादीनि परिगृधन्ते, धातवः कनकादिधातवो गृह्यन्ते, धातवश्च प्रगलत्नानि च धातु-प्रगलद्रत्नानि, दीप्ताश्च ता औपधयश्च दीप्तोषधयः, धातुप्रगलद्रत्नानि च दीप्तोषधयश्च धातु-प्रगलगत्नदीप्तौपधयः, ताः गुहामु यस्य स तथोच्यते । इह च सङ्घमन्दरगिरी हेतुशतान्येव धातवः, अन्वय-व्यतिरेकलक्षणाश्च हेतवो गृह्यन्ते, प्रगलद्रत्नानि तु क्षायोपशमिकभावनिस्यन्दवन्ति श्रुतरत्नानि 10 गृह्यन्ते, दीप्तोपधयस्तु विशुद्धा आमपोपध्यादयो गृह्यन्ते, गुहास्तु समवायाः प्ररूपणगुहा वा गृह्यन्त इति गाथार्थः ।। १४ ।। संबर० गाहा । व्याख्या-संवरश्वासौ वरच संवरवरः, संवरः-प्रत्याख्यानरूपः, सर्वप्राणातिपातादिविनि- वृत्तिरूपत्वाद् वरः, असावेव कर्ममलक्षालनाद् जलमिव जलं संवरत्ररजलम् , तस्मान् प्रगलितं च तदुसरं च संवर- वरजलप्रगलितोझरम् , तथा च संवरवरजलादुपचारतः प्रगलति श्रुनानाघुझरमिति, तदेव प्रविरानमानः हारो 15 यस्य स तथाविधः । “सावगजणे "त्यादि, रवन्तश्च ते मवृराध रचन्मयराः प्रचुराय ने स्वन्मगृराक्ष मनुररत- न्मयूराः, श्रावका एव जनास्त एव प्रचुररचन्मयूरास्तैर्नृत्यन्तीव कुहराणि यन्यनि समानः । इह व निम्नोत्र- गन्धर्वादि कुहराणि शास्त्रमण्डपादीनि [इति] गाथार्थः ॥ १५ विणय० गाहा । व्याख्या-स्फुरन्त्यश्च ता विद्युतश्च स्फुरद्रिघुनः. विनयेन नताः विनयननाः. विनयननाथ ते प्रवरमुनिवराश्चेति, त एव स्फुरद्विधुज्ज्वलन्ति शिवराणि यम्पनि समानः । घर नविनरागाउनोभेद । त्वात् तपांस्येव स्फुरन्ति, प्रावचनिकाश्च विशिष्टाचार्यादयः शिवराणि । "विविध गादि. मिरिया गणा मां ने विविधगुणाः, विशेषणान्यथानुपपत्त्या साधयो गृशन्ने, त एवं विशिष्ट लोपसयान गमगांवमरमदानाग पाल्पक्षकाः विविधगुणकल्पक्षकाः, फलभरश्च कुसुमानि च पालमा ममानि शिविटाकागां पाटकर कुलमानि विविधगुणकल्पक्षकपलभर-कुसुमानि तैराकुलानि बनानि पनि मनाम: ? र मनमो धर्मकामग गृयते, पुरनुमानि ऋद्धयः, बनानि गच्छा इति गाधार्थः ।। १६ ।। णाण० गाहा । व्याख्या-ज्ञानं च तद वरं च ज्ञानवरम् . परमनितिन्ना नया दिन टोपणना पान्ता विमला चैर्यचडा यस्य स तथाविधः । अत्र दीप्यमानति वालिद रिटा फान्ता भव्यजनमनोहारियाद . विमला तदायरणाभावात् । चन्द अनि विकट मिति. कर्मणि या पाठीति गाधार्थः ॥ १७ ॥ रवणम्, ॥
सू. ३-६ गा.१८-२७ श्रीहरिभहमरिमृत्रितया नृत्या सगलतं [सुत्तं३] वंदे उससं अजिअं गंभवमभिणंदणं सुमति सुप्पभ सुपासं । ससि फुप्फदंत सीयल सिज्जंसं वासुपुज्जं च ॥ १८ ॥ विमलमणंतइ धम्म संति कुंथु अरं च मलिं च । मुणिसुब्वय णमि णेमी पासं तह वद्धमाणं च ॥ १९॥ [जुम्म ] ३. वंदे० गाहा । विमल० गाहा । गाथाद्वयमपि निगदसिद्धम् ॥ १८ ॥ १९ ॥ गणधरावलिका तु या स्य तीर्थकृतः सा प्रथमानुयोगानुसारेण द्रष्टव्येति । महावीरवर्द्धमानस्य पुनरियम्- [ सुत्तं ४ ] पढमेत्य इंदभूई वीओ पुण होइ अग्गिभूइ त्ति । तइए य वाउभूई तओ वियत्ते सुहम्मे य ।। २०॥ मंडिय-मोरियपुत्ते अकंपिए चेव अयलभाया य । मेयज्जे य पभासे य गणहरा हंति वीरस्स ॥ २१॥ [जुम्मं ] ॥ २० ॥ २१ ॥ साम्प्रतं वर्तमानतीर्थाधिपतेः स्थविरावलिका प्रतिपादयम्नतिशयभक्त्या सामान्यतस्तच्छा- सनस्तवं प्रतिपादयन्नाह- [सुत्तं ५] णेव्वुइपहसासणयं जयइ सया सव्वभावदेसणयं । कुसमयमयणासणय जिणिंदवखीरसासणय ।। २२ ।। ५. निब्युइपह० रूपकम् । अस्य व्याख्या-नितिपथशासनकमिति, अत्र यद्यपि सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि निर्वाणमार्गस्तथाप्यनेन दर्शन-चरणपरिग्रहः,यत आह-जयति सदा 'सर्वभावदेशनक' सर्वभावप्ररूपकमित्यर्थः, 20 अनेन त ज्ञानपरिग्रहः । अथवा 'निर्वृतिपथशासनकम् ' इन्यनेन सम्पूर्णनिर्वाणमार्गकथनमेवेति गृह्यते, 'जयति सदा सर्वभावदेशनकम् ' इत्यनेन तु विधि-प्रतिषेधद्वारेण 'न नितिमार्गव्यतिरेकेण किञ्चिदस्ति' इति ख्याप्यते । यत एवम्भूतमन एव 'कुसमयमदनाशनक' कुसिद्धान्तावलेपनाशनकमित्यर्थः। जिनेन्द्रवरवीरशासनकं' चरमतीर्थ- करप्रवचनमिति हृदयम् । अयं रूपकार्थः ॥२२॥ येरविच्छेदेन स्थविरैः क्रमेणेदंयुगीनानामानीतं तदावलिकां प्रतिपादयन्नाह- [ सुत्तं ६] मुहम्मं अग्गिवेसाणं जंबूणामं च कासवं । पभवं कचायणं वंदे वच्छं सेज्जंभवं तहा ॥ २३ ॥ . अधुना 5 तीर्थकर-गणधर-जिनशासनत्तव-स्थविरावयः] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ११ ६. सुधम्म० गाहा । व्याख्या-इद्द स्थविरावलिका सुधर्मस्वामिनः प्रवृत्ता। उक्तं च-"तित्थं च सुधम्माओ णिरवचा गणहरा सेसा।" [ ] इति । अतस्तमेव पुरस्कृत्येयं प्रतिपाद्यते-सुधर्म भगवद्गणधरं 'अग्निवैशायनं' इति अग्निवैशायनसगोत्रम् । तथा तच्छिप्यं जन्यनामानं च 'काश्यपं कास्यपगोत्रम् । तस्मान् ‘प्रभवं' तच्छिप्यं प्रभवनामानं 'कात्यायनं इति कात्यायनसगोत्रम् । वन्दे इति क्रिया प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा तच्छिप्यं " वच्छं" इति वत्ससगोत्रं शश्यम्भवं तथेति गाथार्थः ।। २३ ॥ जसभई तुंगियं वंदे संभृयं चेव मादरं । भद्दवाहुं च पाइण्णं थूलभदं च गोयमं ॥ २४ ॥ जसभ६० गाहा । व्याख्या-'शव्यम्भवशिष्यं यशोभद्रं तुङ्गिकं' इति तुङ्गिकगण-यानापसगोत्रं वन्दे । अस्य प्रधानशिप्यो बभूवतः, तद्यथा-सम्भूतविजयो माहरसगोत्रः, भद्रबाहुश्च प्राचीनसगोत्र इति । तथा चाह-सम्भूतं चैव माहर भद्रबाहुं च प्राचीनमिति । तत्र सम्भूतम्य विनेयः स्युलभद्रो गीतमसगोत्र आलीन् । आव-त्यूलभद्रं च गौतम- 10 मिति गाथार्थः ।। २४ ॥ एलाबच्चसगोत्तं बंदामि महागिरि सुहत्यि च । तत्तो कोसियगोत्तं बहुलस्स सरिचयं वंदे ॥ २५ ॥ पलावञ्चम० गाहा । व्याख्या-स्थूलभद्रम्यापि मात्र प्रधानमिप्यौ। नयया-लालसगोत्रो महागिरिः वशिष्टयगोत्रः युदग्नी च । यन आर-पलापव्ययगोत्रं वन्दं महागि नरिमनं २ । नत्र मानिनः मरिमत-गुनिया. 15 दिनयेणाऽऽवलिया यथा दग्नानु [अ० ८ ० २१० नर्थव श्या. नत्राधिका मानिनिकहाधि- कारः। नत्र महागिन्याल-बन्टिर सही कौगिकसगोत्री चमनभातरीही प्रशानी न । नयोगी व मावचनीय आसीन अन आर.-ननः कौशिक गोत्रं बालाय नाय कामात दिन मामार्गः ।। २ ।। हारियगोतं साई व चंदिगो हानि नामः। वंदे कोमियगोतं मंडिरं अज्जनीयथा ॥ २६ ॥ हारिय० गाहा । व्याख्या-मिशिष्यको :: i.. सगोत्रमेय यागारंग । [च्यामार्य शिष्यं का बन्द को ... ! सिमा पर्यायधर्म य यायम् . जीनगिनि-रानम् . जीन माला : . समिनि भावनीयम् . भाग्यमानि १:. आर्मीकार: :: :: ::: नमस्य शिष्यः सामगोपालामा गतीति - + १२ + श्रीहरिभद्रसरिसृत्रितया वृत्त्या सगलातं [ मृ. ६ गा. २८-३५ समुद्रेषु गृहीतममाणं' अतिशयेन द्वीपसागरप्रज्ञप्तिविज्ञायकमिति भावः । अक्षुभितसमुद्रवद् गम्भीरो अक्षुभितसमुद्र- गम्भीरः अतस्तमिति गाथार्थः ॥ २७ ॥ मणगं करगं झरगं पभावगं णाण-दंसणगुणाणं । वंदामि अज्जमंगुं सुयसागरपारगं धीरं ।। २८ ।। भणगं० गाहा । व्याख्या--आर्यसमुद्र शिष्यं वन्दे आर्यमङ्गुमिति योगः। किम्भूतम् ?-'भणकं' कालिकादि- सूत्रार्थ भणतीति भणः, स एव प्राकृतशैल्या भणकस्तम् । 'कारकं कालिकादिसूत्रोक्तमेवोपधिप्रत्युपेक्षणादिक्रिया- कलापं करोतीति कारकस्तम् । 'ध्यातारं' धर्मध्यानं ध्यायतीति ध्याता तम् । इहौवतः कारकमित्युक्ते प्रधानपर- लोकाङ्गताख्यापनार्थं ध्यानस्य ध्यातारमिति विशेषाभिधानम् । यत इत्थम्भूतोऽत आह-प्रभावकं 'ज्ञान-दर्शन- गुणानां' यथावस्थितपदार्थावबोधादीनाम् , एकग्रहणात् तज्जातीयग्रहणात् चरणपरिग्रहः । श्रुतसागरपारगं धीर- 10 मिति गाथार्थः ॥ २८ ॥ णाणम्मि देसणम्मि य तव विणए णिच्चकालमुज्जुत्तं । अज्जाणंदिलखमणं सिरसा वंदे पसण्णमणं ॥२९॥ णाणम्मि० गाहा । व्याख्या- आर्यममुशिष्यं आर्यनन्दिलक्षपणं शिरसा वन्दे प्रसन्नमनसम् । किम्भूतम् ?- ज्ञाने दर्शने च तपसि विनये च, अनेन चरणमाह । नित्यकालं 'उद्युक्तं' अप्रमादिनमिति गाथार्थः ।। २९ ॥ वड्ढउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं । वागरण-करण-भंगिय-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥ ३० ॥ वड्ढउ० गाहा । व्याख्या-'वर्द्धता' वृद्धिमुपयातु ।.कोऽसौ ? 'वाचकवंशः' तत्र विनेयेभ्यः पूर्वगतं सूत्र- मन्यच्च वाचयन्तीति वाचकाः तेषां वंशः-भाविपुरुषपर्वप्रवाहः । किम्भूतः ? यशोवंशः, अनेन विपक्षव्यवच्छेदमाइ । तथाहि-अलमयशःप्रधानस्य संसारहेतोः परममुनिविधृतलिङ्गविडम्बकस्य वृद्धयेति । केपा सम्बन्धिसम्भूतः ? आर्य- 20 नन्दिलक्षपणशिष्याणां आर्यनागहस्तिनाम् । किम्भूतानाम् ? 'व्याकरण-करण-भङ्गिक-कर्मप्रकृतिप्रधानानां' तत्र व्या- करणं-प्रश्नव्याकरणं शब्दप्राभृतं वा, करणं-पिण्डविशुद्धयादि, उक्तं च- पिंडविसोही ४ समिती ५ भावण १२ पडिमा १२ य इंदियणिरोहो ५ । पडिलेहण २५ गुत्तीओ ३ अभिग्गहा ४ चेव करणं तु ॥ १॥ [ओघनि. गा. ३] भङ्गिकाः-चतुर्भगिकाद्यास्तच्छृतं वा, कर्मप्रकृतिः प्रतीता, एतेषु प्ररूपणामधिकृत्य प्रधानानामिति 25 गाथार्थः ॥ ३० ॥ जचंजणधाउसमप्पहाण मुद्दीय-कुवलयनिहाणं । वउ वायगवंसो रेवइणक्खत्तणामाणं ॥३१॥ जगंजणधाउसमप्पहाण० गाना। व्याव्या-जात्यश्वासावञ्जनधातुश्चेति समासः, तत्समा प्रभा-देहच्छाया पेपा ने तथाविधानेपाम्। मा भूदन्यन्तकृष्णसम्पत्ययस्तत आह-मुद्रिका कुवलयनिभाना पकसरसद्राक्षा-नीलोत्पल- . 13 - ?
। स्थविरावलिका ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । १३ निभानामित्यर्थः । रत्नविशेषः कुवलयमित्यन्ये, तथाऽप्यविरोधः । वर्द्धतां वाचकवंशः । केपाम् ? आर्यनागहस्ति- शिष्याणां वतिनक्षत्रनाम्नां खतिवाचकानामिति गायार्थः ।। ३१ ॥ अयलपुरा णिक्खंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । वभद्दीवग सीहे वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥ ३२ ।। अयलपुरा० गाहा । व्याख्या-अचलपुराद निष्क्रान्तान् । कालिकश्रुतानुयोगेन नियुक्ताः कालिकश्रुतानु- योगिकास्तान , यहा कालिकश्रुतानुयोग एपां विद्यत इति समासस्तान कालिकश्रुतानुयोगिनः । 'धीरान् ' स्थि- रान् । 'ब्रमीपिकान् सिद्धान् ब्रह्मट्टीपिकाशाखोपलक्षितान् सिद्धाचार्यान् ग्वातिवाचकशिप्यान । वाचकपदं तत्कालापेक्षया 'उत्तम प्रधान प्राप्तानिति गाथार्थः ।। ३२ ।। जेसि इमो अणुओगो पयरइ अज्जा वि अड्दभरहम्मि । बहुनगरनिग्गयजसे ते वंदे खंदिलायरिए ॥ ३३ ॥ जेसि० • गाधा । व्याख्या-येपामयमनुयोगः प्रचरति अद्याप्यर्दभरते बनायादारतः । बहुनगरेषु निर्गतं- प्रसिद्धं यशो येषां ने बहुनगरनिर्गतयशनः तान बन्द सिवाचकशिष्यान स्कन्दिन्नाचार्यान् । कह पुण तेनि अणुओगो ?, उच्यते, बारममंबच्छरिए महन्ते दुम्भिरखे काले भत्ता फिडियाणं गहण-गुणण-ऽणुप्पेहाऽभावतो मुत्ते विप्पण, पुणो लुभिक्खे काले जाते मगणमहन्ते समुदए ग्वंदिलायरियप्पमुहमघेण 'जो जं संभरह नि एवं संबहिनं कलियर। जम्हा एयं मधुराने 1: फर्य नम्ही मादुग वायणा भन्नति । ला य ग्वंदिलायरियमम्मन नि काननिओ अगुओगो भषणति । अन्ने भनि जहा- यं णो णटुं. तम्मि वृदिमयन्द्रकाने हे अन्ने पहागा अणुओगरा ते विणहा। एगे ग्वंदिलायणि गंधरे । तेण गहुगए पुणी अणुआगी पनि नि भन्नः । लस्मंतिओ य अणुओगो भण्णा नि गाधार्थः ॥ ॥ नत्तो हिमवंतमहनविषामं धीपरवाममोनं । सज्झायमणंतधरं हिमवंतं चंदिमो मिला ।। ४ ॥ नलो० गाता । व्याख्या-मः शिवाभियं न ? मा विवाहिमवन य महाविक्रमः-विकार याप्यादिलक्षणो "E"नि भर. लानिपगमम् . भावनशैल्या न अन्यधोपन्यामः. अगन्ना विकाता :- दा :: विधनम् । “समायमणतधरं "ति अननवा पाया पनि मनाना पर ग्यायागानस्य घर अनि समायः मिनि नापाय : कालिपसुपत्रणभोगस्न धागा धागा व पना। रिमतमामणे वंदे णागम्हणावति ।। ५!! शालिग मायापा- पाकिकागदपोजनामा :: .... बन्द नाव व , 5 . - 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्या समलकृतं [ सू. ६.७ गा. ३६-४४ मिउ-मद्दवसंपण्णे अणुपुब्बि वायगत्तर्ण पत्ते । ओहसुयसमायरए णागज्जुणवायए वंदे ॥ ३६ ॥ मिउ० गाहा । व्याख्या - मृदु-मार्दवसम्पन्नान , उपलक्षणखान्मृदुखस्य कान [सम्पम्नान ] ? क्षमा-मार्दवा-ऽऽ- जैव-सन्तोपसम्पन्नानित्यर्थः । 'आनुपूर्व्या' वयः-पर्यायकालगोचरया वाचकत्वं प्राप्तान् । ऐदंयुगीनानामपि सामाचारीप्रदर्शनपरमेतत् , न चापुष्टं द्वितीयपदमाश्रित्यैदंयुगीनाना- मपि युज्यते कालोचितानुपूर्वी विहाय कचिदप्याचार्यत्वाद्यारोपणम् , महापुरुषाणां गौतमादीनामा- शातनाप्रसङ्गात् , कृतं प्रसङ्गेन, संसार एव दण्डो भगवदाजावितयकारिणामिति । ओघश्रुतसमाचरकान् ' ओघश्रुतं-उत्सर्गश्रुतं तत् समाचरन्ति ये ते तथाविधास्तान् नागार्जुनवाचकान् वन्दे इति गाथार्थः ॥ ३६॥ वरकणगतविय-चंपयविमउलवरकमलगव्मसविण्णे। भवियजणहिययदइए दयागुणविसारए धीरे ॥ ३७॥ अड्दभरहप्पहाणे बहुविहसज्झायसुमुणियपहाणे । अणुओइयवस्वसहे णाइलकुलवंसणंदिकरे ॥ ३८॥ सूअहिययप्पगम्भे वंदे हं भूयदिण्णमायरिए । भवभयवोच्छेयकरे सीसे णागज्जुणरिसीणं ॥ ३९ ॥ [विसेसयं ] वरकणग० गाहा । अड्ढ० गाहा । भूअहियय० गाहा । व्याख्या-इदं गाथात्रयमपि प्रायो निगदसि- द्धमेव । नवरम्-'भव्यजनहदयदयितान्' भव्यजनहृदयवल्लभान् ॥ तथा सुविज्ञातवहुविधस्वाध्यायप्रधानान् , बहुविध आचारादिभेदात् स्वाध्यायः । अनुयोजिता यथोचिते वैयावृत्यादौ वरपभाः-सुसाधवो यैस्तान् । नागेन्द्र- कुलवंशनन्दिकरानिति, प्रमोदकरानित्यर्थः ।। 'भूतहितप्रगल्भान्' अनेकधा सत्वहितनिपुणानिति भावः । 20 वन्देऽहं भूतदिन्नाचार्यानिति, अत्रानुस्वारोऽलाक्षणिकः । ‘भवभयव्यवच्छेदकरान् ' इति सदुपदेशादिना संसार- भयव्यवच्छेदकरणशीलान् ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ सुमुणियणिच्चा-ऽणिचं सुमुणियसुत्त-ऽस्थधारयं णिचं । वंदे हं लोहिचं सम्भावुभावणातचं ।। ४० ॥ सुमुणिय० गाहा । व्याख्या-भूतदिन्नाचार्यशिष्यं "वंदे ह लोहिचं " इति क्रिया । किम्भूतम् ? सुष्टु विज्ञातं 2. नित्याऽनित्यं येन स तथाविधस्तम् । किं विज्ञातम् ?, विशेपणान्यथाऽनुपपत्तेः वस्तु इति गम्यते, यथा 'सवत्सा धेनुः' इत्युक्ते गौः, वडयाया विशेषणायोगादिति । तच वस्तु सचेतनाऽचेतनम् । तत्र सचेतनमात्मा, चेतनखा- उपेक्षया नित्यः, नारक तिर्य-नरा-ऽमरपर्यायापेक्षया चानित्यः । एवमचेतनमप्यण्यादि विज्ञातव्यम् , तथाहि- परमाणुरजीवस मूनसादिभिनित्यः, वर्णादिभिर्यणुकादिभिस्खनित्य इति । उक्तं च- सप्यक्तिपु नियनं क्षणे क्षणेऽन्यसमथ च न विशेषः । सत्याचित्यपचित्योराकृति-जातिव्ययस्थानात् ॥ १ ॥ ] इति । 15 ?
१५ -- स्थविरावलिका परिषच्च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । अत्र बहु वक्तव्यम् , तच नोच्यते, ग्रन्थविस्तरभयात् , गमनिकामात्रप्रधानोऽयमारम्भ इति । अनेन न्याय- वेदित्वमाह। 'मुविज्ञातसूत्राऽर्थधारकम्' इत्यनेन त्वोधत एव स्वभ्यस्तसूत्रा-ऽर्थधारकमिति । 'सद्भावोद्भावनातथ्यम् इत्यनेन सम्यक्प्ररूपकत्वमाहेति गाथार्थः ॥ ४०॥ अत्थ-महत्थक्खाणी सुसमणवक्खाणकहणणेबाणी । पयतीए महुवाणी पयओ पणमामि दूसगणी ॥ ४ ॥ अत्यमहत्वक्वाणी० गाहा । व्याख्या-लोहित्यशिप्यं 'प्रयतः सन् अनुत्मष्टप्रयत्नपरः सन्नित्ययः, प्रणमामि दुप्यगणिनमिति क्रिया । किम्भूतम् ? 'अर्थ-महार्थखानि' खानिरित्र खानिः, अर्थ-महार्थानां खानिः अर्थ- महार्थखानिः तम् । तत्र भाषाभिधेया अर्थाः, विभाषा-वार्निकगोचरा महार्था इति । मुश्रमणव्याख्यानकथने निर्ट- तिर्यस्य स तथाविधस्तम् । तत्र व्याख्यान-प्रतीतम् , कथनं-संशये सनि विनेयप्रश्नोनरकालभाचि व्याकरणम् , अथवा व्याख्यानम्-अनुयोगः, कथनं-ओघतो धर्मस्य, धर्मकयेत्यर्थः । 'प्रकृत्या' स्वभावेन ‘मधुरवाचं' 10 मधुरगिरमिति गाथार्थः ॥४१ ।। सुकुमाल-कोमलतले तेसिं पणमामि लक्वणपसत्थे । पादे पावयणीणं पाडिच्छगसएहि पणिवइए ।। ४२ ॥ मुकुमालकोमल० गाहा । निगदसिद्रा ।। ४२ ।। एवमावलिका क्रमेण महापुलाणां नामभिधाय साम्प्रतं सामान्यनैव श्रुतधरनमस्कारं प्रतिपिपादयिषुराह जे अण्णे भगवंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । ते पणमिऊण सिरसा णाणस्त परूवणं वो ॥ १३ ॥ ॥ थेगवलिया सम्मना ।। जे अन्ने भगवंते० गाहा । व्याख्या-ये चान्य - श्रीना भाविना न:' नावान गमग्रेश्वर्यादिमन्त इत्यर्थः । कालिकश्रुनानुयोगिनः ‘धीराः पश्यनमान : मनमान: आभिनिवाधिकादेः प्ररूपणं वक्ष्ये । क. एबमा ? यामिशिष्यो । इदं च पञ्चप्रकारं ज्ञानम् . एतत्मनिपादयं वाध्ययन बोरा या योग्या-योग्यविभागोपदर्शनार्थमेव नावहिलमा.. [सुनं ७] सेलधण १ कुडग २ चालणि ३ परिपूणग १ हम ५ महिम ! मसग ८ जल्लग : विराली १० जाग गोभी आनीरी ।।2।। ना समानो तिविहा पण्णता. तं नहा-जाणिया : अनिता विपना । ७. सटा मापारया-आमगाव -::-: चलानां माराम मोरयोविभानिक - E :
- 10 १६ श्रीहरिभद्रसूरिसूनितया वृत्त्या सगलकृतं [सू. ७-८ गा. ४४ सोऽर्थिगुणमपेक्ष्य प्रदानक्रियायां प्रवर्त्तन्ते दयालव इति, अत्रोच्यते, ननु यत एव शुभाध्ययनप्रदानाधिकारे समभावव्यवस्थिताः सर्वसत्त्वहितायोधता महापुरुषाश्च गुरवः अत एव योग्या-ऽयोग्यविभागोपदर्शनं न्याय्यम् , मा भूदयोग्यप्रदाने तत्सम्यग्नियोगाक्षमार्थिजनानर्थ इति, “न खलु तत्त्वतोऽनुचितप्रदानेनाऽऽयासहेतुनाs- विवेकिनमर्थिजनमनुयोजयन्तोऽप्यनवगतपरार्थसम्पादनोपाया भवन्ति दयालवः" इत्यवधूय मिथ्या- 5 भिमानमालोच्यतामेतदिति । आह-क इबायोग्यप्रदाने दोपः ? इति, उच्यते, स हाचिन्त्यचिन्तामणिकल्पमनेकभ- वशतसहस्रोपात्तानिष्टदुष्टाष्टकर्मराशिजनितदौर्गत्यविच्छेदकमपीदमयोग्यत्वादवाप्य न विधिवदासेवते, लाघवं चास्य समापादयति, ततो विधिसमासेवकः कल्याणमिव महदकल्याणमासादयति । उक्तं च - आमे धडे निहित्तं जहा जलं तं घडं विणासेइ । इय सिद्धंतरहस्सं अप्पाहारं विणासेइ ॥१॥ ] इत्यादि। अतोऽयोग्यदाने दातकृतमेव वस्तुतस्तस्य तदकल्याणमित्यलं प्रसङ्गेन । प्रकृतं प्रस्तुमः-तत्राधिकृतगाथां प्रपञ्चत आवश्यकानुयोगे व्याख्यास्यामः । इह पुनः स्थानाशून्यार्थं भाष्यगाथाभिर्व्याख्यायत इति 'उल्लेऊण न सको' गज्जइ इय मुग्गसेलओ रन्ने । तं संबटगमेहो सोउं तस्सोवरिं पडइ ॥१॥ 'रविओ' त्ति ठिओ मेहो 'उल्लो मि? ण व?' ति गज्जइ य सेलो। 'सेलसमं गाहेस्स' निविज्जइ गाहगो एवं ॥२॥ आयरिए सुत्तम्मि य परिवाओ, सुत्त-अत्थपलिमंथो । अन्नेसि पि य हाणी, पुट्टा वि न दुद्धया वंझा ॥३॥ 15 वुढे वि दोणमेहे ण कण्हभोमाउ लोट्टए उदगं । गहण-धरणासमत्थे इय देयमछित्तिकारिम्मि ॥४॥ भाविय इयरे य कुडा, अपसत्थ-पसत्थभाविया दुविहा । पुप्फाईहि पसत्था, सुर-तेल्लाईहिं अपसत्या ॥५॥ वम्मा य अत्रम्मा वि य, पसत्थ वम्मा य होति अग्गेज्झा। अपसत्थ अवम्मा वि य, तप्पडिवक्खा भवे गेज्झा ॥६॥ कुप्पवयण-ओसन्नेहिं भाविया एवमेव भावकुडा । संविग्गेहिं पसत्था वम्माऽवम्मा य तह चेव ।। ७ ।। जे पुण अभाविया खलु ते चतुधा, अधविमो गमो अन्नो । छिद्दकुड भिन्न खंढे सगले य परूवणा तेसिं ॥८ 20 सेले य छिट्ट चालिणि मिहो कहा सोउमुठियाणं तु । छिड्डाऽऽह 'तत्थ विट्ठो मुमरिंसु, सरामि णेदाणि' ॥ ९ ॥ एगेण विसइ बीएण णीइ कण्णेण' चालणी आह । 'धन्न स्थ' आह सेलो 'जं पविसति नीति वा तुझं ॥१०॥ तावसखउरकविणयं चालणिपडिबक्खि ण सवइ दवं पि । परिपूणगम्मि य गुणा गलंति, दोसा य चिट्ठति ॥११॥ सबन्नुप्पामन्ना दोसा हु न संति जिणमते केई । जं अणुवउत्तकहणं, अपत्तमासज्ज व हवेज्जा ॥१२॥ अंवत्तणेण जीहाए कृचिया होइ खीरमुदगम्मि । हंसो मोत्तूण जलं आवियइ पयं, तह सुसीसो ॥१३॥ 26 सयमपि न पियइ महिसो, ण य जूहं पियइ लोलियं उदगं।विग्गह-विकहाहि तहा अथकपुच्छाहि य कुसीसो ॥१४॥ अवि गोपयम्मि वि पिए मुढिओ तणुयत्तणेण तोंडस्स। न करेइ कलुसतोयं मेसो, एवं सुसीसो वि ॥ १५ ॥ मसउच्च नुर्द जवादिएदि निच्छुन्भए कुसीसो उ । जलुगा व अमितो पियइ सुसीसो वि सुयणाणं ।। १६॥ उडेउं भूमीए खीरं नह पियइ दुद्रुमज्जारी। परिमुट्ठियाण पासे सिक्खइ एवं विणयभंसी ॥१७॥ पाउं थोर थोर खीरं पासाई जाओ लिहइ । एमेव जियं काउं पुच्छइ मइमं, न खिज्जेइ ।। १८॥ 37 अमो दोन्झिदि कलं, णिरत्ययं किं वदामि से चारिं? । चउचरणगवी उ मता, अवन्न हाणी य बडुगाणं ॥१९॥ - - mm परिषत् पञ्च ज्ञानानि च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । १७ मा मे होज्ज अवश्णो, गोवझा, मा पुणो व न दलिज्जा । वयमवि दोज्झामो पुणो, अणुग्गहो अन्नढे वि ॥२०॥ सीसा पडिच्छंगाणं भरो ति, ते वि य हु सीसगभरो ति। ण करेंति मुत्तहाणी, अन्नत्य वि दुल्लभं तेसि ॥२१॥ कोमुदिया १ संगामिय २ उम्भूतियगा ३ उ तिम्नि भेरीओ। कण्हम्साऽऽसी उ तया, असिवोवसमी चउत्थी उ॥२२॥ सक्कपसंसा, गुणगाहि केसवा, जेमिचंद, सुणदंता । आसरयणस्स हरणं, कुमारभंगे य, पुयजुङ्गं ॥२३॥ णेहि जिओ मि त्ति अहं, असिवोवसमीइ संपयाणं च । छम्मासिययोसणया पसमइ, ण य जायए अग्णो ॥२४॥ 5 आगंतु वाधिखोभे, महिड्डि मोल्लेण, कंथ, दंडणता। अट्टम आराहण, अन्न भेरि, अन्नन्स ठवणं च ॥२५॥ मुझं तया अगहिते, दुपरिन्गहियं कयं तया, कलहो । पिट्टण, अइचिर, विक्किय गते चोरा य, ऊणग्यं ॥२६॥ मा णिण्हव इय दातुं, उवमुंजिय देहि, किं विचिंतेसि ? | विचामेलियदाणे फिलम्मसी तं, चऽहं वेव ॥२७ ।। भणिया जोन्गा-जोन्गा सीसा गुरवो य, तत्थ दोण्डं पि। वेयालियगुण-दोसो, जोगो जोगस्स भासेज्जा ।।२८।। [विशेषा. गा. १४५५-८२, कल्पभा. गा. ३३५-६१ ) 10 एवं तावद् विभागतो योग्याऽयोग्यविनेयविभागोपदर्शनं कृत्वा साम्प्रतं सामान्यन पर्पदं प्ररूपयन्नाह मा समासओ तिविता पन्नत्तेत्यादि सूत्रम् । अस्य व्याख्या-'सा' पर्पत 'समासतः संक्षेपेण 'त्रिविधा त्रिप्रकारा 'प्रज्ञप्ता प्ररूपिता । कैः ? तीर्थकर-गणधरैरिति गम्यते । तद्यथा' इत्युदाहरणोपन्यासार्थः। 'लिका' इति, अत्र “जा अयोधने " इत्यस्य "इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः" [पा. ३.१.१३५] इनि कमत्ययः, इटि च विडति" [पा. ६. ४. ६४ ] इत्याकारलोपः; परगमनम् , टाप, जानातीनि का, कमत्ययः, “प्रत्ययस्थान् ।। कान् पूर्वन्यात इदाप्यमुपः" [पा. ७. ३. ४४] इति इत्त्वम् , 'किका' पग्ज्ञिानचनी । न लिका ‘अतिका तद्विलक्षणा । 'दुर्विदग्या' मिथ्यावलेपगी । तत्थिमा जाणिया गुण-दोसविरोखण्ण, अणभिग्गहिया च कुस्मृति-मएन । एमा जाणगपग्लिा. गणननिता अगाना ॥ १ ॥ मा तु अयाणिया पगामृद्ध अयाणिय, मिगछावय-सीह-वाडयभूया । रयणमिव अमंटरिया. मामलाममा ॥ २ ॥ मा पुग दब्धियडिया किंचिग्मनग्गाठी १ पल्लवगाही २ य तरियगाही ३ य । कुविचड़िया : एमाला निविदा | - साम्मतमिदेवतास्तादिनम्पादिनलकाललौशित्लिा दररोज jཀར་ ८. गाणं पंचविहं पण्णनं. तं जहा-भाभिपित्रोहियोति गणराजवणाणं १ केवलणाणं ५। + . .
[ सू. ८ - -- - १८ श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या समलयातं ८. णाणं पंचविहं पण्णत्तं इत्यादि सूत्रम् । अस्य व्याख्या-ज्ञातिः ज्ञानम् , “कृत्यल्युटो बहुलम्" [पा. ३. ३. ११३] इतिवचनाद् भावसाधनः, संविदित्यर्थः । ज्ञायते वाऽनेनेति ज्ञानम् , तदावरणक्षयोपशमादेव । ज्ञायतेऽस्मिन्निति क्षयोपशमे सति ज्ञानम् । आत्मैव विशिष्टक्षयोपशमयुक्तः जानातीति वा ज्ञानं तदेव, स्वविषयसंवेद- नरूपत्वात् तस्य । 'पञ्चविध मित्यत्र पञ्चेति सङ्ख्यावाचकः, विधानं विधेति, अत्र "डुधाञ् धारण-पोषणयोः" 5 [पा. धातु. १०९२] इत्यस्यानुवन्धलोपे कृते विपूर्वस्य स्त्रियां वर्तमानायां "पिद्भिदादिभ्योऽङ्" [पा. ३. ३. १०४] इति वर्तमाने "आतचोपसर्गे" [पा. ३. १. १३६ ] इत्यनेन अप्रत्ययः, अनुवन्धलोपे कृते "आतो लोप इटि च क्ङिति" [पा. ६. ४. ६४ ] इत्यनेन चाकारलोपे कृते परगमने च "अजायतष्टाप्" [पा. १. १. ४] इति टाप प्रत्ययः, अनुवन्धलोपः, परगमनं विधा, पञ्च विधा अस्येति समासः “इस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य" [पा. १. २. ४७] इति वर्तमाने "गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य" [पा. १. २. ४८] इत्यनेन इस्त्रत्वम् , सुअम्भावः ‘पञ्चविधं पञ्च- 10 प्रकारमिति, एतदेवमनवद्यम्, कुव्याख्याव्यपोहाथ चैतदेवं निदर्शितमित्यलं प्रसङ्गेन । 'प्रज्ञप्त' प्ररूपितम् । कैः ?- अर्थतस्तीर्थकरैः सूत्रतो गणधरैरिति । उक्तं च- अत्थं भासइ अरहा, सुत्तं गंथंति गणहरा पिउणं । सासणस्स हियहाए तओ सुत्तं पवत्तइ ॥१॥ [आव. नि. गा. ९२] इति । अनेन स्वमनीपिकाव्यपोहमाह । अथवा 'प्राज्ञाप्तं' माज्ञात्-तीर्थकरादाप्तमिति-प्राप्तं गौतमादिभिः । अथवा 15 प्राज्ञैराप्तं प्राज्ञाप्तं गौतमादिभिः । प्रज्ञया वाऽऽप्तं प्रज्ञाद्वाऽऽप्तं प्रज्ञाप्तम् , सर्वेरेव संसारिभिरिति । तथाहि-न प्रज्ञा- विकलैरिदमवाप्यत इति भावनीयम् । 'तद्यथा' इति उदाहरणोपन्यासार्थः। आभिनिवोधिकज्ञानं १ श्रुतज्ञानं २ अवधिज्ञानं ३ मनःपर्यायज्ञानं ४ केवलज्ञानं ५ चेति । तत्राऽर्थाभिमुखो नियतो बोधोऽभिनिवोधः, स एव स्वार्थिकप्रत्ययोपादानादाभिनिवोधिकम् । अभिनिवोधे वा भवं तेन वा निर्वृत्तं तन्मयं तत्प्रयोजनं वेत्याभिनियोधिकम् । अभिनियुध्यते वा तदित्याभिनिवोधिकं-अवग्रहादि- 20 रूपं मतिज्ञानमेव, तस्य स्वसंविदितरूपत्वाद् अभेदोपचारादित्यर्थः । अभिनिवुध्यते [वा]ऽनेनेत्याभिनिवोधिकम् , तदावरणक्षयोपशम इति भावार्थः । अभिनिवुध्यतेऽस्मादिति वा आभिनिवोधिकम् , तदावरणकर्मक्षयोपशम एव । अभिनियुध्यतेऽस्मिन्निति वा क्षयोपशमे सति आभिनिवोधिकम् । आत्मैव वा अभिनियोधोपयोगपरिणामानन्यसा- दभिनियुध्यत इत्याभिनिवोधिकम् । आभिनियोधिकं च तज्ज्ञानं चाभिनिवोधिकज्ञानम् १ । तथा श्रूयते इति श्रुतं-शब्द एव, भावभुतकारणखात् , कारणे कार्योपचारादिति भावार्थः । श्रूयते वा 25 अनेनेति श्रुतम् , तदावरणक्षयोपशम इति हृदयम् । श्रूयतेऽस्मादिति वा श्रुतम् , तदावरणक्षयोपशम एव । श्रूयतेऽ स्मिन्निति या क्षयोपशमे सति श्रुतम् । आत्मैव श्रुतोपयोगपरिणामानन्यबाच्छृणोतीति श्रुतम् । श्रुतं च तद् ज्ञान च श्रुतज्ञानम् २। तथाऽवधीयतेऽनेनेत्ययधिः । अवधीयत इति-अधोधो विस्तृत परिच्छिद्यते मर्यादया वेति अवधिः, अवधि- शानावरणकर्मक्षयोपशम एव, तदुपयोगहेतृत्वादित्यर्थः । अवधीयतेऽस्मादित्यवधिः, तदावरणकर्मक्षयोपशम एव । 30 अवधीयतेऽस्मिन्निति वेत्ययधिः, भावार्थः पूर्ववदेव । अबधानं वा अवधिः, विषयपरिच्छेदनमित्यर्थः । अवधिवासी जानं च अवधियानम् ३ । नथा मनःपर्यायज्ञानमित्यत्र परि-सर्वतोभावे, अयनं अयः गमनं वेदनमिति पर्यायाः, परि अयः पर्ययः, . .
१ ९ , पञ्च ज्ञानानि तत्क्रमप्रयोजनं च ] श्रीदेववाचक्रविरचितं नन्दिन्त्रम् । पर्ययनं पर्यय इत्यर्थः, मनसि मनसो वा पर्ययो मनःपर्ययः, सर्वतस्तत्परिच्छेद इत्यर्थः, स एव ज्ञानं मनःपर्यय- मानम् । अथवा मनसः पर्याया मनःपर्यायाः, [पर्यायाः-] धर्मा बाह्यवस्वालोचनादिप्रकारा इत्यनान्तरम् , तेषु झानं मनःपर्यायज्ञानम् , तेषां वा सम्बन्धि ज्ञानं मनःपर्यायज्ञानम् : इदं चाईतृतीयद्वीप-समुद्रान्ततिसंजिमनोगत- द्रव्यालम्बनमेवेति भावार्थः ४ । तथा केवलम्-असहायं मत्यादिज्ञाननिरपेक्षम् । शुद्धं वा केवलम् , आवरणमलकलङ्काङ्करहितम् । सकलं वा । केवलम् , तत्प्रथमतयैवाशेपतदावरणाभावतः सम्पूर्णोत्पत्तेः । असाधारणं वा केवलम् , अनन्यसदृशमिति हृदयम् । जयानन्तत्वादनन्तं वा केवलम् , यथावस्थिताशेषभूत-भवद्-भाविभावस्वभावावभासीति भावना । केवलं च तद् झानं च केवलज्ञानम् ५॥ आह-एपां ज्ञानानामित्थमुपन्यासे कि प्रयोजनम् ? इति, उच्यते, ३६ स्वामि-काल-कारण-विषय-परोक्षत्व- साधर्म्यात् तद्भावे च शेपज्ञानभावादादावेव मतिज्ञान-श्रुतज्ञानयोरुपन्यास इति । तथाहि-य एव मतिज्ञानम्य स्वामी 10 स एव श्रुतज्ञानस्य, “जत्थ मतिणाणं तत्य मुयणाणं" [मुत्तं ४४] इति वचनात् । तया यावान् मतिज्ञानस्य स्थिनि- कालस्तावानेवेतरस्य, प्रवाहापेक्षया अतीता-ऽनागन-वर्तमानः सर्व एव, अप्रनिपतितकनीरापेक्षया च पट्पटिसाग- रोपमाण्यधिकानीति । उक्तं च भाष्यकारण- दो वारे विजयाइनु गयस्स, तिन्नडचुते अहव नाई । अन्नं नरभविवं. पाणाजीवाण मजदं ॥१॥ वि.मा. ०३६] 15 यथा मतिज्ञानं क्षयोपशमहेतुकं तथा श्रुतज्ञानमपि । यथा च मनितानमांतः गचंन्यादिविषयमेवं श्रुनहानमपि । यथा मतिज्ञानं परोक्षं एवं श्रुनानमपीति । तथा मनिन नानयोग भागादिशानभानादिनि । आर-एवमपि मतिज्ञानमादी किमर्थम् ? इति, उच्यने, मनिपयंकवाद विनिमला मादी मनि ज्ञानमिति । उत्तं च- मतिपुव्यं जेण सुयं नेणाऽऽदीए मती, विनिहो या । मनिधी ? || -+ रति पर्याप्तं विस्तरेण । तथा काल-विपर्यय-ग्यामि-लाभसाधान्मनि नामाकर :::- गतिमान श्रुनशानयोः स्थितिकालः प्रवासापेक्ष या मनिपनिने करवाया स्थितिमाधयम् । नया यचंय मतिज्ञान-श्रुतसाने विपर्यय : संगमावर्यम् । तथा य एव गतिमान-श्रुतहानयोः स्वामी ना T विभइमानिनविदशाद: सग्यदर्शनावाप्तो पगपदेव जाना नथा -विषय-भारा यक्षनाथरायशिवायन: अभियान पर भवनि एवं मनःपमानादि पियविश्यमेव मनाएमानमपि मानानि विषयक ཙནྡྷ༌ནཾ ཀཱ ཙTri༣ ཝཱཡཱའུ } པ༌ཡས༔ rལ༌པ नागापमानापमान net २० 5 श्रीहरिभद्र सूरिसूत्रितया वृत्या सगलतं [ सु. ९-१३ धात् , तथाहि-यथा मनःपर्यायज्ञानमप्रमत्तयतेरेव भवति एवं केवलज्ञानमप्यप्रमत्तभावयतेरेवेति साधर्म्यम् । तथाऽवसानलाभाच्च, यो हि सर्वज्ञानानि समासादयति स खल्चन्त एवेदमाप्नोतीति भावना। विपर्ययाभावसा- धाच्च, तथाहि-यथा मनःपर्यायज्ञानं विपर्ययज्ञानं न भवति एवं केवलज्ञानमपीति साधर्म्यम् । अलं विस्तरेणेति सूत्रार्थः ॥ ९. तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पञ्चक्खं च परोक्खं च । ९. तं समासतो दुविहं पन्नत्तमित्यादि सूत्रम् । अस्य व्याख्या-'तत्' पनमकारं ज्ञानं 'समासतः' सक्षेपेण 'द्विविधम् ' इति द्वे विधे अस्येति 'द्विविधं द्विप्रकारं 'प्रज्ञप्त' प्ररूपितम् । तद्यथा' इति उदाहरणोपन्या- सार्थम् । प्रत्यक्षं च परोक्षं च । तत्र प्रत्यक्षमित्यत्र जीवोऽक्षः । कथम् ? "अशु व्याप्ती" [पा. धातु. १२६५] इत्यस्य ज्ञानात्मनाऽश्नुतेऽर्थानित्यक्षः, व्याप्नोतीत्यर्थः, “अश भोजने" [पा. धातु. १५२४ ] इत्यस्य वाऽश्नाति 10 सर्वार्थानिति अक्षः, पालयति भुङ्क्ते चेत्यर्थः, तमक्षं प्रति वर्त्तत इति प्रत्यक्षम् , आत्मनोऽपरनिमित्तमवध्यावती- न्द्रियमिति भावार्थः । 'चशब्दः' स्वगतानेकभेदप्रदर्शनपरः। विचित्रतां चास्योत्तरत्र वक्ष्यामः । 'परोक्षं च' इत्यत्र अक्षस्य-आत्मनः द्रव्येन्द्रियाणि द्रव्यमनश्च पुद्गलमयत्वात् पराणि वर्तन्ते, पृथगित्यर्थः, तेभ्योऽक्षस्य यद् ज्ञानमुत्पद्यते तत् परोक्षम्, परनिमित्तत्वात्, धूमादग्निज्ञानवत् । अथवा परैः उक्षा सम्बन्धनं विषय-विषयिभाव- लक्षणमस्येति परोक्षम् । चशब्दः पूर्ववत् । एवमन्यत्राप्युत्प्रेक्ष्य चशब्दार्थो वक्तव्य इति सूत्रार्थः ॥ एवं भेदद्वये उपन्यस्ते सति अनयोः सम्यक् स्वरूपमनवगच्छन्नाह चोदकः- १०. से किं तं पञ्चक्खं ? पच्चक्खं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-इंदियपञ्चक्खं च णोई- दियपच्चक्खं च । १०. से किं तं पञ्चक्खं ? इत्यादि सूत्रम् । अस्य व्याख्या-सेशब्दो मागधदेशीप्रसिद्धो निपातोऽथशब्दार्थ वर्तते, स च प्रक्रियादियाचकः । यथोक्तम्-“अथ प्रक्रिया प्रश्नाऽनन्तर्य-मङ्गलोपन्यास-प्रतिवचन-समुच्चयेषु" 20 इहोपन्यासार्थः । 'किम्' इति परिमश्ने । 'तत्' मागुपदिष्टं प्रत्यक्षमिति सूत्रार्थः ॥ एवं चोदकेन प्रश्ने कृते सति न्यायमदर्शनार्थमाचार्यश्वोदकोक्तानुवादद्वारेण निर्वचनमभिधातुकाम आह- पञ्चकग्वं दुविहं पन्नत्तमित्यादि सूत्रम् । एवमन्यत्रापि यथायोगं प्रश्न-निर्वचनसूत्राणां पातनिका कार्येति । प्रत्यक्षं विविधं प्रज्ञप्तम् । तद्यथा-इन्द्रियप्रत्यक्षं च नोइन्द्रियप्रत्यक्षं च । इन्द्रियाणां प्रत्यक्षं इन्द्रियपत्यक्षम् । इहेन्द्रः-स्वरूपतो ज्ञानाद्यैश्वर्ययुक्तत्वादात्मा, तस्येदमिन्द्रियम् । तच द्विधा-द्रव्येन्द्रियं च भावेन्द्रियं च । तत्र 25 पुद्गर्यायसंस्थाननिर्वृत्तिः कदम्बपुष्पाद्याकृतिविशिष्टोपकरणं च दव्येन्द्रियम्, “निर्दृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् नन्या. २. १७] इति वचनात् । श्रोत्रेन्द्रियादिविपया सर्वात्मनदेशानां तदावरणक्षयोपशमलब्धिरुपयोगच भावे- न्द्रियम्, “लम्युपयोगी भावेन्द्रियम्" [तत्त्वा. २. १८] इति वचनात् । इन्द्रियप्रत्यक्षं न भवतीति नोइन्द्रिय- प्रत्यक्षम्, नोगदः सर्वमतिपचे ।। ११. से कि तं इंदियपचक्खं ? इंदियपञ्चक्खं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-सोइंदिय- 7 पनवं १ चक्खिदियपञ्चकखं २ घाणिदियपचक्खं ३ रसणेदियपचक्खं फासिदियपञ्चक्खं ५। 15 १ “म्यापी गाने च" ने पाणिनिधानुपाटे ।
ज्ञानस्य भेदा अवधिज्ञानं तद्भेदप्रमेदाश्च ] श्रीदेववाचक्रविरचितं नन्दिसूत्रम् । २१ से तं इंदियपच्चक्खं । ११. से किं तमित्यादि । अथ किं तदिन्द्रियप्रत्यक्षम् ?, इन्द्रियप्रत्यक्षं पञ्चविध प्रज्ञप्तम् । तद्यथा-श्रोत्रे- न्द्रियप्रत्यक्षमित्यादि । श्रोत्रेन्द्रियस्य श्रोत्रेन्द्रियप्रधानं वा प्रत्यक्षं श्रोत्रेन्द्रियप्रत्यक्षम् , श्रोत्रेन्द्रियनिमित्तमित्यर्थः । एवं शेषेष्वपि वक्तव्यम् । एतच्चोपचारतः प्रत्यक्षम् , न परमार्थतः । कथं ज्ञायते ? इति चेन् , सूत्रप्रामाण्यात् । वक्ष्यति च-“परोक्खं दुविहं पम्नत्तं, तंजहा-आभिणिवोहियणाणपरीक्वं च गुयणाणपरोक्वं च [मुक्तं ४३ । । न च मति-श्रुताभ्यामिन्द्रिय-मनोनिमित्तमन्यदस्ति यत् प्रत्यक्षमञ्जमा भवेन् . भावे च पाठवानप्रसङ्गाद् विरोध इति, तस्मान् परोक्षमेवेदं तत्त्वत इति । आह-इह लोके 'लिङ्गजं परोक्षम्' इति प्रतीतमिति, उच्यते, इह यदिन्द्रिय-मनोभिर्वाधलिङ्गप्रत्ययमुत्पद्यते तदकान्तेनैवेन्द्रियाणामात्मनश्च परोक्षम् , परनिमित्तत्वात् , धृमादग्निनानवदिति. अनः परोक्षमिति प्रतीतिः । यत् पुनः साक्षादिन्द्रिय-मनोनिमित्तं तत् तेषामेव प्रत्यक्षम् , अलिङ्गत्वान् . आत्मनोऽवध्यादिवन् न त्वात्मनः, 10 आत्मनस्तु तत् परोक्षमेव, परनिमित्तत्वात् , लैङ्गिकवत् । इन्द्रियाणामपि तदुपचारतः प्रत्यक्षम् . न परमार्थतः, क्यम् ?, अचेतनत्वादिति, अत्र बहु वक्तव्यं तच्चान्यत्र वस्यामः, मा भृन प्रथमग्रन्थ एक प्रतिपनिगौरवमित्वलं विस्तरेण । आह-स्पर्शन-रसन-घ्राण-चक्षुः-श्रोत्राणीन्द्रियाणीति क्रमः, अयमेव च ज्यायान. पूर्वलाम एबोरोनर- नाभान् , अतः किमर्थमुत्क्रमः ?, उच्यते, पश्चानुपादिन्यायमापनार्थ न्याटलंदनकाना मुखातिपन्यम् नि । 1: इद मनोज्ञानमपीन्द्रियज्ञानतुल्ययोग-ममेव द्रष्टव्यम् . नया चामिनिवाधिकहानमनायां प्राध्यत इति । "मे नं इंदियपञ्चवख" तदेतदिन्द्रियप्रत्यक्षम् ॥ १२. से कितं णोइंदियपञ्चक्खं ? णोइंदियपच निवि पणनं तं जहा-ओहि- गाणपञ्चकवं १ मणपज्जवणाणपञ्चवं २ केवलणाणपन्न ३ । १२. से किं तं णोइंदियपचयग्वं ? इत्यादि । अन्य वि. नानादिगिको मिति :) मसप्तम् , तद्यथा-अवधिज्ञानप्रत्यक्षमित्यादि ।। १३. से कि तं ओहिणाणपज्ञवय ? ओरिणाम दुनित पणनं. नं जहा- भवपञ्चतियं च वयोवसमियं च । दोन्हं भवपक्षनियं, न नहा-नानगरमा । दोन्हं, खयोचममियं, तं जहा-मणुस्साणं च पत्रादिपनिधिमजोलिया। ६. से कितं त्यादि सूत्रम् । अव विनदाधिः भरमत्ययंस क्षायोपामिरः । तत्रभवलग मित पर भारत. भय एक प्रत्यारा-मारणं वन्य नद भवमाया !::- निकायोपामिदम् : । नत्र वा पां भवति नः दोलगिन्यादि । योनीको दका निभान्सर ! ܫ ܟ ܀ २२ 5 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया तत्या सगलातं [सू. १४-१८ भवा नारकास्तेपाम् । अत्राह-नन्यवधिज्ञानं क्षायोपशमिके भावे वर्तते, देव-नारकभवबौदायिकः, तत् कथं तद् भवमत्ययम् ? इति, उच्यते, क्षायोपशमिकमेव तत् , किन्तु स देव नारकभवे अवश्यम्भावी, पक्षिणां गगनगमनलब्धि- निमित्तवदित्यतो भवमत्यय इति । उक्तं च- उदय-क्खय-क्खयोवसमोवसमा जं च कम्मुणो भणिया । दवं खेत्तं कालं भवं च भावं च संपप्प ॥१॥१॥ [विशेषा. गा. ५७५, धर्मसं. गा. ९४९] तथा द्वयोः क्षायोपशमिकम् , तद्यथा-मनुष्याणां पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनीनां च । न चैषामवश्यन्तया भवती- त्यतः सत्यपि क्षायोपशमिकत्वे भवप्रत्ययाद् भिन्नमिदमिति २ । तत्त्वतस्तु सर्वमेव क्षायोपशमिकमिति । अधुना क्षयोपशमस्वरूपं प्रतिपादयन्नाह - १४. को हेऊ खायोवसमियं ? खायोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिण्णाणं 10 खपणं अणुदिण्णाणं उवसमेणं ओहिणाणं समुप्पज्जति । अहवा गुणपडिवण्णस्स अणगारस्स ओहिणाणं समुप्पज्जति । १४. को हेऊ इत्यादि । 'को हेतुः' किंनिमित्तं-किविपयं क्षायोपशमिकम् ? यद्वा किंकारणं क्षायोपश- मिकम् ? उच्यते इत्यध्याहारः । अत्र निर्वचनमभिधातुकाम आह-क्षायोपशमिकं 'तदावरणीयानाम्' अवधिज्ञानावर- णीयानां कर्मणां 'उदीर्णानां' उदयावलिकाप्राप्तानां 'क्षयेण' प्रलयेन ‘अनुदीर्णानां च' आत्मनि व्यवस्थितानां 15 'उपशमेन' उदयनिरोधेन अवधिज्ञानमुत्पद्यत इति सम्बन्धः, यत एवमतः कर्मोदयाऽनुदयविषयम् । अथवा येन तदावरणीयानां कर्मणां उदीर्णानां क्षयेणानुदीर्णानामुपशमेनावधिज्ञानमुत्पद्यते तेन क्षायोपशमिकमित्युच्यत इति । स च क्षयोपशमो विशिष्टगुणप्रतिपत्तिमन्तरेण १ तथा गुणप्रतिपत्तितश्च २ भवति । तत्रान्तरेण-यथाऽऽ- काशे घनघनपटलाच्छादितमूर्तेर्दिवसकरमण्डलस्य कथञ्चिदुपजातरन्ध्रेण विनिर्गतास्तिमिरनिचयप्रलयहेतवः किरणाः स्वावपातदेशास्पदं द्रव्यमुद्योतयन्ति तथा प्रकृतिभास्वरस्याऽऽत्मनो मिथ्यावादिजनितज्ञानावरणीयादिकर्ममलप- 20 टलतिमिरतिरस्कृतस्वभावस्यानादौ संसारे परिभ्रमतो यथाप्रवृत्त्योपजातावधिज्ञानावरणक्षयोपशमविवरस्यावधिज्ञा- नालोकः प्रसाधयति स्वकार्यमिति १ । गुणप्रतिपत्तितस्तु मूलगुणादिप्रतिपत्तेर्भवति । यत आह- अथवा इत्यादि । 'अथवा' इति प्रकारान्तरमदर्शनार्थम् , अन्तरेण प्रतिपत्तिमित्यस्मादिदं प्रकारान्तरमेव । गुणाः-मूलगुणादयस्तैः प्रतिपन्नः-गृहीतो गुणपतिपन्न इति, अनेन अतिशयपात्रतामाह, यतः पात्राथयिणो गुणाः । उक्तं च- 25 नोदवानर्षितामेति न चाम्भोभिन पूर्यते । आत्मा तु पात्रतां नेयः पात्रमायान्ति सम्पदः ॥१॥ [ अथवा प्राकृतशैल्या पूर्वापरनिपातकरणात् मतिपन्नगुणस्य 'अनगारस्य' न गच्छन्तीत्यगाः वृक्षाः, कृतमगारं-गृहम् , नास्यागारं विद्यत इत्यनगारः, परित्यक्तद्रव्य-भावगृह इत्यर्थः, तस्य प्रशस्ताव्यवसायस्य तदाब रणकर्मक्षयोपशमे सत्यवधिज्ञानं समुत्पद्यते ॥ २ ॥ १५. तं समासओ छविहं पण्णत्तं, तं जहा-आणुगामियं १ अणाणुगामियं २ 20 बड़माणयं ३ हायमाणयं ४ पडिवाति ५ अपडिवाति ६ । ليا तैः - २३ . 10 आनुगामिकमवधिज्ञानं तद्भेदाश्च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । १५. तं समासतो इत्यादि। 'तद् अवधिज्ञानं 'समासतः' सझेपेण 'पड्विधं' पट्मकारं 'प्रज्ञप्तं' प्ररूपि- तम् । तद्यथा-'आनुगामुकं' अनुगमनशीलमानुगामुकम् , अवधिज्ञानिनं लोचनवद् गच्छन्तमनुगच्छतीति भावार्थः १ । अनानुगामुकं नावधिज्ञानिनं गच्छन्तमनुगच्छति, सङ्कलाप्रतिवद्धप्रदीपवदिति हृदयम् २। वर्धते वर्द्धमानम् , तदेव वर्द्धमानकम् , संज्ञायां कन् , उत्पत्तिकालादारभ्य प्रवर्द्धमानम् , महेन्धननिवन्धनोत्पद्यमानानलचालाकलापवदिति भावना ३ । 'हीयमानकं' हीयते हीयमानम् , तदेव हीयमानकम् , कुत्सायां कन् , उदयसमयसमनन्तरमेव हीय- : मानं दग्धेन्धनमायधूमध्वजा ितवदित्यर्थः ४ । 'प्रतिपाति' प्रतिपननशीलं प्रतिपाति, कथचिदापादितजात्यमणि- प्रभाजालबदिति गर्भार्थः ५ । 'अप्रतिपाति' न प्रतिपाति अप्रतिपाति, भार-मृत्पुटपाकायापाबमानजात्यमणिकिर- गनिकरवदित्यभिप्रायः । आह-आनुगामुका-ऽनानुगामुकभेदद्वय एव शेपभेदानां वर्द्धमानकादीनामन्तर्भावात् किम- र्थमुपन्यासः ? इति, उच्यते, सत्यप्यन्तर्भावे तहिकल्पयादेव तेपामपरिचित्तेः, तथादि-नाऽऽनुगामुकमनानुगा- मुकं चेत्युक्ते वर्द्धमानकादयो गम्यन्त इति, अज्ञातज्ञापनार्थ च शास्त्रप्रनिरित्यलं प्रसङ्गेन । १६. से किं तं आणुगामियं ओहिणाणं ? आणुगामियं ओहिणाणं दुविहं पप्णत्तं, तं जहा-अंतगयं च मज्झगयं च । १६. से किं तमाणुगामियमित्यादि । अथ किं तदानुगामुक्रमवधिज्ञानम् ? आनुगामुकमवधिज्ञानं विविध प्रजप्तम् , तद्यथा-अन्तगतं च १ मध्यगतं च २ । इहान्तः-पर्यन्तो भण्यतं. बनान्तवन. गतं धितमित्यनान्न- रम् , अन्ते गतं 'अन्तगतं' अन्ते स्थितम् । तच्च फडकावधितादात्मप्रदेगाने, मान्मप्रदेश्योपगमभावनो ना 1: औदारिकशरीरान्ते, एकदिगुपलम्भाद्वा तद्योतिनक्षेत्रान्ते गनमन्तगतम् । इह चाऽऽन्ममदनान्नगनमुन्यने. गरु- लनीयोपयोगे सत्यपि साक्षादेकदेशेनैव दर्शनात् ; औदारिकशरीरानगनमपि. औदारिकारका नाम: यथोक्ताक्षेत्रान्तगतं सवधिमतरतदन्तवृत्तेरिति भावना १ । चन्दः पूर्वचन । मायामयः प्रगिट पाहा. दिमध्यवत् , मध्ये गतं 'मध्यगत' मध्य स्थितम् । तत्र सर्वत्र फटकलिंगाना. गागनी या क्षयोपशमयोगाविशेपेऽपि औदारिकशरीरमध्योपलव्धेः नन्माध्य. गणित मी : मध्यगतम् । अत्र चात्ममध्यगतमभिधीयते, सर्वात्मोपयोगे ममाविमा काम माना पलब्धेः; औदारिवाशरीरमध्यगतमपि, औदारिवाशरीरमध्यभागेनवोपकार मध्य भावादिति भावार्थः । चशब्दः पूर्ववत् ।। १७. से कितं अंतगयं ? अंतगयं तिविहं पानं नं नहा- नगर । मग्गओ अंतगयं २ पासतो अंतगयं ३ | १८. से किं तं पुरतो अंतगयं ? पुरतो कार में जहानामा ? पूर्णिया हलिअं वा अलायं वा मणि वा जोई वा पदी का पुत्रो काममा गरेज्जा । से तं पुरओ अंतगयं ।। १७-१८. से विलमित्यादि मापः गानः । नन्द लिया । काग-इल्पाम् । गणि:-पागादिः । प्रति ric : प्रती नामा " 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वरया रामलातं [सू. १९.२१ गा. ४५-५० यायात् “से तं" तदेतत् पुरतोऽन्तगतम् । अयमत्र भावार्थ:-स हि गन्छन् उल्कादिभ्यः सकाशात् पुरत एव पश्यति, नान्यत्र, एवं यतोऽवधिज्ञानाद् विविधक्षयोपशमनिमित्तत्वाद् देशपुरत एव पश्यति, नान्यत्र, तत् पुरतो- ऽन्तगतमभिधीयते इत्येतावतांऽशेन दृष्टान्त इत्येवं सर्वत्र योज्यम् १ ॥ १९. से कि तं मग्गओ अंतगयं ? मग्गओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे 5 उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणि वा जोई वा पईवं वा मग्गओ काउं अणुकड्डेमाणे अणुकड्वेमाणे गच्छेज्जा । से तं मग्गओ अंतगयं २ । २०. से किं तं पासओ अंतगयं ? पासओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पईवं वा पासओ काउं परिकड्वेमाणे परिकड्डेमाणे गच्छेज्जा । से तं पासओ अंतगयं ३ । से तं अंतगयं । १९-२०. से किं तमित्यादि निगदसिद्धम् । नवरं "अणुकड्ढेमाणे अणुकड्ढेमाणे" त्ति अनुकर्षन् अनु- कर्पन् २ । एवं “परिकड्ढेमाणे परिकड्ढेमाणे" ति परिकर्पन परिकर्पन ३॥ २१. से किं तं मज्झगयं ? से जहानामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पईवं वा मत्थए काउं गच्छेज्जा। से तं मझगयं । २१. अथ किं तन्मध्यगतमित्यादि निगदसिद्वमेव । नवरं 'मस्तके शिरसि कृखा गच्छेत् तदेतन्मध्यगत- 15 मिति । एतदुक्तं भवति-स तेन मस्तकस्थेन सर्वत्र तत्प्रकाशितमर्थ पश्यति, परमेवं यतोऽवधिज्ञानात् तदुद्योतिता- विगमस्तन्मध्यगतमित्येतावतांऽशेन दृष्टान्त इति ।। इह व्याख्यानार्थ सम्यगनवगच्छन्नाह चोदकः- २२. अंतगयस्स मज्झगयस्स य को पइविसेसो ? पुरओ अंतगएणं ओहिनाणेणं पुरओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, मग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ. 20 पासओ अंतगएणं ओहिणाणेणं पासओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, मझगएणं ओहिणाणेणं सबओ समंता संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिणाणं । २२. अंतगतस्स य इत्यादि सूत्रसिद्धं यावत् “मज्झगतेण"मित्यादि। मध्यगतेनावधिज्ञानेन 'सर्वतः सर्यामु दिग्विदिक्षु 'समन्तात्' सर्चरात्मप्रदेशपिशुद्धफकै सङ्ख्ययानि वा असइयेयानि वा योजनानि जानाति 26 पश्यति । अथया ‘स मन्ता अवधिज्ञान्येय गृह्यते, सवयेयानि चेत्यत्र सङ्ग्यायन्त इति सत्येयानि-एकादीनि शर्पिप्रहेलिकापर्यन्तानि गृागे, तन ऊर्ध्वमसदयेयानि, तदेतदानुगामुकमवधिज्ञानमिति १ ।। २३. से किं तं अणाणुगामियं ओहिणाणं ? अणाणुगामियं ओहिणाणं से जहा- २५ . अनानुगामिक-वर्धमानकावधिज्ञाने ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिमूत्रम् । णामए केइ पुरिसे एगं महंतं जोड्डाणं काउं तस्सेव जोइट्ठाणस्स परिपेरंतेहिं परिपेरतेहि परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे तमेव जोइवाणं पासइ, अण्णत्व गए ण पासइ, एवमेव अणाणुगामियं ओहिणाणं जत्थेव समुप्पज्जइ तत्येव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा संवद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, अण्णत्य गए ण पासइ । से तं अणाणुगामियं ओहिणाणं २ । २६. से किं तमित्यादि प्रकटार्थमेव । नवरं 'योनिम्न्यानं अग्निस्थानं कृत्वा तस्यैव ज्योनिम्न्यानन्य पर्यन्तेषु, किमेकदिग्गतेषु ? नेत्याह-परिः-पनोभावे, ननश्च परिपर्यन्तेषु परिपर्यन्लेषु 'परिवर्णन परिभ्रमन इत्यर्थः, तदेव 'ज्योतिःस्थानं ' ज्योति प्रकाशिनं क्षेत्रमित्यर्थः पश्यनि. अन्यत्र गतो न पश्यति नदुपलम्मा- भावान् , तदावरणक्षयोपगमस्य तत्क्षेत्रसम्बन्धसापेक्षन्वान , एवमेव अनानुगामुनमवधिनानं यत्रत्र क्षेत्र व्यवन्धितस्य सतः समुत्पद्यने तत्रैव व्यवस्थितः सन सययानि वाऽनन्ययानि वा योजनानि सम्बद्धानि का अवदानि ।" वा जानाति पश्यति, नान्यत्र, तत्क्षेत्रसम्बन्धसापेक्षवावधिज्ञानावरणमयोपणमस्य । दनदनानुगामुरुम् २ ॥ २४. से किं तं वड्डमाणयं ओहिणाणं ? बड्माणयं ओहिणाणं पसत्येसु अझ वसाणहाणेसु चट्टमाणस्स चट्टमाणचरित्तस्य विमुन्नमाणस विमुझमाणचरित्तस्स सव्वओ समंता ओही बड्डइ । जावतिया तिसमयाहारगम्म मुहमम्म पणगजीवन्य। ओगाहणा जहन्ना ओहीखेनं जहनं तु ॥ १५ ॥ सव्यवहुअगणिजीवा णिरंतर जनिर भग्नंग। खेनं सब्बदिमागं परमोही खेननिती ॥ अंगुलमावलियाणं भागमगंज कसा। अंगुलमावलियंतो. आवलिया गुलाम ! हत्यग्मि मुहतो. दिवसंतो नामिलती। जोयण दिवरपुरतं. एक्सको पानी : २८ ५ भरदाग्मि अलमानो. जटीयमिति पानं च मागलोए, दामाद समीर संखेजग्मियाले दीय-मनुहार : कालाग्मि मार दीव भानुरामा " श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगलतं [ सू. ३१-३२ क्रियापरिसमाप्तिः । आत्मनः शरीरेन्द्रिय-प्राणापान-बाङ्-मनोयोग्यदलिकद्रयाहरणक्रियापरिसमाप्तिराहारप- र्याप्तिः १। गृहीतस्य शरीरतया संस्थापनक्रियापरिसमाप्तिः शरीरपर्याप्तिः, संस्थानरचनावटनमित्यर्थः २ । त्वगा- दीन्द्रियनिर्वर्तनक्रियापरिसमाप्तिरिन्द्रियपर्याप्तिः ३। प्राणापानक्रियायोग्यद्रव्यग्रहणशक्तिनिर्वनक्रियापरिसमाप्तिः प्राणापानपर्याप्तिः ४। भापायोग्यद्रव्यग्रहण-निसर्गशक्तिनिर्वर्तनक्रियापरिसमाप्तिः भागापर्याप्तिः ५। मनस्त्वयोग्य- 5 द्रव्यग्रहण-निसर्गशक्तिनिवर्तनक्रियापरिसमाप्तिर्मनःपर्याप्तिरित्येके। आसां युगपदारल्धानामपि क्रमेण परिसमाप्तिः, उत्तरोत्तरसूक्ष्मतरत्वात् । अत्र चाऽऽद्याश्चतस एकेन्द्रियाणाम् , पञ्च विकलेन्द्रियाणाम् , पट् संज्ञिनाम् । उक्तं च- आहार सरीरिदिय पज्जत्ती आणुपाण भास मणे । चत्तारि पंच छ प्पि य एगिदिय-विगल-सन्नीणं ॥१॥ [बृहत्सं. गा. ३४९] तत्र पर्याप्तकनामकर्मोदयाद् निष्पद्यमाननिष्पन्नपर्याप्तिमन्तः पर्याप्ताः, " अर्शआदिभ्यः" [पा. ५-२-१२७] 10 इत्यच् मत्वर्थीयः, त एव पर्याप्तकाः। एवमपर्याप्तकनामकर्मोदयादनिप्पम्नपर्याप्तियोगादपर्याप्ताः, त एवापर्याप्तका इति। सम्यग्-अविपरीता दृष्टिपैपां ते तथा। मिथ्या-विपरीता दृष्टिपां ते तथा। सम्यग्मिथ्यादृष्टयस्तु प्रतिपत्त्यभिमुखा अन्तर्मुहूर्तमानं भवन्ति, न तु परित्यागाभिमुखाः। यत उक्तम्- मिच्छत्ता संकंती अविरुद्धा होइ सम्म-मीसेसु । मीसाओ वा दोसु वि, सम्मा मिच्छं, न पुण मीसं ॥१॥ [कल्पभा. गा. ११४]. संयताः-सकलचारित्रिणः । असंयताः-अविरतसम्यग्दृष्टयः । संयतासंयताः-देशविरतिमन्तः श्रावकाः। प्रमत्तसंयताः गच्छवासिनः, क्वचिदनुपयोगसम्भवात् । अप्रमत्तसंयतास्तु-जिनकल्पिकादयः, सततोपयोगात् ; अथवा गच्छयासिनः तन्निर्गताश्च परिणामविशेषतः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्चादगन्तव्या इति । आमपीपध्यादिलब्धिलक्षणा ऋद्धयः, तासामन्यतरप्राप्तियोगात् माप्तद्धयः अवधिऋद्धिभावाद्वा । अन्ये त्ववधिद्वौ नियममभिदधति । इह च सर्वत्रैव मनुष्यादिपु विधाने सत्यर्थतो गम्यमानस्यापि विपक्षनिषेधस्याभिधानमव्युत्पन्नविनेयजनानुग्रहार्थमदुष्टमेवेति । 20 तथाहि-सर्वपार्पदं हीदं शास्त्रम् , त्रिविधाश्च विनेया भवन्ति, तद्यथा-उद्घटितज्ञाः १ मध्यमबुद्धयः २ प्रपञ्चधिय- ३ श्चेत्यलं विस्तरेण । स्थितमेतत्-प्राप्तद्धर्चप्रमत्तसंयतानामुत्पद्यते ।। ३१. तं च दुविहं उप्पज्जइ, तं जहा-उज्जुमती य विउलमती य । ३१. एतचोत्पद्यमानं द्विधोत्पद्यते, तद्यथा-जुमतिश्च विपुलमतिश्च । मननं मतिः, संवेदनमित्यर्थः, प्रज्ज्वी सामान्यग्राहिणी मतिः जुमतिः, 'घटोऽनेन चिन्तितः' इत्यध्यवसायनिवन्धनमनोद्रव्यप्रतिपत्तिरित्यर्थः । 25 एवं विपुला-विशेषग्राहिणी मतिर्विपुलमतिः, 'घटोऽनेन चिन्तितः, स च सौवर्णः पाटलिपुत्रकोऽद्यतनो महान् इत्याद्यध्यवसायहेतुभूतमनोद्रव्यविज्ञप्तिरिति भावार्थः । अस्यां व्युत्पत्तौ स्वतन्त्रं ज्ञानमेव गृह्यत इति । अथवा अज्जी- सामान्यग्राहिणी मतिरस्य सोऽयं ऋजुमतिः, तद्वानेव गृह्यते। एवं विपुला-विशेपग्राहिणी मतिरस्येति विपुलमतिः, तहानेच । भावार्थः प्राग्वद् , उत्तरत्र वा वक्ष्यामः ॥ ३२. तं समासओ चउब्विहं पण्णतं, तं जहा-दव्यओ खेत्तओ कालओ भावओ। का तत्य दब्बओ णं उज्जुमती अणंते अणंतपदेसिए खंधे जाणइ पासइ, ते चेव विउलमती १दोषि वि, प उ सम्मा परिणमे मीसं इति कल्पमाप्ये ॥ 15 " ३५ 10 मनःपर्यवज्ञानस्य भेदाः] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । अमहियतराए जाणति पासति । खेत्तओ णं उज्जुमती अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उवरिम हेट्ठिलाई खुड्डागपयराई उड्ढं जाव जोतिसस्स उवरिमतले तिरियं जाव अंतोमणु- स्सखित्ते अड्डाइज्जेसु दीव-समुद्देसु सण्णीणं पंचेंदियाणं पज्जत्तगाणं मणोगते भावे जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अड्डाइज्जेहिं अंगुलेहिं अभहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं खेत्तं जाणति पासति । कालओ णं उज्जुमती जहण्णेणं पलिओ- 5 वमस्स असंखेज्जतिभागं उक्कोसेणं पि पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागं अतीयमणागयं वा कालं जाणति पासति, तं चेव विउलमती अमहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं विति- मिरतरागं जाणइ पासइ । भावओ णं उज्जुमती अणंते भावे जाणइ पासइ सव्वभा- वाणं अणंतमागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अमहियतरागं विउलतरागं विसुद्धत- रागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ । ३२.तं समासतो इत्यादि। तत् समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तम् तद्यथा-व्यतः १ क्षेत्रतः २ कालतो ३भावतः४। तत्र द्रव्यतः “ण” इति पूर्ववत् , ऋजुमतिः 'अनन्तान् अपरिमितान 'अनन्तप्रदेशकान्' अनन्तपरमावात्मकानित्यर्थः, 'स्कयान्' विशिष्टैकपरिणामपरिणतान सन्जिभिः पञ्चेन्द्रियैः पर्याप्तकैरतीयद्वीप-समुद्रान्तर्वनिभिर्मनस्त्वेन परि- णामितानित्यर्थः, 'जानीते' इति मनःपर्यायनानावरणक्षयोपशमल्य पटुत्वान् साक्षात्कारेण विशेषभूयिष्ठयरिच्छेदा- जानीत इत्युच्यते । तदालोचितं पुनरर्थ घटादिलक्षणमध्यक्षतो न जानाति, किन्तु तत्परिणामान्यथाऽनुपपत्या- 15 ऽनुमानतः पश्यतीत्युच्यते । उक्तं च भाष्यकारण-"जाणनि यण्माणाओं' [विशेगा. गा. ८१४] नि । इत्य चैतदङ्गीकर्तव्यम् , यतो मूर्तद्रव्यालम्बनमेवेदम् , मन्तारम्त्वमूर्नमपि धान्तिकारादिकं मन्येरन , न च तदनेन साक्षात्कनुं शक्यते । तथा चतुर्विधं च चक्षुर्दर्शनादि दर्शनमुक्तम् . प्रो मिनालम्पनवेदमयनेयम् , तत्र च दर्शन- सम्भवात् पश्यतीत्यपि न दुष्टम् , एकप्रमात्रपेक्षया तदनन्तरमाविमाधारन्यनमिति । भोवतो वा एकविधायो- पशमलब्धौ विविधोपयोगसम्भवाद् विशेष-सामान्यार्थापेक्षया जानाति पनि जलदमियर पिनरंग । गानेर 2) विपुलमतिः अभ्यधिकतरान् स्कन्धान द्रव्यार्थतया वर्णादिभिश्न जानानि पानि च । वन जगमानः भयो याबदल्या रत्नप्रभायाः पृथिव्या उपरिमाधन्त्यानि इलयामतराजीति।पमानामिन पापिलानि---- तिरियलोकाम्स उड्हा-आमटारसजोषणलतियमा काम एकवार नागमेना नलागतो. गेण संवेहिया सबबुहगतरा शगपना नि भति. च नन्दको सपना। निदान दो पाला- पतरा नेबि पि] बहुमज्ज अवुरी स्यमापापुहदीबहुलमभूनिभाने का यह मानी नगी टिप विदिनिविभागों परत्तों, एवं तिरियलायम । एयाली निविलोमनाली महामनी तिरिवं अवगुठभागही उपरिरानो वि अंगलमयकाको एलिमिलाया दीए तार लोगही याचा जाब उड्लोपन कोन होकना जारी गोगनी रन्जुपमाणो. तनो उदोगमती किचकट हातमा मागपपर नि । तिरियासमक्षा पहिलो विमान S ३६ श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया त्या समलम्हतं [ सू. ३३-३६ गा. ५५ अवगाहेण वि अंगुलस्स असंखेयभागो चेव, एवमहोलोगो वड्ढेयव्यो जाब अहोलोगंतो सत्तरज्जभो, सत्तरज्जु- पतरेहितो वि उवरि कमेण खुडागपयरा भाणियव्या जाव तिरियलोयमज्झा रज्जुप्पमाणा सुहागपयर त्ति । एवं खुड्डागपरूवणे कते इमं भन्नइ-"उपरिम" त्ति तिरियलोयमझाओ अहो जाच णव जोयणसयाणि ताव इमीसे रयणप्पभाए पुढवीते उवरिमखुहागपतर ति भन्नंति, तदधो अधोलोगे जाव अहोलोगिया गाम त्ति 5 एए हेहिमखुड्डागपयर त्ति भग्नंति, रिजुमती अहो ताय पस्सति त्ति भणियं होइ । अहवा अहोलोगस्स उवरिमा खुड्डागपयरा तिरियलोगस्स य हेहिमा खुसागपयर त्ति ते जाव पश्यतीत्यर्थः । अन्ने भणंति-"उपरिम" त्ति अधोलोगोवरि जे ते उवरिमा, के य ते ?, उच्यते, सव्यतिरियलोगवत्तिणो तिरियलोगस्स वा अहो नवजोयण- सतवत्तिणो, ताण चेव जे हेहिमा ते जाव पश्यतीत्यर्थः, इमं च ण घडति, अहोलोइयगाममणपजवणाणसंभव- वाहल्लत्तणओ (? संभवपाहण्णत्तणओ)। उक्तं च- इहाधोलौकिका ग्रामा न तिर्यग्लोकवर्तिनः । मनोगतांस्त्वसौ भावान् वेत्ति तहर्तिनामपि ।।१।। 10 अलं प्रसङ्गेन । एवमूर्ध्वं यावज्ज्योतिश्चक्रस्योपरितलम् , तिर्यग् यावद् 'अन्तोमनुष्यक्षेत्रे' मनुष्यलोकान्त इत्यर्थः । शेपं सुगमं यावत् “सण्णीणं पंचिंदियाणं" इत्यादि । तत्र संज्ञिनोऽपान्तरालगतावपि तदायुप्कसंवेदना- 'दभिधीयन्त एव, न तैरिहाधिकार इत्यतः पञ्चेन्द्रियग्रहणम् , तेऽपि चोपपातक्षेत्रपाप्ता अपि मनःपर्याप्त्या अपर्याप्तका 15 अपि भण्यन्ते, न च तैरपीहाधिकार इत्यतः पर्याप्तकग्रहणमिति । स्वरूपकथनं वा सज्ञिनां पञ्चेन्द्रियाणां पर्याप्त- कानामिति । अथवा संझिनो हेतुवादोपदेशेन विकलेन्द्रिया अपि भण्यन्ते, तद्वव्यवच्छेदाथै पञ्चेन्द्रियग्रहणम् , तेऽप्य- पर्याप्तका अपि भवन्ति अतः पर्याप्तकग्रहणमिति । “तं चेवे"त्यादि, इह क्षेत्राधिकारस्यैव प्राधान्यात् 'तदेव' मनोल- ब्धिसमन्वितजीवाधार क्षेत्रमभिगृह्यते । विपुलमतिः अर्द्ध तृतीयस्य येषु तान्यतृतीयानि तैरभ्यधिकतरम् , प्रभूत- तरमित्यर्थः, तदेव प्राकृतशैल्या अभ्यधिकतरकम् , एवं शेपेष्वपि द्रष्टव्यम् । तत्रैकदिशमप्यधिकतरं भवत्यतः 20 सर्वतोऽभ्यधिकतरमिति प्रतिपादनार्थमाह-'विपुलतरं' विस्तीर्णतरम्, अथवाऽऽयाम-विष्कम्भावाश्रित्याभ्यधिकतरम्। वाहल्यमाश्रित्य विपुलतरम् । तथा 'विशुद्धतरं' निर्मलतरमित्यर्थः, यथा चन्द्रकान्तादिप्रकाशकद्रव्यं विमलविमल- तरविशेषाद् विमलप्रकाशितद्रष्टुः सकाशाद् विमलतरप्रकाशितद्रष्टा विशुद्धतरं पश्यति, एवं विष्कम्भितोदयमनः- पर्यायज्ञानावरणस्य कारणभेदतो मन्दमन्दतरविशेषभावाद् ऋजुमतेः सकाशाद् विपुलमतिर्विशुद्धतरमिति, उप- शान्तावरणविशेषादपि ज्ञानस्य विशेप इत्येतायतांऽशेन दृष्टान्तः । तथा तदावरणक्षयोपशमविशेपाच 'वितिमिरतरं' 26 निर्मलतरम् । अथवा प्राग्वद्धतदावरणकर्मक्षयोपशमस्य प्रधानला विशुद्धतरम् , वध्यमानावरणकर्मक्षयोपशमविशेपाच वितिमिरतरम् , वध्यमानाभावाच वितिमिरतरमित्यन्ये । अथवैकार्थिका एचैते शब्दाः नानादेशजानां विनेयानां कस्यचित् कश्चित् प्रसिद्धो भवतीत्युपन्यस्ताः । क्षेत्रं " तात्स्थ्यात् तद्वन्यपदेशः” इति जानाति पश्यति । शेपं निगदसिद्धं यावत्-- ३३. मणपज्जवणाणं पुण जणमणपरिचिंतियत्थपायडणं । माणुसखेत्तणिबद्धं गुणपचइयं चरित्तवओ ॥ ५५॥ से तं मणपज्जवणाणं । 30 10 मनःपर्यवज्ञानं केवलज्ञानं तद्भेदाश्च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ३७ ३३. मणपजव० गाहा । व्याख्या-मनःपर्यायज्ञानं प्राग्निरूपितशब्दार्थम् । पुनःशब्दो विशेषणार्थः । इदं हि रूपिनिवन्धन-क्षायोपशमिक-प्रत्यक्षादिसाम्येऽपि सत्यवधिज्ञानात् स्वाम्यादिभेदेन विशिष्टमिति स्वरूपतः पति- पादयन्नाह-जायन्त इति जनाः, तेषां मनांसि जनमनांसि, जनमनोभिः परिचिन्तितः जनमनःपरिचिन्तितः, जनमनःपरिचिन्तितश्चासावर्थश्चेति समासः, तं प्रकटयति-प्रकाशयति जनमनःपरिचिन्तितार्थप्रकटनम् । मानुप- क्षेत्रम्-अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रपरिमाणं तन्निवद्धम्, न तद्वहिर्व्यवस्थितप्राणिमनःपरिचिन्तितार्थविषयं प्रवर्तत इत्यर्थः। 5 गुणा:-क्षान्त्यादयः त एव प्रत्ययाः-कारणानि यस्य तद् गुणप्रत्ययम् । चारित्रमस्यास्तीति चारित्रवान् तस्य चारित्रवत एवेदं भवति । एतदुक्तं भवति-अप्रमत्तसंयतस्य आमपौंपध्यादिऋद्धिमाप्तस्य चेति गाथार्थः ॥५५॥ "से तं मणपज्जवणाणं" तदेतन्मनःपर्यायज्ञानमिति ॥ ३४. से कि त केवलणाणं ? केवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-भवत्थ केवलणाणं च सिद्ध केवलणाणं च । ३४. से किं तं केवलणाणं ? इत्यादि । अथ किं तत् केवलज्ञानम् ?, केवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा- भवस्थकेवलज्ञानं च सिद्धकेवलज्ञानं च। भवन्त्यस्मिन् कर्मवशवर्तिनः प्राणिन इति भवः, भवो गतिर्जन्मेति पर्यायाः, भवे तिष्टतीति भवस्थः, तस्य केवलज्ञानं भवस्थकेवलज्ञानम् । “पिधौ संराधी" [पा. धातु. ११९२ ] "राध साध संसिदो" {पा. धातु. १२६३-६४ ] "पिधू शास्त्रे माङ्गल्ये च" [पा. धातु. ४८ ] सिध्यति स्म सिद्धः, यो येन गुणेन निप्पन्नः- परिनिष्टितः, न पुनः साधनीयः, सिद्धोदनवत् , स सिद्धः । स च कर्मसिद्धादिभेदादनेकविधः । उक्तं च- कम्मे सिप्पे य विज्जा य मंते जोगे य आगमे । अन्य जना अभिपाए तये कम्मकन्वए इ य ||१|| (आय. नि. गा. ५२७] इह कर्मक्षयसिद्धेनाधिकारः, स चाशेषकर्माक्षयान् कर्मक्षयसिद्धः। मितवमिवाना गिदः, “सि वर्ण- वन्धनयोः" [ ] इति । सितं-बद्धमष्टप्रकारं कर्म नद ध्वनित नीलमन्येनि मिनध्वंगी मिदः, नम्य केवलज्ञानं सिद्ध केवलज्ञानम् ।। ३५. से किं तं भवत्थकेवलणाणं ? भवत्यकेवलणाणं दुविहं पण्णनं. नं जहा-सनो. गिभवत्यकेवलणाणं च अजोगिभवत्थ केवलनाणं च । ३०. से किं तमित्यादि । अध किं तद् भवन्धकवलदान .. मान्यवर टानं द्विवियं प्राप्तम । तद्यथा-सयोगिभवन्धकेवलज्ञानं च अयोगिभवम्धयलहान च । पम्पन्न नि संगाः पागमः, उन: न- काय-बाद-मनःकर्म योगः " (तत्या. ६.१] । तत्रौदारियादिगायनबालमनो वानिक कार योगः । तथौदारिक क्रिया-ऽऽहारयशरीरव्यापारात्तवान्द्रव्यममृहमादिम्माजम्यासानं वालोमः । नादाग्यि- चैनिया-ऽहारवाशरीरव्यापाराहतमनोद्रव्यसमूहमाचिचाजीदन्यापारी मनोगः। दद कयामा काम विपत :ति सयोगी. सयोगी चालों भवन्धश्च सयौनिभवन्धः, नन्द मान मर गानागारदाना न योगी अयोगी. स च भवन्धश्च तन्य केवलानं अयोगिनाम कमानद नमानः।। ३६. से किं तं सजोगिभवत्यकेवलणाणं : नजोगिभवन्यदलमा दुबिई पानं, 20 ३८ श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्या रामलसतं [स. ३७-४० तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचस्मिसमयसजोगिमवत्थ केवलणाणं च । से तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३६. अथ किं तत् सयोगिभवस्थकेवलज्ञानम् ?, सयोगिभवस्थकेवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-प्रथमस- 5 मयसयोगिभवस्थकेवलज्ञानं च अप्रथमसमयसयोगिभवस्थकेवलज्ञानं च । तत्र प्रथगसमयः-तत्मथमतयोत्पत्ति- समय एवं गृह्यते, न प्रथमोऽप्रथमः-द्वितीयादयः सर्व एव शैलेश्यवस्थाप्राप्तेरपथमसमया इति । अथवेत्यन्यथा प्रतिपाद्यते-" चरमसमये" त्यादि, तत्र चरमः-सयोगिकालान्त्यसमयः, न चरमोऽचरमः, प्रधानुपूर्व्या चरमादार- भ्य सर्व एव केवलप्राप्तेरचरमा इति । “से त" मित्यादि निगमनम् ॥ ३७. से किं तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं ? अजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पणत्तं, 10 तं जहा-पढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयअजोगिमवत्थ केवलणाणं च, अहवा चरिमसमयअजोगिमवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३७. से किं तमित्यादि । अत्रापि शैलेश्यवस्थाभावि केवलज्ञानमधिकृत्यैवमेव भावनीयम् । अलं विस्त- रेण । “से त"मित्यादि निगमनम् , तदेतद् भवस्थकेवलज्ञानम् ॥ ३८. से कि तं सिद्धकेवलणाणं ? सिद्ध केवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अणंतरसिद्ध- केवलणाणं च परंपरसिद्ध केवलणाणं च । ३८. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् सिद्धकेवलज्ञानम् ?, सिद्धकेवलज्ञानं द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा- अनन्तरसिद्धकेवलज्ञानं च परम्परसिद्धकेवलज्ञानं च । तत्र शैलेश्यवस्थापर्यन्तवतिसमयसमासादितसिद्धखस्य तस्मिन्नेव समये यत् केवलज्ञानं तदनन्तरसिद्धकेवलज्ञानम् । ततो द्वितीयादिसमयेष्वनन्तामप्यनागताद्धां परम्पर- 20 सिद्धकेवलज्ञानमिति ॥ ३९. से किं तं अणंतरसिद्धकेवलणाणं ? अणंतरसिद्धकेवलणाणं पण्णरसविहं पण्णत्तं, तं जहा-तित्थसिद्धा १ अतित्थसिद्धा २ तित्थगरसिद्धा ३ अतित्थगरसिद्धा ४ सयंवुद्ध- सिद्धा ५ पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ बुद्धबोहियसिद्धा ७ इथिलिंगसिद्धा ८ पुरिसलिंगसिद्धा ९ णपुंसलिंगसिद्धा १० सलिंगसिद्धा ११ अण्णलिंगसिद्धा १२ गिहिलिंगसिद्धा १३ एगसिद्धा 28 १४ अणेगसिद्धा १५ । से तं अणंतरसिद्धकेवलणाणं । ३०. से किं तमित्यादि प्रश्नसूत्रम्य निर्यचनम्-अनन्तरसिद्धकेवलज्ञानं पञ्चदशविधं प्रज्ञप्तम् , सिद्धानाः मेवानन्तरभयगतोपाधिभेदेन पञ्चदशभेदभिन्नत्यान् । पञ्चदशभेदभिन्नतामेव दर्शयन्नाह-'तद्यथा-तीर्थसिद्धाः' इत्यादि । नत्र येनेह जीवा जन्म-जरा-मरणमलिलं मिथ्यादर्शना-विरतिगम्भीरं विचित्रदुःखगणकरिमकरं राग- उपपयनप्रक्षाभितमनन्तसंसारसागरं तरन्ति दन् तीर्थमिति, तच यथावस्थितसकलजीवा-ऽजीवादिपदार्थप्ररूपकं .. 15 - ३९ .. केवलज्ञानं तद्भेदाश्च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । अत्यन्तानवद्याऽन्याविज्ञातवरण-करणक्रियाधारं अचिन्त्यशक्तिसमन्विताविसंवाघुडुपकल्पं चतुस्विंशदतिशयसमन्वि- तपरमगुरुप्रणीतं प्रवचनम् , एतच्च सङ्घः प्रथमगणधरो वा, तथा चोक्तम्-"तित्थं भंते तित्यं ? तित्यकरे तित्थं ?, गोयमा ! अरिहा ताव नियमा तित्थंकरे, तित्थं पुण चाउवग्यो समणसंघो पढमगणहरो वा" [भग. श.२३.उ.८ सू. ६८२] इत्यादि, ततश्च तस्मिन्नुत्पन्ने ये सिद्धास्ते तीर्थसिद्धाः १ । 'अतीर्थसिद्धाः' तीर्थान्तरसिद्धा इत्यर्थः, श्रूयते च-"जिणंतरे साहुवोच्छेओ" [आव. नि. गा. ३६५] त्ति, तत्रापि जातिस्मरणादिनाऽवाप्तापवर्गमार्गाः 5 सिध्यन्त्येवः नरुदेविप्रभृतयो वाऽतीर्थसिद्धाः, तदा तीर्थस्यानुत्पन्नत्वात् २ । 'तीर्थकरसिद्धाः' तीर्थकरा एच ३। 'अतीर्थकरसिद्धाः' अन्ये सामान्यकेवलिनः ४ । स्वयं बुद्धाः सन्तो ये सिद्धास्ते स्वयम्बुद्धसिद्धाः ५। प्रत्येकबुद्धाः सन्तो ये सिद्धास्ते प्रत्येकबुद्धसिद्धा इति ६ । अथ स्वयम्बुद्ध-प्रत्येकबुद्धयोः कः प्रतिविशेषः ? इति, उच्यते, बोध्युपधि-श्रुत-लिङ्गकृतो विशेषः । तथाहि- स्वयबुद्धा बाद्यप्रत्ययमन्तरेणैत्र बुध्यन्ते, प्रत्येकबुद्धास्तु न तद्विरहेण । श्रूयते च वाद्य पभादिप्रत्ययसापेक्षा करक- 10 ण्ड्वादीनां प्रत्येकबुद्धानां बोधिरिति । उपधिस्तु स्वयम्बुद्धानां हादशविधः पानादिः, प्रत्येकयुद्धानां तु नाविधः प्रावरणवर्जः । स्वयम्बुदानां पूर्वाधीतश्रुतेऽनियमः, प्रत्येकबुद्धानां तु नियमतो भवत्येव । लिङ्गप्रतिपत्तिः स्वयम्यु- दानामाचार्यसन्निशामपि भवति, प्रत्येकबुद्धानां तु देवता प्रयच्छतात्यलं विस्तरेण । 'बुद्धबोधितसिद्धाः' बुद्धाः-आचार्यास्तैोधिताः सन्तो ये सिद्धास्त इह गृहान्ते ७ । एते च सर्वेऽपि केचिन् स्त्रीलिङ्गसिद्धाः ८ केचिन् पुल्लिमसिनाः ९ केचिन्नपुंसकन्निमिवा १० इति । आह-तीर्थकरा अपि वीलि. 15 असिद्धा भवन्ति ?, भवन्तीत्याह, यत उक्तं सिद्धप्रामृत-"सवयोवा नित्यगरीलिका, नित्यगरितित्ये जोतित्थ- सिद्धा संखेनगुणा, तित्थगरितित्थे णोतित्यगरिसिताओ खजगुणात्रो. नित्यगरितित्ये पोतित्वगरसिदा संखजगुणा" [गा. १०० वृत्तौ] इति, न त नपुंसकलिकाः। मन्येकमुत्रान्त पल्लिया एव । 'यविमिहाः' इत्यान्नि प्रति रजोहरण-गोच्छकधारिणः ११ । 'अन्यलिङ्गासिन्दाः परित्रानकादिति निदाः १२ । गृहिलिमिदा नरदेवी- प्रभृतयः १३ । 'एकसिद्धाः' इति एकस्मिन् नमये एक पर निकः १४। प्रगनिहाः' इनि पग्गिन गगये ) यावद् अष्टशतं सिद्धम् । यत उक्तम्-- वत्तीला १ अडयाला २ सही ३ वावत्तरी ४ यवोडव्या । मुलीनी , उनी भाग ८ ॥२॥ म. मा. 30 अाऽऽ, चोदयाः-ननु सर्व एवैते भवान्ती निदा नानिमारमाविमा शानिमिता पर तीर्थकरमिलाः, अतीकरमिक्षा अपि तीलिया काचः जामिनदारनीति : सिगेभिः ? अनि, अनोच्यनं. अन्नदि मन्यपि पूर्वभदाचादेकोचगंगाटामाटायनदान भानमिनि । “लेनमित्यादि निगमनम् ।। ४०. से कितं परंपरसिद्ध केवलणाणं ? पपरमिटवलमा अनगविहं पानं, नं जहा-अपदमसमयसिद्धा दुनमयसिद्धा तिसमपनिदा नाममयमिता जाय दसममयनिद्रा गखेज्जलमयसिद्धा असंखज्जनमयनिला अपवनमपनिला. मे न पगानिकला। से सिरकेबलणाणं ।
४० [सू. ४१ 5 श्रीहरिभद्र रिसूत्रितया वृत्या सगलतं ४०. से किं तं परंपर इत्यादि । न प्रथमसमयसिद्धाः अप्रथमसमयसिदाः, परम्परसिद्भविशेषणप्रथम- समयवर्तिनः, सिद्धखद्वितीयसमयवर्तिन इत्यर्थः । व्यादिषु तु द्विसमयसिदादयः मोच्यन्ते । यहा सामान्येनाप्रथ- मसमयसिद्धा अभिधानविशेषतो द्विसमयादिसिद्धाभिधानमिति । शेपं प्रकटार्थ यावत्- ४१. तं समासओ चउव्विहं पण्णतं, तं जहा-दव्वओ खेतओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओणं केवलणाणी सव्वदव्वाई जाणइ पासइ । खेत्तओ णं केवलणाणी सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं केवलणाणी सव्वं कालं जाणइ पासइ । भावओ णं केवलणाणी सव्वे भावे जाणइ पासइ । ४१. तं समासतो इत्यादि । तदिति सामान्येन केवलज्ञानमभिगृह्यते । द्रव्यतः केवलज्ञानी 'सर्वद्रव्याणि' धर्मास्तिकायादीनि साक्षाजानाति पश्यति । क्षेत्रतः केवलज्ञानी 'सर्व क्षेत्र' लोका-ऽलोकभेदभिन्नं साक्षाजानाति 10 पश्यति । [ग्रं. १००० ] इह च धर्मास्तिकायादिसर्वद्रव्यग्रहणे सत्यप्याकाशास्तिकायस्य क्षेत्रत्वेन रूढलाद् भेदे- नोपन्यासः । कालतः केवलज्ञानी 'सर्व कालं' अतीता-ऽनागत-वर्तमानभेदभिन्न साज्ञाजानाति पश्यति । भावतः केवलज्ञानी 'सर्वान् ' जीवा-ऽजीवगतान् भावान् गति-कपायाद्यगुरुलघुलक्षणादीन् साक्षाजानाति पश्यति ॥ इह च केवलज्ञान-दर्शनोपयोगचिन्तायां क्रमोपयोगादौ सूरीणामनेकविधा विप्रतिपत्तिः, अतः सक्षेपतो विनेयजनानुग्रहाय तत्प्रदर्शनं क्रियत इति । तत्र- 'केई भणंति, जुगवं जाणइ पासइ य केवली णियमा । अन्ने एगंतरिय इच्छंति सुओवदेसेणं ॥१॥ अन्ने ण चेव वीसुं दसणमिच्छंति जिणवरिंदस्स । जं चिय केवलनाणं तं चिय से दसणं विति ॥२॥ [विशेषणवती गा. १५३-५४] गाथाद्वयम् । अस्य व्याख्या-'केचन' सिद्धसेनाचार्यादयः भणंति । किम् ? 'युगपद्' एकस्मिन्नेव काले 20 जानाति पश्यति च । कः ? केवली, न त्वन्यः, 'नियमाद्' नियमेन। 'अन्ये ' जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणप्रभृतयः एका- न्तरितं जानाति पश्यति चेत्येवमिच्छन्ति 'श्रुतोपदेशेन' यथाश्रुतागमानुसारेणेत्यर्थः । 'अन्ये तु' वृद्धाचार्याः 'न' नैव 'विष्वक् ' पृथक् तदर्शनमिच्छन्ति 'जिनवरेन्द्रस्य ' केवलिन इत्यर्थः । तर्हि ?, यदेव केवलज्ञानं तदेव "से" तस्य केवलिनो दर्शनं ब्रुवते, क्षीणावरणस्य देशज्ञानाभावात्, केवलदर्शनाभावादिति भावना । अयं गाथाद्वयार्थः ॥११॥२॥ साम्प्रतं युगपदुपयोगवादिमतप्रदर्शनायाह- जं केवलाई सादी-अपजवसियाई दो चि भणियाई । ता विंति केइ, जुगवं जाणइ पासइ य सव्वन्नू ॥३॥ [विशेषणवती गा. १९३] यस्मात् केवलज्ञान-दर्शने साद्यपर्यवसिते द्वे अपि भणिते ततः ब्रुवते 'केचन' सिद्धसेनाचार्यादयः । किम् ? 'युगपद्' एकस्मिन् काले जानाति पश्यति च । कः ? सर्वज्ञ इति गाथार्थः ॥३॥ इहराऽऽदी-णिधणत्तं मिच्छाऽऽवरणक्खयो त्ति व जिणस्स । इयरतरावरणता अहया निकारणावरणं ॥४॥ [विशेषणवती गा. १९४] १ पेपलशान फेवलदानयुगपदुपयोगादिवादसगता एता एव चतुर्विशतिगाथाः श्रीहरिभरिपादैर्धर्मसङ्ग्रदण्यां गा. १३३६ 15 - . 25 30 त: १३५९ गाथारमेनाऽऽहताः सन्ति । ५ 5 - केवलज्ञान-दर्शनोपयोगभेदा-ऽमेदादिचर्चा ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ४१ 'इतरथा अन्यथा 'आदि-निधनत्वं सादि-पर्यवसानत्वम् , केवलज्ञान-दर्शनयोरुत्पत्त्यनन्तरमेव केवलज्ञानोपयोग- काले केवलदर्शनाभावात् , एवं केवलदर्शनोपयोगकालेऽपि केवलज्ञानाभावात् । तथा मिथ्याऽऽवरणक्षय इति वा जिनस्य, न ह्यपनीतावरणौ द्वौ प्रदीपो क्रमेण प्रकाश्यं प्रकाशयत इत्यभिप्रायः । तथा इतरेतरावरणता, आवरणे क्षीणेऽप्यन्यतमभावे अन्यतमाभावादिति भावना । अथवा 'निष्कारणावरणम्' इति अकारणमेव अन्यतरो- पयोगकालेऽन्यतरस्याऽऽवरणम् , तथा च सति सर्वदेव भावा-ऽभावप्रसङ्गः । तथा चोक्तम्- नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वाऽहेतोरन्यानपेक्षणात् । अपेक्षातो हि भावानां कादाचित्कत्वसम्भवः ॥१॥ [प्रमागवात्तिके ३-३४] इति गाथार्थः ॥ ४ ॥ तह य असवन्तुत्तं असञ्चदरिसित्तगप्पसंगो य । एगंतरोवओगे जिणस्स दोसा बहुविहीया ॥५॥ (विशेषणवती गा. १९५ ] व्याख्या-तथा च सति असर्वज्ञत्वमसर्वदर्शित्वप्रसङ्गन्छ । पाक्षिकं वा असर्वज्ञत्वम्-यदा सर्वज्ञो न तदा 10 सर्वदर्शी, दर्शनोपयोगाभावात् ; एवं यदा सर्वदर्शी न तदा सर्वज्ञः, ज्ञानोपयोगाभावात् । एवमेकातरोपयोगेऽभ्युप- गम्यमाने सति 'जिनस्य' कंवलिनो दोपा बहुविधा इति गाथार्थः ॥ ५॥ एवं परेणोक्ते सत्यागमवावाह- भण्गति, भिन्नमुहुत्तोवयोगकाले वि तो तिणाणिस्स । मिच्छा छावट्टी सागरोवमाई वओवसमो ॥६॥ [विशेषगवती गा. २०२ ] व्याख्या-यदुक्तम् ‘इतरथाऽऽदि-निधनत्वम् इति तदमत्' इति दर्शयति-उपयोगाऽनुपयोगकालापेक्षचैत्र 15 साद्यपर्यवसितत्वान् केवलज्ञान-दर्शनयोरित्यभिप्रायः, न चानापमिदम् , कथम् ? भन्यन-अन्यया हि भिन्नमुहनों- पयोगकालेऽपि मत्यादीनां ततस्बिज्ञानिनः मिथ्या पट्पष्टिः नागरीपमाणि अयोपनमः, मनिपादितन सत्रे, नन युगपदेव मत्याधुपयोगः; एवं क्षायिकोपयोगेऽपि भविष्यति, जीवाभाच्यादिनि गाथाभिप्रायः ॥ ६॥ न च क्षयकार्येणावश्यमनवरतमेव भवितव्यमिति दर्शयन्नाह- अह ण वि एवं ना सुण, जाहेब वीणतनाओ अपहा । संते वि अंतरायवरखयम्मि पंचप्पगारम्मि ॥ ७ ॥ सततं न देति लहति व मुंजनि उमभुज र मरन्न । कजम्मि देनि लभति व भुजनिय तय मामि! ८ ॥ किच-दितस्स लभंतस्स य मुंजंतरस र जिणल पर को। ग्बीणंतरादयत्ते जं से वि न संभवट उपात्तसेमेव य णाणग्मि व दंगणन्मि द मिजार। ग्वीणापरणगुणोऽयं. ज कमिणं हह पाना वा !! .:- पो०-पातो चिन जाणद. जाणंद जपाननी जट सिलिंदा । एवं न कदाद दिली मदन्त सम्वद्रागिनी - 2 चाया-पायानपि न जानानि जानन कान परति पनि निन्द्रा : r , নাবালানি : बिहान 20 ४२ 5 - 10 [विशेषणवती गा. २२९ विशेषा. गा. ३०९६] श्रीहरिभरामिभिनया नगा रामना [म. १२ गा. ५६-५७ जुगवमजाणंतो वि हु चउदि वि णाणेहिं जन व उणाणी। भण्णइ, तहेव अरहा सव्यन सयदरिमी ग ।।१२।। (विशेषणाती गा. २१६ ] इयं तु निगदसिद्धैव । नवरं क्षायिकभावमाश्रित्येति गाथार्थः ॥ १२॥ पुनरप्या:- तुल्ले उभयावरणक्खयम्मि पुचतरमुभवो कस्स ? । दुविहुवयोगाभावे जिणस्स जुगवं ति चोदेति ॥ १३ ॥ [ विशेषगवती गा. २१७ ] व्याख्या-तुल्ये 'उभयावरणक्षये केवलज्ञान-दर्शनावरणक्षये 'पूर्वतरं' प्रथमतरं 'उद्भवः' उत्पादः कस्य ?। यदि ज्ञानस्य स किंनिवन्धनः ? इति वाच्यम् , तदावरणक्षयनिवन्धन इति चेत् , दर्शनेऽपि तुल्य इति तस्याप्युझवप्रसङ्गः एवं दर्शनेऽपि वाच्यम् , अतः खावरणक्षयेऽपि दर्शनाभाववद् ज्ञानस्याप्यभावभसङ्गः विपर्ययो वा । एवं द्विविधो- पयोगाभावे 'जिनस्य युगपत्' इति चोदयति । अयं गाथार्थः ॥ १३॥ अत्र सिद्धान्तवाधाह- भण्णति, ण एस नियमो, जुगवुप्पन्नेण जुगवमेवेह । होयव्वं उवओगेण, एत्य सुण ताव दिटुंतं ।। १४ ॥ जह जुगवुप्पत्तीय वि सुत्ते सम्मत्त-मति-सुतादीणं । णत्थि जुगयोवयोगो सम्बेसु, तहेव केवलिणो ॥१५॥ भणियं पि य पन्नत्ती-पन्नवणादीसु, जह जिणो समयं । जं जाणती न पासइ तं अणुरयणप्पभादीणं ॥ १६ ।। [विशेषणवती गा. २१८-२० विशेषा. गा. ३११२] इदं गाथात्रयमपि प्रकटार्थम् ॥१४॥१५॥१६॥ अधुना ये केवलज्ञान-दर्शनाभेदवादिनस्तन्मतमुपन्यस्यन्नाह जह किर खीणावरणे देसन्नाणाण संभवो न जिणे । उभयावरणादीते तह केवलदसणस्सावि ॥ १७॥ [विशेषणवती गा. १५५ ] निगदसिद्धा ॥ १७॥ सिद्धान्तवाद्याह- देसन्नाणोवरमे जह केवलणाणसंभवो भणिओ। देसदसणविगमे तह केवलदसणं होउ ॥१८॥ अह देसणाण-दसणविगमे तुह केवलं मयं णाणं । ण मतं केवलदंसणमिच्छामेत्तं णणु तवेयं ॥ १९॥ [विशेषणवती गा. १५६-५७ ] भण्णइ, जहोहिणाणी जाणइ पासइ य भासितं सुत्ते । न य णाम ओहिदसण-णाणेगत्तं. तह इमं पि ॥२०॥ [विशेषणवती गा. १७८ ] जह पासइ तह पासतु, पासति सो जेण दंसणं तं से। जाणति य जेण अरहा तं से णाणति वतन्वं ॥२१॥ [विशेषणवती गा. १९२] म्यपक्षसमर्थनायैव सिद्धान्तवाद्याह- णाणम्मि दंसणम्मि य पत्तो एगतरयम्मि उवउत्तो। सव्यस्स केवलिस्सा जुगचं दो पत्थि उचओगा ॥२२॥ 15 -- 20 25 30 - 5 10 केवलज्ञानस्वरूपम् ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिन्त्रम् । ४३ उवओगो एगयरो पणुवीसतिमे सते सिणायस्स । भणिओ वियडत्यो च्चिय छबुद्देसे विसेसेडं ॥ २३ ॥ [विशेषगवती गा. २३२ विशेषा. गा. ३१२०] गाथाद्वयमपि निगदसिद्धम् । नवरं भगवत्यां पञ्चविंशतितमे शनेऽधिकारोपलक्षिते "सिणायस्स" त्ति 'स्नात- कस्य केवलिनः ।।२२।।२३।। सिद्धान्तवाद्येवानुनत्यमागमभनि च परां ख्यापयन्नाह- कस्स व णाणुमतमिणं जिणस्स जदि होज दो विउवओगा?। गृणं ण होति जुगवं, जेण णिसिद्धा सुते पहुसो ॥ २४ ॥ [विशेषगवती गा. २४६ विशेषा. गा. ३१३२ ) निगदसिद्धैवेति ।। २४ ।। अलं प्रसङ्गेन । प्रकृतं प्रस्तुमः- ४२. अह सबदव्यपरिणामभावविण्यत्तिकारणमणंतं । सासयमप्पडिवाती एगविहं केवलण्णाणं ॥ ५६ ।। केवलणाणेणऽत्थे णाउंजे तत्व पण्णवणजोगे। ते भासइ तित्ययरो, वइजोग तयं हवइ सेमं ॥ ५७ ॥ से तं केवलणाणं । से तं पञ्चश्वगाणं । ४२. अह० गाहा । व्याख्या-इह मन पर्यायानानन्तरं सूत्रक्रमोहेनतः शुदिलाभनय पार केवलज्ञानमुक्तं 1 तदुपन्यस्यत इत्यतस्तदर्थोऽयमयशब्दः । उक्तं च--" अवगनः प्रक्रिया अन्ना-नन्न नालोपन्यास-प्रतिबनन· समुचये"[ सर्वाणि च नानि यानि यानि-जी-जीवलगानि नेपां परिणामाः-प्रयोग-विश्रयीमयाख्या उत्पादादयः सर्वव्यपरिणामायां भाव-ना पनामिन्मनर्यानरं नन्य विशेषण ज्ञापनं विज्ञप्तिः विज्ञानं वा वितप्तिः नत्र भोपचागत ना विर:-गर्गिी कारणं गाय- परिणामभाववितप्तिकारणम् , अथवा विराप्निरेव कारण विनिमाण पर कालविषय गन् । क्षेत्रादीनामपि द्रव्यत्वात् । तत्र यानन्तत्वादनन्नम् । नागानि नामनिसाना मतिपाति, न प्रतिपाति अप्रतिपाति, नायरिधनमित्यर्थः । :- दामनमान: नि? ति. उच्यने-मा भूद यावद् भवति तायाधनमनपस्नोडनर निपानि, नारयादियों विशेषणमित्यनयरतं भवति चर्यकालं चेति । अदकपदयभित्रविको नाम । तथाहि-शाधतममतिपात्येय, अप्रतिपाति तु शासनमान का एकामयारम् . आवरणाभावान् क्षयन्कार पवाद । मानि: दहावापान ।। ET. 'तीर्थ कान् नमुपजान गवाना देस नि.न. टा. भतरु पत्लान् तम्य र भावभुतपूर्वमान मान्बाद बना शानिन गहिनिमगार- प.पल गा| याम्या तीर का न बांट अभियानमा ला पिक्निका Free [सू. ४३-४५ - . श्रीहरिभद्रसूरित्रितया गत्या सगलयात केवलिनश्च तदभावात् , सर्वशुद्धौ देशशुद्धयभावादित्यर्थः । ये 'तत्र तेपामर्थानां मध्ये प्रज्ञापनं प्रज्ञापना तस्या योग्याः प्रज्ञापनायोग्याः तान् ‘भापते ' तानेव वक्ति, नेतरानिति । प्रज्ञापनीयानिति न सर्वानेव भापते, अनन्त- त्वात् , आयुषः परिमितत्वात् , किं तर्हि ?, योग्यानेव, गृहीतशक्त्यपेक्षया, यो हि गावतां योग्यस्तानिति । तत्र केवल- ज्ञानोपलव्धार्थाभिधायकः शब्दराशिःप्रोच्यमानस्तस्य भगवतो वाग्योग एव भवति, न श्रुतम् , नामकर्मोदयनिवन्धन- 5 त्वात् , श्रुतस्य च क्षायोपशमिकत्वात् , स च श्रुतं भवति शेषम् । 'शेपमिति' अप्रधानम् । एतदुक्तं भवति-श्रोतॄणां श्रुतग्रन्थानुसारिभावश्रुतनिवन्धनत्वात् 'शेष ' अप्रधानं द्रव्यश्रुतमित्यर्थः । अन्ये खेवं पठन्ति- " चइजोग मुयं हवड़ तेसिं" स वाग्योगः श्रुतं भवति 'तेपां' श्रोतृणाम् , भावभुतकारणत्वादित्यभिप्रायः । अथवा वाग्योगः 'श्रुतं' द्रव्यश्रुतमेवेति गाथार्थः ।। ५७ ।। "से तं" इत्यादि निगमनम् । तदेतत् केवलज्ञानम् । तदेतत् प्रत्यक्षम् ॥ एवं प्रत्यक्षे प्रतिपादिते सति 10 परोक्षस्वरूपमनवगच्छन्नाह चोदक:- ४३. से किं तं परोक्खणाणं ? परोक्खणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणिवोहि यणाणपरोक्खं च सुयणाणपरोक्खं च । ४३. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् परोक्षम् ?, परोक्षं द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-आभिनियोधिक- ज्ञानपरोक्षं च श्रुतज्ञानपरोक्षं च । 'चौ' पूर्ववत् । अनयोश्चेत्थं क्रमोपन्यासे प्रयोजनमुक्तमेव ॥ साम्प्रतं स्वाम्यभेदप्रतिपादनायाह- ४४. जत्थाऽऽभिणिवोहियणाणं तत्थ सुयणाणं, जत्थ सुयणागं तत्थाऽऽभिणिवोहिय- णाणं । दो वि एयाई अण्णमण्णमणुगयाई तह वि पुण एत्थाऽऽयरिया णाणत्तं पण्णवेति- अभिणिवुज्झइ त्ति आभिणिबोहियं, सुणतीति सुतं । मतिपुव्वयं सुयं, ण मती सुयपुब्विया। ४४. जत्य आभिणियोहियणाणमित्यादि । 'यत्र' पुरुषे इन्द्रिय-नोइन्द्रियक्षयोपशमे वा आभिनिवोधिक- ज्ञानं 'तत्रैव' पुरुषादौ श्रुतज्ञानम् , तथा यत्र श्रुतज्ञानं तत्राऽऽभिनिवोधिकज्ञानम् । आह-यत्राभिनिवोधिकज्ञानं तत्र श्रुतवानमित्युक्ते यत्र श्रुतज्ञानं तत्राऽऽभिनियोधिकज्ञानमिति गम्यत एवेन्यतः किमनेनोक्तेन ? इति, अत्रोच्यते, नियमतो न गम्यत इत्यतो नियमार्थम् । तथा चाह- "दो वि एयाई" इत्यादि । 'ढे अप्येते' आभिनियोधिक-श्रुते 'अन्योन्यानुगते' परस्परं प्रतियः । 25 स्यादेतद्-एवं सत्यभेद एवास्त्वनयोरित्याशङ्कयाह-"तह वि पुणो” इत्यादि । तथापि पुनराचार्याः 'नानात्व' भेदं प्रज्ञापयन्ति' प्ररूपयन्ति । कथम् ? लक्षणभेदात् , दृष्टवान्योन्यानुगतयोरप्येकाकाशस्थयोधर्मा-ऽधर्मास्तिकाय- योलक्षणभेदाद भेद इति । तत्र यो हि गतिपरिणामपरिणतयोर्जीय-पुद्गलयोर्गत्युपष्टम्भहेतुर्जलमिव झपस्य स खल्व सङ्ग्येयप्रदेशात्मकोऽमृतॊ धर्मास्तिकाय इति, तथा यः स्थितिपरिणामपरिणतयोर्जीव-पुद्गलयोरेव स्थित्युपष्टम्भ- हेतुर्विवक्षया क्षिनिरिच झपस्य स खल्यसक्येयप्रदेशात्मकोऽमृत एवास्तिकाय इति, एचमाभिनियोधिक श्रुतयो- 22 रपि लक्षणभेदाद् भेदः । तथा चाह- 15 - " 200 ?
४५ ? " 'परोक्षजानं मति-श्रुतयोः सहभावित्वादिकं च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । "अभिणिवुज्झइ" इत्यादि । अभिनिथुध्यत इत्याभिनिवोधिकम् , आत्मनः परिणामविशेषः । एवं शृणो- तीति श्रुतम् , आत्मन एव परिणामविशेष इति । एतदुक्तं भवति-यदिन्द्रिय-मनोनिमित्तमात्मनो विज्ञानं श्रुतग्र- न्यानुसारेणोपजायते तत् श्रुतम् , शेपमिन्द्रिय-मनोनिमित्तमाभिनिवोधिकमिति । इत्यं लक्षणभेदाद् भेदमभिधा- याधुना प्रकारान्तरेण भेदमभिधित्मुराह- "मतिपुवं मुतं, ण मती मुयपुब्बिया" "पृ पालन-पूरणयोः" [पागिनिधातु० १४९०] इत्येतस्य पूर्यते । प्राप्यते पाल्यते वाऽनेन कार्यमिति पूर्व-कारणम् , मतिः पूर्वमस्येति मनिपूर्व 'श्रुतं श्रुतज्ञानम् , तथा चेदं मत्या पूर्यते प्राप्यते पाल्यते या, अन्यथा प्रणश्यतीत्यर्थः, न मतिः श्रुतपूर्वेत्ययं महान् भेद इति । अत्राह-मति-श्रुतयो- युगपदेव सम्यक्त्वावाप्तो भाव उक्तः, अज्ञानयोरपि विगमः, तन् कथं मतिपूर्व श्रुतम् ? इति, कित्र-मतिपूर्वकत्वे- भ्युपगम्यमाने सति मतिज्ञानभावेऽपि तत्काले श्रुतमज्ञानं प्राप्नोति, अनाप चेदमिति, अत्रीच्यते-ननु लब्धि प्रति मति-श्रुने समकाले भवतः, न नृपयोगोऽनयोः समकाले इति मतिर्व श्रुतम् । इह पुनः को भावार्थः ? श्रुतोप- 10 योगो मतिप्रभवः, यतो नालश्चिन्त्य मत्या श्रुतग्रन्थानुमारि विज्ञानमुत्यते । आह-एवं मतिरपि श्रुतपूर्वा भव- त्येव, तथाहि-शब्दं श्रुत्वा या मतिरुत्पद्यते ना श्रुतपूर्वेति प्रतीतम् . अनो न विशेषः, यथा मतिपूर्व श्रुतं तथा मतिरपि श्रुनपूर्वेति, अत्रीच्यते-ननु सा द्रव्यश्रुतोद्भवा वर्नने. इह 7 'न मतिः श्रुतपूर्वा इति का भावना ? भाषश्रुनान् सकाशाद् मति नीति, यहा कार्यतया निषिध्यते-न पुनः क्रमेण. क्रमेण 7 श्रुतोपयोगात् न्युतम्य मत्यवस्थान- मिप्यत एवेत्वलं प्रसङ्गेन । न चैतन् बमनीपिकयोच्यते, यतोऽभ्यधावि मा वन- णाणाणण्णाणाणि य समकालाई यनो मड-नुयाई । को न सुयं मनिपुणे, मतिनाणे वा गुमगाणं ॥ १ ॥ इह द्धिमइ-मुयाई नमकालाई, न तूबयोगो नि । मनिपुवं मुर्यामा, पुन मुनापयोगी मनिपभयो ।॥ २ ॥ योऊण जा मता में सा मुयपुश्च नि नेण ण विलो । ना कापमा भाग्यमानी मनी नन्धि ॥ ३ ॥ काजतया, ण तु कमलो, कमेण को वा मनि निवाद? | नल्यान्मालागायोगामी ॥ ४॥ म. १०-१० इतश्च मति-श्रुतयोंर्भ :-भेदभेदान : नथाति-भर ग्रामिनि मानन कमिटाना भेदभिप्नं च श्रुतज्ञानम् । इन्द्रियोपयोगलाभनो मागविभागोका ! :--- मोहंदिओयलड़ी तोर सुनं. सेम न मानणाणं । माटो 12 ? - . नथ भेदः-अनक्षरमपि मनिशानम् . असगनगन मानत Em... मन्याययंः श्रुतमानम् । आवरणगंदाच मंद त्या मतिमन्नान : यो भेदनमा सम्यग-मियादर्शनपरिमाशिपापनापिट?... १५. अविलेनिया मनी मनिणाणं च मतिमा। सामनी जाहिर मनी मनिणाणं. भिल्लादिहिन्न मती मति एमा। अदिनि मनमा चार अण्णाणं व । विसनिय सर्वसम्मदिहिन्म मु मुममा मिति हिन्म मर गया।
४६ [स. १६-१७ गा. ५८-७१ , श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगलातं ४५. अविसेसिता इत्यादि । अविशेपिता मतिः सामान्येनैव मतिवानं मत्यानं च, मामान्येनोभय-- त्रापि मतिशब्दमत्तेः । 'विशेपिता मतिः' स्वामिविशेपेण सम्यग्दृष्टेर्मतिर्मतितानम् , निश्रयनयदर्शनेन स्वकार्य- प्रसाधकत्वात् ; मिथ्यादृष्टेर्मतिः मत्यज्ञानम् , तत्वतः स्वफलरहितत्वादित्यर्थः । एवं श्रुतसूत्रगपि व्याख्येयम् । आह-क्षयोपशमादिकारणाभेदे घटादिपरिच्छेदकार्याभेदे च कथं मिथ्यागेरज्ञाने ? इति, तथा च मिथ्यादृष्टेरपि 5 क्षयोपशमादेव मति-श्रुतप्रवृत्तिः, तथोर्ध्वादिलक्षणाकारमेव घटादिसंवेदनमिति, अगोच्यते-मिथ्यादृष्टेरज्ञाने मति- श्रुते, सदसतोरविशेपात् , उन्मत्तकवत् । उक्तं च भाष्यकारण- सदसदविसेसणाओ, भवहेउ जहिच्छिओवलंभाओ । णाणफलाभावातो, मिच्छदिहिरस अग्नाणं ॥ १ ॥ [विशेपा. गा. ११५] विनेयजनानुग्रहार्थमियं लेशतो व्याख्यायत इति-मिथ्याष्ट्रिः कथञ्चित् सन्तमपि पुरुषे देवादिधर्म न 10 प्रतिपद्यते, पुरुष एवेत्यभ्युपगमात् ; तथा असन्तमपि घटादिधर्म प्रतिपद्यते, अस्त्येवेत्यभ्युपगमात्; अतः सदसतोरविशेष इति । अतश्च मिथ्यादृष्टेर्मति-श्रुते अज्ञाने, भवहेतुत्वाञ्च, मिथ्यादर्शनवन् । इतथाज्ञानम्-यदृच्छो- पलब्धेः, उन्मत्तवत् । इतश्चाज्ञानम् [ज्ञान] कलाभावात् , अन्धप्रदीपवत् , ज्ञानस्य हि फलं विरतिः, सा च मिथ्या- दृष्टेर्न विद्यत इत्यलं प्रसङ्गेन ॥ प्रकृतं प्रस्तुमः-इह मतिपूर्व श्रुतमिति कृत्वा मतिज्ञानमेवाधिकृत्य प्रश्नसूत्रमाह: ४६. से किं तं आभिणिवोहियणाणं ? आभिणियोहियणाण दुविहं पण्णत्तं, तं जहा- 15 सुयणिस्सियं च असुयणिस्सियं च । ४६. से किं तमित्यादि । अत्र निर्वचनम् द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-श्रुतनिश्रितं चाश्रुतनिश्रितं च । 'चौ' पूर्ववत् । श्रुतमिह सामायिकादि लोकबिन्दुसारान्तं द्रव्यश्रुतं गृह्यते, तदनुसारेण श्रुतपरिकर्मितमतेस्तदपेक्षमेव चोत्पादकाले यदुत्पद्यते तत् श्रुतनिश्रितं अवग्रहादि। यत्पुनस्तदनपेक्षं तथाविधक्षयोपशमनभवमेव वर्तते तदश्रुत- निश्रितं औत्पत्तिक्यादि । आह-इदमप्यवग्रहादिरूपमेय, सत्यम् , किन्तु श्रुत्तानुसारमन्तरेणोत्पत्तेर्भेदेनोक्तम् ॥ तत्राल्पतरवक्तव्यत्वादश्रुतनिश्रितमतिज्ञानप्रतिपादनायाह- ४७. से किं तं असुयणिस्सियं ? असुयणिस्सियं चउविहं पण्णत्तं, तं जहा- उप्पत्तिया १ वेणइया २ कम्मया ३ पारिणामिया ४ । बुद्धी चउब्विहा वुत्ता पंचमा नोवलब्भइ ॥ ५८ ॥ पुव्वं अदिट्ठमसुयमवेइयतक्खणविसुद्धगहियत्था । अव्वायफलजोगा चुद्धी उप्पत्तिया णाम ।। ५९ ॥ भरहसिल १ पणिय २ रुक्खे ३ खुड्डग ४ पड ५ सरड ६ काय ७ उच्चारे ८। गय ९ घयण १० गोल ११ खंभे १२ खुड्डग १३ मग्गि १४ स्थि १५ पति १६ पुत्ते १७ ॥६० ॥ भरह सिल १ मिंद २ कुकुड ३ वालुय ४ हत्थी ५ [य] अगड ६ वणसंडे ७ । 20 - ? 25 ४७ त १ ३ 10 अश्रुतनिश्रितमतिज्ञानमौत्पत्तिक्यादिबुद्धिचतुष्कं च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । पायस ८ अइया ९ पत्ते १० खाडहिला ११ पंच पियरो १२ य ॥ ६१ ।। महुसित्य १८ मुद्दि १९ यंके २० य णाणए २१ भिक्खु २२ चेडगणिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्थसत्थे २५ इच्छा य महं २६ सतसहस्से २७ ॥६२ ॥ १। भरणित्थरणसमत्था तिवरगसुत्तत्यगहियपेयाला । उभयोलोगफलवती विणयसमुत्था वति वुद्धी ॥ ३ ॥ णिमित्ते १ अत्थसत्ये २ य लेहे ३ गणिए ४ य कूब ५ अस्से ६ य । गद्दभ ७ लक्वण ८ गंठी ९ अगए १० रहिए य गणिया य ११ ॥ ६ ॥ सीया साडी दीहं च तणं अवसव्वयं च कुंचस्स १२ । निम्बोदए १३ य गोणे घोडग पडणं च रुक्खाओ १४ ॥६५॥ २ । उवओगदिट्ठसारा कम्मपसंगपरिघोलणविसाला । साहुक्कारफलवती कम्मसमुत्या हवति बुद्धी ।। ६६ ॥ हेरण्णिए १ करिसए २ कोलिय ३ डोए ४ य मुनि ५ घय ६ पचए ७। तुण्णाग ८ वड्डती ९ पृतिए १० य घड ११ चिनकारे १२ य ॥ ६७॥ ३ । अणुमाण-हेउ-दिटुंतसाहिया वयविवागपरिणामा । हिय-णीसेसफलवती बुद्धी परिणामिया णाम ।। ६८॥ अभए १ सेट्ठि २ कुमारे ३ देवी (?) ? उदिओदए यति गया ५ । साह य णंदिसेणे ६ धणदने ७ राव( ? वि ) ८ आग : ॥६॥ खमए १० अमनपुने ११ चाणकः १ र लय । णासिवसुंदरीनंदे १४ पहरे :५ परिणामिया युद्धो ॥ ७ ॥ चलणाहण १६ आमंडे १७ मणी १८ यापा, गमिद २३ : परिणामियबुद्धीए एवमादी वाहा ॥ ७॥ 2 ! से अमयनिस्मियं । ४६. ने शिनमित्यादि । -पतियार :::: आ-पायोजनमामा. सत्यापित -- र यथामावालासिमपेशन पनि । किन धर्म, भावाशिमा, निपपासानिका - 15 . .
४८ [सु. १८- - 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूतिगा त्या रागलातं नमनं परिणामः-सुदीर्घकालपूर्वापरार्थावलोकनादिजन्य आत्मधर्म इत्यर्थः, रा कारणमम्यान प्रभाना वा पारिणा- मिकी । वुध्यते अनयेति बुद्धिः, मतिरित्यर्थः, सा चतुर्विधोक्ता तीर्थकर गणधरैः । किमिति ? गम्मात् पञ्चमी नोपलभ्यते केवलिनाऽपि, असत्त्वादिति गाथार्थः ।। ५८ ॥ औत्पत्तिक्या लक्षणं प्रतिपादयगाह- पुच० गाहा । 'पूर्वमिति बुद्धयुत्पादात् प्राक् स्वयमदृष्टः अन्यतथाश्रुतः अवेदितः-मनसाऽप्यनालोचितः 5 तरिमन्नेव क्षणे विशुद्धः-यथावस्थितः गृहीतः-अवधारितः अर्थः-अभिप्रेतपदार्थो यया सा तथा । इहै कान्तिकमिड-पर- लोकाविरुद्धं फलान्तरावाधितं चाव्याहतमुच्यते, फलं--प्रयोजनम्, अव्याहतं च तत् फलं च अव्याहतफलम् , योगोऽ- स्यास्तीति योगिनी, अव्याहतफलेन योगिनी अव्याहतफलयोगिनी । अन्ये पठन्ति- अव्याहतफलयोगा' अव्याह- तफलेन योगोऽस्याः सा अव्याहतफलयोगा बुद्धिः औत्पत्तिकी नामेति गाथार्थः ।। ५९ ।। साम्प्रतं विनेयजनानुग्रहायास्या एव स्वरूपप्रतिपादनार्थमुदाहरणानि प्रतिपादयन्नाह- भरहसिल पणिय० गाहा । भरह० गाहा । महुसित्थ० गाहा ।आसामर्थः कथानकेभ्य एवायसेयः । तानि चावसरमाप्तान्यपि गुरुनियोगान ब्रूमः, कित्त्वावश्यके वक्ष्यामः ।।६०॥६१।।६२।। अधुना चैनयिक्या लक्षणं प्रतिपादयन्नाह- भरणित्थ० गाहा। व्याख्या-इहातिगुरु कार्य दुर्निवहत्वाद् भर इच भरः, तम्निस्तरणे समर्था भरनिस्तरण- समर्था । त्रयो वर्गाखिवर्गमिति लोकरूढेधर्माऽर्थ-कामाः, तदर्जनपरोपायप्रतिपादननिवन्धनं सूत्रम्, तदन्वाख्यानं त्वर्थः, 15 पेयालं-प्रमाणं सारो वा, त्रिवर्गसूत्रार्थयोहीतं प्रमाणं सारो चा यया सा तथाविधा । अथवा त्रिवर्ग:-त्रैलोक्यम् । आह-त्रिवर्गसूत्रार्थगृहीतसारत्वे सति अश्रुतनिश्रितत्वं विरुध्यते ? इति, न हि श्रुताभ्यासमन्तरेण त्रिवर्गसूत्रार्थगृही- तसारत्वं सम्भवति, अत्रोच्यते-इह प्रायोवृत्तिमङ्गीकृत्याश्रुतनिश्रितत्वमुक्तम्, अतः स्वल्पश्रुतनिश्रितभावेऽपि न कश्चिद् दोप इति । 'उभयलोकफलवती' ऐहिका-ऽऽमुष्मिकफलवती ‘विनयसमुत्था' विनयोद्भवा भवति बुद्धिरिति गाथार्थः ।। ६३ ॥ अस्या एव विनेयजनानुग्रहार्थमुदाहरणैः स्वरूपमुपदर्शयन्नाह- णिमित्त० गाहा । सीता० गाहा । गाथाद्वयार्थः कथानकेभ्य एवावसेयः । तानि चोत्तरत्र वक्ष्यामः ॥६॥६५।। साम्प्रतं कर्मजाया बुद्धलक्षणं प्रतिपादयन्नाह- उवयोग० गाहा । व्याख्या-उपयोजनमुपयोगः-विवक्षिते कर्मणि मनसोऽभिनिवेशः, सारः-तस्यैव कर्मणः परमार्थः, उपयोगेन दृष्टः सारो ययेति समासः, अभिनिवेशोपलब्धपरमार्थत्यर्थः । कर्मणि प्रसङ्गः कर्मप्रसङ्गः, प्रसङ्गः-अभ्यासः, परिघोलनं-विचारः, कर्मप्रसङ्ग-परिघोलनाभ्यां विशाला कर्मप्रसङ्ग-परिघोलनविशाला, अभ्यास- 25 विचारविस्तीर्णेति भावार्थः । साधु कृतमिति-मुष्ठ कृतमिति विद्वद्भयः प्रशंसा साधुकारः, तेन फलवतीति समासः, साधुकारेण वा शेपमपि फलं यस्याः सा तथा । 'कर्मसमुत्था' कोद्भवा भवति बुद्धिरिति गाथार्थः ॥६६॥ अस्या अपि विनेयवर्गानुकम्पयोदाहरणैः स्वरूपमुपदर्शयन्नाह- हेरण्णिए० गाहा । व्याख्या-अस्या अप्यर्थ वक्ष्यामः॥६५॥ साम्पतं पारिणामिक्या लक्षणं प्रतिपादयन्नाह- अणुमाण० गाहा। व्याख्या-अनुमान-हेतु-दृष्टान्तैः साध्यमर्थ साधयतीति अनुमान-हेतु-दृष्टान्तसाधिका। इह :0 लिङ्गज्ञानमनुमानम् , स्वार्थमित्यर्थः, तत्प्रतिपादकं वचो हेतुः, परार्थमित्यर्थः । अथवा ज्ञापकमनुमानम् , कारको हेतुः। दृष्टमर्थमन्तं नयतीति दृष्टान्तः । आह-अनुमानग्रहणादेव दृष्टान्तस्य गतबादलमुपन्यासेन, न, अनुमानस्य तत्वत एकल्लक्षणत्वान् । उक्तं च-“अन्यथाऽनुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् ?" [ - 20 - ] इत्यादि। साध्यो- ४९ श्रुतनिश्रितं मतिज्ञानम् ] श्रीदेववाचकरिचितं नन्दिसूत्रम् । पमाभूतश्च दृष्टान्तः । उक्तं च-"यः साध्यस्योपमाभूतः स दृष्टान्त इति कथ्यते"। कालकृतो देहावस्याविशेषो वय इत्युच्यते, तद्विपाकेन परिणामः-पुष्टता यस्याः सा तयाविधा । हितम्-अभ्युदयस्तत्कारणं वा, निःश्रेयसं- मोलस्तनिवन्धनं वा, हित-निःश्रेयसाभ्यां फलवती बुद्धिः पारिणामिक्रीति गाथार्यः।।।६८॥ अस्या अपि शिष्यगणहितायोदाहरणैः स्वस्पं दर्शयन्नाह- अभए० गाहा । खमए गाहा । चलणा० गाहा । आसामर्थः कथानकेभ्य एवावसेयः । नानि चान्यत्र 5 वक्ष्यामः ॥६९।१७०।७१।। “से तं" इत्यादि, तदेतदश्रुतनिश्रितम् ।। ४८. से किं तं सुयणिस्मियं मतिणाणं ? सुयणिस्मियं मतिणाणं बउबिहं पण्णत्तं, तं जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाए ३ धारणा । ४८. से किं तमित्यादि । चतुर्विधं प्राप्तम् , तद्यथा-अवग्रह हा अपायो धारणा । अग्रहणमवग्रहः, यामान्यमात्रानिर्देयार्थग्रहणमित्यर्थः । तथा ईनमीहा, पर्थपालोचनप्त्यर्थः । एतदुक्तं भवति-अग्रहाद्- 10 नीर्णः अपायान् पूर्वः सदभूतार्थविशेषोपादानाभिमुग्योऽसदभूतार्थविपन्यागाभिमुवश्च प्रायो मधुरत्वादयः नसा- दिशब्दधर्मा अत्र बटन्ते, न ग्वर-कर्कश-निष्ठुरनादयः शाहविगधर्मा इनि मतिविशेष हिनि । तथा तदयांध्य- बगायोऽपायः निर्णयो निश्चयोऽवगम इत्यनान्तरम् । एतद्नं भवति-'गार एवायम्. गाई एव वा इत्याधर- धारणात्मकः प्रत्ययोऽपाय इति । तथा तदर्थविषधरणं धारणा. अविन्युनि-पति-वामनाया । से किं तं उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णन. नं जहा-अयोगहे य बंजणोग्गहे य।। ४९. से किं तमित्यादि । अथ कोऽयमवग्रहः ? अबको विविधः प्राजा. नरया-पांनसान व्यअनावग्ररथ । अर्यत इत्यर्थः, अर्थग्यावग्रोऽवग्रहः. यानिनिर्मामाणिमिति भावार्थः । व्यज्यनेऽनेनार्थः प्रदीपेनेच घट इनि व्यजनमः नमोसनी लिमिलो ना. तनश्च व्यञ्जनेन-उपकरणेन्द्रियेण व्यञ्जनानां-मदादिपरिणाम:। मायाम्प न (?) लक्ष्यत्वात सकलेन्द्रियार्थव्यापकत्याच प्रथमपन्यामा माग :) ५०. से कि तं बंजणोग्गहे ? वंजणोग्गा नचिनेनं जागीनिदियाज- णोरगहे. १ घाणेंदियवंजणोगह २ जिभिदियानगोगो : दियजयोगह में नं वंजणोग्गहे। ५०. र विलमित्यादि । अथ कोऽTER:: मिशगनलिनि । प्रशलान्यने-शानामाथि आ-नियमनाया नि किमिन्य शकि. पाति विपनानापानमा काम ::: पियानपान र 7 :- भान पानापानी भावादिसानिति । अन्य कि लम्, काकाकार - 4 .
५० [सु. ५१-५४ 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया नृत्या समलग्रतं तमर्थ गृह्णन्तीति दर्शने रश्मीनां तैजसत्वात् तेजोद्रव्यैरप्रतिस्खलनाददोप इति, एतदप्ययुक्तम्, महाज्यालादौ प्रति- स्खलनोपलब्धेरिति । अत्र बहु वक्तव्यं तत्तु नोच्यते, ग्रन्थविस्तरभयात् , गमनिकामात्रमेतदिति ।। ५१. [१] से किं तं अत्थोग्गहे ? अत्थोग्गहे छबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोइंदिय- अत्थोग्गहे १ चम्खिदियअत्थोग्गहे २ घाणिदियअत्थोग्गहे ३ जिभिदियअत्थोग्गहे ? फासिंदियअत्थोग्गहे ५ णोइंदियअत्थोग्गहे ६। [२] तस्स णं इसे एगठ्ठिया णाणा- घोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-ओगिण्हणया १ उवधारणया २ सवणता ३ अवलंवणता १ मेहा ५। से तं उग्गहे। ५१. [१] से किं तमित्यादि । अथ कोऽयमर्थावग्रहः ?, अर्थावग्रहः पड्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-श्रोत्रेन्द्रि- यार्थावग्रह इत्यादि सूत्रसिद्धं यावत्- [२] तस्स णं इमे इत्यादि । 'तस्य' अवग्रहस्य 'अमूनि' वक्ष्यमाणानि “णं" पूर्ववद् अवग्रहसामान्या- पेक्षयकार्थिकानि नानाघोपाणि नानाव्यञ्जनानि पञ्च नामधेयानि भवन्ति । घोपाः-उदात्तादयः । कादीनि व्यञ्जनानि । नामैव नामधेयम् , अवग्रहविशेषापेक्षया तु कथञ्चिद् भिन्नार्थानि । त्रिविधश्वावग्रहः-सामान्यावग्रहो विशेपावग्रहः विशेपसामान्यार्थावग्रहश्चेति । तत्र भिन्नार्थता निदयते-"तं जहा-ओगिण्हणते "त्यादि, अवगृह्यतेऽने- नेति अवग्रहणम् , करणे ल्युट्, व्यञ्जनावग्रहप्रथमसमयमविष्टशब्दादिद्रव्यादानपरिणाम इत्यर्थः, तद्भावः अव- 15 ग्रहणता १ । धार्यतेऽनेनेति धारणम् । उप-सामीप्येन धारणं उपधारणम् , व्यञ्जनावग्रहद्वयादिसमयेष्ववसानान्तं प्रतिसमयमेव शब्दादिद्रव्यादान-धारणपरिणाम इति भावना, तद्भाव उपधारणता २ । श्रूयतेऽनेनेति श्रवणम् , एक सामयिकसामान्यार्थावग्रहावबोधपरिणाम इत्युक्तं भवति, तद्भावः श्रवणता ३। अवलम्बत इत्यवलम्बनम् , “कृत्यल्युटो बहुलम् " [ पाणि. ३. ३. ११३ ] इतिवचनात् कर्मणि ल्युट्, तद्भावः अबलम्बनता, विशेपसामान्यार्थावग्रह इति भावार्थः । तथाहि-उत्तरोत्तरधर्मजिज्ञासायां सत्यां शब्दादिज्ञानमेवावलम्व्येहादयः प्रवर्तन्ते, 'किमयं शाङ्कः ? किं 20 या शा?' इति, अतस्तदनन्तरमेवेहादिप्रवृत्तेविशेषसामान्यार्थावग्रहोऽवलम्बन मिति ४ । एवमुत्तरोत्तरधर्मजिज्ञासायां सत्यां विशेपसामान्यार्थावग्रहेषु मर्यादया धावतो मेधोच्यते, यावदधिगच्छति, यथा-शासः, स किं मन्द्रः? किं वा तारः? इत्यादि ५। यत्र व्यञ्जनावग्रहो नास्ति तत्राद्यभेदद्वयाभाव इति । " से तं उग्गहे " सोऽयमवग्रहः ।। ५२. [१] से किं तं ईहा ? ईहा छबिहा पण्णता, तं जहा-सोतेंदियईहा १ चक्खि- दियईहा २ घाणेदियईहा ३ जिभिदियईहा ४ फासेंदियईहा ५ णोइंदियईहा है। [२] तीसे णं इमे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा- आभोगणया १ मग्गणया २ गवेसणया ३ चिंता ४ वीमंसा ५। से तं ईहा। ५२. [१] से किं तमित्यादि सूत्रं निगदसिद्धं यावत्- [२] 'आभोगनता' इदार्थावग्रहसमयसमनन्तरमेव सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमालोचनमाभोगनमुच्यते, तनाव आभागनना १। मृग्यतेऽनेन परिणामकरणेनेति मार्गणम्, सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमेच तर्ध्वमन्वय-व्यतिरेकsa धर्मान्वेषणमिति हृदयम्, तद्भायो मार्गणता २ । एवमन्त्रिप्यतेऽनेनेति गयेपणम्, तत ऊवं सद्भूतार्थविशेषाभिमुख- . 25 - .
१ अवग्रहेहादीनां स्वरूपं तदेकाथिकाच] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रन् । मेव व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्माध्यासेनाऽऽलोचनमिति गर्भः, तझावो गवेपणता ३। ततो मुहुर्मुहुःक्षयोपशम- विशेषतः स्वधर्मानुगतसद्भूतार्थविशेषचिन्तनं चिन्ता । विमर्पणं विमर्पः क्षयोपशमविशेषादेवो स्पष्टतरावबोधतः सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमेव व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मालोचनं विमर्पः, नित्या-ऽनित्यादिद्रव्यभावालोचन- मित्यन्ये ५। " से तं ईहा" || ५३. [१] से किं तं अवाए ? अवाए छबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोइंदियावाए १ : चस्विदियावाए २ घाणेंदियावाए ३ जिाम्भदियावाए ४ फालेंदियावाए ५ णोइंदियावाए ६ [२] तस्स णं इमे एगठ्ठिया णाणाघोसा णाणारंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा- आवट्टणया १ पञ्चावट्टणया २ अवाए ३ बुद्धी ४ विण्णाणे ५। से नं अवाए । ५३. [१] से किं तमित्यादि सूत्रसिद्धं यावद- [२] 'आवर्ननता' वर्त्यतेऽनेनेति वर्जन-क्षयोपशमकरण पेच. इहाभारनियभिमुवम्यापायभावप्रतिपच्या 10 भिमुग्यस्य चार्थविशेपावबोधविशेपम्य आ-मर्यादया बननमावर्ननम् . नाव आवर्ननना । ततः प्रतिपल्याऽऽचननं प्रत्यावर्ननं, अर्थविशेष एव विवक्षिनापायप्रत्यानम्नतरबोधविशेषाणां मुद्ननमित्यर्थः. ननावः प्रन्यायननना २। अप अयः अपायः, विशेषतः नकलनेन निश्चयो निर्णयोऽवगम इन्यनयनस. नववाभावाग्निनगावधारणा- बधारितमर्थमवगन्छनोऽपाय इति भावार्थः३। ननन्नवावधान्निमध अयोगमविवाद मिनया पुनः पुनः मट- नरमेव बुद्धधमानस्य बुद्धिः ४ । विशिष्ट ज्ञान विज्ञानम् . अयोपणमविगाहावाग्निामेक नीयनरलागणार- 1: मिन्यर्थः ५। “से तं अवाए " सोऽयमपायः ।। ५४. [१] से किं तं धारणा ? धारणा छविता पना. न जा-मोहंदियधारणा ? चविखदियधारणा २ घाणिदियधारणा ३ जिन्मिदिवधारणा ? कानिदिधारणा ५ जोटंदिय- धारणा ६। [२] तीसे णं इसे एगहिया जानाया जानाजता पंव जामधया भवंति. तं जहा-धरणा १ धारणा २ ठरणा पनि ५ पाया। ५४. [१] से निमित्यादि निगमित बार- [२] भरणा न्यादि । अपायानमा म धरणति भण्यने । तनग्नगेवार्थ उपयोगात या जाना धारणांच्यते । स्थापनापना. नतोऽपायाभान्निई बन माननेयः। धारणा-मापनमा दिन प्रतिष्ठापना लिया भागने भान पाप नि ला ;' :::༌སངྒཏམཱཋཀ་ཀ་ ཀུད༌ པས པ ས ས ས པན་བསམ་ म : ... .. .
५२ [ रा. ५५-५८ - श्रीहरिभद्र नूरिसूत्रितया वृत्या समलकृतं अवग्रहादिकालप्रमाणं प्रतिपादयन्नाह - ५५. उग्गहे एकसामइए, अंतोमुहुत्तिया ईहा, अंतोमुहुत्तिए अवाए, धारणा संखेज्जं वा कालं असंखेज्जं वा कालं । ५५. उग्गहे० इत्यादि । अर्थावग्रह एकसामयिकः। आन्तमौहर्तिकी ईहा । आन्तमौहर्तिकोऽपायः। धारणा 5 सङ्ख्येयं वाऽसङ्ख्येयं वा कालं स्मृति-वासनारूपा, सङ्ख्येयवायुपां सङ्ख्येयमसङ्ख्येयवायुपामसङ्ख्येयम् ॥ ५६. एवं अट्ठावीसतिविहस्स आभिणियोहियणाणस्स बंजणोग्गहस्स परूवणं करिस्सामि पडिवोहगदिटुंतेण मल्लगदिट्ठतेण य । ५६. एवं अट्ठावीसतिविधस्सेत्यादि। एवं' उक्तेन प्रकारेण अष्टाविंशतिविधस्य। कथमष्टाविंशतिविधम् ? चतुर्विधो व्यञ्जनावग्रहः, पड्विधोऽर्थांवग्रहः पड्विधा ईहा, पड्विधोऽपायः, पड्विधा धारणा । एवमष्टाविंशतिविध- 10 स्याऽऽभिनियोधिकज्ञानस्य सवन्धी यो व्यञ्जनावग्रहः तस्य 'प्ररूपणं' प्रतिपादनं करिष्यामि । कथम्? प्रतिबोधकदृष्टान्तेन मल्लकदृष्टान्तेन च ॥ ५७. से किं तं पडिबोहगदिद्रुतेणं ? पडियोहगदिद्रुतेणं से जहाणामए केइ पुरिसे कंचि पुरिसं सुत्तं पडिवोधएज्ज 'अमुगा! अमुग!' त्ति, तत्थ य चोयगे पन्नवगं एवं वयासी- किं एगसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति? दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? जाब 15 दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? संखेज्जसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? । एवं वदंतं चोयगं पण्णवगे एवं वया- सी-णो एगसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमा- गच्छंति, जाव णो दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो संखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति । से तं पडि- 20 बोहगदिटुंतेणं। ५७. से किं तमित्यादि । प्रतिबोधयतीति प्रतिबोधकः, स एव दृष्टान्तस्तेन । तद् यथानाम ‘कश्चिद्' अनिर्दिष्टम्वरूपः पुरुषः ‘कञ्चित्' अन्यतममनिर्दिष्टस्वरूपमेव पुरुपं मुप्तं सन्तं “पडिबोधएज्ज" ति प्रतिबोधयेत् । कथम् ? 'अमुक ! अमुक !' इति । तत्र 'चोदके'त्यादि । इह ज्ञानावरणकर्मोदयतः कथितमपि सूत्रार्थमनवगग्छन् प्रश्नचोदनात् चोदकः, अविशिष्टक्षयोपशमभावतो वा अगृहीतशास्त्रगर्भार्थः पूर्वापरविरोधचोदनात् चोदकः । यथा - यस्थितं सूत्रार्थ प्रज्ञापयतीति प्रज्ञापकः, श्रौतापिक्षया विरुद्धं पुनरुक्तसूत्र वा अर्थतोऽविरुद्धमपुनरुक्तं प्रज्ञापयतीति प्रतापकः । तत्र चोदकः प्रज्ञापकं एवमुक्तवानिति, भूतकालनिर्देशः “अनादिमानागमः" इति ख्यापनार्थः । 'किमकसमयमविष्टे'त्यादि मुगम यान् ‘एवं वदन्तं चोदकं प्रज्ञापक एवमुक्तवान् । 'नो एकसमयप्रविष्टे'त्यादि प्रकटाचं यावद् 'नो सङ्ग्येयसमयमविष्टाः पुद्गला ग्रहणमागच्छन्ति । नवरमय प्रतिषेधः स्फुटशब्दविज्ञानग्राह्यता- ?
५३ अवमहाविज्ञानविपये प्रतिबोधक-मलकदृष्टान्ती] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । मधिकृत्य वेदितव्यः, शब्दविज्ञानजनकत्वेनेत्यर्थः, अन्यथा सम्बन्धमात्रमधिकृत्य प्रथमसमयादारभ्य ग्रहणमागच्छ- न्त्येव । " असंखेज" इत्यादि, प्रतिसमयप्रवेशेनाऽऽदित आरभ्य असल्ययसमयः प्रविष्टैरसन्ख्येयसमयपविष्टाः, न पुनर्विदात्याऽझाभिः पथिकगृहप्रवेशवदपान्तरालागमनसमयापेक्षयाऽसङ्येयसमयमविष्टा इति, पुद्गलाः शब्दद्रव्यविशेषा ग्रहणमागच्छन्ति, अर्थावग्रहज्ञानहेतवो भवन्तीति भावः । ६ व चमन्यमयप्रविष्टा एव ग्रहणमागच्छन्ति, तदन्ये विन्द्रियक्षयोपशमोपकारिण इत्योधतो ग्रहणमुक्तमिनि । अग्नययमानं चात्र जयन्यमावलिकाऽसमस्येयभागसम- चतुल्यम्, उत्कृष्टं तु सख्येयावलिकासमयतुल्यम्, तब प्राणापानपृथक्वकालममयमिति । उक्तं च- वंजणवनहकालो आवलियाऽलंबभागमेती उ । थोत्रो, उकोनो पुण आणापा हुत्तं ति ।।१।। --- . "से" इत्यादि निगमनम् । सेयं प्रतिबोधकष्टान्नेन व्यञ्जनावग्रहमपणेनि वास्योपः ॥ ५८. [१] से किं तं मल्लगदिलुतेणं ? मलगदिलुतणं से जहाणामए केइ पुरिसे आवाग-1 सोसाओ मल्लगं गहाय तत्थेगं उदगचिदं पक्खिवेज्जा ले नहे. अण्णे पश्चित्ते से विणहे. एवं पक्विपमाणेसु पक्खिप्पमाणेमु होही में उदगवि जाणं तं मलगं रावेहिति. होही से उदगविंदू जण्णं तंमि मलगंनि अहिनि, होही ले उदगायेंद्र जगं तं मलां भरेहिति. होही से उदगविंदू जणं तं मलगं पाहिति. एयामय पक्वियमाणे, पक्खिमाणे अणंतेहिं पोरगाह जाह तं वंजणं पृरिनं होनि ना नि निको नेवणं जाणनि । के वेग सदाइ ?, नओ ई. पविमति नयी जग पर महा. तयो अवार्य पविमइ तओ से उवगयं हवन, नओ णं धारणं पविनाको माग गज्ज वा कालं असंखेज्ज वा कालं। [२] से जहाणामा चेह पुरिन सन्मान हिप, जो चेच जाणइ के वेस मार? नो परिमा मलीना, गती णं अवायं पविसह नतो से उजग निको पालं असंग्वेज्ज या कालं। एवं भवन का काम परिवेज्जा। [] जाणाला का पति म मरिदिनानि उगादिए गएण जागतिक महिनामा पक्षणे जि. कोमामा पार जापानमा :
५४ - श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगलतं [सू. ५९ ५८. [१] से किं तमित्यादि । अथ कोऽयं मल्लकटप्पान्तः ?, मल्लकदृष्टान्तो नाम तद् यथानाम कश्रित पुरुपः 'आपाकशिरसः' आपाकः प्रतीतः तच्छिरसश्च 'मल्लकं' शरावं गृहीत्वा, 'इदं रूक्ष भवति' इत्यतोऽस्य ग्रहण- मिति, 'तत्र' मल्लके एक उदकविन्दु प्रक्षिपेत् स नष्टः, तत्रैव तद्भावपरिणतिमापन इत्यर्थः । शेणं मुगमं यावत् "जण्णं तं मल्लकं रावेहिति" आर्द्रतां नेष्यति, शेपं मुगम यावत् “एवामेव" इत्यादि, अतिवहत्वात् प्रतिसमयमनन्तैः 5 'पुद्गलै' शब्दपुद्गलैयदा तद् व्यञ्जनं पूरितं भवति तदा 'हुँ' इति करोति, तमर्थ गृह्णातीत्युक्तं भवति । अत्र व्यञ्जनशब्देन त्रयमभिगृह्यते-द्रव्यं १ इन्द्रियं २ सम्बन्धो ३ वा । यदा द्रव्यं व्यञ्जनमधिक्रियते तदा 'पूरित'- मिति प्रभूतीकृतम् , स्वप्रमाणमानीतम् , स्वविषयव्यक्ती समर्थीकृतमित्यर्थः १ । यदा व्यञ्जनमिन्द्रियं तदा 'पूरित'मित्याभृतम् , आभृतं व्याप्तमित्यर्थः २ । यदा तु द्वयोरपि सम्बन्धोऽधिक्रियते तदा 'पूरित मिति अङ्गाङ्गी- भावमानीतम् , अनुपक्तमित्यर्थः ३ । एवं यदा पूरितं भवति तदानीं तमर्थ गृह्णाति । किंविशिष्टम् ? नाम-जात्यादि- 10 कल्पनारहितम् , तथा चाह-“णो चेव णं जाणइ के वेस सद्दादि ?" त्ति, न पुनरेवं जानाति क एप शब्दादिरर्थ इति, एकसामयिकत्वादर्थावग्रहस्य, अत्रार्थावग्रहात् पूर्व सर्वो व्यञ्जनावग्रह इति । "ततो ईहे पविसति" इत्यादि मुगमं यावत् “संखेनं वा असंखेज वा कालं" ति । अत्राह-मुप्तमङ्गीकृत्य युज्यतेऽयं न्यायः, जाग्रतस्तु शब्दश्र- वणसमनन्तरमेव अवग्रहेहाव्यतिरेकेणैवापायज्ञानमुत्पद्यते, तथोपलम्भात्, न चैतदनार्पम् , यत आह सूत्रकारः- “से जहाणामए" इत्यादि; अथवा यदुक्तम् “न पुनरेवं जानाति ‘क एप शब्दादिः ?" किं तर्हि ? नाम-जात्यादि- 15 कल्पनारहितं गृह्णातीत्येतदयुक्तम् , यत एवमागमः-"से" इत्यादि, अथवा सुप्तप्रतिबोधक-मल्लकदृष्टान्ताभ्यां व्यञ्जना- ऽर्थावग्रहयोः सामान्येन स्वरूपमभिधाय अधुना मल्लकदृष्टान्तेनैव प्रतिपादयन्नाह- [२] से जहा इत्यादि, तद् यथानाम कश्चित् पुरुषः अव्यक्तं शब्दं शृणुयात्। 'अव्यक्तमिति' अनिर्देश्यस्वरूप नामादिकल्पनारहितमिति, अनेनावग्रहमाह, तस्य च श्रोत्रेन्द्रियसम्बन्धिनो व्यञ्जनावग्रहपूर्वकत्वाद् व्यञ्जनावग्रहं च । आह-न ह्यत्रैवं क्रम उपलभ्यते, किन्त्वक्षेपेण शब्दापायज्ञानमेव वेद्यते, सूत्रेऽव्यक्तमिति शब्दविशेपणं कृतम- 20 तोऽव्यक्तं सन्दिग्धं पुरुषादिशब्दभेदेन शब्द शृणुयादिति, न्याय्यम्, तथा चोत्तरसूत्रमप्येतदेवाह-"तेणं सदे त्ति उग्गहिते' 'तेन' श्रोत्रा शब्द इत्यवगृहीतं “णो चेव णं जाणति के वेस सदादि" न पुनरेवं जानाति-कः 'एप' पुरुषादिसमुत्थानामन्यतमः शब्द इति, आदिशब्दाद् रसादिष्वप्ययमेव न्याय इति ज्ञापयति । “ततो ईहं पवि- सति" इत्याद्यपि सम्बद्धमिति, नैतदेवम् , उत्पलपत्रशतव्यतिभेददृष्टान्तेन कालभेदस्य दुर्लक्षत्वाद् अक्षेपेण शब्दापाय ज्ञानानुपपत्तेः, यच्च 'तेन शब्द इत्यवगृहीतम्' इत्युक्तम् , अत्र 'शब्दः' इति भणति वक्ता सूत्रकार इति, करणनिर्दे- 25 शात् शब्दमात्रं चाशेपविशेषविमुखम् , न तु शब्दबुद्धया, तस्यैवापायप्रसङ्गात् , अवग्रहादिश्रुतव्यतिरेकेण च मतिज्ञा- नानुत्पत्तेः, तथा चाह-"णो चेव ण"मित्यादि, न पुनरेवं जानाति क एप शब्दादिरर्थः, सामान्यमात्रप्रति- भासनात् । आह च भाष्यकार:- अव्वत्तमणिदेसं सरूव-णामादिकप्पणारहितं । जदि एवं जं 'तेणं गहियं सद्दे ति तं कह णु ? ॥१॥ 'सद्दे भणति यत्ता, तम्मत्तं वा ण सहमुत्ती(बुद्धी)ए। जदि होज्ज सद्दयुद्धी तोऽवाओ चेव सो होजा ॥२॥ जति सदबुद्धिमत्तयमवग्गहे तबिसेसणमवाओ । णणु सहो णासदो ण य रूवादी विसेसोऽयं ॥३॥ योवमियं णावायो तैभयाविवखणं अवाओ त्ति । तन्भेयाविक्खाए णणु थोवमिणं पि णावाओ ॥४॥ [विशेषा. गा. २५२-५५ ] इत्यादि। १ सामणमणिद्देसं इति महाभाप्ये पाटो वर्तते ॥ २ संखाइविसेसणं अवाओ त्ति महाभाष्ये पाठः ॥ - 30 मल्लकमान्त आभिनियोधिकज्ञानत्य च्यादयो भेदाच] श्रीदेववाचक्रविरचितं नन्दिनूत्रम् । केन्ये त्वाचायां इदं सूत्रं विशेषसामान्यार्थावग्रहविषयं व्याचक्षते-'अव्यक्तं अनि रितविशेषस्वल्पं अशब्द- व्यवच्छेदेन शब्दं शृणुयान, तेन शब्द इति शब्दमात्रमवगृहीतम्, न पुनरेवं जानाति क एप शन्दः ?. शाल-शाम- दीनामन्यतमः, आदिशब्दाद् नादिपरिग्रहः, तत्रापीयमेव वार्नेनि युक्तियुक्ता चेयं व्याख्यनि । ततः 'हां प्रविशति सदर्थपर्यालोचनां करोति, इस च दुरवबोधत्वाद् वस्तुनः अपटुन्वाब मतिज्ञानावरणक्षयोपनामस्यालक्षातापाय एवंडो- पयोगात् च्युतः पुनरप्यन्यमन्तर्मुहर्तमीहते, एवमीहोपयोगाविच्छेदन एवं प्रभूतानप्यन्तर्मुहनांनीहन इति सम्भवः, तनः 'जानानी त्यादि वस्तुतः गतार्थ यावन् पीनेन्द्रियवक्तव्यना । उनं व भा-यकारण- सेनेनु वि न्वादिनु विनएन वि होइ बलखाई । पायं पञ्चामन्ननणमीहादिवत्थणि ॥१॥ थाणुपुरिमादि-कुटुप्पलादि-संभितकरिमंसादी । सप्याप्पणालादि य समाणत्वादिविसयाई ॥२॥ एवं चिय नुमिणादिनु मणगो नबादिएन चिन्नएन्नु । होतिदियवाचाराभावे वि अवन्गवादीया ॥३॥ [विता. गा. २९२-९४ इन्यादि ।। [3] से जहाणामए इन्यादि । इह प्रतिबोधप्रथमलमये अव्यकम अनिदारितवरूपं बन प्रतिसंवेद- येन तस्य तदाऽर्थावग्रहः, तन अमावादय इति । अन्य न मनमोऽप्यनिग्राद पूर्व व्यञ्जना मनोद्रव्यगञ्जन- ग्रहणलक्षणं याचक्षने तन पुनरयुकम्, अनापन्यान. व्यञ्जनावग्रस्य श्रीत्रादि वन धिनाद में प्रकटायम् चावन " ने नं मलगदिलुनणं " । इस च नवप्रतिपयर्थ बनधिका नोनियावादयः प्रतिमादिताः, अन्यथाऽन्यत्रापन्द्रियव्यापाराभाव ननि मनवा पर्यायांचनांगतच्या इति । प्राविमना मादि। नमं विहाय क्वचिदपि मनिनानं नोन्यधने नवं नाम: ? नि. न. मो. कादि-नानातीनी. न चानाहितमवगम्यने, न चानवानं धार्यते इत्या, मन मसिना- ५९. तं समासओ चउब्विहं. एगणनं. न जहालयोनी कालो भावओ। तत्य दबओ णं आभिणियोरिणाणी आपनी लाई जागनिज पामनि ।। खत्तओ णं आरिणिवोटियणाणी आपन मला पाट २ । कालोणं आभिणियोटियणाणी आपमेणं न मान वानमा आमिणि- बोडियणाणी आपसेणं गचे भाव जाणकार ५५. समासनाया। विपनत्र तत्र जमानियामानान.. धमामिलामा माति, पर प.पि. नाना को मात । . आतापमान -, : ܕܟ 1...: :: :: . .
[सू.६१-६५ ५८ 5 " . ६१. से कि तमित्यादि । अथ किं तत् श्रुतज्ञानम् ? श्रुतज्ञानमुपाधिभेदाच्चतुर्दशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-अक्षरश्रुतं श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगलतं गन्धादि स्तोकद्रव्यत्यादभावुकत्वाद् घ्राणादीनां चापटुत्वाद् विनिधिनीतीत्येनं व्यागृणीयादिति गाथार्थः ३ ।।७५।। इह 'स्पृष्टं शृणोति शब्दम्' इत्युक्तम् , तत्र किं शब्दप्रयोगोत्सृष्टान्येव केवलानि शब्दद्रव्याणि गृहाति ? उतान्यानि तद्भावितानि ? आहोश्चिद् मिश्राणि ? इति चोदकाभिप्रायमाशय 'न तावत् केवलानि, तेषां वासक- त्वात् तद्योग्यद्रव्याकुलत्वाच्च लोकस्य, किन्तु मिश्राणि तद्वासितानि वा गृह्णाति'इत्यमुमर्थमभिधित्मुराह- भासा० गाहा । व्याख्या-भाष्यत इति भाषा, वक्त्रा शब्दतयोत्सृज्यमाना द्रव्यसंहतिरित्यर्थः, तस्याः समश्रेणयो भापासमश्रेणयः, समग्रहणं विश्रेणीव्यवच्छेदार्थम् , इह श्रेणयः क्षेत्रप्रदेशश्रेणयोऽभिधीयन्ते, तात्र सर्वस्यैव भापमाणस्य पट्सु दिक्षु विद्यन्ते, यामुत्सृष्टा सति भाषाऽऽद्यसमय एव लोकान्तमनुधावतीति, ता इतः- भापासमश्रेणीतः, इतो गतः प्राप्तः स्थित इत्यनर्थान्तरम् । एतदुक्तं भवति-भापासमश्रेणिव्यवस्थित इति । शब्द्यतेऽनेनेति शब्द:-भापात्वेन परिणतः पुद्गलराशिः तं शब्दम् , यं पुरुपा-ऽश्वादिसम्बन्धिनं 'शृणोति' गृह्णाति 10 उपलभत इति पर्यायाः, यत्तदोनित्यसम्बन्धात् तं मिश्रं शृणोति । एतदुक्तं भवति-उत्साएद्रव्यभावितापान्तराल. स्थशब्दद्रव्यमिश्रमिति । विश्रेणिं पुनः इत इति वर्तते, ततश्चायमों भवति-विश्रेणिव्यवस्थितः पुनः श्रोता शब्दं शृणोति नियमेन पराघाते सति, यानि शब्दद्रव्याण्युत्सृष्टद्रव्याभिघाते वासितानि तान्येव, न पुनरुत्सृष्टानीति भावार्थः, कुतः ? तेषां अनुश्रेणिगमनात् प्रतिघाताभावाच । अथवा विश्रेणिस्थित एव विश्रेणिरभिधीयते, पदेऽपि पदावयवप्रयोगदर्शनात् , भीमसेनः सेनः सत्यभामा भामेति यथेति गाथार्थः ॥७६।। साम्प्रतं विनेयगणसुखप्रतिपत्तये मतिज्ञानपर्यायशब्दानभिधित्मुराह- ईहा० गाहा । व्याख्या-ईहनमीहा, सदर्थपर्यालोचनचेष्टेत्यर्थः । अपोहनमपोहः, निश्चय इत्यर्थः । विमर्पण विमर्पः, ईहा-ऽपायमध्यवर्ती प्रत्ययः । तथाऽन्वयधर्मान्वेपणा मार्गणा। 'चः समुच्चयार्थः। व्यतिरेकधर्मालोचना गवेपणा। तथा संज्ञानं सज्ञा, व्यञ्जनावग्रहोत्तरकालभावी मतिविशेष इत्यर्थः । स्मरणं स्मृतिः, पूर्वानुभूतार्थालम्बन- प्रत्ययः । मननं मतिः, कथञ्चिदर्थपरिच्छित्तावपि सूक्ष्मधर्मालोचनरूपा वुद्धिरित्यर्थः । तथा प्रज्ञानं प्रज्ञा, विशिष्ट- 20 क्षयोपशमजन्या प्रभूतवस्तुगतयथावस्थितधर्मालोचनरूपा संविदिति भावना। सर्वमिदमाभिनिवोधिकम्, मतिज्ञान- मित्यर्थः । एवं किश्चिद्भेदाद् भेदः प्रदर्शितः, तत्त्वतस्तु मतिवाचकाः सर्व एते पर्यायशब्दा इति गाथार्थः ॥७७|| " से त"मित्यादि, तदेतदाभिनियोधिकज्ञानमिति । साम्पतं प्रागुपन्यस्तसकलचरणकरणक्रियाधार- श्रुतज्ञानस्वरूपजिज्ञासयाऽऽह- ६१. से किं तं सुयणाणपरोक्खं ? सुयणाणपरोक्खं चोद्दसविहं पण्णत्तं, तं जहा- 25 अक्खरसुतं १ अणक्खरसुतं २ सण्णिसुयं ३ असण्णिसुयं ४ सम्मसुयं ५ मिच्छसुयं ६ सादीयं अणादीयं ८ सपज्जवसियं ९ अपज्जवसियं १० गमियं ११ अगमियं १२ अंगपविठं १३ अणंगपविट्ठ १४ । 15 " १ अनक्षरश्रुतं २ संजिश्रुतं ३ असंज्ञिश्रुतं ४ सम्यक्तृत ५ मिथ्याश्रुतं ६ सादि ७ अनादि ८ सपर्यवसितं ९ अपर्यवसित 30 १० गमिकं ११ अगमिकं १२ अङ्गप्रविष्टं १३ अनगमविप्टम् १४ । एतेपांच भेदानां स्वरूपं यथावसरं वक्ष्यामः ? मकरयुतस्य संज्ञाक्षरादीनां च वपन् ] प्रीदेदवाचविचितं नन्दिनन् । अक्षरश्रुता-ऽनक्षरतमेदद्वयान्नाव सत्यपि गेषभेदानामुपन्यासोऽनातनापनार्यः, न च भेदद्वयादेवाव्युत्पन्नमतीनां शेषभेदावगम इनि प्रतीतमेतन् । अलं विस्तरेण ।। नाम्पतमुपन्यस्तनभेदानां स्वल्पमनवगनाधं भेदमधिकृत्य प्रश्नमूत्रमाह ६२. से किं तं अस्वरमुतं ? अस्त्वरसुतं तिविहं पण्णत्वं तं जहा-सण्णक्खरं १ बंजण- स्वरं २ लद्धिअस्वरं ३। ६२. से किं तमित्यादि । अथ किं तदारश्रुतम् ?, घर “ मलने" [पाणिनियानु. ८५१ १ न भरतीत्य- धरम्, तब बानम्, चेतनेत्यर्थः, जीवम्वाभाच्यावनुययोगेऽपि नवतो न प्रच्यक्त इत्यर्थःइत्यम्भूतभावाक्षरकार्य- कारणत्वादकाराघप्यक्षरमुच्यते । तत्राधरात्मकं श्रुतममन्युनं व्यानराग्यधिकृत्य. अथवाजरंच तन् श्रुतं चाक्षरधुनं भागक्षरमधिकृत्य । इदमक्षश्रुतं त्रिविध प्रकाप्रम्, असरल्यैव त्रिभदन्वान् । त्रिभेदनामेव वनयमाह-समारं १ व्यसनाखरं लध्यक्षरम् ।। ६३, से किं तं मण्णस्वरं ? मुण्णसवरं अक्सरस्य मंत्राणा-गिती। ले तंमुण्णाखरं ।। ६६. से किं तमित्यादि । अथ कि नन मंगलन्म ?. समान मंत्री मायने ना अननि गा. तनिवन्धनमक्षरं मंशामरम्, इदं च 'अक्षरम्य अकागानानि यानाः बालमियाने नेण कागदिमा प्रवनन :नि । एनच बान्यादिलिपीविधानानिमि। " मानना गाभाम ६४. से कि नं वंजणवावरं ? वंजणवा अपमानजनाभिलायोनियंजणारं २ । ६४. मेरे कि नमिन्यादि । अथ कि ना न्यनाम: च्यानंच नदक्षरं च व्यसनामग. गंधा चमेव मारा: Tr:- .. नथा चार सत्रकार-'अक्षरम्यारा: मनम:': । : :::: यसनातरम् २ ॥ ६५. से विलजिअवरवरं ? लजिनका गमा नं जा-सोदियलनिअपग्य : विवादित m: दियलदिपावर १ पामंदिगलहिजार ५ २ । सेनं अवसरमुकं ।। २२ किमिमा ":::::: f .. HT - :::::: - +-- 5 10 श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या समलस्कृतं [सू. ६६-६९ गा.७८ बेन्द्रियलब्ध्यक्षरमिति, एवं शेषेष्वपि भावनीयम् । “से त"मित्यादि, तदेतल्लध्यक्षरम् । “से त"मित्यादि, तदे- तदक्षरात्मकं अक्षरं च तदिति वा श्रुतं चाक्षरश्रुतम् । अत्र संज्ञा-व्यञ्जनाक्षरे द्रव्यश्रुतम् , लब्ध्यक्षरं पुनर्भावश्रुतम् लब्धेर्विज्ञानरूपखात् ॥ ६६. से किं तं अणक्खरसुयं ? अणक्खरसुयं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा- ऊससियं णीससियं णिच्छूद्धं खासियं च छीयं च । णिस्संघियमणुसारं अणक्खरं छेलियादीयं ।। ७८॥ से तं अणक्वरसुयं । ६६. से किं तमित्यादि । अथ किं तदनक्षरश्रुतम् ? । अनक्षरशब्दकारणं कार्यमनक्षरश्रुतं 'अनेकविधं' अनेकप्रकारं प्रज्ञप्तम् । तद्यथा- अससियं० गाहा । उच्छ्वसनमुच्छ्वसितम् , भावे निष्ठापत्ययः । तथा निःश्वसनं निःश्वसितम् । निष्ठी- वनं निष्ठयूतम् । कासनं कासितम् । 'चशब्दः' समुच्चयार्थः । क्षवणं क्षुतम् । 'चशब्दः' समुच्चयार्थ एव, अस्य व्यव- हितः सम्बन्धः । कथम् ? सेण्टितं चानक्षरं श्रुतमिति वक्ष्यामः । निःसङ्घनं निःसविन्तम् । अनुस्वारबदनुस्वारम् , अक्षरमपि यदनुस्वारवदुच्चार्यते । 'अनक्षर'मिति एतदुच्छ्वसितादि अनक्षरश्रुतमिति । सेण्टनं सेण्टितम्, तत् सेष्टितं चानक्षरश्रुतमिति । इदं चोच्छ्वसितादि द्रव्यश्रुतमात्रम् , ध्वनिमात्रत्वात् । अथवा श्रुतविज्ञानोपयुक्तस्य 15 जन्तोः सर्व एव व्यापारः श्रुतम् , तस्य तद्भावेन परिणतत्वात् । आह-यद्येवं किमित्युपयुक्तस्य चेष्टाऽपि श्रुतं नोच्यते येनोच्छ्वसिताधेवोच्यते ? इति, अत्रोच्यते, रूढया, अथवा श्रूयत इति श्रुतम्, अन्वर्थसंज्ञामधिकृत्योच्छ्व- सितायेव श्रुतमुच्यते, न चेष्टा, तदभावादिति, अनुस्वारादयस्त्वर्थगमकत्वादेव श्रुतमिति ॥७८॥ "से त"मित्यादि, तदेतदनक्षरश्रुतम् ।। ६७. से किं तं सण्णिसुतं ? सण्णिसुतं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालिओवएसेणं ? 20 हेऊवएसेणं २ दिविवादोवदेसेणं ३ । ६७. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् संज्ञिश्रुतम् ? । संज्ञानं संज्ञा, साऽस्यास्तीति संज्ञी, तस्य श्रुतं संनिश्रुतं त्रिविधं प्रज्ञप्तम्, संज्ञिन एव त्रिभेदत्वात् । त्रिभेदतामेव दर्शयन्नाह, तद्यथा-कालिक्युपदेशेन १ हेतूपदेशेन २ दृष्टियादोपदेशेन ३ ॥ ६८. से किं तं कालिओवएसेणं ? कालिओवएसेणं जस्स णं अत्वि ईहा अपोहो 52 मग्गणा गवेसणा चिंता वीमंसा से णं सण्णि त्ति लब्भइ, जस्स णं णत्यि ईहा अपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमंसा से णं असण्णीति लभइ । से तं कालिओवएसेणं १। ६८. से किं तमित्यादि । अथ कोऽयं कालिययुपदेशेन ? इहाऽऽदिपदलोपा दीर्घकालिकी कालिक्युच्यते, संज्ञेति प्रकरणाद् गम्यते, उपदेदानमुपदेशः, कथनमित्यर्थः, दीर्घकालिक्याः सम्बन्धी दीर्घकालिक्या वा मतेनोपदेशो दीर्घकालिक्युपदेशः, स्तेन ‘यस्य प्राणिनः 'अस्ति विद्यते 'ईहा' शब्दाद्यवग्रहणोत्तरकालमन्वय-व्यतिरेकधर्मा- , जनक्षश्रुतादीनां हेतूपदेशित्यादिसंज्ञानां च स्वरूपम् ] श्रीदेववाचकावरचितं नन्दिसूत्रन् । लोचनचेष्टेत्यर्थः; तथा 'अपोह: व्यतिरेकधर्मपरित्यागेनान्वयधर्माच्या नावधारणात्मकः प्रत्यय इति भावना, यथा शब्द इति; तथा 'मार्गणा विशेषधर्मान्वेपणाल्पा संविदित्यर्थः, यया-गब्दः सन् कि माइः किंवा शाः ? इति: तथा 'गवेषणा' व्यतिरेकधर्मस्वन्यालोचना, यथा बरादय एवम्भूना इतिः तया 'चिन्ता' अन्वयधर्मपरिज्ञाना- भिमुग्वा चेप्टा, यथा मधुरत्वादयस्वेत्रम्भूता इतिः तथा 'विमः' त्यान्यधर्मपरित्यागेनोपादेयधर्मग्रनाभि- मुख्यम्, यथा न शाई, प्राचोऽयं मधुरत्वादियोगाच्या इतिः “ में जं नानि नभनि निस: प्राणी ""मिति वाक्यालङ्कार 'नीति लभ्यने मनःपर्याप्त्या पर्याप्नः. अवयवादिनतिज्ञानरमसमन्वित इत्यर्थः । अथवा यस्यास्ति 'ईशा किमेतदिति चेष्टा, इदमित्यवगमोऽपाहः, अजगतार्थाभिलपे नत्प्रार्थना मार्गना, नासाजी च निपुणोपायतोऽन्वेषणं गवेषणा, प्रयुक्तनिस्तापाययोपायान्तरविननं चिना. तद्विषय सोपायालोचना- न्मकः प्रन्ययो विमर्पः, न्न नीति लभ्यते । अयं व गर्भयु-नातिका पुलादिगपातिकव देवादिदेव मनापालि- प्रयुक्तो विजयः, यथोक्तविशेषणकलापनमन्वितत्वात न अनन्यसाहिपविकल इति । आइ च-"जम्न्यादि. यन्य नानिहाऽपोहा मार्गणा गवेषणा चिन्ता त्रिमयः नोटीनि लभ्यते. अयं च मम्यूमिन्द्रिय विकन्टे- न्द्रियादियः, अन्यमनीलब्धिवादभावाच । " न"मिन्यादि. मोऽयं शालिक्युमन ॥ ६९. से किं तं हेऊवगणं ? हेऊवएणं जन्म णं अन्धि अभिसंधारणपुब्धिया करणमनी से णं सुण्णीति लभइ, जन्य गं गन्यि अभियाणयुधिया करणयनी सेणं अमणि त्ति लव्मइ । से च वालेणं २ । ६१. गे कि नमिन्यादि । अध कोऽयं य::--- .. नपदशग्न, कारणोपदेशनन्यर्थः । 'यस्य पाणिनः कि लोचन नपिका-नजागणिका यागनि:-शयाना निबन्धनमायाममिनि भागना. म माणी "M" सिंगपन्द्रियावयानी शियः । नाति-पाको रिपालनार्थ भायो वर्गमान एक. भार्या: त्यही नशा चार-"जर"या. याचा घशास्त्रियः शियामिरवगः, सतील! आयत कल्पनामागार :: माविधाः विधामा ग. ना-नाममा :: भागासा" Fanा माता- पोगा. ::मा. . 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६२ ܝܢ لا श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्या सगलकृतं [सू. ७०-७१ ७०. से किं तं दिट्ठिवाओवएसेणं ? दिविवाओवएसेणं सण्णिसुयस्स खओवसमेणं सण्णी लभति, असण्णिसुयस्स खओवसमेणं असण्णी लमति । से तं दिहिवाओवएसे- णं ३ । से तं सण्णिसुतं ३ । से तं असण्णिसुतं ४ । ७०. से किं तमित्यादि । अथ कोऽयं दृष्टिवादोपशेन ?, दृष्टिः दर्शनं, बदनं वादः, दृष्टीनां वादः दृष्टिवादः 5 तदुपदेशेन तन्मतापेक्षया संज्ञिश्रुतस्य क्षयोपशमेन संज्ञीति लभ्यते, अयमत्र भावार्थः-संज्ञानं संज्ञा, तद्योगात् संज्ञी, तस्य श्रुतं संज्ञिश्रुतम् , इदं सम्यक्छूतमेव, अन्यथा संज्ञानाभावात् , न हि मिथ्यादृष्टेः संज्ञानमस्ति, हिता- ऽहितप्रवृत्ति-निवृत्त्यभावाद् रागादिप्रवृत्तेः । उक्तं च- तज्ज्ञानमेव न भवति यस्मिन्नुदिते विभाति रागगणः । तमसः कुतोऽस्ति शक्तिर्दिनकरकिरणाग्रतः स्थातुम् ? ॥१॥ 10 सम्यग्दृष्टिस्तु तन्निग्रहपरत्वाद् वीतरागसम एव । उक्तं च- कलुसफलेण ण जुज्जइ किं चित्तं तत्थ ? जं विगतराओ। संते वि जो कसाए णिगिण्हती सो वि तत्तुल्लो॥१॥ [विशेषा. गा. ३२६५ ] त्तीत्यादि। अलं प्रसङ्गेन । तदित्यम्भूतस्य संज्ञिश्रुतस्य क्षयोपशमेन सता संज्ञीति लभ्यते, अयं च सम्यग्दृष्टिरेव क्षायो- पशमिकज्ञानयुक्तो रागादिनिग्रहपरः । तदन्यस्त्वसंज्ञी, यत आह ग्रन्थकारः-असंज्ञिश्रुतस्य क्षयोपशमेनासंज्ञीति 15 लभ्यते, “से त"मित्यादि, सोऽयं दृष्टिवादोपदेशेन ३। एवं संज्ञिनस्त्रिभेदभिन्नत्वात् श्रुतमपि तदुपाधिभेदात् त्रिविधमेवेति । अत्राह-कालिक्युपदेशेनेत्यादि क्रमः किमर्थम् ?, उच्यते, इह प्रायः सूत्रे यत्र क्वचित् संज्ञिग्रहणं तत्र दीर्घ- कालिक्युपदेशेन समनस्कसंज्ञिपरिग्रह इति प्रथमं तदुपन्यासः, अप्रधानत्वाचेतरयोः, अन्ते च प्रधानाभिधानमिति न्याय्यम् । “से त"मित्यादि, तदेतत् संज्ञिश्रुतम् ३ । असंज्ञिश्रुतं तु प्रतिपक्षाभिधानादेव प्रतिपादितम् । 20 तदेतदसंज्ञिश्रुतम् ४ ॥ ७१. [१] से किं तं सम्मसुतं ? सम्मसुतं जं इमं अरहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पण्णणाण- दसणधरेहिं तेलोकणिरिक्खिय-महिय-पूइएहि तीय-पचुप्पण्ण-मणागयजाणएहिं सव्वणूहि सम्बदरिसीहिं पणीयं दुवालसंगं गणिपिडगं, तं जहा-आयारो १ सूयगडो २ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरो- 29 बवाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिद्विवाओ १२ । [२] इचेयं दुवालसंगं गणिपिडगं चोदसपुब्बिस्स सम्मसुतं, अभिण्णदसपुब्बिस्स सम्मसुतं, तेण परं भिण्णेसु भयणा । से तं सम्मसुतं ५। ७१. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् सम्यक्श्रुतम् ?, सम्यक्श्रुतं यदिदं प्रणीतमिति सम्बन्धः । तत्रा- शोकायष्टमहामातिहार्यरूपां पूजामन्तीत्यर्हन्तः, तथा चोक्तम्- - ६ सम्यक् श्रुतम् ] श्रीदेवयावविरचितं नन्दिसूत्रम् । अशोकक्षः नुरपुष्पवृष्टिर्दियो ध्वनियामरमाननं च । भामण्डलं दुन्दुभिरानपत्रं, सत्मातिहार्याणि जिनवराणाम् ॥१॥ तरईद्रिः, तत्र शुद्धद्रव्यास्तिकनयमनानुसारिभिः अनादिशुद्धा एच मुक्तामानोऽभ्युपगम्यते । यथोक्तम्- ज्ञानमप्रतिवं यस्य, वैरान्यं च जगत्पतेः । ऐश्वर्य चैत्र धर्मश्च महसिद्ध चतुष्टयम् ।।१।। इत्यादि बहवन केविदिष्यन्ते, तपि च स्थापनादिद्वारेण पूजाईवाईईन्को भवन्त्येव । अतो 'भगाङ्गिः भगः- समग्रेश्वर्यादिलक्षणः, यधोक्तम् -- ऐश्वर्यस्य समान्य रूपस्य यशवः श्रियः । धमन्याय प्रयन्नन्य मां भग इनाहना ॥२॥ -- - " भगो विधन पां ने भगवन्तः नैर्भगवद्धिः, न चानादिशुदानां पर नारायने. अग्निात. शरीरम च रागादिकार्यत्वात, तपां च तदभावादिनि । बच्छानिमोणतः समागमतान् नुमतावानाऽऽर- उन्पन्नशान-दर्शनधरः, न च तनादिशक्षाः उन्यमान-वनयगा. "मानवि को "यादिननविगेशन एवं शुमच्याग्निकनयमनानुसारिपरिकल्पितमुनालायकाय नमः। अपना पांगविनयम नानुमागिरि यायिनमृताध्ययच्छेदार्थमा.-'त्रैलोकनिगक्षिन-महिन-ति मिनट का मान गया श्रेलीययेन निरीक्षिन-महिन-जिना :नि विग्रः। मिर ध्यन्नर-नर-विद्याधर-ज्योतिष्या-मानिकापन्ग्रिा:. निगम .:.. नान्यासाधारणगणोकनिनलक्षणेन भावग्नयन. nिam. दयोऽपि पर्यायाग्नियन गगनानुयायियोवन देवागम-नभायान-चामरादिविधायः । मामा -- -- . । आत आर.-'अनान-मागृपना-नागका ३० नधासागमः- गणिताणगया भगा. जो गाय : अपना र शरणायोगाराम भार नामनामाभिन्न शिजीमा-STREE प.पया संगालामा पाप-:: गीता : भान --- १५.३ १. m [मु. ७२-७३ श्रीहरिभवसरिसूत्रितया गृल्या सगलदानं तत् ? 'द्वादशाद् श्रुतपरमपुरुषोत्तमस्यागानीवाङ्गानि द्वादश अगानि-आनारादीनि यस्मिन्नद हादगाहम् । गुण- गणोऽस्यास्तीति गणी-आचार्यरतम्य पिटकं-सर्वरचं गणिपिटकम् । अथया गणिशब्दः परिच्छेदवननः, नथा नोक्तम्- आयारम्मि अहीए ज णातो होड़ समणधम्मो उ । तम्हा आयारधरी भन्नति पहमं गणिहाणं ।।१॥ [ आनारा नियुक्ति गा. १०] 5 परिच्छेदस्थानमित्यर्थः, ततच परिच्छेदसमूहो गणिपिटकम् , तद्यथा-आचार इत्यादि पाटसिद्धं यावद दृष्टिबादः । अनङ्गप्रविष्टमावश्यकादि, ततोऽहत्मणीतत्वाद् वस्तुत उत्तत्वादनुक्तमपि गृह्यने । इदं सर्वमेव द्रव्या- स्तिकनयमतेन तदभिधेयपञ्चास्तिकायभावरग्नित्यं सत् स्वाम्यसम्बन्धचिन्तायां सूत्राभियरूपं सम्यक्छुतमेत्र भवति । स्वामिसम्बन्धचिन्तायां तु भाज्यम् , स्वामिपरिणामविशेषात् ,कदाचित् सम्यक्ळून कदाचिद् विपर्ययः । तत्र सम्यग्दृष्टेः प्रशमादिसम्यक्परिणामोपेतत्वात् स्वरूपेण प्रतिभासनात् सम्यक्छ्रनम्, पित्तोदयानभिभूतस्य शर्क- 10 रादिरिवेति, मिथ्यादृष्टेः पुनरप्रशमादिमिथ्यापरिणामोपेतत्वाद् वस्तुनः स्वरूपेणाप्रतिभासनान्मिथ्याश्रुनम् , पित्तो- दयाभिभूतस्याशर्करादिवदिति, देशतो दृष्टान्तः, अशर्करादित्वं च तं प्रति तत्कार्याकरणात् , तथाऽप्यभ्युपगमे चातिप्रसङ्गादित्यलं प्रसङ्गेन । श्रुतप्रमाणत एव सम्यक्परिणामनियमनायाह- [२] इच्चेदमित्यादि । इत्येतद् द्वादशाङ्गं गणिपिटकं चतुर्दशपूर्विणः सम्यक्तृतमेव, तथा अभिन्नदश- पूर्विणोऽपि समयक्छ्रुतमेव । “तेण परं भिन्नु भयण" त्ति पश्चानुपूर्व्या ततः परं भिनेगु दशमु 'भजना' कदाचित् 15 सम्यक्त कदाचिन्मिथ्याश्रुतम् , परिणामविशेषात् । एतदुक्तं भवति-आसन्नभव्योऽपि मिथ्यादृष्टिः सम्पूर्णद- शपूर्वरत्ननिधानं न प्राप्नोति, मिथ्यात्वपरिणामकलङ्कितत्वाद् दारिद्रयनिबन्धनपापकलङ्काङ्कितपुरुषवञ्चिन्ताम- णिमिति । “से त"मित्यादि तदेतत् सम्यक्छ्रुतम् ।। ७२. [१] से किं तं मिच्छयुतं ? मिच्छमुतं जं इमं अण्णाणिएहि मिच्छद्दिट्ठीहिं सच्छंदवुद्धि-मतिवियप्पियं, तं जहा-मारहं रामायणं हंभीमासुरक्ख कोडलयं सगभहियाओ 20 खोडमुहं कप्पासियं नामसुहमं कणगसत्तरी वइसेसियं बुद्धवयणं वेसितं कविलं लोगायतं सद्वितंतं माहरं पुराणं वागरणं णाडगादी, अहवा बावत्तरिकलाओ चत्तारि य वेदा संगोवंगा। [२] एयाई मिच्छद्दिहिस्स मिच्छत्तपरिग्गहियाई मिच्छसुतं, एयाणि चेव सम्मदिहिस्स सम्मत्तपरिग्गहियाई सम्मसुयं । [३] अह्वा मिच्छदिहिस्म वि सम्मसुयं, कम्हा ? सम्मत्तहेउत्तणओ, जम्हा ५० मिन्छद्दिहिया तेहिं चेव समपहिं चोइया समाणा के सपक्खदिट्ठीओ वौति । से तं मिन्टसुयं ६। ७२. से किं तमित्यादि । अथ किं तन्मिथ्याश्रुतम् ? मिथ्याश्रुतं यदिदमज्ञानिकैः । तत्राल्पज्ञानभावाद- धनपदशीलयद्वा सम्यादृष्टयोऽप्यज्ञानिकाः पांच्यन्ते, अन आह-मिथ्यादृष्टिभिः । किम् ? 'स्वच्छन्दबुद्धि-मतिवि- ते ६५ . मिथ्यायुतं सादि-सपर्यवसितादिश्रुतज्ञानं च ] श्रीदेववाचक्रविरचितं नन्दिनन् । कल्पित इटावग्रहेहे बुद्धिः, अयाय-धारणे मतिः, बच्चन्दन-वाभिप्रायेण स्वतः सर्वजीतायांनुसारमन्तरेष बुद्धि-मतिभ्यां विकन्वितं स्वच्छन्दबुद्धि-मतिविकन्वितम् . मधुद्धिकन्यनागिन्यनिर्मिनमिन्ययः। नयथा-'भारत' मित्यादि मूत्रनिद्धं यावत् 'चत्वारश्च पत्रान्साझोपानाः । पनानि मल्यनोऽन्यथावम्बभियानान्निध्यायुतमेव । स्वामिसम्बन्धचिन्तायां तु भाग्यानि । तथा चाह- [२] मिथ्याइष्टमिथ्यात्वपरिगृहीतानि विपरीताभिनिरहनुवान्निध्यायुतम् । एतान्येर सम्मनः मुम्यक्त्वपरिगृहीतानि असारतादर्शनेन बिनमयपरिणामांनुवान मन्यवकृतम् [३] अपना मिििहस्स वि सम्बश्रुतम् इत्यादि. अश्या मियाष्टानानि सम्पन्नम् . कम्मान ?, सम्यक्त्वहेतुत्वान् । नया चा-"जम्मा ने मिट्टी या यादि. यम्मान न मिल्गायः " चेव समयेहि चोदिता समाण नि नेवि समयः विद्यान्नः जागविगंधागा नियाने ग्यान कथं बदायप्रतिपनिः? न्यादिना चोदिनाः गन्तः कंचन विकिनः मनसाइन इन. नि: " मधिीमी यमंति" पक्षष्टीम्न्यजन्तीत्यर्थः । " "मिन्यादि. कंदनल विश्वाचनमः ।। ७३. से कि तं सादीयं सपञ्जयन्नियं ? अणातीयं अपजानिय व नियंदुवालगंगं गणिपिडगं विउच्छित्तिणययाए याद्रीय नजमि. अविजितिनयनाए अगादी अपज्जवनियं। ७. मे विनगिन्यादि । वादि ममि : fi नन मादि ?, या. आदिना वन निमामि । बिगिनयः, पर्यायाग्गिय व्यर्थः, नग्या : थार्थमायन. पर्यायापयेत्यर्थः. कि ? मामि...:". मानन सयमिता . नारमादिगा :: :: : जिनयः. न्याग्निकानययनरमायो...' नगामायन गागः, किर : अभियानमेवा मा" ७१. न ममामलो . नल्यव्यसो सम्मान::::. अपज्जपनि मोवा TÆTTI : FORT पी : । 11 ==+: . + . RAM -- m from [रा. ७४-७६ ६६ श्रीहरिभद्रसूरिसूनितया त्या सगलतं पुण भावं पञ्च अणादीयं अपज्जवसियं । ७४. तं समासतो इत्यादि । 'तत्' श्रुतज्ञानं 'समासतः सक्षेपेण चतुर्विधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतो भावतः। तत्र द्रव्यतः “ण"मिति वाक्यालङ्कारे सम्यकद्रुतं एकं पुरुपं प्रतीत्य सादि सपर्यवसितम् । कथम् ?, सम्यक्त्वावाप्तौ तत्पथमपाठतो वा सादि, पुनर्मिथ्याखप्राप्तौ सति वा सम्यक्त्वे प्रमाद-ग्लान-सुरलोकगमन-केवलो- 5 त्पत्तिभावेऽभावात् सपर्यवसितम् । वहून् पुरुषान् प्रतीत्य अनाद्यपर्यवसितम्, सन्तानेन प्रवृत्तत्वात्, पुरुषत्ववत् । तथा क्षेत्रतः पञ्च भरतानि पश्च ऐरवतानि प्रतीत्य सादि सपर्यवसितम्। कथम् ?, तेषु सुपमदुष्पमादिकाले तीर्थकर-धर्म- सङ्घानां तत्पथमतयोत्पत्तेः सादि, एकान्तदुप्पमादिकाले च तदभावे सपर्यवसितम् । तथा महाविदेहादि प्रतीत्य प्रवाहरूपेण तीर्थकरादीनामव्यवच्छित्तेरनाद्यपर्यवसितम् । कालतः "ण"मिति वाक्यालङ्कारे अवसर्पिणी उत्सर्पिणी च प्रतीत्य सादि सपर्यवसितम्, कथम् ?, यतोऽवसर्पिण्यां तिसृष्वेव सुपमदुप्पमा-दुःपममुपमा-दुप्पमास्विति, उत्स- 10 पिण्यां द्वयोः दुष्पमसुषमा-सुपमदुष्पमयोरिति, न परतः, इत्यतः सादि सपर्यवसितम् । अत्र कालचक्र विंशतिसाग- रोपमकोटीकोटिपरिमाणं विनेयजनानुग्रहार्थ प्ररूप्यते- चत्तारि सागरोवमकोडाकोडीउ संततीए उ । एगंतसूसमा खलु जिणेहिं सव्वेहिं णिहिट्ठा ||१|| तीए पुरिसाणमायुं तिण्णि य पलियाई तह पमाणं च । तिम्नेव गाउयाई आदीए भणंति समयण्णू ॥२॥ उवभोग-परीभोगा जम्मंतरसुकयवीयजातातो । कप्पतरुसमूहाओ होति किलेसं विणा तेसिं ॥३॥ ते पुण दसप्पगारा कप्पतरू समणसमयकेतूहिं । धीरेहि विणिट्टिा मणोरहापूरगा एए ॥४॥ मत्तंगया १ य भिंगा २ तुडियंमा ३ दीव ४ जोति ५ चित्तंगा ६। चित्तरसा ७ मणियंगा ८ गेहागारा ९ अणियणा १० य ॥५॥ मत्तंगएसु मज्जं सुहपेज १ भायणाणि भिंगेसु २ । तुडियंगेमु य संगयतुडियाणि बहुप्पगाराणि ३ ॥६॥ दीवसिहा जोतिसणामया य णिचं करेंति उज्जोयं ४।५। चित्तंगेसु य मल्लं ६ चित्तरसा भोयणट्ठाए ७ ॥७॥ मणियंगेमु य भूसणवराणि ८ भवणाणि भवणरुक्खेउ ९ । आयन्नेसु य इच्छियवस्थाणि बहुप्पगाराणि १० ।।८।। एएमु य अन्नेमु य नर-नारिंगगाण ताणमुखभोगा। भविय पुणभवरहिया इय सबन्न जिणा विति १॥९॥ तो तिम्नि सागरोवमकोडाकोडीउ वीयरागेहिं । सुसम ति समक्खाया पवाहरूवेण धीरेहिं ॥१०॥ तीए पुरिसाणमायुं दोणि य पलियाई तह पमाणं च । दो चेव गाउयाइं आईए भगति समयन्नू ॥११॥ उपभोग-परीभोगा तेसि पि य कप्पपादवेहितो । होति किलेसेण विणा नवरं ऊणाणुभावेहि २॥१२॥ तो सुसमदूसमाए पवाहरूवेण कोडिकोडीओ । अयराण दोण्णि सिहा जिणेहिं जियराग-दोसेहिं ॥१३॥ तीए पुरिसाणमाउं एग पलियं तहा पमाणं च । एगं च गाउयं ती आदीए भणंति समयण्णू ॥१४॥ उपभोग-परीभोगा तेसि पि य कप्पपादवेहितो । होति किलेसेण विणा पायं ऊणाणुभावेहिं ।।१५।। मुसमदुसमायसेसे पढमजिणो धम्मणायगो भयवं । उप्पनो कयपुग्नो सिप्पकलादंसगो उसहो ३ ॥१६॥ तो दुसममुस्समूणा बायालीसाए वरिससहसेहिं । सागरकोडाकोडी एगेव जिणेहि पण्णत्ता ॥१७॥ तीए पुरिसाणमायुं पुचपमाणेण तह पमाणं च । धणुसंखानिदिटं विसेसमुत्तादो णायव्वं ॥१८॥ 15 20 25 कालचक्रं सादि-सपर्यवसितादियुतनानं श्रीदेवाचकविचितं नान्दमूत्रम् । ६७ उपभोग-परीमोगा परोसहिमाइप विष्णेया । जिण-चत्रि-वासुदेवानन्द य इमीर वालणा ४ ॥१९॥ इनवीन सहस्साई वालाणं इसमा, इमीए य । जीवियमातमोगादिया य दीपति बारा ५॥२०॥ एनो उ किलिरा जीपमाणादिपहिं निहिता । अतिपन नियोत वामहमाई इनवीनं ६ ॥२६॥ ओमभिगीर एलो कालविभागो जि िनिष्ट्रिी। एमां विय पडिलांनं विनविना वि ॥२२॥ एतं न कालचक्र लिम्लजणाणुगट्या मणि । संवत्रण महन्यो विषयुनायी पायधो ॥२३॥ "णोउम्ब(ोन)प्पिणी "मित्यादि। नोवर्षिणीनोउपिणों च प्रतान्य अनाधर्विवपिनम् . मात्र कालम्यावधिनत्वादिति भावः । भावतः ""मिनि पुर्वचन बनिदिति वन वदा पूचनाही जिनः प्रममा जिनमापाः 'भावाः पदार्थाः "आरिजनि निमारतीच्या प्राण्यायले. मामान्य विगाभ्यां कामयन इत्यर्थः; 'प्राप्यन्ने नामादिभवाभिधाननः 'प्रयन्नामादिनन्यस्यनेन वा-"पयांगानभिनय मित्यादिः 'दश्यन्त उपमानमात्रतः, यथा गोन्नया गच्च न्यादिः निन्न तयानान्यानेनः उमाल अमर निगमनाभ्यामिति सकलनयाभिमायनो या 'तान भागन का कायाका प्रतील मादि सर्वामिनन् । एनदत्तं भवनि-प्रडापकोपयोग-वर-प्रयत्ना-ज्यविशेषतः अन्यथा अभिनेः मादिगार जिनम् । नया चोनाम्- उपयोग-दर-ययना आनामेदादियान पनि भिमा पनवगम्या नाति नाज नमा अधया महापनीयभावापेक्षया गनिम्न- गादि सपर्यचयिनम् . भायोपगियामानामा पर अधयाऽत्र भरिका-पादिरारित नत्र प्रथमभहयामदर्शनाया--- ७५. या समितीचमा :::: दीयं अपज्जवभियं । ५५. "गमिती" : योगासगा भावित । 17:27.::. :: हामतिः २२ Famirns- "म" लागि ETE : 15:. भोर मा ..... P- - ३ मनात -- . . 2 . . . + , १ [ सू. ७७-७९ . श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया त्या समलगृतं तस्य प्रदेशाः-प्रकृष्टा देशाः प्रदेशाः, निर्विभागा भागा इत्यर्थः, तेपामग्रं-परिमाणं सर्वाकाशप्रदेशाग्रम् , सर्वाकाश- प्रदेशैः, किम् ? 'अनन्तगुणितं' अनन्तशो गुणितं अनन्तगुणितम्, एकैकस्मिन्नाकाशप्रदेशे अनन्तागुरुलघुपर्याय- भावात् , 'पर्यायाग्राक्षरं' पर्यायपरिमाणाक्षरं निष्पद्यते, सर्वद्रव्य-पर्यायपरिमाणमिति भावार्थः । स्तोकत्वाचेह धर्मा- स्तिकायादयो नोक्ताः, अर्थतस्तु गृहीता एव ।। ७७. सव्वजीवाणं पि य णं अक्खरस्स अणंतभागो णिचुग्घाडियओ, जति पुण सो वि आवरिज्जा तेण जीवो अजीवत्तं पावेज्जा । सुट्ठ वि मेहसमुदए होति पभा चंद-सूराणं । से तं सादीयं सपज्जवसियं । से तं अणादीतं अपज्जवसितं ७।८।९।१०। ७७. इह च ज्ञानमक्षरं गृह्यते, तथा तज्ज्ञेयम् , तथा अकारादि च, सर्वथाऽप्यविरोध इति । अस्य च 10 सर्वजीवानामपि चाक्षरस्यानन्तभागः 'नित्योद्घाटितः सदाऽप्राप्त इत्यर्थः । स पुनरनन्तभागोऽप्यनेकविधः, तत्र सर्वजघन्यश्चैतन्यमात्रम् , तत् पुनर्न कदाचिदुत्कृष्टावरणस्याप्यात्रियते, जीवस्वाभाव्यात् । आह च ग्रन्थकारः-"जइ पुण" इत्यादि । यदि पुनः सोऽपि आवियेत, ततः किम् ?, 'तेन जीवः अजीवतां प्राप्नुयात्' 'तेन' आवृतेन 'जीव' चैतन्यलक्षणः स्वलक्षणपरित्यागादजीवतां प्राप्नुयात् , न चैतद् दृष्टमिष्टं वा, सर्वस्य सर्वथा स्वभावातिरस्कारात् । अत्रैव दृष्टान्तमाह-"मुट्ठ वी"त्यादि सुष्ठ्वपि मेघसमुदये चन्द्र-सूर्यप्रभाजालतिरस्कारिणि सति भवति प्रभा चन्द्र-सूर्ययोः, 15 सर्वस्य सर्वथा स्वभावातिरस्कारादिति । अत्राह-"सव्वागासपएसग्गं सव्वागासपदेसेहिं अणंतगुणियं पज्जवग्गक्सरं निप्फज्जति" इत्यत्राविशेपितमेवा- क्षरमुक्तम् , अविशेषाभिधानाचेदं केवलमिति गम्यते, इह तु श्रुताधिकारादकारादि प्रकृतं यतः, तत् कथं केवल- पर्यायपरिमाणतुल्यं भवेत् ?, उच्यते, नन्वत्राप्यपर्यवसितश्रुताधिकाराद्येव गम्यते। अथ मतिः-"सबजीवाणं पि य णं अक्खरस्स अणंतभागो णिचुग्याडिओ" त्ति सर्वजीवग्रहणान्न तत् श्रुतम् , यतः समस्तद्वादशाङ्गविदां तत् समस्त- 20 मिति, यद्येवं केवलस्यापि न सर्वजीवानामेवानन्तभागोऽवतिष्ठते, सर्वज्ञसद्भावात् , अतो न तत् केवलाक्षरमपि, कस्यासावनन्तभागोऽस्तु ?, तथा अविशेषेण सर्वजीवग्रहणे सत्यपि प्रकरणाद् अपिशव्दाद्वा केवलिनो विहायान्येषां अनन्तभागो गम्यते, अत एव किं न श्रुतात्मकमक्षरमङ्गीकृत्य समस्तद्वादशाङ्गविदोऽपि विहायान्येपामनन्तभागो गम्यते ? तस्मात् स्व-परपर्यायभेदादुभयमप्यविरुद्धमिति, तथाऽप्यत्रापर्यवसितश्रुताधिकारादकारायेव न्यायानुपाति । तत् पुनरनन्तपर्यायम्-इह अ अ अ इत्यकार उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितः, स सानुनासिको निरनुनासिकश्च, एवं दीर्घः प्लुतः, एवं तावदष्टादशप्रभेदं अवर्ण त्रुवते, एवं यावतः केवल एव अकारो लभते सानुनासिकादीन् । तथाऽन्यवर्णसहितो वा तेऽप्यस्य स्वपर्यायाः, ते चानन्ताः । कथम् ?, अभिलाप्यवाह्यनिमित्तभेदार, तस्य च परमाणु-द्वयणुकादिभेदेनानन्तत्वात्, ध्वनेश्च तथातथाभिधायकत्वपरिणामे सति तत्तदर्थप्रतिपादकत्वादिति, साङ्केति- फशब्दार्धसम्बन्धवादिमतमयावश्यके नैयाधिकारे विचारयिष्यामः, ततश्चैते स्वपर्यायाः, शेपास्तु सर्व एव घटादि- १ अप्राधे पूज्यप्रवरस्वविहिताऽऽवश्यकवृत्तेर्दुष्पमाकालदुष्प्रभावविनष्टत्वाद् यत्किविचित्ततुष्टयभं सम्प्रत्युपलभ्यमानाऽऽगमो- दारफमुदापिता शिप्यदिताख्याऽऽवश्यकलघुवृत्तिरवलोकनीया [आव. नि. गा. ७५४-६० पत्र २८२-८५] । तथाऽप्रार्थे विशेषावश्यकमहाभाष्यसत्याः २१८१ तः २२६३ गाथास्तट्टीवादिकं चापि विलोकनीयमिति ॥
•- 15 जीवानासक्षरानन्तभागोद्घाटत्वं गमिकादिश्रुतज्ञानं च ] . 'श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ६९ पर्यायाः परपर्याया इति, ते पुनः स्वपर्यायेभ्योऽनन्तगुणाः। आह-स्वपर्यायाणां तावत् पर्यायता युक्ता, घटादिपर्यायास्तु विभिन्नवस्त्वाश्रितत्वात् कथं 'तस्य' इति व्यपदिश्यन्ते ?, उच्यते, स्वपर्यायविशेषणोपयोगात्, इह ये यस्य स्वपर्यायविशेपणतयोपयुज्यन्ते ते तस्य पर्यायतया व्यपदिश्यन्ते, यथा घटस्य रूपादयः, उपयुज्यन्ते चाकार- स्वपर्यायाणां विशेषणतया घटादिपर्यायाः, तानन्तरेण स्वपर्यायव्यपदेशाभावात्, तथा वस्तुस्थित्याऽपिं च घटादिपर्याया अभावरूपेणाकारस्य व्यवस्थितत्वाद् घटादिपर्यायाणां अकारपर्यायतायामविरोध इति । इयमत्र भावना-घटादिपर्यायाणामनन्तत्वात् तेभ्यश्चाकारस्य स्वभावभेदेन व्यायत्तत्वात्, स्वभावभेदव्याहत्त्यनभ्युपगमे च घटादिपर्यायाणामेकत्वप्रसङ्गात्, अतः स्वभावभेदनिवन्धनत्वादकारपर्यायता तेपामिति, तस्मात् स्व-परपर्याया- पेक्षया खल्वकारस्य सर्वद्रव्यपर्यायराशितुल्यधर्मताऽविरोध इति । न चेदमुत्सूत्रम्, यत आगमेऽप्युक्तम्-“जे एगं जाणति से सव्वं जागति, जे सव्वं जाणति से एगं जाणति" [आचाराङ्गे श्रु० १ अ० ३ उ० ४ सू० १ ] त्ति । अस्यायमर्थः-य एकं वस्तूपलभते सर्वपर्यायैः स सर्वमुपलभते, कश्चैकं सर्वपर्यायैरुपलभते ? य एव सर्व सर्वथोपलभत 10 इति, अतः सर्वमजानानो नाकारं सर्वथोपलभत इति, ततश्चास्मात् सूत्रात् सर्वमेव वस्तु सर्वद्रव्यपर्यायराशितुल्यधर्मकम्, इह त्वक्षराधिकारादक्षरमुक्तमिति, इतश्चैतदकारायेव प्रतिपत्तव्यम्, अस्मिन्नेवाधिकारे 'अक्षरस्यानन्तभागो नित्योद्घा- टितः' इत्युपन्यस्तत्वात्, केवलस्यं चाविभागसम्पूर्णत्वेन निकृष्टानन्तभागासम्भवात्, भेदभिन्नत्वात्, मनःपर्यायज्ञानस्याप्योधत ऋजु-विपुलभेदभिन्नत्वात्, पारिशेण्यादकारादिश्रुताक्षरस्य निवन्धनज्ञान- स्यैवासावित्यलं प्रसङ्गेन । " से तं" इत्यादि निगमनद्वयमपि निगदसिद्धम् ।। ७८. से किं तं गमियं ? गमियं दिविवाओ। अगमियं कालितं सुयं । से तं गमियं । से तं अगमियं ११ । १२ । ७८. से किं तमित्यादि । अथ किं तद् गमिकम् ? । इहाऽऽदि-मध्या-ऽवसानेपु किश्चिद् विशेषतः पुनस्त- सूत्रोच्चारणलक्षणो गमः, यथाऽऽदिविशेषे तावत् "इह छज्जीवणिके"त्यादि, [ दशवै० अ. ४ सू. १-३ ]गमा अस्य दिद्यन्त इति “अत इनि ठनौ” [ पा. प. २. १२५ ] इति गमिकम् । इदं च प्रायोवृत्त्या दृष्टिवादे, तस्यैव गमवहुलत्वात् । 20 अगमिकं तु प्रायो गाथाद्यसमानग्रन्थत्वात् कालिकश्रुतमाचारादि । “से त"मित्यादि निगमनद्वयं कण्ठयम् ।। ७९. अहवा तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अंगपविट्ठ अंगबाहिरं च । ७२. तं समासतो दुविहं पन्नत्तं 'तद्' गमिका-ऽगमिकं अथवा 'तद्' ओवश्रुतमईदुपदेशानुसारि 'समासतः सङ्क्षपेण द्विविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-अङ्गप्रविष्टं अनचाह्यं च । अत्राह-पूर्वमेव चतुर्दशभेदोद्देशाधिकारे अङ्गभविष्टं च अङ्गवाह्यं चेत्युपन्यस्तम्, किमर्थ पुनः 'तत् समासतः' इत्याद्युपन्यासेन तदेवोद्दिश्यते ? इति, अत्रोच्यते, 25 सर्वभेदानामेवाङ्गाऽनङ्गप्रविष्टभेदद्वयान्तर्भावेनाईत्मणीतत्वेन च माधान्यख्यापनार्थमिति । तत्र- पाददुगं २ जंघो २ रू २ गातयगं च २ दो य वाहूओ २ । गीवा १ सिरं च १ पुरिसो वारसअंगो नुयविसिट्टो ॥१॥ [ श्रुतपुरुपस्याङ्गेषु प्रविष्टम्, अङ्गभावव्यवस्थितमित्यर्थः । अथवा- गणधरकयमंगगयं जं कत थेरेहि वाहिरं तं तु । नियतं वंगपविटं अणिययनुय वाहिरं भणियं ॥१॥ [ तत्राल्पतरवक्तव्यत्वादङ्गवाह्यमधिकृत्य प्रश्नसूत्रमाह- - -- 30 5 10 श्रीहरिभादसूरिसूत्रितया वृत्या सगलातं [रा. ८०-८३ ८०. से किं तं अंगवाहिरं ? अंगवाहिरं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आवस्सगं च आव- स्सगवइरिनं च। ८०. से किं तमित्यादि । अथ किं तदङ्गवाहाम् ? । श्रुतपुरुपाद् व्यतिरिक्तं अगवाह द्विविधं प्रज्ञप्तम् , तधथा-आवश्यकं च आवश्यकव्यतिरिक्तं च ॥ ८१. से किं तं आवस्सगं ? आवस्सगं छव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-सामायियं १ चउ- वीसत्थओ २ वंदणयं ३ पडिकमणं ४ काउस्सग्गो ५ पच्चक्खाणं ६ । से तं आवस्सयं । ८१. से किं तमित्यादि । अथ किं तदावश्यकम् ? अवश्यक्रियानुष्ठानादावश्यकम् , गुणानां वा आ-अभि- विधिना वश्यमात्मानं करोतीत्यावश्यकं पड्विधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-सामायिकमित्यादि । सावज्जजोगविरती १ उक्कित्तण २ गुणवयो य पडिवत्ती ३ । खलियस्स जिंदणा ४ वणतिगिच्छ ५ गुणधारणा ६ चेव ॥१॥ [अनुयोग. पत्रं ४३-१] अधिकारगाथा। एतदनुसारेण आवश्यकपिण्डार्थों वक्तव्यः । “से त"मित्यादि तदेतदावश्यकम् ।। ८२, से किं तं आवस्सयवइरित्तं ? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालियं च उकालियं च। ८२. से किं तमित्यादि । अथ किं तदावश्यकव्यतिरिक्तम् ? । आवश्यकव्यतिरिक्तं द्विविधं प्रज्ञप्तम् , 15 तद्यथा-कालिकं चोत्कालिकं च । यदिह दिवस-निशिप्रथम-पश्चिमपौरुपीद्वय एव पठ्यते तत् कालेन निर्वृत्तं कालि- कम् । यत् पुनः कालवेलावर्ज पठ्यते तदुत्कालिकम् ।। तत्राल्पतरवक्तव्यखादुत्कालिकमधिकृत्य प्रश्नसूत्रमाह ८३. से किं तं उकालियं ? उक्कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-दसवेयालियं १ कप्पियाकप्पियं २ चुलकप्पसुतं ३ महाकप्पसुतं ४ ओवाइयं ५ रायपसेणियं ६ जीवाभिगमो ७ पण्णवणा ८ महापण्णवणा ९ पमायप्पमादं १० नंदी ११ अणुओगदाराई १२ देविदत्थओ 20 १३ तंदुलवेयालियं १४ चंदावेज्झयं १५ सुरपण्णत्ती १६ पोरिसिमंडलं १७ मंडलप्पवेसो १८ विज्जाचरणविणिच्छओ १९ गणिविज्जा २० झाणविभत्ती २१ मरणविभत्ती २२ आयवि- सोही २३ वीयरायसुतं २४ संलेहणासुतं २५ विहारकप्पो २६ चरणविही २७ आउरपञ्चक्खाणं २८ महापचक्खाणं २९ । से तं उकालियं । ८३. से किं तमित्यादि । अथ किं तदुत्कालिकम् ? । उत्कालिकमनेकविधं प्रज्ञप्तम् , तद्यथा-दशवैकालिक 25 प्रतीतम् १ । कल्पा-ऽकल्पप्रतिपादक कल्पाकल्पम् २ । तथा कल्पनं कल्पः-स्थविरकल्पादिः, तत्प्रतिपादकं श्रुतं कल्पश्रुतम् , तत् पुनर्दिभेदम्-चुल्लकप्पसुयं महाकप्पसुयं, एकमल्पग्रन्थमल्पार्थ च, द्वितीयं महाग्रन्थं महार्थं च ३।४। शेपभेदाःप्रायो निगदसिद्धास्तथापि लेशतोऽप्रसिद्धतरान् व्याख्यास्यामः-जीवादीनां प्रज्ञापनं प्रज्ञापना ८। वृहत्तरा महाप्रज्ञापना ९ । प्रमादा-ऽप्रमादस्वरूप-भेद-फल-विपाक-प्रतिपादकमध्ययनं प्रमादाप्रमादम् । प्रमा- । .
. ७१ [ ] अनङ्गप्रविष्टोत्कालिकश्रुतज्ञानम् ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । दस्वरूपं महाकर्मेन्धनप्रभवाविध्यातदुःखानलज्वालाकलापपरीतमशेषमेव संसारवासगृहं पश्यंस्तन्मध्यवर्त्यपि सति तन्निर्गमनोपाये वीतरागमणीतधर्मचिन्तामणौ यतो विचित्रकर्मोदयसाचिव्यजनितात् परिणामविशेषादपश्यन्निव तद्भयमविगणय्य विशिष्टपरलोकक्रियाविमुख एवाऽऽस्ते सत्त्वः स खलु प्रमाद इति । तद्भेदाः मद्यादयः, तत्का- रणत्वात् । उक्तं च- मज्जं विसय कसाया णिदा विगहा य पंचमी भणिया। एए पंच पमाया जीवं पाडंति संसारे ॥१॥ एतस्य च पञ्चप्रकारस्यापि प्रमादस्य फलविपाको दारुणः । उक्तं च- श्रेयो विपमुपभोक्तुं क्षमं भवेत् क्रीडितुं हुताशेन । संसारवन्धनगन तु प्रमादः क्षमः कर्तुम् ॥१॥ अस्यामेव हि जातौ नरमुपहन्याद् विपं हुताशो वा । आसेवितः प्रमादो हन्याजन्मान्तरशतानि ॥२॥ यन्न प्रयान्ति पुरुषाः स्वर्ग, यच्च प्रयान्ति विनिपातम् । तत्र निमित्तमनार्यः प्रमाद इति निश्चितमिदं मे ॥३॥ 10 संसारबन्धनगतो जाति-जरा-व्याधि-मरणदुःखार्तः । यनोद्विजते सत्त्वः स ह्यपराधः प्रमादस्य ॥४॥ आज्ञाप्यते यदवशः तुल्योदर-पाणि-पाद-वदनेन । कर्म च करोति बहुविधमेतदपि फलं प्रमादस्य ।।५।। इह हि प्रमत्तमनसः सोन्मादवदनिभृतेन्द्रियाश्चपलाः । यत् कृत्यं तदकृत्वा सततमकार्येष्वभिपतन्ति ॥६॥ तेपामभिपतितानामुद्भान्तानां प्रमत्तहृदयानाम् । वर्द्धन्त एव दोपाः वनतरव इवाम्बुसेकेन ॥७॥ दृष्ट्वाऽप्यालोकं नैव विश्रम्भितव्य, तीरं नीताऽपि भ्राम्यते वायुना नौः । लब्ध्वा वैराग्य भ्रष्टयोगः प्रमादाचित्रं व्यावृत्तो ब्रह्मदत्तो नरेशः ।।८॥ [ ] इत्यादि। एवं प्रतिपक्षद्वारेणाप्रमादस्वरूपादयो वाच्या इति १० । “नंदी"त्यादि सुगमम् । सूर्यप्रज्ञप्तिः सूर्यचरित- प्रज्ञापनं यस्यां ग्रन्थपद्धतौ सा सूर्यप्रज्ञप्तिः १६ । पौरुषीमण्डलं पुरुषः-शङ्कुः शरीरं वा, तस्मान्निष्पना पौरुपी। इयमत्र भावना-यदा सर्वस्य वस्तुनः स्वप्रमाणा छायोपजायते तदा पौरुपीति, एतच पौरुपीमानं उत्तरायणान्ते दक्षिणायनादौ चैकं दिनं भवति, तत अर्ध्वमङ्गुलस्याप्टावेकपष्टिभागा दक्षिणायने वर्द्धन्ते उत्तरायणे च इसन्तीति, 20 एवं यत्र पौरुपी मण्डले मण्डलेऽन्याऽन्या प्रतिपाद्यते तदध्ययनं पौरुपीमण्डलम् १७ । मण्डलप्रवेशः यत्र हि चन्द्र-सूर्ययोर्दक्षिणोत्तरेषु मण्डलेषु मण्डलान्मण्डलमवेशो व्यावयेते तदध्ययनं मण्डलप्रवेश इति १८ । विद्या- चरणविनिश्चयः विद्येति-ज्ञानम्, तच्च दर्शनसहचरितम्, अन्यथा ज्ञानाभावात्, चरणं-चारित्रम्, एतेषां फल- विनिश्चयप्रतिपादको ग्रन्थः विद्याचरणविनिश्चय इति १९ । 'गणिविद्या' गुणगणोऽस्यास्तीति गणी, स चाऽऽचार्यः, तस्य विद्या-ज्ञानं गणिविद्या, तत्राविशेषेऽप्ययं विशेपः- जोतिस-णिमित्तणाणं गणिणो पचावणादिकज्जेन्ट । उपयुज्नइ तिहि-करणादिजाणणदृऽनहा दोसो ॥१॥ [ ]२०॥ ध्यानविभक्तिः ध्यानानि-आध्यानादीनि, तेषां विभजनं यस्यां ग्रन्यपद्धतीसा ध्यानविभक्तिः २१ ॥ मरणानि-प्राणत्यागलक्षणानि अनुसमयादीनि वर्तन्ते, यथोक्तम्-"अणुसमयं संतरं चे"त्यादि, एनेपां विमननं यस्यां सा मरणविभक्तिः २२ । आत्मनः-जीवस्याऽऽलोचना-प्रायश्चित्तमतिपत्यादिप्रकारेण विशृद्धिः-कर्मविगमलक्षणा 30 15 25 ७२ श्रीहरिभद्रसूरिसूनितया त्या सगलातं [ग. ८१.८५. प्रतिपाद्यते यत्र तदध्ययनं आत्मविशुद्धिः २३। वीतरागश्रुतं सरागगपोहेन पीनरागस्वरूपं प्रतिपाद्यने यत्राध्ययने तद् वीतरागश्रुतम् २४ । संलेखनाश्रुतं द्रव्य-भावसंलेखना प्रतिपावते यत्र तदध्ययनं संलेखना- श्रुतम् । तत्र द्रव्यसंलेखनोत्सर्गतः- चत्तारि विचित्ताई विगतीणिज्जूहियाई चत्तारि । संवच्छरे य दोन्नि उ एगंतरियं च आयामं ॥१॥ णातिविगिट्टो य तवो छम्मासे परिमियं च आयामं । अन्ने वि य छम्मासे होति विगि, नवोकम्मं ।।२।। वासं कोडीसहियं आयामं काउमाणुपुबीए । गिरिकंदरं तु गंतुं पादवगमणं अह करेति ।।३।। [ भावसंलेखना तु क्रोधादिकपायप्रतिपक्षाभ्यास इति २५ । विहारकल्पः विहरणं विहारः, तस्य कल्पः- व्यवस्था स्थविरकल्पादीनामुच्यते यत्र ग्रन्थेऽसौ विहारकल्पः २६। चरणविधिः चरणं-व्रतादि, तथा चोक्तम्- 10 "वय समणधम्म०" गाहा [ओवनि. भा. गा. २ ], एतत्मतिपादकमध्ययनं चरणविधिः २७ । आतुरप्रत्या- ख्यानं आतुरः-क्रियातीतो ग्लानः, तस्य प्रत्याख्यानम् । एत्थ विधी-गिलाणं किरियातीतं गाउं गीयत्था पञ्चक्खावेंति दिणे दिणे दव्वहासं करेन्ता सन्तः, अंते य सबदव्यदायणयाए भत्ते बेरगंजणेत्ता भत्ते णित्तहस्स भवचरिमपञ्चक्खाणं कारेंति, एयं जत्थ अज्झयणे सवित्थरं वणिज्जति तदज्झयणं आउरपचक्खाणं २८ । महा प्रत्याख्यानं महच्च तत् प्रत्याख्यानं चेति समासः, एसित्थ भावत्यो थेरकप्पेण जिणकप्पेण वा विहरेत्ता अंते 15 थेरकप्पिया वारस वासे संलेहं करेत्ता जिणकप्पिया पुण विहारेणेव संलीढा तहा वि जहाजुत्तं संलेहं करेत्ता निव्याघातं सचेट्टा चेव भवचरिमं पञ्चक्खंति, एयं सवित्थरं जत्थऽझयणे वणिजइ तमझयणं महापञ्चक्खाणं २९ । एयाणि अज्झयणाणि जहा अभिधाणत्याणि तहा वण्णियाणि । “से त"मित्यादि निगमनम्, तदेतदुत्कालिकम् । उपलक्षणं चैतदित्युक्तमुत्कालिकम् ।। ८४. से किं तं कालियं ? कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-उत्तरज्झयणाई ? 20 दसाओ २ कप्पो ३ ववहारो ४ णिसीहं ५ महाणिसीहं ६ इसिभासियाई ७ जंबुद्दीवपणत्ती ८ दीवसागरपण्णत्ती ९ चंदपण्णत्ती १० खुड्डियाविमाणपविभत्ती ११ महल्लियाविमाणपविभत्ती १२ अंगचूलिया १३ वग्गचूलिया १४ विवाहचूलिया १५ अरुणोववाए १६ वरुणविवाए १७ गस्लोववाए १८ धरणोववाए १९ वेसमणोववाए २० देविंदोववाए २१ वेलंधरोववाए २२ उट्ठाणसुयं २३ समुट्ठाणसुयं २४ नागपरियावणियाओ २५ निरयावलियाओ २६ कप्पि- 25 याओ २७ कप्पवडिसियाओ २८ पुफियाओ २९ पुष्पचूलियाओ ३० वण्हीदसाओ ३१ । ८४. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् कालिकम् ? । कालिकमनेकविधं प्रज्ञप्तम् । तद्यथा-उत्तराध्ययनानि उत्तराणि-प्रधानानि रूढया चोत्तराध्ययनानि १ । दशेत्यादि प्रायो निगदसिद्धम् । निशीथवद् निशीथम, इदं प्रतीनमेव ५ । अस्मादेव ग्रन्या-र्याभ्यां महत्तरं महानिशीथम् ६ । जम्वृद्धीपप्रज्ञप्तिः ८ । इहाऽऽयलिकाप्रविष्टे- तरविमानप्रविभजनं यत्राध्ययने नद् विमानप्रबिभक्तिः, तचैकमल्पग्रन्थार्थ तथाऽन्यन्महाग्रन्थार्थम् अतः 39 क्षुल्लियाविमान विभक्तिर्महीविमानप्रविभक्तिरिति ११ । १२ । अनचालका- अगस्य-आचारादे- कालिकश्रुतज्ञानं प्रकीर्णकानि च] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । . ७३ शूलिका अङ्गचूलिका, यथाऽऽचारस्यानेकविधा । इहोक्ता-ऽनुक्तार्थसङ्ग्रहात्मिका चूलिका १३ । वर्गचूलिका इह वर्गः-अध्ययनादिसमूहः, यथाऽन्तकृदशास्वष्ट वर्गा इत्यादि, तेषां चूलिका वर्गचूलिका १४ । व्याख्या-भगव- तीति, अस्यालिका व्याख्याचूलिका १५ । अरुणोपपातः इहारुणो नाम देवत्तत्समयनिबद्धो ग्रन्थस्तदुपपा- तहेतुः अरुणोपपातः, जाहे तमझयणं उवउत्ते समाणे समणे परियट्रेति ताहे से अरुणे देवे समयनिवद्धत्तणओ चलियासणे संभमुभंतलोयणे पउत्तावही दियाणियढे हट्टपहढे चल-चवलकुंडलधरे दिव्याए जुतीए दिबाए विभू- ईए दिवाए गतीए जेणामेव से भगवं समणे तेणामेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता भत्तिभरोणयवयणे विमुक्कवर- कुमुमवासे ओवयति, ओवतित्ता ताहे से समणस्स पुरतो ठिचा अंतद्धिए कयंजलिए उवउत्ते संवेगविसुज्झमाण- ज्झवसाणे सुणेमाणे चिट्ठइ, समत्ते य भणइ-सुसज्झाइयं मुसझाइयं, वरं वरेहि त्ति, ततो से इहलोगणिप्पिवासे सम- तिण-मणि-मुत्ता-लेट्ठ-कंचणे सिद्धिवधूणिमराणुरायचित्ते समणे पडिभणइ-ण मे वरेण अट्ठो त्ति, ततो से अरुणे देवे अधिगतरजातसंवेगे पयाहिणं करेत्ता वंदित्ता णमंसित्ता पडिगच्छइ १६ । एवं वरुणोववादादिमु वि भाणि- 1 यव्यं । उत्थानश्रुतं अध्ययनम् , तं पुण सिंगणाइयकज्जेमु जस्सेगकुलस्स वा गामस्स वा जाव रायहाणीए वा स चेव समणे कयसंझप्पे आसुरुत्ते अप्पसम्ने अप्पसन्नलेसे विसमासणत्थे उवउत्ते समाणे उहाणमुअज्झयणं परियट्रेति एकं दो तिनि वा वारे, ताहे से कुले वा गामे वा जाव रायहाणी वा ओहयमणसंकप्पे विलवंते दुयं दुयं पहावंते उद्वेति, उबसति त्ति वुत्तं भवति २३ । तथा समुत्थानश्रुतं अध्ययनम् , तं पुण समत्ते कजे तस्सेव कुलस्स वा गामस्स वा जाव रायहाणीए वा स चेव समणे कयसंकप्पे तुढे पसण्णे पसण्णलेसे सममुहासणत्थे उवउत्ते समाण 1 समुद्राणमुतज्झयणं परियट्रेति एवं दो तिन्नि वा वारे, ताहे से कुले वा जाव रायहाणी वा पहढचित्ते पसन्नमण कलयलं कुणमाणे मंदार गतीए सललियं आगच्छइ, आगच्छित्ता समुद्रेति, आवासेति त्ति वुत्तं भवतीत्यर्थः, पत्रं कयसंकप्पस्स परियट्टेन्तस्स पुन्बुट्टितं समुद्वेति २४ । णागपरियारणियाओ नागपरिज्ञा, नाग त्ति-नागछमात तस्समयणिबद्धमज्झयणं, से जया समणे उवउत्ते परियति तदाऽकयसंकप्पस्स वि ते णागकुमारा तत्यन्या तं समणं परियाणंति वदति नमसंति बहुमाणं च करेंति, सिंगणादियकज्जेनु य वरदा भवन्तीत्यर्थः २५ यावलियाओ जानु आवलियपविटेतरे यणिरया तन्मामिणो य गर-तिरिया पसंगो पनि कप्पियाउ ति सौधर्मादिकल्पगतवक्तव्यतागोचरा ग्रन्थपद्धतयः कल्पिका उच्यन्ते २७ 1 एवं का सिकाः सोधम्मीसाणकप्पेमु जाणि कप्पविमाणाणि ताणि कप्परसियाणि, तेमु य देवांना -- विसेसेण उदबन्ना इढि च पत्ता एवं वन्निज्जति जासु ताओ कप्परडेंसियाओ बुचंति २८ 1 2 त्ति इह चालु ग्रन्थपद्धतिषु गृहवासमुकुलनपरित्यागेन पाणिनः संयमभावपुप्पिनाः मुखिनाः, ॐ रित्यागतो दुःखावाप्तिमुकुलिताः, पुनस्तत्परित्यागादेव पुष्पिताः मतिपाद्यन्ते ताः पुष्पिना : कृतार्थविशेषप्रतिपादिकास्तु पुष्पचूला इति ३० । तथा अन्धकवृष्धिनराधिपवक्तव्यताविप उच्यन्ते ३१ ॥ ८५. एवमाइयाई चउरासीतीपइण्णासहस्साई भगवतो अरहओनिकल यरस्स, तहा संखेज्जाणि एइण्णगसहस्साणि मझिमगाणं जिण स्माणि भगवओ वद्धमाणमामिम्न । अह्मा जस्म जनिया मिमा कम्मयाए पारिणामियाए वउबिहाए बुद्धीए उववेचा तस्म ननि टी०१० ७४ श्रीहरिमा नरित्रितया बसा राग बुद्धा वि तत्तिया चेव । से तं कालियं । से तं आवस्सयवहरितं । से तं अणंगपविहं । ८५. एवसाइयाई इत्यादि । “एवमादीनि' सर्वथा कियन्त्याग्यास्यन्ने ? गरीतिप्रकीर्णकराहमाणि भगवतोऽर्हतः श्रीपमस्याऽऽदितीर्थकरस्य, तथा समव्येयानि प्रकीर्णकसामाणि मध्यमानां-अजितादीनां पानपर्यन्तानां जिनवराणाम्, तीर्थकराणामित्यर्थः, एतानि च यावन्ति तानि प्रथगानुगोगतोऽवसेवानि, तथा नतुर्दश प्रकीर्णकसह- 5 स्राणि अर्हतः, कस्य ?, वर्द्धमानस्वामिनः । अयमत्र भावार्थः-भगवतो उसहस्स चउराशीति समणसाहसीतो होत्या, पयन्नगज्झयणाणि य सयाणि कालिय-उकालियाणं चउरासीतिसहस्साणि । कथम् ? यतो ताणि चउरासीति- समणसहस्साणि अरहंतमग्गोबदिढे जं सुयमणुसरित्ता किचि णिज्जूहंते ताणि सव्वाणि पतिनगाणि, अहवा मुयमणु- सारतो अप्पणो वयणकोसल्लेण ज धम्मदेसणादिमु भासते तं सव्वं पइम्नगं । जम्हा अणंतगम-पज्जवं मुत्तं दिखें, तं च वयणं णियमा अन्नयरगमाणुवाती, तम्हा तं पइन्नगं । एवं चउरासीतिपइन्नगसहस्साणि भवंतीत्यर्थः । एएण 10 विहिणा मज्झिमतित्थगराणं संखेज्जाइं पइन्नगसहस्साणि । समणस्स वि भगवओ महावीरस्स जम्हा चोदस समण- साहस्सीओ उक्कोसिया समणसंपया तम्हा चोदस पइनगझयणसहस्साणि भवंति । एत्य पुण पगे आयरिया एवं पन्नविति-किल एतं चुलसीइसहस्सादिगं उसभादिजिणवराणं समणपरिमाणं पहाणमुत्तणिज्जूहणसमत्थसमणे पडुच भणियं, सामन्नसमणा पुण बहुतरा तकाले । अन्ने भणंति-उसभादीणं भवत्थाणं संचराणं एतं चुलसीतिसहस्सादिगं पमाणं, पवाहेण पुणो एगतित्थेसु बहुगा दहव्या, तत्थ जे पमाणभूयमुत्तणिज्जूहणसमत्था अन्नकालिगा वि ते एत्थ 15 अहिगया, एए ते सुप्पसिद्धप्पइन्नगणिज्जूहगा चेव दट्ठव्या । यत आह- "अथवे"त्यादि, 'अथवा' इति प्रकारान्तर- प्रदर्शनम्, यस्य ऋषभादेस्तीर्थकृतः यावन्तः शिष्या औत्पत्तिक्या वैनयिक्या कर्मजया पारिणामिक्या च चतुर्विधया बुद्धया उपपेताः-समन्विताः तस्य तांवन्त्येव प्रकीर्णकसहस्राणि, प्रत्येकबुद्धा अपि तावन्त एव । अत्रैके व्याचक्षते- किल प्रत्येकबुद्धदृब्धान्येव तान्यवगन्तव्यानि, प्रकीर्णकप्रमाणेन प्रत्येकबुद्धप्रमाणप्रतिपादनात् । स्यादेतत्, प्रत्येकबुद्धानां शिष्यभावो विरुध्यत इति, एतदप्यसत्, तेपां प्रत्येकबुद्धत्वादाचार्यमेवाधिकृत्य शिष्यभावस्य निपि- 20 द्धत्वात्, तीर्थकरमणीतशासनप्रतिपन्नत्वेन तु तच्छिष्यभावो न विरुध्यत इति । अन्ये पुनरित्थमभिदधति सामान्येनेह प्रकीर्णकैस्तुल्यत्वात् प्रत्येकबुद्धानामत्राभिधानम्, न तु नियोगतः प्रत्येकबुद्धब्धानि प्रकीर्णकानीत्यलं विस्तरेण । "से त"मित्यादि, तदेतत् कालिकम्, तदेसदावश्यकव्यतिरिक्तम्, तदेतदनगप्रविष्टमिति ।। ८६. से किं तं अंगपविढं ? अंगपविट्ठ दुवालसविहं पण्णत्तं, तं जहा-आयारो १ सूय- गडो २ ठाणं ३ समवाओ४ वियाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ७ अंतगड- 25 दसाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिहिवाओ १२ ८६. से किं तमित्यादि । अथ किं तदङ्गप्रविष्टम् ?, अङ्गप्रविष्टं द्वादशविधं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-आचारः सूत्रकृतमित्यादि । ८७. से किं तं आयारे ? आयारेणं समणाणं णिग्गंथाणं आयार-गोयर-विणय-वेणइय- सिक्खा-भासा-अभासा-चरण-करण-जाया-माया-वित्तीओ आघविज्जंति । से समासओ पंच- 20 विहे पण्णत्ते, तं जहा-णाणायारे १ दंसणायारे २ चरित्तायारे ३ तवायारे ४ वीरियायारे ५ । आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, ३ بسا अङ्गप्रविष्टश्रुतज्ञानं आचाराङ्गं च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्वंधा, पणुवीसं अज्झयणा, पंचासीती उद्देसणकाला, पंचासीती समुद्देसणकाला, अट्ठा- रस पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अगंता थावरा | सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्ण- विज्जति परूविज्जंति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवंनाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं आयारे १ । ८७. से किं तमित्यादि। अथ किं तदाचारवस्तु ?, यद्वा अथ कोऽयमाचारः ?। आचरणमाचारः, आचर्यत इति वा आचारः, शिष्टाचरितो ज्ञानाधासेवनविधिरिति भावार्थः, तत्पतिपादको ग्रन्थोऽप्याचार एवोच्यते । अनेन चाऽऽचारेण करणभूतेन श्रमणानामाचारादि आख्यायत इति योगः। अथवा आचारे "ण". मिति वाक्यालङ्कारे 'श्रमणानां' प्राग्निरूपितशब्दार्थानां 'निर्ग्रन्थानां' वाह्या-ऽभ्यन्तरग्रन्थरहितानाम्, आह-श्रमणा 10 निर्ग्रन्था एव भवन्ति विशेषणं किमर्थम् ?, उच्यते, शाक्यादिव्यवच्छेदार्थम् । उक्तं च-"निग्गंथ सक तावस गेरुय आजीव पंचहा समणा।" [पिण्डनि. गा. ४४५] तत्राऽऽचारः-ज्ञानाद्यनेकभेदभिन्नः, गोचरः-भिक्षाग्रहणविधि- लक्षणः, विनयः-ज्ञानादि, वैनयिक-फलं कर्मक्षयादि, शिक्षा ग्रहणा-ऽऽसेवनाभेदभिन्ना, विनेयशिक्षेत्यन्ये, विनेयः-शिष्यः, भापा-सत्या १ असत्यामृपा २ च, अभापा-असत्या १ सत्यामृपा २ च, चरणं-व्रतादि, करणं- पिण्डविशुद्धयादि, “जाता-माता-वित्तीओ" त्ति यात्रा-संयमयात्रा, मात्रा तदर्थमेवाहारमात्रा, वर्तनं वृत्तिः विवि- 15 धैरभिग्रहविशेपैरिति, आचारश्च गोचरश्वेत्यादि द्वन्द्वः क्रियते, ततश्वाऽऽचार-गोचर-विनय-चैनयिक-शिक्षा-भाषा- ऽभापा-चरण-करण-यात्रा-मात्रा-वृत्तय आख्यायन्ते । इह च यत्र क्वचिदन्यतरोपादाने अन्यतरगतार्थाभिधानं तत् सर्व तत्माधान्यख्यापनार्थमेवावसेयम् । “से समासतो" इत्यादि, 'सः' आचारः 'समासतः सङ्क्षेपतः पञ्चविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-ज्ञानाचार इत्यादि । तत्र ज्ञानाचारः- काले १ विणए २ बहुमाणे ३ उवहाणे ४ तहा अनिण्हवणे ४ । वंजण ६ अत्थ ७ तदुभए ८ अविदो णागमायारो ॥१॥ [दशावे. नि. गा. १८६] दर्शनाचारः- णिस्संकिय १ णिकंखिय २ णिबितिगिच्छा ३ अमृढदिट्टी ४ य । उबवृह ५ थिरीकरणे ६ वच्छल्ल ७ पभावणे ८ अट्ठ ॥२॥ [दशवे. नि. गा. १८४] अतिसेस १ इहि २ आयरिय ३ वादि ४ थम्मकधि ५ खमग ६ मिनी ७ । विज्जा राया-गणसम्मया ८ य तित्थं पभाति ॥३॥ [निशीथमा. गा. ३३) चारित्राचारः- पणिहाणजोगजुत्तो पंचहिं समितीहि तिहि य गुनीहि । एस चरित्तायारो अविहो होति नायव्यो || दिटावं. नि. गा. १८७] तपाचार:- पारसबिम्मि वि तवे सम्भिनर बाहिर निणुवन्।ि अगिलाए अणाजीवी पायचो सो तायारा ।। दिशदे. नि. पा. १८८ 20 - श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया गत्या सगलयात सु. ८७.८८ 15 वीर्याचार:- अणिगृहियवल-विरिओ परकमइ जो जहुत्तमाउत्तो । गँजति य जहाथाम णायचो वीरियायारो ॥६॥ [दा. नि. गा. १८९] "आयारे णं परित्ता वायणा" आचारे "ण"मिति वाक्यालणारे 'परित्ता' सगेगा, आधन्तोपलव्धे- 5 रनन्ता न भवन्तीत्यर्थः, काः ?, 'वाचनाः' सूत्रा-ऽर्थप्रदानलक्षणाः, अवसर्पिणीकालं वा प्रतीत्य "परित्त" ति । सङ्ख्येयानि 'अनुयोगद्वाराणि' उपक्रमादीनि, अध्ययनानामेव सङ्ख्येयत्वात् प्रज्ञापकवचनगोचरत्वात् । “संखे- ज्जा वेढा" 'वेढाः छन्दोविशेपाः। “संखेजा सिलोगा" श्लोकाः' प्रतीता अनुष्टुप्छन्दसा। "संखेजाओ णिज्जुत्तीओ" निर्युक्तानां युक्तिनियुक्तयुक्तिरिति वाच्ये युक्तशब्दलोपान्नियुक्तिरिति, एताव निक्षेपनियुक्त्याद्याः सङ्ख्येया इति । “संखेजाओ पडिवत्तीओ" द्रव्यादिपदार्थाभ्युपगमाः प्रतिपत्तयः, प्रतिमाघभिग्रहविशेषा वा । 10 “से ण"मित्यादि 'सः' आचारः “ण"मिति वाक्यालङ्कारे 'अङ्गार्थतया' अङ्गार्थत्वेन, अर्थग्रहणं परलोकचिन्तां प्रति सूत्रादर्थस्य गरीयस्त्वख्यापनार्थम् , सूत्रार्थोभयरूपो वाऽयमिति ख्यापनार्थम् , प्रथममङ्गम् , स्थापनामधिक- त्याऽऽद्यमङ्गमित्यर्थः । द्वौ 'श्रुतस्कन्धौ' अध्ययनसमुदायलक्षणौ । पञ्चविंशतिरध्ययनानि, तद्यथा- सत्थपरिन्ना १ लोगविजयो य २ सीतोसणिज्ज ३ सम्मत्तं ४ । आवंति ५ धुअ ६ विमोहो ७ महापरिन्नोटबहाणसुयं ९ ॥१॥ पढमो सुयक्खंधो ।। पिंढेसण १ सेजिररिया ३ भासज्जाया य ४ वत्थ ५ पाएसा ६। उग्गहपडिमा ७ सत्त य सत्तिकया १४ भावण १६ विमुत्ती १६ ॥२॥ [आवश्यकसङ्ग्रहणी. हारि. वृत्ति पत्र ६६०-१] एवमेतानि निशीथवर्जानि पञ्चविंशतिरध्ययनानि । तथा पञ्चाशीत्युद्देशनकालाः, कथम् ? उच्यते, अङ्गस्य श्रुतस्कन्धस्याध्ययनस्योद्देशकस्य च एतेषां चतुर्णामप्येक एव, एवं सत्यपरिन्नाए सत्त उद्देसणकाला ७, लोग- 20 विजयस्स छ फा, सीओसणिज्जस्स चउरो ट्क, सम्मत्तस्स चउरो ट्क, लोगसारस्स छ पुँ, धुतस्स पंच ना, विमोहज्झयणस्स अट्ठ इ, महापरिन्नाए सत्त ग्र, उपहाणसुतस्स चउरो टक, पिंडेसणाए एकारस ११, सेजाए तिन्नि ३, इरियाए तिम्नि ३, भासज्जाए दोन्नि २, वत्थेसणाए दोन्नि २, पाएसणाए दोन्नि २, उग्गहपडिमाए दोन्नि २, सत्तिक्कयाए सत्त ७, भावणाए एको १, विमोत्तीए एक्को १, एवमेए संपिडिया पंचासीई भवन्ति । एत्थ संगहगाहा- सत्त य छ चउ चउरो छ पंच अहेव सत्त चउरो य । एकार ति ति य दो दो दो दो सत्तेक एको य ॥१॥ एवं समुद्देसणकाला वि भाणियव्वा । अष्टादश पदसहस्राणि पदाग्रेण, इह यत्रार्थोपलब्धिस्तत् पदम् । चोदक आह-जदि दो मुतखंधा पणुवीसं अज्झयणाणि अट्ठारस पदसहस्साणि पदग्गेणं भवन्ति तो जं भणिय "णव वंभ- चेरमइओ अट्ठारसपदसहस्सिओ वेओ।" [आचा. नि. गा. ११] ति एयं विरुज्झइ ? आचार्य आह-णणु एत्थ भणियं "वड़ य सपंचचूलो बहु बहुअयरो पयग्गेणं ॥" [आचा. नि. गा. ११] ति, इह मुत्तालावयपदेहिं सहितो 30 वह बहुयरो य वक्तव्य इत्यर्थः, अथवा दो मुयक्खंधा पणुवीसं अज्झयणाणि एयं आयारग्गसहितस्स आयारस्स पमाणं भणियं, अवारस पयसहस्साणि पुण पढममुयक्संधस्स णववंभचेरमतियम्स पमाणं, विचित्तत्यवद्धाणि य मुत्ताणि, गुरूबदेसतो तेसि अत्यो जागियो । “संखेजा अक्खरा" सङ्ख्येयान्यक्षराणि, वेढादीनां सङ्ख्येयत्वात् । 25 Ir ७७ ते . सूत्रकृताङ्गम् ]] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । "अणंता गमा" इह गमा अर्थगमा गृह्यन्ते, अर्थपरिच्छेदा इत्यर्थः, ते चानन्ताः, एकस्मादेव सूत्रात् तत्तद्धर्म- विशिष्टानन्तधर्मात्मकवस्तुप्रतिपत्तेः । अन्ये तु व्याचक्षते-अभिधाना-ऽभिधेयवशतो गमा इति, ते चानन्ताः, पुनरनेन विधिना अवसेयाः, तद्यथा-मुयं मे आउसं ! तेणं भगवया. आउसंतेणं भगवया, सुयं मे आउसंपदा, सुयं मे आउसं तहिं, मुयं मे आउसं, आउसं सुयं मे, आंसुयं मया, तं सुयं मया, आ तया सुयं मया, आ तहिं मुयं मया आ, एवमादिभिर्भण्यमानं किलानन्तगममिति । "अणंता पजवा" स्व-परभेदाभिन्नाः अक्षरार्थपर्याया इत्यर्थः । “परित्ता तसा" त्रस्यन्तीति 'त्रसाः' द्वीन्द्रियादयस्ते च परित्ताः । “अणंता थावरा" वनस्पतिकायसहिताः परिगृह्यन्ते । “सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइय" त्ति शाश्वता द्रव्यार्थतयाऽविच्छेदेन प्रवृत्तेः, कृताः पर्यायार्थतया प्रति- समयमन्यखावाप्तेः, निबद्धाः सूत्र एव, निकाचिता नियुक्ति-सङ्ग्रहणि-हेतूदाहरणादिभिः। "जिणपन्नत्ता" जिनैः प्रज्ञप्ताः 'भावाः' पदार्थाः "आपविजंती"त्यादि ध्रुवगण्डिका पूर्ववत् । साम्प्रतमाचाराङ्गग्रहणफलप्रतिपादनायाऽऽह- "से एव"मित्यादि, 'सः' इत्याचाराजग्राहकोऽभिसम्बध्यते, “एवंआय" त्ति अस्मिन् भावतः सम्यगधीते सति 10 एवमात्मा भवति, तदुक्तक्रियापरिणामात्माव्यतिरेकात् स एव भवतीत्यर्थः । एवं क्रियासारमेव ज्ञानमिति ख्या- पनार्थ क्रियापरिणाममभिधायाधुना ज्ञानमधिकृत्याह-"एवंणाय" त्ति इदमधीत्य एवंज्ञाता भवति यथैवेहोक्तमिति । "एवंविनाय"त्ति एवं विविधो विशिष्टो वा ज्ञाता विज्ञाता एवंविज्ञाता भवति, तन्त्रान्तरीयज्ञातृभ्यः प्रधानतर इत्यर्थः । एवं चरण-करणपरूवणया आघविज्जतीत्यादि । निगमनवाक्यं भावितार्थमेव ।। ८८. से किं तं सूयगडे ? सूयगडेणं लोए सूइज्जइ, अलोए सूइज्जइ, लोया-ऽलोए is सूइज्जइ, जीवा सूइज्जति, अजीवा सूइज्जति, जीवा-ऽजीवा सूइज्जंति, ससमए सूइज्जइ, परसमए सूइज्जइ, ससमय-परसमए सूइज्जइ । सूयगडे णं आसीतस्स किरियावादिसयस्स, चउरासीईए अकिरियवादीणं, सत्तट्ठीए अण्णाणियवादीणं, बत्तीसाए वेणइयवादीणं, तिण्हं तेसवाणं पावाद्यसयाणं वूहं किच्चा ससमए ठाविज्जइ । सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ 20 पडिवत्तीओ । से णं अंगट्ठयाए विइए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तेत्तीसं उद्देसणकाला, तेत्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पदसहस्साणि पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आपविजंति पण्णविज्जति परविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उव- दंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपस्वणा आघविज्जइ । 25 से तं सूयगडे २। ८८. से किं तं मृयगडे ? । “सूच सूचायाम् [ सूचनान् मूत्रम्, मूत्रेण कृतं मूत्रकृतं रुढचाच्यते । तत्र लोक्यते अनेन वाऽम्मिन् वा लोकः। सूच्यत इत्यादि निगदमिदं यावत् 'आसीतम्म किरिया- वादिसतस्स अशीत्यधिकम्य क्रियावादिशतस्य व्यहं कृत्वा स्वसमयः स्थाप्यत इति योगः। एवं पपदेष्यपि किया योजनीति । तुत्र न कर्तारं विना क्रियासम्भव इति नामान्मममवायिनों वदन्ति ये नन्छीलाय ने 30 ।
७८ " 10 - श्रीभिहसूरिभितया या सगरमान म. ८९.९० क्रियावादिनः। ते पुनरात्माघस्तिवमतिपत्तिलक्षणा असुनोपायेनाशीत्यधिकशनरावग्गा गिरोयाः-जीना-जीवा- ऽऽ-श्रव-वन्ध-संवर-निर्जरा-पुण्य-पाप-मोक्षाख्यान नव पदार्थान् विरचय्य परिपाटना जीवपदास्यामः मन-परभेदाः पन्यसनीयौ, तयोरधो नित्या-ऽनित्यभेदी, तयोरप्यधः कालेश्वरा-ऽऽत्म-नियति-खभावगेदाः पञ्च न्यसनीयाः, पुनथैवं विकल्पाः कर्त्तव्याः अस्ति जीवः स्वतो नित्यः कालत इत्येको विकल्पः । विकल्पार्थशायम्-विद्यते 5 खल्वात्मा स्वेन रूपेण नित्यश्च कालवादिनः । उक्तेनैवामिलापेन द्वितीयो विकल्प कारकारगिनः, तृतीयो विकल्प आत्मवादिनः “पुरुष एवेदं सर्वम्" [ऋग्वेदमं. इ० सू. ९० ] इत्यादि, नियतिवादिनचतुर्थविकल्पः, पञ्चमविकल्पः स्वभाववादिनः। एवं स्वत इत्यजहता लब्धाः पञ्च विकल्पाः। परत इत्यनेनापि पश्चैव लभ्यन्ते । नित्यखापरित्यागेन चैते दश विकल्पाः। एवमनित्यत्वेनापि दशैव, एते विंशतिर्जीवपदार्थेन लब्धाः, अजीवादिप्वप्यप्टस्वेवमेव प्रतिपदं विंशतिर्विकल्पानाम् , अतो विंशतिर्नब गुणा शतमशीत्युत्तरं क्रियावादिनामिति । 'चउरासीईते अकिरियावादीणं' चतुरशीतेरक्रियाघादिनाम् , क्रिया पूर्ववत् , न हि कस्यचिदनवस्थितस्य पदार्थस्य क्रिया समस्ति, तद्भावे चावस्थितेरभावादित्येवंवादिनोऽक्रियावादिनः । तथा चाऽऽहुरेके- क्षणिकाः सर्वसंस्काराः, अस्थितानां कुतः क्रिया ? । भूतिये॒पां क्रिया सैव, कारकं सैव चोच्यते ॥१॥ ] इत्यादि। एते चाऽऽत्मादिनास्तित्यप्रतिपत्तिलक्षणा असुनोपायेन चतुरणीतिर्द्रष्टव्याः-एतेषां हि पुण्या-ऽपुण्यविवर्जि- 15 तपदार्थसप्तकन्यासस्तथैव, जीवस्याधः स्व-परविकल्पभेदद्वयोपन्यासः, असत्त्वादात्मनो नित्या-ऽनित्यभेदौ न स्तः, कालादीनां तु पञ्चानां पष्ठी यदृच्छा न्यस्यते, पश्चाद् विकल्पाभिलापः-नास्ति जीवः स्वतः कालत इत्येको विक- ल्पः, एवमीश्वरादिभिरपि यदृच्छावसानैः, सर्वे च पड् विकल्पाः । तथा नास्ति जीवः परतः कालत इति पढेव विकल्पाः, एकत्र द्वादश, एवमजीवादिष्वपि पट्मु प्रतिपदं द्वादश विकल्पाः, एवं द्वादश सप्तगुणाश्चतुरशीति- विकल्पा नास्तिकानामिति । 'सत्तट्टीए अन्नाणियवादीणं' ति सप्तपष्टिरज्ञानिकवादिनाम् , क्रिया प्राग्वत् । तत्र कुत्सितं ज्ञानमज्ञानं तदे- पामस्तीत्यज्ञानिकाः । नन्वेवं लघुत्वात् प्रक्रमस्य प्राग् बहुव्रीहिणा भवितव्यम् ततश्चाज्ञाना इति स्यात्, नैप दोपः, ज्ञानान्तरमेवाज्ञानम् , मिथ्यादर्शनसहचरितत्वात् , ततश्च जातिशब्दत्वात् गौरखरवदरण्यमित्यादिवदज्ञानिकत्वमिति । अथवा अज्ञानेन चरन्ति तत्प्रयोजना वा अज्ञानिकाः, असञ्चिन्त्यकृतवन्धवैफल्यादिप्रतिपत्तिलक्षणाः । ते चामुनो- पायेन सप्तपष्टितिव्याः-तत्र जीवादीन् नव पदार्थान् पूर्ववद् व्यवस्थाप्य पर्यन्ते चोत्पत्तिमुपन्यस्याधः सप्त सदा: 25 दयः उपन्यसनीयाः, सत्त्वं १ असत्त्वं २ सदसत्त्वं ३ अवाच्यत्वं ४ सदवाच्यत्वं ५ असदवाच्यत्वं ६ सदसदवाच्य- त्वमिति ७ च, एकैकस्य जीवादेः सप्त सप्त विकल्पाः, त एते नव सप्तकाः त्रिपष्टिः, उत्पत्तेस्तु चत्वार एवाद्या विक- ल्पाः, तद्यथा-सत्त्वमसत्त्वं सदसत्वं अवाच्यत्वं चेति, त्रिपष्टिमध्ये प्रक्षिप्ताः सप्तपष्टिर्भवन्ति । को जानाति जीवः सन् ? इत्येको विकल्पः, ज्ञातेन वा किम् ?, एवं असदादयोऽपि वाच्याः, उत्पत्तिरपि किं सतोऽसतः सदसतोऽ- पाच्यस्य ? इति को वा जानातीत्येतत् ?, न कश्चिदपीत्यभिप्रायः । "वत्तीसाए. वेणइयवादीणं" द्वात्रिंशतो वैनयिकवादिनाम् , क्रिया पूर्ववत् । तत्र विनयेन चरन्ति विनयो वा प्रयोजनमेपामिति वैनयिकाः, एते चानवधृतलिङ्गा-ऽऽचार-शास्त्रा विनयप्रतिपत्तिलक्षणा अमुनोपायेन द्वात्रिंशदवग- न्तव्याः-गर-नृपति-ज्ञाति-यति-स्थविराऽवम-मातृ-पितॄणां प्रत्येकं कायेन वाचा मनसा दानेन च देश-कालोपपन्नेन 20 " ? 30 ७९ स्थानाङ्गं समवायाङ्गं च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । विनयः कार्य इति, एते चत्वारो भेदाः सुरादिष्षष्टम स्थानेषु, एकत्र मेलिता द्वात्रिंशदिति । सर्वसङ्ख्यां प्रति- पादयन्नाह-"तिण्हं तेसट्ठाण"मित्यादि, त्रयाणां त्रिषष्टयधिकानां 'प्रावादुकशतानां' विचित्रैकैकनयमतावलम्विनां प्रवादिशतानामित्यर्थः 'व्यूह' प्रतिक्षेपं कृता 'स्वसमयः' स्वसिद्धान्तः स्थाप्यते । शेपं किञ्चिद् व्याख्यातं किश्चित् सुगममिति यावत् “से तं सूयगडे" त्ति कण्ठयम् २ ॥ ८९. से किं तं गणे? गणेणं जीवा गविज्जति, अजीवा गविज्जति, जोवा-जीवा । गविज्जति, लोए विज्जइ, अलोए विज्जइ, लोया-ऽलोए विज्जइ, ससमए गवि- ज्जइ, परसमए विज्जइ, ससमय-परसमए गविज्जइ । ठाणे णं टंका कूडा सेला सिहरिणो पभारा कुंडाई गुहाओ आगरा दहा णदीओ आघविज्जंति । ठाणे णं एगाइयाए एगुत्तरियाए वुड्डीए दसट्ठाणगविवड्डियाणं भावाणं परवणया आघविज्जति । ठाणे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ निज्जु- 16 तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवतीओ। से णं अंगठ्ठयाए तइए अंगे, एगे सुयक्वंधे, दस अज्झयणा, एकवीसं उद्देसणकाला, एकवीसं समुद्देसणकाला, बावतरि पदसहस्साई पयरगेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवं- 13 विण्णाया, एवं चरण करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं ठाणे ३ । ८९. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् स्थानम् ?, तिष्ठन्त्यस्मिन् प्रतिपाद्यतया जीवादय इति स्थानम् । तथा चाह-"ठाणे ण"मित्यादि, स्थानेन स्थाने वा जीवाः स्थाप्यन्ते, व्यवस्थितस्वरूपप्रतिपादनयेति हृदयम् । शेपं पायो निगदसिद्धमेव । नवरम्-"टंक" ति छिन्नतडं टंकं । “कृड" त्ति पन्चतोवरिं, जहा वेयड्ढस्सोवरि नव सिद्धाययणादिया कूडा । “सेल" त्ति हिमवंतादिया सेला । "सिहरिणों" ति सिहरेण सिहरिणो ति, ते य 20 वेयड्ढाइया । “प-भार" त्ति जं ऋडं उवरि अंबखुजयं तं पन्भारं, जं वा पचयम्स उपरिभागे हत्यिकुंभागिती कुडु णिग्गयं तं पब्भारं भन्नइ । “कुंड" ति गंगादीणि कुण्डानि । “गुह" ति तिमिसादिया गुहा । "आगर" ति रुप्प-लुबन्न-रयणादिउप्पत्तिट्टाणा आगरा । “दह" ति पोंडरीयादीया दहा । “णदी" नि गंगा-सिंधुमादीओ । शेपं क्षुण्णार्थ यावन्निगमनमिति ३ ।। ९०. से कि तं समवाए ? समवाएणं जीवा समासिज्जंति, अजीवा समासिज्जंति, 25 जीवा-जीवा समासिज्जंति, लोए समासिज्जति, अलोए समासिज्जति, लोया-ऽलोग समासिज्जति, ससमए समासिज्जति, परममए समासिज्जति, ससमय-परसमा समासि- ज्जति । समवाए णं एगाइयाणं एगुत्तरियाणं ठाणगमयविवड्डियाणं भावाणं पम्वणा आय- विज्जति । दुबालसंगस्स य गणिपिडगस्स पल्लवग्गे समासिज्जति । समवाण णं परिना . [मु. ९१-९२ ८० . श्रीहरिभल्सरिन्यूनितया नया समान वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा मिलोगा, संखेजाओ णिज्जु- तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ। से अंगठ्ठयाए उत्थे अंगे, एगे सुयक्खंधे, एगे अज्झयणे, एगे उद्देसणकाले, एगे समुद्देसणकाले, एगे चोयाले पदसयसहस्से पदग्गेणं, संखेज्जा अवखरा, अणंता गमा, अर्णता पज्जवा, परित्ता तसा. 5 अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाझ्या जिणपण्णता भावा आघविज्जति पाणविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं समवाए ४ । २०. से किं तमित्यादि । अथ कोऽयं समवायः ?, सम् अब अयः समवायः, सम्यगधिकपरिच्छेद इत्यर्थः, तहेतुकच ग्रन्थोऽपि समवायः । तथा चाऽऽह-समवायेन समवाये वा जीवाः समाश्रीयन्ते, अविपरीतस्व- 10 रूप-गुणभूपिता बुद्धया अङ्गीक्रियन्त इत्यर्थः । अथवा जीवाः 'समस्यन्ते' कुप्ररूपणाभ्यः सम्यक्प्ररूपणायां क्षिप्यन्ते, शेपं निगदसिद्धमा निगमनम् । नवरम्-"एगादियाण"मित्यादि, अकायकोत्तरं स्थानशतं भवति, यथा-"एगे आया" इत्यादि । शेष सूत्रसिद्धं यावन्निगमनमिति ४ ॥ ९१. से किं तं वियाहे ? वियाहेणं जीवा वियाहिज्जति, अजीवा वियाहिज्जंति, जीवा-ऽजीवा वियाहिज्जति, लोए वियाहिज्जति, अलोए वियाहिज्जति, लोया-ऽलोए 18 वियाहिज्जति, ससमए वियाहिज्जति, परसमए वियाहिज्जति, ससमय-परसमए वियाहि ज्जति । वियाहे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए पंचमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, एगे सातिरेगे अज्झयणसते, दस उद्देसग- सहस्साई, दस समुद्देसगसहस्साई, छत्तीसं वागरणसहस्साई, दो लक्खा अट्ठासीति पयसह- 20 स्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णता मावा आघविज्जति पण्णविज्जति परू- विजंति देसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ । से तं वियाहे ५। ९१. से किं तमित्यादि । अथ केयं व्याख्या ?, व्याख्यानं व्याख्या । तथा चाह-व्याख्यायां जीवादयो 25 व्याख्यायन्ते । इद्द सयं चेव अझयणसम्नं । शेपं प्रकटार्थ यावत् “से तं वियाहे" त्ति निगमनम् ५ ।। ९२. से कि तं णायाधम्मकहाओ ? णायाधम्मकहासु णं णायाणं णगराई उज्जाणाई चेड्याई वणसंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-पर- लोगिया रिद्धिविसेमा भोगपरिचागा पब्वज्जाओ परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई संले- व्याख्यानं ज्ञाताधर्मकथाङ्गं च] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ८१ हणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जंति । दस धम्मकहाणं वग्गा । तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अक्खाइयासयाई, एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासयाई, एगमेगाए उवक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइओवक्खाइयासयाई, एवमेव सपुवावरेणं अद्भुट्ठाओ कहाण- गकोडीओ भवंति त्ति मक्खायं । णायाधम्मकहाणं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए छठे अंगे, दो सुयक्वंधा, एगृणवीसं णात- ज्झयणा, एगूणवीसं उद्देसणकाला, एगूणवीसं समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साइं पय- ग्गेणं, संखेज्जा अक्वरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परिता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति 10 दंसिज्जंति णिदंसिज्जंति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं णायाधम्मकहाओ ६ । ९२. से किं तमित्यादि । अथ कास्ताः ज्ञाताधर्मकथाः ? । ज्ञातानि-उदाहरणानि तत्प्रधाना धर्मकथाः ज्ञाताधर्मकथाः। आह च-"णायाधम्मकहासु णं" इत्यादि, ज्ञातानां-उदाहरणभूतानां नगरादीन्याख्यायन्ते । "दस धम्मकहाणं वग्गा" इत्यादि, एत्थ भावणा-एगृणवीसं णायझयणाणि, णाय त्ति-आहरणा, दिटुंतिओ 15 उपणिज्जति जेहऽत्यो वा ताणि णाताणि-अझयणा, एए पढममुयसंवे। अहिंसादिलक्खणस्स धम्मस्स कहाओ धम्म- कहाओ, धम्मियाओ वा कहाओ धम्मकहाओ, अक्वाणग नि वृत्तं भवति, एवाणि वितियमयखंधे । पढम-वितिय- मुयखंधभणियाणं णायाधम्मकहाणं नगरादिया भन्नति । वितियनुयखंवे दस धम्मकहाणं वग्गा, "वग्गो" ति समूहो, तबिसेसणविसिट्टा दस अझयणा चेव ते दहव्वा, एगृणवीस गाया, दस धम्मकहानी । तत्य णातेमु आदिमा दस णाता णाया चेव, ण तेमु अक्खादियादिसंभवो, संसा णव णाया, तेनु पुण एकः णाते पंच पंच चत्तालाई 20 अक्खाइयासयाई, एत्य वि एकेकाए अक्खाइयाए पंच पंच उववाइयसयाई, नत्य वि एकाए उवक्खाइयाए पंच पंच अकरवाइयोक्खाइयसयाई । एवमेयाई संपिडियाई कि संजायं ?-- इगवीस कोडिसयं लक्खा पन्नासमेव बोद्धव्वा । एवं ठिते समाणे अधिगतमुत्तम्स पत्थावो ||२|| तं जहा-दस धम्मकहाणं वग्गा, तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अन्यादयसयाई, पगमेगाए. 25 अवरवाझ्याए पंच पंच उववरवाइयसयाई, एगमेगाए उपक्खाइयाए पंच पंच अस्वाइयोववाट्यमयाई । एवमेया संपिडियाई कि संजातं ?- पणुवीनं कोडिनयं एत्य य समलवखणाइगा जम्हा । णवणायगनबद्धा अम्बाश्त्यमाया नेपं ॥१॥ ते सोटिजंति फुडं इमाओ रासीओ बंगलाणं तु । पुणरूनवजियाणं पमाणमिन्धं विजिटिं | ( । 33 टी०१६ [म. ९३.६५ ८२ श्रीहरिभरिलिया वारणा राम सोधिए य समाणे अद्भुट्टाओ कहाणगकोडीओ चेच हवंति, अत एनाह-एनमेन गपुगारणमणिग- पगारेणं गुणण-सोहणे कते त्ति वुत्तं भवति, "अद्याभो कहाणयकोडीयो भतीनि मालागं" पाटामिति, पर गुरवो व्याचक्षते । अन्ये पुनरन्यथा, तदभिप्राय पुनर्वयमतिगम्भीरतानाचगच्छामः, परमाणे ला विशिष्टश्रुनविदो विदन्तीत्यलं प्रसङ्गेन । शेष मुगमं यावत् “संखेजा पदसहरमा पदग्गेणं" ग किल पंन लाखा लावचरि न 5 सहस्सा पदग्गेणं, अवा सुत्तालावयपयग्गेणं संखेजा पदसहस्सा भवंति, एवं राज्यत्य भावेगन्न । शेपं सूत्रसिद्ध यावनिगमनमिति ६॥ ९३. से कि तं उवासगदसाओ ? उवासगदसासु णं समणोवासगाणं णगराई उज्जा- णाई चेझ्याई वणसंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपरिचाया परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई सील- 10 व्वय-गुण-वेरमण-पञ्चक्खाण-पोसहोववासपडिवज्जणया पडिमाओ उवसग्गा संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलाभा अंत- किरियाओ य आघविज्जति । उवासगदसासु णं परित्ता वायणा. संखेज्जा अणुयोगदारा: संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेजाओ णिज्जत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए सत्तमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, 15 दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पदसहस्साई पयग्गेणं । संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध- णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आधविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जंति णिर्द- सिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं उवासगदसाओ ७। ९३. से किं तमित्यादि । उपासकाः-श्रावकाः तद्गतक्रियाकलापनिवद्धा दशाः दशाध्ययनोपलक्षिताः उपासकदशाः । तथा चाह-"उवासगदसामु णं" इत्यादि सूत्रसिद्धं यावत् "संखेज्जा पदसहस्सा पदग्गेणं" ते च किल एकारस लक्खा वावन्नं च सहस्सा पयग्गेणं ति । शेपं कण्ठयमा निगमनमिति ७॥ ९४. से किं तं अंतगडदसाओ ? अंतगडदसासुणं अंतगडाणं णगराई उज्जाणाइंचेतियाई वणसंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-परलोगिया 25 रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पव्बज्जाओ परियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाई संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जंति । अंतगडदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोग- दारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जत्तीओ, संखेज्जाओ संगह- 20 ८३ उपासक-अन्तकृद्-अनुत्तरोपपातिकदशाः ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । णीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए अट्ठमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, अट्ठ वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध- णिकाइया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसि- ज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा 5 आघविज्जति । से तं अंतगडदसाओ ८ ९४. से किं तमित्यादि । अन्तः-विनाशः, स च कर्मणस्तत्फलभूतस्य वा संसारस्य कृतो यैस्तेऽन्तकृतः, ते च तीर्थकरादयः, तेषां दशाः प्रथमवर्गे दशाध्ययनानीति तत्सङ्ख्यया अन्तकृदशा इति । तथा चाऽऽह-"अंत- कडदसामु ण"मित्यादि पाठसिद्धं यावत् “अंतकिरियाओ" त्ति भवापेक्षया अन्त्याश्च ताः क्रियाश्चेति समासः, ताश्च शैलेश्यवस्थाचा गृह्यन्ते । शेषं प्रकटार्थ यावत् “अट वग्गा" एत्थ 'वग्गो' त्ति समूहो, सो य अंतगडाणं अझयणाणं 10 वा । सव्वाणि अझयणाणि जुगवं उदिसंति, अतो भणियं-“अदु उद्देसणकाला" इचादि । “संखेजा पदसहस्सा पयन्गेणं" ते य किल एवतिया-तेवीसं लक्खा चउरो य सहस्सा पदग्गेणं ति । शेपं सूत्रसिद्धं यावनिगमनमिति ८॥ ९५. से किं तं अणुत्तरोववाइयदसाओ ? अणुत्तरोववाइयदसासु णं अणुत्तरोववाइयाणं णगराई उज्जाणाई चेइयाई वणसंडाइं समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मा- यरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिवागा पव्वज्जपरियागा सुतपरिगहा 15 तबोवहाणाई पडिमाओ उवसग्गा संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई अणुत्तरो- ववाइयत्ते उववत्ती सुकुलपञ्चायादीओ पुणवोहिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । अणुत्तरोववाइयदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडियत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए णवसे अंगे, एगे सुयक्खंधे, तिण्णि वग्गा, तिण्णि उद्देसणकाला, तिण्णि 20 ससुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साई पयरगेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सानय-कड-णिवद्ध-णिकाझ्या जिणपण्णता भावा आघविज्जंति प्राणविज्जंति परूविज्जति दलिज्नंति णिदंनिज्नंति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपन्वणा आविज्जड़ । से चं अणु- त्तरोबवाइयदसाओ ९। ०५. से वितमित्यादि । उनरः-प्रधानः, नान्योनों विधन पनि अनुनाः, उपवनमुनपातः, जन्मे- त्यर्थः, अनुत्तर:-प्रधानः संसारेऽन्यन्य तथाविधम्बाभावशद् उपमाला पामिनि नमानः, नहगाव्यनामनिवडा पशाः-शाध्ययनोपलक्षिता अनुरोपातिकदमाः । नया पाउडर-"अगुनगंदवायद नाटमिन्यादि ममिट 25 . . चेइयाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोइय-परलोइया रिद्धिविसेसा निरयगमणाई दुहपरंपराओ संसारभवपवंचा दुकुलपचायाईओ दुलहबोहियत्तं से किं तं सुहविवागा ? सुहविवागेसु णं सुहविवागाणं णगराइं उज्जाणाई वणसंडाई श्री मिला यावत् “तिन्नि वग्ग" त्ति इहाध्ययनसमूहो वर्गः, वर्ग नर्गदमा गगनानि । वर्गम गागर मोहिश्या इन्गा आह- "तिन्नि उद्देसणकाला" इत्यादि । “संसजा पदमाया गरोणं" ने ग किलागालीगं लाता ह ग गहरस ति। शेपं भकटार्थ यावन्निगमनमिति ९ ।। ९६. से किं तं पण्हावागरणाई ? पण्हावागरणेसु णं अदठुत्तरं पमिणमयं, अछुत्तरं 5 अपसिणसयं, अठुत्तरं पसिणा-ऽपसिणसयं, अण्णे वि विविधा दिवा विज्जा- तिसया नाग-सुवण्णेहि य सद्धिं दिव्या संवाया आघविज्जति । पण्हावागरणाणं परिचा वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्ज- तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए दसमे अंगे, एर्ग सुयक्खंधे, पणयालीसं अज्झयणा, पणयालीसं उद्देसणकाला, पणयालीसं समुद्देसण- 10 काला, संखेज्जाई पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं- णाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आधविज्जइ । से तं पण्हावागरणाई १० । ९६. से किं तमित्यादि । प्रश्नः-प्रतीतः, तन्निर्वचनं व्याकरणम् , बहुत्वाद् बहुवचनम् । प्रश्नव्याकरणेषु 15 "अट्टोत्तरं पसिणसयं" इत्यादि । अंगुठ-बाहुपसिणादियाओ पसिणाओ। जे पुण विजा-मंता विधीए जविजमाणा अपुच्छिया चेव सुभा-ऽसुभं कहेंति एता अपसिणातो। तहा अंगुष्टपसिणभा च पडच साधेति जा विजाओ ताओ पसिणापसिणाओ त्ति । अथवा अणंतरं जा कहिति ता पसिणा, परपर पसिणापसिण ति, तं पुण विजाकहित तस्स परंपरं भवति । अन्ने य दिव्या विचित्ता विजातिसया। शेपं निगदसिद्धं यावत् “संखेजा पदसहस्सा पदग्गेणं" ते य किल वाणउतिलकरवा सोलस य सहस्स ति। शेपं गतार्थ यावदन्त इति १० ।। ९७. से किं तं विवागसुतं ? विवागसुते णं सुकड-दुक्कडाणं कम्माणं फल-विवागा आघविज्जति । तत्थ णं दस दुहविवागा, दस सुहविवागा। से किं तं दुहविवागा ? दुहविवागेसु णं दुहविवागाणं णगराई उज्जाणाई वणसंडाई 25 आघविज्जंति । से तं दुहविवागा। 20 -- चेइयाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धमकहाओ धम्मायरिया इहलोइअ-परलोइया रिद्धिविसेमा भोगपरिचागा पधज्जाओ परियागा सुतपरिगहा तवोवहाणाई संलेहणाओ ८५ प्रश्नव्याकरण-विपाकश्रुत-दृष्टिवादाः ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । भत्तपञ्चक्खाणाइं पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुहपरंपराओ सुकुलपञ्चायादीओ पुणवो- हिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । विवागसुते णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए एकारसमे अंगे, दो सुयक्खंधा, वीसं अज्झयणा, वीसं उद्देसणकाला, वीस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघ- विजंति पण्णविज्जंति परूविज्जंति दंसिज्जंति णिदंसिज्जंति उवदंसिज्जंति। से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं विवागसुतं ११ । ९७. से किं तमित्यादि । विपचनं विपाकः, शुभा-ऽशुभकर्मपरिणाम इत्यर्थः, तत्प्रतिपादकं श्रुतं विपाक- 1 श्रुतम् । शेपमा निगमनं सूत्रसिद्धमेव । नवरम्-“संखेजा पदसहस्सा पदग्गेणं" एते य एगा पदकोडी चुलसीइं च लक्खा बत्तीसं च सहस्त त्ति ११ ।। ९८. से किं तं दिट्ठिवाए ? दिहिवाए णं सब्वभावपरूवणा आघविज्जति । से समा- सओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-परिकम्मे १ सुत्ताई २ पुब्वगए ३ अणुओगे ४ चूलिया ५। ९८. से किं तमित्यादि । दृष्टयः-दर्शनानि, वदनं वादः, दृष्टीनां वादो दृष्टिवादः। दृष्टीनां वा पातो 1 यत्रासौ दृष्टिपातः, सर्वनयदृष्टय एवेहाऽऽख्यायन्त इत्यर्थः । तथा चाऽऽह-दृष्टिवादेन दृष्टिपातेन दृष्टिवादे दृष्टिपाते वा सर्वभावप्ररूपणा आख्यायते । “से समासओ पंचविहे पन्नत्ते" इत्यादि । सर्वमिदं पायो व्यवच्छिन्नं तथापि लेशतो यथागतसम्प्रदाय किश्चिद् व्याख्यायत इति ॥ ९९. से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे सत्तविहे पण्णते, तं जहा-सिद्धसेणियापरिकम्मे १ मणुस्ससेणियापरिकम्मे २ पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३ ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ उपसंपज्जण- 2 सेणियापरिकम्मे ५ विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ६ चुतअचुतसेणियापरिकम्मे ७। १००. से कि तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? सिद्धसेणियापरिकम्मे चोदमविहे पण्णते, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाई ३ पाटो ? आमासपयाई ५ केउभृयं ६ रासिवद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभृयपडिग्गहो ११ संसारपडिग्गहो १२ नंदा- वत्तं १३ सिद्धावत्तं १४ । से तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? | १०१. से किं तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे ? मणुम्मसेणियापरिकम्मे चोदमविह पणन, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्टापयाई ३ पाटो ? आमालपयाई ५ केउभृयं ६ । 23 ८६ म.१०२.८ 10 श्रीहरिभाषामनिया नया साल रासिवद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केभूयगडिग्गहो ११ संसापडिग्गहो १२ गंदावत्तं १३ मणुस्सावत्तं १४ । से तंगणुस्ससेणियागरिकम्मे २। १०२, से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ? पुट्ठसेणियापरिकम्मे एकारसविहे पण्णते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाई २ केउभूयं ३ रासिवनं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केड- 5 भूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० पुट्ठावत्तं ११ । से तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३ । १०३. से किं तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ? ओगाढसेणियापरिकम्मे एकारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाई २ केउभूयं ३ रासिबद्धं, ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० ओगाढायत्तं ११ । से तं ओगाढसेणियापरिकम्मे । १०४. से किं तं उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ? उपसंपज्जणसेणियापरिकम्मे एकार- सविहे षण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाइं २ केउभूयं ३ रासिवद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० उपसंपज्जणावत्तं ११ । से तं उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ५। १०५. से किं तं विष्पजहणसेणियापरिकम्मे ? विप्पजहणसेणियापरिकम्मे एगारस- 16 विहे पणत्ते, तं जहा-पाढो १ आषासपयाइं २ केउभूयं ३ रासिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं , तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहों गंदावत्तं १० विप्पजहणावत्तं ११ । से तं विष्पजहणसेणियापरिकम्मे ६ । १०६. से किं तं चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाई २ केउभूयं ३ रासिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ 20 तिगुणं ७ केउभूयपडिगहो ८ संसारपडिग्गहो ९ मंदावत्तं १० चुयमचुयावत्तं ११ । से तै चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ७ । ९९-१०६. तत्र सूत्रादिग्रहणयोग्यतासम्पादनसमर्थानि परिकर्माणि, गणितपरिकर्मवत् । तं च परिकम्म- सुयं सिद्धसेणियादिपरिकम्ममूलभेदतो सत्तविहं, उत्तरभेदतो तेरासीतिविहं माउगपदाति । एयं च सव्वं मूलुत्तर भेदं मुत्तत्यतो वोच्छिन्नं, यथागतसम्पदायं वा वाच्यम् ॥ १०७. [इचेइयाई सत्त परिकम्माई, छ ससमइयाई, सत्त आजीवियाई,] छ चउकणइ- याई, सत्त तेरासियाई । से तं परिकम्मे ।।
८७ " दष्टिवादे परिकर्म सूत्राणि च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । १०७. एएसिं परिकम्माण छ आदिमा य परिकम्मा ससमइया चेव, गोसालयपवत्तियआजीवगपासंडि- सिद्धंतमएणं पुण चुयअचुयसेणियापरिकम्मसहिया सत्त पन्नविज्जति । झ्याणिं परिकम्मे णयचिंता-तत्थ णेगमो दुविहो, संगहितो असंगहितो य, संगहिओ संगहं पविट्ठो, असंगहिओ ववहारं, तम्हा संगहो ववहारो ऋजुसुत्तो सदादिया य एक्को एवं चउरो गया। एतेहिं चउहि णएहिं छ ससमझ्याई परिकम्माई चिंतिजंति, अतो भणियं-छ चउकणयाइं भवंति। ते चेत्र आजीविया तेरासिया भणिया। कम्हा ? उच्यते, जम्हा ते सव्वं जगत् त्र्यात्मकमिच्छन्ति, यथा जीवोऽजीवो जीवाजीवो, लोए अलोए लोयालोए, संते असंते संतासंते एवमादि। णयचिंताए ते तिविहं णयमिच्छंति, तंजहा-दवहितो पज्जवहितो उभयडिओ, अओ भणियं-"सत्त तेरासिय"त्ति, सत्त परिकम्माई तेरासियपासंडत्या तिविहाए णयचिंताए चिन्तयन्तीत्यर्थः । “से तं परिकम्मे"त्ति निगमनम् ॥ १०८. से किं तं सुत्ताइं? सुत्ताइ बावीसं पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरि- णयं २ बहुभंगियं ३ विजयवरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मासाणं ७ संजूहं ८ संभिण्णं ९ आयच्चायं १० सोवत्थिप्पण्णं ११ णंदावत्तं १२ बहुलं १३ पुट्ठापुढे १४ वेयावच्चं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्तं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिरूढं १९ सब्बओभई २० पण्णासं २१ दुष्परिग्गहं २२ । इच्चेयाई बावीसं सुत्ताई छिण्णच्छेयणइयाई ससमयसुत्तपरिवाडौंए सुत्ताई १, इच्चेयाई वावीसं सुत्ताई अच्छिण्णच्छेयणइयाई आजीवियसुत्तपरिवाडीए सुत्ताई २, इच्चेयाई बावीसं सुत्ताई तिगणइयाइं तेरासियसुत्तपरिवाडीए मुत्ताई ३, इचेयाई बावीसं सुत्ताई चउकणइयाई ससमयसुत्तपरिवाडीए सुत्ताई ४, एवामेव सपुवावरेणं अट्ठासीति सुत्ताई भवतीति मक्खायं । से तं सुत्ताई २। १०८ से किं तं सुत्ताई ? सुत्ताई उज्जुसुयादियाई बावीसं भवति । इह सर्वद्रव्य-पर्याय-नयाद्यर्थ- सूचनात् सूत्राणि । अमृन्यपि च सूत्रार्थतो व्यवच्छिन्नान्येव, यथागनसम्प्रदायनो वा वाच्यानि। एतानि चेव बावीस गुत्ताई विभागतो अट्टासीतिं हवंति, कथम् ? उच्यते, “इचेयाई बाबीसं गुनाई छिन्नच्छेदणझ्याई, ससमयमुनपरि- वाडीए" ति मुत्तं, एत्यं जो णओ मुत्तं छिन्नं छेदेणं इच्छइ सो छिन्नच्छेदणी, जहा-"धम्मो मंगलमुगटुं" { दशव. अ. १ गा. १] ति सिलोगो जुत्तत्थओ पत्तेयं छेदनयटिओ ण विनियादिमिलोग अयंकवर, प्रत्येकं कल्पिन- पर्यन्त इत्यर्थः। एयाणि एवं बावीसं ससमयमुत्तपरिवाडीए नुनाणि ठियाणि । नथा-"इट्याई यावी मनाई अन्छिनच्छेदणझ्याई आजीवियन्मुत्तपरिवाडीए"त्ति मुनमेव, इह जी पी मुनं अन्छिनं वेदान्छर मो अन्छि- मच्छेदणयो, नहा-"धम्मो मंगलमुकर्ट दिशावै० अ. ना. ति मिलोगो, एन चंब अन्धी विनियादि- सिलीगमवावमागो त्ति वितियादिया य पहनं ति. अन्योऽन्यमापेक्षा इत्यर्थः। ए.यानि वाम भिगोमाट- पवत्तियपानंडपरिवाडीए अवग्यररयणविभागट्रियाणि वि अत्यतो अन्नोग्नमञ्चवमानानि यति । “भमा न्यादि गुत्तं. नत्थ "निकणल्याई ति नपत्रिकाभिप्रायश्चित्यन्त न्यर्थः. प्रेगरिकाबाजीविका एलायन् । नया "चेता" इत्यादि सूत्रम्. पन्ध "चउवाणायाः "नि नयचप्काभिमायतचिन्यन्त पनि भावना । “पयमंन्यादि सूत्रम्. एवं चउरो पार्शमाओ अासीनि मृत्ताई भवंति । “ने तं मनाई" नि निगमानवावयम् ।। ?
.८८ ar णं . १०९. से किं तं पुत्वगते इत्यादि । कम्हा पुधगतं ?, उच्यते, जम्हा तित्थगरो तित्थपवत्तणकाले श्रीहरि मासूरिभितया नया समान | ग.१०.११ गा. ७९-८१ १०९. से किं तं पुव्वगते ? पुब्बगते चोद्दसविहे पण्णते, तं जहा-उप्पादपुव् ? अग्गेणीयं २ वीरियं ३ अत्थिणत्थिप्पवातं ४ नाणप्पवातं मन्त्रणवादं ६ आयप्पवादं ७ कम्मप्पवाद ८ पचक्खाणं ९ विज्जणुप्पवादं १० अवंझं ११ पाणाउं १२ किरियाविसालं १३ लोगबिंदुसारं १४ । उप्पायस्स णं पुवस्स दस वत्थू चत्वारि चुलयवत्थू पण्णत्ता 5 १ । अग्गेणीयस्स णं पुव्वस्स चोदस वत्थू दुवालस चुलबत्थू पण्णत्ता २ । वीरियस्स णं पुवस्स अट्ठ वत्थू अट्ठ चुल्लपत्थू पण्णत्ता ३ । अस्थिणस्थिप्पवायस्स णं पुवस्स अट्ठारस वत्थू दस चुल्लवत्थू पण्णत्ता ४ । णाणप्पवादस्स णं पुवस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ५। सच्च- प्पवायस्स णं पुव्वस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायस्स णं पुवस्स सोलस वत्थू पण्णत्ता ७ । कम्मप्पवायस्स णं पुव्वस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता ८ । पञ्चक्खाणस्स णं पुब्बस्स 10 वीसं वत्थू पण्णत्ता ९ । विज्जणुप्पवादस्स पुवस्स पणरस वत्थू पण्णत्ता १० । अवंझस्स णं पुवस्स बारस वत्थू पण्णत्ता ११ । पाणाउस्स णं पुवस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता १२ । किरियाविसालस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता १३ । लोगबिंदुसारस्स णं पुवस्स पणुः वीसं वत्थू पण्णत्ता १४ । दस १ चोदस २ अट्ठ ३ ऽट्ठारसेव ४ वारस ५ दुवे ६ य वत्थूणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९ पण्णरस १० अणुप्पवायम्मि ॥ ७९ ॥ वारस एक्कारसमे ११ बारसमे तेरसेव वत्थूणि १२ । तीसा पुण तेरसमे १३ चोदसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ८ ॥ चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेव दस ४ चेव चुलवत्थूणि । आइल्लाण चउण्हं, सेसाणं चुल्लया णत्थि ॥ ८१ ॥ से तं पुबगते ३॥ गणधराणं सव्यमुत्ताधारत्तणतो पुव्वं पुव्यगयमुत्तत्थं भासइ तम्हा पुन्य त्ति भणिया, गणधरा पुण सुत्तरयणं करेन्ता आयारादिकमेण रएंति ठवेति य । अन्नायरियमतेणं पुण पुच्चगयमुत्तत्यो पुवं अरहया भासिओ, गणधरेहि पुच्चगयमुयं चेव पुच्चं रइयं, पच्छा आयारादि । चोदक आह-णणु पुवावरविरुद्धं, कम्हा ? जम्हा आयारणि- 25 जुत्तीप भणियं-“सव्वेसिं आयारो०" [गा. ८] गाहा, सत्यमुक्तम्, किन्तु सा ठवणा, इमं पुण अक्खररयणं पडुच्च भणिय, पूर्व पूर्वाणि कृतानीत्यर्थः । ताणि य उप्पायपुयादीणि चोइस पुयाणि पन्नत्ताणि । पढमं उप्पायपुव्यं, तत्य सबदनाणं पन्जयाण य उप्पायभावमंगीकार्ड पनवणा कया, तस्सय पयपरिमाणं एगा पयकोडी १ । बितिय अग्गेगीय, नत्य वि सव्वदव्याण पज्जवाण य सञ्चजीवाजीवविसेसाण य अगं परिमाणं वनिजति त्ति अग्गेणीय, 15 20 ८९ , दृष्टिवादे पूर्वगतं अनुयोगश्च ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । तस्स पयपरिमाणं छनउति पयसयसहस्साणि २ । ततियं वीरियपवाय, तत्थ वि अजीवाणं जीवाणं सकम्मेतरं वीरियं पवयइ त्ति वीरियप्पवाय, तस्स विसत्तरि य पयसयसहस्साणि ३। चउत्थं अस्थिणस्थिपवायं, जं लोए जहा वा अस्थि जहा वा णत्थि अथवा सियवादाभिप्पाततो तदेवास्ति नास्तीत्येवं प्रवदति इति अत्थिणत्थिपवायं भणियं, तं पि पदपरिमाणतो सटिं पदसयसहस्साणि ४ । पंचमं णाणपवादं ति, तम्मि मतिणाणादिपंचकस्स गायपरूवणा जम्हा कया तम्हा णाणप्पवायं, तम्मि पदपरिमाणं एगा पदकोडी एगपणा ५। छठें सच्चप्पवायं, सचं-संजमो सच्चवयणं वा, तं सचं जत्थ सभेयं सपडिवक्खं च वन्निज्जइ तं सच्चप्पवायं, तस्स पदपरिमाणं एगा पयकोडी छप्पयाहिया ६ । सत्तम आयप्पवायं आय त्ति-आत्मा, सोऽणेगहा जत्थ णयदरिसणेहिं वन्निज्जइ तं आयप्पवायं, तस्स वि पदपरिमाणं छन्वीसं पदकोडीओ ७ । अट्टमं कम्मप्पवाय, णाणावरणादियं अट्ठविहं कम्मं पयति-ठिति-अणुभाग-पदेसादिएहिं भेदेहिं अन्नेहि य उत्तरुत्तरभेदेहि जत्थ बनिन्जइ तं कम्मप्पवाय, तस्स वि पयपरिमाणं एगा पयकोडी असीतिं च पयसस्सा भवंति ८ । णवमं पञ्चक्खाणं, तम्मि सबपञ्चक्खागसरुवं वन्निजति त्ति अतो पञ्चक्खाणप्पवायं, तस्स य पदपरिमाणं । चउरासीति पयसयसहस्सा भवंति ९ । दसम विजगुप्पवाय, तत्थ अणेगे विजातिसया वग्गिया, तस्स य पदपरिमाणं एगा पयकोडी दस पयसयसहस्सा १० । एक्कारसमं अवंझं, ति, वंझं णाम-णिप्फलं, ण वंझमवंझं, सफलमित्यर्थः, सव्वे णाण-तव-संजमजोगा सफला वनिति अप्पसत्था य पमादादिया सव्वे अमुहफला वन्निया अतो अवंझं, तस्स वि पयपरिमाणं छब्बीसं पदकोडीओ ११ वारसमं पाणाउं, तत्थ वि आउं-प्राणविधानं सन्यं सभेयं अन्ने य पाणा वनिता, तस्स पयपरिमाणं एगा पयकोडी छप्पन्नं च पदसयसहस्साणि १२ । तेरसमं किरियाविसालं, तत्य काय- 1 किरियादियादओ विसाल त्ति-सभेया संजमकिरियाओ छंदकिरियाविहाणा य, तम्त य पयपरिमाणं णव कोडीओ १३ । चोदसमं लोगबिंदुसारं, तं च इमम्मि लोए मुअलोए वा विदुमिव अक्खरम्स सव्वुत्तमं सबकावरस- निवायपरि (? द्वित)त्तणो लोगविन्दुसारं भणियं, तस्स य पयपरिमाणं अद्धत्तेरस पयकोडीओ १४ । सेत्तं पुन्नगते॥ ११०. से किं तं अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-मूलपढमाणुओगे य गंडियाणुओगे य । ११०. से किं तमित्यादि । अनुरूपः अनुकूलो वा योगोऽनुयोगः, सूत्रस्य निजेनाभिधेयेन सार्द्धमनुरूपः सम्बन्ध इत्यर्थः । स च द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-मूलपधमानुयोगश्च गण्डिकानुयोगध ॥ १११. से किं तं मूलपढमाणुओगे ? मूलपढमाणुओगे णं अरहनाणं भगवंताणं पुच- भवा देवलोगगमणाई आउं चवणाई जम्मणाणि य अभिसेया रायवरसिरीओ पबज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयाओ तित्थपवत्तणाणि य सीसा गणा गणधग य अज्जा य 2- पवत्तिणीओ य. संघस्स चउब्धिहस्स जं च परिमाणं. जिण-मणपज्जब-ओहिणाणि-ममत्तमुय- णाणिणो य वादी य अणुत्तरगती य उनरवेउब्विणो य मुणिणो जत्तिया. जनिया मिन्दा, सिद्धिपहो जह य देसिओ.जबिरं व कालं पादोवगओ. जो जहि जत्तियाई भत्तादं छेयहना अंतगडो मुणिवरुत्तमो तमरओघविष्णमुक्को मुक्खमुहमणुनरं च पनो. पते अन्न य एबमादी भावा मूलपदमाणुओगे कहिया । से तं मूलपदमाणुओगे। टी०१२ श्रीहरिभासूरिसूतितया गरगा समय (न. ११२ १११. से किं तमित्यादि । इहैकवक्तव्यताप्रणयनान्मूल तावत् तीर्थकराः, तेषां प्रथमः गम्पालावाप्ति- लक्षणपूर्वभवादिगोचरोऽनुयोगो मूलपथमानुयोगः। तथा चाह-"मूलपहमाणुगोगे ण"मित्यादि सूत्रसिद्धं यावत् "से तं मूलपढमाणुयोगे"। ११२. से किं तं गंडियाणुओगे? गंडियाणुओगेणं कुलगरगंडियाओ तित्थगरगंडियाओ 5 चकवट्टिगंडियाओ दसारगंडियाओ बलदेवगंडियाओ वासुदेवगंडियाओ गणधरगंडियाओ भबाहुगंडियाओ तवोकम्मगंडियाओ हरिवंसगंडियाओ ओसप्पिणिगंडियाओ उस्मप्पिणि- गंडियाओ चित्तंतरगंडियाओ अमर-णर-तिरिय-निरयगइगमणविविहपरियदृणेसु एवमाइयाओ गंडियाओ आघविज्जति । से तं गंडियाणुओगे । से तं अणुओगे ४ । ११२. से किं तमित्यादि । इहैकवक्तव्यतार्थाधिकारानुगता गण्डिका उच्यन्ते, तासामनुयोगः-अर्थकथन- 10 विधिः गण्डिकानुयोगः । तथा चाह-"गंडियाणुयोगेण" मित्यादि । तत्थ कुलगरंगंडियासु कुलगराणं विमलवाहणा- दीणं पुन्बजम्म-णामादि कहिज्जइ । एवं सेसासु वि अभिधाणवसतो भावेयव्वं, जाव "चित्ततरगंडियाओ" चित्रा:- अनेकार्था अन्तरे-ऋषभा-ऽजिततीर्थकरान्तरे गण्डिकाः-एकवक्तव्यताधिकारानुगताः, ततश्च ता अन्तरगण्डिकाच चित्रान्तरगण्डिकाः। एतदुक्तं भवति-ऋषभा-ऽजिततीर्थकरान्तरे तद्वंशजभूपतीनां शेपगतिगमनव्युदासेन शिवगति- गमना-ऽनुत्तरोपपातप्राप्तिप्रतिपादिकाश्चित्रान्तरगण्डिका इति । एयासिं परूबणे पुयायरिएहि इमो विही दिट्ठो- 15 आदिच्चजसाईणं उसमस्स पउप्पए णरवतीणं । सगरसुताण सुबुद्धी इणमो संखं परिकहेइ ॥१॥ चोद्दस लक्खा सिद्धा णिवतीणिक्को य होति सबढे । एकेकटाणे पुण पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥२॥ पुणरवि चोद्दस लक्खा सिद्धा णिवतीण दोन्नि सबढे । गुणठाणे वि असंखा पुरिसजुगा होति णायव्वा ॥३॥ जाव य लक्खा चोदस सिद्धा पन्नास होति सबढे । पन्नासहाणे वि तु पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥४॥ एगुत्तरा उ ठाणा सबढे णेय जाव पन्नासा । एवेक्केकगठाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥५॥१॥ 20 विवरीयं सचढे चोदस लक्खा उ णिचुतो एगो । स चेव य परिवाडी पन्नासं जाव सिद्धीए ॥६॥२॥ तेण पर दुलक्खादी दो दो ठाणा य समग वचंति । सिवगति सबहिं इणमो तेसि विही होइ |७|| दो लक्खा सिद्धीए दो लक्खा नरवतीण सबढे । एवं तिलक्ख चउ पंच जाव लक्खा असंखेज्जा ॥८॥३॥ सिवगति-सबर्हि चित्तंतरगंडिया ततो चउरो । एगा एगुत्तरिया १ एगादिविउत्तरा वितिया २॥९॥ ततिएगादितिउत्तर ३ तिगमादिविउत्तरा चउत्थेयं ४ । पढमाए सिद्धिको दोन्नि य सबसिद्धम्मि ॥१०॥ · 25 तत्तो तिन्नि नरिंदा सिद्धा चत्तारि होति सबढे । इय जाव असंखेजा सिवगति-सव्वट्ठसिद्धेहिं १॥११॥ ताहे विउत्तराए सिद्धिको तिप्नि होति सचढे । एवं पंच य सत्त य जाव असंखेज दो वि त्ति २॥१२॥ एग चउ सत्त दसगं जाय असंखेज होति दो वि त्ति । सिवगति-सबहिं तिउत्तराए मुणेयव्या ३॥१३॥ ताहे-तियगाइविउत्तराए अउणत्तीसं तु तितग ठावेतुं । पढमे णस्थि उ खेयो सेसेसु इमो भवे खेवो ॥१४।' दुग पण णवगं तेरस सत्तरस दुवीस छ च अटेव । वारस चोदस तह अवीस छब्बीस पणुवीसा ॥१५॥ - 4 ९१ । दृष्टिवादे गण्डिकानुयोगः चित्रान्तरगण्डिकाच ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । एक्कारस तेवीसा सियाल सतरि सतहत्तरी तह य । इग दुग सत्तासीई एगत्तरिमेव वावट्ठी ॥१६॥ अउणत्तरि चउवीसा छायालसयं तहेव छब्बीसा । एए रासीखेवा तिगअंतंता जहाकमसो ॥१७॥ सिवगति-सबढेहिं दो दो ठाण विसमुत्तरा णेया । जावुणतीसहाणे उणतीस पुण छवीसाए ॥१८॥ विसमुत्तरा य पढमा एवमसंख विसमुत्तरा णेया । सव्वत्थ वि अंतिल्लं अन्नाए आदिमं ठाणं ॥१९॥ अउणत्तीसं वारे ठाउं णत्थि पढमए खेवो । सेसेसऽडवीसाए सवत्थ दुगादिओ खेवो ॥२०॥ सिवगति पढमादीए वितियाए तह य होति सबढे । इय एगंतरियाई सिवगइ-सव्वट्ठठाणाई ॥२१॥ एवमसंखेजाओ चित्तंतरगंडियाओ णेयव्या । जाब जियसत्तुराया अजियजिणपिया समुप्पन्नो ४॥२२॥४॥ एवं गाहार्हि चित्तरगंडियाओ समत्ताओ । इमा य एयासिं ठवणा- २ ४ ६ ७ । ८ ९ 1 . ४ २ ५ 15 एत्तिया लक्खा सिद्धि गया १४ १४ | १४ | १४ |१४ १४ | १४ | १४ १४ १४ १४ एत्तिया लक्खा सन्वर्ट पि गया १ २ ३ ५ ९ | १० | ५० एवं जात्र असंखा पुरिसजुगा सिद्धा । एसा पढमा १ । अओ परं- सिद्धा एत्तिया लक्खा १ २ ५ ६ ७ ८ ९ १० ५० सम्मि गया एत्तिया लक्खा | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ १४ १४ १४ १४ | १४ | १४ एवं पि असंखेज्जा पुरिसजुगा सिद्धा । एसा वीया २ । अओ परं- सिद्धा एत्तिया लक्खा सन्चट्टे वि गया एत्तिया लक्खा एवं जाव असंखेजा आवलिया दुगाइएगुत्तरा दो वि गचंति । आवलिया दुरगमणी पंचायइमे ठाणे चिट्ठति । तइया गंडिया ३ । अतः परं चतस्रो गण्डिका एकोनरिकादिकाः प्रदायन्ते- शिवगतो ३ ५७ ९ । एवं जाव अमंग्वेजा २/४/६/८/१०एवं जाव अमंखेजा चित्तंतरगंडिया एगाइएगुत्तरिया पढमा णेया १ । सिद्धा एत्तिया एवं नाव असंखजा सचट्टे एतिया चेव ३ ७ । ११ एवं जाव असंखजा ४ ४ २ ७ ८ १ सर्वार्थे च 20 १ ५ ९ एगादिविउत्तरा वितिया चित्तरगंडिया २ ।
(सू. ११३-१६ गा. ८२ ९२ or सिद्धा एत्तिया सबढे एत्तिया चेव ४ ७ श्रीहरिभारिसूनितया नया समर कलं | १३ एवं जाव असंखेजा १० १६ एवं जाव असंखेजा चित्तंतरगंडिया एगादितिउत्तरा ततिया ३ । ततश्चतुर्थी व्यादिका व्यादिविपमोत्तरप्रक्षेपा एकोनत्रिंशत् त्रिकान संस्थाप्य निदर्यते- शिवगतौ सिद्धा एत्तिया ३ | ८ | १६ | २५ | ११ | १७ २९ / १४ ५० | ८० | ५ सबढे एत्तिया ५ १२ | २० | ९ | १५ | ३१ २८ २६ ७३ | ४ ९० | ६५ २७ १०३ ° ७४/७२ ४९ २९ पुणो वि- 10 " सबढे २९ ३४ ४२ ५१ ३७ ४३ ५५,४०७६,१०६/३१ १०० ९८/७५ ५५ सिद्धौ ३१ ३८ ४६ ३५ ४१ ५७ ५४ ५२ ९९ ३० ११६/ ९१ ५३ १२९ एवं पुनः पञ्चपञ्चाशदादौ कृत्वा एकोनत्रिंशत् स्थानानि संस्थाप्य यादिप्रक्षेपकेण यावत् पश्चिमस्थाने एकाशीतिर्भवति । अनेन [क्रमेण] उत्तरा असङ्ख्येयाश्चित्रान्तरगण्डिका नेयाः ४। सेसं गाहाणुसारेण नेयध्वं जाव असंखेजा॥ शेपं निगदसिद्धं यावत् “से तं अणुओगे" ११३. से किं तं चूलियाओ ? चूलियाओ आइलाणं चउण्हं पुव्वाणं चूलिया, अव- 15 सेसा पुव्या अचूलिया । से तं चूलियाओ ५ । ११४. दिहिवायस्स णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ । से णं अंगठ्ठयाए दुवालसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, चोद्दस पुव्वा, वत्थू, संखेज्जा चुल्लवत्थू, संखेज्जा पाहुडा, संखेज्जा पाहुडपाहुडा, संखेज्जाओ पाहुडि- 20 याओ, संखेज्जाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेज्जाइं पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उव- दंसिज्जंति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्ज- ति । से तं दिविवाए १२ | संखेज्जा .
९३ - 10 -दृष्टिवादे चूलिकाः] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । ११३-१४. से किं तमित्यादि । चूडा इव चूडा, इह दृष्टिवादे परिकर्म-सूत्र-पूर्वानुयोगोक्ता-नुक्तार्थ- सङ्ग्रहपरा ग्रन्थपद्धतयश्चडा इति । एताश्चाद्यानां चतुर्णामेव पूर्वाणां भवन्ति, न शेषाणामिति । अत एवाह- "आदिल्लाण"मित्यादि । सङ्ख्या तासां प्रतिपूर्वमियं यथासङ्ख्यम्- चउ वारसष्ट दस या इवंति चूडा चउण्ड पुन्वाणं । एए य चूलवत्थू सन्चुवरिं किल पढिजति ॥१॥ शेपमा निगमनं सूत्रसिद्धमेव । नवरम् - "संखेज्जा वत्थु" ति पणुवीसुत्तराणि दो सयाणि । “संखेजा 5 चूलवत्यु" त्ति चउतीसं ।। साम्प्रतमोघतो द्वादशाङ्गविपयमेव दर्शयनाह- ११५, इच्चेइयम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे अणंता भावा अणंता अभावा अणंता हेऊ अणंता अहेऊ अणंता कारणा अणंता अकारणा अणंता जीवा अणंता अजीवा अणंता भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणंता सिद्धा अणंता असिद्धा पण्णत्ता। संगहणिगाहा- भावमभावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाऽजीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा य ।। ८२ ॥ ११५. इच्चेयम्मि इत्यादि । इत्येतस्मिन् द्वादशाङ्गे गणिपिटक इति पूर्ववत् , अनन्ता भावाः प्रज्ञप्ता इति योगः, तत्र भवन्तीति भावाः-जीवादयः पदार्थाः, एते च जीव-पुद्गलानन्तत्वाद् अनन्ता इति । तथा अनन्ता अभावाः, सर्व- भावानामेव पररूपेणासत्त्वात् त एवानन्ताअभावा इति, स्व-परसत्ताभावा-ऽभावोभयाधीनत्वावस्तुतत्वस्य। तथाहि- जीवो जीवात्मना भावोऽजीवात्मना चाभावः, अन्यथाऽजीवत्वप्रसङ्गान् , अत्र बहु वक्तव्यं तत्तु नोच्यते, गमनिकामात्र- 15 त्वादारम्भस्य । अन्ये तु 'धर्मापेक्षया अनन्ता भावाः अनन्ता अभावाः प्रनिवस्त्वस्तित्व-नास्तित्वाभ्यां प्रतिबद्धाः' इति व्याचक्षते । तथाऽनन्ता हेतवः, तत्र हिनोति-गमयति जिन्नासित विशिष्टान निति हेतुः, ते चानन्ताः, वस्तुनोऽनन्तधर्मात्मकवात् , तत्प्रतिवद्धधर्मविशिष्टवस्तुगमकत्वाच हेनोः, सूत्रस्य चानन्तगम-पर्यायात्मकतादिति । यथोक्तहेतुप्रतिपक्षतोऽनन्ता अहेतवः । तथाऽनन्तानि कारणानि-नृसिड-नन्यादीनि घट-पटादिनिकानि । तथाऽनन्तान्यकारणानि, सर्वकारणानामेव कार्यान्तराकारणत्वान् , न हि मलिष्टः पटं नियतीति । एवं भाषा- 20 ऽभावाः हेत्वहेतवः कारणा-ऽकारणानि, जीवाः-माणिनः, तथा अजीवाः-द्वषणु कादयः, नया भव्याः-अनादिपा- रिणामिकभव्यभावयुक्ताः, एतेऽनन्ताः प्रजप्ताः । तथा अभव्याः-अनादिपास्लिामिकाभव्य भावयनाः पतंजलाः प्रज्ञप्ता इति योगः । तथा सिद्धा अनन्ताः, तथा अनन्ता अनिद्राः प्रहमा नि । इटभव्या-मव्यानामानन्- भिहिते अनन्ता असिद्धा इति यत् पुनरभिधानं तत् सिद्धेभ्योऽनन्नगुनन्वयारनामिति ।। साम्मतं द्वादशाङ्गविराधना-ऽऽराधननिप्पप्नं त्रैकालिकं फलामुपदयाह- ११६. इच्छेइयं दुवालमंगं गणिपिडगं तीए काले अगंता जीवा आणाग विगहत्ता चाउरंत संसारकंतारं अणुपरियट्टिमु । इबेइयं दुवालगंगं गणिपिडगं पडणाकाले पग्निा जीवा आणाए रािहेत्ता चाउग्तं संसारकंतारं अणुपग्यि नि । इन्ड्यं वानसंग गणिपिडगं अणागते काले अणंता जीवा आणाए विराहना वा नमारकंना अगम्पिट्रिम्मनि । - ९४ [.११७.२० गा.८३-८७. श्रीहरिभारिमूक्तिया नया समस्या ११६. इच्चेयमित्यादि । इत्येतद् द्वादशाई गणिपिटकं अतीतकाले अनन्ना जीना आशया विराध्य नत- रन्तं संसारकान्तारं "अणुपरियटिसु" त्ति अनुपरावृत्तवन्त आसन । इदं हि द्वादगाई रक्षार्थीभगभेदेन त्रिविधम् , ततश्च 'आज्ञया' सूत्राज्ञयाऽभिनिवेशतोऽन्यथापाठादिलक्षणया विराध्य अतीतकाले अनन्ता जीवाः 'चतुरन्तं संसार- कान्तारं' नारक-तिर्यस्-नरा-ऽमरविविधक्षजालदुस्तरं भवाटवीगहनमित्यर्थः, अनुपराटता आसन जमालिवत् ; 5 अर्थाज्ञया पुनरभिनिवेशतोऽन्यथाप्ररूपणादिलक्षणया गोठामाहिलयत् , उभयाज्ञया पुनः पञ्चविधानारपरिज्ञानकरणोद्य- तगुर्वादेशादिलक्षणया गुरुप्रत्यनीकद्रव्यलिङ्गधार्यनेकथमणबत् , अथवा द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावापेक्षयाऽऽगमोक्तानुष्ठान- मेवाज्ञा, एतद्विराधनयवानुपरावृत्ता आसन् । उक्तं च-"सव्याओ वि गतीभो अविरहिया णाण-दंसणधरेहिं" ] इत्यादि । “इचेय"मित्यादि गतार्थमेव । नवरम्-"परित्ता जीवा" इति सान्येया जीवाः, वर्तमानविशिष्टविराधकमनुष्यजीवानां सङ्गन्येयत्वात् , "अणुपरियटंति" ति अनुपरावर्तन्ते, भ्रमन्तीत्यर्थः। “इचेत"- 10 मित्यादि, इदमपि भावितार्थमेव । नवरम्-“अणुपरियटिस्संति" त्ति अनुपरावतिष्यन्ते, पर्यटिप्यन्ति इत्यर्थः ।। ११७. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अतीतकाले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकतारं वितिवइंसु । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं वितिवयंति । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागए . . काले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकता वितिवतिस्संति । ११७. "इच्चेत"मित्यादि, इत्येतद् द्वादशाङ्गं गणिपिटकं अतीतकालेऽनन्ता जीवा आज्ञया आराध्य चतुरन्तं संसारकान्तारं "वितिवइंसु" ति व्यतिक्रान्तवन्तः, चतुर्गतिकसंसारोल्लङ्घनेन मुक्तिमवाप्ता इत्यर्थः। “इचेय"मित्यादि गतार्थम् । नवरम्-"विश्वयंति" ति व्युत्क्रामन्ति । "इचेद"मित्यादि गतार्थमेव । नवरम्-"वितिवयिस्संति" त्ति व्युत्क्रमिप्यन्ते, एतत्प्रभावात् सेत्स्यन्तीत्यर्थः ।। यदिदमनिष्टेतरभेदभिन्नं फलं प्रतिपादितम् एतत् सदाऽवस्थायित्वे सति द्वादशाङ्गस्योपजायत इत्यत्र आहे-- ११८. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ ण भवति ण कयाइ ण भविस्सति, भुविं च भवति य भविस्सति य, धुवे णिअए सासते अक्खए अव्वए अव- हिए णिच्चे । से जहाणामए पंचत्थिकाए ण कयाति णाऽऽसी ण कयाति णत्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुविं च भवति य भविस्सति य, धुवा णीया सासता अक्खया अव्वया अवट्ठिया णिचा, एवामेव दुवालसंगे गणिपिडगे ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ णत्थि ण 25 कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्सति य, धुवे णिअए सासते अक्खए अव्वए अवट्ठिए णिचे। ११८. श्येयमित्यादि । इत्येतद् द्वादशाङ्गं गणिपिटकं न कदाचिन्नासीद् अनादित्वात् , न कदाचिन्न भवति सदैव भावात् , न कदाचिन्न भविष्यति अपर्यवसितत्वात् । किं तर्हि ? "भुर्वि चे"त्यादि, अभूद् भवति भविष्यति च । ततश्चेदं निकालभावित्वादचलत्वाद् ध्रुवम् , मेर्वादिवत् । ध्रुवत्वादेव नियतम्, पश्चास्तिकायेषु 15 20 -~- ९५ 5 द्वादशाङ्गगणिपिटकस्वरूपम् ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । लोकवचनवत् । नियतत्वादेव शाश्वतम् , समया-ऽऽवलिकादिषु कालबद् । शाश्वतलादेव वाचनादिभदानेऽप्यक्षयम् , गङ्गा-सिन्धुप्रवाहेऽपि पौण्डरीकहूदवत् । अक्षयतादेवाव्ययम् , मानुपोत्तराद् वहिः समुद्रवत् । अव्ययखादेव स्वप्रमाणे - वस्थितम् , जम्बूद्वीपादिवत् । अवस्थितखादेव नित्यम् , आकाशवत् । साम्प्रतं दृष्टान्तमाह-"से. जहाणामए"त्यादि, तद् यथानाम 'पञ्चास्तिकायाः' धर्मास्तिकायादयः न कदाचिन्नासन् न कदाचिन्न सन्ति न कदाचिन्न भविष्यन्ति, अभूवन् भवन्ति भविष्यन्ति च । "धुवे" इत्यादि पूर्ववत् । “एवामेवे"त्यादि निगमनं निगदसिद्धमेव ।। ११९. से समासतो चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा-दबओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दवओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ । खेत्तओ णं सुयणागी उवउत्ते सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं सुयणाणी उपउत्ते सव्वं कालं जाणइ पासइ । भावओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ । ११९. “से समासओ" इत्यादि । 'तद्' द्वादशाङ्गं समासतश्चतुर्विध प्रज्ञप्तमित्यादि प्रायो गतार्थमेव । 10 नवरम्-द्रव्यतः श्रुतज्ञानी उपयुक्तः सन् सर्वद्रव्याणि जानाति पश्यतीति, अत्राभिन्नदशपूर्वधरादिः श्रुतकेवली परिगृह्यते, तदारतो भजना, सा पुनर्मतिविशेषतो ज्ञातव्येति । अत्राह-ननु पश्यतीति कथम् ? कथञ्चन सकलगोचर- दर्शनायोगात् , अत्रोच्यते, प्रज्ञापनायां श्रुतज्ञानपश्यत्तायाः प्रतिपादितत्वात् , अनुत्तरविमानादीनां चाऽऽलेख्यकरणात् , सर्वथा चादृष्टस्याऽऽलेख्यकरणानुपपत्तेः । एवं क्षेत्रादिप्यपि भावनीयमिति । अन्ये तु "न पश्यति" इत्यभिधति ॥ साम्प्रतं सङ्ग्रहगाथा आह- १२०. अक्खर १ सण्णी २ सम्म ३ सादीयं ४ खलु सपज्जवसियं ५ च । गमियं ६ अंगपविढे ७ सत्त वि एए सपडिवक्खा ।। ८३ ।। आगमसत्थग्गहणं जं वुद्धिगुणेहिं अहि दिटुं । विति सुयणाणलंभं तं पुब्बबिसारया धीरा ।। ८४ ।। सुस्सूसइ १ पडिपुच्छइ २ सुणेइ ३ गिण्हइ ४ य ईहा ५ याचि । ततो अपोहए ६ वा धारेइ ७ करेइ वा सम्म ८ ॥ ८५।। मूयं १ हुंकारं २ वा वादकार ३ पडिपुच्छ ४ बीमंमा ५। तत्तो पसंगपारायणं ६ च परिणि? ७ मत्तमए ॥८६॥ सुत्तत्थो खलु पदमो. वीओ णिज्जत्तिमीनिओ भणिओ। नइओ य णिवसेसो, एस विही होइ अणुओगे ॥ ८७॥ से तं अंगपविढे । से तं सुयणाणं । से नं पगेमा । ॥से नं गंदी मम्मत्ता ॥ 15 . 20 10 श्रीहरिभामिलिगा र मागमा १२०. अक्स्वर सन्नीत्यादि । इयं गतार्थेन । नवरम्-गप्नाप्ने पक्षाः गानिपक्षाः । ने नैवम्-गर- श्रुतमनक्षरश्रुतमित्यादि ॥८३॥ इदं पुनः श्रुतज्ञानं सर्वातिगयरत्नसमुद्रकल्पम् , नया पायो गर्मायननान गराधीनम् , अतो विनेयानुग्रहार्थ यो यथा चास्य लाभस्तथा दर्शयनात- आगम० गाहा । व्याख्या-आगमनमागमः, आलो अभिविधि-मर्यादाताद अगिविधिना मर्यादया या 5 गमः-परिच्छेद आगमः । स च केवलमत्यवधिलक्षणोऽपि भवति अनम्नारयन्त्यिर्थमाहशामयतेऽनेनेति शायं- श्रुतम् । आगमग्रहणं तु पष्टितन्त्रादिकुशासव्यवच्छेदार्थम् , नेपामनागमतात् सम्यकपरिन्टेदात्मकत्वाभावादित्यर्थः, शाखतया च रूढत्वात् , तत आगमचासौ शास्त्रं च आगमशासं तम्य ग्रहणमिति समासः । गृहीतिर्ग्रहणम् । यद् बुद्धेर्गुणैर्वक्ष्यमाणलक्षणैः करणभूतैरष्टभिष्टं तद् ब्रुवते श्रुतज्ञानस्य लाभः श्रुतज्ञानलाभग्नं तदेव ग्रहणं त्रुवते । के ? पूर्वेपु विशारदाः-विपश्चितः 'धीराः' बतानुपालने स्थिरा इत्यर्थः । अयं गाथार्थः ।।८४॥ बुद्धिगुणैरएभिरित्युक्तं ते चामी- सुस्मसति० गाहा । व्याख्या--विनययुक्तो गुरुमुग्यात् श्रोतुमिच्छति शुश्रूपते । पुनः पृच्छति प्रतिपृच्छति, तत् श्रुतमशङ्कितं करोतीति भावार्थः । पुनः कथितं सच्छृणोति । श्रुखा गृह्णाति । गृहीत्वा च 'ईहते' पर्यालोचयति 'किमिदमित्थम् ? उतान्यथा?' इति । 'चशब्दः समुच्चयार्थः । अपिशब्दात् पर्यालोचयन किश्चित् स्यबुद्धयाऽप्युत्प्रेक्षते । ततस्तदनन्तरं 'अपोहते च' एवमेतद् यदादिष्माचार्येणेति । पुनस्तमर्थमागृहीतं धारयति । करोति च सम्यक् 15 तदुक्तमनुष्ठानमिति, तदुक्तानुष्ठानमपि च श्रुतप्राप्तिहेतुर्भवति, तदावरणक्षयोपशमादिनिमित्तत्यान् तस्येति । अथवा यद् यदाज्ञापयति गुरुस्तत् सम्यगनुग्रहं मन्यमानः श्रोतुमिच्छतीति । पूर्वसन्दिष्टश्च सर्वकार्याणि कुर्वन् पुनः पृच्छति प्रतिपृच्छति । पुनरादिष्टः सन् सम्यक् शृणोति । शेपं पूर्ववत् ।।८५।। बुद्धिगुणा व्याख्यातास्तत्र शुश्रूपतीत्युक्तम् । इदानीं श्रवणविधिप्रतिपादनायाह- मृअं० गाहा । व्याख्या-'मूकमिति' मूकं शृणुयात् । एतदुक्तं भवति-प्रथमश्रवणे संयतगात्रस्तूष्णी 20 खल्यासीत् १ । तथा द्वितीये 'हुङ्कारं च' ईपद्वन्दनं कुर्यादित्यर्थः । तृतीये 'वाहकारं कुर्यात्' वाढमेवमेतम्नान्यः थेति ३ । चतुर्थश्रवणे गृहीतपूर्वा-ऽपरसूत्राभिप्रायो मनाक प्रतिपच्छां कुर्यात् , कथमेतदिति ४ । पञ्चमे तु मीमांसा कुर्यात्, मातुमिच्छा मीमांसा, प्रमाणजिज्ञासेति यावत् ५। ततः पष्ठे श्रवणे तदुत्तरोत्तरगुणप्रसङ्गपारगमनं चास्य भवति ६ । परिनिष्ठा सप्तमे श्रवणे भवति, एतदुक्तं भवति-गुरुवदनुभापत एव सप्तमे श्रवणे इति ७ ॥८६॥ एवं तावत् श्रवणविधिरुक्तः । इदानी व्याक्यानविधिमभिधित्मुराद- मुत्तत्थो० गाहा । व्याख्या-सूत्रार्थमात्रप्रतिपादनपरः सूत्रार्थः, अनुयोग इति गम्यते । 'सलुशन्दस्तु एवकारार्थः, स चायधारणे । एतदुक्तं भवति-गुरुणा सूत्रार्थमात्राभिधानलक्षण एव प्रथमोऽनुयोगः कार्यः, मा भूत प्राथमिकविनेयानां मतिमोहः ।। द्वितीयोऽनुयोगः सूत्रस्पशिकानयुक्तिमिश्रः कार्य इत्येवम्भूतो भणितो जिनेश्व तुर्दशपूर्वधरैश्च २ । तृतीयश्च ‘निरचशेषः' भसक्ता-अनुमसक्तमप्युच्यते एवंलक्षणो निरवशेषः कार्य इति ३ । 'एप' उक्तलक्षणो विधानं विधिः प्रकार इत्यर्थः भणित प्रतिपादितो जिनादिभिः । व ? सूत्रस्य निजेनाभिधेयेन 30 सार्धमनुकुलो योगोऽनुयोगः-सूत्रान्याग्यानमित्यर्थः, तस्मिन्ननुयोग इति गाथार्थः । आह-परिनिष्टा सप्तम, इत्युक्तम् , यथानुयोगमकाराः, तदेतत् कथम् ? इति, अत्रोच्यते, विनयगणं विज्ञाय त्रयाणामन्यतमप्रकारेण सप्तवार तु - 25 ३ श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । करणादविरोधादित्योघविनेयविषयं तावत् सूत्रम्, न पुनः स एव नियमविधिः, उद्घटितज्ञविनेयानां सकृच्छ्रवण एवाशेपग्रहणदर्शनादलं विस्तरेण ॥८७॥ "से त"मित्यादि तदेतत् श्रुतज्ञानमिति निगमनम् । “से त्त"मित्यादि, तत् परोक्षमिति निगमनमेव ।। ॥ नन्द्यध्ययनविवरणं समाप्तम् ।। यदिहोत्सूत्रमज्ञानाद् व्याख्यातं तद् बहुश्रुतैः । क्षन्तव्यं कस्य सम्मोहश्छद्मस्थस्य न जायते ? ॥१॥ नन्यध्ययनविवरणं कृता यदवाप्तमिह मया पुण्यम् । तेन खलु जीवलोको लभतां जिनशासने नन्दीम् ॥२॥ ॥ कृतिः सिताम्बराचार्यजिनभटपादसेवकस्याऽऽचार्यश्रीहरिभद्रस्येति ॥ ।। नमः श्रुतदेवतायै भगवत्यै ॥ ग्रन्थानम् २३३६ ॥ ॥ समाप्ता नन्दिटीका ॥ 5 } णमो त्यु णं समणस्स भगवओ महइमहावीरवद्माणसामिस्स णमो अणुओगधराणं थेराणं मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसरिविनिर्मितं याकिनीमहत्तराधर्मसू नुश्रीहरिभद्रसूरिमणीतायाः नन्दिसूत्रवृत्तः टिप्पनकम् ॥ णमो गंदीए भगवतीए । नन्दी ।। , [पृष्ठ १] देरपि सम्भवात् । पं० ८. अनैकान्तिको अनैश्चयिकः । अनात्यन्तिकः व्यवच्छेदभाक् च । पं. ९. ऐकान्तिकः नैश्वयिकः । आत्यन्तिकोऽव्यवच्छेदपरः । पं. १२. श्रुतधर्मसम्पत्समन्विता एव प्राय इति 'मापतुपादिभिर्व्यभिचारो मा भूत्' इति प्रायोग्रहणम् । [ पृष्ठ २] पं. ३. यस्येति, इश्व अश्च यं तस्य [यस्य] इत्यनेन इकारलोपः । पं. ४. नन्दन्ति समृद्धिमयानुवन्यनयेति पं. ७. नन्दीति यत् कस्यचिद् नाम क्रियते सा नामनन्दी । ममादिषु स्थापिता स्थापनानन्दी। पं. ९. ज्ञशरीरद्रव्यनन्दिरित्यादि, ज्ञातवान् नः, तत्य शरीरम् , नदेवानुभूतभावचाद यनन्दिः जारिद्रगनन्दिः, नन्दिरित्ति यत् पदं तदर्थज्ञायकरय यच्छरीरकं जीवविप्रमुक्तं तद् जाग्यनन्दिनिययः । [भव्यगरीद्रव्यनन्दिरित्यादि] विवक्षितपर्यायेण भविष्यतीति भव्यः, विवक्षितपर्यायाहः, तयोग्य इत्यर्थः, नन्य सामान . नदय भावन्दिकाराचा आदर्भय- 1 शरीरद्रव्यनन्दिः, यो जन्तुर्नन्दिरिति पदमागामिकाले शिक्षिप्यते न नापक्किनेनीवाशि मार्ग मध्यमगरद्रव्यनन्दिग्विणः । पं. ११. भूत-भाविद्रव्यनन्देर्लक्षणाभिधानायाह-भूतम्यत्यादि । नानक कथितम । या कथानम् ! इत्याह-यत् 'कारणं हेतुः । कस्य ? इत्याह 'भावस्य' पर्यायग्छ । करमतम्य! :-- म मामिनी का भविष्यतः । 'लोके' आधारभूते । तय 'सचेतन पुरपादि. 'अवतार ! -: १३ रवर्गादिप्चिन्द्रादित्वेन भूत्वा इदानी मनुष्यादित्वेन परिणतः मोनीदरदिपर्वाचन मगर इन्द्रादिरभिधीयते, अमात्यादिपदपरिभ्रटामात्यादिवत् । तथाऽऽपि पनि पर द कारणदाद् द्रव्यत इन्द्रादिरभिधीयते, भविष्यदागकुनामगजवन् । भावनायेत्यार्यार्थः ॥ पं. १५. भम्भा० गाहा सुगना । नवा भन्ना : : मान्द माली मुग्जाविशेषौ । केदलमेकतः सोऽन्यत्र तु विस्तीग मुकुन्दोभितीने नईनन् । दम्दा । 'तलिमा तिउलिया । रोपं प्रतीतम् ।। पं. १८. नोभागमतो भावनन्दिः पर कामानि दान :: देवाचात् । मोरान्दो देवायचनः । अपवेलियाबागमनका ::::::::: .
१०० मलभारिधी-श्रीनागरिनिनिमित 5 ० गा० ४६] [पृष्ठ ३] पं. १. सञ्चित्तेत्यादि, सच्चित्त-शीत-संवृताश ता इतर-मिक्षाशेति समासः । तोतराः--अनितोग-विकृताख्याः । सचित्ता-ऽचित्तादिद्विरूपतया मिश्रत्वम् । एतत्स्वरूपं चोक्तं पूर्वगुनिमिः-- मीसा य गभवसही, संवुडवियडा य वंसपत्ताई । सीओसिणाइभेया जगहा जोणिभेगा उ ॥१॥ मिस्सत्तं जोणीए सुक्कमचित्तं सचेयणं रुहिरं । अहवा सुकं रुहिरं अचेयण-सचेगणा जोणी ॥२॥ [ एवं मिश्रत्वं तिर्यग्-मनुष्यत्रीयोनेः । तथा- अच्चित्ता खल जोणी नेरइयाण तहेव देवाणं । मीसा य गम्भवसही, तिविहा जोणी उ सेसाणं ॥१॥ [जिन० संग० गा० ३५९, जीवस० तिर्यग-मनुष्यगर्भजव्यतिरिक्तानां सम्मूर्छनजतिर्यग्-मनुष्याणां यथा गोम्यादीनां सचित्ता, काष्ठघुणादीनामचित्ता, 10 गोकृम्यादीनामेव केपाश्चित् पूर्वकृतक्षते समुद्भवतां मिश्रेति निधात्वम् । तथा- सीओसिणजोणीया सब्वे देवा य गभवकंती। उसिणा य तेउकाए, दुह नरए, तिविह सेसाणं ॥१॥ [जिन० संग्र० गा० ३६०, जीवस० गा० ४७] शीतोष्णयोनिकाः सर्वे देवा गर्मजास्तिर्यग्-मनुष्याश्च । तेजःकायिका उष्णयोनिकाः । नारकाणां द्विधा योनिः-तत्राऽऽद्य- पृथिवीत्रयोत्पत्तीनां प्रकृष्टोष्णा, चतुर्थी कचिनरके उष्णा कचिच्छीता, अन्त्यपृथ्वीत्रये तु शीता। सम्मूर्छनजतिर्यग्-मनुष्य-पृथि- 15 व्यादीनां कचिच्छीता कचिदुष्णा कचिन्मिश्रा। तथा संवृता प्रच्छना, विवृता प्रकटा, गोमयादिका संवृतविवृता प्रच्छनप्रकाशा ।। तत्र-एगिदिय-नेरइया संवुडजोणी हवंति देवा य । विगलिंदियाण वियडा, संवुडवियडा य गन्मम्मि ॥१॥ [जिन० संग्र० गा० ३५८, जीवस० गा० ४५] नवरं नारकाः संवृतयोनयः, तदुत्पत्तिभूतानां निष्कुटानां संवृतगवाक्षकल्पत्वात् । देवा अपि संवृतयोनयः, "देवसयणिजसि देवदूसंतरिए अंगुलस्स असंखेज्जइभागमेत्तीए सरीरोगाहणाए उववण्णा" [ 20 देवशयनीयेषु देवदूष्याभ्यन्तरे संवृतस्वरूपे तेपामुत्पादात् । एकेन्द्रियाणामपि केवलिदृष्टेन केनापि प्रकारेण 'संवृतयोनित्वं' गुप्तयोनित्वं भावनीयम् । 'संवृतविकृता' आवृता-नावृतस्वरूपा गर्भजतिर्यग्-मनुष्याणामिति । अन्यच्च शङ्कावर्ता कूर्मोन्नता वंशीपत्रा चेति त्रिधा मनुष्यस्त्रीविषया स्यात् । तत्र च-- उत्तमनरमाऊण नियमा कुम्मुन्नया हवइ जोणी । इयराण वंसपत्ता, संखावता उ रयणस्स ॥१॥ त्ति वाच्यम् ॥ पं. १३. माणा द्वि-त्रि-चतुः प्रोक्ताः, भूतास्तु तरवः स्मृताः । जीवाः पञ्चेन्द्रिया ज्ञेयाः, शेपाः सत्त्वा उदीरिताः ॥१॥ न अन्जावेयच्च त्ति, अज्जावण-तक्षणं । न परिवेत्तव्या समुद्धनेन । परितापः-क्लमः । उद्दवणे-विणासो । ततश्चैप धर्मः 'खेदजैः' सर्वज्ञः 'लोक' जीवास्तिकायात्मकं 'समेत्य' विज्ञाय तत्पीडायकरणतः प्रवेदितः । कीदृशः ? 'ध्रुवः' त्रिकालभाविवाद मेर्वादियदचलः । ध्रुवत्वादेव नित्यः, नियतो वा पञ्चास्तिकायादिलोकवत् । नियतत्वादेव 'शाश्वतः' अक्षयः । पं. २४. 30 'इना' संज्ञा ॥ पं. ३०. सकलदुःखानां परमौपधभूतं यत् प्रवचनं श्रुतं तस्यार्थतः प्रणेतृत्वाद् भगवतः । १जीपति गवादावुत्पद्यमानानां कृम्यादीनामित्यर्थः ।। ] इत्यादिवचनतः पटप्रच्छादितेषु به 25 ليا السا #L श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्ते: टिप्पनकम् । १०१ ८ 15 [ पृष्ठ ४] पं. ६. पश्चानुपूर्व्या अपश्चिम आयो महावीरः । पं. २२. यत् कर्मक्षयात् प्रभाजालं भगवच्छरीराचतसृप्वपि दिन निर्गच्छति तद् भामण्डलमुच्यते, पृष्ठिभागे एव च तत् प्रदर्शयितुं शक्यते प्रतिमायाः । पं. ३०. ते पुण दुसमय० गाहा । 'ते' उपशान्त-क्षीग-सयोगिकेवलिनः द्विसमयस्थितिकस्य सातस्य योगप्रत्यविकस्य बन्धकाः, बन्ध-वेदनारूपद्विसमयस्थितिकस्येत्यर्थः । न पुनः ‘साम्परायिकसातत्य' कपायनिमित्तस्य बन्धकाः, तेषां कपायाभावात् ॥ 5 [ पृष्ठ ६] पं. २. वाह्या भ्रमिः चक्रधारा, नेमिरित्यर्थः । पं. ३. चरकादिभिरिति, आदिग्रहणाचीरिकादिग्रहः । तत्र पाटिवाहकाः सन्तो ये भिक्षां चरन्ति ते चरकाः, यद्दा ये भुञ्जानाश्चरन्ति ते चरकाः। रथ्यापतितचीरपरिधानाः चीरिकाः, यद्वा येषां चीरमयमेव सर्वमुपकरणं ते चीरिकाः । सुप्रणिधानमेतदिति, सुटु-प्रकर्षण नियते मालम्बने धान-धरणं मनः- प्रमृतेरिति सुप्रणिधान-मनःप्रभृतीनामेकाग्रताकरणमभिधीयते । पं. ११. "सज्झायमुनेमिघोसस्स" ति पाठापेक्षया 10 'नेमिनिघोंपो वा' इत्युक्तवान् । पं. २४. कर्णिका बीजकोशल्पा पद्मसत्का मध्यगण्डिकाशब्दवाच्या। [ पृष्ठ ७] पं. २. यथाशक्ति आ प्राणोपरमात् तपश्चरति । पं. १५. कपिल-कणभक्षा-ऽक्षपादादीति, विशेषोऽय- ममीपामुक्तः- के-वै-शैपङ्गत्वानि, अ-नै-पानां तु पोडश । क्रमेणाऽऽधारिका-धारधारिणन्नि-चतुःप्रमाः (१) ॥१॥ [ कपिलः साङ्ख्यमतप्रणेता । पं. २४. धीवेल. त्ति [गा. ११] वेदिका-जलयोरन्तरे यत् रमणं तल्लक्षणा जलवृद्धिलक्षणा वा वेदिकापर्यवसाना मर्यादा वा । [ पृष्ट ८] पं. २३. चित्तकृडस्स त्ति [गा. १३] “चिती संज्ञाने" नित्यने संज्ञायते यस्तु येनानि निजानि । [ पृष्ट ९] पं. ५. उदरिय ति [गा. १४] उद्दर्पिता इति व्याख्यानम् । पं. ११. गुहाग्नु गमवाया इति मानपदानि, श्रुतरत्नप्ररूपणोपाश्रया वा गुहाः । पं. १३. संवरः प्रत्याख्यानरूपः स एयर: उ-भिमां प्रमरः । [ पृष्ट १०] पं. १८. 'रूपक' नाम गाथैकमात्रं छन्दोविशेषः । पं. २६. विधि-प्रनिघद्वारणेन. पाया. भवरस ते चेव तत्तिया मोक्खे' [ओपनि० गा० ५३) इति वचनार विधि:-भादा : पायः मम पि 25 भगवदादिकल्पः केषाश्चिद् गुरुकर्मणां दूरभन्या-उभच्यानां गोशाल्टक सइमादीनां संगानुर्भवति । प्रतियो- योऽपि कश्चिद् हरि-हरादिमिथ्यात्वगोचरः कस्यापि तदाचरणदिन दिन कीनर. व्यतिरिक्त न किश्चिदस्ति । [१४] पं. २५. मुमुणियनिचा-ऽनिश्चमिति १० गाथायां यथा समन्मा अनुसन्तुष्ट १ कपाद । दति । शेम । गादि । जेरि०।२ पवाद र ! । टि. ; ::: '..? । साराम जेटि० ॥ ४ सागर, सऽपि रक्षा धार्यते बेटी० । 20 १०२ मलयानिशी मीना गनिना सर्वाऽप्युच्यते । सचेतनस्य गुणाः पर्यायाध बापाः जनेतना नाता जी मग जाननादयः राति नार गुणाः, नारकत्वादयश्च क्रमवर्तित्वात् पर्यायाः । अचेतनस्थापि वर्गादयः सहनिवार गुणाः. ना पुराणादाला तरय कमभाविनात् पर्यायाः । तदुक्तम् 5 15 सहवत्ति गुणा कमवत्ति पन्जवा जीवतिगुण निरगाई। वागाइ पोगगुणा, पजागा नव पुराणाई ॥१॥ [ पृष्ठ १५] पं. ८. भापाभिधेया अर्था इत्यादि, सूत्रस्य हि त्रयो व्याख्याप्रकारा भवन्ति--गागा निभाषा वार्तिकगिति । तत्र भाषा--- सुत्ते जो जं सुत्तालावगनिष्फन्नं धात्वर्थमात्रमेव भापते स भापको गण्यते १ । जगा तस्स सुत्तस्स जो दोहिं वा तिहिं वा चउहिं वा पगारेहिं अत्थपयाणि विभासइ सो विभासगो भण्णइ २ । जया सवपनहिं अशं भासइ तदा व्यक्तीकरणाद् वार्तिककरोऽभिधीयते । अत एवोक्तम्-भाषाभिधेया अर्थाः, अल्पभाषणविषया इत्यर्थः, बहुबहुतरभाषणचिगयास्थितरे इत्यमीपामय 10 विभागः । पं. १२. सुकुमालेत्यादिगाथा ४२-सुकुमालकोमलं-अतिमृदु तल-चरणाधोभागरूपं येषां ते तथा तान् । पादान् दूसगणिसत्कान् प्रणमामि । 'प्रशस्तलक्षणान्' चक्र-च्छत्र-पा-वा-चामर-पताका-शा-मीन-श्रीवत्स-मन्दर-स्वस्तिक-कलश- वृषभ-सिंह-गजप्रभृत्यन्यतरसामुद्रिकशास्त्राभिहितलक्षणोपेतान् । प्रावचनिकाः-तत्कालोचितप्रकृष्टागमवेत्तारः सूरयः तेषां सम्ब- न्धिनः । ये पठनार्थमागता अन्यगच्छीयास्साधवस्ते प्रतीच्छका अभिधीयन्ते, तैः प्रणिपतितान् ' प्रणतान् , अनेन बाहुश्रुत्यमुक्तम् । यद्वा तेषां प्रावचनिकानां दूसगणिनाम्नां सुकुमालादिविशेषगविशिष्टान् पादान् प्रणमामीति देववाचक इदमाह ॥ [ पृष्ठ १६] पं. ४. अनुयोजयन्तोऽपि श्रुतादिनोपकुर्वन्तोऽपि अयोग्य जनं दयालवो न खलु भवन्ति महीयांसः, कथम्भूताः सन्तः ? न अवगतः परार्थसम्पादने उपायो यैस्तेऽनवगतपरार्थसम्पादनोपायाः सन्तः, येन हि परार्थसम्पादने उपायो ज्ञातो भवति स एव दयालुर्भवति, नेतरः ॥ पं. ६. लाघवं चाऽस्येति, 'लाघव' हीलां 'अस्य' अध्ययनश्रुतस्य असावयोग्यः सम्पा- दयति, तच्च महतेऽनर्थाय । यत उक्तम्- अप्रशान्तमतौ शास्त्रसद्भावप्रतिपादनम् । दोषायाभिनवोदीर्णे शमनीयमिव वरे ॥१॥ धर्मशास्त्रार्थवैतथ्यात् प्रत्यपायो महान् भवेत् । रौद्रदुःखौघजनको दुष्प्रयुक्तादिवौपधात् ॥२॥ [ पं. ८. आमेत्यादि । अल्पाधारं पात्रं सिद्धान्तरहस्य कर्तृ विनाशयति' धर्मादेभ्रंशयति, यथाऽपक्कघटनिक्षिप्त जलं तमेव घटं विनाशयति' स्वरूपाद् भ्रंशयति ।। पं. १०. तत्राधिकृतगाथामिति, “सेलघण-कुडग-चालणी"त्यादि [गा. ४४] प्रागुपन्यस्ताम् । विनेयजनानुग्रहाय चैनां सभाष्या व्याख्यानयामः सम्प्रत्येव वयम् । तद्यथा-सेलघण० गाथायां 25 सेल' त्ति मुद्गशैलः पापाणविशेषः, घनः-मेघः, मुद्गशैलश्च घनश्च तदुदाहरणं प्रथमम् १ । 'कुटः' घटः २ । 'चालनी' प्रतीता ३। 'परिपूर्णकः' सुघर्राचिटिकागृहम् ४ । हंस-महिप-मप-मशकलका वडाल्या प्रतीतः ५-१० । जाहकः-सेहुलकः ११ । गौः १२ भेरी १३ आगीरी १४ चेति । योग्या-योग्यशिष्यविपयाणि चतुर्दशैतान्युदाहरणानि इति प्रकृतगाथासक्षेपार्थः ॥ उदाहरणं च द्विविधं भवति-चरितं कल्पितं च । तत्रेह प्रथमं कल्पितमुदाहरणम् । एतच्च भाष्यकारो विवृण्वन्नाह- पं. १२-१३. उल्लेऊण न सको, गज्जइ इय मुग्गसेलओ रणे । तं संवयमेहो गंतुं तस्सुप्परिं पडइ ॥ १ ॥ रविउ त्ति ठिओ मेहो, उल्लो मि न व त्ति गजई सेलो । सेलसमं गाहिस्सं निविज्जइ गाहगो एवं ॥ २ ॥ १ "जलोको पिडाला: सं० ॥ 20 . - 30 ? श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १०३ इह कचिदरण्ये पर्वतासन्न प्रदेशे समन्तान्निविडो मुद्गवद् वृत्तत्व-लक्ष्णत्वादिधर्मयुक्तः किञ्चिद् भूतले निमग्नः किञ्चित्तु सप्रकाशचिकचिकायमानो बदरादिप्रमाणलघूपलरूपो मुद्गशैलः किलाऽऽसीत् । स च 'गर्जति' साक्षेपं जपति । कथम् ? इत्याह-अहं 'आर्चीकर्तुं' जलेन भेत्तुं केनापि न शक्य इति । तच्च मुद्गशैलस्य सम्बन्धि गर्ववचः कुतश्चिन्नारदकल्पाच्छ्रुत्वा संवर्तको नाम महामेघः तद्र्वमद्याहमपनयामि' इति सम्प्रधार्य तं मुद्गशैलं गत्वा' सम्प्राप्य तत्यैवोपरि 'पतति निरन्तरं मुशलप्रमाणधाराभिर्वतीयर्थः । संवर्तकमेघश्चोत्सर्पिण्यां शुभीभवति काले पूर्वदग्धभूम्याश्वासनार्थ वर्पतीयागमे प्रतिपाद्यते, तेन 5 भरतक्षेत्रत्य प्रचुरमपि सर्वमशुभानुभावं भूमिरूक्षता-दाहादिकं प्रशस्तस्वकीयोदकेन संवर्तयति-नाशयतीति संवर्तक इत्युच्यते, यतत्तत्य सम्बन्धि जलमतीव भूम्यादेवकं वासकं च भवतीति विशेषतस्तस्येह ग्रहणम् । एवं च सप्ताहोरात्राणि महावृष्टि कृचा "टिओ मेहो" त्ति स्थितः' वृप्टेरुपरतोऽसौ मेघः । कया बुद्धया ? इत्याह-रविउ” त्ति 'द्रावितः' खण्डशो नीतो मयाऽसौ मुद्गशैलः इत्यभिप्रायेणेत्यर्थः । पानीये चापसृते युतरामुज्ज्वलीभूतोऽसौ चिकचिकायमानो मुद्गशैलः पुनरपि गर्नति । कथम् ? इत्याह-"उलो मि न व" त्ति आर्दोऽस्यहं न वेति सम्यग् निरीक्षस्व भोः पुष्करावर्तक !, किमित्येवमेव स्थितोऽसि ? तिलतुपत्रि- 10 भागमात्रमपि ममाचापि न भिद्यते इति । ततो लज्जितो विलक्षीभूतः स्वस्थानमुपाश्रितो मेघः ॥ तदेवं मुद्गशैलोदाहरणमभिधायोपनयमाह- सेलसममित्यादि । यस्य वचनकोटिभिरपि चित्तं न भियते, एकमयक्षरं तन्मध्यान्न परिणमतीयर्थः, स एवम्भूतः शैल- समः-मुद्गशैलतुल्य इत्यर्थः । तं तथाभूतं शिप्यं ज्ञात्वाऽपि कश्चिद् ग्राहयताति ग्राहको गुरुः- आचार्यस्यैव तन्नाड्यं यच्छिप्यो नावबुध्यते । गावो गोपालकेनेव कुतीर्थनावतारिताः ॥१॥ [ ] 1. 'यथा तरीतुं न शक्नुवन्ति ततो गोपालस्यैव तद् नाड्यम् , न तासाम्' इत्यादिश्वीकार्यविभ्रमितमतिर्गवीद अहममुं ग्राहगिन्य' इति प्रतिज्ञाय समागतः, महता च सरम्भेगाध्यापयितुमारब्धस्तथापि मुद्दौलोपमः शियोमरमपि न गृङ्गानि, न न मनागपि रवाग्रहास्तत्वेन बुध्यते । ततश्चैयं यथा पुष्करावर्तस्तथैव सुचिरं शमनुभूय निर्वियते पराभन्यते. ततो बिलशीभूनो ललिता निवर्तते तद्ग्राहणादयमाचार्य इति ॥१॥२॥ एवम्भूतस्य च शिप्यस्य मूत्रार्थदाने भागमे प्रायश्चितगुताम् । कुतः ! इयाद ---- आयरिए सुत्तम्मि य परिवाओ, सुत्त-अत्यपलिमंयो। अन्नेसि पि य हाणी, पुट्टा वि न बुद्धया यंता ॥३॥ एवं शैलसमस्यापि शिष्यस्य सूत्रार्थदानप्रवृत्ते आचार्ये 'रेऽपि च भागमे परिवादः वादो लोकमानक भाति । तपथा-अहो ! नास्य सूरेः प्रतिपादिका शक्तिः, नापि तथाविधं किमपि पक्षिना. दोनये मिलायोगि नमः; भागमोऽप्यमीषा सम्बन्धी निरतिशयो युत्तिविकलच, इतरथा कथनयमकोऽन्दरमाद कायदे ! यति । नया पोर... रायसम्भवात् परिगन्थनं-गर्दनं विनाशनं सूत्रार्यपरिमन्धः, तस्मिन्नस्य गगन टन पाया, भवतीयर्थः । अपरं च तद्ग्राहगप्रसक्त सूरी अन्येषां शियागां त्रातातिः. नदाद : । र तथाविधः शिष्यः किचिदपि ग्राहयितुं शक्यः । कुतः ? इत्यादा मात्रा मानना ड दि"..-..- रतनेषु फरया राधाऽपि वन्भ्या गौन खह दुग्धदा भवति । पहा अादि किया हुम्पदा न भवतीति । एवं मुहालसमः शिप्योऽपि गाहाकाकानि गुरु नायौं न दात यो, ऐहिका-ऽऽगुमिकाकायदादिबहुदोपसन्मान । ददाति बंद हो Prasat गटान्तः, के.दलं. न पापाण गेलादीनां जन्मोऽ: : कि निभियानो प्रतिविधानम् . तपथा- ८ पं. १४. 20 ? . .
पं. १५. ये पुनरभाविताः कुटास्ते हिद-भिन्न-खण्ड-सकलभेदाच्चतुर्विधाः । अथवा कुटोदाहरणस्य भाविता-ऽभावितपक्षनिरपेक्ष १०४ चरियं च कप्पियं चिय आहरणं दुविमेव पान । धारा सामान मागलाण ॥ १॥ {गि निगा० ६३०) न वि अस्थि न वि य होही उलायो गुग्गरोन्ट महागं । उनमा म पम का गानय गतिलोक गाणः ॥२॥ [ उरानि गा० ३०९, अनुमो० पर २३२ ] इत्यलं प्रसङ्गेनेति ॥३॥ अथ मुद्गौलप्रतिपक्षमतं घनदृष्टान्तमाह - बुट्टे वि दोणमेहे न कण्ह भोमाउ लोष्टए उदगं । गण-धरणासमत्थे इय देयमछित्तिकारिम्मि ॥ ४ ॥ यावता वृष्टेनाऽऽकाशबिन्दुभिर्महती गर्गरी भियते तावःप्रमा गजलवगी मेगो द्रोणमेघ उगते । तस्मिन् वृन्टेऽणि सति कृष्णा भूमियत्र प्रदेशेऽसौ कृष्णभूमः प्रदेशस्तस्माद् 'न प्रलोठति' वापि तद् गेमजलं पतितं न दृष्ठिवाड्यन्त्र गलति, किन्तु तत्रैवान्तः प्रविशतीति भावः । एवं शिष्योऽपि स कश्चिद् भवति यो गुरुनिरुक्तं बाप्यवधारराति, न पुनरक्षरमणि पार्थतो गन्तीति । एव- 10 म्भूते च सूत्रार्थग्रहण-धारणासमर्थे शिप्ये सूत्रार्थयोः शिष्य-प्रशिष्यपरम्पराप्रदानेनाव्यवछेदकारिणि देयं सूत्रार्थजातम्, नान्यस्मि- न्ननन्तराभिहितमुद्गशैलकल्पे इति ॥४॥ अन्वय-व्यतिरेकात्मकत्वादेकमेवेदमुदाहरणम् । अथ द्वितीय कुटोदाहरणं विवृण्वन्नाह -- पं. १६-१८. भाविय इयरे य कुडा अपसत्य-पसत्यभाविया दुबिहा । पुप्फाईहिं पसत्था, सुर-तेल्लाईहिं अपसत्या ॥ ५ ॥ वम्मा य अवम्मा वि य, पसत्यवम्मा उ होति उ अगेज्झा। अपसत्थअवम्मा वि य, तप्पडिवक्खा भवे गज्झा ॥६॥ कुप्पवयण-ओसण्णेहि भाविया एवमेव भावकुडा। संविग्गेहिं पसत्था, वम्माऽवम्मा य तह चेव ॥ ७॥ कुटाः-घटाः । ते च तावद् द्विविधाः-एके आपाकोत्तीर्णा नूतना अव्याप्रियमाणत्वादद्यापि पुष्प-जल-तैलादिनाऽभाविताः, अन्ये तु व्याप्रियमाणत्वाद् भाविताः। तत्र भाविता द्विविधाः-सुरभिपाटलाकुसुम-पट्टवासादिप्रशस्तवस्तुभिर्भाविताः प्रशस्तभाविताः १ 20 सुरा-तैलाद्यप्रशस्तवस्तुभावितास्त्वप्रशस्तभाविताः २ ॥५॥ प्रशस्तभाविताः पुनरपि द्विविधाः-तद्भावं वमयितुं शक्या वाम्याः, तद्विपरीतास्त्ववाम्याः । एवमप्रशस्तभाविता अपि वाम्या-ऽवाम्यभेदद्वयादेव द्विविधाः। तत्र ये प्रशस्तवाम्याः प्रशस्तभावं वयितुं शक्यास्तेऽग्राह्या भवन्ति, अनादेयाः असुन्दरा इति यावत् । तथा येऽप्रशस्तभावं वमयितुमशक्याः अप्रशस्तावास्यास्तेऽप्यग्राह्या भवन्ति । "तप्पडिवक्खा भवे गझ” त्ति तेषा- प्रशस्तवाम्यानामप्रशस्तावाम्यानां च ये प्रतिपक्षाः-प्रशस्तावाम्या अप्रशस्तवाम्याश्च ते 'ग्राह्याः' आदेयाः सुन्दरा भवन्ति ॥६॥ तदेवं द्रव्यकुटास्तावत् प्ररूपिताः । भावकुटा अपि प्रशस्ता-प्रशस्तगुणजलाधारत्वात् शिष्यजीवा एवमेव भाविता- ऽभावितादिभेदाद् द्रष्टव्याः । केवलमत्र पक्षे कुप्रवचना-ऽबसन्नादिभिर्भाविता अप्रशस्तभाविता उच्यन्त इत्यध्याहारः । ये तु संविग्नैरेव साधुभिर्भावितास्ते 'प्रशस्ताः' प्रशस्तभाविता इत्यर्थः । “वम्माऽवम्मा य तह चेव" त्ति वाम्या-ऽवाम्यभावना यथा द्रव्य कुटपक्षे तथैव भावकुटपक्षेऽपि द्रष्टव्येत्यर्थः । सा चैवम्-प्रशस्तभाविता वाम्या अप्रशस्तभावितास्त्ववाम्याः एते उभयेऽप्यग्राह्याः, उक्तविपरीतास्तु ग्राह्या इति ॥७॥ तदेवमुक्तो भावितकुटपक्षः । अथाभावितकुटपक्षमधिकृत्याह- जे उण अभाविया ते चउन्विहा, अहविमो गमो अन्नो । छिद्दकुड भिन्न खंडे सगले य पख्वणा तेसि ।। ८ ॥ 15 25 30 पं. १९. एवायमन्यस्टिद्र-भिन्नादिको 'गमः' प्रकारो वर्तते । तमेवाह-छिद्दकुडे"त्यादि, इह 'कुटः' घटः कोऽपि तावत् छिद्रः भवति, बुग्ने - 5 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिनूत्रवृत्ते: टिपनकम् । १०५ सच्छिद्रो भवतीत्यर्थः १ अन्यत्तु 'भिन्नः' राजिमान् भवति २ तृतीयन्तु 'खण्डः' भन्नकर्णः ३ चतुर्थस्तु 'सकल' परिपूर्ण एवेति ४ । एतेषां च चतुर्णामपि कुटभेदानां दाष्टन्तिकमधिकृत्य प्ररूपमा स्वयमेव कार्या. यथा-कोऽपि शिष्यः श्रुतमहणमाश्रित्य छिन्- घटकल्यो भवति, कश्चित्तु भिन्नघटकल्प इत्यादि वायमिति ॥८॥ अथ क्रममा चालन्युदाहरणमभिवितुर्मुद्गौल-च्छिद्र कुट- चालन्युदाहरणानां परस्पराभेद्रोद्भावकशिप्यमतं च निगचिकीर्षुराह-- पं. २०-२१. सेले य छि चालणि मिहो कहा सोउमुढ़ियाणं तु । छिट्ठाऽऽह, तत्य चिटो सुमरिंसु, सरामि नेदाणि ॥ ९ ॥ एगेण विसइ बीएण नीइ कपणेण, चालणी आह । धन्न त्य आह सेलो, जं पविसइ नीइ वा तुझं ॥१०॥ शैल-च्छिद्रकुट-चालन्युदाहरणैः प्रतिपादिताः गिया अभ्युपचारात तयोच्यन्ते. तसादृश्यात् । ततश्च शैल-छिटकुट-चाल- न्यभिधानानां शिष्याणां गुर्वन्तिके व्याख्यानं श्रुत्वोथायान्यत्र गतानां 'मिथः परस्परं कथा समभवत् । कीरशी ? इत्याह-- 10 छिन्यादि । छिद्रघटकल्पश्चिशिष्यः प्राह । किम् ? इत्याह-'तत्रगुरुसमी उपविटलदुक्तमन्मार्पमहम् , इदानीं तु न किमपि स्मरामि । छिन्नघटोऽपि होवविध एव भवति. सोऽपि हि स्थानस्थितो मुगादिकं प्रति धरति, अन्यत्र तृभिन्न नीतस्य नन्न प्रायते. अनित्रेण गलित्वा निःस्तत्वात् , अतस्तकल्पः शिवोऽयी यमाहीत भावः ।।९।। छिद्रकुटकल्पेन शिष्येणैवमुक्ते चालनीकल्पः प्राह- एगेणत्यादि । चालनीकल्पः शिव्यथालनी । म प्राइ-भोः छिकुट बोमनन्वं चन गुनमानी परधेन न्चया नादाग्नि 1: तद्वचः पश्चादेव विरमृतम्, मम तु गुर्वन्तिक स्थितम्येकन कर्णन विजनिहितीयन तु निगमति न पुनः किमविदलय चितम्, कणिकादिचालन्या अपि हि जलादिकमुपरिभागेन भियते. अधीमागेन न नि. न न किमपि सनि. असालपमः शिष्योऽपीथमेवाऽऽहेति भावः । तदेवं छिद्रकुट-चालनीन्यामेवाने मुगल-माति. मी यानि -गाकर युवाम् , 'यद यस्मात् कारणाद युवयोग्तावन् कर्णयोगनं किमनि मन . ना. नारा सर्वथाऽपि मध्ये प्रवेशाभावात् : उपलभ्येयंविधत्वाचति भाव पनि ॥१०॥ प्रा. चालन्युदाहरणानां परस्परं विशेषचामिहिनः । अथ चालना निपगार पं. २२. नावमग्नतरवादिणयं मालणिपटिपरमाननादानि परिपूणगम्सि ट गुणा गनि. दाना मिनि ।।१ चालनाप्रतिपक्षो भवनीति शेपः । किं तत्या--नापा :: गंटाटिना। तच विन्द वं शुम्बादिकं च द्रव्यमान नागिता जना भवति, किन्तु सम्यग धानि, एवं शिष्योऽपि यो गा...:::. इति भावः । अथ परिपूर्णकोदा मामा-परियार कि तं गायत. तात्र कारपासपति :- ग. -: नः नसाधन गुमाः सर्वेऽपि तदा पनि... सद पनि लोयर जाति :::: , ६. - १. " मा प्रति ..
१०६ पं. २३. - 10 ? 15 सवण्णुप्पामशा दोला न संनि जिमए के। जं अणुवउत्तकरणं अपत्तमानज्ज होता ॥ १२ ॥ ननु 'सर्वज्ञप्रामाण्यात्' 'सर्वज्ञोऽस्य प्रवर्तकः' इति नामिनाले यो नि ग म मुसी गर्ग, ननकानाय को विनोपान ग्रहीप्यति ? असत्वादेवेति भावः, सत्यम् , किन्तु यनारे जिनगी दोगा न स सानुगापुरम गुरोगा कानयागाविधान 5 तदाश्रित्य दोपा भवेयुरिति सम्बन्धः । अथवा जना गम्' अगोग किया जिनमो-गि जियोग्रेशिता दोगा भनेयुः, निर्दोपेऽपि हि जिनमतेऽपात्रभूताः शिया असतोऽपि दोगानुहावयनयोगः । तमा न लेनमारो भान्ति । ताशा-- पागयभासनिबद्धं को वा जाणइ पणीय केणेयं । किं वा चरणेणं तू दाणेण विणा उ हनद ! ति ॥१॥ काया वया य ते चिय, ते चेव पमाय अपमाया य । मोलाहिगारियाणं जोइरानोगीहिं कि कर्ज ! ॥२॥ [कामाय गा. १३०३, ४९७९ ] को आउरस्स कालो ? मइलंबरधोयणे य को कालो ? । जइ मोक्खहे उ नाणं को कालो ? तस्सऽकालो वा ? ॥३॥ [निशीशभाप्य गा. १० ] इत्यादि । असन्तश्च सर्वेऽप्यमी दोपाः, वाल-स्त्री-मूढ-मूर्खाणां नृणां चारित्रकाङ्क्षिणाम् । अनुग्रहार्थ तत्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः ॥१॥ पुव्वभणियं पि जं वत्थु भण्णए तत्थ कारणं अस्थि । पडिसहो य अणुण्णा वायुविसेसोवलंभो वा ॥२॥ इत्यादिना शास्त्रान्तरे विस्तरेण निराकृतत्वादिति ॥१२॥ अथ हंसोदाहरणव्याख्यामाह- अंवत्तणेण जीहाए कृचिया होइ खीरमुदगम्सि | हंसो मोत्तूण जलं आवियइ पयं, तह सुसीसो ॥ १३ ॥ दुग्धं जलं च मिश्रयित्वा भाजने व्यवस्थाप्य कोऽपि हंसस्य पानार्थमुपनयति, स च तन्मध्ये चञ्चु प्रक्षिपति, तस्य च जिह्वा स्वभावत एवाम्ला भवति, तेन च जिह्वाया अम्लत्वेन हेतुभूतेनोदकमध्यगतं दुग्धं वित्तुलित्वा 'कूचिकाः' बिन्दुरूपा बुद्बुदा भवन्ती- 20 त्यर्थः, ततश्च जलं मुक्त्वा तद् बुद्बुदीभूतं दुग्धमापिबति हंसः । तथा सुशिष्योऽपि गुरोर्जलस्थानीयान् दोपान् परित्यज्य दुग्ध- स्थानीयान् गुणान् गृह्णातीत्यर्थ इति ॥१३॥ अथ महिपोदाहरणं विवृण्वन्नाह- सयमवि न पियइ महिसो, न य जूहं पियइ लोडियं उद्गं । विग्गह-विगहाहि तहा अथकपुच्छाहि य कुसीसो ॥ १४ ॥ स्वयूथेन समं वनमहिपो जलाशये कचिद् गत्वा तन्मध्ये च प्रविश्योद्वर्तन-परावर्तनादिभिस्तथा तज्जलमालोडयति यथा 25 कलुपितं सन्न स्वयं पिबति, नापि तयूथम् । एवं कुशिष्योऽपि व्याख्यानमण्डलिकायामुपविष्टो गुरुणाऽन्येन वा शिष्येण सह विग्रह-कलहं उंदीरयति, विकथाप्रबन्धं वा कञ्चिचालयति, सम्बद्धा-सम्बदरूपाभिरनवरतमुपर्युपरिपृच्छाभिश्च तथा कथञ्चिद् व्याख्यानमालोडयति यथा नाऽऽमनः किश्चित् पर्यवस्यति, नापि शेपविनेयानामिति ॥१४॥ मेपोदाहरणमाह- अवि गोपयम्मि वि पिचे सुढिओ तणुयत्तणेण तुंडस्स । न करेइ कलुस तोयं मेसो, एवं सुसीसो वि ॥ १५ ॥ 'अपि' इति सम्भावने । जलभृते याचिद् गोप्पदेऽपि "मुढिओ” त्ति सङ्कुचिताङ्गः 'मेपः' ऊरणकः पिबेज्जलम् , न च तत्र कलुपं करोति । केन हेतुना ? इत्याह-'तनुकत्वेन' अग्रभागे लण्डस्या मुखस्येति, अग्रपादाभ्यामवनम्य तीक्ष्णेन पं. २४. पं. २५. पं. २६. 30 ? १ करोति सं० ॥
पं.२७. पं. २८. श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दीसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १०७ मुखेन तथाऽसौ जलं पिबति यथा सर्वथैव कल्पं न भवति । एवं मुशियोऽपि तथा गुरोः सकाशानिभृतः श्रुतं गृह्णाति यथा तस्य परिपदो वा न कस्यचिन्ननोवाधादिकं कालप्यं भवति ॥१५॥ मशक-जलूकोदाहरणयविकृतिमाह- मस व्व तुदं जच्चाइएहिं निच्छुभए कुलीसो चि। जलुगा व अदूमेंतो पियह सुलीसो सुयनाणं ॥ १६ ॥ यथा मशको नत्तून् 'तुदति व्यथयति, ततश्च वनाइलादिमिलिन्कृत्य दुर्गक्रियते, तथा कुशियोऽपि जात्यादिवोपोद- 5 नर्गुरं 'तुदन' व्यथमानो 'निकास्यते' परिहियत इति । जसका पुनधासृन विवनि, न चासमन्तं यययंते, तथा मुशियोऽपि गुरुभ्यः श्रुतज्ञानं पिवति' गृह्णाति, न तु नान बायुवनादिना दुनोतीनि ॥१६॥ विडाल्युदाहरणमाह- छट्टेड सूनीए खीरं जह पिया हमजारी। परिमुष्टियाण पासे सिवइ एवं विणयमंसी ॥ १७ ॥ यथा दुष्टमार्जारी तथाविधत्वभावतया स्थायाः श्री भूमौ छविया पिवति. न पुनलन्थन तथा च सति न तत् 10 नन्यास्तथाविधं किञ्चित् पर्यवस्यति । एवं विनयाद नश्यनीति विनयभंगी विनयकरगीतः कुशियो गोष्टामाहिलयत परिषद्- स्थितानां विन्ध्यादीनामिव पार्श्व शिझते श्रुतं गृहगाति, न तु गुरोः समी, ननिय कामयात् । न च तुटमा नयानीयः कुशिष्यः, भूमिकल्पान्नु परिषदुन्थिताः शियाः, छदितदुग्धपाननदशं तु नानथुनकामिति ॥१आ जाकोबाहरणमाह- पाई धोवं योवं चीरं पानाई जाहको लिकह। एमेर जियं का पुच्छह महमं, न पद ॥ १८ ॥ यथा भाजनगत भी नोकं रतीकं पाया जाहकः मलको भावना निमी. पुनर्गर न नो ना पीना भाजनपानि लहि, एवं पुनः पुनन्नावत् करोति यावत माधिन- । - मेनका जित-परिचितं कृत्वा पुनरन्यद गृहगानि, एवं पुनः पुनानायक विकास मन गुरं खेदयतीति ॥१८॥ अथ गोरान्त उन्न-- तत्र च केनापि यजमानेन वेदान्तर्गनागिन प्रोक्ताश्च तेन ते वालणा:-याकाणासी गलियोनि । :: तेन तर्थयोक्ताः । तत्र च प्रथमतिकानां गये किम् । याद ---- अग्लो दोलितति वाहं निरस वि!ि घडचरणगी मा. कामालीन समार': नवतितम- दादा :- प. पयोमीपता:: :::::::- म । ती विनापि, या पं.२९. . ५ 1.
पं. १. 5 पं.२. 10 - १०८ महाभारि मार गिनिर्मित अन्यैस्तु यैश्चतुर्भिश्चरणैगलिया तन्मध्ये प्रथाजनां सुना नागवानी लागाति । किग ! इत्याह.---- [पृष्ठ १७] मा से होज अवणो, गोवज्या वा, पुणो वि न दलेला । वयमवि दोज्झामो पुणो, अणुग्गहो अपणदुढे वि ।। २० ।। मा भूद् जनमध्ये ममावर्णवादः, गोहत्या वा मा भूत , इतोऽस्याभारी प्रगन्यामि, यदि तु न दास्यामि तदा सनात- कलकेभ्योऽस्मभ्यं पुनर्गवादिकं किमपि कोऽपि न दास्यति, अपरं चैतस्यै नारीप्रदाने को दोगः ! प्रत्युत गुण एव, यतवारी- प्रदानपुष्टामेनां पुनरपि वारकेणाऽऽगतां वयमेव धोक्यामः, यदि वाऽन्येनापि ब्रामणेन दुग्धागामेतस्यामस्माकमेवानुग्रह इति ॥२०॥ अथोपनयमाह--- सीसा पडिच्छगाणं भरो त्ति, ते वि य हु सीसगभरो त्ति । न करेंति, सुत्तहाणी, अण्णत्थ वि दुलहं तेसि ।। २१ ।। गुरोविनयकर्मणि कर्तव्ये स्वगच्छदीक्षिताः शिप्यास्तावचिन्तयन्ति । किम् ? इत्याह-'प्रतीच्छकानाम्' उपसम्पन्नानामागन्तुक शिष्याणामयं गुरोविनयकरणलक्षणः ‘भरः' आचारः, किंमस्माकम् ! तेपामेव साम्प्रतं वल्लभत्वादिति । तेऽपि च प्रतीच्छका एवं सम्प्रधारयन्ति-निजशिष्याणामेवायं भरः, किमस्माकमागन्तुकानामय समागतानामन्येयुर्जिगमिपूणाम् ? इति । एवं सम्प्रधार्य उभयेऽपि गुरोर्न किञ्चिद् विनय-वैयावृत्यादिकं कुर्वन्ति । ततश्च गुरुप्ववसीदत्सु तेषां सूत्रा-ऽर्थहानिः, अन्यत्रापि च गतानां तेषां' 15 दुर्विनीतानां दुर्लभ सूत्रमर्थश्च । उपलक्षणत्वादन्येऽप्यवर्णवादादयो दोपाः स्वयमेवाभ्यूह्याः । अयं च दुर्विनीतशिष्योपनयः कृतः । सुविनीतविनेयोपनयस्तूक्तविपर्ययेण स्वयमेव कर्तव्य इति ॥२१॥ भेरीदृष्टान्तमाह- पं. ३-६. कोमुझ्या तह संगामिया य उन्भूइया य भेरीओ। कण्हस्साऽऽसि ण्हु तया, असिवोवसमी चउत्थी उ ॥ २२ ॥ सक पसंसा, गुणगाहि केसवा, नेमिवंद, सुणदंता । आसरयणस्स हरणं, कुमारभंगे य, पुयजुद्धं ॥ २३ ॥ नेहि, जिओ मि त्ति अहं, असिवोवसमीए संपयाणं च । छम्मासिय घोसणया पसमइ, न य जायए अन्नो ॥ २४ ॥ आगंतु वाहिखोभो, महिड्ढि मोल्लेण, कंथ. दंडणया । अहम आराहण, अन्न भेरि, अन्नस्त ठवणं च ॥ २५ ॥ आसां भावार्यः कथानकेनोच्यते-द्वारवत्यां नगर्यां वासुदेवस्य राव्यं पालयतो गोशीर्षश्रीखण्डमण्यो देवतापरिगृहीतास्तिस्रो भेर्य आसन् । तयथा-कौमुदिकी साझामिकी औद्भतिकीति । तत्राऽऽया कौमुदीमहोत्सवायुत्सवज्ञापनार्थं वायते, द्वितीया समामकाले समुपस्थिते सामन्तादीनां ज्ञापनार्थं वायते, तृतीया पुनरुद्भूते आगन्तुके कस्मिंश्चित् प्रयोजने सामन्ता-ऽमात्यादि. लोकस्यैव ज्ञापनार्थं वायते । चतुर्थ्यपि गोशीपश्रीखण्डमयी मेरी तस्याऽऽसीत् , इयं तु पटपण्मासपर्यन्ते वाद्यते, यश्च तच्छन्द शृणोति तस्यातीतमनागतं च प्रत्येकं पाण्मासिकमशिवमुपशाम्यति ॥२२॥ इयं च प्रकृतोपयोगिनी चतुर्थी मेरीति तदुत्पत्ति- 30 लिख्यते-कदाचित् सौधर्मदेवलोके समस्तामरसभापुर:सरमभिहितं शक्रेण- - - 20 25 .
- ICE श्रीहरिभद्रनुरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्ते: टिप्पनकम् । १०९ पेच्छ अहो! हरिपनुहा सम्पुरिसा दोसलखमझे वि । गिहंति गुणं चिय, तह न नीयजुझेग जुझंति ॥१॥ एयं असद्दहतो कोइ कुरो चिंतए, किह णु एवं । संभवइ ? जं अगहिउँ परद्रोसं चिट्ठए कोइ ॥२॥ इय चिंतिझग इहई समागओ, तो विउच्चए एसो । बीमच्छकसणवणं अदुगंधं मयगमुणथं ॥३॥ तस्स य मुहे विश्व कुंदुजलपबरदसगरिछोलि । नेमिजिगवंदनाथं चलियत्स पहम्मि हरिणो य ॥४॥ तं उबदंसह गुणयं, भग्गं गंवेण तत्स हरिसणं । सयलं पि उपहेणं वनड़कण्ही उण सल्वं ॥५॥ विविहं भावतो पोग्गलाण वचइ पहेण तेगेव । दश मुणयंत्वं पभणइ गरुयत्तगेंगे ॥६॥ अहमसि गलिगवथंचले व वयणे इमत्स पेच्छ अहो ! । मुत्तावलि व्यहइ निम्मलजुन्हा दसगपंती ॥७॥ मह चिंतियं सुरेणं. सचं जं अमरसामिणा भगियं । नूण गुणं चिय गरुया पेच्छन्ति परस्सा न हु दोसं ॥८॥ अह अन्नविणे देवो तुरयं अवहाइ वटहं हरिगो । सेन्नं च तत्स सवलं विगिभियं तेग कुलगं || तो अप्पणा वि पिण्ड तुल्यस्स कुटावयम्मि पडिलागो । मह देवेणं भगियं, जिणि घेन्यंति स्वगाई ।।१०।। तो जुझामो त्ति भणेइ केसवो, किंतु रहवरे महयं । तो गेह तुमं पि न्हं जेग समाणं हवइ जुम् ॥११॥ नेच्छइ एयं देवो, तुरएहिं गयाइरहिं वि स जुझं । जा नेच्छइ ना भगिओ हरिणा. तो भगन तुममेव ॥१२॥ देवेण तो भणियं, परम्मुहा दो वि होइङ्ग पुणो । जुन्झामो पुययाहिं. भाई नो कमलो देवं ॥१३॥ नह एवं तो विजिओ मयं तुम, तुगमं नेहि । जुझामि पुगो कहमति न दुपनिसनीयजुझंग ॥१४॥ संजायपञ्चओ सो पञ्चकन्यो होहऊग तो देवो । भगह. नमोहं देवान सां. मग कंपिक ॥१५॥ अह भगद्द केसवो, असिवपसमणि तो पयच्छ मह मेनि । दिग्या वयागमनको सादि न गओ ॥१६॥ छाहं छाहं मासाग सा य वाइजए तहिं भरी। जो दुगह नीम पुकुमार काहीयो२७॥ नासंति तम्स, अवगओ तह य न हु होनि जाय कमाना । मामा को को बागो को ॥१८॥ दाहरण धणियं अभिभूओ भरिरकग्वयं भणः । १९|| भेरीए हिंदिऊणं दिण्णं तगावि लोभवसंगणं । संवेग जी दय अन्नाग विदितेग तेण का काया मा भीमा "मा21 कंथत्तणेण तीस सद्दो मुळ्या न हरिमभाग वि । यात्रीकरण माराविओ य सो भरिरवग्यओ. नेग समं पाई। अन्नो य केसवेणं कामो तहि भरिपालोमो::: वह थमुपनयोऽपि यः -य: योऽशियोपनिया 7::... :: तादिशिग्गलयः कायरोति स न गोग्यः, या का जधाऽऽभीरीमान्तं दिलण्दना- मुध तया अगाहिए. परिणति को मना नही ! पिण, अाचिर. विहिप गएम गायत्री : 17 र कमान भावार्य गरे । ' कर दिया । किन- माय । समापन . ..
5 पं. ८. ११० गलभारिणी-मीन मिताली धृतवारकोऽयं मयाऽगृहीत एव मुक्तस्ततो गानः । आभीरत्वास-उसने नगमा ननानि नोमा गया लौव परियानोऽयं कृतत्ततो भग्नः । इत्युभयोरपि कलहः समभवत् । पिरिता न तेनाऽऽभारी । कल तो गोरगति प्रतिग , उरित- शेपेण च घृतेनोत्सूरेऽर्थोऽप्यूनो लयः । इतरेषु च सार्शिकेपु एतं विवीय गतेगु तोकाकिनोगताना मन्त्री बन्नीवर्दाथ सर्वं तस्करैरपहृतमिति ॥२६॥ एवं दृष्टान्तमभिधायोपनयमाह- मा निण्हव इय दाङ, उवउजिय देहि. किं विचिंतेसि ? । विचामेलियदाणे किलिस्ससे तं च १ चेव ॥ २७ ।। चिन्तनिकाद्यवस्थायां वितथं प्ररूपयन्नधीयानो वा गुरुणा शिक्षितः शिष्यो जगाद-स्वयैव ममेशं व्याख्यातम् , पाठितो वा त्वयैवैवंविधमहम् , अतस्तवैव दोषोऽयम् , किं मां शिक्षयसि ? । आचार्यः प्रांह-न मयैवमुपदिष्टम् । कुशिष्यो ब्रवीति-हन्त ! साक्षादेव मम पुरस्सरमित्थं सूत्रमर्थं वा दत्त्वा सूरे ! मा निहोपीस्त्वम् । इत्यमुक्त आनार्यः किमप्यन्तायन् पुनरप्युक्तः शिष्या- 10 भासेन-किं चलीवात् पातित इव चिन्तयसि ? भव्यगत्या 'उपयुन्य उपयुक्तो भूत्या देहि सूत्रा-ऽर्थी, 'व्यत्यानेडितदाने' वितथ- सूत्रार्थप्रदाने केवलं त्वं अहं च क्लेशमेवानुभवावः । तदिन्थं स्वदोपाप्रतिपत्ती गुरुदोषोदावने वाऽऽभीरमिथुनस्येव गुरु-शिष्ययोः कलह एव प्रवर्तते । तथा च सति व्याख्याव्यवच्छित्ति-सूत्रार्थहान्यादयो दोपाः ॥ अत्र प्रतिपक्षः स्वयमेव द्रष्टव्यः । तथाहि- अन्योऽप्याभीरः किल सकलत्रस्तथैव कापि नगरे घृतविक्रयार्थ गतः । कलत्रस्य च बारके समर्षिते भग्ने च 'अहो! मयाऽनुपयुक्तेन समर्पितोऽयम्' इति ब्रुवाणो झगिति गन्त्र्याः समुत्तीर्य कपरकैर्वृतं संवृणोति । भार्याऽपि 'धिग् मयाऽनुपयुक्तया दुप्प- 15 रिगृहीतः कृतोऽसौ तेन भग्नः' इति वदन्ती तथैव तत् संवृणोति । ततश्चान्योन्यं कलहेऽजाते उभयसंवित्या घृतं शीघ्रमेव विक्रीतम् । सार्थिकैश्च सह क्षेमेण स्वस्थानं जग्मतुः । एवं गुरु-शिष्या अपि स्वदोपं प्रतिपद्यमानाः परदोपं तु निढुवाना येऽन्योन्यं न विवदन्ते। त एव सूत्रार्थप्रदान-ग्रहणयोर्योग्या भवन्ति निर्जरादिलाभभागिनश्चेति ॥२७॥ तदेवं योग्या-ऽयोग्यान् गुरून् शिष्यांश्चोपदोपसंहारपूर्वकं तत्फलमाह- भणिया जोगा-जोग्गा मीसा गुरवो य, तत्थ दोण्हं पि । वेयालियगुण-दोसो, जोग्गो जोग्गस्स भासेज्जा ॥ २८॥ भगिता योग्या-ऽयोग्या गुरु-शिष्याः। तत्र 'द्वयोरपि' गुरु-शिष्ययोर्विचारितगुण-दोपयोोग्यो गुरुयोग्याय शिष्याय सूत्रा-ऽर्थी भापेतेति ॥२८॥ पं. १६. 'अज्ञिका' परिज्ञानरहिता । पं. २१. पगईमुद्धेत्यादिगाथा-~-अज्ञिका प्रकृत्या मुग्धा भवति । कुतः प्रक- त्या मुग्धा भवति ? “मियछावय” त्ति छावगशब्दः सर्वत्र सम्बध्यते, ततो मृग-सिंह-कुक्कुटशावं लघु मृगाद्यपत्यं तद्भूता, अत्यन्त ल्व- 25 साम्यात् तत्सदृशी येत्यर्थः । सहजरत्नमिवासंस्कृता 'मुखसंज्ञाप्या' सुखप्रज्ञापनीया 'गुणैः' गुरुवहुमानादिभिः समृद्धा । अन्यच-- जा खल्लु अभाविया कुस्सुईहिं न य ससमए गहियसारा । अकिलेसकरा सा खलु वइरं छकोडिसुद्धं व ॥१॥ --- पं. ९. 20 [कल्पभाष्य गा० ३६८] पटकोणविशुद्धं 'वनमिय' हीरक इव विशुद्धा या सा खल्वज्ञायकपर्पदिति वाक्यशेपः ॥ पल्लवग्राहित्वादिकं च महतेऽनीय, सम्पूर्णश्रुताभावात् :। तदुक्तम्-~~ पल्लवग्राहि पाण्ड्यिं, क्रयक्रीतं च मैथुनम् । भोजनं च परायत्तं, तिखः पुंसां विडम्बनाः ॥१॥ १ पराधीनं सं० ॥ 30 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्ते: टिप्पनकम् । . . मज्ञः सुखमाराध्यः, मुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । ज्ञानवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि न न रञ्जयति ॥२॥ [भर्तृहरित्रिशती १.२] अत्राऽऽद्यपर्पयं योग्यम् , तृतीया वयोग्येति ।। [ पृष्ठ १८] 'पं. १. नाणमित्यादि। पं. २. सामान्य-विशेषात्मक वस्तुनि विशेषमणामको बोयो ज्ञानं संविदुयते । करणा- उपादाना-ऽधिकरण-कर्तृसाधनोऽपि ज्ञानशब्दो व्युपायः । नवरं कर्तृपक्षे ज्ञान-ज्ञानिनोः कथविदयतिकानात्मैव ज्ञानन् , जानाति । चं रूपं बाह्यभावांश्चेति ज्ञानम् , प्रदीपबत् ल्व-परावमासिवाद ज्ञानस्येति भात्रः । अत एवाऽऽ पं. ३. स्व-विपति स्व-विषययो:-आत्म-बाब्यार्थियोः संवेदनं सुपं यत्येति विग्रहः ।। पं. ७. क च च इन-अनुबन्यो यस्य प्रत्ययस्येति विहः. कानुबन्ध खानुबन्धे चेत्यर्थः । मनादिगणच अच्च अजायत् तन्मात् . अजादीनां तदन्याकारान्तानां च टापिति लियामा प्रवर्तते । पं. १०. कुव्याख्येति. 'विध इत्यकारान्तोऽयम् इति केचिदाहुः तदस्य न सम्मतमिति रूपसिद्दिर्शिता ।। पं. १२. अत्यं० गाहा-दहोपचारादर्थप्रत्यायनहतुवाच्च एव वन्चर्थोऽत्र. ततः वाचमेवार्थत्यायकमर्हन भापते. न तु 10 साक्षादर्थम् , तस्याशब्दरूपत्वेनाभिलपितुमशक्ययात् । गगनोऽपि च शवामकमेव ध्रुनं पतन्ति निगमानं कळवा । तहर्चुभयोः कः प्रतिविशेषः ? इति चेत् , उच्यते स हि भगवान् विशिष्टमनिनन्यगान गाया प्रमूनार्थनमा स्वयमेवाभिवरो, वीजमात्रनया, न चितरजनसाधारणं ग्रन्थगशिमिति, प्रभृतार्थनार्थकम्भाषितम्य गनगनी का कामिति दि इति पं. १८. नत्रेति ज्ञानरचक्रमध्ये । आभिनिवधिकहानसिक न:-अभिल यावानी अर्थाभिमुग्वः अथवल्लायातत्वेन तन्नान्तीयकोडच न्यथः । 'नियनः दकिसी ने भी मानानाम- 15 न्द्रियागां शब्द-रूप-नस-गन्ध-स्पर्शाः स्वविषया मान्यतया नियन्त. न कि विकास को कोषको अभिनिबोध एवाऽऽभिनिवाधिकम् . बिनधादिपाठान बार्थ मिनि, जागिर एव किन्तु यथावटमानमन्यथाऽपि व्युत्पाद्यम् । पं. १९. अभिनित ':. :: . अभिनिवुभ्यते तदिन्यत्र तु गतिज्ञानं कर्माग्नि. ना पानी का काम ::.::. नदिन रूपत्यादिति, स्वयमेव ज्ञानं नीलादिसायनागानं या “ओदनं पचति देवदाः' इत्यादिपु भय कर्म- कागद.::. कथं तदन्यवहारः ? याचाऽ-भदोपचारादित ::: उपचर्यन इनि मायः । यया ज्ञानं पार कर पाना : ज्ञानमुत्तम् । अथवा ज्ञानं योपाम सागा दान अनेन प्रस्तुत जामन नदायरणामोपान दाना : -:: प्रानजानात यापरामा। पं .. अभिनय सति जामिनियोषिताम् । नपान गगनको गाथार्थः ।। . ** ? -1 ... . संधि पर जाने की . . ! ::...:.
११२ गलपारिभानगिनिर्मित पं. २६. यद्वा शृणोतीति शुनमागेवोन्यते, ज्ञान ज्ञानियोः कानिद निकाल मनोयोगपरिणाम ततः शुनं भवति तदत्रापि शब्दस्य श्रुतकारण यात क्षयोपशमस्य च ज्ञानहेतुबार आमना कशक्षित नतिरका उपनान्तः श्रुतं च तद् वानं चेति समासो युज्यते २ । पं. २८. अवशब्दो अधःशब्दार्थः गर्यादाः । 'अवधीयते' मोडगो निलतं परिन्टिगते रूपि वस्तु 'अनेन ज्ञानेनेत्यवधिः । यता अव-रूपिदव्यमर्यादया धीयते--परिसियते नस्तनने गवधिः । पं. २९. अव- 5 धीयते 'अस्माद्' ज्ञानाद् जीवेन साक्षाद् वस्तु इत्यवधिः । पं. ३०. अवधीयते जीीनारिंगन राति तरतु इत्यवतिः । अवधानं वाऽवधिः-साक्षादर्थपरिच्छेदनम् । पं. ३२. पर्ययनं-सर्वतः परि छेदनं पर्ययः । क पुनरसौ ? इत्याह- [ पृष्ठ १९] पं. १. मनसीत्यादि, मनसि ग्राह्ये मनसो वा ग्राह्यस्य सम्बन्धी पर्ययो मनःपर्ययः । पं. ३. यद्वा मनःपर्यायज्ञान- मित्युच्यते । तत्र “इण् गतौ" अयनं आयो लामः प्राप्तिरिति पर्यायाः, परिः-समन्तादायः पर्यायः, गनसः पर्यायास्तेषु ज्ञानम् । 10 यद्वा संज्ञिभि वैः काययोगेन गृहीतानि मनःप्रायोग्यवर्गगापुद्गलद्रव्याणि चिन्तनीयवस्तुचिन्तनव्याघृतेन मनोयोगेन मनस्त्वेन परिणमय्याऽऽलम्व्यमानानि मनासीत्युच्यन्ते । ततश्च जीवैवस्तुचिन्तने व्यापारितानि मनांसि पर्येति-परिच्छिनत्ति मनःपर्यायम् , "कर्मण्यण्" [पा. ३-२-१] तस्य कथञ्चित् कर्तुरनन्यत्वात् कर्तृत्वविवक्षा । कर्ता वा आत्मा यथोक्तानि मनांसि पर्येति अनेनेति मनःपर्यायम् , “अकर्तरि च” (पा. ३-३-१९) इत्यादिना घञ् , ततू पुनस्तदावरणक्षयोपशमजो लब्धिविशेषस्तदुपयोगो वा विषय- ग्रहणात्मकः । यद्वाऽवनं-गमनं वेदनमित्यवः, परिः-समन्तादवः पर्यवः, मनसि मनसो वा पर्यवा मनःपर्यवाः, तेषां तेषु वा 15 इदमित्थम्भूतमनेन चिन्तितमित्येवंरूपं ज्ञानं मनःपर्यवज्ञानं मनःपर्यायज्ञानमिति वेति । इदं चेत्यादि, अर्द्ध तृतीयं येषां तेऽर्धतृतीया द्वीपाः, ते च समुद्रौ चार्धतृतीयद्वीप-समुद्राः, तेषामन्तः-मध्यं तत् तथा, तत्र वर्तन्ते ये तेऽतृतीयद्वीप-समुद्रान्तर्वर्तिनः, ते च ते संजिनश्च तेषां मनोगतानि-मनस्त्वेन परिणमय्य मुक्तानि यानि द्रव्यागि तैरव तान्यालम्बते-आश्रयति अर्थपरिच्छेदकतया यद् ज्ञानं तत् तदालम्बनम् । प. ५. केवलमित्यादि, "केवलमेगं सुद्धं सकलमसाहारणं अणंतं च ।” [विशेषा. गा. ८४] इति वचनात् केवलशब्द एकाद्यर्थपञ्चकवृत्तिरिति क्रमेण व्याचष्टे । तत्र केवलमिति कोऽर्थः ? असहायम् इन्द्रियादिसाहाय्यानपेक्षित्वा- 20 देकमित्यर्थः, तद्भावे शेषच्छानस्थिकज्ञाननिवृत्तेर्वाऽसहायम् । अत एवाह-मत्यादिज्ञाननिरपेक्षम् । केवलं शुद्ध निर्मलमित्यर्थः, सकलावरणमलकलकविगमसम्भूतत्वात् । सकलं वा केवलम् , परिपूर्णमित्यर्थः, सम्पूर्णद्रव्यादिशेयग्राहित्वात् । पं. ६. तत्प्रथमतयैवेति, यो येन भावेन पूर्व नासीदिदानी च जातः स तेन भावेन तत्प्रथम उच्यते तेन प्रथमः, सा चासौ प्रथमता चेति वेति विग्रहः । असाधारणं तादृशापरज्ञानाभावाद् अनन्यसदृशम् । पं. ७. अनन्तं अप्रतिपातित्वेना- विद्यमानपर्यन्तं ज्ञेयानन्तत्वाद्वा अनन्तं केवलमुच्यते । पं. ९. आहेत्यादि, एतेपु मध्ये आदौ मतिश्रुतोपन्यासः किमर्थः ?, उच्यते, स्वाम्यादिकारणपट्कं प्रतीत्य मति-श्रुतयो- रुपन्यासः, नवरमाभिनिवोधिकं ह्योत्पत्तिक्यादिमतिप्रधानत्वान्मतिरप्युच्यते । कालो द्विधा-नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च । स चायं द्विविधोऽप्यनयोस्तुल्य एव, नानाजीवापेक्षया द्वयोरपि सर्वकालमनुच्छेदात् , एकजीवापेक्षया तूभयोरपि निरन्तरसातिरेक- सागरोपमपट्पष्टिस्थितिकत्वेनात्रैवाभिधास्यमानत्वात् । कारणमीन्द्रिय-मनोलक्षणं स्वावरणक्षयोपशमस्वरूपं च द्वयोरपि समानम् । उभयस्यापि “सञ्चगयं सम्मत्तं" [आव० नि० गा० ८३० विशेषा० गा० २७५१] इत्यादिना सर्वव्यादिविषयत्वाद् विषय- 30 तुल्यता। पं. १६. तत्र आदेशत इति, आदेश:-प्रकारः, स च सामान्यतो विशेषतश्च । सामान्यतो द्रव्यजाति जानीते, विशेषतो धर्मास्तिकायादेव देशादिविभागं जानीते । पं. १७. इन्द्रियादिपरनिमित्तत्वादुभयोः परोक्षत्वसमता। १ मनःपर्यवव्युत्पादनं नास्ति हारिभद्रयां व्याख्यातम् ॥ 25 , .
। -- श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । ११३ पं. १८. ननु यद्यनयोः परस्परमेवं तुल्यता तयंकत्र द्वयोरप्युपन्यासोऽस्तु, आदावेव तु तदुपन्यासः कथम् ? इति, उच्यते, मति-श्रुतज्ञानसद्भावे एव शेषावध्यादिज्ञानलाभादादौ तदुपन्यासः, नहि स कश्चित् प्राणी भूतपूर्वोऽस्ति भविष्यति वा यो मति- श्रुतज्ञाने भनासाद्य प्रथममेवावध्यादीनि शेषज्ञानानि प्राप्तवान् प्राप्नोति प्राप्स्यति वेति भावः । तदुक्तम्- जं सामि-काल-कारण-विसय-परोक्खत्तणेहिं तुल्लाई । तब्भावे सेसागि य, तेगाऽऽईए मइ-सुयाई ॥ [विशेषा० गा० ८५] भवतु तादौ मति-श्रुतोपादानम् , केवलं पूर्व मतिः पश्चात्तु श्रुतमित्यत्र किं कारणम् ! उच्यते-मतिपूर्वकत्वादित्यादि । पं. २०. मइपुच्वं० गाहा । व्याख्या-मतिः पूर्व-प्रथममस्येति मतिपूर्व 'येन' कारणेन श्रुतज्ञानं तेन श्रुतस्याऽऽदौ । मतिः तीर्थकर-गणधरैरुक्तेति शेषः, नावग्रहादिरूपे मतिज्ञाने पूर्वमप्रवृत्ते काप्यभिलापप्लावितार्थग्रहणरूपश्रुतप्रवृत्तिरस्तीति भावः । "विसिट्ठो वा मइमेमो चेव सुयं" ति यदि वा इन्द्रिया-ऽनिन्द्रियनिमित्तद्वारेगोपजायमानं सर्वं मतिज्ञानमेव, केवलं परोपदेशादा- गमवचनाच्च भवन् विशिष्टः कश्चिन्मतिभेद एव श्रुतम् , नान्यत् । यतश्च विशिष्टमत्यंश एव श्रुतं ततो मूलभूताया मतेरादौ विन्यासः, तद्भेदरूपं तु श्रुतं मतिसमनन्तरं भणितमिति गाथार्थः ।। पं. २३. मति-श्रुतज्ञानानन्तरमववेरुपन्यासः कालादिचतुष्टयसाधर्म्यात् , नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च मति- 10 श्रुताभ्यां सहावधेः समानस्थितिकालत्वात् कालसाधर्म्यम् । पं. २४. प्रवाहापेक्षयेति, सर्वजीवानाश्रित्य सर्वाद्धां एकजीवा- पेक्षया सागरपट्पष्टिः साधिका स्थितिकालः । पं. २५. यथा च मिथ्यात्वोदये मति-श्रुतज्ञाने अज्ञानरूपं विपर्ययं प्रतिपद्यते तथाऽवधिरपीति विपर्ययसाधर्म्यम् । पं. २६. य एव मति-श्रुतयोः स्वामी स एवावधेरपीति स्वामिसाधर्म्यम् । पं. २७. लाभोऽपि कदाचित् कस्यचिदमीषां त्रयाणामपि ज्ञानानां युगपदेव भवतीति लाभसाधर्म्यम् । पं. २८. अवध्यनन्तरं मनःपर्यायज्ञानस्योपन्यासः छद्मस्थादिकारणचतुष्टयात् , तत्र विषयसाधर्म्य उभयोरपि 15 पुद्गलमात्रविषयतासाधयं यद्यपि सामान्येन तथाप्यस्य मनोवर्गणाविशेषतो विषयः । पं. ३२. सर्वज्ञानानामुपरि केवलस्यो- पन्यासः तस्योत्तमत्वात् , सर्वोत्तमं हि केवलज्ञानम्, अतीता-ऽनागत-वर्तमाननिःशेषज्ञेयस्वरूपावभासित्वात् । सर्वज्ञानानां लाभेऽवसान एवास्य लाभाद्वा भन्ते निर्देशः । विपर्ययाभावश्च साधर्म्यम् । [ पृष्ठ २०] पं. ९. अश्नुते-केवलाद्युत्पत्तौ ज्ञानात्मना सर्वार्थान् व्याप्नोतीति उणादिनिपातनाद् अक्षः-जीवः । यद्वा अश्नाति 20 समस्तत्रिभुवनान्तर्वर्तिनो देवलोकसमृद्ध्यादीनान् पालयति भुक्ते चेति निपातनाद् अक्षः-जीवः, मनातेभोजनार्थत्वात् , भुजेश्व पालना-ऽभ्यवहारार्थत्वादिति भावः, तमक्ष-जीव प्रति साक्षाद् गतमिन्द्रियनिरपेक्षं वर्तते यद् ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् । पं. १०. अत एवोक्तम्-अपरनिमित्तमिति, न परम्-इन्द्रियादि निमित्तं यस्योत्पत्तौ अक्ष-जीव विमुच्य तदपरनिमित्तम् , मत एवातीन्द्रियमेतत् , अवथ्यादित्रयस्यैव साक्षादर्थपरिच्छेदकत्वेन जीवं प्रति साक्षाद् वर्तमानत्वात् प्रत्यक्षव्यपदेशः । पं. ११. विचित्रतां चास्येति, अवथ्यादिप्रत्यक्षत्य परेभ्योऽक्षस्य-जीवस्य यज्ञानमुत्पद्यते तत् परोक्षम् , यस्माद् द्रव्ये- 25 न्द्रियाणि द्रव्यमनश्चाक्षस्य-जीवस्य पराणि वर्तन्ते, भिन्नानीत्यर्थः । कुतः परत्वम् ? द्रव्येन्द्रिय-मनसोः पुद्गलमयत्वादिति । इदमुक्तं भवति-~-अपोद्गलिकत्वादमूतों जीवः, पौगलिकत्वान्मूनि द्रव्येन्द्रिय-मनांसि, अमूर्ताञ्च मूर्त पृथग्भूतम् , ततस्तेभ्यः पौगलिकेन्द्रिय- मनोभ्यः यन्मति-श्रुतलक्षणं ज्ञानमुपजायते तद् धूमादेग्न्यादिनानवत् परनिमित्तत्वात् परोक्षमुच्यते । यहा परैः-इन्द्रियादिभिः उक्षा-सन्बन्धनं लिङ्गानुमेये ग्राह्य-ग्राहकलक्षणं अस्य ज्ञानस्य तत् परोक्षम् । पं २४. द्रव्येन्द्रियमित्यादि, अंतो-बहिनिवत्ती, तस्सत्तिसरुवगं च उवगरणं । दविदियमियरं पुण लधुवओगेहिं नायचं ॥१॥ [ ] 30 " टी० १५ ११४ गलपारिश्री श्रीन:गिनिर्मित कर्णपर्पटिकादि वाह्यसंस्थानं बहिनिवृत्तिः, कदम्बपुष्पगोलकागातिमानिनि समिनियोगकरणम् । यथा खड्गे सङ्गः तद्धारा तच्छेदनशक्तिश्चेति त्रयं व्याप्रियते, एवं इत्येनियगोचरं नितिनं ताकिमोति शिनगं ज्ञान प्रति न्यागियो । पं. २७. नोइन्द्रियप्रत्यक्षमिति, यत्रेन्द्रियं सर्वथैव न प्रवर्तन किन्तु जीव एन साक्षादर्श पनि ता नोइन्द्रिय प्रत्यक्षा- मवध्यादि । [ पृष्ठ २१ ] पं. ४. उपचारतः प्रत्यक्षमिति, इहेन्द्रियं श्रोत्रादि, तदेव निमित्तं सहकारिकारणं गस्गोपित्तोस्तदा (! दालेतिक शब्द-रूप- रस-गन्ध-स्पर्शविषयज्ञानमिन्द्रियप्रत्यक्षम् । इदं चेन्द्रियलक्षणं जीवात् परं-व्यतिरिक्त निमित्तमाश्रित्योत्पयते इति धूमादग्निज्ञानमिव वस्तुतोऽर्थसाक्षात्कारित्वाभावात् परोक्षमेव, केवलं लोकेऽस्य प्रत्यक्षतया रूढत्यात् संव्यवहारतोऽपि प्रत्यक्षत्वगुन्यते, न परमार्थतः, परमार्थतोऽवध्यादिकमेव प्रत्यक्षम् , इन्द्रियायनपेक्षत्वात् । कथं ज्ञायत इत्यादि, मुख्यतोऽपीन्द्रियप्रत्यक्षं किमिति न स्यादिति 0 वितर्कार्थः । पं. ६. न चेत्यादि, मति-श्रुते विमुच्येन्द्रियज्ञानमपरं न किचिदस्ति यत् प्रगुणन्यायेन मुख्यतः प्रत्यक्ष भवेत् । इन्द्रियजज्ञानस्य मति-श्रुताभ्यां पार्थक्ये पष्टज्ञानप्रसङ्गः, तस्मादिन्द्रियजज्ञानस्य मति-श्रुतयोरेवान्तर्भावः । मति-श्रुते च परोक्षे अभि- हिते, तत्परोक्षत्वे इन्द्रियजज्ञानस्यापि परोक्षत्वमेव पारमार्थिकम् । पं. ८. आहेत्यादि, धूमादग्निज्ञानवत् , न त्वक्षजमिति भावः । इह यदित्यादि, हन्त ! इहापीन्द्रिय-मनोभिर्गृहीते बाले धूमादौ लिङ्गेऽन्यादिविषयं यज्ञानमुत्पयते तदेकान्तेन परोक्षम् , इन्द्रिय-मनसामात्मनश्च तद्ग्राह्यार्थस्य एकान्तेन परोक्षत्वादिति भावः । पं. १०. यत् पुनरित्यादि, लिङ्गमन्तरेणैव यदि- 15 न्द्रिय-मनसां वस्तुसाक्षात्कारित्वेन ज्ञानमुपजायते तत् तेषां प्रत्यक्षत्वाल्लोकव्यवहारमात्रापेक्षया प्रत्यक्षमुच्यते, अलिङ्गत्वात् , अवध्यादिवत् , न त्वात्मनस्तत् प्रत्यक्षमिति शेपः । इन्द्रिय-मनोभवं ज्ञानमात्मनः परोक्षमेव, परनिमित्तत्वात् , धूमादग्निज्ञानवत् । पं. ११. यद्येवं यल्लिङ्गमन्तरेणैव साक्षादिन्द्रिय-मनोनिमित्तं ज्ञानमुत्पद्यते तत् परमार्थतः प्रत्यक्षमस्तु, किं तदपि परोक्षत्वे- नेष्यते ? नैवमित्याह-इन्द्रियाणामपीत्यादि, इन्द्रिय-मनांसि ज्ञानजनकत्वेनाऽऽमनो व्याप्रियन्ते इति ज्ञाननिमित्तत्वेन साक्षाद व्याप्रियमाणत्वादुपचारतोऽक्ष–इन्द्रियं प्रति वर्तते इन्द्रियप्रत्यक्षमुच्यते, न तत्त्वतः; यतो यदिन्द्रिय-मनोनिमित्तं ज्ञानमुत्पद्यते 20 तदप्यात्मनः, न त्विन्द्रियाणाम् , तेषामचेतनत्वात् । एतेन ये वैशेपिकादयो अक्ष-इन्द्रियं प्रति गतं प्रत्यक्षमितीन्द्रियाणां साक्षाद् घटाघोंपलब्धेर्घटादिज्ञानं प्रत्यक्षमिच्छन्ति तन्न युज्यत इत्यावेदितम्, इन्द्रियाणामचेतनत्वेन ज्ञानायोगात् । तथाहि-यदचेतनं तन्न जानाति, यथा घटादि, अचेतनानि चेन्द्रियाणि, कुतस्तेषामुपलब्धिः प्रत्यक्षं भवेत् ? । एवं मूर्तिमत्त्वात् स्पर्शादिमत्त्वाच्च न जानन्ति । न च वाच्यम्-' इन्द्रियाणि न जानन्तीति प्रत्यक्षविरोधिनी प्रतिज्ञा, तेषां साक्षात्कारेणार्थोपलब्धेरनुभवप्रत्यक्षेण प्रतिप्राणि प्रसिद्धत्वात् ' [इति], यतश्चक्षुरादीन्द्रिये करणतया व्याप्रियमाणे वस्तूनामुपलब्धा आत्मैव, न त्विन्द्रियम् , चक्षुरादीन्द्रियोपरमेऽपि 25 तदुपलब्धार्थानुस्मर्तृत्वात् । इह यो येपूपरतेप्वपि तदुपलब्धानर्थाननुस्मरति स तत्रोपलब्धा दृष्टः, यथा गृहगवाक्षोपलब्धानामर्थानां तद्विगमेऽप्यर्थानुस्मर्ता देवदत्तादिः, अनुस्मरति चेन्द्रियविगमेऽपि तदुपलब्धमर्थमात्मा, तस्मात् स एवोपलब्धा । यदि पुनरिन्द्रिया- ण्युपलम्भकानि स्युस्तदा तद्विगमे कस्यानुस्मरणं स्यात् ?, नह्यन्येनोपलब्धेऽर्थेऽन्यस्य स्मरणं युक्तम् , अस्ति चानुस्मरणम् , तस्मान्न जानन्तीन्द्रियाणि । ततश्चेन्द्रिय-मनोनिमित्तमात्मनो ज्ञानं परनिमित्तत्वात् परोक्षमति-श्रुतान्तर्भावाच्चानुमानवत् परोक्षं तत्त्वतः, संव्यवहारतस्तु प्रत्यक्षम् । पं. १२. अत एवाह-अत्र बहु वक्तव्यमित्यादि, मनोनिमित्तस्यापि ज्ञानस्य परनिमित्तत्वाद- 30 नुमानवत् परोक्षप्त्वं ज्ञेयम् । न च वक्तव्यम्-'आगमेऽस्य तत् परोक्षत्वं न कचिद् विशेषतोऽभिहितम्' [इति], यतो मति-श्रुतयोरागमे परोक्षःवस्य विशेषतो भणनात् , मनोनिमित्तस्यापि च ज्ञानस्य तदन्तःपातित्वादिन्द्रियजज्ञानस्येव परोक्षत्वं सिद्धमेवाऽऽह । पं. १६. अत एवाह-इह मनोज्ञानमपीत्यादि, योग-क्षेमौ आक्षेप-परिहारौ तुल्यावस्येन्द्रियज्ञानेन सहेति । पं. ३०. कायन्ति शब्दयन्ति योग्यतया तद्वेतुकर्मोपादानत इत्यर्थः । - ?
श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । ११५ [पृष्ठ २२] पं. ४. उदय० गाहा । व्याख्या-उदयः क्षयः क्षयोपशम उपशम इत्येते चत्वारः कर्मणोऽवस्थाविशेषाः 'यद्' यस्माद् भणिता एते प्रवर्तन्ते इत्यर्थः । कथम् ? इत्याह-'द्रव्यं क्षेत्रं कालं भवं च भावं च सम्प्राप्य' इति द्रव्याचपेक्षाः सन्तः स्युः, न यतस्तत इत्यर्थः । तत्र पीतमदिरत्य भक्षितहत्पूरकस्य वा ज्ञानान्यथात्वं द्रव्याद् भवतीति प्रतीतम् , मण्डूक-ब्रामी-कङ्गुणीतैलादिपानादिना कचित् कदाचिदज्ञाननिवृत्तिश्च भवति । देवताराधन-मन्त्रादिस्मरणतश्च सा भवतीति भावापेक्षाऽप्यसौ । एवं स्रक्-चन्दनाऽङ्गना- ऽऽरोग्यत्वादिद्रव्य-भावापेक्षः साताद्युदयो भवति । तथा निद्रादिपञ्चकोदयो भक्षितमाहिपदधि-वृन्ताकादिद्रव्यस्य जीवस्य तत्त- द्र्व्यसपेक्ष्य भवन् द्रव्यापेक्षः । सजलादिक्षेत्रं प्राप्य स एवातिशयेन भवतीति क्षेत्रापेक्षः । निद्रोदयस्यैव रजन्यादिकः कालः विशेषतो ग्रीष्मो वा इति कालापेक्षः । स एवैकेन्द्रियादिभवं प्राप्य पृथिव्यादिवनस्पतीनां विशेषतो निद्रोदय इति भवापेक्षः । स एव चित्तत्वाच्यादिभावमपेक्ष्य भवन् भावापेक्ष इति । एवं द्रव्यादयः परस्परं सव्यपेक्षाः सन्तः कर्मगामुदय-क्षय-क्षयोपशमोपशमरूपं कचित् कदाचिदवस्थाविशेष जनयन्तीति क्षयोपशमजोऽप्यवधिदेव-नारकयोर्भवप्रत्ययो भवति, अवश्यं तस्य तत्र भावात् । तिर्यग्मनु- 1 प्याणां भवे सत्यप्यसौ क्षयोपशमज एव, क्वचित् कदाचिदेव भावाद् इति प्रकृतोपयोगि । अन्यच्च तृणाचाहारस्तज्जप्रभूतभारोद्वहन- सामर्थं च तिरश्च भवप्रत्ययं भवति । नारकाणां तादृशमारणान्तिकवेदनाधिसहनसामर्थ्य भवप्रत्ययं भवति, एवं वीर्यान्तराय- कर्मक्षयोपशमात् केचिन्महासामोपेता मनुष्या अपि दृश्यन्ते, केचित् प्रवलवीर्यान्तरायोदयात् तृणकुब्जीकरणेऽप्यसमर्था इति । एवं सर्वत्र द्रव्याद्यपेक्षया उदयादयः प्रवर्तन्ते इति गाथार्थः ।। अवधानमवधिः-इन्द्रियायनपेक्षमात्मनः साक्षादर्थग्रहणम् । अवधेरैव ज्ञानमवधिज्ञानम् । अथवा अवधिः-मर्यादा, तेनाव- 14 धिना-रूपिद्रव्यमर्यादात्मकेन ज्ञानमवधिज्ञानम् । तद् भवप्रत्ययं नारक-देवानाम् , गुणप्रत्ययं मनुष्य-तिरश्चाम् । [ पृष्ठ २३] पं. १. तद् द्विविवं सत् पोढा आनुगामुकादिभेदात् । आ-अभिविविना अनुगमनशीलमानुगामुकम्, यत्र उत्पन्नं ततो देशान्तरगतमपि ज्ञानिनं यदनुगच्छति लोचनवत् तदानुगामुकम् १ । यत्र क्षेत्रे उत्पन्नं तत्रस्थ एव पश्यति नान्यत्र गत इति, यत् तद्देशस्थितस्यैव भवति स्थानस्थदीपवत् , तत् तदेशनिबन्धनक्षयोपशमजत्वाद् देशान्तरगतस्य तु भ्रंशाद् अनानुगामुकम् २ । 20 वर्द्धमानकं यदगुलासंख्येयभागादिविषयमुत्पद्य पुनः वृद्धि-विषयविस्तरणात्मिकां याति यावदलोके लोकप्रमाणान्यसंख्येयानि खग्डादीनि ३ । हीयमानकं यद् जघन्येनाङ्गुलासंख्येयभागविषयम् उत्कर्षेण सर्वलोकविषयमुत्पद्य पुनः संक्लेशवशात् क्रमेण हानि- विषयसोचात्मिकां याति यावदगुलासंख्येयभागस्ततोऽपि प्रतिपतति, येन त्वलोकस्य प्रदेशोऽपि दृष्टस्तस्य न होयते ४ । प्रतिपाति कियन्तमपि कालं स्थित्वा ततो ध्वंसनस्वभावं यदित्यर्थः ५ । अप्रतिपाति आमरणान्तभावि यदित्यर्थः ६ । अत्र चाप्रतिपाति ज्ञानमनुगाम्येव भवति, आनुगामुकं त्वप्रतिपाति प्रतिपाति च भवतीत्युभयोर्विशेषः । तथा प्रतिपाति प्रतिपतत्येव, 25 पतितमपि च देशान्तरे गतस्य कदाचिज्जायते, न चेत्थमनानुगामुकम् , यत इदं यत्र देशे तिष्ठतः समुत्पन्नं तत्रैव तिष्टतश्यवते न वा, च्युतमपि देशान्तरे पुनरप्युत्पत्तिप्रदेशे समायातस्य भवतीति प्रतिपात्यनानुगामुकयोर्भेदः । कावधित्वादिति, अपवरकादिजालकान्तरस्थप्रदीपप्रभानिर्गमस्थानानीवाऽवधिज्ञानावरणक्षयोपशमजन्यान्यवधिज्ञाननिर्गमस्थानानीह फड्डकान्युच्यन्ते, तानि चैकजीवस्य संख्येयान्यसंख्येयानि च भवन्ति, तैर्यदवधिज्ञानं जीवस्य तत् फट्टकावर्धायुयते । तत्र सकल- जीवोपयोगे सत्यपि साक्षादेकदेशेनैव दर्शनादात्मप्रदेशान्तर्गतमुच्यते १ । सर्वामिप्रदेशक्षयोपशमभावे सत्यौदारिकशारीरिकदेशनैव 30 दर्शनादौदारिकशरीरान्तर्गतमुच्यते २ । एकदिगुपलम्भाद् ज्ञानोद्योतितक्षेत्रान्तर्वृत्तेरवधिमत एगदिगुद्योनितक्षेत्रान्तर्गतमुच्यते ३ । पं. १९. आत्ममध्यगतादिभेदेन मध्यगतमपि त्रिधा-तत्र सर्वान्मोपयोग सत्यपि मध्य एव सर्वकटकविशुद्धिसद्भावात् पं. १५. तच फट्ट- , स किल प्रयत्नविशेषादतिसूदमामवगाहनां कुरुते, नान्यः, अनेन 'किमिति मत्स्योऽतिमहान् गृह्यते ? तृतीयसमयसंक्षिप्तश्च' साक्षान्मध्यभागेनोपलधेरात्ममध्यगतगनिमीयते १ । सर्वागनः योगायोगानी गारिकगिरम मसालोपयोगेदारिक- शरीरमध्यगतमुच्यते २ । सर्वदिगुपलम्भादवधिज्ञानप्रकाशित गराएका मानिक सामान कोरम गण-मांगनीगने ३ । पं. २४. अन्तगतं भूयोऽपि पुरतोऽन्लगतादिभेदात् पिया - गुरतः सगेलनमा मागिन पागमा मातीनाम् । मार्गतः पृष्टतः । पासउ त्ति पार्श्वतः । पं. २९. उल्का दीपिका, लुति या प्रसिदा । मणिं न सिप्रदीपशिखा गणिविशेषः, 5 आदिप्रहणादन्योऽप्येवंजातीयो ग्राह्यः । प्रदीपः कलिकारूपः । प्रेरगन प्रेरयन भाान गार्गन् । [ पृष्ठ २४ ] पं. २. नान्यत्रेति, पृष्टि-पाईयोः । पं. ५. मार्गतोऽन्तगतो-उल्कादिकं अणुकढेमाणे अणुकड्ढेमाणे त्ति अनुकर्षन् अनुकर्षन् गच्छेत् । पं. ८. पार्थतोऽन्तगतसूत्रे-उल्कादिकं प्रदीपान्तं ज्योतिर्वस्तु पार्शतः कुल्या परिकड्ढेमाणे परिकड्ढेमाणे त्ति परिकर्पन् परिकर्पन गच्छेत् । पं. १३. मध्यगतसूने-मस्तकस्थेन ज्योतिर्वस्तुना यथा कश्चिद् गन्छेत् 10 सर्वत्र तत्प्रकाशितमर्थं पश्येत् , एवं मध्यगतावधिज्ञानिन्यपि योन्यम् । पं. २४. विशुद्धफडकैरिति, विशुद्धक्षयोपशमजन्य- फडकानि विशुद्धफडकान्युच्यन्ते, तैरित्यर्थः । [ पृष्ठ २६]] पं. ७. द्रव्यलेश्योपरञ्जितमिति, तत्र- कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात् परिणामो य आत्मनः । स्फटिकस्येव तत्रायं लेश्याशब्दः प्रवर्तते ॥१॥ [ 15 साचिव्यं-सान्निध्यम् । पं. ११. जावइया० गाहा-त्रिसमयमाहारक इति वाक्यम् । यद्वा आहारयतीत्याहारकः, त्रीन् समयानाहारकस्त्रिसमयाहारक इति व्युत्पत्तिः । पं. १९-२४. योजनेत्याचार्यापटकम्-यो मत्स्यो योजनसहनायामः स्व- देहस्यैवैकदेशे उत्पद्यमानः स प्रथमे समये आयामं सङ्क्षिपति । तं च सङ्क्षिपन् प्रतरं करोति, कथम्भूतम् ? इत्याह-'सङ्ख्या तीताख्याङ्गुलविभागबाहल्यमानं' बाहल्येनामुलासङ्ख्येयभागसूक्ष्ममित्यर्थः । पुनरपि कथम्भूतम् ? इत्याह-स्वकेति, मत्स्यदेह- विस्तीर्णम् , शरीरान्तःसम्बद्धत्वादूर्ध्वाधस्तिर्यक् च यावान् मत्स्यदेहस्य विस्तरस्तावांस्तजीवप्रदेशप्रतरस्यापीत्यर्थः । एवं चाऽऽयामतो 20 विष्कम्भतश्च मत्स्यशरीरपृथुत्वतुल्योऽङ्गुलासङ्येयभागबाहल्यश्चायं प्रतरो भवतीत्येप प्रथमसमयव्यापारः, प्रतरमेतावन्मात्र करोति । देयेणापि, कुतः ? जीवसामर्थ्यात् , ततो द्वितीयसमये 'त' प्रतरमायामतो विष्कम्भतश्च संक्षिप्याऽङ्गुलासङ्ख्येयभाग- वाहल्यां मत्स्यशरीरपृथुत्वायामां सूचिं करोति । ततस्तृतीयसमये या निजतनुपृथुत्वेन दीर्घा सूचिः तामपि सूचि सङ्क्षिप्यागुला- सङ्ख्येयभागमात्रावगाहनो भूत्वा निर्णिमत्स्यभवायुरुिदीर्णपरभवायुश्चिाविग्रहगत्या मत्स्यशरीरस्यैवैकदेशे ‘पनकः' सूक्ष्मवनस्पति- जीवविशेपो भवति । अस्मादुत्पादसमयात् तृतीयसमये यद् देहमानमङ्गुलासङ्ख्येयभागमात्रं एतस्य पनकस्य, तद् जघन्यमवधेविषय- 25 भूतं 'क्षेत्र' तज्ज्ञेयद्रव्याधारम् । एतेन तज्ज्ञेयद्रव्याधारत्वेनैव क्षेत्रमवधेतिपय उच्यते, न तु साक्षात् , तस्यामूर्तत्वात्, अवधेस्तु मूर्त विपयत्वादिति । २६. स एव चेत्यादि, यो हि योजनसहस्रायामो महाकायो मत्स्यस्त्रिभिश्च समयैरात्मानं सङ्क्षिपति C - ]] ? ? पं. २७. किं त्रिसमयाहारको इत्येतस्य द्वयस्योत्तरमदायि । दूरे च गत्वाऽन्यत्र यद्युत्पयते विग्रहेण च गच्छति तदा जीवप्रदेशाः किञ्चिद् विस्तरं यान्तीत्यवगाहना स्थूलतरा स्यादित्यविग्रहगत्या स्वशरीरदेश एवोत्पादित इत्येतत् स्वयमेव द्रष्टव्यमिति । 30 गृह्यते ? अत्रोत्तरमाह-प्रथमेत्यादि । पं. २८. त्रिसमयाहारकत्वविपये केचनाऽऽचार्या व्याचक्षते, यदुत-द्वौ तावन्म- स्यस्य सम्बन्धिनौ आयसमयौ गृह्यते-आयामसंहरणेन प्रतरकरणमित्येकः, तत्संहरणेन सूचि यत्र करोति स द्वितीय इत्यायाम- १ पाटुटेति जे० ॥ २ मत्स्यशरीरपृथुत्वमायामो यस्या. जेटि० ॥ Aar- .. श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । ११७ विष्कम्भयोः संहरणसमयद्वयम् , तृतीयसमयस्तु सूचिसंहरण-पनकत्वेनोत्पादश्चेति त्रयम् , ततश्च त्रयः समया यस्यासौ त्रिसमयः, अविग्रहेगोत्पत्तेराहारक्रश्च; एवं च सति प्रत्युताऽतिसूदमपनकवायं सिद्धो भवति, तथा च सति "तिसमयाहारगस्स पगगजीवस्से"ति सूत्रकारवचनमाराधितं भवति, किञ्चेह यथा सूक्ष्मः सूक्ष्मतरोऽसौ भवति तथा कर्तव्यम् , एतच्चास्मिन् व्याख्याने सविशेष सिध्यति, उत्पादसमय एव यतो यस्मादसौ पनकजीवोऽतिजघन्यावगाहनो भवति, न शेषसमयेपु, द्वितीयादिप्वीपमहत्त्वात् , जघन्यावगा- हनश्च सूत्रे प्रोक्तः, ततोऽतिसूक्ष्मत्वसिद्धेस्तस्य पनकदेहस्य समानमेव किलावधेविषयभूतं जवन्यं क्षेत्रं भवतीति । न युक्तमिदं । कैपाश्चिद् व्याख्यानम् , त्रिसमयाहारकत्वस्य पनकविशेषणवेनोक्तत्वात् , मत्स्यसमयद्वयस्य च पनकसमयत्वायोगात् ; योऽपीत्थमपि जघन्यावगाहनालाभलक्षणो गुण उद्भाव्यते सोऽपि न युक्तः, यस्मान्नेहातिसूदमे गातिमहता वा किञ्चित् प्रयोजनम् , किं तर्हि ? योग्येन, योग्यश्च स एव तद्वेत्तृभियो यः प्रथमं जवन्यावगाहनः संस्तस्मिन्नेव भने समयत्रयमाहारं गृङ्गाति । [ पृष्ठ २७ ] पं. ४. सर्वबहग्निजीवाः 'निरन्तरं सततं नैरन्तर्येणेत्यर्थः 'यावदिति' यत्प्रमाणं 'क्षेत्रम्' आकाशं वक्ष्यमाणविशिष्ट सूची- 10 रचनया रचिताः सन्तः 'भृतवन्तः' व्याप्तवन्तः । पं. ५. भूतकालनिर्देशश्चाजितस्वामिकाल एव वदयमाणयुक्त्या प्रायः सर्ववहवोऽनलजीवा भवन्त्यस्यामवसर्पिण्यामित्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थः । अनलजीवोत्पत्तर्महावृष्ट्यादिव्याघाताभावे समस्तभरतैरावत- विदेहलक्षणपञ्चदशसु कर्मभूमिपु सर्ववहवो बादराग्निजीवा भवन्तीति । किमविशेपेग सर्वदैव एतास्वेते भवन्ति ? नैवम् , किन्त्व- जितजिनेन्द्रकाले, अजितंजिनेन्द्रस्याप्युपलक्षणत्वादवसपिण्यां द्वितीयतीर्थकरकाले अग्नि जीवा बहवो भवन्ति । पं. १२. कुतः ? तदारम्भकपुरुषवाहुल्यादिति, तेपां-बादराग्निजीवानां आरम्भकाः-उत्पादकाः सन्धुक्षण-वालनाद्या- 15 रम्भकरणात् तदारम्भका ये पुरुषास्तेषां वाहुल्यात् । कोऽर्थः ? सर्वेभ्योऽप्यतीता-ऽनागतेभ्यो बहवः प्रचुरा गर्भजमनुभ्यास्तदा भवन्ति त्वभावादेवेति । आह-किमेतै रेव वादराग्निजीवैः सर्ववग्निजीवपरिमाणं पूर्यते ? आहोश्चित् सूक्ष्माग्निभिः सह ?, यदि तैस्सह तदा तेऽविशिष्टा अपि गृह्यन्ते ? आहोश्चित् केचिदेव विशिष्टाः ? इति, उच्यते-स्वभावाद् यदा सूक्ष्माग्निजीवा अप्युत्कृष्ट- पदिनः स्युः । इदमत्र हृदयम्-अनन्तानन्तास्ववसर्पिणीषु मध्ये स एव कश्चिद् द्वितीयतीर्थकरकालो गृह्यते यत्र सूदमाग्निजीवा उत्कृष्टपदिनः प्राप्यन्ते, ततश्च तैर्वादरैः सूक्ष्मश्चाग्निजीवैरुत्कृष्टपदिभिर्मीलितैः सर्वबग्निजीवानां परिमाणं ग्राह्यम् । अत एवाह- 20 सूक्ष्माश्चेति । तत्रैवेति तेष्वेव मध्ये गृह्यन्ते । पं. १३. तेषां चावस्थानं बहुतरक्षेत्रपूरकं बुद्धया पोढा यद्यपि सम्भवति तथापि 'पञ्चाऽनादेशाः पष्टत्वादेशः' इति वक्तुमाह-तेषां चेति, अयमर्थः-तैः सर्वेरप्यग्निजीवैः समचतुरस्रो घनो विभेदः स्थाप्यते, कथम् ? इति, उच्यते-एकैकाकाशप्रदेशे एकैकाग्निजीवरचनया स्वावगाहे चाऽसङ्ख्येयाकाशप्रदेशलक्षणे एकैकाग्निजीवरचनयेति । अत्र स्थापना : । एतेषां नवानामग्निजीवानां प्रत्येकमेकैकाकाशप्रदेशे व्यवस्थापितानामधस्तादुपरिष्टाच्चान्येऽपि नव नव जीवा इत्थमेव व्यवस्थाप्यन्ते, एप कल्पनया सप्ताविंशत्या सद्भावतस्त्वसङ्ख्येयैरग्निजीवै रेकैकाकाशप्रदेशव्यवस्थापितैर्घनो मन्तव्यः । द्वितीयोऽपि 25 धन इत्थमेव द्रष्टव्यः, केवलमिहासंख्येयाकाशप्रदेशेवेकैकजीवो व्यवस्थाप्यते । एवमेकैकाकाशप्रदेशे एकैकजीवस्थापनया असङ्ख्येय- प्रदेशात्मकस्वावगाहस्थापनया च प्रतरोऽपि विभेदः, सूचिरपि द्विभेदा । तत्र घन-प्रतरपक्षश्चतुर्भेदः पञ्चमश्चैकैकाकाशप्रदेशस्थापितै- कैकजीवलक्षणसृचिपक्षोऽपि न ग्राह्यः, दोपद्वयानुषङ्गात् । तथाहि-पञ्चविधयाऽप्यनया स्थापनया स्थापिता अग्निजीवाः षट्स्यपि दिक्चवधिज्ञानिनोऽसत्कल्पनया भ्रम्यमागाः स्तोकमेव क्षेत्रं स्पृशन्तीत्येको दोपः, एकैकाकाशप्रदेशे एकजीवस्थापनायामागम- विरोधश्च द्वितीयो दोपः, असङ्ख्येयाकाशप्रदेशानन्तरेणाऽऽगमे जीवावगाहनिपेधात् । पं. १५. असन्कल्पनया प्रतिप्रदेशा- 30 चगाहोऽप्यन्त्यिति चेत्, नैवम् , कल्पनाऽपि सति सम्भवेऽविरोधिन्येव कर्तव्या, किं विरोधिन्या ? इत्यालोच्याऽऽडू-पष्टः श्रुतादेश इति, असहयेयाकाशप्रदेशलक्षणे स्वावगाहे पक्या एकैकजीवस्थापनेन यः सूचिलक्षणः पष्टः पक्षोऽयं श्रुने आदिष्टत्वाद् प्रायः, " १२० लम्बनत्वादवधेरित्ययं भावार्थः । पं. २९-३०. "ओही." गा| T. २९ गा. ५३ | "अमिगो पगो"नि पाठः, पाठान्तरे "वनिओ दुविहो" त्ति पाठः । [ पृष्ठ ३१] पं. ५. नेरड्य० गाहा [ सू० २९ गा. ५१] । यस्य नैरन्तर्गःग सानोमानिनोऽनोरनन् जीवोऽभ्यन्तरे वर्तते 5 सोऽभ्यन्तरावधिः । तथा च [आवश्यक] चूर्णिः-'अभंतरावही नाम' जा रो लिंगररा गोशिनाणं रागुपनं तमो ठाणाओ आरम्भ सो ओहीनाणी निरंतरसंबद्धं संखेनं वा असंखेनं वा तेत्तं ओहिगा जाणः पाराइ एरा गंतरावही" [ विभाग १ पत्र ६३ ] अवधिमतः 'बहिः' बाह्योऽवधिः । अयमर्थः- "जन्य से ठियस्स ओहिनाणं रागुणानं तम्गि ठाणे सो ओहिनागी न किंचि पासइ, तं पुण ठाणं जाहे अंतरिय होइ अंगुल-विहत्थिमाईहिं संखेनेहिं असंगोमोहिं वा जोगणेहिं ताहे पासइ, एस वाहिरावही" [आवश्यकचूर्णि विभाग १ पत्र ६२-६३ ] । एवं चावविव्ये नारका देवास्तीर्थकरायावधिज्ञानस्यावाल्या भवन्ति, 10 अवध्युपलब्धस्य क्षेत्रस्यान्तर्वर्तन्ते, अभ्यन्तरवर्तिन एव भवन्ति, अत एवावालावधय एवैते प्रतिपाद्यन्ते, अभ्यन्तरावधय इत्यर्थः, अवधिप्रकाशितक्षेत्रस्य प्रदीपा इव निजनिजप्रभापटलस्य नैते बहिर्भवन्तीति भावः । तथाऽवधिना 'पश्यन्ति' अवलोकयन्ति, खलु- शब्दस्यावधारणार्थत्वात् ‘सर्वत एव' सर्वास्वेव दिक्षु विदिक्षु च, न तु देशत इत्यर्थः । 'शेषाः' तिर्यग्-गनुष्याः 'देशेनेति' एक- देशेन पश्यन्ति, तत्र वाक्यावधारणविधेरिष्टतः प्रवृत्तेः शेषा एव देशतः पश्यन्ति, न तु शेषा देशत एवेति द्रष्टव्यम् , शेषास्तिर्यग- मनुष्याः सर्वतो देशतश्च पश्यन्तीति भावः । ननु 'अवधेरबाह्या भवन्ति' इत्यवध्युपलपक्षेत्रस्याभ्यन्तर नारकादयो वर्तन्ते इत्युक्ते 15 सति ‘पश्यन्ति सर्वतः' इति किमर्थं भण्यते ? ये ह्यवधिप्रकाशितक्षेत्रस्य मध्ये वर्तन्ते ते सर्वतः पश्यन्त्येवेति गतार्थवादतिरिच्यते ? अत्रोच्यते-यो ह्यसम्बद्धवलयाकारक्षेत्रप्रकाशकावधिर्भवति तद्वान् साध्यादिरवव्युपलब्धक्षेत्रस्यान्तः स्थितोऽपि न सर्वतः पश्यति, अन्तरालादर्शनात् , अतस्तद्वयवच्छेदार्थ कर्तव्यं पश्यन्ति सर्वतः' इति ॥ . अथवा पूर्वार्द्धमन्यथा व्याख्यायते-तत्र के नियतावधयः ? के वाऽनियतावधयः ? इति प्रश्ने नारक-देव-तीर्थकरा अवधेर- वाह्या भवन्तीति । कोऽर्थः-अवधिज्ञानवन्त एवामी भवन्ति, अवधिज्ञानं नियमेनैपां भवतीत्यर्थः । तत्रापि किमी तेनावधिना सर्वतः 20 पश्यन्ति ? देशतो वा ? इति संशये सत्याह-“पासंति” इत्याद्युत्तरार्द्धम् , अस्य व्याख्या तथैवेति । तत्रैतत् स्यात्-"भवप्रत्ययो नारक-देवानाम्” [तत्त्वार्थ. अ. १ सू. २२] इत्यादिवचनात् तथा-"तिहिं नाणेहिं समग्गा तित्थयरा जाव होति गिहवासे ।” [आव० भाष्य गा. ११० पत्र १८७] इत्यादिवचनात् पारभविकावधिसमन्वागमात् सिद्धमेव नारक-देव-तीर्थकराणां नियतावधिव तत् किमनेन ? 'पश्यन्ति सर्वत एव' इत्येतदस्तु, नैवम् , भवप्रत्ययादिवसा सिद्धेऽमीपा नियतावधित्वे "ओहिस्सऽवाहिरा होति” त्ति कालस्य नियमोऽयं विधीयते। इदमुक्तं भवति-भवप्रत्ययादिवचनात् सिध्यति नियमेन नारकादीनामवधिमत्त्वम् , परं न ज्ञायते 25 'किमाभवक्षयममीपामवधिर्भवति ? आहोस्चित् कियन्तमपि कालं भूत्वाऽसौ प्रतिपतति ? इति, ततश्च "ओहिस्सऽबाहिरा होति" इत्यनेन कालनियमः क्रियते, 'सर्वदा' सर्वकालममीपामवधिर्भवति, न त्वन्तरालेऽपि प्रतिपततीति । आह-ययेवं तीर्थकृतां सर्वकाला- वस्थायित्वमवधेविरुध्यते, केवलोत्पत्तौ तदभावात् , न, तेषां केवलोत्पत्तावपि वस्तुतस्तत्परिच्छेदस्याप्यनष्टत्वात् सुतरां केवलज्ञानेन सम्पूर्णानन्तधर्मात्मकवस्तुपरिच्छित्तेः छास्थकालस्य चाविवक्षितत्वाददोपः ॥ इत्यवधिज्ञानं समाप्तम् ।। [पृष्ठ ३३] अध मनःपर्यवज्ञाने किञ्चिदुच्यते- पं. ७. उत्पत्तिस्वामीत्यादि. उत्पत्तेः स्वामी तस्य मार्गणा-अन्वेषगा 'कोहलस्येदमुपजायते ?' इत्येवंरूपा तस्या द्वारं तेनेति विग्रहः । पं. १३. उक्तं चेत्यादि, अयमत्र सम्बन्धः राज्ञोपनीतं १-२ अभंतरलद्धी इति पाठः आव० चूणीं ॥ ३ चाहिरलंभो आव० चूणीं ॥ 30 10 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १२१ यत् सिंहासनं तत्रोपविष्टो भगवत्पादपीठे वोपविष्टो ज्येप्टोऽन्यो वा गगधरो द्वितीयपौरुण्यां सङ्ख्ययाऽतीता भवाः-असङ्ख्येयास्तानपि कथयति, असङ्ख्येयभवेषु यदभवद् यद् भविष्यति तत् सर्वं कथयति। 'यद् वा' यद् वस्तुजातं परः पृच्छेद् अभिलाप्यपदार्थगोचरं तत् सर्वं कथयति । किं बहुना ? 'न च' नैव "ग"मिति वाक्यालङ्कारे "अगाइसेसि" त्ति अनतिशयी अवध्यायतिशयरहित इत्यर्थः विजानाति यथैष गणधरश्छमस्थः' इति, अशेषप्रश्नोत्तरप्रदानसमर्थत्वात् तस्येति भाव इति गाथार्थः ।। पं. १६. अत्रार्थे उत्तरत्रयमदायि । पं. २६. त्रीणि योजनशतानीत्यादि, हिमवांश्च शिखरी च हिमवच्छिखरिणी तयोः पादा इव पादाः- 5 अग्रभागास्तेषु प्रतिष्ठिताः-व्यवस्थिता एकोरुकादयोऽन्तरद्वीपाः । क्षेत्रसमासादिग्रन्थादेतत्स्वरूपं विज्ञेयम् । पं. २९. एकेयां मते पुद्गलद्रव्योपचयाद् यकाऽऽहारादिविषया शक्तिरुत्पद्यते सा पर्याप्तिरुच्यते । पं. ३०. सम्प्रति च-तत्रेत्यादिना इत्येके' पर्यन्तेनापरमतेन पर्याप्तिस्वरूपमुक्तम् । [ पृष्ठ ३४] पं. ५. आसां युगपदिति । वेउवा-ऽऽहाराणं सरीर अन्तो उ (? अंतमुहु), पण इगिगसमया। पिह पण अन्तमुहुत्ता, उरले आहार सामइया ॥१॥ पं. ११. ये मिथ्यात्वात् सम्यक्त्वस्य प्रतिपत्त्यभिमुखाः, न तु सम्यक्त्वस्य परित्यागाभिमुखाः, ते जीवाः सम्यग्मिथ्या- दृष्टयोऽन्तर्मुहूर्तमानं कालं भवन्ति । पं. १२. किमित्येवं तल्लक्षणं व्याख्यायते ? इत्याह-यत उक्तमिति । मिच्छत्ता संकंती अविरुद्धा होइ सम्म-मीसेसु । मीसाओ वा दोसुं सम्मा मिच्छं न उण मीसं ॥ १ ॥ इति गाथा परिपूर्णा । यतः सम्यक्त्वपुञ्जाद् मिश्रपुञ्जगमनं निषिद्धमनयेति भावः । संयतस्य सर्वप्रमादरहितस्य विविधर्द्धिमत 15 इदमुत्पद्यते, शेषश्च सम्यग्दृष्टि पर्याप्तकादिविशेषणकलापः सामर्थ्यलब्धोऽप्युच्यते प्रपञ्चितज्ञशिष्यावबोधार्थम् । पं. २६. अस्यां व्युत्पत्ताविति, ऋची चासौ मतिश्चेति कर्मधारयरूपायाम् , यद्दा ऋची साक्षात्कृतेषु मनोद्रव्येषु अनुमितेषु चार्थेष्वल्पतरविशेष- विषयतया मुग्धा मतिः-विषयपरिच्छित्तिर्यस्य प्रमातुः स ऋजुमतिः । विपुलमतिरपि प्रमातैव । [ पृष्ट ३५] पं. १२. द्रव्यत इत्यादि । अनन्तप्रादेशिकान् मनस्त्वपरिणतानन्तस्कन्धसमूहमयमनोद्रव्यरूपान् स्कन्धान् जानाति । 20 क्षेत्रतस्तु ऋजुमतेरर्द्धतृतीयाङ्गुलहीनो मनुष्यलोको विषयः । स एव विपुलमतेः सम्पूणों निर्मलतरः । कालतस्त्वेतावति क्षेत्रे भूत- भाविनोः पल्योपमासंख्येयभागयोरतीता-ऽनागतानि संज्ञिमनोरूपाणि मूर्तद्रव्याणि विषयः । भावतस्तु तत्पर्याया रूपादय- श्चिन्तनानुगुणा परिणतिरूपा ऋजुमतेविषयः । चिन्तनीयं तु मूर्तममृतं वा त्रिकालगोचरमपि बाह्यमर्थमनुमानादेवेति, 'यत एत- त्परिणतीन्येतानि मनोद्रव्यागीति एतदन्यथानुपपत्तेः अमुकोऽनेनार्थश्चिन्तितः' इति लेखाक्षरदर्शनात् तदुक्तार्थमिवाप्रत्यक्ष मनोद्रव्य- दर्शनाच्चिन्त्यमर्थमनुमिमीते । विपुलमतेश्चायं विषयः स्कुटतरः बहुतरविशेषाध्यासितत्वेन विमलतरोऽवसेयः । तेन मनोगतद्रव्यस्कन्धान 25 तद्गतचिन्तानुगुणान् सर्वपर्यायराश्यनन्तभागरूपाननन्तान् रूपादीन् पर्यायान् चिन्तनीयवाह्यघटादिवस्तुगतांश्च जानाति सविशेषान् , पल्योपमासङ्खयेयभागरूपे काले ये तेषां मनस्वपरिणमितमनोद्रव्यागां भृता अनागताच चिन्तनानुगुणाः पर्यायास्तान् सविशेषान् १ किया-ऽऽहारकयोस्तु शरीरपर्याप्तिः अन्तर्मुहूर्तम् , पच पर्याप्तयः एकसामयिक्यः । औदारिके पर पर्याप्तयः पृथग आन्तहित्तिक्यः, आहारपर्याभिः एकसामयिकी ॥ इति भावार्धगर्भा छाया । अत्राथें एषाऽपि ग्रन्थान्तर्गता गाथाऽवधेया-चटव्यिय पजत्ती सरीर अंतमुह, गेम इगसमया । आहारे इगसमया सेसा, अंतमुहु ओराले ॥ १ ॥ इति । विचारसप्ततिकायां तु मतभेदेन पर्याप्तिस्वरूपं दृश्यते-“टरल- दिव्या-ऽऽहारे छण्ह वि पजत्ति जुगवमारंभो । तिण्ह वि पढमिगसमए, बीआ पुण अंतमोहुत्ती ॥ १४ ॥ पिहु पिहु अनबसमयमंतमुटुत्ता उराल चडरो वि । पिहु पिहु समया चउरो वि हुंति वैव्दिया-ऽऽहारे ॥ ४ ॥ घण्ट् वि सममारंने पटमा समाए, चि अंतमाहुती । ति तुरिज समए समए नुरेसु, पण-घट्ट इगसमए ॥ १६ ॥” इति ॥ २ इयं गाया कल्पलघुभाप्य १११ गाथासमा ॥ टी०१६ १२२ मलयानिशी निगरिनिनिर्मित . - जानाति । पं. १५. "वज्झे" ति बागान निन्तनीयवटामीन माग शिलान्या 11 :-H-नि, it गर्गः । अनुगाना- देव चिन्तनीयममूर्त्तमप्याकाशादिकं वस्तु अवगतिमाशा सामान पनि किनि भागः । ६.१८. अमनः- पर्यायदर्शनं भिन्नं नोक्तं कथं पश्यति' इत्युच्यते ? सत्यम् . अनार्दर्शनारगं गनोमनोदगि बाविषयगर या काव्यम् , तेनास्य दर्शनसम्भवः । अयमर्थः-परस्य घटादिकमर्थं चिन्तयतः सातादेव मनःपर्यायजानी मनोगाणि तानाजानानि, तान्येव च 5 मानसेनाचक्षुर्दर्शनेन विकल्पयति, अतो मानसाचार्दर्शनापेक्षया पश्यनी गुगते । तनोकरी गनःपर्यायझानेनः प्रमातुर्मनःपर्याय- ज्ञानादनन्तरमेव मानस[म)चक्षुर्दर्शनमुत्पयते इलसावेक एव प्रमाता मनःपांगज्ञानेन गनोलागि जानानि, तान्येव नाचक्षुर्दर्शनेन मानसेन पश्यतीत्यभिधीयते । पं. १९. एतदेवाऽऽइ-एकप्रमात्रपेक्षयेति, ज्ञानाननरभाविधान मानसाचशुर्दर्शनस्येति कृत्वा सूत्रे पश्यतीत्युपन्यस्तम् । ओघतो वेति, विशेषोपयोगापेक्षाया जानाति. सामान्गार्योपयोगापेक्षया पश्यतीत्युक्तम् । पं. २१. ऊर्ध्वाधस्तियग्भेदात् त्रिधा मनःपर्यायज्ञानिनः क्षेत्रविषयो दृष्टव्यः । तत्र ऋजुगतेरधोविषयोऽमुप्या रत्नप्रभायाः 10 पृथिव्या उपरिमाधस्त्यान् क्षुल्लकप्रतरान् यावन्मनोगतान् भावान् जानाति, ऊर्च यावज्योतिथक्रस्योपरितलम् , तिर्यक् च मनुष्यलोकान्तम् । सोऽपि ऋजुमतेरझेतृतीयाङ्गुलहीनः, इतरस्य सम्पूर्णः । शेगल्यादिवयं कथितं सुगमं चेति समुदायार्थः । वैशाखस्थानस्थं प्रसारितपादं कटिस्थकरयुग्मं पुरुपमिव लोकं व्यवस्थाप्य सर्वमिदं भावनीयमिति । पं. २३. प्राकृत- चूर्ण्यक्षराणि च व्याख्येयानि एतदनुसारतः । रुचकाभिधानात् तिर्यग्लोकमव्याद् अधो यावन्नव योजनशतानि रुचकादेव चोर्ध्व नव योजनशतानि यावद् ज्योतिश्चक्रस्योपरितलस्तावदेप समुदितोऽष्टादशशतयोजनमानस्तिर्यग्लोक इति । 15 कायचो त्ति संवतः सङ्कोचनम् । पं. २८. संवहो [पृष्ठ ३६] पं. ३. तिरियलोयमज्झाउ त्ति रुचकाभिधानात् तिर्यग्लोकमध्याद् अधो यावन्नव योजनशतानि तावदमुष्या स्नप्रभाया उपरिमाः क्षुल्लकप्रतराः, क्षुल्लकत्वं च तेपामधोलोकप्रतरापेक्षया । तेभ्योऽपि येऽधस्तादधोलोकग्रामान् यावत् तेऽधस्तनाः क्षुल्लक- पं. ५. अहव त्ति रयणप्पहपुढवीए इति न योज्यम् । पं. ६. अत्र पक्षे अण्णे इत्यादि । 20 पं. ७. सव्यतिरियलोगवत्तिणो त्ति अष्टादशशतयोजनवर्तिनः । पं. ८. ताण चेव त्ति नवयोजनशतमध्यवर्तिनाम् । इमं च त्ति अधोलौकिकग्रामेषु मन:पर्यवज्ञानबाधात्वतः, यतस्तियालोकस्थो मनःपर्यायज्ञानी पश्यतीत्यत्र मते आपनम् । प्रतराः । अन्यच्च 25 ग्राद्याः। अहलोइयगामेसुं तित्थयरा केवली य विनंति । जाण विजयाण मज्झे मेरुस्स य पच्छिमदिसाए ॥ १ ॥ पं. १३. अपान्तरालगतावप्युत्पत्तिस्थानमप्राप्नुवन्तोऽपि संज्ञिनोऽभिधीयन्ते, तदायुप्केति आगामिभवायुष्कोदयवशात् । पं. १४. तेऽपि चेति इन्द्रियपर्याप्त्या पर्याप्तत्वभावात् पञ्चेन्द्रियव्यपदेशं लभन्ते, परं मनःपर्याप्त्या पर्याप्ता एव पञ्चेन्द्रिया पं. १६. हेतुवादोपदेशेनेति, हेतुः-निमित्तं कारणमित्यनन्तरम् , तस्य वदनं-चादस्तद्विपय उपदेश:-प्ररूपणं हेतुवादोपदेशः, तेन विकलेन्द्रियाः-दीन्द्रियादयः सचेष्टाकाः संज्ञिनः, पृथिव्यादय एव निश्रेष्टा असंज्ञिनः । हेतुवादश्चायम्- संज्ञिनो द्वीन्द्रियादयः, हेयोपादेयेषु निवृत्ति-प्रवृत्तेः, देवदत्तादिवत् , तथा च तापादिसन्तप्ताश्छायासमाश्रयणादि कुर्वन्तो दृदयन्ते । पं. १८. विपुलमति:जुमतेः सकाशात् जानाति पश्यति क्षेत्रमायाम-विष्कम्भावाश्रित्याभ्यधिकतरकम् , वाहल्यमाश्रित्य 30 विपुलतरकम् , ' विशुद्धतरं ' निर्मलतरं 'वितिमिरतरक' तिमिरकल्पतदावरणस्य विशिष्टतरक्षयोपशमसद्भावात् । पं. २१. विशुद्धतरमित्यत्र दृष्टान्तपुरःसरं विशुद्धतरत्वं भावयति यथा चन्द्रेत्यादिना-कारणविशेषात् कार्यविशेषः किल भवन्नुपलभ्यते, यथा चन्द्रकान्तादिविमलप्रकाशकद्रव्यविशेषाद् विमलप्रकाशयुक्तो द्रष्टा विमलं पश्यति, स एव चन्द्रकान्तादि- . . -- " . श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १२३ विमलतरप्रकाशकद्रव्यविशेषाद् विमलप्रकाशयुक्तद्रष्टुः सकाशाद् विमलतरं पश्यति, एवं प्रकृतेऽपि तपश्चरण-विनय-ध्यानादि यः कारणभेदः ततस्तद्वशाद् विष्कम्भितोदयं यन्मनःपर्यायज्ञानस्याऽवरणम् आवारकं कर्म तस्य मन्द-मन्दतरविशेषभावो भवति । यस्य तपश्चरणाल्पं तस्य मन्दस्तदावरणविष्कम्भितोदयविशेषः, यस्याल्पतरं तस्य सोऽपि मन्दतरः, यस्य तपश्चरणादिभेदः प्रकृष्टः तस्य विष्कम्भितोदयविशेषोऽपि विमलः, यस्य तपश्चरणादि प्रकृष्टतरं तस्य तदावरणविष्कम्भितोदयत्वमपि विशिष्टतर- मित्यक्षरगमनिका । पं. २३. उपशान्तं नाम विष्कम्भितोदयं यदावरणं तस्य विशेषांदपि । तदावरणेति, तिमिरकल्पं 5 यत् तदावरणं तस्य क्षयेण सह उपशमः-उदीर्णानां कर्मगां क्षयेण वेदनकृतः अनुदीर्णानां चोपशमेन विष्कम्भितोदयत्वेन क्षयो- पशमस्तस्य विशेषाद् ‘वितिमिरतरं' आवरणतिमिररहितम् । पं. २५. अथवेति प्राग्वद्धं यत् तदावरणं कर्म तस्य क्षयोपशमः प्रागुक्तस्तस्य प्राधान्याद् विशुद्धतरम् । वध्यमानावरगस्य विशेषस्तारतम्येन यत्र तद् वितिमिरतरम् । पं. २६. अन्ये तु 'तदावरणस्य वध्यमानाभावेन वितिमिरं तदुच्यते' इत्याहुः । पं. २७. अथ 'वितिमिरादिविशेषणं क्षेत्र जानाति पश्यति' इति कथमुच्यते ? क्षेत्रं ह्याकाशम् तस्य चामूर्त्तत्वात् कथं तद्विपये छमस्थस्य पश्यत्तासम्भवः ? इत्याशङ्कयाह- 10 तात्स्थ्यादिति, क्षेत्रस्थं द्रव्यमपि क्षेत्रमुच्यते । समर्थितं मनःपर्यायज्ञानम् ।। [ पृष्ठ ३७] केवलज्ञानमधुना । तत्र पं. १६. कम्मे सिप्पे य० गाहा । नाम-स्थापना-द्रव्यसिद्धव्युदासेन शेषाः कर्मसिद्धा- दयश्चतुर्दशामी सिद्धभेदाः । तत्र कर्मणि सिद्धः कर्मसिद्धः, कर्मगि निष्टां गत इत्यर्थः । एवं शिल्पसिद्धादिप्वपि वाच्यम् । नवरं कर्म-शिल्पयोर्विशेषोऽयम्-आचार्योपदेशाद् यद् न जातं तदनाचार्योपदेशजं सातिशयमनन्यसाधारणं कर्मोच्यते, यदाचार्योपदेशजं 15 ग्रन्थनिबन्धाद्दा उपजायते तत् सातिशयं कर्मापि शिल्पमुच्यते । अयं वाऽनयोविगेपः-यत् किल पीठफलक-मञ्चादिनिर्मापणं तस्मिन्नेव क्षणे प्रारब्धं तदैव निप्पाद्यतेऽकालहीनं तत् कादाचित्कं शिल्पम् , न पुनः प्रासादादिवनित्यं प्रतिदिनं यत् क्रियते, प्रासादादि- निर्मापणादिकं तु बहुदिनसाध्यत्वादाचार्योपदेशजत्वात् सातिशयं नित्यव्यापारत्वात् शिल्पमपि कर्मोच्यते । अत एव बुद्धिप्रस्तावे वश्यति-"कादाचिकं वा शिल्पम् , नित्यव्यापारः कर्म" [ पत्र ४७ पंक्ति २६ ] इति । कर्मसिद्धादिदृष्टान्तास्त्वावश्यकाद् ज्ञेयाः । स्त्रीदेवताधिष्टिता विद्या ससाधना च । पुरुपदेवताधिष्टितो मन्त्रोऽसाधनश्च । योगोऽदृश्यीकरण-पादप्रलेपादिगोचरः । तत्र 20 योगसिद्धः पादलिप्ताचार्यवत् , आगमसिद्धो गौतमवत् , अर्थसिद्धो मम्मणवणिग्वत् , यात्रासिद्धो हनूमानवत् , अभिप्रायः- बुद्धिः तत्सिद्धः चाणक्या-ऽभयकुमारादिवत् , तपःसिद्धो दृढपहारिवत् , कर्मक्षयसिद्धो निरञ्जन-ऋपभादिवत् । पं. १९. सितं वद्धमिति, सेतति-बध्नाति जीवमिति सितम् नान्युपधत्वात् [ कातन्त्र ४-२-५१ ] के सितम् , पिञ् वन्धने वा" भावे ते सितमिति । पं. २८. सह योगेनेति--जीवव्यापारेण वर्तन्ते सयोगाः, योगा मनोवाकाया एव, तेऽस्य सन्तीति सयोगी । [ पृष्ठ ३८] पं. ५. तत्प्रथमतयेति, यो येन भावेन पूर्व नासीद् इदानी च जातः स तेन भावेन तत्प्रथम उच्यते, तस्याप्राप्तपूर्वव्यात, प्राप्तस्य पुनर्वसाभावात् । पं. ६. अन्यथा प्रतिपाद्यत इति, वैविध्यमिति शेपः ॥ पं. २७. अनन्तरभवगतो- पाधिभेदेनेति. अनन्तरभवगतश्वासावुपाधिभेदश्च स तथा तेन । उपाधिः-विशेषगम् । [ पृष्ठ ३९] पं. १. अचिन्त्यशक्तिसमन्वितं च तद् अविसंवादि च तद् उडुपकल्यं च-नौकन्यं नत् नवनि समासः । . 25 30 5 .. با . १२४ गलभारिपती श्रीन निशाना पं. ४. तीर्थान्तरसिद्धा नाम ये सुविधिप्रभृतीनागानां शान्तिनाथालानां गिनानामगिर जागिरणग्णादिना वाज्ञानादि- सन्मार्गाः सन्तः सिद्धाः । तीर्थान्तरकालस्य च मानमिदम् ----- चउभाग चउभागो तिन्नि चउभाग पलियमेगं च । नङगागं न उभागो उभागो उभागो ॥ १ ॥ [प्रवननः गा. १३१] ति। पं. ७. स्वयं-बाह्यनिमित्तमन्तरेण जातिस्मरणादिना बुद्धाः सन्तो ये सितारले स्वयम्सुद्धसिद्धाः । प्रत्येकम्- -अन्यान्यं बाह्य-वृषभादि कारणं दृष्ट्वा वुद्धाः सन्तो ये सिद्धास्ते प्रत्येकबुद्धसिद्धाः । पं. ११. उपधिः पुनः स्वयम्बुदानां चोलपट्ट-मात्रकवर्जः पात्रादिदशविधः । प्रत्येकबुद्धानां पुनर्जघन्यो रजोहरण मुखवसिकारूपो तिविध उपभिः, उत्कृष्टतथोल- पट्ट-मात्रक-कल्पत्रिकवों नवविधः । पं. १२. स्वयम्बुद्धानां पूर्वाधीतं श्रुतं स्याहा न वा । प्रत्येकवुदानां पुनस्तनियमतो भवत्येव, जघन्यत एकादशाङ्गानि, उत्कृष्टतो भिन्नदशपूर्वाणि । लिङ्गप्रतिपत्तिः स्वयम्बुझानां यदि पूर्वाधीतं श्रुतं नास्ति ततो 10 नियमाद् गुरुसमीपे भवति, अथ श्रुतं समस्ति ततो देवता लिङ्ग प्रयच्छति गुरुसमीपे वा प्रतिपयन्ते । यदि चैकाकिविहारयोग्यता इच्छा च समस्ति तत एकाकिन एव विचरन्ति, अन्यथा गच्छ एवाऽऽसते । प्रत्येकबुदाना पुनर्लिङ्ग देवतैव प्रयच्छति, लिङ्गवर्जिता वा भवन्ति । यदुक्तम्-"रुप्पं पत्तेयवुहा" [आव० नि० गा० ११५१ ] इति । अत्र सङ्ग्रहगाथा यथा- सुरलिंगे पुव्वसुए अनियय-नियया सवुद्ध-पत्तेया । अनिमित्तेयरवोही, वारस नव उवहिणो हुँति ॥१॥ पं. १६. तीर्थकरीसिद्धाः स्तोकाः १ तीर्थकरीतीर्थ 'नोतीर्थसिद्धाः' तीर्थान्तरे सिद्धा ये प्रत्येकबुद्धसिद्धा इत्यर्थः ते 15 सङ्ख्यातगुणाः २ तीर्थकरीतीर्थे 'नोतीर्थकरीसिद्धाः' सामान्यकेवलिस्त्रियः ताः सङ्ख्येयगुणाः ३ तीर्थकरीतीर्थ 'नोतीर्थकरसिद्धाः' सामान्यकेवलिपुरुषास्ताभ्यः सङ्ख्येयगुणाः ४ । पं. १८. यथा तीर्थकराः स्त्रीलिंगे भवन्त्येवं नपुंसकलिंगेऽपि किं ते स्युः ? इत्याशंक्याऽऽह-न तु नपुंसकलिङ्गा इति, तीर्थकृतः स्युरिति वाक्यशेपः । प्रत्येकवुद्धा अपि स्त्री-नपुंसकलिङ्गे न भवन्ति, किन्तु पुंस्येव । तीर्थकर-प्रत्येकबुद्धवर्जा: केचन नपुंसकलिङ्गसिद्धा भवन्ति । रजोहरणादिलिङ्गधारिणो ये सिद्धास्ते स्वलिङ्गसिद्धाः । परिव्राजकादिलिगसिद्धा अन्यलिङ्गसिद्धाः । नवरं यदाऽन्यलिङ्गिनामपि भावतः सम्यक्त्वादिप्रतिपन्नानां केवलज्ञानमुत्पद्यते तदैव च 20 कालं कुर्वन्ति तदेदम् । अन्यथा यदि दीर्घमायुरात्मनः पश्यन्ति तदा साधुलिङ्गमेव प्रतिपद्यन्ते । एवं गृहलिङ्गसिद्धा अपि मरुदेवीप्रभृतयः इत्थमेव वक्तव्याः । सिद्धकेवलिनोऽपि गुणाष्टकं भवति । यदुक्तम्- सम्मत्त १ नाण २ दंसण ३ वीरिया ४ ऽवाहा ५ तहा य अवगाहो ६ । अगुरुलहू ७ सुहुमत्तं ८ अट्ठ गुणा हुंति सिद्धस्स ॥ १॥ [ पं. २२. बत्तीसा० गाहा । एतद्विवरणम्-यदा एकसमयेन एकादय उत्कर्षेण द्वात्रिंशत् सिध्यन्ति तदा द्वितीयेऽपि समये 25 द्वात्रिंशत् , एवं नैरन्तर्येण अष्टौ समयान् यावद् द्वात्रिंशत् सिध्यन्ति, तत ऊर्ध्वमवश्यमेवान्तरं भवतीति । यदा पुनस्त्रयस्त्रिंशत आरभ्य अष्टचत्वारिंशदन्ता एकसमयेन सिध्यन्ति तदा निरन्तरं सप्त समयान् सिध्यन्ति, ततोऽवश्यमेवान्तरं भवति । एवं यदा एकोनपञ्चाशतमादिं कृत्वा यावत् पष्टिरेकसमयेन सिध्यन्ति तदा निरन्तरं पट् समयान् सिध्यन्ति, तदुपरि अन्तरं समयादि भवति । एवमन्यत्रापि योयम् । यावद् अष्टशतमेकसमयेन यदा सिध्यति तदाऽवश्यमेव समयाद्यन्तरं भवतीति । अन्ये तु व्याचक्षते-अष्टौ समयान् यदा नैरन्तर्येण सिद्धिस्तदा प्रथमसमये जघन्येनैकः सिध्यति उत्कृष्टतो द्वात्रिंशदिति, द्वितीयसमये 30 जघन्येनेक उत्कृष्टतोऽष्टचत्वारिंशत् , तदेवं सर्वत्र जघन्येनैकः समयः उत्कृष्टतो गाथार्थोऽयं भावनीय इति ।। .[ पृष्ठ ४०] पं. १३. क्रमोपयोगादाविति, आदिशब्देन एकोपयोगमतस्य परिग्रहः । ? با म , . श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १२५ पं. २९. इहराऽऽई० गाहा । व्याख्या-ननु यथेकस्मिन् समये केवलज्ञानोपयोगोऽन्यस्मिंस्तु समये केवलदर्शनोप- योग इष्यते तहर्येवं क्रमोपयोगत्वे केवलज्ञान-दर्शनयोः ‘सनिधनत्वं' प्रतिसमयं सान्तत्वं प्राप्नोति, तथा च सति तयोः समयोक्तमपर्यवसितत्वं हीयते । अथवा यः कष्टशतानि कृत्वा ज्ञानावरगादिक्षयो विहितः सः 'मिध्या' निरर्थकः 'जिनस्य' भगवतः प्राप्नोति, समयात् समयादूर्य केवलज्ञान-दर्शनोपयोगयोः पुनरप्यभावात् ; नापनीतावरगौ द्वौ प्रदीपो क्रमेण प्रकाश्यं प्रकाशयतः किन्तु युगपदेव । अथवा केवलज्ञान-दर्शनयोः ‘इतरेतरावरगता' परस्सरमावारकत्वं प्राप्नोति, कर्मरूपावरणाभावेऽपि 5 अन्यतरसद्भावेऽन्यतराभावादिति । अथ इतरेतरावरणता नेष्यते तन्यतरोपयोगकालेऽन्यस्य निष्कारगमेवाऽऽवरणं स्यात् , तथा च सति "नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा" [प्रमागवार्त्तिक ३-३४] इत्यादि प्रसज्यत इति ॥ ४ ॥ [ पृष्ठ ४१] पं. ९. तथा एकतरस्मिन्-ज्ञाने दर्शने वा अनुपयुक्त एकतरानुपयुक्तः, तस्मिन् एकतरानुपयुक्ते केवलिनीप्यमाणे ज्ञानानु- पयोगेकाले तस्य केवलिनोऽसर्वज्ञत्वं प्राप्नोति, दर्शनानुपयोगेकाले त्वसर्वदर्शित्वं प्रसजति, तच्चासर्वज्ञवमसर्वदर्शित्वं च नेष्टं 10 जैनानाम् , सर्वदैव केवलिनि सर्वज्ञव-सर्वदर्शित्वाभ्युपगमादिति । सूरिराह-ननु छमस्थस्यापि दर्शन-ज्ञानयोरेकान्तरे उपयोगे सर्वमिदं दोपजालं समानमेव । अत्रापि हि शक्यते एवं वक्तुम्-ज्ञानानुपयोगे तस्याज्ञानित्वम् , दर्शनानुपयोगे पुनरदर्शनित्वम् , तथा मिध्याऽऽवरणक्षयः इतरेतरावरणता वा निष्कारणावरणत्वं वेत्यादि ‘बहुविधीकाः' बहुविधा दोवा इत्यर्थः ।। ५ ॥ पं. १३. भण्णईत्यादिगाथाः विवृता ग्रन्थकृता किञ्चित् , सुगमाश्च ।। [पृष्ठ ४२] पं. ४. तदित्थं बुभुक्षिता जरगवीव वुशगृहे प्रविशन्ती निविडयुक्तिलगुडादिवातैर्निवार्यमागाऽपि परस्य दुराग्रहबुद्धिर्न निव- तते, ततश्चक्षुपी निमीच्य धृष्टतया पुनर-याह—तुल्ले उभयावरणे० गाहा। द्विविधोपयोगभावे इप्यमाणे जिनस्य प्रथमतरं उद्भवः-उत्पादः कस्य ? ज्ञानस्य ? दर्शनस्य वा ? इति, आवरणक्षयस्य युगपद्भावात् , ततो जिनस्य द्विविधोपयोगाभावः प्राप्नोति इति प्रश्नः, युगपद्भावानिष्टौ एकोऽपि न प्राप्नोति ॥ १३ ॥ पं. १४. अथैवं सूरिः परं दुरभिनिवेशममुञ्चन्तमवलोक्य युगपदुपयोगद्यपक्षं मूलत एवोन्मूलयितुं क्रमोपयोगसाधकं व्यक्त- 20 मेव सिद्धान्तोक्तमादर्शयन्नाह- भणियं पि य पन्नत्ती-पन्नवणाईसु, जह जिणो समयं । जं जाणइ न वि पासइ तं अणु-रयणप्पभाईणि ॥ १६ ॥ ननु 'प्रज्ञप्त्यां भगवत्यां प्रज्ञापनायां च स्कुटं 'भणितमेव' उक्तमेव, यया-'जिनः' कंवली परमाणु-रत्नप्रभादीनि वस्तूनि "समयं जं जाणइ ति यस्मिन् समये जानाति "न वि पासइ तं" ति तस्मिन् समये नैव पश्यति, किन्वन्यस्मिन् समये 25 नानाति अन्यस्मिंस्तु पश्यति । इयमत्र भावना-इह भगवत्यां तावदृष्टादशशतत्याटमोद्देशके स्फुटमेवोक्तम् , तद्यथा-"एउमत्ये णं भंते ! मणुस्से परमाणुपोग्गलं किं जाणइ न पासइ ? उदाहु न जागइ न पासह ? गो० ! अत्येगइए. जागइ न पासइ, अगइए न जाणइ न पासइ, एवं जाव असंखेजपएसिए खंबे ।" इह छमस्यो निरतिशयो गृह्यते । नत्र श्रुतज्ञानी उपयुक्ताः श्रुतज्ञानेन परमाणुं जानाति न तु पश्यति, श्रुते दर्शनाभावात् । अपरस्तु न जानाति न पश्यति । “पूर्व आहोदिर. वि” आयोवधिक:- न्यूनावधिकः । “परमाहोहिए णं भंते ! मगृते परमाणुपोग्गलं जं समयं जाणइ तं समयं पास ! हं समयं पासद नं समयं 30 ६ दर्शनसमये जैटि० ॥ २ ज्ञानसमये जैटि० ॥ 15 ...
- १२६ मालपारिश्री श्रीनकासर्गिनिर्मित जाणइ ? नो इणद्वे समढे । से केणद्वेणं भंते ! एवं युगइ ! गोल ! सागार से नाणे मा. गागारे से दाणे भाइ, से रोगद्वेग एवं वुचईत्यादि । केवली णं भंते ! मणूसे परमाणुपोग्गलं जं समां जागा तं समयं पाराइ ? जे रामगं पाराः तं रामगं जाणइ ! णो इणद्वे० । से केणद्वेणं भंते ! एवं वुचाइ ? गोल ! सागारे से नाणे भाइ. अनागारे से देराणे भरा, से पाणं एवं बुगई" त्यादि [पत्र ७५५] । एवं प्रज्ञापनोक्तमपि द्रष्टव्यम् । तदेवं सिद्धान्ते स्कुटाभर्युगपदुपयोगे निगिरेऽपि क्रिगिति सर्वानर्थमूलं 5 तदभिमानमुत्सृज्य क्रमोपयोगो नेप्यते ? इति ॥ १६ ॥ [पृष्ठ ४३] पं. १५. सूत्रक्रमोद्देशत इति, नन्द्यादिसूत्रे इत्थमेव तस्य निर्देशात् । शुदित इति. केवलस्य हि सर्वावरणक्षयसम्भ- वत्वेन सर्वोत्कृष्टत्वात् सर्वोपरिवर्तिनी विशुद्धिः । लाभत इति, लाभोऽपि केवलस्य शेषज्ञानानन्तरं पश्चादेव भवतीति मनःपर्याय- ज्ञानादनन्तरं केवलज्ञानमुपन्यस्तम् , अतस्तदर्थसूचकोऽयमथशब्दः । 'अर्थ' अनन्तरं केवलज्ञानमुच्यते । कथम्भूतम् ? इत्याह- 10 सर्वाणि च तानि द्रव्याणि च सर्वव्यागि-जीवादीनि, तेषां परिणमनानि परिणामाः-प्रयोग-विससोभयजन्या उत्पादादयः सर्व- द्रव्यपरिणामाः, तेषां भावः-सत्ता स्वलक्षणं वा तस्य विविधं विशेषेण वा जपनं-प्रबोधनं विज्ञप्तिः, अथवा विविधं विशेषेण वा ज्ञानम्-अवबोधः परिच्छित्तिर्विज्ञप्तिः, तस्याः केवलज्ञानादभेदेऽपि विवक्षितभेदयोः कारणं--हेतुर्विज्ञप्तिकारणम् , सर्वव्य-क्षेत्र- काल-भावास्तित्वपरिच्छेदकमित्यर्थः । तच्चानन्तज्ञेयविषयत्वेनानन्तपर्यायल्यादनन्तम् । शश्वद्भावात् शाश्वतम् , सततोपयोगमित्यर्थः । तथा 'अप्रतिपाति' अव्ययम् , सदाऽवस्थायीत्यर्थः । समस्तावरणक्षयसम्भूतत्वाद् 'एकविध' भेदविमुक्तम् । 'केवलं' परिपूर्णम् , 15 समस्तज्ञेयावगमात् , मत्यादिज्ञाननिरपेक्षत्वाद् असहायं वा केवलम् , तच्च तद् ज्ञानं च केवलज्ञानमिति गाथार्थः ।। पं. ३०. केवलनाणे० गाहा । इह समुत्पन्नकेवलज्ञानस्तीर्थकरादिः 'अर्थान्' धर्मास्तिकायादीन् मूर्ता-ऽमूर्ता-ऽभिलप्या- ऽनभिलप्यान् केवलज्ञानेनैव 'ज्ञात्वा' अवबुध्य, न तु श्रुतज्ञानेन, तस्य क्षायोपशमिकत्वात् केवलिनश्चावरणस्य सर्वथा क्षीणत्वेन तत्क्षयोपशमाभावात् ; नहि सर्वविशुद्धे पटे देशविशुद्धिः सम्भवति, तद्वदिहापीति भावः । ततः किम् ? इत्याह-तत्र' तेपामर्थानां मध्ये ये प्रज्ञापनायाः-प्ररूपणाया योग्याः 'तान्' अभिलप्यान् भापते, नेतराननभिलप्यान् । प्रज्ञापनीयानपि न सर्वानेव भापते, 20 तेपामनन्तत्वात् , आयुपस्तु परिमितत्वात् , किं तर्हि ? योग्यानेव भापते ग्रहीतृशक्त्यपेक्षया, यो हिं यावतां योग्य इति, यत्र वाऽभिहिते शेपमनुक्तमपि विनेयोऽभ्यूहति । तदपि योग्य भापते, यथा ऋपभसेनादीनामुत्पादादिपदत्रयोपन्यासेनैव शेषगतिः । तत्र केवलज्ञानोपलब्धार्थाभिधायकः शब्दराशिर्भाष्यमाणस्तस्य भगवतः "वइजोग" त्ति वाग्योग एव भवति, न तु श्रुतम् , नाम- कर्मोदयजन्यत्वात् । तत्र नामकर्मेह भापापयर्याप्तिसामर्थ्य शरीरनाम वा, तस्योदयजन्यत्वाद् वाक्परिस्पन्दस्य, श्रुतस्य च क्षायोपशमि- कत्वात् । ज्ञानमध्यस्य केवलिनः क्षायिकत्वात् केवलमेव, न भावश्रुतम् । आह-ननु वाग्योगो वाक्परिस्पन्दो वाग्वीर्यमित्यनर्था- 25 न्तरम् , अयं च भवतु नामकर्मोदयजन्यः, भाष्यमाणस्तु पुद्गलात्मकः शब्दः किं भवतु ? इति चेत् , उच्यते-सोऽपि श्रोतॄणां भाव- श्रुतकारणत्वाद् द्रव्यश्रुतमात्रं भवति, न तु भावश्रुतम् । तर्हि किं तद् भावश्रुतम् ? इत्याह-"सुयं हवइ सेसं" ति ज्ञानं यत् गणधरादीनां श्रुतग्रन्थानुसारि ज्ञानं तदेव केवलिगतज्ञानापेक्षया 'शेपम्' अन्यद् भावश्रुतं भवति, क्षायोपशमिकोपयोगात्, न तु केवलिगतं ज्ञानम् , तस्य क्षायिकत्वादिति । अथवा "सुयं हवइ सेसं" इत्यन्यथा व्याख्यायते-तद् .भण्यमानं शब्दमानं तत्काल एव श्रुतं न भवति, किं तर्हि ? शेष कालमिति वाक्यशेपः । इदमुक्तं भवति-तत् केवलिनः शब्दमात्रम् , श्रोतृणां श्रवणानन्तर 30 लक्षणे शेषकाले श्रोतृगतज्ञानकारणत्वेनोपचारात् 'श्रुत' द्रव्यश्रुतं भवति, न तु भणनक्रियाकाल इति । अथवाऽन्यथा व्याख्यायते- स केवलिनः सम्बन्धी वागयोगः श्रुतं भवति । कथम्भूतम् ? 'शेष' गुणभूतमप्रधानम् , औपचारिकत्वादिति । अन्ये तु पठन्ति- "वइजोग मुयं हवइ तेसिं" ति, तत्र 'तेषां' भाषमाणानां सम्बन्धी वाग्योगः श्रोतृगतश्रुतकारणत्वात् श्रुतं भवति, द्रव्यश्रुत- मित्यर्थः । अथवाऽन्योऽयः-'तेपामिति' श्रोतृणां तानाश्रित्येत्यर्थः, भापकगतं वाग्योग एव श्रुतं वाग्योगश्रुतं भवति, भावभुतका- . छमस्थानां .
श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १२७ रणत्वाद् द्रव्यश्रुतमेवेत्यर्थः । अथवा तानर्थान् भापते केवली, वाग्योगश्चायं शब्दराशिरस्य भाषमाणस्य भवति, तेषां श्रोतृणां भावश्रुतकारणत्वात् श्रुतमसौ भवति । पदघटनाकृत एव विशेषः, अर्थः स एवेति गाथार्थः ॥ [ पृष्ठ ४४] पं. १४. अनयोश्चेत्यादि, ‘मतिपूर्वकत्वात् श्रुतस्य विशिष्टमत्यंशरूपत्वाद्वा श्रुतात् प्रथमतो मतिज्ञानमेवोच्यते' इत्यादिकं प्रयोजनमुक्तम् [पत्र १९ पं. १८] । पं. २६. स्वामित्वादिभिर्विशेषाभावाद् मति-श्रुतयोरेकतैव प्राप्ता, न भेदः स्यात्, 5 तथा च सति न परोक्षद्वैविध्यसिद्धिः ज्ञानपञ्चकसिद्धिर्वा, धर्मभेदे हि वस्तूनां भेदः स्यात् , धर्माभेदे तु घट-तत्स्वरूपयोरिवाभेद एव श्रेयानिति पराशयः । अत्राऽऽचार्यः प्रत्युत्तरयति लक्षणभेदादित्यादिना, यद्यपि स्वामि-कालादिभिर्मति-श्रुतयोरेकत्वं तथापि लक्षण-कार्य-कारणभावादिभिर्नानात्वमत्येव, घटा-ऽऽकाश-धर्मा-ऽधर्मादीनामपि हि सत्त्व-प्रमेयल्वा-ऽर्थक्रियाकारित्वादिभिः साम्ये- ऽपि लक्षणादिभेदाद् भेद एव । यदि पुनर्वहुभिर्धर्मभेंदे सत्यपि कियद्धर्मसाम्यमात्रादेवार्थानामेकत्वं प्रेर्येत तदा सर्वं विश्वमेकं स्यात् । किं हि नाम तद् वस्त्वस्ति यस्य वस्त्वन्तरैः सह कैश्चिद् धर्मेन साम्यमस्ति, तस्मात् स्वाम्यादिभिस्तुल्यत्वेऽपि लक्षणा- 10 दिभिर्मति-श्रुतयोर्भेदः । ते च मति-श्रुतभेदनिबन्धना लक्षणादयः सम्पिण्डबैकगाथयोच्यन्ते । सा चेयम् - लक्खणभेया हेउ-फलभावओ भेय-इंदियविभागा । वाग-ऽक्खर-मूएयरभेया भेओ मइ-सुयाणं ॥१॥ विशेषा० गा० ९७] 'लक्षणभेदाद्' भिन्नलक्षणत्वान्मति-श्रुतयोर्भेदः । तथा मतिज्ञानं हेतुः श्रुतं तु तत्फलं-तत्कार्यमिति हेतु-फलभावात् तयो- र्भेदः । तथा "भेय" त्ति विभागशब्दो अत्रापि युज्यते, ततश्च भेदानां विभागः-विशेषो भिन्नत्वं भेदविभागस्तस्मादपि मति-श्रुतयो- भेंदः। अवग्रहादिभेदादष्टाविंशत्यादिभेदं हि मतिज्ञानं वदयते, "अक्खर सगी सम्म"मित्यादिवश्यमाणवचनाच्चतुर्दशादिभेदं 15 च श्रुतज्ञानमिति भेदविभागात् तयोर्भेद इति भावः । "इंदियविभाग” त्ति तत्त्वतः श्रोत्रविषयमेव श्रुतज्ञानम् , शेपेन्द्रियविषयमपि मतिज्ञानमित्येवं वदयमाणादिन्द्रियविभागाच्च तयोर्भेदः । “वागे"त्यादि, वल्कथ अक्षरं च मूकं च वल्कादिप्रतिपक्षभूतानीतराणि च वल्का-ऽक्षर-मूकेतराणि तैर्योऽसौ भेदस्तस्मादपि मति-श्रुतयोर्भेद इत्यर्थः । तथाहि-- "अन्ने मन्नंति मई वागसमा, सुंबसरिसयं सुत्तं ।" [विशेषा० 'गा० १५४ ] इत्यादिना ग्रन्येन कारणत्वाद् वल्कसदृशं मतिज्ञानम् , शुम्बसदृशं तु श्रुतज्ञानम् , कार्यत्वादित्यभिहितम् । तत्र वल्क:-पलाशादित्वग्रूपः, शुम्बं तु इतरशब्देनेहोपात्तम् , 20 तज्जनिता दवरिकोच्यते । ततश्चायमभिप्रायः यथा वलनादिसंस्कृतो विशिष्टावस्थाप्राप्तः सन् वत्को दवरिकेत्युच्यते, तथा परो- पदेशाहद्वचनसंस्कृतविशिष्टावस्थाप्राप्तं सद् मतिज्ञानं श्रुतमभिधीयत इत्येवं वल्केतरभेदान्मति-श्रुतयोर्भेदः । तथा- "अन्ने अगक्खर-ऽक्खरविसेसओ मइ-सुयाई भिंदन्ति । जं मइनाणमगक्खरमक्खरमियरं च मुयनाणं ॥१॥" [विशेपा० गा० १६२] इत्यक्षरेतरभेदात् तयोर्भेदः । तथा- "स-परम्पञ्चायणओ भेओ मूएयराण वाऽभिहिओ। जं मयं मइनाणं स-परम्पञ्चायगं नुत्तं ॥१॥" [विशेषा० गा० १७१] इति वचनान्मूकेतरभेदाद् मति-श्रुतयोर्भेद इति गाथार्थः ।। [ पृष्ट ४५] पं. १. तत्रानयोर्लक्षणभेदाद् भेदं तावत् सूत्रकारः प्राह 'अभिनिबुध्यते' इत्यादिना-यद ज्ञानं कर्न बस्नु कर्मनापन्न- 30 मभिनिवुध्यते-अवगच्छति तद् ज्ञानमाभिनियोधिकन् , भतिज्ञानं तदित्यर्थः, यनीवः शृगोति नत् श्रुतन इत्येवं सूत्रोक्तालक्षण- भेदादनयोर्भेदः । यदि 'यदात्मा शृणोति तत् श्रुतमिति श्रुतस्य लागमुच्यते नहि दाब्दमय जीवः शृणोति सकर- . [ - - 25 १२८ मलधारिणीभीनगमिग 10 - जगत्प्रतीतमेवेति स एव श्रुततां प्राप्नोति. नाऽऽगनः परिणामविला. गो. नी. प. ज्ञान शानिनो दाद जीवः शृगोतीति कृत्वा श्रुतकारणत्वात् श्रुतमन्दः स्यादुपनारनः । पं. २. कागगरे गागि गनिमगोशाणभेदगाह एतदुक्तमित्यादिना—इन्द्रियाणि च मनच तानि निमित्तं यस्य तन तथा नियमनोमाग या विज्ञानगुण जागते नन शुनम् , श्रुतज्ञानमित्यर्थः । इन्द्रिय-मनोनिमित्तं च मतिज्ञानमपि भवःयतस्ता नवदागाह-श्रुतग्रन्थानुसारिणेति, भूगो इति श्रुत-शब्द 5 उच्यते, स च सङ्केतगोचरपरोपदेशरूपः श्रुतग्रन्था-मको गृयते. तदनुसारण गापजायते तत् श्रुतज्ञानम् . नान्गत् । एतदुक्तं भवति-सङ्केतकालप्रवृत्तं श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनं वा घटादिशब्दमनुसृत्य वाप-चानकभावेग संगोग गटो घटः' इत्यागन्तर्जग्गाका- रमन्तःशब्दोल्लेखान्वितमिन्द्रियादिनिमित्तं यद् ज्ञानमुदेति तत् श्रुतज्ञानमित्यर्थः । शेषगिन्धिग-मनोनिमित्तमातानुसारेण यदवप्रहादि ज्ञानं तन्मतिज्ञानमित्यर्थः । तदुक्तम्- इंदिय-मणोनिमित्तं जं विन्नाणं सुयाणुसारेण । निययत्युत्तिसमत्थं तं भावयुयं, मई सेसं ॥१॥ [विशेपागा० १००] सुगमा । नवरमिन्द्रियादिनिमित्तं यद् ज्ञानमुदेति तत् श्रुतज्ञानम् । तद्य कथम्भूतम् ! निजकार्थोक्तिसमर्थम् , अभिलाप्य- वस्तुविषयमित्यर्थः, स्वरूपविशेषणमेतत् , शब्दानुसारिगो ज्ञानस्य निजकार्थोक्तिसामाव्यभिचारात् । अत्राऽऽह कश्चित्-ननु यदि शब्दोल्लेखसहितं श्रुतज्ञानमिष्यते, शेपं तु मतिज्ञानम् , तदा वक्ष्यमाणस्वरूपोऽवग्रह एव मतिज्ञानं स्याद् , न पुनरीहा-उपायादयः, तेषां शब्दोल्लेखसहितत्वात् , मतिज्ञानभेदत्वेन चैते प्रसिद्धाः, मतिज्ञानभेदानां चेहा-ऽपायादीनां सामिलापत्वेन श्रुतज्ञानप्राप्तिश्च स्यादित्युभयलक्षणसङ्कीर्णता, अत्रोच्यते-यद्यपीहादयः साभिलापास्तथापि न तेषां श्रुतरूपता, श्रुतानुसारिण एव सामिलाप- 15 ज्ञानस्य श्रुतत्वात् । अथावग्रहादयः श्रुतनिश्रिता एव सिद्धान्ते प्रोक्ताः, तन्न, पूर्व श्रुतपरिकर्मितमतेरेव ते समुपजायन्त इति श्रुत- निश्रिता उच्यन्ते, न पुनर्व्यवहारकाले श्रुतानुसारित्वमेतेप्चस्ति, तदा हि अभ्यासपाटववशात् परोपदेशसकेतितशब्दानुसरणमन्त- रेणैवाक्षरादिप्रवाचने ईहादिप्रवृत्त्यनुपलक्षणात् कथं श्रुतानुसारित्वं तत्र सङ्गच्छते ? अमुकस्मिन् ग्रन्थे एतदित्श्रमभिहितमित्येवं श्रुतग्रन्थानुसरणं विनाऽपि पटवभ्यासवशादनवरतं विकल्पपरम्परापूर्वकविविधवचनप्रवृत्तिदर्शनाच्च । यत्र तु श्रुतानुसारित्वं तत्रे- हादिपु श्रुतरूपताऽस्माभिरपि न निषिध्यते, तस्मात् श्रुतानुसारित्वाभावेन श्रुतत्वाभावादीहा- पाय-धारणानां मतिज्ञानत्वमेव, न 20 श्रुतज्ञानत्वम् । किञ्च–नेह मति-श्रुतयोः परमाणु-करिणोरिवाऽऽत्यन्तिको भेदः समन्वेषणीयः, यतः प्रागिहैवोक्तम्-विशिष्टः कश्चिन्मति- विशेष एव श्रुतमिति वल्कसदृशं मतिज्ञानं तजनितदवरिकारूपं श्रुतज्ञानम् । न च वल्क-शुम्बयोः परमाणु-कुञ्जरवदात्यन्तिको भेदः, किन्तु कारण-कार्यभावकृत एव, स चेहाप्यस्ति, मतेः कारणत्वेन श्रुतस्य तु कार्यत्वेनाभिधास्यमानत्वात् । न च कारण-कार्ययोरै- कान्तिको भेदः, कनक-कुण्डलादिपु मृत्पिण्ड-कुण्डादिपु च तथाऽदर्शनात् । तस्मादवग्रहापेक्षयाऽनमिलापत्वाद् ईहाद्यपेक्षया तु सामिलापत्वात् सामिलापा-ऽनभिलापं मतिज्ञानं अश्रुतानुसारि च, सङ्केतकालप्रवृत्तस्य श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनो या शब्दरूपस्य श्रुतस्य 25 व्यवहारकालेऽननुसरणात् । श्रुतज्ञानं तु साभिलापमेव श्रुतानुसार्येव च, सङ्केतकालप्रवृत्तस्य श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनो वा शब्दरूपस्य श्रुतस्य व्यवहारकालेऽवश्यमनुसरणादिति स्थितम् ।। पं. ५. इत्थं लक्षणभेदाद् भेदोऽभिहितः । सम्प्रति हेतु-फलभावाद- नयोर्भेदं दर्शयति “मइपुव्वं सुयं, न मई सुयपुचिया” इत्यनेन यदि ोकत्वं मति-श्रुतयोर्भवेत् तदा एवम्भूतो नियमेन पूर्व- पश्चाद्भायो घट-तस्त्वरूपयोरिव न स्यात् , अस्ति चायम् , ततो भेद इति भावः । पृ धातुः पालन-पूरणयोरर्थयोः पठ्यते, तस्य च पिपतीति पूर्वमिति निपात्यते। पूर्वशब्दश्चायमिह कारणपर्यायो द्रष्टव्यः, कार्यात् पूर्वमेव कारणस्य भावात् , सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्व- 30 पुरुषार्थसिद्धिरित्यादौ तथादर्शनात् । ततश्च मतिपूर्वं श्रुतमिति कोऽर्थः ? श्रुतज्ञानं कार्य मतिस्तु तत्कारणम् , कार्य-कारणयोश्च मृत्पिण्ड-घट्योरिव कथञ्चिद् भेदः प्रतीत एव । पं. ६. किमिति पुनर्मतिः पूर्व कारणमस्य श्रुतस्य ? इत्याह-तथा चेद- मित्यादि, अनुप्रेक्षादिकालेऽभ्यूह्याभ्यूह्य श्रुतपर्यायवर्धनेन मत्यैव श्रुतज्ञानं पूर्यते-पोप्यते, पुष्टि नीयत इत्यर्थः, तथा मत्यैवान्यतस्तत् प्राप्यते-गृह्यतेऽन्यस्मै दीयते वा, न मतिमन्तरणेत्यर्थः, तया गृहीतं सदेतत् परावर्तन-चिन्तनद्वारेण मत्यैव पाल्यते-स्थिरीक्रियते, . . ?
श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीतांया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १२९ अन्यथा मत्यभावे तद् गृहीतमपि प्रणश्येदेवेत्यर्थः । श्रुतज्ञानस्यैते पूरण-प्रापण-पालनादयोऽर्था विशिष्टाभ्यूह-धारणादीनन्तरेण कर्तुं न शक्यन्ते, अभ्यूहादयश्च मतिज्ञानमेवेति सर्वथा श्रुतस्य मतिरेव कारणं श्रुतं तु कार्य इति कारण-कार्यरूपत्वाद् मति-श्रुतयो- भेंदः। पं. १३. भावश्रुतान्मतिर्नास्तीति, भावश्रुतपूर्विका मतिर्न भवतीत्यर्थः, द्रव्यश्रुतप्रभवा तु भवतु, को दोषः । । पं. १४. यद्वेति, भावश्रुतान्मतिर्नास्ति, कार्यतयैव निपिप्यते, न पुनः क्रमेणेति । क्रमशस्तु मतिर्नास्तीत्येवं न, किन्तु क्रमशो मतिरस्त्येवं, क्रमेण जायमानां मतिं को निवारयति ? । तथाहि-मत्या श्रुतोपयोगो जन्यते, तदुपरमे तु निजकारणात् प्रवृत्ता पुनरपि मतिरवतिष्ठते, पुनस्तथैव श्रुतं तथैव च मतिरित्येवं क्रमेण भवन्ती मतिरिष्यत एव, यस्मात् श्रुतोपयोगात् श्रुतस्य मताववस्थितिर्भवति, श्रुतोपयोगोपरमे क्रमायातं मत्यवस्थानं न निवार्यते, अन्यथा आमरणान्तं केवलश्रुतमात्रोपयोगप्रसङ्गात् । पं. १६. अथ श्रुतस्य परो मतिपूर्वतां विघटयन्नाह-- नाणाणऽण्णाणाणि य समकालाई जओ मइ-सुयाइं । तो न सुयं मइपुच्वं मइनाणे वा सुयन्नाणं ॥ १ ॥ इह मति-श्रुते वक्ष्यमाणयुक्त्या द्विविधे-सम्यग्दृष्टेनिस्वरूपे, मिथ्यादृष्टेस्त्वज्ञानस्वभावे । तत्र ज्ञाने अज्ञाने वैते प्रत्येक समकालमेव भवतः, तत्क्षयोपशमलाभस्याऽऽगमे युगपदेव निर्देशात् । यतश्चैते ज्ञाने अज्ञाने च मति-श्रुते पृथक् पृथक् समकाले भवतः ततो न श्रुतं मतिपूर्व युज्यते, नहि सममेवोत्पन्नयोः सव्येतरगोविषागयोरिव पूर्व-पश्चाद्भावः सङ्गच्छते । अथोत्सूत्रोऽप्यसदा- प्रहवशात् स पूर्व-पश्चाद्भावो न त्यज्यते इत्याह “मइनाणे वा” इत्यादि । इदमुक्तं भवति-मतिज्ञाने समुत्पन्ने तत्समकालं च श्रुत- ज्ञानेऽनभ्युपगम्यमाने श्रुताज्ञानं जीवस्य प्रसन्यते, श्रुतज्ञानानुत्पादेऽद्यापि तदनिवृत्तेः, न च ज्ञाना-ऽज्ञानयोः समकालमवस्थिति- 1 रागमे क्वचिदप्यनुमन्यते, विरोधात् , ज्ञानस्य सम्यग्दृष्टिसम्भवित्वात् , अज्ञानस्य तु मिव्यादृष्टिभावित्वादिति गाथार्थः ॥ १ ॥ अत्र प्रतिविधानमाह- इह लद्धिमइ-सुयाइं समकालाई, न तूवओगो सिं । मइपुन्वं सुयमिह पुण सुओवओगो मइप्पभवो ॥२॥ ननु ध्यान्यविजृम्भितमिदं परस्य, अभिप्रायापरिज्ञानात् । तथाहि-द्विविवे मति-श्रुते-तदावरणक्षयोपशमरूपलब्धितः उपयोग- 2 तश्च । तत्रेह लब्धितो ये मति-श्रुते ते एव समकालं भवतः, यत्त्वनयोरुपयोगः स युगपन्न भवत्येव, किन्तु केवलज्ञान-दर्शनयोरिव तथास्वाभाव्यात् क्रमेणैव प्रवर्त्तते । अत्र तर्हि लब्धिमङ्गीकृत्य मतिपूर्वता श्रुतस्योक्ता भवियतीति चेत् , नैवमित्याह-मतिपूर्व श्रुतम् , इह तु श्रुतोपयोग एव मतिप्रभवोऽङ्गीक्रियते, न लब्धिरिति भावः । श्रुतोपयोगो हि विशिष्टमन्तर्जपाकारं श्रुतानुसारि ज्ञानमभिधीयते, तच्चावग्रहेहादीनन्तरणाऽऽकस्मिकं न भवति, अवग्रहादयश्च मतिरेवेति तत्पूर्वता श्रुतस्य न विरुध्यत इति गाथार्थः ॥ २ ॥ तदेवं मतिपूर्वं श्रुतमिति समर्थितम् । परस्तु मतेरपि श्रृंतपूर्वताऽऽपादनेनाविशेषमुद्भावयन्नाह- सोऊण जा मई मे सा सुयपुव्व त्ति तेण न विसेसो । सा व्वसुयप्पभवा भावसुयाओ मई नयि ॥३॥ परस्मात् शब्दं श्रुत्वा तद्विपया 'भ' भवतामपि या मतिरुत्पद्यते सा 'श्रुतपूर्वा श्रुतकारशैव, शब्दस्य श्रुनन्वेन प्रागुनचान , तस्याश्च मतेः शब्दप्रभवत्वेन भवतामपि सिद्धत्वात् । ततश्च "न बिसेसो' त्ति अन्योन्यं पूर्वभाविनायां मनि-श्रुनयोर्न विशेष इत्यर्थः, तथा च सति “न मई मुयपुञ्चिय' ति यदुक्तं प्राक् तदयुक्तं प्राप्नोतीति भावः । अत्रोनरमाद-परन्मान्छन्दमाकार्य या मनि- 30 १ श्रुताज्ञान जेटि० ॥ २ श्रुतं पूर्व यस्याः जेटि० ॥ -- पं. १७. 24 टी०१७ १३० . - .. .. मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं रुत्पद्यते सा हन्त ! शब्दस्य द्रव्यश्रुतमात्र वाद् द्रव्यश्रुतप्रभवा, न भावश्रुतकारणा, एतत्तु न केनापि वार्यते, किन्त्वेतदेव वयं ब्रूमः, यदुन-भावश्रुतान्मतिर्नास्ति, भावश्रुतपूर्विका मतिर्न भवतीत्यर्थः, द्रव्यश्रुतप्रभवा तु भवतु, को दोषः ? इति गाथार्थः ।। ३ ॥ ननु भाषश्रुतादूर्व मतिः किं सर्वथा न भवति ? इत्याह पं. १९. कन्जतया, न उ कमसो, कमेण वा को मई निवारेइ ? । जं तत्थावत्थाणं चुतस्स सुतोवओगाओ॥४॥ भावचनान्मतिः कार्यतयैव नास्तीत्यनन्तरोक्तगाथावयवेन सम्बन्धः । "न उ कमसो" त्ति क्रमशस्तु मतिर्नास्तीत्येवं न, किं तर्हि ? , क्रमशः साऽन्तीत्येतत् सर्वोऽपि मन्यते, अन्यथा आमरणावधि श्रुतमात्रोपयोगप्रसङ्गात् । यदि क्रमशः साऽस्ति तर्हि कमेव भवत्याग्नस्या भवन्तः किं कुर्वन्ति ? इत्याह-क्रमेणेत्यादि, वाशब्दः पातनार्थे, सा च कृतैव, क्रमेण भवन्ती मति को चिरति ? । मत्या श्रुतोपयोगो जन्यते, तदुपरमे तु निजकारणकलापात् सदैव प्रवृत्ता पुनरपि मतिरवतिष्ठते, पुनस्तथैव श्रुतम् 16 मनिया में भवन्या मतेनिषेधका वयं न भवाम इत्यर्थः । किम् ? इत्याह-'यद्' यस्मात् कारणात् 'तत्र' तस्यां श्री रमा चिनिर्भवति श्रुतोपयोगात् च्युतस्य, ततः क्रमेण मतिं न निषेधयामः । इदमुक्तं भवति—यथा सामान्यभूतेन माया गयाः काणा-अमुलीयकादयो जन्यन्ते अतस्ते तत्कार्यव्यपदेशं लभन्त एव, सुवर्ण त्वतजन्यत्वात् तत्कार्यतया न म. मास कमालयः काननोक्लादिन्यः सिन्दत्वात् । कङ्गणादिविशेषोपरमे तु सुवर्णावस्थानं क्रमेण न निवार्यते, एवं ::::': या विकारः शुनोपयोगो जन्यतेऽतस्तत्कार्य स. उच्यते, मतित्वतजन्यत्वात् तत्कार्यतया न व्यपदिश्यते, " : यमान सदा सिध्यान स्वविशेषभूतश्रुतोपयोगोपरमे तु क्रमायातं मत्यवस्थानं न निवार्यते, माकर्मः ॥ ४ ॥ गोनगोभिहितः । सम्प्रति भेदविभागात् तमाह-इतथेत्यादि, मागो। रियादिय-गणरतियं वंजणगीहाइयं छदा ॥१॥ [जीवस० गा० ६२] ? . *PM 11 . . । . -- है - . की मां, मेगगं तु मानाणं । मनमा य मेसंग ॥ १ ॥ ॐ यं चेनि श्रोत्रेन्द्रियम् , उपलम्भनमुपलभिः- ज्ञानम् , .: . श्रयाय वा उपलब्धिः श्रोनेतियोगलातित पाटीगमाराः, 4: मान्यमा झब्दो:प्यधिकिराने, ततधाममामागे s". 4 मा न नम्यां भावयुनोगटायनुपयुमय बदली 17 नवदालयात गर्ने वा मावा भनिन, मनावमा गम, ...न, यया पान, श्री. -: पटना था ! .: । ..........!! अन श्रीगो .. ३ - 1 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १३१ मतिज्ञानं भवति, तथा च सत्यनन्तरमवधारणव्याख्यानमुपपन्नं भवति । "सेसयं तु मइनाण"मिति सामान्येनैवोक्ते शेषस्य सर्वस्या- प्युत्सर्गेण मतित्वे प्राप्ते सत्यपवादमाह-"मोत्तूर्ण दश्वसुर्य" ति पुस्तकादिलिखितं यद् द्रव्यश्रुतं तद् 'मुक्त्वा' परित्यज्यैव शेषं मति- ज्ञानं द्रष्टव्यम् , पुस्तकादिन्यस्तं हि भावश्रुतकारणत्वाच्छन्दवद् द्रव्यश्रुतमेवेति कथं मतिज्ञानं स्यात् ? इति भावः । न केवलं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिः श्रुतम् , किन्तु यश्च शेपेषु चतुर्यु चक्षुरादीन्द्रियेषु श्रुतानुसारिसामिलापविज्ञानरूपोऽक्षरलाभः सोऽपि श्रुतम् , न त्वक्षरलाभमात्रम् , तस्येहा-ऽपायाद्यात्मके मतिज्ञानेऽपि सद्भावादिति । आह-यदि चक्षुरादीन्द्रियाक्षरलामोऽपि श्रुतं तर्हि यदाद्य- गाथावयवे 'श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव श्रुतम्' इत्यवधारणं कृतं तन्नोपपद्यते, अश्रोत्रेन्द्रियोपलधेरपीदानीं श्रुतत्वेन समर्थितत्वात् , नैतदेवम् , शेपेन्द्रियाक्षरलाभस्यापि श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरूपत्वात् , स हि श्रुतानुसारिसाभिलापज्ञानरूपोऽत्राधिक्रियते, श्रोत्रेन्द्रियो- पलब्धिरपि चैवम्भूतैव श्रुतमुक्ता, ततश्च साभिलापविज्ञानं शेपेन्द्रियद्वारेणाप्युत्पन्नम् , योग्यतया श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव मन्तव्यम् , अभिलापस्य सर्वस्यापि श्रोत्रेन्द्रियग्रहणयोग्यत्वादिति । अत्राह-ननु “सोइंदिओवलद्धी होइ सुयं" तथा "अक्खरलंभो य सेसेसु" इत्युभयवचनात् श्रुतज्ञानस्य सर्वेन्द्रियनिमित्तता सिद्धा, तथा “सेसयं तु मइनाण"मिति वचनात् तुशब्दस्य समुच्चयाच मतिज्ञानस्यापि । सर्वेन्द्रियकारणता प्रतिष्ठिता, भवद्भिस्त्विन्द्रियविभागान्मति-श्रुतयोर्भेदः प्रतिपादयितुमारब्धः स चैवं न सिव्यति, द्वयोरपि सर्वेन्द्रियनिमित्ततायास्तुल्यत्वप्रतिपादनादिति, अत्रोच्यते, साधूक्तं भवता, किन्तु यद्यपि शेपेन्द्रियद्वारायातत्वात् तदक्षरलाभः शेपेन्द्रियोपलब्धिरुच्यते, तथाप्यभिलापात्मकवादसौ श्रोत्रेन्द्रियग्रहणयोग्य एव, ततश्च तत्त्वतः श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेवायम् । तथा च सति 'परमार्थतः सर्वं श्रोत्रविषयमेव श्रुतज्ञानम् , मतिज्ञानं तु द्विपयं शेनेन्द्रियविषयं च सिद्धं भवति, अत इत्थमिन्द्रियविभागाद् मति-श्रुतयोर्भेदो न विहन्यत इत्यलं विस्तरेणेति पूर्वगतगाथासङ्घपार्थः ॥ पं. २६. आवरणभेदाच्चेति, मतिज्ञानावरण-श्रुतज्ञानावरणलक्षणावरगभेदात् तदावार्यस्यापि भेदः [ पृष्ठ ४६] पं. ७. ननु यथा मति-श्रुताभ्यां सम्यग्दृष्टिर्घटादिकं जानीते व्यवहरति च तथा मिथ्यादृष्टिरपि, तत् किमिति तस्य सत्कं सर्वमप्यज्ञानमुच्यते ? इत्याशङ्कयाऽऽह- सदसदविसेसणाओ, भवहेउ जदिच्छिओवलंभाओ। नाणफलाभावाओ, मिच्छद्दिहिस्स अण्णाणं ॥१॥ सच्च असच्च सदसती, तयोः अविशेषण-अविशेषः तस्माद्धेतोः, मिध्यादरेः सन्बन्धि व्यवहारमात्रेग ज्ञानमपि निश्चयतोऽज्ञान- मुच्यते, सतो ह्यसत्त्वेनासद् विशिष्यते, असतोऽपि च सत्वेन सद् भियते । मिथ्यादृष्टिश्च घंटे सत्य-प्रमेयत्व-मूतत्यादीन स्तम्भ-रम्मा- ऽम्भोरुहादिव्यावृत्तादींश्च पटादिधर्मान् सतोऽप्यसत्त्वेन प्रतिपयते, 'सर्वप्रकारैर्घट एवायम्' इत्यवधारणात् । अनेन हावधारणेन सन्तोऽपि सत्त्व-प्रमेयत्वादयः पटादिधर्माः 'न सन्ति इति प्रतिपद्यते, अन्यथा सन्व-प्रमेयत्वादिसामान्यधर्मद्वारण घटे पटादीनामपि 25 सद्भावात् 'सर्वथा घट एवायम्' इत्यवधारणानुपपत्तेः । 'कथञ्चिद् घट एवायम् इत्यवधारगे त्वनकान्तवादान्युपगमेन सम्यग्दृष्टिय- प्रसङ्गात् , तथा पट-पुट-नट-शकटादिरूपं घटेऽसदपि सत्त्वेनायमभ्युपगच्छति, 'सर्वैः प्रकार: घटोऽन्त्येव' इत्यवधारणान् । 'स्यादत्त्येव.घटः' इत्यवधारणे तु स्याहादाश्रयणात् सम्यग्दृष्टिःवप्राः । तन्मात् सदसतोर्विशेषामायादुन्मनकत्येव मियादले. वोंधोऽज्ञानम् । तथा विपर्यस्तत्वादेव भवहेतुत्वात् तद्बोधोऽज्ञानन् । तथा पशुदय-तिदादिद्वन-जवादवगाहनादिषु संसारदेनुए मोक्षहेतुत्वबुद्धेर्दया-प्रशम-ब्रह्मचर्या-ऽऽकिद्धन्यादिपु तु मोक्षकारगेषु भवहेतु वाध्यवसायतो यदृच्छोपटभान नम्याहानम् । नया 30 विरत्यभावन ज्ञानफलाभावाद मिध्यादृष्टेरज्ञानमिति गाथार्थः ।। 20 . १ धोत्र जेटि० ॥
१३२ मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं पुचि सुयपरिकम्मियमइस्सं जं संपयं सुयाईयं । तनिस्सियमियरं पुण अणिस्सियं मइचउक्नं तं ॥ १ ॥ [ विशेषा० गा० १६९ ] तत्रापि प्रायो वैनयिकीवजे द्रष्टव्यम् , तस्यां श्रुतनिश्रितत्वस्यापि भावात् । पं. १३. मतिज्ञानमेवाधिकृत्य प्रश्नमूत्रमाहेति वदन् [४६] सूत्रे से कि तं आभिणियोहियनाणं इति पाटोऽशुद्ध इत्याचष्टे, किन्तु “से किं तं मइनाणं इत्ययं भवति । पं. १९. आइ-इदमपीत्यादि, कथं पुनरत्रौत्पत्तिक्यादिबुद्धिचतुष्टयेऽवग्रहादयः सम्भवन्ति ? तत्र यथा ते भवन्ति नया दर्यते- किड पडिकुकुडहीणो जुझे ? बिंबेणध्वग्गहो, ईहा । किं मुसिलिट्ठमवाओ दप्पणसंकंतबिंब ति ॥ १ ॥ [ विशेषा० गा० ३०४ ] किलग- ममामिल, १ मिंड २ कुकुड ३ तिल ४ वालय ५ हत्यि ६ अगड ७ वणसंडे ८ । P .: -- २॥r -- ma.097 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १३३ - । - । भरतशिला १ 'मेण्डः' मेपः २ 'कुकुटः' ताम्रचूडः ३ "तिल" त्ति तिलाः ४ “वालुग" त्ति वालुकायाः सम्बन्धिनी वरत्रा ५ हस्ती ६ "अगडे" त्ति 'अवटः' कूपः ७ वनखण्डः ८ पायसं ९ "अइय" त्ति अजिकायाः-छालिकायाः पुरीपगोलिकाः १० "पत्ते" इति पिप्पलपत्रम् ११ "खाडहिल" त्ति तिल्लहडिका १२ 'पञ्च पितरश्च' तव राजन् ! पञ्च जनकाः १३॥तथा महुसित्थेत्यादि। "महुसित्थ" त्ति 'मधुसित्थकं' मदनं १ मुद्रिका २ अङ्कश्च ३ 'नाणकं' व्यवहाराहरूपकलक्षणम् ४ "भिक्खु चेडगनिहाणे” इति भिक्षुः ५ चेटकनिधानं ६ शिक्षा च ७ अर्थः ८ शस्त्रं ९ "इच्छा य महं" ति इच्छा च मम १० शतसहस्रः ११ । एवं 5 चाऽऽद्यसङ्ग्रहगाथायाः सम्बन्धीनि सप्तदश एतानि चैकादश मीलितान्यष्टाविंशतिर्मूलनातान्योत्पत्तिक्यां वुद्धाविति ।। भरहसिल पणित० गाधाए ताव-उजेणी नगरी । जणवए तत्थ णडाणं गामो। तत्थ एगस्स नडस्स भज्जा मया । तस्स य पुत्तो डहरगो । नहेण अण्णा आणीया। सा तस्स दारगस्स ण वति विणय-भोयणाइए । तेग दारएण भगितं-- ममं ण लटुं चट्टसि जइ, तहा ते करेमि जहा मम पादेसु पडसि त्ति । तेग रत्तिं पिता सहसा भणितो-एस गोहो त्ति गोहो त्ति । तेण णातं 'महिला विण?' ति सिडिलरागो जातो। सा भगति-मा पुत्त ! एवं । तेण भगित-ण लट्ठ वट्टसि । सा भणति–वट्टीहामि । 10 अहं पि लटुं करीहामि । सा वट्टितुमारद्धा । अण्णदा छाहीए चेव 'एस गोहो गोहो' त्ति भगिते 'कहिं ?' ति पुट्ठो नियदेहछाहिं दरिसेति । ततो पिता से लज्जितो। 'सो वि एवंविधो' त्ति तीसे घणरागो जातो । सो वि विसभीतो पिताए समं जेमेति । अण्णया पिताए समं उज्जेणिं गतो. दिवा नगरी । निग्गता पिता-पुत्ता । पिता पुणो वि अइगतो 'किं पि ठवियगं विस्सरित' ति । सो सिप्पाए नदीए पुलिणे नगरि सञ्चं आलिहति । तेण णगरी सचच्चरा लिहिता । ततो राया एति । तेण राया वारितो, भगितो- मा राउलमझेणं एहि त्ति । रण्णा कोउहल्लेणं पुच्छितो । सचचरा सव्वा कहिया । रण्णा भगितो- कहिं वससि ? ति । तेग 15 भणित-अमुगगामे । पिता से आगतो । ते गता । रायगो य एगूणगाणि पंच मंतिसयाणि, एगं मग्गति 'जो य सञ्चप्पहागो होज' त्ति चिंतिय-एस होन त्ति । तस्स परिक्खगणिमित्तं इमाणि पेसेति- भरहसिल १ मेंढ २ कुछुड ३ तिल ४ वालुय ५ हल्थि ६ अगड ७ वणसंडे ८ । परमण्ण ९ पत्त १० लिंडग ११ खाडइला १२ पंच पियरो य १३ ॥ लेहं विसजेति, जहा-तुभं गामस्स बाहिं महल्ली सिला तीए मंडवं करह । ते अद्दण्णा । सो दारओ रोहओ छुहा- 20 इओ, पिता से गामेण समं अच्छति, उस्सूरे आगतो। सो रोयइ-अन्हे छुहाइया अच्छामो । सो भगति-नुमं सुहिमओ सि । किह ! । तेण से कहियं । भगति-वीसत्था अच्छह, हेट्ठा खंभे ठवेत्ता थोवथोवं खगह भूमी । खता, उबलवगकतोवयारे मंडवे रनो निवेदितं । केण कय ? । रोहगदारएणं १ । ततो मेंढओ पेसितो-एस पक्खेण अग्रगाहियं पत्तिो चेय पचयिगेयचो । तेहिं भरहो पुच्छितो। तेण वि विरूवेण समं बंधावितो, जवसं दिगं, तं चरंतस्स ण हायति बलं, विन्ग पेनस्स भएण ण बहिनि नि २ । एवं ककुडो अदाएण समं जुझावितो ३ । 'तिलसमं तेलं दायञ्चं ति तिला अदाण्य मिया ४ । बाल्याए-बरहपडिउंदै देह 25 ५ । हथिम्मि-जुण्णहत्थी गामे छूढो, हत्थी 'अप्पाउओ मरिहिति' ति अपितो, 'मतो नि त निवेदियचं । हाथी मनो। तेहिं निवेदितं-जहा ण चरति ण ऊससति न नीससति । रण्णा भगित-मतो ! । तेहिं भनितं-तुम्भ भगद नि ६ । अगटे- आरण्णो ण तीरइ एकल्लतो आणेतुं, णागरं अगडं देह ७ । वणसंडे-गुब्बपामे गनो गानो ८ । परमांकरिसरम्हाए पटा- लम्हाए त्ति ९ । एवं परिक्खिऊग समादिदै-रोहगेणं आगंतव्वं तं पुग न मुबपक्व ना कहपकग्दे, " गई न दिदा, न १ अत्र यद्यपि टिप्पनफरता 'अर्थः ८ शास्त्रम् ९" इति पृथर व्यापार "अविवानिन रहातान्योपनिरको दु" किनिदिन तथाऽप्युदाहरणनिरुपणासरे पूर्वाचार्यव्याख्यापरम्परानुसारि अशारत्रम्' इत्येकनवोदाहरनन्दनं बनने । विमा सिन्दा "अर्पः ८ शत्रम्' इति व्याख्याय उदाहरणसट्रयां चाप्याविशति निर्दिदयापि उदाहरति स्नानसरे शामिदमदोदाहरः नि ? रति विद्धतिविचारणीयमिति ।।
। - १३४ मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं छायाए न उण्हेणं, न छत्तणं न आगासेणं, न पादेहिं न जाणेणं, न पंयेणं न उप्पहेणं, ण ण्हाएणं ण मलिणेणं ति । पच्छा अंगोहली काऊग चक्रमझभूमीए एडिक्कगे एग पादं काऊग चालणीणिहिउत्तमंगो संझासमयम्मि अमावासाए आगतो । रण्णा तितो "गंधचमुखसहो" इत्यादीमां गाथां स पपाठ । आसण्गे य सोवितो । जामविउद्धेण रण्णा सदाइतो-सुत्तो ? जग्गसि ।। भगति-सामि ! जग्गामि । सो सुत्तो विबुद्धो उद्वितो । रण्गा भणितो-जग्गसि ? त्ति । जहा आणवेह । किं तुण्हिक्को अच्छसि ।। । नेग भगित-चितमि । किं चिंतेसि? । भगति-अस्सत्थपत्ताणं किं विंटो महल्लो ? उदाहु छिधा ? । किह ते चिंतितं ।। भणति- दो यि समागि १० । वितिए, जामे छालियालिडियाओ वातेणं ११ । तइए खाडइला जत्तिया पंडरगा तेत्तिया 'कालगा, अनियं न पुलं तत्तियं सरीरं पि आयामेणं १२ । चउत्थे जामे सद्दावितो वायं ण देति, तेण कंबियाए छित्तो उद्वितो । भणति- कि जग्गति ? सुवासि ? । भगति-जग्गामि । किं करेसि? । चितेमि । किं चिंतेसि ? । चिंतेमि-कतिहिं सि तुम जातो ? ति । कनिदि ? । तेग भगित-पंचहिं । केण केण! । रण्णा वेसमणेणं चंडालेणं रयएणं विछिएणं । तेण माया पुच्छिया, निबंधे कहियं MIायवीयपमयत्त गओ रण्णा, उदल्ये वेसमगजक्खपडिमासम्बंगालिंगगाभिप्पायसंपायगाओ वेसमणेणं, उउण्हाणसम- मंजमंत्र चंडालनायगदसगे नदभिलासभावाओ तजायत्तगमवि, तहा विछियभक्खगदोहले जाए कणिकामयस्स तस्स मास- कामगाओ विछिएण थि । सो पुच्छितो-किह ते णाय ? ति । सो भणति-येन यथा न्यायेन रज पालेसि रोग वायनो नि. वेगमों का गेलेणं चंडालो, सञ्चस्सहरणेणं रयो, पुण जेग ममं कवियाए घटिहंसि रोग मिति: १३ । नगमा मलेगि उपरि ठवितो. भोगो य से दिण्णो १ ।
। श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १३५ सरडे-सणं वोसिरंतस्स. सरडा भंडता । एगो तस्स अहिट्ठाणस्स हेट्ठा बिलं पविठ्ठो पुंछेग छिको । घरं गतो अद्धितीए दुबलो जातो । वेजो पुच्छितो भगति-जति सतं देह । दिण्णं । तेग घडए सरडो छूढो लक्खाए विलिंपित्ता. विरेयणं दिणं । वोसिरियं, सरडो कप्परे दिट्ठो, लट्ठीहतो ॥ वितितो सरडो-भिक्खुणा. खुड्डतो पुच्छितो-एस सरडो किं सीसं चालेति ? । तेण भणितं-तुमं जोएति, किं भिक्खू ? भिक्खुणि ? त्ति ६ ॥ कागो-तच्चण्णिएण खुइतो पुच्छितो-अरहन्ताः सर्वज्ञाः ? । वाढं । तो केत्तिया इहं कागा ? । सर्द्वि कागसहस्सा इहई वेण्णातडे परिवसंति । जदि ऊणगा पवसिता, अभहिता तत्थ पाहुणगा ॥ १ ॥ वितितो-निहिम्मि दिढे महिलं परिक्खति-रहस्सं धरेति ? न व ? त्ति । सो भणति-ममं पंडरओ कागो अहिट्ठाणं पविद्यो । ताए सहिन्जिताणं कहितं, जाव रण्णा सुतं । पुच्छितो । कहियं । रणगा से मुझं, मंती य निउत्तो । ततिओ-विट्ठविक्खरणे भागवतो खुड्डगं पुच्छति । खुड्डगो भणति-एस चिंतेति 'एत्थ विठ्ठ अस्थि ? णत्थि ? त्ति ७॥ उचारे-धेजातियस्स भजा तरुणी गामंतरं निजमागी धुत्तेण समं लग्गा । गामे ववहारो। विभत्ताणि पुच्छिताणि 10 आहारं । विद्रयणं दिग्गं, तिलमोदगा । इतरो धाडितो ८ ॥ गतो-हत्थी महतिमहालओ। जो तोलेति तस्स सयसहस्सं देमि । णावाए तोलेति । लंछिता णावा । उत्तारेऊग पाहाणाणं भरिया जाव सा रेहा । पाहाणा तोलिया । एत्तियं तुलति । जितो ९ ।। घतणो-भंडो सव्वरहस्सितो । राया देवीए गुणे कहेति-गिरामयं ति । सो भगति-न भवति । किह ! । जता पुष्पाणि केसराणि वा ते ढोएति तद त्ति । विण्यासितं । णार हसितं । निबंधे कहियं । निश्चिसतो आगत्तो। उवाहणाणं भारेण 15. उवद्वितो । उड्डाहभीयाए रुद्धो १० ॥ गोलतो णकं पविट्ठो जतुमतो । सलागाए तावेत्ता कड्ढितो ११ ॥ खंभो तलागमञ्झे । जो तडे संठितो बंधति तस्स एत्तियं दिनति । तडे खोलगं बंधिऊग परियचिऊग यो । जितो १२ ॥ खुड्डए-परिवाइया भणति-जो जं करेति तं मए कायचं कुसलकम्मं । खुट्टतो गतो भिक्खस्स । पाहतो वारितो। 20 गतो राउलं । दिट्ठा । सा भणति-कतो गिलामि ? । तेग सागारियं दाइतं जिता, काइयण य पउमं लिहियं । सा ण तरति । जिता १३ ॥ मग त्ति-एगो भज गहाय पवहणेण गामंतरं वच्चति । सा सरीरचिंताए ओतिम्मा । तीमे स्वेग वागमतरी विनगा । इतरी रडति । ववहारो । दूरं हत्थो पसारितो । णात १४ ॥ इत्थि त्ति-मूलदेवो अप्पवितिजओ वच्चति । इतो य एगो पुरिसो समहिलो आगच्छंनो दिट्ठो। नीर को मुछिनो 25 एगन्ते उचत्तिऊण अच्छछ । तेण वितियएण भण्गति महिलइत्तो-मम महिला विनानुकाना, एवं विसनेदि नि । तेग विस- जिता । सो तेण समं अच्छति । इतरी वि मूलदेवेग समं रमिऊग आगया । निग्गंतृण य तत्तो पडयं घेत्तूण कंडरीयस्स । धुत्ती भगति हसंती पिवं युगे दारमा जातो ॥ १ ॥१५॥ पति त्ति-दोण्हं भाउगाणं एगा भज्जा । लोगे कोई-दोन्ह वि सना । समानुतं. परं विन्मयं गी । अशी मानि- कतो एवं होहि ? त्ति, अवस्स विसेसो अन्धि । तेग लेहो दिग्गो, जहा-गानं गंतवं । गो पुत्र, तो अन मगर ही 30 दितो । तीए जो पितो सो अवरं पेसियो, जो वेसो सो पुञ्वं पमिती । देसन्म भागदंतम दर्धजन्म दि निटांटे गगे 1 जग. - -- .
मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं दहंतेमु पुणो वि पट्टविऊग समगं पुरिसा पेसिता । ते णं भणंति-ते दढं अपडुगा । ‘एसो मंदसंघयणो' त्ति भणितुं तं पवगा । एवं नातं १६ ॥ पुत्ते जाते एगो वागियतो भन्नाहिं समं अन्नं रजं गतो । तत्थ मतो । तातो दो वि भणंति 'पुत्तो' त्ति पुत्तनि यवहारो न छिन्नति । अमचो भणति-दव्यं विरिचितुं दारगं दो भागे करेह करकचएणं । एगा भणति-एवं होतु । ' • भगति-पतमिव पुत्तो, मा मारिजउ । तीसेव दिण्णो १७ ॥ मधुसित्य-काइ कोलिगिणी उभामइलिया । तेणेव विहाणेण दरिसितं । णाता उभामइल त्ति १८ ॥ मुदियाए-पुरोहितो निक्षेवर घेत्तूगं अण्गेसि न देति । अण्णदा दमएण ठवियं । पडियागतस्स ण देति । सो पिसा जती । अमनो चीधीर जाति । भगति-देहि भो पुरोहित ! मम तं सहस्सं । तस्स किवा जाता, रण्यो कहितं । रण्णा भणि- दि । हामि' ति भगति । अण्णदा रायाण समं जूयं रमति, नाममुद्दागहणं । रायाए सलक्खगं गहाय मणूसस्स है मन में मग्गिया- अमुगं कालं साहस्सो णउलओ दमएण ठवितो तं देहि, इमं अभिण्गाणं । दिण्णो, आणित मला मा कतो । सो सहावितो। पनभिण्यातो। परोनि Crore--- ! .
श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १३७ इच्छा-एगाए भत्तारो मतो । वड्डिपउत्तं न उग्गमति । मित्तो भणितो-उग्गमेहिं । तेण भणितं-मझ वि भागं देहि । ताए भणितं-जं तुम इच्छसि तं ममं देजसि । तेण उग्गमितं, सतं दिण्णं । सा णेच्छति । ववहारो । आणावितं । दो पुंजका कता । कतरं तुम इच्छसि ? । भणति-वई । ताहे भणितो-एतं चैव इमं देहि-त्ति दवावितो २६ ॥ सतसहस्सं ति–एगो परिभदुओ । तस्स सयसाहस्सं खोरं । सो भगति-जो ममं अपुञ्चं सुणावेति तस्स एतं देमि । अण्णदा एगं नगरं गतो, तत्थ उग्घोसेति । सिद्धपुत्तेण सुत, भगति- मझ पितुं तुझ पिता धारेति अगूणगं सयसहस्सं । जति सुयपुवं तो देहि, अह न सुयं मुयसु तो खोरं ॥ १ ॥ जितो २७ ॥ उप्पत्तिया गया। पं. २०, २२. वैनयिक्यामुदाहरणदर्शनाय "निमित्ते" इत्यादिगाथाद्वयम्-निमित्तं १ अर्थशास्त्रं च २ "लेहे" इति लेखनं ३ गणितं च ४ कूपः ५ अश्वश्च ६ गर्दभः ७ लक्षणं ८ ग्रन्थिः ९ अगदं १० गणिका च रथिकश्चेति ११ शीता शाटी दीर्घ च तृणं अपसव्यकं च क्रोञ्चस्य इत्येकमेव १२ । नवरम्-- अतीमितायामपि शीता शाटीत्याहुः, शीतं ते कार्यम् , दीर्घ तृणं 10 द्वाराभिमुखं कुर्वतां 'गच्छ, दीर्घ मार्ग प्रतिपद्यस्व' क्रोच्चाप्रादक्षिण्येनोत्तारण 'प्रतिकूलं सम्प्रति ते राजकुलम्' इत्युपाध्यायेनावगम्यते बुद्ध्या । नीत्रोदकं च १३ गोणः घोटकः पतनं च वृक्षादित्येकमेव १४ । एवं वैनयिक्यां सर्वाग्रेग चतुर्दश ज्ञातानि । निमित्ते-एगस्स सिद्धपुत्तत्स दो सीसगा निमित्तं सिक्खंति । अण्णदा तण-कट्ठस्स वचंति । तेहिं हस्थिपदा दिवा, एगो भगति हस्थिणियाए पदा, कहं ? काइएग । सा य हथिणी काणा, कहं ? एगपासेण तणाई खादिताई । तहा काइएणेव णातं-जहा इत्थी पुरिसो य विलग्गाणि । सो वि णातो ['जुवाणो' त्ति] । सा य 'गुञ्चिणि' त्ति णाता, हत्थाणि थंभित्ता उद्विता । 15 दारतो से भविस्सति, जेण दक्खिगपादो गुरू । पोत्ता रत्ता, दसिता रुक्खे लागा। णदीतीरे एगाए थेरीए पुत्तो पवसियओ तस्स आगमणं पुच्छिता । तत्थ य घडतो भिण्णो, तत्थ य एगो भगति- तज्जातेण य तज्जायं, तन्निभेण य तन्निभं । तारूवेण य तारूवं, सरिसं सरिसेण निदिसे ॥ १ ॥ [गणिविद्यागा. ७५ ] 'मतओ' त्ति परिणामेति । वितिओ भगति-जाहि वुड्ढे ! सो घर आगतेखो। सा गता, दिह्रो पुचाताओ । सा जुवलयं ख्वए य गहाय आगता, सक्कारितो । वितियो भगति-मम सम्भावं गुरू न कहिंति । तेगं पुष्टिता । तेहिं जहाभूतं 20 कहितं । एगो भगति-'विवत्ती' मरणं । एगो भगति-'भूमिजो भूमि चेव मिलितो एवं सो वि दारतो । भगितं च- "तनाएण त तज्जातं०" सिलोगो १ ॥ अत्थसत्थे-कप्पओ दधिकुंडग उच्छुकलावग एवमादि २ ॥ लेहे जहा-अट्ठारसलिविजाणतो॥ एवं गणिए वि ॥ अग्णे भगंनि-योहिं मंतेगं अबखागि सिम्खाविना गगियं च । भयं भावार्थः-खटिकामया गोलकास्तथोपाध्यायेन भूमौ पातिताः कुमारागामारशिमगाय यथा नृमावागण्युपपन्त ३ । ४ ।। 25 कूवे-वायजाणएणं पमाणं भणितं-जहा एदूरे पाणितं नि । तेहिं सायं । तो बोलीग नाम कदिनं । 'पागे आहार भणिता । थासगसद्देण जलमुद्धाइतं ५ ॥ आसे-आसवाणियगा यारवई गता । सचे कुमारा धुले व य निहंति । यादवन ही दवः कर -- सो गहितो ६॥ गर्भाया तरुणपितो। अण्णाय उद्धाइतो लिणपल्लिा नि ! निनाम परितः। पुति पारिन ! 30 १ पूर्वायातः ॥ २ तरणप्रियः ।। टी०१८ । १३८ मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं पिनिर्यितेग माणितओ । तेग कहियं । थेरो भगति-मुयह गद्दभे, जत्थ गद्दभा उस्सिति लेटेति य तत्थ पाणितं । खइतं, पीता य । अग्णे भणंति-उत्सिवगाए चेव जलासतगमणं ७ ॥ लक्षणे-पारसविसए आसरक्खओ। धीताए तरस समं संपत्ती । ताए भणितो-वीसत्थाणं घोलचम्म पाहणाणं भरेऊगं करवाओ मुयाहि, तस्थ जो ण उत्तसति तं लएहि पडहयं च तालेहि, वुझावेहि य खक्वरेणं, जो ण उत्तसति तं लएहि । • सोयेनगगशाले भगति-मम दो देहि अमुगं च अमुगं च । तेण भणितं-सवे गेण्हाहि, किं ते एतेहिं ? । णेच्छति । भजाए काय पीना से दिवउ । सा नेच्छति । सो तीसे बड्ढतिदारगं कहेति-लक्खणजुत्तेणं कुटुंबं परिवड्ढति त्ति-एगरस मातुलएणं ना किया । काम न करइ । भन्नाए चोतितो दिवे दिवे अडवीओ रित्तओ एति, छटे मासे लद्धं । कुलयो सतसहस्सेण सेट्टिणा ओ अपयमिहि नि ८ ॥ गंथिम-पाडलिपुत्ने नयर पालित्तगआयरिया अच्छंति । इतो य जाणएहिं इमाणि विसजिताणि पाडलिपुत्तं-मुत्त र बद्री रमा २ समुन्गओ ३ ति । केणइ ण णाताणि । पालित्तयआयरिया सदाविता-तुब्भे जाणह भगवं !? ति । म र मन उन्होदये छुळे. मयगं विरायं, दिद्वागि अग्गयाणि । दंडओ पाणिते छूढो, मूलं गरुयं । समुग्गतो जउणा का की. उन्नडिनो र । तेग वि य लाउगं राइलेऊग रय गाणि छूढागि, तेगगसिञ्चगीए सिवेग विसज्जितं । रन ९॥ म पनि नि गयाग 'पागितागि विगासियञ्चागि' [ति ] विसकरो पाडितो । पुंजा कया । । उनी जाणितो. पुण्यालो उप्पाडितो, तेणं चेव वालग्गेणं ता विसं दिसणं, म. जो विनानि एतं सो वि विसं, एवं सतसहस्सवेही । अस्थि निवारगविधी ! । ܕ .
। । । श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १३९ कम्मो' त्ति हाविता पुच्छिता केण आउसं कारितं ? । तेग(एगेग ) भगित-दासीए । सा पहता । ताए कहितं । वाणिगिणी पुच्छिता । साहति सभावं । तयाविसो गोणसो त्ति दिट्ठो १३ ॥ गोण घोडग रुक्सपडणं च-एगो अकतपुण्गो जं जं करेति तं तं से विवनति । मित्तस्स जाइएहिं वइल्लेहिं हलं वाहेति । विगाले आणित्ता वाडे छूढा । सो य मित्तो से जेमेति, सो लजाए ण ढुको । तेग वि दिहा । ते निम्फिडिता वाडाओ, हरिता । गहितो देहि' त्ति । राउलं निजति । पडिपहेणं घोडएणं पुरिसो एति । सो तेण पाडितो आसेणं । सो 5 पालतेण भणितो आहण त्ति । तेण मम्मे आहतो मतो । तेण वि लइओ। विगाले नगरस्स बाहिरियाए वुत्था । तत्थ लोमं- थिया मुत्ता, ईमे वि तहिं चेव । सो चिंतेति–जावजीवबंदणो कीरिस्सामि, वरं मे अप्पा ओबद्धो । तेसु सुत्तेसु सो डंडिक्खंडेण तम्मि वडरुक्खे अप्पाणं उक्कलंबेति । तं दुव्वलं तुझु । तेग लोमंथितमहतरतो मारितो । तेहिं वि गहितो । पभाए करणं णीते तिहिं वि कहितं जहावत्तं । सो पुच्छितो भणति-आमं ति । कुमारामच्चो भगति-तुमं वलदे देहि, एतस्स अच्छीणि उक्खम्मंतु । बितितो भणितो-एतस्स आसं देड, तुझ जीहा उक्खम्मङ । इतरे भणिता-एस हेठा होउ, तुभं एगो उब्बंधित्तुं निप्पडउ त्ति काउं 10 मंतिणा मुक्को १४ ॥ वेणतिया गता ।। पं. २८. कर्मजवुद्धयुदाहरणेष्वियं गाहा-" हेरनिए " इत्यादि । 'हैरण्यिकः' सौवर्णिकः १ 'कर्पकः' कृषीवलः २ "कोलिय" त्ति कोलिकः-तन्तुवायः ३ "डोवे य" त्ति दर्वी-चट्टकच, परिवेषक इत्यर्थः ४ "मुत्ति" त्ति मौक्तिकप्रोता ५ "घय" त्ति घृतप्रक्षेपकः ६ प्लवकः ७ "तुन्नाय” इति 'तुनवायः' तुन्नं-त्रुटितं वयति-सीत्र्यति यः स तथा ८ वर्द्धकिः ९ "पूहए य" इति 'पूपिकः' कान्दविकः १० "घड-चित्तकारे य" इति घटकारः-कुम्भकारः ११ चित्रकारः-चित्रकर्मविधाता १२ । एवं द्वादश 15 दृष्टान्ताः कर्मजायां मंतौ ।। हेरणिते अभिक्खजोगेणं अंधकारे वि स्वगं जाणेति हत्थपरामोसेणं १ ॥ करिसतो अभिक्खजोगे जागति फलनिष्फतिं । तत्थ उदाहरणं-एगेणं चोरगं खत्तं पउमागारेणं छिनं । सो जणवत्तं निसामेति । करिसतो भगति-किं सिक्खितस्स दुकरं ? । चोरेणं मुतं । पच्छतो गंतूग छुरियं अंछिऊग भगति-मारेमि ते । तेग पडयं पत्थरेत्ता वीधियाण मुट्ठी भरितो, भणति-किं परम्मुहा पडंतु ? ओहम्मुहा ? पासल्लिया ? । तहेव कतं । तुट्टो २ ॥ कोलितो मुट्ठिणा गहाय तंतू जाणति-एत्तियाएहिं वा कंडहिं विन्निहिति त्ति ३ ।। डोए वड्ढई जाणइ-एत्तियं माहिति ४ ॥ मोत्तियं आयिणेन्तो आगासे उक्खिवित्ता तहा निक्खियनि जहा कोलवाले पटति ५ ॥ घते-सगडे संतओ जदि रुञ्चति कुंडियाए णालए छुहति धारं ६ ॥ पवयो भागासे ताणि करणाणि करति ७ ॥ तुण्णाओ पुव्वं थुल्लाणि पच्छा जहा ण णज्जति सूतीए तत्तियं गेहति जति समति । जहा मामिन दर धीयारण कारितं ८ ॥ वड्ढई नमवेऊग देवकुलरहाण पमाणं जाणति ९ ॥ घडगारो पमाणेण मस्तिं गेहति, भाणरल वि पनाणं अनिगिन्दा कति १० ॥ पृविओ वि पागलपरिमाणं अमऊगं करति ११ ॥ चित्तकारो पटा अमवेऊणं पनागजुत्तं कोति, तनियं का क- कंगत अनि ममाति १२ बम्मया गाना ॥ १ नटाः जेटि० ॥२ नटः जेटि० ॥३ समानजिनविभः ॥ न टिक। 20 25 ...
११० मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मितं [ पृष्ठ ४९] पं. ५. पारिणामिकबुद्धाबुदाहरणानि यथा अभए" इत्यादि । “अभए" इति अभयकुमारः १ "सेट्ठि" त्ति काष्ट श्रेष्टी २ "कुमार” इति क्षुल्लककुमारः ३ 'देवी' पुष्पबत्यभिवाना ४ उदितोदयो भवति राजा ५ साधुश्च 'नन्दिपेगः' श्रेणिकपुत्रः ६ “धनदत्तः मुसुमापिता ७ श्रावकः ८ अमात्यः ९ क्षपकः १० अमात्यपुत्रः ११ चागत्यश्चैव १२ स्थूलभद्रश्च १३ "नासिकसुंदरीनंद" त्ति नासिकानामनि नगरे सुन्दरीनन्दो वणिक् १४ "वइर" इति वैरस्वामी १५ । 'पारिणामिकी बुद्धिः' इत्यनेन वायनात्र पारिगामिकीबुद्धियुक्ता ब्राह्मणी पुत्रिकाचतुष्टयस्य शिक्षादायिनी देवदत्ता च गणिका गृह्यते । इयं च चित्र- कर्मना गर्वनामिनायनाहिका १६ ॥ "बल गावा" नि चलनाहननं १७ "आमंड" त्ति कृत्रिमामलकं १८ मणिश्च १९ सर्पश्च २० "खग्ग" ति खड्गः १२ मन्त्रः २२.२३ पारिणामित्यां बुद्धौ एवमादीनि भवन्त्युदाहरणानि । एवं च पारिणामिक्यां बुद्धौ सूत्रोपात्तानि विनिमकान।। अभयमा कार पारिवामिना बुदी ?-जदा पन्जोओ गतो, रायगिहं रोहितं, तदा अभयेणं खंधावारनिवेसजागरणं न कलयमा नमिना । कड़ियं च से जधा-भेदितो खंधावारो । दावितेसु गट्ठो एस ॥ अहवा जाहे गणियाहिं कव- को नमिलो ननारि वार । नितियं च णे-मोतावेमि अप्पाणं । वरे मग्गितो-अग्गि अतीमि त्ति मुक्को । पर पुगते दिवसतो 'पनोओ हीरति' त्ति कंदतं नगरमझेग नेमि । गतो रायगिहं । कामदारियाजो, गहितो, रइंततो हियो । एवमादिगातो बहुतातो अभयम्मि पारिणागि- 1 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । कुमारो-खुड्डगकुमारो जहा जोगसंगहेहिं ३ ॥ देवी-पुप्फभदे णगरे पुप्फसेगो राया, अग्रामहिसी व पुप्फवती देवी । तीसे दो चेडरूवाणि पुप्फचूलो पुप्फचूला य । तागि अणुरत्ताणि भोगे मुंजंति । देवी पञ्चइता देवलोगे उबवण्णा देवो जातो । सो देवो एवं चिंतेति--जति एतागि एवं मरति तो नरग-तिरिएसु उववन्जिहिन्ति । सुविणए सो देवो नरए देवलोर य उचईसेति । सा भीता जाया पुच्छति पासंडिते । ते ण जाणंति । अण्णियपुत्ता तत्थ आयरिया ते सदाविता । तहेब सुत्तं कड्दति । सा भणति-किं तुम्भेहिं सुविणतो दिट्ठो ?।। सो भणति-अम्हं एरिसं सुत्ते दिटुं । पञ्चइता । देवत्स पारिणामिता ४ ॥ पुरिमतालं नगरं । उदितोदयो राया । सिरिता देवी । दोण्णि वि सावगाणि । परिवाझ्या जिता । दासीहिं मुहमकडिताहिं वेलविता गिच्छूढा पदोसमावण्णा । वाणारसीए धम्मरुई राया । तत्थ गता फल्यपष्टियाए त्वं सिरिकताए लिहिऊगं दाएति धम्मरुयित्स रण्गो । सो अझोववण्गो दूतं विसजेति । पडिहतो निच्छूढो। ताहे सञ्चवलेग आगतो णगरं रोहेति । सो सावगो चिन्तेति उदितोदयो राया-किं बड्डेणं जगक्खएणं ? ति उबवासं ठितो । वेसमणेणं देवेणं सनगरं 10 साधितो । उदितोदयस्स परिणामिया ५ ॥ साधू य णंदिसेणे त्ति-सेणियपुत्तो नंदिसेणो । सीसो य तस्स ओहागुप्पेही । तस्स नंदिसेणस्स चिंता-भगवं जति एजा तो देवीओ अण्णे वि य अतिसए पेच्छिऊग जदि थिरो होन त्ति । भट्टारमओ आगतो । सेणिओ सअंतेउरो णीति, अण्णे य कुमारा संतेपुरा । पंदिसेणस्स अंतेपुरं सेतवरवसणं, पउमिणिमझे हंसीओ ञ्च ओमुक्कआभरणाओ सत्रासिं लायं हरति । सो ताओ दट्टणं चितेति-जदि भारएणं एरिसियाओ मुक्काओ, किमंग ! पुण मझ मंदभागन्स असंनाणं परिचय- 15 चियाग त्ति निवेगमावण्णो, आलोइय-पडिकतो थिरो जातो ६ ॥ धणदत्तो मुंसुमाते परिणामेति--जति एतं ण खामो तो अंतरा मरामो त्ति ७ ॥ सावओ सावियवयंसियाए मुच्छितो । तीसे परिणामो जातो-मा अवसष्टो मरिहि तो गायु निरिणम् वा उयवजिदिति, संसारं हिंडिहिति । तीसे आभरणेहिं विणीतो । संवेगो कहणं च ८ ॥ अमच्चो त्ति-वरघणुगपिता जउपरे कते चिंतेति-एस कुमारी मारिनो होति, बाहिं पि गरिसन्निति सि सुरंगाते 20 णीणितो पलातो ॥ अग्णे भणंति-एगो राया, देवी से अतिप्पिया कालगता । सो य मुखो । सो नीर वियोगदलितो पण सर्गर- ट्टिई करति । मतीहिं भगितो-देव ! एरिसो संसारहिति ति किं की ! । सो भगति-नाई देवीर संगनुिनि जकांनीट करमि । मंतीहिं परिचिंतियं-'न अण्गो उवाओ त्ति पच्छा भगितं-देव : देवी मां गता, नं न ट्रिनियाय व में सत्र पंसि- नड, लट्ठकतदेविट्टितिपउत्तीए पच्छा करेजमु त्ति । रण्णा पडिल्लुतं । माइटानेग गो पगिती । अगो कागा सानि-- कता सरीरद्विती देवीए । पच्छा राया करति । एवं पदिदिगं करेंनाण काल यति । देवानगन्यबटेगे जो गित 25 स्वजनियरा य । एनेग चितियं-अहं पि पत्ति कहमि । पन्छा राया दियो । तेन भनिती-कलो ना मान-भव : मामानी। रण्णा भणित-देवी दिट्ट ? त्ति । सो भगति-जीए चेव पंसितो काहिमनगादिनिनिनं नि । दानिय नमः संपति । रण्णा भणियं -कदा गमिस्ससि ? । तेग भगित-कहं ! भति-जन दे दी गठिा- संपाव्ह । तेहिं चिंतियं-विणटुं कलं, को एथ उबालो ! नि विसरमा । पति-धीन होट । संपाडिऊग गया भगिनो-देवीए कहं जाहिति ? । रमा नमित-जले कई ना मानो पार : यंसेग, ण अण्णहा सगं गन्मति त्ति । राणा भनितं-नहेर पमह । देशमा !! १. आवश्यकनिक्षिगाथा १३०० हारिभद्रीमानौ । . ! , २१२ मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मित वायालो रगो समक्वं बहुं उबहसति तं विसन्नं-जहा देवि भणिज्जसि, सिणेहवंतो ते राया, पुणो वि जं कनं तं संदिसेन्जासि, अगं च इमं च इमं च बहुविहं भगेजसि । तेण भणितं-देव! णाहमेत्तिगमविगलं भणिउं जाणामि, एसो चेव लट्ठो, पेसिज्जउ । गष्णा पडिन्युनं । सो तहेब निनिउमाढत्तो । इतरो मुक्को । इतरस्स माणुसाणि विसण्णाणि पलवंति-हा देव ! अम्हे किं करि- नमो ? । तेगे मणित-नियतुंडं रखेजह । पच्छा मंतीहिं खरंटित मुक्को, मडगं दड्ढे । मंतिस्स पारिणामिता ९ ॥ बमए -खमओ चेल्लाएण समं भिक्खं हिंडति । तेण मंडक्कलिया मारिया । आलोयणवेलाए णाऽऽलोएति । खुट्टएणं भांजी-आलेगह नि । सोन्टो 'आगामि त्ति पधावितो खंभं आवडिओ मओ । एगत्थ विराहितसामण्णाणं सप्पाणं कुलं नथ उकालो दियिसो सप्पो जातो । जाइरसरणेण अवरोप्परं जाणंति, रत्तिं चरति ‘मा जीवे मारेहामो' त्ति, फासुगमाहारेति । सया नदी पुनी अहिणा खइनो मतो य । गया सप्पाणं पयोसमावण्यो भणति-जो सप्पं मारेति तस्स दीणारं देमि । करना अदिणि नाग नहानो दिवाओ. तं विलं ओसहीहिं धम्मति, सीसाणि निताणं छिंदति । सो अभिमुहो ण णीति 'मा 10 मोटामिनि जानिन्सालोणं. तं निग्गयनिग्गतं छिंदति । पच्छा रण्णो उवगीताणि । सो राया णागदेवताए बोहिज्जति- काममा नागदिनों में कुमारो होहि त्ति । सो खमगसप्पो मतो समागो तत्थ राशियाए पुत्तो जातो। उम्मुक्कबालभावो साधु मा पदिलो । सो य बुहालओ अभिग्गहं गेण्हति-न मए रूसियचं ति । दोसीणस्स य हिंडति । तत्थ आय- 1. नगा-मामिला बोमासिनो तिमासितो चउमासितो । रत्तिं देवता आगता ते अण्णे खमए अतिकमित्ता :- ना. भगिता स-कडपूतणे ! एतं तिकालभोई वंदसि, इमे महातवस्सी ण वंदसि । सा .... ... ... नमः नि गता । पभाए दोसीणस्स गतो निमंतेति । एगेण पातं गहाय खेलो छूढो । नभ जोवगीतं । एवं सेसेहिं वि । जिमिउमारदो । तेहिं पारितो । निवेयमावण्यो ।
-- । 11 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १४३ थूलभहसामित्स पारिणामिता-पितुम्मि मारिते कुमारो भण्यति-अमञ्चो होहि त्ति । सो असोगवणियाए चिंतेति- केरिसा भोगा वाउलाणं? ति । ताहे पञ्चयितो। राया भगति-पेच्छह, मा कवटेणं जाएना। गितस्स मुणगमडो वावण्यो, णासं ण ठएति, वञ्चइ पडिलेहंतो । रण्गो कहितं-विरत्तभोगो त्ति । सिरितो ठवितो १३ ॥ णासिकं गगरं, नंदो वाणियओ, मुंदरी से भन्ना, मुंदरिणंदो से णामं जातं । तस्स भाता पुर्बपञ्चतिततो सो सुति-जहा तीए अझोववन्नो । पाहुणतो आगतो, पडिलाहितो, भार्ग तेग गहितं । 'इह एत्थ विसजेहिति' त्ति उज्जाणे णीतो। 'मा भोगगिद्धो गरगे जाहिति' त्ति अहिंगयरेणं उवप्पलोभेमि । सो य वेउचितलद्धौर मकडि दरिसेत्ता पुच्छति-का सुंदरि ? त्ति । मुंदरी । पच्छा विजाहरीए, तुल्ला । पच्छा देवीए, 'देवी अतिसुंदरि त्ति मुच्छितो भगति-कहं एसा लभति ? । 'धम्मेणं' ति पञ्चइतो । साधुत्स पारिणामिकी १४ ॥ वइरसामित्स देवेहिं परिणामो, तमो माता णागुवत्तिया 'मा संघो अवमागिहिनि त्ति । पाडलिपुत्ते वेउचिए 'मा परिभविहि त्ति । पुरियाए ‘पक्यगओभावणा मा होहिति' त्ति सञ्चं कहितवं १५ चलणाहणणे-राया तरुणेहिं बुग्गाहिन्नति-जहा थेरा कुमारामचा अवणि त्ति । सो तेसिं मतिपरिक्ख गनिमित्त भगति-जो रायं सीसे पाएग आहगति तत्स को दंडो? । तरुणा भगंति-तिलं तिलं चिंदियवतो । थेरा पुच्छिता । 'चिंतेमो' त्ति ऊसरित्ता चिंतेत्ता 'शृणं देवीए को अण्गो आणिहिति ? ति भागता भगति-सकायचओ १६ ॥ आमलगं कित्तिमं । एगेग णात-अकालो. विवं होहिति त्ति १७ ॥ मणिम्मि-सम्यो पक्खीगं अंडगाणि खाति रुक्वं बिलग्गित्ता । तत्थ गिद्धेग आल्यं विलगो मारितो । तस्थ मगी 11 पाडितो । हेटाकूयो, तं पाणीयं रत्तीभूतं । कूवातो णागियं साभावितं । दारणं थेग्न्स कहितं । तेग विलग्गिऊग गहितं १८ ॥ सप्पो चंडकोसिओ चिंतति-रिसो महपा १९ ।। खग्गो-सावगपुत्तो जोञ्चगवलम्मत्तो धन्म नेच्छति । तत्तो खग्गेमु उववरगो पल्स दोदि वि पासहिं जहा पाखरा तहा चन्माणि लंबंति । अडवीए चउम्मुहापहे जणं मारेति । साहुणो य तेगेव पहेग महकमनि । वेगेश आगतो तेग ण नाति अल्लिविउ । चितति । जाती संभरिता । पञ्चक्वाणं । देवलोगगमणं २० ॥ शुभा-वैसालीए नगरीए, णगरनाभीए मुणिमुन्वयसामिन्स भी । नम गुरोग कृमिनरल पा पनि । देवगा आगामे कृणितं भगति- समणं जदा कृलवालयं, मागहिता गगिया महिनी । राया व अमोगदप. येमालिं नारं गाती ॥ १ ॥ सो मग्गिजति । का तस्स उत्पत्ती ?। एगस्स आयरियरम चलनी दिलीती । मायक्रो बान । यो पनि । अगया आयरिया सिद्धमिलं तेग समं वंदगा विलगा । ओयस्ता बहार निट मुग । दिदा भायर पदा जोगारिता, 2; रहा मारितो होन्तो ! सावो दिण्गो-दुरात्मन् । इत्थीहितो विनिमहिनि नि । निजी कार कार नामा अन्यति, णी कूल आयांवति, पंथव्भाले जो सत्यो गति तन्दो माहागे होट । टीकर मामी पढा तेग कूलबारतो जातो । तन्ध अच्छतो लागनितो । गनिमाको दावि पर साविना जाता । सधेग गता वंदति-उहागभा न्हि. चं.या दानि तु सामान दया. अनिसारो जाती. पयोगग रियो । उच्चत्तगादीहिं मानेर चिनिने अं!! वेसाली पद । धृभो गीगादिनो । गदिया २१ ।। १ पूर्वप्रनजिनकः ।। . 1 . - ----- - ११२ मलधारिश्री-श्रीचन्द्रसूरिविनिर्मित वायालो रण्यो समक्वं बहुं उवहसति तं विसन्नं-जहा देवि भणिज्जसि, सिणेहयतो ते राया, पुणो वि जं कजं तं संदिसेजासि, मागं च इमं च इमं च बहुविहं भणेनसि । तेण भणितं-देव! णाहमेत्तिगमविगलं भणिउं जाणामि, एसो चेव लट्ठो, पेसिज्जउ । ग्गा पडिम्युनं । सो तहेव निजिउमाढत्तो । इतरो मुक्को । इतरस्स माणुसाणि विसण्णाणि पलयंति-हा देव ! अम्हे किं करि- नमो ? । तेगे भणितं-नियतुंडं रखेन । पन्छा मंतीहिं खरंटित मुक्को, मडगं दड्ढे । मंतिस्स पारिणामिता ९ ॥ समग-ग्यमओ चेल्लपण समं भिक्खं हिंडति । तेण मंडुक्कलिया मारिया । आलोयणवेलाए णाऽऽलोएति । खुट्टएणं भागालोगह नि । सो सट्टो 'आगामि' त्ति पधावितो खंभं आवडिओ मओ । एगत्थ विराहितसामण्णाणं सप्पाणं कुलं नन्य उकालो दिविसा सप्पो जातो । जाइस्सरणेण अवरोप्परं जाणंति, रत्तिं चरति ‘मा जीवे मारेहामो' त्ति, फासुगमाहारेति । माया नन्दो पुनो अदिया खइनो मतो य । राया सप्पाणं पयोसमावण्यो भणति-जो सप्पं. मारेति तस्स दीणारं देमि । मा गाडिण नागं न्हातो दिट्ठाओ, तं विलं ओसहीहिं धम्मति, सीसाणि निताणं छिंदति । सो अभिमुहो ण णीति 'मा 10 मांगामि नि मानिसग्नगणं. तं निग्गयनिग्गतं छिदति । पच्छा रणो उवणीताणि । सो राया णागदेवताए बोहिजति- नागदियों ने गुमागे होदि ति । सो खमगसप्पो मतो समागो तत्थ राणियाए पुत्तो जातो। उम्मुक्कबालभावो साधु दाना पानी । सो य छुहालुओ अभिग्गहं गेहति-न मए रूसियचं ति । दोसीणस्स य हिंडति । तत्थ आय- का मामिल दो मासितो तिमासितो चउमासितो । रत्ति देवता आगता ते अण्णे खमए, अतिकमित्ता गला. भगिता य-कडपूनणे ! एतं तिकालभोई वंदसि, इमे महातबस्सी ण वंदसि । सा ... कानमा नि गता । पभाग दोसीणरस गतो निमंतेति । एगेण पातं गहाय खेलो छूढो । नभं गोवगीनं । एवं सेरोहिं वि । जिमिउमारदो । तेहिं वारितो । निव्वेयमावण्यो।
- 11 . श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्ते: टिप्पनकम् । १४३ थूलभदसामित्स पारिणामिता-पितुन्मि मारिते कुमारो भण्यति-अमचो होहि त्ति । सो असोगवणियाए चिंतेति- केरिसा भोगा वाउलाणं ? ति । ताहे पञ्चयितो। राया भगति-पेच्छह, मा कवडेणं जाएजा। गितस्स सुणगमडो वावण्गो, णासं ण ठएति, वच्चइ पडिलेहतो । रणो कहितं-विरत्तभोगो त्ति । सिरितो ठवितो १३ ॥ णासिकं णगरं, नंदो वाणियओ, मुंदरी से भन्ना, मुंदरिणंदो से णामं जातं । तस्स भाता पुञ्चपब्वतिततो सो सुणेति-जहा तीए अझोववन्नो । पाहुणतो आगतो, पडिलाहितो, भागं तेग गहितं । 'इह एल्थ विसनेहिति' त्ति उजागे णीतो 'मा भोगगिद्धो गरगे जाहिति' त्ति अहिंगयरेणं उवप्पलोभेमि । सो य वेउचितलद्धोए मर्डि दरिसेत्ता पुच्छति-का सुंदरि ? त्ति । मुंदरी । पच्छा विजाहरीए, तुल्ला । पच्छा देवीए, 'देवी अतिसुंदरि त्ति मुच्छितो भगति-कहं एसा लभति ? । 'धम्मेणे' ति पञ्चइतो । साधुस्स पारिणामिकी १४ ॥ वइरसामिस्स देवेहिं परिणामो, तओ माता णाणुवत्तिया ‘मा संघो अवमाणिहिति' त्ति । पाइलिपुत्ते वेउचिए 'मा परिभविहि त्ति । पुरियाए ‘पदयगओभावणा मा होहिति' त्ति सञ्चं कहितवं १५ ॥ चलणाहणणे-राया तरुणेहिं बुग्गाहिन्नति-जहा थेरा कुमारामच्चा अवणिजंतु त्ति । सो तेसिं मतिपरिक्खगनिमित्त भणति-जो रायं सीसे पाएण आहगति तस्स को दंडो ? | तरुणा भगति-तिलं तिलं चिंदियव्यतो । येरा पुन्छिता । 'चिंतेमो' त्ति ऊसरित्ता चिंतेत्ता 'गृणं देवीए को अण्णो आहणिहिति ?' ति आगता भणंति-सकारयवओ १६ ॥ आमलगं कित्तिमं । एगेण णातं-अकालो. विवं होहिति त्ति १७ ॥ मणिम्मि-सप्पो पक्खीगं अंडगागि खाति रक्खं विलग्गित्ता । तत्थ गिद्धेग आलयं विलम्गो मारितो । तत्थ मगी 1. पाडितो । हेटाकूयो, तं पाणीयं रत्तीभूतं । कूवातो णीशियं साभावितं । दारणं थेरस कहितं । तेग विन्दग्गिऊग गहितं १८॥ सप्पो चंडकोसिओ चिंतेति-रिसो महन्या १९ ॥ खग्गो-सावगपुत्तो जोवणबलुम्मत्तो धम्म नेच्छति । तत्तो वग्गेलु उययो पट्टन्स दोदि वि पासहिं जहा पाखरा तहा चम्माणि लंबंति । अडवीए चउम्मुहापहे जणं मारेति । साहुणो य लेंगेय पहेग भइ मनि । वेगंग नागतो तेरा ण नरनि अल्लिविउ । चितेति । जाती संभरिता । पच्चक्खाणं । देवलोगगमणं २० ॥ थूभो-वैसालीए नगरीए णगरनाभीए मुणिमुचयसामिन्स धूभो । नन्स गुणेश कृगिनास पनि । देवगा आगासे कृणितं भगतिः समणं जदा कूलवालयं, मागहिता गगिया रमेहिनी । राधा र अनागवंदर. बंगालि गरि गदिनी ॥ १ ॥ सो मग्गिज्जति । का तस्स उत्पत्ती ?। एगस्स आयरिबरस चेली अदिती । भान बालकाला। अण्णया आयरिया सिद्धसिलं तेग समं वंदगा विलग्गा । जोयतागं वहाए मिला नया हिदा मायरी. पादा जोमाना, 2', दहरा नारितो होन्तो । सावो दिण्गो-दुरात्मन् । यीहितो विनिमहिन्नि नि ! निन्यवाही का नाम अच्छति, णदीप ले आयावति, पंथभासे जो सन्थो एति तत्तो आहागे होट । दीको माटो पढा तेग कूलबारतो जातो । तत्थ अतो आगनितां । गनियाको महाविना -- सादिगा जाता । सत्ये गता वंदति-उदागमोहन न्हि, दया वंदामि तुमुना. " . इया. अतिसारो जातो. पयोगग ठवियो । उयत्तगादाहिं संनिय विनं. किक : 17127 बेसाली घेपर । थूभो जीगावितो । गहिया २. !! १ पूर्वप्राजितवाः ।। .. 20 . । *..
१४२ • -- - मा । 5 - वायालो रगो समा म त अण्णं च इमं न गं च मावि मा.. रण्णा पडिस्लुतं । सो तोच लिया।को।::::.:::...::. . !::: जामो ? । तेणे भणितं---नियत :: ::... खमए-खमओ नेल्लाग समं गिनि::::. भणिओ-आलोएह त्ति । सोन्दो माग :: :: :: :: :: :: :: : तत्थ उववण्णो दिट्टीविसो सगो जातो। आमा भागेका : :: ::. .1: 111111 अण्णया रन्नो पुत्तो अहिणा खातो मतो र । गामा पोकामा मोम Line अण्णता आहिडिएणं ताणं रेहातो विद्वाजो. तं विनं जोमही; 41 की {1 of off 'मा 10 कंचि मारेहामि' त्ति जातिस्सरतणेणं. तं निग्गनिग दिनि। परमो जी । सो गाणागो नि - मा मारेहि, नागदिण्णो ते कुमारो होहि ति । सो समगयो मनो समागो सानो ना। II IIो सा दटुं जाति संभरित्ता पञ्चतितो । सो य छुहालो अभिगः मेगाति न मा सिगा। यति। आग- रियस्स गच्छे चत्तारि खवगा-मासितो दोमासितो निगासितो नउमासितो । निजागा निमागिता तं वंदति । खमएण निग्गछंती हत्थे गहिता, भगिता य-कापूनगे ! गतं निकालभो रिस मासी नंदसि । राा 15 भणति-अहं भावखमगं बंदामि, ण दव्यखमा ति गता । पगाए दोसी गरस गतो निम्तोनि । रोग पात माग गेलो बूढो । सो भगति–मिच्छा मि दुक्कडं जं मए खेलमल्लयं तुभं णोवणीतं । एवं रोरोहि नि । जिमिउमारको । तिवारितो । निगमावण्यो। पंच वि सिद्धा विभासा १० ।। अमच्चपुत्तो वरधणुओ। तस्स तेसु तेसु प्रयोजनेषु पारिभागिता । जाहा-माता गोतागिता, सो पलावितो एवमादी सव्यं विभासियव्वं ॥ अण्णे भणंति-एगो मंतिपुत्तो कप्पडियायकुमारण समं हिंडति । अण्णदा नेमितिको पडितो । रत्ति देवकुड़ि 20 ठिताणं सिवा रडति । कुमारेण नेमित्तिओ पुच्छितो-किं एसा भणति ? ति । तेग गणित--इमं भणति, इमम्मि णदितित्थंसि पूराणीयं कलेवरं चिट्ठति, एयस्स कडीए सयं पातंकाणं, कुमार ! तुमं गेण्हाहि, तुम्श पायंका, मम य कलेवरं ति, मुदियं पुण ण सक्कुणोमि त्ति । कुमारस्स कोडं जातं, ते वंचिय एगागी गतो, तहेव जातं । पार्यके घेत्तूण पञ्चागतो । पुणो रडति । पुणो वि पुच्छितो । सो भणति-चप्फलिगाइतं । कहं ? ति । एसा भणइ-कुमार ! तुझ वि पायकसतं जातं, मज्झ वि कलेवरं ति । कुमारो तुसिणीओ जातो । अमञ्चपुत्तेण चिंतियं-पेच्छामु से सत्तं किं किमिणत्तणेण गहितं ? आहा सोडीरताए ? जति किमिण- 25 तणेणं कैतं, ण तस्स रजं ति नियत्तामि । पच्चूसे भणति-वच्चह तुम्भे, मम पुण सूलं कजति, न सक्नुणोमि गंतुं । कुमारेण भणितं-न जुत्तं तुमं मोत्तूण गंतुं किंतु कोइ एगत्थ जाणिहिति तेण वचामो । पच्छा कुलपुत्तघरं नीतो, समप्पितं च सञ्चं पेजा- मुलं दिणं । मंतिपुत्तस्स अवगयं जहा-सोडीरताए त्ति । भणितं च ण-अस्थि मे विसेसो अतो गच्छामि । पच्छा गतो । कुमारेण रज पत्तं । भोगा वि से दिण्णा । एतस्स पारिणामिगी ११ ॥ चाणको-एगथ णगरं ण पडति । पविट्ठो तिदंडिवेसेण चाणको । वत्थूणि' जोएति, इंदकुमारियातो, तासि तणएण 30 ण पडति । माताए णीणाविताओ, पडितं नगरं । एवं दो वि सालि-रयणाई मग्गिऊण कोडागाराणि सालीणं भरियाणि, रयणाई गद्दभियादीणि तेण, जेण छिण्णाणि छिण्णाणि पुणो पुणो जायंति, आसा एगदिवसजाता मन्गिता, एगदिवसितं णवणीतं मग्गियं । एसा पारिणामिया चाणकरस बुद्धी १२ ॥ १ वाचालेन जेटि० ॥ २ कृतं-पर्याप्तम् जेटि० ॥ ३ मायया ॥ ! " श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तः टिप्पनकम् । १४३ - . है ... .. : 1 . .. 1.- -- धूलभ६सामित्स पारिणामिता-पितुम्मि मारिते कुमारो भण्गति-अमचो होहि त्ति । सो असोगवणियाए चिंतेति- केरिसा भोगा वाउलाणं ? ति । ताहे पञ्चयितो । राया भणति-पेच्छह, मा कवडेणं जाएजा। गितस्स सुणगमडो वावण्यो, णासं ण ठएति, वचई पडिलेहतो । रण्गो कहितं-विरत्तभोगो त्ति । सिरितो ठवितो १३ ॥ णासिकं णगरं, नंदो वाणियओ, मुंदरी से भन्ना, मुंदरिणदो से णामं जातं । तस्स भाता पुञ्चपञ्चतिततो सो सुणेति-जहा तीए अझोवबन्नो । पाहुणतो आगतो, पडिलाहितो, भागं तेग गहितं । 'इह एल्थ विसनेहिति त्ति उजाणे णीतो। 'मा भोगगिद्धो गरगे जाहिति' त्ति अहिंगयरेणं उबप्पलोभेमि । सो य वेउवितलद्धीर मकडि दरिसेत्ता पुच्छति-का मुंदरि ? त्ति । मुंदरी । पच्छा विजाहरीए, तुल्ला । पच्छा देवीए, 'देवी अतिसुंदरि' त्ति मुच्छितो भगति-कहं एसा लभति ? । 'धन्मेणं ति पञ्चइतो । साधुस्स पारिणामिकी १४ ॥ वइरसामिस्स देवेहिं परिणामो, तओ माता णाणुवत्तिया ‘मा संबो अवमागिहिति ति । पाडलिपुत्ते वेउचिए 'मा परिभविहि त्ति । पुरियाए 'पक्यगओभावणा मा होहिति' त्ति सञ्चं कहितवं १५ ॥ चलणाहणणे-राया तरुणेहिं बुग्गाहिजति-जहा थेरा कुमारामचा अवणिजंतु ति । सो तेसिं मतिपरिक्ख गनिमित्तं भणति-जो रायं सीसे पाएण आहगति तत्स को दंडो ? । तरुणा भगंति-तिलं तिलं चिंदियव्यतो । थेरा पुन्छिता । चितेमो त्ति ऊसरित्ता चिंतेत्ता 'गणं देवीए को अण्गो आणिहिति ?' त्ति मागता भगति-सकायचओ १६ ॥ आमलगं फित्तिमं । एगेण णातं-अकालो, विवं होहिति त्ति १७ ॥ मणिम्मि-सम्पो पक्खीगं अंडगागि खाति रुक्खं विलग्गित्ता । तन्य गिद्धेग आल्यं विलगो मारितो । तर मगी 1 पाडितो । हेट्ठा कूयो, तं पाणीयं रत्तीभूतं । कूवातो णागियं साभाविनं । वाराणं घेरल्ल कहितं । तेग चिलगऊग गहितं १८ ॥ सप्पो चंडकोसिओ चिंतेति-रिसो महप्पा १९ ॥ खग्गो-सावगपुत्तो जोवणवलम्मत्तो धम्म नेच्छति । तत्तो खगेनु उयकगो पास दोहि वि पाहिं जहा पालग तहा चम्माणि लंबंति । अडीए चउम्मुहापहे जणं मारेनि । साहुणो व तेच पंग मामीन । बगा जागती ने जननि अल्लिविङ । चितति । जाती संगरिता । पञ्चक्खाणं । देवलोगगमणं २० ॥ थूभी-वैसालीए, नगरीए, णगरनाभीए मुणिमुन्ययसामिल भो । नमन कणिनामा पनि । देवगा आगासे कृणितं भगति- समणं जदा बलरालयं, मागहिता गणिया रमेहिनी । नपा र अनोगदमगालि गरि म ॥ १ ॥ सो मग्गिजति । का तस्स उत्पत्ती ?। एगरस जापरिचरस बस । अण्गया आयरिया सिद्धसिलं तेग समं वंदगा विलाना । जोपांना दहा या पास, 2, रहरा मारितो होन्तो । साचो दिण्णो-दुरात्मन् ! काहिती विमितिम नि । अन्यति, णी कृले आयाति. पंथमाले जो सथो एति ततो पाटो पदा तेग कलवारतो जातो । तन्ध अतो भागनितो । जतिका " .......... :::: सादिगा जाता । सधे गता वंदति-उद्यागमोहन सिंह वाली श्या. अतिसारो जातं. पयोगेग ठविओ। उच्चत्त मादाहिं संनि भिनं. साली पद । धूभो नानावितो । गहिया २१ १ पूर्वप्राजिनकः ॥ । ... .. .... .
-- .. -- . -- : , "''' 11 11:11 f. 15 श्चक्षुःदेशमागत रूपमक्षिस्थमञ्जन-जो-गलागलाकादि . . . . .111111 : if I पग-नि। नस्य प्राप्यकारिताऽभिधीयते, तदयुक्तम् , महाज्यालादी प्रतिस्पलना चादिया. If aniगादिप्रमाणामागचेन 20 श्रद्धातुमशक्यत्वात् , प्रमाणाग्राह्यस्याप्यस्तित्वकल्पनेऽतिप्रसादिति ग्रासम् । तानानामनगीनां नगरि वेदाभ्युपगमे पं. १०. "तस्स णं इमे" । इत्यादि पं. ११. एकाथिकानि परमार्थत एकार्थविषयाणि नानायोपाणि पृथग्भिन्नो- दात्तादिस्वराणि नानाव्यञ्जनानि पृथग्भिन्नककाराद्यक्षरागि नामधेयानि पर्यायवनयः । यथाऽवग्रहस्य पर नामधेयानि चक्खिदिय-मणरहियं, वंजणमीहाइयं सदा ॥ १ ॥ [ जीवसमास गा० ६२] पं. २१. कि मन्द्र इति गम्भीरः तार उच्चैस्तरवनिमान् । पं. २२. योति नयन-मनसोर्विपये व्यञ्जनावग्रहो 30 किमयं स्थाणुः पुरुपो वा ?' इति वितर्के 'वल्लयुत्सर्पण-काकनिलयनादिधर्मदर्शनात् स्थाणुना भाव्यम्, नेतरेण, शिरःकण्डयन- चलनादितदीयधर्मादर्शनात्' इत्येवं व्यतिरेकधर्मनिराकरणपरोऽन्वयधर्मघटनप्रवृत्तश्चापायाभिमुख एव बोध ईहा इति । एवमीहाया- कमाविकालीमा पं. १६. अगमा इत्यत्यताजानं कामयाः । 5 प्राप्यकारिस्थितिय मानाचा रिस्यादि. विषयभूतं वरन कार में अप्राप्यकारि लोननम् . गायनल कुर्यात् तदाऽग्न्यादिनीने गावोगा: :::. ::::.:.:. . . . . . कारि लोचनम् । अथ प्रागुमोमियो:::::::::::::::: : ! :::: 10 वलोकने नयनस्य परमावासको मत :: : "If . अत्रोच्यते, नहि वयमेतद् सुमः-गन माता का नाम -: :: :: :: : - ) If f". !! { भान एव, रविकरान् चिरमवलोकयनो मन .. { 11 मे तो ऽनुग्रहं मन्येत चक्षुरित्येतायता अमान्यकारिन को नाम fr; , स्माभिर्नियन्यते-यदुत विषयदेशे गया आदिमागमा : -::.": :: vi its: f f. •* परिच्छेदानन्तरं तु पश्चात्प्राप्तेन केनाप्युपश्चात के नानुगा के गाना HENETISet of Infit in, fer. शर्करादिभक्षणे मूर्छा-स्वास्थ्यादय इव मनसः । पं. ५० पर: WI: Iffiftinापना गविग्य- रश्मय इव वस्तु प्रकाशयन्तीति सूक्ष्मःवेन तैजस येन न रोपां ना गाए समानादिनि नय- नख-दन्त-भालतलादिगतशरीररदमीनामपि स्पर्शविषयवस्तुपरिन्छेदप्रसारित । [पृष्ट ५०] 25 एवमीहायाः पड्भेदायास्तथाऽपायस्य धारणायाश्च पञ्च नामधेयानि क्रमेण दर्शयिप्यति । पंचहिं वि इंदिएहिं, मणसा अस्थोग्गहो मुणेयव्यो । नास्ति । तत्र चतुर्विधव्यञ्जनावग्रहविपये अवग्रहणता-उपधारणतालक्षणभेदद्वयस्याभावः । मेषां धर्मागां यदन्वेषणं सा मार्गणता ।। पं. ३०. ईहायां मार्गणतेति नई सो 1 . 15 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १४५ [पृष्ठ ५१] पं. २. सद्धर्मानुगत इति, सद्धर्मणि-वस्तुनि अनुगतः सद्धर्मानुगतः । पं. १३. अप अयः-सामस्त्येन परिच्छेदोऽपायः, मधुर-स्निग्धत्वादिगुणत्वात् 'शङ्खस्यैवायं शब्दः, न शृङ्गस्य' इत्यादि यद् विशेषविज्ञानं सोऽपायः । पं. २२. अपायेन निश्चितेऽर्थे तदनन्तरं यावदद्यापि तदर्थोपयोगे सातत्येन वर्तते, न तु तस्मानिवर्तते, तावत् तदर्थोपयोगाद अविच्युतिर्नाम धारणायाः प्रथमभेदो भवति । पं. २५. यत् कर्मक्षयोपशमवशाजीवस्य कालान्तरे इन्द्रियच्यापारादि- सामग्रीवशात् पुनरप्यपायावधारितोऽर्थः स्मृतिरूपेणोन्मीलति सा संस्काररूपा वासना नाम धारणाभेदः । कालान्तरे च वासना- वशात् तदर्थस्येन्द्रियैरुपलब्धस्याथवा तैरनुपलब्धस्यापि मनसि या स्मृतिराविर्भवति सा तृतीयस्तद्भेदः । पं. २७. अत्र मति- दौर्बल्यादिकारणकलापादवग्रहेहादीनां दुर्विज्ञेयत्वेऽपि सर्वज्ञमतप्रामाण्यादवितथात्वमेव भावनीयमित्यावेदयन्नाह-इह चेत्यादि । पं. २९ एकाधिकरणत्वाद् एकाश्रयत्वात् । [ पृष्ठ ५३] पं. ३. न पुनर्विशत्येत्यादि, विंशतिदिनापेक्षया यथा अपान्तराल आसन्नो योऽसावागमनसमयः कालविशेषरूपस्तदिन- भावी अतिक्रान्तप्राचीनदिननिरपेक्षः पथिकस्य गृहप्रवेशकारगम् , न तथा प्रकृते प्राचीनसमयरहितचरमासंख्येयसमयप्रविध- पुद्गलराशिरप्यर्थावग्रहकारणम् , कित्वादित आरभ्य प्रतिसमयप्रवेशेन निरन्तरमसंख्येयसमयप्रविष्टाः पुद्गलाः शन्दविज्ञानजनकाथा- वग्रहहेतवो भवन्तीति भावः । स्कुटशब्दविज्ञानहेतवश्व चरमसमयप्रविष्टा एव यद्यपि भवन्ति, नेतरे. तथापीतरे तःसाहायभावेन व्याप्रियन्त इत्योघतः सर्वेषां सामान्येन ग्रहणमुच्यते । [पृष्ट ५४] पं. १. अथ 'केयं मल्लकदृष्टान्तेन व्यञ्जनावग्रहप्ररूपगा?' इति पृष्टे तां वकुमाइ-तद् ययादिना । "मल्टयं पवाहेहि" त्ति प्लावयिष्यति । पं. ५. व्यञ्जनं पून्तिं भवति नोयन मटकमिव । पं. ६. सम्बन्धो वेति द्रव्य-इन्द्रिययोः सम्बन्धः । यदा द्रव्यं व्यञ्जनमिति, शब्दादिविषयवग्गियुगलसरूपम् । पं. ७. विषयगत्तापिनि स्वग्राहकज्ञानजनने । पं. ८. आभृतमिति, वासितमिन्यर्थः । पं. ९. नाम-जान्यादिकल्यनारदिनमिनि, एक "ना 20 हुँ ति करेह" इत्यस्य व्याख्यानम् । पं. ११. अत्रावग्रहात् पूर्वमिनि मन पियर्थः । पं. १२. इदानी “से जहानामए केइ पुरिसे अञ्चत्तं सदं मुणेजा" याटिकर काम का मानाय समान पातनात्रयं करोति-अत्राहेत्यादिना आधेयम् , अथवा यदुक्तमित्यादिका मिनी: अमानने पर नि अव्यक्तमिति अनिर्देश्यम् , कोऽर्थः ! 'शब्दोऽयम् , सापादिदी : कादि वकार नियनमा पप-नामाही। आदिशब्दाद जाति-गुण-क्रिया-द्रव्यग्रहः । पं. १८. तम्ब चंति पानसर! पं. २३. सम्बद्धमिति युक्तमित्यर्थः । नैतदेवमित्यादिना रिः प्रतिविधने । पं ... ननाद : त्यव्यवसायनेति न । तस्यैवति, अर्थावग्रहं विनैव 'तन्द शादमान जातऽव्यक्तमनिर्दे:यस्वरूपं शब्दायुल्लेग्यरहितमर्थमात्रमयगृहानि । गतं भाया-प्रद ! सामण्णमणिद्देसं सरब-नानाइकप्पणादियं । जड़ एवं जं 'तेणं गहिए मद्देति वित: :: "अत्यनमनिस"मिति हत्तो पाटो हो । नत्र "," : मा. १ सजन ५ः वृत्तौ न बनो मार " .."". . . टी०१६ १४८ पं. ८. --- 5 : :: :: : शवोऽविक इलिमा :: :: शेषनारादीतिमा :::: पाणुगरिमा सप्युप्पलनामा "डादिवस्तूनि पनामानि": । :: :: :: ::: रसादिपियो येपानीहादीनां तानि समान :: : ! :...:.:3111 11::::::fry: ! इत्याह-स्थाणु-पुरुषादिवदिति. पर्यन्ते नि ति ... : ... !: 1:di : TET स्थाणुपुरुषादिवत् समानधर्मा रूपवियोग, गाना र पा : firi: ना! रज्जुः विषधरो वा !' इत्यादिपरिमः । सोडियम होता कामा - frrr:, •F: 1: मनमी के गो 10 वस्तुविशेषः उत्पलं-पमं अनयोः किन्न समानो गयो भवति स ई शेन गो :: : आदिशब्दात् 'किमत्र समच्छदाः मत्तकरिगो वा ! करना का नगमा होना: ::: २५ गाहा राम्भ तकरील-मांसादिवत् समानरसो विषयः, तत्र सम्भृतानि समानानि समानी माग गनिमामिजीनि करीलानि तथा मांसम् , अनयोः किलाऽऽस्वादः समानो भवाने, नतोऽयकारा सामागिन् नि मागतम् हिगिद सम्मत वंशकरीलम् ? आमिषं वा ?' इति, आदिशब्दार 'गुडः साउं गा ! मी का सामना? इयादिपारगः । रपर्शनेन्द्रिग- 15 प्रभवस्येहादेः सर्पोत्पलनालादिवत् समानस्पों विगयः, सपो गलनालगोला तुगरपक्रोनेति: गुगगा, आदिशन्दात् सीपुरुष. लेप्टूपलादिसमानस्पर्शवस्तुपरिग्रह इति गाथार्थः ॥ २ ॥ गण गनुको सूो “से जानामा फेइ पुरिशे अन्चर गुमिण पासेज्जा" इत्यादि, तदनुसृत्य स्वप्ने मनसोऽप्यवग्रहादीन् दर्शयन्नाह - एवं चिय सिमिणाइसु मणसो सहाइएसु विसासु । होतिंदियवावाराभावे वि अवग्गहाईया ॥ ३ ॥ 'एवमेव' उक्तानुसारेणेन्द्रियव्यापाराभावेऽपि स्वप्नादिपु, आदिशब्दाद दत्तकपाट-सान्धकारापवरकादीनीन्द्रियव्यापाराभाव वन्ति स्थानानि गृह्यन्ते, तेषु केवलस्यैव मनसो मन्यमानेषु शब्दादिविषयेषु भवग्रहादयः' अवग्रहा-ऽपाय-धारणा भवन्तीति स्वयमभ्यूह्याः । तथाहि-स्वप्नादौ चित्तोत्प्रेक्षामात्रेण श्रूयमाणे गीतादिशब्दे प्रथमं सामान्यमात्रोत्प्रेक्षायामवग्रहः 'किमयं शब्दः । अशब्दो वा ?' इत्याद्युत्प्रेक्षायां त्वीहा, शब्दनिश्चये पुनरपायः, तदनन्तरं तु धारणा । एवं देवतादिरूपे, कर्पूरादिगन्धे, मोदकादि- रसे, कामिनीकुचकलशादिस्पर्शे चोत्प्रेक्ष्यमाणेऽवग्रहादयो मनसः केवलस्य भावनीया इति गाथार्थः ॥ ३ ॥ मतिज्ञानमिदं द्रव्यादिभेदाच्चतुर्विधम् । यदाह भाष्यकृत्- तं पुण चउन्विहं नेयभेयओ तेण जं तदुवउत्तो। आएसेणं सव्वं व्वाइ चउव्विहं मुणइ ॥१॥ 'तत् पुनः' आभिनिबोधिकज्ञानं 'चतुर्विधे' चतुर्भेदम् । नन्ववग्रहादिभेदेन भेदकथनं प्रागस्य कृतमेव, किमिह पुनरपि भेदो- पन्यासः ? सत्यम् , ज्ञेयमेवेह द्रव्यादिभेदेन चतुर्भेदम् , ज्ञानस्य तु ज्ञेयभेदादेव भेदोऽत्राभिधीयते, सूत्रे तथैवोक्तत्वात् । तच्चेद 30 सूत्रम्- "तं समासओ चउव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दव्वओ खित्तओ कालओ भावओ । दव्वओ णं आभिणिबोहियनाणी आएसेणं सव्वदव्वाइं जाणइ न पासई"त्यादि । ज्ञेयभेदादपि तत् कथं चतुर्विधम् ? इत्याह-"जं तदुवउत्तो” इत्यादि, 'यद्' यस्मात् 'तेन' आभिनिवोधिकज्ञानेन सर्वं द्रव्यादि मुणतीति सम्बन्धः । कथम्भूतम् ? इत्याह-'चतुर्विध' चतुर्भेदं द्रव्य-क्षेत्र-काल- पं. ९. 20 25 ? कारणात् ?
श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १४९ पं. २८. भावमेदभिन्नमित्यर्थः । कथम्भूतः सन् मुगति ? इत्याह-तस्मिन्नेव-आमिनिबोधिकज्ञाने उपयुक्तः तदुपयुक्तः । केन ? इत्याह- आदेशेनेति ॥ १ ॥ कोऽयमादेशः ? इत्याह- आएसो त्ति पगारो, ओहादेसेण सव्वव्वाइं । धम्मत्थियाझ्याइं जाणइ, न उ सचभेएणं ॥ २ ॥ इह 'आदेशो नाम ज्ञातव्यवस्तुप्रकारः । स च द्विविधः-सामान्यप्रकारो विशेषप्रकारश्च । तत्र 'भोपादेशेन' सामान्य- प्रकारेण द्रव्यजातिसामान्येनेत्यर्थः, सर्वव्याणि धर्मास्तिकायादीनि जानाति, 'असंख्येयप्रदेशात्मको लोकव्यापकोऽमूर्तः प्रागिनां पुद्गलानां च गत्युपष्टम्भहेतुर्धर्मात्तिकायः' इत्यादिरूपेण कियत्पर्यायविशिष्टानि पडपि द्रव्याणि सामान्येन मतिज्ञानी जानातीयर्थः । अनभिमतप्रकारप्रतिपेधमाह-'न तु सर्वभेदेन' न सर्वेविशेषैर्न सर्वैरपि पर्यायः केवलिदृष्टैर्विशिष्टानि तानि द्रव्याण्यसो जानातीत्यर्थः, केवलज्ञानगम्यत्वादेव सर्वपर्यायाणामिति भावः ॥ २ ॥ धर्मास्तिकायादिभेदेन कथितं सामान्येन द्रव्यम् । अथ क्षेत्रादिस्वरूपं विशेषतः प्राह- [ पृष्ठ ५६] पं. १. खेत्तं लोगालोगं, कालं सञ्चद्धमय तिविहं पि । पंचोदइयाईए भावे, जं नेयमेवड्यं ॥ ३ ॥ क्षेत्रमपि लोका-ऽलोकस्वरूपं सामान्यादेशेन किय पर्यायविशिष्टं सर्वनपि जानाति, न तु विशेगादेशेन सर्वप्रयायैर्विशिधमपि । एवं कालमपि सर्वाद्धारूपम् , अतीता-ऽनागत-वर्तमानभेदतत्रिविधं वा इत्येक एवार्थः । भावतस्तु सर्वभावानामनन्तभाग 1 जानाति, औदयिकीपशमिक-क्षायिक-क्षायोपशमिक-पारिणामिकान् वा पत्र भावान् सामान्येन जानाति, न परतः । कुतः ! इत्याह 'यद् यस्मादेतावदेव ज्ञेयमस्ति, नान्यदिति । इह क्षेत्र-काली सामान्येन व्यानर्गतायेव. केवलं भेदेन रुढचात् पृथगुपा- दानमवसेयमिति ॥ ३ ॥ आदेशस्य व्याख्यानान्तरमाह- आएसो त्ति व मुत्तं, सुओवलन्हेग्मु तस्ल मइनाणं । पसरह तन्भावणया विणा वि सुत्ताणुमारंण ॥४॥ अथवा आदेशः सूत्रमुच्यते । तेन सूत्रादेशेन सूत्रोपदेष्यपु नरम मानातिनः मासानिविषय मनिशान प्रसन्न । ननु श्रुतोपलन्धेप्वर्थेषु तद् ज्ञानं तत् श्रुतमेव भवति, कथं मतिज्ञानन ! : नारया मोरयोग मन्तरण तहासनामाव्रत एवं यद् द्रव्यादिपु प्रवर्तते तत् नत्रादेशेन मनिनि: ! " ---- पुव्वं सुयपरिकन्मियमहरस जं संपयं नमानि । तन्निस्सियमियरं पुण, अगिरिसयं नाचः ॥ १.cc १६९ इत्यादिप्रकामे प्रोक्तमेवेति गाथाचतुष्टयार्थः ॥ १ ॥ पं. ५. अत्र श्रुतनिश्रितानवग्रहादीस्तावदाह-- उगहो ईद अवाओ य धारणा एव हानि दनारि। आभिणियोहियनाणस्म भेवदत्य समानता म. गा. 55 !! गरप-रसादिमानियम अन्यत्तत्यपन्य मान .............. विचारणं वक्ष्यमाणगया दिशेपारेपानी तथा हि--- पं. २.
१५० १५ - .. +-- -- --- -- -- ! वसको केनात. सदको मन 5 एव बरनि भवनम::::::::: अन्याणं उगा ! वयसायं 7 अगा, पागा.3}} 'मानो' रुपानी : ...:::::::::: । नना, अर्थानामिनि वर्सने नमः का हुन । म र 'fit : niti firi on माण 10 विशेषत्यागसम्मुन्ना 'प्रायः काकीनाक: . . . . . . निरोप ईहेति । विशिष्टोऽयसायो व्यवसाय:-नियर PHTE. TRI II Fri गान-- स्थाणुरवायमित्यवधारणामकः प्रयोगायोगाना , tet on नागो गणः । धृतिधरणम् . अर्थानामिति वर्भने, गायन नियमान नासा को । पारणं । इगर्गः । पुनःशब्दस्याबधारणार्थत्वात् त्रुवन इत्यनेन नायरा पार का इजहार गए । गन्गे गं पठन्ति- 15 "अस्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो" इत्यादि नगीनामनगाने सति यो नाम मागेको हो । गी: दिनणि गोव्यम् । भावार्थस्तु पूर्ववदेव । अथवा “प्राकृतीयायमा विकिरिमामः" इति राणी पनि गावाः ॥ अथैतदेवावग्रहादिस्वरूपं भाप्यकारेण वितं गणा- सामण्णत्थावग्गहणमोग्गहो, भयमग्गणगईशा । तस्साचगगोजागो, अनि भागणा तारा ॥ [ विशेषा० गा० १८० ] अन्तर्भूताशेपविशेषस्य केनापि रूपेगानिर्देश्यस्य सामान्गरगार्थ कसामयिकमवणं सामान्यार्थावग्रहणम् , अथवा 20 सामान्येन-सामान्यरूपेणार्थस्यावग्रहणं सामान्याविग्रहणगवग्रहो येदितव्यः । अथानन्तरणीता प्रवर्तते । कथम्भूतेयम् ! इत्याह- 'भेदमार्गणं' भेदाः-वस्तुनो धर्मास्तेषां मार्गणं-अन्वेषणं विचारणं 'प्रायः काकनिलयनादयः स्थाणुधर्मा अत्र वीक्ष्यन्ते, न तु शिरःकण्डूयनादयः पुरुषधर्माः' इत्येवं वस्तुधर्मविचारणमीहा इत्यर्थः । तस्यैव ईहया ईहितस्य वस्तुनस्तदनन्तरमवगमनमयगमः 'स्थाणुरेवायम्' इत्यादिरूपो निश्चयोऽवायोऽपायो वेति । तस्यैव निश्चितस्य वस्तुनोऽविन्युति-स्मृति-वासनारूपं धरणं धारणा, सूत्रेऽविच्युतेरुपलक्षणत्वादिति गाथार्थः ।। तत्रामूपामिदं स्वरूपम्-अपायानन्तरमवगतमर्थमविच्युत्याऽजघन्योत्कृष्टमन्तर्मुहुर्त्तमात्रं कालं धारयतो धारणाऽविच्युत्या- ख्या । तमेवार्थमुपयोगात् च्युतं जघन्येनान्तर्मुहर्तादुत्कृष्टतोऽसंख्येयकालात् परतः स्मरतः धारणा स्मृत्याख्या । अपायावधा- रितमेवार्थं पूर्वा-ऽपरालोचितं हृदि स्थापयतो धारणा वासनाख्या। नवरं संख्येयवर्षायुपां संख्येयं कालं स्मृति-वासनारूपा धारणा भवति, असंख्येयवर्षायुषामसंख्येयं कालं स्मृति-वासनारूपा धारणा भवति, असंख्येयवर्षायुपामसङ्ग्येयं कालं द्विरूपा- ऽपीय धारणा भवति ॥ पं. ११. पुढे० [ सूत्र गा. ७५ ] गाहा । श्रोत्रेन्द्रियं कर्तृ, शब्दं कर्मतापन्नं शृणोति । कथम्भूतम् ? इत्याह-स्पृश्यत इति स्पृष्टस्तं स्पृष्टम् , तनौ रेणुवदालिङ्गितमात्रमेवेत्यर्थः । इदमुक्तं भवति-स्पृष्टमात्राण्येव शब्दद्रव्याणि श्रोत्रमुपलभते, यतो प्राणा- दीन्द्रियविषयभूतद्रव्येभ्यः तानि सूक्ष्माणि बहूनि भावुकानि च, पटुतरं च श्रोत्रेन्द्रियं विषयपरिच्छेदे घ्राणेन्द्रियादिगणादिति । 25 30 . - पं.१३. श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १५१ श्रोत्रेन्द्रियत्य चेह कतृत्वं शब्दश्रवणान्यथानुपपत्तेर्लभ्यते । एवं प्राणेन्द्रियादिप्वपि वाच्यम् । तानि पुनः कथं गन्धादिकं गृहन्ति ? इत्याह-गव्यत इति गन्धत्तमुपलभते घ्राणेन्द्रियम् , रस्यत इति रसत्तं च गृह्णाति रसनेन्द्रियम् , स्पृश्यत इति स्पर्शतं च जानाति स्पर्शनेन्द्रियम् । कथम्भूतं गन्धादिकम् ? इत्याह-'वद्धस्पृष्टं तत्र त्सृष्टमिति-पूर्ववदेव, बद्धं तु-गादतरमाश्लिष्टं आत्मप्रदेशस्तोयव- दात्मीकृतमित्यर्थः । ततश्च गन्धादिव्यसमूहं प्रथमं स्पृष्टम्-आलिङ्गितं ततश्च स्वर्शनानन्तरं बदम्-आत्मप्रदेशेगांडतरमागृहीतमेवो- पलभते प्राणेन्द्रियादिकमित्येवं व्यागृणीयात् प्रज्ञापकः, यतो घ्राणेन्द्रियादिविषयभूतानि गन्धादिद्व्यागि शब्दच्यापेक्षया स्तोकानि बादराणि अभावुकानि च, विषयपरिच्छेदे श्रोत्रापेक्षयाऽपनि च प्राणादीनि, अतो बतृष्टमेव गन्धादिद्रव्यसमूह गृहन्ति, न पुनः स्पृष्टमात्रमिति भावः । ननु यदि स्पर्शनानन्तरं बद्धं गृह्णाति तर्हि "पुट्ठबद्ध" इति पाठो युक्त इति चेत्, उच्यते- विचित्रत्वात् सूत्रगतेरित्थं निर्देशः, अर्थतस्तु यथाऽन्ययोक्तं तथैव द्रष्टव्यम् । अपरवाह-यद् वदं तत् सृष्टं भवत्येव, विशेष- वन्धे सामान्यवन्धस्यान्तर्भावात् , ततः किं स्पृष्टग्रहणेनेति, तदयुक्तम् , सकलश्रोत्साघार गावाचावारम्भत्य प्रपत्रितज्ञानुपहार्य- मर्थापत्तिगयाथांभिधानेऽप्यदोपादिति । चक्षुरिन्द्रियं त्वप्राप्तमेव विषयं गृहाती याह-"रूवं पुग पासई अपुढे तु" इति रूपं 1 कर्मतापन्नं चक्षुः 'अस्पृष्टम्' अप्राप्तमेव पश्यति । पुनःशब्दस्य विशेषगार्थवादस्पृष्टमपि योग्यदेशस्थमेव पश्यति, नायोग्यदेशरथ सौधर्मादि कटकुड्यादिव्यवहितं वा घटादीति गाथार्थः ।। भासासमसेढीओ सई जं सुणइ मीसयं सुणइ । वीसेढी पुण सदं सुणेइ नियमा पराघाए । म. गा. ७६ ।। भाप्यत इति भापा, वक्त्रा शब्दतयोत्सृज्यमाना द्रव्यसंहतिन्स्यिर्थः. तन्याः समाः-प्राजलाः गयः-आफारापदेश- 1. पङ्क्तयो भापासमश्रेणयः, समग्रहणं विश्रेगिव्यवच्छेदार्थम् , भाषासमश्रेणिषु इनः गनः स्थित इयनयान्तरं भागसमग्रेजीतः । 'इदमुक्तं भवति-भापकस्यान्यस्य वा भेयर्यादेः समवेगिव्यवस्थितः श्रीता या पुरुष-मन-मयादिसम्बन्धिन पनि मोत तं मिश्रकं शृणोतीत्यवगन्तव्यम् , भापकाद्युत्सृष्टशब्दद्रयाणि तहासिनापान्तगयन्यानि ये मिश्र या भगोत. न तु वासकमेय वास्यमेव वा केवलमित्यर्थः । “वीसही पुणे त्यादि. "मना: गनी नि मायाः विपतिः सजा विश्रेणिरुच्यते, स विश्रेणिः पुनः श्रोता शब्द नियमाद् नियमेन पायाने बामन मला मार-मानि । भाषकोत्सृष्टानि शब्दद्रव्याणि भेर्यादिशब्दव्याणि वा त: पगवान बागनामिनि मानिनामानि मामामामानि द्रव्याणि तान्येव विश्रेणिरथः शृणोति, न तु भाषकायुष्ठानि नामनुश्रमियानन प्रनिधातरतेषां विदिग्गतिनिमित्तं सम्भवति. लेष्ट्वादिबावन्द्रयाणामेच ना! . नम:।। वत्ताव्यम्-द्वितीयादिसगयेपु तेषां स्वयमपि विविक्षु गमनसमदान नम: समयान्तरेषु तेषां भाषापरिणामेनानयस्थानात . "भाष्यमाणैव माता भार | 2, "चरहिं समाहिं लोगो भासाए निरंतरं तु हो फुडो" इति वा पति पर अन्यम् । अनाद-मनु यदिवक्तानिसृष्टानि भापाठ यानि प्रधनमाये दि. ध्यागि दिनीयसगये विदिन गायन्ति, ततध दिग-विनियमित कामद... वनपल यते. मेष दोषः, समयादिकालदम्याजिम्मका नागिसमयपनिवेद भाषा. ततो दिमिरची निस यामा नागाऽविरोधाभापा न विस्मते. पता ट:- पनि । अभार-गाया. "रम: . ..
१५२ -4 -- है पं. १५. 5 15 .. इल्याणागपि तयाविना .. :: पीन्द्रियागि गन्नादिया :::::::::::::::: ..... , रद्धटीकाकार इति गावाः ॥ ईहा अपोत वोमंसा माणा ग गोमगा। सण्णा सई मई गया सन आभिगियोगि॥ गा..... "ईह चेतायाम्" हिननीका-गुलामसिना माना जाता । यो :::: for a furi विमर्पः-अपायात् पूर्वः इहायानोत्तरः 'प्राव निकामना पूm Tमार्गमा आगा. धर्मान्येपणं मार्गणा । 'नशयः समुगाः । गो-याने कोमा गो। संज्ञान संकायो मानी मतिविशेष एव । स्मरणं स्मृतिः-पूर्वानुभूतायोलगनः प्रयाः। मन मामः कानगि..णि माननिषा 10 बुद्धिः । तथा प्रज्ञानं प्रज्ञा-विशिष्टयोपसमज-या प्रभूतानमनाया जाननरा : । सीमामागिनिनोमिकम् , कथञ्चित् किञ्चिद् भेददर्शनेऽपि तत्वतः सर्व मनिज्ञानमो इमिगः इति नियोकाः ।। अत्रैतद्व्याख्यानाय भाप्यम्--- होइ अपोहोऽवाओ, सई पिई, रानमेव ग:-पगा। ईहा सेसा, सव्यं इदगाभिगियोहिगं जाण ॥ १ ॥ [ विशेषा० गा० ३९७ ] अपोहस्तावत् किमुच्यते ! इत्याह-अपोहो भवःयपायः, गोऽगमपोहः स गतिज्ञानतृतीयोऽगायो निश्चय उच्यत इत्यर्थः। स्मृतिः पुनः ‘धृतिः' धारणोच्यते, धारणाभेदत्वेनावयवे समुदायोपनारादिति । 'पति' गति-प्रज्ञाशन्दाभ्यां सर्वमेव मति- ज्ञानमुच्यते । “ईहा सेस" त्ति 'शेपाभिधानानि तु' ईहा-विमर्ष-गार्गणा-गोषणा-संज्ञालक्षणानि सर्वाण्यपि हा ईहान्त वीनि द्रष्टव्यानीत्यर्थः । एवं विशेषतः कथञ्चिद् भेदसद्भावेऽपि सामान्यतः सर्वमिदगाभिनिवोधिकज्ञानमेव जानीहि । इदमुक्तं भवति- प्रदर्शितेहा-ऽपोहादयोऽवग्रहादयोऽपि च सर्वेऽपि मतिज्ञानस्य पर्यायाः, अवगृहीतस्येहादिसम्भवात् । ततोऽवग्रहशब्दोऽवग्रहण- 20 लक्षणेनार्थेन सर्वमाभिनिवोधिकं सङ्ग्रहाति, ईहाशब्दस्तु चेष्टालक्षणेन, अपायस्त्ववगमनलक्षणेन, धारणा तु धरणलक्षणेन सर्व संमृ हाति । समर्थितं मतिज्ञानम् ॥ श्रुतज्ञानमुच्यते- [पृष्ठ ५८] पं. २८. अक्षरश्रुतमित्यादि, अक्षरादीनि सप्त द्वाराणि अनक्षरादिप्रतिपक्षसहितानि चतुर्दश भवन्तीति चतुर्दशभेदं श्रुतं भवति । [पृष्ठ ५९] पं. ९. तत्र सक्षेपतः स्वरूपमिदम् 'अक्षरश्रुतं त्रिविधम्-संज्ञा-व्यञ्जन-लब्धिभेदात् । लेख्यलिपिरूपम् , यथा घटाकृतिः ठकार इत्यादि । लिपिभेदतोऽनेकस्वरूपमकाराद्यक्षरं संज्ञाक्षरमुच्यते । पं. १६. भाष्यमाणः शब्दो व्यञ्जनाक्षरम् , तदेतद् द्वितयमज्ञानात्मकमपि श्रुतकारणत्वादुपचारेण श्रुतमुच्यते । तु-शब्दश्रवण-रूपदर्शनादेरर्थप्रत्यायनगर्भाऽक्षरोपलब्धिः, यस्तदावरणक्षयोपशमो यः श्रुतज्ञानोपयोगश्च एतौ द्वावपि लब्ध्यक्षरम् । 30 ततश्च श्रोत्रेन्द्रियलब्ध्यक्षरवत् शेपेन्द्रियविपयाऽक्षरोपलब्धिरपि श्रुतम्, घट-कर्पूर-शर्करा-हंस-रूततूलीरूपे विपयोपलम्भे एतद्वाच- काक्षरोपलम्भसद्भावात् । मनः प्रति च यद् दृष्टं स्वप्ने रूपादि तदक्षरोपलब्धिाह्या । . 25 पं. १२. संज्ञाक्षरं नाम- पं. २४. लब्ध्यक्षरं .
पं. १०. ? न चेखा. त्रिया। श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिमूत्रवृत्तः टिप्पनकम् । १५३ [ पृष्ठ ६०] पं. ८. अनक्षरश्रुतं श्वेडित-शिरःकम्पादिनिमित्तमायति वारयति वेत्यादिरूपमभिप्रायादिपरिज्ञानम् । "ऊससियं" गाहायां शेटितादि चानक्षरश्रुतमिति आदिग्रहणात् प्रकृत-सीकाराविग्रहः । पं. १४. ध्वनिमात्रत्वादिति शब्दमात्रत्वात् , शब्दश्च भावश्रुतत्य कारणमेव, यच्च कारणं तद् द्रव्यमेव भवति । भवति च तथाविधोच्छ्वसित-निःश्वसितादि- श्रवणे 'सशोकोऽयम्' इत्यादि ज्ञानम् । एवं चेष्टाभिसन्धिर्वकनिष्ट्यूत-काशित-शुतादिश्रवणेऽप्यात्मज्ञापनादि अन्यं प्रति ज्ञानं वाच्यम् । पं. १५. सर्व एव व्यापार इति उच्छ्वसिताविकः । तद्भावेन ध्रुतविज्ञानोपयुक्तजन्तुभावेन । आहेत्यादि. यद्येवं गमना-ऽऽगमन-चलन-स्पन्दन-शिरोधूनन-करचालनादिकाऽपि चेष्टा व्यापार एवेन्येपाऽपि श्रुतं किं न भवति ? हन्त प्राप्नो. त्यनेन न्यायेन साऽपि श्रुतम्, किन्तु रूढचेति शास्त्रज्ञलोकप्रसिद्धा नहिरियम्-यदुतो छ्वसितायेव श्रुतं रूहम् , न श्रूयत इति श्रुतमित्यन्चर्यवशात् , चेष्टा तु दृष्ट्यत्वात् कदापि न श्रूयन इति कथमसौ श्रुतं स्यात् ।। पं. १७. अनुस्वारेत्यादि. नकारादिवर्णा इवेति भावः । पं. १९. समनस्कत्य मनःसहायनिन्द्रयैर्जनितं सामिलापमर्थसंवेदनं यत् तत् संनिश्रुतम् । 1 अमनस्कत्येन्द्रियजं मनोरहितं यत् संवेदनं चन्नादिचेष्टालिङ्गितं तद् असंनिश्रुतम् । से किं तमित्यादि. संजिनः सम्बन्धि श्रुतं संज्ञिश्रुतम् । संज्ञी चोच्यते बस्य संज्ञाऽस्ति । सा च त्रिविधा दीर्घकालिकोपदेशादिभेदान् । निविषसंज्ञायोगात् संजितं पं. २७. तत्र प्रभूतमतीतमर्थ स्मरनि 'कथमेतत कर्तव्यम् । इति भावि व विमृशति 'इदमकार्पन . इदं करिये इत्यादिचिन्तामाश्रित्य यस्यां दीवः कालो भवति सा दीविकालिकी । [ पृष्ट ६१] पं. ८. प्रयुक्ताः सन्तः प्रतिहता उपाया यन्य न प्रयुक्तमनिनोपायलम्येति विन्दः । पं. 5. अयं ने गादि. अयं दीर्घकालिकसंज्ञी विज्ञेयो यो मतिज्ञानविषय का मनोजानाबाना का मन बनिस बन्नः मनोयोग्यानन्तान मा मनोवगणाभ्यो गृहीत्या मनरन्वेन परिणमय मन्यने चिन्ननीयं नि म नि नुको को देवो नारक लि. सोऽयं कालिक्युपदेशेन संक्षिश्रुतव्यपदेश ति बावशेषः । प्रवृत्ति-निवृत्ती रतः, न त्वनीता-ऽनागतदाकालाबनी बनना नोगामा:: सशिन्त्य हेयोपादेयेपु निनि-प्रने, देवमादिभिः ।.... पं. २९. आह--संज्ञादशकयोगान पृथिव्यायाम न्यादित्यादिना, उपयोगमात्रगीसंना. व्यंग वियते, न नया संज्ञा वक्तुं युज्यत इति भाव: पाया, भूयर पपीह, नाधिवियते. नागयाधिय ग, .. चाविशिटया संशया संकी गरिमामय, . संजीयते यार- पं. २०. किन्न । संजीवपदिश्यते । संसार संसा-नागीदिशामा -...- मा नन्दिर्णिकला--- r- -- - १. TRE (गा पागार्म... मकर -:-:.:- ।
१५६ लभ्यत इति कम गत सामान :: :: ::::::: एकानेऽपि विसामा गगा? :: :: :: ::::: :: :: :: :: ::....: :::: श्रुतज्ञानमियनयोंर्भदः । एतयो मन : : : । :: कारण-कलविभागो दीन पगासागको :: :: :: !! जुगवं पि समुपन सम्म अहिगां नियो । .:: : मा २॥ अतो युक्त मुक्तं सम्यक्त्यपरिगृहीतं सम्यक नाम निर्मित मा २ पं. १५. अधिकारवशादिति प्रतिपादियः । पं. १६. पानि मागमा श्रुतविचारोऽभिधीयते-ज्यवन्हित्तिनयस्यानित्यवादिनः पयांगारिलायो सादिसण , TET, नीय नारकादिगतिपर्यायवत् । तथाहि-श्रुतज्ञानिनां निरन्तरगपगपरे गायोगाः परमो मो नन रोगो गत मिति 10 श्रुतमस्ति, श्रुतकार्यगृतस्य जीवादितत्वावबोधरय शुनज्ञानरहित यानि आसनामिनि, यानि नोपयोगः शादिः रापर्य- वसित एवेति । पं. १९. अव्यवन्छित्तिनयस्य नियवादिनो गारितारणागिरोणे नादि गर्गतन, निगलात्, पञ्चास्तिकायवत् । तथाहि-यैीवद्रव्यैः श्रुतमिदगीतम् गागधीयन्ते यानि नागेगा तानि ताजमहाऽणि गालिन्ते इति तेपामनादिताऽपर्यन्तता च । ततः श्रुतस्यापि जीवन्यपर्यायभूतस्य तदेगतिरकालिगणतना, नाति रावशाऽरात गाणुरुपाते, सिकतास्वपि तैलायुत्पत्तिप्रसङ्गात् । नापि सतो निरन्वयनाशेनागन्तोछेदः, राशन्गतापतेः, तस्गार श्रुताभारल्याणां सर्वदैव 15 सत्त्वात् तदन्यतिरेकिणः श्रुतस्यापि द्रव्यरूपतैवेति स्थितम् । [ पृष्ठ ६६] पं. ३. अथवा नयविचारमुत्सृज्य द्रव्यादिचतुष्टयमाश्रित्याधिकृतमेवार्थ सागादिस्वरूपं चिन्तयति-तत्र द्रव्य-क्षेत्र-काल- भावैः श्रुतं सादिकमनादिकं सान्तमनन्तं च भवति । इह च द्रव्यतः श्रुतमेकं बहुनि च पुरुपद्रव्याण्याश्रित्य चिन्तनीयम् । तत्रैकपुरुपद्रव्यमङ्गीकृत्य सादि सनिधनं च श्रुतं भावयति कथमित्यादिना यो येन भावेन पूर्व नासीद् इदानीं च जातः स तेन 20 भावेन तत्प्रथमो भवति, सम्यक्त्ववतः श्रुतस्य पाठस्तत्प्रथम इति सादिः, सम्यक्त्वात् च्युतस्य पुनर्मिध्यात्वप्राप्ती सपर्यवसितत्वम् , सति वा सम्यक्त्वे श्रुतलाभात् सादित्वम् , कारणान्तराद्वा [तत्प्रतिपाते सान्तत्वम् । पं. ४. तान्येवाह-प्रमादेति, इहभवेऽपि प्रमादात् श्रुतस्य नाशो भवति, अपरस्य ग्लानावस्थायां नश्यति, कस्यचित् सुरलोकाख्यभवान्तरगमनेन नश्यति । किल कश्चि- चतुर्दशपूर्वधरः साधुर्मृत्वा देवलोकं गतः, तत्र देवत्वे तत् पूर्वाधीतं श्रुतं न स्मरति सर्वमपि, देशेन त्वेकादशाङ्गलक्षणेन कश्चित् स्मरत्यपि इति सम्पूर्णं भवान्तरगमनान्नश्यति । केवलोत्पत्तौ च कस्यचिदिहभवेऽपि श्रुतं नश्यति, "नटुम्मि तु छाउमथिए नाणे" 25 [ आव० नि० गा० ५३९ ] इति वचनात् , ततो लाभकाले तस्य सादित्वम् , प्रतिपाते तु सान्तत्वम् । पं. ५. एक- जीवद्रव्यापेक्षया चिन्तितं सादि-सपर्यवसितत्वम् । नानाजीवद्रव्यापेक्षया तु तदेव चिन्तयति-बहूनित्यादि, द्रव्यविषये नानापुरुषान् नारक-तिर्यङ्-मनुष्य-देवगतान् नानासम्यग्दृष्टिजीवानाश्रित्य सम्यक्श्रुतं सततं वर्त्तते, अभूद् भवति भविष्यति च, न तु कदाचिद् व्यवच्छिद्यते, ततस्तानाश्रित्येदमनाद्यपर्यवसितं भवति । पं. ६. अथ क्षेत्रत एकद्रव्यं प्रतीत्य प्रथमभङ्गं निरूपयति-क्षेत्रत इति, क्षेत्रे चिन्त्यमाने भरतैरावतक्षेत्रेषु प्रथमतीर्थकरकाले सुषमदुःपमारूपे तद् भवतीति सादित्वम् । चरमतीर्थकृत्तीर्थान्ते त्ववश्यं 30 व्यवच्छियत इति सपर्यवसितत्वम् । पञ्च महाविदेहक्षेत्राणि प्रतीत्य श्रुतज्ञानं सततं सर्वदैव वर्त्ततेऽतोऽनाद्यपर्यवसितम् । सामान्येन हि महाविदेहेपूसर्पिण्यवसर्पिण्यभावरूपनिजकालविशिष्टेषु द्वादशाङ्गश्रुतं कदापि न व्यवच्छियते, तीर्थकर-गणधरादीनां तेषु सर्वदैव . . १ द्रव्य जेटि०॥
पं. १२. भावात् । पं. ८. काले वधिक्रियमाणे उत्सर्पिग्यवसर्पियो समाश्रित्य भरतैरावतेषु योरपि समयोस्तृतीयारके प्रथम भावात् सादिन्वन् , उसर्पिण्यां चतुर्थस्याही नवसर्पिण्यां तु पञ्चमल्यान्तेऽवस्यं व्यवच्छेदात् सपर्यवसितत्वन् । कालचक्रगाथात्रयोविंशतिसंख्याः सुगमाः । पं. १८. नवरम्-डिताङ्गेषु सङ्गीतं भवति, तत्र प्रेक्षार्थ गीतवाचं सङ्गीत- मुच्यते । त्रुटितानि बाहुरक्षकादीन्याभरणानि च । पं. २०. अणइन्नेमु व नि अनान्येषु । पं. २१. अनेन य त्ति दशातिरिक्तेषु । भवियपुणभवरहिय त्ति युगलयार्मिकत्वमनुभृय भूत्वा भूयोऽप्यनन्तरमावेन युगलधार्मिका न भवन्ति, किन्तु देवत्वेनोत्पयन्ते, असंकिष्टपरिणामयोगात् । [ पृष्ठ ६७] पं. ७. भावो णमित्यादि, भावे पुनर्विचार्यमाणे प्रज्ञापकं गुनं शुनप्रजापनीयांधायांतासाथ सादिसपर्यवसितं स्यात् । पं. १२. कथम् ? प्रज्ञापकसम्बन्ध्युपयोग १ स्वर २ प्रयन्न ३ आसनविशेषतः ४, उपयोगः-भान्तरः शुनपरिणामः, स्वर:-ध्वनिः, प्रयत्नः--ताल्चादित्र्यापारविषयो यन्नः, आसनविशेषश्न-न्धानविशेषः । ननश्च 'प्रताप गुगै व्याख्यानादि कुर्वति सत्येते भावा भवन्ति । एते च प्रतिक्षामन्यथाभवनतोऽनित्यचात सादि-पर्यवयिताः । ननवतानात्रिय कुकुरनन्यवान धुनमपि सादि-सपर्यवसितं भवति । पं. १४. एतदभिधायिनी [उपयोगसर०] गाय सुगमैत्र । पं. १६. अपवेगा- दिना प्रज्ञापनीयार्थगतान भावानाह । तत्र अश्यादीनां गयातिप्रतिपादनात सादि-सानवम् । न गतिः-अबादीनां गमन- परिणामः, स्थितिः-तेषामेवावस्थितिपरिणामः. वर्ग:-का-गादिः, आदिशवाद भद्र-सात-पादन गन्ध-स्पा-मानादिपरिचयः । नवरं भेदः-अण्वादीनामेवान्यसंयुक्तानां विघटनन . महावस्तु-अन्य सह संयोगः. दादा-मत्र-मयुगतिः. सादयः प्रतीनाः ।। एते गतिस्थिन्यादयो भावाः पयांया धमाः प्रज्ञापनीया परमायादिषु मति अनिवारी गादिसा रिस्ताः नेम प्राद्याः । ग्राहकं च माहानिबन्धनं भवनि, मा बन्न किल, नने का न्यो भने माना कि सादि- सपर्यवसिनम् । मायापशमिकभाव-भावशूनमाबागवानाअनन्त नाम ! णायां सादि-सपर्यवसानपदव्योत्था चन्मी मम्मति-पादिमन हितीयग्नु प्ररूपणामात्रम , असम्भवान । विवयामान:: मनमामानिम : अनागतासापेक्षयाउपर्यवसिनयम । र, किल, मामा शुनमात्रम् , भव्यत्ययत , अनादिकालादार या भावाला न्यबदा नियतं अनाद्यपयनग , अन्याय:: भव्या-उभच्या प्रती यामिनी । म भजार गन्या भव्यहारण गनीय चतुर्थना भागा-भन्यो प्रताय । लागत नार... ' यदि यातना गेय किसे मान , Rite: प्रकाया पगांत । :::: .. . . . -- . . .. M . - ' १५८ m का ... . - न पुनः सर्वागना पर्यायान- .' यदेवाऽसौ श्रुतपर्यायेण विनों की .. :: :: :: ::: नन्तैः पयांग विधियोऽसौ माया :: :: :: ::::::: तस्यायमेवैकः पर्यायो गोत तदा तकिया का मामा, HE IS : ६ पर्यायेणोत्पादार गोधानन्तपमान परमामा :: :: :: : ! .in ज्ञानात्मकं सम्परः, अज्ञानात्मकं या मानिसमा | ::":"; font : ! | सपर्यवसितं मन्यानाम् , केवलपती केवलोपनी र परसाना । भाकिया | TH : मा । [१६८] पं. ३. पर्यायाग्राक्षरं निप्पयते यादि, नापी, मेकाभिमान नगागि 10 धर्मास्तिकायादिपञ्चद्रव्यपयोया अध्यक्षस्य पायमानतया बायाः, अन पो गर्नयागिपरिमाणमिति गाना अनि । ययेवं धर्माऽधर्मा-ऽऽकाश-पुद्गलास्तिकाय-काललगासनः गगराभिषमा जगमान मा किमिति गोगा - स्तोकत्वाचेति, सूत्रे धर्मास्तिकायादीनां पत्रव्यागा पांगा नानिहितारमा जान आकागाने या सोनानागारिनिरत इति कृत्वा, किन्तु य एव तेभ्यो अतिबहवोऽनन्तगुणास्न एव रावांकापर्यायाः साकाः, अर्गार परिकामाविषयोगा आणि स्वीकृता एव द्रष्टव्याः । एवं च सर्वाकाशप्रदेशानां गावन्तः सर्वेऽपि पांगाः रानालगागा नागरगाशरण पर्यागमानं 15 भवति । अथ किमिति सर्वाकाशप्रदेशाग्रं सवांकाशप्रदेशेरनन्तगुणमुक्तम् ! उगते-गत परिगनाकाशादेशे जगन्ता गगुरुला- पर्यायाः सन्ति अत इदमुक्तम् । अयमर्थः-इह निश्चयनयमतेन बादरं वस्तु रागपि गुरुलगु, राम लगुरुलगु, तत्रागुरुलघुवस्तु- सम्बन्धिनः पर्याया अप्यगुरुलघवः समयेऽभिधीयन्ते, आकाशप्रदेशाथागुरुलावोजस्तापाया गयगुरुलावो भण्यन्ते, ते नाऽऽ- काशप्रदेशेषु प्रत्येकमनन्ताः सन्ति अतस्तैरनन्तगुणमुक्तम् । पं. ९. अथेदं सर्वदलग-पायपरिमाणादार कीरशम् । इत्याह- इह चेत्यादि, न क्षरति-न चलत्यनुपयोगेऽपि न प्रच्यवत इत्यक्षरम् , स च चेतनाभावः, जीवस्य ज्ञानपरिणाम इत्यर्थः १ । तज्ज्ञेय- 20 मिति तस्य-ज्ञानस्य ज्ञेयं-घट-व्योमादि तज्ज्ञेयम् , सामिलापज्ञानविषयभूतधटायभिलाप्यार्थरूपं ज्ञेयमप्यारमुच्यते । कथम् ? इति चेत्, यतो घट-व्योमाघभिलप्यं द्रव्यार्थतया न क्षरति-स्वरूपान्न चलति नित्यत्यादित्यक्षरम् २ । तथा अकारादीन् अर्थान् अभि- धेयान् क्षरति-संशब्दयतीति निरुक्तविधिना अर्थ-कारलोपादक्षरम् , 'अकारादि' वर्णरूपम् , वर्णश्च वर्ण्यते-प्रकाश्यतेऽर्थोऽनेनाकार- ककारादिनेति वर्णः अकारादिरेव ३ । त्रिविधेऽप्यक्षरे गृह्यमाणेऽदोपोऽत्र । नन्वेतत् सर्वपर्यायपरिमाणाक्षरं किं सर्वमपि ज्ञानावरण- कर्मणा आवियते । न वा ? इत्याह-अस्य चेत्यादि, अस्य च सामान्येनैव सर्वपर्यायपरिमाणाक्षरस्यानन्तभागः 'नित्योद्घाटितः' 25 सर्वदैवानावृत एवाऽऽस्ते, केषाम् ? सर्वजीवानामपि, चकारात् केवलिवर्जानामिति दृश्यम् , तदक्षरस्य सर्वात्मनोद्घाटात् । स च जधन्य-मध्यमोत्कृष्टभेदादनेकविधः । पं. १०. तत्र सर्वजघन्यस्याक्षरानन्तभागस्य स्वरूपमाह-तत्रेयादि, सर्वजघन्यो- ऽक्षरानन्तभाग आत्मनो जीवत्वनिवन्धनं चैतन्यमानं उत्कृष्टावरणेऽपि सति जीवस्य कदाचिदपि नाऽऽवियते, जीवस्वाभाव्यात्, अन्यथाऽजीवत्वप्रसङ्गात् । यथा सुष्ठ्वपि जलदच्छन्नार्क-चन्द्रप्रकाशो दिन-रात्रिविभागनिबन्धनं किञ्चित्प्रभामात्रकारि मेघेन नाऽऽत्रियते, एवं जीवस्यापि चैतन्यमानं कदापि नाऽऽत्रियते । केपां पुनरसौ सर्वजघन्यः प्राप्यते ? उच्यते स्यानर्द्धिमहानिद्रोदय- 30 सहितोत्कृष्टज्ञानावरणोदयादसौ सर्वजघन्योऽक्षरानन्तभागः पृथिव्यायेकेन्द्रियाणां प्राप्यते, ततः क्रमविशुद्भया द्वीन्द्रियादीनामसौ क्रमेण क्रमेण वर्धते । अथोत्कृष्टो मध्यमश्चाक्षरानन्तभागः केपां भवति ? अत्रोच्यते-उत्कृष्टोऽसावुत्कृष्टश्रुतविदः स्यात् , सम्पूर्णश्रुत- ज्ञानस्य द्वादशाङ्गविद इति भावः । नन्वस्य कथमक्षरानन्तभागः ? यावता श्रुतज्ञानाक्षरं सम्पूर्णमप्यस्य प्राप्यत एव ? सत्यम् । किन्तु संललितसामान्यश्रुतकेवलाक्षरापेक्षयैव समस्तश्रुतविदोऽक्षरानन्तभागो विवक्षितः, सामान्ये चाक्षरे विवक्षिते केवलाक्षरापेक्षया ?
- श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १५९ सम्पूर्णश्रुतविदोऽक्षरस्यानन्तभागवर्त्तित्वं युज्यत एव, केवलज्ञानस्वपर्यायेभ्यः श्रुतज्ञानस्वपर्यायाणामनन्तभागवर्तित्वात् , श्रुतज्ञानस्य परोक्षविषयत्वेनास्पष्टत्वाच । यच्च समुदितस्व-परपर्यायापेक्षया श्रुत-केवलाक्षरयोस्तुल्यत्वं तदिह न विवक्षितम् । विमध्यमाक्षरानन्त- भागश्चोत्कृष्टश्रुतज्ञानविदः सकाशादवशेषाणां पृथिव्यायेकेन्द्रिय-सम्पूर्णश्रुतज्ञानिनोर्मध्ये वर्तमानानामनन्तभागादिषट्स्थानपतितानां प्रायेणासौ भवति । प्रायोग्रहणाद् विवक्षितादेकस्मादुत्कृष्टश्रुतज्ञानिनोऽवशेषाणामपि केपाञ्चिदुत्कृष्टश्रुतज्ञानवतां तत्तुल्य एवाक्षरा- नन्तभागो भवति, उत्कृष्ट इत्यर्थः, न तु विमध्यमः । 'त्रिविधेऽप्यक्षरे गृह्यमाणेऽविरोधः' इत्युक्तम् । 'अक्षरस्य चानन्तभागः सर्व- जघन्यश्चैतन्यमात्रम् , स च पृथिव्यायेकेन्द्रियादीनामसंज्ञि-संज्ञिभेदानां सर्वजीवानामपि च सर्वदैवानावृत एवाऽऽस्ते' इति चोक्तम् । 'अपर्यवसितश्रुताधिकारादकाराचेव चाक्षरं न्यायानुपाति' इति चोक्तम् । अत्राऽऽचष्टे-पुरुप-स्त्री-नपुंसक-घट-पटादिवर्णविज्ञानरूपो- ऽक्षरलाभः 'संजिना' समनस्कीवानां भवतु, एतत् श्रद्दध्महे, 'असंजिनां तु' अमनस्कानां वर्गविज्ञानरूपोऽसौ न युज्यते, अक्षरलाभस्य परोपदेशजत्वात् , मनोविकलानां तु तदसम्भवात् ; न च वाच्यम् ‘मा भवत्वसौ तेषाम्' इति, यतोऽसावेकेन्द्रियाद्यसंज्ञिनामपि वर्णविज्ञानाक्षरलाभोऽभिहितः, श्रुताज्ञानाक्षरस्य तेपामपि श्रुते भणनात् ; तदेतत् कथमुपपद्यते ? । अत्रोच्यते-यथा 'चैतन्य जीवत्व- मकृत्रिममाहारादिसंज्ञाद्वारेणासंज्ञिनामवगम्यते तथा लब्ध्यक्षरात्मकमूहाज्ञानमपि तेपामवगन्तव्यम् , स्तोकत्वेनास्पष्टत्वात् स्थूलदर्शि- भिस्तदृहाज्ञानं नोपलक्ष्यते, पृथिव्याघेकेन्द्रियाणां जीवत्वमिव । यदपि परोपदेशजत्वमक्षरस्योच्यते तदपि संज्ञा-व्यञ्जनाक्षरयोरवसेयम् । लब्ध्यक्षरं तु क्षयोपशमेन्द्रियादिनिमित्तमसंजिनां न विरुष्यते, तदेव च श्रुतज्ञानाधिकारे मुख्यतः प्रस्तुतम् , न तु संज्ञाव्यञ्जनाक्षरे । किञ्च गौरपि शबला-बहुलादिशब्देनाऽऽकारिता सती स्वनाम जानीते, प्रवृत्ति-निवृत्त्यादि च कुर्वती दृश्यते । न चैपां गवादीनां तथाविधः परोपदेशः समस्ति । अथ चाऽस्ति लन्थ्यक्षरम् , नरादिविज्ञानसद्भावात् , पुलीन्द्र-बाल-गोपालादीनामनक्षरागामपि वा यथा तदस्ति एवमसंजिनामपि किमपि तदेष्टव्यम् । तदेवं साधितमेकेन्द्रियादीनामपि यच्च यावञ्च लब्ध्यक्षरम् , इन्द्रिय-मनोनिमित्तं श्रुतग्रन्थानुसारि विज्ञानम् , श्रुतज्ञानोपयोग इत्यर्थः, यश्च तदावरणकर्मक्षयोपशमः, एतौ द्वावपि लब्ध्यक्षरमिति भावार्थः । पं. १६. अत्राहेत्यादि, 'अत्र' अस्मिन् प्रकृते नन्दिसूत्रे 'अविशेषितं' सामान्येनैव 'अक्षरं' ज्ञानमुक्तम् , अविशेषाभिधाने च केवलज्ञानस्य महत्वात् तदेवात्राक्षरं गम्यते, इह तु श्रुतज्ञानविचाराधिकारात् श्रुताक्षरमकाराधेवाक्षरशब्दवाच्यतया प्रकृतम् , तद् अकारादिश्रुताक्षरं कथं केवलपर्यायमानतुल्यं भवेत् ? न कथञ्चिदित्यर्थः; अयमभिप्राय:-केवलस्य सर्वद्रव्यपर्यायवेत्तृत्वाद् भवतु 2 सर्वद्रव्यपर्यायमानता, श्रुतस्य तदैनन्तभागविषयत्वात् कथं तत्पर्यायमानतुल्यता ? इति । अत्रोच्यते-नन्चत्रापि "भक्खर सन्नी सम्म साईयं खलु" इत्यादिप्रक्रमेऽपर्यवसितश्रुते विचार्यमाणे "सञ्चागासपएस/गं" [ सूत्र ७६ ] इत्यादिसूत्रस्य पाठात् श्रुताधिकाराद- क्षरमकारायेवात्र गम्यते, न तु केवलाक्षरम् । पं. १८. अथ ब्रूपे–“सञ्चजीवाणं पि य ण"मित्यादिद्वितीयसूत्रात केवलाक्षर प्रथमसूत्रे गम्यते, न तु श्रुताक्षरम् , श्रुताक्षरपक्षे हि सकलद्वादशाङ्गविदां सन्पूर्णस्यापि श्रुताक्षरस्य उद्घाटसद्भायात् 'सर्वजीवा- श्रितोऽक्षरस्यानन्तभागो नित्योद्घाटः' इति नोपपयते । पं. २०. अत्रार्थे यद्येवमित्यादिना सूरि—ते-हन्त ! एवं सति 2. केवलाक्षरमपि तत्र नोपपद्यते, केवलिनां सम्पूर्णस्यापि केवलाक्षरस्य सद्भावात् 'सर्वजीवानामक्षरस्यानन्तभागो नियोदघाटः' इत्य- स्यार्थस्यानुपपत्तिरेव, न अतस्तदिति, तत् सूत्रोक्तं केवलाक्षरमपि नोपपयत इयर्थः । अथ मनुपे-तत्राविशेषेण सर्वजीवग्रहणे सत्यपि प्रकरणाद् अपिशब्दाहा केवलिनो विहायान्येषामेवाक्षरस्यानन्तभागो नित्योदघाट इनि केवलाक्षरग्रहणेऽविरोधः, हन्त ! तदेतच्छुताक्षरग्रहणेऽपि समानम् , यतस्तत्राविशेषेण सर्वजीवग्रहणे सत्यपि प्रकरणाद अपिदान्दाहा ममतद्वादशाविदो बिहायान्ये- पामेवारमदादीनामक्षरस्यानन्तभागो नित्योद्घाट इतीहापि शक्यत एव बत्तुन् । यामात् प्राक्तनामुत्रे कंबल्लाभरम , द्वितीये चाडका- 30 राधक्षरमपि च भवतु. न कश्चिद् दापः । पं. २३. न च श्रुताक्षरस्य सर्वव्यपर्यायपरिमागता विरुथ्यते इति कायम, स्व-परपर्यायभेदाभयत्यापि तदुपपत्तेः । उभयं श्रुताक्षरं कैवलाक्ष वेयर्थः । तथाऽप्य यादि. 'नन् पुनः अकागवाककमय- १ सर्वद्रव्य जेटि० ॥ .
+1 .. + वान्यम् । . ते , 1 . २७. नियमन मिकारादीनामपि भावनीयम् । इदमुक्तं भवति-अकारेकाराद्यक्षरे घटादिपर्याया अस्तित्वेन न सम्बदा इति तेषां परपर्यायव्यपदेशः, इत्यतस्तेपामपि परपर्यायाणां व्यावृत्तरूपतया पारमार्थिक स्व-परपर्यायत्वं न विरुध्यते । विविध हि वस्तुनः स्वरूपम्-अस्तित्वं नास्तित्वं च, ततो ये यत्रास्तित्वेन प्रतिबद्धास्ते तस्य वस्तुनः स्वपर्याया उज्यन्ते, ये तु यत्र नास्तित्वेन सम्बद्धास्ते तस्य पर- पर्यायाः प्रतिपाद्यन्ते, अतोऽक्षरे घटादिपर्याया अस्तित्वेन न सम्बद्धा इति परपर्याया उज्यन्ते, न पुनः सर्वथा ते तत्र न सम्बद्धाः, पं. १. आइत्यादि, ये घटादीनां पर्यायास्ते कथं 'तस्येति अक्षरस्य सत्का भवन्ति ? तेपामक्षरेऽसम्बद्धत्वादिति पराशयः। विशेषणोपयोगात् स्वपर्यायाणां विशेषणेन-विशेषव्यवस्थापकत्वेन परपर्यायाणामप्युपयोगात्, परपर्याया अप्यक्षरस्योपयुज्यन्त १६० नन्तपर्यायगाम: सर्वेऽपि नाम मिलेगा रागिने कामना सर्वोऽपि सर्वत्र समिति 5 सर्वाका प्रदेशसहिताः सनि::.. शतप्रमाणाः स्वपर्यायाः. सामान::::::: पं. २५. आःहै. ऽनुदात्तेत्यादिना । पं. २६. एनं काल :: .....: :. : :::: :. ! :: :: :: :: :: :: :11 Pief . 'केवलः' अन्यवर्णनासंयुसोनीमा तोक 10 सम्बद्वत्वात् , ते नानन्ताः, नाम लि.: :: : । ... !:15:11 [ivriti Ki ! कायगोचरमन्योन्यविलक्षणमनन्तम् । नाति र 1; in th.jt is भिन्नरूपाणि द्रव्याणि प्राप्यन्ते. भिन्नाभिमान ने TI : : .....: April ID : Periya इति । प्रत्येकं चामेकाभिधानान्येतानि, ना--" मा iit : गा। तथा ट्यगुको द्विप्रदेशिको विभेदो जाया गालि । 15 भिन्नरूपं भिन्नाभिधानं च तेन यपरिमाणमणिय नगरिमा AT-If I Milfarit gift it! | नई येनैव स्वरूपेण घटादिशब्देऽकारादिवर्णाः संयुतारो माग - HARI, Hदागिन्गार घटतत्स्वरूपचदिति, अतोऽभिधेयाऽऽनत्यादगिमानानन्याग गनम HI.: मिलाणे गाना । तिकेत्यादि, शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः साहेतिक एव, पशुबुनो न:११, न गुनस्तास्थित शब्दस्य कश्चिनिजाभिधेयोऽर्थः समस्ति, एवं कुटादिश्वपीनि, गाना गा निकशब्दार्थवादिगना । दिन-दाग , पटः कुट 20 कुम्भ इत्यादयो हि शब्दा भिन्न प्रवृत्तिनिमित्ताः भिन्नार्थगोचराः । नगाला, निरालानों पटः; तथा "फुट कौटिल्ये” कुटनात् कुटः, कौटिल्ययोगात कुटः, “ग उम्भ पूणे, को उन्नत बनाना कुम्भः निगातनादिति । एवं निजाभिधेयमर्थ प्रतिपादयतां शब्दानां वाच्य-याचकभावः शब्दार्ययोत सम्बन लगात्रम् । शेपास्त्यिादि, शेषास्त्विकारादिसम्बन्धिनो घटादिगताश्चास्य परपर्यायाः, तेषां तत्राभावात तेभ्यो व्यावृततया नारिनयन सम्बन्धात् । .. 25 यतो घटादिपर्याया अस्तित्वेन घटादिप्येव सम्बद्धा इत्यक्षरस्य ते परपर्यायाः, केबलगमरव्यायरोन रुपण तेऽपि सम्बद्धा एव नास्तित्वेन तत्रापि सम्बन्धात् । [ पृष्ठ ६९] अत्रोच्यते-देवदत्तस्वधनवदक्षरेऽसम्बद्धा अपि घटादिपर्याया अक्षरस्य पर्याया भवन्ति । कुतः ? इत्याह- पं. २९. साडे , . 30 ? पं. २. स्वपर्याय- श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १६१ इत्यर्थः । ८ HOM -- म पं. ४. तानन्तरेणेत्यादि, नहि परपर्यायेप्वसत्सु स्वपर्यायाः केचिद् भेदेन सिध्यन्ति, स्व-परशब्दयोरापेक्षिक- त्वात् ; अन्यथा तदक्षरं घटादिभ्यो व्यावृत्तं न सिध्येत् । प्रयोगश्चापरोऽपि-घटादिपर्याया अप्यक्षरपर्यायाः, तत्र तेपामुपयुज्यमान- त्वात् । इह यद् यस्योपयुज्यते तद् भेदवर्त्यपि तस्येति व्यपदिश्यते, यथा देवदत्तादेः स्वंधनम् , उपयुज्यन्ते च स्वपर्यायविशेषण- भावेन घटादिपर्याया अप्यक्षरस्य, अतस्ते तस्यापि भवन्ति । एवमक्षरपर्याया अपि घटादेर्वाच्याः । तथा वस्तुस्थित्यापि चेत्यादि- ग्रन्थो भावितार्थ एव । पं. ८. “जे एगं जाणइ" इत्यादि, एतदुक्तं भवति-'एक' किमपि वस्तु सर्वैः स्व-परपर्यायैर्युक्तं जानन्-अवबुध्यमानः 'सर्व' लोका- लोकगतं वस्तु सर्वैः स्व-परपर्यायैर्युक्तं जानाति, सर्ववस्तुपरिज्ञाननान्तरीयकत्वादेकवस्तुज्ञानस्य । यश्च 'सर्व' सर्वपर्यायोपेतं वस्तु जानाति स एकमपि सर्वपर्यायोपेतं जानात्येव, एकपरिज्ञानाविनाभावित्वात् सर्वपरिज्ञानस्येति । अतः सर्वं सर्वपर्यायोपेंतं वस्तु अजानानो नाऽकाररूपमक्षरं 'सर्वथा' सर्वप्रकारैः सर्वपर्यायोपेतं जानाति । तस्माच्छेपसमस्तवस्तुपर्यायैः परिज्ञातैरेव एकमक्षरं ज्ञायते, नान्यथेति भावः । अक्षरविचारस्येह प्रक्रान्तत्वादेकैकमक्षरं सर्वव्यपर्यायराशिमानमुच्यते, अन्यथाऽ- न्येपामपि परमाणु-दूचगुक-घटादिद्रयाणामिदमेव पर्यायमानं द्रष्टव्यम् , एतद् वक्तुमाह पं. ११. ततश्चास्मात् सूत्रादि- त्यादि। पं. १५. असौ अनन्तभागो नित्योद्घाटोऽकारादिश्रुताक्षरस्य तज्जन्यज्ञानस्य वा द्रष्टव्यः, न शेषज्ञानानामित्यर्थः । पं. १८. भिन्नेऽर्थजाते यत् सदृशाक्षरालापकं तद् गमिकम् । असदृशं त्वगमिकम् । अन्यच गाथा-श्लोक-वेष्टकाद्यसदृश- पाठात्मकत्वादगमिकम् । पं. २४. अत्राहेत्यादि, अङ्गा-ऽनङ्गप्रविष्टभेवयस्य प्राधान्यख्यापनार्थम् । पं.२७. गायद्गद्धं तु इति, पूर्व-पश्चिमउर:-पृष्टिरूपम् । पं. ३०. गणहरकय० गाहा, अङ्गा-ऽनङ्गप्रविष्टश्रुतयोरिदं नानात्वम् । किम् ? इत्याह- गणधराः-गौतमस्वाम्यादयः तत्कृतं श्रुतं द्वादशाङ्गरूपमङ्गप्रविष्टमुच्यते । स्थविराः-भद्रबाहुस्वाम्यादयस्तैः 'यत् कृतं' यद् दृब्धं श्रुतमावश्यकनियुक्त्यादिकं तद् 'अङ्गबाह्यम्' अनङ्गप्रविष्टमुच्यते । द्वितीयं भेदकारणमाह-निययमित्यादि, सर्व- तीर्थकरतीर्थेषु 'नियतं' निश्चयभावि यत् श्रुतं तदङ्गप्रविष्टमुच्यते, द्वादशाङ्गमित्यर्थः । यत् पुनः 'मनियतम्' अनिश्चयमावि प्रकीर्णकादिकं श्रुतं तदङ्गबाह्यं भणितम् । आह-ननु प्रथमं पूर्वाण्येवोपनिवघ्नाति गणधर इत्यागमे श्रूयते, पूर्वकरणादेव चैतानि पूर्वाण्यभिधीयन्ते, तेषु च निःशेषमपि वाङ्मयमवतरति, अतश्चतुर्दशपूर्वात्मकं द्वादशमेवाङ्गमस्तु, किं शेषाङ्गविरचनेन ? अङ्गबाह्य- श्रुतरचनेन वा ? इति, अत्रोच्यते यद्यपि दृष्टिवादे सर्वस्यापि वाङ्मयस्यावतारोऽस्ति तथापि दुर्मेधसां तदवधारणाययोग्यानां मन्दमतीनां तथा श्रावकादीनां स्त्रीणां चानुग्रहार्थ विशेषश्रुतस्य पूर्वेभ्यो विभिन्नत्यागबाह्य-शेषाङ्गरूपस्य विरचना कृतेति । खीणां दृष्टिवादे अधिकार एव नास्ति । यदुक्तम्- तुच्छा गारववहुला चलिंदिया दुबला धिईए य । एएण कारणेणं भूतावाओ य नो थीगं ॥१॥ ति [विशेषा० गा० ५५२] अशेपविशेषान्वितस्य समग्रवस्तुस्तोमस्य भूतस्य-सद्भुतस्य वाद:-भणनं यत्रासो 'भूतवादः' दृष्टिवादोऽभिधीयते । दर्षि तकारस्याऽऽर्पत्वात् । [पृष्ठ ७०] पं. ९. सावज्ज० गाहा । सावययोगविरतिराधिकारः सामायिकन्य १ । जिनगगो कीर्तनं चतुर्विशनिम्तवस्यापिकारः २। गुणवतः प्रतिपत्तिर्वन्दनकस्यार्थाधिकारः ३ । स्खलितत्य निन्दा प्रतिक्रमणस्याधिकारः 2 | प्रगचिकिमायाधिकारः कायो. त्सर्गस्य ५ । गुणधारणा च प्रत्याख्यानत्याधिकारः ६ । इति गापामगर्यमात्रम् ॥ पं. १५. यदिह दिवस-निमा- प्रथम-चरमपौरुपीलक्षण एव काले कालग्रहणपूर्वकं पञ्चने, नान्यत्र. नद कालिकम् उनगध्ययनादि । यनु कालन्टिामाच्या शेषकालानियमेन पठ्यते तद उत्कालिकम् आरश्यकादि । अन्यच नन्दलविचारणादिप्रकाको ग्याप्यायप्रग्यापन योगी- क्षेपकायोत्सर्गव न क्रियते । न क टी० २१ sarametermse -- । ] 15 पं. १. महाकर्मन्धनप्रभव मावि पानी यत् कियानुठानविमुखएकाले समसमा योग। . i. ?...या लोकगिति "मी यो पताऽवनदेवति नाना" । .. :: .. 3. :::: ज्ञायतेऽनेने यालोकः--मायाविज्ञानन मालिका. नं कामो नम: । यल्लब्धव्यम्' इति ततो धर्म प्रति गन्दादो भोगनि । यो नगीना ..:ोणी नानी तथाहि-ब्रह्मदत्तोऽत्र राष्ट्रान्तः 'नरेशः' नगी चिनसम्भूत पनि गम्भूत गाना समाना 'प्रमादाद्' विषयव्यामूढचित्तेन निदान करणार गायोगोऽनि. ततः या माहिती Finो मानो-णि चक्रिभवे वाऽनेकशः साधुना भण्यमानोऽपि प्रमोद योगोऽजनि इनि मालमिरगा । पं. २. मालम्याट्रानि- 10 त्यादि । तदुक्तम् अद्वेगसद्विभागा पइदियहं अंगुन्दरस वदति । उसजगणगि पुगो ते नियहागनि मानियां ॥१॥ [ पं. २५. तत्राविशेषेऽपीति ज्ञानस्य सामान्यमिताणेऽपि अयं विशेषः-गोनिन निगिरी न लगोजानं गूगः प्रजाजनादिकार्य उपयुज्यते इति तिथि-करणादि च ज्योति कविपये ज्ञात-गम् । तदगमा विवाहादिनियमापारणे दोषः' गारम्भादिरामुत्थः । [ पृष्ठ ७२] पं. २. संलेखनाश्रुतमिति, संलिख्यतेऽनया देहा-मादीति संलेखना, शरीरारापकर्णणरूपा मसिना । सा च किल त्रिविधा-जघन्या पाण्मासिकी १ मध्यमा संवत्सरप्रमाणा २ उत्कृष्टा तु द्वादशवर्षरूपा ३ । सा जैवम्-- पं. ४-५-६. चत्तारि० गाहा, नाइविगिट्ठो य० गाहा, वासं० गाहा । प्रथमं चचारि वर्षाणि यावर विचित्र' चतुर्थ-पठा-ऽप्रम-दशम-द्वादशादिकं तपः करोति, पारणके च विकृतीगृहाति न वेत्यनियमः । अपराणि तु चत्वारि वांणि तपस्तथैव विचित्रमेव करोति, पारणके तु सर्वथा विकृतिवर्जमस्निग्धं भुङ्क्ते । अन्यत्तु संवत्सरदिकं एकान्तरितमाचाम्लं विदधाति-चतुर्थं कृत्वा आचाम्लेन पारयति, पुनश्चतुर्थ 20 कृत्वा आचाम्लेनैव पारयतीत्यर्थः, एवं पुनः पुनर्यावद् वर्षद्वयम् । एकादशस्य तु वर्पस्याऽऽयान् पण्मासान् 'नातिविकृष्टं' नातिगाढं तपः करोति, चतुर्थ पष्ठं वा विधत्ते, नाप्टमादिकमित्यर्थः । पारणके तु 'परिमितं' किनिदूनोदरतासम्पन्नमाचाम्लं करोति । अपरांस्तु पण्मासान् 'विकृष्टम्' अष्टम-दशम-द्वादशादिकं तपः करोति, पारणके त्वाचाम्लमूनोदरतया न करोति, किन्तु ध्रुवेणेत्यर्थः । द्वादशं तु वर्ष कोटीसहितं निरन्तरमाचाम्लं करोतीत्यर्थः । चतुर्थं कृत्वा आचाम्लेन पारयति, पुनश्चतुर्थ विधायाऽऽचाम्लेनैव पारयतीत्या- दीन्यपि मतान्तराणि द्वादशवर्पविपयाणि दृश्यन्ते । इह च भोजनं कुर्वन् प्रतिदिवसमूनोदरतां तावत् करोति यावदेकं कवलमाहा- 25 रयति, तमप्येक-हि-त्र्यादिसिक्थोनं तावदाहारयति यावदेकमेव सिक्थं भुङ्क्ते । अपरं चेह द्वादशवर्षस्य पर्यन्तवर्तिनश्चतुरो मासान् यावदेकान्तरिकेपु पारणकदिवसेपु सुचिरं तैलगण्डूपमसौ मुखे धार्यते, ततः खेलमल्लके भस्ममध्ये प्रक्षिप्य मुखमुप्पोदकेन शोधयति । यदि पुनस्तैलगण्डूपविधि न कार्यते तदा वायुना मुखमीलनसम्भवे पर्यन्तसमये नमस्कारमुच्चारयितुं न शक्नोति । तदेवमुत्कृष्ट- संलेखनानुसारेण जघन्य-मध्यमे अपि कार्ये । तदन्ते च भक्तप्रत्याख्यानादिमरणानामन्यतरत् प्रतिपद्यते, अत एवाह-गिरिकंदर- मित्यादि। पं. ११. गिलाणं किरियाईयं ति उत्थानादिक्रियाकरणासमर्थं ज्ञात्वा । पं. १२. [सव्वदन्यदायण- 30 याए त्ति सर्वद्रव्यदर्शनेन । नित्तण्हस्स त्ति भक्ते विगततृष्णस्य । पं. २९. आवलिकाप्रविष्टेभ्य इतरविमानानि पुष्पावकीर्णकानि । [पृष्ठ ७३] पं. ४. उवउत्ते समाणे त्ति उपयुक्तः सन् श्रमणः 'परिवर्त्तते' गुणयति । पं. ७. ओवयइ त्ति आकाशाद् 'अवपतति' अवतरति अंतद्धिए त्ति 'अन्तर्हितः' आकाशस्थः । पं. ११. सिंगनाइयकज्जेसु त्ति, शृङ्गज्ञातेन तुल्यानि शृङ्गज्ञातीयानि, पं. १७. । पं. २३. श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १६३ तानि च तानि कार्याणि चेति विग्रहः । यथा गवि स्थितं शृङ्गं सर्वजनप्रकटं भवति, एवं यत् सर्वजनविदितं महदद्भुतं किञ्चिचैत्य- गुरु-सञ्चादिविषयमनर्थरूपं प्रत्यनीकेन क्रियमाणं भवति तत् शृङ्गज्ञातीयमुच्यत इत्येके । शृङ्गनादितकार्यमित्यपरे, तत्र तादृशे कार्ये उत्पन्ने शृङ्गनादः-शृङ्गापूरणपूर्वकं सङ्घमिलनलक्षणः स सञ्जातो यत्र तच्च तत् कार्य चेति व्याचक्षते । गज्ञातीयं शृसङ्घ- कार्यमुच्यते इति तात्पर्यम् । पं. १२. आसुरुप्तः रुष्टः, अत एव 'अप्रसन्नलेश्यः' अप्रशस्तचित्ताध्यवसायः । सललियं ति सलील यथा भवति एवमागत्य स्वस्थाने निवसति । पं. २३. जाणि कप्पविमाणाणि त्ति देव्युत्पत्ति- विषयाणीत्यर्थः । [ पृष्ठ ७४] पं. १३. अन्ने इत्यादि, उसभाईणं संधराणं ति जीवतामित्यर्थः । पं. १४. पवाहेण त्ति निर्वृतानां पुनरेकैक- तीर्थे बहूनि द्रष्टव्यानि । पं. २०. तच्छिष्यभाव इति शासनप्रणेतृतीर्थकरशिष्यभावः प्रत्येकबुद्धानामप्यदुष्टः । पं. २१. अनियोगत (न तु नियोगत) इति न त्ववश्यम्भावेनेत्यर्थः । पं. २६. अङ्गेषु प्रविष्टम्-अन्तर्गतमङ्गप्रविष्टं 1 श्रुतमाचारादि । [ पृष्ठ ७५] पं. १०. वाह्या-ऽभ्यन्तरग्रन्थरहितानामिति, तत्र वाह्यः-धन-धान्यादिकः प्रतीतः, अभ्यन्तरश्च-मिथ्यात्वं नव नोकपायाः क्रोधादिकपायचतुष्टयं चेति चतुर्दशविधः । पं. १७. इह च यत्रेत्यादि आचार-गोचर-विनयेत्यादौ सूत्रे । निस्संकिया • गाहा, 'निःशङ्कितः' निर्गतशङ्को जीवादिषु । 'निष्कासितः' निर्गतकाहोऽन्यतीर्थिकमतेषु । 'निर्विचिकित्सः' निः- 15 सन्दिग्धोऽनुष्टानफलं प्रति । अमूढदृष्टिः कुतीथिकविधादिदर्शनैः। 'चः समुच्चये। एवं गुण-गुणिनोः कथञ्चिदभेदावेदनद्वारेण दर्शना- चारमभिदधता तद्वदभिधानमुखेनाऽसावुक्तः, अतस्तं गुणिनो भेदेनायाह-उपवृंहणमुपवृहा-गुणवत्स्तुतिरूपा । 'स्थिरीकरणं' धर्मे चलाचलस्य स्थिरत्वापादनलक्षणम् । तथा 'वात्सल्यं' वत्सलभावः, साधर्मिकाणामाहारादिभिरुपष्टम्भकरणमित्यर्थः । तथा प्रकर्पण भावना-जिनशासनमाहात्म्याविष्करणरूपा । अष्टावमी दर्शनाचारा इत्यर्थः । पं. २५. प्रभावकानष्टावुद्दिष्टानाह-अइसेस० गाहा, व्याख्या-अतिशेपाः-अवधिज्ञानादयः, ते तैर्वा ऋद्धिर्यत्याऽसावतिशेषर्द्धिः, भिन्ने वा पदे, तद्वन्तौ दृश्यौ १ । आचार्यः' 20 प्रावचनिकः २ । 'वादी' वादलब्धिमान् ३ । 'धर्मकी' धर्मकथालब्धियुक्तः ४ । 'क्षपकः विकृष्टतपःकर्ता ५ । 'नैमित्तिकः' मुनि- श्चितातीतादिनिमित्तवेदी ६ । विद्येत्युपलक्षणत्वाद् विद्यावान् ७ । 'राज-गणसन्मताः' पृथिवीपति-महाजनादिबहुमताः, स्थानद्वयमिदं एकं वा ८, अतिशेपद्धर्चेकत्वविवक्षायाम् । 'तीर्थ' प्रवचनं स्वसमृद्ध्या 'प्रभावयन्ति' मध्यस्थप्राणिनां बहुमानगोचरीकुर्वन्तीति गाथार्थः॥ पं. २८. प्रणिधानं-चित्तकाग्रता, तेन मनो-वामायेषु योगेषु युक्तः-तन्निग्रहपरः । पं. ३२. न इहलोका- घर्चमाजीवति तपसा यः सोऽनाजीवी । [ पृष्ठ ७६ पं. ७. 'वेढाः' छन्दोविशेषाः 'एकार्यप्रतिवद्धवचनसालिकेत्यर्थः' इत्यन्ये । पं. ९. द्रव्याघन्युपगमाः प्रनिपनयः, मतान्तराणी यर्थः । सूत्रादों गरीयान् , अत एव सूत्रधरादर्थधरः प्रधान ल्युच्यते । पं. ११. स्थापनामियादि. रचना- पक्षया तु द्वादशमङ्गं प्रथमम् , पूर्वगतस्य पूर्व प्रवचनात् पूर्व क्रियनागवान पूर्वायुष्यन्ते । ग्थापनामधिल्य च आचारः प्रथम- मद्गम् । पं. १३. सत्यपरिग्नेयादिगाधायामत्र चतुर्यपादो महापरिनोवद्यापमृयमिति कायमाच्याख्याने नागपात्र 30 पाठः । अन्यत्र च "उवहाणमुयं महपरिने "ति पठ्यते नवेद नोपपद्यते, वेदानकालसंख्यामा विषटनान, महापरिवायान प्रथममुपादानात् पश्चादुपधानश्रुतस्येति । प्रथमश्रुतस्कन्धो नयाध्ययननिको नवनि ! पिंटमयादिना नियमामाच्या यनपोडशकम् । तत्र- " . 25 HMA ANNtterwaswariourmuspencompared १६६ Ty ar । पं. १०. उसामान : कामदेवादीनां समय :::: रागादिविग्नयः. मायामा 5 प्रतिपत्नयः तान्याममायो । ":" "पाओवगगणा" नि पानोपमा म: परिजयय तन्गरणा युगमान । म सन्या विच अनागोमो कप:::::::::::: . -- - : 1 ||2|| 10 . .. . . भोगारि 15 प्रत्याख्यानं नाम भागनिने। पं. २९. मा। भोगा इति पदम् , तत्र "पगिरणा हो परिमोगी"। FREE: गोग: गोमा पनि माग गरे । [ T३] पं. ११. अत्र सव्याणि अज्झयणाणि जुगागानि गो गो गो , : सर्ग- ण्येकवर्गगतानि युगपदिश्यन्ते ।। [१] पं. ४. पण्डावागरणाई झ्यादि । प्रधानां न यार मालगोगा या frifलि. नागन बालान स्यात् । अद्वैत्तरमित्यादि, तत्राकुट-बाहुप्रभादिका मानि: । या full गाना HATT शुभा-अशुभ कथयन्त्येता अप्रश्नाः । तथा अष्टादिप्रश्नमा नदभाव न प्रानीय गान STAFi कति ता: प्रभाः' उभयरूपा ज्ञेयाः । तथाऽन्ये 'दिव्याः विचित्रा विद्यानिमायाः' स्तम्भ- लोणीकरणोजनामा आएका पाहु-आदर्शकादि- 20 सम्बन्धिीभिः प्रश्नविद्याभिः अङ्गुष्टादीनामावेशनात शुभाऽशुभ हथ्यो । 'नाग गुपणः' राह भावनगतिविशेष : उपलक्षणवाद यक्षादि- भिश्च सह साधकस्येति गम्यते 'दिव्याः' तारिखकाः 'संवादाः' शुभा-शुभगताः संलापा आगागन्त, नागादयोऽवतारिताः स्मृता वा सन्त आगत्य शुभा-ऽशुभं कथयन्ति । पं. ९. नवरग्- यद्यपीहाध्ययनानां दशवाद दशयोदेशनकाला भवन्ति, तथापि वाचनान्तरापेक्षया पञ्चचत्वारिंशदिति सम्भाव्यते इति पणयालीसमित्याचविरुद्धम् । फलरूपो विपाकः फलविपाकः स आख्यायते । [ पृष्ठ ८५] पं. १७. प्रायो व्यवच्छिम्नमिति, प्रायोग्रणेन प्रथमानुयोगमात्रस्यास्तित्वं तत्काल सूचयति । [पृष्ठ ८६] पं. २३. उत्तरभेयो तेयासीतिविहं ति, मूलभेदसप्तसु मध्यादायद्वयस्य प्रत्येकं चतुर्दशभेदत्वात् २८, तृतीयादिशेष- भेदपञ्चकस्य प्रत्येकमेकादशभेदत्वात् ५५, सर्वभेदाः ८३ त्र्यशीतिर्भवन्ति । [ पृष्ठ ८७] पं. ६. नयचिंताए वि त्ति नयचिन्तायामपि । पं. २१. मुत्तं छिन्नं ति अपरनिरपेक्षम् । वावीसाउत्ति छिनच्छेदनय२२ अच्छिन्नच्छेदनय२२त्रिकनय२२ चतुष्कनया२२भिप्रायतः चतस्रः । [पृष्ठ ८८] पं. २५. सव्वेसिं आयारो तित्थस्स पवत्तणे पढमयाए । सेसाई अंगाई एकारस आणुपुचीए ॥१॥ [ आचाराङ्गनि० गा० ८ ] इति सम्पूर्णगाथा । किंतु सा ठवण त्ति स्थापनामाश्रित्य नियुक्तावभिहितं प्रथमत्वम् । अक्षररचनया तु पूर्व पूर्वाणि रच्यन्ते । पं. २०. फलविवाग इति, 25 30 पं. ३०. चउरो 35 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १६७ [ पृष्ठ ८९] पं. ८. अट्ठमे कम्मप्पवायपुव्वे पयइ-ठिइ-अणुभाग-पएसाइएहिं ति एतत्स्वरूपं यथा- स्वभावः प्रकृतिः प्रोक्ता, स्थितिः कालावधारणम् । [ए]तद्रसोऽनुभागः स्यात् , प्रदेशो (घ)शकल्पनम् ॥१॥ यद्वा- पं.२६. " 1 ...1::. ... . ठिइवंधु दलस्स ठिई, पएसबंधो पएसगहणं जं । ताण रसो अणुभागो, तस्समुदाओ पगइवंधो ॥१॥ [ पञ्चसङ्ग्रह गा० ४३२] पं. १४. वारसमे अन्ने य पाणा वन्निय त्ति, इन्द्रियादयः । पं. १६. तेरसमे छंद-किरियाविहाणा यत्ति, पद्यविषयाणि तन्मध्या(?)शार्दूलादिरूपाणि छन्दांसि क्रियाश्च-करोति-भवत्यादय एतासां विधानानि वर्ण्यन्त इति क्रियाविशालम् । [पत्र ८८ पंक्ति ४ ] उप्पायपुव्बस्स णमित्यादि । नवरम्-'वस्तु' नियतार्थाधिकारप्रतिवद्रो ग्रन्थविशेषः, अध्ययनवत् । 'समत्तसुयनाणिणो' चउदसपुञ्चधरा । पं. २०. एकवक्तव्यतार्थाधिकारानुगता वाक्यपद्धतयो गण्डिका उच्यन्ते । [ पृष्ट ९०] पं. ५. दसारगंडियाउ त्ति दशार्हाः-समुद्रविजयादयो दश वसुदेवान्ताः तत्प्रतिबद्धा गण्डिका दशाहगण्डिकाः । पं. १५. आइचजसाईणमित्यादि । ऋषभनिर्वृतिप्राप्त्यनन्तरं ऋपभस्य पओप्पए आदित्ययशःप्रभृतीनां नरपतीनां सङ्ख्या सिद्धि-सर्वार्थसिद्धिगमनविषयां सगरसुतानामग्रतः सुबुद्धिनामाऽमात्यः परिकथयति । पं. १६. नृपतीनां चतुर्दश लक्षाः सिद्धाः, एको लेक्षः सर्वार्थे, एवमेकैकस्थाने पुरुपयुगान्यसङ्ख्येयानि भवन्ति । तदनन्तरं चतुर्दश लक्षाः सिद्धाः द्वौ लक्षौ सर्वार्थ, 1 १ अत्र ह्याद्यानुलोम-प्रतिलोमसिद्धगण्डिकायुगले श्रीमलयगिरिसूरिविरचितनन्दिसूत्रवृत्ति-श्रीदेवेन्द्रसूरिनिर्मितसिद्धदण्डिका- प्रकरण-तदवचूरी-श्रीविनयविजयोपाध्यायरचितलोकप्रकाशादिपु एक-द्वि-त्रि-चतुः-पञ्च-यावसमाशसंख्याः वर्तन्ते, न तु एकलक्ष- द्विलक्ष-त्रिलक्षादिकाः ; यथा श्रीसङ्घदासगणिवाचकविहितपसुदेव हिण्डीप्रथमन्त्रण्डान्तर्गतसिद्धगण्डिकायां [पत्र ३०१ ] श्रीजिनदास- गणिमहत्तरनिर्मितनन्दीसूत्रचूर्णिगतसिद्धगण्डिकायां [पत्र ७८] श्रीहरिभद्रमूरित्रितनन्दिसूचलघुवृत्तिगतसिण्डिकायां [पत्र ९१] च आद्यानुलोम-प्रतिलोमसिद्धगण्डिकायन्त्रयुगले दृश्यन्ते । अत एव तदनुसारेण श्रीश्रीचन्द्राचार्य गर्दः अत्राद्यानुलोम-प्रतिलोमसिद्ध गण्डिका- युगले एकलक्ष-द्विलक्ष-त्रिलक्षादिव्याख्यानं कृतमस्ति । अपि च- एतद्वयाख्यानभेदविपये एतदप्यवधेयमस्ति यन्- सिद्धगण्डिकास्वरूलावेद कोपरि निर्दिष्टगि-त्यादिसर्वप्रन्ये सिदगडिका- स्वरूपावेदकोल्लिखितगाथाकदम्बकावलोकनेन केवलक-द्वि-त्रि-चनुः-मन-यापत्रमागत्यंन्यान्तरितगिदि-सायंगमनप्रीतिरेयोपजायते, न लक्षा- न्तरितप्रतीतिरिति । तथा वसुदेवहिण्डि-नन्दिचूणि-नन्दीलघुवृत्तिपु मिसटिकारसमावेदकगायानां व्याख्याने सप्टो करणं ना लेशतोऽपि न वर्तते, किन्तु गाथाभावावेदकानि यन्त्रकाण्येय फेलं वर्तन्ते । नेषु न अन्तरित कवि कादिरूपाने नानिदंग पर चले । किच-श्रीमलयगिरिनन्दीवृत्ती सिद्धदण्डिकाप्रकरणे लोकप्रकाशे च चूर्णि-वृत्तिरदामिनमिवरिष्कारवरूपावेदकगाथानां व्याख्यानं यन्त्रकाणि चापि वर्तन्ते, तवान्तरितक-द्विकादिसंख्यानि एक वर्नने, न सानिमा इला सारिकनियरियो बहुश्रुताः प्रमाणम् । अथ चात्र द्वितीय प्रतिलोमसिद्धगण्टिकाविषयेऽपि एतदधानीयमस्नि, पत्-चूर्णि-लघुनि दयनि-मिजदण्डिकाप्रकरणाय- चूरी-लोकप्रकाशादिसर्वशाग्नेषु प्रतिलोमसिद्धगठिकायन्त्रक मुद्रितर सम्म नेपालन्यते, किन्तु चूर्णिमृद्-लघुनियोग- सिद्धगण्डिकास्वरूपाचेदवगाथामु प्रोमलयगिरिवृत्ति-सिद्धदण्टिकाप्रकरण-नदयचूरी-लोकप्रकादोपु "ना (अनुलोमसिद्धगण्टिकासमा'त्यनन्तरं ) चतुर्दश लक्षा नरपतीनां निरन्तरं नवधान : गिद्धी, भूवन र पर: Int, एवं चतुर्दशलक्षान्तरित एकका सिली तारद् वक्तव्यो पावत् तेऽप्येकका अन्यथा नवनि" इत्यादि नि वर, भित्र निया अनुलोमण्टियाचरमपाशसधिसिद्धानन्तरं प्रतिलोमसिनगरिष्टकाप्रारम्नत् नुमलादेव शिवत नहा प्रयोग न प्रनीतिमायाति, एवं मेन सिनीय प्रतिलोमटिकारागार मिनिममनन दमाममंद पर जायेत समापि तृतीयरिया प्रारम्भी न सन्यय. प्रनिमायास्पति न पत्रानुसार काममा मनि। सियान तथा repenvirtamarhwop.
१६८ + .. ++ . . अत्रापि पुरगगुगान्य सोमायतिमा मानिसमाजा। ::.:.:.:.::.;:. विजय-वैजयन्तादिक विमान पापिया गपुर . त्रयस्त्रिंशसागरोपमायुक या सर्व पानांगे यनका वि . . . . : मान । वान्यम् , इह विमानपजकाधारण तारतमा समधिनाना स स 11:11: T ::.:. ft. 5 विमानेपृपयन्ते देवा इति सम्प्रदायः. देवेन्द्रनर केन्द्रको प्रयोगमा : if I fit योजनकोटिप्रमागानि सन्तीति न कशिद विरोषः। पं. २०. निसरीयं गाः ।। FIER एयाए परिवाडीए ताव नेयं जाव सिबीए पास लाखा. रानो नोमाला ।। पं. २३. निनादिगानी नउरो त्ति, प्रथमा एकाकोत्तरा । नवरम् -परपरापेक्षाया एकागेको वाम . गरिमा १ । गागामा उपरि च एकादिद्विकोत्तरत्वम् २ । तृतीयागामेकादि-गुरारतमा उगरि कार्गम् ३। नागा गेन भोगाोन 10 एकूणतीसं तिगा मंडेयञ्चा, सा च त्र्यादिका गादिविणगोत्तरा ।। पं. २६. जान अरांगेजदो मिति, 2 सिद्धि- सर्वार्थगमने असहायेयपुरुपयुगरूपेण वान्ये एकादित्तगयां नितान्तरगणिकायाम् २ । तीयामागे तानिदरायां गणिकाया- मेकः शिवगतौ चत्वारः सर्वार्थ उत्पयन्ते । अनया री या द्वावपि राशी एकादियुतरम्लरोगाराजगपुरुणगानि गाना भवतः ३ । पं. २८. व्यादिकायां यादिविषमोत्तरायां चतुर्थगण्डिकायां सेसेमु इमो भवे खेतो ति राशियमान एकोनविंश- त्सङ्ख्यस्थापितत्रिकेप्वाचं विमुच्य शेपेप्वष्टाविंशतिसायेचवस्तनोपरितनेषु विश्वयं निकादिको वणगाणगावागोकोऽक्षेपः कार्यः, 15 ततोऽधस्तनत्रिकमध्ये द्विकक्षेपे जाताः पान १, उपरितननिकमाये पानोगे जाता गयो २, गनगा रीत्या सर्व वागम् , याव- देकत्रिंशत्सङ्ख्या (.? यावदष्टाविंशतिसझ्या )वरतनत्रिकस्य शतक्षेपे जातं १०३, उपरितनत्रिकस्य न गरी पड्विंशया शिप्तयाऽन्त्ये जाता एकोनत्रिंशत् । एवमियमाद्या गण्डिका विपमोत्तरा । अनया दिशा असाया भन्या विषमोतरा शेगाः । परं सर्वस्यामप्यन्यस्यां गण्डिकायां प्ररूप्यमाणायां यदन्त्यिमकस्थानं किश्चित् प्राचीनागामागतं तदेकोनशिसायवाराः स्थाप्यम् , ततः प्रथमं स्थानं विमुच्य शेपासु एकोनत्रिंशत्स्वष्टाविंशतिसंख्यासु “दुग पण नवग"गित्यादि प्रागुक्तगाथात्रयोक्तो विकायप्रक्षेपः अध उपरि च 20 प्रागीत्या कार्यः । पञ्चाशल्लक्षाः। सागरोपमकोटीनां किल ऋपमा-ऽजितयोरन्तरम् , एतावदन्तरे च प्रभूतकालस्वरूपे प्रभूता- सङ्खयेयासङ्खयेयसङ्ख्यानेन एतावन्तः सिद्धाः सर्वार्थ च गता इति सगरपुत्राणां मुबुद्धिर्जगाद । चूर्णिकृदादिनिर्दिष्टा " विवरीयं सबढे चोद्दस लक्खा उ निव्वुतो एगो।" इत्यादिगाथा सामान्यनिर्देशहीव प्रत्येतव्या, न कमावेदिकेति चोद्धव्यम् । यद्यप्यस्मिन् व्याख्याने श्रीमलयगिरिसूरि-श्रीदेवेन्द्रसूरि-श्रीविनयविजयोपाध्यादिव्याख्यानेन सह स्पष्ट एव विरोधस्तथापि तैरेव लिखितयन्त्रकेण सहानाहूतो विरोधोऽपि स्पष्ट एवेत्यपि विचार्यमस्ति । अपरं च-श्रीदेवेन्द्रसूरिसूत्रितचैत्यचन्दनभाष्यसत्कश्रीधर्मघोपसूरिविरचितसंघाचारटीकायां रत्नसारकथायां सिद्धगण्डिकाव्या- वर्णने सिद्धदण्डिकाप्रकरणगाथा एवोद्धृताः सन्ति, तत्र सङ्घाचारवृत्तिरचनासमये तैः स्वगुरुश्रीदेवेन्द्रसूरिसूत्रिता एव गाथा यथाय- दुद्धृताः. किन्तु तदृत्तिपुनःप्रमार्जनसमये उपर्युक्तगण्डिकान्त-प्रारम्भाप्रतीतिदोपमुद्भाव्य यन्त्रकानुसारेण सिद्धदण्डिकाप्रकरणगत- गाथायाः परावृत्तिः स्वव्याख्यायां कृताऽस्ति । सा चैवम् - आइपजसाइ सिवे चउदस लक्खा उ, एगु सबढे । एवं जा इफिफा असंख, इय दुग-तिगाई वि ॥ जा पनासमसंखा १, तो सवम्मि लक्खचउदसगं । एगो सिवे, तहेव य अस्संखा जाव पण्गास ॥ अन द्वितीयगाथायां " तो सव्यहम्मि लक्ख० " इत्यादिगाथापाठस्थाने श्रीधर्मघोपसूरिपादैः " तो सिवि इगु चउद लक्ख सव्वद्वे । पुण इगु सिवे तहेव य०" इति अतिसुसातपाठपरागृत्तिर्विहिताऽस्ति । यद्यपि जेसलमेरु-पत्तनादिस्थितताडपत्रीयादिप्रतिषु नास्तीयं पाठपरावृत्तिः किन्तु स्तम्भतीर्थीयश्रीशान्तिनाथताडपत्रीयभाण्डागारे संशोधित-परिवर्धितादर्श इयं सुसाता पाठपरागृत्तिदृश्यत इति । प्रतिधेयं तदन्तः प्रतिपत्रं तथा स्थाने स्थाने नवीनपरिवर्धितानेकपत्रेषु पूजादिविषयकानेकमतमतान्तरचर्चाद्युल्लेखेन बृहवृत्तिप्रतिरूपा जाताऽस्ति, अतीवोपयोगिनी चाप्यस्ति ।। .
5 10 पं. १७. श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीताया नन्दिसूत्रवृत्तेः टिप्पनकम् । १६९ [ पृष्ठ ९३] पं. ५. पणवीसुत्तराणि दो सयाणि त्ति, इहोत्पादादीनां विन्दुसारपर्यन्तानां चतुर्दशानां पूर्वाणां "दस चोदस भट्टष्टारसेव वारस दुवे य कथूणि" । [ सू. १०९ गा. ७९-८० ] इत्यादिना प्राक् सूत्रोक्तगाथाद्वयेनाभिहितदशादिपञ्च-. विंशत्यन्तानामझानां मीलने पञ्चविंशत्युत्तरशतद्वयं भवति । पं. ६. चउतीसं ति "चउ वारस अट्ठ य दस हवंति" [ पंक्ति ४] इतिगाथोक्तचतुःप्रभृतीनां मीलने ३४ भवति । पं. १२. इचेयम्मि इत्यादि । पं. १६. अन्ये तु- धर्मापेक्षया अनन्ता भावाः प्रतिवस्त्वस्तित्वप्रतिवद्धाः, कोऽर्थः ?-एकस्यैव वस्तुनोऽनुवृत्तिरूपाः [भावाः] धर्मा अनन्ताः सन्ति, तदारम्भकाणामधेनामनन्तगुणकृष्णादिधर्मयुक्तत्वात् । अनन्ता अभावा प्रतिवस्तु नास्तित्वप्रतिबद्धाः, एकस्यापि वस्तुनत्रैलोक्यन्यावृत्तत्वादित्यभावानामनन्तत्वम् । पं. २३. सिद्धा अनन्ताः निष्टितार्था लोकान्तवर्तिनः । असिद्धास्तु संसारिणस्तेऽप्यनन्ताः, असिद्धसर्वजीवराशेः सिद्धराश्यपेक्षया अनन्तगुणचख्यापनार्थमित्यर्थः । [ पृष्ठ ९४ ] पं. ५. उभयाज्ञया पुनरिति सूत्रार्थोभयैर्विराध्य । पं. ६. अथवेत्यादि एतद्विराधनयेति, आज्ञाऽकरणेनेत्यर्थः । पं. ९. वर्तमाने विशिष्टविराधका ये मनुष्यजीवास्तेषाम् । पं. १६. विइवइंमु त्ति व्यतिब्रजितवन्तः । प्रत्युत्पन्नसूत्रे व्यतिव्रजन्ति व्यतिक्रामन्ति । विश्वइस्संति 'व्यतिबजिप्यन्ति' व्यतिक्रमिप्यन्तीत्यर्थः । [ पृष्ठ ९५] पं. ११. श्रुतज्ञानी दत्तोपयोगः जानाति स्पष्टावभासिना श्रुतज्ञानेनावबुध्यते । पं. १२. मतिविशेषत इति, 15 तदुक्तम्- अक्खरलंभेण समा ऊगडहिया हुंति मइविसेसेण । ते वि य मईवितेसा सुयनागभंतरे जाण ॥१॥ [विशेश. गा. १४३] श्रुतज्ञानाश्रयास्ते इत्यर्थः ।। पं. १८. आगमसत्थ० गाहा । पूर्वेषु विशारदाः विपश्चितो 'धीराः' व्रतानु- पालनस्थिराः श्रुतज्ञानस्य लाभं 'ब्रुवते' प्रतिपादयन्ति । किं तत् ? इत्याह-"त" ति तदेवाऽऽगमशालग्रहणम् । यत् किम् ? इत्याह-यद् 'बुद्धिगुणैः' वक्ष्यमाणत्वरूपैरष्टभिर्दष्टं शास्त्रे इत्यक्षरयोजना । अयमर्थः-शिष्यते-शिष्यते बोव्यते प्राणी अनेनेति 20 शास्त्रम् , तच्चाविशेपितं सामान्येन सर्वमपि मत्यादिज्ञानमुच्यते, सर्वणापि ज्ञानेन जन्तूनां बोधनात् । भतो विशेने स्थापयितुमाह- आगमरूपं शास्त्रमागमशास्त्रम् , श्रुतज्ञानमित्यर्थः, तस्य ग्रहणं-गुरुसकाशादादानं तदेव ध्रुतलाभं चुवते, यद बुदिगुणैरटभिः शास्त्रे दृष्टम् , नान्यदिति, वक्ष्यमाणशुश्रूपादिगुणाष्टकक्रमेणैव श्रुतज्ञानं प्रायम् नान्यथेति तापर्यमिति गाथार्थः ।। पं. २०. गुस्सुसइ० गाहा । अथवा यद् यदाज्ञापयनि कार्यजातं गुरुन्तत् तत् सम्यगनुग्रहं मन्यमानः श्रोतुमिन्छति शुश्रूपते । पूर्वनिरूपितश्च कार्यकरणकाल पुनः पृच्छति प्रतिपृच्छति । इधं चाऽगचितन्य गुगेरन्तिके मृत्रं तदर्थ या सम्यक शृणोति । 25 श्रुतं चावग्रहेण गृहाति इत्यादि पूर्ववत् । यहा प्रतिपटेन गुरुगा पुनगादिष्ठश्च सन् ननः सम्यक् गोति । श्रुतं गाऽयप्रदेश सम्यग् गृह्णातीयादि तथैव, यावत् करोति च गुरुभणितं सम्यगिनि । एवं गुर्वागधनविश्य नाष्टायपि गुगा न्यायायन्ते, श्रुता- वाप्ती मूलोपायत्वाद् गुराधनाया इति गाथार्थः ।। श्रीधनेश्वरसूरीणां पादपद्मोपजीविना । नन्दिनी कुना व्याख्या श्रीमन्द्रीचन्द्रग रिणा ॥१॥ समाप्ता चेयं नन्यध्ययनटीकायां श्रीशीलभद्र-प्रभुश्रीधनेवरमरिशिष्य. श्री-श्रीचन्द्रहरिविरचिता वर्गपदव्याच्या ।। से तं नंदी समत्तेति वचनादाचार्यपदस्थापनाकामनुयोगानुवाविवेयं नन्दिता माता मर्दिन । ? .. टी० २२ 44 -.in हियागयं वा सिद्धिसिलातलगतं वा आो गीर समस्या नि नियं पण्णवियं परवियं दसियं णिसिगं उपदमियं. मा को आगे ना मामी, अर्ग सहुकुंभे आसी । से त्तं जाणगलरीर दवाणुगणा । ८. से त्ति अथ केयं ज्ञनगर:न्यानुज्ञा : यो अणन निमावि. : ९गामी 5 तदेवानुभूतभावत्वाद् द्रव्यानुज्ञा ! यन्चरीरकं नव्यानुज्ञा तत् कारय सम्मानित पारो या गो सानोविकार: अर्थवटनव्युत्पत्तिरूपः तं ज्ञातवतः सम्बन्धि । कथम्भूतं सदिदं जारी बयानुशा मानिया:--अपमा गानिलय रहने । । जीवविप्रमुक्तमित्यक्षरघटना । तत्र व्यपगत-नेतन्यपर्यायादतन्या पर्यायात IIT; जान पान -गारा निःशास- जीवनादिदशविधप्राणेभ्यः परिभ्रष्टम् अचेतनस्योन्छ्वासाययोगात् : यात समावतो न परिमशः किन याविनं-चली गरा आयुःक्षयेण तेभ्यः परिभ्रंशितम् । एवं च सति कथम्भूतं तत् ? इत्याह---यादेतं. "दि उपनगे" यको :- हारपरिणति 10 जनित उपचयो येन तत् त्यक्तदेहम् , अचेतनस्याहारग्रहण-परिणयोरभावात । एवं प्रदर्शितनिगिना जीन गात्मना विविधम्- अनेकधा प्रकर्षण मुक्तं जीवविप्रमुक्तम् । तदेतदनुज्ञापदार्थज्ञस्य शरीरकपनीतानुजाभावस्य कारणवाद मलगानुज्ञा, नोआगगन चास्यास्तदानीमागमस्य सर्वथाऽभावात् । भूयः कथम्भूतं शरीरकम् ? इत्याह-सेजागयं वेत्यादि शाया--गहती सर्वानागाणा त गतं शय्यास्थितमित्यर्थः । संस्तारः-अतृतीयहस्तमानस्तं गतं तत्रस्थम् । नैपेधिकी-शवपरिस्थापनभूमिस्तां गतं-प्राप्तम् । या महर्पिः कश्चित् सिद्धस्तत् सिद्धशिलातलं तद्गतं तत्र स्थितमिति । भक्तपरिज्ञायनशनप्रतिपत्तिभूमिळ सिनशिलातलं तद्गतम् । अह 15 णमिति अहोशब्दो अन्यपार्श्वस्थितामन्त्रणे, ‘अनेन' प्रत्यक्षतया दृश्यमानेन शरीरमेव पुगलससातत्वात् समुन्छ्यस्तेन अनुज्ञेति प 'आधविर्य'ति छान्दसत्वाद् गुरोः सकाशादागृहीतं तदावरणकर्मक्षयोपशमात , 'प्रज्ञापित' अन्येभ्यः कथितम् , 'प्ररूपित' ते एव तदर्थकथनतः, 'दर्शितं' सान्वयोऽयं शब्दो न तु मण्डपादिवन्निरन्वय इत्येवं शिष्येभ्यः प्रकटितम् , 'निदर्शित' परस्य कथञ्चिद गृह्णतः परयाऽनुकम्पया निश्चयेन पुनः पुनर्निवेदितम् , 'उपदर्शितं' पुनः पुनः स्मरणतः । आह-नन्वनेन शरीरसमुच्छूयेणाऽनुज्ञा पदमागृहीतमित्यादि नोपपद्यते, ग्रहण-प्ररूपणादीनां जीवधर्मत्वेन शरीरस्याघटमानकत्वात् , सत्यम् , किन्तु भूतपूर्वगत्या जीव 20 शरीरयोरभेदोपचारादित्थमुपन्यास इत्यदोपः । यथा कोऽत्र दृष्टान्तः ? इति पृष्टे सत्याह-यथा अयमित्यादि । एतदुक्तं भवति- यथा घृते मधुनि वा प्रक्षिप्यापनीते तदाधारत्वपर्यायेऽतिक्रान्तेऽपि अयं घृतकुम्भ इत्यादि व्यपदेशो लोके प्रवर्त्तते तथाऽनुज्ञ पदार्थवेत्तृत्वपर्यायेऽतिक्रान्तेऽप्यतीतपर्यायानुवृत्त्या द्रव्यानुज्ञेयमुच्यते । इतीयं ज्ञशरीरद्रव्यानुज्ञा ।। २. से किं तं भवियसरीरवाणुण्णा ? भवियसरीरवाणुण्णा जे जीवे जम्मणजोणीणि क्खते इमेण चेव सरीरसमुस्सएणं आदत्तेणं जिणदिटेणं भावेणं 'अणुण्ण'त्ति पेयं सेयका 25 सिक्खिस्सइ, न ताव सिक्खइ । जहा को दिद्रुतो ? अयं घयकुंभे भविस्सति, अयं महुकुं भविस्सति । से त्तं भवियसरीरवाणुण्णा । ९. अथ केयं भव्यशरीरद्रव्यानुज्ञा ? इति पृष्टे सत्याह-जे जीवे इत्यादि विवक्षितपर्यायेण भविष्यतीति भत्र्यः-विवक्षित पर्यायाहः तद्योग्य इत्यर्थः तस्य शरीरं तदेव भाविभावानुज्ञापदार्थवेत्तृत्वकारणत्वाद् द्रव्यानुज्ञा भव्यशरीरद्रव्यानुज्ञा । किं पुनस्तत इत्यत्रोच्यते-यो जीवो योनीजन्मत्वनिष्क्रान्तोऽनेनैव शरीरसमुच्छ्रयेण 'आत्तेन' गृहीतेन 'जिनदृष्टेन' तीर्थकराभिमतेन 'भावे 30 तदावरणकर्मक्षयोपशमलक्षणेनानुज्ञेति पदमागामिनि काले शिक्षिष्यते न तावच्छिक्षते तद् जीवाधिष्ठितं शरीरं भव्यशरीरद्रव्यानुज्ञे समुदायार्थः । अवयवार्थस्तु-यः कश्चिद् 'जीवः' जन्तुः योन्याः-योपिदवाच्यदेशलक्षणायाः परिपूर्णसमस्तदेहो जन्मत्वेन-जन १ पयं सेए काले सं० ॥
जहा-लोड्या 10 लघुनन्दि:-अनुज्ञानन्दिः । १७५ समयेन निष्क्रान्तः, न पुनरामगर्भावस्थ एव पतितो योनिजन्मत्वनिष्क्रान्तः, अनेनैव शरीरमेव पुद्गलसातत्वादुत्पत्तिसमयादारभ्य प्रतिसमयं समुत्सर्पणाद्दा समुच्छ्यस्तेन 'आतेन' आगृहीतेन प्राकृतशैलीवशादात्मीयेन वा जिनोपदिष्टेनेत्यादि पूर्ववत् सेयकाले त्ति छान्दसत्वादागामिनि काले 'शिक्षिप्यते' अध्येप्यते साम्प्रतं तु न तावद्यापि शिक्षते तद् जीवाधिष्टितं शरीरं द्रव्यानुज्ञा । नोआगमत्वं चात्रायागमाभावमाश्रित्य मन्तव्यम् , तदानीं तत्र वपुप्यागमाभावाद् नोशब्दत्य चात्रापि सर्वनिषेधवचनत्वादिति । यथा कोऽत्र दृष्टान्तः ? इति निर्वचनमाह-यथाऽयं घृतकुम्भो भविष्यतीत्यादि । एतदुक्तं भवति–यथा घृते मधुनि वा प्रक्षेन्तुमिष्टे तदा- 5 धारत्वपर्याये भविष्यत्यपि लोके अयं घृतकुम्भो मधुकुन्भो वेत्यादिव्यपदेशो दृश्यते तथाऽत्राप्यनुज्ञापदार्थवेत्तृवपर्याये भविष्यत्यपि तदस्तित्वपरनयाऽनुवृत्या द्रव्यानुज्ञेयमुच्यते इति भावः । निगमयन्नाह से त्तमित्यादि तदेतद् भव्यशरीरद्रव्यानुज्ञेति ॥ उक्तो नोआगमतो द्रव्यानुज्ञाद्वितीयभेदः । तृतीयभेदनिरूपणार्थमाह- १०. से किं तं जाणगसरीर-भवियसरीरवतिरित्ता दवाणुण्णा? जागगसरीर-भवियसरीर- वतिरित्ता वाणुण्णा तिविहा पण्णत्ता, तं कुप्पाक्यणिया लोउत्तरिया य । १०. से किं तमित्यादि । यत्र ज्ञशरीर-भव्यशरीरयोः सम्बन्धि पूर्वोक्तं लक्षणं न घटने तत्र आभ्यां व्यतिरिक्ता-भिन्ना द्रव्यानुज्ञोच्यते । सा च त्रिविधा प्रज्ञता, तद्यथा--लौकिकी कुप्रावनिकी लोकोतरिकी च ॥ तत्र प्रथमभेदं जिज्ञासुराह- ११. से कि तं लोइया० दवाणुण्णा ? लोड्या० दवागुण्णा तिविहा पण्णत्ता, तं जहा- सचित्ता अचित्ता मीसिया । १२. से किं तं सचित्ता० ? सचित्ता० से जहागामए राया इ वा जुवराया इ वा ईसरे इ 15 वा तलवरे इ वा कोडंचिए इ वा माडंचिए इ वा इन्भे इ वा सेट्टी इ वा सत्यवाहे इ वा मेणावई इ वा कस्सइ कम्हि कारणे तुझे समाणे आसं वा हत्यि वा उदं वा गोणं वा वरं वा घोडयं वो पलयं वा अयं वा दास वा दासि वा अणुजाणेजा । से तं सचित्ता । ११-१२. से किं तमित्यादि नुगमम् । नवरं 'राजा चक्रवर्ती यामुन्यो बलदेवो महामाडलिकथा भरः युवराज राज्ञो द्वितीयस्थानवर्ती सामान्यमाण्डलिकोऽमात्यश्च । अन्ये नव्याजोगमावविध कारः। परिनुनपनि- 20 प्रदत्तरत्नालङ्कृतसौवर्गपविभूषितशिरारतलयरः । यग्य पाचन सामन्चमाय मान-मादिक नागिन ना मान्य जनाय- विशेषरूपं महम्बमुच्यते, तस्याऽधिपतिर्माऽम्बिकः । कतिपय कुटमणः गोदितः । - नगा यातीयः, यस्य सत्कपुञ्जीकृतहिरण्य-रत्नादिद्रव्येणान्तरितो हत्यपि न र मदिराको काम गर्थः । मीना पामिन पविभूषितोत्तमाः पुरज्येष्ठो चणिग्विशेषः श्रेटी । हस्य-मम पानिमाया गया पर । "गणिमं धरिमं मेनं पारिवं, चैव दबजायं तु । योग ।। 2 नियवहुमओ पसिद्धो दीगा-गाहाग वालो पं । सानोमाय !! एतागयुक्तः सार्थवाहः । एतदन्यतमः कति गहिरका जानीयात् संयं सचित्तानुज्ञा ॥ १६. से वितं अचित्ता अचित्ताने जहाणामा नया नि या दरापाटार हदा कलापरे ! या कोडंपिए दामारंथिए र दा दम्भ ? का मलबाई : वाट्टीः या मंगा हा माहिए था पोरिए हामदासस्वा दारही मा... । पा घाला यंदा दाहाला दान । १ गादिया सहारा Ring...!
? १७८ २४. से कि तं कालाणुगणा ? कालागुणा जो गांजा का प्रमाणति, जानिये ना कालं, जम्मि वा काले अणुजाण, तं- नीलं काम ना अपामांना वगं वा हेमंत गा पाउसं वा अवत्याग से सं कालागुणणा । २४. कालानुज्ञायां यो राजादिस्य तपः सन् काल्गनुमान मामा मागनिया गाजी मणि मग न 5 दातव्यमिदं करादीति जत्तियं वा कालं ति यथा दुर्लगमा गनिने गरिमिकका गभगामार यानित श्रेणिकेन नियतदिनरूपकालानुज्ञा राज्यं प्रत्यभयकुमाराय कृता । गस्मिन् वा नशा की सेगं कालानुजा , ॥ २५. से किं तं भावाणुण्णा ? सावाणुण्णा तिविता पणत्ता, तं जहा-लोइगा कुप्पावय- णिया लोगुत्तरिया। २६. से किं तं लोड्या भावाणुण्णा ? २ से जहानामा राया इ वा गुबराया इ वा जाव 10 तुढे समाणे कस्सइ कोहाइभावं अणुजाणिजा । से तं लोझ्या भावाणुण्णा । २७. से किं तं कुप्पावयणिया भावाणुण्णा ? २ से जहानामए केइ आयरिण इ वा जाव कस्सइ कोहाइभावं अणुजाणिज्जा । से तं कुप्पावणिया भावाणुगणा। २८. से किं तं लोगुत्तरिया भावाणुण्णा? २ से जहानामए आयरिए इ वा जाव कम्हि कारणे तुट्टे समाणे कालोचियनाणाइगुणजोगिणो विणीयस्स खमाइपहाणस्म सुसीलस्स सिस्सस्स तिवि- 15 हेणं तिगरणविसुद्धेणं भावेणं आयारं वा मूयगडं वा ठाणं वा समवायं वा विवाहपण्णत्तिं या नायाधम्मकहं वा उवासगदसाओ वा अंतगडदसाओ वा अणुत्तरोववाइयदसाओ वा पाहावागरणं वा विवागसुयं वा दिहिवायं वा सव्वदव्य-गुण-पन्जवेहिं सव्वाणुओगं वो अणुजाणिज्जा । से तं लोगु- त्तरिया भावाणुण्णा । से त्तं भावाणुण्णा ६। २५-२८. भावानुज्ञा क्षायोपशमिकभाववाचारादिश्रुतानुज्ञाविषया। ततश्च य आचार्यादिर्यस्य शिप्यस्य तुष्टः सन् 20 'भावेन' कर्मनिर्जराभिप्रायेण मनो-वाक्कायैः करण-कारणा-ऽनुमतिभिः शुद्धेन न त्वैहलौकिकवलादिलिप्सया आचारादिकं यावद् दृष्टिवादं वा 'अनुजानाति द्रव्य-गुण-पर्यवैः' मुत्कलयति व्याख्यानाय अन्येपामध्यापनाय च सेयं भावानुज्ञा ६ ॥ सम्प्रत्यनुज्ञाया यतः प्रवृत्तिरस्यामवसर्पिण्यां प्रथमं जाता तदभिधित्सुः प्रश्नानि तावदाह- २९. किमणुण्ण ? कस्सऽणुण्णा ? केवतिकालं पवत्तियाऽणुण्णा ?। आदिकर पुरिमताले पवत्तिया उसभसेणस्स ॥१॥ २९. किमणुम्न गाहा । किमनुज्ञाख्यं वस्तूच्यते ? तच्च पड्विधत्वेन वर्णितमेव । कस्यानुज्ञा क्रियते ? यो हि गाम्भीर्य- धैर्य-क्षमादिगुणान्वितो भवति तस्येयं भवति । कियति च काले प्रवर्तिताऽनुज्ञा ? अवसर्पिण्यां तृतीयारकपर्यन्ते । केन प्रवर्त्तिता क? कस्य ? इत्याह-आदीत्यादि उत्पन्नज्ञानेनाऽऽदितीर्थकरेण भगवता 'उसमसेनस्य' पुण्डरीकस्य पुरिमतालनगरे 'अनुज्ञा प्रवर्तिता' अनुज्ञा कृता द्वादशाङ्गविपया शिष्यविपया ॥ १ ॥ इदानीमनुज्ञाया एकार्थाभिधायि गाथाद्वयमाह-- ३०. अणुण्णा १ उपणमणी २ णमणी ३ शामणी ४ ठवणा ५ पभवो ६ पभावणं ७ पयारो ८। तदुभय ९ हिय १० मजाया ११ णाओ १२ मग्गो १३ य कप्पो १४ य ॥ १॥ १ वियाह ल. ॥ २ वा इति खं० मुद्रिते च नास्ति ।। ३ तदुभयहिय ९ मजाया १० णायो ११ मग्गो १२ य कप्पो १३ य ॥ १॥ संगह १४ संवर १५ णिजर १६ ठितिकरण १७ चे जीवबुद्धि १८ पयं १९ । पदपवर २० चेष तदा जे० ल. मुद्रिते च ।। . ? ? 25 ? 30 लघुनन्दिः-अनुज्ञानन्दिः । १७९ संगह १५ संवर १६ णिज्जर १७ ठिइकरणं १८ चेव जीवबुढिपयं १९ । पदपवरं २० चेव तहा, वीसमणुण्णाए णामाई ॥२॥ अणुण्णानंदी समत्ता ॥ ३०. अणुन्ना० गाहा । [संगह० गाहा । ] आद्यगाथायां चतुर्दशानुज्ञाभिधानानि, द्वितीयायां पट्, सर्वाणि २० । तद्यथा-अनुज्ञा १ उनमनी २ नमनी ३ नामनी ४ स्थापना ५ प्रभवः ६ प्रभावना ७ प्रचारः ८ तदुभयं ९ हितं १० मर्यादा ११ 5 न्यायः १२ मार्गश्च १३ कल्पश्च १४ संग्रहः १५ संवरः १६ निर्जरा १७ स्थितिकरणं १८ जीतवृदिपदं १९ पदप्रवरं २० इति विंशतिः । एतेषां च पदानामर्थः सम्प्रदायाभावानोच्यते ॥ १-२ ।। 10 ॥ इति समाप्ता श्रीशीलभद्र-प्रभुश्रीधनेश्वरसूरिशिप्यश्री-श्रीचन्द्रमूरिविरचिता नन्दिटीकाया दुर्गपदव्याख्या ॥ [ व्याख्याकारप्रशस्तिः-] स्वं कप्टेऽतिनिधाय कष्टमधिकं मा मेऽन्यदा जायतां, व्याख्यानेऽन्य तथाविध सुमनसामन्पश्रुतानाममुन् (नामपि)। इत्यालोचयता तथापि किमपि प्रोक्तं मया तत्र च, दुर्थ्याख्यानविशोधनं विदधतु प्राज्ञाः परार्थीयताः ॥ १ ॥ दुःसम्प्रदायादसदनाहा, प्रकाशितं यद् वितथं मयेह । तद् धीधन मनुक्र-पयद्भिः, योध्यं मतार्यक्षतिरस्तु मैवम् ॥ २ ॥ ॥ ग्रन्थानम् ३३०० ।। Pणार. मरि ॥
जोगणंदी नाणं पंचविहं पण्णत्तं, तंजहा-आभिणियोहियनाणं १ मुयनाणं २ ओहिनाणं ३ मणपजव- नाणं ४ केवलनाणं । तत्य णं चत्तारि नाणाई ठप्पाइं ठवणिजाई नो उदिस्मिजंति नो समुधि- 5 सिजति नो अणुएणविजंति, सुयनाणस्स पुण उसो १ समुझेसो २ अणुगणा ३ अणुओगो ४ य पवत्तइ । 15 ३ जइ सुयनाणस्स उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुग्णा ३ अणुओगो ४ पवत्तइ किं अंगपविट्ठस्स उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ पबत्तइ ? किं अंगवाहिरस्स उसो १ समुद्देसो २ अणुष्णा ३ अणुओगो ४ पवत्तइ ? गो० ! अंगपविस्म चि उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुषणा ३ अणु- 10 ओगो ४ पबत्तइ, अंगवाहिरस्स वि उद्देसो १ समुहेसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ पबत्तइ, इमं पुण पट्टवणं पडुच्च अंगवाहिरस्स उद्देसो० ४ । जइ पुण अंगबाहिरस्स उद्देसो जाव अणुओगो पवत्तइ किं कालियस्म उद्देसो० ४?, किं उका- लियस्स उद्देसो० ४ ? गो० ! कालियस्स वि उद्देसो० ४ उकालियस्स वि उद्देसो० ४, इमं पुण पट्ठवणं पडुच्च उकालियस्स उद्देसो० ४। जइ उक्कालियस्स उद्देसो० ४ किं आवस्सगस्स उद्देसो समुदेसो अणुण्णा अणुओगो पवत्तइ आवस्सगवइरित्तस्स० ४ ? गो० ! आवस्सगस्स वि उद्देसो० ४ आवस्सगवदरित्तस्स चि उद्देसो० ४। जइ आवस्सगस्स उद्देसो किं सामाइयस्स १ चउचीसत्ययस्स २ बंदणस्स ३ पडिकमणस्स ४ काउस्सग्गस्स ५ पञ्चक्खाणस्स ६ ? सव्वेसि एतेसिं उद्देसो १ समुदेसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ य पवत्तइ। जइ आवस्सगवइरित्तस्स उद्देसो० ४ किं कालियसुयस्स उद्देसो० ४ उक्कालियसुयस्स उद्देसो० ४ ? कालियस्स वि उद्देसो० ४, उक्कालियस्स वि उद्देसो०४। जइ उकालियस्स उद्देसो० ४ किं दसकालियस्स १ कप्पियाकप्पियस्स २ चुल्लकप्पसुयस्स ३ महाकप्पसुयस्स ४ उववाइयसुयस्स५ रायपसेणीयसुयस्सद जीवाभिगमस्स७ पण्णवणाए ८ महा- पण्णवणाए ९ पमायप्पमायस्स १० नंदीए ११ अणुओगदाराणं १२ देथियस्स १३ तंदुलवेयालि- 25 यस्स १४ चंदाविज्झयस्स १५ सूरपण्णत्तीए १६ पोरिसिमंडलस्स १७ मंडलप्पवेसस्स १८ विजा- चरणविणिच्छियस्स १९ गणिविज्जाए २० संलेहणासुयस्स २१ विहारकप्पस्स २२ वीयरागसुयस्स २३ झाणविभत्तीए २४ मरणविभत्तीए २५ मरणचिसोहीए २६ आयविभत्तीए २७ आयविसोहीए २८ चरणविसोहीए २९ आउरपञ्चक्खाणस्स ३० महापञ्चक्खाणस्स ३१? सव्वेसिं एएसिं उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ पवत्तइ । जइ कालियस्स उद्देसो जाव अणुओगो पवत्तइ कि उत्तरज्झयणाणं १ दसाणं २ कप्पस्स ३ चवहारस्स ४ निसीहस्स ५ महानिसीहस्स ६ इसिभासियाणं ७ जंबुद्दीवपण्णत्तीए ८ चंदपण्णत्तीए 20 . 30 जोगणंदी। १८१ ९ दीवपण्णत्तीए १० सागरपण्णत्तीए ११ खुड्डियाविमाणपविभत्तीए १२ महल्लियाविमाण- पविभत्तीए १३ अंगचूलियाए १४ वग्गचूलियाए १५ विवाहवूलियाए १६ अरुणोववायस्स १७ वरुणोववायस्स १८ गरुलोववायस्स १९ धरणोवधायस्स २० वेसमणोक्वायस्स २१ वेलंधरोववा- यस्स २२ देविंदोववायस्स २३ उट्ठाणसुयस्स २४ समुदाणसुयस्स २५ नागपरियावणियाणं २६ निरयावलियाणं २७ कप्पियाण २८ कप्पवडिसियाणं २९ पुफियाणं ३० पुप्फचूलियाणं ३१ [वहि- : याणं ३२] वणिहदसाणं ३३ आसीविसभावणाणं ३४ दिद्विविसभावणाणं ३५ चारणभा०३६ सुमि- णभा० ३७ महासुमिणभा० ३८ तेयग्गिनिसग्गाणं ३९ ? सव्वेसि पि एपसिं उद्देसो जाव अणुओगो ४ पवत्तइ । जइ अंगपविट्ठस्स उद्देसो जाव अणुओगो पवत्तइ किं आयारस्स १ सयगडस्स २ ठाणस्स ३ समवायस्सं ४ विवाहपण्णत्तीए ५ नायाधम्मकहाणं ६ उवामगदसाणं ७ अंतगडदसाणं ८ अणु- 10 त्तरोववाझ्यदसाणं ९ पाहावागरणाणं १० विवागसुयस्स ११ दिहिवायत्स १२ ? सच्चेसिं गएसि उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ पचत्तइ, इमं पुण पट्टवणं पडच इमस्स साहुस्स इमाए साहुणीए उद्देसो १ समुद्देसो २ अणुण्णा ३ अणुओगो ४ पवत्तइ खमासमणाणं हत्येणं सुत्तेणं अत्येणं तदुभएणं उद्देसामि समुदेसामि अणुजाणामि ॥ ॥ जोगणंदी समत्ता ॥
आचार्यश्रीविमलसरिशिष्यश्री-नन्द्रकीनियरिधिनि याकिनीमहत्तरावर्गस नुश्रीहरिगदर रिपणीतायाः नन्दिसूत्रवृत्तेः विषमपदटिपनकम् ॥ 5 10 " 15 - नमो जिनाग ॥ [ पृष्ठ १] पं. २. जयतीति जेतव्यजयेन विजयते । पं. ९. ऐकान्तिक इति नैयायिकः। आत्यन्तिक इति अत्यवच्छेदपरः । पं. १२. माय इति मापतुपादिभिर्व्यभिचारो मा भूदिति प्रायोगहणम् । [ पृष्ठ २] पं. ३. यस्येति इश्व अश्च यं तस्य । पं. ४. नन्दन्त्यनयेति समृमिमाप्नुवन्ति । पं. १७. आगमतो भावनन्दी(न्दिः), आगमत इति गमनं गमः-परिच्छेदः, आ-सामस्त्येन गम आगमः तस्माद् आगमतः । [पृष्ठ ३] पं. १३. न अज्जावेयव्वा वुद्धया, न परिघेत्तव्या सरने, न परितावेयन्वा रुमः, न उदवेयव्वा विनाश; समेच विज्ञाय, खेयन्नेहि खेदज्ञैः । पं. २४. इङ्गनेति संज्ञा । [ पृष्ठ ७] पं. २४. वेदिका-जलान्तररमणलक्षणा, वेदिका-जलयोरन्तरे यद् रमणं तल्लक्षणा जलवृद्धिलक्षणा वा वेदिका पर्यवसानं मर्यादा वा वेलेति । [ पृष्ठ ८] पं. २१. उज्ज्वलानि सप्रकाशानि । चित्यते-संज्ञायते । [पृष्ठ ९] पं. ११. समवायाः साधुवृन्दानि । पं. १३. संवरः अम्भसां प्रसवः । पं. १४. उज्झरमिति निर्धारणम् । पं. १७. कुहराणि पर्वतदेशाः । [पृष्ठ ११] पं. २६. गो. २७. पेयाला विचाराः । [ पृष्ठ १२] पं. ९. वोधानां श्रद्धानाम् । चरणपरिग्रहः गुणशब्देन वा । [ पृष्ठ १३] पं. १४. फिडियाणं निर्गतानाम् । पं. १८. संधरे सन्धृतः-जीवितः । [पृष्ठ १६] पं. १२. उल्लेऊण आर्द्राकर्तु-जलेन भेत्तुमिति । पं. १३. रविउ ति द्रवित [इति] | उल्लो मि न व त्ति 30 मार्दोऽस्म्यहं न वेति । पं. १९. इमो गमो इति प्रकारः । छिड्ड इति बुध्ने, भिन्न इति कण्ठे, खंड इति कण्ठैकदेशे। पं. २२. तावसखउर इति तापसानां भोजनादिनिमित्तं उपकरणविशेषः खउरकठिनकमुच्यते, वंशीपत्रमयं पुटकमिति लक्ष्यते । परिपूणग इति सुघरीरचितो नीडविशेषः । पं. २४. कूचिया चरेडिकाः। सङ्कुचिताङ्गः । पं. २९. जियमिति परिचितम् । 20 25 १ . पं. २६. सुढिओ पं.१०. 10 श्रीहरिभद्रसूरिप्रणीतायाः नन्दिसूत्रवृत्तेः विषमपदटिप्पनकम् । १८३ [ पृष्ठ १७] पं. ५. पुयजुज्झमिति अधिष्ठानिकामुद्घाट्य पुताभ्यां पराङ्मुखीभूय । पं. ८. विचामेलियमिति व्यत्यानेडितः । [ पृष्ठ १८] पं. ३. तदेवेति ज्ञानमात्मानं जानाति । ननु कथमेक एव कर्ता कर्म वा ? इति मेदादिति । कुव्याख्या० विध इत्यकारान्तोऽयमित्यत्य । पं. १९. तन्मयं अभिनिवोषस्य विकारः मनत्वेन परिणमिताः [ पुग़लाः]। 5 [ पृष्ठ १९] पं. १६. आदेश त] इति, आदेश:-प्रकारः, स च सामान्यतो विशेषतच, सामान्यतो द्रव्यजाति जानीते, विशेषतो धर्मास्तिकायत्तस्य च देश इत्यादिविभागं जानीते । पं. १८. विशिष्ट इति विशिष्ट एव कश्चिद् मतिविशेष एव श्रुतम् । पं. ३०. सामान्येन इति मनोवर्गगाविशेषतो विशेषो यत्याः । [पृष्ठ २०] पं. १०. अपर इति न परम्-अक्षादि निमित्तं यस्य, द्रव्यं मनश्चेत्यत्राच्याहारः, कृतः(अतः) परत्वमनयोः । [ पृष्ठ २३ ] पं. १५. अपवरकादिशालान्तरस्थप्रदीपप्रभानिर्गमस्थानानीव अवधिज्ञानावरणक्षयोपशमजन्यानि भवधिज्ञाननिर्गम- स्थानानींह फडकानि उच्यन्ते । [ पृष्ट २६] पं. २७. नान्य इति किं त्रिसमयाहारकोऽत्र गृह्यते ? अत्रोत्तरम् । [ पृष्ठ २८] पं. २४. द्रव्यं भाज्यमिति अवस्थितेऽपि हि द्रव्ये तथाविधक्षयोपदानवृदी पयांया वन्त एव । अत्रामवर्तिनामिति एककालवर्तिनां रूपादीनाम् । ननु यदि व्यवृद्धी यन्ते ततः पर्यायानां ममतवान् कादिः कथं न भवति ? उच्यते-कालवृद्धीयादि । [पृष्ट ३३ ] पं. ७. उत्पत्तिस्वामीति उत्पत्तेः स्वामी तरय मार्गगा दायतु । ६.६४. आगामेनानि जनितमी । [पृष्ट ३४ ] पं. २१. घटोऽनेन चिन्तित इत्यादिना दर्शितरूपः । [पृष्ट ३५] पं. १७. मन्तार इति चिन्तकाः मन्येरन् चिन्तः । ६. ८. भिमाग ri फिलोत्तम् । तत्र चेति चतुर्विधदर्शने । पं. २८. संबह (हो [ पृष्ट पं. १३. तदायुप्त इति भागामिभयः । पं. ६६. वादन पं. २५. वध्यमान इति तारतम्येन । [E पं. २८. [ ? सयोगीति) सह योगेनेति-जी या पं.२५. पं. १६. नोतित्यसिद्धाति प्रमाण । ९.:. निदा राति सामान्य परिपुरपाः । पं. ६.८. नर नरक!
कर 10 १८४ भी नाम गिर्मिन [१] पं. २. मिथ्यावरण इति ज्ञानावरणादियो विहितः स मिया नियमान. PEPPE: लोपयोगयोः पुनरप्यभावात् । [१३] पं. १५. सूत्रक्रमोदेश त] इति नन्यादिसून इयमेवोपयग्नम् । पं. १९. मेनोपनार न केवलजानाभेदेऽपि व्यभिचार इति, न केवलमुभयपदव्यभिचारे यथा नीलोत्पलम् । पं. २६. अगम्गेनि सगरमागरमासान नात् । [ पृष्ठ ४४ ] पं. ६. निवन्धनत्वादिति वाक्परिरपन्दस्य । [पृष्ट ४५ पं. १६. नाणाणऽनाणाणि य समकालाइमित्यादि, न तूपयोगो इति रागकालः । पं. १९. कन्जतया निषेध इति । पं. २१. भेदा (द) भेदादिति भेदानां भेदः । पं. २३. सोइंदिय इति भावशुतगतः । अविरलंभ इति यथा गन्धं गृहीत्वा सुरभिअक्षरग्रहणम् । सेसेमु इति इन्द्रियेषु । पं. २६. आवरण इति गनिज्ञानावरण-शुतज्ञानावरण । [पृष्ठ ४६] पं. ६. सदसतोरविशेपादिति स्यात्पदवैधुर्यात् । पं. ७. द्रव्यत्वेन मिन् दिद्विरस इति सर्वो बोधोऽज्ञानम् । 15 पं. ९. देवादिधर्ममिति देवतत्त्वम् । पं. १९. औत्पत्तिक्यादि इति प्रातिभमिति हृदयम् । [ पृष्ठ ४९] पं. १४. अविच्युति-स्मृति-वासनारूपा [१] । पं. २८. न पश्यतीति चक्षुः कर्ट । नालम्बत इति मनः कर्तृ । [पृष्ठ ५०] पं. १६. श्रूयतेऽनेनेति अत्र व्युत्पत्ति द्रियते किन्तु अर्थमात्रम् । [पृष्ठ ५१] पं. १३. अपाय इति सामस्त्येन परिच्छेदः । [ पृष्ठ ५४ ] पं. ६. द्रव्यं व्यञ्जनमिति द्रव्यादिविपयपरिणतपुद्गलसमूहरूपम् । पं. ७. स्वविपयव्यक्ताविति ग्राहकज्ञानजनने । पं. ९. तमर्थमिति व्यञ्जनार्थम् , इन्द्रिय-मनोव्यापारणालम्बते इत्यर्थः । पं. १०. कल्पनारहितमिति एतच्च "ताहे 25 हुं ति करेति" [ सूत्र. ५८. पत्र. ५३ पं. १५ ] इत्यस्य व्याख्यानम् । पं. १४. अथवा यदुक्तं इत्यादिकपातनिका- द्वयस्य व्याख्या। १७. अव्यक्तमिति शब्दोऽयं रूपादिर्वा इत्यादिप्रकारेण वक्तव्यम् । स्वरूप(पं) नामादीति आदि- शब्दाद् जाति-क्रिया-गुण-द्रव्यग्रहः । पं. १८. तस्य चेति अर्थावग्रहस्य । पं. २३. नैतदेवमिति सूरिराह । पं. २५. शब्दबुद्धया इति शब्दोऽयमित्यध्यवसायेन। तस्यैवेति अर्थावग्रहं विनैव शब्दमावत्यैव । पं. २८. जइ एवमिति पर आह । जं इति यन्नन्धध्ययनप्रोक्तं तेन इत्यादि । [ पृष्ठ ५५] पं. १५. अन्यत्रापीति स्वप्नादन्यत्र सान्धकारापवरकादौ । [पृष्ठ ५६] पं. १. पंचोदइयाइया इति औदायिकौपशमिक-क्षायिक-क्षायोपशमिक-पारिणामिकाः । जं नेयमिति यतो ज्ञेयमेताव- देव। पं. २. तद्भा(१०मा)वनया इति श्रुतोपयोगमन्तरेण तद्वासनामात्रत एव । 20 A 30 श्रीहरिभद्रसूरिग्रणीतायाः नन्दिसूत्रवृत्तेः विषमपटिप्पनकम् । १८५ [ पृष्ठ ५८] पं. १. स्तोकद्रव्यतादिति शब्दद्रव्यापेक्षया गन्धादिद्रव्याणि स्नोकानि । विनिश्चिनोति इति प्राणादि इन्द्रियं कर्नु। पं. ४. तद्योग्य इति भाषायोग्यः । पं. ६. क्षेत्र इति आकाशम् । पं. १२. परापाए(ते) इति वासनायां सन्याम् । [ पृष्ठ ५९] पं. २६. यत्तद्वावरणक्षयोपटामो यश्च तज्ञानोपयोगश्च एतौ वायपि लभ्यक्षरम् । [ पृष्ट ६० ] पं. १. एवं शेषेष्वपि इति घट-कपर-कर्करा-हंसतूली पु। पं. १५. व्यापार इति उच्च्वसितादिः । पं. २७. कालिवयुपदेश इति संज्ञिश्रुतव्यपदेशः । [ पृष्ट ६१] पं. २८. न सन्ति लोका इति "अपुत्रत्य गतिनास्निः" इत्यादि । [ पृष्ठ ६३] पं. २३. भग्गा इति ये भन्नाले न निधानगताः । निचुया इति वर्तमानकाले मुखिनः । [ पृष्ठ ६४] पं. ३. आवारम्मि इनि आचारनियुक्ती । [पृष्ट ६५] पं. १५. अधिकारवशादिति प्रतिपक्षसम्बन्धशादिनि । ६. २२. अधिकृनम्ति सापतिमानमा । [पृष्ठ ६६] पं. १८. गु(न)डियाणि नीनानादीनि । पं. २०. आगम: । ६. २१. मग ग इति दशातिरिक्तेषु । पुणभवरहिया नि गन्चा घुनढुंगलबालिका २ : 1. पं. १६. गति-पित्यावीच त्य-क्षेत्र-काल-मा:: [६८ पं. ९. नोनजो)यमिनि पदागिता: । ::: पं. १०. अक्षरम्यति नवपर्यायपरियामा | ६. २२. अन एवेति प्रकल्गाद अपि । - , Pr । ... . ३. चपर्शयविदोषण : ६. ८. नमितानि.... पं. ... गायनमिति का नि। ५. . दिन १८६ श्री.नकीर्तिरिविनिर्गन 5 पं. २९. व्यूह- 15 [ पृष्ठ ७३ ] पं. ४. समाणे इति सन् । पं. ७. अंतदिए इति आकाश गर्गः । पं. ११. सिंगनाइयांगनि सहकार्यम् । पं. २७. सृष्णिदशा इति अवरथाः । [ पृष्ठ ७४] पं. २०. तच्छिप्यभाव इति शासनप्रणेतृतीर्थकरः । [ पृष्ठ ७५ ] पं. १७. इह चेति अथवा आचारगोचरविनयेत्यादौ । [पृष्ठ ७६] पं. ९. प्रतिपत्तय इति मतान्तराणि । पं. १४. महापरिन्नोवहाणमुयं इति पढमो सुयासंधः (धो)। 10 पं. २९. सपंचचूलो इति द्वितीयश्रुतस्कन्धे पञ्च चूडाः । पं. ३०. आयारग्ग इति चूलादिकम् । [ पृष्ठ ७७ ] पं. ८. निकाचिता इति प्रतिष्ठिताः । पं. २८. सव्या उच्यते इति द्वितीयमेवाङ्गम् । मिति तिरस्कारम् । [ पृष्ट ७८] पं. ५. ईश्वरकारिण(कारणिन) इति “अज्ञो जन्तुरनीशः स्यादात्मनः सुख-दुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गन्छेत् श्व_ वा स्वर्गमेव वा ॥१॥"। पं. १०. पूर्ववदिति व्यूहं कृत्वा निवार्य । पं. २६. उत्पत्तेरिति अग्रेतनानां त्रिविकल्पानाम- सम्भवात् । पं. २७. सत्त्वमिति जीवः सन् , ततः किम् ? इति विकल्पा: कार्याः । पं. ३२. अवमः लवुभ्राता । [ पृष्ठ ८१] पं. १९. ते दट्टन्या इति अर्थाधिकारसमूहात्मकान्येवाध्ययनानि दश वर्गा द्रष्टव्याः । पं. २४. एवं ठिए इति 20 प्रथमश्रुतस्कन्धवक्तव्यतायां भणितायाम् । पं. २८. अति(इ)गा इति अतिगच्छन्तीति । [ पृष्ठ ८४ ] पं. १६. साह(.)ति इति शुभा-ऽशुभम् । [ पृष्ठ ८५] पं. १७. इदं प्राय इति प्रायोग्रहणेन प्रथमानुयोगमात्रस्यास्तित्वं तत्काले सूचयति । [ पृष्ठ ८७] पं. ६. चिंताए वि इति चिन्तायामपि । [ पृष्ठ ८९] पं. १६. छंदकिरिया इति छन्दः-शार्दूलादि करोति । [ पृष्ठ ९०] पं. १५. पउप्पए पच्छोपके । सगरसुयाण इति पर्यन्ते, यतः सगरस्य जितशत्रुः भ्रातृजः । ॥ इति नन्दीविपमपदपर्यायाः समर्थिताः ।। 25 30 १ प्रथमं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रान्तर्गतानां सूत्रगाधानामकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका । गाथा सूनाक गाथा गाथा गाथा गाथा: ५१: . و ५ ५३ पदमेत्य इंदभूती परतिषियगहपहाणा- पुसणेति गह [नाव नि गा ..] पुग्ध अमिनुभम [आव. नि गा ९३९ याम एकामे ४७ ७३; ८१ १ । २ ८३ काले चह बुद्धी २१ [आव. नि. ना..६] ११८ ३८ किमगुग? कस्सऽशुण्या? १.७८ [अनुज्ञानन्दौ] केवलणाणेणऽन्ये [आव नि. गा. ७८ ] खमए अमन्चधुने पं. ६ [आव. नि. गा. ९५०] गुणभवणगहण : मुय- चत्तारि बालस अह १०९ चलणाहण आमं [ आव. नि. गा. ९५१] जगंजगधारसम- जय जगजीवोणी- १ जयट मुयाणं पात्रो जसभर नुगिय को जायनिया निम्मया- ७७; [आय नि गा पं. जीवदयानंद:- ताण, भग गि मो : गिक शामा ४२ र नि... .. ४७ : band अक्सर सप्णी सम्म १२० [आव. नि गा १९] अद्दभरहप्पहाणे अणुमाण हेड-दिटुंत- [आव. नि गा ९४८] अस्थमहत्यक्खागो ६ अत्याणं उगहणं ६० [आव. नि. गा] १५० अभए सेधि कुमारे [आय. नि. गा ९४९] अयलपुरा णिक्यते ६ अह सबदव्यपरिणाम- [आव नि. गा. ७७] अंगुरमावलियाण [आव. नि गा ३२] यागममत्थन्गहणं [आव नि. गा २१] ईशा अपोह वीमंसा ६० [आव नि. गा. १२] १५२ उगह दावाओ [आय नि गा. २] ११९ उगी एवं समय [आर नि गा १] रपतिया चणत्या साप. नि. गा ९३८] उपागनिसारा [भाद. मि गा. ९१६] उत्सवं जीरासिन भाद मि गा..] एमोस ३ " " t..... ४ . . पं. २८ . बाद" : . . . . .
१८८ गनीमतगतमामानामा: :: : । । गाथा २ १६ ... " ४५ विणयणयपवरमुणिवर. विमलमणंतद धम्म ३ सम्मईसणवइरदाट- सव्यवहुअगणिजीवा २४ [आव नि. गा. ३१] संखेजम्मि उ काले २४ [आव नि. गा. २५] संगह१५ संवर १६ णिजर १७ १७९ [अनुज्ञानन्दौ] संजमतवतुंचारय- में : ITIE [t.नि. मा ३६) मावगर- सीया सागीश्रीन [भाव नि गा. ९) सुकुमालगोगला ཙ: ; ''བཅ} [आय नि मा. २५] सुमुणिगणितानि मस्रामा पनि [आव निगा २२] ५८ [is नि. गा ३१ १ ६ २६ . ५ [भा नि. गा ५५० २ द्वितीयं परिशिष्टम् नन्दीहारिभद्रीवृत्ति-तर्गपदव्याख्या-लघुनन्दिवृत्त्यन्तर्गतानामुद्धरणाना- मकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका । उमापाव पत्र-पति आइनसाइ जिवे १६९-दिपाली लाइमलाइंग ༤iཏུན་ १३-१ [वि. मा. १४७९, कपमा ना. ३५९] बाबास्क तमा सकर्तरि च ७१-१२ १८-१ मानसोनम [...] १७-१४: २८-६ مس [वि., ..] ran ii. •j पत्र पति उद्धरणादि पत्र-पहिल असणत्तरि चटवीसा ९१-० अने ण व वो, अटणत्तीसं वारे [विशेषणवती गा १५४ ] ११२-१३ अन्ने मन्नंति मई अक्खरलंनेण समा १६९-१६ विशेषा गा. १५४] [विशेपा गा. १४३] अन्यथाऽनुपरमन्त्र ४८-३२ अचित्ता खलु जोणी १००-७ [न्यायविनिश्रय का १२३] १८५-१३ [जिन संग्र ‘गा. ३५९., जीवस. गा ५६] अपुत्रस्य गतिनास्ति अजायतटाप १८-७ अप्रशान्तमती गाल- १०२-२० [पा. ४ १.४] अभंतरावही नाम जन्य अनः मुखमाराध्यः १1१-१ [आवश्यक. दिमाग १ पत्र] [भर्तृहरित्रिशती १२] अशआदिभ्यः अनो जन्तुरनीशः स्या- १६४-१८ [पा ५ २ १२७] अटेगट्टिभागा अवि गोपम्मिवि पिए:-२६:10.-८ १६२-११ अणिनूदियबलविरिओ [विशेषा. गा. १४६९, कन्दम .:::. अण्णो दोजिसदि कटं १६-३०; १०७-२१ শনি [विशेषा गा. १४७३, यल्पभा गा. ३५३ [विशेपा गा २५ अन पनि उनी ६९-२० [पा धार १५: [पा. .. २. ११५] अतिम १ इटिट २ आयरिय : [पा. भाव १६..] [निशीधभा गा ३३] असाय:: AIET:- मातीतानागनान् भावान् अग: कार - अत्यंभाग सरा १८-५२ [यो ग . (जाय नि. गा ..] सपशवः प्रमिया-प्रया- मपासाय नसन्ति लोदा: सनगनगनोदरता प्रगमा १७५] मामामागमः पयोगी योग : 1. म अग भोजन , T अश्रु ग्यामा ~~ ... .. : 4 । । . ...
नन्दीसूत्रत्यागन्तर्गतानागुकारणानागकागनिजामः । १९० कर्मण्यण . उद्धरणादि पत्र-पणिक उमरणानि इहराऽऽदी-णिधणतं ४०-२९ पहोइ अगारते [विशेषणवती गा. १९४ ] diཙཀ ཀུnm*7 इह लद्धि-मइसुयाई १२९-१८ ओस पिणीए पलो [विशेषा गा १०८] कजतगा, ण तु कमसो १५-१६; १३... इह हि प्रमत्तमनसः ७१-१३ [विशेषा. गा. ११०] इहाधोलौकिका ग्रामा ३६-१० कति ण भंते ! एगिदियाणं ६१-२५ ईर गति-प्रेरणयोः ४-९ कम्गे सिप्पे विजा य उत्तमनरमाऊणं १००-२३ [आव. नि. गा. ५२७ ] उत्पद्यते च पनकः २६-२३ ११२-१२ उदय-क्खय-क्खयोवस- २२-४ [पा ३ २ १] [विशेषा. गा. ५७५, धर्मसं. गा. ९४९] कनुमफलेण ण जुजइ ६२-११ उपमितं व्याघ्रादिभिः ५-१८ [विशेषा. गा ३२६५] [पा. २. १. ५६] क-वे पात्यानि १०१-१५ उरल-विउव्वा-ऽऽहारे १२१-टि १ कस्स व णाणुमतमिणं ४३-६ [विचारसप्ततिका गा ४४ ] [विशेषणवती गा. २४६, विशेषा. गा ३१३२] उल्हेऊण न सको १६-१२, १०२-२९ कहि ण भंते ! सम्मुच्छिम ३३-१९ [विशेपा गा. १४५५, कल्पभा. गा ३३५] [प्रज्ञा. पदम् १ सूत्रम् ३६] उवउत्तरसेमेव य ४१-२६ काय-बाङ-मनःकर्म योगः ३७-२५ [विशेषणवती गा. २०६] [तत्त्वा ६. १] उवओगो एगयरो काया वया य ते चिय १०६-८ [विशेपणवती गा. २३२, विशेषा. गा ३१२०] [कल्पभा. गा. ४९७९] उवभोग-परीभोगा जम्म- ६६-१४ कारण-कनविभागो १५६-४ उवभोग-परीभोगा तेसि ६६-२४ २७ काले १ विणए २ वहुमाणे ३ ७५-२० उवभोग-परीभोगा पवरो ६७-१ [ दशवै. नि. गा. १८६] उपयोग-सर-पयत्ता ६७-१४ किह पडिकुकुडहीणो १३२-७ [विशेपा गा. ५४७] [विशेपा. गा. ३०४] ऋपयः संयतात्मानः ६३-२६ किचिम्मत्तग्गाही १७-२४ पएसु य अन्नेसु य ६६-२१ [कल्पभा. गा. ३६९] ९१-१ कुप्पवयण ओसन्नेहिं १६-१८; १०४-१६ एग चउ सत्त दसगं ९०-२७ एगिदिय-नेरइया १००-१६ [विशेपा गा. १४६१, कल्पभा. गा. ३४१] [जिन. संग्र गा. ३५८, जीवस गा. ४५] कृत्यल्युटो बहुलम् १-२४, ६-३१; एगुत्तरा उठाणा ९०-१९ [पा. ३ ३. ११३] एगेण विसइ बीएण १६-२१, १०५-७ कृदिकारादक्तिनः २-१ [विशेपा गा. १४६५, कल्पभा. गा. ३४४ ] [पा वा. ४ १. ४५] एतं तु कालच; ६७-५ कृमि-कीट-पतझाद्याः १५३-३० एत्तो न किलिट्टतरा ६७-३ [ नन्दिचूर्णि पत्र ४८] एवमसंखेजाओ ९१-७ कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात् ११६-१४ एवं चिय मुमिणादिमु ५५-९, १४८-१८ केई भणंति जुगवं ४०-१५ [विशेषणवती गा. १५३ ] ११२-१८ [पा गा. ८५ को माउरग माली 1.8-10 [निगीनमाय गा १०] कोगुढगा ? गंगामिग २ ११-३,१०८-17 [रिशेगा. गा. १५७६, कल्पमा गा. ३५६] होतं लोगा-जोगं १६-१:१५९-१२ [विशेषा. गा. ४०४] गणपरकगगगगगं गावीए पुण दिन ११९-१३ गुण-दोसविसे राण्णू १७-१८ [कल्पमा. गा ३६५] गोखियोरुपराजनस्य १८-९ [पा. १. २. ४८] चउ तिय चउरो दो दो चड वारमऽदरा या ९३-४ चउभाग चडव्भागो १२४-३ चतुर्थी चाऽऽशिष्याऽऽयुष्य- [पा. २ ३ चत्तारि विचित्ताई चत्तारि सागरोयम- चरियं च कप्पियं चिय १०४-१ [ पिण्डनि. गा. ६३०] चित्तरत्नमसंक्लिट- ८-२५ चोस दस य अभिण्णे १५५-८ [विशेपा. गा ५३४] चोद्दस लक्खा सिद्धा ९०-१६ छउमत्थाणं सन्ना १५४-१७ [विशेपा गा. ५२४] छउमत्थे णं भंते! मणुस्से १२५-२६ [भगवतीपत्र ७५५] छंद भूमीए १६-२८१०७-८ [विशेपा. गा १४७१, कल्पभा. गा ३५१] घण्ह वि सममारंमे १२१-टि.१ [विचारसप्ततिका गा. ४६] जगन्ति जमान्याहु- २-३१ जतिं सद्दबुद्धिमत्तय- ५४-३०; १४६-२६ [विशेषा. गा. २५४] ७३ ] एकारस तेवीसा नन्दीसूत्रवृत्त्याद्यन्तर्गतानामुद्भरणानामकाराविक्रमः । १९१ उसरणादि पत्र-पदिक तारसबउरकठिन १६-२२,०५-२२ [वि. गा. १४६५, कालभा. गा.:१५) ताहे बिजनराए निन् ३ महन्मायो नित्यं भंते ! निलं? [भग. ग. २३ द. ८ . ६८] नियगाइविडसाराम .१२-२७ उद्धरणादि पत्र-पदिल ज्ञानमप्रतिष यत्य :-४ टुगदि समृद्धी १-१८ [पा. पा. पा. ६७] ठिइबंधु दलस्त ठिई २६७... [पदसङ्ग्रह गा. ४३२] ण णिहागगया भग्गा ण दुघरं तोडिय अपिडी १.८-२४ णवयंभचेरमडओ ७६-२.. [आचा. नि. गा. 1१] पाणम्मि दंसम्मि य [विशेषणवती गा. २२९. विशेषा. गा. ?...] जाणाणण्णाणाणिय [विगंधा. गा. 10.] पातिविमिठो र यो णिस्मंकिय १ निपनिय [दर्य गा. १८१] पेहि जिओ मिनि बह:-:०८-३ [ब्रिगपा. गा. ११:८ मा .:. ८ ? तज्जन या [गणिनिया ग .. [आर. भादगा. १३० पत्र 100] तीर पुन किमी वीए पुरिगामा ती, पुरिगामा निहित की पुरिनमा होमि .:: उद्धरणादि पत्र-पति वह किर खीणावरणे ४२-१८ [विशेषगवती गा. १५५] वह जुगवुप्पत्तीय वि [विशेषगवती गा. २१९] जह दुबयणमवयणं १५४-१२ [विशेपा. गा. ५२०] जह पासइ तह पासठ [विशेषणवती गा १९२] जं केवलाई सादी ४०-२५ [विशेपणवती गा. १९३] में सामि-काल-कारण- ११३-४ [विशेषा. गा. ८५] जा खलु अभाविया कु.. ११०-२६ [कल्पमा. ना. ३६८] जाणति वझेऽणुमाणाओ [विशेषा. गा. ८१४] का पहासमखा जावल्या तिसमया- [ आय. नि. गा. ३०] जायण एस जीवे एयइ वेयर ४-२६ [भग. ग. उ. सू. पत्र जाव य रखा चोहस ९.-१८ जि जये १-१६ जिगंवरे साहुबोच्छेओ [आय. नि. गा. १६५] जीदादीनां वृत्ति- जगवमजाणतो चि [विशेषणवती गा. २१६] गव पि समुप्पन in जागति से गव्यं सानागा ५.१ अ.३ उ. सु.] : अस्तिथा उ उ. खोपनि, गा. ५३ पातलमानिया पर मा... ११६. मा. ना. १६ कार : स .. मा. १६८-टिप्पणी ":. ::: ] . नमिागविधि गणारगम [दिया . . मी ाि म. २ [fe". ..... M .. T .
- .. , . , 17-10 १३२-14 १२०-२० मस ग तुदं जयादिएहि १६-२७,१०७--- [विशेपा. गा १४७०, कल्पभा. गा. ३५० विशेपा. गा. १४८१, कल्पभा. गा ३६१ [विशेषा. गा. १४८०, कल्पभा. गा. ३६ १९२ ना उदरणादि पत्र- दुर्गतिप्रमतान् जीवान दृष्ट्याऽप्यालोक नैव विधम्भितल्यं [R: ...? देवसयणिजसि देवदूसंतरिए १००-१८ देवागम-नभोयान- ६३-१६ पन : [आप्तमीमांसा का.१] [HITE. मा. देसन्नाणोवरमे पाइयो [विशेषणवती गा. १५६] (शिका मा १५... ना. गा. 3:21 दो लक्खा सिद्धीए पागयभामभिः [मा. 211 दो वारे विजयाइमु १९-१४ [पमा गा. १३..] [विशेपा. गा. ४३६] पावगं २ २२ धर्मशास्त्रार्थवैतथ्यात् १०२-२१ पासको नि जाप नम्मि तु छाउमथिए नाणे १५६-२४ [निगेनी गा. २१:] [ III. 1. गा. ९ .१] [ आव. नि. गा. ५३९] १२१. पिहु पि अगंगगम:- गोजाना नत्थि नएहि विहणं १७२-२९ नमिऊण जिणवरिदे [विनारसप्ततिका गा. ४५] [म. . १ स. २२) ११९-११ सभा मा मत पिजविसोही समिती [उपदेशमाला गा. १] न वि अस्थि न वि य होही [ ओघनि. गा ३] माग गरे ना १६-१६% १०१-१ १०४-२ [अनुयो. पत्र २३२, उत्तरा. नि. गा. ३०९] पिंटस्म जा विसोही [संपा. गा. ११५९, कल्पभा. गा. ३३९) [व्या भा पी. गा. २८९] भवाय मागिनोना नाणमवाय-धिईओ १५५-२० पिंडेसण १ सेजिररिया ३ [विशेपा. गा. ५३६] मता कोशनि 11८-२०:११९.३२:१५१-१ मजा किराय कगाया नाम्युपधत्वात् १२३-२३ [ कातन्त्र ४. २. ५१] [आवश्यकसग्रहणी हारि. गृत्ति पत्र ६६०-१] गदा पितुं तुजा पिता निग्गंथ सक तावस ७५-११ पुणरवि चोइस लक्खा मणियंगेग य भूगण- [पिण्डनि गा. ४४५] पुरुष एवेद सवं मतिपुटर अंश मुय नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा [ ऋग्वेद मं. १० सू. ९० [विशेषा. गा. ८६] ४१-६, १२५-७ [प्रमाणवार्तिक ३-४] पुव्वभणियं पि जं वत्यु १०६-१४ मत्तंगगम मज मत्तंगया १ य भिगा २ निवृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् पुचि मुयपरिकम्मिय-पुव्वं मुं २०-२५ १३२-१ [ तत्त्वा. २. १७ ] [विशेपा. गा. १६९] १४९-२४ नेगम संगह ववहार १३२-३१ प्रत्ययस्थात् कात् पूर्व- १७-१५ नोदवानर्थितामेति २२-२५ [पा. ७ ३. ४४] मा णिण्य इय दातुं पगतीमुद्ध अयाणिय १७-२१ प्राणा द्वि-त्रि-चतुः प्रोक्ताः १००-२५ [कल्पभा. गा. ३६७] प्रायश्चित्तं विनयो मा में होज अवष्णो ५-२६ फलप्रधानाः समारम्भाः [विशेपा. गा. १४७४, कल्पभा. गा. ३५ [प्रशम. आ. १७२] ३९-२२ मिच्छत्ता संकंती पणिहाणजोगजुत्तो ७५-२८ [बृहत्सं. गा. ३३३] [कल्पभा. गा. ११४] [ दशवं. नि. गा १८७] बहुवयणेण दुवयणं ५७-१२ मिस्सत्तं जोणीए पणुवीस कोटिसयं ८१-२८ वारसविहम्मि वि तवे ७५-३१ मीसा य गन्भवसही परिहरणा होइ परिभोगो १६६-११ मुकं तया अगहिते पल्लवग्राहि पाण्डित्यं ११०-३० बाल स्त्री-मुढ-मूर्वाणां १०६-१३ २-११; १७१-1 - १३७- १९-२ •] १७-८११० . १७-१, १०८ पञ्चाश्रवाद् विरमणं बत्तीसा १ अटयाला २ ३४-१३; १२१- १०० १०० [ दशवै. नि गा. १८८] १७-७; १०९- नन्दीसूत्रवृत्त्याद्यन्तर्गतानानुरणानामकारादिक्रमः । १९३ शूर वीर विक्रान्ती उदरणादि पत्र-पदिक मोहा-उउउगवजाणं ४-२९ [पदा १६ गा. ४१] मौ यो पमाऽव- १६२-१ [जयदेवच्छन्दः अ६ सू. १७ यद् यस्तुनोऽभिधानं ६७-टि. १ या प्रयान्ति पुरुषाः ७१-१० यस्य [पा ६.४ १४८] यः समः सर्वभूतेषु यः माध्यस्योपमाभूतः १९-१ उद्धरणादि पत्र-पटिस शरणादि पत्र-पहिस व्याख्यानयन्ति केचित् ३-२५ सर्वतोऽस्मियादित्येक [नन्टिहरिभद्रवृत्ति] [पा. वा. १.१ ४ ४-८ संबंधानुभ्य इन् [पा. धा. पा. १९०३] [पा. ३. ५ श्रेयांसि बहुविवानि सनि नियन प्रेयो विषमुपभुकं ७१-८ पिन बन्धन वा [आ.नि. गा.८.०, विवा... २.. पिद्धिदादिभ्योऽड १८- महायोग निगमिदा [पा. ३. ३. १०१] पिधू मात्रे माहुल्ये .. [पा. यातु. ४८] पिधी मंरादी विनायकरा.": ... [पा. बानु ११९२] सबरसंसा, गुगगाहि ३-?:०८-१९ [विया. गा. ११७३: अन्यमा क..! र:-. ::: सह यानीनाम्यागुल- नचिनगीनमंतन- [नवार्य २ .:] सनायनानोमन [आर नि. ना... गट्टि या महामा यु मिश्रण [पा धा. पा १०३३] योजनसहनमानो २६-१९ यो पन्युपेनसम्यक्त्यो रपिओ नि ठिो मेहो १६-१:१०२-११ [विशंपा. गा. १४५६, कल्पमा. गा. 22:] गय माध संमिली ३७-१३ [पा. धातु. १२६:-६४] गाए पनयवहा १२४-१२ उबवणनेदा उपल- १२.७-१२ [विशेषा. गा. ९७] र युपयोगी भावनियम् नग२.१८] चम्मा यमा निय १६-१७४१०५-१९ [मिटीपा गा. ११६०, कम्पभा. गा.?..] 7 [दिप 14 , मा. [.. " . ह [शोधनि भा गा २] कालो मानना पटलापना i निनीय गरी ८ *4 २ .
१९४ नन्दीसूत्रत्रयागतर्गतानामुरणानागका : HTTPासमा मा: Mant -- उद्धरणादि पत्र-पदित सीसा पटिच्चगाणं १७-२; १०८-९ [विशेपा. गा. १४७५, कल्पना. गा. ३५५) सुयधम्मो सज्सामो [निशीथभाप्य गा ३२९९] सुरलिंगे पुनसुए १२४-१३ सुसमदुसमावसेसे ६६-२८ मुंदरवुद्धीए कयं ११९-१३ सूच सूचायाम् ७७-२७ उद्धरणात पन मेले गदिम नामणि १६-२:10:- [विशेषा. मा. १५६३, नरपगा. गा. ३५ ] मेरोग विनादिग [विशेषा गा. २९२] सोइदियोवलको १५-२३,१३०-२० [विशेषा. गा. ११७] सोऊग मा मती गे ५५-1८3१२९-२६ [विशेषा. ना १०९] : गगनानी (आना नि गा. 11] होम पोहोजाको सो नपुंगो पाकि- [पा. १. २. ५..] १५२-१३ १८-८ "o.in ३ तृतीयं परिशिष्टम् । नन्दीमत्रमल-हारिभद्रीवृत्ति-हा.ह.दुर्गपव्याख्या-हा.कृ.विषमपटिप्पनक-सवृत्तिलघुनन्दी- योगनन्दीलान्तर्गतानां विशेषनाम्नासकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका। [ अस्मिन् परिशिष्टे *एतादृक्युष्पिकायुतानि नामानि नन्दोत्रमूलादिसूत्रपाटगतानि यानि पत्र- N বিন किम् ? पत्र-पदित विशेषनाम किम्? • अपिय निग्रन्थ-गणधर १०-११ अणियण यकिरियाचादि दार्शनिक ७८-१० चायन्न । भाजीवाल ७७ -१८ *अणुओगदार नागम ४.-: • अमावयाच 'अफ्रियायादिन ७८-१०,११ *अणुत्तरोव- २-":..-, भान अक्षपाद ७-१५,१०१-१६ वाइयदसा १०१-टि १ + अग्निभृक्ष निग्रन्थ-गणथर ९०-९ अण्णाणियवादि वामन अमि १०-२३ समणीय पूर्व ८८-२८ अपिणयपुन निबंध ८८-२ गोत्र अनिदनमा कमी अपराध अचूलिया नागम "::::: * अगित li .. अनिकायन . . M थचलपुर पनि जिन-जिन- गीर्धकर रवामिन ७१-३-१२: कारण ५१७-११,१५,१६८-... गाजिय Bir ::.:. , ३ " । . . १ 7 विधिर : ... * ខ្ញុំ ។ । मा. दर . १५ ... है नन्दीसमून्द नगालगनानां : ... ! १९६ पुग J आतुरप्रत्याख्यान जनागम -- ३३-२० " " ६५-२५ विशेषनाम किम् ? पत्र-पति विपनाम किम! Fift ::11 1१८ आजीच श्रमणभेद ७५-१२ यावश्यकणि नागा आजीवग दर्शन ८७-१ आवश्यक नियुनि 157.75 आजीविय ८७-२४ मावश्यक नागग-.. 5... मामि ८६-२५,८७-१४ त्ति भगमाना रि- जगनियणि भनीयामि ७२-१० आत्मवादिन दार्शनिक ७८-६ आवस्मग-'य गलिया माग नागम 190-13:१४-१ उम्सपिणी मागि १८.-१५१६ ७२-१ आत्मविशुद्धि जनागम उपभ १८१-६ तीर्थकर *आदिकर १७८-२४ *आसीविमभावणा 1-२,१६: आदिचजस राजा ९०-१५ *इसिभानिय १२-२०:१८.-३१ ५.-१२,१३,१६७-१३; आदितीर्थकर तीर्थकर *ईदभूप निग्रा-गणधर १६८-२० आदित्ययशस् राजा १६३-१३ ईश्वरकारणिन् दार्शनिक पकोरफ दीप यानन्द श्रावक १६६-१ *उज्जुसुत दृष्टिवादप्रनिभाग *एगगुण रटिशादप्रतिभाग ८५-२४; *यामासपय दृष्टिवादप्र- ८५-२३,२७; उज्जेणो नगरी १३३ -७१३ ८६-१४७११, विभाग ८६-४,७,११, *उठाणसुय जैनागम ७२-२४,१८१-४ ६५,१९ * उत्तरायण ७२-१९;१८०-३" *पगट्टियपय *आयचाय ८७-११ उत्तराध्ययन ७२-२६:11-३१ एगंतसूसमा गालनिशेष यायन कल्पवृक्षनाम उत्थानश्रुत ७३-११ *परवाय क्षेत्र आणयण उत्पलपत्रात- समयनिरूपको-५८-२३:५७-९, पलापत्य गोन ११-१४,१५ *आयप्पवाद पूर्व ८८-२,८ व्यतिमेददृष्टान्त दाहरण *एलावा ११-१२ आयप्पवाय ८९-७ उत्पात-'द १३-३०७ आयविभत्ति जनागम १८०-१७ * पवंभूय दृटियादप्रविभाग १६९-१ आयविसोहि ७०-२१; परवत क्षेत्र १८०-२७ * उदिमोदय राजा ४७-१६ ऐरावत " ११७-१२,१५६-२९; ११७-७,१० यायार ,६२-२३;७४-२३ २८, उपासकदशा जैनागम ८२-२१ *ओगाढसेणि- दृष्टिवादप्रविभाग ८५-२० ७५-६,१८१-९ *उप्पाद + पुच पूर्व ८८-१,४ यापरिकम्म मायारणिज्जुत्ति जनागम ८८-२४ उपायपुव्य ८८-२६:१६७-९ *योगाढायत्त यार्य गोत्र ११-२५ उभृदया मेरीनाम १७-३,१०८-१७ ओदियोदय राजा ४७-१६ उयकोसा आर्यनन्दिल निर्ग्रन्थ-स्थविर १२-१३ १९ गणिका १३८-१८ , ओवादय जनागम * उपचाड्य आर्यनागहस्तिन १२-२०% १८०-२३ *भोसप्पिणि दृष्टिपाद- १३-१ *उपसंपजणलेणि- दृष्टिवाद प्र- ८५-२०; गडिया प्रविभाग यापरिकम्म मार्यम? विभाग ८५-१०,१३ १२-५,१३ ओसप्पिणी कालविशेष आर्यसमुद्र ११-२८,१२-५ * उपसंपाणावत्त ८६-१२ औद्भुतिकी मेरीनाम ५०८-२६ जनागम এনাম उवासगदसा १६-११; आवश्यक तलनाम १६६-१ करणी ६४-६,७०-४ ६२-२४;७४-२४ *कशायण गोन ७४-२२;१२३-१९; ८२-७१२.१९,१८१-१० कट्ट श्रेष्ठी १६१-६२ उसभ नीर्थकर ७४-१२,९३,९०-१५ कणगसत्तरी शास्त्र लघु- जैनागम-हरिभद्री- ६८-२९, * १०-१ कणभक्ष दार्शनिक ७-१५,१०१-१३ वृत्ति या गृत्ति,लभ्यमाना टि.१ उसभसेण निग्रन्ध-गणधर १७८-२४ कणाद पूर्व ८७-११ . १५७-१ ६४ ३,८८-२४ उदितोदय " ८६-६, ८६-८ ७०-१८ जनागम ६७-४ . - ११५-३ १०.२५ १४०-१५ - १०१-टि.
नन्दीसूत्रमूल-तवृत्त्यावन्तर्गतानां विशेषनान्नामकादिक्रमः । १ a ८-३११: गोयम i , . , शास्त्र " विपनाम किम् ? पत्र-परित विशेषनाम किम् ? पत्र परित विपनाम वासुदेव १०९-५. *केरभूय दृष्टिवाद- कपिल दार्शनिक ७-१५:१०१-१३.१६ प्रविभाग ८६-१.५,११. जनगम ७२-२०:१८० ३० कप्पडिसिया ७२-२५:१८१-५ उभ्यपडि ८५.४:८-११ হলিয়া ८,12,10 गोशालक कप्पासिय केसच वामुळेच कप्पिया জার २२२१ गोडामादिल निक ७२-२४:१८१-५ सोडल्लय कप्पियाम्पिय ७०~१८८०-२२ कोमुझ्या मेगनाम 15-::२०८-२७ गोसान+ कम्मापडि १२-१६ कोमा * कम्मपवाद पूब कम्मरवाय+पुत्र ८.-८; कौमुनिकी कौशिक मिन् निग्रन्थ-मुनि क्रियावादिन बागति कर्म प्रकृति जनप्रकरण क्रियाविशाल नादिगडिया .... कल्पलघुमाय जैनागम १२९ -टि २ विकाविमा- नमः कल्याकल्प नप्रविनि, कल्पावतंसिका अत्रनमान far অবিঙ্গা . जनप्रकरण . ८८-३,९ *कोसिय E पूर्व . . सार 4 १ गोत्र धानका ४ दांडगेय काम्यायन पामय पापण कान्चमा पानाचमा मालया दिन दारय नाणका चालवितोप १५-१ युनियानिमा गतिमि ५.५:.:. • मा (६ - ५० - .. ... + - + शाशनिक गीन fri. साघ रिमायादि व . art-1 शिनिशादिसाल. प J * . fini . 1 - . - १०-७७४-१० १३-१४ २०० नन्दीगृहमनाया मार्ग १४...- विशेपनाम पत्र-पकि किम् ? निग्रन्थ-स्थविर ११-३.५ म. 2:}, प्रभव ७०-२८ प्रमादाप्रमाद जैनागम (मिरोगाम) १२-२१ १. 20/- प्रश्नव्याकरण भागकार निर्णन. ११-१३:3': -3:: प्राणिती प्राचीन गोन ११.९ मानिसी सानाग *मा (जिनभद्रगति ::२१:११९-२ : 10 .. 23:12..? *बलदेवगंडिया दृष्टिवाद- प्रविभाग क्षमागण) * माणा निर्ग्रन्थ-स्थविर बलिस्सह ११-१७ २१ भाग्यरुत् --१९: मारामापना मातापमान 11८-१:१५८-२': ८७-१० *बहुभंगिय दृष्टिवादप्रविभाग महाभाग ५५-१,२:५५- निनन्य स्थविर बहुल ११-१७,१८ भिग कल्पनाम (मामा) दि. १ ११-१३ भृतदिन निगम-राविर १५-२०.२१ महानिदेव दृष्टिवादप्रविभाग ८७-११ *भृयदिण्ण १-३०,३१ *बहुलसरिव्यय निर्ग्रन्थ-स्थविर ११-१३ भृतवाद নামা (बलिस्सह) भूतावास १६१-२३ महावीर तीर्थकर 3-दि.३:५-८; *वंभद्दीवग निग्रन्थशाखा १३-१४ *भूयावत्त दृष्टिवादप्रविभाग घर्तमान वारवा नगरी १३७-२८ मणियंग कल्पनाम ६६-१७ २. महावीर विन्दुसार पूर्व १६९-१ *मणुस्ससेणिया- दृष्टिवाद ८५-२० २६: *महासुमिणभावणा जनागम १८१-७ ६४ २० शास्त्र *बुद्धवयण परिकम्म प्रविभाग ८६-२ मग नगरी वेण्णायड-तड नगर १३४ २१,१३५-६ *मणुम्सावत्त ८६-२ पडलापस जैनागम ७०-२०:१८० . २५ ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती १६२-७ मण्डलप्रवेश नागम ७१-२१,२२ *मंडिय निग्रंन्य-गणधर ब्रह्मद्वीपिका निग्रन्थशाखा १३-७ मण्डक तलनाम ११५-३ मंदर पर्वत ब्राह्मी लिपि ५९-१४ मत्तगय कल्पवृक्षनाम तैलनाम ६६-१६ १८ *माउगापय दृष्टियादप्रतिभाग ८५-२३ २७ ११५-३ मम्मण वणिक १२३-२१ भापा मागधदेशी भगवती जैनागम ४३-४;१२५-२४,२६ मरणविभयित जैनागम ७१-३० मागहिता गणिका *भद्दबाहु निग्रन्थ-स्थविर ११-७ *मरणविभत्ति ७०-२१,१८०-२७ मादर गोत्र *भदयाहुगं- ९०-६ *मग्णविसोहि १८०-२७ डियाओ वादप्रविभाग मरुदेवी कुलकरराज्ञी ३९-१९; * भगवाहु + निर्ग्रन्थ-स्थविर ११-९,१०; (ऋपभजिनमाता) १२४-२१ *मासाण दृष्टिवादप्रविभाग स्वामिन् १६१-१५ मलयगिरि निग्रन्थ-आचार्य १६७-टि.१ जैनागमयाचना १३-१६ १८ माहुरा वायणा भरत १३२-१३,३२ नट मल्लकदृष्टान्त अवग्रहादि- तीर्थकर क्षेत्र ४-५,२८-४,३३.२५; निरूपकोदाहरण ५४-१,१५ मुणिमुव्वयसामि ६६-६,१०३-६,११७-१२; *मल्लगदिटुंत ५२-७:५३-१०,२७ भूलदेव धत १५६-२९;१५७-१ *मल्लि तीर्थकर १०-३ *मूलपढमा- दृष्टिवाद- भरह १३२-१० महतीचिमान- जैनागम ७२-३० णुओग प्रविभाग ४६-२६,२९,१३३-१८ प्रविभक्ति मूलप्रथमानुयोग क्षेत्र २५-२३;६५-२५ *महलिया वि- ७२-२१,१८१-१ *मेयता निर्ग्रन्थ-गणधर भवणरुपख कल्पवृक्षनाम ६६-१७,२० माणपविभत्ति मेरु पर्वत गेहागार महाकापरसुय ७०-२६ *मोरियपुत्त निर्ग्रन्थ-गणधर *भारह शास्त्र ६४-१९ ७०-१८,१८०-२३ यशोभद्र १०-११ ३५-२५ २०-१८ १४३-२३ ११-९१. ११.६ दृष्टि- ६४.२१ ५२-११; *मुणिसुव्यय - नट १०-४ १४३-२१ १३५-२५ २७ ८९-१९ २२, ३. ८९-२१ १०-१२ ९४-२९ १०-११ ११-८ * -त -स्थविर * नन्दीसूत्रमूल-तद्वृत्त्यायन्तर्गतानां विशेषनान्नामकाराविक्रमः । २०१ नागन . . १३४-२२,२५; वसुदेव - . विशेषनाम किम् ? पत्र-पदिक विशेषनाम किम् ? रत्नप्रभा १२२-१७ वरुणोचवाय ७२-२२:१८-: वियाह । ८.-... रयणप्पभ-भा,ह ., ३५-२५,३६-४; वर्गचूलिका पणत्ति १२२-१९ वर्द्धमानत्वामिन् नोर्यकर ५१.५ *वियाग: मुन সমা घवहार जनागम ७२-२०::00-21 ८"-.:.-९: 'रामायण मात्र ६४-१९ वशिष्ट गोत्र ११-१५ প্তি गा-कृष्णग्निा। १६- *शिवाचूलिया ११०-११.११ वसुदेवहिण्डि नयाग्रा १६-नि.: +विवाहपनि : -101-1- কাৰথি এলাম ७०-१८:१८०-२३ विशेषयमयश रासिबद्ध दृष्टिवादप्र- ८५-२४;८६ -१, *याउभूद विभाग *यागरण ४.७.११,१५१९ पर्वत २८-१२२-१३ १७ वाचकचंश निन्यवन १२-:::?- वाचनान्तर नागमती- बीनागमन २५-२१ •डीवायन वणवत्त निन्य-स्थविर বানী রবিনয় १:- *यायनयंत பத்ரன் तिवाचक वीराम.....- रोड्य-ग वासुदेव किन रचण समुद्र नंडिया लोकप्रकाश अनशाय १६-वि.५ लोविन्दुसार पूर्व वायुयुज ४६-१७ लोगबिंदुनार विचारमननिका 5- ८९.-१७ विजय ८८-११२ विजयनमित्र ." है वासुदेव .. " ३ . . - . लागायन २०२ नन्दीस्त्रमूल तयानन्तर्गनाना fri: : । " १६६-२० विशेषनाम किम् ? पत्र-पत्रिका विशेषनाम शब्दप्राभूत এনার १२-२१ सम्पतियाचना जनागारमान- 23-74 गिशामा शय्यम्भव निग्रन्ध-स्थविर ११-५,११-८ परम्परा गिडगिला 141-२". शाक्य श्रमणभेद ९-४७५-११ सम्भूत अन्यन निर्णय १६२-७ सिगर्ग शाण्डिल्य निग्रन्थ-स्थविर ११-२२,२५,२८ सम्भूतविजय । निगम-विर ११-९,१० *मिसेणिगा- भाग ८':-- १२. शान्तिनाथताडप- जैनशानभ- १६८-टि. सम्भूत गरिका त्रीयभाण्डागार ण्डारनाम सर्वार्ध + सिलि, दालोक ९१-२०:१६७- सिहसेनानायनि1-31 नाय ५०-११.२५ शिखरिन् पवत ३३-२६१२१-५ सिद्ध १५.११:१६७- सिहावत गिरनिगाग शीलभद्रनिग्रन्थ-आचार्य १६९-३०,१७९-८ टि १, १६८- सिन्धु नदी (नन्दिसूनहारिभद्रीवृत्ति- ३,५,५१११२.२१ सिप्पा १३३-१४ दुर्गपदव्याख्याकारगुरु ) *सव ओभ६ दृष्टिवादपविभाग ८७-१२ सिरिता रागी १४१.७,८ शैव दर्शन १०१-टि.१ सचट्ठ देवलोक ९०-१६नः२६ २९; सिरित अमात्यान,अमात्य १४३-३ श्यामार्य निग्रन्थ-स्थविर ११-२२ ९.१-३,६ १०.१३. "सीयल तीर्थकर १०-२ श्रीचन्द्र+सूरि निर्ग्रन्थ-आचार्य १६७-टि १; १३ २३:१२-२,६, *सोह निग्रन्थ-सचिर १३-४ (नन्दीसूत्रवृत्ति १६९-२९३१, ८१६८-१६,७ टि नीथकर *ससि सुगत भगवान् बुद्ध दुर्गपदव्याख्याकार) १७०-१,१७९-८ १०.२ दर्शन १५४-२९ श्रेणिक संगामिया मेरीनाम राजा १७८-५ १७-३:१०८-१७ सुधम्म निग्रन्थ-गणधर ११-१ श्रमणभेद ७५-११ *संजूद दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१० सुधर्म + स्वामिन् ११-१.२ *सगभदिया *संडिल्ल निग्रन्थ-स्थविर शास्त्र ६४-१९ ११-२० सुपर्ण देवजाति चक्रवर्ती ९०-१५,१६७-१४; *संति तीर्थकर सगर १०-३ तीर्थकर *सुपास *संभव १६८-२११८६-३० सङ्गम *सुप्पम देव १०१-२६ *संभिण्ण दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१० सुप्रतिवद्ध निग्रन्ध-स्थविर सङ्घदासगणि निम्रन्थ-वाचक १६७-टि.१ •*संभूय निग्रन्थ-स्थविर सुबुद्धि अमात्य ९०-१५ (वसुदेवहिण्डिकार) १६७-१४:१६८-२१ सङ्घाचारटीका जैनशास्त्र १६८-टि. *संलेहणासुत-य ७०-२२,१८०-२६ *सुमति तीर्थकर (चैत्यवन्दनभाष्यटीका) *संसारपडिग्गह दृष्टिवाद. ८५-२४८६-१, *सुमिणभावणा जैनागम १८१-६ *सञ्चप्पवाद पूर्व ८८-२७ प्रविभाग ५८१२,१६२० सच्चप्पवाय देवजाति निग्रन्थ-स्थविर ८९-५ *साइ *सद्वितंत कालविशेष शशास्त्र ६४-२१ *सागरपण्णत्ती जैनागम १८१-१ सुसमदूसमा सत्यकी ६५-१० साङ्ग्रामिकी भेरीनाम १०८-२६ सुसमा *समभिरुढ दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१ सुस्थित निर्ग्रन्थ-स्थविर ११-१५ *सामज निर्ग्रन्थ-स्थविर ११-१९ समवाय जनागम ८०-८,९ सामायिक जैनागम १६५-८ सामि तीर्थकर १३९-२६ सुहम्म निर्ग्रन्थ-गणधर १०-१०,२६ ६२-२३,७४-२४; (वर्द्धमानस्वामि) सुहस्तिन् -स्थविर ७९-२५,२८,२९,८०-७ सिद्ध+वाचको निर्ग्रन्थ-स्थविर १३-७,१२ सुंदरी वणिकपत्नी १८१-१० समवायागवृत्ति १६५-११ *सिज्जंस तीर्थकर १०-२ सुंदरीणंद वणिवपुत्र *समुट्ठाणसुय ७२-२४,१८१-४ सिणपल्ली चौरपल्ली १३७-३० *सुंदरीनंद समुत्थानश्रुत ७३-१४ सिद्धदण्डिका जैनप्रकरण १६७-टि-१; सुसुमा वणिक्पुत्री समुद्रविजय राजा(नेमिजिनपिता) १६७-१२ १६८-टि. सूत्रकृत जैनागम ७७-२५,१६४-१६ १०-१ ११-१५ संलेखनात जैनागम १०-१ ११-१९ *सुवण्ण ६६-२५ ११-१२ ४६-१७ *सुहत्थि " ७९-२५,२८,२९४८०५. सिस+वाचक } ११-१५ १४३-४७ ४७-१९ १४३-४ ४७-१९ १४१-१७ नन्दीसूत्रमूल-तबृत्त्यावन्तर्गतानां विशेषनान्नामकारादिक्रमः. पाठान्तरायादकत्थानानि च । पत्र पनि .. विपनाम किम् ? पत्र-पडित विशेपनाम किम् ? पत्र-पति निम्? 'सूयगड जनागम ६२-२३;७४-०३; स्तुतिकार निर्गन्ध-आचार्य 12-१८ हिरियंस- हिवार ७७-१५१७ १९.२६%3 (सिदनादिवाकर) বিষা विभाग १८१-९ स्थान ७९-७ भीमासुरुषत्र र मुयगड १६४-१६ स्थूलभद्र निग्रन्थ-मधिन ११-१०.? *हारिय मुरपण्णत्ती जनागम ७०-२०:१८०-२५ स्वभाववादिन् दागनिक कारीत सूर्यप्रक्षप्ति ७१-१७,१८ स्वाति नियन्यस्यति सेन्जमव - निग्रन्ध-स्थविर १०-२ स्वोपनिटीका नागम हिमवन् ५२-दि. सेणित-य राजपुत्र,राजा १३४-२०; (विशेषावकवीका ) १२६-२५ हनूमत् राजा (वानरवर्गीय) :-" सोधिप्पण्ण दृष्टियादप्रविभाग ८७-११ हिमवक्षसासमा हरि १०९-१.१.५.18 सौधर्म देवलोक किमयंत १०८-३० स्कन्दिलाचार्य निम्रन्थ-स्थविर १३-१२२२ हरिमत्रमुनि निन्ध-आचार्य ९:-:: स्तम्भती १६८-टि. (नन्दीपत्रकृतिकार) - . : नगर ५ पञ्चमं परिशिष्टम् । नन्दीसूत्रमूल-हारिभद्रीवृत्त्यावन्तर्गतानां व्याख्याताव्याख्यातशब्दानामकारादिकमेणानुक्रमणिका । मूलशब्द-अादि गूलशब्द-अर्यादि ३८-२२ अक्ष= जीव 3D ४३-१५,१६.१७ [अस्मिन् परिशिष्टे *एतत्फुल्लिकाचिह्नान्विताः शब्दा मूले व्याख्याताः, +एतदलिताः । एतगिलगाड़िताशा शदाः 'पाइगसामहण्णवा'- ख्यकोशानुपलभ्यमाना व्याख्याताः, + एतचिद्रयान्विताः शब्दाः 'पाइय० स० म०' कोशानुपलभ्यगाना अव्याख्याताश ज्ञेयाः ] शब्द मूलशब्द-अर्थादि पत्र-पदिक्त शब्द पत्र-परिक्त पत्र पवित अकर्मभूमि अकम्मभूमि ३३-२६ अचित्ता कुप्रावनिकी १७७-३ +$अपिणया-स्वामिनी १४०-२० अकारण अकारण ९३-२० शशरीर-भव्यशरीरव्यति- +अतित्थगरसिद्ध अक्रिय अकिरिय रिक्ता द्रव्यानुमा अतिदूसमा अक्रियावादिन अकिरियावादि ७८-१०,११ *अचित्ता लोइया जाणगस- १७५-२९ तः अतिशेष अइसेस १६३-२० अक्ख २०-८,९ १०.१२; रीर-भवियसरीरवतिरित्ता १७६-३ अतिशेपद्धि अदरोसइढि १६३-२० ११३-२०,२१,२२ दवाणुण्णा अतीर्थसिद्ध अतित्थसिद्ध ३९-४५६ = इन्द्रिय अक्ख ११४-१९२० *अचित्ता लोउत्तरिया १७७-१० अत्थोग्गह १४४-२६ - चन्दनक १७१-२ व्याणुण्णा तः १३ অয় अह अक्षर अक्खर ६८-८; अच्छिन्नच्छेदणय ८७-२४तः २६ अधर्मास्तिकाय ४४-२८,२९ १५८-१९त:२३ अजीव अजीव ९३-२१ अध्यवसायस्थान अज्सवसाणहाण २६-७ अक्षरलब्धिक अक्खरलद्धीय ५९-२४,२५, +अजावण = तजन १००-२७ २६ अनक्षरश्रुत अणक्खरसुय ६०-८तः१७ अज्ञान अण्णाण १५३-१तः अक्षरश्रुत अक्खरसुय ५९-६ तः ९ अज्ञानिक अण्णाणिय ७८-२०तः २३ अनगार अणगार २२-२६,२८ अगमिक अगमिय ६९-२१,१६१-१२, अज्ञिका+पर्पत् अजाणिया+ १७-१६,२१ अनत्यक्षर अणचक्खर १७२-८ १३,१८५-२९ परिसा अनन्त अणंत अग ८८-२८ + अट्ठापय दृष्टिवादप्रविभाग ८५-२३,२७ अनन्तगुणित अणंतगुणिय अग्गेणीय ८८-२८ *अणखरसुय अनन्तप्रदेशक अणंतपएसिअ अन अग्ग ६८-१ + अणंतर= दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१० अङ्गचूलिका अंगलिया ७२-३०तः +अणाइसेसि= अनतिशायिन् १८३-२२ अनन्तरसिद्ध- अणंतरसिद्ध- ३८-१८,१ केवलज्ञान केवलणाण ७३-१ *अणाणुगामिय[ओहिणाण] २४-२७ १६५- अङ्गप्रविष्ट अंगपविट्ठ १६१-१५,१६ १७; तः २५-५ १६३-१० +$अणुओगदार = जनागम ७०-१९ अनाजीविन् अणाजीवि अङ्गवाह्य अंगवाहिर १६१-१५ १७,१८ अणुकड्ढ ११६-७,८ अनात्यन्तिक अचित्तजोणि १००-७ *अणुत्तरोववाइयदसा ८३-१३तः२५ अनानुगामुक अणाणुगामिय २३-३२५ *अचित्ता कुप्पावय- १७६-२० तः २३ अणुभाग १६७-५ [अवधिज्ञान] [ओहिणाण] ६तः११,११५ णिया जाणगसरी- +अणेगसिद्ध ३८-२५,३९-२०, रभवियसरीरवतिरि- २१,२२ अनुशा अणुण्णा त्ता दव्याणुण्णा +अण्णलिंगसिद्ध ३८-२४ अनुत्तर अणुत्तर । १३-२३ ३५-१६ अनवधृत = अनियत १६३-२४.२ ९९- १९,२ १७०-८ ८३-२
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२०६ मूलराव-यादि , -- : ." . . १२ - - 1 " . . ५-१० *अंतगडदला +आउरपचमखाण '.-२२ मोना आउं आपस-प्रकार ": ...111..... : 1.11.१२:::-: आगम *आगममो दवाणुण्णा १७१-१९८:२८ 1. - 13:011-2 आगमतः १८२-२०११ मागवाय- आगमतो द्रव्यनन्दि आगमतो आगमओ मागविलोकि १७१-२९ ताः मागत माम द्रव्यानुज्ञा दव्वाणुष्णा १७३-२१ - JrPertatif) 7.618 ११८ २९ आगमतो भावनन्दि २-१७,१८ नायिणेन - पानिमान जालि ७० - १२: आगमशास्त्र आगमसत्य आयस-म आगमसिद्ध १२३-२१ आर्य 11-२२ आगर आगजीतपर गीगार आगृहीत आघविय उत्तरगुण १७४-१६ आलोक आधविज्जति आख्यायन्ते ६७-८:१६४ -१३ +* भावणया - शान ताज्माण आचार आयार ७५-७,८,१२ उतराध्ययनारायण आवरण १२३.२ आचार्य-दर्शनान्त- आयरिय १७७-१ आवर्तनता जागा उत्थानश्रत उदाणयुग 11-1011 रीयाचार्य उमण ,,-निर्ग्रन्थाचार्य आयरिय आवलिका आलिया २७-२२,२३:११८- १७७-२० उन्धान उमाण आतुर आउर ७२-११ ११:१५ उपचारप्रत्यक्ष आतुरप्रत्याख्यान आउरपञ्चक्वाण ७२-१० সাম आवराय आबनविशेष त:१३ उपदर्शित. उदसिय आत्मप्रदेशान्तर्गत[अवधिज्ञान] ११५-३० आसुरुप्त आमुरुत्त १६३-१ उपदश्यन्ते उनदरािजति आत्ममध्यगत [अवधिज्ञान] ११५-३२ आहारक आहारग ११६-१५ त: ११६-१ आहारपर्याप्ति ३४-१ उपधारणता उयधारणया आत्मवादिन ७८-६ इगना १००-३०,१५४-२७ उपपात आत्मविशुद्धि आयविसोहि ७१-३०तः७२-१ नइथिलिंगसिद्ध उपवुहा ३८-२३ उपयुदा आदेश - प्रकार आएस ५५-३:११२-३० इद्र जीव इंद २०-२४१३०-२२ उपयोग १४९-५,१८३-६ इन्द्रिय इंदिय उपलब्धि उपलद्धि २०-२४ १४९-२१ इन्द्रियपर्याप्ति उपशान्त आनुगामुक[अ- आणुगामि- २३-२,११५- इन्द्रियप्रत्यक्ष इंदियपम्पक्स २०-२३तः२७ उपसर्ग उवसम्ग वधिज्ञान यओहिणाण १८,१९ उपाधि आभिणियोहिय १५२-४,५,१३,१४ उपचारप्रत्यक्ष ११४-६,७,८ उपाध्याय उवझाय ४४-१८ इभ्य इब्भ १७५-२२-२३ कलाध्यापक आभिनियो- आभिणिवो- १८-१८तः२३; ईश्वर ईसर धिक+शान हियणाण ४५-१३,१११- १७५-१९,२० ७८-५ १४तः३०:१२७- ईहए ९६-१२ ५६-७१५०-६ ७२-१९ ७२-२६.२५ ७३-११तः१५ १००-२७ १६५-१६.१५ ११४-६,७,८ . १७४-१८ ६५.१०; १६४-१५ ५०-१५,१६ उववाय १६३-१४ उपओग ४८-२२,१५७.९ १३०-२२ %3 सूत्र १२३-५ . १२३-२९ १७७-१ ईश्वरकारणिन् = निग्रन्थ उपासक उवासग उपासकदशा उवासगदसा *उप्पत्तिया बुद्धि १७७-२१ ८२-२० ८२-२० ४६-२५,२५ . . . ? ०१ -- . - नन्दीसूत्रमूल-तदृत्यायन्तर्गतानां व्याख्यातायाख्यानसम्दानामनुक्रमः । मद मूनशब्द-अर्यादि पत्र-पति मूदाब्द-अर्यादि पत्र-पदिन मूममदद ८८-२६,२७ .....१९ उपायपुग्ध कालो मोतिपाणि उल्का उका २९-२९1१६-१ कण्ठोष्टविप्र-कंटोविमनुछ । २-१ *शाली दलणाति दीपिका मुक्त कालोनिलमति कतं [मनपस्वजाना उयरिम बुझागपतन] कालो मम्मरमुन +उयसंप- दृष्टिवादप्रविभाग ८६-१२ +कप - अनुना जणायत्त कषिरया । उवासगदसा कल्पिका ८२- 5:१९ कम्मप्यवाद-याय उपयोनिक उमिजोणिय १००-११.१३ काननोऽधि:- कम्मन्यवाय ८.-८::::- उसमप्पिणी ६६-१२नः३७-१ कामवादिन् म ३४.२१ * कम्मयाबुद्धि ऋजमतिमनः- उमनि १.२३,२? । पर्यवहान मिणपजणाग] करकन अ = पत्र नियम- उनुमय . अद्धि करणाधिन का पकसित एगिद्ध पकाधिकरणस्य ११-८ गगुण = टिबाट विभाग ८६-१,४,७,११.१. + पहियाय - काका पगमित है:.. +गनग्यम्ममा +र: भूय वामप्रभाग मातिया +ोगायन माग गोगा. गोपा imnirl साराम मागी . : . . : . . ३ - •rt 3 - . - ir - ४ fir . .
२०८ नन्दी समूल तक गागलगताना या गावागार::.::.: । Trn . माम 15.. - गोगर - मोदय शब्द मूलशब्द-अर्यादि पत्र-पति गगनीदि कूमेन्निता योनि) कुम्गुमया १००-२१, ग्यायोवसमिय भोहिणाण) २२-'.. गण 70.17 गुम + के उभूय - दृष्टिवादप्रविभाग ८५-२३,२७; +बुनियाविमाणपविभति गुगवानोगा Pritam ८६-४,७,११,१५,१९ खेत्ती आभिणियोहियणाणि',':-२ . 1",14 +$केउभूयपडिग्गह: ८५-२४:८६-१, खेत्तओ उज्नुमति गोनर ४.८,१२,१६,२० [मणपजवणाण] गोरगर केवलज्ञान केवलणाण १९-५त:८; खेत्तओ योहिणाणि থিম गनिम 13.-३०,३१ याण ४३-२६ खेतओ केवलणाणि ग्राहा गागरा +कोडल्लय = शास्त्र ६४-१९ मद १३.-२० *खेत्तओ विउलमति- +$कोलवाल = प्राणिविशेषवाल १३९-२३ १७५-१७:१७६-१८ मिणपजवणाण] कोष्ठक कोह ५१-२६,२७ *खेत्तओ सम्मसुय +ोलनम्म - मंगोला, १९८-३ कौटुम्विक कोडचित्र १७५-२२ घोपसम *खेत्तागुण्णा १७२-५६ १७७-२७,२८ क्रियावादिन किरियावादि ७७-३० तः खेदज्ञ चतुरन्तसंसा चाउरतगंगा- १००-२८ रकान्तार +खोडमुह ६४-२० क्रियाविशाल किरियाविसाल १६७-७,८ गणावच्छेदक गणावच्छेगअ +चलि+ आनन्द+गान १४२-२३ १७७-२५ क्षयोपशम १२३-६ गाइत गणिन् : गणपालक,आचार्य गणि १४२-२३ क्षायोपशमिक खयोवसमिय २१ २७,२८ चरक १०१-८ २,३.. (अवधिज्ञान] [ओहिणाण] चरण ,, गुणगणवान् आचार्य गणि ७२-९,१०,७५-१४ चरण विधि चरण विहि ७२-९१० क्षुल्लकातर खुट्टागपयर ३५-२३ तः३६- त: २७ गणिपिटक गणिपिढग ६४-२तः५ +चरणविधिः ७०~२२ शुल्लिकाविमान- खुहियावि- ७२-२९,३० गणिविद्या गणिविजा ७१-२४,२५ चारित्राचार चरित्तायार ७५-२८,२९ प्रविभक्ति माणपविभत्ति गण्डिका गंडिया ९०-९,१२,१६७-१० १०१-१९ क्षेत्रत ऋजुमति- खेत्तओ उज्जु-३५-२१ गण्डिकानुयोग गढियाणुओग ९०-९१० +चित्तरगंडिया विपुलमति मनः- मति-विउलम-त. ३६ गम = समानसूत्रोचार- गम ६९-१८ १९ चित्र चित्त ९०-११ पर्यायज्ञान] ति[मणपज्जवणाण] -१९ लक्षण चित्रकर्म चित्तकम्म १७०-३० अर्थपरिच्छेद चित्रान्तरग- चित्तंतरगं- ९०-११तः१४ ७७-१,२ क्षेत्रतः केवल- खेत्तओ केव- गमिक [श्रुत = गमियमुय ६९-१८ १९, ण्डिका डिया शानिन् लणाणि १०,११ १ सूत्रोचारणलक्षणवत् , २०१६१-१२; चिन्ता चिता ५१-१,२,६१-३,४ क्षेत्रतोऽवधिज्ञा- खेत्तओ ओ- ३०-२०. २ सदृशाक्षरालापक, दृष्टिवाद १८५-२९ चीरिक १०१-८,९ निन् हिणाणि २१,२२ गर्छ १०३-२ चुडली चुटलिया क्षेत्रमध्यगत [अवधिज्ञान) ११६-२ गवेपणता गवसणया ५०-३०त.५१-१ + चुतमचुतसे = दृष्टिवादप्रविभाग ८५-२१; शेत्रानुशा खेत्ताणुण्णा १७७ -२९३० गवेषणा गवसणा ५८-१७,१८६१-३; णियापरिकम्म- ८६-१८,२१ क्षत्रान्तर्गत [अवधिशान) ११५-३१ १५२-८ खउरकठिनका कढिणय १०५-२४,२५, चुयमचुय गन्यून गाउय २८-२ टि१ +चुयमचुयावत्त- *गंडियाणुओग ९०-४तः८ +खक्खर + सद्द = 'सट-खट्'शब्द १३८-४ +चुल्लकप्पसुय गायदुगद्ध १६१-१३,१४ चूडा चूलिया ९३-१,२ १३२-२९,१३४-२५ +गिहिलिंगसिद्ध ३८-२४ चूलिका +Sबायजाणगब्यातज्ञायक, १३७-२६ सर्वातन् १०२-१,४ चैत्य चेइय १६५-१७,१८ भूम्यन्तगतपदार्थज्ञानिन् = कृष्ण-नीलादि १४६-६ च्यावित चतिय १७१-८,९ चित्त . +खलुग- मुद्रिका गुण %3D
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२१२ . १००-२५ १६१-२५ शब्द मूलशब्द-अगदिश प्रभावना पगाणा १६१-१८.१५ गुद्धि माणित प्रमत्तसंयत पमत्तसंजय ३५-१६,१७ बुद्धि :- मान, ' मानानि प्रमाद पमाय १६२-२३ बोधिलाभ मा प्रमादाप्रमाद पमायप्पमाय ७०.२८ [भरत प्रत्यारपान मा : 25:१- भागो मग : ०२४४६-१: प्रयत्न १५७-१० भातः काल मानो प्ररूपित परूविय १७४-१६,१७ भाग- ३-२६:६३-६ भगवत् सानिन गाणि ३०-२४, भानतोऽअधि- भागो प्ररूप्यन्ते परूविजंति ६७-९,१६४-१३ १४ प्रवर्तक पवत्ति भरिका १७७-२१त:२३ भंगिया गोपिाणि शानिन् भणक भग মান १२-.' प्रव्रज्यापर्याय पवजापरियाग १६५-२० ७२-८ भावमलेगना भम्भा प्रश्न पसिण १६६-१७ १०८-१२ *भावाणुण्णा १७८-९तः१८ प्रश्नव्याकरण पण्हावागरण ८४-१४ भरनिस्तरणसमर्थ भरणितारण- ८-१३ भावानुजा १७८-१९:२१ प्रश्ना-ऽप्रश्न पसिणा-ऽपसिण १६६-१८ समत्व भावेन्द्रिय प्रसङ्ग पसंग ४८-२४ २१-२६,३७-१२ भा १०२-७ সঙ্গী प्राज्ञाप्त पण्यत्त १८-१४,१५ भवप्रत्यय[अ. भवपनातिय २१-२६, भापा भासा ५८ ५७५-१४,१५१-१५ प्राण पाण १००-२५ ३४-४ वधिशान भाषापर्याप्ति [ओहिणाण] प्राणापानपर्याप्ति ३४-३.४ प्राप्तद्धि भापासमणि भागारामरोठी १५१-१५ १६ भवसिद्धिक इढिपत्त भवसिदीय ३४-१८ भवस्थ भरत्यकेवलज्ञान भूय भूत ३७ -१२,१३ प्रावनिक १०२-१२ केवलशान भूतवाद भूतानाअ प्रावादुक पावादुय +$भूयावत्त *भवियसरीरव्याणुण्णा १७४ -२३तः२६ = दृष्टिवादप्रविभाग प्रेर ११६-५ भ्रमि पारिया भव्य फडक ११५-२८,१८३-१३,१४ भविय, भवसिद्धिय ९३-२१ = विवक्षितपर्यायाह, भविय १७४-२७,२८ +मग %D अनुज्ञा १७८-३० फडकावधिज्ञान ११५-२९ फल प्रयोजन भव्यशरीरद्रव्यनन्दि ४८-६ ९९-१०,११ *मग्गओ अंतगय [आणुगामिय २४-४, ओहिणाण] भव्यशरीर- फलविपाक फलविवाग १६६-२३,२४ भवियसरी- १७४-२७तः १७८.३० फिडिय = निर्गत द्रव्यानुक्षा १८२-२७ रदवाणुण्णा +मजाया % अनुज्ञा १७५-७ वद्ध वद्ध ५७-३१ +भंडग = आभरण १७६-९,१२,२५ *मझगय [आणुगामिय- २४-१२,१३ ओद्दिणाण] बद्धस्पृष्ट वद्धपुट १५१-३,४५ भाज्य भइयध २८-१७,२१ %= मदीय +मिल्झंच १४०-३२ +विहुभंगिय = दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१० भामण्डल १०१-२,३ मडस्य मडंव +बहुल ८७-११ भाव % पर्याय ३०-२४,९९-१३ मणि बाढकार वाढकार ९६-२० = सत्ता स्वलक्षण ४३-१८3१२६-११ वादिरावहि = दृष्टिवादप्रविभाग = पदार्थ +Sमणुस्तावत्त १२०-७८ ६७-८७७-९९३-१३; मण्डलप्रवेश मंडलप्पवेस वाह्यग्रन्थ १६३-१३ १६४-१२ मति मति-इ ३४-२३:५८-१९; बाह्यतपः = अस्तित्वादि ९३-१६ १०१-७ *भावो आभिणियोहियणाणि ५५-२२ *मतिअण्णाण वुद्ध = आचार्य, बुद्ध ३९-१४ *भाव ओ उज्जुमति ३५-८९ मतिशान बुद्धयोधितसिद्ध ३९-१४ [मणपजवणाण] +चुद्धयोहियसिद्ध ३८-२४ *भावओ ओहिणाणि ३०-११,१२ *मतिणाण ८७-१२ १७५-२१ ११६-१ ८६.२ ७१-२१,२२ बाह्या भ्रमि १५२-९ १५-२८,२९ ४५-२५:१३०-३१ १५२-१६ ४५-२८,२९
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जन्मीमागू नका :: :: :: :: ! म" :... HT" ग मूलशब्द-अर्धादि ११-२१ 21-17 विप्रमुक्त १६९-१३ ११०-१० १७४-७ पत्र-पति 103 विगा वराटक घराउ १७१ २ -वरुणोचवाय * विमानणवि वि ..- २२..] ७२-२२ 1८२-15 निहाय देाि शिप वर्ग = अध्ययन समूह, वग्ग ७३-२:८५-१: १६६-१३ विनर - मा, मिशन गालिागार .:९-१३ वर्गचूलिका -जानाति वग्गलिया ७३-१,२ गाभाग वर्द्धमान अव- वड्डमाणओ- २३-३.५: विशारत शिवागमन +ोलागेनगाग धिज्ञान] हिणाण २६-६तः२८-३२: विपुल वित वेशिम नदिम 100-11:11-1 ११५-२१ विपुलतर + क विउत्तराग ३६-२०,२१, नयिक - कागापिल, नेग ७':-१३ वल्क वाग १२७-१८.२० २६१२२-२५,३० दानिक ७८-३०,३१ वस्तु वत्यु १६७-९ विपुलमति[म- निउलगति- ३५-२' तः चैनयिकी जि] नेणाया ५७-२५;५८- +वंजणक्खर ५९-१५ नम्पर्य यशान) [मणापा माण] २७:१२१- गुजित १३:१८ चंझ ८९-१२ व्यसनाक्षर वंगणागर ५१-१६तः१८; +विंसपत्ता [जोणि] = योनिविशेष १००-२३ +$विप्पजहणावत्त-रिवारप्रतिभाग ८६-१६ १५२-२८ वाग्योग% वाग्द्रव्यसमूहसाचिव्याद् ३७-२६; विप्पगुक १७४-१०,११ ज्यानायग्राद गंजणोरगद ४९-१८ १९ जीवव्यापार, वाक्परिस्पन्द. १२६-२४ विमापक-अधविशेष १०२-८ व्यतित्रजन्ति विश्वयंति वाग्वीर्य विमर्ग वीमंसा ५१-२३,५८- व्यत्यादित शिवालिय वाचक+वंश वायग+ वंस १२-१७.१८ १६,१७६१.४.५:१५२-७ व्यपगत चवगय वाचना वायणा विमानप्रविभक्ति निमाणप- ७२-२८,२९ १७२-१९ विभत्ति व्यवच्छित्तिन- विउच्छिति-६५-१६,१७ वात्सल्य १६३-१८ यार्थता णयद्वया वाद वा ८५-१५ +चियस्थि = वितस्ति *विया वाम्य ८०-१३त:२३ चवसाय वम्म व्यवसाय १०४-२१ वातिककर = अर्थविशेप १०२-८९ विरमण रमण १६६-२,३ व्यवहार चवदार १७३-५ वासना-मतिज्ञानभेद, स्थापना १४५-५,६, विराधना १६९-११ व्याकरण घागरण १५०-२७ ८४-२०तः८५.९ व्याख्या पियाह ७३-२,८०-२४; विश्वइस्संति व्यतित्रजिष्यन्ति १६९-१३ +विवाहचूलिया ७२-२२ विइवइंसु व्यतिक्रान्तवन्तः, ९४-१६ विशुद्ध विसुद्ध ४८-५ व्याख्याचूलिका वियाहचूलिया ७३-३ व्यतिवजितवन्तः १६९-१२ विशुद्धतर विसुद्धतराग ३६-२१,२६; व्याख्यान वक्खाण विश्वयंति = व्युत्क्रामन्ति ९४-१७ १२२-३० व्यूद वृह विकृष्ट [तपः] १६२-२२ विशुद्धफडक ११६-१० विचारण वियालण ५७-२ विसाल ८९-१६ शहावर्ता संखवत्ता जोणि १००-२१,२३ +विजयचरिय = दृष्टिवादप्रविभाग ८७-१० +विहारकप्प ७०-२२ शत- अध्ययन, +विजाचरणविणिच्छ अ विहारकल्प विहारकप्प ७०-२१ ७२-८,९ सद्दनय शव्दनय विज्ञप्ति विन्नत्ति ४३-१९,१२६- वीतरागश्रुत वीयरायसुय ७२-१,२ शय्या सेजा ११,१२ +चीयरायसुत ७०-२२ विज्ञान দ্বিারা ५१-१५ + घीरिय = पूर्व ८८-२ शरीरपर्याप्ति विशायक बियाण वीर्याचार वीरियायार ७६-१,२.३ शाश्वत सत्य वितिमिरतर+क वितिमिरतराग ३६ वृत्ति वित्ति शास्त्र ७५-१५ ७५-१३ २४,२६:१२२-३०,१२३-७ सिकाता वृष्णिदशा शिक्षा १८६-२ वच्छल ५७-३ १२.२१ *विवागसुत १६५-१३ १५-१० ७९-३,१६४-१६ १७; १८६-१३ सत १६५-१५ १५३-२० १७४-१२ १७४-१२,१३ शय्यागत सेज्जागय १००-२९ ९६-५,१६९ २०२१
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२१६ 7 . -- + .. । + - 14 .. +- ३ . . . - A - मृगश-माद +संकट - संकोचन यापार ! संबर 3 प्रत्यारगानकर पर + अनुशा संवत संगः सप्तकिमान संवर्तकमेघ सग संवाद संवाय संवित् सुरणात ": संवृतयोनि संयुः जोणि १०० - १६.१८ संवृतविवृता संयुमरियडा १००-१६,२१ *सुराणाणलंभ Part fit: सुसम [योनि [जोणि सुममममा +संसारपडिग्गह-दृष्टिवादप्रविभाग ८':-२४; Effe: '... ' ८,1':; ८६-१,५८,१२,१६,२० सूत्रका संस्तार संथार कि "सूगगन ..-7'::२.. संस्तारगत संधारगय १७५-१३ १८१-१३ गुर्गप्राप्ति गति ..] - 1.7,14 साचिव्य ११६-१५ सादि सादीयं मामलेग - १६-३२२ तस्म ५. २२ सादिसपर्यवसान आईनिहणत्त सेण्टिन भीमारामा सामान्यार्थाव- सामण्णत्था- १५०-१९, सेनापति *कायमा गोविणाण ग्रहण वग्गहण हिता साम्परायिफसात १०१-५ सेल १७८-३० सार १८-२२ + सोवस्थिापण शिवादप्रनिगाग ८.१-१५ सार्थवाह हीयमान हीयगाणय २९-११:८; सत्यवाह १७५-२५तः२७ सन्धि गंभ सित [अवधिमान [ओरिणाण११५-२२२१ १२३-२३ स्थचिर थेर सिद्ध इंकार ३७-१३तः१९१६९-८ स्थान ठाण सिद्धकेवलज्ञान सिद्धकेवलणाण ३७-१३ * हेऊवपस [सपिण, असण्णि) ३१-१३ स्थापना-धारणा, व्यणा ५१-२१,२५; तः२० (मतिज्ञानमेद) १४५-६७ सिद्धशिलात सिद्धसिलातलगय १७४-१४ हेतु स्थापनानन्दि लगत स्थापनानुशा ठवणाणुण्णा १७०-२२तः हेतुवादोपदेश +सिद्धावत्त = दृष्टिवादप्रविभाग ८५-२५ १७१-३ हेतूपदेश+संशिन्, हेऊयएस + ६१-१६ सिहरि ७९-२० स्थासक = आदर्श, थासग १७६-१२२६ असंशिन् सिंगनाइय १८६-१ ठित १७२-२३ +होडा पण 4. गागा मेणा: सेयकाल -हिय- मा तः१५ ९-१०:४८-३० ९३-१७ १२२-२६,२८ मणि,असगि तः२२ स्थित १३४-टि
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२१८ पत्रस्य पाली ::." १०८ ३२ गोगोषी " भाविना ११६ . . 'ला रा २ HTT(! ATTR) " " २. "I" 'मा . . ३१ ३१ ‘लादि ११७ २० एक्मा ११८ १३ यःशिलाका २२ 'तम्। पं. १६ 'सी ११९ १ तदाऽशल १४ दिपु'- अन्तराद्' १२५ १७ 'योगभावे १२७ १६ तयोमद १४० १२ १४१ २६ दिठो १४२ १४ निग्गछंती २४ आहा १४४ २ °णयासमत्ता १४५ २३ °मित्यादिका दोगः शाशातीगं राय- ३ शाशी शराब 'नन् । [२] पनी तदाऽगुण "दिशु' 'अंतरा' 'योगाभाने तयोभद २१ दिवो निगच्छंती आदो 'णया समत्ता "मित्यादिना २५ २ १० 15 20 १७४ १४ गिताशिला २२ कोटुमिका १८५ शिर्षके मन 10 25 सिक्षिशिला कौटुम्यिकः 'यन "
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1 -In ()::.2710 Since -* 17 -- 12 * . 1 A. 1), ly Vinale, ilir ???!. translated lis l'rof. S. ! . .:۱:۱۱۹۹ ۱۰,۱۱٫۱ -Demy Quarto sire..13603 1.1.!.::. i'.:.:::::...;... This great Prakril-Hinili Dija77 ji proglasilor! it: it: • {}, '; 1; i:: : 1' 11 :. XXVIISTINITENT -Domy Qusrto size, l'ages 101 : I'rin Rs. 1: Nandisutra with its Ciroi i critically clitoit by Mani Sari tumrijsji for the firit pour l'ivr indiccs harc been added at the onl. WORKS IN TIIE PRESS. 1. PUNCARIAN Part 11 -Demy Quarto size.. The second part of this great work will be published very soon. 2. PASACARIU -Demy Quarto size.. This work is critically cdited and translated in Ilindi by Prof. P. K. Modi, Principal, Sanskrit College, Indore. This is a work on the life of Pārsvanātha, the 23rd Tirthaukara in Apabhrarhia language. 3, SŪTRAKRITĂNGA -Demy Quarto size.. Sūtrakſtānga is an important canonical text of the Jains. It gives the fare idea of the various Sects and Philosophical Schools of the sixth Century B. C. and also deals with fundamental teachings of Lord Mahavira, This is critically edited by Muni Shri Punyavijayaji with two commentaries in Prakrit, viz. Niryukti and Cūrni. 4 DASAKĀLIKA. -Demy Quarto size.. Dasakālika is written by Sayyambhaya in the 4th Century B. C. It will be published with Niryukti and Cūrņi of Agastyasimha for the first time. It deals with the conduct of the Jaina Monks. It is edited by Muni Shri Punyavijayaji. 5. PUHAVICANDACARIYAM This work written by Ācārya Säntisūri deals with the famous story of Pșthvicandra. It is a fine piece of ornate Prakrit poetry. 6. MULASUDDHI The text is written by Ācārya Pradyumnasūri and is commanted by Ācārya Devacandra the Guru of Hemacandrasűri. This important work contains many stories regarding purity of the faith etc.
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२६ 5 - , श्रीहरिभद्र सूरिसृत्रितया वृत्त्या समलङ्कृतं सू. २४ गा.५१-५२ काले चउण्ह वुड्डी, कालो सइयव्वु खेत्तवुड्डीए । बुड्डीए दब्ब-पज्जव भइयब्बा खेत्त-काला उ ॥ ५१ ।। सुहुमो य होइ कालो, तत्तो सुहुमयरयं हवइ खेत्तं । अंगुलसेढीमेत्ते ओसप्पिणिओ असंखेज्जा ॥ ५२ ।। से तं वडमाणयं ओहिणाणं ३ । २४. से किं तमित्यादि । अथ किं तद् वर्द्धमानकम् ? 'वर्द्धमानकं' बर्द्धमानमेव बर्द्धमानकं प्रशस्तेष्व- ध्यवसायस्थानेषु वर्त्तमानस्य वर्तमानचारित्रस्य । इहौघतो द्रव्यलेश्योपरञ्जितं चित्तमध्यवसायस्थानमुच्यते, अस्य चानवस्थितत्वात् तद्रव्यसाचिव्ये सति विशेपभावाद् बहुत्वमिति । तत्र 'प्रशस्तेपु' इत्यनेनाप्रशस्तकृष्णलेश्यादि- द्रव्योपरञ्जितव्यवच्छेदमाइ । अध्यवसायस्थानेषु वर्तमानस्य, प्रशस्ताध्यवसायस्येत्यर्थः, 'सर्वतः समन्तादवधिः 10 परिवर्द्धत इति योगः, अनेनाविरतसम्यग्दृष्टेरपि वर्द्धमानक उक्तो वेदितव्यः । वर्तमानचारित्रस्येत्यनेन तु देशविरत- सर्वविरतयोरिति । 'विशुध्यमानस्य' तदावरणकर्ममलविगमादुत्तरोत्तरं शुद्धिमनुभवतः अविरतसम्यग्दृप्टेरेव, अने- नावधेः शुद्धिजन्यत्वमाह, विशुध्यमानचारित्रस्य देश-सर्वविरतस्य सर्वतः समन्तादवधिः परिवर्द्धत इति, ततः परिवर्द्धत इत्युक्तम् ।। अथ सर्वजघन्योऽयं क्रियत्प्रमाणो भवति ? इति प्रश्नसम्भवे क्षेत्रतः प्रतिपादयन्नाह- जावड्या० गाहा । व्याख्या-'यावती' यावत्प्रमाणा, आहारयतीत्याहारकः, त्रिसमयं आहारकः त्रिसमया- 15 हारकः, त्रीन् वा समयानिति तस्य । सूक्ष्मनामकर्मोदयात् सूक्ष्मस्तस्य । पनकवासी जीवश्च पनकजीवः, वनस्पति- विशेष इत्यर्थः, तस्य । अवगाहन्ते यस्यां प्राणिनः सा अवगाहना, तनुरित्यर्थः । 'जघन्या' सर्वस्तोका । अवधेः क्षेत्रं अवधिक्षेत्रम् । 'जधन्यं' सर्वस्तोकम् । तुशब्द एवकारार्थः, स चावधारणे, तस्य चैवं प्रयोगः-अवधिक्षेत्रं जघन्यमेतावदेवेति । अत्र च सम्प्रदायसमधिगम्योऽयमर्थः- योजनसहस्रमानो मत्स्यो मृत्वा स्वकायदेशे यः । उत्पद्यते हि सूक्ष्मः पनकत्वेनेह स ग्राह्यः ॥ १॥ संहृत्य चाऽऽद्यसमये स ह्यायामं करोति च प्रतरम् । सङ्ख्यातीताख्याङ्गुलविभागवाहल्यमानं तु ॥२॥ स्वकतनुपृथुत्वमात्र दीर्घत्वेनापि जीवसामर्थ्यात् । तमपि द्वितीयसमय संहृत्य करोत्यसौ सूचिम् ॥ ३॥ सद्यातीताख्याङ्गुलविभागविष्कम्भमाननिर्दिष्टाम् । निजतनुपृथुत्वदैयां तृतीयसमये तु संहृत्य ॥४॥ उत्पद्यते च पनकः स्वदेहदेशे स सूक्ष्मपरिणामः । समयत्रयेण तस्याऽवगाहना यावती भवति ॥५॥ तावजघन्यमवधेरालम्बनवस्तुभाजनं क्षेत्रम् । इदमित्थमेव मुनिगणमुसम्पदायात् समबसेयम् ॥ ६॥ अत्र कश्चिदाह-किमिति महान् मत्स्यः? किं वा तस्य तृतीयसमये निजदेहदेशे समुत्पादः त्रिसमयाहारकत्वं चा कल्प्यते? इति, अत्रोच्यते, स एव हि महामत्स्यस्त्रिभिः समयैरात्मानं सङ्क्षिपन् प्रयत्नविशेषात् सूक्ष्मा- गाइनो भवति, नान्यः; प्रथम-द्वितीयसमययोश्चातिसूक्ष्मः, चतुर्थादिषु चातिस्थरः, त्रिसमयाहारक एव च तद्योग्य इत्यतस्तद्ग्रहणमिति । अन्ये तु व्याचक्षते-त्रिसमयाहारक इति आयामविष्कम्भ संहारसमयद्वयं सूचिसंहरणोत्पा- दसमयभेने त्रयः समयाः, विग्रहाभावाचाऽऽहारक एतेषित्यत उत्पादसमय एवं त्रिसमयाहारकः सूक्ष्मः पनकजीवो 3) जयन्यावगाहनथ, अनम्नत्ममाणं जवन्यमवधिक्षेत्रमिति, एतचायुक्तम् , त्रिसमयाहारकत्वस्य पनकजीवविशेपणत्वात् , मत्म्यापाम-विष्कम्भमंढरणममयद्वयम्य च पनकसमयायोगात विसमबाहारकत्वाख्यविशेपणानुपपत्तिप्रसङ्गात् । अलं १. दि पनका सूक्ष्मन्नेद मलयगिरिवृत्ती ।। 20 23 वर्द्धमानकावधिज्ञानम् ] श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । २७ ? प्रसङ्गेनेति गाथार्थः ॥४५॥ एवं तावज्जघन्यमवधिक्षेत्रमुक्तम् । इदानीमुत्कृष्टविभागमभिधातुकाम आह- सव्ववहुअगणिजीवा० गाहा । व्याख्या- सर्वेभ्यः-विवक्षितकालावस्थायिभ्योऽनलजीवेभ्य एव बहवः सर्वबहवः, न भूत-भविष्यङ्ग्यो नापि शेपजीवेभ्यः । कुतः ? असम्भवात् । अग्नयश्च ते जीवाश्च अग्निजीवाः, वहवश्च ते अग्निजीवाश्च सर्वबह्वग्निजीवाः । निरन्तरमिति क्रियाविशेषणम् । 'यावद्' यावत्परिमाणं 'भृतवन्तः व्याप्तवन्तः 'क्षेत्रम् ' आकाशम् । एतदुक्तं भवति-नैरन्तर्येण विशिष्टसूचित्रचनया यावद् भृतवन्त इति । भूतकाल- 5 निर्देशश्च 'अजितस्वामिकाल एवं प्रायः सर्वववोऽनलजीका भवन्त्यल्यामवसर्पिण्याम् ' इत्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थम् । इदमनन्तरादितविशेषणं क्षेत्रमेकदिक्कमपि भवति अत आह-सर्वदिकम् , अनेन सूचीपरिभ्रमणप्रमितमेवाह । परम- थासाववधिश्च परमावधिः क्षेत्रम्-अनन्तव्यावणितं प्रभूतानलजीवमितमङ्गीकृत्य निर्दिष्टः क्षेत्रनिर्दिष्टः प्रतिपादितो गणधरादिभिरिति, ततश्च पर्यायेण परमावधेरेतावत् क्षेत्रमित्युक्तं भवति । अथवा सर्वबहग्निजीवा निरन्तरं यावद् भृतवन्तः क्षेत्रं सर्वदिकं एतावति क्षेत्रे यानि अवस्थितानि द्रव्याणि तत्परिच्छेदसामर्थ्ययुक्तः परमावधिः क्षेत्रम- 10 ङ्गीकृत्य निर्दिष्टः, भावार्थस्तु पूर्ववदेव । अयमक्षरार्थः । इदानीं साम्प्रदायिकः प्रतिपाद्यते-तत्र सर्वववग्निजीवा बादराः प्रायोऽजितत्वामितीर्थकरकाले भवन्ति, तदारम्भकपुरुषवाहुल्यात्, सूक्ष्मायोत्कृष्टपदिनस्तत्रैवावरुध्यन्ते, ततश्च सर्वववो भवन्ति, तेपां च बुद्धया पोढाऽवस्थानं कल्प्यते-एकैकक्षेत्रमदेशे एकैकजीवावगाहनया सर्वतश्च- तुरस्रो धनः प्रथमम् १, स एव जीवः स्वावगाहनया द्वितीयम् २, एवं प्रतरोऽपि द्विभेदः ३-४, श्रेग्यपि द्विभेदा ५-६, तत्राऽऽद्याः पञ्च प्रकारा अनादेशाः, क्षेत्रस्याल्पत्वात् कचित् समयविरोधाच, पष्ठपकारस्तु सूत्रादेश इति । 15 ततवासी श्रेणी अवधिज्ञानिनः सर्वानु दिक्षु शरीरपर्यन्तेन भ्राम्यते, सा चासङ्ग्येयानलोके लोकमात्रान् क्षेत्रवि- भागान् व्याप्नोति एतावदधिक्षेत्रमुत्कृष्टमिति । सामर्थ्यमङ्गीकृत्यैवं प्ररूप्यते, एतावति क्षेत्रे यदि द्रष्टव्यं भवति पश्यति, न त्वलोके द्रष्टव्यमस्तीति गाथार्थः ।।४६।। एवं तारज्जयन्यमुत्कृष्टं चावधिक्षेत्रमभिहितम् । इदानी विमध्यमप्रतिपिपादयिपया एतावत्क्षेत्रोपलम्भे चैतावत्कालोपलम्भः तथा एतावत्कालोपन्नम्भे चैतावत्क्षेत्रोपलम्भ इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनाय चेदं गाथाचतुष्टयं जगाद शास्त्रकारः अंगुलमावलियाणं० गाहा । हत्थम्मि० गाहा । भरहनि गाहा । संखेनम्मि उ० गाहा । आसां व्याख्या-'अङ्गुलं' क्षेत्राधिकारात् प्रमाणाङ्गुलं गृह्यते, अध्यधिकारागोन्द्रयालमियके । आवटिका- असचेयसमयसङ्घातोपलक्षितः कालः, उक्तं च-"असंखयाणं ममयाणं नमुदयसमिनिममागमेणं एगा आवलिंग त्ति बुच्चइ" [अनुयो० सूत्रं १३८ पत्रं १७८-२] अगुलं च आवलिका व अगटा-बनिनयोग्गला-ऽऽयनि- कयोर्भागमस येयं पश्यति अवधिज्ञानी । एतदुत्तं भवति-क्षेत्रमङ्गलागल्येयभागमात्रं पश्यन कालन प्रायटिका- 2, या असचेयमेव भागं पश्यति अतीतमनागतं चेति । क्षेत्रकालदर्शनमुश्चापोच्चनं. अन्यथा दि क्षेत्रव्यवम्भि- तानि दर्शनयोग्यानि द्रव्याणि तत्पर्यायांश्च विवक्षितकालान्तर्वनिनः पश्यनि. न न क्षेत्र-काली. मनद्रव्यायम्पनत्यान, एवं सर्वत्र भावना द्रष्टया । निया च नाथाचतुष्टपेऽप्यध्याहा । नया 'हयोः अाला-उज्यविकलोः माची भागौ पश्यति, अल्गुलनाचेयभागमात्र क्षेत्रं पश्यनालियापाः मा देवनागर पम्पनील्यर्थः । नया अगलं पश्यन् क्षेत्रत आवलिकान्तः पश्यति. भिनामावलिकामित्यर्थः । नया काल भलिझा पायन टाइगर यवत्वं पश्यति. पृथक्त्वं हि हिप्रतिरानमभ्यः । इति प्रथनगाचार्यः ॥१७॥ मिनीयगापायाख्या-हस्ते' इति हतविपनः मतांवधिः शारदा वान्टः पति. निन- - 20 २८. - -- श्रीहरिभद्रसूरिसूत्रितया वृत्त्या समलङ्कृतं [सू. २५-२७ मुहूर्त्तमित्यर्थः, अवध्यवधिमतोरभेदोपचारादवधिः पश्यतीत्युच्यते । तथा कालतः ‘दिवसान्तः' भिन्नदिवसं पश्यन् क्षेत्रतः 'गव्यूते' इति गव्यूतविषयो बोद्धव्यः । तथा योजनविपयः क्षेत्रतोऽवधिः कालतो दिवसपृथक्त्वं पश्यति । तथा 'पक्षान्तः' भिन्न पक्षं पश्यन् कालतः पञ्चविंशतिं योजनानि पश्यतीति द्वितीयगाथार्थः ॥ ४८ ॥ तृतीयगाथाव्याख्या- 'भरते' इति क्षेत्रतो भरतविपयेऽवधौ कालतः अर्द्धमास उक्तः । एवं जम्बूद्वीप- । विपये चावधौ साधिको मासः । वर्ष च मनुष्यलोकविषयेऽवधाविति, मनुष्यलोकः खल्बर्द्धतृतीयद्वीप-समुद्रपरि- माणः । वर्षपृथक्त्वं च रुचकाख्यवाह्यद्वीपविपयेऽवधाववगन्तव्यमिति तृतीयगाथार्थः ।। ४९ ॥ चतुर्थगाथाव्याख्या-सङ्घयायत इति सङ्ख्येयः, स च संवत्सरलक्षणोऽपि भवति । तुशब्दो विशेषणार्थः। किं विशिनष्टि ? सङ्ख्येयो वर्षसहस्रात् परतोऽपि गृह्यत इति, तस्मिन् समयेये कलनं कालः तस्मिन् काले अवधे- गोचरे सति क्षेत्रतस्तस्यैवावधेर्गोचरतया द्वीपाश्च समुद्राश्च द्वीप-समुद्रा अपि भवन्ति सन्न्येयाः । अपिशब्दाद् महा- 10 नेकोऽपि तदेकदेशोऽपीति । तथा 'कालेऽसङ्ख्येये' पल्योपमादिलक्षणेऽवधेविपये सति तस्यैवासङ्ख्येयकालपरिच्छे- दकस्यावधेः क्षेत्रतः परिच्छेद्यतया द्वीप-समुद्रास्तु भाज्याः कदाचिदसङ्ख्येया एव । यदा इह कस्यचिन्मनुष्यस्या- सङ्ख्येयद्वीप-समुद्रविषयोऽवधिरुत्पद्यत इति, कदाचिन्महान्तः सङ्ख्येयाः, कदाचिदेकदेशः स्वयम्भूरमणतिरश्चोऽवधि- विज्ञेयः, स्वयम्भूरमणविषयमनुष्यवाह्यावधेर्वा, योजनापेक्षया च सर्वपक्षेष्वसङ्ख्येयमेव क्षेत्रमिति गाथार्थः ॥५०॥ एवं तावत् परिस्थूरन्यायमङ्गीकृत्य क्षेत्रद्धया कालवृद्धिरनियता, कालवृद्धया च क्षेत्रद्धिः प्रतिपादिता। साम्प्रतं 15 द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावापेक्षया यस्य वृद्धौ यस्य वृद्धिर्भवति यस्य वा न भवत्यमुमर्थमभिधित्सुराह काले० गाहा । व्याख्या-'काले' अवधिज्ञानगोचरे वर्द्धमाने 'चतुर्णा' द्रव्यादीनां वृद्धिर्भवति । कालस्तु भाज्यः' विकल्पयितव्यः क्षेत्रस्य वृद्धिः क्षेत्रवृद्धिः तस्यां क्षेत्रवृद्धौ सत्याम् , कदाचिद् वर्द्धते कदाचिन्नेति। कुतः? क्षेत्रस्य सूक्ष्मत्वात् , कालस्य च स्थूलखात् । द्रव्य-पर्यायौ तु वर्द्धते । सप्तम्यन्तता चास्य- ए होइ अयारंते पयम्मि वीयाए बहुस्सु पुल्लिंगे। तइयाइसु छटी-सत्तमीण एकम्मि महिलत्थे ॥१॥ 20 [ अस्माल्लक्षणात् सिद्धेति । एवमन्यत्रापि प्राकृतशैल्या इष्टविभक्त्यन्तता पदानामवगन्तव्येति । तथा वृद्धौ च द्रव्यं च पर्यायश्च द्रव्य-पर्यायौ तयोद्धौ सत्यां 'भाज्यौ' विकल्पनीयौ क्षेत्र-कालावेव, तुशब्दस्यैवकारार्थखात्, कदाचिदनयोर्टद्धिर्भवति कदाचिन्नेति, द्रव्य-पर्याययोः सकाशात् परिस्थरत्वात् क्षेत्र-कालयोरिति भावार्थः । द्रव्य- सुद्धौ तु पर्याया वर्द्धन्त एव, पर्यायद्धौ च द्रव्यं भाज्यम् , द्रव्यात् पर्यायाणां सूक्ष्मवाद् एकस्मिन् भावे 26 क्रमवर्तिनामपि च वृद्धिसम्भवात् कालद्धयभावो भावनीय इति गाथार्थः ॥५१॥ अत्र कश्चिदाह-जघन्य-मध्य- मोत्कृष्टभेदभिन्नयोरचधिज्ञानसम्बन्धिनोः क्षेत्र-कालयोरङ्गला-ऽऽवलिकाऽसङ्ख्येयभागोपलक्षितयोः परस्परतः प्रदेश- समयसगळ्यया परिस्थर-सूक्ष्मत्वे सति कियता भागेन हीना-ऽधिकत्वम् ? इति, अत्रोच्यते, सर्वत्र प्रतियोगिनः खल्यावलिकाऽसग्व्येयभागादेः कालादसख्येयगुणं क्षेत्रम् । कुत एतत् ? अत आह- सहुमो य० गाहा । व्याख्या-सूक्ष्मश्च-श्लक्ष्णश्च भवति कालः, यस्मादुत्पलपत्रशतभेदे समयाः प्रतिपत्र- :20 मसाघेयाः प्रतिपादिनाः। तथापि नतः कालान् सूक्ष्मतरं भवति क्षेत्रम् । कुतः ?, यस्मादङ्गुलश्रेणिमात्रे क्षेत्रे प्रदेश- परिमाणं प्रतिपदेशं समयगणनया अवसर्पिण्यः असङ्ग्येयास्तीर्थकृद्भिः प्रतिपादिताः । एतदुक्तं भवति-अङ्गुलश्रे- गिमात्रक्षेत्रमदेशाग्रममायावसर्पिणीसमयराशिपरिमाणमिति गाथार्थः ।। ५२ ॥ ?
हीयमान-प्रतिपात्याद्यवधिज्ञानम् ) श्रीदेववाचकविरचितं नन्दिसूत्रम् । से तं इत्यादि, तदेतद् वर्द्धमानकं अअधिज्ञानमिति ॥ २५. से किं तं हायमाणयं आहिणाणं ? हायमाणयं ओहिणाणं अप्पसत्थेहि अज्झवसायट्ठाणेहि वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकिलिस्समाणस्स संकिलिस्समाणच- रित्तस्स सव्वओ समंता ओही परिहायति । से तं हायमाणयं ओहिणाणं ४ । २५. से किं तमित्यादि । अथ किं तद् होयमानकम् ?, हीयमानकं कथञ्चिदवाप्तं सद् अप्रशस्तेवध्य. 5 वसायस्थानेषु वर्तमानस्य सतोऽविरतसम्यग्दृष्टेः, 'वर्तमानचारित्रस्य' देशविरतादेः, 'संक्लिश्यमानस्य' वध्यमा- नकर्मसंसर्गादुत्तरोत्तरं संक्लेशमासादयत अविरतसम्यग्दृष्टेरेव, 'संक्लिश्यमानचारित्रस्य' देशविरतादेः, सर्वतः समन्तादवधिः परिक्षीयते । तदेतद् हीयमानकमवधिज्ञानमिति ४।। २६. से किं तं पडिवाति ओहिणाणं ? पडिवाति ओहिणाणं जण्णं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेज्जतिभागं वा संखेज्जतिभागं वा वालग्गं वा वालग्गपुहत्तं वा लिक्खं वा लिक्खपुहत्तं 10 वा जूयं वा जूयपुहत्तं वा जवं वा जवपुहत्तं वा अंगुलं वा अंगुलपुहत्तं वा पायं वा पायपुहत्तं वा वियत्थिं वा वियत्थिपुहत्तं वा स्यणि वा स्यणिपुहत्तं वा कुच्छि वा कुच्छिपुहत्तं वा धणुयं वा धणुयपुहत्तं वा गाउयं वा गाउयपुहत्तं वा जोयणं वा जोयणपुहत्तं वा जोयणसयं वा जोयणसय- पुहत्तं वा जोयणसहस्सं वा जोयणसहस्सपुहत्तं वा जोयणसतसहस्सं वा जोयणसतसहस्सपुहत्तं वा जोयणकोडि वा जोयणकोडिपुहत्तं वा जोयणकोडाकोडे वा जोयणकोडाकोडिपुहत्तं 15 वा उक्कोसेण लोगं वा पासित्ता णं पडिवएज्जा । से तं पडियाति ओहिणाणं ५१ २६. से किं तमित्यादि । अथ किं तत् प्रतिपात्यवधिनानम् ?. प्रतिपान्यवधिज्ञानं "जन "मिनि 'यद' अवधिज्ञानं 'जघन्येन ' सर्वस्तोकतयाऽङ्गुलन्यासक्येयभागमात्रं वा. उन्का गर्वमन्नया याद 'लोकं दृष्ट्रा' लोकमुपलभ्य तथाविधक्षयोपशमजन्यत्वात् प्रतिपतेत् न भवदित्यर्थः. नदेन मनिपान्याधितानमिनि क्रिया। एं मायो निगढसिद्धम् । नवरं 'पृथक्त्वमिति' हिमभृतिः आ नयभ्य इति सिमानानिमाया नया दलहगं गतिमल्यने । 20 चत्वारो हस्ता धनुरिति । " से त"मित्यादि तदेतत् प्रतिपान्याधिद्वानम् ।। २७. से किं तं अपडिवाति ओहिणाणं ? अपडिबानि ओहिणाणं जेणं अलोगरम एगमवि आगासपदेसं पासेज्जा तेण परं अपडिवाति ओहिणाणं । से तं अपडियानि ओहिणाणं ६ । २७. से किं तमित्यादि । अथ किं तदप्रतिपात्यधिजानन ?. ""तन प्राधिटाननाटकम्य सम्बन्धिनमेकमप्याकाशमदेशम् . अपिशब्दाद् बहन का पाचन शरमवीर भेन. पवादलायोममम मन 'नन उर्वमिति तत आरम्भापतिपाति आ कलमाप्नेदवितानमिति ! अयमात्र भावार्थ:-स्टारनामा. म्मामात्मा पिनिातभधानप्रतिपक्षयोधमहान व नापतिर्न पुनः कर्ममा परिवन नि ? मास्तिदार. दालोय. एकातिनिरत्तः शेपमपि धर्मश विनिर्मियाऽऽगनि दलगायत्रियमिति । योग-विमान- ३२ श्रीहरिभवसूरिसूत्रितया वृत्त्या सगदसतं [सु. ३० स्साणं ? गोयमा ! कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अकम्मभूमगगभवतियमणुस्साणं, णो अंतरदीवगगव्सवकंतियमणुस्साणं । [१] जइ कम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं किं संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगलवकंतियमणुस्साणं असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभ- वकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो 5 असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं । [५] जइ संखेज्जवासाउयकम्म- भूमगगम्भवतियमणुस्साणं कि पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! पज्जत्तगसंखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भ- वतियमणुस्साणं। [६] जइ पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं 10 किं सम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं मिच्छदिट्ठिपज्ज- त्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगव्भवतियमणुस्साणं सम्मामिच्छदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवा- साउयकम्मभूमगगव्भवकंतियमणुस्साणं? गोयमा ! सम्मदिविपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- म्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो मिच्छदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभव- कंतियमणुस्साणं, णो सम्मामिच्छदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणु- 15 स्साणं। [७] जइ सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणु- स्साणं किं संजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं असंज- यसम्मद्दिहिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं संजयासंजयसम्मदि- हिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! संजयसम्मदिट्ठि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो असंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तग- 20 संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो संजयासंजयसम्मद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [८] जइ संजयसम्मबिट्ठिपज्जत्तग- संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं पमत्तसंजयसम्महिट्ठिपज्जत्तगखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं अपमत्तसंजयसम्महि द्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउय- कम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! अपमत्तसंजयसम्महि द्विपज्जत्तगसंखेज्जवासा- 25 उयकम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं, णो पमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- म्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [९] जइ अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवफंतियमणुस्साणं किं इडिपत्तअपमत्तसंजयसम्मद्दिछिपज्जत्तग-