Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Shri Guriji Samrg [ Khand - 12]
Front matter
No text on this page.
149SO
श्री गुरुजी सभा
hr
खड
स्मरणांजलि ।
स्वत्वाधिकार
डा हेडगेवाररमारक समिति
हा हेडनेवारभवन
महाल नानपुर-४४००३२
प्रकाशक
सुरुचि प्रकाशन
देशययुशुप्ता मार्ग
नई दिल्ली-११००५५
प्रथम सस्करण
माघ कृष्ण एकादशी युगाब्द ५१०६
मुद्रक
गोपसन्सपेपर्स लि
नोएडा-२०१३०१
मूल्य प्रति सच
दोहजाररुपए
, ਨੂੰ ਯਾਦ ਹੈ पारिभाषिक शब्द सरसघचालक सरकार्यवाह सघचालक मुख्यशिक्षक कार्यवाह गटनायक प्रचारक शाखा उपशाखा बैठक बौद्धिक समता सपत् सघ के मार्गदर्शका सघ के निर्वाचित सर्वोच्च पदाधिकारी। स्थागीय कार्य व कार्यकर्ताओं के पानक। नित्य चलनेवाली शापा के कार्यक्रमों को समानित करनेवाला। शारना क्षेत्र का प्रमुखा शासा क्षेत्र के एक छोटे भौगोलिक भाग का प्रमुख । सघकार्य हेतु पूर्णत समर्पित अवैतनिक कार्यक्र्ता । सरकार निर्माण हेतु नित्यप्रति का एकीकरण । एक स्थान पर चलने वाली विभिन्न शाखाएँ। विचार-मथन व मामूहिक निर्णय प्रक्रिया हेतु एकर बैठने की प्रक्रिया। वैचारिक प्रबोधन का कार्यक्रम भापण। अनुशासन के प्रशिक्षण हेतु शारीरिक कार्यक्रम। कार्यक्रम प्रारभ करने हेतु स्वयसेवकों को निश्चित रचना में खड़ा करने की आज्ञा। शाखा-कार्यक्रम की समाप्ति की अतिम आता। लाठी। एक साथ मिल-बैटकर जलपान करना। अपने-अपने घर से लाए भोजन को एक साथ पिल-वैटकर करना। कैंप। सघ की कार्यपद्धति सिखाने हेतु क्रमबद्ध त्रिवर्षीय प्रशिक्षण योजना। शिविर तथा वर्ग का अतिम सार्वजनिक कार्यक्रम । वर्ग का केवल शिक्षार्थियों के लिए दीक्षात कार्यक्रम । - पिकिर दड चदन सहभोज शिविर सघ शिक्षा वर्ग सार्वजनिक समारोप खासगी समारोप अनुक्रमणिका ४ लेखाजलि १ मैंने देखा इच्छामरण श्री अटलबिहारी वाजपेयी ३ २ अखड सघवती श्री अप्पाजी जोशी ५ ३ गऊ कथा, गुरु कथा श्री अशोक मित्र मेरा गुरुभाई स्वामी अमूर्तानद १२ ५ जीवन सध्या श्री आबाजी थत्ते २२ ६ श्री गुरुजी के सान्निध्य में श्री कुशाभाऊ ठाकरे २६ सघकार्य की तेजस्वी परपरा श्री कृष्णराव मोहरील २७ जागरूक कर्मयोगी श्री ग वि केतकर २६ . राष्ट्रहित में तिरोहित श्री क्षितीश वेदालकार ३२ १० भ्रम टूटा श्री खुशवत सिह ३६ ११ अलौकिक ज्योति श्री जनार्दन स्वामी ३८ १२ आध्यात्मिक विभूति श्री जयप्रकाश नारायण ४० १३ प्रचड आत्मविश्वासी डा सैफुद्दीन जिलानी ४१ १४ विचार व व्यवहार का सयोग श्री जैनेंद्र ४३ १५ उनका जीवन सूत्र श्री दादासाहेब आप्टे १६ समप्टिमय जीवन प दीनदयाल उपाध्याय १७ मृत्युजय डा धर्मवीर १८ मूलगामी दृष्टि श्री नानाजी देशमुख १६ सबके अपने श्री पाडुरगपत क्षीरसागर ६० २० जागरूक दूरदर्शिता श्री प्रकाशवीर शास्त्री २१ एक्सरे एक रोगी का डा प्रफुल्ल देसाई ६६ २२ वास्तविक सन्यासी सत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ७० २३ साधनामय व्यक्तित्व श्री बच्छराज व्यास ७३ २४ सहज सकोची श्री बबुआ जी २५ हमारे आप्त श्री बाबासाहेब घटाटे ७८ २६ आध्यात्मिक अधिष्ठान श्री बालशास्त्री हरदास ८४ - - . ७६ --- २७ कार्यरत रहना ही सच्ची पृ वातासाहब देवरस ८४ २८ धीरोदात्त पुजारी श्री भालजी पेंढारकर ८६ २६ अनुयायी होने का धर्म श्री माधवराव मुल्ये E२ ३० अनामिक पथिक श्री मोरोपत पिगले ६५ ३१ मेरा अहोभाग्य प मौलिचद्र शर्मा ६८ ३२ केशव-माधव मिलन श्री यादवराव जोशी १०१ ३३ अनोखे भावविश्व में श्री रज्जूभैया १०८ ३४ श्रद्धावान विभूति भक्त रामशरणदास ११३ ३५ दलितों के प्रति दुर्भाव नहीं था श्री रा सु गवई ११८ ३६ नेता हो तो ऐसा श्री वसतराव ओक ११८ ३७ वह प्रकाश श्री हो वे शेषाद्रि १२१ ३८ पटेल-गुरुजी भेंट श्री स का पाटील १२६ ३६ एक अनजाना पहलू श्री सुदर्शन जी १२७ ४० पूज्य विभृति डा श्रीधर भा वर्णेकर १३१ सभाजलि १ अ भा प्रतिनिधि सभा १३७ २ १३८ ३ महाराष्ट्र विधानसभा १४१ महाराष्ट्र विधानपरिपद् १४५ राजस्थान विधानसभा १४६ ६ बिहार विधानसभा बुधाजलि सतजन १५४ २ नेतागण १५६ ३ सामाजिक कार्यकर्ता १५८ साहित्यकार १६० शब्दाजलि १५१ १ समाचार पत्रों द्वारा १६१
खड-१२
स्मरणाजलि
श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित लोगो
ने उनके प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए,
उससे 'भी' स्पष्ट होता है कि उनका व्यक्तित्व
कितना विशाल और व्यापक था। इस खड मे
समाज जीवन मे उनके व्यक्तित्व के प्रभाव की
गराई को प्रदर्शित करने वाले कुछ श्रद्धासुमन
सकलित है।
- लेखाजलि १ मैंने देखा इच्छामरण (श्री अटलबिहारी वाजपेयी, राजनेता) ५ जून १६७३ सवेरे का समय, चाय-पान का वक्त, पूजनीय श्री गुरुजी के कमरे में (उसे कोठरी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा) जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढाए । सदेव की भाँति पॉव पीछे खींच लिए। मेरे साथ आए स्वयसेवकों का परिचय हुआ। उनमें आदिलाबाद के एक डाक्टर थे। श्री गुरुजी विनोदवार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डाक्टर के पास गया। डाक्टर ने पृछा- 'क्या कप्ट है? सारी कहानी सुनाओ।' मरीज बिगड गया। बोला- 'अगर मुझे ही अपना रोग बताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे? विना बताए जो बीमारी समझे, मुझे ऐसा डाक्टर चाहिए।' डाक्टर एक क्षण चुप रहे। फिर बोले 'ठहरो, तुम्हारे लिए दूसरा डाक्टर बुलाता हूँ। जो डाक्टर आया वह जानवरों का डाक्टर था। बिना कुछ कहे सब कुछ समझ लेता था। कथा सुनकर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। रात्रि भर के जागरण की थकान, पल भर में दूर हो गई। श्री गुरुजी स्वय हॅसी में शामिल हो गए। फिर एक किस्सा सुनाया, हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गए। इतने में चाय आ गई। चाय सवको मिली या नहीं इसकी चिता श्री गुरुजी स्वय कर रहे थे। कौन चाय नहीं पीता, किसको दूध की आवश्यकता है, इसका उन्हें बडा ध्यान रहता। सबके बाद स्वय चाय ली। कप श्रीगुरुजीसमय अड १२ {३] . में नाम मात्र को चाय थी। उन्होंने उसे और कम कराया। शायद हमारा साथ देने के लिए ही वे चायपान कर रहे थे। निगलने में बडा कष्ट था। साँस लेने में अत्यधिक पीडा थी। कितु चेहरे पर थी वही मुक्तमोहिनी मुस्कान। हृदय-हृदय को हरनेवाला हास्य। मुरझाए मन की कली-कली को खिलाने वाली खिलखिलाहट। निराशा, हताशा ओर दुराशा को दूर भगाने वाला दुर्दम्य आत्मविश्वास । कमरे के किसी कोने में मौत खडी थी। शरीर छूट रहा था। एक-एक कर सभी बधन टूट रहे थे। महामुक्ति का मगल मुहूर्त निकट था। एक क्षण के लिए मुझे लगा, शूलों की शय्या पर भीष्म पितामह मृत्यु की बाट जोह रहे हैं। इच्छामरण सुना भर था, आज ऑखों से देख लिया। ६ जून १६७३ हेडगेवार भवन। एक दिन में कितना अतर हो गया। कल सब शात था। आज शोक का निस्तब्ध चीत्कार हृदय को चीर रहा था। कल सब अपने काम में लगे थे। आज जैसे सब कुछ खोकर खाली हाथ खडे थे। ऑखों मे पानी, हृदयों में हाहाकार। कभी न भरने वाला घाव, कभी न मिटने वाला दर्द। पूजनीय गुरुजी का पार्थिव शरीर दर्शन के लिए कार्यालय के कमरे में रखा था। आज उन्होंने मुझे चरण स्पर्श करने से नहीं रोका। अपने पॉव पीछे नहीं हटाए। सिर पर प्रेम से हाथ नहीं फेरा। हस उड चुका था, काया के पिंजडे को तोडकर पूर्ण में विलीन हो चुका था। गुरुजी नहीं रहे। उनका विराट व्यक्तित्व छोटी सी काया में कब तक कैद रहता? जीवन भर तिल-तिल कर जलकर लाखों जीवनों को आलोकित, प्रकाशित करने वाला तेजपुज मुट्ठी भर हाड-मास के शरीर में कब तक सीमित रहता? लेकिन गुरुजी हमेशा रहेंगे। हमारे जीवन में, हृदयों में, कार्यों में। अग्नि उनके शरीर को निगल सकती है, हृदय-हृदय में उनके द्वारा प्रदीप्त प्रखर राष्ट्रप्रेम तथा नि स्वार्थी समाजसेवा की चिगारी को कोई नहीं बुझा सकेगा। उनकी पुनीत स्मृति में शतश प्रणाम। (पाचजन्य पुभाई १९७३) श्रीगुरुजी समय खड १२ ३ २ अखडसघवती (श्री अप्पाजी जोशी, डाक्टर हेडगेवार के निकटस्थ) मैं यह अपना परम सौभाग्य समझता हूँ कि मुझे परमपूजनीय डा हेडगेवार और परमपूजनीय श्री गुरुजी- दोनों महापुरुषों का सहवास और असीम स्नेह प्राप्त हुआ। डाक्टर साहय को तो मैंने अपनी किशोरावस्था में ही देखा था और मैं उनका अनुयायी बन गया था। परतु श्री गुरुजी के दर्शन का सौभाग्य तव प्राप्त हुआ, जब मैं डाक्टर जी के साथ काशी गया था। उस समय की उनकी इकहरी, फुर्तीली, तेजस्वी मृर्ति आज भी मेरी आँखों के सम्मुख है। आगे यथासमय उनके गुणों का भी परिचय हुआ। सन् १६३६ के फरवरी मास में सिदी में हमारे मित्र और सघ-यधु स्व नानासाहय टालाटुले के घर पर जो एक अत्यत महत्त्वपूर्ण वैठक ८-१० दिनों तक हुई, उसमें श्री गुरुजी के साथ अत्यत घनिष्ट परिचय हुआ। एक दिन की बैठक में एक बात पर मेरी और श्री गुरुजी की जोरदार वहस हुई। दोनों में से कोई अपने विचार से पीछे हटने को तैयार नहीं था। अत में डाक्टर जी पर निर्णय करने का काम सौंपा गया। उन्होंने मेरे पक्ष में निर्णय दिया। निर्णय अपने विरुद्ध दिया गया इस बात का तनिक भी दुख श्री गुरुजी के मुख पर दिखाई नहीं दिया। उल्टे पहले के समान ही उन्होंने हँसते-खेलते अगले कार्यक्रमों में भाग लिया। राजनैतिक क्षेत्र की मनोवृति से मेरा परिचय था। अत मन पर काबू पाने के उनके असाधारण और अनपेक्षित उदाहरण से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ। उसके बाद जब मैं और डाक्टर हेडगेवार जी दोनों घूमने गए, तब डाक्टर जी ने अचानक मुझसे कहा- 'आप्पाजी, भावी सरसघचालक के रूप में माधवराव जी के बारे में आपकी क्या राय है?' उस पर मैंने तुरत कहा- 'वाह बहुत ही सुदर चुनाव है। जिसने अपना मन जीत लिया है, । वह दुनिया भी जीत सकता है। आगे डाक्टर जी का वह चुनाव सब दृष्टि से कितना उचित था, यह समय ने सिद्ध कर दिखाया। श्री गुरुजी के लौकिक जीवन के विषय में बहुतों को बहुत कुछ जानकारी है, परतु उनके आध्यात्मिक जीवन के बारे बहुत कम ज्ञान है। उन्होंने स्वय इस विषय में कभी चर्चा नहीं की। परतु इस क्षेत्र में वे कितने । अधिकारी पुरुष थे, इसका मेरा अपना अनुभव यहाँ उद्धृत किए बिना रहा नहीं जाता। श्रीगुरुजी समन खड १२ 1 - गाँधी जी की मृत्यु के पश्चात् मैं और श्री गुरुजी एक ही जेल (नागपुर) में थे। सयोग से हम दोनों एक ही कोठरी में थे। कारागृह में दूसरों की दृष्टि बचाकर व्यक्तिगत व्यवहार करने की गुजाइश नहीं रहती, इसलिए व्यक्ति के सारे व्यवहार का, विल्कुल अतरग का भी अच्छी तरह से निरीक्षण किया जा सकता है। सभी को विदित है कि श्री गुरुजी ध्यान-धारणा करते थे। कारागृह में कोई काम-धाम तो नहीं था, इसलिए वे ध्यान-धारणा में अधिक समय विताया करते थे। कोठरी की सलाखों को चादर आदि वाँधकर हम अस्थायी एकात स्थान बना लेते और वहाँ बैठकर ध्यान-धारणा और गप-शप करते बैठते। कभी-कभी सलाखो से बँधे वस्त्र हवा के झोंके से इधर-उधर उड जाते, तब उन्हें फिर से ठीक करना पड़ता। जब एक बार हवा के झोके से परदे इधर-उधर उड गए, तब में परदे को बाँधने के लिए गया। अनजाने मेरी दृष्टि उनके मुख पर पडी। मुझे उनके मुखमडल पर एक तेजस्वी अनोखी आभा दिखाई दी। उनकी आँखें अधखुली थीं । मुख पर शाति और सतोष के भाव और दैवी स्मित झलक रहा था। वह दृश्य आज भी मेरे हृदय-पटल पर ज्यो का त्यों अकित है। मेरा अतर्मन हमेशा मुझे गवाही देता है कि वे उस समय दैवी साक्षात्कार की अवस्था में होंगे। वह असाधारण देवी दृश्य मैंने स्वय देखा है, इस कल्पना से मुझे सदैव एक तरह का सात्विक अभिमान और आनद होता है। साक्षात्कारी श्रेष्ठ आध्यात्मिक पुरुप होने के नाते उनके प्रति मुझे आदर और आकर्षण था ही, परतु मेरी दृष्टि में उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात थी उनकी प्रखर, अनन्यसाधारण कर्मठ सघनिष्ठा और परमपूजनीय डा हेडगेवार जी के प्रति, अर्थात् संघ के प्रति उनका पूर्ण समर्पण। पू डाक्टर जी के प्रति श्री गुरुजी का आत्मसमर्पण अद्भुत था, जो उनके बाह्यत कठोर दिखाई देनेवाले स्वभाव के बिल्कुल विरुद्ध लगता था। पूजनीय डाक्टर जी के विषय में वे कितने कोमल और भावना प्रधान हो जाते थे, इसका में अनेक बार अनुभव कर चुका था। प्रारभ में श्री गुरुजी ने डा हेडगेवार जी की अनेक प्रकार से परीक्षा ली, परतु बाद में उनकी निरपेक्ष देशभक्ति, समाज के प्रति आत्मीयता और उसके लिए अहर्निश प्रामाणिक कार्यरतता आदि का अनुभव करने के पश्चात् डाक्टर जी पर उनका विश्वास अधिक दृढ हुआ। उन्होंने स्वय श्रीगुरुजीसमय खड १२ अनुभव किया कि सघकार्य ही मातृभूमि और समाज की सेवा करने का उत्कृष्ट माध्यम है। इसके पश्चात् जिस सहजता से उन्होंने अपने लोकोत्तर गुणों का अकार न रखते हुए, स्वय को सघकार्य में सपूर्णत समर्पित कर दिया, उस कारण मुझे उनके प्रति आत्यतिक आत्मीयता ही नहीं, भक्ति भी है। वास्तव में उनके समान एकातप्रिय और आध्यात्मिक प्रकृति के व्यक्ति को हिमालय की किसी गुफा में तपश्चर्या करते हुए, ईश्वर-दर्शन के आनद का सदैव उपभोग लेते बैठना और तथाकथित दुनियादारी के क्षुद्र झमेले से हमेशा के लिए पृथक रहना अधिक प्रिय होता और लोगों को भी वह अस्वाभाविक नहीं लगता। एक बार वे इस प्रकार के वातावरण और मन स्थिति में पहुँचे थे, परतु यह अलौकिक मोह भी निग्रहपूर्वक दूर किया और इस निश्चय से कि मेरा देश, मेरा समाज ही परमेश्वर है तथा मेरा उद्धार भी इसी पर निर्भर है, वे सतत अविश्रात सघकार्य करते रहे। उपेक्षा, अपमान, अवहेलना, अकारण विरोध के कितने ही आघात उन्होंने शाति से सहे और स्वय सभी कार्यकर्ताओं को सतत उत्साह और प्रेरणा देते और उनकी पीठ पर ममतामय हाथ फेरते रहे। संघ की प्रतिज्ञा के अनुसार 'सघ-व्रत' का उन्होंने आजन्म अक्षरश अतिम साँस तक निष्ठा से पालन किया। उनके जीवन से स्वयसेवकों और समाज के अन्य लोगों को भी यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि देश और समाज की सेवा के आगे प्रत्यक्ष ईश्वर-प्राप्ति सहित सभी मोह, सभी लोभ गौण हैं। साधारण मनुष्य के जीवन में प्रतिदिन हर पल अनेक छोटे-बडे मोह आते हैं। उनका वह शिकार होता है। वह कुछ भी काम नहीं कर सकता है। एक बार निश्चयपूर्वक स्वीकृत कर्तव्य, स्वय की पूर्ण शक्ति दॉच पर लगाकर अतिम क्षण तक करते रहना, उसके अनुकूल अपने जीवन की रचना करना, अपने स्वभाव में भी कार्यानुकूल आवश्यक परिवर्तन करना और कार्य सफल कर दिखाना, यही आदर्श श्री गुरुजी के जीवन ने हमारे सम्मुख रखा है। (श्री शुरूपी समयदर्शन खड-१) -- ...- श्रीगुरुजी समय खड १२ ७ ) । - भी N । ३ गऊकथा, गुरुकथा (अशोक मित्र) सन् १६६६ समाप्त होने को था। देश की हालत बढी खराव चल रही थी। इदिरा जी के प्रधानमनित्व का पहला ही साल था। शुरू में ही सकट खडा हो गया। जन आक्रोश घनीभूत हो रहा था। किसी भी क्षण आक्रोश जनविक्षोभ का रूप ले सकता है ऐसी आशका व्यक्त की जा रही थी। परिस्थिति का लाभ उठाया गोमाता की देखभाल में सदा वितित साधुओं ने। लग रहा था कि भृखों की फौज का देश भर में स्थान-स्थान पर क्रोधोद्रेक होगा। और देखा कि एक दिन भरी दोपहरी में क्रोध से भरे साधुओं का जमावडा बहादुरी जताने के लिए रास्ते पर उतर आया है। उनकी आँखों से आग बरस रही थी, हाथ में त्रिशूल लिए कोई डेढ-दो हजार जटाधारी सन्यासी नई दिल्ली में बदस्तूर ससद भवन पर ही आक्रमण कर बैठे। अतत पुलिस को अश्रु गैस का प्रयोग कर साधुओं को रोकना पडा। ससद भवन का सारा इलाका अश्रु गैस के धुएँ से भर गया। मैं स्वय कृषिभवन के अपने कमरे में अश्रु गैम को झेल रहा था। अकाल की स्थिति, वेतहाशा बढती कीमतें और इदिरा गाँधी की पहली सरकार की लडखडाती हालत। ऐसे में साधुओं के क्षोभ का कारण था इस लम्पट सरकार द्वारा भारतीय परपरा का अपमान करना व गोमाता को उचित श्रद्धायुक्त सम्मान न देना। यहाँ तक कि भारतीय सविधान तक की अवहेलना करना। सविधान की ४८वी धारा में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि गाय-बछडे की हत्या वद होनी चाहिए। फिर भी यह कृतघ्न सरकार गोवश रक्षा के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा तथा दक्षिण के और दो-एक राज्यों में बड़े पैमाने पर गाएँ काटी जा रही हैं, खुलेआम गोमास विक रहा है। इस देश में इस तरह का भ्रष्टाचार और अधिक सहन करना साधुओं की सहनशक्ति के परे था। साधुओं के लिए ससद भवन पर आक्रमण के सिवाय और मार्ग नहीं था। इस लडखडाती इदिरा सरकार के गृहमनी थे गुलजारी लाल नदा। वे भारत साधु समाज के प्रमुख सरक्षक भी थे। दो-एक गुरुओं (साधुओं) की पीठ पर लाठी भी वरसी थी अश्रु गैस प्रयोग के बाद भगदड में कुछ साधु घायल भी हुए थे। नई दिल्ली में परिस्थिति गभीर थी। साधुओं को } श्रीशुलणी समय खड १२ ।
पीछे से उकसाए जा रहे थे राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के चेले चपाटे। उनकी एक सस्था राष्ट्रीय गोरक्षा समिति ने रातोंरात बडे पैमाने पर दिल्ली में हल्ला-गुल्ला मचाना शुरू कर दिया। इदिरा जी विचलित हुई। अभी तक नई होने के कारण उनकी अपनी सरकार पर पकड मजबूत नहीं हुई थी। वे सरकार चलाने में माहिर भी नहीं हुई थीं। इधर उनके विरुद्ध पैंतरेबाजी शुरू हो गई थी। दो-तीन महीनों के बाद ही आम चुनाव होने थे। किसी भी हालत में त्रिशूलधारियों के साथ समझौता जरूरी था। प्रधानमत्री जी ने साधुओं की मांगों पर विचार करने के लिए एक उच्चाधिकारयुक्त समिति की घोषणा कर दी, जो पूरी तरह से विचार करके सरकार को जल्द से जल्द बताती कि राष्ट्रीय गोरक्षा समिति के आदोलन के परिप्रेक्ष्य में गोरक्षण तथा गो-सवर्धन के लिए सरकार द्वारा शीघ्रातिशीघ्र क्या कारवाई की जानी चाहिए। समिति के अध्यक्ष प्रख्यात कानूनविद् सद्य सेवानिवृत्त, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्रीमान् अमलकुमार सरकार नियुक्त किए गए। गोरक्षा समिति की ओर से पुरी के जगद्गुरु शकराचार्य, भूतपूर्व न्यायाधीश श्यामाप्रसाद मुखोपाध्याय एव साथ ही राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सर्वसघपरिचालक गुरु गोलवलकर भी इस समिति में प्रतिनिधित्व कर रहे थे। और चार सदस्य थे हरियाणा, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु एव केरल के कृषि एव पशुपालन मत्री तथा विशेषज्ञ के रूप में केंद्रीय सरकार के तत्कालीन पशुपालन आयुक्त प्रियव्रत भट्टाचार्य एव दूसरे विशेषज्ञ के रूप में आणद के स्वनामधन्य वर्गीज कुरियन। अर्थशास्त्रज्ञ के नाते मुझे समिति में लिया गया था। इस अद्भुत समिति के विचित्र एव तरह-तरह के अनुभव थे। समिति के सर्वोच्च पद पर थे न्यायमूर्ति सरकार, कोलकाता के बाग बाजार मोहल्ले के निवासी हम सबके अमल दा। अत्यत विनम्र, विनयी एव मधुर स्वभाव के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की पदमर्यादानुकूल गरिमायुक्त आचरण का सयुक्त मिश्रण उनके व्यवहार में रहता था। वार्तालाप के दौरान सभी को साथ लेकर चलने का उनका पुरजोर प्रयास रहता था। वे कई बार इस प्रयास में सफल नहीं हो पाते थे तो केवल पुरी के शकराचार्य के कारण। गोमाता की रक्षा के पवित्रतम एव महत्तम कर्तव्य के निर्वाह के लिए ही वे मानो हम जैसे म्लेच्छों के सामने एव आसपास बैठे, अन्यथा ऐसा बैठना उनकी मर्यादा के प्रतिकूल है- यह दशाने में वे अपने हावभाव में एक दिन भी नहीं चूके। उनमें समिति के प्रति अवज्ञा, घृणा, श्रीगुरुजी समय खड १२ - अनुकपा एव क्रोध का भाव प्रकट होता था। उनके क्रोध का विशेष कारण भी था। समिति की बैठक होती थी कृपिभवन में। जब भी जगद्गुरु कृपिभवन में आते, प्रवेश द्वार पर एव गलियारे में अगणित भक्तों की भीड रहती थी। कार्यालय में ही सभी उनको साप्टाग दडवत करते थे। जगद्गुरु भी हाथ उठाकर आशीर्वाद की वर्षा करते हुए बैठक कक्ष में प्रवेश करते थे। उपस्थित नौकरशाह भक्तिभाव के साथ उठ खड़े होते, केवल मात्र हम जैसे कुछ ढीठ कुर्सियों में से रहते थे। जगद्गुरु हम लोगों पर रोपपूर्ण नजर डालते। उनका शिष्य अपवित्र कुर्सी पर व्याघ्रचर्म विछाता एवं शकराचार्य उस पर बैठकर मानो सभी को कृतार्थ करते। समिति के अध्यक्ष, सर्वोच्च न्यायालय के एक समय के मुख्य न्यायाधीश जगद्गुरु की गिनती में ही नहीं थे। जगद्गुरु यह मानकर चलते थे कि वे स्वय उपस्थित हैं एव विषय जय गोमाता की हितरक्षा का है, तब उनके निर्देशानुसार ही सारी बातें होंगी। कितु यह तो होना नहीं था। गोरक्षा समिति के अन्य प्रतिनिधि आशुतोप तनय, श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अग्रज रमाप्रसाद मुखोपाध्याय भी तरह-तरह के प्रश्न करते थे, वाद-विवाद भी करते थे, कितु कभी भी उन्होंने शालीनता की मर्यादा का उल्लघन नहीं किया। किसी को भी कठोर वाणी से तनिक भी ममाहत नहीं किया। हमारे साथ जब भी मत भिन्नता होती थी- (अधिकाश समय ही मतों का मेल नहीं होता था)- केवल हँसकर गर्दन हिलाकर अपनी आपत्ति दर्ज कराते थे। पर हम सबको सर्वाधिक अचभे में डाल दिया समिति के तीसरे एव सर्वाधिक चर्चित प्रतिनिधि गुरु गोलवलकर ने। उनके उग्र स्वभाव के सबध में हजारों बातें सुनी थीं। हम सबकी उनके बारे में यही धारणा थी कि राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रतिष्ठापक व्यक्ति एक ओर अधभक्ति और दूसरी ओर घोर आतक के मध्यमणि हैं। पर वे सभी पुरानी धारणाएँ ध्वस्त कर दी समिति के नि शब्दतम सदस्य गुरु गोलवलकर ने। अत्यत आवश्यक हो तो ही वे बोलते थे। जब कुछ कहना अपरिहार्य लगता था, तव अत्यत विनम्र शब्दों में अपनी बात रखते थे। यदि किमी का विचार या दृष्टिकोण उन्हें घोर नापसद होता तो भी उनके व्यवहार पर उस बात का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। भारतवर्ष की प्राय सभी भाषाओं के वे जानकार थे। वे मेरे साथ थोडी-वात बँगला बोल लेते थे। मेरे विचार, मेरा चितन निश्चित ही उनके लिए विप समान दासकारी रहा होगा, पर श्रीशुरुणीसमय सड १२ -- मेरे साथ उनके विनम्र व्यवहार में तनिक भी बदल नहीं आया। समिति की कार्यवाही में उन्होंने जव भी, जितना कुछ हिस्सा लिया, कभी भी अपनी वाणी में कठोरता का स्पर्श नहीं होने दिया। उनका व्यक्तित्व जगद्गुरु के पूर्णत विपरीत था। मैं यह अस्वीकार नहीं कर सकता कि गुरु गोलवलकर ने अपने आचरण से मुझे मोहित कर लिया था। कितु उस समय क्या मैं जानता था कि मुझे मोहित करने के लिए और भी बहुत कुछ होना बाकी है? समिति भग होने के करीव एक वर्ष बाद मैं नई दिल्ली स्टेशन से एक दिन सायकाल दक्षिण एक्सप्रेस या ऐसी ही किसी ट्रेन से शायद भोपाल जाने के लिए दो शायिकाओं (वर्थ) वाले कूपे में चढा था। कुछ ही मिनट के याद कृपे के सहयाती आए। वे दूसरे-तीसरे कोई नहीं स्वय गुरु गोलवलकर थे। झाँसी या कहीं जाना था उनको। उन्होंने देखते ही मुझे दृढता के साथ आलिगनवद्ध कर लिया। उनसे शरीर स्वास्थ्य के बारे में पूछा तथा थोडी-बहुत समिति की अधूरी रही कार्यवाही के बारे में जानकारी और देश की विभिन्न समस्याओं के बारे में चर्चा की। गोलवलकर विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। मैं उम्र में उनसे छोटा था, परिणत वयस्क ज्येष्ठ व्यक्ति से जितनी मात्रा में अपने समाज में उदार व्यवहार की अपेक्षा रहती है, उससे कई गुनी अधिक उदारतापूर्वक उन्होंने मुझ पर स्नेहवर्षण किया। ट्रेन चली। वाहर अँधेरा गहरा रहा था। बातचीत बद कर मैंने अपने ब्रीफ केस से किताव या पत्रिका वाहर निकाली एव बत्ती जलाकर पढने बैठ गया। गुरु गोलवलकर ने भी पढना चालू किया। में यह मानकर चल रहा था कि धर्म की उग्रतम ध्वजा के वाहक राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रधान (मुखिया) या तो धर्म के किसी प्रथ या दर्शन की किसी जटिल पुस्तक को पढने के लिए निकालेंगे। कितु इस बार मेरे अचभित होने की बारी थी। देखता हूँ कि वे अमरीका से हाल में प्रकाशित हेनरी मिलर का अद्यतन उपन्यास निकाल कर पढने जा रहे हैं। और अधिक छिपाने से क्या लाभ? उसी क्षण गुरु गोलवलकर के बारे में मेरे मन में श्रद्धाभाव कई गुना वर्धित हुआ था। हो सकता है यह कहानी सबको बताने के अपराध में ।। सघ का एकाध कट्टर स्वयसेवक मुझे वधभूमि में पकडकर ले जाने का । निर्णय ले बेटे। (आजकाल' कोलकाता ६६१९६१ पृष्ठ४ बॅला से अनूदित) श्रीशुरुजी समय खड १२ {१५} a सारगाछी पत्र भेजता हूँ और वाया का उत्तर आने के पश्चात् तुमको सूचित करूँगा। पर यह बात किसी से कहना नहीं।' श्री वावा को सारगाछी पत्र लिखकर अनुमति मांगी। आठ दिनों के पश्चात् श्री वावा की अनुमति प्राप्त हुई और मधु का सारगाछी जाना निश्चित हुआ। मैंने कहा, 'जल्दी योजना बनाकर जाना चाहिए। कोलकाता में, वेलूड में न रुकते हुए सीधे सारगाछी चले जाना।' मधु उसी दिन प्रस्थान कर तीन दिनों बाद सारगाछी पहुंच गए। दो मास के पश्चात् मैंने श्रीमत् बाया को सारगाछी पत्र लिखकर पूछा कि माधवराव सदाशिवराव गोवलकर कैसे हैं?' श्रीमत् बाबा लिखते हैं, गोवलकर* मेरी सेवा करता है। उसका स्वास्थ्य अच्छा है। मैंने उससे कह दिया है कि 'जव तुम मेरे पास मुझे गुरु बनाने के लिए आए हो तो तुम अच्छी तरह से मुझे परख लो और मैं भी जो मेरा शिष्य बनने के लिए आया है, उसे अच्छी तरह से परख लूंगा।' कुछ दिन के पश्चात श्रीमत् स्वामी अखडानदजी ने मुझे पत्र भेजकर अपने पास रहने तथा सेवा करने के लिए नागपुर से सारगाछी आने का आदेश दिया। श्रीमत् वावा का स्वास्थ्य खराब था, इसलिए उन्होंने अपने अति निकट के शिष्यों को वहाँ बुलाया था। मैं तुरत ही सारगाछी गया। आश्रम पहुँचने के पश्चात् मैंने श्रीमत् बाबा को साष्टाग प्रणिपात किया। बाबा बहुत प्रसन्न हुए। उनके पास ही मधु खडा था। मधु भी प्रसन्न था। श्रीमत् बाबा मुझसे बोले, 'यह देखो तुम्हारा गोवलकर। अच्छा है न" मैंने कहा, 'आपकी कृपा से अच्छा ही होगा। उसी दिन सध्या के समय जब मैं श्रीमत् बाया से मिला तो उन्होंने मुझे आदेश दिया कि 'नागपुर जाने के पूर्व तुम आश्रम में जो काम करते थे, उसी काम को आज से प्रारभ कर दो, अर्थात् श्री ठाकुर की पूजा तथा मेरी सेवा। * स्वामी अखडानन्द जी श्री गुरुजी का उपनाम गोलवलकर के स्थान पर गोवलकर का उच्चारण करते थे। श्रीगुरुतीसमय अड १२ r । को - नागपुर से चलते समय की मधु की स्थिति और इस समय की स्थिति में मैंने बहुत अतर देखा। महासागर जैसी शात मुखछवि तथा अतिशय नम्र, विनयपूर्ण व मधुर व्यवहार। उसी समय मेरे मन को लगा कि मधु की तपस्या सफल हो रही है। मधु से वार्तालाप करते हुए मुझे ज्ञात हुआ कि सारगाछी आश्रम के कठोर जीवन के कारण मधु के शरीर और मन पर कोई विपरीत परिणाम नहीं हुआ है और मधु बहुत प्रसन्न है। मधु मुझे कहने लगा, 'यदि ऐसा ही चलता रहा तो सपूर्ण जीवन यहाँ रह सकता हूँ।' तब मैंने मधु से पूछा, 'क्या दीक्षा हो गई है?" मधु ने उत्तर दिया, 'अभी नहीं।' मधु के प्रत्येक व्यवहार की परख बहुत गहराई से श्रीमत् बाबा कर रहे थे। शिष्य की कटोर परीक्षा चल रही थी। आसन लगाकर घटों बैठने को श्रीमत् वावा कहा करते थे और मधु आसन जमाकर बैठ जाता था। कभी-कभी ऐसे आसन में बैठे मधु को मैंने देखा है। हिमालय के परम पावन परिसर में जाकर एकातवास में रहने की अति प्रबल इच्छा मथु के मन में जमी थी। मधु अत्यधिक भक्तिभाव से एव देहभान भूलकर तन्मय हो श्री वाया की सेवा कर रहा था। रात्रि को एक-डेढ बजे तक गुरुसेवा किया करता और प्रात ४ बजे गुरु जब शय्या से उटते थे तो उनका पैर जमीन पर आने के पूर्व ही उनकी खडाऊ लेकर सामने उपस्थित रहता। मानो शिष्य की कठोर परीक्षा चल रही थी। एक दिन श्रीमत् याबा ने मधु को बुलाया और उसके आने पर उसे खडे रहने के लिए कहा। घटा बीत गया, कितु न उसे कोई काम बताया और न उसको जाने के लिए कहा। मधु उसी स्थान पर निश्चल खडा रहा। मैंने श्रीमत् बाबा का ध्यान जब उसकी ओर आकर्षित किया, तब उन्होने कहा, 'हाँ, मैंने ही उसे वहाँ खडे रहने के लिए कहा है।' श्रीमत् बाबा द्वारा यह परीक्षा ली जा रही थी। दिसबर १६३६ के मध्य में नित्य क्रम के अनुसार मैं एक दिन श्रीमत् बाबा की सेवा करने के लिए विनोद कुटी' में गया तो जाते समय देखा कि मधु स्वामी सर्वानदजी लिखित 'कठोपनिषद्' पढ रहा है। मैंने श्रीगुरुती समय खड १२ {१५} बुलाओ।' श्री उससे पूछा कि 'यहाँ तुमारी रात कैसी बीतती है? नींद लगती है?' मधु ने उत्तर दिया, 'श्रीमत् यात्रा का आदेश है कि रात में निद्रा कम लेकर साधना करना अच्छा है।' मुझे बहुत प्रसनता हुई और श्रीमत् बाबा के कमरे में जाकर उनकी सेवा करने लगा। पैर दवाते समय मैंने श्री वावा से पृछा, 'आपकी सेवा मधु कैसी करता है?" श्री बाया वोले, 'मधु का भक्तिभाव, उसका कर्म करने का कौशल्य व श्रद्धा अपूर्व है। वाद में वे पूछने लगे, 'गोवलकर क्या करता है?' मैंने कहा, 'अपने कमरे में कटोपनिषद् पढ रहा था। 'देखो, वह इस समय क्या कर रहा है? और उसको वावा ने आदेश दिया। मैं बाहर गया और वापस आकर कहने लगा की मधु ध्यान कर रहा है। श्री बावा ने उसको बुलाने के लिए फिर से कहा। मधु को बुलाया गया। मधु आया और प्रणाम कर श्री वावा के पास खडा रहा। श्री बाबा ने पूछा गोवलकर, तुम कैसे हो?' 'वावा, मैं अच्छा हूँ।' मधु का उत्तर आया। फिर श्रीमत् बाबा की वाणी से शब्द निकले- 'सेवा करना बहुत कठिन काम है। सेवा करते समय तुमको यह नहीं सोचना चाहिए कि तुम किसी व्यक्ति विशेष की सेवा कर रहे हो। तुम्हारा सर्व कर्म ईश्वर को समर्पित होना चाहिए।' 'सेवाधर्मो परम गहनो यो मुनीनामपि अगम्य ।। 'कोई भी सेवा हो- जनसेवा, व्यक्तिसेवा, आतुरसेवा समाजसेवा सेवा- करते समय अपनी प्रतिष्ठा बढे इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए।' श्री गुरुमहाराजजी हम सभी के सामने 'प्रतिष्ठाशूकरविष्ठा' ऐसा कहकर हाथ में थूकते थे और बोलते थे कि 'प्रतिष्ठा का ध्यान रखने के कारण भ्रष्ट होने की सभावना होती है। इसके ऊपर तुम खूब विचार करो।' 'तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो श्रीकृष्ण के जीवन का सम्पूर्ण रीति से ध्यान करो। कोई भी कठिनाई आई तो अपने को निस्सहाय for श्रीगुरुजी समय खत १२ वैसी मधु मत समझना। सभी अवस्था में श्रीठाकुर तुम्हारे साथ रहेंगे। यही तुम्हारा ध्यान और तुम्हारी तपस्या है। श्री मॉ जगदम्बा की कृपा से तुमको अपूर्व उपलब्धि होगी। मैं यह सब सुन रहा था। मधु निस्तब्ध होकर श्रीमत् बाबा का यह उपदेशामृत मानो सारे शरीर का पात्र बनाकर प्राशन कर रहा था। वह उस उपदेश को अपने जीवन के अमूल्य मार्गदर्शन के रूप में ग्रहण कर रहा था। यथेच्छ भोजन के पश्चात् जैसी सतुष्ट मुद्रा होती है, की मुद्रा थी। फिर श्रीमत् बाबा बोले, 'जाओ, मैंने अभी जो कहा उस विषय में चितन करो।' जनवरी मास के पहले सप्ताह में में श्रीमत् वाया से बोला, 'मधु को दीक्षा देकर नागपुर भेजना चाहिए। इससे उसे माता-पिता की सेवा तथा अपना व्यवसाय करने में सुविधा होगी।' श्रीमत् बाबा सुन रहे थे। बाद में बोले- 'दीक्षा देने का समय अभी नहीं आया। यह तो श्रीठाकुर जी से पूछने के बाद दूंगा। परतु मधु नागपुर जाकर अपने व्यवसाय में लग जाएगा, यह कौन कह सकता है?" मेरा सारगाछी आश्रम में रहने का समय पूर्ण हो चुका था। इसलिए मैं जब श्रीमत् बाबा, 'से नागपुर जाने की अनुमति लेने पहुंचा तो वे बोले, 'मेरा शरीर अब बहुत दिन रहनेवाला नहीं है। तू मेरा पुराना शिष्य होने के कारण आश्रम की सीमा के बाहर मत जाना।' में अपने गुरु की इच्छा को समझकर पूर्णरूपेण उनकी सेवा में लग गया। श्रीमत् बाबा की अस्वस्थता बढ़ती जा रही थी। बरहमपूर के अनेक गणमान्य डाक्टर वहाँ आकर उनकी चिकित्सा कर रहे थे। कितु स्थिति सुधरने की अपेक्षा गिरती ही जा रही थी। उन्हें कोलकाता ले जाने की बात चलने लगी। मकर सक्राति के चार दिन पूर्व मैंने श्रीमत् बाबा से मधु की दीक्षा के सबंध में पूछा। श्री बाबा ने उत्तर दिया, 'शीघ्र ही मुहूर्त आएगा और दीक्षा दूंगा।' १२ जनवरी १६३७ के दिन सध्या को श्रीमत् बाबा मुझसे कहने लगे, 'गोवलकर की दीक्षा कल मकर सक्राति के मुहूर्त पर दी जाए, ऐसी ठाकुर जी की इच्छा है।' मकर सक्राति के दिन प्रात काल में जब श्री ठाकुर की पूजा कर श्रीगुरुजी समय खड १२ {१७} ।
की रहा था, तो प्रसन्नवदन मधु वहाँ पहुँचा। मेरे पास आकर मुझे प्रणाम करना चाहा। मैं समझ गया कि दीक्षा हो गई है, कितु श्री ठाकुर के सामने स्वय को प्रणाम करने से मैंने मधु को मना कर दिया। में श्री ठाकुर जी का प्रसाद देने के लिए जय श्रीमत् वावर के पास पहुंचा तो उन्होंने बताया, 'ठाकुर जी के आदेश से मधु की दीक्षा हो गई है। कितु उसे आश्रम में मत रखना । उसका कार्य आश्रम के बाहर है। उसकी वृत्ति समाधि की ओर है। आश्रम में रहेगा तो उसी ओर जाएगा। जब-जब कोई कठिनाई आए, तो उसे परामर्श देते रहना।' दीक्षा हो जाने पर एक बार मैंने श्रीमत् वाया से पूछा, 'मधु हिमालय जाने की इच्छा अतिशय प्रबल है। परतु उसको नागपुर जाकर माता-पिता के पास पहुंचाना पड़ेगा। आगे कैसा करना उचित होगा?' श्रीमत बावा बोले, 'ऐसा लगता है कि यह डाक्टर हेडगेवार जी के साथ रहकर काम करेगा। शुद्ध भाव से समाजसेवा में, लोक भगवान की सेवा मैं अखडरत~ ऐसा कर्ममय जीवन इसका होगा। हिमालय जाने की इच्छा कभी प्रबल हो उठेगी, तव ध्यान रखना। बद्रिकाश्रम आदि स्थानों पर जाकर चाहे तो हिमालय का दर्शन अवश्य करे, परतु एकातवास में रहने से उसको परावृत्त करना पड़ेगा। तुम्ही को यह काम करना होगा।' इसी अवसर पर मैंने डाक्टरों का उन्हें कोलकाता ले जाने का विचार बताया। श्रीमत् बावा ने उसकी अनावश्यकता प्रकट की, किंतु अनुमति दे दी। साथ में कौन-कौन चलेगा, यह भी पूछ लिया। थोडी देर बाद श्रीमत् बाबा अष्टमहाविद्या का वर्णन करने लगे। उस समय उनके हावभाव देखकर मैंने मधु को बुलाया और कहा, 'देख, समाधि कैसी होती है, अच्छी तरह देख ले। मैंने श्रीमत् बाबा का हाथ मधु के हाथ में देकर कहा कि इनकी अगुलियों दवाओ, उनकी चिमटी काटो। कितु यह सब करने पर भी देहभान से परे हुए श्रीमत् वावा पर कोई परिणाम परिलक्षित नहीं हुआ और देवी के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार चलता रहा कि साक्षात् देवी को सामने खडी देख रहे हों। सय व्यवस्था करके श्रीमत् बावा को कोलकाता लाया गया और चिकित्सालय में आवश्यक जाँच आदि होने के पश्चात उन्हें जब बेलूड मठ में लाया गया सब प्रभात के तीन बजे थे। उनकी दशा गभीर होती गई श्रीगुरुजी समय खड १२ r . में और ७ फरवरी १६३७ को दोपहर श्रीमत् बाबा महासमाधिस्थ हो गए। रामकृष्ण आश्रम के अनेक सन्यासी, स्वामी अभेदानद आदि वाया के गुरुवधु तथा सहस्रों भक्तजन वेलूड मट में एकत्र हो गए थे। अति विशाल शवयात्रा के पश्चात् उनका पार्थिव शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया गया। रात्रि के समय स्वामी अखडानदजी के गुरुवधुओं के समीप अनेक आश्रमवासी एकनित होकर श्रीमत् स्वामीजी के दिव्य गुणों का जब स्मरण कर रहे थे, तब मेरी दृष्टि अपने मधु को ढूंढ रही थी। तुरत मुझे कुछ स्मरण आया और मैं गगातट की ओर उसी जगह के लिए चल पडा, जहाँ श्रीमत् बाबा का दाहसस्कार हुआ था। वहाँ मधु चिता में से फूल चुन रहा था। मैं समझा-बुझाकर साथ लाया, कितु कुछ पवित्र अस्थियों को अत्यत पवित्र धरोहर समझकर वह अपने साथ ले आया। तत्पश्चात् तेरह दिन बेलूड मठ में ही चर्चा एव भविष्य की योजनाओं के सबंध में विचार-विमर्श में चीते। मैं मधु को श्रीरामकृष्ण परमहस के शिष्य स्वामी अभेदानदजी, स्वामी विवेकानद के मॅझले भाई श्री उपेंद्रनाथ दत्त और श्री रामकृष्ण देव के समय के परिचित सभी के पास दर्शन हेतु ले गया। स्वामी अभेदानद जी मधु को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपने एक चित्र पर हस्ताक्षर कर उसे देते हुए कहा, 'स्वास्थ्य अच्छा रहा तो एक बार नागपुर आऊँगा। उन्होने मधु के सबंध में मत प्रकट करते हुए कहा, 'तुम त्यागी के समान जीवनयापन करोगे।' मधु के छुटपन के एक सहपाठी ने, जो सारगाछी आश्रम में रहते थे, बेलूड मठ में रहने का निश्चय प्रकट किया। मधु ने भी वही मन्तव्य प्रकट किया। तब मैंने उन्हें अलग ले जाकर कहा कि तुम्हें रामकृष्ण आश्रम में नहीं रहना है।' मधु ने चौंककर कहा, 'आप सच कह रहे हैं? आपको कैसे मालूम हुआ?" मैंने श्रीमत् बावा से हुआ वार्तालाप बता दिया। मधु ने कहा, 'मुझे भी गुरुदेव ने यही आदेश दिया और यह भी कहा कि जब भी कोई कठिनाई आए, मैं आपसे परामर्श लिया करूँ। अब आपकी मेरे बारे में क्या योजना है?' मैंने कहा कि 'मैं तुमको जहाँ से लाया हूँ, वहाँ ले जाकर सौंप दूंगा।' श्रीगुरुजी समय खड १२ {१६} मधु को साथ लेकर मैं गपुर पीटा। मास भर रामकृष्ण आश्रम । में रसकर स्वामी विवेकासद के शिकागो व्याख्यान का मराठी आत कराया, मानो परम श्रमेय थावाजी के दाग प्राप्त हुई दीक्षा की पर गुरुदक्षिणा थी। तत्पश्चात् मधु के मामा को युलयाकर उनसे मैंने कहा कि वे उनको अक्टर हेडगेवार के पास पहुंचा दें। और इस तरा डाक्टर साहब को भावी सरसंघचालक की उपालि गई। 'सन् १६४० के पश्चात् में लगभग चार साल उत्तराखड की पान में व्यरत था। कश्मीर से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गगोनी, जमनोनी कैलाश मानसरोवर आदि हिमालय की गोद में बसे तीर्थरथलों की यात्रा कर कोलकाता वापस आया और बैलर मट में राने लगा। कोलकाता के मघ के कार्यकर्ता मुझसे नित्य मिलते रहे। मेरा उनसे अत्यत घनिष्ठ परिचय हो गया था। ३० जनवरी १६४८ को बेलूट मट के पास लगे एक सघ के शिविर को देखने के लिए में संघ के कार्यकर्ताओं के साथ गया था। शाम को लौटते समय महात्माजी की हत्या की वार्ता प्रसारित हो रही थी। मुझे कारावास में ले जाने की इच्छा से पुलिस बेलुड मट से सलग्न एक मेडिकल अस्पताल में, जो रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित था और जहाँ में काम करता था, पहुँची। सरकार की सघ के विषय में दमननीति का रुख देखकर मुझे लगा कि इससे वेलुड मठ को तकलीफ होगी। यह न हो इसलिए मैंने रामकृष्ण मठ और मिशन के जनरल सेक्रेटरी श्री माधवानद जी महाराज से विचार-विमर्श कर वेलुड छोडकर चेन्नै प्रस्थान किया। चेन्नै से लका, इंडोनेशिया, थाइलैंड, वर्मा, मलाया आदि स्थानों पर भ्रमण करता रहा । जय मैं सिगापुर में था। तब वृन-पनों से समाचार मिला कि सघ पर की पावदी हट गई है और श्री गुरुजी (मधु) का भारतवर्ष में भ्रमण चल रहा है व स्थान-स्थान पर उनका स्वागत हो रहा है। श्री गुरुजी का कार्यक्रम जब मैसूर में था तव में भी चेन्न होते हुए बगलौर पहुंचा। वहाँ से मैसूर गया व श्री गुरुजी से लगभग १२-१३ वर्षों के बाद मिला। उसके पश्चात मेरा श्री गुरुजी से नित्य सपर्क रहा। सन् १६६२ में अप्रैल ५ को वर्ष प्रतिपदा का पर्व था। पूजपीय डाक्टर जी के म्मृति मदिर के उद्घाटन का कार्यक्रम था। श्री गुरुजी की इच्छानुरूप में नागपुर आया था। गुरुजी की माता श्री ताई का स्वास्थ्य बहुत क्षीण हो गया था। परतु उनकी स्वाभाविक रूप से इच्छा थी की स्मृति मदिर और पूजनीय डाक्टर जी का समाधिस्थल देखें। मातु श्री ताई की श्रीगुरुजी समन खड १२ ।
इच्छा पूरी हो जाना चाहिए ऐसा मुझे लगा। श्री गुरुजी को भी मेरा विचार अच्छा लगा और व्यवस्था करके ताई को स्मृति मदिर का सुबह का कार्यक्रम कुर्सी पर पडे-पडे देखने का आनद प्राप्त हुआ। उससे ताई को बहुत समाधान मिला। कुछ दिनों पश्चात् ताई का देहावसान हो गया। प्रखर विरक्ति से गुरुजी का हृदय भर गया व हिमालय के पवित्र परिसर में जाकर एकातवास करने की तीव्र इच्छा उनके मन में जाग उठी। मुझे श्री बाबा ने सारगाछी में जो कहा था, वह स्मरण हो आया। मैंने गुरुजी को परावृत्त करते हुए कहा अभी सघ का कार्य पूर्ण नहीं हुआ है। अपना कार्य करने के लिए अभी तो कायालय में जो अपना छोटा-सा कमरा है, वहीं हमें चलना चाहिए। हिमालय में जाने की अपेक्षा साधना के लिए शेष जीवन तक अपना वह कमरा ही अच्छा है। मैं भी तो कार्यालय में रहता हूँ। वही चलें।' २२-२३ फरवरी १६७३ को वालाघाट में डा देवरस जी की सुपुत्री के विवाह में उपस्थित रहने के लिए गुरुजी ने मुझे कहा था। मैं उस विवाह में उपस्थित था। गुरुजी और मेरी एक ही कमरे में रहने की व्यवस्था थी। उन दो दिनों में हमारा दिल खोलकर वार्तालाप हुआ। अपना शरीर अब अधिक काल तक साथ नहीं देगा इसकी बहुत स्पष्ट कल्पना गुरुजी को थी। बहुत साफ शब्दों में यह उन्होंने कहा था। उनके साथ की पूजा की पवित्र वस्तुएँ, पुणे में जहाँ उनके कुलदेवता की उपासना चलती है, वहाँ श्री वासुदेवराव गोळवलकर के पास भेजने का विचार मैंने उनसे कहा। उनको यह विचार जॅच गया। वे तुरत मान गए और उसी प्रकार उन वस्तुओं की व्यवस्था की। आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत उच्च कोटि के अधिकारी परम श्रद्धेय अखडानद जी और भारत माता तथा उसकी कोटि-कोटि सतानों की निरपेक्ष सेवा में रत श्रेष्ट कर्मयोगी परम पूजनीय डाक्टर जी- इन दोनों का अलौकिक मागदर्शन तथा आधार श्री गुरुजी के सपूर्ण जीवन में स्पष्ट रूप से दिखता है। स्वामी विवेकानद जी की उस उक्ति की याद आती है 'मातृदेवो । भव, पितृदेवो भव, अतिथिदेवो भव के साथ आर्तदेवो भव, दरिद्रदेवो भव' । इस भाव से समाज के प्रत्येक मनुष्य के पास जाना चाहिए, उसकी परमेश्वरभाव से पूजा करनी चाहिए। श्री गुरुजी ने अपने जीवन में इस | विचार को पूर्णरूपेण चरितार्थ किया। आध्यात्मिक क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ आधार श्रीगुरुजीसमय खह १२ {२} बनाकर उन्होंने सपूर्ण समाज की ‘सहनशीर्षा पुरुप सहस्राक्ष सहमपाद' इस परमेश्वर भाव से पूजा की और इसी भाव से 'समाज को उपास्य देवता मानकर सघ का कार्य करो' ऐसा मौलिक विचार उन्होंने स्वयसेवकों को प्रदान किया। (१४पजवरी १६७५ मकस- ५ जीवन सध्या (डा आवाजी थत्ते, श्री गुरुजी के निजी सचिव) अगस्त १६६६ में मैं अपने स्वय के स्वास्थ्य के कारणों से पूजनी श्री गुरुजी के साथ प्रवास पर नहीं गया था। उस समय उनका प्रवार कारवार जिले में था। वे सिरसी नामक स्थान पर थे। वहाँ विश्राति के लिए वे रुके थे। जय में वहाँ पहुँचा उनका मुकाम समाप्त हो रहा था। उन सीने पर लेप लगा देख मैंने पूछा 'यह लेप किस लिए लगाया?' उन्हों वताया 'छोटी-सी गॉठ है। एक पुराना दोस्त मिल गया, सो उसे गले ल लिया। मेरा फाऊटेन पेन गाँठ पर दबने से खूब वेदना हुई। इसलिए ले लगाया। मैंने उस समय वह गाँठ नहीं देखी। नागपुर लौटने पर डाक्टरों उसपर कुछ औषधियाँ दीं। गाँठ छोटी-सी थी। सन् १६६४-६५ में ऐसी है एक छोटी-सी गाँठ उनकी पीठ पर आई थी। होम्योपैथी की औषधियों रं वह ठीक हो गई थी। ऐसा लगा यह भी ठीक हो जाएगी। परतु ३ मः १६७० के आसपास एक दिन उन्होंने कहा 'बगल में गॉट है, ऐसा लगत है। उसे देखने के बाद लगा यह मामला कुछ ठीक नहीं। बात कुछ सर सी नहीं लगती। कुछ दिनों बाद वे पुणे जानेवाले थे। पुणे में डा नामजोर्श ने परीक्षण किया। तत्काल उन्होंने कहा, 'यह कैन्सर है, ऐसी आशका है जाँच होनी चाहिए।' प्रारभ में होम्योपैथी की औषधियाँ चल रही थी और प्रवास । चल रहा था। १८ मई १६७० की रात्रि को मुबई में डा श्रीखडे और डा फडवं नै उनकी जाँच की। उन्होंने भी कहा कैन्सर होगा, ऐसा लगता है। श्र गुरुजी ने उन्हें अत्यत स्पष्ट रूप से कहा वायोप्सी नहीं होगी। पूर्णरूप है श्रीगुरुजी समन खड १२ - २०७१ अक्तूबर को बाबा रुग्णालय में पुत्र परीक्षण इTU ही काटिए, पर मुझे अभी समय नहीं। प्रवास समाप्त होते, ही मैं आऊँगा, फिर आपरेशन करें। २८ जून १६७० को प्रवास समाप्त हुआ। हम मुबई पहुँचे। २६ जून को परीक्षण हुआ और ३० जून को उन्हें टाटा रुग्णालय में भरती किया गया। १ जुलाई को गाँठ काटकर उसका परीक्षण किया गया। १० मिनट में ही निष्कर्ष निकला कि कैन्सर है। डाक्टरों ने पूर्णरूप से जितनी गाँठे निकालनी थी निकाली। शस्त्रक्रिया वहुत सफल रही। जख्म भरने की प्रक्रिया भी वेग से हुई। टाँके निकालने के बाद डीप एक्सरे देने का निश्चय किया गया। उसी रुग्णालय में सीने और पीठ पर डीप एक्सरे दिया गया। अब श्री गुरुजी को कुछ नहीं होगा, इस विश्वास के साथ २६ जुलाई को हम मुवई के रुग्णालय से लौटे। कुछ दिनों तक मुबई में रहने के बाद, श्री गुरुजी नागपुर लौटे। यहाँ ड्रेसिग आदि चलता रहा। चेकअप के लिए पुन मुबई हो आए। वह अगस्त का तीसरा सप्ताह था। एक दिन प्रार्थना करते-करते मुबई में ही उन्हें चक्कर आया। वे मूर्च्छित हो गए। लौटने पर पता चला कि उनकी बगल से पानी और पस निकल रहा है। वहाँ एक छिद्र-सा भी हो गया था। इसे रेडियो नेक्रॉटिक अल्सर कहते हैं। उस जख्म पर उपचार किए गए और वह भर गया। नागपुर आने पर श्री जनार्दन स्वामी ने एक तेल दिया। उस तेल से जख्म तीन माह में भर गया। प्रयास फिर भी चल ही रहा था। अक्तूबर के बाद तो उनका स्वास्थ्य सामान्य हो गया था। केवल बाएँ हाथ पर सूजन थी। शस्त्रक्रिया की सफलता की वह निशानी थी और यह सूजन अत तक कायम रही। सन् १६७१ में विशेष कुछ नहीं हुआ। १६७२ का पूर्वार्थ भी टीक रहा। सितबर १६७२ में उनको कधे पर गॉट दिखाई दी। उस समय घे जयपुर में थे। एक दिन उन्हें तेज बुखार हो आया। उनके जीवन की यह पहली घटना थी कि वे बुखार में स्वय पर सतुलन नहीं रख सके। बैठक में उनके बोलने में असबद्धता आने लगी। अत में बैठक रोक दी। तीन । घटों में ही वे पूर्ववत हो गए। -- -- - -- । दिनों तक पाएगाजपा ११ पवबर के करीब श्रीशुरुजी समय खर्ड तपालक एट वापनालेय {२३) . दो-तीन सप्ताह उन्हें गले में बहुत कष्ट हुआ। निगलने में, बोलने में २६ होने लगा। डा जायस्वाल ने उनका परीक्षण किया। बाद में दिसम्बर अ तक वे विश्राति के लिए, इदौर गए। वर्ष में दो बार श्री गुरुजी का भारत भ्रमण होता था। सन् १६७ का उनका प्रवास २६-३०-३१ दिसबर १६७२ से अहमदाबाद से प्रारः हुआ। उस समय यह कल्पना भी नहीं थी कि यह उनका अतिम प्रवा होगा। १४ मार्च को राँची में प्रवास समाप्त हुआ। मार्च के प्रथम सप्ता से उन्हें थकान अनुभव हो रही थी। पर वह प्रयास की थकान होगी, ऐर लगा। थकान बढ रही थी। १६ मार्च को नागपुर में एक्सरे लिया गया मैं उन्हे मुबई ले गया। डाक्टरों ने मत व्यक्त किया कि रोग फेफड़ों में प्रदेश कर गया है। उन्होंने कुछ इजेक्शन भी दिए। २२ मार्च १६७३ को नागपुर में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभ की बैठक चल रही थी। श्री गुरुजी को सॉस लेने में बहुत कष्ट हो रह था। स्वास्थ्य इतनी गभीर स्थिति पर पहुंचा कि भय हुआ कि अमावस्य बीतेगी या नहीं। ३०-३१ मार्च तक इजेक्शन दिए। इसके बाद प रामनारायणजी शास्त्री के उपचार प्रारभ हुए। प्रात ५ ३० से रात्रि को सार तक भाँति-भाँति की ओषधियाँ दी जाती थीं। १ अप्रैल के बाद स्वास्थ धीरे-धीरे सुधरने लगा। ४ अप्रैल के बाद तो खतरा टल गया, ऐसा लग १०-११ अप्रैल तक वे पूर्णत सामान्य हो गए। सॉस लेने में कष्ट अव था पर विशेष नहीं था। १०-११ अप्रेल से २५-२६ मई तक का का बहुत अच्छा बीता। २७ मई को कोलकाता के चेस्ट स्पेशलिस्ट डा करा नागपुर आए। उन्होंने जॉच की। फिजिकल फाईंडिग्ज और साँस लगन डिसप्रपोर्शनेट है, यह निष्कर्ष उन्होंने निकाला । एक्सरे से भी इस बात मैं ज्ञान नहीं हो रहा था कि सॉस क्यों लगता है? यही नहीं तो ३० अप्रैल को जो एक्सरे निकाला गया, वह अच्छा था। २६ मई का तो उससे 4 अच्छा था। इजेक्शन जारी थे। ३ जून को प रामनारायण शास्त्री आए बाकी के लक्षणों से उन्हें कुछ गभीर बात नहीं लगी। उन्होंने इतना ही कहा- 'सॉस क्यों लगता है समझ में नहीं आ रहा।' औषधियों से साँस् कम होगा, यह आशा व्यक्त कर वे ४ जून को इदौर लौटे। आखिर यह भीषण दिन भी आया। ५ जून १६७३ एक अत्यत दुर्दैवी क्रूर दिवस प्रति से ही पूजनीय गुरुजी को सॉस बेहद कष्ट दे रहा था। मैंने कहा भी। इस पर उन्होंने कहा- ऐसा लगता है, आखिरी घटी बज रही है। श्रीशुरुखी समय खह १२ । मैंने समझाते हुए कहा- "पिछली बार भी ऐसा कष्ट हुआ था, पर फिर ठीक हो गया था।' कितु विधिलिखित अलग ही था। औपधियाँ चल रही थीं। भोजन के समय उन्होंने कहा- 'थोडा-सा ही दो। क्योंकि खाते समय भी कप्ट हो रहा था। आखिर के दो-तीन दिन उन्हें आमरस देना शुरू किया था। पर उस दिन रस भी थोडा ही लिया। दो-तीन दिनों से उन्होंने भोजन बहुत कम कर दिया था। ५ जून को दोपहर पौने तीन बजे आधा कप दूध लिया। साढे तीन वजे एक घुट चाय पी। ६ बजे पुन दूध के लिए कहा तो वोले- 'सच पूछो तो नहीं चाहिए पर लाए हो, तो दे दो।' इसी बीच डाक्टरों को बुलवा लिया था। उन्होंने कुछ इजेक्शन दिए । साय ७ बजे के करीब वे प्रार्थना में आने के लिए कहने लगे। वेदनाएँ हो रही थीं। तब मैंने उनसे कहा आप अपने कमरे में ही रहिए। इस पर उन्होंने पूछा- 'प्रार्थना सुनाई देगी क्या?" मैंने कहा, 'हाँ'। उन्होंने अपने कमरे में बैठकर ही प्रार्थना की। सायकाल की प्रार्थना के बाद रोज कृष्णराव, विष्णुपत मुठाळ तथा अन्य उपस्थितों के साथ वे चाय लेते थे, पर उस दिन उन्होंने चाय नहीं ली। हमसे कहा- 'मैं नहीं ले रहा तो क्या हुआ, तुम लोग लो।' साढे सात से ८ तक में नीचे गया था। इस बीच वे अपने कमरे से निकलकर लघुशका के लिए गए। ग्लानि आ रही थी, इस कारण विष्णुपत मुटाळ और बाबूराव चौथाईवाले उन पर बराबर ध्यान रखे हुए थे। लघुशका के बाद हाथ पैर धोने का प्रयास कर रहे थे कि मूर्छा आई। उन्हें उठा कर कुर्सी पर रखा। उसके बाद वे कुछ नहीं बोले। ८ के करीब में आया। नाडी नहीं लग रही थी। प्रात से लाया ऑक्सीजन दिया। इसी समय डा रामदास पराजपे, डा इदापवार आदि पहुंचे। नाडी आ गई, ऐसा लगा। पर वह आभास ही था। ८ के बाद स्वास्थ्य नाजुक होने लगा। डाक्टरों ने सूचना देने के लिए कह दिया। श्री गुरुजी कुर्सी पर बैठे थे। । धीरे-धीरे साँस की गति कम हो रही थी। ६ बजकर ५ मिनट पर उन्होंने अतिम सॉस ली। घर-धरी नहीं अथवा हिचकी नहीं, शाति के साथ गरटन - टेढी हो गई, बसा ध्यान में आ गया कि अब सब समाप्त हो गया। (पुणे तरुण भारत श्रद्धाजलि अक घुमाई १६७३) श्रीपुरुजीसमय खड १२ {२५} - । - - -- - -- 1 ६ श्रीगुरुजी के सानिध्य मे (श्री कुशाभाऊ ठाकरे, राजनीतिक कुशल सगठक) परम पूजनीय श्री गुरुजी के साथ बिताया हुआ एक एक क्षण बहुत ही शिक्षाप्रद रहता था। उनकी बातचीत, उनका व्यवहार उनका विनोर सभी बातों में से शिक्षा प्राप्त होती थी। यह अनायास एक अनौपचारिक वातावरण में प्राप्त होती थी। यदि यह सब कुछ लिखने बैठे, तो महाभारत जैसा एक ग्रथ तैयार हो जाएगा। बातचीत में सब प्रकार की चर्चा चलती ही थी। जनसघ की गतिविधियों और राजनीति पर भी चर्चा होती थी। वे एक ही बात पर जोर देते थे कि अपने सिद्धातों पर अटल रहो। जब मुझे जनसघ का काम करत के लिए कहा गया, उसके बाद मैं पूजनीय गुरुजी से मिला था। उनमे मार्गदर्शन मांगा। तब उन्होंने जो कहा, वह मेरे लिए जीवन का पाथेय चन गया। उन्होंने कहा 'तुम्हें राजनीति में शठे प्रति शाट्यम् की नीति अपनान । होगी। पर ध्यान रखना कि कहीं तुम्हारा स्वभाव ही उसका न बन जाए। सस्ती लोकप्रियता के पीछे पड़कर अपने सिद्धातों को मत भूलना।' उनका कहना था कि राजनीति में विजयश्री प्राप्त करने के लिए अशुद्ध व निषिद्ध साधनों का प्रयोग लोग करते हैं। अशुद्धता विजयी नहीं होनी चाहिए। इसके लिए हमें सतर्क होकर उपाययोजना करनी चाहिए। किंतु यह सब करते समय यह भय बना रहे कि हम अपने मन की पवित्रता न सो बैठे। हमारी स्वय की पवित्रता बनी रहनी चाहिए- इस बारे में भी हो सतर्क रहना चाहिए। चुनाव में कौन कहाँ-कहाँ से खडा हो कौन कार्यकता कौन-सा पद ग्रहण करे आदि बातों में वे कभी भी दिलचस्पी नहीं लेते थे, पर जानकारी पूरी रखते थे। वे स्वयसेवकों की भावना का भी बहुत ध्यान रखते थे। गुरुजी ट्रेन से अजमेर से इदौर जा रहे थे। रास्ते में गाडी करीब २ घर रतलाम में खडी रहती है। वह समय भोजन का भी रहता है। स्टेशन में पास ही रहने वाले एक स्वयसेवक श्री गोपालराव के घर उनका भोजन था समय काफी था। इसलिए यह विचार किया गया कि रतलाम शाखा स्वयसेवकों की एक बैठक भी हो जाए। उस दिन गाडी देरी से आई। अब श्रीशुरुजीसमय खड १२ । पूजनीय ३ fro समय इतना नहीं था कि भोजन और बैठक दोनों कार्यक्रम हों। पूजनीय गुरुजी ने भोजन छोड बैठक में जाने का ही निश्चय किया। बैठक पूरी करके हम वापस स्टेशन पर आए । स्वाभाविक रूप से गोपालराव को दुख हुआ और गाडी छूटते समय उनकी आँखों में आंसू आ गए। पूजनीय गुरुजी के यह बात ध्यान में आई। उन्होंने तत्काल कहा, 'गोपालराव में परसों पुन इधर से ही निकल रहा हूँ। जाते समय भोजन तुम्हारे ही घर करूँगा।' पूजनीय गुरुजी को इदौर से निकलना था। वे एक समय केवल दोपहर में ही भोजन करते थे। उन्होंने उस दिन इदौर में दोपहर का भोजन करने से इनकार कर दिया। शाम रतलाम आकर गोपालराव के यहाँ भोजन किया। कितना ख्याल रखते थे स्वयसेवकों का (युगधर्म श्रीपुरुषी स्मृति अक मुलाई १६७३) ७ सघकार्यकीतेजस्वीपरपरा (श्री कृष्णराव मोहरील, नागपुर कार्यालय के आधारस्तभ) डा हेडगेवार की व्यक्ति-परख अत्यत अचूक थी। श्री गुरुजी में निहित गुणवत्ता, राष्ट्रकार्य की असीम एव उत्कट लगन डाक्टर जी ने शुरू से ही पहचान ली थी। अपने बाद वे सघकार्य की जिम्मेदारी संभाल सकेंगे तथा उसका विस्तार कर सकेंगे, इसका उन्हें पूर्ण विश्वास था। अपने बाद उन्होंने सघकार्य का दायित्व सँभालना चाहिए, ऐसी इच्छा उनकी प्रारभ से रही। श्री गुरुजी जब बनारस विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे थे, उन दिनों की बात है। सन् १६३२ में सघ का विजयादशमी महोत्सव निकट आ रहा था। डाक्टर जी ने मुझे श्री गुरुजी को पत्र भेजकर बुलवाने की बात कही। डाक्टर जी की इच्छानुसार श्री गुरुजी तथा उनके सहयोगी स्वयसेवक सद्गोपाल जी नागपुर पहुंचे। उत्सव के दिन डाक्टर जी ने मुझे दो पुष्पहार लाने का आदेश दिया। उत्सव में स्वयसेवकों द्वारा प्रात्यक्षिक होने पर डाक्टर जी ने अपने प्रास्ताविक भाषण में कहा कि 'अन्य प्रातों में भी सघकार्य का प्रचार हो रहा है। काशी जैसे स्थान पर सघ का प्रचार करनेवाले श्री माधवराव गोळवलकर यहाँ आए हुए हैं। ऐसा कहकर उन्होंने वे पुष्पहार श्री गुरुजी और सद्गोपाल जी को पहनाए । सघ की कार्यपद्धति में न बैठने वाली यह बात डाक्टर जी ने श्री गुरुजी के लिए की। इसी से श्री गुरुजी के प्रति डाक्टर जी के मन में कौन-से विचार उठ रहे थे, उनकी श्रीशुरुजी समय खड १२ {२७) - सहज कल्पना की जा सकती है। तथापि श्री गुरुजी एकाएक यह दायित्व स्वीकार कर लेंगे, यह सभव नहीं था। इसलिए डाक्टर जी श्री गुरुजी को निरतर अपने सान्निध्य में रखते। प्रवास में भी श्री गुरुजी अपने साथ रहें, यह उनका आग्रह बना रहता। स्वामी विवेकानद ने जिस प्रकार अपने गुरु की परीक्षा ली थी, उसा प्रकार श्री गुरुजी ने सघ और डाक्टर जी के प्रति वैसी ही परीक्षा लेकर ही यह महान दायित्व सँभालना स्वीकार किया। सन् १६३६ का प्रसग है। सरस्वती सिनेटोन के 'भगवा झेंडा' नामक चित्रपट के उद्घाटन प्रसग पर उपस्थित रहने के लिए डाक्टर जी श्री गुरुजी के साथ पुणे गए हुए थे। इस समारोह से लौटते हुए वे दोनों देवळाली विश्राम करने गए, जहाँ मा बाबासाहेब घटाटे भी थे। वहीं डाक्टर जी को तेज बुखार चढा। किसी भी प्रकार बुखार उतर नहीं पा रहा था। डाक्टर जी बुखार में भी सघकाय की ही चचा करते थे। अपने सगे-सवधियों का नामोल्लेख तक न करते। यही क्यों, जब स्वास्थ्य अधिक गभीर हो गया तब भी उन्होंने इसकी सूचना नागपुर न भेजने की बात कही। श्री गुरुजी ने जब उनसे पूछा कि क्या किसी को नागपुर से बुलवा लें? तो डाक्टर जी ने तुरत कहा- 'इसकी क्या आवश्यकता है? तुम जो यहाँ हो। नासिक के श्री नाना तेलग और अपने सघ के स्थानीय कार्यकर्ताओं के रहते मुझे कोई चिता नहीं है।' सघकार्य के प्रति डाक्टर जी की लगन देखकर गुरुजी भी प्रभावित हुए। डाक्टर जी जहाँ सघ-मत्र के उद्गाता थे, वहीं तत्र के भी निर्माता थे। उनके निर्वाण के बाद काफी तेजी से सारे भारतवर्ष में सघ-मन का प्रचार व प्रसार श्री गुरुजी ने किया। श्री गुरुजी की बीमारी के बाद सन् १९७० में 'उनके बाद कौन?" यह सवाल उपस्थित कर समाचार-पत्रों में काफी उल्टी-सीधी बातें लिखी जाती रहीं। अनेक नामों की चर्चा होती रही। कितु श्री गुरुजी ने अपने मन में बाळासाहेब की योजना ही कर रखी थी। तथा अपने निर्णय की कल्पना सभी प्रमुख व्यक्तियों को दे रखी थी। इस कारण श्री गुरुजी के निर्वाण के बाद मानो वे किसी प्रवास पर हैं, इस पद्धति से सब कुछ यथावत् चल रहा है। (युजयम नालपुर स्मृति अक शुलाई १९७३) श्रीगुरुजीसमय खड १२ {२८] ८ जागरूक कर्मयोगी (श्री ग वि केतकर, सपादक केसरी, पुणे) सन् १६४८ में लगाए गए प्रतिबंध के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ ने सत्याग्रह प्रारभ किया था। श्री गुरुजी नागपुर के निकट सिवनी के कारागृह में थे। सघ पर प्रतिबंध झूठे सदेह पर निष्कारण लगाया गया है, वह उठाया जाए इस हेतु दिल्ली में सघ को चाहनेवाले और सरदार पटेल के परिचित श्री मौलिचद्र शर्मा अतस्थ वार्ता का मार्ग तैयार कर रहे थे। मुझे इसकी कोई जानकारी थी नहीं। मौलिचद्र शर्मा या सरदार पटेल से मेरा पूर्व परिचय भी नहीं था। यह स्थिति रहते मुझे 'केसरी' के पते पर मौलिकचद्र शर्मा का तार मिला। तार था- 'निगोशीएशन्स के लिए दिल्ली में आपकी उपस्थिति जरूरी है। सघ का सत्याग्रह स्थगित कराने के लिए पुणे के प्रा त्र्यबक भिकाजी हर्डीकर अत्यत निष्ठा से योजनापूर्वक प्रयास कर रहे थे। उनकी प्रेरणा और सतत आग्रह नहीं होता तो मैं उसमें नहीं पड़ता। पुणे से हर्डीकर और दिल्ली से मौलिचद्र शर्मा ने मुझसे यह कार्य करवाया। मुझे दिल्ली का बुलावा शायद इसलिए रहा, क्योंकि इसके पूर्व मैंने प्रा हार्डीकर की प्रेरणा से सरदार पटेल से पत्रव्यवहार किया था। पर इसके पूर्व प मौलिचद्र का कोई पत्र या सदेश नहीं था। सौभाग्य से सत्याग्रह क नियोजन करने के लिए सघ के जो नेता बाहर थे, उनमें श्री बाबाराव भिडे भी थे। यह अचानक प्राप्त हुआ तार लेकर मैं उनसे मिला। उन्होंने कहा 'मुझे भी कुछ निश्चित जानकारी नहीं। पर दिल्ली में कुछ चर्चा चल रह है, यह सुना है। आप तार के सदेश के अनुसार दिल्ली जाइए। वहाँ जाओगे तो सारी जानकारी मिलेगी।' मैं जन्म से दमा से पीडित हूँ। बाबाराव ने कहा, 'आपके साथ एक स्वयसेवक रहेगा। प्रवास की पूरी व्यवस्था करेंगे। उसके अनुसार मैं विमान से दिल्ली गया। मौलिचद्रजी ने मेरी सरदार पटेल से भेंट की व्यवस्था की। सरदार पटेल जी का भी स्वास्थ्य नरम था। दो बार भेंट हुई। 'कॉट पर पडे-पडे ही उन्होंने बात की। मुझे इस कार्य हेतु चुने जाने का कारण होगा कि सघ में जो प्रत्यक्ष नहीं, पर सहानुभूति और गुरुजी से जिसका परिचय हो ऐसा व्यक्ति। उसी की इस काम हेतु जरूरत थी। सध पर लगे प्रतिबध का कसकर विरोध में अपने सपादकीय में 'पहले फाँसी फिर जॉच' इस मालिका में 'केसरी' में लिख रहा था। यहाँ तक कि श्रीगुरुजीसमय खड १२ २६} - कुछ हितचितक कहने लगे, 'इन लेखों द्वारा आप भी कारावास ओढ लेंगे। सघ पर लगा प्रतिवध सरदार पटेल को भी पसद नहीं था। उन्होंन । कहा, 'दिल्ली के सत्ता केंद्र में इस मामले में मैं अकेला पड गया हूँ। पर गुरुजी किसी भी निमित्त से सत्याग्रह स्थगित करें तो प्रतिवध उठवाने के अगले प्रयासों मे सहायता होगी।' में सिवनी आया। वहाँ के कारागृह में गुरुजी को रखा गया था। दिल्ली से गृहमनी की आज्ञा के कारण मुझे गुरुजी से तुरत भेंट का समय मिला। यह भी काल के किसी वधन के वगैर। इस विकट परिस्थिति में भी गुरुजी की अविवल, निश्चयी, शात वृत्ति बनी रही। मुझ जैसे हितचितक कुछ भी कर प्रतियध उठे, यह चाहते थे। पर गुरुजी का निश्चय था कि सघ की तत्त्वनिष्ठा को वाधा न पहुँचाते हुए, सघ की प्रतिमा पर आधात किए बिना जो हो सके, वह किया जाए। केवल पटेल कहते हैं, इसलिए सत्याग्रह वापस लेने को वे तैयार नहीं थे। मैं पुन दिल्ली गया। इस बार सरदार पटेल से जो भेंट हुई, वह उनके कार्यवाह ने अत्यत गुप्तरूप से कराने की व्यवस्था की। मुझे अँधेरे में खडा किया गया। सरदार पटेल लेट गए। उनके सिरहाने की खिडकी बद हो गई। दीप शात किए गए। थोड़ी देर बाद केवल कमरे की बडी जाली खुली और पिछले दरवाजे से मुझे अदर भेजा गया। मुझे बताया गया कि संघ की ओर से कोई मध्यस्थ सरदार से मिल रहा है, यह भनक सवाददाताओं को लगी है। वे ढूँढ रहे हैं। इसी कारण सभी के जाने के बाद आपको अदर छोड़ा है। बातचीत का निष्कर्ष यह था कि गुरुजी सत्याग्रह स्थगित करने के लिए अपनी कल्पना या आशा व्यक्त करें, पर सरकार की ओर से या सबधित अधिकारी व्यक्ति से कुछ आश्वासन मिलने का उल्लेख उसमें नहीं हो। सरदार पटेल से इस भेंट के बाद मैं पुन सिवनी गया। गुरुजी से मिला। यह भेंट चार घटों से अधिक समय तक चली। अनुमति दी घटे की दी गई थी। बीच में रुककर मैंने अधिकारी से पूछा 'समय समाप्त हो गया क्या? उन्होंने कहा 'आप जितना चाहें, समय लें। हम कोई रोक-टोक नहीं करेंगे।' सत्यागह स्थगित करने के आज्ञापन के शब्द गुरुजी बार-बार दुरुस्त कर रहे थे। एक के बाद एक चार प्रारूप बने। 'शब्दयोजना ठीक नहीं कहकर कुछ हटा दिए गए। पाँचवों प्रारूप मन के अनुसार बना। सघ की ओर कमी {३०} श्रीगुरुजीसमय खत १२ - - । । नहीं आ पाए, इसलिए गुरुजी एक-एक शब्द तोलकर लिख रहे थे। अतिम मान्य प्रारूप की दो प्रतियाँ वनीं । एक गुरुजी के पास रही। दूसरी लेकर पॉच घटों के बाद मैं कारागार के बाहर निकला। सवाददाताओं ने मुझे घेर लिया। 'सरदार ने आपको कोई वचन दिया है क्या?' यह प्रश्न सभी का था। मैंने कहा "किसी का कोई आश्वासन नहीं, पर आशा तो की जा सकती है। सिवनी के कारावास के अधिकारियों का सौजन्य मैं भूल नहीं सकता और गुरुजी का क्या कहें? मैं उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछता तो 'उत्तम है', कहकर मेरी चिता ही अधिक करते। कारागृह में रहनेवाले लोग अपनी असुविधा का रोना रोते हैं। पर गुरुजी को तो कारागृह में रहने का भान ही नहीं था। उनकी उस आनदी वृत्ति से में भी भूल जाता था कि मैं उनसे कारागृह में मिल रहा हूँ। उस निवेदन में लिखी उनकी बातों पर प्रतिबध उठने तक बोलना योग्य नहीं था। इसी विलब के कारण ये बातें सभी के सामने रखना मेरा कर्तव्य था। सत्याग्रह स्थगित होने के बाद कुछ माह बीतने पर प्रतिबंध हटा। पर तब तक गुरुजी, मैं और सरदार पटेल तीनों अधातर स्थिति में थे। मुझपर और सरदार पटेल पर यह आक्षेप लग गया कि गुरुजी को निष्कारण सत्याग्रह वापस लेने के लिए बाध्य किया और प्रतिबध तो उठा नहीं। खैर अत अच्छा हुआ, तो सब अच्छा हुआ। याने सभी पावन हो जाता है। यही सच है। सघ पर से प्रतिबध उठाने में मैंने प्रयत्न किया, यह कहना गीता के उपदेश के अनुसार अहकार होगा। कर्म के कारणों में से 'दैव चैवात्र पचमम्' यह पाँचवॉ कारण साख्यशास्त्र से गीता ने दिया है। यही इस व्यवस्था में प्रबल रहा। मैं तो किसी प्रकार प्रवाहपतित सा धकेला गया। सघ से प्रतिबंध उठने के बाद, उसे हटवाने के लिए प्रयत्न करनेवाले श्री व्यकटराम शास्त्री और प मौलिचद्र शर्मा के साथ मेरा नामनिर्देश भी गुरुजी ने अपने पत्रक में किया और मुझे भी धन्यवाद का पत्र भेजा। सघ ही गुरुजी का ससार था। वह देशव्यापी था। उन्होंने उसे अधिकाधिक देशव्यापी किया। गुरुजी, याने भारतीय सस्कृति के उज्ज्वल तत्त्व के चलते-बोलते प्रतीक थे। उनके भाषण समान या उससे भी अधिक श्रीगुरुजी समय खड १२ {३} - - ट उनका जीवनचरित्र परिणामकारक होता रहा। गीता में भगवत के 41 कर्मयोग को उन्होंने जागम्बकता से अपने आचरण में लाया था। उन मूर्ति सभी के मन चक्षु के सम्मुख आती रहेगी और वही आदर्श समी कर्तव्य की प्रेरणा देता रहेगा। (साप्ताहिक विवेक १७ पूत्र १६७३३ की । ६ राष्ट्रहित मे तिरोहित व्यक्तित्व (श्री क्षितीश वेदालकार, सपादक, दैनिक हिंदुस्थान) वात सन् १६७१ के मार्च मास के प्रारभ की है । दक्षिण भारत यात्रा करते हुए हम वर्धा से नागपुर पहुंचे थे। आर्य स्पेशल ट्रेन के लगभग ४०० यानी नागपुर पहुँचने के पश्चात् सघ कार्यालय और सरसघचालक गुरुजी के दर्शन के लिए उत्सुक थे। यात्रियों के मन में दक्षिण भारत । यात्रा के अनेक दर्शनीय स्थानों की याद ताजा थी। मन में सबसे जो स्मृति जड जमाकर बैठी थी, वह थी कन्याकुमारी में विवेकानद स्मारक की अद्भुत रचना और भारत के ऐन दक्षिणी छोर पर एक सशरी सास्कृतिक चौकी के रूप में उसकी उपयोगिता। जिस किसी के मन में । उस स्मारक की कल्पना आई हो, उसके इस कल्पना वैभव की प्रर करनी ही पडेगी। जिन लोगों ने एकनिष्ठ भाव से उस अद्भुत स्मारक की रचना करके समस्त भारत की जनता में उसको लोकप्रिय बना दिया, वे भी कम साधुवाद के पान नहीं हैं। जाननेवाले जानते हैं कि उस स्मारक की कल्पना से लेकर उसके निर्माण के पूर्ण होने तक मूल प्रेरणा किसकी थी। शायद स्पष्ट रूप में किसी एक व्यक्ति के नाम का इगित करना कठिन हो, परतु इस प्रेरणा के स्रोतों में किसी न किसी स्तर पर श्री गुरुजी का स्थान अनन्यतम है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इस भावभूमि के साथ जव यात्री नागपुर के रेलवे स्टेशन पर उतरे तो उनके मन में संघ कार्यालय, डा हेडगेवार जी की समाधि और श्री गुरुजी के दर्शनों की लालसा अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती। प्रात काल ही, जबकि बाजार अभी खुले नहीं थे और लोगों की चहल-पहल तथा भीड-भडक्का शुरू नहीं हुआ था स्पेशल ट्रेन के यात्रियों {३२) श्रीगुरुजी समय खड १२ मा का यह दल अनुशासनवद्ध स्वयसेवकों की तरह गीत गाता और नारे लगाता जब सघ कार्यालय में पहुँचा, तब गुरुजी भी यात्रियों की इस भव्य शोभायात्रा से प्रभावित हुए विना नहीं रहे। कार्यालय के विशाल भवन में सय यानी, जिनमें स्त्रियों की संख्या भी कम नहीं थी, पक्तिवद्ध चैट गए। थोड़ी देर बाद श्री गुरुजी आए। उन्होंने सब यात्रियों को करवद्ध होकर नमस्कार किया और इसके बाद सवको आशीर्वाद-सा देते हुए जाने की तत्परता प्रकट की, परतु यात्रियों को इतने मात्र से कृतकृत्यता कैसे अनुभव होती? यात्रियों की उत्सुकता केवल आँखों के माध्यम से ही नहीं, अपितु कानों के माध्यम से भी झाँक रही थी। सव यात्रियों ने एक स्वर से श्री गुरुजी से कुछ संदेश देने का आग्रह किया। गुरुजी साक्षात् विनम्रता की मूर्ति। कहने लगे कि मैं सदेश क्या दें? परतु उत्सुक यानियों के अत करण फिर प्रार्थना के स्वरों में गूंजे कि नहीं, कुछ तो कहिए। तब गुरुजी जैसे ध्यानस्थ हो गए। आँखें सबको देखते हुए भी किसी भावलोक में खो गईं। फिर अत्यत शाति और मृदु स्वर में उनकी वाणी का प्रवाह यह पड़ा। जिन्होंने गुरुजी के व्याख्यान सुने हैं, वे उनकी भाषा और विचारों के प्रवाह के सदा कायल रहे हैं। परतु उस दिन का वह भाषण, भाषण नहीं था। शायद उसे बातचीत भी न कहा जा सके। उसे आत्माभिव्यक्ति का एक ऐसा प्रकार कहना ही उचित होगा, जिसमें कहीं कला की दृष्टि से बनावट या याक्छल की भी गुजाइश नहीं। वे जैसे अपना हृदय खोलकर सबके सामने रख रहे थे। उनके इस वक्तव्य में कहीं अहमन्यता, सरसघचालकत्व का नेतृत्वबोध, अपने आपको औरों पर थोपने की प्रवृत्ति या उपदेशात्मकता जैसी कोई चीज नहीं थी। थी केवल आत्मार्पण की अदम्य आकाक्षा। राष्ट्र के लिए अपने आपको समर्पित कर देने की जो निर्धूम ज्वाला उनके मन में सतत जागरूक रहती थी, जैसे उसी ज्वाला की एक चिगारी वे उन सब यानियों । में भर देना चाहते थे। उनकी वाणी की सौम्यता इस बात की निशानी थी । कि उन्हें उस ज्वाला का उत्ताप नहीं, सातत्य ही अभीप्ट है। श्री गुरुजी जब यात्रियों के मध्य से विदा हुए, तब सब यात्री जैसे सोते से जागे। अब तक आत्मलीनता की जिस स्थिति में थे, उससे हटे। श्रीशुरुजी समय खड १२ अपने बाहरी परिवेश का अनुभव हुआ। मन में एक नई प्रेरणा लेकर 4 से सब यानी हेडगेवार जी की समाधि के दर्शन के लिए चल दिए। गुरुजी फिर द्वार पर खडे होकर सयको विदाई के नमस्कार से आप्लारित करते रहे। पूर्व पाकिस्तान में क्राति का शख फूंका जा चुका था। पाकिस्तानी सैनिक नृशस अत्याचार करने पर उतारू थे और जनता जैसे करवट ले रही थी। उसी दिन यह समाचार आया था कि टिक्का खाँ, जिन्हें मृत पाकिस्तान का जनादोलन समाप्त करने के लिए सर्वाधिकार देकर भेज गया था, को 'गोली लगी है। बांग्लादेश का भविष्य तय तक अनिश्चित छ। और घटनाएँ क्या रूप लेंगी, इसके बारे में कुछ भी कह सकना कठिन था। परतु मन में बार-बार यह तडप उठती थी कि भारत के पूर्वी छोर पर घटने वाले इतने महत्त्वपूर्ण घटनाचक्र में हम भारतवासी भी कुछ योगदान का सकें, तो कितना अच्छा हो। भारत सरकार तब तक केवल निरपेक्ष भाव से मूकदर्शक मात्र बनी हुई थी। मैंने गुरुजी से पूछा कि जिस प्रकार आपके सघ के स्वयसेवकों का जाल भारतवर्ष के प्रत्येक राज्य में बिछा हुआ है, क्या उसी प्रकार पूर्व पाकिस्तान में भी सघ की कुछ गतिविधियाँ हैं? यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इससे पहले मैं उनको अपना परिचय दे चुका था और गुरुजी पनकार जगत् के अपने परिचित अन्य कुछ विशिष्ट लोगों के बारे में कुशल-क्षेम पूछ चुके थे। मुझे लगा कि गुरुजी शायद मुझसे इस प्रकार के प्रश्न की आशा नहीं करते थे। या शायद मेरे पत्रकार होने का भाव उनके मन पर हावी रहा हो, क्योंकि मैं यह समझता हूँ कि जो दो-चार व्यक्ति वहाँ बैठे थे, वे सब उनकी अतरग मडली के ही नोग थे, इसलिए किसी से कोई छिपाने की बात रही हो, ऐसा मानो को जी नहीं चाहता। परतु गुरुजी ने मुझे जो उत्तर दिया, उससे मुझे ऐसा लग कि में कहीं उनके किसी कथन को प्रचारित न करूं, इसलिए पहले से ही पेशवदी करके उन्होंने बहुत सुरक्षित भाषा का प्रयोग किया। वे बोले, 'पूर्वी पाकिस्तान में हमारी गतिविधियाँ क्या हो सकती हैं। आप जानते हैं कि पाकिस्तान की सरकार का हमारे प्रति क्या रवैया है सकता है? वह हमें कैसे बरदाश्त करेगा? इसलिए मघ के तो वहाँ किस भी प्रकार के कार्य का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। ऊपर मैंने गुरुजी द्वारा सुरक्षित भाषा' के प्रयोग की बात कही है ९३४] श्रीशुरुजीसमन खड १२ - . यह इसलिए कि इससे पहले अपनी त्रिपुरा याना के दौरान मैं एक ऐसे 'व्यक्ति से भेंट कर चुका हूँ जो पूर्वी बगाल का निवासी था और सघ का स्वयसेवक था। अब तो सार्वभौमसत्तासपन्न बाँग्लादेश का उदय हो ही चुका है अत अव इस रहस्य को उद्घाटित करने में किसी प्रकार की आपत्ति : की सभावना नहीं है। अगरतला में, जो त्रिपुरा की राजधानी है, 'हिदुस्थान समाचार' के प्रतिनिधि हैं श्री केशवचंद्र सूर । शायद कोलकाता के समाचार-पत्रों को छोड कर यदि अन्य किसी पन या सवाद समिति का कोई प्रतिनिधि अगरतला ' में है, तो वह केवल 'हिदुस्थान समाचार' का ही है। इन केशवचंद्र सूर से जव मैं मिला तो उनसे बातचीत करने पर पता लगा कि केवल त्रिपुरा में ही नहीं, प्रत्युत पूर्वी पाकिस्तान के समाचार भी वे अपनी सवाद समिति को भेजते हैं। मैंने उनसे पूछा कि पूर्वी पाकिस्तान के समाचार जानने के आपके पास साधन क्या हैं? तो उन्होंने 1 नि सकोच भाव से कहा कि मैं स्वय पूर्वी वगाल का निवासी हूँ और सध • का स्वयसेवक रहा हूँ। मेरे अनेक स्वयसेवक साथी अभी तक पूर्वी बगाल में ही हैं, उनके ही द्वारा मुझे समाचार प्राप्त होते रहते हैं। श्री सूर की इस बात में कितनी सच्चाई थी और उनके द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समाचारों की प्रामाणिकता कैसी असदिग्ध रही होगी, । इसकी पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि सन् १६६५ के भारत-पाक : सघर्ष के दौरान निपुरा के मुख्यमत्री एक दिन स्वय श्री सूर के निवासस्थान पर पहुँचे थे और सरकारी सूत्रों से प्राप्त किसी समाचार विशेष की 1 प्रामाणिकता के बारे में उन्होंने श्री सूर की गवाही चाही थी। 'हिंदुस्थान समाचार' के प्रतिनिधि, अविवाहित और धुन के धनी । श्री केशवचद्र सूर उस दिन सब पत्रकारों के पत्र-प्रतिनिधियों की ईर्ष्या के है पात्र बन गए, जिस दिन मुख्यमत्री स्वय उनके निवासस्थान पर पहुंचे। उसके बाद से अन्य पत्रों के प्रतिनिधियों की दृष्टि में भी श्री सूर जैसे | निरीह व्यक्ति का महत्त्व बढ गया और वे भी पूर्वी पाकिस्तान के समाचार जानने के लिए श्री सूर का मुँह जोहने लगे। इस प्रत्यक्ष जानकारी के आधार पर यह मानने को मेरा मन नहीं । चाहता कि पूर्वी वगाल में सघ की कोई गतिविधि नहीं थी। फिर गुरुजी ने वैसा उत्तर क्यों दिया? इसका कारण मैं यही समझता हूँ कि वे इस बात श्रीगुरुजी समय खड १२ - . " (पाचजज्य पुभाई ७३ साप्रदायिक दगों में राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ की करतूतें, महात्मा गाँधी की मेरी कल्पना थी कि उनसे मिलते समय मुझे गणवेशधारी स्वयसेवको वहाँ होगा, पर ऐसा भी कुछ नहीं था। जहाँ वे रुके थे, वह किसी मध्यम केशराशि, मुखमुद्रा को आवृत करती उनकी मूंछे, विरल भूरी दाढी, की को प्रकाश में नहीं आने देना चाहते थे। शायद कोई और व्यक्ति होता है इस बात को लेकर ही शेखी वधारने का प्रयत्न करता और इस श्रेय अपने-आपको मडित करना चाहता कि जो काम सरकार भी नहीं कर सकती, वह हम कर रहे हैं। परतु गुरुजी ने 'सुरक्षित भाषा' में मेरे प्रश्न का उत्तर देकर जहाँ उच्च कोटि की राजनयिक दूरदर्शिता का परिचय दिया वहाँ यह भी कि उनका निजी या सघ का व्यक्तित्व राष्ट्र से भिन्न कुछ नई है। राष्ट्र के हित में ही उनका सारा व्यक्तित्व तिरोहित हो गया है। उम दिन में यही भावना लेकर उनके कक्ष से निकला था और आज भी मेरी इस भावना में कोई अतर नहीं आया है। १० भ्रम टूटा (श्री खुशवतसिह, सपादक इलस्ट्रेटेड वीकली) कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जिनको बिना समझे ही हम घृणा लगते हैं। इस प्रकार के लोगों में गुरु गोळवलकर मेरी सूची में सर्वप्रथम हत्या, भारत को धर्मनिरपेक्ष से हिदुराज्य बनाने के प्रयास आदि अनेक बातें थीं, जो मैंने सुन रखी थीं। फिर भी एक पत्रकार के नाते उनसे मिलने का मोह मैं टाल नहीं सका। के घेरे में से गुजरना होगा, कितु ऐसा नहीं हुआ। इतना ही नहीं, मेरी समझ थी कि मेरी कार का नम्बर नोट करने वाला कोई मुफ्ती गुप्तचर श्रेणी के परिवार का कमरा था। बाहर जूतों-चप्पलों की कतार लगी थी। वातावरण में व्याप्त अगरबत्ती की सुगध से ऐसा लगता था, मानो कमरे पूजा हो रही हो। भीतर के कमरों में महिलाओं की हलचलें हो रही थीं। वर्तनों और कप-सासरों की आवाज आ रही थी। मैं कमरे में पहुँचा। महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों की पद्धति के अनुसार शुभ-धवल धोती-कुरते १०-१२ व्यक्ति वहाँ बैठे थे। ६५ के लगभग आयु, इकहरी देह, कधों पर झूलती काली र करने - भी श्रीशुरुजी समय खह १२ 1 -लुप्त न होने वाली मुस्कान और चश्मे के भीतर से झाँकते उनके काले चमकीले नेत्र । मुझे लगा कि वे भारतीय होची-मिन्ह ही हैं। उनकी छाती के कर्करोग पर अभी-अभी शल्यक्रिया हुई है, फिर भी वे पूर्ण स्वस्थ एव प्रसन्नचित दिखाई दे रहे हैं। गुरु होने के कारण शिष्यवत् चरणस्पर्श की वे मुझसे अपेक्षा करते हों, इस मान्यता से में झुका, परतु उन्होंने मुझे वैसा करने का अवसर ही नहीं दिया। उन्होंने मेरे हाथ पकडे, मुझे खींचकर अपने निकट विठा लिया और कहा- 'आपसे मिलकर बडी प्रसनता हुई। बहुत दिनों से आपसे मिलने की इच्छा थी। उनकी हिदी बडी शुद्ध थी। 'मुझे भी। खासकर, जबसे मैने आपका 'वच आफ लेटस' पढा', कुछ सकुचाते हुए मैंने कहा। 'यच आफ थॉट्स' कहकर उन्होंने मेरी भूल सुधारी, कितु उस ग्रथ पर मेरी राय जानने की उन्होंने कोई इच्छा व्यक्त नहीं की। मेरी एक हथेली को अपने हाथों में लेकर उसे सहलाते हुए वे मुझसे बोले- 'कहिए'। मैं समझ नहीं पा रहा था कि प्रारभ कहाँ से करूँ। मैंने कहा- । 'सुना है, आप समाचार-पत्रीय प्रसिद्धि को टालते हैं और आप का सगठन - गुप्त है। - । -- 'यह सत्य है कि हमें प्रसिद्धि की चाह नहीं, कितु गुप्तता की कोई वात ही नहीं। जो चाहे पूछे', उन्होंने उत्तर दिया। इसी प्रकार विभिन्न विषयों पर परस्पर खुलकर बातचीत हुई। 'मैं गुरुजी का आधे घंटे का समय ले चुका था। फिर भी उनमें किसी तरह की बेचैनी के चिह्न दिखाई नहीं दिए। मैं उनसे आज्ञा लेने लगा तो उन्होंने हाथ पकडकर पैर छूने से मुझे रोक दिया। 'क्या मैं प्रभावित हुआ? मैं स्वीकार करता हूँ कि हाँ। उन्होंने मुझे अपना दृष्टिकोण स्वीकार कराने का कोई प्रयास नहीं किया, अपितु उन्होंने मेरे भीतर यह भावना निर्माण कर दी की किसी भी बात को समझने-समझाने के लिए उनका हृदय खुला हुआ है। नागपुर आकर वस्तुस्थिति को स्वय समझने का उनका निमत्रण मैंने स्वीकार कर लिया है। हो सकता है कि हिंदू-मुस्लिम एकता को राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ का उद्देश्य बनाने के लिए मैं उनको मना सकूँगा और यह भी हो सकता है कि मेरी यह धारणा एक भोले-भाले सरदार जी जैसी हो।' (इलेस्ट्रेट वीकली १७ नवबर १६७२) श्रीगुरुजीसमय खड १२ {३७), - ल दी। अपने सारे काम रहने पर भी उसे ध्यानपूर्वक पढकर उन्होंने अपग मत प्रकट किया। उस पुस्तक की प्रेस कॉपी करने का काम उन्होंने स्वयं । लिखी 'आसने व आरोग्य' पुस्तक पर तथा मेरी भी पुस्तक के हिदीकरण के बाद दोनों पुस्तकें जब उन्हें दी, तो पहले के अनुसार सहकार्य देकर हिदुस्थान में त्वरित गति से हो, इस हेतु से मैंने उनसे कहा- 'अपनी संघ ११ अलोकिकज्योति (श्री जनार्दन स्वामी, योग्याम्यासी मडल, नागपुर) परमपूज्य परमादरणीय माधयराव गोळवलकर गुरुजी से मेरी प भेंट १६५१ की जनवरी की १४ तारीख को, माने मकर सक्रांति के नि हुई। पद्मभूषण डा शिवाजीराव पटवर्धन ने जो परिचयपत्र दिया था, पर श्री वावासाहेव घटाटे को देने के लिए, उनके वगले पर गया था। उनके साथ ही संघ के मकर सक्राति कार्यक्रम के लिए रेशमबाग पहुँचा। वर्ष बाया सात्व ने गुरुजी से मेरी भेंट करा दी, कार्यक्रम पूर्ण होने के का। श्री गुरुजी ने मुझसे मेरे कार्य की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने कहा- 2 कार्य बहुत अच्छा है। आज के नए समाज का ढहता स्तर सुधारकर उन स्थिति पर ले जाने के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि योगिक अभ्यास की बहुत जरूरत है। आप प्रयत्नपूर्वक यह कार्य कर रहे हैं, जानकर सतोष हुआ। उसके बाद जव-जव गुरुजी से भेंट होती थी वे आदरयुक्त अत करण से बोलते थे। कुछ दिनों बाद मैंने 'प्राणायाम व यौगिक क्रिया । पर पुस्तक लिखी। उसे पढकर, उस पर अभिमत के लिए मूल प्रति उन होकर कार्यालय के एक कार्यकर्ता को दिया। कैसी यह परोपकारी वृत्ति और अपनापना उसी भाँति स्व स ना पचवटीकर द्वारा योगाभ्यासी मडल के लिए उन्होंने उपकृत किया। एक दिन गुरुजी की बैठक में बैठा था। योग का प्रचार सारे की शाखाएँ सर्वदूर चल रही हैं। उन शाखाओं में योगासन सिखाने की योजना आप यदि करें, तो यह प्रचार सर्वदूर तेजी से होगा।' इस पर उन्होंने कहा- 'बात अच्छी है। सघ के कार्यकर्ता उन्हें जो श्रीगुरुजीसमय खठ १२ -- । --- . । --- करना सभव लगता है, वही करते हैं। अमुक किया जाए, यह मैं विशेष आग्रह से नहीं बताता। आपकी इच्छा उन्हें कह दूंगा। फिर इश्वरी प्रेरणा से जो होगा, सो होगा।' बुद्धि की यह कितनी समाधारणा। गुरुजी की स्मरणशक्ति अत्यत उच्च स्तर की थी। बैठक में कभी भी, किसी भी गाँव के किसी कार्यकर्ता की बात निकलती, तो उसका नाम, । गाँव, स्थान उस व्यक्ति की कार्य करने की पद्धति, उसकी विशेषता वे तुरत ' बताते। यह मैंने कई बार देखा। लोगों के पत्र आने के बाद, चार-चार माह पश्चात् भी उसमें क्या लिखा है, वे ताजा वाचन के समान बताते थे। सन् १९६५ में विश्व हिंदू परिषद् का पहला अधिवेशन प्रयाग क्षेत्र में हुआ। उस प्रसग में सभी सप्रदायों के प्रमुख विद्वान और तपस्वी उपस्थित थे। उस परिषद् के सूत्र पूजनीय गुरुजी के विचारों से ही मुख्यत सचालित हो रहे थे। दूसरे दिन जगन्नाथपुरी के गोवर्धन पीठ के श्री शकराचार्य तथा स्व तुकडोजी महाराज आदि कुछ के बीच हिंदू-समाज के धर्मातरित लोगों को शुद्ध करने के मुद्दे पर विरोध उत्पन्न हुआ। इस मुद्दे पर काफी देर तक चर्चा चली। भोजन का समय हो जाने से, मुद्दा वैसे ही छोड लोग उठे। इस बीच श्री गुरुजी ने श्री शकराचार्य एव अन्य नेताओं से मिलकर परस्पर रहा विरोध दूर किया। बाद में बैठक प्रारभ होने पर स्वय श्री शकराचार्य ने खुलासा करते हुए 'समयानुरूप शुद्धि आवश्यक है'- यह प्रतिपादन किया। इसी अधिवेशन में कुछ नेताओं के भाषणों से थोडी गभीर स्थिति उत्पन्न हुई। श्री गुरुजी ने शुद्ध भाव से किए अपने सहज भाषण से । स्थिति सॅभाल ली। इस प्रकार सर्वव्यापी विचार करनेवाला, सभी सप्रदायों और राजकीय दलों के नेताओं से जिसका स्नेहभाव रहा एव हिदू धर्म के तथा हिदू-समाज । के उत्कर्ष हेतु निर्भयता से अपना मत प्रस्तुत कर, अविरत परिश्रम से । देहपात होने तक, सघ के कार्य की प्रगति के लिए जूझनेवाले गुरुजी- यह व्यक्ति, याने अलौकिक सामर्थ्य की व विशेष पुण्य की अपूर्व ज्योति थी। ईश्वर तपस्वी एव तत्त्वज्ञानी लोगों को मिलनेवाली सद्गति गुरुजी को दे। ।। ओ३म् शाति शाति शाति ।। (तरुणभारत श्रावलि विशेषाक १६७३ नागपुर) । श्रीगुरुजी समय खड १२ - '३६) ।
- १२ आध्यात्मिक विभूति (लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण) पूज्य श्री गुरुजी तपस्वी थे। उनका सपूर्ण जीवन तपोमय था हमारे यहाँ सब आदों में बडा आदर्श है त्याग का आदर्श। वे तो त्याग की साक्षात् मृर्ति ही थे। पूज्य महात्मा जी और उनसे पूर्व जन्मे देश के महापुरुषों की परपरा में ही पूज्य गुरुजी का भी जीवन था। देश की इतनी बडी सस्था राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ और उसके एकमात्र नेता श्री गुरुजी। उन्होंने सादगी का आदर्श नहीं छोडा, क्योंकि वे जानते थे कि सादगी का आदर्श छोडने का स्पष्ट अर्थ है, दूसरे सहस्रों गरीबों के मुँह की रोटी छीन लेना। में अत्यन्त अस्वस्थ हूँ, अभी भी मेरी साँस फूल रही है। मैं यहीं आता-जाता नहीं। फिर भी मेरे मन में पूज्य गुरुजी के लिए जो भावना है, वह ऐसी है कि उसने मुझे इस बात के लिए इजाजत नहीं दी कि मैं यहाँ आने से अपने को रोक सकूँ। गुरुजी के असामान्य व्यक्तित्व का यह प्रमाण है कि आज यहाँ भिन्न-भिन्न दल और वर्गों के लोग उपस्थित हैं। मार्क्सवादी मित्र की बात सुनकर मुझे वडी खुशी हुई है। प्रदेश काग्रेस तथा कम्युनिस्ट पार्टी के किसी प्रतिनिधि का यहाँ नहीं होना, मुझे अखर रहा है। जब राष्ट्रपति श्री गिरि और प्रधानमत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने सबसे आगे बढकर अपना शोक संदेश भेजा था, तब उन्हें किसी प्रकार का सकोच नहीं होना चाहिए था। श्री पूज्य गुरुजी कर्मठता के मूर्तिमान रूप थे। कर्मठता की कमी है देश में। गुरुजी ने अपने जीवन में कर्मठता का जो आदर्श रखा है, वह अनुकरणीय है। समय-समय पर मेरा सघ के स्वयसेवकों के साथ संबंध आता रहा है। अकाल के समय सघ के स्वयसेवकों ने जो कार्य किया, वह 'अपूर्व' था। मैं जब भी उसका स्मरण करता हूँ, श्रद्धावनत हो जाता हूँ। श्री गुरुजी आध्यात्मिक विभूति थे। यह एक बडा बोध है कि हम भारतीय हैं, हमारी हजारों वर्ष पुरानी परपरा है, भारत का निर्माण भारतीय आधार पर ही होगा। चाहे हम कितने ही 'माडर्न' क्यों न हो जाएँ। हम अमरीकी, फ्रेंच, इग्लिश, जर्मन नहीं कहला सकते, हम भारतीय ही रहेंगे- यह बोध , जिसे सहस्रों नवयुवकों में जगाया था पूज्य गुरुजी ने। मैं आशा करता हूँ कि श्री बाला साहव देवरस पूज्य गुरुजी की परपरा को निभाएँगे। (पटना कीशोमा) श्रीशुरुजी समय खड १२ १३ प्रचड आत्मविश्वासी (डा सैफुद्दीन जिलानी, पत्रकार) श्री गुरुजी का कोलकाता में निवास बहुत थोडे समय के लिए था तथा वर भी व्यस्त कार्यक्रमों से युक्त । अत उनसे भेंट होना आसान नहीं था। परतु उनसे मिलना बहुत जरूरी था। जातीयता के प्रश्न पर राजनीतिक नेतागण जनता को गुमराह कर रहे थे। अत इस मामले पर उनसे चर्चा के लिए, मैं अधीर था। इसके पूर्व मेरी उनसे कोई प्रत्यक्ष भेंट नहीं हुई थी। कोई पत्र-व्यवहार भी नहीं हुआ। हाल ही ये बीमार हुए और उन पर बडी शल्यक्रिया हुई। इसलिए मैंने यह अपना कर्तव्य समझा कि उनके स्वास्थ्य की पृछताछ करूँ तथा शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ और दीर्घायु के लिए अल्लाह से प्रार्थना करूँ। अपनी उक्त भावना मेरे मित्र आचार्य दादासाहेव आप्टे और श्री आर पी खन्ना के जरिये मैंने उन तक पहुँचा दी थी। यह एक चमत्कार ही है कि श्री गुरुजी एक दुर्धर रोग से मुक्त हो गए। परमात्मा ने जिन असख्य भारतीयों की प्रार्थना सुनी, उनमें से मैं भी एक हूँ। इसलिए उनका अभिनदन करने की मेरी इच्छा थी। श्री गुरुजी न केवल इस देश के सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं, अपितु वे देश के भाग्य-विधाता हैं। वे कोलकाता आए, तब मुझे उनसे मिलने का अवसर मिल गया। जातिवाद के दैत्य पर पूर्ण विजय मेरी आकाक्षा है। मुस्लिम वधुओं के विषय में सद्भावना रखनेवाले हिदुओं की संख्या बहुत होने के कारण मुझे अपने प्रयत्नों में कुछ यश अवश्य प्राप्त हुआ। कितु वह सतोपकारक नहीं माना जा सकता। मेरे मतानुसार इस कार्य में, सिवा श्री गुरुजी के अन्य कोई भी सहायक सिद्ध नहीं हो सकता। श्री गुरुजी से भेंट, मेरे जीवन की अत्यत प्रेरक एव अविस्मरणीय घटना सिद्ध हुई। हिटलर से लेकर नास्सर तक विश्व की बडी-बड़ी हस्तियों से मैं मिल चुका हूँ। कितु श्री गुरुजी जैसा प्रसन्नचित्त, आत्मविश्वासी और प्रभावी व्यक्तित्व अभी तक मेरे देखने में नहीं आया। ईमानदारी के साथ मुझे लगता है कि हिंदू-मुस्लिम समस्या को सुलझाने के विषय में एकमात्र श्री गुरुजी ही हैं जो यथोचित मार्गदर्शन कर सकते हैं। यह बात कहते समय मैंने राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को अपनी श्रीगुरुजी समय खड १२ {४१ -- --- - नेताओं के नाम थे, उनमें से एक भी नाम उनमें नहीं था। इसलिए मेरे उनके उक्त शब्दों में सदिच्छा एव प्रामाणिकता का स्पष्ट आह्वान आँखों से ओझल नहीं किया है। अनेक वर्षों से सघ का कार्य मैं वर नजदीक से देखता आ रहा हूँ। उसके आधार पर मैं असंदिग्धरूप से कर सकता हूँ, कि सप इस देश के लिए बात बड़ा सहारा है। किंतु अपने देश की दृष्टि से सघकार्य के महत्त्व का जिने आकलन नहीं हुआ, ऐसे तार अज्ञानवश अथवा जानवृझकर सप-विरोधी प्रचार किया करते हैं। सच्चाई तो यह है कि राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ मुसलमानों का शत्रु नहीं, अपितु मित्र है। कितु यह वात मुसलमानों की समझ में नहीं आती। इसका कारण यह है कि वे स्वय की बुद्धि से विचार नहीं करते। मानो, विचार करने को जिम्मेदारी उन्होंने अपने अनभिज्ञ और पड्याकारी नेताओं पर सौंप दी है। उसी प्रकार में यह भी नहीं भूला हूँ कि राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ में मुसलमानों का प्रवेश निषिद्ध है। हिद-समाज में स्वाभिमान जागृत करन के लिए सघ का जन्म हुआ है। यह कार्य पूर्ण होते ही सघ के द्वार अहिदुओं के लिए तत्काल खुल जाएँगे। किसी भी इमारत का निर्माण कार्य उसकी नींव से हुआ करता है। भारत के भव्य प्रसाद की आधारशिला हिदू है। यह नींव मजबूत होते ही प्रासाद अभूतपूर्व वैभव से जगमगाने लगेगा। मैंने श्री गुरुजी से पूछा- 'हाल ही के दिनों में किसी प्रमुख मुसलमान ने आपसे जातिवाद की समस्या पर चर्चा की है अथवा नहीं? उन्होंने अनेक नाम बताए । परतु इस सदर्भ में मेरे दिमाग में जिन मुस्लिम दिमाग में जो नाम थे, उनका उल्लेख करते हुए मैंने उनसे सीधा प्रश्न पूछा- 'क्या आप इनसे मिलना चाहेंगे? उन्होंने तत्काल उत्तर दिया- * उनसे जरूर मिलना चाहूँगा' इतना ही नहीं, उनसे मिलकर मुझे प्रसन्नता होगी। था। परतु जैसा कि कुरान में कहा गया है, 'विकृति से चेतनाशून्य हुए कानों में क्या वह प्रविष्ट होगा? में समग्र भारतीय जनता का एक नम्र सेवक हूँ, परतु सच कहूँ तो मेर दिमाग में सबसे पहले अगर कोई बात आती है तो वह है भारत के मेरे मुस्लिम भाइयों के बारे में। हिदुओं के लिए नेतृत्व की कोई कमी नहीं है। किनु मुसलमानों की हालत उन भेडों जैसी है, जिनका कोई गडरिया ही नहीं है। इसलिए मैं मुसलमानों से यही कहना चाहता हूँ कि वे अपनी ऑर्षे और दिमाग खुले रखें। (३०मजवरी १९७१ कोलकता) श्रीशुरुषी समय खत १२ - 11 आधारित है। हिंदू शब्द में किसी का खडन कहाँ है? अगर हम उसके पक्ष १४ विचारव व्यवहारकासयोग (डा जैनेंद्र, सुप्रसिद्ध गाँधीवादी विचारक व साहित्यकार) तव की बात है जब विमान सेवा चली ही थी। पालम का अस्तित्व कल्पना तक में नहीं था। विमान, सफदरजग जिसको विलिग्डन एयरपोर्ट कहते थे, से चला करते थे। मैं हैदरावाद जा रहा था। गुरुजी नागपुर के लिए एयरपोर्ट पर आए थे। उनके स्वागत में काफी लोग एकत्र थे। श्री - हसराज गुप्त ने वहाँ मेरा परिचय श्री गुरुजी से कराया। विमान में मुझे विस्मय हुआ कि गुरुजी उठकर पास आ बैठे और कर रहे हैं कि 'जैनेंद्र' में तुम्हें जानता हूँ।' मैंने कहा 'अभी हसराज जी ने परिचय कराया था। वे बोले, FA 'नहीं' | मैंने कहा, 'मुझे तो, साक्षात्कार पहले कभी हुआ हो, ऐसा जान नहीं वे बोले 'डा हेडगेवार डायरी लिखा करते थे। वह मैंने पढ़ी थी। में उसमें तुम्हारा जिक्र कई जगह आया है। इस तरह मैं तुम्हें जानता हूँ।' डा हेडगेवार का स्नेह मुझे अवश्य प्राप्त हुआ था। सन् १६२१ 1 और १९२३ में मैं नागपुर गया था, और मुझे याद है कि डाक्टर साहब ६ ने सहसा स्नेह से अपना लिया था। आयु में बहुत लवा अतर था। मैं १६ 7 या १८ वर्ष का था, कितु वह अतर बाधा नहीं ला सका और यदि नाम है। का उल्लेख उनकी दैनदिनी में भी आया हो तो यह डाक्टर साहब की कृपा है ही माननी चाहिए। उसी को लेकर गुरुजी इस सहज भाव से आ मिले, तो इससे मुझमें एक प्रकार की कृतार्थता का अनुभव जगा। फिर तो काफी बातचीत हुई। मैंने कहा- 'आपके सामने से को इस्लाम और मुस्लिम हट जाएगा, तो आपके आदोलन का आधार ही समाप्त हो जाएगा। वे बोले- 'तुमने कैसे समझ लिया कि हमारा आदोलन धृणा पर पड़ता। की बात करते तो उसमें इस्लाम या मुस्लिम का विरोध देखना ठीक नहीं है। किसी स्वार्थ के कारण वैसा लाछन हम पर लगाया जाता हो तो उसका निराकरण क्या किया जाए? लेकिन मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ कि हम विरोध के आधार पर नहीं खडे हैं। हिंदू संस्कृति जो मूल में सकारवादी है, उसे श्रीगुरुजी समय खड १२ है विस्मय मुझे तब हुआ जब स्वय गुरुजी राका जी के घर पर फिर से पुष्ट और जागृत किया जाए। इसलिए भारत की ही नहीं, प्रता माव मान की रक्षा म उसमें देखते ।। मैंने करा कि 'क्या आपके राम पर में इस तरह का कोई व दे सकता है?" वे बोले- 'जबर दो, लेकिन मेरे नाम के सहारे की तुम्हें कर आवश्यकता है? फिर पृटा 'राए में उतर सकते हो?' मैंने विवशता बताई । हैदराबाद पहुँचना है। करने लगे 'पापसी में सीधे मत निमाल जाना, एकाय दिन नागपुर रहकर जाना। तय तो सभव नहीं हुआ। लेकिन एक बार नागपुर गया, हेडगेवार भवन पहुँच गया। भवन देखकर और गुरुजी का स्थान दर बहुत अच्छा अनुभव हुआ कि कोई अतिरिक्त वस्तु वहाँ नही थी। यथावश्यक। आडवर कहीं नहीं। गुरुजी स्वय नितात सरल और सहा मुझे पाकर जैसे मेरे सम्मान में ही सर्वथा व्यस्त हो गए। वह स्नेहभाव में सुखद और आश्चयकारी प्रतीत हुआ। गुस्ता जैसी चीज भी प्रकट हानी तो मैं तो उसे अन्यथा न समझता लेकिन उसकी कहीं सभावना न देखी का भात कार्य कर सकते थे । मैंने देखा कि ये हार्दिक आदर व श्रद्धा की प्रेरणा है। इसी भावना है उनके साथी सहयोगी काम करते हैं। उसमें पद की कृत्रिमता का मिश्रण र है। हर समय भी नित्य सैकड़ों प्रकार के मनुष्यों से काम पडता होगा, लेकिन बीच में किसी कृत्रिम व्यवधान को डालकर व्यवहार को बनावटी बनाने की वृत्ति उनमें नहीं देखी। चलने लगा तो गुरुजी स्वय वाहर तक साथ आए और बोले- यह गाडी किसकी है।' तत्काल खोज हुई। ड्राइवर महाशय आए तो कहा कि 'देखिये, ये जैनेंद्र जी हैं, अमुक स्थान पर इन्हें पहुँचा आइए।' उसके एकाध वर्ष के अदर की बात रही होगी। मुझे अपने लिए किसी सभ्रम का भ्रम न हो सकता था। मैं ठहरा था मेट पूनमचद्र राक के यहाँ जो उस समय शायद स्थानीय कायेस के अध्यक्ष थे। पर उस सबसे गुरुजी के व्यवहार में कुछ भी अतर नहीं आया। f श्रीगुरुजी समय खड १२ उपस्थित हुए। निर्मलचित्तता के कारण ही ऐसा हो सकता है। अन्य कई प्रवासों में यदा-कदा उनसे भेंट हुई। दो वार तो रेल में ही साक्षात्कार हुआ। हम देर तक खुलकर बातें करते रहे। कई प्रश्नों के मूल में सहमति नहीं होती थी, लेकिन चर्चा में कहीं भी यह प्रश्न नहीं होता था कि सहमति वे जरूरी मानते हैं। एक सगठन के अध्यक्ष और विचारधारा के प्रवर्तक होकर भी उनमें ऐसी उदारता रह सकती है, यह बात मेरे जैसे साहित्यिक के लिए बहुत प्रिय होती थी। एक वार उन्हें मालूम हुआ कि मैं अहमदाबाद जाऊँगा। तारीखें पूछी। लगभग उन्हीं दिनों अहमदावाद उन्हें भी पहुंचना था। पूछा कहाँ ठहरे हो, फोन है वहाँ? फोन करूँ और आऊँ तो समय और सुविधा होगी। यह अनुग्रह मेरे लिए भारी ही था। लेकिन उनके लिए सहज । मैंने कहा-- 'आप स्थान वताइए, आपको अवकाश हुआ तो मैं स्वय उपस्थित होऊँगा। कितु फोन उनका ही पहले आया। यद्यपि उनको आने से रोककर, में स्वय उनके पास गया। एक बार अचानक दो बधु पधारे और कहा कि रामलीला मैदान में चलना है। गुरुजी पधारे हैं और रैली की अध्यक्षता आपको करनी है। मैंने पूछा यह निर्णय कैसे हुआ? बताया गया कि तीन नामों का पैनल चुना गया था। नाम गुरुजी के पास पहुंचे। निर्णय उनको करना था। शेष दो नाम सर्वदा उनके अनुकूल थे। मेरा ही नाम कुछ प्रतिकृल समझा जा सकता था। उन्होंने बताया गुरुजी ने तीनों नाम देखकर तत्काल आपका निर्णय दिया। याद नहीं कि एक प्रमुख काग्रेसी महोदय, तभी पास बैठे थे या तनिक वाद में आए थे, बोले- 'आप सघ की रैली में जाएँगे?" मैंने कहा, 'आप मुझे खद्दर में देख कर भी सशय रखते हैं? गुरुजी को तो सशय नहीं हुआ। यद्यपि वे स्वय खद्दरधारी नहीं हैं। बताइए मैं सकीर्ण किसे कहूँ और उदार किसको?' राजनीति बाँट डालती है। राष्ट्र को मिलाने का काम उससे नहीं हो पाएगा। जनसघ में गुरुजी का राष्ट्रीय स्वयसेवक सध खो नहीं गया। इसको मैं गोळवलकर जी की मौलिक विशेषता मानता है। दद्व में जो नीति रहे, वह राजनीति हो सकती है। उनका सघ रचनात्मक होगा, राजनीति नहीं। इस आग्रह को मैं उनके व्यक्तित्व का सूचक मानता हूँ। श्रीगुरुजीसमन्य खड १२ -- ।
(पापणन्य घुमाई १६७३ के अद्वितीय जीवन की प्रेरणा क्या होगी। इसलिए उनसे पूछा- 'गुरुजी 'सूत्र। सूत्र क्या बताऊँ? पर मैंने निस्पृहता, मित्रता, निरहकारिता कितु उनकी दृढता, सकल्पशीयन अथक कर्म प्रवणता के उदाहरण अन्यत्र मुझे नहीं मिले। गाँधीयुग के तो स्वार्थहीनता और नित्य बलिदान को प्रेरणा देनेवाले व्यक्तित्व अपवादमा हो गए हैं। गुरुजी के गतिशील और प्रणवद्ध व्यक्तित्व के परिचय का लाभ मुझे मिला, इसको मैं अपना सद्भाग मानता हूँ। उनमें मैंने कभी प्रमाद न देखा और जिस क्षण भी मिलना हुआ, उन्हें तत्पर और उद्यत ही पान इस अवसर पर मैं उनकी स्मृति में अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। १५ उनका जीवन सूत्र (श्री दादासाहब आप्टे, सस्थापक महामत्री वि हि परिषद्) जय से पूजनीय गुरुजी का स्वास्थ्य खराव हुआ था, तर से हो माह तीन दिन उनसे मिलने और उनके साथ रहने के लिए जाया कर था। ऐसे ही १८ अप्रैल १६७३ को उनके पास बैठा था। मन में विवार आया कि महापुरुषों के जीवन किसी न किसी तत्त्व में गढे रहते हैं। गुरु क्या आपने जीवन के कुछ सूत्र निश्चित किए थे?" मेरा प्रश्न सुनकर उन्होंने कहा- तय कर लिया था कि प्रवाह के साथ बहते रहना।' पूछा- 'क्या इसका अर्थ प्रवाहपतित होना है?" उन्होंने उत्तर दिया- 'नहीं। प्रवाह के साथ बहते जाना । प्रवाह बाहर तो जाना ही नहीं। प्रवाह में डूबना भी नहीं। प्रवाह के विरुद्ध कैले जाना? किनारे से लगकर प्रवाह की ओर देखते नहीं रहना। भगवान कहा है- कुर्याद् विद्वास तथासक्तश चिकीर्षुलॊकसग्रहम् । (गीता, ३-२५) यह मेरा जीवनसृन है। विश्व को मार्ग दिखानेवालों को तो लोक विलक्षण होना ही नहीं चाहिए। लोक संग्रह का व्रत जिन्होंने लिया है, उन्हें सर्वसाधारण से अलग नहीं होना चाहिए, न दिखलाई देना चाहिए। यह है गुरुजी जीयन का महाकाव्य। श्रीपुरुषी समन खड १२ के में के - दुनिया के अनेक महापुरुषों के जन्मस्थान और निवासस्थान देखने का अवसर मुझे मिला है। समकालीन इतिहास गढनेवाले अनेक राष्ट्रपुरुष, शूर-वीर, ज्ञानी-योगियों से दूर से, निकट से मिलने का सौभाग्य भी मुझे मिला है। लोक विलक्षणता उन सभी का गुण रहा है। पर अपने गुरुजी का सर्वसाधारण व्यक्तित्व ही उनकी अलौकिकता थी। लक्ष-लक्ष स्वयसेवकों का केंद्रबिदु होकर भी गुरुजी लोकविलक्षण नहीं थे। भगवान ने कहा है, ज्ञानेश्वर ने बताया है और डाक्टर जी के उदाहरण को देखा है। तारुण्य के अपने सारे गुण, प्रवृत्ति और प्रकृति सधानुकूल कर गुरुजी सघ रूप बन गए। पर इस असामान्यता के अविष्कार में कितनी स्थितप्रज्ञता तक पहुँचे थे, उसकी कल्पना करना भी कठिन है। सबेरै ६ से रात १२ बजे तक पिछले ३४ वर्ष गुरुजी का समय स्वयसेवकों के साथ ही बीता। इस कारण उनका सार्वजनिक चरित्र सुनकर, पढकर सभी जानते हैं, पर उनके अतर्मन का दर्शन और अतरग का जो साक्षात्कार मुझे हुआ, उसे किचित मात्र शब्दाकित करने का यह प्रयत्न है। किसी भी व्यक्ति के महात्म्य का मूल्याकन उसके व्यावहारिक यशापयश के निकष की कसौटी पर किया जाता है। यह गलत हो या सही पर अनुभव यही है कि किस मार्ग से, किस माध्यम से, साधन से, कौन कितनी मात्रा में अपने विचार को समझाकर उन्हें अपना अनुयायी या समर्थक बना सकता है, इसी पर उसका बडप्पन नापा जाता है। इस लौकिक कसौटी पर गुरुजी और जिन्होंने सघ के लिए समग्र जीवन का अग्निहोत्र किया, उनका मूल्याकन करना अप्रस्तुत होगा। वैसे देखा जाए तो यह काल ही विलक्षण सगठन, साधन तन युग का है। नाम न लेने की इच्छा होने पर भी उदाहरण सामने आते हैं। अभिजात प्रतिभा से मुखरित कल्पना, धन-साधन व शासन सामर्थ्य साथ रहते हुए भी निर्माल्य हुई हम देखते हैं। चद्र-सूर्य की गवाही देकर स्वपराक्रम की गर्जना करनेवाले लौहपुरुष निष्प्रभ पडे हम देख रहे हैं। एक विचार मन में उठता है कि क्या अपने इस भारतीय जनसमाज सुज्ञ भाग्यविधाता के पथ-प्रदर्शकों को चुनौती तो नहीं दी कि आप हमें क्या सुधारोगे, हमारा उद्धार कैसे करोगे? देखें कौन हारता है? सचमुच काल विचित्र है। यशापयश का विचार एक ओर रखकर गुरुजी ने तो शाश्वत मूल्य हमारे सामने रखे, उनपर स्वय आचरण कर श्रीगुरुजी समय खड १२ {४७) - - - ने तो ससद में दिखाया कि वे जनेऊ धारण नहीं करते। कुछ विद्वानों ने दिखाया। उसका स्मरण और निप्दुर पालन करना क्या राष्ट्रोत्थान का एकमेव उपाय नहीं? पूजनीय गुरुजी की और देखते समय सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में न देखकर अपने संगठन को शाश्वत, अक्षरस्वरूप आधार प्राप्त करने के लिए उन्होंने जो किया उसका थोडा दिग्दर्शन किया जाए। उनके अनेक परलू का निर्देश करना आवश्यक है। यह सस्कृत सुभाषित कहीं पूजनीय गुरुजी के वर्णत हेतु ही तो नहीं लिखा गया है- मानुष्ये सति दुर्लभा पुरुपता पुस्त्वे पुनर्विप्रता विप्रत्वे बहुविद्यतातिगुणता विद्यावतोऽर्थज्ञता। अर्थज्ञस्य विचित्रवाक्यपटुता तत्रापि लोकज्ञता लोकज्ञस्य समस्त शास्त्रविदुपो धर्मे मतिर्दुर्लभा ।। लेकिन आज तो ब्राह्मण ही लोगों को पसद नहीं। कुछ महाब्राह्मणों - उसका उपयोग न कर उसे खूटी पर टाँग रखा है। अपने गुरुजी ने ब्राह्मण के कर्तव्य, याने अध्ययन और लोकशिक्षण पर किसी प्रकार का अभिनिवेश न कर, का पालन जन्मभर किया। वे अनेक शास्त्र तथा विद्या के तन थे। ज्योतिष, वैद्यक, जीवशास्त्र आदि में पारगत थे। सगीत उनकी प्रिय कला थी। पर सघकार्य स्वीकार करने पर उन्होंने अपनी बाँसुरी और सितार मित्र को दे दी। फिर कभी उसे हाथ नहीं लगाया। गुरुजी जितने वाक्पटु थे उतने ही विनोदी भी थे। हम सभी बैठे थे कि एक परिचित ज्योतिषी मिलने के लिए आए। मैंने कहा 'आप लोग क्या ज्योतिष की बात करते हैं। राम के राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त निकाला था, पर उन्हें तो वनवास भोगना पड़ा। ऐसे ही समर्थ रामदास के विवाह का भी मुहुर्त निकाला पर वे मडप से ही भाग गए। गुरुजी हमारी बात का आनद ले रहे थे। ज्योतिषी सज्जन जब जाने लगे, तब गुरुजी ने उनसे पृछा, 'तो कल मिलोगे न? उन्होंने कहा, 'अवश्य ।' मैंने कहा 'महोदय, गुरुजी पूछ रहे हैं, अगले २४ घटे जीवित रहोगे न। और हँसी के बीच बात समाप्त हो गई। ये गुण अनेक लोगों में मिलते हैं, पर श्री गुरुजी की धर्मनिष्ठा और मातृभक्ति अविचल थी। श्रीगुरुजी समय खड १२ श्री गुरुजी सरसधचालक बने, उसके बाद युगातर करा देने वाला एक छोटा कालखड आया। छिन्न-विच्छिन्न अवस्था में ही क्यों न हो, पर स्वतत्रता मिली। 'अब आगे क्या' को लेकर अपने ही कुछ लोग सभ्रम में थे। उस कठिन काल में श्री गुरुजी ने संघ को शाश्वत और अक्षरस्वरूप दिया। यह उनकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति और प्रतिभा से ही सभव हुआ। उन्हें क्या माना जाए- सत, योगी, राजनीतिज्ञ या अध्यात्म के मार्ग का एक पथिक? राष्ट्र की निर्मिति के लिए और मुख्यत हिंदू समाज के सगठन के लिए जो भी आवश्यक था, वे सभी गुण उनमें थे। उन सभी की पृष्ठभूमि और प्रतिष्ठापना अध्यात्म के आधार पर थी। किसी योगी सा उनका जीवन था। स्थितप्रज्ञ के लक्षण में कहा गया है 'विपया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन ।' (गीता, २-५६) लवे समय से वे एकमुक्त थे। बीच के कुछ काल तक माँ के समाधान हेतु सायकाल सभी स्वयसेवकों के साथ माँ के सामने थोडा फलाहार करते, पर माँ के निधन के बाद यह सर्वसकल्प सन्यासी पचेद्रियों की सारी वासनाओं के जाल से मुक्त हो गया था। जैसा ज्ञानेश्वर कह गए हैं- वे अपनी इन्द्रियों को आज्ञा देते और इन्द्रियाँ विचारी लगाम खिचे घोडे के समान चलती। उन्होंने कभी देह पूजा नहीं की। इसी कारण शायद वे छाया-चित्रकारों को पास फटकने नहीं देते थे। कभी कोई मूल्यवान वस्तु भी धारण नहीं की। पुस्तकें भी पढने के बाद किसी को दे देते। कभी अपने पास उनका सग्रह नहीं किया। श्री गुरुजी के अतर्मन के विचारों का दर्शन ऐसे छोटे से लेख द्वारा करना, याने समुद्र के किनारे खडे रहकर उसके तल में स्थित मौक्तिक दलों की कल्पना करना ही होगा। सच कहें, तो इस योगी का सपूर्ण दर्शन हुआ ही नहीं। केवल सगठन, लोक-व्यवहार आदि लौकिक बातों से ही हम उनका परिचय करने का प्रयास करते हैं। उनकी ऊँचाई तय करते हैं। तत्त्व । के रूप में हमें दिखाई देगा कि अपने भारतवर्ष में ही नहीं, तो समूचे मानव समाज में वे एक अलौकिक पुरुष हो गए। (तरुण भारत पुणे वाजलि विशेषाक) - श्रीशुरुजी समय खड १२ {४६) के लडके से की। कितु कोई यह समझने की भूल नहीं कर सकता कि - । १६. समष्टिमय जीवन (प दीनदयाल उपाध्याय) एक सज्जन ने, जो अपने आपको सघ के विरोधी समयते हैं, कहा- 'राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसपचालक के नाते नहीं, बल्कि श्री माधवराव गोळवलकर के नाते श्री गुरुजी के व्यक्तित्व में मेरी श्रद्धा है। उनका कथन कोई अनूठा नहीं, क्योंकि इस प्रकार का विचार करनेवाले बहुत से हैं। एक समय वह भी था (सन् १६४८ में) जय वडों-बड़ों ने या कहा- कि 'सघ और सघ के स्वयसेवक तो अच्छे हैं, कितु उनके नेता और सचालक उन्हें गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं। अर्थात् दोनों प्रकार में व्यक्तियों की भावनाओं में अतर हो सकता है, किंतु विचारों की भूमिका में नहीं। उनके अनुसार राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसघचालक और श्री माधवराव गोळवलकर दो व्यक्ति हैं। मेरे अनुसार वे दोनों को ही नहीं समय पाए, न तो सघ को और न श्री गुरुजी को। मैं जब यह कहता हूँ कि श्री गुरुजी का व्यक्तित्व सध मरसघचालक से पृथक कुछ भी नहीं, तो मेरा यह अर्थ नहीं कि उन महान विभूतिमत्व का अभाव है। सघ के सरसंघचालक बनने पर उहाँ कहा था कि 'यह तो विक्रमादित्य का आसन है, इस पर बैठकर गरि का लडका भी न्याय करेगा।' विनय के साथ उन्होंने अपनी तुलना गरि ' उनकी अप्रतिम महत्ता सिहासन के कारण नहीं, अपितु उनके अपने विक्रम के कारण है। हॉ, उन्होंने अपनी सपूर्ण शक्ति और विक्रम को संघ के साथ एकरूप कर दिया और वही है उनके जीवन का लक्ष्य और उनकी महानता का रहस्य। सन् १६३८ की बात है, सघ के आद्य सरसघचालक परम पूजनीय डाक्टर हेडगेवार जीवित थे। उमी वर्ष श्री गुरुजी नागपुर में लगनेवाल अधिकारी शिक्षण शिविर के सर्वाधिकारी थे। शिविर की समाप्ति के पूर्व उसमें भाग लेने वाले स्वयसेवकों ने परम पूजनीय डाक्टर जी को भेंट करने के लिए निधि एकर की। प्रत्येक ने अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार दिया। यह किसी को ज्ञात नहीं था कि किसने क्या दिया। एक स्वयसेवक ने निधि में कुछ न देते हुए अपनी श्रद्धा के स्वरूप परम पूजनीय डाक्टर जी भी घडी की सोने की चैन भेंट की। निधि और चैन भेंट करने का कार्यक्रम श्रीगुरुजीसमला खड १२ .
1 . अहकार गा हुआ। हम लोग अपने मन में उस स्वयसेवक की प्रशसा कर रहे थे, जिसने त्याग करके वह सोने की चैन भेंट की। हमारे सम्मुख वही उस दिन का हीरो था। सर्वाधिकारी के नाते श्री गुरुजी समारोप भाषण के निमित्त खड़े हुए। अपने भाषण में उन्होंने सोने की चैन का उल्लेख करते हुए कहा- "मैं मानता हूँ कि जिस स्वयसेवक ने यह चैन भेंट की है, उसके मन में डाक्टर जी के प्रति बड़ा आदर, प्रेम एव श्रद्धा है,। कितु वह अभी पूरा स्वयसेवक नहीं है, उसमें कहीं न कहीं उसका 'अह' छिपा हुआ है। जो निधि दी गई है, उसमें किसी का व्यक्तित्व पृथक नहीं, उस निधि में साथ न देते हुए अलग से देने के मूल में अपने व्यक्तित्व की पृथकता और है।" श्री गुरुजी के ये शब्द सुन कर हम लोगों को एकदम धक्का लगा, कितु सघ का स्वयसेवक बनने के लिए अपने व्यक्तित्व को सघ जीवन E में कितना विलीन करना पड़ता है, इसका ऐसा पाठ मिल गया, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। 27 अपने सपूर्ण जीवन को सघ के साथ एकरूप करने का कहीं आदर्श मिल सकता है तो वह परम पूजनीय श्री गुरुजी के जीवन में । किसी ध्येय तथा कार्य के साथ तादात्म्य सरल नहीं और विशेष कर उस व्यक्ति है के लिए, जो उस सस्था का सर्वप्रथम नेता हो । यदि किसी अन्य व्यक्ति के । सम्मुख व्यष्टि और समष्टि में सघप आ जाए या दिशा का सभ्रम उपस्थित न हो जाए, तो वह समष्टि की भावनाओं, इच्छाओं और आकाक्षाओं के प्रतीक अपने नेता की आज्ञा को सर्वमान्य कर चल सकता है, उसका मार्ग सरल न है। कितु जिस व्यक्ति के ऊपर सपूर्ण कार्य के नेतृत्व की जिम्मेदारी हो, वह 1 अपनी अतरात्मा को छोड़कर और किससे प्रेरणा ले सकता है? जनतत्र की । प्रचलित पद्धतियों वहाँ निरुपयोगी सिद्ध होंगी। उनसे समष्टि की भावना * और उसके हिताहित का पता नहीं चलता। सत्य न तो अनेक असत्यों अथवा अर्ध सत्यों का औसत है और न उनका योग। फिर राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ही तो सपूर्ण समष्टि नहीं, वह तो समष्टि का एक विदु मात्र है। उन्हें तो सपूर्ण समाज का विचार करना होता है। पूजनीय गुरुजी ने समष्टि का हित ही अपने सम्मुख रखकर नई राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का सचालन किया। कई बार ये लोग, जो या तो उन्हें समझ नहीं पाते अथवा समष्टिहित की अपेक्षा किसी छोटे हित को सम्मुख रख कर सघ की गतिविधि का सचालन चाहते हैं, वे श्री गुरुजी की जो दृढता और सिद्धातों का आग्रह देखकर उन्हें अधिनायकवादी कह देते हैं, का श्रीपुरुषी समय खड १२ {५१ - मपूर्व त ६ तो सरकार के अत्याचारों और अन्याय की निदा करते हुए खूब खरी-खोटी यह आत्मीयता ही उनकी महानता और उनके प्रति व्यापक श्रद्धा का कारण है और उनकी महानता इसमें है कि वे इस आत्मीयता को लेकर चल सके हैं। गत वर्ष 'धर्मयुग' साप्ताहिक ने भारत के अनेक महापुरुषों नहीं। 'एकहि साधे सब सधे के अनुसार वे सघ की साधना करके सबसे फलत सघ के अतिरिक्त वे किसी चीज को नहीं पहचानते। उनकी सघ को शैतान का दूसरा स्वरूप समझा जाता था, तब भी वे अपने ध्येय पर अविचल रहे और जब प्रतिवध हटने के पश्चात चारों ओर विशाल कितु वे उस मनोवृत्ति से कोसों दूर हैं। उनका अपना मत कुछ नहीं, सब का मत ही उनका मत है और उनका मत ही सघ का मत होता है, क्योंकि उन्होंने पूर्ण तादात्म्य का अनुभव किया है। ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब व्यक्ति और सस्था की प्रतिष्ठा के चिता न करते हुए उन्होंने राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि महत्त्व दिया है। स्त्र १६४८ में जब राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ पर प्रतिवध लगा, उस समय यदि वे चाहते तो शासन की खुली अवज्ञा करके अपनी शक्ति का परिचय दे सक्ने थे, कितु उन्होंने सघ के कार्य का विसर्जन करके अपनी देशभक्ति के परिचय दिया। प्रतियध उठने के पश्चात् स्थान-स्थान पर उनका भन्न स्थागत हुआ। दिल्ली में रामलीला मैदान पर जो समा हुई, उसका आरि और अत नहीं दिखता था। बड़े से बड़े सत के अहकार को जगा देने के लिए वह दृश्य पर्याप्त था। जव श्री गुरुजी बोलने के लिए खडे हुए, उन्होंने कहा- 'यदि अपना दाँत जीभ काट ले तो मुक्का मारकर यह दान नहीं तोडा जाता। लोग चकित रह गए। उन्होंने आशा की थी कि गुरुजी सुनाएँगे। कितु उस महापुरुष की गहराई को वे नाप नहीं पाए। वहाँ तो सबके लिए आत्मीयता ही है। के जीवन के ध्येयवाश्य छापे थे। पूजनीय श्री गुरुजी का ध्येयवाक्य सबल छोटा कितु समर्पफ था- 'मैं नहीं, तू ही।' इन चार शब्दों में श्री गुरुजी का सपूर्ण जीवन समाया हुआ है। यह 'तू' कौन है? सप, समाज, ईश्वर- तीनों को एकरूप करके चलते हैं। तीनों की सेवा में विरोध नहीं, दि. साधना में लगे हुए हैं। उनका जीवन ही साधना बन गया है। ध्येयदृष्टि इतनी पैनी है कि लोगों की प्रशसा और विरोध- दोनों में ही वे विचलित नहीं होते। सघ पर प्रतिबंध लगने के बाद जब कुप्रचार म्वागत समारोह हुए, वे उस हवा में नहीं वहे। . श्रीगुरुजीसमन खड १२ के कारण - -- । - हम लोग समाचार-पत्र पढ रहे थे। आदि से अत तक करीब-करीब । सारा पत्र पढ डाला। इतने में पूजनीय श्री गुरुजी ने कमरे में प्रवेश किया और सहज भाव से पत्र उठाकर इधर-उधर निगाह डाली। सुर्खिया देखीं, पन्ने उल्टे और पत्र रख दिया। बातचीत शुरू हो गई। उसके दोगन सघ-सवधी एक समाचार, जो उसी पत्र में छपा था, का जिक्र आ गया। 'परतु वह समाचार है कहाँ? मैने पृछा। 'इसी अखबार में तो है' पूजनीय गुरुजी ने कहा। मैने पूरा अखवार पढा था, मुझे वह समाचार कहीं नहीं दिखा। अखबार लेकर फिर पन्ने उल्टे, पर सघ का वहाँ कहीं नाम भी नहीं मिला। गुरुजी ने मेरी हैरानी देखकर अखबार हाथ में लिया और बताया 'यह है वह समाचार'। बाजार भावों के पन्ने पर एक ओर वह छोटा-सा समाचार छपा था। 'कहाँ छाप दिया है। हम लोग क्या व्यापारी हैं, जो इस पन्ने पर निगाह जाती?' मैंने मन ही मन सोचा । दूसरे ही क्षण विचार आया 'पूजनीय गुरुजी भी तो व्यापारी नहीं, वे तो कोसों दूर है, मोल-तोल और भाव-ताव से। उनकी निगाह कैसे गई? और फिर अखबार भी मेरी तरह पूरा नहीं पढ़ा था, सुर्खियाँ ही इतनी थीं, कि जितनी देर वह पत्र उनके हाथ में रहा, पूरी नहीं पढी जा सकती थीं। मैंने अपनी शका रखी भी नहीं, पर शायद वे समझ गए। उन्होंने इतना ही कहा-- "भीड में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है, कोलाहल । में भी आत्मीयजनों के शब्द साफ समझ में आते हैं।' मेरी समझ में आ गया। उनकी वही आत्मीयता है, जिसके कारण वे उस समाचार को देख सके। अन्य देशों के ऐसे कितने ही समाचार उनकी निगाह में आ जाते हैं। : जबकि हम लोग नेताओं के वक्तव्य पढ़ते-पढते ही समाचार-पत्रों को पी जाने की कोशिश तो करते हैं, कितु अनेक महत्त्वपूर्ण समाचारों को छोड़ १ जाते हैं। वे अक्सर कहते- 'मैं तो समाचार-पत्र नही पढता। पर मैं कहूँगा कि वे (श्री गुरुजी) ही समाचार-पत्र पढते हैं, हम लोग तो उन्हें देखते हैं । और बहुत देर तक देखते रहते हैं। एक बार उन्हें एक पुस्तक, जो हाल ही छप कर आई थी, दिखाई। पुस्तक उन्होंने हाथ में ली। इधर-उधर देखा और सहज ही एक जगह से । खोला। एक वाक्य पढते हुए पृछा- 'यह क्या लिखा है? वहाँ गलती थी । मैंने उसे स्वीकार किया। उन्होंने फिर दूसरा पृष्ठ खोला और वहाँ भी ऐसी के ही एक अशुद्धि निकल आई। पुस्तक मैंने ले ली। बाद में फिर से उसे , आदि से अत तक देखा। वही दो अशुद्धियाँ थीं। पूजनीय गुरुजी की निगाह श्रीगुरुजीसमय खड १२ ~ - -- -- - - {५३) । --- से अगुआ होंगे, कितु जिसने सपूर्ण जीवन का पूर्णता के साथ आकलन किया और जो बिना किसी मोह या भय के एव साहस के साथ उस सत्य (युगधर्म नागपुरपूर्ति-अक पुभाई ५५६) आज परम पूजनीय श्री गुरुजी (माधवराव सदाशिवराव गोळवलकर) तो सदा ही हमारे साथ रहेंगे। वास्तव में पहले के समान वही हमारा माई परमानद जी के दर्शन किए जाएँ। उन्होंने परमपूज्य डा हेडगेवार से बिना किसी प्रयास के उन अशुद्धियों पर ही कैसे गई? उन्हें कोई सिन्नि प्राप्त नहीं थी और न यह कोई तुक्का था, जो लग गया। ऐसे और भी अनुभव आए हैं। कहना न होगा कि यह कार्य की लगन और एकात्मना है, जिसने उन्हें अचूक दृष्टि दी है। उसी दृष्टि के कारण वे प्रत्येक परिस्थिति में सत्य का दर्शन कर लेते तथा भविष्य के गर्भ में क्या डिग है, इसका भी आभास पा जाते हैं। आगे की बात कहने के कारण यदि गभीरतापूर्वक विचार नहीं किया जाए, तो उनकी बातें बडी अटपटी सी लगती हैं, कितु थोडे ही दिनों में उनकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है। सा १६४७ में उन्होंने भावात्मक राष्ट्रीयता पर बल दिया, एकात्मता की बात कही, राष्ट्रीय चारित्र्य की आवश्यकता बताई, राजनीति को मर्यादाओं का उल्लेख करते हुए सास्कृतिक अधिष्ठान पर समाज के संगठन का संदेश दिया। पिछन्ने आठ वर्षों ने उनके प्रत्येक कथन को सत्य सिद्ध किया है तथा प्रत्येक नई घटना उसे अधिकाधिक पुष्ट करती जा रही है। मैं तो नि सकोच भाव से कहता हूँ कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के बहुत का उच्चार कर सकता है, ऐसा एक ही व्यक्ति है और वह है- राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसंघचालक श्री माधवराव गोलवलकर। १७ मृत्युजय (प्रो धर्मवीर, सयुक्त पजाब में सघ के आधारस्तभ) हमारे मध्य नहीं हैं। लेकिन नहीं, उनका शरीर हमारे मध्य में नहीं है, ६ । मार्गदर्शन किया करेंगे। इस समय मृत्यु के संबंध में उनके विचार हमारे समक्ष हैं। सद १९४० से पहले की बात है। लाहौर में प्रशिक्षण शिविर लग रहा था। शिविर समाप्त हो रहा था। एक दिन श्री गुरुजी के मन में आया कि पूर्ण - -- - श्रीशुरूपी समन सड १२ । इसका उल्लेख किया। उन्हें इसमें कोई आपत्ति न हो सकती थी, क्योंकि स्वय डा साहब के अदर भाईजी के प्रति बहुत श्रद्धा थी। श्री गुरुजी मुझे साथ लेकर श्री भाईजी के मकान पर गए, जो शिविर के निकट ही था। (शिविर गुरुदत्त भवन में था और भाईजी का 'मकान उसके पिछवाडे में शीशमहल रोड पर स्थित था।) प्रात का समय था। श्री भाईजी सध्या-बदन समाप्त करके अकेले ही बैठे थे। श्री गुरुजी ने नमस्कार किया। श्री भाईजी ने उन्हें अपने सामने बैठाया। कुशल-क्षेम के पश्चात् श्री गुरुजी ने कई प्रश्न उनसे किए। उनमें से सबसे अधिक महत्त्व का यह था 'मृत्यु के सबंध में आपका क्या विचार है?" श्री भाईजी मुस्कराने लगे। 'किमकी मृत्यु?' उन्होंने कहा, 'शरीर की मृत्यु किसी समय भी हो सकती है। आत्मा मरती नहीं। इसलिए जानता वह है, जो यह जानता है कि मेरे लिए मृत्यु है ही नहीं।' यह सुनकर हम दोनों चकित रह गए। जब हम श्री भाईजी से अनुमति लेकर नीचे गली में चले आए तब श्री गुरुजी ने मुझसे कहा- 'श्री | भाईजी कितने विलक्षण है। जीवन-मरण के सवध में कितनी स्पष्ट कल्पना 'है। यह शक्ति किसी विरले को ही प्राप्त होती है।' श्री गुरुजी के इन शब्दों से मुझे मृत्यु के विषय में स्वय श्री गुरुजी का मत मालूम हो गया। जालधर नगर से बाहर दयानद कॉलेज छात्रावास में गर्मियों की छुट्टियों में प्रशिक्षण शिविर लग रहा था । एक दिन कुँए के पास ठडी जगह पर कुर्सियाँ विछाई गई। श्री गुरुजी, जालधर-सघचालक और डा आवा थत्ते बैठे थे। न मालूम कैसे पूर्वाभास की बातें चल पड़ीं। श्री गुरुजी ने बताया, "एक दिन नागपुर के पास ही रामटेक में मुझे जाना था। मेरी माता जी ने मुझे कहा- 'मधु, तुम रामटेक जा रहे हो। जरा अमुक सज्जन को भी देख आना। वे बीमार हैं। मैंने रामटेक में उन सज्जन को देखा तो पास बैठे डाक्टर बिल्कुल निश्चित थे, परतु मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह तो आज ही आज है। फलस्वरूप नागपुर में उस रोज शाम को लौटने पर मैंने माँ से कहा- 'वह तो कल का सूर्य नहीं देखेगा।' (बाद में ऐसा ही हुआ)। माँ ने डॉटते हुए कहा- 'कभी ऐसी बात भी मुंह से निकाला करते हैं? यह कहना भी हो, तो इसके कितने ही दूसरे ढग हो सकते हैं।' मैं चुप हो गया। अपने मन में सकल्प कर लिया कि आगे से किसी के भविष्य के श्रीगुरुजीसमय खड १२ -- T ~ । कर्तव्य का पालन करना चाहिए। जो कर्तव्य जिसके जिम्मे है, उसे व प्राणपण से निभाता है तो यह उसके लिए पर्याप्त होता है। इससे अधिक सघ में में कोई विशेष कार्य नहीं करता। ऊँट की नकेल चूहे के हाथ है दी गई है। अब क्या चूहा इस बात का गर्व कर सकता है कि मैं ऊँट में नहीं मिलता। इसमें उन्हें सफलता मिली। इस सफलता के अत स्थल कितने ही अन्य कार्यकर्ताओं का हाथ है, परतु सबसे अधिक उस युगपुर है सघ अपना काम कर रहा है। जो व्यक्ति अपने आपको नहीं पहचानते या जो अपने आपको अभी तक मानव नहीं बना पाए, उन्हें छोडकर शर विषय में कुछ न कहूँगा।" मैंने प्रश्न किया- 'क्या ऐसा योगी अपने भविष्य के विषय में ६ जान सकता है?' श्री गुरुजी हँस कर बोते- "में योगी नही हूँ। लेकिन इतना सकता हूँ कि जिसने अपना जीवन परमात्मा के हाथ में दे रखा हो, उने मृत्यु की चिता नहीं हुआ करती।' आपरेशन के पश्चात् जब वे परली बार दिल्ली आए, तब सी सस्थाओं ने मिलकर उन्हें बधाई दी और परमात्मा के प्रति . कृतज्ञता प्रकट की। इस अवसर पर कार्यक्रम के अध्यक्ष दीवान कुमार (पजाव विश्वविद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति) ने बधाई दी और सो की आयु के लिए परमात्मा से प्रार्थना की। इसके उत्तर में श्री गुरुजी स्पष्ट शब्दों में कहा- 'मुझे मृत्यु कभी डरा नहीं सकी, क्योंकि में हूँ कि यह एक न एक दिन आने वाली है। फिर भी मैं यह जानता हूँ । प्रकृति अपने नियमों का पालन करती है। ऐसी अवस्था में हमें अपने की उसे आशा ही क्यों हो? इसके अतिरिक्त में तो यह भी जानता हूँ कि चला रहा हूँ। जो भी हो, अपनी समझ में तो एक ही बात आती है। भारत इतिहास में पूज्य डा हेडगेवार ने हिदू राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए महान प्रयोग किया, जिसका सानी भारत ही नहीं ससार के इतिहास का है, जिन्हें हम 'श्री गुरुजी कहते हैं। आज देश का कोई प्रात, प्रात का कोई जिला, किसी जिले की कोई तहसील, किसी तहसील का कस्वा नहीं, जहाँ सघ अपना काम न कर रहा हो। इस देश में ही नहीं इसके बाहर वर्मा अफ्रीका इग्लैंड, अफगानिस्तान आदि में जहाँ कही हि } के श्रीशुरुखी समय खड १२ सव सघ का काम करने में गर्व समझते हैं। कारण? इस के कार्यकर्ताओं के समक्ष कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं। एक मान हिदू सस्कृति तथा धर्म ही उनका ध्येय है। सघ को इस दर्जे तक पहुँचाने के लिए श्री गुरुजी ने इस देश की परिक्रमा बीसियों यार की है। इस राष्ट्र के मान की रक्षा के लिए कितने ही दीनदयालों ने अपने प्राण न्योछावर किए है। परतु उन सबके लिए स्फूर्ति के केंद्र श्री गुरुजी चले आ रहे हैं, इस कारण वे अमर है (१७पून १६७३ पाचजन्य) + -- . . १८ मूलगामी दृष्टि (श्री नानाजी देशमुख, ग्राम विकास के पुरोधा) विभिन्न विवादास्पद विषयों पर भी गुरुजी सहज भाव से समाधान यता दिया करते थे। जव कभी कोई मार्ग नहीं सूझता था, गुरुजी का मागदर्शन काम आता था। बात उस समय की है, जब पजाव भाषा विवाद खडा हुआ था। सयोग से दीनदयाल जी की और मेरी नागपुर में गुरुजी से भेंट हुई। कई स्थानीय कार्यकर्ता भी थे। गुरुजी बोले- 'अरे भाई क्या चल रहा है पजाब में तुम्हारे नेता लोग क्या कह रहे हैं पजाबी भाषा के बारे में?' हममे से कोई कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद गुरुजी स्वय बोले- 'क्या राजनीति में काम करने वालों का दृष्टिकोण सीमित (दलगत) हो जाता है? वह (दृष्टिकोण) व्यापक नहीं रह पाता? हिदी राष्ट्रभाषा है, स्वाभाविक रूप से उसके प्रति मोह, उसके विकास के लिए प्रयत्न होना लेकिन पजावी भाषा क्या विदेशी भाषा है? क्या वह साप्रदायिक भाषा है? पजावी भाषा एक क्षेत्रीय भाषा है और हमारी अपनी भाषा है। उसका अभिमान होना चाहिए न कि उसका उपहास। यह सिर्फ केशधारियों -1 की भाषा नहीं है। यह कहना भी गलत है कि यह सिर्फ नानकपथियों की भाषा है। 'गुरुग्रथ साहब' आदि धार्मिक ग्रथों में क्या केवल पजाबी भाषा है? अनेक भाषाएँ मिन्नती हैं। उन्हें किसी भाषा से नफरत नहीं थी। किसी । और को भी उनकी भाषा से नफरत नहीं होनी चाहिए। कितना स्पष्ट . चाहिए। - विचार था उन्होंने किया हुआ समस्या का विश्लेषण और निदान सत्य श्रीगुरूजीस खड १२ आता था, गुरुजी के व्यक्तित्व से सपूर्णानद जी से मेरे बहुत पहले से सबध थे। वे इस शिविर के समापन समारोह में पधारे। गुरुजी भी थे। उस समय तो उनसे (डा सपूर्णानद से मैंने पूछा- 'क्या आपको हमारे कमाडर बनने में कुछ एतराज है? जो तुम्हारे गुरुजी हैं, उनका बडा विशिष्ट व्यक्तित्व, बडी डायनेमिक और हुई कि विवादास्पद विषय का पूर्ण अनुमान कर गुरुजी ऐसा मत प्रकट करते थे कि सामने बैठे व्यक्तियों को एक नये ढंग से सोचने के लिए प्रेरणा मैंने पूछा- 'वावृजी आपने यह सब कहा तो सही, पर बात कसौटी पर भी खरा उतरता था। आध्र विवाद जब शुरू हुआ तो हमारे लोगों ने वहाँ एक स्टडी टीम भेजी। गुरुजी उन दिनों इदौर में विश्राम कर रहे थे। में भी सयोग से इदौर में था। उनसे भेंट हुई तव वे बोले- 'तुम्हार स्टडी टीम वहाँ क्या कर रही है? आध्र और तेलंगाना के अलग होने से कोई कठिनाई नहीं आएगी? इससे राष्ट्रीय एकता खडित नहीं होगी? लोग को सुविधा हो, आर्थिक विकास में पोषण हो और प्रशासनिक दृष्टि से सुविधाजनक हो तो आवश्यकतानुसार प्रातों की पुनर्रचना राष्ट्रीय एकात्मता के लिए भी आवश्यक रहती है। इसमें स्टडी का क्या प्रश्न है? यह तो स्वर स्पष्ट हैं। आध्र-तेलगाना के प्रश्न को विवादास्पद बनाकर लोगों में असतोप व हिसक वृत्ति को बल मिले, ऐसी हठवादिता का क्या अर्थ है?" गुरुजी के सान्निध्य में जो प्रभावित हुए विना नहीं रह सकता था। बात शायद सन् १६४६ या १६४७ की है। काशी के डी ए वी कालेज में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का शिक्षण शिविर लगा था। स्व डा बातचीत नहीं हो सकी, पर बाद में उनसे मिलने का सयोग हुआ बोले- 'हम तुम्हारे सघ को देख आए हैं।' मैंने कहा- 'मैं भी वहाँ था' वे बोले- 'हॉ, तुम उस दिन मिलिट्री कमान्डर जैसे लग रहे थे। उन्होंने जवाब दिया- 'नहीं भाई, ऐसी कोई बात नहीं। मैं तो क रहा था कि तुमारे यहाँ वडा गजब का अनुशासन है। इस संगठन के पर डोमिनेटिग पर्सनेलिटी है। मतभेद की बात दिखने के बाद भी उनसे विवार करने की इच्छा नहीं होती। उनसे मिलकर एक आश्चर्य की बात अनुभव मिल जाती है। क्या हुई?' श्रीपुरुषी समय सह १२ - वे बोले- 'खैर छोडो, तुम्हारे गुरुजी के बारे में मेरा ऐसा इप्रेशन हो गया है। सही या गलत मैं नहीं जानता, यह तुम जानो।' गुरुजी के सानिध्य में ही नहीं उनके विचारों और भाषणों से भी अनेक विद्वान और नेता अभिभूत हुए हैं। श्री श्रीप्रकाश जी का सस्मरण समीचीन रहेगा। महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से निवृत्त होकर श्रीप्रकाश जी देहरादून में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। बाद में पता चला कि डा सपूर्णानद ने उन्हें लिखा था कि तुम नाना जी को मिलो। गुरुजी की 'बच ऑफ थॉट्स' पुस्तक को अवश्य पढो। डा सपूर्णानद जी ने ही मेरा परिचय श्रीप्रकाश जी से कराया था। उनकी इच्छा देख 'बच ऑफ थॉट्स' उन्हें भी भेज दी। जब मेरा श्री श्रीप्रकाश से साक्षात्कार हुआ तो वे बोल-- मैं गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य था, कितु उनका व्यक्तित्व इतना सर्वव्यापी है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हो सकता है, कुछ मामलों में मतभेद हो, पर उनका चितन बडा मौलिक और जड़ को छूने वाला है। इसका आप लोग व्यापक प्रचार क्यों नहीं करते? कोई चीजें तो ऐसी हैं, जिनको व्यवहार में लाया गया तो हिदुस्थान की सब समस्याएँ हल हो जाएँगी। मैं नहीं समझता था कि तुम्हारे गुरुजी धर्म परिवर्तन किए बिना मुसलमान और ईसाईयों को राष्ट्रजीवन का अग मानने के लिए तैयार हो सकते हैं। गुरुजी के सारे विचार देखकर लगता है कि यदि मुसलमानों ने थोडा-सा भी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया और हिदुस्थान की गौरवमयी राष्ट्रीय परपरा का अभिमान रखा, तो तुम्हारे गुरुजी को उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता के अग मानने में कोई एतराज नहीं होगा। यह एक बहुत बड़ी बात मैं गुरुजी की समझ पाया हूँ। गुरुजी के उस विचार से मतभेद नहीं रखा जा सकता। मेरे मन में उनके प्रति आदर बढ़ गया है।' दीनदयाल जी के प्रति गुरुजी के मन में बडा स्थान था, बडा स्नेह और अटूट विश्वास। बात उस समय की है जब कालीकट के अधिवेशन के पूर्व दीनदयाल जी जनसघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। कालीकट के अधिवेशन के बाद हम लोग कार से बगलौर होते हुए डोंडक्ल्लापुर पहुंचे। वहाँ सघ कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लग रहा था। गुरुजी सघ कार्यकर्ताओं को श्रीगुरुजी समन्य खह १२ {५६} - - (पाचवन्य पुमाई १६७३) तक जा सकेंगे। यह हमारी खुसपुस राजाभैया के ध्यान में आ गई। उन्होंने मार्गदर्शन दे रहे थे। कार में दीनदयात जी, सुदरसिर जी भडारी जगन्नाथराव जी जोशी भी थे। हम लोगों को देखते ही गुरुजी बोले- 'तुम सब ने। लोग यहाँ कहाँ आ गए?' भोजन, विश्राम के बाद गुरुजी के साथ चाय के लिए चैटे। । गुरुनी का वौद्धिक होने वाला था। चाय के समय गुरुजी बोले- 'आज दीनदयान वोलेगा।' हम सब आश्चर्यचकित रह गए। किसी ने कहा कि वर्ग में सभी लोग आपसे मार्गदर्शन पाने के लिए एकत्रित हुए हैं। सभी कार्यक्रम आप ही को लेने हैं। गुरुजी बोले- 'नही भाई, दीनदयाल ही वोलेगा। फिर किसा ने कहा, 'गुरुजी वे तो जनसघ के अध्यक्ष हैं।' गुरुजी ने तत्काल उत्तर दिया- 'नहीं, दीनदयाल स्वयसेवक है। स्वयसेवक के नाते बोलेगा, जनसब अध्यक्ष के रूप में नहीं। और वस्तुत दीनदयाल जी का जव यौद्धिक हुआ, तो गुरुजी ने भी बहुत सराहा। १६ सबके अपने (श्री पाडुरगपत क्षीरसागर, नागपुर कार्यालय प्रमुख) ग्वालियर के एक य्यातनाम वृद्ध गायक स्व राजाभेया पूंछवाले सन् १९५१ या ५२ में, नागपुर विद्यापीठ की सगीत परीक्षा लेने नागपुर आए हुए थे। परमपूजनीय श्री गुरुजी नागपुर में हैं, यह ज्ञात होने पर सत्र कार्यालय में आकर वे उनसे मिले। श्री राजाभैया की ख्याति गुरुजी ने सुनी थी। पर ७५ वर्ष के वृद्ध तथा अर्धागवायु से पीडित होने के कारण वे कहाँ गुरुजी से कहा- 'मुझे आपको गाना सुनाना है।' सारी स्थिति को भापकर श्री गुरुजी ने हमें बुलाया और कहा कि कार्यालय में ही आज रात गजाभया के गायन हेतु व्यवस्था करो। आदेश के अनुसार हार्मोनियम व तबला लाया गया। उन्हें बजानेवाले भी आए और गायन का कार्यक्रम हुआ। भाऊजी गोळवलकर, भाऊसाहेब काळीकर आदि ५-७ लोगों के साथ कार्यालय के हम १५-२० लोग थे। गायन शुरू हुआ। सघ के प्रचड काम के रहते गायक, कलाकार, लेखक, कवि आदि श्रीगुरुजीसमा खड १२ " som} -- । = सभी से वे परिचय रखते एव उनके योग्य गुणों का गुणवणन करते। परमपूजनीय डा हेडगेवार की स्मृति में नागपुर में रेशमबाग में स्मृतिमदिर का निर्माण करना निश्चित हुआ। पुणे के स्थापत्य विशारद श्री = बाळासाहेब दीक्षित पर यह दायित्व सौंपा गया। उन्होंने तुरत काम प्रारभ किया। मदिर के नक्शे पुणे के ख्यातनाम आर्किटेक्ट श्री उद्धवराव आप्टे से तैयार करवाए। मूल नक्शे में स्मृतिमदिर में जो कमानें दिखाई गई थीं, वे मुगल आर्किटेक्चर की थी। श्री आप्टे ने भी यह मान्य किया। श्री आप्टे श्री दीक्षित और कुछ हम लोग श्री गुरुजी से जब कार्यार्थ मिले, अलग-अलग कल्पनाएँ सूझने लगीं। परमपूजनीय गुरुजी ने एक कागज लिया। फाऊटनपेन से एक ही रेषा में एक कमान निकाली। वह एक धनुष्य था। श्री आप्टे ने यह कल्पना एकदम पसद की। उसी से आज धनुष्याकृति बनी कमान हम देखते हैं। पूजनीय श्री गुरुजी के अनेक मित्र अन्यधर्मीय थे। नागपुर के एडवोकेट शमदाद अली उनमें से एक। श्री गुरुजी से मिलने वे सघ । कार्यालय पधारे। उनकी आँखों में पीडा थी। श्री गुरुजी ने उनके उपचार की व्यवस्था सीतापुर में करा दी। नागपुर मे ही श्री जाल पी गिमी, श्री । डी पी आर कासद, श्री बैरामा जी आदि पारसी लोगों से उनके स्नेहपूर्ण सबध थे। श्री जाल पी गिमी तो विजयादशमी पर श्री गुरुजी को सोना देने आते थे। प्रोफेसर जिलानी से भी उनके अच्छे सबध थे। पूजनीय डाक्टर हेडगेवार जी के स्मृतिमदिर के निर्माण हेतु जोधपुर और मकराणा से पत्थर तो लाया गया, पर कारीगर कहाँ से आते? उन कठिन पत्थरों पर काम करने के लिए सोलापुर के वडार कारीगर तैयार नहीं थे। श्री बाळासाहेब इसपर राजस्थान गए और उन्होंने जानकारी प्राप्त की। इस काम के लिए एक ठेकेदार हकीमभाई की नियुक्ति की। पूजनीय गुरुजी ने उसे खुशी से सम्मति दी। हकीमभाई नागपुर में दो वर्ष रहे। अपनी प्रत्येक भेंट में श्री गुरुजी उनकी तथा उनके २०-२२ लोगों की पूछताछ करते। उसी समय उषा भार्गव काड पर जबलपुर में उपद्रव हुआ। नागपुर के कुछ लोगों ने हकीमभाई के लोगों को डर दिखाया। १-२ तो राजस्थान लौट गए, पर बाकी को हकीमभाई ने श्री गुरुजी का नाम बताकर रोक लिया। काम पूरा करा लिया। एक-दो बार इन सभी कारीगरों का चायपान भी श्री गुरुजी के साथ कार्यालय में हुआ। वे सभी विश्वास श्रीगुरुजी समय खड १२ ।
(पुणेतरुण भारत श्रीगुरुणीश्रवामि विशेषाद) - उसकी कार्यालय का एक पुराना रसोइया, जो अब लगभग व्यवस्थापक 'परममित्र पडित मगलप्रसाद मिश्र, सप्रेम नमस्ते।' यह पढकर मगलप्रसाद करते। किसी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा तो उससे मिलने उसके कम में जाते। उसकी व्यवस्था, औषधोपचार ठीक है या नहीं, इसपर ध्यान से काम में जुटे रहे। स्मृतिमदिर का काम पूर्ण होने पर श्री हकीमभाई के आग्रह पर श्री गुरुजी ने एक प्रमाणपत्र अपने हाथों लिखकर उन्हें दिया। हकीमभाई ने वह फ्रेम कर रखा है। इसके बाद श्री गुरुजी का राजस्थान में जब-जव प्रवास होता, उस क्षेत्र में रहे तो हकीम भाई सघ की काली । टोपी पहनकर उपस्थित रहे। नागपुर के सघ कार्यालय में 'नारायण चापके' नामक एक चर्मकार नियमित रूप से दोपहर को आता है। जूते-चप्पल, दुरुस्ती का काम हो तो वह करता है। दिनभर घूम-घूम कर थकने से कार्यालय की छाँह में विश्राति लेता है। उनका यह क्रम १५-२० वर्षों से है। पूछताछ करना गुरुजी कभी नही भूले। पूजनीय गुरुजी के निधन की समाचार सुनकर वह बेचैन हो गया। अश्रुपूर्ण नेत्रों से गुरुजी को श्रद्धाजलि अर्पण करने ६ तारीख को कार्यालय में आया, वह दृश्य देखने लायक था। है- मगलप्रसाद से गुरुजी के अत्यत निकट के सबंध थे। अतिम दो माह मे गुरुजी के पथ्य और भोजन की व्यवस्था मगलप्रसाद पर थी, वह उसने अत्यत चोखे ढंग से रखी। गुरुजी की प्राणज्योत शात हुई तो वह अत्यत उदास हो गया, अभी भी हमेशा की मन स्थिति में नहीं है। मगलप्रसाद के कामकाजी भाई के देहात का समाचार गुरुजी मिला, तो उन्होंने शोक सवेदना का पत्र लिखा था। उसका प्रारभ था- का हृदय भर आया था। कार्यालय के कार्यकर्ता ही नहीं तो छात्रों, नौकरों की पूछताछ देते। ऐसे, वे सबके अपने थे। उनके साथ रहते हुए कभी लगता ही नहीं था कि वे इतने बडे सगठन के प्रमुख हैं। उनके व्यवहार के कारण वे सबके अपने थे। को -- वे श्रीपुरूजीसमय अड १२ है । -- - -- - २० जागरूकदूरदर्शिता (श्री प्रकाशवीर शास्त्री, राजनेता) राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसघचालक माननीय श्री गुरुजी तेजस्वी दूरदर्शी तथा तपस्वी राष्ट्रनेता थे। उनका व्यक्तित्व चमत्कारी तथा कृतित्व प्रेरणादायक था। उनोंने सघ के सरसंघचालक के रूप में पूरे ३३ वर्षों तक हिंदू समाज व राष्ट्र की जो सेवा की वह भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अकित रहेगी। भारत विभाजन के दौरान श्री गुरुजी के तेजस्वी व कुशल नेतृत्व में सघ के स्वयसेवकों ने पजाब, दिल्ली में जान पर । खेलकर भी लाखों निरीर नर-नारियों की आततायियों से जिस प्रकार रक्षा की तथा दिल्ली व अन्य नगरों को अराष्ट्रीय तत्वों के पड्यन से ध्वस्त होने । से यचाया, उससे सघ के राष्ट्रप्रेम व साहस का ज्वलत प्रमाण मिलता है। • दिल्ली को आग में स्वाहा होने से बचाने का श्रेय श्री वसतराव ओक तथा अन्य स्वयसेवकों को है, यह सरदार पटेल तक ने स्वीकार किया था। श्री गुरुजी से भेंट करने, उनके साथ भोजन करने तथा उनके हास्य-विनोद में शामिल होने का मुझे अनेक वार सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी विनम्रता, निरहकारिता, स्नेह तथा तपस्वी जीवन बरबस ही दूसरे को अपना बना लेने की अपूर्व क्षमता रखते थे। उनके ऋपियों जैसे व्यक्तित्व में एक अजीव आकर्षण था तथा उनके दर्शन करते ही बरबस सिर श्रद्धा से उनके घरणों में झुक जाता था। बडे-बडे नेताओं से लेकर प्रधानमनी श्री लालवहादुर शास्त्री तक को मैंने उनके समक्ष नतमस्तक होते स्वय अपनी आँखों से देखा था। सन् १९६५ में पाकिस्तान के आक्रमण के समय प्रधानमत्री श्री लालवहादुर शास्त्री ने पहली बार भेदभाव को त्याग कर सभी राष्ट्रवादी दलों के नेताओं को राष्ट्र पर आए सकट के मुकाबले में सहयोग व सुझाव देने के लिए आमनित कर एक स्वस्थ परपरा का शुभारभ किया। उस बैठक में श्री गुरुजी को भी आमंत्रित किया गया तो कम्युनिस्टों तथा अन्य तत्त्वों ने दवेला मचाने का भरसक प्रयास किया, कितु श्री लालबहादुर जी ने स्पष्ट रूप से यह कह कर कि सबकी राष्ट्रभक्ति असदिग्ध है, विरोध करनेवालों का मुँह वद कर दिया था। उस बैटक में मुझे श्री गुरुजी में तेजस्वी व राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत व्यक्तित्व की झलक देखने को मिली थी। श्री अन्नादुराई के प्रेरक भाषण श्रीगुरुजी समय खड १२ {६३) ।
आशा व प्रेरणा से फूल उठे थे। मैंने देखा कि श्री लालबहादुर शास्त्री जी समाए थे। इसके बाद सघ के स्वयसेवकों ने जिस प्रकार युद्ध में सहयोग एक दिन मुझे श्री गुरुजी से भेंट का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री गुरुजी देश चेतावनी देश को दे दी थी तथा भारत को सैनिक दृष्टि से तेजी से तैयारी भेंट के दौरान जब मैंने उनकी दूरदर्शिता के विषय में कहा, तब उन्होंने गभीर होकर कहा कि 'इस देश के शासक आज भी तटस्थता का राग अलापने में लगे हुए हैं। गगा के तट पर पडा तिनका अपने को तटस्थ कहे तो यह उसका व्यर्थ का ही अहकार है। जल के एक झोंके से उसका तो वह अवश्य बडी-बडी आँधियों के वेग को सहन करने की क्षमता रखता मुजे द्वारा स्थापित स्कृल की तरह देशभर में सैन्य शिक्षा देने वाले विद्यालयों के बाद श्री गुरुजी ने केवल चद शब्दों में उपस्थित सभी नेताओं को स्तव्य कर दिया था। उन्ोंने कहा था- 'जव देश के विभाजा के समय अधकार की घटाएँ छाई हुई थी, तव सघ ने राष्ट्र व समाज की रक्षा के रूप में दीपक जलाकर उस घार अधकार में प्रकाश की किरणें फैलाने का प्रयास किया था। अनेक स्वयसेवकों ने अपने प्राण देकर भी समाजवधुओं के प्राणों की रक्षा की थी। आज हम पुन राष्ट्र पर हुए आक्रमण के प्रतिकार के लिए जी जान से तत्पर हैं। जिस मोर्चे पर खडा होने को कोई उद्यत न हो, उसपर मैं आर स्वयसेवक आपको तैयार खडे मिलेंगे।' उनके उपर्युक्त वाक्य सुनकर उपस्थित सभी नेताओं के हत्य स्वय उस तपस्वी नेता के अत करण के उन उद्गारों को सुनकर फूले न दिया, ट्रैफिक व्यवस्था से लेकर रक्तदान तक में बढ-चढकर भाग लिया, वह किसी से छिपा नहीं है। सन् १९६२ में चीन ने भारत पर आक्रमण किया था, उसी दौरान करने का आह्वान किया था। यह अहकार छूमतर हो जाएगा। हाँ, यदि कोई पहाड कहे कि मैं तटस्थ हूँ है। अत उसका कथन ठीक है।' कहने का अर्थ यही है कि श्री गुरुजी तटस्थता की नीति को समर्थ व शक्तिशाली होने के बाद ही सार्थक मानते थे। धर्मवीर डा मुजे व वीर सावरकर की तरह वे भारत के सैनिकीकरण के प्रवल समर्थक थे। वे डा. श्रीशुरुजी समग्र खड १२ ।
है - । - - । की स्थापना के आकाक्षी थे। श्री गुरुजी देश को कम्युनिस्ट तानाशाही के खतरे से बचाने के : लिए चितित रहते थे। वे जहाँ अमरीका के भारत पर सास्कृतिक आक्रमण को भीषण खतरा समझते थे, वहाँ कम्युनिस्ट देशों के सकेत पर देश को । खून में डुवो डालने के कम्युनिस्ट कुचक्र के खतरे से भी पूरी तरह सावधान थे। प्रजातन की सफलता के लिए वे एक स्वस्थ व सबल विरोध पक्ष की । आवश्यकता अनुभव करते थे। सन् १६६६ में दिल्ली में लाला हसराज गुप्त के निवास स्थान पर मुझे श्री रघुवीर सिर शास्त्री तथा श्री शिवकुमार शास्त्री के साथ जाकर उनसे काफी देर तक विचार-विनिमय का अवसर प्राप्त हुआ। मैंने देखा कि । चे स्वय इस बात के आकाक्षी थे कि भारत के प्रति पूर्ण निष्ठा रखनेवाले सभी दल एक सशक्त शालीन व स्वस्थ विरोध पक्ष के रूप में उभर कर सामने आएँ। क्योंकि वे स्वय राजनीति से अलिप्त थे, अत इस कार्य में सक्रिय भाग ले नहीं सकते थे। श्री गुरुजी का विनोदपूर्ण स्वभाव ही उनके स्वास्थ्य, सफलता तथा कर्मठता का रहस्य था। वे बड़ों के साथ वडों जैसी बातें करते, तो बच्चों में वैटकर बच्चे का स्वरूप धारण कर लेते थे। एक बार इदौर में आयोजित आर्यसमाज के सम्मेलन में भाग लेने गया, तब पता चला कि श्री गुरुजी, प रामनारायण जी शास्त्री के यहाँ विराजमान है। मैं उनके दर्शनों का मोह न छोड पाया तथा वहाँ जा पहुंचा। मैंने हँसी मजाक के बीच कह दिया- 'शास्त्रों में वैद्य के नमक को अच्छा नहीं कहा गया है। वे मेरे कथन को सुनकर ठहाका लगाकर हॅस पडे तथा तपाक से बोले 'वैद्य, डाक्टरों व शमशान की सगत से जीवन के प्रति मोह व भय कम होता है, यह भी तो शास्त्रों में कहा गया हैं। मैं उनके प्रत्युत्तर को सुनकर अवाक् रह गया। वे अत्यत कुशल हाजिरजवाब थे। श्री गुरुजी आज हमारे बीच नहीं हैं, कितु राष्ट्र व हिदू समाज की रक्षा व सेवा के लिए सघ के रूप में जो वरदान वे छोड गए हैं, वह सदैव उनके लक्ष्य पर चलकर सफलता प्राप्त करता रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। वे राष्ट्रपुरुप थे तथा राष्ट्र उनसे सदा प्रेरणा ही लेता रहेगा। (पाचजन्य पशुलाई १९७३) श्रीगुरुजीसमय खड १२ {६५) A प्रारभिक बातचीत से ही मैंने उनके व्यक्तित्व के विषय में बहुत कुछ जान सादी डाक्टरी भाषा में कहा- 'आपकी दशा से कैन्सर की सभावना का संदेह हो रहा है। इसका ठीक पता लगाने और चिकित्सा हेतु शल्यक्रिया २१ एक्सरे एकरोगीका (डा प्रफुल्ल वी देसाई, मुबई, कैन्सर रोग विशेषज्ञ) आज से ठीक ३ वर्ष पूर्व एक वर्ष आँधी वाली रात को मेरे एक सहयोगी ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या श्री गुरुजी गोळवलकर की डाक्टरी परीक्षा करने का समय दे सकता हूँ। अगले प्रात में उन्हें देखने चल दिया। कार की गति के साथ ही अनेक विचार भी मेरे मस्तिष्क में दौड़ रहे थे। हमने गोळवलकर जी के वारे में बहुत पढा और सुना था। हमें मालूम था कि उन्हें अपनी मान्यताओं के प्रति अटूट आस्था है तथा उनकी मान्यताएँ हिंदूराष्ट्र एव हिंदुत्व पर दृढ व अचल हैं और यह कि इस संबंध में ये बहुत ही कट्टरपयी एव सकुचित हैं। मैं इस अतिम विषय में कितना गलत था यह बाद में पती चला। यही कारण था कि में दर्शन करने को उत्सुक था और मैं सोच रहा था कि चिकित्सा के विषय में आश्वस्त करने में आज एक विकट व्यक्ति का सामना करना पडेगा। उनका निर्बल और कृश शरीर उनके विषय में मेरी पूर्व जानकारी और कल्पना तथा धारणा के बिलकुल विपरीत था। पहली ही भेंट में मुझे पता चल गया कि मैं एक गभीर दृष्टि थाने ज्ञानेच्छुक व्यक्ति के सामने हूँ। वह व्यक्ति तशील है, विनम्र है, प्रबुद्ध है और दूसरे पक्ष के दृष्टिकोण को सुन सकता है, उन्हें समझ सकता है। -- लिया। 'तो डाक्टर, मेरे रोग के विषय में आपका क्या विचार है?" उन्होंने शुद्ध हिंदी में प्रश्न किया। उनकी तरह शुद्ध हिंदी में बोलने का अभ्यास न होने से मैंने सीधी आवश्यक होगी। मेरे इस निदान से वे जरा भी नहीं घबराए जैसा कि आमतौर पर साधारण आदमियों के साथ होता है। कुछ पल सोचकर गुरुजी ने कहा- 'यदि कैन्सर ही है तो मेरी राय श्रीगुरुजीसमय अठ १२ - . में उसे यों ही रहने दें। अच्छा, डाक्टर क्या आपको आशा है कि आप उसे ठीक कर लेंगे?' उन्हें इस रोग और मानव शरीर पर उसके कुप्रभावों का पूरा ज्ञान था। 'क्या यह अन्यत्र भी पहुंच गया है?' उनका अगला प्रश्न था । उनके जैसे प्रवुद्ध व्यक्ति को आश्वस्त करने के लिए मुझे तत्काल उत्तर देना था। मैंने कहा, 'यह अपनी राय की बात है। लेकिन इसे यों ही छोड दिया जाए, इससे मैं सहमत नहीं हूँ। कैन्सर से निरोग होना इस पर र निर्भर है कि रोग कितना व्यापक है। इसका पता आपरेशन से ही चल सकेगा और उसके बाद ही चिकित्सा का प्रकार निश्चित किया जाएगा। 7 इसको यों ही छोड़ देना किसी जलपोत को हिमखडों की तरफ बढते हुए 1 छोड देने के समान होगा। आपकी चिकित्सा करना, स्थिति को सँभालना " हो तो, अर्थात् प्रत्यक्ष सकट से आपको दूर ले जाना होगा। अभी यह । अन्यत्र नहीं फैला है, कितु कितना है, इसका पता आपरेशन से ही चलेगा।' गुरुजी ने स्थिति समझ ली और वे चुप हो गए। शायद विचारमग्न या आत्मदर्शन करने लगे थे। लम्बी चुप्पी के बाद वै बोले- 'अब तो मुझे में आपरेशन कराना ही होगा। उन्होंने धीरता से कहा। उसके बाद वे जैसे । अपने विचारों को स्वर देने लगे। अनेक लोगों से मिलना, कार्यक्रम, . उत्तरदायित्व, प्रवास आदि जिनकी योजना वे बना चुके थे, के बारे में निर्णय लेना था। उनके साथियों तथा सचिव को आवश्यक आदेश भेज दिए 1 गए। गुरुजी ३० जून १६७० को अस्पताल में भर्ती हो गए और १ जुलाई १६७० को कैन्सर का आपरेशन कर दिया गया। इस पहली भेंट में ही उनके गरिमामय व्यक्तित्व की अनेक विशेषताएँ उजागर हो गई थीं। ज्ञान और विज्ञान को स्वीकार करने की उनकी इच्छा का पता चल गया था। अपनी शारीरिक दशा के विषय में जानकारी प्राप्त करने हेतु उन्होंने कुछ प्रश्न किए थे। उनकी यह आतुरता उनके मस्तिष्क की अतर्भेदी दृष्टि की द्योतक थी। विषम स्थिति का सामना करने के उनके साहस का परिचायक थी। उनके धैर्य, दूरदर्शिता और अपने काम के प्रति निष्ठा का अगाध प्रमाण थी। मैंने उनसे कहा था कि आप इससे मुक्त होंगे तो भविष्य में आपके कार्य में बाधा नहीं पडेगी। इसके उपरात उन्होंने तर्क नहीं किया था। श्रीगुरुजी समय खड १२ {६७) ह - 뾰 - जानना चाहते थे। मैंने आपरेशन के सात दिन बाद गुरुजी मुबई के उपनगर की एक सभा उनके व्यक्तित्व की पूर्ण मीमासा करने के लिए कोई भी विशेषण उचित और उपयुक्त नहीं लगता। वे एक दार्शनिक व गहन अध्ययनकर्ता विज्ञान परमावश्यक है।' यह सुनकर मुझे सचमुच आश्चर्य हुआ था, क्योंकि यह शब्द एक अगाध धार्मिक आस्थावाले व्यक्तित्व ने कहे थे। वे उन लोगों में से नहीं थे जो अपना दर्शन और अपनी आस्था दूसरों पर थोपते हैं। ६५ वर्ष की आयु होने पर भी उन्होंने शल्यक्रिया के बाद ही अनुकूल लक्षण प्रस्तुत किए थे। आपरेशन के अगले दिन वह उठ बैठे थे और चलने-फिरने लगे थे। अस्पताल में उनके तीन हफ्ते के निवास ने मुये उनके मन और व्यक्तित्व का अध्ययन करने का काफी लया अवसर प्रदान किया था। उनसे हुई अनेक भेटवार्ताएँ मेरे जैसे आदमी के लिए ज्ञानवर्धन का माध्यम सिद्ध हुई। उनके अतरित्र को स्पष्ट करनेवाली कुछ घटनाए मैं नीचे दे रहा हूँ। वे अपने रोग की गभीरता एव व्यापकता के विषय में पूर्ण जानकारी और अपने जीवन की सभावना के बारे सत्य को उनसे छिपाया नहीं था। सभी बातें साफ-साफ बता दी थीं। 'ओह! तव तो ठीक है।' उन्होंने कहा था- 'इतने दिन बहुत हैं और मेरे पास इतने दिनों के हेतु काफी काम हैं।" में गए। उन्होंने वहाँ जाने की आज्ञा डॉक्टरों से ले ली थी। मैंने उनसे कहा था कि मैं आपको चला जाने दूंगा वशर्ते आप भाग न जाएँ। इस पर उन्होंने यह कह कर अपनी विनोदप्रियता का परिचय दिया था कि- 'क्या मैं चोर-उचक्का लगता हूँ?" जितने दिन वे अस्पताल में रहे, वहाँ विनोद और खुशी वातावरण छाया रहा। थे। मानव, पदार्थ, घटनाक्रम का अपरिसीम ज्ञान उन्हें था। विचारधारा में विज्ञान, धर्म और सस्कृति का समान समावेश था। एक दिन उन्होंने कहा था- 'मानव के प्रत्येक विकास के लिए । का - उनकी उन्होंने कितु वे अपनी मान्यताओं और कथनी के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे। कहा था- 'जो मेरी दृष्टि में सत्य और न्यायपूर्ण है, मैं उसके लिए हमेशा प्रयत्नशील रहा हूँ और रहूँगा। यही एक वाक्य उनकी अतर्भावना और साहस का सक्षिप्त परिचय - ra श्रीशुरुजीसमय खड १२ -- क मृत्यु + था और इस प्रश्न का उत्तर भी था कि उनके अधिक अनुयायी क्यों हैं। गुरुजी अस्पताल के अल्पकालीन निवास में भी अपना सारा कार्य कर रहे थे। आपरेशन के बाद की गई चिकित्सा भी उनके अनुकूल रही। थी। अस्पताल आने की पूर्व सध्या को उन्होंने कहा था कि 'मनुष्य को की चिता नहीं करनी चाहिए। सभी को भरना होगा। जीवन की अवधि नहीं, उसकी उपयोगिता का महत्त्व होता है। मेरे सामने एक लक्ष्य है और । मैं चाहता हूँ कि अतिम श्वास तक में उसके हेतु प्रयत्नशील रह सकूँ।' ! मुझे तब ऐसा लगा था कि वे एक ऐसे पुरुप हैं, जो अपना काम पूरा कर लेने के लिए बहुत ही आतुर हैं। वाद के दो वर्ष वे बहुत ही स्वस्थ्य और कर्मण्य रहे थे। मेरी आशा के विपरीत उनका जीवन बहुत आगे तक चलता रहा। उनके रोग की गभीरता के कारण में उनके अपरिहार्य अत के प्रति बहुत भयाक्रात था। वे एक उल्लेखनीय और बहुत ही सहज रोगी थे। जब भी मुबई आते थे, परीक्षण के लिए अस्पताल आया करते थे। एकयार मैंने पूछा- 'युवा पुरुष के क्या हाल हैं?' 'दिन पर दिन युवा होता जा रहा है, उन्होंने उत्तर दिया था। समय किसी को नहीं छोडता अतएव उसने गुरुजी को भी नहीं छोडा । इस वर्ष फरवरी या मार्च से उन्हें फिर कष्ट होने लगा था। यद्यपि वे कार्यशील थे, परतु मृत्यु की छाया उनके निकट आती जा रही थी। अप्रैल में लिए गए एक्स-रे से पता चला था कि रोग अत्यत गभीर हो गया है। उसके बाद के घटनाक्रम को और लिखने को अब शेष ही क्या बचा इस आलेख का यह उद्देश्य नहीं है कि गुरुजी को मृत्यूपरात उस रूप में दर्शाया जाए, जो वे जीवन में नहीं थे। वह व्यक्ति, जिसने एक भयकर रोग के शारीरिक और मानसिक आघात का धीरज और साहस से सामना किया, वह व्यक्ति, अपने देश के हेतु जिसकी मान्यताएँ और आस्थाएँ निष्ठापूर्ण थी, जो उन आस्थाओं से कभी डिगा नहीं, वह व्यक्ति, जो शरीर से दुर्बल और कृश था, कितु जिसमें अखड अथाह क्रियाशीलता थी, जिसमें अनुशासन था, आगे बढने की आतुरता थी, वह व्यक्ति जिसने गलत को सही राह पर लाने के लिए अथक प्रयास किया, वह थे-- गुरुजी गोळवलकर। श्रीशुरुषी समय खड १२ नहीं। एक कमडलु, एक वस्त्र- यही उनका सग्रह था। परिव्राजक सन्यासी (पाधणज्य भाई है, जहाँ पर वे प्रकट होते हैं। वे किसी एक देश के, किसी एक जाति के नही होते, वे ससार की एक सार्वजनिक निधि होते है। हमारे गोलवलकरजी ऐसे ही महापुरुषों में थे। ऐसे पुण्यश्लोक पुरुष अवनि के अद्वितीय आभूषण होते हैं। गोळवलकर जी धर्मात्मा थे। वे सतत मानवधर्म का पालन करते थे, नित्य नियम से सन्ध्यावदन किया करते थे, धर्म के जो धृतिक्षमानि है, उनसे वे बड़ी सावधानी से बचे रहते थे। हम लोग जो अपने को में रहते हुए भी इन सबसे सर्वथा दूर ही बने रहते थे। राष्ट्रीय स्वयसेवक कितु उस सस्था के प्रति उनको मोह नहीं था। मोह तो उनको किसी से नहीं था। किसी ने एक लक्ष रुपए उन्हें दिए और कह दिया- 'आप इसे चाहें जिस कार्य में व्यय कर दें।' यद्यपि सघ उस समय आर्थिक सकट में था, कितु उन्होंने कहा- 'अमुक स्वामी जी की सस्था को आर्थिक सहायता की आवश्यकता है, उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, ये रुपए उन्ही की कभी एक पैसा रखना नहीं, किसी से याचना नहीं, कोई संग्रह बडे दुख की बात है कि वह व्यक्ति अव हमारे बीच नहीं हैं, फितु मुझे इस बात का गर्व है कि थोडे समय के लिए ही सही मैं उन्हें पहचान सका था। मुझे प्रसन्नता है कि ऐसे व्यक्तित्व के चरण इस धरती पर पडे थे। २२ वास्तविकसन्यासी (सत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी) ऐसे युगपुरुष कभी-कभी ही प्रादुर्भूत होते हैं। वे जिस कुल में प्रकट होते हैं, उस कुल को पावन बना जाते है। जिन माता-पिता से पैर होते हैं, उन्हें कृतार्थ कर जाते हैं। वह वसुधरा परम भाग्यवती बन जाती दश लक्षण हैं, उनका वे सहज भाव से पालन करते थे। पद, प्रतिष्ठा, पैसा, प्रमदा तथा कीर्ति जो लोकधर्म तथा जैव धर्म साधु-सत कहते हैं, गृहत्यागी होने पर भी मठ, मदिर, आश्रम, पैसा, प्रतिष्ठा के घगुल में किसी-न-किसी प्रकार फँसे ही रहते हैं। कितु ये घर सघ के सरसंघचालक बनकर सतत इस सस्था की सेवा में सलग्न रहते सस्था में लगा दिए जाएँ।' -- श्रीशुरुषी समन खड १२ -- 1 की भाँति पूरे भारतवर्ष की एक वर्ष में दो परिक्रमाएँ करते रहना, यही तीस । - वर्षों तक उनका व्यापार था। सन्यासी की भाँति जिसके घर ठहरे, जो भी, जैसा भी भोजन मिल गया, उसी पर निर्वाह । मान, प्रतिष्ठा, प्रशसा से बहुत । दूर। एक दिन मुझसे बोले- 'महाराजजी, लोग समझते हैं कि मैं राष्ट्रपति बनने के लिए ऐसा सगठन कर रहा हूँ। मैं तो जीवन में कोई पद स्वीकार करनेवाला नहीं, ऐसा ही फक्कड बना रहूँगा।' सो वे जैसे सघ में प्रविष्ट हुए, वैसे के वैसे ही चले गए। जैसी चद्दर ओढी थी, उसे बिना मैली किए उतारकर रख गए। साधु पुरुषों के प्रति आस्था के कारण नाममात्र के वेशधारी साधु को भी वे सबके सम्मुख प्रणाम करते थे। मैं तो नगण्य हूँ, फिर भी वे मेरा अत्यधिक आदर करते, सबके सम्मुख साप्टाग प्रणाम करते, यह उनकी महानता थी। आदर करनेवाला आदरणीय से श्रेप्ट होता है। कामतृष्णा तो उनके समीप फटकने नहीं पाती थी, न घर की कामना, न परिवार की कामना, न धन-कामना, न लोकेषणा की कामना। नागपुर में में उनके घर पर गया हूँ। एक दृटा-फूटा-सा निर्धनों का-सा किराए का घर था। केवल माता-पिता थे, न भाई, न बहन, न कोई सगा सबधी। माता-पिता के सतोपार्थ घर से सवध रखते थे। प्रतिदिन ताई, भाऊजी से मिलने जाते थे। माता-पिता परम सात्विक भोले-भाले। तीर्थयात्रा प्रसग में वे हमारे आश्रम में आए थे। में भी उनके घर गया था। उस घर को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह इतने ख्यातनाम महापुरुष का घर है। माता-पिता जय तक जीवित रहे, उस घर से सबधित रहे। उनके देहात के पश्चात् सघ-कायालय का एक कोना यही उनका निवास, कार्यालय तथा सब कुछ था। त्याग की वे सजीव साकार मूर्ति थे। दूसरों के दोप वे न देखते न सुनते थे। मैंने जब नेहरू जी के विरुद्ध चुनाव लड़ा, उसके पश्चात् वे आश्रम में आए। एक पडित ने श्लोकों द्वारा यह बताया कि 'नेहरू जी ने कश्मीरी लडकियों का नारी-कवच बनाकर विजय प्राप्त की।' इसे सुनकर उन्होंने अप्रसन्नता प्रकट की। वे किसी की भी निदा सुनना नहीं चाहते थे। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य जनताजनार्दन की, असगठित, अपने लक्ष्य से च्युत हिदूसमाज की सेवा करना ही था। वे सतत सेवा में ही सलग्न रहते। अपने तन-मन से जिसकी भी जितनी सेवा हो जाए श्रीगुरुजी समय खठ १२ {७१) - ।
उनकी दशा अधिक समय बैठने योग्य नहीं थी। मैं सप्ताह सुनाता प्रतिनिधि बनाकर यहाँ अँसी के सकीर्तन भवन में ही उनकी परलोकगत आत्मा की शाति हेतु सप्ताह सुनाया। इन गुणों के कारण मुझे ऐसा लगा कि श्रीमद्भागवत माहात्म्य में गोकर्णजी ने अपने पिता आत्मदेव को जो यह उपदेश दिया था कि 'पिताजी तुम धमे का सतत आचरण करो, लोकधर्मों को छोडो, साधु पुरुषों का सत्सग करो, कामतृष्णा को त्यागौ। अन्य पुरुष के दोषों का तथा गुणों का मन से भी चितन न करके सेवा-कथारूपी रस डा हेडगेवार जी ने हिदू-समाज के हितार्थ राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का वीज बोया था। वह बीज पूरा अकुरित भी नहीं हुआ था, तभी दे अल्पायु में ही उस अकुर को गुरुजी गोळवलकर को सौंपकर चल बसे। उस फल की इच्छा कभी न करना, याद करके वे भी फल का विना उतनी ही करने को वे सदा सनद्ध राते। सेवा से समय निकालकर वे भगवद्गीता आदि धार्मिक ग्रयों को अध्ययन करते। में पहले उन्हें सेवापरायण एक सार्वजनिक नेता ही समझना था। जव पाँच दिन श्रीवदीनाथजी में मैंने उने भागवत चरित की अमानत की कथा सुनाई, तब मुझे पता चला उनका हृदय तो भगवद्भक्ति से ओतप्रोत है। पाँच दिनों तक में जितनी भी देर कथा सुनाता, उनके नेत्रों से अविरल अश्रु प्रवाहित होते रहते। ऐसा श्रोता तो जीवन में मुझे दृसर नही मिला। मैं उन्हें पूरा सप्ताह सुनाना चाहता था, कितु उन्हें अपकार कहाँ? रुग्णावस्था में मैंने लिखा, 'मैं आपको सप्ताह सुनाना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा- 'महाराजजी! आप तो स्वय शुकदेवजी के स्वरूप है, कि मैं परीक्षित की भाँति तो नहीं हूँ। आप मुझे सुनाने की कृपा करेंगे, तो यह सब प्रवध आपकी इच्छानुसार हो जाएगा।' तो चाहे जैसे हो, वे बैठते अवश्य । इससे सेवक मन-ही-मन मुझसे क्रुज होते। इससे मैं नागपुर नहीं गया। कह दिया, 'आप स्वस्थ हो जाएँगे, तब सुनाऊँगा'। सो वे बीच में ही चल बसे। तब मैंने रज्जूभैय्या को उनक का निरतर पान करते रहो,' यह उन पर स्पष्ट दिखाई पडा। समय गोळवलकर जी की अल्पायु ही थी वे केवल ३०-३२ वर्ष के युदर थे। कितु उन्होंने उस अकुर को बढ़ाया, उसका विस्तार किया। पल्लवित, पुष्पित बनकर जब फल देने लगा, तभी गीता के इस श्लोक 'मा फलेषु कदावन उपयोग किए ही चल बसे। -- } श्रीगुरूवी समय खड १२ हमारे पास तो १००-५० ही विद्यार्थी रहते हैं। उनमें से शायद ही कोई हमारी बात मानने को तत्पर हो। कितु सघ के स्वयसेवक अपना व्यय करके, अपना भोजन करके सघ की सेवा में सदा सलग्न रहते हैं। मेरे एक । साथी ने बडे आश्चर्य से कहा- 'महाराज जी। न जाने गुरुजी स्वयसेवकों को कौन-सी ऐसी औषधि पिला देते हैं कि जो सघ का स्वयसेवक हुआ, वह फिर सर्वस्व त्याग करने को उद्यत हो जाता है। कभी सघ को छोडता । ही नहीं।' । - बहुत-से त्यागी तपस्वी होते हैं, वे स्वय कितने भी महान बन जाएँ, कितु सवको अपने समान बना लें, यह अत्यत कठिन है। इसीलिए किसी कवि ने कहा है- 'पारस में अरु सत में, सत बडो करि मान। वह लोहा सोना करे, यह करे आपु समान ।।' इसीलिए भर्तृहरिजी ने कहा है 'हम उस सुवर्ण के सुमेरु पर्वत की, तथा चाँदी के कैलास पर्वत की प्रशसा क्या करें, क्योंकि इन पर्वतों के वृक्ष, वृक्ष ही बने रहते हैं। हम तो उस मलयाचल की ही प्रशसा करते हैं, उसी को धन्य मानते हैं, जिस पर उगे नीम, ककोल, कुटज जैसे वृक्ष भी चदन ही बन जाते है। कि तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा, यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव ।। मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण। ककोल-निम्ब-कुटजा अपि चन्दना स्यु ।। (नीतिशक-७५) (आरती आलोक की २४ नवबर १६८०) --- २३ साधनामय व्यक्तित्व (श्री बच्छराज व्यास, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनसघ) सन् १६३४ में मैंने प्रथम बार श्री गुरुजी का दर्शन किया था। एक बौद्धिक वर्ग में जब उनका परिचय कराया गया और वे हम स्वयसेवकों के समक्ष वक्ता के रूप में बोलने लगे, तब की स्मृति आज भी ताजी हो उठती है। प्रारभ में धीमे स्वर से और फिर क्रमश स्वर ऊँचा करते हुए और गति को तेज करते हुए वे विचार प्रकट करने लगे थे और हम लोग उनके भाषण में 'खो गए थे। श्रीगुरुजी समय खत १२ {७३) व्यक्ति की भाँति दोहराते देखा है। दक्षिण भारत के सुविख्यात उदारमतवादी १६४६ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चेन्नै शाखा के उत्सव पर आना स्वीकार करते समय कार्यकर्ताओं के सामने शर्त रखी थी कि 'आपका सुनने की आपकी तैयारी हो, तो मुझे बताइये। उत्सव में श्री गुरुजी ने शास्त्रीजी इतने प्रभावित हो चुके थे कि उनके भाषण में वही विचार बरबस आज देशभर में श्री गुरुजी राष्ट्रीय विचारधारा हिंदुत्व के प्रखर और प्रभावी विचारक और मार्गदर्शक माने जाते हैं। उनका सतत प्रवास, उसी वर्ष ये राष्ट्रीय म्ययंसेयफ संघ यी पागपुर में तुलसीना में चतोवाली केंद्र-सघशाया के कार्यवार रियुक्त हुए थे। सघ के स्वयसपा में तय उपका काशी विश्वविद्यालय के 7 छात्रों द्वारा दिया गया 'गुरुजी' म प्रचलित ने गया था। स्यमं ा रेडगेवार जी भी उन्हें 'गुरुजी' ही काा करते थे। यद्यपि गुरुजी उस समय एक संघ शाया के कार्यवार मान थे। विश्व हिंदू परिषद के प्रयाग अधिवेशा के अतिम दिन श्री गुरु का जो भाषण हुआ, उसके प्रवाह में मो हजारों प्रतिनिधियों, जिनमें जगद्गुरु श्री शकरावार्य, कई मरामडलेश्वर और अनेक पराकोटि के विद्वान और विचारक शामित थे, को उसी तरा देखा जैसे गम सन् १६३४ के कुछ युवक कार्यकर्ता सघ के नित्यक्रम के उस बौद्धिक में वय को 'खो बैठे थे। श्री गुरुजी की वाणी में माँ सरस्वती की वीणा के तारों की हृदयस्पर्शी झकार है, भगवती दुर्गा की शनुमर्दिनी एकार है और समुद्र गाभीर्य है। सन् १६४६ के दिल्ली शाखा के वार्षिकोत्सव के प्रसग पर उनके भाषण के पश्चात् उत्सव की अध्यक्षता करते एक नामाकित वकील और प्रमुख काग्रेसी कर्णधार डा कैलासनाथ काटजू को मैंने श्री गुरुजी हिंदूराष्ट्र और उसके विजयी जीवन सवधी विचारों को सहर्ष, मत्र-मुग्ध और दुर्लभ विद्वान नेता स्वर्गीय श्री टी आर वेंकटराम शास्त्री ने सन आग्रह है तो आऊँगा अवश्य, परतु मुझे जो करना है, वही कहूँगा। उसे अति विनम्रतापूर्वक प्रारभ करके ४५ मिनट तक अपना सघ की भूमिका स्पष्ट करनेवाला थाराप्रवाह, तर्कशुद्ध और औजस्वी भाषण दिया। श्रद्धेय निकल पडे। निरतर मेहनत अनुपम कार्यशीलता और इन सबके बीच उसके चेहरे पर सदा झलक्नेवाली युवक-सुलभ, प्रफुल्ल आत्म-विश्वास की चमक किसी की श्रीगुरुजी समय खड १२ के को - १ * - यह याद ही नहीं करने देती कि अव वे युवा नहीं हैं। श्री गुरुजी का सारा जीवन गगोत्री के जल के समान पवित्र, नर्मदा के प्रवाह के समान गतियुक्त, महर्षि दधीचि के जीवन के समान त्यागपूर्ण और 'गौरीशकर' की चोटी के समान उत्तुग सिद्ध हुआ है। जिन्होंने २ वर्ष की छोटी आयु में कई सस्कृत श्लोक कठस्थ कर लिए थे, विद्यार्थी जीवन में जो 'उत्पाती' होते हुए भी 'एकपाठी' विद्यार्थियों में से रहे, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जिन्होंने अपनी विद्वत्ता, तेजस्विता और स्पष्टवादिता से 'महामना' तक को प्रभावित किया था। वे सघ के हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं को नाम से पहचाननेवाले, पुरानी पहचान को कभी न भूलनेवाले, एक बार जिससे मिले उसे सदा के लिए याद रखनेवाले, स्वयसेवकों के सुख-दुख, आशा-आकाक्षाओं से अधिकतम परिचित, सघ के शारीरिक शिक्षणक्रम की दृष्टि से सिद्धहस्त थे। अधिकारियों को सदा शका रहती है कि 'गुरुजी' की पैनी नजर से उनकी कोई भी भूल' छिप नहीं सकेगी, और बौद्धिक दृष्टि से निष्णात कार्यकताओं को भी श्री गुरुजी की उपस्थिति में भाषण देने का प्रसग आए, तो वडा अटपटा सा लगता। फिर भी हर स्वयसेवक को अथवा अधिकारी को अपने मन की बात उनसे साफ कहने में सकोच नहीं होता। श्री गुरुजी में लेखन की असामान्य प्रतिभा होते हुए भी वे 'लेखक' नहीं है। उन्हें अपने भारतव्यापी सचार में प्राय प्रतिदिन हजारों की सभा से लगाकर, ५-२५ कार्यकर्ताओं, या मिलने आए विशिष्ट व्यक्तियों से बोलना पडता है (और लोग उन्हें आज भारत में विद्यमान सर्व-प्रभावी वक्ताओं में से एक मानते भी है), कितु उन्हें 'वक्ता' कहलाना पसद नहीं। श्री गुरुजी ने हजारों नवयुवकों को घर-वार का मोह छोडकर राष्ट्रकार्य की त्यागमय साधना के मार्ग की ओर बढाया है, कितु यह भी उनकी आँखों में कोई विशेष वात, महत्त्व की बात नहीं है। वे तो स्वय को 'राष्ट्र-विषयक कसक' से अभिभूत पाते हैं और अपने शरीर को साथना में 'दिनोंदिन । घुलाने' और 'वर्षानुवर्ष जलाते-रहने' में उन्हें सहज आनद की प्राप्ति होती है। दो दशकों से भी अधिक काल से चली आ रही इस एक ही साधना का उन्होंने जिस अद्भुत ढग से और सातत्य से सचालन और । पालन किया है, उसकी मिसाल आज के भारत में तो मुझे कहीं भी दिखाई नहीं पड़ती। समुद्र के तूफान में लहरें कहीं की कहीं बह जाती है और जो उनकी चपेट में आए उसे बहा ले जाती हैं या डुबो देती हैं, कितु समुद्र का श्रीगुरुजी समय खड १२ {७५} र 1 ॥ a . कितु स्वय उनकी दृष्टि में वे सघ के एक साधारण स्वयसेवर १६३६ में पटना स्टेशन पर देखा था। गया में सघ शाखा प्रारभ। अभी ठड शुरू नहीं हुई थी। बरसात का अत था, उसी समर थोडा प्रयास करने के बाद उनको ढूँढ लिया। दाढी-बालों वाला चेहर किनारा अपना न तो स्थान छोडता है, न निश्चय। इसी प्रशर परिस्थितिनिरपेक्ष सघकार्य का सचालन, भारत की क्षण-क्षण वदना परिस्थितियों में श्री गुरुजी ने कर दिखाया है। श्री गुरुजी के जीवन का रहस्य उनकी शारीरिक व मानसिक शक्तियों से भी अधिक उनकी आध्यात्मिक शक्ति में है। वे चमत्कारों में विश्वास नहीं करते। 'गुरुडम' से उन्हें घृणा है, कितु भारत परपराप्राप्त आत्मशक्ति पर उनकी श्रद्धा है और स्वीकृत कार्य के 'ईश्वरीय' कार्य होने में उन्हें रच मात्र सदेर नहीं। और सघ सस्थापक डा हेडगेवार जी को अपना 'इष्टदेव' माननेवाले एक निष्ठावान साधक मात्र हैं। २४ सहजसकोची (श्री बबुआजी, क्षेत्र सघचालक बिहार) जहाँ तक स्मरण आता है, मैंने पहले-पहल श्री गुरुजी को स चुकी थी। उन दिनों सघ में कार्यकर्ताओं को डाक्टर हेडगेवार जी वाद जिन तीन व्यक्तियों का नाम बताया जाता था, उनमें श्री गुरुजी बाबासाहब आप्टे तथा दादाराव परमार्थ थे। कहीं से श्री गुरुजी रात की गाडी से कोलकाता जा रहे थे। स्टेशन प (युमयर्म १६ पसरी १६६६ सहज ही पहचान में आ गया। तब से लेकर अत तक उनसे मेर घनिष्ठ सपर्क रहा। वे स्वभाव से बडे ही सकोची थे। वडे-बडे कार्यक्रमों में शामिर होने, वहाँ भाषण देने, बैठकों में खुलकर बोलनेवाले नित्य के व्यवहा में सकोच से काम लेते थे। सन् १६४२ का ही प्रसग लें। जेल से रिह होने के बाद सावरकर जी मेरे घर पर ठहरे हुए थे। उसी मजिल श्रीगुरुखी समय खड । ।
दूसरे कमरे में श्री गुरुजी भी ठहरे हुए थे। उस समय तक आवाजी उनके साथ नहीं रहते थे। सावरकर जी को प्रात मेल से जाना था। श्री गुरुजी उनके कमरे में जाकर उन्हें नमस्कार करना चाहते थे। सावरकर जी के कमरे में रोशनी जल रही थी। वे प्रवास पर जाने की तैयारी में होंगे। श्री गुरुजी उनके कमरे में न जाकर तव तक बाहर खडे रहे, जय तक वे स्वयं बाहर न निकले आए। उनका मुक्त हास्य स्वयसेवकों को सदा स्मरण रहेगा। मैं भी उनकी हँसी में थोडा बहुत साथ देता रहा हूँ। सन् १६४१ में हिदू महासभा के अखिल भारतीय अधिवेशन पर बिहार सरकार ने प्रतिवथ लगा दिया था। महासभा ने प्रतिवध तोडकर सम्मेलन करने का निश्चय किया। सारे भारत से आए कार्यकर्ता गिरफ्तारियाँ दे रहे थे। सावरकर जी का भाषण पढने के कारण मुझे भी गिरफ्तार किया गया। उस समय श्री गुरुजी मुझसे मिलने जेल आए थे। मुझे देखते ही जोर से ठहाका लगाते हुए कहा-'Let me have your laugh' (अपनी मुक्त हँसी का आनद तो लेने दीजिए)। फिजूलखर्ची उन्हें विल्कुल पसद नहीं थी। नागपुर में प्रतिनिधि सभा की बैठक के लिए गया था। धैठक रेशमबाग में थी। प्रात पाँच वजे देखता क्या हूँ कि बरामदे में हल्के पावर के कई वल्ब जल रहे थे, उन सबको उन्होंने स्वय जाकर बुझाया। भोजन सवधी किसी विशिष्ट पदार्थ को बनाने के लिए उन्होने कभी नहीं कहा। में ही इस बात का ध्यान रखने का प्रयत्न करता कि उन्हें उनकी रुचि का भोजन मिल सके। वे बडे साफ-सुथरे और अच्छे ढंग से रहते थे, लेकिन उनमें पूरी सादगी थी। नागपुर में उनके बैठक । कक्ष में दरी के अलावा कभी गद्दा नहीं देखा। प्रारभ में तो उनको कई । बार साइकिल पर चलते देखा है। वे सच्चे साधु थे। उनका जीवन पूरी तरह एक सन्यासी की । तरह का था, पर उन्होंने कभी साधु का वस्त्र नहीं पहना । वे जनसाधारण की तरह ही रहते थे। इसीलिए हमें प्रभावित करते थे, हमारे अपने । m - + लगते थे। (श्रीपुरूषी जीवन प्रसा भाग १) श्रीगुरुखी समय खड १२ {७७) पहली बार आया। मैं अपने परिवार के साथ देवलाली गया था। डार वर्ग समाप्त होने के बाद डाक्टर साहब गुरुजी के साथ देवलाली आ मुझे याद है जब माननीय कृष्णराव जी मोहरील डाक्टर जी का स्थास्थ देखने नागपुर से आए, तब उन्होने कहा- 'कृष्णा, मेरी बीमारी में : करते थे) सरकार्यवाह बनाया जाए। गुरु पौर्णिमा उत्सव के समय हा उसी दिन मुझे भी नागपुर का सघचालक बनाया गया। उस इसकी घोषणा करेंगे। २५ हमारेआप्त (श्री बाबासाहेव घटाटे, नागपुर सघचालक) परम पूजनीय गुरुजी का जव स्वर्गवास हुआ, में वही उनके पान ही खडा था। आज गुरुजी नहीं हैं- केवल उनकी स्मृतियाँ ही शेष हैं। ऐसी स्मृतियाँ जिनमें पग-पग पर उनके दर्शन होते हैं। मेरा यह मीभाग्य था कि पिछले ३४ वर्षों से मेरा उनका निकट का सवध वन रहा। डाक्टर हेडगेवार जी ने मेरा उनसे परिचय कराया था। तब है लेकर पिछले ३४ वर्षों का काल बीत गया। स्मृतियाँ इतनी अधिक है कि सोच पाना भी कठिन हो रहा है कि किसे अनुक्रम दूँ। सन् १६३६ की गर्मियाँ थीं, जब गुरुजी के निकट का सपन साहब से मैने कहा था कि वे भी विश्राति हेतु यहाँ आएँ। सघ शिक्ष और करीब एक माह तक वहाँ रहे। वहीं डाक्टर जी को इन निमोनिया हो गया। गुरुजी दिन-रात उनकी सेवासुश्रुषा में जुटे रहते समय नष्ट नहीं हुआ है। संघ को एक मूल्यवान निधि प्राप्त हुई है। मैं तय कर लिया है कि माधवराव को (वे गुरुजी को माधवराव ही कर F दिन से मैं गुरुजी के निर्देशन में कार्य करता रहा। हम लोगों के वी सवध दृढतर बनते गए। उस समय तो डाक्टर साहव के शब्दों का समझ में नहीं आ पाया था कि ऐसी कौन-सी मूल्यवान निधि मिली है पर उनके देहात के पश्चात् गुरुजी ने कभी उनका (डाक्टर जी) अभा हमें खटकने नहीं दिया। डाक्टर जी के देहात से निर्माण हुई रिक्तता ३ पूर्ण रूप से उन्होंने अपने कार्य से पूर्ति कर दी थी। गुरुजी अनुशासन का कडाई से पालन करने में विश्वास रख थे। उनकी इस कडाई से कई बार बडी विचित्र स्थिति उत्पन्न होती, श्रीगुरुजीसमय खड - कई वार मनोरजक घटनाएं हो जाती। मेरे ज्येष्ठ पुत्र का व्रतवध था। डाक्टर साहब ने उसमें उपस्थित रहने की स्वीकृति दे दी थी। पर एकाएक राजगीर, जहाँ वे विश्राम हेतु गए थे, से मुझे एक पत्र मिला कि वे उपस्थित नहीं रह सकेंगे। मैं निराश हो गया। समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए गुरुजी उस समय नागपुर में थे। उन्होंने कहा- 'यदि तार भेजा जाए, तो डाक्टर साहव अवश्य आएँगे।' उन्होंने स्वय तार लिखा- your presence Imperative (आपकी उपस्थिति अनिवार्य है) तार जाते ही जवाव आया कि 'ये आ रहे हैं। जबलपुर में यदि कार की व्यवस्था हो सके तो वे समय पर नागपुर पहुँच सकेंगे। गुरुजी को जब डाक्टर साहव का उत्तर बताया गया, तब तो वे स्वय कार से जवलपुर गए और उन्हे साथ ले आए। बाद में मुझे जब यह पता चला तो मेरी बडी विचित्र स्थिति हुई कि डाक्टर साहब ने राजगीर में स्वयसेवकों को बताया कि उन्हें तार को शिरोधार्य मानना पड़ा। वे भले ही सरसघचालक हों, पर पहले एक स्वयसेवक हैं और नागपुर सघचालक के आदेश का उल्लघन कैसे करते? गुरुजी ने तार को लिखते समय डाक्टर साहव की क्या प्रतिक्रिया रहेगी, इसका बिलकुल सही-सही मूल्याकन किया था। गुरुजी स्वय भी जव मैं कुछ सुझाता मुझे यही जवाव देते थे। अपने व्यवहार से उन्होंने स्वय को अनुशासन का उच्च आदर्श प्रस्थापित किया था। श्री गुरुजी के व्यवहार की यह विशेषता थी, उनके स्वभाव का । यह अग बन चुका था कि वे कभी यह अनुभव नहीं होने देते थे कि वे एक साधारण व्यक्ति से कुछ अलग हैं, अधिक है। जवकि वे वास्तव में बहुत बडे थे। जब हम दोनों ही जेल में रहे थे मैं उनके पूर्व स्नान कर लेता था। पहले दिन मेरे गीले कपडे पूजा कर लेने के बाद धोने के लिए पड़े रहे। पर जब पूजा खत्म कर स्नानगृह मे गया तो चकित रह गया। गुरुजी ने मेरे कपडे धो डाले थे। जब मैंने इसका विरोध किया तो वे बोले- 'इससे क्या फर्क पडता है। हम दोनों को यहाँ काम ही क्या करना पड़ता है?' दूसरे दिन से मैं पूजा के पूर्व ही कपड़े धोने लगा। श्रीगुरुजी समय खड १२ {७६} - ।
डा मुजे की प्रतिमा का अनावरण बारे में इतनी बारीक जानकारी रखता हो। तत्त्वज्ञान, धर्म, राजनीत, | रुचि ली थी। समारोह समिति के लोग जनरल करिअप्पा के साथ वे जलेबी कैसे बनी इसकी जानकारी पूछ रहे थे। गुरुजी जनरल को लेकर रसोईघर में ही पहुँच गए। यही नहीं उन्होंने जलेबी कैसे बनती है, उसकी सारी क्रिया भी उन्हें समझाई। यह सब समझाने के बाद वे मेरी ओर मुडे और मुझसे पूछा 'ठीक है न। मैने अपनी हँसी के बीच दुनिया के लिए वे एक महान सामाजिक कार्यकर्ता थे। एक अनुशासित सगठन राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ के सर्वोच्च अधिकारी थे पर मेरे लिए वे मेरे परिवार के एक अविभाज्य अग थे। मेरे परिवार के भाँति-भाँति के प्रश्न कर परेशान करते, पर वे शाति से उनका समाधान करते। बच्चो के लिए उनके पास हमेशा समय रहता और बच्चे इस अपने अतिम दिनों में उन्होंने मेरे पुत्र से, पीएच डी का प्रया उनकी मृत्यु से एक महान देशभक्त, एक कर्मयोगी का अत। गया, पर मेरे परिवार का सदस्य खो गया। मेरे लिए यह कल्पना, गुरुजी की यह विशेषता ही थी कि वे प्रथम वार के सपर्क में ही लोगों को जीत लेते थे और लोग उनकी ओर आकर्षित हो जाते थे। मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जो इतने सारे विषयों के विज्ञान आदि पर वे साधिकार बोलते। उनके ज्ञान की नित्य नई क्षिनिन रेखा देख में विस्मित रह जाता। अभी-अभी की घटना है, जब पिछले दिसवर १६७२ में जनरत करिअप्पा नागपुर आए थे। स्व उनके हाथों हुआ था। गुरुजी ने डा मुजे जन्मशताब्दी समारोह में स्वर दोपहर के भोज पर मेरे यहाँ थे। जनरल को जलेबी पसद आ गई थी। 'हाँ' में सिर हिलाया। बच्चो के मार्गदर्शक थे। मेरे बच्चे बचपन से उन्हें जानते थे। जानते थे। जो यह गुलाबराव महाराज पर लिख रहा है, पढ़ने के लिए माँगा औ कई सुझाव भी दिए। कठिन है कि में उन्हें फिर नहीं देख पाऊँगा। (युगधर्म रमृति अक गुमाई १६७ r श्रीपुरुजीसमन खड २६ आध्यात्मिक अधिष्ठान का नेतृत्व (महामहोपाध्याय श्री बालशास्त्री हरदास) वर्तमान भारत के राजकीय एव सामाजिक नेताओं की चौखट रखा जाए, ऐसा श्री गोलवलकरजी का नेतृत्व नहीं है। उनके जीवन का अधिष्ठान आध्यात्मिक है। उनकी आध्यात्मिक जीवननिष्ठा केवल वैचारिक व बौद्धिक परिणति के स्परूप की न होकर उपासना, साधना एव गुरुकृपा का आधार लेकर उस हेतु जीवन को सुखाकर प्राप्त अनुभूति की परिणति है। इस कारण व्यक्तिगत भाव को अत करण में कोई स्थान नहीं है। यह धारणा न होती तो सघ पर और उनपर जो सकट और जो प्रसग आए और जिन स्थितियों से सघ जा रहा है, उससे कोई भी भग्नहृदय ढेर हो जाता। पूजनीय डाक्टर हेडगेवार जी ने भारतीय राष्ट्रजीवन का आमूलाग्र भाव परिवर्तन करने के उद्दिष्ट से प्रत्येक व्यक्ति का जीवन गढनेवाली यत्रणा राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के रूप में खडी की। एक विशिष्ट मर्यादा तक सघ पहुँचा ही था कि डाक्टर जी का लौकिक जीवन समाप्त हो गया। कार्य की धुरा उस समय सरकार्यवाह रहे श्री माधवराव गोलवलकर पर आई। अल्पावकाश में उन्होंने सपूर्ण जीवन सघ के लिए समर्पण करनेवाले प्रचारकों की प्रभावी यत्रणा तैयार की। उसी के कारण सघ का इतना विस्तार हुआ कि सन् १६४७ में राष्ट्रजीवन के तत्कालीन कर्णधारों को भी सघ की धाक अनुभव होने लगी। सघ के साथ अपने सयध निकट के हों, इस हेतु से वे लोग प्रयत्न करने लगे। स्वय महात्मा गाँधी सघ का निकट से परिचय पाने के लिए सघ शाखा को भेंट देने आए। पडित जवाहरलाल नेहरू गुरुजी से चर्चा के लिए उत्सुक हुए। सरदार पटेल ने सघ से सबंध स्थापित किया। विभाजन पूर्व काल में बिहार और विभाजन के समय तथा बाद में पजाब और दिल्ली में सघ के स्वयसेवकों ने जो पौरुष प्रकट किया, त्याग का जो आदर्श निर्माण किया, अनेक खिलते जीवनपुष्पों ने आपत्ति के अग्निकुड में जलकर जो इतिहास निर्माण किया, उसका जनमानस पर जबरदस्त प्रभाव रहा। राष्ट्रजीवन में जिस महान सामुदायिक कर्तृत्व से यह स्थित्यतर हुआ, उस कर्तृत्व की प्रेरणा एव स्फूर्ति श्री माधवराव गोलवलकर । - - ही थे। इस स्थित्यतर का उपयोग कर राष्ट्रजीवन को योग्य आकार देने श्रीगुरुजी समय खड १२ {८१ था। पूजनीय डाक्टर जी के समय विपरीत वातावरण और सामाजिक क्षोभ इस सबका जिसपर कोई परिणाम नहीं हुआ, ऐसे श्री गोलवलकर ही थे। में अविकपित रहना ही साधना थी। उनकी भूमिका समाजसेवक की थी। सेवकों पर धनी नाराज हो सकता है, पर सेवक को नाराज होने का अधिकार नहीं रहता। अहमदाबाद में एक शिविर में उनके साथ रहने का सौभाग्य मुझे मिला था। उस समय एक भाषण में स्वयसेवक बधुओं के सम्मुख उन्होंने कहा था- 'समाज सघ पर नाराज हो सकता है, पर सघ समाज पर नाराज नहीं हो सकता। क्योंकि सघ समाज की सेवा के लिए है, समाज सघ की सेवा के लिए नहीं। वे ईश्वर की सेवा के महत्त्व की तरह ही समाज सेवा की ओर देखते थे। दैवी सपदा की समाज जीवन में प्रतिष्ठापना करना और उसके द्वारा समाज के कल्याण की साधना कर अविरत प्रयत्न करना यही साधना का स्वरूप है। इस धारणा से ही उस भीषण परिस्थिति में वे अविकपित रहे। बधनमुक्त होते ही 'पुनश्च ओ३म्' कहकर पहले के ही समान प्रसन्नवृत्ति से उन्होंने कार्य को चालना दी। सघकार्य के स्वरूप में कोई भी परिवर्तन न करते हुए उनकी प्रेरणा से वह पुन उभर आया और वर्धिष्णु स्वरूप में राष्ट्रजीवन के अनेक क्षेत्रों में कारण से ही ईश्वर और समाज को छोड अन्य कोई विषय उसके पास नहीं के प्रयास में वे थे कि गाँधीजी की त्या का अनर्थकारी प्रकरण हुआ। स्व के हितशत्रुओं ने उसका पूरा-पूरा लाभ उठाकर राष्ट्रहित से परहित, व्यक्तिगत लाभ व सत्ता उनको अधिक महत्त्व की प्रतीत होती थी। उन्होंने सघ को उखाडने का पड्यत्र रचा। सत्तारूढ पक्ष और उनके स्वार्थार साथियों ने योजनापूर्वक अपप्रचार कर सघ के विरुद्ध इतना प्रचड सामाजिक क्षोभ उत्पन्न किया कि कुछ भी बाकी न रहे। उस सामाजिक क्षोभ के समय जो क्षुद्रता, जो कृतघ्नता अनुभव हुई, उससे अनेक धैर्य यो बेठे। कई आमूलाग्र परिवर्तन की भाषा बोलने लगे, तो कोई कहने लगे- 'कार्य की आवश्यकता ही नहीं। समाज इतना कृतघ्न है तो उसकी सेवा की झझट में क्यों पडे? य कहकर कुछ निवृत्त हुए। पुन माला में एक-एक मणि गूंथने का वह समय का सामना करने की स्थिति नहीं थी। अब भीषण रूप में सामने थी। उनकी दृष्टि में लोकक्षोभ में ईश्वर अल्पधारिष्ट देख रहा था। इस परीक्षा प्रभावी हो रहा है। वजादपि कठोराणि, मृदृनिकुसुमादपि' की आध्यात्मिक धारण - हरि के २] श्रीगुरुजी समन्य खड १२ , -था। इसे नहीं समझ पानेवाले, स्वय को उनके विशेष प्रेम का मानकर अहकार धारण करनेवाले लडखडा कर गिर पड़े। उनके आत्यतिक प्रेम के 'इन विषयों के प्रति जिन्हें निष्ठा और प्रेम नहीं, उसकी सेवा का भाव जिनके अत करण में नहीं, उन्हें आत्मीय सबध रहने पर भी उन्होंने सहज - कठोरता से दूर कर दिया। विशिष्ट कर्तृत्व का अहकार और सेवाभाव का -लोप होते ही व्यक्तिभाव का उदय होता है। यह भाव जिनमें उत्पन्न हुआ वह कर्तृत्वशाली व्यक्ति भी राष्ट्रकार्य के लिए हानिकर होता है। वर्षों से समाजकार्य में रहे कार्यकर्ता के मन के भावों का पोषण श्री गोलवलकर के परिसर में नहीं हो सकता, इस कारण रुष्ट होकर दूर गए या कटोरता से दूर किए व्यक्ति से उनके निजी सबध कभी बिगडे नहीं। इसी कारण केवल मतभिन्नता उनके स्नेह की आड़े नहीं आ सकी। राष्ट्र के हित के लिए आवश्यक उस दल के या मत के व्यक्तियों को वे सहकार्य देते, उनसे मिलते मार्गदर्शन का प्रयत्न करते। आज के राजकर्ताओं ने अनेक बार उनके सहकार्य का हाथ झिडक दिया। फिर भी, जब भी जरूरत रहती, वे सहकार्य के लिए सिद्ध रहते। भारत के राष्ट्रजीवन की मूलभूत अस्मिता जनमानस में प्रज्ज्वलित करने के लिए, उसे विशुद्ध रखने हेतु श्री गोलवलकर समान आध्यात्मिक धारणा के तपस्वी की आवश्यकता रहती है। श्री गोलवलकर जी को साप्रदायिक माननेवाले लोग, विश्व हिंदू परिषद् द्वारा सारी दुनिया के हिंदुओं के सप्रदायों के एकत्रीकरण का जो महान प्रयत्न हुआ है, उसका निर्विकार मन से चितन भी करें, तो उनका भ्रम दूर होगा। पक्षोपपक्षता एव सीमित दृष्टिकोण की बाधा केवल राजकीय जीवन को ही नहीं हुई, वह धार्मिक, सामाजिक सास्कृतिक जीवन को भी हुई है। या ऐसा कहें कि धार्मिक, सामाजिक, सास्कृतिक जीवन पहले वाधित हुआ और उसका परिणाम राजकीय जीवन में हुआ। एक ही वैदिक सप्रदाय के शाकर, माध्व, रामानुज, वल्लभ आदि पीटों के आचार्य एकत्र आएँ और धर्मजीवन का, समाजजीवन का विचार करें, यह असभाव्य रहा। बौद्ध, जैन, लिगायत, सिख नामधारी, तत्रमार्गी, वारकरी, रामदासी आदि सप्रदायों का एकत्र आना तो कठिन ही था। निरहकारिता के अधिष्ठान पर निर्माण हुए इन सप्रदायों का अहकार इतना बढा कि एक-दूसरे के मडप में जाना तो सभव ही नहीं था। इन सभी को श्रीगुरुजीसमय खड १२ {८३} - .
उनके साथ सबध आया था। परतु उनके सवध में उस समय हमा (तसवमा मेरा यह अहोमाग्य रहा कि मेरा सघ के दो महापुरुषों-- संघ निर्माता डा हेडगेवार तथा उनके पश्चात् अपने पूजनीय श्री गुरुजी के साथ वडा निकट का सवध रहा। डाक्टर जी के समय छोटी आयु के कारण आया, तव हम डाक्टर जी द्वारा गढे जा चुके थे। हम लोगों की व्यावहारिस पूजनीय श्री गुरुजी सरसघचालक बने, तथापि उसके पूर्व भी हम लोगों उन्होंने अपने भावी जीवन की दिशा तब तक निश्चित नहीं की थी। उनकी रुचि हमें आध्यात्मिकता की ओर अधिक दिखाई दी। सर्वसाधारण लोगों जैसी वेशभूषा करनेवाले गुरुजी को हमने कुछ दिनों के बाद दाढी-केश बढाए हुए देखा। इन सब बातों के कारण हम लोग उनके विषय में कोई एकत्र लाने का अमृतपूर्व प्रयोग समाज धारणा के व्यापक अधिष्टान से गोलवतकर जी ने सफा कर दिखाया। आध्यात्मिक अधिष्टान के आधार पर पडे श्री गोनवलकर जी का नेतृत्व भारत को उपलब्ध हुआ। इसका विचार करने पर 'कथमित्र भवनोऽस्मिन् तादृशा सम्पयन्ति' का अनुभव होता है। २७ कार्यरत रहनाहीसच्ची श्रद्धाजलि (श्री बालासाहब देवरस) मेरी समझ कम थी तथा उनके सहवास में मेरा गठन हो रहा था। समान ही मेरे अन्य साथियों, जो आज भिन्न-भिन्न प्रातों में प्रमुख के ना कार्य कर रहे हैं, की स्थिति थी। जव पूजनीय गुरुजी के साथ हमारा सब शिक्षा भी समाप्त हो चुकी थी और उस समय तक कोई नागपुर कोई भिन्न-भिन्न प्रातों का कार्यभार संभालने लगा था। जब पूजनीय गुरु- के साथ सपर्क आया, तब हम अनुभवी हैं, हमने कुछ कार्य किया है, . कुछ जानते हैं- ऐसा भाव या अहकार मन के कोने में नहीं रहा होगा, ऐर नहीं कहा जा सकता। यद्यपि सन् १६४० में पूजनीय डाक्टर जी के देहात के पश्चा 1 में . निश्चित कोई धारणा नहीं बन पाई थी। वैसे वे बुद्धिमान तथा बहुश्रुत है यह हम लोगों ने सुना था। उन गुणों का हम अनुभव भी करते थे। पर श्रीशुरुजी समय खत १२ निश्चित धारणा नहीं बना पाए। इन प्रारभिक सवधों के बाद सन् १६३६ में डाक्टर जी की + उपस्थिति में सिदी में हुई एक दीर्घकालीन बैठक में उनके निकट सपर्क में । रहने का अवसर मिला। उस बैठक में हम लोगों ने श्री गुरुजी की वादविवाद पटुता, बुद्धिमत्ता तथा अभिनिवेश के साथ स्वमत प्रतिपादन की - विशेषताएँ देखी। साथ ही बैठक में एक निर्णय हो जाने पर उसे शिरोधार्थ मानकर चलने की उनकी सघवृत्ति (टीम-स्पिरिट) का भी परिचय हुआ। सन् १६३८ से १६४० में उनके साथ मेरा और घनिष्ठ सपर्क आया। १६४० के नागपुर सघ शिक्षा वर्ग के वे सर्वाधिकारी थे। उनके साथ ४० दिन के इस सहवास के काल में मुझे उनके व्यक्तिमत्व के विभिन्न पहलुओं तथा गुणों का परिचय हुआ। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि डाक्टर जी उनकी ओर विशेष दृष्टि से देखते हैं। डाक्टर जी १६३८ से सघकार्य के बारे में कुछ चितित से दिखाई देने लगे थे। एक तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था, जिसके कारण वे मनचाहा दौरा नहीं कर पाते थे। आज जैसा सघकार्य का उस समय वटवृक्ष के समान विस्तार नहीं हो पाया था। गुरुजी के साथ सपर्क बढने पर वे प्रसन्न हुए और हम लोगों से कहने लगे कि मुझे अग्रेजी व हिंदी दोनों भाषाओं में धाराप्रवाही विचार रख सकने की जिसकी क्षमता है, ऐसा पुरुप मिल गया है। हम लोगों ने जब श्री गुरुजी का प्रथम अग्रेजी भाषण सुना, तव उनका अग्रेजी भाषा पर असाधारण प्रभुत्व देखकर हम स्तभित रह गए। श्री डाक्टर जी के व्यक्तित्व में ऐसा कुछ अवश्य था कि एक बार मिलने के लिए आया हुआ व्यक्ति बार-बार उनके सपर्क में आने की इच्छा करने लगता। श्री गुरुजी का भी वही हुआ और वे डाक्टर जी की ओर धीरे-धीरे आकृष्ट हुए और डाक्टर जी ने १६४० में सघकार्य का सपूर्ण दायित्व उनपर सौंप दिया। उस समय श्री गुरुजी की आयु लगभग ३४-३५ वर्ष की होगी। उनका सार्वजनिक जीवन का अनुभव भी अधिक नहीं था। उन्होंने अपने अतिम पत्र में जो कहा है कि उन पर जब सरसघचालक पद का भार आ पड़ा, तब वे कुछ जानते नहीं थे। वह औपचारिकता नहीं, वस्तुस्थिति थी। अर्थात् उन्होंने सफलता का काफी श्रेय सहयोगियों को दिया है, परतु स्वय श्री गुरुजी का श्रेष्ठ व्यक्तिमत्व भी कारण है। सरसघचालक पद का भार ग्रहण करने के वाद अत्यत श्रद्धा तथा लगन के साथ वे कार्य में जुट गए। उनके स्वभाव में आमूलाग्र परिवर्तन हो गया। प्रारभ में वे क्रोधी थे। पर उन्होंने अपना श्रीगुरुजी समय खड १२ {८५ - -- के - कोई ल फैल जाता था। वे एम तोगों से करते थे कि यद्यपि वे शीघ्रकोपी हैं, तयार और उग्रवृत्ति दोनों का अनुमय मैंने स्वयं किया है। नववर १६४७ साहस प्रकट किया था, उसके कारण श्री गुरुजी जहाँ भी जाते वहाँ लाखा व्यक्ति होता तो अहकार से फूल उठता। श्री गुरुजी के मन में विभाजन की पीडा थी, अपने भापण में उसकी वे आलोचना भी करते थे। फिर भी वे लोग को क्रोध न करने तथा सतुलन न खोने का परामर्श देते थे। मुबई की महती सभा में उन्होंने जो भाषण दिया यह चिरस्मरणीय रहेगा। उन्होंने वहाँ कहा था कि बाहरी आक्रमण के समय 'वय पचाधिक शतम् (हम एक सौ परतु जब शासनकर्ताओं ने विना कारण सघ पर प्रतिबंध लगाया तब उन्होंने शासनकर्ताओं के प्रति कडा रुख अपनाया था। प्रतिबंध काल में सहनों स्वयसेवकों ने सत्याग्रह कर कारावास स्वीकार किया। श्री गुरुजी को भी बदी बनाया गया। सघ पर लगाई गई पाबदी के विषय में उन्होंने सरकार का कडे शब्दो में निषेध किया। गृहमत्रालय के एक अधिकारी ने श्री व्यकटराम शास्त्री के निकट जो उन दिनों सघ और सरकार के बीच Mr MS Golwalkar is a blunt man innocent of the etiquette required in a correspondence with Government The soft word that गुरुजी क्रोध का शमन करनेवाली मधुर भाषा नहीं जानते थे, ऐसा स्वभाव बदत डाला। प्रारमिक दिनों में बैठक में कभी-कभी श्री गुरुजन रूप धारण तो कर रोते थे, परंतु कुछ मिाटों के बाद वे कोई ऐसी दन छेउ देते थे कि बैटक का गमीर यातावरण दूर होकर हँसी का वातावरण दीर्घद्वेषी नहीं हैं। देश के विभाजा तथा सघ पर प्रतिबंध के समय उनकी क्षमावृति जनवरी १६४८ तक, अर्थात् सघ पर प्रतिबंध लगने तक मुझे श्री गुरुजा साथ दौरा करने का अवसर मिला था। विभाजन के कारण हिंदुओं पर जो सकट आया था उसमें सघ स्वयसेवकों ने अपने वधुओं को बचाने में जो लोग उनका भाषण सुनने के लिए एकत्र हुआ करते थे। लाखों लोगों का सभाओं में आना, उनका श्रद्धा से नतमस्तक होना देखकर दूसरा पाँच) हैं। मध्यस्थता कर रहे थे, कहा भी था कि पूजनीय गुरुजी के पत्रों की मान बहुत कडी रहती है। इस पर श्री व्यकटमा ने एक वक्तव्य देते हुए उन्हें उत्तर दिया था- turneth away wrath is not among his gifts *- श्रीगुरूजीसमय खड १२ । सा नहीं था। परतु सघ की प्रतिष्ठा रखने के लिए उन्होंने उस समय अत्यत । कडा रुख अपनाया था। उनकी कार्यपद्धति की अनेक विशेषताएँ हैं। प्रतियध काल और कैन्सर के आपरेशन के बाद का ३-४ मास का समय छोड दें तो लगभग ३२ वर्ष लगातार प्रतिवर्ष एक बार सघ शिक्षा वर्ग के निमित्त और दूसरी ई बार प्रातश कार्यक्रमों के निमित्त सपूर्ण देश का प्रवास करते रहे। उनका । अतिम प्रवास मार्च के मध्य में समाप्त हुआ और उसके ढाई महीने बाद - उनकी मृत्यु हुई। उनके जैसा अपने देश का इतना विस्तृत दौरा विश्व के में किसी भी व्यक्ति ने नहीं किया होगा। इस दौरे में किसी न किसी व्यक्ति के घर में वे टहरा करते थे तथा उस घर के सभी व्यक्तियों को अपने -1 स्नेहपूर्ण व्यवहार से आकर्षित कर लेते थे। इस प्रकार उनका सबध लाखों = परिवारों के छोटे-बड़े व्यक्तियों से आया तथा वे श्री गुरुजी को अपने ई परिवार का ही एक निकट व्यक्ति मानने लगे थे। श्री गुरुजी उनके सवध = की पूर्ण जानकारी रखते थे और दुवारा भेंट होने पर प्रत्येक के विषय में नाम लेकर जानकारी पूछते थे। उनकी मृत्यु के बाद जो शोक-सवेदना पत्र । यहाँ आए हैं, उनमें कईयों ने लिखा है कि हम पुन अनाथ हो गए हैं। जैसा - उनका प्रत्यक्ष सपर्क अद्भुत था, वैसा उनका पत्रव्यवहार भी था। पूजनीय डाक्टर जी पत्र लिखते थे, तब पत्र के एक-एक शब्द पर डाक्टर जी हम लोगों के साथ चर्चा करते थे। उस समय देश की परिस्थिति और सघकार्य का फैलाव के कारण अधिक पत्र लिखने की आवश्यकता हो- ऐसा नहीं था। परंतु श्री गुरुजी के कार्यकाल में पत्रलेखन के क्षेत्र की कल्पना करते ही किसी एक व्यक्ति द्वारा यह होना असभव लगता है। परतु श्री गुरुजी स्वय पत्र लिखते थे। आसपास मिलने आए हुए स्वयसेवक बैठे हुए हैं, वार्तालाप चल रहा है, हास्य विनोद हो रहा है, आर उसी बीच गुरुजी पत्र लिखते जा रहे है, यह दृश्य सबके लिए परिचित था। प्रतिदिन पाँच पत्र के हिसाब से पूरे ३३ वर्षों में उन्होंने कितने पत्र लिखे होंगे इसका गणित करें तो आश्चर्यचकित होना पडेगा। पत्र लिखने का भी यह एक विश्व-विक्रम' (World Record) हुआ कहना पडेगा। अपनी विशिष्ट कार्य पद्धति के द्वारा उन्होंने सघकार्य का आज का स्वरूप खडा किया है। डाक्टर जी ने सघकार्य की आधारशिला रखी और श्री गुरुजी ने प्रासाद खडा किया। वे सपकार्य रूपी प्रासाद के शिल्पी थे। श्रीगुरुजी समय खड १२ {८७) .
उनके व्यक्तिमत्त्व का हर पहलू आश्चर्यजनक था। उनका स्वास्थ्य तो उनका दुर्वल शरीर ही रहा। इसलिए ये बातें सुनकर सभव है आश्चर्य सुप्रसिद्ध अध-गायक सावळाराम उनके अभिन्नहृदय मित्र थे। परतु सघमर्य। स्वास्थ्य की चिता नहीं की। अखड कार्यरत रहे। अपनी शारीरिक पीडाओं के सबध में कभी किसी से कुछ नहीं कहा, पर दूसरों के स्वास्थ्य के बारे में दस बार पूछा करते थे। नागपुर में रहते, तब बीमार स्वयसेवकों के घर उनके आदर्श के कारण सपूर्ण देशभर में सघकार्य का एक विशेष वायुमडल निर्माण हुआ। जब किसी सगठन के छोटे से लेकर बडे तक सभी एक विशिष्ट व्यवहार करते हैं, तब उस सगठन का वायुमडल निर्माण होता है। आज जो कुछ सघ के विषय में लोभनीय, प्रशसनीय दिखाई देता है उसका सपूर्ण श्रेय पूजनीय गुरुजी को है। वे हमारे बीच से चले गए हैं। वैसे, मानव मर्त्य है- कहकर मन को कितना भी समझाने का प्रयत्ल किया, परतु यह भी हम स्मरण रखें कि यदि हम शोक करते बैठे रहे, तो क्या वह गुरुजी को अच्छा लगेगा? अत तक जिन्होंने सघ की प्रार्थना की, कार्यशील स्थिति में देह शात किया, उनके हम अनुयायी दुख करते नहीं बैठेंगे। उन्हें सच्ची श्रद्धाजलि अर्पण करना तभी होगा, जब हम अपना कर्तव्य पूर्ण करने की दृष्टि से प्रतिदिन सघ-शाखा में जाने का निश्चय करेंगे। श्री गुरुजी का दैनिक शाखा का आग्रह अत्यधिक था। शाखा पर अनेक सकटों में से उन्होंने सघकार्य को वढाया। सकटों के सामने वे विचलित नहीं हुए, जैसा एक सस्कृत सुभाषितकार ने कहा है कि- उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तसमये तथा। सपत्ती च विपत्ती च महतामेकरूपता।। जिस प्रकार उदय तथा अस्त के समय सूर्य का रक्तवर्ण एक-स रहता है, वैसे ही महापुरुष सपत्ति और विपत्ति में एकरूप रहते हैं। उसी प्रकार श्री गुरुजी का व्यवहार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में एक-सी प्रारभ में उत्तम था और वे मलखम के चैम्पियन थे। हम लोगो के सामने लगता होगा। वे उत्तम संगीतज्ञ थे। स्वय उत्तम वशीवादक थे। नागपुर के में जुट जाने के बाद उन्होंने सारा लक्ष्य उसी ओर केंद्रित किया। मिलने जाते, मेडिकल कॉलेज में रुग्ण स्वयसेवक को देखने जाते थे। तो भी धैर्य नहीं बँधता। अपने श्रीगुरुचीसमन खड १२ सामूहिक जीवन का सस्कार होता है। तथाकथित बुद्धिवादी सस्कार-श्रद्धा आदि बातों की हँसी उडाया करते हैं, परतु उन लोगों का बुद्धिवाद उथला है। गुरुजी बुद्धिवादी तो थे, पर मानते थे कि सच्चा बुद्धिमान वही है, जो श्रद्धा, सस्कार आदि का महत्त्व समझता है। अपने दैनिक जीवन के २४ घटों में से एक घटा भी राष्ट्र कार्य के लिए न देनेवाला व्यक्ति राष्ट्र के लिए कुछ नहीं कर सकता। प्रतिदिन कधे से कथा लगाकर कार्य करने का जिसे अभ्यास हुआ हो, जिसकी एकात्मता की अनुभूति प्रतिदिन साथियों के साहचर्य से परिपुष्ट हुई हो, वही राष्ट्रहित के कार्य में आगे आ सकता है। हम स्वयसेवक अपने व्यवहार को निर्दोष बनाकर तथा अपने कर्मक्षेत्र में अपना कर्तव्य प्रामाणिकता से पूर्ण करते हुए समाजजीवन में परिवतन ला सकते हैं। जीवन में हम विभिन्न भूमिकाओं में काम करते हैं। जीवननिर्वाह के लिए कोई नौकरी करता है तो कोई अन्य कुछ। पारिवारिक जीवन में पिता, भाई, पुत्र आदि सवथ से बँधा रहता है। परिवार में, कार्यक्षेत्र में, नागरिक के नाते हम सबका व्यवहार आदर्श रहना चाहिए। दैनदिन शाखा में जाने से अपनी सघशक्ति बढेगी तथा अपने उत्तम आचरण से समाजजीवन में हम विशिष्ट परिवर्तन ला सकेंगे। बड़ा तूफान आने के बाद जो हानि होती है, उसी प्रकार परमपूज्य गुरुजी की मृत्यु से एक बहुत वडा आघात हुआ है। आज गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं, परतु उन्होंने जो मार्गदर्शन किया उसके अनुसार चलने का हम दृढ सकल्प करेंगे, तो ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धाजलि होगी। (युगधर्म श्रीपुरुषी स्मृति अक ८ जुलाई १६७३) २८ धीरोदात्तपुजारी (श्री भालजी पेंढारकर, सघचालक एव चलचित्र निर्माता) श्री गुरुजी की मूर्ति ऑखों के सामने आते ही उनकी 'शिवभक्ति' और उनकी धीरोदात्तता-- दोनों लोकोत्तर गुण सामने आते हैं। उनके इन दोनों गुणों का दर्शन करानेवाली घटना मैंने स्वय अनुभव की है, जो अत्यत मुखर और मार्गदर्शक हैं। सघ में छत्रपति शिवाजी महाराज की देवता समान पूजा होती है श्रीगुरुजीसमय खड १२ {८६ - हम पनालगढ़ पहुंचे। साथ मे डा आवाजी थत्ते और श्री मोरोपत मिट्टी कपाल पर लगाई और उसी विषण्ण मनस्थिति में हम घर ली। छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रति उनकी यह भक्ति देखकर में दग रह गॉधी हत्या का निराधार और घृणास्पद आरोप कर भारत सरकार ने सप पर प्रतिवध लगाया। संघ के ऐतिहासिक सत्यागह के बाद सरकार ने आरोप वापस लिया। प्रतिबंध हटा लिया। सरकार ने मान्य किया की गॉधीहत्या में संघ का हाथ नहीं है। फिर भी विशेपत दक्षिण महाराष्ट्र की में सधविरोधी राजकीय नेता इस घटना का लाभ उठाकर सघकार्य को पुन पनपने का अवसर नहीं देना चाहते थे। उन्होंने जनता को भड़का प्रतिबंध हटते ही श्री गुरुजी दक्षिण महाराष्ट्र के प्रवास पर आए। उस समय प्रचड मात्रा में उपद्रव हुआ। इस प्रयास में श्री गुरुजी को सही सलामत नहीं जाने देंगे यह मानो उन्होंने तय कर लिया था, यह कहना गुरुजी ने किचित भी विचलित न होते हुए शाति रखी। यही नहीं तो हमेश की सहजता से ही कोल्हापुर के अपने कार्यक्रम पूरे किए। उनकी यह धीरोदात्तता देख उहें 'स्थितप्रज्ञ कहना होगा। इतने वर्षों बाद भी सारा या केवल दिखावटी या लोकप्रियता हेतु नास है। अत करण से शियार माराज के प्रति प्रेम सघ स्वयसेवकों में भरा है, इसका अनुभव सर के सरसघचालक श्री गुरुजी के व्ययाार में दिखाई दिया। श्री गुरुजी कोलापुर होते हुए रत्नागिरी जा रहे थे। कोल्हापुर में मेरी उनसे भेंट को उस समय उसका स्वास्थ्य टीक नहीं था। 'विश्रांति के लिए पन्हाला चलिए', या अनुरोध में उसे किया। ये एक शर्त पर तैपा हुए। शर्त थी पन्तला मे श्री शिवप्रमु के रियासस्थान की जगह दिखाना पिगले थे। पन्राला में हम वा पहुंचे, जहाँ शिवप्रभु के वास्तव्य की वास्तु थी। वहाँ मात्र परती भूमि है। पूर्ण रूप से भग्नावस्था में पडे उस स्थान को की गुरुजी दस मिनट तक अस्वस्थ व व्यथित नजर से निहारते रहे। मन में उन रहा तूफान, अस्वस्थ चेहरे पर दिखाई दे रहा था। फिर ये झुके। वहाँ की जनता वह निष्कर्ष मानने के लिए तैयार नहीं थी। या यूँ कहें कि उस दिया था। प्रसग किसी चलचित्रपट सा ऑखों के सामने आता है। श्रीगुरुजी समय खड १२ गया। क्षेत्र उस दिन श्री गुरुजी रेल से सवेरे कोल्हापुर पहुंचेंगे- यह पहले ही - घोषित हो चुका था। उनका प्रवेश रोकने के लिए ही चार-पाँच हजार प्रदर्शनकारियों की भीड स्टेशन के बाहर जमा थी। पूर्व योजनानुसार स्टेशन पर उतरते ही श्री गुरुजी चार शब्द वोलें, इसलिए मच भी बनाया था। श्री गुरुजी के स्टेशन के बाहर आते ही प्रदर्शनकारियों ने भीषण पथराव शुरू किया। परिणामत भाषण का कार्यक्रम रद्द किया। श्री गुरुजी को एक मोटर गाडी में तेजी से वहाँ से निकाला। मोटर में ही उन्हें सुझाया कि सुरक्षा की दृष्टि से सीधे अपने स्टुडियो में चलेंगे, पर उन्होंने इनकार किया। कहा- 'डा वापट के यहाँ चलेंगे। वहाँ जाकर श्री अबादेवी का दर्शन करेंगे। फिर स्टुडियो में चलेंगे।' तब तक शहर में उपद्रव फैल गया था। पर गुरुजी ने अत्यत शाति से स्नानादि से निवृत होकर देवी के दर्शन किए। बाद में वे स्टुडियो आए। स्टुडियो में आते ही उन्होंने कहा कि- 'मैं स्वयसेवक वधुओं से मिलने आया हूँ। वह कार्यक्रम होना चाहिए, श्री गुरुजी स्टुडियो में पहुँचे हैं, यह वार्ता याहर फैलते ही चार-पाँच हजार प्रदर्शनकारियों ने स्टुडियो को घेर लिया। दोनों रास्ते पत्थर रखकर बद किए गए थे। अदर हमेशा के ही वातावरण में बैठक चल रही थी। जैसे शहर में मानो कुछ हुआ ही नहीं। श्री गुरुजी स्वयसेवकों से पूछताछ कर रहे थे। बैठक में मुझे न देखकर उन्होंने मुझे बुलवाया। कोई विशेष गडबड नहीं हो, यह सोचकर मैं दरवाजे पर खास रक्षण कर रहा था। हमारी जिद थी, श्री गुरुजी को यहाँ से सुरक्षित बाहर ले जाएँ, मेरे स्वभाव से वे अच्छी तरह परिचित थे। भडककर मैं कुछ न करूँ, इसीलिए मुझे बुलाकर शात रहने की ताकीद दी। बैठक समाप्त हुई। वातावरण अधिक भडकने के पूर्व वहाँ से निकला जाए, यह सुझाव हमने रखा। उसपर श्री गुरुजी ने कहा 'कोल्हापुर । आकर श्री जगदवा का दर्शन करना और यहाँ के स्वयसेवक वधुओं से मिलना, यही इच्छा थी। अब आप लोगों को अधिक कष्ट नही दूंगा। जैसा कहोगे, वैसा करूँगा। उनकी सम्मति मिलते ही तत्कालीन पुलिस अधिकारी की कल्पकता और बहुमूल्य सहकार्य से, लोग समझ भी नहीं पाए, इस तरह से पुलिस की वद गाडी में उन्हें बाहर निकाला गया। टेमलाई में दूसरी गाडी तैयार । रखी थी। उस गाडी से वे सागली की और रवाना हुए। इस बीच कुछ श्रीगुरुजी समय खह १२ {८ (श्रीपुरुषी श्रद्धाजलि विरोषाक तरुण भारत पुणे अनेक अच्छे-बुरे प्रसग देखे हैं। मैं स्वय को अत्यत हिम्मतवाला समझना पाना मेरे लिए सभव नहीं। ऐसे उस महापुरुष की स्मृति में शतश प्रणाम। श्री गुरुजी गए। मृत्यु का क्रूर प्रहार हुआ। हम सब जिस बात की आशका मात्र से व्यथित थे, वह हो गई। लाखों स्वयसेवकों और करोड़ों हिदुओं की व्याकुलता की कल्पना करना कठिन है। अपने परमपूज्य सरसंघचालक जी के इगित मात्र पर जीवनसर्वस्व की बाजी लगा देने के लिए सदा तैयार रहने वाले लाखों निष्ठावान स्वयसेवकों को विधाता का यह परमपूजनीय गुरुजी की तपोसाधना से राष्ट्रकार्य का जो तेजस्वी रूप निर्माण हुआ है, वह हम सबका मार्गदर्शन कर रहा है। वही हमको सात्वना प्रदान कर सकता है। जो कुछ चला गया, वह तो केवल भौतिक हमने उनके मुँह से ही सुना है कि यौवन की गध से भरपूर पूरा खिला हुआ जीवनपुष्प ही मातृभूमि के चरणों पर चढा कर हमें आराधना करनी चाहिए। हमने उनके मुँह से यह भी सुना है कि आयु का क्षण-क्षण तथा शक्ति का कण-कण लगा कर कार्य करें और सब कुछ राष्ट्रकार्य में अर्पित कर गन्ने को निचोडने के बाद जिस प्रकार छूछा बचा रहता है, उस विरोधियों ने श्री गुरुजी से भेंट के निमित्त स्टुडियो में प्रवेश भी किया था। वे उनका कमरा ढूँढ रहे थे, पर यह जम नहीं पाया। श्री गुरुजी पुलिस की गाडी में वाहर निकले हैं, यह ध्यान में आते ही टेमलाई तक उन्होंने पीछा भी किया। पर तब तक श्री गुरुजी कोल्हापुर से बाहर जा चुके थे। मैं धन्य हुआ। इस प्राणों पर वीते प्रसग से उस महापुरुष को सकुशल बाहर ले जाने पर हमें अत्यत समाधान हुआ। अपने जीवन में मैंने हूँ। पर उस समय में भी गडवडा गया था। परतु श्री गुरुजी स्टेशन पर उतरने से लेकर कोल्हापुर से बाहर निकलने तक अत्यत शात थे। उनकी वह धीरोदात्तता देख में धन्य हो गया। पिछले अनेक वर्षों में उनसे कई बार मिला। अनेक स्मृतियाँ, प्रसग हुए, पर ये दोनों घटनाएँ अपने जीवन में भूत २६ अनुयायी होने काधर्म (सरकार्यवाह श्री माधवराव मुल्ये) क्रूर निर्णय स्वीकार करना पड़ा। काया मान है। उनका कीर्तिरूप व्यक्तित्व अजर-अमर है। [२] श्रीशुरूपी समन खड १२ । प्रकार शरीर छोड दें। सन् १६४० में उनके सरसघचालक बनने के बाद - विगत ३३ वर्षों में सगठन पर कितनी ही आपत्तियाँ आई, अग्रेजों के शासन । की कुटिल चालों और अपने ही देश के कर्णधारों की अज्ञानतापूर्ण दुर्नीतियों के कारण विकट परिस्थितियाँ निर्माण हुईं, परतु श्री गुरुजी के नेतृत्व में हिंदूराष्ट्र के निर्माण का यह कार्य अबाध गति से आगे ही -- बढता गया। श्री गुरुजी के विभिन्न गुणों का परिचय अपनी क्षमतानुसार हम । सबको है। कठोर तपस्या द्वारा उन्होंने आध्यात्मिक शक्तियाँ अर्जित की थीं। । विभिन्न विषयों के अध्ययन द्वारा उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। श्रेष्ठ 1 महापुरुषों के सपर्क और मार्गदर्शन में उन्होंने जीवन लक्ष्य की श्रेष्ठतम अनुभूति का साक्षात्कार किया था। योगी, ज्ञानी, तपस्वी अनेक रूपों में उनके दर्शन अनेक लोगों ने किए थे, कितु इन सब गुणों को उन्होंने । राष्ट्रकार्य में समर्पित किया। निस्वार्थ भाव से और पूरी तन्मयता से अखड राष्ट्रसेवा का आदर्श उन्होंने हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उनके इतने गुणों को अपने जीवन में निर्माण करना हमारे लिए भले ही असभव हो परतु उनके अनुयायी होने के नाते हमारे लिए इतना करना नि सदेह सरल है कि हम भी उनके समान अखड कर्ममय जीवन का निश्चय धारण करें। राष्ट्रकार्य के लिए जिन-जिन गुणों की आवश्यकता है, उनका अपने जीवन में निर्माण करने का दृढतापूर्वक प्रयत्न करें और जितनी शक्ति भी हमें प्राप्त हो, वह सब राष्ट्रकार्य में समर्पित करें। हमें विश्वास होना चाहिए कि हमारे इस निश्चय में उनका आशीर्वाद और उनकी अनुकम्पा सदैव हमारे साथ रहेगी। श्री गुरुजी ने हम सभी स्वयसेवकों को सबोधित कर जो पत्र लिख छोडे हैं, उनमें भी यही बात निहित है। उन्होंने लिखा है कि 'अपना कार्य । राष्ट्रपूजक है, व्यक्ति-पूजा को उसमें स्थान नहीं है। श्री गुरुजी ने यह वाक्य लिखकर इसी बात का स्मरण दिलाया है कि हम राष्ट्र के लिए समर्पित व्यक्तित्व वाले लोग हैं। हम सभी स्वयसेवकों को उनके मार्गदर्शन में कार्य करने का भाग्य प्राप्त हुआ है। हममें से कई वधु विशेषत भारत से बाहर विदेशों में ऐसे भी हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष उन्हें देखने का अवसर नहीं मिला। फिर भी उनके जीवन की कठोर साधना से निसृत चिगारियाँ अपने-अपने स्थान पर चलनेवाले सघकार्य के माध्यम से हम सभी को छू गई हैं। सघ के स्वयसेवक श्रीशुरुजीसमन खड १२ {६३) अस्तु। इन कठिन क्षणों में अपने हृदय में अपने परमपूज्य दिवगत की भारी दौडधूप का स्मरण करें। कार्य पूर्ण करने को उनकी अधूरी होने के नाते व्यक्तिपूजा से ऊपर उठकर तत्त्वपूजा के हम सब पथिक हैं। इसलिए एम सबके लिए यही योग्य है कि उनकी पुनीत स्मृति में ध्यपूर्ति पर ही अपनी दृष्टि केंद्रित करें। उाके योग्य अनुयायी होने का परिचय हम तभी दे सकते हैं, जब हम उसके अखड कर्मयोगी जीवन से प्रेरणा ग्रहा कर अपना जीवन भी कर्ममय बनाएँ। राष्ट्रीय स्वयसेवक सय के स्वयसेवकों के लिए ऐसा ही एक प्रसग उस समय उपस्थित हुआ था, जय सघ के आद्य सरसघचालक डा हेडगेवार जी का निधन हुआ था। तब दुनिया ने अनेक आशकाएँ प्रकट की थीं। परतु तत्त्व के पुजारी सघ के स्वयसयकों ने यह सिद्ध कर दिखाया कि डा हेडगेवार के अनुयायी अपने प्रिय नेता के पदचिह्नों पर चलकर कठोर निश्चय और कार्यपृर्ति की धुन लेकर आगे बढ़ने वाले लोग हैं। डा हेडगेवार जी के अपूर्ण कार्य को पूर्ण करने के लिए, उसी वर्ष कितने ही तरुण कीटुविक मोह-ममता छोडकर घरों से निकल पड़े। विभिन्न प्रातों में कार्य विस्तार की होड लग गई। दुनिया आश्चर्यचकित रही कि इस भीषण आपत्ति की चोट से स्वयसेवकों के हृदय सुन्न पड़ने के स्थान पर अधिक उत्साह, निश्चय और लगन से भर उठे हैं। आपत्तियों में इसी प्रकार दृढतापूर्वक ध्येयमार्ग पर अग्रेसर होने की अपनी परपरा रही है। सरसघचालक की अखड कर्ममय मूर्ति की स्थापना करें। उनके तैंतीस वयाँ अभिलाषा की कसक को अपने भीतर संजोए दुनिया को यह दिखाने की अवसर हमारे सामने आया है कि श्री गुरुजी के नेतृत्व में कार्य करने वाले लोग किस धातु के बने हैं। श्री गुरुजी ने हम स्वयसेवकों को लिखे पत्र में कहा भी है कि 'अपने कार्य की स्नेहपूर्ण एकात्मता की पद्धति, व्यक्ति निरपेक्षता, ध्येयनिष्ठा आदि विशेषताओं को ध्यान में रखकर सब छोटे-बड़े स्वयसेवक वधु अपने परमपूज्य सरसघचालक जी के मार्गदर्शन में सपकार्य की पूर्ति हेतु काया-वाचा-मनसा जुटे रहेंगे। कार्य शीघ्र लक्ष्यपूर्ति कर सकेगा, ऐसा मैरा विश्वास है। अपने दिवगत नेता के इसी विश्वास के पात्र वन कर हमें अपने नूतन सरसंघचालक के नेतृत्व में कार्यपूर्ति कर दिखानी है। इसी में अपने जीवन की सार्थकता है। (श्री भुरुषी के निधन पर स्वयसेवकों के लिए प्रतारित सवेरा श्रीशुरुजी समन्य खठ १२ ३१ દી m ३० अनामिक पथिक (श्री मोरोपत पिगले) सडसठ वर्ष पूर्व की माघ वद्य एकादशी शक सवत् १८२७, याने १६ फरवरी १६०६ को सी लक्ष्मीबाई और श्री सदाशिवराव गोळवलकर के यहाँ एक बालक ने नागपुर में जन्म लिया। अपने पर्वतमय कर्तृत्व से कालप्रवाह की भी दिशा बदल डालने का सामर्थ्य पर अपना नाम भी पीछे न रहे इस भाँति निरहकार भाव का यह अनामिक यात्री! इस दम्पति की पूर्व की सताने काल की अकाली छाया से नहीं रही थीं। इस बालक का नाम लाड से 'माधव' रखा गया। पर सभी माधव की - अपेक्षा 'मथु' कहकर ही पुकारते। नियति के सकेत का मानो यह प्रथम चिह्न ही था कि नाम के प्रति ममत्व नहीं रहे। इस व्यक्ति को लोग अपनी पसद के नाम से पुकारें, शायद नियति को यही लगा हो या इस बालक की नैसर्गिक मधुरता देख माता-पिता के मुँह से स्वाभाविकत 'मधु' यह नाम निकला हो। केवल यही वालक बच पाया था। बचा और बडा हुआ। बहुत-बहुत बडा हुआ। सभी अर्थों से वडा हुआ और अपने अखड ध्येयरत जीवन की कालावधि समाप्त कर ज्येष्ठ शुद्ध पचमी शक सवत् १८६५, याने ५ जून १६७३ की रात्रि को पचतत्त्व में विलीन हो गया। अपने जीवन में उन्होंने इतने सारे कार्य किए कि उनकी गिनती ही सभव नहीं। कार्य का प्रभाव भी इतना प्रचड है कि इस कार्य का भावी युग में क्या परिणाम होगा, कार्य का फल कितना भव्य होगा, इसका निश्चित अनुमान करना इतिहास के बडे-बडे अध्ययनकर्ताओं के लिए भी असभव सा है। कार्य की गिनती करना कठिन और महत्ता बताना भी कठिन। प्रत्येक कार्य इस तोल का है कि उस एक कार्य करनेवाले का जीवन भी धन्य हो जाए। अपने जाने के बाद अपने पीछे कीर्ति की पताका फहराती रहे, यह आकाक्षा बडे-बडे कर्तृत्वान पुरुषों की रहती है। यह आकाक्षा उनके कर्तृत्व की गरिमा के अनुसार ही होती है, पर अपना श्राद्ध भी अपने ही हाथों से करनेवाला यह केशधारी सन्यासी निरहकार के उत्तुग हिमालयतुल्य शुभ्र शिखर पर ऐसी लीनता से खडा रहा कि आसपास उफन रही अहकार की मैली-मटमैली लहरों के कल्लोल की एक बूंद भी, उसके चरण तो दूर रहे, पर वह जहाँ खडा था, उस पर्वत को भी स्पर्श नहीं कर पाई। घनाधकार {६५] श्रीपुरुषी समय खत १२ वशपरपरागत सपत्ति, घर जैसी स्थावर बातें, एक प्रकार का पर स्मृतिचिहन होता है। नई पीढ़ियों को औत्सुक्यपूर्ण करने के लिए महान नष्ट हो चुका है। यानी बनकर वे आगे चलते गए और अपनी स्मृतियाँ सभवनीयता नहीं रही। माता-पिता के इकलौते सुपुत्र और वह भी आजन्म प्रेम का स्पदन दुहरा होता है। अपने मन में उभरनेवाली भावना में और शोर मचा रही झाझा में भी दीप की ज्योत अखड जलती रही और ऐसी समा गई कि पीछे राय भी Tी यची। कपूर की भाँति जलती रहा ज्योति। यज्ञ ऐसा किया की समिधा से उटनेवाली ज्वालाओं की गरमा किसी को नहीं लगी। यश ऐसा किया कि समिधा की आहुति की आदान तक नहीं। कहीं चरचर तक नहीं। यज्ञ ऐसा किया की अग्नि के शात होने पर स्थडिल भी शेप नहीं रहे। अहकार की हवा नहीं लगने पाए, यह कोई उनका व्रत नहीं था, प्रयत्नपूर्वक की गई कोई कठोर तपश्चर्या नहीं थी। वह तो उनका सहन स्वभाव था। उसमें कोई प्रयास नहीं था या निरहकार इतना स्वयमू और सभी ओर से अखड था कि दामिकता को कहीं प्रवेश के लिए अवसर ही नहीं था। मानो इसीलिए नियति या परमेश्वर भी उनकी इस वृत्ति का साथ दे रहा था। जन्मस्थान महान लोगों की स्मृतियाँ पीछे छोड़नेवाला एक मोटे तौर लोगों के जन्मस्थान, घर सरक्षित रखे जाते हैं। अपने ऐसे स्मृतिचिन नहीं रह पाएँ, यह वे मन से चाहते थे और किसी के सोचे वगैर वैसा ही होता रहा। श्री गुरुजी का जन्म किस घर में हुआ, यह नागपुर में कोई भी दिखा नहीं सकेगा, क्योंकि वह घर सडक चौडा करने के कार्य में कभी ध पीछे नहीं रहे, उनके इस शुद्ध एव प्रामाणिक भाव को पूर्ण करने के लिए नियति मानो उनके पीछे-पीछे पथ के चरणचिह्न भी पोंछती गई स्मारक होता है। पर अपनी ऐसी जो कुछ भी मालमत्ता पिता द्वारा अर्जित थी, जो पैसा आदि था, वह भी वे समर्पित कर चुके थे। तो उस प्रकार स्मृतिचिह्न भी रहने का प्रश्न नहीं था। आगे चलकर बढनेवाली वश वेल भी महान व्यक्ति का स्मरण देती रहकर एक स्मृतिचिह्न बनती है। पर गुरुजी के मामले में वह ब्रह्मचारी। इस कारण वशवेल यहीं पूर्ण हो गई। के भी श्रीगुरुजीसमन्य अड १२ -- । F वह दूसरे के मन में अचूक और हल्के से पहुंचाता है। अपने प्रति प्रेम के । कारण और आदर की भावना से, अपने वाद सघ के स्वयसेवक निश्चित रूप से कुछ स्मारक खडा करने का उपक्रम करेंगे, इसकी कल्पना उन्हें थी। इसी कारण 'स्मारक' नहीं बनाया जाए, यह सुस्पष्ट ताकीद उन्होंने स्वयसेवकों को दी। ताकीद नहीं, वह आज्ञा ही थी। सगठन के सर्वोच्च पद पर रहकर भी उन्होने कभी किसी को कोई आज्ञा नहीं दी और आज आखिरी क्षण में ऐसी आज्ञा दी कि हमारा हृदय हिल उठे। नम्र शब्दों में धीमे, पर अत्यत प्रसन्नता से वे ऐसा कुछ कहते कि उनके शब्द झेलने के लिए अनेकों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। पर उन्होंने जाते-जाते धीमे से ऐसा एक शब्द कह डाला कि अत्यत कर्तव्यकठोर कार्यकर्ता का हृदय भी पसीज उठे। स्मारक बनाने की इच्छा रहने पर भी वह साकार नहीं करनी थी। हृदय की इच्छा हृदय में ही रखकर उनकी स्मृति की मूर्ति से हमारे क्षुद्र हृदयों को भी मदिर सी शोभा मिलेगी। अपने आखिरी पत्र में उन्होंने यह कहा कि उनका कोई स्मारक नहीं बनाया जाए। उसी प्रकार स्मृति रखने के विषय में एक विशेष बात भी कही। स्वयसेवकों को ही देवता सबोधित कर उन्होंने 'करा छाया कृपेची' यह नम्र हृदय से सत तुकाराम के शब्दों में उन्होंने कहा- अतिम ये प्रार्थना, सतजन सुनें सभी, विस्मरण न हो मेरा, आपको प्रभो कभी। अधिक और क्या कहूँ, विदित सभी श्री चरणों को। तुका कहे पैरों पहूँ, करे कृपा की छाँह को।। अलेक्जेंडर पोप की कविता की चार पक्तियाँ वे हमेशा उद्धृत किया करते थे। वे है- Thus let me live unseen unknown Unlamented let me die Steal from the world and not a stone Tell where I lie ऐसा भाव मन में रख उन्होंने पूरा जीवन व्यतीत किया। कुछ स्मृतिचिन पोंछ डालने में नियति ने उन्हें साथ दिया हो पर आगे भी ऐसा ही हो, ऐसा नहीं। नियति को भी मात देनेवाली बलवत्तर शक्तियाँ हैं। श्री गुरुजी ने अपने पीछे अपना कुछ नहीं रहे, यह अत करणपूर्वक प्रयत्न किया यह सच है, पर जो स्मृतिचिन पोंछे नहीं जा सकते, उनका क्या? उनके श्रीशुरुषी समय खड १२ {७] - जनाधिकार समिति के मच से मैंने देशभर में भ्रमण करके इस अन्याय के पीछे लाखों स्वयसेवक हैं। उन्हीं के हैं। हिंदू समाज के लिए उन्होंने अहोरात्र अपनी देह को चदन सा प्रयुक्त किया। यह कोटि-कोटि का हिंदू-समान उनका अनुयायी है। भारत माँ का यह महान सुपुत्र हम लोगों के बीच से गया, तो भी उसके पीछे यह साक्षात् भारतमाता है। वह अपने लाडले पुत्र की स्मृति क्या कभी भुला सकेगी? जिस भूमि के एक कोने से दूसरे कोने तक, सभी दिशाओं में जिन्होंने भ्रमण किया, उनकी स्मृति इस मिट्टी का कण-कण क्या भूल सकता है? जिस पावन नर्मदा में उनकी रक्षा का विसजन हुआ, वह नर्मदा क्या उनका स्मरण सदा नहीं रखेगी? (साबलि विशेषाक तरुण भारत पुमाई १८७३) ३१ मेरा अहोभाग्य (प मौलिचद्र शर्मा, राजनेता) मैंने पहले-पहल श्री गुरुजी के दर्शन सिवनी जेल में उस समय किए थे, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गांधी हत्या का झूठा व बेहूदा आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया गया था और श्री गुरुजी व उनके सहयोगियों को सहस्रों-सहनों की संख्या में जेलों में डाल दिया गया था। तब मुझसे यह अन्याय सहन नहीं हुआ। श्री एकनाथ रानडे तथा श्री वसतराव औक से सपर्क हुआ और जनाधिकार समिति की स्थापना हुई विरुद्ध आवाज उठाई तथा राष्ट्र व समाजभक्त सहस्रों स्वयसेवकों को तुरन रिहा किए जाने की मांग की। मध्य प्रात के गृहमनी श्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र ने कहा- 'नागपुर चलो, अब सघ के मामले को निपटाना ही है।' मैंने कहा, 'आपने प्रतिवथ लगाया नहीं, अत आप उसे हटा नहीं सकते। मैं कच्ची गोलियों से नहीं खेलता कि विना बात आपके साथ चला चलूँ। उन्होंने कहा कि 'भाई में देहरादून से आ रहा हूँ।' उन दिनों सरदार पटेल देहरादून में स्वास्थ्य लाभ के लिए गए हुए मैं पहली ट्रेन पकडकर ही नागपुर गया। नागपुर पहुँचते ही श्री भैया श्री हो गईं। चरणस्पर्श किए, जिसने राष्ट्र व हिदू समाज को गुरुजी के रूप में एक + से परामर्श करके जो नीति निश्चित हुई, तदनुसार सिवनी जेल गया। गुरुजी | को एक कमरे में एकात में रखा गया था, जिसमें दो ओर से हवा आने । का स्थान था। मैंने उनके दर्शन करते ही चरण स्पर्श किए और अपने आने का उद्देश्य कहना प्रारभ किया था कि उन्होंने मेरे मुँह पर हाथ रखते हुए कहा 'ये सब बातें पीछे होंगी। आप मेरे पास आए हैं, तो पहले आपका सत्कार करना मेरा कर्तव्य है।' पास के कोने में रखी बोरी में से उन्होंने स्टोय निकाला उसे जलाया तथा झटपट अपने हाथों चाय बना डाली। मैं उस महापुरुष की इस लीला को देखकर जैसे खो गया तथा मेरी आँखें नम उन्होंने दो प्याले चाय मुझे पिलाई व एक प्याला स्वय ली। उनके चेहरे की निश्चितता, उदारता व आत्मीयता एक-एक क्षण में मुझे प्रभावित किए जा रही थी और मेरे हृदय ने अनुभव किया कि मैं एक अलौकिक महापुरुष के सान्निध्य में बैठा हूँ। वे बोले- 'आपने व मेरे सहयोगी मित्रों ने जो सोचा होगा, वह ठीक ही होगा। उन्होंने अपने नाम के कागज पर पत्र लिखकर मुझे दिया। अपना काम समाप्त होने के कारण मुझे उठकर विदा ले लेनी चाहिए थी, कितु मैं उस महापुरुष के साथ इतना लीन हो गया कि उठने को जी नहीं करता था। अत और बहुत सी चर्चा छिड गई। अतत उन्होंने ही मुझे स्मरण कराया- 'भाई शाम होने जा रही है, आपको नागपुर भी तो लौटना है?" अस्तु मुझे मजबूरी में चरणस्पर्श कर कर विदा लेनी पडी। नागपुर पहुंचकर श्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र के घर से दोनों पत्र सरदार पटेल को देहराइन फोन करके सुनाए। उन्होंने कहा कि इन दोनों पत्रों को मेरे पास भेज दीजिए। मैंने अपने पत्र के साथ उन्हें सरदार के पास भेज दिया तथा अनुरोध किया कि सघ पर प्रतिबंध व सहस्रों व्यक्तियों को जेल में रखने का औचित्य नहीं है। खैर, श्री गुरुजी ससम्मान रिहा किए गए और जेल से छूटकर नागपुर पहुंचे तो नागपुर में उनका जो भव्य स्वागत हुआ, उसे मैं भुला नहीं पाऊँगा। सारा नागपुर उनके दर्शन के लिए उमड पडा था। आवाल नर-नारी व बच्चे, वृद्ध अपने तपस्वी नेता की जय-जयकार कर रहे थे। श्री गुरुजी अपनी माता के चरणस्पर्श के लिए गए। एक कच्चे से मकान में उनके साथ पहुंचते ही मैंने भी उस महान आदर्श हिदू जननी के {६६} श्रीशुरुजीसमय खत १२ वही इसका रक्षण करेगा, हम तो नाम मात्र के साधन कहला सकते हैं। कैन्सर के आपरेशन के पश्चात् दिल्ली में उनका जो अभिनदन दिए। उस दिन चाय पीते समय मुझे सिवनी में गुरुजी के हाथों तैयार चाय इसके पश्चात् राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के दिल्ली कार्यालय में उनके दर्शन व बातचीत का अवसर मिला। उस दिन में अपने अत्त करण का कष्ट उन्हें सुनाने गया था। उन्होंने मेरी वेदना को गभीरता से सुना। उसके बाद उन्होंने मेरे कधे दोनों हाथों से पकडकर कहा- 'आप तो स्वय पडित हैं। इस हिदू-समाज की रक्षा मेरे या आप पर निर्भर नहीं है। जो अपने से बना, किया, जो वन रहा है, वह कर रहे हैं इससे भी अधिक जो दन पाएगा, करते रहेंगे। अपना, कर्तव्य हमें करना है, उत्तरदायी भगवान है। वरदान दिया था। गुरुजी ने माताजी से करा- 'यह वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने सघ पर से प्रतियथ हटाने के लिए भारी प्रयास किया है। माताजी ने ये गले से लगा लिया व काँसे की थाली में अपने हाथों प्रेम से भोजन कराया। तव मेरी आँखों के समक्ष माताजी के रूप में जीजावाई की प्रतिमा आ खी हुई। जिस प्रकार जीजावाई ने मात हिंदू-राष्ट्र की स्थापना के लिए शिवाजी को मुगलों के विरुद्ध खडा किया था, उसी प्रकार इन माताजी ने गुरुजी को हिदू-समाज के पुनरुत्थान के लिए पैदा किया है। मैं उस दिन धन्य-धन्य हो गया। इसके बाद अनेक अवसर श्री गुरुजी के सपर्क में आने के मिना जनसघ की स्थापना के दौरान उनसे अनेक वार मिलने का सौभाग्य मिला। कुछ ही दिन बाद में जनसघ से छूट गया, किंतु गुरुजी व राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ से छूटना तो दूर रहा उल्टे उसके महान राष्ट्रकार्य के प्रति मेरी श्री दिनोंदिन बढती ही गई। हुआ, उसमें में उपस्थित था। स्वागत का उत्तर देते समय भाषण करते हुए श्री गुरुजी की पैनी निगाह मुझ पर पडी होगी और जय सभा विसजित हुई तो उन्होंने सघ के एक अधिकारी को मुझे बुलाने के लिए भेजा। इसनि कि मैं चाय उनके साथ लूँ। उनसे आत्मीयतापूर्ण वातचीत हुई। मैंने उनके अस्वस्थ होने पर चिता व स्वस्थ होने पर सती प्रकट किया तो वे मुस्कुरा याद आ गई। - उन्होंने आँखें मूंदी व कुछ देर रुककर उनकी धीमी वाणी गूंज उठी- 'हमें परमशक्तिवान परमात्मा में विश्वास रखना चाहिए। मेरा दृछ निश्वय है कि यह जाति उठेगी इसका अभ्युदय होगा और हिंदू राष्ट्र - श्रीगुरुजी समय खड १२ - -1 ससार के सामने अपने आदर्शों को रखकर विश्व का मार्गदर्शन करेगा।' वे फिर मीन हुए तथा कुछ देर रुक कर बोले- 'इस रोग के बाद मेरे शरीर का भरोसा नहीं कि कितना चले। शरीर जो आता है, वह जाता 5 ही है। इसलिए इतने पर ही सतोष करना चाहिए कि हमने यथाशक्ति किया और आगे यह क्रम चलता रहे, इसके लिए अपने सदृश साथी तैयार करें। । शेष यह श्री भगवान का काम है कि वह इन साथियों को सामर्थ्य प्रदान करे।' उनकी इस दृढ निष्ठा व अटूट विश्वास को देखकर मैं अतस्थल तक आप्लावित हो उठा। मैं उस दिन हृदय की तमाम वेदना से मुक्त होकर उनके पास से लौटा। मैंने उन्हें पूर्ण ब्राह्मण व ऋषि कहा है, कितु अब मैं उन्हें 'आदर्श हिंदू' कहने में अधिक आनदित हो रहा हूँ। हिदू का जैसा दर्द उन्हें था, वे ही जानते हैं, जो उनके सपर्क में आए हैं। इस दर्द का इलाज भी उन्होंने अपने जीवन में करके दिखाया। वह था इस हिदू समाज के सगठन के लिए सर्वस्व अर्पण व भगवान में अनत श्रद्धा। 'हारिये न हिम्मत, बिसारिये न राम'- यह पुरानी कहावत उनके जीवन भर चरितार्थ रही। आपको अव वह सव करना है, जो शेष रह गया है। यही मेरी व आपकी उस महापुरुष के प्रति श्रद्धाजलि होगी। (पाचजन्य जुलाई १६७३) ३२ केशव-माधव मिलन (श्री यादवराव जोशी) सन् १६२५ में सघकार्य के प्रारभ से ही डा हेडगेवार जी के अखड परिश्रम से सघकार्य की प्रगति हो रही थी। सन् १६२६-३० में डा हेडगेवार सघकार्य प्रारभ करने के लिए काशी गए। दो महान विभूतिओं को निकट लानेवाला यही प्रथम अवसर था। एक विभृति राष्ट्र के उत्तरोत्तर पुनरुत्थान मार्ग पर बढ रही थी, तो दूसरी राष्ट्रोत्थान के मार्ग पर वढने के लिए मार्ग खोज रही थी। पहली विभृति, याने डा हेडगेवार तथा दूसरी, याने परमपूजनीय गुरुजी। काशी की एक बैठक में कई प्रौढ एकत्रित हुए थे। गुरुजी भी उनमें {१०१) - श्रीगुरुजी समय खड १२ काशी की सघशाखा दिनोंदिन सुदृढ होती गई। सभी प्राध्यापकों एक बार विश्वविद्यालय का स्नेह-सम्मेलन था। सघ स्वयसेवकों के अनुशासनबद्ध व्यवहार का पूरा ज्ञान होने से विश्वविद्यालय के अधिकारियों स्त्रियों के लिए अलग से प्रबंध किया गया था। समारोह के समय एक प्राध्यापक स्त्रियों के लिए निश्चित द्वार से अदर जाने लगे, तब स्वयसेवसें ने उन्हें रोका और पुरुषों के लिए बने द्वार से जाने का अनुरोध किया। द्वार अपने लिए मुक्त मान रहे थे। उन्हें रोका गया। अनुशासन के मामले को महिलाओं के लिए निर्धारित द्वार से प्रवेश नहीं दे रहे थे। गुरुजी भी होने लगा। प मालवीयजी के पास जानकारी पहुँच चुकी थी। उन्होंने थे। पूजनीय डाक्टर हेडगेवार जी द्वारा प्रकट की गई सघ की भूमिय अत्यत स्पष्ट और मन को स्वीकार्य हो, ऐसी ही थी। इस कार्यक्रम के अन में गुरुजी को काशी सघशाखा का सघचालक नियुक्त किए जाने की घोष। डाक्टर जी ने की। उसी दिन काशी सपशाखा का आरभ हुआ और गुरुग्ण के ध्येयजीवन का प्रारम हुआ। डाक्टर जी ने अत्यत दूरदृष्टि से विचार करके ही काशा में सघकार्य का आरम किया था। पडित मदनमोहन मालवीय के पुण्यप्रसाद से काशी एक महान विद्याकेंद्र बना था। भारत के कोने-कोने से अनेक विद्यार्थी वहाँ आते थे। सपकार्य की जड़ें यहाँ जम जाने पर सघकाय देश भर में फैलाना सरल होगा, यह डाक्टर जी के मा में था। हिंदू संस्कृति के विकसित सुगधी पुष्प के समान स्थित काशी विश्वविद्यालय को एक महान मेधावी प्राध्यापक, काशी सघशाखा के सघचालक के रूप में प्राप्त हुए, इसपर डाक्टर जी को अत्यत प्रसन्नता हो रही थी। एव विद्यार्थियों के अत करण सघ विचार से प्रभावित हो जाने के कारण शाखा बढ रही थी। ने समारोह की सारी व्यवस्था गुरुजी पर सौंप दी थी। व्यवस्था उत्तम थी। वे प्राध्यापक प मदनमोहन मालवीय के अत्यत प्रिय थे, इसी कारण वे सारे में अत्यत कडे रहनेवाले, वहाँ के कार्यवाह श्री सद्गोपाल, उक्त प्राध्यापक महोदय को वही समझा रहे थे। पर वे नहीं माने और लौट गए। समारोह व्यवस्थित रूप से पूर्ण हुआ। समारोह की व्यवस्था और संघ के अनुशासन की सभी ने मुक्तकट से स्तुति की। परतु इस घटना का परिणाम समारोह की समाप्ति के बाद अनुभव उक्त प्राध्यापक } श्रीगुरुजी समन्य ख १२ गुरुजी को और श्री सद्गोपाल को वुलवाया। गुरुजी ने सारी घटना मालवीय जी को बताई और कहा- 'व्यवस्था की सारी जिम्मेदारी हम पर सौंपी गई थी। अत उसका पालन हर किसी को करना चाहिए था। इसमें गलत क्या हुआ? हमसे गलती हुई हो तो एक बार नहीं, सौ वार क्षमा मॉगने के लिए हम तैयार हैं। पर जब हमारा वर्तन (व्यवहार) न्यायपूर्ण है, तो क्षमा मांगने का प्रश्न ही नहीं उठता। पूजनीय डाक्टर जी को जब यह सब पता चला, तो किसी भी मामले में न्यायपूर्ण मार्ग का अवलब कर चलने की गुरुजी की दृढ नीति पर उन्हें आनद हुआ। इस घटना का उल्लेख डाक्टर जी अपनी बैठकों में अनेक बार करते थे। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, गुरुजी सबधी अनेक उदाहरण डाक्टर जी पर गहरा परिणाम कर रहे थे। गुरुजी कुछ दिनों तक नागपुर में वकीली का बोर्ड लगाए थे। उन्हीं दिनों वकीलों की एक बैठक बुलाई गई। गुरुजी भी उसमें थे। सधकार्य की आवश्यकता और अनिवार्यता बताकर डाक्टर जी ने वकीलों से भी इस कार्य की जिम्मेदारी उठाने का आह्वान किया। बैठक में उपस्थित कुछ वकीलों ने टालमटोल शुरू की। दैनदिन कार्य से हम थक जाते हैं। बाहर के कामों के लिए समय ही नहीं मिलता। जिनके पास बहुत समय है पर कोई दूसरा उद्योग नहीं, वे ही यह कार्य करें, यह भी कुछ ने कहा। इस पद्धति से विचार करने में कितने दोष हैं, यह समझाने का प्रयास डाक्टर जी कर रहे थे। पर भाँति-भाँति के कारण बताकर वकील स्वय को बचाना चाहते थे। गुरुजी ने इस पर तुरत कहा, 'हाँ, आप लोगों की बात ठीक है। श्मशान घाट जाने की राह देखनेवालो को ही यह कार्य करना है।' गुरुजी के इन उद्गारों पर हॅसी फूट पडी और सारा विवाद वहीं समाप्त हुआ। करीब १६३३ में गुरुजी काशी से नागपुर लौटे और डाक्टर जी के निकट सहवास में आए, तब तक सर्वत्र सघ की प्रगति ओर सघकार्य का प्रभाव अनुभव हो रहा था। उसी वर्ष काग्रेस ने अन्य प्रातों की भॉति, मध्यप्रात में भी चुनाव में विजय प्राप्त कर मत्रिमडल बनाया था। उसके बाद प्रातीय काग्रेस समिति का अधिवेशन नागपुर में हुआ। उस समय की विषय नियामक समिति की कार्यक्रम पत्रिका पर चर्चा के लिए 'सघ' यह {१०३} - श्रीगुरुजी समय खड १२ 4 1 काशी की सघशाखा दिनोंदिन सुदृढ होती गई। सभी प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के अत करण सघ विचार से प्रभावित हो जाने के कारण एक बार विश्वविद्यालय का स्नेह-सम्मेलन था। सघ स्वयसेवकों के अनुशासनबद्ध व्यवहार का पूरा ज्ञान होने से विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने समारोह की सारी व्यवस्था गुरुजी पर सौंप दी थी। व्यवस्था उत्तम थी। स्त्रियों के लिए अलग से प्रबंध किया गया था। समारोह के समय एक प्राध्यापक स्त्रियों के लिए निश्चित द्वार से अदर जाने लगे, तब स्वयसेवरों ने उन्हें रोका और पुरुषों के लिए बने द्वार से जाने का अनुरोध किया। वे प्राध्यापक प मदनमोहन मालवीय के अत्यत प्रिय थे, इसी कारण वे सारे द्वार अपने लिए मुक्त मान रहे थे। उन्हें रोका गया। अनुशासन के मामले में अत्यत कडे रहनेवाले, वहाँ के कार्यवाह श्री सद्गोपाल, उक्त प्राध्यापक को महिलाओं के लिए निर्धारित द्वार से प्रवेश नहीं दे रहे थे। गुरुजी भी उक्त प्राध्यापक महोदय को वही समझा रहे थे। पर वे नहीं माने और लाट गए। समारोह व्यवस्थित रूप से पूर्ण हुआ। समारोह की व्यवस्था और संघ परतु इस घटना का परिणाम समारोह की समाप्ति के बाद अनुभव होने लगा। प मालवीयजी के पास जानकारी पहुंच चुकी थी। उन्होंने थे। पूजनीय डाक्टर हेडगेवार जी द्वारा प्रकट की गई सघ की भूमिका अत्यत स्पष्ट और मन को स्वीकार्य हो, ऐसी ही थी। इस कार्यक्रम के अत में गुरुजी को काशी सघशाखा का सघचालक नियुक्त किए जाने की घोषणा डाक्टर जी ने की। उसी दिन काशी सघशाखा का आरभ हुआ और गुरुजी के ध्येयजीवन का प्रारम हुआ। डाक्टर जी ने अत्यत दूरदृष्टि से विचार करके ही काशी में सघकार्य का आरभ किया था। पडित मदनमोहन मालवीय के पुण्यप्रसाद से काशी एक महान विद्या केंद्र बना था। भारत के कोने-कोने से अनेक विद्यार्थी वहाँ आते थे। सपकार्य की जड़ें वहाँ जम जाने पर सघकार्य देश भर में फैलाना सरल होगा, यह डाक्टर जी के मन में था। हिंदू संस्कृति के विकसित सुगधी पुष्प के समान स्थित काशी विश्वविद्यालय को एक महान मेधावी प्राध्यापक, काशी सघशाखा के सघचालक के रूप में प्राप्त हुए, इसपर डाक्टर जी को अत्यत प्रसन्नता हो रही थी। शाखा बढ रही थी। के अनुशासन की सभी मुक्तकद से स्तुति की। ०२} श्रीगुरुपी समन अह १२ - गुरुजी को और श्री सद्गोपाल को बुलवाया। गुरुजी ने सारी घटना मालवीय जी को बताई और कहा- 'व्यवस्था की सारी जिम्मेदारी हम पर सौंपी गई थी। अत उसका पालन हर किसी को करना चाहिए था। इसमें गलत क्या हुआ? हमसे गलती हुई हो तो एक बार नहीं, सो वार क्षमा माँगने के लिए हम तैयार हैं। पर जब हमारा वर्तन (व्यवहार) न्यायपूर्ण है, तो क्षमा मांगने का प्रश्न ही नहीं उठता। पूजनीय डाक्टर जी को जब यह सब पता चला, तो किसी भी मामले में न्यायपूर्ण मार्ग का अवलब कर चलने की गुरुजी की दृढ नीति पर उन्हें आनद हुआ। इस घटना का उल्लेख डाक्टर जी अपनी बैठकों में अनेक बार करते थे। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, गुरुजी सवधी अनेक उदाहरण डाक्टर जी पर गहरा परिणाम कर रहे थे। गुरुजी कुछ दिनों तक नागपुर में वकीली का बोर्ड लगाए थे। उन्हीं दिनों वकीलों की एक बैठक बुलाई गई। गुरुजी भी उसमें थे। सघकार्य की आवश्यकता और अनिवार्यता बताकर डाक्टर जी ने वकीलों से भी इस कार्य की जिम्मेदारी उठाने का आह्वान किया। बैठक में उपस्थित कुछ वकीलों ने टालमटोल शुरू की। दैनदिन कार्य से हम थक जाते हैं। बाहर के कामों के लिए समय ही नहीं मिलता। जिनके पास बहुत समय है पर कोई दूसरा उद्योग नहीं, वे ही यह कार्य करें, यह भी कुछ ने कहा। इस पद्धति से विचार करने में कितने दोष हैं, यह समझाने का प्रयास डाक्टर जी कर रहे थे। पर भाँति-भाँति के कारण बताकर वकील स्वय को बचाना चाहते थे। गुरुजी ने इस पर तुरत कहा, 'हाँ, आप लोगो की वात ठीक है। श्मशान घाट जाने की राह देखनेवालो को ही यह कार्य करना है।' गुरुजी के इन उद्गारों पर हँसी फूट पडी और सारा विवाद वहीं समाप्त हुआ। करीब १६३३ में गुरुजी काशी से नागपुर लौटे और डाक्टर जी के निकट सहवास में आए, तब तक सर्वत्र सघ की प्रगति और सघकार्य का प्रभाव अनुभव हो रहा था। उसी वर्ष काग्रेस ने अन्य प्रातों की भाँति, मध्यप्रात में भी चुनाव में विजय प्राप्त कर मत्रिमडल बनाया था। उसके बाद प्रातीय काग्रेस समिति का अधिवेशन नागपुर में हुआ। उस समय की विषय नियामक समिति की कार्यक्रम पत्रिका पर चर्चा के लिए 'सघ' यह श्रीगुरुजीसमय खड १२ {१०३} सबके सामने रखा जाना आवश्यक था। परतु अध्यक्ष श्री जमनालाल बजाज नहीं है। अत नीचे दिए विषयों पर स्पष्टीकरण दें। इसके साथ एक लबी परमेश्वर की कृपा से ऐसे शब्द मेरे पास नहीं हैं। परतु हमसे व्यवहार करते काग्रेस के अधिवेशन में सघ पर चर्चा के लिए यह पन-व्यवहार विषय रखा गया था। इस सबध में डाक्टर जी से पत्र-व्यवहार करने का अधिकार, प्रातीय काग्रेस समिति के कार्यवाह को दिया गया था। उन्होंने डाक्टर जी को जो पत्र लिखा, उसमें कहा गया था- 'सघ के बारे में काग्रेस की क्या भूमिका है, यह अनेक लोगों द्वारा पूछा जा रहा है। अत हमने चर्चा के लिए 'सघ' यह विषय रखा है। आपको सघ का ध्येय नीति स्पष्टत हमें तुरत सृचित करनी चाहिए।' गुरुजी ने जब वह पत्र देखा तो वे डाक्टर जी से वोले- 'मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह पत्र सीधे लॅग से नहीं लिखा गया है। चुनाव में प्राप्त विजय से उनका दिमाग ठिकाने पर नहीं है। अत इस पत्र का योग्य उत्तर देना चाहिए।' डाक्टर जी को गुरुजी का विचार योग्य प्रतीत हुआ। उन्होंने काग्रेस कार्यवाह को उत्तर लिखा- 'पिछले बारह वर्षों से हम यह कार्य करते आ रहे हैं। अब तक अनेक आमसभाओं में सघ का उद्देश्य विस्तार के साथ बताया जा चुका है। आप भी नागपुर में रहते हैं, अत सघ के बारे में स्वाभाविकत आपको जानकारी है। उससे अधिक बताने लायक मेरे पास कुछ है, ऐसा नहीं लगता।' काग्रेस कार्यवाह ने डाक्टर जी के इस पत्र का जो उत्तर भेजा, उससे गुरुजी का सदेह सत्य प्रमाणित हुआ। उन्होंने लिखा- 'आपका उत्तर मूल विषय को 'बगल' देनेवाला है। जो प्रश्न हमने पूछा है उसके उत्तर में प्रश्न सूची उन्होंने डाक्टर जी के पास भेजी थी। डाक्टर जी ने उसके उत्तर में लिखा- 'मेरे उत्तर को आपने बगल देनेवाला उत्तर कहा है। समय अधिक जिम्मेदारी के साथ शब्दों का प्रयोग करना ठीक होगा। किसी परीक्षा में बैठकर पत्रों के उत्तर देने का काल बीत चुका है। सघ और काग्रेस के परस्पर सवधों पर तो यही कहना है कि अपने-अपने क्षेत्र में काम करने का पूर्ण अवसर देकर, सपूर्ण देश के कल्याण की दृष्टि से परस्पर आदर एव अभिमान रखना ही योग्य होगा।' -- । को वह पत्र-व्यवहार देखकर अपने पक्ष की गलती की अनुभूति हुई थी। उसमें भी 'बगल देना' इस शब्द प्रयोग में तो भारी गलती थी। सभी सदस्यों के सामने वह पत्र-व्यवहार रखने का धैर्य उन्हें नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि कार्यक्रम की विषयपत्रिका में 'संघ' पर चर्चा के लिए {१०४ श्रीगुरुजी समय खड १२ 1 , । 1 महत्त्वपूर्ण स्थान रहने पर भी उस पर चर्चा न कर, उसे छोड़ दिया गया। डाक्टर जी व गुरुजी के परस्पर सबध दिनोंदिन बढ रहे थे। श्री गुरुजी सघकार्य से पूर्णत एकरूप हो चुके थे। डाक्टर जी ने अपनी दूरदृष्टि से गुरुजी के अतर्यामी हिमालय स्वरूप उत्तुग कर्तृत्व को पहचान लिया था। डाक्टर जी ने अपने देश के दो प्रमुख केंद्र माने जानेवाले मुबई और याद में कोलकाता, इन शहरों में सघकार्य हेतु श्री गुरुजी को भेजा। नागपुर के सघ शिक्षा वर्ग में गुरुजी कई वर्षों तक सर्वाधिकारी रहे। कुछ ही दिनों में वे सरकार्यवाह बने। इन बढती जा रही जिम्मेदारियों को गुरुजी द्वारा अत्यत दक्षता एव कुशलता से पूर्ण करते रहे देखकर डाक्टर जी का अत करण आनद से पुलकित होता था। सन् १६४० में नागपुर में सघ शिक्षा वर्ग चल रहा था। डाक्टर जी इस वर्ग में दो दिन भाग ले सके। पहले गुरुजी को भाषण करने के लिए कहा गया। भाषण का विषय था- "शिवाजी द्वारा जयसिह को लिखा गया पत्र।' अत्यत ओजस्वी वाणी में तीन घटों तक गुरुजी का भाषण चलता रहा। वक्तृत्व मानो अपने पूर्ण वैभव के साथ ही प्रकट हुआ था। भाषण में हृदय पुलकित करनेवाला प्रेरक विचार सुनकर गुरुजी के प्रति डाक्टर जी के मन में आनद और अभिमान की भावना ही भर आई। बाद में जब डाक्टर जी रुग्णशया पर पडे तो मिलने के लिए आनेवाले स्वयसेवकों से 'सबसे उत्तम भाषण किसका रहा'। यह पूछते और अब तक के भाषणों में गुरुजी का भाषण विचारों से परिपूर्ण था, यह स्वत ही कहते। अपना शरीर 'अब अधिक समय तक काम नहीं कर सकेगा', यह डाक्टर जी को प्रतीत हो रहा था। कभी-कभी वे चितातुर होकर कहते- 'मुझे जैसा व्यक्ति चाहिए, नहीं मिला है।' पर इस समय वे जिसकी खोज में थे, वही यह भावी नेता है- इस दृष्टि से वे इस तरुण की और देख रहे थे। डाक्टर जी की सूक्ष्म दृष्टि को गुरुजी के प्रत्येक शब्द व प्रत्येक कृति से उनके सर्वस्पर्शी उत्तुग व्यक्तिमत्व का परिचय होता ही था। अपने इस महान प्राचीन राष्ट्र को वैभव मार्ग पर ले जानेवाला समर्थ पुरुष- इस रूप में वे गुरुजी को देख रहे थे। डाक्टर जी के अतिम दिनों में उन्हें समाधान एक ही बात का था और वे थे गुरुजी। वे हमेशा गुरुजी के बारे में, उनके तेजस्वी गुणों के बारे में ही बोला करते। ऐसे समय आतरिक समाधान व श्रेष्ठ आनद के भाव उनके {१०५} श्रीगुरुजी समन्ट खड १२ - चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देते। विशेषत अतिम कुछ दिनों में गुरुजी के प्रति अपने सूक्ष्म अवलोकन के बारे में वै मुझे खुलकर बताया करते थे। डाक्टर जी जब नासिक में अस्वस्थ थे, उन दिनों उनकी सेवा सुश्रुपा गुरुजी ने कैसे की, यह एक वार डाक्टर जी ने मुझे बताया था। एक बार तो पूरे छह घटों तक डाक्टर जी की नाडी धीमे चल रही थी। 'वास्तविक सेवा सुश्रुषा क्या होती है, यह केवल गुरुजी ही जानते हैं। यह कह कर छोटी-छोटी आवश्यकताओं के प्रति भी, रात्रि-रात्रि जागरण कर, गुरुजी कैसे सतर्क रहा करते इसका वर्णन करते। डाक्टर जी कहते-- 'एक शब्द में कहें तो माँ के समान ही' सेवा करते थे। गुरुजी पर डाक्टर जी का अत्यत विश्वास था। एक बार डाक्टर जी ने एक स्वप्न बताया। स्वप्न में एक लखपति सघ को भारी रकम देने आया। उसकी माँग यही थी कि सघ उसके पक्ष को समर्थन दे। डाक्टर जी ने उसे गुरुजी के पास भेजा। गुरुजी ने एक क्षण भी विचार न करते हुए उसे कहा- 'यह सगठन एक उच्च ध्येय की साधना के लिए है। त्रैलोक्य का राज्य आने पर भी उसके बदले हम एक इच भी हट नहीं सकते।' लखपति का आग्रह जारी था कि आप अपने ध्वज में थोडा परिवर्तन कर ले तो भी बहुत होगा। गुरुजी ने इसे भी अस्वीकार कर कहा- 'हजारों वर्षों से चला आ रहा यह राष्ट्रध्वज है। उसमें तिलमात्र परिवर्तन भी सभव नहीं।' लखपति निराश होकर लौट गया। दूसरे दिन सभी समाचार-पत्रों ने छापा- 'सघ ने लखपति की लाखों रुपयों की राशि टुकरा दी।' स्वप्न में भी डाक्टर जी को श्री गुरुजी के प्रति इतना विश्वास था। डाक्टर जी के जीवन के वे अतिम दिन थे। दिनोंदिन अधिकाधिक खराब होते जा रहे स्वास्थ्य से भी चिता में थे पर अपने रक्त के खाद पानी से बढाए इस सगठन के भविष्य के प्रति डाक्टर जी चिता कर रहे थे। में हमेशा उनके पास ही रहा करता था। उनकी मृत्यु के तीन दिन पूर्व उन्होंने मुझे पास बुलाया और एक विचित्र प्रश्न किया। संघ के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी की मृत्यु होने पर क्या उसकी अत्ययात्रा सैनिकी पद्धति से निकाली जाएगी। यह प्रश्न किसके बारे में किया जा रहा है, यह मन को वेदना हो, इतना स्पष्ट था। मैंने उसे टाल दिया, यह कहकर कि औषधि लेने का समय हो गया है। पर वे उसका अर्थ समझ गए। मुझे निकट थुलाकर उन्होंने कहा- 'सघ के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी की मृत्यु होने पर {१०६} श्रीगुरूजीसमय अह १२ - अत्ययात्रा सैनिकी पद्धति से होनी चाहिए। गुरुजी को उन्होंने आग्रह के स्वीकार करने के पहले दिन ही गुरुजी की यह विचित्र परीक्षा हो रही है, कहना ही सच निकला। सघ कोई निजी सैनिक सगठन नहीं, इसकी पूरी उसकी अत्ययात्रा सैनिकी पद्धति से निकाली जाना उचित नहीं होगा। थोडा रुककर उन्होंने कहा कि 'सघ क्या है? गुरुजी को इसकी पूरी कल्पना है। सघ के बारे में अनेक लोगों की अनेक कल्पनाएँ हैं, परतु गुरुजी का विचार परिपूर्ण है। उस दिन के उनके वे शब्द मुझ तक ही रहे। घटे-घटे में उनका स्वास्थ्य खराव होता जा रहा था। आखिर वह दुर्दिन भी आया। गुरुजी और अन्य सभी अत्यत दुखित अत करण से ऑखों में वहॉ ऑसू भरे खडे थे। डाक्टर जी की शारीरिक यातनाएँ असत्य थीं वे कभी सचेत रहते, तो कभी अचेत। डाक्टरों ने उनका लबर पक्चर करना पडेगा, यह निर्णय लिया। यह सुनते ही डाक्टर जी ने ऑखें खोली। गुरुजी की ओर दृष्टि डालकर कपित आवाज में उन्होंने कहा 'गुरुजी इस कार्य की धुरा अब आप पर है।' इसके बाद वे अचेत हो गए। उन शब्दों की तीव्रता सभी को अनुभव हुई, पर उसका अर्थ उस समय ध्यान में नहीं आया। डाक्टर जी ने भावी सरसघचालक की नियुक्ति कर अपने अतिम कर्तव्य की पूर्ति कर ली है, ऐसा किसी को नहीं लगा। स्वास्थ्य देख रहे डाक्टरों का निर्णय कान पर पड़ते ही अपना अतिम समय निकट आ गया है, वह उन्होंने पहचान लिया और पूरी तरह होश में रहते हुए उन्होंने यह वाक्य कहा था। दूसरे दिन सबेरे लबर पक्चर के बाद डाक्टर जी का देहात हो गया। लाखों हृदयों में प्रकाश निर्माण कर स्फूर्ति देनेवाला वह महान व्यक्तित्व अपने शाश्वत स्थान पर लौट गया, तब सभी को उनके शब्दों का स्मरण हुआ। उस श्रेष्ठ आत्मा को धारण करनेवाले पुण्यशाली शरीर का अतिम दर्शन करने के लिए हजारों स्वयसेवक नागपुर दौडे चले आए। अतिम यात्रा की सिद्धता चल रही थी, तब कई स्थानिक व्यक्तियों ने सुझाया कि अत्ययात्रा सैनिकी पद्धति से होनी चाहिए। अनेकों की कल्पना भी ऐसी ही थी कि अनुशासनबद्ध व प्रवल इस अतुलनीय सगठन के जन्मदाता की साथ यह सुझाया भी। डाक्टर साँप गए कार्य की जिम्मेदारी ऐसा मुझे लगा। पर गुरुजी किसी के दबाव में नहीं आए। डाक्टर जी का {१०७) श्रीशुरुजी समय खड १२ (युनयम स्मृति प्रक पुमाई १-७३) वार श्री बदरीनाथ धाम चलें। इस इच्छा के अनुसार यात्रा कार्यक्रम बनने समुचित कारण चाहिए ही। जहाँ सघ की शाखा और स्वयसेवक हैं, वहाँ अपने स्वयसेवकों से मिलने के लिए ही श्री गुरुजी के जाने का कार्यक्रम साधारणत बनता है। अत श्री महाराजजी ने एक मार्ग निकाला। बदरीनाथ धाम में लोगों के ठहरने के लिए सकीर्तन भवन की ओर से एक भवन का निर्माण कराया गया था, उन्होंने उसका उद्घाटन श्री गुरुजी से करवाने का हरिद्वार में विश्व हिंदू परिपद् की बैठक हुई। ऋषिकेश में देवी कल्पना गुरुजी को थी। सघ आज या कल सारे समाज का समावेश कर लेनेवाले एक बडे परिवार के रूप में रहे, यह वे पहचान चुके थे। बाद में सारे क्रियाकर्म एक पारिवारिक स्वरूप में, याने पिता की मृत्यु के बाद जिस स्वरूप में होने चाहिए, उसी में हुए। परिवार के बडे लडके द्वारा पिता को अग्निस्पर्श करने से लेकर तो सारे क्रियाकर्म गुरुजी ने किए। उसके बाद बडे लडके के नाते से ही डाक्टर जी द्वारा दी जिम्मेदारी उन्होंने ग्रहण की। तवसे अव तक सघकार्य की प्रगति देख अनेकों के मन में यह भाव आया होगा कि प्रत्यक्ष पिता ही पुत्र के रूप में पुन जन्म लेकर आया है, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। ३३ अनोखभावविश्व मे (श्री रज्जू भैया) पूज्य श्री प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी की बडी इच्छा थी कि श्री गुरुजी एक में बडा सहारा मिला। श्री गुरुजी के गुरुभाई स्वामी अमूर्तानदजी भी कई वार यदरी-केदार की यात्रा का कार्यक्रम बनाने के लिए कह चुके थे। पर श्री गुरुजी मला वहाँ क्योंकर जाने लगा वरीनाथ जाने के लिए कोई तय किया और आग्रहपूर्ण निमत्रण उनके अगले प्रवास तय होने के पूर्व ही जुलाई मास में श्री गुरुजी के पास भेज दिया। सप शिक्षा वर्ग के पूर्व श्री गुरुजी का जाना असभव ही था इसलिए सितवर मास में यात्रा की योजना बनाई गई। श्री गुरुजी, डा आवाजी थत्ते, स्वामी अमूर्तानदजी, लाला हसराजजी और उस क्षेत्र के मुछ तरुण कार्यकर्ता प्रमुदत्तजी ब्रह्मचारी के साथ यात्रा पर निकले। . श्रीशुरुजी समझ खड १२ अन्य कुछ पहनते नहीं। में श्री गुरुजी के लिए सूती वुना हुआ एक नया पाजामा लेता गया था, जो धोती के नीचे पहना जा सकता है। यह इसलिए कभी नहीं किया। मोजे और जूते की भी व्यवस्था की थी, परतु उसका भी उपयोग श्री गुरुजी ने नहीं किया। मेरे अतिशय आग्रह करने पर उन्होंने उत्तर दिया कि 'पहाड पर अनेकों व्यक्ति शीत-निवारक वस्त्र के विना काम = जीव सस्थान' में आश्रमवासियों के मध्य श्री गुरुजी का प्रवचन हुआ। श्रीनगर में स्वयसेवकों का एक कार्यक्रम हुआ। यात्रा में एक एम्बेसडर कार, एक जीप तथा श्री गुरुजी के लिए देहरादून के सघचालक जी की एक बडी इम्पाला कार थी। ब्रह्मचारी जी की अपनी गाडी थी। अभी असली चढाई प्रारभ भी नहीं हुई थी कि इम्पाला कार ने दम तोडना आरभ कर दिया। ऐसा लगा कि वह विदेशी कार स्वदेशी तीर्थ स्थानों पर जाना नहीं चाहती थी। अत उसे वापस लौटा दिया गया। उसके यानी शेष वाहनों में बँट गए और काफिला केदारनाथ की ओर चल दिया। अभी केदारनाथ का रास्ता पूरी तरह बना नहीं था, अतिम चढाई भी काफी कठिन थी। श्री गुरुजी को अव पैदल चलने का अधिक अभ्यास न होने के कारण थकावट हो सकती थी। इसलिए घोडे की सवारी अथवा डाडी से यात्रा करने का सुझाव दिया। जिसको अभ्यास न हो, उसे घोडे पर वैटकर याना करना भी कप्टदायक होता है। सारा शरीर दुखने लगता है। पर श्री गुरुजी डाडी में बैठने को तैयार नहीं थे। अधिक आग्रह करने पर उन्होंने साफ कह दिया कि मनुष्य के कधों पर चढकर चलने के लिए उन्होंने केवल अतिम महायाना का प्रसग निश्चित कर रखा है। तय हमने श्री महाराज जी से निवेदन किया कि शास्त्र की कोई वात बताकर वे इसके लिए श्री गुरुजी को मनाएँ। श्री महाराज जी के कहने पर उन्होंने इतना ही कहा कि वहाँ चलकर देखेंगे। पर केदारनाथ जाने का प्रसग ही नहीं आया। वर्षा के कारण रास्ते में कई स्थानों पर पहाड खिसक आया था और मार्ग अवरुद्ध हो गए थे। सडक के टूट जाने से केदारनाथ की यात्रा हो नहीं पाई। बदरीनाथ के रास्ते साफ होने के लिए ही हमको दो दिन रुद्रप्रयाग में रुकना पडा। पहाडों पर सर्दी बहुत पडती है और श्री गुरुजी धोती छोडकर {१०६] श्रीगुरुजी समय खड १२ लोट आना पडा। आने पर श्री गुरुजी ने श्री महाराज जी से कहा- 'आज - महाराज जी श्री गुरुजी के लिए विशेष रूप से मूंग के लड्डू बनवा कर लाए में श्री गुरुजी का वही पूर्ववत एक बार भोजन का तथा शुद्ध चाय का प्रयोग केदारनाथ जी यात्रा न हो पाने के कारण श्री बदरीनाथ क्षेत्र में पाँच दिन ठहरने का अवसर मिला। श्री गुरुजी ने बडे भक्ति-भाव से भगवान श्री बदरीनाथ जी का सविधि अभिषेक कराया। श्री अलखनदा के तट पर ब्रह्म-कपाली में अपने माता-पिताजी के लिए तथा पूर्वजों के लिए विधिवत पिड-दान दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपना भी श्राद्ध कर दिया। अपने लिए किए गए श्राद्ध की बात उन्होंने भरसक अप्रकट ही को एकत्रित करके अपने देश व धर्म के विषय में प्रश्न पूछे तथा सभी को का विचार वसुधारा भी जाने का था। माना तक तो जीप से गए पर माना साँस फूलने लगी। वसुधारा केवल डेढ मील रह गई थी। लेकिन वहीं से चलाते हैं, तो मुझे सर्दी से बचने के लिए इतने वस्त्रों की क्या आवश्यकता है? श्री गुरुजी को चाय पीने का चाव तो अवश्य है, पर कई वर्षों से उन्होंने चाय के साथ कुछ खाना छोड दिया था। न तो सायकाल भोजन करते थे और न रात्रि में दूध लेते थे। दिन भर में केवल एक बार भोजन और वह भी अत्यल्प करते थे। हम लोगों को बडी चिता थी कि यह अल्प आहार पहाड की सर्दी से बचने के लिए कैसे पर्याप्त शक्ति और उष्णता प्रदान कर पाएगा। यह सब सोचकर हम लोगों ने कुछ सूखे मेवे तथा मुनक्का निर्मित लड्डू अपने साथ ले लिए थे। मैंने उनसे कहा कि पहाड पर चाय के साथ कुछ लेना अत्यत आवश्यक है। एक दिन उनको आग्रहपूर्वक एक लड़ खिलाया। परतु यह कह कर कि इसमें मेरे दॉत चिपक जाते हैं, न तो उन्होंने आगे लड्डू ही याया और न मेया का ही प्रयोग किया। श्री थे, पर उन लड्डुओं को भी हम कार्यकर्ताओं को ही खाना पडा। पूरे प्रवास रखी। अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ श्री गुरुजी माना ग्राम भी गए, भारत का सीमावर्ती अतिम ग्राम है। माना ग्राम के छोटे-छोटे सभी थब्धयों मिठाई देने की व्यवस्था करवाई। श्री बदरीना जी से तीन मील की दूरी पर माना ग्राम है और ग्राम से आगे तीन मील पर वसुधाग से आगे पैदल जाना था। श्री गुरुजी डेढ मील तो जैसे-तैसे चले, पर, बना रहा। नो श्री गुरुजी दान मुझे अनुभव हुआ कि मैं बूढा हो रहा हूँ। माना के आगे डेढ मील १० श्रीगुरुजीसमन खड १२ " । । ह भाव-विभोरता को देखकर श्री महाराज जी ने बाद में कहा- 'अव तक तो ब्रह्मचारी जी महाराज ने सकीर्तन भवन का निर्माण कराया था और उसका 1 मुझे एक पद चलना भी भारी हो गया।' बदरीनाथ में एक दिन वहाँ के सभी तीर्थ पुरोहितों की बैठक हुई। उस बैठक में श्री गुरुजी ने सभी से पूछा कि वे अपने कर्मकाड के विषय में कितना जानते हैं। श्री गुरुजी ने सभी को सुझाव दिया कि दक्षिणा में क्या मिलता है, कितना मिलता है, इसका विचार न करते हुए सभी तीर्थ-पुरोहितों को अपना-अपना कार्य शास्त्रसम्मत रीति से करना चाहिए ऐसा करने से ही हिंदू समाज की श्रद्धा-भावना टिकी रह सकती है। श्री बदरीनाथ जी के मदिर के पुजारी केरल प्रदेश के नवृद्री ब्राह्मण हुआ करते हैं। उन दिनों मंदिर के जो रावल थे, उन्होंने अपनी विद्यार्थी अवस्था में श्री - गुरुजी का भाषण केरल में सुना था। सघ से भी उनका अच्छा परिचय था। उनके साथ भी श्री गुरुजी की बातचीत हुई। बदरीनाथ के अन्य नागरिकों के साथ भी भेट-वार्ता हुई। सभी से श्री गुरुजी ने यही कहा कि अपने धर्म पर आस्थापूर्वक चलें और अपने वधुओं के साथ स्नेह-सवध सुदृढ बनाए रखें। इन्हीं दिनों श्री महाराज जी के श्रीमुख से भागवत कथा सुनने का अवसर श्री गुरुजी को प्राप्त हुआ। दोपहर को तीन बजे से घटे-डेढ घटे उनकी रसमयी वाणी से कथा-श्रवण का आनद हम सभी को प्राप्त होता था। श्री महाराज जी कथा इतनी तन्मयता के साथ कहते, प्रसों का वर्णन इतना रोचक होता, पानों की भाव-भावनाएँ इतनी सुदर रीति से व्यक्त होती कि सुनने वाले उस कथा गगा में पूर्णत वह जाते। प्रेमाश्रु-पूर्ण नेत्रों से श्री गुरुजी भी उस कथा को सुनते थे। श्री महाराज जी नित्य श्रीकृष्ण-घरित्र की कथा सुनाया करते थे। प्रसग था अमर-गीत का। श्री गुरुजी की मैं उन्हें एक सामाजिक नेता के रूप में समझता था, कितु भगवत्कथा के समय में जान पाया कि वे तो नारियल की भाँति हैं। नारियल जो ऊपर से तो दृढ कटोर दिखलाई देता है, पर जिसके भीतर स्वच्छ निर्मल नीर परिपूर्ण रूप से भरा रहता है। जितनी देर वे कथा सुनते, उनकी आँखों से रह-रह कर अश्रु प्रवाहित होते रहते थे। अपनी इस तीर्थ यात्रा तथा कथा-श्रवण के बारे में श्री गुरुजी ने स्वय एक पत्र में लिखा है- 'श्री बदरीनारायण क्षेत्र में श्रद्धेय श्री प्रभुदत्त {१११) 1 श्रीगुरुपी समय खड १२ प्रकट हो जाता था कि यद्यपि श्री गुरुजी ने डाक्टर साहब के कहने पर अपना अध्यात्म-परक प्रथम प्रेम छोडकर समाज-सेवा का व्रत अपनाया था, कथा कहीं मुझे यहीं रह जाने के लिए विवश न कर दे। ऐसे प्रसगों पर परतु फिर भी वह प्रथम आकर्पण जव-तब उचित उद्दीपन पाकर प्रबल हो उद्घाटन मुझे ही करना चाहिए, ऐसी उनकी इच्छा थी। श्री महाराज जी की इच्छा को आदेश मानकर मैंने श्री बदरीनाथ की यात्रा करने का निश्चय किया। सोचा कि वर्षों की उत्कट इच्छा पूर्ण करने के लिए परम कृपालु श्री बदरीनाथ ने ही यह सयोग वनवाया होगा और अपने अतरग भक्त श्री ब्रह्मचारी जी महाराज को मुझे भवन के उद्घाटन करने के हेतु निमंत्रित करने की प्रेरणा दी होगी। इस कार्यक्रम को निमित्त बनाकर मुझ पर श्री भगवान ने दया कर मुझे अपने पास खींचकर ले जाने का मेरे लिए भाग्य का सुयोग प्राप्त करा दिया। अकारण करुणा करने का यह पवित्र खेल, खेलकर मुझ पर अपना वरदहस्त रख दिया। श्री यदरीनाथ पहुँच कर पाँच रात्रि वहाँ भगवच्चरणों में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और श्री महारान जी के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत के कुछ अश का विवरण सुनने का असीम सुख प्राप्त कर सका। भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के कारण शोक विह्वल गोप-गोपियों और विशेषकर नद वाया और यशोदा मैया की भाव-विभोर अवस्था का उनके द्वारा किया हुआ वर्णन पत्थर को पिघला सकने वाला कारुण्य रस का उत्कट आविष्कार था। उनको सात्वना देने के लिए श्री भगवान के द्वारा प्रेषित उद्धवजी के आगमन पर गोप, गोपी, यशोदा माई आदि की स्थिति, उनकी भावनाएँ उनका उद्धव जी के साथ हुआ सभाषण श्री ब्रह्मचारी जी के श्रीमुख से सुनते-सुनते मन एक सुखद वेदना का अनुभव कर द्रवित हो जाता था। इस अनुभव का वर्णन किस प्रकार करूँ?' श्री गुरुजी की विह्वल स्थिति की बात तो उनके अनोखे व्यक्तित्व के अनुरूप ही है। उसकी चर्चा ही क्या की जाए, जबकि हम जैसे शुष्क व्यक्ति भी कथा की समाप्ति के बाद एक अनिर्वचनीय अतृप्ति का अनुभव करते थे। श्री बदरीनाथ यात्रा का यह कथा-श्रवण प्रसग अद्भुत और अभूतपूर्व था। एक दिन श्री गुरुजी ने मुझसे कहा- 'अव यहाँ से जल्दी ही चलना चाहिए, नहीं तो हिमालय की यह शाति और ब्रह्मचारी जी की यह उटता था और श्री गुरुजी उसे प्रयत्नपूर्वक दयाकर रखते थे। -- (पीवज प्रता- पृष्ठ ३७ श्रीपुरुषी समय सह १२ सर्वोपरि महत्ता हमारे राष्ट्र के वर्तमान सदर्भ में ही नहीं है, वरन् अतर्राष्ट्रीय सदर्भ में भी है। हमारी सास्कृतिक दृष्टि को ही, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम एव सामजस्य के लिए सच्चा आधार प्रदान करती है और जीवन के सपूर्ण दर्शन को मूर्त करती है, आज के इस युद्ध से ध्वस्त हुए ३४ श्रद्धावान विभूति (भक्त रामशरणदास, पिलखुवा) हमारे देश का नेतृत्व दो प्रकार के नेताओं के हाथ में रहा । एक प्रकार के नेता वे थे, जो भौतिकवाद की चकाचौंध में फंसे रहने के कारण भौतिक प्रगति को ही सर्वोपरि मानकर भारत को अमरीका, ब्रिटेन व फ्रास की तरह घोर भौतिकवादी देश बना डालने का स्वप्न देखते रहे। उनकी दृष्टि में भारतीय दर्शन, अध्यात्मवाद आदि का कोई महत्त्व ही नहीं था। भारत पश्चिमी देशों का अधानुकरण कर तेजी से भोगवाद की ओर अग्रसर हो- यह उनकी आकाक्षा रही। दूसरी ओर भारत के प्राण धर्म, संस्कृति तथा उनके महान दर्शन को ही भारत की प्रगति तथा सच्ची समृद्धि माननेवाले नेता थे। भारत की स्वाधीनता के बाद देश में दोनों प्रकार के प्रयास चलते रहे। भारत तेजी से भौतिकवाद की ओर दौडने लगा और उसके दुष्परिणाम घोर अशाति, असतोप तथा अनुशासनहीनता के रूप में तत्काल सामने आने लगे। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी राष्ट्र के उन अग्रणी नेताओं में से थे जो घोर भौतिकवाद के दुष्परिणामों को भली-भाँति जानते थे, अत उन्होंने स्वाधीनता प्राप्त होने से पूर्व स्वाधीन भारत की कल्पना करते समय 'स्वाधीन भारत' को भारतीय संस्कृति, भारतीय दर्शन तथा अध्यात्मवादी मूल्यों से युक्त धर्मप्राण अखड भारत का स्वप्न हृदय में सँजोया था। अपने इस महान स्वप्न की पूर्ति के लिए वे जीवन के अतिम क्षणों तक अनवरत प्रयास करते रहे। स्वामी विवेकानद तथा स्वामी रामतीर्थ की तरह धर्मप्राण भारत के आध्यात्मिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए उन्होंने देश भर का भ्रमण कर जो अथक प्रयास किया, वह भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। श्री गुरुजी ने भारतीय सस्कृति की पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था- 'हमारी संस्कृति के प्राचीन एव जीवनदायी लक्षणों को पुन तारुण्य प्रदान करने के कार्य की अविलब आवश्यकता और श्रीगुरुजीसमय खड १२ {११३} - उस बैंक में लगाई है, जो कभी डूब नहीं सकता।" उनके ये शब्द उनरी विश्व के सामने प्रभावी ढंग से रखने की आवश्यकता है।' 'हमें विदेशी वादों की मानसिक शृखलाओं और आधुनिक जीवन के विदेशी व्यवहारों तथा अस्थिर 'फैशनों' से अपनी मुक्ति कर लेनी होगी। परानुकरण से बढकर राष्ट्र की अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती। हम स्मरण रखें कि अधानुकरण माने प्रगति नहीं। वह आत्मिक पराधीनता की ओर ले जाता है। 'हमारी महान सस्कृति की जडें अमरता के स्रोतों में अत्यत दृढता से एव गहराई तक जमी हुई हैं, जो सरलता से सूख नहीं सकती। वे अपने प्राचीन ओज एव जीवन शक्ति को निश्चय के साथ प्रकट करेंगी ही एव अपनी सपूर्ण पुरातन शुद्धता एवं भव्यता के साथ एक बार पुन अकुरित होंगी। श्री गुरुजी के उपरोक्त शब्दों में भारतीय संस्कृति की महानता के साथ-साथ उनके इस दृढ विश्वास की झलक मिलती है कि भारतीय सस्कृति को बड़ी से बड़ी शक्ति भी हिला नहीं सकती। विपरीत परिस्थितियों में भी वे इसी दृढ आशा व विश्वास के कारण भारतीय संस्कृति के रक्षण व सवर्धन के लिए अनवरत प्रयास करते रहे। बडी-बडी बाधाओं व आरोप-प्रत्यारोपों से जूझते हुए भी वे प्राचीन भारत के गौरव की रक्षा की सिहनाद करते रहे। श्री गुरुजी दृढ ईश्वर विश्वासी तथा सनातन धर्मी थे। वे प्रत्येक कार्य को प्रारभ करते समय ईश्वर वदना करना न भूलते थे। ईश्वर पर दृढ विश्वास का परिचय उन्होंने सघ पर लगे प्रतिवध के समय अनेक बार दिया था। उन्हें सरकार ने छह माह तक एकात कारावास में रखा, तर उन्होंने एकातवास का उपयोग प्रभुभक्ति में किया। उनके स्वास्थ्य की जानकारी के लिए जब जस्टिस मगलमूर्ति ने कारावास जाकर उनसे भेंट की लो उन्होंने हँसते हुए कहा था- “मैंने अपनी जीवन-पूँजी 'ईश्वर' नामक ईश्वर के प्रति दृढ आस्था के ही प्रतीक हैं। गुरुजी ने एक बार सघ के स्वयसेवकों तथा हिंदू समाज के प्रत्येक घटक के नाम दिए अपने संदेश में कहा था- “विजय निश्चित है। क्योंकि धर्म के साथ श्री भगवान और उनके श्रीगुरुखी समझ ख १२ । शकराचार्य से भेंट करते अत्यत विनम्रता के साथ उनके चरणस्पर्श करते। विचारों की अनेक बातें ऐसी हैं, जिन्हें वे भले ही ठीक न समझते हों तथा साथ विजय रहती है। तो फिर हृदयाकाश से जगदाफाश तक 'भारत माता की जयध्वनि' ललकार कर उठी, और कार्य पूर्ण करके ही रहो।" वे ईश्वर, देवी-देवता, तीर्थस्थानों, गाय, गगा, गायत्री आदि सभी के प्रति आस्था रखते थे। सघकार्य हेतु प्रयास के दौरान मदिरों व तीर्थस्थलों में एक श्रद्धालु के नाते जाकर दर्शन करते थे। अटक से लेकर कटक तक तथा हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक के तीर्थो तथा देवमंदिरों के सभवत उन्होंने सबसे अधिक धार दर्शन किए होंगे। वे ब्रजयाना के दौरान द्वारकाधीश जी या भगवान बाकेबिहारी जी के मदिर में जाते, तो भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष पहुँचते ही लीन हो जाते थे। श्री गुरुजी को निकट से देखने का मुझे अनेक बार अवसर प्राप्त हुआ। कभी सत प्रभुदत्त ब्रम्हचारी जी के यहाँ तो कभी द्वारिका के जगद्गुरु शकराचार्य जी महाराज के यहाँ। मैंने उनके व्यक्तित्व में महान आस्तिकता के दर्शन किए। प्रयाग के कुभ के अवसर पर विश्व हिंदू परिषद् के मच पर हिंदू-समाज के सभी संप्रदायों के धर्माचार्यों को एक साथ एकत्रित करने का श्रेय श्री गुरुजी के विनम्र व प्रभावी व्यक्तित्व को ही है। मच पर चारों पीठों के जगद्गुरु शकराचार्य तथा अन्य धर्माचार्य विराजमान थे। श्री शकराचार्य महाराज ने प्रवचन से पूर्व 'श्री राम जय राम जय जय राम' महामत्र का गायन प्रारभ किया कि श्री गुरुजी तन्मयता के साथ सकीर्तन में मग्न हो गए। इसके पश्चात् सत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के झूसी आश्रम में उन्होंने भगवन्नाम सकीर्तन में तन्मयता से भाग लिया। भगवान श्रीकृष्ण की लीला का रसास्वादन करते उन्हें हमने स्वय देखा था। गुरुजी धर्माचार्यों एव सत-महात्माओं के प्रति पूर्ण आदर की भावना व्यक्त करते थे। गोहत्या विरोधी आदोलन के दौरान जब भी वे श्री यही विनम्रता एव निरहकारिता उनके बडप्पन की सबसे बडी थाती थी। एक सच्चे व आस्तिक व्यक्ति में भला अहकार जैसा दुर्गुण पास फटक भी पूजनीय गुरुजी का मुझसे बहुत स्नेह था। मेरे कट्टरपथी सनातनी {११५) कैसे सकता है? श्रीगुरुजी सिम खड १२ शकराचार्य जी ने कहा- 'आप इन्हें जानते हैं? वे तपाक से मुस्कराकर बोले- 'ये पिलखुवा जी हैं? हमारे हिदू समाज को लेखनी से सचेत करने मेरे निवासस्थान पिलखुवा के कारण वे मुझे प्राय 'पिलखुवा जी' गोहत्या के इस भीषण कलक को मिटाने के लिए उन्होंने समय-समय पर भारी प्रयास किया। संघ के स्वयसेवकों ने पौने दो करोड से अधिक हस्ताक्षर सग्रहित कर गोहत्या बदी की माँग की। जब भी गोरक्षा आदोलन प्रारभ हुआ, उन्होंने उसमें पूर्ण योग दिया। इसी प्रकार जब कभी काग्रेसी सरकार ने हिदू धर्म पर आधात किए, उन्होंने उनका डटकर उत्तर दिया। मुझे भली-भाँति स्मरण है कि सन् १९६२ से पूर्व ही उन्होंने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि चीन भारत पर आक्रमण करेगा, अत हमें रखता होऊँ, कितु व्यक्तिगत रूप से उनका मुझ पर वरावर स्नेह वना रहता था। विचारभिन्नता ने उनकी कृपा या स्नेह में कभी कोई कमी नहीं आने दी। एक बार मुझे भीषण रोगी रहना पड़ा तो मित्रवर श्री अक्षयकुमार जैन (सपादक, नवभारत टाईम्स) मुझे देखने पिलखुवा पधारे। श्री गुरुजी ने प्रवास के दौरान 'नवभारत टाईम्स' में यह समाचार पढ लिया। उन्होंने तुरत पत्र लिखा तथा स्वास्थ्य की कामना की। मेरट में अथवा दिल्ली या प्रयाग में जब भी उनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्होंने सघ अधिकारियों से परिचय कराते समय अत्यत स्नेह प्रकट कर अपनी विशाल हृदयता का परिचय दिया। गोरक्षा आदोलन के दौरान १६६१ में द्वारिका पीठाधीश्वर जगद्गुरु शकराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानद तीर्थ जी महाराज दिल्ली पधारे हुए थे। कर्जन रोड स्थित श्री कुदनलाल के निवासस्थान पर मैं अपने पुत्र शिवकुमार गोयल के साथ उनके पास वैटा वार्ता कर रहा था। अचानक श्री गुरुजी वहाँ आ पहुंचे तथा शकराचार्य जी के चरणस्पर्श कर बैठ गए। का विभाग इन्हीं के पास है।' कहकर सबोधित करते थे। पूजनीय गुरुजी धर्मप्राण ऋषि-मुनियों के देश भारत की पवित्र भूमि पर गोहत्या के कल जारी रहन से अत्यत दुखित रहते थे। देश की जनता को समय-समय पर सचेत कर उसे राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित किया। {११६] श्रीशुरुषी समय खड १२ कृतित्व व व्यक्तित्व से निरतर प्रेरणा प्राप्त कर धर्म व समाज की सेवा के आज तमाम देश शोकमग्न है। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, कितु हम उनके सतर्क रहना चाहिए। किंतु हमारे अदूरदर्शी प्रधानमत्री आदि ने इस भविष्यवाणी को 'पागलपन' तक कर कर मजाक में उड़ा दिया था। कितु जब चीन ने आक्रमण कर दिया तो इस महापुरुष की दूरदर्शिता पर सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया था। आजकल वढती हुई महत्त्वाकाक्षा के युग में नेता लोग अपने व्यक्तिगत प्रचार के लिए नई-नई तिकडमें अपनाते हैं। स्वय प्रयास कर अपने बारे में अभिनदन-पत्र तथा अमिनदन-पथ प्रकाशित कराने का प्रयास करते हैं। अनेक ने तो अपने ही सामने अपनी मूर्तियाँ तक जनवा लीं, ताकि मरते समय यह आशका ही न रहे कि बाद में कोई पृछेगा भी नहीं। दूसरी ओर गुरुजी जैसे अपने प्रचार से कोसों दूर रहने वाले महापुरुष आज के युग में विरले ही होते है। उनके महान व्यक्तित्व व कार्यों को देखते हुए एक क्या, एक दर्जन विशाल अभिनदन-ग्रथ भेंट किए जा सकते थे, कितु उन्होंने इस प्रकार का आयोजन कभी स्वीकार ही नहीं किया। गोलोकवासी होने के पूर्व दो अप्रेल १६७३ को लिखी अपनी अतिम इच्छा में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि 'अपना कार्य व्यक्तिपूजक नहीं, राष्ट्रपूजक है, अत मेरा स्मारक आदि विल्कुल न बनाया जाए। गुरुजी धर्मशास्त्रों की मर्यादा व परपरा के पालन के प्रति कितने सजग थे, यह भी उनकी अंतिम वसीयत से प्रकट होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार सन्यासी अथवा अविवाहित व्यक्ति के लिए स्वय अपने जीवनकाल में अपने हाथों श्राद्ध क्रिया कर लेने का विधान है। उन्होंने ब्रह्मकपाल जाकर स्वय अपना श्राद्ध कर रखा था। यह उनके अतिम पत्र से रहस्योद्घाटन हुआ। उनके अतिम उद्गार जो उन्होंने सत तुकाराम के भजन को उद्धृत कर व्यक्त किए थे, वे अत्यत मार्मिक व उनकी दृढ ईश्वरनिष्ठा के परिचायक हैं। उन्होंने अपने कुलदेवता अर्थात् भगवान को सबोधित करते हुए कहा था- 'मेरे देवता मेरी तुमसे यही अतिम प्रार्थना है कि तुम मुझे भूल न जाना। श्री गुरुजी के निधन को हिंदू समाज की अपूरणीय क्षति मानते हुए मार्ग पर चल सकते है। श्रीपुरुषी समय खड १२ (युगधर्म खून १६७३) {११७ रखता होऊँ, कितु व्यक्तिगत रूप से उनका मुझ पर वरावर स्नेह बना रहता था। विचारभिनता ने उनकी कृपा या स्नेह में कभी कोई कमी नहीं आने दी। एक बार मुझे भीषण रोगी रहना पडा तो मित्रवर श्री अक्षयकुमार जैन (सपादक, नवभारत टाईम्स) मुझे देखने पिलखुवा पधारे। श्री गुरुजी ने प्रवास के दौरान 'नवभारत टाईम्स' में यह समाचार पढ़ लिया। उन्होंने तुरत पत्र लिखा तथा स्वास्थ्य की कामना की। मेरट में अथवा दिल्ली या प्रयाग में जब भी उनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्होंने सप अधिकारियों से परिचय कराते समय अत्यत स्नेह प्रकट कर अपनी विशाल हृदयता का परिचय दिया। गोरक्षा आदोलन के दौरान १६६१ में द्वारिका पीठाधीश्वर जगद्गुरु शकराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिदानद तीर्थ जी महाराज दिल्ली पधारे हुए थे। कर्जन रोड स्थित श्री कुदनलाल के निवासस्थान पर मैं अपने पुत्र शिवकुमार गोयल के साथ उनके पास बैठा वार्ता कर रहा था। अचानक श्री गुरुजी यहाँ आ पहुंचे तथा शकराचार्य जी के चरणस्पर्श कर बैठ गए। सकराचार्य जी ने कहा- 'आप इन्हें जानते हैं? घे तपाक से मुस्कराकर बोले- 'ये पिलखुवा जी हैं? हमारे हिदृ समाज को लेखनी से सचेत करने का विभाग इन्हीं के पास है।' मेरे निवासस्थान पिलखुवा के कारण वे मुझे प्राय "पिलखुवा जी' कहकर सबोधित करते थे। पूजनीय गुरुजी धर्मप्राण ऋषि-मुनियों के देश भारत की पविन भूमि पर गोहत्या के कलक के जारी रहने से अत्यत दुखित रहते थे। गोहत्या के इस भीषण कलक को मिटाने के लिए उन्होंने समय-समय पर भारी प्रयास किया। संघ के स्वयसेवकों ने पौने दो करोड़ से अधिक हस्ताक्षर संग्रहित कर गोहत्या बदी की माँग की। जब भी गोरक्षा आदोलन प्रारभ हुआ, उन्होंने उसमें पूर्ण योग दिया। इसी प्रकार जव कमी काग्रेसी सरकार ने हिदु धर्म पर आधात किए, उन्होंने उनका डटकर उत्तर दिया। देश की जनता को ममय-समय पर सचेत कर उसे राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित किया। मुझे भली-भाँति स्मरण है कि सन् १९६२ से पूर्व ही उन्होंने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि चीन भारत पर आक्रमण करेगा, अत हमें श्रीधुरुजीसमय खड १२ ३ सतर्क रहना चाहिए। किंतु एमारे अदूरदर्शी प्रधानमत्री आदि ने इस भविष्यवाणी को 'पागलपन' तक कहकर मजाक में उड़ा दिया था। कितु जय चीन ने आक्रमण कर दिया तो इस महापुरुष की दूरदर्शिता पर सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया था। आजकल बटती हुई मात्वाकाक्षा के युग में नेता लोग अपने व्यक्तिगत प्रचार के लिए नई-नई तिकडमें अपनाते हैं। स्वय प्रयास कर अपने बारे में अमिनदन-पत्र तथा अभिनदन-प्रथ प्रकाशित कराने का प्रयास करते हैं। अनेक ने तो अपने ही सामने अपनी मृर्तियाँ तक बनवा लीं, ताकि मरते समय यह आशका ही न रहे कि याद में कोई पृछेगा भी नहीं। दूसरी ओर गुरुजी जैसे अपने प्रचार से कोसों दूर रहने वाले महापुरुष आज के युग में विरले ही होते है। उनके महान व्यक्तित्व व कार्यों को देखते हुए एक क्या, एक दर्जन विशाल अभिनदन-अथ भेंट किए जा सकते थे, कितु उन्होंने इस प्रकार का आयोजन कभी स्वीकार ही नहीं किया। गोलोकवासी होने के पूर्व दो अप्रैल १६७३ को लिखी अपनी अतिम इच्छा में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि 'अपना कार्य व्यक्तिपूजक नहीं, राष्ट्रपूजक है, अत मेरा स्मारक आदि विल्कुल न बनाया जाए। गुरुजी धर्मशास्त्रों की मर्यादा व परपरा के पालन के प्रति कितने सजग थे, यह भी उनकी अंतिम यसीयत से प्रकट होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार सन्यासी अथवा अविवाहित व्यक्ति के लिए स्वय अपने जीवनकाल में अपने हाथों श्राद्ध क्रिया कर लेने का विधान है। उन्होंने ब्रह्मकपाल जाकर स्वय अपना श्राद्ध कर रखा था। यह उनके अतिम पन से रहस्योद्घाटन हुआ। उनके अतिम उद्गार जो उन्होंने सत तुकाराम के भजन को उद्धृत कर व्यक्त किए थे, वे अत्यत मार्मिक व उनकी दृढ ईश्वरनिष्ठा के परिचायक हैं। उन्होंने अपने कुलदेवता अर्थात् भगवान को सबोधित करते हुए कहा था- 'मेरे देवता मेरी तुमसे यही अतिम प्रार्थना है कि तुम मुझे भूल न जाना।' श्री गुरुजी के निधन को हिंदू समाज की अपूरणीय क्षति मानते हुए आज तमाम देश शोकमग्न है। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, कितु हम उनके कृतित्व व व्यक्तित्व से निरतर प्रेरणा प्राप्त कर धर्म व समाज की सेवा के मार्ग पर चल सकते है। (युषयर्म जून १६७३) {११७) श्रीपुरुषी समय खड १२ ३५ दलितो के प्रतिदुर्भाव नहीं था (श्री रा सु गवई, रिपब्लिकन नेता) गुरुजी ने वर्णाश्रम व्यवस्था और धातुवर्ण्य का समर्थन किया। यह समर्थन हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को कभी भी मान्य नहीं हो सकता था, पर उन्होंने यह समर्थन दलितों के प्रति दुर्भाव से नहीं किया था। कम से कम मैं तो यह मानने को तैयार नहीं है। गुरुजी के विचार प्रामाणिक थे। हम कार्यकर्ताओं ने उसकी जो आलोचना की, वह केवल तात्विक मतभेद के कारण ही। उनके प्रति दुभावना हमारे मन में स्पर्श तक नही कर पाई थी। गुरुजी के मत और हमारे मत देखें तो वह विचारों का प्रामाणिक मतभेद है, यही मानकर उस और देखना होगा। ऐसा नहीं होता तो वर्णव्यवस्था का विरोध करनेवाले हम कार्यकर्ता गुरुजी के विरोध में खड़े रहते, पर ऐसा नहीं हुआ। गुरुजी विचारों के प्रति कटोर, मत के प्रति आग्रही थे, पर प्रत्यक्ष दर्शन में भेट के समय और सहवास में अत्यत मृदु, नम्र, विनयशील थे। उनसे मिलने का दो-तीन बार अवसर मिला। गुरुजी प्रखर तत्त्व के थे। ऐसे लोगों को दूसरों से जमा लेना कठिन जाता है। पर गुरुजी इसके अपवाद थे। राष्ट्रीय एकात्मता का निस्सीम भक्त, इस रूप में उनका उल्लेख करना होगा। उनकी प्रत्येक कृति में राष्ट्रभक्ति और त्याग था। उत्तम सगठक, त्यागी, विद्वान, अनुशासनप्रिय- ऐसा यह नेतृत्व था। ऐसे लोग, देश को उनकी जरूरत रहते बिछुड़ रहे हैं, यह दुर्भाग्य है। (मराठा श्रीलकी खालि विशेषाक मुबई माई १६७३) ३६ नेता हो तो ऐसा (श्री वसतराव ओक) सितवर १६४७ के दिन थे। पजाव में भीषण बाढ आई हुई थी। परमपूजनीय श्री गुरुजी को जालधर से फगवाडा के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जाना था। जालघर के पास नदी में भीषण बाढ के कारण रेलवे पुल के बीच श्रीधुरपी समर ख १२ fe) बोले- 'जो हिदृ बधु अपने पावन धर्म की रक्षा के लिए दर-दर की ठोकरें सकता। वे इस भीषण परीक्षा में सफल हुए हैं।' के खये बह गए थे तथा रेल पटरियाँ केवल इधर-उधर के दो आधारों पर लटकी हुई थीं। जालघर से नदी पार करने का और कोई मार्ग था ही नहीं। लटकी हुई रेल पटरी को पार करना खतरे से खाली नहीं था। श्री गुरुजी फगवाडा के कार्यक्रम में पहुँचने को दृढ सकल्प थे उन्हें खतरे के नाम पर रोका नहीं जा सकता था। हमने योजना बनाई कि सबसे आगे मैं रहूँगा, बीच में श्री गुरुजी तथा पीछे अन्य व्यक्ति- इस प्रकार सतर्कता से स्लीपरों पर पैर रखते हुए उसे पार कर लेंगे। जैसे ही पुल पर पहुँचे कि श्री गुरुजी तेजी से आगे बढकर हम सबसे आगे हो लिए। हमारी योजना धरी की धरी रह गई। नाम मान को लटकी हुई रेल पटरी के स्लीपरों पर वे निर्भीकता के साथ अपने चरण बढाते हुए पार हो गए। मुझे तय तक जान में जान नहीं आई, जब तक वे सकुशल पार नहीं पहुंच गए। किसी भी कार्यक्रम में समय पर पहुँचना तथा बड़े से बड़े खतरे का स्वय आगे रहकर सामना करना- यह श्री गुरुजी की सदा ही प्रवृत्ति रही। किसी सकट या खतरे से भयभीत या विचलित होना तो उन्होंने भारत विभाजन के दौरान श्री गुरुजी अमृतसर में थे। सघ के स्वयसेवक पाकिस्तान बने क्षेत्रों से मारे-पिटे व लुटकर आने वाले हिदू यधुओं की हर प्रकार सेवा में तत्पर थे। श्री गुरुजी जब लाहौर मुल्तान, कराची, आदि अनेक स्थानों पर अपने हिदू जनों की रक्षा के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने व अत्याचार सहन करने की घटनाएँ सुनते तो उनका एक दिन प्रख्यात नेता श्री मेहरचद महाजन तथा जस्टिस रामलाल उनसे भेंट करने आए। श्री महाजन ने कहा, 'गुरुजी' हम तो रिफ्यूजी हैं।' श्री गुरुजी ने यह वाक्य सुनते ही कहा 'नहीं, आप रिफ्यूजी नहीं, यह समस्त राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति का है, आप सब उसके समान अधिकारी हैं। कोई अपने ही देश में 'रिफ्यूजी' कैसे हो सकता है। वे कुछ क्षण रुके तथा खाकर भी इधर आ रहे है, उनके बलिदानों को कभी नहीं भुलाया जा सीखा ही नहीं था। हृदय द्रवित हो उठता। सायकाल अमृतसर में एक विराट सभा का आयोजन था। कुछ ही {११६} श्रीशुरुजीसमा खड १२ ।
देर पूर्व हिंदू वधुओं के बलिदानों व अत्याचारों की घटनाएँ सुनकर विदीर्ण हुए हृदय ने सभा में पूर्ण धैर्य का परिचय दिया। उनकी वाणी में न उत्तेजना थी न आवेश। शात भाव से उपस्थित लाखों विस्थापितों को सबोधित किया। यह बात भारत विभाजन से पूर्व १६४६ की है। मैं श्री गुरुजी के साथ हैदराबाद व कराधी आदि के प्रवास पर था। हैदराबाद में मुस्लिम आततायियों ने हिदुओं पर आक्रमण कर अनेकों को जान से मार डाला था। इस दगे में सघ के एक कर्मट कार्यकर्ता की भी हत्या कर दी गई थी। हैदराबाद पहुँचते ही श्री गुरुजी ने स्वयसेवकों से पूछा- 'उस हुतात्मा स्वयसेवक के घर में कौन है?' जव उन्हें बताया गया कि उसकी विधवा पत्नी है। तो वे स्वय उसके पास जाकर मिले। उसे सात्वना दी तथा कार्यकर्ताओं को उस शहीद पत्नी के जीवन निर्वाह की व्यवस्था का निर्देश दिया। इस प्रकार सदेव ही वे सघ के प्रत्येक कार्यकर्ता के योगक्षेम की चिता राष्ट्रकार्य के समान रखते थे। इन दिनों कराची में साधु टी एल वासवानी की अध्यक्षता में श्री गुरुजी की जो सभा हुई थी, वह बहुत विराट सभा थी। श्री गुरुजी के एक शब्द से वहाँ के हिदुओं में आशा का संचार हो उठा था। गोवा को पुर्तगाली दासता से मुक्त कराने का सकल्प लेकर १६५५ में जब मैंने दिल्ली से सत्याग्रही जत्था ले जाने का निर्णय किया तो श्री गुरुजी को पत्र लिखकर गोवा सग्राम को सफलता के लिए उनके शुभाशीर्वाद की कामना की। श्री गुरुजी ने पत्र मिलते ही मुझे जो शब्द लिखे वे मेरे जीवन के लिए प्रेरणा के अजस स्रोत बन गए। उन्होंने लिया था- 'यदि मेरे पास अपनी कुछ पुण्याई है, भगवान की कृपा है, तो वह समस्त पुण्याई तुम्हारे साथ है। शुभकार्य में सफलता का विश्वास लेकर आगे बढो तथा यशस्विता से वापस लौटो।' पूजनीय श्री गुरुजी इस युग के ऐसे राष्ट्रपुरुप थे कि जिनके व्यक्तित्व-कृतित्व से विश्वभर के व्यक्ति व राष्ट्र समाजसेवा, अनुशासन तथा सगठन की प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे। उनका विराट व्यक्तित्व नवसृजन का प्रतीक था। विभिन्नता में एकता के विश्वश्रेष्ठ भारतीय जीवनदर्शन के ये मूर्तिमान स्वरूप थे। उनकी प्रत्येक कृति और विचार में सपूर्ण भारत की २०) श्रीशुरुजी समन अट १२ -- -- कार्यभार जिन्हें सौंपा था, उन श्री गुरुजी की चिता की ज्वाला है वह। डा हेडगेवार जी द्वारा सौंपे गए कार्य की सिद्धि हेतु अपनी सपूर्ण आयु यज्ञकुड उसकी साक्षीभूत ज्वाला है यह। ध्येय सिद्धि के अपने जीवनयज्ञ में उनके द्वारा दी गई पूर्णाहुति से प्रज्ज्वलित ज्वाला का प्रकाश है वह। उस रात को दिन के रूप में परिवर्तन करने वाला स्वर्ण प्रकाश है वह। अखडता का दर्शन होता है। उनके साथ अनेक वर्ष बिताने, उनसे बहुत कुछ सीखने उनके विराट व महान व्यक्तित्व को निकट से देखने का मुझे जो सौभाग्य प्राप्त हुआ वह मेरे जीवन की अमूल्य थाती रहेगी। (पाचजन्य गुमाई १९७३) ३७ वहप्रकाश (श्री हो वे शेषाद्रि) २० जून १६४०। नागपुर। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सस्थापक पूज्य डाक्टर केशवराव रेडगेवार की अस्वस्थता विषम स्थिति को पहुँची है। उन्हें भास होने लगा है कि अतिम क्षण आ रहे हैं। उन्होंने गुरुजी तथा सघ के अन्य प्रमुखों को अपनी शय्या के पास बुलाया और गुरुजी को सबोधित कर 'अव से सघ का सारा उत्तरदायित्व आपको ग्रहण करना होगा' कहते हुए एक ही वाक्य में समाप्त कर दिया। इसके अगले दिन उन्होंने अपना इस बात के पश्चात् लगभग ३३ वर्ष व्यतीत हो गए। इसी वर्ष ६ जून १६७३ को सूर्यास्त के पश्चात् रात्रि का आगमन हुआ है, परतु नागपुर का रेशमबाग मैदान प्रकाशित हो रहा है। वह कौन-सा प्रकाश है? डा हेडगेवार जी के समाधिस्थल पर उनका स्मृतिमदिर है। उसमें उनकी पूर्णाकृति की भव्य प्रतिमा है। वे पूर्व दिशा की ओर एकटक देखते हुए बैठे हैं। प्रत्येक दिन प्रात उकालीन स्वर्णकिरणों को निहारने वाले उनके नेत्र आज रात्रि के समय वही स्वर्ण किरणें देख रही हैं। वह कौन-सा प्रकाश है? वह एक चिता की ज्वाला है। डा हेडगेवार जी ने सघ का के समान लगातार जलाकर अब श्री गुरुजी अपनी जो पूर्णाहुति दे चुके हैं, उस दिन ६ जून को रेशमबाग मैदान में मात्र चमका हुआ एक {१२१) शरीर त्याग दिया। an - श्रीगुरुजीसमन्य खह १२ --- प्रकाश नहीं है वह। उस प्रकाश की प्रखरता अपूर्व है, अपार है। उस प्रकाश का सामर्थ्य इतना है कि वह दूरी और काल की सीमा को पार कर सकता है। केवल चदन की लकड़ियों को लगी ज्वाला का ही नहीं, अपितु ६७ वर्षों की आयु के अपड तप की अग्नि का प्रकाश है वह! उस तप का स्वरूप क्या है? किस कार्य की सिद्धि के लिए वह तप चन्ना? स्वय के लिए स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से? मोक्ष सिद्धि के लिए? आत्म साक्षात्कार के लिए? नहीं, नहीं। इनमें से किसी के लिए भी नहीं। भारतीय जनता को इस लोक में ही स्वर्गतुल्य सुख प्राप्ति की कामना से किया गया तप है वह। आज हमारे राष्ट्र पर आच्छादित सैंकड़ों समस्याओं व सकटों से राष्ट्र की मुक्ति हेतु किया गया तप है वह! आत्मविस्मृति तथा आत्महीनता की भावना अधकार में छटपटा रही हमारी पीढी को अपने राष्ट्रीय ध्येय का वास्तविक ज्ञान कराने हेतु किया गया तप है वह। राष्ट्रीय आत्म साक्षात्कार के लिए किया गया तप है वह! पूज्य डा हेडगेवार जी ने सन् १६२५ की विजयादशमी को नागपुर में सघ का बीज बोया। देश के पुनरुत्थान के लिए 'हिंदू सगठन' का बीजमन दिया। उस मत्र की सिद्धि के लिए एकनिष्ठ वीरव्रतियों का एक समुदाय गठित किया। मत्र-सिद्धि की एक परिणामकारी पद्धति भी उन्होंने प्रदान की। पद्रह वर्षो तक अपने जीवन की सपूर्ण शक्ति को उँडेल कर उस मत्र की प्राण प्रतिष्ठापना भी की। शरीर त्यागने से पूर्व अपने हाथ के हिंदू सगठन के ध्येय मत्र की ज्योति को भावी नेता श्री गुरुजी के हाथों में सौंपकर वे चले गए। हेंदू सगठन' शब्द के दो भाग है। पहला है 'हिंदू'। वह जैसे हमारा समाजसूचक शब्द है, वैसे ही हमारे राष्ट्रीय ध्येय का सूचक भी है। श्री गुरुजी की जीवन-साधना का सबसे प्रमुख पहलू है- जनमानस में हमारे राष्ट्रीय ध्येय को ग्रसित करनेवाले ग्रहण को दूर करने के लिए उनके द्वारा की गई प्रभावकारी साधना । हिदुत्व के ध्येय मत्र की उपासना किए बिना यह आशा करना कि भारत पुन विश्व के लिए उदात्त मानवीय आदर्शों का, आध्यात्मिक सस्कृति का गुरु बनकर चमकेगा, मृग-मरीचिका का पीछा करना ही है। इसीलिए श्री गुरुजी ने एकाग्रनिष्ठा से इसकी उपासना अपनाई। उस दिन जब डाक्टर हेडगेवार जी ने हिंदू संगठन का ध्येय मत्र २२) श्री शुरुजीसमन खड १२ में उसका केवल प्रारभ हुआ था। तब से अब तक हजारों केंद्र फैल गए। हजारों, लाखों निष्ठावान कार्यकर्ताओं को एकत्र फिया। महात्मा गाँधी जी ने राजनीति में प्रवेश करने के प्रश्चात् एक बात सकता। मार खाफर रोते बैठने का हिदू का वह समय कभी का बीत गया । प्रज्ज्वलित उस चिता ज्वाला का प्रकाश मानो हिदुओं के इस ऐक्य जीवन के उपकाल का प्रतिविव है। श्री गुरुजी के जीवन यज्ञ से प्रसन्न होने वाले दिया, राष्ट्रजीवन के किसी भी क्षेत्र में हिंदुत्व की छाया नहीं दिखाई देती थी। सब ओर हिंदुत्व के प्रति घृणा व धिक्कार की भावना ही व्याप्त थी। 'हिंदू' शब्द से नाक भी सिकोडने वाले आत्मक्लैव्य का शिकार था हमार जनमानस । परतु आज वह परिस्थिति नहीं रही। विद्यार्थी, श्रम, शिक्षा, धर्म, राजनीति, साहित्य आदि अनेक क्षेत्रों में हिंदुत्व की सुगधि फैली हुई है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में सैंकडों, हजारों ध्येयनिष्ठ कार्यकर्ता प्रत्येक प्रात में कार्यरत हैं। सपूर्ण राष्ट्रजीवन में इस भूमि की सत्य राष्ट्रीयता का सिहगर्जन आज सर्वत्र प्रतिध्वनित है। अराष्ट्रीय वादों के नारों के मोहक आवरण उखड़ने लगे हैं। भारत पुन अपने आत्मप्रकाश में सचमुच भारत प्रकाशपूर्ण बन ऊपर उट रहा है । ६ जून की सध्या को पूज्य डा हेडगेवार जी के मुख मडल को जिस चिताज्वाला के प्रकाश ने प्रज्ज्वलित किया, वह भारत के आत्मप्रकाश का प्रतिरूप है। श्री गुरुजी के ३३ वर्षों के अखड आत्मयज्ञ का अमृतमय प्रतिफल है। हिंदू संगठन' शब्द में 'सगठन' का भाग उसका दूसरा अत्यत मुख्य पहलू है। हिंदु जनता को अपने राष्ट्रीय ध्येय के प्रखर ज्ञान से प्रेरणा पाने के अतिरिक्त अपनी सभी सामाजिक विघटन व विषमताओं को त्याग कर एक अखड सगठित राष्ट्रपुरुष के रूप में उत्तिष्ठ होना राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए उतना ही आवश्यक है। डा हेडगेवार जी के शरीर त्याग से पहले इस हिंदू संगठन का कार्य अघिकतया महाराष्ट्र व विदर्भ तक ही सीमित था। देश के अन्य भागों संगठन वृहद् रूप में वढा । सपूर्ण देशव्यापी हो गया। प्रत्येक प्रात में सैंकड़ों, कही थी कि 'सर्व साधारण हिदू एक कायर है। एक साधारण मुसलमान गुड़ा है। परतु आज हिंदू के संबंध में ऐसा कहने का साहस कोई नहीं कर ६ जून की शाम को डा हेडगेवार जी की प्रतिमा के सम्मुख यज्ञपुरुष का महाप्रसाद है। {१२३} गुरुजी के नेतृत्व में che श्रीसी समय खड १२ हम श्री गुरुजी के सबंध में जितना अधिक सोचते हैं, उतना अधिक स्पष्ट रूप से हमारे अत चक्षुओं के सम्मुख एक महोज्ज्वल राष्ट्रीय व्यक्तित्व का चित्र प्रस्तुत होता है। वह ऐसा राष्ट्रस्वरूपी निर्मल उज्ज्वल चित्र है, जिस पर निजी, व्यक्तिगत किसी इच्छा अनिच्छा, भावना-विकारों की छाया तक नहीं पड़ी। स्वामी रामतीर्थ ने एक परिपूर्ण देशभक्त का वर्णन करते हुआ कहा था कि- 'तुम देशभक्त बनना चाहते हो तो अपने देश व जनता के माथ प्रेम से समरस बन जाओ। तुम्हारे और तुम्हारी जनता के वीच तुम्हारे व्यक्तित्व की अलग छाया भी न पडे में ही यह देश हूँ, मैं ही यह सपूर्ण भारत हूँ, ऐसा चितन करो ओ । मेग कद कितना भव्य है। मैं चलूँ तो भारत ही चलता है। मेरा स्वर ही भारत का स्वर है। मेरी सॉस ही भारत की साँस है। मैं ही भारत हूँ। में ही शकर हूँ। यही सच्चा वेदात है। यही सच्ची देशभक्ति है।' श्री गुरुजी का जीवन मानो इस आदर्श का रक्त व मास से भरा सजीव हदय था। कोई भी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक समस्याएँ घिरी हों, उन सब के मध्य भारत की एकात्मकता के प्रकाशस्तभ के रूप में श्री गुरुजी की वाणी मुखरित होती थी। श्री विनोबा भावे ने श्रद्धाजलि अर्पित करते हुए इसी बात पर बल देकर कहा कि 'श्री गुरुजी का राष्ट्रभाव, अखिल भारतीय दृष्टि विशाल है तथा अध्यात्म निष्ठा गहरी है। श्री गुरुजी को अपना प्रतिस्पर्धी समझने वाले राजीतिक नेताओं ने भी अपने सदना सदेश में यह बातें मुक्त मन से कही। प्रधानमनी श्रीमती इदिरा गाँधी ने कहा- 'अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व तथा प्रखर जीवननिष्ठा से श्री गुरुजी ने राष्ट्रजीवन में आदर का स्थान पाया था। इसमें भी श्री गुरुजी के राष्ट्रीय व्यक्तित्व की आभा ही प्रतिबिंबित है। जनता को एकत्रित करने की, रूपित करने की उनकी असदृश सगठन कुशलता राष्ट्रीय जीवन के साथ समरस उनके व्यक्तित्व में व्याप्त एक और अद्भुत बुद्धि प्रतिभा थी। स्वामी विवेकानद अपने देहत्याग के पूर्व भविष्य का एक सुदर चित्र खींच गए- 'और भी अनेक विवेकानद जन्म लेंगे। उस भव्य स्वप्न को साकार करने में श्री गुरुजी ने जो उज्ज्वल सफलता प्राप्त की उसने श्री विवेकानद की आत्मा को भी अपार गर्व प्रदान किया होगा। विवेकानंद के जीवन के अग्निकण के समान सहनों {१२४ श्रीशुरुजी समन आड १२ राजनैतिक प्रतिस्पर्धा आदि स्वार्थ के कीडों से मुक्त पवित्र, शील तथा तेजस्वी राष्ट्रसमर्पित नवयुवकों को गढना राष्ट्रमाता को श्री गुरुजी द्वारा समर्पित सर्वाधिक अमूल्य देन है। किसी महापुरुष की सफलता का मूल्याकन करने के लिए दो दृष्टियों से देखना होगा। पहली है उसके व्यक्तिगत सद्गुण, जीवनादर्श, उसके द्वारा स्थापित सस्था, रचित साहित्य इत्यादि। दूसरी इससे भी मुख्य है, उसके पश्चात् भी उन्हीं आदर्शों को जारी रखनेवाले निष्ठावान प्रज्ञावान कार्यकर्ताओं की परपरा। इस दूसरी दृष्टि से भी हाल की शताब्दियों में, प्राय सारे विश्व में गुरुजी की कार्यसिद्धि अद्वितीय है, इसमें सदेह नहीं। यह गुरुजी की महान सिद्धियों के उत्तुग शृग पर स्थित स्वर्णकलश के समान परमोच्च साधना है। श्री गुरुजी को श्रद्धाजलि अर्पित करते हुए अनेक स्थानों पर, अनेक दलों के नेताओं ने वर्णन किया है 'गॉधीजी के पश्चात् उसी स्तर पर भारत के नभो मडल को प्रकाशवान करने वाले नेता हैं श्री गुरुजी'। इस दृष्टि से श्री गुरुजी की जीवन सिद्धियाँ क्या हैं? गाँधी जी ने विदेशियों की राजनैतिक दासता को उखाड़ फेंकने के स्वातत्र्य युद्ध का विगुल बजाया, पर राजनैतिक दासता से मुक्त होने पर भी राष्ट्रजीवन पर मानसिक दासता छाई हुई थी। उसके विरोध में श्री गुरुजी ने स्वातत्र्य संग्राम का बिगुल बजाया। इस कार्य की सफलता के लिए उन्होंने राजनीति से परे, परिशुद्ध राष्ट्रीय संस्कृति की निष्ठा को जनजीवन में ढालने के अत्यत श्रमसाध्य आह्वान को अपनाया। अपने पश्चात् भी यही कार्य अविरत रूप से चल सके ऐसी सफल परपरा का निर्माण करना श्री गुरुजी की एक और महान सिद्धि है। डा हेडगेवार जी ने असाधारण दूरदर्शिता से ध्येयनिष्ठ व्यक्तियों के निर्माण का, राष्ट्रीय शील सवर्धन का जो विधायक कार्य प्रारभ किया, उसी को श्री गुरुजी ने देशव्यापी बनाया। सत्ता, कीर्ति, प्रसिद्धि, प्रचार, धन, स्थान-मान, समर्पण के वातावरण में अपने सहयोगियों के जीवन कमलों को उन्होंने । 11 Ac headac विकसित किया। हृदयस्पर्शी भावनाओं का यह ऐसा प्रकाश है, जिससे लगता है कि श्री गुरुजी अपने जीवन की सपूर्ण सफलताओं का भोग डा हेडगेवार जी को घढा रहे हो। अपनी चितावाला प्रकाश से अपने नेता की प्रतिमा . श्रीशुरुजी समय खड १२ के मुखमडल ही को नहीं, अपितु उस नेता के अत करण को भी आनद और गर्व से प्रकाशित करने वाला प्रकाश है वह । इसके अतिरिक्त अपने इस परमप्रिय हिंदू देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए तडप रहे प्रत्येक हृदय को भी चिरकाल तक प्रकाशित करने वाला प्रकाश है वह। सदा-सर्वदा अपनी परपरा को विकसित करते हुए, नए-नए हृदयों को प्रकाशित करते हुए भविष्य में राष्ट्रजीवन के नवीन दिन को सपूर्ण प्रकाश के साथ प्रकाशित करने वाला चिर प्रकाश है वह। (जाहनवी खाजभिविशेषाक १६७३) ३८ पटेल -गुरुजी भेट (श्री स का पाटील, काग्रेस नेता) यह महत्त्वपूर्ण जानकारी आज प्रथमत दे रहा हूँ। गाँधीजी की हत्या के बाद सघ पर प्रतिवध लगा। प्रतिवध से गुरुजी और सघ पर आसमान फट पड़ा। कई स्वयसेवक पकडे गए। सघ को लेकर लोग सदेह करने लगे। उन्हीं दिनों मेरे एक मित्र मुझे गुरुजी के पास ले गए। गुरुजी और मेरी खुलकर चर्चा हुई। इसके बाद मैं अनेक बार गुरुजी से मिलता रहा। गुरुजी के बारे में मेरा मत अत्यत अच्छा हुआ। मैंने अपना यह मत गृहमत्री सरदार पटेल के सामने रखा। सरदार राष्ट्रीय वृत्ति के थे। हिदू धर्म के प्रति उन्हें अत्यत आदर था। पडित नेहरू और सरदार की सघ की ओर देखने की दृष्टि भिन्न थी। पूरा प्रयास कर सरदार ने पडितजी के मन में सघ के प्रति, गुरुजी के प्रति रहा संदेह दूर किया। सरदार और गुरुजी की भेंट मैंने करा दी थी। पर दोनों की भेंट के समय मैं वहाँ नहीं था। इस कारण क्या बातचीत हुई, यह मुझे ज्ञात नहीं। पर चर्चा का परिणाम प्रतिवध उठने में रहा। इसके बाद में गुरुजी के बहुत निकट पहुंचा। हममें परस्पर प्रेम था, आदर था। विना कारण के हम मिले नहीं। पर उनके प्रति आदर कभी कम नहीं हुआ। इस प्रकार मेरा उनसे २५ वर्षों से परिचय रहा है। गुरुजी मेरे जीवन में अनेक बार आए। उनका एक ध्येय के प्रति अर्पित जीवन था। उन्होंने स्वतत्र और बलवान राष्ट्र बलवान हिदू धर्म- इस ध्येय की पूर्ति के लिए ही सारा जीवन लगा दिया था। गुरुजी हिदू धर्म के अभिमानी थे, पर अन्य श्रीशुरुजी समन खड १२ कारक तथा दर्शक रहे हैं और इसलिए आप नहीं बताएँगे तो पूजनीय अपनी आत्मा को शरीर के किसी भाग से अलग कर लेने की क्षमता प्राप्त होने पर उन्हें नहीं सता पाती थी। तुरत मुझे रमण महर्षि का स्मरण हो अरुणाचलम् से बाहर नहीं जाते थे। अत चेन्नै शासन ने वहीं अस्थायी धर्मों का द्वेष उनमें नहीं था। अपने धर्म के प्रति आत्यतिक निष्ठा, प्रेम का अर्थ दूसरे धर्मों के प्रति द्वेष नहीं होता। उनका जीवन ऋषि-मुनि सा था। वैसा नहीं होता तो हजारों तरुणों को वे आकर्षित नहीं कर पाते। दो-तीन वर्ष पूर्व मैं नागपुर में उनसे मिला था। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। गिर रहा था। पर वे खुलकर बात करते रहे। मै भी सध के बारे में खुले मन से बोलता रहा। इस भेंट का परिणाम राजकीय दृष्टि से अत्यत अच्छा रहा। उनके निधन से राष्ट्र का एक महान व्यक्ति खो गया है। (सालि विशेषाक मराठा मुबई १६७३) ३६ और एक अनजाना पहलू यह भी (श्री सुदर्शन जी) पूजनीय गुरुजी के जून सन् १९७३ में दिव्यलोकगमन के पश्चात् उस समय उपलब्ध उनके विचारों के सकलन एव प्रकाशन का कार्य प्रारभ हुआ और 'श्री गुरुजी-समग्र दर्शन' माला का भाग ६ सर्वप्रथम मुद्रित हुआ। सन् १६७४ के वर्षप्रतिपदा से प्रात-प्रातों में उसके विमोचन के कार्यक्रम आयोजित हुए। इदीर के इस कार्यक्रम में पूजनीय गुरुजी के ज्येष्ठ गुरुभाई स्वामी अमृानद जी के सान्निध्य-लाभ का सौभाग्य हम लोगों को प्राप्त हुआ। पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम के उपरात अनौपचारिक बातचीत में मैंने पूजनीय स्वामी जी से पूछा कि पूजनीय गुरुजी की आध्यात्मिक उपलब्धि क्या थी? पहले तो उन्होंने बताने से मना किया, कितु मेरे अधिक आग्रह करने पर कि पूजनीय गुरुजी कि अध्यात्म साधना के आप ही प्रेरक, गुरुजी का यह पहलू अनावृत्त ही रह जाएगा। क्या यह उचित होगा? मेरे इस आग्रह के पश्चात् उन्होंने कहा कि पूजनीय गुरुजी ने कर ली थी और इसलिए शरीर के किसी भाग में हुइ व्याधि की पीडा इच्छा आया। रमण महर्षि को भी कर्करोग हो गया था और वे तमिलनाडु स्थित whe + श्रीपुरुषी समय खड १२ {१२७] } शल्यक्रिया कक्ष खडा किया व चेन्नै से ख्यातनाम शल्यचिकित्सकों को वहाँ भेजा। जय शल्यक्रिया प्रारभ करने का समय आया, तव चिकित्सकों ने रमण महर्षि को मूर्छवस्था में ले जाना चाहा, जिसे करने से उन्होंने मना कर दिया और बिना सज्ञा-हरक के शल्यक्रिया करने के लिए कहा। शल्य चिकित्सक शल्यक्रिया करने में जुट गए, कितु उनके सामने एक समस्या खडी हो गई। जब कर्क रोग की गाँठ को काटते हैं, तब जो मृत कोशिकाएँ होती हैं, उन्हें काटने पर तो वेदना नहीं होती, कितु जव जीवित कोशिकाओं से शल्य स्पर्श करता है, तब वेदना से मुँह से सिसकारी या चीख निकलती है या मूर्छावस्था में शरीर में हलचल होती है जिससे चिकित्सकों को ज्ञात हो जाता है कि वहाँ जीवित कोशिका है। कितु रमण महर्षि के मुँह से सिसकारी भी नहीं निकल रही थी। अत डाक्टरों की परेशानी यह थी कि पता कैसे लगे कि कौन-सी कोशिकाएँ मृत हैं और कौन सी जीवित। चिकित्सकों ने अपनी परेशानी रमण महर्षि के सामने रखी तो उन्होंने कहा-'जिस शरीर पर तुम शल्यक्रिया कर रहे हो, वह मैं नहीं हूँ। मैंने अपने आपको शरीर से असपृक्त कर रखा है और वेदना तो शरीर को होती है।' चिकित्सकों के अनुनय करने पर यह समझौता हुआ कि जब जीवित कोशिकाओं को शल्य स्पर्श करे तो वे अगुलि उठाकर सकेत कर दें। इस प्रकार करने पर ही शल्यक्रिया पूरी हो सकी थी। दूसरी घटना रामकृष्ण मिशन के स्वामी तुरीयानद जी की है। उनकी पीठ में दुष्ट व्रण (कारबकल) हो गया था और उसकी शल्यक्रिया करने का निश्चय हुआ। दूसरे दिन जब उन्हें मूर्छावस्था में ले जाने की तैयारी हुई तब स्वामी जी ने कहा कि मृर्छित किए बिना ही शल्यचिकित्सा करो। सारी क्रिया ठीक तरह से सपन्न हुई। दूसरे दिन जब घाव को साफ करने के लिए डाक्टर गए तो पाया कि एक छोटा-सा टुकडा बच गया है। उन्होंने सोचा कि निकाल दें। पर ज्यों ही निकाला तो स्वामी जी के मुँह से जोर की चीख निकली। डाक्टर हतप्रभ हो गए। उन्होंने कहा- 'स्वामी जी कल सारा व्रण निकाला, तब तो आप शात रहे, आज छोटा-सा बचा टुकडा निकालने पर चीख क्यों पडे?' तब स्वामी जी ने उत्तर दिया कि पहले बताते तो मैं अपने-आप को शरीर के उस भाग से समेट लेता। कल मैंने वैसा ही किया था इसलिए वेदना नहीं हुई।' पूजनीय गुरुजी के कर्क की गठान पर जव शल्यक्रिया हुई तब उन्हें श्रीशुरुजी समय खड १२ को देख नहीं सके और कमरे से बाहर चले गए, कितु पूजनीय गुरुजी ने सबध में पूजनीय गुरुजी के साथ एक वार्तालाप का स्मरण होता है। अनौपचारिक बातचीत में उनसे प्राणायाम के सबध में चर्चा चल पड़ी। मृर्छित तो अवश्य किया गया, कितु जैसे ही सज्ञा-हरक का प्रभाव समाप्त होकर वे होश में आए, त्यों ही कमरे से बाहर निकलकर आसपास के कमरों में जाकर रोगियों का हालचाल पूछने लगे। शल्यचिकित्सा के पश्चात् पूजनीय गुरुजी ने नागपुर में मा बाबासाहेब घटाटे के यहाँ कुछ दिन विश्राम किया, जहाँ घाव की साफ-सफाई करने के लिए डा रामदास पराजपे रोज जाया करते थे। डा पराजपे साफ-सफाई करते और उधर पूजनीय गुरुजी के मुँह से हास्यविनोद की फुलझडियाँ झडती और चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण बन जाता। एक दिन डा पराजपे के हाथ से अनजाने में एक भूल हो गई। रक्त से सने कपास के टुकड़े को निकालते समय उस टुकडे के स्थान पर मास का खड चिमटी की पकड में आ गया और रक्त वह चला। यह देखकर सभी के मुँह से सीत्कार फूट पडा। डा पराजपे का मन भी ग्लानि से भर गया और वे अपने प्रमाद के लिए पूजनीय गुरुजी से क्षमायाचना करने लगे। डा पराजपे की भावनाओं को सहलाते हुए श्री गुरुजी ने बडे शात चित्त से उत्तर दिया- 'आप व्यर्थ ही मन में कष्ट मान रहे हैं। कपास के टुकडे और मास में मेरे लिए कोई अतर नहीं है। मेरे लिए दोनों समान हैं। जब आप घाव को साफ करते हैं, तब तक मेरा मन शरीर से अलग रहता है और जब मन शरीर से अलग रहता है तव शारीरिक पीडा का अनुभव नहीं होता।' डा श्रीधर भास्कर वर्णेकर लिखते हैं- 'यह सब जानते हैं कि कर्करोग की शल्यक्रिया के बाद भी गुरुजी के शरीर में बहुत जलन रहा करती थी और कष्ट भी अपार था, पर उनसे बात करते समय कोई भी अनुमान नहीं लगा पाता था कि उन्हें इतनी अधिक पीडा है। प्रफुल्ल मुखाकृति की छाप लेकर ही गुरुजी के पास से लोग लौटा करते।' आगे चलकर अकडी वॉह की अग्निदग्ध चिकित्सा पुणे में कराई गई। उसे कराते समय उन्होंने सज्ञा-शून्य करने से मना कर दिया। जब अग्नि से दाग दिया जाता था तव मास जलने की 'चरी' की आवाज आती थी, पूजनीय गुरुजी के निजी सचिव डा आबाजी थत्ते तक उस दृश्य पूजनीय गुरुजी को कर्करोग होने का क्या कारण रहा होगा? इस ur 2 ។ *- शातचित्त से सब सहा। प को श्रीगुरुजी समय खड १२ [१२६] } - उन्होंने बताया कि- 'प्राणायाम किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही किया जाना चाहिए। प्राणायाम की क्रिया में पूरक (श्वास अदर लेना) और रेचक (श्वास बाहर छोडना) तो विशेष हानिकारक नहीं हैं' कितु कुभक (श्वास रोके रखना) अतीव सावधानी की अपेक्षा रखता है। ठीक विधि से प्राणायाम की क्रिया करने पर प्राण नियत्रित होता है, कितु यदि उसमें गडबड हुई तो प्राण नियत्रित होने के स्थान पर कुपित हो सकता है। और यह कहते हुए उन्होंने अपने खुद का अनुभव सुनाया। उन्होंने कहा- 'मैं रोज सध्या करते समय प्राणायाम भी किया करता था। एक दिन कक्ष का द्वार केवल भिडा हुआ था। मैं जब कुमक की स्थिति में था तव शरीर किसी भी प्रकार का धक्का सहन करने की स्थिति में नहीं था। उसी समय मेरी चार वर्ष की नातिन अदर आई और मेरी पीठ पर लद गई। उसके कारण छाती में बायीं ओर जो दर्द शुरू हुआ वह आज तक नहीं गया।' आगे चलकर हमने देखा कि उसी स्थान पर कर्क की गठान उभरी। पूजनीय गुरुजी को साक्षात्कार हुआ था या नहीं इस सबध में महाराष्ट्र के एक सत श्री दत्ता बाळ ने अपनी श्रद्धाजलि सभा में कहा- 'मेरे व्याख्यानों का कार्यक्रम जब नागपुर में आयोजित हुआ, तब मैंने देखा कि एक दाढी-मूंछ व लबे केशवाले सज्जन कार्यक्रम में आए हैं। मैंने अपने साथियों से पूछा कि वे कौन हैं? तब बताया गया कि वे गुरुजी गोलवलकर हैं। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरे मन में उनके प्रति कोई आदर का भाव नहीं था। कितु उन्हें अपने कार्यक्रम में देखकर मुझे कौतूहल हुआ और दूसरे दिन उनसे मिलने डा हेडगेवार भवन चला गया। उनसे एकात में वार्तालाप में मैंने योग सवधी कुछ प्रश्न पूछे। मैंने अनुभव किया कि वे जो उत्तर देते थे वे एक स्तर आगे के रहते थे। इस प्रकार एक-एक सीढी हम ऊपर उठते गए। अत में मैंने उनसे एक प्रश्न पूछ लिया- 'गुरुजी, क्या आपको भगवान के दर्शन हुए हैं?' उन्होंने मेरी ओर कुछ देर तक देखा ओर मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा कि- 'एक शर्त पर ही बताता हूँ कि किसी से कहोगे नहीं।' मेरे हाँ कहने पर उन्होंने कहा- "हॉ, हुआ है। सघ पर लगे प्रतिबध के समय जब मैं सिवनी जेल में था और खाट पर बैठे हुए सारे घटनाक्रम के बारे में चितित हो रहा था तब मुझे लगा कि कोई मेरे कधे को दवा रहा है। जब पलटकर ऊपर देखा तो साक्षात् जगज्जननी-माँ सामने खडी थी। उसने आश्वस्त करते हुए कहा- 'सब ठीक होगा । उसी बलबूते पर तो आगे के सारे सकटों का में दृढता के {१३०} श्रीगुरुजी समय खड १२ ।
ने मौलवीजी की पुन प्रशसा की। उन्होंने कहा- साथ सामना कर सका।" और यह सुनाते हुए श्री दत्ता याळ ने कहा- 'चूंकि अब वे दिवगत हो गए हैं, इसलिए उनको दिए गए अभिवचन से में मुक्त हो गया हूँ और यह बात आप सबको बता रहा हूँ।' ऐसे एक अध्यात्म-शक्तिसपन्न व्यक्ति के दर्शन, निर्देशन, सान्निध्य और नेतृत्व का लाभ हम सबको मिल सका, इसे अपने पूर्वजन्मों के सुकृत का ही परिणाम मानना होगा। ४० पूज्य विभूति (प्रज्ञाभारती डा श्रीधर भास्कर वर्णेकर) पूजनीय गुरुजी के सहवास में कुछ काल बितानेवाले को थोडी देर में ही उनके अत करण की प्रगाढ भाविकता की अनुभूति होती थी। सभी पथोपपथ के सत, उनका भावरम्य साहित्य, उनके तीर्थक्षेत्र, व्रत, उत्सव, मत्र, तन, देवदेवता इन सभी के प्रति उनकी पराकाष्ठा की ज्ञानपूर्ण भक्ति थी। स्वधर्म-परधर्म का भेद वह भक्ति नहीं जानती थी। हिस्लॉप कॉलेज के विद्यार्थी रहते प्रिसिपल गार्डिनर को उन्होंने बाईबल के अपने मार्मिक ज्ञान से चकित कर दिया था। यह तो प्रसिद्ध ही है। कुछ वर्ष पूर्व विद्यार्थी परिषद की नागपुर शाखा ने विविध धर्मो के प्रतिनिधियों का धर्मविषयक एक परिसवाद पूजनीय गुरुजी की अध्यक्षता में आयोजित किया था। उस समय मोहम्मदी धर्ममत का प्रतिपादन करने के लिए नागपुर विभाग के बहुजन समाज का श्रद्धास्थान रहे श्री ताजुद्दीनबावा की दरगाह के एक वृद्ध मौलवी भाषण करने आए थे। मच पर श्री गुरुजी के निकट की कुर्सी पर ही वे विराजमान थे। कुरान के वचनों के आधार पर मोहम्मदी सप्रदाय का अतरग का अत्यत मार्मिक रूप से उन्होंने प्रतिपादन किया। उनका उर्दूभाषण गुरुजी को बहुत पसद आ रहा है, यह उनकी मुख की प्रसन्नता एवं शुचिस्मित देखकर हम श्रोताओं की समझ में आ रहा था। मौलवीजी का भाषण समाप्त होते ही गुरुजी ने अपनी हमेशा की आदत के अनुसार उनकी पीठ पर थाप देकर अपनी प्रसन्नता जाहिर की। भाषणों का दौर समाप्त होने पर सभी के साथ चाय के समय गुरुजी 'ताजुद्दीनबाबा पर बचपन में मैं कई बार दर्शन के लिए आ चुका हूँ।' श्री , श्रीगुरुजी समय खड १२ दरगाह हमेशा रहने वालों के लिए यह जानकारी नई थी। मौलवी जी के चेहरे पर तो आश्चर्य छिपा नहीं सका। व्यावसायिक राजकीय नेताओं ने श्री गुरुजी की प्रतिमा कट्टर द्वेष्टा के रूप में चित्रित करने के प्रयत्न किए होने से उन मौलवीजी का भी वैसा ही पूर्वाग्रह रहा होगा। इसीलिए श्री गुरुजी से वह अनौपचारिक वाक्य सुनते ही वे चकित रह गए। इसी सदर्भ में एक और घटना का स्मरण आता है। नागपुर के रोटरी क्लब में श्री गुरुजी का भाषण हुआ। व्याख्यान के बाद प्रमुख श्रोताओं का परिचय कराया जा रहा था। एक तरुण मुसलमान सदस्य का परिचय कराया गया। तभी श्री गुरुजी ने उनके परिवार के चार-पाँच वरिष्ठजनों के नाम लेकर उनकी पूछताछ की। बहुत दिनों से उनकी भेंट नहीं हुई, यह कहा और भेंट का योग शीघ्र कभी हो, यह अपेक्षा भी व्यक्त की। वह तरुण तथा अन्य सारे लोग इस अनपेक्षित प्रकार से चकित रह गए। गुरुजी के निधन के बाद आचार्य विनोवा ने अपनी श्रद्धाजलि में यह वाक्य सहेतु डाला कि उनके पास मुसलमानों के प्रति द्वेषभाव नहीं था' । विशिष्ट मत प्रणाली के स्वार्थी लोगों ने श्री गुरुजी के प्रति विपरीत ग्रह समाज में सतत प्रसृत किया है, जो झूठा है- इसकी उनको कल्पना थी, इसीलिए उन्होंने यह उल्लेख किया। साधुपुरुषों के प्रति निरपवाद परमादर उनका स्थायी भाव था। श्रद्धेय विनोबाजी ने भूदान यज्ञ के लिए जब देशव्यापी पदयात्रा शुरू की तो उनसे कहीं भेंट-दर्शन का योग मिले, यह इच्छा गुरुजी ने कई बार व्यक्त की थी। वह पूरी होने का अवसर आया जब विनोवा जी सिदी के पास थे। आचार्यजी द्वारा दी गई सवेरे की बेला में 'पडाव' पर पहुंचा जा सके इसलिए गुरुजी रात को सिदी में ही रुके। वह भेंट पूरी तरह निजी थी। डेढ घटे तक दोनों सत्पुरुषों की चर्चा में कौन-कौन से विषय रहे, यह बताने का किसी को अधिकार नहीं। फिर भी वहाँ उपस्थित रहकर जो विस्तृत वृत्तात मिला, उसमें श्री गुरुजी ने कहा मुसलमानादि अन्य धर्मियों के प्रति 'सहिष्णुता' हमें मान्य नहीं, क्योंकि 'सहिष्णुता' शब्द- हम कुछ वडे हैं और वह अप्रिय होने पर भी किसी भॉति सहन किए जाने योग्य हैं- यह भाव व्यक्त करता है। हम अन्य धर्मियों का सत्कार करते हैं। अन्यधर्मियों के प्रति हमारी भूमिका सहिष्णुता की नहीं सत्कार की है। श्रीशुरुखीसमन खठ १२ गुरुजी वैदिक परपरा के अभिमानी थे। सभी श्रेष्ठ धनपाठी वेदज्ञों के प्रति उनके अत करण में नितात श्रद्धा थी। अनेक वेदमूर्तियों के सत्कार पर अध्यक्ष के रूप में या अपनी श्रद्धा व्यक्त करने वे तत्परता से उपस्थित रहे। नागपुर भोसला महाविद्यालय पर भी उनकी सदैव कृपादृष्टि रही। महाविद्यालय के ६०वें वार्षिकोत्सव में काशी के महापडित श्री राजेश्वर शास्त्री द्रविड पधारे थे। नागपुर की वैदिक मडली की ओर से पडितराज का सार्वजनिक सत्कार आयोजित था। गुरुजी को उसी दिन प्रवास पर जाना था। फिर भी श्री राजेश्वर शास्त्री के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने वे समय निकालकर, पूजन सामग्री लेकर उपस्थित रहे। पारपरिक पद्धति के अनुसार महावस्त्र श्रीफल देकर गुरुजी सत्कार करने लगे तो पडितराज से नहीं रहा गया। उन्होंने कहा- 'यह उपचार अन्य लोगों के लिए भले ही उचित हो, पर आपके समान व्यक्ति को करने की आवश्यकता नहीं। आप तो समाज के परमपूजनीय हैं।' उन्हें बीच में रोककर गुरुजी से कहा- “पर आपके लिए नहीं। हमारे नागपुर में आकर भी आपकी पूजा नहीं करें, यह व्यतिक्रम होगा।' वेदमूर्ति सातवलेकरजी के प्रति गुरुजी को नितात प्रेम व आदर था। अस्सी वर्ष के होने पर भी पडितजी से तरुण भी शरमा जाएँ, इतना उत्साह था। अच्छी नमूनेदार बातें वे सुनाया करते। नागपुर के सघ के एक उत्सव में पडितजी उपस्थित नहीं रह पाए थे। उनका मन उन्हें कचोट रहा था। सन् १९५४ में मैं मुबई में था। श्री गुरुजी कल्याण होते हुए पुणे जा रहे थे। उनसे मिलने कल्याण गया। प्लेटफॉर्म पर गुरुजी मिले। मैंने बताया कि पडितजी से मिलने किल्ला पारडी जा रहा हूँ। गुरुजी ने कहा अपने नागपुर के गुरुदक्षिणा उत्सव के अध्यक्ष वे हों, इस हेतु व्यक्तिश मेरी ओर से उन्हें आमरण दें। वेदमूर्ति सातवलेकर को सघ और गुरुजी के प्रति कितनी आत्मीयता एव श्रद्धा थी, यह शब्दों में कहना कठिन है। पडितजी के नागपुर पधारने पर सघ के बड़े कार्यक्रम के अलावा जितने सारे कार्यक्रम हुए, उनमें तत्परता से उपस्थित रहने का प्रयत्न गुरुजी कर रहे थे। एक-दो कार्यक्रमों में उपस्थित नहीं रह पाए थे। उसका दुख थिऑसॉफिकल लॉज के कार्यक्रम में व्यक्त किया। परपरागत पद्धति से जैसा होना चाहिए, वैसा उनका वेदाध्ययन यद्यपि नहीं हुआ था, फिर भी पुरानी पीढी के कर्मनिष्ठ ब्राह्मण को जितना श्रीगुरुजी समय खड १२ [१३३] - .
। वेदमत्रों का पाठ ज्ञात होना चाहिए, उन्हें था । उपनिषदों के तो वे अधिकारी विशेषज्ञ थे। पिछले ३३ वर्षो से उन्होंने जो अखडित राष्ट्रव्यापी ज्ञानसत्र जारी रखा था, उसमें से उदाहरण के लिए सभी पुराणों से सैंकड़ों आख्यान और उपाख्यान अपनी रोचक शैली और चुटीले शब्दों में बताते थे। उनसे मेरी पहली भेट सन् १६३६ में हुई। उस दिन उनके हाथ में जो ग्रथ था वह था, याज्ञवल्क्य स्मृति-मिताक्षरा। यह सारा कुछ बताने का कारण यह है कि गुरुजी वैदिक परपरा के निष्ठावत अभिमानी थे। 'वैदिक' कहा गया कि इस देश में यह माना जाता है कि वह भगवान बुद्ध का आलोचक होना ही चाहिए। यह मानो अलिखित सकेत रूढ है। १५-१६ वर्ष पूर्व एक बार शाखा के बाद मैंने भगवान बुद्ध की अवैदिकता की बात छेडी। गुरुजी ने तुरत कहा- 'हम भगवान रामकृष्ण परमहस के भक्त हैं। स्वामी विवेकानद का बुद्ध के प्रति जो अभिप्राय है, वही हमारा भी है। इसके बाद विवेकानदजी ने बुद्ध के प्रति जो गौरवपूर्ण विधान किए हैं, वे सभी उन्होंने सुनाए। गुरुजी की भगवान बुद्ध के प्रति श्रद्धा कितने उच्च स्तर की है, इसकी कल्पना मुझे उस दिन आई। सघ और महात्मा गाँधी के बारे में गलतफहमी गहराई तक जमी है। व्यवसायिक राजनीतिज्ञों ने सहेतुक उसे जमाया है। बीच में राजकीय क्षेत्र में राष्ट्रीयता को लेकर जो विवाद उपस्थित हुआ, उसमें राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की हिदुत्वनिष्ठ भूमिका नहीं समझ पाने से भी यह गलतफहमी बढी। सघ के अनेक स्वयसेवक भी अपवाद नहीं थे। विशेषत महात्माजी की हत्या के बाद जो घोर व्यवहार तत्कालीन राजनीतिकों ने किया, उससे इस विषय में भारी कटुता निर्माण हुई। इसके बाद जो पीडा लोगों को हुई, वह सघ के अनुशासन के सस्कार से सयम के अनुसार रहा, पर श्री गुरुजी जैसे सभी स्थितप्रज्ञ नहीं थे। इस कारण महात्मा गाँधी का लोकोत्तर विभूतिमत्व मान्य होने पर भी उस नाम के प्रति आत्मीयता क्षीण हो गई थी। इस वातावरण में 'भारत भक्ति स्तोत्र' में महात्मा गाँधी के नाम का अतर्भाव कई लोगों को अच्छा नहीं लगा। उन्हीं दिनों गुरुजी से एक बैठक में यह चर्चा हुई। उस समय उन्होंने महात्मा गाँधी का सपूर्ण कार्य, उनके लेखों के अनेक मोलिक धर्मविचार, कुल मिलाकर गाँधीजी की भारतीय परपरानुसारिणी जीवननिष्ठा का इतना सुदर विवेचन किया कि वैसा आज तक वडे-बडे नामी गाँधी भक्तों के व्याख्यान में भी मैंने सुना नही। {१३४ श्रीगुरुजीसमन खड १२ - - 'गाँधीवाद' के रूप में निर्देशित विचारधारणा के कुछ मुद्दों पर गुरुजी ने व्याख्यानों में विशिष्ट राजकीय परिस्थिति में प्रत्युत्तर के लिए आलोचना भी की। कभी कडे शब्दों में भी की। ऐसा ही एक व्याख्यान श्रीमान् ढेवरभाई ने गुजरात में सुना था और, 'आ गुरुजी घणा तिख्खा बोले छे' यह प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। सैद्धातिक खडन के लिए कभी तीखी भाषा रही हो, पर उस व्यक्ति के प्रति अत करण की सद्भावना निर्मल रहती थी। यह 'कर्मसु कौशलम्' गुरुजी द्वारा पूरी तरह सिद्ध हुआ था। महात्माजी की जन्मशताब्दी निमित्त सागली की आम सभा में गाँधीजी को आदराजलि समर्पण करने के लिए गुरुजी ने जो व्याख्यान दिया, वही निजी बैठक में भी सुनने का सौभाग्य मुझे मिला। निजी तौर पर एक और सार्वजनिक तौर पर अलग मतलवी द्वैत गुरुजी के जीवन में कभी नहीं था। यह विभूति विषयक श्रद्धाभाव उनके अत करण में इस कोटि तक था कि किसी महापुरुष के बारे में कोई मजाक में भी उलटा-सीधा बोलता, तो उन्हें सहन नहीं होता था। स्वातत्र्यवीर सावरकर के हिदी वक्तृत्व पर हम कुछ दिन आपस में हंसी से बोल रहे थे। हमारी बातों के विनोद को वे मद स्मित से साथ दे रहे थे। विनोद में सतुलन टूटकर एक ने सावरकरजी के प्रति 'बालिस्टर' कहा। गुरुजी पत्रलेखन कर रहे थे। उसे रोककर उन्होंने जोर से निषेधदर्शक हुँकार किया। उनकी विभूतिनिष्ठा निपक्ष स्फटिकवत निर्मल, अखड जागृत थी। इसी से अपने देशव्यापी चिरप्रवास में जहाँ-जहाँ वे गए, वहाँ के महान साधु-सतों के दर्शन करने, प्राचीन देवताओं की परपरागत पद्धति से पूजा अर्चा करने, किसी आश्रम या मठ में कोई समस्या हो तो उसे साक्षेप रूप में सुलझाते थे। किसी साधु-सत का चरित्र लिखकर कोई दिखाए, तो वह हस्तलिखित पढकर, उसके मुद्रण की व्यवस्था करने का कार्य उनके जीवन में सघकार्य का ही एक भाग था। तीर्थस्थानों के पावित्र्य और मर्यादा का वे कठोरता से पालन करते थे। वे गाणगापूर गए थे। वहाँ की परपरा के अनुसार गीले कपड़ों में कधे पर गागर उठाकर वे देवदर्शन के लिए गए। नागपुर के दक्षिणामूर्ति मदिर में खुले बदन पगत में बैठने की परिपाटी है। एक बार प्रसाद लेने गुरुजी वहाँ पहुँचे। जव स्व बाबूराव हरदास ने उनसे कहा- 'डाक्टर जी हमारे घर की पगत में खुले वदन बैठते थे' तव गुरुजी तुरत खुलेबदन पगत में बैठे। श्रीगुरुजी समय खड १२ {१३५} । आखिरी बीमारी में काचीकामकोटि के जगद्गुरु श्री जयेंद्र सरस्वती पदयात्रा करते हुए नागपुर पहुंचे थे। नागपुर की सीमा पर ही उन्हें दडवत करने की उनकी आतरिक इच्छा, निर्दय रोग ने पूरी नहीं होने दी। हैदराबाद से जगद्गुरु के प्रवास का दैनिक वृत्तात वे जानना चाहते थे। नागपुर की स्वागत समिति के कार्य की प्रगति वे अपने कमरे से नित्य लेते थे। स्वामी जी रामनगर में वास्तव्य हेतु थे। वहाँ दर्शनार्थ जाने की उनकी भारी इच्छा थी, पर शरीर साथ नहीं दे रहा था। काचीकामकोटि पीठ के प्रति उनकी श्रद्धा आकाश से बडी थी। पीठ के अधिपति नागपुर पधारे हैं और उन्हें दडवत करने नहीं जा पा रहे हैं, उनके हृदय की यह पीडा देखी नहीं जा रही थी। आखिर जगद्गुरु उनसे मिलने सघ कार्यालय पर आए। जगद्गुरु आनेवाले हैं, इसलिए दाक्षिणात्य पद्धति की पूजा-सामग्री लेकर घटा-दो घटा वे आतुरता से प्रतीक्षा करते रहे। उनके गले में तुलसीमाला अपने हाथों समर्पित की, तब कहीं वह विभृतिपूजकता स्वस्थ हुई। यद्यद्वि विभूतिमत्त्सत्त्व, श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्देवावगच्छ त्व मम तेजोंऽशसभवम् । (गीता, १०-४०) इस भगवद्वाक्य का परम रहस्य कोई जान पाया हो, ऐसा नहीं लगता। अपनी योगसाधना में यह 'विभूतियोग' उन्होंने अपने जीवन की पूर्णता से लिखा। साधक के अत करण में थोडा भी अहकार रहा तो उसे यह दुर्घट योग आचरण में लाना सभव नहीं होता। श्री गुरुजी ने जिस दिन से अधिकार पद पर चरणन्यास किया, उस दिन नहीं, उसी क्षण से उन्होंने अध्यात्म-मार्ग के सबसे प्रवल वैरी अहकार को तिलाजलि दे दी थी। (मासिक श्राख दिन विशेषाक तरुण भारत ५ शुभाई ८७३) हमारा सम्पूर्ण समाज साक्षात् ईश्वर के रूप मे हमारे हृदयो मे पुन प्रतिष्ठित होना चाहिए। वास्तव मे यही एकत्व की भावना हमारी प्राचीन संस्कृति का अमर सन्देश रही है। ससार के अन्य लोग ईश्वर के पितृत्व एव मनुष्य के भ्रातृत्व तक पहुँचकर रुक गए कितु हमने तो ब्रह्म से लेकर जड पदार्थ पर्यंत एकत्व का अनुभव किया है। - श्री गुरुजी {१३६] श्रीपुरुषीसमन खत १२ सभाजलि र प (१) अखिल भारतीय प्रतिनिधिसभा,रा स्व सघ (श्री गुरुजी के मासिक श्राद्ध पर विशेष रूप से आहूत प्रतिनिधि सभा में ४ जुलाई १६७३ को) राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा परम पूजनीय श्री गुरुजी के महानिर्वाण पर उनके तपोमय, तेजोमय तथा अद्वितीय व्यक्तित्व के प्रति अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करती है। आसेतु हिमाचल विशाल राष्ट्रजीवन में एकात्मता का साक्षात्कार कराने हेतु, उन्होंने अपनी प्रतिभाओं एवं कठोर साधना से अर्जित असीम आध्यात्मिक शक्तियों को मातृमृमि के चरणों में समर्पित किया। व्यक्ति-व्यक्ति का अत करण राष्ट्रप्रेम से प्रज्ज्वलित कराने के लिए वै अपनी आयु का क्षण-क्षण और जीवन का कण-कण समर्पित कर, जगज्जननी मातृभूमि भारत की सतत परिक्रमाएँ करते रहे। विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय एकात्मता के प्रखर आत्मविश्वास को मजबूत नींव पर, दीप-स्तम के समान राष्ट्र-चेतना का प्रकाश फैलाते हुए, परम पूजनीय सरसघचालक श्री गुरुजी अडिग खडे रहे। उपहास, आलोचना, विरोध और दमन में भी उनकी प्रशात और प्रसन्न मूर्ति अपनी दृढता, उदारता, विशालता और सौहार्द से आत्मीयता का ही चारों ओर मधुर वर्षाव करते हुए, लक्षावधि स्वयसेवकों एव कोटि-कोटि देशवासियों की प्रेरणा का अखड स्रोत बनी रही। उनकी इस साधना का परिणाम है कि राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ का कार्य, न केवल नगर-नगर और दूर गाँव-गाँव तक जा पहुंचा, अपितु एक विश्वसनीय महान शक्ति के रूप में जन-साधारण के बीच आस्था का केंद्र बन गया है। इस घडी में परम पूजनीय श्री गुरुजी का स्वर्ग सिधारना {१३७} . श्रीगुरुजीसमय खड १२ राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ तथा सपूर्ण राष्ट्र पर नियति का क्रूर प्रहार है। इस दुख की वेला में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा अनुभव करती है कि सपूर्ण राष्ट्र आशाभरी दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के ओर निहार रहा है। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के लिए परिस्थितियों का आह्वान आज और भी गहरा हुआ है कि वे राष्ट्र-निर्माण के अपने सुनिश्चित कार्य की पूर्ति के लिए अधिकाधिक त्याग, परिश्रम से उद्यत हों। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का विश्वास है कि अपने प्राणप्रिय परमपूजनीय गुरुजी की पावन स्मृति में सघ का प्रत्येक स्वयसेवक दृढ सकल्प धारण करेगा और सर्वस्व की बाजी लगाकर समाज संगठन के कार्य को अति शीघ्र सर्वव्यापी बनाएगा, जिससे देश की वर्तमान दुरवस्था को हटाकर भारत सुदृढ, समृद्ध, सुखी और सर्वशक्तिसपन्न हो सके। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा परमपूजनीय श्री गुरुजी के प्रति श्रद्धावान असख्य देशवासियों को आह्वान करती है कि वे भी सघ के राष्ट्र-निर्माण के कार्य में सक्रिय सहभागी बनें। यही श्री गुरुजी के प्रति यथार्थ श्रद्धाजलि है। (२) ससद राज्यसभा के सभापति श्रीगोपालस्वरूप पाठक श्री एम एस गोलवलकर जी की मृत्यु की सूचना सदन में प्राप्त हुई है। श्री गोलवलकर जी का जन्म १६०६ में हुआ। नागपुर में अध्ययन के बाद वे बनारस आए और काशी हिदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए। बाद में कुछ काल उन्होंने रामकृष्णमिशन-कार्य में भी सक्रिय सहयोग दिया। वे श्रेष्ठ सगठन-क्षमतावाले व्यक्ति थे। उन्होंने अपना सपूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा में लगाया। वे गहरी धार्मिकतावाले व्यक्ति थे और हिंदू-सस्कृति और सभ्यता में सुधार के लिए उन्होंने लवलीन होकर कार्य किया। हमारे राष्ट्रजीवन में आदरपूर्ण स्थान उन्होंने प्राप्त किया। उनके निधन से एक सम्माननीय व्यक्ति हमने खोया है। {१३८ श्रीपुरुषी समन खस १२ निर्माण करता है। उसको पूरा करना ही हमारा दायित्व है। । को प्रज्ज्वलित करने के हेतु ही उनके जीवन की परिपूर्ति हुई। लोकसभा अध्यक्ष श्री पुरुषयालसिह ढिल्लो 'गुरुजी' नाम से विख्यात श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की मृत्यु की दु यद सूचना सदन में दी जा रही है। ६७ वर्ष की आयु में वे ५ जून १६७३ को नागपुर में स्वर्गवासी हुए। श्री गोलवलकर श्रेष्ठ सगठन-क्षमतावाले नेता थे। अपने व्यक्तित्व, विद्वत्ता और अपने उद्देश्य के प्रति अथाए निष्ठा के बल पर ये जनजीवन में विचारकों के बीच प्रमुख रूप से जाने-माने जाते थे। यद्यपि कई लोग ऐसे हो सकते हैं, जो उनकी विचारधारा और राजनीतिक दर्शा से मतभिन्नता रखते हों, फिर भी यह सत्य है कि उन्होंने अपने तरीके से देश की सेवा में अथक प्रयत्न किए। उनके निधन से देश के सार्वजनिक क्षेत्र में गहरी क्षति हुई है। प्रधानमत्री और सदन की नेता श्रीमतीगाँधी जो सदन के सदस्य नहीं थे, ऐसे एक अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति श्री गोन्नयलकर जी नहीं रहे। वे विद्वान थे और शक्तिशाली आस्थावाले व्यक्ति थे। जैसा आपने कहा, हममें से कई उनकी मूलगामी विचारधारा से सहमत नहीं थे, परतु उन्होंने अपने अनुयायियों पर गहरा प्रभाव निर्माण किया था। श्री ईश सैझियन (द्रविक्ष मुन्नेत्र कहनम) श्री गोलवलकरजी की मृत्यु के सवध में अध्यक्ष महोदय आपके और सदन की नेता के द्वारा व्यक्त मनोभावों के साथ में भी सहभागी हूँ। जगन्नाथराव जोशी (जनसघ) पृजनीय गुरुजी के महानिर्वाण को हम भारतीय परपरा में पले हुए एक तपस्वी और कर्मयोगी के जीवन की समाप्ति कहेंगे। उनके विचार से कई लोग सहमत थे और कई लोग असहमत थे, फितु गष्ट्रीय चरित्र निर्माण में लगातार जीवन की आखिरी साँस तक अपनी समिधा को समर्पित कर उन्होंने अग्निकुड को जलाया। इस राष्ट्रीय जीवन की ज्वाला दिवगत महानुभाव का निर्वाण देश में एक अपूरणीय क्षति का श्रीगुरुजी समय खड १२ {१३६} । श्रीश्यामनदन मिश्र (सगठन काग्रेस) एक विशेष श्रेणी में हमारे गुरु गोलवलकर आते है। वे कई मामलों में एक विशेष श्रेणी के व्यक्ति थे। यह कहना जरूरी नहीं है कि हमारे उनके साथ सैद्धातिक और दूसरे मतभेद थे। यह वक्त इस बात का तकाजा करता हो, मैं यह भी नहीं मानता। उसका इजहार कहीं और किया जाएगा और पहले भी करते रहे हैं। लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि वे बडे मनीषी थे, चितक थे, तपोपूत व्यक्ति थे, भारतीय वाड्मय के बडे ज्ञाता थे और मुझे ऐसा लगता है कि वे बडे कर्मयोगी और आत्मज्ञानी थे। तभी कैन्सर के रोगी होते हुए भी जिदगी की आखिरी साँस तक उन्होंने अपने कर्तव्य को निभाया। इसमें सदेह नहीं कि उनमें अद्भुत सगठन-शक्ति थी। उनका चरित्र और उनका व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत था, तभी तो लाखों-लाख कार्यकर्ताओं को उन्होंने प्रेरित किया, इतनी बडी सस्था को आगे बढाया। श्री पी के देव (स्वतत्र पार्टी) श्री गुरुजी के नाम से विख्यात श्री मा स गोलवलकर हृदय से राष्ट्रवादी थे। कई मामलों में हम उनसे सहमत भले ही न हुए हों, परतु हम निश्चित ही स्वीकार करते हैं कि उनका जीवन त्यागपूर्ण और समर्पित था। वे महान सगठक थे और देश में उनका विशाल अनुयायी वर्ग है। उनके निधन से स्वाभाविक ही रिक्तता निर्माण हुई है। श्री समर गुहा (सोशलिस्ट पार्टी) श्री गुरुजी गोलवलकर के सबध में यही कहना होगा कि वे केवल विद्वान ही थे यह बात नहीं, क्योंकि ऐसे प्राय सभी विद्वानों जैसा उन्होंने एकात जीवन नहीं बिताया। वे देशभक्त थे और उन्होंने राष्ट्रीय कार्यों में देशभक्ति, समर्पण ओर सेवा के भाव देश के हजारों तरुणों में विगत चालीस वर्षों तक सचारित किए। डा कीसिह (निर्दलीय) श्री गुरुजी महान राष्ट्रीय नेता थे। मैं मानता हूँ कि वे उन कुछ महान व्यक्तियों में से थे, जिन्होंने देश को आत्मत्याग का मार्गदर्शन दिया। मैं अनुभव करता हूँ कि वे उन महान व्यक्तियों में से थे, जो देश का सचालन कठिन तथा सकटपूर्ण स्थिति में करने का कार्य अधूरा छोड हमारे {१४०} श्रीगुरुपी समय खड १२ । किया। सन् १६३१ में बनारस हिंदू विद्यापीठ में उनकी अध्यापक के रूप में नियुक्ति हुई। वहाँ तीन वर्षों तक उन्होंने अध्यापन कार्य किया। में धर्म, शास्त्र, वाड्मय, तत्त्वज्ञान आदि सभी शाखाओं के गहन वाचन और मनन का प्रारभ उन्होंने किया। बनारस विद्यापीठ में रहते समय विद्यार्थियों चीच से उस समय चले गए, जव देश उनकी सेवाओं का उपयोग कर सक्ता था। श्री पुरुषोत्तमपणेश मावलकर (निर्दलीय) श्री गुरुजी के नाम से विख्यात श्री एम एस गोलवलकर की असंदिग्ध देशभक्ति सभी को ज्ञात है। उन्होंने नागरिकों में और विशेषत तरुणों में अनुशासन तथा राष्ट्रीय चरित्र निर्माण किया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह कार्य उन्होंने अपने 'सादा जीवन, उच्च विचार' के निजी आदर्श को सबके सामने रखकर किया। उन्होंने सर्वत्यागी सन्यासी का जीवन बिताया। 41.950 कि 1510 (३) महाराष्ट्र विधानसभा श्री वसतराव नाईक (मुख्यमन्त्री) अध्यक्ष महोदय, चौथा शोक-प्रस्ताव स्व श्री माधवराव सदाशिवराव गोळवलकर के विषय में है। स्व श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का जन्म माघ वद्य ११ शक सवत् १८२७, याने १६ फरवरी १६०६ को, नागपुर में हुआ था। चद्रपुर के जुबली हाईस्कूल से १६२२ में वे मैट्रिक हुए। उसके बाद महाविद्यालयीन शिक्षा का प्रारभ पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में हुआ था। परतु निवास विषयक सरकारी नियमों के कारण उन्हें नागपुर लौटना पड़ा। नागपुर के हिस्लॉप कॉलेज से इटर की परीक्षा उन्होंने १६२४ में उत्तीर्ण की। उनका विषय था प्राणिशास्त्र अंग्रेजी में भी उन्होंने प्रावीण्य प्राप्त किया था। इसके बाद ये वनारस हिंदू विद्यापीठ में दाखिल हुए। १६२६ में वी एससी तथा १६२८ में एम एससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। एम एससी के बाद चेन्नै के मत्स्य संग्रहालय में उन्होंने एक वर्ष तक सशोधन कार्य चेन्नै में रहते समय उनका मन, अध्यात्म की ओर झुका । बनारस {१४} व हा के + श्रीगुरुजीसमय खत १२ । की निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि विषयों में भी वे आत्मीयता से सहृदय सहायता करते। इसी कारण विद्यार्थी उन्हें आदर-भाव से 'गुरुजी' इस नाम से सबोधित करते और आगे चलकर वही नाम रूढ़ हुआ। बनारस में रहते स्व गोलवलकर गुरुजी का राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ से सबध जुडा। १६३१ में स्व गुरुजी के माता-पिता नागपुर में आकर बसे। इस कारण गुरुजी भी नागपुर लौट आए। यहाँ उन्होंने वकालत का अध्ययन किया। १६३५ में वे वकालत की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। पिता की इच्छा थी कि गुरुजी वकालत करें। पर गुरुजी का झुकाव तो वकालत से ज्यादा अध्यात्म की ओर था। १६३६ में रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष श्री स्वामी अखडानद से उनकी भेंट हुई। सारगाछी आश्रम में जाकर उन्होंने उनसे दीक्षा ली। फिर भी समाज और राष्ट्र की सेवा में उनके अध्यात्म चितन की परिणति उन्होंने की थी। आधुनिक भारतीय जीवन का पुनरुत्थान हिदू विचारों के आधार पर कैसे किया जाए, यह उनके गहरे चितन का विषय था। राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ के आद्य सरसघचालक डाक्टर हेडगेवार का २१ जून १६४० को निधन होने के बाद, श्री गुरुजी की नियुक्ति इस पद पर हुई। यह जिम्मेवारी स्वीकार करने के बाद उन्होंने देशभर प्रवास कर सघ शाखाओं का विस्तार किया। सन् १६४८ में सघ पर प्रतिवध लगाया गया। कुछ काल तक उन्हें कारागृह में रखा गया। १६४E में प्रतिवध उठाए जानेपर उन्हें कारागृह से मुक्त किया गया। सघकार्य हेतु वर्ष में तीन बार वे देश के सभी प्रदेशों में प्रवास करते थे। अगाध वाचन, अपार जिज्ञासा और कुशाग्र बुद्धि के कारण उनका प्रभाव तुरत पडता था। विभिन्न विषयों का उनका अध्ययन आखिर तक जारी था। उनके ज्ञान की अथाह सीमा देखकर, सामान्य व्यक्ति स्तभित हो जाता था। विद्वत्ता और कतृत्व का अपूर्व सगम उनमें था। उन्हें अनेक भारतीय भाषाएँ ज्ञात थीं। सन् १६७० में वे कर्करोग से पीडित हुए। उन दिनों सीभाग्य से मेरी उनसे भेंट हुई थी। उनके साथ मेरे सवध घरेलू थे। जिस समय में उनसे मिलने गया, उनका सारा उत्साह, उनका आनद देख मुझे स्वय को लगा कि वे अच्छे हो जाएंगे। पर कुछ ही दिनों बाद वे हमें छोड़कर चले गए। इस महान नेता का ५ जून १६६३ की रात्रि को ६ वजे, आयु के ६७वें वर्ष में नागपुर में निधन हो गया। {१४२} श्रीशुरुजी समन खड १२ स्वयसेवक सघ के सरसघचालक, इस नाते से उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाइ । वे कहीं भी, कभी रुके नहीं। राष्ट्रहित को छोड वे किसी के आगे बिल्डिग ही समाज-जीवन का महत्त्वपूर्ण पहलू है। देश के लिए वह आवश्यक है। तभी देश का आर्थिक, सामाजिक नियोजन सफल हो सकेगा। श्री त्र्य सी कारखानीस (कोल्हापुर) गोलवलकर गुरुजी के बारे में बोलते हुए, मुख्यमत्री जी ने उनके जीवन की सविस्तार जानकारी दी ही है। उनके अत करण की जाज्वल्य देशनिष्ठा का यहाँ उल्लेख हुआ है। उसी भाँति समाज जीवन को गढते समय, उसका जो घटक व्यक्ति है, उस व्यक्ति को चारित्र्यसपन्न होना चाहिए, समाज की प्रगति के लिए और राष्ट्र की उन्नति के लिए सभी आवश्यक गुण उसमें पनपें, यह उन्होंने प्रमुखता से अपना कर्तव्य माना। चारित्र्यसपन्नता और ज्ञानसपन्नता का जो आग्रह करते थे, उससे उनके व्यक्तित्व की कल्पना की जा सकती है। वे एक बडे तपस्वी थे। समाज और देश को जो देना आवश्यक था, उन्होंने दिया। उनके निधन पर शोक व्यक्त करना सभी सदस्यों का कर्तव्य है। श्रीरा का म्हाळगी (पुणे) परमपूज्य गोलवलकर गुरुजी के महान निर्वाण को कल तीन मास पूरे हो रहे हैं। वे एक महान मानव थे।Sir, he was a master man उनका जीवन समर्पित जीवन का एक भारतीय आदर्श हम मानते हैं। वे नर सिह हो गए। एक महान व्यक्ति हमारे बीच से उठ गया है। उन्होंने अपना जीवन किसी विद्युल्लता समान व्यतीत किया। स्वय कण-कण जलना और दूसरों को, चहुँ ओर के लोगों को सुगथ देकर प्रसन्न करना, स्वय जलना और दूसरे को प्रकाश देना, यह समर्पित जीवन की विशेषता है। हमने यह गुरुजी के जीवन में देखा। वे एक महान कर्मयोगी हो गए। आधुनिक ऋषि महात्मा कहें, यह खिताव उन्हें दिया गया है। गुरुजी का जीवन हमने निकट से देखा है। दुर्भाग्य की बात है कि जीवन के बारे में उनके जो विचार हैं, वे लोकप्रिय होने में कुछ समय लगा है। स्वामी विवेकानद के जीवन में जो अटल सत्य उन्हें देखने को मिला, वही बात पूजनीय गोलवलकर गुरुजी के विचारों के बारे में अनेकों ने निकटता से देखी। ३०-३२ वर्षों तक राष्ट्रीय झुके नहीं। उनका जीवन उनको अखड साधना थी। यह सभी ने निकट से देखा है। सम्माननीय सदस्य नसा कहा, आखिर करेक्टर श्रीशुरुजी समय खड १२ {१४३) - - उनकी ऐसी ही धारणा होने से प्रचड लोकसग्रा कर जनता को योग्य प्रकार से सीख देने के लिए आवश्यक वातावरण निर्माण करने हेतु ३०-३२ वर्ष की कालावधि में उन्होंने सारा भारत देखा। हथेली की चीज दिखाई दे, इस भाँति कीन-सी चीज कहाँ है, क्या है, यह पूरी जानकारी उन्हें थी। सैंकडो-हजारों तरुण उनकी प्रेरणा से समाज के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। उनके विचार चैतन्यदायी थे। समाज जीवन को अधिक मजबूत करने के लिए उन विचारों का आदर हमेशा काम आएगा। श्री अतु पाटील गुरुजी ध्येयनिष्टा का एक आदर्श हमारे सम्मुख रख गए हैं। उनके तत्त्वज्ञान के प्रति किसी का भिन्न मत हो सकता है, पर एक बात पर सहमत होना ही होगा कि स्वीकार किया हुआ तत्त्व पूरा करना और उसके प्रति अटल निष्टा रखकर, उसका अनुमोदन करते समय किसी अन्य विचार को स्थान नहीं देना, इस ध्येयप्रणाली के लिए उन्हें सारा जीवन लगा दिया। श्रीमती मृणाल गोरे (मालाड) स्व गोलवलकर गुरुजी के बारे में अनेक बातें कही गई हैं। प्रकाश के बाहर रहकर किसी सगठन में जीवन भर कार्य करना कोई सरल बात नहीं। गोलवलकर गुरुजी ने यह कर दिखाया। यही नहीं तो अपने जीवन-आदर्श महाराष्ट्र में ही नहीं तो सपूर्ण भारत में हजारों तरुणों को ध्येयवादी बनाकर, एक विशिष्ट ध्येय से, अपना सपूर्ण जीवन व्यतीत किया है। पूर्व वक्ताओं ने कहा है कि चारित्र्यसपन्नता महत्त्व की बात है। गोलवलकर गुरुजी ने चारित्र्यसपन्न नई पीढी तैयार करने के लिए जीवनभर कप्ट किए। उनके तत्त्वों से सहमत हों या नहीं, पर उनके प्रति अभिमान रखे वगैर नहीं रह सकते। अध्यक्ष बैरिस्टर वानखोडे स्व गोलवलकर गुरुजी और मेरे सबध अत्यत निकट के रहे हैं। इन सबधों को मैत्री का कहना भी गलत नहीं होगा। आयु में वे मुझसे सात-आठ वर्ष बडे होंगे। लॉ कॉलेज में हम साथ-साथ पढते थे। लॉ कॉलेज में रहते समय उस तरुणाई में भी मेरी उनसे जमी नहीं। फिर भी जन्मभर उनका और मेरा मैत्री का सबध बना रहा। जब भी कभी मुबई {१४४ श्रीगुरुजीसमन खह १२ आते, टेलिफोन पर पूछताछ करते। हम भी उनसे अलग-अलग प्रकार से पृछताछ किया करते। उन्होंने अपने सम्मुख एक ध्येयवाद रखा था, उसे उन्होंने देश के सामने रखा। देश के प्रधानमत्री ने भी उनके बारे में कहा है कि देश का एक महान सुपुत्र खो गया है। मृत्यु के समय या मृत्यु के बाद भी प्रत्येक के मन में समानता निर्माण होती है। ऐसे अवसर पर राजनीति के मतभेद भुलाकर उनके कार्य का हम गौरव करते हैं। कि (४) महाराष्ट्र विधान परिषद् सभागृह नेता श्री वसतदादा पाटील अध्यक्ष महोदय, में श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के निधन के कारण शोक प्रस्ताव रख रहा हूँ। श्री उत्तमराव पाटील (स्नातक मतदाता सघ) सभागृह के नेता ने रखे प्रस्ताव का समर्थन करने में खड़ा हूँ। श्री गुरुजी का शब्द-रूप से वर्णन करने का प्रयत्न मैं नहीं कर सकता। उसे प्रेरणा प्राप्त कर ही मैं सार्वजनिक जीवन में कार्यरत हूँ। श्री गुरुजी उत्कृष्ट सगठक थे। राष्ट्रीय स्वयसेवक सध के रूप में उन्होंने समाज को सगठित करने का प्रयत्न किया। उन्हीं से प्रेरणा लेकर समाज-जीवन के विविध क्षेत्रों में असख्य तरुण कार्यरत हैं। निष्कलक चारित्र्य के आदर्श की दृष्टि से हम श्री गुरुजी की तरफ देख सकते हैं। श्रेष्ठ सगठक, निष्कलक चारित्र्यसपन्न और उस सबसे महत्त्वपूर्ण, याने प्रखर राष्ट्रभक्ति सपन्न ऐसा एक श्रेष्ठ पुरुष अपने में से गया। मैं अत करणपूर्वक उनको श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। श्री.प्रप्रधान (स्नातक मतदाता सघ) मेरी पीढी के अनेक तरुण श्री गोलवलकर गुरुजी के प्रभाव के कारण राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ में त्याग वृत्ति से, समर्पित भावना से अनेक वर्षों तक कार्य कर रहे हैं। उन तरुणों को जीवन के अन्य क्षेत्र में कहीं भी अपनी कर्तबगारी दिखा पाना सभव था, परतु उन सबको दूर रखकर केवल राष्ट्रभक्ति से प्रेरित होकर सघकार्य के लिए जिन्होंने अपना जीवन श्रीगुरुजी समय खड १२ {१४५] - समर्पित किया, ऐसे तरुणों के स्फूर्तिनिधान श्री गुरुजी थे। स्वर्गीय गोलवलकर गुरुजी के सभी विचार सभी को मान्य हो, ऐसे नहीं थे, परतु समर्थ रामदास स्वामी की परपरा उन्होंने आगे चलाई। तरुणों को बलोपासना सिखाना, उनके मन में देश और धर्म के सवध में नितात श्रद्धा निर्माण करना और केवल स्वत के लिए सकुचित जीवन में न रमते हुए समाज के लिए अपना जीवन समर्पण करने के सरकार तरुणों के मन पर करने का समर्थ रामदास जैसा कार्य श्री गुरुजी ने किया। इसी कारण उनके निधन से अपने देश की व विशेषत महाराष्ट्र की अति हानि हुई है। श्रीय जि मोहिते (सहकार मत्री) कैलाशवासी गोलवलकर गुरुजी भारतीय सस्कृति की नितात चाह रखनेवाले थे। अपनी सस्कृति की रक्षा हो तथा अपने अत करण में भारतीयता का प्रमाण बढते रहना चाहिए, इस हेतु उन्होंने अपना सपूर्ण जीवन अर्पित किया व भारतीय परपरा को सम्मान प्राप्त करा देने का प्रयत्न किया। हमारे देश के तरुणों में राष्ट्रप्रेम कूट-कूटकर भरा जाए तथा उनके मन में भारत के सबध में नितात निष्ठा निर्माण हो, इसलिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। इसलिए उनके बारे में जो भाव सभागृह के नेता ने व्यक्त किया है, उसमें मैं सहभागी हूँ। श्री मनोहर जोशी (बृहन्मुबई स्थानीय प्राधिकारी सस्था) जिस काल में निष्कलक, जाज्वल्य राष्ट्रभक्ति, प्रामाणिकता, ध्येयनिष्ठा जिनमें हैं, ऐसे व्यक्तियों की देश को नितात आवश्यकता है, ऐसे में श्री गुरुजी सरीखे महानुभावों का अपने में से उठ जाना वास्तव में दुर्दैव भरी घटना है। गोलवलकर गुरुजी को चाहनेवाला और उनके आदेश माननेवाला मैं एक स्वयसेवक था। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ में मैंने कार्य किया हुआ है। राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ में बचपन से ही देशप्रेम, ध्येयनिष्ठा आदि गुणों का सवर्धन किया जाता है- यह बात कोई किसी भी विचारधारा का हो, वह नकार नहीं सकता। इसी सगठन में ध्येयनिष्ठा, राष्ट्रीय चारित्र्य राष्ट्रीय वृत्ति का अनुशासन सवर्धन किया जाने के कारण इस सगठन का महत्त्व किसी को भी स्वीकार करना पड़ता है। इस सगठन का विकास करते-करते सघ ही उनका ईश्वर बन गया। इस संगठन के घटकों पर श्री गुरुजी का गहरा प्रभाव किसी को भी दृष्टिग्गोचार होता है। श्रीगुरुजीसमन खड १२ } + -- राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ में गुरुदक्षिणा का कार्यक्रम रहता है। उसमें मैंने देखा है कि पूजन के लिए आनेवाले स्वयसेवक खुद के चैन में, खुद पर होनेवाले खर्च में कटौती करके त्याग भावना से गुरुदक्षिणा देते हैं। राष्ट्रप्रेम, ध्येयनिष्ठा आदि गुणों के विकास की दिशा में सघ में विशेष प्रयास किए जाते हैं। गुणों से युक्त लक्षावथि तरुण सघ के द्वारा देश को समर्पित किए गए हैं। गोलवलकर गुरुजी का मार्गदर्शन राष्ट्रीय स्वयसेवक सध तथा देश की युवा पीढी को प्राप्त होता था। उस मार्गदर्शन से अब अपना देश पचित हुआ है। श्री विघदेशपाहे (विदर्भस्नातक मतदाता सघ) भारत वर्ष के इतिहास में जिनके व्यक्तिमत्व का विस्मरण कभी भी नहीं होगा, ऐसे महान नेता को हम आज अपनी श्रद्धाजलि अर्पित कर रहें हैं। कै श्री गोलवलकर गुरुजी (के , अर्थात् कैलाशवासी स) श्री गोलवलकर गुरुजी का और मेरा सवथ जव में लॉ कॉलेज में पढता था, तवसे आया है। मैंने उनको बहुत निकट से देखा है। साधारणत हम जिनको बहुत बार निकट से देखते हैं, उनके बारे में आदरभाव पहले से कम होता है। परतु श्री गुरुजी अपवाद रूप से ऐसे थे कि उनके बारे में हमेशा नितात आदरभाव रहा। उनके जैसा निष्कलक चारित्र्य, नीतिमत्ता व ज्वलत राष्ट्रभक्ति अति कम लोगों में मिलती है। परमपूजनीय डा हेडगेवार जी के साथ गोलवलकर गुरुजी ने कार्य किया। उन्होंने एकसघ भारत के निर्माण के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की सगठना वढाई। सघ देशभक्तों का सगठन है, जहाँ भारतीय संस्कृति के सवर्धन का प्रयास सतत किया जाता है। हर एक में राष्ट्राभिमान जागृत करके उसके द्वारा राष्ट्र प्रवल करने के उद्देश्य से सघ शुरू हुआ था। के गुरुजी ने सघ की जिम्मेदारी अपने कधों पर उठाने के बाद वर्ष के ३६५ दिन और दिन के २४ घटे उनके सामने केवल सध ही रहता था। उन्होंने सघ खड़ा करने में और उसको प्रवल बनाने में अविरत परिश्रम किए हैं, यह कोई भी नकार नहीं सकता। उनको अहोरात्र संघ का ही ध्यान रहा करता था। आसेतु हिमालय एक राष्ट्र निर्माण होना चाहिए, यह उनका स्वप्न था। मैंने उनको सतत कार्य करते ही देखा है। उनके निर्वाण के १५ दिन पहले मैं उनको मिलने गया था। उस समय भी वे 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' व 'भारत माता की जय' बोल रहे थे। मैं वहाँ गया तब वे ऊपर श्रीशुरुती समय खड १२ {१४७) की मजिल पर थे। उन्होंने मुझे देखकर कहा 'आपको ऊपर आना समव नहीं, मुझे भी नीचे आना सभव नहीं। में ऊपर जा नहीं सकता था और वे नीचे नहीं आ सकते थे। अपने मार्ग से कभी नीचे न आ सकने के उनके स्वभाव के कारण उनके बारे में गलतफहमी भी होती थी। परतु उनकी तरफ उन्होंने कभी विशेष ध्यान नहीं दिया। वे अपने कार्य से कभी भी परावृत्त नहीं हुए। उनको अति कठिन परिस्थिति का सामना करना पडा। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ एक ऐसा सगठन है कि उसके स्वयसेवक भारत के सभी भागों में हैं। यह सगठन स्थानीयवाद, भाषावाद, प्रातवाद से सतत अलिप्त रहा है। वे केवल राष्ट्रवाद ही मानते हैं। मैं 'सयुक्त महाराष्ट्र' के आदोलन में सम्मिलित हुआ और उस निमित्त मुझे अनेक राज्यों में जाने का मौका मिला। कन्नड भाषी भाग में भी हम गए थे। कहीं स्वयसेवकों में भाषावाद देखने को नहीं मिला। आसेतु हिमाचल सघ के स्वयसेवक एक ही सूत्र से बँधे हुए हैं, ऐसा दिखेगा। उनमें भापावाद, प्रातवाद- ऐसा सकुचितवाद कभी नहीं दिखेगा। तरुणों में ज्वलत राष्ट्राभिमान निर्माण करने का कार्य श्री गुरुजी ने किया व अत्यत अनुशासनवद्ध प्रभावी सगठन खडा किया। इस ध्येयवाद से प्रेरित अनेक तरुण आज हमें देखने को मिलेंगे। आज सघ में ऐसे अनेक तरुण हैं, जो एम ए, पीएच डी हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन में विवाह या प्रापचिक बातों को कुछ भी स्थान न देते हुए अपना सारा जीवन सघकार्य को समर्पित किया। स्वातत्र्योत्तर काल में इस प्रकार ध्येयवाद से भरे हुए तरुणों की अत्यत आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ यह महान कार्य कर रहा है। सघ को गोलवलकर गुरुजी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ने राष्ट्रजीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। ऐसे महत्त्वपूर्ण सगठन की नीव के परमपूज्य डा हेडगेवार ने भरी है, उसपर के श्री गुरुजी ने कलश रखा- ऐसा तो नहीं कह सकते, परतु उस कार्य को उन्होंने बहुत व्यापक किया। ऐसे इस महान पुरुष को विधान परिषद् में श्रद्धाजलि अर्पित की जा रही है, यह बात लक्षणीय है। यह महान कार्यकर्ता कभी लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभा या राज्य विधानपरिषद् का सदस्य नहीं बना। न किसी भी प्रकार के निर्वाचन में प्रत्याशी रहा, तो भी 'राष्ट्रीय कार्य करनेवाला सच्या पुरुष- ऐसा ही उनका वर्णन करना पड़ेगा। ऐसे महापुरुष को मैं इस स्थान पर श्रद्धाजलि अर्पित कर रहा हूँ। यह पुरुष राष्ट्र के इतिहास में दीपस्तभ समान सबको मार्गदर्शी करता रहेगा- यह मेरा विश्वास है। श्रीपुरुणीसमन्त्र खत १२ 1 उनका जीवन राष्ट्र के तरुणों को आदर्शभूत रहेगा। मेरे यह विचार उनके परिवार के सदस्यों को भेजने की कृपा करें, इस प्रार्थना के साथ में उन्हें श्रद्धाजलि समर्पित करता हूँ। उपसभापति श्री गोलवलकर गुरुजी, श्री अवीद अली जाफरभाई व श्री डी आर उर्फ आनदराव चव्हाण, इनके दुखद निधन के निमित्त जो शोकप्रस्ताव आया है, उस बारे में सभागृह के नेता, विरोधी पक्ष के नेता और अन्य सदस्यों ने जो भावना व्यक्त की है, उनसे में भी सहमत हूँ। दिवगत सदस्यों के परिवार जनों को यह प्रस्ताव भेजा जाएगा। (५) राजस्थान विधानसभा (३ अक्तूबर १६७३, शोक प्रस्ताव एव श्रद्धाजलि) मुख्यमत्री श्री बरकतुल्ला खा माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं श्री गोलवलकर जी के बारे में कहना चाहता हूँ। बहुत बडे, पढे, समझदार और सूझबूझ के व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन में डिसिप्लिन पैदा किया और दूसरों में डिसिप्लिन पैदा करने कोशिश की। उन्होंने बोला कम और काम ज्यादा किया। इस तरीके से दूसरे लोगों को काम करना सिखाया। बहुत से लोगों से उनकी राजनीति नहीं मिलती थी, उससे आज कोई सबध नहीं हैं। उनके देहात होने पर मैं शोक प्रकट करता हूँ। श्री लक्ष्मण सिह (दूगरपुर) अध्यक्ष महोदय, श्री गोलवलकर जी एक बडे त्यागी थे, निस्वार्थ व्यक्ति थे। उनमें सगठन की बहुत बड़ी शक्ति थी। वह परम देशभक्त और विद्वान थे। भारतीय संस्कृति के अग्रणी प्रतीक थे और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को जन्म दिया। ऐसे महान नेता के निधन से राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ को तथा देश को बड़ी भारी हानि हुई है। इसकी क्षतिपूर्ति होना कठिन है। श्रीगुरुजीसमय खड १२ {१४६) । श्री घुमानमल लोढा (जोधपुर) अध्यक्ष महोदय, दिवगत मान आत्मा गोलवलकर के बारे में कहा गया है। वास्तव में आज के युग में वह युगपुरुप थे। उन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण और रक्त की बूँद-बूँद राष्ट्रदेवता के घरणों में राष्ट्र और देशभक्ति की शिक्षा देते हुए अर्पित कर दी। १६ फरवरी १६०६ इस महान पुरुप का जन्म हुआ। एम एस सी पास करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कार्य किया। इसी नाते वह राष्ट्र में परम पूज्य गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। सन् १६३६ में रामकृष्ण मिशन में प्रविष्ट हुए। सन् १६४० में उन्हें राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ का सरसघचालक नियुक्त किया गया। इस देश ने स्वामी विवेकानद, रामकृष्ण परमहस, अरविंद घोष और महात्मा गाँधी जैसे महान पुरुषों की शृखला पैदा की है। उसी की वह भी एक कड़ी थे। अध्यक्ष महोदय, उनके बारे में केवल उनके दल के ही लोगों द्वारा नहीं, बल्कि अन्य दलों के द्वारा भी श्रद्धाजलि अर्पित की गई है। वह अजातशत्रु थे। उन्होंने अपने जीवन का सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दिया। अध्यक्ष महोदय, कुछ समय पहले 'साप्ताहिक धर्मयुग' की ओर से उनसे पूछा गया कि 'आप बताइये, आपके जीवन का ध्येयवाक्य क्या था?" गुरुजी ने उत्तर दिया, 'मैं नहीं तू ही। अग्रेजी में कहते हैं, आल आईज आर कैपिटल। यही हम अपने जीवन में प्रयास करते हैं। परतु गुरुजी ने अपनी वसीयत दी है, यदि मेरे जीवन की समाप्ति हो जाए तो किसी प्रकार का स्मारक नहीं बनाया जाए। कोई यादगार नहीं बनाई जाए। यह महान व्यक्तित्व का परिचायक है। वह महान देशभक्त थे। 'ब्लिट्ज' साप्ताहिक में लिखा है- 'जिस एकाग्रचित्त भक्ति से उन्होंने सघ का सगोपन किया, उस पर कोई भी व्यक्ति आक्षेप नहीं ले सकता। उनका वैयक्तिक जीवन सन्यास का था। उनकी सगठन क्षमता अद्वितीय थी। उनमें कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। अपने ध्येय पथ पर चलते हुए उनके हृदय में आलस्य नहीं था। शब्दो में कमजोरी नहीं थी तथा भौहों पर थकान नहीं थी। यह उचित होगा कि अन्यान्य राजनैतिक नेतागण उनके उदाहरण को अपनाएँ, जो पूर्णतया समर्पण का है। जिन्होंने अपने जीवन का समर्पण करके लाखों व्यक्तियों को प्रेरणा, स्फूर्ति और अभिव्यक्ति दी है, ऐसे महान . श्रीशुरुजी समय खड १२ व्यक्ति का अभाव सदियों तक खटकेगा। उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर हम उनकी इच्छा को पूरा कर सकेंगे। मैं अत में यह कहूँगा- 'जिस दीपक ने हमें जलाया, आज उसी का गुण गाते हैं, और उसी के पदचिह्नों पर चल करके हम जल जाते हैं।' श्री निरजन नाथ आचार्य (मावली) गुरु गोळवलकर अपनी मान्यताओं में विशिष्ट थे, सगठन शक्ति में अग्रणी थे। साथ ही अपने तप और साधना में वेजोड थे। इसलिए उनका निधन भी राष्ट्र के लिए क्षति है। मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। अध्यक्ष श्रद्धेय श्री गुरु गोळवलकर के बारे में मैं समझता हूँ, ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। जो भाव माननीय सदस्य गुमानमल जी लोढा ने व्यक्त किए हैं, उनमें मैं अपने आपको सम्मिलित करता हूँ और उनके बारे में निश्चित कह सकता हूँ कि वह एक कुशल सगठनकर्ता थे और भारतीय विवारधारा और पूर्व की सभ्यता में विशेष आस्था रखनेवाले थे। R । " -- (६) बिहार विधानसभा अध्यक्ष श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर का जन्म १E फरवरी १६०६ में हुआ था। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमएस सी और एलएल बी की परीक्षा पास करने के उपरात वहीं उन्होंने प्राध्यापक का कार्य प्रारभ किया। बचपन से ही सात्विक प्रवृत्ति रखनेवाले गोलवलकर शीघ्र ही स्वामी विवेकानद के गुरुमाई स्वामी अखडाक सपर्क में आए और उनसे दीक्षा ग्रहण की। फिर उनका सपर्क डा हेगडेवार से हुआ और उनकी मृत्यु के बाद उन्होंने ही गष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का नेतृत्त्व जीवनपर्यंत किया। राष्ट्रजीवन की प्रत्येक समस्या पर उनके विचार स्पष्ट हुआ करते थे। सघ को राजनीति से अलग रखने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया। अनेकों {१५१ श्रीगुरुजी समय खड १२ ।
सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक सस्थाओं को उन्होंने जन्म दिया। अनुशासन ही जीवन की सफलता का बीजमन है, इसका आजीवन प्रचार किया। १६६६-७० में इनके फेफड़े में केन्सर हो गया। बीच में कुछ सुधार हुआ परतु ५ जून ७३ को ऋर काल ने अनुशासन के इस महान गुरु को हमसे छीन लिया। भगवान दिवगत आत्मा को शाति प्रदान करें। अब्दुलधार श्री गोळवलकर जी हमारे सूबे के रहनेवाले नहीं थे, लेकिन हिदुस्तान में उनकी भी शख्मियत एक खास शख्सियत थी। उन्होंने एक खास विचारधारा हिदुस्तान पॉलिटिकल पार्टीज के सामने रखी, जिसके बारे में हमारे सदन के सभी लोगों को इलम है। उनकी मौत से काफी अफसोस है। कँवर बसत नारायण सिह जो हिंदुस्तान का एक वडा महान व्यक्ति उठ गया, वह है हमारे गुरु गोलवलकर। उन्होंने वी एच यू से एमएस सी पास किया था और उनका मालवीयजी के साथ सपर्क था। उन्होंने उनके सिद्धात के अनुसार रहकर कार्यक्रम चलाया। स्व विवेकानद के गुरुभाई स्वामी अखडानद के साथ उनका विशेष सपर्क था, लेकिन उन्होंने अपनी योग्यता का प्रदर्शन नहीं किया। डा हेडगेवार जब आसन्नमरण थे तो उन्होंने अपनी सारी जिम्मेवारी गुरुजी को सौंप दी। गुरुजी कैन्सर के रोगी हो गए और उनका आपरेशन भी हुआ। मालूम पड़ा कि वे अच्छे हो जाएँगे, लेकिन कैन्सर फिर रीअपीयर हो गया। वे अपने मरने के दो सप्ताह पहले मुबई के मुख्यमत्री नाईक से मिले थे, तो उन्होंने उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा, लेकिन उन्होने अपने बारे में कुछ भी नहीं बताया। इसी से आप समझ सकते हैं कि वे कितने वडे योगी थे। हो सकता है कि उनकी फिलोसॉफी लोग नहीं समझते हैं और उनके विचार से अलग हों। लेकिन अपने स्ट्राग विलपावर के कारण वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक घूमते थे। बच्चों के साथ जब वे मिलते या बातें करते, तो वे इस तरह से उनसे व्यवहार करते कि उन्हें ऐसा ज्ञात न हो कि वे एक महान व्यक्ति के साथ बात कर रहे हैं। वे इतने बड़े होते हुए भी स्वभाव से सरल थे। वह महान व्यक्ति हमारे हिंदुस्तान से चला गया। एक दीपक बुझ गया। जिन विचारों के लिए उन्होंने अपना सारा २} श्रीगुरुजीसमय खड १२
जीवन दे दिया, जिन विचारों से वे हिदुस्तान को सबल और दृढ बनाना
चाहते थे, उनको हमें अपनाना चाहिए।
कर्पूरी ठाकुर
इस मुल्क में आज जो शान-शौकत है, जो ठाठ-बाट है और जो
वाह्य दिखावा है, प्रशासन में और अन्य जगहों में- इन सब कुछ के
बावजूद गुरु गोलवलकर ने जो उदाहरण उपस्थित किया है, वह अनुकरणीय
है। उनका जीवन सादगी का था। उनका जीवन सयम का था। उनका
जीवन अनुशासन का था। उनका जीवन न केवल विचार का था, बल्कि
आचार का था। हमारा उनसे बहुत स्थानों में गहरा मतभेद रहता था, मगर
सब कुछ के रहते हुए मुझे यह मानने को बाध्य होना पडता है कि उन्होंने
अपने विचार से अधिक आचार से जीवन में लाखों-लाख लोगों को
प्रभावित किया था। इस हद तक उन्होंने प्रभावित किया कि उनके इशारे
पर लोग अपना जीवन देने को तैयार रहते थे। नि सदेह ऐसा व्यक्ति
सामान्य नहीं हो सकता । महान व्यक्ति ही ऐसा हो सकता है। अपनी ओर
से और अपने दल की और से उनके निधन पर शोक व्यक्त करता हूँ।
प
के
को
जनता मे जनार्दन देखने की यह अति श्रेष्ठ
दृष्टि ही हमारी राष्ट्र-कल्पना का हृदय है
इसने हमारे चितन को परिव्याप्त कर लिया है
तथा हमारे सास्कृतिक दाय की विविध अनुपम
कल्पनाओ को जन्म दिया है।
श्री गुरुजी
ई
+-
श्रीगुरुखी समय खह १२
{१५३} }
बुधाजलि (१)सतजन स्वामी निरजन देव तीर्थ पुरी के जगद्गुरु शकराचार्य श्री गोलवलकर जी ने धर्म प्राण भारत से गोहत्या के कलक को मिटाने के लिए सदैव आगे रहकर प्रयास किया। हिंदू सगठन के ये आकाक्षी थे। हमें उनके इस महान लक्ष्य की पूर्ति करके उनकी आकाक्षा को साकार रूप देना चाहिए। ज्योतिर्मठ के जगद्गुरु शकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम श्री गुरुजी का निधन हिदू-समाज पर भारी आघात है। श्री गुरुजी ने धर्मप्रवण भारत से गोहत्या के कलक को मिटाने के लिए सदैव आगे रहकर प्रयास किया। हिदू सगटन के वे आकाक्षी थे। हमें उनके इस महान लक्ष्य की पूर्ति कर उनकी आकाक्षा को साकार रूप देना चाहिए। स्वामी जयेद्र सरस्वती शकराचार्य काची कामकोटिपीठ श्री गोलवलकर जी जीवन के अतिम क्षणों तक हिंदू धर्म, हिंदू सस्कृति तथा राष्ट्र की सेवा के लिए अथक प्रयत्न करते रहे। वे सफेद कपडों में एक तपस्वी सत थे। स्वामी श्री करपात्री जी महाराज श्री गुरुजी के निधन से राष्ट्र व हिंदू समाज की अपूरणीय क्षति हुई है। श्री गुरुजी से धार्मिक विषयों में मतभेद हो सकते हैं, कितु उनकी उत्कट राष्ट्रभक्ति तथा समर्पित भाव से राष्ट्र व समाज सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्य सदैव प्रेरणास्पद रहेंगे। वे धर्मप्रवण भारत से गोहत्या के कलक श्रीगुरुजीसमय अड १२ को पूरी तरह मिटा देने के आकाक्षी थे। हम गोहत्या बद कराकर ही उनके एक महान स्वप्न को साकार कर सकते हैं। जैन सत आचार्यश्री तुलसी श्री गोलवलकर जी के स्वर्गवास का समाचार आकस्मिक सा लगा। उनमें सक्रियता, सगठन शक्ति और भारतीय सस्कृति का अनुराग था। वे समालोचक और गुणग्राही- दोनों एक साथ थे। वे राष्ट्रीय चरित्र पर बहुत वल देते थे, इसीलिए उनसे हमारा सपर्क और अणुव्रत आदोलन के प्रति उनका आकर्षण हुआ। गोरक्षपीठाधीश्वर श्री महत अवैद्यनाथ जी श्री गुरुजी के निधन से हिंदू धर्म तथा हिदू जाति की अपूरणीय क्षति हुई है। जैन मुनि श्री सुशील कुमार जी राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जी के दुखद निधन से हमने एक महान सास्कृतिक व्यक्तित्व खो दिया है, जिसकी पृर्ति असभव सी प्रतीत होती है। देश की वर्तमान सकटमय घडी में उनकी उपस्थिति की अत्यधिक आवश्यकता थी। हमें उनका अभाव निरतर खटकेगा। उन्होंने राष्ट्र, धर्म एव सस्कृति के उन्नयन में जो महान योगदान दिया है, उसके लिए समस्त राष्ट्र उनका चिर ऋणी रहेगा। आचार्य विनोबा भावे मेरे हृदय में उनके लिए वडा आदर रहा है। उनका दृष्टिकोण व्यापक उदार और राष्ट्रीय था, वे हर चीज राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार करते थे। उनका अध्यात्म में अटूट विश्वास था और सभी धर्मों के लिए उनके हृदय में आदर का भाव था। उनमें सकीर्णता लेश-मात्र भी नहीं थी वे हमेशा उच्च राष्ट्रीय विचारों से कार्य करते थे। श्री गोलवलकर को अध्यात्म से गहरा प्रेम था, वे इस्लाम, मसीही आदि अन्य धर्मों को बडे आदर की दृष्टि से देखते थे और यह अपेक्षा करते थे कि भारत में कोई अलग न रह जाए। - श्रीपुरुषी समय खड १२ {१५५} (२) नेतागण राष्ट्रपति श्री वराह गिरि व्यकट गिरि श्री गोलवलकर गभीर धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुष थे। उनकी मृत्यु से उनके असख्य प्रशसकों और अनुयायियों को गहरा दुख हुआ है। मैं उनके प्रति हार्दिक सवेदना और सहानुभूति व्यक्त करता हूँ। प्रधानमत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी मुझे गुरुजी की मृत्यु का समाचार सुनकर बहुत दुख हुआ। अपने प्रभावी व्यक्तित्व और विचारों के प्रति अटूट निष्ठा के कारण राष्ट्रीय जीवन में उनका सम्मानपूर्ण स्थान था। लालकृष्ण अडवाणी अध्यक्ष भारतीय जनसघ गुरुजी के निधन से जो गहरा दुख हुआ है, उसकी अभिव्यक्ति शब्दों द्वारा नहीं की जा सकती। हालाँकि वह काफी दिनों से बीमार थे, फिर भी जब उनके मरने की खबर मिली तो गहरा धक्का लगा। गुरुजी आधुनिक युग के स्वामी विवेकानद थे, जो महान व विशाल भारत के निर्माण के लिए दृढ सकल्प व निष्ठा के साथ प्रयत्नशील थे। देश के लाखों युवकों के लिए गुरुजी अटल देशभक्ति और नि स्वार्थ त्याग के प्रेरणादायक प्रतीक थे। यह कल्पना ही अत्यधिक कष्टदायक है कि जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति कैसे होगी? देश के अन्य लाखों स्वयसेवकों के साथ अश्रुपूरित नेत्रों से मैं श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। अटल बिहारी वाजपेयी श्री गुरुजी के महान व्यक्तित्व में समर्थ स्वामी रामदास की भक्ति तथा शिवाजी महाराज की शक्ति का अपूर्व सगम था। उनमें रामकृष्ण की तपस्या और विवेकानद के तेज का समन्वय था। आत्मविस्मृत हिदू समाज को स्वत्व का साक्षात्कार कराके श्री गुरुजी ने उसे सगठित शक्तिशाली तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाने के राष्ट्रकार्य के लिए अपने शरीर का कण-कण और जीवन का क्षण-क्षण समर्पित कर दिया। लाखों युवकों ने उनके तपस्वी तथा तेजस्वी जीवन से F१८६} श्रीगुरुजी समन खड १२ प्रेरणा लेकर अपना घर बार छोडा और समूचे भारत में प्रखर एव विशुद्ध राष्ट्रवाद का अलख जगाया। यह उनकी अखड साधना तथा अद्वितीय सगठन कुशलता का ही परिणाम है कि हिदू समाज आज जागृत हो गया और अपने ऊपर होने वाले किसी भी आक्रमण का प्रतिकार करने में सक्षम है। श्री गुरुजी के देहावसान से अधकार में मार्ग दिखानेवाला प्रकाशस्तभ ढह गया। एक युगपुरुष हमारे बीच से उठ गया। यह हम सबका कर्तव्य है कि डा हेडगेवार के सपनों को सत्य-सृष्टि में परिणत करने का व्रत लेनेवाले श्री गुरुजी के तप पूत जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्रकार्य को अधिक वेग से पूरा करके दिखाएँ। डा शकरदयाल शर्मा, अध्यक्ष काग्रेस श्री गुरुजी का राष्ट्रीय जीवन में सम्मानपूर्ण स्थान था और वे अपने विश्वासों के प्रति दृढ थे। राजमाता विजयाराजे सिधिया उपाध्यक्ष, जनसघ जब राष्ट्र को उनकी सबसे ज्यादा आवश्यकता थी, तब वे चल दिए। यह हमारा और देश का दुर्भाग्य है। राष्ट्र के लिए समर्पित उस महान जीवन से हम देश के लिए पल-पल, तिल-तिल जलने की प्रेरणा लें। वित्तमत्री यशवतराव चव्हाण श्री गोलवलकर के निधन से सार्वजनिक जीवन से एक अत्यत प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उठ गया। वे निश्चय ही विद्वान और चरित्रवान व्यक्ति थे। रक्षामत्री जगजीवन राम भारत ने सरसघचालक श्री गोलवलकर की मृत्यु से एक ऐसा नेता खो दिया है, जो सगठन की योग्यता रखता था तथा जिसमें राष्ट्रीय हित को लेकर कष्ट उठाने की क्षमता थी। एस एम जोशी सोशलिस्ट नेता श्री गोलवलकर के निधन से एक तपस्वी की जीवन ज्योति बुझ गई है। मुझे यह विश्वास है कि श्री गोलवलकर की सगठनात्मक शक्ति का उपयोग राष्ट्रीय प्रगति के लिए किया जाएगा। श्रीशुरुजी समय खड १२ {१५७)
-
प्रो राम सिह अध्यक्ष हिदू महासभा
श्री गुरुजी ने हिदुत्व की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया
हुआ था। वे निर्भीक व तेजस्वी नेता तथा वक्ता थे। वर्तमान समय में
हिदू-समाज को उनकी भारी आवश्यकता थी।
ओम प्रकाश त्यागी सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा
श्री गुरुजी आर्यसमाज के सामाजिक उत्थान के कार्य के प्रबल
समर्थक थे। आर्यसमाज द्वारा सचालित ईसाई मिशनरी विरोधी गतिविधियों
को उनकी पूरी सहानुभूति प्राप्त थी। उनके निधन से आर्य जगत् की भारी
क्षति हुई है।
सतोष सिह, जत्थेदार अकाली दल
श्री गुरुजी एक महापुरुष थे। उनके जैसे व्यक्ति अमर होते हैं। श्री
गुरुजी के देहावसान से सिक्ख सप्रदाय को भारी क्षति हुई है। उनके सामने
खडे होकर हिदू-सिख का भेद-भाव खत्म हो जाता था।
बाल ठाकरे, शिवसेना
किसी जहाज के नायक की भॉति श्री गोलवलकर जी सघ को
अनेक सकटों में से कुशलतापूर्वक आगे बढाते ही गए।
कामरेड तकी रहीम, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी
यद्यपि मैंने श्री गुरुजी के कभी दर्शन नहीं किए, तथापि देश के
उज्ज्वल भविष्य के उनके आदर्श में विश्वास रखने वालों में गुरुजी की
प्रेरणाशक्ति को मैंने अनुभव किया है।
मधुमेहता स्वतत्र दल
श्री गुरुजी के निधन से भारत एक महान देशभक्त से वचित हो
गया है।
हाफीजुद्दीन कुरैशी काग्रेसी नेता पटना
वे वास्तव में
महापुरुष
थे । दूर से देखने वाले लोग उनके बारे में
गलत धारणा बना लेते थे। वे साप्रदायिक नहीं थे, वे मुस्लिम-विरोधी भी
श्रीशुरुषी समय खड १२
नहीं थे। मुस्लिम-विरोध के नाम पर आज तक मुसलमानों को संघ के नाम
पर बरगलाया जाता रहा है। श्री गुरुजी समान अधिकारों और धार्मिक
स्वतत्रता के पक्षधर थे।
(३)सामाजिक कार्यकर्ता
दादासाहब आप्टे, महामत्री विश्व हिदू परिषद्
श्री गुरुजी के निधन से हिंदू समाज ने एक महान दार्शनिक और
पथ-प्रदर्शक खो दिया।
तनसिह शाडिल्य, सयोजक. भारतीय किसान संघ
राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिव ।
राव गोलवलकर स्वामी विवेकानद की भाँति सच्चे अर्थ में दरिद्रनारायण के
उपासक थे। श्री गोलवलकर ने अपने जीवन से करोडों देशवासियों को वह
प्रेरणा दी, जिससे अनेक युवकों ने अपने घर-बार छोडकर देश व धर्म की
सेवा में अपना जीवन अर्पण कर दिया। वस्तुत इस युग में वे युवकों के
हृदय सम्राट थे।
श्रीमती मावशी केलकर, सचालिका राष्ट्र सेविका समिति
भारत की हिदुत्वनिष्ट शक्ति का मानबिदु चला गया है, हिदुराष्ट्र
की इससे अपरिमित क्षति हुई है।
मिश्रीलाल तिवारी सगठन मत्री, वनवासी कल्याण परिषद्
गुरुजी के रूप में वनवासी बधुओं के एक बहुत बडे हितैषी
मार्गदर्शक महामानव को हमने खो दिया, जिनकी सत्प्रेरणा से ही २२ वर्ष
पूर्व वनवासियों के कल्याणार्थ जशपुर में कल्याण आश्रम की स्थापना की
गई थी।
श्रीगुरुजीसमय खड १२
[१५]
(४)साहित्यकार
जैनेद्र कुमार जैन
श्री गोलयलकर भारत के प्रभावशाली तथा प्रतिभावान सुपुत्रों में से
थे। उनका व्यक्तित्व तथा वक्तव्य अनूठा था। उनके निधन से भारत एक
रत्न से वचित हो गया।
उपन्यासकार गुरुदत्त
मुझे इस समाचार से भारी आघात लगा है। इस अभाव की पूर्ति
होना कठिन है।
काशीनाथ उपाध्याय
उस महान व्यक्ति को,
जीवन की शक्ति को,
राष्ट्रीय अभिव्यक्ति को, मेरा नमन ।
प्रो विष्णुकात शास्त्री
श्री गुरुजी भारतीय संस्कृति के मूर्तिमान स्वरूप थे। उनका जीवन
समस्त राष्ट्र को समर्पित था। जीवन के अतिम क्षणों तक वे राष्ट्र को
आलोकित करते रहे।
अनेकता में एकता का हमारा वैशिष्ट्य हमारे
सामाजिक जीवन के भौतिक एव आध्यात्मिक
समी क्षेत्रो मे व्यक्त हुआ है। यह उस एक दिव्य
दीपक के समान है जो चारो ओर विविध रगो
के शीशो से ढका हुआ हो। उसके भीतर का
प्रकाश दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार
भांति-भाँति के वर्णों एव छायाओ मे प्रकट
होता है।
श्री गुरुजी
श्रीशुरुषी समय खड १२
।
शब्दाजलि नागपुरटाइम्स इस सामान्य विश्वास के विपरीत कि दीक्षा से व्यक्ति योगी बन जाता है, श्री गुरुजी को भी दीक्षा मिली थी, पर उसने उन्हें देश-सेवा में ही दृढ रूप से प्रतिष्ठित किया, लेकिन इसने उन्हें योगाभ्यास या ध्यान लगाने या आध्यात्मिक साधना से विमुख नहीं किया। वास्तव में वे अध्यात्म के मार्ग पर तीव्र गति से बढते रहे और इन वर्षों में उनका जैसा आचरण और व्यवहार रहा, उससे यह प्रतीत होता है कि उन्होंने परमानद की अनुभूति कर ली थी। कितु इस अनुभूति में भी वे अपने उस मिशन के प्रति पूरा ध्यान देते रहे, जिसके अतर्गत वे लोगों को उन बातों का स्मरण कराते रहे, जिन्हें वे विस्मृत कर गए थे। वे लोगों को भारत की प्राचीन परपरा से सबध बनाने के लिए जागरूक करते रहे। इससे यही सिद्ध होता है कि वे सन्यासी के रूप में एक निष्ठावान कर्मयोगी थे। उनका यह विश्वास था कि जनमानस में इस सत्य के बीज के आरोपण से बढकर कोई कार्य नहीं है कि वे सभी मिलकर एक राष्ट्र हैं और उनका राष्ट्र निमाणावस्था में नहीं है, बल्कि पहले से फल-फूल रहा है और सबसे बढकर यह कि यह भूमि, मात्र मिट्टी या धूल नहीं है, बल्कि यह उन सबकी पवित्र माता है। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद भयानक घटनाओं का जो दौर चला, उनसे इस प्रकार के विशाल अनुयायी वर्ग वाले किसी भी व्यक्ति का सतुलन बिगड जाता। या तो वह उस सगठन, जिसका वह नेतृत्व करता है, को भग कर देता या उसको वह निदनीय मार्गों पर ले जाता। लेकिन श्री गोलवलकर ने सतों जैसा जो सयम दिखाया, वह भारत के सर्वाधिक श्रीगुरुजी समय खड १२ {१६} . - - । अनुशासित लोगों के इस सगठन के सरसघचालक के रूप में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही है कई ऐसे अवसरों पर, जबकि निहित स्वार्थो के राजनीतिक दलों या राजनीतिक नेताओं ने जानबूझ कर उत्तेजनाएँ फैलाई, श्री गोलवलकर ने इसमें ऐसा कोई कारण नहीं देखा, जिससे कि वे परेशान हों, न ही सगठन के नेतृत्व वर्ग के अन्य लोगों पर ही इसका कोई प्रभाव पडा। ऐसे छोटे-मोटे लोगों, जिनके पास न तो श्री गोलवलकर जी जैसी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि थी, न ही उनके पास श्री गुरुजी के जैसा कोई सुगठित सगठन ही था, ने उन पर कीचड फेंकने की कोशिश की और समाचार-पत्रों के मुखपृष्ठों पर थोडा-बहुत प्रचार प्राप्त किया। लेकिन श्री गुरुजी ने उनके साथ कभी भी विवाद नहीं उठाया। वे अपने को उस विशाल समुदाय का ही एक अग मानते रहे, जिसमें किसी अज्ञानी व्यक्ति को इस प्रकार से आमोद-प्रमोद में अपनी अज्ञानता के कारण स्वय कष्ट उठाना पडता है। भारत में कुछ ही लोग सत्ता में न रहते हुए भी इतना सम्मान और प्यार पा सके, जितना श्री गोलवलकर को मिला। मातृ-भूमि से उनका प्रेम जीवन के प्रति प्रबुद्ध आनद के समकक्ष ही था। विज्ञान, गणित, नक्षत्र विज्ञान आदि के अध्ययन के साथ ही साथ वेदात अध्ययन, होम्योपैथी, योग और उन सभी ज्ञान क्षेत्रों, जो भारत के अपने हैं, का अध्ययन उन्होंने भली-भाँति किया। वे इस बात की हमेशा वकालत करते रहे हैं कि मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय व्यक्तित्व ने शानदार सफलताएँ अर्जित कीं। चूँकि मानव जीवन को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए क्रमबद्ध रूप से नियमित किया गया था, अत (भारतीय) विचार और कर्म के क्षेत्र की प्रत्येक बात उनको अर्थपूर्ण और उपयोगी प्रतीत होती थी। अगर यह देश सर्वोच्च मूल्य को अपने मस्तिष्क में वरावर सँजोए रखे, तो वह इस सारे विचार और कर्म को (सही ढग से) समझा सकता है। अपने स्वयं के उदाहरण के द्वारा वे यह बात अपने पीछे छोड़ गए हैं कि हम किस सदेश का पालन करें। कितु पूर्ण समर्पण के इस यामूल्य जीयन की क्षतिपूर्ति किसी प्रकार से नहीं हो सकती, जिसको हर फाल ने हमारे बीच से छीन लिया है। श्रीगुरुपी समन अ6 १२ ~ इडियन एक्सप्रेस श्री गोलवलकर में ऐसा कुछ जरूर था जो प्राचीन भारत के ऋपियों में ही मिलता है। उनकी लबी दाढी, उनका सयमित व्यक्तिगत जीवन, उन मूल्यों के प्रति उनकी गहरी आस्था जिसका, प्रतिनिधित्व हिंदू समाज युगों-युगों से करता आया है। इन बातों के कारण भारत के सर्वाधिक अनुशासित सगठनों में से एक राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के विलक्षण नेता के रूप में उन्हें सबसे अलग और विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ। श्री गोलवलकर के अदर इतनी अधिक ऊर्जा थी कि वे कभी थकते नहीं थे। वे देश के प्रत्येक भाग से उसी प्रकार भली-भाँति परिचित थे, जैसे अपनी हथेली से। भारतीय इतिहास के वे गहरे अध्येता थे और भारत की प्रतिरक्षा तथा उत्तर और पश्चिम की सीमाओं की सुरक्षा के लिए वे गभीर रूप से चितित रहते थे। वे उन लोगों में से थे, जिन्होंने भारत के विभाजन को कभी नहीं स्वीकारा। ये । चाहते थे कि भारत में मुसलमान भारत की मुख्य जीवनधारा से एकजुट हो जाएँ और राष्ट्र की विरासत के रूप में हिंदू सस्कृति का आदर करें। इस कारण वे विवादास्पद होंगे, लेकिन वे हमेशा इस आरोप का बलपूर्वक खडन करते रहे कि वे मुस्लिम-विरोधी हैं। ट्रिब्यून यदि व्यक्तित्व किसी आदमी के लिए वैसा ही है, जैसे पुष्प के लिए सुरभि, तो स्वर्गीय श्री गोलवलकर का व्यक्तित्व विलक्षण था। दिखने में वे दुबले-पतले और कठोर सयम के प्रतीक लगते थे। उन्हें अपनी इमेज बनाने के लिए रेडियो, फिल्म या प्रेस की कोई आवश्यकता नहीं थी। वे आत्मप्रक्षेपण को अनावश्यक मानकर इसकी उपेक्षा करते थे और इसके बावजूद अपने योग्य प्रतिष्ठा का स्थान बना सके थे। श्रीगुरुजी समय खड १२ {१६३} टाइम्स आफ इंडिया गाँधी जी की हत्या के उपरात जो जनरोप उमडा, उसके परिणामस्वरूप सघ बिल्कुल अस्तव्यस्त हो गया था। अगर प्रतिबंध के शक्तिक्षय के कुछ वर्षों के बाद यह फिर से क्रियाशील हुआ तो यह केवल श्री गुरुजी के सगठन की दुर्लभ क्षमताओं के कारण ही। पचासोत्तरी दशक में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के विकास में श्री गोलवलकर की कठोर और सयमयुक्त जीवन-पद्धति का योगदान किसी भी रूप में कम न था। हिदुस्तान टाइम्स श्री एम एस गोलवलकर का दिवगत हो जाना राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ के एक युग की समाप्ति का द्योतक है। सन् १६४० में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के संस्थापक डा हेडगेवार द्वारा सरसघचालक के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद श्री गोलवलकर ने संघ को एक सिद्धात और सगठित रूप प्रदान किया, जो तत्कालीन परिस्थितियों में एक सुगठित और जबरदस्त सास्कृतिक निकाय के रूप में विकसित हुआ। -- मदरलैड आज श्री गुरुजी नहीं रहे। लेकिन असख्य लोगों के जीवन में जो ज्योति उन्होंने जगाई थी, वह इस भूमि पर जब भी अधेरा छाता प्रतीत होगा, देश को भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रकाशमान कर देगी। हम इस समय शोक मना रहे हैं, लेकिन आगे आने वाली पीढियाँ इस बात से फूली नहीं समाएँगी कि इस भूमि पर उनके जैसा देवदूत भी कभी चला करता था। उनकी पवित्र स्मृति में हमारी विनम्र श्रद्धाजलि। हिदुस्तान भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों की भाँति अपनी बौद्धिक- आध्यात्मिक क्षमता सपूर्ण सार्थकता में निचोडकर उन्होंने कुशल रसायनशास्त्री की तरह श्रीभुरुषी समय खह १२ ।
- इनका उपयोग किया था। यही कारण है कि निराशाओं, बाधाओं और विवशताओं के बावजूद उनके अभियान की गति कभी मद नहीं हुई और हतोत्साह उनके स्नायुमडल को कभी पगुता में नहीं जकड सका। इसके विपरीत वे उत्तरोत्तर वैयक्तिक उत्कर्ष और लोकमागल्य की नित्य नई वैभव-विभृतियाँ प्राप्त करते रहे। राष्ट्रोत्कर्ष पर श्री गुरुजी की अनन्य भक्ति थी। अपने निजी आयुर्वल के साथ राष्ट्र के बल को भी वे उसमें सींचना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ को अपना निमित्त बनाया और अथक परिश्रम, दूरदर्शी नेतृत्व एव सगठन-कौशल्य से उसे विकसित कर देश की व्यापक बलवती शक्ति बना दिया। राजनीतिक स्तर पर जनसघ का निर्माण भी गुरुजी की ही सूझ-बूझ का परिणाम है। देश की राजनीतिक पार्टियों में अनुशासन की दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ या जनसघ के मुकाबले की शायद ही कोई पार्टी होगी। गुरुजी शक्ति के उपासक तो थे ही, विवेकानद एव शकराचार्य की भाँति शक्ति और चरित्र के मत्रदाता भी थे। उनका पथ अवश्य भिन्न था, कितु इतिहास व्यक्ति का मूल्याकन पथ से नहीं करता, पथ पर चलने की लगन और पीरुप-पुरुषार्थ के साथ अपराजित निष्ठा से निखरे चरित्ररूपी स्वर्ण को कसौटी पर चढाकर करता है। व्यक्ति और व्यक्ति के क्षेत्र में गुरुजी प्रदीप्त स्वर्ण थे। अपनी पीढी की विशिष्ट विभूतियों में वे सदैव स्मरणीय रहेंगे। वीर अर्जुन आप केवल राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के लाखों स्वयसेवकों के पथ प्रदर्शक, नेता और अदम्य साहसी सहयोगी ही नहीं थे, वरन् अन्य सभी मातृभूमि, पुण्यभूमि प्रेमियों और देशभक्तों के लिए भी एक महान प्रेरणास्रोत थे। जिस प्रकार कभी आदि शकराचार्य ने और फिर स्वामी दयानद सरस्वती ने देश की महानतम सभ्यता और सस्कृति का शखनाद किया, ठीक वैसे ही आप जीवनपर्यंत देश को प्रगति और उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने के लिए प्रयत्नशील रहे। आपकी प्रेरणा से सन् १६६२, १६६५ और १६७१ के युद्धों में श्रीशुरुजी समय खड १२ {१६५} स्वयसेवकों ने उत्कट देशभक्ति का परिचय देकर हर किसी को स्तभित कर दिया था। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि आपका निधन पूरे राष्ट्र की एक अपूरणीय क्षति है। किसी को आपके विचारों से मतभिन्नता भी हो सकती है, परतु आपने हर जटिल वेला में देश का जो मार्गदर्शन किया, उसके सदर्भ में इन मतभेदों के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। नवभारत टाइम्स राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसघचालक 'गुरुजी' सर्वप्रिय सबोधन से समादृत स्वर माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के देहावसान से ऐसा प्रतीत होता है कि एक महान व्यक्तित्व हमारे बीच से उठ गया। विगत दो सौ वर्षों के अतर्गत सामाजिक सास्कृतिक, राजनीतिक दृष्टि से हमारे देश में ऐसे व्यक्तियों का उदय हुआ है जिनकी महनीयता का आभास पाने के लिए विराट शब्द जुडता है। गुरु गोलवलकर उन्हीं विराट व्यक्तियों में से एक थे। विचार और आदर्शो से मतभेद रखनेवाले लोग भी स्व गुरु गोलवलकर जी के जीवन की तेजस्विता, त्याग और तपस्या को हार्दिक स्वीकृति देते हैं। गुणों का हमारे राष्ट्रीय जीवन से लोप हो रहा है, आदर्शों १ की व्यक्तिगत साधना आज के सतही विचारकों के हाथों उपहास का विषय बनाई जाती है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक निर्विवाद तथ्य है कि किसी भी राष्ट्र का एक शत्ति ली राष्ट्र के रूप में तब तक निर्माण नहीं किया जा सकता, जब तक उसमें उन्हीं गुणों का समावेश नहीं होगा, जिनका श्री गोलवलकर जी के जीवन में आविष्कार हुआ था। इन महान गुणों के सामने धर्मनिरपेक्षता और लौकिकतावादी चमक फीकी पड जाती है। दिनमान श्री गुरुजी के राष्ट्र और देश सवधी विचारों से असहमत होने के बावजूद इस बात को सभी स्वीकार करते हैं कि माधवराव गोलवलकर में सगटन की अभूतपूर्व क्षमता थी। अपने सरल जीवन और चारित्रिक दृढता श्रीगुरुजीसमन खड १२ - ।
के कारण उनके व्यक्तिगत जीवन की आलोचना करनेवाले बहुत ही कम लोग मिलेंगे। एक सच्चे सन्यासी की तरह उन्होंने देश का चप्पा-चप्प छान मारा था। इसीलिए वह कहा करते थे कि रेल का डिब्बा उनका घर है। राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ को कठिनतम परिस्थितियो में आगे ले जाने और उसे सामान्य शारीरिक क्षेत्र से आगे बढाकर सास्कृतिक और अन्य क्षेत्रों में फैलाने का श्रेय श्री गोलवलकर को है। अपने जीवन में उन्होंने इस बात का प्रयास किया था कि हिदू-समाज में विभिन्न पथों के आचार्य मिलकर एक समरस समाज के लिए सर्व-सम्मत मार्ग तय करें। इसी सिलसिले में उन्होने चारों शकराचार्यों को एक ही मच पर खडा किया था। अग्रेजीसाप्ताहिक 'ब्लिट्ज' देश का शायद ही ऐसा कोई भाग होगा, जहाँ वे कई बार नहीं गए हों, वे कुलपति की उस महान परपरा के थे, जो पूरे कुल को चलाता व उसका रक्षण करता था। उनका व्यक्तिगत जीवन सादगीपूर्ण था। सगठन क्षमता अद्वितीय थी। उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ था ही नहीं और अपने आदर्शों के पालन में उनके हृदय में कोई दुर्बलता नहीं थी। उनकी वाणी में कमजोरी नहीं थी। उनके माथे पर थकान की कोई झलक नहीं थी। भटकनेवालों को उन्होंने पुन बुलाया तथा साथ ही व्यक्तियों को फिर से प्रेरित किया। अच्छा हो, यदि कुछ राजनीतिक नेता उनके समर्पित जीवन के उदाहरण का अनुसरण करें और अनुयायियों का सम्मान और विश्वास अर्जित करें। श्री गुरुजी ने हिदू-धर्मग्रथों व सस्कृत के श्रेष्ठ ग्रथों का व्यापक और बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन किया था। वे बडे विनम्र और मृदुभाषी व्यक्ति थे। उनके द्वारा नामजद व्यक्ति को उनका उत्तराधिकारी मान लिया जाना भले ही अधिनायकत्व का सकेत करे, परतु यह सघ के सुदृढ अनुशासन का व उसके जनसमर्थन का प्रमाण है। आज के समय में थोडे-से अनुशासन से ही देश बहुत कुछ कर सकता है। {१६७} श्रीगुरुजी समय खठ १२ युगधर्म, नागपुर एक अति बुद्धिमान, कुशाग्र प्राध्यापक या वकील रहकर वे अपार धन प्राप्त कर सकते थे, प्रतिष्ठा अर्जित करके अपना नाम चमका सकते थे। पर राष्ट्रसेवा का व्रत और वह भी किसी दाभिकता या दिखावटी रवरूप का नहीं, अपितु अपनी कल्पना का भारत बनाने का स्वप्न सँजोए, उन्होंने उठाया था। जिस एकता के लिए जन-जन से आह्वान किया, उसके लिए स्वय जुझे भी। विश्व हिंदू परिषद् के माध्यम से हिंदू धर्म के विभिन्न सप्रदायों, मतमतातर के बावजूद भी उनके आचार्यों को एक मच पर लाने में उन्होंने जो असाधारण सफलता प्राप्त की, वह कल्पनातीत ही कही जाएगी। हिंदू धर्म की महत्ता को जन-जन तक पहुँचाने में सभी श्री शकराचार्य पीठों के आचार्यों को देश भर में सपर्क हेतु उद्यत कराने का श्रेय भी उन्हीं को है। यह स्मरण ही होगा कि गत वर्षप्रतिपदा के अवसर पर नागपुर पथारे काचीकामकोटि पीठ के आचार्य स्वामी जी स्वय होकर श्री गुरुजी से मिलने हेडगेवार भवन तक गए थे। उनके प्रति आदर भावना का ही यह द्योतक था। एक जागृति का मत्र उन्होंने प्रत्येक के हृदय में फूंक दिया था। श्री गुरुजी के निधन से देश की एक प्रेरक शक्ति लुप्त हो गई है। देश एक बुद्धिमान व्यक्तित्व, कुशल सगठक, असाधारण दूरदर्शी विचारक को खो चुका है। श्री गुरुजी नहीं रहे, पर उनका कार्य अमर है। सघकार्य के रूप में वह उनकी स्मृति सदा कराता रहेगा। उनके वैचारिक पुष्पों की सुगध देशभर में फैलाता रहेगा। दैनिक'आज', वाराणसी जब देश का विभाजन हुआ तथा जब हैदराबाद में रजाकार आदोलन उभरा, तब राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ ने उस समय किसी प्रकार का प्रतिक्रियात्मक भाग नहीं लिया। उस समय द्विराष्ट्र सिद्धात को लेकर जिस प्रकार का साप्रदायिक वातावरण था, उस समय यदि सघ ने आधिकारिक रूप से सक्रियता दिखाई होती, तो कोई आश्चर्य न होता। कितु सघ ने दोनों अवसरों पर स्वय को पृथक रखा। वह इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ पर सकीर्ण साप्रदायिकता का आरोप नहीं लगाया } श्रीगुरुजी समय खड १२ जा सकता। उस समय तथा उसके बाद भी सघ को सक्रिय राजनीति से दूर रखने का श्रेय श्री गोलवलकर के व्यक्तित्व तथा राष्ट्रसेवा सवधी उच्च आदर्श को ही है। साप्ताहिक 'केसरी',कालीकत श्री गुरुजी महायोगी और राष्ट्र के मपि थे। इतिहास के पृष्ठों में उनका स्थान विशिष्ट और जनक की श्रेणी में होगा। उनका जीवन सत्ता-सपादन के लिए नहीं, अपितु शासकों को सत्य की राह पर चलने का मार्गदर्शन करने के लिए था। वे किसी से घृणा नहीं अपितु सभी पर प्रेम करते थे। वे किसी उपासना पथ के विरुद्ध नहीं थे, फिर भी राष्ट्र के प्रति उनके आत्यतिक प्रेम को चूँकि कई लोग समझ नहीं पाते थे, इसलिए गलत धारणाएँ रखते थे। उन्हें कोई प्रलोमित नहीं कर सकता था और न कोई बाथा उन्हें रोक सकती थी। उन्हें यह सतोप प्राप्त हो सका कि ईश्वर ने उन्हें जो कार्य सौंपा था, उसे उन्होंने पूर्ण किया। वे इस विश्वास के साथ हमारे बीच से गए कि बचा हुआ कार्य हम लोग पूर्ण कर लेंगे। उनके निधन से हमें दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। - दैनिक'आर्यावर्ती, पटना गोलवलकर जी में धैर्य, साहस और मानसिक सतुलन अपूर्व था। राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ पर उनके जीवनकाल में कई सकट आए, पर वे कभी अधीर नहीं हुए और न कभी मानसिक सतुलन ही खोया। देश के पड़े से बड़े नेताओं ने उनके विरुद्ध निदा के शब्द कहे, पर उन्होंने अपनी वाणी से कभी किसी की परोक्ष या एकात में भी निदा नहीं की। दैनिक दिनमणि',चेन्नै उन्होंने सघ के प्रमुख के नाते जो सेवा की, वह अद्वितीय है। ईश्वरभक्ति, राष्ट्रभक्ति, त्यांग भावना, अनुशासन का भाव भरने तथा {१६६} श्रीगुरुजीसमय खह १२ दुखियों का दुख दूर करने तथा समाज के जागरूक प्रहरी के नाते कर्तव्य-दक्ष रहने का भाव जागृत करने का जो कार्य उन्होंने किया है, वह अतुलनीय है। महात्मा गाँधी के समान ही उन्होंने युवकों को अनुप्राणित किया था। उनके जैसा नेता पाना कठिन है। दैनिक 'सन्मार्ग', कोलकाता । ओजस्वी वक्ता और तेजस्वी नेता के रूप में वे सदैव स्मरण किए जाएंगे। उनके उपदेश और कार्य प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे। उनकी वाणी अमर है। वस्तुत उनकी मृत्यु से भारत ने एक महान नेता, उपदेष्टा और पथप्रदर्शक खो दिया है। हिदू-धर्म और सस्कृति की रक्षा के लिए उनकी सेवाओं की बहुत बडी आवश्यकता थी। दैनिक 'समाज',कटक वर्तमान परिस्थिति में जो दुर्दशा हुई है, उससे ऊपर उठाकर फिर से उस गौरवपूर्ण स्थान पर स्थापित कराना- यह था उनके जीवन का महान व्रत। इसलिए विभिन्न उत्थान-पतन की परिस्थितियों में अनेकों बार कारावास सहकर भी गत ३३ वर्षों के अपने जीवन का अति उत्कृष्ट समय उन्होंने सरसघचालक के नाते बिताया। इस दीर्घ काल में उनके अनुयायी तथा सहयोगियों में उनका प्रभाव अधिकतम था। छत्रपति शिवाजी महाराज के समान वे एक उच्च कोटि के देशप्रेमी और सगठक थे। अभूतपूर्व सगठन-शक्ति होने के कारण शिवाजी के समान भारत को दृढ, बलिष्ठ एव शक्तिशाली बनाने का स्वप्न उन्होंने हमेशा अपने सामने रखा था और अपने अनुयायियों को एव अन्यों को भी उसी स्वप्न को साकार बनाने के लिए उद्बोधन करते थे। साप्ताहिक 'आलोक',गोहाटी भारतवर्ष ऋषियों का देश । श्री गुरुजी ने अपने देशवासियों के सम्मुख अतर्वाह्य ऋषिरूप का परिचय प्रस्तुत किया। आत्मविस्मृत हिंदू को श्रीपुरुषी समय खह १२ जगाने के लिए उन्होंने जागरण की जो अपडधारा प्रवाहित की, वह भारत में चिरकाल तक प्रवाहित होती रहेगी। ईश्वरप्रेरित श्री गुरुजी ने सासारिक जाल में न फंसकर धन, यश, मान आदि का परित्याग कर भारतीय सभ्यता, सस्कृति का श्रेष्ठ आदर्श अपने जीवन में प्रत्यक्ष उतारा। आज श्री गुरुजी नहीं हैं, कितु हिदू-समाज जब तक जीवित रहेगा, तब तक दलित, पतित, आत्मविस्मृत हिदू के पथप्रदर्शक के रूप में वे सदैव श्रद्धापूर्वक स्मरण किए जाते रहेंगे। दैनिक आध्रप्रभा' 1 अपने ध्येय और आदर्श की प्राप्ति के लिए श्री गोलवलकर जी ने जो प्रयत्न किए, वे विचारणीय हैं। उनका ध्येय-समर्पण अनुकरणीय है। उन्होंने भारतीयों को जिस ढग से संगठित किया है, उससे अन्य राजनैतिक नेताओं को शिक्षा लेनी चाहिए। विशिष्ट ध्येय के प्रति लाखों युवकों को आत्मसमर्पित करा लेना आसान कार्य नहीं है। स्वातत्र्यपूर्वकाल में देश का युवा वर्ग अप्रतिम त्याग के लिए कूद पड़ा था। ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की विचारधारा ने बहुत बड़ी संख्या में युवकों को अपनी ओर आकर्षित किया। श्री गोलवलकर की तरह अन्य लोगों ने भी देश के युवकों और उनके असीमित सामर्थ्य को रचनात्मक कार्यों के लिए संगठित किया होता तो देश का चिन आज कुछ और ही होता । दैनिक 'प्रजावाणी', बगलौर उनके द्वारा प्रतिपादित हिंदू-राष्ट्र' जातिवाचक न था, देशवाचक था। उनकी धारणा थी कि भारत को अपनी मातृभूमि मानकर, उसकी संस्कृति, परम्पराओं के प्रति श्रद्धा, गौरव रखनेवाले सभी भारतीय हिंदू हैं। भाषावार प्रातरचना का प्रारभ से ही विरोध करनेवाले वे यह घोषित करते रहे कि भाषा, राज्य, प्रदेश, सप्रदाय आदि के नाम पर चलनेवाले सभी आदोलन अतत राष्ट्र की एकता को दुर्बल बनाते हैं। {१७१) श्रीगुरुली समय खड १२ 'मसुराश्रम पत्रिका' मासिक, मुबई उनकी प्रखर राष्ट्रभक्ति और मातृभक्ति के लिए उनके नि स्वार्थ समर्पण से भयभीत ईर्ष्यालु लोगों ने उनके विषय में निरतर भ्रम निर्माण किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि 'हमें पराक्रमवाद का पुनर्जागरण करना ही चाहिए। इसके लिए हमें यह स्पष्ट रूप से कहना होगा कि यहाँ रहनेवाले गैरहिदुओं का एक राष्ट्रधर्म है, एक समाजधर्म है, एक कुलधर्म है तथा इसके बाद उनका व्यक्तिधर्म आता है। अपनी पारलौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे चाहे जो मार्ग अपना सकते हैं। व्यक्तिगत जीवन के एक अश के लिए चयन की उन्हें छूट है, कितु शेष सभी बातों में राष्ट्रीय जीवनप्रवाह से उन्हें समरस होना ही चाहिए। - दैनिक 'केसरी',पुणे परमेश्वर द्वारा बनाए गए आत्मा के स्वरूप 'नैन छिन्दन्ति शस्त्राणि नैन दहति पावक' को उन्होंने राष्ट्र की आत्मा के साथ एकाकार रूप में देखा तथा अत में उसी सनातन राष्ट्र के चरणों में अपना देह-पुष्प समर्पित कर दिया। गगा अत में जाकर जिस प्रकार सागर में मिलती है, ठीक उसी तरह उनकी विशुद्ध कार्य-गगा जनसागर में समा गई और उससे एकाकार हो गई। उनके इस अलौकिक कार्य को उनके देशबधु लाख-लाख प्रणाम करेंगे, इसमें सदेह नहीं। है दैनिक 'जनसत्ता',अहमदाबाद प मालवीय तथा स्वामी विवेकानद ने भारतीयत्व के विषय में जिस प्रकार के उपदेश दिए थे, उसी धरोहर की श्रृंखला को चालू रखनेवाले तथा स्वदेशी और भारतीयत्व के सबंध में देश के वर्तमान नेताओं में वे ही अकेले एक ज्योतिर्धर थे। . श्रीधुरुजीसमन्य खठ १२ 'राष्ट्रदूत', जयपुर गुरुजी बडी कुशलता से सगठन को शक्तिशाली बनाने में लगे रहे। देशभर के इस कोने से उस कोने तक उनके तूफानी दौरे होते थे। उनके भाषणों का प्रभाव गहरा पडता था। उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जादू था कि उनके सपर्क में आनेवाला व्यक्ति प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता था। उनकी भाषण देने की शैली अनुपम थी। थाराप्रवाह हिदी में वह भाषण करते तो लोग मत्र-मुग्ध होकर सुनते थे। 'नवज्योति', जयपुर आधुनिक भारत में ऋपि-मुनियों की जो एक शृखला चली आ रही है, गुरु गोलवलकर के निधन से उसकी एक कडी टूट गई। जिस शालीनता व विनम्रता से वे अपनी आलोचना का उत्तर देते थे, उससे सामनेवाले पर उनकी प्रतिभा की छाप पडे विना नहीं रहती थी। गुरुजी प्रभावी व्यक्तित्व के कर्मयोगी ऋषि थे। अपने विचारों के प्रति अटूट निष्ठा के कारण राष्ट्रीय जीवन में उनका सम्मानपूर्ण स्थान था। वे धर्मनिष्ठा तथा सगठन-प्रतिभा के धनी थे और देश के लाखों युवकों के प्रेरणास्रोत थे। वे अपने ढग से राष्ट्र की सेवा में आजीवन रत रहे। दैनिक 'नवभारत',रायपुर देश के समक्ष जब-जब विभिन्न प्रकार के सकट आए, तब-तब गुरुजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ने अपने ध्येय के अनुसार जनता में जाकर उनकी सेवा की, उसमें आत्मरक्षा की भावना का निर्माण किया। अपनी आस्था के आधार पर उन्होंने हिदुओं को उनकी अस्मिता से परिचित कराया। उनका निधन निस्सदेह राष्ट्र की क्षति है निस्सदेह गुरुजी का जीवन एक सत का जीवन था और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि औरगजेब के शासनकाल में सत श्रीपुरुषी समय खड १२ {१७३} तुलसीदास की रामायण ने इस देश की बहुसख्यक जनता में जिन प्राणों का सचार किया, वैसा ही कुछ कार्य गुरुजी के तपस्वी जीवन ने अग्रेजों के शासनकाल में किया। दैनिक 'स्वदेश', इंदौर वे तो मुक्त आत्मा थे, वे तो मृत्युजय थे, पर जब उन्होंने देखा कि इस पार्थिव शरीर से राष्ट्रसेवा समय नहीं है, तो उन्होंने उसे त्याग दिया। पर राष्ट्र-वैभव को पुनरपि प्राप्त करने हेतु अहर्निश छटपटानेवाला वह आत्मा और प्रखरता के साथ हमारे अत करणों को राष्ट्र-सेवा हेतु प्रेरित करेगा। उनके प्रति हमारी श्रद्धा एक ही कसौटी पर कसी जाएगी कि उनके अभाव में उनके द्वारा दिखाई गई दिशा की ओर कितनी प्रमाणिकता, तत्परता एव तेजी के साथ हम चढते हैं। साप्ताहिक 'हिदू', जालधर १६४० में पूजनीय डाक्टर जी का स्वर्गवास हुआ तब से अब तक प्रतिवर्ष वे सपूर्ण देश का एक बार अवश्य प्रवास करते रहे। उनका हाथ निरतर हिंदू समाज की नाडी पर ही रहा। क्या-क्या न्यूनताएँ हैं, उन्हें किस प्रकार दूर किया जाए, दीर्घकालीन परतत्रता के कारण समाज में उत्पन्न बुराइयाँ कैसे दूर हों, मातृभूमि की प्रखर भक्ति के सस्कार किस तरह किए जाएँ, यही उनकी चिता का विषय था। ईश्वर की कृपा से अपने लक्ष्य की सिद्धि में उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली। उनके नेतृत्व में सघकार्य दिन दूना रात चौगुना बढता चला गया। साप्ताहिक आर्गनायजर', दिल्ली श्री गुरुजी अब नहीं रहे। जिन लाखों लोगों को मातृभूमि की सेवा करने की प्रेरणा उनसे मिली, वे अपने जीवन में उनकी मृत्यु के पश्चात् खोया-खोया सा अनुभव करेंगे। जहाँ दूसरे लोग सतही दृष्टि से विषय समझने का यत्न करते हैं {१७४} श्रीशुरुषी समय खड १२ वहाँ श्री गुरुजी की दृष्टि मर्मग्राही थी। वे मत्रद्रष्टा ऋषि थे। वे न केवल सर्वसाधारण से अधिक तथा अच्छे ढग से देखा करते थे, अपितु जो कुछ प्रत्यक्ष देखते, उसे उसी रूप में प्रकट भी करते थे। उदात्त व्यक्तित्व, विशुद्ध जीवन तथा श्रेष्ठ गुणों के कारण वे साधारण मनुष्यों में नहीं, ऋषियों की श्रेणी में थे। जब श्री गुरुजी हिंदू-सगठन, हिदू-राष्ट्र तथा हिदू-सस्कृति की बात करते, तव कुछ राजनीतिज्ञ उसे साप्रदायिक समझने की भूल करते। वास्तव में वे उतने ही साप्रदायिक थे, जितना विवेकानद या अरविद को कहा जा सकता है। वे अनुभूति के उच्च स्तर से ही बोला करते थे। श्री गुरुजी हिदुओं के लिए अधिक अधिकार और अन्यों के लिए कम की दृष्टि से सोचते ही नहीं थे। वे तो हिदुत्व का जागरण तथा हिदुस्थान की एकात्मता तथा दोनों के आनेवाले कल के विश्व एव भावी सस्कृति के लिए योगदान की ही चिता करते थे। उन्हें राजनीति में नहीं, राष्ट्रभक्ति में रुचि थी। सत्ता की लालसा उनमें थी ही नहीं। चारित्र्य-निर्माण के कार्य में ही वे सलग्न रहे। उनके जीवन में ज्ञान-विज्ञान का सुदर सगम हुआ था। वैदिक वाङ्मय में उनकी उतनी ही पैठ थी, जितनी कि अणु-विज्ञान में थी। वे वास्तव में पूर्ण पुरुष थे। उनके साथ बिताए हुए क्षण शिक्षाप्रद होते थे। उनके साथ कार्य करना एक आध्यात्मिक अनुभूति थी। आज श्री गुरुजी नहीं रहे, परतु जो ज्योति अगणित हृदयों में वे प्रज्ज्वलित कर गए, वह जब भी कभी देश के क्षितिज पर अधकार का साया पडेगा, सतत प्रकाश देती रहेगी। आज हम उनके स्वर्गवास पर दुख मना रहे हैं, पर भावी पीढियाँ इस बात पर हर्ष प्रकट करेंगी कि इस भूमि पर उनके रूप में देवदूत ने विचरण किया था। उनकी पविन स्मृति में हमारी विनीत श्रद्धाजलि। साप्ताहिक 'पाचजन्य', दिल्ली परमपूजनीय श्री गुरुजी देवदूत की नाईं भारतीय क्षितिज पर उस समय अवतरित हुए, जब स्वार्थ और मोहवश परानुकरण की प्रवृत्ति से हिंदू-धर्म सस्कृति तथा समाज का हास हो रहा था। उन्होंने निर्भयता से श्रीगुरुजी समय ख {१७५} १२ हिदू-राष्ट्र के सत्य को गुंजाया। राष्ट्रीयता की शुद्ध व्याख्या के अतर्गत भारत के राष्ट्रीय जन को अपनी अस्मिता के साथ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। हिदू शब्द, जो विदेशी कूटनीति के कारण साप्रदायिक और जातीय माना जाने लगा था, उन्होंने उसे पुन सच्चे राष्ट्रीय अर्थ में प्रतिष्ठापित किया। 'गोधन' मासिक, दिल्ली उनकी यह महती आकाक्षा थी कि भारत के सभी नागरिक भारत को अपना राष्ट्र समझें, उसकी सस्कृति को अपनी सस्कृति माने और देश के मानविदुओं की रक्षा करने में सकोच न करें। गोरक्षा आदोलन के तो गुरुजी सूत्रधार ही थे। वह एक क्षण भी भारत के मस्तक पर गोहत्या का कलक लगा नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने गोभक्तों को सदा यही प्रेरणा दी कि वे गोहत्या के कलक को मिटाने के लिए बडे से वडा उत्सर्ग करने में पीछे न रहें। दैनिक 'पायनियर',लखनऊ लाखों लोगों के लिए राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ के श्री माधव सदाशिव गोलवलकर गुरु, मार्गदर्शक और दार्शनिक थे। वे अब नहीं रहे। इतिहास ही उनकी योग्यता का सही मूल्याकन कर सकेगा। परतु पूरी सच्चाई के साथ इस बात का अकन तो अवश्य ही किया जा सकता है कि श्री गुरुजी का समर्पित जीवन था और उन्होंने अपने चितन के अनुसार राष्ट्र की सेवा भक्तिपूर्वक और यहाँ तक कि एकातिक निष्ठा के साथ की। उन्होंने जिसे सत्य माना उसके साथ कभी समझौता नहीं किया। उनके लिए भारत एक अखड और अविभाज्य था। उनके कार्यो की चाहे जो सीमाएँ रही हों और उनके निदकों के अनुसार तो वे कई थीं, फिर भी श्री गोलवलकर दृढ देशभक्त थे। वे परपरावादी और यहाँ तक कि पुनरुत्थानवादी भी गिने जाते रहे, परतु उन्हें सकुचित अथवा जातिवादी कहना उनके साथ अन्याय करना है। यह उनका ही सिद्धात था कि आक्रमणों का सामना करने में समर्थ और शक्तिशाली राष्ट्र तब ही बन सकता है, जब राष्ट्र को एकसूत्रता में गूंथा जाए। {१७६} श्रीगुरुजीसमन्त्र खत १२ मासिक 'प्रबुद्ध भारत', मायावती आश्रम बहुविख्यात भारतीय नेता, राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर जी की मृत्यु ५ जून १६७३ को नागपुर में हुई। अपने जीवनकाल में वे वहुत विवादास्पद व्यक्तित्व थे। एक ओर उनके अनुयायी उन्हें बहुत सम्मान और प्रेम करते थे, तो दूसरी ओर उनकी निदा करनेवाले उनके प्रति घोर घृणा प्रकट करते थे। परतु उनकी मृत्यु के बाद हम क्या पाते हैं? सभवत उन्हें भी आश्चर्य हुआ होगा कि देहत्याग के बाद उनके प्रति विवाद समाप्त होकर राख में मिल गया और उनका निर्मल चरित्र उस राख से निकल कर दमक उठा। अव उनकी स्मृति में जो श्रद्धाजलि-पुष्पहार अर्पित किए जा रहे हैं, उसमें अनेक अप्रत्याशित स्थानों के पुष्प भी हैं। इस श्रद्धाजलि-पुष्पहार में बिना धागे के गुफित ये पुष्प विभिन्न कोनों से सहसा खिलकर आ मिले हैं। इसलिए इसमें सुवास भी है और विविधता भी। गोलवलकर जी का जीवन एक खुला हुआ ग्रथ है, जिसे सब पढ सकते हैं। हो सकता है आप कई मुद्दों पर उनसे सहमत न हुए हों, परतु आज इसका कोई महत्त्व नहीं रहा। महत्त्व इस बात का है कि आज आप उनमें एक ऐसे व्यक्ति और चरित्र का दर्शन कर रहे हैं, जो निष्कलक, नि स्वार्थ, निर्भय है। वे अपने लिए नहीं, पूर्णत सबके लिए जिए। भला ऐसी बात इस विश्व में कितने व्यक्तियों के लिए कही जा सकती है। इससे भी अधिक श्री गोलवलकर जी ने जो सबसे बडी सेवा भारत और उसके लोगों को की, वह है उनके द्वारा वाणी और व्यवहार में उन का सरक्षण, जिनकी राष्ट्र के अस्तित्व और उसके सुव्यवस्थित विकास के लिए आवश्यकता है। जवकि जाने माने राजनीतिक नेतागण, नदी-योजनाओं, औद्योगीकरण, परिवार नियोजन, जीवन-स्तर आदि की यातें कर रहे थे, तब वे अनुशासन, शक्ति, निर्भयता, चरित्र, नि स्वार्थ सेवा, गतिशील देशभक्ति की शिक्षा दे रहे थे, जिसके बिना आधुनिक भारत को उज्ज्वल भविष्य कदापि प्रदान नहीं कर सकते। इससे भी अधिक बात यह है कि आज 'वाटरगेट' जैसे भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता से व्याप्त । वायुमडल में वे अखिल भारतवर्ष में चरित्रयुक्त अनुशासित व्यक्तियों का विशेष मूल्यों निर्माण कर गए हैं। श्रीगुरुजी समय खड १२ {१७७) 1 मासिक कल्याण ऋपिकल्प परमपूज्य श्री गुरुजी जो हमारे ही नहीं, सपूर्ण रतवर्ष के परम सेवक, हितचितक, आत्मीय, मार्गदर्शक और स्वजन हम लोगों को छोडकर भगवान के चरणों का सान्निध्य प्राप्त कर या, इससे हमारे मन और प्राण दोनों व्यथित है। वे मुक्त पुरुष थे। इर्निश सेवा-कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी अपनी आध्यात्मिकता को होंने अक्षुण्ण बनाए रखा और इस प्रकार जगत् के कर्म-सकुल जीवन रहकर 'पद्मपनमियाभसा' का आदर्श उपस्थित किया। ऐसे महामनीपी, विचारक और मानवता को सच्चा मार्ग दिखानेवाले महापुरुष यदा-कदा वान की विशेष प्रेरणा से ही जन्म ग्रहण करते हैं। उनके जीवन का दर्श चिरकाल तक मानवता को प्रकाश देता रहेगा। 'सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुखभाग्भवेत्।' की महनीय भावना से प्रभावित होकर भारतवर्ष के उज्ज्वल वेष्य निर्माण की साथ लेकर परमपूजनीय श्री गोलवलकर जी ने दावधि तरुणों को भापा तथा प्रादेशिक भावना की सकीर्ण परिधियों ऊपर रखकर चरित्रवान अनुशासनवद्ध तथा सगठित बनाने की दिशा आजीवन जो अखड साधनामय तप पूत जीवनादर्श प्रस्तुत किया है, नने श्री गुरुजी को सहज ही हिदू युवक-वर्ग का हृदय-सम्राट बना उनकी मगलमयी भावना से अनुप्राणित होकर हिदू-जीवन के भी क्षेत्रों में उनके भगीरथ प्रयास से जिस नवजीवन का सचार हुआ उसी पर विश्व की आँखें टिकी हुई हैं। देश की यह प्रबुद्ध तरुण ढी श्री गुरुजी के आध्यात्मिक आदर्श को दृढता से अपनाकर उनके प्नों को साकार करने के लिए निकल पडे, यही उनके प्रति हमारी च्ची श्रद्धाजलि होगी। 'कल्याण' तथा 'गीता प्रेस' अपने इन परम जन एव आत्मीय के तिरोधान की शोक-वेला में सघ के साथ हैं। ७८} श्रीशुरुजीसमय खड १२ शब्दसकेत खड १२ अबादेवी ८१ अणुव्रत आदोलन १५५ अखडानद स्वामी १२,१३ २१, १४११५१,१५२ अगरतला ३५ अटक ११५ अडवानी लालकृष्ण १५६ अनुशीलन समिति १२ अन्नादुराई ६३ अफगानिस्तान अफ्रीका अबीद अली जाफरभाई १४६ अब्दुल गफूर १५२ अ भा प्रतिनिधि सभा २४७७१३७ अभेदानद स्वामी १६ अमरीका ६५६८११३ अमूर्तानद स्वामी १२,१०८,१२७ अमृतसर ११६ अरविद १५०१७५ अरुणाचलम् तमिलनाडु १२७ अलखनदा ११० ६१ ७ आत्मप्रकाशानद स्वामी १२ आदिलाबाद ३ आप्टे उद्धवराव ६१ आप्टे दादासाहब ४१,४६१५६ आप्टे बाबासाहब आरती आलोक की ७३ आर्गनायजर साप्ताहिक १७४ आर्य १५८ आर्यसमाज १५८ आर्यावर्त दैनिक १६६ आलोक साप्ताहिक १७० आसने व आरोग्य ३८ इग्लैंड ५६११३ इडियन एक्सप्रेस १६३ इदापवार डा इदौर २४५८,६५१२७ इलेस्ट्रेटेड वीकली ईसाई १५८ उत्तरप्रदेश E उत्तराखड २० उपनिषद् १३४ उपाध्याय काशीनाथ १६० उषा भार्गव काड ६१ ऋपिकेश १०८ ओक वसतराव ६३६८११८ औरगजेब १७३ कटक ११५ कठोपनिषद् १५ कीसिह डा १४० कन्नड १४८ कन्याकुमारी ३२१४५ {१७६} ६७ १५५ १८ २४४४,८२ ५८ अली शमशाद अलेक्जेंडर पोप अवैद्यनाथ जी महत अष्टमहाविद्या अहमदाबाद आध्रप्रदेश आम्रप्रभा दैनिक आचार्य तुलसी आज दैनिक आणद गुजरात आत्मदेव श्रीगुरुजीसमय खड १२ १७१ १६८ ६ ७२ ७६ गवई रा सु करपाना महाराज १५४ खन्ना आर पी ४१ कराई डा २४ पुशवतसिंह ३६ कराची ११६१२० गगा ६४,११५ १७२ करिअप्पा जी ८० गगोत्री २०७५ कल्याण मासिक १७८ गया कल्याण मुंबई १३३ ११८ कश्मीर २० गाँधी इदिरा ८६४० १२४ १३६ १५६ काग्रेस ४०१०३१०४११६१४० गाँधी महात्मा ३६४०८१६८१२३ काँची कामकोटिपीट १३६१६८ १२५१२६ १३४१३५,१५०१६१ काटजू कैलाशनाथ ७४ गाँधीवाद कारखानीस त्र्य सी १४३ गाणगापुर १३५ कारवार जिला २२ गायनी ११५ कालिकत गार्डिनर प्रिंसिपल १३१ कालीकर भाऊसाहव ६० गिमी जाल पी काशी २७५८१०११०२१३३ गिरि वीवी ४०१५६ कासद डी पी आर ६१ गीता ३१३२७६ कुदनलाल ११६ गीता प्रेस १७८ कुँवर बसत नारायणसिह १५२ गुप्त हसराज ४३१०८ कुरान ४२४४,१३१ गुरुग्रथ साहव कुरियन वर्गीज ६ गुरुजी जीवन प्रसग ७७ कुरेशी हाफीजुद्दीन १५८ गुरुदत्त १६० कृष्णबोधाश्रम स्वामी १५४ गुलाबराव महाराज ८० कृष्णराव २४ गोकर्ण जी ७२ केतकर ग वि २६ गोधन मासिक १७८ केदारनाथ २०१०८१०६ गोपालराव २६ करल गोरक्षा आदोलन ६११६ लकर मावशी १४४ १५६ गोलवलकर भाऊजी ६०७१६५ सरी २६१६६१७२ गोलवलकर वासुदेवराव २१ লাহা २०७३ गोवा ८१२० ोलकाता १२१७१८२० गौरीशकर ७५ २४४१४२१०५ ग्वालियर ૬૦ मल्हापुर ६०६२ घटाटे बाबासाहव २८३८७८१२६ aco श्रीगुरुजी समय खड १२ गोरे मृणाल शवचद्र सूर चद्रपुर जुबली हायस्कुल १४१ १६४ चव्हाणआनदराव १४६ २३ १५७ ५ टाइम्स आफ इडिया टाटा रुग्णालय टालाटुले नानासाहब टिक्का खाँ ट्रिब्यून टेमलाई ३४ १६३ ६१ ठाकरे कुशाभाऊ ठाकरे बाल २६ १५८ चव्हाण यशवतराव चातुवर्ण्य ११८ चापके नारायण ६२ चीन ६४ चेन्नै २०,७४१२७१४१ चौथाईवाले बाबूराव २५ जगजीवन राम १५७ जनसघ ५६१००,१३६ १६५ जनसत्ता दैनिक १७२ जनार्दन स्वामी २३३८ जनाधिकार समिति ९८ जबलपुर ६१७६ जयप्रकाश नारायण ४० जयपुर २३ जयसिह १०५ जयेंद्र सरस्वती १३६१५४ जशपुर १५६ जालघर ५५११८ जाह्नवी १२६ जिलानी सैफुद्दीन ४१६१ जीजाबाई १०० जैन ८३ ठाकुर कर्पुरी १५३ डीएवी कॉलेज ५८ डोंडवल्लापुर ५६ ढिल्लों गुरुदयालसिह १३६ ढेबरभाई १३५ तनमार्गी तनय आशुतोष १० तमिलनाडु ६ तरुण भारत २७३६४६ ६२८४ ६२६८१३६ ताई (श्री गुरुजी की माँ) २०२१७१ ताजुद्दीनवाया १३१ तिवारी मिश्रीलाल १५६ तुकडोजी महाराज ३६ तुकाराम ६७११७ तुरीयानद १२८ तुलसीदास सत १७४ तेलग नाना २८ तेलगाना ५८ त्यागी ओमप्रकाश १५७ थत्ते आवजी २२५५६०१०८१२६ थिओसॉफिकल लॉज १३३ दत्त उपेंद्रनाथ १६ दत्ता बाल दधीचि ७५ {१८१ ११६ ४३१६० जैन अक्षयकुमार जैनेंद्र कुमार जोधपुर जोशी अप्पाजी जोशी एस एम जोशी जगन्नाथराव जोशी मनोहर जोशी यादवराव 도 १५७ ६०१३६ १४६ १०१ १३१ ७२ झूसी श्रीगुरुजी समय खड १२ नाईक वसतराव १४११५२ नागपुर १२,१७,२२-२४,३७, ५०६१७१-७३७७,७६८० ६६,६८,६१०३ १०५१०८ १२११२२१३११३३१३५१३६ नागपुर टाइम्स १६१ नामजोशी डा २२ नामधारी ८३ नासिक २८१०६ ६१ ५७ दयानद कॉलेज छात्रावास दयानद सरस्वती १६५ दक्षिणामूर्ति मदिर १३५ दाणी भैयाजी ६८ दामोदर नदी १२ दिनमणि दैनिक १६६ दिनमान १६६ दिल्ली ८२६,५६,६३,८१,१०० दीनदयाल उपाध्याय ५०,५७ ५६,६० दीवान आनदकुमार दीक्षित बाळासाहब दुर्गा ७४ देव पी के १४० देवरस डाक्टर २१ देवरस बालासाहब २८४०८४,६८ देवलाली २५७८ देशपाडे विघ १४७ देशमुख नानाजी ५७ देसाई प्रफुल्ल बी ६६ देहरादून ५६६८ दैवी जीव सस्थान १०८ द्रविड मुनेन कडघम १३६ द्वारकाधीश ११५ धर्मयुग साप्ताहिक ५२१५० धर्मवीर घोंगडी रघुवीर १३ नद बाबा ११२ नदा गुलजारीलाल नर्मदा ७५८८ नवज्योति जयपुर १७६ नवभारत टाईम्स ११६१६६ नवभारत दैनिक १७३ {१८२ नास्सर ४४ निरजन देव तीर्थ १५४ निरजननाथ आचार्य १५१ नीतिशतक ७३ नेहरू जवाहरलाल ७१८११२६ पचवटीकर स ना ३८ पजाब ६३८१ पजाबी भाषा पटना ७६ पटवर्धन शिवाजीराव पटेल सरदार २८३०६३ ८१६८१२५ पन्हाला ६० परमार्थ दादाराव ७६,१०११७५ पराजपे रामदास ७१२६ परीक्षित ७२ पाचजन्य ४३६ ४६५७,६०६५७० पाकिस्तान ३४३५६३११३ पाटील अतु १४४ पाटील उत्तमराव १४५ पाटील वसतदादा १४५ पाटील सका १२६ पाटक गोपालस्वरूप १३८ पायनियर दैनिक लखनऊ १७६ पारडी (गुजरात) श्रीपुरूषीसमन खठ १२ १५१ १३४ १२,१८,२० ६१ ५३,८७ ११० बिहार विधानसभा बुद्ध बेलुड मट वैराम बौद्ध ब्रह्मकपाली ब्लिट्ज अग्रेजी साप्ताहिक भडारी सुन्दरसिह भगवा झेंडा (चित्रपट) भर्तृहरि भट्टाचार्य प्रियव्रत भाई परमानद जी १६७ ६० २८ ७३ . पारसी पिंगले मोरोपत ६०,६५ पिलखुवा ११६ पुणे २१२२२५२६,६१ पुराण १३४ पेंढारकर भालजी ८६ पोर्तुगाल १२० प्रजावाणी दैनिक १७१ प्रधान ग प्र १४५ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ७०१०८-११२ ११५ प्रबुद्ध भारत मासिक ৩৬৩ प्रयाग ३६७४,११५ प्रियदा महाराज १२ फगवाड़ा ११८११६ २२ फर्ग्युसन कॉलेज १४१ फ्रास ११३ वगलौर २० बगाल ८३५ वच ऑफ थॉटस् ३७५६ बजाज जमनालाल १०४ बद्रिकाश्रम १८,२०७२,१०८-११२ बनारस-वाराणसी १३६१४११६५ बबुआजी ७६ बरकतुल्ला खाँ १४६ बर्मा भागवतग्रथ ७२१११ फडके डा भारत ३१४०४७५६ १२०१२४१५४,१६१ भारत भक्ति स्तोत्र १३४ भारत सरकार ३४६० ८ भारत साधू समाज भारतीय सविधान भावे विनोबा भास्करेश्वरानद भिडे बाबाराव १२४१३२१५५ १३ २६ भूदान यज्ञ १३२ १३३ ६२ भोंसला महाविद्यालय नागपुर मगलप्रसाद मगलमूर्ति जस्टिस मकराणा मदरलैंड ११४ १७ ६१ ११५ १६४ मधु मेहता १५८ ११८१२७ १३१ बरहमपुर बाकेविहारी बाँग्लादेश बाइवल बापट डा बालाघाट बिहार श्रीशुरुजीसमन खड १२ ७३ ६१ मराठा वृत्तपत्र मलयाचल मसुराश्रम पनिका महाजन मेहरचद १७१ २१ ११६ ८१ {१८३) महाभारत २६ ३८ ६० ७२,१०८ १६८ १४५ महाराष्ट्र महाराष्ट्र विधान परिषद् महाराष्ट्र विधानसभा मार्क्सवादी १४१ २६ ४० योगाभ्यासी मंडल रज्जूभैया रजाकार आदोलन रतलाम रत्नागिरि रमण महर्षि रहीम कामरेड तकी राका पूनमचन्द्र राँची ६० माथवानद महाराज २० १२७,१२८ १५८ ४४ २४ रानडे एकनाथ माध्व सप्रदाय मानसरोवर २० माना ग्राम ११० मालवीय मदनमोहन ७५१०२, १५२१७२ मावलकर पुरुषोत्तम गणेश १४१ मिश्र द्वारिका प्रासाद ६८ मिश्र श्यामनदन १४० मित्र अशोक ८ मुजे डा ६४८० मुबई २२-२४६६ ६६८६१०५१४५ मुखोपाध्याय रमाप्रसाद १० मुखोपाध्याय श्यामाप्रसाद ९ मुठाळ विष्णुपत २५ मुलतान ११६ मुले माधवराव ६२ मुसलमान-मुस्लिम-इस्लाम ४१-४३ १३१ मैसूर २० मोहरील कृष्णराव २७२८ मोहिते य जि १४६ म्हालगी रा का १४३ यमुनोत्री २० यशोदा ११२ याज्ञवल्क्य स्मृति मिताक्षरा १३४ युगधर्म २७२८५४७६८० ८६१०८११७१६९ {१८४} ६८ रामकृष्ण परमहस १३४१५० रामकृष्ण मिशन १२२०१२८ १३६१४११५० राजगीर ७६ राजस्थान ६२ राजस्थान विधानसभा १४ राजाभैया पूँछवाले ६० राज्यसभा १३६ रामटेक रामतीर्थ स्वामी ११३१२४ रामदासी सप्रदाय रामनगर नागपुर १३६ रामलाल जस्टिस ११६ रामशरणदास ११३ रामसिह प्रो १५७ रामानुज सप्रदाय ८३ राष्ट्रदूत दैनिक १७३ राष्ट्र सेविका समिति १५६ राष्ट्रीय गोरक्षा समिति ६ रुद्रप्रयाग १० रेशमबाग ३८७७१२१ रोटरी क्लब १३२ लक्ष्मणसिह जी १४. श्रीगुरुजी समय खड १२ २४६५ शुकदेव जी लक्ष्मीबाई (श्री गुरुजी की माताजी) ६५ लाहौर ५४११६ लिगायत ८३ लोकसभा १३८ लोढ़ा गुमानमत १५० अनयासी कल्याण आश्रम १५६ धर्णाश्रम ११८ वर्णेकर श्रीपर भास्कर १२६१३१ यल्लम संप्रदाय ८३ वसुधारा ११० वाजपेयी अटलबिहारी ३१५६ वारकरी सप्रदाय वानखेड़े वैरिस्टर १४४ विद्यार्थी परिषद् १३१ विवेक साप्ताहिक ३२ विवेकानद २०२१२८११३१२४ १३४१४३१५०१५११५६ १५६१५६,१६५,१७२ १७५ विवेकानद शिला स्मारक ३२ विवेकानंद सोसायटी १३ विश्व हिंदू परिषद् ३६७४८३ १०८११५,१६८ विश्वविक्रम वीर अर्जुन १६५ वेदालकार क्षितीश ३२ वैदिक ८३१३४१७५ व्यास बच्छराज शंकराचार्य १६५१६८ शकराचार्य गोवर्धनपीठ ६३६ शकराचार्य द्वारिकापीट ११५११६ शर्मा शंकरदयाल जी १५७ शर्मा मौलिचंद्र २६३१६८ शाकर ८३ श्रीपुरुजी समय खड १२ शाडिल्य तनसिह १५६ शास्त्री टी आर वेंकटराम ३१७४ शास्त्री प्रकाशवीर ६३ शास्त्री रघुवीरसिह शास्त्री राजेश्वर १३३ शास्त्री प रामनारायण शास्त्री लालबहादुर शास्त्री विष्णुकांत १६० शास्त्री शिवकुमार ६५ शिकागो व्याख्यान २० शिवाजी ६०१००१०५१५६ १७० शिवानदजी महाराज १२ ७२ शेषाद्रि हो वे १२१ श्रीकृष्ण १६११२,११५ श्रीखडे डा २२ श्रीप्रकाश सकीर्तन भवन संतोषसिह १५८ सपूर्णानन्द जी ५८५६ ससद संयुक्त पजाव संयुक्त महाराष्ट्र सस्कृत १६७ सत्याग्रह २६,३०८६६० सद्गोपाल २७१०२ १०३ सन्मार्ग दैनिक १७० समर्थ रामदास १४६,१५६ समर गुहा १४० समाज दैनिक १७० सरकार अमलकुमार सरकार्यवाह ७८८११०५ सरसघचालक ७०७६८४८५ {१८५] ७२ ८ १४८ १५ ६३१४३,१५०,१७० सरस्वती देवी ७४ सरस्वती सिनेटोन २८ सर्वानदजी स्वामी सागली ६१,१३५ सातवलेकर जी १३३ साम्यवाद-कम्युनिस्ट ४०,६३६५ सारगाछी आश्रम १२,१४,१४२ सावरकर विदा ६४७६,१३५ सावळाराम १३,८८ सिगापुर २० सिदी ५,८५१३२ सिधिया विजियाराजे १५७ सिख ८३१५८ सिरसी २२ सिवनी २६३०८,६६१३१ सीतापुर सुदर्शन जी १२७ सुमेरु पर्वत ७३ सुशील कुमार जी (जैन मुनि) सेजियन ईरा १३६ सोशलिस्ट पार्टी १४० स्मृति मदिर २१६११६१ स्वतन्त्र पार्टी १४० स्यदेश दैनिक १७४ एकीमभाई ६१ हरिद्वार १०८ हरियाणा ६ हडकर त्र्यंबक भिकाजी हरदास पायराव हरदास बालभारती १२० हिंदुस्थान टाइमर १६४ (१८६ हिंदुस्थान दैनिक ३२ १६५ हिदुस्थान समाचार ३५ हिंदू महासभा ७७ हिंदू विश्वविद्यालय २७७४७५७७, १३६,१४११५०१५१ हिदू साप्ताहिक जालघर १७४ हिटलर ४४ हिमालय १८२१११२११५ हिस्लॉप कॉलेज १३११४१ हेडगेवार ५,६ १२ १८२०,२१२६ ३२ ४३ ४७५०,५४,५६,६०, ७२७४,७६७८८१,८२९४, ८७६४१०१-०७,११२१२१ १२२ १२५,१३५१४२ १४७१५१ १५६१६४१७४ हेडगेवार भवन ४४४ १३१,१३६,१६८ हेनरी मिलर ११ हैदराबाद १३६१६८ १२० होची-मिन्ह ३७ त्रिपुरा ३५ त्रैलोक्यनाथ महाराज १२ ६० मानेश्वर ४७४६ हैदराबाद (सिथ) क्षीरसागर पाडुरगपत 1 ~~ म २६ य 5 श्रीपुरुषी समय ख १२ -
No text on this page.
No text on this page.