Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Jiyo To Aise Jiyo

Dharma Sharma · 2011/03

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जियोतो
ऐसे जियो
लेखक
धर्मपाल शर्मा
आशा प्रकाशन गृह
नई दिल्ली-110005
करोल बाग,

प्रकाशक
आशा प्रकाशन गह
30, नाईवाला, करोल बाग,
नई दिल्ली 110005
दूरभाष 5721221
प्रथम सस्करण 1989
द्वितीय सस्करण 1990
प्रकाशकाधीन सुरक्षित
मूल्य पदह रुपये
न्यु मान प्राफ्ट प्रिंटर्स,
४६५ डी.जी. ए. कोम्प्लेक्स, दयावस्ती दिल्ली

दो शब्द देश की उन्नति तथा विकास के लिए यह परम आवश्यक है कि वहाँ के निवासी शिक्षित हो। हमारा देश 'भारत' वर्षों तक परतत्र रहा है। विदेशी शासनकाल में इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया कि यहां के सभी लोग शिक्षित हो। पर आज भारत स्वतत्र है, अपनी सरकार है । अब इस आवश्यक बात को भली प्रकार समझा गया है कि देश के उत्थान के लिए जन मानस को शिक्षित किया जाये। हमारी सरकार नयी से नयी योजनाए बना रही है। नयी शिक्षा नीति का निर्माण किया गया है जिसमे बालको, प्रौढो एव शिक्षा के सभी स्तरो पर सुधार के लिए विशेष ध्यान दिया गया है। आज हमारी सरकार का दृढ सकल्प है कि बिना किसी भेद भाव के सभी नागरिता को शिक्षित करके उनका सभव सह्योग राष्ट्र के विकास के कार्यों में लिया जाये। दश के प्रति अपने कतव्य का निभाने की इस भावना को सबमे जागृत करना है--इस काय म ऐतिहासिक घटनाओ, महापुरुषो के जीवन तथा व्यवहार से प्रेरणा प्राप्त हो सकती है। मैं स्वलिखित लेखो को पाठको के लिए इस पुस्तक म सकलित कर रहा हूँ ताकि वे राष्ट्र के विकास मे कतव्यनिष्ठ होकर हाथ बटा सके। मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक देश के सभी बालको, प्रौढो एव सभी स्त्री एव पुरुषो मे उत्साह, उमग एव जागृति पैदा करने मे सहायक सिद्ध होगी।

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अनुक्रम 5 7 9 11 14 15 18 20 1 देशभक्त की निदा असहनीय 2 प्राण देश की धरोहर 3 इद न मम की भावना 4 चलते-चलते राह बन गये 5 चलते रहो 6 साथ चलेंगे, साथ जियेंगे 7 कुन्दन खरा कसौटी पर 8 जो लौटकर घर न आये 9 मानवता की सच्ची सीढी 10 राज्य धर्म का अर्थ है जन-सेवा 11 लोक-सग्रह ही एकमात्र धर्म 12 स्वतमता के दीवाने 13 पहली पराजय 14 निर्भाक्ता 15 अजातशत्रु मालवीय जी 16 अद्वितीय सयम 17 करुणा के स्रोत 22 24 27 29 32 33 34 36 37 39 41 44 46 47 49 51 53 56 58 60 62 18 अनवरत क्राति का साधक 19 राज्याभिषेक किसके लिए? 20 विरोध के लिए कृतज्ञता 21 लोक-सग्राहक की दृष्टि 22 प्रेरणा के अजस्र स्रोत 23 ताकि मशाल जलती रहे । 24 समता के लिए समपण 25 हरिजन तो मुक्ति न मागे 26 तीर्थयात्रा 27 लक्ष्य के लिए समर्पित जीवन 28 एक और दधीचि 29 कर्तव्य-पालन का सम्मान 30 दृढ सकल्प की शक्ति 31 कल्पना भी फलती है 32 निष्काम कम ही फलते हैं 33 अल निश्चय 34 अणु मे छिपा विराट दशन 35 जन जागरण ही कर्तव्य है 36 मौत की घाटी से सदेश 37 राजसत्ता का दायित्व 38 देवत्व के सोपान 39 आचरण की सुगध विखेरो 40 कर्म की भाषा मे सवाद 41 महत्तर की खोज में 42 एमका आदर्श 43 पीडितो का ध्यान 64 66 68 70 73 75 78 80 82 85 87 89 91 93 95 97 99 101 -104 107 110 112 115 44 लोकहित मे समर्पित 45 उपदेश नही, मौन कार्य 46 सेवापथ की शक्ति 47 चिकित्सा जिसका धम है 48 ताकि घर घर दीप जले 49 आत्मवत् सर्वभूतेषु 50 वतन पर मिटनेवालो का, 51 जिंदगी के बाद भी 52 एक जन्म दूसरो के लिए 53 आस्था के आशा दीप 54 कर्तव्यनिष्ठा की अग्नि-परीक्षा 55 ऐसे बहती है पवित्रता की गगा 56 जब राजहठ को झुकना पड़ा 57 ताकि जाति की मशाल जले 58 कचन कसौटी पर 59 स्वत्व का अभिमान 60 साहस और जातीय सस्कार 61 मिट्टी की महक मे पला राष्ट्र पति 62 जब सस्कृति के सुमन खिले 63 ज्ञान की सार्थकता 117 119 121 123 124 126 128 131 133 137 139

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आतक के उस दौर में घोंगडा के पिता ने जो भारत के सेभेटरी
ऑफस्ट थे-मदनलाल को अपना पुत्र न मानने की घोषणा
का तार सार माल को भेजा।लन्दन-स्थित धीगडा के भाई ने
भी उसे अपना भाई मानने से इनकार कर दिया। इस अवसर
पर जग्रेज आकारियों ने रदन स्थित भारतीय राजभवती की
एक समा बुनदार मदनलाल धीगडा यी निदामा प्रस्ताव
पास पल का निश्चय किया ताकि इस घटना का लाभ
कातिकारान उसम वल्कि वे बदनाम हो जाएँ और मिEि
मरकार भारतीय प्रान्तिकारी आन्दोलन के दमन
अवसर मिल जाय । लदन के कैक्स्टन हॉल मे अनेक
चापलमा भर भाषण हुए। अन्त मे सभाकीancer
रहागावानप्रस्ताव पडा--"यह सभा समान
लाल धागड़ा की निदा करती है।"एकnिister
1 • देशभक्त की निन्दा असहनीय
मदनलाल धीगडा नामक एक भारतीय युवक ने लन्दन मे, उन
के घर में घुसकर त्रिटिश अधिकारी कर्जन वायली को गोली
मार दी। इस घटना से अप्रेजी जनमानस में सनसनी फैल गई।
-
-

से गरज उठा-"नही, सवसम्मति से नहीं, मैं इसका विरोध
करता हूँ।" उपस्थित लोग विस्फारित नेत्रों से असहमत युवक
की ओर देखने लगे-ब्रिटेन की राजधानी मे साम्राज्यवादी
शक्ति का प्रवल विरोध करने वाला यह कौन है । ब्रिटिश
अधिकारी तिलमिला उठे। पुलिस बुला ली गई । विरोध करन
वाले युवक ने गरजकर कहा- 'मैं हूँ विनायक दामोदर
सावरकर-मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूँ।"
पामर नामक एक ऐग्लो इडियन ने क्रोध मे भरकर
सावरकर के मस्तक पर प्रहार किया, जिससे खून बहने लगा।
कातिकारी एम० पी० थीरुमलाचाय नामक युवक द्वारा छडी
के एक ही प्रहार से पामर गिर पटा और नातिकारी
वी० वी० एस० अय्यर ने उस पर रिवाल्वर तान ली।
सावरकर ने कहा, "हमारा लक्ष्य पूर्ण हो चुका
है । साम्राज्यशाही की नाक के नीचे विरोध के स्वर बुल द हो
चुके हैं । आवेश मे हम इससे अधिक फिलहाल कुछ नहीं करेंगे।"
सावरकर और कातिकारी साथियो को दोपी न पाकर ब्रिटिश
पुलिस गिरफ्तार न कर सकी। सावरकर ने इडिया हाउस के
प्रातिकारी साथियो से कहा, "अब हमारा अगला काय होगा
पुलिस द्वारा जन किये गये मदनलाल धीगडा के बयान को
पेरिस मे छपवाकर फासी से पूब उसे सारे ल दन के अखबार
में प्रकाशित करपा देना।" ब्रिटिश पुफिया पुलिस पूरी तरह
सावरकर के पीछे थी कि ऐमा कोई बयान प्रकाशित न कग
सके, लेकिन उनकी आंखो में धूल झोर कर धीगडा ये फांसी
वाले दिन ब्रिटेन के सभी पत्रा में वह बयान छप चुका था।
र साम्राज्यवाद की छाती पर बैठकर स्वतन्त्रता के लिए
"ठहरो"
।
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आवाज बुलन्द करने वाले सावरकर उस दिन मजा सरकार
के शत्रु नम्बर एक घोषित कर दिये गये किन्तु सावरकर के उस
अदम्य साहस से भारत के क्रान्तिकारी, आन्दोलनको म्याल
फिर ऐसी भडकी कि उसकी ज्योति से सैकडो कान्ति-दीप जल
उठे।
ar
2 प्राण देश की धरोहर
।
उस समय बालाजी राव पेशवा के सेनापतित्व मे मराठी
सेना सयद वधुओ की सहायताय दिल्ली के समीप पडाव डाले
हुए थी । सेनापति बालाजी राव के साथ उनका तरुण पुत्र
बाजीराव भी था । पडाव के आसपास चारो ओर फमल लहरा
रही थी। सेनापति का आदेश था कि किसी भी सैनिक के
द्वारा किसानो की फसल को कोई क्षति न पहुँचने पाये। एक
दिन मराठी सेना के कुछ उद्दड सिपाहियो ने घोडो को खिलाने
के लिए कुछ खेत काट लिये। वेचारे किसान रोते हुए सेनापति
के पास आए, लेकिन वे शिविर मे नही थे । वाजीराव ने उन
पिसानो की प्रार्थना सुनी। उन पर किए गए अत्याचार से वे
क्षुध हो उठे।
उहोने स्वय अपराधियो की जांच की तो पता लगा कि इन
उद्दड सिपाहियो के मेनानायक अद्वितीय मराठा वीर मल्हार
राव होल्कर थे। अपने सैनिको को बाजीराव द्वारा फटकारे
जाते देखकर होरकर कुछ क्रुद्ध हो उठे और बाजीराव पर प्रहार
कर बैठे। रात्रि को सेनानायको की सगत हुई तो उद्दड सैनिको
वो दड दिया गया और मल्हारराव से कहा गया कि वह अपने
7

-
दुष्कृत्य के लिए बाजीराव से क्षमा मांगे। मल्हारराव को क्षमा
मांगनी पडी । परन्तु मल्हारराव मन ही मन वाजीराव से
बदला लेने के अवसर की तलाश में रहने लगे।
एक दिन सयोगवश वाजीराव अकेले अपने घोडे पर चढे
हुए कही से लौट रहे थे। भ्रमण पर निकले मल्हारराव भी
अकेले थे। मल्हारराव ने अपने अपमान का बदला लेने का यह
उचित अवसर समझा और बाजीराव की छाती पर भाला
तानते हुए बोले, "बोलो, अब बचकर कहाँ जाओगे?" वाजी-
राव इस स्थिति से तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे बोले,
"मल्हारराव, जीवन-मृत्यु तो वीरो के लिए एक खेल मात्र है।
यदि लडना ही चाहते हो तो मुझे भी शस्त्र दो और अपने शौय
की परीक्षा कर लो, परन्तु इससे पूर्व यह समझ लो कि आपस
मे इस प्रकार लडकर प्राण गंवाने से क्या हमारे लक्ष्य को हानि
न पहुंचेगी? क्यो न हम प्रतिज्ञा करें कि हम वैर भाव छोडकर
देश और जाति के शत्रुओ से लडेंगे और देशभक्त शूरवीरो का
दायरा अधिक बढाते जायेंगे।"
देशभक्त बाजीराव के अविचलित धैय और प्रबोधक शब्दो
का मल्हारराव पर ऐसा जादू हुआ कि उ होने तुरन्त भाला
फेक दिया और आजीवन वाजीराव के साथ शत्रु दल से लडने
की प्रतिज्ञा की। इतिहास साक्षी है कि अजातशत्रु बाजीराव
की दूरदष्टि और प्रखर देशभक्ति से प्रेरित मल्हारराव होल्कर
ही नहीं, सैकडो शूरवीर प्राण हथेली पर लिये उनके साथ कदम
मिलाकर चलते रहे।
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3 इद न मम की भावना
"दादा। मां की हालत खराव है। पता चला है कि उन्हे
अनेक बार उपवास करना पडता है। इजाजत हो, तो इस धन
मे से हम उन्हे कुछ रुपया पहुंचा दें।" च द्रशेखर आजाद के
चरणो मे दल के लिए एकत्रित धन समर्पित करते हुए
क्रातिकारी दल के एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा। आजाद के चेहरे
पर एक क्षण को कुछ कठोर रेखायें उभर आयी। हाथ मे पकडे
हुए पिस्तौल को उछालते हुए बोले, "यदि क्रान्तिकोष मे से कुछ
देना ही पड़ा तो मां के लिए मैं पिस्तौल की एक गोली ही दे
सकता हूँ, जो सदैव के लिए काफी होगी, इस से अधिक कुछ
नहीं।" क्रान्तिकारी युवक अवाक् आजाद का मुंह ताकते रह
गये। आजाद ने स्थिर दृष्टि से दल के सदस्यो की ओर देखा
और दृढ स्वर मे बोले, "प्राणो की बाजी लगाकर जो धन
स्वतन्त्रतादेवी की उपासना के लिए आप एकत्रित करते हैं,
उनके एक पैसे पर भी किसी का व्यक्तिगत अधिकार नहीं हो
सकता । फिर मेरी मां के लिए ही उसमे से कैसे दिया जा सकता
"
सावजनिक धन के प्रति निस्पृहता की यह दृष्टि ही
कान्तिकारियो के सगठन को अभेद्य बनाये रही। व्यक्ति होया
सगठन, जब तक सार्वजनिक धन के प्रति उसमे प्रामाणिकता
रहती है, उनमें पवित्रता और अभयता बनी रहती है।
उन दिनो की बात है जब सुभाष बाबू आजाद हिन्द सेना
के साथ रगून के मोर्चे पर थे। अपने व्यक्तिगत व्यय के लिए
उहोने अल्पमत धनराशि निश्चित कर रखी थी। उस बजट में
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से प्रतिदिन वे तीन केले भोजन के बाद लेते थे। एक दिन उनके सेवक 'काली' ने कहा कि केला महंगा हो गया है । "वेला महंगा हो गया है, तो कल से दो केले लाया करो।" सुभाष बाबू ने कहा। कुछ दिन के पश्चात काली ने फिर कहा, "महाराज, केला और महंगा हो गया है।" "तो फिर कल से एक ही केला लाया करो।" सुभाष वाबू ने कहा। आजाद हिंद सेना जैसे महान सगटन का संचालन करने वाले सुभाषचन्द्र बोस स्वय के प्रति जितने कठोर थे इस मामले मे, सहयोगियो के प्रति उतने ही उदार। यही कारण था कि आजाद हिन्द सेना का प्रत्येक सैनिक उ है पितातुल्य समझता था। सावजनिक धन के प्रति प्रामाणिकता रखने वाले नेताओ के पीछे ऐसे ही समर्पित अनुगामियो की परम्परा खडी होती है । श्री गुरुजी (मा० स० गोलवलकर) ने इसीलिए एक बार कहा था कि धन सपनता वढने पर अकसर बडे बडे सगठन भी विशृखलित हो जाया करते हैं क्योकि सगठनो मे धन सपनता का मोह पथभ्रष्ट तत्त्वो के लिए प्रलोभन का कारण बन जाता है और वे किसी न किसी प्रकार स्वार्थपूर्ति के लिए सगठनो मे घुस जाया करते हैं। दीनवधु ठक्कर बापा इस दृष्टि से बडे सजग रहते थे कि सार्वजनिक धन का तिल मात्र भी दुरपयोग उनका कोई कायकर्ता न करे । सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और हिसाब- किताब के सम्बध मे वापा स्वय भी जागरूक थे। हरिजन सेवक संघ के कोप मे से एक बार दो कार्यकर्ताओ ने कुछ गोल- माल कर दिया। सम्बन्धित कायकर्ता दिल्ली मे बापू के सामने बुलाये गये। दोनो ने अपनी परिस्थितियां समझायी । बापू बडे 10

,
ध्यान से सुन रहे थे। दोनो पुराने कार्यकर्ता थे। पर वापा मै
इतना धैर्य कहां वे एकदम बापू पर बरस पड़े, "आप इतना समय
नष्ट कर रहे हैं । इनके साथ सहानुभूति का व्यवहार विलकुल
नहीं करना चाहिए । इन्हे तो एकदम जेल भेज देना चाहिए।
जिसे स्वाथपूर्ति करनी है, उसे सेवा के पवित्र पथ से हट जाना
वाहिए।"
4 चलते-चलते राह बन गए
'क्या आप एकदम तैयार हैं ?" नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से
आश्चयपूर्ण मुद्रा में सैनिक ने पूछा।
"मैं हर समय तैयार रहता हूँ ।" सहज मुसकान के साथ
सुभाषचन्द्र बोस ने उत्तर दिया--"आखिर मेरा सब कुछ जब
मातृभूमि के लिए समर्पित है तब ऐसी सिद्धता भी चाहिए न ।"
उस ममय रात्रि के आठ बजे थे, जब आजाद हिन्द फौज
का एक सैनिक उहे ए कार्यक्रम के लिए बुलाने आया था।
उसने सोचा था कि दिन भर के थके हारे सुभाप अब विश्राम
की मुद्रा में होंगे और उन्हे तैयार होने में कुछ देर लगेगी।
लेकिन उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अपना सैनिक वेश
पहने हुए ही वे बिस्तर पर लेट गये थे।
"चकित-से क्यो हो, मित्र " सुभाष बाबू ने पूछा, "इस
जीवन में मेरे लिए पूर्ण विश्राम नहीं है, इसलिए ऐसे ही थोडा
आराम फर लेता हूँ ताकि किसी भी क्षण यहीं भी जाने की
तयारी मे समय नष्ट न हो।"
युवा सैनिक नतमस्तक हो गया, अपने नेता की यह
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अहोरात्रि सिद्धता देखकर । उसे कुछ ग्लानि हो आयी अपने
पर । सोचने लगा, 'क्या ऐसे नेता के प्रति मैं पूर्ण ईमानदार
हूँ? क्या मैं उनका सच्चा सहयोगी बन पाया ?" और तीव्र
स्फुरण मे से एक निर्णय उभरा वि, "मैं भी चौबीसो घटे तन
मन से अपने नेता के लिए समर्पित रहूंगा।"
थोडी देर बाद सुभाष रगमच के वायक्रम में उपस्थित थे।
आजाद हिंद फौज के सैनिको ने एक नाटक का आयोजन किया
था। सुभाष बाबू को उसमे आमनित किया गया था। नाटक
था भारतीय प्रातिकारियो पर अग्रेजो के जुल्मो का प्रदर्शन और
क्रातिकारियो के न झुकने, न टूटने की स्थिति के सन्दभ मे।
एक युवक अग्रेज पुलिस अधिकारी का अभिनय कर रहा था।
प्रातिकारियो पर अमानवीय जुल्म और यातनाओ का सुन्दर
अभिनय था उसका।
"नही नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।" सहसा सुभाष बाबू
चीख पडे-"गहार कही के । तुम देशभक्तो का दमन नहीं कर
सकते।" आवेश से सुभाष बाबू का चेहरा तमतमा उठा था और
उन्होने अपना जूता निकालकर पुलिस आफिसर के सिर पर दे
मारा।
'पुलिस आफिसर' का अभिनय करने वाले युवक ने वह
जूता उठाकर माथे से लगा लिया । हर्षातिरेक से उसके आँसू
उमड पड़े और वह बोला-"मैं धय हूँ कि नेताजी ने मेरे
अभिनय को सराहा है। उनका यह भावावेश ही मेरे अभिनय
की कसौटी है और यह जूता सबसे बडा इनाम।"
युवक ने नेताजी के चरण छुए। सुभाष बाबू ने उसे सीने
से लगा लिया। वे बोले-"मैं भावुक हो उठा था, मेरे दोस्त ।"
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.
उनको फिर आमेश भा गया था-"पाल्पना मे भी मैं देशभगतो
का अपमान नही सह पासा-मैं भूरा ही गगा था कि गह
अभिनय है। तुम्हारे इस सुपर अभिनय गोलिए मेरी हादिका
बधाई।" गुपका धन्य हो गया अपने नेता मा भाशीष पाकर।
और एक दिन जब ये एक सभा के पिरान के माद
अपनी भार मे बैठ रहे थे कि एक गुयम कॉपी-लम लेकर
उनके पास भामा।बोला-"मोर आटोसफ, प्लीण!" मेताजी
ने गुषक को सिर से पाय सका देया। उनकी सम्भेषणीय दृष्टि
युवक शेल न पाया-"तुम्हे शर्म नहीं आती ये भाटोमाफ
(हस्ताक्षर) मांगते हुए । यह राशियो का काम है। तुम्हे सुभाष
से प्यार है तो उसके कार्यों में हाथ बँटाभो। मुझे गागर
प्रशंसफो को नहीं, गमठ कार्यकर्ताको भी जरूरत है।" गुपक
सज्जित हो उठा पा । रोगाल्प से उसकी मुट्ठी सग गयी। बड़े
लोगो के भाटोमाफ को नोटबुक सराफ पर फेंक दी।
"अरे, तुम?" सुभाष पायू में पूछा। आज सुभाष माखू के
पगित होने की बारी थी। वे देख रहे थे उस गुपक को, जो भाग
उनकी रोना की अग्रिम पंक्ति मे यहापा। सुभाष नेहरामर
पाहा,
R, "लाओ, अब तुम्हारी भाटोमाफ भुमा पर सपा मार डूं।"
"अब तो पर फेंग दी है, सर । सैनिको के लिए मा मह
काम शोभा देखा?" सुभाष मायू में प्यार से उसमी पीठ
पपथपाई, "मौन माहता है कि मेरे देश में गायागो और शूरवीरो
की कमी है, बस उहे आवाग देने की ही तो जरूरत है।"
सुभाष के पे गम्प आज भी सत्य हैं, सदैव रहेगे। ध्येम के सात
एमारूप होने वाले सयमो के पीछे सैकड़ो कदम
पड़ते हैं।

5 चलते रहो . 70 क्रान्तिकारी नारायणदास को सयासी वेश मे देखकर उनके साथी भगवानदास माहौर ने पूछा, "अरे, तुम भरी तरुणाई मे यह सन्यासी वेश बनाए क्यो घूमते हो भला 'पूर्ण स्वारज्य तो बहुत बड़ी बात है भैया, दैनिक स्वराज्य का प्रबध पहले जरूरी है। उसी का प्रबध मैंने किया है।" खरे ने व्यग्यपूर्ण मुस्कराहट से उत्तर दिया । "क्या मतलब ?" माहौर ने चौंककर पूछा। "देखो भाई," खरे ने सहज मुस्कान के साथ कहा, 'देश और समाज का काम करने वाले कायकर्ता को दैनिक भोजन की व्यवस्था भर चाहिए और इतनी हमारा समाज भगवा वेश- धारी की कर देता है।"नारायणदास का सारा जीवन दशन ही सेवा का दशन बना रहा। उसमे कभी कुछ निजीपन आया ही नहीं। स्वतत्रता प्राप्त होने के बाद अनेक क्रान्तिकारी अपने अपने निजी कार्यों मे लेग गये कि चलो, अब तो देश आजाद हो गया, अब कंसाकाम । लेकिन नारायणदास का चिंतन था कि समाज और देश की सेवा का काय एक जीवत सकल्प है, इसमें विराम कैसा? इसलिए स्वाधीनता के बाद वे देश का भविष्य संवारने के लिए सघप मे जुट गए। जब हैदरावाद का आय सत्याग्रह चला तो नारायणदास उसमे भी चले गये। वापस लौटने पर माहौर ने पूछा, "आप और सत्याग्रह इस पर खरे का उत्तर विचित्र किन्तु अथपूण था। उहोने कहा, 'वघे रहने से घोडा और बैठे रहने से सिपाही बिगड जाता है, यह तो कसरत करने जैसी बात है।' सिद्धातवादिता से मुक्त 20

किन्तु कितनी बडी सिद्धान्त की बात कह दो थी श्री खरे ने ।
जीवन के नियमित कार्यों के समान ही देश के प्रति कतव्य
जीवन का अग होना चाहिए । और उसका अत कैसा हो? यह
भी खरे ने सिद्ध करके ही दिखाया। टीकमगढ़ राज्य के ग्रामो
मे वे शोषित पीडित जनता की आवाज बुलन्द करते घूमते रहे।
जमीदारो द्वारा उनके शोषण के विरुद्ध लडते रहे। एक दिन उन
पर जमीदारो ने आक्रमण करने की योजना बनाई। साथियो ने
बहुत समझाया कि आज वे न जाएँ, उनकी जान को खतरा है।
"आज ही टालने से क्या होगा ?" खरे ने कहा, 'मुझे तो
आजीवन इसी तरह काम करना है। सवाल तो काम करने के
ढग का है, अन्याय के विरुद्ध लडने का है, और वह अत तक
जारी रहेगा।" और नारायणदास खरे अपनी टूटी-फूटी
साइकिल उठाकर चल दिए। माग मे जमीदारी के गुडो का
भारी गिरोह था-कुल्हाडी, व दूक, तलवार और लाठियो से
लेस। वे एक निहत्थे कातिकारी पर टूट पडे और उनके टुकडे
टुकडे कर डाले। नारायणदास देश की जिस मिट्टी में पले बढे
थे, उसी मे विलीन हो गये लेकिन उनके ये शब्द आज भी फिजाँ
मे गूंज रहे हैं कि क्रातिकारी कभी विश्राम नहीं करता । अविराम
चलते रहने वाला ही इस पथ का सच्चा पथिक है और उसकी
अतिम शरणस्थली मातृभूमि की गोद है ।
6 साथ चलेगे, साथ जियेगे
"डॉ० घोष, जबकि हमारे मित्र, सहकर्मी, देशवासी गोलियो के
शिकार हो रहे हैं और मेरे भाग्य मे उनके साथ कधे से कन्धा
IS

भिडाकर गोलियां झेलना नहीं लिखा है, तब इस जेल से अधिक उपयुक्त जगह मेरे मरने के लिए दूसरी नहीं हो सकती।" डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ये शब्द 1943 मे पटना जेल में बन्दी के रूप में जेल सुपरिटेंडेंट डॉ० घोप से उस समय कहे जब अस्वस्थता के कारण उहे छोडे जाने की चर्चा चल पड़ी। वे बोले, "बीमार के नाम पर सरकार मुझे छोडना भी चाहेगी तो मैं अपना वश रहते बाहर नही जाऊगा बल्कि यही मरूंगा।" यह सुनकर डॉ० घोष चुपचाप बाहर चले गये। देशवासियो के साथ स्वातत्र्य सघर्ष मे कन्धे से कन्धा भिडाकर अग्रिम पक्ति में लडने मरने की चाह रखने वाले राजेद्र वाबू मे जहां यह सैनिव-शौय का भाव था वहीं उनकी लोकदृष्टि भाव-विभोर पर देने वाली थी। उन्ही दिनो की घटना है, राजेद्र बाबू को मुलाकात के लिए आने वालो से पता चला कि जेल मे बदी कुछ कार्यकर्ताओं के परिवारो की हालत वडी दयनीय है और उनकी किसी को भी चिन्ता नही है। परिवार भूखो मरने की स्थिति में है। यह समाचार सुनकर डॉ० राजेद्र प्रसाद मर्माहत हो उठे। एक दिन जब उनके पुत्र मृत्युजय प्रसाद उनसे जेल में मिलने आये तो राजेद्र बाबू ने कहा कि उक्त परिवारो की स्थिति सकटपूण है, अत अन्य कार्यकर्ताओ से बाहर मिलो और उनकी भरसक महायता की व्यवस्था करो। मत्युजय प्रसाद सम्भवत प्रयत्न करके भी इस काय मे सफल नही हो पाये थे, लेकिन एक महीने वाद दोबारा जेल मे भेंट होने पर राजेद्र बाबू ने फिर उन परिवारो की सहायता के बारे मे पूछा। जब उहें पता चला कि इस सम्बध में कुछ नही किया जा सका तो वे बडे दुखी हुए। वे बोले "मृत्युजय, तुम मेरे नाम पर ऋण लेकर उन 16 परिवारो की सहायता करो। मैं यदि जेल से जिन्दा निकला तो कोई न कोई प्रबन्ध करके यह ऋण चुका दूगा। यदि जेल में ही मर गया तो यह भार तुम्हें ही उठाना होगा।" कुछ समय बाद भेंट के बावजूद जब उन परिवारो को आर्थिक सहायता न हो पायी तो राजेन्द्र बाबू ने शात और स्थिर स्वर मे कहा, "मृत्युजय, तुम समझ नही रहे हो। मुझसे यह वरदाश्त नही होता है कि तुम सभी लोग सुखी रहो और मेरे सहकर्मी जो जेल में सड़ रहे हैं, उनके बाल-बच्चे भूखै मरें।।" वे काफी गम्भीर स्वर मे वोले, "वहुत सम्भव है तुम्हे एक दिन यह सुनने को मिले कि इसी दुख के प्रायश्चित मे मैंने अनशन आरम्भ कर दिया।" यह सुनकर मृत्युजय प्रसाद घबरा उठे और बाबूजी के राष्ट्रसेवी व्यवसायी मित्र बनारसीप्रमाद झुनझुनवाला से यह घटना कह सुनाई । मृत्युजय प्रसाद के जेल से मिलकर लौटने पर वे राजेद्र बाबू का समाचार पूछने आये थे। उन्होने तुरन्त तीन सौ रुपये मासिक की व्यवस्था उन परिवारो के लिए कर दी। फिर अ य लोगो तक भी यह समाचार उन्होंने पहुंचा दिया और सहायता की बाढ-सी लग गयी । जगली भेंट में राजेन्द्र वाबू को जब यह सहायता काय सम्पन होने का समाचार दिया गया तो रुग्णता से म्लान उनके चेहरे पर अनिवचनीय आनद की भाभा उभर आयी। भरे कण्ठ से राजेन्द्र, इतना ही कह पाये-"देश के लिए अपना जीका पादेवाने वधुमओ से अधिक भला और कौन हो सकता है. को चिन्ता करना हमारा मनन्य धर्म है। उस परम सन्तोष से उनका रोग काफी घटने लगा था। .

7 कुन्दन खरा कसौटी पर उस दिन जव हरे भरे खेतो के पास से लालबहादुर शास्त्री की कार गुजर रही थी, सहसा उन्होने अपने कार चालक को रुकने का सकेत किया। निर्जन स्थान में शास्त्री जी के द्वारा रोके जाने पर चालक कुछ चकित हुआ। शास्त्री जी ने कहा, 'देखो मामने चने का खेत है, उसमे से कुछ चने ले आओ लेकिन खेत के मालिक से पहले अनुमति ले लेना।" चालक खेत के स्वामी के पास गया और बताया कि कार मे बैठे भारत के प्रधानमत्री शास्त्री जी कुछ हरे चने चाहते हैं। यदि आपकी अनुमति हो तो ले लें। अब चकित होने की बारी खेत के किसान की थी । भारत का प्रधानमत्री थोडे चनो के लिए अनुमति मांग रहा है , क्तिना आश्चर्य । जवकि छोटे छोटे सरकारी कमचारी तक स्वय को मालिक समझकर व्यवहार करते हैं । किसान शास्त्री जी की महानता पर भाव-विह्वल हो गया। स्वय उसने चने के कुछ पेड उखाडकर शास्त्री जी को भेंट किये और प्रेमाश्रु छलकाते हुए बोला, "आज मेरा जीवन सफल हुआ, देवता के दशन कर लिये। जैसा मैंने सुना था, उससे अधिक हो आपको पाया।" शास्त्री जी ने प्रेम से किसान की पीठ थपथपाई और विनम्न मुस्कान फेंक मागे वढ चले। शायद शब्दाडम्वर से भरपूर भाषण उस ग्राम्य कृपक को इतना अभिभूत न करता जितना शास्त्री जी का यह शिष्ट और विनम्र व्यवहार कर गया। व्यक्ति के चरित्र को महानता उसके वाह्य जीवन-व्यवहार में रहती है। वही व्यक्तित्व लोकनायकत्व प्राप्त करते हैं जिनके जीवन को हर कृति से प्रकाश शरता है। 18

"
गाधी जी की लोकप्रियता का रहस्य भी उनके व्यक्तित्व की
चुम्बकीय शक्ति था। निस्सन्देह समर्पित और शिष्ट व्यक्तित्व
मे चुम्बकीय शक्ति उत्पन्न हो जाती है। एक वार गाधीजी
के साथ उनकी एक अनय भक्त अग्रेज महिला यात्रा पर
थी। प्रात काल होते ही गाधीजी उनके कक्ष की तरफ जा
निकले । देखा, उक्त भद्र महिला कुछ परेशान थी। उन्होने
मुसकराते हुए पूछा, "वात क्या है, आप कुछ परेशान नजर
आती हैं
"मुझे बेड टी (विस्तर पर ही जल्दी चाय) की आदत है
और शायद यहां अभी देर तक कोई व्यवस्था न होगी।" महिला
ने बतलाया । आपके लिए मैंने प्रबन्ध कर लिया था । चाय का
सारा सामान मेरे कमरे मे है। चाय आपको मिल जायेगी।"
गाधीजी ने कहा। "लेकिन आप तो चाय पीते ही नहीं, आपको
मेरा ध्यान कैसे रह गया ?" महिला ने साश्चर्य पूछा।
"मैं चाय नहीं पीता यह तो ठीक, परन्तु मुझे पता था कि आप
यह जहर पीती हैं, इसलिए रख लिया था।" गाधीजी ने घ्याय
मुसकान के साथ कहा । उक्त महिला ने अपने सम्मरी में बाट
लिया था कि मैं गावीजी की विद्वत्ता से कभी इतना
नहीं हुई जितनी उनकी ऐसी छोटी-छोटी बातों में !
साथियो की इतनी चिता एक माँ की ही बाददि ,
किमी अन्य के लिए यह सभव नहीं।
दैनिक जीवन की छोटी छोटी माही
महानता की झांकी मिलती है। EिNT
दूसरो के सुखो के उत्स उभग्न हैं,Farans
खरे उतरते हैं।

8 जो लौटकर घर न आये
"देखो मैं अन्तिम क्षण तक सडक को घेरे रहूंगा " मेजर
शैतानसिंह पूरी बात न यह पाये थे, बदन मे धंसी गोली से विप
फैलता जा रहा था। मेजर पीडा पर काबू पाते हुए फिर बोले,
"तुम तुम सब सैनिक साथियो को लेकर सुरक्षित स्थान पर
लौट जाओ।"
"मेजर । लेकिन हम ऐसी हालत मे आपको घायल छोडकर
कैसे जा सकते हैं ?" वात अभी पूरी भी न हो पायी थी कि चुशूल
हवाई अड्डे पर चीनी मशीनगन से गोलियो की एक बौछार
और आयी, मेजर शैतान सिंह के कुछ और साथी मौत की गोद
मे सो रहे । मेजर दढतापूर्वक बोले, "तुम्हे याद है हमने इसी
मोर्चे पर चीनियो के छक्के छुडाये थे। लेकिन अब हम भारी
तोपो और टको से घिर चुके है।' रिसते घाव को पीडा से
कराहते हुए वे बोले, "मैं तो अब वच नहीं सकता, इसलिए मेरा
हुक्म मानो। ज'कर मोर्चे की तैयारी करो ताकि एक भी चीनी
आगे न बढ सके। तब तक मैं रक्त की अतिम वूद शेप रहने तक
उहे रोके रखूगा।"
आज्ञाकारी सैनिक अपने नेता को मौत की गोद में छोडकर
विवश लौट रहे थे। अपनी मौत पर आह न भरने वाले उन
जवानों की आखो से भी उस समय अविरल अश्रु वह रहे थे।
जाते-जाते उहोने फिर पीछे मुड़कर देखा-सारे परिवार के
ममता मोह को पीछे छोड माने वाले जवान अपने वीर मेजर
को मौत की गोद मे तडपते देखकर विह्वल हो रहे थे। मेजर
ने कठोर स्वर मे फिर आदेश दोहराया, 'जल्दी वापस लौटो,
20

में दुश्मन को रोक
बानीसेम्बत्र बादेश
बाग उगल रही थी।
बन चुका पा। लेकिन
सेवेतब तक दुश्मन
मोर्च तक न पहुंच
छातीपार निकल
भारत की मिट्टी
पितामह की तरह
सकल्प-पूर्ति तक मौत
था। अपने बेटे
वीर ने पिरविदा से
की सतत रक्षा के
आजादी बरकरार
ने यह
के लिए प्रतिक्षण
जीवन जी सके।
थे। 23 अक्टूबर
ने जूम-सा
साथियों के
चीनी सैनिकों को
मुरार पोवेन्दर

की जांध मे धंस गयी । रक्त का फव्वारा छूट पडा । किन्तु वीर
जोगे दर को फुर्सत कहाँ थी कि वह अपने बहते खून को देखे ।
उसकी नजरें तो दुश्मन पर थी और हाथो की उगलियां मशीन
गन पर । विशाल टिड्डी दल की तरह चीनी सेना बढती जा
रही थी और सूबेदार जोगेन्दर सिंह के पास थे केवल सौ जवान।
चीनी अफसर ने ऊँचे स्वर मे समपण का आदेश दिया।
वीर जोगेदर ने उत्तर दिया गोलियो को बौछार से।
जोगे दर के सैनिक अद्भुत पराक्रम से लड़ते हुए गिरते
रहे।
-
जोगेन्दर के पास गोलियां भी खत्म हो चुकी थी। मशीनगनो
को गोलियो की वोछार से जोगे दर मानो स्नान कर रहे थे ।
अत में उहोने अपनी रायफल पर सगौन चढाई। आखिरी
गोली छाती के पार हो जाने तक वे सात चीनियो को मौत के
घाट उतार चुके थे।
ऐसे कितने मेजर और सैनिक चले गये जो कभी लौटकर
घर नहीं पहुंचे, जिनके घर के दीपक सदा के लिए बुझ गए,
माताओ की गोद सूनी हो गयी और पत्नियो के सुहाग पुंछ गए,
लेकिन इन शूरवीर पुत्रो के रक्त से ही तो स्वतत्रतादेवी का
अचन होता है। देश के विशाल आँगन मे असख्य दीप जलते
रहे, इसीलिए तो वे अपना जीवन-दीप बुझाते हैं ।
9
मानवता की सच्ची सीढी
"मां, तुम्हारी आँखो मे यह आंसू । कहो अपने पुत्र से क्या फप्ट
है तुम्हें " निधन गृहस्वामिनी से भिक्षा ग्रहण करते हुए जगद्-
22

गुरु शकराचाय ने आर्द्र कठ से पूछा । यह स्नेहिल स्वर सुनकर गृहस्वामिनी की आँखो से अत्यन्त वेग से अश्रुधारा बह चली, कठ अवरुद्ध हो गया। अत्यन्त कठिनाई से वह कह पायी कि पिछले तीन दिन से उन्हे अन्न के दर्शन नहीं हुए। निर्धनता के इस अभिशाप के कारण वह घर मे पडे सूखे आंवले हो भिक्षा मे दे पा रही है इसलिए इतनी दुखी है। परदुखकातर शकराचार्य का मन इस दीन दशा को देखकर द्रवित हो उठा। "कल्याण होगा, माँ" का आशीर्वाद देकर वे आगे बढ़ चले। समीप ही खडी एक अट्टालिका के द्वार पर वे जा पहुंचे। धन- कुबेर गृहस्वामी के आश्चर्य की कोई सीमा न थी। जगद्गुरु और उसके द्वार पर । वे तो कभी लक्ष्मीपतियो के दरवाजे पर जाते ही नहीं। उसने अपने भाग्य को सराहा। शायद किसी पुण्य का यह सुफल हो। आदरयुक्त प्रणाम कर जगद्गुरु से आतिथ्य ग्रहण करने की प्रार्थना की। आज उन्होंने सहज-सरल भाव से आतिथ्य ग्रहण कर लिया। लक्ष्मीपति ने विनीत भाव से जगद्गुरु के चरणो मे बैठते हुए कहा, "माज मुझे आज्ञा दीजिए गुरुदेव, मैं आपके किसी काम आ सकू, दर्शन देकर आपने तो मुझे कृतार्थ कर दिया।" "लक्ष्मीपति "शकराचार्य का मर्माहत स्वर फूट पडा, "तुम्हारे पडोस मे एक निधन, गरीब परिवार तीन दिन से अन्न के दाने-दाने को तरस रहा है और तुम स्वय पकवान खाया, क्या यही धर्म है ' जगपिता प्रसन्न होगे. इससे असीम व्यथा थी, कर्तव्य का निर्देश आकरराचार्य ने फिर कहा "जब तक पडोपा भूजे परिवार का उपवास नहीं टूटेगा मैं तुम्हारे घर जल भी ग्रहण नहीं करूंगा। .

लक्ष्मीपति उठे और उसी क्षण पडोसी के घर को धन धाय
से पूर्ण बनाने का निर्देश दिया और जगद्गुरु को आश्वासन
दिया, "अब उस घर के दैन्य-दारिद्रय सदेव के लिए विदा
ले चुके हैं। आप आतिथ्य ग्रहण कर कृपा करें सेवक पर।"
शकराचार्य ने जब अन्न का प्रथम ग्रास उठाया तो महान
सयासी के मुखमडल पर दिव्यानन्द की आभा छिटक रही थी
और नयनो से छलक रहे पे आनन्दाश्रु ।
सृष्टि के एक-एक पुत्र को पीडा से जिस हृदय के तार
झनझना उठे, वही परदुखकातर मनुष्य ईश्वर का सच्चा
पुत्र कहलाने का अधिकारी है । गृहस्थ हो या सन्यासी, दूसरो के
दुख से जिसका हृदय आदोलित हो उठता है, उनके दुखो को
जो गरल सम पान कर लेता है, निश्चय ही वह नीलकठ सा
शिवत्व प्राप्त कर लेता है।
10 राज्य-धर्म का अर्थ हैजन-सेवा
अपने अश्वो की पीठ पर सवार सब साथियो ने एक दूसरे
की ओर देखा, घोडो को एड लगाई और द्रुत वेग से चल पडै ।
सहसा तरुण नायक शिवाजी एक स्थान पर तनिक ठिठके
और अपने एक साथी की ओर घूमकर बोले, "सूर्याजी, देखते
हो सामने यह मन्दिर।" सबकी दृष्टि मन्दिर की ओर घूम
गई। खण्डित मूति, सूना मदिर। एक साधी ने नीचे झुककर
मूर्ति के टुक्डो को जोड़ने का उपक्रम किया, शिवाजी के मुख
पर आवेश की लालिमा छा गई । वे बोले, "ऐसे नही बधु, इन
जोडने वाले हाथो को इतना सबल बनाना होगा कि तोडने वाले
24

हाथ काट दिये जायें।" सभी साथियो ने नायक के सकल्प को दोहराया, "अवश्य, हम वह शक्ति सचित करके ही दम लेंगे।" विदेशियो से भारतभूमि को मुक्त कर स्वराज्य स्थापना के लिए सगठन-हेतु युवको की यह टोली गांवो, कस्बो और गिरि- घाटियो को लांघती घूम रही थी। शिवाजी बीच-बीच मे दासता की ऐसी क्रूर परछाइयो को देखकर आविष्ट हो जाते थे। "साथियो, चलो उस मदिर की ओर।" शिवाजी ने कहा कि वे सब रामेश्वरम महादेव के मन्दिर में पहुंचे। सबने देवाधि- देव को बिल्वपत्रो से पूजा की और फिर प्रत्येक ने जय महाकाल के सम्मुख वच सकल्प किया कि जब तक स्वराज्य प्राप्त नही कर लेंगे, चैन से नही बैठेंगे। टोली बढती गई और सैकडो बलिदानी युवको का सगठन स्वराज्य निर्माण के लिए शिवाजी के झडे तले इकट्ठा होता गया । एक दिन बीजापुर के शाह आदिल शाह के पास खबर पहुंची-'शाहजी का लडका शिवाजी बगावत का शडा बुलन्द कर रहा है । उसने तोरण, सुभाग भगत, जावलि और कोडा आदि के अनेक प्रमुख किले जीत लिये हैं।' बादशाह चौंक उठा। उसने प्रारम्भ मे जिसे शिवाजी की बाल उद्दडता समझी थो-वह आज उसके लिए चुनौती बन गई। सहसा बादशाह ने व्यग्य से वजीर मुस्तफाखान से कहा, “खान, शाहजी हमारी नौकरी मे है, तुम उसे किसी चाल से बन्दी बनाने की कोशिश करो। बेटे की अक्ल अपने आप ठिकाने आ जायगी। उधर बालाजी हैबतराय शिवाजी पर हमला कर उसका दिमाग ठिकाने लगा देगा।" आदिल शाह का षड्यन्त्र शुरू हुी शिवाणी पर आक्रमण किया गया, किन्तु बालाजी हेतराम परास्त हुए। फिर

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"गुरुदेव, यह राज्य आपका है, मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया।" समर्थ गुरु ने स्नेहसिक्त स्वर मे आदेश दिया, "राज्य धर्म का है शिवा, तुम सेवक बनकराजनहितार्थ उस का संचालन करो, यही मेरा आदेश है।" इतिहास साक्षी है, शिवाजी अन्तिम क्षण तक विनम्र सेवक की भांति धम, सस्कृति और स्वदेश का सरक्षण करते रहे। . 11 लोक-सग्रह ही एकमात्र धर्म । प्रताप प्रेस के द्वारपाल ने सूचना दी कि अमुक व्यक्ति दूसरी बार टाइप की चोरी करते पकडा गया है। प्रबन्धक ने उसे सेवामुक्त कर दिया। वह कमचारी भागा भागा गणेश- शकर विद्यार्थी के पास गया। अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए क्षमा याचना की। विद्यार्थीजी ने उसे नीचे से ऊपर तक एक सम्प्रेषणीय दृष्टि से देखा और फिर स्नेहपूर्ण वाणी से बोले, "अपनी आवश्यकताएँ मुझसे से कहते, ऐसा पाप कर्म नही करना चाहिए । भले आदमी, इसमे मेरी नही तुम्हारी ही हानि है, तुम्हारा अध पतन होता है । जाओ भविष्य मे ऐसी गलती मत करना । तुम्हे क्षमा किया।" प्रबधक को इस क्षमादान की सूचना मिली तो बहा विस्मित हुआ। वह विद्यार्थीजी के पास आया और बोला, "यह व्यक्ति दूसरी बार चोरी करने मकहा.. गया है। क्या इसे बार-बार क्षमा होगी। . "व्यवस्था मनुष्य ने बनाई है मिन र वह चिन्तन के लिए बनाई है। एक व्यक्ति के द्वित- । समाजोपयोगी बनाना अधिक उचित है। कठोर व्यवस्था के नाम पर दडित करके उसे विद्रोही बनाना उचित नहीं। मुझे आशा है अब वह भूल नहीं करेगा।"शात स्वर मे गणेशशार विद्यार्थी ने उत्तर दिया। लोकसग्रही व्यक्ति अपार सहिष्णुता चाहिए। गणेशशकर विद्यार्थी कहा करते थे कि एक मां का हृदय कभी अपने दुर्गुणी पुत्र के लिए भी कठोर नहीं होता। ऐसा ही लोकसग्रही का हृदय होना चाहिए । साथ लेकर चलने वाले लोगो के लिए जान भी जोखिम मे डालनी पड़े तो उसकी तैयारी रहे, वही हो सकता है सच्चा लोक्सग्रही। यह अग्रेजी आतक के जमाने की बात है । विद्यार्थी जी के साथ अनेक कार्यकर्ता रेल मे यात्रा कर रहे थे। उसी डिब्बे मे बैठे कुछ गोरे सैनिको को एक मजाक सूझी। वे कार्यकर्ताओ की काग्रेसी टोपियो को सगीनो की नोक से उतार कर बाहर फेंकते और ठहाका लगाते। कार्यकर्ताओ ने कुछ कहा तो मारने के लिए सगीने तान ली । आतक के कारण कार्यकर्ता चुपचाप बर्दाश्त करने लगे। दूसरे डिब्बे मे बैठे हुए विद्यार्थीजी के पास जव यह बात पहुंची तो वे भडक उठे। तुरत बडे होकर बास्तीने चढा ली। लोगेने बहुत समझाया कि आप उधर मत जाइये, पागल पूनी लोग हैं। लेकिन विद्यार्थीजी नहीं माने।बोले, "मुझे इन नर पशुओं का प्रवध करने दो।"वे गोरे सनिकों सामने डटकर घटे हो गये। उनकी कही प्रतारणा की। विद्यार्थीजी के साहस और आत्मविश्वास भरे व्यक्तित्व का ऐसा जादू पहा बि गोरे सैनिन चुपचाप बैठ गए। मोर सपही पक्ति के लिए महत्त्व गुणों का होता है, भारी- भरपम उपाधियों या पदों का नहीं । विद्यार्थीजी सदेय ऐसे छोटे 28 से छोटे व्यक्ति का आदर करते थे, जो समाज के लिए उपयोगी हो। इसके विपरीत समाज के लिए निरुपयोगी भारस्वरूप लोगों के लिए उनके मन में कोई स्थान न था। एक बार एक सज्जन ने कानपुर से विद्यार्थीजी को लिखा कि मैं पांच सौ वर्ष से भी अधिक आयु के कुछ स यासियो को आपके पास ला रहा हूँ। आप उनके स्वागत की तैयारी करें। विद्यार्थी जो ने तुरन्त वह पत्र रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। बाद मे वे सज्जन मिले और स्वागत की तयारी न देखकर जब इसका कारण पूछा तब विद्यार्थीजी ने उत्तर दिया, "ये साधु पाँच सौ साल के हो या पांच हजार साल के-केवल अपने लिए जिये, हमारे समाज के लिए एक भी दिन जिए हो तो बताइये?" समाज के लिए तिल तिल जीवनदान करने वाला यह व्यक्ति गुणो का ऐसा आगार था कि उसमे परमाथ के अतिरिक्त स्वार्थ के लिए किसी कोने मे भी कोई स्थान न था। 12 रवतलता के दीवाने 'किसने फाडा है मेरा कैलेंडर?" कमरे मे प्रवेश करते ही रूपगविता की फटी हुई तस्वीर को कटी देखकर राजगुरु चीख पडा। "मैंने फाडा है," क्रातिकारी नेता चन्द्रशेखर आजाद ने रोषपूर्वक उत्तर दिया । आजाद को सामने देख राजगुरु का क्रोध जरा पिघला लेकिन वे अशात-से वोले, "हम इतनी सुन्दर तस्वीर लाए और आपने फोड दी, क्या आप हर सुन्दर वस्तु को इसी तरह नष्ट भ्रष्ट कर देंगे?" "हा, हम कर देंगे।" शेखर Ar29

।
ने मावेश में ही उत्तर दिया।
"क्या आपका वश चले तो भाप ताजमहल को भी तोड
देंगे?" राजगुरु ने अब उलाहने के स्वर मे कहा । "हा, मेरा वश
चलेगा तो तोड दूंगा।" आजाद आवेश मे कह गये । जब आजाद
का क्रोध शात हुआ तो उन्होने राजगुरु को समझाया "हम सिर
पर कफन बांधकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमे ऐसा
कोई काम नहीं करना चाहिए जो हमारी साधना मे जरा भी
व्यवधान डाले।" उन्होने प्रश्न किया, "क्या ऐसे मोहक चित्र
हमारे कमरो में शोभा देते हैं ?" क्रातिकारी देशभक्त भी
सामान्य मानव ही थे। उनमे भी कोमल भावनाएँ थी। लेकिन
प्रातिकारी नेता आजाद का अपने साथियो से आग्रह था कि
स्वातश्यदेवी की उपासना करने चले हो तो मन को भी कुदन
की तरह तपाना होगा । भावनाओ की भी आहुति देनी पड़ेगी।
जब भारत के स्वातश्य सघर्ष की गाथाएँ इग्लंड में
आई० सी० एस० की पढाई कर रहे सुभाषचन्द्र बोस के कानो
तक पहुंचती तो वे बार बार भावुक हो उठते । पढाई मे मन न
लगता। एक दिन वे अपने सहपाठी से बोले, "अव बहुत हो
चुका, मित्र । मैं अपने 'भविष्य' को संवारता रहूं और मेरे देश
मे युवक मातभूमि की मुक्ति के लिए प्राण यौछावर करते रहे,
यह पौरुष को चुनौती है । ' "तुम्हारी भावना सराहनीय है,
सुभाष सहपाठी ने गम्भीरता से कहा, "लेकिन जरा सोचो,
क्या अग्रेज हमारे देशवासियो का यह प्रचार न करेंगे कि सुभाष
भगोडा है, इससे आई० सी० एस० की तैयारी न हो सको तो
यह देश के लिए क्या करेगा?"
"फिर क्या सुझाव है तुम्हारा सुभाप ने व्यग्रतापूर्वक
"
"
30

पूछा । "तुम आई० सी० एस० को परीक्षा सर्वोच्च अको से उत्तीर्ण करो और फिर इसमे लात मारकर मैदान मे कूद पडो।" सहपाठी ने सुझाया। सुभाष ने अपनी भावनाओ को नियत्रित किया। वे परीक्षा की तैयारी में जुट गये । आई० सी० एस. की परीक्षा का परिणाम निकला। सुभाष ने प्रथम श्रेणी मे प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इस मेधावी छात्र की सारे देश मे धूम मच गयी। अगले ही दिन सुभाष ने घोषणा कर दी, "मैंने आई० सी० एस० मे सर्वोच्च स्थान प्राप्त करके केवल यह दिखाया है कि भारतीयो मे असीम प्रतिभा है, वे गोरो से प्रतिभा मे कम नहीं। लेकिन मैं अग्रेजो की नौकरी करके मातृभूमि के बधनो को मजबूत नहीं करूंगा बल्कि उन्हे तोडने के लिए ही काय करूंगा।" सुभाषचन्द्र बोस द्वारा सवश्रेष्ठ प्रतिभा के प्रदशन और समावित वैभव के सारे आकर्षणो को ठुकरा देने की घोषणा से वे रातोरात विश्वविख्यात हो गये । स्वतनता के इस नये सेनानी का देश ने बडी गर्मजोशी से अभिनन्दन किया। त्याग का मूल्याकन तभी होता है, जब उच्चतम उपलब्धियां अजित कर स्वदेश के लिए उनका समर्पण किया जाय। स्वतत्रता के लिए सवस्व अर्पित करने का दृढ सकल्प हो तो दो पगो के पीछे सैकडो पग चल पड़ते हैं। ऐसे ही एक जमजात देशभक्त बालक केशव ने उस दिन नागपुर की अपनी पाठशाला मे सहपाठियो को ललकारा, "हम आज निरीक्षण के लिए आने वाले अंग्रेज इस्पेक्टर का 'पदेमातरम्' के घोप-से- स्वागत करेंगे।" अग्रेज शिक्षाधिकारी के माते ही 'वन्देमातरम्' के घोप से उसका स्वागत किया गया। अग्रेज शिक्षाधिकारी'

'वन्देमातरम्' के घोष को सुनकर गरज उठा-"मैं इस स्कूल
को वद कराऊँगा, सबको कठोर दड दिया जायेगा।" प्राचाय
द्वारा छात्रो को समझाने-बुझाने और सारे स्कूल के हित का
वास्ता देने से वे क्षमा याचना के लिए तैयार हो गये लेकिन
स्वाभिमानी बाल नेता ने गवपूर्वक क्षमायाचना से इनकार
करते हुए कहा, "कैसी क्षमा याचना ? मैंने मातृ वदना करके
कोई अपराध नहीं किया। मैं फिर से यही घोप करता हूँ।"
और पुन वन्देमातरम् का घोप करके वे कक्षा से बाहर आ
गये । उहे स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। बाद मे किशोर
सकल्प की चिनगारी दावानल बनकर धधक उठी। केशव के
इसी सकल्प की दढता मे से कालातर मे राष्ट्रीय चरित्र
निर्माण करने वाले ऐतिहासिक सगठन राष्ट्रीय स्वयसेवक
का जम हुआ।
स्वातत्र्यदेवी की उपासना के लिए सवस्व समर्पित करने
वाले दीवानो के कदम विचारशूय आवेश के वशीभूत नहीं
अपितु दढ सयम, साहस और सकल्पद्वारा परिचालित होते हैं। -
13 पहली पराजय
एक महान भारतीय. सत की स्याति उस समय आक्रमण
कारी नादिरशाह के यानों सर भी पहुंची जय यह दिल्ली में
आराम फरमा रहा था। जनश्रुति यह थी यि सत त्रिकालश
है। नादिरगाह ने सन्त को युलावा भेजा कि वह उसकी सेवा
में पेश हो। मेपिन सत ने साफ इनकार कर दिया कि उसका
मुन्तान नादिरगाह से कोई काम नहीं है, यह पाहे तो मुझसे
32

मिल सकता है। नादिरशाह ने क्रोध से दांत पीस लिये, लेकिन
फिर भी इस धृष्टता को बर्दाश्त कर सत के पास जा पहुंचा।
उसने पूछा, "मुझे ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे निद्रा पर
विजय पा सकू ताकि कम-से-कम समय मे सारी दुनिया को जीत
तू।" निर्भीक सत एक क्षण मुसकराया, फिर उसने कहा,
"तुम्हारे लिए तो यही उचित है कि तुम्हे दिन-रात नीद आये,
ताकि दुनिया अत्याचार से बचे और तुम पाप कर्मों से बचो।
इसलिए मेरी सलाह है कि तुम अधिक से अधिक सोओगे तो
तुम्हारा और दुनिया दोनो का ही इस मे भला होगा।" वर्बर
नादिरशाह के सामने दुनिया सिर झुकाती थी। सन्त के
निभयतापूण उत्तर से वह बौखला उठा । उसने कहा, "जानते
हो तुम किससे बात कर रहे हो ' दुनिया के बादशाह के सामने
ऐसी गुस्ताखी करने की तुम्हारी जुर्रत ? तुम्हे मालूम है इसकी
सजा सत मुसकराया, "मैं जानता हूँ कि तुम मुझे कुछ दे
नही सरते, केवल ले सकते हो और अधिक से अधिक मेरे प्राण
ले सकते हो, लेकिन मैं अमर हूँ।" उस समय नादिरशाह को
लगा था कि वह पहली बार पराजित हुपा है-वह भी एक
फवकह सन्त से।
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14 निर्भीकता
नेताजी सुभाषवद्र बोस उस दिन जर्मनी में हिटलर से
विचार विमश पर कहे थे। भारत को आजाद कराने के लिए
ये दुनिया भर के देशो का सहयोग लेना चाहते थे। लेकिन
हिटलर अपया पिसी के भी इस प्रस्ताव से सहमत नही थे कि
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अपने प्रिय हिश पर बमबारी की जाय या एक इच भूमि भी
किसी को दी जाय। परिणामस्वरूप उन्होने हिटलर के प्रस्ताव
को ठुकरा दिया और चलने के लिए उद्यत हुए। हिटलर ने उ हे
चेतावनी देते हुए कहा, "हिटलर अस्वीकृति सुनने का अभ्यस्त
नहीं है। जानते हो अब तुम हिटलर के सामने हो, क्या तुम्हे
विश्वास है कि तुम मुझे इनकार करके जीवित लौट सकते
हो" सुभाष बाबू का निर्मीक उत्तर था, "दुनिया मे अभी
कोई ऐसी जेल नही बनी जो सुभाष को बन्दी रख सके।
विशाल ब्रिटिश शासन की आँखो मे धूल झोक्कर भारत की
सीमाओ को लांघने वाले को तुम बन्दी नही बना सकते ।"
सुभाप के आत्मविश्वास, निर्भीकता और अपरिमित तेज का
हिटलर पर ऐसा जादू हुआ कि उसने ससम्मान, सुरक्षित अपने
देश की सीमाओ के पार सुभाष बाबू को विदा किया।
निर्भयता वह प्रकाश है जो मन के अंधियारे छोरो तक को
आलोकित कर देता है, और निभय व्यक्ति को माग की कोई
वाधा पथ से विचलित नहीं कर पाती।
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15 अजातश मालवीय जी
महामना मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता मे काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय की एक बैठक चल रही थी कि अस्मात एक
नाविक क्रोध से कांपता हुआ उनके कक्ष मे घुस आया
और मालवीय जी पर गालियो की बौछार करने लगा। बैठक
में उपस्थित सनात जन स्तब्ध थे, छात्रगण भी भोघावश से
सुब्ध हो रहे थे कि एक मामूली नाविक महामना मालवीय को
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गाली दे रहा है लेकिन वे सब विवश थे क्योकि कठोर अनु
शासन के कारण नाविक को कुछ कह भी नहीं सकते थे। बात.
यह थी कि विश्वविद्यालय के कुछ उद्दड छात्रो ने नाविक को
नाव को काफी क्षति पहुँचा दी थी इसीलिए यह आगबबूला
होकर मालवीय जी को गाली दे रहा था । नाविक गाली देता
जा रहा था और मालवीय जी की आँखो से अश्रुधारा बह रही
थी-अनजाने अपराध के प्रति घोर पश्चाताप की ग्लानि से
विगलित अश्रुधारा । उन्होने क्षुब्ध नाविक के चरण पकड लिये
और पश्चाताप भरे स्वर मे कहा, "भाई, लगता है मुझसे
तुम्हारा कोई भारी अपराध हो गया है जो तुम इतने क्रुद्ध हो।
मेरा अपराध क्षमा कर दो। क्या मैं जान सकता हूँ, मुझसे क्या
अपराध हो गया है ?" मालवीय जी का यह व्यवहार देखकर,
नाविक पानी पानी हो गया। उसके मुख मे शब्द न निकल
पाये। वह मालवीय जी से लडने की कल्पना लेकर आया था
लेकिन लडाई तो तब होती जव मालवीय जी तनिक भी क्रुद्ध
हुए होते। वह बडी कठिनाई से छात्रो द्वारा अपनी नाय
को पहुँची क्षति की बात कह पाया। मालवीय जी ने प्रेमा
स्वर मे कहा, 'भगवन वास्तव मे तुम्हारी वडी क्षति हुई है।
ये छात्र तुम्हारे ही पुत्र हैं। इहे क्षमा कर दो। नौका सुधरवा
दो जायगी।" नाविक आया या गालियां देने-बरसा चला
अजस्र आशीर्वादो की मधुर धारा । श्रोध को अपने पास न
फटकने देने वाले महामानव ही अजातशत्रु होते हैं. वर्वर
पगुना भी उनके चरण चूमने लगती है । प्रतिकार से,कमी लोध
का शमन नही हुआ, स्नेहसित स्वरधारा से ही क्रोधाग्नि,
शात होती है।

लेकिन महामना के पथ की प्रचड बाधा क्रोध पर नियंत्रण क्या इतना सरल है ? सामान्य स्थिति मे शान्त रहना तो सरल है, किन्तु जटिल और उद्विग्नतापूर्ण परिस्थितियो मे भी क्रोध पर विजय पाना ही सच्ची सफलता है इस दुर्गुण पर। मानवता की ऊची मजिल की ओर वही कदम सफलता से बढे हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को सद्गुण के बढने वाले पथ पर समर्पित कर दिया था। 16 अद्वितीय सयम गुरुत्वाकर्षण के आविष्कर्ता महान् वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन उस दिन अनेक वर्षों से तैयार किए हुए अपने शोध पत्रो को मेज पर रखकर कमरे मे बाहर खुली हवा मे निकल आये थे। कार्यपूर्ति की असीम प्रफुल्लता उनके चेहरे पर चमक रही थी। सहसा उनके कुत्ते जैकी वो कोई परछाई-सी दिखाई दी और वह मेज पर उछल पडा। मेज पर जलती मोमबत्ती शोध पत्रो पर गिर पडी। वर्षों की तपस्या से तैयार शोध-पत्र जलकर राख हो गए। “यूटन ने कमरे में प्रवेश कर देखा तो स्तब्ध रह गए। एक क्षण के मौन के बाद उहोंने प्यार से जैकी की पीठ सहलाते हुए कहा, "प्यारे जैकी, तुझे क्या पता कि तूने मेरी वर्षों की मेहनत को राय यना दिया है । येर चलो, अब फिर से शुरू परते हैं ।" वैसा अद्वितीय सयम जीवन भर की साधना नष्ट हो गई लेकिन एक पशु पर भी त्रोध नहीं । मानवता के ऐसे ही दीप साधना से दुगम पथ को बालोकित किया करते हैं। .

17 करुणा के स्रोत . "वल्लभमाई वरफ से ढंका हुमा ज्वालामुखी है।" सरदार पटेल के लिए यह साथक उक्ति थो स्व० शौकत अली थानवी की। अपनी दृढना और अविचल कर्तव्यनिष्ठा के कारण सरदार पटेल को इतिहास 'लौह-पुरुष' के नाम से स्मरण करता रहेगा लेकिन स्वदेश के लिए सब कुछ समपण करने वाले हृदय मे कठोरता ही नहीं, करुणा और प्रेम का भी अजस्र स्रोत उमडा करता है। यह करुणा और लोकहित-कामना ही देशभक्तो को कठोर कर्तव्य-पथ के लिए प्रेरित किया करती है। सरदार भी लोकमगल की इस भावना से ओतप्रोत थे। जुलाई सन् 1927 की अर्द्धरात्रि थी। उस दिन सरदार सो न सके। गुजरात मे भयानक तूफान आया था। पिछले छ दिन से मूसलाधार वर्षा के कारण प्रलयकर वाढ ने अहमदाबाद नगर को घेर लिया था। नगर में भयकर बेचैनी व्याप्त थी। लोग छतों पर वर्षा मे भीगते हुए इस कालरात्रि मे सहमे बैठे थे। रात्रि के बारह बजे अचानक सरदार के मन में एक सकल्प जाग उठा । साय-साय करतो तेज हवा और मूसलाधार वर्षा को चोरते सरदार घर से निकल पडे । सहसा उन्होंने इस अद्ध- रात्रि मे एक द्वार पर दस्तक दी। गृहस्वामी ने चकित होकर पूछा, "इस समय कौन है ?" "मैं वल्लभभाई पटेल ।" सरदार ने उत्तर दिया । "आप, इस समय? " गृहस्वामी हरिलाल कापडिया ने आश्चय प्रकट किया। "अधिक समय नहीं, जल्दी मेरे साथ चलो। शहर को यथासभव बचाना है।" सरदार ने उद्विग्नता से हरिलाल कापडिया को जल्दी तैयार होने का निर्देश दिया। सरदार पटेल कापडिया को लेकर सवेरा होने तक उस वर्षा-तूफान मे घूमते रहे। नगर की स्थिति का सर्वेक्षण करके कमेटी के इजीनियर के घर आए। फिर उसे लेकर जमादारो और मजदूरो को एकत्रित किया। चार दिन तक सरदार इन सहयोगियो को लेकर रात दिन जुटे रहे। उनके कपडे पानी से भीगे रहते। तेज हवा उन्हे थपेडे मारती लेकिन वह अनथक सेनानी की तरह कर्तव्य मे जुटे रहे। आखिर नगर का पानी निकालकर ही दम लिया और अहमदाबाद के लाखो लोगो को सकट से बचा लिया। लोकमगल की भावना का उदय कठोर हृदय मे नही अपितु सरसता से प्लावित हृदय में ही हो सकता है । इसीलिए कहा गया है कि महापुरुषो का हृदय जहा वज़ से अधिक कठोर होता है, वही वह कुसुम से अधिक कोमल भी होता है। छ सौ रियासतो मे बँटे भारत को एक सूत्र में बांधने का महान ऐतिहासिक काय करने वाले सरदार मानवीय गुणो और महान मर्यादाओ के मूर्त रूप थे । नेतृत्व के दम्भ अथवा राज- नीति की एकता ने कभी उनकी उदात्त मानवता को धूमिल नहीं किया। विट्ठलभाई पटेल सरदार के बडे भाई थे। राज- नीति मे दोनो मे मतभेद रहता किन्तु सामा य व्यवहार मे वल्लभभाई पटेल बडे भाई को राम समान आदर देते थे। सरदार पटेल ने बैरिस्टरी पास करने के लिए लदन जाने का निणय किया था। बड़े भाई को पता लगा तो उहोने कहा, "मुझे जाने दो। मेरा आखिरी साल है।" सरदार ने अपने जीवन के महत्त्वपूण निणय को भाई के लिए पल भर में बदल दिया और 38

उन्हे लन्दन जाने दिया।
दृढ-प्रतिज्ञ महान लोगो के जीवन का असर फौलादो पक्ष
इतिहास के सामने आता है लेकिन इस सब को भुनाया नही
जा सकता कि देश प्रेम और उसके लिए सर्वस्व-समपण को
भावना का प्रस्फुटन एक सवेदनशोल मानवीय हृदय मे हो हो
सकता है । इतिहास पुरुष सरदार पटेल के जीवन का यह उदात्त
चरित्र ही उनको सफलता का सोपान था।
18 अनवरत क्राति का साधक
"अमो तो कुछ मो न हो हुमा । स्वातलय लक्ष्मी का आराधना
के लिए हमे अपने प्रागो को बलि चढानो है, सवस्व समपण
करना है।' व दीगृह मे वीर सावरकर को जब अपने भाई को
गिरफ्तारी का समाचार मिला तब उन्होने यह उद्गार व्यक्त
किए और तीसरे व धु को गिरफ्तारी पर उन्होंने कहा, "चनो,
इससे ज्यादा गौरव को क्या बात होगी कि हम तोनो भाई हो
स्वातय लक्ष्मी की आराधना मे लोन हैं।" सावरकर जीवन्त
क्राति थे स्वय । उनका रोम रोम, रक्त का प्रत्येक बिदु मानो
स्वातन्त्र्यदेवी के लिए समर्पित था। भारतीय स्वतन्त्रता के
लिए सशस्त्र क्रान्ति को सुनियोजित योजना हेतु सावरकर ने
ल दन मे जाकर विश्व जनमत को हिला दिसालासरी
अनेक पत्रो का प्रकाशन, सस्याओ कसहिन और सुसिम
पुस्तक '1857 का स्वातन्त्र्य समर नखकर सावरकर
पाश्चात्य देशो की धरती पर भारीय स्वातध्य को पक्ष
उजागर करके अग्रेजो की नीद हराम
दया। सादर
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की यह अमर पुस्तक त्रातिकारियो के लिए 'सशस्त्र प्राति के
तत्त्वज्ञान की गीता' बन गयी थी। इसकी एक एक प्रति तीन
तीन सौ रुपये में चिकी। सावरकर के साहित्य ने आग लगा
दी। अग्रेज अफसरो को धडाधड मौत के घाट उतारा जाने
लगा। फास, जर्मनी आदि देशो मे घूमकर जब पुन सावरकर
लन्दन लौटे तो बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने उहे गिरफ्तार
कर लिया। विशाल सशस्त्र पहरे के बीच सावरकर जहाज ।
के केबिन मे बदी थे। विशाल सागर की विकराल छाती पर
जहाज सतरण कर रहा था । पातिवीर सावरकर के सामने
प्रश्न था, 'वया व दीगृह मे व द रबर कमवीर विवश हो जाय
या मौत का खेल खेलकर मातृ बधन काटने के लिए मुक्तिपथ
का वरण करे कमवीर के सामने माग स्पष्ट था। कैबिन
की छोटी सी खिडकी के शीशे तोडकर विशाल सागर मे कूद
पडा। अडतालीस घटे अनवरत तैरता गया। जहां जरा
सिर निकला कि सैकडो गोलियो की बौछार। आखिर
फ्रासीसी सीमा के तट पर धोने से इस वीर को पकड लिया
गया। विश्व के सारे प्रमुख समाचारपत्रो ने अगले दिन इस
साहसिक घटना को शीपक रूप मे छापा । क्रान्तिवीर सावरकर
के साहस का विश्वभर मे अभिन दन हुआ। जब अंग्रेजी
सरकार ने सावरकर को बम्बई की अदालत मे लाकर दो जामो
के कारावास की सजा सुनाई तो सावरकर ने व्यग्य से कहा,
"मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ईसाई सरकार ने मुझे दो जीवन का
कारावास दड देकर पुनज म के हिदू सिद्धान्त को तो मार
लिया।"
लेकिन क्रान्ति क्या कभी मरती है ? सीखचो के बीच भी
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40

सावरकर ने नुकीले पत्थर के टुकडो से जेल की दीवारो पर
'गोमान्तक' जैसा महाकाव्य और 'वन्दी की आत्मकथा' लिखे
और उन्हें कठस्थ करके बाहर आने पर प्रकाशित कराया।
स्वतन्त्र भारत मे सावरकर जब रोग-शैया पर पड़े थे तब
उहोने औषधोपचार छोड दिया था। कुछ नेताओं को इस
प्राथना पर कि आपका जीवन राष्ट्र की सपत्ति है, आप हमे
इसके सरक्षण का अधिकार दीजिए, सावरकर ने उत्तर दिया
था, "क्या आप फिर एक क्रान्तिकारी भारत के निर्माण मे मुझे
सह्योग का वचन देंगे? तब मैं जीने का सकल्प कर सकता
'जीवन का अस्तित्व तभी तक है जब तक वह देश और
समाज के काम आ सके'-अपने सम्पूर्ण व्यवहार से सावरकर
ने इस जोवन-मन्त्र को साकार किया था।
19 राज्याभिषेक किसके लिए?
उस दिन हरी भरी फसलो मे यवन सैनिको ने आग लगा दी और
ग्रामीणो को लूट लिया। किशोर शिवाजी ने यह देखा तो मा
जीजाबाई से पूछा-"यह यवन सैनिक निर्दयतापूर्वक लोगो
पर अत्याचार क्यो करते हैं, मां ?" "क्योकि देश यवनो का
गुलाम है, बेटे" मा जीजाबाई ने कहा था। "तो फिरलोग इन्हें
मार क्यो नही भगाते " शिवाजी ने पूछा था, और मां इस
प्रश्न पर जरा रुक गई थी क्योकि प्रश्न का उत्तर सरल न था।
तनिक रुककर जीजाबाई ने कहा था, "गुलामी मे जीते-जीते
रक्त मे कायरता भर जाती है, पुत्र और तब कोई सकल्प-धनी
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नापक ही ऐसी मृतप्राय जाति को जाया करता है।"
जोगवाई ने एक क्षण अपने पुत्र को गौरव से निहारा और फिर
वोली, 'अव यह कार्य तुम्हें करना है, शिववा। इन विदेशियो
से देश को तुम मुक्त करोगे।" शिवाग ने जावेश में अपनी
नही-सी कटार खींचकर उसी दिन निज रक्त बिन्दुओ से तुलजा
का अभिषेक कर प्रतिज्ञा की थी, "जब तक मैं विदेशी
आत्राताओ को भगा नहीं दूंगा, मा, तब तक चैन न लूगा।'
पिर वह बढ चले लोक संग्रह के कटिन मार्ग पर । स्वदेश को मुक्त
कराने के लिए हजारो साथी चाहिए। दस-दारिद्रय से पीडित
और दासता के कशापातो से प्रतारित बधुओ को घर घर
जाकर शिवाजी ने झकझोरा । अनेक हताशा भरे प्रानो का
समाधान किया। व्यग्य उपहास खेले । विरोधो के इशावातो
से टकराए और तब चल पडे हजारो कदम उनके पीछे पीछे।
सकरप का पौधा प्याथ कठोर चट्टान पर अकुरित होने लगा।
"वह देखोसामने- देख रहे हो?" शिवाजी अपने साथियो से
कहते और एक के बाद एक किले जीतने लगे। यादिलशाही की
नीद हराम हो गयी। कृष्ण के वध की योजनाओ की तरह एक
के बाद एक व्यूह रचनाकर शिवाजी को समाप्त करने के षड्यत्र
रचे गये, पर नाकाम रहे। अफजल खां आया हो या दिलेर
खान बढा हो, शाइस्ता खां बढा हो या वहलोत खान, शिवाजी
ने सबके दांत खट्टे कर दिये और एक दिन आया 6 जून,
1677 का वह शुभ प्रभात, जव स्वराज्य-सस्थापक शिवाजी के
राज्याभिषेक की तैयारियां हुई। लेकिन 'मैं तो स्वराज्य का
एक सेवक हूँ। स्वराज्य ईश्वर का है, जनता जनादन का है
फिर किसका राज्याभिषेक ?' कहकर शिवाजी ने अभिषेक
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? कराने से इनकार कर आवाय गागाभट्ट को चकित कर दिया। आचाय न राज्याभिषेक के लिए नरसहार होते देखे थे। इधर स्वबाहुबल से स्वराज्य स्थापित करने पर भी शिवाजी का यह उत्सर्ग भाव । बडी मुश्किल से देश हित की दुहाई देकर उन्हे राज्याभिषेक के लिए राजी किया जा सका।स्वराज्य- सस्थापक शिवाजी क्या भूल पाये कि उनका लक्ष्य राज्य पाना नहीं अपितु आदिलशाही से लेकर मुगलशाही तक फैले विशाल भारत की दासता से पीडित हिन्दू जनता को मुक्त कराना है महान लक्ष्य के लिए शत्रुओ को चुनौती देते हुए, मित्रो से कदम मिलाकर, भटको को पुन पथ दिखलाकर वे वढते ही रहे। कभी भी इस साहसी जननायक ने विश्राम न जाना, लेकिन जब अपने ही पुत्र शम्भाजी के विलासी जीवन के समाचार मिले तो वे समर्थ गुरु रामदास के सामने जाकर व्यथा से द्रवित हो गए । अर्जुन के समान उस समय शिवाजी ने कहा, "गुरुदेव, मुझे राज्य की कामना नहीं है। यह आपको समर्पित । मेरा कार्य अब पूरा हुआ, गुरुदेव " चट्टान जैसे वीर पुरुष के चेहरे पर विपाद का कारण समझते उहें देर न लगी । स्वदेश के लिए तिल-तिल जलने वाले वीर पुरुष का पुत्र ही उस साधना को खडित करे, तो क्या दुख न होगा? समर्थ गुरु की एक दिव्य दृष्टि और एक शब्द ने उन्हें फिर से कर्तव्य माग पर चलने की प्रेरणा दी। "निष्काम कर्म करना ही आपका धर्म है। यदि एक पुत्र अयोग्य हुआ तो क्या, इस राष्ट्र के अनेक पुत्र तैयार हैं, आप धर्म- सरक्षण के काय मे बढ़ चले।" ? 43 - 20 • विरोध के लिए कृतज्ञता उन दिनो महर्षि दयानन्द सरस्वती पूना मे ठहरे हुए थे उनकी विद्वत्ता और वाग्मिता की ख्याति पख लगाकर फैल रही थी। प्रसिद्ध सामाजिक नेता न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानडे ने निश्चय किया कि लोकमगल और राष्ट्र उत्थान के लिए कार्य करने वाले ऐसे सत का भव्य स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने अपने सहयोगियो से विचार-विमश कर दूसरे दिन प्रात महर्षि दयानन्द के सम्मान मे भव्य जुलूस निकालने का निश्चय किया, किन्तु कुछ विपथगामी विरोधियो को जैसे ही यह बात मालूम हुई तो उन्होने जुलूस पर आक्रमण करने और महर्षि का भरपूर अपमान करने का निश्चय किया। विरोधियो ने एक गधे को सजाकर कुछ गुण्डो के सरक्षण मे एक जुलूस निकाला। न्यायमूर्ति रानडे ने सुरक्षायं पुलिस-दल को जुलूस के साथ रखने को व्यवस्था कर ली थी। महर्षि दयानन्द के भाषण के उपरान्त पूना से अतिम विदाई के रूप में उहें हाथी पर बैठाकर जुलूस निकलने ही वाला था कि दूसरे पक्ष के शरारती तत्त्वो ने समारोह में घुसकर शोर मचाना शुरू कर दिया । महर्षि दयानद जी को जान-बूझकर इस स्थिति की सभावना बताई नही गयी थी। आशा की गई थी कि पुलिस-दल के रहते गडवड होगी नहीं। उधर शरारती तत्वों की योजना थी कि पुलिस दल के रहते वे आक्रमण करेंगे और पुलिस के द्वारा हस्तक्षेप होने से महर्षि की अधिक बदनामी होगी। उनकी छवि अराजकता फैलाने वाले सत को बन जायेगी और विरोधियों का उद्देश्य सफल हो जायेगा।

उधर स्वामी दयानन्द ने जैसे हालेखा कि वाधार
डाली जा रही है, उहाने तुरन्त रामदे की बुलाया और पाहा कि
पुलिस तब तक कोई कायवाही न करे,
का निर्देश न दें, चाहे जुलूस मे कैसी खडी से
जुलूस वढता रहा। विरोधी गुट चकित औरनिराश
उनके द्वारा उत्तेजित किये जाने पर भी सब लोग शात बने हुए
है। यह देखकर उनकी निराशा कोध मे बदल गई। उन्होने अब
जुलूस पर जो भी चीजे हाथ लगी, फेंकनी शुरू कर दी। जिसके
हाथ में कुछ नही था, उसने नालियो मे से कीचड उठाकर फेंकना
शुरू किया। जुलूस पर दनादन कीचड पत्थर बरस रहे थे और
इसमे शामिल सभी लोग स्वामी दयानन्द और श्री रानडे के
निर्देश से शात चले जा रहे थे । उनके चेहरो पर कोई प्रतिक्रिया
नहीं थी। पुलिस दल में भी भक्तजन लोग थे। वे इन हरकतो
पर क्रुद्ध होते हुए भी विवश मौन थे, क्योकि उन्हे स्वामीजी की
ओर से निर्देश था कि वे कोई प्रतिरोध नहीं करेंगे, सिफ जुलूस के
साथ शोभा के लिए रहेंगे। कुछ लोगो को चोटें आयी, अस्पताल
जाना पड़ा । जुलूस अन्ततोगत्वा अपने गतव्य स्थान पर पहुँच
गया तो महर्षिजी ने श्री रानडे से मुसकराकर पूछा, "जुलूस का
पुरस्कार कैसा लगा?" श्री रानडे ने विनम्रता से उत्तर दिया,
"आशासे अधिक अच्छा रहा ऋषिवर, और ऐसा आपके अहिंसक
सत्याग्रही स्वरूप के कारण हो सका।" सारे पूना मे विरोधी
लाछित हुए। उन तथाकथित विद्वानो का मिथ्या अहकार धूल
मे मिल गया, जो इस षड्यन्त्र के सूत्रधार थे।
--"अविचल शाति और सहिष्णुता की
कोधिक तोता
से फैलेगी। विरोधियो के इस सहयोग के लिए,
।
राना

चाहिए।"
महपि ने गम्भीरता से कहा, "सत्य मे स्वय एक तेज होता है,
विरोधो के बवडर उसे सान देकर अधिक चमकाते ही हैं । शत
यही है कि सत्य-साधक कसोटी की कठोर परख को मुसकराते
हुए स्वीकार करें।"
21 • लोकराग्राहक की दृष्टि
सैनिक गृहद्वार पर खडी महिला को देख घर में घुस आया और
उपहास करने लगा। गृहपति गोपालराव काले ने उसे फटकारा,
'शिवाजी के सैनिक होकर भी तुम सभ्य आचरण नही जानते ?
उन्हे कलकित करते हो 'मदाघ सैनिक को यह उपदेश अच्छा
न लगा। उसने गोपाल काले को मार डालने की धमकी दी।
काले अब और अधिक सहन न कर सका । उसने सैनिक को
कमरे से पकड घर से बाहर लाकर सड़क के दूसरी ओर नीचे
घाटी में फेंक दिया।
दूसरे दिन प्रात काल सैनिक परेड के समय उस सैनिक को
अनुपस्थित पाकर उसकी खोज हुई। काफी खोजबीन करने पर
गदन टूटा हुआ उसका मृत शरीर घाटी मे पड़ा मिला । सभी
संनिक चकित थे कि यह कैसे हुआ? किसका दुस्साहस हुआ,
जिसने महाराज शिवाजी के सैनिक के प्राण लिये ? शिवाजी तक
खबर पहुंची तो उनके क्रोध को सीमा न रही। उहोने उस
गांव के प्रत्येक व्यक्ति को अपने सम्मुख उपस्थित होने का आदेश
दिया। शीघ्र ही उस ग्राम के सभी लोग शिवाजी के सम्मुख
एकत्रित हो गए । शिवाजी ने क्रोध से गरजते हुए ग्रामवासियो
46

से सैनिक के हत्यारे को पेश करने को कहा। गोपाल काले निर्भीकतापूर्वक आगे बढा और जनसमूह से बाहर आकर सारी घटना सुनाते हुए कहा, "महाराज, सैनिक की भ्रष्ट चरित्रता और उद्दड व्यवहार मुझसे सहन न हुआ, इसलिए मैंने उसे मारा। आप मुझे जोदड दें, मैं उसके लिए तैयार हू।' उसने एक क्षण रुक- कर कहा-'लेकिन एक प्रार्थना है महाराज, ऐसे सैनिको से सेना को बचाए रखें ताकि वे अपने भ्रष्ट आचरण से आपकी पवित्र सेना को कलकित न कर पाएँ।" शिवाजी गोपाल काले की निर्भीकता और सत्यप्रियता से प्रस न होकर मच से उतरे और उसे सीने से लगाते हुए बोले, "तुम जैसे शुद्ध हृदय और निर्भीक युवको की ही तो मुझे आवश्यकता है, क्या तुम मेरी सेना मे प्रविष्ट होना पसद करोगे?" गोपाल काले ने शिवाजी के बारे मे जैसा सुना था वैसा ही पाया-एक महान पुरुष। वह उनके चरणों मे नतमस्तक होते हुए बोला, "यह मेरा सौभाग्य होगा महाराज कि देशोद्धार के लिए सेवारत आप समान महापुरुष की सेवा मे रहकर मैं भी अपना जीवन सफल वना पाऊ, मुझे आपका आदेश सहर्ष स्वीकार है।" शिवाजी की पारदर्शी लोकसग्रही दृष्टि के कारण ऐसे कितने ही शूरवीर स्वतत्रता-पथ के सेनानी बनते चले गए। 0 22 प्रेरणा के अजसू स्रोत "बौद्ध सूत्र पथ केवल चीनी लिपि मे उपलब्ध है।" आचार्य तेत्सुजेन के एक शिष्य ने कहा, "क्यो न इन्हे जापानी लिपि मे मुद्रित कर लिया जाय?" 'ठीक है," आचार्य तेरसुजेन ने कहा, 47 "लेकिन इसके लिए असीम धन की आवश्यकता होगी।" और उसी दिन से तेत्सुजेन इस काय के लिए धन सग्रह करने मे जुट गये । शिष्य मण्डली के साथ इस महान काय के लिए धन सग्रह करने में उसे दस वर्ष लग गये। उसने घोषणा की कि वह ऐतिहासिक क्षण आ पहुँचा है जब बौद्ध सून ग्रथो का जापानी भाषा तर घर घर पहुँचाया जा सकेगा। "इससे बढकर क्या सुकम होगा आचाय कि ज्ञान के दीपक को हर घर तक पहुँचाया जा सके।" एक शिष्य ने कहा। आचाय तेत्सुजेन के मुखमण्डल पर भी चरम सतोष की रेखा उभर आयी। सहसा समाचार मिला कि जापान की विशाल नदी यूजी मे बाढ आ गयी है । जन जीवन अस्तव्यस्त हो गया है। पीडित जनो का सर्वस्व वाढ की भेट चढ गया है और वे बेघरबार हो छटपटा रहे हैं। सत तेत्सुजेन का हृदय बधुओ को पीडा से सवेदित हो उठा। उसने सारा सचित वन बाढ- पीडित वधुओ की रक्षार्थ उनकी सेवा में लगा दिया । शिष्य गण कुछ बोले तो नही कि तु मर्माहत हो उठे कि अब सूत्र ग्रथो के भाषा तर का महान काय कैसे पूरा होगा। फिर से सब मिलकर धन-संग्रह मे जुट गये। दस वप मे फिर इतना धन जुट पाया, कि तु इस बार भयकर महामारी फैली और तेत्सुजेन ने सारा धन सेवा काय मे व्यय कर दिया। आखिर एक शिष्य ने पूछ ही लिया, "आचार्य, क्या इस प्रकार कभी सून भापा तर का काय पूरा हो सकेगा?" सत तेत्सुजेन गम्भीर हो गये।वोले 'तुम कितने भ्रम मे हो शिष्यगण। जिहे ज्ञान-रश्मियों वाटने के लिए हम बौद्ध मूत्रा का भाषातर करने का सकल्प लिये हुए हैं, उन्ही की रक्षा के लिए यदि सहस्र बार भी यह धन सच करना पडे 48

तो यह हमारा परम कतव्य है। हमारे सम्मुख साध्य तो जापानी
व धुओ की सेवा ही है न, बौद्ध सूत्र का भाषान्तर तो केवल
साधन है।" शिष्यो को कम का मर्म समझ मे आ चुका था। वे
दुगुने उत्साह से फिर धन संग्रह मे जुट गये। धूमधाम से एक
उत्सव मनाया गया, जापानी जनता ने आचाय तेत्सुजेन का.
हार्दिक स्वागत किया। आखिर उन्होने चालीस वर्ष की
साधना के पश्चात् बौद्ध स्नो के जापानी भाषान्तर के रूप
मे जन जन को ज्ञान का दीपक थमाया था।
अपने अभिनन्दन का उत्तर देते हुए उस दिन आचाय
तेत्सुजेन ने कहा था-"दरअसल सेवा के रूप में पीडित बन्धुओ
के लिए किए गए काय के रूप मे पहले दो 'सस्करण' अधिक
सुन्दर कि तु अदृश्य थे-वे अतुलनीय है।" निश्चय ही उनका
यह कथन सही था । आज भी जापान मे बौद्ध सूत्रो के भाषातर
की कथा मे आचार्य तेत्सुजेन की यह त्याग क्था स्मरणीय बनी
हुई है और जापानी लोग अपो वच्चो को बताया करते है कि
सेवा के रूप मे समर्पित दो अदृश्य सस्करण अधिक सुन्दर है,
क्योकि वे कर्म प्रेरणा के अजस्र स्रोत बने रहेगे।
.
23 ताकि मशाल जलती रहे
जेल के सीखचो मे बन्द उस कैदी को देखकर जेलर भी हतप्रभ
था। कटे हुए दाहिने हाथ को अक्षमता के बावजूद अद्भुत जीवट
था उसमे। अकल्पनीय यातनाओ से भी न वह टूटा और न हताश
हुआ। जेलर आता और हसते हुए प्रश्न करता-"सूफी, अभी
तक तुम जिदा हो?" और वह इस सत पुरुष की अदम्य शक्ति
-
49

२
मोदेगररपति रह जागा। गूपी सम्बाप्रमाद पारउप में सन
भी देग मोगा में लिए माठिा से नए
पे। रहमी अपणी सेयीद्वारा अपनी गरसार पिनास मापी
आग उगमी थी। गमिए 1906 में जन-अधि पूरी होने ही
अग्रेजी सरसार फिर मे दम पित्रोही मो सोयों म यसरने
मी टायर गूपो मोपना पनारि भोगगन रिसागतको
अप्रेनी रेजिट गयड ससे हरपो मी साजिश रप राहै।
गूरी पर प्रसार परमार थे। उस समय अगा यागार पत्रिग से
उमरा रायध था। उन्होंने रिपय रियास्पियन मोविपन
मगा है। एस गिनी पूजा, 'पाप मेरो रेमिट मे रहस्योरापना
लगायेंगे गरी सरसता से उत्तर दिया-"रिमी तरह से
रेजिडेंट पे यगर्मपरनोपरी प्राप्त पर उसमे यतंन मोगा, याना
पाऊंगा।' आप यह राय करेंगे, गूपी साहब" आश्पर्म से मित्र
ने पूछा। दरअसल मूपी अम्बाप्रसाद दराने पहुंचे हुए सूको ये कि
उनी ओर प्रदानु भयन उनसे परण टूरर गरी अनेक प्रकार
से सेया परते। लेशिये देश की स्वतनताये लिए तुच्छतम काय
परने यो तैयार रहते। ये पागल से व्यशिश के रप में रेजिडेंट के
वगले पर गये और उहें भोजन मात्र मे बदले भरतन साफ
परने या याम मिल गया। उधर अमृत याजार पत्रिका में उक्त
रेजिडेंट के विरुद्ध घडाघड लेय छाने लगे और यह इतना बदनाम
हो गया कि उसे पदच्युत कर दिया गया। जिस समय वह
रियासत से विदाई लेकर स्टेशन पर पहुंचा तो उससे एक काला
व्यक्ति सूट-बूट में मिलने पहुँचा। उसे देखकर रेजिडेंट चकित
रह गया और बोला, "अरे, तुम तो वही व्यक्ति हो जो मेरे बगले
पर वरतन साफ करते थे। आज तो तुम पागल नहीं हो कही
50

तुम "
,
"आपने ठीक पहचाना है।" सूफी ने बात काटते हुए कहा,
"मैं वही गुप्तचर हू, जिसने तुम्हारे भ्रष्टाचार का सारा रहस्य
प्रकाशित करवाकर तुम्हें पदच्युत कराया है। अब मुझे इस
सफलता के लिए इनाम देंगे।"
रेजिडेंट क्रोध से कांप उठा, बोला-"यदि उस समय मुझे
पता चल जाता तो तुम्हारी बोटी-बोटी उडवा देता। खैर,
तुम्हारी सफलता के लिए बधाई और यह पुरस्कार "कहते हुए
रेजिडेंट ने अपनी कीमती कलाई घडी उहें भेंट कर दी और
फिर प्रस्ताव रखा, "यदि तुम स्वीकार करो तो जासूस विभाग
से एक हजार रुपये मासिक वेतन पर तुम्हे सरकारी सेवा मे
नियुक्त करा दू" सूफी ने गवपूवक उत्तर दिया, श्रीमान्, यदि
मुझे वेतन ही लेना होता तो तुम्हारे जूठे बर्तन क्यो साफ
करता?" उहोंने एक क्षण रेजिडेंट की ओर देखा और यह कहते
हुए चल दिये, 'मैं चलता हूँ। अग्रेजी राज की किसी दूसरी शाख
को गिराने की योजना बनानी होगी ।" अंग्रेज अधिकारी
विस्फारित नेत्रों से इस कातिकारी को देखता रह गया।
स्वदेश की स्वतन्त्रता के लिए तुच्छत्तम कार्य करने की
सिद्धता रखने वाले सूफी सत अम्बाप्रसाद जैसे क्रांतिकारियो
के कारण ही स्वाधीनता की वह मशाल सतत जलती रही। .
24 समता के लिए समर्पण
यज्ञ का दिव्य वातावरण था।
तपस्वी सन्त पांचलेगावकर महाराज की अमृतवाणी के
51

पश्चात महिलाओ ने एक दूसरे को कुमकुम तिलक लगाया। कि तु एक ओर वंठी कुछ महिलाओ की उपक्षा कर दी गयी। उनका मन असतोप से भर उठा। श्रम तपस्या, यज्ञ के मायोजक मानवीय सद्भाव और श्रम- उपासना के इस यज्ञ का प्रतिफल जानने के लिए जन-जन से सम्पक करें ऐसा सत पाचलेगावकर का आदेश था। पूना की इस मानव कल्याणी सस्था के दिशा दश सत ने अपने अनुयायियो और सहयोगियो से कहा, "यज्ञ की सफलता किसी दैवी वरदान से नहीं, बल्कि धरती पुत्रो के हृदयो की समरसता मे से ही प्रकट होगी। इसलिए उनके हृदयो मे झांककर देखो कि यज्ञमय कल्याणी भावना उहे एकत्व के सूत्र मे बांध रही है अथवा नहीं।" अत यज्ञ के दैनिक कायक्रम के पश्चात् एक आयोजक ने जो एक हरिजन परिवार के साथ ठहरे थे, उनसे यज्ञ के बारे में पूछा। "अच्छा है, लेकिन वह हमारे लिए नहीं है, हमारा उससे कोई वास्ता नहीं।" एक कटुतापूर्ण उत्तर मिला। "क्यो ?" आयोजक ने व्यग्रभाव से पूछा, "इस सामूहिक श्रम से जो एक सडक बन रही है, उससे तो लाभ हरिजनो को भी होगा?" कुछ देर मौन छाया रहा, फिर एक वृद्धा फूट पडी- "आज शाम ऊंची जाति की स्त्रियो ने आपस मे ही तिलक लगाया। हम हरिजन स्त्रियो को कोई परवाह ही नहीं की। जब हमें वे मनुष्य समझने को भी तयार नही तो ऐसे यज्ञ से हमे क्या " लाभ ६.

सत पाचलेगावकर को यह बात बताई गई। वे मर्माहत हो
उठे। 'जब तक उच्चता के अह की दीवारें नही गिरेंगी, समता
की भूमि पर सब एक साथ खडे नही होगे, तब तक यज्ञ का
कोई अथ नहीं है'-उन्होंने सोचा।
दूसरे दिन प्रात वह गांव के प्रत्येक हरिजन के घर मे गए।
उन्होने हरिजनो के प्रत्येक घर को गोबर से स्वय लीपा और
महिलाओ को फिर कुमकुम लगाया। सत के निर्मल व्यवहार से
हरिजन महिलाओ की सारी मनोव्यथा धुल गयी। दूरी की
दीवारें भरभराकर गिर गयी। सवर्ण महिलाओ ने भी अपनी
भूल को पहचाना। समरसता का जो अमृत लम्बे प्रवचनो से
नही उपजा था, वह सन के निमल और समर्पित व्यवहार से
सवको सराबोर कर गया।
८
21
25 हरिजन तो मुक्ति न मागे
युवा इजीनियर ने पूछा, "तुम्हारा सबसे छोटा भाई कहाँ है
बच्चो ने निर्जीव दृष्टि से प्रश्नकर्ता की ओर देखा और सपाट
स्वर मे उत्तर दिया, "हमने उसे गड्ढा खोदकर मिट्टी मे दवा
दिया, वह हमसे सँभलता हो न था।"
युवक इजीनियर अमृतलाल ठक्कर की आंखो से अविरल
अश्रु बह चले, "ओह ! भारत की ये अभागी सतानें।" उनकी
मर्माहत व्यथा उमड पड़ी। इस दारुण घटना ने युवक अमृत
लाल के हृदय को झकझोर दिया। सपूण काठियावाड पर उस
समय अकाल की काली छाया मंडरा रही थी। पेट भरने के
लिए पेडो के पत्ते भी खत्म हो चुके थे । जहाँ-तहां भूख से मृत
53

लोगो की लाशें पडी दिखाई देती थी। पोरबन्दर मे नियुक्त इजीनियर अमृतलाल ने दो दिन पूर्व ही इन बच्चो के श्रमिक माता पिता को अकाल की भूख से तडपकर मरते देखा था- पीछे बच रहे थे दो किशोर और एक-दो महीने का उनका नन्हा भाई । भला बच्चे कैसे इस शिशु को सँभाल पाते । उहोने शिशु को जिन्दा ही जमीन मे गाडकर अपना सिरदर्द खत्म किया। अमृतलाल पर इस हृदयस्पर्शी घटना का गम्भीर प्रभाव पड़ा। उन्होने अपनी डायरी मे लिखा, "जिस देश की सन्ताने भूख और अकाल की पीड़ा से कीट-पतगो के समान दम तोड रही हो, नन्हे बालक नालियो मे बीनकर अनकण बटोर रहे हो, यदि विधर्मी तत्त्व सेवा-भाव से नही, धम-परिवतन की भावना से उन्हें फुसला सकें तो आश्चय ही क्या है।" उनकी व्यथा घनीभूत हो उठी। उसमे से एक सकल्प उभरा,"करोडो दीन दुखी, अभावग्रस्त बन्धुओ के लिए मुझे अपनी सीमाएँ तोडनी होगी। परिवार की परिधि मे बंधे रहकर यह सेवा काय असभव है।" अमृतलाल ठक्कर ने सारे बन्धन तोडकर आजीवन सेवा का सकल्प धारण कर लिया। देश के कोने कोने मे दीन-दुखी, हरिजनो, गिरिजनो की सेवा के लिए घूमने वाले ठक्कर सबके वापा बन गए । उस दिन अकाल पीडितो को अन वस्त्र बाँटते वे शकरपुर ग्राम पहुंचे। जैसे ही वह एक झोपडी के द्वार पर अन्न-वम्ब देने पहुंचे कि महिला ने झट से घास फूस का वह द्वार बद कर लिया। वापा ने चक्ति स्वर मे पूछा, 'क्यो वहन, तुम्हें कुछ अन-वस्त्र नही चाहिए? हम तुम्हारी सहायता के लिए आए हैं।" "मैं घर के बाहर द्वार तक कैसे आ सकती हूँ, वापा " स्त्री 54 ने दरवाजे की आड से ही उत्तर दिया, "मेरे पास तन की लाज ढकने को एक वस्त्र भी तो नहीं-निर्वस्त्र झोपडी की ओट में बैठी हैं।" बापा यह सुन करुणाभिभूत हो उठे। कुछ कपडे अन्दर फेंके, तब वस्त्र पहनकर महिला द्वार तक आ सकी। जो दोनो मे अपना अस्तित्व मिटा दे, वही दीनबन्धु दीनबन्धु वापा एक दिन कुछ सहयोगियो के आग्रह से जयपुर गए। एक सहयोगी ने जयपुर के रमणीक दृश्य दिखाते हुए कहा, "बापा, खुसरो ने कश्मीर को देखकर कहा था, यदि धरती पर स्वग है तो यही है, यही है, यही है। क्या जयपुर को देखकर नहीं लगता कि स्वग यही है ?" बापा वोले, "मुझे वस्ती मे ले चलो। तब निणय करूंगा।" बापा ने हरिजन वस्ती का नारकीय जीवन देखा तो उनका हृदय भर आया। बोले, "इसे कहते हो तुम स्वर्ग 1" उनकी आखो में असीम वेदना झलक उठी। केंधे कठ से वोले, "अगर मुझसे पूछते हो, तो मैं कहूंगा कि अगर पृथ्वी पर कही नरक है, तो यही है, यही है, यही है ।" प्रकृतिस्थ होने पर बापा ने सहयोगियो से कहा, "मेरे लिए सु दर-असुन्दर की एक ही कसौटी है-यह वह कि वहाँ दलित-पीडित हरिजनो और गिरि- जनो को कितना सुख प्राप्त है ।" अनवरत वृद्धावस्था तक मेवा- रत होने वाले ऐसे बापा दिल्ली के हरिजन निवास मे एक आराम- कुर्सी पर लेटे भावविभोर से भजन गा रहे थे-'हरिजन जन तो मुक्ति न मांगे निरखवा नदकुमार रे।' सहसा वियोगी हरि ने प्रवेश करते हुए पूछा, "वापा, कही हैं भी आपके नद- कुमार?" "क्या तुमने नन्दकुमार को नहीं देखा?" गद्गद 55 कठ स्वर से वापा बोले, "अरे, हरिजनो, गिरिजनो और दलितो के नग धडग वालक ही तो मेरे नन्दकुमार है।" और बापा फिर वही पक्ति गुनगुना रहे थे, अश्रु बहते जा रहे थे। दलित पीडितो के इस मसीहा ने सेवा का वह पथ प्रशस्त किया कि वाद मे इस सेवा-पथ पर हजारो लोग बढ चले। बापा के इक्यासीवें जन्म दिवस समारोह पर किसी नेता ने सार्थक ही कहा था, "देवताओ के कल्याण हेतु महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां दी थी और बापा ने दलितोद्वार के लिए अपना प्रत्येक श्वास अर्पित किया है।" 26 तीर्थयात्रा "वावा, क्या आप तीथयात्रा पर चलने के लिए तैयार है " मथुर बाबू ने रामकृष्ण परमहस से पूछा। रामकृष्ण परमहस बालसुलभ प्रसनता से प्रफुल्लित होकर बोले, "अवश्य, मथुर बाबू, मैं तैयार हूँ।" लेकिन दूसरे ही क्षण वे तनिक गम्भीर स्वर में वोले, "मथुर, क्या तीथयात्रा के लिए तुम्हारे मन की तयारी हो चुकी है ?" मथुर वाबू कुछ समझ न पाये, मन की न्यारी से क्या मतलब है बाबा का । रामकृष्ण मुक्त हास्य कर उठे, "अरे, जिसके हृदय मे भक्ति भाव रहता है, वह यदि तीय यात्रा करने जाता है तो उसका भाव और अधिक बढ़ जाता है और जिसके हृदय मे भक्ति भाव नही, उसे तीययात्रा से कोई लाभ नहीं होता।' मथुर बाबू चक्ति हुए। वे काफी समय से 'बाबा' से तीर्थयात्रा पर चलने का आग्रह कर रहे थे। यह उनका भक्ति भाव ही तो था जो उहे तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित , 56 . कर रहा था। फिर वावा को उनके भवितधान वे इसे एक अबूझ पहेली समझकर तैयारी हो गई। तीर्थयात्रा सुरते वैद्यनाथ के पास एक गांव में विपन्नता और दुख क्लेश देखकर वावा उनकी आँखो में आँसू भर आए। वे मथुर से बोले, "तू तो रानी माता का कोठीवान है रे मयुर, इन सब लोगो में से प्रत्येक को एक एक वस्त्र और एक वार भरपेट भोजन तो करा दे। देख तो, माँ के नग्न और भूखे पुत्र कितने विपन हैं।" श्री रामकृष्ण की व्यथा नयनो से बरस रही थी। "बाबा, इस तीर्थयात्रा मे तो काफी खर्च हो चुका है । और फिर इन लोगो की सरया बहुत है। इन सरको अन्न-वस्त्र देते चले तो बहुत खच हो जाएगा ।" मथुर बोला । दीनो के दुख से द्रवित श्री रामकृष्ण गोधपूर्ण दृष्टि से मथुर की ओर देखा और बोले, "दूर हो, मूख । तेरी काशी को मैं नही चलता । चला जातू, मैं इही के साथ रहूँगा। इनका कोई नही है । इनको छोडकर मैं यही नहीं जाता।" यह कहकर वे एक छोटे बालक के समान उही लोगो में जाकर हृदय का बाध तोडकर रोने लगे। "क्यो रे, यही है तेरी भक्ति ?"श्री रामकृष्ण ने मथुर से पूछा, "तीर्थ- दर्शन का अथ क्या है, नहीं जानता तू " उन्होने दोनो को गले लगाते हुए कहा, "अरे, यही तो हैं मेरे तीय देव, क्या तू इहे नहीं पहचानता मथुर बाबू सब समझ चुके थे। उन्होने तुरत कलकत्ता से अनाज और कपडा मंगाने के लिए आदमी भेजा। जब तक सब कुछ आ न गया, श्री रामकृष्ण वहाँ से हिले नही। अन वस्त्र आने और निधनो को बांटने के समय श्री । " 57

रामकृष्ण एक सरल बालक की तरह तालिया बजा रहे थे।
एक एक के निकट जाकर उसे अपने हाथो से खिला रहे थे।
प्रसन्नता के आंसू पोरते हुए वे मथुर से बोले, "सफल हुई रे
तेरी तीर्थयात्रा, देख न भगवान मिल गए।" मथुर वावू अब
भक्ति का अर्थ समझ चुके थे। निर्धन ग्रामीण टुकुर-टुकुर देख
रहे थे। शायद मौन सकेत से एक-दूसरे से कह रहे थे कि हमे
आज भगवान के दर्शन हुए हैं। दरिद्र और दरिद्रनारायण का
यह अद्भुत मिलन था। "अब चलो काशी।" श्री रामकृष्ण ने
आनदित होते हुए कहा। मथुर वावू विनम्र अनुचर की तरह
काशी की ओर बढ चले किन्तु वे मन मे सोच रहे थे, 'काशी
तो मेरे साथ है। तीर्थरूप रामकृष्ण देव के सानिध्य से बढकर
भला कौन सा तीर्थ ।' उन्होने पश्चाताप से द्रवित अत करण से
उमडे अश्रुकण श्रीरामकृष्ण के चरणो मे चढ़ाकर अपने जीवन
को तीथमय बना लिया।
27 लक्ष्य के लिए समर्पित जीवन
"नरेद्र, तुम्हे घर यार का मोह छोडना ही होगा। दुखित
मानवता तुम्हें पुकार रही है, क्या तम उसकी पु" गरा
दोगे ?"

मुसकान से नरेन्द्र को प्रेरित किया और यही नरेन्द्र पीडित मानवता के लिए जीवन होम करने चल पडे । लक्ष्य के लिए सर्वस्व समर्पित करने वाले इस महामानव को दुनिया ने विवेकानन्द के रूप मे जाना। किसी लक्ष्य के लिए समर्पित जीवन न तो संघर्ष को देखता है और न आकर्षणो के सम्मुख झुकता है । लन्दन के एक स्कूल मे एक प्रधानाध्यापिका मिस मारग्रेट नोबल बडे प्यार से बच्चो को पढा रही थी। रगीन सपने उसकी आँखो मे थे। वाईस वसन्त पार करने वाली यह तरुणी जीवन के सुख-वैभव को आकठ भोगना चाहती थी कि एक दिन लन्दन की एक सभा मे उसे स्वामी विवेकानन्द के मर्मस्पर्शी प्रवचन की पुकार ने झकझोर दिया। जीवनधारा बदल गयी। विवेकानन्द ने उस सभा में कहा था, "यदि मुझे केवल बीस समर्पित व्यक्ति मिल जाएं तो भारत का नक्शा बदल सकता हूँ।" "मि० विवेकानन्द, उन्नीस व्यक्ति कहाँ से मिलेंगे, यह तो मैं नहीं कह सकती। लेकिन मैं भारत की सेवा के लिए जीवन समर्पित करती हूँ। आप मुझे अपने साथ ले चलें।" मिस मारग्रेट ने उस सभा मे खडे होकर कहा। भारत मे अनवरत जीवन-भर सेवा करने वाली इस युवती का नाम स्वामीजी ने रखा सिस्टर निवेदिता। लक्ष्य के लिए समर्पित व्यक्ति जितने उदार और कोमल- हृदय होते हैं, अपनी भावनाओ के प्रति वे उतने ही कठोर भी होते हैं । ऐसे ही भावनामय और लक्ष्य-समर्पित व्यक्ति थे सरदार पटेल । उनके सामने लक्ष्य था समाज और देश की निर्हेतुक सेवा । फांसी के एक मुकदमे की वे पैरवी कर रहे थे, अचानक अदालत मे तार मिला। खोलकर पढा-उसमे उनकी 59 पत्नी की मृत्यु का दारुण समाचार या। सरदार ने तार मोडकर जेब मे रखा और पूरी लगन से मुकदमे की पैरवी मे फिर जुट गा । यहस पत्म होने पर मित्र वकीलो ने पूछा, "क्या था तार मै" "पत्नी की मृत्यु का समाचार ।" सरदार वोले, और अब उनका कठावरोध हो चुका था। लेकिन मित्र चकित थे इस महामानव पर। अपने क्तव्य-माग मे उहोने ऐसी दारुण व्यथा को पीडा को भी बाधक नहीं बनने दिया । 28. एक और दधीचि "क्या मैं नौकरी के जजाल से छूटकर अपना सारा समय दलितो और दुखियो की सेवा मे लगा सकता हूँ?" पिता को पत्र लिख कर यह अनुमति मांगनी चाही थी दीनब धु ठक्कर बापा ने । वम्बई की झुग्गी झोपडियो मे रहने वाले पीडितो की नारकीय दशा देखकर ठक्कर बापा का हृदय करुणा से विगलित हो उठा। इसी कारण नौकरी तक छोडकर पिछडे दीनबधुओ की सेवा भावना उनमे जाग उठी थी। पिता के जीवित रहते तो उहे नौकरी छोड़ने की इजाजत नहीं मिली लेकिन उनकी मृत्यु के तुरत उपरात यह कमयोगी सारे ब धन तोडकर देश और समाज की सेवा के लिए निकल पड़ा । सेवा पथ के लिए गोखले जी का सान्निध्य ग्रहण करते हुए उन्होने एक पत्र मे अपने भाइयो को लिखा था, "मैं निश्चयपूर्वक मानने लगा हूँ कि भारत को आज समग्र जीवन अर्पित कर देने वाले सेवको की जरूरत है, फुरसत या सुविधा से काम करने वालो की नहीं। जब तक आजीवन कार्य करने वाले सेवक भारत को नहीं 60

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मिलेंगे, तब तक हमारी कोई प्रगति नहीं हो सकेगी। जीवन
मे सभी वियोग दुखदायी होते हैं, परन्तु मैं तुम सबको श्रेष्ठ काम
करने के लिए छोडकर जा रहा हूँ।"
देश के जिस किसी कोने में कोई दुःखद प्रसग आता, बापा
वही दौडकर पहुंच जाते। उन्हे लगता जैसे देश के प्रत्येक कोने
पर पीडित उनका कोई परिवारजन पुकार रहा है। उन दिनो
गुजरात के अकाल पीडित अस्थिपंजर भीलो के लिए ही नही
अपितु भूख-प्यास से मरते हुए मूक पशुओ के लिए भी वे देवदूत
बनकर आये।
सेवा के अभिनय और सेवा की प्रेरणा में अन्तर होता है।
वापा निधनो और दलितो के जीवन मे समरस होकर उनके
हर दुख दर्द को बांटने की कोशिश करते और हर समस्या
का समाधान ढूंढकर ही चैन लेते। बम्बई महापालिका के
भगियो को कज मे डूबी हुई जिन्दगी और लेनदारो की क्रूरता
से भी वे मर्माहत हो उठे। उहोने देखा कि मूल से भी अधिक
ब्याज के कारण ये दलित गुलामो का-सा जीवन विताने को
मजबूर किये जा रहे हैं। उनका हृदय देशबन्धुओ की इस दीन
दशा पर तडप उठा। जगह-जगह घूमकर उन्होने हरिजनो को
ऋण मुक्ति के लिए महकारी ममिति बनाई और इन कों से
उहें मुक्ति दिलाई।
सेवा और निर तर सेवा के लिए उनका तन-मन समर्पित
था, लेकिन धन के स्रोत तो वाहर ही थे। अकाल, भीलो में
जागति और शिक्षा तथा विधर्मी बनने से बचाने के लिए
सहायता के लिए अपार धन की आवश्यकता थी। बापा का
सकल्प था कि मैं अपने जीवन का प्रत्येक सांस पीडितों के लिए

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लगा दूगा लेविन धन
यच बढता जा रहा था इसलिए
पापा ने एक बडी मार्मिक अपील करते हुए कहा, "हमारे
समाज की ऐसा कुचली हुई जातियो का भविष्य बदलना
जरूरी है, जिसके लिए सेवको और धन दोनो की जरूरत है।
धनवानो के भडार मे इन गिरी हुई जातियो को सीधा खडे
करने के लिए आवश्यक धन सामग्री भरी पड़ी है। उसमे से
थोडी सहायता क्या वे इन पिछडे वधुओ के लिए नहीं दे
सक्ते"
जीवन सध्या के अन्तिम वर्षों मे बापा जव काफी दुर्वल
दोखने लगे तो अनुयायियो ने प्रायना की कि अब आप घूमना-
फिरना छोडिए, इस पर वापा सीना तानकर बैठ गए और
बोले, "अगर यह सलाह मैं मान लू तो यह विश्राम नहीं, मेरा
अकाल मरण होगा। मैं तो काम करते करते ही मरना चाहता
हूँ, खाट पर पड़े-पडे नही। शरीर क्षीण होना तो जराधम है,
पर मन क्या दुबल हुआ करता है" हुआ भी यही । बापा
निर तर कम करते हुए इस लोक से गये । उनको श्रद्धाजलि देते
हुए जहाँ सरदार पटेल ने महान कमयोगी कहा था, वही बाबू
जगजीवन राम ने पिछडे वर्गों की सेवा के लिए जीवनदान करने
के कारण उहे आधुनिक युग के दधीचि की साथक श्रद्धाजलि
अर्पित की थी।
29 कर्तव्य-पालन का सम्मान
उन दिनो प्रोफेसर गालनेथ भारत म अमेरिका के रा
उहोने अपनी महिला निजी सचिव को
है
रथे।
62

Faceurs
दोपहर के भोजन के बाद जब वह आराम कर रहे हो, तो किमी
भी कारण उन्हें परेशान न किया जाय और न उस-समय किसी
को मिलने दिया जाय । सचिव सदैव इस आदेश को कठोरता
से पालन करती।
एक दिन वाशिंगटन से राष्ट्रपति के विशेष सचिव ने
दूतावास में फोन किया कि राष्ट्रपति कोई जरैरी यातास
करना चाहते हैं। "फिलहाल तो असभव है । थोडी देर बाद
फोन कीजिये।" प्रोफेसर गालब्रथ की निजी सचिव ने उत्तर
दिया।
उधर से आग्रह हुआ कि बात जरूरी है इसलिए उन्हे सदेश
दे दीजिए। राजदूत को निजी सचिव ने विनम्रतापूर्वक कहा,
"मुझे आदेश है कि उहे दोपहर के भोजन के बाद आराम के
समय परेशान न किया जाय, इसलिए इस समय उन्हे नहीं
जगाया जा सकता।"
इस पर वाशिंगटन से राष्ट्रपति के सचिव ने फिर अनुरोध
किया, "राष्ट्रपति स्वय बातचीत करने के लिए बैठे है और
बातचीत इसी समय होना जरूरी है।"
अब भारत मे अमेरिकी राजदूत की निजी सचिव को थोडा
आक्रोश आ गया। वह बोली, ' मैं अपने आका की बात सुनूगी,
और किसी की नहीं।
वाशिंगटन मे टेलीफोन से बात करते हुए विशेष सचिव के
पास बैठे राष्ट्रपति ने यह सवाद सुना तो वे हपविभोर हो उठे।
उन्हे ऐसे निष्ठावान वमचारी पर गव हो आया जो उन
(राष्ट्रपति) से भी अधिक महत्त्व अपने निकटस्थ स्वामी के प्रति
कर्तव्य पालन को देती है। वह इस महिला की बात पर इतने
63

खुश हुए कि उन्होने तुरन्त दिल्ली से बुलाकर वाशिंगटन डी० सा० मे-राष्ट्रपति के ह्वाइट हाउस मे उसे नियुक्त करने का आदेश दे दिया। राष्ट्रपति का विचार था कि ऐसे निष्ठावान और कर्तव्य परायण कमचारी राष्ट्र की उच्चतम सेवा मे रहने चाहिए। सर्वोच्चतम व्यक्ति की परवाह न कर कतव्यपालन की निर्भयता का सम्मान ही लोकतत्र के फूलने फलने की गारटी है । ऐसी स्थापनाओ को पुरस्कृत करने से ही लोकतन्त्र का रथ विकास की दिशा मे चल पाता है। 30 · दृढ सकल्प की शक्ति माता पिता की तीव्र जिज्ञासा थी, अपने बालक का भविष्य जानने की । पडित जी ने बडी निराशा से हाथ देखकर बताया कि बालक के भाग्य में विद्या नहीं है। वालक ने पूछा, "महाराज, कहाँ होती है विद्या की रेखा ? कृपया मुझे बताएं।" पडित जी ने वालक के हाथ मे सकेत से रेखा का स्थान बता दिया। उसी क्षण वालक एक तेज धार वाला चाकू लाया और उसकी नोक से एक गहरी रेखा हथेली पर खीच दी। पून की धारा बह चली। हस्तरेखा पहित विशेषज्ञ वालक के साहस से चकित हो उठा। उसने वालक के साहस की सराहना परते हुए कहा विचार से तो हाथ पर रेखाएं नहीं बनाई जा सकती लेकिन दृढ़ सकल्प से यह सभव है कि तुम विद्या प्राप्त पर सकी। उस बालक ने उसी दाण दृढ़ सकल्पकी शपथ ली और भाग्य में विद्या न होने की घोषणा को मिथ्या सिद्ध कर वह एक दिन महान प्यारणाचार्य बन गया । इस सकल्पवान वालक का नाम 64

था पाणिनी-विश्व जिन्हे आज सस्कृत के माहन व्याकरणाचार्य
के नाम से जानता है।
दृढ सकल्प में असीम शक्ति होती है। सकल्प के विना
अपरिमित साधन और शक्तियाँ बालू के महल के समान नष्ट
हो जाती हैं। दृढ सकल्प वह आत्मबल प्रदान करता है कि
सफलता का मार्ग स्वय प्रशस्त होता जाता है । दृढ सकल्प के
ऐसे ही धनी थे स्वामी रामतीय । अनेक संघर्षों के बीच मढने वाले
छात्र रामतीर्थ ने उस दिन निश्चय किया था कि सूर्य की प्रथम
किरण देखने से पूर्व वह सारे प्रश्न हल कर लेंगे। उन्होने एक
नग्न कृपाण अपने सिरहाने रख लिया कि भोर होने के पूर्व
सारे प्रश्न हल नहीं कर पाए तो स्वयं को कृपाण से समाप्त कर
लेंगे । रामतीथ रातभर परिश्रम करते रहे रिन्तु एक प्रश्न
हल नहीं हो सका । आकाश में सूर्य उदय होने को था। आखिर
रामतीथ ने कृपाण की नोक अपनी गरदन पर रखकर दबाई
और रक्त की धारा बह चली। उसी क्षण अस्मात् उहें ऐसा
लगा मानो अतरिक्ष में प्रश्न का कही उत्तर लिखा है। रामतीर्थ
ने तुरन्त कृपाण फॅश और उत्तर को लिपिबद्ध कर लिया।
अपने सकल्प की शक्ति से उनमे इस शक्ति का उदय हुआ कि
यही रामतीर्थ विश्व भर को भारतीय अध्यात्म का स देश
देकर उसके गूढ़तम जीवन प्रश्नो को हल कर सके।
विश्व का यह अलौकिक उत्कष,
अनेक
रहस्यमय
आविष्कार और धरती पर ज्ञान का यह विपुल भडार दृढ सकल्पी
महापुरुषो की कृति का ही तो प्रतिफल है। लक्ष्य दिनना ही
दूर हो, बाधाएं दुर्गम हो, स्थिति जटिल हो और साधन क्तिने
ही अल्प हो, दृढ सकल्पवान व्यक्ति नक्षत्र के तारोको भी धरती
65

। पर लाने के स्वप्न देया करते हैं। वालक अब्राहम अमेरिका के एक साधारण किसान का पुत्र था। दोनो समय मुश्किल से उसे दो-दो रोटी मिलती। एक समय की रोटी बचाकर वह होटल पर बेच आता और उस धन को वचाकर पढने के लिए पुस्तकें खरीदता। घर मे प्रकाश नहीं है तो क्या, निकट के विजनी के खम्भे की रोशनी में पढ लेता। लेकिन प्रतिदिन अपनी स्कूल की कुर्सी पर 'पी' णब्द लिखना न भूलता । साथी सहपाठियो ने 'पी' शब्द का अर्थ पूछा तो बताया कि मुझे अमेरिका का प्रेसिडेंट बनना है, इस सकल्प को दोहराता हूँ। सहपाठियो ने उसका उपहास किया लेकिन दढ सकल्पवान यही बालक एक दिन अमेरिका के प्रख्यात राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के नाम से विस्थात हुआ। इसी महान राष्ट्रपति को अमेरिका ने फादर अब्राहम की उपाधि से विभूपित किया। 31 कल्पना भी फलती है जसे ही उस व्यक्ति ने समुद्र की ओर कदम बढाये, 'जरा ठहरिये' के एक स्वर से उसके कदम रुक गये। "मुझे लगता है आप जीवन सग्राम से पराजित हो गये हैं।" रोकने वाले सज्जन हैली बर्टन ने कहा । और मधुर मुसकान के साथ उसे दो डालर तथा अपने पते का कार्ड थमाते हुए बोले, ' कल आप मेरे कार्यालय आ जाइये, मैं आपकी हर सभव सहायता करूँगा।" 'आपकी सहृदयता के लिए धयवाद ।" कहते हुए उस व्यक्ति ने डालर और पते वाला कार्ड रख लिया। जीवन सग्राम 66 के आकस्मिक आघात से चोट खाये यह सज्जन थे अमेरिका के प्रख्यात व्यापारी चेस्टरफील्ड । चेस्टरफील्ड को किसी आर्थिक सहायता की आवश्यकता इतनी न थी जितनी एक मृदुल सहानुभूति की और हैलीवर्टन से उन्हे वह सहानुभूति मिली, आवेश के उन क्षणो मे जब वे जीवन का अत करने जा रहे थे। आवेश का पल टल गया और चेस्टरफील्ड का जीवन बच गया। हैलीबर्टन के पास जाने का तो कोई प्रश्न ही न था। एक अतराल के बाद चेस्टरफील्ड एक समाचारपत्र मे यह समाचार पढकर चौक उठे-"अपार घाटे के कारण प्रसिद्ध व्यवसायी हैलीवर्टन का फार्म वन्द हो रहा है।" फोल्ड को स्मरण आया कि यह तो वही सज्जन हैं जिन्होंने मुझे एक बार समुद्रतट पर मदद करने का वचन दिया था। एक क्षण भी विलम्ब पिए बिना वह उठे और वही पते वाला काड लेकर हैलीबर्टन के पास जा पहुँचे। उन्होने हैलीबर्टन के सम्मुख उनके पते वाला कार्ड रख दिया। हैलीवर्टन को अपना वायदा स्मरण आया लेकिन वह व्यथा के साथ बोले, "मिन, मुझे दुख है कि तुम जरा देर से आये, और आज स्थिति यह है कि मैं स्वय भारी सकट मे हूँ।" चेस्टरफील्ड कोरी चेक-बुक हैलीबटन के सम्मुख वढाते हुए बोले, "मिन, मैं आपसे इस समय कुछ लेने नहीं आया, अपितु एक ऐसे उदाहरण पुरुप की सेवा करने आया हूँ जो उदारता की खान है।" हैलोवर्टन ने चौंककर आगन्तुक को देखा । इस विचित्र विडम्बना पर वह चकित और विस्मित थे कि जिसकी सहायता के लिए वे आश्वासन भर ही दे पाये थे, वही व्यक्ति आज उनको सहायता के लिए उपस्थित है। फील्ड ने पुन आग्रह किया, "इस सक्ट के समय आपको 67

जितने धन की आवश्यकता है आप चेक मे नि सकोच भर
दीजिए।"
राकोचपूर्वक हैलीवटन ने चालीस लाख डालर की राशि
लिख दी । "मैं आज तुम्हारी सदाशयता का कुछ भार हल्ला
कर पाया हूँ, मित्र । तुम्हारी स्वीकृति के लिए धन्यवाद।" कहते
हुए चेस्टरफील्ड ने चालीस लाख डालर का चेक हैलीबटन को
दे दिया और बिना धयवाद की प्रतीक्षा किए हुए चल दिए।
"उदारता की कल्पना मात्र के ये कैसे मधुर फल ।"
हैलीवर्टन भावावेश मे बडबडा उठे।
२
32 • निष्काम कर्म ही फलते है
और भी दुधष
उस दिन वर्पा और आधी मे मानो होड लगी हुई थी। वातावरण
की इस विक्षुब्धता को कडकडाती हुई बिजली
बना दिया था। यूया के उस दम्पति को फिलाडलफिया की
यह यात्रा इस घोर वर्षा, तूफान और ठडी रात मे बडी त्रासदायी
लगी। फिलाडलफिया मे ही रात गुजारने के अलावा इस वर्षा
तूफान मे और चारा भी क्या था ? किन्तु पूर्व आरक्षण न होने
के कारण वे जिग होटल मे भी गए, उ हे ठहरने को स्थान न
मिला। इसलिए धनाढय विलियम वाल्डोफ के सपन जीवन में
यह यात्रा कालरात्रि के समान भयानक बनती जा रही थी।
उहोने आशा निराशा के बीच झूलते हुए एक अय होटल म
प्रवेश किया, लेकिन होटल प्रबंधक द्वारा यहा भी 'स्थान नही
है' का निराशाजनक उत्तर पार वे जैसे ही वापस लौटने को
मुढे नि आवाज आयो, "जरा ठहिये।"
68

उन्होंने देखा कि एक माधारण बरे ने उन्हे पुकारा है।
दूसरे ही क्षण बेरे ने होटल प्रबन्धक से अनुमति मांगी, "क्या मैं
अतिथि को अपने निजी कमरे मे ठहरा सकता हूँ
"मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तुम रात कहां गुजारोगे?"
प्रबधक ने आश्चर्यचकित स्वर मे पूछा। प्रबंधक की अनुमति
पाकर उक्त वैरे ने दूसरे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय अतिथि
से कहा, "यदि आप अन्यथा न समझें तो रात को मेरे कमरे में
विश्राम कर लें । इतनी रात गए अब आपको फिलाडलफिया के
किसी होटल मे स्थान मिलेगा भी तो नही।"बैरे ने कहा, "ऐसी
वर्षा और ठडो रात मे आप मेरा यह विनम्र प्रस्ताव स्वीकार
कर लें।"
धनाढ्य विलियम ने आभार मिश्रित आश्चय से पूछा,
"लेकिन रात मे तुम कहां आराम करोगे, मेरे दोस्त ?"
बैरा मुसकराया, "मैं बाहर मेज पर सोया रहूँगा । मेरी
चिन्ता आप न करें। फिलाडलफिया मे आए एक अतिथि दम्पति
को जगह मिलनी ही चाहिए।"
कपकपाती ठडी रात में विलियम वाल्डोफ के सामने इस
प्रस्ताव को स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय न था।
प्रात काल होटल से प्रस्थान करते समय विलियम ने आग्रहपूर्वक
उक्त बैरे का नाम और पता पूछा । समय के आवत मे बैरा जान
डेविड इसे भूल गया। लेकिन एक दिन वह अपनी मेज पर एक
तार पाकर आश्चयचकित हुआ, जिसमे लिखा था कि वह
प्रसिद्ध उद्योगपति विलियम वाल्डोफ से तुरन्त मिल ले। साथ मे
न्यूयार्क का हवाई टिकट भी था।
जान डेविड तुरन्त न्यूयाक पहुंचा । उसे आश्यय हो रहा था,
69

7 यह सब क्या है इतने वडे उद्योगपति ने उसे कैसे बुलाया-यह स्वप्न है या जीवन की वास्तविकता है। विलियम बाल्डोफ के महल मे पहुँचते ही उसने देखा कि यह तो वही सज्जन हैं, जो उस दिन रात मे उसके होटल में ठहरे थे। जान डेविड को आश्चय हुआ कि किस बात के लिए इतने बड़े उद्योगपति ने उसे यहाँ बुलाया "सुनो, जान " विलियम ने उसकी उत्सुकता को समाप्त करते हुए कहा "तुम आज से उस होटल के मैनेजर रहोगे, जो मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है।" "लेकिन श्रीमान्, मैं तो एक साधारण बैरा हूँ।' जान डविड ने कहा, "भला मुझे प्रवधक का अनुभव कहा?' विलियम मुस्कराये, “मिस्टर डविड तुमसे श्रेष्ठ प्रवन्धक कौन हो सकता है, जो स्वयं को सकट मे डालकर अतिथि की देवतुत्य सेवा करने को तत्पर रहता हो।" डेविड ने कुछ बोलने का प्रयत्न किया ही था कि धनपति विलियम ने रोका, "मिस्टर डेविड, मैंने यह होटल केवल तुम्हारे ही लिए बनवाया है, ताकि निष्ठा और प्रामाणिकता तथा महान सेवा-भावना को ठोकरो मे नहीं, बल्कि उस शिखर पर स्थान मिल पाए जिसकी वह अधिकारी है। मत तुम इसे स्वीकार करो।" 9 33 अटल निश्चय "अब कुछ समय के लिए युद्ध विराम कर पोप से समझौता करना ही उचित होगा।" लोकतत्र प्रेमी 'तरुण सध' के कार्य-

कर्ताओ को वठक ने निश्चित किया। अधिकाश सदस्यो ने इस
कायरतापूर्ण निणय के पीछे यह तक दिया कि व्यथ लम्बे समय
तक पोप से टकराकर शक्ति क्षीण करने के बजाय हमे समझौता
करके कुछ समय के लिए शक्ति सचय हेतु युद्ध-विराम कर
आत्म-समपण कर देना चाहिए। गैरोबाल्डो इस कायरतापूर्ण
निणय से क्षुब्ध हो उठा। उसने कहा, "एक बार हमने शस्त्र रख
दिए तो पोप और उसके सहायक हमे पूरी तरह कुचलकर रख
देंगे और फिर हमारी स्वतत्रता की कल्पना केवल स्वप्न बनकर
रह जाएगी।" लेकिन 'तरुण सघ' की उस बैठक मे समझौता-
बादी पलायनवादियो के सम्मुख गरीबाल्डी की एक न चली।
गैरीपाल्डी आकोशपूर्वक उठा। उसने अपने साथ मृत्यु पर्यंत
स्वतन्त्रता हेतु लडने वाले सैनिको का आह्वान किया। पांच
हजार सनिक उसके साथ अतिम सांस तक लडने का सकल्प
लेकर चल पडे। शत्रुओ को 'तरुण सघ' के विघटन और वीर
सेनानी गैरोवाल्डी के अकेले पड जाने का समाचार मिल गया
था । उन्होने स्थान स्थान पर सैनिक टुकडियो द्वारा उस पर
आक्रमण किए, हर मुठभेड मे गेरीवाल्डी के काफी सैनिक मारे
जाते रहे। एक ओर से आस्ट्रियन सेना ने गैरीबाल्डी पर प्रबल
वेग से आक्रमण किया । गैरीबाल्डी की सेना छि न-विच्छिन
हो चुकी थी। अब उसके पास केवल नौ सैनि: बचे थे। उसके
साथ सैनिक पहरे के बीच उसकी जीवन-सगिनी अनीता थी।
गैरोबाल्डो थोडी ही देर मे समुद्र के किनारे खडी नावो पर
सवार हो गया।
अब गैरीवाल्डी के साथ उसकी पत्नी अनोता, उसका
विश्वम्त साथी कप्तान लेगिमोरो और मात्र नौ सनिक बचे थे।
71

। । भूख-प्यास, लम्बे संघर्ष और बीमारी के कारण अनीता जर्जर हो चुकी थी। उसने पति से क्षीण स्वर मे याचना की, "क्या कुछ क्षण कही ठहर नहीं सकते " वज साहसी गैरीबाल्डी एक बार सिहर उठा। स्वतन्त्रतादेवी के लिए अपने रक्त की अन्तिम बूंद तक न्यौछावर करने वाला सकल्प-धनी वीर अपनी पत्नी के निष्प्रभ मुख-मण्डल और उस पर खिंची गहरी अवसाद की रेखा से विचलित-सा हो उठा। उसने आसपास दृष्टि दौडाई। कुछ दूर एक टापू दिखाई पडा, नावो का रुख उधर मोड दिया गया। थोडी देर बाद वे सब टीले पर थे। गैरीबाल्डी ने अपनी क्लात पत्नी को लिटाकर उसके मस्तक पर स्नह हस्त रखा ही था कि अकस्मात यहाँ भी आस्ट्रियन सेना की शिकारी टुकडी खोज करती आ धमकी । गैरीबाल्डी के इस छोटे से दल पर गोलियो की वर्षा होने लगी। अंधेरे का लाभ उठाकर वह अपनी पत्नी अनीता को लेकर झोपडी की ओर बढा । उसके बचे-खुचे नौ सैनिक भी अपने नेता की रक्षा के लिए लडते हुए शहीद हो गए। रात्रि के समय नीरव स्थान पर एक छोटी-सी झोपड़ी में इटली का महान सेनानी अपने अनन्य सहयोगी और रुग्ण पत्नी के साथ बैठा कल के लिए सोच रहा था कि पत्नी ने उखडती सांस के साथ पूछा, "अब क्या करोगे?" गैरीवाल्डी ने पत्नी का आशय समझते हुए सान्त्वनापूवक उत्तर दिया, "अन्तिम दम तक इटली की स्वतत्रता के लिए लड़ता रहूंगा, अनीता।" ये शब्द सुनकर अनीता के मुखमण्डल पर एक बार प्रसनता की चमक उभर आयी। दूसरे ही क्षण वुझते दीपक के समान क्षीण स्वर में उसने कहा, "पानी।" गरीबाल्डी ने चारो ओर देखा, इससे पूर्व दि वह पानी की व्यवस्था करता, अनीता चिरनिद्रा 12 में विलीन हो गई। "मित्र लेगिओरो"गरीबाल्डी ने असीम वेदना को समेटते हुए कहा "अनीता भो हमे छोडकर चली गई।" लेगिओरो को गैरोबाल्डा को इस असोम पोडा का अनुभव हुआ। वह बोला, "यह हमारी कठोरतम परीक्षा है, मित्र नियति ने अब तुम्हे इटली की सेवा के लिए पूर्ण बन्धनमुक्त कर दिया है ।" सहसा मार्ग में रात्रि बिताने वाले समीप के किसान ने खबर दी- आस्ट्रियन सैनिक उन्हे खोजते घूम रहे हैं और किसी भी क्षग यहां तक पहुँच सकते हैं । आप यहाँ से सुरक्षित स्थान पर चले जायें। गैरोबाल्डी ने कप्तान लेगिओरो की ओर देखा । फिर एक दृष्टि किसान पर डालते हुए बोला, "तो फिर मेरी पत्नी का अन्तिम सस्कार तुम्ही कर देना, मेरे दोस्त । मेरे पास समय बहुत कम है।" गैरोबाल्डो ने ममतापूर्ण दृष्टि से अन्तिम बार पत्नी को मृत देह की ओर निहारा और वह महान स्वतन्त्रता-योता अपने स्वात त्र्य युद्ध के लिए फिर आगे बढ चला। 34 अणु मे छिपा विराट दर्शन प्रख्यात समाजसेवी एव महान पत्रकार श्री गणेशशकर विद्यार्थी अपने एक सहयोगी के साथ रेल मे यात्रा कर रहे थे। सहसा रात्रि को उठकर उन्होने देखा कि उक्त सहयोगी के पास पर्याप्त ओढ़ने के वस्त्र नही हैं और वे ठड में सिकुड रहे हैं। विद्यार्थी जी ने अपना कम्बल उन्हें मोढ़ा दिया और स्वय हल्की-सी चादर लेकर सो रहे। प्रान आँख खुलने पर उक्त सहयोगी बघु ने देखा कि गणेशशकर विद्यार्थी का कम्बल उनके पर पहा

है और विद्यार्थी जी सर्दी मे सिकुडे पडे हैं । उह नीद तो आयी
नही थी, बस लेटे हुए ही थे। उन्होने सहयोगी से पूछा, "कहो,
रात को नीद तो ठीक आ गई न?" उक्त कायकर्ता ने पूछा,
"आप रात भर सर्दी मे ठिठुरते रहे और "
"अरे, कुछ नहीं।" विद्यार्थी जी बीच में टोकते हुए बोले,
"मुझे तो ऐसे ही रहने की आदत है।" उस क्षण लगा कि
कतव्य-पथ का वह अडिग हिमालय सहयोगियो के लिए अपने
अन्तर मे मोम से भी अधिक तरलता सँजोये है ।
छोटी छोटी बातो मे आत्मीयता के व्यवहार को यह झलक
विद्वतापूण लम्बे प्रवचनो से अधिक प्रभावी होती है। राष्ट्रीय
स्वयसेवक संघ के भूतपूर्व सरसघचालक श्री गुरुजी एक बार
कुछ कार्यकर्ताओ के साथ एक ग्राम मे पहुँचे तो एक दीन हीन
किसान भाव विभोर होकर उनके लिए बड़ी श्रद्धा से चाय
लाया। गुड को वह चाय इतनी काली थी कि उसे औषधियुक्त
काढा ही कहा जाना उचित है। श्रद्धापूर्वक किसान ने उसे अपनी
महीनो की मैली धोती मे छानना भी उचित समझा । आखिर
वह विना छनी चाय कैसे देता गुरु जी को | गुरु जी ने बडे प्रेम
से अनेकानेक धेयवाद देते हुए, भरपूर प्रशसा करते हुए चायपान
किया, लेकिन अय साथियो ने चाय पीने मे असमथता प्रकट
की। बाद मे गुरु जी से एक राहयात्री कायकर्ता ने पूछा, "जिस
चाय को देखकर भी वमन हो जाय, ऐसी चाय आप इतनी
प्रशसा करके कैसे पी गये"
गुरु जी ने निश्छल स्नेहपूर्वक उत्तर दिया, "अरे, चाय को
क्यो देखते हो, उस असीम श्रद्धाभाव को देखो जिससे प्रेरित
होकर उसने त मयतापूर्वक वह चाय बनाई और अपने बहुमूल्य
।
.
74

वस्त्र मे छानकर लाया ।" और वह अपनी सहज वृत्ति के अनुसार उ मुक्त रूप से हंस पडे। स्वामी विवेकान द ने इस महानता की ओर सकेत कर कहा था, 'महानता इस बात मे नही है कि ज्ञान का कितना असीम भडार हमने अपने सिर पर लाद लिया है, अपितु इसमे है कि अपने दैनिक जीवन मे मनुष्यत्व का हम कितना आह्वान कर पाये हैं।" 35 जन-जागरण ही कर्तत्य है "आप मे से कोई भी पुलिस को न रोके न कुछ कहे । मैं स्वय पुलिस के ह्वाले होता हूँ।" यह आदेश देकर उस दिन पडित दामोदर श्रीपाद सातवलेकर ने गुरुकुल के विद्यार्थियो को रोक लिया। पुलिस ने उनके हाथो मे हथकडियां और कमर मे रस्सिया जकड दी और से ट्रल जेन मे ले जाकर खूनी कैदियो के वार्ड मे बन्द कर दिया । अपने बचाव मे न्यायाधीश के सम्मुख सातवलेकर ने अदालत मे कहा, "माननीय न्यायमूर्ति, मैं वेदो का पुजारी हूँ। वेदो की आज्ञा है कि यदि देश परतत्र हो जाए तो क्षत्रीय को जागत करके देश को परत यता से मुक्त करना ही सच्चे ब्राह्मण का कर्तव्य है । मैं ग्राह्मण हूँ। आप जो कहते हैं, वह सब मैंने लिखा है । उसे लिखने के बारे मे जो उचित निर्णय हो, उसे खुशी से दें।" विद्या के लिए सक्ष-त्याग वेदो के प्रति ऐसी अनय श्रद्धा ने ही पडिन सातवलेकर को ज्ञान का यह कटकाकीण पप अपनाने की प्रेरणा दी थी।

सातवलेकर जी यशस्वी चित्रकार थे और चित्रकला से उन्हें हजारो रुपये की आय होती थी तथा वे राजसी ठाट-बाट से रहते थे। लेकिन परतत्रता के उस काल में जब उन्हें लगा कि महान वेदज्ञान के द्वारा ही राष्ट्रीय चेतना जागृत की जा सकती है तो तत्क्षण अपनी जीविका के इस साधन को ठुकराकर उन्होने अपना सर्वस्व वेदज्ञान की साधना मे समर्पित कर दिया। एक बार गुरुकुल कागडी मे प्रोफेसर महेशचरण जी ने सातवलेकर जी से कहा, "पडित जी, अपने एक परिचित का आदमकद चित्र आपसे बनवाना है।" "मैं अब कभी चित्र न बना सकूगा।" पडित जी ने उत्तर दिया। प्रोफेसर महेशवरण ने सोचा कि शायद वे मिलने वाली धनराशि के प्रति शकित हैं इसलिए वे बोले, "पडित जी, आप निश्चिन्त रहिए, मैं आपको पांच हजार रुपये की राशि दिलवा दूगा।" पडित सातवलेकर मुस्कराये, बोले, "भाई, मैंने तो वेद के लिए सन्यास ले लिया है, इसलिए पांच हजार क्या, अब मैं पचास हजार के प्रलोभन से भी यह काय नहीं कर सकूगा ।" "कौन कहता है कि आपने सन्यास ले लिया है ? आपने तो गृहस्थियो के वस्त्र पहने हुए हैं ?" प्रोफेसर महेशचरण बोले । "सन्यास वस्त्रो केरग से नहीं, मन की भावना से होता है। मैंने वेद के लिए सन्यास लिया है, और सब काम धषे छोड दिए हैं।" पडित जी ने उत्तर दिया। उनके इस उत्तर से आसपास बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गये। सहभाग अभावों से जूझते हुए भी साधनों का अनुपम परित्याग था यह । वेदों के लिए समर्पित सही अर्यो मे वैदिक पद्धति से जीने 76

?
हाला यह महापुरुष अपने व्यक्तित्व को समष्टि में विलीन कर
चुका था। उस समय पडित जी 19 वर्ष के वयोवृद्ध थे औध
में आयोजित राष्ट्रीय स्वयसेवक सघ के शस्द शिविर की एक
पटना है । पडित जी शिविर मे उपस्थित कम अचानक धनयोग
वर्षा होने लगी। वर्षा मे भीगते हुए देखकर एक अधिकारी
उनसे बोले, "यहां वर्षा तेज है इसलिए आप मोटर से बस्ती मे
चले जाइये-ये स्वयसेवक पीछे से आते रहेगे।" सुनकर पडित
जी बोले, "मेरी नजरो के सामने ये छोटे छोटे किशोर स्वयसेवक
पानी मे भीग रहे हैं, फिर भला मै यहाँ से कैसे जा सकता हूँ
मुझ वृद्ध की चिन्ता आप क्यो करते हैं? पहले इन सबकी
व्यवस्था कर दीजिए। मैं भी इन्ही के साथ जाऊँगा।"
मारमचरित की साथकता
जब पडिन जी से किसी ने एक बार कहा, "पडितजी,
आप महान वैदिक ज्ञान को पुनर्दीप्त कर रहे हैं, इसके लिए
आपने अपना जीवन होम दिया है अत अपना एक आत्मचरित
तो लिख जाइये ताकि आगामी पीढियो को प्रेरणा मिल सके।"
तब पडित जी ने कहा था, "तुम जो कहते हो वह ठीक है, पर
मै आत्मचरित लिखने की अपेक्षा मरुत्देव का चरित लिखना
अधिक पसन्द करूगा । आत्मचरित लिखने मे जो समय लगेगा,
वही समय यदि साहित्य पर खर्च करूं तो ज्यादा लाभदायक
होगा। आत्मचरित अनुपयोगी नही, पर उसके लिए मै अपना
अमूल्य समय नष्ट करना नही चाहता।"

36 मौत की घाटी से सदेश
धूम मच गई।
वह जब सीखचो के बाहर रहा, नाजी अत्याचारो के खिलाफ
अपनी कलम से आग उगलता रहा । आखिर नाजियों को पकड
मे आ ही गया। जूलियस फ्यूसिक-यही नाम था उस महान
कातिकारी फा। विश्व भर मे उसके लेखो की
वार्डर को एक दिन फ्यूसिक ने कहा, "किसी भी तरह तुम ये
कागज बाहर पहुचा दो।" वार्डर ने उसे श्रद्धापूर्वक देखा और
कागज बाहर पहुचा दिए। यह क्रम लगातार जारी रहा।
ये
साधारण कागज नही, जेल मे लिखे गये नाजी अत्याचारो के
विरुद्ध विस्फोटक दस्तावेज थे। नाजी सरकार हिल उठी।
गैस्टापो के मुख्य अधिकारी (नाजी जर्मनी का खुफिया विभाग)
के सम्मुख जूलियस फ्यूसिक को पेश किया गया। उसने पूछा,
"क्या तुम नहीं समझ पा रहे थे कि तुम्हारा अतकाल आ पहुंचा
है और तुम इस प्रकार अपना सब कुछ खो रहे हो?"
फ्यूसिक का मस्तक गव से ऊंचा हो गया। वह बोला, ' मुझे
गौरव है कि मै अकेला ही शहीद हो रहा हूँ क्योकि तुम मेरे अय
साथियो के बारे में नहीं जान पाओगे।" क्या तुम्हे अभी तक
रूसियो की विजय मे विश्वास है" अधिकारी ने पूछा।
"निसदेह ।" फ्यूसिक ने उत्तर दिया और फिर प्रारम्भ हुआ
असोम यातनाओं का चक्र । फ्यूसिक को हर प्रकार से तोडने की
कोशिश की गई। उसे बताया गया कि यातनाओ से उसके कुछ
साथी दम तोड़ चुके हैं और कुछ रहस्य उगल चुके हैं लेकिन
फ्यूसिक पर इसका कोई असर न पडा। आखिर नाजी अफसरो
को एक तरकीव सूझी। यातनाओ का दौर एकदम बद कर
78

दिया गया। वे उसे लम्बे और सुविधाजनक शाम
ताकि मामा य जीवन को सुख-सुविधा और
आनन्द उसमे जीने की लालसा पैदा कर देगा अपना
निश्चय छोडकर रहस्य उगल दे। किन्तु पावन पर.
इन हथकहो का भी कोई प्रभाव
प्रलोभन दोनों साधन असफल हो गए । आखिर
से सपक किया गया। "कम-से कम उसे अपने परिवार के लिए
प्रेरणा दो।" गेस्टापो अधिकारी ने कहा, "देखो, उससे कहो कि
वह तुम्हारे प्रेम के लिए जीवित रहे । और हाँ, याद रखो, यदि
वह इतने पर भी अडा रहा तो तुम दोनो को आज रात गोली
मार दी जाएगी।" जूलियस फ्यूसिक की पत्नी ने अधिकारी को
शात स्थिर दष्टि से देखा और बोली, "यह मेरे लिए धमकी
नहीं है श्रीमान, यही तो मेरो अन्तिम इच्छा है कि आप मेरे
महान पति को दड दें तो मुझे भी अवश्य दें।" मुलाकात के
समय फ्यूसिक ने कहा, "प्रियतमा, ये हमारी जिन्दगी छीन सकते
हैं लेकिन हमारे गौरव और प्यार को नहीं छीन सकते।" आखिर
उसे मृत्युदण्ड सुना दिया गया । फांसी से पूर्व उससे पूछा गया,
"क्या तुम्हारी कोई अन्तिम इच्छा है " "हा।" फ्यूसिक ने
कहा, 'मेरे देशवासियो कह देना कि मैं मानवता की प्रसन्नता
के लिए जिया, उसी की प्रसनता के लिए मौत का वरण कर
रहा हूं और यह मेरा अपमान होगा अगर मेरे देशवासियो ने
मेरी कब्र पर एक भी आँसू बहाया अथवा शोक का गीत लिखा।"
जूलियस फ्यूसिक आज विश्व भर के क्रानिवारियो का
आदश है। उस महान पत्रकार मौत की घाटी में बैठकर भी
मौत की घाटी से सदेश' नामक पुस्तक मे वह अमर सन्देश
79

दिया जिसमे अवसाद का एक भी शब्द नही बल्कि प्रेरणा के
अनगिनत स्फुलिंग हैं।
फायदा
?"
37 राजसत्ता का दायित्व
'मैं निश्चय ही आज प्रधानमनी से इस अयाय का बदला
लूगा।" वह बडबडाया और भरा पिस्तौल लेकर उनसे मिलने
चल पडा । उसे पता था कि इदौर रियासत के (तत्कालीन)
प्रधानमत्री प्रतिदिन सवेरे नौ से दस बजे तक अपने बगीचे मे
जनता की शिकायतें सुनते हैं। "लेकिन शिकायत सुनाने से
'उद्विग्नमना नाथूराम झुझलाया, "अब तो इस अयाय
के वृक्ष की जड काटकर ही दम लूगा।" इदौर रियासत के
प्रधानमत्री सिरेमल बापना एक एक व्यक्ति से उसकी दुख-दद
कथा सुन रहे थे । नाथूराम सबसे पीछे खडा अपनी बारी की
प्रतीक्षा बेसब्री से कर रहा था। बापना साहब उससे कुछ पूछते,
इससे पहले ही उसने पिस्तोल उनकी ओर तान दी । सिरेमल
बापना तनिक भी विचलित नही हुए । “तुम मुझे मारना चाहते
होन" वे मुस्कराते हुए बोले, "ठीक है, यह काम तो तुम कभी
भी कर सकते हो, म तो हमेशा यही मिलता हूँ । अच्छा हो कि
मारने से पहले मेरे योग्य कोई काय हो तो ले लो, फिर जब चाहो
मार देना।" यह एक कतव्यनिष्ठ शासक की वाणी थी।
नाथूराम उनके व्यवहार से अभिभूत हो उठा। उसके हाथ
से
रिवाल्वर छूटकर धरती पर आ गिरा।
आँखों से आंसुओ को धारा बहने लगी और पश्चात्ताप से
विचलित होकर वह वापना माहब के चरणो मे गिर पड़ा।
80

उदार हृदय बापना साहव ने नाथूराम को उठाकर सीने से लगा
लिया और धैय बंधाकर कहा, "तुम्हे जो तकलीफ है, मुझे
सुनाओ।" नाथूराम ने बताया, "पुलिस ने मेरे विरोधियो से
मिलकर मुझे बर्बाद कर दिया है । मुझ पर अनेक झूठे मुकदमे
चला रखे हैं। एक से मुक्त होता है तो दूसरा चला देते है । अब
मुझमे इस अयाय से लडने का शक्ति नहीं बची है।"
बापना साहब ऐसी घटनाओ से स्वय व्यथित हो जाते थे।
उन्होने स्वय प्रत्येक विभाग को निर्देश देकर सारी फाइले
निकलवाई और सब झूठे केस समाप्त कर दिए।
चौदह वप तक इदौर रियासत के प्रधानमत्री रहने वाले इस
कतव्यपरायण व्यक्ति का सारा समय जनसेवा मे बीतता था
और वेतन का अधिकाश भाग जरूरतमद लोगो की सेवा में ही
लग जाता था जबकि ऐसे पद पर रहने वाले सामान्य कायकर्ता
भी आज करोडो रुपये बटोर लेते है । जब उनसे एक हितचितक
ने कहा, "बापना साहब, कुछ बीमा तो कर दीजिए ताकि
भविष्य मे काम आ सके।" तब बापना साहब ने उत्तर दिया,
"मेरे बीमा कराने से यदि हमारे प्रजाजनो की सुरक्षा हो सके तो
जरूर करूंगा। केवल अपनी सुरक्षा को चिन्ता कैसी ?" और
उन्होने बीमा कराने से इनकार कर दिया।
राजसत्ता के भोग मे मदान्ध हो जाना एक आम बात है।
बापना जी का मत था कि राजसत्ता का दायित्व सेवा का सबसे
बडा किन्तु कठोर दायित्व है। इसलिए उनके पास साधारण
चपरासी मिलने माता तो वे उसे अपने सम्मुख कुर्सी पर विठाते
और उसकी व्यथा-कथा सुनते । उन्होने समता के आदर्शों को
अपने जीवन में पूरी तरह साकार किया। कोई भी अतिथि
81

।
उनके लिए सामान्य नहीं था, सभी असामाय और देवतुल्य ।
एक बार उनके निजी सचिव ने उनके घर ठहरे एक अतिथि को
जो राज्य के ही एक क्लक थे-उनसे पहले भोजन करा दिया।
जर उहे यह पता लगा तो उहोने सचिव से कहा कि सायकाल
का भोजन वे मेरे साथ करेंगे । अतिथि के पूण सम्मान के लिए
ही उन्होंने ऐसा किया।
उनका तन-मन धन प्रजातको के लिए समर्पित था। किमी
व्यथित बेरोजगार युवक ने एक बार उनका द्वार खटखटाया,
'मैं ग्रेजुएट वेकार हूँ। घर मे खाने को एक दाना नहीं है । मा,
वहन और भाई मुझ पर ही आश्रित हैं।" उसने पश्रुपूण दष्टि से
वापना जी की ओर देखकर कहा, "मेरे जीवन को बचा लीजिए,
मुझे कोई नौरो तुरत दे दीजिए।" वापना साहब ने एक क्षण
उसे सरलता से देखा और स्नेह से उसकी पीठ सहलाते हुए बोले,
"युवक, जब तक तुम्हारी नौकरी का प्रबध हो, पचास रुपये
मासिक मुझमे ले जाया करो, शीघ्र ही तुम्हारी नौकरी की
व्यवस्था भी हो जाएगी।" यह कहते हुए उहोने एक लिफाफ मे
रखकर उसे पचास रुपये दे दिये । इसी प्रकार किसी विधवा,
वृद्ध, असहाय जसे अनेक दीन जनो को पेंशन उहोने अपने
वेतन मे से वाँध रखी थी। काश, आज स्वतन्त्र भारत की
राजनीति मे यदि सिरेमल वापना जैसे वरद् पुत्र सक्रिय
होते तो इस विकृत राजनीति मे कितना सुधार होता ।
38 देवत्व के सोपान
'जगर आपको कोई चिट्ठी अग्रेजी मे लिखनी हो तो इसे बला
82

लेना।" दीनबधु एड्रज ने बनारसीदास चतुर्वेदी की ओर सकेत कर कहा। ऋपितुल्य बडे दादा ने एक क्षण चतुर्वेदी जी को देखा और पूछा- "हा, तो चतुर्वेदी, वेदो का अध्ययन कितना किया है तुमने ॥ "कुछ भी नहीं।" चतुर्वेदी जी ने लज्जापूवक सिर झुकाते हुए कहा । "भारतीय दशनशास्त्र के विषय मे कुछ जानते हो?" "नहीं जानता।" "मूल बातें भी नहीं जानते " बडे दादा ने अचरज से पूछा। 'नही जानता।" सकोचपूवक चतुर्वेदी जी बोल । बडे दादा ने आश्चय से चतुर्वेदी जी को देखा। वे नाम के साथ पडित का तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे। बोले, "अच्छा, बैठो। कुछ मोटी बातें सुन लो।" और बडे दादा चालीस- पंतालीस मिनट तक भारतीय दशन पर भाषण देते रहे। इसकी रूपरेखा समझाते रहे। ये ज्ञान वारिधी थे द्विजे द्रनाथ ठाकुर, महपि देवेद्रनाथ के ज्येष्ठ सुपुत्र और महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बडे भाई। लेकिन अपने प्रकाड पाडिल्य सरल जीवन और प्राणिमात्र के प्रति अपार मनता के कारण ये सभी के बडे दादा कहलाते थे। उनका महान जान द्रवित होकर जीवन की अजस्र धारा बन गया था। अद्वैतवादी बडे दादा उस दिन भोजन करने बैठे तो एक कोर अपने मुह मे डालते और एक सामने बैठे मैले कुचले वस्त्रधारी बच्चे को खिलाते । वह उनके नौकर का वालक था। उनकी जमीदार परिवार की महिलाओ 83 ? ने देखा तो अचरज से दातो तले अगुली दबा ली, "वडे दादा, यह क्या 'इससे अधिक कोई क्या कहता उन्हे । कोई ब्राह्मण आया, "मेरी बेटी का विवाह है, कुछ सहायता कीजिए दयानिधान ।" वडे दादा ने देखा इस समय उनके पास कुछ नहीं है। सहसा उनका ध्यान बाहर गया । “सुनो।" वे बोले, ' इस समय और तो कुछ मेरे पास नहीं है भैया, यह घोडागाडी है, इसे ले जाओ और वेचकर काम चलाओ।" और उन्होने याचक को घोडा गाडी दे दी। महर्षि देवेन्द्रनाथ को ऐसा लगा कि अब अपनी जिम्मेदारी वांटने का समय आ गया है। उन्होने अपने ज्येष्ठ और योग्यतम इस पुत्र को जमीदारी का काम सौप दिया। बडे दादा लगान उगाहने गावो मे पहुंचे। उनकी उदारता और दानवीरता के किस्से प्रसिद्ध थे । अत किसानो ने कहा, "हुजूर, खाने को नहीं मिलता, लगान कहाँ से दें ?" किसानो की गरीबी और भोजन न मिलने की बात से वे द्रवित हो उठे तुरन्त पिताजी को पत्र भेजा, “यहाँ दुर्भिक्ष पडा हुआ है, तुरन्त रुपया भेजो।" ज्ञान और कर्म के समय की इस साकार प्रतिमा के प्रथम दशन के बाद गाधी जी ने श्री द्विजेन्द्रनाथ के लिए साथक ही कहा था, "इतने दिनो बाद भारतवर्ष के प्राचीन ऋषि की मूर्ति देखने को मिली। आज तक केवल पुस्तको मे ही ऐसा पढ़ा था। जो पशु पक्षी हम लोगो को आवाज सुनकर भाग खड़े होते हैं, वे ही प्रेमवश बडे दादा के सगी हैं । अपूर्व है यह मत्री और प्रेम की लीला।" नि सदेह असीम ज्ञान जब दप की धुध न बनकर कर्म का दपण बनता है तभी देवत्व के सोपान शुरू होते हैं। . 84

39 आचरण की सुगन्ध बिखेरो
"कल प्रात मत्रिमण्डल की एक आपात् वैठक गवनर जनरल
माउटबेटन की अध्यक्षता मे होगी।' क्नल ने सैनिक अधि
कारिया की तरफ देखते हुए कहा, 'ध्यान रहे यह महत्त्वपूर्ण
नक्शा बैठक से पूर्व तैयार चाहिए।" अधिकारी गण नक्शा
बनाने में जुट गए। 1947 के सत्ता हस्तातरण के उन दिनो मे
प्रत्येक काम सतकता की अपेक्षा रखता था। दिनभर वे सैनिक
अधिकारी नक्शा बनाने में जुटे रहे। इसमे भारतीय सेना के
सभी ठिकाने दिखाने थे। सायकाल नक्शा पूर्ण कर जैसे ही
अधिकारी गण उठे कि ले० श्रीनिवास सिन्हा चौक उठे, "अरे,
यह तो सारा नक्शा ही गलत बन गया। वास्तविक ठिकानो के
बजाय इसमे प्रस्तावित ठिकाने दिखा दिये गये।"
"अब क्या होगा?" एक सहयोगी अधिकारी ने घबराहट
भरे स्वर में कहा । क्या हो सकता है अन?" सिन्हा बोले,
"प्रात बैठक है, कनल हमे माफ नहीं करेंगे इस भूल के लिए।"
सैनिक अधिकारी डरते डरते तत्कालीन कर्नल मानेक शा के
पास गये । सब सोच रहे थे कि वे बरस पड़ेंगे। कर्नल भानेक शा
को डरते डरते सभी भूलें बताई गईं। "पूरी रात तुम
लोगो के पास है, फिर घबराहट कैसी ?" कनल मुसकराये,
"तरोताजा होकर फिर से जुट जाइये, रात भर मे काम पूरा हो
जाएगा।" इतनी भारी भूल के वावजूद कनल के चेहरे पर उद्वेग
या क्रोध की एक रेखा न उभरो देखकर सैनिक अधिकारियो
की दिनभर की थकान मिट गयी। इस अनपेक्षित सौम्य
व्यवहार से उनका मन खिल उठा। भोर से पूर्व नेक्शा तैयार हो
85

चुका था।
भयकर उद्वेगकारी परिस्थितियो मे आचरण की सुगध
विखेरने वाले ऐसे नायक काया पर नही, हृदयो पर राज्य करते
हैं । ऐसे ही जननायक थे राजकुमार फिलिप । उस दिन वे जहाज
मे यात्रा कर रहे थे। उनके विशेष सम्मान और सुरक्षा की
व्यवस्था की गई थी। अत्यधिक सज-धज के साथ अपने प्रिय
राजकुमार के स्वागत के लिए मद गति से शाही वरा अल्पाहार
लेकर आ रहा था, ताकि वातावरण की तनिक भी हलचल उहे
कष्ट न पहुंचा दें। किन्तु भरपूर सावधानी के वावजूद सहसा
उसे ठोकर लगी। सारा सामान बिखर गया। काफी कुछ
राजकुमार के कपडो पर भी विखरा। शाही सेवक कांप उठा इस
दुघटना पर।
सहसा राजकुमार फिलिप झुके और फर्श पर से नाश्ते के
समोसे आदि बीनने लगे। फिर मुसकराकर अपनी पत्नी से
बोले, "डालिंग, मैंने अपने हिस्से के बटोर लिये हैं, तुम अपने
हिस्से के उठाओ।" एक स्निग्ध दृष्टि उहोने युवक बैरे पर
डाली। इससे पहले कि वह पश्चात्ताप का कोई शब्द कहै, वे
मुसकराते हुए बोले, "अब तुम जा सकते हो।"
प्ररयात विचारक जेम्स एलेन ने ऐमे ही उदार मानवो को
लक्ष्य कर कहा था, "इस धरती पर यदि कुछ बिखेरना ही
चाहते हो तो आचरण की सुगध के ऐसे बीज बिखेरो ताकि चारो
तरफ प्रेम और प्रसन्नता की बगिया लहलहा उठे।"
R
86

40 कर्म की भाषा मे संवाद महान वैज्ञानिक आइस्टीन की ख्याति विश्वभर में फैल चुकी थी। अनेक स्थानों से उनके पास स्वागत निमत्रण आते। विद्वानों को आशा रहती थी कि इन अभिनन्दन समारोहो मे आइस्टीन अपनी प्रखर मेधा और महान अनुवीक्षण शक्ति का शायद कोई रहस्य खोल देंगे। इसी क्रम मे एक दिन कोलम्बिया के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. फेक आयडेलाटे ने आइस्टीन के सम्मान में एक प्रीति सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन मे डॉ० फेक आयडेलाटे ने वडे गौरव और आत्मविश्वास के साथ कहा, "हमे गर्व है कि महान वैज्ञानिक और विलक्षण बुद्धि के स्वामी आइस्टीन आज हमारा मार्ग- दशन करने के लिए उपस्थित हैं।" प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. फेक ने कहा, "इस युग की ही नहीं, सभवत आगामी युगो तक को दुलभ प्रतिभा का प्रतिनिधि मानव हमारे सामने ज्ञान के नये आयाम प्रस्तुत करेगा।" आइस्टीन खडे हुए। सभी उपस्थित अतिथि श्रोताओ ने स्वय को धन्य माना कि आर्ग उन्हें ऐसे प्रतिभा सम्पन्न वैज्ञानिक से कुछ दिशा-दर्शन प्राप्त होगा। "सज्जनो ।" आइस्टीन बोले, "मुझे अत्यधिक खेद है कि मेरे पास आप लोगो से कहने के लिए अभी कुछ भी नही है ।" यह कहकर वे अपने स्थान पर आ बैठे। अतिथियो मे असन्तोष की एक तीव्र लहर दौड गई । उहें आइस्टीन का भाषण सुनने के लिए ही तो बुलाया गया था। डॉ. फ्रेंक ने अपने आतिथेय की लाज रखने के लिए उनसे पुन निवेदन किया कि वे कुछ तो बोलें। आइस्टोन पुन मच पर 87 पहुंचे, "मुझे क्षमा कीजियेगा।" वे बोले, "जब भी मेरे पास कहने के लिए कुछ होगा, मैं स्वय आप लोगो के सम्मुख उपस्थित हो जाऊँगा।" विद्वान श्रोता ठगे से रह गये। उनमे से अनेक बडबडाये,"हम आइस्टीन के दशन करने तोनही आये थे।"किसी प्रकार डॉ. फक ने वातावरण को सामान्य बनाया । समय बीतता गया। सब लोग इस घटना को भूल गये थे कि ठीक छ वर्ष बाद डॉ. फक आयडेलाटे के पास आइम्टीन का तार आया, "मित्रवर, अब मेरे पास कहने के लिए कुछ है--माय अतिथियो को बुलाइये।" शीघ्र ही दूसरे दिन साहित्यकारो के प्रीति सम्मेलन का आयोजन किया गया। आइस्टीन मच पर आये और अपना नया वैज्ञानिक सिद्धान्त 'क्वाटम थ्योरी' समझाना शुरू कर दिया। पांच दस मिनट नही, आइस्टीन धारा- प्रवाह एक घटे तक यह वैज्ञानिक सिद्धा त समझाते रहे। साहित्यकार इस बार भी ठगे से देखते रहे । उहे इस विज्ञान- दर्शन का एक शब्द भी समझ मे नही आ रहा था । अपने सिद्धात की व्याय्या करके आइस्टीन ने विजयी मुद्रा में अपना स्थान ग्रहण किया। अत मे डॉ० फेक खडे हुए। उनके चेहरे पर अपरिमित सतोष की ओभा थी। वे बोले, "मित्रो, हम सब साहित्यकार हैं इसलिए महान वैज्ञानिक का एक शद भी हमारी समझ मे नही आया, लेकिन आइस्टीन ने हमे एकाग्न साधना का वह मम समझा दिया है, जो हजारो दशन ग्रथ भी नही समझा सकते।" डॉ० फ क ने अतिथियो से पूछा, "क्या उनकी एकाग्र साधना का यह मौन स देश काफी नहीं है कि जब तक उनके सम्मुख कृति न हो, वे अनावश्यक एव भी शब्द बोलना काय शक्ति का अपव्यय 88 समझते हैं " प्रत्युत्तर मे उस क्षण तालियो की गडगडाहट से अतिथि कक्ष गूंज उठा। श्रोताओ ने उस क्षण हजारो दर्शन- शास्त्रो के साथ एकाग्र साधना के महत्त्व को साकार देखकर आइस्टोन का हार्दिक अभिन दन किया। 41 महत्तर की खोज मे न्यूयार्क के विख्यात कहानीकार जेम्स थर्वर की कहानी पर बनी फिल्म 'वाल्टर सिटी' ने प्रदर्शित होते ही अपूर्व सफलता प्राप्त कर ली। इसकी सफलता के कारण बडे बडे निर्माताओ ने थर्वर को फिल्म कथा लिखने के लिए अनुबधित करना चाहा। प्रतिदिन ऐसे प्रस्तावो के अनेक पन आये। थर्वर उस समय 'न्यूयार्कर' पत्र में काम करते थे। फिल्म निर्माताओ के पास धन का अपार प्रलोभन था लेकिन थवर उन प्रस्तावो को एक नजर देखते और रद्दी की टोकरी में डाल देते । निर्माता गोल्डविन ने सकल्प किया कि किसी भी कीमत पर इस महान कथाकार को मैं अनुबधित करके ही रहूँगा। वह प्रतिदिन धनराशि बढाकर पत्र लिखते लेकिन प्रत्युत्तर मे जेम्स थवर का तुरन्त उत्तर होता कि "यूयाकर' के संपादक मि० रास ने मेरे वेतन मे इससे अधिक वृद्धि कर दी है। आखिर वेतन की राशि बढाते-बढाते गोल्डविन ने पत्र लिखा, "मैं आपको पच्चीस हजार डालर प्रति सप्ताह दूगा । निश्चय ही इससे अधिक तो समाचार-पत्र नहीं दे सकता, इसलिए मैं आशा करता हूँ कि इस प्रस्ताव को आप नही ठुकरायेंगे और तुरन्त स्वीकृतिसूचक उत्तर देंगे।" जेम्स थर्वर ने लापरवाही से पत्र देखकर रद्दी की टोकरी 89

मे डाल दिया और ग्रोविन को लिखा, "रास ने मेरा वेतन
पच्चीस हजार डालप्रति सप्ताह कर दिया है ।" थवर को
अनुबधित करने का संकल्प करने वाला गोल्डविन इस पत्र को
पाकर झल्ला उठा, "यह सब झूठ है, कोई अखबार थर्वर को
इतना पैसा नहीं दे सकता।" उसने थवर को क्रोध मे पत्र लिखा,
'3 ब मैं आपको प्रति सप्ताह पन्द्रह हजार से अधिक नहीं दे
सकता । इतने वेतन पर जब आपको आना हो तो आ जायें।"
थोडे ही दिन बाद निर्माता गोल्डविन को थवर का एक पत्र
मिला । उसमे लिखा था, "मि० गोल्डविन, कृपा के लिए
धयवाद । रास ने भी मेरे वेतन मे आपके अन्तिम प्रस्ताव के
अनुसार ही कटौती कर दी है।"
गोल्डविन इस विचित्र लेखक के चिन्तन से आश्चयचकित
रह गया। प्रख्यात फिल्म निर्माता गोल्डविन थवर से मिलने का
लोभ सवरण न कर सका। उसने अपनी कार निकाली और
पवर के निवास पर जा पहुंचा। जेम्स थवर उस महान फिल्म
निर्माता को अपने निवास पर देखकर आश्चयचकित हुए।
गोल्डविन ने पूछा, "मि० थर्वर, तुम्हे "ययाकर' क्या किसी भी
समाचार-पत्र मे मेरे प्रस्ताव के मुतायिक धन मिलना असभव
है, फिर भी तुमने इतने आकषक वेतन प्रस्ताव को क्यो ठुकरा
दिया?"
"मिस्टर गोल्डविन !"पवर ने उत्तर दिया, "नि मदेह मुझे
यूयार' मे यम पैसा मिलता है और आपके बरायर कोई भी
नहीं दे सकता लेकिन मेरे अस्वीकार करने का कारण दूसरा
है।" "क्या ?" गोल्डविन ने आश्चयपूर्वक जानना चाहा।
धनाजनकी जीवन के लिए अनिवार्यता है लेफिन उससे
.
90

भी ऊपर है जीवन का सतोषदायी लक्ष्या और.पीथा मझे 'न्यूयार्कर' के माध्यम से अपने देश और समाज के लिए लिखने के मे मिल सकता है, वह अन्य कही नहीं।" थर्वर ने गोल्डविन की ओर विजेता की दृष्टि से देखते हुए पूछा, "क्या जीवन लक्ष्य के इस बहुमूल्य आत्मसतोष की कीमत आप दे सकते हैं ? प्रत्येक वस्तु को धन-बल से खरीदने वाले गोल्डविन को उस दिन समझ मे आया कि धन से भी महत्तर वस्तु को उन्होने देखा है। . 42. कर्म का आदर्श "आखिर तुमने इस बार फिर त्यागपत्र दे दिया ?" इग्लैंड के प्रख्यात मानवतावादी पत्रकार एच० डब्ल्यू. नेविनसन से उसके पत्रकार मित्र ने पूछा । उसने व्यग्रतापूर्वक कहा, "क्या जीवन भर तक तुम अपने सिद्धान्तो के लिए दर दर भटकते ही रहोगे?" नेविनसन ने मुसकराकर उत्तर दिया, "भई, चुप रहना मेरे लिए मुश्किल है, सिद्धान्त के सामने अपनी वाणी को रोकना मेरे लिए मृत्यु के समान है। और, हो," नेविनसन ने गम्भीरता से कहा, "मेरा समय हो गया है, मुझे महिला मताधिकार सम्मेलन की मीटिंग मे जाना है।" मित्र ने टोका,"ठीक है, लेकिन क्या जरूरी है कि रिपोटिंग का काम छोडकर तुम उनके संघर्ष मे ही कूद पडो और पत्रकार के बजाय हर जगह एक योद्धा बन जाओ" नेविनसन मुसकराया और बिना उत्तर दिए सम्मेलन के लिए चल पडा। सभास्थल महिलाओ से भरा हुमा था। इसमे विशेष आमनित इग्लड के मत्री लायड जाज जैसे ही बोलने के लिए 91

मे डाल दिया और योजविन को लिया, "रास ने मेरा वेतन
पच्चीस हजार साल प्रति सप्ताह कर दिया है।" यवर को
अनुवधित पने का संकल्प करने वाला गोल्डविन इस पत्र को
पाकर झल्ला उठी, "यह सब झूठ है, कोई अखबार थवर को
इतना पैसा नहीं दे सकता।" उसने थवर को प्रोध मे पत्र लिखा,
' व मैं आपको प्रति सप्ताह पन्द्रह हजार से अधिक नहीं दे
सकता । इतने वेतन पर जब आपको आना हो तो आ जायं।"
थोडे ही दिन बाद निर्माता गोल्डविन को थवर का एक पत्र
मिला। उसमे लिखा था, "मि० गोल्डविन, कृपा के लिए
धन्यवाद ! रास ने भी मेरे वेतन मे आपके अन्तिम प्रस्ताव के
अनुसार ही कटौती कर दी है।"
गोल्डविन इस विचित्र लेखक के चिन्तन से आश्चयचकित
रह गया। प्रख्यात फिल्म निर्माता गोल्डविन थर्वर से मिलने का
लोभ सवरण न कर सका। उसने अपनी कार निकाली और
यवर के निवास पर जा पहुंचा। जेम्स थर्वर उस महान फिल्म
निर्माता को अपने निवास पर देखकर आश्चर्यचकित हुए।
गोल्डविन ने पूछा, "मि० थर्वर, तुम्हे "ययाकर' वया, किसी भी
समाचार पत्र में मेरे प्रस्ताव के मुताबिक धन मिलना असभव
है, फिर भी तुमने इतने आकषक वेतन प्रस्ताव को क्यो ठुकरा
"मिस्टर गोल्डविन ! 'यवर ने उत्तर दिया "नि सदेह मुझे
यूयाकर' मे कम पैसा मिलता है और आपके बराबर कोई भी
नहीं दे सकता लेकिन मेरे अस्वीकार करने का कारण दूसरा
है।" "वया ?" गोल्डविन ने आश्चयपूर्वक जानना चाहा।
'धनाजन की जीवन के लिए अनिवार्यता है लेकिन उससे
दिया"
.
90

FOR भी ऊपर है जीवन का सतोपदायी लक्ष्य और त्रिीकातोष महो 'न्यूयार्कर' के माध्यम से अपने देश और समाज के लिए लिखने मे मिल सकता है, वह अन्य कही नही।" थर्वर ने गोल्डविन को ओर विजेता की दृष्टि से देखते हुए पूछा, "क्या जीवन लक्ष्य के इस बहुमूल्य आत्मसतोष को कीमत आप दे सकते हैं ?" प्रत्येक वस्तु को धन-बल से खरीदने वाले गोल्डविन को उस दिन समझे मे आया कि धन से भो महतर वस्तु को उन्होंने देखा है।। 42 कर्म का आदर्श "आखिर तुमने इस बार फिर त्यागपत्र दे दिया ?" इग्लैंड के प्रख्यात मानवतावादी पत्रकार एच० डब्ल्यू. नेविनसन से उसके पत्रकार मित्र ने पूछा । उसने व्यग्रतापूर्वक कहा, "क्या जीवन भर तक तुम अपने सिद्धान्तो के लिए दर दर भटकते ही रहोगे?" नेविनसन ने मुसकराकर उत्तर दिया, "भई, चुप रहना मेरे लिए मुश्किल है, सिद्धान्त के सामने अपनी वाणी को रोकना मेरे लिए मृत्यु के समान है। और, हाँ," नेविनसन ने गम्भीरता से कहा, "मेरा समय हो गया है, मुझे महिला मताधिकार सम्मेलन की मीटिंग में जाना है।" मित्र ने टोका,"ठीक है, लेकिन क्या जरूरी है कि रिपोटिंग का काम छोडकर तुम उनके संघर्ष मे ही कूद पडो और पत्रकार के बजाय हर जगह एक योद्धा बन जाओ?" नेविनसन मुसकराया और विना उत्तर दिए सम्मेलन के लिए चल पडा। सभास्थल महिलाओ से भरा हुआ था। इसमे विशेष आमत्रित इग्लैड के मत्री लामह जाज जैसे ही बोलने के लिए 91

खडे हुए कि महिलाओ के लिए मताधिकार मांगने वाली
महिलाएं घडी हो गयी। वहीं से एक स्वर उभरा, "हमे ठोस
काम चाहिए, कोरे आश्वासन नहीं।' फिर क्या था, चारो ओर
से शोर मच गया। प्रबधको (पुलिस) ने महिलाओ को पकड़
पराडकर बाहर फेंकना शुरू किया। भला निमम नेविनसन कैसे
चुप रह सकते थे। वे उठ खडे हुए और बोले,"मि० लायड जाज,
क्या इस बार फिर बेरहमी से कार्यवाही की जाएगी" बात
यह थी कि इससे पहले भी महिला मताधिकारी की मांग करने
वाली महिलाओ को लायड जार्ज ने एक मीटिंग मे से जबरदस्ती
उठवाकर बाहर फिकवा दिया था। नेविनसन तब तक इस
अयाय के विरुद्ध चिल्लाते रहे जब तक उहे मारते मारते बेहोश
करके सडक पर न फेंक दिया गया। होश आने के बाद घर
पहुँचे तो नेविनसन को पत्र के सम्पादक ए० जी० गाडिनर द्वारा
नौकरी से निलम्बन का आदेश मिला । अगले दिन नेविनसन
ने जब अपने पत्र 'डेली न्यूज' में ही महिला मताधिकार के विरुद्ध
अग्रलेख देखा तो वे क्षुब्ध हो उठे और तुरन्त त्यागपत्र लिखकर
भेज दिया। अब सिद्धान्तवादी नेविनसन के सामने फिर भयकर
अनिश्चितता आ खडी हुई। आदशवादी नेविनसन फिर भूस
और अभाव से लड़ते रहे । लेकिन जब एक दिन उहे समाचार
मिला कि महिलाओ को मताधिकार मिल गया है तो उनकी
प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। इसका सबसे बडा श्रेय नेविनसन
को ही दिया गया, महिलाओ के द्वारा विशाल सम्मेलन में
हार्दिक धयवाद के साथ ही 2805
उस दिन नेचिनसन ने अपनी
के विरुद्ध सफलता के चन्द क्षणो
भेंट
v
८

पुरस्कार होती है। क्या ही अच्छा होता कि सफलता के
महोत्सव के इन क्षणो में मेरे जीवन का अवसान हो जाता । मैं
एक विजयी योद्धा के रूप मे इस धरती से चला जाता। काश,
मृत्यु के लिए व्यक्ति उचित अवसर चुन सकने में समर्थ हो
पाता।"नेविनसन की यह आकाक्षा ध्येय के साथ एकाकार होने
को ही परिचायक थी। वह आदर्शो के लिए जिया लेकिन उसकी
कामना थी कि वह मृत्यु का आलिंगन भी विजयी योद्धा की
भांति ही करे-जीवन और मृत्यु के बीच कोई क्षण अकर्मण्यता
का उसे स्वीकार न था।
43 • पीडितो का ध्यान
"कुम्भ नहाने आया था।" दीनता मे महाकवि निराला की ओर
याचनाभरी दृष्टि से देखते हुए उसने कहा, "मेरे सभी वस्त्र और
सामान चोरी चला गया, उसमे कुछ पैसे भी थे।" वह केवल
एक लगोटो पहने सीधे गगानट से आया था, सर्दी से कांप रहा
था। "किसी तरह दिन का समय तो सूरज को धूप मे कट
जाएगा।" उसने कहा, "लेकिन रात को सर्दी विना वनो के
बिताना मुश्किल है।"
निराला जी ने उसे नीचे से ऊपर तक घूरकर देखा और एक
क्षण को भी देर किये बिना कधे से अपना कम्बल उतारकर उसे
दे दिया। "यह आपने क्या किया?" साथ में खडे उनके मित्र
वाचस्पति पाठक ने पूछा, "जानते हैं, थोडी देर मे यह कम्बल को
गुदडी बाजार मे जाकर चार आने मे बेच देगा।" पाठक जी
उलाहने भरे स्वर मे वोले, "लगता है, आप अपना नाम सार्थक
93

।
करने पर ही तुले हैं । भला इस प्रकार सहानुभूति के नाम पर
छले जाने मे तुक क्या है ?" "धोखा भी हो सकता है, और
इसकी वात सच भी हो सकती है।"
कुछ दिन बाद काग्रेस के अधिवेशन में दर्शक की हैसियत से
गये निराला जी अचानक 'निराला जी, निराला जी' की पुकार
से चौक पडे । देखा-एक व्यक्ति स्वयसेवक की वर्दी मे दौडा आ
रहा है। निराला जी उसे एक्टक देखते ही रह गये, पहचान
नही पाये । "मैं वही हूँ," उसने लडखडाती हिदी मे कहा,
"जिसे आपने ओढने को कम्बल दिया था।" आतरिक श्रद्धा
और कृतज्ञता उसके रोम-रोम से छलक रही थी।
'देश जाना चाहता हूँ, रेल का किराया नहीं है तो कोई
बात नही, भीख मांगते मांगते खाते पैदल चला जाऊंगा,
लेकिा " उसने अपने पैरो की ओर देखते हुए कहा, "पैर जल
जाते हैं, तेज गर्मी से धरती जलती है, एक जोडी चप्पल आप
ले दें तो
लौह मदृश देह और अतक्य बुद्धिशाली इस नरपुगव के हृदय
मे दया ममता के अजस्र स्रोत बहते थे । वे अपनी विवशता पर
लज्जित हो उठे। उनके पैरो मे स्वय जीणप्राय चप्पल थे।
"क्षमा करें, वधु'" वे वोले, ' काश ! मैं तुम्हारी यह सहायता
कर सकता।" "कोई बात नहीं, आप मजबूर है आप खुश रह।"
वह हप-अश्रु विषराता ढेरो आशीर्वाद देता चला गया।
महारवि अपनी विवशता को विस्मत करने के लिए शय
आकाश की ओर निहारने लगे।
"
-
.
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44 लोकहित मे समर्पित "क्या सुनते नहीं लाय बार कहा है कि मैं काम मे लगी है, वहरे हो क्या" महिला ने क्रुद्ध होकर कहा और यह कहते हुए भीगा पोतना उठाकर समर्थ गुरु रामदास के चेहरे पर दे मारा । समथ गुरु रामदास कीचड के गदे पानी से लथपथ हो गए, लेकिन उनके चेहरे पर वही सौम्य शाति बनी रही और वे उस द्वार से वापस लौट आए । छत्रपति शिवाजी ने समय गुरु से आग्रह किया था कि वे राज्य का आतिथ्य स्वीकार करे क्योकि इस राज्य की स्थापना उन्ही के तप तेज का ही तो फल है। किन्तु समर्थ गुरु ने इस प्राथना को यह कहकर ठुकरा दिया था कि सन्यासी का धम सेग है, ग्रहण नही । इसलिए उ होने राज्य से कोई भी प्रतिदान न ग्रहण कर भ्रमण और भिक्षा काय जारी रखा । यह भ्रमण और भिक्षा का वधन उहोने अपने सभी शिष्यो पर लागू किया हुआ था, ताकि वे समाज की वास्तविक दशा और व्यथा-कथा से परिचित रहे । इसी प्रसग मे भिक्षाटन करते हुए वे इस दिन एक कस्वे में पहुंचे । भिक्षा के अवसर पर एक विशाल भवन के द्वार पर जाकर उहोने अभग गाने शुरू किये। गृहिणी ने दूर से ही चिल्लाकर कहा, "मैं काम मे व्यस्त हूँ, फिर कभी आना।" कि तु समर्थ गुरु नो रामभजन मे लोन थे अत गृहिणी की वात सुने बिना गाते रहे । इसी पर क्रुद्ध होकर उक्त गृहिणी ने भीगा पोतना समर्थ गुरु के चेहरे पर दे मारा। इस प्रकार उक्त महिला द्वारा उह प्रताडित, अपमानित करने की घटना कस्बे मे फल गयी। जन समूह विक्षुब्ध हो उठा। 95 - एर महान तपस्वी सयासी का ऐसा अपमान ! लोगो ने उस महिता की भरपूर निदा की। अन्त मे वह लोक प्रताडित महिला स्वय समथ गुरु के सम्मुख क्षमा याचना के लिए उपस्थित होकर बोली, "स्वामी जी, मैं भूल से आप जैसे महात्मा का अपमान कर बैठी । लोकनिंदा के रूप मे मुझे उसका काफी पुरस्कार मिल चुका है । मुये क्षमा करें, तभी मेरा उद्धार होगा।" "बहन " चरणो मे नत महिला से समर्थ गुरु ने स्नेहपूर्वक कहा, तुम किसी भी हालत मे दोपी नही हो, क्योकि तुमने मुझसे जो कहा था अभग गाते रहने के कारण मैं सुन नही सका था।" समर्थ गुरु ने पश्चात्ताप से विगलित महिला को आदत करते हुए कहा, 'फिर तुमने जो पोतना मुझे समर्पित किया वह मेरे बहुन काम आया। मेरे पास भगवान राम की आरती उतारने के लिए दीप बातो को हमेशा कमी रहती थी, तुम्हारे द्वारा दिए इम पोतने को धो धोकर मैंने साफ किया और उसके धागो से सैकडो बत्तिया वना ली।' सभी जानते थे कि शक्ति-सम्पन समर्थ गुरु ने साम्राज्य निर्माण किया लेकिन राजगुरु के पद तक को स्वीकार नहीं किया । ऐमे लोक्सेवक सयासी से ही जनता अभिभूत होकर देश के लिए प्राणापित करने के लिए तत्पर रहती थी। समथ गुरु के समीप अब शिष्यो का जमघट लगने लगा। उहोने देखा कि उनमे अनेक स्वाथवश इकटठे हो गये है । उहे लगा कि ऐसे निकम्मे शिष्यो से तो लोक-कल्याण के माग मे वाधा ही पहुंचेगी, अन इन्हें किसी तरह खिसकाना चाहिए । एक उचित अवसर पर उन्होने शिष्यो के एकत्रित समुदाय मे नग्न तलवार घुमाना - 96

।
शुरू कर दिया और हरेक की ओर मारने के लिए झपटे। अनेक
शिष्य 'समर्थ जी पागल हो गये है' कहते हुए भाग गए।
उनमे ने एक शिष्य यह समाचार कल्याण स्वामी को सुनाने
पहुंचे। वे आए और जैसे ही वे समर्थ गुरु के पास गये, समय गुरु
उनकी ओर तलवार तानते हुए बोले-
"खवरदार, आगे बढे तो तुम्हे मार डालूगा।"
"अवश्य, मैं मरने के लिए प्रस्तुत हूँ।" यह कहते हुए
कल्याण स्वामी गरदन झुकाकर खडे हो गये। समथ गुरु ने
तत्क्षण मुसकराकर कल्याण स्वामी को देखा और तलवार म्यान
मे रख ली। समथ गुरु का मठ निकम्मे शिप्यो से मुक्त हो चुका
था। इस प्रकार आदश राज्य की स्थापना मे छत्रपति शिवाजी
के मागदृष्टा समर्थ गुरु लोकसग्रह और लोकसेवा के प्रति सतत
जागरूक रहे।
45 उपदेश नही, मौन कार्य
प्रसिद्ध बौद्ध त्रिपिटकाचाय ने जैसे ही राजदरबार मे प्रवेश
किया, मगध सम्राट अशोक ने उनका हार्दिक स्वागत किया।
निपिटकाचाय ने आसन ग्रहण कर कहा, "सम्राट, मैंने पचीस वर्षों
तक सारे बौद्ध जगत् का तीर्थाटन करके धम के गूढ तत्त्वो का
रहस्योद्घाटन किया है । मेरी कामना है कि आपके राज्य का
पुरोहित बनकर मैं मगध के शासन को धम के कल्याणकारी
मार्ग पर चलने मे निमित्त बनू।" समाट अशोक भिक्षु की
कामना सुनकर मन ही मन मुसकराए। किन्तु प्रत्यक्ष रूप में
आदर सहित बोले "आपकी इच्छा मगलमयी है भगवन, किंतु
97

आप से मेरी प्राथना है कि आप धर्मग्रयो को एक आवृत्ति और पर लें तो अच्छा।" भिक्षु प्रिपिटकाचाय को सम्राट की बात पर बडा मोघ आया, लेकिन उस समय उसने मौन रहकर सम्राट के परामश को मानना ही उचित समझा। 'आखिर राज- पुराहित ये प्रतिष्ठिन पद को प्राप्त करने के लिए राजहठ का मान रखने मे हज भी क्या है।' उसने सोचा। पूरा एक वर्ष धमग्रयो को पुन पढने मे लग गया। भिक्षु पुन ममाट के सम्मुख उपस्थित हुआ। समाट ने इस बार फिर उमे एक बार और धमग्रथो के पारायण का विनम्र परामश दे डाला । भिक्षु क्रोध और अपमान से आहत हो उठा । उसे लगा कि ज्ञान गाम्भीर्य की उपेक्षा कर सम्राट ने उसका ही अपमान नहीं किया अपितु देश का भी अहित किया है । आखिर वह देश के हित मे ही तो यह महान उत्तरदायित्व लेना चाहता था- उसने सोचा । अपमान के दश से आहत भिक्षु नदी के नीरव तट पर सध्या प्राथना के लिए जा बैठा । आहत स्वाध्याय अहम सिमट गया। दिव्य चेतना के तार झकृत हो उठे। भिक्षु को लगा जैसे अन त आनन्द की धारा मे वह निमग्न हो गया है। एक वर्ष बीत गया। सम्राट अशोक अपनी धमयात्रा के अनुक्रम मे उधर आ निकले। उहोने भिक्षु त्रिपिटकाचाय को असीम आन दमग्न स्थिति मे साधनारत देखा। सम्राट ने देखा कि पाडित्य के गव के वजाय उनके मुखमण्डल पर आत्मज्ञान का दिव्य आलोक व्याप्त हो गया है । सम्राट अशोक ने प्राथना की, "आचायप्रवर, मगध की प्रजा आपकी बाट जोह रही है । धर्माचाय का मासन आपके लिए रिक्त है । लोककल्याण के लिए आप मगध का मागदर्शन 98 । करें।" भिक्षु त्रिपिटकाचाय के अधरो पर दिव्य मुसकान बिखर गयी। "राजन, न मुझे अब धर्मासन की कामना है और न मगध को उसको आवश्यकता। ज्ञान के सूय से पाडित्य की धुव पिघल गयी है। धर्म का उपदेश नही, आचरण होना चाहिए। आचरण की ज्योति से स्वय वे किरणें फूटती हैं जो शब्दातीत हैं, जिनकी अदृश्य शक्ति वाणी से सहस्रगुना प्रभावी है । आपके राज्य मे आप सदृश्य ऐसे कर्मयोगी बढते रहे तो धम का दीपक स्वयमेव जलता रहेगा।" सम्राट अशोक भिक्षु निपिटकाचाय को आदराजलि अर्पित कर जब वापस लौटे तो उहे आभास हुआ कि भिक्षु का तपोतेज अब इस वन प्रातर से ही उनकी समस्त प्रजा को आलोकित करता रहेगा। 46 सेवापथ की शक्ति श्रावस्ती किसी समय समद्ध और शक्ति सम्पन्न राज्य था और आज यह अकाल की पीड़ा से छटपटा रहा है। भगवान बुद्ध ने श्रावस्ती के श्रेष्ठीजनो को उद्वोधित करते हुए कहा, "कौन सहस्रो भूखो को भोजन देने की जिम्मेदारी उठा सकता है?" श्रेष्ठी सभा मे इस प्रश्न को सुनकर मौन छा गया। भ्रमण करते हुए उन दिनो गौतम बुद्ध श्रावस्ती मे ही ठहरे थे और श्रावस्ती गणराज्य को इस विपत्ति के समय, जिसमें हजारो लोग अनावृष्टिजन्य अकाल के कारण मृत्यु के मुख मे समा रहे थे, वे द्रवित हो उठे थे। सहसा उनकी दृष्टि श्रावस्ती गण के श्रेष्ठो रत्नाकर शाह पर केन्द्रित हुई। रलाकर शाह ने सव 99 उभरा-- कुछ समझते हुए विनम्रतापूवर यहा, "महाबोधि क्षमा रें, इन सहस्रो धाय लोगो के लिए तो मेरी सम्पत्ति से भी अधिक धन चाहिए।" अय उपस्थित धन-कुबेरा ने भी गूछे जाने से पूर्व ऐसे ही उत्तर दिए कि वे अकिंचन हैं और उनका धन भूखो की क्षुधा शात कर पाने के लिए अपर्याप्त है । मत्रिगण भी हताश होकर टुपुर टुपुर देख रहे थे। व्यथित हृदय सेनापति ने महात्मा बुद्ध से निराशाजनक स्वर मे कहा, "भगवन, हम मव पीडित प्रजाजनो के लिए अपने प्राण भी अर्पित कर सकते हैं, किंतु विसी के पास भी इतना धन नहीं है जो सहस्रो क्षुधार्थों की भूख मिटा सके।" अचानक सभाभवन के द्वार के समीप एक स्वर -"भगवन्, मुझे आज्ञा हो तो मैं इस कतव्य भार को उठा सकती हूँ। मैं दे सकूगी सहस्रो भूखो को भोजन।" भगवान बद्ध सहित सभी श्रेष्ठीजनो की दष्टि सभागार के द्वार की ओर घूम गयी। यह स्वर एक भिखारी क्या का था । बुद्ध के मुख- मडल पर दिव्य मुसकान उभर आयी, लेकिन श्रेष्ठीजनो की आँखो से परस रहे थे व्यग्यवाण। किसी ने कहा, "भिखारी कया का दुस्साहस देखिए, अपना पेट भरने के लिए दर- दर भटकने वाली श्रावस्ती गणराज्य के सहस्रो भूखो की भूख मिटाने की बात करती है। पागल है।" कोई स्वर उभरा। बुद्ध ने वालिका को स्नेहपूर्वक पुकारा, "क्या नाम है । धय बालिके तुम्हारा 'सुप्रिया ।" वालिका का सक्षिप्त उत्तर था । महात्मा बुद्ध ने आत्मविश्वास और वज्र सकल्प से प्रदीप्त सुप्रिया की ओर देखते हुए पूछा, "वता दो बेटी, श्रेष्ठीजनो को बता दो कि तुम अपना सकल्प कैसे पूरा ?" 100 करोगी।" "मैं सबसे निधन हूँ महाप्रभु, यह सत्य है, लेकिन इसीलिए सब के भडार गृहो मे मेरा हिस्सा है ।" बालिका ने कहा, "हाँ, प्रभु मेरे अह की सीमा भी तो नहीं है कोई, मैं अस्तित्वहीन भिखारिन कन्या घर घर, द्वार द्वार जाकर याचना करूंगी और सबके भडारो से अन सग्रह कर सहस्रो भूखो को भोजन दूगी।" "हम भी घर-घर से 'अन सग्रह अभियान' मे सुप्रिया का साथ देंगे।" स्वाभिमानी युवक समूह ने इस चेतावनी को स्वीकारा । श्रेष्ठीजन विस्मित, लज्जित और चकित थे। भगवान बुद्ध ने श्रेष्ठीजनो को सबोधित किया, "सेवा के वच सकल्प और उसके लिए समपण मे महाशक्ति छिपी है। भद्रजनो, सेवा-पथ पर बढने वाले के पथ की सभी बाधाएँ स्वय गिर जाती हैं, यही सुप्रिया की शक्ति है, यही हर सेवक की शक्ति है।" 47 चिकित्सा जिसका धर्म है स्वदेश भक्ति की प्रेरणा से वह अपने देश की सेना में सास्कृतिक एव प्रचार दल को सदस्या के रूप मे काय तो करने लगी लेनिन युद्धकाल के कठोर सघप के कारण अल्पकाल मे ही उसका म्वास्थ्य गिरता गया । संप चिकित्सको ने निदान किया कि उसे क्षय हो गया है। उसका उचित उपचार वहाँ समव नही था। डॉक्टर निराश थे। ऐसी कतव्यपरायण युवती की प्राण- रक्षा मे म्पय को वे असहाय अनुभव कर रहे थे। सहसा 101 + । , उन्हें केन्द्रीय हेवई क्षेत्र के इस मुरयालय पर प्रख्यात सय चिकित्सक डॉ० वैथ्यू के आने का समाचार मिला । उहोने इस कैनेडियन डॉक्टर से प्रार्थना की कि वह इस क्र्तव्यपरायण देशभक्त युवती की जान बचाने के लिए कुछ करें। डॉ० बैथ्यू ने युवती सन का परीक्षण किया और दीघ निश्वास छोडा। "डॉक्टर, क्या मिस सन को किसी प्रकार वचाया जा सकता है ?" उन्होने पूछा। "हाँ, इसे बचाया जा सकता है।" डॉक्टर बैथ्यू ने गम्भीरता पूर्वर कहा ' लेकिन यहां नहीं, इसे वीपिंग (वतमान बीजिंग) ले जाना होगा।" बीपिंग का नाम सुनते ही उन सबके चेहरो पर हताशा व्याप्त हो गई। वीपिंग उन दिनो शत्रओ (जापान) के कब्जे में था और वहा जाने का प्रयास भी मृत्यु के वरण से कम न था। लेकिन कतव्यपरायण डॉक्टर निराश होना नहीं जानता था। उसने अपने कार्यालय मे आते ही अपने वरिष्ठ अधिकारी, 'चीफ ऑफ स्टाफ को पत्र लिखा कि किसी भी प्रकार इस लडकी को बीपिंग भेजने का प्रवध कराया जाये । लेकिन उन्होने इसे अपना दायित्व मानने से इनकार कर दिया।डॉ० बैथ्यू इस उत्तर से मर्माहत हो उठे। "ओह !" उन्होने अन्तर की सारी व्यथा को समेटते हुए कहा, ' देश के लिए समर्पित प्रत्येक प्राण मूल्यवान है, मुये प्राण वचाने ही होगे।" उन्होने अपने सहायक को निर्देश दिया, "तुरत मेरे अश्य को तयार करो, अब जनरल के पास ही इस काय के लिए चलना होगा।' सहायक हतप्रभ थे डॉ. वैथ्यू की निष्ठा देखकर। एक रोगी को बचाने के लिए वे मन का चन यो बैठे थे। जनरल के पास पहुंचते ही वे सादर 102

वोले, "जनरल, आशा है आप मुझे एक वचन देंगे।" चीन के
सर्वोच्च सेनापति हैलाग ने चकित भाव से डॉ० वैय्यू को और
देखा। अपने लिए जिसने कभी कुछ नहीं चाहा, कुछ नही
मांगा, यह क्तव्यपरायण डॉक्टर कैसी याचना लेकर आया
'मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूं डॉ० वैथ्यू ?"
सेनापति ने एक कुर्सी की ओर बैठने का इशारा करते हुए
डॉक्टर से पूछा।
"मैं एक लड़की को चिकित्सा के लिए वीपिंग भेजना
चाहता हूँ।"
'यह असभव है !" डॉक्टर की बात बीच में ही वाटते
हुए जनरल बोले। तनिक रुककर सेनापति ने फिर कहा,
"जानते हो स्थितिया क्तिनी भयानक हैं ? हमारे पाम बनेक
घायल और बीमार सैनिक हैं। हम उनमें मेंहाक कागि
नही भेज सकते। यदि हमने ऐसी परमग प्राप्ति पर दोनो
वडी कठिनाई हो जायेगी।"
डॉ. वैथ्यू विचलित हो उठे, "उतरन्न परम्परा की
स्थापना और उल्लघन का नदी है। गमक्त युवती में
प्राण सकट मे हैं, इसे तु न चिकिती बरत है। र
डॉक्टर के नाते चुपचाप घर म यिदि
नहीं सकता।"
जनरल हैलाग मुमकान, दुलार्ग
हूँ- येक मनिस का दे-
जरूरी तो नहीं किया हो।
डॉ० वैथ्यू असिना रहे.

हूँ और आप से बेहतर जानता हूँ कि किस रोगी को कहां भेजा
जाना चाहिए।"
आखिर सेनापति हैलाग को निष्ठावान डॉक्टर से हार
माननी पड़ी।
"ठीक है, देखेंगे।" वे वोले, 'शत्रु के कडे पहरे के पार
उसे पहुँचाने का माग क्या हो सकता है ?"
डॉ० वैल्यू के चेहरे पर चमक उभर आयी, " यूजीलड की
मिशनरी सिस्टर हाल शीघ्र ही वीपिंग जा रही है। उन पर
कोई रोक-टोक न होगी। मैं उहे राजी करूँगा कि वे मिस
सन को अपने साथ ले जाएँ।" डॉक्टर बैथ्यू ने मानवता का
सदभ देकर मिस हाल को तैयार किया। अगले दिन जब
रोगिणी मिस सन सिस्टर हाल के साथ बीपिंग के लिए रवाना
हो रही थी, तब डॉ० बैथ्य की आँखो मे आंसू
थे, जैसे वह किसी रोगी को नहीं, अपनी बेटी को विदा कर रह
हो और चेहरे पर थी गर्व की दीप्ति, कतव्य पालन के सतोप
का अनिर्वचनीय आनद ।
उमड आये
48 ताकि घर-घर दीप जले
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्रो मे उस दिन विचित्र जोश
था। युशी के उद्दाम आवेश मे उन्होने विश्वविद्यालय के
दरवाजे तोडकर उनकी होली जलाई, नृत्य किया। युवा छात्र
हरदयाल यह देखकर चकित हुए, "देश प्रेम का कैसा
उमादकारी ज्वार है यह।"
ब्रिटिश लोगो द्वारा अफ्रीका मे वोअरो को पराजित करने
104

की खुशी मे ब्रिटिश छात्र यह हर्षोल्लास मना रहे थे । देशभक्त हरदयाल के चेहरे पर एक दृढ सकल्प उभर आया। स्वतत्र देश के राष्ट्रभक्तिपूर्ण वातावरण ने उन्हे झकझोर दिया, "ठीक है, विदेशी भूमि ही विप्लवी-कम के लिए अनुकूल है, मैं यहाँ आये हुए युवको को स्वातन्त्र्य सघर्ष के लिए तैयार करूंगा।" एक दिन ऑक्सफोर्ड से लन्दन जाकर उन्होने भाई परमान द से कहा, "भाई जो, भारत सरकार को छात्रवृत्ति के बल पर अध्ययन करना मैं अपने देश का अपमान समझता हूँ। क्यो न इसे ठुकरा दू?" भाई परमानन्द गभीरतापूर्वक बोले, "इस विषय मे शीघ्रता की नहीं, धैयपूर्वक विचार की जरूरत है, हरदयाल जी।" उनकी पत्नी सु दर रानी भी लन्दन मे उनके साथ थी। उन्होने जब पलो को यह निर्णय बताया तो वह बोली, “यदि आपने सरकारी छात्रवृत्ति को त्याग दिया तो हमारा निर्वाह कैसे होगा ' अ य कोई साधन भी तो नही है ? "कुछ भी हो, रानी।" हरदयाल ने कहा, "जिन डाकुओ (अग्रेजो) के हाथ मेरे देशवासियो के खून से रगे हैं, उनसे रुपया लेना तो अधम है।" श्यामजी कृष्ण वर्मा को जब हरदयाल का यह निर्णय मालूम हुआ तो उन्होने उनके व्यय के लिए धन भेजने की व्यवस्था कर दी । कातिकारी हरदयाल पर राष्ट्र प्रेम का ऐसा नशा सवार था कि वह एक पल भी किसो अय कार्य मे नष्ट करना अच्छा नहीं समझते थे। मोचते, कोई क्षण मातृभूमि की सेवा के अतिरिक्त तो नहीं बीत रहा, और एक दिन उहे लगा कि वे ऑक्सफोड को डिपो के लिए एक वर्ष वेकार मे ही नष्ट कर रहे हैं। बस, यह विचार आते ही 105

21
तुर त विश्वविद्यालय से त्यागपत्र दे दिया और मातृभूमि की
सेवा के लिए भारत लौट आये।
"क्यो रानी, तुम मेरे देश सेवा के पथ मे हर सहयोग देने
को तैयार हो न?"एक दिन वे अपनी पत्नी से बोले।
"मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लघन किया है भला
सुदर रानी बोली, 'मैं तो सदैव आपके माग मे सहायक ही
रही हूँ।"
"तो मुझे आज्ञा दो देवी कि मैं अपना सारा जीवन, इसका
प्रत्येक क्षण अव देश को समर्पित कर दू।" एक क्षण वे परुणाद्र
हो उठे। रख कर बोले, "अब समय आ गया है कि अपना प्रत्येक
पल मैं देश को समर्पित कर दूं।"
सुदर रानी क्या कहती भला । आज्ञाकारिणी अर्धागिनी ने
अपार व्यथा को हृदय में समेटकर हरदयाल जी को सल्यास
की आज्ञा दे दी। सुदर रानी के प्रथम सतान होने वाली थी।
लेकिन इस मांतिकारी सयासी ने एप बार घर से निकलवर
फिर कभी भी अपनी पत्नी और पुत्री पा चेहरा न देवा । ये
देश भर मे धूम घूमगर ऐसे ध्येयनिष्ठ युवको को तलाश करने
सगे जो राष्ट्रीय चेतना के प्रचारक बन सकें। उन्हें ऐसे अनेर
युयय मिल भी गये । लाला जी तपम्यो जीवन बिताने लगे।
एम दिन भाई परमानद ने उनसे पूछा आपमे दम तप से
शिसयो साभ होगा-मायो, भारत को या माय रामाज
मोया आप पा मन पसामा चारत है? यदिनही ता गौतम
उसमे बजाय आज ये गाम में स्वामी विवेशासो आग
बनाये। इसी मा। आज भारत और मसार को
मावापरताहै।"
106

एक बार फिर वैरागी हरदयाल को झाति-भावना जाग
उठी और वे विश्व भर मे भारतीय स्वतत्रता का शख फूंकने चल
पडे । अमेरिका, काम, जमनी, स्वीडन--सर्वत्र भारतीय प्राति
का प्रवल उद्घोप करते रहे । सेन फ्रासिस्को से प्रकाशित अपो
'गदर' अखबार मे उन्होने स्वातत्र्य सैनिको के लिए अपील
निकाली-"आवश्यकता है भारत में गदर मचाने वाले वीर
सनिको की । वेतन-मृत्यु, इनाम-शहादत, पेंशन-स्वतन्त्रता,
युद्धक्षेत्र-भारत ।" सचमुच लाला हरदयाल ने विश्वभर मे
धूम घूमकर भारतीय स्वतत्रता की अलख जगायी और विप्लव
के लिए अनेक युवको को तैयार कर भारत भेजा । जब एक
वार किसी ने उनसे पूछा, “सदैव अपने प्रियजनो से दूर क्या
कभी इस कठोर साधना मे आप अवसाद अनुभव नहीं करते,
लाला जी?" तब लाला हरदयाल ने जो उत्तर दिया, वह
सचमुच उनकी कमयाना का मही चित्र था। उन्होने कहा,
"देश के लिए मरना सरल है मित्र, किन्तु प्रियजनो की स्मृति
से भो दूर रहकर जीवित रहते हुए कर्तव्य करते रहने में ही
तो कम को सायकता है।" और सचमुच हरदयाल अतिम क्षण
तक अपने हृदय का सारा स्नेह स्वदेश की मशाल जलाने के
लिए ही उड़ेलते रहे ताकि भारत के अनगिनत घरो का अँधेरा
दूर हो सके, घर-घर दीप जल सकें।
49 आत्मवत् सर्वभूतेषु
सिद्धपुरुष महर्षि रमण का आश्रम । प्रकृति के सानिध्य मे
मनोरम शाति का साम्राज्य । भक्तजन महर्षि के प्रवचन की
प्रवचन की

तैयारी मे व्यस्त हैं। आश्रम में पालयो लगाकर गात चित्त बठने का नियम है । एक अग्रेज महिला भी महपि को मुनने आयी है। वह पालथी लगाने में असमर्थ, पर फैलाकर बैठ जाती है। भक्तजन और प्रबन्धक उसे टोरते हैं कि यहां इस प्रकार बैठना वर्जित है इसलिए यह पालथी लगाकर बैठे । उक्त महिला बडी परेशानी मे पड जाती है। महर्षि रमण प्रवचन-स्थल पर आते हैं तो उन्हे यह दृश्य दीख पड़ता है। वे कुछ वोलते नहीं। उनके पैर मे भयकर गठिया का दर्द है, फिर भी आज वे दर्द को पीकर पालथी मे बैठने का प्रयास करते हैं। प्रयधक उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं कि वे पैर फैलाकर ही बैठे रहे, शरीर को अनावश्यक कप्ट न दें । महर्षि किसी ओर ध्यान न देकर बलपूर्वक पालथी लगाते हैं। बार-चार प्रबन्धको द्वारा ऐसा करने से रोके जाने पर वे कह उठते हैं, "क्या मुझ मे और उस महिला मे आत्मा का कोई भिन्न रूप है ? जो नियम उसके लिए है, वही मेरे लिए भी है । प्राणिमात्र की पीडा एक समान है।" भक्त प्रवधागण ग्लानि से विचलित हो उठे। उहे अपनी भूल का अहसास हो चुका था। उन्होने तुरन्त उस भद्र महिला से सुविधापूर्वक जाने की प्रार्थना की । इसके बाद महपि से निवेदन किया कि वे अव अपने शरीर को अनावश्यक कष्ट न दें, और अब महर्षि के मुखमडल पर सरल मुसकान व्याप्त थी। कोरी ज्ञान चर्चा या प्रवचनो के द्वारा लोगो के हृदय को स्पर्श नही किया जा सकता। ऐसे महामानव लोकमानस पर राज्य किया करते हैं जो प्राणिमात्र के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं और उनके सुख मे प्रसन तथा दुख मे कष्ट अनुभव करते हैं। 108 गाधी जो के दो पगो के पीछे देश के करोडो पग चल पड़ने का भी यही रहस्य था। 'आत्मवत् सवभूतेषु' का शाश्वत मन उनके जीवन मे न्याप्त था। मार्च 1947 की घटना है । उन दिनो 'करो या मरो' मान्दोलन चल रहा था। गाधी जी विहार मे थ। इसी समय एकाएक वायसराय ने उहे मिलने का निमश्रण भेजा । उहोने मनु बह्न को आदेश दिया कि वह रेल के तीसरे दर्जे का एक छोटा-सा डिब्बा देख लें। मनु वहन ने सामान तो कम-मे कम लिया लेकिन डिब्बा ऐसा चुना जो दो भागो वाला था। गाधी जी ने डिब्बे का निरीक्षण किया तो चकित रह गये। बोले, "मनु, तुमने मेरी और अपनी सुविधा के लिए ही दो कमरे ले लिये हैं न, क्या तुमने यह नहीं देखा कि सैकडो लोग बाहर दरवाजे पर लटक रहे हैं ? इसी का नाम है अधा प्रेम, जिममे हम अपने प्रियजनो के स्वाथ के लिए दूसरो के दुख और असुविधाओ को भूल जाते हैं। ध्यान रहे, अगले स्टेशन पर बाहर लटके लोगो को अदर बुला लेना।" अगला स्टेशन आया । स्टेशन मास्टर आये और गाधी जी ने उनसे दु ख प्रस्ट करते हुए कहा, "हमने दूसरा कमरा साली कर दिया है। जो लोग वाहर लटक रहे हैं उनको उसमे बैठाइये । तभी मेरा दुख कम होगा।" स्टेशन मास्टर ने बहुत आग्रह किया कि आप इसे खाली न करें, मैं उनके लिए दूसरा हिन्या लगवाये देता हूँ। गाधी जी ने कहा, "हाँ, दूसरा डिब्बा तो लगवा हो दीजिए लेकिन इसका भी उपयोग कीजिये। दूसरो से अधिक सुविधा उपभोग परने का हमे क्या अधिकार है ?" जब तक उस डिब्बे मे बाहर लटके लोग आ नहीं गये, गाधी जी 109

शात चित्त नहीं रह सके। उनके अन्दर आने पर ही वे अपने काय
मे लग सके।
समता और अपनत्व की यह भावना जीवन मे अद्भुत शक्ति
उत्प न कर देती है और ऐसा तेज प्रखर जीवन ही अपने पीछ
चलने वाले करोडा अनुयायियो की प्रवल प्रेरणा बनता है।
50
वतन पर मिटने वालो का
23 अक्टूबर, 1962 अचानक दो सौ चीनियो ने जूम ला चौकी
(नेपाल) पर हमला कर दिया। चौकी पर तैनात सूबेदार
जोगिन्दर सिंह ने सिख जवानो के साथ रण शौय का ऐसा
परिचय दिया कि चीनी सैनिको को भागते ही बना। तीन-तीन
बार चीनियो को पराजय की धून चढाने वाला यह वीर सेनानी
उस दिन दुश्मनो के लिए काल बन गया था। अचानक एक
गोलो सूबेदार जोगिदर सिंह की जाँघ मे धंस गयी, रक्त की
धारा बह निकली, परतु मा के वीर लाडले को इतनी पुरसत
कहाँ कि वह उधर देखे । उसके चेहरे पर शिक्न तक नही आयी।
उसकी दृष्टि तो दुश्मन पर थी और हाथो की अगुलिया मशीन
गन पर जो लगातार गोली बरसा रही थी। सूवेदार जोगि दर
सिंह के पास थे सौ साथी और नोनी सेना टिड्डी दल के समान
विराट । चीनी अफमर ने ऊँचे स्वर मे समपण करने का आदेश
दिया कितु जोगिन्दर सिंह के साथियो ने जवाब दिया गोलियो
की वर्षा से । लेकिन सो मनिक दत्याकार चीनी सेना से कब
तद लडते ? आखिर जोगिदर सिंह घिर गये । जसे ही उन्हे
चीनी सैनिक गिरफ्तार करने के लिए बढे, उहोंने राइफल पर
।
110

7
सगीन चढाकर दो-तीन चीनियो की छाती मे भोक दी।
जानते थे कि मौत मेरे सिर पर है लेकिन अन्त तक मातृभूमि के
लिए लडने का सकल्प लेने वाला वीर भला चुप क्यो रहता
आखिरी गोली छाती के पार जाने तक वे सात चीनियो को मौत
के घाट उतार चुके थे।
किसी देश के ऐसे ही शूरवीर बेटे उसका मस्तक ऊँगा
रखते हैं ' शस्त्र सज्जित विशाल वाहिनी नही राडती, रामरो है
मातृभूमि के लिए हदय मे असीम प्यार और रयत मे शौम की
ऊष्मा धारण करने वाले उसके वीर पुत्र । ऐरो वीरोगे सागगे
सरया बल का महत्त्व नहीं होता। वे मुट्ठी भर भी हुए तो
क्या, हजारो शत्रुओ के लिए काफी होते है ।
ऐसा ही एक वीर पुत्र था मेजर शैतान सिंह । पुराना
अड्डे के पास एक चौकी पर तैनात यह बहादुर एम चार सी
मोर्चे पर चीनियो को धूल चटा चुका था। दरा यार मुक्षमता
था चीनी टैकों, भारी तोपो तथा मेजर शैतानसिंह और शीff.
गनो में । मेजर घायल हो चुके थे। स्वय को पिरा देयमार र
ने साथियो को आदेश दिया, मैं अतिम रागग त सधन को
घेरे रखूगा, सब सैनिक साथी सुरक्षित स्थान पर नापस गौर
जायें।" ' मेजर । यह कैसे हो सकता है कि हम भाग 1 पाल
छोडकर चले जाये और उस सैनिक गी भात बी पीगी
न हो पायी थी कि मेजर ने दृढ स्वर मे गहा, " तो अब पन मही
सकता, इसलिए मेरा हुक्म मानो और मोमगायो ताकि एक
भी चोनी आगे न बढ़ सपे। रमत मी अतिग
बूद शेप रहने तक रोके रयूगा।" निगश जयागो को अपन
नेता को छोडकर लौटना पड़ा। सीनिमशतापी यहा
।
"

आज्ञाकारी मजबूर जवानो को अपने नेता को हमेशा के
लिए मौत को गोद मे छोडकर आना पड़ रहा था । उस
ममप अपनी मोत पर आह भी न करने वाले उन जवानो की
आखो मे अविग्ल अश्रु वह रहे थे। जव तक सारे साथी
मुरक्षित वापस न पहुँच गय, मेजर शैतानसिंह अकेले ही
दुश्मनो को रोके रहे और अत मे छाती में एक गोली धंसने से
शहीद हुए।
ऐसे ही शवीर पुत्रो के रक्त से स्वतयतादेवी का अचन
होता है । इन लिदानियो के घर के दीपक बुयते हैं, पत्नियो के
सुहाग पुछते है और माताओ की गोद सूनी होती है।
तभी देश विशाल आगन के दीप जल पाते हैं और
तभी हम घनत्र देश को सुली हवा में सांस ले पाते
51 ज़िदगी के बाद भी
"उठो जागो मघप करो और तन तब विश्राम मत परा,
जब तक तुम अपने लक्ष्य पर नहीं पहुंच जाते।' 20 दिसम्बर,
1902 को मद्रास के 'पच इअप्पा हॉल' में भारत एपता या
गदेश देते हुए जब भगिनी निवेदिता ने यह आहार पिया तो
श्रोतागण मत्रमुग्प हो गए। मुद्गर इग्लड से यह युवती जीवन की
गुग गुविधाएं छोड पराधीन भारत की सेवा कर आयी थी।
क्योमि निरतर मत्य मा अवेपण मरते हुए उमे यह आत्मयोय
हुआया कि भाग्नभूमि ही यह घमभूमि है जो पिरसत्य की
ओर ले जा मरती है।
112

।
आयरलैंड के एक सभ्रात परिवार में जन्मी यह बाला मिस
मारग्रेट भी उसी प्रकार मुनहले सपनो के बीच पली थी जसे
भौतिक आकषणो के बीच हर बालक पलता है । वय के साथ
जीवन के 'रगीन स्वप्न' भी निखरते जा रहे थे। युवती मारपट
उस समय 'रेक्सहाम' मे अध्यापिका थी। उसने एक विद्वान और
युवा अभियन्ता के साथ अपनी दुनिया बसाने का स्वप्न सजोया।
विवाह समारोह की तिथि तय हो गयो । लेकिन विधि के विधान
मे मिस मारग्रेट के लिए सुख का छोटा सा नोड बनाने के बजाय
करोडो लोगो के सुख की साधना का महान काय लिखा था अत
नियति के एक झोके ने उसके महल को चकनाचूर कर दिया।
उसका प्रियतम समारोह के एक दिन पूर्व उससे सदव क लिए
अज्ञात लोक की याना पर चला गया ।
मिस मारग्रेट की धनोभूत व्यथा ने उसको झकझोर दिया ।
वह जीवन और जगत् के रहस्यो को जानने के लिए आकुल हो
उठी। शाति की खोज की अनवरत यात्रा । एक बम से दूसरे
को ओर-उसे जहा भी प्रकाश की किरण दिखाई देती, हृदय
की आकुल पुवार पर उधर ही दौड पडती कि तु निकट जाने
पर मिलता अलघ्य और दुनिवार अधकार। और 10
सितम्बर 1897 के एक शुभ प्रभात मे उसे वह पथ मिल ही गया
जिसके लिए वह भटक रही थी। उस दिन ल दन के एक विशिष्ट
अतिथि स्वागत मे उसे विवेकानन्द के दशन हुए। उनके प्रखर
तेज और दशन मान से मिस मारग्रेट के अनुत्तरित प्रश्नो का
समाधान मिल गया। "मैं भारत की सेवा करना चाहती हू,
आपके सान्निध्य मे।" मिस मारग्रेट ने कहा। स्वामी विवेकानन्द
ने सेवा पथ के कटक,पथ की कठोरता को समझाकर उसे रोकना
113

चाहा। लेकिन दृढ प्रतिज्ञ मारग्रेट को वे निश्चय से डिगा न सके।
भारत आने से पूर्व स्वामी जी ने भ्रमित पश्चिम को वेदान्त का
सदेश देने का कार्य सौंपा निवेदिता को। एक स्थान पर हताश
होकर निवेदिता ने लिखा कि लोग भाषण सुनने हजारो की
सख्या मे आते है लेकिन सहायता कोई एक पैसे की भी नहीं देता।
अभावग्रस्त जीवन दूभर हो रहा है। स्वामी जी ने उत्तर
दिया, 'अभावो और सघर्षों की गाथा कहकर तुम मुझे द्रवित
करने की कोशिश न करो। सेवा पथ स्वय चुना हुआ कांटो का
पथ होता है। जिसमे साहस है, वह इस पर चले नहीं तो उसे लौट
जाना चाहिए।"
निवेदिता को इन शब्दो ने झकझोर दिया। फिर कभी उसने
स्वामी जी से याचना नही की। सेवा क्षेत्र बढता गया।
दीन दुखियो के बीच सेवा, पतितो के उत्थान के लिए
संघर्ष-यहां तक कि निवेदिता स्वय सेवामय हो गयी।
भारत की सस्कृति, नारी की श्रद्धा और जन जन की भक्ति
देखकर वे अभिभूत हो गयी। उन्होने व्यथित हो इग्लैंड के लोगो
को डाकू बताते हुए लिखा, "भारत अध्ययन मे तल्लीन था,
इसी बीच डाकुओ का एक दल आया और उसके देश (भारत)
को नष्ट कर दिया भ रत की सेवा के लिए सवस्व समर्पित
करने वाली निवेदिता को अतिम विदाई का समय आ चुका था,
स्वातिसार से पीडित वे चिरयात्रा की तयारी मे थी। देश के
गणमाय नेता भी इनसे प्रेरणा लेते थे। उनकी अतिम इच्छा
पूछने पर उन्होने कहा था -"मेरे पास जो कुछ था वह
मातृभूमि का था-जिदगी मे भी और जिदगी के वाद
।
114

52 • एक जन्म दूसरो के लिए
नरेद्र उस दोपहर मे भूखे प्यासे अपने मित्रो के साथ एक स्मारक
की छांह मे खडे थे । सहसा उनका एक मिन भगवान की अपार
करुणा का गीत गाने लगा। नरेन्द्र गरज उठे, “बन्द करो यह
गाना।" उहोने आक्रोशपूर्वक कहा, 'जिनके पास बभव के
भडार हैं, जिनके माता-पिता घर भूखो नही मर रहे हैं, उहे
ऐसी कल्पनाएँ मधुर जान पड़ती है।" मन की सारी व्यथा
समेटते हुए वे बोले, "एक समय था जब मुझ भी ऐसा लगता था
लेकिन अब जब जीवन की कठोरता मेरे सामने है मुझे यह कूर
मजाक जैसे सालता है।" स्थिति ऐसी ही विकट थी। नरेद्र के
पिता की मृत्यु के बाद उसके भाई, बहन और मा शोचनीय
स्थिति में थे। उसकी ईश्वरीय सत्ता में आस्था डोल गयी थी।
रामकृष्ण परमहस के कुछ शिष्यो ने उनसे उलाहने के स्वर में
पूछा, "आप नरेन्द्र को असीम प्यार करते हैं, उसमे दिव्य शक्ति
का आभास पाते हैं, लेकिन वह तो घोर नास्तिको जैसी बातें
करता है आजकल ।" रामकृष्ण सरल मुसकान बिखेरते हुए
बोले, "नरेन्द्र को असीम दुख और क्लेश के सम्पर्क में आने दो,
फिर यही रूपातरित होगा। वह मानवीय दुख पीडा से
अभिभूत हो उठेगा और अपने देशवासियो के दुख दैन्य के
मे वह एक ऐसा चकमक पत्थर होगा जिसकी टकराहट
से सारी आत्मा प्रज्वलित हो उठेगी।" परमहस वाल सुलभ
प्रफुल्लता से बोल उठे, "और फिर इसी आधारशिला पर
उसकी सारी महत्त्वाकाक्षाए, शक्तियाँ और कामनाएं मानव मात्र
की सेवा के व्रत मे लय हो जाएंगी।" सचमुच एक दिन ऐसा
-
समग
115

। आया जब नरेद्र विवेकानद बन गया।उस दिन जब वे एक शिष्य के साथ किसी सूक्ष्म दर्शन तत्त्व पर विचार कर रहे थे तो विख्यात बगला नाटककार गिरीश वहा आए । उ होने पूछा, अच्छा नरेद्र, मैं तुमसे एक प्रश्न पूछता हूं-भला तुम्हारे वेद और वेदात मे सुधात जनो के लिए दिन प्रतिदिन अन्याय और दुखो से पीडित मानवो के लिए भी कुछ उणय है ' एक मां जो पचास जनो को नित्य खिलाती थी आज उसके बच्चे तीन दिन से से तडप रहे है ।" गिरीश ने और उत्तेजित होते हुए कहा, "अमुक परिवार की स्त्री को गुडो ने अपमानित कर, यत्रणा दे देकर मार डाला।" गिरीश की वाणी आग उगल रही थी, “नरेद्र, मैं तुमसे पूछता हूँ तुमने वेदो मे इन सब पापो के निवारण की कोई व्यवस्था देखी है " विवेकानन्द सुन न सके यह सब । उनकी आंखो मे आंसू भर आये। उनको छिपाने क लिए वे उस कमरे से निकल गये । अव गिरीश मुसकरा उठे । एक शिष्य से बोले, "देखो तुमने प्रत्यक्ष देखा न, तुम्हारे गुरु का हृदय कितना विशाल है । मैं उनके पाडित्य के कारण नही, मानवता के प्रति उनकी इसी असीम करुणा के कारण उनका आदर करता हूँ।" थोडी देर वाद विवेकानन्द लौट आए और शिष्य सदान द से बोले, देशवासियो का दुख दारिद्रय देखकर मेरा अन्तर रो उठता है ।" वह शिष्य की ओर उमुख होकर बोले, "कुछ करो सदान द, कम से कम एक सहायता के द्र ही खोलो, हमारे चारो ओर तो पीडा का साम्राज्य न रहे।" उहोन परुणाभिभूत होकर गिरीश से कहा, 'आर गिरीश | मेरा मन कहता है कि जगत् के दुख निवारण के लिए, किसी का रचमात्र क्लेश मिटाने के लिए यदि मुझे सहस्र बार जम लेने का दह भी 116 अभ्यास भोगना पडे तो सहप भोगूगा।" वे अपने शिष्यो की ओर अभिमुख होकर भावावेश मे बोले, "तुम सब मेधावी बालक हो, और अपने को मेरा शिष्य कहते हो। बताओ तो तुमने क्या-क्या काम किया है ?" हदयस्पर्शी आह्वान करते हुए उन्होने कहा, "एक जम दूसरो को दे डालना क्या तुमसे न होगा? घ्यान, इत्यादि अगले किसी जन्म मे कर लेना । यह शरीर पर-सेवा मे अर्पित कर दो, तब मैं समझूगा कि तुम्हारा मेरे पास आना साथक हुआ है।" विवेकानद के करुणासिक्त हृदय का आह्वान शिष्यो को अभिभूत कर गया और उन्होने उसी दिन समर्पित भाव से उस महान स यासी द्वारा निर्दिष्ट मानव-सेवा-पथ मे स्वय को समर्पित कर दिया। 53 आस्था के आशा-दीप पश्चिमी जमनी का गुसवाख गाँव । दो किशोर आपस में मल्ल- युद्ध कर रहे थे। उनमे से एक सम्पन पादरी का पुत्र था और दूसरा एक श्रमिक का बेटा । पादरी के बेटे ने श्रमिक के पुन को पछाड दिया। वह गर्वोक्ति से बोला, "मला तू मुझे हरा सकता है । बडा आया मुझसे लडने वाला" पराजित बालक मन से नहीं हारा था, वह बोला, "काश, मुझे भी तेरी तरह पौष्टिक भोजन मिला होता तो मजा चखा देता" और फिर उसने बताया कि गरीबी के कारण पौष्टिक भोजन तो दूर, उन्हे जीने की कोई भी सुविधा जुटाना कितना मुश्किल होता है। ऐसी घटनाएँ प्राय रोज होती रहती है, लेकिन बालक अल्वर्ट श्वाइजर के मन- मस्तिष्क को इस घटना ने शक्झोर दिया। 117 दुखी मानवता की पीडा को दूर करने के मनस्ताप ने उसके मन-मस्तिष्क को व्यथित कर दिया-'मेरे जीवन का लक्ष्य वही होना चाहिए जिससे अधिकतम पीडित मानवो को पीडा मुक्ति मिल सके।' यह जीवनदृष्टि मिलते ही अल्बर्ट ने निश्चय किया कि वह डॉक्टर बनकर जगली अफ्रीकी लोगो के बीच जायेगा जिहें गोरो ने गुलाम बनाकर दासता की मार से रुग्ण- जर्जर भी बना दिया है, वह इस पाप का प्रक्षालन करेगा। श्वासवर्ग विश्वविद्यालय में चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करते हुए जब एक दिन हेलन ब्रेसला नामक युवती ने सारा सकोच मिटाकर कहा,"अल्बट, मैं तुम्हारी जीवन-सगिनी बनना चाहूँगी, क्या तुम इसे स्वीकार करोगे?" तव अल्बट एकाएक स्तब्ध रह गया था। उसने सोचा भी नही था कि अफ्रीका के जगली लोगो के बीच सेवा के कटकाकीण पथ में उसके साथ कभी कोई दूसरा सगी साथी जा सकेगा-फिर जीवन-सगिनी की तो कल्पना भी कैसी ? हेलन अल्बट की मनस्थिति को भांप गई, उसे उसके लक्ष्य का आभास हो चुका था। उसने कहा, "मैं नसिंग का प्रशिक्षण प्राप्त करके वहाँ आपका हाथ ही चटाऊँगी, सेवा-पय मे बाधक नही बनूगी।" अल्बट दवाइजर भावविभोर हो उठे थे, "मैं ऐसी जीवन-सगिनी यो पावर स्वयं को धय समपूगा।" और फिर एक दिन वे दूरस्थ अफ्रीको वस्व लेम्बारेल मे थे। अपने हाथो से झाड-पोटपर इस नवदम्पति ने क्यूतरो के घोसलो, पुराने जालो और वर्षों के सीलन भरे एय यमरेका साप पिया। वैभव मे पले दोनो स्वप्नदशियो की रठोर परीक्षा गुर हो गुपी थी। दवा और उपचार या नाम भी न जानी वाले जगली अमोमी अल्वर्ट यो सेवा-मुश्रूषा और उपचार से स्वस्थ 118 होने लगे। उनके लिए यह सब एक जादू था कि बीमारी ठीक भी होती है। वे अल्बर्ट को जादूगर कहने लगे-जादूगर मसीहा। इसी बीच अल्वद श्वाइजर ने अपनी अनुभूतियो को संजोकर एक पुस्तक निखी-'जीवन के प्रति सम्मान' । उनके सेवा-कार्य की कीति विश्वभर में फैल चुकी थी। 1952 मे उहे शाति के लिए विश्वविरयात नोबल पुरस्कार मिला, तब एक अफ्रीकी मित्र जोमेफ ने कहा, "अल्बट, तुमने जीवन भर काफी कष्ट सहे, अब इस विशाल पुरस्कार की राशि से आरामपूर्वक जिन्दगी गुजार सकोगे।" अल्बट श्वाइजर मुसकराये,"मिन, यदि वैभव-विलास की कामना मुझे होती तो इस पथ को स्वीकार ही क्यों करता यह कहते उहोने इस विशाल राशि को लेम्बारेन मे एक कुष्ठ सेवा केन्द्र स्थापित करने हेतु लगा दिया। अपनी तरफ आश्चर्य से देखते हुए मिन से बोले "मेरा एक ही लक्ष्य है जोसेफ-जीवन के प्रति सम्मान-प्राणिमान की सेवा।" निश्चय ही हिंसा और विध्वस की होड मे लगे विश्व के बीच आज भी अल्बट श्वाइत्जर जैसे प्रकाश-स्तम्भ मानवता की आस्था के आशा-दीप बने हुए है। " 54 कर्तव्यनिष्ठा की अग्नि-परीक्षा स्वतन्त्रता के लिए 'करो या मरो' का नारा उस समय बुलन्द था। पग्नेजो सरकार सतर्क और भयभीत थी इसलिए जेल- निरीक्षको को कडे आदेश दे दिये गये थे कि वे कडी देख-रेख और कठोर अनुशासन वनाए रखें । जेलों के नियमानुसार शाम को किसो स्थान का साकेतिक नाम निश्चित कर दिया जाता 119.

ताकि कोई भी व्यक्ति छद्मवेश मे वहाँ प्रवेश न कर सके। जिन अधिकारियो, कमचारियो और सन्तरियो की रात को ड्यूटी लगाई जाती, उहे निश्चित सकेत चुपचाप बतला दिया जाता ताकि वे ड्यूटी पर नियुक्त सिपाही को बताकर आ जा सकें। मियांवाली जेल मे (अब पाकिस्तान मे) एक रात वहा के जेल सुपरिटेंडेंट निरीक्षण करते हुए घूम रहे थे, हर सन्तरीको उस रोज का निश्चित सकेतचिह्न बताते हुए बढ रहे थे । एक सन्तरी को उन्होंने गलत सकेत बताया तो सन्तरी उच्च स्वर मे गरजा, “खवरदार, आगे न बढना वर्ना गोली मार दूगा ।' एक अदना से सन्तरी ने जेल सुपरिटेंडेंट को चुनौती क्या दी कि आफत आ गई। उन्होने तुरन्त खतरे की सीटी बजा दी। इसे सुनते ही जेल की खतरे की घटी बज उठी। इस आवाज को सुनते ही तुरत प्रत्येक सिपाही खतरे के स्थान पर पहुंच गया । जेल सुपरिटेंडेंट के आदेश से उक्त सन्तरी को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे के दौरान जेलो के सर्वोच्च अधिकारी आई० जी० ने कहा, "तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है किन्तु तुम्हारी पुरानी सेवाओ का खयाल रखते हुए तुम्हे माफ किया जा सकता है, लेकिन तुम्हे अपनी वेअदबी के लिए लिखित माफी मांगनी होगी और भविष्य मे ऐसी भूल न दोहराने की शपथ लेनी होगी अन्यथा छ माह की सस्त कैद भुगतनी पडेगी।" सजा की बात सुनकर वह सन्तरो एक वार काप उठा लेकिन दूसरे क्षण दृढतापूर्वक शात स्वर मे वोला, "हुजूर, मैंने कोई कसर नही किया है, अत माफी नही मांग सकता।" "अपने बड़े अफसर को गोली मारने के लिए तैयार हो जाना तुम्हारी नजर 120

मे काई कसूर नहीं है ?" आई० जी० ने उसे पनी दृष्टि से घूरते
हुए पूछा । "मेरी यह हिम्मत यहां साहब, कि अपने अफसर के
खिलाफ कोई गुस्ताखी करूं, लेकिन उहोने ही यह फर्मान दिया
था ड्यूटी का मुस्तैदी से पालन करो।' सतरी ने आदरपूर्वक
उत्तर दिया। बहुत समझाने पर भी उस सन्तरी ने माफी नहीं
मागी इसलिए उमे छ माह के कठोर कारावास की सजा सुना-
पर अदालत उठ गई। उसे जेल के सीयचो मे बन्द कर दिया
गया। उसकी वृद्धा मां, रुग्ण पत्नी और बच्चे पिलख.
विलखकर रोने लगे, लेकिन वह अटल कतव्यनिष्ठा के साथ
सजा भुगतने के लिए अपने निश्चय पर डटा रहा।
थोडी देर बाद आई० जी० और जेल सुपरिटेंडेंट सन्तरी
की कोठरी मे पहुँचे। कतव्यनिष्ठा पर अविचल रहने के लिए
पुरस्कृत करते हुए उहोने उसकी कमीज पर हवलदारी का विल्ला
लगा दिया। सन्तरी अचानक इस परिवतन पर चकित हुमा ।
आई० जी० ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, "यह सारा
अभिनय अनुशासन के परीक्षण के लिए किया गया था। इसमें
एकमात्र तुम खरे उतरे इसलिए तुम्हे पदोन्नत किया गया है ।"
उस क्षण सन्तरी ने अनुभव किया कि अग्नि-परीक्षा से तपकर
निकले स्वण की आभा पहले से भी द्विगुणित हो गई है।
55 ऐसे बहती है पविलता की गगा
चद्रगुप्त मौय के शासनकाल मे उस वर्ष बहुत सर्दी पडी।
सम्राट ने मत्रिमडल के साथ बैठकर निश्चय किया कि विश्वस्त
अधिकारी की देख-रेख मे अभावग्रस्त प्रजाजनो को कम्बल बांटे
121

7 जाएं। कवल बाटे जाने लगे, लेकिन साथ ही यह भीसमाचार मिल रहे थे कि चोरो ने कम्बलो की चोरी का व्यापक अभियान चला रखा है। अधिकारीपरेशान थे। प्रधान अमात्य चाणक्य ने च द्रगुप्त से कहा, "अब मै स्वय कम्बलो के वितरण की व्यवस्था देखूगा।" सम्राट च द्रगुप्त चकित-से बोले,"आचाय, आप करेंगे यह कष्ट लेकिन उससे क्या समस्या हल हो जायेगी ?" आचार्य चाणक्य मुसकराकर रह गये, "समय ही इसका उत्तर देगा।" आचाय चाणक्य की कुटिया मे निधनो को वाटे जाने वाले कम्बलो का ढेर लगा था। चोरो को यह पता लगा तो वे रात्रि को उनकी कुटिया पर पहुंचे। कुटिया के द्वार पर पहुंचकर उहोने देखा कि आचाय और उनकी माता जमीन पर चटाई बिछाकर पुराने कम्बल ओढे हुए सो रहे हैं। पुराने कम्बल जीर्ण- शीण, बीच बीच मे फटे थे जिसके कारण आचार्य चाणक्य और उनकी मा ठड से सिकुडे हुए थे । एक ओर नये कम्बलो का ढेर लगा था। चोरो को आश्चय हुआ कि इतने कम्बलो के ढेर के बावजूद वे इहे ओढ क्यो नही रहे हैं। वे इसे रहस्य समझकर चकित विस्मित थे। आखिर उहोने आचाय चाणक्य को जगाकर कहा, 'आचार्य, क्षमा करें, हम कम्बलो की चोरी करने आए थे परतु कम्बलो के इतने ढेर के बावजूद आप इस प्रकार सर्दी से ठिठुर रहे है, हम जानना चाहते है, इसके पीछे क्या रहस्य । आचार्य ने मद मुसकान के साथ उत्तर दिया, "ये कम्बल उन निधनो के लिए है जिनके पास इनका अभाव है। इन पर केवल उही का अधिकार है। यदि मैं ओढता तो मैं भी तुम्हारे समान ही चोर कहलाता।" 122 चोरी करने के लिए आए उन व्यक्तियो की आँखें खुल गई। उन्होने क्षमायाचना करते हुए भविष्य में कभी चोरी न करने की शपथ पायी। आचार्य चाणक्य जैसे निम्पृह प्रधान अमात्य के कारण ही चद्रगुप्त मौर्य के शासन मे सुख-समृद्धि और समता का साम्राज्य था । सर्वोच्च शासको के आदश की प्रेरणा ही गगा की भांति उच्च शिखर से प्रत्येक प्रजाजन के मन को पवित्र करती हुई बहती रहती है। 56 जब राजहठ को झुकना पडा हैदरावाद की सडको पर उस दिन एक धनाढ्य व्यक्ति की शवयात्रा निकल रही थी। शव के ऊपर छावर रके सिक्के लुटाये जा रहे थे । पैसे बटोरने वालो को भीड भी कम न थी। शवयात्रा मे चल रहे एक व्यक्ति की नजर सहसा पैसा बटोरने वाले एक भद्र पुरुप पर पड़ी। अकस्मात उसे अपनी आंखो पर विश्वास ही नहीं हुआ। उसने उस दिव्य मूर्ति को फिर ध्यान से देखा । अय साथियो को भी बताया--"देख रहे हैं आप उस भद्र पुरुष को, जोजमीन पर से पैसे बटोर रहा है ? वे हैं पडित मदन- मोह्न मालवीय । देश के महान सपूत, लोकनेता।" और कहने वाले का क्ण्ठ रुंध गया था। मालवीयजी को भला कौन नहीं जानता था । शवयात्रा मे शामिल अनेक व्यक्तियो ने उहे विनम्र प्रणाम किया। वे लज्जित स्वर में बोले, "देश और मानवता के लिए अपना सवस्व त्याग देने वाले महामना मालवीयजी को आज ये शव- पुष्प (पैसे) चुनने की क्या जरूरत पड गयी?" उपस्थित भद्रजनो 123

ने पूछा, "पडित जी, हमे आजा कीजिए, हैदराबाद की जनता
इतनी कृतघ्न तो नहीं है कि एक समर्पित देशभक्त को यह काम
भी करना पडे।"
पडित जी सहज मुसकान बिखेरते हुए बोले, 'काशी से आया
था कि निजाम हैदरावाद से विश्वविद्यालय के लिए प्रचुर धन
ले जाऊँगा । अतुल सम्पदा के स्वामी से काफी कुछ धन मिलेगा।
लेकिन उहोने इनकार कर दिया है।" मालवीयजी बोले,
"अव आपही बताइये, क्या मैं काशीखाली हाथ जाऊँगा? वहाँ
कुछ जवाब तो देना ही होगा कि हैदरावाद से क्या लाया हूं।"
उन्होने सरल मुसकान से कहा, "निजाम भले ही न दें, हैदराबाद
मे तो लेकर ही जाऊँगा। इसलिए सोचा, ऐसे ही इकट्ठा
कर लू।" भद्रजन मालवीयजी को आदर-सहित अपने
साथ ले गये। निजाम हैदराबाद के पास पूरी बात पहुँचाई
गई—यह तो समूचे हैदराबाद का अपमान होगा कि मालवीयजी
इस प्रकार खाली जाएँ। धर्माध निजाम भी पिघल गया। उसे
झुकना पडा और उसने महामना मालवीयजी को वाछित धन
देकर सम्मान सहित विदा किया। समाज के लिए अपने सपूर्ण
अह को गला देने वाले मालवीयजी के सम्मुख कुबेर को भी
अपने द्वार खोलने पड़े।
57 लाकि क्राति की मशाल जले
"कुछ दिनो मे ही ये दोनो इतिहास-पुरुष और देश की संपत्ति
हो जायेंगे और तब सिर्फ याद ही बाकी रह जायेगी।"
क्रान्तिकारी नेता च द्रशेखर आजाद ने भगतमिह और
124

बटुकेश्वर दत्त के एसेम्बली मे बल फेंकने के निणय पर गभीरता- पूर्वक कहा था। क्रान्तिकारी दल ने निश्चय किया था कि अग्नेजी सरकार की अन्यायपूर्ण नीति का पर्दाफाश करने और भारत भर मे कातिकारियो का जीवन-दशन प्रचारित करने के लिए एसेम्बली मे धमाका करना जरूरी है। उन्होने यह भी निश्चय किया था कि विस्फोट के बाद गिरफ्तारी देकर वे मुकदमे की कायवाही मे अदालत को अपना प्रचार-मच बनाएंगे और इस तरह उनके सिद्धान्तो का अच्छा प्रचार हो जायेगा। 8 अप्रैल 1929 का दिन था। भगतसिंह और दत्त एसेम्बली की गैलरी मे मौजूद थे। जाज शस्टर ने ज्यो ही सूचना दी कि दोनो (जनविरोधी) विधेयको को महामहिम वायसराय ने अपने विशेषाधिकार द्वारा स्वीकृत कर लिया है, उसी समय भगतसिंह और दत्त खडे हो गए। दोनो ने एक एक बम फेंका। एसेम्बली मे भगदड मच गई । जाज शुस्टर अपनी डेस्क के नीचे छिप गया। अय लोग भी भागे। भगतसिंह और दत्त के नारो से एसेम्बली भवन गूज उठा, "इनकलाब जिदाबाद साम्राज्यवाद का नाश हो ।" और फिर उन्होने एक पर्चा वाटा जिसका साराश था-- "हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम मानव रक्त वहाने के लिए अपनी विवशता के लिए दुखी हैं, परन्तु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रान्ति के अवसर पर कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।' और उसके बाद भगतसिंह और दत्त ने आत्मसमर्पण कर दिया। मुकदमे का नाटक शुरू होने पर भगतसिंह प्रतिदिन अदालत मे क्रान्ति-दर्शन समझाने के लिए एक भाषण देते। विश्व भर मे यह विचित्र 125

मुक्दमा विरयात हो गया। दुनिया भर से मुकदमे की सहायता
के लिए चदा आने लगा। पौलेंड की एक महिला ने भी रुपये भेजे
और मुकदमा लडते रहने का आगह किया। आखिर मुकदमे के
नाटक के बाद 7 अक्तूबर को जब भगतसिंह को फासी की सजा
मुनाई गई तो उसने कहा था, "मेरी शहादत से कान्ति की वह
मशाल जलेगी जो शायद जीवित रहने से न जलती। मेरे हँसते
हँसते फॉसी पाने की सूरत हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चो के
भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी। और देश के लिए
वलिदान होने वालो की तादाद इतनी बढ जायेगी कि विशाल
साम्राज्यवादी ताकत कान्ति की आवाज को रोक नहीं पायेगी।"
निश्चित समय पर 23 माच कोसाय सात बजे जव भगतसिंह
फासी के फदे की ओर बढे तो उहोने मुसकराकर वहाँ
उपस्थित मजिस्ट्रेट से कहा-"आप बहुत भाग्यवान हैं,श्रीमन ।
आज आपको अपनी आँखो से यह देखने का अवसर मिल रहा
है कि भारतीय क्रान्तिकारी कैसे खुशी के साथ आदर्शो के लिए
मृत्यु का आलिंगन कर सकते हैं।"
58 कवन कसौटी पर
इग्लैड का स्टुवर्ड वशीय राजा जेम्स द्वितीय पदच्युत किये जाने
के बाद हताश होकर निर्वासित जीवन विता रहा था।
अव राजसिंहासन पर विलियम ततीय विद्यमान था।
जेस्स को अपनी अक्मण्यता और अकुशलता के कारण ही
गद्दी से हाथ धोना पड़ा था किन्तु अव भी उसे अपने कुछ वफादार
साथियो और अनुचरो पर भरोसा या दि वह उनके बल पर
126

- सिंहासन हथिया लेगा। निर्वासित राजा जेम्स को गोष्ठी मे नित नई नई मरणाएँ चलती रहती। वह दिन भी निकट आ पहुँचा जब सिंहासनासीन राजा जेम्स के विरुद्ध पड्यत्र की योजना पूर्ण हुई । विद्रोह से सम्बधित सभी नक्शे और गुप्त कागजात जेम्स के वफादार धनी मित्र के पास रखे गये। किन्तु विलियम तृतीय जितना दक्ष प्रशासक और जागरूक राजा था, उतना ही नीति-निपुण था। वह जानता था कि पदमुक्त राजा जेम्स और उसके वफादार साथी इतनी जल्दी निराश होकर नही बैठ जायेंगे बल्कि वे विद्रोह के पड्यन मे सक्रिय रहेगे। इस कारण विलियम ने जेम्स के प्रत्येक अनुचर और साथी के पीछे जासूस लगा रखे थे जो प्रतिक्षण उनकी गतिविधियो पर नजर रखते थे। एक दिन जासूसी ब्यूरो के प्रमुख ने विलियम को सूचना दी कि पड्यत्रकारी सक्रिय है और सत्ता हथियाने की योजनाएँ आकार ले रही है। "ठीक है।" विलियम ने ब्यूरोके प्रमुख से कहा, "उन पर तब तक हाथ न डाला जाय जब तक षड्यंत्र के पूरे साक्ष्य उपलब्ध न हो जाएँ।" आखिर पड्यन की पूरी योजना बन गई। आगामी चौबीस घटो के अन्दर सत्ता-परिवतन का नाटक पूर्ण होने वाला था। जेम्स के धनी मित्र के पास से पड्यत्र के समस्त गुप्त कागजात पकडे गए। पदभ्रष्ट राजा जेम्म के धनी मित्र को वदी बनाकर विलियम के सम्मुख पेश किया गया। जेम्स के धनी मित्र के मृत्यु-भय से होश उड गए। उसे कोई सदेह नही था कि उसे प्राणदड दिया जायेगा। "आखिर तुमने षड्यन मे भाग क्यो लिया ?" विलियम ने शात स्थिर स्वर मे उस व्यक्ति से पूछा। मृत्यु निकट देखकर उसने एक क्षण साहस बटोरा और 127

हदय का सत्य कहना ही उचित समझा। निश्चयात्मक मृत्युदड
की कल्पना ने उसमे दिव्यता का संचार कर दिया था। वह
गोला, "राजा जेम्स मेरा परम मित्र है। उसके मुझ पर अनेक
उपकार है। मेरा यह नैतिक कतव्य था कि अपने प्राणो को
सक्ट मे झोककर भी मैं उसकी मदद करूँ।"
राजा विलियम जेम्स के विश्वस्त मित्र के इस कथन पर
मद मुसकरा उठा । उसने पड्यन सम्बधी कागजो को निक्ट ही
जलती मोमबत्ती की लौ छुआई और भस्म कर दिया। विलियम
के राजदरबारी हतप्रभ रह गए । जासूसी ब्यूरो के प्रमुख के
चेहरे पर विचित विस्मय की रेखा उभर आयी । राजा
विलियम ने सबको लक्ष्य कर कहा, "जो व्यक्ति अपने भूतपूर्व
स्वामी के प्रति निस्वाथ भाव से प्राणो को सक्ट में डालकर भी
वफादारी निभाने की तैयारी रखता हो, वह वध्य नहीं अपितु
नरश्रष्ठ है, सम्माननीय है। ऐसे व्यक्ति को तो पुरस्कृत कर
मित्रता की याचना की जानी चाहिए।"
पड्यत्रकारी मे भी महानता खोजने वाले गुणग्राही राजा
विलियम के प्रति जेम्स का साथी नतमस्तक हो
के दरवारियो मे जहा उसकी गुण ग्राहकता और सौज य के
कारण आस्था दृढ हुई, वही विरोधियो की पडयत्रकारी ज्वाला
भी पश्चाताप के जल से शात हो गई।
| उठा। विलियम
59 रवत्व का अभिमान
एक दिन ईश्वरच द्र विद्यासागर कलकत्ता प्रेजीडेसी कालेज के
अग्रेज प्रिंसिपल के कमरे मे किसी काम से गए । अग्रेजियत के दप
128

से प्रिंसिपल मेज पर पैर फैलाये बैठा रहा और उपेक्षापूर्वक विद्यासागर जी से बातचीत करता रहा। सयोगवश कुछ समय के उपरान्त इस अग्रेज प्रिंसिपल को विद्यासागर के कमरे मे आना पडा।तब विद्यासागरजी ने भी मेज पर पैर पसारे हुए ही उसका स्वागत किया।वे भी उसी प्रकार उपेक्षापूवक बैठे बातें करते रहे। अग्रेज प्रिंसिपल को यह बहुत बुरा लगा। उसने प्रबंध समिति के अधिकारियो से विद्यासागर के असभ्य व्यवहार की शिकायत की। ईश्वरच द्र विद्यासागर की पेशी हुई और उनसे जवाब मागा गया। विद्यासागर ने कहा, "प्रिसिपल महोदय सभ्य अग्रेजी समाज के प्रतिनिधि हैं अत मैंने उनके 'सभ्य व्यवहार' का अनुवरण करके ही अपना व्यवहार निर्धारित किया है । आखिर हम हिदुस्तानियो को सभ्यता का मापदड सभ्य अनेजा' से ही तो अपनाना होगा।" विद्यासागर के बेजोड उत्तर को सुनकर अग्रेज प्रिंसिपल को अपनी भूल स्वीकार करनी पडी। विद्यासागर ने अनुभव क्यिा था कि अग्रेज भारतीयो को हीनदृष्टि से देखने के कारण अपमाजनक व्यवहार करते है। शासक दप से चूर जाति भारतीयो का अपमान करे, इसे वे सहन नही कर पाते थे, अत इसी प्रकार निर्भीकता से भारतीय अपमान का बदला चुकाते। केवल राष्ट्रीय मान-सम्मान का ही प्रश्न नहीं, सच्चे देश- भक्त नागरिक मै अपनी सस्कृति, सभ्यता, देश और परम्परा- सभी का अभिमान होना चाहिए। स्वत्व का यह अभिमान रखने वाली जाति ही विश्व में सम्मानित होती है । हमारे देश के ऋषिगण भी धमलीन होकर कभी स्वाभिमान से विमुरा नहीं रहे। ऐसे ही दिव्य पुरुष थे महर्षि दयानन्द । 129

उनकी यश-सुरभि भारत के कोने कोने मे फैल चुकी थी । अपार
जनसमूह भक्तिभाव से उनके प्रवचन सुनता था।
महपि की इस प्याति और लोकप्रियता की सूचना तत्कालीन
गवनर जनरल लाड नाथव क तक भी पहुंची। उहोने महर्षि
को बुला भेजा। भेंट के दौरान लार्ड नाथ क ने पूछा, "महाराज,
अग्रेजी राज मे आपकी सभाएँ शातिपूवक होती हैं। आपको
कोई कप्ट तो नही?"
महर्षि ने कहा, "ईश्वर की कृपा से मेरी सभाएँ निविघ्न
होती हैं और सुप्रवध के लिए मै आपको वन्यवाद देता हूँ।"
लाड नार्थवक ने फिर अपने मन की बात कही, फिर
महाराज, अप अतिम प्रार्थना के समय अग्रेजी राज्य की
दीर्घायु के लिए भी प्राथना किया करें तो कैसा रहे ?"
इस बात को सुनकर देशाभिमान से स्फूर्त महर्षि दयान द
तुरन्त गम्भीर हो गये और वोले, "चाहे अग्रेजी राज्य मे अपार
मुख सुविधाएं भी क्यो न हो, वह स्वराज्य से श्रेष्ठ कभी नहीं
हो सकता। अत मैं स्वराज्य के लिए प्राथना कर सकता हूँ,
अग्रेजी राज्य के स्थायित्व के लिए कदापि नहीं।"
देशाभिमान से युक्त इस निर्भीक वाणी को सुनकर नाथन क
भानवका रह गया। वह समयता था कि एक धर्म-प्रचारक शायद
धर्म के अतिरिक्त अय वाता से कोई नाता नहीं रखता। इसके
वाद महपि पर भी अग्रेजा यी सदैव टेढी नजर रही।
सत्य के इस अभिमान ये पारण ही कोई सस्कृति और
गाट जीवित रहता है। इसी सत्य को पहचान पर लाड वाले।
कहा था, 'मैंने भारत यो गुलाम बनाय रयने या फार्मूला खोज
किया है और यह है इसकी शिक्षा पद्धति यो नष्ट कर अंग्रेजी
130

शिक्षा पद्धति लाद देना और सुनियोजित प्रचार द्वारा भारतीयो म अपनी सभ्यता के प्रति हीन-भाव पैदा कर देना।" राष्ट्रीय उत्कर्ष के लिए देशाभिमान ही नहीं, अपनी प्रत्येक परम्परा के प्रति आस्था जरूरी है । लन्दन मे गोलमेज कास के लिए जब गाधी जी को निमश्रित किया गया, तब उनसे आग्रह किया गया कि वे सभ्य पोशाक यानी अग्रेजी पोशाक मे वहां आएँ, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि मैं करोडा भारतीयो का प्रतिनिधि हूँ अत उन्ही के वेश मे यहा आऊँगा । आखिर उनको शत माननी पड़ी। विश्व मच पर उसी देश और जाति का सम्मान होता है जिसके पास अपना जीवन दशन है, अपने मूल्य है और उसके वासियो मे है उनके प्रति अटूट सम्मान । श्रेष्ठ परम्पराओ से सम्पन्न भारत के पुत्रो ने सदैव स्वत्व सरक्षण की राह दिखाई 60 साहस और जातीय सरकार जीवन पथ के किसी भी विकट माग पर प्राणो को जान-बूझकर सकट में डालने वाले वीर पुरुप साहसी कहलाते हैं। ऐसे ही साहस के धनी महामानवो के कारण मानवता गौरवान्वित हुई है। सप्टि का विकास साहस की कहानी है। साहस नितान्त व्यक्तिगत जीवन-यात्रा में भी प्रकट हो तो वह महान क्तव्य-पथ के लिए प्रेरणा का मन बनता है। साहस के ऐसे ही जीवन्त प्रतीक थे सरदार पटेल । एक बार उनकी बगल में ऐसा भयकर फोडा निकला कि किसी उपचार से ठीक

होने मे न आया। अत मे किसी ने बताया कि यह केवल गर्म
लोहे से दागने से ठीक हो सकता है। सरदार पटेल उस समय
वकालत करते थे। घर पर दागने वाले नाई को बुलाया गया।
उसने लोहे को लाल गम दहका लिया। घर के लोग भयभीत हो
उठे कि ऐसी यातना कैसे सहेगे सरदार ! लेकिन सरदार पटेल
के चेहरे पर कोई शिकन न थी। नाई ने लोहे की लाल दहकती
छड धीरे से सरदार पटेल के फोडे को छुआ दी।
सरदार कडककर बोले, "तुम घबराते हो तो लाओ छड मुझे
दो।" और उहोने लाल दहकती छड लेकर तुरन्त फोडे के चारो
ओर धुमा दी । रक्त और पीव की धारा बह निकाली। सरदार
के इस साहस पर सभ
कित रह गये।
व्यक्तिगत जीवन मे साहस ही आगे चलकर राष्ट्रीय जीवन
मे स्थायी सस्कार का रूप धारण करता है। जनवरी 1941 मे
यरवदा जेल मे बदी सरदार ने साहस की इस वृत्ति का परिचय
दिया था। उस दिन जेलर ने सरदार पटेल और उनके साथी
राजनीतिक बन्दियो से कहा, "आज मच्छरदानियां नही मिल
पायेंगी क्योकि पुरानी मच्छरदानियां फट गयी हैं और नयी
आने में समय लगेगा।"
मरदार पटेल गरज उठे, "मच्छरदानियां फट गयी हैं, तो
वाजार से तुरन्त नयी लाओ। क्या मैं यहा अपनी इच्छा से
आया था? यदि यहां मच्छरदानी नहीं है तो जेल का दरवाजा
खोल दो में चला जाऊँगा । जब मच्छरदानिया होगी, फिर
आ जाऊंगा।" और फिर सरदार अपने साथियो की तरफ घूमे
और आवेश मे गरजे, "मैं पूछता हूँ जब इनके पास हमे जेल मे
रखने के लिए मच्छरदानियो का भी प्रयध नही है तो यहाँ क्या

रखा है 74 जेलर सरदार पटेल को आवेशपूर्ण मुद्रा से कांप उठा और भागकर सुपरिटेंडेंट के पास गया। एक घटे के अन्दर जेल मे नयी मच्छरदानिया आ चुकी थी। ऐसे ही साहस के धनी थे महात्मा गाधी। उन दिनो खबर मिली कि चम्पारन मे नीलहे गोरे वहाँ के किसानो पर भारी अत्याचार करते हैं। गाधी जी ने जनता मे जागरण का शख फ्क कर शक्ति का संचार किया। गोरे परेशान हो उठे। एक शुभ- चिन्तक ने गाधी जी को आकर बताया कि एक गोरा उन्हे जान से मारने का निश्चय कर चुका है अत वह चम्पारन छोडकर तुरन्त चले जाएँ। गाधी जी ने मुसकराकर बात टाल दी और उसी रात को उस गोरे की कोठी पर जा पहुँचे । गोरे ने अचानक रात को एक अजनबी को देखा तो चौक पडा। पूछा, "कौन होतुम "गाधी" महात्मा गाधी ने सक्षिप्त उत्तर दिया। फिर उसकी तरफ स्थिर दृष्टि से देखते हुए बोले, "तुम मुझे मारना चाहते हो न, लो मैं अकेला ही आया हूँ। तुम अपनी इच्छा पूर्ण कर सक्ते हो।" गाधी जी के अदम्य साहस से गारा हतप्रभ हो उठा। साहसी व्यक्तित्व के जादू का उस पर ऐसा प्रभाव पडा कि वह गाधी जी के सामने नतमस्तक हो गया और उनसे क्षमा याचना की। ?" 61 मिट्टी की महकमेपलाराष्ट्रपति न्यायाधीश ने जेल अधिकारियो को फटकारते हुए कहा, "जव मेरे आने की पूर्व सूचना थी तो बन्दी को अभी तक उपस्थित 133

नही किया जा सका।
समय बीतता जा रहा था । इस सभ्रात बन्दी का मुकदमा
जिलमही सुनने के लिए उक्त अग्रेज न्यायाधीश को जेल परिसर
ही नियुक्त किया गया था। वन्दी थे ज्योतिर्मठ के जगदगुरु
शकराचार्य। जेल अधिकारी परेशान थे। वे पूजा मे समाधिस्थ
बैठे शकराचाय जी को उठाकर तोला नही सकते थे।
"ठीक है, अब मैं जाता हूँ। ध्यान रहे, ठीक तीन बजे
सार्यकाल बदी को अवश्य उपस्थित किया जाय "न्यायाधीश
क्रोध से कापते हुए चले गये।
जगद्गुरु शकराचाय के एक भाषण से क्षुब्ध अग्रेजी सरकार
ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया था । सार्यकाल
नर्धारित समय पर शकराचाय जी अपनी गरिमामय चाल
चले आ रहे थे। घडी की सुइयां आगे बढती जा रही थी।
प्रत्येक क्षण न्यायाधीश को क्रोधोमत्त बना रहा था। निरीक्षक
एव अधिकारी भी सहमे हुए से थे कि न जाने यह क्रुद्ध
न्यायाधीश शकराचार्य जी का क्या अपमान कर बैठे। उहे कसी
कठोर सजा दे बैठे । शकराचाय समस्त हिन्दुओ के पूज्य थे,
अत चिन्ता स्वाभाविक थी। राजेद्र बाबू विशेष रूप से इस
अवसर पर उपस्थित रहने की अनुमति प्राप्त करके मुगेर जेल
आये थे। वे परेशान थे कि मेरे सम्मुख यह कैसा धम सकट
आया है। मेरे ही सम्मुख हि दुओ के परमपूज्य जगद्गुरु
शकराचाय का अपमान हो गया तो क्तिनी ग्लानि की बात
होगी। एक क्षण उन्होने कुछ सोचा और जैसे ही शकराचाय जी
ने न्यायाधीश के कक्ष मे प्रथम पग रखा कि राजेद्र वावू ने अपनी
टोपी उतारकर शकराचार्य जी के चरणो में रख दी और
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साष्टाग प्रणाम की मुद्रा में उनके चरण पकडकर लेट गये। इस आकस्मिक घटना से सभी स्तब्ध रह गये। देश के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक नेता के रूप मे ख्यातिप्राप्त राजेद्र बाबू को इस प्रकार जगद्गुरु के चरणो मे गिरते देख वातावरण बदल गया । सभी उपस्थित लोगो ने आदरपूर्वक झुककर जगद्गुरु का अभिवादन किया। न्यायाधीश भी इस भारतीय सन्यासी के प्रति जनमानस मे ऐसी श्रद्धा देखकर अभिभूत हो उठा और उममा सारा क्रोध समाप्त हो गया। राजेद्र बाबू ने अपनी आत्मकथा मे लिखा है कि जगद्गुरु का मेरे सम्मुख कही अपमान न हो जाए इसलिए उसी क्षण एकाएक मुझे यह उपाय सूझा और अपनी तथा हिंदू समाज की समस्त श्रद्धा समेटकर मैं सावजनिक रूप से उनके चरणो मे लिपट गया। राजेद्र बाबू की यह सूझ बूझ एकाकी नही थी। उनके रोम रोम मे भारतीय सस्कृति की मर्यादाएँ मुखरित थी। भारत के राष्ट्रपति बन जाने के बाद भी उनका अत करण करोडो देशवासियो के उत्कष के लिए छटपटाता रहता था। वे अकसर प्रात काल दूर तक धूमने जाते। एक दिन वे घूमते हुए चाणक्यपुरी के पास मजदूरो की झोपडियो तक जा पहुँचे । उन दिनो इस क्षेत्र का विकास अधूरा था। उदार राष्ट्रपति का हृदय विचलित हो उठा । वह अपने सचिव की ओर घूमकर कह उठे, "युग युग को यह कैसी विषमता है, भव्य अट्टालिकाओ के समीप ही निनको से बनो ये झोपडियाँ सदैव दिखती आयो हैं ।" उ होने देखा कि मजदूर उनके दशनो के लिए उत्सुकता से निहार तो रहे हैं किन्तु निक्ट आने का साहस नही कर पा रहे हैं। राजेन्द्र बाबू ने सकेत से उ हें बुलाया । निकट आने पर स्नेहपूर्वक पूछा, 135

सपको यहां कोई तकलीफ तो नहीं है ?"
एकही कष्ट है हुजूर, हमारी बस्ती मे कोई भी नल नहीं
है...सामने वाली कोठी मे एक है, जिससे उनकी घास मे पानी
लगता है, लेकिन वे भरने नहीं देते है । मेहरबानी करके एक नल
वा दीजिए एक मजदूर ने साहस करके कहा ।
"तुम लोग यहां कितने दिनो से रहते हो?" राजेद्र बाबू ने
पूछा।
"
"हम यहा दो साल से रह रहे हैं, बावूजी | पहले यहाँ
जगल था, हम लोगो ने ही कोठिया वनाई है। अब तो काफी
रौनक हो गई है, हुजूर" मजदूरो ने उत्तर दिया।
राजेद्र बाबू के हृदय मे कही भारी टीस उभर उठी, आखे
नम हो आयी। वे सचिव की ओर मुडे, “सुनो वाल्मीकि
उहोने गभीर स्वर मे कहा, "कल तक यहाँ नल लग जाना
चाहिए।"
अगले दिन राष्ट्रपति फिर उधर घूमने निकले । मजदूरो के
चेहरो पर आज अजीब खुशी थी । नल लग चुका था।
"आपका इधर आना हमारे लिए वरदान बन गया,
बाबूजी !" एक मजदूर ने कहा।
राष्ट्रपति डॉ० राजे द्रप्रसाद उन मजदूरो की खुशी मे ऐसे
खुश दिख रहे थे जैसे उहोने आज ही कोई इच्छित वर पाया
हो । कि तु थोडी ही देर बाद उनकी सचित व्यथा उमड पडी,
उन करोडो पीस्ति देशवासियो की समस्या का हल तब तक
कसे हो सकता है जब तक प्रत्येक व्यक्ति मे, चाहे वह शासक हो
या अधिकारी, अपने कर्तव्य का बोध उत्पन नहीं होता।
यह क्तव्य बोध कितना उत्पन हो सका यह अलग प्रश्न
136

है, किंतु राजेन्द्र बाबू अपनी अतिम श्वास तक अनवरत कतव्य
की ज्योति जगाते रहे।
1
62 जब सस्कृति के सुमन
खिले
"वीरवर दुर्गादास, यह उचित होगा कि आप शाही बच्चो को
दिल्ली ले जाने की अनुमति दें।" औरगजेव के प्रतिनिधि
ईश्वरदाम ने कहा।
"दोनो बच्चो पर बादशाह का पूर्ण अधिकार है,
ईश्वरदास ।' दुर्गादास ने कहा, 'वादशाह के पौन और पौनी
उनकी अमानत हैं मेरे पास । उन्हें मैं स्वय दिल्ली पहुँचा दृगा,
किन्तु शत यह है कि मुगल सम्राट औरगजेब को अजीतसिंह को
जोवपुर नरेश स्वीकार करना होगा।"
ईश्वरसिंह सारी स्थिति के लिए तैयार होकर आया था।
औरगजेव के सामने इसके अलावा कोई उपाय न था इसलिए
यह शत स्वीकार कर ली गई । नीति-निपुण दुर्गादास इस
सरलता से औरगजेब को झुकते देख चकित हो गए लेकिन चतुर
कूटनीतिज्ञ दुर्गादास भी मजे हुए राज नीतिक शतरज के
खिलाडी थे । अत वे शहजादे वुलन्द अरतर को जोधपुर ही
छोडकर केवल शहजादी सफायतुनिमा को दिल्ली ले गये ।
पौत्री (शहजादी) ने जैसे ही वार के कदमो मे सिर झुकाया
तो प्रेम से उसे आशीर्वाद देते हुए औरगजेब बोला, "वेटी, तुम
अभी तक काफिरो के साथ रही हो, तुम्हे अपने मजा का ज्ञान
नही है, इसलिए अच्छा होगा कि अब कुरान पढकर अपने
मजहब का पूर (प्रकाश) हासिल करो।"
137

पायाजान एटी बोली, "मैंने तो कुरान पढा है।
दुर्गादास जी ने मुझकरान पढाने और इस्लामी तालीम
हामिन कपणे लिए योग्य मौसवी नियुक्त कर दिए थे।" वह
इठमकर मोती अप पुछ देखिये, मुझे कुरान की पूरी आयतें
"क्या सचे।
फा मुह अचरज से खुला रह गया ।
"यह सच है वावा " शहजादी ने जवाब दिया।
"हिन्दुओ की बहुत सी बातें ऐसी हैं वेटी, कि उनसे फरिश्ते
भी शायद मुकावला न कर सकें।" भावविभोर होकर
औरगजेब ने बेटी को प्यार से थपथपाया।
"यह हमारा स्वाभाविक कतव्य था, जहाँपनाह " सहसा
दरवार मे प्रवेश करते हुए दुर्गादास ने कहा। वे बोले, 'आपसे
हमारा मतभेद हो सकता है शहशाह, किसी धर्म से हमारा
विद्वेप नही। इसलिए शाही बच्चो को वह इस्लामी शिक्षा दी
गई जो आपके मजहब के मुताविक उहें दी जानी चाहिए थी।
ये शाही बच्चे हमारे मेहमान थे और हमारे पास शहशाह
की धरोहर थे। हमे गौरव है कि हम इनकी उचित देखभाल
कर पाये।
इस्लाम का कट्टर पुजारो औरगजेब दुर्गादास की सदाशयता
से अभिभूत हो उठा। उसकी आखें तरल हो आयी।
"दुर्गादास, तुम फरिश्ते हो।" बादशाह ने कहा और उसी
क्षण अजीतसिंह को जोधपुर-नरेश स्वीकार करने का फर्मान
जारी कर दिया।
"शहशाह, इस सम्मान का अधिकारी मैं नहीं, हम हि दुओ
को गौरवमय सस्कृति है जिसके कारण युग-युग से हमारे रक्त मे
138

उच्च मानवता के ये सस्कार प्रवाहित हैं।" नि सदेह उस दिन वह भारतीय संस्कृति को उदात्तता की ही विजय थी कि दुर्गादास को सदाशयता से अभिभूत हो कठोर- हृदय शहशाह औरंगजेब ने तत्क्षण अजीतसिंह को जोधपुर नरेश मानने का फर्मान जारी कर दिया। 63: ज्ञान की सार्थकता "महाराज, कार्य बहुत है, प्रयोगशाला के लिए मुझे एक औ सहायक चाहिए।" विक्रमादित्य युग के विख्यात रसायनाचा नागार्जुन ने महाराज से निवेदन दिया। "आपके काय । अवरोध तो राजकीय क्षति है, आचाय, उसे हम नहीं होने देंगे कल हो आपके पास दो सुयोग्य युवको को भेज दिया जायेग उनमे से आप योग्यतम का चुनाव कर लें।" महाराज नागार्जुन को वचन दिया। दूसरे दिन प्रात निश्चित समय पर दो सुयोग्य युव नागार्जुन के निवास पर उपस्थित थे। दोनो की समान योग्यर एव दक्षता देखकर आचार्य चकित हुए कि किसे सेवा का अवस दें। कुछ क्षण के चिन्तन के पश्चात् वे बोले, "मैं एक रसाय आप दोनो को देता हूँ। कल प्रात जो इसकी परख कर और इ कोई गया पदार्थ बनाकर लायेगा, उसी को मैं अपना सहाय बनाऊंगा, लेकिन एक बात ध्यान रहे"-उन्होने जाते हुए युवा से कहा, "तुम्हें राजमार्ग को पार करते हुए ही जाना होगा युवक आश्चयचकित थे कि राजमार्ग से जाने का ही नि आखिर क्यो दिया आचार्य ने, वितु वे बिना कोई प्रश्न वि - 1 सादर नमन कर चले गये । आचार्य ने देखा कि दूसरे दिन दोनो युवक समय पर उपस्थित है, लेकिन जहा एक के चेहरे पर विजय की दीप्ति है, वही दूसरा म्लान मुख नज़रें झुकाए खडा है । दोनो से पूछताछ करने पर पहले वाले युवक ने बताया कि उसने पदाथ को न केवल परख लिया है, बल्कि एक रसायन भी आदेशानुसार तैयार कर लिया है। दूसरे युवक ने खेदपूर्वक अपने कर्तव्य को पूरा न कर पाने की विवशता बताते हुए कहा, "आचाय-प्रवर, जिस समय मैं राजमार्ग से गुजर रहा था, मैंने देखा कि एक पेड के नीचे एक असहाय रुग्ण व्यक्ति पड़ा हुआ है, जिसे कोई भी पूछने वाला नहीं है । मैं अपने मानवीय क्तव्य की अवहेलना न कर सका और उसे उठाकर अपने घर ले गया।" युवक ने दुखपूवक कहा, 'मैं जानता था कि ऐसा करने से मैं आत्राय की सेवा से वचित हो जाऊँगा, लेकिन असहाय व्यक्ति की सेवा मुझे अपने स्वाथ से कही अधिक महत्त्वपूण लगी।" 'तुमने ठीक ही किया, युवक " आचाय नागार्जुन ने मुसकराते हुए उसकी पीठ ठोकी । वे बोले, "मुझे रसायन बनाने वाले यन्त्र मानव की नहीं, ऐसे सवेदनशील हृदय की ही जरुरत है, जो पीडित मानवो के दुख-दर्द मे समरस हो सके।" आचाय ने कहा, “मनुष्य की सर्वोत्तम योग्यता उसकी मानवीयता है। शेप सब गौण हैं।" रागार्जुन ने कहा, "श्रेष्ठतम ज्ञान विज्ञान और रसायन आखिर मानव की सेवा के लिए ही तो हैं । सेवा-भाव ही नही तो इनकी उपयोगिता कैसी? इसीलिए मैं सहायक के रूप मे तुम्हारा चयन करता हूँ।"

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Jiyo To Aise Jiyo

Author
Dharma Sharma
Title
Jiyo To Aise Jiyo
File name
Jiyo To Aise Jiyo
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2011/03
Publisher
Aasha Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
149
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551028
Barcode
4990010031810.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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