Adarsh Library, Jaipur

Kali Andhi

Kamleshwar · 2011/03

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काली आंधी

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काली आंधी

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जग्गी वायू मेरे दोस्त हैं। होटल गोल्डन सन के मैनेजर । हाटल के मैनेजरों के बारे में तरह-तरह की ऊची-नीची बातें रहती हैं, पर जग्गी वावू इस पेशे मे अपनी तरह के अकेले आदमी हैं। मुझे मालूम है कि उन्होंने अपनी जिंदगी को क्यों एक जगह रोक रखा है । कहने के लिए नुछ भी कहा जा सकता है। पर आदमी की तवालीफ की असलियत जानना शायद बहुत मुश्किल होता है । औरो से क्या कहूं, अब तक खुद अपने घर में मैं यह साबित नहीं कर पाया कि जग्गी वावू के भीतर एक ऐसा इन्सान बैठा हुआ है जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए रोता है "सच कहूं, तो मालती के लिए रोता है। मालती के लिए यह आदमी अपनी जिन्दगी को एक जगह पकड़कर बैठ गया है-~-न जिन्दगी को आगे बढने देता है, न पीछे हटने देता है। कमी माप जग्गी वावू के कमरे में जाइए। होटल गोल्डन सन के टैरेस पर बने दो कमरों के अपार्टमेंट में वे अकेले रहते हैं। मैनेजर हैं, इसलिए उन्हें वही रहने के लिए जगह भी मिल गई है। उनके कमरे में दो सास चीजें हैं, एक हिन्बा, जिममें उनकी प्यारी बिटिया लिली के सत रखे रहते हैं और दूसरी है एक घड़ी, जो हमेशा बद रहती है। वक्त को नापते-नापते एक दिन वह अचानक रुक गई। जग्गी वाबू ने उसे चलाया नहीं । न उसे चावी दी। मैंने एक दिन उनमे पूछा था यह घड़ी खराब हो गई है ? जव आता हूं, हमेशा एक वक्त पर अटकी मिलती है !

। ... --- जग्गी वाबू मुस्करा दिए थे। फिर बोले थे-क्या यह जरूरी है कि घड़ी खराव हो जाए, तभी रुके ! उसे किसी खास वक्त पर खुद भी तो रोका जा सकता है।" -~-तो इसे चलाया भी जा सकता है ! वे फिर फीकी-हंसी सी हंसे थे-तुम भी क्या बात करते हो ! वन्त चलता है"यह घड़ी चलते-बदलते हुए वक्त को सिर्फ नापती है । और वक्त को नापने की ख्वाहिश अब मुझमें नहीं है ---तो वक्त को वदल ही दो" -बदलने की ताकत सब में नहीं होती 'जिनमें होती है वे भी वक्त को बदलते-बदलते खुद बदल जाते हैं. वे, जिनके पास यह शक्ति है, शायद वक्त को बदलना भी नहीं चाहते" "सिर्फ वक्त का इस्तेमाल करना चाहते हैं। मैं जान रहा था कि जग्गी वाबू के भीतर की कौन-सी चोट बोल रही थी । एक तरह से कहें तो यह बहुत व्यक्तिगत चोट है पर खुली आंखों से देखें तो यह सबकी चोट है। एक तरह से अव मैं भी राजनीति में हूं। करीब-करीब उन्हीं दिनों से, जव से मालती जी राजनीति में आई। यों मैं मालती को बचपन से जानता रहा हूं। मैं मालती जी के पिता वैरिस्टर प्रतापराय के दफ्तर में असिस्टेंट था और वहीं से मालती जी के परिवार के साथ हमारा एक रिश्ता शुरू हुआ था। प्रतापराय जी की मृत्यु के बाद, या कहूं कि मालती जी की शादी के बाद मेरा संबंध कुछ टूट गया। प्रतापराय जी की मृत्यु के बाद मैं उनकी जायदाद की देख-भाल करता रहा । जव मालती जी राजनीति में आई तो उन्होंने एक सहायक के रूप में मुझे फिर से अपने साथ बुला लिया था। तब से मैं मालती जी के साथ जग्गी वावू राजनीति की बातों में नहीं पड़ते। समझते सब हैं, पर वात कीजिए तो कतराते हैं। एक बार कुरेद दिया तो चिढ़कर बोले थे- यार, तुम्हारी यह राजनीति बड़ी घटिया चीज़ है."तुम लोगों ने इसे निहायत वेहूदा बना दिया है। तुम लोग सिर्फ चीजों का बखूबी इस्तेमाल करना जानते हो !"बाढ़ आई तो उसे इस्तेमाल करो, सूखा पड़ा तो - - उसे इस्तेमाल करो, कहीं कोई लड़को भाग गई तो उसके भागने को इस्ते- माल करो'"कहीं कोई मर गया तो उसकी मौत को इस्तेमाल करो" तुम लोगों ने आदमी के आंसुओं और जजबातों तक को नहीं छोड़ा" उसकी आशाओं और सपनों तक को नहीं वरूषा"इससे ज्यादा घटिया बात और क्या हो सकती है कि दुखी और मुसीवतजदा इन्सानों के सपनों तक का इस्तेमाल तुमने कर लिया"सुदा के लिए, उसके सपने तो उसके लिए छोड़ दिए होते "ताकि वह अपनी बदहाली और मुसीवतों के बीच सपनों के सहारे तो जी लेता"तुमने "तुमने उसके सपनों को नारे बना कर निचोड़ लिया! अब क्या वचा है आदमी के पास ? खर छोड़ो.. कहां की बातें ले बैठे" ज्यादातर जग्गी वाबू बातों को टाल जाते हैं । मालती जी की बात करो तो भी शामिल नहीं होते, ऐसे जताते रहते हैं जैसे मालती जी से उन्हें कुछ भी लेना-देना न हो । जैसे वे उनकी जिंदगी में कभी आए ही न हो। मालती जी एक धमाके के साथ राजनीति में आई। सफलता की सीढियां पढ़ती हुई। जहां से उन्होंने शुरू किया, यहां से पीछे मुड़कर देखने की जरूरत उन्हें नहीं पड़ी। पहला चुनाव उन्होंने म्युनिस्पल वार्ड कमेटी का लड़ा"हगामा बहुत हुआ। तरह-तरह की अफवाहें फैली। शायद इसलिए और भी ज्यादा कि जग्गी बाबू खजुराहो मे एक टूरिस्ट होटल चलाते थे। जब पहली बार मालती जी ने घर से बाहर कदम रखा तो जग्गी वावू बहुत सुश थे। कोई वहस करने लगे और कहने लगे- जागी बाबू, इस चुनाव में तो आपको खड़ा होना चाहिए था ! तो वे तपाक से कहते थे-देश के निर्माण मे औरतो को भी आगे आना चाहिए। योरते यानी हमारी आधी जनसत्या जब तक इस तामीर में हाय नहीं वंटाएगी, तब तक हर काम की स्पीड आधी रहेगी"यह बेहद जरूरी है कि हमारे घरों की औरतें आगे आए और हर काम में मदों का हाथ बंटाएं.. और पहली बार जग्गी वावू और मालती जी के पर घर की दहलीज से साय-साय थाहर आए थे।

नौकर विंदा बताता था कि मालकिन बहुत डर रही थीं और जग्गी बाबू उन्हें हिम्मत बंधा रहे थे-और स्पीच देने में क्या रखा है ? ये देखो, मैंने तुम्हारी स्पीच लिख दी है"इसे रट लो, वस" मालती जी कमरे में घूम-घूमकर स्पीच रटती रही थीं और जगह- जगह पर अटककर पूछती जाती थीं-यह क्या लफ्ज़ है ? -~-ये ऑक्टराय, यानी महसूल"चुंगी जो टैक्स लगाती है । पूरा सेंटेंस इस तरह बोलना-गांवों से शहर आने वाले माल पर जो ऑक्ट- राय यानी चुंगी.का महसूल लगता है, वह आखिर तो वही गरीब किसान देता है जो हमें जिंदा रखता है ! मेरा वादा है कि मैं अपने गरीब किसान और गांववाले भाइयों के हित में इस चुंगी के महसूल को खत्म करूंगी." समझी यहां पर तालियां बजेंगी, तव एक मिनट रुकना और आगे यों शुरू करना "तो मेरे इस गरीव खजुराहो शहर के भाइयो और वहनो! और यह क्रम जो चला तो रुकने को नहीं आया। सफलता मालती जी के कदम चूमती चली गई । आवाज गूंजती रही, एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक । चुंगी की मेम्वरी से पार्लियामेंट के चुनाव तक । मैंने मालती जी के हर चुनाव अभियान में हाथ बंटाया है और वे आवाजें अब तक मेरे कानों में गूंजती हैं जो एक दिन खजुराहो म्युनिस्पल बोर्ड के चुनाव से शुरू हुई थीं-मेरे इस गरीव खजुराहो शहर के भाइयो और बहनो! मेरे जिले के भाइयो और बहनो ! मेरे प्रदेश के भाइयो और बहनो ! मेरे देश के भाइयो और बहनो ! यह आवाज़ फैलती गई। आवाज़ का दायरा बढ़ता गया । आवाज़ की गूंज गहराती गई। और जग्गी वाबू हर बार इस फैलती आवाज़ के साथ-साथ पीछे छूटते गए । पहली बार जब मालती जी जीतीं तो शहर की जनता ने उनका स्वागत समारोह किया था। दोनों एक ही जीप पर साथ-साथ बैठकर आए थे। मंच पर मालती जी और जागी वावू एक- साथ ही बैठे थे। विंदा मालाएं संभाले हुए था। ज़िला परिपद् वाला चुनाव जीतने पर फिर स्वागत समारोह हुआ था। कारों की कतार में इस वार जग्गी वावू पीछे आनेवाली कार में थे - बोर मालाएं गोद में रखे बैठे थे। असेम्बली चुनाव में जीतने के बाद मालती जी तरह घिरी हुई थीं। जग्गी वाबू कारों की कतार में सबसे पोछे वाली कार पर थे और मंच पर जब चढ़ने लगे थे तो एक बालिटियर ने उन्हें रोक लिया या । व अवकचाकर बोले-अरे भाई; मैं, मैं, मालती जी का वालिटियर ने अपने जोम में जवाब दे दिया या हां हां, यहां सभी मालती जी के घरवाने ही हैं । हटिए"नीचे उतरिए । मेरी निगाह न पड़ती तो जग्गी वावू अपमानित होकर सीढ़ियों से उतर ही गए होते । वालिटियर को डांटकर मैं उन्हें मच पर ले आया या। कुर्मिया नहीं थी तो एक मोडे का इंतजाम करके उन्हें बैठा दिया था । वे बैठे तो रहे थे, पर वेहद बुझे हुए थे । सफल होनेवाले के चारों तरफ कैसे मनमा जुटता है और सही लोग कैसे उससे दूर होते जाते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण जग्गी वावू हैं । उनका एलवम उठाकर देखिए । इम दुःखद सच्चाई की दास्तान तस्वीरें ही बता देंगी। तस्वीरों में से झाकता जग्गी वावू का हसता खिल. खिलाता और सुशी से भरा चेहरा खामोश और उदास होते-होते एक दिन बिलयुल गायब हो जाता है। और तब वे सारा वक्त अपने खजुराहो वाले होटल पर ही गुजारने लगे थे । अफवाहें भी फैली थी कि जग्गी वावू का होटल होटल नहीं, वह तो लोगों को पटाने की शिकारगाह है । कि जग्गी बाबू ने अपनी बीवी को औरो के लिए छोड दिया है"आखिर पैसा बनाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा"यह साला अपनी बीवी को दाव पर लगा बैठा है। खजुराहो वाले होटल में उन दिनो कई बार जग्गी बाबू से मेरी बातें हुई हैं । वे दोनों तरफ से दुसो थे । मालती को लेकर भी और इन अफवाहों को लेकर भी। और एक दिन मालती जी से उनका झगडा हुआ था। मालती जी ने उनसे कहा था-माप यह होटल वद कर दीजिए। -लेकिन क्यों ? जग्गी बाबू चौखे थे। --इसलिए कि मैं पब्लिक में यह नहीं सुनना चाहती कि हम लोगों ने होटल को बहाना बना रखा है। कि यह होटल हमारी काली आमदनी । - . का जरिया है कि यह गंदे कामों के लिए इस्तेमाल होता है"इससे मेरी पब्लिक इमेज पर धब्बा लगता है." -लेकिन मालती'"जीने के लिए आमदनी का यह एक इज्ज़तदार जरिया है।" -और मेरी बदनामी का भी यही एक जरिया है। ----आखिर मैं कुछ करूंगा या नहीं ? मुझे जीने और काम करने का हक है या नहीं"तुम समझती क्यों नहीं... -समझती तो हूं पर राजनीति की इस दुनिया में साफ चेहरा रखने के लिए बहुत नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। और होटल का बंद होना कोई इतना बड़ा नुकसान नहीं है कि "आप मेरी खातिर इतना भी न कर सके.. -फिर मैं करूंगा क्या ? -~-क्यों, मेरे साथ मेरे काम में हाथ नहीं वंटा सकते ? इतने गैर लोग साथ रहकर काम करते हैं। कितनी चीज़ों को संभालना पड़ता है। आप इस कमेटियों के मेम्बर हो सकते हैं "गैर लोग मुझसे फायदा उठा सकते हैं पर आपके लिए मैं किसी लायक नहीं ? तुम्हारा पति हूं"फायदा उठा सकनेवाला गैर आदमी नहीं.. मैं तुमसे फायदा उठाऊंगा? सोचो, क्या बात कही है तुमने ? --कोई गलत बात तो नहीं कही । अगर एक औरत इस लायक हो जाए तो इसमें पति-पत्नी का रिश्ता -~-क्या कह रही हो तुम? -रिश्ते कामों को आसान करने के लिए होते हैं। "वेड़ियां डालने के लिए नहीं। सही बात यह है कि आप अभी तक मेरी इस सेवा और त्याग की जिन्दगी, पब्लिक सर्विस की जिन्दगी से अपने को जोड़ ही नहीं पाए हैं। सही बात कहूं मालती । अव तुम्हें रिश्तों की ज़रूरत ही नहीं रह गई है।"खामख्वाह इन्हें ढोते जाने से अव तुम्हें कुछ हासिल होनेवाला नहीं है। मालती ने उन्हें गुस्से से भरी आंखों से देखा था। और इतना ही १० / काली आंधी

बोली थी-संर"यह सव डिस्कस करने का वक्त मेरे पास नहीं है ।
चीफ मिनिस्टर सतरपुर आनेवाले हैं और उनके आने से पहले मुझे तमाम
काम पूरे करने हैं"साथ-आठ दिन छतरपुर स्ककर मैं पन्ना चली
जाऊंगी।
-मुझे उरूरत होगी तो तुम्हारे सेक्रेटरी से सब प्रोग्राम मालूम कर
लूगा।
और चलते-चलते मालती जी ने इतना ही कहा था- मैं 'होटल
वाले की बीवी' कहलाती रहू"यह आपको गवारा है तो ठीक है !
-तो तुम किसकी बीवी कहलाना पसन्द करोगी?
-कैसी बातें करते हैं आप"मेरा मतलब आप अच्छी तरह समझ
रहे हैं । मुझे उम्मीद है कि आप
-कोशिश करूंगा।"पर जाने से पहले एक वात और कह देना
चाहता हू । मैं सोचता हूं लिली को किसी होस्टल में डाल दूं ताकि हमारी
रोज-रोज की चटखती और टूटती हुई जिंदगी की तकलीफ की याया से
वह अलग रह सके।
-पह हर वार लिली का वास्ता देकर मुझे कमजोर बनाने का
जरिया आपने खूब ढूंढ रखा है ? जब देखो तव लिली ! अपनी मर्जी की
बात मनवाने के लिए आप हर वार लिली को आगे कर देते हैं । आइन्दा
से आप लिली को पासग वनाना बद कीजिए!
-~-में लिली को पासंग बनाता हूं ?
--और नहीं तो क्या?
-~मालती "तुम समझती हो, मैं धमकी देता हूं! मैं बेचारा हूँ"
पर मैं कहे देता हू, मैं तो जाऊंगा ही, लिली को भी तुम्हारी जिंदगी से
वहीं बहुत दूर लेकर चला जाऊगा."
-हूं, फिर वही दलील ! वही वास्ता देने की यादत !
-इस वार में करके दिखा दूगा"तुम समझती हो, मुझमें कुछ भी
करने की शक्ति नहीं रह गई है !
-काश! वह दिन देखने को मिलता !
-ठीक है ! टीक है ! "जगी वावू गुस्से से उफन रहे थे--में

1 लाचार नहीं हूं! मेरी वच्ची लाचार नहीं है तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी । मालती जी समझ गई थी कि उनका सेक्रेटरी जगतसिंह होगा। घड़ी पर नज़र डाल कर उन्होंने इतना ही जग्गी वावू से कहा था-~~अब ये नाटक बंद कीजिए"बहुत बार देख चुकी हूं"और एकदम प्रकृतिस्थ होकर उन्होंने जगतसिंह को आवाज़ दी थी-~~~यस कम इन'"और ऐसे हो गई थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। जगतसिंह कुछ ज़रूरी तार लेकर आया था । डायरी उसके हाथ में थी। मालती जी तारों को देखती रही थीं और जग्गी वावू चुपचाप कमरे से बाहर निकल गये थे। और इस दिन के बाद सब कुछ एकदम तहस-नहस हो गया था । हम छतरपुर पहुंचे थे। मालती जी का दो हफ्ते का दौरा था। उन्हें महिला सेवादल का गठन करना था। तारीफ करूंगा मालती जी की भी। पूरे दौरे में कभी पता नहीं लगा कि वे कितना बड़ा तूफान मन में दवाए हैं । आखिर अपनी बच्ची का खयाल तो उन्हें आता ही होगा। उनके नौकर विंदा ने छतरपुर आकर खवर दी थी कि जग्गी वावू ने खजराहो के होटल में तीसरे दिन ही ताला डाल दिया था और लिली को लेकर वे कहीं चले गए थे। एक क्षण के लिए वे उदास हुई थीं। उन्होंने मांखें बंद करके अपने आंसू छुपाए थे और बच्चों के अनाथाश्रम की नई इमारत का उद्घाटन करने चली गई थीं। अनाथाश्रम में तीस-चालीस वच्चे थे। खपरैल की छोटी-सी इमारत थी। अनाथ बच्चों का अपना वैण्ड था और वे वच्चे मालती जी के स्वागत में, उनके पहुंचते ही प्रार्थना गाने लगे थे- वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावें परसेवा, पर उपकार में हम जगजीवन सफल वना जावें हम दीन दुखी, निवलों, विकलों के सेवक वन संताप हरें जो हैं अटके, भूले भटके, उनको तारें हम तर जावें.."

मालती जी की यांखों में रह-रहकर आंसू आ रहे थे और वे छोटे- छोटे बच्चों को प्यार से रह-रहकर चिपका लेती थी । एक फोटोग्राफर बार-बार फोटो ले रहा या और वहां जमा हुए लोग मालती जी की ममता देख-देसकर द्रवित और प्रसन्न हो रहे थे। उनके चेहरों पर मालती जी की ममता के लिए प्रशंसा की चमक थी। पर मैं जान रहा था कि यह कौन-सी हलचल यो"और मालती जी की कि रह-रहकर क्यों नम हो रही थीं! पर तारीफ करूंगा उनको"कि कितना उन्होंने अपने को संभाला था और अपने एकांतिक दुख को दे कैसे चुपचाप पो रही थी। मुझे दिखाई दे रही थी-एक ट्रेन ! उसमें बैठे हुए जग्गी वाबू और मामूम लिली ! यह तो पता नहीं, वह ट्रेन वहां जा रही थी, पर इतना मालूम था कि वह ट्रेन मालती जी से कहीं दूर, और दूर भागती जा रही थी। और शाम को ही महिला सेवादल का गठन होना था। दोपहर क- मनायाथम वाला यह क्षण गुजर चुका था । और मालती जी ने अपने के संभाल लिया था। में एक कुर्मी पर चुपचाप बैठा सब देख रहा था। महिलाओं की मीटिंग में वे बोल रही यी-आप वहनें कहती हैं कि आपको वक्त नहीं मिलता ! मैं खुद कभी नहीं वहती कि बाप अपने घर परिवार और पति की सुशियों की कीमत पर राजनीति का काम करें। मह जरूरी है कि परिवार और पति की पूरी परवाह की जाए "समाज की खुशी का असली माधार यही है" "अगर मैं अपना उदाहरण पेश कर तो याप क्या कहिएगा ! कौन कह सकता है कि मेरा परिवार और पनि मुखी नहीं हैं ! और में समाज के कामों के लिए भी पूरा वक्त निकालत हूं--तो वहनी, हमें एक महिला सेवादल बनाना है"मुख्यमन्त्री महोदय कल नगर में आ रहे हैं और उन्हें दिखाना है कि हम महिलाए भी अपना मोर्चा संभाले हुए हैं"आनेवाले चुनावों में हमें बहुन काम करना है" मैं चाहूंगी कि कम से कम तीस महिलाएं मागे आए और दल वा निर्मा- ? करें"तो पहला नाम किसका लिखा जाए कई हाथ एकाएक उठे थे और मालती जी ने एक की ओर इशारा करके पूछा था-आपका नाम ? उत्तर मिला था-लक्ष्मी अग्रवाल ! और मैंने वहीं बैठे-बैठे जैसे देखा था-पंचमढ़ी पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल के सामने जग्गी वायू और लिली वैठे थे । प्रिसिपल ने पूछा था -~-यस माई चाइल्ड, वाट्स योर नेम ! -लिली !"लिली ने तुतलाते हुए कहा था । "वेरी स्वीट नेम ! लिली ! सो यू विल लिव विद अस हियर ? ""यस ! लिली बोली थी। और वापसी का सफर । जग्गी बाबू लिली को स्कूल में दाखिल करा के लौट आए थे। उनकी आखें नम थीं। वे बार-बार खिड़की के शीशे को साफ कर रहे थे ताकि बाहर देख सकें, पर पानी की परत खिड़की के शीशे पर नहीं, उनकी आखों पर छाई हुई थी। उन्होंने आस्तीन से आंखें सुखा ली थीं। लेकिन वह वापसी का सफर घर-वापसी का नहीं था । वे खजुराहो लौट कर नहीं आये थे। सीधे भोपाल चले गए थे। ।

मैं किसी की तारीफ करूं ? किसे दोप दूं ? किसे गलत या सही कहूं ? एक तरफ जग्गी वाचू हैं और दूसरी तरफ मालती जी। और लिली? वह बेचारी तो अवोध है । जग्गी वायू की तकलीफ गहरी है तो मालती जी की महत्त्वाकाक्षा भी उतनी ही गहरी है । जग्गी वावू का दुख गहरा है तो मालती जी का दुख भी कम गहरा नही है । दोनों ने अपने को बहुत संभाला है । मालती जी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं दिखाई दी। जग्गी वाबू ने कभी शिकायत नहीं की। कभी बात भी करो तो वे टाल जाते हैं । सफलता कितनी क्रूर होती है, कितनी जालिम होती है, इसका नशा कितना गहरा होता है, और खुद अपनी सफलता मे व्यक्ति कैसे कंद हो जाता है, इसका जीता-जागता उदाहरण हैं मालती जी । दुख और त्याग कितना जालिम होता है और इसमें व्यवित कैसे बुझ जाता है, इसका जलता हुआ उदाहरण है जग्गी बाबू ! मुझे वे दिन याद हैं जब मालती जी और जग्गी वावू का मिलना- जुलना शुरू हुआ था । यह बात भी खजुराहो की है । यो प्रतापराय जी दिल्ली में रहते थे, अपने पेशे की जरूरतो के लिए। लेकिन बीच-बीच में वे छुट्टी निकालकर अपने घर छतरपुर आते रहते थे । जग्गी वायू खजु- राहो के रहनेवाले हैं । उनका पुश्तैनी मकान वही है । एक बार घर के लोग खजुराहो गए हुए थे। रुकने का इतजाम जग्गी बाबू के घर पर ही हुआ था। पूरा इलाका-पन्ना, रीवा, मैहर वगैरह । घूमने का इतजाम वही से हुआ था। तब मालती जी की उम्र उन्नीस-बीस साल थी। अगले साल वे पढ़ाई के लिए विदेश जानेवाली थी। जग्गी वायू की हवेली के पास, खजुराहो के मन्दिरों के नजदीक जहां बड़ा तालाब है, वही पर गुलाव का एक याग है । काम कुछ करने के लिए या नहीं, मैं तालाब में बसी डाले बैठा था। पीछे खजुराहो के मदिर थे और बीच में गुलाब याग । उम बाग मे कोई कुछ बातें कर रहा था- ये गुलाव लाल क्यों हो जाते हैं ? किसी लड़की की आवाज़ थी।

Prak राल में गे गीले होते. गानों से मां शो समारती से लाल हो भी मामाली। ..! लगी बोली। -~~iet, गौर गायों-गरी गा सागा बोध, शो मे पिर पीटी पर गोदामा। --AT सीमोली भी। - PAN .....यो में एक पीला गुलाब तुम्हें देतीदेगी, यह पास art गा नहीं? गी, तुम्हारे मुहे में में पीला गुलान लगागा "मम तुम नारपुर पागमा, म मा । मेरी गे मादों-गरी मास इसे ही सी लेगी गौर गा पास हो जाएगा! ... राम ! परी भोली भी। 0 गुनगारखा मा । शरण मा लाल गोला मंदिरोंगी भूम रहामा मार मालती रामा जग्गी वा गुलाम माग से सिर amr गंदिरो मोर जार में । मालती माने में नशा-सा पीला गुलाब फिर हर रोका पीला गुलाम गो गालती जी में देशा था, Mr म भुराहो गये। मारपुर ranो पाराम मीनाए। गातीजीनगदेश जाने की मामी, पर मालती जीत रोहिणा ना.... * मीमती मनी भासा में ही रहूंगी ! प्रतापरामजी मालती जी गो महत समागा.. रियर भी रागाल तातिशादी तोगी भीगार राती रिरमा लामी मे पास मागही होता। ET मालती जागी भागीणी जोर माता जी की गुहा- निमाही की शादी मग्गी मार से हो गई पी। शादी के गारी पर सात माराम जीमी गीतहोगा पीनार मोतीन शाल Hit ।

जायदाद की देखभाल मैंने की यो, उसके बाद जब मालती जी ने राज- नीति के क्षेत्र में कदम रखा था, तो मुझे सजुराहो बुला लिया था। तभी से राजनीति की दुनिया से मेरा परिचय हुआ और मालती जी के सिर सफलता का जो पहला सेहरा बंधा, वह आज तक तो उतरा नहीं। सफलता उनके कदम चूमती चली गई और यह सफलता कुछ इस रफ्तार से आई कि उनकी और जग्गी वाबू की जिंदगी को तोड़ती, छोड़ती निकल गई। बीच के कई बरस इसी नशे में निकल गए । जग्गी वायू भोपाल में जाकर गोल्डन सन के असिस्टेंट मैनेजर हो गए। फिर बढते-बढ़ते मैनेजर हुए और वही रहने लगे। लिली पचमढ़ी में पढती रही। उसे अपनी मा मे मिलने का मौका ही नहीं मिला और मालती जी चुनाव जीतती-जीतती एक दिन मिनिस्टर हो गई ! बीच के कुछ वरस खामोशी के बरस हैं । या यों कहिए कि मालती जी की सफलता के बरस हैं और जग्गी यावू तथा लिली के लिए अकेले- पन के वरस हैं । मालती जी में अद्भुत आत्मशक्ति और धीरज है। ऐसे मौके बहुत कम आए हैं जब उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के दर्द का अहसास किसी को हुआ हो । लिली को लेकर भी उन्होंने कभी फ्यादा वात नही की । शायद उन्हें भरोसा था कि जिंदगी में वे जब भी चाहेंगी, लिली को भी जीत लेंगी। ताज्जुब यही होता था कि जग्गी वाबू को जीतने की बात कभी उनके मन मे नही आई। और जीतते जाने तथा वक्त आने पर जीत लेने का आत्मविश्वास उनकी सबसे बड़ी शक्ति लोकसभा के चुनावों के लिए जब उन्हें भोपाल क्षेत्र मिला और बातें हुई कि हमें अभी से कुछ प्रभावशाली लोकल सामाजिक और राज- नीतिक लोगों से वहां सम्पर्क करना चाहिए, तो उसी 'जीत' वाले आत्म- विश्वास से मालती जी ने कहा था -उन्हें जीत लेना मुश्किल नहीं होगा । वक्त आने दीजिए."अभी से अगर उन लोगों को यह अंदाज हो गया कि हमें उनकी जरूरत है तो उन्हें जीतना मुश्किल हो जाएगा ! उन लोगों को यह अहसास होना चाहिए कि उन्हें हमारी ज़रूरत "सचमुच कितना धीरज चाहिए' वक्त आने दीजिए ! उन्हें जीतना मुश्किल नहीं होगा!' मालती जी की यह नीति वेहद सफल सावित होती रही। वक्त ! ज़रूरत ! और जीत ! इन तीनों बातों पर ही वे टिकी हुई थीं। वक्त की नब्ज को वे पहचानती थीं । और ज़रूरत के हिसाब से वे सब तय कर लेती थीं, उनकी यही शक्ति थी और इसी शक्ति में उनकी जीत निहित थी। , भोपाल क्षेत्र मिलने के बाद जब हमारा पहला काफिला वहां पहुंचा तो सारी जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, क्योंकि मेरा परिवार भोपाल में ही रहता था। मैंने पुराने भोपाल में एक बंगले का इंतजाम कर लिया था और चुनाव कार्यालय का बोर्ड लटका दिया था । धीरे- धीरे कार्यकर्ता आने शुरू हुए। कुछ लोकल लोग भी आए और हमारी जोड़-तोड़ शुरू हो गई । मालती जी एक दिन के लिए आई और अपने कैंडीडेट होने का कागज़ भरकर चली गईं । उनके जाने से पहले जिम्मे- दार कार्यकर्ताओं की एक मीटिंग हुई। इस बात पर गौर किया गया कि जाति के हिसाब से चुनाव-क्षेत्र में किसकी अक्सरियत है और चुनाव लड़ने के पैतरे क्या होंगे। उस छोटी-सी अंतरंग मीटिंग का उन कार्य- फर्ताओं पर भी बहुत असर पड़ा जिन्होंने मालती जी को इतने पास से पहली दफा देखा था, जब उन्होंने कहा-देखिए, हमें विरोधी दलों के हथकण्डे नहीं अपनाने हैं । चुनाव एक पवित्र कार्यक्रम है ! हम जनता के पास अपना अमली कार्यक्रम लेकर जाएंगे और जनता की समझ पर ही निर्भर करेंगे ! पैंतरेबाजी और उठा-पटक का सवाल नहीं है। हम १८ / काली आंधी जातियों के आधार पर भी चनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि हमारी नीति किसी सास जाति के लिए नहीं है, पूरी जनता के लिए है ! छोटे-छोटे कार्यकर्ता वाह-वाह करने लगे थे। मालती जी की यही विशेषता थी और यही बड़प्पन, जिसके सामने उनके विरोधी बौने ही 1 जाते थे। चुनाय कार्यालय में एक पूरी फौज जमा हो चुकी थी। साने-पीने का इतजाम रामनारायण के हाथों में था, इसलिए हमने उनका नाम फिलहाल भण्डारी रख लिया था। चुनाव कार्यालय में किचिन चालू हो गया था और वेकार के लोग भी बहुत भरे रहते थे । बिदा, मालती जी का विश्वस्त नौकर, परेशान था कि वे साना क्या साएंगी, मालती जी के लिए अच्छा साना आ जाए । विदा मुझे रास्ते में जाता मिल गया था। तभी एकाएक मुझे याद आया था और मैंने पूछा था-गोल्डन सन जा रहे हो? -भण्डारी वायू ने वही से खाना लाने को बताया है ! -पता है, जग्गी वाबू आजकल वही मैनेजर हैं ! -कोन, अपने मालिक...! विदा की आंखो मे एक चमक आई थी."बहुत दिन हो गए, मालिक को देखा भी नहीं । उनको नमस्ते भी करता याऊगा! और बिंद्रा जग्गी बाबू का कमरा पूछकर नमस्ते करने गया था। --अरे विन्दा ! तू यहा कैसे ? जग्गी बाबू ने आश्चयं से पूछा था। पुरानी यादों से विदा भर गया था और उसने जग्गी बाबू के पर छू लिये थे । जग्गी मावू बुध अचकचाए थे । इतना ही बोल पाए थे- टीक है, ठीक"यह पैर छूने की आदत कव से पड़ गई ? अच्छी तरह तो है ! -~-यहुत अच्छी तरह हूँ मालिक । आपका आशीर्वाद है ! विदा ने उमड़ते प्यार और अपनी स्थिति के हिसाब से महा था। -- । मालती जी ने जब साना शुरू किया तो कागज को एक प्लेट में - हसन की चटनी भी निकली थी। मुझे मालूम है, मालता नहसन की चटनी बहुत पसंद है और गोल्डन सन जैसे बड़े होटलों में ऐसी चटनी नहीं बनती। यह जग्गी वाबू ने खास तौर से वनवाकर रखवाई होगी। मालती जी ने अनजाने में ही कहा था----अरे विंदा, इतने वरंसों बाद इस लहसन की चटनी का ध्यान तुझे कैसे आ गया ? -आपको पसंद आई ! भण्डारी ने खीसें निपोरकर पूछा था। ---यह मेरी वीकनेस है ! "घर पर यह चटनी नहीं बनती थी तो नौकरों पर डांट पड़ती थी। अरे इस विदा ने कितनी डांट खाई है इस चटनी के लिए ! पूछिए इससे "वे कहती रहीं और हंसती रहीं-इस जिंदगी में जव से आई"न जाने कितनी चीज़ों की याद तक नहीं रही। सामने पड़ जाती हैं तो ध्यान आता है। भण्डारी जी, अरे क्या नाम है आपका, रामनारायण जी, मैं यहां रहूं तो यह चटनी ज़रूर मिलती रहे कहकर वे अन्य जरूरी बातें करती रहीं। बातचीत के दौरान विंदा ने अपने उत्साह में यह बताने की कोशिश भी की कि यह लहसन की चटनी खास तौर से बनवाकर जग्गी बाबू ने रखवा दी थी, पर मौका ठीक न समझकर मैंने विंदा को आंख के इशारे से मना कर दिया था। भण्डारी वाबू भी चाहते थे कि चटनी का श्रेय उनके नाम ही रहे। तमाम कार्यकर्ताओं पर मालती जी के भव्य व्यक्तित्व और उनकी बातों की पावनता का असर साफ जाहिर था । टी० टी० नगर क्षेत्र के अमजदअली मिर्जा तो पागल ही हो गए थे। बाहर उन्होंने ऐलान कर दिया था-ऐसे पाक-साफ और उसूलों पर चुनाव लड़नेवाले हमारे रह- नुमा को कोन हरा सकता है ! हमारी जीत तो अभी ही हो गई भाइयो ! हमारी जीत हो गई ! चलते-चलते मालती जी ने मुझे अलग बुलाकर एक आदेश दि था-देखिए, इस चुनाव-क्षेत्र में वनियों की अक्सरियत है । खास २० / काली आंधी से शहरी इलाकों में । गांवों के जो इलाके हमारे क्षेत्र में हैं, उनके गरवि किसानों को भी यही बनिये वक्त-जरूरत रुपया वगैरह कज़ देते हैं--- यानी उन इलाकों में भी इनकी बांहे फैली हुई हैं। इसलिए जरूरी है बनियो के बीच से भी कोई के डीडेट इस चुनाव में खड़ा हो" ---यह आप क्या कह रही हैं ? मैंने बेहद ताज्जुब से कहा था-यह तो अपने पैर में खुद कुल्हाडी मारनी होगी "दुध सोचिए तो." मालती जी मुस्कराने लगी थी। वही धीरज और आत्मविश्वाम उनके चेहरे पर था । वगैर किसी तनाव के उन्होने कहा था-मुनिए, मेरी बात सुनिए"वनियों में लाला दीनानाय का बहुत असर है । आप उन्हें तैयार कीजिए कि वे चुनाव के मैदान में आएं"पर्चे परसो तक दाखिल हो समते हैं" लेकिन मैं अचम्भे मे था। -~-वयत आने दीजिए"जो कह रही है वह करने की कोशिश कीजिए । समझे ! मातली जी का वही ब्रह्मास्त्र-वक्त आने दीजिए." कुछ देर बाद सादी बात मेरी समझ में आ गई थी और मैं मालती जी की अक्ल का लोहा मान गया था। उन्होंने अपने उसी लहजे में सब समझा दिया था। —देखिए, हम जातिवाद के सहारे चुनाव नहीं नगे, यह बात साफ है । पर सच्चाई को भी देखिए । चुनाव मैदान में इत्तफाक से बनियो का कोई अपना कंडीडेट नही है । लाला दीनानाथ के खडे होते ही सारे वनिमे उनके इद-गिर्द जमा हो जाएगे"यह शर्तिया होगा, क्यों. कि लोगो के मन में अपनी जाति के लिए लगाव होना लाजिमी है। लाला दीनानाप के खडे होते ही सब बनिये एकजुट हो जाएगे और उनका समर्थन करेंगे... - लेकिन इससे तो हमे नुकसान ही होगा ! मेरा शक उभर आया था। -आप मुनिए तो, मालती जी ने कहा था-जब सारे बनिमे लाला दीनानाथ के अण्डे के नीचे जमा हो जाएगे, उस वक्त लाला दीनानाथ चुनाव मैदान से मेरे फेवर में विट्ठा करेंगे ! समझे आप ! तव एक भी अनिया कहीं टूटकर नही जा सकता" सचमुच यह बात बहुत मार्के की थी। पर एक क्षण के लिए मन में त आई तो मैंने हिचकते हुए पूछ ही ली थी-पर हम तो जातिवाद आधार पर चुनाव लड़ना नहीं चाहते ! -गुरूसरन जी ! आपकी अकल जैसी की तैसी है । मालती जी ने नुस्कराते हुए कहा था। वे जव मेरा नाम लेकर कोई वाक्य शुरू करती थीं, तब मैं समझ जाता था कि अब वे मुझ पर कुछ गुस्सा हैं। पर उनकी खासियत यही थी कि बड़ी शालीनता से फिर भी बात करती रहती थीं। बोलीं-हम जातिवाद के आधार पर कहां चुनाव लड़ रहे हैं ? मैं उनकी जाति की नहीं हूं ! हुं"जनता के बीच काम करने वाले की कोई जाति नहीं होती"समझे आप ? लाला दीनानाथ अगर अपने जाति- भाइयों को अपनी मुट्ठी में ले लेते हैं और वक्त आने पर हम लाला दीनानाथ को जीत लेते हैं तो इसमें हम कहां जातिवादी हो जाते हैं ? बताइए ! हमपर कौन इल्ज़ाम लगा सकता है इस बात का? और हम कोई गलत बात कर भी नहीं रहे हैं... मैं कन्विस हो गया था । वात थी भी सही । ईमानदारी और वेईमानी में चार अंगुल का भी फरक नहीं है । यह सवाल चित और पट का है। एक ही स्थिति के ये दो पहलू हैं, अब यह आप पर है कि आप किस पहलू से देखते हैं । राजनीति यही है । और राजनीति की सफलता भी यही है कि आपका पहलू ईमानदारी से भरा और सही माना जाए ! शाम की गाड़ी से मालती जी जा रही थीं। स्टेशन पर काफी भीड़ उन्हें छोड़ने आई थी, मालाएं लिये हुए । और वे घिरी हुई खड़ी थीं। इसी समय एक कार्यकर्ता ने मुझे बताया था-एक आदमी विंदा को पूछ रहा है। विदा कहीं दिखाई नहीं पड़ता । जरा आप देख लीजिए और उसने इशारे से मुझे वह आदमी दिखा दिया था। मैंने देखा-वह होटल गोल्डन सन का एक वेयरा था। वर्दी में हाथ में एक बड़ा-सा पैकिट लिये था। मैं सब समझ गया था । २२/ काली आंधी ----यह मैनेजर साहब ने भेजा है। वेयरा बोला था। -~-रात का खाना है ! चोला था, विदा साहब को देना ! मैंने पंकिट ले लिया था । गोल्डन सन के रंपर में लिपटा खाना मैंने विंदा को थमा दिया था, जो भीतर डिब्बे में विस्तर लगा रहा था । सूंघ- कर देखा था-~-लहसन को महक थी या नहीं." साना तो भण्डारी जी ने रप दिया है। विदा बोला था-पर इसमें चटनी जरूर होगी! कहते हुए उसने जग्गी वावू वाला पैकिट भी वहीं टिफिन कैरियर के पास रख दिया था।

। । मालती जी के जाने के बाद सरगर्मी और बढ़ गई। उनके व्यक्तित्व की धाक सवपर बैठ गई थी। चुनाव -कार्यालय में कार्यकर्ताओं की भीड़ बढ़ती जा रही थी। हम लोग शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए जीपों और साइकिलों का इंतजाम कर रहे थे। टेलीफोन जल्दी मिल जाए, इस कोशिश में लगे थे। पोस्टरों और पर्यों की छपाई हो जाए, यह भी देख रहे थे । चाहते यही थे कि पन्द्रह दिन बाद, मालती जी के आने के समय तक, सब कुछ पूरा हो जाए। हज़ार तरह के इंतजाम करने थे। घर-घर जाकर काम करने वालों के लिए विल्ले चाहिए थे । हर आदमी विल्ला मांगता आता था । लाउडस्पीकरों और बैटरी का इन्तजाम होना था । चुनाव बुखार चढ़ने के बाद ये चीजें फिर नहीं मिलती। पेट्रोल टंकी वालों के पास हिसाव खोलना था । झण्डे और चुनाव-चिह्न बनने थे । झण्डों के लिए वांसों और लाठियों का इंतजाम होना था। लाठियां इसलिए कि विरोधी पार्टियों वाले हर तरह की शैतानी पर आमादा हो सकते थे। कुछ दादा किस्म के लोगों को भी रोज़नदारी पर रखना था। मालती जी की जीप के लिए ऐसा ड्राइवर चाहिए था जो जरूरत पड़ने पर दादागीरी भी कर सके । मालती जी का अपना ड्राइवर सुलतान अव इस लायक नहीं रह गया था। वोटरों की लिस्टें बननी थीं, परचियां तैयार होनी थीं। और सबसे ज्यादा मुसीवत राशन की थी। चुनाव- फौज बढ़ती जा रही थी। यों अभी इतना काम नहीं था, पर पन्द्रह-बीस रोज बाद ज़रूरत पड़नी ही थी, इसलिए इस वक्त किसीसे यह भी नहीं कह सकते थे कि अभी अपने घर जाओ। सबसे बड़ी दिक्कत खाने की थी। भण्डारी रामनारायण का बुरा हाल था । एक शाम तो वह हाथ झटका- कर खड़ा हो गया-राशन हो, तो भी मैं इतने बेकार के खानेवालों का इन्तजाम नहीं कर सकता। यहां क्या साला भण्डार खुला हुआ है ? बेकार के कार्यकर्ताओं में से कुछेक ने यह बात सुन ली थी। बाहर बरामदे में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई थी। भण्डारी अपने जोम में था, चीख- ।

कर बोला--तुम नही जानते गुरुसरन ! इनमें से कितने ऐसे हैं जो काम विरोधी उम्मीदवारों का करते हैं और रोटियां यहां तोड़ते हैं ! गुस्सा तो मुझे भी आया था कि ऐसे हरामखोरों को लात मारकर फेंक दूं, पर मालती जी से मैंने बहुत-कुछ सीखा था-वही मूल मंत्र- वक्त ! जरूरत ! और जीत ! हर काम वक्त पर करो, जब जरूरत पड़े तब आदमी को या स्थितियों को इस्तेमाल करो और जीत लो। मैंने भडारी को समझा-बुझा दिया था, पर वह गुस्से में इतना ही कहकर चला गया था कि तो फिर राशन का इन्तजाम करो ! राशन की किल्लत थी, पर अपने प्रभाव और जोर-जबरदस्ती से हमने पूरा इतजाम कर लिया था । एक कमरा राशन से भरवा दिया था । इस काम में हमने जग्गी बाबू की मदद भी ली थी । जो कुछ इंत- जाम वह करवा सके, उन्होंने भी करवा दिया था। खास चुनाव के दिनो के इन्तजाम के लिए मैंने उनसे कह भी दिया था। उन्होंने हामी भर ली थी और हमारा एक बडा सिर-दर्द खत्म हो गया था। पर चुनाव ऐसी वाहियात चीज़ है कि सिर-दर्द खत्म नहीं होता, बल्कि बढ़ता ही जाता है। राशन की कमी इस इलाके में ही क्या, पूरे देश में है । और ये विरोधी पार्टियोंवाले नम्बरी शैतान लोग होते हैं। सच पूछिए तो इनका कोई ज़मीर नहीं होता । इन्हे तो वस मौका मिलना चाहिए और ये हर मौके को हगामे में बदल देने में उस्ताद हैं । पता नही कसे, उन्हें यह सब पता चल गया कि हमने काफी राशन का इन्तजाम कर लिया है। हमारे यहां आकर खाना खा जाने वाले उनके गुरगों ने ही खबर दी होगी । एक दोपहर हगामा हो गया। विरोधी उम्मीदवार चन्द्रसेन के पक्षधरो ने शहर-भर के फकीरों को जमा करके मोर्चा भेज दिया। वे आकर चुनाव कार्यालय के सामने नारे लगाने लगे--- मालती जी ! हाय हाय ! हम भूसे-नंगे ! हाय हाय ! मैंने उन भिखमगों की भीड़ को शात करने के लिए एक छोटा-सा भाषण दिया, चुनाव अभियानों में शामिल होते-होते इतना तो सीख ही गया हूं--गाइयो ! और गरीबी''ये एक दिन का सवाल नहीं है ! हमें यह सवाल हमेशा के लिए सुलझाना है और यही वजह है कि हमारी पार्टी और हमारी पार्टी की उम्मीदवार मालती जी इस चुनाव के मैदान में उतरी हैं, ताकि भूख और गरीबी को हमेशा-हमेशा के लिए नेस्तनाबूद किया जा सो ! सिर्फ आग शाम का साना मिल जाने या फल सुबह का साना हासिल हो जाने से मसला सुलश नहीं जाएगा! यह मसला इसीसे सुलझेगा कि आप अपने प्रतिनिधि के रूप में निसे चुनते हैं और वह प्रतिनिधि आपका सच्चा हमदर्द है या नहीं! वह हमदर्द ही आपकी भूख मिटाने का पुस्ता इंतजाम कर सकता है ! इसलिए भाइयो, आप इन टुटपूंजिये और मौके का फायदा उठाकर आपको इस्ते- माल कर लेने वाले इन दगाबाज़ छुटभइयों के बहकावे में मत आइए" और चुनावों के इस पवित्र कार्यक्रम को पूरा होने दीजिए ! मुझे ताज्जुब था कि मैं यह सब फैसे बोल गया था। किराये के लोगों के पैर नहीं होते "ये राब प्रदर्शनकारी फुसफुसाते हुए लौट गए थे। और हमारे साथी जगतसिंह ने मुझे सीने से लगा लिया था-यार, तुम तो बिलकुल मालती जी की तरह बोलते हो ! वही दमखम, वही इत्मीनान ! मेरी छाती दुगनी हो गई थी। एक क्षण गो लगा था कि मालती जी यदि इस करिश्मे को देखतीं तो बहुत खुश होती। पर गेरी यह सुशी चंद घंटे भी टिकने नहीं पाई । विरोधी उम्मीद- चार चन्द्रसेन ने गाम को ही एक मीटिंग में बोलते हुए बड़े गंदे तरीके से इलजाम लगाया--~-4 मालती जी और उनकी पार्टी से पूछना चाहता हूं कि जब हमारे इस शहर के गामूली आदमी को राशन की लाइन में घंटों लगे रहने के बाद भी पेट-गर राशन नहीं मिल पाता, तव उनके चुनाव-गार्यालय में सैकड़ों बोरी अनाज कहां से आया है ? यह काले बाजार से नहीं आया है तो कहां से आया है ? तो भाइयो, भूखी और नंगी जनता अब बर्दाश्त नहीं गारेगी"मालती जी को लोग यहां चुनाव - २ली ती गया हूं-भाइयो ! भूख और गरीवी "ये एक दिन का सवाल नहीं है ! हमें यह सवाल हमेशा के लिए सुलझाना है और यही वजह है कि हमारी पार्टी और हमारी पार्टी की उम्मीदवार मालती जी इस चुनाव के मैदान में उत्तरी हैं, ताकि भूख और गरीवी को हमेशा-हमेशा के लिए नेस्तनाबूद किया जा सके ! सिर्फ आज शाम का खाना मिल जाने या कल सुबह का खाना हासिल हो जाने से मसला सुलझ नहीं जाएगा ! यह मसला इसीसे सुलझेगा कि आप अपने प्रतिनिधि के रूप में किसे चुनते हैं और वह प्रतिनिधि आपका सच्चा हमदर्द है या नहीं ! वह हमदर्द ही आपकी भूख मिटाने का पुख्ता इंतजाम कर सकता है ! इसलिए भाइयो, आप इन टुटपूंजिये और मौके का फायदा उठाकर आपको इस्ते- माल कर लेने वाले इन दगावाज छुटभइयों के वहकावे में मत आइए' और चुनावों के इस पवित्र कार्यक्रम को पूरा होने दीजिए ! मुझे ताज्जुब था कि मैं यह सब कैसे बोल गया था। किराये के लोगों के पैर नहीं होते वे सब प्रदर्शनकारी फुसफुसाते हुए लौट गए थे । और हमारे साथी जगतसिंह ने मुझे सीने से लगा लिया था~यार, तुम तो. बिलकुल मालती जी की तरह बोलते हो ! वही दमखम, वही इत्मीनान ! मेरी छाती दुगनी हो गई थी। एक क्षण को लगा था कि मालती जी यदि इस करिश्मे को देखतीं तो बहुत खुश होती। पर मेरी यह खुशी चंद घंटे भी टिकने नहीं पाई। विरोधी उम्मीद- वार चन्द्रसेन ने शाम को ही एक मीटिंग में बोलते हुए बड़े गंदे तरीके से इलज़ाम लगाया-~-मैं मालती जी और उनकी पार्टी से पूछना चाहता कि जब हमारे इस शहर के मामूली आदमी को राशन की लाइन घंटों लगे रहने के बाद भी पेट-भर राशन नहीं मिल पाता, तव चुनाव-कार्यालय में सैकड़ों बोरी अनाज कहां से आया है ? ग बाजार से नहीं आया है तो कहां से आया है ? तो भाइयो,' नंगी जनता अव बर्दाश्त नहीं करेगी "मालती जी के लोग २६ / काली आंधी

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- भागा पहुंचा, तब तक सब खत्म हो चुका था। विरोधी उम्मीदवारों के गुण्डों ने हमारे चुनाव-कार्यालय पर हमला बोलकर जो कुछ मिला, लूट लिया था, मारपीट भी की थी, और चुनाव-कार्यालय में आग भी लगा दी थी। भण्डारी रामनारायण के काफी चोट आई थी। जगतसिंह भी घायल हुए थे, कुछ और कार्यकर्ता भी। गनीमत थी कि सवकी जान बच गई थी। और सुवह शहर के अखबारों में सुर्सी थीनाराज़ और भूखी जनता ने चुनाव-कार्यालय में जमा अनाज लूट लिया !' यह सरासर ज्यादती थी। जनता ने नहीं, विरोधी उम्मीदवारों के गुण्डों ने यह सब किया था। आखिर तीसरे दिन एक दूसरे अखबार में मैंने इस गुण्डागर्दी का पर्दाफाश किया, जिसका अच्छा असर जनता पर पड़ा। लेकिन अब दिक्कत चुनाव कार्यालय की थी। खास तौर से मालती जी की सुरक्षा की। हम एस० पी० से मिले और उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि ऐसी वारदातें वे भरसक नहीं होने देंगे और राय दी कि चुनाव के दौरान मालती जी के ठहरने और रहने का प्रबंध किसी ऐसी जगह किया जाए जो खुली हुई न हो"जरूरत पड़ने पर जहां पुलिस का इंतजाम भी किया जा सके । विरोधी पार्टी के उम्मीदवारों को भी वे यही राय दे चुके हैं, क्योंकि पुलिस के लिए सब की सुरक्षा एक-सी है ! ठीक भी था। पुलिस के लिए सव वरावर थे। और आपस में बहुत सोच-विचार करने के बाद सबसे सुरक्षित और ठीक जगह हमें गोल्डन सन होटल ही लगी थी। चूंकि चुनाव-कार्यालय दूर नहीं रह सकता था और हमें फोन की ताडवतोड़ जरूरत थी, इसीलिए यह तय हुआ कि हम अपना कार्यालय गोल्डन सन होटल के एक कॉटेज में खोल लें और मालती जी के रहने का इंतजाम किसी हवादार आरामदेह कमरे में कर दें--ताकि वे पास भी रहें और हर समय की भीड़भाड़ से वची भी रहें। यह इंतजाम मालती जी ने भी पसंद किया था। होटल के मालिक हमारी पार्टी के समर्थक भी थे और उन्हें यह तजवीज़ बहुत रास भी आई थी। बाद में खर्चे वगैरह के हिसाव के सिलसिले में यह भी कह सकते थे कि होटल २८ / काली आंधी राजनो ऐसा सेन ने पोyिारको बैठती चली जाती में 141Rata भासिर सर होगमा Ratnanalit हमारा नया कार्यातम IT Itihimmat मैदान में आधार मा कोतो. 10 attit- भाइयो को बटोरने पगे । itnint or unturalniti अब सिर्फ मासपीजीभाकोरी ngnatil तार मिला कि ये सवारको भाग नरसी सेठ ने जग्गी वावू को बुलाकर खास हिदायत दी देखिए मैनेजर साहब ! यह हमारे होटल का सौभाग्य है कि मालती जी जैसी देश के नेता हमारे यहां रहेंगी और यहीं से जीत कर जाएंगी। आप खास तौर से खयाल रखिए कि उन्हें कोई तकलीफ न होने पाए"उनकी हर जरूरत पूरी की जाए." -जी ! जग्गी वाबू ने धीरे से कहा था । मैं उस वक्त उनके दिल की हालत समझ रहा था। लेकिन मैं नरसी सेठ के सामने यह जाहिर भी नहीं करना चाहता था कि जग्गी बाबू क्या हैं "जो वात जिन्दगी में खत्म हो चुकी थी, उसे जाहिर करने से फायदा ही क्या था ! पर जग्गी वाबू के चेहरे पर जो पीड़ा उस समय उभरी थी, वह सिर्फ मैं ही समझ सकता था। -आपने बहुत मरी हुई आवाज़ में सिर्फ 'जी' कहा ! क्या बात है जगदीश जी ! नरसी सेठ ने कुछ संशय से पूछा। नहीं, ऐसी कोई बात नहीं मैं होटल का मैनेजर हूं और यहां आने वाले हर मेहमान का खयाल रखना मेरा फर्ज है 'आप वेफिक रहें, कोई कमी नहीं होगी ! जग्गी वाबू ने फटी हुई आवाज में काफी संयम से कहा था। -आनेवाले हर मेहमान और मालती जी में बहुत फर्क है जगदीश वावू । नरसी सेठ बोले थे। -जी, मैं समझता हूं ! आप फिक न करें ! जग्गी वाबू ने जैसे मन पर बहुत भारी पत्थर रखते हुए कहा था । जग्गी वावू को इस हाल में देखना मेरे लिए मुश्किल हो गया था। स्थिति को संभालने के लिए मैंने इतना ही कहा था-~-नरसी सेठ, सब हो जाएगा। आइए जग्गी वावू" मैं सब संभाल लूंगा। पर नरसी सेठ ने मुझे रोक लिया था--आप जाइए मैनेजर साहब । गुस्सरन जी, आप एक मिनट रुक सके तो मेहरवानी होगी। - ३० / काली आंधी जग्गी बाबू को इस तरह जाते में नहीं देख पाया था। एकाएक मेरे मुंह से निकल गया था"आप ज़रा-सा रकिए जग्गी बाबू, में भी चलता हूं। हा, यताइए नरसी सेठ... नरसी सेठ जग्गी बाबू को उपस्थिति से कुछ अटक गया था और यह बात जग्गी बाबू ने मार्क की थी। लेकिन फिर भी नरसी सेठ ने इतना तो वह ही दिया था--गुरूसरन जो, एक सिफारिश आपको करवानी पड़ेगी. मैं जानता हूं, मालती जी से यह काम सिर्फ आप ही करवा सकते है"इलेक्शन हो जाने दीजिए, मुझे कोई जल्दी नहीं है। ... -~जी, देस लेंगे."मैं किस खेत को भुनी है और लोग हैं जो और ज्यादा बड़े हक से कह सकते हैं । यह हो जाएगा नरसी सेठ ! मैं जैसे- तसे वात टालना चाहता था और इस दर्दभरी स्थिति से जग्गी बाबू को जल्दी-से-जल्दी निकाल लेना चाहता था। मैंने उनसे कहा था--आइए जग्गी वायू । और हम दोनो विना एक-दूसरे से आख मिलाए, अपने में डूबे हुए, परामदा पार कर आए 'मालती जी से यह काम सिर्फ आप ही करवा सकते हैं।' यह जुमला जग्गी बाबू ने कैसे झेला होगा, मैं अदाज नहीं लगा सकता । शायद उन्हें रोककर खुद मैंने बड़ी गलती की थी, पर मालती जी के सदर्भ में नरसी सेठ के पास भेरा रुकना और उनका चला जाना भी मुझे गवारा नहीं हो पाया था। नरसी सेठ का वह जुमला मुझे वरावर कचोटना रहा था। और अपना जुमना भी..."और लोग हैं जो और ज्यादा बडे हक से कह सकते हैं..." जग्गी वाबू के सामने ही खुद उन्हें ही 'और लोगो' में शुमार करना कैसा लगा होगा? लेकिन मैं और कह भी क्या सकता था ?... - ती जी आ गई थीं, पर वे सीधे होटल न आकर पहले अमज़दअली मिर्जा साहब के घर चली गई थीं। विदा होटल में आ गया था । के साथ कुछ और लोग भी थे जो चुनाव-प्रचार के लिए खास तौर आए थे। मालती जी के आ जाने में रौनक तो हो ही गई थी, पर दिखावा छ ज्यादा ही बढ़ गया था। हरेक यही शो करने में लगा कि वह उनके कितने करीब है। इस दिखावे में लल्लू बाबू सबसे आगे थे। वे उनके साथ ही दिल्ली से आए थे और प्रचार-अभियान की स्कीमें सुझाने के अलावा वे यह ज्यादा जाहिर कर रहे थे कि उनसे ज्यादा मालती जी के वारे में कोई नहीं जानता। आते ही उन्होंने सव-कुछ जैसे हाथ में ले लिया। लल्लू बाबू खासे खुरीट और पुराने खिलाड़ी हैं। गंजे और गलीज़ । उन्हें पसंद कोई नहीं करता, पर वर्दाश्त सव करते हैं । सवको ताज्जुब है कि मालती जी जैसी महिला और नेता के साथ वे कैसे चिपके हुए हैं। और पहुंचते ही उन्होंने सवाल शुरू कर दिए--गुरूसरन जी, कल कहां-कहां किस-किस इलाके में मीटिंगें हैं ? जी कितनी आ गई ? अरे भई हां, मालती जी के कमरे का क्या इंतजाम हुआ"चलिए, जरा देख लें... -वह हो गया है । मैनेजर साहब ने सब ठीक करवा दिया है। मैंने कहा। -देख लेने में क्या बुराई है ? वे वोले । उनकी जिद के कारण हमें जाना पड़ा । मुझे उम्मीद नहीं थी। जग्गी वावू खुद वहां होंगे। पर वे खुद सारा इंतज़ाम देख रहे थे । रू वॉय नीली चादर लगाने लगा तो जग्गी वावू ने टोका-सफेद च लगाओ। इन्हें हटा दो। और कमरे में 'जग' की जगह एक सुराही र दी थी। जग्गी वावू को अभी तक याद था कि मालती जी को सु । ३२ / काली आंधी का सोपा पानी बहन पद या। तब वक नलू बाबू ने टांग बढ़ा दी ये ननर के नई हटवाइए! देबड भी बाहर करवाइए। यह सब क्या है? -~-अब हो रहा है! बम्मो बाबु ने उराली ने कहा। -श्रापको नालन है, मालती जी हुनेमा बनौन पर सोती है ! कह रहा हूं, यह हटवाइए ! बाहर कीजिए ! लल्लू वावू ने बड़े कवि- कार से कहा-बार लोग बनी टांग मत बट्टाइए। जो बताता है, वह करने बाइए। करने के लिए यह स्म-वांप है। उ बढा दीपिर! जनी बाबू ने जलती हुई बातों के बन्हें देते हुए कहा था और वो करूस हो, नु फोन कर दीजिएगा! कहाँ हुए वे कमरे में चले गए थे। -यह आदनी निहायत नगर है। कोल है मह ? नन्न वायू में सम-बांचनवाल किमाया। ---नेवर हैं, नाहब !-न-बों ने कहा था और महा दाने समाया। -~-बार गांव रहिए"मन सन्तु बाबू का कंघा काय हर बात को मनाना या। -~यह दो कौड़ी का आदनी "मूट पहन लिया, ममता है, नाट- गहा हो गया ! वाले इस होटल में इंववान ही क्यों किया? जॉन मुझपर मवाल दागा। दूरी यी ! मैंने कहा। वनी पता चला कि मालती जो भा रही है। इन नौब माले । दुछ कारें वा दुको यो । दुध वाट्टी दी । नारे लगाते हुए कुछ लोग जोर वेधुर्व वा हे - मानतीजी! जिन्दाबाद ! मानवी जी! विदावाद ! कानी कापी/१३ । खासा हुजूम हो गया था। मैंने पोटिको में देखा था। होटल के करीब-करीव भी लोग खड़े थे । जग्गी वावू नहीं थे । मैंने निगाह ऊपर डाली थी। जग्गी वावू ऊपर टैरेस से चुपचाप सब देख रहे थे। तभी नरसी सेठ का आदमी आया था और मुझसे बोला था-मालिक ने कहा है, एक मिनट मालती जी को वहीं कॉटेज में रखिए"जब वे होटल की मेन विल्डिंग में दाखिल होंगी, सेठ जी उनका स्वागत करेंगे ! काफी देर तक मालती जी चुनाव कार्यालय वाले कॉटेज में सव चीजों की तफसील लेती रहीं। जान-पहचान वालों से बातें करती रहीं। उनका हाल-चाल पूछती रहीं। हम सब लोग सारे प्रबंध के बारे में बताते रहे। तभी खबर मिली कि नरसी सेठ स्वागत के लिए तैयार हैं। हम मालती जी को लेकर आगे बढ़े। होटल के सब लोग, तमाश- वीन और कर्मचारी भरे हुए थे। मालती जी के लिए रास्ता बनाना पड़ा । फोटोग्राफर तस्वीरें ले रहे थे। जैसे ही मालती जी मुख्य दरवाजे की नीचे वाली सीढ़ियों तक पहुंची, नरसी सेठ ने उन्हें माला पहनाई थी। कर्मचारियों ने फूलों की वर्षा की थी और तव नरसी सेठ ने परिचय करवाया था-ये हैं हमारे होटल के मैनेजर मिस्टर जगदीश वर्मा ! मेरे लिए यह दृश्य हिला देनेवाला था। मालती जी ने एकाएक उन्हें देखा था"जग्गी बाबू हाथ जोड़े नमस्ते कर रहे थे। मालती जी की हथेलियां जुड़ते-जुड़ते कांप गई थीं। और उनके हाथ की माला नीचे गिर पड़ी थी। मालती जी बहुत थक गई हैं । हटिए"हटिए 'कहता हुआ मैं उन्हें शेष लोगों के बीच की औपचारिकता से निकाल ले गया था। लिफ्ट में लल्लू बाबू भी घुस आए थे। मालती जी आंखें बंद किए उंगलियों से दोनों भवों के पास वाले हिस्से को दवा रही थीं, जैसे उनकी आंखों में एकाएक दर्द हो गया हो। । कमरे में पहुंचकर जो हाल उन्होंने देखा, तो एकदम बोलीं-इस होटल में बंड नहीं हैं ? लल्लू बाबू ने लपककर ट्रम्प मारा-मैंने सोचा, आप यहां चुनाव के - २५ काली आँधी दौरान अगर जमीन पर सोए तो" -इस दिखावे की क्या जरूरत है ! यह सब मुझे पसंद नहीं । आप तो हद कर देते हैं लल्लू वावू ! मुझे ज़मीन पर नीद नहीं आएगी, हो सके तो इसमे बंड लगवा दीजिए"मालती जी ने चिढ़ते हुए कहा था। --मैनेजर साहव वोला या "बैड ही रहेगा और सफेद चादर रहेगा, पर साव बोला, नही, आप जमीन पर गद्दा विद्याकर सोएगा। कहते हुए रूम-वॉय ने लल्लू बाबू की ओर इशारा किया था। —ये सारा तमाशा वद कीजिए लल्लू बाबू ! मालती जी ने कहा था और कुर्सी पर माथा पकड़कर बैठ गई थी ! रूम-वॉय बिस्तर हटाने लगा था। --ठीक है, अब मैं आराम करूगी। जरा बिदा को भेज दीजिएगा। मालती जी ने कहा और वे पानी का गिलास भरकर हाथ में पकड़े रही। उन्होंने एक क्षण के लिए सुराही को देखा था, फिर वे खिड़की के बाहर ताकती रही। हम दोनो चले आए । नीचे से हमने विंदा को भेज दिया। मैंने विदा को समझा भी दिया था कि मालती जो एकाएक कुछ डिस्टर्व हो गई हैं और वह जाए तो बहुत समझदारी से काम ले । मेरी मुश्किल यह थी कि मैं लोगों से कह भी नही सकता था । पता नहीं, मालती जी पसद करें या न करें"इस रिश्ते को जाहिर करना उन्हे उचित लगे या न लगे। कालो आधी/३५ .- - रात काफी गहरी हो गई थी। हम सात-आठ लोग चुनाव कार्यालय वाले कॉटेज में लेटे हुए थे। लल्लू बाबू ने अपनी वास्कट की जेब से खुराक लगी मिक्चर की शीशी निकाली थी, उसे हिलाया था और एक खुराक पी गए थे। -~आपकी तवियत गड़बड़ है ? मैंने यूं ही पूछा था । -हां, काफी गड़बड़ है ! लल्लू बाबू वोले थे। -तो बताया होता, किसी डाक्टर को दिखा देते । --चुनाव की फिक्र करें या इस तवियत की! कहते हुए उन्होंने फिर शीशी उठाकर खुराक के निशान पर अंगूठा लगाया, हिलाया और एक खुराक और पी गए । -बड़ी जल्दी-जल्दी दवा पी रहे हैं ! मैंने कहा तो वे करवट लेकर लेट गए और उसी तरफ मुंह किए-किए बोले-~~-गुरुसरन जी, मेरे खयाल से गांव के इलाकों में जरा जोरदार तरीके से मजमा जमाइए ! -~-गांववाले अव मुश्किल से पकड़ में आते हैं। -तो एक रामायणी पण्डित जी को पकड़िए । गांव के किसी असर- दार आदमी के घर रामायण का पाठ रखवाइए और उसी बहाने अपना, काम कीजिए। शहर के लिए एक-एक मोहल्ले में एक-एक दिन नौटंकी और कव्वाली का प्रोग्राम आर्गनाइज़ कीजिए। ऐसे चुनाव नहीं लड़े जाते, जैसे आप लड़ रहे हैं ! लल्लू बाबू ने कहा। -मालती जी पसंद करेंगी? मैंने शक जाहिर किया । -उनके पसंद करने या नापसंद करने से क्या होता है । यह सब उनसे पूरने की ज़रूरत भी नहीं है । कण्डीडेट हार जाए तो सब गलत और बुरा होता है, जीत जाए तो सब सही और अच्छा ! हूं! कहते हुए उन्होंने शीशी हिलाकर तीसरी और आखिरी खुराक भी पी ली। मैं समक्ष गया था कि यह दवा कैसी थी। तीसरी खुराक लेकर लल्लू बाबू खुटि भरने लगे थे । मुझे नींद नहीं आ रही थी। रह-रहकर जगी बाबू का काली आंधी | ३६

सयाल रहा था।
तमो विदा लोट आया था । आकर मेरे पास बैठ गया था।
पता चला कि मालती जी बहुत उदास थीं। उन्होंने विदा से पूछा
था-तुमने पहचाना?
-~हा, मैं तो पिछली बार भी मिल गया था। लहसन की चटनी
मालिक ने ही रखवाई थी। मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि आपसे कहता।
बिंदा ने बताया था।
--लिली का कुछ पता है ? मालती जी ने डूवी बावाज़ में पूछा था।
-~-मालूम नहीं।
--जरा फोन मिता..
कहां?
-~मैं.."ने'"ज. मेरा मतलब है"इन""वो लिली का जरा पता
-~-मैनेजर साहब को फोन दीजिए । विंदा ने फोन मिलाकर आपरेटर
से कहा था । जवाव मिला था-वे अपने फ्लंट में चले गए हैं, ड्यूटी पर
नही है"कहिए तो वहां मिला दें, शायद आराम कर रहे होंगे।
-~-रहने 21 मालती जी ने कहा था-तू भी जा, आराम कर।
---जी! विदा ने कहा था, और वह मालती जी को वाकी जरूरत
की चीजों को करीने से लगाने लगा था। मालती जी विस्तर पर लेट गई
भी। विदा ने उनकी चप्पलें पंताने लगा दी थी। छोटा तौलिया सिरहाने
रख दिमा था। नजल ड्राप्त की प्लास्टिक की शीशी तकिये के नीचे दवा
दी थी। और फाइलें उधर कमरे में ले जाने लगा था, तो उसने देखा
था--मालती जी ने फोन का रिसीवर एकाएक झटके से उठाया था और
कान से लगा लिया था।
-~-कोई नम्बर चाहिए ! फाइतें वही रखकर विदा लपककर पास
आगया था।
नही"घंटी बजी थीन?
---फोन की!
काली आधी/३७

-फोन की"हां" मालती जी ने कहा था।
-मैंने तो नहीं सुनी" विंदा वोला था।
-अच्छा ! बुदबुदाते हुए मालती जी ने कहा था और रिसीवर
रख दिया था और वे लस्त होकर लेट गई थीं।
-
काली आंधी |३८

मुझे नहीं मालूम, उस रात और क्या हुआ । मालती जी सो, पाई या जागती रहीं-जग्गी बाबू रात भर टैरेस पर टहलते रहे या जागते रहे-पर इतना तो जरूर लगा कि कही न कही उस रात छतरपुर का घर भी उभरा होगा'"लिली भी दौड़ती आई होगी। खजुराहो का वह गुलाब वाग भी आया होगा"मदिरों की छायाओं के तले से शायद दोनों साथ या अकेले-अकेले गुजरे होंगे । डूबते सूरज को उन्होने अलग-अलग या साथ-साथ देखा होगा और इलाके के पलाश-वन दहके होंगे। मुझे वह सफर याद है, जब हम बेतवा पार करके आए थे । पाट बहुत चौडा तो नही था, पर वेतवा है तो खतरनाक । उस पार खड़े हम बड़ी नाव के आने का इतज़ार कर रहे थे । हम एक मीटिंग से साथ लौटे थे । जग्गी वावू भी थे । जीप से उतरकर हम पास को चाय की दुकान में चले गए थे। फागुन के दिन थे, पर फिर भी एक अधेड़ बैठा थाल्हा गा रहा था."वेतवा की महिमा का प्रसंग था। वेतवा वाढ़ पर थी और ऊदल की सेनाओं को पार जाना था. कुछ जानवर भी झुण्ड में खड़े थे । गड़रिये उन्हें उस पार ले जाने के लिए रुके हुए थे। आखिर उस पार से खेप लेकर बड़ी नाव आई थी । जीप, जानवर और हम सब लोग उसमें लद गए थे। उस पार उतरकर जब हमने सफर शुरू किया था तो पलाश-वन दहक रहे थे। पतले डामर के रास्ते पर पलाश के फूलों का लाल कालीन विछा हुआ था। जीप उन्हे कच-कच कुचलती चली जा रही थी। मालती जी बोली थी-साढ़े पाच बज गया । चार बजे पहुंचना था। वे लोग इतजार कर रहे होंगे ! --तो क्या हुआ और इन्तजार कर लेंगे आपको सब जगह की मीटिंगों के निमंत्रण स्वीकार नहीं करने चाहिए । माखिर कितनी मीटिंगें एड्रेस करेंगी ? मैंने कहा था। काली आधी/३६ -क्या करें"ड्राइवर, जरा तेज़ चलाओ ! मालती जी वोली थीं। -ड्राइवर, जीप रोको! एकाएक जग्गी बाबू वोले थे। -~-क्यों ? मालती जी ने कहा था। -क्या हो गया! "ये फूल कुचलते हैं तो मन में जाने कैसा-सा होता है."जग्गी वावू सड़क पर कुचले फूलों को देखकर फूले हुए पलाश-वनों की ओर देखने लगे थे, और जीप से उतर गए थे --ए, देर मत करो प्लीज ! घड़ी देखकर मालती जी वोली थी- धीरे चलोगे तब भी फूल कुचले जाएंगे ! आओ, जल्दी बैठो। सभा के लिए बहुत देर हो जाएगी और मालती जी ने उन्हें बांह पकड़कर अपनी ओर खींचा था। जग्गी वावू वेमन से फिर बैठ गए थे। जीप चल दी थी। -एक दफा तुम इलेक्शन में हार जाओ तो ठीक रहे ! जग्गी वावू ने शैतानी से कहा था। ----फिर वही बात ! मालती जी ने उन्हें प्यार-भरी टेढ़ी नज़रों से देखा था। ----और क्या ! एक दफा हार जाओ, तो तुम्हें कुछ वक्त मिलने लगेगा. अपने लिए, मेरे लिए' 'सुनो, जीते हुए आदमी के पास वक्त बिल्कुल नहीं होता। हारे हुए के पास वक्त ही वक्त होता है ! क्यों, गलत कह रहा हूं गुरुसरन जी ! जग्गी बाबू ने मजाक को और फैलाते हुए कहा था। -सुन लिया गुरुसरन जी ? मालती जी ने मुड़कर कहा था-अपने घर में ही विरोधी बैठे हुए हैं ! पहले इन्हें पटाइए ! और पूरी बात एक हल्के मजाक के माहौल में घुल गई थी। पीछे देखते हुए पर आज मुझे लग रहा था कि हार या जीत का एक और मैदान भी है। उसमें न वक्त है, न जरूरत और न जीत । उसमें सिर्फ हार ही हार है। दोनों हारते हैं एक-दूसरे से। एक भी जीत जाए तो सब विखर जाता है। पता नहीं, मालती जी और जग्गी वाबू को क्या-क्या याद होगा! इस रात उनमें से कौन जीता होगा? या दोनों हारे होंगे - ४०/ काली आंधी लेकिन राजनीति का यह नशा ! सफलता का नशा ! सफलता की दौड़ में कोई थकता नहीं"इस दौड़ का कोई पड़ाव या मंजिल होती नही" सफल व्यक्ति सिर्फ दौड़ना रह जाता है "और दोडना ही उसकी सफलता बन जाती है। क्योंकि दौड़ते-दौड़ते वह यह भूल जाता है कि उसने दौड़ना क्यों शुरू किया था। सफलता की मजिल सिर्फ सफलता है ! राजनीति में जो सबसे बड़ा दल है वह यही कि दौड़नेवाला हमेशा कहता रहता है- हम तुम्हारे लिए दौड़ रहे हैं ! जबकि सही यह होता है कि खुद वह अपने लिए भी दौड़ नहीं रहा होता"कुछ इसी तरह की दौड़ मालती जी की रही है । और इस दौड़ का नुकसान भुगतता है वह दौर, जो सफलता को इस राजनीति की चपेट में बा जाता है । इतिहास की बड़ी-बड़ी सफलताओं के दौर असल में भयानक असफलताओं के दौर रहे हैं." काली आंधी -क्या करें"ड्राइवर, जरा तेज़ चलाओ ! मालती जी बोली थीं। -ड्राइवर, जीप रोको! एकाएक जग्गी वावू वोले थे। -क्यों ? मालती जी ने कहा था। -क्या हो गया! "ये फूल कुचलते हैं तो मन में जाने कैसा-सा होता है "जग्गी बाबू सड़क पर कुचले फूलों को देखकर फूले हुए पलाश-वनों की ओर देखने लगे थे, और जीप से उतर गए थे। -ए, देर मत करो प्लीज ! घड़ी देखकर मालती जी बोली थी-- धीरे चलोगे तब भी फूल कुचले जाएंगे ! आओ, जल्दी वैठो। सभा के लिए बहुत देर हो जाएगी और मालती जी ने उन्हें बांह पकड़कर अपनी ओर खींचा था। जग्गी बाबू वेमन से फिर बैठ गए थे । जीप चल दी थी। --एक दफा तुम इलेक्शन में हार जाओ तो ठीक रहे ! जग्गी वाबू ने शैतानी से कहा था। -फिर वही वात ! मालती जी ने उन्हें प्यार-भरी टेढ़ी नजरों से देखा था। -और क्या ! एक दफा हार जाओ, तो तुम्हें कुछ वक्त मिलने लगेगा अपने लिए, मेरे लिए "सुनो, जीते हुए आदमी के पास वक्त विल्कुल नहीं होता। हारे हुए के पास वक्त ही वक्त होता है ! क्यों, गलत कह रहा हूं गुरुसरन जी ! जग्गी वाबू ने मजाक को और फैलाते हुए कहा था। --सुन लिया गुरुसरन जी ? मालती जी ने मुड़कर पीछे देखते कहा था-अपने घर में ही विरोधी बैठे हुए हैं ! पहले इन्हें पटाइए ! और पूरी वात एक हल्के मज़ाक के माहौल में धुल गई थी। पर माज मुझे लग रहा था कि हार या जीत का एक और मैदान भी है। उसमें न वक्त है, न जरूरत और न जीत । उसमें सिर्फ हार ही हार है। दोनों हारते हैं एक-दूसरे से । एक भी जीत जाए तो सव विखर जाता है। पता नहीं, मालती जी और जग्गी वावू को क्या-क्या याद होगा ! इस रात उनमें से कौन जीता होगा? या दोनों हारे होंगे ४०/काली आंधी लेकिन राजनीति का यह नशा ! सफलता का नशा ! सफलता की दौड़ में कोई यकता नही"इस दौड़ का कोई पडाव या मजिल होती नही... सफल व्यक्ति सिर्फ दौड़ना रह जाता है "और दौड़ना ही उसकी सफलता बन जाती है। क्योंकि दौडते-दौड़ते वह यह भूल जाता है कि उसने दौड़ना क्यों शुरू किया था। सफलता की मजिल सिर्फ सफलता है ! राजनीति में जो सबसे बड़ा छल है वह यही कि दौडनेवाला हमेशा कहता रहता है- हम तुम्हारे लिए दौड़ रहे हैं ! जवकि सही यह होता है कि खुद वह अपने लिए भी दौड़ नहीं रहा होता "कुछ इसी तरह की दौड मालती जी की रही है । और इस दौड़ का नुकसान भुगतता है वह दौर, जो सफलता की इस रागनीति की चपेट में आ जाता है। इतिहास की बड़ी-बड़ी सफलताओं के दौर असल में भयानक असफलताओं के दौर रहे हैं।"

जग्गी बाबू -क्या करें"ड्राइवर, ज़रा तेज़ चलाओ ! मालती जी बोली थीं। -ड्राइवर, जीप रोको ! एकाएक वोले थे। -क्यों ? मालती जी ने कहा था। -क्या हो गया ! "ये फूल कुचलते हैं तो मन में जाने कैसा-सा होता है. "जग्गी वाबू सड़क पर कुचले फूलों को देखकर फूले हुए पलाश-वनों की ओर देखने लगे थे, और जीप से उतर गए थे। -ए, देर मत करो प्लीज ! घड़ी देखकर मालती जी बोली थी- धीरे चलोगे तब भी फूल कुचले जाएंगे ! आओ, जल्दी वैठो। सभा के लिए बहुत देर हो जाएगी "और मालती जी ने उन्हें बांह पकड़कर अपनी ओर खींचा था। जग्गी बाबू वेमन से फिर बैठ गए थे। जीप चल दी थी। -एक दफा तुम इलेक्शन में हार जाओ तो ठीक रहे ! जग्गी वावू ने शैतानी से कहा था। -फिर वही वात ! मालती जी ने उन्हें प्यार-भरी टेढ़ी नज़रों से देखा था। —और क्या ! एक दफा हार जाओ, तो तुम्हें कुछ वक्त मिलने लगेगा अपने लिए, मेरे लिए""सुनो, जीते हुए आदमी के पास वक्त विल्कुल नहीं होता । हारे हुए के पास वक्त ही वक्त होता है ! क्यों, गलत कह रहा हूं गुरुसरन जी ! जग्गी वावू ने मजाक को और फैलाते हुए कहा था। -सुन लिया गुरूसरन जी ? मालती जी ने मुड़कर पीछे देखते हुए कहा था-अपने घर में ही विरोधी बैठे हुए हैं ! पहले इन्हें पटाइए ! और पूरी वात एक हल्के मजाक के माहौल में घुल गई थी। । पर आज मुझे लग रहा था कि हार या जीत का एक और मैदान भी है। उसमें न वक्त है, न ज़रूरत और न जीत। उसमें सिर्फ हार ही हार है। दोनों हारते हैं एक-दूसरे से । एक भी जीत जाए तो सव विखर जाता है। पता नहीं, मालती जी और जग्गी वावू को क्या-क्या याद होगा ! इस रात उनमें से कौन जीता होगा? या दोनों हारे होंगे...

... लेकिन राजनीति का यह नशा ! सफलता का नशा ! सफलता की दौड़ में कोई धकता नहीं"इस दौड़ का कोई पड़ाव या मजिल होती नहीं सफल व्यक्ति सिर्फ दौड़ना रह जाता है "और दोड़ना ही उसको सफलता बन जाती है । क्योकि दौड़ते-दौड़ते वह यह भूल जाता है कि उसने दौड़ना क्यों शुरू किया था। सफलता की मजिल सिर्फ सफलता है ! राजनीति में जो सबसे बड़ा छल है वह यही कि दौडनेवाला हमेशा कहता रहता है-- हम तुम्हारे लिए दौड़ रहे हैं ! जबकि सही यह होता है कि खुद वह अपने लिए भी दौड़ नहीं रहा होता"कुछ इसी तरह की दौड़ मालती जी की रही है । और इस दौड़ का नुकसान भुगतता है वह दौर, जो सफलता की इस राजनीति की चपेट में आ जाता है । इतिहास की बड़ी-बड़ी सफलताओं के दौर असत में भयानक असफलताओं के दौर रहे हैं...

- सुबह मेरी आंख फोन की घंटी से खुली । पता नहीं क्यों, एकाएक लगा, जग्गी बाबू का फोन होगा। लेकिन नहीं, वह नरसी सेठ का था-नमस्ते ! कोई तकलीफ तो नहीं। देखिए, मालती जी की एक पार्टी आप अभी से तय कर लीजिए, मेरी तरफ से। एक शाम बुक कीजिए। विदा उठकर गया था और लौट आया था। बताने लगा-~-अमी सो रही है। सुनते ही लल्लू वावू बोले-तब तो लड़ चुकी इलेक्शन ! साढ़े सात बज रहा है । और उम्मीदवार तो अब तक एक-एक मीटिंग एड्रेस कर चुके होंगे। तभी एक और फोन आया--महिला-मण्डल वाले सम्मान-सभा करना चाहते हैं ! मैंने लल्लू बाबू को बताया। -अरे छोड़िए ! महिला मण्डल से हमें क्या लेना-देना। वक्त कहां है ? मना कीजिए ! फिर एकाएक कुछ सोचकर बोले-उनसे पूछिए, अगर पांच-सात महिला वालंटियर दे सके तो दस मिनट के लिए चली आएंगी। कहिए, फोन पर तय नहीं होगा । कोई यहां चला आए । तभी देखा, मालती जी कार्यालय की ओर चली आ रही हैं । हम सव सतक हो गए । आते ही बोलीं-गुरुसरन जी, इधर आइए। हम दोनों एक तरफ हो गए। उन्होंने धीरे से पूछा-लाला दीना- नाथ का काम हो गया ? -- . -जी! --हां, तो बताइए, मुझे क्या करना है ? या यों ही बुलाकर आप लोगों ने बैठा लिया है ? जल्दी-जल्दी वताइए। क्या प्रोग्राम है ? कहां- पाहां जाना है ? कितनी सभाएं हैं ? मालती जी अपनी रो में थीं। जगतसिंह ने डायरी खोलकर प्रोग्राम बताने शुरू किए। तब तक कुछ लोग और भी आ गए थे। भण्डारी जी ने चाय पेश कर दी थी। मालती जी ने मजाक किया--अब तो लुटने का अंदेशा नहीं है ? ४२ / काली आंधी भण्डारी जी कब मानने वाले थे। चोले-लुटवा तो उन्होने दिया जो काम दूसरों का करते थे और रोटियां खाने हमारे यहां आ जाते थे." गुरूपरत जी ने लंगर खुलवा दिया था। जो लोग शहर से खवर लेकर आए थे उनमें मिर्जा साहब भी थे। वे एक उम्मीदवार के बारे में कुछ अहम सवरें लेकर आए थे। उन्होंने फौरन बवाना शुरू किया-देखिए, अब आप सब संभालिए। नहीं तो यह इलेक्शनवाजी बहुत टेढ़ा रुख ले जाएगी। आपको मालूम ही है कि गुलशेर अहमद मैदान में मौजूद हैं । अभी तक वे अक्ल की बातें तो नहीं कर रहे थे, पर खतरनाक बातें भी नहीं कर रहे थे। लेकिन अब उनके इर्दगिर्द वे सब ताकतें जमा हो रही हैं, जो बुनियादी तौर पर कम्युनन हैं। वे जातियों में भेद पैदा करके वोटों को हिन्दू और मुसलमान वोटों में तकसीम कर देना चाहते हैं और चोरी-छुपे यह ऐलान भी कर रहे हैं कि भारत मे इस्लाम खतरे में है। इसलिए जरूरी है कि मुसलमान अपने वोटो को मुसलमान के इस्तेमाल करें। और उधर लाला दीनानाथ विल्कुल जाति के सहारे चल रहे हैं । वे बनियों को जमा कर रहे हैं। शहर में हजारों लोग बाहर से घुस पड़े हैं और यहा-वहां तनातनी का माहौल पैदा कर रहे हैं. "गुलशेर अहमद को तो किसी भी कीमत पर रामझाया नहीं जा सकता, क्योकि वो तास्सुबी हैं। लेकिन लाला दीना- नाथ, जो इस शहर के जाने-माने समझदार आदमी हैं, उन्हें यह बुखार क्योंकर चढ़ गया है, यह समझ मे नहीं आता। मैंने मालती जी की ओर भेदभरी नज़रो से देखा था। आखिर हमेशा की तरह उन्होने अकाट बात कही-जिन रुझानों को हमें नेस्त- नाबूद करना है, वे सामने और ऊपर निकलकर आ जाए तो अच्छा ही हैं । जड़ से उखाडने के लिए पौधे को ऊपर से ही पकडना पड़ता है ! मिर्जा साहब खुशी से उछल पड़े-क्या बात कही है आपने ! वल्लाह ! आपको तो अदब के फील्ड मे होना चाहिए था। जी चाहता है, आपकी हर बात लिखता जाऊ ! तभी वैयरा आ गया था--जी, नाश्ता लग गया है। काली आधी/४३ ? कहा। और मालती जी, मैं, मिर्जा साहब और लल्लू वाबू नाश्ते के लिए कमरे में पहुंचे थे। नाश्ता मेज़ पर नहीं, नीचे दस्तरखान पर लगा था। देखते ही मिर्जा साहब फिर चहक उठे-क्या बात है ! इन होटलों में तो मेज-कुर्सी से आदमी नीचे नहीं उतरता "यह नीचे बैठकर नाश्ते की वात खूब सूझी''आपका ही हुक्म होगा यह -हुक्म तो खैर मेरा नहीं था, पर यों अरेंज हो गया। मुझे मेज- कुर्सी पर बैठकर खाना अच्छा नहीं लगता ! मालती जी ने कहा था। -सुना है, यहां के मैनेजर साहव आपके कोई करीवी रिश्तेदार हैं ! मिर्जा साहब ने ---आप पराठा पसंद करेंगे? मैंने वात संभाली। --अरे पराठा! होटल के नाश्ते में ! कमाल है"मैं तो साहब, वेगम से कहूंगा, खाना खाना हो तो होटल में आदमी खाए और रहना हो तो ससुराल में रहे । ये अपने घर का रहना और अपने ही घर का खाना बिलकुल वेहूदी चीज़ है ! अव तो होटल घर हो गए हैं और घर होटल !"गलत कह रहा हूं? वे बोले थे तो सब हंस दिए थे। मैं मालती जी की ओर देखकर चुप रह गया था। -शाम को आपकी मीटिंग है मुहल्ले में, मिर्जा साहब ! मैंने फिर वातावरण को हल्का करने की कोशिश की। जी हां, मुझे पता है । हमें तैयारी भी करनी है। गुलशेर के लोग शायद कुछ ववाल खड़ा करने की कोशिश करेंगे । पर हमें किसका डर है, जो होगा, सुलंट लेंगे। मालती जी ने कहा था। ! ! ४४ / काली आंधी और शाम को मीटिंग में मालती जी ने बहुत जोशीला भाषण दिया- "तो भाइयो और बहनो ! मेरे कहने का मतलब सिर्फ यही है कि आप बड़े और खुले दिमाग से सोचें, दोस्त और दुश्मन में फर्क करें! अगर हम हिंदू और मुसलमान की तरह सोचते रहे तो यह मुल्क गारत. हो जाएगा। मैं गुलशेर साहब जैसे उम्मीदवारों के लिए क्या कहूं जो फिरकापरस्ती में यकीन करते हैं और लोगों के मज़हबी जरबों को भड़का कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते है"मजहब बड़ी चीज है, पर हमारी सबसे बड़ी जरूरत है गरीबी और भूख को मिटाना ! (तालियां) पर दुःख होता है लाला दीनानाथ जैसे आदमी को इस रूप में देखकर जो अपनी जाति का झण्डा लेकर खडे हुए है, जाति का भी नही, कास्ट का ! मैं पूछती हूं कि जाति प्रथा ने हमे क्या दिया है ? और फिर इस का अत क्या है ? जातियों में भी उपजातिया है."सव वनिया नहीं हैं, बनियों में भी कुछ अग्रवाल हैं, कुछ गुप्ता हैं, कुछ और भी हैं"अगर कोई अग्रवालों के नाम पर खड़ा हो जाए तो क्या होगा ? तव गुप्ता कहां जाएगे ? क्या गुप्ता और अग्रवालो की परेशानिया अलग-अलग हैं ? नही, बिलकुल नहीं ! यह खुशहाली की लड़ाई हिंदू और मुसलमान को अलग-अलग खानों में वटी लड़ाई नहीं है । यह अग्रवालो, गुप्ताओं या ब्राह्मणों की अलग-अलग लड़ी जानेवाली लड़ाई नहीं है । यह मिली. जुली लडाई है और सबकी है। इसीलिए हमें साम्प्रदायिकता, फिरका- परस्ती और हर तरह के जातिवाद का विरोध करना है ! (तालिया) "सुना है कि विरोधी उम्मीदवार चन्द्रसेन ने खुली सभा मे मुझसे कोई सवाल पूछा था । में जवाब देने आई हूं और वे सुन लें। हमारे चुनाव कार्यालय में बनाज इकट्ठा नहीं किया गया "जो थोड़ा-बहुत था भी, वह उन लोगों में बाटने के लिए था, जिन्हें कुछ नहीं मिल पाता। वह गरीबो के लिए था । उस नाज को, उस अन्न को जलाकर चन्द्रसैन जी को क्या मिला ? नुकसान किसका हुआ?"गुण्डागर्दी से चुनाव नहीं जीते काली आधी/४५ जाते"तो भाइयो और बहनो, हमें इन तरह-तरह के मौकापरस्त लोगों से आगाह रहना है और अपने पोट का सही इस्तेमाल करना है ! मैं नहीं कहती कि आप वोट मुझे दें"मेरा कहना सिर्फ इतना है कि जो आपको सबसे सही लगे, क्योंकि कमियां सब में हैं, उसे ही आप अपना समर्थन दे ! जय हिंद ! बीच-बीच में तालियां बजती रहीं । मिर्जा साहब बहुत खुश हो रहे थे। सभा समाप्त हुई तो खुद मिर्जा साहब ने नारे लगाए- मालती जी! जिन्दावाद ! मालती जी! जिंदाबाद! संतोप की मुस्कराहट लिये मालती जी जगतसिंह की ओर देखने लगी, जैसे पूछ रही हों-अब? जगतसिंह ने फौरन डायरी खोलकर देखा और बताया अब जिला कमेटी की ओर से डिनर है ! ----जिनर, कहां? वहीं होटल में। -कौन-कौन आ रहा है? -जिला कमेटी के लोग हैं । और कलक्टर साहब तथा टूरिस्ट अफसर साहब एक मिनट के लिए वहीं आपसे मिलना चाहते हैं । -अच्छा, वहीं मिलवा दीजिएगा। और हम सब लोग होटल लौट आए थे । हमें पहुंचने में देर हुई थी। वहीं लाउंज में कालगटर साहब और टूरिस्ट आफिसर को आराम से बैठाए जग्गी वावु वातों में उलझाए हुए थे। मालती जो के पहुंचते ही ये सोनों उठकर खड़े हो गए थे और जग्गी वायू एक ओर सरफ गए थे। कहिए कलगटर साहब ? मालती जी ने पूछा-क्या हुक्म है ? - RAMA ४६ / काली आंधी -~-जी, हुक्म का क्या सवाल-उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा था- स्टेट टूरिस्ट डायरेक्टर हैं !"जी, आपको तो पता ही है कि विदेश से एम्पीज का एक हेलिगेशन आजकल आया हुआ है" -~-हा-हां, आया हुआ है, पर यहां क्या ज़रूरत पड़ गई? -~-जी, वो डेलिगेशन इधर खजुराहो घूमने आया हुआ है। उन्हें पता चला कि इसी इलाके में चुनाव होने जा रहे हैं। सो उन्होंने ख्वाहिश जाहिर की है कि भारतीय चुनावों को देखने के लिए नगर वे एक दिन मापके साथ गुजार सकें"तो" टूरिस्ट डायरेक्टर ने हाथ मलते हुए चात अधूरी छोड़ दी। -~-मुमकिन हो तो परसों। डायरेक्टर ने कहा। मालती जी ने जगतसिंह की जोर देसा । जगतसिंह ने डायरी देखी। 'ठीक है' के अदाज में सिर हिलाया । मालती जी ने कहा -~-ठीक है, ले आइए। फिर जगतसिंह से कहा-विदेशियों के लिए उसी शाम एक स्वागत पार्टी यही होटल में अरेंज कर दीजिए। ---इस मौके पर शहर के कुछ चने हुए लोगो को भी बुला लिया जाए । लल्लू बाबू ने मुझाया। ~जी, वो हम कर लेंगे । कलक्टर साहब ने कहा। नहीं, नहीं, औरो का झझट मत लगाइए"मालती जी ने कहा। ---जी, ठीक है ! कलक्टर ने कहा, फिर मालती जी के गले की भारो आवाज मार्क करते हुए बोला"आपको शायद सर्दी लग गई मालती जी ने बात को बनमुना करते हुए मेरी मोर देखा, और कहा-~-ठीक है, तो मैं जाऊं। -~-जी, वो जिला कमेटी वालों का डिनर"जगतसिंह ने कहा। -हाथ-मुह भी नहीं धोने देंगे क्या? मालती जी ने जैसे उलाहना दिया-में दस मिनट में आती हूं। सब तैयार है ? कहती हुई वे लिफ्ट की ओर चली गई। काली आमी/४ । बड़ा टेवा इंतजाम था। जिला कमेटी के सदस्यों को अलग-अलग जरूरतें थीं। एक साहब को मूंग की दाल चाहिए थी। दूसरे को लौकी : की सब्जी । तीसरे को बिना नमक का खाना "जैसे ही मालती जी ऊपर गई, जगतसिंह लपककर जग्गी बाबू के पास पहुंचा और दरयाफ्त करने लगा-सब चौकस है न ! एक साहब को मूंग की दाल जरूर चाहिए. और दूसरे को पूरा खाना बिना नमक का चाहिए तीसरे को आप बेफिक रहिए । सब इंतजाम हो गया है ! जग्गी बाबू ने कहा और कौन कहां बैठेगा, उसके हिसाब से बेयरों को अलग-अलग जसरत का खाना परोसने के लिए समझा दिया था। और हम लोग उस कमरे में पहुंच गए जहां डिनर का इंतजाम था। सब कुछ चौफस लगा हुआ था । साइट रूम में बैरे हमलावर फौजियों की तरह तैनात थे। तभी एकाएक जग्गी बाबू ने मेज़ की ओर देखा और बगल वाले कमरे से जाकर खुद ही एक फ्लावर पाट उठा लाए और उसे उन्होंने बीच में रख दिया । और मैंने देखा था- जागी बाबू ने सब की आंख बचाकर पीले गुलाब की एक कली फुल प्लेट और क्वार्टर प्लेट के बीच में रख दी थी, उस सीट पर जहां मालती जी वैठनेवाली थीं। खाना शुरू हुआ। मालती जी आई। नेपकिन उठाते हुए उन्होंने पीले गुलाव की कली को देखा था। एक क्षण के लिए उनका हाथ रुका था। उनकी आंखों ने एकाएक शुन्य में कुछ देखा था कि तभी वेयरा सर्विस लेकर उनके वाई और आ खड़ा हुआ था। सब्जी परस लेने के वाद उन्होंने कली को प्लेट को किनारी के नीचे सरका दिया था। खाना शुरू हुआ तो जिला कमेटी के मूंग की दाल वाले, गंजी चांद' वाले सदस्य ने हांक लगाई...अरे, दाल नहीं है क्या? वयरा दाल का टोंगा लेकर दौड़ पड़ा। दाल परस गई तो उन्होंने ही फिर आवाज लगाई-अरे, घी नहीं है क्या? ४८ / काली आंधी मैंने उन्हे गौर से देखा । शायद वे सख्त नज़र से ही कुछ समझ जाएं, पर उनपर कोई असर नहीं हुआ । वे कुल सात. सदस्य थे। सबके- सव निहायत उजड्ड । धूल से सने हुए और अपने गरूर में मस्त । लेकिन ऐसे लोगों को भी साधना पडता है । मालतो जी का रवैया हम सभी देख रहे थे। सवकी जेब में दस-दस, पाच-पांच हजार वोट पड़े हुए थे। उन्ही सदस्य ने टोपी उतारी, अपनी गंजी चाद खुजलाई और फिर गुहार लगाई–अरे, घी नहीं है क्या? जग्गी वावू जब तक दौड़कर आएं, मैंने उनसे कहा-यह मक्खन डाल लीजिए" -पिघला हुआ हो तो ठीक रहे ! उन्होने कहा और जग्गी बाबू ने फौरन एक वेयरे को हुक्म दिया कि मक्खन गर्म करवा के ले आए, गर्म होकर मक्खन आए तब तक जग्गी वावू ने उन्हे सभालने के लिए कहा- अभी आ रहा है"एक मिनट । वेयरा घला मक्खन ले आया तो जग्गी वावू ने खुद ही उनकी दाल में मक्खन डाल दिया । उन्होने हाय रोका तो गजे वादू बोले- एक चम्मच और डाल दीजिए न.. पिघले मक्खन का बाउल मेज पर रखकर जग्गी वावू एक ओर खड़े हो गए। वे समझ गए थे कि काफी मुश्किल किस्म के राजनीतिक जतु आए हुए हैं। अभी एक सदस्य कह ही रहे थे कि इस बरस सूखे के कारण किसान परेशान और बेहाल रहा है कि उन्ही गजे बाबू ने दाल का कौर खाकर मुंह बिगाड़ा-अरे, यह क्या है भाई ? चढ़े मुह से उन्होने जग्गी वावू को देखा-अरे, आपके इतने बड़े होटल में दाल भी ठीक से नहीं बन सकती क्या? -जी, क्या हुआ? जग्गी वावू ने झुककर दरयापत किया। -यहां के आप मैनेजर वावू है न"इसे खाकर देखिए न ! गजी चाद वाले ने कहा, और दाल का चम्मच उनके मुह को मोर बढ़ाया । जग्गी बाबू सकते में आ गए। काली आंधी/४६ - ---जी, क्या ? इसे खाइए न ! वे बहुत भद्दे तरीके से वोले । -जी, आप बता दीजिए"जग्गी वाबू ने अपने गुस्से और अपमान को पीते हुए कहा। -~-मैं कहता हूं, इसे खाइए न ! उन्होंने फिर ज़िद की। मालती जी ने उधर देखा और टालने की तरह वे निर्लिप्त हो गई। जग्गी वाबू ने मालती जी को एक पल घूरा और बोले-जी, जो कमी हो, बता दीजिए.. -इसमें नमक नहीं है ! वे विफरकर बोले । तव तक दूसरे सदस्य ने बात संभालने की कोशिश की तो नमक डाल लीजिए न ! -वेयरा ! जग्गी वाबू ने अपमान से सुलगते और खून का चूंट पीते हुए कहा-साहब की दाल में नमक डाल दो ! और वे तेजी से वहां से निकल गए। --अजीव होटल है, भाई ! गंजी चांदवाले वुदबुदा रहे थे--यहां न दाल में नमक पड़ता है, न धी! हुः "और ऊपर से गलती भी नहीं मानते ! -~~-गलती किसीकी नहीं है ! दूसरे सदस्य ने कहा- हमने भी मूंग की दाल के लिए बोला था चौधरी "हमने इधर नमक छोड़ा हुआ है। -~~~-अरे, तो हमारी दाल में नमक तो होना चाहिए न ! गंजी चांद- वाले अपनी रट लगाए हुए थे। -दाल तो एक ही बनेगी न ! दूसरे सदस्य ने बहुत समझाने की कोशिश की। आखिर लल्लू बाबू ने वात बदली-उस बात को छोडिए न चौधरी साहब"यह बताइए, गांवों में बहुत झक मारनी पड़ेगी या कम" मालती जी भी कुछ अटपटा महसूस करने लगी थीं। सारा माहौल बिगड़-सा गया था। खास तौर से मेरे और मालती जी के लिए। ऐसे नाजुक मौके पर कुछ कहा भी नहीं जा सकता था। मैं उठकर भी नहीं जा सकता था। फिर यह भी पता नहीं था कि मालती जी मेरा उठकर जाना पसंद करेंगी या नहीं । शायद नहीं, क्योंकि जिला कमेटी के सातों ५०/काली आंधी सदस्य अपनी-अपनी तरह से बहुत महत्त्वपूर्ण धे-कम-से-कम तव तक, जब तक चुनाव चलने थे। इस तरह के निहायत उजड्ड और सुरदरे लोगों को भी संभालना पड़ता है। ये लोग गाव के कहलाते हैं, पर गांव के रह नहीं गए हैं। कहीं-कही तो यह शहर वालो से भी ज्यादा चालाक और मौकापरस्त हो गए हैं। मौके पर क्या गिरफ्त होनी चाहिए, इसके माहिर ! सिर्फ माहिर ही नहीं, बल्कि मगरूर और दुर्मुख भी "सो फीसदी घाघ! पर हमे तो निभाना था । पुल गए विष के वावजूद लल्लू वाबू अपनी रो मे थे। उन्होंने फिर अपना सवाल दोहराया-हां, तो चौधरी साहब, आपने वताया नहीं, गाव का मोर्चा सभालने के लिए क्या-क्या करना होगा? गजी चाद वाले अव खाने में मशगूल थे। एक सुलझे हुए सदस्य ने बात का छोर पकड़ा । बोले--अब गायों में हाल बहुत बदल गया है। छोटी-छोटी पार्टियों और गैरजिम्मेदार नेताओ ने माहोल विगाड़ दिया है । इन्हीं लोगो की वजह से अब गाव वाले किसी पर यकीन नहीं करते। ----जी, और चालाक भी हो गए हैं । दूसरे ने कहा। --में यह नहीं मानती ! मालती जो वोली-मेरा अनुभव है कि हमारे ग्रामीण अब भी उतने ही भोले है। गैरजिम्मेदार नेताओं से वे जरूर परहेज करते हैं। --आपको वात दूसरी है ! तीसरे सदस्य ने मस्का लगाया लेकिन अब वे किसी को सुनते नहीं । चुनाव के दौरान तो और भी नहीं। -~-हरी मिरच नहीं है क्या ? उन्हीं गजे वावू ने गुहार लगाई। वरे ने भेज पर से सलाद की प्लेट उठाकर उनके सामने कर दी। उन्होंने मिचं उठाकर कुतरी ओर मू-सू करने लगे-बहुत कड़वी है भई"फिर इधर-उधर देखकर वोले- अरे, थोडी कम कड़वी हरी मिचं नहीं है क्या? - अजी, गाव के लोग बहुत बदल गए हैं ! लल्लू बाबू ने तपाक से कहा-और गाव के ही क्या, शहरो में देख लीजिए ! मीटिंग कीजिए तो हजार नखरे करते हैं। वोट देते हैं तो लगता है अहसान कर रहे हैं." -~-आप ठोक कह रहे हैं ! चौथे सदस्य ने कहा । काली याधी/५१ -मैये ! कथा करवाइए, रामायण-पाठ करवाइए तो फौरन आ जाएंगे ! लल्लू बाबू ने अपना पुराना राग पकड़ा-इससे अच्छा प्रचार का साधन और है भी नहीं। क्यों भण्डारी रामनारायण जी ? गांव के इलाकों के लिए एक रामायण वांचने वाले पण्डित जी का इन्तजाम हो सकता है ? -देखेंगे ! भण्डारी ने कहा । -और मिर्जा साहब शहर की सभाओं के लिए कव्वालों का इंतजाम हो जाए तो रंग ही जम जाए ! लल्लू बाबू और उत्साहित हो गए। -क्या बात करते हैं आप ! मालती जी ने झिड़का-आपको भी अजीब-अजीब बातें सूझती हैं ! इतना सुनते ही लल्लू बावू पर पानी पड़ गया। । खाना खत्म हुआ तो सभी लोग अपनी-अपनी स्कीमें बताते हुए चलने लगे । जिला कमेटी के दो सदस्यों ने अपने इलाके में मीटिंग का दिन और समय तय किया । मैं मालती जी को गौर से देखता रहा। जग्गी वाबू बातों के दौरान कुछ देर दरवाजे के पास खड़े रहे थे । फिर जब खाना समाप्त होने लगा तो वे चुपचाप चले गए थे। उन्होंने शायद यह मार्क किया था कि मालती जी की आवाज़ बैठ गई है । चलते-चलते मालती जी ने पीले गुलाब की कली हथेली में दवा ली थी. यह मैंने देखा था और मुझे यह अच्छा भी लगा था। नमस्ते-नमस्ते होती रही और काउंटर के पास से होती हुई मालती जी जब लिफ्ट की ओर चली गई तो जग्गी वावू ने इशारे से मुझे बुला- कर कहा-नमक के गरारे करवा दीजिए। नहीं तो गला एकदम बैठ जाएगा "यहां का पानी भारी है। रात में गले में कुछ लपेट लें या सेक लें तो ठीक रहेगा। तभी बिंदा आया और मुझसे बोला-आपको बुला रही हैं ! ५२ / काली आंधी और मैं ऊपर पहुंचा। मालती जो शाम के प्रोग्राम से बहुत सन्तुष्ट यो । वोली-ठीक रहा। -बेहद ! मैंने कहा। -मिर्जा साहब सव संभाल पाएगे"गुलशेर के मुकाबले ? वे बोली। - लगता तो है" -मेरे खयाल से लल्लू बाबू जो कह रहे थे, उसका इन्तजाम करवा दीजिए. -वो रामायण पाठ वाला?"आपके रुख से उस वक्त तो लल्लू रावू सहम-से गए थे"मैंने कहा --तो यह सब उन्हे सबके बीच कहना चाहिए? ये सब काम तो याप लोगो को अपनी मूझ-बूझ से करने चाहिए"जैसी जरूरत हो, जैसा वक्त हो मैं कहूंगी कि लोगो को जमा करने के लिए रामायण-पाठ कर- वाया जाए? वंसे इधर गाव के लोगो ने राजनीति की परवाह करना जरा कम कर दिया है, इसलिए यह जरिया बुरा नही है । मकसद उन्हें जमा करना है."जरूरत की वात है ! मालती जी ने कहा तो मैं उनको इच्छा समक्ष गया था । सवाल यह नहीं था कि वे क्या चाहती थी, सवाल यह था कि वे 'कसे' चाहती थीं। उनकी बातों में जरूरत' और 'वक्त' शब्द फिर आ गये थे। और में समझ गया था कि अब इस वक्त वे राजनीतिक हो रही हैं। उनकी बातों में 'ज़रूरत', 'वक्त' और 'जीत' शब्द तभी आते थे, जब वे अपने पूरे राजनीतिक रूप में होती थी। मैंने धीरे से कहा-आपका गला पड़ गया है । नमक के गरारे कर लीजिए."सिंकाई करके गले को लपेटे रहिए तो सुवह तक आराम हो जाएगा। यह पुराना नुस्खा आपको सूय याद आया!"देख रही हूं, यहां मेरी देखभाल कुछ ज्यादा हो रही है"मालती जी ने गहरी नजरों से काली बाधी/५३ RA देखा "वे ताड़ गई थीं कि यह नुस्खा मेरा नहीं है। -जी "जी"वो जग्गी वावू ने "मैं हकलाने लगा था। -मैं भी वही कह रही थी"वेअक्ल तो नहीं हूं। कहते हुए वे अपना नाखून कुतरने लगी थीं और एक गहरी सांस लेकर खिड़की की और मुंह करके खड़ी हो गई थीं। यह क्षण बहुत भारी था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं." और कुछ न समझकर मैंने अंचकचाते हुए इतना ही कहा था तो "मैं ... - -नहीं, उन्हें यहां बुलाइए ! मालती जी की आवाज़ सपाट थो- इस सिलसिले को सुलझा लेना ही बेहतर है"उसी सपाट आवाज़ में बोलते-बोलते उनका स्वर कुछ पिघला हुआ हो आया था-~~-आप तो सब जानते हैं गुरुसरन जी''मेरे पास इतना वक्त नहीं है कि इस तरह की बातों में अव पड़ सकूँ. मैं यहां आई हूं चुनावों के लिए -यह तो एक इत्तफाक की बात है ! मैंने जैसे-तैसे कहा था। जो भी सही पर हर वक्त मैं इसे इत्तफाक नहीं बने रहने देना चाहती। मुझे जरूरत नहीं है कि कोई मेरा इस तरह खयाल रखे "मेरी जिंदगी की जरूरत यह नहीं है 'मालती जी ने कहा तो मुझे कुछ बुरा लगा। आखिर यह सब मुझसे कहने की जरूरत क्या थी। बहुत ताकत वटोरकर मैंने कह ही दिया-वेहतर हो, यह बातें आप जग्गी बाबू से करें। कहें तो फोन करके बुला दूं। -बुलाइए मैंने फोन किया-~-जग्गीवावू, एक मिनट के लिए कमरे में आ जाइए। वे फौरन आ गए। वे जब आए तव मालती जी बिस्तर पर बैठी हुई थीं। एकाएक वे उठकर खड़ी हो गई। जग्गी वावू की नज़र उनकी ऊंची- ऊंची पहनी साड़ी पर पड़ी, तो उन्होंने उसे जल्दी से ठीक कर लिया। आंचल को कायदे से कंधे तक लपेट लिया ओर वालों की लटों को भीतर समेट लिया । शायद सबसे भारी क्षण यही था। मालती जी की उंगलियां कांप रही थी और वे अपनी सोने की चूड़ियों को कलाई पर ऊपर-नीचे करती रही थीं । मेरा हलक सूख रहा था। उस तकलीफदेह । ५४ / काली आंधी खामोशी को मैंने ही तोड़ा-आप वैठिए" जग्गी वावू जब मालती जी की ओर देखते वैठ गए, तो बहुत सिमट- कर मालतो जो भी कुर्सी में बैठ गई । अव मेरी समझ मे फिर कुछ नहीं पा रहा था । आखिर जग्गी वावू ने ही उस क्षण भर मे जम गई बर्फ की चट्टान को तोड़ा-होटल में कोई तकलीफ ? कोई शिकायत? मुझे उम्मीद है, आप लोग माराम से हैं ! -मै कुछ और वात करना चाहती थी"मालती जी ने कहीं और देखते हुए कहा। -जी, कहिए ! जग्गी वावू की आवाज़ एक-सी थी। -अगर इजाजत दें तो मैं ""मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ था। --आप रुकिए"मालती जी ने कहा, और में पत्थर की मूरत को तरह फिर बैठ गया। पास रसे पानी के गिलास से एक चूंट लेकर वे वोली-आप जानते ही हैं कि मेरे-आपके रास्ते अलग हो चुके हैं ! जग्गी बाबू ने उन्हे बहुत गौर से देखते हुए कहा-जी, और शायद आप भी यह अच्छी तरह जानती हैं कि मेरे-आपके रास्ते अलग हो चुके हैं। -यह इत्तफाक की बात है कि हम यहा मिल गए हैं ! -जी, यह महज़ इत्तफाक की ही बात है कि हम यहां मिल गए हैं ! जग्गी वावू की आवाज़ एकदम साफ थी । -यह मजदूरी थी कि मैं इस होटल में ठहरी । -~-जी, और इस होटल की मजबूरी यह है कि मैं इसका मैनेजर हूं इस होटल और आपको इस मजदूरी में मैं क्या मदद कर सकता हूं? जग्गी वायू ने वात को समझकर खोलना चाहा था। -मदद मुझे नही चाहिए ! मालती जी ने हल्के स्वर में कहा । -तो आपके खयाल से मैं किसी मदद के लिए इस वक्त आया हूं। -मेरा मतलब यह नहीं था. - बेहतर हो आप बता दें कि आपने किस जरूरत से इस वक्त मुझे बुलाया है"शायद मैं बेहतर जानता हूं कि जरूरत के वगर आपके लिए कोई जरूरी नहीं होता, और वक्त की अहमियत के वर्गर बेवक्त आप - काली आधी/ ५५ को बुलाती नहीं ! --आप इल्जाम ही लगाते जाएंगे ? मालती जी ने कहा -~~यह आप मुझसे कह रही हैं, जबकि मैं जानता हूं कि इस वक्त किसी इल्जाम के तहत ही मुझे बुलाया गया होगा ! जग्गी वाबू ने और वे हथेलियां मलते हुए उठ खड़े हुए। उनके खड़े होते ही मालती जी भी वैठी नहीं रह सकीं। खड़े होते बोलीं-मैं चाहती हूं कि." -~~-आपके चाहने के मुताबिक मैंने हर काम किया है । जो-जो आप वाहती गई हैं, वह-वह होता गया है ! वे बोले थे। -कि' "मेरा और आपका रिश्ता'"यहां के लोगों... -ओह समझा ! यहां के लोगों को न मालूम पड़े ! हुं:."मेरा और आपका कोई रिश्ता है क्या ? मैंने तो लिली तक को कभी इस रिश्ते के बारे में नहीं बताया "क्या आप समझती हैं कि जो बाप अपनी बच्ची से एक टूटे हुए रिश्ते के बारे में छुपाता रहा है, वह औरों को बताता फिरेगा? मालती जी ने वहुत गहरी सांस ली थी और वाथरूम का नॉव दबाकर वे भीतर गुसलखाने में चली गई थीं। जग्गी वायू परेशान और नाराज-से कमरे में चहलकदमी करते रहे थे और वार-बार बाथरूम के दरवाजे की ओर देखते रहे थे। एक मिनट बाद मालती जी छोटे तौलिये से भीगा मुंह पोंछती निकल आई थीं। उनकी आंखों में आंसू अभी भी सुसे नहीं थे। जग्गी बाबू ज्यादा ही भरे हुए थे। एक क्षण वे मालती जी को देखते रहे। जव पलकें झपका-झपकाकर मालती जी ने अपनी आंखें कुछ सुखा ली थीं तो बहुत गहरी सांस लेकर जग्गी वाबू बोले थे-देखो मालती, मेरी वात का बुरा मत मानना'"तुमने हमेशा वह सब लिया है: जो चाहा है ! जो तुम्हें सीधे-सीधे मांगने से नहीं मिला वह तुमने प्यान से हासिल किया; जो प्यार से नहीं मिला, वह तुमने ज़िद से लियाः जो ज़िद से नहीं मिला, उसे तुमने हक से लेना चाहा; और ज तुम हक से कुछ हासिल नहीं कर पाईं, वहां तुमने आंसुओं से सव-य ५६ / काली आंघो - . .

पाना चाहा ! ""प्यार, जिद, हक और आंसू"ये सब मिलकर भी जो तुम्हें नहीं दे पाएगे, वह भी मैं तुम्हें दूंगा! तुम वेफिक रहो"जो रिश्ता कभी था, उसे जो लोग जानते होंगे, वे कम से कम मेरी तरफ से नहीं जान पाएंगे, यह में कर सकता हूं"और यही करूगा। -शायद आप गलत समझ रहे हैं । कुछ झिझककर मालती जी ने कहा था। बहुत रूखी और तकलीफदेह हसी के बाद जग्गी बाबू ने कहा था- जव-जब तुमने कहा है कि मैं तुम्हें गलत समझ रहा हूं, सिर्फ तभी मैंने तुम्हें ठीक-ठीक समझा है"तुम कब क्या चाहती हो, यह तो शायद मेरे सिवा कुछ और लोग भी समझ सकते हैं, पर तुम जो चाहती हो, उसे कैसे चाहती हो, सिर्फ मैं ही समझ सकता हूं !"जग्गी वाबू ने बोलकर गहरी सांस ली थी। मालती जी ने पूरी भरी नजरो से जग्गी वावू को देखा था। जग्गी बाबू ने अब कुछ सहज होकर कहा था-तुम परेशान मत होओ। तुम बहुत बड़ी लीडर हो । मुझे मालूम हैं। इस होटल का मैनेजर हूं । यह तुम्हे मालूम है ! तुम्हें चुनाव जीतना है। मुझे अपना होटल चलाना है। फिर एक क्षण रुककर, जैसे कोई सख्त चीज निगलकर वे बोले थे-आप यहा ठहरी हैं."मेरा और आपका रिश्ता सिर्फ मैनेजर और मेहमान का है सिर्फ मैनेजर और मेहमान का !"अण्डरस्टैण्ड ! "गुड नाइट, मैडम ! और जग्गी बाबू तेजी से दरवाजा खोलकर बाहर निकल गए थे। गलियारे में उनके दूर जाते हुए कदमों की आहट काफी देर तक आती रही थी। .. मुझे अंदाज़ था कि मालती जी इस घटना के बाद दुखी होंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। वे शात थीं। ऐसा नहीं कि उनके आसू झूठे थे या उन्हें पीड़ा नहीं हुई थी"पर इतना ही था कि सहना भी उन्हें आता था और पाना भी। क्या सहकर क्या पाना है, यह वह शायद अदाज लगा काली आधी/ ५७ - ती थीं। हम-आप जैसे लोग सहने और पाने का संतुलन नहीं ते । या तो हमें लगता है कि हमने बहुत सहा है और बहुत कम पाया या कि हमने सहा तो कुछ भी नहीं, खोया बहुत ज्यादा है। मालती जी की विशेषता यही है कि उनमें सहने, खोने और पाने का एक विचित्र संतुलन बना रहता है। ऐसा नहीं था कि लिली की उन्हें याद न आई हो या जग्गी वावू के आने पर वे डावांडोल न हुई हों-पर उस वक्त कुछ उन्होंने सहा या खोया, उसके मुकावले उन्होंने क्या पाया, यह वे अच्छी तरह जान रही थीं."और यह जानना भी उनकी सफलता का एक अहम जरिया था। मैं खुद अंदाज़ नहीं लगा पाता कि वह रात भी कैसी गुज़री होगी, क्योंकि जग्गी वाबू के जाने के बाद उन्होंने कोई बात नहीं की। इतना ही कहा-आप भी जाइए, आराम कीजिए और विंदा को भेज दीजिए।

दो-तीन दिन काम काफी उसडा-उसड़ा चलता रहा। लल्लू बाबू शहर के चुनाव कार्यालयों का दौरा करते रहे । शहर में तनाव है, यह सबरें तो काफी पहले से आती रही थीं। मिर्धा साहब आए तो और बातें मालूम पड़ी। यही कि कुछ लोग खास तौर से बाहर से बुलाए गए हैं ताकि मौका पड़ने पर दगा-फसाद सड़ा कर सकें । मालती जी जरा जल्दी में घी, उन्हें छात्रों को एक सभा में बोलने जाना था, इसलिए हम लोग उनके कमरे से बात-यात करते नीचे उतर आए थे। मिर्जा साहब भी साथ ही थे । ड्राइवर न जाने कहा चला गया था, जब तक विदा ड्राइ- घर को सोजकर लाए, हम काउटर के पास ही खड़े रहे। काउटर के उस पार जग्गी बाबू अपने असिस्टेंट को कुछ समझा रहे थे। मिर्जा साहब ने मालती जी को यों तो सब बता दिया था, पर चलते-चलते फिर याग्रह किया-अगर दंगा हो गया तो गज़ब हो जाएगा "हालत ऐसी है कि किसी भी वक्त झगड़ा हो सकता है। कहते हुए उन्होंने अपना गिलोरी- दान निकाला और मालती जी को पान पेश किया। पान देखकर मालती जी खिल उठी--यह वही घरवाला पान है ? -जी, वेगम के हाथ के हैं ! मिर्जा साहव ने कहा । -वेगम साहिबा बहुत बढ़िया पान लगाती हैं "मजा आ जाता है"गुरूसरन जी, आज आप भी एक खाइए ! कहते हुए उन्होंने गिलोरी- दान से दो पान उठाकर मुह में रखे । तब तक मिर्जा साहब ने तम्बाकू की डिबिया बढ़ा दी-असली जद जाफरानी जो आपने उस दिन वोला था। -अरे, यह उर्दा आपने मगवा भी लिया ! -~-एक दुकान है यहा, सिर्फ उसीके यहां मिलता है। अपने काम पर अपनी पीठ ठोकते हुए मिर्जा साहब ने बताया। -वाह ! वाह ! कहते हुए मालती जी ने चुटकी भरी। काउटर के उस तरफ से जग्गी वायु की नजरें अकस्मात् मालती जी काली आधी/५६ र उठीं.."मालती जी ने भी शायद उस तरफ देखा था और उनकी को जर्दा दवाए हुए उसी तरह चिपकी रह गई थी"शायद एक सहज च के कारण। मुझे याद है, जब बहुत पहले एक वार मालती जी ने ज़र्दा खाया तो जग्गी बाबू ने कहा था-जर्दे की महक मुझे अच्छी नहीं लगती। के लिए जर्दा खाने की आदत मत डालो.. मेरा ध्यान उनकी चुटकी की ओर ही लगा रहा था और मैंने देखा था, जब वे कार में बैठी थीं, तो उन्होंने चुटकी खोलकर जर्दे को गिरा दिया था, और मुझसे कहा था-गुरुसरन जी, आप भी इसीमें आ जाइए । रास्ते में उतर जाइयेगा । जरा पुराने वाज़ार एरिया की आव- हवा तो पता लगाइए । पूरी रिपोर्ट लाइए ! दा कार ने मुझे आधे रास्ते छोड़ दिया था। मैं उधर से घूमता-घामता पुराना बाजार एरिया पहुंचा था । तनाव सचमुच था। वह इलाका भी सा ही था। नानवाइयों की दुकानें और मामूली काम करने वालों के धे । वे-पढ़े-लिखे लोगों का इलाका। यही-दी, ताले और छाते बनानेवाले । चमड़े का काम करनेवाले, वगैरह। वहां के लोगों से मैंने हालत दरयाफ्त की। मालूम हुआ कि यों तो सव शांत दिखाई देता है पर जब जुलूस निकलते हैं तो तनाव बढ़ जाता है । जुलूस में हमेशा कु चेहरे ऐसे नजर आते हैं जो इलाके वालों के पहचाने हुए नहीं हैं । पर नहीं, ये लोग कहां से आए हैं। मैंने सोचा, थानेदार को आगाह करता जाऊं। एकाध कांस्टे अगर पोस्ट कर दिया जाए तो काफी होगा । जगह-जगह लगे और दीवारों पर चिपके पोस्टरों से लग रहा था कि इस इलाके में शेर अहमद का काफी जोर है। हमारे दफ्तर पर कुत्ते मूत रहे थे बुजुर्ग मियां टीन की कुरसी पर बैठे अखवार पढ़ रहे थे। ये भी सपोर्टर नहीं थे, इन्हें रोजनदारी पर पचियां वगैरह बनाने के लि - | काली मांची किया गया पा। दरयाफ्त किया तो बूढ़े मिया जी ने बताया- कल शाम कुछ हुड़दगा हुआ था, सो डर के मारे चारों कारकुन अपने-अपने घर भाग गए हैं । कोन लौटकर आएगा, कौन नहीं, कुछ पता नहीं है। -~मुझे दिन के पैसे भी नहीं मिले हैं। मिया जी ने कहा । -~जब काम ही नहीं हो रहा है तो पैसे कैसे ? मैंने कहा । -~~यह खूब रही ! मैंने ईमानदारी से सिर्फ आपकी तरफ का काम करा । इसका नतीजा यह कि मेरे पैसे भी गोल ! जो दोनों तरफ का काम करते हैं, वे ही मजे में हैं। आपसे भी पैसा पाते हैं और उनसे भी।"मियां जी ने जरा नाखुशी से बात कही-मैं दो दिन से इंतजार कर रहा हूं । रोटी तक खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं । पूधिए रामबरन से, अठन्नी उधार लेकर कल शाम को रोटी खाई थी... -~-आपके पैसे आपको मिल जाएगे" .."पर ये दोनों तरफ का काम... -जी, और क्या? छुट्टन और वद्री दोनों गुलशेर साहब की पचियां भी बांटते हैं और आपकी भी ! किसी को इससे क्या लेना-देना कि कौन जीतता है, कौन हारता है। हमे आपकी सियासत से क्या ? हमें तो काम चाहिए कि चार पैसे मिलते रहे और पेट भरता रहे । मेरा तो जिस्म नहीं चलता, नहीं तो मैं भी गुलशेर साहब का काम उठा लेता ...मैंने बूढ़े मिया के हाथ पर पाच रुपये रखे तो उन्होने कहा-टूटा रुपया तो मेरे पास नहीं है । दो दिन के चार रुपये हुए ! -रखिए"रखिए"कहता हुआ मैं मेन बाजार का हाल लेने चला गया। सवर अच्छी नहीं है, यह मैने लौटते ही मालती जी को बता दिया पा । शहर के असबारो मे भी पिछले दिनो से छिटपुट गाली-गलोज और मारपीट की वारदातो की खबरें आ रही थी, जो चुनाव की सरगर्मियो का तापमान बताती थीं। लल्लू वायू बराबर शहर का दौरा करते रहे और चौथे दिन सुबह से ही बुरी खबरें आने लगी । पुराने बाजार एरिया काली आधी/६१ - - र मारपीट हो गई थी। पांच-सात लोग घायल भी हो का कहना था कि मिर्जा साहब के मुहल्ले में मालती जी की जो र मीटिंग हुई थी, उसके बाद गुलशेर अहमद के पैर-तले की ज़मीन क गई थी। इसलिए वह इन हरकतों पर आमादा था। हम सब नि बैठे हुए थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। लल्लू वायू मालती के पास गए हुए थे। मैं भी चुनाव कार्यालय से निकलकर मालती जी कमरे की ओर चला तो गेट के पास जग्गी वाबू मिल गए। उन्होंने जाक में ही पूछा-कहिए गुरूसरन जी, आपके वालंटियर तो सही- लामत हैं ? मैं एक मिनट के लिए रुका ही था कि लल्लू बाबू लिफ्ट से निकल- कर तेजी से मेरे पास आए और बोले-भइये, मालती जी ने अभी तय किया है कि वे दंगाग्रस्त इलाके में जाएंगी"वहां के लोगों से मिलेंगी." आप सब लोग तैयार रहिए"सब लोग साथ जाएंगे." -लेकिन वहां जाना ठीक होगा? मैंने यूं ही पूछा-खतरा बहुत हो सकता है ! -खतरों से डरते हैं तो पालिटिक्स में क्यों आए हो भइये ! लल्लू वाबू ने अपने लहजे में कहा और लपकते हुए कार्यालय की ओर चले गए। मैं ज़रा चलूँ ! कहकर मैंने जग्गी वावू को वहीं छोड़ा और ऊपर चला गया। . - फोन खड़कने लगे और यह खबर उन सब लोगों को दे दी गई, जो भी फोन पर मिल सकते थे, कि मालती जी दंगाग्रस्त इलाके का दौर करेंगी "वे एक जुलूस का नेतृत्व करती हुई जाएंगी, इसलिए जो आ पाएं, यहीं होटल में जमा हो जाएं। देखते-देखते खासी भीड़ जमा हो गई। छोटे-मोटे लोग तो , कार्यालय के पास ही खड़े रहे, पर जो खास थे, वे मालती जी के व और बरामदे में जमा थे। जगतसिंह ने लाठियों में झण्डे पहना दिए भीड़ को जुलूस के रूप में चलने का तरीका समझा दिया था। ६२ / काली आंधी मनसा वाज वायू यशानसमालपार भव्हल ह। मैंने जाकर पूछा-जग्गी वावू, क्या बात है ? -कुछ नहीं ! कहकर वे लिपट के पास खड़े हो गए थे। तभी मालती जो चार-पांच लोगों के साथ निकली थीं। लल्लू बाबू से उन्होंने इतना ही कहा था-इन लोगों को भी बता दीजिए जरा. और लल्लू बाबू ने सबको रोक लिया-मुनिए, सुनिए "और पंद्रह-बीस लोगों का वह मजमा जो मालती भी के लिए रुका हुआ था, लल्लू बाबू के गिदं जमा हो गया था। मालती जी लिफ्ट में चली गई तो जग्गी वाबू भी एकाएक उसी में घुस गए थे। लिफ्ट नीचे जा रही थी और जग्गी वाबू ने बहुत हिचकते हुए मालती जी ने कहा था-वह इलाका बहुत खतरनाक है। मेरे खयाल से आपको वहा नहीं जाना चाहिए ! मैं अपने को रोक नहीं पाया इसलिए कह रहा हूं ! यू मुझे कोई हक नही है कि कुछ भी कहूं या राय मालती जी की आखें छलछला आई थी। उन्होने आदत के मुता- चिक पलको को झपका-झपकाकर आमू सभालने की कोशिश की थी." पर न संभाल पाने के कारण अपने हैण्डवैग से धूप का चश्मा निकाला था और चुपचाप लगा लिया था । शायद इसलिए कि जग्गी वावू उनकी आखो मे आए आमुओं को न देख पाएं। लिफ्ट से निकलकर जग्गी वावू सीधे अपने केविन में चले गए थे। मालती जी लॉबी में पहुंची थी, तो वाहर खड़े लोगों ने उन्हें घेर लिया था। छोटे-से जुलूस की तैयारिया थी। काली आंधी/ ६३ - थीं। जुलूस आखिर जव सव जमा हो गए तो लल्लू वावू ने नारा लगाया- हिंदू-मुस्लिम ! भीड़ ने साथ दिया-भाई ! भाई !! और वह छोटा-सा जुलूस चल दिया। कुछ लोग साइकिलों पर थे। मालती जी व हम लोग जीप पर थे। लल्लू वाबू ने पुख्ता इंतजाम कर दिया था। वस्ती के पास तक आकर मालती जी जीप से उतर पड़ी की भीड़ भी कुछ मिनटों में ही पास आ गई थी। वहां पर कुछ लोग मिर्ज़ा साहब के साथ इंतजार कर रहे थे। कुछ देर वहां बातचीत होती रही । एक कार्यकर्ता ने सुझाया-पुलिस का इंतज़ाम रहे. तो ठीक है ! सुनते ही लल्लू वावू भड़क गए-भइये ! क्या बात करते हैं आप? मेरे साथ नारा लगाइए-मालती जी! वे सज्जन चीखे--जिंदावाद ! लल्लू वावू चीखे-हिंदू-मुस्लिम ! मिर्जा साहब और भीड़ ने साथ दिया-भाई-भाई ! और जुलूस चल दिया। मालती जी के आगे-आगे मिर्जा साहब और लल्लू बाबू थे-~-कुछेक लोग और, जो उसी मुहल्ले के थे। हम पुराने बाजार एरिया में घुसे तो तमाम लोग तमाशबीनों की तरह दोनों तरफ जमा थे । जुलूस पुराने बाजार में अपने चुनाव कार्यालय पर आकर रुक गया। बूढ़े मियां ने फौरन टीन की कुर्सी मालती जी के लिए हाजिर की। मिर्जा साहब ने मोर्चा संभाला-हाज़रीन !"आज मालती जी खुद आप सबसे मिलने और कुछ कहने आई हैं। कल से, जव से इन्हें पता चला कि बदमाश गुण्डों ने यहां मारपीट की है और भाइयों-भाइयों में तफरका फैलाने की कोशिश की है, तब से मालती जी बुरी तरह बेचैन है."यह काम उन जाहिल और फिरकापरस्त लोगों का है जो इन्सानी कीमतों को धूल में मिला देना चाहते हैं "गरीब और उन भूखे लोगों को, ६४ / काली आंधी फा-४ यो जिंदगी की जद्दोजहद में अपना खून-पसीना बहा रहे हैं, ये वहशी लोग उन्हें खूखार जंगली जानवरो में बदल देना चाहते हैं ताकि वे आपस में लड़ते रहें, अपने भाइयो की गर्दनें काटते रहें और उन लोगो के खिलाफ न उठ सड़े हों जो सचमुच इनका खून चूसते हैं "गरीबो का खून चूसने- वाले तबके की यह साजिश है कि गरीव एक न होने पाएं" तभी उस छोटे-से मजमे में सनसनी-सी हुई। लल्लू बाबू कल की मारपीट में घायल हुए, पट्टी वाघे, दो लोगो और एक बच्चे को लिये हुए चले आ रहे थे। उन घायलो को उन्होने फौरन मालती जी के सामने पेश किया"मालती जी उन लोगों के साथ खड़ी-खडी कुछ वातें करती रही । प्रेस फोटोग्राफर भी आ गया था, उसने तस्वीरें उतारी और मिर्जा साहब बोलते रहे-इन्हें देखिए! इस बच्चे को देखिए"इस मामूम ने किसका क्या बिगाड़ा था? मिर्जा साहब ने घायलों की ओर इशारा किया-मैं कहता हूं"यह वहशीपन हमारे शहर में नहीं चलेगा" हमारे सूबे में नहीं चलेगा"हमारे मुल्क में नहीं चलेगा! हम उन ताकतों से लडेंगे, उन वहशी ताकतो से टक्कर लेंगे जो यह यह घिनौना और जलील सेल खेल रही हैं।" तभी कुछ शोर मचा। कुछ नारे मुनाई दिए-चन्द्रसेन I जिदावाद ! गुलशेर अहमद ! जिंदाबाद ! कुछ हलचल-सी हुई । कुछ लोग घबराए । गली के मुहाने की तरफ से चन्द्रसेन और गुलशेर अहमद के सपोर्टर मिला-जुला जुलूस लिये चले आ रहे थे । गली मे भीड़ बढ गई थी। हमारी चल रही सभा के पास आते ही उन विरोधियों ने नारे लगाने शुरू किए- यह भूठा नाटक ! बंद करो, बद करो! हम लोगों को भी जोश आ गया था । हमारे सपोर्टर उनके विरोध में नारे लगाने लगे-- चन्द्रसेन ! मुर्दाबाद ! गुलशेर अहमद ! मुर्दावाद ! तब तक उन लोगों की तरफ से नया नारा आया- काली आधी/ ६५ आलती मालती! वस्ता क्यों नहीं बांधती ! जनता तेरे खिलाफ है ! कहना क्यों नहीं मानती ! और वे लोग इस नारे को कीर्तन की तरह जोर-जोर से गाने लगे। इधर से भी जोश लहरा आया- चन्द्रसेन ! दलाल है ! गुलशेर अहमद ! कलाल है ! नारों का यह युद्ध कुछ देर चलता रहा और जोशो-खरोश में हाथापाई हो गई । पत्थरबाजी हुई। भगदड़ मची और चीख-पुकार के साथ सब कुछ तहस-नहस हो गया । मालती जी एक पत्थर से जख्मी थीं। बूढ़े मियां भी अपना कमज़ोर घुटना पकड़े वहीं चबूतरे पर पड़े विलविला रहे थे । मालती जी को हम लोग भीतर कोठरी में ले आए थे। लल्लू बाबू ने फौरन अपने झोले से कपड़ा निकालकर पट्टी फाड़ी और मालती जी के सिर पर वांध दी गई। पुलिस भी आ गई थी। गली में सन्नाटा छा गया था। पत्थर और ढेले जहां-तहां पड़े थे । कुछ चप्पलें और टूटे हुए डंडे पड़े थे। दुकानें चट- पट बंद हो गई थीं। पटरी पर बैठने वाले छोटे-मोटे कारोबारी लोग अपनी चीजें समेटकर इधर-उधर तितर-बितर हो गए थे। कोठरी से हम लोग बाहर निकले तो बूढ़े मियां को दीवार का सहारा लिये कराहते देखा, तो लल्लू बाबू ने नुस्खा बताया-भइये, आप इसपर कड़वे तेल को गरम करके मालिश कर लें... और मालती जी को लेकर हम होटल लौट आए थे यों भीड़ तो कम हो गई थी, पर जो भी सुनता कि मालती जी के चोट लगी है, वह मिलने और देखने चला आ रहा था । खासा झमेला ही हो गया। लल्लू बाबू सबको बता रहे थे--कोई तरीका है भइये ! अमन की सभा में वदअमनी! आप ही बताइए, यह कोई तरीका है, भइये! जग्गी बाबू को मैंने बताया था कि मालती जी के चोट आ गई है। यों भी उन्हें पता चल ही जाता । सिर पर पट्टी बंधी सबने देखी थी। ६६ / काली आंधी मिलनेवालों की भीड़ टूट नहीं रही थी । आसिर हमने लोगों को रोकना शुरू किया । जग्गी बाबू दो बार लौट चुके थे। मालती जी के बाहर वाले कमरे में भीड़ यी, और बेडरूम में भी आदमी से हुए थे। आखिर शाम के बाद तावा टूटा । साना वहीं बेडरूम में मंगवा लिया गया। जग्गी बाबू तीसरी बार बाए तो बेडरूम में कुछेक लोगी को देखकर बाहर वाले कमरे में ही इतजार करते रहे. लल्लू बाबू अव अपने पूरे रग में थे। सारी कारवाई का सेहरा अपने सिर वापते हुए बोले-अब बताइए, कंसी रही ! मालती जी धीरे से मुस्करा दी। कुछ बोलते-बोलते रुकीं । फिर कहने लगी-सल्लू बाबू, हुआ तो सब ठीक ही "लेकिन.. देखिए, चुनाव का मामला है, इसमे लेकिन वेकिन नहीं चलता। हां ! हर काम तय करके ही किया जाता है."मैंने पहले ही बद्री को सब बता दिया था"जब तक बापके चोट नहीं लगती, हगामा चलता रहता! हा"लल्लू बाबू ने कहा तो मैंने टोका-मान लीजिए, चोट यादा ही बा जाती तो... -~-अरे भईये, तुम अभी बच्चे हो । कडे बोट ज्यादा का जाती' जितनी चोट तय की गई पी, उतनी ही वा सकती थी !'सल्लू बाबू ने मुझे फटकार दिया या। में चुपचाप बाहर वाले कमरे में चला आया था। जग्गी वावू सक्ने में खड़े थे। मैंने उनकी बाह पर हाथ रखकर भीतर चलने और मालती जी को देस लेने के लिए इशारा किया, तो उन्होने इशारे से कह दिया- नही, अव नहीं" और दुगी-से, वाश्चर्यचक्ति-से कमरे से निकलकर वे अपनी टेरेम गए ये। मैं भी चुपचाप नीचे कार्यालय में चला नाया।न किसी बात को एशी थी, न संतोप । अगर कहूं कि मलाल था, तो वह भी गलत होगा। मलाल भी नहीं था। इतनी ज्यादा सन्चाई वरती भी नहीं जा सकती। शायद जग्गी वावू के सामने वाव गुल जाने से ही मुझे कुछ दुःख हुआ या । नहीं तो, बहुव-सी बातो के लिए यो भी बास लपेटनी पड़ती है। पर चले काली यांधी ६७ खैर, जो हुआ, सो हो गया था। कुछ देर बाद लल्लू बाबू भी आ गए । वे जीत के नशे में थे । इसी वक्त लाला दीनानाथ का एक आदमी आ गया। आते ही उसने कहना शुरू किया--मिर्जा साहब के मुहल्लेवाली सभा में मालती जी ने जो कुछ लाला दीनानाथ के लिए कहा है, वह अच्छा नहीं हुआ है ! -क्या अच्छा नहीं हुआ है, भइये? लल्लू बाबू ने बीच में टोका । -यही कहना कि लाला जी जातिवाद के सहारे इलेक्शन लड़ रहे --तो और क्या कहा जाता ? आप ही बताओ, भइये ! लल्लू वावू बोले। -कुछ भी और कहा जाता! -अरे भइये, लगता है तुम बुरा मान गए हो" -~लालाजी ने बहुत बुरा माना है" -~-पहला इलेक्शन लड़ रहे हैं न लाला जी, इसीलिए ! दूसरा- तीसरा लड़ेंगे तो बुरा मानना छोड़ देंगे। समझे भइये ! इलेक्शन का धर्म यही है कि सब-कुछ कहा जाए, पर कही बात में कभी विश्वासन किया जाए "समझे भइये ! -लेकिन यह तो और भी गलत बात है ! उस आदमी ने कहा। -आप नहीं समझोगे "भण्डारी जी, इन्हें एक अठन्नी दो भइये ! आप जाके एक गिलास दूध पिओ और आराम से सो जाओ जाके । यह चक्कर आपकी समश से परे है"हां" कहकर लल्लू वावू लेट गए- और हमें भी सोने दो "समझे भइये ! वह आदमी अपमानित-सा उठ गया । उसके जाते ही लल्लू बाबू ने अपनी मिक्सचर की शीशी निकाली और आदतन उसे हिलाकर एक खुराक पी गए। ---यह मिक्सचर तो उसी रात खत्म हो गया था, लल्लू बाबू" आपने तीनों खुराफें पी ली थी। डाक्टर के यहां भी नहीं गए । यह शीशी -- - ६८ / काली मांधी फेर कसे भर गई ? मैंने पूछा तो लल्लू बाबू निश्छल हंसी हसे और ले-भइये, तुम भी एक खुराफ पी लो, तबियत हरी हो जाएगी !" चरा नमकीन का इंतजाम करो भइये! कहते हुए उन्होंने दूसरी खुराक पर गूठा लगाया और उसे भी पी गए । फिर दात चूसते हुए बोले- या करें भइये, अपन लोगो की जिंदगी ही ऐसी है इस जिंदगी का गुरुमन है-हर काम करो, पर उसकी शक्ल बदलकर करो"समझे, नइये! में लल्लू बाबू को शायद अब ज्यादा अच्छी तरह समझने लगा था। भण्डारी ने बताया कि उन्होंने रामायण वाचनेवाले पडित जी का प्रवन्य कर दिया है । दूसरे दिन दोपहर को ही एक जीप से लल्लू बाबू ने डित जी को पूरे तामझाम के साथ सिहोर गाव पहुंचा दिया था। मुसिया जी ने रामायण-पाठ की सबर अपने गाव तथा आसपास के गाव के लोगो को पहुचा दी थी। मौली, पान, सुपारी, तुलसीदल, प्रसाद और हवन की पूरी सामग्री का इतजाम लल्लू वादू ने कर दिया था। कालो भागो - -- हम जब मालती जी और विदेशियों के साथ गांव पहुंचे तो रामायण-पाठ समाप्त हो चुका था। हवन चल रहा था। विदेशी यह सब देखकर बहुत खुश हुए थे और सब बातों को जानने में लगे थे। पंडित जी भी समझदार निकले । मालती जी को देखते ही बोले-~~मया, आप वहुत भागवान हैं "भगवान की इच्छा के वगैर उनकी पूजा में कोई सम्मिलित नहीं हो पाता ! इन सवका और आपका भाग्य एक डोर में बंधा है ! कहते हुए उन्होंने जमा हुए गांववालों की ओर इशारा करते हुए मालती जी से कहा-आइए, हवन कीजिए ! -इनसे भी हवन करवाओ? लल्लू बाबू ने विदेशियों की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा । मैंने विदेशियों को बताया कि वे चाहें तो हवन में शामिल हो जाएं । मालती जी ने तबतक उनकी हथेलियों में हवन- सामग्री थमा दी और विदेशी भी हवनमें शामिल हो गए। गांववाले गद्गद हो गए । जो इधर-उधर थे, वे भी जमा हो गए। गांव की औरतें कौतुक से चूंघट दवा-दवाकर यह अद्भुत दृश्य देखती रहीं और गांव भर में मालती जी के इस करिश्मे की तारीफ फैल गईअरे, वो तो अंग्रेज से भी हवन करवा लेती हैं ! साक्षात पार्वती हैं... हवन के बाद पंडित जी ने जयकारा लगाया-बोल सियावर राम- चंद्र की"जय ! भीड़ ने उत्साह से साथ दिया। और पंडित जी के जयकारे समाप्त होते ही लल्लू बाबू ने अपना लगाया-वोल मालती जी की- -जय ! भीड़ ने उसी तरह साथ दिया। गांव हमने सर कर लिया था। अब मीटिंग में कुछ रखा नहीं था। जो काम होना था, वह हो चुका था। विदेशियों के आने और हवन में उनके शामिल हो जाने का असर पर लगाकर गांव-गांव चल पड़ा है, इसका अहसास हमें वहीं होने लगा था, क्योंकि सिहोर के पास के गांवों के लोग भी रामायण-पाठ में आए हुए थे हम कोई मौका चूकना नहीं चाहते थे । प्रसाद खूब बांटा गया और लल्लू वायु की अपल की दाद देनी ही पड़ी । वे गंगाजली में तुलसीदल डाले आचमनी लिये सबको चरणामृत बांट रहे थे और कहते जाते थे- . - भगवान का चरणामृत साक्षी है"हमारा साथ देना ! सोगद है ग्रम जो की ! मूलना मत! और फिर जमकर सभा हुई। गांव वाले मूखा-पानी से तो इतने दुसी नहीं थे, पर शहर के सरकारी अमलों और साऊ लोगों से कुठे हुए थे। मालती जी ने हवा का रख देखकर ही मीटिंग में भापण दिया। वैनिक स्कूल को एक मेज लगाकर मच बन गया था। स्कूल से ही कुसिया भी आ गई यो। मालती जी, विदेशी पतिपि, लल्लू बाबू, मैं और भण्डारीत्री कुसियों पर जमे हुए थे। मुसिया भी हमारे साथ ये । जगतसिंह अनता में बैठे थे। मालती जी ने सरकारी कमलों और वेईमान पटवारियों, नायब तहसीलदारों और बी० डी० बी० के बारे में सुलकर बातें की। उन्होंने कहा- मुझे मालूम है कि गावा-जैसी ईमानदारी शहरों में नहीं है । मुझे यह भी मालूम है कि जब आप गाववाले मुश्किलें लेकर कोर्ट- कचहरी या सरकारी दफ्तरों में जाते हैं तो वहा के छोटे-छोटे चपराती और वायू लोग पंसा बर्गर लिये नापका काम नहीं करते । आपको परेशान करते हैं । जगह-जगह ऐसे घ्रप्टाचारी, ऐसे खाऊ लोग घुस गए हैं "हम इनका सफाया करेंगे, पर इसका मठलव यह नहीं कि आप सब पर शक करें। ईमानदार लोग भी हैं जो आपकी सेवा करना चाहते हैं, जो इस प्रप्टा- चार और सामने को खत्म करना चाहते हैं देखिए ! पांचों अगुलियां वरावर नहीं होती "कहते हुए मालती जी ने अपना हाय उठाकर बात समझाई भीड़ में बैठे जगतसिंह ने वाली बजाई और पूरी भीड़ ताली बजाने सगी। बगल में बैठे विदेगी ने जानना चाहा कि मालती जी ने क्या बात रही है तो लल्लू बाबू ने बाघी बग्रेजी योर आयो हिन्दी में उसे सम- झापा--पी टोल्ड, हाय की सव अगलिया बाल फिंगसं बार नाट बरावर ""ईसकुन ! हमारे बीच बुरे बादमी, बंड पीपुल भो हैं और गुड पोपुल भी हैं। अभी मालती जी का हाय उठा हना ही था कि भीड़ में से एक बूढ़ा पागल-सा बादमी उठकर बोसा-इंकोलाव"जिदाबाद ! और काली आधी/७१ नारा लगाने के बाद उसने कोर पकड़ने की तरह अंगुलियों को मिलाया और वहीं से मालती जी से बोला -पर देखो, खाते वखत सव बरोबर हो जाती हैं ! और वह बूढ़ा पागल-सा आदमी अपनी अंगुलियों को मिलाए भीड़ को दिखाता रहा- हां! ऐसे खाते वखत वरोवर हो जाती हैं !"ई आई आर, वीवीसी आई.यानी रामप्रसाद बिस्मिल ! उस पागल-से बूढ़े की प्रतिक्रिया देखकर सब गांववाले हंसने लगे। विदेशी ने बहुत उत्सुकता से जानना चाहा कि बूढ़ा क्या कह रहा है, तो लल्लू बाबू ने समझाया-~-वह कह रहा है"ही टोल्ड "कि हम सब आप के साथ हैं, जैसे ये मिली हुई अंगुलियां हैं "लाइक दीज ज्वाइन्ट फिगर्स । वी आर टुगेदर'"जोश में आकर विदेशी ने ताली बजाना शुरू कर दिया ! उसने अपने साथियों को भी बताया तो वे भी ताली बजाने लगे। मालती जी ने तनिक परेशानी से उन लोगों की ओर देखा और खुद भी ताली बजाने लगीं। लल्लू बाबू ने भी साथ दिया, और भीड़ भी तालियां बजाने लगी । जगतसिंह उस बूढ़े पागल-से लगते आदमी को लेकर भीड़ से निकल गया। उसका सभा में बैठना खतरनाक था। एक क्षण वाद मालती जी ने सबको शांत करते हुए कहा-ये विदेशी दोस्त भी कितने खुश हैं, आपने देखा । ये खुश हैं कि हमारे यहां हर आदमी को अपनी बात कहने की छूट है और हम सब साथ हैं." कि आप सब हमारे साथ हैं."यही हमारी ताकत है ! हम आपके हैं और आप सब हमारे ! मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि आपकी परे- शानियां हम खत्म करेंगे लेकिन यह तभी हो सकता है जब आप इसी तरह हमेशा हमारा साथ दें जैसे आज दिया है । जय हिंद ! सभा समाप्त हुई तो सव बहुत खुश थे । ज़रा ज्यादा ही खुश थे। उस बूढ़े पागल-से आदमी के बारे में पूछने पर पता चला था कि वह पुराना गांधीवादी है। अब पागल हो गया है और गांव-गांव घूमता रहता है, अपनी सायकिल पर । सबसे लड़ता-झगड़ता रहता है । नेताओं या ७२/ काली मांधी - हुक्कामों को देखता है तो पाने को दौड़ता है। लोगों ने बताया कि यह तो गनीमत हुई कि उसने इस सभा में गड़बड़ नहीं को। नहीं तो यह सरे-आम इरजत उतार लेता है। उस पागल-बूढे की शक्ल मुझे लोटते हुए वरावर याद आती रही पी। रास्ते भर में उसके बारे में सोचता रहा था । बाहिर पके हारे हम वापस पहुंचे । लल्लू बाबू के चेहरे पर विजय को चमक पौ-हमने कहा था नभईये, रामाय ग-याउ करवाओ ! वर शहर में कमाली-पाठ भी हो जाए तो समझो, पूरा मैदान मार लिया । अव सिहोर गाव तो सालिड हो गया ! हो गया मालिड या नहीं?.."फिर आस दवाते हुए उन्होंने कहा- भाइये, घोड़े नमकीन का प्रबंध हो जाए तो... विदेशियों का डिनर था । हम लोगों को वहा वो नही साना था, पर तैनात तो रहना ही था। कुछ और लोग भी थे ही । बावजूद इसके कि मालती जी ने मना कर दिया था । पानी ऐसे लोग ही थे जो बिलकुल नापसी के माने जा सकते हैं या जिन्हें वापसदारी के घेरे में हमे समे- टना पा। जाम मा गए पे और सब विदेशियों ने मालती जी के स्वास्थ्य और विजय की कामना के साथ जाम टकराए। मालती जी की एक विशेषता यह भी है कि हर तरह के माहौल में खप जाती हैं । मालती जी ने अपना जाम उठाते हुए बड़ी गालीनता से उनको शुभ कामनाएं स्वीकार को । यातें चलने लगी, यही कि भारतीय जनतंत्र अब पुल्ला नीव पर खड़ा है। भारत के नेताओं का गांववालों से बड़ा गाढ़ा सम्पर्क और सम्बन्ध है । भारत ने एक नई वाला दुनिया को दी है । सब खुश और मस्त थे। मालती वो भी घूट भरती जा रही थीं । ताज्जुब पा कि लल्लू वायू सुपचाप मेरे साय पड़े थे। तभी जग्गी बाबू एकदम मुक्त-से भीतर बाए पे और विदेशी मेहमानों के नेता के पास आकर पूछने लगे ये- होप यू बाल आर इज्वाइग वेल! नो कम्पलेंट सर! । काली यांपो/७३ 'ओह नो ! एवरी थिंग इज जस्ट फाइन !' विदेशी ने कहा था। जग्गी बाबू के आते ही एक बात हुई थी। मालती जी का हाथ एकाएक अपने जाम तक गया था और उन्होंने अपना गिलास अनजाने ही कुर्सी के किनारे छुपा लिया था। मैं जानता हूं, यह परहेज़ के कारण नहीं था पर जग्गी बाबू के होते वे एक सहज संकोच से भर गई थीं। पता नहीं क्यों, सब बातों के बावजूद यह संकोच मुझे प्यारा लगा था। जग्गी बावू ने भी इस संकोच को भांप लिया था और वे बेयरों को समझाकर जल्दी से जल्दी उस कमरे से निकल गए थे। उसके बाद मालती जी कुछ बुझ-सी गई थीं...अपने भीतर ही भीतर। उसके बाद उनका जाम वैसे का वैसा ही सामने रखा रहा था, और उनकी आंखें जव-तव उस दरवाजे को ताक लेती थीं जिससे जग्गी वाबू आ सकते थे। लेकिन जग्गी वाबू बहुत समझदार आदमी हैं । जब तक खाना-पीना चलता रहा, वे नहीं आए। हां, लल्लू बाबू ने भी अपना काम कर लिया था। उन्होंने अपनी खुराक-लगी शीशे में दवा भरवा ली थी। एक कागज़ में कुछ काजू लपेटकर मेरी जेब में ढूंस दिये थे...भइये, थोड़ा-सा नमकीन है ! और गायव हो गए थे। - ७४/ काली आंधी सुबह हन तो बदवारों का देर रमाया । हुन बानी नोटिंग की सिर्ट देन रहे थे। कुछ पत्रों में हमारी निस्तित जीत की भविष्य- वागी यी । कुछ में सिखबर थी। दो अखबारों में बंद नदी रिपोर्ट बाई या। समझ में नहीं आता था कि इतनी झूटी बार गलत बातें करें गढ़ी जा सकती थी। लल्लू बाबू बहुत उत्तेजित कल गान को पार्टी में उम मरिमल ने आदनों को दंदा या नवी दहजो नगर की तरह पी रहा था। यह कारस्तानी मी की है" रिपोर्ट में बेमिसर के इलजान लगाए गए थे-नाली त्रों के चुनावबड्डे-गोल्डन मन में गगव और मत्राव भरी रगीन रात' यह तो तय था कि यह मब विरोधियों ने लिखवाया है, पर दे इतनी गंदगी उचालेंगे, इनका चंदा नहीं था। रिसोर्ट में आने कहा नया या कि मालती जी ने चुनावों में जीवन के लिए गयर के इन दलवा दिया है। होटल गोल्डन मन में गराव की नदियां बढ़ रही हैं"इतना ही नहीं, होटल गोल्डन सन पिछले दिनों से गवार का बड़ा बन गया है जहा मालती जी का माय देने का वचन देने वालों को रगीन गर्ने मुजान्न की सब मुविधाए दी जाती हैं !"और यह मन कान मारती जी के पूर्व पति जगदीय वर्मा के परिव हो रहा है। बगीय वर्मा ने अनावशाली व्यक्तियों को जीतने के लिए होटल को चल में बदल दिया है"धार बजे रान के बाद होटल में दही लोग कुन सकते है, जिनको मनगट में इजाजत मिल जाती है। इतना ही नहीं, मालती जी के कारकुन मांड कल गाम को वैश्याओं के मुहल्ले में घूमते हार देन मा। यह पढ़ते-पढ़त लल्लू बाद यग्यरा गर यह नव वदान है ! जब आप लोग होटल की तरह लौट रहे थे तब निजी साहब के घर चला गया था और निडा माहब के आदमी के माय में कब्दाली गानंदानी मलींना वेगन को तय करने गया या दिन मिनट में हम लान लोट बाट ये बार ये दरानजादा यह मव लिद रहा है नहब ! राजनीति इतनी काला यावी/७५ गंदी हो गई है, यह नहीं पता था" चुनाव कार्यालय में अजीब-सी मुर्दनी छा गई थी। सबके चेहरे पिटे हुए से थे। हालांकि यह सब गलत और बेबुनियाद था, लेकिन जनता के मूड के बारे में कुछ भी कह सकना मुश्किल होता है। मैं इसलिए भी ज्यादा परेशान था कि जग्गी वाबू पर वेवात कीचड़ उछाला गया था। - अभी हम लोग तैयार हो ही रहे थे कि दूसरा वम फटा । हमारा एक शहरी कार्यकर्ता सायकिल दौड़ाता हुआ आया और उसने एक पर्चा दिया, जो मालती जी के विरोध में छपाया गया और बांटा जा रहा था--उस गलीज़ पर्चे की सुखी थी-'मालती जी के काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा!' इस गलीज पर्चे में मालती जी की व्यक्तिगत जिंदगी को लेकर वहुत बेहूदी बातें की गई थीं। इस तरह की छीछालेदर कि क्या कहा जाए ! उसमें नम्बरवार बातें उठाई गई थीं। १. जगदीश वर्मा-गोल्डन सन के मैनेजर मालती जी के पति हैं, प्रेमी हैं या यार ? २. क्या यह सही है कि जगदीश वर्मा ने मालती जी को इसलिए छोड़ दिया था कि वे उनके 'धरा' में नहीं रह गई थीं? ३. क्या यह सही है कि जगदीश वर्मा ने एक बार मालती जी के फिसी चाहनेवाले को गोली मार देने की धमकी दी थी? ४. क्या यह सही है मालती जी अपनी बच्ची लिली को जगदीश वर्मा के पास छोड़कर भाग गई थीं? ५. क्या यह सही है कि मालती जी ने अपने चुनाव के लिए सेठों की गर्दनें दवाकर और डरा-धमकाकर चंदा वसूल किया ६. पया यह सही है कि मालती जी ने चार-चार लाख की पांच कोठियां खड़ी कर ली हैं ? ७. क्या यह सही है कि मालती जी हर शाम शराब के नशे में धुत्त रहती हैं ? ७६ / काली आंधी ८. क्या यह सही है कि मालती जी के कारण कई हसते-फूलते घर टूटकर नरक बन गए हैं ? और अंत में एक पैराग्राफ और था- हम महिला-समाज की सदस्य महिलाएं अपने लिए मालती जी सी महिला को कलक समझती हैं। ऐसी चरितभ्रष्ट और दुराचारो महिला के लिए हमारे मन में गहरा गुस्सा और नफरत ही हो सकती है। हम अपनी बहनो और महिला वोटरो के साथ-साथ भाइयों और पुरुप वोटरों को भी सचेत करती हैं कि वे महिलाओं की कलक मालती जी को वोट न दें ! हमारी परंपरा सीता, पद्मिनी, लक्ष्मीबाई और सरोजिनी नायडू की है ! महिलाओं के नाम पर मालती जी के फरे में फंसनेवालों को हम आगाह करती हैं और प्रण करती हैं कि जहा-जहां वे जाएगी, हम काले झण्डो से उनका विरोध करेंगी! -महिला समाज की ओर से प्रचारित और प्रसारित ! यह पर्चा पढ़ते ही सबके चेहरे काले पड़ गए थे। सन्नाटा छा गया था । भण्डारी जी ने चाय वनवाकर स्टोव भी वुझा दिया था। इसलिए सन्नाटा और गहरा हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे रातों-रात सब तहस-नहस हो गया हो"और सुबह होते हमारे बीच कोई मौत हो गई हो । हम सब एक-दूसरे से कन्नी काट रहे थे। नजरे बचा रहे थे, यह जानते हुए भी कि यह सब निहायत बकवास, गलीज, झूठा और कमीने- पन से भरा हुआ है ! सच्चाई का एक रेशा तक इसमें नहीं है । चुनाव कार्यालय में तो सन्नाटा था ही, मालती जी के कमरे से भी कोई फोन नही आया था। शायद पर्चा तो उन तक नहीं पहुंचा होगा, पर अखबारों का वण्डल पहुच चुका था। बिदा गया था, वह भी नहीं लौटा था। हमें अफसोस तो था ही, पर मुझे खासतौर से गुस्सा इस बात का था कि इन कमीनो ने जग्गी वावू को बदनाम कि- काली आदी/७ - राजनीतिक लोग हैं। हमारे अपने खेल हैं। हम सब खिलाड़ी हैं, हम झटका खाकर भी उठ खड़े होते हैं । कलंकों को भी धो लेते हैं या ज्यादा वड़े कलंक औरों पर लगाकर अपने कलंकों को छोटा कर लेते हैं। या जनता की याददाश्त कम होने का फायदा भी उठा लेते हैं क्योंकि हम निडर होकर, या कहिए कि किसी हद तक बेशर्मी से, मैदान में डटे रहते हैं; हार भी जाते हैं तो फिर उसी मैदान में जीतने के लिए लौटते हैं। पर जग्गी बाबू के लिए यह सब मौके कहां हैं ? वे तो खुद ही किनारा किए बैठे हैं और उन जैसे साधु व्यक्ति को इस लपेट में लेना बहुत गलत हुआ था। एक तूफान आया था और कीचड़ की भयानक वारिश हुई थी। हर कार्यकर्ता जैसे अपने से डर रहा था । जगतसिंह चुपचाप डायरी खोल- कर देखता और फिर बंद करके इधर-उधर ताकने लगता। लल्लू वावू पंक्चर होकर पड़े थे। उन्हें शक था कि मालती जी शायद उनकी इस वात पर यकीन नहीं करेंगी कि ने कव्वाली-गायिका को खोजने के लिए उस मुहल्ले में गए थे। बहुत देर बाद भण्डारी रामनारायण ने खामोशी तोड़ी-गुरूसरन जी, महिला समाज नाम की कोई संस्था आजतक तो सुनी नहीं ! यह आज कैसे पंदा हो गई? लल्लू बाबू भी उठकर बैठ गए-वात मोके की है भइये ! और पों को उलट-पलटकर देखते हुए बोले-~~मेरे खयाल से तो मानहानि का मुकद्दमा ठोंक देना चाहिए ! -लेकिन किस पर ? भण्डारी ने कहा-नाम तो किसी का है m नहीं! लल्लू वाचू ने फिर पर्चे को उलटा-पलटा-प्रेस तक का नाम नहीं है"यह तो सरासर जुर्म है भइये ! आखिर यह पर्चा किसी प्रेस में छपा तो है ही। और रातों-रात छपा है। इसका मतलव है, प्रेस भी शहर का है"पुलिस साथ दे तो पता तो लग सकता है ! ७८ / काली आंधी --हम यहां मुकद्दमा लड़ने वहीं, चुनाव लड़ने आए हैं। जगतसिंह अपनी ही परेशानी में मुन्तिला था। --भइये, राजे ! मुकद्दमा भी चुनाव का एक हिस्सा है ! लल्लू वायू बोले। . --तो चलिए, पहले वही लड़ लें ! जगतसिंह ने चिढ़कर कहा । -मइये, तू तो ऐसे विगड़ रहा है जैसे पर्चा मैंने छापा हो ! --इन बातों में क्या रखा है ? यह सोचिए कि अब इस कीचड़ को साफ कैसे किया जाए ? मैंने खाली दिमाग से कहा, क्योकि कुछ कहना जरूरी लग रहा था । -~शाम को बहुत बड़ी मीटिंग भी है"कल महिलाओं वाली सभा है"जगतसिंह ने डायरो देखकर कहा-इसीलिए अफरा-तफरी में यह पर्चा आज ही वाटा गया है ! ताकि औरतो वाली मीटिंग मे कल हंगामा हो जाए ! तभी लल्लू बाबू को दूर की सूझी। बोले-भइये, वो उस दिन महिला सेवा मण्डल वाली देविया मालती जी के लिए सम्मान सभा करना चाहती थीं, अगर उन्हें पकड़ा जाए तो कैसा रहे? --किसलिए? भण्डारी जी ने पूछा। -~-उनमें से दस-बीस को पकड़कर सबसे पहले मालती जी के पास भेजा जाए। वे जाकर कहे कि वे मालती जी को अपना नेता मानती हैं। इससे मालती जी को नैतिक बल मिलेगा और यह स्टेटमेंट जारी करें कि इस तथाकथित बोर नापद महिला समाज की ओर से जो कुछ छपवाया गया है, वे सब उसका घोर विरोध करती हैं ! यह खबर फौरन अखबारों को दी जाए और आज शाम को औरतो की मीटिंग से पहले उन महि- लाओं को घर-घर भेजा जाए जहा जाकर वे इस गदे प्रचार के विरुद्ध जनमत तयार करें! लल्लू वायू ने पुराने खिलाड़ी की तरह पामा फेंका। -~-जरा यह भी तो सोचिए, मालती जी के दिल पर इस वक्त क्या गुजर रही होगी? सुबह से दस फोन या जाते थे। वे किस तकलीफ मे खामोश बैठी होंगी? उनका रवैया क्या होगा? उनसे राय लिये बगैर हमें कुछ नही करना चाहिए ! भण्डारी नै राय दी। काली मांधी/७६ ? इस बात के वीच मुझे रह-रहकर जग्गी वाबू का ध्यान आ रहा था। उनके लिए कोई नहीं सोच रहा था। उस आदमी पर क्या गाज गिरी होगी? हम लोग अपनी मिसकोट कर ही रहे थे कि एक वेयरा हमारी डाक लेकर आया। मैंने धीरे से उससे दरयाफ्त किया-मैनेजर साहब नीचे आ गए हैं ? -जी नहीं, उनकी तबियत ठीक नहीं है ! वेयरे ने बताया। -~-क्यों, क्या हुआ -मालूम नहीं साहब" कहता हुआ वह चला गया। -मेरा माथा ठनका। अजीब हालत थी। लेकिन कोई क्या कर सकता था, अब जो कुछ था, भुगतना ही था। एक क्षण के लिए तो मन में आया था कि सब डेरा-डावर तम्बू-कनातें उखाड़कर चल दिया जाए। तभी जगतसिंह ने कहा- सचमुच बहुत गड़बड़ हो गया है"कुछ समझ में नहीं आता."मेरा तो दिमाग ही फेल हो गया है। ~~~~और मेरे दिमाग को भण्डारी जी फेल किए दे रहे हैं भइये ! लल्लू बाबू ने कहा। -सब बातें एक साथ जुड़ गई हैं ! भण्डारी ने लल्लू वाबू से कहा- कल शाम विदेशियों की पार्टी, आपका वेश्याओं के मुहल्ले में जाना' लल्लू बाबू एकदम बिगड़ गएभण्डारी भइये ! जरा सोच-समझ- कर बात कहो। तुम्ही कहोगे कि मैं वेश्याओं के मुहल्ले में गया था, तो औरों का मुंह कसे बंद कर लोगे ? ---मेरा यह मतलब नहीं, भण्डारी बोले-~-मतलब यह कि बदमाशों ने वात का बतंगड़ बना दिया है ! सारा काम बिगाड़ दिया है। मालती जी भी इस अंधड़ को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी" तभी देखा होटल की सीढ़ियों से मालती जी उतर रही थीं। वे सीधे कॉटेज की तरफ ही आ रही थीं। पीछे-पीछे विंदा था । ... , ... । मालती जी का चेहरा सुजा-सुजा-सा था। आंखें भरी-भरी। शरीर सुस्त और थका हुआ। पर कमाल की हिम्मत है उनमें । उनके आते ही ८०/ काली गांधी हम सब खड़े हो गए थे । वे काफी निश्चित नजर आ रही थीं। पर मुझे अहसास हो रहा था कि वे बड़ी कोशिश से अपने को सभाले हुए थी। होठो पर तीखी पर हलकी मुस्कराहट लाते हुए उन्होने कहा-जो, कुछ छपा है, पढ़ लिया आप लोगो ने ! किसीने कोई जवाब नहीं दिया । एक क्षण की चुप्पी के बाद वे फिर बोली-क्या हुआ है आप लोगों को?"वे धीरे से व्यग्य से हसी-" यह सब तो होता रहता है । इसका भी मुकाबला करेगे .. लल्लू वावू का खयाल है, हमें मुकदमा कर देना चाहिए ! जैसे- तैसे जगतसिंह ने कहा। -हूं ! वे फिर हंसी-कानून की अदालते हमारी अदालतें नहीं हैं । हमारी सबसे बडी अदालत है जनता! वही, उसी जनता की अदालत में यह मुकदमा लडा जाएगा और जीता जाएगा! हम अपनी तरह से, और अपनी ज़रूरत के मुताविक यह मुकदमा लडेगे." मालती जी की शब्दावली साफ थी । जीत और जरूरत जैसे शब्द फिर आ गए थे और मैं समझ गया था कि भूचाल का सामना करने के लिए वे अपनी पूरी राजनीति के साथ तैयार थी ! -यह पर्चा आपने देखा है ? यह भी, आज अभी सुबह ही बाटा गया है ! भण्डारी ने कारनामों का कच्चा चिट्ठा वाला पर्चा उनके सामने कर दिया । वह उन्होने नही देखा था। चश्मा लगाकर उसे उन्होने पढ़ा । कुछ पलो के लिए काले बादल उनके थके हुए चेहरे पर मडराए फिर भीतर से खून को ललाई आई."फिर चेहरे पर सिमट आया खून पारे की तरह उतर गया और उन्होने पर्चा जगतसिंहकी ओर बढ़ा दिया-- हूं! रखो "शाम को महिलाओ वाली मीटिंग मे यह पर्चा मुझे देना" इसका जवाब मैं वही दूंगी ! और जरूर दूंगी ! "आप लोग परेशान न हों"अपना काम करते रहें"इन हमलो को मैं देखती रहूंगी." इतना कहकर वे चली गई। काली आंधी/ ८१ मैं कुछ देर सोचता रहा कि जग्गी बाबू के पास जाऊं या नहीं, क्योंकि उस दिन के मालती जी के व्यवहार और जग्गी वावू के एकदम चले जाने ने मेरे लिए कहीं कट अटक गया था। मालती जी ने तो जहरत के मुताविक अपना दिमागी तनाव खत्म कर लिया था, पर मैं बीच में लटक गया था। मैं सोच ही नहीं पा रहा था कि मालती जी मेरा उनसे मिलना पसंद करेंगी या नहीं। या जग्गी वाबू उस शाम के बाद मुझसे उसी तरह मिलेंगे या नहीं। फिर मुझे लगा कि बीच के इन बरसों में मेरा और जग्गी बाबू का अपना एक दोस्ती का रिश्ता भी रहा है। वे शायद मुझे खुद न बुलाएं-इस चुनाव-चक्कर के दौरान, पर मुझे जाना चाहिए । मैंने एक निगाह होटल की ऊंची विल्डिग पर डाली"उस तरफ देखा, जिस तरफ जग्गी बाबू का टैरेस एपार्टमेंट था। थोड़ी देर और सोचा, फिर चल ही दिया-उनकी तबियत भी तो खराब थी। मैं जव पहुंचा तो वे काफी झुंझलाए हुए थे। फोन का रिसीवर हाथ में लिये आपरेटर पर बिगड़ रहे थे तीन घंटे ने अजेंट कॉल नहीं मिल रही ! तमाशा है "यू गो मान ट्राइंग। येस. पी०पी० मेंट मेरीज गम हाई स्कूल "प्रिन्सिपल मदर मिराण्डा ! येस प्लीज'"मोर एक झटके से रिसीवर उन्होंने रख दिया । कुछ क्षण माथा पकड़े हुए वे बैठे रहे। -कैसी है तबियत ? मैंने पूया। अरे, आप कब आए ? जग्गी बाबू ने मुझे गाते हुए नहीं देखा था- मन देखा ही नहीं ! तवियत, विल्कुल ठीक है। -वेवरे ने बताया कि ही ऐसे ही"वे बोले। -आप कुछ परेगान हैं ! ने कहा। मेरी नजर बंद घड़ी पर भी पड़ी और टानी के उस डिब्बे पर नी, जिसमें वे लिली के खत रखते थे, और सुबह के उन अखबारों पर भी जिनमें वे गलीज रिपोटें आई थीं। वह पर्चा भी पड़ा हुआ था जो नापंद महिला समाज की ओर से छापा -- ८२/ काली आंधी . गया था। -नहीं"परेशानी किस बात की "जग्गी बाबू बहुत खोए-खोए थे। वे अपनी परेशानी छुपाने की कोशिश में लगे हुए थे। धीरे से बोले ~~~गुरूसरन जी, एक शेर याद आ रहा है- नक्शा उठा के अब कोई नया शहर देखिए ! इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गई। मैं चुपचाप उन्हे देखता रहा ऐसा लगा, जैसे कोई आदमी रास्ते पर पड़े पैरों के निशान मिटाता हुआ और कही जाने की कोशिश कर रहा हो । कितनी कठिन थी यह कोशिश और कितनी पीड़ा-भरी । जग्गी-बाबू चुपचाप बाहर की ओर देख रहे थे-~~-शीशे की दीवार के उस पार । वातावरण अजीब हो गया था । जग्गी वावू शायद खुलने के में नहीं थे। वे अपने भीतर-भीतर घुमड रहे थे । अगर फोन न आ जाता तो शायद वे सुलते भी नहीं। यह तो मैं समझ ही गया था कि उन्होंने पत्र- मढी में लिली के स्कूल की प्रिंसिपल के लिए ट्रंककॉल बुक करवा रखा है और बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तभी फोन की घटी बजी। जग्गी वावू वे रिसीवर उठाया, ट्रककॉल मिल गया था, वे फोन पर बात करने लगे थे-प्रिंसिपल"मदर मिराण्डागुडमानिग"दिस इज जग- दीश वर्मा काम भीपाल"येस"येस"लिली कैसी है"जी, मैं चाहता था कि उसे आप वही रोक लें, जी"भोपाल न भेजें"छुट्टिया तो खराव होगी "जी, मैं जानता हू"हा, लिली जरूर जिद करेगी"पर कुछ ऐसी दिक्कत है कि मैं चाहता हूँ, वह वहीं रुकी रहे"यहा न आए "जी, हो सकता है मैं ही आ जाऊं, आप उसे समझा दीजिएगा प्लीज़, ओके.. फोन रखकर उन्होंने मुझे देखा, अव सव साफ था । -लिली आनेवाली थी ? मैंने पूछा । -~-हा, उसको पन्द्रह दिनों की छुट्टियां थी। लेकिन मैंने उसे वहीं होस्टल में रोक दिया है। --अकेली रहेगी होस्टल में? -~आखिर मेरी वच्ची है ! रह लेगी। मैं नहीं चाहता था कि वह इस वक्त यहां आए। मैं नहीं चाहता कि अपनी उम्र से पहले वह दु काली आंघो। ६३ ? की चालाकियों से परिचय प्राप्त करले । मैं नहीं चाहता कि वह अपने वाप और मां की टूटी हुई जिन्दगी के इस पक्ष को अभी जाने और हमेशा के लिए डिस्टर्व हो जाए ! मेरे पास अगर अपनी वच्ची को देने के लिए कुछ नहीं है, तो उससे वह क्यों छीन लूं जो उसके पास है ?" जग्गी वावू ने कहा। -लेकिन... -'लेकिन' क्या गुरूसरन जी ! इस कीचड़ में लिथड़ने के लिए उस बच्ची को भी आने दूं? कहते हुए उन्होंने वे अखवार एक ओर पटक दिए---उसका क्या दोप है ? मुझे ही बताइए, मेरा क्या दोप है ? -यह गंदगी इधर राजनीति में बहुत आ गई है ! ~~~यों आपकी राजनीति से मुझे क्या लेना-देना है ? इस कीचड़ और गंदगी को में क्यों बर्दाश्त करूं? आपकी राजनीति का शिकार मैं और मेरी बच्ची क्यों हो जाए ?..." -ज्यादती तो हो गई है"क्या कहा जाए - आप लोगों के पास कहने के लिए है क्या? जग्गी बाबू ने कहा, तो इस 'आप लोगों' का मतलब मैं समझ गया था। वे बहुत भरे हुए थे। कहते ही चले गए-मैं सब छोड़-छाड़कर कहीं और चला जाऊंगा, गुरूसरन जी इसलिए नहीं कि मैं कमजोर हूं या जिन्दगी में जो फैसला मैंने लिया था, उसे गलत समझता हूं, या मैं कुछ चाहता हूं "सिर्फ इस लिए कि मालती को जो दुनिया चाहिए जो सक्सेस और सफलता चाहिए, वह उसे मिलती चली जाए ! मेरी वजह से उसमें रुकावट न आए"वह यह न समझे कि मैं कहीं उसके रास्ते में हूं ! मुझे कोई पछ- तावा नहीं है । मेरी जिंदगी में अब कोई तमन्ना उससे जुड़ी हुई नहीं है"लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि अपनी किसी असफलता का दोप वह मेरे सिर मढ़ दे."उसे कोई वहाना मिल जाए 'कि मेरी वजह से उसे नुकसान हुआ -~~यह आप क्या कह रहे हैं ? मैं ठीक कह रहा हूं ! मैं नहीं चाहता कि मेरी वच्ची आपकी जालिम पालिटिक्स की शिकार हो जाए "कल को कोई उठकर यह भी । -- ८४/ काली आंधी कह सकता है कि यह मेरो वच्ची नहीं है "आपको दुनिया का जमीर में खूब जानता हूं गुरूसरन जी । आपके यहा बोलाद के रिश्ते तक को इस्तेमाल किया जा सकता है ! मैं अपनी बच्ची को आपको इस गलीज दुनिया से दूर रखना चाहता हू"और आपकी मालती जी के नाम पर मुझे लेकर कीचड़ उछाला जाए, यह भी मैं नहीं चाहता "वारह वरस पहले जो खुला रास्ता उसे देकर मैं दूसरी तरफ चला बाया था."उस रास्ते में मैं अपनी छाया तक को नहीं आने देना चाहता"एक क्षण रुककर जन्गी बाबू ने गहरी सास ली और कहा-गुल्सरन जी, सोच-समझकर एक फैसला और लिया है मैंने एक बार फिर तय किया है"मैं होटल की मैनेजरी से रिजाइन कर रहा रहा हूं और यहा से जा रहा हूँ ! -क्या! -हा "मेरा यहा रहना किसीके हित में नहीं है ! लिली के हित में नहीं है । मेरे हित में नहीं है और आपकी मालती जी के हित में नहीं है ! हूं। इसलिए मैंने यह फैसला लिया है." -जल्दीबाजी मे आपको त्यागपत्र नहीं देना चाहिए जग्गी वावू ! मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। -जल्दीबाजी ! जल्दीवाजी कैसी? मुझे क्या जीतना है या हासिल करना है, जिसकी जल्दीवाजी होगी ! और वे व्यग्य से हस दिए थे। तभी फोन वजा । जग्गी वावू ने उठाया । मुनकर उनके ओठों पर टेढ़ी-सी मुस्कराहट आई और फोन रखते हुए बोले---आपका बुलावा आया है । भण्डारी जी का फोन था। मालती जी को कोई काम है, कमरे में बुलाया है।

. । मैं उठकर चला आया । मालती जी के पास पहुंचा तो देखा, लल्लूवाबू व जगतसिंह भी बैठे हुए हैं । यो आभास हुआ कि वे नार्मल हैं । उन्होंने जैसे सब सोख लिया था और अपने पैंतरे भी तय कर लिये थे। पहुंचते ही उन्होंने सवाल दागा-कहां थे माप? कुछ काम होता है या नहीं" -~-जी, वो मैं जरा जग्गी वावू के पास चला गया था। पता चला कि उनकी तबियत ठीक नहीं है ! मैंने कहा । ---तवियत ठीक नहीं है ? मालती जी के पूछने में कशिश थी। मुझे यह बदलाव जरा आश्चर्यपूर्ण लगा था। लेकिन किसीकी भाव- नाओं पर शक भी तो नहीं किया जा सकता। माखिर तो एक सम्बन्ध दोनों का रहा ही है। सारे ठण्टेपन और वेरुखी के बावजूद कभी-कभी भावनापूर्ण पल उसके बीच में आ भी सकते हैं। मैंने थोड़ा परखने के लिए कहा हां, कोई खास बात नहीं है। -अखबार-बखबार पढ़कर परेशान हो गये होंगे "उनकी आदत है ! खैर "हां, तो आप मिर्जा जी के यहां चले जाइये । अभी खबर मिली है कि शहर में साम्प्रदायिक तनाव फिर पैदा हो रहा है ! गुलशेर अहमद के लोगों ने अपने कुछ कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया है । पुराने बाजार वाले अपने आफिस के लोग काम करने के लिए बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। संभलकर जाइएगा । और हां, अब नाम वापस लेने की तारीख तो गुज़र गई । लाला दीनानाथ का क्या रक्या है ? मालती जी ने एक काम सौंपते हुए दूसरा सवाल भी कर दिया। - उन्हें सपने आने लगे हैं कि वे जीत सकते हैं ! लल्लू बाबू ने कहा। मालती जी हंसी । सबको हंसी आ गई। -आप पता कर लीजिए और लाला दीनानाथ से कह दीजिए कि जीत के सपने आने बंद हो गए हों तो वे ऐलान करें कि वे मेरे पक्ष में आ गए हैं और चाहते हैं कि उनके पक्षधर मुझे वोट दें। यह ऐलान ८६ / काली आंधी वे उसी मच से करेंगे, जिससे मैं वोलूंगी"ठीक है ! मालती जी ने कहा। ---उसके बाद लाला दीनानाथ के जितने चुनाव-दफ्तर हैं, सब बंद कर दिए जाएगे, उनके वालटियर हमारे साथ काम करेंगे और खुद लाला दीनानाथ मालती जी के साथ हर मीटिंग में शामिल रहेंगे ! लल्लू बाबू ने सारी शतें साफ कर दी-नहीं तो वो सारी मदद वद कर दी जाएगी, जो अभी तक हम लाला दीनानाथ को देते रहे हैं समझ गए, भइये! -अरे, तो मैं लाला दीनानाथ या उनका आदमी तो नहीं हूं, जो आप मुझे इस तरह मैं बोला। —तुम्हें समझा रहा हूं कि कैसे बात करना"तुमसे थोड़े ही कह रहा हूं भइये ! हां ! लल्लू बाबू बोले-सब निपटाकर आना" । मैं सीधा पुराना बाजार एरिया में गया। दफ्तर तो खुला हुआ था "बूढ़े मियां भी घुटने पर हल्दी की पुल्टिस वाघे बैठे थे । और कोई नहीं था। मैंने पूछा-और सब कहा हैं ? -काम करने गए ! बूढ़े मिया ने बताया। -गुना है, गुलशेर अहमद के आदमियों ने अपने लोगों को डराया- धमकाया है ? मैंने पूछा। --कैसी बातें करते हैं आप भी! बूढ़े मियां मुस्कराए-काम करने वाले दोनों के एक हैं । कौन किसे धमकाएगा ! आप खुद सोचिए ! -अफवाह होगी ! मैंने चलते हुए कहा । -अफवाह भी होगी तो खुद उन्ही के आदमियों ने फैलाई होगी. जी"कहकर बढ़े मिया अपना घुटना दवाने लगे। मैं वहा से चलकर सीधा लाला दीनानाथ के यहा पहुंचा, उनसे अकेले में सारी बातें की। उन्होंने कहा कि वे मालती जी से मिलकर ही सब वाते तय करेंगे । जब तक पूरी वात तय न हो जाए, कोई खवर बाहर नहीं जानी चाहिए। यह भी जाहिर नहीं होना चाहिए कि लाला दीनानाथ काती आंधी८७

और मानतीजीनी गोई गुप्त मीटिंग हुई है। मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी
गई उनको मालती जी की मीटिंग तय करने में उन्हें गावर दूंगा।
यह सब तय करने में चला आया। रास्ते-भर नाता नानायकी
यातां पर सोता रहा। उनकी बातों में इतना जफर लग रहा था कि
मामता मापद पंगों पर अटकेगा। पं बार-बार गही बात कही है-
गुरूमरन जी,
लालारा तो अलग से मेरी जेब से रान हो चुका है
जी."यह गुगसान तोन उदाएमा !

।
लौटकर होटल पहुंचा तो मैंने सारा हाल बता दिया । लाला दीनानाथ
की मीटिंग मालती जी के साथ तय करवाकर खबर भिजवा दी।
जरा-सा आराम करने के लिए पीठ टिकाई ही थी कि जग्गी बाबू का
फोन आया-एक मिनट के लिए आ सकते हैं ?
जग्गी
वाबू के पास पहुंचा तो अहम खबर मिली। मेरे बाजार चले
जाने के बाद लल्लू बाबू, भण्डारी जी और जगतसिंह को विदा करके
मालती जी अकेली जग्गी वावू के एपार्टमेंट में पहुची थीं । जग्गी बाबू ने
ही सारी बात तफसील से बताई थी।
-~-सुना, आपकी तवियत
कुछ खराब हो गई है ! मालती जी ने उनसे
पूछा था।
---आपको गलत खबर मिली है । जग्गी बाबू बोले थे।
-आप बैठने के लिए भी नहीं कहेगे ?
-बठिए ! कहते हुए जग्गी वावू ने एक कुर्सी खिसका दी थी, पर
मालती जी कुर्सी पर नही बैठी थी। वे बिस्तर के एक कोने पर बैठ
गई थी।
-और कोई हुक्म ? जग्गी वाबू ने व्यग्य से पूछा था।
-मुझे बहुत अफसोस है"
-किस बात का? मैंने जिन्दगी मे जो कुछ किया है या जो कुछ
मेरे साथ हुआ है, मुझे किसी बात का अफसोस नहीं है । कोई अफसोस
नहीं है । जग्गी वाचू ने कहा था।
सचमुच ? मालती जी ने बहुत गहराई से टटोलते हुए पूछा था ।
---लेकिन मेरी वजह से आपको जो कुछ सुनना पड़ा है या बर्दाश्त
करना पड़ा है, मुझे उसका अफसोस है । और कुछ न भी हो तो भी इतना
तो मैं हमेशा चाहती रही हूं कि हमारा साथ रहना, या अलग रहना."
हमारे बीच की वात रहे ! मालती जी बोली यों-इसमें दूसरे लोग
काली आधी/८६

दराल क्यों? ---यह तो तुम्हारी दुनिया की बातें हैं, तुम बेहतर जानती होगी ! मुझे तो मालूम नहीं कि राजनीति की तुम्हारी दुनिया के क्या-क्या उमूल हैं। मैं मामुली आदमी हूं और मामूली तरीके से ही अपनी जिन्दगी बसर करना चाहता हूं। ये भून लीला देने वाले तनाप "दिमाग खराब कर देने वाली मामीनी हरकते."ये नीचता की हद तक सड़ांध में उतार लेने वाली लोगों को मजबूरियां और ये उठा-पटक, बीना-गोपटी "यह सब मेरी दुनिया है ही नहीं आपको सब बातें सही हैं। पर मैं हमेगा यही सोचती रही कि पति-पली के रूप में, या उस रूप में न भी सही "मेरा और आपका रिता "मारे आपसी फैसलों का रिश्ता है-मालती जी ने कहा था। -~-ससे मैं काय इन्कार करता हूं। लेकिन जो फसला हमें लेना था, यह तो हम बारह बरस पहले ले चुके हैं ! जग्गी बाबू बोल थे। ~~~-इसके बावजुद मालती जी कुछ हिचकिचाकर बोली थी-यह तो आप भी जानते हैं कि आपसे अलग होने के बाद मैंने अपनी व्यक्तिगत विदगी में कभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जो पापके लिए अपमान का कारण बनता ! मेरी जिंदगी में कोई पुरुप या प्रेमी या पति कभी भी रहा है तो यह सिर्फ आप ही रहे है ! इतना कहार मालती जी ने उदास नजरों से जन्नी वार को देखा था। मैने कभी यह नहीं कहा कि कोई और कहा है। जगी वाय ! म -~~लेकिन अगर दुसरे कहें, तो ? -तो में गया कर सकता ? -आपको पराने ताली नहीं होती." होती है मालती होती है."मी बाबू नायुफ ही आए थे। -~~यन, साना ही मुखजानना भा“सिर्फ अपने लिए। मालती जी नेपामार जी आरआईभी। .-और निपं अपने लिए मनसय लिया था कि त्यागपत्र देकर पहा ने भी पला जागा लिली को लेकर कही औराई कामदा - २० कालो नांगो लूंगा ! जग्गी वावू बोले थे। -यह आप नहीं करेंगे ! मेरे कारण आप दस तरह की वातें सुनें, बर्दाश्त करें और अपने ढरे से उखड़ जाएं"यह मैं वर्दाश्त नहीं कर पाऊगी."प्लीज, आप रिजाइन नहीं करेंगे"मालती जी ने इसरार से कहा था। --कोई रास्ता पलटता नही मालती"रास्ते तो, अपनी राह चले जाते हैं."आदमी पलट आता है लेकिन मैं अब आदमी कहां रह गया गया हूं"मैं अब सिर्फ एक रास्ता रह गया हूं"वह भी केवल लिली के लिए ? उसे अभी मेरी ज़रूरत है। जब उसे भी जरूरत नहीं रहेगी तो रास्तों की तरह ही मैं अपनी राह चला जाऊगा "जग्गी बाबू ने भावुक होकर कहा था। -कैसी बातें कर रहे हैं आप? मालती जी ने पिघलते हुए कहा था। -ठीक कह रहा हूं मालती ! हूं तो आदमी हो"पर एक रास्ते की तरह रह गया हूं। कभी-कभी कुछ पलों के लिए आदमी बनता हूं तो सब-कुछ उसी तरह व्यापने लगता है, जैसे एक आदमी को व्यापना चाहिए"कुछ देर के लिए दुःख-मुख, ममता-प्यार सव उमडता है." उसके बाद सव समाप्त हो जाता है"मैं महज एक रास्ता रह जाता हूं। इसलिए मेरी बातों के गलत अर्थ कभी मत लगाना "जग्गी बाबू ने कहा था। -किन बातो के ? मालती जी ने पूछा था । -वही""जो कुछ इस बीच कभी-कभी मेरे मन ने उमड़कर तुम्हारे लिए कुछ किया, या किसी जरिये से कुछ कहने की कोशिश की। पीले गुलाब की कली ने शायद तुमसे कुछ कहा होगा""पर उससे मेरा मकसद यह नही था कि तुम लौट आओ या मैं पलट आऊगा । हमारी- तुम्हारी जिंदगी में एक खूबसूरत क्षण कभी आया था, उसे मैंने एक बार और जी लिया । बस ! इसके अलावा मेरा कोई और मकसद नहीं था। न होगा! जग्गी वाबू ने बात साफ कर दी थी। --शायद आपने उस दिन मेरी बात का बहुत बुरा माना था जव काली आधी मैंने आपसे इतने बरसों बाद कुछ कहा था" -नहीं, बिल्कुल नहीं सिर्फ अपने पर अफसोस हुआ था कि कुछ न चाहते हुए, कुछ न मांगते हुए, कोई तमन्ना न करते हुए भी ये खूब- सूरत क्षण क्यों मेरे भीतर जाग पड़ते हैं ? अब, जबकि इन क्षणों से कुछ भी लेना-देना नहीं है, तब ये क्यों लीट आते हैं। इसका अफसोस जरूर हुआ था। -और अब? --कोई अफसोस नहीं ! "हो! - आपने अपने को पत्थर बना लिया है ? -नहीं। --तो...कभी कुछ कहूं-तो मानेंगे ? -~-जव तुम्हें कुछ कहने की जरूरत पड़े तो बता देना। -अब भी ऐसे ही सोचते रहेंगे... -और क्या कर सकता हूं ! इतना भरोसा जरूर दे सकता हूं कि तुम जब भी, जो भी मुझसे चाहोगी, हमेशा मिलेगा। जो कुछ तुम्हें चाहिए''मैं हमेशा दूंगा! जग्गी बाबू ने गहरी नजरों से मालती जी को देखा था। -मेरे लिए इतना ही बहुत है ! मालती जी ने बहुत उदासी से कहा था-~~अच्छा, तो मैं जाऊं."बहुत लोग इन्तजार कर रहे होंगे। और वे चुपचाप चली गई थीं। सब कुछ बताकर, जो भी उनके और मालती जी के बीच घटित हुआ था, वे मेरी ओर देखने लगे थे। मैं भी चुप था। फिर उन्होंने ही पूछा था-गुरूसरन जी, इस सबका मतलब क्या है ? आज बारह बरस हो गए, मुझे मालती से कुछ लेना-देना नहीं रहा है। मैंने कभी उसका रास्ता भी नहीं काटा। न उसके जरिये कुछ चाहा"पर वह हमेशा यही समझती रही कि मुझे शायद उसकी जरूरत पड़ेगी "उस दिन भी उसके कमरे में जो कुछ हुआ, वह भी इसी बात का सबूत ६२) काली आंधी था । वह नहीं चाहती थी कि मैं किसीसे कहूं कि मालती मेरी बीवी रही है । लेकिन आज यह जाना, मेरी तबियत का पता करता" समझ में नहीं आता । पिछले बारह बरसों में भी तो बीमार पड़ा होऊमा"उसे पता भी चला होगा । जब मेरा आपरेशन दिल्ली मे हुआ था, तब भी वह वही थी, पर तब भी उसे जानने की जरूरत महसुस नहीं हुई थी लिली के बारे में भी जानने की उसने कोशिश नहीं की.. यह सब क्या है ? अव ऐसा क्या हो गया है." जग्गी वावू यह सवाल मुझसे कर रहे थे ! मैं कैसे उन्हें बताता कि जरूरत पड़ने पर और वक्त आने पर मालती जी कुछ भी कर सकती हैं-- इस बात का अहसास आपको मुझसे शादा होना चाहिए ! पर मेरा मन यह कह नही पाया । मेरा चुप रहना ही बेहतर था। काली मांधी ६३ । और इस घटना के बाद ही चमत्कार हुआ । मैं कभी सोच नहीं सकता कि यह सब भी हो सकता था। मुझे उस समय तक विश्वास नहीं हुआ जब तक सब घटित नहीं हो गया। सभी अवाक् और बौराए हुए थे, क्योंकि किसी के लिए भी यह विश्वास कर सकना संभव नहीं था। हमारे चुनाव-अभियान की यह अन्यतम और शाहकार मीटिंग थी। गांधी मैदान में सभा आयोजित हुई थी । बहुत भीड़ थी । इतनी कि हमने कल्पना तक नहीं की थी। जितने आदमी थे, उतनी ही औरतें। मालती जी के कारण औरतों में अतिरिक्त उत्साह था । पुराने बाजार में सिर पर मालती जी ने जो चोट खाई थी, वह बहुत कारगर सावित हुई थी । भीड़ या जनता में किस तरह बातें फैलती हैं और कैसी-कैसी कहानियां सांसें लेने लगती हैं, इसका अंदाज़ उस दिन की सभा से ही लग सकता था । पूरा गांधी मैदान खचाखच भरा हुआ था और हर तरफ यही चर्चा थी कि मालती जी जैसी दवंग और साहसी औरत का जवाब नहीं । उनका कद एकाएक बहुत बड़ा हो गया था । सव लोग उनके सामने अपने को जैसे बौना मानने लगे थे । और राजनीति में यही सबसे बड़ा क्षण होता है-बरावरी का ऐलान करते हुए बराबर वालों से बड़ा हो जाना! वरावर वालों को यह यह अहसास करा देना कि कोई उनसे बहुत बड़ा है, यही मालती जी ने हासिल किया था। जनता ऐसे उमड़ी थी जैसे किसी देवदूत को देखने आई हो । गांधी मैदान में सुननेवालों के अलावा खोंचेवाले भी आ गए थे। वह सभा नहीं, मेला लग रहा था । तमाशवीन भी थे, पर केवल तमाशवीन ही नहीं थे। वे मालती जी को देखना भी चाहते थे । झंडों की भरमार थी । कागज की झंडियां लिये बच्चे घूम रहे थे । खोंचेवाले वहुत प्रसन्न थे- हम लोग~~यानी मैं, भंडारी, मिर्जा साहब और चुनाव-कार्यालय के बाकी लोग-पहले ही सभास्थल पर पहुंच गए थे। यह तो मुझे मालूम ६४ / काली आंधी - था कि लाला दीनानाथ वाला कर्मकाण्ड आज होगा, क्योंकि सब बाते तय हो गई थीं। लेकिन उससे भी बड़ा आश्चर्य उपस्थित होगा, इसका शायद किसीको कोई अदाज नहीं था। यह सारी कार्रवाई कुछ ज्यादा ही नाटकीय ढंग से रखी गई थी। सभामंच पर चहल-पहल थी । लाउडस्पीकर पर गाने चल रहे थे। सब लोगों को मालती जी का इतजार था । मच पर आने का रास्ता बाई ओर से था--जहा कारे आराम से आकर रुक सकती थी। पर लल्लू बाबू के वंदोबस्त का लोहा भी मानना पड़ता है और अक्ल की दाद देनी पड़ती है। एकाएक हमने देखा~मच के सामने, जहां भीड़ प्रतीक्षा कर रही थी उसके पीछे कुज्ञ कारे आकर रुकी। उनमे से काफी लोग उतरे । बंदो- वस्त के मुताबिक हमारी पार्टी के वाल टियर झण्डे फहराते हुए दायें- वायें से आए और 'मालती जी जिंदाबाद' के नारे लगाने लगे। श्रोताओं की पिछली वाली पक्तियो में हलचल मच गई। श्रोताओ के बीच से जो पतला रास्ता छोड़ा गया था, उसीसे नमस्कार लेती मालती जी आई। पीछे फहराते हुए अडे और जयघोषो की बौछार । लल्लू बावू तो आगे-आगे थे ही सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि मालती जी के साथ-साथ जग्गी वाबू भी चले आ रहे थे। यह चम- त्कार कैसे हुआ था "यह मेरी समझ में नही आया था । मैं भी अवाक् आखिर सव मच पर आ गए। जगासह मालती जी से ज्यादा जग्गी बाबू की देखभाल कर रहा था । होटल के मालिक नरसो सेठ भी साथ थे । पर जग्गी बाबू का जो सम्मान आज था, वह नरसी सेठ का भी नहीं था। मालती जी के साथ बहुत आदर से जग्गी वावू को बैठाया गया । उन्हे भी मालाए पहनाई गई । जो जग्गी वाबू को नही जानते थे, वे निश्चय ही उन्हें कोई बड़ा नेता समझ रहे होगे । यों मालती जी के माथे पर लगी चोट ठीक हो चुकी थी, पर मैंने देखा, उसी जगह पर खासा बड़ा फाहा लगाकर प्लास्टर-पट्टियों से चिप. काली आधी/१५ काया गया था, कुछ इतना बड़ा कि काफी दूर से भी दिखाई दें। और तब सभा शुरू हुई। लल्लू बाबू ने माइक पकड़ा, छुक-छुक किया। कुछ आवाज नहीं सुनाई दी तो लाउडस्पीकर वाले की तरफ देखकर बोले-ये बोलेगा न, भइये ! अपनी गावाज सुनाई पड़ते ही उन्होंने मोर्चा संभाला-भाइयो और वहनो! चंद दिन पहले अपने इस मशहूर शहर में वह राब हुआ है, जो कभी नहीं हुआ था। इस शहर की अपनी एक शानदार परम्परा और इतिहास है "हमारा यह शहर अपनी शानो-शौकत और तहजीव के लिए मशहूर रहा है और आज भी है। गंदगी, गद्दी बातें, लड़ाई-दंगे-फसाद, कमीनी हरकतें, अफवाहें और बेसिर-पर के गये इलजाम लगाने की परं- परा हमारे इरा शहर की नहीं रही है। और यह सब यहां के तहजीव- परस्त, पालाप्रेमी और अमनपसंद वाशिदों के रहते हुए हुआ है, जो किसी साम्य और शालीन आदमी को दुःख पहुंचा सकता है। यह समा, आज की सगा, इलेक्शन की मीटिंग नहीं है बल्कि यह अपने शानदार शहर की शानदार पम्पराओं को फिर पेश करने और सड़ांध तथा कीचड़ से भर गए इरा वातावरण को साफ करने के लिए आयोजित है। इलेक्शन जीत लेना आसान होता है। पर जो गंदगी और कीचड़ उछाली जाती है, उसे साफ करना बहुत मुश्किल है। ."अपने यहां दंगा हुआ! इतिहास में पहली बार ! और आपने उन अखवारों को भी देखा होगा, जिनमें कुछ जलील और गलत इल्जाम मालती जी पर लगाए गए । माग उन सब बातों की सफाई होगी और आपके सामने होगी। आपको मालूम हो कि दंगाग्रस्त इलाकों में जाकर, वहां की जनता की तकलीफों में शामिल होकर और वहशी हो गए लोगों को रास्ते पर लाने की कोशिश के दौरान मालती जी खुद भी गुण्डों की मार की शिकार हुई थीं। लेकिन वे बहुत हिम्मतवाली महिला हैं "साहस से गरी हुई नेता हैं। चोट अभी ठीक नहीं हुई है, लेकिन फिर भी वे हमारे बीच आई हैं ! अब मैं मालती जी से दरख्वास्त करूंगा कि वे अपनी बातें आपसे पाहे -मालती जी। १६ / काली आंधी तालियों की एक जबरदस्त वोहार आई, मंच पर भी तालियां बजने लगी। मैंने जग्गी वाबू को देखा-वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि अपने हायों का क्या करें"इधर-उधर अचकाकर देखने के बाद तालियों की रौ में उन्होंने बड़े वेढंगे तरीके से एक बार ताली बजाई, फिर अपने दोनों हाथ मेज के नीचे लटका लिए । उनको उलझन साफ थी । माइक का घुटना तोड़कर वही फिट किया गया, जहा मालती जी थीं । यो मालती जो हमेशा उठकर मन पर खड़े होकर भाषण देती थीं। पर आज कुछ खास ही वात थी। शायद वे जग्गी बाबू से दूर नहीं जाना चाहती थी। मालती जी ने शुरू किया वहनी और भाइयो ! यह जो 'बहनो और भाइयो' को आज मैंने आवाज लगाई है"यह जो सवोधन किया है, इसका आज एक सास अर्थ है | आज मैं जनता की ही अदालत में नहीं, वल्कि अपनी बहनों और अपने भाइयों की अदालत में इसाफ मांगने आई हूं। लोगो ने मुझसे कहा, मैं कानूनी अदालत में जाऊ ! मैंने कहा : वह मेरी अदालत नहीं है ! मेरी अदालत यह है, जहा इस वक्त मैं मौजूद हूं ! तालियों की बौछार फिर हुई। मिर्जा साहव उछले और पास वाले से बोले-~-सुभान अल्लाह ! क्या बात है ! मालती को नजर न लगे... अदव वोलती हैं अदव ! वल्लाह "तो भाइयो ! कुछ दिन पहले अखबारों में आपने पढ़ा होगा मैं तो इतनी गदी भापा भी जुबान पर नही ला सकती, लेकिन क्या करू, आपकी अदालत में मामला पेश करने के लिए मुझे इल्जामो को फेहरिस्त भी पढ़नी ही होगी और उसी भाषा में, जिस भाषा में वे लिखे गए हैं" इस बीच जगतसिंह ने अखबार निकालकर मालती जी के हाथों में थमा दिया था। "तो, सुनिए ! इल्जाम लगाया गया है-मालती जी के चुनाव- बड्डे-गोल्डन सन में शराब और शवाव से भरी रंगीन रातें ! "यह भाषा आपने सुन ली ! अरे, हमने तो अपना चुनाव कार्यालय एक झोपड़ी में खोला था लेकिन यह समझकर कि मैं एक औरत हूं और हर जाऊंगी, उन लोगो ने क्या सलूक किया, जो आज यह लिख रहे हैं ! काली मांधी/७ ..

हमारे कार्यालय को लूटा गया, उसमें भाग लगाई गई और हमारे शांत कार्यकर्ताओंको बुरी तरह पीटा गया''अव आप बताइए, या तो मैं डरकर चुनाव के मैदान से भाग जाती, या ईंट का जवाब पत्थर से देती ये दोनों ही रास्ते बुज़दिली के होते । मैं कायर नहीं हूं"वुज़दिल नहीं हूं." तालियों की फिर वौछार हुई, मिर्जा साहव फिर उछले । "इसलिए"इसलिए "इसलिए मालती जी जनता के शांत होने का इंतजार कर रही थीं-इसलिए, हमने तय किया कि होटल में कार्यालय खोला जाए, जिससे कि मेरे चुनाव में जी-जान से जुटे लोग कम से कम अपने हाथ-पैर तो सलामत रख सकें."आखिर ये सब भी वाल-बच्चे वाले लोग हैं"आप ही बताएं, मेरे सामने और क्या रास्ता था? खैर और यह खबर कि होटल में शराब की नदियां बह रही हैं, कितनी गलत और बेहूदा है, मैं क्या बताऊं ! लेकिन आपकी अदालत में आई हूं तो झूठ नहीं बोलूंगी "अगर दूसरे देशों के लोग, विदेशी लोग हमारे घर आएं और उनके स्वागत-सत्कार के लिए कुछ किया जाए, तो क्या यह गलत है ? शराब को हम गलत मानते हैं, पर वे पानी की जगह उसे पीते हैं "क्या हम घर-आए मेहमान की वेइजती करें? और यह किसी ने नहीं लिखा कि उन्हीं विदेशियों ने गांव में हमारे साथ जाकर भगवान का चरणामृत भी पिया? हम अगर अपनी संस्कृति का सम्मान करते हैं तो जरूरी हो जाता है कि विदेशियों की संस्कृति का सम्मान भी करें । जो दूसरों का सम्मान करना नहीं जानता, उसका सम्मान कोई नहीं करता .."तो शराव की वात मैंने आपके सामने सच्चाई से साफ कर दी.. अव शवाब वाली बात को लें. “ये शब्द ही इतना गंदा है कि मुझे कुछ भी कहते संकोच होता है "क्या यही हमारी तहजीव है हम अपनी बहनों के शरीरों के लिए शवाव शब्द का इस्तेमाल करें? .. और जिस होटल का नाम लेकर यह गलीज़ प्रचार किया गया है, उसी होटल के मालिक नरसी सेठ और मै"मै"मै"ने"जर साहब मेरे साथ यहीं मौजूद हैं ! मालती जी जग्गी वावू को मैनेजर कहते और उनका नाम लेते हिच- , ९८ / काली आंधी - किचाई थी, इसलिए, मैनेजर साहब' जैसे-तैसे कहकर उन्होंने उस वक्त अपना काम निकाल लिया था । जग्गी वावू ने भी बहुत अटपटा महसूस किया था"पर यह तो पब्लिक मीटिंग थी, यहां सारा काम धड़ल्ले से होना था। और वे आगे वोली थी-नरसी सेठ ने हमें फ्री रहने की जगह दी है, हमे को खाना देते हैं ! इसलिए कि इनका भी उन्हीं उसूलों में विश्वास है, जिनमे हमारा है"मेरा कहना सिर्फ इतना है कि वे लोग जो गदगी उछालते है"मुझे बदनाम कर लें, क्योकि उन्हें हारने का खतरा मुझसे है । इन वेगुनाह लोगों को क्यो बीच में लपेटते हैं ? मैं खुले-आम कहती हूं कि इन गदे और गलीज़ लोगों को जो बदला लेना हो, मुझसे ले "उन लोगों पर कीचड़ उछालना बंद करें, जिनका कोई दोष नहीं है ! नरसी सेठ का नाम जब मालती जी के भाषण के दौरान आया था तो वे अपनी कुर्सी से उचके थे। उन्हे इस बात की तमीज़ नही थी कि उनका नाम किस सदर्भ मे आ रहा है । उन्हे सिर्फ यही खुशी थी कि उन का नाम आ रहा है और यह भी मालती जीसी नेता के जरिये ! मालती जी ने जब खाने और रहने की फ्री व्यवस्था का जिक्र किया था तो नरसी सेठ को उम्मीद थी कि उनकी दरियादिली पर तालिया बजेंगी."और वे हाथ पर हाथ तयार रखे थे। तालियां न वजने से उन्हें खासी मायूसी हुई थी, पर इतना सतोप उन्हें जरूर था कि फ्री वाली बात मालती जी ने कह दी थी। फिर मालती जी ने आगे कहा-अव मैं अपनी बहनो से मुखातिव होना चाहती हूं।"और इसी बीच जगतसिंह ने फाइल से निकालकर 'महिला समाज' वाला पर्चा थमा दिया था। उसे हवा में लहराते हुए मालती जी ने कहा-यह पर्चा एक नापद संस्था महिला समाज की ओर से बंटवाया गया है । मैं जानती हूं कि आपने इसे देखते ही नाली में फेक दिया होगा'"क्योकि इस पर्चे से जो बदबू आती है, उसे कोई भारतीय नारी बर्दाश्त नहीं कर सकती। मिर्जा जी एकाएक ताली बजाते हुए चीखे-हीयर"हीयर ! और तालियों की गड़गड़ाहट भोड़ से होती हुई गुजर गई। साली आंघी/ 88 - मालती जी ने प्रशंसा की दृष्टि से मिर्जा साहब को देखा और आगे बोलीं-क्या करूं, आप सव हाजरीन मुझे माफ करेंगे "मुझे इस पर्चे की भाषा में ही फिर बात करनी पड़ेगी। इसमें, इस पर्चे में पहला सवाल पूछा गया है-श्री"श्री-वर्मा... लल्लू बाबू ने माइक में मुंह घुरोड़कर कहा-भाइयो और बहिनो ! मालती जी अपने पति का नाम नहीं ले पा रही हैं, उनका नाम है श्री जगदीश वर्मा ! होटल गोल्डन सन के मैनेजर साहव श्री जगदीश वर्मा ! मालती जी ने सूत्र जोड़ा-पूछा गया है कि गोल्डन सन के मैनेजर मेरे पति हैं, या प्रेमी हैं या "या"यार !"आप ही बताइए, यह जवान क्या हमारे घरों की हैं ? लेकिन खैर'"मैं इसका जवाब भी दूंगी। भाइयो और बहनो खासतौर से मेरी बहनो ! मुझे यह कहना है कि ये "ये.." मालती जी ने बहुत स्निग्धता से जग्गी वावू की तरफ देखा था, और उसी क्षण लल्ल वाबू ने जग्गी बाबू को दूल्हे की तरह उठाकर खड़ा कर दिया था और मालती जी ने आगे कहा था--जी ! यही हैं मेरे पति ! पति परमेश्वर, मेरे दोस्त, मेरे प्रेमी और मेरे यार! जो यही हैं ! और ये मेरे साथ आपकी अदालत में मौजूद हैं ! तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान और मंच बड़ी देर तक गूंजता रहा था। जनता ने मालती जी की साफवयानी और साहस के सामने अपना माथा झुका दिया था और वह अनथके तालियां बजाती जा रही थी। जग्गी बाबू निलिप्त-से खड़े थे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करें। किधर देखें, खड़े रहें या बैठ जाएं" उनकी समझ में कुछ नहीं आया तो सामने पड़ी मालाओं के ढेर में से फूल नोचकर वहीं उसकी पत्तियां गिराते रहे। मिर्जा जी आपे से बाहर हो गए थे। तालियां बजाते-बजाते और भीतरी आह्लाद से खुश होते-होते उनकी आंखों में आंसू भर आए थे। जव उत्साह का तूफान कुछ शांत हुआ तो मालती जी ने बेहद भरे हुए गले से कहा-मैंने अपने पति को लाकर आपकी अदालत में खड़ा कर दिया। अब मेरे बारे में, मेरे चरित्न के वारे में, मेरी बच्ची के वारे जो कुछ भी हैं, । १०० / काली आंधी में आप जो कुछ पूछना चाहें "इन्हीं से पूछ लीजिए ! मेरे पास सबसे बड़ा जवाब यही हैं ! मेरे पति"और ये आपके सामने मौजूद हैं- इससे प्यादा में और क्या कह सकती हूं! एक बोरत अपने चरित्र पर लगे इलजाम का सबसे बड़ा सबूत क्या दे सकती है ! कहते-कहते मालती जी का गला इंघ गया था। उनसे वोला नहीं जा रहा था। लल्लू बाबू ने तपाक से मेरी ओर देखा-देख क्या रहे हो, एक गिलास पानी लाओ भइये! जब तक मालती जी ने पानी पिया और आमू पोछे, तब तक मिर्जा साह्य माइक पर सुद वा गए और दहाड़ने लगे--मैं अपने मुल्क की सदियों पुरानी कल्चर और अपने इस शहर की शानदार तवारीख के नाम पर धब्बा लगाने वालों के मुह पर घूकता हू और उन्हें आगाह करता हूं कि आइदा वे ऐसे जलील हथकडे काम मे न लाए "नही तो उनका हश्र अच्छा नहीं होगा । मेरे शहर की जनता उन लोगों को फाड़कर खा जाएगी जो औरतो और बहनो के पाक नामों पर कीचड़ उछालने की कोशिश करेंगे... –'मालती जी! जिंदावाद !' जनता के बीच से जयघोष वाया ! उसी जयघोप में तमाम आवाजें मिल गई और दूर पर दिखाई पड़ा कि ऐन वक्त पर लाला दीनानाय अपने सगी-साथियो के साथ नारे लगाते उसी रास्ते से चले आ रहे हैं, जिससे मालती जी आई थी। उनके कार्य- कर्ता झण्डे उठाए हुए थे। जनता सहमी-सी रह गई। समझ ही नहीं पाई कि यह क्या माजरा है । हमारे वालटियरों ने उन्हें सुरक्षा दे रखी थी। आखिर दीनानाथ जी मंच पर आए। सबने लपककर उनका स्वागत किया और कुछेक क्षणो को मापाधापी के वाद लल्लू बाबू ने माइक पर घोषणा की-अव एक जबरदस्त ऐलान और है । हमारे सम्माननीय बुजुर्ग और नेता लाला दीनानाथ इसी मच से आपसे कुछ कहेगे । लाला दीनानाथ जी! १०१/ काली बाधी । दीनानाथ जी आए और अपने लहजे में बोलने लगे-वहिन मालती जी और उपस्थित दोस्तो ! मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है। मान इतना है कि मालती जी जैसी निर्भीक और बुद्धिमान तथा साहसी नेता के हाथों में हमारा भविष्य सुरक्षित है ! जो कुछ मैं आप सबके लिए कर सकता हूं, उससे अधिक मालती जी कर सकती हैं, इसलिए मैंने यह तय किया है कि मैं चुनाव नहीं लड़गा'"अव नाम तो वापस नहीं लिया जा सकता, पर मैं अपने सारे कार्यकर्ताओं और समर्थकों से विनती करता हूं कि वे अब मालती जी का साथ दें। जो वोट वे मुझे देनेवाले थे, वे मालती जी को दें । मैं अव उनके साथ हूं-और साथ रहूंगा ! मालती जी की जीत हम सब की जीत है ! नमस्कार... 'मालती जी! जिदावाद !' भीड़ फिर गरजी''तालियों की आवाज़ से कान के पर्दे फटने लगे । लाला दीनानाथ के लिए लल्लू वावू ने मालती जी के पास वाली वह कुरसी खाली करवानी चाही, जिस पर अभी तक जग्गी बाबू बैठे थे। -~~-आप मेरी कुर्सी पर आ जाइए ! लल्लू वावू ने जग्गी वावू से कहा और लाला दीनानाथ के हाथ पकड़ कर धन्यवाद देते हुए उन्हें खींच कर ले आए और जग्गी वाबू की दुवारा खाली की गई कुर्सी पर उन्होंने लाला दीनानाथ को बैठा दिया। लल्लू वावू लाला दीनानाथ की कुर्सी के हत्थे पर झुके हुए कुछ वात करने लगे तो उनका कंघा जग्गी बाबू के लगा। जग्गी वाबू ने धीरे से खुद ही लल्लू बाबू के लिए कुर्सी खाली कर दी आप वैठिए "वात कीजिए' "मैं इधर वैठ जाऊंगा'"कहते हुए जग्गी वाव कुछ खिसियाए-से कोने वाली कुर्सी पर बैठ गए । मैंने बहुत तकलीफ से देखा था । जग्गी बाबू की जगह फिर वीच से कोने की तरफ हटने लगी थी। लेकिन मैं क्या कर सकता था ! गनीमत यही थी कि नरसी सेठ इस वीच चुपचाप उठकर चले गए थे। अब प्रोग्राम के नाम पर कुछ खास नहीं रह गया था। भीड़ उठने लगी थी थी तो मिर्जा साहब ने माइक से अगली सभाओं की सूचना देनी शुरू कर दी थी। १०२/ काली आंधी थके-हारे हम लोग भी लोट आए थे। लाला दीनानाथ मालती जी के साथ उन्हीं की कार में होटल तक गए थे । जग्गी वावू को लल्लू बाबू ने मेरे साथ बैठा दिया था। जग्गी वावू न खुश थे, न नाराज"वे वीत- राग थे। हम लोग लौटे तब तक बंधेरा हो चुका था । जग्गी वाबू ने रास्ते में कोई खास बात नहीं की । सबके चेहरो पर जीव का संतोष था। कुछ ऐसा भाव कि आज मैदान सर कर लिया है। और यह भाव गलत भी नहीं था। हुआ यही था। सचमुच जनता पर वेहद असर पड़ा था। विरोधियों को हमने पीट लिया था। होटल में आकर उतरे तो मैं जग्गी वाबू के साथ कपर चला गया था। जग्गी वावू नाखुश नहीं थे। पर वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ। मैंने उनसे धीरे से कहा-चुनाव खत्म हो जाए, तो मेरे खयाल से आप और मालती जी पचमढ़ी हो आइए" --क्यों ? उन्होंने विना समझे-बूझे ही पूछ लिया था। —या लिली को यहा बुला लीजिए ! वे धीरे से मुस्कराए। फिर वोले-कुछ समझ में नहीं आता." हमारी जिन्दगी का क्या रूप हो सकता है ? बाखिर क्या शक्ल होगी? गुरूसरन जी, जिन्दगी एक वार वदशक्त हो जाए तो बहुत मुश्किल होता है."उसे दुबारा वही पुराना सुन्दर रूप देना ! मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता." इसी समय एक वेयरा नीचे से तार लेकर आ गया था"तार लिली का था-~-पापा ! मैं यहा पूरे होस्टल में अकेली हू । मन नहीं लगता है । याप आकर मुझे ले जाइए ! उन्होंने तार मेरे हाथ मे दे दिया । वे बहुत उदास हो गए थे। मैंने बात बदलनी चाही, बोला-जिस तरह वातें प्राज घटित हुई हैं, उन्हीके वल पर कह रहा हूं जग्गी वावू, कि लिली के पास या तो आप दोनो चले जाइए या उसे यहा बुला लीजिए-यही ठीक होगा। -~-मुश्किल यह है गुरूसरनजी, कि जैसे बाहरी दुनिया में वातें घटित होती हैं, वैसी आपसी दुनिया में नहीं होती। मेरे लिए वापस लौटना काली आंधी | १०३ दीनानाथ जी आए और अपने लहजे में बोलने लगे-~बहिन मालती जी और उपस्थित दोस्तो ! गुणे अधिक कुछ नहीं माना है। गाव इतना है कि मालती जी जैसी निगा और बुद्धिमान तथा साहसी नेता के हाथों में हमारा भविष्य सुरक्षित है ! जोगध में आप सबके लिए कर समता ई. उरारो अधिक मालती जी पार रामती हैं, इसलिए मैंने यह तय किया हमें चुनाव नहीं लगा "अब नाग तो वापरा नहीं लिया जा सकता, पर में अपने सारे माताओं और समर्थकों से धिनती रता हूं कि ये अव मालती जी का साथ दें। जो वोट पे गुगो देनेवाले थे, ये गालती जी को में। मैं उनके साथ और साथ रहूंगा ! मालती जी की जीत हम राबगी जीत है! नमस्कार... -'गालती जी! जिन्दावाद !ीय फिर गरजी तालियों की आपाश रोमान गर्दै पाटने लगे। लाला दीनानाथ के लिए लल्लू बाबू ने मालती जी को पारा पाली यह पुरसी साली पारपानी पाही, जिस पर अगी तसा जगी बाबू बैठे थे। -आग मेरी कुर्सी पर आ जाइए ! लल्लू बाबू ने जगी बाबू से HTET और लाला दीनानाथ गो हाथ पाइयार धन्यवाद देते हुए उन्हें सींच आए और जगी सुधारा साली की गई कुर्सी पर उन्होंने लाला दीनानाथ को बैठा दिया। पल्लू, बाबू नाला धीमानाय की गुर्गी हों पर शुश हुए गाछ बात पारने लगे तो उन पर जग्गी बाबू ने लगा। जग्गी वान ने पीरे से तुम ही लल्लू बापू के लिए रौं खाली कर दी-आप बलिए'"वात गीजिए इधर बैठ जाऊंगा'"हते हुए जग्गी बाबू गुष सिरियाए-से कोने वाली पुरी पर बैठ गए। ने बहुत तकलीफ से देखा था। जग्गी बान जगह फिर चीपरो कोने की गरम हटने लगी थी। लेकिन मैं नया कर सकता था! गनीगा मही भी किसी सेठ इस बीप गुगनाप उठगार पले गए थे। आ पोशाग नाम पर कुछ खास नहीं रह गया था। भीड़ उटने लगी भी थी तो मिल साहब ने माह से अगली रामाओं की सुचना देनी शुरू कर दी थी। बाकी १०२ / काली आंधी थके-हारे हम लोग भी लौट आए थे। लाला दीनानाय मालती जी के साथ उन्हीं की कार में होटल तक गए थे। जग्गी वावू को लल्लू बाबू ने मेरे साथ बैठा दिया था । जग्गी वावू न खुश थे, न नाराज"वे चीत- राग थे। हम लोग लौटे तब तक अंधेरा हो चुका था। जग्गी बाबू ने रास्ते में कोई खास बात नही की । सबके चेहरों पर जीत का सतोप था। कुछ ऐसा भाव कि आज मैदान सर कर लिया है । और यह भाव गलत भी नहीं था। हुआ यही या । सचमुच जनता पर बेहद असर पड़ा था। विरोधियों को हमने पीट लिया था। होटल में आकर उतरे तो मैं जग्गी वाबू के साथ ऊपर चला गया था। जग्गी बाबू नाखुश नही थे । पर वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ । मैंने उनसे धीरे से कहा-चुनाव खत्म हो जाएं, तो मेरे खयाल से आप और मालती जी पचमढ़ी हो याइए" -क्यो ? उन्होने बिना समझे-बूझे ही पूछ लिया था। ---या लिली को यहा बुला लीजिए ! वे धीरे से मुस्कराए। फिर वोले-कुछ समझ में नहीं आता" हमारी जिन्दगी का क्या रूप हो सकता है ? आखिर क्या शक्ल होगी? गुरूसरन जी, जिन्दगी एक वार बदशक्त हो जाए तो बहुत मुश्किल होता है"उसे दुवारा वही पुराना सुन्दर रूप देना ! मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता... इसी समय एक वेयरा नीचे से तार लेकर आ गया था."तार लिली का था-पापा ! में यहां पूरे होस्टल में अकेली हूं। मन नहीं लगता है । आप आकर मुझे ले जाइए ! उन्होंने तार मेरे हाथ में दे दिया । वे वहुत उदास हो गए थे। मैंने वात बदलनी चाही, बोला-जिस तरह बातें प्राज घटित हुई हैं, उन्हीके बल पर कह रहा हूं जग्गी बाबू, कि लिलो के पास या तो बाप दोनों चले जाइए या उसे यहा बुला लीजिए-यही ठीक होगा। - मुस्किल यह है गुरूसरनजी, कि जैसे बाहरी दुनिया में बातें घटित होती हैं, वैसी आपसी दुनिया में नहीं होती। मेरे लिए वापस लौटना फाली बांधी।

दीनानाथ जी आए और अपने लहजे में बोलने लगे-बहिन मालती जी और उपस्थित दोस्तो! मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है । मान इतना है कि मालती जी जैसी निर्भीक और बुद्धिमान तथा साहसी नेता के हाथों में हमारा भविष्य सुरक्षित है ! जो कुछ मैं आप सबके लिए कर सकता हूं, उससे अधिक मालती जी कर सकती हैं, इसलिए मैंने यह तय किया है कि मैं चुनाव नहीं लड़गा'"अब नाम तो वापस नहीं लिया जा सकता, पर मैं अपने सारे कार्यकर्ताओं और समर्थकों से विनती करता हूं कि वे अव मालती जी का साथ दें। जो वोट वे मुझे देनेवाले थे, वे मालती जी को दें । मैं अब उनके साथ हूं-और साथ रहूंगा ! मालती जी की जीत हम सब की जीत है ! नमस्कार... -'मालती जी ! जिंदावाद !' भीड़ फिर गरजी''तालियों की आवाज से कान के पर्दे फटने लगे। लाला दीनानाथ के लिए लल्लू बाबू ने मालती जी के पास वाली वह कुरसी खाली करवानी चाही, जिस पर अभी तक जग्गी बाबू बैठे थे। -आप मेरी कुर्सी पर आ जाइए ! लल्लू बाबू ने जग्गी वाबू से कहा और लाला दीनानाथ के हाथ पकड़कर धन्यवाद देते हुए उन्हें खींच कर ले आए और जग्गी बाबू की दुवारा खाली की गई कुर्सी पर उन्होंने लाला दीनानाथ को बैठा दिया। लल्लू वावू लाला दीनानाथ की कुर्सी के हत्थे पर झुके हुए कुछ बात करने लगे तो उनका कंधा जग्गी बाबू के लगा। जग्गी वाबू ने धीरे से खुद ही लल्लू बाबू के लिए कुर्सी खाली कर दी—आप वैठिए "वात कीजिए "मैं इधर बैठ जाऊंगा'"कहते हुए जग्गी बाबू कुछ खिसियाए-से कोने वाली कुसी पर बैठ गए। मैंने बहुत तकलीफ से देखा था । जग्गी बाबू की जगह फिर वीच से कोने की तरफ हटने लगी थी। लेकिन मैं क्या कर सकता था! गनीमत यही थी कि नरसी सेठ इस बीच चुपचाप उठकर चले गए थे। अव प्रोग्राम के नाम पर कुछ खास नहीं रह गया था। भीड़ उठने लगी थी थी तो मिर्जा साहब ने माइक से अगली सभाओं की सूचना देनी शुरू कर दी थी। ran - १०२ / काली आंधी थके-हारे हम लोग भी लौट आए थे। लाला दीनानाथ मालवी जी के साथ उन्हीं की कार में होटल तक गए थे । जग्गी वावू को लल्लू बाबू ने मेरे साथ बैठा दिया था । जग्गी वावू न खुश थे, न नाराज"वे वीत- राग थे। हम लोग लौटे तब तक बंधेरा हो चुका था । जग्गी वावू ने रास्ते में कोई सास वात नहीं की। सबके चेहरों पर जीत का संतोष था। कुछ ऐसा भाव कि आज मैदान सर कर लिया है। और यह भाव गलत भी नहीं था। हुआ यही या । सचमुच जनता पर वेहद असर पड़ा था। विरोधियों को हमने पीट लिया था। होटल में आकर उतरे तो मैं जग्गी वायू के साथ ऊपर चला गया था । जग्गी बाबू नाखुश नहीं थे। पर वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ। मैंने उनसे धीरे से कहा-चुनाव खत्म हो जाए, तो मेरे खयाल से आप और मालती जी पचमढ़ी हो आइए" -क्यों ? उन्होने विना समझे-बूझे ही पूछ लिया था। -~-या लिली को यहा बुला लीजिए ! वे धीरे से मुस्कराए। फिर वोले कुछ समझ में नहीं आता." हमारी ज़िन्दगी का क्या रूप हो सकता है ? आखिर क्या शक्ल होगी? गुरूस रन जी, जिन्दगी एक बार वदशक्ल हो जाए तो बहुत मुश्किल होता है"उसे दुबारा वही पुराना सुन्दर रूप देना ! मेरी समझ मे कुछ भी नहीं आता." इसी समय एक वेयरा नीचे से तार लेकर आ गया था"तार लिली का था-पापा ! मैं यहा पूरे होस्टल में अकेली हू । मन नहीं लगता है। आप आकर मुझे ले जाइए ! उन्होंने तार मेरे हाथ में दे दिया । वे बहुत उदास हो गए थे। मैंने बात वदलनी चाही, बोला-जिस तरह बातें आज घटित हुई हैं, उन्हीके बल पर कह रहा हूं जग्गी वावू, फि लिलो के पास या तो आप दोनों चले जाइए या उसे यहां बुला लीजिए-यही ठीक होगा। –मुश्किल यह है गुरुसरनजी, कि जैसे बाहरी दुनिया में बातें घटित होती हैं, वंसी आपसी दुनिया में नहीं होती। मेरे लिए वापस लोटना .. कालो बांधी। १०३ . दीनानाथ जी आए और अपने लहजे में बोलने लगे-वहिन मालती जी और उपस्थित दोस्तो ! मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है । मान इतना कि मालती जी जैसी निर्भीक और बुद्धिमान तथा साहसी नेता के हाथों में हमारा भविष्य सुरक्षित है ! जो कुछ मैं आप सबके लिए कर सकता हूं, उससे अधिक मालती जी कर सकती हैं, इसलिए मैंने यह तय किया है कि मैं चुनाव नहीं लड़गा'अव नाम तो वापस नहीं लिया जा सकता, पर मैं अपने सारे कार्यकर्ताओं और समर्थकों से विनती करता हूं कि वे अव मालती जी का साथ दें। जो वोट वे मुझे देनेवाले थे, वे मालती जी को दें। मैं अव उनके साथ -और साथ रहूंगा ! मालती जी की जीत हम सब की जीत है ! नमस्कार" -'मालती जी! जिंदावाद !' भीड़ फिर गरजी."तालियों की आवाज़ से कान के पर्दे फटने लगे। लाला दीनानाथ के लिए लल्लू वायू ने मालती जी के पास वाली वह कुरसी खाली करवानी चाही, जिस पर अभी तक जग्गी बाबू वैठे थे। --आप मेरी कुर्सी पर आ जाइए ! लल्लू बाबू ने जग्गी वावू से कहा और लाला दीनानाथ के हाथ पकड़कर धन्यवाद देते कर ले आए और जग्गी बाबू की दुवारा खाली की गई कुर्सी पर उन्होंने लाला दीनानाथ को बैठा दिया। लल्लू बाबू लाला दीनानाथ की कुर्सी के हत्थे पर झुके हुए कुछ बात करने लगे तो उनका कंधा जग्गी बावू के लगा। जग्गी वाबू ने धीरे से खुद ही लल्लू वायू के लिए कुर्सी खाली कर दी-आप वैठिए बात कीजिए''मैं इधर बैठ जाऊंगा "कहते हुए जग्गी वा कुछ खिसियाए-से कोने वाली कुर्सी पर बैठ गए। मैंने बहुत तकलीफ से देखा था। जग्गी जगह फिर बीच से कोने की तरफ हटने लगी थी। लेकिन मैं क्या कर सकता था! गनीमत यही थी कि नरसी सेठ इस बीच चुपचाप उठकर चले गए थे। अब प्रोग्राम के नाम पर कुछ खास नहीं रह गया था। भीड़ उठने लगी थी थी तो मिर्जा साहब ने माइक से अगली सभाओं की सूचना देनी शुरू कर दी थी। हुए उन्हें खींच बाबू की थके-हारे हम लोग भी लौट आए थे। लाला दीनानाथ मालती जी के साथ उन्हीं की कार में होटल तक गए थे। जग्गी बाबू को लल्लू बाबू ने मेरे साथ बैठा दिया था । जग्गी वावू न सुश थे, न नाराज""वे वीत- राग थे। हम लोग लोटे तब तक अंधेरा हो चुका था । जग्गी वावू ने रास्ते में कोई खास बात नहीं की । सबके चेहरों पर जीत का सतोप था। कुछ ऐसा भाव कि आज मैदान सर कर लिया है । और यह भाव गलत भी नहीं था। हुआ यही था । सचमुच जनता पर वेहद असर पड़ा था। विरोधियों को हमने पीट लिया था। होटल में आकर उतरे तो मैं जग्गी वाबू के साथ ऊपर चला गया था। जगी बाबू नाखुश नहीं थे। पर वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ। मैंने उनसे धीरे से कहा-चुनाव खत्म हो जाए, तो मेरे खयाल से आप और मालती जी पचमढ़ी हो आइए" --क्यों ? उन्होने विना समझे-बूझे ही पूछ लिया था। —या लिली को यहा बुला लीजिए ! वे धीरे से मुस्कराए। फिर बोले कुछ समझ में नहीं आता." हमारी ज़िन्दगी का क्या रूप हो सकता है ? आखिर क्या शक्ल होगी? गुरूसरन जी, जिन्दगी एक वार बदशक्ल हो जाए बहुत मुश्किल होता है "उसे दुवारा वही पुराना सुन्दर रूप देना ! मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता" इसी समय एक वेयरा नीचे से तार लेकर आ गया था"तार लिली का था-पापा ! मैं यहा पूरे होस्टल में अकेली हूं । मन नहीं लगता है। आप आकर मुझे ले जाइए ! उन्होंने तार मेरे हाथ मे दे दिया । वे बहुत उदास हो गए थे। मैंने बात बदलनी चाही, बोला-जिस तरह बातें आज घटित हुई हैं, उन्हीके बल पर कह रहा हूं जग्गी बाबू, कि लिली के पास या तो आप दोनो चले जाइए या उसे यहा बुला लीजिए- यही ठीक होगा। –मुश्किल यह है गुरूसरनजी, कि जैसे बाहरी दुनिया में बातें घटित होती हैं, वैसी आपसी दुनिया मे नही होती । मेरे लिए वापस लौटना काली आंधी /१०३ संभव नहीं है"मेरा मन अपनी तरह रहते-रहते इसी तरह रहने को तैयार हो चुका है"जग्गी बाबू ने कहा । मैंने यही उचित समझा कि उन्हें उनके खयालों के साथ छोड़ दिया जाए, ताकि वे कुछ और सोच सकें और किसी नतीजे पर पहुंच सकें तो अच्छा हो।

में कार्यालय में आया तो सब जुटे हुए थे । लल्लू बाबू का भापण चल रहा था-मुझसे पूछिए तो इलेक्शन तो जीत लिया, भइये ! अब रह क्या गया है ! सब की जमानत जास्त न हुई तो मुझसे कहना. चन्द्रसेन का तो सामान नीलाम होगा, देख लेना । न हो तो मुझसे कहना भइये ! फिर उन्होने धीरे से मुझसे कहा--इन लोगो को काटो भइये ! काफी रात हो गई, अपने-अपने घर जाए । अरा से नमकीन का इतजाम हो जाए तो मजा आ जाए भइये ! जैसे-जैसे मालती जी की जीत निश्चित होती गई, उनके आसपास भीड़ बढ़ती गई। अब चुनाव अभियान ने पूरा जोर पकड़ लिया था। अखबार वाले, जो हमेशा विरोध में ही लिखा करते थे, उनके टोन में भी फरक आ गया था। लेकिन लल्लू बाबू सतर्क थे,—इत्मीनान नही करना चाहिए भइये ! इलेक्शन का ऊट कव किस करवट बैठ जाए, कुछ पता नहीं होता"इसे घेरकर खड़ा रखना चाहिए." विरोधी दलों और उम्मीदवारों के काफी कार्यकर्ता टूट-टूटकर हमारी ओर पा रहे थे, पर लल्लू बाबू की दृष्टि सवको देख रही थी। मिर्जा साहब काफी बड़े जत्थे को लेकर आए थे ये सव अपने साथ शामिल होने को तैयार हैं.. मालती जी बहुत खुश हुई थी, पर लल्लू बाबू ने तत्काल आग्रह किया था-सोच-समझकर तय कीजिए। अब इस वक्त नये लोगों को शामिल करना मेरे खयाल से ठीक नहीं होगा, हा ! ये लोग भीतर से तोड़-फोड़ करने की साजिश भी कर सकते हैं।" --तो जो आप ठीक समझिए कीजिए"मालती जो ने सारी जिम्मे- दारी लल्लू बाबू पर डाल दी थी। लल्लू बाबू के रवये से मिर्जा साहब थोड़े दुखी भी हुए थे, पर वे भी जानते थे कि चुनाव तक लल्लू बाबू की वात ही चलेगी। इसलिए मिर्जा साहब ने और आगे की सोची-क्यों काली आंधी/१०५ -- . लल्लू वायू, जीतने के बाद किस तरह के जशन का इंतजाम किया जाए? -नाच-गाना करवाइए ! क्यों भइये ? उन्होंने मेरी तरफ देखकर आंख मारी। -पब्लिक फंक्शन की बात कर रहा हूं। नरसी सेठ को पटाइए"सव कार्यकर्ताओं की एक शानदार दावत हो जाए तो क्या कहने ! लल्लू वावू ने सुझाव दिया । एक मुशायरा करवा दिया जाए तो कैसा रहे ? मिर्जा साहब ने समर्थन चाहा, तो लल्ल वाबू ताड़ गए, बोले-लगता है, आपने कोई नाम कही है ! और मिर्जा साहब झेंप गए, लेकिन उन्होंने बात को संभाला शहर में बहुत से शायर हैं, यह कहिए कि भोपाल शायरों का शहर है"हर गली-कूचे में शायर पड़े हुए हैं, सभी चाहेंगे कि मालती जी की जीत को शानदार तरीके से मनाया जाए और उन्हें भी उसमें शामिल होने की खुशी हासिल हो. -तो जो ठीक समझिए, कर लीजिए। हमें तो आप एक शाम कव्वाली सुनवा दीजिए"चाहे मेरे अकेले सुनने का ही इंतजाम हो जाए ! क्यों भइये ----यह भी हो जाएगा ! तो चलता हूं"और मिर्जा साहव उठकर चले गए । लल्लू बाबू ने खुराक ली और वोले-नमकीन का इंतजाम नहीं हुआ, भइये ! -- सुवह से फिर हलचल शुरू हो गई । फोन वरावर बजता रहा। तरह-तरह के लोग जानकारी चाहते रहे और प्रशंसा करते रहे। इसके बावजूद मैंने यह अनुभव किया कि अब राजनीतिक दांव-पेंच और गहरे उतर गए थे। वे बहुत थे। और कुछ गम्भीर मंत्रणाएं चालू हो गई थीं। मालती जी ने अगले दिन के कार्यक्रम ऐसे रखे थे, जो खास नहीं थे। ज्यादातर लोग उनसे अकेले में ही मिल रहे सतह से नीचे पहुँच गए १०६ / काली आंधी थे। यानी बाहरी प्रदर्शन का काम शायद उतना ज़रूरी नहीं रह गया था। लल्लू बाबू के मुताबिक हमें बाहरी काम को और जोर-शोर से चलाना था, पर वह सब अब मुल्य लोगों के सहारे नहीं, बल्कि दूसरे और तीसरे नंबर के लोगों को सौंपा जा रहा था। प्रत्येक पोलिंग बूध के लिए पोलिंग एजेंट नियुक्त करने का काम मुझे सौंप दिया गया था। महिलाओं को निकालकर लाने और बोट डल. पाने के लिए औरतों की एक पूरी फौज खड़ी हो गई थी। उसका इंचार्ज एक खुर्राट महिला को बना दिया गया था। गाव के इलाके में बनियों की वसूली करने वाले घूम रहे थे, जिसका लल्लू बाबू ने विरोध किया था । यह बात सही भी पी, वसूलयावी करने वालों को सभी घृणा से देखते हैं, इसलिए जगतसिंह को खासतौर से सिहोर गाव के इलाके में भेजा गया था कि वह जाकर दूसरे जिम्मेदार लोगो को खोजकर निकाले और काम पर लगाए। अभी दोपहर ही हुई थी कि एक ग्रामीण-सा लगता आदमी सायकिल पर आया था। तमाम झण्डे लगाए और अपनी पूरी गृहस्थी सायकिल में लटके झोलों मे भरे, उलझे बाल और बदहवास आखें"मैंने उसे देखा तो पहचाना-सा लगा। यह वही आदमी था जो सिहोर गाव में मैंने देखा था। जिसने भरी सभा में मालती जी से कहा था-साते वक्त सब अगुलिया बरोबर हो जाती हैं, और जिसे सभा में से जगतसिंह उठा ले गया था। आते ही उसने सवाल किया--सरदार भगतसिंह कहा है ? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ ! उस पागल की आखे जल रही थी। मैं सकपकाया । वह चीखा-बीवी सी आई, ई आई आर "जलिया वाला बाग काकोरी ट्रेन डकैती"इलाहावाद ! चन्द्रशेखर आजाद कहा है ? मुझे अभी उनसे मिलना है। सब लोग जमा हो गए थे, जगतसिह ने उस उस पागल को सम- झाया--आप वैठिए, अभी सब आ जाएगे- -कौन-कौन आएगा ! वह पागल चीसा। -सया जाएगे"भण्डारी जी एक प्याला चाय दीर सिंह ने आवाज लगाई। कालीयाधी:

-कहां है फिरंगी की तोप ? कहां है मेरा सुभाषचन्द्र बोस ? वह बूढ़ा फिर चीखा- मुझे सुभाषचन्द्र बोस से मिलना है। उन्हें लेकर मेरे पास आओ.." --आप खामोशी से वैठेंगे या नहीं ? जगतसिंह ने सख्त पड़ते हुए कहा। -~~~-क्या ? खामोश । मैं अब खामोश नहीं वैलूंगा। तुम सब को गोली से उड़ा दूंगा । कहते हुए उस पागल बूढ़ेने एक तमंचा निकाल लिया था-और क्रांतिकारियों की तरह सबकी तरफ दिखाते हुए चीखने लगा था-हरामजादे ! सबको भूनकर रख दूंगा । 'मक्कारो, सीने से गोलियां पार कर दूंगा। सब लोग सकते में आ गए थे, जगतसिंह ने बात विगड़ती देखी तो लपककर उस बूढ़े को जोर से एक मुक्का मारा था, वह बिलबिलाता हुआ जमीन पर गिर गया था। कुछ देर बाद वह डरा हुआ-सा उठकर अपनी सायकिल लेकर दीवार के सहारे चुपचाप बैठ गया था और फूट- फूटकर रोने लगा था। जगतसिंह ने ही बताया था कि वह बूढ़ा कभी-कभी पागलपन की बातें करता है। कुछ देर के लिए दिमाग चल जाता है, फिर ठीक हो जाता है । जब ठीक हो जाता है तो अक्लमंदी की बातें करता है। वह वस यों ही अपनी सायकिल पर झण्डा लगाए और झोले लटकाए इधर- उधर घूमता रहता है। भूख लगती है तो बकता है।

मुझे नहीं मालूम, शाम को मीटिंग कैसी हुई, क्योकि मैं गांवों की ओर चला गया था। लोटा तो देर हो गई थी। हाल-चाल बताने के लिए पर गया तो बिदा मिला, उसने बताया~मालती जी कुछ जरूरी कागज देख रही हैं। आसपास फैली महक से मैं समझ गया था कि इस पस्त मिलना मुस्किल होगा । लेकिन विंदा ने वंठा लिया। रोशनदान की गिरी से, जहाँ से रोशनी फूट रही थी, सिगरेट का धुआ तैरता हुआ पा रहा था। मैंने दरवाजे की ओर देता-मालती जी चश्मा लगाए पी, शाल कपों पर पड़ा था । वे कुछ कागज भी पलटती जा रही थी और सिगरेट भी पीती जा रही थी। एज-ट्रे बगल में रखी थी, उनका हाथ रास झाल्ने के लिए एश-ट्रे धक गया था, जरा-मा ठिटका था, फिर ये पिड़की के पास गई थी, वहीं सिगरेट की रास माहकर उन्होंने दो करा और लिये थे और सिगरेट युझाकर खिड़की से नीचे फेंक दी थी। एगदे मेज से उटा कर साइड-टेबुल पर रख दी थी और कागज देखने में फिर ममगूल हो गई थी मैं चुपचाप उठाया था । गलती से लिफ्ट पर चला गया तो सोचा जग्गी बाबू को भी देसता जाऊ । वे जाग रहे थे। दोनों हथेलियां सिर के पीछे टिकाए चुपचाप लेटे थे। मुझे देखते ही उटकर बैठ गए। बोले- में नापको हो याद कर रहा था, सोच रहा था कि फोन करके युनान । -बताइए"मैं हाजिरह ! मैंने कहा। -अब में परेशान हूं! --क्यों, क्या हुआ? •-मैं भी सब बातें साफ कर लेना चाहता हूं"श्न तह निग की तरह बीच में लटका नहीं रहना चाहता । बागिर इस गार नाटक का मतलब क्या है ? वणी वायू बोनि । कानी आधी/06 -~-किस नाटक का? वे उठे और झटके से उन्होंने एक पैकेट खोलकर मेरे सामने कर दिया--यह सब क्या है ? यह किसलिए भेजा गया है ? भंने देखा--उसमें लिली के लिए कुछ कपड़े थे। कुछ कितावें और कुछ स्वीट्स। -----यह किसलिए भेजा गया है ? यह तमाशा है ? मैं जग्गी वावू का गुस्सा भांप गया था, मेरा चुप रहना ही बेहतर था। मैंने भी अपनी असहमति जताई थी और इतना ही कहा था-मैं आज इधर था नहीं। मैं गांव की तरफ गया हुआ था। अभी कुछ देर पहले ही वापस आया। मालती जी की आपसे मुलाकात हुई थी या" ----यह जगतसिंह लाया था !"यह किस चीज़ का इनाम है ? उन्होंने ऊंची आवाज में मुझसे पूछा था। -~-बहुत बड़ी गलती की है मालती जी ने मुझे कुछ वक्त दीजिए मैं उनसे बात करूंगा"मैं सकपकाकर कह गया था। -आप क्या बात करेंगे, बात मैं करूंगा ! वे गुस्से में ही बोले । -मेरे खयाल से आप कुछ दिन और रुक जाएं-इलेक्शन हो जाए तो सब बातें खुलकर कर ली जाएं ! क्यों ! हर बात उनकी सुविधा, उनकी जरूरत और उनके वक्त का इंतजार क्यों करती रहे ? किसलिए? अव हर बात मालती की जरूरत और वक्त के मुताविक नहीं होगी "मेरी अपनी ज़रूरत और वक्त के मुताविक होगी ! जग्गी बाबू ने ओंट चवाते हुए कहा था । -मेरे खयाल से अगर आप चार-पांच दिन जोर रुक जाएं तो बेहतर है। जिस दिन वोट पड़ेंगे, सब सन्नाटा होगा, वे एकदम खाली होंगी." लोग भी नहीं होंगे, तब ठीक रहेगा। मैंने उन्हें समझाया-इतनी-सी मेरी बात मान लीजिए। वे बंद पिंजरे में शेर की तरह टहलते रहे । मेरे लिए उठकर आना मुश्किल हो रहा था। अंधेरा चारों तरफ भरा हुआ था। उनके चहरे पर रोशनी की लकीर माती और हट जाती थी । जग्गी बाबू की तकलीफ बहुत सही और गहरी थी। लेकिन किया क्या जा सकता -- -- ११० / काली आंधी था? मैं यह भी नहीं चाहता कि मालती जी का सारा काम अन्तिम दिनों में बिगड़ जाए । 'मैं सुबह आऊगा' कहकर मैं उठने लगा था। जाइए, आप भी माराम कीजिए ! जग्गी वायू ने कहा था- मैं कोई बात नहीं करूगा । क्यो करूं? खामखाह इस मामले में पड़ गया। हूं'"मुझे क्या जरूरत है"कहकर वे विस्तर पर लेट गए। मैं भी उठकर चला आया। चलते-चलते यों ही कह बाया था~मैं सुबह आऊंगा। यों सुबह जग्गी वाबू से मिलने का कोई कारण तो नहीं था, पर कह आया था, इसलिए गया तो देखा "एपार्टमेंट में ताला वद है । नीचे उतर कर आया। असिस्टेंट मैनेजर से पूछा तो उसने बताया वे कही गए हैं । ---कहां? -~-यह तो पता नहीं। शायद अपनी बच्ची के पास पचमढ़ी गए हों। और कही वे जाते भी नहीं। -~-इसका मतलब है, छुट्टी लेकर गए है ! मैं सुन्न रह गया। हालांकि चुनाव-बुखार काफी तेज था, पर मेरा हाल बुरा हो गया था । एक तो काम का बोझ-ऊपर से यह जबरदस्त झटका ! मैं कार्यालय में आकर चुपचाप लेट गया था। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । जग्गी बाबू ने यह क्या किया था। कही वे त्यागपत्र देकर तो नहीं चले गए ? कही कुछ और तो नहीं कर बैठेगे ? अपने सम्मान और अपनी अकेली दुनिया को लेकर जीने वाले आदमी की यही तो मुश्किल होती है । मुझे समझ मे नही रहा था कि मालती जी ने जगतसिंह के हाथों लिली के लिए वह पैकेट क्यों भिजवाया था। क्या मालती जी ने जग्गी बाबू और लिली को कपड़ों और कुछ उपहारी से तौलना चाहा था। ये उपहार क्या बदसुरत उपहार में नहीं बदल गए थे? मैं चुपचाप पड़ा काली आधी/१११ सोच ही रहा था कि लल्लू बाबू ने पास से गुजरते हुए पूछा-यक गए 'भइये ? आज शाम तुम भी एक खुराक लेना" मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। तभी सायकिल की घंटी बजी और दरवाजे के पार वही बूढ़ा पागल दिखाई दिया। उसने वहीं से आवाज़ लगाई-जगतसिंह जी ! हमारे साथ गरीबी मिटाने चलेंगे ? आइए, चलिए। इस वक्त वह बिलकुल ठीक-ठीक बोल रहा था। इतने में जगतसिंह आ गया था । उस बूढ़े को देखते ही बोला--- आप फिर आ गए? बूढ़े ने विलकुल सामान्य आदमी की तरह कहा-मैं आपका साथ देने आया हूं। बहुत विचार किया । मैंने बहुत विचार किया और तय किया कि एक बार आपका साथ और दिया जाए"शायद गरीबी इस बार मिट सके ! इस बार और देखता हूं."नहीं तो तमंचा मेरे पास है ही "भगतसिंह, आजाद, विस्मिल मेरे साथ हैं ही "वह बूढ़ा फिर बहकने लगा था। -~~-आप उधर जाकर चाय पीजिए। कुछ नाश्ता कर लीजिए"जगत सिंह ने कहा और उन्हें भण्डारी वाले कोने की ओर ठेलकर भीतर आया, उसे कोई फोन करना था। फोन नहीं मिला तो उठकर जाने लगा । मैंने उसे वहीं रोक लिया। बिना पूछे मेरा दिल नहीं मान रहा था । मैंने पूचा -क्यों जगतसिंह, जग्गी वावू को वह उपहारों का पैकेट तुम दे । आए थे? .-हां"क्यों ? लल्लू बाबू ने कहा था । जगतसिंह बोला। -~-लल्लू बाबू ने कहा था ? पैकेट किसने दिया था, मालती जी ने या लल्लू बाबू ने? मैंने पता किया। ----लल्लू बाबू ने ही दिया था। यहीं दिया था । मुझसे कहा, ऊपर जाकर दे आओ और कह देना मालती जी ने भेजा है । क्यों, क्या हुआ जगतसिंह की उत्सुकता जागी। ---कुछ नहीं। मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि वह मालती जी ने भिजवाया था या नहीं"मैंने कहा। ? २१२ / काली मांधी .

---ठीक-ठोक मुझे मालूम नहीं । मालती जी ने मेरे सामने तो दिया नहीं, लेकिन लल्लू बाबू ने जब कहा कि कहना, मालती जी ने भेजा है, तो उन्होने ही भेना होगा । और कौन भेज सकता है ! आप मालती जी से दरयाफ्त कर लीजिए."कोन-सी बड़ी बात 'कहते हुए. जगतसिंह चला गया। मेरी उलझन और बढ़ गई। यह वक्त भी ऐसा नहीं था कि मालती जी से पूछता । वह विगड़ पड़तों-'यह वात करने का यही मौका है ? जो काम कर रहे हैं, पहले उसे देखिए।' रह-रहकर मुझे क्षत-विक्षत जग्गी वाबू का ध्यान आ रहा था। वे एकाएक बिना बताए चले गए । पता नहीं, क्या सोचकर गए होंगे ! पच- मढ़ी ही गए है या कहीं और "लौटकर आएगे या नहीं? आएगे भी तो कय । मुझे यही लग रहा था कि सहने की कोशिश करते हुए भी भीतर से किसी भी स्थिति के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए अवतः वे वरत नहीं कर पाए । लिलो की छुट्टियां थी। वह अकेली होस्टल में होगी, यह बात भी लगातार उन्हें दुख देती रही होगी और फिर लिली का तार भी आया था । रुकना मुश्किल हुआ होगा उनके लिए । हो सकता है, पे लिली को लेकर कही और चले जाए"यह तो तय लग रहा था कि वे तब तक लौटकर नहीं आएगे, जब तक यह धूमधाम खत्म नहीं हो जाती."यानी मालती जी चली नहीं जाती। यह सब बहुत दुःखद था। मुझे उम्मीद तो नहीं थी। लेकिन आते-जाते मेरी निगाहे यही सोजती रहती थीं कि कही वे आ न गए हों दूसरे दिन में ताल की निचली सड़क की ओर गया था जहा मनियों के वगले हैं"वहां जग्गी बाबू से मिलने की कतई उम्मीद नहीं थी, लेकिन एक पुलिया के पास देखा–तामा खड़ा है, और लिली का सामान रखा है, और लिली तथा जग्गी वाबू दोनों ताल-किनारे खड़े डूबता हुआ काली आंघो | ११३ सूरज देख रहे हैं । ताल का पानी काफी उतरा हुआ था"वहां दो नावें पड़ी थीं। लिली उधर भाग गई थी। जग्गी वाबू उसे आवाज दे रहे थे। तभी मैंने उन्हें आवाज दीअरे जगी वाव, आप यहां ? --अरे आप ! हां लिली को पचमढ़ी से ले आया हूं। स्टेशन पर उतरकर जिद करने लगी, तांगे से चलिए पापाताल का चक्कर लगाते हुए चलिए पापा"बहुत शैतान है । जरा देखू उसे, कहीं नाव पानी में न उतार ले "कहते हुए जग्गी वाबू किनारे की ओर भागते चले गए। मुझे जल्दी थी। मैं वाप-बेटी को कुछ क्षण देखता रहा. वे दोनों दौड़ रहे थे। लिली आगे-आगे, जग्गी वावू पीछे-पीछे 'लिली की भोली आवाज़ आ रही थी-पापा, हमें पकड़िए"पापा, हमें पकड़िए." तांगे वाला उन्हें अचरज और प्यार से देख रहा था। मैं उन्हें पलट-पलटकर देखता चला आया। वे दोनों अपने में डूबे हुए थे। उन्हें किसी की परवाह नहीं थी। वे डूबते हुए सूरज को भी भूल गए थे। भागते-भागते वे दोनों काफी दूर निकल गए थे । ताल का पानी सुनहला होकर लहरा रहा था। हवा धीरे-धीरे चल रही थी। किनारे की घास सरसरा रही थी। लिली के खुले हुए रेशमी बाल उड़ रहे थे। काफी लम्बा चक्कर काटकर जब मैं वापस होटल पहुंचा, तब तक जग्गी बाबू और लिली नहीं लौटे थे। रात हो गई थी। मैं मालती जी के पास चला गया। उनसे कुछ जरूरी बातें करनी थीं। मन में आया भी था कि उन्हें बता दूंगा: लिली आई हुई है, पर मैंने जानबूझकर नहीं बताया""मालती जी का संतुलन बिगड़ और जग्गी वावू को बुरा लग सकता था।

हो जाना था। इसलिए ये आखिरी दो दिन थे । प्रदर्शन और प्रचार का काम भी जोरों पर था और भीतर ही भीतर ठोस काम भी चल रहा था। मालती जो उसीमें बहुत व्यस्त थी। लिली बहुत प्यारी बच्ची थी। मुबह मन नहीं माना तो चुपचाप उठकर उसे देखने चला गया। वह बैठी अपने पापा अखबार की स्नवरें पढकर मुना रही थी। पापा का चश्मा लगाए हुए-इलेक्शन फीवर रोचेज हाइएस्ट पिच ! वायलेंस इन गुजरात । सुनिए पापा"यायल फाइड इन वाम्बे हाई.. -अच्छा, चश्मा उतार और देख, चाचा जी आए हैं ! जग्गी बाबू ने उसे टोका । चश्मा लगाए-लगाए ही उसने शैतानी से मुझे देखा-- नमस्ते अंफल! नमस्ते बेटे ! कहकर मैंने उसे प्यार किया और बैठने लगा तो जग्गी वायू ने कुर्सी पर विखरी लिली की तमाम चीजें बटोरते हुए कहा-पूरी गृहस्थी उठा लाई है ! ओह ! यह टोपी देखी "गुरूस रन जो "यह लिली मेरे लिए लाई है। रगीन मूत की फुदनेदार टोपी। जग्गी बाबू ने लगाई तो लिली ने आखें चमकाई-अच्छी है न पापा! -बहुत बढ़िया"अच्छा अव तुम तैयार हो जाओ"हं, जग्गी बाबू ने कहा तो लिलो चश्मा उतारकर गई और कथा उठा लाई-हमारे बाल बनाओ पापा। वह पापा कुछ इस प्यारे तरीके से कहती थी कि एकाएक प्यार उमहने लगता था। जग्गी बाबू कर्फे से उसके बाल सुलझाने लगे "सुलझाते-सुल- झाते बोले-मैं जानवूनकर इसे यहां ले आया हूं। -क्यो पापा ? लिली ने सवाल किया। -कुछ नहीं वेटे । यह अपना घर नहीं है ? जग्गी बाबू ने कुछ इस तरह से कहा कि लगा, वे वात बदलना चाहते हैं। ---तभी वेयरा एक ट्रे मे नाश्ता लेकर आ गया-गुड मानिग लिली देवी! --मानिंग रामसिंह अंकल ! गुड मानिग"लिली चहकी। काली आधी/ ११५ -- -~-ये रहा लिली वेवी का दूध ! वेयरे ने जैसे छेड़ते हुए कहा । -देखिए पापा"हम दूध नहीं पिएंगे."रामसिंह अंकल को सम- झाइए ! लिली ने रूठते हुए कहा । -पहले गिलास भी तो देखो"उसमें क्या है ! जग्गी वाबू ने राम- सिंह के हाथ से संतरे के रस का गिलास लेकर सामने कर दिया। लिली मुस्करा अच्छा, मैं अभी चलूं. मैंने कहा और लिली को प्यार करके मैं मुक्त मन से दी। चला आया। काम तो मैं सब करता रहा पर आंखें हमेशा लिली के लिए सतर्क रहीं। इधर-उधर वह दिखाई पड़ती रही । अपने अकेलेपन में मस्त वह अपने साथ रहने की आदी हो गई थी। कभी वह टैरेस की दीवार पर लटकी साबुन के बुलबुले छोड़ती नजर आती "कभी काउंटर के पार पड़ी कुसियों पर पैर हिलाती बैठी रहती। कभी हमारे कॉटेज के पास वाले लॉन में तितलियां पकड़ने आती।

किसी गनीमत हुई कि वोटिंग शांत ढंग से हो गई । दंगे-फसाद की उम्मीद तो थी ही। लेकिन हम भी तैयार थे। लल्लू बाबू ने पूरी तैयारी कर रखी थी। ज्यादा खतरा गलोर अहमद के यादमियो की तरफ से था। गुलशेर ने इस वीच जमकर साप्रदायिक जहर फैलाया था। हम लोग सतर्क थे, पर कहा क्या जा सकता था? कब क्या हो जाए, को पता नहीं होता । चन्द्रसैन तो रस्सी का सांप थे । यह बात चुनाव- अभियान के जोर पकड़ते-पकड़ते साफ हो गई थी। फिर भी वे निकटतम प्रतिद्वन्दी थे। वोटिंग शाम पाच बजे बद हो गई। हम लोग जस्त-पस्त पड़ गए। किसी को कुछ भी होश नहीं था। सब लोग घोहे चेचकर सो गए थे। सुबह नौ बजे से कलक्टरी मे गिनती होने वाली थी, पर हमारा कोई एजेंट वहा नहीं पहुंचा था। आखिर पोलिंग आफीसर का फोन आया और जैसे-तैसे तैयार होकर लल्लू बाबू भागे। कुछ देर बाद लोग पहुंच गए । गिनती शुरू हो गई थी। कलक्टरी के बाहर लोगो की भीड़ जमा थी। वहां पहुचकर यह अदाज हुआ था कि चन्द्रसेन और गुलशेर अहमद के लोग भी काफी उत्साहित थे । ऐसी बात नहीं थी कि उन्हें जीतने की उम्मीद न हो। अलग-अलग उम्मीदवारों के लोग कलक्टरी की चहारदीवारी के वाहर पेड़ो की छाया में जमा धे। गिनती चलने के कारण गारद का पहरा भी उस हिस्से में या । चन्द्रसेन के लोगों ने चाय की दुकानों से किराये पर तस्त लेकर अपनी गद्दी नीम के पेड़ के नीचे कायम कर ली थी। गुलशेर अहमद के मजमे में घरवत वट रहा था। करीब दो घंटे बाद चार-पाच आदमी उस कमरे के दरवाजे पर दिखाई पड़े जहां काउटिंग हो रही थी। लल्लू बाबू उनमें थे। वे बहुत पुत्र नही थे। शेप लोग दूसरे उम्मीदवारों के एजेंट थे। वाहर सड़े लोगो के गिरोहों ने उन्हें घेर लिया-क्या हाल है ? कितनी काउटिंग हुई? काली मापी /११७ - ! चन्द्रसेन के एजेंट ने गर्व से कहा-अब तक सात हजार की काउटिंग हुई है । चन्द्रसेन जी दो हजार से आगे हैं । -चन्द्रसेन जिंदावाद ! चन्द्रसेन जिंदावाद ! कुछ नारे लगे और चन्द्रसेन के मजमे में चाय के कुल्हड़ और गिलास चलने लगे। पत्तों पर भजिया भी आने लगी। गुलशेर अहमद के मजमे में शरवत के गिलास रुक गए। हम लोग खामोश थे। अभी कुछ कहा नहीं जा सकता था। अभी तो शुरुआत थी। ऊपर-नीचे तो लगा ही रहता है । डेढ़ लाख की गिनती में बहुत बार हिचकोले लगने थे। वह साइकिल वाला बूढ़ा पागल भी एक जगह खड़ा था। कुछ देर बाद उसने भी मजमा जोड़ लिया था । वह बोल रहा था-गांधी जी ने गोली क्यों खाई थी? बोलो मेरे भाइयो ! गांधी जी ने गोली क्यों खाई थी? भगतसिंह फांसी पर क्यों चढ़े थे? चन्द्रशेखर आजाद क्यों शहीद थे ? सुभाषचन्द्र बोस ने बाना क्यों बदला था ? बोलो, मुझे बताओ "और इसगे बाद उस बूढ़े पागल ने झोले से खंजड़ी निकाली और कात पर हाथ रखकर आलाप लेने लगा-- मेहनतकश लोगो, सावधान" मैं ठेके की चोट बताता हूं. पुरसी है इनका परम लक्ष्य गुरसी वाला कोई भी हो" जो गुरशी , वह देशभक्त उजला-काला कोई भी हो... मेहनतकश लोगो, सावधान मैं उंगी नोट बताता हूँ मादुर-किसानों में करते ये, पात मजदुर-किसानों की परशुली वकालत करते हैं गे धनवानों की, सामंतों की! ११८ / काली आंधी कुरसी पर इनको याद नहीं बाई बानू मजदुर किसानों के में डके की चोट बताता हूं ये सब, मायी हैं मंतानों के... हनतका लोगो ! सावधान ! मजम में लोग भटकने लगे थे कि तभी एक पुलिस वाला बापा । बड़े पागल ने डरकर ने देसा और मंत्रही बवाना वद कर दिया। पुग्नि वाला बिल्लापा-फिर वा गया ! चस मार! और उसने उनकी सबरी छीनकर एक तरफ फेंक दी। स्टेण्ड पर खड़ी माइकित को गिरा दिया और बूढ़े को एक बार धकेल दिया । वृद्धा हमला हुआ उठकर खड़ा हो गया । जो वह पुलिस वाले को विजा रहा हो । मनमा विसर गदा । बूढ़े ने बाना नामान बटोय चोर दूर एक पेड़ के नीचे बैटकर बीड़ी पौने लगा। तब तक एजेंट फिर बाहर वाए थे। फिर सबर फत्री-पच्चीत हबार की काउटिंग हो गई है । चन्द्रसेन बव पाच हजार से नोट कर रहे हैं । गलगेर बहमद नम्बर दी और मानती त्री नम्बर तीन । लल्लू बाब पर पटकते हुए निकले थे।पान आकर गल्ले में बौने- वर भये, बिना कटी वालों ने गन्ना दिया है। रोटिया हमारी तोड़ीं, वोट बटन को दे बाए । देता भइये ! गांव के इलाकों को काउटिंग पूरी हो गई है। वहां तो बरना भट्टा बैठ गया । पर ये गनर बहमद कहाँ में इतने भी वोट निकाल ले गया। समझ नहीं जाता, भय ! चाय का एक गिलास पीकर और जल्दी-जल्दी भरिया साकर नन वाव दिर भीतर चले गए । चन्द्रसेन वाले पेड़ के नीचे सबसे ज्यादा भोड़ हो गई थी। महर में भी बानन-फानन सबर पढन गई थी। कुछ नीर साइकिलों से, मोटरों ने बाए थे। कुछ जो भी बा आई यो"मारी मोद चन्दन वाले पड़ के नीचे जमा हो रही थी। उनके दम का एक कारवां कह रहा या कुलमालाओं का इनाम कर नो"और में पिटरोल भी भरवा नो"वाय जी को खबर पहुंच रही है न? -बाबू जी घर में चल चुके हैं। अभी बाजार में अटके हुए हैं। काली वापी |११६ । वहीं उन्हें खबर दे दी गई है ! किसीने बताया था 'बाबूजी' से उनका मतलव चन्द्रसेन से था। हमारी तरफ सन्नाटा था। सबके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं । गुलशेर अहमद के खेमे में रौनक थी। दोपहर ढलते-ढलते काफी कुछ साफ हो गया था। कुछ ढोल-नगाड़े वाले चुपचाप आफर चाय वालों की बैंचों पर जम गए थे। बीच-वीच वे जरा-सा ढोल वजाकर यह जता देते थे कि वाजे वाले भी मौजूद हैं। जिन्हें जरूरत हो वह अभी तय कर ले । कुछ मालिने भी आ गई थीं- फूलों के हार लिये और गठरी में खुदरा फूल वांधे । दूर से हिजड़ों की एक टोली तालियां चटकाती चली आ रही थी। हिजड़े आकर बाजे वालों के साय जम गए थे गुलशेर अहमद की हालत खस्ता हो चुकी थी । वे चुपचाप एक जीप में बैठे थे। उनके इर्द-गिर्द सात-आठ आदमी ही थे । वाकी लोग चन्द्रसेन के मजमे में शामिल हो गए थे। कुछ भीड़ अब हमारी तरफ भी बढ़ रही थी। लीड तो चन्द्रसेन ही कर रहे थे पर फर्क सिर्फ ढाई हजार का था। पता चला था कि चन्द्रसेन कलक्टरी के पास वाले होटल तक आ गए थे। अब वे तभी कलक्टरी पर आने वाले थे जब जीत की खबर सुनाई पड़ेगी। मालती जी को हम लोग पेट्रोल पम्प पर लगे फोन से सारी खवर दे रहे थे। आखिरी घंटे बहुत संशय के थे। तभी मैंने देखा, जग्गी बाबू लिली को लिए हुए आए थे । वे उसे सब समझा रहे थे."हिजड़े चन्द्रसेन को गजमे में नाच रहे थे । ढोल वाले धीरे-धीरे भांप रहे थे। -~-या हाल है गुरुसरन जी? जग्गी बाबू ने पूछा था । -कुछ कहा नहीं जा सकता""देखिए" -फिक मत कीजिए । जीत जाएंगे आप ! कोकाकोला मंगवाऊं? मैंने पूछा। -~-नहीं-नहीं, इसे बाजार ले जा रहा था। सोचा, यह तमाशा भी दिखा दूं! कहते हुए वे लिली को लेकर चल दिए थे। १२० / काली आंधी चन्द्रसेन के दल में कुछ लोग मालाएं खरीदकर शामिल हो गए थे। तभी संतोप की मुस्कराहट लिये लल्लू बाबू ने दरवाजे से झांका या। जगतसिंह दौड़कर पास गया था और वहीं से चीखता हुआ भागा था- मालती जी! हम लोगों ने विना जाने हुए ही नारा लगाया घा-जिदावाद ! सनसनी बढ़ गई थी। पता चला कि मालती जी तीन हजार से आगे हो गई थीं। मुनते ही हिजड़े हमारे सेमे में बाकर हुड़दंगा मचाने और तालिया चटकाने लगे। मालाओं वाले कुछ लोग धीरे से उधर से खिसककर इधर हमारी ओर आ गए। और हमने अपनी जीप सजाने का इंतजाम शुरू कर दिया । बाजे वाले भी हमारी ओर आ गए थे । मैंने दौड़कर पम्प से मालती जी को खबर दी और इसरार किया कि वे कलक्टरी पर आ जाएं । अव सिर्फ दस हजार की गिनती शेप रह गई थी और हमें पूरी उम्मीद थी कि हम जीतेंगे। 1 और वही हुआ ! मालती जो सात हजार वोटो से जीत गई थीं। लोग पागल हो गए थे। दमादम ढोल बजने लगे थे। हिजडे साही का छोर पकड़-पकड़कर फिरकी की तरह नाचने लगे ये । फूलो की वारिश हो गई थी। मालती जी मिर्जा साहब, लाला दीनानाय व अन्य तमाम साथियों के साथ आ गई थीं। खुशियो और वधाइयों के दौर के बाद जव उत्साह योड़ा कम हुआ था तो इपर ध्यान गया। चन्द्रसेन के कार्यकर्ता नदारद थे। तस्त खाली पड़े थे। चाय के गिलास और कुल्हड़ विखरे पड़े थे। चन्द्रसेन सात हजार वोटों से हारे ये और गलोर महमद की जमानत जन्त हो गई थी ! गुलमेर अहमद कलक्टरी के फाटक के सामने खड़े पागलों की तरह चीरा रहे घे-हमारी जमानत कैसे जन्न हो सकती है ! मैं पूछता हूं कैसे जन्त हो सकती है । जब पूरा इलेक्शन जात और मजहब के नाम पर काली आंधी/१२१ . लड़ा गया है तो मेरे साठ हजार मुसलमान कहां गए ? मैं पूछता हूं मेरे - साठ हजार मुसलमान कहां गए ? या तो मेरे वो साठ हजार मुसलमान मुझे दिए जाएं, नहीं तो जमानत का पैसा वापस किया जाए ! उनके तीन-चार साथी जोर-जवरदस्ती उन्हें जीप में डालकर ले गए । घर पर जाते-जाते भी वो यही चीखते गए-मेरे साठ हजार मुस- लमान कहां गए? मेरे साठ हजार मुसलमान कहां गए." फिर एक शानदार जुलूस वहीं कलक्टरी से शुरू हुआ था। जीप में मालती जी मालाओं से लदी खड़ी थीं। मिर्जा साहब शान से बगल में खड़े थे। लल्लू वावू ड्राइवर के पास बैठे थे । मैं उनकी बगल में जमा था । जगतसिंह मालती जी के पीछे था। भण्डारी भी लटके हुए थे। कुछ और लोग भी जीप में भरे हुए थे । आगे-आगे वाजे वाले थे। हिजड़ों को मालती जी ने पैसे दिलवाकर रवाना करवा दिया था। नारों की आवाज से सड़क गूंज रही थी। जगह-जगह से तमाशवीन लोग कभी फूल फेंक देते, कभी नारे लगा देते थे। वीच बाजार से हमारा जुलूस गुजरा तो मैंने देखाएक जगह पटरी पर जमा भीड़ के किनारे पर ही जग्गी बाबू भी खड़े थे। लोग नारे लगा रहे थे और मैंने देखा था--लिली उधर की रौनक देखकर कुछ चकराई- सी खड़ी थी और छोटे-छोटे हाथों से तालियां बजाती जा रही थी। उसने अपने पापा से कुछ पूछा था "इधर जुलूस की तरफ कुछ इशारा भी किया था। जग्गी वावू ने उसे क्या बताया था, यह सुन पाया, पर अपने अंदाज से लगा था कि लिली ने यही पूछा होगा- पापा, ये कौन हैं ? -ये एक लीडर हैं। इलेक्शन में जीती हैं ! हमारी जीप आगे निकल गई थी। और भीड़ के साथ ही वे दोनों भी पीछे छूट गए थे। आधी रात के बाद हंगामा खत्म हुआ। तो नहीं १२२ / काली आंधी दूसरी शाम को हो वहीं गोल्डन उन होटल के बड़े नॉन में गहर के नागरिकों की ओर से मालती जी के लिए अभिनन्दन समारोह आयो- जित किया गया था। नरसी सेठ ने खुद उगी बाबू को बवा-बताकर सारा इंतजाम करवाया था। नरसी सेठ बार-बार कहते जा रहे थे- जगदीश जी ! यह तो हमारी सुशनसोयी है कि आप हमारे साथ हैं." आपको क्या कमी है" --आप छोड़िये सेठ जी, मैं सब इतजाम करवा दूंगा। चग्गी बाबू कहा तो नरसी सेठ बोले- आप शर्मिन्दा मत कीजिए जगदीश जी." बापने मुझे एकदम अधेरे में रसा"यह तो नापका बड़प्पन है ! -~-अरे, इस दहप्पन में क्या रखा है ? जग्गी बाबू ने कहते हुए मजदूरो को हिदायत दो--सोफा ऊपर "स्टेज पर शाम होते ही भीड पहुंचने लगी। लिली वितलियां पकड़ने भी नहीं आई । लॉन में यह तामझाम था। मैंने एक बार पर टैरेस की तरफ देखा था। उसके रेशमी वालो वाला मामूम-सा चेहरा कानिस पर ठोड़ी टिकाए नीचे चल रहे सजावट के सरजाम को देख रहा था। शानदार जलसा हुआ। स्टेज पर हम लोग नहीं गए क्योकि यह नागरिको का जलसा था। कई स्कूलों के बच्चे भी आए हुए थे। महिला विद्यालय की टीचरें चुनी हुई बच्चियों को लिये खडी थी। सास नागरिको को भीड़ स्टेज पर यो । हम लोग घरवालों की तरह इधर-उधर घूम रहे थे। जग्गी वायू बीच-बीच मे आते थे, पर ज्यादा वक्त वे अपने केविन के भीतर ही रहे थे। मुझे यह अच्छा लगा था कि जग्गी वाव ने लिली को नहीं रोका था। वह कुछ अचरज, कुछ मुलभ सहजता से इधर-उपर लोगो को ताक रही पी। कभी फुदफती हुई फवारों के पास चली जाती थी। एक बार जग्गी वायू ने आकर उसे बुलाया पा-तू मेरे केबिन में - काखी बांधी/ १२३ लकर वैठ.."मेरे पास... नहीं पापा'"हम ये देखेंगे ! लिली ठुनकी थी। -आइसक्रीम रखी है वहां! जग्गी वाबू ने उसे ललचाया था। हम आइसक्रीम नहीं खाएंगे पापा 'प्लीज़ ! लिली ने कहा था और वह उधर चली गई थी जहां पन्द्रह-बीस बच्चे फूलों के गुलदस्ते लिये तैयार खड़े थे। मालती जी स्टेज पर आई तो तालियों की गड़गड़ाहट ने उनका स्वागत किया। एक तेजस्वी नागरिक ने माइक संभाला और भाषण देना शुरू किया-दोस्तो! हमारे नगर का यह सौभाग्य है कि हम अपने बीच से, अपने प्रतिनिधि के रूप में मालती जी को अपनी रहनुमाई करने के लिए भेज रहे हैं । "इनसे बेहतर रहनुमा और कौन हो सकता है ! तो आज अपनी असली कार्रवाई शुरू करने से पहले मैं उन तमाम संस्थाओं के लोगों से निवेदन करूंगा कि जो मालती जी को उनकी इस शानदार सफलता पर बधाई देने के लिए यहां जमा हुई हैं, कि वे एक-एक करके आएं और मालती जी को फूल-मालाएं या गुलदस्ते या और जो कुछ वे अर्पित करना चाहते हैं, अर्पित करें.." एक दूसरे सज्जन नाम पुकारते गए और संस्थाओं के प्रतिनिधि आ- आकर मालती जी को फूल अर्पित करते गए। कुछ ही देर में सिलसिला टूट गया और खासी भीड़ मंच पर जमा हो गई। मैंने लिली को खोजा- वह भागी हुई अपने पापा के केविन की ओर जा रही थी। कुछ देर बा वह लिफ्ट से नीचे आई थी। बीच में केविन के पास जग्गी वाबू ने रोका था, पर वह उन्हें कुछ समझाकर, कुछ जिद करके, सीधी दौड़ हुई जलसे में चली आई थी। उस समय स्कूली बच्चे मंच पर थे और मालती जी को गुलदस्ते कर रहे थे। लिली वेधड़क मंच पर चली गई थी और उसने मालती की ओर अपनी ऑटोग्राफ-बुक बढ़ाते हुए कहा था-मंडम, योर : ग्राफ प्लीज़ ! मालती जी ने नेता की तरह मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा १२४./ काली आंधी जगतसिंह ने कलम लेकर ऑटोग्राफ किया था और प्यार से उसी तरह उसका गाल भी थपथपा दिया था जैसे वे अन्य स्कूली बच्चों के यपयपाती रही थी ! लिली उनके हस्तामर देखते हुए दूसरी तरफ से उतर आई थी। उसी कोने पर जग्गी वाचू चुपचाप खड़े थे। खून के धूंट की तरह अपने आंसू पोते हुए। लिली ने उत्सुकता से जग्गी बाबू को अपनी कापी दिखाई थी हमने ऑटोग्राफ ले लिया पापा'"यह देसिए. -ठीक है बेटे ! जग्गी वाव ने उदासी से उसे थपथपा दिया था। और वे बेहद थके हुए-से अपने केविन को ओर चले गए सजावट के लिए लगे गुब्बारों में से लिली ने एक तोड़ लिया था। बौर उसे उछालती-सेलती वह उनके पीछे-पीछे चली गई थी। जलसा चलता रहा । लल्लू बाबू ने मुझसे कहा-आज चाय-कॉफी ही चलती रहेगी भइये ? चाय-कॉफी पीने से मुह का सवाद विगढ़ जाता -जगतसिंह से कह, शायद वह आपके लिए कुछ इतजाम कर दें... मैंने कहा। -इसे छोड़ो, मइये.. तभी मिर्जा साहब आ गए, तपाक से वोले-लल्लू वायू ! बापने ऐसी शतरज विद्याई कि सब पिट गए"जवाव नहीं है आपका । असली हीरो तो आप हैं । -भइये, जीत जाओ तो हीरो, हार जाओ तो जीरो ! इस वक्त तो अपन जीरो बने घूम रहे हैं"कुछ इंतशाम हो जाए तो अपन भी ] हीरो हो जाएं, भइये ! लल्लू वायू ने बास दवाकर कहा । मिजा साहब समझ गए। चोले-अरे, क्या बात करते हैं रल्ल वायू । आपके लिए किसी चीज की कमी हो सकती है ? लल्ल बाबू ने फोरन सुराक लगी शीशी निकालकर मिर्जा साहब की घेरवानी की बेव में सरका दी-इसी में रहे तो ठीक है । और एक प्लेट से मुट्ठी भर दाल- मोठ लेकर उन्होंने कागज के नेपकिन को पुडिया वाघो और मेरी वेव में सरका दी-पूरा इन्तजाम कर लिया जाए, भइये ! ! काली आंधी। १२५

उधर मंच से भाषण होते रहे।
धीरे-धीरे सब शांत हो गया। जलसा समाप्त हो गया। हम लोग
अपने काटेज में लौट आए । मालती जी भी बहुत थकी हुई थीं। वे सीधी
ऊपर चली गई।

अब मेला उसड़ रहा था। मालती जी को दिल्ली जाने की जल्दी थी।
जगतसिंह ने सव कागउवागज समेटने शुरू कर दिए थे। विदा ने
सामान सभाल लिया था। हम लोगो ने अपनी चीजें इकट्ठी कर ली थीं।
हिसाव किताव बाकी रह गया था। बहुत-से पेमेण्ट्स होने थे।
मालती जी ने मुबह-सुबह ही फोन करके पर बुला लिया था। मैं पहुंचा
तो उन्होंने कहा-मैं तो कल जाने की सोचती हूं"यह हिसाब-किताव
आप निपटाते रहिएगा."
---सब हिसाब-किताव मैं कैसे निपटा पाऊगा ! मैंने सास मसलहत
से बात कही थी।
—क्यों ? ऐसा कौन-सा वडा हिसाब-किताव है ? जो जरूरत पड़े,
बता दीजिएगा । दिल्ली से भेज दूंगी "मालती जी बोलीं।
-वहा से वह नहीं निपट पाएगा ! मैंने कहा तो उन्होंने गौर से
मुझे देखा।
-मैं समझी नहीं। वे बोलों।
-मायद आपको मालूम नहीं "लिली बाई हुई है। दो-एक दिन
मैं ही वापस अपने स्कूल चली जाएगी!
-लिली"वह यही है ? सचमुच...! वे मोम की तरह पिघल उठी
थीं।
-जी ! आप उसे पहचान भी नही पाई
-कब, कहा "मुझे पता ही नही"बिलकुल नहीं मालूम ! ये
कातर होकर वोली थी।
-~-कल जलसे में जो वच्ची आपका हस्ताक्षर लेने बाई थी."
-ओह ! वे बहुत गहरी सांस लेकर रो पड़ी। जब कुछ शांत हुई
तो शून्य में देखती रही थीं। फिर धीरे-धीरे बोली पों-मेरी जिंदगी क्या
हो गई है ! ओह"आमू पोंछकर वे कहने लगी-झपर होगी"चलिए।
चलेंगे जरा..
काली नाघी/१२७

हम ऊपर पहुंचे तो जग्गी वावू का दरवाजा बंद था।
या तो कोई आवाज नहीं आई। मैंने खिड़की से जाकर देखा : लिली
र जग्गी वावू-दोनों सो रहे थे। लिली की एक बांह जग्गी वाबू के
ने पर रखी हुई थी। पंखा चल रहा था और एक छोटा-सा लाल
गुब्वारा हवा के झोकों में इधर-उधर उड़ रहा था। मैंने इशारे से मालती
जी को बुलाया था। मालती जी खिड़की की छड़ें पकड़े एकटक देखती
रह गई थीं। वे मूर्ति की तरह जड़ हो गई थीं।
मैं जैसे-तैसे उन्हें लेकर लौट आया था ।
मालती जी भयानक हलचल में फंसी हुई थीं। उनकी समझ में कुछ
नहीं आया तो वे नहाने चली गई। नहाकर वाथरूम से निकलीं तो
विलकुल गृहस्थिन की तरह लग रही थीं। मैंने उन्हें गौर से देखा कहीं
कुछ वदला हुआ था। और तब एकाएक मेरा ध्यान उनके चेहरे की ओर
गया था-निर्मल घुला हुआ चेहरा। खुले हुए बाल और माथे पर
एक लाल छोटी-सी विदी। इस वक्त उन्हें कोई देखता तो पहचान ही
नहीं पाता कि ये वही मालती जी हैं। आते ही उन्होंने फोन उठाया-
क्या नम्बर है?
-जग्गी बाबू का ? टू सेवन एट !
उन्होंने फोन मिलाया। कुछ देर आहट लेकर फिर नंवर घुमाया
फिर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वोलीं-यह लगता ही नहीं । अ
देखिए।
मैंने नम्बर मिलाया । इंगेज की आवाज आई-इंगेज है।
-तो जाग गए हैं। चलेंगे जरा..
-जागे नहीं होंगे। जग्गी वावू सोने से पहले रिसीवर
नीचे रख देते हैं । मैंने कहा ।
तव तक विंदा ने आकर खवर दी-चौधरी साहब मिल
१२८ / कालीआंधी

मालती जी को उनका आना बहुत अच्छा नहीं लगा। अभी वे वैमन से चौधरी साहब मे मिलने के लिए तैयार हो हो रही पी कि पता चना, दो-तीन लोग ओर आ गए हैं। लल्लू बाबू भी नपत हुए या गए थे। मालती जी को उनसे मिलने बाहर वाले कमरे में जाना ही पड़ा । उन्होंने बाल वाघे, साड़ी टोक की, और देखते-देखते उनका पूरा व्यक्तित्व बदल गया। चौधरी साहब ने कहा-अरे, बर हमारे गाव तक पक्की सड़क मी नहीं बनेगी वया? उनके बोलते ही मुझे दावन वाला वह दृश्य बाद पा गया जब वे दाल, पी और हरी मिर्च मांग रहे पे। उन्होंने या जारी • रसी-अव तो आप जीत गई हैं."अब भी सड़क नहीं बनेगी क्या? मालती जी का व्यक्तित्व कसे बदलता है, यह मैंने बाबूवी उसी समय देगा । दूसरे सार विसातियों की तरफ से आए पे। बोले-जी, वह तहसील की पटरी पर हम सोतह-गवह विसातियों को दूकानें हैं, म्युनिसिपल बोर्ड ने आर्डर जारी किया है कि दुकानें हटाई जाए। हम गरीब लोग हैं "आप ही बताइए, कहा जाएगे? अगर आप कलक्टर साहब से कह दें और कलक्टर साहब चेयरमन साहब से कह दें तो" साहय हाय मलते सड़े हो गए थे। -यो भाइये, चुनाव प्रचार के दौरान हम अपना अण्डा सगाने गए पे, तब तो आप लोगों ने दुरदुरा के भगा दिया था। जिनका प्रणा फहराया था, उन्हीसे कहो जाकर"वे कलक्टर साहब से कहें, कनपटर साहव चेयरमैन साहब से कहें, समझे भइये ! सल्लू बावू नै विना हिचर्क विसातियों की बोर से आए आदमी से कह दिया था। विसातियों के प्रतिनिधि का मुह उतर गया था। वह मानवी जी को ओर देसता रहा कि शायद कुछ बात बन जाए । मालती जी ने सोपा जवाब दे दिया-इसमें मैं क्या कर सकती हूं। यह वो चुंगी वालों का मामला है। वे जल्दी से जल्दी सबको टरका देना चाहती थी । वासिर हम सबसे निपटकर फिर ऊपर पहुंचे। लिली साबुन फाली बायो। १२१ बुलबुले वना रही थी। जग्गी वावू तैयार हो रहे थे। -~-आइए। जग्गी वावू ने बहुत कायदे से कहा। लिली उन्हें देखती रह गई। मालती जी की आंखें लिली पर ही उलझी रह गईं। लिली अपने बुलबुले बनाने में मशगूल थी। बड़े कठिन क्षण थे। जग्गी वावू ने टाई बांधते हुए पूछा-कहिए। कोई और जरूरत? मैं आपके किसी और काम आ सकता हूं! एक क्षण के लिए भयानक सन्नाटा छा गया। फिर टूटती-सी आवाज में मालती जी ने कहा-- लिली'से" -~-लिली वेटे, देखो ये तुमसे मिलने आई हैं। इधर आओ! जग्गी बाबू ने बात बहुत आसान कर दी। लिली सावुन की शीशी रखकर उनके पास आकर ठिठक गई। मालती जी का बांध टूट गया । मालती जी ने उसे प्यार से वांहों में समेटते हुए गीली आखों को झपकते हुए कहा-बेटे, मैं "मैं तुम्हारी मां हूं! -जी! लिली ने बेहद मामूली तरीके से कहा और बारी-बारी से उसने हम तीनों को आंख उठाकर देखा, जैसे वह मालती जी के शब्दों के अर्थ ही न समझी हो! -~~-तुम मेरी बेटी हो"मेरी ! मालती जी ने उसे प्यार करते हुए कहा। -जी ! लिली ने ऐसे जवाब दिया जैसे स्कूल में किसी सख्त मास्टरनी ने सवाल समझाकर पूछा हो-समझ में आ गया? -तुम मुझे पहचानती हो? -~-जी ! लिली ने उसी तरह कहा था और कसमसाकर वह उनकी बांहों से निकल गई थी। कि तुम आ गई ! जग्गी बाबू ने माहौल की जड़ता को फिर तोड़ा था---एक दिन लिली के सामने मुझे सव साफ करना था। इसे वताना था कि तुमने इसे जन्म तो दिया है, पर तुम इसकी मां नहीं हो ! अच्छा हुआ कि वह वक्त आज ही आ गया"इस एकाएक और १३०/ काली आंधी वकस्मात् आ गए अंघड़ के बाद फिर किसी नतीजे पर पहुंचना जरूरी हो गया था. -केसा नतीजा? -~-यही कि लिली भी सच्चाइयों को जान ले! -कैसी सच्चाइया? -~हूं। जग्गी बाबू व्यग्य में मुस्काराए थे--यही, जो सामने हैं। लिली भी जान ले कि तुम क्या हो"अब वह समझदार हो रही है" ~मा के अलावा और मैं क्या हो सकती हूं उसके लिए! -~-जो कल घों"जब उसने ऑटोग्राफ लिया था"वह भी तो सच्चाई ही पी। नही ? जग्गी बापू ने कहा था। -~-मुझे कुछ भी मालूम नहीं था "मालतीजी दुसी स्वर में बोली थीं। -उसे भी नहीं मालूम पा ! सन्नाटा फिर छा गया था। लिली अवोध आखों से सब कुछ देख रही थी । वह जैसे सुन कुछ नही रही थी। मालती जो ने आसे पोछ ली थी । जग्गी बाबू ने सस्त नजरों से उन्हें देखा था। फिर कुछ अटककर बोले थे--मेरे सयाल से तुम मुझे लिली का वास्ता देकर किसी नतीजे पर पहुचने के लिए मजबूर नहीं करोगी! --आप मुझे पूरी तरह जलोल कर लेना चाहते हैं ! मालती जी के स्पर में थोड़ी सस्ती थी। -~-और तुम मुझे पूरी तरह इस्तेमाल कर लेना चाहती हो "देखो मालती, नव, मेरी पूर्ति "मेरे जीवन की मजिल लिली के सफर में ही पूरी होगी। मुझे अपनी पूर्णता लिली के जरिये ही मिलेगी"और तुम्हारी मजिल की यात्रा में न लिसी को कोई जगह है, न मरी। -मुनिए, आप लिली को लेकर दिल्ली आ सकते हैं ? -किसलिए? - मुझे कल जाना है"अगर आप आ सके तो -लिती को भी कल जाना है ! देखो मालती, जिंदगी में हर चीज नहीं मिलती। आदमी को चुनाव करना पड़ता है कि उसे क्या चाहिए" इम मुनाप में जो चीजें छूट जाती हैं, उनके लिए दुःस नहीं करना काती आधी/ १३१ .. ...

. चाहिए ! तुमने जो. ठीक समझा"उसे चुन लिया था । मैंने जो ठीक समझा, वह चुन लिया था । अव पछताना फैसा? -पछताना'मालती जी की बात अधूरी रह गई थी। ~~~~हां मालती, पछताने में कुछ नहीं रखा है, जीतने वाला तो जीतता ही है, हारने वाला भी एक दिन जीत जाता है लेकिन पछताने वाला हमेशा पछताता ही रह जाता है। - मैं पछता नहीं रही हूं! -~~यही ठीक है ! इसलिए यह और भी ठीक है कि हम बार-बार पछताने के लिए बार-बार न मिलें। हम जब-जव मिले"पछताते ही रहे। बेहतर है कि हमारे सामने जो कुछ है उसे साहस से स्वीकार करें। जो है, वह है; जो नहीं है, वह नहीं है ! -हो-जो है, वह है। जो नहीं है, वह नहीं है ! मालती जी ने बहुत गहरी सांस लेकर कहा था। -फिर भी तुम हो, मैं हूं और लिली भी है लेकिन हम अपनी- अपनी जगह पर हैं ! आज की जिंदगी इतनी ज्यादा उलझनों से भरी हुई है मालती, कि अपनी सब भावनाओं के लिए, अपनी अब इच्छाओं के लिए जी सकने का पूरा-पूरा वक्त किसीके पास नहीं है, टुकड़ों-टुकड़ों में जीना और पछताना "क्या रखा है इसमें ! जगी बाबू ने कहा था और वे कोट पहनकर तैयार हो गए थे। मालती जी उन्हें उठता देख खुद भी खड़ी हो गई थी। -~-मालती"इतने दिनों अकेले रहकर मैंने यही सोचा है । तुम्हें 1. अपनी रफ्तार दौड़ती जिंदगी में सोचने का वक्त ही कहां मिला है ? मशीनें नहीं सोचती, मशीनों के लिए आदमी सोचता है ! और सफलता' सफलता सिर्फ एक मशीन है ! अव तुम औरत नहीं-एक सफलता वन गई हो ! अब तुम भी कुछ नहीं हो। सिर्फ एक सफलता रह गई हो" अब तुम्हारी गुपित और ज्यादा सफल होते जाने में है और कोई रास्ता नहीं है । यही तुम्हारा एकमात्र रास्ता है"जग्गी बाबू बोले .. .. मालती जी ने आंखें भरकर उन्हें देखा था । लिली को देखा था। १३२ / काली आंधी लागे बढ़कर उन्होंने बहुत प्यार से लिली को चूमा और वैतरह रो पड़ी पी। फिर बायें नीचे किए-किए ही उन्होंने जग्गी वाव को नमस्ते किया था और बावन मह में दयाये बाहर या गई थी। उन्हें कमरे में छोड़कर मैं नीचे चला बाया था। कमरे में घुसते ही उन्होंने इतना ही कहा था--गुरूसरन जी, आज मैं किसीसे भी नहीं मिल पाऊगी। जो भी बाए, समता दीजिएगा। काली आंघी/१३ । । दूसरे दिन मालती जी को जाना था। स्टेशन पर बहुत भीड़ जमा हुई थी। वही मालाएं और फूल । जग्गी वाबू भी लिली को पहुंचाने जा रहे थे। दोनों की गाड़ियां पांच मिनट के अंतराल से छूटती थीं। दो दिशाओं को जाने वाली गाड़ियां ! एक दिल्ली, दूसरी पचमढ़ी। जग्गी बाबू लिली को लिये हुए आए थे। लिली की पतली उंगलियों में खाने का पैकेट झूल रहा था-वही गोल्डन सनः वाला । जग्गी वाबू ने चुपचाप वह पैकेट विंदा को थमा दिया और लिली को लिये हुए अपनी गाड़ी की ओर चले गये थे। मालती जी की गाड़ी जव छूटी तो वे भरी आंखें लिए दरवाजे पर नमस्ते करती खड़ी थीं और नारे लग रहे थे-~मालती जी ! जिन्दा- वाद ! मालती जी ! जिन्दावाद ! । उन्हें विदा देकर मैं जग्गी बाबू की गाड़ी पर आ गया था । लिली अपनी वही सावुन के बुलवुलों वाली शीशी लिये खिड़की के पास बैठी थी । आखिर उनकी भी गाड़ी छूटी । लिली वुलवुले उड़ाती चली जा रही थी । जग्गी वावू चुपचाप कहीं देख रहे थे। मैं भारी कदमों से लौट रहा था। कानों में 'मालती जी ! जिन्दा- वाद !' के नारे गूंज रहे थे और लग रहा था कि अब अपनी खिड़की की छड़ें पकड़े मालती जी को शायद वही दृश्य दिखाई दे रहा होगा जो उन्हों- ने कल सुवह खिड़की से देखा था-लिली और जग्गी वावू गहरी नींद में सोते हुए । लिली की नरम वांह उनके सीने पर रखी हुई और हवा के झोंकों में इधर-उधर टकराता हुआ वह लाल गुब्बारा फोन का नीचे रखा हुआ रिसीवर.. और जग्गी वायू"वे शायद देख रहे होंगे"लिली को प्यार करके एकदम फूट-फूटकर रो पड़ने वाली मालती जी को"या अपना गिलास १३४ / काली आंधी

लेने वाली मालती जी को"या लिली को ऑटोग्राफ देने वाली
मालती जी को
और लिली सावुन के बलवले उड़ाती अपने में मस्त होगी।
इसके सिवा वे तीनों और क्या कर रहे होगे !

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Kali Andhi

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Kamleshwar
Title
Kali Andhi
File name
Kali Andhi
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Citation
1910
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
149
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