Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Japan Charitra
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जापान-चरित्र
और
रूस-जापान का युद्ध
इतिहास।
वायू आर० ए० अग्रवाल,
चन्दिया (रीवां स्टेट) निवासी कृत।
"Japan is indeed the object lesson of national efficiency,
and heppy is the nation that learns it'
-Lord Rosebury
"वाल-हितेषी" यन्त्रालय,
१० सदानन्द बाजार, बनारस सिटी।
प्रथम सस्करण]
[मूल्य ॥ श्राना
$
PRINTED AND PUBLISHFU
CHANDRA KUMAR BHATTACHARYA
AT TIF
3AL HITOISI PRESS, BERARES CITY
* सूची-पत्र *
१३
.
४८
..."
प्रयकार की निवेदन
भौगोलिक वृत्तान्त
ऐतिहामिक वृत्तान्त
राज परिवार व प्रधान पुरुष
धम्म प्रणाली
सामाजिक राति नीति
शिक्षा प्रणाली
जापानी साहित्य और सम्बाद पन
जापान-साम्राज्य की गठन प्रणाली और राजनीति
वाणिज्य
जापान को समर-शक्ति
जापान की चाना कथाए
। रूस जापान का युद्ध
रमजापान की संधि
.
१२३
--
-
(२)
छपते समय मैंने भ्रूफ आदि विलकुल ही नहीं देखा है।
इससे सम्भव है कि कहीं छपते समय अशुद्धि हो गई हो।
सो मैं अपने उदार पाठकों से यह निवेदन करता हूं कि शुद्धा-
शुद्धिकी ओर ध्यान न देवास्तविक विपयकी ओर सष्टि दें।
अशुद्धिया द्वितीय संस्करण में ठीक करदी जायेंगी।'
चन्दिया( विास्लेट)
३१ मई, १६१३
}
निवेदफ
आर० ए० अप्रवाल ।
-- PHOROSHNIDHIOIL जापान-चरित्र 5150soyeus भौगोलिक वृत्तान्त। १-स्थल निर्देश । सियाफे पूर्वप्रान्त प्रशान्त महासागर के मध्य स्थल में कई एक छोटे बड़े द्वीपों को एकत्रित फार जापान साम्राज्य सगंठित हुश्रा है। उन में निपन, किवसिव, सिकक, येशौ और फार- मोशा, यह पाच द्वीप सर्व प्रधान है, इसके सिवा फिवराइल, लुचुवोनिन, आदि यदुत से छोटे २ द्वीप * इसके अन्तर्गत है। जापान समुद्र कोरिया प्रणाली के पश्चिम में स्थित जापान प्रसियाटिक कम और कोरिया उपद्वपि से F
जापान-चरित्रk
--
वर्तमान सम्राट् योशीहिटो।
भौगोलिकप्तान्त AA २-राजधानी और प्रधान नगरी॥ जापानी भापानीपन शब्द का अर्थ सूर्योदयका होता है। इस द्वीप को चीना लोग, यदु व जिपनऊ नाम से पुकारते थे।प्राचीन युगके भारतवर्ष में इस द्वीपका नाम सुदर्शन था। जापान देश की राजधानी टोकिओ नीपन द्वीप में अवस्थित है। 'टो' शन्द में प्राच्य ओर 'किव' शब्द से राजधानी का अर्थ होता है।जापानी भाषा में टोकिओं के अर्थमें प्राच्य- राजधानी समझना चाहिये । यह भूतपूर्व हमारी राजधानी कलकत्से से ३२०० मील उत्तर पूर्वमें विराजमान है। मनुष्य संख्या इस शहर की १८ लाख है । यह नगर एशिया महादेश की गौरव स्वरूप सर्व प्रधान उन्नतिमय और वाणिज्य प्रधान स्थान है । समुद्र की कई एक शाखाये टोकियो के बीच में से होकर निकली है। उनके उभय पाव नानाविध सुन्दर २ वृक्ष श्रेणियां विराजमान हैं । राजधानी में अनेक छोटे बड़े सुहावने पुल हैं। सर्व प्रधान पुलका नाम पवस है। राजप्रासाद शहरके मध्य अवस्थित है , सम्राट के व्यव- हार तथा राज काज के सुविधाके निमित्त नानास्थानों में अनेक एक से एक बढ़ कर महल बने हुए हैं। और महलाके : चारों और जापान के अनेक प्रधानन्यक्तियों की नानाप्रकार की इमारतें मुशोभित है। इस देशके साधारण गृदादि अधिकतर काष्ठ निर्मित 'है। पीन शहर के राजभवन में जापान की पारतियामेन्ट 4 .
४
जापान-चरित्र
.
१२६ से १५० अक्षांस के बीच में यह साम्राज्य अवस्थित
है। जामान राज्यका विस्तार प्राय. २,५०००० वर्ग मील है।
यह इगलेन्ड, वेलस, स्काटलेण्ड और 'प्रायरलेन्डसे दुगना
पचम जर्मन साम्राज्य और 'फास के बराबर है। यहां की
मनुष्य सध्या ४ करोड से अधिक है।
जापान राज्य दो भागों में विभक्त है। जापान और आधीन
छीय पुंज । जापान शब्द कहने से नीपन, किवसिव सिकक,
और कई एक छोटे २ छीपों का नाम भाजाता है। इन में नापन
लम्बाई में ९०० और चौड़ाई में १०० मील है।
किवासिक, लम्याई में २०० और चौड़ाई में ८० मलि है।
सिकक द्वीप १५० मील दीर्घ और ८० मील प्रशस्त है।
श्राधीन द्वीप पुंजों में येशौ और फारमोसा सर्वापेक्षा
नृहत है । येशो की लम्बाई ३०० मील और चौड़ाई
११०० मील है । फारमोसा लम्बाई में २०० और चौड़ाई में ७०
मोलके करीब है।
'येशी द्वीप इस समय होकायदा नामसे पुकारा जाता है।
फारमोसा चीन समुद्र में है। गत चीन-जापान के युद्ध (१८१४
इ०)मे जापानी लोगों ने चीन से यह द्वीप प्राप्त कर अपने
साम्राज्य में मिला लिया है।
आधीन'द्वीप पुजों में येगौ और फारमोसा सर्वापेक्षा
वृहत है । येशी की लम्बाई ३०० मील और चौड़ाई १०० मीत है
फारमोसा लम्बाई में २०० मील और चौड़ाई में ७ मील है।
।
३
भागोलिक पृप्तान्त ranMKAnwww - - 7 २-राजधानी और प्रधान नगरी॥ जापानीभाषामेनीपन शन्द काअर्थसूर्योदयका होता। इस शीप को चीना लोग,'यटु व जिपनऊ नामने से पुकारते ये प्राचीन युगके भारतवर्षमें इस झोपका नाम सुदर्शन था। जापान देश की राजधानी टोकिओ नीर्पन द्वीप में अवस्थित है। 'टो' शन्द में प्राच्य और 'कि' शब्द से राजधानी का अर्थ होता है।जापानी भाषा में टोकिओ के अर्थ में प्राच्य- राजधानी समझना चाहिये। यह भूतपूर्व हमारी राजधानी फलक से ३२०० मील उत्तर पूर्व में विराजमान है। मनुष्य संख्या इस शहर की १८ लाख है। यह नगर एशिया महादेश की गौरव स्वरूप सर्व प्रधान उन्नतिमय और वाणिज्य प्रधान स्थान है । समुद्र की कई एक शाखाय टोकियो के बीच में से होकर निकला है। उनके उभय पार्श्व नानाविध सुन्दर २ वृक्ष श्रेणियां विराजमान हैं । राजधानी में अनेक छोटे बड़े सुहावने पुल हैं। सर्व प्रधान पुलका नाम निपवस है। राजप्रासाद शहरके मध्य अवस्थित है, सम्राट के व्यव- हार तथा राज काज के सुविधाके निमित्त नानास्थानों में अनेक एक से एक बढ कर महल बने हुए है । और महलाकर चारों ओर जापान के अनेक प्रधान २ व्यकियों की नानाप्रकार की इमारतें सुशोभित है। इस देशके साधारण गृहादि अधिकतर काष्ठ निर्मित 'हैं। बीन शहर के राजभवन में नापान की पारलियामेन्ट . ।
जापान-धरित्र
(महासभा), इउनिवरसिटी, वक,नेवस-कालेज, टारपेटो
कालेज आदि है। इस शहर में बाजार, चौक, उपदन और
डक आदि बने हैं । सन् १६०९ ई० में इस शहर की मनुष्य
संख्या १८ लाख के करीब थी।
पोशाका तृतीय प्रधान शहर है। यह नगर समुद्रतीर में
अवस्थित अति सुरक्षित बन्दर है। यहां की मनुष्य संख्या
१२ लाखके लगभग है। यहां पर युद्धोपयोगी अस्त्र शस्त्रगोला
भारुद भादि प्रस्तुत होते हैं । अनेक लोग इस शहर को
मोरोप के उलविच नगर से तुलना करते हैं । इस नगर के
अधिवासियों में अनेक लोग धनाढ्य और विलास प्रिय
हैं।जापानी लोग इस शहर को 'प्रमोद निकेतन' के नाम
से प्रसिद्ध करते हैं।
कियातो-कियातोके विश्वविद्यालय जगत प्रसिख है।
यहाँ पर जापान धर्मोपदशक निवास करते हैं। जापानी लोग
इनको 'देरी' कहते हैं। इस शहर में जापान के प्राचीन समय
के अनेक चिढ़ पाये जाते हैं। कियातो कुछ दिन हुए समग्र
जापान राज्यकी राजधानी थी।
इयाकोहामा-जापान देशकी सर्व प्रधान सामुद्रिक वन्दर
हैं। यहां पर अंग्रेज फरासीसी शादि वैदेशिक लोगोंके वाणिज्य
जहाज़ आदि आकर लड्नर डाला करते हैं।
हीयोगो-वाणिज्य का प्रधान केन्द्रस्थल है।
तिमनतेकी-सुमुन्द्र तारवर्ती सुरक्षित बन्दर है । इस
मागोलिक वृत्तान्त ७ 1 नगरम चीन जापान का सन्धिपत्र स्वाक्षरित दुना था। मेजारू-यहा एक गवर्नमेण्ट डक है। इस नगर में जल युरोपयोगी अस्त्र शस्त्रादि निर्माण हुआ करते हैं। नागासाक-अति सुरक्षित यन्दर है। फिवसिव दीपमें अवस्थित इस शहरके डफ जगत् विख्यात है। यहां बहुत कोयला निकला करता है । अंग्रेज अमरिकादि युरोपके हरेक जाति के लोग यहा विराट घाणिज्य फैलाए हुवे है । इस शहरके अधिकतर गृहादि अति सुन्दर कई रन के पत्थरोके बने हुए हैं, और बौद्धमत के मठादि भी बहुत से बने हुए हैं। सेसावी-जापान समुद्र के जहाज का प्रधान आश्रयस्थल है। यहां कई एक गवर्नमेण्ट डक है । इस यन्दर में बड़े २जहाज, लाइनार, टारपेडोपोटादि तैयार हुआ करते हैं। हाकाडोत-सुगारू प्रणाली के उत्तर तीर स्थित श्रति सुरक्षित बन्दर है। यहां जहाज निर्माणोपयोगी का एक उत्कृष्ट डकादि है। मातरामै-यैशी द्वीपके शासन कर्ता यहा निवास करते हैं। जापान सम्राट समय २ पर इस मगरमें निवास करने के लिये पाते हैं। शहर चहूं ओर से छोटे २पहाडहाँ शारापरिवेधित है। देखने में यह नगर रमणीय और स्वास्थप्रद है। मारायान-अति सुरक्षित सामुद्रिक बन्दर है। इसके सिवाय जापान में फुकुसमा, आदि बड़े २ नगर है। तवाने-पीनफे दक्षिण पूर्वके उपकुल में अवस्थित फार- + ।
-
--
I
जापान-चरित्र
www
मोशा दीपका प्रधान नगर है । यहां पर जापान के राज
प्रतिनिधि निवास करते हैं । पहिले चीनके घोरपराधी यहां
मंजे जातेथे। फारमोशाम औरभी एक अतिसमृद्धिशाली नगर
ताफाम्रो है। उपरि उक्त नगरोंकेसिवाजापान साम्राज्यम कोवा
हिरोसिमा, फूरि, निगातो आदि कई एक उल्लने योग्य नगर
और भी हैं।
३-जलवायु।
जापान देशका प्राय. समस्त भागही शीत मण्डलके अन्त
जंगत है। उत्तराशमें युरोपके समान अति तीव्र जाड़ा होता है ।
वहादिसम्बर और जनवरीमास में तापमान यन्त्रका पारा २८०
डिगरी के नीचे गिरजाता है। दक्षिणांशमें वायुका ताप शाति
प्रीम के समय ६८ होजाता है, किन्तु दिनमें दक्षिणकी ओर
से और रात्रि में पूर्वकी और से समुद्र वायु प्रवाहित होने के
कारण ग्रीष्म का ताप तेज नहीं होने पाता । इस देश की ऋतु
अत्यन्त परिवर्तनशील होन पर भी जल वायु.साधारणत.
स्वास्थप्रद है । पुर्व बायुकी अपेक्षा दक्षिणकी वायु समधिक
सूखप्रद है।वर्षातमें जापान देशमें अतिवारि वर्षण हुआ करता
है। ग्रीष्म में वायुभीप्रति प्रचण्ड चलती है ।झाटिका, वनपात,
समुद्रसावन और भूमिकम्प सर्वदा ही हम देश में हुश्रा
करते हैं॥
भौगोलिक वृत्तान्त
.
7
४-भूमि, और आपन्य।
जापान की भुमिसाधारणत-उर्वरा हे।देशमें सर्वत्रही कृषि
कार्य अति उत्तमतासे हुआ करता है । जापानी लोगों के
समान शापि कुशल जाति पृथ्वी में और कहीं नहीं होगी। यहां
खोग एक टुकडा जमीनको भी नहीं फालतू रहने देते हैं। सुविधा
के अनुसार बढे २ उच्च पहाडॉमें भी खेतियां हुसा करती हैं।
सरकारी अाशा है कि यदि कोई जगलों को काट कूट कर खेती
कोरेगा तो उससे ५ साल तक कुछ भी भुमि का महसूल नहीं
लिया जागा और यदि कोई आदमी थपने खेतको पिना,जोते,
घोये एक सालभी पढा रहने देगा तो उस कीजमीन छीनकर
फिसी दूसरे को देवी जायगी। हां, यदि उसके पास कार्य
चोग्य सामग्री न होतो सरकारले सर्व प्रकारकी सहायता
दी जायेगी।
आपान देश में धान, जौ, गहुँ, चाह, रुई, रेशम, पाट, तम्बाकू
सादि प्रचुर परिमाणले उत्पन्न होती है। धान की खेती ही यहां
सबसे अधिक होती है। यहापर एक प्रकारका प्रति उत्कृष्ट
चावल होती है जिस को शीतल जलमें डुशेने ही से भात बन
जातातम्यातनागासाकि ओरसासमाप्रान्तकी अतिउत्कृष्ट
और सुगन्धयुक्त होती है। जापानी लोग यही विद्वचासे
तम्बाएकी खेतीकिया करते हैं। विदेशी जिसने कभी तम्बास
का सेवने न किया होगा वह भी इस देशमें पहुंचने पर अवश्य
साचार हो इस सम्बाकूको पीयेगा और उसे इस तम्बाक की
-
२
जापान-धरित्र
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ममता त्यागनी कठिन हो जायगी।
और भीनाना प्रकारकी वस्तुएं जैसे तरबूज, आलू, काफी,
चा, सन्तरा, अंगूर, अमरुद, आम, केला, वाश, कपूर और
चार्निश उत्पाटक वृक्षादि, नानाविध आश्चर्य उद्भिज यहापर
अधिकतासे उत्पन्न होत है ।
एक प्रकारके वृक्षसे धके समान श्वेत वर्ण रस निकलता
जो बसे भी अधिक उपकारी और मीठा होता है। बड़े बड़े
वृक्षों में श्रोक, पाइन, देवदार मदाग्नि शादिश्रधिक होते है।
जापान देशमें नाना श्रेणीके अति मनोहर सुगन्धयुक्त पुष्प
खिलते हैं । इस देशमें पशमका प्रभाव नहीं है । यहाकी तूत
से पैठा हुई रशम जगत प्रसिद्ध है।
५-धातु।
स्वर्ण, रोप्य, तात्र, टीन, पत्थर का कोयला आदि अधि
कता से खानों से निकाला जाता है । लोह अधिक नहीं
निकलता है इससे यहां के निवासी अधिक कार्य ताम्बे से ही
लिया करते है। यहां के ताम्बे के समान अति उत्कृष्ट ताम्बा
पृथ्वी के किसी और भाग में नहीं मिलता है । जापानी लोग
इस ताम्बे की एक इञ्च मोटें और वीस फुट चौड़े तखते
आदि बना कर संसार के नाना प्रान्ता में विक्रय परते हैं।
दूसरे नम्बरके ताम्या ईर के आकारका बनाया जाता है ।
सौगोलिक वृत्तान
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जापान नाम्चेती किसी किसी सानसे सोना निकलने
लगता है।
सम्राटकी भाशा चिना पोई भी फम्पनी स्वर्ण सुदाइका
कार्य प्रराम्भ नहीं कर सकती ह । इस देशका टीन चादीके
समान उज्वल होता है । जापान देशके नाना स्थानों में एक
विलकुल सफेद रंगकी मिट्टी निकलती है जिसके वर्तन
बनने पर पत्थरके समान मजबुत हो जाते है । हमारे देशमें
जो एक से पक वढीया बने हुए चीनी के वर्तन पाते हैं वह
यहा से ही अधिक प्राते हैं तथा संसारके नाना प्रान्तों में
जाकर बहु मूल्य में विकते है ।
-
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।
६-जीव-जन्तु ।
जापानम अश्न, महिप, गाय, थैलादि भी अधिक है।
इस देश के प्रश्न अति बलोष्ठ किन्तु ठिंगने होते हैं। मृत्ति-
कामपर्ण और गाडी खींचने के लिये अधिकतर इन घोड़े
और वेलामे काम लिया जाता है। मेप, हरिण, शूकर, रीछ
यकरा आदि भी अधिक हैं ।
जापान के पशु, पक्षी अतिविचित्रही होते हैं। इस पार्थिव
अमरावती, हस, मोर, और मरत पक्षीके सिवा उज्वलवर्ण
विशिष्ट विहंग बहुत हे॥
यहासर्प बहुत कम है। फिनाकारी और तिताराजी नामक
दो श्रेणी के सर्प यहा है । यह हमारे यहा के काले और चिने
www wwwwwwwwwwww.
नापान चरित्र
वैदिक धर्मोपदेशक लोग इन देशोम साया करते थे इल
वातका विस्तार सहित स्वीकार किया है।
कुछही समय व्यतीत सुधा जव ार्य वणिक सम्प्रदाय
जहाजों में सवार हो वालि, जावा, सुमीत्रा, वोर्नियो, आदि
प्राच्य द्वीप पुओंमें आवागमन करते थे । इन सब स्थानोम
अवतक भी आर्यलोगोंके उपनिवेशके स्पष्ट चिह्न वर्तमान
है। श्रायं लोग जापानमें ' वरावर भाते जाते थे इस ।
यातका बहुतसा प्रमाण उक्त देशमें अवतकमी विद्यमान
है। इयाकोहामास कुछ दूर, कामिमुरा नामक स्थानमें
१६ । १७ हाथ ऊंची एक स्वच्छ प्रस्तर की बुद्धदेवकी प्रति-
मूर्ति है । मुर्तिके नीचे सस्कृत श्लोकों में जो विवरण लिखा
है उसके पढ़ने से मालुम होता है कि सन् ई० फे बहुत
पहिले बनी हुई यह प्रतिमा भारतघर्ष से यहां बड़ी धूम
धामके साथ खरीद कर लाई गई थी।
यह स्पष्ट झात होता है कि जापानदेश का प्राचीन
नाम सुदर्शन द्वीप था। वाल्मीकि रामायणके अन्तर्गत
किष्किन्धा काण्डके चौबीसवें सगमें, चारुदर्शन सुदर्शन
द्वीप और सूर्य राग राखत मनोहर स्वर्ण पर्वतोंका उल्लेख
है। कालक्रम से सुदर्शनका अर्थ 'निपन' होगया है।
प्राचीन सुवर्ण पर्वतसे आधुनिक फुजिसान पर्वतका नाम
उत्पन्न हुआ है। महर्षि वाल्मीकि जी ने सुदर्शन छीपको
सुर्योदयका स्थान कहकर वर्णन किया है। हम ऊपर लिस
झाये हैं कि जापानी भापाम नापन शब्दका अर्थ सूम्याक्ष्य
सापान-चरित्रkh
-
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तिहासिक वृतान्त ।
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का स्थान होता है। प्रायोके वैवखत मनुके समान जापान,
राजवंशंके श्रादि पुरुप शिन्तो ( Shinto ) सूर्यले उत्पन्न
हैं। जापान राजवंशके लोगशपनेकोअरतक भी सूर्यवंशीय
कह कर परिचय देते है।
अनेक युरोपियन लोग अनुमान करते हैं कि सभ्यता
अग्निसे प्रज्वलित हो जापान श्राज ऊया के सुकुमार करुण
प्रभाके समान जो उन्नतिके मार्गमें अग्रसर हो रहा है
सो वह सब जापान बासियोंने युरोपसे प्राप्त की है । यह
उनका अनुमान ठीक नहीं है । पाश्चात्य सभ्यतासे जापानने
बहुत कुछ शिल्पचातुर्य प्राप्त किया है किन्तु उसके
जातीय फलेवरका संगठन प्राचीन आर्यावर्त से ही
सगठित हुआ है । अवतक भी उसका दृढ़ निदर्शन उसके
उदाहरण इस देशवासियों में प्रत्यक्ष दृष्टिगत होते हैं।
जापान हीपकी उत्पत्ति भोर पहा के निवासियों के
सम्बन्ध अनेक उपारयान प्रचलित है। उनमें अधिकागही
भारतीय पोराणिक प्रारीयोंके सामान अपूर्व रहस्यो
से परिपूर्ण है। जापानी लोगोंको विश्वास है कि हमलोगोंके
छ पहिले इस द्वीपमें देवता राज करते थे। उमीदेव
यशमें श्रातय और देव-धर्म-विशिष्ट एक सम्प्रदायके मनु-
प्योका जन्म हुश्रा । कुछ दिन बाद उन लोगों की सन्तान
। सन्ततिसे हमलोगों की उत्पत्ति हुई है।
अंगरेज ग्रन्थमारांदा अनुमान है कि चीनसे जापानी
7
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जाणन पारिन, , " जोजिकी" नामक जापानके पुराना ग्रन्थमें लिता है कि शिन्ती' नामक एक महापुरुष भगवान सूर्यसे नृत्युतोक म उत्तान हुए । 'उनकी सन्तानसन्तति बहुत , दिनो तना पृस्त्रीम; सुगासन फर फिर रवर्ग-लोकको चलो गई। उनके चले जानेपर यहा 'निपन' राज्यम देवासुर संग्राम प्रारम्भ, दुवा । तय देवी वनुमती 'उकुनिननी' नामक अजेय असुर द्वारा महापादित दो प्रभाकर-पत्ती मादेषी "शमृतरासिको' का प्राशय ग्रहण किया। महादेवाने वसुन्धराके कातर भान्दन से दयार्द्र हो 'मिफाडो' नामक महावलशाली देवसेनापतिको दैत्य दमनार्थ भूततने प्रेरित किया । यहुत दिनोंतक देव दानवका भीपण युद्ध होता रहा। शन्तमें मिकाडो और उगने मानस-पुत्रके वासुदलसे दानव पगजित हो देश त्याग कर पाताल में भाग गये । युद्ध के चन्द होनेपर मिनोडो निपनके सम्राट हुए । उसो मिलाडो-वंशम “जीमुतमनु " नामक एक महा प्रतिभाशाली नरपतिने जन्म ग्रहण किया।प्रथम निनो'सम्वत् में अर्थात इस्सी सन्के ६६० वर्ष पहिले इनका आविर्भाव हुमा था। इस समयले जापानमें काल-गणनाका सुन- पान मा हे। देव-घंश-सम्भूत कहकर प्रसिद्ध होने के कारण जीमुतमनु देशम महान प्रतिया प्राप्त किया था। सप धर्म मन्दिर में महोत्सबके साथ आपकी नित्यपूजा -
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जापान-चरित्र Lyri
ऐतिहासिक मृतान्त
MNANAMAN
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उस समय
.
छुआ करती थी। प्रजागण आपको साक्षात-ईश्वर समझ
श्रापले भय और भक्ति करती थी। इन्हीसी अाशाश्रां
को जापानी लोग शिन्तो धर्म' करते हैं। सूर्य-पूजा, राजा
भक्ति शोर स्वदेश नीति इस धर्मका मूल-मन्त्र है। प्रजा'
मात्र ही सम्रा आर स्वदेशके निमित्त सागर सलिलके
'समान अकातर प्रर्थ भोर शोणित व्यय कर देता है।
जोमुतमनु मिकाडो के वादसे जापानका राज सम्मान
अति अधिक पारमाण से वृद्धि पाता रहा।
जन साधारण सम्राट को देवता समझकर उनका शरीर
। परम पविन जान पूजा करती थी। राजा उन समय
मृत्तिका स्पर्श नहीं करते थे। किसी स्थानमें जाते'
समय चाहकों के कन्धे पर तामजाम में विराजमान हो
परदेको योटर्म हो पाते जाते थे। सम्राट के जख प्रार
। केश पाप जयल कोई काटछाट नहीं सकता था।
। सनाटके लिये प्रतिदिन नूतन पात्रों में भोजन चनता, भौजनके
चादपस्तववेतन समुद्रम फंक दिये जाते थे,किसीको धुने तक
को यह नहीं दिय जाते थे। जिसदिन सम्राट नूतन स्वर्ण
पानाम भोजन करते वे सब सोनेके वर्तन गलाकर
यातुके टुकटे बना लिये जाते। सम्राट की तबियत भी कुछ
। अलील होने पर शिन्तो धर्ममन्दिर के पुरोहितलोग
उपवासी गा निकाल सन्ध्या भोर परमात्मा से प्राथर्ना
किया करते थे। सन्नाट भारद सुन्दरी सियों तक को-
जापान-चरित्र । t ऐतिहासिक वृत्तान्त wrHANN . . + दुना करती थी। प्रजागण आपको साक्षात-ईश्वर समझ आपसे भय और भक्ति करती थी। इन्हीसी आशाओं को जापानीलोग शिन्तो-धर्म' कहते है। सूर्य पूजा राज भक्ति और रचदेश प्रीति इस धर्मका मूल मन्त्र है । प्रजा मात्र ही सम्राट और स्वदेशके निमित्त सागर-सलिल के समान अमातर अर्थ थोर शोणित व्यय फर देती है। जामुतमनु मिकाडो के बाद जापानका राज अति अधिक पारिमास से वृद्धि पाता रहा। उस समय जन-साधारण सम्राट को देवता समझकर उनका शरीर परम पविन जान पुजा करती थी। राजा उस समय । मृत्तिका स्पर्श नहीं करते थे। किसी स्थान में जाते समय पादकों के कन्धे पर तामजाम में विराजमान हो परदकी मोटी हो पाते जाते थे। सम्राट के जर और देश पाप भयस कोई फाद छाट नहीं सकता था। सम्राटलिये प्रतिदिन नूतन पात्रोंमें भोजन बनता, भोजन पादपदपर्वतन समुद्रमफेंक दिये जातेधे किसीको धुने नय को पद्द नहीं दिये जाते थे। जिसदिन सम्राट नग स्वा पानाम भोजन करते वे सय सोनेके वर्तन तार । यातुके टुकटे बना लियं जाते । सम्राट की तबियत भी दूर प्रलीज होने पर शिन्तो धर्ममन्दिर के पुहिनरोग उपयाली रत, निकाल सन्या और परमात्मा से प्राची किया करते !, सम्राट मारह सुन्दरी लियों का - -
or
जापान-चरिन
.
अपने भोग विलासके लिये रख सकते थे। पतीगमजात
सन्तान मानही राज-सम्मान प्राप्त किया करती थी।
परन्तु सबसे बड़ा पुत्रकाही गौरव अधिक होनेके कारण
वही राज-सिंहासन पर बैठाया जाता था। सम्राटकी
मृत्यु होनेपर कनिष्ठ पत्नी स्वामी के संग सती की
खाती थी । अन्यान्य राज-महिपी अपनी इच्छानुसार सती
धर्म पालन करती या पुन• अपना विवाह कर लिया
फरती थी।'
हमारे पुराण प्रन्धों की तरह जापानी पुराण प्रन्थों
में भी असम्भव बाते भरी हुई हैं। उनमें लिखा हे
कि पृथ्वी के नीचे एक वृहदाकार तिमि मछली है,,
उसीके मस्तक पर यह संसार टंगा हुवा है, उसीके जरा
इधर उधर हिलने डोलने पर भुमि कम्प प्रादि महान
उपद्व हुश्रा करते हैं। पहिले जापानीलोगोंका यह
विश्वास था कि देशके सय देव मन्दिर शिन्तोकी पताका
के ऊपर स्थापित है, उससे उन मन्दिरों में भुमि कम्प
सादिका कुछ असर नहीं होसकता है, मनुष्य कुदिनमें
मरने पर प्रेतयोनिको प्राप्त होता है, तथा अधाम्पिक लोग
मरने पर ऋगाल, कुकुरा गुकर और कावे हुआ करते है।
हम जिस समयकी बात लिख रहे हैं उस समय
भारत, चीन, ग्रीस और मिलर देशके सिवा सारे
संसारफे मनुष्य इसी प्रकार असानान्धकार में निमन्न थे।
ऐतिहासिफ हत्तारा इसवी सनके २५५० वर्ष पहिले से अवतकका जापानी इतिहास लिखा हुआ मिलता है। उसके पढने से मालूम होता है कि प्राचीन युग में भी जापानवासियों की शिल्प-कला और वाणिज्य-प्रियता बढी हुई थी। सन् ईसवी के ६५० वर्ष पहिले जापानी लोग सदेश- जात द्रव्यादिको लेकर चीन और कोरिया के साथ समुद्रपथम वाणिज्य व्यवसाय किया करते थे। वर्तमान समय से दो सहस्र वर्ष पहिते भी उस देश प्रति १० वर्ष देशकी मनुष्य सख्या गिनी जानी थी। १७०५ वर्ष व्यतीत हुए जय जापान में डाकघर स्थापित हो चुके थे। एक हजार वर्ष हुया जर जापानी लोग रेशम शेयार कर उसके कपड़े चीनी तथा मिट्टि के बढ़िया वासन बनाना जानते थे। ईसा जन्म के बहुन पहिलेसे ही जापानी लोग आर्यवर्त देशकी बात जानते थे। उसी समय यह लोग भारतवर्षको 'तेनजिकू' और भारतवानीको ' तेनजिक- जिन' नामसे अभिवादन करते थे। उक्त दोनो शन्दों फार्थ यथाक्रम स्वर्ग और स्वर्गवासी है। प्राचीनयुगमे जापानी- लोग किसी भारतवासी को दूर से देखने पर यापसमकहते थे, 'श्राज मेरा माननजन्म सफल हुश्रा, और स्तर्ग-यात्रा का पथ खुत गया, क्याफि मेने मामात स्वर्गवासी देवताके दर्शन कर .
जापान चरित्र सौ वर्ष बाद कालकमले 'माइनामतो' वंशका फि अभ्युदय हुवा । उसमें 'येरितोमो' नामक एक महावीर प्रतापी पुरुपकी उत्पत्ति हुई। इतिहासमें लिखा है कि उनके समान असामान्य धीशक्तिसम्पन्न राजनीति व्यक्ति जापानमें इसके पहिले और एक भी जन्म प्रहर नहीं किया था। वह सन १९८० में सम्राट 'तोका कुरा' के साथ मित्रताकर अपने पुद्धि-कौशलसे प्रधान मन्त्रीका पद प्राप्त कर सव राज-कार्य स्वयही चलाने लगे, याके चो कहिये कि अवसे आपने जापानके सर्वप्रधान शासक वन अस्त हुवे अपने वंशको फिर उदय किया। किसी किसी इतिहास वेत्ताने लिखा है कि 'योरितोभा' नापान-साम्राज्यके 'ताईकुन' अर्थात् सेना- पतिके प्रधान पदमें विराजमान थे। इसी समय जापान की जागीरदारी की प्रथाका परि- वर्तन हुवा। अव श्रागे से जागीरदार लोग अपनी सब भूमि सम्नाटको अर्पण कर बढे २ जर्मादार लोग अपन चेतन स्वरूप 'दस हजार मन कोकू अर्थात् धान वार्षिक पाने लगे। जागीरदारों को जापानी भापा में 'दाई-मित्रो' कहते हैं। सन् १९८६ ई० में जापानके 'सांगन' अर्थात् राज- रक्षक नागका एक प्रधान पद् निर्मान किया गया। उन्ही 'माईनामतो' प्रथम सोगन वंशके बुद्धिमान मन्त्री पोतिहासिक वृत्तान्त। २७ 1 । के परिवार में सन १९८६ ई० से १३३६ ई० तक राज- शासन रहा । 'काकामुरा' नामक नगरमें उक्त मन्त्री महोदय के निवास करनेक भनन श्रादिके भग्नावशेष अवतक भी : वर्तमान है। 'पासिकागो' नामक द्वितीय सोगन चंशने २३७ वर्ष तक कियातो' नगरमें निवास कर राज्य शासन किया था। इस वंशम 'हिटोहयोसी' नामक एक प्रसिद्ध व्यक्तिने सोगन उपाधि धारण कर दो घार फोरिया देशका अधिकाश अपने प्राधिकारमें कर लिया था। प्रयोदश शताब्दी में प्रसिद्ध विजयी 'जंगास,खाँ' के पुत्र सुप्रसिद्ध फुधलाई खां ने असंख्य मुगल सेना के । साथ टीडी दलके समान जापान देशको घेर लिया । प्राय पांच वर्ष तक युद्ध होता रहा। अन्तके भीपण युद्ध में तीन लास सेना को नष्ट करना अपने कई एक साथियों के साथ वह यवन धार जापानियों से सम्र्पूण पराजित हो स्वदेश भाग गया। इस दीर्घकाल व्यापी महासमर में जापान-निवासियों ने जो श्रदुत योरत्व और पूर्व स्वदेश-भक्ति का नमूना दिसलाया था उसका वर्णन जापानी इतिहान ग्रन्थों में पढ़ने से शरीर रोमाञ्चिव और प्रेम-पुलकित हो जाता है। बुद्धिमान' कुवलाई साँ पराजित हो स्वदेश को लौट कर शत्रु जापानियां का देश प्रेम तथा चौद्ध-धर्मकी । गम्भीरता अनुभव कर इतना प्रसन्न हुवा 'फि चीन 1 जापान चरित्र -~ और जापानी सादर चहुतसे लामाओं को अपने देश म बुला प्रार उनके धम्मोपदश सुन पहले आप बौद्ध घरीरलम्बी दुवा, फिर अपने राज्यमें चौद्ध-धर्म प्रचार की श्रासा दी। ना - सन १३०७ ई० में "तोकागुया" वंशक एक प्रसिद्ध व्यक्तिने सोगन उपाधि धारण कर जापानके राज सिंहा सन अधिकार करनेका विचार किया । दाधकाल व्यापी भीपर गृह-युद्धके पश्चात मिकाडो वशने 'कियाता' 'मियाको' और सोगन वंशके 'जेडो' (टोकियो) शहर को अपने अधिकार में कर लिया। इस दारुण गृह-विवाद के विपमय फलके वीजसे जापानकी राजनेतिक तथा सामाजिक सव उन्नतियाँ बहुत दिनांके लिये रुक गई थी। इस समयको अवस्थाका वर्णन करते समय युरो पियन और अमेरिकन इतिहास वेत्ताने लिया है कि जापान में दो नृपति राज करते थे। टोफियो का राजा राज्य शासन करता धा, और कियातो का बौद्ध-धर्म का प्रचार कर रहा था। सुप्रसिद्ध जापानी ऐतिहासिक 'योकाकुरा' ने इस विषय में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'Awakening of Japan ' में लिखा है कि इस देश की अवस्था के साथ वर्तमान भारतवर्ष और जोर साम्राज्य की तुलना की जा सकती है। 111 ऐतिहासिक वृत्तान्त MAN जापानी सोग वेदेशिक जातियों फो, विशेप कर युरोपिय कृस्तान-सम्प्रदायी तोगों को, बहुत दिनों से विद्वेष और अविश्वासकी दृष्टिसे देस रहे थे। सप्तदश शताब्दीके शारम्भमें अग्नेज, फ्रान्ससी, पात्तगीज, डेनमार्क आदि युरोपिय जाति पण वाणिज्य के लिये जापान में भागमन कर कोशल से अपने पेर अदादिये, किन्तु चतुर जापानियों ने अपना भविष्य विचार उससे साव- धान हो कृस्तानोंको अपने देश से निकाल बाहर कर दिया था। हमने इसके पहिले जिस गह-युद्ध की बात का उल्लेख किया है, उसके विषमय फल से क्रमश सापानकी अवस्था शोचनीय होना प्रारम्भ हुई। इसी लमय (सन १८५३ ई. में) कमोडाके पेरी नामक एक पमेरिकन जहाजी सेनापति अनेक युद्ध जहाज लेकर जापान समुद्र में पहुंचा। जापान राज्य और अमेरिका साधारण तन्त्रों के बीच में एक वाणिज्य-सन्धि स्थापित करना ही उसका उद्देश्य था। उस समय 'तोकागुया' वंशके द्वादश सोगन जापान में राज्य कर रहे थे। वह उस हाजी सरदार प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इससे सेनापति पेरी शोषित हो जहाजी तोपों से समुद्र किनारे के शहर टोकियो आदि में गोला परत्ताने .
जापान-चारम
.
यह स्थिर करतेही सबसे पहिले जापानले अद्वितीय
शाकिधर प्रधान सेनापति "फिकि" स्वदेश-हित तमें
शात्म स्वार्थ विसर्जन किया ।
वह अपनी विशाल
राज्य लोगनका. स्वर्ण सिंहासन, अतुल सम्मान प्रादि
समस्तहो सम्राटके चरणों में सोप, आप केवल मात्र
'एक तलवार हाथ ले अल्प वेतनमें ही नोकरी करना
ख्वीकार कर लिया। फिर 'दाइमिओं' उपाविधारी वढे २
जागीरदार लोग, 'श्राइच' और 'तोकामुया' बंशके
सामुराईलोग और अन्यान्य सम्मानित वंशके राजा रईसों
ने एक एक करके 'किकि ' सोगन के सपान्त
अनुसरण किया।
का
बड़े बडे लक्षपति रईसोने हंसते हुबे स्वेच्छा से
साधारण गृहस्थ वन अपनी २ सब अतुल धन सम्पति
राज्यके कोपर्म जमा कर दिये। इस आदर्शका दृष्टान्त
मान, निरक्षर एक फौजी सिपाही तकने अपनी सब भूमि
सम्राट को सौंप, स्वदेश-गौरव रक्षार्थ सन्नाट के सन्मुख
सड़ा वा।
समस्त देशमें ही स्वदेशानुरागफी प्रवल वा बहने
लगी। प्रति नगर, प्रति ग्राम में, स्वदेश घोर सम्राट
की मजल कामनाके लिये भगवान शाक्य मुनिकी आराधना
होने लगी। वालक से वृद्ध पर्यन्त, कृषकले नमीदार
,
६
पोतिहासिक इतान्त ३३ RAMMAnwrwwwmorrowroriwww raw - -- . । सफ, मूर्खमे पण्डित तक-सयही लोग सम्राट और स्वदेशके निमित्त जीवन उत्सर्ग करनेके लिये प्रस्तुत हुवे । स्वदेशानुराग और जाति-प्रेमको प्रल घति से जापान भूमि परम पुरयमय होगई। सोगन पद विलुप्त हो जापान साम्राज्य एक मात्र सम्राटके आधीन हुवा । इस प्रकार सन १८६७ ई० में प्रशान्त महासागर के सुनील यक्षस्थल में एशिया के मुखोजलकारी जापान देशमें नरयुग शारम्भ हुवा। २-नवयुग - . सोगन आधिपत्य अवमान के बाद अगले वर्ष सर १८६८ १० में प्राचीन जापान को नव-जीवन प्राप्त क्षुधा। इसी वर्ष 'मेहजी सम्बत् ' का इस देश में प्रचार किया गया। बड़ी धूमधाम के साथ सब देशमें एक प्रधान अधिपति होनेका दिढोरा पीटा गया। सन्नाट ने शपथ ले स्पदश-गोरव-रक्षार्थ प्रतिक्षा की। प्रथम मेइजी सम्वत में मिकाडो मेघमुक्त प्रभाकर के समान राज-सिंहासन में मुंशोमित हो एक घोषणा प्रचार किया। उस घोपण-प्रम में निस-लिखित पाव विषय हिजे गये थे- (१) राज्यफे यायतीय, फार्य देशोधिहान हितैपायों मग परिमालित होंगे। --
जापान-चरित्र
-
जापान के स्वर्गीय सम्राट् मुत्सुदिटो।
पतिशालिक सुवास
Pune
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1
सफ, मूखसे पण्डित तफ-सवही लोग सम्राट और
स्वदेश निमित्त जीवन उत्सर्ग करनेके लिये प्रस्तुत पुगे।
स्वदेशानुराग और जाति-प्रेमकी प्रयल पति से
जापान भूमि परम पुण्यमय होंगई। सोगन पद विलुप्त
हो जापान साम्राज्य एक मात्र सम्राटके आधीन दुवा ।
इस प्रकार सन १८६७ ई० में प्रशान्त महासागर
के सुनील पक्षस्थल में एशिया ने मुपोज्जलपारी
नापान राम नत्रयुग भारम्भ इगा।
२-नवयुग
सोगन भाधिपत्य अपसान के बाद अगले वर्षमा
१८६८० में प्राचीन जापान को नव-जांचन प्राप्त एया।
इसी पर्प मेइती सम्वन् ' का इस देश में प्रचार किया
गया। बसी धूमधाम के साथ सर देशमें एक प्रधान
अधिपति दोनेका द्विारा पाटा गया। सम्राट ने शपथ ले
स्वदेश-गौग्य-रक्षार्थ प्रतिक्षा की।
प्रथम मेरी सम्पत में मिकाडो मेघमुक्त प्रभाकर फे
समार राज-सिंहासन में मुंशोभित हो एक घोपणा प्रचार
किया। उस घोषणा-प्रन में नित-लिसित पांच धिपय
दिख गये थे-
(१) गर यायतीय फारय देश विधान हितपीयों
नागरिमाणित होंगे।
जापान-चरिथ manA 1 - स्वरूप मिलता है। इसके सिवा पूर्व नेरशों के सञ्चित वातसा धन-जैसे, सोना, चांदी, मणि मुक्तादि- से आपका खजाना भरपूर है। अमेरिकाके एक जापान इतिहास वेचा ने लिखा है कि इनके भण्डार में दो सो करोड़ से भी अधिक का बहु मूल्य धन संगृहीत है। आप घोड़े पर सवार हो भ्रमण करना बहुत पसन्द करते थे । इस लिये आपके अश्वशाला में पृथ्वी के प्रत्येक प्रान्त के रंग बिरंगे घोड़े अवतक विधमान है । सद् अन्ध और सम्वाद-पत्र पढने में भी आपकी अधिक प्रीति थी,इस कारण संसारके प्रति देश से आपके पठन-पाठन के निमित्त संपादपत्र मंगा कर आपके प्राईवेट सेक्रटरी लोग मेजों पर सजादिया करते थे। आप कभी कभी किसी विषय फी अपनी बनाई हुई अपूठी कविताएं पेपरों में छपा दिया करते थे। आप अपनी प्रजा व स्त्रवन्धियों से प्रति प्रेमपूर्वक व्यवहार किया करते थे। सम्राट महिषी प्रिन्सेस 'हाफको 'का जन्म २४ मई १८५० ई० को हुवा था । १ फरवरी १८६६५० को मिकाडो के साथ आपका विवाह हुना था। यह ओमती पतिव्रता, विदुषी और कार्य-प्रिय है। असंख्य दास दासियों से राज भवन परिपूर्ण होने पर भी प्राप निज कर-कमलोसे पतिकी सेवा किया करती थी। राज- कार्य का कोई गूद विषय आ पड़ने पर सदैव
-परिवार 'य प्रधान पुरप
परामर्श लिया करते थे और आप
की ओरका ही सुपरामर्श दिया करती
ने दीन, दरिद्र, पीडित व्यक्ति और
काय्यांके लिये आपसे अपरिमित
ती है उसकी गिनती करना भी
पति के समान आप भी मुकवि,
चती है। वहु सन्तति की जनक
रमाद-दम्पति को समय २ में कर
अकाल मृत्यु पर शोक-ग्रसित
य द्वितीय, पष्ठ, सप्तम, अष्टम
वेत है। मुसाको, कुसाको,
मक यह राज-कन्यायें, जननी
यती और 'रूपवती हैं।
यशोहित दारु नोमिया'सपने
है।
सन १८७१ ई० के ३१
हुवा था । ३ नवम्बर
अर्थात् जापानके, युवराज
.
सन ,१६०० ई०
7
यती रूपवती
--
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राज-परिवार में प्रधान पुरष
अएम
सम्राट आपसे परामर्श लिया करते थे और आप
बदुधा प्रजाके हितकी ओरका ही सुपरामर्श दिया करती
थी। राज्यके कितने दीन, दरिद्र, पीडित व्यक्ति और
देश के उपकारी काय्याँके लिये आपसे अपरिमित
सहायता मिला करती है उसकी गिनती करना भी
असम्भव है। अपने पति के समान आप भी सुकपि,
विद्वान और महा रूपवती हैं। वहु सन्तति की जनक
जननी होनके, कारण सम्राट-दम्पति को समय २ में कई
चार अपने बालकों के अकाल मृत्यु पर शोक-प्रसित
होना पड़ा है। इस समय द्वितीय, पाठ, सप्तम,
और नवम कन्या जीवित है । मुसाको, कुसाको,
नबुको, एकीको आदि नामक यह राज कन्याय, जननी
के समान विद्यावति, गुणवती और 'रूपवती है।
सम्राट के द्वितीय पुन 'यशोहित दारु नोमिया'यपने
पिताके समान शुभगुण-सम्पन्न है। सन १८७२ ई० के ३१
अगस्त को श्रापका जन्म हुचा था । ३ नवम्बर
सन १८८८ ई० को 'कोतसी' अर्थात् जापानके युवराज
पदमें अभिषेक किये गये। सन १९०० ई० के १० मई
को 'सादाको' नामक एक गुणरती रूपवती अभिजात
राज कुमारी के साथ आपका विवाह हुवा और दूसरे
वर्ष १६. अप्रल १९०१ को युवराज पतीने प्रथम पुत्र प्रसव
किया। बालक का नाम 'हिराहित लीय सन्नाटने
-
जापान चरित्र
३-मारकुईस पारीयोशीइयामागातो।
यह अब जापानके सर्व-प्रधान सेनापति हैं। इनका ,
विधा, धुद्धि और विक्रम असाधारण है। वयस इस समय
७८ वर्षकी होने पर भी मारकुईस साहय देह और
हृदयसे कुछ हीन नहीं हुवे हैं। इस समय श्राप
जापानके फील्ड मार्शलके गौरवान्वित पदमें अधिष्ठित है।
४-काउन्ट कातसुरा ।
गत नम-जापान युद्ध के समय आप जापानके 'बैंजो-
दैजिन" अर्थात् प्रधान- मन्त्री--पदमें विराजमान थे।
युर विद्यामें आप इयामागातोके प्रिय शिष्य एवम्
कूट मन्त्रणाके लिये आईतो के समकक्ष हैं। श्रापके
कौशल और सुमन्त्रणासे जापान साम्राज्यने थोड़ी ही
दिनों में उन्नति करते २ सभ्य जगतको आश्चर्यान्वितः
कर दिया है।
५-मारकुईस सैयनजीकिन मतारू ।
सन् १९०६ ई० से फरवरी १९१३ तक आप जापान के
प्रधान मन्त्री-पदमें विराजमान थे। इस अल्प समयमें
ही आपने जापानदेशके वाणिज्य सम्बन्धमें जिस प्रकार
असाधारया उन्नति साधित किया है उससे पाएको
।
।
नापान-चरित्र फील्डमार्शल यामागाटा।
ܝ रात-परिवार य प्रधान पुरुष ४३ ~ Jive पुद्धिमत्ता और कार्य तत्परताका महान परिचय ससार फो मिल चुका है। ६-व्यारन कामुरा । - । - गत महायुद्धके समय भाप जापानके पर-राष्ट्र सचिव (Foreign Secretary) थे। जापान साम्राज्यमें आप एक महान, विलक्षण राज-नीतिज्ञ पुत्प कहकर सभ्य जगतमं विख्यात है। आपने अमेरिकाके पोर्टसमाउथ नामक नगरमें धनुत दिनों तक वास कर रूस-जापान युद्ध की पञ्चायत सभामें सम्मिलित रह जापान गवर्नमेन्ट की थोरसे सन्धि-पनमें हस्ताक्षर किया था। ७-मारकुईस ओयामा । इनकी अवस्था र ६५ वर्षकी है। गत महा युद्धम अापका अद्भुत रण-पाण्डित्य और असाधारण सैन्य पारिनालन शक्ति देस कर सभ्य जगत स्तम्भित हो गया था । गृहमें परिजनगनों से भाप सदा धति भद्र व्यवहार किया करते हैं और सदैव हास्य- घदन और शान्त स्वभाव से रहते है, किन्तु रण क्षेनम शाका आप यमराज सदृश अनुभव होते हैं। श्राप सन १८६४ ई० में चीन-जापान युद्ध में ८० हजार सेना ले नाफर लड़े और शीन विजय को प्राप्त किया था। गत -
नापान चरित्र
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-
कर समन सभ्य जगत विस्मितं और स्तम्भित
गया है। इनका सङ्कल्प स्थिर और अभ्यवसाय असाधा
रण हैं। मन्त्र गुप्त रखने में यह संसार के सव सेना
पति से अग्रसर हो चुके हैं। एडमिरल महोदय किसी
समय भी अधिक वातीलाप नहीं करते । इनका श
एक साधारल गृहस्थके समान है। एकवार सरकारी
चिनकर "मरूकी" के जापान के नाना स्थानों में अपने छाया
चित्र (Photograph) वेचना प्रारम्भ करने पर वह बहुतही
दुखित हुवे थे। इनके पुत्र और कन्या भी बहुत सीध
सादे ह। एडमिरल महोदय कई वार इगलेन्ड में गये।
हैं। एकवार भारत भ्रमण भी फर गये हैं। आप इस
समय जापान के प्रधान नो सेनापति पदमें विराजमान है।
१२-एडमिल कामिमुरा ।
आप जापानके द्वितीय नो-सेनापति है। गत मदा.
युर में श्रापने व्लादिवष्टक (Vladivostok) पन्दर फो
घेरा था।
१३-व्यारन शिवशहा।
श्राप जापान साम्राज्य के कुबेर कहकर विरयात हैं।
इनके पास कई करोड़ की नकद सम्पत्ति विद्यमान है।
आप बुद्धिमान् , सुलेखक और प्राचीन पुण्य होने के
जापान चरित्र
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घाइस एडमिरल कामीमुरा
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राज-परिवार व प्रधान पुष्प
४०
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कारण जापान में बहु माननीय समझे आते है। श्रर्थनीति
और पात्ती-शास्त्र में इनका पचुर अभिझता है। गत
रहायुद्ध में ब्यारन महोदय अपनी कुल सम्पत्ति ही
नम्राट के चरणों में रस युद्ध-क्षेत्र में जानका विचार
फट करने पर सम्राट उनको पटु पन्यवाद दे ऐसा
करने से रोक दिया था ।
इनके अतिरिक्त जापानमें और भी बहुनसे रुतबिध ओर
कार्य-कुशल व्यक्ति निवास किया करते हैं जो ससारके
नाना स्थानों में सरकार की ओरसे राज-दूत का कार्य
कर चुके है। यह सबद्दी सुपरिडत और राजनीति
विशारद हैं। इस समय जापानमें १६ मिन्म (Prince),
४५ मारकुईस (Marquis), १२० फाउन्ट (Count), २००
वारकाउन्ट (Viscount) और व्यारन (Baron) उपाविधारी
३०० जन महा सुशिक्षित और बहु शास्त्रश व्यक्ति विद्यमान है।
+
धर्म-प्रणाली।
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म पहिले ही लिख पाये है कि शिन्तो धम्म'
जापानका प्राचीन धर्म है। इस समय इस
धर्मके लोग "सिनजू"कहे जाते हैं। सूर्य
सहधर्मिमणी'अमृतराशु'च उपा देवी सिनजू
लोगोंकी आराध्यदेवी है। देश के नाना
स्थानोंमें 'मियासिपा' नामक सिनजू लोगोंके धर्म-मन्दिर
यने हुवे है। उन मान्दिरोंके पुरोहित लोग 'निगि' और
'कनेगि' नामसे पुकार जाते हैं। सिनजू लोग अपना
मस्तक मुण्डन नहीं करते। कोई कोई अपना विवाह
भी नहीं करते । सिनजू लोगों में एक विशेपत्व यह है
कि यह लोग अपने देहके कपड़ों और शिरमें लगाने की
टोपी पर अपना नाम, धाम श्रादि पूरा पता लिख दिया |
करते हैं। यह लोग मासके प्रथम, पञ्चदर्श और अष्टा-
विंशति दिवस को उपासनाके अतिरिक्त और कोई गृह
कार्य नहीं किया करते हैं। सिनजू तोग राजाशा-पालन
तीर्थ मण, भिखारी-भोजन, पुण्य दिनमें दान देना
आदिसे अपनी मुक्ति हो जानेका विश्वास किया करते हैं।
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-
-
जापान-चरित्रा
चिनशाला प्रेस, ८१८ सदाशिव पेठ, पुना सिटी
[फमाकरा का डावासू नामक बुद्ध की वृहत् मूर्ति । (यह मूर्ति ५०.फीट ऊची, है।)।
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धम्म-प्रणाली। ४९ इसवी सन के छटी शताब्दी में चीन देशके प्रचारक लोग जापान में वौद्ध धर्म का प्रचार करना प्रारम्भ किया। इसीसमय जापान में 'शिन्तो' धर्म भारतीय तात्रिक धर्म और चीन दार्श- निक कनाफेडसियास प्रतित एक प्राचीनधर्म विद्यमान था। इस समय जापान के अधिकाश व्यक्तिही यौद्ध धर्माव- लम्बी है। हर एक महल्लों में यौद्ध धर्म मन्दिर और पुरोहित लोग देस पड़ते हैं। जापान में प्रत्येक गृहस्थ के मकान में तीन पवित्र स्थान होते है (१) 'कामिदाना' अर्थात् सृष्टिकर्ता भगवान के पूजा का स्थान । (२) 'दसूदान' अर्थात् युद्ध देवी । (३) 'इ.. जिगमी' अर्थात् कुल देवता का गृह । इन सव स्थानों में प्रतिदिन यथारीति पूजा हुआ करती है । सिनजू लोग देवता के सन्मुख दर्पण, स्वच्छ वस्त्र प्रादि रस फिर उन्हें प्राय व्यवहार किया करते है। राजप्रासाट में तीन पविन मन्दिर हैं.-(१) काशिको दोकोरो (२) कोराईदेन (३) शिनदेन । इन तीनों पवित्र स्थानो में देश हितकर समाजोपकारी विषयों की आलोचना हुमा करती है। जापानवासी सिनजू और बौद्ध लोगों में किसी की मृत्यु होजाने पर उसकी देह फूंक दी जाती और कंगालों को भोजन सिलाया जाता है । भारत की तरह हट्टे कट्टे महाब्राह्मणों को व्यर्थ व्यय करने के लिये धन नहीं दिया जाता है। ७
.
। जापान-चरित्र
.
पैरों तक लम्या झला करता है, और इसके भीतरी भार
में असंख्य छोटे २ जेब होते है । "प्रोबी" नामक ७८ हाथ
लम्वा कपड़े से कमरवन्द का काम लिया जाता है । कारमा
और ओवी साधारणत कपास के सूत से ही बनाया जाता
है। कोई रेशमी कपड़े से भी बनवा लिया करते हैं । जापान
में जेवर पहिरने की रीति बहुत ही कम देख पड़ती है।
जापान के बालक बालिकानों को बाल्यावस्था से हा
पिता, माता, ज्येष्ठ भ्राता आदि गुरुजनों का आदेश प्रति
पालन करने का पाठ,पढ़ाया जाता है। इस कारण जापान
लोगों को पारिवारिक जीवन में कोई अशान्ति नहीं उठान
पड़ता है । जापानी वालिका शैशव से ही रन्धन, गृहमार
शय्या रचना, निमन्त्रित लोगों को स्वादिष्ट भोजन कराना
आदि प्रावश्यकीय गृह कार्यों को अति यत्न पूर्वक सम्पप
कर लिया करती हैं।
जापान कुमारी अति अल्प वयस से ही पतिव्रत धर्म
की शिक्षा पाया करती है । घोड़े,पर चढना, नदी जलने
कागज की नौका चलाना, कृत्रिम युद्ध विवाहाभिनय, पुतलिय
की तीर्थ यात्रा, धूल में खेलना आदि इस देश के बाला
बालिकामा का प्रधान कीड़ा है।
जापान में प्रत्येक बालक बालिका का योग्य वयस ही
में विवाह हुना करता है । उच्च श्रेणियों में पात्र की २२ वर्ष
और पानी की १६ वर्ष की अवस्था हो जाने पर विवाह किया
पान-चरित्र दो सुन्दर लडकियां।
.
सामाजिक रीति-नीति
AmAnamin
नि हुआ करती है। पिता,माता आदि प्रकृत अभिभावक
वेवाह सम्बन्ध स्थिर किया करते हैं। इससे कोई पक्ष
गि प्रदर्शन नहीं करता।*
निज परिवार व आत्मीय स्वजन में कन्या का विवाह
बन्ध स्थिर नहीं होसकता है । कोई जापानी युक्ती स्व
छा से स्वयम्वर कर विवाई स्थिर नहीं कर सकती है।
प्रदाय विशेप में कन्यापन ओर वर-पन प्रचलित है।
वाह की रजनी में पान भोजन के अतिरिक्त अन्य कोई
शेप अनुष्ठान नहीं किया जाता है । स्त्री प्राचार प्रचलित
। विवाह समाप्त होने पर वर वधू बहुमूल्य वख्न धारण
( गुरजनों की सेवा में सौन्दर्यवर्द्धन और दीर्घजीवन
'मना के लिये आशीर्वाद प्रदान करने का प्रार्थना किया
रते हैं । विवाह में एक निष्ठुर प्रथा यह प्रचलित है कि
पति युगल में से किसी की या दोनों की मृत्यु हो जाने
उसी विवाह की पोशाक में मृत देह को आच्छादित कर
* वत्तमान के जापानी शिक्षित समाज में एक नूतन प्रथा का प्रचलन
आ है । विवाह सम्बन्ध स्थापन के पहिले भावी जमाता को निमन्त्रण कर
पन मकान में ले आ उसको उसकी भावी पत्नी से वार्तालाप करने का
सय दिया जाता है । साक्षात हो जाने पर यया कम कन्या से कन्या का
ण, विद्या और रूप के सम्बध में चर तथा उसी प्रकार युवती मी अपने
ति की सब प्रकार रूप गुण सुशीलना आदि की परीक्षा कर लिया
रना है।
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सामाजिक रीति-नीति
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न हुआ करती है । पिता माता आदि प्रकृत अभिभावक
वाह सम्बन्ध स्थिर किया करते हैं । इससे कोई पक्ष
ग प्रदर्शन नहीं करता।
निन परिवार व श्रात्मीय स्वजन में कन्या का विवाह
न्ध स्थिर नहीं होसकता है । कोई जापानी युवती स्त्र
मासे स्वयम्बर कर विभाई स्थिर नहीं कर सकती है।
मदाय विशेष में 'कन्यापन और घर पन प्रचलित है।
आह की रजनी में पान भोजन के अतिरिक्त अन्य कोई
प अनुष्ठान नहीं किया जाता है । स्त्री प्राचार प्रचलित
विवाह समाप्त होने पर वर-वधू बहुमूल्य वस्त्र धारण :
गुरुजनों की सेवा में सौन्दर्यवर्द्धन पार दीर्घजीवन
मना के लिये आशीर्वाद प्रदान करने का प्रार्थना किया
.
ते है । विवाह में एक निष्ठुर प्रथा यह प्रचलित है कि
पति युगल में से किसी की या दोनों की मृत्यु हो जाने
उसा विगह की पोशाक में मृत देह को आच्छादित कर
अरमान के जापानी शिक्षित समाज में एक नूतन प्रथा का प्रचलन
nा विवाद सम्बन्ध स्थापन के पहिले भावी जमाता को निमन्त्रण करें
न महान में ते मा उसको उसकी भाषा पनी से वात्तालाप करने का
1 दिया जाता है। मामत हो जाने पर यया कम कन्या से कन्या का
। विश और रस के रूप में यर तया उसी प्रचार युवती भी अपने
सासर सर स तता आदि को परीक्षा कर लिया
*
1
जापान-चरित्र अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की जाती है। इसलिये उन कपड़ों को जापानी लोग बढ़े यत के साथ रस छाड़ते हैं। वालिका वधू विवाह के कुछ दिन बाद ही पविगृह में चली जाती है। वहां उसको सास-ससुर आदि गुरुजनों के आधीन निवास करना पड़ता है। अर्थात् उसे नित्य प्रात काल सबसे पहिले शय्या से उठकर संसार के यावतीय कर्म सम्पन्न करना पड़ता है । जापानी युवती सदा अपने पति के आज्ञाधीन रहा करती है। वह अपने पति को देवता के समान समझ सदा भक्ति भाव प्रदर्शन किया करती है। स्वामी के कुचरित्र होने पर भी वह उसे कुछ नहीं कहती। उन लोगों को विश्वास है कि प्रवृत्ति शान्त होने पर स्वामा को चरित्र स्वयमही शुद्ध होजावेगा । सचमुच में जापान रमणीही पति-हृदय की चिर प्रवादिनी, गृह-सरोवर की प्रफुल्ल-कमलिनी, संसारतरु की विनोद-चल्लरी, शान्तिकुल की सुरभि मल्लिका है। प्राचीन और मध्ययुग में जापान में बहु विवाह प्रथा प्रचलित था। तेहो संहिता" नामक जापानी प्राचीन धर्म शास्त्र केव्यवस्थानुसारभार्याव्यभिचारिणी,मिथ्या भाषिणा, गुरजन विद्वपिणो, कन्या-प्रसविनो*, चौादि दोपाक्रान्ता और पीडिता होने पर स्वामी परित्याग कर सकता है । • The Commentators of the Tho Code say that the stealtriters doss tot mean actual barrenness but the faulare of male $5UC- अर्थात्, तेहो सहिता के टीकाकार ने लिखा है कि केवल क्या नहीं, कन्या पूसविनी स्त्री होने पर भी पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है । "
सामाजिक रीति-नीति
इस समय खी व्यभिचारिणी, अभिभावक के असम्मति
से गृह त्यागिनी और चौर्यादि दोपाकान्त होने पर राज
विधान की सहायता द्वारा सी परित्याग करना पड़ता है।
जो लिखा पढ़ी कर विवाह सम्बन्ध स्थिर किया करते हैं
वह अपनी लिखित प्रतिज्ञा (तहरीरी एकरार) के अनुसार
कार्रवाई किया करते हैं।
जापान में सब श्रेणी के निवासियों में स्वइच्छानुसार
विधवा विवाह प्रथा प्रचलित है। उप और सम्भ्रान्त गृहों
मैं पहिले भारतवर्ष की नाई पति की मृत्यु पर कोई २ सती
होजाया करती थी। किन्तु रागनियमानुसार अय यह प्रथा
एक बार ही राफ दी गई है।
जापान में भिम २ यायाधारी अनेक वंशों का परिचय
पाया जाता है। प्रत्येक बंशही में एक जन"इकजीनोकोमी"
अर्थात् प्रधान है। पहिले जापान में प्रत्येक वंश फी रेजिस्टरी
इभा करती थी और सरकारी रोजिस्टर में प्रत्येक वंश के
प्रधान-व्यक्ति का नाम और वास स्थान लिखा रहता था।
एक रजिस्टर में १९८२ बशों का उल्लेख है।
जापान के प्राचीन धर्म -पुस्तक
में त्याज्य पुत्र का
उल्लेख है। पुत्र के वश के प्रधान पुरुप का अपमान करने
पर, बंश गौरव के कोई हानिकर कार्य करने से अथवा
उन्मत्त (पागल) व क्लीव होने पर मा कि चोरी आदि का
बुरा स्वभाव दोने से पिता द्वारा त्याज्य होसकता है । इस
२८
नापाम-चरित्र
समय सरकारी कानून की सहायता बिना कोई व्यक्ति अपने
पुत्र को परित्याग नहीं कर सकता है।
जापान में "कियो योशी" अर्थात् पोध्यपुत्र ग्रहण की
प्रथा प्रचलित है । चार पुरुषों के मध्यस्थित शाति से १०
वर्ष से कम आयु का चालक गोद लिया जाता है। किन्तु
किसी बालक को अपने घर में रख उसके साथ अपनी
लड़की का विवाह दे तो वह गोदी में लिया हुशा समझा
जा सकता है । इस प्रथा को जापान में "मुकोयोशी" कहते
हैं। वर्तमान में यह प्रथा अधिक प्रचलित होजाने के कारण
नवीन दीवानी आईन की ८१६ दफे में और रजिस्टरी आईन
के १०२ धारा में "मुकोयोशी" के सम्बन्ध में कई एक समि
नव नियम बना लिये गये हैं।
जापान में ज्येष्ठ पुत्रही पिता का सम्मान "वोटेको
सोजा" और सम्पत्ति "प्राईसन सोजा" प्राप्त किया
करता है। पुत्र के अभाव पर मृत व्यक्ति का पिता, पिता
के अभाव पर माता, उसके न होने पर प्रथम पती, उसके
अभाव में मृतक का सहोदर, उसके भी अभाव होने पर
अन्य स्त्रियां, तदाभाव में मृतक का नातेदार मातागए
लम्पत्ति के उत्तराधिकारी हो सकते है।
अन्न, मछली, शाक सयजी जापानी लोगों का प्रधान
भोजन है।प्रति सम्भ्रान्त व्यक्ति से दीन हीन गरीच तफसवही
लोग भात, मछली और शाक सबजी माहार किया करते हैं।
-
सामाजिक रीति-नीति
५६
जापान में शूकर और गो मांस भक्षण करने की प्रथा
प्रचलित है। वहां कोई भी गो हत्या नहीं कर सकता।
कस्तान और युरोप से आये मुवे कोई कोई लोग विदेश से
मंगा कर वाफ भक्षण किया करते है । तरकारी विशेप में
दूध, घी, नवनीत, तैल और चरवी अधिक भोजन किया
करते हैं।
।
जापान के अधिकांश नर नारी चाह पान किया करते
हैं। "साकी" और "सय" जापान की जातीय सुरा है इस
लिये उसको प्राय सपही लोग पान किया करते है । साफी
चावल से बनाई जाती है। वह पहिले पहल ओशाका नगर
में निम्मित सुई थी इस लिये इसका नाम "साकी" रक्खा
गया हे । चिकित्सक के अनुमति बिना कोई व्याक जापान
में अफीम, गांजा, चरस का सेवन नहीं कर सकता है।
यहाँ सिगारेट पोर विविध प्रकार की ताम्रकूट (तम्बारसू)
सेवन की प्रथा अधिक है।
जापानी तोगा में अब तक अनेक कुसंस्कार वर्तमान है।
रावि समय कोई निमक उधार लेता देता नहीं । मास के
शेष शनिवार को वन धुलाना दोप समझा जाता है। विवाद
के दिन वर कन्या को परिच्छद लाल वा बैंगनी रंग की
होने पर उभय में दाम्पत्य चन्धन स्थायी नहीं होगा। ग्रहण
के समय जलपान करने पर शरीर में विष प्रविष्ट होजाता है।
इकुर के रोने पर गृहस्थ का अकल्याण होता है। मुरगे के
जापान-चरित्र
KAAN
गर के ऊपर चढ़ जाने पर उस मकान में आग लग जाने की
सम्भावना है। मछली पकड़ते जाते समय यदि मार्ग में
पुरोहित से साक्षात होजाय तो अपने गृह में लौट आजाना
ही उचित है। ग्राम में यसन्त और कालेरा प्रभृति छुभा छूत
के रोग के फैलने पर गृहस्थ लोग अपने घर के बाहर
दरवाजे में लिख दिया करते हैं कि "इस मकान में फालतू
श्रादमी एकभी नहीं हैं। जापानी लोग यात्रा समय, बकवक"
और "सूकि" नामक कच्छप देसने पर अति प्रानन्द अनुभव
किया करते हैं।
जापानी लोग सदैवही स्वच्छ वस्त्र धारण करना बहुत
पसन्द करते हैं। नित्य प्रति ३ बार स्नान किया करते हैं।
यहां प्रत्येक गृहस्थ के मकान में कई एक फूलों के पेड़ होते
हैं, एक टुकड़ा फ्रीड़ा भूमि और एक कुआं देख पढ़ता है।
जापानी लोग खुली हवा सेवन करने पर अति प्रसन्न हुआ
करते हैं।
शिक्षा-प्रणाली। AHnth है शिक्षाही सावध उन्नति को मूल सु साम्राज्य की परमोनति, वाणिज्य का विपुल विस्तार, स्वदेश का भीपुष्टि साधित करना, शानकी परिधि प्रसारन आदि सय विषय मुशिक्षा से ही प्राप्त हुआ करते हैं। जापान- वासियों ने गत ३५ वर्षों में शिक्षा विषय में जो उन्नति लाम किया है, वह संसार के इतिहास में अति अपूर्व और सर्यो- पेक्षा विस्मयजनक है। जापान के शिक्षा का इतिहास सन् १८६८ ई० से प्रारम्भ होता है। इसके तीन वर्ष बाद गवर्णमेण्ट की आशा से जापान में 'मवासो' अर्थात् शिक्षा-विभाग स्थापित हुआ। २८७२६० में शिक्षा विपय के कुछ नियम निर्मित हुए, उसी से शिक्षा विभाग में नवयुग का प्राविर्भाव हुआ। इस समय जापान में चार श्रेणी के विद्यालय देख पड़ते हैं, यथा-प्राथमिक विद्यालय, मध्य विद्यालय, उच्च विद्यालय और विश्वविद्यालय। प्राथमिक विद्यालय जापान के प्रति 'सान' अर्थात् देहातों में देख पड़ते हैं। इनमें ६ वर्ष से १४ वर्ष तक के बालक
जापान-चरित्र
।
बालिकाओं को जापानी भाषा में शिल्प, कृषि, वाणिज्य,
गणित और स्वास्थ्य-रक्षा विषयक साधारण विषयों की
सुशिक्षा दी जाती है, पीड़ित और अति दरिद्र के सिवा
ग्राम के सब बालक बालिकामाही को इन विद्यालयों में
पढ़ने आना पड़ता है।
यह समस्त विद्यालय गवर्णमेण्ट और ग्राम वासियों के
द्रव्य की सहायता से चला करते हैं। सन् १६०२ ई० में इस
श्रेणी के विद्यालयों की संख्या २८३८ छात्र और छात्री संख्या
५० लाख के करीव और शिक्षक और स्त्री-शिक्षकों की संख्या
२ लाख के करीब थी।
जापान के प्रति जिलों में ही एक व उससे अधिक मध्य
विद्यालय अवस्थित हैं । इन सव स्कूलों में १४ से २० वर्ष
तक के चालक बालिकाओं को जापानी, चीना, और अंग्रेजी
भाषा में साहित्य, इतिहास, भूगोल, गणित, ज्यामिति, विज्ञान,
रसायन, ज्योतिप प्रभृति विविध विषय' की शिक्षा दी जाया
करती है । जिसमें छात्र और छात्रियों की धर्म-धान, नीति
और शारीरिक शक्ति ठीक तौर से बनी रहे उसके प्रति
विशेष दृष्टि रक्खी जाती है। सन् १९१२ ई० में इस श्रेणी के
स्कूलों की संख्या १२९२, छात्र और छात्रियों की संख्या ५
लाख के करीर थी।
उच्च विद्यालय राजधानी और प्रधान प्रधान नगरों में
अवस्थित है। इनमें जापानी, अंग्रेजी और जरमन भाषा में
शिक्षा-प्रणाली १३ गणित, दर्शन, साहित्य, विज्ञान, श्राईन, चिकित्साशास्त्र, कपि, वाणिज्य, भूतत्व प्रभृति विविध विषयों की शिक्षा दी जाया करती है। इन विद्यालयों में अट्ठारह वर्ष से निम्न अवस्था का कोई बालक प्रविष्ट नहीं होसकता है । सन् १९१२ ई० में जापान के उच्च विद्यालयों की संख्या १५ और छात्र संख्या २६१२ थी। जापान में १०० उच्च बालिका विद्यालय, और ५४ नार. मल विद्यालय है । नारमल स्कूलों के विद्यार्थियों को चार वर्ष और स्त्री विद्यार्थीनियों को ३ घर्प अध्ययन करना पड़ता है। नारमल विद्यालय के शिक्षक और शिक्षयित्री की प्रस्तुत करने के लिये और भी उच्च विद्यालय है । इनमें एक टोकियो राज- यानी में और दूसरा तीसरा हिरोसिमा और श्रीशाका नगर में अवस्थित है। गत पूर्व वर्ष में इनको छात्र संख्या ११ सौ और छानी संख्या ५ सौ के करीब थी । जापान के मेदे गाकू, श्रधात् विश्वविद्यालय दो हैं। इनमें एक राजधानी और दूसरा मिया शहर में है। उच्च विद्यालय से पास छात्रों के सिवा और कोई विद्यार्थी इनमें प्रविष्ट नहीं होसकता है। 1 टोकियो विश्वविद्यालय-यहा आईन, चिकित्सा इनजि नियरिङ्ग साहित्य, विज्ञान, और कृषि विद्या विषयक ८ कालेज है। आईन विभाग के कालेजों में चिकित्सा शास्त्र भी पढाया जाता है।
६४
जापान-चरित्र
M
इनजिनियरिङ्ग-विभाग में गृह निर्माण, रसायन, वारद
खनि और धातु सम्बन्धी ९ प्रकार पठन पाठन के विषय
हैं। साहित्य कालेज में दर्शन, जापानी साहित्य, चीनी साहित्य,
इतिहास और विविध वैदेशिक साहित्य पढ़ाये जाते हैं।
।
विज्ञान-कालेज में गणित, ज्योतिष, पदार्थ विषा प्रणाली
विद्या उद्भिज शास्त्र आदि सात प्रकार के पढ़ने के विषय
हैं। कृषि-कालेज में कृषि विद्या, वन विद्या आदि चार प्रकार
के पाद्य विषय हैं। इन सब विद्यालयों में एक २ वृहत
पुस्तकालय और अस्पताल हैं । आईन कालेज में कितने
दिन पढना होगा उसका कुछ निश्चय नहीं हैं, विद्यार्थियों
के परिश्रम के अनुसार इसका निश्चय होता है । अन्यान्य
कालेजों में तीन वर्ष अध्ययन करना होता है । किसी भी
विभाग के छात्रों को ३ वार फेल होजाने पर फिर आगे
पढ़ने की अनुमति नहीं दीजा सकती है।
टोकियो-युनीवरसिटी में वर्तमान वर्ष आईन विभाग
में ५०,चिकित्सा विभाग में ४८, इनजिनियरिङ्ग-विभाग में ५०,
साहित्य-विभाग में ४०, विज्ञान-विभाग में ४०, और कृषि
डिपार्टमेण्ट में ३० सुयोग्य प्रोफेसर व प्रिन्सपेल हैं । यहा से
चिकित्साशास्त्र में उत्तीर्ण होने से'ईगाकुशी'इनजिनियरिङ्ग वि
घा में पास होने से कोगाकुशी, साहित्य में उत्तीर्ण होने से वान
गाकुशी, विज्ञान-शास्त्र में अभिशताप्राप्त करने पर रिंगाकुशी
और कृषि विद्या में उत्तीर्ण होने पर नागाकुशी उपाधि मिलती है।
शिक्षा-प्रणाली
AAAAAAAAA
NAAMANAwrvk
जापान-गवर्नमेण्ट टोकियो विश्वविद्यालय के लिये
तिवर्ष प्राय ४० लाख रुपया व्यय किया करती है । इस
पुनीवरसिटी की छात्र सरया प्रति वर्ष किस हिसार से बढ़
हो है यह नीचे लिखो हुई तालिका से ज्ञात होगा।
-
विषय सन् १८९०/१८९५१६०० १९१०
आईन ३.१४७२/८२०/१५०८
चिकित्सा
१९६/२०३/८०१ ११३३३
इंजिनियरिङ्ग १९८/२९५,४९३ ९०१
साहित्य १३३ २३६/४०३/२६०
विज्ञान ११३ २०६१०५/११३
कृषि ४८६/२३२/१११६२०००
विविध ४८ १०५१९३/२५०
कियाते-विश्वविद्यालय में आईन, चिकित्सा, विज्ञाम,
सम् इजिनियरिङ्ग आदि के र कालेज हैं । हरेक कालेज में
विद्यार्थियों को ३ वर्ष अध्ययन करना पड़ता है और सय
नियमादि टोकियो-विश्वविद्यालय के अनुरूप ही हैं।
विश्वविद्यालयों की फीस यथाक्रम ३७३) रु० वार्पिक के
हिसाव से है। इंजिनियरिङ्ग विभाग के छात्रों को और भी
अधिक १५) २० वार्पिक जमा करना पटता है । उक्त दो
विश्वविद्यालय से गत वर्ष प्राय. १२००० ज्ञान प्रत्तीर्ण हुए हैं।
३
जापाग-चरित्र
टोकियो-और कियातो युनीवरसिटी के सिवा जापान
में शिक्षा, कृषि और स्त्री शिक्षा संकान्त और भी कई महावि
यालय आदि है।
उक्त कालेजों के सिवा जापान में उच और निम्न श्रेणी
फे १८९९ पाठशालाएं घर्तमान हैं। उनमें ४७ कृषि, २०० शिल्प
चाणिज्य विषयक कालेज विशेष उल्लेख योग्य है । शिल्प
विद्यालय में टोकियो उच्च शिल्प शिक्षालय, पोशाफा शिल्प
निद्यालय और कियातो का शिल्प विद्यालय जगत प्रसिद्ध
हैं । इन सव विद्यालयों में रासायनिक, वैद्युतिक यन्त्रादि का
बनाना, रङ्ग रङ्गना, घस्न बुनना, चीनी मट्टी के बासन
बनाना, मद्य प्रस्तुत करना, धातु विद्या, मानचित्र अङ्कित
करना, चित्र-विद्या श्रादि विविध-विषय हाथ से करके
सितलाए जाते हैं।
इस समय जापान में २५ मूकवधिर स्कूल और २००
किण्डर-गार्टन पाठशाला विद्यमान है।
जापान सरकार ने सन् १८७० ई० से शिल्प-विज्ञान
शिक्षा के लिये विदेश में विद्यार्थियोंको भेजना प्रारम्भ किया
है । सन् १८७२ ई० में ३५० मात्र भेजे गये थे। १९१० ई० मैं
केबल १७ जन मात्र भेजे गये थे। पहिले नापानी कालेजों के
लिये युरोप अमेरिका से अध्यापक धुलाना पड़ता था। इस
समय उनकी कुछ जरूरत नहीं रह गई है, जापान वासी ही
इस योग्य होगये हैं। समस्त जापान में वर्तमान समय प्रायः
शिक्षा-प्रणाली ८० अस्सी लाख छात्र छात्री विविध पाठशालाओं में पठन । पाठन करते हैं। जाशन में १०० लड़कों में ८५ लडके स्कूल में पड़ने लिखने जाया करत है। अमेरिका के युक्त-राज्य (इऊ- नाइटड स्टेटस) पृथ्वी में सर्वपेक्षा सुसभ्य देश कहकर विल्यात है, किन्तु प्राथमिक शिक्षा विषय में यह शक्तिशाली महादेश भी जापान की परापरी नहीं कर सकता है। जापानी लोगों ने इङ्गलैण्ड से नौ विद्या, फ्रांस से युद्ध विद्या, जर्मनी से चिकित्साशास्त्र, और अमेरिका से शिक्षा- प्रणाली सीस कर सब अपने स्वदेश के अनुकूल और उप- योगी बना लिया है । किसी विषय में हम भारत-वासियों के समान अविकल नकल करकेही चुप नहीं होगये हैं । जापान सम्राट मिडो ने एक यार अपने न्यारयान में जो कहा था उसका कुछ अंश यों है। "It is designed henceforth Education shall be so diffused that there may not be a village with an ignorant family nor a family with an iguorant member" सम्राट की यह उक्ति वर्तमान में सार्थक होगई है। - -
--
जापानी साहित्य
और सम्वादपत्र ।
पानी भाषा का साहित्य-भण्डार पृथ्वी के
जा
अन्यान्य जातियों के साहित्य के समान
ऐश्वर्य से परिपूर्ण है । जापानी साहित्य
में कालीदास, शेक्सपियर, मिलटन और
तुलसीदास के समान प्राचीन कवियों की
कवितायें विद्यमान है।
"कोजिकी" जापान की सर्वापेक्षा प्राचीन ग्रन्थ है। यह
भारतीय दर्शन ग्रन्थों के समान विविध प्राकृति विपयों से
परिपूर्ण है। कोजिकी के किसी फिसी अध्याय में हमारे
पुराण अन्यों की तरह विचित्र उपाख्यान भी भरे हुए हैं
यह पुस्तक गद्य में है और बहुत बड़ी है।
जापानी लोगों के सबसे प्राचीन नीति शास्त्र का नाम
'सिडो' है । हिन्दुओं में वेद, मुसलमानों में कुरान, कृस्तानों
में वाइयिस जिस प्रकार पूजनीय धर्मग्रन्थ माना जाता है
उसी प्रकार जापानी लोगों का यह वार्मिक ग्रन्थ है । जापान
के चौद्ध लोग इस ग्रन्थ को भगवान भास्कर के स्वमुख
ते
जापानी साहित्य और सम्बादपत्र
नकली हुई वेव वाणियों का संग्रह मानते हैं । इस महा
सन्थ में परमात्मा, जीवात्मा, पुनर्जन्म, पर जन्म, पाप, पुण्य,
स्वास्थ्य, पीडा, राजभक्ति, संदेश भक्ति आदि विपयों की
बहुविधि मालाचना की गई है।
पूर्व काल में वृसिडो ( Busido ) अर्थात् क्षत्रिय जाति
के भिन्न अन्य कोई इस पुस्तक के पढ़ने का अधिकारी नहीं
था। इस समय जापान के उन्नतिमय जगत् में यह प्रन्थ
सर्व
साधारण की
यस्तु होगई है। जापान की सभी जातिया
इसको पाठ कर लाभ उठाती है । पूसिडो के कई उपदेशो
का भाषान्तर हम नीचे लिखते हैं.-
ए-आडम्मर परित्याग कर दीन भाव में जीवन यात्रा
का पथ पार करो । २-आत्म अवस्था में सन्तुष्ट रह स्वधर्म
का प्रतिपालन करो। ३-हिंसा, दुप, मिथ्या, चातुरी, त्याग
कर सत्य और सरलता का पाश्रय ग्रहण करो। ४-परलोक
के विषय में विश्वास स्थापित कर धर्माचरण करो।
५-विवेक की सहायता से पाप पुण्य का निर्णय करो।
कोजिको, बूसिडो आदि अन्य पठन करने से स्पष्टही
समझ में आजाता है कि प्राचीन युग के जापानी साहित्य में
खूवही सस्कृत भाषा की राति नाति और शब्दों की भरमार
होगई थी । संस्कृत के समान जापानी कविता में भी शब्दों
पङ्गति लगाई जाती है और बहुत से' जापानी शब्दों का
सस्कृत शब्दों से मिलान होजाता है । यथा-शामन (श्रवण)
.
जापान-चरित्र सर (स्वर्ग) सामुरे (समर) यियूतसू (यियूसूत) सैतद्न (चन्दन) इत्यादि। । कृस्तानी पञ्चम और पाठशताब्दि में जापानी साहित्य बौद्ध धर्म नवीन उपादानों से पालकृत हो गया ।उसी समय चीनी भाषा से कई बड़े बड़े ग्रन्थ जापानी भाश में अनुवादित किये गये। इन सब ग्रन्थों में प्राशा पारिमिता महामाशा पारिमिता, आमिताभ सूत्र, रतनज ल सूत्र, महानिर्वाण सूत्र आदि कई एक ग्रन्थ इस समय हमारे संस्कृत भाषा में नहीं मिलते हैं। इनमें ललित विस्तार, धर्मपद, सांख्य दर्शन, चन्द्रगर्भ और सूर्यगर्भम, महापन सूत्र श्रादि धर्म ग्रन्थ अति विख्यात हैं। सप्तम शताब्दि के साहित्य में प्राचीन भारत के समान कविता का प्रति प्रचार जापान में हो गया था । इसी लमय चीन दार्शनिक 'कनफिऊसिबास' की नीति शिक्षा, जापानी मनुष्यों के हृदय को धर्मानुरक्त करने के लिये जापानी कवियों ने विविध विषय की कविता लिखना प्रारम्भ को । द्वादश शताव्दि में वह सब पुस्तके इतिहासों के खमान लिखी जाने लगी। इसी समय 'मुरासाफि सिकवू' नामक एक जापानी महिलाने गेनिमोना गातार नामक एक पद्य ग्रन्थ निर्मित किया। "सुप्रसिद्ध मनयाशियों अर्थात् वृक्षपत्र नामक कविता पुस्तक भी इसी शताब्दी में एक जापानी महा विद्वान् ने लिखी। प्रयोदश ई० में जापान के नी' नामक एक श्रेणी के
।
आपानी साहित्य और सम्बादपत्र
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| साहित्य की उत्पत्ति हुई थी। यह अनेकाश में आधुनिक गीत
'कविता के समान थी। इस समय जापान में "कोई ओजन"
+ Kayee Ozcan अचात् प्रहसन पुस्तकों की सृष्टि दुई । पोडश
शनाम्दी के जापानी साहित्य में विविध उपन्यास (नित.
जिवू ) वने और नाटक (जोमाखन) भी लिखे जाने लगे।
इम समय जापान में जो कई एक छन्द अधिक प्रचलित है
उनमें "तोको" सर्व प्रधान है। प्राय सैफड़े पीछे ८० कविता इन्हीं
छन्दोमरची जाती है। इसमें ३१ अक्षरसम्पलित पञ्चपदमै यथा
क्रम स५७,५७, और अक्षर रहते है। नीचे हम सम्राट रचित
एक कविता और उसका भाषान्तरनागरी भाषा में लिखते है.-
(१) कोरे ओया मिना । ईकछा नोमि व यानि ईदो
हातेते । श्रोकि, नाइया हितोरि इयमादा मरुवान । (१)
स्वदेश माता के सुसन्तान उन्मुक्त कृपाण हाथों में ले युद्ध
- करने के लिये गये है, उन लोगों को धन्यवाद है। (२)
चिहिया कुरु, कामिनों कोको रोनाकानो योरान ! श्रीयागा
कुन तामिना छूकरू माकोते ओया। (२) जगीश्वर
उन लोगों पर दया करे और खूब उन लोगों में स्वदेश के
लिये ऐक्यता और बल बुद्धि को वृद्धि करें। (३) कुनिश्रो,
श्रा मोत्री मिलि नि फूतात छूाया, निकारि किर कुछ
लोनिओ यानी तात जू मोता तामो मा (३) समरक्षेत्र उन
पीरोंके लिये रङ्ग महल है, स्वदेश सेवासे अधिक संसार में
मनुष्यों के लिये अन्य कोई सुकार्य नहीं हो सका है।
।
७२
सापान-चरित्र
इस समय जापनी भाषा के एक से एक बढकर महा
विद्वान अनेक लेखक अपनी मातृभापा के साहित्य भण्डार
को संसार के सभी प्रांतों से उत्तमोत्तम ग्रन्थ खोज और
उनको भापान्तर कर भर चुके हैं । गत ३५ वर्ष में जो सब
विदेशी ग्रन्थ जापानी भाषा में अनुवादित हुए हैं उनमें
स्माइलस, मिल, स्पेन्सर और फ्यान्ट की अन्थावली जगत्
प्रसिद्ध है। उपन्यासों में अर्नेष्ठ मलट्रोवार, आदि मब से
पहिले अनुवादित हुए थे । टेलीमेकस और रविन्सन
क्रूसा के पाठक जापान में अधिक हैं। इसके सिवा इमा,
धर्न कारपन्टर, धागार्ड आदिक सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखको
की ग्रन्थावली का अनुवाद भी जापानी साहित्य भण्डार में
सुशोभित है।
अनुवादित कविता पुस्तकों में ग्रे की एलिजी, गोल्ड
स्मिथका डेजर्टेड विलज, टेनिसन का एनक आर्डन, शाफ्स
पियर का सर्व पुस्तकावली विशेष उल्लेख योग्य है । जापानी
भाषा के उपन्यास लेखकों में पेकिनते निदिको, मानसुई,
इक्कू और न्यानसी आदि ग्रन्थकार जगत् विख्यात हैं।
जापानी साहित्य के समालोचक हम लोगों को यथा क्रम से
लिटन, स्काट, हिलोगो, डिकेन्स, और कलिन्ल के मुकाविले
का समझते हैं । मानवचरित्र अङ्कन में वेकिनको शेक्स
पियर के समान समझा जा सकता है।
.
जापान के सय से प्राचीन सम्बाद पत्र का जन्म सन
-
--
जापानी साहित्य और सम्वादपत्र
sho
"
२६०३ का हुआ था। इसका नाम प्रोमिनार है। इसके पीछे
के उल्लेख योग्य सम्पाद-पत्रों के नाम केहगों और सिम्बू है।
१७७१ ई० से जिम्बू जिजी नामक और एक बड़ा पत्रं छपता
जापान के कोई कोई सम्याद पन दैनिक के सिवा दिन में
२ वार तक निकलते हैं।
सन् १८७२ ई० में जान, ब्लाक की ओर से "जापान.
इंग्ल्ड" नामक एक वाहुन बढ़िया दैनिक पत्र अग्नेजी में
निकला । उस समय से जापान में सम्बाद पत्रों की सख्या
दिन पर दिन वर्तमान में बहुत बढ़ गई है। सन् १८७८ ई०
में
जापान में सम्याद पत्रों की संरया २०० और पाठकों की
सस्या ३ करोड़ थी । १८९४ ई० में पत्रों की सरया ८१४ हो
गई। इसके ५ वर्ष बाद १००० हुई । साल (सन् १९१०)
में असवारों की संरया दो हजार हो गई है । जापान
देश के दस सहस्र मनुष्यों का कोई पैसा निवास स्थान
नहीं होगा जहा से दो तीन दैनिक पत्र न निकलते हो।
राजधानी टोकियो से प्रति दिन ५० गजट निकलते हैं।
उनमें जिजी निचि निचि, कमिन निपन, जिजिसिम्पो,
प्यासाद, होचि, माईपाकिआदि कई एक पेपर जगन्प्रसिद्ध है।
ओशाका, कोर, योकोहामा और नगाया मे कई एक
पहे यठे दैनिक पत्र निकलते है। अगजी अपवारों में जापान
गेजेट, जापान टाइम्स, मन हेल्ड, फोर इंग्ल्ड, आदि पत्र
विशेष उल्लेग्न योग्य है।
जापान-चरित्र
इनमें किसी किसी पत्र की ग्राहक संख्या एक लाख से
भी अधिक है । जापान की मुद्रायन्त्र अति कठोर है । राज्य
सम्बन्धी कोई अति मूढ़ रहस्य प्रगट कर देने पर सम्पादक
को अवश्य जेल जाना पड़ता था। किन्तु अब तो जापान
पालीमेंट ने बहुत से हक प्रेस एक्ट सम्बन्धी जापान वासियों
को दे दिये हैं, तो भी जापानी अखबार इतना निर्मय हो
लेखनी चलाते हैं कि उनको एक उपसम्पादक को काम
सौप कर जेल जाने के लिये तय्यार ही रहना पड़ता है।
।
१
जापान साम्राज्य की गठन
प्रणाली और राज्य-नीति।
स
मस्त जापान साम्राज्य ४५ केना अर्थात
प्रदेशों में विभक्त है। प्रति प्रदेश में एक चो
अर्थात शासनकर्ता निवास करता है। प्रति
ग्राम में ही ग्रामवासिगण गठित विधि से,
निर्वाचित १२ प्रधान व्यक्तियों द्वारा एक
समिति निर्माण की जाती है। प्रतिग्राम मेंही एक पुलीसमैना
निवास करता है । सम्राटही राज्य के सर्व प्रधान अधीश्वर
हैं । वह "नेकम्याक" अर्थात मंत्री सभा की सहायता और
अनुमति से राज्य शासन किया करते हैं। कार्य यथोचित
रीतिसे निर्वाह होने के लिये मंत्री सभा राजस्व, शिक्षा,'
सामरिक, वैदेशिक, उपनिवेश आदि नाना भागो में विभक
है। प्रत्येक विभागमें एक 'दैजिन' (मंत्री) है।
सन् १८६० ई० में इंगलेन्ड के अनुकरण से जापान में
पालीमेन्ट अर्थात प्रतिनिधि शासन सभा स्थापित हुई। यह ।
समा अभिजात और साधारण सभा के नाम से दो भागों में
विभक्त है। साधारण सभा के सभ्यों की क्षमता अधिक है।
मर्थात साम्राज्य के यावत प्राय और व्यय के ऊपर इन
जापान-चरित्र
AMAN
इनमें किसी किसी पत्र की ग्राहक संख्या एक लाख से
भी अधिक है । जापान की मुद्रायन्त्र अति कठोर है। राज्य
सम्बन्धी कोई अति गढ़ रहस्य प्रगट कर देने पर सम्पादक
को अवश्य जेल जाना पड़ता था। किन्तु अब तो जापान
पालीमेंट ने बहुत से हक प्रेस एक्ट सम्बन्धी जापान वासियों
को दे दिये हैं, तो भी जापानी अखयार इतना निर्भय हो
लेखनी चलाते हैं कि उनको एक उपसम्पादक को काम
सौंप कर जेल जाने के लिये तय्यार ही रहना पड़ता है।
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जापान साम्राज्य की गठन
प्रणाली और राज्य-नीति ।
स
मस्त जापान साम्राज्य ४५ केन अर्थात
प्रदेशों में विभक्त है। प्रति प्रदेश में एक चो
अर्थात शासनकर्ता निवास करता है। प्रति
ग्राम में ही ग्रामवासिगण गठित विधि से,
निर्वाचित १२ प्रधान व्यकियों द्वारा एका
समिति निर्माण की जाती है। प्रतिग्राम मेही एक पुलीसमैना
निवास करता है । सम्राटही राज्य के सर्व प्रधान अधीश्वर
हैं। वह "नेकम्याक" अर्थात मंत्री सभा की सहायता और
अनुमति से राज्य शासन किया करते हैं । कार्य यथोचित
रोतिसे निर्वाह होने के लिये मंत्री सभा राजस्व, शिक्षा, '
सामरिक, वैदेशिक, उपनिवेश आदि नाना भागो में विभक्त
है। प्रत्येक विभागमें एक दैजिन' (मंत्री) है।
सन् १८६० ई० में इंगलेन्ड के अनुकरण से जापान में
पालीमेन्ट अर्थात प्रतिनिधि शासन सभा स्थापित हुई। यह ।
समा अभिजात और साधारण सभा के नाम से दो भागों में
विमत है। साधारण सभा के सभ्यों की क्षमता अधिक है,
मर्थात साम्राज्य के यावत प्राय और व्यय के ऊपर इन
जापान-धोरेन
इनमें किसी किसी पत्र की ग्राहक संख्या एक लाख से
भी अधिक है । जापान की मुद्रायन्त्र अति कठोर है। राज्य
सम्बन्धी कोई अति मूढ़ रहस्य प्रगट कर देने पर सम्पादक
को अवश्य जेल जाना पड़ता था। किन्तु अब तो जापान
पार्लीमेंट ने बहुत से हक प्रेस एक्ट सम्बन्धी जापान वासियों
को दे दिये हैं, तो भी जापानी अखवार इतना निर्भय हो
लेखनी चलाते हैं कि उनको एक उपसम्पादक को काम
सौंप कर जेल जाने के लिये तय्यार ही रहना पड़ता है।
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अर्थात साम्राज्य के यावत प्राय और परत
जापान साम्राज्य की गठन
प्रणाली और राज्य-नीति ।
अनुमति से राज्य शासन किया करते हैं। कार्य योचित
रोतिसे निर्वाह होने के लिये मंत्री समा राजस्व शिक्षा.'
सामरिक, वैदेशिक, उपनिवेश आदि नाना भागो में विमक
पालीमेन्ट अर्थात प्रतिनिधि शासन सभा स्थापित । यह ।
सन् १८६०ई० में इंगलेन्ड के अनुकरए सेवापान में
समा अभिजात और साधारण सभा के नाम से दो भागों में
विभक है। साधारण सभा के सभ्यो की क्षमता अधिक है।
स
मस्त जापान सानाज्य ४५ केन' अर्थात
प्रदेशों में विभक्त है। प्रति प्रदेश में एक चो
अर्थात शासनका निवास करता है। प्रति
ग्राम में ही ग्रामवासिगण गठित विधि स.
निर्वाचित १२ प्रधान व्यक्तियों द्वारा एक
समिति निर्माण की जाती है। प्रतिग्राम मैही एक पुलीसमैन
निवास करता है । सम्राटही राज्य के सर्व प्रधान अधोर
हैं । वह "नेकन्याक" अर्थात मंत्री सभा की सहायता और
है। प्रत्येक विभागमें एक 'दैजिन' (मंत्री) है।
जापान-चरित्र
MMMAWA
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प्रवन्ध है। लांच रिसवत किस चिड़िया का नाम है यहां यह
वात कोई जानताही नहीं।
जापान में १३६ जेलखाने हैं। प्रति कारागारही में एक
एक जेल गवर्नर है । उसका वार्षिक वेतन नौ सौ से अढ़ाई
हजार रुपया तक है । गत वर्ष सब जेल के कर्मचारियों की
संख्या १९६६५थी, और सब कारागारों के कैदियों की संख्या
६० हजार थी।
हरेक कैदी के स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान दिया
जाता है। उन लोगों को ग्रीष्म ऋतु में रोज, और शीतकाल में
आठवें दिन स्नान करने का अवसर दिया जाता है । प्रति
दिन ३ बार खुराक दजाती है।कैदी लोग जेल से छूटने पर
जिसमें सद उपाय से जीविका निर्वाह कर सके उसके लिये
जेल में रहते समयही वन चुनना, सूची फर्म, ईंट निर्माण
करना, घड़ी-साजी, मोटर चलाना, वाइसिकेल सुधारना
आदि खूब अच्छी तरह से सिखला दिया जाता है । कैदी
लोग जेल से बाहर होतेही स्वतन्त्र व्यवसाय कर सद उपाय से
जिसमें परिवार पालन करें, उसके लिये विशेष ध्यान दिया
जाता है । कैदियों के जेल से छूटने पर कुछ पूंजी उनको कर्ज
के तौर पर दे दी जाती है, और चाल चलन पर कुछ दिनों
तफ ध्यान दिया जाता है।
जापान गवर्नमेन्ट के कोप में गत वर्ष एक वर्ष की
आमदनी के ६४ करोड़ रुपये जमा हुए थे। आगामी वर्ष
.
-
८
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जापान साम्राज्य की गठन प्रणाली और राज्यनीति ७१
पाव
.
का बजट ८० करोड़ के लगभग अनुमान किया गया है।
जमीन का महसूल २॥) रु० सैकड़े के हिसाब से लिया जाता
है । १८ करोड़ रुपया भूमि-कर का गत वर्ष वसूल हुआ था।
वार्षिक ४५०) से अधिक आय वालों को इनकम टेक्स
देना पड़ता है, गत वर्ष इसमें ६ करोड़ एकत्रित हुआ था।'
शेष रूपया देशी और विदेशी मदिरा, तम्माकू में, व्यापार
के महसूल में, और रेलवे पोस्ट ऑफिस, बन विभाग, खानों
के टैक्स, कस्टम स्टाम्प आदि की आमदनी में संगृहीत
आ था । पहिले प्रति जापानी को ४३ पेस वार्षिक कर देना
पड़ता था । गत रूस जापान के महा युद्ध में अधिक खर्च
पर जाने के कारण सरकार ने ३७ पैस और अधिक यदा
दिया है। इस प्रकार नाना विषयों में राज-कर प्रजा को
कुल ११० पंस तक सालाना देना पड़ता है।
जापान सरकार को फौजी-खर्च के लिये प्रति वर्ष प्राय छ.
करोड रुपया खर्च करना पड़ता है
साधारण शिक्षा
विभाग में ॥) रुपया सैकडा अर्थात प्राय एक करोड़
* साकि ( मदिरा ) जापान में ५ प्रकार की पनाई जाती है, यथा--
1-यिशु (परथुनी ), २-मिरिन (मिष्ट ), ३-सिरोजोकी (श्वेतवर्ण ),
४-मोच (आलू से उत्पन होती है ), और ५- डाकसू ( अपरिष्कार )।
तीन वप पहिले तम्मा का रोजगार अग्रेज और अमेरिका बालों के
हाथ में या। इस समय जापान सरकार ने ही यह लाभदायक व्यवसाय
भयो हाय म ले लिया है।
न
जापान-चरित्र 1 । । 14 । 1 प्रवन्ध है। लांच रिसवत किस चिड़िया का नाम है यहां यह वात कोई जानताही नहीं। जापान में १३६ जेलखाने हैं। प्रति कारागारही में एक एक जेल गवर्नर है। उसका वार्षिक वेतन नौ सौ से अढ़ाई ।। हजार रुपया तक है । गत वर्ष सब जेल के कर्मचारियों को संख्या ११६६५थी, और सब कारागारों के कैदियों की संख्या ६० हजार थी। हरेक कैदी के स्वास्थ्य को और विशेष ध्यान दिया जाता है। उन लोगों को प्राप्म ऋतु में रोज, और शीतकाल में आठवें दिन स्नान करने का अवसर दिया जाता है। प्रति दिन ३ वार खुराक दोजाती है। कैदी लोग जेल से छूटने पर जिसमें सद् उपाय से जीविका निर्वाह कर सकें उसके लिये जेल में रहते समयही वन चुनना, सूची कर्म, ईट निर्माण करना, घडी-साजी, मोटर चलाना, वाइसिकेल सुधारना. आदि खूब अच्छी तरह से सिखला दिया जाता है । कैदी लोग जेल से बाहर होतेही स्वतन्त्र व्यवसाय कर सद उपाय से जिसमें परिवार पालन करें, उसके लिये विशेष ध्यान दिया जाता है। कैदियों के जेल से छूटने पर कुछ पूंजी उनको कर्ज के तौर पर दे दी जाती है, और चाल चलन पर कुछ दिनों तफ ध्यान दिया जाता है। जापान गवर्नमेन्ट के कोष में गत वर्ष एक वर्ष की आमदनी के ६४ करोड़ रपये जमा हुए थे। आगामी वर्ष . ।
वाणिज्य।... . NOTE रजेण्टाइन, अस्ट्रिया, वेलजियम, कसिका, डेन- मार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटन, इटेली,मेकसी- को, नेदरलेण्ड, पेरू, रूम, रोम, स्याम, स्पेन, सुईडेन, स्वीटजरलेण्ड, युनाइटेड स्टेटस, एमेरिका श्रादि वैदेशिक गवर्नमेण्टों के साथ जापान का वाणिज्य सम्बन्ध है। जापान से जो व्यादि विदेश में भेजी जाती है उनमें चाय, चावल, कपूर, कपूर का तेल, तम्बाखू, मदली, दियासलाई विछौना, मोम, रेशम, रेशमी वस्त्र, पशम, सूत, वार्निश, ताम्बा, कोयलाआदि सर्व प्रधान है।चावल प्रधान उत्पन्न द्रव्य होन पर भी सम्राट के निशेप प्राशा विना विदेश नही भेजा जा सकता है । इस कारण जापान में कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता है । सन् १९१० ई० में साढ़े अस्सी करोद का व्यापारी द्रव्यादि विदेश में ७० करोड़ का माल विदेश दुआ था। और में जापानियों ने पृथ्वी तके श्रेष्ठ अधिकार गिर का मैन- १. भेजा गया था। स ।
८०
जापान-चरित्र
रुपया जापानी सरकार का खर्च होता है। वाणिज्य
कृपि के उन्नति के लिये प्रायः डेढ़ करोड़ रुपया वा
व्यय होता है। जापान गवर्नमेन्ट जिस स्थान में।
व्यय निर्वाहार्थ व्यक्ति प्रतिभाना सालाना खर्च के
है, भारत गवर्नमेन्ट शिक्षा विभाग में अढ़ाई पैसा फी श्री
के हिसाब से वार्षिक व्यय करने में भी आनाकानी
है । जापानी लोगों को पार्थिक अवस्था भारत बा।
के समान शोचनीय नहीं है । जापान के प्रत्येक आदम
की मोटे हिसाब से ८०) रुपया से अधिक आमदानी है
उन लोगों को सर्व प्रकार के सरकारी करों में कुल
साल से अधिक नहीं देना पड़ता है।
।
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. वाणिज्य। - 11 । + EDO - रजेण्टाइन, अस्ट्रिया, चेलजियम, कर्सिका, डेन- मार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटन, इटैली,मेकसी- को, नेदरलेण्ड, पेरू, रूस, रोम, स्याम, स्पेन, सुईडेन, स्वीटजरलेण्ड, युनाइटेड स्टेटस, पमेरिका आदि वैदेशिक गवर्नमेण्टो के साथ जापान फावाणिज्य सम्बन्ध है। जापान से जो द्रव्यादि विदेश में भेजी जाती है उनमें चाय, चावल, कपूर, कर्पूर का तैल, तम्बाखू, मछली, दियासलाई, विछोना, मोम, रेशम, रेशमी वस्त्र, पशम, सूत, वार्निश, ताम्बा, कोयला आदि सर्व प्रधान है।चावल प्रधान उत्पन्न द्रव्य होन पर भी सम्राट फे विशेष प्राशा विना विदेश नहीं भेजा जा सकता है । इस कारण जापान में कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता है । सन् १६१० ई० में साढ़े अस्सी करोड़ का व्यापारी द्रव्यादि विदेश मजा गया था। इसके पूर्व घर्ष में ७० करोड फा माल विदेश मेरित हुआ था। सूत और रेशर्मा वनादि वुनने में जापानियों ने पृथ्वी के अन्य जाति के मनुष्यों की अपेक्षा सय से श्रेष्ठ अधिकार प्राप्त किया है । ओसाका यन्दर प्रशान्त महासागर का मैन- घटर यन गया है।
जापान-चरित्र
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ह्वाइट द्वीप में कोयला, किरोसिन तैल, और सोने चांदी,
को बड़ी र खाने हैं। जापान का तम्बा जगत विण्यात है।
इस समय कुल जापान देश में १०० चांदी, २०० ताम्बे तथा
अन्य मिश्रित धातुओं की खाने हैं । इन सब खानों से गत
धर्ष २० लाख मन ताम्बा, ६२ हजार मन सोना, डेढ लाख
मन चांदी, ३५ करोढ मन कोयला निकाला गया था।
गत वर्प जापान में जो नवीन स्वर्ण-खानि तलाशी गई
है उसका मूल्य अनुमान ५०० करोड़ रुपया युरोपियन व्यव
सायी पण्डितों ने कूता है । जापान सभ्यता के उस सोपान
में चढ़ने पर भी देशी वाणिज्य के उन्नति के सम्बन्ध में
अणुमात्र भी उदासीन नहीं हुआ है । भाफ-यंत्र के प्रयत
प्रतियोगिता न कर सकने पर भी जापान के हरेक छोटे २
ग्रामों में पुरानी चाल के चरखाश्रोही से सूत कातने और
नांत के द्वारा वस्त्र चुनने का कार्य अधिक होता है।
जापान देश के गृह २ में हस्त जात छुरी, कैंची, मृत्तिका
निर्मित बासन और बांस की बनी हुई नाना विधि ग्रह सामग्री
देखने में आती है।
जापान देश के कारीगर कागज के दरवाजा, खिड़की,
फोट, कमीज, आदि नाना प्रकार की व्यवहारिक घस्तुएं
पना कर बेचा करते हैं। चांस के बिछौने, वाकस, वेग श्रादि
प्रस्तुत विषय में असामान्य निपुणता प्रदर्शन करते है।
जापान निवासी फेवलमान समर शास्त्र पारदर्शी होकर
वाणिज्य
ही युरोपीय जातियों के समकक्ष हुए हैं, यही नहीं,
किन्तु वे लोग पि, शिल्प और वाणिज्यादि विषय में भी
असाधारण उन्नति लाभ कर युरोपीय जातियों को विस्मित
कर दिया है। गत महायुद्ध में फसे रहने के समय भी
जापानी किसान लोग उस वर्ष भूमि से २८ करोड़ मन
चावल, १२ करोड़ मन जव और ८ करोड़ मन विविध
तरकारी उत्पन्न किया था। सरकारी गणनानुसार गत वर्ष
जापान में २३ लाख मन नील पत्र, १८ लास मन तम्वासू
और पौने सात लास मन उत्तम चाय उत्पन्न हुई थी।
-
राजधानी टोकियो शहर में कागज के दो प्रकाण्ड कारः-
खाने है। घहा "मितसुमतो कोजो" और "गाम्बी" नामक
वृक्ष से कागज प्रस्तुत होता है। लकड़ी का कागज बनाया
जाता है और कागज के गृह निर्मित होने है, कही वरगा
प्रस्तुत होते हैं, रेल के डिब्बे बनाये जाते है। जल की नौकाएं,
चाय पीने के पियाले आदि एक से एक बढ़कर महोपकारी
वस्तुएं तैयार हुआ करती है।
जापान में मछली का व्यापार बहुतही अधिकहोता है । १३
लास घर मछली पकड़ने वाले मछुओं के है, उनमें ८० लाख स्त्री
'पुरुष, बालक-बालिका समस्त जापान में जल जीव पकड़ने की
जीविका करते है। यह लोग क्षुद्र औरवृहत्जाल,शी,पोर यांस
निर्मित यत्रादि की सहायता से जापान, कोरिया, साइविरिया
के समुद्रों में विविध प्रकार केजल जन्तुयोंको पफदा करते है।
जापान-चरित्र
AM NAAnand
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।
17
गत पाच वर्ष पहिले समग्र जापान में साढे छ लाख
नौकायें और १३ लाख नाना प्रकार के जाल थे। जापान सर.
कार की सर्वापेक्षा वृहत् नौका का नाम "साईवास" है यह
लम्बाई में ५० फीट और चौड़ाई में २० फीट है।
गम, चीनी, गज-दन्त, स्वर्ण, लौह, कांच, चमड़ा, औषधि,
पुस्तक, मानचित्र, विविध प्रकार के रज तेल, श्रादि विदेशों
से पाते हैं।
इन सब वस्तुओं में चीन का गम, और कोरिया का
सुवर्ण अधिक प्रसिद्ध है। गत वर्ष की आमदनी का मूल्य
एक करोड़ रुपया रिथर हुआ था।जापान के डाक, रेल, टेलो
ग्राफ, कपड़े की कल, सूत की कल, मुद्रा-यंत्र,वादि बहुत से
कल कारखाने देश में, देश के मूल-धन से देशी लोगों के
ही द्वारा परिचालित हो रहे हैं । सामान्य सूई से लेकर
विशाल युद्ध-जहाज तक सब जापान में ही प्रस्तुत होता है ।
इन समय जापान में विविध श्रेणी के १० हजार कल कार
साने विद्यमान है । इन सवों में ४ हजार विजली और माफ
के नल से चलते हैं। शेष सब हस्त कौशल द्वारा अपना
कार्य कर रहे हैं।
इन सब कारखानों का मूल-धन ८९८, २८७ रुपये से
अधिक है। इस समय जापान में ६० सूत की फलों में ३० लाख
चरखे चला करते हैं। सब कारखानों में ५ लाख से अधिक
श्रमजीपी मनुष्य जाति कार्य कर अपना उदरनिर्वाह करते हैं।
वाणिज्य
.
क्रमश वाणिज्य उन्नति के साथ एक ओर जिस प्रकार
देश को धन वृद्धि होरही है, दूसरी ओर उसी प्रकार जीवन
। सग्राम की कठोरता की भी वृद्धि होरहा है । आज कल दैनिक
मजदूरों का भाव जापान में अत्यन्तही अधिक बढ़ गया है।
जो जापानी सौदागर पृथ्वी के नाना प्रान्तों में व्यवसाय
वाणिज्य करते हैं उनमें ताकसामा, आमाजसाकि, लिटस,
निपन, गोडा, कानाकिम, और ओसाका नामक कम्पनियां
जगत प्रसिद्ध है। इनमें प्रत्येक की वार्षिक आमदनी डेढ़ करोड़
रुपये से भी अधिक है।
पाणिज्य की सुविधा के लिय जापान साम्राज्य में ३३१७
- जिनको,अर्थात् बैंक हैं। इन सवयकों में जापान यक (Japan's
Bank ) सव प्रधान हैं । इस वेक को पूजी कुल ५० करोड़
से भी अधिक होगी। इसके सिवा एक हजार साधारण, ५
- कृषि, और बहुत सो सरविस वके ( Service Bank) हैं।
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जापान-चरित्र
AmnivAMAN
।
-
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.
जापान गवर्नमेन्ट इस समय जो सैनिक-विभाग के सम्बन्ध
में व्यवस्था की है उससे भविष्य में १० लाख फोज लढाई
के लिये एक दिन में भेजी जा सकती है । जापानी
सरकार ने मंचूरिया और कोरिया की फौज की संरया भी
श्रर सून बढा दी है । गत मास के पालीमेन्ट महासमा में
सैन्य-सचिव'ने स्पष्ट ही कहा था, कि जापानी लोगों को हम
इस प्रकार रणकुशल बना देंगे कि बड़े २ साम्राज्य भी जापा
नियों से प्रतियोगिता करने की हिम्मत न कर सकेंगे । अवश्य
ही युरोपियन लोगों को जापान की यह श्राशातीत उन्नति काटे
के समान गती है, चाहे ऊपर से कितनी ही मित्रता करी ।
न प्रगट करें।
युस के लिये यहां पर इतनी जबरदरत फौज तैयार
रहने पर भी सरकार का ६ करोड़ से अधिक वार्षिक रुपया
व्यय नहीं होता है । जापान के प्रति पदातिक और अश्वा
रोहा सिपाही का ४५) और ६०) से अधिक वार्षिक वेतन
नहीं है। कर्नल, कप्तान, प्रभृति सेना संचालकों का वेतन
१५०) से २००) वार्पिक तक है। प्रधान सेनापति का वेतन
५००) वार्षिक से अधिक नहीं है।
फौज में रहने वाले कुली मजदूर और खिदमतगारों
का वेतन
खुराक और दो श्राना रोज है। युद्ध क्षेत्र में फौज
को दिन में तीन बार भोजन दिया जाता है। प्रात काल
चाय, विसकुट, मछली का सुरुमा और रोटी, मध्यान्हकाल
-
समर-शक्ति भात. सूखी मछली और सायंकाल चाय, वाली, पावरोटी, दूध, मक्खन और शराब । डाक्टरों के नादेशानुसार इसमें कभी कभी उलटफेर भी हो जाया करता है। नौबल। । जापान-वासियों ने गत तीस वर्ष के अन्दर जल युद्ध विषय में भी असामान्य उन्नति किया है। जापानियों ने यह महा मन भी रख लिया है कि, द्वीप वासियों की प्रबल नौवल के सिवा दूसरे प्रकार से मात्म रक्षा देश रक्षा होना अस. म्भचित है। अगरेज नौ सेनापति किटजिराल्ड ने भी स्पष्टा तरों में नाच लिखी हुई बातें कही हे- जापानियों ने स्वीय प्रतिभा प्रताप से किसी किसी विषय में अंगरेजी नौ युद्ध से भी अधिक उन्नति प्राप्त की है। नीचे जापान के वर्तमान सामुद्रिक बलका कुछ थोड़ा सा विवरण जो हमको मालूम हो सका है, सूची देते है, युद्ध जहाज। नाम कितने टन अभ्व शक्ति वेग तोप १ मिकासो १५३५० १६२०३ १८मिल ५० क २ सिकिशामा १५०८८ १८७०० १८ ॥ ३ टययासाही १५४४९ १५०२६ १२३२० १६००० ५ हिजन १२००० १६००० २६७२ ८००० - ४ फ्यूजि १८॥ ३८ जापान-चरित्र naman NAKARAM घ . . १८॥ १२ टोगो ५० भ ७ एफाई ८ सात-जुमा १९२० ६ इयासिमा १८२४९ । १० पाइयोयामि १३६०० १६००० ११चीन रयेन ७७३५ ६२०० १०३६० ११२५५ १३ कातोरी १५६८० १६००० १४ सुओ १२६७८ १४५०० लौह मण्डति प्रथम श्रेणी की रण-तराणियां । शक्ति १ रोकियो ६८०५ १८२४५ २ प्रादजुमा ३८६५ १६००० ३ प्राशी ७७३५ २७४०० ४ मयासुगा ७६२८ १३५०० ५ निशिन ७६२८ ९४०० ६ इकोमा १००० १५५०० ७ आईोपेत ९९५६ १८७०० लौह माण्डित रक्षित रण-तराणियां । १ एकागी एकसि ३ पकी सुसीमा ५ हासिडेत.. आजुमा ७ एफिनो साभा (रूस से युद्ध में छीना गया है) •-मानिनोयो - " र ६ 1 १३ सूमा १८६७ ई. में सिर्फ ८जहाज थे १८७२ मे २० हुए। सन् १८९३ ई. में संख्या वढते पढ़ते ३२ हुई। गत पांच हुए तब जहाज सरया ५८ और तोप २१५६दुईयों। जापानी गवर्नमेन्ट गजट में जो हिसाय छपा था। उसका समर शक्ति तेकासेगो कासागी ११ मात सुसिमा सुंगारू (रूस से छीना गया है) इन सुमीमा १५ तकिचिो नितेका १७इडजुमा अकोशी १६ टोकियो २० इयेयामा २१ सेप रूस का बेण्ड २२ भातेया इसके सिवा तोपों से भरे हुए तथा उपकूलों में रक्षार्थ- और मी ३० जहाज हैं । टारपेंडो ७८ र टारपेडो नाशक जल जहाज ५१ हे। उपर्युक्त महाशक्तिशाली जहाजों के मिया और भी ५५०० पाणिज्य पोत है इनमें १४००० बिजली द्वारा तथा शेष दूसरी फलो से चलते हैं। यह जलयान भी नीचे ऊपर मजवून लोहें और ताम्बे से मडित हैं इस कारण युद्ध कार्य में भी श्रावश्यक पड़ने पर काम दे सकते हैं। अपरका हिसाय जो मैंने दिया है सो सन् १९०६ ई० का है।
जापान-चरित्र
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-
संक्षेप अनुवाद है। मैंने यहां के और भी सम्बाद पत्रों से
मिलान किया तो ठीक ऐसाही हिसाव पाया।
जापानी जहाज यिभाग के एडमिरल, वाइस एडमिरल,
रियर एडमिरल,कमान्डर, कप्तान, लफटिनएट, चीफ गनर
और पाटस आयन उपाधिधारी कर्मचारी हैं।
क। लड़ाई में अग्नि लगने से जल गया था किन्तु अब
मरम्मत हो गई है।
ग। रूसी नाम निकोलस था।
घ। अभी बनकर तैयार हुआ है ।
छ । पृथिवी के सब जहाजों से बड़ा है।
छ। चीन में मिला।
ज। रुसी नाम पालटोभा था।
झ। रूसी नाम पोविडा था।
ट। यह इगलेण्ड में बना है।
ठ। चिली देश से खरीदा गया है।
ड। अभी बना है।
ढ। इसके सिवा कुकुमा सुकूकू नामफी नवीन ढग की
रणतरणी अभी बनकर तैयार हुई है।
प्रथम तीन श्रेणी के नौ सेना पतियों को वर्ष में यथाक्रम
नौ हजार छ हजार और पाच हजार रुपया वेतन मिलता
है। उससे निन्न अफसरोंका वेतन यथाक्रम २५९०) १८००)
और १५००) वार्षिक नियत है।
--
जापान की नाना कथाएं।
(मुद्रा-विभाग)
-
रिन का एक छन।
१०८ छन का एक इयेन ।
इयेन चादी का शिका है यह अंग्रेजी
२ सिलेंग के वरायर का होता है हमारे देश
के २॥) रु० के घरायर हुआ।
छन-ताम्र मुद्रा है यह हमारे देश के एक पैसे के यरा
पर कीमत में चलता है । रिन-दो दमड़ी के कीमत का
होता है।
वजन-प्रणाली।
१०किन फा १ कोयान ।
१७ कोयान का१पाइकल ।
४-पाइकल का १ कोक।
एककिन हमारे देश के प्राय श्राध सेर के बरार होता है।
जमीन नापने की रीति ।
६-माकू का १ केन।
६० कैन का१चो।
३६ ची कीराई।
जापान-चरित्र
H
अंग्रेजी ९९४ फिट का एक मात्र होता है । १ चो प्राय
३५ हाथ के बरावर का होता है एक राई अंग्रेजी दो मील
के कुछ ऊपर अर्थात् हमारे एक कोस से कुछ कम की
होती है।
डाक-विभाग।
सन् १८७१ ई० के मार्च मास से जापान में युरोप को
प्रधानुसार डाक घर स्थापित हुए। और इसी वर्ष पोस्ट के
(आईन) कानून तथा टिकट छापे गये १८७५ ई० में सेविवेक
की प्रथा प्रचलित की गई । १८८५ ई० में ( Reply) जवाबी
पोस्टकार्ड चलाया गया, इस समय जापान में एक जेनरेल
पोस्टमाफिस ६ हजार भिन्न २ श्रेणी के डाक घर और दो
हजार टेलीग्राफ आफिस हैं।
गत वर्ष डाक-विभाग के उच्च कर्मचारियों की संख्या
४ सौ, मध्य कर्मचारियों की २० हजार और निम्न कार्य
करतानों की संख्या ७० हजार थी.। गत वर्ष समस्त
जापान में ४० करोड पोस्ट-कार्ड, १८ करोड़ लिफाफ
बिके थे। डाक विभाग से जितनी आमदनी होती है। सैकड़ा
पीछे १५) रु० के हिसाब से इसी विभाग की उन्नति के लिय
वार्पिक व्यय कर दी जाती है।
जापान में आधे भाउन्स-वजन के पत्र और अढाई
बाउन्स वजन सम्याद पत्र का यथाक्रम से ३ छैन और ६छन
। महसूल लगता है। पोस्टकार्ड और जवाबी कार्ड की कीमत
P
.
जापान की नाना कथाएं
मा छैन और ३ छेन है। बुक पैकट का नमूनाडाफ के प्रत्येक
All पाउन्स का २ छेन महसूल देना पड़ता है। रजिस्टरी
विट्ठी एक पाउन्स तक ७ छेन में जाती है । पत्रादि
परिङ्ग होने पर दूना महसूल देना पड़ता है। जापान में १०
इन का मनीआर्डर भेजने पर छेन कमीसन देना पड़ता
है। तार द्वारा खबर भेजने से १५ शब्दों तक का २० छैन
लगता है।
जापान का रेल-पथ।
जापान में सब से पहिले रेल-पथ सन् १८७२ ई० के
१२ अप्रैल को खुली १८७७ ई० में ६५ मील मार्ग प्रस्तुत हुआ।
देश की उन्नति के साथही साथ रेल-पथ भी यढ़ता गया।
वर्तमान समय में हजार मील तक रेल पटरी बिधी हुई
। पहिले जापान गवर्नमेण्ट को खास दो यही २ लाइनें;
अंधी और कम्पनियों की ४१ रेलवे लाइने अलग थीं, परन्तु
अब सरकार ने सय अपने अधिकार में कर लिया है। जापान
में प्रथम-द्वितीय और तृतीय श्रेणी की गाड़िया हैं । भाड़ा का
(द)दर यथाक्रम से चौगुना, दुगुना और मामूली है । यारह
ष से कम उमर वाले पालकों का आधा किराया लगता है।
चार वर्ष तक के पालकों का कुछ भी महसूल नहीं लिया
जाता।
(Return ticket)दोनों तरफ काटिफट पूरभाड़े से चौथाई
का दाम लेकर देदिया जाता है। पहिले दरजे का टिकेट खरी-
+
जापान चरित्र
-
दने वाले १००किन, दूसरोदरजे वाले ६०किन और तृतीय श्रेणी
के यात्री.३०किन, तक का वजन बिना,महसुल दिये ले जा
सकते हैं । मुसाफिरों को अपनी साइकेल किराया भी कुछ नहीं
देना पड़ता है । जापानी रेलवे ट्रेनों में ( first) प्रथम ओर
( second.) द्विर्यात क्लास के यात्रियों को साथ (बगल के
कमरों में एक २ नौका भी तीसरे दरजे की भाड़ा देकर ले
जाने की इजाजत है।
-
-
.
जापान-देश पृथ्वी का नन्दन कानन, के नाम से जगत्
में विख्यात हैं। इसी लिये प्राचीन आर्य लोगों ने इस
द्वीप का नाम-सुदर्शन रक्खा था। जीवन सार्थक और नयन,
परितृप्त करने के लिये ईश्वर ने अनेक अपूर्व दृश्य इहा सुशो
मित कर रक्खा है । याकोहाम-बन्दर हाकौन-पर्वत की
उत्तम फोले, जिसामा शृंग, सीता पर्वत का रेल-पथ,
तेनारू-नदी के लोहे का पुल, हामानाद, नागोवा के स्वर्ण
भवन, इयारो का जल प्रपात । और ऊंच २ उत्तम पर्वता
कियातो के यांशों के फुज, मीनातो गोया आदि के तीर्थ
स्थान, जापान जाने वालों केलिये विशेष आनन्दप्रद दर्शनीय,
तथा रमणीक है।
कलफत्ते से प्रति सप्ताह औपकार, कम्पनी का और
Indo china & Co का डाक जहाज हाग कांग द्वीप में
जाता है हाग कांग से प्रसान्त महासागर के मेलसिप में
यात्रा करने से बड़ा सुभीता रहता है।
-
जापछि फेफड़ा और हृदय
WHAMMAnanew
हिन्दी भाषा में "पेशीविनष्ठ" करना होता है किन्तु इसके
बारा सब देह' की 'पेशी' विनए न होकर, अत्यन्त वलिष्ट
होजाती है। अत्यन्त दुर्यल तथा निर्वल मनुष्य भी नियम
वक इस व्यायाम के करने से हष्टपुट और ताकतवर होजाता
है। जापान के सैनिक और जहाजी लोगों को भी इसी
पायाम का अभ्यास करना पड़ता है ।इस व्यायाम म सय
पहिल याहार-उत्तम २ पुष्टकर यस्तुओं का करना पड़ता
जापान की नाना कथाएं
१७
कलकत्ते से हांग कांग के प्रथम श्रेणी का किराया २५०)
द्वितीय श्रेणी का २००) और डेक का भाड़ा ४५/रुपया लगता
है। हाग काग से इयाकाहामा का १दर का २२७। Jजहाज
के सन्मुख कमरे का ) रु० और डेक का किराया ३५J
रुपया परता है । न० ६ ओलडकोट हाउस स्ट्रीट कलकत्ता के
सामस एण्ड सन्स के कार्यालय में टिकट आदि बिकते हैं।
तथा आवश्यकीय क्षातव्य विषय भी इस कम्पनी द्वारा
मालूम होजाते हैं।
बम्बई वन्दर और हांग काग से पैसाफिक मेल जापान
को सीधा जाता है । मदरास में एक स्वदेशी जहाजी कम्पनी
ली है । जो सीधे मदरास से जापान को पहुंचा देती है ।
सुनते हैं इस कम्पनी ने किराये का रेट बहुतही कमरक्सा है।
जापानियों ने जिस प्रणाली को अवलम्यन कर शारीरिक
बनवार्य वढाया है उस व्यायाम कानाम (yuyutsu) 'युयुत्सू'
-
की उति साधन करनी
जापान-चरित्र
.
पड़ती है। सीखने वालों को अस्त्र-विद्या और प्राणी-विद्या
की आलोचना करनी पाती है । और योगिगों के समान
नियम से रह-शुद्धाचारी वनना पड़ता है । ४ वर्प विशेष धैर्य
के साथ अभ्यास करने से यह अपूर्व-विद्या आजाती है और
देह पत्थर के समान पुष्ट होकर, उसमें ताकत आजाती है ।
जापान से सीख कर युरोप के नाना प्रान्तों में इस
व्यायाम को शालाएं खोली गई हैं। भारत में भी दो चार
जगह यह व्यायाम नियम पूर्वक सिखलाया जाता है।
जापान में हाराकिरी' अर्थात् आत्महत्या का प्रबल
प्रचार है । जापानी लोग अतिसामान्य कारणमेही अपना
अमूल्य जीवन विनष्ट कर डालते हैं। इन लोगों का विश्वास
है.कि आत्महत्या करने से इस लोक में यश तथा परलोक
में स्वर्ग प्राप्त होता है। जापानियों के प्राचीन धर्म शास्त्र में
लिखा है कि मनुष्य जाति मात्र को धात्म जीवन रक्षा और
विनाश करने का अधिकार है।
वर्तमान राजकीय-माईन में यह घोर अपराध माना
गया है। इससे ऐसे घृणित कार्य की चेष्टा करते हुए किसी
जापानी के पकड़े जाने पर उसे जेल जाना पड़ता है
जापान की 'शिभोज' नामक वारूद जगत विख्यात है।
प्रोफेसर 'शिभाज' इसे दीर्घकालव्यापी परिश्रम और परीक्षा के
याद आविष्कार किया है और अपने नामही के अनुसार
घायर का भी नाम रख लिया है।
।
-
जापान की नाना कथाएं
।
इस प्रकार असाधारण विषफोटक शक्ति सम्पन्न वारूद पृथ्वी
के ओर किसी वैज्ञानिक द्वारा नाज तक नआविष्कार होसका।
जापानी-अध्यापक 'मोमोरि' ने भूकम्प की गति विधि
और स्थिति परिमाणक जो यन्त्र प्रस्तुत किया है वह पश्चात्य
पण्डित मिलनी' के यन्त्र की अपेक्षा विशेष कार्य कर और
सस्ता है। इस समय इस यन्त्र की सहायता से शिमला
शैल से १००० मील दूरवर्ती स्थान के भूमि-कम्प का वृतांत
। बहुत सहज रीति से पहिलही मालूम होजाता है।
२९ जून १८८८ ई० को जापानी प्रोफेसर "कितो सातो"
हांग काग द्वीप में पहुंच प्लग के कीड़ों की सांच की। वर्तमान
में आपके ही विचारानुसार संसार में, विशेष कर भारत में
सग की श्रीपधि और व्यवस्था आदि की जाती है।
चिकित्सा शास्त्र में जापानियों ने अनेक प्रकार से उन्नति
साधन किया है। डाक्टर "शिगो" नेनामाशय रोग फे कीड़ों
को निकाल पाश्चात्य जगत के बड़े २ चिकित्सकों को आधर्य
में डाल दिया है । जापानी डाक्टर शिगो-आमाशय रोगा
के रोगी के सून से इन कीड़ों को निकाल कर शीघ उनको
निरोम कर देते हैं और एक जापानी चिकित्सक ने पशु-पक्षी
आदि जीवों के देह से एक प्रकार का रस प्रस्तुत किया है
जिसे कि मरते हुए मनुष्यों के देव में तनिफसा पहुंचा देने
कुछ काल के लिये यह मरणापन रोगी होश में प्रा.
बातें करने लगता है कभी २ जी भी जाता है।
से
१००
जापान चरित्र
गोइसा-जापान कीनृत्य कारणी रमाणियों की एक जाति
है। इन अपसरा चिनिदित सुन्दरी युवतियों का नृत्य-पान
अवलोकन करने के लिये जापानी लोगों की विशेष रुचि रहती
है। यालाओं की मनोहर मुख शोभा विचित्र-वेश विन्यास
और अङ्ग की सुघराई अवलोकन करने पर मात होता है
कि, मानों जगदीश्वर ने पुरुप जाति के चक्षुओं को तृप्त करने
ही के लिये "गोइसा" कामिनियों को स्वर्ग से मृत्यु लोक में
प्रेरित किया है। किन्तु गोइसा-सुन्दरियों का चरित्र दूषित
नहीं होता। ये रमणियां पिता माता भ्राता आदि अमि
मावकों के श्राधीन रह नृत्य-गीतादि का व्यापार करती हैं ।
विवाह होजाने पर फिर कभी इस पेशे को नहीं कर सकती है
।
जापानी लोगों से भद्रता और नम्रता सय संसार को
सीखना चाहिये। यह लोग बात २ में धन्यवाद और नम्रता
स्वीकार करते जाते हैं। गुरुजनों को हमारे देश की तरह
सिर नवाकर रोज प्रणाम करते हैं । आपस में गाली गलौज
या मार पीट करना जापान में बड़े दोष का काम समझा
जाता है । चमड़े का जूता पहिन घर के भीतर जाना मना
है इससे कपड़े का जूता पहिन घर में विचरण करते हैं।
जापानी भाषा में कुत्सित गाली गलौज देने के लिये वैसे
शब्दही सायद नहीं है । विशेष गुस्सा होने पर "पागल" कह
कर ये लोग अपना कोप प्रगट करते है।
जापान के 'सात जुमा' अर्थात् मल्ल, उपाधि धारी एक
जापान की नाना कथाएं १०१ ww wwwwwwwvoviww प्रसिद्ध वश है। यह लोग कुस्तीयाज पाइलवान के सिवा भन्य किसी को अपनी कन्या का विवाह करना महा अनु- चिन कार्य समझते हैं। अपनी जाति में कन्या या पुत्र होन पर एक वृक्ष उसी दिन लगा देते हैं । उस बालक बालिका के युवा, होने पर जब उसका विवाह होता है तब वृक्ष के पत्तों से मुकुट बना कर उसके सिर में N उसी बांधते हैं। जापान के समान वैद्य पृथ्वी के और किसी देश में नहीं होंगे । जापानी भाषा में प्राचीन रीति के अनुसार वैद्य- की का पेशा करनेवालो को "सा" कहते हैं । इन लोगों की दवा सस्ती, किन्तु अति उपकारी होती है। मृग नाभि से यह लोग नाना प्रकार की महौषधियां तैयार किया, जापान में जो किस्से कहानियां प्रचलित हैं उनमें से - एको का मिलान इस देश की कथाओं से होजाता है। - यथा देव परियों की कहानी, हातमताई के समान चीर पुरुषों की अदभुत कार्यावली, देव दानव मनुष्य और परियों का विवाह, व्याघ्र गाल आदि का मनुष्य रूपधारन करना । लोमड़ी जापान देश में विचित्र शक्तिशाली जानवर समझो गई है। उसके विचित्र भयानक कार्यों की कथाएं प्रसिद्ध है । कुत्तों के भी सम्बन्ध में अनेक कहानिया इस देश में प्रसिद्ध हैं। ।
जापान-चरित्र
Nawaran
किन्तु जापान फा युरोपीयभावापन्नः सिक्षित समाज
पुरानी बातों को ढकासला समम उसपर बिलकुल ही
ध्यान नहीं देता।
पहली जून सन् १८९६ ई० को जापान गवर्नमेन्ट नै युद्ध
के क्षतिपूर्ण स्वरूप चीन से "कारमोशा" तावान' और
उसके निकट के छोटे ३७६ द्वीप पुजों को ग्रहण किया था।
इसके पहिले इन छीपों की अवस्था विशेष सोचनीय थी,
किन्तु जापान के सुशासन प्रताप से अव यह एक महातिजा
रती क्षेत्र हो गया है। वर्तमान साल में इस द्वीप की मनुष्य
संख्या ४० लाख से भी अधिक थी।
वहां के "तेहोफ कागी हामा"आदि प्रधान नगरी में बहुत
से स्कूल कालेज डाफ्टर-खाने और थक आदि स्थापित
हो गये हैं। इस द्वीप में रेल पथ ६ हैं और ट्रेन गाड़िया भी
यहां कई जगह चलती हैं। टेलीग्राफ की लम्बाई ३ हजार
मील से भी अधिक है । समग्न छोप में २०० डाक घर हैं।
इस द्वीप से बहुत सी अफीम, निमक, कपूर, चीनी, चावल
फांच, कागज और कोयला आदि पृथ्वी के नाना स्थानों
में भेजा जाता है। इनमें पहिल की ३ वस्तुओं का व्यापार
सिर्फ सरकारी की ओर से होता है। इस द्वीप में भी
जापान के समान विना डाक्टर की अनुमति के कोई अफीम
का सेवन नहीं कर सकता है।
कई वर्ष हुए जापान गवर्नमेन्ट ने फ्रांतीसियों से
-
-
मानन्द का विषय है कि आर्यावर्त से गये हुए आर्य
सहायता प्रदान किया करते हैं।
जापान को नाना कथाएं
मालास्का द्वीप के निकट की सेन्टपारी और दूसरे कई एक
छाटे २ द्रोपों का खरीद किया है इससे अमेरिका में जापान
का प्रयम अधिकार स्थापित हुआ है।
कुछ ही महीने हुए जापान ने कोरिया देश को पूर्ण
रीति से अपने अधिकार में कर लिया है। यह कौतुक देस
युरोप अमेरिका कुछ न कह, मन मसोस कर चुप रह गये।
और कोरिया जापान द्वारा साशित हो रहा है ।
जापान में निवास करने के व्यय-आदि।
जापान के किसी भले आदमी के घर में हिन्दुस्थानी
मनुष्य खर्च श्राद्रि देकर पहुत दिनों तक निवास कर
सकता है। और कम से कम २५/२० मासिक तक में गुजारा
हो सकता है । अमारी ढंग से रहने में ५०) ६०) मासिक
पडता है । जापानी भाषा विदेशियों के लिये पढ़ना महा
कठिन है, किन्तु भारतवासी परिश्रम कर पढ़े तो ८ आठ
महीने में बखूनी आ जाती है ।लाहौर दयानन्द एलो वैदिक
कॉलेज और कलकत्ता अलवर्ट कालेज में जापानी भाषा
पढ़ाई जाती है।
लोगों से जापानी सादर भाव से मिलते हैं। और सर्वदा पदन
लिखने तथा अन्य कार्यों में सर्व प्रकार की यथा सामर्थ
. रूस-जापान का युद्ध इतिहास-( संक्षेप से) ICTIO न का वाकसर विद्रोह शान्त होनेपर मार्किन, जापान और युरोप के अन्य शक्ति शाली राष्ट्रों ने एकत्रित हो स्वीकार किया कि हम लोग अपने क्षतिपूर्ण स्वरूप चीनी सरकार से एक लक्ष रुपया लेंगे। ओर चीनी राजसत्ता में कुछ दखल नहीं देंगे। और सम्मिलित सैन्य समुदायों ने चीन के जो किले और नगर आदि को अपन अधिकार में कर लिये हैं, वहां से सब लोग अपनी २ फौज को हटा लेंगे। अन्यान्य शक्ति पुंज अपनो २ प्रतिशानुसार चीन राज्य परित्याग, अपने २ देशों को सैन्यदल बुला लिया। किन्तु रूस ने मंचूरिया को परित्याग न कर, नियम विरुद्ध कार्य किया। शक्ति पुजों के चार २कहने और लड़ाई का भय दिख लाने पर भी रूस धूर्तता युक्त हो आज कल का बहाना कर बरसो टाल दिया। और मंचूरिया परित्याग करना तो दरांक- मार रहा समीप के कोरिया राज्य के ऊपर भी अपनी कुटिल लोपष्टि निक्षेप करना प्रारम्भ किया । और देखते २
रूस जापान का युद्ध
१०५
ARMA
AW~
२ कोशल से आलू नदी के तीरवती जगलों का अधिकार
पत्र ग्रहण कर लकड़ी के बड़े २ कीमती लट्टे कटाना प्रारम्भ
कर दिया। कारिया का "उइजू" यन्दर रुस के अधिकार में
पूरा तौर से आ गया।
रूस की यह दुरभिसंधि गंभीर दृष्टि से अवलोकन कर
जापानी गवर्नमेन्ट स्वभावत उत्तेजित हो उठी । जापान
ने अपने हृदय में विचार किया, रूस तो मचूरिया परि-
त्याग करेगा नहीं। यदि इसी प्रकार धोरे २ कोरिया देश
भी ग्रास कर लिया तो, फिर कुछ ही दिनों में हमारे
देश की स्वाधीनता गौरव विलुप्त होते भी देर न लगेगी।
आज २८०० सौ वर्ष से जो कोरिया पर हमारा अखड
आधिपत्य विद्यमान है, जिससे कि जापान का जीवन मरण
निभर है । उसी कारियाराज्य को हमलोग अपने बाजी
कभी रूस के अधिकार में नहीं जाने देंगे। जापानियों ने
स्थिर कर लिया कि, यदि पापी रूस न्याय, धर्म और युक्ति
के मस्तक में पदाघात फर पर राज्य ग्रास करने को जो तत्पर
हुआ है तो हम जापानी बौध लोग भी अपने जीवन की
आजन्म स्वाधीनता-गौरव-रक्षा के लिय जगदीश्वर का
महामहिमामांडत नाम स्मरण कर धर्म युद्ध में अग्रसर होंगे।
गत २३ जून सन् १९०३ ई० को राजधानी टोकियो के
मषणा मंदिर में स्म दून व्यारन गसन के साथ जापान के
परराए, सचिरव्याग्न कामुरा महाशय का मचल नाकयुद्ध
NotPROM
जापान चरित्र
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-
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उपस्थित पुश्रा । सप्त मास व्यापी तर्क वितर्फ के बाद
कस्तानी धर्मपरायण रूस के जार महोदय ने स्पष्ट प्रकाश
फर दिया कि, मंचूरिया के सम्बन्ध में हम जापान की
कोई बात नहीं स्वीकार करेंगे । कोरिया का अंश निरपेक्ष
रहेगा । अवशिष्ट अंश रुसाधिकार में रहेगा। २२ दिसम्बर
को जापान सम्राट मिकाडो ने उत्तर दिया, यह कदापि न
हो सकेगा रुस को निर्दिष्ठ समय के अन्दर मचूरिया
परित्याग करना पड़ेगा । और कारिया में जापान की प्रभुता
अखंड रहेगी।
६ जनवरी सन् १९०३ को रूस ने राजनैतिकभाषा में
मंचूरिया में जापान का स्वत्व स्वीकार किया, किन्तु कोरिया
के सम्बन्ध में निज अभिप्राय प्रगट कर कहा कि मंत्रिया में !
समस्त जातिया जिसमें स्वाधीन भाव से वाणिज्य कर सकें,
ऐसी व्यवस्था हो जानी चाहिये । और कारिया में जापान,
का प्रभुत्व तथा वाणिज्याधिकार पूरीतौर से रहेगा।
इसके बाद २२ दिन व्यतीत हो गय, तथापि रूसी गव
नेमेन्ट ने कोई सन्तोषदायक उत्तर प्रदान न किया । इस
घटना द्वारा जापानी सरकार के मन में रूस की बदनियती
पूरी तौर से समझ में भा गई । इसलिये रूस से सब
राजनैतिक सम्बन्ध त्याग जापान सरकार ने युद्ध
घोषणा प्रगट की।
इस प्रकार मस की चालाकी स्वार्थपरता दुराकाक्षा
।
।
विया, रसिया, F कारिक E धगाटिर F marvarnar आर्थर बन्दर के (युद्ध जहाज)जार उचB रेटविसाना सिवोस्ट पोल G पोलटावा G पारचविट ६ पोविटा G पेटपेवलस्कि A. (लोह मारिडत रणतरणी) देयन, (रक्षित रणतरणी) अस्फल्ड C.नविक E. डियाग D' पालाहG वरिन E कोरिया के उपकूल में, ( रक्षित घेलाडिवष्ठक बन्दर की (लोह मण्डित रणतरणी) प्रोमो- रूस जापान का युद्ध १०७ तथा परराज्य हरण करने की लोलुपता द्वाराजो विषमय फल उतपन्न हुआ और सुदूरमाच्य भूखंड में जो लाक-भीषण मम- सनल प्रज्वलित होउठा उसीका संक्षिप्त वर्णन हम अागे करेंगे। जल-युद्ध । फरवरी १९१४ ई० को अर्धरात्रि के समय रूस जापान का प्राकृत युद्ध प्रारम्भ हुआ । उस दिन से लगातार सन्धि पत्र हस्ताक्षरित होने के दिन तक जितने जल-युद्ध हुए हैं (समुद्र के वक्ष स्थल में ) उनसभी समरों में, विजय लक्ष्मी. जापान ही की ओर रही है। उतने दिनों में रूस की जल सैन्य सम्पूर्ण निमूल होगई सम की कितनी हानि हुई है, यह, हम नीच एक सूची: प्रदर्शित कर प्रगट करते हैं युद्ध के पहिले दिन तक सुदर प्रशान्त महासागर में रूस की निम्नलिखित रणतरणा मौजूद थी। रणतरणो) वेरियाग E कोरिजE
१०८
जापान-चरित्र
में भग्ना
उपरोक्त प्रथम श्रेणी केरणतरणियों में A चिन्हित जहाज
जापान के आग्नेय यन्त्रों में पड़,मय ७०० फौजीजवानों के और
प्रचुर युद्धापयागी सामान के साथ समुद्र में इच गया।
इन जहाजों में सुप्रशिद्ध नौ-सेनापति भ्याकारफ और जगत
विख्यात चित्रकार घेरंट सागिन भी अवस्थित थ ।
B चिन्हित जहाज चीन के "कियाचिउ" चन्दर के निकट
जल में मग्न हुश्रा इसमें सेनापति "उईटगार" दो सौ जवानो के
साथ मृत्यु मुख में पतित हुए थे।
C चिन्हित अस्कल्ड चीन के "ऊसा" बन्दर
वस्था दशा में बन्दी हुआ था।
D चिन्हित फ्रान्सीसी अधिकृत सैगन चन्दर में कैद
हुश्रा था।
E चिन्हित ६ रणतरणी जापान के गोला और टारपेडो
के अधाता द्वारा प्रचुर सैन्य तथा युद्धोपकरन सतसागर
सलिल में निमग्न हुई थी।
F चिन्हित दानोरणतरणी तेजी से भागते समय समुद्र
के पर्वतो से टकरा कर खण्ड विसण्ड हो समुद्र में डूब गई ।
G चिन्हित प्रथम श्रेणी के E जहाज आर्थर बन्दर में
जल मग्न हुए थे, पाछे ले जापानियों ने निकाल लिये।
इसके सिवाय इनिसि, किरगाछि, नि, रेछफनि प्रभृति
अनेक सामानवाही और टारपेडो ध्वंसिनी तराणयां विनष्ट
और निरपेक्ष बन्दरों में जाकर कैद होगई थीं। रेसिटेलनी,
-
रूस जापान का युद्ध । मगोलिया श्रादि कई एक जहाजों को जापानियों ने युद्ध में रूस स छीन लिये हैं उपरोक्त सब जहाजों की कीमत तीन सौ करोड रुपये से अधिक ही का हिसाब लगाया गया है। इस युद्ध में जापान का "हातसुज" नामक युद्ध जहाज "यशिनो" नामक रक्षितरणतरणी पार कई पक टारपेडोवोट अल पन्न हुए थे। स्थल-युद्ध । रूम जापान के समर में जितने उल्लेख योग्य युद्ध संघ- टित हुए हैं। उन सभी में जयलक्ष्मी रूस के प्रति विरुद्धता प्रगट करती गई है । क्या आलू नदी के किनारे, क्या दुरा. रोह न्यानसन पर्वत में, क्या येफ्यानक प्रान्त में, क्या सुरक्षित केइयिंग नगर में, क्या दुर्गम भेटियन गिर-प्रदेश में, क्या टोसिचित्रो क्षेत्र में, सभी स्थानोंही में रूस सैन्य पराजित हो भगाई गई । जल्दी में भागते समय रूस सेना पतियों को प्रति युद्ध में बहुत सी फौज के साथ सैकडो तोप हजारों घन्क बहुनसो रसद सामग्री आदि परित्याग कर लज्जित हो, अपना प्राण बचाने के लिये भागना पड़ा है रूसी सिपाही और अफसरोंक टीक धारों के समान प्राण पण से घोर युद्ध करने पर भी उक्त छ. प्रो समर क्षेत्र में घे लोग पराजित ही हुए हैं। उन लागों के प्रत्येक युद्धोंही में जान पर खेलकर अपूर्व बुद्धिमत्ता और वीरत्व की पराकाष्ठा . .
१०८ सापान-चरित्र M - । : - N । उपरोक्त प्रथम श्रेणी के रणतरणियों में A चिन्हित जहाज। जापान के आग्नेय यन्त्रों में पढ़,मय ७०० फौजीजवानों के और प्रचुर युद्धापयागी सामान के साथ समुद्र में च गया। इन जहाजों में सुप्रशिद्ध नौ-सेनापति भ्याकारफ और जगत, विख्यात चित्रकार घे रेट सागिन भी अवस्थित थ । B चिन्हित जहाज चीन के "कियाचि" बन्दर के निकट । जल में मन हुआइसमें सेनापति "उईटंगा दो सौ जवानों के साथ मृत्यु मुख में पतित हुए थे। C चिन्हित अस्कल्ड चीन के "ऊसा" बन्दर में भग्ना वस्था दशा में यन्दी हुआ था। D चिन्दित फ्रान्सीसी अधिकृत सैगन बन्दर में कैद हुया था। E. चिन्हित ६रणतरणी जापान के गोला और टारपेडो के अघातों द्वारा प्रचुर सैन्य तथा युद्धोपकरन सतसागर सलिल में निमग्न हुई थीं। F चिन्हित दोनोरणतरणी तेजी से भागते समय समुद्र के पर्वतो से टकराकर खण्ड विखण्ड हो समुद्र में डूब गई। G चिन्हित प्रथम श्रेणी के E जहाज आर्थर धन्दर में जल मग्न हुए थे, पाछे ले जापानियों ने निकाल लिये। इसके सिवाय इनिसि, किरगाछि, नि, रेष्ठफनि प्रभृति अनेक सामानवाही और टारपेडो ध्वंसिनी सराणयां विनष्ट और निरपेक्ष बन्दरों में जाकर कैद होगई थीं । रेसिटेलनी, -- . ।
मान पर खेलकर अपूर्व बुद्धिमत्ता और धीरत्व की
- www
1
राह न्यानसन पर्वत म, क्या थयफ्यानक प्रान्त में, क्या
सुरक्षित केया नगर में, क्या दुर्गम मेटियन गिर-प्रदेश
में, क्या टोसिचिनो क्षेत्र में, सभी स्थानोंही में सस सैन्य
पराजित हो भगाई गई। जल्दी में भागते समय रूस सेना-
पतियों को प्रति युद्ध में बहुत सी फौज के साथ
तोप हजारो घन्क यहुनसो रसद सामग्री आदि परित्याग
कर लज्जित हो, अपना मारण चचाने के लिये भागना पड़ा है
रूसी सिपाही और अफसरोक टोक वीरों के समान प्राण
पण से घोर यद्ध करने पर भी उक्त छ. प्रो समर क्षेत्र में
थे लोग पराजित ही हुए है। उन लागों के प्रत्येक युखोंदी में
रूस जापान का युद्ध
अंगालिया आदि कई एक जहाजों को जापानियों ने युद्ध में
अम स छीन लिय हैं।
पति सब जहाजों की कीमत तीन सौ करोड़ रुपये
से अधिक ही का हिसाब लगाया गया है।
इस युद्ध में जापान का "हातसुज" नामक युद्ध जहाज
"यशिनो" नामक रवितरणतरणी पार कई पक टारपेडो घोट
स्थल-युद्ध ।
कम जापान के समर में जितने उल्लेख योग्य युद्ध
रित हुए हैं। उन सभी में जयलमास के प्रति विरुद्धता
पाट करती गई है । क्या पालू नदी के किनारे, क्या दुरा-
सैकड़ों
जल मल हुए ।
संघ
।
जापान-चरित्र
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प्रदर्शित करने पर भी, वे लोग निष्ठुर प्रष्ट देवी के चित्त
विनोदन में सामर्थ नहीं हासक हैं।
मप्तम युद्ध पृथ्वी के समर इतिहास में "लेयर"युद्ध नाम
से लिखागया है। यह वासवीं शताब्दी का सबसे प्रथम प्रधान
लोक क्षयकर महायुद्ध है । रूस सेनापति कुरोपाटकिन
साढ़े तेरह लाख प्रथम श्रेणी की सुशिक्षित फौज लेकर और
६ सौ से अधिक तोपों के साथ लेयड्ग नगर में निवास करते
थानी पर्वत प्राचीर और परिखा आदि से यह शहर स्वभा
वत ही दुरभेद्य और दृढ़ था। तिसपर भी रूम के पष्ठमास
व्यापी विपुल अध्यवसाय और अमामान्य चेष्टा से लेया
नगरी एक अजेयदुर्ग बन गई थी। वहां पर महायुद्ध होने की
आशंका से कुरोपाटकिन ने अपना अवस्थान सुरक्षित करने
क सम्बन्ध में कुछ त्रुटि नहीं की थी, किन्तु-
हाय-तिस पर भी विधातावामही हुआ! भीषण पराजय
सहन कर और महालजित हो पात्म-रक्षा के लिये तस्करों
के समान रूसियों को भागना पड़ा। अमेरिका जापान और
विलायती पत्र सम्पादकों ने कुरोपाटकिन के इस अद्भुत
पलायन सम्बाद को वणन करते समय अत्यंत आर्शय प्रगट
किये थे।
फरासीसी, जर्मन और रूस के पत्र सम्पादकों ने कुछ
भी इस विषय में आनन्द प्रकाश न कर, स्तम्भित हो गये थे।
इस तरह पीठ दिखलाने के विषय में रूस की सर्व साधारण
.
से जापान का युद्ध
गजा ने कुछ भी नहीं कहा था जार महोदय और उनके मंत्रियों
ने यह महापराजय का सम्बाद मलिन बदन मंडल से किसी
प्रकार सुन लिया, किन्तु शोक को नहीं समाल सके थे। इस
कारण फिर बहुत सी सेना युद्ध स्थल में प्ररित किया।
जो दाम्भिक सेनापति तीन लाखमात्र फौज लेकर युद्धा.
रम्भ के छ महीने के अन्दर ही जापान की राजधानी
"टोकियो" क नन्दन फानन में प्रवेश करने का भरोसा सम्राट
का दिया था उनके अपूर्व वीरत्व प्रगट करने पर भी
चार २ पलायन कौशल से व्यथित होते देख हम भी आनन्द
प्रकाश नहीं कर सकते हैं। इस महा युद्ध के भयानक फल
से विचलित हो कुरोपाटकिन का लजित कर जार महोदय
ने द्वितीय सेनापनि ग्रिपनवर्ग को रूस से मचूरिया (युद्ध
स्थल ) में भेजा था।
।
सूसी गवर्नमेण्ट ने जो हिसाय "लेयङ्ग" शुद्ध का प्रकाश
किया, था वह इस प्रकार था। ३० हजार फेज हताहत हुई,
जापान के हताहतों की संख्या चालीस हजार के करीब थी।
इस युद्ध में १३ रूसी सिपाही और ३० युद्ध के
अस्त्र
जापान ने बदी किये थे। इसके सिवा, चार हजार यंदूक, १६
लाख टोटा, १० हजार शेल गोला १२ सौ गाही १६ हजार
जमीन साफ करने क इथियार श्रादि ६५०० कोट पटलून
१० हजार कनस्तर मान और प्रचुर रेस लाने का समान
जापान के हस्तगत हुभ्रा था।
-
३
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जापान-चरित्र
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प्रदर्शित करने पर भी, वे लोग निष्ठुर अदृष्ट देवी के चित्त
विनोदन में सामर्थ नहीं हासक हैं।
सप्तम युद्ध पृथ्वी के समर इतिहास में "लेयङ्ग" युद्ध नाम
से लिखा गया है। यह वासवीं शताब्दीका सव से प्रथम प्रधान
लोक-क्षयकर महायुद्ध है । रूस सेनापति कुरोपाटकिन
साढ़े तेरह लाख प्रथम श्रेणी की सुशिक्षित फौज लेकर और
६ सौ से अधिक तोपों के साथ लेयङ्ग नगर में निवास करते
थे।नदी पर्वत प्राचीर और परिखा आदि से यह शहर स्वभा
वत ही दुरभेद्य और दृढ़ था। तिसपर भी रूम के
पष्ठमास
व्यापी विपुल अध्यवसाय और अमामान्य चेष्टा से लेया
नगरी एक अजेयदुर्ग बन गई थी। वहां पर महायुद्ध होने की
आशंका से कुरोपाटकिन ने अपना अवस्थान सुरक्षित करने
क सम्बन्ध में कुछ त्रुटि नहीं की थी, किन्तु-
पर भी विधाता वामही हुआ भीषण पराजय
सहन कर और महालजित हो आत्मरक्षा के लिये तस्करों
के समान रूसियों को भागना पड़ा। अमेरिका जापान और
विलायती पत्र सम्पादकों ने कुरोपाटकिन के इस अद्भुत
पलायन सम्बाद को वणन करते समय अत्यंत प्राचय प्रगट
हाय-तिस
किये थे।
फरासीसी, जर्मन और बस के पत्र सम्पादकों ने कुछ
इस विषय में प्रानन्द प्रकाश न कर, स्तम्भित हो गये थे।
तरह पीठ दिखलान के विषय में रूस की सर्व साधारण
असे जापान का युद्ध
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जाने कुछ भी नहीं कहा था जार महोदय और उनके मंत्रिया
यह महापराजय का सम्बाद मलिन बदन मंडलम विर
अकार सुन लिया, किन्तु शोक को नहीं समाल सके यस
कारण फिर बहुत सी सेना युद्ध स्थल में प्ररित किया।
जो दाम्भिक सेनापति तीन लाखमात्र फोज लेकर गुरा
रस्म के छ महीने के अन्दर ही जापान की रामधानी
"टाकियो" क नन्दन फानन में प्रवेश करने का भरोसा सम्राट
यार २ पलायन कौशल से व्यथित होते देस हम भी मानन्द
से विचलित हो कुरोपाटकिन का लजित कर जार महोदप
का दिया था उनके अपूर्व परित्व प्रगट करने पर
प्रकाश नहीं कर सकते हैं । इस महा युद्ध के भयानक
1
।
-
ने द्वितीय सेनापति ग्रिपनवर्ग को रूस से मंचूरिया (पुर
स्थल) में भेजा था।
कसी गवर्नमेण्ट ने जो हिसाय "लेया" युद्ध का प्रकाश
किया, था वह इस प्रकार था । ३० हजार फौज हताहत हुई,
जापान के हताहतों की संख्या चालीस हजार के करीब थी।
इस युद्ध में १३ रूसी सिपाही और ३० युद्ध के अस्त्र
जापान ने बदी किये थे। इसके सिवा, चार हजार पंक, १६
लाख टोटा, १० हजार शेल गोला १२ सौ गाडी १६ हजार
जमीन साफ करने क हथियार आदि ६४०० कोर
पटलून
१५ हजार कनस्टर मान और प्रचुर रेल बनान का समान
जापान के हररागत हुश्रा था।
जापान चरित्र AMAm अष्ठम युद्ध "सा" नदी के किनारेपर होने के कारण सा ही युद्ध के नाम से इतिहासों में दर्ज किया गया है। इस युद्ध में सेनापति कुरापाटकिन तीन लाख फौज के साथ विपुल- विक्रम से जापानी दल पर आक्रमण किया था । किन्तु अन्त में पराजित हो कुरोपाटकिन ही को भागना पहा, इस साहो युद्ध में रूस की जितनी हानि हुई थी, लेखको ने लिखा है कि इसके पहिले.केसी युद्ध में रूस की इतनी हानि नहीं हुई थी। युरोप के सर्वश्रेष्ठ सेनापति साहो-युद्ध के भीषण परिणाम को अवलोकन कर चकित हो गये ध। इस युद्ध में ७०९ रूसी जापान के पास कैदी हुए थे। समरक्षेत्र में जापानी मुरदा उठाने वालों ने १५ हजार रूसी मुरदों को दफन किया इसके सिवा ४९ बड़ी २ तोप ५४०० बदूक ७८ हजार टोंटा और ७ हजार बड़े २ गोलों को विजयी जापान ने कासियों से छीना था अनेक-इतिहास लेखकों का अनु माना है कि इस युद्ध में एक लाख के करीब रूसी फौज हताहत हुई थीं। सा हो युद्ध में जापानी सैन्य को भी असाधारण क्षति नहीं हुई । ३० हजार जापानी फौज हताहत और १२ तो रूस के कयजे में चली गई थी। नयम युद्ध द्वितीय सा हो समर के नाम से कहा गया है। कोई २ अथकार इसको "हिकन्टोइयकार" नाम से अपने ग्रंथों - -
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ने यथा समय सना की सहायता
सेंस जापान का युद्ध
में लिया है कि २५ जनवरी को द्वितीय रूस सेनापति ग्रिपन
वर्ग नेविपुल सैन्य के साथ बड़ी सावधानी से जापान वाहिनी
के वामभाग में अाक्रमण किया। प्रथम चार दिन के युद्ध
को देख । बहुत लोगो ने अनुमान कर लिया था कि, अवश्य
ही इस बार जय लक्ष्मी रूस के गल में विजयहार पहिना.
वेगा, किन्तु हाय ' यह होत २ भी नहीं हो सका!स के भग्न
अध में यह शुभ मुर्हत पाकरभीफिर गया।जापान सेनापति
"श्रोपामा" के पूर्व सेना सचालन कौशल द्वारा चौथे दिन के
शेष रात्रि में युद्ध की गति बदल गई, लेन के देने पड़ गये।
भोर होते २ रूस कमजोर हो गया तथा सम्पूर्णरूप से पराजित
हो सेना खेत छोड़ भागी और जापानियों ने पीछा
किया।
इस युद्ध का वृतान्त इस प्रकार पछि से प्रकाश हुआ
था कि, ३६ हजार रूसी सेना और सात सहन जापानी
फोज हताहत हुई थी।
अपनी पराजय के सम्बन्ध में ग्रिपनवर्ग ने प्रकाश किया
था कि, कुरोप
मुझको नहीं पहुंचाई इसी कारण यह हार हुई। और करो
पाटाफन ने जार महोदय को लिखा था कि ग्रिपनर ने
मुझ से बिना सलाह लियेही एकाएक यह युद्ध प्रारम्भ कर
दिया था, इसी कारण यह महापराजय हुई है।
आर्थरयन्दर अधिकार पृथ्वी के समर-इतिहास में पर
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जापान चरित्र
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अपूर्व कीर्ति सूचफ है । जापानियों ने २३३ दिनों तक इस
महादुर्ग को घेर कर बहुत सी, फौज का वलिदान कर दिया।
किन्तु अन्ततः पहली जनवरी १९०५६० को अजेय आर्थर
कल में मिकाडो की सूर्याड़ित घिजय-वैजयन्ती उही। इस
यन्दर को अधिकार करने में जापानियों ने जो असाधारण
सहिष्णुता, विपुलअध्यवसाय और अद्भुत शर वीरता आदि
प्रदर्शन किया है। वर्तमान, जगत के इतिहास में उसकी तुलना
नहीं होसवाती।
रूस सेनापति महावीर ठोसल प्रतिज्ञा कर जारमहोदय
को लिखा था कि एक भी आदमी के जीवित रहते मैं इस
किले को नहीं त्यागूंगा आप शंका न कीजिये ।
अन्त में उन्हीं कठोरकर्मी सेनापति स्टोसल को निरू
पाय हो शोच, दुःख, लजा अभिमान से कातर हो, जापानी
सेनापति (पोर्ट आर्थर विजयों) नोगी को लिखना पड़ा
था। बस अब सब हो चुका हम आत्म समरपण करते हैं।
आप कृपा दृष्टि कीजियेगा।
पाइली जनवरी को आर्थर बन्दर स्थित सभी लोगों ने
जापान की सेवा में प्रात्म समरपण किया।इस से पन्दर के सब
किले, गोला, गोली, तोप, वस्दक, जहाज आदि सब सामान
विविध वाणिज्य जहाजबादि भी जापानी गवर्नमेण्ट के हस्त
गत हुए थे।
रूस ने जिस सम्पत्ति को दस वर्ष पहिले-जापान को
।
रूस जापान का युद
धोखा दे अपने कपजे में कर लिया था जापान सेनापति
"नोगी" केवलमात्र जापानी सेना की सहायता से अपने
अधिकार में कर लिया। इसको देखः सुन कर लो प्रानन्द
जापानियों को हुआ, वह इस क्षुद्र लेखनी द्वारा प्रगट.
करना असम्भव है।
रूस कर्मचारियों के विशेष वीरत्व प्रकाश करने के
समय जापान सेनापति ने विशेष उदारता प्रगट करते हुए
लिखा था कि-जो फोर्जीयफसर तथा सिपाही यह प्रतिक्षा
करें किहम फिर कभी जापान के विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे।
उन्हें हम किले से निकाल कर स्वदेश लौट जाने की
श्राक्षा दे देवेगे। उसी अनुसार इसी प्रकार की सपथ कर
महावीर स्टोसल ४४१ फौजी अफसर २ सिपाही तथा
२२९ अरदलियों में साथ मुक्तिलाभ किया था । अवशिष्ट
४३ अफसर और २३४९१ जन सैनिक केंदी बनाकर जापान
भेजे गये थे।
सैन्य और कर्मचारी के अतिरिक्त विजयीजापान सेनापति
ने आर्थर बन्दर क ५६ स्थायी दुर्ग, ५४६ तोप और ३५,
हज़ार बन्दूक ८२ हजार शेल गोला, १९ लाख मन कोयला,
४ युसु जहाज, २ लोह माडित रणतरण, १४ टारपेडा तरणी.
१० वाणिज्य जहाज, ३५ और जहाज तथा यहुत सारेल:
वनान का समान प्राप्त किया था।
दशम युद्ध मकडग, समर के नाम से प्रसिद्ध है।
+
जापान चरित्र
जनरल बैरन नोगी
।
रूस जापान का युद्ध
MINA
धोखा दे अपने कवजे में कर लिया था जापान सेनापति
"नोगी" केनलमात्र जापानी सेना की सहायता से अपने
अधिकार में कर लिया। इसको देख सुन कर जो प्रानन्द
जापानियों को हुआ, वह इस क्षुद्र लेखनी द्वाग प्रगट
करना असम्भव है।
रूस कर्मचारियों के विशेष वीरत्व प्रकाश करने के.
समय जापान सेनापति ने विशेष उदारता प्रगट करते हुए
लखा था कि-जो फोर्जीमफसर तथा सिपाही यह प्रतिक्षा.
करें कि, हम फिर कभी जापान के विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे।
उन्हें हम किले से निकाल कर स्वदेश लौट जाने की
आशा दे देवेंगे। उसी अनुसार इसी प्रकार की स्वपथ कर
महावीर स्टोसल ४४१ फौजी अफसर 4 सिपाही तथा
२२९ अरदलियों के साथ मुक्तिलाभ किया था । अवशिष्ट
४३ अफसर और २३४९१ जन सैनिक फैदी बनाकर आपान
भेजे गये थे।
सैन्य और कर्मचारी के अतिरिक्त विजयीजापान सेनापति
ने आर्थर बन्दर क ५६ स्थायी दुर्ग, ५४६ तोप और ३५०,
हजार बन्दुक ८२ हजार शेल गोला, १९ लाख मन कोयला,
४ या जहाज, २ लोह मटित रणतरण, १४ टारपेडा तरणी
२० वाणिज्य जहाज, ३५ और जहाज तथा बहुत सारेल
बनान का समान प्राप्त किया था।
दशम युद्ध माडग, समर के नाम से प्रसिद्ध है।
.
जापान-चरित्र
.
नहीं मालुम होता था। इस समय जर्मनी फ्रान्सीसी आदि
निरपक्ष कहलानेवाली शक्ति पुंजो ने भी विविध उपायों द्वारा
रूस की सहायता की थी। यहा तक कि अंग्रेजी कम्पनियों
ने भी द्रव्य के लालच में फस कर, इस विकराल-वेड़े को नाना
प्रकार की सहायता दी थी। विशेषत. जव रूस वाहिनी चीन
सागर पार कर जापान समुद्र के निकट उचर की ओर से
अग्रसर हुई उस समय तक जापानी नौसेनापति टोगो
शत्रु की गति रोध करने के लिय किसी प्रकार की चेष्टा
नहीं की थी, तब तो जापान के विजय-सम्बन्ध
संसार को ही दारूण सन्दह होने लगा किन्तु हाय ! इतनी,
चेप्टा और आडम्बर होते हुए भी रूसियों के भाग्य
दोप के कारण फिर भी महा पराजय हुई। संसार में फिर
एक घार धर्म की जप और अधर्मे के लिये ईश्वरीय नियम
की घोषणा प्रचार हुई।
में समस्त
जापान और कोरिया प्रायद्वीप के बीच में कोरिया-
प्रणाली है । गत २९ मई शनिवार १६०५ ई० को वहां रूस-तो-
चाहिनी चार भागों में विमच हो इस प्रणाली में घुसी किन्तु
घुसते ही वहां जापानी जहाजी वेड़ों से घिर गई ।फिर क्या
था लेने के देने पड़ गये । चीर जापानियों ने शनिवार के
प्रात काल के प्रारम्भसे सोमवार तक बिना एक क्षण भी
प्राराम किय यरावर दिन रात तीन दिन तक युद्ध करत रहे ।
रूखी बेड़े को एक दम नष्ट भृष्ट कर डाला। प्रथम आकर
जान-चरित्र एडमिरल टोगो।।
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रूसा जापान का युद्ध - मण के १२ ही घन्टे में रूसी वेडा घयड़ा कर भागना शुरू कर दिया, किन्तु जापानी टारपेडो के आघातों से विल- कुल नेस्त नावूद हो गया मागने में भी पनाहं न मिली। जितनी देर तक कि शत्रु पूरी तौर से पराजित नहीं हुआ। उतनी देर तक जापानी फौज ने विश्राम लेना पाप का कार्य समझ लिया था। और सब वेडों क जापानियों ने उक्तावात की सपथकर ली थीकि, पिना शत्रु कोनटकिये पानी भी न पियेंगे। इस महासमर में रूस का रियाजसूवा, यफअलेक- जेएडर, बोरिडिनो, दिमिदी, राचमहफ, चालाडिमिर, मनोमोक, जामयुग, ऊपाहक, असलिया, नारिन, आला- माज प्रादि कई एक लढाई के जहाज कोरिया प्रणाली' स्थित सुसीमर द्वीप के पास डूब गये । निकोलस ओरेल, आप्राफसिन, नियाविन, और चिवोमि यह पाच जहाज विजयी जापानियों ने छीन लिये। इन पाचोजहाजों की कीमता २० करोड़ रुपये से कम न थी। इस महायुद्ध में जापान के तीन टारडो' नाव बिनष्ट और ४०० मनुष्य हताहत हुए थे। सेनापति टोगो और पड. मिरल यिशु भी सामान्य रूप से महायुद्ध करते समय कुछ घायल होगये थे। इस युद्ध में ५५०० सौ रूसी सेना के साथ प्रधान सेना. पति रोजडेजवेनस्फि. नेयोगेटव, फोकरसाम, और वोट्रो. बोस्ति, जापान के कैदी हुए थे।
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जापान-चरित्र
अत्यन्त दर्प से लंकेश्वर रावण विनष्ट हुआ था, अतिशय
अभिमान से कुरूपति दुर्योधन का सर्वनाश हुश्रा-और
अति लोभ के कारण रूस सम्राट निकोलस का मान मर्दन
इस बीसवीं शताम्दी में हुआ।आधे युरोप और अर्ध एसिया
में जिसका अटल राज विराजमान है। इस युद्ध के प्रताप से
उन्हीं रूस सम्राट को जापान की इच्छानुसार सन्धि पत्र पर
दस्तखत करना पड़ा । धन बल, बाहुबल, मनुष्य बल की
अपेक्षा धर्म-बल कितना श्रेष्ठ है, यह बात सायद उनको मालूम
नहीं थी इसी कारण यह श्राफत झेलनी पड़ी । अर्ध पृथ्वी
के आप्रेय श्राधीश्वर की अपेक्षा सुद्र द्वीप के प्रिय सम्राट
कितने शाक्तशाली होते हैं 'जार महोदयने इस युद्ध में उसका
प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त कर लिया।
जापान के इस अश्रुत पूर्व जयलाभ से तमाम एसिया
परमानन्दित हुआ था जापान ने गत महायुद्ध में पाश्चात
मोह-जाल को छिन्न भिन्न कर प्राच्य जगत का मुखोज्वल
किया। इसी लिये भारत वर्ष के निवासी भी परमानन्दित
हुए। किन्तु प्रवल प्रतापी रूस सम्राट की अवस्था का स्मरण
होने से भी हमें कुछ शोक ग्रसित होना चाहिये ।
भारतवर्ष के भीषण दुर्भिक्ष के समय रूस ने नाना प्रकार
को सहायता भेजी थी । रूस सम्राट निकोलस हमारे भूतपूर्व
सम्राट सप्तम एडवर्ड के रिस्तेदार हैं। इस कारण भी कुछ
भारतवासी उनके दुख से दुखी हुए थे। किन्तु यदि यह
रूस जापान का शुद्ध wwwwwwwwww wwwwwww हम लोगों की दुर्मिक्ष-विपद में सहायता न करते तथापि कुछ शोक प्रगट करना उचित ही है। क्योंकि प्रपल भूमिकम्प में गगनस्पर्शी अट्टालिका भूमिशायी होने से कौन सा घह सजन पुरुष है, जो खेद प्रदर्शित न करेगा। गत रूस आपान के युद्ध का सब ख्यातनामा जिसमें कल सेनापतिगणों के दामणभाग्य का उलट फेर हुभा नीचे उनकी सूची लिखते हैं। स्थल-सेनापति । (जेनरेल उपाधिधारी जो २८ जन युद्ध क्षेत्र मे उपस्थित थे) १-छोसल कैदी * १०-रेटको वास्कि (मारे गये) २-ग्रिपन वर्ग (अपमानित हो] ११-मारनफ (वन्दीमा) स्वदेश वापिस आगये) १२-रेचटालिनिस्कि - ३. १३-प्लाग ४-देशक १४-विलि ५-फेलार ( युद्ध-क्षेत्र में मारे | १५-गोरयाट को भास्कि १६-निकटिन ६-कोन्डो चनको १७-फक (पन्दी) ७-जारपिटास १८-कोन्द्राविच (घोर रूप ८-रियालिनकिन से घायल हुए) ९.-स्नोसनस्कि भरलक - गये) D * रूम में मुकदमा कायम हो विचार द्वारा १० वर्ष के लिये जेल भेजे गये।
१२२ जापान चरित्र हत) - १९-कासाटोलिनिस्कि (श्रा- २५-विलडारि २६-लिनविच ( यह युद्ध क्षेत्र २०-साचूलिच (पदानत) में अन्त तक रहे) २१-छोकेलवर्ग (पाहत) २७-कवलारस (युद्ध के शेष २२-नेनकाम्प = तक अपने पद पर विरा २३-मिचचनको = जमान थे) २४-कुरोपाटकिन (पदापनत) २८-साकारक = जल-सेनापति । (एडमिरिल उपाधिधारी १६ वीर सेनापति- युद्ध में नियुक्त थे) १-एलेकस्फि-(अपमानित हो। -रोजडेजवेनस्फि(जपाना वापिस गये) के चन्दी हुए) २-ठार्क = १०-फोफेरशाम ३-स्काई डलफ = ११-बोट्रोवास्कि - १-घेजो प्राजफ : १२-मेकोरफ (निहत) ५- खटोमस्कि (बन्दी) १३-नेवागेटफ= ६-इरेन - १५-मोलस ७-लचिनस्कि १५-उइटगेट ८-निगोरिविच = १६-जेहरू (युद्ध के शेष पर्यन्त वलाडियस्टक बन्दर में ये S रूस जापान की संधि। लैंटिक नौ वादिनी का सोचनीय, परिणाम वा अवलोकन करअमेरिकायुक्त राज्य के प्रेसी डेन्ट रूजवेल्ट महोदय ने ९ जून १९०५ ई. को जापान के "युयुत्सूद्वय" राजवश की सेवा में संधि का प्रस्ताव किया । उसी अनुसार रूस की ओर से काउन्टडिउटी और जापान की प्रोर से व्यारन कामुरा संधि दत नियत हो अमेरिका के पोट- समाउथनगर में पहुंच।१. अगस्त को सधिविचार का पहिला प्रधिवेशन हुआ। प्रायः एक महीने तक प्रवल तर्क वितर्क के बाद५ सेप्टेम्बर को उभय पक्ष के संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर ईसवीं शत्वादी के प्रथम महायुद्ध को बंद किया। नीचे संधि की हरेक बातो को हम नंबरवार लिखते है- १-युद्ध के क्षतिपूर्णस्वरूप जापान गवर्नमेन्ट रूस से कुछ न लेवे । जो सर कसी फोज कैदी हो कर जापान में है इसमें जो सर्च लगा होगा सस जापान को देवेगा। २-साधिकृत सगेलियन द्रोप समान दो अंश में: विभक्त कर उसका दक्षिणी भाग जापान पाव, इम अर्धाश
1
जापान चरित्र
M
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में जापान गवर्नमेन्ट स्थायी भाव से कोई किले वगैर न
बनवाये "येशो" और संगलियन द्वीप के मध्यवर्ती लापिरुज
प्रणाली जापान के अधिकार में रहेगी।
३-"लियाऊटंग" उपद्वीप मय किले, आदि के प्रार्थर
यन्दर और इलियट द्वीप पुज जापान सरकार पावेगी।
४- युयुत्सू जाति द्वय निर्दिष्ट समय के अन्दर मंचूरिया
परित्याग कर देवेगी।
५--स्वराज्य में चीन गवर्नमेन्ट का पूरा अधिकार रहेगा।
६--चीन गज्य में समस्त वैदेशिक शक्तियों को समान ।
वाणिज्याधिकार रहेगा।
७- हार्विन से प्रार्थर बन्दर तक रूस की रेल सडक
आपान गवर्नमेन्ट पावेगी व्लाडिबस्टक की रेलवे में रूस
का अधिकार रहेगा।
८- कोरिया राज्य के सब विभागों में जापान का पूर्ण
अधिकार रहेगा।
९-रूस के अधिकृत बलाडियटक से "वेरि." प्रणाली
तक साईवेरिया प्रदेश के उपकूलों में जापानियों को मछली
पकड़ने का पूरा अधिकार रहेगा।
१०-रूस के जो सप युद्ध और वाणिज्य जहाज
जापानी फौज ने छीन लिये हैं और जो समुद्र में डूब गये
* वह सब जापानी सरकार को मिले।
११-रूस के जो सब युद्ध और वाणिज्य जहाज निरपेक्ष
H
हैं
-
उस जापान की संधि वन्दरों में अत्मसमर्पण किये हैं, बह सय कसी गवर्नमेन्ट चापिस पा जावे। १२-उपरोक्त संधिपत्र का स्थूल मर्म प्रकाश होने के याद से समन सभ्यजगत में हलचल मच गई थी। विलायती "टाइम्स" ने कहा था जापानियों ने इस संधि को स्वीकृत कर जिस उदारता महानुमावता और आत्मसयमता का परिचय प्रदान किया है पद पृथ्वी के इतिहास में और कहीं नहीं मिलेगा। "निङ्ग पोस्ट" ने कहा था इस महात्याग स्वीकार से जापान का विजय गौरव सैकड़ों गुणा बढ़ गया। "प्राफिक" ने कहा था कस्तानी सम्राटा में इस प्रकार की 'महान उदारता के रटान्त बहुत ही कम मिलते हैं जो जापान ने प्रगट किया है। "देलीमेल" ने लिखा था युद्ध, कौशल में जापानी श्रेष्ठ वीर होने पर भी फट राजनीति में रूसियों की बराबरी नहीं कर सके हैं। "ठान्डाई"ने प्रकाश किया था कि रूस गवर्नमेन्ट ने चुप चाप युद्ध का खर्च जापानियों को कुछ दिया है और शेप देना स्वीकार कर लिया है किन्तु लोक लजा के कारण जार महोदय के विशप अनुरोध से यह यात संधि, पत्र में नहीं लिखी गई तथा बहुत लाग इस बात को जानते भी नहीं है। जापानी पत्र सम्पादकों ने लिखा था, जापान की जय- तुलना में यह सन्धि पत्र कुछ चीज नहीं है।
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१२४
जापान चरित्र
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में जापान गवर्नमेन्ट स्थायी भाव से कोई किले वगैर न
बनवाये "येशी" और संगलियन द्वीप के मध्यवर्ती लापिरुज
प्रणाली जापान के अधिकार में रहेगी।
३-"लियाऊटंग" उपद्वीप मय किले, श्रादि के श्रार्थर
बन्दर और इलियट द्वीप पुज जापान सरकार पावेगी ।
४-युयुत्सू जाति छय निर्दिष्ट समय के अन्दर मंचूरिया
परित्याग कर देवेगी।
५-स्वराज्य में चीन गवर्नमेन्ट का पूरा अधिकार रहेगा।
६-चीन गज्य में समस्त वैदेशिक शक्तियों को समान
वाणिज्याधिकार रहेगा।
७-हार्विन से प्रार्थर वन्दर तक रूस की रेल सडक
आपान गवर्नमेन्ट पावेगी ब्लाडियस्टक की रेलवे में रूस
का अधिकार रहेगा।
कोरिया राज्य के सब विभागों में जापान का पूर्ण
अधिकार रहेगा।
९-रूस के अधिकृत चलाडियटक से "वैरि" प्रणाली
तक साइवेरिया प्रदेश के उपकूलों में जापानियों को मछली
पकड़ने का पूरा अधिकार रहेगा।
१०-रूस के जो सय युद्ध और वाणिज्य जहाज
जापानी फौज ने छीन लिये हैं और जो समुद्र में डूब गये
हैं * यह सब जापानी सरकार को मिले।
११-कस के जो सब युद्ध और वाणिज्य जहाज निरपेक्ष
M
।
.
वन्दरों में आत्मसमर्पण किये हैं, यह सपकसी प्रकार
१२-उपरोक्त संधिपत्र का स्थूल मर्म प्रकाश ये
के बाद से समन सभ्यजगत में हलचल मद मोदी
स्वीकृत कर जिस उदारता महानुमावता और मारपसंयममा
का परिचय प्रदान किया है वह पृथ्वी के इतिहास में और
कहीं नहीं मिलेगा। "निङ्ग पोस्ट" ने कहा थाइस मारवाण
"ग्राफिक" ने कहा था कृस्तानी सम्राटा मे इस प्रकार
रूस जापान की संधि
वापिस पा जावे।
विलायती "टाइम्स" ने कहा था
महान उदारता के दृष्टान्त बहुत ही कम
जापानियों ने व संधि
.
जापान ने प्रगट किया है। "डेलीमेल" ने लिखामा
M
क
दिशा
में सियों की यरावरी नहीं कर सके हैं।
"छान्डाई"नेप्रफाश किया था कि रूस गाने
चाप युद्ध का खर्च जापानियों को
कुछ
देना स्वीकार कर लिया है किन्तु लोक
जार महोदय के विशप अनुरोध से यह
नहीं लिखी गई तथा यात लोग इस बात
--
नहीं है।
जापानी पत्र, सम्पादकों ने लिखा था,
तुलना में यह सन्धि पत्र कुछ चीज नहीं है।
जापान-चरित्र
अमेरिका, जरमनी और पेरिस के पत्र सम्पादकों ने
एकवाक्य से जापान की महानुभावता और समन्त्रियों
की कूट राजनीतषता की बड़ी भारी प्रशंसा के गीत गाये थे।
रूस पत्र "नवोनिमिया" ने लिखा था, वर्तमान सन्धि स
हमारी महा हानि हुई है । रूस के "सुमंट" पत्र ने कहा था-
संगलिया द्वीप का अधीश परित्याग की तुलना मेंजापानियों
का यह त्याग स्वीकार किसी काम का नहीं है। "रास" पत्र
में प्रकाश हुआ था-वर्तमान सन्धि से शत्रुपक्ष को ही अधिक
लाभ हुआ हमारी हानिही हानि है । "नमोस्ती" ने लिखा था,
इस सधि से रूस का पूर्ण गौरव विनष्ट हो चुका है।
कस-जापान के युद्ध का संधि पर हस्ताक्षरित होने के कुछ
पहिले अंग्रेज और जापानियों में (१२ अगस्त १९०५ ई०
फो) एक मित्रता के वर्ताव का सधि पत्र लिखा गया
उसमें उभय शक्तियों ने एक दूसरे को अवसर पडने पर
सहायता करने की प्रतिज्ञा की है। फिर कुछ दिनों बाद
रूस जापान का भी मित्रता सूचक एक संधि पत्र लिखा
गया है, जिसमें उक्त साम्राज्यों ने समय पडने पर एक दूसरे
को सहायता देने का (आपस में ) वचन दिया है।
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Sant
सम्पूर्ण।
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