Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-ii
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५०२ म हा भारत [ आदिपर्व A000 200/coconoc5c5" được cơ: . इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः । वैशम्पायन उवाच-क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चुक्रोध भारत ॥ १० ॥ भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः । उवाच च महीपालाराजजलदनिःस्वनः रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः । आहृय दानं कन्यानां गुणवन्यः स्मृतं बुधैः ॥ १२ ॥ अलंकृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि । प्रयच्छन्त्यपरे कन्यां मिथुनेन गवामपि ॥ १३ ॥ वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ॥ १४ ॥ आर्ष विधिं पुरस्कृत्य दारान्विन्दन्ति चापरे । अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिवृतम् ॥ १५॥ स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च । प्रमथ्य तु हृतामाहुायसी धर्मवादिनः ॥ १६ ॥ बूढ़े शान्तनु के पुत्र भीष्माचार्य को देखकर वह गम्भीर स्वर से सब राजाओं को सुनाकर कहा- अप्सरा-सदृश सुन्दरी कन्यायें मनमें कुछ डरी और गुणवान् वर को बुलाकर यथाशक्ति गहने और धन यह सोचकर वहां से हटने को हुई कि 'यह बूढा, देकर कन्या देने को विद्वान् लोग 'ब्राह्म' विवाह धर्मात्मा, सफेद बालों से युक्त, भीष्म निर्लज बन कहते है । कुछ लोग दो गौलेकर कन्या देते है कर यहां किसलिये आया है ? हे भारत ! अपनी यह 'आप' विवाह कहा है। कोई कोई पण्डित धन ही प्रतिज्ञा असत्य करके अब यह जनता में क्या लेकर कन्या देते हैं यह 'आसुर' विवाह कहा है। कहेगा : भीष्म ब्रह्मचारी है, यह बाल सचमुच असत्य कोई कोई बलपूर्वक कन्या को ले जाते हैं। यह ही है । इस प्रकार बोलते हुये वे सब नीच राजा 'राक्षस' विवाह है। कोई कोई कन्या को प्रसन्न लोग उसकी हंसी उड़ाने लगे ॥६॥१०॥ करके उसकी सम्मति से विवाह करते हैं। इसको वैशम्पायन कहते है-क्षत्रियों की उक्त बातें विद्वानों ने 'गान्धर्व' विवाह कहा है। कोई कोई सुनकर भीष्माचार्य क्रोधित हुये। तब भीष्म जी असावधान कन्या को छल से ले जाकर विवाह करते ने उन कन्याओं को आप ग्रहण करना विचारा । है । यह 'पैशाच' विवाह कहा है। कोई कोई दाग ऐसा विचार करके उन्होंने बलपूर्वक उन तीनों ] करनेवाले को बुलाकर वा स्वयं जाकर कन्या को कन्याओं को अपने रथ पर बिठाकर मेघ के समान प्राप्त करते है। यह 'प्राजापत्य' विवाह है। कोई कोई - 20cricorror 30.crororerocorreiral PARAN अध्याय १०२ ] महाभारत ५०३ Poprocc00. carica acscariraroorder Calcica GUCNOGO ता इमाः पृथिवीपाला जिहीमि वलादितः । ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ॥ १७॥ स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः । एवमुक्त्वा महीपालान्काशिराजं च वीर्यवान् ॥ १८ ॥ सर्वाः कन्याःस कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् । आमन्त्र्य च स तान्प्रायाच्छीघ्र कन्याःप्रगृह्य ताः॥ १९ ॥ ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्पिताः संस्पृशन्तः स्वकान्वाहून्दशंतो दशनच्छदान् ॥ २० ॥ तेपामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् । आमुश्चनां च वर्माणि संभ्रमः सुमहानभूत् ॥ २१ ॥ ताराणामिव संपातो वभूव जनमेजय । भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ॥ २२ ॥ सवर्मभिर्भूपणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः सक्रोधामप॑जिह्मभ्रूकपायीकृतलोचनाः ॥ २३ ॥ सूतोपक्लुप्तान्रुचिरान्सदश्वरुपकल्पितान् रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ॥ २४ ॥ यज्ञ में कन्या ग्रहण करत हैं। यह 'दैव' विवाह जी उन कन्याओं को रथ पर बिठाकर, सपको । इन सब में क्षत्रिय के लिये राक्षस विवाह युद्ध के लिये ललकारते हुए वहा से चल दिये ।। ही श्रेष्ठ कहा गया है । परन्तु क्षत्रिय लोग स्वयम्वर ११॥१९॥ की प्रशंसा करते है और उसमे जाते है । धर्म के इसके पश्चात् सब राजा लोग महा क्रोध से ज्ञाता शत्रु पक्ष को परास्त करके कन्या को हर ला दान्तों को पीस पीस भुजाओं को स्पर्श करते हुए उठ कर उससे विवाह करने को ही सब से श्रेष्ठ समझते खट हुये। उनमें से किसी किसी ने क्रोध के वश में हैं । इस कारण हे राजाओ। मैं इन तीनों कन्याओं होकर ऐसी शीघ्रसा की, कि उनके पहने हुये कवच को बलपूर्वक इस स्थान से हरता हू। मै युद्ध के और गहने इधर-उधर गिरने लगे। ऐसा जान पडता लिये तैय्यार खड़ा है, यदि तुम लोगों में शक्ति है था मानों आकाशमण्डल से तारे गिर रहे है तो आर मेरा सामना करो, अथवा हार मान जाओ। चारों ओर कोलाहल होने लगा। सारथियों ने घोडों इसी समय जय या पराजय पाओगे। काशी के को रथों में जोडकर तैय्यार किया । नाना प्रकार राजा और अन्यान्य राजाओं से एमा कहकर भीष्म के अस्त्र शस्त्र लेकर सब राजा लोग उन रयों पर कहा - ono0 Procon ५०४ महा भारत [आदिपर्व Xeoc00000000000000rsr verservoirror प्रयान्तमथ कारख्यमनुसतुरुदायुधाः ततः समभवद्युद्धं तेषां तस्य च भारत । एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्पणम् ॥ २५ ॥ ते त्विपून्दशसाहस्रांस्तस्मिन्युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तथांतरा ॥ २६ ॥ अच्छिनच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्यतम् ॥ २७ ॥ ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्वुदाः स तं वाणमयं वर्ष शरैरावार्य सर्वतः ॥ २८ ॥ ततः सर्वान्महीपालान्पर्यविध्यत्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन्विव्याध पञ्चभिः ॥ २९ ॥ सच तान्प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन्। तद्युद्धमासीत्तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ॥ ३० ॥ पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनपि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ॥ ३१ ॥ चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्यातिपुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ॥ ३२ ॥ चढकर भीष्म जी के पीछे दौडे ! क्रोध के कारण किसी पहाड की चोटी पर बादल जल वर्षा रहे है। उन सबकी भौंहें टेढी और आखें लाल हुई हुई। इसके पश्चात् भीष्म जी ने अपने वाणों से उन वाणों थीं ॥२०॥२५॥ की वर्षा को रोककर प्रत्येक राजा के तीन तीन वाण हे भारत | अब अकेले भीम जी के साथ उन मारे । तब प्रत्यक राजा ने क्रोध में आकर भीष्म सब राजाओं का घोर युद्ध होने लगा। उन सब जी को पाच पाच वाण मारे। भीम जी ने फिर उन राजाओं ने एक साथ दश सहस्र वाण भीष्म जी के वाणों की वर्षा को निष्फल करके प्रत्येक राजा को ऊपर चलाये । परन्तु वह वाण भीष्म जी के पास दो दो वाण और मारे । वैशम्पायन जी बोले-है पहुचने नहीं पाये थे, कि भीम जी ने अपने वाणों । राजा । इस प्रकार से उन राजा और भीष्म जी से से उनको काटकर बीच में ही गिरा दिया । तब सब शक्ति आदि अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्रों से राजा लोग चारों ओर से भीष्म जी को घेरकर उन- देवता और असुरों के युद्ध के समान युद्ध हुआ । पर वाण वर्षाने लगे। ऐसा जान पडता था मानों | अन्त में भीष्म जी ने अपने वाणों से हजारों शत्रुओं । - वाण, orocarrorcarororronirono-o- अध्याय १०२ ] म हा मारत १५०५ voca/2520000pcoooooooooo Ja oicesciccicio .. - .. रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । तान्विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः कन्याभिः सहितः प्रायादारतो भारतान्प्रति । ततस्तं पृष्ठतो राजञ्च्छाल्वराजो महारथः ॥ ३४ ॥ अभ्यगच्छदमेयात्मा भीम शान्तनवं रणे । वारणं जघने भिन्दन्दन्ताभ्यामपरो यथा ॥ ३५॥ वासितामनुसंप्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठति भीममाह स पार्थिवः ॥ ३६ ॥ शाल्वराजो महावाहुरमर्पण प्रचोदितः ततः स पुरुषव्याघो भीप्मः परवलार्दनः ॥ ३७॥ तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । वितनेषुधनुप्पाणिर्धिकुञ्चितललाटभृत् ॥ ३८ ॥ क्षत्रधर्म समास्थाय व्यपेतभयसंभ्रमः निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ॥ ३९ ॥ निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीपमशाल्वसमागमे ॥ ४०॥ तो वृपाचिव नर्दन्तौ बलिनो वासितान्तरे । अन्योन्यमभिवर्तेतां बलविक्रमशालिनी के धनुष, ध्वजा, कवच और शिर काट काट कर दात पीसता हुआ उनके पीछे दौड़ा । ऐसा जान गिरा दिये । उनके अलौकिक विचित्र कामों और पड़ता था मानों कोई महापराक्रमी गजराज हस्तिनी शरीर-रक्षा की चतुराई को देखकर सब राजा लोग के लिये दूसरे गजराज पर हमला करने के लिये उनकी प्रशंसा करने लगे। इसके पश्चात् शस्त्र- दौड़ता है। राजा शाल्व दूर से उनको युद्ध करने धारियों में श्रेष्ठ भरत-वंश-तिलक भीष्म जी ने युद्ध में । के लिये ललकारने लगा। भीम जी ने उसकी राजाओं को जीतकर उन कन्याओं सहित अपने आवाज़ को सुनकर बड़े क्रोध से निर्भय काल-अमि नगर की ओर गमन किया ॥२६॥३४|| के समान धनुषवाण हाथ में लेकर अपने रथ को भीम जी अभी थोड़ी दूर ही गये थे कि इतने पीछे लौटाया ||३५।३९] राजा शाल्व स्त्री की कामना से पंड़ क्रोध से सब गजा लोग उनको निवृत्त होते देखकर मीम crosaicJASchcrosie 0221/01/ 2oA3hi" ५०६ महा भारत [ आदिपर्व occolic500000Scol rcravateerarircancies ततो भीष्म शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः । शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ॥ ४२ ॥ पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः । विस्मिताःसमपद्यन्त साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥ ४३ ॥ लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ॥४४॥ क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः । क्रुद्धः शान्तनवो भीमस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभापत ॥४५॥ सारथिं चाब्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्रैप पार्थिवः । यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ॥ ४६ ॥ ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग्योजयामास कौरवः । तेनाश्वांश्चतुरोऽमृगाच्छाल्वराजस्य भूपते ॥ ४७ ॥ अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः । भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत्तस्य सारथिम् ॥४८॥ अस्त्रेण चाप्यथैन्द्रेण न्यवधीत्तुरगोत्तमान् । कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीप्मः शांतनवस्तदा जित्वा विसर्जयामास जीवंतं नृपसत्तमम् । ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ॥ ५०॥ और शाल्व दोनों का समागम देखने के लिये खड़े इसके पश्चात् शान्तनु के पुत्र भीम ने क्षत्रियों हो गये। वे दोनों राजा आपस में इस प्रकार से गर्ज की वह प्रशंसा की वाणी सुन करके क्रोध में गर्ज कर युद्ध करने लगे जैसे ऋतुमती गौ को देख- होकर "खड़ा रह-खड़ा रह" यह बात कही और कर सांड दहाड़ते है । जो राजा लोग पहले मीप्म, क्रोधपूर्वक सारथी से कहा-इस शाल्व के पास शीघ्र के सन्मुख से भाग गये थे अलग खड़े होकर उन मेरा रथ ले चल । जिम प्रकार गरुड़ सर्प नष्ट करता दोनों का युद्ध देखने लगे । राजा शाल्व ने वाणों है, उस प्रकार मैं इसका नाश करूंगा। इसके पश्चात् से भीष्म जी को ढक दिया। यह देखकर सब कुरु-नन्दन भीम ने वारुणास्त्र का प्रयोग करके वाण राजा लोग "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा" कहकर चलाया। उससे शाल्व राजा के घोड़े कट गये । शाल्व की बड़ाई करने लगे ॥४०॥४४॥ फिर राजा शाल्व ने भी अस्त्र चलाये । भीष्म जी ने DococcccccccclesiCcc.co/01/0Cry/200/con:
- CICUCAICOS 01015 अध्याय १०२] महाभारत coomcccccomopeorealcodedicare.annocoiral खराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा राजानो ये च तत्रासन्स्वयंवरदिदृक्षवः ॥ ५१ ॥ स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः । एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ५२ ॥ प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः । विचित्रवीर्यों धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ॥ ५३ ।। यथा पितास्य कौरव्यः शांतनुर्नृपसत्तमः । सोऽचिरेणैव कालेन अत्यकामनराधिप ॥ ५४॥ वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान्दुमान् । अक्षतः क्षपयित्वारीन्संख्येसंख्येयविक्रमः आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः । स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव.चानुजाः ॥ ५६ ॥ यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् आनिन्ये स महाबाहुर्धातुः प्रियचिकीर्पया ॥ ५७ ॥ ताः सर्वगुणसंपन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे । भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ॥ ५८ ।। उन अस्त्रों को अपने अस्त्रों से नष्ट करके उसके के माई चत्रवीर्य अपने पिता धर्मात्मा शान्तनु सारथी को भी मार डाला। इसके पश्चात् भीम ने तरह प्रजा का पालन कर रहे थे। महापराक्रमी ऐन्द्र अस्र से उसके दूसरे स्थ के घोडों को भी मार भीष्म जी वन, नदी, पर्वत और भान्ति मान्ति के डाला। इस प्रकार से भीष्म जी राजा शाल्व को वृक्षों से पूर्ण बीइट मैदानों को लापते हुये, काशी- जीतकर और उसको जीता छोड़कर वहां से । राज की तीनों कन्याओं को बेटी बहिन के समान हस्तिनापुर की ओर चल दिये १४५/५०॥ | अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के साथ विवाह करने इस तरह राजा शाल्व अपने नगर को चला गया को लिये हुए उस हस्तिनापुर में पहुंचे ॥५१॥५५॥ और वहा धर्मानुसार अपने राज्य का पालन करने भीष्म जी ने तीनों कन्याये अपने भाई विचित्र- लगा । जो राजा लोग म्वयम्वर देखने को आय थे वीर्य के हवाले कर दी। इसके पश्चात् अपनी माता वे भी अपने अपने नगर को चले गये । योधाओं में श्रेष्ठ सत्यवती से सलाह लेकर वे उन कन्याओं के साथ भीम जी इस प्रकार तीनों कन्याओं को जीतकर विचित्रवीर्य के विवाह का उद्योग करने लगे। तब हस्तिनापुर की ओर चल पड़े। उस समय भीम उन कन्याओं में से बड़ी कन्या ने भीम से हंसकर 3rcircrorecrrorcircrori ५०८ म हा भारत [ आदिपर्व ococo एवं धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुपम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य विवाहायोपचक्रमे सत्यवत्या सह मिथः कृत्वा निश्चयमात्मवान् ॥ ५९ ॥ विवाहं कारयिष्यन्तं भीष्म काशिपतेः सुता । ज्येष्टा तासामिदं वाक्यमब्रवीद्धसती तदा ॥६॥ मया सौभपतिः पूर्व मनसा हि वृतः पतिः । तेन चास्मि वृता पूर्वमेप कामश्च मे पितुः ॥ ६१ ॥ मया वरयितव्योऽभूच्छाल्वस्तस्मिन्स्वयंवरे । एतद्विज्ञाय धर्मज्ञ धर्मतत्त्वं समाचर ॥ ६२ ॥ एवमुक्तस्तया भीष्मः कन्यया विप्रसंसदि । चिन्तामभ्यगमद्वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ॥ ६३ ॥ विनिश्चित्य स धर्मज्ञो ब्राह्मणैवेदपारगैः अनुजज्ञे तदा ज्येष्ठामम्बां काशिपतेः सुताम् ॥ ६४ ॥ अम्बिकाम्बालिके भायें प्रादाभाडे यवीयसे । भीमो विचित्रवीर्याय विधिदृष्टेन कर्मणा ॥६५॥ तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ॥ ६६ ॥ ते चापि बृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपयोधरे कहा-मैने पहले से अपने मन में राजा शारव को । करके अम्बा को जाने की आज्ञा दी। इसके पश्चात् वर रक्खा था और राजा शाल्व ने भी मेरे पिता उसकी दानों छोटी बहिने अम्बिका और अम्बालिका की सलाह से मुझे अङ्गीकार किया था। इस कारण का विवाह अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से कर दिया। से मेरा स्वयम्बर राजा शाल्व ही के साथ होना रूप और यौवन से युक्त धर्मात्मा विचित्रवीर्य उचित है। आप धर्मात्मा हैं, धर्म के तत्त्व को जान अम्बिका, अम्बालिका का पाणिग्रहण कर कामातुर कर जैसा उचित हो वैसा करें ॥५६॥६२॥ हुए ॥६३॥६६॥ अम्बा के ये वचन सुनकर भीष्म जी विचार में बूंघरवाले नीले केशवाली, लाल और तुंगनख- पड़ गये । अन्त में उन्होंने वेद-पारगब्राह्मणोंसे निश्चय युक्त और शुभलक्षणवाली अम्बिका और अम्बा- a 20205050. Doconcoconor अध्याय १०३ ] महाभारत aooro 030 आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लब्धः पत्तिरिति स्थिते। विचित्रवीर्य कल्याण्यौ पूजयामासतुः शुभे ॥ ६८ ॥ स चाश्विरूपसदृशो देवतुल्यपराकमः सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनो रहा ॥ ६९ ॥ ताभ्यां सह समाः सप्त बिहरन्पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्मणा समगृह्यत ॥ ७० ॥ सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः । जगामास्तमिवादित्यः कौरव्यो यमसादनम् ॥ ७१ ।। धर्मात्मा स तु गाङ्गेयश्चिन्ताशोकपरायणः प्रेतकार्याणि सर्वाणि तस्य सम्यगकारयत् " ७२ ॥ राज्ञो विचित्रवीर्यस्य सत्यवत्या मते स्थिनः । ऋविग्भिः सहितो भीष्मः सर्वेश्च कुरुपुङ्गवः ॥ ७३ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि विचित्रवीर्योपरमे व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ॥ लिका दोनों पाननितम्बिनी और पीनपयोधरा थीं। हुआ । इसके पश्चात् विश्वासी चिकित्सकों से यन वे अपनी इच्छा के अनुसार वर पाकर विचित्रवीर्य । करने पर भी कुरुकुल प्रदीप विचित्रवीर्य कालवश को अधिक प्यार करने लगी। अश्विनीकुमारों की हो अम्ताचल को गये हुए सूर्य के समान अदृश्य सदृश रूपवान् और देवताओं के समान पराक्रमी हुआ । धर्मात्मा भीष्म को अपने भाई विचित्रवीर्य विचित्रवीर्य दोनों स्त्रियों को प्रोति से रखने लगा। की मृत्यु से बड़ा शोक हुआ। अन्त को भीष्म ने वह उन दोनों स्त्रियों के साथ सात वर्ष विहार ब्राह्मणों और माता सत्यवती की आज्ञा से उसका कर यौवन अवस्था ही में भयानक क्षयरोग से प्रसित सम्पूर्ण प्रेतकर्म अच्छी प्रकार से किया ॥६॥७३॥ आदिपर्व का एक मो दो अध्याय ममाप्त हुआ । अथ व्याधिकागततमोऽध्याय ॥ १०३ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः सत्यवती दीना कृपणा पुनन्दिनी । पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि स्तुपाभ्यां सह भारत ॥ १ ॥ ॥ एक सौ ती अध्याय १०३ ॥ वैशम्पायन जी बोले-हे राजा ! महामागा सत्य- हुई और उसकी क्रियाकर्म होने के पीछे अपनी वती अपने पुत्र के मरने के शोक से अत्यन्त दुःखी दोनों पुत्रवधुओं को समझा बुझाकर मातृवंश और ५१० महाभारत [ आदिपर्व Phoolcoooooconcoccc00.000005o womedesicJe समाश्वास्य स्नुपे ते च भीमं शस्त्रभृतां वरम् । धर्म च पितृवंश च मातृवंश च भाविनी । प्रसमीक्ष्य महाभागा गांगेयं वाक्य मत्रवीत् ॥ २ ॥ शान्तनोधर्मनित्यस्य कौरवस्य यशस्विनः । स्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं च प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् । यथा चायुर्धवं सत्ये त्वयि धर्मस्तथा ध्रुवः ॥ ४ ॥ वेत्थ धर्माश्च धर्मज्ञ समासेनेतरेण च विविधास्त्वं श्रुतीवेत्थ वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ५ ॥ व्यवस्थानं च ते धर्म कुलाचारं च लक्षये । प्रतिपत्तिं च कृच्छ्रेषु शुक्रागिरसयोरिव ॥ ६ ॥ तस्मात्सुभृशमाश्वस्य त्वयि धर्मभृतां वर । कार्ये त्वां विनियोक्ष्यामि तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ॥ ७ ॥ मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान्सुप्रियश्च ते । बाल एव गतः स्वर्गमपुत्रः पुरुषर्षभ । इमे महिप्यौ भ्रातुस्ते काशराजसुते शुभे । रूपयौवनसंपन्ने पुत्रकामे च भारत पितृवंश की दशा पर ध्यान करके धर्मानुसार भीष्म अच्छी तरह जानती हू। विपत्ति के समय तुम्हें से कहने लगी ॥१२॥ शुक्राचार्य और अगिरा ऋषि के समान स्थिर बुद्धि हे भीष्म ! धर्मशील, यशस्वी, कुरुवशी नरेश से विचार करने की समर्थ भी है । मुझको तुमपर शान्तनु का वश, कीर्ति और पिण्ड एक तुम्हीं पर पूरा विश्वास है, इसीमे मैं एक काम करने के लिये निर्भर है । जैसे अच्छे कामों के करने से म्वर्ग की तुमको आज्ञा देती हूँ। तुम उसे सुनकर अम्वीकार प्राप्ति होती है, सत्य बोलने से आयु की वृद्धि होती न करना । हे पुरुषश्रेष्ठ । तुम्हारा प्यारा भाई और है ऐसे ही तुम से धर्म प्रतिष्ठित है। तुम सक्षप से मेरा पराक्रमी पुत्र नि सन्तान युवा अवस्था में ही और विस्तार स धर्म के स्वरूप को जानते हो- म्वर्गवासी हो गया है । हे भारत ! तुम्हारे भाई की अनेक श्रुतियों और वेदाहों के यथार्थ तत्व को दोनों म्रिया रूपाती और गुणवती ये काशीराज समझे हुये हो ॥३॥५॥ की कन्यायें पुत्र की इच्छा रखती है । है महाभुज तुम्हारी धर्मशीलता और कुल के आचार को मैं इसलिये मेरी आज्ञा के अनुसार वंश की रक्षा के । 17.50 20-sirsr.sorrorairoinorrore:
अध्याय १०३ ] महा भारत Prore25000/cordeos/corroccrorecoract JOULICIDJOJOJO तयोरुत्पादयापत्यं संतानाय कुलस्य नः मन्नियोगान्महावाहो धर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१०॥ राज्ये चैवाभिषिच्यस्व भारताननुशाधि च । दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच- -तयोच्यमानो मात्रा स सुहृद्भिश्च परंतपः । इत्युवाचाथ धर्मात्मा धर्नामेवोत्तरं वचः असंशयं परो धर्मस्त्वया मातरुदाहृतः खमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञा वेत्थ वै पराम् ॥ १३ ॥ जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे । स सत्यवति सत्यं ते प्रतिजानाम्यहं पुनः ॥ १४ ॥ परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः । यद्वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन ॥ १५ ॥ त्यजेच्च पृथिवी गन्धमापश्च रसमात्मनः ज्योतिस्तथा त्यजेद्रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ॥ १६ ॥ प्रभां समुत्स्टजेदों धूमकेतुस्तथोप्मताम् । त्यजेच्छब्दं तथाऽsकाशं सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ॥१७॥ विक्रम वृत्रहा जह्याद्धर्म जह्याच्च धर्मराट् । न त्वहं सत्यमुत्त्रष्टुं व्यवस्येयं कथंचन ॥१८॥ लिये तुम इनके गर्भ से पुत्र उत्पन्न करके धर्म का अच्छी तरह जानती हैं । आपके बदले में जो वचन पालन करो । तुम राज्य में अभिषिक्त होकर भरत मैने आपके पिता को दिया था उसे मैं कदापि भूल राज्य का शासन करके धर्मानुसार विवाह कर लो। नहीं सकता हू । आज फिर आपके आगे प्रतिज्ञा अनर्थक अपने पितरों को नरक में न डालो ॥६।११॥ करता हूँ कि मै त्रिलोकी के राज्य को, देवलोक के वैशम्पायन जी ने कहा-प्रिय माता के ऐमा राज्य को और उससे भी बढ़कर यदि कुछ हो तो कहने पर धर्मात्मा परन्तप मीम ने धर्मानुसार यह उसे भी छोड दूगा, परन्तु सत्य को नहीं खेट उत्तर दिया, कि हे माता। इसमें सन्देह नहीं कि सकता । इसके सिवाय चाहे पृथ्वी गन्ध को, जल आपने जो कहा धर्मयुक्त है, परन्तु पुत्र उत्पन्न करने रस को, ज्योति रूप को, वायु स्पर्श को, सूर्य अपने के सम्बन्ध में जो पतिज्ञा मैं कर चुका हू उसे आप ! प्रकाश को, पुन्छल तारा अपनी गर्मी को आकाशे rrorarzzrs.orarorarmrorror महा मारत [ आदिपर्व coc0s000amaroo100000 meroosic: एवमुक्ता तु पुत्रेण भूरिद्रविणतेजसा माता सत्यवती भीममुवाच तदनन्तरम् ॥ १९ ॥ जानामि ते स्थितिं सत्ये परां सत्यपराक्रम । इच्छन्सृजेथास्त्रील्लोकानन्यांस्त्वं स्वेन तेजसा ॥२०॥ जानामि चैवं सत्यं तन्मदर्थे यच्च भापिनम् । आपद्धर्म स्वमावेक्ष्य वह पैतामहीं धुरम् ॥ २१ ॥ यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् । सुहृदश्च प्रहृप्यरंस्तथा कुरु परंतप ॥ २२ ॥ लालप्यमानां तामेवं कृपणां पुत्रगृधिनीम् । धर्मादपेतं ब्रुवतीं भीष्मो भूयोऽब्रवीदिदम् ॥ २३ ॥ राज्ञि धर्मानवेक्षस्व मा नः सर्वान्व्यनीनशः । सत्याच्च्युतिः क्षत्रियस्य न धर्मेषु प्रशस्यते ॥२४॥ शान्तनोरपि संतानं यथा स्यादक्षयं मुवि । तत्ते धर्म प्रवक्ष्यामि क्षात्रं राज्ञि सनातनम् ॥ २५ ॥ श्रुत्वा तं प्रतिपद्यस्व प्राज्ञैः सह पुरोहितैः । आपद्धर्मार्थकुशलैलोकतन्त्रमवेक्ष्य च ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपणि भीष्ममत्यवतीमंवाद व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥ शब्द को, चन्द्रमा शीतलता को, इन्द्र पराक्रम को । धर्म की हानि न हो और इष्टमित्र तथा स्वजनों और धर्मराज धर्म को छोड़ देवें परन्तु मै सत्य को को भी हर्ष हो ॥१९॥२२॥ किसी प्रकार से भी छोड़ नहीं सकता हू॥१२॥१८॥ अपनी माता सत्यवती के धर्म-विरुद्ध वाक्य अति बलवान् भीष्म के ऐसा कहने पर उसकी । सुनकर भीष्म ने फिर कहा-हे रानी ! आप धर्म को माता सत्यवती ने कहा-हे सत्यपराक्रमी ! तुम्हारी । देखे । अधर्म से हम सबका नाश न कराये । क्षत्रिय सत्य-निष्ठा को मैं अच्छीतरह जानती हूँ। तुम ! का असत्य व्यवहार धर्मशास्त्रों में निन्दित महा अपनी इच्छा और तेज से त्रिलोक रच सकते हो। गया है । हे रानी ! मै आप से ऐसा सनातन क्षत्रिय मेरे लिये तुमने जो सत्य प्रतिज्ञा की है वह भी मुझे धर्म कहता हूं, कि जिससे पृथ्वी में शान्तनु का याद है । परन्तु हे परन्तप ! इस विपत्ति की दशा । वंश अक्षय बना रहे । आप उसे सुनकर लोकाचार पर ध्यान देकर पिता के वंश का भार लो। तुमको । के अनुसार पुरोहितों और धर्मार्थ विषय में जो ऐसा काम करना चाहिये जिससे कुल नष्ट न हो,' पण्डित हैं उनके साथ विचार करें ॥२३॥२६॥ आदिपर्व का एक मो तीन अध्याय समाप्त हुआ ।। IOAInwoorCorgronyoNoNoNoNoNnoco अध्याय १०४ ] महाभारत rococorcedeo.odiroecorcocooo - rarsecoverarried अथ चतुरधिकशततमोऽध्याय ॥ १०४ ॥ भीष्म उवाच-जामदग्न्येन रामेण पितुर्वधममृष्यता राजा परशुना पूर्व हैहयाधिपतिर्हतः शतानि दश वाहूनां निकृत्तान्यर्जुनस्य वै । लोकस्याचरितो धर्मस्तेनाति किल दुश्चरः ॥ २ ॥ पुनश्च धनुरादाय महास्त्राणि प्रमुञ्चता । निर्दग्धं क्षत्रमसकृद्रथेन जयता महीम् एवमुच्चावचैरस्त्रैर्भार्गवेण महात्मना त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा ॥ ४ ॥ एवं निःक्षत्रिये लोके कृते तेन महर्षिणा । ततः संभूय सर्वाभिः क्षत्रियाभिः समन्ततः ॥ ५ ॥ उत्पादितान्यपत्यानि ब्राह्मणैर्वेदपारगैः पाणिग्राहस्य तनय इति वेदेषु निश्चितम् ॥ ६ ॥ धर्म मनसि संस्थाप्य ब्राह्मणांस्ताः समभ्ययुः । लोकेऽप्याचरितो दृष्टः क्षत्रियाणां पुनर्भवः ॥ ७ ॥ ततः पुनः समुदितं क्षत्रं समभवत्तदा इमं चैवात्र वक्ष्येऽहमितिहासं पुरातनम् एक सौ चार अध्याय १०४ ॥ भीम जी ने कहा-पूर्व समय में जमदनि के ब्राह्मणों के पास सतान के लिये गई। वेदों में भी पुत्र परशुराम ने अपने पिता के वध से दुखी होकर यह निश्चय करके रिखा है कि क्षेत्र में उत्पन्न हेय देश के राजा अर्जुन को परशु से मारा । हुआ पुत्र उसीका होता है जिसका वह क्षेत्र हो परशुराम ने उसके हजार भुजा काटने पर भी शात अर्थात् जिस स्त्री का विवाह जिससे हुआ हो उस न होकर पृथिवी को जीतने के लिये रथ पर चढकर स्त्री के जो पुत्र उत्सन्न होता है वह उसीका होता चाप और महात्रों के प्रयोगों से बार बार क्षत्रिय है। इसलिए धर्म जानकर ही क्षत्रियानियों ने कुल का नाश किया था 11१1३|| ब्राह्मणों से ससर्ग किया था। इससे फिर क्षनियों उस महात्मा ने अस्त्रों से इछीसवार क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई । मैं आपको इम विषय में एक से युद्ध करके उनका रेशमान पृथ्वी पर नहीं रहने और भी प्राचीन इतिहास कहता हू-सुनो ॥४॥७॥ दिया था। उस समय क्षत्रियों की स्त्रिय वेद पारग पहले समय में उतथ्य नाम का एक बुद्धिमान् acinaccuedeoicoiraroese. JHANA 7.
महाभारत [ आदपर्व coooococ0000cdcocole ooooocc अथोतथ्य इति ख्यात आसीद्धीमानृषिः पुरा । ममता नाम तस्यासीद्भार्या परमसंमता उतथ्यस्य यवीयांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम् । बृहस्पतिवृहत्तेजा ममतामन्वपद्यत उवाच ममता तं तु देवरं वदतां वरम् । अन्तर्वत्नी त्वहं भ्रात्रा ज्येष्ठेनारम्यतामिति ॥ ११ ॥ अयं च मे महाभाग कुक्षावेव बृहस्पते । औतथ्यो वेदमत्रापि पडझं प्रत्यधीयत अगोधरेतास्त्वं चापि द्वयोर्नास्त्यत्र संभवः । तस्मादेवंगते त्वद्य उपारमितुमर्हसि एवमुक्तस्तदा सम्यग्बृहस्पतिरुदारधीः कामात्मानं तदाऽऽत्मानं न शशाक नियच्छितुम् ॥१४॥ स वभूव ततः कामी तया सार्धमकामया उत्सृजन्तं तु तं रेतः स गर्भस्थोऽभ्यभाषत ॥ १५ ॥ भोस्तात मा गमः कामं द्वयोर्नास्तीह संभवः । अल्पावकाशो भगवन्पूर्व चाहमिहागतः ऋषि था। उसकी परमप्यारी ममता नाम की एक ममता के ऐसा कहने पर वृहस्पति बडा तेजम्बी स्त्री थी । एक दिन उतथ्य के छोटे भाई देवताओं | होने पर भी काम के वशीभूत हुआ हुआ अपने के पुरोहित और महातेजस्वी वृहस्पति ने ममता से मन को न रोक सका । ममता की इच्छा न रहने आकर रमण करने की इच्छा प्रगट की । तब ममता पर भी अपनी इच्छा से वृहस्पति ने उसके साथ ने वृहस्पति देवर से कहा-हे देवर ! तुम्हारे बडे रमण करना चाहा । तब वृहस्पति से गर्भ में ठहरे भाई के वीर्य से मैं गर्भवती हो गई हू । हे महात्मा हुए बालक ने कहा-हे तात ! काम के अधीन हो वृहस्पति ! मेरे गर्भ में ठहरा हुआ उतथ्य ऋषि कर आप मैथुन न करें। इस गर्म में दो बालकों का बालक वेद ज्ञानी है । मै निश्चित रूप से जानती की जगह नहीं है । हे भगवन् । यह स्थान छोटा ह कि तुम्हारा भी वीर्य निष्फल नहीं हो सकता। है । मै पहिले यहा आचुका है। आप बड़े वीर्यवान् गर्भाशय में एक के सिवाय दूसरे बालक के रहने है। इस कारण मुझे पीडा न पहुचाइये । परन्तु काम को स्थान नहीं है । इसलिए तुम अपना यह ! से पीटित वृहस्पति ने इसपर कुछ ध्यान न देकर विचार छोड दो ॥८॥१२॥ उस सुन्दरनेवाली ममता से रमण किया । इसके OOGIAJOJAUCORICO - priorrorani.000010 colo meomoooz .. अध्याय १०४ ] महा भारत arma अमोघरेताश्च भवान्न पीडां कर्तुमर्हति अश्रुत्वैव तु तद्वाक्यं गर्भस्थस्य वृहस्पतिः ॥ १७ ॥ जगाम मैथुनायैव ममतां चारुलोचनाम् । शुक्रोत्सर्ग ततो बुद्ध्वा तस्या गर्भगतो मुनिः ॥ १८ ॥ पन्यामारोधयन्मार्ग शुक्रस्य च वृहस्पतेः । स्थानमप्राप्तमथ तच्छुकं प्रतिहतं तदा पपात सहसा भूमौ ततः क्रुद्धो बृहस्पतिः । तं दृष्ट्वा पतितं शुक्र शशाप स रुषान्वितः ॥ २० ॥ उतथ्यपुत्रं गर्भस्थं निर्भय॑ भगवानृषिः । यन्मां त्वमीशे काले सर्वभूतेप्सिते सति एवमात्थ वचस्तस्मात्तमो दीर्घ प्रवेष्यसि । स वै दीर्घतमा नाम शापाहपिरजायत ॥ २२ ॥ बृहस्पतेवृहत्कीर्तेर्वृहस्पतिरिवौजसा जात्यन्धो वेदवित्प्राज्ञः पत्नी लेभे स विद्यया ॥ २३ ॥ तरुणी रूपसंपन्नां प्रद्वेषीं नाम ब्राह्मणीम् स पुत्राअनयामास गौतमादीन्महायशाः ॥ २४ ॥ ऋषेरुतथ्यस्य तदा सन्तानकुलवृद्धये धर्मात्मा च महात्मा च वेदवेदाङ्गपारगः गोधर्म सौरभयाच्च सोऽधीत्य निखिलं मुनिः । प्रावर्तत तदा कर्तुं श्रद्धावांम्तमशकन्या ॥ २६॥ पश्चात् गर्भ में ठहरे हुये उस बालक ने वृहस्पति तुमने मेरे वीर्य को व्यर्थ किया है इसलिए इस के वीर्य गिरने के समय को जानकर अपने दोनों पाप से तुम दीर्घतम को प्राप्त होकर जन्म लोगे पैरों से गर्भाशय के रास्ते को बन्द कर दिया । तब अर्थात् अन्धे होगे। थोड़े काल में यह बालक यह वीर्य राम्ता न पाकर उसी क्षण पृथ्वी पर गिर , कीर्तिवान् वृहस्पति जी के शाप के कारण से दीर्घतमा- पड़ा । इमार वृहस्पति ने क्रोध में होकर गर्भ में नाम अन्धा उत्पन्न हुआ और विद्या के प्रभाव से उसका विवाह प्रद्वेषी नामवाली तरुण, रूपवती ठहरे हुए उतथ्य-पुत्र को डाटकर माप दिया । १३.१९॥ | ब्राह्मणी से हुआ। इससे महायश ने कुल को बढ़ाने Oropreryry Oyun महाभारत [ आदिपर्व Oco000-00/ Accolcod .. - ततो बितथमर्यादं तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमाः कुद्धा मोहाभिभूतास्ते सर्वे तत्रश्रामौकसः ॥ २७ ॥ अहोऽयं भिन्नमर्यादो नाश्रमे वस्तुमर्हति तस्मादेनं वयं सर्वे पापात्मानं त्यजामहे ॥ २८॥ इत्यन्योऽन्यं समाभाष्य ते दीर्घतमसं मुनिम् । पुत्रलाभा च सा पत्नी न तुतोप पति तदा ॥ २९ ॥ प्रद्विषन्ती पतिर्भार्यां किं मां द्वेक्षीति चाब्रवीत् । प्रद्धेप्युवाच भार्याया भरणाद्भर्ता पालनाञ्च पतिः स्मृतः ॥ ३०॥ अहं त्वां भरणं कृत्वा जात्यन्धं ससुतं तदा । नित्यकालं श्रमेणार्ता न भरेयं महातपाः ॥ ३१ ॥ भीष्म उवाच-तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ऋपिः कोपसमन्वितः । प्रत्युवाच ततः पत्नी प्रद्वेषीं ससुतां तदा ॥३२॥ नीयता क्षत्रियकुले धनार्थश्च भविष्यति प्रद्वेष्युवाच-त्वया दत्तं धनं विप्र नेच्छेयं दुःखकारणम् ॥ ३३ ॥ यथेष्टं कुरु विप्रेन्द्र न भरेयं पुरा यथा दीर्घतमा उवाच-अद्यप्रभृति मर्यादा मया लोके प्रतिष्टिता ॥ ३४ ॥ के लिये गौतमादि पुत्र उत्पन्न किये ।।२०।२५।। होती थी। वह भी उससे द्वेषभाव रखती थी। एक अन्त को धर्मात्मा, महात्मा, वेद-वेदाङ्ग के दिन दीर्घतमा ने अपनी स्त्री को असन्तुष्ट देखकर जानकर दीर्घतमा ने मुरभि के पुत्र से गोधर्म । पूछा-तुम मुझ से मन में द्वषभाव क्यों रखती हो? (प्रकाश मैथुन) सीखकर उसपर श्रद्धा रखकर ॥२६॥२९॥ नि शंक चित्त से कुल की वृद्धि के लिये उसीका तर प्रदुषी ने कहा-पति स्त्री का भरणपोषण आचरण किया। इस प्रकार दीर्घतमा को मर्यादा करते है इसलिये वह भर्ता और पति कहलाते हैं। छोडते देखकर तपस्वी मुनियों को बड़ा क्रोध हो | हे महातपम्वी ! मै सदा से तुम्हारी जन्मान्धता के आया। वे आपस में कहने लगे-इसने मर्यादा का कारण तुम्हारा और तुम्हारे पुत्रों का भरणपोषण उल्लङ्घन किया है, लोक-लज्जा से हीन होने के करती करती थक गई हूं । परन्तु अब मुझ से यह कारण यह आश्रम में रहने के योग्य नहीं है। न हो सकेगा ॥३०॥३१॥ इससे इसको त्यागना चाहिये । दीर्घतमा की प्रद्वेषी भीष्म कहते हैं कि प्रद्वेषी के वचन सुनकर नामवाली स्त्री भी उस अन्धे पति से सन्तुष्ट नहीं । दीर्घतमा को क्रोध चढ़ आया। उसने पुत्रवती स्त्री , momcomirarars.srarar FOcredroon अध्याय १०४ ] महा भारत ५१७ 1200oroli एक एव पतिर्नार्या यावजीवं परायणम् । मृते जीवति वा तस्मिन्नापरं प्राप्नुयान्नरम् ॥ ३५॥ अभिगम्य परं नारी पतिप्यति न संशयः । अपतीनां तु नारीणामद्यप्रभृति पातकम् ॥ ३६ ।। यद्यस्ति चेद्धनं सर्वं वृथाभोगा भवन्तु ताः । अकीर्तिः परिवादाश्च नित्यं तासां भवन्तु वै ॥ ३७॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणी भृशकोपितः । गगायां नीयतामेप पुत्रा इत्येवमब्रवीत् ॥ ३८ ॥ लोभमोहाभि भूतास्ते पुत्रास्तं गौतमादयः । वध्वोडुपे परिक्षिप्य गङ्गायां समवासुजन् ॥ ३९ ॥ कस्मादन्धश्च वृद्धश्च भर्तव्योऽयमितिस्मते । चिन्तयित्वा ततः क्रूराः प्रतिजग्मुरथो गृहान् ॥ ४०॥ सोऽनुस्रोतस्तदा विप्रः प्लवमानो यदृच्छया । जगाम सुवहून्देशानन्धस्तेनोडुपेन ह ॥ ११॥ तं तु राजा बलि म सर्वधर्मविदांवरः । अपश्यन्मजनगतः स्रोतसाभ्याशमागतम् ॥ ४२ ॥ प्रद्वेपी से कहा -तुमको यदि धन की आवश्यकता उल्लङ्घन करेगी वह पतित समझी जायेगी। इसमें है तो मुझको किसी क्षत्रिय राजा के पास ले चर। | सन्देह नहीं जिस स्त्री का पति नहीं है उसे पग पग वहा जितना धन तुम चाहोगी, मिल सकेगा। में पाप होगा और उसका इकत्र किया हुआ धन प्रद्वेषी ने कहा-हे ब्राहाण ! तुम्हारे दिये हुए दुस भी व्यर्थ होगा । वे नित्य अपयश और निन्दा की दायी धन की मुझे इच्छा नहीं है। तुम जो चाहो भागिनी होंगी। अपने पति के ये वचन सुनकर सो करो, मै पहिले की तरह अब तुम्हारा भरणपोषण । प्रद्वेषी क्रोध से बोली कि हे पुत्रो ! तुम इस अन्धे न कर सकूगी ॥३२॥३४॥ पिता को गङ्गा में डाल आओ ॥३५॥३८॥ यह सुनकर दीर्घतमा ऋषि ने कहा-मैं आज गौतमादि पुत्रों ने अन्ध बाप को बाधकर बेडे से इस संसार में यह मर्यादा पान्धता हु स्त्री पर रखकर गगा के प्रवाह में बहा दिया। वे कुटिल मरते दम तक एक ही पति के अधीन रहेगी । पति पुत्र यह सोचते हुए घर को लौटे कि अब इस अन्ध के मरने पर या उसके जीते जी स्त्री दूसरे पुस्प को | और बूट का भरणपोपण न करना पड़ेगा । वह स्वीकार न कर सकेगी। जो स्त्री इस मर्यादा का अधा ब्राह्मण गगा की धारा में बहता हुआ अनेक JFonr महाभारत [.. 00000000000000 roconocoomcoom जग्राह चैनं धर्मात्मा वलिः सत्यपराक्रमः । ज्ञात्वा चैवं स वत्रेऽथ पुत्रार्थे भरतर्षभ ॥४३॥ संतानार्थं महाभाग भार्यासु मम मानद । पुत्रान्धर्मार्थकुशलानुत्पादयितुमर्हसि ॥४४॥ एनमुक्तः स तेजस्वी तं तथेत्युक्तवानृषिः । तस्मै स राजास्वां भार्यां सुदेष्णां प्राहिणोत्तदा ॥ ४५ ॥ अन्धं वृद्धं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह । स्वां तु धात्रयिका तस्मै वृद्धाय प्राहिणोत्तदा ॥ ४६॥ तस्यां काक्षीवदादीन्स शूद्रयोनावृपिस्तदा । जनयामास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु ॥४७॥ काक्षीवदादीन्पुत्रांस्तान्दृष्ट्वा सर्वानधीयतः उवाच तमृर्षि राजा ममेम इति भारत ॥४८॥ नेत्युवाच महर्षिस्तं ममेम इति चाब्रवीत् । शूद्रयोनौ मया हीमे जाताः काक्षीवदादयः ॥ ४९ ॥ अन्धं वृद्धं च मां दृष्ट्वा सुदेष्णा महिपी तब । अवमन्य ददौ मूढां शूद्रां धात्रेयिका मम ॥ ५० ॥ ततः प्रसादयामास पुनस्तमृपिसत्तमम् बलिः सुदेष्णां स्वां भायाँ तस्मै स प्राहिणोत्पुनः॥ ५१ ॥ देशों और देशान्तरों में होता हुआ चला जाता था। अपनी रानी सुदेष्णा से ऋषि के पास जाने के लिये इतने में बलि नाम के धार्मिक राजा ने गंगा स्नान कहा । परन्तु उसने उसको अन्धा और बूढ़ा जान- करते हुए निकट बहते हुए उस ऋषि को देखा। कर अपनी जगह अपनी दासी को भेज दिया। इसके पश्चात् पलि राजा उस सत्यपराक्रमी को अपने धर्मात्मा ऋषि ने उसके गर्भ से काक्षीवान् आदि घर ले आया और पुत्र की कामना से उस ऋषि ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये । राजा ने उन पुत्रों को से प्रार्थना करके कहने लगा-हे महामाग ! तुम पठनशील देखकर उस अन्धे ऋषि से पूछा-क्या मेरे वंश की रक्षा के लिए मेरी स्त्री से सन्तान ये मेरे पुत्र हैं ! ऋषि ने उत्तर दिया-ये तुम्हारे उत्पन्न करो जो धर्म और अर्थ में कुशल हो॥३९॥४४॥ | पुत्र नहीं हैं, ये मेरे हैं । उन्होंने मुझसे शूद्र- ऋषि ने- स्वीकार कर लिया। तव बलि ने / योनि में जन्म लिया है । तुम्हारी रानी सुदेष्णा ने :020129000 cococa acococococc0000000000 अध्याय १०५ ] महाभारत cooov4 तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाब्रवीत् । भविष्यन्ति कुमारास्ते तेजसाऽऽदित्यवर्चसः ॥ ५२ ॥ अङ्गो वंगः कलिंगश्च पुण्डूः सुमश्च ते सुताः । तेषां देशाः समाख्याताः स्वनामकथिता भुवि ॥.५३ ॥ अंगस्यांगोऽभवद्देशो वंगो वङ्गस्य च स्मृतः । कलिंगविषयश्चैव कलिंगस्य च स स्मृतः ॥ ५४॥ पुण्ड्रस्य पुण्ड्राः प्रख्याताः सुह्माः सुह्मस्य च स्मृताः । एवं वलेः पुरा वंशः प्रख्यातो वै महर्षिजः ॥ ५५ ॥ एवमन्ये महेष्वासा ब्राह्मणैः क्षत्रिया भुवि । जाताः परमधर्मज्ञा वीर्यवन्तो महावलाः ॥ एतच्छुत्वा स्वमप्यत्र मातः कुरु यथेप्सितम् ॥ ५६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि भीष्मसत्यवतीसंवादे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥ मूर्खता से मुझको अन्धा और बूढा देखकर अनादर | अंग के नाम से अंग देश, रंग के नाम से बंग देश, से अपनी दासी को मेरे पास भेज दिया था॥४५॥५०॥ कलिंग के नाम से कलिंग देश, पुण्डू के नाम से पुण्डू इसके पश्चात् राजा बलि ने फिर उस ऋपि को | देश और सुह्य के नाम से सुह्य देश प्रसिद्ध होगा। प्रसन्न करके अपनी स्त्री सुदप्णा को उसके पास । पूर्व काल में इस प्रकार ऋषि से जन्म लिया हुआ भेजा । अन्धे ऋषि ने देवी सुदेष्णा के अंगों को राजा बलि का वंश प्रसिद्ध हुआ था। इनके सिवाय स्पर्श करके कहा कि तुम्हारे आदित्य-समान तेज- और भी बहुत से महाबली, पराक्रमी, धर्मज्ञ और स्वी पांच पुत्र उत्पन्न होंगे। उनके नाम अंग, बंग, | चापधारी क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के वीर्य से जन्म पुण्डू और सुह्य होंगे । वे अपने अपने नाम लिया। हे माता ! आप यह सुनकर जो मन में आये से एक एक देश में एक एक राज्य स्थापित करेंगे सो करें ॥५१॥५६॥ आदिपर्व का एक सौ चार अध्याय समाप्त हुआ । कलिंग, - अथ पंचाधिकशततमोऽध्याय || १०५ ।। भीम उवाच-पुनर्भरतवंशस्य हेतुं सन्तानवृद्धये वक्ष्यामि नियतं मातस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ १ ॥ ब्राह्मणो गुणवान्कश्चिद्धनेनोपनिमन्त्र्यताम् । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषुयः समुत्पादयेत्प्रजाः ॥ ॥ २ ॥ Emirarawasiriraoornarorandiroccredroorroreandroine ५२० महा भारत [ आदिपर्व ocodoooooo 2010000000000 . वैशम्पायन उवाच-ततः सत्यवती भीष्मं वाचा संसज्जमानया । विहसन्तीव सबीडमिदं वचनमब्रवीत् सत्यमेतन्महावाहो यथा वदसि भारत विश्वासात्ते प्रवक्ष्यामि सन्तानाय कुलस्य नः ॥ ४ ॥ न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धर्म तथाविधम् । त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परागतिः ॥ ५ ॥ . तस्मान्निशम्य सत्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् । धर्मयुक्तस्य धर्मार्थ पितुरासीत्तरी मम ॥ ६ ॥ सा कदाचिदहं तत्र गता प्रथमयौवनम् । अथ धर्मविदा श्रेष्ठः परमर्षिः पराशरः ॥ ७ ॥ । आजगामतरी धीमांस्तरिष्यन्यमुना नदीम् । स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याब्रवीत्तदा ॥ ८ ॥ सान्त्वपूर्व मुनिश्रेष्ठः कामातों मधुरं वचः । उक्तं जन्म कुलं मह्यमस्मि दाशसुतेत्यहम् ॥ ९ ॥ तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत । वरैरसुलभैरुक्ता न प्रत्याख्यातुमुत्सहे । एक सौ पांच अध्याय १०५ ॥ मीम जी ने कहा-हे माता ! मैं भरत-वंश के | तुमही सत्य हो और तुमही गति हो । इसलिये बढ़ाने के लिये योग्य उपाय कहता हूं, सुनौ । किसी । मेरी सत्य घात को सुनकर जो कर्तव्य समझना सो गुणवान् ब्राह्मण को धन देकर बुलाओ। उससे | करना ॥३॥५॥ विचित्रवीर्य के क्षेत्र में पुत्र उत्पादन कराओ ॥१२॥ मेरे पिता धर्मात्मा थे। उन्होंने धर्मार्थ, बिना वैशम्पायन जी कहते हैं कि हे राजन् ! भीम | कुछ लिये, यमुना पार कर देने को एक नाव रख की माता सत्यवती ने लजा के मारे शिर नीचा छोड़ी थी। एक समय यौवन अवस्था में मै उस करके धीमे स्वर से कहा-हे महाबाहो! तुमने जो | नाव को चला रही थी। उसी समय धर्मात्माओं में कहा सो सत्य है । मुझको तुमपर पूरा विश्वास है, | श्रेष्ठ महर्षि पराशर वहां पर आये । मै उनको नदी इसीसे कहती हूं । मैं वंश की वृद्धि के लिये जो के पार नाव पर लिये जा रही थी; बीच में काम- कहूंगी उसे आपद्धर्म समझकर उसमें तुम असम्मति वश होकर ऋषि ने प्रार्थनापूर्वक समझाकर मुझसे न प्रकट करना । हमारे वंश में तुमही धर्म हो, | कहा-हे सुन्दरी ! तुम मेरी इच्छा पूरी करो। - 2c com00705/051 coccccc000000 circra अध्याय १०५ ] महाभारत ပေါ်လာသော orroroominner अभिभूय स मां वाला तेजसा वशमानयत् । तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ॥ ११ ॥ मत्स्यगन्धो महानासीत्पुरा मम जुगुप्सितः । तमपास्य शुभं गन्धमिमं प्रादात्स मे मुनिः ॥ १२ ॥ ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् । द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ १३ ॥ पाराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषिः । कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः ॥ १४ ॥ यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः । लोके व्यासत्वमापेदे कात्कृिष्णवमेव च ॥ १५ ॥ सत्यवादी शमपरस्तपस्वी दग्धकिल्विषः समुत्पन्नः स तु महान्सह पित्रा ततो गतः ॥ १६ ॥ स नियुक्तो मया व्यक्तं त्वया चाप्रतिमद्युतिः । भ्रातुः क्षेत्रेषु कल्याणमपत्यं जनयिष्यति ॥ १७ ॥ स हि मामुक्तवांस्तत्र स्मरेः कृच्छेषु मामिति । तं स्मरिष्ये महाबाहो यदि भीष्म स्वमिच्छसि ॥१८॥ हे भारत ! मैं पिता के भय और ऋपि के शाप के | महर्पि महायोगी जन्म लेकर द्वैपायन नाम से प्रसिद्ध भय से उत्तम वर पाकर उनके कहने को न टाल हुए ॥१२॥१४॥ सकी। उस मुनि ने मुझको नाव पर स्थित और वह भगवान् ऋषि तप के प्रभाव से चारों वेदों बालिका पाकर तेज से अपने वश में कर लिया | के व्यास अर्थात् विभागकर व्यास नाम से प्रख्यात और चारों दिशाओं में कोहरा उत्पन्न करके अन्धेरा हुये हैं। और काला रंग होने से उनका नाम कृष्ण कर दिया ॥६॥११॥ हुआ है। सदैव सत्य बोलनेवाले, शान्तशील और पहिले मेरे शरीर में मछली की दुर्गन्ध आती पापों से रहित वह महात्मा जन्म लेते ही उसी क्षण थी। अपि ने उस दुर्गन्ध को दूर कर मेरे शरीर पिता के साथ चले गये थे । उन अप्रतिम द्युतिमान् में सुगन्ध पैदा कर दी। इसके पश्चात् उन्होंने कहा व्यास को मेरे कहने से वह तुम्हारे भ्राता के क्षेत्र तुम इस यमुना द्वीप में ही मेरे वीर्य से उसन्न गर्भ में पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं ॥१५॥१७॥ को छोड़ फिर कन्या ही बनी रहोगी । उससे यमुना हे महाभुज ! उन्होंने जाते समय मुझसे कह द्वीप में मेरे कन्यावस्था के गर्भ से पराशर के पुत्र दिया था कि माता, विपत्ति के समय मुझे स्मरण । 2000 ५२२ महाभारत [ आदिपर्व तव ह्यनुमते भीष्म नियतं स महातपाः । विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति वैशम्पायन उवाच-महर्षेः कीर्तने तस्य भीष्मः प्राञ्जलिरब्रवीत् । धर्ममर्थं च कामं च त्रीनेतान्योऽनुपश्यति ॥ २० ॥ अर्थमर्थानुबन्धं च धर्मं धर्मानुवन्धनम् । . कामं कामानुवन्धं च विपरीतान्पृथक्पृथक् ॥ २१ ॥ यो विचिन्त्य धिया धीरो व्यवस्यति सवुद्धिमान्। तदिदं धर्मयुक्तं च हितं चैव कुलस्य नः ॥ २२ ॥ उक्तं भवत्या यच्छ्रेयस्तन्मह्यं रोचते शुभम् । वैशम्पायन उवाच-ततस्तस्मिन्प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन ॥ २३ ॥ कृष्णद्वैपायनं काली चिन्तयामास वै मुनिम् । स वेदान्विब्रुवन्धी मान्मातुर्विज्ञाय चिन्तितम् ॥ २४ ॥ प्रादुर्बभूवाविदितः क्षणेन कुरुनन्दन तस्मै पूजां ततः कृत्वा सुताय विधिपूर्वकम् ॥ २५ ॥ परिष्वज्य च वाहुभ्यां प्रस्रवैरभ्यपिञ्चत मुमोच बाष्पं दाशेयी पुत्रं दृष्ट्वा चिरस्य तु ॥ २६ ॥ करना, मै उसी समय तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा। सम्भावना बनी रहे और एक में दूसरे विषय का हे भीष्म ! यदि तुम सम्मति दो तो मैं उन्हें स्मरण | मेल न हो वही बुद्धिमन् कहलाते हैं। इस समय करूं । तुम्हारी सम्मति होने से वह महातपस्वी आपने हमारे वंश की भलाई और उद्धार के लिये व्यास विचित्रवीर्य के क्षेत्र में पुत्र उत्पन्न करेंगे धर्म के अनुसार जो कर्तव्य निश्चित किया है उसमें ॥१७॥१९॥ मैं आपसे सहमत हूं ॥२०॥२३॥ वैशम्पायन ने कहाहे राजा ! महर्षि वेदव्यास वैशम्पायन ने कहा-हे कुरुनन्दन! भीष्म जी के का नाम सुनते ही भीष्म जी ने दोनों हाथ जोड़-ऐसा कहने पर सत्यवती ने अपने पुत्र कृष्ण- कर सत्यवती से कहा-हे माता ! जो कोई स्थिर द्वैपायन का स्मरण किया । बुद्धिमान् वेदव्यास चित्त से धर्म, अर्थ और काम को अच्छीतरह वेद की व्याख्या कर रहे थे। उस समय माता समझते है और इस प्रकार उनका वर्ताव करते हैं | की चिन्ता जानकर क्षणभर में माता के कि धर्म के साथ धर्म का, अर्थ के साथ अर्थ का, पास आ पहुंचे । किसी दूसरे को इसकी खबर और काम के साथ काम का सम्बन्ध रहे और | तक ही नहीं हुई । तब धीवर की कन्या सत्यवती Scoco/03 205500ccorrorosorrond अध्याय १०५ महा भारत ५२३ 000000000 1000 200000woooooo तामद्भिः परिपिच्याता . महर्षिरभिवाद्य च । मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥ भवत्या यदभिप्रेतं तदहं कर्तुमागतः शाधि मां धर्मतत्त्वज्ञे करवाणि प्रियं तव ॥ २८ ॥ तस्मै पूजां ततोऽकात्पुिरोधाः परमर्पये । स च तां प्रतिजग्राह विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ॥ २९ ॥ पूजितो मन्त्रपूर्व तु विधिवत्प्रीतिमाप सः । तमासनगतं माता पृष्ट्वा • कुशलमव्ययम् ॥ ३० ॥ सत्यवत्यथ वीक्ष्यैनमुवाचेदमनन्तरम् मातापित्रोः प्रजायन्ते पुत्राः साधारणाः कवे ॥ ३१ ॥ तेषां पिता यथा स्वामी तथा माता न संशयः। विधानविहितः स त्वं यथा मे प्रथमः सुतः ॥ ३२ ॥ विचित्रवीर्यो ब्रह्म तथा मेऽवरजः सुतः यथा च पितृतो भीष्मस्तथा त्वमपि मातृतः ॥ ३३ ॥ भ्राता विचित्रवीर्यस्य यथा वा पुत्र मन्यसे । अयं शान्तनवः सत्यं पालयन्सत्यविक्रमः ॥ ३४ ॥ ने पुत्र का विधिपूर्वक आदर कर गले लगाकर आसन पर बैठे हुए देखकर कुशल पूछ करके स्तनों के दूध से न्हलाया । बहुत दिनों के बाद कहा कि हे कवि ! माता और पिता दोनों के मेल पुत्र को देखकर सत्यवती ने आनन्द के आंसू | से सन्तान उत्पन्न होती है । इस कारण उसपर गिराये । पूर्व पैदा हुए पुत्र व्यास दुःखित माता | दोनों का एक जैसा अधिकार है । पुत्र पर जो पर जल छोड़कर प्रणामपूर्वक बोले-हे धर्मतत्व पिता का अधिकार है इसमें सन्देह नहीं माता का भाननेवाली ! मैं आपका कार्य सिद्ध करने के भी वैसा ही अधिकार है । हे झापश्रेष्ठ! देवगति लिये यहां आया है; आज्ञा दीजिये, अब मुझ से पैदा हुए जिस प्रकार तुम मेरे प्रथम पुत्र हो वैसे क्या करना होगा ॥२४॥२८॥ ही विचित्रवीर्य मी मेरा छोटा पुत्र था (विचित्रवीर्य इसके पश्चात् पुरोहित ने आकर उन परमर्षि और भीष्म एक पिता के पुत्र होने से जैसे भीष्म की यथाविधि पूजा की, उन्होंने भी मन्त्र सहित विचित्रवीर्य का भाई है उसी प्रकार तुम और वह पूजा ग्रहण की और मन्त्र से उपासना किये | विचित्रवीर्य एक माता के गर्भ से उत्पन्न होने के जाकर प्रसन्न हुये । माता सत्यवती ने उनको | कारण भाई हो । मेरा तो यही मत है। मालूम नहीं, cacions coor-crocorrore ५२४ म हा भारत [ आदिपर्व 090000000000000 1000000/- बुद्धिं न कुरुतेऽपत्ये तथा राज्यानुशासने । स वं व्यपेक्षया भ्रातुः सन्तानाय कुलस्य च ॥ ३५ ॥ भीष्मस्य चास्य वचनान्नियोगाच्च ममानघ । अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय च ॥ ३६ ॥ आनृशंस्याञ्च यत्रूयां तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि । यवीयसस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे रूपयौवनसंपन्ने, पुत्रकामे च धर्मतः तयोरुत्पादयापत्यं समर्थो ह्यसि पुत्रक ॥ ३८ ॥ अनुरूपं कुलस्यास्य संतत्याः प्रसवस्य च । व्यास उवाच-वेत्थ धर्म सत्यवति परं चापरमेव च तथा तब महाप्राज्ञे धर्म प्रणिहिता मतिः । तस्मादहं त्वन्नियोगाद्धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥ ४० ॥ ईप्सितं ते करिष्यामि दृष्टं ह्येतत्सनातनम् । भ्रातुः पुत्रान्प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान् ॥ ४१ ॥ व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया । संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः ॥४२॥ तुम्हारा क्या मत है ॥२९॥३४॥ पुत्र उत्पन्न करो ॥३५॥३९॥ यह शान्तनु का पुत्र भीष्म अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा व्यास जी ने कहा-हे अति बुद्धिमती सत्यवती! का पालन कर रहा है, इस कारण न पुत्र उत्पन्न आप इस लोक और परलोक दोनों प्रकार के धों करना चाहता है और न राज्य करना चाहता है । | को जैसे जानती है वैसेही आपका चित्त भी भाई के सैह से, उसकी कुल की वृद्धि के लिये | प्राणियों के हित में लगा हुआ है । इस कारण, भीम के अनुरोध और मेरी आज्ञा को मानकर, | मैं आपकी आज्ञा से धर्म के अनुसार आपकी सब प्रजा पर दया करके उसकी रक्षा के विचार | इच्छा पूर्ण करूंगा । क्योंकि मैं सनातनधर्म को से जैसा मैं तुमको कहती हूं वैसा करो । हे पुत्र ! जानता हूं। मैं अपने भाई की स्त्रियों में मित्र-वरुण तुम्हारे छोटे भाई विचित्रवीर्य की दो स्त्रियां है । के समान प्रतापी और तेजस्वी पुत्र उत्पन्न करूंगा वे दोनों देव-कन्याओं के समान सुन्दरी, गुणवती ॥४०॥४१॥ और धर्म के अनुसार पुत्र की इच्छा उन दोनों विचित्रवीर्य की स्त्रियों को शुद्धि के तुम उन के गर्भ से इस कुरु को बढ़ाने के लिये । लिये एक वर्ष तक व्रत धारण करना होगा । इस 1 Roci/coose-001006.3000 poocd - अध्याय १०५] महाभारत ocoroscopeorosperoyooooooooooooooz न हि मामवतोपेता उपेयात्काचिदङ्गाना सत्यवत्युवाच- सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भ तथा कुरु अराजकेषु राष्ट्रेपु प्रजाऽनाथा विनश्यति नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता ॥ १४ ॥ कथं चाऽराजकं राष्ट्र शक्यं धारयितुं प्रभो । तस्माद्गर्भ समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति ॥१५॥ व्यास उवाच- यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिकः । विरूपतां मे सहतां तयोरेतत्परं व्रतम् ॥४६ ॥ यदि मे सहते गन्धं रूपं वेपं तथा वपुः अद्यव गर्भ कौशल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम् ॥४७॥ शम्पायन उवाच- -एवमुक्त्वा महातेजा व्यासः सत्यवती तदा । शयने सा च कौशल्या शुचिवस्त्रा ह्यलंकृता ॥ ४८ ।। समागमनमाकाक्षेदिति सोऽन्तर्हितो मुनिः । ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम् ॥ ४९ ॥ धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम् कौशल्ये धर्मतन्त्रं त्वां यदुव्रवीमि निबोध तत् ॥ ५० ॥ व्रत को क्येि बिना कोई स्त्री मेरे पास नहीं स्त्रियों के लिये यही एक परम व्रत है कि मेरे इस आ सकती । सत्यवती ने कहा-ऐसा करो जिससे गन्धरूप वेप को देखकर घृणा न करें । यदि देवी राजरानिये आज ही गर्भवती होजाय । राजा कौशल्या मेरे शरीर की गन्ध को सह ले और मेरे के न होने पर रक्षकहीन प्रजा का शीघ्र ही नाग रूप, वेप और शरीर को देखकर डरे नहीं तो वह हो जाता है । ऐसी दशा में न जप यज्ञादि धर्म निश्चय उसी समय गर्भवती हो जायगी ॥४२।४७|| होते हैं, न वर्षा होती है और न ही देवता रहते। वेशम्पायन ने कहा-महातेजस्वी व्यास यू हैं। इसी कारण राजा के न होने से किसीतरह कहकर अन्तर्धान हो गये । जाते समय कह गये राज्य की रक्षा नहीं हो सकती है। तुम शीघ्र ही कि कौशल्या ( यह अम्बिका का दूसरा नाम था) उन दोनों स्त्रियों के पुत्र उत्पन्न करो। भीष्म उन शुद्ध कपड़े और गहने पहनकर मेरे समागम की पुत्रों की पारना करके जल्दी ही राज्यशासन के इच्छा करे । इसके पश्चात् सत्यवती ने एकान्त में योग्य बना देंगे । व्यास जी ने कहा-यदि अकाल पुत्र-वधू को चुराकर कहा- हे कौशल्या! मैं तुमसे में ही पुत्र उत्पन्न करने को कहती हो तो उन | धर्म, अर्थ और हितयुक्त बात कहती ह, सुनो। मेरे - -orolvroror महाभारत [ आदिपर्व 000000000000 ncaoca0 2030 200100vooooooo. भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात् । व्यथितां मां च संप्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् ॥ ५१ ।। भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्याऽस्य विवृद्धये । सा च बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा ॥ ५२ ।। नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् स हि राज्यधुरं गुर्वीमुंद्वक्ष्यति कुलस्य नः ॥ ५३ ।। सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद्धर्मचारिणीम् । भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा ॥ ५४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सत्यवत्युपदेशे पंचाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥ दुर्भाग्य के कारण अव यह भरत-वंश अस्त होता | हे सुन्दरी ! देव-राज के समान प्रभावशाली पुत्र जान पड़ता है । भीष्म ने मुझको दुःखित देखकर उत्पन्न करके इस रोप हो रहे वंश की फिर रक्षा और पिता के वंश नष्ट होने पर विचार करके | करो। तुम्हारा पुत्र इस भारी राज्य के भार को कुल की वृद्धि के लिये एक उपाय सोचा है। संभाल लेगा । सत्यवती ने कौशल्या को इस प्रकार हे बेटी ! उस उपाय द्वारा के कार्य की सिद्धि तभी समझा-बुझाकर पुत्र के उत्पन्न करने के रिये उद्यत हो सकती है जय तुम. उसे स्वीकार करो। तुम | किया । और देवता, ऋपि, ब्राह्मण और अतिथियों मेरा कहा मानकर भरत-वंश का उद्धार करो। को भोजन कराया ॥४८॥५४॥ आदिपर्व का एक सौ पांच अध्याय समाप्त हुआ। - - अथ पडधिकशततमोऽध्याय ॥ १०६ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत कौशल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वाऽनुप्रवेक्ष्यति । अप्रमत्ता प्रतीक्षेनं निशीथे ह्यागमिष्यति ॥ २ ॥ ॥ एक सौ छ अध्याय १०६ ।। वागायन ने कहा-ई गजा जनमेजय ! इसके बिठाकर धीमे म्बर से कहा-हे कौशल्या ! तुम्हारे पथात् कौगल्या के यथा समय ऋतुमान करने देवर आज रात्रि को तुम्हारे पास आयेंगे ॥१२॥ सत्यवती ने उसको अच्छे सजे हुए पिम्तर पर । 1500rrrrroom14.3000 ------ अध्याय १०६ ] महा भारत ५२७ ocaooooooooooook 0.500/cocotco/ CO4 श्वश्वास्तद्वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे । साचिन्तयत्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥ ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृपिः । दीप्यमानेषु दीपेषु शरणं प्रविवेश ह तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने । वभूणि चैव ३मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ॥ ५ ॥ संबभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया । भयात्काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षतुम् ॥ ६ ॥ ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह । अप्यस्या गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ॥ ७ ॥ निशम्य तद्वचो मातुासः सत्यवतीसुतः । प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना संप्रचोदितः ॥ ८ ॥ नागायुतसमप्राणो विद्वान्राजर्पिसत्तमः । महाभागो महावीर्यो महावुद्धिर्भविष्यति ॥ ९ ॥ तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः । किं तु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ॥ १० ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् । नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ॥ ११ ॥ तुम एकचित्त होकर उनका ध्यान करती | अपनी माता सत्यवती का प्रिय साधने के लिये उसके रहो । कौशल्या सास की यह बात सुनकर भीष्म साथ संगम किया । परन्तु काशीराज की कन्या और दूसरे कुरु-श्रेष्ठों का ध्यान करने लगी । इसके भय से उनकी ओर न देख सकी ॥३॥६|| पश्चात् सत्यवती के पुत्र सत्य वचन बोलनेवाले व्यास जी के बाहर आने पर सत्यवती ने पूछा- ऋषि ने पहिले अम्बिका के लिये नियुक्त होकर हे पुत्र ! क्या इस गर्भ से गुणवान् पुत्र उत्पन्न होगा? उसके घर में प्रवेश किया । उस समय वहां इन्द्रियों के अतीत, ज्ञानी सत्यवती के पुत्र व्यास ने रत्न-दीपक जगमगा रहे थे । अम्बिका ने उस काले माता की यह बात सुनकर कहा-हे माता ! इस रूपवाले पुरुष की बड़ी दजा और दाडी और जलते | गर्म से दस हज़ार हाथियों का बल रखनेवाला, विद्वान्, हुए नेत्र देखकर आंखें बन्द कर ली । द्वैपायन ने | राजार्पियों में श्रेष्ठ, महाभाग, महावीर्यवान् और अति OOOOONALCo-orcard [ आदिपर्व ५२६ महाभारत moortoo o.co/con0 mrorecrooroor 0000000.orcomoooo भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात् । व्यथितां मां च संप्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् ॥ ११ ॥ भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्याऽस्य विवृद्धये । सा च बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा ॥५२॥ नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् स हि राज्यधुरं गुर्वीमुंद्वक्ष्यति कुलस्य नः ॥ ५३ ॥ सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद्धर्मचारिणीम् । भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा ॥५४ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सत्यवत्युपदेशे पंचाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ।। दुर्भाग्य के कारण अब यह भरत-वंश अस्त होता । हे सुन्दरी ! देव-राज के समान प्रभावशाली पुत्र जान पड़ता है । भीष्म ने मुझको दुःखित देखकर | उत्पन्न करके इस लोप हो रहे वंश की फिर रक्षा और पिता के वंश नष्ट होने पर विचार करके | करो। तुम्हारा पुत्र इस भारी राज्य के भार को कुल की वृद्धि के लिये एक उपाय सोचा है। | संभाल लेगा । सत्यवती ने कौशल्या को इस प्रकार हे बेटी ! उस उपाय द्वारा के कार्य की सिद्धि सभी | समझा-बुझाकर पुत्र के उत्पन्न करने के लिये उद्यत हो सकती है जब तुम उसे स्वीकार करो । तुम किया । और देवता, ऋषि, ब्राह्मण और अतिथियों मेरा कहा मानकर भरत-वंश का उद्धार करो। को भोजन कराया ॥४८॥५४॥ आदिपर्व का एक सौ पांच अध्याय ममाप्त हुआ। - अथ पडधिकशततमोऽध्याय ॥ १०६ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत् कौशल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वाऽनुप्रवेक्ष्यति । अप्रमत्ता प्रतीक्षेनं निशीथे ह्यागमिष्यति ॥ ॥ एक सौ छ अध्याय १०६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे गजा जनमेजय ! इसके बिठाकर धीमे स्वर से कहा-हे कौशल्या ! तुम्हारे पश्चात् कौशल्या के यथा समय ऋतुमान करने पर देवर आज रात्रि को तुम्हारे पास आवेगे ॥१२॥ सत्यवती ने उसको अच्छे सजे हुए विस्तर पर rororacaoro0.00Amirror अध्याय १०६ ] महाभारत ५२७ Ac000000000000000000002.00000 co-ocom meicomamarkomworcerenconore - श्वश्चास्तद्वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे । साचिन्तयत्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥ ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवापिः । दीप्यमाने दीपेषु शरणं प्रविवेश ह तस्य कृष्णस्य कपिला जटां दीप्ते च लोचने । वभ्रूणि चैव इमश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ॥ ५ ॥ संवभूव तया साधं मातुः प्रियचिकीर्षया । भयात्काशिसुता तं तु नाशकोदभिवीक्षतुम् ॥ ६ ॥ ततो निष्कान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह । अप्यस्या गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ॥ ७ ॥ निशम्य तद्वचो मातुया॑सः सत्यवतीसुतः । प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना संप्रचोदितः ॥ ८ ॥ नागायुतसमप्राणो विद्वानराजर्षिसत्तमः । महाभागो महावीर्यों महावुद्धिर्भविष्यति ॥ ९ ॥ तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः । किं तु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ॥ १० ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् । नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ॥११॥ तुम एकचित होकर उनका ध्यान करती। अपनी माता सत्यवर्ती का प्रिय साधने के लिय उसके रहो । कौशल्या सास की यह बात सुनकर भीष्म साथ संगम किया । परन्तु काशीराज की कन्या और दूसरे कुरु-श्रेष्ठों का ध्यान करने लगी । इसके भय से उनकी और न देस सकी ॥३६॥ पश्चात् सत्यवती के पुत्र सत्य वचन बोलनेवाले व्यास जी के बाहर आने पर सत्ययती ने पूछा- अपि ने पहिले अम्बिका के लिये नियुक्त होकर हे पुत्र! क्या इस गर्भ में गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा। उसके घर में प्रवेश किया । उस समय यहां इन्द्रियों के अतीत, मानी सत्यवती के पुत्र ब्याम में रल दीपक जगमगा रहे थे । अम्बिका ने उस काले माता की यह पात सुनकर कहा-है माता संपवाले पुरुष की बड़ी टना और दाटी और जलने गर्म मे दस हनार हाथियों का पल रखनेवाला, Aut, हुए नेत्र देखकर मांस पन्द कर ली। द्वैपायन ने राजर्पियों में श्रेष्ठ, महामाग, महावीर्यवान् र भनि । recorairmarrierrorrrrdroin ५२८ म हा भारत [आदिपर्व coconORC co100000.00 noococonco occevedio - 000 ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् । द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि ॥ १२ ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशाः । सापि कालेन कौशल्या सुपुवेऽन्धं तमात्मजम् ॥ १३ ॥ पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः ऋषि मावाहयत्सत्या यथापूर्वमरिन्दम् ॥ १४ ॥ ततस्तेनैव विधिना महर्पिस्तामपद्यत अम्बालिकामथाभ्यागाहर्षि दृष्ट्वा च सापि तम् ॥ १५ ॥ विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत । तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णांप्रेक्ष्य भारत ॥ १६ ॥ व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् । यस्मात्पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामिह ॥ १७॥ तस्मादेष सुतस्ते वै पाण्डुरेव भविष्यति । नाम चास्यैतदेवेह भविष्यति शुभानने ॥ १८ ॥ इत्युक्त्वा स निराकामद्भगवानृषिसत्तमः । ततो निष्क्रान्तमालोक्य सत्या पुत्रमथाऽब्रवीत् ॥ १९ ॥ शशंस स पुनर्मात्रे तस्य वालस्य पाण्डुताम् । त माता पुनरेवाऽन्यमेकं पुत्रमयाचत ॥ २० ॥ बुद्धिमान् राजर्षि बालक उत्पन्न होगा । परन्तु वह | सत्यवती देवी ने अब दूसरी पुत्र-वधू अम्बालिका को बालक माता के दोष से अन्धा होगा ॥७॥१०॥ प्रसन्न करके फिर वेदव्यास का म्मरण किया । उस महात्मा के भी एक सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। महर्षि व्यास विधि के अनुमार अम्बालिका के पास पुत्र की यह बात सुनकर माता ने कहा-हे तपोधन! | आये और उसके साथ सगम किया ॥११॥१४॥ अन्धा पालक तो कुर-वंश के योग्य राजा नहीं हो हे भारत! उस समय अम्बालिका उस ऋपि को सकता। इस कारण तुम जाति और कुल की रक्षा करने | देखकर पीली पड़ गई। यह देखकर वेदव्यास ने वाला, पिता के वंश को बढ़ानेवारा दूसरा पुत्र उत्पन्न | उसमे कहा-तुम मुझे देखकर पारी पड़ गई हो, परो । महायशस्वी व्यास माता की इस आज्ञा को इसलिये तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न बालक भी पीला होगा भी स्वीकार करके चले गये। समय आने पर और वह पाण्टु का होकर पाण्डु नाम से ही प्रसिद्ध फौशल्या के गर्भ से एक अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ। होगा। भगवान् पिश्रेष्ठ के यह बात कहकर घर से -orandir.30srinari70.sire अध्याय १०६ ] महा भारत ५२९ 000/oo0Icon 092desicJossex तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत । ततः कुमारं सा देवी प्राप्तकालमजीजनत् ॥ २१ ॥ पाण्डं लक्षणसंपन्नं दीप्यमानं वरश्रिया । यस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः ॥ २२ ॥ ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजयत् । सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तम् ॥ २३ ।। नाकरोद्वचनं देव्या भयात्सुरसुतोपमा । ततः स्वर्भूपणैर्दासी भूषयित्वाऽप्सरोपमाम् ॥ २४ ।। प्रेषयामास कृष्णाय ततः काशिपतेः सुता । सा तमृषिमनुप्राप्त प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥ २५ ॥ संविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिसगादृषिः ॥ २६ ॥ तया सहोपितो राजन्महर्पिः संशितव्रतः । उत्तिष्ठन्नववीदेनामभुजिप्या भविष्यसि ॥ २७॥ अयं च ते शुभे गर्भः श्रेयानुदरमागतः । धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ २८ ॥ निकलने पर सत्यवती ने उनसे सन्तान की बात पूछी। ने स्वीकार कर तो लिया, परन्तु उस ऋपि के व्यास जी ने माता सत्यवती को फिर पुत्र के पीला । शरीर की दुर्गन्ध, उनका रूप, वेष और शरीर का होने का विषय यह सुनाया ॥१५॥२०॥ स्मरण होने से उनके पास जा न सकी ॥२१॥२३॥ सत्यवती ने यह मुनकर फिर उनसे और एक इसके पश्चात् काशीराज की पुत्री अम्विका ने पुत्र उत्पन्न करने के लिये प्रार्थना की। महर्षि ने अप्सग के समान सुन्दर अपनी दासी को अपने वह भी स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात् ममय वस्त्र और गहने पहनाकर वेदव्यास के पास भेज आने पर देवी अम्बालिका के गर्भ से एक मुन्दर दिया । आग अपि के आने पर दामी ने उठकर पाण्डवर्ण कुमार उत्पन्न हुआ । बड़े चापधारी उनको नमस्कार किया और उनकी आज्ञा से पांचों पाण्डव इन्हीं पाण्डु के पुत्र है । कुछ समय के विम्तर पर जा बैठी । प्रतधारी महर्षि उसके व्यतीत होने पर बड़ी गनी अम्बिका ने फिर सहयास से अति प्रसन्न हुए। उन्होंने जाते समय ऋतुग्नान किया । यह देखकर सत्यवती ने फिर उममे कहा कि आज से तुम दामीमाव मे छुटकारा वेदव्यास के पास जाने को उससे कहा । अम्बिका पाजाओगी। हे शुभे! तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न बालक irrorsorrorwarirmirmire महा भारत [ आदिपर्व onchoot 70.00000000000000cco विदुररूपेण स जज्ञे विदुरो नाम कृष्णद्वैपायनात्मजः । धृतराष्ट्रस्य वै भ्राता पाण्डोश्चैव महात्मनः ॥ २९ ॥ धर्मों शापात्तस्य महात्मनः । माण्डव्यस्यार्थतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः ॥ ३० ॥ कृष्णद्वैपायनोऽप्येतत्सत्यवत्यै न्यवेदयत् । प्रलम्भमात्मनश्चैव शूद्रायाः पुत्रजन्म च ॥३१ ।। स धर्मस्यानृणो भूत्वा पुनर्मात्रा समेत्य च तस्यै गर्भ समावेद्य तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३२ ॥ एते विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रे द्वैपायनादपि । जज्ञिरे देवगर्भाभाः कुरुवंशविवर्धनाः ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि विचित्रवीर्यसुतोत्पत्तौ पडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ।। धर्मात्मा और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगा । कृष्ण स्वरूप में पुत्र का जन्म यह सब कह सुनाया । द्वैपायन के वीर्य और उसके गर्भ से धृतराष्ट्र और इसके पश्चात् वह उस गर्भ की कथा माता से पाण्डु के भाई विदुर ने जन्म लिया ॥२४॥२९॥ कहकर और धर्म के अनुसार ऋण से छुटकारा धर्मतत्व के जाननेवाले, जितेन्द्रिय कृष्णद्वैपायन | पाकर उस स्थान से अन्तरराहित हुये । हे राजन् ! ने माता सत्यवती से आकर महात्मा अणीमाण्डव्य इस प्रकार विचित्रवीर्य के क्षेत्र में महर्षि व्यास के के शाप से धर्म का विदुर के स्वरूप में जन्म और | वीर्य से कुरुकुल को बढ़ानेवाल देवकुमार समान पुत्रों अपने पास में दासी का आना और उससे धर्म का जन्म हुआ ॥३०॥३३॥ आदिपर्व का एक सौ छ अध्याय समाम हुआ। - अथ समाधिकशततमोऽध्याय ॥१०७ ।। जनमेजय उवाच- -किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् । कस्य शापाच्च ब्रह्मर्पः शूद्रयोनावजायत ॥ १ ॥ यशम्पायन उवाच-बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः धृतिमान्सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ॥ २ ॥ एक मी मात अभ्याय ॥ १०७ ॥ राजा जनमेजय ने पूछा-हे मगवन् ! धर्मराज योनि में जन्म लेना पड़ा ? यह ऋषि कौन थे ने ऐसा कौनसा कर्म किया था जिममे उन्हें शब्द- जिन्होंने उनकी शाप दिया ! गम्पायन ने कहा- rzrs24irzrs-correcirrirmiran" r-raril inocococoriescocorno अध्याय १०७ ] महाभारत ५३१ Poroamarpornoormernococonomimicrormanoreonworooroornar स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः । ऊर्ध्ववाहुमहायोगी तस्थो मौनव्रतान्वितः ॥ ३ ॥ तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः । तमाश्रमपदं प्राप्ता दस्यत्रो लोप्नहारिणः ॥ ४ ॥ अनुसार्यमाणा बहुभी राक्षभिर्भरतर्षभ । ते तस्यावसथे लोप्नं दस्यवः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥ निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते वले । तेषु लीनेप्वथो शीघ्रं ततस्तदक्षिणां वलम् ॥ ६ ॥ आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृपिं तस्करानुगाः । तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ॥ ७ ॥ कतमेन पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम । तेन गच्छामहे ब्रह्मन्यथा शीघ्रतरं वयम् ॥ ८ ॥ तथा तु रक्षिणां तेषां त्रुवतां स तपोधनः । न किंचिद्वचनं राजन्नबवीत्साध्वसाधु वा ॥ ९॥ विचिन्वानास्तमाश्रमम् । ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चौरांस्तद द्रव्यमेव च ॥१०॥ ततः शङ्का समभवदक्षिणां तं मुनि प्रति । संयम्यैनं ततो राजे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ॥ ११ ॥ माण्डव्य नाम के प्रसिद्ध बुद्धिमान् , धर्मज्ञ, सत्यवादी उस धन को वहीं पर धरती में गाड़कर आप भी एक ब्राह्मण थे । वे एक समय अपने आश्रम के । वहीं छिप रहे । राजदूत उन चोरों का पीछा करने द्वार पर, एक वृक्ष की जड़ में बैठकर, ऊपर को | हुए उमी समय वहा पर आ पहुंचे। हे राजन ! हाथ उठाये मौनव्रत धारण किये बहुत दिनों से ' उन्होंने उस दशा में उस तपम्वी ऋषि को देखकर तपस्या कर रहे थे ॥१३॥ पूछा-हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! लुटेरे विघर भाग गये हैं। इसीपकार युछ काल के व्यतीत होने पर लुटेरे शघि यतलाइये, हम भी उसी राह जायं । हे राजन् ! नही हुई वस्तुओं को लेकर उस आश्रम में आये । तपस्वी माण्डव्य मीननन धारण किये हुए थे, इम है मानवंशों में श्रेष्ठ ! उन लुटेरों के पीछे राजदूत कारण ये कुछ उत्तर नहीं दे सके । इसके पश्चात् (सिपाही) मा रहे थे। इस कारण वे डर के मारे वे सिपाही रोग इधर-उधर उन चारों की ताराश ततस्ते राजपुरुषा महा भारत [ आदिपर्व crocrerawani तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाध्यतामिति । स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ॥ १२॥ ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनि रक्षिणस्तदा । प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ॥ १३ ॥ शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः । निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ॥१४॥ धारयामास च प्राणानृपींश्च समुपानयत् । शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ॥ १५ ॥ संताप परमं जग्मुर्मुनयस्तपसान्विताः । ते रात्रौ शकुना भूत्वा सनिपत्य तु भारत ॥ १६ ॥ दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन्द्विजोत्तमम् । श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन्किं पापं कृतवानसि । येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अणीमांडव्योपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ।। १०७ । करने लगे । उन्हें वे सब चोर उसी आश्रम के पर चढाये जाने पर भी मरे नहीं। वे वहां निराहार आसपास छिपे हुए मिल गये । लूटा हुआ धन भी रहकर तपस्या करने लगे । चे तप के बल से जीते धरती में गड़ा हुआ निकला । तब उन सिपाहियों रहे और ऋपियों को अपने पास बुला लिया। को उस मुनि पर भी संदेह हुआ। ये उसको भी हे भारत ! उनकी ऐसी दशा का पता पाकर तप लटेरों के साथ बांधकर राजा के पास ले गये। के बल से युक्त मुनि लोग रात्रि को पक्षियों के ॥४॥११॥ स्वरूप में उनके पास आये और उस महात्मा को राजा ने लुटेरों के साथ मुनि को भी सूली पर सूली के ऊपर तप में मम देखकर अति दुःखी हुए। चढ़ाने का दण्ड दे दिया। सिपाहियों ने लुटेरों के | उन्होंने अपना-अपना परिचय देकर माण्डव्य से साथ माण्डव्य ऋपि को भी सूली पर चढ़ा दिया। पूछा-आपने कौनसा ऐसा कर्म किया है जिससे इसके पश्चात् वह सब चुगया हुआ धन राजा के आप इस सूली का भारी दुःख और भय सहन कर खज़ान में जमा हो गया । धर्मात्मा माण्डव्य सूली रह हैं ? कहिए, हम मुनना चाहते है ॥१२॥१७॥ आदिपर्व का एक मौ सात अध्याय समाम हुआ। । sroreir-rssearsrir.orsrran ->res ५३३ 2004 अध्याय १०८ ] महा भारत ormanormonomy अथ अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८॥ वैशम्पायन उवाच-ततः स मुनिशार्दूलस्तानुवाच · तपोधनान् । दोपतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योऽपराध्यति ॥ १ ॥ तं दृष्ट्वा रक्षिणस्तत्र तथा बहुतिथेऽहनि । न्यवेदयंस्तथा राजे यथावृत्तं नराधिप ॥ २॥ श्रुत्वा च वचनं तेषां निश्चित्य सह मन्त्रिभिः । प्रसादयामास तदा शूलस्थमृषिसत्तमम् ॥ ३ ॥ राजोवाच-यन्मयाऽपकृतं मोहादज्ञानादृपिसत्तम । प्रसादये त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्भुमर्हसि ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्ततो राज्ञा प्रसादमकरोन्मुनिः । कृतप्रसादं राजा तं ततः समवतारयत् ॥ ५ ॥ अवतार्य च शूलाग्रात्तच्छूलं निश्चकर्ष ह । अशक्नुवंश्च निष्क्रष्टुं शूलं मूले स चिच्छिदे ॥ ६ ॥ स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनि । तेनातितपसा लोकान्विजिग्ये दुर्लभान्परैः ॥ ७ ॥ अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते । स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमात्मवित् ॥ ८ ॥ एक सौ आठ अध्याय ॥ १०८॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! माण्डव्य मैन अज्ञानता के कारण आपको दु.स दिया है । ने उन तपस्वियों से कहा-मैं क्या दोष बताऊ । इम कारण आप संतुष्ट होकर मेरा अपराध क्षमा मैंने तो आजतक क्सिी का कुछ अपराध नहीं क्यिा। कीजिए । राजा की इस स्तुति से माण्डव्य ऋषि कुछ समय के व्यतीत होने पर सिपाहियों ने उनको बहुत प्रसन्न हुए । राजा ने ऋापि को सूली पर से इस दशा में देखकर राजा के पास जाकर सब हाल उतरवा दिया। उनके शरीर में घुसी हुई सूली की कह सुनाया । राजा ने मुनकर मन्त्रियों से सलाह नोक को निकालने की गजा ने बड़ी चेष्टा की, करके यह निश्चय किया कि यह चौर नहीं है, परन्तु वह न निकरी । अन्त में राजा ने सूरी को नि.सदेह कोई सपम्वी है । तब वह राजा मत्रियों- तुडवा डाला । इसके पश्चात् ऋपि माण्डव्य बहुत सहित उस सूली पर चढ़े ऋषि को प्रसन्न करने के दिनों तक उसी दशा में कठिन तपस्या करते रहे। लिए, नम्रतापूर्वक आफर कहने लगा। हे ऋषिश्रेष्ठ! पटिन तपाया करके टन्होंने दुर्लम पुण्यलोकों को -- rarmmons: oro rrrrrrrrrarsers.comhorse
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धर्म
उवाच-
५३४
महाभारत
[ आदपव
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आसनस्थं ततो धर्म दृष्ट्वोपालभत प्रभुः ।
किं नु तदुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता ॥ ९ ॥
यस्येयं फलनिवृत्तिरीदृश्यासादिता मया ।
शीघूमाचक्ष्व मे तत्वं पश्य मे तपसो वलम् ॥ १० ॥
--पतङ्गिकानां पुच्छेषु त्वयेपीका प्रवेशिता ।
कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत्तपोधन ॥ ११ ॥
स्वल्पमेव यथा दत्तं दानं बहुगुणं भवेत् ।
अधर्म एवं
विप्रर्षे
वहुदुःखफलप्रदः ॥ १२ ॥
अणीमाण्टव्य उवाच-कस्मिन्काले मया तत्तु कृतं ब्रूहि यथातथम् ।
तेनोक्तो धर्मराजेन बालभावे त्वया कृतम् ॥ १३ ॥
अणीमाण्डव्य उवाच-बालो हि द्वादशाद्वर्पाजन्मतो यत्करिष्यति ।
न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यन्ति नै दिशः ॥ १४ ॥
अल्पेऽपराधेऽपि महान्मम दण्डस्त्वया धृतः ।
गरीयान्त्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ॥ १५ ॥
शूद्रयोनावतो धर्म मानुपः संभविष्यसि ।
मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके धर्मफलोदयाम् ॥ १६ ॥
जीत लिया । वह अणी अर्थात् सूली का अग्रमाग प्रकार बहुत दुःख देनेवाला होता है । अणीमाण्डव्य
शरीर में घुसे रहने के कारण वे अणीमाण्डव्य ने कहा-हे धर्मराज ! मेरे पाल्यावस्था में किये
नाम से प्रसिद्ध हुए । एक दिन ये अणीमाण्डव्य हुए छोटे से दोप का तुमने ऐसा कठोर दण्ड दिया
धर्मराज की समा में पहुंचे ॥१८॥
है, इस कारण तुम मनुष्य होकर शुद्गयोनि में जन्म
धर्मराज का तिरस्कार करते हुए नापि ने कहा
मग अज्ञानता से कौनमा मारी पाप किया है जिसका आज से मैं संसार में यह मर्यादा स्थापित
मुझे यह परिणाम मिला। इसका कारण मुझं शीन करता कि जस्तक चौदह वर्ष की आयु पूरी न
बतनगओ, नहीं तो अमी में तुमको अपना तपोयल हो तबतक पाप करने से भी पाप नहीं होगा।
गिराता है। धर्म ने कहा-हे तपोधन ! तुमने एक चौदह वर्ष के पीछे किये हुए पाप का फल सपको
दिन पनंग की पूंछ में मीक गुगाई थी। उसी कर्म मांगना पड़ेगा। शम्पायन ने कहा कि इस दोप
का यह फल तुमको निरा। योग किया हुआ के हेतु महात्मा भीमाण्डव्य के शाप से धर्म ने
दान मा उमा या फन्दा होता है, अपर्म भी उसी-विदुर के प्यार में गवयोनि में जन्म लिया।
लोगे ॥२॥१२॥
अध्याय १०९ ] महा भारत ५३५ oooooooo/20100 .ooo Poona आचतुर्दशकाद्वान्न भविष्यति पातकम् ।। परतः कुर्वतामेव दोप एव भविष्यति ॥१७॥ वैशम्पायन उवाच-एतेन स्वपराधेन शापात्तस्य महात्मनः । धर्मों विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥१८॥ धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः । दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अणीमांडव्योपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ।। चे और अर्थ के विषय में निपुण, काम और | कौरवों की भलाई में सदैव तत्पर रहते थे ॥१३॥१९॥ क्रोध आदि से रहित, परिणामदर्शी, शान्त और आदिपर्व का एक मौ आठ अध्याय समाप्त हुआ | अथ नवाधिकशततमोऽध्याय ॥ १०९ ॥ वैशम्पायन उवाच-तेषु त्रिपु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्र त्रयमेतदवर्धत ॥१॥ ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ॥ २ ॥ वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ३ ॥ वणिम्भिश्चान्वकीर्यन्त नगरापयथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ॥ ४ ॥ नाभवन्दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ॥ ५ ॥ एक सौ नी अध्याय ॥ १०९ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धृतराष्ट्र, बहुत फल-फूल लगते थे। उन दिनों सब पशु, पाण्टु और महात्मा विदुरके उत्पन्न होने पर कुरुजाल, पक्षी प्रसन्न और मालायें गन्धयुक्त और फल रसयुक्त कुरुक्षेत्र और कुरुवंशियों की पूरी उन्नति होने लगी। होते थे ॥१३॥ पृथ्वी में बहुत अन्न उत्पन्न होने लगा। अन्न म्वादिष्ट सब नगर पनियों और शिल्लियों से मरे हुए थे। होता था। उचित समय में वृष्टि होने से वृक्षों में सय रोग वीर, विद्वान् और सच्चरित्र होकर मुस coom महाभारत [ आदिपर्व cocon00 ococcornoopoorcor धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः । अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ॥ ६ ॥ मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः । अन्योऽन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ॥ ७ ॥ तन्महोदधिवत्पूर्ण नगरं वै व्यरोचत । द्वारतोरणनिहेर्युक्तमभ्रचयोपमैः ॥ ८ ॥ प्रासादशतसंवाधं महेन्द्रपुरसन्निभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ॥ ९ ॥ उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा । विस्पधमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ॥ १० ॥ नाभवत्कृपणः कश्चिन्नाभवन्विधवाः स्त्रियः । तस्मिञ्जनपदे रम्य कुरुभिर्वहुलीकृते ॥ ११ ॥ कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वद्धियुतास्तस्मिन्ाष्ट्रे सदोत्सवाः ॥ १२ ॥ भोगते थे । उस समय में लुटेरों का भय नहीं रहता पर्वतों पर प्रसन्नचित्त से विहार करने लगे । दक्षिण था। कोई पाप करने का विचार भी न करता था। लोग उत्तर के कुरुओं से एक दूसर को ऐसा प्रतीत होता था मानों राज्य के सब प्रदेशों | अहंकार दिखाकर देवता, ऋपि और चारणों के साथ में सत्ययुग आ गया है । प्रजा धर्मशील, पागशील, विचाने लगे ॥७॥१०॥ सत्यशील और आपस में प्रेमशील होने से बढ़ने उस राज्य में असंख्य कुरुवंशी रहते थे। वहां समी ॥४॥६॥ कोई कृपण पुरुष या विधवा स्त्री नहीं दिखाई पड़ती सर लोग क्रोध, लोम और अभिमान से रहित थी। कुआ, उपवन, बावड़ी और ब्राह्मणों के घर होकर धर्म के अनुसार परम्पर आनन्द करने लगे। सब समृद्धियों से युक्त दिखाई पड़ते थे । सव स्थानों उस समय वह नगर बड़े भारी समुद्र के समान मरा | में सदा उत्सव हुआ करते थे। धर्म के अनुसार हुआ, संकड़ों पड़े बड़े भवनों से परिपूर्ण और | मीम सब प्रजा का पालन करने लगे । वह राज्य बादल दल के समान द्वार और तोरणों से संयुक्त ] अनेक देशों के यज्ञ के खम्भों से चित्रित होकर होकर अमरावती जैसी शोमा पाने लगा। सब मनुष्य अति रमणीय बन गया । भीष्म के विधान से वहां नदी, वन, पहाड, तालार, रमणीय फुलवाड़ी और | धर्म का चक इस प्रकार चलने लगा कि सभी राज्यों orreirarrairnrsc.irsinhriroinvirgican अध्याय १०९] महा भारत ५३७ 000.04 भीष्मेण धर्मतो राजन्सर्वतः राजन्सर्वतः परिरक्षिते । वभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताविन्तः ॥ १३ ॥ स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः । भीमेण विहितं राष्ट्र धर्मचक्रमवर्तत ॥ १४ ॥ क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् । पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः परमोत्सुकाः ॥ १५ ॥ गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप । दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः । जन्मप्रभृति भीपमेण पुत्रवत्परिपालिताः ॥ १७ ॥ संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्यायनसंयुताः । श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ॥१८॥ धनुर्वेदे च वेदे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ॥ १९ ॥ इतिहासपुराणेपु नानाशिक्षासु बोधिताः । वेदवेदान्तत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ॥ २०॥ पाण्डुर्धनुपि विक्रान्तो नरेवभ्यधिकोऽभवत् । अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥ २१ ॥ के मनुष्य अपने-अपने देश छोड़कर उमी राज्य में जाति के योग्य संस्कारों से मंस्कृत कर तीनों रहने के लिए आने लगे। महात्मा कुरुकुमारों के कुमारों को पढ़ने में लगाते थे। कुछ समय के व्यतीत कामों को देखकर नगर और नाम के लोग अति होने पर वे तीनों युमार यौवन अवस्था को प्राप्त उत्साहयुक्त हुए ॥११.१५|| हुए ॥१६॥१८॥ हे राजन् ! प्रधान प्रधान कुरुवशियों और वे वेद, येदार, गदायुद्ध और सङ्ग चलाने, पुरवासियों के घरों में दान करने और साधु अभ्या हाथी घोड़ों पर चढ़ने में, नीतिशास्त्र, इतिहास, पुगण गतों को भोजन कराने के ही शब्द सुनाई देने लगे। और नाना विषयों की शिक्षा आदि में पूरे पण्डित मृतराष्ट्र, पाण्दु और बुद्धिमान् विदुर को माम हो गये थे । विक्रमी पाण्टु धनुप के युद्ध में और परपन ही से अपने पुत्रों की तरह पालने लगे। धृतराष्ट्र पराक्रम में मय से पढ़कर हुए। हे राजन् ! Dro" ५३८ महाभारत [ आदपर्व 0.000woooor0000000cor न त्रिषु लोकेषु न त्वासीत्कश्चिद्विदुरसंमितः । धर्मनित्यस्तथा राजन्धर्मे च परमं गतः ॥ २२ ॥ प्रनष्टं शान्तनोवंशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् । ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ॥ २३ ॥ वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् । सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ॥ २४ ॥ धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद्राज्यं प्रत्यपद्यत । पारशवत्वाद्विदुरो राजा पाण्डुर्वभूव ह ॥ २५॥ कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डुराज्याभिषेके नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥ विदुर के समान धर्म का जानकार और धर्मात्मा । भीष्म श्रेष्ठ है और नगरों में हस्तिनापुर नगर श्रेष्ठ पुरुष तीनों लोकों में कोई नहीं है । उस समय में है। धृतराष्ट्र को जन्मान्ध होने के कारण और राजा शान्तनु के नष्ट होते हुए वंश को फिर से विदुर को शूद्रा के गर्भ में जन्म लेने के कारण चलत देखकर सब राज्यों में ऐसी प्रशंसा हुई कि राज्य की प्राप्ति नहीं हुई । पाण्डु ही राज्य के वीर पैदा करनेवाली स्त्रियों में काशिराज की अधिकारी हुए। इसके पश्चात् एक दिन नीतिशास्त्र अम्बिका और अम्बालिका नाम की दोनों कन्याएं में निपुण भीष्म जी ने धर्म और अर्थशास्त्र के श्रेष्ठ हैं, देशों में कुरुजागल देश श्रेष्ठ है, धर्मज्ञों में | जानकार विदुर को बुलाकर कहा ॥१९।२६।। आदिपर्व को एक सौ नौ अध्याय समाप्त हुआ ॥ अथ दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ भीष्म उवाच-गुणैः समुदिनं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् । अप्यन्यान्यपृथिवीपालान्पृथिव्यामधिराज्यभाक ॥ १ ॥ रक्षितं राजभिः पूर्व धर्मविद्भिर्महात्मभिः । नोत्सादमगमञ्चदं कदाचिदिह नः कुलम् ॥ २ ॥ आदिपर्व का एक सौ दस अभ्याय !! ११० ।। भीष्म ने कहा कि हमारा यह सर्व गुणों से | दूसरे सब पृथ्वीपालों पर अधिकार फैलाता माया युक्त और सर्वत्र प्रख्यात कुरुतुल पृथ्वी भर में । है । इस विषय में किधर्मशील महात्मा राजाभों के rececreonomorrierrorroreironocacin 1504 अध्याय ११० ] म हा भारत ५३९ 2005 cooooooooooo 200000 मया च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना । समवस्थापितं भूयो युप्मासु कुलतन्तुषु ॥ ३ ॥ तच्चैतद्वर्धते भूयः सागरवद्यथा । तथा मया विधातव्यं स्खया चैव न संशयः ॥ ४ ॥ श्रूयते यादवी कन्या स्वनुरूपा कुलस्य नः । सुवलस्यात्मजा चैव तथा मद्रेश्वरस्य च ॥ ५ ॥ कुलीना रूपवत्यश्च ताः कन्याः पुत्र सर्वशः । उचिताश्चैव संवन्धे ह्यस्माकं क्षत्रियर्षभाः ॥ ६ ॥ मन्ये वरयितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर । सन्तानार्थं कुलस्यास्य यद्वा विदुर मन्यसे ॥७ ॥ विदुर उवाच-भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः । तस्मात्स्वयं कुलस्यास्य विचार्य कुरु यद्धितम् ॥ ८ ॥ वैशम्पायन उवाच-अथ शुश्राव विप्रेभ्यो गान्धारी सुक्लात्मजाम् । आराध्य वरदं देवं भगनेत्रहर हरम् ॥ ९॥ गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा । इति शुश्राव तत्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥ १० ॥ द्वारा पहिले से रक्षित यह वंश अधोगति को मात समझता हूं कि इस वंश की सन्तान के निमित्त न हो, मेरे सत्यवती के और महात्मा वेदव्यास के उन्हीं से विवाह करना उचित है अथवा तुम्हारी प्रयल से तुम तीन कुलतंतु उत्पन्न हुए हो। अब समझ में जो आवे सो कहो । विदुर ने कहा-आप तुम्ही तीनों पर कुल स्थापित हुआ है । इसलिए ही इन तीनों बालकों के माता, पिता और परमगुरु तुम्हारी और मेरी ऐसी चेष्टा होनी चाहिये, कि है इस कारण जिसमें आप इस वंश की भलाई समझें यह कुल समुद्र के समान जैसे बढ़ाया जा सके वैसे वही करें ।।५।८॥ रहे ॥१४॥ वैशम्पायन ने कहा-कौरवों के पितामह भीष्म मैंने सुना है कि यदुवंशी राजा शूरमैन, राजा । ने प्राक्षणों के मुख से मुना कि राजा मुगल की मुबल और मदान, इन तीनों के एक-एक मुन्दरी ! कन्या गाधारी ने भगवान शंकर की आराधना कन्या है । हे पुत्र ! क्षत्राणियों में श्रेष्ठ वे तीनों करके उनमे सौ पुत्र होने का वर पाया है। यह पन्याएं अच्छे कुल में उत्तन, रूपवती और हमारे मुनकर मीम ने गान्धार देश के राजा मुवल के सम्पन्ध के योग्य हैं। हे बुद्धिमान् विदुर ! में पास अपना दूत भेजा । धृतराष्ट्र के अन्धे होने का oroccorronocoroncon 1 ५४० महाभारत [ आदिपर्व 000coooooo oooooncocoorcoroorcort ततो गान्धारराजस्य प्रेपयामास भारत । अचक्षुरिति तत्रासीत्सुवलस्य विचारणा ॥ ११ ॥ कुलं ख्यातिं च वृत्तं च बुद्धया तु प्रसमीक्ष्य सः । ददौ तां धृतराष्ट्राय गान्धारी धर्मचारिणीम् ॥ १२ ॥ गान्धारी त्वथ शुश्राव धृतराष्ट्रमचक्षुषम् । आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ॥ १३ ॥ ततः सा. पट्टमादाय कृत्वा बहुगुणं तदा । ववन्ध नेत्रे स्वे राजन्पतिव्रतपरायणा ॥ १४ ॥ नाभ्यसूयां पातमहामित्येवं . कृतनिश्चया ॥ १५ ॥ ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् । स्वसारं वयसा लक्ष्म्या युक्तामादाय कौरवान् ॥ १६ ॥ तां तदा धृतराष्ट्राय ददौ परमसत्कृताम् । भीष्मस्यानुमते चैव विवाहं समकारयत् ॥ १७ ॥ दत्वा स भगिनी वीरो यथार्ह च परिच्छदम् । पुनरायात्स्वनगरं भीष्मेण प्रतिपूजितः ॥ १८ ॥ गान्धार्यपि वरारोहा शीलाचारविचेष्टितैः । तुष्टिं कुरूणां सर्वेषां जनयामास भारत ॥ १९ ॥ गान्धार राजा ने बहुत विचार किया परन्तु कौरवों | से डाह न करंगी। इसके पश्चात् गान्धार राजकुमार के कुल की प्रसिद्धि और चरित्र को जानकर शकुनीरूप यौवनवती अपनी बहिन को साथ लिये धृतराष्ट्र को गान्धारी नानी कन्या का देना स्वीकार हस्तिनापुर में आये । उन्होंने भीष्म की अनुमति से कर लिया ॥९॥१२॥ धृतराष्ट्र के साथ गान्धारी का विवाह कर दिया हे भारत ! गान्धारी ने सुना, कि उसके पति ॥१३॥१७॥ धृतराष्ट्र अन्धे हैं और माता पिता ने उन्हीं के इस प्रकार वस्त्र, माभूपण, रन मादि के साथ साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया है । तब अपनी वहिन देकर शकुमी अपने नगर को चले । इस विचार से, पतिव्रता गान्धारी ने उसी समय वस्त्र | जाते समय उनका भीम ने यथोचित आदर सत्कार लेकर कई फेर लगाकर भपने नेत्रों को बांधा, किया। हे भारत! पतिव्रता गान्धारी भी अपने शील- क्योंकि उसने यह निश्चय किया था, कि में पति | स्वभाव और आचरण से सब कौरवों को और wal c3-01000olco 20201007 अध्याय १११ ] महा भारत ५४१ 2000000000 Joooo.00000 Cove वृत्तेनाराध्य तान्सर्वान्गुरुत्पतिपरायणा । वाचापि पुरुषानन्यान्सुव्रता नान्वकीर्तयत् ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि धृतराष्ट्रविवाहे दशाधिकशततमोऽध्याय ॥ ११० ॥ अपने पति को प्रसन्न रखने लगी । वह कभी ॥१८॥२०॥ भूलकर भी दूसरे पुरुष का नाम नहीं लेती थी आदिपर्व का एक सौ दश अध्याय समाप्त हुआ। एकादशाधिकशततमोऽध्याय ॥ १११ ॥ वैशम्पायन उवाच-शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताभवत् । तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ १ ॥ पितृष्वस्त्रीयाय स तामनपत्याय भारत । अग्न्यमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक् ॥ २ ॥ अग्रजामथ नां कन्यां शूगेऽनुग्रहकांक्षिणे । प्रददौ कुंतिभोजाय सखा सख्ये महात्मने ॥ ३ ॥ नियुक्ता सा पितुगेंहे ब्राह्मणातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरत्तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ ४॥ निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमु संशितात्मानं सर्वयत्नरतोपयत् ॥ ५ ॥ तस्ये स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया । आभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः ॥ ६ ॥ । एक सौ ग्यारह अध्याय १११ ॥ वैशम्पायन ने कहा-यदु के वश में शूरसेन नाम सो हमको देना 1 उन्होंने यह बात स्वीकार कर के एक प्रसिद्ध यादव हुए । उनके पुत्र वसुदेव री । उसी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार शूरसेन ने कन्या हुए । उनकी कन्या का नाम पृथा था । वह कन्या होने पर अपने बुशा के लड़के कृतिमोज को यह ऐसी सम्भवती थी, कि ससार भर में कोई कन्या दे दी । जब यह युवा अवस्था को प्राप्त हुई तर उसके रूप की परावरी नहीं कर सकती थी। राजा कुतिमोज ने उसको अपने घर आये हुए उसके उत्सान होने के पहले शूरसेन के फीजाद अभ्यागत ब्राह्मण नापियों की मेवा में लगा दिया। माई राजा पुतिभोज ने सन्तान न होने के कारण एक दिन पृथा अपने घर में आर टहरे हुए से शूरसेन से कहा था कि तुम्हारे जो सन्तान हो । जितेन्द्रिय, प्रतधारी, धर्म के गूढ तत्वों को जाननेवाले Ciroli-orolorercicoirara" ५४२ महाभारत [ आदिपर्व Xooooo यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तस्य तस्य प्रभावेण तव पुत्रो भविष्यति ॥ ७ ॥ तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ ८ ॥ सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम् । विस्मिता चानवद्याही दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥ ९ ॥ तां समासाद्य देवस्तु विवस्वानिदमब्रवीत् । अयमस्म्यसितापानि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १० ॥ कुन्त्युवाच-कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद्वरं विद्यां च शत्रुहन् । तद्विजिज्ञासयाह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो ॥ ११ ॥ एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाहं प्रसादये । योपितो हि सदा रक्ष्याः स्वापराद्धापि नित्यशः ॥ १२ ॥ सूर्य उवाच--वेदाहं सर्वमेवैतद्यदुर्वासा वरं ददौ । संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम ॥ १३ ॥ अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे । वृथाह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्यान्नात्र संशयः ॥ १४ ॥ महर्षि दुर्वासा की सेवा करने लगी। पृथा ने अनेक यह आश्चर्य्य घटना देखकर कुन्ती को बड़ा अचरज प्रकार से सेवा करके ऋपि दुर्वासा को प्रसन्न कर हुआ । सूर्यदेव ने उसके पास आकर कहा-हे लिया। जाते समय उन्होंने भविष्य आपद्धर्म को। कमलनयनी ! मै आ गया हूं, कहो, मैं तुम्हारा क्या जानकर उसे वशीकरण मंत्र विधिपूर्वक यतलाया प्रिय कार्य करूं? ॥१०॥ और उससे कहा कि इस मंत्र को पढ़कर तुम जिस पृथा ने हाथ जोड़कर कहा है शत्रुनाशी देवता का आवाहन करोगी, वह तुम्हारे पास चला विभो ! एक ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर मुझे विद्या आवेगा और उसके प्रभाव से तुम्हारे पुत्र उत्पन्न | और वर दिया था। मैंने उसकी परीक्षा करने के होगा ॥१७॥ लिए ही आपको बुलाया है । मैं इस अपराध के यशस्विनी याला पृथा ने दुर्वासा की यह बात । लिए सिर झुकाकर आरको प्रसन्न करती हूं । आप मुनकर अचरज माना और कन्या अवस्था में ही प्रसन्न होकर क्षमा कीजिए । स्त्री यदि बहुत अपराध एर्य देवता का आवाहन किया । आवाहन करते । भी करे, तो भी उसकी रक्षा करनी चाहिये । ही तीनों लोकों के नाय तेजम्बी म्र्य वहां आ गये। , मूर्यदेव ने कहा- जानता हूं कि महर्षि दुर्वासा ने । का Po02020002 0.070mcor000000000 अध्याय १११ ] म हा भारत ५४३ boor वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता । सा तु नैच्छदरारोहा कन्याहमिति भारत ॥१५॥ बंधुपक्षभयाद्रीता लज्जया च यशस्विनी । तामर्कः पुनरेवेदमब्रवीद्भरतर्षभ मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोप इत्युत । एवमुक्त्वा स भगवान्कुन्तिराजसुतां तदा ॥ १७ ॥ प्रकाशकर्ता तपनः संवभूव तया सह । तत्र वीरः सम भवत्सर्वशस्त्रभृतां वरः । आमुक्तकवचः श्रीमान्देवगर्भः श्रियान्वितः ॥ १८ ॥ सहज कवचं विभ्रत्कुण्डलोद्योतिताननः । अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥ १९ ॥ प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः । दत्वा च तपता श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः ॥ २० ॥ दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा । एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥ २१ ॥ गृहमानापचारं सा वन्धुपक्ष भयात्तदा । उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम् ॥ २२ ॥ प्रसन्न होकर तुमको यह वर दिया है। अब तुम का कहना मानने को तैय्यार न हुई। हे भरतपर्भ ! भय को छोड़कर मुझ से सगम करो । है गुमे । दिवाकर ने फिर उससे कहा, कि हे राजकुमारी ! मेरा दर्शन अव्यर्थ है। है भीरु । तुमने जिम कारण मैं प्रसन्न होकर तुमको यह वर देता है कि इस मुझको चुराया, यदि वह व्यर्थ हो, तो इसमें सदेह मेरे सहवास से तुम्हारा यह कन्यामाव दूषित न नहीं, कि हानि होगी ॥११॥१४॥ होगा । प्रकाशनाथ भगवान् आदित्य ने कुन्तीराज वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! सूर्य की कन्या से यह कहकर उसके साथ रमण किया। ने इसतरह समझा-बुझाकर कुन्ती का भय दृर इमसे सर्व शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, तीनों लोकों में करना चाहा, परन्तु यशस्विनी कुन्ती, अपने कन्या मसिद्ध, देर-युमार-सदृश म्वाभाविक कवच और यम्मा को यादकर, गन्धु माधों के डर और गुण्डल पहिने कर्ण उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात् रोकलज्जा के कारण, किसीतरह से भी सूर्यदय परमद्युतिमान् आदित्य फिर उमको कन्यावस्था देकर wr.orrariraircarcror- म हा मारत [ आदिपर्व .00000004 तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः । पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः ॥ २३ ॥ नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तावुभौ । वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवविति ॥ २४ ॥ स वर्धमानो वलवान्सर्वास्त्रेद्यतोऽभवत् । आपृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान् ॥ २५ ॥ तस्मिन्काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्किंचिद्वसु महीतले ॥ २६ ॥ तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थी समुपागमत् । कवचं प्रार्थयामास फाल्गुनस्य हिते रतः ॥ २७ ॥ स्वशरीरात्समुत्कृत्य कवचं स्वं निसर्गजम् । विप्ररूपाय शक्राय ददौ कर्णः कृताञ्जलिः ॥२८॥ प्रतिगृह्य तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा । ददी शक्तिं सुरपतिर्वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २९ ॥ देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यमेकं जेतुमिच्छेथाः सोऽनया न भविष्यति ॥३० ।। आकाश को चले गये ॥ १५॥२०॥ स्त्री ने उस बालक का नाम वसुषेण रखा ॥२१॥२४॥ पुत्र पैदा हुमा देखकर कुन्ती विचार करने थोड़े दिनों में वह बालक बड़ा होकर महाशूरवीर लगी कि अब कौनसा उपाय करना चाहिये ! क्या और सब अस्त्र-शस्त्रों का जाननेवाला हो गया। वह करूं; तो मला होवे । अंत में उसने उस बुरे काम | सूर्य के सामने बैठकर उस समय तक सूर्य की को छिपाने के लिए, भाई घान्धों के डर से, उसी आराधना किया करता था जब तक सूर्य पीठ पीछ समय पैदा हुए कुमार को जल में बहा दिया। जाते थे। उस समय कोई भी ब्राह्मण आकर जो उसको जल में वहते हुए देखकर राधा के पति कुछ उससे मांगता था, वही देता था। एक दिन महायशस्वी सूतपुत्र ने उसे जल से बाहर निकाल | देवराज इन्द्र ने अर्जुन का हित साधने के लिये, लिया और घर लाकर अपनी स्त्री को दे दिया। भिक्षुक ब्राह्मण का वेप धारण करके, कर्ण के पास यह उसको अपने पुत्र के समान पालने लगी । उस आकर उससे उसके कवच और कुण्डल गांगे । वर्ण बालक ने यमु अर्यात् कुण्डल और कवचरूपी धन ने हाथ जोड़कर उसी समय अपने शरीर से के साथ जन्म लिया था, इससे राधापति और उसकी म्वामार ही से मिले हुए कवच और कुण्डल । 7-1500109100%ONE.SO5C को 05000110co/ oreone अध्याय ११२ ] म हा भारत ५४५ peore प्राङ् नाम तस्य कथितं वसुपेण इति क्षितौ । कों वैकतनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥३१॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि कर्णसंभवे एकादशाधिकशततमोऽध्याय ॥ १११ ।। काटकर ब्राह्मणरूपी इन्द्र को दे दिये ॥२५॥२८॥ जिस एक को तुम नष्ट करना चाहोगे वह इस कर्ण के इस कार्य को देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न | शक्ति से नष्ट होगा । पहले तो उसका नाम वसुपेण हुआ। उसने कवच-कुण्डल लेकर कर्ण को एक प्रसिद्ध था, कवच काट देने से कर्ण नाम से प्रसिद्ध शक्तिअस्त्र दिया और कहा कि तुम देवता, असुर, हुआ ॥२९॥३१॥ मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षस इनमें से चाहे आदिपर्व का एक सौ ग्यारह अध्याय समाम हुआ अथ द्वादशाधिकशततमोऽध्याय ॥ ११२ ॥ वैशम्पायन उवाच-सत्वरूपगुणोपेता धर्मारामा महावता । दुहिता कुन्तिभोजस्य पृथा पृथुललोचना ॥ १ ॥ तां तु तेजस्विनी कन्यां रूपयौवनशालिनीम् । व्यावृण्वन्पार्थिवाः केचिदतीव स्त्रीगुणैर्युताम् ॥ २ ॥ ततः सा कुन्तिभोजेन राज्ञाहूय नराधिपान् । पित्रा स्वयंवरे दत्ता दुहिता राजसत्तम ॥ ३ ॥ ततः सा रकमध्यस्थं तेषां राज्ञां मनस्विनी । ददर्श राजशार्दूलं पाण्डं भरतसत्तमम् ॥ ४ ॥ सिंहदर्प महोरस्कं वृपभाक्षं महाबलम् । आदित्यमिव सर्वेषां राज्ञां प्रच्छाद्य वै प्रभाः ॥ ५ ॥ एक सा यारह अध्याय ।। ११२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अच्छे राजाओं के बीच में बैठे हुए भरतवशों में श्रेष्ठ गज- नेत्रोंवारी राजा कुन्तिभोज की कन्या पृथा अत्यन्त सिंह पाण्डु को देखा । राजाओं की समा में टहरे गुणवती और शीलवती थी। ऐसी तेजस्विनी, युवती हुए दूसरे देवराज के समान सिंह सदृश विक्रम- और अच्छे सी के गुणों से भूषित कुन्ती को उसके वाले, चौड़ी छातीवाले, बड़ी बड़ी आसोदार, महापरी पिता से कई राजाभों ने भागा। इसलिए उसके । महाराज पाण्डु अपने तेज से सब राजाओं की पिता राजा बुन्तिभोन ने सयपर कर दिया । म्वयवर कान्ति को फीका क्येि हुए आदित्य के समान में देश देश के राजा आये । पृथा ने उन सय प्रकाशमान हो रहे हैं । राज-समा में इन्द्र के समान -- vr.ororar -Cor Doorcococon cocococ •oosed महा भारत [आदिपर्व Corea तिष्ठन्तं राजसमितौ पुरन्दरमिवापरम् । तं दृष्ट्वा सानवद्याङ्गी कुन्तिभोजसुता शुभा ॥ ६ ॥ पाण्डं नरवरं रंगे हृदयेनाकुलाभवत् । ततः कामपरीताङ्गी सकृत्प्रचलमानसा ॥ ७ ॥ बीडमाना स्रजं कुन्ती राज्ञः स्कन्धे समासजत् । तं निशम्य वृतं पाण्डं कुन्त्या सर्वे नराधिपाः ॥ ८ ॥ यथागतं समाजग्मुर्गजैरश्वै रथैस्तथा ततस्तस्याः पिता राजन्विवाहमकरोत्प्रभुः ॥ ९ ॥ स तया कुन्ति भोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः । युयुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव ॥ १० ॥ कुन्त्याः पाण्डोश्च राजेन्द्र कुन्तिभोजो महीपतिः । कृत्वोद्वाहं तदा तं तु नानावसुभिरर्चितम् । स्वपुरं प्रेषयामास स राजा कुरुसत्तम ॥ ११ ।। ततो बलेन महता नानाध्वजपताकिना । स्तूयमानः स चाशीर्भिाह्मणैश्च महर्षिभिः ॥ १२ ।। संप्राप्य नगरं राजा पाण्डुः कौरवन्दनः । न्यवेशयत तां भार्यां कुन्तीं स्वभवने प्रभुः ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि कुन्तीविवाहे द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ।। बैठे हुए पाण्ड को देखकर अनिन्दित अंगवाली, शची को मिले थे उसीप्रकार सौभाग्ययुक्त कुरुनंदन शुम लक्षणवाली कुन्ती आसक्त हो गई और काम कुन्ती से मिले । हे राजा ! करुश्रेष्ठ राजा कुंतिभाज के वश में होकर लज्जा से सिर झुकाकर पाण्डु के ने कुन्ती का विवाह कर दहेज में बहुत धन-रल गले में ही माला डाल दी। पाण्डु के गले में माला देकर उसको विदा किया । राजा पाण्डु महर्षि और डालते देखकर राजा लोग हाथी, घोड़े और रथों ब्राह्मणों के आशीर्वाद से स्तुति किये हुए नाना पर चढ़कर जैसे आये थे वैसे ही अपने अपने स्थान प्रकार की ध्वजाओं वाली सेना के साथ अपने नगर को चले गये ॥१८॥ को आये। उन्होंने पृथा को अपने महलों में भेज तब राजा कुंतिभोज ने विधिपूर्वक राजा पाण्डु के दिया ॥९।१३।। साथ पृथा का विवाह कर दिया। देवराज जिसप्रकार आदिपर्व का एक सौ बारह अध्याय समान हुआ । worororococacocorococeryrocurorud --0 .000003 : : अध्याय ११३ ] म हा भारत ५४७ emorancomercoroorce अथ त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः । विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान्मतिम् ॥ १ ॥ सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्धं ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । वलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम् ॥ २ ॥ तमागतमभिश्रुत्य भीष्म वाहीकपुङ्गवः । प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ॥ ३ ॥ दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमयं तथैव च । मधुपर्क च मद्रेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ ४ ॥ तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः । आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिंदम ॥ ५ ॥ श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी । तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ॥ ६ ॥ युक्तरूपो हि संवन्धे त्वं नो राजन्वयं तव । एतत्संचित्य मदेश गृहाणास्मान्यथाविधि ॥ ७॥ तमेवंवादिनं भीष्म प्रत्यभापत मद्रपः । न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ॥ ८ ॥ एक सौ तेरह अध्याय ॥ ११३ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके से उनसे आने का कारण पूछा। कुरुवंश के प्रधान पश्चात् राजा शान्तनु के पुत्र बुद्धिमान् भीम ने | भीष्म ने कहा-हे मद्र-राज ! मैं कन्या के लिए यशस्वी राजा पाण्टु का और एक विवाह करना आया हूं। मैंने सुना है कि साध्वी, यशस्विनी चाहा । वृद्ध मन्त्रियों, प्रामणों, महर्षियों और मादी नामवाली आपकी एक बहिन है। मैं पाण्डु चतुरहिनी सेना को साथ लिये महाबली भीम मद्र के साथ व्याहने को आपसे उसे मांगता है। हे देश को गये ॥१२॥ राजन् ! आप हमारे और हम आपके सम्बन्ध के वाहीकों में श्रेष्ठ मद्र-पति भीम के आने की योग्य है । हे मदेश्वर ! इस विषय में सोच विचार सवर पाले ही मागे से आकर यथाविधि उनकी कर आप हमारे इस सम्बन्ध को स्वीकार कीजिए पूजा करके उनको अपने नगर में ले गये । आसन, ॥३७॥ पाद्य, अर्थ, मधुपर्क मादि देकर मद्र-पति ने भीम भीष्म की यह वार्ता मुनार मद्रराज ने कहा- . . amom ५४८ महाभारत [ आदिपर्य 2ca xcono.000000000000000 पूर्वेः प्रवर्तितं किंचित्कुलेऽस्मिन्नृपसत्तमः । साधु वा यदि वाऽसाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ॥ ९ ॥ व्यक्तं तद्भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः । न च युक्तं तथा वक्तुं भवान्देहीति सत्तम ॥१०॥ कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् । तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ॥ ११ ॥ तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः । धर्म एप परो राजस्वयमुक्तः स्वयंभुवा ॥ १२ ॥ नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वविधिरयं कृतः । विदितेयं च ते शल्य मर्यादा साधुसंमता ॥ १३ ॥ इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् । रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात्सहस्रशः ॥ १४ ॥ गजानश्वान्रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च । मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृजच्छुभम् ॥ १५॥ . तत्प्रगृह्य धनं सर्व शल्यः संप्रीतमानसः । ददौ तां समलंकृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ॥ १६ ॥ हे कौरव ! मैं समझता हू कि हमको आपके समान भीष्म ने तब मद्र राज से कहा-हे राजन् ! ब्रह्मा श्रेष्ठ सम्बन्धी दूसरा नहीं प्राप्त हो सकता। परन्तु हमारे | जी ने स्वय कहा है कि कुल-धर्म ही श्रेष्ठ धर्म है । वंश में पहले के राजाओं ने शुल्क (मूल्य) लेने यह रीति पहले के राजाओं की चलाई हुई है । इस- का नियम किया है वह भला हो चाहे वुग मैं उसके | लिये कन्या का मूल्य लेना आपके लिए दोप नहीं विरुद्ध नहीं कर सकता । आप हमारे कुल के है। हे शल्य ! आप साधु-सात सदाचार को आचार को अच्छीतरह जानते हैं । इसलिये हे वीर | अच्छीतरह जानते हैं । महातेजस्वी भीष्म ने यह यह पात कहना, कि हमको कन्या दो आपके लिए पात कहकर बहुत सा सोना, सोने के आभूषण, उचित नहीं है। हे शत्रुओं के नाश करनेवाले ! विचित्र प्रकार के रत, हाथी, रथ, घोड़े, वस्त्र और शुल्क ऐना हमारे युल की रीति है। यही हमारे माण के ढेरों के देर, मोती, मंगे आदि मद्रदेश के रिए परम प्रमाण है। इसलिए हम उस रीति के राजा शल्य को दिये ॥१२॥१५॥ अनुसार, धन रिये पिना, आपको कन्या नहीं दे उस धन को रेकर शल्य बहुत प्रसन्न हुए। सकेंगे ||८॥११॥ उन्होंने उसी समय कौरव-श्रेष्ठ भीम को नाना -orporacoirorers Dr.dewr.com/niroscorer अध्याय ११३ ] महा भारत ५४९ Dooscova Hcdood -opo0000000 - icocccrediciescovernocccizedeo स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः । आजगाम पुरीं धीमान्प्रविष्टो गजसाह्वयम् ॥१७॥ तत इप्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसंमते । जग्राह विधिवत्पाणिं माद्रयाः पाण्डुर्नराधिपः ॥ १८ ॥ ततो विवाहे निवृत्ते स राजा कुरुनन्दनः । स्थापयामास तांभार्या शुभे वेश्मनि भाविनीम् ॥ १९ ॥ स ताभ्यां व्यचरत्सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः । कुन्त्या माद्रयाच राजेन्द्रोयथाकामं यथासुखम् ॥ २० ।। ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः । जिगीपया महीं पाण्डुनिरक्रामत्पुरात्प्रभो ॥ २१ ॥ स भीष्मप्रमुखान्वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च । धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान्कुरुसत्तमान् ॥ २२ ॥ आमन्न्य प्रययो राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः । महलाचारयुक्ताभिराशीभिरभिनन्दितः ॥ २३ ॥ गजवाजिरथोघेन बलेन महतागमत् । स राजा देवगर्भाभो विजिगीपुर्वसुन्धराम् ॥ २४ ॥ हृष्टपुष्टवलैः प्रायात्पाण्डुः शत्रूननेकशः । पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशार्णाः समरे जिताः ॥ २५ ॥ कौरवाणां यशोभृता । प्रकार के अलंकारों से सजी हुई कन्या दान की। कुरुश्रेष्ठ पाण्डु ने कुन्ती और माद्री के साथ मादी को लेकर भीष्म शीघ्र ही अपने नगर हस्तिनापुर तीस रात्रि मनमाना विहार करके पृथ्वी जय करने में आ गये । इसके पश्चात् महाराज पाण्डु ने की इच्छा से भीष्म, धृतराष्ट्र आदि वृद्ध कुरुवंशियों शुभ दिन और शुभ लम में विधिपूर्वक माद्री से ! को प्रणाम नमस्कार और निमंत्रण करके उनकी विवाह किया। आगे विवाह के निर्वाह होने पर आज्ञा से मंगलाचरणयुक्त आशीर्वाद सुनता हुआ कुरनंदन ने न्यी व्याही स्त्री के रहने के लिये एक हाथी, घोड़ों और रथों से भरी हुई मारी सेना के सुंदर महल दिया । राजाओं में श्रेष्ठ पाण्डु कुन्ती और साथ अपने नगर से बाहर निकला । देवतुल्य राजा माद्री के साथ मनमाने सुस से रहने लगे॥१६॥२०॥ पाण्डु इसतरह पृथ्वी को जय करने की इच्छा से पाण्डुना नरसिंहेन - Acne 10scesrc3comAdoravAccorn महाभारत [ आदिपर्व Roooooooooooooo0000.orcocoooooooooo0000000000 ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् ॥ २६ ॥ प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम् । आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः ॥ २७ ॥ गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घो राजगृहे हतः । ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः ॥ २८ ॥ पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः । तथा काशिपु सुझेपु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ ॥ २९ ॥ स्ववाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद्यशः । तं शरौघमहाज्वालं शस्त्रार्चिपमरिन्दमम् ॥ ३० ॥ पाण्डुपावकमासाद्य व्यदह्यन्त नराधिपाः । ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला नृपाः ॥३१ ।। पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः । तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ॥ ३२ ॥ तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरन्दरम् । तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः ॥ ३३ ॥ उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च । मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्ण रजतं बहु ॥ ३४ ॥ सेना साथ लेकर चारों ओर विचरने लगा।।२१।२५|| चला । वहां जाकर उसने विदेह राजा को जीता कौरवों के यश बढ़ानेवाले नरों में सिंहरूपी ॥२६॥२८॥ पाण्डु ने पहले के अपराधी दशार्णदेश के राजाओं है भरतश्रेष्ठ ! इसके पश्चात् राजा पाण्डु ने को जीतकर अपने वश में कर लिया। इसके पश्चात् काशी, सुह्म और पुण्ड् देशों में जाकर अपने बाहु-बल रशविरम झण्डों के साथ अगणित हाथी, घोड़े, | से राजाओं को परास्त करके कौरवों का यश बढाया। रथ और पैदलों से बनी हुई सेना को लेकर अनेक बहुत से राजा लोग उस पाण्डरूपी अमि की वाण- राजाओं को हानि पहुंचानेवाले बल और अहंकार | रूपी ज्याला में पड़कर मर गये और बहुत से पलहीन से गर्वित, मगधदेश के दीर्घ नामक राजा को होकर राजा पाण्दु के वश में होकर कुरुओं की राजगृह में मारकर और वहां से बहुत सा धन, । सेवा में नियुक्त हुए ॥२९॥३२॥ रन तथा घोड़े आदि लेकर वह मिथिला की और जिन जिन राजाओं को पाण्डु ने जीता या, उन . Rews.comrosco.ooozrora.
अध्याय ११३ ] म हा भारत ५५१ acococcoooooooo oroscom तदादाय यया Scorecordrococorracoco गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् । खरोष्ट्रमाहिपाश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् ॥ ३५॥ कम्वलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च । तत्सर्व प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ॥ ३६ ॥ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः । हर्षयिष्यन्स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ॥ ३७॥ शान्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः । प्रनष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृनः ॥ ३८॥ ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जन्हुः कुरुधनानि च । ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ॥ ३९॥ इत्यभापन्त राजानो राजामात्याश्च संगताः । प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ॥ ४० ।। प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीमपुरोगमाः । ते न दूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयात् ॥ ४१ ॥ आवृतं ददृशुर्हष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः । नानायानसमानीत रतरुच्चावचैस्तदा ॥ ४२ ॥ सबों ने राजा पाण्डु को देवताओं में इन्द्र के समान राजा और मन्त्रिगण पुश्वासी और ग्रामवासियों से शूरवीर समझा । और सब हाथ जोड़ उनको प्रणाम | मिलकर प्रसन्नचित्त से आपस में यह कहने लगे, कर अस्त्र, मणि, मूगा, मोती, सुवर्ण, चादी, गाय, कि धीमान् भरत और राजाओं में सिंहरूपी शान्तनु घोड़े, हाथी, गधे, ऊट, भैसे, बकरी, भेड़, कम्बल, की कीर्ति बिगड़ने पर हुई थी, परन्तु अब पाण्डु मृगचर्म और मृग के बालों से बने हुए कपड़े आदि ने फिर उसको उज्ज्वल कर दिया। जिन राजाओं के धन लेकर उनके सामने खड़े हुए। ने पहले कौरवों के राज्य और धन को हर लिया हस्तिनापुर के राजा पाण्डु ने उन सबको ग्रहण कर था वे सब इस समय पाण्डु से हारकर उसको कर लिया ॥३३॥३६॥ देने लग ॥३७॥३९॥ इसके पश्चात् वे अति प्रसन्न सेनाओं के साथ उसके आने का समाचार सुनकर मन्त्री, प्रधान अपने राज्य की प्रजा और पुरवासियों को आनन्द प्रधान कौरव ओर पुरवासियों को साथ रिये हुए देने के लिए हस्तिनापुर में लौट गये । पाण्डु को भीम पाण्डु से मिरने और उनका स्वागत करने देखकर सब प्रजा को बड़ा आनन्द हुआ। तब के लिये नगर से बाहर आ गये । वे राजा के अनेक प्रकार oraco/ro म हा भारत [ आदिपर्व Horroreovernmenevedio.omoeomoves हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैस्तथाविभिः । नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः ॥ ४३ ॥ सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः । यथाह मानयामास पौरजानपदानपि ॥४४॥ प्रमृद्य पुरराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् । पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४५ ॥ स तूर्यशतशंखानां भेरीणां च महास्वनैः । हर्षयन्सर्वशः पौरान्विवेश गजसाह्वयम् ॥ ४६ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डुदिग्विजये त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ! साथियों को धन से भरा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए, | आदि का यथायोग्य सम्मान किया। अन्य राजाओं नाना प्रकार के छकड़ों पर लदे हुए रत्न, गाय, को जीतकर बहुत दिनों के बाद आये हुए पाण्डु बड़े बड़े हाथी, घोड़े, ऊंट, भेड़ आदि इतने | को गले से लगाकर आनन्द के आंसू बरसाने लगे। आरहे थे कि उनका अन्त ही नहीं दीखता था । पाण्डु ने तुरही, नगाड़े और शङ्ख आदि अनेक कौशल्या के आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र पाण्डु ने अपने बाजों के घोर शब्द से सम्पूर्ण पुरवासियों को प्रसन्न पिता भीम के चरणों में बन्दना करके सब पुरवासी कर हस्तिनापुर में प्रवेश किया ॥४०॥४६॥ आदिपर्व का एक सौ तेरह अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ।। वैशम्पायन उवाच -धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः स्ववाहुविजितं धनम् । भीमाय सत्यवत्यै च मात्रे चोपजहार सः ॥ १ ॥ विदुराय च वै पाण्डुः प्रेषयामास तद्धनम् । सुहृदश्चापि धर्मात्मा धनेन समतर्पयत् ॥ २ ।। ततः सत्यवती भीष्म कौसल्यां च यशस्विनीम् । शुभैः पाण्डुजितैरर्थेस्तोषयामास भारत ॥ ३ ॥ । एक सौ चौदह अध्याय ११४ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ! धर्मात्मा उन्होंने आत्मजनों को धन से संतुष्ट किया । हे पाण्डु ने धृतराष्ट्र की आज्ञा से अपने बाहु-बल से भारत 1 सत्यवती ने पाण्डु के जीतकर लाये हुए पैदा किया हुमा सारा धन भीष्म, विदुर, सत्यवती रलों से भीम और यशस्विनी और अपनी माता कौशल्या को अर्पण कर दिया। कौशल्या को प्रसन्न किया। कौशल्या पुस्पश्रेष्ठ अपने arrorsraep । नाना प्रकार orro"o"o"orar cực अध्याय ११४ ] महा भारत Cocolloonc00 0.00cococ0%0000000000/cd .. ननन्द माता कौसल्या तमप्रतिमतेजसम् । जयन्तमिव पौलोमी पौलोमी परिष्वज्य नरर्पभम् ॥ ४ ॥ तस्य वीरस्य विक्रान्तैः सहस्रशतदक्षिणैः । अश्वमेधशतरीज धृतराष्ट्रो महामखैः ॥ ५ ॥ संप्रयुक्तस्तु कुन्त्या च माया च भरतर्षभ । जिततन्द्रीस्तदा पाण्डुर्वभूव वनगोचरः ॥ ६ ॥ हित्वा प्रासादनिलयं शुभानि शयनानि च । अरण्यनित्यः सततं बभूव मृगयापरः ॥ ७ ॥ स चरन्दक्षिणं पार्श्व रम्यं हिमवतो गिरेः । उवास गिरिपृष्टेषु महाशालवनेषु च ॥ ८ ॥ रराज कुन्त्या माद्रया च पाण्डुः सह वने चरन् । करेण्वोरिव मध्यस्थः श्रीमान्पोरन्दरो गजः ॥ ९ ॥ भारतं सह भार्याभ्यां खड्गवाणधनुर्धरम् । विचित्रकवचं वीरं परमास्त्रविदं नृपम् । देवोऽयमित्यमन्यन्त चरन्तं वनवासिनः ॥ १०॥ तस्य कामांश्च भोगांश्च नरा नित्यमतन्द्रिताः । उपजन्हुव॑नान्तेषु धृतराष्ट्रेण चोदिताः ॥ ११ ॥ पुन पाण्डु से मिलकर ऐसे प्रसन्न हुई जैसे इन्द्राणी कोमल शय्या छोड़कर वन में सदा रहते हुए शिकार अपने पुत्र जयन्त को मिलकर होती है ॥१४॥ खेलने लगे ॥५॥८॥ धृतराष्ट्र वीर पाण्डु के बाहु-बल से लाये हुए श्रीमान् पाण्डु कुन्ती और माद्री के साथ इस इतने अधिक धन से पञ्चमहायज्ञ किया करते थे, । प्रकार से घूमा करते थे जैसे ऐरावत हाथी अपनी कि उस धन से सैंकड़ों सहस्रों गुणा अधिक दक्षिणा । हथिनियों के साथ में कीड़ा करता हुआ विचरा युक्त सैंकड़ों अश्वमेध यज्ञ हो सकते थे। कुछ दिनों करता है। दो स्त्रियों को साथ लिये खग, वाण के पश्चात् भरत कुल प्रदीप पाण्डु कुन्ती और माद्री और चाप धरे हुए, परमास्त्र चलाने में दक्ष, के साथ एकत्र हो शिकार खेलने के लिये हिमालय | विचित्रक्वच से सुशोभित, विचरते हुए पाण्डु को पहाड़ के दक्षिण ओर बड़े बड़े शालवृक्ष के वनों | देखकर वन के रहनेवाले लोग उनको देवता में जाकर रहने लगे । वे सुखदायी राजमहल और | समझने लगे। विशेष ध्यान रखकर महात्मा धृतराष्ट्र : 2/0ran" rormodarron.moirora.orosrorroorons महा भारत [ आदिपर्व saxco4 Coco/I00 ततस्तु वरयित्वा अथ पारसवीं कन्यां देवकस्य महीपतेः । रूपयौवनसंपन्न स शुश्रावापगालुतः ॥ १२ ॥ तामानीय भरतर्षभः । विवाहं कारयामास विदुरस्य महामतेः ॥ १३ ॥ तस्यां चोत्पादयामास विदुरः कुरुनन्दनः । पुत्रान्विनयसंपन्नानात्मनः सदृशान्गुणैः ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि विदुरपरिणये चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय. ॥ ११४ । सब भोजन की सामग्री उसी वन में पाण्डु के मांगकर वुद्धिमान् विदुर से उसका विवाह कर दिया । भेजते रहते थे ॥९॥११॥ कुरुनन्दन विदुर ने उस क्षत्रिय के वीर्य और इधर गङ्गा-पुत्र भीष्म ने सुना कि राजा देवक शूद्राणी से उत्पन्न हुई कन्या से अपने समान गुण के शूद्राणी के गर्भ से जन्मी हुई रूप और यौवनयुक्त | और नम्रतायुक्त कई पुत्रों को जन्म दिया ॥१२॥१४॥ एक कन्या है । उन्होंने राजा देवक से वह कन्या आदिपर्व का एक सौ चौदह अध्याय समाप्त हुआ । पास ----- अथ पंचादशाधिकशततमोऽध्याय ॥ ११५ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः पुत्रशतं जज्ञे गान्धायाँ जनमेजय । धृतराष्ट्रस्य वैश्यायामेकश्चापि शतात्परः ॥ १ ॥ पाण्डोः कुन्त्यां च माद्रयांच पुत्राः पञ्च महारथाः । देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय कुलस्य वै ॥ २ ॥ जनमेजय उवाच-कथं पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां द्विजसत्तम । कियता चैव कालेन तेपामायुश्च किं परम् ॥ ३ ॥ कथं चैकः स वैश्यायां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् । कथं च सदृशीं भायाँ गान्धारी धर्मचारिणीम् । TecevedoJcc एक सौ पन्द्रह अध्याय ॥ १२५॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धृतराष्ट्र और माद्री के गर्भ से पांच महारथी पुत्र उत्पन्न के वीर्य और गाधारी के गर्भ से एक सौ पुत्रों और हुए ॥१॥२॥ धेश्या के गर्भ से एक पुत्र ने जन्म लिया । पाण्टु जनमेजय ने कहा-हे ब्राह्मणों में श्रा! किस कारण के वंश की रक्षा के लिये देवताओं के द्वारा कुन्ती और कितने दिनों में गान्धारी के एक सा पुत्र recipcarrorumrar" अध्याय ११५ ] महा मारत councomcore10000coroscope 000004 COCAJAVK आनुकूल्ये वर्तमानां धृतराष्ट्रोऽभ्यवर्तत ॥ ४ ॥ कथं च शसस्य सतः पाण्डोस्तेन महात्मना । समुत्पन्ना देवतेभ्यः पुत्राः पञ्च महारथाः ॥ ५ ॥ एतद्विद्वन्यथान्यायं विस्तरेण तपोधन । कथयस्व न मे तृप्तिः कथ्यमानेषु बन्धुषु ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच-क्षुच्छ्रमाभिपरिग्लानं 'द्वैपायनमुपस्थितम् । तोपयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ ॥ ७ ॥ सा बने सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः । ततः कालेन सा गर्भ धृतराष्ट्रादथाग्रहीत् ॥ ८ ॥ संवत्सरद्वयं तं तु गान्धारी गर्भमाहितम् । अप्रजा धारयामास ततस्तां दुःखमाविशत् ॥ ९ ॥ श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं वालार्कसमतेजसम् । उदरस्यात्मनः स्थैर्यमुपलभ्यान्वचिन्तयत् ॥ १० ॥ अज्ञातं धृतराष्ट्रस्य यत्नेन महता ततः । सोदरं घातयामास गान्धारी दुःखमूर्छिता ॥ ११ ॥ ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता । द्विवर्षसंभृतां कुक्षौ तामुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ १२ ॥ उत्पन्न हुए । उनकी कितनी आयु थी। धृतराष्ट्र सतुष्ट किया । उन्होंने प्रसन्न होकर गाधारी से वर के वीर्य और चैश्या के गर्भ से एक पुत्र मे उत्पन्न मागने के लिए कहा ! गान्धारी ने पति के समान हुआ ? धृतराष्ट्र अपनी प्यारी स्त्री गाधारी से कैसा वीर्यवान् सा पुत्र मागे । “ऐसा ही होगा" वेदव्यास व्यवहार किया करते थे ? महात्मा मृगरूपी मुनि कहर चले गये । कुछ समय के व्यतीत होने पर के शाप देने के पश्चात् पाण्डु के पाच महारथी पुत्र | धृतराष्ट्र के सहवास से गान्धारी गर्भवती हुई परन्तु कैसे उत्पन्न हुए हे विद्वान् पाण्डत तपोधन ! दो वर्ष तक सन्तान न उत्पन्न हुई । इसलिए यह सब वृत्तात आप विस्तार से कहिए । कुल का गाधारी बड़ी दुखी होने लगी। इसके पश्चात् कुन्ती चरित्र सुनकर मैं तृप्त नहीं हुआ हू ॥३॥६॥ के सूर्य क समान पुत्र के जन्म का होना सुनकर वैशम्पायन ने कहा-एक दिन भगव न् वेदव्यास | उसको बड़ा चिन्ता हुई और धृतराष्ट्र से छिपाकर भूखे प्यासे और थके गाधारी के पास आये। अब में गर्भ को पीटने लगी। उसकी चोट से दो गाधारी ने बड़े आदर से सवा करके उनको वर्ष का यह गर्भ कटी हुई लोहे की गेंद के समान ? 2 00000T•>coc0020 महा भारत [ आदिपर्व Ocoo00.00 व्यास उवाच --- अथ द्वैपायनो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत् । तां स मांसमयीं पेशी ददर्श जपतां वरः ॥ १३ ॥ नतोऽब्रवीत्सौवलेयी किमिदं ते चिकीर्पितम् । सा चात्मनो मतं सत्यं शशंस परमर्षये ॥ १४ ॥ गान्धार्युवाच ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् । दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया ॥१५॥ शतं च किल पुत्राणां वितीणं मे त्वया पुरा । इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै ॥ १६ ॥ एवमेतत्सौवलेयि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । वितथं नोक्तपूर्व मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १७ ॥ घृतपूर्णं कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम् । सुगुप्तेषु च देशेषु रक्षा चैव विधीयताम् । शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां पगिर्षिचय ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच-सा सिच्यमाना त्वष्ठीला वभूव शतधा तदा । अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां पृथगेव तु ॥ १९ ॥ पूर्ण यथायोगं .विशांपते । मांसपेश्यास्तदा राजन्क्रमशः कालपर्ययात् ॥ २० ॥ मांस के टुकड़े के रूप में भूगी पर गिरा ॥७॥१२॥ सौ पुत्रों के बदले में यह मांस का लोथड़ा हुआ रानी ने उसे फेंक देना चाहा। योग-बल से है। व्यास जी ने कहा-हे सुबलपुत्री ! तुम्हारे सो सपकुछ जाननेवाले वेदव्यास उसी समय वहां पर पुत्र अवश्य होंगे। मैं कभी हंसी से भी झूठ नहीं उपस्थित हुए। उस मांस के लोथड़े को देखकर कहता हूं। भला तुम्हें तो वर दिया है। अब तुम उन्होंने कहा-हे राजा मुबल की कन्या ! तुम यह ! जल्दी से घी से भरे सौ घड़े मंगाकर एकान्त में क्या कर रही हो ! गांधारी ने ठीक-ठीक भाव प्रगट | यत्न से रख दो और ठंडे जल से इस मांस को घी भो करके कहा-हे महाराज ! मैने कुन्ती के सूर्य के समान पुत्र उत्पन्न होने का वृत्तांत मुनकर बड़े दुःख वैशम्पायन ने कहा कि हे नरेश, व्यास जी की से अपने पेट को पीट डाला। उसकी नोट से मेरे आज्ञा के अनुसार गान्धारी उस मांस-पेशी के ऊपर यह मांस का लोथड़ा उत्पन्न हुआ है । आपने वर जल छिड़कती रही । छिड़कते छिड़कते उस मांस दिया था कि मेरे एक मी पुत्र होंगे । परन्तु उन के पिण्ड के अंगूठे-अंगूठे भर के अलग अलग मी एकाधिकशतं ॥१३॥१८॥ zzrror32Prorecor.
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च्याम ताप यग्दा म गाधाग य य मी पुत्र और एय या उपनाना ।
अध्याय ११५ ] महा भारत ५५७ proacococoedos popcomoooooooooooooo concercomx । ततस्तांस्तेपु कुण्डेषु गर्भानवदधे तदा । स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां वै व्यदधाततः ॥ २१ ॥ शशंस चैव भगवान्कालेनैतावता पुनः । उद्घाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौचलीम् ॥ २२ ॥ इत्युक्त्वा भगवान्व्यासस्तथा प्रतिनिधाय च । जगाम तपसे धीमान्हिमवन्तं शिलोच्चयम् ॥ २३ ॥ जज्ञे क्रमेण चैतेन तेषां दुर्योधनो नृपः । जन्मतस्तु प्रमाणेन ज्येष्टो राजा युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥ तदाख्यातं तु भीष्माय विदुराय च धीमते । यस्मिन्नहनि दुर्धर्षों जज्ञे दुर्योधनस्तदा ॥ २५ ॥ तस्मिन्नेव महावाहुर्जज्ञे भीमोऽपि वीर्यवान् । स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप ॥२६॥ रासभारावसदृशं रुराव ननाद च तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः ॥ २७ ॥ वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत्तदा । ततस्तु भीतवद्राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २८ ॥ समानीय वहन्धिप्रान्भीष्म विदुरमेव च । अन्यांश्च सुहृदो राजन्कुरून्सास्तथैव च ॥ २९ ॥ टुकड़े हो गये। तब व्यास जी ने उन सौ टुकड़ों में पहुंची। जिस दिन दुर्योधन उत्पन्न हुआ उसी को उन्हीं घी के सौ पड़ों में डालकर अच्छी तरह गुप्त दिन भीमसेन ने भी जन्म लिया था ॥२४॥२६॥ स्थान में रखवा दिये । जाते समय व्यास जी कह हे राजन् ! धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र दुर्योधन जन्म गये कि दो वर्ष पीछे इन घड़ों को खोलना। अब लेते ही गधे की तरह रोने भीर चिल्लाने लगा। बुद्धिमान् भगवान् द्वेषयन तपस्या करने के लिए उसके उस शब्द को सुनकर गिद्ध, गधे, सियार फिर हिमालय पर्वत पर चले गये ॥२०॥२३॥ और कौवे कोलाहल मचाने लगे। हवा बड़े वेग कुछ दिनों के पश्चात् समय पूरा होने पर, उन से चरने लगी। चारों दिशायें जलने लगी। हे मांस के टुकड़ों में से पहले दुर्योधन का जन्म हुआ। महाराज ! इस भयानक अवम्या को देखकर धृतराष्ट्र जन्म के अनुसार युधिष्ठिर दुर्योधन से बड़े थे । बहुत भयभीत हुए। उन्होंने मीप्म, विदुर, ब्रामण और यह वात बुद्धिमान् विदुर और पृतराष्ट्र के कानों सब मुहद कुरु-वंशियों को बुलाकर कहा-हमारे कुल rror-07-2015-rsirmiri Irrorator महाभारत [ आदिपर्व cooooooooooooconod 02 AAJAKOS05.. युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्टो नः कुलवर्धनः । प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन्वाच्यमस्ति नः ॥३०॥ अयं स्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति । एतद्विवृत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ॥ ३१ ॥ वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत । क्रव्यादाः प्राणदन्घोराः शिवाश्चाशिवशंसिनः ॥ ३२ ॥ लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः । तेऽब्रुवन्त्राह्मणा राजन्विदुरश्च राजन्विदुरश्च महामतिः ॥ ३३ ॥ यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप । उत्थितानि सुते ज्येष्ठे तानि ते पुरुषर्षभ ॥ ३४ ॥ व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव । तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ॥३५॥ शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते । त्यजैनमेकं शान्ति चेत्कुलस्येच्छसि भारत । एकेन कुरु वे क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा ॥ ३६ ॥ त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ ३७ ॥ को बढानेवाला युधिष्ठिर पहले उत्पन्न हुआ है वह का जन्म के समय बोलना अच्छा नहीं है । यह राजा होगा, इस विषय में तो कुछ कहना ही नहीं वडा भारी अशकुन है । यदि इस बालक की रक्षा है । परन्तु मेरे इस पुत्र ने युधिष्ठिर से पीछे जन्म की जायेगी तो वडा अक्ल्याण होगा और यह लिया है क्या यह राजकुमार उनके पीछे राजा हो आपका बालक अवश्य वश-नाश का कारण होगा। सकेगा। इस विषय में जो निश्चय हो वह आप यदि आप अपने कुल की भलाई चाहते हैं तो इसे ठीक ठीक कहिये ॥२७॥३१॥ त्याग दीजिए । इसके त्याग देने से यदि अपने हे महारान ! धृतराष्ट्र की यह बात पूरी होते वश की, और जगत् की भलाई हो सकती है तो ही सियार और मास खानेवाले कुटिल जन्तु | सौ पुत्रा की अपेक्षा एक कम सौ पुत्र ही अच्छे अमालकारी शब्द करने सगे। चारों ओर यह सब है । हे महाराज ! नीति में भी कहा है, कि कुल अमल चिद देखकर ब्राह्मणों और महामति विदुर की रक्षा के लिये एक पुरुष को, गाव की भलाई ने धृतराष्ट्र से कहा-हे पुरुषप्रेष्ठ महाराज ! गीदड़ों के रिये युर को, देश की माई के लिये गाव को -Dircrorror अध्याय ११६ ] महाभारत 2004 स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्द्विजोत्तमैः । न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः ॥ ३८ ॥ ततः पुत्रशतं पूर्ण धृतराष्ट्रस्य पार्थिव । मासमात्रेण संजज्ञे कन्या चैका शताधिका ॥ ३९ ।। गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता । धृतराष्ट्र महाराज वैश्या वैश्या पर्यचरत्किल ॥४०॥ तम्मिन्संवत्सरे राजन्धृतराष्ट्रान्महायशाः । जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः, करणो नृप ॥ ४१ ॥ एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः । महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका ॥ ४२ ॥ युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान् ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि गांधारीपुत्रोत्पत्ती पश्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥ और अपनी भलाई के लिय सारे संसार को छोड़ अधिक उत्पन्न हुई । जिस समय गान्धारी के गर्भ देना ही ठीक है ॥३२॥३७॥ था और वह कमज़ोर थी उस समय एक वैश्या हे राजन् ! सब ब्राह्मणों के और विदुर के धृतराष्ट्र की सेवा करती थी । उसी समय उसके बहुतेरा समझाने पर भी धृतराष्ट्र ने पुत्र के स्नेह के । गर्भ से धृतराष्ट्र के वीर्य से महातेजस्वी युयुत्सु नाम कारण उसका त्याग नहीं किया। इसके उपरान्त । का एक और पुत्र उत्पन्न हुआ। है राजा जनमेजय ! एक महीने के अन्तर में धृतराष्ट्र के वे सब पुत्र इस तरह धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र और एक उत्पन हो गये और उन सौ पुत्रों में एक कन्या कन्या उत्पन्न हुई ॥३८॥४३॥ आदिपर्व का एक मो पन्द्रह अध्याय ममाप्त हुआ। अथ पोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥१६॥ जनमेजय उवाच-धृतरामस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया । ऋपेः प्रसादात्तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता ॥१॥ वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका । गांधारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ ॥ २ ॥ एक मो माला अध्याय ११६ ॥ जनमेजय ने कहा, कि हे अनघ : आपने कहा के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुमा परन्तु व्यास जी ने कि गांधारी के सौ पुत्र और एक कन्या और वैश्या तो गान्धारी के मी पुत्र ही होने का वरदान दिया -50-3500/- rarrorl ५६० महाभारत [ आदिपर्व comcoloococoooo. comc0002 उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा । कथं विदानी भगवन्कन्यां त्वं तु ब्रवीपि मे ॥ ३ ॥ यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा ।' न प्रजास्यति चेद्भूयः सौवलयी कथंचन ॥ ४ ॥ कथं तु संभवस्तस्या दुःशलाया वदस्व मे यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम् ॥ ५ ॥ वैशम्पायन उवाच-साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते तां मांसपेशी'.भगवान्स्वयमेव महातपाः ॥ ६ ॥ शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत् । यो यथा कल्पितो भागस्तं तं धात्र्या तथा नृप ॥ ७ ॥ घृतपूर्णेषु कुण्डेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत्तदा । एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता ॥ ८ ॥- दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना । मनसाचिन्तयद्देवी एतत्पुत्रशतं मम ॥ ९ ॥ भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः । ममेयं परमा तुप्टिटुंहिता मे भवेद्यदि ॥ १० ॥ एका शताधिका वाला भविष्यति कनीयसी । ततो दौहित्रजाल्लोकादवाह्योऽसौ पतिर्मम ॥ ११ ॥ था। महर्षि व्यास जी ने मांस-पेशी के सौ टुकड़े से उन मांस के टुकड़ों को धुलवाकर अलग-अलग सौ घड़ों में रखवाये थे। उनस सौ पुत्र उत्पन्न हुए । करने की कल्पना की । हे महाराज ! वे ज्यों ज्यों गान्धारी दुवारा गर्भवती भी नहीं हुई । फिर उसके । उसके टुकड़े करते थे त्या त्या गान्धारी उन्हें धृत दुःशला नाम की कन्या कब और किस तरह उत्पन्न के धड़ों में छोड़ने लगी। उस समय कठिन व्रतों हुई ! मुझको इसमें बड़ा सदेह है आप कृपा करके । के करनवाली सुन्दरी गांधारी अपने मन में विचार इसका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए ।।११५|| । करने लगी किव्यास जीने सत्य कहा था मेरे निःसंदेह वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! आपने यह सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। परन्तु यदि इन सौ पुत्रों के अच्छा प्रश्न किया है । मैं आपको इसका उत्तर । सिवाय एक पुत्री भी होती तो क्या ही अच्छा या देता है मुनो । भगवान् व्यास जी ने स्वयं टंडे जल ॥६॥१०॥ । 00000000000002.mroroscoiral 1510 अध्याय ११६ ] महा भारत 500000000002050sc opiccio-700105050cci Kocieocomecuricored व्यास उवाच- अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत् । यदि नाम ममापि स्याद् दुहितैका शताधिका ॥ १२ ॥ कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता । यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाप्यथ वा हुतम् ॥ १३ ॥ गुरवस्तोपिता वापि तथास्तु दुहिता मम । एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ १४ ॥ व्यभजत्स तदा पेशी भगवानृपिसत्तमः । गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौवलीम् ॥१५॥ -पूर्ण पुत्रशतं वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता । दौहित्रयोगाय भाग एकः शिष्टः शतात्परः ॥ १६ ॥ एपा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता । ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः । तं चापि प्राक्षिपत्तत्र कन्याभागं तपोधनः ॥१७॥ एतत्ते कथितं राजन्दुःशलाजन्म भारत । बेहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि दुःशलोत्पत्ती पोहशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ।। कन्या उत्पन्न हो तो मेरे पति भी वर्ग-लाम से द्वैपायन ने उन टुकड़ों को गिना तो सौ से एक वधित न हो। विशेषकर दामाद होने से स्त्रियों को अधिक निकला। इसके पश्चात् व्यास जी ने गान्धारी जैसा आनन्द होता है येसा आनन्द और किसी से कहा है गान्धारी ! मैं कभी भी असत्य नहीं बोलता। तरह नहीं होता। इसलिए यदि इन सा पुत्रों से तुम्हारे सौ पुत्र तो अवश्य ही होंगे। इन सौ टुकड़ों अधिक मेरे एक पन्या भी उत्तम हो तो में पुनों के मियाय एक टुकड़ा बचा है। इस टुकड़े से और नातियों से अपने को कृतार्थ सम । यदि तुम्हारे एक कन्या भी होगी । यह कहकर महर्षि मैने सभी शनि से तप किया है, दान दिया है, च्याम जी ने और एक घी का पड़ा मंगाकर उसमें हवन किया है और गुरुओं की मेवाभक्ति की है, वह टुकड़ा डाल दिया । गायन ने कहा-हे मो मेरे गर्भ से निश्चय एक कन्या उसन्न हो राजा जनमेजय ! यह दुःशला के जन्म का यान्त ॥११॥१३॥ मैंने तुमसे कह दिया । अब आप और क्या गान्धारीपमा मौन हो रही थी कि साषिश्रेष्ठ भगवान् मुनना चाहते हैं ! ॥११॥ आदिपर्व पाएफ मा नौला अध्याय ममान हुआ।
[ आदिपर्व ५६२ महा भारत marparcom cocolomooooooo50.00000000000000 अथ सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥ जनमेजय उवाच-ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक्पृथक् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय ॥ १॥ वैशम्पायन उवाच- -दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन्दुःशासनस्तथा । दुःसहो दुःशलश्चैव जलसन्धः समः सहः ॥ २ ॥ विन्दानुविन्दो दुर्धर्षः सुवाहुर्दुष्प्रधर्पणः । दुर्मर्पणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ॥ ३ ॥ विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्त्वः सुलोचनः । चित्रोपचित्रो चित्राक्षश्चारुचित्रः शरासनः ॥ ४ ॥ दुर्मदो दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः । ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दको ॥ ५ ॥ चित्रवाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा · दुर्विमोचनः । अयोवाहुमहावाहुश्चित्राङ्गश्चित्रकुण्डलः भीमवेगो भीमवलो बलाकी चलवर्धनः । उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डधारो महोदरः ॥ ७ ॥ चित्रायुधो निपङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा । दृढवर्मा सोमकीर्तिरनूदरः ॥ दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् । उग्रश्रवा उग्रसेनः सेनानीर्दुप्पराजयः ॥ ९ ॥ एक मौ सत्रह अध्याय ॥ ११७ ॥ राजा जनमेजय ने कहा-हे महाराज । धृतराष्ट्र के चारुचित्र. शरासन, दुर्मद, दुर्विगाह, विवित्स, बड़े छोटे के क्रम से उन सौ पुत्रों के नाम आद्योपान्त विकटानन, ऊर्णनाम, सुनाम, नन्द, उपनन्द, कहिये । वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! दुर्योधन, । चित्रवाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोपाहु, युयुत्सु, दु.शासन, दु.सह, दु.गल, जलमंघ, समसह, महाबाहु, चित्रा, चित्रकुण्डल, ४।६। भीमवेग, विन्द, अनुविन्द, दुर्धप, सुबाहु, दुष्पदर्पण, दुर्मपण, । भीमयल, बलाकी, बलबर्द्धन, उग्रायुध, सुपेण, दुर्मुख, दुर्ण, कर्ण, ।१३। विविंशति, विवर्ण, | कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निपगी, पाशी, वृन्दारका शर, मत्त्व, मुरोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, दृदयर्मा, दक्षत्र, सोमति, अनुदर, हदसन्ध, Disciciesr. soiraopace -- vroucrururururururururururu Pomooomcocoooooo0000 c.i/ed 20ROPoro 2onomicavesence ricucJa अध्याय ११७] महा भारत ore अपराजितः कुण्डशायी विशालाक्षो दुराधरः । दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ॥ १० ॥ आदित्यकेतुर्वताशी नागदत्चोग्रयाय्यपि । कवची क्रथनः कुण्डो कुण्डधारो धनुर्धरः ॥ ११ ॥ उग्रभीमरथी वीरों वीरवाहुरलोलुपः । अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः ॥ १२ ॥ अनाधृष्यः कुण्डभेदी विराबी दीर्घलोचनः । प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ दीर्घबाहुमहावाहुयूंढोर. कनकध्वजः । कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका ॥ १४ ॥ इति पुत्रशतं राजन्कन्या चैव शताधिका । नामधेयानुपूर्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप ॥ १५ ॥ सर्व त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः । सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ॥ १६ ॥ सर्वेपामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते । धृतराष्ट्रेण समये परक्ष्यि विधिवन्नृप ॥ १७ ॥ दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः । जयद्रथाय प्रददो विधिना विधिना भरतर्षभ ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि धृतराष्ट्रपुरनामस्थन मप्रदाधिकशततमोऽध्याय ॥ ११७॥ जरासन्ध, सत्यसन्ध, सदमुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, । और विरजा ये सौ पुत्र और एक दु शला नाम की सेनानी, दुप्पराजय, 19२। अपराजित, कुण्टमायी, कन्या उत्पन्न हुई ॥१३॥१५॥ विशालाक्ष, दुराधर, रहस्स, सुहम्त, वातरंग, हे महाराज ! इन नामों के प्रम के अनुसार सुया, आदित्यकेतु, वहाशी, नागदत्त, अप्रयायी, इनके जन्म काम भी जानना । वे सब महारथी करनी, प्रथन, कुण्ड, मुण्डधार, धनुद्धर, उग्र, दार, युद्ध में दक्ष, पदों में पण्डित और अम्बराने गमिरय, वीर, वाग्वादु, अरोलुप, अमय, रोद्रामी, में निपुण थे। हे महीपाल ! धृतराष्ट्र ने परीक्षा हदरथाश्रय ।१०।१२। अगापृश्य, वण्डभेदी, विरावी, करके योग्य कन्याओं का निश्चय करके उचिन दीर्घरोनन, प्रमथ, प्रमाथी, वीर्यवान् दीर्घराम, समय में यथारीति टन सयों का विवाह कर दिया। दीर्घबाहु, महापाहु, व्यूदीर, कनकपन, गुण्डागी हे मरतरप्रटीप ! अनन्तर महाराजा धृतराष्ट्र ने म हा भारत [ आदपर्व onorrenorronoredcore.reocomwweomorroreone उस दु शला नाम कन्या का विवाह राजा जयद्रथ से कर दिया ॥१६॥१८॥ आदिपर्व का एक सौ सत्रह अध्याय समाप्त हुआ। अथ अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय ॥ ११८ ॥ जनमेजय उवाच-कथितो धार्तराष्ट्राणामार्षः संभव उत्तमः । अमनुष्यो मनुष्याणां भवता ब्रह्मवादिना ॥ १ ॥ नामधेयानि चाप्येषां कथ्यमानानि भागशः । स्वत्तः श्रुतानि मे ब्रह्मन्पाण्डवानां व कीर्तय ॥ २ ॥ ते हि सर्वे महात्मानो देवराजपराक्रमाः । स्वयैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमतिमानुपकर्मणाम् । तेपामाजननं सर्व वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच-राजा पाण्डुमहारण्ये मृगव्यालनिषेविते । चरन्मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम् ॥ ५ ॥ ततस्तां च मृगीं तं च रुक्मपुकैः सुपत्रिभिः । निर्विभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ॥ ६ ॥ स च राजन्महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः । भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ॥ ७ ॥ एक सौ अठारह अध्याय ॥ ११८ ॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मवादी । आप धृतराष्ट्र वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! राजा पाण्ड के पुत्रों के श्रेष्ठ अविक आप जन्म की कथा | ने मृगों और हिंसा करनेवाले पशुओं से भरे हुए और उनके अरग अरग नाम भी कह चुके । अब एक बड़े वन में विचरत पिचरते एक दिन एक मृग में पाण्डवों के जन्म की भी क्या विम्नारसहित । और मृगी को विहार करते देखा। और मुवर्ण की मुनना चाहता है । आपो अशायतरण में कहा है 'पटवाले शोभित सुन्दर परवाले नोकदार और मिपानों पाण्डव महात्मा और इन्द्र के समान तेज चरनेवाले पाच वाणी से उस मृा और मृगी पराक्रमी थे । अगावतरण में आपने उन्हें देवताओं को मारा 1 महाराज! कोई बडे तेजम्बी तपोधन ६ अन से उत्तम्प बनाया है। मैं उन अकिक ऋषि कुमार मृग का म्वरूप रेकर बी के साथ कर्म करनेवाले पाण्डवों की जन्म मे रेकर आयोपान्न उस प्रकार विहार कर रहे थे। वे उस मृगी से मपूर्ण या मुनना चाहता ॥१॥ लिपटे हुए ही वाण लगने से क्षणमर में धरती पर - 1 ro 2.00 न अध्याय ११८ ] म हा भारत cocroommon संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन्गिरम् । क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेंद्रियः ॥ ८ ॥ मृग उवाच-काममन्युपरीता हि बुद्धया विरहिता अपि । वर्जयंति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ॥ ९ ॥ न विधि प्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः । विधिपर्यागतानान्प्राज्ञो प्रतिपद्यते ॥ १० ॥ शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत । कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः ॥ ११ ।। पाण्डयान-शत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता । राज्ञां मृग न मां मोहात्त्वं गर्हयितुमर्हसि ॥ १२ ॥ अच्छद्मना मायया च मृगाणां वध इप्यते । स एव धर्मों राज्ञां तु तद्धि त्वं किं नु गर्हसे ॥ १३ ॥ अगस्त्यः सत्रमासीनश्चकार मृगयामृपिः । आरण्यान्सर्वदेवत्यान्मृगान्प्रोक्ष्य महावने ॥ १४ ॥ प्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान्विगर्हसे । अगस्त्यस्याभिचारेण युप्माकं च वपा हुता ॥ १५ ॥ मृग उपाप-न रिपून्वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति नराः शरान् । रन्ध्र एपां विशेपेण वधकालः प्रशस्यते ॥ १६ ॥ गिरकर मनुष्यों की बोली में विकल चिच मे पाण्ड यह सुनकर पाण्टु ने कहा-हे मृग ! राजा लोग से बोले ॥५॥८॥ सत्रु के मारने में जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही दे राजा ! जो मनुष्य कामी, कोपी, बुद्धि से शिकार में मृग का वध करने में भी करते है। रदित और पापी हैं वे भी ऐसा कुर्म नहीं करते ' इसलिए तू धर्म को जाने बिना क्यों हमारी निन्दा है जैसा तुमने किया है। हां, भावी तो परवान् कर रहा है ! छिपार और सामने मे मृग का शिकार होती है और मनुष्य की बुद्धि भी मावी के अनुसार करना राजाओं का धर्म है। पहले अगम्य ऋषि हो जाती है । परन्तु जैसा तुम्हारा पुल धर्मात्मायों ने जब या रिया या तब देवताओं पूजा के में गुम्य गिना जाता है पैसा काम तुमने नहीं किया लिप विकार में गूगों को मारा था। उन्होंने अमिनार ॥११॥ कर्म के लिए मार हुए. मृगों से मेदा में हवन किया । acocsedcorcinesicomsucer महाभारत [ आदिपर्व Coconcoccooconcod ci.motovocho Kochorocarcinoroornooncorno पाण्डुरुवाच-प्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृतं नंति चौजसा । उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कस्मान्मृग विगर्हसे ॥१७॥ मृग उवाच-नाहं घ्नन्तं मृगान्राजन्विगहें चात्मकारणात् । मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यतः ॥ १८ ॥ सर्वभूतहिते काले सर्वभूतेप्सिते तथा । को हि विद्वान्मृगं हन्याश्चरन्तं मैथुनं वने ॥ १९ ॥ अस्यां मृग्यां च राजेन्द्र हर्षान्मैथुनमाचरन् । पुरुषार्थफलं कर्तुं तत्त्वया विफलीकृतम् ॥ २० ॥ पौरवाणां महाराज तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । वंशे जातस्य कौरव्य नानुरूपमिदं तव ॥ २१ ॥ नृशंसं कर्म सुमहत्सर्वलोकविगार्हतम् । अस्वय॑मयशस्यं चाप्यर्मिष्ठं च भारत ॥ २२ ॥ स्त्रीभोगानां विशेषज्ञः शास्त्रधर्मार्थतत्त्ववित् । नाहस्त्वं सुरसंकाश कर्तुमस्वय॑मीदृशम् ॥ २३ ॥ त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ॥ २४ ।। था । इस कारण मैने प्रमाणिक धर्म के अनुसार तेरा । मैं तो यही कहता हूं कि इस समय निप्टुर व्यवहार वध किया है । तू क्यों वृथा मेरी निन्दा कर रहा न करके मेरे मैथुन के समाप्त होने तक ठहरा है ? मृग ने कहा कि मनुष्य लोग शत्रु को अच्छी रहना चाहिये था । मैथुन का समय सभी प्राणियों तरह न देखकर वाण नहीं चलाते । विशेषकर जिस के लिए हित का कारण और उनको आनन्द- समय शत्रु से दोप होता है उसी समय शत्रु के दायक होता है । इस कारण मृग जब मैथुन करते मारने का सुन्दर अवसर कहा है ॥१२॥१६॥ होते हैं तब बुद्धिमान् लोग उनका वध नहीं करते। पाण्टु ने कहा-हे मृग ! चाहे मृग प्रमत्त हो हे राजेन्द्र ! मैं सन्तान पैदा करने के लिए या अप्रमत हों, लोग नाना प्रकारके कठोर उपायों से | आनन्द से मृगी के साथ रमण कर रहा था। सुलामुली उनको मारते हैं । इसलिए तुम क्यों | आपने मेरे इस उद्देश्य को व्यर्थ कर दिया। है मेरी निन्दा करते हो । मृग ने कहा-हे महाराज ! महाराज! आपने शुद्ध कर्म करनघाले कुरुवंशियों तुमने मुझे मारा है, इस कारण पक्षपात् करके में में जन्म लिया है सो यह कार्य आपके योग्य नहीं केवल मृग-वप के लिए आपकी निन्दा नहीं करता। हुआ है ॥१७॥२१॥ ururoroorocurorucunrurocoryn । - JAJr0 अध्याय ११८ ] महाभारत ५६७ 03com 000.ooooo 20000000000 icrorecoconco किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं नता । मुनि मूलफलाहारं मृगवेपधरं नृप ॥२५॥ वसमानमरण्येपु नित्यं शमपरायणम् । त्वयाहं हिंसितो यस्मात्तस्मात्वामप्यहं शपे ॥२६॥ द्वयोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् । जीवितान्तकरो भाव एवमेवागमिष्यति ॥२७॥ अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः । व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ॥ २८॥ मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने । न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ॥ २९ ॥ मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् । अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ॥ ३० ॥ प्रियया सह संत्रासं प्राप्य कामविमोहितः । त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ॥ ३१ ॥ अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया । प्रेतराजपुरं प्राप्त सर्वभूतदुरत्ययम् । हे भारत ! यह बडा निष्ठुर कर्म स्वर्ग के नाश मारकर आपको क्या लाभ हुआ। मैं नित्य शान्तचित्त करनेवाला, यश के नाश करनवाला, धर्म के नाम होकर वन में रहता था । आपने काम से मोहित करनेवाला और सब लोकों के लिए अनुचित हुआ होकर हम दोनों निरपराध प्राणियों को मैथुन के है। हे देवतुल्य ! आपने शास जाननेवाले, धर्मार्थ समय मारा है। इस कारण ऐसी ही अवस्था में तत्वों के जाननेवाले और स्त्री से मिलने के सुख आपकी भी मृत्यु होगी ॥२५॥२७॥ को अनुभव करनेवाले होकर भी जो यह वर्ग के मैं किन्दम नाम तपस्वी मुनि हु। मनुष्यों की नाश करनेवाला कार्य किया है वह आपके योग्य लज्जा से बचने के लिए मैं मृगी से रमण कर रहा नहीं था। हे नरेशों में श्रेष्ठ ! आप राजा है । जो था। आपने यह हाल बिना जाने मृग समझकर लोग धर्म, अर्थ, काम को छोडकर निप्टर पाप कर्म मुझे माग है, इसलिए मैं आपको ब्रह्महत्या के शाप करते है उन्हें आप ही दण्ड देते हैं ॥२२॥२४॥ से मुक्त करता है। परन्तु इस पाप-कर्म का फल हे महाप्राज्ञ ! मैं मृग के स्वरूप में फल मूल आपको अवश्य भोगना पड़ेगा । आप अन्त समय पर जीनवाला मुनि हूँ। मुझको बिना अपराध | मोह के वश में होकर जिस समय स्त्री से भोग करना .. - op ricmirmireo507003erocortra म हा भारत [आदपर्व rcorcorrorroroorcoro 00000004 भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वानुगमिष्यति ॥ ३२ ॥ वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वया । तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात्स व्यमुच्यत । मृगः पाण्डुश्च दुःखातः क्षणेन समपद्यत ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डुमृगशापे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ चाहोगे उसी समय आपकी मृत्यु होगी । हे मूर्ख! हुए मृग ने इतना कहकर प्राण छोड़ दिये । इस जैसे सुख-भोग के समय आपने मुझे दुःख में डाला अवस्था को देखकर महाराज पाण्डु को बड़ा भारी है वैसेही सुख के समय आपको भी मृत्यु का दुःख । दुःख हुआ ॥२८॥३४॥ होगा। वैशम्पायन ने कहा, कि शोक से व्याकुल आदिपर्व का एक सौ अठारह अध्याय समाप्त हुआ । अथ ऊनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ।। वैशम्पायन उवाच-तंव्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव वान्धवम् । स भार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ॥ १ ॥ पाण्डुरुवाच-सतामपि कुले जाताः कर्मणा वत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ॥ २ ॥ शश्वद्धर्मात्मना जातो वाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥ तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवापिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद्भगवान्मामजीजनत् ॥ ४ ॥ तम्याद्य व्यसने वुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ॥ ५॥ एक सौ उन्नीस अध्याय ॥ ११९॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! उस । उत्पन्न होकर भी काम के वश में होकर अपने ही मृग की मृत्यु से महाराज पाण्डु को अपने मित्र के कर्म से अकृतार्थ रह जाते है और अन्त को दुर्गति मरने का सा दु.स हुआ । वह शोक और दुःख से भोगते हैं । मैने सुना है, कि मेरे पिता विचित्रवीर्य पीडित हुआ हुआ अपनी स्त्रियों के साथ विलाप धारमा शान्तनु से उत्पन्न होकर बाल्यवस्था में ही करता हुआ कहने रगा-पापी लोग अच्छे वंश में काम-वग होने से स्वर्गवासी हुए थे ॥१॥३॥ Prococc000-rosco.orror .. । अध्याय ११९ ] म हा भारत 20%a0ocoo5000. yoooooooooooooooo मोक्षमेव व्यवस्यामि वन्धो हि व्यसनं महत् । स्ववृत्तिमनुवर्तिप्ये तामहं पितुरव्ययाम् ॥ ६ ॥ अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकोऽहमेकाकी एकस्मिन्वनस्पती ॥ ७ ॥ चरन्भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ॥ ८॥ वृक्षमूलनिकेतो त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन्न प्रहृष्यंश्चतुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ ९ ॥ निराशीनिनमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । न चाप्यवहसन्कंचिन्न कुर्वन्भ्रुकुटी क्वचित् ॥ १० ॥ प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः जङ्गमाजङ्गम सर्वमविहिसंश्चतुर्विधम् ॥ ११ ॥ स्वासु प्रजास्त्रिव सदा समः प्राणभृतः प्रति । एककालं चरन्भैक्ष्यं कुलानि दश पञ्च वा ॥ १२ ॥ उस कामयुक्त राजा के क्षेत्र में साक्षात् भगवान् | में रहूंगा। हर्ष और शोक को त्याग दूंगा । अपनी ऋपि सत्यवादी वेदव्यास ने मुझे जन्म दिया है । निन्दा और प्रशंसा को बराबर समझूगा । निराहार देवताओं ने मुझे त्याग दिया, नहीं तो इस शिकार ही पड़ा रहूंगा। आशीर्वाद या प्रणाम की इच्छा के शौक में पड़कर मै ऐसा अनुचित कार्य क्यों । भी न करूंगा । किसी से विरोध भी न करूंगा और करता, जिससे मुझे ऐसा शाप मिला । पुत्र के न । न किसी का साथ ही करूगा । सुख दुख आदि होने से मैं स्वर्ग को नहीं जा सकता । अब मैं । द्वन्द्वों से बचकर खड़ाऊं आदि का भी त्याग कर मोक्षमार्ग का रास्ता ग्रहण करूंगा । पुत्र उत्पन्न | दूंगा । न तो मैं किसी की हंसी करूंगा और न करना आदि सासारिक बन्धन अति दु ख का कारण भौहें चढाऊंगा । मै सदा प्रसन्नचित्त होकर सदा है । अब मैं ब्रह्मचारी रहकर अपने पिता वेदव्यास प्राणियों की भलाई में लगा रहूंगा ।।४।१०॥ की तरह तपस्या में ही जीवन बिताऊगा । स्त्री अडज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्य चार प्रकार आदि का त्याग करके शिर मुडाकर, मुनि होकर, के जड़ या चेतन किसी भी प्राणी की हिंसा न करूंगा। नित्य वृक्षों से भिक्षा मांगकर अपने जीवन का सब प्राणियों को अपनी सन्तान की तरह स्नेह की निर्वाह करूंगा और अकेला मुनियों के आश्रमों में दृष्टि से देखूगा । वृक्षों से भिक्षा न मिलने पर नित्य विचरूगा । सब प्रिय और अप्रिय को छोड़कर पांच या दश घरों में जाकर एकबार भिक्षा मांग शरीर में भस्म रमाकर सूने घर में या पेड़ की छाया । लाऊंगा । जिस दिन भिक्षा नहीं मिलेगी उस दिन । poojos 3rocircar10com 727010 महा भारत [ आदिपर्व 20000 00000000.occor000000000000000000 असंभवे वा भक्ष्यस्य चरन्ननशनान्यपि । अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित् ॥ १३ ॥ अन्यानविचरल्लोभादलाभे सत्यपूरयन् । अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः ॥ १४ ॥ वास्यैकं तक्षतो वाई चन्दनेनैकमुक्षतः । नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ॥ १५ ॥ न जिजीविषुवत्किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् । जीवितं मरणं चैव नाभिनंदन्न च द्विषन् ॥ १६ ॥ याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेपादिव्यवस्थिताः ॥ १७ ॥ तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियाः । संपरित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्मुक्तात्मकल्मपः ॥ १८ ॥ निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन्सधर्मा मातरिश्वनः ॥ १९ ॥ एतया सततं वृत्त्या चरन्नेवंप्रकारया । देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः ॥ २० ॥ बिना भोजन के ही रह जाऊंगा । थोड़ा भोजन ही | अर्थ की सब क्रियाओं के फल को अनित्य जानकर कर लंगा, परन्तु एकबार के सिवाय दुबारा भिक्षा सबका त्याग करूंगा । चित्त की मलिनता को शुद्ध न करूंगा । सात या दश घरों में भिक्षा मागने पर करूंगा । सब पापों और बन्धनों से बचकर वायु के यदि भीख न मिले तो लोभ से अन्य घर में नहीं समान हो रहूंगा । किसी के वश में नहीं रहूंगा जाऊगा । लाभ हो या न हो मै सरको एक जैसा ॥१५॥१९॥ समझूगा। कठिन तपस्या किया करूंगा ॥११॥१४॥ इन कमों को करके देहांत तक निर्भय मार्ग का कोई मेरे एक हाथ को यदि कुल्हाड़े से काट आश्रय लेकर रहूंगा । वीर्यवर्जित होकर आत्मतत्व- डाले और यदि कोई मेरे एक हाथ में चन्दन का रूपी धर्म से सदा अलग रहकर अपने वीर्यनाशी लेप कर दे तो दोनों में से किसी को भला बुरा न | कुमार्ग पर कभी पांव न रखंगा। कामरहित होने फहंगा । जीवन और मृत्यु से सुखी और दुःखी | पर भी जो कोई कामयुक्त होकर दीन के समान न हूंगा । जीवन और मृत्यु की हनेवालों की फिर काम में फंसता है वह चाहे खोटा काम करे तरह कोई कर्म न करूंगा । यज, इन्द्रियां, धर्म और | चाहे युरा अवश्य ही कुते का सा कार्य करता है 20010507 Prococc0 2077020 अध्याय ११९ ] म हा भारत ६७१ ooooooooo/001/00000000oodcocon o2007cord accorakorcoice नाहं सुकृपणे मार्गे स्ववीर्यक्षयशोचिते । स्वधर्मात्सततोपते चरेयं वीर्यवर्जितः ॥ २१ ॥ सत्कृतोऽसत्कृतो वापि योऽन्यं कृपणचक्षुपा । उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच- -एवमुक्त्वा सुदुः दुःखा? निश्वासपरमो नृपः । अवेक्ष्यमाणः कुंती च माद्रीं च समभापत ॥ २३ ॥ कौशल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह बन्धुभिः । आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः ॥ २४ ॥ ब्राह्मणाश्च महात्मानः सोमपाः शसितव्रताः । पौरवृद्धाश्च ये तत्र निवसन्त्यम्मदाश्रयाः । प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् ॥२५॥ निशम्य वचनं भतुर्वनवासे धृतात्मनः । तत्सम वचनं कुन्ती माद्री च समभापताम् ॥ २६ ॥ अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ॥ २७ ॥ शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्ग प्राप्य महाफलम् । स्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ॥ २८ ॥ अर्थात् जूठा चाटनेवाला होता है ॥२०॥२२॥ अपने पति के ये वचन सुनकर कुन्ती और माद्री वैशम्पायन ने कहा-इसके पश्चात् राजा पाण्डु | ने समझा कि पाण्डु ने सचमुच सन्यास लेने का अति दुखी होकर यह सब बातें कहकर लम्बे रम्बे । निश्चय कर लिया है। तब उन्होंने कहा-हे भरतश्रेष्ठ! श्वासों से कुन्ती और माद्री की ओर देखकर बोरा सन्यास के सिराय और भी बहुत आश्रम हैं जिनको तुम दोनों हस्तिनापुर जाकर अम्बिका, विदुर, ग्रहण करके आप दोनों धर्म पत्नियों के साथ कठिन भीम, राजा धृतराष्ट्र, सत्यवती, राजपुरोहित, तपस्या कर सकते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रतशील, सोम पीनेवाले महात्मा ब्राह्मण रोग और शरीर छोड़ने का महाफलदायक धर्म प्राप्त करके जितने नगर के वृद्धजन मेरे आश्रय हैं उन सबको आप स्वर्ग के अधिकारी हो सकते हैं। हम दोनों प्रसन्न करके कहना कि राजा पाण्डु सन्यासी होकर भी पति के साथ सब इन्द्रियों को रोककर कामना वन को चला गया ॥२३॥२५॥ और सुख को त्यागकर बड़ी तपस्या करेंगी॥२६॥२९॥ rrierolc720001020050001pooozocorococored ५७२ म हा भारत [ आदिपर्व 0000000/- Zooo.omc cotoo cococca - प्रणिधायेन्द्रियग्राम भर्तृलोकपरायणे । त्यक्त्वा कामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ॥ २९ ॥ यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशांपते । अद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ॥ ३० ॥ पाण्डुरुवाच-यदि व्यवसितं ह्येतद्युवयोधर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिप्ये तामहं तामहं पितुरव्ययाम् ॥ ३१ ॥ त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत्तपः । वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ॥ ३२ ॥ अग्नौ जुह्वदुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ॥ ३३ ॥ शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोपयन् एकान्तशीलो विमृशन्पक्कापक्केन विमृशन्पक्कापक्केन वर्तयन् । पितृन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ॥ ३५ ॥ वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम् ॥ ३६ ॥ हे महाप्राज्ञ पृथ्वीनाथ | यदि आप हमको छोड करूगा । सर्दी, गर्मी और हवा को सहन करूगा। देंगे तो नि सदेह हम आज ही प्राण छोड़ देंगी। । भूख और प्यास पर ध्यान न रखूगा । कठोर तपस्या पर सुनकर राजा पाण्टु ने कहा-यदि तुम दोनों ' करके अपने शरीर को सुखा दूगा ॥३०॥३४॥ ने ऐसा ही विचार कर लिया है तो अपने धर्म का । एकान्त में रहूगा । किसी जीव की हिंसा न पालन करने के रिये तुम भी मेरे साथ रहो। मैं कलगा । बच्चे पर क्द-मूल आदि खाकर अपना अपने पिता की अव्यय वृत्ति को ग्रहण करूगा । निर्वाह करूगा । वाणमस्थ के योग्य शाम्प की चर्चा राजसी भोगों और सुखों को छोड़कर कठोर तपस्या करता हुआ विचरूगा । वन के फर मूल, जल और करुगा । वस्कल (पेडा की छाल के वस्त्र) पहिनकर वाणी से पितरों और देवताओं को सतुष्ट करूगा । कन्द-मून-फल साना हुआ वनों में रहा। दोनों गृहस्थियों की बात तो दूर रही, एक ही जगह समय म्नान करके अमिहोत्र किया करूगा। थोड़ा रहते हुए वाणपन्थों का भी सग नहीं करगा । मैं आहार करके अपने शरीर को दुबर फर डालगा। किमी का भी अप्रिय कार्य नहीं करूगा । जयतक एक कपड़ा या चर्म का वरूपहनूगा । जटा धारण मेरा शरीर न टूटेगा तबतक इसीतरह सब नियमों ruriynovourynonymeryyrim - oc•o000000000000014 अध्याय ११९ ] महा भारत ५७३ moonzedamodie. एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् कांक्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्य समापनात् ॥ ३७ ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः । ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ॥ ३८ ॥ वासांसि च महाहाणि स्त्रीणामाभरणानि च । प्रदाय सर्व विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभापत ॥ ३९ ॥ गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रवाजितो वनम् । अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ॥ ४० ॥ प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः । ततस्तस्यानुयातारस्ते चेत्र · परिचारकाः ॥ ४१ ॥ श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः । भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुकुशुः ॥ ४२ ॥ उष्णमश्रु विमुञ्चन्तं तं विहाय महीपतिम् । ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद्धनम् ॥४३॥ ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः । कथयाश्चक्रिरे राज्ञस्तद्धनं विविधं ददुः ॥४४॥ को कठोर विधियों से पालन करता हुआ तप रहनेवाले ब्राह्मण और अन्यान्य नौकर अति दुःखित करूंगा ॥३४॥३६॥ हो कोलाहल से हाहाकार करते हुए रोने लगे वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! कौरव- ॥३७॥४२॥ नन्दन राजा पाण्डु दोनों स्त्रियों से यह बात कहकर वह सब धन लेकर शोक के आंसू गिराते हुए मणि-मुकट, कुण्डल, चूड़ामणि, अगद, बहुत कीमती सब लोग राजा पाण्डु को वहीं छोड़कर बिना विलम्ब वस्त्र और स्त्रियों के सब आभूषण आदि सब वस्तुएं हस्तिनापुर में आ गये। उन्होंने धृतराष्ट्र से सब ब्राह्मणों को देकर अपने साथियों से बोला कि तुम वृत्तान्त कह सुनाया। उनसे सब वृत्तान्त सुनकर लोग हस्तिनापुर में जाकर कह दो कि कुरुनन्दन पाण्डु राजा धृतराष्ट्र दुःख के मारे अत्यन्त व्याकुल हो अर्थ, काम, सुख, और परमप्रिय स्त्रियों के मिलने उठे और पाण्डु के लिये बड़ा शोक करने लंग। के सुख सबको त्यागकर दोनों स्त्रियों के साथ वन भाई के शोक से विकल होकर, उन्हीं की चिन्ता में, को चला गया है। उस भरतवंश के सिंहरूपी राजा धृतराष्ट्र को न सोना अच्छा लगता था, न कहीं पाण्डु की करुणायुक्त बातें सुनकर उनके साथ ! बैठना अच्छा लगता था, और न किसी सुखभोग 7co/2010 manora2000 ococcccc ५७४ महा मारत [ आदिपर्व capoorcolococorcoroscorec 04 श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्व यथावृत्तं महावने । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ॥ ४५ ॥ न शय्यासनभोगेषु रतिं विंदति कर्हिचित् । भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थ विचिन्तयन् ॥ ४६ ॥ राजपुत्रस्तु कौरव्यः पाण्डुर्मूलफलाशनः । जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ॥४७॥ चैत्ररथमासाद्य कालकूटमनीत्य च । हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ॥४८॥ रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धश्च परमर्पिभिः । उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ॥ १९ ॥ इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य प्राप्य हंसकूटमतीत्य च । शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ॥ ५० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डुचरिते ऊनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥ को उनका जी चाहता था ॥४३॥४६॥ सिद्ध, विद्याधर आदि, उनकी रक्षा किया करते थे। हे कौरववंशी ! इधर राजकुमार पाण्डु फल-मूल | वे सम भूमि और रूखे स्थानों में जाते और रहते खाते हुए दोनों स्त्रियों के साथ नागशत नाम के थे। वहां से इन्द्रद्युम्न तालाब और हंसकूट पर्वत पहाड़ पर गये । वहां कुछ दिन रहकर चैत्ररथ, को पीछे छोड़कर महाराज पाण्डु शतशृङ्ग पर्वत पर कालकूट और हिमालय पर्वत को पीछे छोड़कर पहुंचे । वहां वे कठोर तपस्या करने लगे ॥४७॥५०॥ गन्धमादन पर्वत पर पहुंचे । हे महाराज ! महर्षि, आदिपर्व का एक सौ उन्नीस अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ।। वैशम्पायन उवाच तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् । सिद्धचारणसवानां वभूव प्रियदर्शनः ॥ १ ॥ शुश्रूषुरनहंवादी संयतात्मा जितेन्द्रियः । स्वर्ग गन्तुं पराक्रान्तः स्वेन वीर्येण भारत ॥ २ ॥ एक सा वीस अध्याय ॥ १२० ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! पराक्रमी पाण्डु प्रियदर्शन हो गए । वे प्रत्येक ऋषि की सेवा में शतशृङ्ग पर्वत पर तप करते-करते सब ऋपियों के | चित्त लगाकर जितेन्द्रिय, अहंकाररहित और स्वर्ग oococosocoroorococoonYDOL o अध्याय १२० ] महा मारत ५७५ 00000000 we0000woooo000000000 केयांचिदभवद्धाता केयांचिदभवत्सखा । ऋपयस्त्वपरे चैनं पुत्रवत्परिपालयन् ॥ ३॥ स तु कालेन महता प्राप्य निष्कल्मषं तपः । ब्रह्मर्पिसहशः पाण्डुर्वभूव भरतर्षभ ॥ ४ ॥ अमावास्यां तु सहिता ऋषयः संशितव्रताः । ब्रह्माणं द्रष्टुकामास्ते संप्रतस्थुमहर्षयः ॥ ५ ॥ संप्रयातानृपीन्दृष्ट्वा पाण्डुर्वचनमब्रवीत् । भवन्तः क्व गमिष्यन्ति ब्रूत मे वदतांवराः ॥ ६ ॥ ऋपय ऊचु-समवायो महानद्य ब्रह्मलोके महात्मनाम् । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ॥ ७ ॥ वयं तत्र गमिष्यामो द्रष्टुकामाः स्वयंभुवम् । वैशम्पायन उवाच पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभिः ॥ ८ ॥ स्वर्गपारं तितीर्घः स शतशृनादुदड्मुखः । प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्त च तापसाः ॥ ९ ॥ उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः । दृष्टवन्तो गिरौ रम्ये दुर्गान्देशान्वहून्वयम् ॥ १० ॥ जाने की इच्छा से तप करनेवाले होकर रहने लगे। ब्रह्मा जी के दर्शनों को जा रहे हैं ॥५॥७॥ कोई ऋपि उनको भाई के समान, कोई मित्र के वैशम्पायन ने कहा-यह बात सुनते ही राजा समान और कोई पुत्र के समान समझते थे। पाण्डु उन मुनियों के साथ अपार स्वर्ग को जाने हे भरतश्रेष्ठ ! अनन्तर राजा पाण्डु बहुत दिनों में की इच्छा से ऊपर को मुख करके दोनों स्त्रियों तपोबल से निष्पाप होकर साक्षात् ब्रह्मपि के समान सहित उठ खड़े हुए । उनको वहा जाने को उद्यत देखकर ऋषियों ने कहा-हे पाण्डु ! स्वर्ग की राह एक समय वहा के सब तेजस्वी पि एकत्र ) तुम्हारे जाने के योग्य नहीं है । क्योंकि हमने उत्तर होकर अमावस्या के दिन ब्रह्मा जी के दर्शन करने की ओर शैलराज से क्रमश ऊपर को चरते हुए को जा रहे थे । उनको जाते हुए देखकर पाण्डु ने इस सुन्दर पर्वत पर अगणित बड़े-बड़े कठिन देश पूछा-आप सब लोग एकत्र होकर कहा जा रहे हैं। देखे हैं । आगे चलकर सैंकड़ों विमानों से शोभित मपियों ने कहा-आज ब्रह्मलोक में महात्मा, देवता, और गाने-बनाने के शब्दों से परिपूर्ण देवता, ऋषि और पितर लोग एकत्रित होंगे । हम वहीं । गन्धर्व और अप्सराओं के रहने की भूमि देख पड़ती हो गये ॥१४॥ । 12/ 2D> co200
५७६
म हा भारत
[ आदिपर्व
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विमानशतसंवाधां गीतस्वरनिनादिताम् ।
आक्रीडभूमि देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥ ११ ॥
उद्यानानि कुवेरस्य समानि विषमाणि च ।
महानदीनितम्बांश्च गहनागिरिगह्वरान् ॥ १२ ॥
संति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः ।
संति क्वचिन्महादों दुर्गाः केचिद्दुरासदाः ॥ १३ ॥
नातिकमेत पक्षी यान्कुत एवेतरे मृगाः ।
वायुरेको हि यात्यत्र सिद्धाश्च परमर्पयः ॥ १४ ॥
गच्छन्त्यो शैलराजेऽस्मिन्राजपुत्र्यौ कथं त्विमे ।
न सीदेतामदुःखाहें मा गमो भरतर्षभ ॥ १५ ॥
पाण्डुपाच-अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते ।
स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तु ब्रवीमि वः ॥ १६ ॥
पित्र्याणादनिर्मुक्तस्तेन तप्ये
तपोधनाः ।
देहनाशे ध्रुवो नाशः पितॄणामेष निश्चयः ॥ १७ ॥
ऋणैश्चतुर्भिः संयुक्ता जायन्ते मानवा भुवि ।
पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च
धर्मतः ॥ १८ ॥
है ॥८॥११॥
कष्ट होगा। इसलिए हे भरतश्रेष्ठ ! तुम मत जाभो ।
कहीं-कहीं कुबेर के सम और विषम भूमि से | यह सुनकर राजा पाण्डु ने कहा-हे महाभाग ऋषियो!
युक्त बाण है। रास्ते में बड़ी-बड़ा नदियां और कहते है कि जिसके सन्तान नहीं वह मनुष्य स्वर्ण
पहाड़ों की कन्दराए (गुफाए) हैं। कोई-कोई स्थान में नहीं जा सकता। उसके लिये स्वर्ग के द्वार भी
नित्य वर्फ से ढके रहते हैं । वहा न तो वृक्ष, मृग, बन्द है। मेरे सन्तान नहीं है इसलिए इस
पक्षी है न और कुछ है । कहीं-कहीं दुर्गम गिरिदुख से जलकर आप लोगों से प्रार्थना करता हूँ
कन्दराए हैं । मृग आदि पशुओं की बात तो दूर
रही, पक्षी भी उन स्थानों में नहीं जा सकते है। है तपोधन ऋपियो ! मैं पितरों के ऋण से
वहा तो केवल वायु, सिद्धपुरुष और महिप लोग | मुक्त न होने ही के कारण बड़ा दुःखी हुआ हुआ
जा सकते हैं ॥१२॥१४॥
हु । मुझको यह निश्चय दो गया है कि मेरे इस
इन राजकन्याओं ने कभी दुख सहन नहीं शरीर के नष्ट होने पर पितर रोग भी नष्ट होंगे।
किया है । ऐसे दुर्गम स्थान में जाने से इन्हें अवश्य । मनुष्य जब उत्पन्न होता है तब उसपर पितर, देवता,
!
अति
॥१५॥१६॥
अध्याय १२० ] ५७७ महा भारत cocotooncoco - एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानवः । न तस्य लोकाः सन्तीति धर्मविद्भिः प्रतिष्ठितम् ॥ १९ ॥ यज्ञैस्तु देवान्प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन् । पुत्रैः श्राद्धैः पितॄश्चापि आनृशंस्येन मानवान् ॥ २० ॥ ऋषिदेवमनुष्याणां परिमुक्तोऽस्मि धर्मतः । प्रयाणामितरेषां तु नाश आत्मनि नश्यति ॥ २१ ॥ पित्र्याणादनिर्मुक्त इदानीमस्मि तापसाः । इह तस्मात्प्रजाहेतोः प्रजायन्ते नरोत्तमाः ॥ २२ ॥ यथैवाहं पितुः क्षेत्रे जातस्तेन महर्षिणा । तथवास्मिन्मम क्षेत्रे कथं वै संभवेत्प्रजा ॥ २३ ॥ ऋषय ऊचु -अस्ति वै तव धर्मात्मन्विद्मो देवोपमं शुभम् ॥ अपत्यमनघं राजन्वयं दिव्येन चक्षुपा ॥२४॥ देवोद्दिष्टं नरव्याघ्र कर्मणेहोपपादय .। अक्लिष्टं फलसव्यग्रो 'विंदते बुद्धिमान्नरः ॥२५॥ तस्मिन्दृष्टे फले राजन्प्रयत्नं कर्तुमर्हसि ॥ अपत्यं गुणसंपन्नं लब्धा प्रीतिकरं ह्यसि ॥ २६ ॥ ऋषि और मनुष्यों का ऋण होता है । इस कारण जो मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं वे पितरों के ऋण से.मुक्त ऋण चुकाना ही प्रत्येक मनुष्य का धर्म और कर्तव्य होने के लिये सन्तान पैदा करने को पृथ्वी में जन्म है। धर्मज्ञ लोग कहते है कि जो मनुष्य इन स्वाभाविक | लेते है ॥२०॥२२॥ ऋणों को नहीं चुकाता उसकी अच्छी गति नहीं मै अभी उस ऋण से मुक्त नहीं हुआ है। होती ॥१७॥१९॥ इसलिये पूछता है कि मैने जिसप्रकार पिता विचत्रवीर्य यज्ञ से देवताओं का ऋण, तप करके मुनियों | के क्षेत्र में महर्षि व्यास से जन्म लिया है क्या वैसे का ऋण, पुत्र उत्पन्न करके पितरों का ऋण और | ही मेरे इस क्षेत्र म सन्तान उत्पन्न हो सकेगी। सब प्राणियों पर दया करके मनुष्यों का ऋण ऋपियों ने कहा-हे धर्मात्मा नरेश । हम दिव्य चुकाया जाता है । मै धर्म के अनुसार देवता, ऋपि | दृष्टि से देख रहे हैं कि तुम्हारे पापरहित, और मनुष्यों के ऋण से मुक्त हुआ हू । केवल | देवता के समान पुत्र उत्पन्न होंगे । है नरव्याघ्र ! 'पितरों का ऋण न चुकाने के कारण मेरे शरीर के तुम कर्म से देवताओं का अभिप्राय पूरा करो । नष्ट होते ही उनका भी नष्ट होजावगा। हे तपस्वीगण! | क्योंकि बुद्धिमान् पुरुप स्थिर चित्त से कार्य करके 51020050ral orrocoic ५७८ महा भारत [ आदिपर्व voornococonorooracicoot0ro.ccoroscarconoc0000 वैशम्पायन उवाच-तच्छ्रुत्वा तापसवचः पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् । आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रियाम् ॥ २७ ॥ सोऽब्रवीद्विजने कुंती धर्मपत्नी यशस्विनीम् । अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता । इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः ॥ २९ ॥ इष्टं दत्तं नपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते सोऽहमेवं विदित्वैतत्प्रपश्यामि शुचिस्मिते अनपत्यः शुभाँल्लोकान्न प्राप्स्यामीति चिंतयन् ॥ ३१ ॥ मृगाभिशापान्नष्टं मे जननं ह्यकृतात्मनः नृशंसकारिणो भीरु यथैवोपहतं पुरा ॥ ३२॥ इमे वै बन्धुदायादाः षट् पुत्रा धर्मदर्शने । पडेवावन्धुदायादाः पुत्रास्ताञ्च्छृणु मे पृथे ॥ ३३ ॥ स्वयंजातः प्रणीतश्च परिक्रीतश्च यः सुतः । पौन वश्च कानीनः स्वैरिण्या यश्च जायते ॥ ३४ ॥ सुन्दर फल प्राप्त करते है । हे महाराज ! हमको | पुरुषों का कहना है कि ससार में एक मात्र पुत्र से तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होने की सफलता देख पड़ती ही अच्छी गति मिलती है । यज्ञ, दान, तपस्या है । इमलिये तुम सन्तान उत्पन्न करने की चेष्टा और नियमानुसार व्रत के आचरण से भी सतान करो। उससे तुमको अवश्य ही आनन्द देनेवाली के बिना पुरुप पवित्र नहीं हो सकता ॥२७॥३०॥ सन्तान प्राप्त होगी ॥२३॥२६॥ हे सुन्दरी ! इस बात को समझकर मैं जानता वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! गजा है कि मुझे मरने पर अच्छे रोक नहीं मिलेंगे। पाण्डु उन ऋपियों की यह यात सुनकर अपने को | पहरे में एक मृग को मारकर बड़ा निष्ठुर कार्य शाप के कारण से सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ कर चुका है। इसलिये मृग के शाप से मैं पुत्र देखकर चिन्ता करने रगा और यशस्विनी धर्म-पत्नी उत्पन्न नहीं कर सकता । धर्मशाला में भी कहा है कुन्ती को एकान्त में बुराकर कहने रगा-हे युन्ती! किछ प्रकार के पुत्र बन्धु के धन के हितकारी हमारे कोई सन्तान नहीं है । इमरिए विपचिकार होते हैं और छ प्रकार के पुत्र उसके अधिकारी में तुम पुत्र उत्पन्न करने का प्रयत्न करो। धर्मज्ञ । नहीं होते। मैं उन बारह प्रकार के पुत्रों की कथा - अध्याय १२० ] म हा भारत ५७९ orooroo 204 000000 0000000000000 दत्तः क्रीतः कृत्रिमश्च उपगच्छेत्स्वयं च यः सहोढो ज्ञातिरेताश्च हीनयोनिधृतश्च यः ॥ ३५॥ पूर्वपूर्वतमाभावं मत्वा लिप्सेत वै सुतम् उत्तमाद्देवरात्पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि ॥ ३६ ॥ अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति मानवाः आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥ ३७ ।। तस्मात्प्रहेप्याम्यद्य त्वां हीनः प्रजननात्स्वयम् । सदृशाच्छेयसो वा त्वं विद्धयपत्यं यशस्विनि ॥ ३८ ॥ शृणु कुन्ति- कथामेतां शारदण्डायिनी प्रति । सा वीरपत्नी गुरुणा नियुक्ता पुत्रजन्मनि ॥३९॥ पुष्पेण प्रयता स्नाता निशि कुन्ति चतुष्पथे । वरयित्वा द्विजं सिद्धं हुत्वा पुंसवनेऽनलम् ॥ ४०॥ कहता हूं, सुनो ॥३१॥३३॥ विवाह करने पर उत्पन्न हो, (१२) हीनयोनिधृत, (१) औरस, अर्थात् विवाहिता स्त्री के गर्भ से अर्थात् हीन जाति की स्त्री के गर्भ से उत्पन्न किया अपने वीर्य से उत्पन्न हो, (२) प्रणीत, अर्थात् हुआ हो। इन बारह प्रकार के पुत्रों में पहला न अन्य अच्छे पुरुष के द्वारा अपने क्षेत्र में उत्पन्न हो, बन पड़े तो उससे पिछला, फिर उससे पिछला इसी- (३) परिक्रीत, अर्थात् मूल्य देकर लिये हुए वीर्य प्रकार माता को पुत्र की इच्छा करनी चाहिये के द्वारा अपने क्षेत्र में उत्पन्न हो, (४) पौनर्भव, ॥३४॥३६॥ अर्थात् अपनी मृत्यु हुए पीछे विधवा के गर्भ से आपत्तिकाल में स्त्रियां उत्तम छोटे सगे भाई से दूसरे के द्वारा उत्पन्न हो, (५) कानीन, अर्थात् भी पुत्र उत्पन्न कर सकती हैं । स्वायम्भुव मनु ने अपनी विवाहिता स्त्री में उसके कन्यावस्था में ही कहा है कि श्रेष्ठ मनुष्यों से उत्पन्न हुआ जो पुत्र है उत्पन्न, (६) कुण्ड, अर्थात् विवाहिता स्त्री के वह अपने वीर्य से उत्पन्न हुये पुत्र से अधिक धर्म- व्यभिचार से उत्पन्न हो, (७) दत्तक, अर्थात् जो फल का देनेवाला है । हे कुन्ती ! मैं इस समय पहले माता पिता से दिया जाय, (८) क्रीत, अर्थात् पुत्र पैदा करने को अममर्थ हूं। इसलिए तुमको धन देकर लिया गया हो, (९) उपक्रीत, अर्थात् / आज्ञा देता है कि तुम मेरे समान या मुझ से श्रेष्ठ पाला हुआ, (१०) स्वयम् उपागत, अर्थात् म्ययं पुरुप से यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने की चेष्टा करो आया हुआ, अर्थात् “मै तुम्हारा पुत्र होऊंगा" ॥३७॥३८॥ यह कहकर स्वयं उपस्थित, (११) ज्ञातिरेता हे पृथा ! मै शरदण्ड की स्त्री की कथा कहता सहोड़, अर्थात् जो भाई आदि की गर्भवती स्त्री के । हूं, सुनो । वह वीरपत्नी शरदण्ड की स्त्री पुत्र पैदा rococotococcor महा भारत [ आदिपर्व Icccomory 0000004 goo.comcoxo000000 - ग कर्मण्यवसिते तस्मिन्सा तेनैव सहावसत् तत्र त्रीञ्जनयामास दुर्जयादीन्महारथान् तथा त्वामपि कल्याणि ब्राह्मणात्तपसाधिकात् । मन्नियोगाद्यत क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति ॥ ४२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डुपृथासंवादे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥ करने के लिए, पति की आज्ञा पाकर, एक दिन चढ़ाकर उस कर्म को पूरा करने के लिये उस दिन ऋतुस्नान करके रात्रि को चौराहे पर खड़ी हुइ थी। | उसी ब्राह्मण से सहवास किया। उससे उसके दुर्जय उसी समय एक सिद्ध ब्राह्मण वहां आ निकले। आंदि तीन महारथी पुत्र उत्पन्न हुए । हे सुन्दरी ! स्त्री ने उनसे पुत्र के लिये कहा । उन्होंने स्वीकार इसप्रकार तुम भी सन्तान के लिये मेरी आज्ञा से कर लिया । स्त्री ने पुसवन-यज में अमि की आहुति किसी तपस्वी ब्राह्मण से प्रार्थना करो ॥३९॥४२॥ आदिपर्व का एक साँघीस अध्याय समाम हुआ अथ एकविंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥१२१॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ता महाराज 'कुन्ती पाण्डुमभापत कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपति पतिम् ॥ १ ॥ 'न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं 'कथंचन । धर्मपत्नीर्मभिरतां त्वयि 'राजीवलोचने स्त्रमेव तु महावाहो मय्यपत्यांनि भारत वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि ॥३॥ स्वर्ग 'मनुजशार्दूल गच्छेयं 'सहिता वया । अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन न ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् । ‘वत्तः प्रतिविशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः ॥ ५ ॥ एक सौ इक्कीस अध्याय ॥ १२१ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे गजा जनमेजय ! पाण्डु | किसी अन्य पुरुष को नहीं जानती । इसलिये धर्म की ये बात सुनकर कुन्ती ने कहा । है धर्मज्ञ ! के अनुसार आपही मुझसे अपने वीर्य के द्वारा संतान में आपकी धर्मपत्नी और प्रेम करनेवाली हूं। उत्पन्न करें । हे मनुष्यों में व्याघ्र ! ऐसा ही होने इसलिये आपको मुझसे ऐसी बात कहना उचित से मैं आपके साथ स्वर्ग को जासकूँगी। हे कुरुनन्दन! नहीं है। वीर महाभुज! मैं आपके सिवाय और मैं आपके सिवाय अन्य पुरुष का सन्न मन से भी :1 . Corororororigrororocco CocoDron अध्याय १२१ ] महा मारत 2000cb050 Kokokorakorakorkokorc इमां च तावद्धर्मात्मन्पौराणी शृणु मे कथाम् । परिश्रुतां विशालाक्ष कोर्नयिष्यामि यामहम् ॥ ६ ॥ व्युपिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः । पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोवंशविवर्धनः तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे । उपागमस्ततो देवाः सेंद्रा देवर्षिभिः सह ॥ ८ ॥ अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । व्युपिताश्वस्य राजर्षस्ततो यज्ञे महात्मनः ॥ ९ ॥ देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चकुः कर्म स्वयं तदा व्युपिताश्वस्ततो राजन्नतिमान्व्यरोचत सर्वभूतान्प्रति यथा तपनः शिशिगत्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन्राजसत्तम प्राच्यानुदीच्यापाश्चात्यान्दाक्षिणात्यानकालयत् । अश्वमेधे महायज्ञे व्युपिताश्वः प्रतापवान् ॥ १२ ॥ वभूव स हि राजेन्द्रो दशनागवलान्वितः । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥ १३ ॥ नहीं कर सकती । विशेषकर इस पृथ्वी पर ऐसा के अन्त होने पर सूर्य जैसे और भी प्रकाशित और कौन है जो आपसे ज्यादा श्रेष्ठ हो ॥११५|| तेजस्वी हो जाते हैं वैसेही यज्ञ के अन्त होने पर हे धार्मिक ! इसी बारे में पहले मैने एक पौराणिक | राजा व्युपिताश्व भी अमानुपिक तेजस्वी हो गये। कथा सुनी थी। उसको कहती हूं, सुनिए । पूर्वकाल वह प्रतापीराजेंद्र दश हाथियों के समान बल रखते में गुरु के वंश में उत्पन्न व्युपिताश्व नाम के एक थे । अश्वमेध यज्ञ करके अपने बल और पराक्रम से प्रसिद्ध राजा थे। उन धर्मात्मा महाभुज नरेश के यज्ञ | उन्होंने पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सब आरम्भ करने पर इन्द्र आदि देवता और देवर्षि । समुद्र तक पृथ्वी को जीतकर सजामों को बाधकर वहां आये १६८॥ अपने वश में कर लिया ॥९।१२!! उन महात्मा राजर्षि व्युपिताश्व के यज्ञ में इन्द्र हे कुस्कुलश्रेष्ठ ! पुराण इतिहास के जाननेवाले सोम-रस पीकर और ब्राह्मण लोग दक्षिणा पाकर लोगों का कहना है कि राजा व्युपिताश्व ने समुद्र बहुत प्रसन्न हुए । देवताओं और देवर्पियों ने स्वय तक इस पृथ्वी को जीतकर सब वों की प्रजा का सदम्य होकर यज्ञ का कार्य कराया । शिशिरऋतु | इस प्रकार पालन किया जैसे पिता अपने सगे पुत्रों vooroccorororerorrororocorocococor ५८२ महा भारत [ आदिपर्व Choooot ococc00000000 व्युपिताश्वे यशोवृद्ध मनुष्येन्द्रे कुरूद्वह । व्युपिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ॥ १४ ॥ अपालयत्सर्ववर्णापिता पुत्रानिवौरसान् यजमानो महायज्ञेाह्मणेभ्यो धनं ददौ ॥ १५ ॥ अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाकतून् । सुपाव च वहून्सोमान्सोमसंस्थास्ततान च ॥ १६ ॥ आसीत्काक्षीवती चास्य भार्या परमसंमता । भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि ॥ १७ ॥ कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् । स तस्यां कामसंपन्नो यक्ष्मणा समपद्यत तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् तस्मिन्प्रेते मनुष्येन्द्र भार्याऽस्य भृशदुःखिता ॥ १९ ॥ अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् । भद्रा परमदुःखार्ता तन्निवोध जनाधिप ॥ २० ॥ भद्रावाच-नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता पति विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ॥ २१ ॥ पति विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुङ्गव । त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्त्र नयस्व माम् ॥ २२ ॥ की रक्षा करता है। अनन्तर उन्होंने अमिष्टोम, व्युपिताश्व को क्षयरोग ने आन घेरा । इससे वे सूर्य अत्यमिष्टोम आदि यज्ञ करके उनमें सोम-लता का के समान थोड़े ही काल में अस्त हो गये । उनके रस खूब पिलाया और ब्राह्मणों को बहुत सा धन परलोक सिधारने पर उनकी स्त्री शोक से बड़ी और अनेक रत्न दिये । राजा काक्षीवान् की कन्या विकल हुई । हे पुरुषों में व्याघ्ररूपी नरेश ! भद्रा ने भद्रा व्युपिताश्च की परमप्यारी स्त्री थी । हे मनुप्यों अति दुःखी होकर जैसा शोक किया था वैसा कहती में इन्द्र ! पृथ्वीमर में उस भद्रा के समान अनुपम हूं, मुनिए ॥१८॥२०॥ रूपवाली स्त्री कोई दूमरी नहीं थी ॥१३॥१०॥ भद्रा मर्ता को लक्षकर कहने लगी कि हे धर्मज्ञ ! जिसप्रकार स्त्रीपति की कामना करती थी उसप्रकार पति के बिना स्त्री का जीवन निष्फल है। पति की पति भी उसम्त्री के प्रेमी थे। अगन्तर भद्रा के प्रेमी । मृत्यु पर स्त्री का मर जाना ही अच्छा होता है । इस- । 070-rerrorrorcrosorro10-croon महा भारत ५८३ अध्याय १२१ ] 000 000cod त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नयस्व माम् ॥ २३ ॥ पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विपमेषु च त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम् छायेवानुगता राजन्सततं वशवर्तिनी भविष्यामि नरव्याघ्र नित्यं प्रियहिते रता ॥ २५ ॥ अद्य प्रभृति मां राजन्कप्टा हृदयशोषणाः । आधयोऽभिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण ॥ २६॥ अभाग्यया मया नूनं वियुक्ताः सहचारिणः । तेन मे विप्रयोगोऽयमुपपन्नस्त्वया सह ॥ २७ ॥ विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति । दुःखं जीवति सा पापा नरकस्येव पार्थिव ॥ २८ ॥ संयुक्ता विप्रयुक्ताश्च पूर्वदेहे कृता 'मया तमोभिः कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु संचितम् ॥ २९ ॥ दुःखं मामनुसंप्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम् । अद्यप्रभृत्यहं राजन्कुशसंस्तरशायिनी भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वदर्शनपरायणा लिए मैं आपके साथ ही जाना चाहती हूं । आप प्रसन्न | सुखानेवाले अनेक प्रकार के कष्ट मुझे सहन करने होकर मुझको साथ ले चलो। हे महाराज ! आपके | पड़ेंगे ॥२१॥२६॥ विना मुझे क्षणभर भी जीने की इच्छा नहीं है। निश्चय जान पड़ता है, मैंने पहले जन्म में दो इसलिए आप प्रसन्न हो और बिना विलम्ब मुझको । मित्रों को या पति और पत्नी को अलग कर दिया यहां से ले जाओ। हे राजाओं में व्याघ्ररूपी पुरुष ! | है । उसी पाप के फल से मुझ मन्दभागिनी को चाहे समभूमि हो चाहे रूखी हो मैं छाया की तरह आपके व्योग का यह दुःख प्राप्त हुआ है। हे आपके पछि-पीछे जाऊंगी। मैं वहीं पर आपको पृथ्वीनाथ ! जो स्त्री विना पति के क्षणभर भी छोड़कर लौटने का विचार न करूंगी। हे नरव्याघ्र ! | जीनी है उसका जीना नरक में गिरने के समान है। मैं आपकी आज्ञा का पालन किया करूंगी। मै । मैंने पूर्व जन्म में जो पाप किये हैं वही आज मेरे आपको सदा प्रसन्न रक्खूगी । आज से हृदय को | सामने आये हैं । हे राजन् ! आज से मैं आपके । 1 orococorolcorar co/concocooooor 0000 । ५८४ महाभारत [ आदिपर्व rcorecoroncomcomcore दर्शयस्त्र नरव्याघ्र शाधि मामसुखान्विताम् । कृपणां नाथ करुणां विलपन्ती नरेश्वर फुन्त्युवाच-एवं बहुविधं तस्यां विलपन्त्यां पुनः पुनः । तं शवं संपरिष्वज्य वाकिलाऽन्तर्हिताऽब्रवीत् ॥ ३२ ॥ उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव । जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि ॥ ३३ ॥ आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् । अष्टमी वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह ॥ ३४ ॥ एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता । यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा ॥ ३५ ॥ सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ त्रीन्शाल्वांश्चतुरो मद्रान्सुतान्भरतसत्तम ॥ ३६ ॥ तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगवलान्वितः ॥३७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ज्युपिताश्वोपाख्याने एफविशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ वियोग में सब सुखों को छोड़कर कुशा के बिछौन उत्पन्न करूंगा। हे सुन्दरी ! अष्टमी, चतुर्दशी में पर सोकर आपके दर्शन पाने का उपाय किया ऋतुस्नान करके अपने विस्तर पर लेटना ॥२७॥३४॥ करूंगी। हे महाराज ! मुझ दुःखी और विलाप यह आकाश-वाणी सुनकर पुत्र चाहनेवाली करती हुई पर कृपा करो और आज्ञा दो। कुन्ती देवी पतिव्रता भद्रा उसके अनुसार लेटी रही। हे ने कहा-इस प्रकार से व्युपिताश्व की स्त्री उस मुर्दे भरतवंश में श्रेष्ठ! उस देवी के तीन शाल्व और से लिपटकर बार-बार तरह-तरह के विलाप कर चार मद्र कुल सात पुत्र उत्पन्न हुए । हे भरतश्रेष्ठ ! रही थी । उस समय आकाश-वाणी हुई-हे भद्रा ! इस प्रकार आप भी तप और योग के बल से मुझसे तुम उठो और अपने घर जाओ। हे मधुरहासिनी! ! सन्तान पैदा कर सकते हैं ॥३५॥३७॥ मैं तुमको वर देता हूं कि मैं तुम्हारे गर्भ से सन्तान आदिपर्व पाएक सी इक्कीस अध्याय समाप्त हुआ । -------- moryroroororycynocrymarocurar अध्याय १२२ ] महा भारत 077odcocococcorporacoict00000000000000ccc अथ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय ।। १२२ ।। वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् । धर्मविद्धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम् पाण्डुरुवाच-एवमेतत्पुरा कुंति व्युपिताश्वश्वकार ह । यथा त्वयोक्तं कल्याण स ह्यासीदमरोपमः ॥ २ ॥ अथ विदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे । पुराणमृपिभिदृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः अनावृताः किल पुरा स्त्रिय आसन्वरानने । कामचारविहारिण्यः स्वतन्त्राश्चारुहासिनि तासां व्युच्चरमाणानां कौमारात्सुभगे पतीन् । नाधर्मोऽभूदरारोहे स हि धर्मः पुराभवत् ॥ ५॥ तं चैव धर्म पौराणं तिर्यग्योनिगताः प्रजाः अद्याप्यनुविधीयन्ते कामक्रोधविवर्जिताः प्रमाणदृष्टो धर्मोऽयं पूज्यते च महर्षिभिः उत्तरेषु च रम्भोरु कुरुष्वद्यापि पूज्यते स्त्रीणामनुग्रहकरः स हि धर्मः सनातनः । अस्मिंस्तु लोके न चिरान्मर्यादेयं शुचिस्मिते ॥ ८ ॥ स्थापिता येन यस्माच तन्मे विस्तरतः शृणु । बभूवोद्दालको नाम महर्षिरिति नः श्रुतम् ॥ १ ॥ एक सौ यास अध्याय ॥ १०॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय धर्मन स्वाधीन थीं। वे उन दिनो स्वतन्त्र रहकर भोग की राजा पाण्टु देवी कुन्ती से यह बात सुनकर फिर आमा में घूमा करती थीं। वे कन्यावस्था में ही उससे कहने रगे। हे कुन्ती ! तुमने जो च्युपिताश्च व्यभिचार किया करती थीं । उनको उस व्यभिचार का वृतान्त कहा सो ठीक है। उन्होंने ऐसा ही का दोप नहीं रगता था । प्राचीन धर्म ऐसा ही था किया या। परन्तु धर्मत महात्मा महपियों ने पुगणों परन्तु अब वह धर्म नहीं रहा है। काम और द्वप मादि में धर्म का जोतत्य दिग्पगया है वह तुमसे कहता से रहित पशु पक्षी आदि इस समय मी टसी धर्म के , सुनौ । हे सुन्दरी ! पूर्वकाल में मर गया मनुमार चलते है। महर्षि संगमी प्रमाण से दीये ॥ wournea arrorescoreoved । 05-JPri ५८६ महा भारत [ आदिपर्व 20000000.0cooooooo4 धर्मः सनातनः - श्वेतकेतुरिति ख्यातः पुत्रस्तस्याभवन्मुनिः मर्यादेयं कृता तेन धा वै श्वेतकेतुना ॥ १० ॥ कोपात्कमलपत्राक्षि यदर्थं तन्निबोध मे श्वेतकेतोः किल पुरा समक्षं मातरं पितुः ॥ ११ ॥ जग्राह ब्राह्मणः पाणौ गच्छाव इति चाब्रवीत् । ऋषिपुत्रस्ततः कोपं चकारामपंचोदितः ॥ १२ ॥ मातरं तां तथा दृष्ट्वा नीयमानां बलादिव । क्रुद्धं तं तु पिता दृष्ट्वा श्वेतकेतुमुवाच ह ॥ १३ ॥ मा तात कोपं कास्त्विमेष अनावृता हि सर्वेषां वर्णानामङ्गाना भुवि ॥ १४ ॥ यथा गावः स्थितास्तात स्वे स्वे वर्णे तथा प्रजाः । ऋपिपुत्रोऽथ तं धर्म श्वेतकेतुन चक्षमे चकार चैव मर्यादामिमां स्त्रीपुंसयोर्भुवि मानुपेषु महाभागे न वेवान्येपु जन्तुषु ॥ १६ ॥ तदाप्रभृति मर्यादा स्थितेयमिति नः श्रुतम् । व्युच्चरन्त्याः पतिं नार्या अद्यप्रभृति पातकम् ॥ १७॥ हुए इस धर्म की प्रशसा किया करते हैं । हे सुन्दरी ! | तुम मेरे साथ चरो। अब वह ब्राह्मण बलपूर्वक उत्तर-कुरु देश में अबतक यही धर्म प्रचलित है, | श्वेतकेतु की माता को लेकर चल दिया । अनन्तर क्योंकि यह धर्म अत्यन्त प्राचीन और स्त्रियों के ऋषिकुमार श्वेतकेतु अन्य पुरुष के साथ माता को अनुकूल है । कुछ समय हुआ यह मर्यादा इस देश जाते देखकर बड़ा दुखी और क्रोधी हुआ। उसके से उठ गई है कारण उसका यह है कि उद्दालक पिता उद्दालक ने उसे क्रोध से कापते हुए देखकर नाम के एक महिप थे ॥१९॥ कहा-हे बेटा ! तुम क्रोध मत करो । यह धर्म उनके प्रसिद्ध पुत्र का नाम श्वेतकेतु था । उस प्राचीन काल से ही चला आ रहा है । इस संसार में श्वत केतु ने क्रोध के वश में होकर इम व्यभिचार की सभी वर्गों की स्त्रिया बिना रोक टोक सब से मिरती रीति को दृषित टहराकर पृथ्वी से उठा दिया है। हैं । हे बेटा ! सब मनुष्य अपने वर्ण की सियों से हे पद्मने । उसके क्रोध का कारण यह है । एक दिन | गाय के समान आचरण करते हैं। जो जिसमे एक ब्राह्मण श्वेतकेतु के पिता के सामने उसकी | चाहे विहार कर सकता है ॥१०॥१४॥ माता का हाथ पकड़कर कहने लगा-हे युवती ! उद्दालक के इस प्रकार पुत्र को समझाने पर भी Maryururoroonrocurororororororocorro ५८७ अध्याय १२२ ] महा भारत 050004 2051000 000050004 2000 pohokomovei भ्रूणहत्यासमं घोरं भविष्यत्यसुखावहम् । भार्या तथा व्युच्चरतः कौमारब्रह्मचारिणीम् ॥१८॥ पतिव्रतामेतदेव भविता पातकं भुवि पत्या नियुक्ता या चैव पत्नी पुत्रार्थमेव च न करिष्यति तस्याश्च भविष्यति तदेव हि । इति तेन पुरा भीरु मर्यादा स्थापिता वलात् ॥ २० ॥ उद्दालकस्य पुत्रेण धा वै श्वेतकेतुना । सौदासेन च रम्भोरु नियुक्ता पुत्रजन्मनि ॥ २१ ॥ मदयंती जगामर्षि वसिष्ठमिति नः श्रुतम् तस्माल्लेभे च सा पुत्रमश्मकं नाम भाविनी ॥ २२ ॥ एवं कृतवती सापि भर्तुः प्रियचिकीर्षया अस्माकमपि ते जन्म विदितं कमलेक्षणे ॥ २३ ॥ कृष्णद्वैपायनाद्भीरु कुरूणां वंशवृद्धये अत एतानि सर्वाणि कारणानि समीक्ष्य वै ॥ २४ ।। ममैतद्वचनं धयं कर्तुमर्हस्यनिंदिते ऋतावृतो राजपुत्रि स्त्रिया भर्ता पतिव्रते ॥ २५ ॥ नातिवर्तव्य इत्येवं धर्म धर्मविदो विदुः शेषेष्वन्येषु कालेषु स्वातंत्र्यं स्त्री किलाहति ॥ २६ ॥ उसने उस धर्म को अच्छा नहीं जाना । उस कुपित और जीवों में अभी वहीं धर्म चला जाता है। हे श्वेतकेतु ने स्त्रियों और पुरुषों के लिए यह मर्यादा | सुन्दरी ! सुना है कि राजा सौदास की स्त्री मदयन्ती बांध दी कि आज से जो स्त्री व्यभिचार करेगी उसको पति की आज्ञा से पुत्र के लिये महर्षि वसिष्ठ के गर्भहत्या के समान पाप होगा । जो पुरुष पतिव्रता पास गई और उनसे अश्मक नामक पुत्र उत्पन्न स्त्री को छोड़कर अन्य स्त्री के साथ भोग करेगा | किया । उसने पति का प्रिय करने के लिये ही ऐसा उसे भी यही पाप होगा। और जो स्त्री पति से किया था ॥१५॥२२॥ आज्ञा दी हुई सन्तान उत्पन्न करने के लिये और तुम यह भी जानती हो कि कुरुओं का वंश पुरुष के पास न जायगी उसको भी यही पाप होगा। चलाने के लिये भगवान् कृष्णद्वैपायन से हम तीनों तब से मनुष्यों में यह मर्यादा हो गई है। परन्तु | भाईयों का जन्म हुआ है । इसलिये हे प्रिये ! तुमको ! -ococococococorroro COLOrorocococok 0000 ५८८ महाभारत [ आदिपर्व Dooooooooo धर्ममेवं जनाः सन्तः पुराणं परिचक्षते । भर्ता भार्यां राजपुत्रि धयं वाधर्म्यमेव वा ॥ २७॥ यद् ब्रूयात्तत्तथा कार्यमिति वेद विदो विदुः । विशेषतः पुत्रगृद्धी हीनः प्रजननात्स्वयम् ॥ २८॥ यथाहमनवद्याङ्गि पुत्रदर्शनलालसः तथा रक्तांगुलिनिभः पद्मपत्रनिभः शुभे ॥ २९ ॥ प्रसादार्थ मया तेऽयं शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः । मन्नियोगात्सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात् ॥ ३० ॥ पुत्रान्गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम् ॥ ३१ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डे परपुरञ्जयम् । प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ३२ ॥ पितृवेश्मन्यहं वाला नियुक्तातिथिपूजने उग्रं पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ ३३ ॥ निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः . तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नरतोषयम् ॥ ३४ ॥ इन सब विषयों पर अच्छीप्रकार विचार करके मेरी करने के लिये अपनी लाल अंगुलियों से कमल के इस धर्मानुसार बात को मानना उचित है । हे पतिव्रता समान अञ्जली बनाकर हाथ जोड़ता हूं । तुम मेरी राजपुत्री ! प्राचीन धर्मन लोगों का कहना है कि आना से किसी तपस्वी ब्राह्मण के द्वारा गुणी सन्तान ऋतुकाल आने पर स्त्री को पति के साथ संगम उत्पन्न करो। हे प्रिये ! तुम्हारी कृपा से मैं पुत्र करना अवश्य उचित है और अन्य समय में स्त्री रखनेवाले पुरुषों की अच्छी गति पाऊंगा ॥२८॥३१॥ की इच्छा है संगम करे अथवा न करे ॥२३॥२७॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! पति है राजपुत्री ! वेदों के जानकार पुरुषों का कहना | के प्रिय कार्य और हित चाहनेवाली सुन्दरी कुन्ती है कि पति की माना धर्म के विरुद्ध भी हो तो भी | शत्रुदमन महाराज पाण्डु की यह बात सुनकर बोली- उसका पालन करना प्रत्येक स्त्री का धर्म और जब मै पिता के घर में कन्या थी उस समय मैं कर्तव्य है। हे मुन्दरी ! मेरी पुत्र उत्पन्न करने की अपने पिता की आज्ञा से अतिथियों की सेवा किया शक्ति जाती रही परन्तु पुन्न की इच्छा है । इसलिये करती थी । एक दिन धर्म के गृह तत्व जाननेवाले, दे शुभे ! में पुत्र देखने की इच्छा से तुमको प्रसन्न । प्रसिद्ध, जितेंद्रिय, महर्षि दुर्वासा यहां आये । मैंने । - rercensr01/0930 अध्याय १२२ ] महा भारत ५८९ 100000500.70 poro०० मेऽभिचारसंयुक्तमाचष्ट .भगवान्वरम् मन्त्रं विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम् ॥ ३५ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैयति ॥ ३६ ॥ तस्य तस्य प्रसादात्ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति । इत्युक्ताऽहं तदा तेन पितृवेश्मनि भारत ॥३७॥ ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोऽयमागतः । अनुज्ञाता त्वया देवानाह्वयेयमहं नृप ॥ ३८ ॥ तेन मंत्रेण राजर्षे यथा स्यान्नौ प्रजा हिता । आवाहयामि के देवं ब िसत्यवतां वर त्वत्तोऽनुज्ञाप्रतीक्षा मां विद्धयम्मिन्कर्मणि स्थिताम् ॥३९॥ पाण्डुरुवाच-अद्यैव वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक् ॥४०॥ अधर्मेण न नो धर्मः संयुज्येति कथंचन लोकश्चायं वरारोहे धर्मोऽयामिति मन्यते ॥ ११ ॥ धार्मिकश्च कुरूणां स भविष्यति न संशयः । धर्मेण चापि दत्तस्य नाधर्मे रंस्यते मनः ॥ ४२ ॥ बड़े यत्न से उनकी सेवा की । उससे प्रसन्न होकर सकता है। अब आप पुत्र के उत्पन्न करने के लिये उन्होंने एक अभिचार-मन्त्र बतलाकर मुझसे कहा| जिस देवता के बुलाने की मुझे आना देखें उसको मैं ॥३२॥३४॥ बुलालू ।मैं केवल आपकी आना चाहती हूं॥३५॥३९॥ हे राजकुमारी ! यह मन्त्र पढ़कर तुम जिस यह सुनकर राजा पाण्डु ने कहा-हे सुन्दरी ! देवता का आवाहन करोगी वह किसी काम में लगा आज ही जैसे बन पड़े देवता को बुलाने का प्रयत्न हो अथवा न लगा हो उसीक्षण तुम्हारे पास आने | करो। हे शुभे! धर्म को बुलाओ क्योंकि वही के लिये विवश होगा ! तुम उस देवता के द्वारा देवताओं में पुण्यरूप हैं । उनके अंश से उत्पन्न पुत्र उत्पन्न कर सकोगी । हे भारत ! पिता के घर में हुआ पुत्र भी कभी अधर्म नहीं करेगा। लोग भी महर्षि दुर्वासा ने मुझसे ऐसा कहा था। है राजा ! ! यही समझेंगे कि धर्म से पुत्र उत्पन्न हुआ है। इसमें ब्राह्मण का वचन किसी प्रकार से मिथ्या नहीं हो सन्देह नहीं कि धर्म के द्वारा जो पुत्र उत्पन्न rycococosoccord । o-corecardrocococorosr.
000cc020 महाभारत [ आदिपर्व aaicomvorona तस्माद्धर्म पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते । उपचाराभिचाराभ्यां धर्ममावाहयस्व वै वैशम्पायन उवाच-सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्ना वराङ्गना । अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत ॥४४॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि कुंतीपुत्रोत्पत्यनुज्ञाने द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१२२ ।। करागी वह कुरुवश मे प्रधान धर्मात्मा होगा। उसका जनमेजय ! उस श्रेष्ठ स्त्री कुन्ती ने अपने पति की मन कभी अधर्म की ओर न झुकेगा । इसलिये हे आज्ञा स्वीकार करके प्रदक्षिणा की और प्रणाम सुन्दरी ! तुम आचारपूर्वक अभिचार-मत्र के द्वारा किया ॥४०॥४४॥ धर्म ही को बुलाओ। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा आदिपर्व का एक सौ वाईस अध्याय समाप्त हुआ || अथ त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १२३ ।। वैशम्पायन उवाच-संवत्सरधृते गर्भ गान्धार्या जनमेजय । आह्वयामास वै कुन्ती गर्भार्थे धर्ममच्युतम् ॥ १ ॥ सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह जजाप विधिवजप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा ॥ २ ॥ आजगाम ततो देवो धर्मों मंत्रवलात्ततः । विमाने सूर्यसङ्काशे कुन्ती यत्र जपस्थिता ॥ ३ ॥ विहस्य तां ततो व्याः कुन्ति किं ते ददाम्यहम् । सा तं विहस्यमानाऽपि पुत्रं देखनवीदिदम् ॥ ४ ॥ संयुक्ता सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण ह लेभे पुत्रं वगरोहा सर्वप्राणभृतां हितम् ॥ ५ ॥ एफ मौ तेईस अध्याय ।। १२३ ॥ वैशम्पायन ने कहा हे राजा जनमेजय ! गाधारी सूर्य के समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर का गर्म जब एक वर्ष का हो चुका तब कुन्ती ने वहां तुरन्त आन पहुचे ॥१३॥ धर्मदेव को बुराया। कुन्ती शीघ्र ही पूजा की सामग्री उन्होंने हसकर कुन्ती से कहा-हे कुन्ती ! तुम तय्यार करके दुर्वासा के दिये हुए मत्र को विधि- मुझमे क्या चाहती हो! कुन्ती ने कुछ हसकर पूर्वक जपने रगी । उस मंत्र की शक्ति से, धर्मराज | कहा-मैने पुत्र की इच्छा से आपको बुराया है। carrorecorrecorrora ran अध्याय १२३ ] यहा मारत ५९१ onconoo4 rootoozcole ऐन्द्रे चन्द्रसमायुक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पूर्णेऽतिपूजिते ॥ ६ ॥ समृद्धयशसं कुंती सुपाव प्रवरं सुतम् जातमात्रे सुते तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी एप धर्मभृतां श्रेष्ठो भविष्यति नरोत्तमः विक्रान्तः सत्यवाक्चैव राजा पृथ्व्यां भविष्यति ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर इति ख्यातः पाण्डोः प्रथमजः सुतः । भविता प्रथितो राजा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः यशसा तेजसा चैन व्रतेन च समन्वितः धार्मिकं तं सुतं लब्ध्वा पाण्डुस्तां पुनरब्रवीत् ॥ १० ॥ प्राहुः क्षत्रं बलज्येष्ठं वलज्येष्ठं सुतं वृणु । ततस्तथोक्ता भर्ना तु वायुमेवाजुहाव सा ततस्तामागतो वायुमृगारूढो महाबलः किं ते कुन्ति ददाम्यद्य ब्रूहि यत्ते हृदि स्थितम् ॥ १२ ॥ सा सलज्जा विहस्याह पुत्रं देहि सुरोत्तम । बलवन्तं महाकायं सर्वदर्पप्रभञ्जनम् ॥ १३ ॥ तस्माज्जज्ञे महावाहुीमो भीमपराक्रमः । तमप्यतिवलं जातं वायुवाचाशरीरिणी ॥ १४ ॥ अनन्तर कुन्ती ने योगी का स्वरूप धारण किये | धर्मात्मा पुत्र को पाकर पाण्डु ने फिर कुन्ती से कहा- धर्म से सहवास किया। उसके प्रभाव से | हे कुन्ती ! क्षत्रिय के लिए चल ही मुख्य है । उसके शुक्लपक्ष पञ्चमी तिथि ज्येष्ठानक्षत्र तुलालम | इसलिए तुम एक बलवान् पुत्र भी उत्पन्न करो। अभिजित्महूर्त दुपहर के समय में पुत्र उत्पन्न अपने पति की आजा पाकर कुन्ती ने उसीतरह हुआ। पुत्र का जन्म होते ही आकाश-वाणी हुई वायुदेव को बुलाया ॥४१११॥ कि यह पुत्र धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, मनुष्यों में उत्तम, महाबली वायुदेव मृग पर चढ़कर उसके पास पड़ा पराक्रमी, सत्यवादी, व्रतधारी, पृथ्वीभर में | आये और कहा-हे कुन्ती ! तुम मुझसे क्या एक ही अधिकारी, तीनों लोकों में प्रशसित, यशस्वी, चाहती हो । कुन्ती लज्जा से मुख नीचा करके कुछ युधिष्ठिर नाम से प्रसिद्ध होगा। ऐसे तेजस्वी और | हसकर बोली-हे देवोत्तम ! मैं आपसे बड़ा शरीरoursmomcoroenomicornwroreraorporroreoroman ।
महा भारत [ आदिपर्व -- , सर्वेषां वलिनां श्रेष्ठो जातोऽयमिति भारत । इदमत्यद्भुतं चासीज्जातमात्रे वृकोदरे यदकात्पतितो मातुः शिलां गात्रैरचूर्णयत् कुन्ती व्याघ्रभयोद्विग्ना सहसोत्पतिता किल ॥ १६ ॥ नान्वबुध्यत संसुप्तमुत्सङ्गे स्वे वृकोदरम् ततः स वज्रसंघातः कुमारो न्यपतनिरौ ॥१७॥ पतता ते शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता तां शिलां चूर्णितां दृष्ट्वा पाण्डुर्विस्मयमागतः ॥ १८ ॥ यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भरतसत्तम दुर्योधनोऽपि तत्रैव प्रजज्ञे वसुधाधिप ॥ १९ ॥ जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् । कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ॥ २० ॥ देवे पुरुषकारे च लोकोऽयं संप्रतिष्ठितः । तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥ २१ ॥ इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् । अप्रमेयवलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ॥ २२॥ धारी, महावली और सबके घमण्ड को चूर करने- हद शरीर की चोट से वह पत्थर सैंकड़ों भागों में बाला पुत्र चाहती हूं । उनके सहवास से कुन्ती ने चूर्ण हो गया। इस बात को देखकर राजा पाण्डु यथासमय पराक्रमी भीम को उसन्न किया। उस ने बड़ा आश्चर्य माना । हे भरतश्रेष्ठ! जिस दिन महावी पुत्र भीमसेन के जन्म लेते ही आकाश- | भीम ने जन्म लिया उसी दिन दुर्योधन का जन्म वाणी हुई-"यह बालक शरीर के यल में सभी हुआ था । भीमसेन के उत्पन्न होने पर राजा पाण्ड प्राणियों से बढकर होगा" ॥१२॥१४॥ ये विचार करने लगे कि किसतरह मेरे एक पुत्र युकोदर के जन्म लेते ही एक अद्भुत घटना देवताओं के समान पराक्रमी और उत्पन्न हो । हुई । एक दिन कुन्ती अपनी गोद में मीमसेन को मनुष्यों में से कोई देव-बल से और कोई अपने लिये हुए बैठी हुई थी। बैठे बैठे भीमसेन सो गये, पौरप से संसार में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ॥१५॥२१॥ उम समय उन्ती एक व्याघ्र के डर मे एकाएक उठकर सुना है, इन्द्र सब देवताओं का राजा और खड़ी हो गई। इससे भीमसेन उसकी गोदी से लुढ़क प्रधान है । उनका उत्साह, बल, वीर्य और प्रभार कर पत्थर पर गिर पड़े। उनके पन-समान अत्यन्त भी अपार है। अब उन्हीं को तपस्या से प्रसस vrucar arzuconyrcorrororg । C."
५९३ अध्याय १२३ ] म हा भारत Doooo.com 0000000.0corcocc तं तोपयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम् । यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीयान्भविष्यति ॥ २३ ॥ अमानुपान्मानुपांश्च संग्रामे स हनिष्यसि । कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्तप्स्ये महत्तपः ॥ २४ ॥ ततः पाण्डुमहाराजो मन्त्रयित्वा महर्षिभिः । दिदेश कुन्त्याः कौरव्यो व्रतं सांवत्सरं शुभम् ॥ २५ ॥ आत्मना च महाबाहुरेकपादस्थिनोऽभवत् । उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ॥ २६ ॥ आरिराधयिपुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम् सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यतप्यत भारत ॥२७॥ तं तु कालेन महता वासवः प्रत्यपद्यत शक्र उवाच-पुत्रं तव प्रदास्यामि त्रिषु लोकेपु विश्रुतम् ॥ २८ ॥ ब्राह्मणानां गवां चैव सुहृदां चार्थसाधकम् । दुहृदां शोकजननं सर्ववान्धवनन्दनम् ॥ २९ ॥ सुतं तेऽग्न्यं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम् । इत्युक्तः कौरवो राजा वासवेन महात्मना ॥ ३० ॥ उवाच कुन्ती धर्मात्मा देवराजवचः स्मरन् उदर्कस्तव कल्याणि तुष्टो देवगणेश्वरः ॥ ३१ ॥ करके एक महापराक्रमी पुत्र प्राप्त करना चाहिये । सूर्य के अम्त होने तक खड़े रहकर इन्द्र की तपस्या उनका दिया हुआ पुत्र अवश्य ही सब में श्रेष्ठ करने लगे । बहुत दिनों में इन्द्र प्रसन्न हुए और होगा । वह युद्ध में मनुष्य, देवता, गन्धर्व आदि राजा पाण्डु से आकर बोले-हे राजन् ! मैं तुमको सबको परास्त करेगा । मै मन, वाणी और काया तीनों लोकों में प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ पुत्र दूगा। वह से कठोर तपस्या करूगा। इसके पश्चात् कुरु-श्रेष्ठ | पुत्र गौ, ब्राह्मण और पितरों का हित करनेवाला महाराज पाण्डु ने विचार करके महर्पियों से सलाह होगा। वह अपने सब शत्रुओं का नाश करेगा की। उन्होंने कुन्ती को एक वर्ष तक व्रत धारण और सब वान्धवों को आनन्द देनेवाला होगा करने की आज्ञा दी ॥२२॥२५॥ ॥२६॥२९॥ और आप भी एक पांव से सूर्य के उदय से महात्मा इन्द्र के यह बात कहने पर राजा पाण्डु 5.ormco0.000000scolococoroo0 20707003ere - ५९४ महाभारत [ आदिपर्व oooooooooo soooooor । orororococo दातुमिच्छति ते पुत्रं यथा संकल्पितं त्वया । अतिमानुपकर्माणं यशस्विनमरिन्दमम् ॥ ३२ ॥ नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम् दुराधर्ष क्रियावन्तमतीवाद्भुतदर्शनम् ॥ ३३ ॥ पुत्रं जनय सुश्रोणि धाम क्षत्रियतेजसाम् । लब्धः प्रसादो देवेन्द्रात्तमाह्वय शुचिस्मिते ॥ ३४ ॥ वेशम्पायन उवाच-एवमुक्ता ततः शक्रमाजुहाव यशस्विनी । अथाजगाम देवेन्द्रो जनयामास चार्जुनम् जातमात्रे कुमारे तु वायुवाचाशरीरिणी महागम्भीरनि?षा नभो नादयती तदा शृण्वतां सर्वभूतानां तेषां चाश्रमवासिनाम् । कुन्तीमाभाष्य विस्पष्टमुवाचेदं शुचिस्मिताम् ॥ ३७ ।। कार्तवीर्यसमः कुन्ति शिवतुल्यपराक्रमः । एप शक इवाजय्यो यशस्ते प्रथयिष्यति ॥ ३८ ॥ अदित्या विष्णुना प्रीतिर्यथाऽभूदभिवर्धिता । तथा विष्णुसमः प्रीतिं वर्धयिष्यति तेऽर्जुनः ॥ ३९ ॥ उस बात को स्मरण कर कुन्ती से बोले-हे कल्याणि । हुए। उन्होंने कुन्ती की इच्छा पूर्ण की । कुन्ती के तुम्हारा कर्म सफर हुआ। इन्द्र प्रसन्न होकर तुम्हारी | गर्भ से अर्जुन उत्पन्न हुए। उस कुमार के जन्म लेते इच्छा के योग्य तुमको एक पुत्र देंगे । हे सुन्दरी! ही बड़े गम्भीर स्वर से आकाश गूजकर आकाश-वाणी अब एक और यशस्वी शत्रुओं का नाश करनेवालरा, | हुई-हे कुन्ती ! तुम्हारा यह पुत्र कार्तवीर्य सदृश नीतिश, सूर्य के सगान तेजस्वी, अरौकिक कर्म | वीर्यवान्, शिव के समान पराक्रमी होकर युद्ध में करनेगला, देखने में अद्भुत्, क्षत्रियों के तेज से | इन्द्र के समान यश पायेगा ॥३५॥३८॥ परिपूर्ण, पुत्र उत्पा करो । हे मुन्दरी ! मैंने इन्द्र विष्णु को उत्पन्न करके भदिति जैसे सुखी हुई को प्रसज कर लिया है। अब तुम उनका आवाहन थी वैसेही इस बालक से तुमको भी आनन्द प्राप्त करो ॥३०॥३४॥ होगा । तुम्हारा यह पुत्र अर्जुन नाम से प्रसिद्ध वैशम्पायन ने कहा-टे राजा जनमेजय ! अपने होर मद्र, बुरु, सोमक, चेदि, काशी, करुष आदि पनि की भाशा पाइर यशस्विनी कुन्तीने मन्त्र द्वारा | देशों और वशों के राजाओं को जीनेगा और पुरवश इन्द्र का आवाहन किया । इन्द्रदेव वहा उपम्पित की राज लक्ष्मी को सुरक्षित रक्खेगा । पाण्डव धन को । ।
अध्याय १२३ ] महा भारत ५९५ 50004 2000 एप मन्द्रान्वशे कृत्वा कुरूंश्च सह सोमकैः । चेदिकाशिकरूपांश्च कुरुलक्ष्मी वहिप्यति ॥ ४० ॥ एतस्य भुजवीर्येण खाण्डवे हव्यवाहनः । मेदसा सर्वभूतानां तृप्तिं यास्यति वै पराम् ॥४१॥ ग्रामणीश्च महीपालानेप जित्वा महाबलः । भ्रातृभिः सहितो वीरस्त्रीन्मेधानाहरिप्यति ॥ ४२ ॥ जामदग्न्यसमः कुन्ति विष्णुतुल्यपराक्रमः । एप वीर्यवनां श्रेष्ठो भविष्यति महायशाः ॥४३॥ एप युद्धे महादेवं तोपयिष्यति शङ्करम् । अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात्तुष्टादवाप्स्यति ॥ ४४ ॥ निवातकवचा नाम दैत्या विवुधविद्विषः । शक्राज्ञया महावाहुस्तान्वधिप्यति ते सुतः ॥ ४५ ॥ तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलेनाहरिष्यति । विप्रनष्टां श्रियं चायमाहर्ता पुरुषर्षभः ॥ ४६॥ एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके । वाचमुच्चरितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम् ॥ ४७॥ चभूव परमो हर्षः शतशृङ्गनिवासिनाम् । तथा देवनिकायानां सेन्द्राणां च दिवौकसाम् ॥४८॥ जलाकर अनेक प्राणियों की चर्स से अमिदेव को | तुम्हारे कुल की नष्ट हुई लक्ष्मी का उद्धार इसी के तृप्त और सतुष्ट करेगा । राजाओं को जीतकर बड़े | द्वारा होगा। कुन्ती ने पुत्र के विषय में यह भाई युधिष्ठिर से तीन अश्वमेध यज्ञ करावेगा। आश्चर्ययुक्त वाणी सुनी । यह आकाश वाणी सुनकर हे कुन्ती ! यह अति यशवत पुत्र विष्णु के समान | कुन्ती और उस शतशृग पर्वत के निवासी सन पराक्रमी और परशुराम के समान वीर्यवान् नरों में तपम्ची ऋपियों को बड़ा हर्ष हुआ। विमानों पर श्रेष्ठ होगा। यह युद्ध में महादेव शकर को प्रसन्न चढे हुए इन्द्रादि देवता भी पड़े प्रसन्न हुए । करके उनसे पाशुपत अस्त्र प्राप्त करंगा ॥३९॥४४॥ आकाश में नगाड़े बजने लगे। घोर शब्द होने उन्द्र की आजा से निजातक्वच नाम के दैत्यों रगा। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। को मारकर सब दिव्य अस्त्रों को प्राप्त करेगा। कुन्ती-पुत्र अर्जुन की अभ्यर्थना के लिये सब देवता ASON Jraorsera/ econorror Cocon महाभारत [ आदिपर्व Protococonocencorerodocto.ncomonarcorn आकाशे दुन्दुभीनां च वभूव तुमुलः स्वनः । उदतिष्ठन्महाघोषः पुष्पवृष्टिभिरावृतः ॥ ४९ ॥ समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजयन् । काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा । प्रजानां पतयः सर्वे सप्त चैव महर्षयः ॥ ५० ॥ भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः । यश्चोदितो भास्करेऽभूत्प्रनप्टे सोऽप्यत्रात्रिभंगवानाजगाम ॥ ५१ ॥ मरीचिरनिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥५२॥ दिव्यमाल्याम्बरधराः सर्वालङ्कारभूषिताः । उपगायन्ति वीभत्सुं नृत्यन्त्यप्सरसां गणाः ॥ ५३ ॥ तथा महर्पयश्चापि जेपुस्तत्र समन्ततः गन्धर्व सहितः श्रीमान्प्रागायत च तुम्बुरुः ॥ ५४ ॥ भीमसेनोग्रसेनौ च अर्णायुरनधस्तथा गोपतिधृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चास्तथाप्टमः युगपस्तृणपः कार्निन्दिश्चित्ररथस्तथा त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः ॥ ५६ ॥ कलिः पञ्चदशश्चैव नारदश्चात्र पोडशः ऋत्वा वृहत्वा वृहका करालश्च महामनाः ॥५७॥ मपि आदि आकाश में आर पृथ्वी पर आकर दक्ष प्रजापति आये । दिव्य वैजयन्ती माला और एकत्रित हुए ॥४५॥४९॥ दिव्य वस्र, आभूषण पहने अप्सराएं अर्जुन की क्दू और विनता के पुत्र, गन्धर्ष, अप्सराएं, प्रशंसा के गीत गाती हुई नाचने लगी। चारों ओर प्रजापति, भरद्वाज कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, महर्षि लोग मंगल के लिये स्वम्त्ययन-मंत्र का जाप जमदमि, वशिष्ठ और सप्त सापि यहा आपे । सूर्य फरने लगे । गन्धर्वराज तुम्बुरु, भीमसेन, उग्रसेन, के अम्त होने पर आकाशमण्डल में उदय होने- ऊर्णायु, अनघ, गोपति, धृतराष्ट्र, मूर्यवर्ना, युगप, पार महर्षि अत्रि भी यहां उपस्थित हुए। इसके तृणप, कार्णि, नन्दि, निनस्य, भारि शिरा, पथात् मरीनि, अहिरा, पुरम्य, पुरह, तु भार पर्जन्य, कलि, नारद, पारग, पृदया, वृहक, - occasiced werecoccursion - Ordererrorrororarroravrrrrr- ५९७ महा भारत अध्याय १२३ ] 00000 onco ब्रह्मचारी बहुगुणः सुवर्णश्चेति विश्रुतः विश्वावसु मन्युश्च सुचन्द्रश्च शरुस्तथा ॥ ५८॥ गीतमाधुर्यसंपन्नौ विख्यातौ च हहा हुहू । इत्येते देवगन्धर्वा जग्मुस्तत्र नराधिप ॥ ५९॥ तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालङ्कारभूपिताः । ननृतुर्वे महाभागा जगुश्चायतलोचनाः अनूचानानवद्या च गुणमुख्या गुणावरा अद्रिका च तथा सोमा मिश्रकेशी त्वलम्वुपा ॥ ६१ ॥ मरीचिः शुचिका चैव विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा । अम्विका लक्षणा क्षेमा देवी रम्भा मनोरमा ॥ ६२ ॥ असिता च सुवाहुश्च सुप्रिया च वपुस्तथा । पुण्डरीका सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥ ६३ ॥ काम्या शारद्वती चैव ननृतस्तत्र सङ्घशः मेनका सहजन्या च कर्णिका पुञ्जिकस्थला ॥ ६४ ॥ ऋतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि । उम्लोचेति च विख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ॥ ६५ ॥ उर्वश्येकादशी तासां जगुश्चायतलोचनाः धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा ॥ ६६ ॥ कराल, ब्रह्मचारी, बहुगुण, सुवर्ण, विश्वावसु, भूमन्यु, विद्युतपर्णा, तिलोत्तमा, अम्बिका, रक्षणा, क्षेमा, सुचन्द्र, शरु और मधुर कण्ठ से उत्तम गीत गाने- देवी, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुप्रिया, वाले प्रसिद्ध हाहा और हुहू नाम के गन्धर्व वहा | सुवपु, पुण्डरीका, सुगन्धा, सुरसा, प्रमायिनी, काम्या और शारद्वती आदि अप्सराए जुट वाधकर नाचने उनके साथ ही सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से लगीं ॥६०६४॥ सज धजकर, विशाल नेत्रोंवारी सुन्दरी अप्सराए और मेनका, सहजन्या, कर्णिका, पुनस्थरा, प्रसन्नचिच से गाने-बजाने और नाचने लगी। ऋतुस्थरा, घृताची, विश्वाची, पूर्वचित्ति, उन्रोचा, अनूचाना, अनवद्या, गुणमुख्या, गुणावरा, अद्रिका, , प्रम्रोचा और उर्वशी, ये ग्यारह वर्ग की प्रसिद्ध सोमा, मिश्रकेशी, अगम्युषा, मरीचि, शुचिका, । अप्सराए एकत्र होकर गीत गाने रगी। धाता, गाने रंग ॥५०॥५९।।
५९८ महा भारत [ आदिपर्व 00000.occoooook 00000a इन्द्रो विवस्वान्पूपा च त्वष्टा च सविता तथा । पर्जन्यश्चैव विष्णुश्च आदित्या द्वादश स्मृताः । महिमानं पाण्डवस्य वर्धयन्तोऽम्बरे स्थिताः ॥ ६७॥ मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परन्तप ॥ ६८॥ दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते । स्थाणुर्भगश्च भगवान्रुद्रास्तत्रावतस्थिरे अश्विनौ वसवश्चाप्टौ मरुतश्च महाबलाः विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन्परिसंस्थिताः ॥ ७० ॥ कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः कच्छपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ॥ ७१॥ आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः । एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः ॥ ७२ ॥ तार्थ्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः ॥७३॥ तांश्च देवगणान्सास्तपःसिद्धा महर्षयः विमानगिर्यग्रगतान्दहशुनेंतरे जनाः ॥ ७४॥ तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः । अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन्याण्डवान्प्रति ॥७५॥ अर्थमा, मित्र, वरुण अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान् , ! दोनों अश्विनीकुमार, आठौं वमु, महाबली मरुद्गण, पूपा, त्वष्टा, सविता और विष्णु, ये बारहों आदित्य | विश्वेदेवा और साध्यगण भी वहां आ गये । कर्कोटक, और पर्जन्य तथा पावकगण आकाश में ठहरे हुए । वासुकि, कच्छप, कुण्ड, महोरग और तक्षक आदि पाण्डु-पुत्र अर्जुन की महिमा बढ़ाने लगे॥६५॥६५॥ ये सप तापयुक्त बड़े क्रोधी महाबली सर्प और हे शत्रुओं के नाश करनेवाले पृथ्वीनाथ ! | दूसरे बहुत नाग वहां आ पहुंचे ॥६८७२॥ मृगव्याध, सर्प, अति यशवंत निति, अजेकपात्, विनता के पुत्र तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड़, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु असितध्वज, अरुण और आरुणि भी आय । विमानों 5 और भगवान् मग, ये ग्यारह रुद्र भी वहां आये । पर चढ़े और पर्वत के शिखर पर ठहरे देवताओं - - 11-5/2000 DOcrisrirscorses-micsrore 0512000 । अध्याय १२४ ] महा भारत Rocovernorroreirconorcrore पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलाभान्महायशाः । वक्तुमैच्छद्धर्मपत्नी कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत् ॥७६ ॥ नातश्चतुर्थं प्रसवमापत्स्वपि वदन्त्युत अतः परं स्वैरिणी स्याह्वन्धकी पञ्चमे भवेत् ॥७॥ स त्वं विद्वन्धर्ममिममधिगम्य कथं नु माम् । अपत्यार्थं समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पांडवोसत्तौ त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥ को उसे वनवासी सिद्ध ऋपियों के सिवाय और | पण्डितों ने इसतरह तीन ही वार पुत्र उत्पन्न करने कोई नहीं देख सका। मुनियों ने यह सब अति | की व्यवस्था दी है । चौथी वार स्त्री ऐसा नहीं कर आश्चर्य लीला देखकर अचरज माना और तब से | सकती । चौथी वार पुरुष से मिलने से स्त्री स्वैरिणी पाण्डवों की और भी श्रद्धा करने लगे ॥७३।७५॥ । (कुलटा) कहलाती है । यदि पांचवीं वार ऐसा करे कुछ समय के व्यतीत होने पर अति यशवंत | तो वैश्या के समान हो जाती है । हे विद्वान् ! पाण्डु ने फिर पुत्र के लोभ में पड़कर कुन्ती को आप सनातनधर्म को भलीप्रकार जानते हैं। फिर एक और पुत्र उत्पन्न करने के लिये कहा । उसपर भी पुत्र उत्पन्न करने के लिये चौथी वार क्यों ऐसी पतिव्रता कुन्ती ने कहा-हे महाराज ! पुत्र से रहित आज्ञा देने को तय्यार है ? ॥७५/७८॥ होने की आपत्ति के समय में भी धर्म जाननेवाले आदिपर्व का एक सौ तेईस अध्याय समाप्त हुआ । अथ चतुर्विशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १२४ ॥ वैशम्पायन उवाच-कुन्तीपुत्रेषु जातेषु च-कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च मद्रराजसुता पाण्डे रहो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ न मेऽस्ति त्वयि संतापो विगुणेऽपि परन्तप नावरत्वे वराहायाः स्थित्वा चानघ नित्यदा ॥ २ ॥ गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा । श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत्कुरुनन्दन एक सौ चौवीस अध्याय ।। १२४ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अनन्तर के नाश करनेवाले ! आपके मुझपर कृपायुक्त न कुन्ती और गान्धारी के पुत्रों के उत्पन्न होने पर रहने के कारण मुझे कोई विशेष दुःख नहीं है। माद्री एकान्त में राजा पाण्डु से बोली-हे शत्रुओं । हे अनघ ! सम्मान के योग्य कुन्ती की अपेक्षा . - orococococ0 -coconcoconoon. 1250 0000000000 000000000 ६०० महा मारत [ आदि पर्व :omorroremeona इदं तु मे महदुःखं तुल्यतायामपुत्रता । दिष्टया विदानीं भर्तुम कुन्त्यामप्यस्ति सन्ततिः ॥ ४ ॥ यदि त्वपत्यसन्तानं कुन्तिराजसुता मयि कुर्यादनुग्रहो मे स्यात्तव चापि. हितं भवेत् ॥ ५ ॥ संरम्भो हि सपत्नीत्वाद्वक्तुं कुन्तिसुतां प्रति । यदि तु त्वं प्रसन्नो मे स्वयमेनां प्रचोदय ॥ ६ ॥ पाण्डुरुवाच-ममाप्येवं सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्तते न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया ॥७ ॥ तव विदं मतं मत्वा प्रयतिष्याम्यतः परम् । मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचनं प्रतिपत्स्यते ॥ ८ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः कुती पुनः पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत् । कुलस्य मम सन्तानं लोकस्य च कुरु प्रियम् ॥ ९ ॥ मम चापिण्डनाशाय पूर्वेपामपि चात्मनः मप्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ १० ॥ यशसोऽर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् । प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोऽर्थिना ॥ ११ ॥ अपना कम आदर होने से भी दुःख नहीं है । हे | मुझपर प्रसन्न हो तो आप ही उसको आज्ञा 'कुरुनन्दन ! गान्धारी के एक सौ पुत्र हुए सुनकर | दीजिए ॥४६॥ भी मुझे कुछ खेद नहीं हुआ ॥१३॥ यह सुनकर पाण्डु ने कहा-हे माद्री ! इस मुझको तो बड़ा भारी दुःख यही है कि आपके विषय में मै सदा मन ही मन में सोचा करता हूं। पुत्र उत्पन्न करने की शक्ति से हीन होने के कारण परन्तु तुम इसके लिये रानी हो या न हो, यह जानकर कुन्ती और मै दोनों ही पुत्र का मुख नहीं देख | तुममे कहने को साहस नहीं हुआ था । इस समय सकती थीं। तोभी मेरे सन्तान नहीं हुई भाग्यवश तुम्हारी इच्छा मुझे मालूम हो गई है। इसलिए कुन्ती से आपके सन्तान हुई है । इस समय यदि | इस विषय में तुम्हारे लिए उपाय भी करूंगा । मुझे कुन्ती मुझपर कृपा करे तो मै भी पुत्र का मुख निश्चय है कि कुन्ती मेरे कहे को कभी भी न देख सकती हूं । इससे आपका भी हित हो सकता टालेगी । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! है। कुन्ती मेरी सौत है इसलिये मै स्वयं उससे | इसके पश्चात् पाण्डु ने कुन्ती को एकान्त में बुलाकर इसके लिये प्रार्थना नहीं कर सकती । यदि आप कहा-हे कल्याणि ! मैं कुल की वृद्धि के लिये एक wrococococcccccwearconcercarconcoroncorozroroor oooooo4 अध्याय १२४ ] महा भारत 7215 oremonocorruconarconoroorne तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुप्करम् । गुरूनभ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय भाविनि ॥ १२ ॥ तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः । चकुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ॥ १३ ॥ सा त्वं माद्री प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृञ्चिन्तय दैवतम् । तस्मात्ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ॥ १५॥ ततो माद्री विचार्य जगाम मनसाश्विनी तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमौ भुवि तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी सत्वरूपगुणोपेतो भवतोऽत्यश्विनाविति भासतस्तेजसात्यर्थं रूपद्रविणसम्पदा नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः भक्त्या च कर्मणा चैव तथाऽऽशीभिर्विशाम्पते ॥ १९ ॥ बात कहता हु । उसके करने से मेरा बड़ा प्रिय माद्री के सन्तान उत्पन्न हो जाये तो ससार में तुम्हारा और तुम्हारी संसार में बड़ी कीर्ति होगी ॥७॥१०॥ यश फैल जायेगा । अपने पति के ये वचन सुनकर तुम कीर्चि के लिये इस कार्य को हाथ में ले । कुन्ती ने माद्री से कहा-तुम एक बार किसी देवता लो। देखो, यश के लिये इन्द्र ने अधिपति होने का स्मरण करो । नि सदेह उससे तुम्हारे पुत्र पर भी बड़े-बड़े यज्ञ किये थे । मन्त्र जाननेवाले उत्पन्न होगा ! माद्री ने अच्छीतरह सोचकर अन्त ब्राह्मण लोग यश ही के लिये कठोर तपकर गुरु की | में अश्विनीकुमारों का स्मरण किया। स्मरण करते उपासना किया करते है । राजर्षि और तपोधन । ही कुन्ती के मन के बल से दोनों अश्विनीकुमार ब्राह्मण यश ही के लिये तरह-तरह के कठिन काम वहा आ गये । उनके द्वारा माद्री के गर्भ से नकुल और सहदेव नामक अनुपम रूपवान् यमज (जोड़ा) इसलिए हे निन्दावर्जित प्यारी ! तुम पुत्र पुत्र उत्पन्न हुए ॥१४॥१६॥ हीनता-रूप भयानक समुद्र में डूबी हुई माद्री को उनके उत्सन्न होते ही आकाश-वाणी हुई- नार की तरह उवार लो । यदि तुम्हारी कृपा से | अश्विनीकुमारों के ये दोनों पुत्र बलवान् और बड़े - करते है ।।११।१३॥ 000000ooroce [ आदिपर्व ६०२ महाभारत 20.0oolcohoore । ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन्. पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ॥ २१॥ अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्चसंवत्सरा इव ॥ २२ ॥ महासत्त्वा महावीर्या महावलपराक्रमाः पाण्डुदृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान्महौजसः ॥ २३ ॥ मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ॥ २४॥ प्रिया वभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् । कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्रयर्थे समचोदयत् ॥ २५॥ तमुवाच पृथा राजनरहस्युक्ता तदा सती उक्ता सकृद्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ॥ २६ ॥ विभेम्यस्याः परिभवात्कुस्त्रीणां गतिरीहशी नाज्ञासिपमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ॥ २७॥ ही सुन्दर होंगे । ये रूप और तेज में अश्विनीकुमारों | वर्ष की अवस्था वाले जान पड़ते थे । राजा पाण्ड से भी अधिक होंगे। हे पृथ्वीनाथ ! अनन्तर उन पुत्रों को देव-समान तेजस्वी देखकर बड़े शतशृङ्ग पर्वत पर रहनेवाले ब्रामणों ने कुमारों के आनन्दित हुए ॥२१॥२३॥ आश्चर्य काम और भक्ति देखकर प्रसन्नचित्त से शतशृंग पर्वत पर रहनेवाले ऋषि और उनकी आशीस देकर नाम रख दिये । उन्होंने कुन्ती के स्त्रियां अत्यन्त आनन्दित होकर उन पालकों को पुत्रों में बड़े का नाम युधिष्ठिर, मझले का नाम प्यार करती थीं। कुछ समय के व्यतीत होने पर भीमसेन, छोटे का नाम अर्जुन रक्खा ॥१७॥२०॥ | पाण्डु ने फिर कुन्ती से माद्री के पुत्र उत्पन्न होने मादी के दो पुत्रों में से पहले जन्म लिये हुए के लिये प्रार्थना की। कुन्ती ने उत्तर दिया कि का नाम नकुल और दूसरे का नाम सहदेव रक्खा। | मैंने एक पुत्र उत्पन्न होने के लिये मन्त्र दिया था सौ कुरुवंश में श्रेष्ठ पांचों बालक दिनों दिन व ते हुए उसने अपनी ठगई से युग्मदेवों को बुलाकर दो पुत्र वल, वीर्य और पराक्रम से पूर्ण होने लगे। उनकी उत्पन्न किये । मैं ऐसा नहीं समझी थी कि इनका आयु जब एक-एक वर्ष की हुई तब वे पांच-पांच नाम द्विवचन होने से पुत्र भी दो ही होंगे। इससे ocococcomco000conomoooo-cono.
अध्याय १२५ ] महा भारत तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैपोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ॥ २८॥ संभूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः शुभलक्षणसंपन्नाः सोमवत्प्रियदर्शनाः ॥२९॥ सिंहदर्पा महेष्वासाः सिंहविक्रान्तगामिनः । सिंहग्रीवा मनुष्येन्द्रा क्वृधुर्देवविक्रमाः ॥३०॥ विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । विस्मयं जनयामासुमहर्षीणां समेयुपाम् ॥ ३१ ॥ ते च पञ्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धनाः । सर्वे ववृधुरल्पेन कालेनाप्स्विव नीरजाः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डवोत्पत्ता चतुर्विशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥ अब आप मुझसे उसके लिये कुछ न कहिये । | नेत्रोंवाले, सिंह सदृश विक्रमी, सिंह के समान अधिक पुत्र होने से माद्री मेरा अपमान कर गर्दनवाले, सिंह के विक्रम से पूरित स्थान में जाने- सकती है। क्योंकि बुरी स्त्रियों का स्वभाव ऐसा ही वाले, देवताओं के समान विक्रमी होकर दिन पर होता है । हे महाराज ! इस प्रकार देवताओं के | दिन बढ़ने लगे । पवित्र हिमालय पर रहनेवाले दिये हुए, महावली, कीर्तिशाली, कुरुवंश बढ़ाने- | महर्पियों ने उनको इस प्रकार बढ़ते देखकर बड़ा वाले पाण्डु के पांच पुत्र हुए। वे मनुष्यों में श्रेष्ठ | आश्चर्य माना । पाचों पाण्डव और धृतराष्ट्र के पाण्टु लोग शुभलक्षणयुक्त, चन्द्रमा के समान देखने एक सौ पुत्र जल में कमल की नाई थोड़े ही काल में प्रिय, बड़े चापधारी, सिंह के समान छाती- में बढ़कर समर्थवान् हो गये ॥२४॥३२॥ वाले, सिंह के समान शक्तिवाले, सिंह के समान आदिपर्व का एक सौ चौवीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १२५ ॥ वैशम्पायन उवाच-दर्शनीयांस्ततः पुत्रान्पाण्डुः पञ्च महावने । तान्पश्यन्पर्वते रम्ये स्वबाहुवलमाश्रितः ॥ १ ॥ एक सौ पचीस अध्याय ॥ १२५ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अनन्तर पर्वत पर सुख से समय व्यतीत करने लगे। एक राजा पाण्डु देखने के योग्य उन पाच पुत्रों को समय चैत्र वैशाख के दिनों में वसंत ऋतु के आने देखकर केवल अपने बाहुबल के आश्रय से उस पर नाना प्रकार के फलों और फूलों से सजे हुए coccorerooroorcoicrocioormonocroreon [ आदिपर्व ६०४ महा मारत 0000000oncolo000/202 0000000000 । - सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे भूतसंमोहने राजा सभार्यों व्यचरद्वनम् पलाशैस्तिलकैश्चतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः अन्यैश्च बहुभिवृक्षैः फलपुप्पसमृद्धिभिः ॥ ३ ॥ जलस्थानश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् । पाण्डोवन तत्संप्रेक्ष्य' प्रजज्ञे हृदि मन्मथः ॥ ४ ॥ प्रहृष्टमनसं तत्र विचरन्तं यथामरम् तं माद्रयनुजगामैका वसनं विभ्रती शुभम् ॥ ५ ॥ समीक्ष्यमाणां स तु तां वयःस्थां तनुवाससम् । तस्य कामः प्रववृते गहनेऽग्निरिवोद्गतः रहस्येकां तु तां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् । न शशाक नियन्तुं तं कामं कामवशीकृतः ॥ ७ ॥ तत एनां चलाद्राजा निजग्राह रहोगताम् । वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथावलम् ॥ ८ ॥ स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत । माद्री मैथुनधर्मेण सोऽन्वगच्छबलादिव ॥ ९ ॥ जीवितान्ताय कौरव्य मन्मथस्य वशंगतः । शापजं भयमुत्सृज्य विधिना संप्रचोदितः ॥१०॥ वन में राजा पाण्डु स्त्री-सहित घूमने लगे। वहां के हृदय पर कामदेव का अधिकार प्रगट हुआ । देखा कि चारों ओर गूजनेवाले भारों से ढके हुए | सुन्दर वस्त्र पहने हुए माद्री अकेली प्रसन्नचित्त से पलाश, तिलक, आम, चम्पा, पारिभद्रक, कर्णिकार, देवता समान घूमते हुए उस राजा के पीछे-पीछे केशर, अतिमुक्त, अशोक, कुरुक्क, मदार और | चलने लगी। तब पतला सुन्दर वस्त्र पहने हुए दूसरे पौदे अनेक प्रकार के फलों और फूलों से | युवती माद्रो को देखकर राजा के हृदय में इस सजे हैं । कोयल कूक रही है । मधु मक्खी भिन प्रकार मदन की आग सुलग उठी कि जैसे वन में भिनाती हुई गीत गा रही है ॥१५॥ आग लग जाती है ॥६॥ ताल खिले हुए पद्म के वनों से शोभित है । वे एकान्त में उस सुन्दर नेत्रोंवाली माद्री को वसन्त ऋतु की शोभा को देखते हुए राजा पाण्डु पाकर अपने आप को संभाल न सके। काम के 20000roo 00000000 - अध्याय १२५ ] महा भारत 000ocomorrora commroomnorammermics. तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात्कालेन मोहिता । संप्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रनष्टा सह चेतसा स तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दनः । पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा ॥ १२ ॥ ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् । मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः . पुनरतीव हि ॥ १३ ॥ सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः ॥ १४ ॥ ततो मायब्रवीद्राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः । एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवाधाय दारकान् । हताहमिति विक्रुश्य सहसैवाजगाम सा दृष्ट्वा पाण्डं च माद्री च शयानौ धरणीतले । कुन्ती शोकपरीताही विललाप सुदुःखिता ॥ १७॥ रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् । कथं त्वामत्यतिक्रान्तः शापं जानन्वनौकसः ॥ १८ ॥ वश में हुए-हुए राजा पाण्डु ऋषि के शाप को भूल मृत्यु को प्राप्त हुए ॥९॥१२॥ गये और माद्री को पकड़कर बलपूर्वक अपनी इच्छा यह देखकर मादी ने राजा को हृदय से लगा पूरी करने के लिए तैय्यार हुए। माद्री शाप को लिया और बड़े ऊचे स्वर से रोने-पीटने लगी। याद करके डर से कापने लगी और यथाशक्ति आगे पुत्रों के साथ कुन्ती और माद्री के दोनों राजा को रोकना चाहा । परन्तु राजा ने किसी पुत्र उस शोक्युक्त शब्द को सुनकर एकत्र हो करके प्रकार नहीं माना; माद्री को नहीं छोड़ा । हे राजन् ! वहा जाने लगे जहा राजा की वह दशा हुई थी। पाण्डु की आयु पूरी हो चुकी थी, इसी से काम में । हे महाराज ! उनको दूर से देखकर माद्री ने कुन्ती अन्धे होकर उन्होंने शाप की याद दिलाने पर भी | से कहा-हे बहन ! तुम अकेली ही यहां आओ, उसकी कुछ परवा नहीं की। उनकी बुद्धि कालवश लड़कों को वहीं छोड़ दो । पुत्रों को वहीं छोड़कर मोह को प्राप्त होकर, इन्द्रियों को उत्तेजित करके, कुन्ती "हाय मैं मारी गई" कहकर रोती-पीटती प्राणों की गाहक बन गई । हे महाराज ! इस प्रकार हुई उसीक्षण माद्री के पास आ पहुंची ॥१३॥१६॥ कुरुनन्दन धर्मात्मा पाण्डु स्त्री के साथ मिलते ही और माद्री के साथ पाण्डु को धरती पर लेटे Corrrrrrrowrooooooooroomorrorcare ६०६ महाभारत [ आदिपर्व प्रहृष्टस्य महीपतेः ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो नराधिपः । सा कथं लोभितवती विजने वं नराधिपम् ॥ १९ ।। कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् । तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्पः समजायत ॥ २० ॥ धन्या त्वमसि वाहीकि मत्तो भाग्यतरा तथा । दृष्टवत्यसि यद्वक्त्रं प्रहृष्टस्य ॥ २१ ॥ माद्रयुवाच-विलपन्त्या मया देवि वार्यमाणेन चासकृत् आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ॥ २२ ॥ कुन्त्युवाच-अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम । अवश्यंभाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ॥ २३ ॥ अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् . । उत्तिष्ठ वं विसृज्यैनमिमान्पालय दारकान् ॥ २४ ॥ माव्यवाच-अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ॥ २५ ॥ मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद्भरतसत्तमः । तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ॥ २६ ॥ हुए देखकर शोक से विह्वल हुई और अति दु ख मुझसे अधिक भाग्यवती हो । क्योंकि तुमने काम- से विलाप करके माद्री से कहने लगी-हे माद्री ! युक्त महाराज का प्रफुल्ल मुख देखा है ॥१७॥२१॥ मै वीर जितेन्द्रिय राजा को सदा इस काम से माद्री ने कहा-हे देवी ! मैं विलाप करती हुई बचाये रखती थी। ऋषि के शाप को जानते हुए बार-बार राजा को रोकती थी परन्तु राजा शाप के भी उन्होंने कैसे तुमको पकड़ लिया ? हे माद्री ! | हेतु दुर्भाग्यता सफल करने ही के लिये अपने को तुमको उस समय पति की रक्षा करनी चाहिये थी। नहीं रोक सके । अनन्तर कुन्ती ने कहा-हे माद्री! तुमने एकान्त में महाराज के पास रहकर उन्हें ! मैं बड़ी धर्मपत्नी हूं, पतिव्रता धर्म का प्रधान फल कामान्ध क्यों बनाया ? यह शाप से ग्रसित होने | मुझे ही मिलना चाहिये । सो हे माद्री ! अवश्यमेव के समय से वे सदा दु.खी चित्त से उस शाप के | होनेवाले विषय से तुम मुझे मत रोको । मैं मरे हुए सोच में रहते थे। फिर एकान्त में तुमको पाकर पति के साथ, सती होकर, स्वर्ग को जाऊंगी । तुम उस शाप को भूलकर वै कैसे प्रफुल्ल होकर कामवश | इनको छोड़कर इन बालकों की रक्षा करना।।२२।२४॥ हो गये! हे वाहीक कुमारी ! तुम्ही धन्य और यह सुनकर माद्री ने कहा-मैं कामरस से अभी -- coniromcoroscopicnicsrarearriecororeore 00.00 अध्याय १२६ ] महा भारत 000Conorocoso न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेपं सुतेषु ते । वृत्तिमायें चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ॥ २७ ॥ तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ॥ २८ ॥ राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदायें प्रियं कुरु ॥ २९ ॥ दारकेष्वप्रमत्ता च भवैथाश्च हिता मम । अतोऽन्यं न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ॥ ३० ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्पभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद्यशस्विनी ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपणि पाण्डूपरमे पश्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ।। अच्छीतरह तृप्त नहीं हुई हूं, इस कारण मैं ही ये राजा मेरी ही कामना करके परलोक को सिधारे इनके साथ सती होऊंगी । तुम मुझसे बड़ी हो, हैं । मेरे इस शरीर को तुम इनके साथ जला दो। इसलिये मुझे आज्ञा दो। इन भरतकुल-प्रदीप ने हे आयें ! ऐसा करने से ही मुझे प्रसन्नता होगी । मुझपर ही आसक्त होकर जान दी है, इसलिये उनके | इसके मिवाय मै यही प्रार्थना करती हूं कि मेरे साथ जाकर उनकी इच्छा पूरी करना मेरा धर्म और पुत्रों को तुम अपने पुत्रों के समान जानना । इसके कर्तव्य है । हे आयें ! ऐसा नहीं जान पड़ता है कि मैं | अतिरिक्त मुझे तुमसे और कुछ कहना नहीं है । जीवित रहकर तुम्हारे पुत्रों को अपने पुत्रों की तरह वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! उस धर्मपत्नी पाल सकूँगी, सो इस हेतु मुझको पाप की आच यशयुक्ता मद्रराज की कन्या ने यह कहकर अपने लग सकती है। इसलिए हे कुन्ती ! तुम मेरे इन प्राण छोड़ दिये ॥२५॥३१॥ दोनों पुत्रों से अपने पुत्रों की तरह वर्ताव करना । आदिपर्व का एक सौ पच्चीस अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ पड्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १२६ ॥ वैशम्पायन उवाच-पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्पयः ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयाञ्चक्रिरे मिथः एक सौ छच्चीस अभ्याय ॥ १२६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! पाण्डु सब महर्षि तपस्वीगण एकत्र होकर आपस में इस की मृत्यु को देखकर देवताओं के समान युक्तिदाता प्रकार सलाह करने लगे कि महायशस्वी महात्मा concorroroconocoracococcil . - न हुई। नगर बहुत दूर होने पर भी उसे पास ही जान पड़ा। यशस्विनी कुन्ती ने थोडे समय में ही [ आदिपर्व 2010004 poooooooooooooo वहा तपस्वियों ने द्वारपालों से कहा राजा धृतराष्ट्र ६०८ महाभारत oorwwormoroon तापसा ऊचु -हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशाः । अस्मिन्स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाशरणं गतः ॥ २ ॥ स जातमात्रान्पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह प्रादायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः तस्येमानारमजान्देहं भायां च सुमहात्मनः । स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नःस्मृतः ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः पाण्डोः पुत्रान्पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ॥ ५ ॥ उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः भीष्माय पाण्डवान्दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ॥ ६ ॥ तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे । पाण्डोरांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः ॥ ७ ॥ सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला । प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत ॥ ८ ॥ सा त्वदीर्पण कालेन संप्राप्ता कुरुजाङ्गलम् । वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी द्वारिणं तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय । ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः ॥ १० ॥ पाण्डु ने राज्य को छोड़कर इस स्थान में तप करते को लेकर हस्तिनापुर जाना चाहा और उसी समय के हुए तपस्वियों की शरण ली थी। वे स्त्री और बच्चों पाण्डको स्त्री, पुत्रा और दोनों लाशों को लेकर गये को इस स्थान में हमारे पास छोड़कर स्वर्ग को चले । पुत्रवत्सला कुन्ता को अपनी राजधानी में जाने की गये है । इसरिए आओ, हम उन महात्मा के मृत शरीर रानी और पुत्रों को लेकर उनकी राजधानी उत्सुक्ता के कारण राह की यकावट कुछ भी मालूम देव सदृश महपियों ने आपस में ऐसी युक्ति कर भीष्म और धृतराष्ट्र को सौंप देने के लिये पाण्डवों में ||५/९॥ Yocorynorocorocoroccoyooooooor Dorcarton अध्याय १२६ ] महाभारत 000000000orporcorosoochoom capoor0000 तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा । श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मयः समपद्यत मुहूोंदित आदित्ये सर्वे वालपुरस्कृताः सदारास्तापसान्द्रष्टुं निर्ययुः निर्ययुः पुरवासिनः ॥ १२ ॥ स्त्रीसङ्घाः क्षत्रसङ्घाश्च यानसंघसमास्थिताः । ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुाह्मणानां च योपितः ॥ १३ ॥ तथा विट्झंद्रसङ्घानां महान्व्यतिकरोऽभवत् । कश्चिदकरोदामभवन्धर्मबुद्धयः ॥ १४॥ तथा भीष्मः शान्तनवः सोमदत्तोऽथ वाहिकः । प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्पिः क्षत्ता च विदुरः स्वयम् ॥ १५ ॥ सा च सत्यवती देवी कोसल्या च यशस्विनी । राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः भूपिता भूषणैश्चित्रैः शतसङ्ख्या विनिर्ययुः ॥ १७ ॥ तान्महर्पिगणान्दृष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः ॥ १८ ॥ तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च उपोपविविशुः सर्वे पौरजानपदा अपि को हमारे आने की सूचना दे दो। द्वारपालों ने उमी और चले । उस समय किसी ने किसी पर कैप उसीक्षण राज्यसमा में जाकर पियों के आने की प्रगट नहीं किया। सबकी बुद्धि धर्म-मार्ग में स्थित मूचना दी। हम्निनापुर में अनेक गुह्यक मुनियों के रही । शान्तनु के पुत्र भीष्म, वाहीक, सोमदत्त, आने की खबर पाकर पुरवासियों को बड़ा अचरज प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र, विदुर, देवी सत्यवती, हुआ । फिर सूर्योदय के पश्चात् पुत्रों और पियों यगम्विनी कानाराज की कन्या अम्बिका और को साथ लिये हुए सब पुरवासी लोग तपस्वियों के अन्यान्य युरुवंशियों की स्त्रियों के साथ गान्धारी दर्शन के लिये वहां पहुंचने लगे ॥१०॥१२॥ भी चली ।।१३।१६॥ यानों (टकह) पर चढ़े हुए क्षत्रिय, उनकी स्त्रियां, दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के सौ पुत्र भी अनेक मामण, उनकी स्त्रियां, वैदय और शूद आदि सर प्रकार के मुन्दर गहनों से मजकर यहां पहुंन । । Arise ArrJr.oroscococcccirmirmire महा भारत [ आदिपर्व 0.000 coco0003colod circrorevasieswar तमकूजमाभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा पूजयित्वा यथान्यायं पायेनार्येण च प्रभो ॥ २० ॥ भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्पिभ्यो न्यवेदयत् । तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी । ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥ यः स कौरव्यदायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः । काम भोगान्परित्यज्य शतशृङ्गमितो गतः ॥ २२ ॥ ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना साक्षाद्धर्मादयं पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिरः ॥ २३॥ तथैनं वलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः मातरिश्वा ददौ पुत्र भीमं नाम महावलम् ॥ २४ ॥ पुरुहूतादयं जज्ञे कुन्त्यामेव धनञ्जयः यस्य कीर्तिमहेष्वासान्सर्वानभिभविष्यति यो तु माद्री महेष्वासावसूत पुरुषोत्तमौ । अश्विभ्यां पुरुषव्याघ्राविमौ तावपि पश्यत ॥ २६ ॥ चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना । नष्टः पैतामहो वंशः पाण्डुना पुनरुद्धृतः ॥ २७ ॥ कुरुवंश के सब लोग उन तपस्वियों के समीप आये। | के आधीश महाराज पाण्डु विषय-भोग छोड़कर तपस्वियों को देखकर उन सब ने प्रणाम किया। तप करने के लिये यहां से शतशृंग पर्वत पर गये उनकी आज्ञा पाकर वे नागरिक और ग्रामवासी थे। उनके ब्रह्मचर्य व्रत के घारण करने पर किसी लोग सब सिर झुकाकर प्रणाम करके उनके दिव्य कारण से शतशृंग पर साक्षात् धर्म से इस पुत्र पास बैठ गय । अनन्तर भीम ने चारों ओर सब का जन्म हुआ है । इसका नाम युधिष्ठिर है । उन लोगों को चुपचाप देखकर पाद्य, अर्घ्य देकर उन महात्मा का मंझला पुत्र यह महाबली भीमसेन वायु ऋषियों का सत्कार और पूजन किया। इसके पश्चात् । से उत्पन्न हुआ है । उनका सबसे छोटा पुत्र यह राज्य और राजधानी के कुशल-मंगल का हाल अर्जुन इन्द्र के द्वारा कुन्ती के गर्भ से उत्पन हुआ सुनाया । इसके पश्चात् उनमें से एक बहुत बूढे, है । यह अपनी फीति से सम्पूर्ण चापपारियों को बड़ी जटा और मृगछाला धारण किये हुए मुनि ने पराजय करेगा ॥१७॥२६॥ उठकर सबकी सम्मति लेकर कहा-देखो, कौरवराज्य माद्री ने अधिनीकुमार देवों की कृपा से इन दो 5c0/20c100000 M.irora अध्याय १२६ ] महा भारत Ooncoconom000. 7Coca0000000000000000 पुत्राणां जन्म वृद्धिं च वैदिकाध्ययनानि च । पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ ॥ २८॥ वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य च । पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि ॥ २९ ॥ तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम् प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मनः ॥३०॥ सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता तस्यास्तस्य च यत्कार्य क्रियतां तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥ इमे तयोः शरीरे द्वे पुत्राश्चेमे तयोर्वराः । क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परन्तपाः ॥ ३२ ॥ प्रेतकार्ये निवृत्ते तु पितृमेधं महायशाः । लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा कुरून्सर्वान्कुरूणामेव पश्यताम् । क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे तापसा गुह्यकैः सह ॥ ३४ ॥ गन्धर्वनगराकारं तथैवान्तर्हितं पुनः ऋपिसिद्धगणान्दृष्ट्वा विम्मयं ते परं ययुः ॥ ३५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि पिमंवादे पद्दविंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥१२६ ।। महाबली पुस्प-श्रेष्ठ पुत्रों को उत्पन्न किया है। की जो क्रिया करनी हो सो करो। उन दोनों की इनका नाम नकुल और सहदेव है । यशम्वी धर्मात्मा राश हम यहा ले आये हैं। प्रेत-कार्य होने से पाण्ड ने वन में रहकर नष्ट होनेवाले पिता के इस अति यशवी सर्व धर्म जाननेवाले कुरवंशियों में वंश का फिर से उद्धार किया है। इस समय तुमको श्रेष्ठ पुरुप पाण्टु को अन्नही गति मिले। इन पुत्रों पाण्दु के पुत्रों का जन्म, वृद्धि और वेदपाठ देख- के रिये मी जो कुछ मालिक कर्म करने चाहिये सुनकर आनन्दित होना चाहिये ॥२७॥२९॥ उन्हें करके इन्हें और कुन्नी को ग्रहण करो। इन्हें मुनि प्रतधारी महाराज पाण्डु पुत्र प्राप्त करके प्रहण करना तुम्हारा धर्म और कर्तव्य है विशम्पायन आज सात दिन हुए पितृरोक को सिधार है । ने कहा-हे राजा जनमेजय ! तपम्बी रोग ये उनके साथ ही पतिव्रता मादी ने भी अपना शरीर कहकर गुपका सहित उनके सामने से उसीक्षण छोर दिया है। यह उनके साथ ही उनकी गनि चले गये । उन प्रापि और मिद्धों को गन्धयों के को प्राप्त हुई है। अब तुम रोग टनके पररोक नगर की तरह टपस्थित होते और फिर अन्तदान CAUCOorury ADAMOVIC "5-7500/- महा भारत [ आदिपर्व 000000cco0000200co/ होते देखकर सबने आश्चर्य किया ॥३०|३५|| आदिपर्व का एक सौ छब्बीस अभ्याय समाप्त हुआ। अथ सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२७ ॥ धृतराष्ट्र उवाच---4 -पाण्डोर्विदुर सर्वाणि प्रेतकार्याणि कारय । राजवद्राजसिंहस्य मायाश्चैव विशेषतः ॥ १ ॥ पशून्वासांसि रत्नानि धनानि विविधानि च । पाण्डोः प्रयच्छ मायाश्च येभ्यो यावञ्च वाञ्छितम् ॥ २ ॥ यथा च कुन्ती सत्कारं कुर्यान्माद्यास्तथा कुरु । यथा न वायुर्नादित्यः पश्येतां तां सुसंवृताम् ॥ ३ ॥ न शोच्यः पाण्डुरनघः प्रशस्यः स नराधिपः । यस्य पञ्च सुता वीरा जाताः सुरसुतोपमाः ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच-विदुरस्तं तथेत्युक्त्वा भीष्मेण सह भारत । पाण्डं संस्कारयामास देशे परमपूजिते ततस्तु नगरातूर्णमाज्यगन्धपुरस्कृताः निर्हताः पावका दीसाः पाण्डो राजन्पुरोहितैः ॥ ६ ॥ अथैनमार्तवः पुष्पैर्गन्धैश्च विविधैर्वरः शिविका तामलंकृत्य वाससाच्छाद्य सर्वशः एक सौ सत्ताईस अध्याय ॥ १२७ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे विदुर ! राज्यविधि के छोड़कर स्वर्गवासी हुए है । वैशम्पायन ने कहा- अनुसार पाण्डु और मादी का क्रियाकर्म अच्छी- हे भारत 1 विदुर ने 'बहुत अच्छा' कहकर माटम के प्रकार कराओ । पाण्डु और माद्री के नाम पर पशु, साथ जाकर परमपवित्र स्थान में पाण्डु के दाहकर्म वा, धन और नाना प्रकार के रन आदि जितना का प्रबन्ध कर दिया । राजपुरोहित लोग शीघ्र जो चाहे उतना उसे दो। कुन्ती जिसतरह माद्री राजा पाण्डु के दाह करने के लिये नगर से सुगन्धयुक्त का सत्कार करना चाहे उसीतरह होने का प्रबन्ध प्रज्वलित अमि लेकर चले । आग्नि में जलते हुए करो। माद्री की लाश इस प्रकार लपेट कर रक्खो घी की सुगन्ध चारों ओर फैल गई। इसके पश्चात् कि वायु और सूर्य मी न देख सकें ॥१॥३॥ राजमंत्री जाति के माई-बन्धु पुरवासी वस्त्र से निष्पाप राजा पाण्डु के लिये शोक न करो, | पाण्डु के शरीर को ढककर तरह-तरह के फल, क्योंकि वे देवकुमार सान, शूरवीर पांच पुत्र । सुगन्धयुक्त बहुत कीमती वस और माला - ccc•»oyococces अध्याय १२७ ] महा भारत ००००० chooco तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः । अमात्या ज्ञातयश्चैनं सुहृदश्चोपतस्थिरे नृसिंह नरयुक्तेन परमालंकृतेन तम् अवहन्यानमुख्येन सह मान्या सुसंवृतम् ॥ ९ ॥ पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन सर्ववादिननादैश्च समलंचक्रिरे ततः रत्नानि चाप्युपादाय बहूनि शतशो नराः प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तस्योर्ध्वदेहिके ॥ ११ ॥ अथ च्छत्राणि शुभ्राणि चामराणि बृहन्ति च । आजन्हुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च ॥ १२ ॥ याजकैः शुक्लचासोभिहूयमाना हुताशनाः । अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमानाः स्वलंकृताः ॥१३ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव सहस्रशः । रुदन्तः शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम् ॥ १४ ॥ अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते कृत्वा चास्माननाथांश्च क यास्यति नराधिपः ॥१५॥ कोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च । रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ॥१६ ॥ आदि से पालकी को सुशोभित कर उनके पास जा चंवर आदि सामग्री लेकर नौकर लोग चले ॥९॥१२॥ पहुंचे ॥४॥ श्वेत वस्त्र पहने पुरोहित लोग अमिहोत्र की इस प्रकार पालकी सजाकर सब लोग पाण्डु और आगलकर आगे-आगे चले। हज़ारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, माद्री के शवों को ले चले । किसी ने राजा पाण्डु | वैश्य, शूद्र शोकयुक्त होकर राजा के पीछे-पीछे चलने के ऊपर सफ़ेद छन लगा लिया । कोई चंवर हिलाने | लगे । सब पुरवासी ऊंचे स्वर से रोते हुए कहते लगा। चारों ओर अनेक प्रकार के बाजे बजते जा जाते थे कि हे राजा ! हमें अनाथ करके सदा के रहे थे । पाण्डु की औवं क्रिया के लिये सैंकड़ों लिये दुःख में डालकर आप कहां चले गये। इसके मनुष्य बहुत स्ल लेकर मांगनेवालों को दान देकर पश्चात् भीष्म, विदुर और पांचों पाण्डव रोते हुए प्रसन्न करने लगे । पाण्डु के लिये सफ़ेद वस्त्र, छत्र, गंगा के किनारे पर एक सुंदर वन में पहुंचे । वहां । 20060500005cm25c5c00000000000550
६१४
महा मारत
[ आदिपर्व
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न्यासयामासुरथ तां शिविकां सत्यवादिनः ।
स भार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोर क्लिष्टकर्मणः
ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् ।
शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरुपितम् ॥ १८॥
पर्यषिञ्चालेनाशु शातकुम्भमयैर्घटः
चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन्
कालागुरुविमिश्रेण तथा तुहरसेन च
अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन् ॥ २० ॥
संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः ।
शुशुभे स नरव्याघ्रो महाहंशयनोचितः ॥ २१ ॥
याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुष्ठिते
घृतावसिक्तं राजानं सह मान्या स्वलंकृतम् ॥ २२ ॥
तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना
अन्यश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन् ॥ २३ ॥
ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता
हाहा पुत्रेति कोसल्या पपात सहसा भुवि ॥ २४ ॥
तां प्रेक्ष्य पतितामाता पौरजानपदो जनः
रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या' कृपान्वितः ॥ २५ ॥
यह गलकी जिसमें राजा पाण्डु और रानी की लाशें जाने पर, जीवित से मालूम पड़ने लगे ॥१८॥२१॥
थी, रस दी गई ॥१३॥१७॥
अनन्तर ऋषिकों की आजानुसार प्रेत-कर्म
अनन्तर उन्होंने कृष्ण अगर से लिप्त और चन्दन | हो जाने पर उन्होंने मृत से नहाये और अहंकृत
और मुगन्धियों से सुगन्धित सुवर्ण के काम में माद्री सहित राजा को तुम और पद्म नामक सुगन्धित
लाये हुए जल से पाण्टु की देह को नहराकर पदार्थों से मिली हुई चन्दन की लकड़ी और दूसरे
चारों और सफेद चन्दन लगा दिया। फिर कृष्ण तरह-तरह के गन्धयुक्त पदार्थों से विधिपूर्वक दाह
अगर से मिले हुए तुंगरसनामक मुगन्धि पदार्थ से क्यिा । तब काशिराज की पुत्री कौशल्या माह से
स्पेटकर उनको सफेद यस से एक दिया। बहुत हाय पुर ! हाय पुत्र ! कदती हुई अचत होकर
कीमती पिम्ता पर महाराज पाण्टु यस पटनाये। ग्वी पर गिर पड़ो ॥२२॥२॥
अध्याय १२८ ] महाभारत 200heoncoroscompornooncore5001.00000000000000000 कुन्त्याश्चैवार्तनादेन सर्वाणि च विचुकुशुः मानुपैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ २६ ॥ तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः । सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन्भृशदुःखिताः ॥ २७॥ ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः । उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोपितः चुक्रुशुः : पाण्डवाः सर्वे भीमः शान्तनवस्तथा । विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्रुश्चाप्युदकक्रियाः ॥ २९ ॥ कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान् । सर्वाः प्रकृतयो राजञ्छोचमाना न्यवारयन् ॥ ३० ॥ यथैव पाण्डवा भूमौ सुपुपुः सह बान्धवैः । तथैव नागरा राजशिश्यिरे ब्राह्मणादयः ॥ ३१ ॥ तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् बभूव पाण्डवैः सार्ध नगरं द्वादश क्षपाः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पाण्डदाहे सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ।। नगरवाले और जनपद वासी उसको शोषयुक्त हे महाराज ! सब मंत्रीगण इन जल किया किये और गिरते हुए देसकर राजमक्ति से दया पूरित , हुए शोक से व्याकुल पाण्डयों को लेकर शोक करने और दुःखी होकर रोने लगे। कुन्ती के परम करुणा हुए अपने स्थान को लौट आये । पान्धवों सहित और दुःसयुक्त रोने को देखकर भीष्म, विदुर आदि । पाण्डवों को पृथ्वी पर रेटते देखकर ब्राह्मण आदि सब मनुष्य और पशु-पक्षी आदि जीव रोने लगे। । नगरवासी भी पृथ्वी पर लेटने लगे । बारह रात्रि इसके पीछे दाह क्रिया अन्त होने पर पाण्डवों ! तक पाण्डवों के दुःख से दुःम्बित, यालक से वृहे सहित भीष्म, विदुर, धृतराष्ट्र और सब कौरवों की तक, सब नगर के रहनेवाले शोकविह धारण किये सियों ने पाण्ड की जल किया की ॥२५॥२९॥ हुए मानन्दहीन रहे ॥३०॥३२॥ आदिपर्व का एक सौ माहम अध्याय ममाप्त हुआ । अथ अष्टाविंगरयाधिरशततमोऽध्याय ॥ १२८ ।। यशम्पायन उयार-ततः कुन्ती च राजा च भीष्मश्च सह बन्धुभिः । दुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमयं तदा arreirararararurera ६१६ म हा भारत [ आदिपर्व Hoono.00000000 कुरुंश्च विप्रमुख्यांश्च भोजयित्वा सहस्रशः रत्नौघान्विप्रमुख्येभ्यो दत्वा ग्रामवरांस्तथा ॥ २ ॥ कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान्भरतर्षभान् । आदाय विविशुः सर्वे पुरं वारणसाह्वयम् ॥ ३ ॥ सततं स्मानुशोचन्तस्तमेव भरतर्षभम् पौरजानपदाः सर्वे मृतं स्वमिव वान्धवम् ॥ ४ ॥ श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम् । संमूढां दुःखशोकार्ता व्यासो मातरमब्रवीत् ॥ ५ ॥ अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः । श्वः श्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना ॥ ६ ॥ बहुमायासमाकी! नानादोपसमाकुलः लप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति ॥ ७ ॥ कुरूणामनयाच्चापि पृथिवी न भविष्यति गच्छ स्वं योगमास्थाय युक्ता वस तपोवने ॥ ८ ॥ मा द्राक्षीस्त्वं कुलस्यास्य घोरं संक्षयमात्मनः । तथेति समनुज्ञाय सा प्रविश्याब्रवीत्स्नुपाम् ॥ ९ ॥ एक सौ अट्ठाईस अभ्याय ॥ १२८ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । अब सब प्रजा को दुःखी देखकर मोहयुक्त और दुःख कुन्ती, धृतराष्ट्र और भीष्म ने बन्धु-गान्धवों सहित गोक से विहल माता सत्यवती से कहा-हे माता! महाराज पाण्टु का थाद्ध और पिण्ड दान किया। अब सुख का समय व्यतीत हो गया; घोर विपत्ति श्राद्ध के अवसर पर सब कुरुवंशियों और हज़ारों का समय आ रहा है । दिनों दिन पाप बढ़ता जा अच्छे-अच्छ बामणों को भोजन कराये गये । उनको । पृथ्वी की सम्पत्ति और उपजाऊ शक्ति अनेक मुन्दर गांव और रस आदि भी दिये । घटती जा रही है । अब ऐसा समय आवेगा कि इस पूरा दो जाने पर सब नगर के पृथ्वी पर बड़े-बड़े छल और प्रपंच होंगे। धर्मक्रिया लोग पाण्डयों को लेकर हस्तिनापुर में आये । ये । और आचार का नाम तक भी न रहेगा ॥१७॥ अपने मरे हुए मित्र की माति टन कुरु-श्रेष्ठ पाण्ड कुरुओं की अनीति से मव देश और कुटुम्ब के लिये सदा शोक करने लगे। अनन्तर श्राद्ध का नाश होगा । इसलिय अब तुम यन में जाकर मिया के समाप्त हो जाने पर महर्षि व्यास ने आकर चिर की वृत्तियों को रोककर योग-मार्ग से तप करो। रहा अनन्तर असाच AprowserJAJ.JPrecurrorror अध्याय १२८ ] महा भारत 0000000 oooo Doooooooomco अम्बिके तव पौत्रस्य दुर्नयात्किलं भारताः सानुबन्धा विनंक्ष्यन्ति पौराश्चैवेति नः श्रुतम् ॥ १० ॥ तत्कौशल्यामिमामात पुत्रशोकाभिपीडिताम् । वनमादाय भद्रं ते गच्छामि यदि मन्यसे ॥ ११ ॥ तथेत्युक्त्वा त्वम्बिकया भीष्ममामन्य सुव्रता वनं ययौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत ॥ १२ ॥ ताः सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम । देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा ॥ १३ ॥ वेशम्पायन उवाच-अथाप्तवन्तो वेदोक्तान्संस्कारान्पाण्डवास्तदा । संव्यवर्धन्त भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि ॥ १४ ॥ धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तो मुदिताः सुखम् । वालक्रीडासु सर्वासु विशिष्टास्तेजसाभवन् ॥ १५ ॥ जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे धार्तराष्ट्रान्भीमसेनः सर्वान्स परिमर्दति ॥ १६ ॥ हर्षात्प्रक्रीडमानांस्तान्गृह्य राजन्निलीयते शिरःसु विनिमयैतान्योधयामास पाण्डवैः ॥ १७ ॥ इस बुढ़ापे की अवस्था में अपने वंश का घार नाश उनके साथ हो लीं ॥८॥१२॥ देखने के लिये यहां न रहो। यह सुनकर सत्यवती हे मारतश्रेष्ठ महाराज ! उन तीनों देवियों ने ने व्यासजी को 'बहुत अच्छा कहकर' विदा किया | यहां कठोर तपस्या करके देह छोड़कर अपनी इच्छा और आप महल में जाकर अपनी बहू अम्विका को के अनुसार सुगति प्राप्त की । वैशम्पायन ने कहा- चुलाकर कहा-मैने सुना है कि तुम्हारे पुत्र-पौत्रों हे राजन् ! इसके पश्चात् पाण्डव वेदों के अनुसार के अन्याय से अब आगे सब कुटुम्ब और देश का ! संस्कारों को पाकर नाना प्रकार के भोगों के पदार्थ नाश होगा । यदि तुम कहो तो मैं कौशल्या भागते हुए पिता के घर में बढने लगे । वे प्रसन्न- (अम्बालिका ) को जो पुत्र के शोक से अत्यन्त चित होकर धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ मुसपूर्वक दुखी है साथ लेकर वन में तपस्या करने चली जाऊ । , खेलते कृदते थे। पाण्डवों में धृतराष्ट्र के पुत्रों से [यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी चरी] हे राजा अधिक तेज और चल देरा पड़ता था। दौड़ने में, जनमंजय ! सत्यवती यों कहकर भीष्म की सम्मति ! निशानयानी में, खाने-पीने में, धूल फैक्ने आदि में से पन को चरी । अम्बिका और अम्यानिका भी भीमसेन पुनराष्ट्र के पुत्रों से मदार ये और 1 onurururunumoronarororor महा भारत [ आदिपर्व creomorroncorroncer शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम् । एक एव निगृह्णाति नातिकृच्छ्रावृकोदरः ॥ १८ ॥ कचेषु च निगृयैनान्विनिहत्य बलाबली चकर्ष क्रोशतो भूमौ धृष्टजानुशिरोंसकान् ॥ १९ ॥ दश वालाञ्जले क्रीडन्भुजाभ्यां परिगृह्य सः आस्ते स्म सलिले मनो मृतकल्पान्विमुञ्चति ॥ २० ॥ फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ते यदा । तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते दुमान् ॥ २१ ॥ प्रहारवेगाभिहता दुमा व्यापूर्णितास्ततः सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुतं त्रस्ताः कुमारकाः ॥ २२ ॥ न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन । कुमारा उत्तरं चक्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ॥ २३ ॥ एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं वाल्यान्न द्रोहचेतसा ॥ २४ ॥ ततो वलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । भीमसेनस्य तज्ज्ञावा दुष्टभावमदर्शयत् ॥ २५॥ उनको नीचा दिखाते थे ॥१३॥१६॥' पकड़कर गहरे जल में ले जाते और गोता देकर मुर्दा जब धृतराष्ट्र के पुत्र खेलते थे तब पाण्डव उनको ! करके छोड़ते थे ॥१७॥२०॥ पकड़कर एक दूओर से अलग कर देते थे और और जब कभी धृतराष्ट्र के पुत्र किसी वृक्ष पर उनके सिरों को पकड़कर एक दूसरे से लड़ा देते फल तोड़ने को चढ़ जाते तब भीमसेन उस वृक्ष को थे। उन बड़े तेजवंत एक सौ एक पुत्रों को अकेले | पकड़कर हिरा देते थे । इससे वे सय बालक और भीम दिछ किया करते थे। महाबली भीमसेन वल वृक्ष के फल नीचे गिर पड़ते थे । धृतराष्ट्र के सब से उनके केश पकड़कर मारते पीटते थे। किसी को बालक कुश्ती में, दौड़ने में और शिक्षा में किसी यात मही पर घसीटते और किसी का सिर गर्दन आदि में भीमसेन से कभी न जीत सके । भीमसेन धृतराष्ट्र रगड़ते थे। इससे किसी की जांघ में, किसी के के पुत्रों को कोई हानि नहीं पहुंचाना चाहते थे। केवल सिर में, और किसी के कन्धे में चोट मा जाती लड़ापन के स्वभाव के कारण लागयाजी रखकर थी । वे चोट से चिल्लाते ही रह जाते थे । भीमसन | धृतराष्ट्र के पुत्रों कोता किया करते थे।।२१।२४॥ उनमें से दस-दस बालकों को, दोनों हाथों से अगन्तर प्रतापी धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र दुर्योधन •rice" धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों पायालयरिन ।
अध्याय १२८ ] 1 Lowecovesic तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः मोहादेश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ॥ २६ ॥ अयं वलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । मध्यमः पाण्डुपुत्राणां निकृत्या संनिगृह्यताम् ॥ २७॥ प्राणवान्विक्रमी चैव शौर्यण महतान्वितः स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः ॥ २८॥ तं तु सुप्तं पुरोद्याने गढ़ायां प्रक्षिपामहे अथ तस्मादवरजं श्रेष्टं चैव युधिष्टिरम् ॥ २९ ॥ प्रसह्य वन्धने वध्वा प्रशासिष्ये वसुन्धराम् एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा । नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यामीन्महात्मनः ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत चैलकम्बलवेइमानि बिचित्राणि महान्ति च ॥ ३१ ॥ सर्वकामः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च । तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः ॥ ३२॥ उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्य ह ॥ ३३ ॥ भीमसेन का ऐसा अति प्रख्यात बल देखकर शत्रुता बलपूर्वक बांधकर मैं अकेला अकंटक होकर राज्य दिखलाने लगा । धर्महीन पापी दुर्योधन का चित करूंगा । पापात्मा दुर्योधन यो निश्चय करके महात्मा अज्ञानता और ऐश्वर्य के लोभ से पाप पर दौड़ा। भीमसेन को सदा ढूंढ़ने लगा । है भारत ! अन्त को वह विचारने लगा कि पाण्डवों में मंझला यह कुन्ती पुत्र उस पापी दुर्योधन ने जलक्रीड़ा के लिये गङ्गातट | इसतरह मैं इसका कुछ पर स्थित प्रमाणकोटि नामक स्थान में, जल के नहीं कर सकता। इसलिए इसको छल से ही मार किनारे स्थल में, कपड़े और कम्बल आदि के विचित्र डालना चाहिये । अत्यन्त बली वीर भीमसेन बड़े-बड़े डेरे और तम्बू लगवाये । उनमें तरह-तरह अकेला ही हम सबको हगता है ॥२५॥२८॥ की खाने-पीने की और सुखभोग सामग्रियां जब वह नगर के चाग में सो जायगा तब उसे रखवा दी 1 उन भवनों के ऊपर कई रंग की गंगा की धारा में फैक दूगा । इसके पश्चात् उसके ध्वजाएं फहराने लगी ॥२९॥३२॥ छोटे भाई अर्जुन और बड़े भाई युधिष्ठिर को हे भारत नन्दन! उस मवन का नाम 'जलक्रीड़ा' भीमसेन बड़ा बलवान् co.0000000mm महा भारत [ आदिपर्व 2000.occomod occerooroscowcascame310 . “भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च । उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ॥ ३४ ॥ न्यवेदयंस्तत्पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ॥३५॥ गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम् । सहिता भ्रातरः सर्वे जलकीडामवाप्नुमः ॥ ३६ ॥ एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः । ते रथेनगराकारैर्देशजश्च गजोत्तमैः ॥ ३७॥ निर्ययुर्नगराच्छ्रराः कौरवाः पाण्डवैः सह उद्यानवनमासाद्य विस्मृज्य च महाजनम् ॥ ३८॥ विशन्ति स्म तदा वीरः सिंहा इव गिरेहाम् । उद्यानमभिपश्न्तो भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ३९ ॥ उपस्थानगृहैः शुभैवलभीभिश्च शोभितम् । गवाक्षकैस्तथा जालर्यन्त्रैः साश्चारिकरपि ॥ ४०॥ समार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम् दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पुष्करिणीभिर्हि ॥ ४१ ॥ जलं तच्छुशुभे छन्नं फुल्लैलरुहेस्तथा । उपच्छन्ना वसुमती तथा पुप्पैर्यथर्तुकैः रक्खा गया । रसोई बनाने में चतुर, रसोईवालों ने समान बड़े-बड़े रथों और बड़े-बड़ शरीरवाले हाथियों चायने, चूसने, नाटने और पीने आदि की अनेक पर चढ़कर, नगर से बाहर निकले। नगर से प्रमाण- भोजन की वस्तुएं तैयार कर रक्खी । सब ठीक कोटि में पहुंचकर शूरवीर कौरवों ने साथ आने वाले हो जाने पर नौकरों ने आकर दुर्योधन को सूचना | लोगों को विदा किया ॥३३॥३८॥ दी । सय दुर्मति दुर्योधन ने पाण्डवों से कहा-चलो, फिर सिंह जैसे पर्वन की कन्दरा (गुफ़ा) में हम सब माई मिलर वन और यगीचे से सुशोभित प्रवेश करते है वैसे ही पाण्डव और धृतराष्ट्र के गंगा के किनारे जाकर यहां जरीड़ा करें। पुत्र, उपवन की शोभा देखने के लिये बाग में घुसे। युधिष्ठिर ने इस बात को स्वीकार कर लिया। वहां देखा कि श्वेत सुन्दर बैठकें बनी है । उन पृतराष्ट्र के पुत्र, पाण्डवों को साथ नगर के ! मुन्दर भवनों में बंगलेदार अण्टियां बनी हुई है। ॥४२॥ 5.0ccroccorroral.sinirvicomsorror
Trural
१-वृतराष्ट्र के पुत्र पाण्डयों को साथ लेकर बड़े-बड़े रथों और हाथिया पर चढ़कर
नगर से बाहर निकल रहे हैं । २-जल क्रीड़ा स्थान ।
१-दुर्योधन का भीमसेन को मार डालने के लिये चेष्टा करना।
२-धृतराष्ट्र के पुत्रों और पाण्डया का मिलकर जलक्रीड़ा करने के लिये गंगा के अन्दर घुमना ।
३-दुर्योधन का अचेत हुए हुए भीमसेन को लताजाल मे बांधकर गंगा में गिरा देना ।
महा भारत अध्याय १२८ ] 0000000004 000000000000 200000000000 - तत्र प्रविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह । उपच्छन्नान्वहून्कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः ॥ ४३ ॥ अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्च ते । परस्परस्य वक्त्रेभ्यो ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः ॥४४ ॥ ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम् । विपं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया ॥४५॥ स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः स वाचामृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद्यथा ॥ ४६ ॥ स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पापकृत् । प्रतीक्षितं स्म भीमेन तं वै दोपमजानता ॥४७॥ ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः ॥४८॥ ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तंदा मुदितमानसाः ॥ ४९ ॥ क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलंकृताः । दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः ॥ ५० ॥ वहा चित्रकारों ने अनेक प्रकार के सुन्दर बेल बूटों का खिलाने लगा । हृदय में धार और मुंह में अमृत सी काम कर रक्खा है । हवा आने के लिये सुन्दर झरोखे मीठी बातें रखनेवाले दुर्योधन ने अपने आप उठकर और जालिया लगी हुई है। पानी के फुहार चल रहे । भाई और मित्र का सा भाव दिखाते हुए वह विष हैं । जगह-जगह पर कूप और बावलियां बनी हुई हैं। से मिला हुआ भोजन भीमसेन को बहुत सा खिला ताल और तलैयों में कमल फूल रहे हैं । ऋतु के | दिया ॥४३॥४७|| फलों की सुवास चारों ओर बसी हुई है ॥३९॥४२॥ तब पुरुषों में बड़ा अधम दुर्योधन अपनी इच्छा अनन्तर कौरव और पाण्डव वहां जाकर बैठे | पूरी हुई जानकर मानो मन ही मन में हंसने लगा। और अनेक स्थानों से आई हुई सामग्रियों का इसके पश्चात् धृतराष्ट्र के पुत्र और पाण्डव मिलकर उपभोग करने लगे। उस सुन्दर बाग में खेलते हुए गगा के अन्दर घुमे और प्रसन्नचित्त होकर जल- एक दूसरे के मुख में खाने की वस्तुएं देने लगे। उस क्रीडा करने लगे। जल में खेलने के पश्चात् सबने समय पापी दुर्योधन, भीमसेन को मार डालने की | अपने-अपने गहने और कपड़े पहन लिये । जलक्रीड़ा इच्छा से, विष से मिला हुआ भोजन भीमसेन को ! के परिश्रम से थके हुए वालकों ने सन्ध्या के समय, - HC0100100% corcoconcococonc..
६२२ महा भारत [ आदिपर्व 20cooooo srconorocor00000000000ok - ccicrorarowarmchacice विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् खिन्नस्तु बलवान्भीमो व्यायम्याभ्यधिकं तदा ॥ ५१ ।। वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा प्रमाणकोटयां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत्स्थलम् ॥ ५२ ।। शीतं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः । विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः ॥ ५३ ॥ ततो वध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः स्वयम् । मृतकल्पं तदा वीरं स्थलाजलमपातयत् स निःसंज्ञो जलस्यान्तमथ वै पाण्डवोऽविशत् । आक्रामन्नाभवने तदा नागकुमारकान् ततः समेत्य बहुभिस्तदा नागैर्महाविषैः अदश्यत भृशं भीमो महादंट्रैर्विपोल्वणैः ॥ ५६ ॥ ततोऽस्य दश्यमानस्य तद्विपं कालकूटकम् हृतं सर्पविषेणैव स्थावरं जङ्कमेन तु ॥ ५७॥ दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः । त्वचं नैवास्य विभिदुः सारस्वात्पृथुवक्षसः ॥ ५८॥ उसी उपवन में बने हुए बिहार भवनों में रहने का अवसर पाकर दुर्योधन ने उनको लताजाल से विचार किया। महाररी भीमसेन ने जलक्रीड़ा के बाधकर म्थल से गगा के जल में गिरा दिया। समय सब कुमारों को अधिक व्यायाम कराया था। अचत पड़े हुए पाण्डव जल में डूबकर नागों के इस कारण से वे बहुत ही थक गये थे । वे आराम स्थान में उनके बच्चों पर जा गिरे ॥५३॥५५॥ करने की इच्छा से उम प्रमाणकोदि की स्थर-भृमि तर सैकड़ों बड़ी-बड़ी डादोयाले विपैले सर्प में आकर ही किनारे पर सो रहे ॥४८॥५२॥ आकर उनके शरीर से रिपट गये और उनको पाण्टु पुत्र भीमसेन एक तो यके थे, दूसरे उन्हें | काटने लगे। भीमसेन के शरीर में जो स्थावर विप का नशा चढ़ा हुआ था। फिर ठण्डी हवा फार पट विष फैल गया था वह सपों के जहम विप लगने से सब शरीर में विष फैलने के कारण वे के द्वारा नष्ट हो गया, उसका असर जाना रहा। एकदम अनेत (बेहोश) हो गये । [और सब रोग सों ने भीममेन के गर्मस्थानों में ही काटा था, तथा नारों पाण्डा यस भवनों में विश्राम कर रहे । पान्तु उनकी खार बहुत ही कड़ी होने के कारण थे] भीम को मृत्यु को माम हुआ समझकर यह मपों के दात अन्दर घुस ही नहीं मर । अनन्तर
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१-भीमसेन का नागलोक म पहुचना ।
२--नागरान वासुकि की आज्ञा से भीमसेन का रस पान करना ।
अध्याय १२८ ] महा भारत ६२३ coooro000000/- 200concoodoox ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्व संछिद्य बन्धनम् । पोथयामास तान्सन्केिचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः ॥ ५९॥ हतावशेपा भीमेन सर्वे वासुकिमभ्ययुः ऊचुश्च सर्पराजानं वासुकिं वासबोपमम् ॥६० ॥ अयं नरो वै नागेन्द्र छप्सु वध्वा प्रवेशितः । यथा च नो मतिर्वीर विषपीतो भविष्यति ॥६१ ॥ निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्तः स च दप्टोऽन्वबुध्यत । ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्वा वन्धनमाशु नः ॥ ६२॥ पोथयन्तं महावाहुं त्वं चैनं ज्ञातुमर्हसि । ततो वासुकिरभ्येत्य नागैरनुगतस्तदा ६३ ॥ पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम् । आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च ॥ ६४ ॥ तदा दौहित्रदौहित्रः परिप्वक्तः सुपीडितम् । सुप्रीतश्चाभवत्तस्य वासुकिः सुमहायशाः अब्रवीत्तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम् । धोघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम् ॥ ६६ ॥ एवमुक्तस्तदा नागो वासुकि प्रत्यभापत । यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः ॥ ६७ ॥ कुन्ती पुत्र भीमसेन सचेत होकर बन्धनों को काटकर पर वह होश में आकर, पन्धन तोड़कर, उठ बैठा उन सी को पृथ्वी पर पटक-पटककर मारने लगे। है और पृथ्वी पर पटक-पटककर सपों का नाश उनमें से कुछ सर्प भय खाकर वहां से चैग से कर रहा है । वह महाभुज कौन है ? तब वासुकि भाग गये और देवराज समान सर्प वासुकि के पास ने साथी नागों के साथ वहां आकर बड़ पराक्रमी जाकर कहने लगे ॥५६६०॥ महाभुज भीम को देखा। इन्हीं सब सों में आर्यक हे वार नागेन्द्र लताजाल से बंधा हुआ एक नाम का एक सर्प था । वह कुन्ती के पिता शूरसेन मनुष्य जल में डूबकर नागलोक में आया है। का नाना था। आर्यक नामक नागराज ने अपने हमको जान पड़ता है कि उसने विप खाया था। नाती के नाती भीमसेन को देखकर गले से लगा जब हमारे पास गिरा तब अचेत था। हमारे काटने । लिया ॥६१॥६५॥ 50join-rinolrecor-oleococoncor.corrow/57 ६२४ महा भारत [ आदिपर्व Co205oooox - : रसं पिवेत्कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः वलं नागसहस्रस्य यस्मिन्कुण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६८ ॥ यावरिपवति वालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम् । एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत ॥ ६९ ॥ ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः । प्राङ्मुखश्चोपविष्टः स रसं पिबति पाण्डवः ॥ ७० ॥ एकोच्छ्वासात्ततः कुण्डं पिबति सम महाबलः । एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिवत्पाण्डुनन्दनः ॥ ७१ ॥ ततस्तु शयने दिव्ये. नागदत्ते महाभुजः अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमारिन्दमः इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि भीमसेनरसपाने अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ।। इससे अति यशस्वी नागेन्द्र वासुकि ने उनपर जितना रस इनसे पिया जाय उतना ही पीने की प्रसन्न होकर नागराज आर्यक से कहा-अब इनका आजा दीजिए। नागराज वासुकि ने यह बात क्या प्रिय कार्य करना चाहिये । इन्हें प्रसन्न करने | स्वीकार कर ले। तब भीमसैन पवित्र होकर और के लिये बहुत सा धन आदि अनेक रत्न दो। नागों से मंगलाचरण किये जाकर पूर्व की ओर मुख वासुकि की यह बात सुनकर आर्यक ने कहा- | करके बैठकर रस पीने लगे । महाबली भीमसेन हे नागेन्द्र ! इस राजकुमार को धन आदि अनेक रत्नों | एकदम में ही एक कुण्ड का रस पी गये । इसीवरह की आवश्यकता ही क्या है ? यदि आप इनपर | उन्होंने आठ कुण्डों का रस पी लिया । अनन्तर सन्तुष्ट हुए हैं तो इन्हें कुण्ड से रस पीने के लिये | शत्रुओं के नाश करनेवाले भीमसेन नागों की दी माज्ञा दीजिए। हज़ार हाथियों का चल देनेवाले हुई सेज पर परम सुख से सो रहे ॥६६॥७२॥ कुण्ड के रस को पीकर ये महाबली हो जाएंगे। आदिपर्व का एक सा अट्ठाईस अध्याय समाप्त हुआ । ॥ ७२ ॥ अथ उनशिदधिकशततमोऽध्याय ॥१२९ ।। चाम्पायन उवाच -ततस्ते कौरवाः सर्वे विना भीमं च पाण्डवाः वृत्तक्रीडाविहारास्तु प्रतस्थुर्गजसाह्वयम् रथेगजैस्तथा चाश्वर्यानैश्चान्यग्नेकशः ब्रुवन्तो भीमसेनस्तु यातो ह्यग्रत एव नः ॥ २ ॥ comoryrurocurorurzrorongorongororoms अध्याय १२९ ] महा मारत pooooooone - ततो दुर्योधनः पापस्तत्रापश्यन्वृकोदरम् भ्रातृभिः सहितो हृष्टो नगरं प्रविवेश ह ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा ह्यविदन्पापमात्मनि । स्वेनानुमानेन परं . साधुं समनुपश्यति सोऽभ्युपेत्य तदा पार्थो मातरं भ्रातृवत्सलः । अभिवाद्याब्रवीत्कुन्तीमम्ब भीम इहागतः क गतो भविता मातर्नेह पश्यामि तं शुभे । उद्यानानि वनं चैव विचितानि समन्ततः ॥ ६ ॥ . तदर्थं न च तं वीरं दृष्टवन्तो वृकोदरम् मन्यमानास्ततः सर्वे यातो नः पूर्वमेव सः ॥ ७ ॥ आगताः स्म महाभागे व्याकुलेनान्तरात्मना । इहागम्य क नु-गतस्त्वया वा प्रेपितः क नु ॥ ८ ॥ कथयस्व महावाहुं भीमसेनं यशस्विनि न हि मे शुध्यते भावस्तं वीरं प्रति शोभने ॥ ९ ॥ यतः प्रसुप्तं मन्येऽहं भीमं नेति हतस्तु सः इत्युक्ता-च ततः कुन्ती धर्मराजेन धीमता ॥ १० ॥ एक सौ उनतीस अध्याय ।। १२९॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! भीमसेन | थे ॥१४॥ की तो यहा यह गति हुई और वहा जरक्रीडा मातृवत्सल युधिष्ठिर ने नगर में आते ही अपनी समाप्त हो जाने पर, विश्राम करके सब कौरव और माता कुन्ती के पास जाकर प्रणाम करके पूछा- पाण्डव वहा से रथ, घोड, हाथी आदि अनेक यान) हे माता ! क्या भीम यहा आ गये हैं ' हे शुभ पर चढकर हस्तिनापुर को चले । दुर्योधन के कुकर्म चाहूनेवाली ! ये अभी तक क्यों नहीं दिखाई देते, को न जानने के कारण रास्ते में पाण्डवों ने आपस कहा गये है हमने उपवन में और गगातट के में यह निश्चय कर लिया कि भीमसेन हमसे पहले वन में उन्हें बहुत ठुढा, परन्तु वे कहीं नहीं दिखाई अकेले ही घर को चले गये है। उस पापारमा दुर्योधन देते । अन्त को हमने यह विचार किया कि वे ने उनमें भीम को न देखकर प्रसन्नचित्त से नगर | हमसे पहले घर चले गये होंगे ॥५॥७॥ में प्रवेश किया। धर्मात्मा युधिष्ठिर बड़े धर्मात्मा थे, हे यशस्विनी ! हम बड़ी चिन्ता और व्याकुरता इस कारण वे अपने ही समान सबको भला समझते के साथ यहा आ रहे है । शीघ्र यताओ, महामुन overeircorecrcorrecroorciorancoroomarcoteorooresrce ६२६ महाभारत [ आदिपर्व 2010 हाहेति कृत्वा संभ्रान्ता प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् । न पुत्र भीमं पश्यामि न मामभ्येत्यसाविति ॥ ११ ॥ शीघूमन्वेषणे यत्नं कुरु तस्यानुजैः सह इत्युक्त्वा तनयं ज्येष्ठं हृदयेन विदूयता ॥ १२ ॥ क्षत्तारमानाय्य तदा कुन्ती वचनमब्रवीत । क्व गतो भगवनक्षत्तीमसेनो न दृश्यते उद्यानान्निर्गताः सर्वे भ्रातरो भ्रातृभिः सह । तत्रैकस्तु महावाहुर्रमो नाभ्येति मामिह ॥ १४ ॥ न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः । कूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः ॥ १५ ॥ निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः । तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च विदुर उवाच-मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेपेऽपि प्रहरेत्तव ॥ १७ ।। दीर्घायुपस्तव सुता यथोवाच महामुनिः । आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीति चोत्पादयिष्यति ॥ १८ ॥ भीमसेन कहां है ! कहीं आपने उनको तो नहीं वह कहीं नहीं दिखाई देता। और सब भाई खल- भेजा है ? उनके लिये हमारे मन में तरह-तरह के कूदकर बाग से लौट आये हैं । महाभुज भीम ही विचार उत्पल हो रहे हैं। हमें प्रतीत होता है, वे अबतक नहीं आया । उसको देखकर दुर्योधन अन जीवित नहीं हैं। वे वहां सोते थे, अवश्य किसी प्रसन्न नहीं होता । वह बड़ा चालाक, दुर्मति, नीच ने उनको मार डाला है ॥८॥१०॥ और लन्ना से रहित है । ऐसा न हो कि क्रोधवश बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर उसने उस वीर को मार डाला हो। इस डर के मारे कुन्ती हाय-हाय करती हुई दु.ख से बोली-हे पुत्र! मेरा चित्त विकल और हृदय जल रहा है ॥११॥१६॥ मैंने भीम को नहीं देखा; वह अभी तक मेरे पास विदुर ने कहा-हे फल्याणी ! तुम यह बात नहीं आया। तुम छोटे भाइयों के साथ जाकर प्रगट न करो । अब शेप पुत्रों की रक्षा करो।क्योंकि शीम उसकी तालाश करो । दुःखित कुन्ती ने पड़े इस समय कुछ कहने-सुनने से यह दुरात्मा दुर्योधन पुत्र युधिष्ठिर से यों कहकर विदुर को बुलाया और तुम्हारे शेप पुत्रों को भी मार सकता है । महामनि कहा-हे देवर ! मानम नहीं, मीमसेन कहां गया व्यास का कहा कभी अन्यथा नहीं हो सकता। 2000-00-1705/200700crore-cro 00 अध्याय १२९ ] महा मारत ६२७ potoshoo- 00000 वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्धिदुरः स्वं निवेशनम् । कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैःहे ॥ १९ ॥ ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः तस्मिंस्तदा रसे जाणे सोऽप्रमेयवलो वली ॥२०॥ तं दृष्ट्वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः । सान्त्वयामासुरव्यया वचनं चेदमब्रुवन् ॥ २१ ॥ यत्ते पीतो महावाहो रसोऽयं वीर्यसंभृतः । तस्मान्नागायुतवलों ग्णेऽधृष्यो भविष्यसि ॥ २२ ॥ गच्छाद्य त्वं च स्वगृह स्नातो दिव्यरिभैर्जलैः । भ्रातरम्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव ॥ २३॥ ततः स्नातो महावाहुः शुचिः शुक्लाम्बरस्त्रजः । ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः ॥ २४ ॥ ओपधीभिर्विपघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः भुक्तवान्परमान्नं च नागैर्दत्तं महावलः ॥ २५॥ पूजितो भुजगेर्वीर आशीभिश्चाभिनन्दितः । दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्य पाण्डवः ॥ २६ ॥ तुम्हारे सब पुत्र दीर्घायु होंगे। तुम्हारा पुत्र । है । रणभूमि में तुमको कोई परास्त न कर सकेगा। भीमसेन शीघ्र आकर तुमको प्रसन्न करेगा ॥१७॥१८॥ हे कुरुश्रेष्ठ ! आज तुम इस दिव्य और पवित्र गगा वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् । विद्वान् विदुर के जल में नहा करके अपने घर को जाओ । तुमको कुन्ती से ये कहकर अपने घर चले गये। चिन्ता न देखकर तुम्हारी माता और भाई बड़े दुखी हो में डूबी हुई कुन्ती शेप चार पुत्रों के साथ घर में । रहे है ॥१९॥२३॥ रहने लगी। अनन्तर आठ दिन के बाद भीमसेन इसके पश्चात् महाभुज महाबली भीमसेन ने उस की आख खुरी । ये उठ बैठे । आठ कुण्डों का पवित्र जल में नहाया, तवस्त्र और श्वेतमालाए रस पच जाने से वे बड़े बलवान् हो गये थे। उस पहनी । भोजन के लिये नागलोक के दिव्य भोजन पाण्डु-पुत्र भीमसेन को जगा हुआ देग्वकर सर सर्प आये । नागों के दिये दिव्य अलकार पहने हुए उनके पास आ गये। उन्होंने कहा-हे महाभुज। भीमसेन ने अपनी इच्छानुसार भोजन किया और तुमने जो वीर्य देनेवाला रस पिया है, इस कारण ऐसी औषधिया मी साई जिनसे विष का असर तुम्हारे शरीर में हजार हाथियों का बल आ गया हटता है । फिर नागों से आशीर्वाद पार-विदा- । 5002cos 19020505Prororrorroro ६२८ महाभारत [ आदिपर्व 2c000000xoopcorcoso.oro00000000000c - roracocococcocoe% उदतिष्ठत्प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिन्दमः उत्क्षिप्तः स तु नागेन जलाजलरुहेक्षणः ॥ २७॥ तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः ॥ २८ ॥ तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः आजगाम महावाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा ॥२९॥ ततोऽभिवाद्य जननी ज्येष्ठं भ्रातरमेव च । कनीयसः समाघाय शिरःस्वरिविमर्दनः ॥ ३० ॥ तैश्चापि संपरिष्वक्तः सह मात्रा नरर्षभैः अन्योन्यगतसौहार्दाद्दिष्टया दिष्ट्येति चाब्रुवन् ॥ ३१ ॥ ततस्तत्सर्वमाचष्ट दुर्योधनविचेष्टितम् भ्रातॄणां भीमसेनश्च महाबलपराक्रमः ॥ ३२ ॥ नागलोके च यवृत्तं गुणदोषमशेषतः तच्च सर्वमशेषेण कथयामास पाण्डवः ॥ ३३ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा भीममाह वचोऽर्थवत् । तूष्णीं भव न ते जल्प्यमिदं कार्य कथंचन ॥ ३४ ॥ इतः प्रभृति कौन्तेया रक्षतान्योन्यमाहताः एवमुक्त्वा महावाहुर्धर्मराजो युधिष्ठिरः भ्रातृभिः सहितः सर्वैरप्रमत्तोऽभवत्तदा ॥ ३५॥ होकर शत्रुनाशी भीमसेन प्रसन्नचित्त से ऊपर की | मिलकर भीमसेन के आने पर आनन्द प्रगट करने ओर उठे । नागों ने उस कमल नेत्रवाले कुरनन्दन को रगे। पराक्रमी भीमसेन ने भाइयों के आगे दुर्योधन जल से उठाकर उसी वनसड में छोड़ दिया और की दुष्टता का सर हार कह सुनाया। नागरोक माप अपने लोक को चले गये ॥२४॥२८॥ में अच्छा बुरा जो कुछ हुआ था उसका भी वर्णन फिर वह महाभुज महाबली कुन्तीपुत्र भीमसेन | किया। तब युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा-हे भाई! उस म्यान से झटपट अपनी माता के पास पहुंचे। तुम चुप रहो। यह सब हार किसी और से न अपनी माता और बड़े भाई के चरणों में प्रणाम करके ! कहना||२०१३४॥ उन्होंने छोटे भाइयों को गरे से लगा लिया । सब इस प्रकार भाइयों को सावधान रहने का उपदेश - crore.5200-rrror ६२९ म हा भारत अध्याय १२९ ] p.orolocco 1000000 2000000000 Docooooooo t- - सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जन्निवान् । धर्मात्मा विदुरस्तेषां पार्थानां प्रददौ मतिम् ॥ ३६ ॥ भोजने भीमसेनस्य पुनः प्राक्षेपयद्विषम् कालकूटं नवं तीक्ष्णं संभृतं लोमहर्षणम् ॥ ३७ ॥ वैश्यापुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया । तच्चापि भुक्त्वाऽजरयदविकारं वृकोदरः विकारं न ह्यजनयत्सुतीक्ष्णमपि तद्विषम् भीमसंहनने भीमे अजीर्यत वृकोदरे एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौवलः । अनेकैरभ्युपायैस्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ॥ ४० ॥ पाण्डवाश्चापि तत्सर्व प्रत्यजानन्नमर्पिताः उद्भावनमकुर्वन्नो विदुरस्य मते स्थिताः कुमारान्क्रीडमानांस्तान्दृष्ट्वा राजाऽतिदुर्मदान । गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तन्न्यवेदयत् ॥ ४२ ॥ शरस्तम्बे समुद्भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम् अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात्तु ते इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि भीमप्रत्यागमने ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥ देकर वे आप भी सावधान रहने लगे। धर्मात्मा सुवल-पुत्र शकुनि की सलाह से नाना प्रकार के विदुर की सम्मति से पाण्डवों ने दुर्योधन के इस उपायों से पाण्डवों को नष्ट करने की चेष्टा की थी। कुर्म को जानकर प्रकट नहीं किया। फिर दुर्योधन परन्तु वे विदुर की सम्मति से सदा पचते रहे । ने भीममेन के भोजन में दुबारा तीक्ष्ण विष मिलवा हे शत्रुनाशी । पाण्डव यह जानते हुए भी उसपर दिया परन्तु विदुर ने इसकी सूचना पाण्डवों को क्रोध प्रकट नहीं करते थे ॥३५॥४१॥ दे दी । वृकोदर ने इस विप को भी पचा लिया । धृतराष्ट्र ने बालकों की शिक्षा के लिये सरकण्डे वह विप तेज नारा करनेवाले योग्य भी भीम में की लकड़ी से उत्पन्न, वेद-शास्त्रों के जानकार, फोई विकार उत्पन्न न कर सका और भीम ने उसको कृपाचार्य को नियत कर दिया । सब यालक उन्हीं पचा रिया । इस प्रकार दुर्योधन ने, कर्ण और से धनुर्वेद की शिक्षा पाने रंगे ॥४२॥४३॥ आदिपर्व का एक मा उनतीम अध्याय ममाम हुआ। onererururururururuyurvorrorororoveyor . - म हा भारत [ आदिपर्व coconocorcocorconocoteocom अथ त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३०॥ जनमेजय उवाच--कृपस्यापि मम ब्रह्मन्संभवं वक्तुमर्हसि शरस्तम्वात्कथं जज्ञे कथं वास्त्राण्यवाप्तवान् ॥ १ ॥ वैशम्पायन उवाच-महर्षेातमस्यासीच्छरद्वान्नाम गौतमः पुत्रः किल महाराज जातः सह शरैविभो ॥ २ ॥ न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्विरजायत यथाऽस्य बुद्धिरभवद्धनुर्वेदे परंतप अधिजग्मुर्यथा वेदांस्तपसा ब्रह्मचारिणः तथा ल तपसोपेतः सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च भृशं संतापयामास देवराजं स गौतमः ततो जानपदी नाम देवकन्यां सुरेश्वरः प्राहिणोत्तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव सा हि गत्वाऽऽश्रमं तस्य रमणीयं शरद्वतः धनुर्वाणधरं वाला लोभयामास गौतमम् ॥ ७ ॥ तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं बने लोकेऽप्रतिमसंस्थानां प्रोत्फुल्लनयनोऽभवत् ॥ ८ ॥ एक सौ तीस अध्याय ॥ १३० । जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मन् । आप कृपा करके / शरद्वान् ने तपस्या के द्वारा सब अस्त्रों को प्राप्त कृपाचार्य के जन्म का वृत्तान्त कहिए । वे किस किया था। इन्द्र उनकी तपस्या और अस्त्र-विद्या की प्रकार शरस्तम्ब (सरकंडे की लकड़ी) से पैदा हुए! निपुणता को देखकर बहुत डरे । हे कौरव ! अनन्तर किससे और किस प्रकार उन्होंने अस्त्र-विद्या सीखी? देवेन्द्र ने जानपदी नाम्नी एक देवकन्या (अप्सरा) वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! महर्षि गौतम के को शरद्वान् के तप में विघ्न डालने के लिए उनके शरद्वान् नाम के एक पुत्र थे । गौतम ने सरकण्डे आश्रम में भेजा | इन्द्र की आज्ञा को पाकर युवती से जन्म लिया था । हे शत्रुनाशी ! जैसे वे धनुर्वेद | जानपदी एक वस्त्र पहने हुए शरद्वान् के आश्रम में के पण्डित हुए वैसे वेदज्ञ नहीं हुए । उनका चित्त | आई । यहां धनुष-बाण लिये, धनुर्वेद का अभ्यास धनुर्विद्या में ही अधिक लगता था। ब्रह्मचारी मुनियों | कर रहे, उन शरद्वान् को वह देवकन्या अपने ने जैसे तप करके वेदों को प्राप्त किया वैसे ही हाव-भाव से लुभाने की चेष्टा करने लगी। उस cao 2070oroorcocore अध्याय १३० ] महा भारत porom DOcroroomcrowaoncoove धनुश्च हि शरास्तस्य कराभ्यामपतन्भुवि । वेपथुश्चापि तां दृष्ट्वा शरीरे समजायत स तु ज्ञानगरीयस्त्वात्तपसश्च समर्थनात् अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्येण परमेण ह यस्तस्य सहसा राजन्विकारः समदृश्यत तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नान्वबुध्यत धनुश्च सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च । स विहायाश्रमं तं च तां चैवाऽप्सरसं मुनिः ॥ १२ ॥ जगाम रेतस्तत्तस्य शरस्तम्बे पपात च शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नृप तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः मृगयां चरतो राज्ञः शान्तनोस्तु यदृच्छया ॥ १४ ॥ कश्चित्सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च ॥ १५ ॥ ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनुः ॥ १६ ॥ एकान्त तपोवन में सर्वान-सुन्दरी अप्सरा को एक दूसरे स्थान को चले गये । हे महाराज ! सरकण्डे ही वस्त्र पहने देखकर गौतम-पुत्र शरद्वान् आश्चर्य की लकड़ी पर गिरने से उनके वीर्य के दो भाग आनन्द में मम हो गये । उनके हाथों से धनुप और हो गये । उससे एक कन्या और एक पुत्र का जन्म वाण घरती पर गिर पड़े। काम में आसक्त उस हुआ था । इसी अवसर में मृगया के लिये मनमाने मापिकुमार का शरीर कांपने लगा। परन्तु वे अच्छे घूमनेवाले नरनाथ शान्तनु के एक सिपाही ने वन जानी और ब्रह्मचारी थे; इस कारण उन्होंने अपने में उस पुत्र और कन्या को देसा ॥११॥१४॥ आप को संभाल लिया ॥१॥१०॥ पास ही मृगचर्म और धनुषवाण देखकर समझा, हे महाराज ! उनमें एकाएक जो विकार आ क्सिी धनुर्वेद के पण्डित नाक्षण के ये पालक और पहुंचा था उसमें उनका वीर्य गिर पड़ा। उनको बालिका है। यह घनुप-याण सहित उन दोनों चार्य निकलने की गयर भी न हुई। अनन्तर व पालकों को राजा के पाम ले गया। राजा गान्तनु धनुष, याण, मृग का चर्म आदि सामग्री और उस । के दिल में दया आ गई । उन्होंने मेरी सन्तान है। माधम और अप्सरा को छोड़कर वहा से किसी ये कहकर दोनों बालकों को ले लिया । टन्हें रेकर ।
६३२ महा भारत [ आदिपर्व moonkoncocoroorcorco0.00crooreovcoe000000 स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वितः । आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन् ॥ १७ ॥ ततः संवर्धयामास संस्कारैश्चाप्ययोजयत् प्रातिपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत् ॥ १८ ॥ गौतमोऽपि ततोऽभ्येत्य धनुर्वेदपरोऽभवत् । कृपया यन्मया वालाविमो संवर्धिताविति ॥ १९ ॥ तस्मात्तयोनाम चके तदेव स महीपतिः गोपितौ गौतमस्तत्र तपसा समविन्दत ॥ २०॥ आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा । चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च ॥ २१ ॥ निखिलेनास्य तत्सर्व गुह्यमाख्यातवांस्तदा सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गतः ॥ २२ ॥ ततोऽधिजग्मुः सर्वे ते धनुर्वेदं महारथाः धृतराष्ट्रात्मजाश्चैव पाण्डवाः सह यादवैः । वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि कृपोत्पत्तौ त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१३० वे अपनी राजधानी में आये । इसके पश्चात् राजा दिया। उन्होंने अपने पुत्र कृपाचार्य को चार प्रकार शान्तनु ने उस कन्या और पुत्र के संस्कारों को की धनुर्विद्या, सब शास्त्र, शत्रों के चलाने की रीति करके दोनों बालकों को पाल-पोसुकर बड़ा किया । । और अन्य गुप्त विषयों की शिक्षा दी । वे भाड़े राजा शान्तनु ने यह समझकर कि मैने कृपापूर्वक । ही दिनों मे धनुर्वेद के श्रेष्ठ आचार्य बन गये । इन बालकों को जिलाया है उनके नाम कृप और भीष्म ने धृतराष्ट्र के पुत्रों और पाण्डवों को धनुर्वेद कृपी रख दिये ।।१५।१९।। सिखलाने का काम कृपाचार्य के सुपुर्द कर दिया। इधर गौतम के पुत्र शरद्वान् को तप प्रभाव इनके मिवाय यादवों के बालक और कई दूसरे से यह मालूम हो गया कि उनके दोनों बालक देशों के राजकुमार भी उनसे धनुर्वेद की शिक्षा राजा शान्तनु के पास हैं । इसलिये उन्होंने राजा प्राप्त करने के लिये आते थे ॥२०॥२३॥ शान्तनु के पास जाकर अपना गोत्र आदि सब कह आदिपर्व का एक सौ तीस अध्याय समाप्त हुआ । - । occrorrorsemicroorcoconscooaroorcoorcoroccoo 'अध्याय १३१ ] महाभारत 22050andc0edoconscococ00000000103028 -- 1 । अथ एकत्रिंगदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥ वंशम्पायन उवाच-विशेषार्थी ततो भीष्मः पौत्राणां विनयेप्सया । इण्वस्त्रज्ञान्पर्यपृच्छदाचार्यान्वीर्यसंमतान् नाल्पधी महाभागस्तथा नानस्त्रकोविदः नादेवसत्वो विनयेत्कुरूनस्त्रे महावलान् इति संचिन्त्य गायः सदा भरतसत्तमः ।. द्रोणाय वेदविदुपे भारद्वाजाय धीमते पाण्डवान्कौरवांश्चैव : ददो शिप्यान्नरर्पभ । शास्त्रतः पूजितश्चैव सम्यक्तेन महात्मना स भीप्मेण महाभागस्तुष्टोऽस्त्रविदुपां वरः । प्रतिजग्राह तान्सर्वाशिष्यत्वेन महायशाः ॥ ५ ॥ शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषतः तेऽचिरेणैव कालेन सर्वशास्त्रविशारदाः बभूवुः कौरवा राजन्पाण्डवाश्चामितौजसः जनमेजय उवाच-कथं समभवद् द्रोणः कथं चास्त्राण्यवाप्तवान् । कथं चागारकुरून्द्रह्मन्कस्य पुत्रः स वीर्यवान् ॥ ७ ॥ कथं चास्य सुतो जातः सोऽश्वत्थामाऽस्त्रवित्तमः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय एय. मी इकतीम आयाय ।। १३१ ।। वैशम्पायन ने कहा- राजा जनमेजय ! बनाना चाहा । हमके लिये उन्होंने द्रोणाचार्य में अनन्तर भाम पात्रों को विशेष रूप में विद्या पदाने मार्थना की। भीम ने मार की विधि के अनुसार भार विनय सिगाने के लिये वाण बनाने में दक्ष, द्रोणाचार्य की पूजा की। उन्होंने प्रमस होर आमरिया में पंडिन पराम.मी गुरु की ताराम करने उन पाराको अपना गिय पनाना मारकर रंगे । टएम बुद्धिमान, महामाग, भनेक के गिा। योगाचार्य उनको भनेर प्रसार में प्रयोग में चतुर और देर गमन मामा भानार्य मनुर्वेदी निशाने नंगे 1 महाग दीपुरा के पालकों को पनुदानिश अनन्न पुश ही दिनों में भमतिका या विमारकर मीन ने पुराट के भीरमायके पूरे पनि गंगे || पुत्रों का दाना नानाराम नगर ने पूछा-२ प्रान जमीन осохождессекссессуси -arrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr.
६३४ महा भारत [ आदिपर्व Cococ00000000000000000000000000 - Moovoicore वैशम्पायन उवाच-गङ्गाद्वारं प्रति महान्वभूव भगवानृषिः भरद्वाज इति ख्यातः सततं संशितव्रतः सोऽभिपेक्तुं ततो गङ्गां पूर्वमेवागमन्नदीम् । महर्पिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन्पुरा ददर्शाप्सरसं साक्षाद् घृताचीमाप्लुतामृपिः रूपयौवनसंपन्नां मददृप्तां मदालसाम् तस्याः पुनर्नदीतीरे वसनं पर्यवर्तत व्यपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः ॥ १२॥ तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः ततोऽस्य रेतश्चस्कन्द तपिद्रोण आदधे ॥ १३ ॥ ततः समभवद् द्रोणः कलशे तस्य धीमतः । अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ १४ ॥ अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः अग्नेस्तु जातः स मुनिस्ततो भरतसत्तम भरद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ १६ ॥ किसके पुत्र थे ? किसप्रकार उनका जन्म हुआ ! रही है । वायु लगने से उसके शरीर पर से वस उन्हें अस्त्र किसतरह प्राप्त हुए ? वे किस कारण भी हट गया । उसके अत्यन्त सुन्दर यौवन स्वरूप से कौरवों की राजधानी में आये। अस्त्रविद्या के | को देखकर बुद्धिमान् महर्षि कामासक्त हो गये । जानकार उनके पुत्र अश्वत्थामा का जन्म किसतरह अत्यन्त काम के वेग से महर्षि का वीर्य स्खलित हुआ ? इन प्रश्नों का उत्तर मै आपसे विस्तारपूर्वक हो गया । ऋषि ने शीघ्रता से द्रोण नामक यज- सुनना चाहता हूं । कृपा करके कहिए। वैशम्पायन | पात्र में उस वीर्य को रख दिया। बुद्धिमान् भारद्वाज ने कहा-हे राजन् ! गंगा द्वार के निकट ब्रह्मचारी | के द्रोण में रखे हुए उस वीर्य से द्रोणाचार्य का महर्षि भारद्वाज का आश्रम था। एक दिन वे जन्म हुआ। भारद्वाज के पुत्र द्रोण ने थोड़े ही महर्षियों के साथ अग्निहोत्र करने के लिये गंगा में समय में सब वेद और वेदाङ्ग पढ़ लिये ॥७॥१४॥ खान करने गये । गङ्गा के किनारे पहुंचकर उन्होंने अस्त्रविद्या जाननेवालों में प्रधान प्रतापी भारद्वाज देखा कि सौन्दर्य मद से भरी, मन्दगामिनी, युवती ने पहले अग्निवेश नामक महाभाग महर्षि को घृताची अप्सरा स्नान करके जल से बाहर निकल | आग्नेय अस्त्र दिया था । हे भरतश्रेष्ठ ! अमि - somcococcoomcooor.orccrocoooo अध्याय १३१ ] महा मारत 21070010050con 3cor00000003cococoncor00100000 - sscoomics Prococonscvcocorce भरद्वाजसखा चाऽऽसीत्पृपतो नाम पार्थिवः । तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्सुतः स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिवः । चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्पभः ॥ १८॥ ततो व्यतीते पृपते स राजा द्रुपदोऽभवत् । पञ्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वरः ॥ १९ ॥ भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा तत्रैव च वसन्द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः ॥ २० ॥ वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा दग्धकिल्विपः । ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशाः ॥ २१ ॥ शारद्वतीं ततो भार्या कृपी द्रोणोऽन्वविन्दत । अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम् ॥ २२ ॥ अलभद्गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च स जातमात्रो व्यनदद्यथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥ २३ ॥ तच्छ्रुत्वान्नर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् अश्वस्येवास्य यत्स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ॥ २४ ॥ से जन्म लिये हुए उस रपि अगिवेश ने अपने पिता के आश्रम में रहकर तप करने लगा ॥१७॥२०॥ गुरुपुत्र द्रोण को यह आमेय अम देदिया ॥१५॥१६॥ अनन्तर वेद-वेदार के पूरे पण्डित और तपस्या पृपत नाम के एक राजा ऋपि भारद्वाज के के वन से निप्पापी उस अति यशवन्न द्रोण ने, मित्र थे । जिस समय भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य पिता की पहले दी हुई आशा के अनुमार, पुत्र का जन्म हुआ उमी ममय पृपत क भी दुपद नाम की इच्छा से शाद्वान् की कन्या कृती से विवाह का एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। यह पृपन का पुत्र किया । अनन्तर अमिहोत्र में वाणी आदि इन्द्रियों द्रुपद नित्य भारद्वाज के आश्रम में जाकर द्रोणा- को गाने में लगी हुई उम गौतम पुत्री पी के नार्य के साथ सेस्ना मार धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त गर्भ में द्रोण के अश्वत्थामा रसन्न हुए । अश्वत्थामा करता था। हे नरनाथ ! राजा पृपत के पररोक उतने ही उपयवा अश्व का माशद करके सिधारने पर महाभुज द्रुपद उघा पाचाल देश का रोने रगा। रम शब्द को मुनकर अन्नरिक्ष में गजाभा । उस समय महर्षि भारद्वाज का भी विन अदृश्य देवताओं ने कहा-पाई की तह नयाम हो गया । अनि तपयुक्त द्रोण भी अपने दाद करनेवाले इस साला का म्याम (मल) - महाभारत {[ आदिपर्व Zooo000000000000001/2018 - beacococoroscoco । अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मोन्नाम्ना भविष्यति ।। 'सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ॥२५॥ तत्रैव च वसन्धीमान्धनुर्वेदपरोऽभवत् 'स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् - ॥२६॥ सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन्दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥२७॥ स रामस्य धनुर्वेदं दिव्याण्यस्त्राणि चैव है ।' श्रुत्वा तेषु मनश्चके नीतिशास्त्रे तथैव च ॥ २८॥ ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः । • वृतः प्रायान्महाबार्डमहेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः । ॥ - क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद्भृगुनन्दनम् । ॥ ३० ॥ ततो द्रोणो वृतः, शिष्यैरुपगम्य भृगूदहम् । -आचख्यावात्मनो नाम जन्म चांगिरसः कुले ॥३१ ॥ निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् । । ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषु तदा ॥ ३२ ॥ जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् । भरद्वाजात्समुत्पन्नं तथा वं मामयोनिजम् ॥ ३३ ॥ चारों दिशाओं में पहुचा है, इसलिये इसका नाम द्रोण ने परशुराम के धनुर्वेद-सम्बन्धी ज्ञान की 'अश्वत्थामा' होगा। इससे भारद्वाज-पुत्र द्रोण उस श्रेष्ठता और दिव्य अस्त्रों की जानकारीका समाचार पुत्र को पाकर बहुत ही आनन्दित हुए ॥२११२५|| पहले से ही सुन रक्खा था। उन्हें प्राप्त करने की वे उसी आश्रम में रहकर फिर पहले की तरह इच्छा से वे अपने ब्रह्मचारी तपस्वी शिष्यों को धनुर्वेद का अभ्यास करने लगे। हे महाराज ! साथ लेकर महेन्द्र पर्वत पर गये । वहा पहुंचकर उन्होंने उस समय सुना कि सब शस्त्रधारियों में उन्होंने ब्राह्मणों के वैरी क्षत्रियों का सहार करने- श्रेष्ठ, सर्वज्ञ, शत्रुनाशी, ब्राह्मण, महात्मा, जमदमि- वाले भृगु-पुत्र को देखा । अनन्तर द्रोण ने शिष्यो- पुत्र, परशुराम ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान कर सहित महात्मा जामदग्नि को प्रणाम किया और रहे है ॥२६॥२७॥ अपना नाम बताकर उनसे कहा-मैं अगिरा के कुल - rororoorocor. Joipopyror अध्याय १३१ ] म हा भारत 2004 cooE groomind 200000 आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तमम् । तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे । एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद्वचः ॥३५॥ रामं प्रहरतां श्रेष्टं दिसन्तं विविधं वसु अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलवत राम उवाच-हिरण्यं मम यच्चाऽन्यद्वसु किंचिदिह स्थितम् । ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत्तपोधन ॥३७॥ तथैवेयं धरादेवी सागरान्ता सपत्तना कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेपितम् अस्त्राणि चमहार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ॥ ३९ ॥ अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्ममोद्यतम् । वृणीव किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ॥ ४० ॥ द्रोण उवाच-अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव । सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ॥ ११ ॥ तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः । सरहस्यवतं चैव धनुर्वेदमशेषत: ॥ ४२ ॥ में उत्पन और महपि भारद्वाज का पुत्र है । सत्र में प्रधान जामदग्नि से कहा-हे मन मे अपरीिमत छोड़-छाड़कर वन म जाने की इच्छा किये हुए धन चाहता हु । परशुराम ने उत्तर दिया-दे तपोधन! परशुराम से द्रोणाचार्य ने कहा है महामने । म मेरे पाम सुवर्ण रस आदि जो कुछ धन था वह भारद्वाज का अयोनि से उत्पन्न पुत्र ह ॥२८॥३३॥ तो मैंने मय ब्राह्मणों को दे दिया। ग्राम और नगरा आपके पास धन की इच्छा से आया है। की माला मे सजी हुई समुद्र पर्यन्त, यह पृश्वी मी क्षत्रिय कुल नाशी महात्मा परशुराम ने उनसे कहा कश्यप झापि को दान में दे चुका ||३४|३८॥ हे द्वितश्रेष्ठ ! तुम्हारा आना शुम हो । तुम ठीक अव मेरे पाम फेरल मेरे बड़े कीमती अम्त्र, टीक कहो क्या चाहते दो। यह सुनकर मारद्वान शम्त्र और गरीरही है। द्रोण । अब अस्त्र के उस धन देने के लिये तैय्यार योधाओं और गरीर देने को तैय्यार है। गाय को, इन पुत्र JIJ महा मारत [ आदिपर्व 3200000 .ooo01/2012 ॥ प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः । प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ॥४३॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभयपर्वणि द्रोणमार्गवसंवादेस्त्रप्राप्ती एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१३१॥ दोनों में से क्या चाहते हो वही मै तुमको दे दूंगा।। दे दिये । द्विजों में श्रेष्ठ द्रोण सब अस्त्र शस्त्रों को द्रोण ने कहा-हे भार्गव ! प्रयोग, उपसंहार और ; लेकर कृतार्थ होकर प्रसन्नचित्त से अपने प्रिय मित्र रहस्य के साथ सब अस्स मुझे दे दीजिए । परशुराम द्रुपद के पास गये ॥३९॥४३॥ ने 'तथास्तु' कहकर उसी समय सब अस्त्र उनको आदिपर्व का एक सौ इकतीम अध्याय समान हुआ अथ द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥१३२ ।। वैशम्पायन उवाच-ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत्पार्थिवं राजन्सखायं विद्धि मामिह ॥ १ ॥ इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्वं जनेश्वरः । भारद्वाजेन पाञ्चाल्यो नामृष्यत वचोऽस्य तत् ॥ २ ॥ सक्रोधामप॑जिह्मभूः कपायीकृतलोचनः ऐश्वर्यमदसंपन्नो द्रोणं राजाऽब्रवीदिदम् द्रपद उवाच-अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा 'यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ॥ ४ ॥ न हि राज्ञामुदीर्णानामेवं भूतैर्नरैः क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मश्रियाहीनधनच्युतैः ॥ ५ ॥ सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्व सामर्थ्यबन्धनम् ॥ ६ ॥ एक सौ बत्तीस अध्याय ॥ १३२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! प्रतापी | टेढी भौहें और लाल नेत्र किये हुए बोला-हे भारद्वाज के पुत्र द्रोण ने राजा द्रुपद के पास पहुचकर । ब्राह्मण ! तुम्हारी बुद्धि अभी कच्ची ही बनी है। प्रसन्नतापूर्वक कहा-हे महाराज । आपने मुझे तुममें कुछ भी समझदारी नहीं आई, नहीं तो पहचाना? मै आपका मित्र हू । द्रोण के ये वचन इस तरह आकर तुम मुझे अपना मित्र न बताते । सुनकर द्रुपद ऐश्वर्य के अहंकार से क्रोधित होकर हे नासमझ ब्राह्मण ! तू यह नहीं जानता है कि nicooo-srococom Ooo.co.ororo ६३९ म हा भारत अध्याय १३२ ] Mocomooooo 0000000000000 00000000000 न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो ह्येनं विहरति क्रोधो वैनं रहत्युत मैवं जीर्णमुपास्त्र व सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिवन्धनम् ॥८॥ न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुपः सखा न शूरस्य सखा क्लीवः सखिपूर्व किमिप्यते ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ १० ॥ नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी गथनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिप्यते वैशम्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ १२ ॥ स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रति बुद्धिमान् । जगाम कुरुमुरयानां नगरं नागसाह्वयम् इति श्रामन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि द्रोणद्रुपदमवादे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १३२ ॥ शोभाहीन और दरिद्री मनुष्यों से बड़े राजाओं की मूर्ख कभी पण्डित से मित्रता नहीं कर सकता और मित्रता क्याकर हो सकती है। काल पार सय नपुसक कभी वीर का मित्र नहीं हो सकता । फिर वस्तुए मिट जाती है। समय पाकर मित्रता भी तुम इस समय पहले की मित्रता का दावा क्यों हर जाती है । पहले मै भी तुम्हारी जैसी दशा में करते हो। जिनका धन और वल समान है उन्ही था, इसी कारण से तुम्हारे साथ मित्रता हो गई में परम्पर शत्रुता और मित्रता हो सकती है । पुष्ट थी। हृदय में मित्रता का भाव कभी चिरस्थायी और अपुष्ट जना से कभी शत्रुता और मित्रता नहीं नहीं हो सकता। समय के व्यतीत होने पर और हो सकती ।।८।१०॥ बोध से मित्रता जाती रहती है ॥१७॥ जो श्रोत्रिय नहीं है वह कभी प्रोत्रिय का मित्र इसरिय अब तुम उस पुरानी मित्रता पर विश्वास नहीं हो सकता, रथवारे मे विना रथवारा कभी न रक्सो। उस मित्रता को एक चीती हुई यात मित्रता नहीं कर सकता और जो राजा नही यह समशे। दे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! अवश्य ही किमी राना के माथ कभी मित्रता नहीं कर माता । प्रयोजनवश मेरी तुम्हारे साथ मित्रता हो गई थी। इसलिय पहले की मित्रता को अब तुम भूल जाओ। देमा, दरिद्री कभीधी का मित नहीं हो साना, । शायन ने कहा कि पनापी भारद्वान के पुत्र - 2-yror ६४० महा भारत [आदिपर्व reOrcorooroomoroorcom oxo00000000002 ထား द्रोण पाञ्चालराज द्रुपद की यह बात सुनकर कोष दिये और कुरुवंश की राजधानी हस्तिनापुर में से जलकर क्षणभर विचार करके वे वहां से चल पहुंचे ॥११॥१३॥ आदिपर्व का एक सौ वत्तीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने भारद्वाजोऽवसत्तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तमः भारद्वाजस्ततः पार्थान्कृपस्यानन्तरं प्रभुः अस्त्राणि शिक्षयामास नावुध्यन्त च तं जनाः ॥ २ ॥ एवं स तत्र गूढात्मा कंचित्कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वयात् ॥ ३ ॥ क्रीडन्तो वीटया तत्र वीराः पर्यचरन्मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा ॥ ४ ॥ ततस्ते यत्नमातिष्ठन्धीटामुद्धर्तुमादृताः न च ते प्रत्यपद्यन्तं कर्म वीटोपलब्धये ततोऽन्योन्यमवैक्षन्त वीडयाऽवनताननाः तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताऽभवन् ॥ ६ ॥ तेऽपश्यन्ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं. कृशम् । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम् एक सौ तेंतीस अध्याय ॥ १३३ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! द्विज-श्रेष्ठ भारद्वाज । के बाहर गये । वहां खेलते-खेलते अकस्मात् उनकी के पुत्र द्रोण हस्तिनापुर में पहुंचकर कृपाचार्य के गुल्ली कुएं में जा पड़ी ॥१४॥ घर में छिपकर रहने लगे । वहा प्रतापी द्रोणाचार्य । उसके निकालने के लिये उन बालकों ने अनेक कृपाचार्य को शिक्षा देने के पश्चात् कुन्ती के पुत्रों यत्न किये परन्तु वह गुल्ली कुएं से न निकली । को अस्त्र-विद्या की शिक्षा देते थे । इस प्रकार गुप्त इससे वे लज्जा से सिर नीचा कर आपस में एक रूप से वे वहां बहुत दिनों तक रहे, परन्तु कोई दूसरे का मुंह ताकने लगे। उस गुल्ली को निकालने उन्हें पहचान न सका । एक दिन ऐसा हुआ कि के लिये सभी बहुत उत्कण्ठिन हुए । उस समय कुरुवंश के सब बालक गुल्ली-डण्डा खेलने को नगर ' उन्होंने देखा, एक अग्निहोत्री ब्राह्मण नित्यकर्म - - -- co%20cococok 5.5000coconsomoooorco054 महा भारत अध्याय १३३ ] boorconoona ते तं दृष्ट्वा महात्मानमुपगम्य कुमारकाः । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मणं पर्यवारयन् अथ द्रोणः कुमारांस्तान्दृष्ट्वा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान् ॥ ९ ॥ अहो वो धिग्वलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्रताम् । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत ॥१०॥ , वीटां च मुद्रिकां चैव ह्यहमेतदपि द्वयम् । उद्धरेयमिपीकाभिर्भोजनं मे प्रदीयताम् एवमुक्त्वा कुमारांस्तान्द्रोणः स्वायलिवेष्टनम् । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिन्दमः ततोऽब्रवीत्तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर उवाच-कृपस्यानुमते ब्रह्मन्भिक्षामाप्नुहि शाश्वतीम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् द्रोण उवाच-एषा मुष्टिरिषीकाणां मयाऽस्त्रेणाभिमन्त्रिताः अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते ॥ १४ ॥ भेत्स्यामीपीकया वीटां तामिपीकां तथाऽन्यया । तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम ॥१५॥ करके यहीं पास खड़े है । उनका रङ्ग काला और से निकाले देता हूं । अब शत्रुनाशी द्रोण ने पालकों शरीर दुर्बल हुआ हुआ है ॥५॥७॥ से यह कहकर उस निर्जल कुएं में अपनी अंगूठी उन महात्मा ब्राह्मण को देखते ही सब बालक भी डाल दी ॥८॥१२॥ उनके पास गये और उन्हें चारों ओर से घेरकर यह देखकर कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर ने उनसे कहा- खड़े हुए । वीर्यवन्त द्रोण उन लड़कों को, यत्न हे ब्रह्मन् ! कृपाचार्य की आज्ञा लेकर आप सदा के निष्फल होने से, उदास देखकर अपनी अस्त्रविद्या लिय भोजन प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनकर के बल का स्मरण करके कुछ हसकर बोले-तुम्हार द्रोणाचार्य ने कुछ हंसकर भरतकुमारों से कहा- क्षत्रिय बल और अम्त्रविद्या पर धिकार है। तुम यह मुट्ठी के बराबर सीके हैं। मैं मंत्र द्वारा गुल्ली भरत-वंश में जन्म लेकर भी इस कुएं से गुल्ली नहीं को एक सींक से छेदता हु और उस सींक को निकाल सके । यदि तुम मुझे खाने को दो तो दूसरी से और दूसरी को तीसरी से छैदकर तुम्हारी मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी यह अगुठी अभी सीक गुल्ली को निकाले देता है। तुम मंत्र का पराक्रम 2004 Nov000 - ६४२ महा भारत [ आदिपर्व womorrowomorce वैशम्पायन उवाच-ततो यथोक्तं द्रोणेन तत्सर्वं कृतमञ्जसा तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ॥ १६ ॥ कुमारा ऊचु-मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघूमेतां समुद्धर ॥ १७ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः शरं समादाय धनुद्रोणो महायशाः । शरेण विधवा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत्प्रभुः ॥ १८ ॥ सशरं समुपादाय कूपादयलिवेष्टनम् ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः । मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ॥ १९ ॥ कुमारा ऊचुः-अभिवादयामहे ब्रह्मन्नतदन्येषु विद्यते कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान् ॥ २१ ॥ द्रोण वाच-आचक्षध्वं च भीमाय रूपेण च गुणैश्च माम् । स एव सुमहातेजाः सांप्रतं प्रतिपत्स्यते ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच-तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीममूचुः कुमारकाः । ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् ॥ २३ ॥ देखो यह बात कोई अन्य मनुष्य नहीं कर सकता और बड़ा आश्चर्य हुआ । कुमारों ने कहा-हे ब्रह्मन् ! है ॥१३॥१५॥ ऐसी विद्या हमने और किसी में नहीं देखी । हम वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! यह | आपको प्रणाम करते है । हम जानना चाहते हैं कि कहकर द्रोणाचार्य ने उक्तरीति से गुल्ली को निकाल आप कौन है ! किसके पुत्र है ? कहिए, हम आपको दिया। उनका यह कर्म देखकर सब बालक बड़े प्रसन्न करने के लिये आपका क्या प्रिय कार्य करें ? प्रसन्न हुए। उसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर उन । कुमारों के ये वचन सुनकर द्रोणाचार्य ने कहा- बालकों ने द्रोण से कहा-हे ब्रह्मन् ! आप इस | तुम सब भीष्म के पास जाकर ठीक-ठीक मेरे रूप अंगूठी को भी निकाल दीजिए । अनन्तर महायशस्वी | और गुणों का वर्णन करो। इससे वे बड़े तेजम्बी द्रोण ने धनुष लेकर उसपर वाण चढाया और उस भीम मुझे पहचान लेंगे ॥१७.२२॥ वाण से अंगूठी को छेदकर निकाल दिया । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! तब सब बालकों द्रोणाचार्य ने अंगूठी-सहित वह वाण चालकों के | ने भीष्म के पास जाकर उस ब्राह्मण का ठीक-ठीक हाथ में दे दिया । यह कर्म देखकर बालकों को हाल और उनके आश्चर्य कार्य की बात कह सुनाई। occcc0JoorcoomcomcoomcoctoroorcoreDeccccc ६४३ म हा भारत अध्याय १३३ ] 000000coo०० looooo 20000000000 द्रोण उवाच--- भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत । युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च ॥ २४ ॥ अथेनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः । हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्व न्यवेदयत् ॥ २५ ॥ -महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत अस्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदचिकीर्पया ॥ २६ ॥ ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूपणे रतः ॥२७॥ पाश्चाल्यो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः इष्वस्त्रहेतोय॑वसत्तस्मिन्नेव गुरौ प्रभुः ॥ २८॥ स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन्सुचिरं प्रभो ॥ २९ ॥ वाल्यात्प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः ॥ ३० ॥ अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम् । अहं प्रियतमः पुत्रः पितुद्रोण महात्मनः ॥ ३१ ॥ उनसे सुनते ही भीष्म समझ गये कि वे महारथी नम्र, जटाधारी और गुरु की सेवा में उत्साहित होकर द्रोणाचार्य है। और यह सोचा, कि यही आचार्य- मैंने कई वर्ष व्यतीत पिये। उन दिनों पाञ्चालराज कार्य के योग्य हैं । अनन्तर शम्बधारियों में श्रेष्ठ के पुत्र महावरी प्रभावी यज्ञसेन (द्रुपद ) उन्हीं भीम स्वय उसी समय वहा जाकर उनको अपने घर गुरु के पास अविद्या और धनुर्विद्या सीम्वने के ले आये । आदरपूर्वक पूजा करके भीष्म ने द्रोणा- रिये गये और वहीं रहने रगे। हे प्रमु! वे उस चार्य से हस्तिनापुर में आने का कारण पूछ । समय वहा मेरे उपकारी, मित्र और प्यारे थे । द्रोण ने आदि से अन्त तक सब हाल कह सुनाया उनके माथ एकत्र रहकर मैं बहुत दिनों तक मुम्य ॥२३१२५11 से रहा । हे कौरव ! बाल्यावस्था में उनके साथ उन्होंने ने कहा-हे आयुप्मन् ! में पहले एकत्र मैंने पढ़ा था, इमलिय वे सदा मेरे प्रिय अम्त्रविद्या और धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करने के कार्य को करनेवारे और प्रिय कहनेगार मित्र थे लिये महर्षि अमिवश के पास गया था। यहा प्रभचारी, ॥२६॥३०॥ morirurarurore ६४४ पहा भारत [ आदिपर्य o0 02co 000000 अभिपेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चाल्यो यदा तदा । तवद्भोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे ॥ ३२ ।। मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक्त्वाऽथ वनाज कृतास्त्रः पूजितो मया ॥ ३३ ॥ तच वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयस्तदा सोऽहं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद्यशस्विनीम् ॥ ३४ ॥ नातिकेशी महाप्रज्ञामुपयेमे महावताम् अग्निहोत्रे च सत्ये च दमे च सततं रताम् ॥ ३५ ॥ अलभद्गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम् भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम् ॥ ३६ ।। पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिवतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान् ॥ ३७ ॥ अश्वत्थामाऽरुदद्वालम्तन्मे संदेहयद्दिशः न स्नातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु ॥ ३८॥ इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन् । विशुद्धमिच्छन्गांगेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् वे मुझे प्रसन्न करने के लिये उस समय कहा व्रतशीला और अग्निहोत्र तथा यज्ञ करने और करते थे- हे द्रोण ! मै अपने महानुभाव पिता का इन्द्रियों के रोकने में सदा नियुक्त कृपी से विवाह बड़ा प्यारा पुत्र हूं । मै यह तुमसे सौगन्ध खाकर किया ॥३१॥३५॥ कहता हूं कि जब राजा मुझे राज्य देंगे तब तुम कुछ दिनों के पश्चात् मेरे वीर्य से कृपी के बड़ा भी मेरे साथ आनन्द करना। हे मित्र ! मेरा राज्य- पराक्रमी, सूर्य के समान तेजस्वी, पुत्र अश्वत्थामा भोग, सम्पत्ति और सुख, सबकुछ तुम्हारे अधीन | उत्पन्न हुआ। मेरे पिता भग्द्वाज जैसे मुझे पाकर रहेगा । इसके पश्चात् जब द्रुपद अम्बशिक्षा समाप्त प्रसन्न हुए थे वैसे ही सन्तान को पाकर मै भी करके अपने घर जाने लगे तब मैने उचित आदर प्रसन्न हुआ। बालकपन में एक दिन धनी के पुत्रों सत्कार करके उनको विदा किया । राजा द्रुपद की को दूध पीते देखकर वह अश्वत्थामा करुण म्बर प्रतिज्ञा स्मरण करके मै मदा मन में प्रसन्न रहता | से रोने लगा। उसका रोना सुनकर मेरी आंखों के था । अनन्तर पिता की पहली दी हुई आज्ञा के | आगे अंधरा सा छा गया ॥३६॥३८॥ अनुसार पुत्र की कामना से मैंने असाधारण बुद्धिमती, यज्ञ करनेवाले अमिहोत्री ब्राह्मण के पास यदि - conomicoroorcedeoc00.mrpoooooooorcotcom अध्याय १३३ ] महा भारत ६४५ otoox xcxccreauced अन्तादन्नं परिक्रम्य नाभ्यगच्छं पयस्विनीम् अथ पिष्टोदकेननं लोभयन्ति कुमारकाः पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयाऽपि च । ननोत्थाय कौरव्य हृष्टो वाल्यादिमोहितः ॥११॥ तं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु वालैः परिवृतं सुतम् । हास्यतामुपसंप्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत् ॥४२ ॥ द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति । पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया ॥४३ ॥ नृत्यति स्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाऽप्युत । इति संभापतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् ॥१४॥ आत्मानं चात्मना गहन्मनसेदं व्यचिन्तयम् । अपि चाहं पुरा विवर्जितो गर्हितो बसे परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया । इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम् ॥ ४६ ॥ पूर्वस्नेहानुरागित्वात्सादरः सौमकि गतः अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् ॥४७॥ अधिक गायें न हों तो उससे गाय मागने से उसके प्रसन्नता से नाचते देखकर वे सब उसकी सी धर्म का लोप हो सकता है । मै शुद्ध प्रतिग्रह लेने उड़ाने लगे । यह देखकर में बहुत ही दुःखित की इच्छा से गाय के लिये सब देशों में फिरा । हुआ । पुरवासी बामण आपस में कहने लगे कि परन्तु किसी ने मुझको गाय न दी । अन्त में मैंने द्रोण को धिधार है । वे कहीं धन उपार्जन नहीं पालक को बहलाने के लिये पिसे हुए चावल पानी कर सकते । उनके बालक को दूध पीने को भी में पोलकर वह दूध का सा सफेद पानी उमे पीने ' नहीं मिलता । यह चावलों का पानी पीकर, उसे के लिये दिया ॥३९॥१०॥ ही दूध समझार आनन्द से नाच रहा है। उन हे पुरनन्दन ! पालक अश्वत्थामा उस चायलों । पुरवासी बामणों की ये बातें सुनकर मेरा जाता के पानी को पीर पाल्यावस्था के कारण मुग्य रहा परन्तु फिर मैं आप ही अपने को भिधार देता होकर यह कहकरके कि "मैंने दूध पिया है" उठकर हुआ मनमें पहने रमा-मैं प्राणों में त्याग दिये भानन्द से नाचने लगा । मय भनी मेरी दशा को जाने और निन्दित होने पर भी यहां हो रहूंगा। जागते ही थे । अश्वत्थामा फो चावरों का पानी पीकर में धन के संभ से पराई मेवा करने का नान पति Dirror A/cur ६४६ महा भारत [ आदिपर्व 200concoco/oo0000000 । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् संस्मरन्संगमं चैव वचनं चैव तस्य तत् ॥४८॥ ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो अब्रुवं पुरुषव्याघू सखायं विद्धि मामिति ॥ ४९ ॥ उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगतः स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ॥ ५१ ॥ संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्व सामर्थ्यवन्धनम् ॥ ५२ ॥ नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा। साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यान्नोपपद्यते ॥ ५३॥ न सख्यमज लोके विद्यते जातु कस्यचित् । कालो वैन विहरति क्रोधो वैनं रहत्युत ॥ ५४॥ ग्रहण नहीं कर सकता । हे भीष्म ! मै इस विचार बतलाते । काल पाकर सभी वस्तुएं मिट जाती हैं। पर दृढ़ न रह सका । अपने प्यारे मित्र द्रुपद के समय पाकर मित्रता भी टूट जाती है। पहले जो राजा होने का समाचार पाकर मै अपनी स्त्री और | मैने तुम्हारे साथ मित्रता की थी उसका कारण यह पुत्र को लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक उनके पास चला था कि उस समय मेरी दशा तुम्हारी जैसी ही थी। ॥४१॥४६॥ | देखो, जो श्रोत्रिय नहीं है वह कभी श्रोत्रिय हे प्रभु ! उनकी पूर्व प्रतिज्ञा को स्मरण करता का मित्र नहीं हो सकता, रथवाले से बिना स्थवाला हुआ मैं पाञ्चाल देश की राजधानी में पहुंचा । मुझे कमी मित्रता नहीं कर सकता और जो राजा नहीं अपने मित्र द्रुपद पर पूरा विश्वास था । इस कारण है वह राजा के साथ कभी मित्रता नहीं कर सकता मैंने वैधड़क उनके पास जाकर कहा-हे नरों में है। इसलिए तुम क्यों पहली मित्रता की इच्छा श्रेष्ठ ! मै तुम्हारा मित्र हूं; यह कहकर मित्र की | करते हो ? जो समान है उन्हीं में मित्रता हो तरह पास जाकर उनसे मिला ||४७१५०! सकती है, अच्छी और बुरी दशावालों में परस्पर इससे नीच मनुष्य की तरह मुझपर हंसकर मित्रता नहीं हो सकती ॥५१॥५॥ उन्होंने कहा-हे ब्राह्मण ! तुम्हारी बुद्धि अभी कच्ची इस संसार में किसी की मित्रता सदा के लिये ही बनी है । तुममें कुछ भी समझदारी नहीं आई; नहीं बनी रहती । कामवश या क्रोध से वह मिन्नता नहीं तो इसतरह आकर तुम मुझे अपना मित्र न जड़ से नष्ट हो जाती है । इसलिए तुम उस पुरानी copics/Cococc000000000003coosecscove ६४७ महा भारत अध्याय १३३ ] मैवं जीर्णमुपास्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिवन्धनम् ॥ ५५॥ न ह्यनाढ्यः सखाढ्यस्य नाविद्वान्विदुपः सखा। न शूरस्य सखा क्लीवः सखिपूर्व किमिप्यते ॥ ५६ ॥ न हि राज्ञामुदीर्णानामेवंभूतैनरैः क्वचित् सख्यं भवति मन्दात्मश्रियाहीनधनच्युतैः नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिप्यते ॥ ५८॥ अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम् । एकरात्रं तु ते ब्रह्मन्कामं दास्यामि भोजनम् ॥ ५९॥ एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा तां प्रतिज्ञा प्रतिज्ञाय यां कर्ताऽस्म्यचिरादिव ॥ ६ ॥ द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाऽभिपरिप्लुतः अभ्यागच्छं कुरून्भीप्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः ॥ ६१ ॥ ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः इदं नागपुरं रम्य ब्रूहि किं करवाणि ते ॥६२ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभापत ॥ ६३ ॥ मित्रता की इच्छा करना छोड़ दो। हे ब्राह्मणों प्रतिज्ञा की थी, परन्तु वह मुझे तो स्मरण नहीं । में श्रेष्ठ ! अवश्य ही किसी प्रयोजनवश मेरी तुम्हारे हां, एक दिन मैं तुमको अच्छी प्रकार भोजन करा साथ मित्रता हो गई थी। देखो, दरिद्री कभी धनी सकता हूं । राजा द्रुपद के ये वचन सुनकर मैं का मित्र नहीं हो सकता, मूर्ख कभी पाण्डित से अपनी स्त्री, बालक और शिष्यों के साथ वहां से मित्रता नहीं कर सकता और नपुंसक कभी वीर का लौट आया । हे भीष्म ! वहां से लौटते समय मैंने मित्र नहीं हो सकता । फिर तुम इस समय पहले | एक प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञा को मैं शीघ्र ही की मित्रता का दावा क्यों करते हो ? हे नासमझ | पूरी करने की चेष्टा करुगा। राजा द्रुपद के व्यवहार ब्राह्मण ! तुम नहीं सोचते कि अनन्त ऐश्वर्ययुक्त से मुझे अत्यन्त क्रोध हुआ। इसी कारण, आश्रय राजा लोग तुम ऐसे दरिद्रों के साथ क्योंकर मित्रता की इच्छा से, गुणी शिष्यों के साथ मैं इस कुरुवंश करने लगे? ॥५४॥५८॥ की गजधानी में आया हूं। आप क्या चाहते हैं ? तुम कहते हो, मैने पहले तुमसे राज्य देने की | मैं आपकी इच्छा पूरी करने को तैय्यार हूं ॥५९।६२।। 000000rco 0000000om O ६४८ महा भारत [ आदिपर्व भीष्म उवाच -अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुव भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥ ६४ ॥ कुरूणामस्ति यद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव यच ते प्रार्थितं ब्रह्मन्कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्टया प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान्मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ६६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३३ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् | द्रोणाचार्य के | सबको और कुरुओं को आप अपना ही समझिये । ये वचन सुनकर भीष्म ने कहा-आप धनुष को । हे ब्रह्मन् ! आपकी जो कुछ इच्छा हो उसे पूरी ही उतार दीजिए। यहां रहकर इन कुमारों को धनुर्वेद समझिए । हम अपना अहोभाग्य समझते हैं जो और अत्रों की शिक्षा दीजिए । कुरुओं से पूजे आप कृपा करके हमारे यहां आये । आपने हमारे जाकर भोग के पदार्थ भोगिये ॥६३०६४॥ ऊपर बड़ी कृपा की ॥६५/६६॥ कुरुओं के पास जो कुछ राज्य और धन है उस आदिपर्व का एक सौ तेत्तीस अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ चतुस्त्रिंशत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १३४ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः संपूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन्पौत्रानादाय कौरवान् । शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ॥ २ ॥ गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः स ताञ्छिष्यान्महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् । पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः एक सौ चौतीस अध्याय ॥ १३४ ॥ वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमेजय | अनन्तर भीष्म ने बहुत सा धन दक्षिणा में देकर अपने पौत्रों अति तेजस्वी मनुष्यों में श्रेष्ठ द्रोण, भीष्म से पूजे को उनका शिष्य कर दिया । भीष्म ने धन-अन्न से जाकर कुरुओं के घर में आदरपूर्वक रहने लगे। भरा एक सुन्दर घर द्रोण को दिया ॥१३॥ Doormarroreovernraoooovernoroscarmourcarrrrorawers - 9/03 210 HOTo0 areeopeacoc00000 । अध्याय १३४ ] म हा भारत ६४९ Indian प्रतिगृह्य च तान्सर्वान्द्रोणो वचनमब्रवीत् । रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा द्रोण उवाच-कार्य, मे कांक्षितं किंचिद्धृदि संपरिवर्तते कृतास्त्रैस्तप्रदेयं मे तदेतद्वदतानघाः वैशम्पायन उवाच-तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन्विशांपते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परंतप ततोऽर्जुन तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः । प्रीतिपूर्व परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च । ग्राहयामास दिव्यानि मानुपाणि च वीर्यवान् ॥ ९ ॥ गजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ । अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ॥ १० ॥ वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरु द्रोणमियात्तदा स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्पणः दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ॥ १२ ॥ यड़े धनुषधारी द्रोणाचार्य प्रसन्नचित्त से उन हर्ष के मारे उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे। धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों को, शिप्य करके, इसके पश्चात् वे वीर्यवन्त द्रोण अपने शिष्यों को धनुर्वेद की शिक्षा देने लगे । एक दिन सबको अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्रों की शिक्षा देने लगे। एकान्त में बुलाकर द्रोणाचार्य ने कहा-हे अनघगण! हे भरतश्रेष्ठ ! तब दूसरे अनेक राजकुमार भी आकरके मेरे मन में एक इच्छा है; अम्त्रविद्या समाप्त होने । अस्त्रशिक्षा के लिये ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य के पर तुम लोग वह मेरी इच्छा पूरी करोगे ॥४६॥ पास एकत्रित होने लगे ॥७॥१०॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! द्रोणाचार्य के वृष्णि और अन्धकवंशी आदि अनेक वंशों के ये वचन सुनकर सब कुमार चुप हो रहे । अनन्तर राजा लोग अस्त्रविद्या सीखने को वहां आकर शत्रुओं के नाश करनेवाले अर्जुन ने उत्साह के साथ | द्रोणाचार्य के शिष्य हुए । और सूत के पुत्र कर्ण गुरु की इच्छा पूरी करने की प्रतिज्ञा की । तब भी वहां अस्त्रविद्या सीखने को आते थे। वे अति द्रोणाचार्य ने अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार अर्जुन । द्वेषयुक्त होकर अर्जुन से अहंकार दिखाकर दुर्योधन का सिर चूमकर उनको हृदय से लगाया । और , की और झुककर पाण्डवों का अनादर करने लगे। prioscom100 महाभारत [ आदिपर्व rococa अभ्ययात्स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्पया । शिक्षाभुजवलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः ॥ १३ ॥ अस्त्रविद्यानुरागाच विशिष्टोऽभवदर्जुनः तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्ठवेषु च सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः । ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेवमन्यत एवं सर्वकुमाराणामिप्वस्त्रं प्रत्यपादयत् कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छञ्चिरकारणात् ॥ १६ ॥ पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात् । यावत्ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम् ॥ १७ ॥ द्रोण आचष्ट पुत्राय तत्कर्म जिष्णुरौहत । ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम् सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः आचार्यपुत्रात्तस्मात्तु विशेषोपचयेऽपृथक् न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः ॥ १९ ॥ अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद्गुरुपूजने अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत् ॥ २० ॥ अर्जुन धनुर्वेद सीखने के लिये सदा द्रोणाचार्य के | देने लगे । वे नित्य सब शिष्यों को एक-एक पास रहते थे। वे शिक्षा, भुजाओं के बल, उद्योग | कमण्डलु अर्थात् छोटे मुँहवाला जल का वर्तन देते और अस्त्रविद्या में यत्न रखने के कारण उन सबों में थे, और शीघ्र कार्य पूरा करने के लिये अपने पुत्र बढ़चढ़ कर हुए । अस्त्रविद्या में वे द्रोण के समान अश्वत्थामा को एक कलसा देकर जल लाने के लिये हो गये । गुरु द्रोणाचार्य तो सभी शिष्यों को | भेजते थे । कलसे का मुँह कमण्डलु से बड़ा होने समान रूप से अस्त्र-प्रयोग, फुर्ती और अस्त्र चलाने के कारण अश्वत्थामा सबसे पहले जल लेकर आ की सफाई का काम सिखाते थे परन्तु सब शिष्यों | जाते थे। अन्य शिष्य देर में आते थे । उसी अवसर में अर्जुन ही सब बातों में अच्छे हुए। यह देखकर में द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को किसी-किसी द्रोण ने सोचा कि कोई भी शिक्षा के विषय में इस श्रेष्ठ प्रकार का उपदेश किया करते थे । पाण्ड-पुत्र इन्द्र-पुत्र अर्जुन के समान नहीं हो सकेगा, आचार्य अर्जुन ने अपनी बुद्धि से शीघ्र ही इस रहस्य को द्रोण इस प्रकार वाण और अस्त्रविद्या की शिक्षा जान लिया। वे वारुणास्त्र के प्रयोग से कमण्डलु - - ecoccomocococco •30000000conconcocoo2000 अध्याय १३४ ] महा भारत pod Doooooo0i2003002 0202004 तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिप्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम् । आय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत ॥ २१ ॥ अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन । न चाख्ययामदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया ॥ २२ ॥ ततः कदाचिद्भुनाने प्रववी वायुरर्जुने तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः ॥ २३ ॥ भुक्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात् ॥२४॥ तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः योग्यां चक्रे महावाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः ॥ २५॥ तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत । उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ द्रोण उवाच-प्रयतिप्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः । त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च । रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत् ॥ २८ ॥ भरकर आचार्य के पुत्र अश्वत्थामा के साथ एक ही | भोजन न देना। और अर्जुन से यह भी नहीं कहना, समय में गुरु के पास आ जाते थे । इससे अस्रविद्या कि मैंने तुमसे ऐसा कहा है ॥२०॥२२॥ जाननेवालों में श्रेष्ठ, मेधावी अर्जुन विशेष-विशेष गुणों एक दिन अर्जुन भोजन कर रहे थे कि ऐसे में आचार्य के पुत्र से अलग और कम नहीं हुए समय में वायु चलने लगी, इससे जलते हुए प्रदीप ॥११॥१९॥ के वुझजाने पर भी तेजस्वी अर्जुन तब अंधेरे में वे पड़े यत्न के साथ गुरु की सेवा करते हुए भोजन करने लगे । अभ्यास के कारण उनका हाथ अस्त्रविद्या का अभ्यास किया करते थे, इसी कारण ठीक मुंह के पास जाता था। इससे महामुज पाण्डु- द्रोणाचार्य उनपर बड़ी कृपा रखने लगे । अर्जुन नन्दन अर्जुन ने यह समझकर कि अभ्यास से ही अपने गुणों के कारण द्रोणाचार्य को सबसे पढ़कर ऐसा होता है रात्रि के समय न देखने योग्य निशाने प्यार हो गये । उनको अघों की शिक्षा में सदा से वाण चलाने का अभ्यास आरम्भ कर दिया । तत्पर देसकर द्रोणाचार्य ने रसोईवाले को एकान्त | हे भारत ! आचार्य द्रोण ने रात्रि को धनुप की टोरी में बुलाकर कहा-तुम अर्जुन को कभी अंधेरे में का टंकार सुना । वे उसी समय उठकर अर्जुन के 000000001 H-0000000 [ आदिपर्व 0.0coped0cc ६५२ महा मारत Coconocord yoacáncos गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ॥ २९ ॥ तस्य तत्कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुपः सुतः । एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह न स तं प्रतिजग्राह नैपादिरिति चिन्तयन् । शिष्यं धनुपि धर्मज्ञस्तेषामेवान्यवेक्षया ॥ ३२ ॥ स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतपः । अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ॥ ३३ ॥ तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा इण्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ॥ ३४ ॥ परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः ॥३५॥ अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित्कुरुपाण्डवाः । स्थैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दन ॥ ३६ ॥ पास आये । प्रसन्न होकर उन्होंने अर्जुन को गले सुनकर सहखों राजा और राजकुमार उनके अस्ता- से लगा लिया और कहा-मै तुमको ऐसा बनाने का भ्यास सीखने को आये ॥२८॥३०॥ विशेष यत बदए कि तुम्हारे समाज धनुर्दिदार के ३ महाराज एकदिन हिरवन नापक शिवद जाननेवाला इस संसार में दूसरा न हो ॥२३॥२७॥ राजकुमार एकलव्य द्रोण के पास आया । धर्मज्ञ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! द्रोण यह समझकर कि यह व्याध का पुत्र भनन्तर वीर्यवन्त द्रोणाचार्य ने सब कुमारों को राजकुमारों के चिढ़ने के मय से उसको नहीं लिया। हाथी, रथ, घोड़े और पृथ्वी पर का युद्ध, गदायुद्ध, : हे शत्रुनाशि ! एकलव्य द्रोणाचार्य के पावों पर सिर तलवार चलाने, तोमर, प्रास, शक्ति आदि विशेष रखकर प्रणाम करके लौट गया। वन में जाकर विशेष अत्रों के फेंकने में और तंग युद्ध में अर्थात् एक । उसने मिट्टी की द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर अपने ही समय अनेक वाण चलाने अथवा एक बार ही सामने रख ली और उसको आचार्य समझकर अनेक मनुष्यों के साथ युद्ध करने में सुशिक्षित । उसकी सेवा करता हुआ वह उसी के आगे बाण किया । द्रोणाचार्य की अस्त्रविद्या में ऐसी कुशलता चलाने का अभ्यास करने लगा। बड़ी श्रद्धा - अध्याय १३४ ] महा भारत 7c 0.0ccicocono0000000racol mocracror0700se तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद्यदृच्छया राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ॥ ३७॥ तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया । श्वा चरन्स बने मूढो नैपादि प्रति जग्मिवान् ॥ ३८ ॥ स कृष्णमलदिग्धानं कृष्णाजिनजटाधरम् । नेपादि श्वा समालक्ष्य भपस्तस्थौ तदन्तिके ॥३९॥ तदा तस्याथ भपतः शुनः सप्त शरान्मुखे । लाघवं दर्शयन्नम्त्रे मुमोच युगपद्यथा ॥४०॥ स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह । तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ॥ ११ ॥ लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत्परमं तदा प्रेक्ष्य तं वीडिताश्चासन्प्रगशंसुश्च सर्वशः ॥ ४२ ॥ तं ततोऽन्वेषमाणास्ते बने वननिवासिनम् । दहशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ४३ ॥ न चैनमभिजानस्ते तदा विकृतदर्शनम् तथनं परिपप्रच्छुः को भवान्कस्य वेत्युत ॥४४॥ नियम के साथ मन लगाकर अभ्यास करने से वाण काला, विष्ठा से शरीर रक्षा हुमा, काला चमड़ा चलाने में और अत्रों के प्रयोग में वह निपुण हो गया । पहने हुए और जटाधारी देखकर उसके सामने ॥३१॥३५॥ , खड़ा होकर भौंकने लगा ॥३६॥३९॥ अनन्तर किसी समय शत्रुओं के नाश करनवाले व्यायपुत्र ने बड़ी शीघ्रता से सात वाण मारकर धृतराष्ट्र और पाण्ड्ड के पुत्र, द्रोणाचार्य की आज्ञा से, | उस कुत्ते का मुँह भर दिया। ऐसा जान पड़ा, रथा पर चढ़कर वन में मृगया के लिये गये । हे मानों एक साथ ही सातों वाण उस कुत्ते के मुंह में राजन् ! तब एक मनुष्य मृगया के लिये जाल आदि धुम गये हो । कुत्ता व्याकुल होकर भागता हुआ लेकर एक कुत्ते को साथ लेकर अपनी इच्छानुसार पाण्डवों के पास आया । उसकी यह दशा देखकर पाण्डवों के साथ चलने लगा। आगे उस वन में ' वीर पाण्डवों को बड़ा आश्चर्य हुआ । उसके पाण जब सब लोग अपना-अपना कार्य पूरा करने के , चलाने की बड़ी फुर्ती और शब्द अपने की सामर्थ्य लिये धूम रहे थे, नम उनका साथी कुता किसी से देखकर सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। ऐसी देसे जाकर व्याध की ओर गया और उसको चतुराई अपने में न देखकर सब राजकुमार बहुत 1 Prandeo1015 ६५४. महाभारत [ आदिपर्व - - एकलव्य उवाच-निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुपः सुतम् द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ॥ ४५ ॥ वैशम्पायन उवाच-ते तमाज्ञाय तत्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः यथावृत्तं वने सर्व द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ॥ ४६॥ कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ॥४७॥ अर्जुन उवाच-तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ॥ १८ ॥ अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् । अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निपादाधिपतेः सुतः ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच-मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम् सव्यसाचिनमादाय नैपादिं प्रति जग्मिवान् ॥ ५० ॥ ददर्श मलदिग्धा जटिलं चीरवाससम् । एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान् एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् । 'अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ५२॥ ही लज्जित हुए ॥४०॥४२॥ वहां से आकर द्रोणाचार्य से सब हाल कह सुनाया। हे राजन् ! तब पाण्डवों ने उस वन में रहनेवाले । हे राजन् ! कुन्ती-पुत्र अर्जुन ने एकलव्य की बात अस्त्र चलानेवाले को वन में ढूढ़ते हुए देखा, कि म्मरण करके एकान्त में द्रोणाचार्य से आकर कहा- वह बराबर वाण चला रहा है । उस समय हे आचार्य ! पहले आपने प्रसन्न होकर, गले से एकलव्य का रूप ऐसा विकृत हो रहा था कि किसी लगाकर कहा था कि आप का कोई भी शिष्य ने उसे नहीं पहचाना । अन्त में उन्होंने उससे धनुर्विद्या में मुझसे श्रेष्ठ न होगा । फिर निषादपति पूछा-आप कौन हैं ? किसके पुत्र है ? एकलव्य ने का एकलव्य नामक पुत्र मुझसे अधिक और सारे कहा-हे वीरो! मै निषादराज हिरण्य धनुष का पुत्र संसार में विशेष पराक्रमी क्यों है । ॥४६॥४९॥ हू, द्रोणाचार्य का शिष्य हो करके सदा धनुर्वेद वैशम्पायन जी बोले-हे महाराज ! अर्जुन की सीखने के लिये परिश्रम कर रहा हूं ॥४३॥४५|| बात को सुनकर द्रोणाचार्य ने कुछ देर तक तो वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! अनन्तर उन विचार किया उपरान्त उसे साथ लेकर वन में गये। राजकुमारों ने उसे अच्छीतरह पहचान लिया। वहा देखा, कि जटाधारी, मैले और फटे कपड़े --- oroorcoc00 50%20100areeococolroconscom ६५५ महाभारत अध्याय १३४ ] roor - - पूजयित्वा ततो द्रोण विधिवत्स निपादजः । निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ॥ ५३॥ ततो द्रोणोऽब्रवीद्राजन्नेकलव्यमिद वचः यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतन दीयतां मम एकलव्यस्तु तच्छुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् ॥ ५४ ॥ परव्य उवाच-किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम ॥ ५५ ॥ वैशम्पायन उवाच तमत्रवीत्वयांगुष्टो दक्षिणो दीयतामिति एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् ॥ ५६ ॥ प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्ये च नियतः सदा तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः ॥ ५७॥ छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद् द्रोणायाङ्गुष्टमात्मनः । तत शरं तु नेपादिग्गुलीभिर्व्यकर्पत न तथा च स शीघोऽभूयथा पूर्व नराधिप ततोऽर्जुनः प्रीतमना वभूव विगतज्वरः द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम् ॥ ५९ ॥ द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यो बभूवतुः । दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसो ॥६०॥ पहने हुए एकरव्य बरावर वाण चला रहा है । दर में श्रेष्ठ ' आप मेरे गुर हैं, इसलिये प्रेमी कोई यन्तु में आचार्य को आते देखकर उसने पास आकर नहीं जो आप को न दी जा सके । यह मुनकर प्रणाम दिया। सादर प्रणाम और विधिपूर्वक पूजा द्रोणाचार्य ने कहा-हे एकरय ! मैं गुरु-दपिणा में कर उसने कहा-यह आपका शिष्य सेवा में तुम्हारे दाहने हाथ का अगृठा मागता ह ॥५४॥५६॥ उपम्पिन है क्या आजा है । एकर य अय हाथ द्रोणाचार्य के ये वचन मुनार उम सत्यवादी जेडकर आंग मड़ा रहा ॥५०॥३॥ एकरूप ने, अपनी प्रतिभा के अनुसार, बड़े उत्माह द्राणाचार्य ने कहा-यदि तुम मेरे मिप्य हो तो मे दाहने हाय । अगूठा काटकर गुरु को दे दिया। मुझे गुरु-दक्षिणा दो । एकर य ने ममल होर हे नरेश ! अनन्नर निपारानकुमार रोप उगलियों महादे रहाराज ! कहिप में क्या हमागा मे याण चन्यने रमा, पातु यह पहरे की तरह महा मारत [ आदिपर्व ooxcoooozcooorkoecor - अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्याधिकोऽभवत् । तथातिपुरुषानन्यान्सारुको यमजावुभौ युधिष्ठिरो रथिश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनञ्जयः प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः ॥ ६२ ।। बुद्धियोगवलोत्साहैः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् एकः सर्वकुमाराणां वभूवातिरयोऽर्जुनः ॥ ६४ ॥ प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम् धार्तराष्ट्रा दुरारमानो नामृप्यन्त परस्परम् तांस्तु सर्वान्समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् । द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुपर्षभः कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् । अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥६७ ॥ द्रोण उवाच- शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं संधिपवः शीघ्रता से काम न कर सका। यह देखकर अर्जुन | बातें थीं । वह अस्त्रों के चलाने में बड़े दक्ष थे की चिन्ता दूर हुई, वे बहुत प्रसन्न हुए । और गुरु की सेवा करने में उनके समान दूसरा कोई द्रोणाचार्य ने अपना यह वचन सत्य किया कि नहीं था ॥६०६३|| "अर्जुन के समान मेरा कोई शिप्य न होगा" वे स्थी दल के स्वामियों के दलपति समुद्र से ॥५७/५९॥ लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी में प्रसिद्ध हुए । द्रोणाचार्य सब दुर्योधन और भीमसेन ने द्रोणाचार्य से गदायुद्ध शिष्यों को समानमाव से धनुर्वेद की शिक्षा देते थे, सीखकर बड़ा अभ्यास किया | अस्त्रविद्या की गुप्त तथापि वीर्यवन्त अर्जुन अपनी स्थिर बुद्धि के प्रभाव बातों के जानने में अश्वत्थामा सब से बढ़कर हुए। से सब कुमारी से बढ़कर हुए । है शत्रनाशि ! नकुल और सहदेव के समान तलवार के चलाने में दुरात्मा धृतराष्ट्र के पुत्र, बड़े बली भीमसेन और कोई न हुआ । युधिष्ठिर रथ हांकने में सबसे चतुर धनुर्विद्या सखि हुए अर्जुन को देखकर द्वप से जलने हुए। परन्तु अर्जुन सभी बातों में सबसे श्रेष्ठ हुए । लगे । हे पुरुषश्रेष्ठ ! अब अपने शिष्यों की शिक्षा अर्जुन में बुद्धि, एकाग्रता, बल और उत्साह सभी समाप्त समझकर द्रोणाचार्य ने उनकी परीक्षा लेनी Cococococooooooooooooooooooooooolcocoroorcons अध्याय १३४ ] महा भारत DO00000000002050 cocore मद्राक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम् । एकैकगो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥ ६९ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचागिरसां वरः संधत्स्व वाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुश्चतम् ॥७॥ ततो युधिष्ठिरः पूर्व धनुर्गृह्य परन्तपः तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्य प्रचोदितः ॥७१ ॥ ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् ‘स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ।। ७२॥ पश्येनं त्वं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज पच्यामीत्येवमाचार्य प्रत्युवाच युधिष्ठिरः स मुहूर्तादिव पुनोणस्तं प्रत्यभापत ॥ ७३ ॥ द्रोण उवाच- अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातृन्वापि प्रपश्यसि ॥ ७४ ॥ तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् । भवन्तं च तथा भ्रातृन्भासं चेति पुनः पुनः ॥ ७५ ॥ तमुवाचापसपेंति द्रोणोऽप्रीतमना इव नैतच्छक्यं त्वया वेद लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥ ७६ ॥ चाही। उन्होंने कारीगर से एक नकरी गिद्ध वनवा- | बेटा ! धनुष पर वाण चढाओ ! मेरे कहने पर उसे कर एक वृक्ष पर, रख दिया ! उसी को निशाना छोड़ना । शत्रुओं के दमन करनेवाले युधिष्ठिर ने बनाया ॥६४।६७|| गुरु की आज्ञा से धनुष पर वाण चढाया। तव द्रोण पिर सब कुमारों को बुलाकर वही गिद्ध का ने पूछा-हे राजकुमार ! इस वृक्ष की शाखा पर एक निशाना दिखाकर रोणाचार्य ने उनसे कहा है कुमारो! , गिद्ध बैठा हुआ है, उसे देखते हो । युधिष्ठिर ने तुम रोग शी अपने अपने धनुप लेकर उनपर कहा-हा देखता हू ॥७०७३॥ याण चढाकर सड़े हो जाओ। जब हम कहें तय द्रोण ने फिर उसमे पूछा-तुम इस वृक्ष को, तुमको इस गिद्ध के सिर को काटना होगा । एक एक मुझको अथवा अपने भाइयों को भी देख रहे हो फरक, जिससे मैं कह वही निशाने पर वाण चरावे या नहीं । युधिष्ठिर ने कहा-हा, में इस वृष का, ॥६८६९॥ आपका, अपने भाइयों को भीर उस पक्षी को भी वंशयन ने कहा-हे राजन् । अगिरा वशियों देख रहा हु । आचार्य मे यार यार यों पूर्ण जाने में श्रेष्ठ द्रोण ने सबसे पहले युधिष्ठिर से कहा-दे पर भी उन्होंने बार-बार वैमा ही कहा। इसमें द्रोण Prori.inmrprJul ६५८ महा भारत [आदिपर्व conceremoncocorc000000mooncoco/cscaca Sereci-cardcom ततो दुर्योधनादीस्तान्धार्तराष्ट्रान्महायशाः तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ॥७७॥ अन्यांश्च शिप्यान्भीमादीन्राज्ञश्चैवान्यदेशजान् । तथा च सर्वे तत्सर्व पश्याम इति कुत्सिताः ॥ ७८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि द्रोणशिष्यपरीक्षायां चतुरिंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१३४॥ उनपर असंतुष्ट होकर झिड़क कर बोले-तुम चले था । भीमसेन, नकुल, सहदेव और अन्यान्य देशों जाओ; तुम इस निशाने को नहीं मार सकते । के राजकुमारों को खड़ा करके द्रोण ने वही प्रश्न इसके पश्चात् धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन आदि को किया। सबने वही उत्तर दिया । सबको झिड़क कर भी वहां पर खड़ा करके द्रोण ने वही प्रश्न किया। द्रोणाचार्य ने पीछे हटा दिया ॥७४१७८॥ उन सपने बही उत्तर दिया जो युधिष्ठिर ने दिया आदिपर्व का एक सौ चौत्तीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पंचत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो धनञ्जयं द्रोणः समयमानोऽभ्यभाषत । त्वयेदानी प्रहर्तव्यमेतलक्ष्यं विलोक्यताम् ॥ १ ॥ मद्वाक्यसमकालं से मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥ ३ ॥ मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन पक्ष्याम्येक भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभापत । न तु वृक्षं भवन्तं वा पयामीति च भारत एक सौ पैंतीस अभ्याय ॥ १३५ ।। वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमेजय ! इसके ) से धनुष पर वाण चढ़ाकर, निशान की ओर दृष्ट पीछ द्रोणाचार्य कुछ हंसकर अर्जुन से बोले-हे पुत्र! | जमाकर, खड़े रहे । तब द्रोणाचार्य ने कहा है इस निशाने की ओर देखा; अब तुमको यह निशाना ! अर्जुन ! तुम इस वृक्ष को, पक्षी को और मुझे देख मारना होगा। तुम अभी धनुष पर वाण चढ़ाकर रहे हो ? हे भारत! अर्जुन ने कहा, कि केवल पक्षी मेरी आज्ञा की बाट देखो । अर्जुन गुरु की आज्ञा ही को तो देखता हूं, वृक्ष को और आपको नहीं oomcoroscoresresorrectoroozotoroornawwarescorrorn wrocuracara - .
अध्याय १३५] महा भारत co colooconcocococoose. 000000000000000 -rrrricmraekaci ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः । प्रत्यभापत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् भासं पश्यासि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥ अर्जुननैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः मुश्चस्वेत्यत्रवीत्पार्थं स मुमोचाविचारयन् ततस्तस्य नगस्थस्य सुरेण निशितेन च शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः तस्मिन्कर्मणि संसिद्ध पर्यष्वजत पाण्डवम् । भेने च द्रुपदं सङ्ख्ये सानुवन्धं पराजितम् ॥ १० ॥ कस्यचित्तथ कालस्य सशिष्योऽहिरसां वरः जगाम गङ्गामभितो मजितुं भरतर्षभ अवगाढमथो द्रोणं सलिल सलिलेचरः ग्राहो जग्राह वलवाजङ्घान्ते कालचोदितः ॥ १२ ॥ स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान्सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षय मामिति स्वरयन्निव ॥१३॥ तद्वाक्यसमकालं तु वीभत्सुनिशितैः शरैः । अवार्यः पञ्चभिहिं मन्नमम्भस्यताडयत् देखता हूँ । अनन्तर दुर्द्धपं द्रोण प्रसन्न होकर कुछ । नाई वाण से वृक्ष पर के पक्षी का सिर कटकर देर ठहर कर पाण्डवों में महारथी उन अर्जुन से नीचे गिरा । अर्जुन को इस कार्य में सफलता प्राप्त बोले-तुम पक्षी का कैसा आकार देख रहे हो ? करते देख द्रोणाचार्य को बड़ा आनन्द हुआ। अर्जुन ने कहा है आचार्य ! मैं केवल उस पक्षी। उन्होंने अर्जुन को गले से लगा लिया । और मन का सिर देख रहा हूं; शरीर नहीं देखता । अर्जुन ही मन में यह निश्चय कर लिया कि अर्जुन ही युद्ध की यह बात सुनकर द्रोणाचार्य ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक में राजा द्रुपद को जीत सकेंगे। हे भारतकुल में फहा, कि अप वाण चलाओ । गुरु की आज्ञा पाते श्रेष्ठ पुष्प ! कुछ समय के व्यतीत होने पर एक दिन ही पाण्डु-पुत्र अर्जुन ने कोई विचार न करके वाण द्रोणाचार्य, शिष्यों को साथ लिये हुए, गहा में को छोड़ा। उससे उसीक्षण उस तेज उम्तरे की मान करने को गये। ज्योंही आचार्य जल के भीतर nirmwareneuroramanarrora .. - arrorarirrororanarsrarrrrrrrrrory महा मारत [ आदिपर्व comco coc Prococorrororsrecorrorror - इतरे त्वथ समूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥ १५ ॥ विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा । स पार्थवाणैर्वहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥ १६ ॥ ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जवां त्यक्त्वा महात्मनः । अथाऽब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ॥ १७॥ यहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ॥ १८ ॥ न च ते मानुषेप्येतत्प्रयोक्तव्यं कथंचन । जगद्विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ॥ १९ ॥ असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते तद्धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ॥ २० ॥ वाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ॥ २१ ॥ तथेति संप्रतिश्रुत्य बीभत्तुः स कृताञ्जलिः । जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ॥ २२ ॥ उतरे त्योंही एक बड़े बलवान् मगर ने उनकी जाय छोड़कर अर्जुन के वाणों से टुकड़े-टुकड़े होकर पकड़ ली । द्रोण स्वयं उससे बचने में समर्थ होने | परलोक को सिधाग। इसके पश्चात् महामति भारद्वाज- पर भी सब शिष्यों से मानों उनकी शीघ्ता देखने पुत्र महात्मा अर्जुन से बाले-हे महाभुज ! प्रयोग के लिये बोले-तुम गंग तुरन्त इस मगर को मार और संहार के साथ ब्रह्मशिर नामक यह अति फर मेरी रक्षा करो । गुरु द्रोणाचार्य के यह बात | दुर्द्धर्प श्रेष्ठ अस्त्र मैं तुमको देता हूं। परन्तु देखो, कहते ही अर्जुन ने पांच न रोक्ने योग्य वाणों से मनुष्यों के ऊार कभी यह अस्त्र न चलाना; क्योंकि जल में डूबे हुए मगर को विद्ध किया। और शेष सब मनुष्यों का तेज थोडा होता है। यह अत्र मारे शिष्य अपनी-अपनी जगह पर मूखों की तरह खड़ेजगत् को जला सकता है। तीनों रोगों में इस अम्न देखते रहे । तब आचार्य द्रोण अर्जुन को काम में को बहुत कम लोग जानते हैं । हे वीर ! तुम इसे सफलता प्राप्त करते देखकर उनको सब शिप्यों में यनपूर्वक रखना । इसके सिवाय यह मै तुमसे वह श्रेष्ठ समझने लगे । अर्जुन पर आचार्य बहुत ही देता हूं कि यदि मनुष्य के सिवाय और कोई शत्रु प्रसन्न हुए। वह मगर महात्मा द्रोण की जांघ को | तुम्हारे ऊपर आक्रमण करे तो तुम युद्धस्थल में । 5000000 Primarorporrorarrorrorrent अध्याय १३६ ] महाभारत orrorosconcorporateconorrorecy Formanraormireams भविता त्वत्समो नान्यः पुमाल्लोके धनुर्धरः । अजेयः सर्वशत्रूणां कीर्तिमांश्च भविष्यसि ॥ २३ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्रोगग्राहमोक्षणे पंचत्रिंगदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ।। उसे मारने के लिये इस अस्त्र को चला सकते हो। ने फिर उनसे कहा-हे अर्जुन ! इस पृथ्वी पर तुम्हारे अर्जुन ने दोनों हाथ जोड़कर उनी आजा को समान धनुर्विद्या का जाननेवाला और कोई न होगा स्वीकार करके उस परमात्र को ले लिया । तब गुरु ११॥२३॥ आदिपर्व का एक सापतीस अध्याय समान हुआ । अथ पत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १३६ ।। वैशम्पायन उवाच-कृतास्त्रान्धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद्राजन्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् कृपस्य सोमदत्तस्य वाहीकस्य च धीमतः । गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च राजन्सप्राप्त विद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम ते दर्शययुः स्वां शिक्षा राजन्ननुमते तव ॥ ३ ॥ ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना धृतराष्ट्र उवाच -भारद्वाज महत्कर्म कृतं ते द्विजसत्तम यदानुमन्यसे कालं यस्मिन्देशे यथा यथा तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥ ५ ॥ स्पृहयाम्यद्य निर्वेदारपुरुषाणां सचक्षुपाम् अस्त्रहतोः पराकान्तान्ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥ ६ ॥ एक सौ छत्तीम अध्याय ॥ १३६ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धृतराष्ट्र में आकर अपनी मानी शिक्षा का परिचय दें। के पुत्रों और पाण्डवों को अस्त्र-विद्या में दक्ष धृतराष्ट्र ने प्रसन्न होकर कहा-हे ब्राह्मण कुल में देसार द्रोणाचार्य ने एक दिन कृपाचार्य, सोमदत्त, श्रेष्ठ मारद्वाज ! आपने यह मेरा बड़ा अद्भुन काम पाहीक, व्यास, विदुर और भीष्म आदि के आगे किया है । अब जिस दिन, जिस पड़ी, जिस म्यान राजा पृतराष्ट्र से कहा-हे कुम्कल में श्रेष्ठ महाराज! पर जो-जो विधान आपको चाहिये सा मुझसे भापके बालक अच्छी तरह धनुर्विया का अभ्पाम कदिये । हम भी नवाले मनुप्यों को माप निक्षा र चुके हैं। यदि भारकी आशा हो तो ये राजामगा किये हुए अम्वाभ्यास को दिमाया राहते हैं। oraciciaakari.irar prior 0000000000x cocoreiroio. महा मारत [ आदिपर्व Premorror क्षतर्यद्गुरुराचार्यों ब्रवीति कुरु तत्तथा । न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ॥ ७ ॥ ततो राजानमामन्त्र्य निर्गतो विदुरो बहिः भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ॥ ८ ॥ समामवृक्षां निर्गुल्मामुदप्रस्रवणान्विताम् । तस्यां भूमौ वलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ॥ ९ ॥ अवघुष्टे समाजे च तदर्थं वदतां वरः रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रुस्ते तस्य शिल्पिनः । राज्ञः सर्वायुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ मश्चांश्च कारयामासुस्तत्र जानपदा जनाः विपुलानुच्छ्रयोपेताञ्छित्रिकाश्च महाधनाः ॥ १२ ॥ तम्मिस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा । भीमं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ॥ १३ ॥ मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम् शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ॥ १४ ॥ धृतराष्ट्र ने द्रोणाचार्य से यह कहकर विदुरजी को अब कारीगरों ने पहले सभामण्डप बनाया। आज्ञा दी कि तुम द्रोणाचार्य के साथ जाकर जो इसके पश्चात् राजा और रानियों के बैठने के लिये जिसतरह करने को कहें वह उसीतरह करो। शास्त्रोक्त रीति से अस्त्र शस्त्रों से सजे सजाये और हे धर्म-वत्सल ! मेरी समझ में इससे बढकर सुख । लम्बे चौड़े देखने के स्थान बनवाये । स्त्रियों के का काम और सुख का अवसर और नहीं होगा। भी बैठने के लिये अलग प्रबन्ध किया गया ।धनादप राजा की आज्ञा पाकर विदुरजी द्रोणाचार्य के साथ और अन्य प्रजा लोगों के लिये विदुरजी ने यथायोग्य पाहर आये। द्रोण ने रंगभूमि के लिये समतल स्थान और ऊचे ऊंचे मञ्च बनवाये, पालकियां भूमि देखकर उसे नाप उस भूमि में घास और वृक्ष सजवाई। नगर में चारों ओर डौंडी पिटवा दी नहीं थे । आसपास जलागय होने से यह स्थान गई कि अमुक तिथि को राजकुमारों की अम्ब-शिक्षा बहुत ही सुहावना प्रतीत होता था । अच्छे नक्षत्र देखने का उत्सव होगा 1 ] अनन्तर कुमारों के से युक्त शुभ तिथि में शास्त्रोक्त विधि के अनुमार विक्रम दिग्याने के निश्चय किये हुए दिन के गाने उस स्थान को तय्यार किया ॥१॥१०॥ पर राजा धृतराष्ट्र, मन्त्री आदि को साथ लेकर sooccasirirror. 1 --- अध्याय १३६ ] महा मारत orro006 corechoercircore गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर । स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः ॥ १५ ।। हांदारुरुहुर्मचान्मेरुं देवस्त्रियो यथा ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वण्र्यं पुराद् द्रुतम् ॥ १६ ॥ दर्शनेप्सु समभ्यागात्कुमाराणां कृतास्त्रताम् । क्षणेनकस्थतां तत्र दर्शनेप्सु जगाम ह प्रवादितैश्च वादिजनकोतूहलेन च महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत्तदा ॥ १८ ॥ ततः शुक्लाम्बाधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान् शुक्लकेशः सितमश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः रङ्गमध्यं तदाचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह नभो जलधहीनं सागारक इवांशुमान् ॥ २०॥ स यथासमयं चक्रे बलिं बलवतां वरः ब्राह्मणांस्तु सु मन्त्रज्ञान्कारयामास मङ्गलम् ॥ २१ ॥ सुखपुण्याहघोपस्य पुण्यस्य समनन्तरम् विविशुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः ॥ २२ ॥ भाग और कृपाचार्य को आगे किये हुए उस वहा अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे, देखने के मुला गणि-मण्डित, चैदूर्य मणियों से सजे सजाये, लिए उत्कण्ठित दर्शकों का शोर चारों ओर गूज मुवर्ण से अस्कृत, दिव्य स्थान में पहुचे ॥१११४११ रहा था। उस भीड़ को देखकर ऐसा जान परता गान्धारी, भाग्यशारिनी पुन्ती और राजा के था कि मानों महाममुद्र उमड़ पड़ा है ॥१५॥१८॥ कुल की स्त्रिया भी अपनी-अपनी दासियों सदित इसके पधात् श्वेत वस्त्र और शेन अनेऊ पहन पहा मार अचे-उने मयों पर इस प्रकार से हुए मानार्य द्रोण अपने पुत्र के साथ उम मामि चार पेट गई जैसे देवताभों की मिया मुमेरु में आये । उनके देश और दादी-मूछे सफेद थी। पर्वत पर पाती है। ग्रामण, क्षत्रिय, वैश्य और ये सफेद चन्दन गाये और मोद ही पूगे। पद चारों वर्ग के लोग राजपुत्रों की असशिक्षा मारा पदन दुप। उस समय पेमा जान पहा का उत्सव देखने की हर से नगर से निस्कर कि मानो मारमा साथ प्राममान् देय मादल गामिनी और नेले क्षणभर में उस स्थान पर रहित आकार हैं। उममेट महारी दभनेवारों का भारी जमाव हो गया । उस समय मानार्य ने टम म्यान में रचित ममय में सूजन - XJForc महा भारत [ आदिपर्व Kococoncocono1000010.oconocozoorcon0000/- ततो बद्धांगुलित्राणा बद्धकक्षा महारथाः । बद्धतूणाः सधनुषो विविशुभरतर्षभाः ॥ २३ ॥ अनुज्येष्ठं तु ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ॥ २४ ॥ केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः ते स्म लक्ष्याणि विभिदुर्वाणैर्नामाङ्कशोभितैः । विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्दुतम् ॥ २६ ॥. तत्कुमारवलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिता भवन् ॥ २७ ॥ सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधु साध्विति भारत कृत्वा धनुपि ते मार्गान्रधचर्यासु चासकृत् गजपृष्टेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महावलाः गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः सरुमार्गान्यथोद्दिष्टांश्चरुः सर्वासु भूमिषु ॥ ३० ॥ किया और मन्त्र जाननेवाले ब्राह्मणों से मंगला- | अद्भुत कामों को देखने लगे । वीर राजकुमार घोड़ों चरण करवाया। पवित्र पुण्य दिन की कथा के समाप्त पर चढ़कर, उन्हें दौड़ाकर, अपने-अपने नाम से हो चुकने पर नियुक्त किये हुए लोग नाना प्रकार के अफित वाणों के द्वारा निशाना उड़ाने की फुर्ती अस्त्र-शस्त्र लेकर अखाड़े में आकर खड़े हुए । वे । दिखाने लगे । तब देखनेवालों ने धनुपवाण लिये महारथी कुमार उंगलियों में अंगुलित्र पहने, कमर हुए कुमारों को गन्धर्य नगर के समान वह आश्चर्य कसे, तरकस बांधे और धनुष आदि शस्त्र लिये हुए लीला देखकर बड़ा अचरज माना ॥२५॥२७॥ . थे । युधिष्ठिर आदि कुमार बड़े-छोटे के क्रम से हे भारत ! आश्चर्य के मारे अखि फाड़-फाड़कर एक-एक करके अपना-अपना करतब दिखान लगे । देख रहे दर्शक एकाएक चारों ओर से वाह-वाह ॥१९॥२४॥ कहकर चिल्ला उठे। धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्र तब देखनेवालों में कोई कोई तो वाणों के धनुष के द्वारा अस्थिर लक्ष्यपात प्रभृति विचित्र गिरने के भय से सिर नीच किये रहे और कोई-कोई कार्य करके फिर ढाल-तलवार लेकर रथ, हाथी, बेखटके आश्चर्य के साथ मन लगाकर कुमारों के पौड़ आदि के ऊपर से शम्स-कौशल दिखाने लगे। - - । gronyororonyonyororororororums 0000000cc OCE CODOCA अध्याय १३७ ] म हा भारत proon लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिताम् । ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः ॥ ३१॥ अथ तो नित्यसंहृष्टौ सुयोधनकोदरौ अवतीर्णी गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलो बद्धकक्षौ महावाहू पौरुपे पर्यवस्थितो वृहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरी तो प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महावलौ । चेरतुर्निर्मलगी समदाविव कुञ्जरी विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः न्यवेदयेतां तत्सर्व कुमाराणां विचेष्टितम् इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि स्त्रदर्शने पत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥ उन्होंने खड्ग-युद्ध के पैतरे दिखलाये । उनकी फुती, | चाहनेवाले वे दो महाभुज वीर कमर कसकर गर्जने पैतरे, शोमा, स्थिरता, मुट्टी की दृढ़ता,तलवार चलाकर लगे। गदा लिये हुए मदमत हाथियों के समान और उसको ढाल पर रोकना देखकर सब देखनेवाले महाबली दुर्योधन और भीम दहिनी पलट और बाई बहुत ही प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् सदा के अहंकारी पलट के अनुसार गोलाकार होकर अखाड़े में घूमने दुर्योधन और महाबली, महाबाहु भीमसेन गदा हाथ लगे । विदुर धृतराष्ट्र को और कुन्ती गांधारी को में लेकर एक ही चोटीवाले पहाड़ों के समान अखाड़े कुमारों के कौशल का सब हाल बताती जाती थीं में उतरे । एक हथिनी के लोभ से दो उन्मत हाथी ॥२७॥३५॥ जिस प्रकार चिल्लाते रहते हैं उनके समान बढ़ाई आदिपर्व का एक सौ छत्तीस अध्याय ममाप्त हुआ। अथ मप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥ पैगम्पायन उवाच-कुरुराजे हि रहस्थे भीमे च बलिनां वरे पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवजनः ही वीर कुरुराजेति ही भीम इति जल्पताम् । पुरुपाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोस्थिताः ॥ २ ॥ एक मौ सतीम अभ्याय ॥ १३७ ।। शम्पायन जी ने कहा- राजा जनमेजय ! उतरने पर देखनेवाले पक्षशत से यह कर दो दलों रराज दुर्योधन और मदारी भीम के असारे में में बट गये। कोई तो कहने लगे कि कुरान कम rrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr .
महा भारत [ आदपव Co00/rzcoolcoooo ०.ocococoncococon ॥ ततः क्षुब्धार्णवनिभं रङ्गमालोक्य बुद्धिमान् । भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत् द्रोण उवाच-वारयैतौ महावीर्यों कृतयोग्यावुभावपि मा भूद्रंगप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः वैशम्पायन उवाच-ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितो युगान्तानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवो ततोरङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत् निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् यो मे पुत्राप्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा वद्धगोधांगुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः काञ्चनं कवचं बिभ्रत्प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः सार्कः सेन्द्रायुधतडित्समन्ध्य इव तोयदः ॥ ९ ॥ ततः सर्वस्य रंगस्य समुत्पिजलकोऽभवत् । प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशंखानि समन्ततः अच्छे वीर हैं ! और दूसरे कहने लगे कि भीम कैसे इसके पश्चात् द्रोणाचार्य ने अखाड़े में जाकर, अच्छे वीर हैं ! चारों ओर से इसी बात का बड़ा बाजे बजाना बन्द कराकर, मेघ के गरजने के समान कोलाहल मच उठा । अनन्तर बुद्धिमान् आचार्य ने गम्भीर म्बर से कहा-अब तुम लोग अर्जुन को उमड़े हुए समुद्र के समान उस भीड़ का कोलाहल देखा । उपेंद्र के सदृश, मर्म शास्त्रों में प्रधान, सुनकर अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामा से कहा-हे पुत्र ! इन्द्र-पुत्र अर्जुन मुझे पुत्र मे बढ़ाकर प्यारे हैं । तब महापराक्रमी भीमसेन और दुर्योधन गदा-युद्ध का आचार्य की आजा से तरुण अवस्था के फाल्गुन कौशल अच्छीतरह दिखा चुके । अब इनको रोक मंगलाचरण करने के पश्चात् रङ्गभूमि में आये । दो । पक्षपाती लोग कहीं बिगड़ खड़े न हों। मोने के कवच पहरकर मानों सूर्यप्रकाश के समान हे महाराज ! तब गुरु पुत्र अश्वत्थामा ने बीच में जलत हुए और इन्द्रधनु तथा बिजली की चमक की जाकर उन समुद्र के दोनों किनारों में चली हुई तरह सुहाते हुए, धनुष लिये, तरकस बाधे, गोह के प्रलय-काल की आंधी के समान, झपटकर आते चमड़े के अंगुलित्र उंगलियों में पहने हुए अर्जुन, , हुए. वीरों को रोक दिया ॥१५॥ सन्ध्याकाल के बादल के सदृश दीख पड़े ॥६॥९॥ - Arrrrrrrrorarirar.orsrrrrrrrrrrrr ६६७ ooooocoC proc000000000. । Jerrories .. अध्याय १३७ ] महा भारत Price एप कुन्तीसुतः श्रीमानेप मध्यमपाण्डवः एप पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेप रक्षिता एपोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एप धर्मभृतां वरः एप शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः इत्येवं तुमुला वाचः शुश्रुवुः प्रेक्षकरिताः । कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरौः क्लिन्नमुरोऽभवत् ॥ १३ ॥ तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथात्रवीत् धृतराष्ट्रो नरश्रेष्टो विदुरं हृष्टमानसः ॥ १४ ॥ क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेप सुमहास्वनः सहसेवोत्थितो रहे भिन्दन्निव नभस्तलम् विदुर आच-एप पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः । अवतीर्णः सकवचस्तत्रेप सुमहास्वनः धृतराष्ट्र त्याच-धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते । पृथारणिसमुद्भूतैत्रिभिः पाण्डववह्निभिः वैशम्पायन उवाच-तस्मिन्प्रमुदित रङ्गेः कथंचित्प्रत्युपस्थिते दर्शयामास वीभत्सुगचार्यायास्त्रलाघवम ॥ १८ ॥ उन्हें आते देखकर सब लोग बड़े प्रपन्न हुए । आकाश को विदीर्ण किये डालता है-क्यों मुन चारों ओर शह नगाई आदि गाजे बजने लगे। पड़ रहा है ! ॥१०॥१५॥ देखनेवाले लोग कहने लगे-यही श्रीमान् कुन्ती-पुत्र विदुर ने कहा-हे महाराज ! ये कुन्ती के गर्म मंझले पाण्टव हैं । यही इन्द्र के पुत्र कुरुओं की से उत्पन्न पाण्टुनन्दन अर्जुन कवच पहने हुए रक्षा करनेवाले है। इनके समान अम्र-विद्या में राममि में आकर पढ़े हुए हैं । इमीसे यह कोलाहल निपुण पुरुष इस संमार में दमग नहीं है । ये यह मुनाई पड़ रहा । धृतग ने कहा-हे महामनि ही मुशील और धर्मामाई । दर्शकों की प्रेमी विदुर ! कुन्नीला नीन पाण्टुपुर गप अपियों में अनेक बातें सुनकर और पुत्र को रममि में दमकर में धन्य हुआ: अनुगृहीन हुआ मुरक्षिन हुमा । पुन्नी काटय आनन्द के आंपुओं में भाग गया। वशायनत्री बोल-राजन् ! अमारक टन एकाएक दर्शकों का कोगहल मुनका प्रमसचित उपयुक्त रोगों के उस्मादिन होस गुमात दी नगष्ट ने विदुर मै पछा- विरदशक-मण्डी जाने पर महागा अजुन आचार्य को अपने में यह ममुद के टमड़ने का मा पार काराहल-जो की दक्षता विमाने रगे। पहले उन्होंने भा- । PA म हा भारत [ आदिपर्व o50m/rocol 10000000.0050eoloccolo०% आग्नेयेनासृजद्वहिं वारुणेनासृजत्पयः वायव्येनास्मृजद्वायुं पार्जन्येनासृजद्घनान् भौमेन प्राविशद्भूमि पार्वतेनासृजगिरीन् अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् क्षणात्प्रांशुः क्षणाद्भूस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः । क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम् सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरुं चापि गुरुप्रियः । सौष्ठवेनाभिसंक्षिप्तः सोऽविध्यद्विविधैः शरैः ॥ २२ ॥ भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् । पञ्चवाणानसंसक्तान्संमुमोचैकवाणवत् गव्ये विषाणकोशे च चले रज्ज्ववलम्विनि निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम ॥ २४ ॥ इत्येवमादि सुमहत्खड्गे धनुषि चानघ गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि प्रदर्शयन् ॥ २५ ॥ ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन्कर्माण भारत मन्दीभूते समाजे च वादिनस्य च निः स्वने ॥ २६ ॥ छोड़कर अमि उत्पन्न की, फिर वारुण-अस्त्र छोड़कर सुकुमार (भरा घड़ा, मुर्गी का अण्डा आदि) निशानों पानी उत्पन्न करके उस अग्नि को शान्त किया। को वाणों से भेदा । फिर घुघुची आदि के सूक्ष्म इसीप्रकार वायव्य-अस्त्र से वायु चलाकर पर्जन्य-अस्त्र निशानों को भेदा । इसके पश्चात् लौहपिण्ड आदि से चारों ओर मेघ प्रकट कर दिये। फिर मौमात्र के भारी निशाने मार कर अपनी चतुराई दिखाई। से पृथ्वी में घुस गये और पार्वतास्त्र से पर्वत प्रकट चलते हुए लोहे के बने सुअर के मुंह में एक-एक किये । अन्त को अन्तर्धान-अम्त्र का प्रयोग करके करके पांच वाण मारे, परन्तु देखनेवाले लोगों को एक आप छिप गय ।।१६।२०॥ ही वाण चलाया मालूम पड़ा । रस्सी में लटके हुए इसके पश्चात् लोगों ने देखा कि वे क्षणभर में गौ के सांग में इक्कीस वाण चलाकर अर्जुन ने पहुत लम्रे, क्षणभर में यहुत छोटे, क्षणभर में स्थ अपना करतब दिखाया । हे अनघ । शत्र-विद्या के धुरों के पास, क्षणभर में रथ के अन्दर और में निपुण अर्जुन ने फिर खायुद्ध, धनुयुद्ध और क्षणभर में पृथ्वी के ऊपर अपना कौशल दिखा रहे गदायुद्ध के अनेक पतरे और हाथ दिखलाये हैं । गुरुप्रेमी अर्जुन ने अब बड़ी चतुराई के साथ ॥२१॥२५॥ rorescocurrorarwaorpiririoirreiraircrosoran .. ।
अध्याय १३८ ] म हा भारत coozolescorcarrore 9comc.9072400 . .. -- द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्यवलसूचकः वज्रनिष्पेपसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः ॥ २७॥ दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद्भमिर्विदीर्यते । किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्धनः ॥ २८ ॥ रंगस्यैवं मतिरभूत्क्षणेन वसुधाधिप द्वारं चाभिमुखाः सर्वे वभूवुः प्रेक्षकास्तदा ॥ २९ ॥ पञ्चभिभ्रातृभिः पार्थेद्रोणः परिवृतो वभौ पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम् । दुर्योधनममित्रनमुत्थितं पर्यवारयत् स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधैर्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः । वभौ यथा दानवसंक्षये पुरा पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि प्रदर्शने समत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥ अर्जुन अपना सब शिक्षा-कौशल दिखा चुके । पाण्डवों-सहित ऐसे शोभायमान् देख पड़ते थे बाजों का गन्द भी धीमा हो गया । लोगों के जमे हम्तनक्षत्र के पांचों तारों-सहित चन्द्रमा आकाश बोलने का कोलाहल बन्द हो गया। तब रङ्गभूमि में दिखाई देता है । अर्जुन की प्रशंसा सुनकर के द्वार पर अपना बल दिखलाने के लिये भुजाओं दुर्योधन से नहीं रहा गया। वह अश्वत्थामा अपने पर ताल मारने का वज़ के समान शब्द सुनाई सब छोटे भाइयों के साथ उठकर झगड़ा करने के पड़ा। उस शब्द को सुनते ही सब मनुष्य आधर्य लिये तैय्यार हो गया । ऐसी अवस्था देखकर से रंगभूमि के दरयाज की ओर दंग्यने लगे। वे द्रोणाचार्य ने उसे रोका। शम्म ताने हुए सौ भाइयों आपम में कहने लगे कि क्या कोई पदाइ हट रहा के बीच गदा हाथ में लिये खड़ा हुआ दुर्योधन, है या की फट रही है अथवा आकाश में मेघ देयताओं के चीन में सड़े हुए इन्द्र के ममान गरज रहा है ! उम ममय द्रोणाचार्य पांचों शोभायमान हुआ ॥२६॥३२॥ आदिपर्य पाएर मा मनीम अध्याय ममाम हुआ। अथ अयानिशदधिकशततमोऽयाय ॥१३८॥ बदाम्पायन माप-दत्तेऽवकाशे पुरुर्विग्मयोत्फुटलोचनः विवेश रंगं विस्तीर्ण कर्णः परपुरायः ६७० महा मारत [ आदिपर्व cococcooooooor0.oooooroccvconococipat सहजं कवचं विभ्रत्कुण्डलोद्योतिताननः स धनुर्वद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः कन्यागर्भः पृथुयशाः पृथायाः पृथुलोचनः । तीक्ष्णांशो स्करस्यांशः कर्णोऽरिंगणसूदनः ॥ ३ ॥ सिंहर्षभगजेन्द्राणां बलवीर्यपराक्रमः दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्द्रज्वलनोपमः प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा असंख्येयगुणः श्रीमान्भास्करस्यात्मसंभवः स निरीक्ष्य महाबाहुः सर्वतो रङ्गमण्डलम् । प्रणाम द्रोणकृपयोन त्यातमिवाकरोत् स समाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः । कोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत् सोऽब्रवीन्मेघगम्भीरस्वरेण वदतां वरः भ्राता भ्रातरमज्ञातं सावित्रः पाकशासनिम् ॥ ८ ॥ पार्थ यत्ते कृतं कर्म विशेषवदहं ततः करिष्ये पश्यतां नृणां मात्मानं विस्मयं गमः ॥ ९ ॥ एक सौ अड़तीस अध्याय ॥ १३८ ॥ वैशम्पायन ने कहा कि जब रङ्गभूमि से मनुष्य के समान थी । लम्बे डील-डौलवाले कर्ण देखने में चलने लगे और कुछ अवकाश हुआ तब कुन्ती के सोने के ताड़ के समान जान पड़ते थे । असंख्य कन्यापने में सूर्य के अंग से उत्पन्न हुआ कर्ण नामी गुणों से युक्त नौजवान कर्ण सिंह के समान शरीर- पुत्र आश्चर्य से आंखों को प्रफुल्लित किये हुये उस वाले थे । उन्होंने राममि में आते ही चारों ओर समा-मण्डप में आया । उस समय वह स्वाभाविक देम्ब कृपाचार्य और द्रोणाचार्य को साधारण भाव से कवच धारण किये हुये था । शरीर पर्वत के यमान प्रणाम किया ॥१६॥ और मुख कुण्डलों से प्रकाशमान हो रहा था। समा में उपस्थित सब लोग स्थिर दृष्टि से कर्णकी कमर में तलवार लटक रही थी। हाथ में धनुप था। और देखने लगे । सब लोग आपस में पूछने लगे- पद सिंह के समान पली, बैल के समान वीर्यशाली यह वीर पुरुप कौन है। यह जानने के लिय सम भार हाथी के समान पराक्रमी था । उसका तेज सूर्य लोग चच्छल हो । उस समय सूर्य-पुत्र कर्ण ने क कान्ति चन्द्रमा के समान और घुति अगि मेघ के समान गम्भीर म्बर से अपने अज्ञात भाई समान, Pri.WATrror ६७१ अध्याय १३८ ] महा भारत 200000000 10000000000000000 प्रीतिश्च मनुजव्याघ्र - कर्ण उवाच-- असमाते ततस्तस्य वचने वदतां वर यन्त्रोरिक्षप्त इवोत्तस्थौ क्षिप्रं वै सर्वतो जनः ॥ १० ॥ दुर्योधनमुपाविशत् हीश्च क्रोधश्च वीभत्सुं क्षणेनान्वाविवेश ह ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः कर्णः प्रियरणः सदा । यत्कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महाबलः अथ दुर्योधनस्तत्र भ्रातृभिः सह भारत कर्ण परिष्वज्य मुदा ततो वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥ दुर्योधन उयाच-स्वागतं ते महावाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद । अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ॥ १४ ॥ कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो दुर्योधन उवाच -भुक्ष्व भोगान्मया साधं वन्धूनां प्रियकृद्भव । दुहृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिन्दम वैशम्पायन उवाच-ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत । कर्णं भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ॥ १७ ॥ इन्द्र-पुत्र अर्जुन से कहा हे अर्जुन । रंगभूमि में पली कर्ण ने सफ़ाई के साथ वे सब काम कर दिखाये तुमने जो कुछ अद्भुत काम दिखाये हैं, उनको जो अर्जुन ने किये थे। हे भारत ! तव भाइयों- और भी विशेषता के साथ मैं इन देखनेवालों के सहित दुर्योधन ने उठकर कर्ण को गले से लगा लिया सामने कर दिखाऊगा । तुम अपने शिक्षा-कौशल और प्रसन्न होकर कहा-हे महाभुज ! मैं तुम्हारा का मान न करना। कर्ण की यह बात अभी पूरी भी म्वागत करता हूं । तुम्हारे आने को मैं अपना बड़ा न होने पाई थी कि सभा के सब मनुष्य देखने के भारी सौभाग्य समझता हूं। यह कुरुवंश का राज्य लिये एकदम उठ खड़े हुए; मानों किसी यत्र के तुम्हारा ही है। तुम अच्छी प्रकार से इसका उपमोग द्वारा वे चर से खड़े कर दिये गये हों ॥७॥१०॥ करो। मैं मी तुम्हारे वश में होकर रहूंगा। कर्ण ने कहा हे मानवश्रेष्ठ ! कर्ण के इन वचनों को सुनकर कि मुझे और किमी वात की अमिलापा नहीं है। मैं दुर्योधन बड़ा प्रमस हुआ । अर्जुन का चित्त क्रोध केवल आपकी मित्रता चाहता हूं और अर्जुन से और लजा से अधीर हुआ । अब द्रोणाचार्य की एकपार द्वन्द्वयुद्र किया चाहता हूँ॥११॥१५॥ आज्ञा पाकर सदा युद्ध की इच्छा करनेवाले महा दुर्योधन ने कहा-हे शत्रुओं के नाश करनेवाले ! 1 rurrrrrrororonorrororor mcc- - 1033Ci501050 ६७२ महा भारत [ आदिपर्व woworrarooooornoores orm.omwweonorrorean -अनाहूतोपसृष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम् ये लोकास्तान्हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥ १८ ॥ कर्ण आच-रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तब फाल्गुन । वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो वलं धर्मोऽनुवर्तते ॥ १९ ॥ किं क्षेपैर्दुर्वलायासैः शरैः कथय भारत गुरोः समक्षं यावत्ते हराम्यद्य शिरः शरैः ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरञ्जयः भ्रातृभिस्त्वरयाश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ।। २१ ॥ ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ २२ ॥ ततः सविद्युत्स्तनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः आवृतं गगनं मेधैर्वलाकापंक्तिहासिभिः ॥ २३ ॥ ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान्धनान् । २४ ॥ मेघच्छायोपगूढस्तु तनोऽदृश्यत फाल्गुनः सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ॥ २५ ॥ आप मेरे साथ राज्य का सुख भोगो । मित्रों का धर्म बल ही की शरण लेता है । हे भारत ! दुर्वल प्रिय करते हुए दुष्ट शत्रुओं के सिर पर पैर रखकर लोगों की तरह वचनों के द्वारा आक्षेप करने से क्या मेरे पास रहो । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! लाभ है ? वाणों से बातचीत करो । आचार्य के तब अर्जुन ने अपने को अपमानित समझकर दुर्योधन आगे अभी मैं वाणां से तुम्हाग सिर काटकर पृथ्वी आदि सौ भाइयों के मध्य में पर्वत के समान स्थित पर गिराये देता हूं ॥१६॥२०॥ कर्ण से कहा-हे. कर्ण ! जो लोग बिना बुलाये वैशम्पायन ने कहा कि अनन्तर द्रोणाचार्य की आते हैं और मिना बुलाये आकर बोलने लगते है। आज्ञा पाकर और भाइयों के गले लगकर, महायली उनकी जो गति होती है मुझसे प्राण खोकर तुम । अर्जुन द्वन्द्वयुद्ध के लिये कर्ण के सामने आये । उसको प्राप्त करोगे। कर्ण ने कहा-हे अर्जुन ! यह इधर कर्ण को दुर्योधन ने और उसके भाइयों ने अखाड़ा सबके लिये समान है भला मेरे आने से , गले से लगाया । धनुप वाण लिये हुए कर्ण युद्ध के तुम्हारी क्या हानि हो सकती है । क्षत्रिय लोग : आरम्भ की राह देखने लगे। उस समय इन्द्र-धनुप पल ही से प्रधान होते हैं । इसलिये भत्रियों का ! मे मोहते हुए बिजली तथा गर्जन में भरे मादलों : -- 92ecur 102010070455205 953rsrrrrr- म हा मारत अध्याय १३८ ] 200corce - धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन्देशे व्यवस्थिताः । भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ।॥ २६ ।। द्विधा रङ्गः समभवत्स्त्रीणां द्वैधमजायन कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह ॥ २७॥ तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित् । कुन्तीमा श्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः ॥ २८॥ ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशितो पुत्रौ दृष्ट्वा सुसंभ्रान्ता नान्वपद्यत किंचन ॥ २९ ॥ तावुद्यतमहाचापो कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित् अयं पृथायास्तनयः कनीयान्पांडुनन्दनः कौरवो भवता साधू द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति ॥ ३१ ॥ स्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम् । कथयस्व नरेन्द्राणां येषां वं कुलभूषणम् ॥३२॥ ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा । वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः ॥ ३३ ॥ से आकाशमंडल इक गया । अनन्तर इन्द्र को जल से उस मूच्छित कुन्ती को सचेत किया। अपने पुत्र अर्जुन पर महवश अखाड़े की और चेत होने पर कवच पहने युद्ध के लिये तैय्यार ताकते हुए देसकर सूर्य ने अपने पुत्र कर्ण के पास दोनों पुत्रों को देखकर कुन्ती बहुत घबराई, पर के जल धागणवाले बादलों को नष्ट किया । तब कुछ कर न सकी ॥२६॥२९॥ अर्जुन बादलों की छ या से ढका हुआ और कर्ण उन दोनों वीरों को धनुप चढ़ाये हुए युद्ध के मूर्य की किरणों मे घिग हुआ दीग्वने लगा॥२१२५॥ लिये उद्यत देखकर सब धर्म जाननेवाले और कर्ण की ओर धृतराष्ट्र के पुत्र और अर्जुन की द्व-द्वयुद्ध की नीति में निपुण कृपाचार्य ने कहा- और द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और माम खड़े थे। है कर्ण ! अर्जुन कुरुवंशी राजा पाण्ड का पुत्र है। अखादा दो भागों में बट गया । देखनेवाली स्त्रियों कुन्ती के तीमरे गर्भ से इसका जन्म हुआ है। यह के भी दो दल हो गये । कुन्ती आने पुत्र कर्ण तुममे युद्ध करने को तैयार है। इसलिये है यार ! । और अर्जुन का युद्ध में प्रवृत होना देवार मोहवश तुम भी अपनी माना और पिता का नाम बतलामी। हुई। धर्मात्मा विदुर ने दामियों की सहायता मे नंदन जिस कुल को तुमने अरंकृत किया है उसका हम्म 050-32rerprior r:9-1-51 woowereo0 OIC ६७४ महा मारत [ आदिपर्व recorvoirpooran वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्य कर्णस्य बीडावनतमाननम् वभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा दुर्योधन उवाच-आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये । सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेना प्रकर्षति यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धुमिच्छति तस्मादेषोऽहविपये मया राज्येऽभिषिच्यते ॥३६॥ वैशम्पायन उवाच-ततस्तस्मिन्क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः ॥ ३७ ॥ अभिषिक्तोऽङ्गराज्यस्य श्रिया युक्तो महावलः । सच्छत्रवालव्यजनो जय शब्दोत्तरेण च उवाच कौरवं राजा वचनं स वृषस्तदा अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददामि ते प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप । अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधनः ॥ ४० ॥ एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम् हर्पाचोभी समाश्लिप्य परां मुदमवापतुः ॥ ४१ ॥ इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि कर्णाभिपेके अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ।। करना भी आवश्यक है। उसे सुनकर अर्जुन तुमसे राजा के सिवा दूसरे से युद्ध करना नहीं चाहते तो लड़ने या न लड़ने का निश्चय करेगा । क्योंकि मै अभी इस कर्ण को अंगराज्य में अभिषिक्त कर राजकुमार लोग छोटे कुल में जन्म लिये हुए देता हूं । वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज! उमी सदाचार-वर्जित जनों से द्वन्द्वयुद्ध नहीं करते । समय महाबलयंत, महारथी थीमान् कर्ण को सुवर्ण वैशम्पायन ने कहा कि आचार्य कृप के इस प्रकार ! के सिंहासन पर बिठाकर, मंत्रज्ञ ब्राह्मणों के द्वारा कहने पर कर्ण का मुख लजा से नीचे होकर वी फूल और सुवर्ण-कलशों के जल से अभिषेक कराकर, के जल से धोये हुए कमल की नाई मलिन हो गया । दुर्योधन ने अंगदेश का राजा बना दिया । कर्ण के ॥३०॥३४॥ । ऊपर छत्र लग गया और चंबर डुलाये जाने लगे। तप दुर्योधन ने कहा-हे आचार्य ! राजवंश में चारों ओर लोग कर्ण का जय जयकार करने लगे। या अच्छे कुल में उत्पन्न पुरुष, वीर पुरुष और तब कर्ण ने दुर्योधन से कहा-हे राजाओं में व्याप्र. सेनापति, ये तीनों राजा हो सकते हैं । यदि अर्जुन , समान महाराज ! आपने जो मुझको राज्य दिया - Airiririrrorshirirrrrry म हा भारत अध्याय १३९ ] c000000 - कहिये आपको मैं इसके बदले क्या दू । आप जैसा । हू । ऐसा कहे जाकर कर्ण ने प्रतिज्ञा के साथ उसको कहेंगे मैं वैसा ही करने को तैय्यार हू । दुर्योधन । मान लिया। दोनों हर्ष से एक दूसरे को गले लगाकर ने कहा-मैं आपसे अच्छी मित्रता की प्रार्थना करता बड़े प्रसन्न हुए ॥३५॥४१॥ आदिपर्व का एक सौ अड़तीम अध्याय समान हुआ ! अथ उनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः स्रस्तोत्तरपटः सप्रस्वेदः सवेपथुः विवेशाधिरथो रंगं यष्टिप्राणो हयन्निव तमालोक्य धनुस्त्यक्त्वा पितृगौरवयन्त्रितः । कर्णोऽभिषेकाशिराः शिरसा समवन्दत ततः पादाववच्छाद्य पटान्तेन ससंभ्रमः पुत्रेति परिपूर्णार्थमब्रवीद्रथसारथिः परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः अंगराज्याभिषेकामश्रुभिः सिपिचे पुनः तं दृष्ट्वा सूतपुत्रोऽयमिति संचिन्त्य पाण्डवः भीमसेनस्तदा वाक्यमब्रवीत्प्रहसन्निव न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम् कुलस्य सदृशस्तूर्णं प्रतोदो गृह्यतां त्वया एक सौ उन्तालीम अध्याय ।। १३९ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! कर्ण अपने पैरों को ढककर राज्य पान से कृतार्थ कर्ण का अभिपक होने के पीछे वहा अघिस्थ नाम कर्ण को पुत्र कहकर उसने सैह के मारे गले लगा लिया फा पिता सब अंग शिधिल कापता हुआ रनममि और अगराज में अभिषिक्त कर्ण के भीगे सिरको में आ पहुचा । अपराहट के मोरे उसके कन्धे पर आनन्द के आसुओं से दुबारा भिगो दिया ॥१४॥ से कपड़ा खिसका जा रहा था ।शरीर पपीने से यह देखकर भीमसेन को निश्चय हो गया कि भीगा हुआ था। उसे देखकर पिता का मान करने कर्ण इमी सारथी का बेटा है तब उन्होंने कर्ण की के लिये धनुषवाण रम्पर वर्ण उठ सड़े हुए। इसी उड़ाते हुए कहा-हे सूतपुत्र कर्ण ! तुम रण- अभिषेक के जल से भीगा हुआ मिर उमके चरणों भूमि में अर्जुन मे मारे जाने के योग्य नहीं हो। पर रखकर कर्ण ने प्रणाम किया। रथ के सारथी पोड़ों की रास पकड़ना ही तुम्हारे कुल योग्य मधिरण ने सम्मान के साथ यम के अनमाग से काम है। हे नराधम ! जैसे कुणा या के हवि में ६७६ महा भारत [आदिपर्व 000000000000000000000rsrore rrocorehrarurardcorever अंगराज्यं च नाहस्त्वमुपभोक्तुं नराधम श्वा हुताशंसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे एवमुक्तस्ततः कर्णः किंचित्प्रस्फुरिताधरः गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत ततो दुर्योधनः कोपादुत्पपात महाबलः भ्रातृपद्मवनात्तस्मान्मदोत्कट इव द्विपः सोऽब्रवीद्भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम् वृकोदर न युक्तं ते वचनं वक्तुमीदृशम् ॥ १० ॥ क्षत्रियाणां वलं ज्येष्ठं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना । शूराणां च नदीनां च दुर्विदाः प्रभवाः किल ॥ ११ ।। सलिलादुत्थितो वह्निर्येन व्याप्नं चराचरम् दधीचस्यास्थितो वजं कृतं दानवसूदनम् ॥ १२॥ आग्नेयः कृत्तिकापुत्रो रोद्रो गाङ्गेय इत्यपि । श्रूयते भगवान्देवः सर्वगुह्यमयो गुहः ॥ १३ ॥ क्षत्रियेभ्यश्च ये जाता ब्राह्मणास्ते च ते श्रुताः । विश्वामित्रप्रभृतयः प्राप्ता ब्रह्मत्वमव्ययम् ॥ १४॥ आचार्यः कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतमः मुख नहीं डाल सक्ता वैसे ही तुम भी अगराज कहने चाहिए । क्षत्रियों का पर ही श्रेष्ठ है का उपभोग करने के योग्य नहीं हो ॥५॥७॥ क्षत्रिय के निन्दित होने पर भी उमसे रहना चाहिये। भीमसेन के ये कटोर वचन सुनकर श्रोध के मारे शूरों और नदियों के जन्म का वृत्तान्त कोई नहीं कर्ण के होट फड़कने रंगे । उसने एक रम्बी सास जानता ॥८॥११॥ कर आकाशमण्डल में स्थित सूर्यदेव की ओर देखो, चराचर विश्व में व्याप्त तेजम्बी अमि का देखा । इसके पश्चत् महाबली दुर्योधन प्रोधिन जन्म जल से हुआ ८ । दानवों का नाश करनेवाग दोकर कमल यन सदृश भाइयों के झुण्ड से मदमत्त यजदीचि नापिकी हड्डियों में बना है। भगवान् हाथी के समान उठार, पास ही खड़े हुए भीमसेन देव कार्तिकेय के जन्म का भी कुछ निश्चय नहीं। से कहने लगा-हे भीममेन ! तुमको ऐसे वचन न उन्हें कोर्ट अनि का, कोई कृमि का, कोई रन्द्र अध्याय १३९ ] म हा भारत ६७७ 2000701070erovernierorecrore भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया । सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम् कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्र जनिप्यति ॥ १६ ॥ पृथिवीराज्यमोऽयं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः अनेन वाहुवीर्येण मया चाज्ञानुवर्तिना ।॥ १७॥ यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम् । रथमारुह्य पद्भयां स विनामयतु कार्मुकम् ॥ १८ ॥ ततः सर्वस्य रङ्गस्य हाहाकारो महानभूत् । साधुवादानुसंवद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत् ततो दुर्योधनः कर्णमालम्ब्यायकरे नृपः दीपिकाग्निकृतालोकस्तम्माद्रङ्गाद्विनिर्ययो ॥ २० ॥ पाण्डवाश्च सहद्रोणाः सकृपाश्च विशाम्पते । भीष्मेण सहिताः सर्वे ययुः स्वं खं निवेशनम् ॥ २१ ॥ अर्जुनेति जनः कश्चित्कश्चित्कर्णेति भारत कश्चिद् दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा ॥ २२ ॥ का और कोई गंगा का पुत्र कहते हैं । क्षत्रियों अगदेश का राजा बनाया है । जो कोई इस बात से उत्पन्न विश्वामित्र आदि ब्राह्मण हो गये हैं । को न सह सके यह रथ पर चढकर घनुप चढ़ाकर शत्र-धारियों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य यज्ञ के कलश से युद्ध करे । यह सुनते ही मय राममि में हाहाकार उत्पन्न हुए हैं। गौतम के पुत्र कृपाचार्य ने सरकण्डे मच गया और माधुवाद की धुनि के माय मूर्य की लकड़ी से जन्म लिया ॥१२।१५।। अम्न हो गये ॥१६॥१०॥ औरों की कथा कहने का क्या प्रयोजन है तब दुर्योधन कर्ण का हाथ पकड़कर राममि तुम्हारा जन्म जिस प्रकार हुआ यह भी मैं जानता से चल दिया । मशालें हाथ में लिये नीर लांग है। म्याभाविक कवच और युण्डल धारण करने वाले, आगे-आगे चले । है पृथ्वीनाथ! मोम, द्रोण और सर्व लक्षणों से युक्त, सूर्य के समान नेजम्वी कर्ण, कृपाचार्य के गाय पाण्डा भी अपने पगें को गये । भी नीच जाति की नी में उत्पन्न नहा है। मृगी देवनगारों में से कोई अजुन की, कोई की कही सिंह को पैदा कर सकती है। मैं इनका और कोई दुर्योधन की पढ़ाई करते हुए अपने-अपने घरी को मिधार । दिव्य रक्षणों मे युक अपने पुत्र भाजाकारी मित्र हूं। ये पर अगराज्य ही नहीं, यह पृथ्वी भर का गज्य कर सकते है । मैंने इनकी रणे को पहनानार और उमा भंगगम में । rror ६७८ महाभारत [ आदिपर्व ooranhooroscope 100cooooooooooo- कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम् । पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत ॥ २३॥ दुर्योधनस्यापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ २४ ॥ स चापि वीरः कृतशस्त्रनिःश्रमः परेण साम्नाऽभ्यवदत्सुयोधनम् । युधिष्ठिरस्याप्यभवत्तदा मतिन कर्णतुल्योऽस्ति धनुर्धरः क्षितौ ॥२५॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अस्त्रदर्शने ऊनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ।। अभिपिक्त देखकर कुन्ती मन में बड़ी प्रसन्न हुई। को प्रसन्न करने लगे । यह युधिष्ठिर को भी निश्चय दुर्योधन के हृदय में अर्जुन का जो भय था वह हो गया कि पृथ्वी भर में वर्ण के समान धनुषधारी कर्ण की मित्रता से जाता रहा । शस्त्र-विद्या में और कोई नहीं है ॥२०॥२५॥ परिश्रमी वीर कर्ण भी मीठी-मीठी बातों से दुर्योधन आदिपर्व का एक सौ उनतालीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४०॥ वैशम्पायन उवाच-पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान्प्रसमीक्ष्य सः । गुवथ दक्षिणाकाले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः ततः शिप्यान्समानीय आचार्योऽर्थमचोदयत् । द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते पाश्चालराजं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात्परमदक्षिणा ॥ ३ ॥ तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्णं प्रहारिणः । आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः एक मौ चालीस अध्याय ।। १४० ॥ वैशम्पायन ने कहा-दे राजन् ! अनन्तर आचार्य की आज्ञा कर बोले-तुम लोग पाचाल देश के राजा द्रोण ने पाण्डवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों को अस्त्र- द्रुपद को युद्ध में हराकर मेरे पास पकड़ लाओ। मैं विया में शिक्षित देखकर गुरु-दक्षिणा के समय आने यही गुरु-दक्षिणा तुमसे चाहता है । तुम्हारा भग पर दक्षिणा के योग्य विषय का निश्चय किया । तय हो। द्रोणाचार्य की भाना मान करके, अम्र-शस्त्रों से सब शिष्यों को बुलाकर गुरु-दक्षिणा के योग्य वस्तु सज-धजार, रथों पर चढ़कर सब राजकुमार गुपद -Prarmr-IN अध्याय १४० ] महा भारत 0.00hcood 000000000 .. । ततोऽभिजग्मुः पाञ्चालान्निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः । ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः दुःशासनो विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः । अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह । प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः तस्मिन्काले तु पाश्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद्वलम् । भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययो हात् ॥ ९ ॥ ततस्तु कृतसन्नाहो यज्ञसेनो महीधरः शरवर्षाणि मुश्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥ १०॥ ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् । यज्ञसेनः शरान्घोरान्ववर्ष युधि दुर्जयः वैशम्पायन उवाच-पूर्वमेव तु समय पार्थो द्रोणमथाब्रवीत् दोद्रेकारकुमाराणामाचार्य द्विजसत्तमम् ॥ १२ ॥ को जीतने के लिये चरे। उनके साथ द्रोणाचार्य भी सी शत्रु सेना को नगर में देखा तब वे भी अपने भाइयों के साथ युद्ध के लिये राजभवन से बाहर राजकुमारों ने द्रुपद के पाचाल देश में पहुचकर निकले । अम्ब शस्त्रों से सुसज्जित, कवच धारण किये वहा के निवासियों को मारना और द्रुपद हुए, द्रुपद के सब भाई सिंहनाद करते हुए वाणी को सय प्रकार तहसनहस करना आरम्भ कर दिया। की वर्षा करने रंगे ॥५॥१०॥ दुर्योधन, कर्ण, महाबरी युयुत्सु, दु शासन, विकर्ण, तब दुर्जय यज्ञसन श्वेतरथ पर चटार कारों जर सन्ध, सुलोचन और अन्यान्य पराक्रमी क्षत्रिय के सामने आकर युद्ध-स्थल में घोर वाणों की यपी श्रेष्ठ राजकुमार रयों पर चढ़े हुए, घुड़सवार सेना करने रगे। वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! अहकार के साथ, नगर में घुसकर रानमार्ग में पहुने। उनमें से पद रहे नरा के पुत्र। को नीचा दिखाने के से हर एक सबसे पहले राजा द्रुपद को पकड़ने का रिय पहले ही आपम में मार करके अर्जुन ने 1 उत्साह दिसामहाराज' पान ल के राजा द्रोणाचार्य मे कह दिया हे गुरु जी ! दुर्योधन द्रुपद को जब यह गयर मिरी भार उन्होंने बहुत आदि को युद्ध मे अग्ना पर मम दिम्ला देने दीजिए, गये ॥१४॥ के नगर ६८० महा भारत [ आदिपर्व 507pyooooooook colooc03030 M एपां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद्बहिरेव सः ॥१४॥ द्रुपदः कौरवान्दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः शरजालेन महता मोयन्कौरवी चमूम् ॥ १५ ॥ तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमावहे अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतो दिशम् । ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः ॥१७॥ प्रावाद्यन्त महाराज पाञ्चालानां निवेशने सिंहनादश्च संजज्ञे पाञ्चालानां महात्मनाम् धनुातलशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान् । दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुदीर्घलोचनः दुःशासनश्च संक्रुद्धः शरवरवाकिरन् सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्पतो युधि दुर्जयः ॥ २० ॥ व्यधमत्तान्यनाकानि तरक्षणादेव भारत दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम् ॥ २१ ॥ पीछे हम सब पाण्डव साहस के साथ द्रुपद को को बड़ा भय रगा । एक द्रुपद ही उन्हें अनेक से पाड़ने का उद्योग करेंगे । मुझे आशा है कि वे जान पड़ने लगे ॥११॥१६॥ रोग युद्ध में राजा दुपद को पकड़ नहीं सक्ते । राजा द्रुपद के कठोर वाण चारों ओर चल रहे थे। कुन्ती पुत्र अर्जुन यह कहकर भाइयों के साथ नगर इसके पश्चात् पाचारों की सेना में शह, नगाड़े और से आधे कोस पर ठहरे रहे । इधर राजा द्रुपद कौरवों मृदग आदि गाजे बनने रगे। हजारों वीरों की धनुष की सेना में घुमार युद्ध करने लगा आर आने की डोरी का शब्द आकाश में गूंजने लगा। तय तण वाणों से दुर्योधन, वर्ण, विकर्ण और-और दुर्योधन, विकर्ण, मुगाह, दीर्घलोचन और दु गासन राज पुत्रों को व्याकुल कर दिया । युद्धभूमि में आदि धृतराष्ट्र के पुर झोषित होकर राजा द्रुपद के रथपर चंद हुए रागा द्रुग्द की फुता देवकर कौरवों ऊपर वाणी की वर्षा करने रंगे। हे भारत' धनुष । । Horrorrarrrrnair.resrrrrrrrrrrr-
1500/colo
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स्वनं श्रुत्वा
:
अध्याय १४०]
म हा मारत
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नानानृपसुतान्वीरान्सैन्यानि विविधानि च ।
अलातचक्रवत्सर्व चरन्वाणैरतर्पयत् ॥ २२ ॥
ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैयष्टिभिस्तदा ।
अभ्यवर्पन्त कौरव्यान्वर्षमाणा घना इव ॥ २३ ॥
सवालवृद्धास्ते पौराः कौरवानभ्ययुस्तदा
श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥ २४ ॥
द्रवन्ति स्म नदन्ति स्म क्रोशन्तः पाण्डवान्प्रति ।
पाण्डवास्तु
आर्तानां लोमहर्पणम् ॥ २५ ॥
अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा
युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥ २६ ॥
माद्रेयो चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाऽकरोत् ।
सेनानगो भीमसेनः सदाऽभूद्गदया सह ॥ २७॥
तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
आयाजवेन कौन्तेयो रथेनानादयन्दिशः
पाञ्चालानां ततः सेनामुद्भूतार्णवनिःस्वनाम् ।
भीमसेनो महावाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २९ ॥
धारण किये हुए दुर्जय द्रुपद उन वाणों से बहुत । लाठियों की वर्षा करने लगे। अन्त में सब कौरव
घायल होकर और भी भयानक रूप से सग्राम करने और कौरवों की सेना के मनुष्य द्रुपद के वाण और
नगरवामियों के प्रहारों से व्याकुल होकर हाहाकार
जलती हुई लकड़ी के चपर की तरह घूम रहे करते हुए पाण्डवों की ओर भागे । कौरवों के आर्त-
राजा द्रुपद अकेले ही दुधिन,विकर्ण, महावली कर्ण नाद को सुनकर पाण्डव लोग युद्ध के लिये तयार
और नाना देशों के वीर राजकुमारों का सामना हुए । वे ट्रोणाचार्य को प्रणाम करके अपने-अपने
करते हुए श की सेना का सहार करने लगे । रथों पर सवार हुए । अर्जुन ने शीघ्रता मे युधिष्ठिर
किसी को करने के लिये यह नहीं रह गया कि से कहा आप युद्ध न करें, मैं अभी द्रुपद को
मुझे द्रुपद से युद्ध करके उन्हें पकड़ने का अवसर पकड़ार राना ॥ २१॥२६॥
ही नहीं मिला। इसके पश्चात् नगर के रहनेवाले नकुल और माईदेव का मर्जुन के रथ के पहियों
रोग भी-चालक, पूढे सर-दर आये और बरसने की रक्षा में नियुक्त किया और मदा मेना
हुए पादरों की तरह कौरवों के ऊपर म्मन और के भाग चनाले भीममेन हाथ में गदा रेर
रंग ॥१७॥२०॥
म हा भारत [ आदिपर्व Zodoo000000000003cror - - .. car प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा स्वयमभ्यद्रवद्भीमो नागानीकं गदाधरः ॥ ३० ॥ स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चात्मनः । अहनत्कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृक् ते गजा गिरिसकानाः क्षरन्तो रुधिरं वहु । भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः ॥ ३२ ॥ गजानश्व व्रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः ॥ ३३ ।। गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान्वने चालयबथनागांश्च संचचाल वृकोदरः ॥ ३४ ॥ वैशम्पायन उवाच-भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात्स पाण्डवः हयोघांश्च रथोघांश्च गजौघांश्च समन्ततः पातयन्समरे राजन्युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ ३६ ॥ चरे । कुन्ती पुत्र अर्जुन शत्रुओं का शब्द सुनकर खाकर हाथी गिरने लगे। तरह अर्जुन के बड़े स्था की आहट से दिशाओं को प्रतिध्वनित करते भाई भीमसेन ने अगणित गज, घोड़े, रथ धरती पर साथ बड़े वेग से रणभूमि में आ गिराये और असरूप रथी और पैदलों को यमराज गये । जिस प्रकार मगर समुद्र में प्रवेश करता है के घर भेजा। जिसतरह जङ्गल में गौओं के रखवाले वैसे ही हाथ में लकड़ी लिये यमराज के समान लकड़ी से पशुओं को पीटते है वैसे ही हाथी मादि भीमसेन उछलते हुए समुद्र के समान कोलाहल कर को पीटते हुए भीममेन युद्ध भूमि में विचरने लगे। रही पाचाल देश की मेना में घुसे । अतुल बाहुबल ॥३२॥३४॥ धारी युद्ध में चतुर भीमसेन काल की तरह गदा से वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! तब पाण्ड पुन हाधियों पर नही हुई सेना की ओर दौड़कर उसको अर्जुन ने आचार्य द्रोण के प्रियकार्य करने में उद्यत नष्ट करने लगे ॥२७॥३१॥ होकर वाणों के द्वारा हाथी पर से पाचालराज को पहाड़ ऐसे हाथियों के मस्तक गदा की चोट गिराया । प्ररयकार की अग्नि के ममान युद्ध में से फट गये और रक्त बहने लगा । वज्र गिरने से प्रचरित होकर महावीर अर्जुन चारों ओर हाथी, जैसे पहाड़ फट जाते हैं वैसे ही गदा की चोट पोई, रथ आदि के समूहों को पृथ्वी पर गिराने रगे। हुए भाइयों pron-rssorscori-Jrzzrrrrrraiwritram म हा भारत अध्याय १४० accoice 20507050 ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा । शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थ संछाद्य सर्वशः सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् । तद्युद्धमभवदघोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत्पाकशासनिः ॥ ३८॥ ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान्समरेऽद्रवत् । छादयन्निपुजालेन महता मोहयन्निव शीघ्रमभ्यस्यतो वाणान्संदधानस्य चानिशम् । नान्तरं ददृशे किंचित्कौन्तेयस्य यशस्विनः ॥ ४० ॥ सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशव्देन मिश्रितः ततः पाञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह ॥ ४१ ॥ त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा । महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत् ॥ ४२ ॥ ततो हलहलाशब्द आसीत्पाञ्चालके वले । जिघृक्षति महासिंहो गजानामिव यूथपम् ॥ ४३ ॥ दृष्ट्वा पार्थं तदायान्तं सत्यजित्सत्यविक्रमः । पाञ्चालं वै परिप्रेप्सुर्धनञ्जयमदुद्रवत् ॥४४॥ तब सिंह के समान गर्जन करके वाणों वर्षा । है । अर्जुन की फुर्ती को देखकर शत्रु भी उनकी करते हुए पाञ्चाल और सृञ्जय वंश के वीगें ने चारों प्रशंसा करते हुए सिंहनाद करने लगे ॥३८॥४१॥ ओर से अर्जुन को घेर लिया ॥३५॥३७॥ शम्बासुर जिस प्रकार इन्द्र की ओर दौड़ा था युद्ध धीरे-धीरे घोर और अद्भुत रूप धारण करने वैसे ही पाश्चालराज तब अपने भाई सत्यजित् के लगा। शत्रुओं के सिंह के समान गर्जन को वीर साथ शीघ्रता से अर्जुन की ओर दौड़े। अर्जुन ने अर्जुन न सह सके । वे वाण-वर्षा से पाञ्चालों को असंख्य वाण चलाकर पांचालराज को ढक दिया। मोहित करते हुए उनकी और दौड़े। अर्जुन को जैसे कोई सिंह गजगज पर झपटे वैसे अर्जुन जय ऐसी फुती से वाण चढ़ाने और चलाने का अभ्यास द्रुपद की ओर बढ़े तब पांचाल देश की सेना में था कि कोई देख नहीं सकता था कि कब वे वाण बड़ा कोलाहल मच गया। अर्जुन को आते देखकर निकालते हैं, कब चढ़ाते और कब चलाते हैं । ऐसा पाञ्चालराज की रक्षा करने को महापराक्रमी सत्यजित्. जान पड़ता था, मानों वे लगातार वाण बरसा रहे सामना करने के लिये, आगे बढ़ा । इन्द्र और राजा -air.vipiniorpioprovc. ucynycynyynn महाभारत [ आदपर्व 00mrowse/o00000000000000000000 cousic ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतो व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ॥४५॥ ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः विव्याध बलवद्गाढं तदद्भुतमिवाभवत् ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमादयत् । पार्थस्तु शरवर्पण च्छाद्यमानो महारथः ॥४७॥ वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ध्यामवमृज्य च ततः सत्यजितश्चापं छित्वा राजानमभ्ययात् ॥ १८ ॥ अथान्यदनुरादाय सत्यजिद्वेगवत्तरम् साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥ ४९ ॥ स तं न ममृपे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि । ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ ५० ॥ हयाध्वजं धनुर्मुप्टिमुभौ तौ पाणिसारथी स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५१ ॥ हयेषु विनियुक्तेषु विमुखोऽभवदाहवे स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥५२॥ वेगेन महता राजन्नभ्यवर्पत पाण्डवम् तदा चक्रे महाद्धमर्जुनो जयतां वरः बलि के समान अर्जुन और सत्यजित् युद्ध करने लगे सत्यजित् राजा द्रुपद की ओर चले । सत्यजित् ने ॥४२॥४५॥ दूसरा धनुप लेकर अर्जुन को घोड़े, रथ और सारथी. अर्जुन और सत्यजित् एक दूसरे की सेना में सहित वाण मारकर व्याकुल किया ॥४६॥५०॥ 'हलचल मचाने लगे । सत्यजित् के पास आने पर अर्जुन इस बात कोन सह सके और जल्दी से अर्जुन ने दस मर्मभेदी वाण मारकर उसको घायल अपने वाणों से सत्यजित् का धनुप काटकर उसके पर डाला । इसके पश्चात् सत्यजित् ने सौ वाण स्थ की रक्षा करनेवालों को, सारथी को और घोड़ों मारकर अर्जुन को दक दिया । अर्जुन ने अपने धनुष को भी मार डाला । इसके पश्चात् घोड़ों के बार-बार की प्रत्यचा को और चढा लिया और तीक्ष्ण वाण मार- मारे जाने और धनुष के काटने के कारण से सत्य- कर सत्यजित् के धनुष की डोरी काट डाली । अब जित् अर्जुन के सम्मुख से लड़ना छोड़कर भाग गया। 7.rendi.or.Jerrorrarzrs महा भारत अध्याय १४० ] 21001001/2017 तस्य पार्थो धनुश्छित्वा ध्वजं चोामपातयत् । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान्सूतं च सायकैः ॥ ५४ ॥ तत उत्सृज्य तचापमाददानं शरावरम्, खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥५५॥ पाञ्चालस्य रथस्येषामाप्लुत्य सहसापतत् । पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनंजयः विक्षोभ्याम्भोनिधिं पार्थस्तं नागमिव सोऽग्रहीत् । ततस्तु सर्वे पाञ्चाला विन्द्रवन्ति दिशो दश ॥ ५७॥ दर्शयन्सर्वसैन्यानां स बाहोलमात्मनः सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनञ्जयः ॥ ५८॥ आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः अर्जुन उवाच-संवन्धी कुरुवीराणां दुपदो राजसत्तमः मा वधीस्तवलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम् ॥६॥ वशम्पायन उवाच-भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महावलः सत्यजित् को युद्ध में हारते देखकर पाचालराज लिया कि जैसे रोग समुद्र के जर को मथकर हस्ती दुपद बड़े वेग के साथ अर्जुन की ओर झपटकर को पकड़ लाते है । यह देखकर सब पाचाल सेना उनपर याण बरसाने लगे । तब अर्जुन घोर युद्ध इधर उधर भागने लगी ॥५६/५७|| करने लगे ॥५१॥५३॥ तय अर्जुन सब सेनाओं को ,अपना बाहु घर उन्होंने राजा द्रुपद का धनुष और घना काट दिखार सिंहनाद करते हुए देणाचार्य के पास डाली । फिर पाच वाणों से द्रुपद के सारथी को चले । अर्जुन को वापस आने देखकर सब एकत्र और रथ के घोडों को घायल कर दिया । अनन्तर होकर उस समय महात्मा द्रुपद नगर को नष्ट कुन्ती पुन अर्जुन धनुषाण छोड़कर, खड्ग हाथ में भ्रष्ट करने लगे। फिर अर्जुन ने भीमसन में कहा लेकर सिंह के समान शब्द करते हुए द्रुपद की ओर हे भीम ! राजाओं में श्रेष्ठ द्रुपद हम कुरुबगियों के झपटे ॥५४॥५५॥ सम्बन्धी है। उनकी सेना को न मारो । चलो, ये एकाएक कूदकर पाचालराज के रथ पर चले गुरु महाराज को गुस्-दक्षिणा देवें । वैशम्पायन गये ! अर्जुन ने ऐसे निर्भय होकर द्रुपद को पड़ ने कहा-हे राजन् ! भीमसेन यद्यपि युद्ध से तृप्त rrorirror, ६८६ महा मारत [ आदिपर्व Yoon । cacicccuc5cmcicles । ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि . . उपाजग्मुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ भग्नदर्प हृतधनं तं तथा वशमागतम् सवैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ॥ ६३ ॥ विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्व किमिप्यते ॥ ६४ ॥ एवमुक्त्वा प्रहस्यैवं किंचित्स पुनरब्रवीत् । मा भैः प्राणभयाद्वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ॥६५॥ आश्रमे क्रीडितं यत्तु त्वया बाल्ये मया सह । तेन संवर्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ॥६६ ॥ प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप । वरं ददामि ते राजनराज्यस्यार्धमवाप्नुहि ॥ ६७॥ अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञतेन मयातव ॥ ६८॥ राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ॥ ६९ ॥ नहीं हुए थे तथापि अर्जुन के मना करने पर वे कहा हे वीर द्रुपद ! तुम डरो नहीं । मैं तुम्हारे रुक गये । हे भारत ! मन्त्री सहित दुरद को प्राण न लंगा ! हम ब्राह्मण हैं इमरिये क्षमायुक्त तरह पकड़कर कुमारों ने गुरु द्रोणाचार्य के आगे हैं। हे क्षत्रियों में श्रेष्ठ ! लड़कपन में मुझसे खड़ा कर दिया । द्रुपद का अहंकार मिट गया, सब खेलने कृदन ही के हेतु तुमपर मेरा स्नेह और कुछ खोया गया । इस दशा में अपने अधीन द्रुपद प्रेम बढ़ा था । सो हे वीर ! मै फिर तुमसे मित्रता को देखकर पहले की शत्रुता को स्मरण करके करना चाहता हूं। मैं तुमको तुम्हारा आधा राज्य द्रोणाचार्य ने कहा 1-मैंने तुम्हारा राज्य छीन लिया। अभी वापस किये देता हू ॥६५/६७॥ है, तुम्हारे नगर को लूट लिया है । इस समय हे यज्ञसेन ! तुमने मुझे कहा था कि जो राजा तुम जीते हुए शत्रु के अधीन हो । अब तुम नहीं है वह राजा का मित्र नहीं हो सकता। इसी पहले की मित्रता का ख्याल करके मुझसे क्या ' से मैने तुम्हारा राज्य हरने का प्रयत्न किया। चाहते हो ! ।।५८/६४॥ गंगा के दक्षिण किनारे के तुम राजा हो और , इसके पश्चात् मुसकराकर फिर आचार्य ने उत्तर भोर का राज्य में करूंगा। अब तुम चाहो इमscreirarorsrirrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr
ana
अर्जुन से दुपद का हारना ओर अर्जुन का दुपद को पकड़कर अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास लाना ।
द्रोण और दुपद की फिर मित्रता होना ।
६८७ अध्याय १४०] म हा भारत 100100100 rroreD000000000000000000 द्रुपद उवाच-अनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन्विक्रान्तेषु - महात्मसु । प्रीये त्वयाहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छामि शाश्वतीम् ॥ ७॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तः स तं द्रोणो मोक्षयामास भारत । सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्या प्रत्यपादयत् ॥ ७९ ॥ माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरेजनपदायुताम् सोऽध्यावसद्दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम् ॥ ७२ ॥ दक्षिणांश्चापि पाञ्चालान्यावञ्चमण्वती नदी । द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः ॥ ७३ ॥ क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत्स पराजयम् हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मण स वलेन तु ॥७४ ॥ पुत्रजन्म परीप्सन्वै पृथिवीमन्वसंचरत् अहिच्छत्रं च विषयं द्रोण. समभिपद्यत एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदायुता युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता ॥७६ ॥ इनि श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि द्रुपदशासने चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥१४० ।। तो मुझे अपना मित्र समझो । द्रुपद ने कहा द्रुपद चर्मण्यती नदी तक गगा के दक्षिण तट है ब्रह्मन् ! विक्रमी महात्मा पुरुषों के लिये यह आश्चर्य । के प्रदेश की शामन करने लंगे। उन्होंने मन में नहीं है। मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हु और आपसे । सोचा कि मै ब्राह्मण के बल से हीन है, और सदा बनी रहने वाली मित्रता करना चाहता हू द्रोणाचार्य को मै क्षत्रिय के बल से पराम्त नहीं ॥६८७०॥ कर सकता । इमलिये पुत्र उत्पत्ति की इच्छा से वे वैशम्पायन ने कहा है भारत | द्रुपद के ऐसे पृथ्वी के चारों ओर घूमने लगे । इधर द्रोणाचार्य कहने पर द्रोणाचार्य ने उनको बन्धन से मुक्त कर अहिच्छत्र देश का राज्य करने लगे। हे राजन् । प्रसन्नचित्त से सत्कार करके राज्य का आधा भाग इस प्रकार युद्ध में राजा द्रुपद को जीतकर अर्जुन ने दिया । मन ही मन इस अपमान से दु खिन द्रुपद । आचार्य को अहिन्धन देश का राज्य सौंप दिया गगा के तट पर स्थित मादी नाम के देश के था !!७११७६॥ काम्पिल्य नगर म रहने लगे। द्रोणाचार्य से हारकर । आदिपर्व का एक्सी वालीम अध्याय ममाम हुआ। Koc - ० oranaroon nirmirarorarurihororarural महा भारत [ आदिपर्व 0000000000cc.comcocococorolcocorict peacuodikcicucuri अथ एकचत्वारिंगदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः संवत्सरस्यान्ते यौवराज्याय पार्थिव । स्थापितो धृतराष्ट्रेण पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥ धृतिस्थैर्यसहिष्णुत्वादानृशंस्यात्तथाऽऽर्जवात् । भृत्यानामनुकम्पार्थं तथैव स्थिरसौहृदात् ततोऽदीर्घेण कालेन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । पितुरन्तर्दधे कीर्ति शीलवृत्तसमाधिभिः असियुद्धे गदायुद्धे रथयुद्धे च पाण्डवः संकर्षणादशिक्षद्वै शश्वच्छिक्षां वृकोदरः समाप्तशिक्षौ भीमस्तु द्युमत्सेनसमो बले पराक्रमण सम्पन्नो भ्रातणामचरद्वशे ॥ ५.॥ प्रगाढढमुष्टित्वे लाघवे वेधने तथा क्षुरनाराचभल्लानां विपाटानां च तत्त्ववित् ॥ ६ ॥ ऋजुवक्रविशालानां प्रयोक्ता फाल्गुनोऽभवत् । लाघवे सौष्ठवे चैव नान्यः कश्चन विद्यते बीभत्सुसदृशो लोके इति द्रोणो व्यवस्थितः ॥ ७ ॥ ततोऽब्रवीगुडाकेशं द्रोणः कौरवसंसदि एक सौ इकतालीस अध्याय ॥ १४१ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे पृथ्वीनाथ अनन्तर एक वर्ष जी से सदा असि, गदा, रथ के युद्ध के विषय में के व्यतीत होने पर राजा धृतराष्ट्र ने धीरता, स्थिरता, अच्छी शिक्षा मिलती थी । द्युमत्सेन के समान बली सहनशीलता, अनिदर्यता, आर्जव, नौकरों पर दया भीमसेन भली मान्ति शिक्षित होकर पराक्रमी भाइयों और सर्व साधारण से स्थिर मित्रता गुण से सुहावने । के परम मित्र बने रहे ॥४५॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को युवराज के पद पर बैठाया। महावीर अर्जुन कसी और दृढ़ मुट्ठी से धनुष कुन्ती-कुमार युधिष्ठिर ने अपने विनयादि गुण और पकड़ने में, सफ़ाई में, निशाना मारने में, सीधे तथा प्रजा के समाधान से थोड़े ही दिनों में अपने पिता टेढ़े बड़े-बड़े अस्त्रों के चलाने में अच्छे समर्थ हुए। की कीर्ति को छिपा दिया और पिता से अधिक द्रोणाचार्य ने निश्चय किया था कि शीघ्रता तथा यशस्वी हो गया ॥१३॥ । सुनियम के विषय में अर्जुन के समान इस संसार इसी समय में पाण्डु-नन्दन भीमसेन को बलदेव ' में दूसरा कोई नहीं है ॥४७॥ - Rocom700707reonorrorar अध्याय १४१ ] महा भारत ६८९ conococococc000000 Ja Leonococo . :5ccccescarcscircle onzotourvorczera " अगस्त्यस्य धनुर्वेदे शिष्यो मम गुरुः पुरा ॥ ८ ॥ अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्मि भारत । तीर्थात्तीर्थ गमयितुमहमेतत्समुद्यतः ॥ ९॥ तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद्दहेत्पृथिवीमपि ॥ १० ॥ ददता गुरुणा चोक्तं न मनुष्येप्चिदं त्वया भारद्वाज विमोक्तव्यमल्पवीर्यप्वपि प्रभो स्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योऽहति विदम् । समयस्तु त्वया रक्ष्यो मुनिस्कृष्टो विशांपते ॥ १२ ॥ . आचार्यदक्षिणां देहि ज्ञाति ग्रामस्य पश्यतः । ददानीति प्रतिज्ञाते फाल्गुनेनाप्रवीद्गुरुः युद्धेऽहं प्रतियोद्धव्यो युद्धयमानस्त्वयाऽनघ । तथेति च प्रतिज्ञाय द्रोणाय कुरुपुङ्गवः ॥ १४ ॥ उपसंगृह्य चरणों स, प्रायादुत्तर दिशम् स्वभावादगमच्छन्दो महीं सागरमेखलाम् अर्जुनस्य समो लोके नास्ति कश्चिद्धनुर्धरः । गदायुद्धऽसियुद्धे च रथयुद्धे च पाण्डवः कुछ समय के उपरान्त एक दिन द्रोणाचार्य ने के ऊपर यह अस्त्र का न चलाना। [जो छिपकर कौरवों की सभा में अर्जुन से कहा-हे अर्जुन ! मायायुद्ध करते हैं उन तेजवी राक्षम, गन्धर्व पूर्वकाल में अग्निवेश नाम से प्रसिद्ध मुनि अगम्य आदि को मारने के लिये तुम युद्ध में इस अम्त्र का के शिप्य धनुर्वेद में मेरे गुरु थे । मैने उन अप्रिवेश प्रयोग कर सकते हो । चीर ! पछि तुमने मुन के शिष्य होकर शिक्षा पाई थी। मैंने बहुत दिन से वह दिव्य अन्त्र पाया है कोई दूसरा इसके पाने तप करके जो बम के समान प्रागिर नाम का के योग्य नहीं है । पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरु के अपोप अत्र अपने गुरु में पाया था या में नुमको पूर्वोक्त नियम को म्मरण रयकर मनुष्यों पर यह दे चुका है। यह प्रम अब मम्पूर्ण सी को जला अत्र न चराना ॥११॥१२॥ सकता है ॥८॥१०॥ अय असंग भ्यानों के मामने मुझ गुरु दक्षिणा गुरु ने जय मुझको यद अर दिया था, नरकमा दो ! अंजन ने कहा मागिए, में यही दंगा । द्रोण भा, कि भारद्वाज ! तुम मर वीर्यवाले मनुष्यों ने कहा है अनप ! में या दक्षिणा मांगता हकि [ आदिपर्व wereiraksonseren - महाभारत 0.000mmarrrrrrrores पारगश्च धनुर्युद्धे बभूवाथ धनञ्जयः नीतिमान्सकलां नीति विवुधाधिपतेस्तदा ॥ १७ ॥ अवाप्य सहदेवोऽपि भ्रातृणां ववृते वशे । द्रोणेनैव विनीतश्च भ्रातॄणां नकुलः प्रियः ॥ १८ ॥ चित्रयोधी समाख्यातो बभूवातिरथोदितः त्रिवर्षकृतयज्ञस्तु गन्धर्वाणामुपप्लवे अर्जुनप्रमुखैः पार्थः सौवीरः समरे हतः न शशाक वशे कर्तुं यं पाण्डुरपि वीर्यवान् ॥ २० ॥ सोऽर्जुनेन वशं नीतो गजाऽऽसीद्यवनाधिपः अतीव वलसंपन्नः सदा मानी कुरून्प्रति ॥ २१ ॥ विपुलो नाम सौवीरः शस्तः पार्थेन धीमता । दत्तामित्र इति ख्यातं संग्रामे कृतनिश्चयम् ॥ २२ ॥ सुमित्रं नाम सौवीरमर्जुनोऽदमयच्छरैः भीमसेनसहायश्च स्थानामयुतं च सः ॥ २३ ॥ अर्जुनः समरे प्राच्यान्सर्वानेकरथोऽजयत् तथैवैकरथो गत्वा दक्षिणामजयद्दिशम् 1 २४ ॥ युद्धभूमि में तुम मुझसे युद्ध करना । अर्जुन ने वहीं | सौवीर देश के राजा को जिसने गन्धर्वो के उपद्रव स्वीकार करके गुरु के चरणों में प्रणाम किया । में तीन वर्ष तक यज्ञ किया था और जिसे राजा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीमण्डल में आप ही आप यह बात पाण्डु भी न जीत सका था उसे युद्ध में जीतकर फैल गई कि संसार भर में इस समय अर्जुन के समान मार डाला। पराक्रमी महाराज पाण्डु भी जिस यवन- चापधारी कोई वीर नहीं है। अर्जुन गदायुद्ध, राज को अपने वश में नहीं कर सकते थे, अर्जुन खड्गयुद्ध, रथयुद्ध और धनुर्युद्ध में पूरे निपुण ने उसको भी युद्ध में परास्त करके अपने अधीन हो गये । सहदेव भी द्रोणाचार्य से नीतिशास्त्र | कर लिया । विपुल नाम का एक और सौवीरराज पढकर भाइयों की आज्ञा का पालन करने लगे। जो बड़ा बली था और कुरुवशियों से सदा अहकार भाइयों के प्यारे नकुल आचार्य द्रोण से अच्छी शिक्षा करता था अर्जुन ने उसे भी युद्ध में मार डाला। पाकर चित्र-युद्ध करनेवाले अतिरथ कहलाने लगे बड़े मारी योद्धा, दत्तामित्र और सुमित्रनाम के दो ॥१३।१८॥ और वीर सौवीर देश के राजाओं को हराकर अर्जुन अर्जुन आदि पाण्डवों ने उत्तर दिशा में जाकर | ने अपने वश में कर लिया । अर्जुन ने आप एक . 350%eral rror.oroconocornrairat अध्याय १४१ ] महा मारत 04 000000hooroscope ODoop00000 धनौघं प्रापयामास कुरुराष्ट्रं धनञ्जयः एवं सर्वे महात्मानः पाण्डवा मनुजोत्तमाः ॥ २५ ॥ परराष्ट्राणि निर्जित्य स्वराष्ट्रं वधुः पुराः ततो बलमातिख्यातं विज्ञाय दृढधन्विनाम् ॥ २६ ॥ दूषितः सहसा भावो धृतराष्ट्रस्य पाण्डुषु । स चिन्तापरमो राजा न निद्रामलभन्निशि ॥ २७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि धृतराष्ट्रचिन्ताया कचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ । रथी होने पर भी भीमसेन की सहायता से, रथ पर किया । पाण्डवों की शूरता और धनु-विद्या की चढ़कर, पूर्व देश के दश हज़ार रथी वीरों को जीत . निपुणता को देखकर धृतराष्ट्र का चित्त अचानक लिया । इसीप्रकार उन्होंने दक्षिण देश को परास्त पाण्डवों की ओर से बिगड़ गया । उन्हें चिन्ता के करके कुरुराज्य में अनेक धन भेना । हे राजन् ! । मोरे रात को अच्छीतरह नींद भी न आती थी मानवों में श्रेष्ठ महात्मा पाण्डवों ने इस प्रकार शत्रुओं ॥१९॥२७॥ के राज्य जीतकर अपने राज्य को बढ़ाना आरम्भ आदिपर्व का एक सौ इकतालीस अध्याय समाप्त हुआ । . reso ॥ २ ॥ अथ द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय. ॥१४२ ॥ वैशम्पायन उपाच-श्रुत्वा पाण्डुसुतान्वीरान्वलोद्रिक्तान्महौजसः । धृतराष्ट्रो महीपालश्चिन्तामगमदातुरः तत आइय मन्त्रज्ञं राजशास्त्रार्थवित्तमम् कणिकं मन्त्रिणां श्रेष्ठं धृतरामोऽयवीद्वचः धृतराष्ट्र उवाच-उरिसक्ताः पाण्डवा नित्यं तेभ्योऽसूर्य द्विजोत्तम । तत्र मे निश्चिततमं संधिविग्रहकारणम् कणिक त्वं ममाचक्ष्व करिष्ये वचनं तव ॥ ३ ॥ एक सौ बयालीस अध्याय ॥ १४२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! राजा बुलाकर कहा-हे कणिक ! पाण्डव दिन प्रति दिन धृतराष्ट्र को पाण्डवों की ओर से चिन्ता होने के यहते चले जाते हैं । मुझे उनको देख देखकर ईपी पछि एक दिन उसने अपने गजशास्त्रार्थ में पडित, होती है । इमसे मधि और विग्रह का कारण निश्चय मंत्रज्ञ, मुनियों में थेष्ठ, कणिक नाम मन्त्री को करने के लिये तुमको युगया है । कहो, तुम्हारी - -~-3027 -750/- ६९२ महाभारत [ आदिपर्व -ozooooozcoomerol 1000 30/02 Jcoricoricicoatesed वैशम्पायन उवाच-स प्रसन्नमनास्तेन परिपृष्टो द्विजोत्तमः उवाच वचनं तीक्ष्णं राजशास्त्रार्थदर्शनः पणिक उवाच-शृणुराजन्निदं तत्र प्रोच्यमानं मयाऽनघ न मेऽभ्यसूया कर्तव्या श्रुत्वैतत्कुरुसत्तम नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपोरुपः अच्छिद्रच्छिद्रदर्शी स्यात्परेषां विवरानुगः नित्यमुद्यतदण्डादि भृशमुद्विजते जनः तस्मात्सर्वाणि कार्याणि दण्डेनैव विधारयेत् ॥ ७ ॥ नास्य च्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेण परमन्वियात् । गृहेस्कूर्म इवाहानि रक्षेद्विवरमात्मनः नासम्यक्कृतकारी स्यादुपक्रम्य कदाचन कण्टको ह्यपि दुच्छिन्न आस्रावं जनयेचिरम् ॥ ९ ॥ वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम् सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ॥ १० ॥ आपद्यापदि काले च कुर्वीत न विचारयेत् नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्वलोऽपि कथंचन अल्पोऽप्यग्निर्वनं कृत्स्नं दहत्याश्रयसंश्रयात् ॥ ११ ॥ समझ में क्या आता है ॥१३॥ शत्रु के छिद्र को आप देख ले । जिस दण्ड के करने वैशम्पायन ने कहा कि मामलों में उत्तर कणिक से सब काम सिद्ध होते ही उसे कमी न भूले । राजा धृतराष्ट की बात सुनकर प्रसन्न होकर बोला कछुआ जिस प्रकार अपना अङ्ग छिपा लेता है, कि मैं राजनीति के अनुसार आपसे कहता हूं आप वैसे ही राजा सहायता, साधना और उपाय आदि को उसके अनुसार करना उचित है । हे अनघ- से अपने अङ्गों को छिपाकर रक्खे ॥४८॥ कुरुश्रेष्ठ ! यह सुनकर मुझपर क्रोध न करना । राजा कभी कोई काम अधूरा न छोड़े। जो काम करे को चाहिये कि सदा दण्ड देने को उद्यत रहे । उसे पूरा करने की चेष्टा करे । शत्रु को की शेष अपने पराक्रम को प्रकट करके दिखाता रहे । अपना न छोड़े क्योंकि पैर का लगा हुआ काटा समय पर भेद किसी को न दे दूसरे का भेद आप ले ले। दुख अवश्य देता है। जो शत्रु अपकारक ( हानी राजा के सदा दण्ड देने में उद्यत रहने से लोग उनसे पहुंचानवारा ) हो उसको अवश्य मार डाले । बहुत डरते हैं । अपने छिद्र को शत्रु न देखने पावे । जो शत्रु बलवान् हो और विपत्ति पड़ने से भाग गया - । 7/0c9comcaricocococriArcsc-505/07 docolcood ccc अध्याय १४२ ] महा भारत ६९३ areerconce अन्धः स्यादन्धवेलायां वाधिर्यमपि चाश्रयेत् । कुर्यात्तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् ॥ १२ ॥ सान्त्वादिभिरुपायैस्तु हन्याच्छर्छवशे स्थितम् । दया न तस्मिन्कर्तव्या शरणागत इत्युत निरुद्विग्नो हि भवति न हतांजायते भयम् । हन्यादमित्रं दानेन तथा पूर्वापकारिणम् हन्यात्रीपञ्च सप्तेति परपक्षस्य सर्वशः मूलमेवादितश्छिन्द्यात्परपक्षस्य नित्यशः ततः सहायांस्तत्पक्षान्सर्वांश्च तदनन्तरम् छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः ॥ १६ ॥ कथं नु शाखास्तिष्ठेरंश्छिन्नमूले वनस्पती । एकाग्रः स्यादविवृतो नित्यं विवरदर्शकः राजन्नित्यं सपनेषु नित्योद्विग्नः समाचरेत् । अग्न्याधानेन यज्ञेन कापायेण जटाजिनः ॥ १८॥ हो तो मिलने पर उसको भी अवश्य मार डाले का कर्तव्य है । शरण में आये हुए शत्रु पर भी क्सिी कारण से न छोड़े। जो शत्रु निर्यल भी हो तो दया न करनी चाहिये । शत्रु के मारने से खटका उसको भी न छोड़े । क्योंकि आग की छोटी सी जाता रहता है । मरा हुआ शत्रु कुछ हानि नहीं एक चिंगारी भी तृण का सयोग पाने से सारे जगल' पहुंचा सकता । पहले के अपकारी शत्रु को भी, को जा सकती है ॥९॥११॥ उसके नौकरों को धन का लोभ देवर मिरार, जो शत्रु अपने से बलवान् विशेष होवे तो उनके द्वारा मरवा डालना चाहिये ॥१२॥१४॥ अधा और बहिरा बनकर समय देखा करे और शत्रुपक्ष के तीन (ऐश्वर्य, मन्न, उत्माह), पाच अवसर पाकर उसको मारने से कभी न चुके । जैसे (मन्त्री, राज्य, दुर्ग, खजाना, सेना) या सात मृग को पकड़ने के लिये यहडिया आग्ने मूदकर साम, दान, भेद, दण्ड, उद्वन्धन, विष, वदि) लेट रहता है और अवसर पार पास आये हुए के द्वारा अनी को मदा नष्ट करने का उद्योग मृग को पकड़ लेता है या उसको तीर मारता है, करना चाहिये । पहले शत्रुपक्ष की जड़ को ही वैसे ही शत्रु को विश्वाम दिलाने के लिये-काम काटे । फिर उसके सहायकों और पक्ष करनवारों पड़े तो-उसके घर में भी सो रहे और अवमर को नष्ट करे । आधार रुपी जड़ के क्ट जान से पार वार कर दे । शत्रु को विश्वाम दिसार उसके आश्रय में रहनेवाले सभी नष्ट हो जात साम, दान आदि उपायों से नष्ट करना ही राजा हैं। पेड़ की जड़ काट देने पर क्या टमी गाम्या ..
६९४ महा भारत [ आदिपवे ootoroloxotomorrowoloricroto.com - लोकान्विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद्यथा वृकः । अङ्कुशं शौचमित्याहुरर्थानामुपधारणे ॥ १९ ॥ आनाम्य फलितां शाखां पकं पक्कं प्रशातयेत् । फलार्थोऽयं समारम्भो लोके पुंसां विपश्चिताम् ॥ २० ॥ बहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालस्य पर्ययः ततः प्रत्यागते काले भिन्द्याटमिवाइमनि अमित्रो न विमोक्तव्यः कृपणं वहपि त्रुवन् । कृपा न तस्मिन्कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम् ॥ २२ ॥ हन्यादमित्रं सांत्वेन तथा दानेन वा पुनः तथैव भददण्डाभ्यां सर्वोपायैः प्रशातयेत् ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-कथं सान्त्वेन दानेन भेदैर्दण्डेन वा पुनः । अमित्रः शक्यते हन्तुं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ २४ ॥ कणिक उयाच-शृणु राजन्यथावृत्तं वने निवसतः पुरा जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः ॥२५॥ अंथ कश्चित्कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः । सखिभियवसत्सार्धं व्याघ्राखुवृकवभ्रुभिः ॥ २६ ॥ हरी-भरी रह सकती है ! हे राजन् ! शत्रु से शत्रु की सराहना करके उसको सिर पर चढ़ा ले और निश्चिन्त रहकर छिप-छिपकर सदा उसके दोष समय आने पर ऐसे मार डाले जैसे पत्थर पर परक ढूंढने में चित्त को नियुक्त कर राज्य करना देने से सिर का घड़ा फूट जाता है । शत्रु चाहे चाहिये । शत्रुओं से सदा सावधान होकर रहना दीन वचन भी बोले परन्तु उसपर दया कभी करना चाहिये ॥१५॥१७॥ उचित नहीं है । अपकारी पर कृपा न करके उसे अग्निहोत्र करके, यज्ञ करके अथवा साधुओं मार डालना ही श्रेष्ठ है । साम, दान, भेद, दण्ड, का वेष बनाकर जिस प्रकार से हो शत्रु को अपना | इन उपायों से जिस तरह हो सके शत्रु को नष्ट विश्वास कराकर मार डाले और अपनी फलसिद्धि कर दे ॥२१॥२३॥ करे। जैसे वृक्ष की डाल को झुकाकर लोग पक्के यह सुनकर धृतराष्ट्र ने पूछा-हे द्विजश्रेष्ठ ! पक्के फल तोड़ लेते है ऐसे ही आप शत्रु से नम्र साम, दान, भेद और दण्ड के द्वारा किस तरह होकर उसके वध रूपी फल को तोड़ने में चित्त शत्रु का नाश किया जा सकता है । कणिक ने लगाये रहे ॥१८॥२०॥ कहा-हे महाराज ! पूर्व समय में नीतिशास्त्र ज्ञानisic2J5rrera ६९५ अध्याय १४२ ] महा भारत 7ozococorococ 15c cocc00000 orotocokomorroroxoxoto तेऽपश्यन्विपिने तम्मिन्वलिनं मृगयूथपम् अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन् ॥ २७ ॥ जम्बुक उवाच-असकृद्यतितो ह्येप हन्तुं व्याघ्र वने त्वया । युवा वै जवसंपन्नो बुद्धिशाली न शक्यते ॥ २८ ॥ मूपिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम् अथैनं भक्षितैः पादैाघो गृह्णातु वै ततः ॥ २९ ॥ ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः । जम्बुकस्य तु तद्वाक्यं तथा चक्रुः समाहिताः ॥ ३०॥ मूपिकाभक्षितः पार्दैम॒गं व्याघोऽवधीत्तदा । दृष्ट्वाचेष्टमानं तु भूमो मृगकलेवरम् स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वो रक्षामीत्याह जम्बुकः ॥ ३१ ॥ शृगालवचनात्तेऽपि गताः सर्वे नदी ततः स चिन्तापरमो तस्थौ तत्रैव जम्बुकः भूत्वा ॥ ३२ ॥ अथाजगाम पूर्व तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम् ॥ ३३ ॥ चारा एक सयार वन में रहता था । उसका बैठकर इसका मास खायगे । सयार की यह सलाह वृत्तान्त मैं आपसे कहता हू, सुनिए । किसी समय मुनकर उसी तरह सर काम करना मित्रों ने म्चीकार एक म्वार्थपण्डित सयार ने एक व्याघ, एक चूहा, कर लिया। चूहे ने सब से पहरे जाकर मृग के एक भेडिया आर एक न्योले के साथ मित्रता की पैरों को ग्वालिया। फिर व्याघ्र ने जाकर उसे और वह उन चारों के साथ इन में रहने लगा। मार डारा । तब सयार ने उम मृग का मृतकशरीर एक दिन उनके स्थान के निकट एक हिरण चरता धरती पर पड़ा देखकर सब स कहा-तुम सर पहले हुआ चला आया । उसको दबकर सयार उसको स्नान कर आओ, फिर भोजन करना । म मृग के पकड़ने की अपनी समर्थ न देखर यार से बोला गरीर की रक्षा करता हु ||३१|| हे व्या7 । आपने इम चतुर और नवान हिग्न को व्याघ्र आदि सय मित्र, सियार के कहने मे, नदी मारन का कई बार उपाय किया परन्तु आप इस म स्नान करने गये । सयार वहीं टहरकर चिन्ता कमी न मार सके । यदि हमारा मित्र नृह। नार करन रगा । महायरी व्याघ्र मवम पहरे नहार हिरन के पैरों को काटकर उसे रगड़ा कर दे तो आप रोट आया। मियार का चिन्ना से व्याकुर देखकर अवश्य इस पड रें। फिर हम मर आनन्द में व्याघ्र ने पूछा-हे मियार ' तुम हम सब से बरार raniririrararrrrr.ruarrrrrrrs cococcccccsc.Cococcwe Jro महा भारत [ आदिपर्व 7000700c.cooo व्याघ्र उवाच-किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः । अशिवा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम् ॥ ३४ ॥ जम्युरु याव-शृणु मे त्वं महाबाहो यद्वाक्यं मूपिकोऽब्रवीत् । धिग्वलं मृगराजस्य मयाऽद्याऽयं मृगो हतः ॥ ३५॥ मदाहुवलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति गर्जमानस्य तस्यैवमतो भक्ष्यं न रोचये ॥३६ ॥ व्याघ्र उवाच-वीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मिन्प्रबोधितः स्ववाहुबलमाश्रित्य हनिप्येऽहं वनचरान् खादिप्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितो वनम् ॥ ३७॥ एतस्मिन्नेव काले तु मूपिकोऽप्याजगाम ह तमागतमभिप्रेक्ष्य शृगालोऽप्यनवीद्वचः ॥ ३८॥ जम्युफ उवाच-शृणु मूपिकं भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत् । मृगमांसं न खादेयं गर मेतन्न रोचते ॥ ३९ ॥ मूपिकं भक्षयिष्यामि तद्भवाननुमन्यताम् तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम् ॥ ४० ॥ ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप । बुद्धिमान् होकर भी इस समय क्यों सोच में पडे वन के रहने वाले जीवों को मारूगा और वही मास हुए हो ' अभी इस मृग का मास खाकर हम सब खाऊगा । यह कहकर व्यार तो चला गया, इसी मित्र आनन्द मनावगे । सियार ने कहा-हे महानुज! बीच में चूहा लौटकर आया । उसे देखकर सियार चूहे ने अभी जो मुझ से कहा है वह मै तुमसे कहता ने कहा-हे मित्र चूहे । तुम्हारा कल्याण हो । मुझसे हू, सुनो । उसने कहा है कि आज मैंने ही इस अभी नयोरा जो कह गया है वह मै तुमसे कहता मृग को मारा है । व्याघ्र के बल को धिक्कार है । वे ह, सुनो । उसने कहा कि व्याघ ने इस मृग को मेरे भुज-बल से आज अपना पेट भरेंगे ! हे मित्र | मारा है । उसके दातों का विष इस मृग के मास व्याघ ! चूहे के ये अहकार से भरे वचन जब से | में भिद गया है । इससे मै यह मास कदापि न मैने सुने है तब से इस मृग का मास खाने की रुचि खाऊगा । यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मै चूहे को मुझे नहीं रही ॥३२॥३६॥ खाकर अपना पेट भर लू सयार की यह बात व्यापू ने कहा चूहे की ये बातें सुनकर आज सुनकर डर के मारे ग बिल में घुस गया||३७१४०॥ मुझे चेत हुआ । आज से मै अपने हाथ के बल से हे राजन् ! इसके पश्चात् भेड़िया स्नान करके - - Horosrricrore अध्याय १४२ ] महा भारत ६९७ oraemorroreoooooooooooooooooooooo तमागतमिदं वाक्यमनवीजम्बुकस्तदा मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति । सकलनस्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् ॥ ४२ ॥ एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ततोऽवल्लुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः ॥४३॥ एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्याजगाम ह तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको बने ॥४४॥ स्ववाहुवलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः मम दत्वा नियुद्धं त्वं भुड्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् ॥ ४५ ॥ नकुल याच-मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूपिकः निर्जिता यत्वया वीरास्तस्माद्वीरतरो भशन् । न त्वयाऽप्युस्सहे योद्भुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत्॥ ४६ ।। पणिक उवाच-एवं तेषु प्रयातेपु जम्बुको हृष्टमानमः खादति स्म तदा मांसमेकः सन्मन्त्रनिश्चयात् ।। ४७ ॥ एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधत भूपतिः भयेन भेदयेद्भीरुं शूरमंजलिकर्मणा ॥४८॥ आया । उससे सयार ने कहा--आज व्याधू तुमपर ये सब वीर जब तुम से हार गये तब मैं तुमसे लड़ना बहुत अप्रसन्न है । यहा ठहरना तुम्हारे लिये अच्च नहीं चाहता । इतना कहकर न्यारा भाग गया। नहीं । वह अपनी स्त्री को साथ लेकर यहा आ रहा कणिक कहते है-हे कुरुनन्दन ! इस प्रकार बुद्धि है। जैसा उचित हो वैसा करो। मास के भक्षण के बल से व्या, भेड़िये, चूहे और नयोले को करनेवाल। भेड़िया सयार की यह पात मुनकरके भगाकर गीदड ने प्रसन्नचित होकर अकेले मास ही अपनी जाति के म्यभार के अनुमार शरीर को सकोड़ कर भागा। हे महाराज ! उसके पीछे न्योल राजा रोग सदा ऐसा यवहार करने से सुग्वी के वहा आने पर मयार उससे बोला मैने अपने हो सकते हैं । इसी तरह कायर को भय दिखाकर हाथों के घर से -पार, भेड़िये आदि को हराकर अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये। हे महागज , भगा दिया है। तुम भा मुझ से रहार मुझे हराकर यह सर वृतान्त आपको सुना दिया है। अब और मनमाना मास खाओ ॥११॥४५॥ कुछ नीति के मिद्धान्त रहता ह, सुनिछ । पुन, न्योल ने कहा भड़िया और बुद्धिमान् चूहा, मित्र, भाई, पिना या गुर यदि ना करें तो हित खाया ॥६४७|| - -Anar" irrorirrorrrrrrrrrrrr महा मारत [ आदिपर्व 70Koccoom0000/cococcoronoco -- - । cococcicorcacscore लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तौजसा एवं ते कथितं राजशृणु चाप्यपरं तथा ॥ १९॥ पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः। रिपुस्थानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ ५० ॥ शपथेनाप्यरिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन उभौ चेत्संशयोपेतौ श्रद्धाबांस्तत्र वर्धते गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ॥ ५२ ॥ उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् । क्रुन्द्रोऽप्यक्रुद्धरूपः स्यास्मितपूर्वाभिभापिता ॥ ५३ ॥ न चाप्यन्यमपध्वंसेकदाचित्कोपसंयुतः प्रहरिष्यन्प्रियं ब्रूयात्प्रहरन्नपि भारत प्रहृत्य च कृपायीत शोचेत च रुदेत च आश्वासयेच्चापि परं सान्त्वधर्मार्थवृत्तिभिः ॥ ५५॥ अथास्य प्रहरेत्काले यदा विचलिते पथि अपि घोरापराधस्य धर्ममाश्रित्य तिष्ठतः स हि प्रच्छाद्यते दोषः शैलो मेघैरिवासितैः । यः स्यादनुप्राप्तवधस्तस्यागारं प्रदीपयेत् चाहनेवालों को उनका नष्ट करना उचित है । भी कर्तव्य और अकर्तव्य को न जानकर खोटे सौगन्ध खाकर, धन देकर, विष दिलार या माया | रास्ते मे जानेवाला और अहंकारी हो तो उसे भी का जाल फैलाकर, जिस तरह हो सके, शत्रु को मार दण्ड देना उचित है । राजा को क्रोध की अवस्था में डालना ही नीति है । अवसर पाकर उसे छोड़ देना भी प्रसन्न रूप ही रहना चाहिये, वह हस-हसार ठीक नहीं ॥१८५१॥ बात करे, मन में क्रोध रहने पर भी निन्दा न करे । परम्पर शत्रुता रखनेवाले दोनों पक्ष यदि सहाय, साधन, | अपना वार करते समय या उसके पहले भी प्रिय उपाय आदि में बराबर हों, तो दोनों में से जो मेरी ही बोले ॥२२॥५४॥ कही हुई इस नीति को मानकर चलेगा वही बढकर मारकर अन्त में कृा दिखाने, शोक प्रकट करे दूसरे को दया सकेगा। यदि बड़ा और मान्य पुरुष । ओर रो भी दे । शत्रु को शान्त वचनों से अपना orrorarorreirrorircromorrorrrrore - " ००० अध्याय १४२ ] महा भारत boscos अधनान्नास्तिकांश्चौरान्विपये स्वे न वासयेत् । प्रत्युत्थानासनाद्येन संप्रदानेन केनचित् ॥ ५८॥ प्रतिविश्रब्धघाती स्यात्तीक्ष्णदंष्ट्रो निमग्नकः । अशङ्कितेभ्यः शङ्कत शङ्कितेभ्यश्च सर्वशः ॥ ५९ ॥ अशङ्कयाद्भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नाऽतिविश्वसेत् ॥ ६० ॥ विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति चारः सुविहितः कार्य आत्मनश्च परस्य वा ॥ ६१ ॥ पापण्डांस्तापसादींश्च पररानेषु योजयेत् उद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ ६३ ॥ समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत् वाचा भृशं विनीतः स्यादृदेयन तथा क्षुरः स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात्सृष्टो रौद्रेण कर्मणा । अञ्जलिः शपथ-सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् ॥६५॥ विश्वास दिलावे और जब उसे मार्ग से विमुख देख भी विश्वास नहीं करना चाहिये । क्योंकि विश्वासी उसी समय में अपना प्रहार करे। बड़ा अपराध करने की काटी हुई जड़ ही नहीं होती है। अपने लोगों पर धर्ममार्ग पर चरनेवाले राजा का वह दोष इम का और शत्रुओं का हार जानने के लिये उत्तम प्रकार से छिर जाता है जैसे काली घटाओं से पहाड़ चतुर दूतों का रखना भी राजा का सब से पहला नहीं दीखते है । राजा को उचित है कि शत्रु को काम है । वे दूत चाहे अपने हों अथवा पराये बिना मारकर उसके घर को भी जला दे और अधम नास्तिक परीक्षा लिये न रखने चाहिए ॥६०।६१॥ और चोरों को अपने राज्य में न रहने दे । आये दूसरों के राज्य में पाखण्डी, तपम्बी आदि के हुए शत्रु का बड़ा आदर करे, बैठने के लिये आमन वेप में घूमनेवाले दूतों को रखना चाहिये । बागों में, दे ओर यदि धन देने की आवश्यकता हा तो धन क्रीडास्थानों में, देव मन्दिरों में, मदिरा पीने के भी दे दे । जब उसको पूरा पूरा विश्वास हो जावे स्थानों म, राह में, तीर्थ स्थानों में, जगरों में, सर्व तब समय पाकर वार कर दे ॥५५॥५०॥ साधारण के लिये बने हुए चबूतरों पर, कुओं पर, राजा को विश्वासी और विश्वासघाती किसी का पहाड़ों पर, नदियों पर और जहा-जहा मनुष्य इकडे 1 ---- 7.mp3AJrvehrar •zrCor ७०० महा भारत [ आदिपर्व cond Hosco5000.0 0000cons - cacies आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता सपुष्पितः स्यादफलः फलवान्स्यादुरारुहः आमः स्यात्पक्कसंकाशो न च जीर्येत कर्हिचित् । त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धास्तथैव च ॥६७॥ अनुवन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत् । धर्म विचरतः पीडा सापि, द्वाभ्यां नियच्छति ॥ ६८ ॥ अर्थ चाप्यर्थलब्धस्य कामस्यातिप्रवर्तिनः अगर्वितारमा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता ॥ ६९ ॥ अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा मन्त्रयीत द्विजैः सह । कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च ॥ ७० ॥ उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थों धर्ममाचरेत् न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति यस्य बुद्धिः परिभवेत्तमतीतेन सान्त्वयेत् ॥ ७२ ।। होते हों उन सब स्थानों में विचार कर नियत करना बात है परन्तु राजा को उचित है कि फल को तो चाहिये ॥६२।६४॥ शुभ जान और पीड़ा को छोड़ दे ॥६५।६८॥ राजा को सब से नम्रता के साथ और हंसकर धर्मात्मा अर्थी और कामी इन्हीं तीनों को पीड़ा बोलना उचित है परन्तु हृदय में कठोरता रखे और होती है । इसी तरह अर्थलोभी का चित्त धर्म और. समय आने पर भयंकर काम भी कर डाले । अपनी काम के विचार से चञ्चल होता है और कामासक्त भलाई के रिपे हाथ जोड़कर, सौगन्ध खाकर, विनय का चित्त धर्म और अर्थ के ख्याल से डांवाडोल करके, पैरों पर सिर रखकर, आशा देकर शत्रु से होता है । राजा को उचि। है कि सलाह ऐसे ब्राह्मणों काम निकालना चाहिये। फिर अवसर पाकर उसका | के साथ करे जो घमण्डी न हो शान्त स्वभाव और सर्वनाश कर डाले । अच्छीतरह फूलकर भी फल शुद्धात्मा होवे । दीन आत्मा का उद्धार कठिन अथवा से हीन रहे अर्थात् प्रसन्न होकर भी कुछ दे नहीं। | सुलभ उपायों से जैसे हो सके करे और समर्थ होने वृक्ष की तरह फलकर भी दुरारोह बना रहे कि पर धर्म का आचरण करे । मनुप्य को अपना कोई उसपर हमला न कर सके । निबल होने पर कल्याणकारी मार्ग उस समय तक नहीं देखता है भी सबल ऐसा अपन को दिखावे । क्मी हताश न जब तक उसपर कोई संक्ट नहीं पड़ता ।।६९/७१॥ हो । धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में तीन प्रकार सकट पड़ने पर जो उससे बचता है तो उसको की पीड़ा होती है और तीनों के फलों में भी वही उसका यथावत् ज्ञान हो जाता है । जिस मनुष्य । SOD05/- cira rolco/050001Poonam007070 - Jesca अध्याय १४२ ] महा भारत 7215 yearedera अनागतेन दुर्बुद्धिः प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् । योऽरिणा सह संधाय शयीत कृतकृत्यवत् ॥७३॥ स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिवुध्यते ।. मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता ॥७४ ॥ आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः नाच्छित्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्मदारुणम् ॥७५ ॥ नाहत्वा मत्स्य घातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् । कर्शितं व्याधितं क्लीवमपानीयमघासकम् ॥७६॥ परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेवलम् । नाऽर्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति संगतम् ॥ ७७ ॥ तस्मात्सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् । संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योऽनसूयता उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भृतिमिच्छता । नास्य कृत्यानि बुद्धयरन्मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ७९ ॥ की बुद्धि शोक से भ्रष्ट हो जाय उसे नल, राम आदि । नहीं मिलती है । शत्रु की सेना जब थकी हुई हो, के उदाहरण देकर समझाना चाहिये । जिसकी बुद्धि कमर पड़ गई हो, किमी सक्रामक रोग के फैलने रोम आदि के द्वारा बिगड़ गई हो उसे आशा देकर से पीड़ित हो, भूखी और प्यासी हो, या किसी कि आंग किसी समय तुम्हारा भरा होगा सन्तुष्ट प्रकार का विश्वास दिलाने से असावधान हो गई करना चाहिये । जो पटित हो उसको धन आदि हो, तब उसपर धागा करके उसे नष्ट कर दे। अर्थ के द्वारा सन्तुष्ट करना चाहिये । जो मनुष्य शत्रु की कामना रखने वाले दो पुरप कभी आपम में से मिगप करके निशक रहता है उमकी गनि मित्र नहीं हो सकते। कोई किसी के काम को ऐमी है जमे वृक्ष पर मोनेवारा मनुष्य नीचे गिरने पूरा कभी न करे अपने हाथ में भी कुछ अवश्य पर जगता है। अपन मन्त्र को कभी किसी से कहना रहने दे। शत्रु को वश अथा नष्ट करने के लिये योग्य नहीं है । अपने दूतों से दृमरों की पर तो कोई उपाय उटा न रम्यना चाहिये । साम, दान, रेता रहे, किन्तु औरों के दूतों से अपने उदय के भेद, दण्ड आदि का प्रयोग करके अपने मन की प्रोध और प्रसन्नता आदि मावों को छिपाये रहे नेष्टा करनी चाहिये । ऐश्वर्य चादनेवाल राजाको ॥७२७५॥ चाहिये कि मस्या छोड़ार यापूर्वक महाय, माधन, शत्रु के मर्मों को पिना काटे और बिना दारण उपाय आदि का गाद और समय पार युद्ध कर। कर्म किय मनुष्य को मरम्यघाती म्हग २६मा हम काम में बड़ा उरमाही और तगा रहे । राजा - - । Jricorn महाभारत [ आदिपर्व coco/ 000colorocaroo । pecieschememore । .. । आरब्धान्येव पश्येरन्सुपर्यवसितान्यपि भीतवत्संविधातव्यं यावद्भयमनागतम् आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् दण्डेनोपनतं, शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः ॥ ८१॥ स मृत्युमुपगृह्णीयाद्दर्भमश्वतरी यथा अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्य पुरः स्थितम् ॥ ८२॥ . न तु बुद्धिक्षयात्किंचिदतिकामेत्प्रयोजनम् । उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः नैःश्रेयसौ तु तो ज्ञेयो देशकालाविति स्थितिः ॥ ८४ ॥ तालवत्कुरुते मूलं वालः शत्रुरुपेक्षितः गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान् ॥ ८५॥ अग्निं स्तोकमिवाऽऽत्मानं संधुक्षयति यो नरः । स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम् ॥८६॥ आशां कालवती दद्यात्कालं विघ्नेन योजयेत् । विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वापि हेतुतः ॥ ८७ ॥ को ऐसा उपाय करना चाहिये कि शत्रु और मित्र गजा को हर काम का उत्साह देश, काल और भाग्य भी उसके दिल के भाव को न जान सके । राजा को विचारकर यत्नपूर्वक करना उचित है ॥७६।८३॥ जिस काम में हाथ डाले वह पूरा होने पर ही प्रकट पूर्वसञ्चित कर्म, धर्म, अर्थ और काम को भी होना चाहिये । यदि किसी प्रकार की आपत्ति देश काल के अनुसार सफल और सम्पन्न करना आनेवाली हो तो उसके दूर करने का पहिले से ही चाहिये । देश और काल को देखकर काम करने से यत्न करना चाहिये । जब आपत्ति आ जाय तब ही सफलता और कल्याण होता है । जो मनुष्य निडर होकर उसका सामना करे । जो मनुष्य दण्ड शत्रु को छोटा जानकर छोड़ देता है उसके दुख से वश किये हुए शत्रु पर अनुग्रह करता है वह उसी | की जड़ें ताल के वृक्ष के समान बड़ी बड़ी हो जाती प्रकार से पचत्व को प्राप्त हो जाता है जैसे खच्चर हैं। वह इस प्रकार से नाश हो जाता है जैसे छोटी गर्भ धारण करके मर जाती है । जो काम आगे , सी चिनगारी से सब जङ्गल का जङ्गल भम्म हो जाता करना हो उसको पहले से विचार ले और बुद्धि से । है । जो राजा सहाय, साधन आदि के द्वारा अपने बिना विचारे कोई काम न करे । ऐश्वर्य चाहनेवाले । को बढ़ाता रहता है वह बड़े से बड़े सबल शत्रु और . । 02Rescoroconscoconoripoorn ७०३ Cirs । roscacies अध्याय १४२ ] महाभारत revermaconoreomorroron क्षुरो भूत्वा हरेत्प्राणान्निशितः कालसाधनः प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः ॥८८॥ पाण्डवेषु यथान्यायमन्येषु च कुरूद्वह वर्तमानो न मजेस्त्वं तथा कृत्यं समाचर सर्वकल्याणसंपन्नो विशिष्ट इति निश्चयः तस्मात्त्वं पाण्डुपुत्रेभ्यो रक्षाऽऽत्मानं नराधिप ॥ ९ ॥ भ्रातृभ्यो बलिनो यस्मात्पाण्डुपुत्रा नराधिप । ब्रवीमि तस्माद्विस्पष्टं यत्कर्तव्यमरिन्दम सपुत्रः शृणु तद्राजश्रुत्वा च भव यत्नवान् यथा भयं न पाण्डुभ्यस्तथा कुरु नराधिप पश्चात्तापो यथा न स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ९२ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा संप्रतस्थे कणिकः स्वगृहं गतः धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्यः शोकातः समपद्यत ॥ ९३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि कणि नाक्ये द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४ ॥ समाप्रश्न सभवपर्न । अथ जतुगृहपर्व । उसके सहायकों को चौपट कर सकता है। शत्र को रहा है, आप प्रधान राजा समझे जाते है। पाण्डवों देना भी न चाहिय, केवल आशा ही पर रक्खे । से आप अपनी अपने ऐश्वर्य की रक्षा कीजिए। बहुत दिनों का वायदा कर दे और पायदे का समय हे शत्रुओं के नाश करनेवाले महाराज ! आपके आने पर बहाना कर दे और अपना समय देखता भतीजे बड़े बरी हैं। वही काम कीजिए जिसमें रहे । समय आने पर भी न चुके शत्रु को अवश्य पछि किसी विपत्ति का सामना न हो । वैशम्पायन मार डारे । इमसे हे राजा धृतराष्ट्र ! पाण्डवों और जी बोले-हे राजा जनमेजय ! कणिक धृतराष्ट से अय राजाओं के साथ इमी न्याय से व्यवहार ऐसा कहकर अपने घर को चला गया। उसकी करते हुए आप यही कानिए जिममें पोछ पश्चाताप बातें सुनकर धृतराष्ट्र को यही चिता हो गई न करना पड़े ॥८४१८८॥ १८०१०३॥ आप इस समय सब प्रकार से अभ्युदय हो आन्पिर्य याय मो याराम अध्याय ममाप्त हुआ। ---.
Zoololoc.comcmcom/col । । महा भारत [ आदिपच ma अथ त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४३ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः सुबलपुत्रस्तु - राजा दुर्योधनश्च ह दुःशासनश्च कर्णश्च दुष्टं मंत्रममन्त्रयन् ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम् दहने तु सपुत्रायाः कुन्त्या बुद्धिमकारयन् ॥ २ ॥ तेपामिङ्गितभावज्ञो विदुरस्तत्त्वदर्शिवान् आकारेण च तं मंत्रं बुबुधे दुष्टचेतसाम् ततो विदितवेद्यात्मा पाण्डवानां हिने रतः । पलायने मतिं चके कुन्त्याः पुत्रैः सहानघः ॥ ४ ॥ ततो वातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् । अमिक्षमा दृढां कृत्वा कुन्तीमिदमुवाच ह ॥ ५ ॥ विदुर उवाच-एप जातः कुलस्यास्य कीर्तिवंशप्रणाशनः धृतराष्ट्रः परीतात्मा धर्म त्यजति शाश्वतम् ॥ ६ ॥ इयं वारिपथे युक्ता तरङ्गपवनक्षमा नौर्यया मृत्युपाशात्वं सपुत्रा मोक्ष्यसे शुभे ॥ ७ ॥ वैशम्पायन उवाच-तच्छ्रुत्वा व्यथिता कुन्ती पुत्रैः सह यशस्विनी । नावमारुह्य गङ्गायां प्रययौ भरतर्षभ एक सौ तेतालीस अध्याय .॥ १४३ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! अनन्तर से ऐसी एक बड़ी दृढ़ नार जो वायु के वेग और सुवल-पुत्र शकुनि, राजा दुर्योधन, दु शासन और | पानी की लहरों को सह सके लहर सहित बनवाई कर्ण इन चारों ने मिलकर यह सलाह की कि कुन्ती ॥१५॥ और पाण्डवों को आग में जलाकर मार डालना फिर विदुर ने कुन्ती से कहा-हे कुन्ती । ये चाहिये । इसकी सूचना धृतराष्ट्र को भी दे दी। धृतराष्ट्र इस कुल की कीर्ति और वंश को नष्ट करने इन दुष्टात्माओं का इशारा और अभिप्राय समझने पर उतारू है। इनकी बुद्धि उल्टी हो गई है, इसीसे वाले तत्त्वदर्शी विदुर आंखों की सैनत आदि चिहीं ये शाश्वतधर्म को छोड़ने के लिये तैय्यार है। चाहे से उस इरादे को समझ गये ! तब उन्होंने विचारा जो कुछ हो, मैने रहर और हवा के वेग को सहने कि कुन्ती अपने पुत्रों को लेकर यहां से भाग जाय; वाली यह नाव बनाकर जल में छोड़ दी है, इसी पर यही उनके लिये अच्छा होगा । विदुर ने गुप्त रूप तुम अपने पुत्री के साथ बैठकर, प्राणों की रक्षा के :00-10airs Proccoraron अध्याय १४३ ] महाभारत ७०५ 905csrore 0050000000000 Jc7-JJ ततो विदुरवाक्येन नावं विक्षिप्य पाण्डवाः धनं चादाय तैर्दत्तमरिष्टं प्राविशन्वनम् निपादी पञ्चपुत्रा तु जातुपे तत्र वेश्मनि । कारणाभ्यागता दग्धा सह पुत्रैरनागसा ॥१०॥ स च म्लेच्छाधमः पापो दग्धस्तत्र पुरोचनः । वञ्चिताश्च दुरात्मानो धार्तराष्ट्राः सहानुगाः अविज्ञाता महात्मानो जनानामक्षतास्तथा जनन्या सह कौन्तेया मुक्ता विदुरमन्त्रिताः ॥ १२ ॥ ततस्तस्मिन्पुरे लोका नगरे वारणावते दृष्ट्वा जतुगृहं दग्धमन्वशोचन्त दुःखिताः ॥ १३ ॥ राज्ञे च प्रेपयामासुर्यथावृत्तं निवेदितुम् संवृत्ताते महान्कामः पाण्डवान्दग्धवानसि ॥ १४ ॥ सकामो भव कौरव्य भुक्ष्व राज्यं सपुत्रकः । तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रम्तु सह पुत्रेण शोचयन् ॥ १५ ॥ प्रेतकार्याणि च तथा चकार सह वान्धवैः । पाण्डवानां तथा क्षत्ता भीमश्च कुरुसत्तमः ॥ १६ ॥ रिये, यहा से चले जाओ ॥६॥७॥ घर में जरकर मर गई ॥८॥१०॥ हे भारत । श्रेष्ठ यशस्विनी कुन्ती यह बात सुनकर वह म्लेच्छ से भी अधम पापात्मा पुरोचन भी जो पुत्रों सहित दुखी हुई और उसी नाव पर चढकर जराने के लिये नियुक्त हुआ था वह भी जलकर के घर से जरने से रचकर गगा जी के पार भन्म हो गया। इस प्रकार विदुर की सम्मति के होकर पुत्रों सहित चरी गई। अय विदुर की आज्ञा अनुमार, अनुचरों-सहित धृतराष्ट्र के पुत्रों का धोम्वा के अनुमार पाण्डवों ने उस नाव को छेड़ दिया देकर, महात्मा पाण्डव और उनकी माता कुन्ती और धन को साथ रिय हुए वे निर्मित रूप से वन मृत्यु के मुह से बच गई । वारणारन नगर के रोग में पहुच गये । इधर एक निपाद कीत्री अपने जतुगृह को जल्ने देवार दुखी चिच से नोक पानों पुत्रों को रिय हुए दैवयोग मे उमी, युन्ती. प्रष्ट करने रंगे ॥११॥१३॥ सहित पण्डयों को जराने के रिये, दुर्योधन के उन्होंने दून के द्वारा धृतराष्ट्र के पाम कहला रनवाय राम के घर में आकर साई थी। वह भेजा कि हे राजन् ! आपका मनोरथ सिद्ध हो गया। निदोर निगाद की मी अपने पुत्रों के माय उमी आपने पाण्डयों को आग में जरकार मरवा हारा। राख curre/E-51 महा मारत [ आदिपर्व JNcork.scoo00.000001-Joscomro - जनमेजय उवाच-पुनर्विस्तरशः श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १७ ॥ सुनृशंसमिदं कर्म तेषां क्रूरोपसहितम् कीर्तयस्व यथावृत्तं परं कौतूहलं मम पैदाम्पायन उवाच-शृणु विस्तरशो राजन्वदतो मे परंतप दाहं जतुगृहस्यैतत्पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १९ ॥ प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम् दुर्योधनो लक्षयित्वा पर्यतप्यत दुर्मनाः ॥ २०॥ ततो वैकर्तनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । अनकैरभ्युपायैस्ते जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ॥ २१ ॥ पाण्डवा अपि तत्सर्वं प्रतिचक्रुर्यथागतम् उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ॥ २२ ॥ गुणैः समुदितान्दृष्ट्वा पौराः पाण्डुसुतास्तदा । कथयाश्चक्रिरे तेषां गुणान्संसत्सु भारत ॥ २३ ॥ राज्यप्राप्तिं च संप्राप्तं ज्येष्टं पाण्डुसुतं तदा'। कथयन्ति स्म संभूय चत्वरेषु सभासु च ॥ २४ ॥ आपकी इच्छा पूरी हो गई । अब पुत्र के साथ विस्तार के साथ कहता हू, सुनिए । दुष्टबुद्धि निष्कण्टक राज्य करो । यह सुनकर धृतर ष्ट्र ने दुर्योधन भीमसेन को अत्यन्त बलवान् और अर्जुन पुत्री-सहित पाण्डवों का बड़ा शोच किया। फिर को सम्पूर्ण अस्र विद्या में निपुण हुआ देखकर भीष्म, विदुर और अन्यान्य भाई बन्धुओं के साथ अपार सन्ताप से जलने लगा। आगे सूर्य के पुत्र कुन्ती और पाण्डवों की प्रेत क्रिया की ॥१४॥१६॥ कर्ण और सुबलकुमार शकुनि तरह-तरह के उपायों जनमंजय ने कहा-हे महाराज ! मै राख के घर से पाण्डवों के प्राण लेने की चेष्टा करने लगे । जब के जलने और पाण्डवों के वचने की कथा विस्त र- | कोई विपत्ति आ पड़ती थी तब पाण्डव लोग भी पूर्वक सुनना चाहता हू । धृतराष्ट्र आदि ने यह क्रूर उसमे बचने का उपाय कर लेने थे । वे विदुर के कर्म क्यों किया । मुझको इम में बड़ा आश्चर्य मत के अनुसार, दुर्योधन आदि की करतूतों को होता है ॥१७॥१८॥ प्रकट नहीं करते थे ॥१९॥२२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! लाख के घर के हे भारत ! पाण्डवों में अनेक प्रकार के गुण जलने और उससे पाण्डवों के बचने का वृत्तान्त मै देखकर नगर के रहनेवाले रोग सब प्रकार की Mor- ७०७ 200c05/2011000 50.00000con co०04 । sciesimove अध्याय १४३ ] . महा भारत are Orica wipron प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वाद्धृतराष्ट्रो जनेश्वरः राज्यं न प्राप्तवान्पूर्व स कथं नृपतिर्भवेत् ॥ २५ ॥ तथा शान्तनवो भीष्मः सत्यसन्धो महानतः । प्रत्याख्याय पुरा राज्यं न स जातु ग्रहीष्यति ॥ २६ ॥ ते वयं पाण्डवज्येष्ठं तरुणं वृद्धशीलिनम् अभ्यपिंचाम साध्वद्य सत्यकारुण्यवेदिनम् ॥ २७॥ स हि भीष्मं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च धर्मवित् । सपुत्रं विविधौगैर्योजयिष्यति पूजयन् ॥ २८ ।। तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि जल्पताम् । युधिष्ठिरानुरक्तानां पर्यंतप्यत दुर्मतिः ॥ २९ ॥ स तप्यमानो दुष्टात्मा तेषां वाचो न चक्षमे । ईग्रंया चापि संतप्तो धृतराष्ट्रमुपागमत् ॥ ३०॥ ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः पौरानुरागसंतप्तः पश्चादिदमभाषत दुर्योधन उपाच-श्रुत्वा मे जल्पतां तात पौराणाराशिवा गिरः । स्वामनाहत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम् ॥ ३२ ॥ समाजों में उनके गुणों का कीर्तन करने लगे। पाण्डु-पुत्र युधिष्ठिर को अपना राजा बनावें ॥२३।२५।। सभा-समाजों में और चौगहों पर जमा होकर सब वह धर्मात्मा युधिष्ठिर शान्तनु पुत्र भीष्म धृतराष्ट्र रोग "युधिष्ठिर महाराज पाण्ड के बड़े पुत्र है; इस और दुर्योधन आदि का यथोचित सेवा-सत्कार कारण वही वास्तव में राजगद्दी के अधिकारी है" करते हुए उन्हें तरह-तरह की भोग की सामग्रियां इम विषय पर कोलाहल करने लगे । वे कहने । देकर सतुष्ट रक्खेंगे । युधिष्ठिर के बारे में प्रजा की लगे कि प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र को, अन्धे यह बातचीत सुनार दुर्योधन को बड़ा क्रोध और होने के कारण, पहले राज्य नही मिला । इसी दुख हुमा । वह चिन्ता से मन ही मन में जलने कारण अब ये किमतरह राजा हो सकत है। लगा। दुष्ट विचारवाला दुर्योधन सन्ताप के मारे और सत्यशील महावन शान्तनु-पुत्र भीम ने पहले लोगों की ऐसी बातों को सुन न सकता था । इर्पा राज्य त्याग दिया था। वे अब उमे ग्रहण ही नहीं से जलता हुआ वह एक दिन धृतराष्ट्र के पास कर सकते । इमसे आभो हम सब मिलकर पहुंना ॥२६॥३०॥ नवयुवक, युद्धकुशल, सत्यानुरागी, दयालु, वेदज्ञ, यहा और किसी को न देखकर वह धृतराष्ट्र . 1 । Hr3/rDnsror- ७०८, पहा भारत [ आदिपर्व -~-05000070.00035cmro oscosezos मतमेतच भीष्मस्य न स राज्यं बुभुक्षति अम्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनः पितृतः प्राप्तवान्राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा -स्वमन्धगुणसंयोगात्प्राप्तं राज्यं न लब्धवान् ॥ ३४ ॥ स एप पाण्डोदयायं यदि. प्राप्नोति पाण्डवः । तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्यापि चापरः ॥ ३५ ॥ ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३७॥ यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान् । ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनेायां त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४३ ॥ को प्रणाम करके, युधिष्ठिर पर प्रजा के प्रेम से होने यदि पाण्डु के पुत्र उनके उत्तराधिकारी होने के वाले अपने दुःख का हाल कहने लगा है पिताजी ! कारण राज्य पायेंगे तो फिर उनके पुत्र पौत्र ही राज्य मैने कोलाहल करनेवाले पुरवासियों से अशुभ बातें | पाते रहेंगे । हे महाराज ! ऐसा होने से हम सब सुनी हैं । उन्होंने आपका और भीष्म का अनादर | राजवंश से हीन होने के कारण पुत्रों सहित बड़े करके पाण्डवों को ही अपना राजा बनाने का विचार | दीन हो जाएंगे । राजा न होने से हमारा कोई किया है। भीम जी का भी यही मत है क्योंकि आदर न करेगा। अब आप कोई ऐसा उपाय कीजिए, उन्होंने तो राज्य छोड़ ही दिया है । पुरवासी | जिससे हमको पराये दिये अन्न से पलकर कष्ट न कहते है कि अपने गुणों की अधिकता से राजा | भोगना पड़े । हे राजन् । यदि पहिले आप राज्य पाण्डु को पहले राज्य मिला था। केवल अन्धे होने पाते तो हम भी राजा होते । हम प्रजा के विपरीत के कारण आपको राज्य नहीं मिला ॥३१॥३४॥ होने पर भी राज्य अवश्य ले लेते ॥३५॥३८॥ आदिपर्व का एक सौ तेतालीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४४ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं श्रुत्वा तु पुत्रस्य प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः । कणिकस्य च वाक्यानि तानि श्रुत्वा स सर्वशः ॥ १ ॥ oncorrono . yoonycynydrocynunin अध्याय १४४ ] महाभारत ७०९ Hooooos colo.o 201000000cc000/ - scicsc-cocococc धृतराष्ट्रो द्विधाचित्तः शोकार्तः समपद्यत दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिः सौवलस्तथा दुःशासनचतुर्थास्ते मन्त्रयामासुरेकतः ततो दुर्योधनो राजा धृतराष्ट्रभभापत पाण्डवेभ्यो भयं नः स्यात्तान्विवासयतां भवान् । निपुणेनाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् धृतराष्ट्रस्तु पुत्रेण श्रुत्वा वचनमीरितम् मुहूर्तमिव संचिन्त्य दुर्योधनमथाब्रवीत् धृतराष्ट्र नान-धर्मनित्यः सदा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः सर्वेषु ज्ञातिपु तथा मयि वासीद्विशेषतः नासो किंचिद्विजानाति भोजनादि चिकीर्पितम् । निवेदयति नित्यं हि मम राज्यं धृतव्रतः तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः । गुणवानलोकविख्यातः पौरवाणां सुसंमतः सुसंमतः ॥ ८ ॥ स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाकर्तुं बलादितः पितृपैतामहाद्राज्यात्ससहायो विशेषतः एक सौ चवालीस अध्याय ॥ १४४ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे गजा जनमेजय प्रजाचक्षु होने के कारण से सब जाति के मनुष्यों का प्यारा राजा धृतराष्ट्र पुत्र की ये बातें सुनकर और कणिक था। मुझे भी उससे अत्यन्त प्रेम था। उसे भोजन, की कही हुई राजनीति को स्मरण करके सोच में वत्र आदि किसी सामग्री का लोम न था। यह कुछ पड़ गये । दुविधा में पड़कर वे कुछ भी निश्चय न नहीं जानता था । मेरा ही दिया हुआ खाता और कर सके । इसके पश्चात् दुर्योधन ने कर्ण, शकुनि पहनता था। उसने राज्य का सब काम मेरे ऊपर और दु शासन से सराह करके युक्तिपूर्वक राजा ही सौंप रक्सा था। अब उसके पुत्र भी उसके समान धृतराष्ट्र से कहा-आप किसी चतुर उपाय से पाण्डवों धर्मात्मा, गुणी, यशाम्बी और नगरवामियों के प्यारे को वारणावत में भेज दें। ऐसा करने में उनसे हुए है । उसके चारों भाई और सब प्रजा के रोग दमको फिर कोई भय नहीं रहेगा ॥१४॥ महायक हैं। मैं उप पाण्टु नन्दन युधिष्ठिर को पुत्र की यह बात सुनकर धृतराष्ट्र ने क्षणभर बरपूर्वक उसके यार-दाद के राज्य से क्स निकाल विनार करके दुर्योधन से कहा राजा पाण्टु धर्मात्मा बाहर कर सकता ह॥५०॥ 77242 महाभारत [ आदिपर्व comcomcoooomroorco%20correcorakoro ते भृता हि पाण्डुनामात्या वलं च सततं भृतम् । भृताः पुत्राश्च पोत्राश्च तेपामपि विशेषतः ॥ १०॥ पुरा सस्कृतास्तात पाण्डुना नागरा जनाः । कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सवान्धवान् ॥ ११ ॥ दुर्योधन उवाच-एवमेतन्मया तात भावितं दोपमात्मनि दृष्ट्वा प्रकृतयः सर्वा अर्थमानेन पूजिताः ॥ १२ ॥ ध्रुवमस्मत्सहायास्ते भविष्यति प्रधानतः अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते ॥ १३ ॥ स भवान्पाण्डवानाशु विवासयितुमर्हति मृदुनैवाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् यदा प्रतिष्ठितं राज्यं मयि राजन्भविष्यति । तदा कुन्ती सहापत्या पुनरेष्यति भारत धृतराष्ट्र उवाच-दुर्योधन ममाप्येतद्धृदि संपरिवर्तते अभिप्रायस्य पापत्वान्नैवं तु विवृणोम्यहम् ॥ १६ ॥ न च भीष्मो न च द्रोणो न च क्षत्ता न गौतमः । विवास्यमानान्कौन्तेयाननुमंस्यन्ति कर्हिचित् ॥ १७ ॥ महाराज पाण्टु अपने मन्त्री और सेना के रोगों लोग फिर उत्पात नहीं करेंगे और आपकी सहायता को सदा पालते और प्रसन्न रखते थे । मन्त्रियों और | करेंगे । इस समय मन्त्री मेरे ही कहे में है और सैनिकों के लड़के और बाले भी अबतक उससे खजाना भी मेरे ही हाथ में है । इस कारण आप पाये हुए धन और जीविका से फल रहे हैं । पाण्डु | पाण्डवों को वारणावत नगर में भेजने का शीघ्र उपाय ने नगरवासी आदि जिन लोगों का सरकार क्यिा | कीजिए । जब सब राज्य मेरे वश में हो जायगा तब है वे इस समय युधिष्ठिर के साथ बुरा बर्ताव करते | मै उसको कुन्ती सहित फिर बुलालगा ॥१०॥१५॥ देखकर अवश्य ही हमारे विरोधी बन जायगे । वे धृतराष्ट्र ने कहा-हे दुर्योधन ! तुम जो कह रहे हमको और हमारे बाधवों को, मारने के लिये क्यों | हो उस बारे में मै भी मन ही मन सोचता रहता है, न तैय्यार हो जायगे दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी । परन्तु इसको दुष्ट विचार समझार मैने आनतक आप जो कह रहे है सो ठीक है । सब खजाना मेरे | किसी के आगे प्रकट नहीं किया था । भीष्म, विदुर, ही पास है। मै धन आदि के द्वारा सब मन्त्री और | द्राणाचार्य, कृपाचार्य और कुरुवशी लोग जा हमारे पुरवासियों को अपने वश में कर लूगा । वे सब बड़े अथवा वरावर के है वह पाण्डवों का वहा जाना ००Porno70703402 अध्याय १४४ ] महाभारत ७११ .7090 oooooo .. . cicoice समा हि कौरवेयाणां वयं ते चैव. पुत्रक । नैते विषममिच्छेयुर्धर्मयुक्ता मनखिनः ॥१८॥ ते वयं कोरवेयाणामेतेषां च महात्मनाम् । कथं न वध्यतां तात गच्छेम जगतस्तथा ॥ १९ ॥ दुर्योधन उगाच-मध्यस्थः सततं भीष्मो द्रोणपुत्रो मयि स्थितः । यतः पुत्रस्ततो द्रोणो भविता नात्र संशयः ॥ २० ॥ कृपः शारद्वतश्चैव यत एतौ ततो भवेत् द्रोणं च भागिनेयं च न स त्यक्ष्यति कर्हि चित् ॥ २१ ॥ क्षत्तार्थवद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं संयतः परैः न चैकः स समर्थोऽस्मान्पाण्डवार्थेऽधिवाधितुम् ॥ २२ ॥ सुविश्रब्धः पाण्डुपुत्रान्सह मात्रा प्रवासय वारणावतमयैव यथा यान्ति तथा कुरु ॥ २३ ॥ विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम् । शोकपावकमुद्भूतं कर्मणेतेन नाशय इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनपरामर्श चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४४ ।। म्भीकार नहीं करेंगे । हे पुत्र ! कुरवशियों को तुम रहेंगे क्योंकि वे कभी मानजे अश्वत्थामा और द्रोण और पाण्डव दोनों समान हो इसमें सदेह नहीं है । को नहीं छोड़ सकते ॥२०॥२१॥ वे महानुभाव रोग दोनों में से किसी को कम और विदुर हमसे पलते है परन्तु वे छिपकर पाण्डवों किसी को अधिक समझकर किसी की बुराई न की भराई सोचा करते है । वे अकेले पाण्डयों का चाहेंगे । हम यदि पाण्डवों की बुराई करने को पक्ष लेकर हमारा कुछ विगाड़ नहीं सकते। इसरिय तैय्यार होंग तो ये महात्मा कुरुरशी और सारे संसार आप चेम्बटके कुन्ती-सहित पाण्डवों को यहां से के लोग हमारे मनु बन जाएंगे ॥१६॥१९॥ निकाल दीजिए। कोई ऐमा उपाय कीजिए जिससे दुर्योधन ने कहा-आप क्यों डरते हैं । भीष्म आज ही वे वारणावत नगर को चल दें । मुझे नींद दमो और पाण्डयों को एक सा जानते हैं। द्रोणाचार्य नहीं माती, कठोर मूग की नाई मेरे हृदय में पाय के पुत्र अश्वत्थामा मेरे ही पक्ष में हैं। इसमें कोई सा रगा हुआ है। यह काम करके आप मेरे शोक मंदा नहीं है कि आनार्य द्रोण को हमारी तरफ. को दूर कीजिए ॥२२॥२४॥ रहना पड़ेगा। कृपाचार्य भी अवश्य ही उसी पक्ष में आदिपर्व पापमो चौनालीम अध्याय ममान तुला ॥ ------ pc-encoremose. Tecocg - ७१२ महा भारत [ आदिपर्व 200000000000000coroccocoroscoco अथ पश्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५॥ वैशम्पायन उवाच-ततो दुर्योधनो राजा सर्वाः प्रकृतयः शनैः अर्थमानप्रदानाभ्यां संजहार सहानुजः धृतराष्ट्रप्रयुक्तास्ते केचित्कुशलमन्त्रिणः कथयाश्चक्रिरे रम्यं नगरं वारणावतम् अयं समाजः सुमहान्रमणीयतमो भुवि उपस्थितः पशुपतेनगरे वारणावते सर्वरत्नसमाकीर्णे पुंसां देशे मनोरमे इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाञ्चक्रिरे कथाः कथ्यमाने तथा रम्ये नगरे वारणावते गमने पाण्डुपुत्राणां जज्ञे तत्र मतिनृप यदा त्वमन्यत नृपो जातकोतूहला इति । उवाचतानेत्य तदा पाण्डवानम्बिकासुतः धृतराष्ट्र उवाच-ममैते पुरुषा नित्यं कथयन्ति पुनः पुनः रमणीयतमं लोके नगरं वारणावतम् ते ताता यदि मन्यध्वमुत्सवं वारणावते सगणाः सान्वयाश्चैव विहरध्वं यथामराः एक सौ पैंतालीस अध्याय ॥ १४५ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! अनन्तर दुर्योधन , है । हे राजन् ! उन मस्त्रियों के मुंह से बागपत और छोटे भाइयों की सहायता से धन देकर और ! की ऐसी प्रशंसा सुनकर वहां जाने के लिये पाण्डवों सम्मान करके प्रजा को धीरे-धीरे अपने वश में लाने का भी जी चाहा । जब अम्बिका के पुत्र राजा का उद्योग करने लगा। धृतराष्ट्र की आज्ञा से चतुर धृतराष्ट्र को यह मालूम हुआ कि वारणावत नगर मन्त्रियों ने पाण्डयों के आगे वारणावत नगर को को देखने के लिये पाण्डव जाना चाहते हैं तब सुन्दर बतलाकर उसकी प्रशसा करनी शुरू की कि उन्होंने उनसे कहा-हे पुत्रो ! ये सब लोग मुझसे वह स्थान बहुत ही मुहावना है । थोड़े दिनों में बार-बार कहा करते है कि वारणावत नगर एक बड़ा वारणावत में अति श्रेष्ठ पाशुपति का महोत्सव (मेला) ही सुन्दर स्थान है । वहां एक बड़ा भारी उत्सव होने वाला है। वारणावत नगर योंही रत्नों से भरा भी हुआ करता है। यदि वह उत्सव देखने को और पवित्र स्थान होने के कारण देखने योग्य तुम्हारा दिल चाहता हो तो अपने नौकरों और । 05000201005000002050 0000-700 zoooood - cococococcs अध्याय १४५ ] मदा मारत ७१३ peoroorrecorpornsrconore Dooreoroopcorooran ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गायनेभ्यश्च सर्वशः । प्रयच्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः कंचित्कालं वित्यैवमनुभूय परां मुदम् इदं वै हास्तिनपुरं सुखिनः पुनरेप्यथ ॥ १० ॥ वैशम्पायन उवाच-धृतराष्ट्रस्य तं काममनुवुद्ध्या युधिष्ठिरः आत्मनश्चसहायत्वं तथेति प्रत्युवाचतम् ॥ ११ ॥ ततो भीष्मं शान्तनवं विदुरं च महामतिम् । द्रोणं च वाहिकं चैव सोमदत्तं च कौरवम् ॥ १२ ॥ कृपमाचार्यपुत्रं च भूरिश्रवसमेव च मान्यानन्यानमात्यांश्च ब्राह्मणांश्च तपोधनान् ॥ १३ ॥ पुरोहितांश्च पौरांश्च गान्धारीं च यशस्विनीम् । युधिष्ठिरः शनैर्दीन उवाचेदं वचस्तदा ॥ १४ ॥ रमणीये जनाकीणे नगरे वारणावते सगणास्तत्र यास्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥१५ ।। प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुश्चत । आशीभिहितानस्मान्न पापं प्रसहिप्यते एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवाः । प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान् ॥ १७॥ परिवार के रोगों के साथ वहा जाकर देवताओं के / है वही होगा ॥१११११ गमान आनन्द करो ॥१८॥ इसके पश्चात् उन्दोंने भीष्म, बुद्धिमान् विदुर, यहा गया और बामणों को मनमाना धन रन द्रणाचार्य, वहीक, सोमदर, कौरव, कृपाचार्य, आदि देते रहो। इस प्रकार देवताओं के समान अवस्थामा, रिश्रम और दुमरे माननीय पुरुषों तेजम्यो तुम सब भाई कुछ दिन तक आनन्द करो। और मंत्रियों, ब्राह्मणो, तपोधनों, पुहिती, पुरयामियों फिर जब जी च दे, हस्तिनापुर को रोट आना । और यगम्बिनी गान्धारी से दीनतापूर्वक कोमल शम्पायन कहता है कि राजा युधिष्ठिर ने पृष्ट भाव से कहा हम राजा नराष्ट्र की मात्रा मे माथियों 1 अभिमाय समशार और अपने को असहाय गमन अति मुन्दर यों से भी वारणायन नगर में जगार यह उस दिया कि आप जगी आज्ञा करने जारंगे । आरोग प्रमाचिस से यह आनागार - -- - [ आदिपर्व ७१४ महाभारत .00000000 colosko0 स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः । माच वोऽस्त्वशुभं किंचित्सर्वशः पाण्डुनन्दनाः ॥ १८ ॥ ततः कृतस्त्रस्त्ययना राज्यलम्भाय पार्थिवाः कृत्वा सर्वाणि कार्याणि प्रययुारणावतम् इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि वारणावतयात्रायां पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥१४५॥ देवें कि हम वहां दिन पर दिन अपनी उन्नति कर किसी तरह की कोई विपत्ति न हो। इसके पश्चात् सकें, किसी पापकर्म में हमारी प्रवृत्ति न हो। राज्य-लाभ के लिये स्वस्तययन पाठ करके और हे महाराज ! युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर भीम अन्यान्य मङ्गल के कर्मों को पूरा करके सब पाण्डव आदि सब कौरव उन्हें प्रसन्न करने के लिये कहने वारणावत नगर को जाने के लिये तैय्यार हो गये लगे-रास्ते में सब प्राणी तुम्हारी रक्षा करें; तुम्हें ॥१२॥१९॥ आदिपर्व का एक सौ पैंतालीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्ययाः ॥१४६ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तेषु राज्ञा तु पाण्डुपुत्रेषु भारत दुर्योधनः परं हर्षमगच्छत्स दुरात्मवान् स पुरोचनमेकान्तमानीय भरतर्षभ गृहीत्वा दक्षिणे पाणी सचिवं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥ दुर्योधन उवाच-ममेयं वसुसंपूर्णा पुरोचन वसुन्धरा यथेयं मम तद्वत्ते स तां रक्षितुमर्हसि न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति विश्वासिकतरस्त्वया । सहायो येन संधाय मन्त्रयेयं यथा त्वया ॥ ४ ॥ संरक्ष तात मन्त्रं च सपत्नांश्च ममोद्धर । निपुणेनाभ्युपायेन यद्ब्रवीमि तथा कुरु एक सौ छियालीस अध्याय ।। १४६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! पाण्डवों के अधिकार है तुम्हारा भी उतना ही है । तुमको जाने पर दुरात्मा दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ । उसने उसकी रक्षा करनी चाहिये । देखो, तुम से अधिक पुरोचन नाम के मन्त्री को एकान्त में बुलाकर उसका ' विश्वासी, सहायक मेरा कोई नहीं है कि जिससे दाहना हाथ पकड़कर कहा-हे पुरोचन ! यह धन मिलकर मै ऐसी सलाह कर सकं । से भरी पृथ्वी मेरे वश में है। इसपर मेरा जितना इस सलाह को गुप्त रखकर मेरे शत्रुओं को जड़- मित्र ! तुम 1 00002.3. orolormcorrorpora अध्याय १४६ ] महाभारत ७१५ oO4 Pooood Homc5cdc. पाण्डवा धृतराष्ट्रेण प्रेषिता वारणावतम् उत्सवे विहरिष्यन्ति धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ ६ ॥ स वं रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना । वारणावतमद्यैव यथा यासि तथा कुरु तत्र गत्वा चतुःशालं गृहं परमसंवृतम् । नगरोपान्तमाश्रित्य कारयेथा महाधनम् शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् । आग्नेयान्युत संतीह तानि तत्र प्रदापय सर्पिस्तैलवसाभिश्च लाक्षया चाप्यनल्पया मृत्तिकां मिश्रयित्वा वं लेपं कुड्येषु दापय ॥ १० ॥ शणं तैलं घृतं चैव जतु दारूणि चैव हि । तम्मिन्वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः ॥ ११ ॥ यथा च तन्न पश्येरन्परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः आग्नेयमिति तत्कार्यमपि चान्येऽपि मानवाः ॥ १२ ॥ वेश्मन्येवं कृते तत्र गत्वा तान्परमार्चितान् । वासयेथाः पाण्डवेयान्कुन्ती च ससुहृजनाम् ॥ १३ ।। मूल से नष्ट कर दे।। मै जिसतरह कहता हू उस ऊपर से ऐसा लेप कर दो कि जिससे पाण्डव आदि तरह चतुराई के साथ सब काम करो ॥१५॥ कोई उस भेद को न जान सके ॥६॥१०॥ धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को वारणावत नगर में जाने | सन, तेल, घृत, लाग्य और लकडी आदि सब की आज्ञा दे दी है । उसी आज्ञा के अनुसार ये वस्तुए उस घर में हर स्थान में डाल रखना । परन्तु चदा जाकर उत्सव देखेंगे और कुछ दिन रहकर सैर यह सब काम ऐसे गुप्त रूप से चतुराई के साथ करेंगे। इसलिये तुम आज ही शीघ्र चलनेवाले । होना चाहिये कि पाण्डव लोग या और कोई विशेष खच्चगें के रथ पर बैठकर वारणावत में जाओ। यहा परीक्षा से यह न जान सकें कि वह घर आग से पहुचकर जितना द्रव्य लगे लगाकर एक चौपाल जलनेवाला है । इसतरह घर बनवाकर वहीं ठहरो। घर उस नगर के पास बनवाकर तैय्यार करो । जब माता कुन्ती सहित पाण्डव वहा पहुचें तप बड़े पहले सन, धूप आदि जितनी आग को भड़कानेवाली आदर के साथ उनसे उसी घर में ठहराना । उस वस्तुए है उनसे वह घर बनवाओ। फिर कुछ मिट्टी। घर में पाण्डवों के लिये बैठने को सुन्दर आसन, में पृत, तेल, चीं और बहुत सी लाख मिलाकर दिव्य यान,परग आदि सब आराम के सामान रखना, JaharvI95- ७१६ म हा भारत [ आदिपर्व 5000000000ococcooloorconocococom । आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च । विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुप्येत वै पिता ॥ १४ ॥ यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते । तथा सर्व विधातव्यं यावत्कालस्य पर्ययः ॥ १५ ॥ ज्ञात्वा च तान्सुविश्वस्ताशयानानकुतोभयान् । अग्निस्त्वया ततो देयो द्वारतस्तस्य वेश्मनः ॥ १६ ।। दह्यमाने स्वके गेहे दग्धा इति ततो जनाः न गर्हयेयुरस्मान्दै पाण्डवार्थाय कर्हिचित् ॥ १७॥ स तथेति प्रतिज्ञाय कौरवाय पुरोचनः । प्रायाद्रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥ १८ ॥ स गत्वा त्वरितं राजन्दर्योधनमते स्थितः यथोक्तं राजपुत्रेण सर्वं चक्रे पुरोचनः ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि पुरोचनोपदेशे पष्ठ चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ।। १४६ । जिसमें मेरे पिता सुनकर सन्तुष्ट हो । वारणावत नगर और कोई हमारी निन्दा भी न करेगा। प्रजा समझगी के लोग और पाण्डव किसी तरह हमारे इस विचार कि पाण्डव घर में आग लगने ही से जलकर मर और कार्य का कुछ भी पता न पा सकें । फिर ठीक | गये । यह सुनकर पुरोचन ने दुर्योधन से घर बनवाने समय आने पर अर्थात् जब पाण्डवों को उस घर में | की प्रतिज्ञा की और वहा से बड़े शघ्र चलनेवाले अच्छे विश्वासपूर्वक सोते और नि शक होते देखो खच्चरों को रथ में जोतकर उसपर बैठकर वारणावत तब ही उस घर के द्वार में आग लगाना ॥११॥१६॥ नगर में पहुचा ! वहा लाख के घर के बनाने की पाण्डवों सहित कुन्ती उसी घर में जलकर भस्म रचना प्रारम्भ करके उक्त रीति से दुर्योधन के कहने हो जायगी। इस तरह हमारा कार्य सिद्ध हो जावेगा के अनुसार घर बनवाकर तैय्यार कर दिया॥१७॥१९॥ आदिपर्व का एक सौ छियालीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४७ ॥ वैशम्पायन उवाच-पाण्डवास्तु रथान्युक्त्वा सदश्वरनिलोपमैः । आरोहमाणा भीष्मस्य पादौ जगृहुरार्तवत् ॥ १ ॥ एक सौ सैंतालीस अध्याय ।। १४७ ॥ वैशम्पायन ने कहा-ह गजा जनमेजय ! हवा | है उन रथों पर सवार होने से पहले पाण्डवों ने के समान वेग से चरनेवाले श्रेष्ठ घोड़े जिन में जुते । आर्तभाव से भीष्म, राजा धृतराष्ट्र, महात्मा Dococo ooooo - rcocorescococci - अध्याय १४७ ] महा भारत ७१७ paraoraonorarorno.or राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः अन्येषां चैव वृद्धानां कृपस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥ एवं सर्वान्कुरून्वृद्धानभिवाद्य यतव्रताः समालिङ्गय समानान्यै वालैश्चाप्यभिवादिताः ॥ ३ ॥ सर्वा मातृस्तथाऽऽपृच्छय कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । सर्वाः प्रकृतयश्चैव प्रययुारणावतम् विदुरश्च महाप्राज्ञस्तथाऽन्ये कुरुपुङ्गवाः पौराश्च पुरुषव्याघ्रानन्बीयुः शोककर्शिताः तत्र केचिद् ब्रुवन्ति स्म ब्राह्मणा निर्भयास्तदा । दीनान्दृष्ट्वा पाण्डुसुतानतीव भृशदुःखिताः ॥ ६ ॥ विषमं पश्यते राजा सर्वथा स सुमन्दधीः कौरव्यो धृतराष्ट्रस्तु न च धर्म प्रपश्यति न हि पापमपापात्मा रोचयिप्यति पाण्डवः । भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनञ्जयः कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्री करिष्यतः तानाज्यं पितृतः प्राप्तान्धृतराष्ट्रो न मृष्यते ॥ ९ ॥ अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीप्मोऽनुमन्यते । विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते ॥ १० ॥ द्रोणाचार्य, विदुर, कृपाचार्य और अन्य बड़े-बूदों के । चले । वे पाण्डवों के चित्त को मलिन देखकर अति चरणों में प्रणाम किया। जो बराबरवाले थे उनको | दुख से कहने लगे-कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र दुष्ट- गले से लगाया । जो पाण्डवों मे छोटे थे उन्होंने बुद्धि से पक्षपात करते है और धर्म की ओर दृष्टि उन्हें प्रणाम किया । माताओं की प्रदक्षिणा करके ' नहीं देते ॥१७॥ और उनमे आज्ञा लेकर पाण्डवों ने सब पुरवामियों निप्पाप पाण्टुपुत्र कुन्ती-नन्दन युधिष्ठिर, महाबली से भी सादर सम्भापण किया। इसके पश्चात् वे भीम, अर्जुन, या माद्री के पुत्र महात्मा नकुल और वारणावत नगर को चल दिये । महापाज विदुर सहदेव से धृतराष्ट्र का या उनके पुत्रों का कुछ भी और कुछ कुरुवंश के वृद्ध लोग और बहुत मे अनिष्ट नहीं हो सकता । पहले राजा शान्तनु था। पुरवासी शोकाकुल होकर पाण्डवों के पंछे-पीछे उसके पीछे विचित्रवीर्य ने राज्य किया । उसके -rororanrrararirirroririnirrrrrrrorseurn ७१८ म हा भारत [ आदिपर्व Zooo70500050M.Amcooooooooo पितेव हि तृपोऽस्माकमभूच्छान्तनवः पुरा विचित्रवीर्यों राजर्पिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ॥ ११ ॥ स तस्मिन्पुरुषव्याघ्र देवभावं गते सति राजपुत्रानिमान्वालान्धृतराष्ट्रो न मृप्यते वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् गृहान्विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥ तांस्तथावादिनः पौरान्दुःखितान्दुःखकर्शितः उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः । अशङ्कमानस्तत्कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम् भवन्तः सुहृदोऽस्माकमस्मान्कृत्वा प्रदक्षिणम् । प्रतिनन्द्य तथाऽऽशीभिनिवर्तध्वं यथागृहम् ॥ १६ ॥ यदा तु कार्यमस्माकं भवद्भिपपत्स्यते तदा करिष्यथाऽस्माकं प्रियाणि च हितानि च ॥ १७ ॥ एवमुक्तास्ततः पौराः :: कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् . । आशीभिश्चाभिनन्येताञ्जग्मुर्नगरमेव हि ॥ १८ ॥ परेषु विनिवृत्तेषु विदुरः सर्वधर्मवित् बोधयन्पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् उपरान्त राजा पाण्डु हमारा राजा हुआ । वह राजा के ये वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर को भी अत्यन्त पाण्डु मर गया है इमसे धृतराष्ट्र इन बालकों को दुख हुआ । उन्होंने क्षणभर सोचकर कहा-राजा नहीं देख सकते हैं । पाण्डवों को राज्य से निकालकर धृतराष्ट्र हमारे पिता, माननीय और गुरु है और किसी अन्य जगह भेज देना बड़ा ही अधर्म है। वही प्रधान है। किसी तरह की शंका न करके महात्मा भीम कैसे इस अधर्म को देख रहे है और उनका कहा करना ही मेरा व्रत है । आप लंग इसका अनुमोदन कर रहे है ? उन्होंने क्यों नहीं भी हमारे हितकारी है। प्रदक्षिणा करके, आशीर्वाद इस अन्याय का प्रतिवाद किया ! हम इस अनीति देकर, प्रसन्नतापूर्वक तुम लोग अपने-अपने घरों को को नहीं चाहते है । इससे हम सब भी युधिष्ठिर चले जाओ। आवश्यकता पड़ने पर तुम लोग हमारा के साथ चलेगे । हे महाराज ! दुःखी पुरवासियों प्रिय और हित करने का उद्योग करना । यह सुनकर 500mAh Jijrshirurrrrrrrroriri roris/ । । अध्याय १४७ ] महा भारत ७१९ prororororocORODDOLID WOOYOY0700CYCUCIRO प्राज्ञः प्राज्ञप्रलापज्ञः प्रलापज्ञमिदं वचः । प्राज्ञं प्राज्ञः प्रलापज्ञः प्रलापलं वचोऽब्रवीत् ॥ २० ॥ यो जानाति परप्रज्ञा नीतिशास्त्रानुसारिणीम् । विज्ञायेह तथा कुर्यादापदं निस्तरेद्यथा अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्ननम् यो वत्ति न तु तं नन्ति प्रतिघातविदं द्विपः ॥ २२ ॥ कक्षनः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे विलौकसः न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति ॥ २३ ॥ नाचक्षुत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः नाधृतिर्बुद्धिमाप्नोति बुद्धयस्वैवं प्रबोधितः ॥ २४ ॥ अनार्दत्तमादत्ते नरः शस्त्रमलोहजम् श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात् ॥ २५॥ चरन्मार्गान्विजानाति नक्षत्रैविन्दते दिशः । आत्मना चात्मनः पञ्च पीडयन्नानुपीड्यते ॥ २६ ॥ सम पुरयासी राजा युधिष्ठिर को आशीर्वाद दे देकर जाता है उमको शत्रु नहीं मार सकना । देखो, तृण अपने अपने घरों को गट गये । ॥८॥१८॥ आदि को जलानेवाली और जाड़े को नष्ट करनेवाली उन लोगों के चले जाने पर सब नीतियों के ' अमि सारे जाल को जला देती है परन्तु गढ़ों के जाननेवाले, धर्मज्ञ, बुद्धिमान् विदुर पाण्डवों में प्रधान भीतर रहनेवाले जीव उसमे अपनी रक्षा कर लेते हैं। युधिष्ठिर को सावधान करने के लिये कहने लंग। इस नियम से जो अपनी रक्षा करना है वही जीवित इमलिये कि और लोग न समझ म विदुर ने म्लेच्छ रहता है अर्थात् जो शत्रु अपने साथ रहे भार अमि भाषा में इशारे मे कहा-जो मनुष्य शत्रुओं की, से मारना चाहे उममे पचने के लिये सुरंग के राम्त नीति शास्त्र के अनुकूल, सलाद की ममझ मकना मे निकल जाव ॥१९॥२२॥ है उमे चाहिये कि शत्रुओं के इरादे को जानकर जिसका विवक जाता रहता है उसको राम्ता आपत्ति से अपना उद्धार करने का उपाय करे। नहीं दीखता। और जोशान नहीं जानना उसकी अम यद्यपि लोहे का बना हुआ नहीं है नो भी दिशा नहीं जान पड़ती है। जिमको धैर्य नहीं है तीक्ष्ण भीर गैर को नष्ट कर सकना है । उमे यह ऐश्वर्य प्राप्त नहीं कर सकना । जो शत्रु अपने जो जानना उस पान जानने वाले को पत्र नहीं को अग्नि मम्बन्धी पहायों में बने हुए पर में टहराये मार मस्ते अर्थात जो मनुष्य रात्रि में छिी हुए ना उममे बचने के लिये कोई दूसरा राना हंट अमि सम्बन्धी पदायों के बनाये हुए घर को पहचान लो। मनुष्य का नादिया कि पहले से राम्ना दम ७२० महा भारत [ आदिपर्व oooooooooOJOV0ocorror coccorn .. एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो युधिष्ठिरः विदुरं विदुषां श्रेष्ठं ज्ञातमित्येव पाण्डवः अनुशिक्ष्यानुगम्यैतान्कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । पाण्डवानभ्यनुज्ञाय विदुरः प्रययौ गृहान् ॥ २८ ॥ निवृत्ते विदुरे चापि भीष्मे पौरजने तथा । अजातशत्रुमासाद्य कुन्ती वचनमब्रवीत् क्षत्ता यदब्रवीद्वाक्यं जनमध्येऽत्रुवन्नित्र स्वया च स तथेत्युक्तो जानीमो न च तद्वयम् ॥ ३० ॥ यदीदं शक्यमस्माभिआतुं न च सदोपवत् श्रोतुमिच्छामि तत्सर्व संवादं तव तस्य च ॥३१॥ युधिष्ठिर उवाच-गृहादग्निश्च वोद्धव्य इति मां विदुरोऽब्रवीत् । पन्थाश्च वो नाविदितः कश्चित्स्यादिति धर्मधीः ॥ ३२ ॥ जितेन्द्रियश्च वसुधां प्राप्स्यतीति च मेऽब्रवीत् । विज्ञातमिति तत्सर्व प्रयुक्तो विदुरो मया ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-अष्टमेऽहनि रोहिण्यां प्रयाताः फाल्गुनस्य ते । वारणावतमासाद्य ददृशुर्नागरं जनम् ॥ ३४॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि वारणावतरामने चत्वासप्तरिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४७॥ स्खे और रात्रि के समय में दिशाओं को नक्षत्रों जो कुछ धीरे-धीरे तुमसे कहा और तुमने उनसे कहा से जान लेथे । जो मनुष्य बुद्धि के द्वारा पाचों कि मैं आपके अभिप्राय को अच्छीतरह समझ गया इन्द्रियों को वश में रखता है यह पीड़ा से बच जाता है। वह मेरी समझ में नहीं आया। यदि मुझसे कहने गनु उसे कुछ भी हानि नहीं पहुंचा सक्ते ॥२३॥२५॥ में कुछ हानि न हो, और मैं उसे समझ सक, तो पाण्ड पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर इन उक्त गृह दोनों के बीच में जो पात हुई उसका तात्पर्य अर्थवाले वचनों को मुनार विदुर जी से बोले-में मुझको पतलाओ ॥२६॥३०॥ आपके अभिप्राय को अचटिरह समझ गया। इसके युधिष्ठिर ने कहा-विदुर ने मुझसे कहा है कि पथात् विदुर जी पाण्डवों से मिलकर और प्रदक्षिणा घर में आग लगेगी तुम यह जानकर पहले से करके अपने नगर को ₹ट गये । भीष्म, विदुर सावधान होकर रहना । वहा की सब राह दम्बार और पुग्यासी सब के रंगट जाने पर कुन्ती ने युधिष्ठिर के जान रेगा। नक्षत्रों में दिशाओं की पहचान कर पाम जाकर कहा-सब पुरवासियों के आगे पिदुर ने रेन । ] जिम घर में रहना उमे अछीनाह देग अध्याय १४८ ] महा भारत Po1050sode - भाल लेना। जितेंद्रिय पुरुष ही पृथ्वी का राज्य पा नक्षत्र में, पाण्डव वारणावत नगर के लिये रवाना सकता है । धर्मशील विदुर के ऐसा कहने पर मैंने हुए । उस नगर में पहुचकर पाण्डवों ने नगरवासियों उनसे कहा कि मै सब समझ गया । वैशम्पायन ने से भेंट की ॥३१॥३४॥ कहा-हे राजन फाल्गुन वदी अष्टमी को, रोहिणी आदिपर्व का एक सा मेंतालीस अध्याय समाप्त हुआ। - cover अथ अप्रचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १४८ ।। शम्पायन उवाच-ततः सर्वाः प्रकृतयो नगराद्वारणावतात् सर्वमङ्गलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः श्रुत्वागतान्पाण्डुपुत्रान्नानायानैः सहस्रशः अभिजग्मुर्नरश्रेष्ठाञ्श्रुत्वैव परया मुदा ते समासाद्य कौन्तेयान्वारणावतका जनाः कृत्वा जयाशिपः सर्वे परिवार्यावतस्थिरे तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः विधभौ देवसङ्काशो बज्रपाणिरिवामरैः सत्कृताश्चैव पौरस्ते पौरान्सत्कृत्य चानघ अलंकृतं जनाकीर्ण विविशुर्वारणावतम् ते प्रविश्य पुरी वीरास्तूर्णं जग्मुरथो गृहान् । ब्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ॥ ६ ॥ नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां तदा उपतस्थुर्नरश्रेष्ठा वैश्यशुद्रगृहाण्यपि एक सौ अड़तारीस अध्याय ॥ १४८ ॥ वैशम्शयन ने कहा है राजा जनमेनय! पाण्डवों घेर लिया। जयजयकार करते हुए वे सब लोग के माने की मृचना पाकर वारणायत नगर के रोग आगीवाद देने लगे ॥१३॥ चंद्र प्रसन्न हुए। अनेकों नगरवासी लोग, शास्त्र की देवसदृश पुरपया धर्मराज युधिष्ठिर उन विधि के अनुसार, बड़े उत्साह के साथ सब मागल्य पुरवासियों के बीच में, इन्द्र के समान शोमा पनि पदार्थ और अनेक प्रकार की भेट रेकर नाना प्रकार रगे। पुण्यामा पाण्डवों ने सर पुरवासियों का बड़ा के अगणित यानों पर चढकर पाण्डवों से मिलने सरकार किया और उन सर को माथ रिय हुप बड़ी के रिय चरे । उन्होंने पाण्टयों को चारों भार से धूमधाम में वारणाचन नगर के भीतर गये । धीर - ॥ ७ ॥ -~-m-worror-rrrrrr ७२२ महा मारत [ आदिपर्व rror/ CDNKo" mcoicom.oooonmomcorol - đa xơ cứ अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभ जग्मुरावसथं पश्चात्पुरोचनपुरःसराः तेभ्यो भक्ष्याणि पानानि शयनानि शुभानि च । आसनानि च मुख्यानि प्रददौ स पुरोचनः ॥ ९ ॥ तत्र ते संस्कृतास्तेन सुमहाहपरिच्छदाः उपास्यमानाः पुरुपैरूपुः पुरनिवासिभिः ॥ १०॥ दशरात्रोषितानां तु तत्र तेषां पुरोचनः निवेदयामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ॥ ११ । तत्र ते पुरुषव्याघ्रा विविशुः सपरिच्छदाः पुरोचनस्य वचनात्कैलासमिव गुह्यकाः ।। १२ ॥ तच्चागारमभिप्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरः उवाचाग्नेयमित्येवं भीमसेनं युधिष्ठिरः ।। १३ ॥ युधिष्ठिर उवाच-जिघ्राणोऽस्य वसागन्धं सर्पिजतुविमिश्रितम् । कृतं हि व्यक्तमाग्नेयमिदं वेश्म परंतप ॥ १४ ॥ शणसर्जरसं व्यक्तमानीय गृहकर्मणि मुञ्जबल्वजवंशादि द्रव्यं सर्व घृतोक्षितम् ॥ १५ ॥ पाण्ड-नन्दन पुर में प्रवेश कर पहले वेद पढने आदि लगे। इस प्रकार दश दिन व्यतीत होने पर पुगेचन मुकर्म में नियुक्त ब्राह्मणों के घरों में गये । फिर । पाण्डवों से उसी अमलरूप लाख के बनाये हुए क्रमशः नगर के अधिकारी, योद्धा लोगों के घरों में, घर की चर्चा करने लगा । गुह्यक लोग जिसप्रकार वैश्यों और शूद्रों के यहां उपस्थित हुए ॥१७॥ कैलास की चोटी पर चढ़ते है वैसे ही सब पाण्डव हे भरतश्रेष्ठ ! इस प्रकार नगरवामियों से पूजे अच्छे यन्त्र पहनकर पुरोचन के वचन सुनकर उस जाकर, पुरोचन के साथ, पांचों पाण्डव अपने डेरे घर में प्रवेश हुए ॥८॥१२॥ पर पहुंचे । वहां पुरोचन ने बड़े आदर के साथ उस घर को अच्छीतरह देखकर धर्मराज युधिष्ठिर उनको रहराया । उनको अच्छी-अच्छी साने की ने भीमसेन से कहा-हे भीम ! यह घर आग वन्तुएं, पीने के लिये पदार्थ, पलंग और उत्तम आमन लगानेवाली वस्तुओं से बना हुआ है । हे शत्रुओं आदि देकर उन्हें संतुष्ट करने की चेष्टा की। बहुत के नाश करने वाले । पृन और लाख से मिली हुई कीमती वम पहने हुए पाण्डव पुरोचन की सेवा चर्षी की गन्ध से मालूम होता है कि यह घर आग और पुरवासियों में उपासना किये हुए वहा रहने लगानेवाली वस्तुओं से बना हुआ है । घर बनाने । . procrprimirrrrrrrrrrrrrrrrori" अध्याय १४८ ] महा मारत ७२३ 50ccoomc20 शिल्पिभिः सुकृतं ह्याप्तैर्विनीतर्वेश्मकर्मणि । विश्वस्तं मामयं पापो दग्धुकामः पुरोचनः ॥ १६ ॥ तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः । इमां तु तां महाबुद्धिर्विदुरो दृष्टवांस्तथा ॥ १७॥ आपदं तेन मां पार्थ :स संबोधितवान्पुरा । ते वयं बोधितास्तेन नित्यमस्मद्धितैषिणा पित्रा कनीयसा स्नेहाद बुद्धिमन्तोऽशिवं गृहम् । अनार्यः सुकृतं गूढैदुर्योधनवशानुगैः भीममेन वाय-यदीदं गृहमाग्नेयं विहितं मन्यते भवान् । तथैव साधु गच्छामो यत्र पूर्वोपिता वयम् ॥ २० ॥ युधिष्ठिर उवाच-इह यत्तैर्निराकारैर्वस्तव्यमिति रोचये अप्रमत्तैर्विचिन्वद्भिर्गतिमिष्टां ध्रुवामितः ॥ २१ ॥ यदि विन्देत चाकारमस्माकं स पुरोचनः क्षिप्रकारी तनो भूत्वा प्रसह्यापि दहेत नः ॥ २२ ॥ नायं विभेत्युपक्रोशादधर्माद्वा पुरोचनः तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः ॥ २३ ॥ अपि चायं प्रदग्धेषु भीमोऽस्मासु पितामहः । कोपं कुर्याकिमर्थं वा कौरवान्कोपयीत सः ॥ २४ ॥ की विद्या में निपुण और शत्रुओं के विश्वासपात्र यह सुनकर भीममेन बोले कि जो यह घर अमि कारीगरों ने सन, धूम, सरकण्डा, तृण और बाम सम्बन्धी पदार्थों का बना हुआ है तो चलकर वहीं आदि को घी मे तर करके उनसे यह घर बनवाया टहरे जहा हम पहले टहरे थे। यह मुनकर युधिष्ठिर है । यह पापी पुगचन दुर्योधन की सलाह से हमको ने कहा कि हमकोइम पर के मर हाल का छिपाकर जलाना चाहता है ॥१३॥१६॥ यसपूर्वक मावधानी मे यहीं रहना उचित है । क्योंकि हमारे छोटे चचा विदुरजी हमसे चढ़ा महकाने हैं। पुरोचन दुर्योधन के मन में स्थित होकर निन्दा भार वेबड़े बुद्धिमान है । उन्होंने इन सब बातों को अपनी अधर्म में नहीं टरता है। यदि उसको यह बात बुद्धिबल से जानकर इस घर के सम्पूर्ण वृत्तान्त से मालूम हो गई कि दम रोग:म मकान के हाल मुझे चरते समय मावधान कर दिया था॥१७.१०॥ को जान गये है तो वह दुष्ट हम सबको दट करके rrrrreiraserrorreiniorainvercre । prior ७२४ म हा भारत [ आदिपर्व orcA000ro. 001030.0000003cocircr-90 अथवापीह दग्धेषु भीष्मोऽस्माकं पितामहः । धर्म इत्येव कुप्येरन्ये चान्ये कुरुपुङ्गवाः ॥ २५॥ वयं तु यदि दाहस्य विभ्यतः प्रवेम हि । स्पशैर्निर्घातयत्सर्वान्राज्यलुब्धः सुयोधनः ॥ २६ ॥ अपदस्थापदे तिष्ठन्नपक्षान्पक्षसंस्थितः हीनकोशान्महाकोशः प्रयोगे_तये ध्रुवम् ॥ २७ ॥ तदस्माभिरिमं पापं तं च पापं सुयोधनम् वञ्चयद्भिर्विवस्तव्यं छन्नावासं क्वचिवचित् ॥ २८ ॥ ते व्यं मृगयाशीलाश्चराम वसुधामिमाम् तथा नो विदिता मार्गा भविष्यन्ति पलायताम् ॥ २९ भौमं च विलमद्यैव करवाम सुसंवृतम् । गूढश्चासान्न नस्तत्र हुताशः संप्रवक्ष्यति ॥ ३० ॥ वसतोऽत्र यथा चास्मान्न बुध्येत पुरोचनः । पौरो वापि जनः कश्चित्तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥ ३१ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमसेनयुधिष्ठिरसंवादेऽष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय १४८ जला देगा । हम यदि यहां जल गये तो हमारे भीष्म उपायों से हमें नष्ट कर सकता है। इसलिये पापी ही क्यों कौरवों पर क्रोध करेंगे ? अथवा कौरवों पुरोचन और दुर्योधन को धोखा देकर हमें अनेक को ही कुछ कहकर कुपित क्यों करेंगे? ॥२०॥२४॥ स्थानों में गुप्त रूप से रहना चाहिये । सदा शिकार या धर्म का ध्यान रखकर भीष्म और अन्य करते फिरना चाहिये । ऐसा करने से हमें सब राम्ते कुरुवंशी लोग दुष्ट दगाबाज़ों पर क्रोध भी करेंगे मालूम हो जायंगे और हम सहज में भाग सकेंगे । तो वह व्यर्थ होगा । यदि हम लोग यहां से कहीं हम आज ही से आलम्य छोड़कर, जमीन के भीतर- को भागकर चले चलें तो दुर्योधन हम लोगों को भीतर, एक गुप्त सुरंग खोदेंगे । उसके भीतर आने दूतों से मरवा डालेगा। वह दुरात्मा राजपद पर पर हम आग में जल न सकेंगे। ऐसा उपाय करना बैठा है, उसके अनेक सहायक हैं, उसके पास चाहिये कि हम यहां से निकलकर चले जावे और खजाना भी है; और हम पद के बाहर, सहायहीन हमारे भेद को पुरोचन या पुरवासी कोई न जान और निर्धन है। इसमें संदेह नहीं कि वह अनेक सकें ॥२५॥३१॥ आदिपर्व का एक सौ अड़तालीस अध्याय ममाप्त हुआ ।। । riorrorarrirrorsporn accesocono107070 Jimicroscic अध्याय १४९ ] म ही भारत ७२५ opoinciana अथ ऊनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥ वैशम्पायन उवाच-विदुरस्य सुहृत्कश्चिरखनकः कुशलो नरः विविक्ते पाण्डवानाजन्निदं वचनमब्रवीत् प्रहितो विदुरेणाम्मि खनकः कुशलो ह्यहम् पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ॥ २ ॥ प्रच्छन्नं विदरेणोक्तः श्रेयस्त्वमिह पाण्डवान् । प्रतिपादय विश्वासादिति किं करवाणि वः ॥ ३ ॥ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम् मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ५ ॥ किंचिच्च विदुरेणोक्तो म्लेच्छवाचासि पाण्डव । त्वया' च तत्तथेत्युक्तमेतद्विश्वासकारणम् उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ॥ ७ ॥ शुचिमातं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम् । न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ॥ ८ ॥ एक सौ उनचास अध्याय || १४९ ॥ वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! विदुर का विश्वासी और आपने भी कहा था कि मैं आपके अभिप्राय मित्र, चतुर एक सुरंग खोदनेवाला था। उसने एकान्त को अच्छीतरह समझ गया । पुगेचन कृष्णपक्ष की में पाण्डवों के पास आकर कहा-मै खनिक हूं। 'वी द्वादशी को दुर्योधन के कहने के अनुसार घर के खोदने के काम में बहुत निपुण इ.। विदुर जी ने द्वार पर से तुम सबको जलाने के लिये आग लगावेगा। मुझको यह कहकर भेजा है कि तुम बाणाचन में दुर्बुद्धि दुर्योधन कुन्ती सहित आप सबको जला देने जाकर पाण्टयो का प्रिय और उपकार करी । इसलिए का विचार कर चुका है ॥१॥६॥ आप आजा कीजिए, मुझे क्या करना होगा ? यह सुनकर कुन्ती के पुत्र युधिष्ठिर ने उसमे मुझपर आप विश्वास करें, मै आपको विश्वाम के तौर कहा-हे सौम्य ! मुझे निश्चय हो गया कि तुम यहा पर बतलाता हू कि चलते समय विदुर जी ने मलेन्छ किमी दुष्ट विचार से नहीं आये हो । तुम विदुर के भाषा मे इशारे से आपको कुछ उपदेश दिया था प्रिय मित्र, भक और अनुगत हो । नुम उन्हें बहुन VIVAJhar महा भारत [ आदिपर्व Pricsco/cs00000000000c050cocrror । wrrrrrrrrrrrrro . यंथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान्यथा कविः इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १० ॥ स पापः कोपश्चैिव ससहायश्च दुर्मतिः । अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रवाधते ॥ ११ ॥ स भवान्मोक्षयत्वस्मान्यत्नेनास्माद्भुताशनात् । अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात्सुयोधनः ॥ १२ ॥ समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्पितम् प्रागेव विदुगे वेद तेनास्मानन्ववोधयत् ॥ १४ ॥ सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान्पुरा पुगेचनस्याविदितानस्मास्त्वं प्रतिमोचय स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः । परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाविलम् ॥ १६ ॥ प्यारे हो । तुमसे विदुर जी का कोई हाल छिपा इसमें भी सन्देह नहीं कि हम लोग यदि आग ពី नहीं है । तुम विदुर को जिस दृष्टि से देखते हो जल जायं तो दुर्योधन की आशा पूरी हो जायगी। उसी दृष्टि से हमको भी देखो। हम विदुर को जैसा उस दुरात्मा ने यह घर एसा बनवाया है कि इसमे हितचिन्तक समझते हैं वैसा ही तुमको जानते है। निकलना कोई सहज काम नहीं है । इसके चारों हम तुम्हारे ही है । तुम हमको इस अमि के घर और ऊंची-ऊंची दीवारें हैं और एक ही द्वार है । से बचाने का कोई उपाय करो। मैं जानता हू, दुर्योधन के इस ग्योटे विचार को विदुर ने पहले ही पुरोचन ने दुर्योधन की आजा से हमें जलाने के से अपनी बुद्धिवल से जान लिया था। इसीमे उन्होंने लिये यह घर बनवाया है ॥१०॥ मुझे मावधान कर दिया था । विदुर को जिस विरचि पापात्मा कुमति दुर्योधन के पास इस समय की गंगा थी वह इस समय हमारे सिर पर आ यनाना है, उसके सहायक भी बहुत है । वह सदा गई है । इसलिये ऐसा उपाय रो जिससे पुगेचन हमको नष्ट करने की चेष्टा करता है । इस कारण को कुछ हाल मालम न हो ॥११॥१५॥ तुम यलपूर्वक हमको इस आग के घर से बनाओ। यह सुनकर वह खनिक युधिष्ठिर से ऐमा ही होगा Jr-05-2017 PASS-32-JAerol 27-0oolod , अध्याय १५० ] म हा भारत ७२७ 000000 ROHorooroopercorrore: चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्येनातिमहाद्विलम् । कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत पुरोचनभयादेव व्यदधात्संवृतं मुखम् स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ॥१८॥ तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप । दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनावनम् ॥ १९ ॥ विश्वस्तवदविश्वस्ता वश्चयन्तः पुरोचनम् अतुष्टास्तुष्टवद्राजन्नूपुः परमविस्मिताः ॥ २० ॥ न चनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः अन्यत्र विदुरामात्यात्तस्मात्खनकसत्तमात् ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहवासे ऊनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१४९ ॥ कहकर, मौरी साफ़ करने के बहाने, एक बड़ी भारी । देखकर किसी को यह शंका नहीं हो सकती थी सुरज खोदने लगा। उसने सुरंग खोदकर उसमें कि उन्हें दुर्योधन का यह दुष्ट विचार मालूम हो ऐसा द्वार लगाया कि भूमि के समान हो गया । गया है। पुरोचन को धोखा देने के लिये उनपर पुरोचन के डर से उस सुरंग का मुंह बन्द कर दिया। विश्वास न रखकर भी विश्वासी के समान और सदा दुष्टबुद्धि पुगेचन उस घर के द्वार पर सदा रहा असंतुष्ट होकर भी संतुष्ट की भांति अति विस्मित करता था। रात्रि को सब अस्त्र-शस्त्र लेकर पाण्डव होकर वहां रहने लगे। परन्तु विदुर के मन्त्री उस उसी घर के भीतर रहते और दिन को वन में खनिक के सिवा कोई नगरनिवासी भी पाण्डवों के शिकार किया करते थे । पाण्डवों का चेहरा हृदय के भाव को नहीं जान सका ॥१६॥२१॥ आदिपर्व का एक मौ उनचास अध्याय ममाम हुआ । अथ पञ्चागदधिकशततमोऽध्याय ॥ १५० ॥ वैशम्पायन यान-तांस्तु दृष्ट्वा सुमनसः परिसंवत्सरोपितान् । विश्वस्तानिव सलक्ष्य हर्ष चक्रे पुरोचनः ॥ १ ॥ पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेयोऽथ युधिष्टिरः । भीमसेनार्जुनौ चोभौ यमो प्रोवाच धर्मवित् ॥ एक मो पचाम अध्याय ॥ १५० ।। वैशम्पायन ने कहा-है गजा जनमेजय ! जब पुरोचन ने ममझ लिया कि अब पाण्डवों को पूरा पाण्डवों को यहां रहते हुए एक वर्ष हो गया तब विश्वास हो गया दः उनके मन में किसी प्रकार का २ ॥ ---y-currrrr- -~-rror:
७२८ महा मारत [आदिपर्व 7-JcacokcocsiO20.3 -500000 युधिष्टिर उवाच--अस्मानयं सुविश्वस्तान्वेत्ति पापः पुरोचनः । वञ्चितोऽयं नृशंसात्मा कालं मन्ये पलायने ॥ ३ ॥ आयुधागारमादीप्यं दग्ध्वा चैव पुरोचनम् पट्याणिनो निधायेह द्रवामोऽनभिलक्षिताः ॥ ४ वैशम्पायन उवाच-अथ दानापदेशेन कुन्ती ब्राह्मणभोजनम् । चक्रे निशि महाराज आजग्मुस्तत्र योपितः ॥ ५ ॥ ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत । जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम् ॥ ६ ॥ निपादी पञ्चपुत्रा तु तस्मिन्भोज्ये यहच्छया । अन्नार्थिनी समभ्यागात्सपुत्रा कालचोदिता ॥ ७ ॥ सा पीत्वा मदिरां मत्ता सपुत्रा मदविह्वला । सह सर्वेः सुतै राजस्तस्मिन्नेव निवेशने सुष्वाप विगतज्ञाना मृतकल्पा नराधिप अथ प्रवाते तुमुले निशि सुप्ते जने तदा तदुपादीपयद्भीमः शेते यत्र पुरोचनः ततो जतुगृहद्वारं दीपयामास पाण्डवः ॥ १० ॥ संदेह नहीं है इससे उस दुष्ट को बड़ा आनन्द हुआ। आई थीं और रात्रि को खा-पीकर आनन्दपूर्वक कुन्ती-पुत्र धर्मवीर्य युधिष्टिर ने उसको प्रसन्न देखकर कुन्ती की आजा से अपने-अपने घर को गई ॥१६॥ भीम, अर्जुन, नकुल और महदेव से कहा-दुष्ट उसी समय देव की इच्छा और काल की प्रेरणा पुरोचन को निश्चय हो गया है कि हम लोग उसके से एक मल्लाह की औरत, अपने पाच पुत्रों-महित ऊपर विश्वास करके इस घर में रहते | इस पापी उस उत्सव में भोजन मांगने आई थी । वह अपने को धोखा देने का काम अन्छीतरह हो गया। अब पुनो-सहित मदिरा से उन्मत्त और बिहल होकर हमारे भागने का ममय आ गया है । हम अबशारा उसी घर में सो रही। यह एक बार ही अचन होकर में आग लगाकर पुगेचन को जरार यहां छ मरी सीवहां पड़ी थी। इसके पश्चात् जब रानि यहुत मनुष्यों को छोड़कर लोगों से छिपार भागेंगे। गई और सब मनुष्य मो गये तय वायु के चरमे गायन ने कहा-हे महाराज ! एक दिन कुन्ती पर भीमसेन ने उम लाख के घर में उम म्यान ने दान देने के बहाने रात्रि में ब्राह्मणों को भोजन अमि लगा दी जिम म्याग में पुगेनन मोना था। कराया । उम दिन नगर की बहुन मी मियां यदा फिर उग म्यान के चारों ओर लगाकर माता- arrrrrrrrroror.irararirrrrrrrrrrror जतुगृहदाह और माता का लेकर पाण्डया का सुरंग की राह मे निकल भागना ।
अध्याय १५० ] महा भारत ७२९ aolod 300000000000oooook - समन्ततो ददौ पश्चादग्निं तत्र निवेशने ज्ञात्वा तु तद्गृहं सर्वमादीप्तं पाण्डुनन्दनाः ॥ ११ ॥ सुरुङ्गा विविशुस्तूर्णं मात्रा सार्धमरिंदमाः ततः प्रतापः सुमहाञ्छब्दश्चैव विभावसोः ॥ १२ ॥ प्रादुरासीत्तदा तेन बुबुधे स जनवजः तदवेक्ष्य गृहं दीप्तमाहुः पौरा कृशाननाः ॥ १३ ॥ पौरा ऊचुः-दुर्योधनप्रयुक्तेन पापेनाकृतवुद्धिना गृहमात्मविनाशाय कारितं दाहितं च तत् ॥ १४ ॥ अहो धिग्धृतराष्ट्रस्य · बुद्धिर्नातिसमअंसा यः शुचीन्पाण्डुदायादान्दाहयामास शत्रुवत् ॥ १५ ॥ दिष्टया विदानी पापात्मा दग्धोऽयमतिदुर्मतिः । अनागसः सुविश्वस्तान्यो ददाह नरोत्तमान् ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं ते विलपन्ति स्म वारणावनका जनाः परिवार्य गृहं तच तस्थू रात्रौ समन्ततः पाण्डवाश्चापि ते सर्वे सह मात्रा सुदुःखिताः । विलेन तेन निर्गत्य जग्मुर्दुतमलक्षिताः ॥ १८॥ तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः न शेकुःसहसा गन्तुं सह मात्रा परंतपाः सहित सब पाण्डव सुरग की राह से बाहर निकलकर भी भाग्यवश से जल गये । इस दुष्ट ने यह घर चल दिये । जलकर बह रही आग की असह्य गर्मी । अपने नाश के हेतु से ही बनवाया था। हाय ! और उत्कट उजेला चारों ओर फैल गया। आग में धृतराष्ट्र की बुद्धि कैसी कच्ची है। उसकी इस बुद्धि जलकर फट रहे वास आदि का शब्द दूर तक सुनाई पर धिकार है जिससे उसने निप्पापी पाण्डवों को पड़ने लगा। तब सब पुरवासी एक दम जाग पड़े। | शत्रुओं के सदृश जला दिया ॥७॥१६॥ उस जलते हुए घर की भयानक दशा देगकर सब वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! वारणावत नगर लोग दु ख प्रकट करते हुए कहने लगे कि इस दुष्ट | के रहनेवाले रोग इस प्रकार शोक करते हुए उस पापी पुरोचन ने दुर्योधन की सलाह से पाण्डवों के ! रात्रि को घर के चारों ओर सड़े रहे । इधर शत्रुनागी साथ विश्वासघात करके उनको जलाया है और आप पाण्डव लोग माता-सहित सुरंग से निकलकर अत्यन्त Arora121 •iroroornimoroorroozrs ७३० म हा मारत [ आदिपर्व Pomooozoicoroorkocercole Noodlesococoncol भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रमः जगाम भ्रातृनादाय सर्वान्मातरमेव च ॥ २० ॥ स्कन्धमारोप्य जननी यमावङ्केन वीर्यवान् । पार्थी गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ स महाबलः ॥ २१ ॥ उरसा पादपान्भञ्जन्महीं पञ्चां विदारयन् । स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहदाहे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५० । दुःखी होकर चल दिये । परन्तु नींद और डर के | कन्धे पर, नकुल और सहदेव को गोद में और कारण से शीघ्र नहीं चल सके । तब महाबली भीमसेन युधिष्ठिर तथा अर्जुन के हाथ पकड़कर छाती से माता और सब भाइयों को साथ लेकर चलने लगे। पेड़ों को तोड़ते और पैरों से धरती को फाड़ते हुए अति बलवीर्यवन्त और हवा के समान वेग से चले ॥१७१२२।। चलनेवाले, तेजम्वी भीमसेन जाते समय माता को आदिपर्व का एक सौ पचाम अध्याय समाप्त हुआ | अथ एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १५१ ॥ वैशम्पायन उवाच-एतस्मिन्नेव काले तु यथासंप्रत्ययं कविः । विदुरः प्रेषयामास तद्वनं पुरुषं शुचिम् स गत्वा तु यथोद्देशं पाण्डवान्ददृशे वने । जनन्या सह कौरव्य मापयानान्नदीजलम् ॥ २ ॥ विदितं तन्महाबुद्धर्विदुरस्य महात्मनः ततस्तस्यापि चारेण चेष्टिनं पापचेतसः ततः प्रवासितो विद्वान्विदुरेण नरस्तदा पार्थानां दर्शयामास मनोमारुतगामिनीम् एक सौ इक्यावन अध्याय ॥ १५१ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । इसी असाधारण बुद्धिमान् विदुर को गुप्त दूत के द्वारा समय सर्वज्ञ विदुर का भेजा हुआ एक विश्वासी पुरुष दुर्योधन के दुर्विचार का हाल पहले उस वन में पहुंचा । हे कुरुनन्दन ! विदुर के भेजे गया था । इमी से पाण्डवों को राह बतलाने के हुए पुरुष ने पाण्डयों को माता के साथ नदी का लिये उन्होंने इस मनुष्य को भेज दिया था । एक जल नापते हुए देखा ॥१२॥ विश्वस्त कागगर की बनाई, हवा और लहरों के वेग .4 - .. मालूम हो -205505.0" - Poscope अध्याय १५१ ] महा मारत ७३१ Posroresreorooro roomeone.rancornreranaras सर्ववातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् । शिवे भागीरथीतीरे नरैर्विसम्भिभिः कृताम् ॥ ५ ॥ ततः पुनरथोवाच ज्ञापकं पूर्वचोदितम् युधिष्ठिर निबोधेदं संज्ञार्थं वचनं कवेः कक्षनः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः न हन्तीत्येवमात्मानं यो रक्षति स जीवति ॥ ७ ॥ तेन मां प्रेपितं विद्धि . विश्वस्तं संज्ञयानया भूयश्चैवाह मां क्षत्ता विदुरः सर्वतोऽर्थवित् ॥ ८ ॥ कर्ण दुर्योधनं चैव भातृभिः सहितं रणे शकुनि चैव कौन्तेय विजेतासि न संशयः ॥ ९ ॥ इयं वारिपथे युक्ता नौरप्सु सुखगामिनी मोचयिष्यति वः सर्वानस्माद्देशान्न संशयः ॥१०॥ अथ तान्व्यथितान्दृष्ट्वा सह मात्रा नरोत्तमान् । नावमारोप्य गङ्गायां प्रस्थितानववीत्पुनः विदुरो मून्युपाघ्राय परिष्वज्य वचो मुहुः । अरिष्टं गच्छताव्ययाः पन्थानमिति चाब्रवीत ॥ १२ ॥ को सह सकनेवाली, लंगरदार, पताका से शोभित, समझाकर यहां भेजा है । दूरदर्मा विदुर ने यह भी मन और हवा के समान वेग से जानेवाली हट नार कहा है कि आप युद्धभूमि में कर्ण, शकुनि और गंगा के किनारे बंधी हुई थी। यह नाय दिखाकर भाइयों ममेत दुर्योधन को अवश्य ही परास्त करोगे। उम मनुष्य ने पाण्डवों से कहा-हे युधिष्ठिर ! आप जल के राम्त से जाने के लिये यह नाय तैय्यार है। को विधाम दिलाने के लिये विदुर ने जो सकेत के आप गर लोग इस पर चढ़कर अवश्य इम विपति वाक्य कहे हैं सों में कहता हू । तृण आदि को मे छुटकारा पा जाओगे ||८.१०] जलानेवाला शिशिर शोषक अगि भारी जंगल में गडे उम पुरुर ने यदुन हो दुःखित युती-सहित के भीतर रहनेवाले प्राणियों को नहीं जा सकता। पाण्डवों को उस नाव पर नहार फिर कहा-विदुर यह जानकर जो कोई अपनी रक्षा करता है. यह ने आपका नाम लेकर मिर मकर और गले गाकर जीवित रहता है ।। चार यार यद कहा है कि तुम गाने में परमार है पाण्डय ! मैं विदुर का विधामी और कर निधि मगरपूर्वक जाओ। हे राजेन्द्र ! विदुर के का जानकार है। उन्होंने गुशको मारे में यह पान मंझे हुए उम पुष ने नरपेष्ठ पाण्डवों को यह मान riririrrrrrrrrrrrrorror ७३२ म हा भारत [ आदिपर्व orczcraicor000000000000.00dcocococococo ana इत्युक्त्वा स तु तान्वीरान्पुमान्विदुरचोदितः । तारयामास राजेन्द्र गंगां नावा नरर्षभान् ॥ १३ ॥ तारयित्वा ततो गंगां पारं प्राप्तांश्च सर्वशः । जयाशिपः प्रयुज्याथ यथागतमगाद्धि सः पाण्डवाश्च महात्मानः प्रतिसंदिश्य वै कवेः । गंगामुत्तीर्य वेगेन जग्मुगूढमलक्षिताः इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि गंगोत्तरणे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥ कहते हुए नाव पर गंगा के दूसरे पार पर पहुंचाया 'चला गया । पाण्डवों ने उसी पुरुष के द्वारा विदुर ॥११॥१३॥ के पाम अपने कुशल का समाचार भेज दिया। अब दूसरे किनारे पर छोडकर आशीर्वाद देकर , माता को साथ लिये हुए पाण्डव किसी के बिना जयजयकार करता हुआ वह पुरष अपने स्थान को । देख वेगपूर्वक आगे बढ़े ॥१४॥१५॥ आदिपर्व का एक सौ इक्यावन अध्याय समाप्त हुआ ।। - - . अध द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥ वैशम्पायन उवाच-अथ राव्यां व्यतीतायामशेषो नागरो जनः । तत्राजगाम त्वरितो दिदृक्षुः पाण्डुनन्दनान् ॥ १ ॥ निर्वापयन्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः । जातुपं तद् गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम् ॥ २ ॥ नृनं दुर्योधनेनेदं विहितं पापकर्मणा पापडवानां विनाकारयेत्येवं ते चुकुशुर्जनाः ॥ ३ ॥ विदिते धृतराष्ट्रस्य धार्तराष्ट्रो न संशयः दग्धवान्पाण्डुदायादान्न ह्येनं प्रतिपिद्धवान् एक सौ पावन अध्याय ॥ १५२ । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! इधर रात्रि व्यतीत तब वे सब लोग रोते हुए चिल्लाकर कहने लगे- होने पर सब नगरवासी पाण्डवों को देखने के लिये अवश्य पापात्मा दुर्योधन ने केवल पाण्डयों के नष्ट शीप्रतापूर्वक उस जल रहे लाख के घर के पास करने को ही ऐगा किया था। इसमें संदेह नहीं कि पहुंचे । आग बुझाकर मन्त्री पुरोचन को जतुगृह दुर्योधन के साथ पाण्डयों के जलाने के विषय में के साथ जला हुमा पाया ॥१२॥ पृतराष्ट्र की सम्मति थी। उनकी सम्मति न होती unoynonyryngonomyngryny --- . - अध्याय १५२ ] महा भारत ७३३ xxmarama नूनं शान्तनवोऽपीह न धर्ममनुवर्तते द्रोणश्च विदुरश्चैव कृपश्चान्ये च कौरवाः ते वयं धृतराष्ट्रस्य प्रेपयामो दुरात्मनः संवृत्तस्ते परः कामः पाण्डवान्दग्धवानास ततो व्यपोहमानास्ते पाण्डवार्थे हुताशनम् निपादी ददृशुर्दग्धां पञ्चपुत्रामनागसम् खनकेन तु तेनैव वेश्म शोधयता विलम् · । पांसुभिः पिहितं तच्च पुरुपैस्तैर्न लक्षितम् ततस्ते ज्ञापयामासुधृतराष्ट्रस्य नागराः पाण्डवानग्निना दग्धानमात्यं च पुरोचनम् ॥ ९ ॥ श्रुत्वा तु धृतराष्ट्रस्तद्राजा सुमहदप्रियम् विनाशं पाण्डुपुत्राणां विललाप सुदुःखितः ॥ १० ॥ अद्य पाण्डुम॒तो राजा मम भ्राता महायशाः । तेषु वीरेषु दग्धेषु मात्रा सह विशेषतः गच्छन्तु पुरुषाः शीघं नगरं वारणावतम् । सत्कारयन्तु तान्वीरान्कुन्तिराजसुतां च ताम् ॥ १२ ॥ तो वे मना करते । शान्तनु नन्दन भीष्म, द्रोणाचार्य, बन्द कर दिया | अब पुरवासियों ने दूत के द्वारा विदुर, कृपाचार्य और दूसरे कौरवों ने भी इस विषय धृतराष्ट्र के पास कहला भेजा कि पुरोचन, कुन्ती में धर्म पर दृष्टि नहीं दी ॥३॥५॥ और पांचों पाण्डव उस घर में जलकर मर गये है। अब हम दुरात्मा धृतराष्ट्र से कहला भेजते है कि राजा राष्ट्र पाण्डवों के विनाशरूपी अति अप्रिय तुम्हारी बड़ी आगा पूरी हुई, तुमने पाण्डयों को । समाचार को सुनकर दुःखी चित्त से विलाप करते जला मारा । इसके पश्चात् पाण्डवों को ढूढने के ' हुए कहने लगे ||८|१०|| लिये अलि को उठाकर बुझाते हुए पाचौ पुत्रों-सहित । हाय ! पाचौ वीर पाण्डव अपनी माता के साथ जली हुई मल्लाह की स्त्री को देखा ॥६७|| जलकर मर गये । आज मुझे भाई पाण्डु के मरने से उसे देखकर वो निश्चय हो गया कि पांचों भी बढकर दुख हुआ। कौरव लोग शीघ्र वारणायन पाण्डव और कुन्ती जल गई। इसी समय विदुर के में जाकर उन पाचों वीरों और राजपुत्री कुन्ती भेजे हुए पूर्वोक्त ग्यनिक ने घर को साफ करने के का अशि संस्कार करें। हमारे कुल के आचार बहाने से दूगरों के न देखने हुए उस मुरग का द्वार के मुताबिक सब पुण्य-मं किये जायं । पुरोचन नगर ७३४ म हा भारत [ आदिपर्व 000 । 050dcocor कारयन्तु च कुल्यानि शुभानि च वृहन्ति च । ये च तत्र मृतास्तेषां सुहृदो यान्तु तानपि ॥ १३ ॥ एवं गते मया शक्यं यद्यत्कारयितुं हितम् । पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत्सर्वं क्रियतां धनैः ॥ १४ ॥ एवमुक्त्वा ततश्चक्रे ज्ञातिभिः परिवारितः उदकं पाण्डुपुत्राणां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ १५ ॥ रुरुदुः सहिताः सर्वे भृशं शोकपरायणाः । हा युधिष्ठिर कौरव्य हा भीम इति चापरे ॥ १६ ॥ हा फाल्गुनेति चाप्यन्ये हा यमाविति चापरे । कुन्तीमार्ताश्च शोचन्त’ उदकं चक्रिरे जनाः ॥ १७ ॥ अन्ये पौरजनाश्चैवमन्वशोचन्त पाण्डवान् विदुरस्त्वल्पशश्चके शोकं वेद परं हि सः ॥ १८ ॥ पाण्डवाश्चापि निर्गत्य नगराद्वारणावतात् नदीं गङ्गामनुप्राप्ता मातृपष्ठा महावलाः दाशानां भुजवेगेन नद्याः स्रोतोजवेन च । वायुना चानुकूलेन तूर्णं पारमवाप्नुवन् ॥ २० ॥ ततो नावं परित्यज्य प्रययुदक्षिणां दिशम् विज्ञाय निशि पन्थानं नक्षत्रगणसूचितम् ॥ २१ ॥ आदि और जो लोग वहां जलकर मर गये हैं उनके | हाय सहदेव ! हाय कुन्ती कहकर विलाप करने बन्धु-बान्धव जाकर उनका भी अग्नि संस्कार करें। लगे। उन्होंने भी माता-सहित पाण्डवों को तिलाञ्जलि जितना द्रव्य लगे लगाकर सब कर्म इस रीति से दी । दूसरे पुरवासी लोग भी पाण्डवों की इस किये जायं जिसमें कुन्ती और वीर पाण्डव अच्छी अकालमृत्यु के लिये बड़ा शोक प्रकट करने लगे। गति को प्राप्त हो । अब अम्विका-पुत्र ने ऐसा कहकर | विदुर जी ने थोड़ा ही शोक प्रकट किया, क्योंकि जातिवालों के साथ पाण्डवों की जल क्रिया की | वे सब गुप्त वृत्तान्त जानते थे ॥१६॥१८॥ ॥११।१५|| इधर महावली पाण्डव लोग माता-सहित वारणावत सब कौरव एकत्र होकर हाय कुरुकुल भूषण | से निकलकर गंगा के किनारे पहुंचे । फिर मलाही युधिष्ठिर! हाय भीमसेन ! हाय अर्जुन ! हाय नकुल। | के भुजरल, प्रवाह के वेग और अनुकूल वायु की - Cococorn MAOImra" Om । . अध्याय १५३ ] महा मारत ७३५ rarwaseradorainreonwroomeromeo यतमाना वनं राजन्गहनं प्रतिपेदिरे ततःश्रान्ताः पिपासार्ता निद्रान्धाः पाण्डुनन्दनाः ।। २२ ॥ पुनरूचुर्महावीर्य भीमसेनमिदं वचः इतः कप्टतरं किं नु यद्वयं गहने वने । दिशश्च न विजानीमो गन्तुं चैव न शक्नुमः ॥ २३ ॥ तं च पापं न जानीमो यदि दग्धः पुरोचनः । कथं तु विप्रमुच्येम भयादस्मादलक्षिताः ।। २४.11 पुनरस्मानुपादाय तथैव बृज भारत स्वं हि नो वलवानेको यथा सततगस्तथा ॥ २५ ॥ इन्युक्तो धर्मराजेन भीमसेनो महाबलः आदाय कुन्तीं भातृ॑श्च जगामाशु महाबलः ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अतुगृहपर्वणि पाण्डववनप्रवेशे द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ।। सहायता से वे शीघ्र ही दूसरी पार जा पहुंचे। न चल सकते हैं । हमको नहीं मालम कि दुष्ट ॥११॥२०॥ पुरोचन जल गया या नहीं। यदि यह जल भो गया वे नाव को छोड़कर रात्रि को तारों के सहारे । हो तो हम औरों के बिना देखे क्योंकर इस गहरी राम्ता जानकर दक्षिण ओर चलने लगे । हे राजन् ! विपत्ति से पार होंगे। हे भारततुम्ही हम सब से उनको बड़े परिश्रम से एक तपोवन मिला । तब बली और वायु के समान तेज चलनेवाले हो। नींद से अधेि और थके-प्यासे पाण्डवों ने पराक्रमी इमलिये अब तुम फिर उसी तरह हम सब को ले भीगमन मे कहा-दे माई ! हम अब इस घने जंगल चलो । यह सुनकर भीमसेन माता और चारों भाइयों में आ पहुंचे हैं। इससे अधिक और क्या कष्ट हो को पहले की तरह उठाकर बैग के साथ चलने माना। अब न तो दिगा प्रतीत होती है और लगेर॥२६॥ आदिपर पापा मा यायन अध्याय मगान हुआ । - cca VICG अथ त्रिपञ्चागदधिरशमनमोभ्यायः ॥ १५३ ।। नापाया याच तेन विक्रममाणेन उरुवेगसमीरितम् वनं सक्षविटपं व्यापूर्णितमिवाभवत् जबाबातो वो चास्य शुचिशुक्रागमे यथा आवर्जितलनावृक्षं मार्ग चक्रे महाबलः ७३६ म हा भारत [ आदिर्पव rakooo- 230000500ccococcol/ - . -- स मृद्गन्पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् अवरुज्य ययौ गुल्मान्पथस्तस्य समीपजान् ॥ ३ ॥ सरोपित इव क्रुद्धो बने भञ्जन्महाद्रुमान् त्रि प्रसृतमदः शुष्मी षष्टिवर्षी मतङ्गराट् ॥ ४ ॥ गच्छतस्तस्य वेगेन तायमारुतरंहसः भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूर्छव समजायत असकृच्चापि सतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात्तदा कृच्छ्रेण मातरं चैव सुकुमारी यशस्विनीम् अवहत्स तु पृष्ठेन रोध सु विपमेपु च अगमच्च वनोद्देशमल्पमूलफलोदकम् क्रूरपक्षिमृगं घोरं सायाह्न भरतर्षभ घोरा समभवत्सन्ध्या दारुणा मृगपक्षिणः अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननातवैः एक सौ तिरपन अध्याय ॥ १५३ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! वेग के | गरुड़ और वायु के समान चरने के वेग से पाण्डा साथ चल रहे भीमसेन की जापों के जोर से वृक्षों मूर्षित हो गये ॥१॥५॥ और उनकी शाखाओं सहित वह वन कापने रगा। अपनी भुजाओं के द्वारा भीमसेन ने अपने भाइयों जिसप्रकार जेठ और आपाढ के महीने में प्रबल को और कुन्ती को समुद्रसदृश मार्ग के पार पहुचाया। हवा चरती है वैसे ही उस महाबरी की जाघ की नदीतट के ऊंच नीच म्थानों में अपनी पीठ पर चोट से हवा ससनाने रगी । भीमसेन के वेग से | सुकुमारी यशस्विनी माता कुन्ती को चढाये हुए बड़ी सामने के वृक्ष और लताए हट हटकर गिर जाने से सावधानी के साथ चरते थे । इसप्रकार बड़े कट यह रास्ता बराबर होता चला जाता था। वे आस से अनेक वन रापकर भी दुष्ट दुर्योधन के डर से पाप्स के फले पूले वृक्षों को, रताओं को और पाण्डय अपने को छिपाये हुए ही चरने लगे॥६७॥ झाड़ियों को तोड़ते और कुचलते हुए चले जा रहे इसके पश्चात् वे एक ऐसे भयानक निर्जन वन थे। गर्दन आदि तीन अङ्गों से साठ वर्ष की अवस्था में जहा फल-मूर या जर का नागौनशान न था वारा क्रोधित गजराज जिसप्रकार वन के बड़े बड़े | और हिंसक पशु पक्षी रहते थे सन्ध्या के समय आ पेड़ों को तोड़ता हुआ चला जाता है वैसे ही ये | पहुचे । धीरे धीरे सन्ध्या का घना अधरा और भी बड़े-बड़े पेड़ों को तोड़ते हुए चले जा रहे थे। उनके | गहरा हो आया। उस समय वन के सर पशु पक्षी .. - , roro000 202/05o ७३७ अध्याय १५३ ] महा भारत oicolor0010 100coooooooooole - शीर्णपर्णफलै राजन्बहुगुल्मक्षुपैर्दुमैः भग्नावभुग्नभूयिष्ठेर्नानाद्रुमसमाकुलैः ते श्रमेण च कौरव्यास्तृप्णया च प्रपीडितः । नाशवनुवंस्तदा गन्तुं निद्रया च प्रवृद्धया ॥ ११ ॥ म्यविशन्त हि ते सर्वे निरास्वादे महावने । ततस्तृपापरिक्लान्ता कुन्ती पुत्रानथाब्रवीत् ॥ १२ ॥ माता सती पाण्डवानां पञ्चानां मध्यतः स्थिता । तृष्णया हि परीतास्मि पुत्रान्भृशमथाब्रवीत् ॥ १३ ॥ तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात्प्रजल्पितम् । कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे ततो भीमो वनं घोरं प्रविश्य विजनं महत् । न्यग्रोधं विपुलच्छायं रमणीयं ददर्श ह ॥ १५ ॥ तत्र निक्षिप्य तान्सर्वानुवाच भरतर्षभः पानीयं मृगयामीह विश्रमध्वमिति प्रभो ॥ १६ ॥ एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः ध्रुवमत्र जलस्थानं महच्चेति मतिर्मम अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत । जगाम तत्र यत्र स्म सारसा जलचारिणः ॥ १८ ॥ भयानक शब्द करने लगे । सब दिशाओं को माता होकर पांची पाण्डवों के बीच में रहकर भी अन्धकार ने ढक लिया। वायु बड़े वेग से चल रही जल की प्यास से कातर हो गई । कुन्ती के मुँह से थी। उससे वहां के गले, सड़े पत्ते और सूखे फलवाले बार-बार यही बात सुनकर भीमसेन बहुत दुःखी हुए। छोटे-बड़े पेड़ और लता कुछ टूटने और कुछ नीचे माना के मह और करुणा के मारे उनसे रहा नहीं गिरने लगे ॥८॥१०॥ गया । वे फिर माना और चारों भाइयों को लेकर उस समय पाण्डव प्यास, निद्रा और थकावट के पानी की तराग में आगे बढ़े । उस घोर वन में कारण से आगे न चल सके । वहीं विना अन और जाकर एक बड़ा भारी घनी छायावाला यरगद का जग के पड़े रहे । तब प्याम से व्याकल हो रही पड़ दसा ॥११.१५॥ कुन्ती ने पाण्डवों से कहा-में पान पाण्डयों की हे राजन् ! भरतश्रष्ठ भीमसेन उन सबों को यहां rrrrrrrrror ७३८ महा मारत [ आदिपर्व Ookooooooooooooooz4 Kococococonce स तत्र पीत्वा पानीयं स्नात्वा च भरतर्षभ । तेपामर्थे च जग्राह भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलः उत्तरीयेण पानीयमानयामास भारत ॥ १९ ॥ गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति । शोकदुःखपरीतात्मा निशश्वासोरगो यथा ॥ २० ॥ स सुप्तां मातरं दृष्ट्वा भ्रातृ॑श्च वसुधातले भृशं शोकपरीतात्मा विललाप वृकोदरः ॥ २१ ॥ अनः कटतरं किं नु द्रष्टव्यं हि भविष्यति । यत्पश्यामि महीसुप्तान्भ्रातृनद्य सुमन्दभाक् ॥ २२ ॥ शयनेषु पराद्धर्येषु ये पुरा वारणावते नाधिजग्मुस्तदा निद्रां तेऽद्य सुप्ता महीतले ॥ २३ ॥ स्वसारं वसुदेवस्य शत्रुसङ्घावमर्दिनः कुन्तिराजसुतां कुन्ती सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ २४ ॥ स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्या पाण्डोमहात्मनः । तथैव चास्मजननी पुण्डरीकोदरप्रभाम् ॥ २५॥ सुकुमारतरामेनां महार्हशयनोचिताम् शयानां पश्यताऽद्येह पृथिव्यामतथोचिताम् उतार कर बोले-तुम सब यहीं पर विश्राम करो। | और चारों पाण्डव सो गये थे । उनको इसतरह तेसी मैं जरू की तलाश में आता है। यहा जल में चरने- दशा में पड़े देखकर भीमसेन को बड़ा ही शक वाले सारसों का शब्द सुन पड़ता है । मतीत होता हुआ। वे साप की तरह लम्बी लम्बी सासें देते है कि यहा पास ही कोई बड़ा भारी तालाब है। पिराप करते हुए कहने लगे-अब इससे बढकर और बड़े भाई की आज्ञा लेकर उसी ओर भीमसेन चले क्या दु ख होगा कि मैं अपने भाई और माता को ॥१६॥१८॥ जो बड़ी उत्तम सेजों पर महलों में सोते थे आज हे महाराज ! उन्होंने यहा नहाकर जल पृथ्वी पर पड़े हुए इस प्रकार से सोते हुए देयता पिया । फिर वे पानी में दुपट्टा भिगोकर माता और | हशिनुदर नागी वसुदेव की वहन, राजा कुन्तिभोज भाइयों के रिये जर ले चले । वह स्थान दो कोस की पुत्री, विचिनीर्य की वह, महात्मा गजा पाण्ड की दूरी पर था । परन्तु भीमसेन वायु के समान की स्त्री और हमारी माता है जो सब अच्छे लक्षणों चलकर यहुत शीघ्र आन पहुंचे। उस समय कुन्ती से सुशोभित, कमर के गामे के समान कान्तिवारी, - - cro-50 अध्याय १५३ ] महा भारत ७३९ HOJ20100100 oa arracocococococa wwcowcase । धर्मादिन्द्राञ्च वाताञ्च सुपुवे या सुतानिमान् । सेयं भूमौ परिश्रान्ता शेत प्रासादशायिनी ॥ २७ ॥ किं नु दुःखतरं शक्यं मया द्रामतःपरम् योऽहमद्य नरव्याघ्रान्सुप्तान्पश्यामि भूतले ॥ २८ ॥ त्रिषु लोकेषु यो राज्यं धर्मनित्योऽहते नृपः सोऽयं भृमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत्कथम् ॥ २९ ॥ अयं नीलाम्बुदश्यामो नरेप्वप्रतिमोऽर्जुनः । शेते प्राकृतवद्भूमौ ततो दुःखतरं नु किम् अश्विनाविव देवानां याविमौ रूपसंपदा तो प्राकृतवदद्यमौ प्रसुप्तौ धरणीतले ज्ञातयो यस्य नै व स्युर्विपमाः कुलपासनाः । स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ॥ ३२ ॥ एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत्पर्णफलान्वितः । चैत्यो भवति निर्धातिरर्चनीयः सुपूजितः ॥ ३३ ॥ येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः । ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ॥ ३४ ॥ सुकुमारी और बहुमूल्य परग पर सोने के योग्य बराबर इस मातरोक में कोई नहीं है आज साधारण होकर भी आज वनभूमि में पड़ी सो रही है। जिसने मनुष्य की तरह पृथ्वी पर पड़े हुए है । इससे धर्मराज इन्द्र और वायु से हम सबको उत्पन्न किया बढकर और दुख क्या हो सकता है । ये दोनों है और उत्तम से उत्तम स्थानों में शय्या पर सान के नकुल और सहदेव जो मनुप्यों में ऐसे सुन्दर और यंग्य है अब इस विपति में यहा पृषी पर पड़ी गुणवान् हैं जसे देवताओं में अश्विनीकुमार है आज हुई है ॥१०॥२७॥ इस आपत्तिकाल में प्रारत मनुष्यों की तरह पृवी इमसे बढकर दुम्प और कष्ट की बात और क्या । पर पड़े हुए हैं ॥२८॥३१॥ देखने को मिरेगी। मैं इन पुरुपा म श्रेष्ठ पाण्डवों जिस मनुष्य के म्बनाती तुलनाशक नहीं होते को परवी पर पड़े हुए दंसता हु । ये युधिष्ठिर जो है वह मनुष्य गाय में अमेरे पक्ष के समान युसपूर्वक सब रामाओं के मुरगाण होने के योग्य है ये भाज जाता है । निस गाव में एक ही वृक्ष होता है और साधारण मनुष्य की तरह यपर रवी पर सो रहे फनता परता है उस गाव में सह पृष्ठ जातिवागं है। ये नारे बादल के समाा श्रीमान् मर्जुन निनके के न होने के कारण से पूजित बना रहता है। और ।
[ आदिपर । । raraicorracorrorror महा भारत aroooorcecorcarrored वलवन्तः समृद्धार्थी मित्रवान्धवनन्दनाः जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ॥ ३५॥ वयं तु धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण दुरात्मना विवासिता न दग्धाश्च कथंचिंदैवसंश्रयात् ॥ ३६ ॥ तम्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः । को दिशं प्रतिपत्स्यामः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ॥ ३७ ॥ सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥ प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते । नन्वद्य ससुतामात्यं सकर्णानुजसोवलम् गत्वा क्रोधसमा विष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम् । किं नु शक्यं मया कर्तुं यत्ते न क्रुध्यते नृपः ॥ ४० ॥ धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः एवमुक्त्वा महावाहुः क्रोधसंदीप्तमानसः ॥४१॥ करं करेण निपिप्य निःश्वसन्दीनमानसः । पुनर्दीनमना भूत्वा शान्ताचिरिब पावकः ॥ ४२ ॥ जिस मनुष्य के स्वजाती सब शूरवीर और धर्मात्मा | इस समय तू अपनी इच्छा पूरी कर ले । इसमें होते हैं तो वह मनुष्य भी सुखपूर्वक रहता है। संदेह नहीं कि अभी तुझपर देवनाओं की कृपा है। जो मनुष्य बरबान और मित्र और भाई-बन्धवों की पोंकि राजा युधिष्ठिर तुझे मारने की आज्ञा मुझसे प्रसन्नता करनेवाले होते है ये परस्पर एक दूसरे के | नहीं देते । हे नीच ! इसी से तू अब तक जी रहा आश्रय रहकर वन में एक साथ उत्पन्न हुए वृक्षों की है। नहीं तो तुझ, मन्त्री, भाई, कर्ण और शकुनि- तरह आनन्द से रहते हैं ॥३२॥३५॥ सहित मारकर अभी यमलोक भज सकता है, पर दुष्ट धृनराष्ट्र और उसके दुरात्मा पुत्रों ने हमको क्या करू, धर्मामा नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर तुझपर देश से निकालकर जलाना चाहा था। देवाधीन बचकर क्रोध ही नहीं करते। यों कहते हुए भागमेन प्राध अब यहां इस वृक्ष के नीचे आये हैं । न जाने अब के मारे तपे हुए अजारों के समान लाल हो उठे और इस वन के प्लेशों को भोगते हुए कहां जायेंग' हाथ से हाथ मलने लगे। शोक के मार उन्होंने ॥३६:३७॥ लम्बी मांगरी। फिरवुशी हुई आग की तरह दीन बुद्धि, अददी धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ! होकर नमसन पृथ्वी पर साधारण पुरषों की तरह - - arerrrrrrrrrrrrrror Hococo 00004 । अध्याय १५४ ] महा मारत ७४१ Poornworomocrococoncorce भ्रातृन्महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः विश्वस्तानिव संविष्टान्पृथग्जनसमानिव ॥४३॥ नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वयम् ॥ ४४ ।। पास्यन्तीमे जलं पश्चात्प्रतिवुद्धा जितक्लमाः इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा ॥ १५॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमजलाहरणे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥ समाप्त जतुगृहपर्व । बेखटके सो रहे भाइयों की ओर देखने लगे। वे आप जब इनकी थकावट दूर हो जायगी तब ये उठकर ही आप कहने लगे-चारणावत नगर यहां से बहुत दूर जल पियेंगे। यह विचार करके भीमसेन जागते हुए नहीं है । यहां पर जागते रहना चाहिये । ये सब पहरा देने लगे ॥३८॥४५॥ सो रहे हैं इसलिये अब मै यहां जागता रहूगा । आदिपर्व का एक सा तिरपन अध्याय समाप्त हुआ ॥ अथ चतु पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ अथ हिडिम्बवधपर्व। वैशम्पायन उवाच-तत्र तेषु शयानेषु हिडिम्यो नाम राक्षसः अविदूरे वनात्तस्माच्छालवृक्षं समाश्रितः क्रूरो मानुपमांसादो महावीर्यपराक्रमः प्राड्जलधरश्यामः पिङ्गाक्षो दारुणाकृतिः ॥ २ ॥ दंष्ट्राकरालवदनः पिशितेप्सुः क्षुधादितः लम्वस्फिग्लम्बजठगे रक्तश्मश्रुशिरोरुहः महावृक्षगलस्कन्धः शंकुकर्णो विभीपणः यदृच्छया तानपश्यत्पाण्डुपुत्रांन्महारथान् एक मा चयन अध्याय ।। १५४ ॥ वैशम्पायन ने कहा-दे गजन् ! उस वन में जहां गक्षस रेटा हुआ था। उस दारण रूपवाले राक्षम पर पाण्डव सो रहे से वहां से थोड़ी दूर पर गाल की जा और पेट बढ़ा लम्या था । में श्री के पेड़ के ऊपर मनुष्य-मामाहारी, बड़ा वीर्ययन्त और दाद पैनी तथा कराल थी! दादी-मूंछ और और पराक्रमी, वपाल के मंघ के समान काग, मिक बाल गल थे । गर्दन और ये बड़े भारी देमने में भयानक, भूम्मा हिटिंय नामक एक कुटिल गृक्ष के ममान थे । दोनों कान नदी ध । - । नाद ७४२ म हा भारत [ आदिपर्व cooooo C.4 Cocor विरूपरूपः पिङ्गाक्षः करालो घोरदर्शनः पिशितेप्सुः क्षुधार्तश्च तानपश्यद्यदृच्छया ऊर्ध्वालिः स कण्डूयन्धुन्वन्रूक्षाशिरोरुहान् । जृम्भमाणो महावक्त्रः पुनः पुनरवेक्ष्य च हृष्टो मानुषमांसस्य महाकायो महाबलः मेघसंघातवमा च तीक्ष्णदंष्ट्रोज्ज्वलाननः आघाय मानुपं गन्धं भगिनीमिदमब्रवीत् । उपपन्नश्चिरस्याद्य भक्ष्योऽयं मम सुप्रियः ॥ ८ ॥ स्नेहस्रवान्प्रस्रवति जिह्वा पर्येति मे सुखम् । अष्टौ दंष्ट्राः सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्यापातदुःसहाः देहेषु मज्जयिष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च आक्रम्य .मानुपं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि ॥१०॥ उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं बहु । गच्छ जानीहि के वेते शेरते वनमाश्रिताः ॥११॥ मानुपो बलवान्गन्धो घाणं तर्पयतीव मे हत्वैतान्मानुपान्सर्वानानयस्व ममान्तिकम् 'देखने में बड़े भयानक उस पिघली हुई आंखयाले, तेज है। उन्हें मैं जिसके अंग में गड़ा दूं वह उनके मांस खानेवाले, भूखे.करालरूप राक्षस दृष्टि आघात से जीता नहीं बच सकता। वे ही असह्य एकाएक सोते हुए पाण्डवों पर पड़ी । मनुष्यों की | दांत आज मै बहुत दिनों के बाद इन मनुष्यों के गन्ध सूंघकर उंगलियों से सिर के रूखे और खड़े | कोमल शरीर के मांस में धंसाऊंगा । आज मै मनुष्य बालों को खुजलात-युजलाते वह राक्षस बार-बार का गला पकड़कर, नसें निकालकर बहुत सा रक्त पाण्डवों की ओर देखने और जम्माई लेने लगा। पिऊंगा । तू वहां इन लोगों के पास जा । यह चड़े भारी डील-डोलवाला महायली यह राक्षस मनुष्य जानने की चेष्टा कर कि ये कौन हैं जो इस वृक्ष मांस खाने की आशा से प्रसन्न होकर अपनी बहन से | की जड़ में पड़े सो रहे हैं ॥१॥११॥ कहने लगा-मनुष्य का मांस साना मुझे बहुत रुचता मुझको निश्चय जान पड़ना है कि वे मनुष्य ही है। वही नर-मांस आज दैवयोग से सहज ही पास होंगे क्योंकि मनुष्य की तेज गन्ध मेरी नासिका में आ गया है । उसे देखकर मेरे मुँह से लाल टपक प्रवेश कर रही है । तुम उन मनुष्यों को मारकर रही है। मेरे आट दांतों का अगला भाग बड़ा | शीघ्र मेरे पास ले आओ। यहां पर मेरा ही ranoryroidroine
HARA
-मीडिम्य राधम या पाण्डको दमना पाण्डया यां मारपर लगन से अपनी
पनि डिम्यो पा भगना । :-भीममन र हिडिम्य ग युर।
७४३ अध्याय १५४ म हा भारत- Occ Good 202 CO colod अस्मद्विषयसुप्तेभ्यो नैतेभ्यो भयमस्ति ते एपामुस्कृत्य मांसानि मानुपाणां यथेष्टतः ॥१३॥ भक्षयिष्याव सहितौ कुरु तूर्णं वचो मम भक्षयित्वा च मांसानि मानुपाणां प्रकामतः ॥ १४ ॥ नृत्याव सहितावावां दत्ततालावनेकशः एवमुक्ता हिडिम्बा तु हिडिम्वेन तदा वने भ्रातुर्वचनमाज्ञाय त्वरमाणेच राक्षसी जगाम तत्र यत्र स्म पाण्डवा भरतर्षभ ॥ १६ ॥ ददर्श तत्र सा गत्वा पाण्डवान्पृथया सह । शयानान्भीमसेनं च जाग्रतं स्वपराजितम् ॥ १७ ॥ दृष्ट्वैव भीमसेनं सा शालपोतमिवोद्गतम् राक्षसी कामयामास रूपेणाप्रतिमं भुवि: ॥ १८ ॥ अयं श्यामो महावाहुः सिंहस्कन्धो महाद्युनिः । कम्बुग्रीवः पुष्कराक्षो भर्ता युक्तो भवेन्मम ॥. १९ ॥ नाहं भ्रातुर्वचो जातु कुर्यां क्रूरोपसहितम् । पतिस्नेहोऽतिबलवान्न तथा भ्रातृसौहृदम् ॥ २० ॥ मुहूर्नमेव तृप्तिश्च भवेदातुर्ममेव च हतरेतैरहत्वा तु मोदिप्ये शाश्वतीः समाः ॥ २१ ॥ अधिकार है । यहा तुझको किसी प्रकार का भय रहे हैं ॥१४॥१७॥ नहीं है ॥१२॥१३॥ नये साल के वृक्ष के समान बड़े ऊंचे कन्धोंवाले आज हम तुम दोनों इनके मास को खाकर प्रसन्न अद्वितीय सुन्दर भीमसेन के मनोहर रूप को देखकर होंगे । तुम मेरा कहा जल्दी करो। हम अपनी ही यह काम के वश में हो गई । यह विचार करने इच्छा के अनुसार मास खाकर इसी वन में ताल लगी कि यह महाभुज, मिह की सी गर्दनवाला, देकर नाचेंगे । हे भरतश्रेष्ठ ! हिडिम्ब के ये बनन अतिद्युतिमान, शहनीव, पद्मनेत्र पुरुप मेरा पनि होने मुगकर हिडिम्बा राक्षमी का आई जहा पाण्डर सो ' के योग्य है ॥१८॥१०॥ रहे थे। वहां पहुंचकर उसने देखा कि कुन्ती-सहित में कभी अपने घर माई की निटर आशा का चारों पाण्डव पड़े सो रहे है; अले भीममेन जाग पालन नहीं करगी। त्रियों को जितना पति प्यारा reserverin ७४४ म हा भारत [ आदिर्पव D><oo । vrokaroraroo । - सा कामरूपिणी रूपं कृत्वा मानुपमुत्तमम् उपतस्थे महावाहुं भीमसेनं शनैः शनैः ॥ २२ ॥ लजमानेव ललना दिव्याभरणभूपिता स्मिनपूर्वमिदं वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ २३ ॥ कुतस्त्वमसि संप्राप्तः कश्चासि पुरुषर्षभ क इमे शेरते चेह पुरुपा देवरूपिणः ॥ २४ ॥ केयं वै वृहती श्यामा सुकुमारी तवानघ शेते वनमिदं प्राप्य विश्वस्ता स्वगृहेयथा ॥ २५ ॥ नेदं जानाति गहनं वनं राक्षससेवितम् वसति पत्र पापात्मा हिडिम्वो नाम राक्षसः ॥ २६ ॥ तेनाहं प्रेषिता भ्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा विभक्षयिपता मांसं युष्माकममरोपमाः ॥ २७॥ साहं त्वामभिसंप्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम् नान्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ २८ ॥ एतद्विज्ञाय धर्मज्ञ युक्तं मयि समाचर कामोपहतचित्तागी भजमानां भजस्व माम् ॥ २९ ॥ होता है उतना भाई नहीं होता । इनको मारने से ये जो देवतुल्य पुरुष पड़े सो रहे है सो कौन है ? मेरे भाई को और मुझको क्षणभर, सुख मिलेगा और | हे अनघ ! तपे हुए सुवर्ण के समान कान्तिवाली न मारने से मैं इसके साथ आनन्दपूर्वक सदैव रमण कोमलाङ्गी यह स्त्री आपकी कौन है, जो इस घोर. करूंगी ॥२०॥२१॥ वन को अपने घर के समान निर्भय स्थान समझकर अनेक रूप धारण करनेवाली उस राक्षसी ने यों | बेखटके सो रही है ? क्या आप यह नहीं जानते विचार करके उसी दम सुन्दर मानुपी रूप धारण कि इस वन में रक्षस लोग रहते हैं। यहां पर हिडिम्ब कर लिया । अब वह धीरे धीरे टहरती हुई भीमसेन नामवाला एक पापी राक्षस रहता है ॥२२॥२६॥ के पास पहुंची । सुन्दरी, पीन पयोधरों से मनोहर, वह मेग भाई है । हे देवतुल्य पुरुषश्रेष्ठ ! उस कमलमुखी, मनुष्य के रूप को धारण करनेवाली राक्षम ने आप लोगों का मांस खाने के विचार से, वह राक्षसी नम्रता और लज्जा का भाव दिखाती आप लोगों की हत्या के लिये, मुझे इस जगह भेजा हुई कुछ मुसकराकर भीमसेन से कहने लगी कि है; परन्तु मै सत्य कहती हूं कि आपको देखकर हे पुरुषश्रेष्ठ ! आप कौन हैं ? कहां से आये हैं ! ! अब और किसी को अपना पति बनाने के लिये rcono704 20:007. 10mrorn ७४१ - अध्याय १५४ ] महा भारत 00000004 प्रास्यामि त्वां महाबाहो राक्षसात्पुरुषादकात् । वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ अन्तरिक्षचरी ह्यस्मि कामतो विचरामि च अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मया सह ॥३१॥ भीमसेन उवाच-मातरं भ्रातरं ज्येष्ठं सुखसुप्तान्कथं विमान् । परित्यजेत को न्वद्य प्रभवन्निह राक्षसि ॥ ३२ ॥ को हि सुप्तानिमान्भातृन्दत्वा राक्षस भोजनम् । मातरं च नरो गच्छेत्कामात इव मद्विधः ॥ ३३ ॥ राक्षम्युनाव-यत्ते प्रियं तत्करिष्ये सर्वानेतान्प्रवोधय मोक्षयिष्याम्यहं कामं राक्षसात्पुरुषादकात् ॥ ३४ ॥ भीम उवाच-सुखसुप्तावने भ्रातृन्मातरं चैव राक्षसि न भयाद्वोधयिष्यामि भ्रातुस्तव दुरात्मनः ॥ ३५ ॥ न हि मे राक्षसा भीरु सोढुं शक्ताः पराक्रमम् । न मनुष्या न गन्धर्वा न यक्षाश्चारुलोचने ॥ ३६ ॥ गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद्वाऽपीच्छसि तत्कुरु । तं वा प्रेपय तन्वति भ्रातरं पुरुपादकम् ॥ ३७॥ इतिश्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिग्यवधपर्वणिहिडिम्याभीमसंवाद चतु पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय.१५४ मेग जी नहीं चाहता । हे धर्मशील ! यह जानकर भीमसेन ने कहा-हे राक्षसी ! ऐसे सुख भागने जो उचित हो सो कीजिए। काम ने मेरे हृदय पर के लिय माता, बड़े भाई तथा छोटे भाइयों को कौन अपना अधिकार कर लिया है । मै आपको भजने ! छोड़ देगा ! मेरे सदृश कौन पुरुप काम के वश के लिये आग्रह कर रही हू । आप कृपा करके मुझे होकर मुख से साये हुए भाइयों को तथा माता अनीकार कीजिए ॥२७२९॥ 1 को राक्षस के मुह में छोड़कर चरा जा सकता है। हे महाभुज ! मै उस मनुष्य के माम के आहार भीमसेन के ये वचन सुनकर राक्षमी ने कहा-आप करनेवाले राक्षस से आपको बचाऊगी । आप मेरा जो कहेंगे वही, आपकी प्रसन्नता के लिये, में संगी। पति होना म्वीकार करें। मैं आकाश मार्ग में उड़ आप इन रोगों को जगा दीजिए । म सहज ही सक्ती हूं । इच्छानुमार आश आदि सब स्थानों में इन सबका मनुष्य के सानवाले राक्षम के हाथ में चलती फिरती हु। मेरे साथ उन स्थानों की सर से छुड़ाऊगी ॥३२॥३४॥ करने से आपको पड़ा आनन्द प्राप्त होगा ॥३०॥३१॥ भीममेन ने कहा-हे राक्षसी ! मै तेरे दुरामा mroomyra ७४६ महा मारत । आदिपर्व Hcolok00000000000054 mco - पापी भाई के डर से इस वन में सुख से सोये हुए मन में आवे सो कर चाहे जा, चाहे रह; और चाहे भाइयों और माता को नहीं जगा सकता। हे भीरु! अपने भाई को भेज दे । मुझे उसका टर नहीं है। राक्षस, गन्धर्व, मनुष्य और यक्ष आदि कोई मेरे ॥३५॥३७॥ पराक्रम को नहीं सह सकता है । हे भद्रे ! तेरे आदिपर्व का एक सौ चौवन अध्याय समाप्त हुआ । अथ पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥ वैशम्पायन उवाच-तां विदित्वा चिरगतां हिडिम्वो राक्षसेश्वरः । अवतीर्य द्रुमात्तस्मादाजगामाशु पाण्डवान् लोहिताक्षो महावाहुरूर्ध्वकेशो महाननः मेघसङ्घातवां च तीक्ष्णदंष्ट्रो भयानकः तमापतन्तं दृष्ट्वैव तथा विकृतदर्शनम् हिडिम्बोवाच वित्रस्ता भीमसेनमिदं वचः ॥ ३ ॥ आपतत्येप दुष्टात्मा संक्रुद्धः पुरुपादकः साऽहं त्वां भ्रातृभिः सार्ध यद्ब्रवीमि तथा कुरु ॥ ४ ॥ अहं कामगमा वीर रक्षोचलसमन्विता आरुहेमां मम श्रोणिं नेष्यामि त्वां विहायसा ॥ ५ ॥ प्रबोधयैतान्संसुप्तान्मातरं च परंतप सर्वानेव गमिष्यामि गृहीत्वा वो विहायसा ॥ ६ ॥ भीम उयाच -मा भैस्त्वं पृथुसुश्रोणि नैप कश्चिन्मयि स्थिते । एक सौ पचपन अध्याय ॥ १५५ । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके | से भरा हुआ बड़ी डरावनी सूरत बनाये हुए आ पश्चात् लाल नेत्र किये, लम्बे हाथ फैलाये, खड़े हुए रहा है । अब मै जो कहती हूं सो आप अपने बालोवाला, बड़े मुँहवाला, बादल के समान काला, | भाइयों सहित कीजिए । हे वीर ! मै आनी जाति तेज दांतोंवाला वह विकराल कराल्युक्त हिडिम्ब नाम के बल-वीर्य रखने के हेतु जहां चाहं तहां जा राक्षस अपनी बहन को देर की गई हुई जानकर सकती हूं। आप मेरी पीठ पर चढ़ जाइए। मैं आपकी उस शाल के वृक्ष से नीचे उतरकर पाण्डवा के पास आकाश-मार्ग से ले जाऊंगी. हे शत्रुनाशी ! आप शीघ्र आने लगा । उसको आत हुए देखकर हिडिम्बा इन सोई हुई माता और भाइयों को जगा दीजिए। ने डरकर भीमसेन से कहा-देखा, मेरा भाई क्रोध मै सबको लकर आकाश-मार्ग से जाऊगी ॥१६॥ - 9 rrroraoonzoo 4.in 7.rornvrroro अध्याय १५५ ] महाभारत 000000000corosco700c0.00comcolo । हिंसितुं शक्नुयाद्रक्ष इति मे निश्चिता मतिः । अहमनं हनिष्यामि प्रेक्षन्त्यास्ते सुमध्यमे ॥ ७ ॥ नायं प्रतिवलो भीरु राक्षसापसदो मम सोढुं युधि परिस्पन्दमथवा सर्वराक्षसाः पश्य पाहू सुवृत्तौ मे हस्तिहस्तनिभाविौं । उरू परिघसङ्काशी संहतं चाप्युरो महत् ॥ ९ ॥ विक्रमं मे यथेन्द्रस्य साऽद्य द्रक्ष्यसि शोभने । मावमंस्थाः पृथुश्रोणि मत्वा मामिह मानुषम् ॥ १० ।। हिडिम्योगाच-नावमन्ये नरव्याघ्र त्वामहं देवरूपिणम् • दृष्टप्रभावस्तु मया मानुपेवेव राक्षसः वैशम्पायन उवाच-तथा संजल्पतस्तस्य भीमसेनस्य भारत वाचः शुश्राव ताः क्रुद्रो राक्षसः पुरुपादकः ॥ १२ ॥ अवेक्षमाणस्तस्याश्च हिडिम्बो मानुषं वपुः । स्रग्दामपूरितशिखं समग्रेन्दुनिभाननम् सुभ्रूनासाक्षिकेशान्तं सुकुमारनखत्वचम् सर्वाभरणसंयुक्तं सुसूक्षमाम्बरवाससम् ॥ १४ ॥ भीमसेन ने कहा- हे सुन्दरी ! तुम डरो नहीं। है । मै आपका अनादर नहीं करती परन्तु मनुष्य मेरे आगे यद, राक्षस कोई चीज नहीं है । हे सुन्दर पर राक्षस का जितना प्रभाव है यह मैं देख चुकी कमरारी ! मैं अभी तुम्हारे देखते ही देसने इसे है। वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! भीमसेन हिटिम्या यमलोक में पहुचाता है । यह एक अलग राक्षस से ये बातें कर ही रहे थे कि इतने में मनुष्य के क्या है यदि यहुन से राक्षस भी हो तो भी मेरा खानेवाले विटिम्प ने पोधपूर्वक आकर यह पनि तुछ नहीं कर सकते है ॥८॥ सुन ॥११.१२॥ हाथी की मूड के समान यह मेरी दोनों भुजा, उसन देसा कि हिटिम्बा मुन्दर स्त्री का का रोहे के मुद्दर के समान दोनों जांघे और बड़ी हर छाती धरण किप हुए है। उसकी चोटी में प्रों की को देख मुझे मनुष्य जानार यह न समझना कि माला रिपटी हुई है। गुग्य पूर्ण चन्द्रमा के समान यह कुछ नहीं कर सकेगा । मेरा इन्द्र के समान मनादर है । नम और त्वचा कोमल है । भौं, नाम, पराकम तुमसे अभी मालम हो जायगा ॥१०॥ नेत्र और कम सर मुटौल है। मुन्दर पना यात्र हिडिया ने कहा गयान ! आप देवासी नया व अमों में गर्दने पहने हुए हैं। उनके पसे - [ आदिपर्व booroscococc ७४८ म हा भारत rormona तां तथा मानुषं रूपं विभ्रती सुमनोहरम् ।' पुस्कामां शङ्कमानश्च चुक्रोध पुरुषादकः संक्रुद्धो राक्षसस्तस्या भगिन्याः कुरुसत्तम उत्फाल्य विपुले नेत्रे ततस्तामिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥ को हि मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः । न विभपि हिडिम्बे किं मत्कोपाद्विप्रमोहिता धिक्त्वामसति पुस्कामे मम विप्रियकारिणि । पूर्वेषां राक्षसेन्द्राणां सर्वेषामयशस्करि ॥ १८॥ योनि मानाधिनाऽकार्विप्रियं सुमहन्मम एप तानद्य वै सर्वान्हनिष्यामि त्वया सह ॥ १९॥ एवमुक्त्वा हिडिम्बां स हिडिम्बो लोहितेक्षणः । वधायाभिपपतिनान्दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ॥ २०॥ तमापतन्तं संप्रेक्ष्य भीमः प्रहरतां वरः भसयामास तेजस्वी तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥ वैशम्पायन उवाच-भीमसेनस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं प्रहसन्नित्र भगिनी प्रति संक्रुद्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ किं ते हिडिम्ब एतैर्वा सुख मुप्तैः प्रबोधितैः । मामासादय दुर्बुद्धे तरसा स्वं नराशन ॥ २३ ॥ सुन्दर मानुषी रूप को देखते ही राक्षस ताड़ गया | गई और मेरा अप्रिय करके मनुष्य को चाहने रगी। कि वह भीमसेन पर रीझ गई है और उनसे अङ्ग- तुझकोधिकार है । तुझने राक्षसों के कुल को करवित सङ्ग चाहती है । यह देख हिडिम्ब और भी क्रोध कर दिया है । तूने इन्हीं पुस्पा के बलपर साहस से राल हो गया । हे कुरुश्रेष्ठ ! तब क्रोध से करके मेरा अप्रिय किया है । देख, मै अभी इन लाल-लाल आखें निकालकर उसने वहन से कहा सनको और इनके साथ तुझको भी मारे डारता ह ॥१३॥१६॥ ॥१७॥१९॥ मै इन मनुष्यों को मारकर इनका मास खाना यह कहकर वह राक्षस लाल-लाल आखों से चाहता हू । इसमें कौन दुर्बुद्धि विघ्न डाल रहा है। घूरता और दात पीसता हुआ पाण्डवों को मारने है हिडिम्बा ! तू मेरे क्रोध को भूलकर निडर हो | के लिये दाड़ा । मारने में दक्ष तेजस्वी भीमसेन ने । ine norm ror/co अध्याय १५५ ] महाभारत roco/roc000 000000000 मय्येव प्रहरैहि त्वं न स्त्रियं हन्तुमर्हसि विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ २४ ॥ न हीयं स्ववशा वाला कामयत्यद्य मामिह । चोदितैपा ह्यनङ्केन शरीरान्तरचारिणा ॥ २५॥ भगिनी तव दुर्वृत्त रक्षसां वै यशोहर त्वन्नियोगेन चैवयं रूपं मम समीक्ष्य च ॥ २६ ॥ कामयत्यद्य मां भीरुस्तव नैपापराध्यति अनङ्गेन कृते दोपे नेमां गर्हितुमर्हसि ॥ २७॥ मयि तिष्ठति दुष्टात्मन्न स्त्रियं हन्तुमर्हसि । संगच्छस्व मया सार्धमेकेनैको नराशन ॥ २८ ॥ अहमेको गमिष्यामि त्वामद्य यमसादनम् अद्य मद्वलनिप्पिष्टं शिरो राक्षस दीर्यताम् ॥ २९ ॥ कुञ्जरस्येव पादेन विनिप्पिष्टं चलीयसः अद्य गात्राणि ते कङ्काः श्येना गोमायवस्तथा ॥ ३० ॥ कर्पन्तु भुवि संहृष्टा निहतस्य मया मृधे । क्षणेनाद्य करिष्येऽहमिदं वनमराक्षसम् पुरा यद्दपितं नित्यं त्वया भक्षयता नरान् ॥ ३१ ॥ उसको आते देसकर लालन के साथ कहा कि | देखकर वह काम के वश हो गई। इसमें इस स्त्री टहर जा ॥२०॥२१॥ का क्या दोष ! दोप तो कामदेव का है फिर तू वैशम्पायन ने कहा कि भीमसेन उस राक्षस को ! इसपर क्यों कुपित हो रहा है ! हे दुष्ट ! मेरे बहन पर क्रोधित देखकर हंमते हुए बोले -हे दुवुद्धि रहते हुए तू इस म्बी को नहीं मार सकेगा । तू मनुष्य खानेवाले ! इन सुख से सो रहे मेरे भाइयों अकेला मुझसे युद्ध कर । मैं अकेला ही तुझे अभी को जगाकर तू क्या करेगा। मेरे सामने आकर यमलोक में पहुंचा दूंगा । म दोनों हाथों से तेरे चोट कर। हिडिम्या को क्यों मारने के लिये तैय्यार सिर को ऐम ममर डालंगा मानों हाथी के पैर के है ! इसने क्या अपराध किया है । इमने यह तेरा नीचे कुचल गया हो। आज युद्धगाम में तेरे मारे कर्म कामदेव के वश में होने से किया है । हे दुष्ट, जाने पर गृद्ध और गीदर आदि आनन्द से नीचे राक्षसों के वंश को करवित करनेगले । तेरी बहन उतरकर तेरे शरीर को इधर-उधर घमीटते फिरेंगे। तेरी ही आज्ञा से यहां आई थी । यहां मंग का पहले नून सदा मनुष्यों को बाहर जिम वन को 22- महा भारत [ आदिपव Horo 10.010500cococcolcd अद्य त्वां भगिनी रक्षः कृष्यमाणं मयाऽसकृत् । द्रक्ष्यत्यद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाद्विपम् ॥ ३२ ॥ निरावाधास्त्वयि हते मया राक्षसपांसन वनमेतच्चरिष्यन्ति पुरुषा वनचारिणः हिडिम्य उवाच-गर्जितेन वृथा किं ते कत्थितेन च मानुप । कृत्वैतत्कर्मणा सर्व कत्थेथा मा चिरं कृथाः । ३४ ॥ चलिनं मन्यसे यच्चाप्यात्मानं सपराक्रमम् । ज्ञास्यस्यद्य समागम्य मयाऽऽत्मानं बलाधिकम् ॥ ३५ ॥ न तावदेतान्हिसिष्ये स्वपन्वते यथासुखम् । एप त्वामेव दुर्बुद्धे निहन्म्यद्याप्रियंवदम् पीत्वा तवास्मृग्गात्रेभ्यस्ततः पश्चादिमानपि हनिष्यामि ततः पश्चादिमा विप्रियकारिणीम् ॥ ३७ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा ततो वाहुं प्रगृह्य पुरुपादकः अभ्यद्रवत संक्रुद्धो भीमसेनमरिन्दमम् ॥ ३८ ॥ तस्याभिद्रवतस्तूर्ण भीमो भीमपराक्रमः वेगेन प्रहितं वाहुं निजग्राह हसन्निव दूपित किया था आज मैं क्षणभर में इस वन को मारूंगा वे सुख से सोते रहें । अप्रिय कठोर बचन राक्षस-हीन कर दूंगा ॥२२॥३१॥ कहनेवाले तुझको ही मै सबसे पहिले मारूंगा। हे राक्षस ! तेरी बहन के देखते हुये मै आज पहले तेरे शरीर का रुधिर पीकर फिर इस अपनी यहां तुझको ऐसे खीचूगा जैसे बड़े हाथी को सिंह, बहन को जिसने मेरा बड़ा अपिय किया है न खींचता है। तेरे मारे जाने से इस वन के रहनेवाले छोडूगा ॥३५३७॥ लोग बिना वाधा इस वन में रहेंगे । यह सुनकर वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! मनुष्य के मांस हिडिम्ब राक्षस ने कहा-हे मनुष्य ! वृथा गर्जने से | के आहार करनेवाला राक्षस अब दोनों हाथ फैलाकर क्या होता है ? जैसा कह रहा है वैसा करके दिखा । क्रोध के मारे शत्रुओं के नाश करनेवाले भीमसेन दे। अपनी पढ़ाई प्रकट कर, देर मत कर ॥३२॥३४॥ की ओर दौड़ा । भीम पराक्रमी भीमसेन ने हंसते तू अपने को बली और पराक्रमी समझता हुए उसी क्षण दौड़ने हुए उस राक्षम के वेग से अभी मुझसे युद्ध करने पर तुझे मालूम पड़ जायगा चलाये हुए हाथों को पड़ लिया ॥३८१३९।। कि तरा बल कितना है। मै इस समय उनको नहीं फिर बलपूर्वक उन फैलाये हुए हाथों को थामकर, । । porocare vrolossomeoniroozb70001010 अध्याय १५६ ] महा भारत pocococc pooncocc निगृह्य तं वलाद्भीमो विस्फुरन्तं चकर्ष ह । तस्माद्देशाधनूंष्यष्टौ सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥४०॥ ततः स राक्षसः क्रुद्धः पाण्डवेन वलार्दितः । भीमसेनं समालिङ्गय व्यनदरैरवं रवम् ॥४१॥ पुनर्भीमो बलादेनं विचकर्ष महावलः मा शब्दः सुखसुप्तानां भ्रातॄणां मे भवेदिति ॥ ४२ ॥ अन्योऽन्यं तौ समासाद्य विचकर्पतुरोजसा हिडिम्बो भीमसेनश्च विक्रम चक्रतुः परम् ॥ १३ ॥ वभञ्जतुस्तदावृक्षाल्लताश्चाऽऽकर्पतुस्तदा मत्ताविव च संरब्धौ वारणौ पष्टिहायनौ ॥४४॥ तयोः शब्देन महता विबुधास्ते नरर्षभाः सह मात्रा च ददृशुर्हिडिम्बामग्रतः स्थिताम् ॥ ४५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिम्यवधपर्वणि हिडिम्बभीमयुद्धे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय: १५५ सिंह जिसप्रकार छोटे से मृग को घसीटता है उस विक्रम प्रकाश करते हुए बल से एक दूसरे को पकड़ने प्रकार, वहां से आठ धनु अर्थात् बत्तीस हाथ की लगे ॥४०॥४३॥ दूरी पर वे घसीट ले गये । इसतरह भीमसेन के वे दोनों ही साठ वर्ष के कुपित मस्त हाथियों पीड़ा पहुंचाने पर यह राक्षस उनके शरीर से लिपट- की तरह वृक्षों को तोड़ने और लताओं को उखाड़ने कर बुरी तरह चिल्लाने लगा। उसका चिल्लाना सुनकर लगे । उनके उस घोर शब्द से पुरुप श्रेष्ठ पाण्डव कहीं माता और भाई जाग न पड़ें, इस आशङ्का से जाग पड़े । कुन्ती की भी आंख खुल गई । कुन्ती महायली भीमसेन और दूर तक उसे घसीटते ले गये । और पाण्डवों ने सुन्दर रूप के धारण करनेवाली तप हिडिम्प और भीमसेन दोनों एक दूसरे पर हिडिम्या को अपने आगे खड़ा हुआ देखा ॥४४॥४५॥ आदिपर्व का एक सौ पचपन अध्याय समाप्त हुआ। अथ पट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ बैगम्पायन उवाग-प्रबुद्धास्ते हिडिम्बाया रूपं दृष्ट्वाऽतिमानुपम् । विस्मिताः पुरुपव्याघ्रा वभूवुः पृथया सह एफमापन अध्याय ॥ १५६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! कुन्ती अगकिक रूा देखकर बड़ा अचरज माना। फिर और पुरण-श्रेष्ठ पाण्डवों ने जागकर हिडिम्या का कुन्ती उसकी ओर भली भांति देखकर रूप की ७५२ महा मारत [ आदपत्र Modehooooook 050coc :58colo . ततः कुन्ती समीक्ष्यैनां विस्मिता रूपसम्पदा । उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं शनैः कस्य वं सुरगर्भाभे का वाऽसि वरवर्णिनि । केन कार्येण संप्राप्ता कुतश्चाऽऽगमनं तव ॥ ३ ॥ यदि वाऽस्य वनस्य त्वं देवता यदि वाऽप्सराः । आचव मम तत्सर्व किमर्थं चेह तिष्ठसि हिडिम्बोवाच-यदेतत्पश्यसि वनं नीलमेघनिभं महत् निवासो राक्षसस्यैप हिडिम्वस्य ममैव च तस्य मां राक्षसेन्द्रस्य भगिनीं विद्धि भाविनि । भ्रात्रा संप्रेषितामार्ये त्वां सपुत्रां जिघांसितुम् ॥ ६ ॥ कूरबुद्धेरहं तस्य वचनादागता विह अद्राक्षं नवहेमाभं तव पुत्रं महावलम् ततोऽहं सर्वभूतानां भावे विचरता शुभे । चोदिता तव पुत्रस्य मन्मथेन वशानुगा ततो वृतो मया भर्ता तव पुत्रो महाबलः अपनेतुं च यतितो न चैव शकितो मया शोभा से अचरज मानकर शान्त और मीठी बातों में धीरे-धीरे बोरी ॥१२॥ मैं उम कुटिल बुद्धि भाई के कहने से यहां आई। हे देयकन्या के समान सुन्दरी ! तुम कौन हो? | यहां आकर मैंने तपे हुए सोने के समान कान्तिवाले किसकी स्त्री हो ? तुम किस काम के लिये और आपके महाबली पुत्र को देखा । सब जीवों के शरीर कहां से यहां आई हो ? यदि तुम इस वन की देवी | में रहनेवाले कामदेव ने मुझे, आपके पुत्र को देखते वा अप्सरा हो तो मुझसे कहो कि क्यों यहां ही, अपने वश में कर लिया । मैंने उस काम के खड़ी हो ! ॥४॥ वेग को रोकना चाहा, पर किसी प्रकार सग नहीं हिडिम्या ने कहा-यह जो मेघ की घटा के समान | हुई ॥७॥८॥ नीला वन देख पड़ रहा है इसमें हिडिम्य राक्षस इसलिये आपके महायलो पुत्र को मैंने मन ही और मैं रहती हूं । हे देवी ! मैं उस राक्षसराज मन में अपना पति मान लिया । अनन्तर मेरे हिडिम्ब की बहन हूँ ! मेरे भाई ने आपकी और लाटने में विलम्य होने से, आप पुत्रों को मारने आपके पुत्रों की हिंसा करने के लिये मुझे भेजा के लिये, मेरा गाई आप आ पहुंच। । धागान , था ॥५॥६॥ cror0-7557 ७५३ अध्याय १५६ ] महाभारत boroscocococo 05000000000000000 । चिरायमाणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुपादकः स्वयमेवाऽऽगतो हन्तुमिमान्सर्वांस्तवाऽऽत्मजान् ॥ १० ॥ स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता वलादितो विनिष्पिप्य व्यपनीतो महात्मना विकर्पन्तौ महावेगी गर्जमानौ परस्परम् पश्य स्वं युधि विक्रान्तावेतौ च नरराक्षसौ ॥ १२ ॥ वैशम्पायन उवाच-तस्याः श्रुत्वैव वचनमुत्पपात युधिष्ठिरः अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् तो ते ददृशुरासक्तौ विकर्पन्तौ परस्परम् काक्षमाणौ जयं चैव सिंहाविव वलोत्कटौ ॥१४ ॥ अथान्योन्यं समाश्लिप्य विकर्पन्तौ पुनः पुनः । दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः वसुधारेणुसंवीतौ वसुधाधरसंनिभी विभ्राजतुर्यथा शैलौ नीहारेणाऽभिसंवृतौ राक्षसेन तदा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य च उवाचेदं वचः पार्थः प्रहसञ्छनकरिव भीम मा भैर्महाबाहो न त्वां बुध्यामहे वयम् । समेतं भीमरूपेण रक्षसा श्रमकर्शिताः ॥ १८ ॥ बुद्धिमान, महात्मा आपके महाबली पुत्र उसे बरपूर्वक | दोनों जय की आशा से एक दूसरे को पकड़कर पकड़कर यहा से दूर ले गये है । देसिये, वह अति बलि सिंहों की तरह सींच रहे हैं ॥१३॥१४॥ मनुप्य और राक्षस दोनों युद्ध में विक्रम दिखाकर दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए है। उनके इस युद्ध ररकारते हुए एक दूसरे को वेग से पड़ रहे है में दावानल के धुएँ के समान धूल उड़ रही है । उस ॥९॥१२॥ धूर के पड़ने से उनके शरीर कोहरे से ढके हुए वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! उसके ये वचन पहाड़ों की तरह जान पड़ते हैं ॥१५॥१६॥ सुनकर वीर्यवन्त युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव तब अर्जुन भीमसेन को राक्षम से पीड़ित होते सब भाई जल्दी से उठकर उस युद्ध-स्थल में पहुचे। देखकर हसते हुए धीरे से बोले-हे महाभुज भीम ! वहा जाकर उन्होंने देसा कि राक्षस और भीम आप क्यों इतना कष्ट उठा रहे है ' बहुत ही थक opan ७५४ महा मारत [ आदिपर्व 0102004 2000%Kococonoooooooo soc074 साहाय्येऽस्मि स्थितः पार्थ पातयिष्यामि राक्षसम् । नकुलः सहदेवश्च मातरं गोपयिष्यतः भीम उवाच-उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः संभ्रमस्त्वया । न जात्वयं पुनर्जीवेन्मद्वाह्वन्तरमागतः ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच-किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा गन्तव्ये न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिन्दम ॥ २१ ॥ पुरा संरज्यते प्राची पुरा सन्ध्या प्रवर्तते । रौद्रे मुहूर्ते रक्षांसि प्रचलानि भवन्त्युत ॥ २२ ॥ स्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो विभीपणम् । पुरा विकुरुते मायां भुजयोः सारमर्पय ॥ २३ ॥ पेशम्पायन उवाच-अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो रोपाज्ज्वलन्निव वलमाहारयामास यद्वायोर्जगतः क्षये ॥ २४ ॥ ततस्तस्याऽम्बुदाभस्य भीमो रोपातु रक्षसः । उत्क्षिप्याऽभ्रामयद्देहं तूर्णं शतगुणं तदा ॥ २५॥ भीम उवाच-वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः वृथामरणमहंस्त्वं वृथाऽद्य न भविष्यसि जाने के कारण हम सो गये थे। इसीसे हमको नहीं | मुझसे आप यहा से जाने के लिये कहते है तो मालम हुआ कि ऐसे घोर रूपवाले राक्षस के साथ | अधिक विरम्ब न कीजिए । देखो, अब अरुणोदय आपको भिड़ना पड़ा है । हे भाई ! मैं आपको का समय आ गया है। प्रात काल और सायकाल सहारा देने को खड़ा हो गया हू । कहो तो मैं के रौद्र मुहर्त में राक्षस प्रबल हुआ करते है और अभी इस राक्षस को मार डाल ' नकुर और सहदेव अनेक प्रकार से माया करते हैं ॥२०॥२२॥ माता की रक्षा करेंगे ॥१७॥१९॥ इससे है भीम ! अब इसके साथ बहुन मोड़ा गीम ने कहा-तुम इसमें हाथ न डालो। तुम मत कीजिए, अपनी भुजा के बल से इसे शीम मार खड़े-खड़े देखते रहो, इतना घबड़ाने की आवश्यक्ता डालिए । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! भीमसेन नहीं । मेरी भुजाओं के बीच में आकर यह राक्षम ! अर्जुन की बात को सुनकर क्रोध से जाज्वल्यमान किसी प्रकार नहीं बच सकता है । तब अर्जुन ने हो उठे । वे प्रत्यकार की आधी के समान राक्षम कहा-हे भीम ! इस राक्षस को और अधिक समय पर हट पड़े। युक्ति भीमसेन काले चादर के समान तक जीवित रखने की क्या आवश्यकता है । यदि उस राक्षम को ऊपर उठाकर सैकड़ों बार सिर के -2075547rrorircro-or-rsion ७५५ महा मारत अध्याय १५६ ] 70000000000000000000000x क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुपान्हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ॥ २७॥ अर्जुन उवाच-यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ॥ २८ ॥ अथ वाऽप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ॥ २९॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्पणः निष्पिप्यैनं वलाद्भूमौ पशुमारममारयत् ॥ ३०॥ स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद्वनं सर्वं जलाई इव दुन्दुभिः वाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान्पाण्डुनन्दनः । मध्ये भङ्क्त्वा महावाहुर्हर्पयामास पाण्डवान् ॥ ३२ ॥ हिडिम्ब निहतं दृष्ट्वा सहृष्टास्ते तरस्विनः । अपूजयन्नरव्याघ्र भीमसेनमरिंदमम् ॥ ३३ ॥ अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् पुनरेवाऽर्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ॥ ३४ ॥ ऊपर घुमाने लगे ॥२३॥२५॥ हे वृकोदर ! अथवा कहिये तो मै ही इसका काम भीगसेन ने हिडिम्ब से कहा-हे नीच राक्षस ! पूरा करू । क्योंकि आप इससे युद्ध करते-करते तूने मनुष्यों को खा खाकर उनके मास से वृथा थक गये है थोड़ी देर विश्राम कर लीजिए ॥२८॥२०॥ अपना यह शरीर पुष्ट किया है, इमरिये तू व्यर्थ वैशम्पायन ने कहा कि भीमसेन ने उनकी इस मृत्यु अर्थात् जिस पाहुयुद्ध में मरने से स्वर्ग नहीं बात को सुनकर प्रोधित हो चल से राक्षम को मिट्टी मिरता उसके ही योग्य है इससे तू व्यर्थ मृत्यु को पर पीसकर पशु की भाति नष्ट क्यिा । राक्षस ने प्राप्त करेगा। हे राक्षम! आज मैं इस वन को शान्तियुक्त मरने के समय जल से भीगे हुए नगाड़े की भाति और निकटक करगा । तू फिर मनुष्य मारकर घोर गन्द से चिल्लार उस वन को पूरित किया नहीं सा सकेगा ॥२६॥२७॥ ॥३०॥३१॥ अर्जुन ने भीमसेन से कहा-यदि आपने इस उस ममय भीमसेन ने घर मे उम राक्षम के राक्षम को युद्ध में भार समझा हो तो मैं आरपी दायों को पैर मे दवाकर चीन में से दो करदार और सहायता करू, आप इसका शीम अन्त कीजिए। यह राक्षस मर गया। उसको मरा हुआ देसार ro10-15 •rryr7 महाभारत [ आदिपर्व 0000raco 0320006ococore न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात्सुयोधनः ॥ ३५॥ ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा मात्रा सह महारथाः । प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ॥३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अतुगृहपर्वणि हिडिम्बवधे पष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १५६ ॥ सब पाण्डव प्रसन्न हुए और सम भाइयों ने भीमसेन हम रोगों को अब यहा से शीघ्र चल देना चाहिये। का सत्कार किया ॥३२॥३३॥ ऐसा करना चाहिये जिसमें दुर्योधन को हमारे जीते अनन्तर अर्जुन महात्मा भीम पराक्रमी वृकोदर | रहने का पता न लगे । अर्जुन का कहना मानकर का आदर पर बोले-हे विभो ! मुझको जान पडता माता को लिये हुए सब भाई वहा से चल दिये । है कि इस वन से नगर बड़ी दूर नहीं है । इसलिये | उनके साथ साथ हिडिम्बा भी चली ॥३४॥३६॥ आदिपर्व का एक सौ चप्पन अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १५७ ।। भीमसेन पाच-स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ॥ १ ॥ युधिष्ठिर उवाच-क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्मं गोपाय पाण्डव चधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महावलम् रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्रा करिष्यति ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उयाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्टिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् एक सौ सत्तावन अध्याय ।। १५७ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! हिडिम्बा ! हो तो स्त्री को मत मारो। हे पाण्डव दरीर से को पछि आते देखकर भीमसेन ने कहा है हिटिम्बा। धर्म बड़ा है, इसरिये तुम धर्म को पारन करो। राक्षस रोग पहले के पैर को भूलते नहीं, ये मोहनी जब तुमन उस महायरी राक्षस को जो हमको माया का आश्रय लेकर अवश्य बदल चुकाते हैं। मारन आया था मार डारा तब उसकी यह मोभ इस कारण यही अच्छा है कि तू भी अपने माई करके हमारा क्या बिगाड़ सकती है । ॥१३॥ के साथ यमरोक को चरीजा । यह सुनकर युधिष्ठिर वंशम्पायन ने कहा- है राजन् ! इसके पश्चात् ने कहा-हे पुरष याम गौम ! तुम मोधित भी हुए. हिटिम्चा ने तुन्ती और युधिष्ठिर को प्रणाम करके .5525rsrirroriram- ७५७ अध्याय १५७ ] महा भारत mo010ona 1000000००० । - - आर्ये जानासि यदुःखमिह स्त्रीणामनङ्गाजम् । तदिदं मामनुप्राप्त भीमसेनकृतं शुभे सोढं तत्परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ॥ ६ ॥ मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघूस्तव पुत्रः पतिः शुभे ॥ ७ ॥ वीरेणाऽहं तथाऽनेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ ८ ॥ तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि वं वरवर्णिनि मत्वा मूढेति तन्मां वं भक्ता वाऽनुगतेति वा ॥ ९ ॥ भर्नाऽनेन महाभागे संयोजय सुतेन ह नमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् पुनश्चवाऽऽनयिष्यामि विनम्भं कुरु मे शुभे ॥ १० ॥ अहं हि मनसा ध्याता सर्वान्नेप्यामि वः सदा । वृजिनात्तारयिष्यामि दुर्गेषु विपमेषु च पृष्टेन वो वहिप्यामि शीघां गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ॥ १२ ॥ कुन्ती से कहा-हे आयें । तुम जानती हो कि अपनी आज्ञाकारी अथवा मूढभक्त पुत्रवधू जानकर कामदेव से स्त्रियों को कितना दुख होता है । इस अपने पुत्र को मेरे साथ कर देखें । मैं आपके हे शुभे ! यह दुख मुझको भीमसेन के कारण से देवतुल्य पुत्र को अपने साथ ले जाकर यथेष्ट स्थानों हुआ है । और समय न होने के कारण से उस में विहार कम्गी, और फिर आपके पास पहुंचा दुख को में अब तक सहती रही। अब यह समय जाऊगी । हे शुभे । आप मेरा विश्वास करें। आपके निवृत हुआ और सुख का समय आया है । देगो, स्मरण करते ही मैं आकर आप रोगों की मनमाने मैंने अपने भाई बन्धु और जातिवारों को छोड़कर स्थान में ले जाऊगी ॥७॥१०॥ अनुराग से तुम्हारे पुत्र को अपना पति साप कर जिम समय आपको कोई विषम और दुर्गम म्याT रिया। यदि आप या आपके पुत्र भीम मुझको मिले उस समय मुझको आप याद करना । शीन म्वीकार न करेंगे तो मे सत्य कहती ह शाम अपने वहा पर अपनी पीट पर भाप मरको नदार माण दे दृगी। इससे मेरे ऊार या करके मुझे रे नवगी। आप रोग प्रसन्न हो कि भीममन गुग्नमे cocozo । ७५८ महा भारत [ आदिपर oreovcoercored आपदस्तरणे प्राणान्धारयेयेन तेन वा सर्वमाहृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता आपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तमः । व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ॥ १४ ॥ पुण्यं प्राणान्धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते । येन येनाऽऽचरेद्धर्म तस्मिन्गर्दा न विद्यते ॥१५॥ युधिष्ठिर उवाच-एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं हिडिम्वे नाऽत्र संशयः । स्थातव्यं तु त्वया सत्ये यथा ब्रूयां सुमध्यमे ॥ १६ ॥ स्नातं कृताहिकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् भीमसेनं भजेथास्त्वं प्रागस्तगमनाद्रवेः ॥१७॥ अहःसु विहराऽनेन यथाकामं मनोजवा अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच-तथेति तत्प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम् शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम् ॥ १९ ॥ यावत्कालेन भवति पुत्रस्योत्पादन शुभे तावत्कालं गमिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ २० ॥ प्रीति करें ।।११।१२॥ नहीं जो तुमने कहा सब ठीक है। परन्तु तुमने विपत्ति से बचने के लिये जिस तरह हो अपनी जैसा कहा तुमको उसी सत्य में आवद्ध रहना पड़ेगा। रक्षा करनी चाहिये । धर्म पर दृष्टि रखकर ही सब | हे भद्रे ! स्नान, आदिक, स्वस्त्ययन आदि जर काम करने चाहिय। धर्म पर चलनेवाले मनुप्य को भीमसेन कर चुकें तब तुम उन्हें अपने साथ ले जाना। सप दुःख सहर धर्म रखना चाहिये । जो कोई | सन्ध्या तक तुम उनको अपने पास रख सकोगी। अपने धर्म को आपत्तिकाल में रखता है वह | हे मन के वेग के समान चल्नेवारी । दिन को धर्मात्माओं में श्रेष्ठ कहराताहै। आपचि ही धर्मात्माओं/ भीमसेन से मनमाना विहार करके नित्य रात्रि की के धर्म का बाधक है । प्राण को धारण करनेवारा यहां पहुंचा देना ॥१६॥१८॥ और देनेवाला पुण्य ही है। इससे मनुष्य धर्म के वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! युधिष्ठिर की आचरण के निमित्त जो-जो कर्म करता है उसके आज्ञा मानकर भीमसेन ने हिडिम्या से कहा -है उस कर्म की कोई निन्दा नहीं करता है ।।१३।१५|| दिडिम्या ! मैं तुमसे यह प्रतिज्ञा करता हूं कि जब युधिष्ठिर ने कहा-हे हिडिम्बा ! इसमें सदेह तक तुम्हारे पुत्र न उत्पन्न होगा तभी तक में तुम्हारे rorcroscom Ho- Dicd 000 अध्याय १५७ ] म हा मा र त 0000 वैशम्पायन उवाच-तथेति तत्प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । भीमसेनमुपादाय सोलमाचक्रमे ततः ॥२१॥ शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ॥ २२ ॥ कृत्वा च रूपं परमं सर्वाभरणभूपिता सझल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ॥ २३ ॥ तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिपु सरःसु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ॥ २४ ॥ नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीपु . च ॥ २५॥ काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिपु हिमवनिरिकुलेषु गुहालु विविधासु च ॥ २६ ॥ प्रफुल्लशतपत्रेषु सरःस्त्रमलवारिपु सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ॥ २७॥ पत्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च देवारण्येपु पुण्येपु तथा पर्वतसानुपु ॥ २८॥ गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च सर्वतुफलरम्येषु मानसेषु सरःसु च ॥ २९ ॥ साथ जाऊंगा ॥१९२०॥ कभी मृगों से युक्त और पक्षियों के कल-नाद से पूर्ण वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! राक्षसी ने यह वनों में, कभी फूले वृक्षों मे सुहावनी जगह कभी स्वीकार कर लिया। वह भीमसेन को लेकर उसीक्षण नीले व लाल पद्म से सुशोभित सुन्दर सरोवर में, आश-मार्ग को चली गई। फिर मन के समान और कभी वैदूर्यमणि और नदी के बाल से पूरित तेज चलनेवाली वह राक्षमी परम मनोहर रूप धारण ! द्वीपों में भीमसेन को ले जाकर प्रसन्न करने लगी। कर सर भूपणों से सजकर मीठी बोली बोलती हुई वह राक्षसी कभी पवित्र जलवाली पहाड़ी नदियों समय-समय पर नाना प्रकार के स्थानों में भीनसेन के किनारे, ॥२१॥२५॥ के साथ आनन्द करने लगी। वह राक्षसी भी कभी फूलवाले पौधों और लताओं से मुहावने सुन्दर पर्वत के शिखर पर, कमी देव मन्दिरों में, वन में, कभी हिमाचल के बुझ में, कभी कन्दरा rrrrrrrrrrrrnoraminormomream ७६० म हा भारत [ आदिपर्व -drococoncoco concocococococol.com Povcomcarooron . विभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ॥३०॥ प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाचलम् । विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्ण विभीषणम् ॥ ३१ ॥ भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम् । महेष्वासं महावीर्य महासत्वं महाभुजम् ॥ ३२ ॥ महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम् दीर्घघाणं महोरस्कं विकटोद्वद्धपिण्डिकम् ॥ ३३ ॥ अमानुपं मानुपजं भीमवेगं महावलम् यः पिशाचानतीत्याऽन्यान्वभूवाऽतीव राक्षसान् ॥ ३४ ॥ बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते । सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद्वली ॥ ३५॥ सद्यो हि गर्भाराक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च । कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात्स पितुस्तदा । मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामाऽस्य चक्रतुः ॥ ३७ ॥ के भीतर, कभी खिले कमलों से सोहते हुए जल भरे आखें डरावनी, मुख बड़ा, कान खड़े हुए, शब्द ताल में, कभी सुबर्व से भरे सागरखण्ड में, कभी | बहुत ही भयङ्कर, ओठ लाल-लाल, दांत और दाद मनोहर नगर और उपवन में, कभी देवताओं के पैनी, नाक लम्बी, छाती चौड़ी, पिंडलियां टेढ़ी और पवित्र वन में, कभी पहाड़ की कन्दरा में, ॥२६॥२८॥ ऊंची थीं ॥३१॥३३॥ कभी गुह्यकों की वासभूमि में, कभी तपस्वियों वह मनुष्य से उत्पन्न हुआ था परन्तु उसका के स्थान में और कभी सब ऋतुओं के फूलों से सब शरीर अमानुषी था और ऐसा प्रतापी था कि शोभित मानस सरोवर के पास भीमसेन को ले जाकर- | पिशाच राक्षसों से भी बढ़ गया । हे राजन् ! उस वहां की सैर कराकर-प्रसन्न करने लगी ।।२९/३०॥ | बलवान् वीर पुत्र ने बालक होने पर भी यौवन प्राप्त थोड़े काल में उस राक्षसी के भीमसेन से एक | किया । सब अस्त्र-शस्त्र चलान की चातुरी उसे आप पुत्र उत्पन्न हुआ । वह पुत्र बड़ा पराक्रमी, | ही से आ गई। राक्षसियां गर्भ धारण करके उसी बड़ा वानेत, बुद्धिमान् , महा मायावी, शत्रुओं को समय बालक उत्पन्न करती हैं ! यह बालक भी जन्म दमन करनेवाला भयानक वेपधारी था। उसकी लेते ही मनमाना रूप धारण कर सकता है ॥३४॥३६॥ voorn - >>25051 horo '७६१ rooooo अध्याय १५७ ] महाभारत coordinaren घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभापत अब्रवीत्तेन नामाऽस्य घटोत्कच इति स्म ह ॥ ३८ ॥ अनुरक्तश्च तानासीत्पाण्डवान्स घटोत्कचः तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ॥ ३९ ॥ संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् । हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ॥ ४० ॥ घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान्पृथया सह । अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच प्रभाप्य ताम् ॥ ४१ ॥ किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्कं वदताऽनघाः । तं ब्रुवन्तं भैमसेनि कुन्ती वचन मब्रवीत् ॥ ४२ ॥ त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद्भीमसमो ह्यसि । ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ॥ ४३ ॥ वैशम्पायन उवाच-पृथयाऽप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् ॥४४॥ यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महावलः । वर्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाऽभवं नृषु ॥४५॥ कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कचः । आमन्व्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ॥ ४६॥ महा धनुर्द्धर उस हिडिम्बा के पुत्र ने उत्पन्न अनुसार हिडिम्बा ने पाण्डवों से कहा-अब मैं जाती होते ही समर्थ होकर माता और पिता के चरणों में ह, क्योंकि प्रतिज्ञा के अनुसार म्वामी के सहवास प्रणाम किया। उन्होंने भी उसका नामकरण किया। का समय पूरा हो गया । इतना कहकर वह राक्षसी उस बालक के कच (केश) ऊपर उठे हुए थे और उत्तर दिशा को चली गई। राक्षसों में श्रेष्ठ घोक्च मुग घट (घड़े) के समान था । उसे दिसावर ने भी कुती सहित पाण्डवों को प्रणाम करके कहा-मैं हिडिम्बा न भीमसेन से कहा इस बालक का मुह आपका सेवक है। उससे कुन्ती ने कहा कि तुम्हारा पड़े के समान है आर वाल खड़े हुए हैं। इसरिये जन्म कुरवश में हुआ है, तुम पाण्डवों के बड़े लड़के भीमसेन ने उसका नाम घटोत्कच रक्खा ॥३७॥३८॥ हो । समय आने पर हमारी सहायता करना । घटोत्कच सदा स्वतन्त्र रहकर पाण्डयों की आज्ञा ॥३०॥४३॥ का पार न करता था। पाण्डा रंग भी उससे बड़ा वैगम्पायन ने कहा-दे राजन् ! घटोत्कच भी पाण्डवों अंग्ह करते थे। इसके उपरान्त अपनी प्रतिज्ञा के से ऐमा ही होगा' कहकर उत्तर दिशा को चरा colcod , । ७६२ महा भारत [ आदिपर्व roorercoicor.orcorcocococomorrorcorrorman स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना । कर्णस्याऽप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ॥४७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिम्ववधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तो सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय १५७ गया । इन्द्र भगवान् ने वर्ण की एकघातिनी शक्ति को उत्पन्न किया था ॥४४।४७|| से अर्जुन को बचाने के लिये, महारथी घटोत्कच आदिपर्व का एक सौ सत्तावन अध्याय समाप्त हुआ। अथ अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय ॥१५८ ।। वैशम्पायन उवाच-ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान्वहून् । अपक्रम्य ययू राजस्वरमाणा महारथाः मत्स्यास्त्रिगर्तान्पश्चालोन्कीचकानन्तरेण च रमणीयान्वनोद्देशान्प्रेक्षमाणाः सरांसि च जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः । सह कुन्त्या महात्मानो विभ्रतस्तापसं वपुः ॥ ३ ॥ क्वचिद्वहन्तो जननीं वरमाणा महारथाः क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः ॥ ४ ॥ ब्राझं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः नीतिशास्त्रं च सर्वज्ञा ददृशुस्ते पितामहम् ॥ ५ ॥ तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परंतपाः ॥ ६ ॥ एक सौ अट्ठावन अध्याय ॥ १५८ ॥ वैशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ! अब थे । सुरक्षित स्थान में पहुचने पर धीरे-धीरे चरने महात्मा पाण्डव जटाधारी होकर, मृगचर्म और वमल गते और फिर कहीं पर तेजी से चरने लगते थे। पहनकर तपस्वियों के वेष में वनों में घूमते हुए आगे | उछ दूर आगे जाकर उन वेद और शास्त्र जाननेवाले चढे । वे राह में मृगों का शिकार करके उन्हीं का पाण्टयों ने अपने पितामह व्याम जी को देखा। मास साते थे । जाते समय उन्होंने रास्ते में मत्स्य, उनको देखकर सन पाण्डव माता सहित दण्डवत् त्रिगर्न, पाचाल, कीचक आदि देशों के मनोहर वनों | करके हाथ जोड़े हुए उनके सन्मुस खड़े हो गये । और सरोवरों की सूर्य सर की । वे कहीं-कहीं शीन व्यास जी ने कहा-दे पुत्रो! मैं पहले ही से जानता चरने के रिय माता कुन्ती को कन्धे पर चढा देते। हनिराष्ट्र के पुत्रों ने अपर्म से तुमको निकारा 2000oCocoo010 अध्याय १५८ ] म हा भारत rerogroormorcorrace व्याम उवाच-मयदं व्यसनं पूर्व विदितं भरतर्षभाः यथा तु तैरधर्मेण धार्तरागैर्विवासिताः ॥ ७ ॥ तद्विदित्वाऽस्मि संप्राप्तश्चिकीर्षुः परमं हितम् । . न विपादोऽत्र कर्तव्यः सर्वमेतत्सुखाय वः ॥ ८ ॥ समास्ते चैव मे सर्वे यूयं चैव न संशयः । दीनतो चालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति मानवाः तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम सांप्रतम् । स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं वस्तन्निबोधत ॥ १० ॥ इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम् वसतेह प्रतिच्छन्ना ममाऽऽगमनकांक्षिणः ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं स तान् समाश्वास्य व्यासः सत्यवतीसुतः । एकचक्रामभिगतः कुन्तीमाश्वासयत्प्रभुः ॥ १२ ॥ व्यास उवाच-जीवत्पुत्रि सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः । धर्मेण पृथिवीं जित्वा महात्मा पुरुपर्पभः । पृथिव्यां पार्थिवान्सर्वान्प्रशासिष्यति धर्मराट् ॥ १३ ।। पृथिवीमखिला जित्वा सर्वां सागरमेखलाम् । भीमसेनार्जुनवलाद्भोक्ष्यते नाऽत्र संशयः ॥ १४ ॥ है। इसी से तुम्हारा हित करने के लिये मै यहा वैशम्शयन ने कहा कि सत्यपती-पुत्र धर्मात्मा पर आया हूं। दुर्योधन ने तुमको निकाल दिया है, | व्यासदेव इस प्रकार धीरज देकर पाण्डवों को साथ इसके लिये तुम कुछ खेद न करो। यह जो कुछ । लिये हुए एकचक्रा नगरी की ओर चले । जाते-जाते हुआ है और हो रहा है उससे आगे चलकर तुमको | उन्होंने कुन्ती को आवास देने के लिये उनसे मुग्य ही होगा। यद्यपि तुम कहा-है पुत्री ! तुम जीती रहो, घबराओ नहीं। मेरे सगान हो परन्तु मनुष्य दीन चालकों पर नेह तुम्हारे पुन धर्मात्मा, महात्मा, पुरपश्रेष्ठ धर्मराज करते हैं इस कारण से अब मुझको तुममे अधिक युधिष्ठिर धर्मपूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर सब यह है । और उस मेह ही के कारण से मैं तुम्हारे राजाओं पर हुकमन करेंगे। ये भीम और अर्जुन लिये कुछ हित करना चाहता है । इसमे तुम अब के बाहुवन की सहायता से समुद्र पर्यन्त पृथ्वी- इस रमणीक पानमापुरी नाम नगर में गुप्त होकर मण्डर पर अपना अधिकार करके मामाज्य की रही ॥११॥ म्थापना और मुमभोग करेंगे। तुम्हारे महारथी पुत्र और घृतराष्ट्र के । - ww ७६४ म हा मारत [ आदिपर्व oodpooooooz - पुत्रास्तव च माव्याश्च सर्व एव महारथाः। स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसः सदा ॥ १५॥ यक्ष्यन्ति च नरव्याघू निर्जित्य पृथिवीमिमाम् । राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ १६ ॥ अनुगृह्य सुहृद्वर्ग भौगश्वर्यसुखेन च पितृपैतामहं राज्यमिमे भोक्ष्यन्ति ते सुताः ॥ १७ ॥ वैशम्पायन याच-एवमुक्त्वा निवेश्यैतान्ब्राह्मणस्य निवेशने अब्रवीत्पाण्डवश्रेष्ठमृपिद्वैपायनस्तदा ॥ १८ ॥ इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः देशकालौ विदित्वैव लप्स्यवं परमां मुदम् ॥ १९ ॥ स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो नराधिप । जगाम भगवान्व्यासो यथागत मृषिः प्रभुः ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिम्यवधपर्वणि व्यासदर्शने एकचनाप्रवेशे अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय ॥ १५८ ।। समाप्त च हिडिम्बवधपर्व। और माद्री के कुमारगण सदा अपने राज्य में प्रसन्न | युधिष्ठिर से कहा-तुम मेरे आने तक यहीं रहा मै मन होकर सुख से आनन्द करेंगे । ये बड़े बड़े फिर आऊगा । तुम देश काल को विचारकर काम राजसूय आदि यज्ञों को करके सुखपूर्वक अपने बाप- | करते रहोगे तो परम हर्ष प्राप्त करोगे । उन सब ने दादे के राज्य को भोगेंगे । वैशम्पायन ने कहा-हे हाथ जोड़कर उनकी बात मान री । अनन्तर महपि राजन् । यों कह कर व्यास जी ने एकचक्रा नगरी भगनान् व्यास जहा से आये थे वहा को चले गये में एक ब्राह्मण के यहा कुन्ती और पाण्डवों के ॥१२॥२०॥ रहने का प्रबन्ध कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने आदिपर्व काण्क सौ अट्टावन अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ उनपश्याधिकशततमोऽध्याय ॥ १५९ ॥ अथ वक्वधपर्व। जनमेजय उवाच-एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः अत ऊर्ध्व द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः एर सो उनसठ अध्याय ।। १५९ । जनमेजय ने कहा-हे श्रेष्ठ ! इसके पश्चात् क्या किया। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! महारथी महारथी कुन्ती पुत्रों ने एकचमा नगरी में रहकर पाण्डव एकचना नगरी में ब्राह्मण के यहा युछ दिनों - ० moirairirirmovewr ७६५ अध्याय १५९ ] महाभारत 5.00cococorce Cococococococo4 ococ reaucraca noornaras वैशम्पायन उवाच-एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । ऊपुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २ ॥ रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च । पार्थिवानपि चोद्देशान्सरितश्च सरांसि च चेरुभैक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते वभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि । तया विभक्तान्भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक्पृथक् ॥ ५ ॥ अर्धं ते भुजते वीराः सह मात्रा परंतपाः अर्ध सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुक्ते महाबलः ॥ ६ ॥ तथा तु तेषां वसतां तस्मिन्राष्ट्रे महात्मनाम् । अतिचक्राम सुमहान्कालोऽथ भरतर्षभ ततः कदाचिद्भक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथया सह ॥ ८ ॥ अथाऽऽतिज महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत रोख्यमाणांस्तान्दृष्ट्वा परिदेवयतश्च सा कारुण्यात्साधु भावाच्च कुन्ती राजन्न चक्षमे ॥१०॥ तक रहे । वे उन दिनों नित्य सुन्दर प्रदेश नदी आधा भाग युधिष्ठिर, अर्जुन, नकूल, सहदेव और और सरोवरों को देखते हुए शिक्षापूर्वक वहा के सब । कुन्ती यह सब मिलकर भोजन करते थे और आधा स्थानों में घूमते ये ॥१३॥ भाग महाबली भीमसेन खाते थे ॥४६॥ धीरे-धीरे वे अपने गुणों के कारण से नगरवारों हे भरतश्रेष्ठ । महात्मा पाण्डयों को इस प्रकार के प्रिय बन गये । वे दिन को भिक्षा मागकर जो | रहते हुए उस राज्य में कुछ समय व्यतीत हो गया। कुछ पाते सो रात को आकर माता कुन्ती के आगे अनन्तर एक दिन युधिष्ठिर आदि चारों भाई भिक्षा रख देते थे। कुन्ती जब उनकी उस भिक्षा से मिली मागने के लिये गये, दैवयोग से भीमसेन घर में हुई वस्तु को अलग अलग बाँद देती थी तब वे माता के पास ही रह गये ।।७.८॥ भोजन करते थे । भिक्षा से जो मिलता था उसका इसी बीच में कुन्ती ने उस ब्राह्मण के घर से - oursawrvkoror ७६६ महा भारत [आदिर्पव Moo04 .ooooor zcacaod - मथ्यमानेन दुःखेन हृदयेन पृथा तदा उवाच भीमं कल्याणी कृपान्वितमिदं वचः ॥ ११ ॥ वसाम सुसुखं पुत्र ब्राह्मणस्य निवेशने । अज्ञाता धार्तराष्ट्रस्य सत्कृता वीतमन्यवः ॥ १२ ॥ सा चिन्तये सदा पुत्र ब्राह्मणस्याऽस्य किं न्वहम् । प्रियं कुर्यामिति गृहे यत्कुर्युरुपिताः सुखम् ॥ १३ ॥ एतावान्पुरुषस्तात कृतं यम्मिन्न नश्यति । यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यादभ्यधिकं ततः तदिदं ब्राह्मणस्याऽस्य दुखमापतितं ध्रुवम् । तत्राऽस्य यदि साहाय्यं कुर्यामुपकृतं भवेत् ॥ १५॥ भीगसेन उवाच-ज्ञायतामस्य यदुःखं यतश्चैव समुत्थितम् । विदित्वा व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं तो कथन्तौ च भूयः शुश्रुवतुः स्वनम् आतिजं तस्य विप्रस्य स भार्यस्य विशांपते ॥१७॥ अन्तःपुरं ततस्तस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः विवेश त्वरिता कुन्ती बद्धवत्सेव सौरभी ॥ १८ ॥ रोने की आवाज़ सुनी । हे राजन् ! वे दयालु और | ही मै इम ब्राह्मण का बदले में क्या उपकार करू ।' कोमल स्वभाव की थीं, इसी से वह पिप का किसी के किये हुए उपकार के बदले में जो उपकार शब्द सुनकर उनसे रहा नहीं गया। ये ब्राह्मण के करता है वही पुरुष है। जो किसी के किये उपकार कुटुम्ब का रोना पीटना न सुन सकी ।।९।१०॥ को नहीं भूलता वही सत्पुस्प है। गनुष्य को चाहिये असल दु ख से उनके हृदय को मानों कोई कि जितना उसका उपकार कोई करे उससे अधिक मधने लगा। अन्त में उस सुन्दरी कुन्ती ने भीमसेन ही उसका उपकार कर दे ॥११३१४|| से कहा-हे घटा । हमने इस ब्राक्षण के घर में मुझको निश्चय जान पड़ना है कि इस प्रायण रहकर बड़ा मुरा पाया है । धृतराष्ट्र का पुन दुष्ट के घर में कोई दु य है और उस दु रा के दूर करने दुर्योधन हमारा पता नहीं पा सकता । बामण हमारा के लिये यदि उनकी उछ सहायता कर सके तो बड़ा आदर-सत्कार करता है । म सदा यही सोना उपकार का बदरा हो सकता है । कुन्ती के ये वचन करती हूँ कि जैसे दुर्वामा आदि महात्मा रोग जिसके मुनकर भीममैन ने कहा- इम ब्रामण का दुग आप घर में रहते हैं ना कोई हितकार्य करते है वैगे मालम र उमा जान रेने पर यदि कठिन भी, -5-3-74-9-2-in-vricole अध्याय १५९ ] महा मारत ७६७ conomenorockorconicoac ततस्तं ब्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च । दुहित्रा चैव सहितं ददर्शाऽवनताननम् बाहाण उवाच --धिगिदं जीवितं लोके गतसारमनर्थकम् दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रियभागि च ॥ २० ॥ जीवित परमं दुःखं जीविते परमो ज्वरः । जीविते वर्तमानस्य दुःखानामागमो ध्रुवः ॥ २१ ॥ आत्मा ह्येको हि धर्मार्थों कामं चैव निपेवते । एतैश्च विप्रयोगोऽपि दुःखं परमनन्तकम् ॥ २२ ॥ आहुः केचित्परं मोक्षं स च नास्ति कथंचन । अर्थप्राप्तौ तु नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ॥ २३ ॥ अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तो ततोऽधिकम् । जातनहस्य चाऽर्थेषु विप्रयोगे महत्तरम् ॥ २४॥ न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः । पुत्रदारेण वा सार्ध प्राद्रवेयमनामयम् ॥ २५॥ होगा तो उसके दूर करने का प्रयत्न करूगा।।१५।१६॥ देखो, एक ही आत्मा धर्म, अर्थ और काम इन वैशम्पायन ने कहा-हे पृथ्वीनाथ ! जब कुन्ती | तीनों की एक दूसरे से बिना विरोध किये सेवा नहीं कर और भीमसेन इस प्रकार बात चीत कर ही रहे थे | सकती। इन तीनों के अभाव से अनन्त दु ख भोगना कि उस समय फिर उस ब्राह्मण और ब्राह्मणी के | पड़ता है । कोई-कोई पण्डित लोग मोक्ष को ही श्रेष्ठ रोने की आवाज़ सुनाई दी । अनन्तर कुन्ती ने इस | बतलाते है; किन्तु हमको संसार पर अनुराग है इस प्रकार वेग से कि जैसे कामधेनु अपने बँधे हुए कारण हम मोक्ष पाने के अधिकारी भी नहीं हैं। बछड़े के पास जाती है उस महात्मा ब्राह्मण के घर विशेष करके मुझे उस मोक्ष की चाह भी नहीं। में जाकर देखा कि ब्राह्मण अपनी स्त्री, बेटे और अर्थ (धन ) पाने के विषय में भी सब प्रकार दुःख बेटी के साथ विलाप कर रहा है ॥१७॥१९॥ भोगना पड़ता है । देखो, धन कमाने की लालसा ब्राह्मण कह रहा है कि यह ससार केवल दुख दुख का कारण है। धन मिलने पर भी सुख नहीं; की जड़ दूसरे का आधीन और अति हानिकारी है। उसमें उससे बढकर कष्ट उठाने पड़ते हैं । प्राप्त किये इस कारण एमे व्यर्थ जीवन पर धिकार है । जीवित हुए धन पर स्नेह वह जाता है । यदि किसी प्रकार रहने से परम दु.ख और परम पीडा भोगनी पड़ती उस धन का नाश हो गया तो उसमें मबसे बहकर है। जो मनुष्य जीवित है उसे अवश्य ही सुख दुख दु ख भोगना पड़ता है ।।२२ २४॥ आदि द्वन्द्वों का सामना करना पड़ेगा ।।२०।२१।। मुझे इस समय इस आपसि से छुटकारा मिलने -- । na 25oC ७६८ महाभारत [ आदिपर्व - यतितं वै मया पूर्व वेत्थ ब्राह्माण तत्तथा । क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ॥ २६ ॥ इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयाऽसकृत् ॥ २७ ॥ स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव । वान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ॥ २८ ॥ सोऽयं ते वन्धुकामाया अशृण्वन्त्या वचो मम वन्धुप्रणाशः संप्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ॥ २९ ॥ अथवा मद्विनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन । परित्यक्तुमहं वन्धुं स्वयं जीवन्नृशंसवत् ॥ ३० ॥ सहधर्मचरी दान्तां नित्यं मातृसमां मम । सखायं विहितां देवर्नित्यं परमिकां. गतिम् ॥ ३१ ॥ पित्रा मात्रा च विहितांसदा गार्हस्थ्य भागिनीम् । बरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत्परिणीय च कुलीनां शीलसंपन्नामपत्यजननीमपि लामहं जीवितस्याऽर्थे साध्वीमनपकारिणीम् ॥ ३३ ॥ का कोई भी उपाय नहीं सूझ पड़ता । मै सोचता | जाने को तुम्हारा जी क्यों न चाहा ? तुमने बन्धुओं के हूं कि क्या, स्त्री-पुत्र आदि को लेकर किसी निर्णय स्नेह से मेरी बात नहीं सुनी। इसीसे यह तुम्होर बन्धुओं स्थान में भाग जाऊँ ? हे ब्राह्मणी ! मैने तो पहले | के नाश का समय आ गया। इससे इस समय मुझे ही कहा था कि यहां से कहीं को भाग चलो परन्तु बड़ा दुःख हो रहा है। इस समय ही अपने प्राण तुमने मेरी बात को नहीं माना । यह तुम्हारी ही दूंगा; क्योंकि मैं आप जीवित रहकर बन्धुओं के कुबुद्धि है कि जब मैने बार-बार दूमरे स्थान को जाना | विनाश को न देख सकूँगा। तुम मेरी सहधर्म नारिणी, चाहा तभी तुमने कहा कि यह मेरे पिता का घर नित्य माता के समान स्नेह करनेवाली, गुणवती और है। यहां पैदा होकर मैं इतनी बड़ी हुई हूं। इसलिये परमगति हो । तुम अपनी इन्द्रियों को वश में रखार में इस स्थान को नहीं छोड़ सकती ॥२५॥२७॥ सदा नम्रभाव से रहती हो । देवताओं ने तुम्हें ही हे प्यारी ! तुम्हारे माता-पिता और बन्धु-बान्धव मेरा जन्म भर का साथी और सखा बना दिया है। बहुन दिन पहले ही इम म्यान को छोड़कर स्वर्ग तुम अच्छे कुल में उत्पन्न और मुशीला हो । तुम सिधार चुके हैं, फिर यह स्थान छोड़कर दूसरी जगह सन्तान की उत्तन करनेवाली, गृहस्थाश्रम के मुख Sirrrrroriranwrrrrrrrrrrrorreirritr अध्याय १५९ ] महाभारत ७६९ Yo5032 परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भायाँ नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ॥ ३४ ॥ घालामप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् भर्तुराय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ॥ ३५ ॥ यथा दौहित्रजॉल्लोकानाशंसे पितृभिः सह स्वयमुत्पाद्य तां वालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥३६ ॥ . मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुनराः कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ॥ ३७॥ यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं वाला कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥ ३८ ॥ आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः । त्यक्ता ह्येते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ॥ ३९ ॥ एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः आत्मत्यागे कृते चेमे मरिप्यन्ति मया विना ॥४०॥ की मूल, पतिव्रता और अपकार न करनेवाली स्त्री हो। पर अधिक मेह होता है और कोई कहते है कि माता-पिता की आज्ञा से शास्त्र की विधि के अनुसार, कन्या ही पर अधिक स्नेह होता है परन्तु मेरे लिये मन्त्रपाठ-पूर्वक मैने तुम्हाग पाणिग्रहण किया है । | दोनों समान है ॥३७॥ अपने जीवन के लिये तुम जैसी अनुगत स्त्री को मैं जिससे सुगति मिलती है, जिससे वंश की रक्षा कैसे छोड़ सकता हूं ॥२८॥३४॥ होती है और जिससे नित्य सुख मिलता है उस. फिर जिस बालक की आज तक दाड़ी मूंछ नहीं पापरहित बालिका को त्याग देने का साहस कैसे निकली है ऐसे छोटी अवस्थावाले पुत्र को भी क्यों कर करूं । यदि मै आप अपने को नष्ट करता हूं तो भी स्वयं त्याग सकता है । कन्या को भी अपनी जान मुझे दुःख ही होगा क्योंकि मेरे परिवार की जिन्दगी बनाने के लिये नहीं त्याग सक्ता । महात्मा मेरे ही जीवन पर निर्भर है ॥३८॥३९॥ विधाताने योग्य भर्ता के हाथ में सौपने के लिये जिस इनमें से किसी एक को त्याग देना बड़ा अनुचित कन्या को न्यायपूर्वक मेरे पास छोडा है, जिस कन्या और निठुर काम होगा ! मैं अपना जीवन दे दूंगा से मैं पितगे के साथ अक्षय लोक के.पाने की आगा तो भी ये जी नहीं सस्ते । इस कारण मैं गहरी रखता हू; उस बालिका को क्योंकर स्वय त्याग देने विपत में पड़ा हू । हाय, इस विपत्ति से बचने का को उद्यत हु ॥३५॥३६॥ कोई उपाय नहीं दीखता । मुझपर धिकार है। मेरे कोई-कोई कहा करते हैं कि पिता का पुत्र ही और मेरे इस परिवार के बचने का और कोई उपाय orocco/ ७७० [ आदिपर्व महाभारत moremeokroaccicome.reveremovererecoreover स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्ततुमापदम् । अहो धिक्कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सवान्धवः । सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ॥४१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायामूनपष्टयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ । ही नहीं है। इस कारण परिवार सहित जीवन छोड़ना । कर्तव्य है । जीवित रहना मेरे लिये किसी तरह ही मेरे लिये मङ्गलदायी है । यही मेरा इस समय | उचित नहीं ॥४०॥४१॥ आदिपर्व का एक सौ उनसठ अध्याय समाप्त हुआ। अथ पष्टयधिकशततमोऽध्याय ॥ १६० ।। ब्राहाण्युपाचन संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् । न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते अवश्यं निधनं सर्वेर्गन्तव्यमिह मानवैः अवश्यं भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिप्यते । व्यथां जहि सुबुध्या वं स्वयं यास्यामि तत्र च ॥ ३ ॥ एतन्द्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम् । प्राणानपि परित्यज्य यद्भर्तुहितमाचरेत् तच्च तत्र कृतं कर्म तवाऽपीदं सुखावहम् , भवत्यमुत्र चाऽक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ॥ ५ ॥ एप चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते एक सौ साठ अध्याय ॥ १६०॥ ब्राह्मणी ने कहा-हे ब्राह्मण ! आप विद्वान् है; रोग अपने मुरा के लिये ही श्री, पुत्र, कन्या इसलिये साधारण मनुष्यों की तरह शोक करना इन सब की प्रार्थना करते हैं । इसलिये आप सबुद्धि आपको उचित नहीं। यह शोक का समय नहीं है। को ग्रहण करके अपनी चिन्ता को दूर कीजिए । में पृथ्वी पर जितने मनुष्य हैं उनका अवश्य ही एक आपका जीवन बनाने के लिये स्वयं जाऊगी। इस दिन मरना होगा। इसलिये जो बात अवश्य होने- संसार में पत्नी के रिय सनातनधर्म यही है कि प्राण वारी उसके बारे में शोक करना था है ॥१॥३॥ देकर भी पति का हित करे ॥४॥ coice . 300034 अध्याय १६० ] महाभारत ७७१ 000000000000000000 2000co यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि । कन्या चैका कुमारश्च कृतोऽहम नृणा त्वया ॥ ७ ॥ समर्थः पोषणे चापि सुतयो रक्षणे तथा न स्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ॥ ८ ॥ मम हि त्वविहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर कथं स्यातां सुतौ वालौ भवेयं च कथं वहम् ॥ ९ ॥ कथं हि विधवाऽनाथा बालपुत्रा विना त्वया । मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ॥ १० ॥ अहंकृतावलिप्तश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् अयुक्तैस्तव संवन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ॥ ११ ॥ उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः । प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथास्त्रियम् ॥ १२ ॥ साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः । स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सजनेप्टे द्विजोत्तम ॥ १३ ॥ कथं तव कुलस्यकामिमां बालामनागसम् पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे इसलिये मैं प्राण त्यागकर इस लोक में यश और | बिना मैं क्योंकर जीऊगी आप की मृत्यु के उपरान्त परलोक में अक्षय सद्गति प्राप्त करूगी । हे द्विजश्रेष्ठ! ये दोनों बालक ही किस प्रकार जीवित रह सकेंगे। मै जो कहती हू वही श्रेष्ठ धर्म है । ऐसा करने से आपके न रहने पर मै ही किस तरह अच्छी राह पर तुम्हारे लिये भी प्रचुर धर्म और अर्थ का कार्य होगा स्थिर रहकर इनके जीवन की रक्षा कर सकूगी ? ॥५६॥ आपके बाद यदि आपके घराने के साथ विवाहिक देखो, जिस अभिप्राय से स्त्री की कामना की सम्बन्ध के अयोग्य कलङ्कित और गर्वितजन यदि जाती है वह आपको सिद्ध हो गया है। मैंने पुत्र | इस कन्या के लिये प्रार्थना करें तो मै किस तरह और कन्या उत्पन्न करके आपका ऋण चुका दिया उस कन्या की रक्षा कर सकृगी जैसे पृथ्वी पर पड़े है । आप इस पुत्र और कन्या के पालने पोपणे और । हुए मास को सब पक्षी खाने की इच्छा किया करते देखने भालने में समर्थ हो, किन्तु मैं जीवित रहकर इस | हैं इसी प्रकार से पतिहीन स्त्री को भी सब मनुष्य कार्य को भरी भाति नहीं कर सकती ॥७1८॥ चाहा करते है ॥९॥१२॥ आप मेरे प्राण और धन सबके ईश्वर हो। आपके है द्विजश्रेष्ठ ! मेरे पतिहीना होने से दुरात्मा रोग - Mrmyron.
[ आदिपर्व 2-200carooo coroccoom Voro । ७७२ म हा भारत Grammarrormaemmemorroreone कथं शक्ष्यामि वालेऽग्मिन्गुणानाधातुमीप्सितान् । अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा वं धर्मदर्शिवान् ॥ १५ ॥ इमामपि च ते वालामनाथां परिभूय माम् । अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुति यथा तां चेदहं न दित्सेयं त्वद्गुणैरुपबृंहिताम् । प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविवांक्षा इवाऽध्वरात् ॥ १७ ॥ संप्रेक्षमाणा पुत्रं ते नाऽनुरूपमिवाऽऽत्मनः । अनहवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ॥ १८॥ अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती अवलिसनरब्रह्मन्मरिष्यामि न संशयः ॥ १९ ॥ तौ च हीनौ मया बालौ त्वया चैव तथाऽऽत्मजी। विनश्येतां न सन्देहो मत्स्याविव च लक्षये ॥ २० ॥ त्रितयं सर्वथाऽप्येवं विनशिष्यत्यसंशयम् त्वया विहीनं तस्मात्वं मां परित्यक्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ व्युष्टिरेषा परा स्त्रीणां पूर्वं भर्तुः परां गतिम् । गन्तुं ब्रह्मन्सपुत्राणामिति धर्मविदो विदुः ॥ २२ ॥ मेरी कामना कर मेरे चित्त को चलायमान कर सकते | जैसे यज्ञ की वस्तु लट खाता है वैसे ही वे लाकर है । हे नाथ ! तो मैं उस अवस्था में किसतरह बरपूर्वक इसको हर ले जायेंगे ॥१६॥१७|| साधु जन जिसकी बदाई करते हैं उस-सुमार्ग पर हे ब्रह्मन् । जब मै रोकों में अनादर की जाऊगी टिकी रह सकृगी। मैं आपकी इस बालिका कन्या तो नहीं कह सकती कि मेरी कैसी कुगति होगी। को ही किस तरह आपके बाप दाद की चाल पर ऐसी दशा में आपके पुत्र को कुल के विपरीत चरते चराने में समर्थ हो सकूगी । और फिर क्योंकर मै और कन्या को दुष्टा के वश में देखकर निम्सदेह इस पितृहीन अनाथ बालक को आप जैसे धर्मज्ञ के | मैं मर जाऊगी । तब मेरे आपके दोनों के न होने योग्य वाछित विद्या पटा सकूगी ॥१३॥१५॥ पर ये बालक भी बिना जल के मछरीक समाज अयोग्य जन मुझको हराकर शूद्रों के वेद | मर जायेंगे ॥१८॥२०॥ सुनाने की प्रार्थना के सदृश इस अनाथ बाग को इसलिये माप विचार करके देखिये, आपके मागेंगे तिस पर आपके गुणों से मुहावनी इस कन्या | मरने पर मैं और ये दोनों बचे भी अवश्य र को यदि में अयोग्य वर को न देना चाह तो कोमा । जायेंगे । इमरिय मेरी समझ में मुझको त्याग देना -- 2-3I/ अध्याय १६० ] महाभारत ७७३ conococoreovcore200000 cococork .. . परित्यक्तः सुतश्चाऽयं दुहितेयं तथा मया वान्धवाश्च परित्यक्तास्त्वदर्थं जीवितं च मे ॥ २३ ॥ यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्दानैश्च विविधैस्तथा विशिष्यते स्त्रिया भतुनित्यं प्रियहिते स्थितिः ॥ २४ ॥ तदिदं यचिकीर्षामि धर्म परमसंमतम् इष्टं चैव हितं चैव तव चैव कुलस्य च ॥ २५॥ इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रियाः । आपन्द्रर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम् ॥ २६ ॥ आपदर्थे धनं रक्षेद्दारानक्षेद्धनैरपि आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि । ॥ २७॥ दृष्टादृष्टफलार्थं हि भार्या पुत्रो धनं गृहम् । सर्वमेतद्विधातव्यं बुधानामेप निश्चयः ॥ २८ ॥ एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धन । न समं सर्वमेवेति बुधानामेप निश्चयः ॥ २९ ॥ स कुरुष्व मया कार्य तारयाऽऽत्मानमात्मना । अनुजानीहि मामार्य सुतौ मे परिपालय ॥ ३० ॥ ही आपको उचित है । हे ब्रह्मन् ! इसके अतिरिक्त वह सब विपत्ति से बचने के लिये रक्खी नाती है धर्म जाननेवाले मनुष्य कहते है कि पुत्रवती स्त्री का ॥२५॥२६॥ पति से पहले मरना बड़े भाग्य की बात है ॥२१॥२२॥ और विपत्ति से बचने के लिये धन का सञ्चय मैं आपके हित के लिये पुत्र, कन्या, बान्धव करना चाहिये, धन के द्वारा स्त्री की रक्षा करनी और जीवन सब त्याग देने को उद्यत हुई है। स्त्रियों चाहिये । पण्डित लोगों ने निश्चय करके कहा है के लिये नाना प्रकार के यज्ञ, तप, नियम और दान ! कि इष्ट और अदृष्ट दोनों तरह के फल प्राप्त करने इन सब कामों से सदा पनि का प्रिय और हित के लिगे लड़की लड़के उत्पन्न करने चाहिएँ, विवाह करना ही अधिक फरदाई है ।।२।१४|| करना चाहिये और घर बनाकर अर्थोपार्जन करना मैंने जिस काम का करना ठान लिया है वही चाहिये ॥२७२८॥ इष्ट परमधर्म और आपके तथा आपके वश का मगल एक और वंश को और दूमरी और अपने को करनेवाला है । पण्डितों ने कहा है कि स्त्री, पुत्र, रखकर तोरने से सारे वंश की अपेक्षा अपना ही प्यारे मित्र और अर्थ चाहे जितनी इष्ट वस्तु हो पल्ला भारी देख पड़ेगा। इसलिये हे आर्य ! आप ७७४ महाभारत [ आदिपर्व 04 . ॥३२॥ अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्मनिश्चये धर्मज्ञानाक्षसानाहुर्न हन्यात्स च मामपि ॥ ३१ ॥ निःसंशयं वधः पुंसां स्त्रीणां संशयितो वधः । अतो मामेव धर्मज्ञ प्रस्थापयितुमर्हसि भुक्तं प्रियाण्यवाप्तानि धर्मश्च चरितो महान् । स्वत्प्रसूतिः प्रिया प्राप्ता न मां तप्स्यत्य जीवितम् ॥ ३३ ॥ जातपुत्रा च वृद्धा च प्रियकामा च ते सदा समीक्ष्यैतदहं सर्वं व्यवसायं करोम्यतः ॥ ३४ ॥ उत्सृज्याऽपि हिमामार्य प्राप्स्यस्यन्यामपि स्त्रियम् । ततः प्रतिष्ठितो धर्मो भविष्यति पुनस्तव ॥३५॥ न चाऽप्यधर्मः कल्याण बहुपत्नीकृता नृणाम् । स्त्रीणामधर्मः सुमहान्भर्तुः पूर्वस्य लङ्घने एतत्सर्व समीक्ष्य त्वमात्मत्यागं च गर्हितम् । आत्मानं तारयाऽद्याऽऽशु कुलं चेमौ च दारको ॥ ३७ ॥ वैशम्पायन उवाचएवमुक्तस्तया भर्ता तां समालिङ्गय भारत मुमोच वाष्पं शनकैः सभार्यों भृशदुःखितः ॥ ३८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वर वधपर्वणि ब्राह्मणीवाक्ये पाट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ।। मुश से काम पूरा कर बुद्धि के अनुसार अपनी रक्षा | चुके हैं । मैं बहुत धर्मसञ्चय कर चुकी हूं और फीजिए। मुझे ही जाने के लिये आश दीजिए। मापसे सन्तान भी प्राप्त कर चुकी हूं । इममिये आप इस पुत्र और कन्या का भरण-पोषण कीजिएगाजीवन त्याग करने में मुझे तनिक भी दु.ख न होगा ॥२९॥३०॥ मैं सन्तान उत्पन्न कर चुकी हूं, बूढी हो आई हूं, धर्म जाननेवालों ने कहा है कि स्त्रियों का वध | और सदा आफ्ना हित किया करती हूं । यही सब नहीं करना चाहिये, और राक्षस लोग भी धर्मज्ञ सोच-विचारकर मैने अपने प्राण देना ही निश्चित होते हैं । इसलिय सम्भव है, वह सक्षस मुझकोन कर लिया है ॥३१॥३४॥ मारे हे धर्मज्ञ। इस स्थल पर पुरुष का वध निश्चित इसके अतिरिक्त मेरे न रहने पर आप दूसरा विवाह और स्त्री का वध अनिश्चित देख पड़ता है। इस कर सकते हैं। इस कारण फिर धर्माचरण कर महंगे। कारण मुझे ही वहां भेजना उचित है। मैं बहुत मुस हे मंगलमय ! पुरुष को यहुन सी स्त्रियों के साथ भी भोग चुकी हूं । आप भी मेरा बहुत कुछ प्रिय कर विवाद करने से कोई अधर्म नहीं होता है। परन्तु Pror •orrrrrrmrori" अध्याय १६१ ] महाभारत ৩৩৭ -31525 Cococoron0000 curorumayores स्त्री यदि पहरे पति को छोड़ करके दूसरे पति का और इन दो बालकों और आत्मा की रक्षा करें। आश्रय रे रेती है तो उसे पाप लगता है ॥३५॥३६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! ब्राह्मण अपनी आप इन सन बातों को भली भाति विचार कर म्त्री के ये वचन सुनकर उससे लिपट गया और अपना नाश करना अनुचित जानकर अपने कुर | असह्य दु ख के मारे दोनों रोने लगे ॥३७॥३८॥ आदिपर्व का एक सौ माठ अध्याय ममाप्त हुआ । अथ एस्पध्याधिकशततमोऽध्याय ॥ १६१ ॥ वैशम्पायन उपाय-तयोर्दुःखितयोर्वाक्यमतिमात्रं निशम्य तु ततो दुःखपरीतागी कन्या तावभ्यभापत किमेवं भृशदुःखातों रोरूयेतामनाथवत् ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम् ॥ २ ॥ धर्मतोऽहं परित्याज्या ,युवयोनोऽत्र संशयः त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्रातं सर्व मयैकया ॥ ३ ॥ इत्यर्थमिप्यतेऽपत्यं तारयिष्यति मामिति अस्मिन्नुपस्थिते काले तरध्वं प्लववन्मया इह वा तारयेदुर्गादुत वा प्रेत्य भारत सर्वथा तारयेत्पुत्रः पुत्र इत्युच्यते बुधैः ॥ ५ ॥ आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रान्मयि नित्यं पितामहाः । तत्स्वयं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः ॥ ६.॥ भ्राता च मम वालोऽयं गते लोकममुं त्वयि । अचिरेणव कालेन विनश्येत न संशयः n मी इय सठ अध्याय ॥ १६१ ।। वैशम्पायन ने कहा कि अनन्तर कन्या इन दुमी वर मुझं त्यागार आप सी रक्षा क्यों नहीं करता माना हिना की बात आदि से अन्त तक मुनकर रोग निम्तार पाने की आना से ही सन्तान की मा मेदयुक्त चिस से बोली आप क्यों दु रा होरर करने है । इसलिये न्यारूपी नाव की सहायता मे अनाधीनद रो रहे हैं । पहरे मेरी यान मुनार आपदम विपति सागर के पार पहुन जाइप ॥३॥ जो उनित दो सो करें ॥१॥ आरमज मे रोग हम रोक और पररोष गमय आप रोग धर्म के अनुमार अवश्य ही एक दिन विग्न मे उद्धार होने हैं इसरिय पण्डिन रोग टमको मुझे और दंगाइसम्यि जर मग त्याग निधिन र पुत्र हन है । ति रोगों के उद्धार के निमिछदा - JA ওও महा मारत [ आदिपर्व 707 1200 5omoo.2oE coordar तातेऽपि हि गते स्वर्ग विनष्टे च ममाऽनुजे । पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत्तत्तेषां विप्रियं भवेत् ॥ ८ ॥ पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाऽहमसंशयम् । दुःखाद्दुःखतरं प्राप्य नियेयमतथोचिता त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः । सन्तानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम् आत्मा पुत्रः सखा भार्या कृच्छं तु दुहिता किल। स कृच्छ्रान्मोचयाऽऽत्मानं मां च धर्मे नियोजय ॥ ११ ॥ अनाथा कृपणा वाला यत्र कचन गामिनी । भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा ॥ १२ ॥ अथवाऽहं करिष्यामि कुलस्याऽस्य विमोचनम् । फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १३ ॥ अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम । पीडिताऽहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि ॥ १४ ॥ तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं च सत्तम आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज ॥ १५॥ मुझसे नाती की आशा करते है, किन्तु मै नाती तो माता, बालक पुत्र, वश और पिण्ड, सबकी रक्षा की अपेक्षा न करके म्पय पिता का जीवन बनाकर होगी ॥२॥१०॥ उनका उद्धार करूगी ॥५॥६॥ है पिता जी ! पुत्र अपने तुल्य होता है और हे पिता जी ! यदि आप अपनी रक्षा न करगे स्त्री मित्र के समान होती है, किन्तु कन्या कष्ट के तो इसमें संदेह नहीं है कि मेरा छोटा भाई थोड़े समान होती है । इस कारण कष्ट के स्वरूप इम ही कार में मर जायगा । तब आपके और भाई के कन्या के द्वारा अपनी रक्षा कीजिए । मुझे अपने धर्म का पालन करने की आज्ञा दीजिए। हे पिता जी ! रह जायगा । उससे बड़ा अनिष्ट होगा ॥८ और मैं तब पिता, माता के बिना बड़ी दुखी जहातहा जाना पड़ेगा ॥११॥१२॥ हगी और दु ख पाकर अनुचित मृत्यु के वश में हो अतएव में इस कठिन काम को करके बुर की जाऊगी । यदि आप सिर बुद्धि से धैर्य के साथ रक्षा य रूगी। उसके कारण मुझे अनेक शभ होग। विचार करके इस विपत्ति से अपना उद्धार कर सकेंग द्विजश्रेष्ठ। यदि आप मुझे छोड़कर उस राईम के - - . न रहने से पितरों को पिण्ड पहुँचानेवाला कोई न म बालकाह। आपके बिना अनाथ और दीन होकर 7.75A-Iron.7 अध्याय १६१ ] महाभारत ওওও Dirstococci.chcotco200 - - अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम् । किं त्वतः परमं दुःखं यहयं स्वर्गते त्वयि ॥ १६ ॥ याचमानाः परादन्नं परिधावेमहि इववत् स्वयि स्वरोगे निर्मुक्त क्लेशादस्मात्सवान्धवे । अमृतव सती लोके भविष्यामि सुखान्विता ॥ १७ ।। इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति नः श्रुतम् । त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यन्ति हिताय वै ।। १८ ॥ वेशपागन यान-एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम् पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः ॥ १९ ॥ ततः प्ररुदितान्सान्निशम्याऽथ सुतस्तदा । उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत् ॥ २०॥ मापितः क्रन्द मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाऽब्रवीत् । प्रहसन्निव सर्वास्तानेकैकमनुसर्पति ॥ २१ ॥ ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत् अनेनाऽहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ॥ २२॥ पास जायँगे तो मुझे बड़ा कष्ट होगा ॥१३॥१४॥ मैंने सुन भी रक्खा है कि ऐसे अनुचित कार्य में इमलिये मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मुझपर कृपा कन्या दे देने पर भी पितरों को जल देने से वे हित कीजिए । मेरे और धर्म तथा कुल की रक्षा के करनेवाले बने रहते हैं । अतएव आप यह कार्य अनुरोध से आप अपनी रक्षा कीजिए । एक समय । मुझको सौपकर अपने आप जीवित रह करके यदि मुझको तो त्यागना ही होगा फिर अप ही त्याग पितरा को जल दें तो वे हित करनेवाले होंगे॥१७१८॥ देने में क्या हानि है । निश्चित रूप से जो काम कन्या के ये वचन सुनकर पिता और माता दोनों करना ही है उसमें देर करने की क्या आवश्यक्ता और भी रोने लगे। कन्या भी उनके साथ रोने लगी। है।॥१५॥१६॥ अन्त को यह बालक उन्हें रोते देखकर प्रसन्नमुस इससे अधिक दुख की क्या बात होगी आपके हार मयुर तोतली वाणी से कहने लगा-हे माना वर्ग को सिधारने पर हमको सदा अन्न माग माग जी और पिता जी ! आप क्यों रोते हैं । हे बहन ! कर बुना की तरह फिरना पड़ेगा। आप इस वित्ति तुम भी शौक न करो । अब यह पारक हर एक से छुटकाग पार यदि भाई यापुआ के साथ मुस के पास जाकर मान्तसना देने की चेष्टा करने लगा। से जीवन व्यतीत करेंगे तो मै मुख से रह समगी। इसके पश्चत् एक तिनका उठाकर यह कहने लगा- rar-J ८० महाभारत [ आदिप Accolo106Kore TOATOTO orrorecar । विपरीतं मया चेदं त्रयं सर्वमुपार्जितम् तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम् ॥ १३ ॥ सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः भोजनं पुरुपश्चैकः प्रदेयं वेतनं मया. न च मे विद्यते वित्तं संक्रेतुं पुरुषं क्वचित् । सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कदाचन गनिं चैव न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय रक्षसः । सोऽहं दुःखार्णवे मनो महत्यसुकरे भृशम् सहवैतर्गमिष्यामि बन्धवैद्य राक्षसम् ततो नः सहितान्क्षुद्रः सर्वानवोपभोक्ष्यति ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चकवधपर्वणि कुन्तीप्रश्ने द्विपप्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ।। परन्तु मैने उसके विपरीत काम किया है और मेरे पास इतना धन नहीं है कि कहीं से एक कहा भी है कि पहले राजा का आश्रय लेना चाहिये, मनुष्य मोल ले आऊँ और उस राक्षस के अर्पण करूँ। फिर स्त्री से विवाह करना चाहिये और तब धन और अपने परिवार के किसी मनुष्य को भी मैं दे सञ्चय करना चाहिये। इन तीनों बातों को प्राप्त करने नहीं सकता। इस कारण आज उस राक्षस के हाथ से जाति और पुत्रों की रक्षा की जा सकती है। किन्तु से छुटकारा पाने का कोई भी उपाय मुझे नहीं देख इन तीनों का संग्रह मैने उलटे ढह से किया है । पड़ता इसलिये अनि अपार दु.ख के समुद्र में ड्या इसी कारण इस समय विपत के समुद्र में गिरकर बड़ा हूं । मैंने निश्चय कर लिया है कि दुःखी हो रहा हूं.। आज वही कुलक्षय करनेवाली बान्धवों के साथ उस नीच राक्षस के पास जाऊंगा। हमारी बारी है । उस राक्षस के भोजन के लिय र के बस, वह हम सबको एक साथ खा जायगा ॥१५॥१७॥ स्वरूप में एक मनुप्य मुझको देना पड़ेगा ॥१२॥१४॥ आदिपर्य का एक मौ बासठ अध्याय ममाप्त हुआ। आजम सव अथ त्रिपाठाधिकशततमोभ्यायः ॥ १६३ ।। गुन्युगाच- न विपादस्त्वया कार्यों भयादस्मात्कथंचन उपायः परिदृष्टोऽत्र तस्मान्मोक्षाय रक्षसः एक मां निरमठ अध्याय ॥ १६३ ॥ युन्ती ने कहा हे ब्रामण ! आप इस भय से । एक टाय मान लिया।आफ काल एक रिसीतरह का खेद न करे। मैने उम सक्षम गं यनने पुत्र और पकया है। ये दोनों मनी -. - अध्याय १६३ ] म हा मारत ७८१ occo - एकस्तव सुतो वालः कन्या चैका तपस्विनी । न चैतयोस्तथा पल्या गमनं तव रोचये ॥ २ ॥ मम पञ्च सुता ब्रह्मस्तेषामेको गमिष्यति त्वदर्थं बलिमादाय तस्य पापस्य रक्षसः ब्राह्मण उवाच-नाऽहमेतत्करिष्यामि जीवितार्थे कथंचन ब्राह्मणस्याऽतिथेश्चैव स्वार्थे प्राणान्वियोजयन् ॥ ४ ॥ न वेतदकुलीनासु नाऽधर्मिष्ठासु विद्यते यवाह्मणार्थं विस्तृजेदात्मानमपि चाऽऽत्मजम् ॥ ५ ॥ आत्मनस्तु मया श्रेयो बोद्धव्यमिति रोचये ब्रह्मवध्याऽऽत्मवध्या वा श्रेयानात्मवधो मम ब्रह्मवध्या परं पापं निप्कृति ऽत्र विद्यते अबुद्धिपूर्वं कृत्वाऽपि वरमात्मवधो मम न वह वधमाकांक्षे स्वयमेवाऽऽत्मनः शुभे परैः कृते वधे पापं न किंचिन्मयि विद्यते अभिसन्धिकृते तस्मिन्ब्राह्मणस्य वधे मया । निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च इमलिये मैं नहीं चाहती कि आपकी स्त्री या आप पुत्र को राक्षस का आहार बना देना चाहती हो। स्वयं उस राक्षस के पास जाय ॥१॥२॥ किन्तु मै इसे किसी तरह स्वीकार नहीं कर सकता। मेरे पान पुत्र है, उनमें से एक तुम्हारे उपकार बामणवध और आत्महत्या इन दोनों में आत्महत्या के लिये उपहार लेकर उस पापी राक्षस के यहां ही टीक और मेरा कर्तव्य है ॥५॥६॥ जायगा । ब्राह्मण ने कहा-मे अपना जीवन बचाने बामणवध करके उसके महापाप से किमी ताद के लिये कभी ऐसा काम नहीं कर सकृगा। मैं अपने मुझे अपना छुटकारा नहीं देख पड़ता । बिना जाने रिय ब्राह्मण और अतिथि का प्राण लेने के लिये भी ब्रह्महत्या की जाय तो उसमें यों छुटकारा नहीं साहस नहीं कर सकता ॥३१॥ होना । मैं अपने हाथ से अपनी हत्या मीनदी जोनीच वंग में उत्पन्न और अधार्मिक है वे भी करना चाहता । दूमरा यदि मरी हत्या करेगा तो ऐसे काम में हाथ नहीं डारते । तुम निम्सन्देह कोई उममें मुझे पापभागी न होना पड़ेगा !!७८|| दुर्गन घर की धर्म में निष्ठा रखनेवारी स्त्री हो, जो किन्तु यदि जान बूझर अपने म्यार्थ के रिय भाषण के रिये अपने आत्मा मे भी बढ़कर प्यारे में मामणी हत्या कराऊंगा तो उस महापानक मे, r ७७८ महा भारत [ आदिपर्व Prod 3cooooooooolcoraco . तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत् । चालस्य चाक्यमव्यक्तं हर्पः समभवन्महान् ॥ २३ ॥ अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुप स्मृत्य तान् । गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत् ॥ २४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणकन्यापुत्रवाक्ये एकपट्यधिकशततमोऽध्यायः १६१ मैं इस तृण के द्वारा उस मनुष्य-मांसाहारी राक्षस कुन्ती अपने मन के भाव को प्रकट करने का उपयुक्त का नाश कर डालूंगा ॥१९॥२२॥ अवसर उपस्थित देख, उनके पास जाकर, जैसे अमृत उसके पिता-माता और बहन यद्यपि बड़े दुःख छिड़ककर कोई मुर्दे को जिला दे उसतरह, उस ब्राह्मण से कातर थे तथापि उस समय उस बालक की असपष्ट ! के परिवार के शरीरों में जान सी डालती हुई यों बात सुनकर उनको बड़ा हर्ष हुआ। इसके पश्चात् । कहने लगी ॥२३१२४॥ आदिपर्व का एक सौ इकसठ अध्याय समाप्त हुआ । अथ द्विपप्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥ कुन्त्युवाच --कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः । विदित्वाऽप्यपकयं शक्यं चेदपकर्षितुम् ग्याह्मण उवाच-उपपन्नं सतामेतद्यद्वीपि तपोधने न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ॥ २ ॥ समीपं नगरस्याऽस्य वको वसति राक्षसः ईशो जनपदस्याऽस्य पुरस्य च महाबलः 'पुष्टो मानुपमांसेन दुर्बुद्धिः पुरुपादकः रक्षत्यसुरराट् नित्यमिमं जनपदं वली नगरं चैव देशं च रक्षोवलसमन्वितः तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भयम् ॥ ५ ॥ एक सौ बासठ अध्याय ॥ १६२ ॥ कुन्ती ने कहा-मैं जानना चाहती हूं कि ऐसे शक्ति से बाहर है ॥१२॥ दुख का कारण क्या है क्योंकि यदि उससे बचने इम नगर के सपि वक नाम का एक महाबली का उपाय बन पड़े तो करंगी। ब्राह्मण ने कहा राक्षस रहता है । वह मनुप्याहारी इस नगर पर हे तपम्बिनी ! तुम जो कहती वह साधुओं ही ' और इस प्रदेश पर अपना अधिकार रखता है। के योग्य है किन्तु यह दुःख दूर करना मनुष्य की मनुष्य मांस पुष्ट, महावनी और दुष्टबुद्धि वह । MAIsrory.comsirire
अध्याय १६४ ]
महाभारत
गुरुणा चाऽननुज्ञातो ग्राहयेद्यत्सुतो मम
न स कुर्यात्तथा कार्य विद्ययेति सतां मतम् ॥ १८ ॥
एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह ।
हृष्टः संपूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम् ॥ १९ ॥
ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम् ।
तमतां कुरुप्वेति स तथेत्यब्रवीच तो
॥ २०॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिर्वणि वकाधार्वणि भीमबकवधाङ्गीकारे त्रिपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः । १६३ ।।
करेंगे तो विद्यार्थी ऋषिकुमार कौतूहल-पश वैसी कुन्ती के ये वचन सुनकर ब्राह्मणी-सहित ब्राह्मण
शक्ति पाने के लिये गरे पुत्रों को बहुत ही तह करेगे। को बड़ा आनन्द हुआ। उसने कुन्ती के अमृत मधुर
साधु रोगों का कहना है कि गुरु की आज्ञा के बिना ? वचनों का सादर अभिनन्दन किया। इसके उपरान्त
मेरे पुत्र जो विद्या दूसरों को देंगे उस विद्या के द्वारा | कुन्ती के साथ जाकर उस ब्राह्मण ने और कुन्तीने
ये फिर आप कुछ न कर सकेंगे। इसलिये वे यह भी यह कार्य करने के लिये भीमसेन से अनुरोध
विद्या गुरु की आज्ञा के रिना और किसी को नहीं किया । भीमसेन ने सुनते ही स्वीकार कर लिया
दे सकते ॥१७॥१८॥
॥१९॥२०॥
आदिपर्व का एक मौ तिरसठ अध्याय समाप्त हुआ |
अथ चतु पट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥
वैशम्पायन उवाच-करिप्य इति भीमेन प्रतिज्ञातेऽथ भारत
आजग्मुस्ते ततः सर्वे भक्ष्यमादाय पाण्डवाः ॥ १ ॥
आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डपुत्रो युधिष्ठिरः ।
रहः समुपविश्यकस्ततः पप्रच्छ मातरम्
युधिष्ठिर उवाच -किं चिकीर्पत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः
भवत्यनुमते किंचित्स्वयं वा कर्तुमिच्छति ॥ ३ ॥
गुन्युग-ममैव वचनादेप करिष्यति परंतपः
ब्राह्मणार्थे महत्कृत्यं मोक्षाय
नगरस्य च
एक मोचीमठ अध्याय ॥ १६४ ।
वैशम्पायन ने कहा- भारत! भीमसेन के उस भीमसेन के आकार को देखार टनमें मे युधिष्ठिर
काम को करने की प्रतिज्ञा करने पर चारों पाण्डर दुन्नी को एकान्त में ले जाकर पटा-भीग पराक्रमी
यादर मे भिक्षा मांगार आर पहुने ! अनन्तर भीमगन क्या अपनी इच्छा से यह काम करने के
.
॥ २ ॥
७८२ महा मारत [ आदिपर्व आगतस्य गृहं त्यागस्तथैव शरणार्थिनः याचमानस्य च वधो नृशंसो गर्हितों बुधैः ॥ १० ॥ कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन , । इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥ ११ ॥ श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् । ब्राह्मणस्य वधं नाऽहमनुमंस्ये कदाचन ॥ १२ ॥ कुन्त्युवाच-ममाप्येपा मतिब्रह्मन्विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा। न चाऽप्यनिष्ठः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १३ ॥ न चाऽसौ राक्षसः शक्तो मम पुत्र विनाशने । वीर्यवान्मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ॥ १४ ॥ राक्षसाय च तत्सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम् । मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः ॥१५॥ समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः वलवन्तो महाकाया निहताश्चाऽप्यनेकशः न विदं केषुचिब्रह्मन्व्याहर्तव्यं कथंचन विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान्विप्रकुर्युः कुतूहलात् ॥ १७ ॥ सहज में या कष्ट से, किसी तरह मैं मुक्त नहीं हो किया है कि ब्राह्मणों की अवश्य रक्षा करनी चाहिये । सकता। इसके सिवा यह बड़ा नीच और निन्दित और, सौ होने पर भी माता-पिता के रिये हर एक कर्म है । पण्डितों ने कहा है कि अतिथि वा शरण पुत्र प्रिय होता है। मेरा पुत्र वीर्यवन्त, तेजस्वी और लिये हुए को त्याग देना और मांगनेवाले को मार मंत्रज्ञ है। इसलिये वह राक्षस उसको नष्ट करने में डालना अति निटुर और अनुचित कार्य है ॥९।१०॥ समर्थ न होगा ॥१३॥१४॥ आपद्धर्म के जाननेवाले पहले महात्माओं ने कहा मुझको निश्चय जान पड़ता है कि मेरा पुत्र उस है कि निन्दित और निष्ठुर कार्य कभी न करना राक्षस को सब खाने की सामग्री दे आवेगा और चाहिये । अतएव आज स्त्री-सहित मेरे मरने में ही आप सही-सलामत चला आवेगा। मैने देखा है मेरा माल है । अपने लिये तुम्हारे पुत्र ब्राह्मण की कि इससे पहले अनेको महाचली राक्षस उस वीर से हत्या का अनुमोदन में कभी किसी तरह नहीं कर लड़कर मारे गये है ॥१५॥१६॥ १॥१२॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! यह बात किसी और के मारे कुन्ती ने कहा-हे ब्राह्मण ! मैंने भी यही निश्चय प्रकट न कीजिएगा, क्योंकि आप यह रात प्राट - - . सकता PM orror coccou cord अध्याय १६४ ] महा मारत ७८३ recorrorcorrore गुरुणा चाऽननुज्ञातो ग्राहयेद्यत्सुतो मम न स कुर्यात्तथा कार्य विद्ययेति सतां मतम् ॥ १८ ॥ एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह । हृष्टः संपूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम् ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम् । तमनां कुरुष्वेति स तथेत्यववीच्च तो ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि यकवधर्वणि भीमयकाधाङ्गीकारे त्रिपप्ठ्यधिकशततमोऽध्याय. । १६३ ।। करेंगे तो विद्यार्थी ऋपिकुमार कौतूदर-वश वैसी कुन्ती के ये वचन सुनकर ब्राह्मणी-सहित ब्राह्मण शक्ति पाने के लिये मेरे पुत्रों को बहुत ही तग करेंगे। को बड़ा आनन्द हुआ। उसने कुन्ती के अमृत मधुर साधु रोगों का कहना है कि गुरु की आज्ञा के बिना वचनों का सादर अभिनन्दन किया। इसके उपरान्त मेरे पुत्र जो विद्या दूसरों को देंगे उस विद्या के द्वारा । कुन्ती के साथ जार उस ब्राह्मण ने और कुन्ती ने वे फिर आप कुछ न कर सकेंगे। इसलिये वे वह भी यह कार्य करने के लिये भीमसेन से अनुरोध विद्या गुरु की आज्ञा के बिना और किसी को नहीं किया । भीमसेन ने सुनते ही स्वीकार कर लिया दे सकते ॥१७॥१८॥ ॥१९॥२०॥ आदिपर्व का एक मौ तिरसठ अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतु पश्यधिकशनतमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥ पैशम्पायन यान-करिष्य इति भीमेन प्रतिज्ञातेऽथ भारत आजग्मुस्ते ततः सर्वे भक्ष्यमादाय पाण्डवाः ॥ १ ॥ आकारणव तं ज्ञात्वा पाण्ड्डपुत्रो युधिष्ठिरः रहः समुपविश्यकस्ततः पप्रच्छ मातरम् युधिष्ठिर याच -किं चिकीर्पत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः भवत्यनुमते किंचित्स्वयं वा कर्तुमिच्छति गुन्त्यु गच-ममेव वचनादेप करिष्यति परंतपः ब्राह्मणार्थे महत्कृत्यं मोक्षाय नगरस्य च ॥ ४ ॥ एक मौघांसठ अध्याय ।। १६४ । शम्पायन ने कहा है भारत' भीमसेन के उम भीमसेन के आकार को देसार टनमें मे युधिष्ठिर ने काम को करने की प्रतिमा करने पर चारों पाण्टर कुन्नी को पकान्त में ले जाकर पूरा-भीम पराक्रमी बाहर से भिक्षा मागार आर पाने । अनन्नर भीमन क्या अपनी इच्छा.से यह काम करने के ॥ armrprart - JAroruAM.I7-J7-7-- ७८४ म हा भारत [ आदिपर्व rolod 107cd Joocoooooooococol । युधिष्ठिर उवाच-किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्करं कृतम् । परित्यागं हि पुत्रस्य न प्रशंसन्ति साधवः कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि लोकवेदविरुद्धं हि पुत्रत्यागास्कृतं त्वया यस्य वाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे शयामहे राज्यं चापहृतं क्षुद्रराजिहीर्षामहे पुनः यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तयन्नमितौजसः न शेते रजनीः सर्वा दुःखाच्छकुनिना सह ॥ ८ ॥ यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद्वयम् । अन्येभ्यश्चैव पापेभ्यो निहतश्च पुरोचनः ॥ ९ ॥ यस्य वीर्य समाश्रित्य नसुपूर्णां वसुन्धराम् । इमां मन्यामहे प्राप्तां निहत्य धृतराष्ट्रजान् ॥ १०॥ । तस्य व्यवसितस्त्यागो बुद्धिमास्थाय कां त्वया । कञ्चिन्नु दुःखैबुद्धिस्ते विलुप्ता गतचेतसः ॥ ११ ॥ पुन्त्युवाच- युधिष्ठिर न संतापस्त्वया कार्यो वृकोदरे । न चायं बुद्धिोवल्याद्वयवसायः कृतो मया ॥ १२॥ रिय तैय्यार हुए है या आपने उनको आज्ञा दी है। निश्चिन्त होकर सोने हैं, जिसके भुजबल के भरोसे कुन्ती ने कहा -शत्रुनाशी भीमसेन मेरी आज्ञा से ही हमको नीचाशय दुर्योधन आदि से लटे हुए राज्य ब्राह्मण को और इस नगर भर को विपत्ति से बचाने के पाने की आशा है, जिसके पराक्रम को स्मरण के लिये यह भारी ओर दुप्पर कार्य करने को उद्यत । करके दु ख और डर के मार दुर्योधन और शनि हुए हैं ॥१४॥ को गत्रि के समय नींद नहीं आती; ॥८॥ यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-आपने ऐसा भयानक जिस वीर के भुजवीय से हम रोग जगृह भार दुप्पर साहस पैसे किया ' साधु रोग कमी पुत्र | दूसरी विषदों से बचे और जिमने पुगेचन को यमराज त्यागने की प्रशसा नहीं करते और दूसरे का पुत्र के घर भेजा, यहा तक कि जिसके भुजार्य की बचाने के रिये अपना पुन त्यागना क्योंपर उचित आमा से हमको ऐसा विश्वास है कि गाना हम धृतराष्ट्र हो सकता है। आज आपने पुत्रोत्यागकर लोकाचार के पुत्रों को मारकर इस खोये हुए राज्य को पिर के विपरीत और वेद के विरुद्ध कर्म किया है ॥५६॥ पा चुके है। उसे आप क्या समझार त्यागने को जिसके भुजवर के भासरे हम रोग मुग से उपत हुई है।९।१०॥ --- अध्याय १६४ ] म हा भारत ७८५ Scorevrolo००८54kacokoracokoc इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिताः अज्ञाता धार्तराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यवः तस्य प्रतिक्रिया पार्थ ममेयं प्रसमीक्षिता एतावानेव पुरुषः कृतं यस्मिन्न। नश्यति । यावञ्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्याद्वहुगुणं ततः ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तं तदा जतुगृहे महत् । हिडिम्बस्य वधाच्चैवं विश्वासो मे वृकोदरे ॥ १५ ॥ बाहोर्यलं हि भीमस्य नागायुतसमं महत् येन यूयं गजप्रख्या नियूंढा वारणावतात् वृकोदरेण सदृशो वलेनाऽन्यो न विद्यते यो व्यतीयाद्युधि श्रेष्ठमपि चक्रधरं स्वयम् जातमात्रः पुरा चैव ममाऽङ्कात्पतितो गिरी । शरीरगौरवादस्य शिला गात्रैर्विचूर्णिता ॥ १८ ॥ तदहं प्रज्ञया ज्ञात्वा वलं भीमस्य पांडव । प्रतिकार्य च विप्रस्य ततः कृतवती मतिम् ॥ १९ ॥ क्या आपने अपना ज्ञान खो दिया, क्या दुःख से विशेषकर जो जितना उपकार करता है बदले आपकी बुद्धि जाती रही ? यह सुनकर कुन्ती ने | में उसका उससे अधिक उपकार करना उचित है। कहा-हे युधिष्ठिर तुम भीम के लिये चिन्ता न करो। जतुगृह में भीमसेन का जितना विक्रम देखा है और मै दुर्बुद्धि या मोह के कारण ऐसा काम करने को । उसने जिसप्रकार हिडिम्ब को मारा उससे मुझको तैय्यार नहीं हुई हूं ॥११॥१२॥ विधास हो गया है कि उसकी भुजाओं का बल दस हे पुत्र 1 देखा, इस ब्राह्मण के घर में हम सुख । हज़ार हाथियों के बराबर है ॥१५॥१६॥ से रहते हैं । इसने आदर-सत्कार करके हमारे दुख जिम भीम ने हाथी की भांति तुमको वारणावत को बहुत कुछ घटा दिया है । इसके घर में आश्रय नगर से निकाला था उस भीम के समान चली इस पाने के कारण ही धृतराष्ट्र के पुत्र अवतक हमारा घाती भर में कोई नहीं दीख पड़ता । ऐमा जान पता नहीं पा सके। इसी कारण इस समय इमनरह पड़ता है कि मेगभीम योधाओं में श्रेष्ठ वजधारी इन्द्र मैने उसके उपकार का बदला चुकाना सोचा है। को भी युद्ध में परास्त कर सकता है । हे पाण्डवश्रेष्ठ ! जो किसी के दिये उपकार को नहीं भृन्ता वही भीमसेन जन्म रेते ही मेरी गोद से पहाड़ की चट्टान सघा मनुष्य है ॥१३॥ पर गिर पड़ा था। उसके शरीर की चोट से पत्थर Amran ZJrzzrrrrrrr .
७८६ महा मारत [ आदिपर्व 20700105Koccoloc.zooooooococ arorore नेदं लोभान्न चाऽज्ञानान्न च मोहाद्विनिश्चितम् । बुद्धिपूर्व तु धर्मस्य व्यवसायः कृतो मया ॥ २० ॥ अर्थों द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः । प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान् ॥ २१ ॥ यो ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुर्यादर्थेषु कर्हिचित् । क्षत्रियः स शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयादिति मे मतिः ॥ २२ ॥ क्षत्रियस्यैव कुर्वाणः क्षत्रियो वधमोक्षणम् । विपुलां कीर्तिमानोति लोकेऽस्मिंश्च परत्र च ॥ २३ ॥ वैश्यस्याऽर्थे च साहाय्यं कुर्वाणः क्षत्रियो भुवि । स सर्वेष्वपि लोकेषु प्रजा रञ्जयते ध्रुवम् ॥ २४ ॥ शूद्रं तु मोचयेद्राजा शरणार्थिनमागतम् । प्राप्नोतीह कुले जन्म सद्व्ये राजपूजिते ॥ २५ ॥ एवं मां भगवान्व्यासः पुरा पौरवनन्दन । प्रोवाचाऽसुकरप्रज्ञस्तस्मादेवं चिकीर्पितम् ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि कुन्तीयुधिष्ठिरवाक्ये चतु पष्टयधिकशततमोऽध्याय ।। १६४ । के टुकड़े पिसकर चूर-चूर हो गये ॥१७॥१८॥ जो क्षत्रिय क्षत्रिय की जान बचाते है वह इस मैने खूब सोचकर उसके बल का पूरा अनुभव रोक और परलोक में अत्यन्त यश प्राप्त करते है। करके उसे ब्राह्मण का यह उपकार करने की आज्ञा इसमें संदेह नहीं कि यदि क्षत्रिय वैश्य की सहायता दी है । मैने अज्ञान, रोभ या मोह के वश होकर रे तो भूमण्डल में सर्वत्र प्रजा उसकी प्रेमी होती है ऐसा निश्चय नहीं किया । अच्छीतरह सोच-विचार ॥२३॥२४॥ करके मै यह धर्म का कार्य करने को उद्यत हुई हु जो राजा शरणागत शूद को विपत्ति से बचाता ॥१९॥२०॥ है वह भी ऐश्वर्यसम्पन्न, सर्वश्रेष्ठ राजवश में उत्पन्न हे युधिष्ठिर ! इस कार्य से दो प्रयोजन सिद्ध होता है। हे कौरवनन्दन! पूर्वकाल में अति बुद्धिमान् होंगे । हमको ब्राह्मण ने आश्रय दिया है, इस उपकार भगवान् व्यासदेव ने मुझको यह सब उपदेश दिये का बदला चुक जायगा, और धर्म भी होगा। मै थे इसलिये मैने यह काम करने की इच्छा की निश्चय जानती हूं कि जो क्षत्रिय ब्राह्मण की सहायता ॥२५॥२६॥ करते है वह अच्छी गति को प्राप्त करते है ॥२१॥२२॥ आदिपर्व का एक सौ चौसठ अध्याय ममाप्त हुआ । Yocorrorororonororororororororor ७८७ orrococcococola.oconcocor अध्याय १६५ ] महा भारत Herain अथ पञ्चपप्ठ्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १६५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद् बुद्धिपूर्वकम् । आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुकोशादिदं कृतम् ध्रुवमेष्यति भीमोऽयं निहत्य पुरुषादकम् सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुकोशवत्यसि ॥ २ ॥ यथा विदं न विन्देयुनरा नगरवासिनः तथाऽयं ब्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः वैशम्पायन उवाच-ततो राख्यां व्यतीतायामन्नमादाय पाण्डवः । भीमसेनो ययौ तत्र यत्राऽसौ पुरुषादकः ॥ ४ ॥ आसाद्य तु वनं तस्य रक्षसः पाण्डवो वली । आजुहाव ततो नाना तदन्नमुपपादयन् ततः स राक्षलः क्रुद्धो भीमस्य वचनात्तदा । आजगाम सुसंकुन्द्रो यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ ६ ॥ महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् । लोहिताक्षः करालश्च लोहितश्मश्रुमूर्धजः आकर्णाद्भिन्नवक्त्रश्च शंकुकर्णो विभीषणः त्रिशिखां भृकुटीं कृत्वा संदश्य रदनच्छदम् ॥ ८ ॥ एक सौ पैंसठ अध्याय ॥ १६५ ॥ माता की यह बातें सुनकर युधिष्ठिर ने कहा वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! इसके उपरान्त हे माता जी! आपने अपनी बुद्धि से विचारकर ब्राह्मण रात्रि व्यतीत होने पर भीमसन आहार की सामग्री पर दया करके ऐमाकिया सो उचित ही है । मापने । लेकर उस स्थान में गये जहा वह राक्षम रहता था। ब्राह्मण के दु.ख से दुखी होकर यह परोपकार का । वहां पहुचकर महाबरी भीमसेन आप ही उस खान काम करना विचारा है, इमलिये भीमसेन अवश्य ही की सामग्रो को खाते हुए उस राक्षस को पुकारने उस मनुष्य पक्षी राक्षस को मारकर रोट आवेगे। लगे । भीमसेन के पुकारने पर उस राक्षस को बड़ा किन्तु आप ब्राह्मण से यह कह दीजिएगा कि नगर क्रोध आया । यह वेग से दौड़ता हुआ वहा आया के रहनेवाले लोग यह बात न जान सके कि भीमसेन जहा भीममेन थे ॥४॥ ने यह काम किया है । उससे कह दना कि वह इस उसका गरीर बहुत बड़ा, आखें-दादी-मूंछ यात की असलियत को सावधानी से छिपा रख॥१३॥ और सिर के बाल ल-राल, आकार बहुत ही ७८८ Doorcococor-orrotocolor: .. 3ccesorosciocordcocon महाभारत [ आदिपर्व wired भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् कोऽयमन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम् .। पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्मियासुर्यमसादनम् ॥१०॥ भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एवं पराङ्मुखः वं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ अभ्यद्रवद्भीमसेनं जिघांसुः पुरुपादकः ॥ १२ ॥ तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा अमर्षेण तु संपूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ॥ १४ ॥ तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः नेवाऽवलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ततः स भूयःसंक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवदली. ॥ १६ ॥ भयानक, मुँह कान तक फैला हुआ और दोनों कान ने अनसुने से कर दिये । उस राक्षस का अनादर शंख के समान देखने में भयकर थे । उस राक्षस करके हँसते से भीमसेन मुँह फिगये हुए भोजन की भौहें क्रोध के कारण तीन जगह से टेढ़ी हो रही करते रहे । तब वह मांसाहारी राक्षस भयानक शब्द थी। वह दांतों से ओठ चबाता हुआ, बड़े वेग से करता हुआ दोनों हाथ उठाये भीमसेन को मारने धरती को कपाता हुआ, दौड़ा। पास पहुंचार के लिये उनकी ओर दौड़ा । तब भी शत्रुनाशन भीमसेन को अपने भाहार की सामग्री खाते देख पाण्टु-पुत्र भीमसेन उपेक्षा के साथ उसकी और वह मोघ के मारे आग के समान प्रज्वलित हो देखकर भोजन करते ही रहे । सक्षम ने तय क्रोध उठा। वह आंख निकालकर भीमसेन से कहने लगा- से जलकर भीमसेन के पछि खड़ा होकर दोनों तू कौन दुर्बुद्धि पुरुष है जो यमगज के यहां जाने । मुट्टियों से भीमसेन की पीट पर गाग। उस परी की इच्छा से मेरे सामने ही मेरे लिये भेजे गये । राक्षस के दोनों हाथों की नौट गाकर मी भीम ने इम अन्न को माप खा रहा है ! ॥७॥१०॥ उसकी ओर आंख उठाकर देगा तक नहीं, वे गोजन हे राजन् ! राक्षम के ये वचन मुनकर भी भागमन करते ही रहे ॥११॥१५॥ ASPror" oricalc00 000000000 - - अध्याय १६५ ] महा भारत ७८९ conooncones ततो भीमः शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुपर्षभः वायुपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महावलः ॥ १७॥ क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान्वहुविधान्चली प्राहिणोद्भीमसेनाय तस्मै भीमश्च पाण्डवः तवृक्षयुद्धम भवन्महीरुहविनाशनम् घोररूपं महागज नरराक्षसराजयोः ॥ २०॥ नाम विश्राव्य तु वकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् । भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महावलम् भीमसेनोऽपि तद्रक्षः परिरभ्य महाभुजः विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष वलाद्वली ॥ २२॥ स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्च पाण्डवम् । समयुज्यत तीत्रेण क्लमेन पुरुषादकः ॥ २३ ॥ तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत पादपांश्च महाकायांश्चूर्णयामासतुस्तदा ॥ २४ ॥ तब वह राक्षस अति क्रोध से अन्ध के समान परस्पर युद्ध होने से उस बन के अनेकों वृक्षों का होकर मारने के लिये वृक्ष उठाकर फिर उनपर दौड़ा। नाश हो गया । महाबली बकासुर महाबली पाण्डु-पुत्र फिर महाबली पुरुपेन्द्र भीमसेन धीरे धीरे वह अन्न | भीमसेन को अपना नाम सुनाकर उन से झपटकर खाकर मुँह धोकर प्रसन्नचित्त से युद्ध के लिये खई | घोर युद्ध करने लगा । अब दोनों वर्ली वीर लिपट हुए ॥१६॥१७॥ गये और एक दूसरे को अपनी ओर खींचने लगा। उन्होंने राक्षस के चलाये हुए उस वृक्ष को | भीमसेन को आप खींचकर और भीमसन के द्वारा हंसते-हंसते बायें हाथ से पकड़ लिया । यह देखकर आप खींचा जाकर वह राक्षस थोड़ी देर में थक बलवन्त राक्षस तरह तरह के वृक्ष उखाड़कर फिर गया ॥२०॥२३॥ भीमसेन पर प्रहार करने लगा। भीमसेन भी विविध उन दोनों योद्धाओं के वेग से पृथ्वी कांपने लगी। वृक्ष उखाड़कर उनके उसके प्रहारों को रोककर आप बड़े-बड़े वृक्ष चूर चूर होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । भी उस पर प्रहार करने लगे ॥१८.१०॥ भीमसेन ने देखा, वह मनुष्याहारी रासस थक गया हे राजन् ! इस तरह मनुष्य और राक्षस का है । तब उन्होंने बलपूर्वक उसे पृथ्वी पर गिरा दिया Horo 1212 ७९० महा मारत [ आदिपर्व care cod Toooozoo.ooo cocococok हीयमानं तु तदक्षः समीक्ष्य पुरुपादकम् निप्पिप्य भूमौ जानुभ्यां समाजप्ने वृकोदरः ॥ २५॥ नतोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव वाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम ॥ २६ ॥ सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः तद्रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम् , ॥२७॥ ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात्प्रादुरासीद्विशाम्पते भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ॥२८॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वकवधपर्वणि वकभीमयुद्धे पञ्चपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥ और उसकी कोखों में घुटने मारते हुए वे उसको | उसके दो टुकड़े कर डाले । उस समय वह राक्षस बलपूर्वक पीसने लगे । अन्त को भीम ने उसकी | घोर शब्द करने लगा। तब उसके मुँह से रक्त की पीठ में घुटना रखकर दाहने हाथ से उसकी गर्दन धारा बहने लगी ॥२४॥२८॥ और बायें हाथ से उसकी कमर पकड़कर बीच से आदिपर्व का एक सौ पैंसठ अध्याय समाप्त हुआ। ०-- - . अथ पद्पष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः स भग्नपाङ्गिो नदित्वा भैरवं स्वम् शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद्वकः तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याऽथ रक्षसः निष्पपात गृहाद्राजन्सहैव परिचारिभिः तान्भीतान्विगतज्ञानान्भीमः प्रहरतां वरः सान्त्वयामास वलवान्समये च न्यवेशयत् न हिंस्या मानुपा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् । हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति एक सोचच्छ अध्याय ॥ १६६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! पर्वत ऐसे शरीर | हे राजन् ! उसके शब्द को मुनकर उस राक्षस वाले बकासुर को भीमसेन ने अन-भङ्ग करके मार कुटुम्बी और नौकर लोग वहाँ दौड़े हुए आये और डाला । वह भयानक शब्द करता हुआ मर गया। भीमसेन के हाथ से यक राक्षस को मरा हुआ देखकर के Choro -ronon-srcror0507 अध्याय १६६ ] महा मारत ७२१ oesco 50000-03c- Sconcocococc - 1 । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैनगरवासिभिः ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुपादकम् द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामाऽनुपलक्षितः दृष्ट्वा भीमवलोद्भूतं वकं विनिहतं तदा ज्ञातयोऽस्य भयोद्विग्नाः प्रतिजग्मुस्ततस्ततः ॥ ८ ॥ ततः स भीमस्तं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् । आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात्कल्यमेव तु । ददृशुनिहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे ततः सहस्रशो राजन्नरा नगरवासिनः तत्राऽऽजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः ॥ १२ ॥ भीमसेन के डर के मारे कापने लगे । उनको कापते के हाथों बकासुर की यह गति देवकर, डर के मारे हुए देखकर भीमसेन ने कहा-तुम अपने प्राणों का जहा-तहा को भाग गये ॥७॥८॥ भयगत करो। मेरे सामने सौगन्ध साओ कि आज । इधर राक्षस को मारकर भीमसेन उसी ब्राह्मण पीछे हम कभी मनुष्यों को नहीं मारेंगे। यह सुनकर के घर लौट आये। उन्होंने अपनी माता और भाइयों राक्षमों ने सौगन्ध ग्याई और कहा कि आज से लेकर से वहा का सब वृत्तान्त आदि से अन्त तक कह हम कभी मनुष्यों को नहीं मारेंगे। तब से यहा के सुनाया। दूसरे दिन प्रात काल नगरवामियों ने नगर राक्षम बहुत सीधे देग पड़ने लगे ॥१६॥ के बाहर निलर देखा, टस सक्षम की रक्त में अब भीमसन ने उस मरे हुए राक्षस की राम भीगी हुई पहाड़ के शियर के समान मयानक राम को उठाकर नगर के द्वार पर रग दिया और आप यहा पृरती पर पड़ी है । उस देगार उनके रोमाघ गुप्त रूप से माता और भाइयों के पास चल दिये। हो आया ॥९॥११॥ यापुर के सनालियों में से बहुत से राक्षम, भीम जो गंग नगर के द्वार पर गये ये परम मAR ७९२ म हा भारत [ आदिपर्व 2050colo 200cocon oroscokokokorococorrorobo ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वाऽतिमानुपम् । दैवतान्यर्चयांचक्रुः सर्व एव विशांपते ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने । ज्ञात्वा चाऽऽगम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ॥ १४ ॥ . एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् । उवाच नागरान्सर्वानिदं विप्रर्पभस्तदा ॥ १५ ॥ आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ॥ १६ ॥ परिपृच्छय स मां पूर्व परिक्लेशं पुरस्य च । अब्रवीवाह्मणश्रेष्टो विश्वास्य प्रहसन्निव ॥ १७॥ प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतदुरात्मने मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाऽब्रवीत् ॥ १८ ॥ स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति तेन नूनं भवेदेतत्कर्म लोकहितं कृतम् ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः । वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा होकर नगर में लौट आये। उन्होंने एकचक्रा नगरी लोगों के बहुत पूछने पर उमने पाण्डवों को के और लोगों को यह समाचार सुनाया। हे राजन् ! बचाकर कह दिया कि अपनी पारी जानकर मै अपने तच सहस्रों बालक-बूढे-जवान नगर निवासी स्त्री-पुरुष । परिवार के साथ बहुत बिलख विलखकर रो रहा था। चक राक्षस को देखने के लिये उसी ओर चल पड़े। उस समय एक मंत्र में सिद्ध महात्मा ब्राह्मण ने मुझको लोगों का ताँता बँध गया । उस अद्भुत अमानुषी | उस दशा में देख कर पूछा ॥१५१६|| काम को देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । राक्षम और इस नगर के घोर क्लेश के वृत्तान्त से ज्ञान के मरने के लिये जिसने जिस देवता की पूजा करने । होकर ढाढस देकर हँसते हुए मुझसे कहा-मैं ही की मानता मान रक्खी थी वह उमे करने लगा। उस दुष्ट राक्षस के पास उसका आहार ले जाऊँगा; इसके पश्चात् सब लोग पता लगाने लगे कि कल किस मेरे लिये तुम्हे डरने या चिन्ता की आवश्यकता की बारी थी। गिनने से उसी ब्राह्मण की वारी मालम ; नहीं ॥१७११८|| हुई । तब सबने उस ब्रामण के पास जाकर इस इसके पश्चात् आहार की सामग्री लेकर ये कहासुर घटना के बारे में पूछा ॥१२॥१४॥ के पास वन में गये । मुझे निश्चय है कि उन्होंने ॥ २० ॥ 1 Pri Jyos अध्याय १६७ ] महा मारत ७९३ crorches Horoor mco ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति तदद्भुततमं दृष्ट्वा पार्थास्तत्रैव चाऽवसन् इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वकवधपर्वणि वकवधे पट्पट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ।। वायपर्व समाप्त। यह दुष्कर काम करके हम लोगा का हित किया नगर के भीतर बड़े सुख से रहने लगे। कुन्ती-सहित है । यह सुनकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पाचों पाण्डव भी उसी पुरी में ब्राह्मण के यहा आनन्द सबको बड़ा अचरज हुआ | उन सबने इस खुशी से रहने रंगे ॥१९॥२१॥ में एक बड़ा भारी नह्मभोज किया। तब से सब रोग आदिपर्व का एक सोनाल्ठ अध्याय समाप्त हुआ । अथ सातपाट्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १६७ ।। अथ चैत्ररथपर्व। जनमेजय उवाच- च-ते तथा पुरुषव्याघ्रा निहत्य बकराक्षसम् अत ऊर्ध्व ततो ब्रह्मन्किमकुर्वत पाण्डवाः वैशम्पायन उवाच-तथैव निवसन्राजन्निहत्य चकराक्षसम् अधीयानाः परं ब्रह्म ब्राह्मणस्य निवेशने ततः कतिपयाहस्य ब्राह्मणः संशितव्रतः प्रतिश्रयार्थी तश्म ब्राह्मणस्याऽऽजगाम ह ॥ ३ ॥ स सम्यक्पूजयित्वा तं विप्रं विप्रर्पभस्तदा । ददौ प्रतिश्रयं तस्मै तदा सर्वातिथिव्रतः ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सह कुन्त्या नरर्षभाः । उपासाश्चक्रिरे विप्रं कथयन्तः कथाः शुभाः ॥ ५ ॥ कथयामास देशांश्च तीर्थानि सरितस्तथा राज्ञश्च विविधाश्चर्यान्देशांश्चैव पुराणि च एक सौ मड़सठ अन्याय ॥ १६७ ॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मण' पुस्पश्रेष्ठ पाण्डवों । कुछ दिनों में उस ब्राह्मण के घर एक बड़ा प्रत ने कामुर को मारने के बाद वहा रहकर क्या क्यिा, करनेवाल। तपम्बी ब्राह्मण आया। उस नामण ने सो मुझे सुनाइए । वैशम्पायन ने कहा है राजन्! अतिथि जानकर बड़े आदर से उसे अपने घर में । ये ब्राह्मण के पर में रहकर उसी तरह वेद का ठहराया ॥३४॥ अध्ययन करने रगे ॥१॥ यहा रहकर वह अभ्यागत ब्रामण नित्य अनेक -->r.Jr-mirzaw.zHuroori Prors.5000-4 ७१४ महाभारत [ आदिपर्व roozooyoyxcom000000.00roozoolc2cco स तत्राऽकथयाद्विप्रः कथान्ते जनमेजय पाञ्चालेष्वद्भुताकारं याज्ञसेन्याः स्वयंवरम् ॥ ७ ॥ धृष्टद्युम्नस्य चोत्पत्तिमुत्पत्तिं च शिखण्डिनः । अयोनिजत्वं कृष्णाया द्रुपदस्य महामखे ॥ ८ ॥ तदद्भुततमं श्रुत्वा लोके तस्य महात्मनः विस्तरेणैव पप्रच्छुः कथान्ते पुरुषर्षभाः पाण्डवा ऊचु –कथं द्रुपदपुत्रस्य धृष्टद्युम्नस्य पावकात् वेदीमध्याच्च कृष्णायाः संभवः कथमद्भुतः ॥ १० ॥ कथं द्रोणान्महेष्वासात्सर्वाण्यस्त्राण्यशिक्षत कथं विप्र सखायौ तौ भिन्नो कस्य कृतेन वा ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं तैश्चोदितो राजन्स विप्रः पुरुषर्षभैः । कथयामास तत्सर्व द्रौपदीसंभवं तदा ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रोपदीसभये सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १६७ ॥ देश, तीर्थ, नदी, राजा, राज्य और नगर आदि के साथ वर्णन करने के लिये अनुरोध किया। उन्होंने की बहुत सी अद्भुत बातों का वर्णन किया करता कहा-हे ब्राह्मण ! द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न अमि से था। हे राजा जनमेजय ! पुरपश्रेष्ठ पाण्डव कुन्ती कैसे उत्पन्न हुए ' द्रौपदी भी यज्ञ की वेदी से कैसे के साथ उस ब्राह्मण की सेवा करते और उससे उसन्न हुई । इनकी अद्भुत उत्सति का हाल आर देश-देशान्तर की बातें सुना करते थे। एक दिन उस विस्तार के साथ कहिए । द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने ब्रामण ने बातें करते करते पाचाल देश में द्रोपदी के बड़े चापधारी आचार्य द्रोण से सब अस्त्रों की शिक्षा अद्भुत स्वयवर, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी की उत्गत, | कैसे पाई ? ओर राजा द्रुपद से द्रोण की मित्रता कम तथा द्रुपद के महायज्ञ में यज्ञवेदी से द्रौपदी की दृटी ? आप विस्तार के साथ सब कथा हिए। उत्पत्ति का हाल सुनाया ||५/८॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! पुरषों में प्रधान महात्मा ब्राह्मण के मुँह से सक्षेप में यह विचित्र पाण्डवों से यह बात सुनकर वह ब्राह्मण द्रौपदी की वृत्तान्त सुनकर नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने उससे फिर विस्तार उत्पत्ति का वृत्तान्त कहने रगा ॥२॥१२॥ आदिपर्व का एक सो सड़सठ अध्याय समाप्त हुआ। अथ अष्टपष्टयधिकशततमोऽध्याय ॥ १६८ ॥ प्रामण उवाच-गङ्गाद्वारं प्रति महान्वभूवर्पिमहातपाः भरद्वाजो महाप्राज्ञः सततं संशितव्रतः PAvaorolm अध्याय १६८ महा भारत ७९५ oooooooooooooooooolcalconce सोऽभिपेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवाऽऽगतां सतीम् । ददर्शाऽप्सरसं तत्र घृताचीमाप्लुतामृपिः तस्या वायुनदीतीरे वमनं व्यहरत्तदा अपकृप्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृपिश्चकमे तदा तस्यां संसक्तमनसः कौमारब्रह्मचारिणः चिरस्य रेतश्चस्कन्द तपिद्रोण आदधे ततः समभवद् द्रोणः कुमारस्तस्य धीमतः । अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ५ ॥ भरद्वाजस्य तु सखा पृफ्नो नाम पार्थिवः । तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्सुतः स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्षतः चिक्रीडाऽध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्पभः ॥ ७ ॥ ततस्तु पृषतेऽतीते स राजा द्रुपदोऽभवत् । द्रोणोऽपि रामं शुश्राव दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ८ ॥ वनं तु प्रस्थितं रामं भरद्वाजसुतोऽब्रवीत् । आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥ एक सौ अडसठ अध्याय ॥ १६८ ॥ ब्राह्मण ने कहा-हरिद्वार के निकट भारद्वाज नाम | उन्होंने उस वीर्य को उसीक्षण द्रोण नामक पात्र में के एक महानपम्बी, धर्मात्मा, प्रतधारी असाधारण रख दिया । उसी वीर्य से उनके द्रोणाचार्य उत्पन्न तेजम्धी महपि रहते थे। वे एक समय गगा तट पर हुए । द्रोण ने सब वेदों और वेदाहों को पढा ।।३।५|| मान करने गये । वहा पहुचकर उन्होंने देसा कि उस समय पृपत नाम के एक राजा भारद्वाज घृताची नाम की अपारा मान किये हुए जल से | ऋषि के मित्र थे। उनके भी इसी समय द्रुपद नाम बाहर निर रही है ।।१२।। । का एक पुर उत्पन्न हुआ । क्षत्रियश्रेष्ठ पृपत के पुत्र 'देवयोग से उस अप्सरा के वस्त्र हवा से उड़ द्रुपद नित्य भारद्वाज के आश्रम में जाकर द्रोण के गये और वह नगी हो गई । उमे उस दशा में देखने साथ खरते और पढ़ते थे । राजा पृपत का स्वर्गवास से ऋषि का चित चञ्चल हो गया । कौमार दशा होने पर द्रुपद को राज्य मिरा । इसी समय द्रोण से ब्रह्मनाग उम महर्षि का चित्त मृताची पर चरते ने मुना कि परशुराम जी अपना सब धन दान कर ही उनका सदा की रक्षा क्या हुआ वीर्य गिर गया। रहे है । परशुगम वन को जाने के लिये तैय्यार थे, JAur-Jyoni ७९६ म हा भारत . [ आदिपर्व 70125ccc oooooooooooooooo Poncoco - - -~-coo राम उवाच-शरीरमात्रमेवाऽद्य मया समवशेपितम् अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मन्नेकतमं वृणु ॥ १० ॥ द्रोण उवाच-अस्त्राणि चैव सर्वाणि तेषां संहारमेव च । प्रयोगं चैव सर्वेषां दातुमर्हति मे भवान् ॥ ११ ॥ ब्राह्मण उवाच-तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रददौ भृगुनन्दनः प्रतिगृह्य तदा द्रोणः कृतकृत्योऽभवत्तदा ॥ १२ ॥ संप्रहृष्टमना द्रोणो रामात्परमसंमतम् ब्रह्मास्त्रं समनुज्ञाप्य नरेष्लभ्यधिकोऽभवत् ॥ १३ ॥ ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् अब्रवीत्पुरुषव्याघ्रः सखायं विद्धि मामिति ॥ १४ ॥ द्रपद उवाच-नाऽश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नाऽरथी रथिनः सखा । नाऽराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते ॥ १५ ॥ ग्राहाण उवाच-स विनिश्चित्य मनसा पाश्चाल्यं प्रति बुद्धिमान् । जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् तस्मै -पौत्रान्समादाय वसूनि विविधानि च प्राप्ताय प्रददौ भीष्मः शिष्यान्द्रोणाय धीमते ॥ १७॥ इसी समय भारद्वाज-पुत्र द्रोण ने उनके पास जाकर अनन्तर प्रतापी पुरुपेन्द्र भारद्वाज-पुत्र द्रोण ने दुपद कहा-हे द्विजश्रेष्ठ! मै धन की इच्छा से आपके पास के पास आकर कहा ॥१२॥१४॥ आया हूं । परशुराम ने कहा-हे ब्राह्मण ! मैं सब हे राजन् ! आपने मुझे पहचाना ? मै आपका कुछ दान कर चुका हूँ । अब मेरा शरीर और अस्त्र मित्र द्रोण हूं । द्रुपद ने उत्तर दिया-जो श्रोत्रिय नहीं ही शेष है । अतएव चाहे मेरे अस्त्र वा शरीर इन है वह कभी श्रोत्रिय का मित्र नहीं हो सकता, जो दोनों में से एक की प्रार्थना करो। द्रोण ने कहा रथी नहीं है वह कभी रथी का मित्र नहीं हो सकता आप अपने सब अस्त्र मुझे देकर उनके प्रयोग और और जो स्वयं राजा नहीं है यह कभी राजा का मित्र उपसंहार की विधि बता दीजिए ॥६॥११॥ नहीं हो सकता।इस कारण इस समय तुम्हारा पहले परशुराम ने यह स्वीकार करके अपने सब अस को मित्रता को स्मरण करना व्यर्थ है । द्रोण ने द्रोण को दे दिये । द्रोण ने उनको लेकर अपने को पांचार राज की यह बात सुनकर मन ही मन में बदला कृतार्थ समझा । वे परशुराम से परमसम्मत ब्रह्मास्त्र लेने का निश्चय किया और कौरवों के हस्तिनापुर पार और सब अत्रों के पाने से अधिक प्रसन्न हुए। नामक नगर को गये । कौरवों की राजधानी में - । -orroroscom 9.500-500 अध्याय १६८ ] पदा भारत ७९७ :0103204 - 4 द्रोणः शिष्यांस्ततः पार्थानिदं वचनमब्रवीत् । समानीय तु तान्शिप्यान्द्रुपदस्याऽसुखाय वै ॥ १८ ॥ आचार्यवेतनं किंचिद्धृदि यद्वर्तते मम कृतास्त्रैस्तत्प्रदेयं स्यात्तदृतं वदताऽनघाः सोऽर्जुनप्रमुखैरुक्तस्तथास्त्विति गुरुस्तदा ॥ १९ ॥ यदा च पाण्डवाः सर्वे कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः । ततो द्रोणोऽब्रवीभूयो वेतनार्थमिदं वचः ॥ २० ॥ पार्वतो द्रुपदो नाम च्छत्रवत्यां नरेश्वरः । तस्मादाकृष्य तद्राज्यं मम शीघ्रं प्रदीयताम् ॥ २१ ॥ ततः पाण्डुसुता पश्च निर्जित्य द्रुपदं युधि द्रोणाय दर्शयामासुबवा ससचिवं तदा ॥ २२ ॥ द्रोण उवाच-प्रार्थयामि त्वया सख्यं पुनरेव नराधिप अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति ॥ २३ ॥ अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन त्वया सह राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याऽहमुत्तरे, ।। २४ ॥ द्रोणाचार्य के पहुचने पर भीष्म ने बड़े आदर के | यह गुरु दक्षिणा के लिये कहा ॥१५॥२०॥ साथ बहुत सा धन देकर उनकी अधीनता में अपने कि पृषत के पुत्र राजा द्रुपद को, जो छत्रवती पोतों को धनुर्वेद की शिक्षा के लिये रख दिया। नगरी में राज्य करते हैं, और उनसे छीनकर उनके अनन्तर द्रोण ने द्रुपद को नीचा दिखाने के विचार राज्य को शीघ्र मुझे अर्पण करे । इसके पश्चात् से युन्ती के पुत्रों को अपने पास बुलाकर कहा- पाण्डरों ने द्रुाद को युद्ध में परास्त करके पकड़ हे निष्पाप राजकुमारी ! तुम लोग अस्त्र-विद्या सीखकर लिया और मंत्रियों-सहित उन्हें बांध लाकर द्रोणाचार्य जा समर्थ दो जाओ तब मेरे मन में जो अभिलाषा के पास उपस्थित कर दिया ॥२१॥२२॥ है उस, गुरु दक्षिणा के रूप में, पूरी करना । तुम तय द्रोण ने द्रुपद से कहा-हे नरनाथ ! मैं तुममे सच सच कहो, मेरी उस अभिलापा को पूर्ण करोगे? फिर पहले की मित्रता की प्रार्थना करता हूं। अर्जुन आदि शिष्यों ने गुरु के आगे उनकी इच्छा तुमने कहा था कि जो राजा नहीं है यह राजा का पूरी करना स्वीकार किया । द्रोण ने जब देखा कि मित्र नहीं हो सकता । इसी कारण मैंने तुम्हारे । अम्ब विधा में निपुण पाण्डवों ने उनकी इच्छा पूरी साथ राज्य करने के लिये यह यस किया है। परने का दृढ़ निश्चय कर लिया है नय द्रोण ने उनसे गंगा के दक्षिण देश का र.ग्य तुम करो और उचर --- ansrorairrorirani rrrrrrrrrrrrr.
Proccolo महा भारत- [ आदिपर्व xocos ब्राह्मण उवाच-एवमुक्तो हि पाञ्चाल्यो भारद्वाजेन धीमता । उवाचाऽस्त्रविदां श्रेष्ठो द्रोणं ब्राह्मणसत्तमम् ॥ २५ ॥ एवं भवतु भद्रं ते भारद्वाज महामते सख्यं तदेव भवतु शश्वद्यदभिमन्यसे ॥ २६॥ एवमन्योऽन्यमुक्त्वा तौ कृत्वा सख्यमनुत्तमम् । जग्मतुोणपाञ्चाल्यौ यथागतमरिन्दमौ ॥ २७॥ असत्कारः स तु महान्मुहूर्तमपि तस्य तु । नापैति हृदयाद्राज्ञो दुर्मना स कृशोऽभवत् ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसंभवे अष्टपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६८ ।। देश का राज्य मैं करूँगा ॥२३॥२४॥ शत्रुनाशी द्रोण और द्रुपद एक दूसरे से ऐसा द्विजश्रेष्ठ द्रोण के ये वचन सुनकर अस्त्रज्ञ- कहकर और मित्रता स्थापित करके अपने-अपने शिरोमणि द्रुपद ने कहा 1-हे महाबुद्धिमान् द्रोण ! स्थान को चले गये । परन्तु राजा द्रुपद के मन से तुम्हारा भला हो । तुम्हारा ही कहा हो । तुम्हारी । वह बड़ा अपमान क्षणभर के लिये दूर नहीं हुआ। इच्छा के अनुसार हम दोनों की यह मित्रता सदा वे इसी चिन्ता में दिन पर दिन अति दुःखी और बनी रहे ॥२५॥२६॥ दुबले होने लगे ॥२७॥२८॥ आदिपर्व का एक सौ अड़सठ अध्याय समाप्त हुआ। अथ नवसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥ ब्राह्मण उवाच-अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान्द्रिजर्षभान् । अन्विच्छन्परिचक्राम ब्राह्मणावसथान्वहून् पुत्रजन्म परीप्सन्वै शोकोपहतचेतनः नास्ति श्रेष्ठमपत्यं मे इति नित्यमचिन्तयत् ॥ २ जातान्पुत्रान्स निर्वेदाद्धिग्वन्धूनिति चाऽब्रवीत् । निःश्वासपरमश्चाऽसीद् द्रोणं प्रतिचिकीर्पयाः ॥ ३ ॥ एक सौ उनहत्तर अध्याय ॥ १६९ ॥ ब्राह्मण ने कहा क्रोध से भरे हुए राजा द्रुपद की चिन्ता से वे बहुत ही व्याकुल हो गये। मेरी मन्त्राल से कार्य सिद्ध करने की शक्ति रखनेवाले | इच्छा पूरी करनेवाला कोई श्रेष्ठ पुत्र मेरे नहीं है, याज्ञिक ब्राह्मणों की खोज में इधर-उधर अनेक । यह सोचकर वे बड़े शोक में रहते थे ॥१२॥ ब्राह्मणों के यहां गये । एक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न करने पहले जो पुत्र उत्पन्न हुए थे उनको और अपने rooronyroonynonymorurongronor । ॥
अध्याय १६९ ]
महाभारत
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प्रभावं विनयं शिक्षा द्रोणस्य चरितानि च ।
क्षात्रेण च बलेनाऽस्य चिन्तयन्नाऽध्यगच्छत ॥ ४ ॥
प्रतिकर्तुं नृपश्रेप्टो यतमानोऽपि भारत
अभितः सोऽथ कल्मापी गङ्गाकूले परिभ्रमन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः
तत्र नाऽस्नातकः कश्चिन्न चाऽऽसीदवती द्विजः॥ ६ ॥
तथैव च महाभागः सोऽपश्यत्संशितव्रतो
याजोपयाजो ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ परमेष्टिनी ॥ ७ ॥
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपो ।
तारणेयो युक्तरूपी ब्राह्मणावृषिसत्तमौ
स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः
बुवा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपहरे
प्रपेदे छन्दयन्कामैरुपयाजं धृतवतम्
पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक्सर्वकामदः
अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः
येन मे कर्मणा ब्रह्मपुत्रः स्याद् द्रोणमृत्यवे ।
उपयाज कृते तस्मिन्गवां दाताऽस्मि तेऽव॒दम् ॥ ११ ॥
माई-बन्धुओं को विधार देते हुए ये उन्हें उपेक्षा उनमें याज और उपयाज नामक, प्रतशील,
की दृष्टि से देखने लगे। द्रोण से बदला लेने की शमगुणी, ब्रह्मप्रेमी, संहिता पाठ में नियुक्त काश्यप
निन्ता में वे सदा गर्म और सम्बी-लम्बी साँसें लिया गोत्रवाले ऋपियों में श्रेष्ठ दो ब्रह्मऋषियों को देखकर
करते थे। वे बदला लेने को चाहने पर भी सोचतर उनको इन्छानुरूप कार्य पूरा कराने के योग्य समझा।
निश्श्य नहीं कर सकते कि क्षत्रियरल से क्योंर वे आरम्य को छोड़कर सम्पूर्ण कामनाओं से उनकी
द्रोण के प्रभार, नारता, निशा और चरित्र से बढ़ उसामना करने लगे ॥७॥
सकते हैं ॥३॥४॥
राजा दोनों नापियों में छोटे भाई को अधिक
भनन्नर गंगा के किनारे घूमने हुए कल्माषपाद मनाती जानकर, पर दयार, प्रिय वाक्य कहकर और
राजाकी नगरी के निकट बामणों के पास जा पहुंचे। सब प्रकार की महायता करके विपम्पसेटही
यहां के मामणनातक, मनगीन और महाभाग थे की उपासना करने में प्रवृत्त हुए | पा समय दुपद
न विधिपूर्वक उपयान की पूजा कर कहा है नमन् !
॥५॥६॥
colookcocol .9011050 ocororocococcus महा मारत [ आदिपर्व rrorrora यदा तेऽन्यद् द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत् । सर्व तत्ते प्रदाताऽहं न हि मेत्राऽस्ति संशयः ॥ १२ ॥ इत्युक्तो नाऽहमित्येवं तमृपिः प्रत्यभापत आराधयिष्यन्द्रुपदः स तं पर्यचरन्पुनः ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः उपयाजोऽब्रवीत्काले राजन्मधुरया गिरा ज्येष्टो भ्राता ममाऽगृह्णाद्विचरन्गहने वने अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम् तदपश्यमहं भ्रातुरसांप्रतमनुत्रजन् विमर्श संकरादाने नाऽयं कुर्यात्कदाचन दृष्ट्वा फलस्य नाऽपश्यद्दोपान्पापानुवन्धकान् । विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् ॥ १७ ।। संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले च यः भैक्ष्यमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा ॥ १८ ॥ कीर्तयन्गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः तं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुपा ॥ १९ ॥ जिस कार्य के द्वारा मेर एक ऐसा पुत्र हो जो द्रोण | बड़े भाई ने एक दिन वन में घूमते घूमते धरती पर को मार सके वह कार्य आप मेरे लिये कीजिए ।. पड़ा हुआ एक फल उठा लिया था। परन्तु जिस हे उपयाज ! आप मेरा यह कार्य कर देंगे तो मैं | स्थान पर वह फल पड़ा था वह पवित्र था या आपको एक अर्बुद (दस करोड़) गायें अर्पण करूंगा; | अपवित्र, यह बात उन्हें नहीं मालूम थी। मैं भी अथवा आप जो चाहेंगे वही दूंगा ॥१०॥१२॥ उनके पीछे पीछे जा रहा था; इमसे उनका यह राजा के ये वचन सुनकर उपयाज ऋपि ने कहा- | अनुचित काम मैंने देख लिया था । इससे मै में यह काम नहीं कर सकंगा। उन्हें प्रसन्न करने | समझना है कि दोपयुक्त वस्तु के ग्रहण करने में के लिये द्रुपद फिर उनकी सेवा करने लगे । अनन्तर वे कुछ सोच-विचार न करेंगे। फल के पापजनक एक वर्ष व्यतीत होने पर द्विजोत्तम टपयाज ने राजा दोप को देखकर भी उन्होंने उसका विचार नहीं द्रुपद से मीठी बातों में कहा ॥१३॥१४॥ किया ॥१५॥१६॥ तुम मेरे बड़े भाई याज के पास जाओ; मैं इमलिये जिन्होंने एक स्थान में शौचकर विचार समझता हूं, वे तुम्हारी इच्छा पूरी कर देगे। मेरे । नहीं दिया वह अन्य स्थान में क्योंकर दोषदर्शी Proeconorara" "om COCOCOCO oose अध्याय १६९ ] महा भारत 7215 co 10000014 तं वे गच्छस्व नृपते स त्वां संयाजायप्यति । जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् || २० ॥ उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याऽऽश्रममभ्यगात् । अभिसंपूज्य पूजाहमथ याजमुवाच ह ॥ २१ ॥ अयुतानि ददान्यप्टी गवां याजय मां विभो । द्रोणवैराभिसंतप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि ॥ २२ ॥ स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाऽप्यनुत्तमः । तस्माद् द्रोणः पराजेप्ट मां वै स सखिविग्रहे ॥ २३ ॥ क्षत्रियो नास्ति तस्याऽस्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणी। कोरवाचार्यमुग्व्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः ॥ २४॥ द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च पडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत् ॥ २५॥ स हि ब्राह्मणवेपेण क्षात्रं वेगमसंशयम् प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः ॥ २६ ॥ क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवाऽऽस्थितः । तस्य शस्त्रवलं घोरमप्रधृप्यं नरेभुवि *॥ २७॥ हो सकते हैं अर्थात् वह तुम्हारे प्रिय विषय में इसलिये उपयाज के बनाने पर वे उन्हीं के पास दोष नहीं देख पायेंगे । जब वे गुरुकुल में रहकर पहुने । पूजनीय याज की पूजा करके द्रुपद ने वेद-संहिता पढते थे तब बहुधा औरों की जूठी कहा-हे विभो ! मैं आप को एक अर्बुद गाय यस्तु भी सा रेते थे । इसमें उनको पृणा नी दगा, आप मुझको एक यज्ञ कराए। में द्रोण होनी थी ॥१७॥१८॥ की शत्रुता रूपी आग से जल रहा हूँ। आप हमा पे सदा अनही का गुण गाया करते थे। ली जल से सींचार मुझको गीतल करें।॥१९॥२२॥ रोगी है और धन की इच्छा रगत ६ । इसमे द्रोणाचार्य प्राविधा और मार दीना में दक्ष गुभे निधय कि उनमे तुम्हाग काग मिद्ध हो हैं। इस कारण मुझे युद्ध में उनमे नीना देमना जायेगा। महाराज । तुम उन्ही के पास जाओ। पड़ा। वे बुद्धिमान् काम्वों के प्रधान यानाय, यही तुम्हें इम उद्देश से यज रायगे । यान के ॥२३॥२शा जो कर्म मुनार राना को मन ही गा बड़ी गृणा इम ममण्डल में कोई सत्रिय उनमें श्रेष्ठ नहीं दुदं पर उनसतो माना कार्य मापना था, ६। छ हाय का उन भनुप भी रहा भयानक coccoucc5c5ccc7c . - 1 ८०२ महा भारत [ आदिपर्व rotocoooo 00%rvem.orvk ब्राझं संधारयस्तेजो हुताहुतिरिवाऽनलः समेत्य स दहत्याजी क्षात्रधर्मपुरःसरः ॥ २८॥ ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्म तेजो विशिष्यते । सोऽहं क्षात्रवलाद्धीनो ब्राह्म तेजः प्रदिवान् ॥ २९ ॥ द्रोणाद्विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ॥ ३० ॥ तत्कर्म कुरु मे याज वितराम्यव॒दं गवाम् । तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् ॥ ३१ ॥ गुर्वर्थ इति चाऽकाममुपयाजमचोदयत् याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः ॥ ३२ ॥ ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै ॥ ३३॥ स च पुत्रो महावीर्यों महातेजा महाबलः इष्यते यद्विधो राजन्भविता ते तथाविधः ॥ ३४ ॥ है। उनका वाणजाल सर्व जीवों को नाश कर सकता ब्रह्म तेज में अधिक समझता हूं। मुझे निश्चय है है । महावीर योद्धा द्रोणाचार्य उत्पन्न तो ब्राह्मण के | कि आप मुझे द्रोण को मारनेवाला, युद्ध में अजेय, वंश में हैं, परन्तु उनमें क्षत्रिय के तेज और पराक्रम एक पुत्र दे सकते है । हे याज ! आप ऐसा यज्ञ को निश्चितरूप से परास्त करने की शक्ति है।।२५।२६॥ कराइए । मैं आपको दस कोड़ गायें दूंगा। याज क्षत्रिय का बल उनका कुछ नहीं कर सकता। ने स्वीकार कर लिया। अब वे सोचने लगे कि किस वे परशुराम की तरह क्षत्रियों की जड़ उखाड़ने के देवता के उद्देश से कौनसा यज्ञ करना चाहिये लिये पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए है । पृथ्वी पर उनका ॥२७३१॥ अस्त्र बल अनिवार्य है। हवन के समय घी की उस कार्य को कठिन जानकर यान ने राजा आहूति पाकर प्रचण्ड हो रही आग की तरह वे युद्ध द्रुपद को निष्काम उपयाज से सहायता करने को में शत्रुओं को जलाते है। उनमें ब्रह्म-तेज और | कहा । महर्षि याज ने जब द्रोणनाश के लिये क्षात्र धर्म दोनों है । क्षत्रिय के बल की अपेक्षा ब्रह्म प्रतिज्ञा की तब महात्मा उपयाज ने राजा द्रुपद से तेज ही श्रेष्ठ है । फिर उनमें तो दोनों वाते हैं। मैं उनके पुत्र फल के लिये श्रोतामि साध्यकर्म की कथा क्षात्र-बल में उनसे हीन होने के कारण अब आपके कह सुनाई और कहा-हे द्रुपद ! तुम जैसे तपम्ची पास ब्रह्म-तेज की शरण में आया है। आप वेदज्ञ और बलवीर्यवन्त पुत्र की कामना करोगे तुमको वसा ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं । मै आपको द्रोणाचार्य से भी ही पुत्र मिलेगा ॥३२॥३४॥ । । rary."
अध्याय १६९ ] महाभारत 707OTicarconcolorocod 2hcorao नाहाण सार- . भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसंधाय भूपतिः । आजहे तत्तथा सर्व द्रुपदः कर्मसिद्धये याजस्तु हवनस्याऽन्त देवीमाज्ञापयत्तदा प्रहि मां राज्ञि पृपति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ॥ ३६ ॥ रायवाच --अवलितं मुखं ब्रह्मन्दिव्यान्गन्धान्विभर्मि च । सुतार्थे नोपलव्धास्मि तिष्ट यानं मम प्रिये ॥ ३७ ।। याज उपाच-याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् । कथं कामं न संदध्यात्सा वं विप्रेहि तिष्ठ वा ॥ ३८ ॥ -एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविपि संस्कृते । उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसन्निभः ज्वालावों घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् । । विभ्रत्सखड्गः सशरो धनुष्मान्विनदन्मुहुः ॥ १० ॥ सोऽध्यारोहद्रथवरं तेन च प्रययौ तदा ततः प्रणेदुः पाञ्चालाः प्रहृष्टाः साधुसाध्विति ॥ ४१ ।। हर्षाविष्टांस्ततश्चैतान्नेयं सेहे वसुंधरा भयापहो राजपुत्रः पाञ्चालानां यशस्करः ॥ ४२ ॥ इसके पश्चात् राजा द्रुपद ने द्रोणनाशी पुत्र पाने ने कहा-उपयाज के द्वारा अभिमन्त्रित की युक्ति निश्चय कर कार्य साधने के लिये उस हवि की आहुति में अमि में छोड़ता है । वह अवश्य यन के योग्य सम्पूर्ण सामग्री एकत्रित कर दी। तब ही यजमान की इच्छा को पूर्ण करेगी । तुम आओ उन्होंने यन आरम्भ कर दिया । हवन समाप्त होने या न आओ, कुछ हानि नहीं । यस, मत्र पढकर पर उन्होंने द्रुपद की रानी से कहा है रानी! याज ने यह आहुति अगि में छोड़ दी। उसी तुग हचि लेने के लिये भी मेरे पास आओ। समय देवतुल्य, गमिवर्ण, घोररूप एक कुमार एक कन्या और एक पुत्र तुमको प्राप्त होगा। रानी किशट मुकुट, उत्तम क्यच, खग और धनुप वाण ने कहा-हे ब्रमन् । मैने इस समय अपने मुंह में धारण किये, बार बार गर्नता हुआ, उस अमिके दिव्य सुगन्ध को चीनें लगाई है, अगों में अमराग भीतर से प्रकट हुभा। यह उमी ममय रथ पर रगया है । इसनिय विना स्नान किये में यक्ष पा चार पर उपर विचरने लगा ॥३८॥४०॥ हरि से ग्रहण कर सकती है। मेरा प्रिय करने यह देगार पाचार देश के रोग आनन्दिन के रिये भार थोरी दर ठर जइए ॥३॥ ३७॥ होरर 'साधु, साधु' कहकर ऐमा सवार दल wczczeak - याज महा मारत [ आदिपर्व orociomorKook ookcococol carrorroramcaxvrokar ॥ ४५ ॥ राज्ञः शोकापहो जात एप द्रोणवधाय वै इत्युवाच महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा ।। ४३ ॥ कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात्समुत्थिता । सुभगा दर्शनीयाङ्गी स्वसितायतलोचना ॥४४॥ श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा । ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूश्चारुपीनपयोधरा मानुपं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रधावति ॥ १६ ॥ या विभर्ति परं रूपं यस्या नाऽस्त्युपमा भुवि । देवदानवयक्षाणामीप्सितां देवरूपिणीम् ॥४७॥ तां चापि जातां सुश्रोणी वागुवाचाऽशरीरिणी । सर्वयोपिद्वरा कृष्णा निनीषुः क्षत्रियान्क्षयम् ॥ ४८ ॥ सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा अस्या हेतोः कौरवाणां महदुत्पत्स्यते भयम् ॥ ४९ ॥ तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् । न चैतान्हर्पसंपूर्णानियं सेहे वसुन्धरा करने लगे कि मानों धरती उन हर्षयुक्त पाञ्चालों थे! उसकी शोभा देखकर जान पड़ता था मानों का भार संभालने को असमर्थ हो गई । तब आकाश मनुप्य रूप धारण किये कोई स्वर्ग की सुन्दरी पृथ्वी वाणी हुई कि यह अमि से उत्पन्न कुमार लोगों को पर प्रकट हुई है । उस कुमारी के शरीर से नीले निर्भय करता हुआ पाञ्चाल राजवंश का यश बहावेगा कमल की सुगन्ध आती थी और चारों ओर कोसभर और इसी के हाथों द्रोणाचार्य की मृत्यु होगी तक फैल रही थी। उस कुमारी के शरीर का रंग ॥४१॥४३॥ । साँवला या । पृथ्वी पर उसके समान सुन्दर स्त्री इसके पश्चात् सौभाग्यशालिनी, दर्शनीय अङ्गो- दूमरी नहीं निकल सकती । देवता, दानव, यक्ष वाली, कमलदल के समान विशाल नेत्रीवाली, आदि जो कोई उसे दस लेता था वही उसपर रोझ सर्यासुन्दरी एक कुमारी भी उस यन की वेदी से उत्सन्न हुई । उसके केश काले और घूघरवाले थे।। उस सुन्दर कुमारी के प्रकट होने पर आकाश-वाणी उसके लाल रंग के नख कुछ उभरे हुए थे । भैहें हुई कि यह वी-रल कृष्णा क्षत्रियवंश के नारा बहुत ही मनोहर और दोनोंम्मन ऊँने और शोभायुक्त का कारण होगी । हम सुन्दरी से उचिन समय पर । जाता था॥४४॥४७॥ 7-JANPriral ८०५ अध्याय १६९ ] महा मारत 0700100100cococ 050005050 तो दृष्ट्वा पार्वती या प्रपेदे वै सुतार्थिनी । न वै मदन्यां जननी जानीयातामिमाविति ॥ ५१॥ तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रियचिकीर्पया । तयोश्च नामनी चक्रुर्द्विजाः संपूर्णमानसाः ॥ ५२॥ धृष्टत्वादत्यमर्पित्वाद् द्युम्नाद् द्युत्संभवादपि धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवविति कृष्णेत्येवाऽब्रुवन्कृप्णां कृष्णाऽभूत्सा हि वर्णतः । तथा तन्मिथुन जज्ञे द्रुपदस्य महामखे ॥ ५४॥ धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम् । उपाकरोदस्त्रहेतो द्वाजः प्रतापवान् ॥ ५५ ॥ अमोक्षणीयं देवं हि भावि मत्वा महामतिः । तथा तत्कृतवान्द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात् ॥ ५६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रोपदीसंभवे उनपाट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥ देवताओं का कार्य पूरा होगा। इसके कारण ही कहा-यह बालक धृष्ट अर्थात् विपक्षियों की उन्नति कौरवों में बड़ा भय उपस्थित होगा ॥४८॥४९॥ न सहनेवाला और द्युम्न अर्थात् कवच कुण्डल आदि यह सुनकर सब पाञ्चाल वीर सिंहों की तरह साथ उत्पन्न हुआ है, इस कारण इसका नाम सिंहनाद करने लगे । हर्ष के मारे वे इतना धृष्टद्युम्न होगा ॥५२॥५३॥ उपलने-कूदने लगे कि पृथ्वी को उनका भार कुमारी का रङ्ग कारा था, इसलिये उसका नाम असम-सा हो उठा। पुत्र चाहनेवाली राजा दृपद कृष्णा रक्खा गया । राजा द्रुपद के महायज्ञ में की रानी ने पुत्र और कन्या को देखकर याज के ' इसतरह एक पुत्र और एक कन्या की उत्पत्ति पास जाकर कहा-हे भगवन् ! मैं आप से प्रार्थना हुई थी । अनन्तर प्रतापी भारद्वाज-पुत्र द्रोण ने, करती हूं कि ये दोनों पालक मुझे ही अपनी माता यह सब हाल जानकर भी, धृष्टद्युम्न को अपने समझें ॥५०॥५१॥ पास रखर अस्त्र-विद्या की शिक्षा दी। उन्होंने याज ने राजा का प्रिय करने के लिये, कहा समझ लिया कि हानी को कोई टाल नहीं सकता। अच्छा, ऐसा ही होगा ! अब ब्रामगों ने उस इस कारण अपनी कीर्ति की रक्षा के लिये उन्होंने कुमार भीर कुमारी का नामकरण किया। उन्होंने धृष्टद्युम्न को अन्त्र विद्या सिपला दी ॥५४॥५६॥ आदिपर्व का एक सी उनहत्तर अध्याय ममाप्त हुआ ! marronnexxr xrorogoronyrynons महा भारत [ आदिपर्व 400050000 >1000000%oooooz .. .. । coccococcar . अथ सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥१७० ॥ पैशम्पायन आच-एतच्छुत्वा तु कौन्तेयाःशल्यविद्धा इवाऽभवन् । सर्वे चाऽस्वस्थमनसो वभूवुस्ते महावलाः ततः कुन्ती सुतान्दृष्ट्वा सास्तद्गतचेतसः । युधिष्ठिरमुवाचेदं वचनं सत्यवादिनी कु-त्युवान-चिररात्रोपिताः स्मेह ब्राह्मणस्य निवेशने रममाणाः पुरे रम्ये लब्धभैक्ष्या महात्मनः ॥ ३ ॥ यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च । सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनः पुनररिंदम पुनद्रष्टुं हि तानीह प्रीणयन्ति न नस्तथा । भक्ष्यं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन ॥ ५ ॥ ते वयं साधु पञ्चालान्गच्छाम यदि मन्यसे । अपूर्वदर्शनं वीर रमणीयं भविष्यति सुभिक्षाश्चैव पञ्चालाः श्रूयन्ते शत्रुकर्शन । यज्ञसेनश्च राजाऽसौ ब्रह्मण्य इति शुश्रुम ॥ ७ ॥ एकत्र चिरवासश्च क्षमो न च मतो मम ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे ॥ ८ ॥ एक सौ सत्तर अध्याय ॥ १७० ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! यह वृत्तान्त हुए बहुत दिन हो गये । इस सुन्दर नगर में भिक्षा सुनकर कुती क महावरी पुत्र द्रोपदी के लिये बहुत मागकर हमने मुख से इतना समय बिताया। यहा ही उत्कण्ठित हुए । हृदय में जैसे किसी ने वाण जितने सुन्दर रन और उपवन हे वह सब कई बार मार दिया हो, इसतरह बेचैनी से उन्होंने वह गत | देख लिये ॥३४॥ काटी । कुन्ती ने समझ लिया कि उनके सब पुत्र हे कुरुनन्दन ! उन सबको बार-बार देखने से अद्वितीय सुन्दरी कृष्णा के लिये उत्कण्ठिन हो रहे अब वैसा आनन्द नहीं मिल सकता । एक स्थान हैं । सबका मन द्रौपदी म लगा हुआ है । सत्य में रहने से वैमा शिक्षा मिलने की भी सम्भावना कहनेवारी कुन्ती ने पुत्रों को बेचैन देखकर युधिष्ठिर ! नहीं रहती। इसरिये यदि तुम्हारी इच्छा हो तो से कहा ॥१२॥ हमसब पाचार देश को चलें । यह स्थान पहले हे शत्रुदरन ! हमको इस ब्राह्मण के घर रहते नहीं देखा है उसके देखने से मुख प्राप्त होगा ॥५॥६॥ 200cooirao. । horocarrormal orrorar ८०७ म हा भारत अध्याय १७१ ] CONDOA Comca युधिष्ठिर उवाच-भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम् । अनुजांस्तु न जानामि गच्छेयुर्नेति वा पुनः ॥ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः कुन्ती भीमसेनमर्जुनं यमजौ तथा । उवाच गमनं ते च तथेत्येवाऽब्रुवस्तदा ॥ १० ॥ तत आमन्न्य तं विप्रं कुन्ती राजन्सुतैः सह । प्रतस्थे नगरी रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पाञ्चालदेशयात्रायां सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ।। हे शत्रुनाशी ! सुना है कि पाञ्चाल देश अन्न | वैसा ही करेंगे । वही करने से हमारा माल होगा। से भरा हुआ है। वहां का राजा द्रुपद भी बड़ा परन्तु यह मै नहीं जानता कि मेरे भाई वहां जाना उदार और अतिथि की सेवा करनेवाला है। एक चाहते हैं या नहीं। वैशम्पायन ने कहा-अनन्तर स्थान पर बहुत दिनों तक रहना उचित नहीं । कम कुन्ती ने जब भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव से से कम मेरी सलाह तो यह नहीं है। इसलिये हे वहां जाने की इच्छा पूछी तब उन्होंने भी स्वीकार पुत्र ! जो तुम्हारी इच्छा हो तो हमसब पाचाल किया । हे राजन् ! अब कुन्ती उस ब्राह्मण से विदा देश की शुभ यात्रा करें ॥७८॥ होकर पुत्रों के साथ महात्मा द्रुपद के मनोहर देश युधिष्ठिर ने कहा-तुम्हारी जैसी इच्छा होगी को चल दी।९।११॥ आदिपर्व का एक सौ सत्तर अध्याय समाप्त हुआ। अथ एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७ ॥ वैशम्पायन उवाच-वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु । आजगामाऽथ तान्द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १ ॥ तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परंतपाः प्रणिपत्याऽभिवायेनं तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा समनुज्ञाप्य तान्सर्वानांसीनान्मुनिरब्रवीत् प्रच्छन्नं पूजितः पार्थः प्रीतिपूर्वमिदं वचः एक सौ इकहत्तर अध्याय ॥ १७१ ।। वैशम्शयन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! जब | देखकर आगे बढ़कर प्रणाम किया । ये हाथ जोड़कर महात्मा पाण्डव रोग ब्राह्मण के घर में छिपकर रहते उनके आगे खड़े हो गये। मुनि ने पाण्डवों की पूजा थे तब एक दिन सत्यवती के पुत्र व्यास जी उससे ग्रहण करके बुगर-प्रश्न दिया और उन्हें बैठने के मिलने को आये । शत्रुनाशी पाण्डवों ने उन्हें भाते लिये आजा टी । जापाण्डव चैट गये तय व्यास जी coom [ आदिपर्व Dronolomcoomkoo cocococokokococakace महा मारत Sonowinner Mcroco अयि धर्मेण वर्तध्वं शास्त्रेण च परंतपाः अयि विप्रेषु पूजा वः पूजापु न हीयते ॥ ४ ॥ अथ धर्मार्थवद्वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः विचित्राश्च कथास्नास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥ व्यास उवाच आसीत्तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता ॥ ६ ॥ कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत । नाऽध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ७ ॥ तपस्तप्तुमथाऽऽरेभे पत्यर्थमसुखा ततः तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम् ॥ ८ ॥ तस्याः स भगवास्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम् । वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शंकरः वरदोऽस्मीति शंकरः ॥ ९ ॥ अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् । पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः पञ्च ते पतयो भने भविष्यन्तीति भारताः ॥ ११ ॥ एवमुक्त्वा ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत् । एकमिच्छाम्यहं देव स्वत्प्रसादात्पति प्रभो ॥ १२ ॥ ने पूछ' हे पाण्डवो ! तुम शास्त्रों का अध्ययन और | थीं। वह बड़ी सुन्दरी और सब गुणों से सुहावनी धर्म का आचरण बराबर करते रहते हो न पूजनीय थी। अपन क्मों के दोष से वह कन्या अभागिन ब्राह्मणों की पूजा करने में तो तुमसे कोई भूर चूक निक्ली । उस अनुपम सुन्दरी को उसके योग्य कोई नहीं होने पाती ? धर्म और अर्थ से युक्त ये वाक्य पति न गिरा। तब वह अत्यन्त दुखी होकर, पति कहकर ऋपिवर व्यास अनेक अद्भुत इतिहासों का पाने के लिये, कठोर तप करके महादेव की आराधना वर्णन करने लगे। वर्णन करते करते उन्होंने कहा- करने रगी। भगवान् शङ्कर ने प्रसन्न होकर उस ॥१५॥ | यशम्विनी कुमारी से कहा-हे मद्रे ! मैं शहर , एक तपोवन में किसी महात्मा ऋषि की एक | तुम्हें वर देने को आया ह । तुम मुझसे वर मागो कन्या थी । उसकी कमर पतली और भौहें अच्छी - । ॥६॥९॥ •rrrrrrrrrrrrrrrrroron । अध्याय १७२ महा भारत aroroon.oromove पुनरेवाऽब्रवीद्देव इदं वचनमुत्तमम् पञ्चकृत्वस्त्वया युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः ॥ १३ ॥ देहमन्यं गतायास्ते यथोक्तं तद्भविष्यति द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पापत्यनिन्दिता ॥ १४ ॥ पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसचं महाबलाः सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः ॥१५॥ एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान्स पितामहः । पार्थानामन्य कुन्ती च प्रातिष्ठत महातपाः ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीजन्मांतरकथने एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ । तुम्हारा मंगल होगा। ऋषि की कन्या ने अपने । है वैसा ही होगा । हे भरतकुलभूषण ! यही कन्या हित के निमित्त ईश्वर से बार-बार कहा-मै सर्व गुणों इस समय द्रुपद के यहां उत्पन्न हुई है। वह सर्वान- से भूपित पति मांगती हूं । तब शङ्का ने कहा-हे भद्रे ! सुन्दरी कृष्णा तुम्हारी पत्नी होगी। यह बात पहले भरतवंश में उत्सन्न पांच वीर तुम्हारे पति होंगे । से ही निर्दिष्ट हो चुकी है। इसलिये अब तुम पाश्चाल- यह सुनकर उस कन्या ने वर देनेवाले महादेव से राज के नगर में जाकर रहो। हे महाबली पाण्डवो। कहा-हे देव ! मैं तो आपकी कृपा से एक ही पति कृष्णा को प्राप्त करके तुम निःसंदेह सुख पाओगे। मांगती हूं ॥१०॥१३॥ पाण्डयों के पितामह व्यासदेव यों कहकर कुन्ती और महादेव ने फिर उससे कहा-तुमने पांच वार पाडण्वों से विदा होकर अपने स्थान को चले गये मुझसे कहा कि पति दीजिए इसलिये दूसरे जन्म में ॥१४॥१६॥ तुम्होर पाँच ही पति होंगे। तुमने जैसी प्रार्थना की आदिपर्व का एक सौ इकहत्तर अध्याय समाप्त हुआ।। --. अथ द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७२ ॥ वैशम्पायन उवाच-गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः । ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ॥ १ ॥ एक सौ बहत्तर अध्याय ॥ १७२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! भगवान् | नगर की ओर चल दिये । आश्रयदाता ब्राह्मण से व्यास के चले जाने पर पुरुषश्रेष्ठ शत्रुनाशी पाण्डव विदा वे मांग ही चुके थे। वे अपने उद्देश के अनुसार माता को आगे करके प्रसन्नतापूर्वक वहां से पाञ्चाल सीधे उत्तर की ओर चलकर सोमाश्रयायण नामक .000 [ आदिपर्व Socio9070 ८१० म हा भारत commorernmmmmsenozommorrorror आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्याऽनुमान्य च । समैरुदङ्मुखैर्मागैर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ॥ २ ॥ ते त्वगच्छन्नहोरात्रात्तीर्थ सोमाश्रयायणम् आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ॥ ३ ॥ उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनञ्जयः प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्त क्रीडयन्स्त्रियः । ईर्युगन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः शब्दं तेषां स शुश्राव नदी समुपसर्पताम् । तेन शव्देन चाऽविष्टश्चक्रोध बलवद्वली स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परन्तपान् । विस्फारंयन्धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७॥ सन्ध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेपु या अशीतिभिर्लहीनं तन्मुहूर्न प्रचक्षते विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् शेपमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ॥ ९ ॥ लोभात्प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्ता निगृहीमो राक्षसैः सह बांलिशान् ॥ १० ॥ तीर्थ में जा पहुंचे ॥१२॥ धनुप चढ़ाकर उसने कहा ॥५॥६॥ यहां पहुंचकर पाण्डव गंगा पार जाने के लिये जिस समय सूर्यास्त की सन्ध्या होती है उसके किनारे पर गये। महारथी अर्जुन एक लकड़ी जलाकर अस्सी पल उपरान्त से कर्मचारी यक्ष, गन्धर्व, राक्षस उजला करके राह दिखाने के लिये सबकी रक्षा करते ! आदि के विहार का समय होता है। अन्य समय हुए आगे-आगे चले । उसी समय वहां गंगा जी में में मनुष्य विचरते और सब काम करते. है ||७८|| कोई गन्धर्वराज स्त्रियों-सहित एकान्त में जर कीड़ा मूढ मनुष्य यदि लोभवश होकर उस समय घूमते कर रहा था ॥३॥१॥ हुए हम लोगों के पाम आते हैं तो हम लोग राक्षसों अर्जुन आदि के आने का शब्द सुनकर महाबली के साथ उनसे पकड़ रसते या मार डालने हैं। गन्धर्वराज मोध में भर गया और अपना भयानक इसी कारण से बेदन ग्रामणों ने रात्रि में नदी पर जाना - 1 Nrora.oroore concococ poooo००० अध्याय १७२ ] . महा मारत ८११ invor अतो रात्रौ प्राप्नुवतो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान्सर्वान्वलस्थान्नृपतीनपि आरात्तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ॥ १२ ॥ अद्भारपणं गन्धर्व वित्त मां स्ववलाश्रयम् । अहं हि मानी चेष्र्युश्च कुवेरस्य प्रियः सखा ॥ १३ ॥ अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम अनुगंगां चरन्कामाश्चित्तं यत्र रमाम्यहम् ॥ १४ ॥ न कोणपाः श्रृंगिणो वा न देवा न च मानुपाः । इदं समुपसर्पन्ति तक समुपसर्पथ अर्जुन उवाच-समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते । रात्रावहनि सन्ध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ॥ १६ ॥ भुक्तो वाप्यथ वाऽभुक्तो रात्रावहनि खेचर । न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ॥ १७ ॥ वयं च शक्तिसंपन्ना अकाले त्वामधृष्णुम अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानन्ति मानवाः ॥ १८ ॥ निषेध कहा है। और मनुष्य की तो किन में गिनती अर्जुन ने कहा-हे दुर्बुद्धि गन्धर्व । समुद्र पर, है बलवान् राजा भी वहा नहीं जा सकता ।।९।१०॥ हिमालय के शिखर पर और इस गंगा नदी के ऊपर इसलिये तुम दूर रहो, मेरे पास न आओ। किसी एक का अधिकार नहीं । गंगा के भीतर जाने क्या तुम नहीं जानते कि मै गंगाजल के भीतर विहार के लिये समय का कोई नियम नहीं है । भोजन करने आया हूं ? मै अङ्गारपर्ण नाम का गन्धर्वराज । करके या बिना भोजन किये, रात को या दिन को, हु ! मुझे अपने बाहुबल का ही आश्रय है । मैं बड़ा हर एक हर समय गंगा के पास आ सकता और पराक्रमी, मानी, ईपी और कुबेर का मित्र हू ॥११॥१२॥ गगा जल को छू सकता है ॥१५॥१६॥ मेरे अधिकार का यह वन अगारपर्ण नाम से हम भी सामर्थ्यहीन नहीं हैं। तुझको इस कुसमय विख्यात है। यहीं गंगातट पर मेरे रहने का विचित्र पर भी धर्पण कर सकते है । वह मनुप्य दुर्बल होंगे स्थान बना हुआ है । यहा देवता, राक्षस आदि जो तुझसे डरकर चले गये होंगे। सुन, पूर्व समय में किसी की आने की सामर्थ्य नहीं है । तुम लोग क्सि | यह गगा हिमाचल की चोटीसे निकलकर सात घाराओ होमले पर मेरे पास चले आ रहे हो । ॥१३॥१४॥ में बँटकर समुद्र के जल से मिल गई है ॥१७॥१८॥ Horonounce - । ।
८१२ महा भारत [ आदिपर्व ro ००००००००० oroscomcacaroork पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद्विनिःस्मृता गङ्गा गत्वा समुद्राम्सः सप्तधा, समपद्यत ॥ १९ ॥ गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् । रथस्थां सरयूं चैव गोमती गण्डकी तथा ॥ २० ॥ अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये इयं भूत्वा चैकवा शुचिराकाशगा पुनः देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् ॥ २१ ॥ तथा पितॄन्वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ २२॥ असंवाधा देवनदी स्वर्गसंपादनी शुभा कथामिच्छसि तां रोद्धं नैप धर्मः सनातनः ॥ २३ ॥ अनिवार्यमसंवाधं तव वाचा कथं वयम् न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-अंगारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् । मुमोच वाणान्निशितानहीनाशीविपानिव ॥ २५॥ उल्मुकं भ्रामयस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तमम् । व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनञ्जयः ॥ २६॥ वे सातों धाराएं गंगा, यमुना, प्लक्षजाता, | से क्यों रोकते हो? यह सनातन का धर्म है। इसलिये सरस्वती, रथस्सा, सायू, गोमती और गण्ड नामों हम क्योंकर इस बाधा से रहित पवित्र गंगा को से प्रसिद्ध है । जो लोग इन सातों नदियों का जल न छुएँ ॥२२॥२३॥ पीते हैं उनके सब पाप दूर हो जाते हैं । हे गन्धर्व । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! अर्जुन के ये आकाश में बहनेवाली पवित्र यह गंगा देवलोक में वचन सुनकर क्रोधिन अङ्गारपर्ण धनुष चढ़ाकर अति अलकन्दा के नाम से और पितृलोक में पापात्माओं| विषयुक्त सर्प के समान तेज वाण बरसाने लगा। को तारने के लिये वैतरणी नाम से प्रसिद्ध हुई है। पाण्डु-पुत्र अर्जुन ने उस जलती हुई लड़ी और हमने यह व्यास जी से सुना है ॥१९॥२१॥ मृगछाला को घुमाकर उसके सब वाणां को रोक लिया मंगल और स्वर्गगति को देनेवाली देवनदी गंगा ॥२४॥२५॥ में किसी के लिये कभी स्नान करने, जल पीने या इस तरह वाणों को निष्फल करके अर्जुन ने छूने की मनाही नहीं है। फिर तुम गंगा जी में जाने । कहा-हे गन्धर्व ! जो लोग अस्त्र-विद्या जानते हैं " - -7-or- अध्याय १७२ ] महा भारत ८१३ nova अर्जुन उवाच-विभीषिका वै गन्धर्व नाऽस्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते । अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत्प्रविलीयते ॥२७॥ मानुपानतिगन्धर्वान्सर्वान्गन्धर्व लक्षये तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ॥ २८ ॥ पुगऽस्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात्किल बृहस्पतिः भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतकनोः ॥ २९ ॥ भरद्वाजादाग्निवेश्य अग्निवेश्याद्गुरुर्मम साध्विदं मह्यमददद् द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ३० ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहाऽस्य रथं तु तत् ॥ ३१ ॥ विग्थं विप्लुतं तं तु स गन्धर्व महाबलम् अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाड्मुखम् ॥ ३२ ॥ शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनञ्जयः भ्रातृन्प्रति चकर्षाऽथ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ॥ ३३ ॥ युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ॥ ३४ ॥ उनको धमकाना उचित नहीं है। क्योंकि उनके के ऊपर चलाया । उस अस्त्र से गन्धर्व का प्रसिद्ध आगे वह डर फेने की तरह शीघ्र ही मिट जाता है। रथ जल गया। रथ से हीन, अस्त्र-तेज से जल रहा हे ग धर्च ! मैं समझता हू कि गन्धर्व मनुष्य-जाति महावली अङ्गारपर्ण अचेत होकर औधे मुँह पृथ्वी से अधिक पराक्रमी होते है। इसलिये मै तुझसे पर गिर पड़ा। वैसे ही अर्जुन ने मालाओं से सजे कपट युद्ध न करके दिव्य अस्त्री के द्वारा युद्ध करूगा। उसके केश पकड़ लिये । और अस्त्र की चोट इन्द्र के गुरु महामान्य वृस्पति ने पहले यह उत्तम से अचैन उस गन्धर्ष को भाइयों के पास ले चले। आमेयास्त्र भारद्वाज ऋपि को दिया था। भारद्वाज अनन्तर उस गन्धर्म की स्त्री कुम्भीनसी नाम की से अग्निवेश्य को मिला । और अग्निवश्य से मेरे गन्धर्व कन्या, पति की रक्षा के लिये, युधिष्ठिर की गुर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्रोण को मिला। उन्होंने यह शरण में आकर कहने लगी ॥३१॥३४॥ सुन्दर अस्त्र मुझसे दिया है ॥२६॥३०॥ हे महाभाग ! मेरी रक्षा कीजिए। मेरे पति को वैशम्पायन ने कहा है राजन् । पाण्डु के पुत्र छोड़ दीजिए। हे प्रभो ! मेरा नाम दुम्भीनसी है । मैं कुपित अर्जुन ने वह प्रज्वरित आमेयारत्र उस गन्धर्व गन्धर्वी है। आपकी शरण में आई हू । तब युधिष्ठिर -prersarorore [ आदिपर्व 0000ca ८१४ महा भारत vooroyaconcedido com गन्धव्युवाच-त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुश्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् को निहन्याद्रिपुं तात मुश्चेमं रिपुसूदन ॥ ३६ ॥ अर्जुन उवाच-जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिश्यत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः गन्धर्व उवाच-जितोऽहं पूर्वकं नाम मुश्चाम्यंगारपर्णताम् । न च श्लाघे बलेनांग न नाम्ना जनसंसदि ॥ ३८ ॥ साध्विमंलब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धा माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ॥ ३९ ॥ , अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ॥ ४० ॥ संभृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ॥४१॥ संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् यो रिपुं योजयेत्प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ॥ ४२ ॥ ने अर्जुन से कहा-हे शत्रुनाशी ! जो शत्रु युद्ध में करना ठीक नहीं समझा जाता ॥३७॥३८॥ हारकर पराक्रम और यशहीन होकर स्त्री से बचाया मै दिव्य अस्त्रों के जानकार अर्जुन को गन्धर्वो है उसको कौन वीर पुरुष मार सकता है । | की माया दिया चाहता हूं, और इसे अपने लिये इसलिये तुम अब इस गन्धर्व को छोड़ दो॥३५॥३६॥ परम लाभ समझता हूं । अस्त्र की आग से मेरा अनन्तर अर्जुन ने उस गन्धर्व से कहा-हे गन्धर्व! विचित्र उत्तम रथ जल गया है । अब मै चित्ररथ मैं अब तेरे जीवन को नष्ट न करूंगा। अब तू से 'दग्धरथ' हो गया हूं ॥३९॥४०॥ शोक छोड़कर जहां जी चाहे वहां चला जा । आज पहले मैंने तप करके यह विद्या प्राप्त की थी। कुरुराज युधिष्ठिर ने तुझको बचाने की आज्ञा दे दी | वही इस समय प्राण-दान करनेवाले महात्मा अर्जुन है। गन्धर्व ने कहा--मैं हार गया, इसलिये अब को दूंगा! बल के द्वारा शत्रु को परास्त करके, अपने अजारपर्ण (जिसका रथ अगार की तरह छूने उसके शरणागत होने पर, उसे माण-दान करनेवाला योग्य नहीं) नाम का गर्व छोड़ता हूं, क्योंकि जन वीर पुरुष अवश्य ही प्रत्युत्कार का पात्र होता है समान में यश से रहित अपने निरर्थक नाम का गर्व ॥४१॥४२॥ Saroroconaroo - जाना 7070s0orrors - अध्याय १७२ ] महा भारत ८१५ Voorcorroreroorrorecorace चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ॥४३॥ सेयं कापुरुपं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्य प्रति निबोध मे ॥ ४४ ॥ यच्चक्षुपा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन तत्पश्येद्यादृशं चेच्छेत्तादृशं द्रष्टुमर्हति ॥४५॥ 'एकपादेन पण्मासास्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रते कृते ॥४६ ॥ विद्यया ह्यनया राजन्वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रदर्शिनः ॥४७॥ गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ॥ १८ ॥ देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः क्षीणाक्षीणा भवन्त्यते न हीयन्ते च रंहसः ॥४९॥ पुराकृतं महेन्द्रस्य वजं वृत्रनिबर्हणम् दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ॥५०॥ मैं चाक्षुपी नाम की विद्या अर्जुन को देना चाहता हम लोग इसी विद्या के प्रभाव से देवताओं की है । पहले-पहल यह विद्या भगवान् मनु से सोम बराबरी से आकाश-मार्ग में चल सकते है । हे पुरुषश्रेष्ठ! को मिली थी। फिर सोम से गन्धर्वराज विश्वावसु । मै तुमको और तुम्हारे भाइयों में से हर एक को को और उनकी कृपा से मुझे प्रप्त हुई । कायर को सौ सौ गन्धर्वजाति के घोड़े दूगा । उन घोड़ों पर यह विद्या फलती नहीं है ।।४३१४४॥ देवता और गन्धर्व सवार होते है । वे दिव्य है और हे अर्जुन ! इस विद्या के प्रभाव से तीनों रोको मन के समान वेग से चलते हैं। देखने में कुछ दुबले- की जो वस्तु जैसी देखना चाहोगे वह वस्तु वैसी | पतले होने पर भी उनकी गति का वेग क्षीण नहीं ही देख सकोगे । यह विद्या प्राप्त करने के लिये छ. होता ॥४७॥४९॥ गहीने तक एक पैर से खड़े होकर तप करने की पूर्व समय में वृत्रासुर को मारने के लिये जो इन्द्र आवश्यकता होती है परन्तु मै तुमको यों ही देता का बज्र बना था उसके वृत्रासुर के मस्तक पर लगने हूं। तुम्हें तप आदि कुछ न करना पड़ेगा।॥४५॥४६॥ से हजार टुकड़े हो गये थे। देवता लोग उन वज इसी विद्या के बल से हम मनुष्यों से श्रेष्ठ हैं। , के टुक्ड़ों की प्रशसा करते हैं । इन तीनों लोकों pornnar 7000 ormonomrol 22 occoooo - ८१६ म हा भारत [ आदिपर्व moreramod ततो भागीकृतो दवैर्वज्रभाग उपास्यते लोके यशोधनं किंचित्सा वै वजतनुः स्मृता ॥ ५१ ॥ वज्रपाणिर्ताह्मणः स्यारक्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवजा यवीयसः ॥ ५२ ॥ क्षत्रवतस्य भागेन अध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्ग वडवा सूते शूराश्चाऽश्वेषु ये मताः कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूयिष्यन्ति मे हयाः ॥ ५४ ॥ अर्जुन उवाच-यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्याधनं श्रुतं वापि न तद्गन्धर्व रोचये ॥ ५५ ॥ गन्धर्व उवाच-संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ॥ ५६ ॥ त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् । तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ॥ ५७॥ अर्जुन ज्याच-स्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान्सयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ। सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद्भयं भवेत् ॥ ५८ ॥ में यशरूपी धन उस बज का एक भाग है । ब्राह्मणों | अर्जुन ने कहा-हे गन्धर्व ! तू हमको प्रीति अथवा का हाथ वज्र का अंश है। क्षत्रिय का रथ वज्र का भय के कारण से जोधन या विद्या या शास्त्र देना अंश है । वैश्य का दान वज्र का अंश है और शूद्रों चाहता है उसे लेना हम अच्छा नहीं समझते का सेवाधर्म उसी वज़ का अंश है । क्षत्रियों के ॥५४॥५५|| बज़-भाग-रूप रथ का अंग होने के ही कारण पशुओं यह सुनकर गन्धर्व के कहा-महात्मा बड़े मनुष्यों में घोड़ा मारने के योग्य नहीं समझा जाता। रथ में का संग मिलने से प्रीति अवश्य हो जाती है । और चलनेवाले घोड़ों को घोड़ी उत्पन्न करती है; वे ही मैं तो अपने प्राण-दान की प्रीति से तुमको यह विद्या घोड़ों में शूर समझे जाते हैं ॥५०॥५३॥ देता है, साथ ही उसके बदले में मै भी तुमसे यह गन्धर्व जाति के मेरे ये घोड़े और सब घोड़ों उत्तम आमय अम्न सदा के लिये लेना चाहता हूँ । से श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन ! ये गन्धर्वदेश के घोड़े। यह अत्र सब तरह तुम ऐसे प्रतापी वीर पुरुष के जो इच्छा के अनुसार चलते और ठहर जाते है योग्य है ॥५६॥५७|| तुम्हारी सब कामनाओं को पूरा करेंगे | यह सुनकर , अर्जुन ने कहा- गन्धर्वराज ! अम्त्र देकर Mooooooo 1 - Prorisriririronwrroroori ८१७ अध्याय १७२ ] महा मारत orolo500-00 - कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद्येन स्म धर्पिताः यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिन्दमाः गन्धर्व उवाच -अनग्नयोऽनाहुनयो न च विप्रपुरस्कृताः यूगं ततो धर्पिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ॥ ६०॥ यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ॥६१ ॥ नारदप्रभृतीनां तु देवीणां मया श्रुतम् । गुणान्कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ॥ ६२ ॥ स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमती कृत्स्ना प्रभावः सुकुलस्य ते ॥ ६३ ॥ वेदे धनुपि चाऽऽचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ॥ ६४ ॥ धर्म वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा । पाण्डं च कुरुशार्दूल पडेतान्कुरुवर्धनान् पितृनेतानहं पार्थ देवमानुपसत्तमान् दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः मैं तुमसे घोड़े ले सकता हूं। मैं भी तुमसे सदा के | करते हैं ॥५८।६१।। लिये मित्रता करना चाहता हू । हे मित्र गन्धर्ष ! हे वीर ! भैने नारद अदि देवर्षियों के मुंह से अब तुम यह बताओ कि मनुष्य तुम लोगों से क्यों तुम्हारे पुरखों के गुणों का वर्णन सुना है । समुद्र डरते है ? और यह भी बताओ कि हम शत्रुनागी, तक फैली हुई पृथ्वी पर विचार कर मैने भी अपनी साधु और वेदज्ञ होने पर भी रात को चलते हुए तुमसे ! आखों से तुम्हारे श्रेष्ठ कुल का प्रभाव और प्रताप क्यो रान्छित हुए । गन्धर्ष ने कहा-हे पाण्डुपुत्र देखा है। हे अर्जुन ! तुम्हें धनुर्वेद सिखानेवाले तीनों तुम्हारे साथ अग्निहोत्र का अग्नि नहीं है, तुमने हान लोकों में प्रसिद्ध यशम्वी भारद्वाज पुत्र द्रोणाचार्य को भी नहीं दिया। तुम्हारे साथ आगे-आंग ब्राह्मण भी भी मैं जानता हू । हे कुख्याघ्र ! देवताओं और नहीं थे, इसी कारण तुमपरं आक्रमण करने की मनुष्यों में श्रेष्ठ तथा तुम लोगों के पिता धर्म, वायु, हिम्मत मुझे हुई । यक्ष, राक्षप, गर्म, पिशाच, | इन्द्र, अश्विनीकुमार और पाण्डु को भी मै जानता नाग और दानव आदि सब जातियों में जो बुद्धिमान् हू, जिनसे कुरु-कुल की वृद्धि हुई है । मुझे यह भी हैं वे कुरुवश के विस्तार और यश का वर्णन किया | मालूम है कि तुम पाँचों भाई देवरूनी, महात्मा, सब carorcoconconcomic Compk.
८१८ महाभारत [ आदिपर्व 7chowkoooooooo bocococokol сохахосуухсул । भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ॥ ६६ ॥ उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् । जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ॥ ६७ ॥ स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान्क्षन्तुमर्हति । धर्षणामात्मनः पश्यन्वाहुद्रविणमाश्रितः नक्तं च वलमम्माकं भूय एवाऽभिवर्धते यतस्ततो मां कौन्तेय सादरं मन्युराविशत् ॥ ६९ ॥ सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन । येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ७० ॥ ब्रह्मचर्यपरो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि - । यस्मात्तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मिन्विजितस्त्वया ॥ ७१ ॥ यस्तु स्यात्क्षत्रियः कश्चित्कामवृत्तः परन्तप । नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत्कथंचन ॥ ७२ ॥ यस्तु स्यात्कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः । जयेन्नक्तंचरान्सर्वान्स पुरोहितधूर्गतः ॥ ७३॥ तस्मात्तापत्य यत्किचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् । तस्मिन्कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ॥७४ ॥ वेदे पडझे निरताः शुचयः सत्यवादिनः अंसं धाग्यों में श्रेष्ठ और ब्रह्मचारी हो ॥६२।६६॥ सुनो ॥६७/७०॥ तुम्हारे। मन और बुद्धि बहुन अच्छी और स्वभाव हे पार्थ! ब्रह्मचर्य ही श्रेष्ठ धर्म है । तुमने भली अनि शुद्ध है । हे पार्थ ! मैंने यह सब जानने पर भी भांति उस ब्रह्मचर्य का पालन किया है । इमी कारण तुमको लाञ्छन किया था क्योंकि भुजबलयुक्त कोई तुमने मुझे सहज ही युद्ध में जीत लिया। हे शत्रुनाशी ! पुरुष स्त्री के सामने अपने अपमान को नहीं मह यदि कोई विवाह किया हुआक्षत्रिय रात्रि के समय सकता । विशेष कर रात्रि के समय हम रोगों का हमारी जाति से युद्ध करे तो वह कभी अपने घर को बल बहुत बढ जाता है । इसलिये मैं म्बी के सहित | जीता लौट नहीं सकता। विवाह कर लेने पर भी जो शोध के वश में हो गया था। मैं जिस विधि के क्षत्रिय वेद से अलङ्कृत होकर पुरोहितों पर सब अनुसार युद्ध में परास्त हो गया हतुमसे कहता हूं, कार्य का भार सौंप देना है वह युद्ध में निशाचरों को - " MAJ ८१९ 0000000000 अध्याय १७३ ] महा भारत namororoid धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युनृपाणां पुरोहिताः ॥ ७५ ॥ जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् । यस्य स्याद्धर्मविद्वाग्मी पुरोधाः शीलवाञ्शुचिः ॥७६ ॥ लाभं लब्धुमलव्धुं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् । पुरोहितं प्रकुर्वीत .राजा गुणसमन्वितम् ॥ ७७॥ पुरोहितमते तिप्टेद्य इच्छेद्भूतिमात्मनः प्राप्तुं वसुमती सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ॥ ७८ ॥ न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च जयेदब्राह्मणः कश्चिद्भूमि भूमिपतिः क्वचित् ॥ ७९ ॥ तस्मादेवं विजानाहि कुरूणां वंशवर्धन ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितु चिरम् ॥८॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्यणि गन्धर्वपराभवे द्विमप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ परास्त कर सकता है ॥७११७३॥ के लिये गुणवान् पुगेहित नियुक्त करना चाहिये इसलिये मनुष्यों को हर एक शुभ कर्म में दम- ॥७६/७७|| गुणयुक्त पुरोहित नियुक्त करना चाहिये । हे मित्र ! जो राजा उन्नति और समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को जो वेद और शिक्षा आदि छः अंगों में पण्डित पवित्र, प्राप्त करना चाहता हो उसे चाहिये कि पुरोहित के सत्यवादी, धर्मात्मा और जितेन्द्रिय है वही राज मत के अनुसार काम करे । योग्य के विना केवल पुगेहित होने के योग्य है ॥७४।७५|| शूर और कुलीन होने से ही राजा पृथ्वीमण्डल को जिस राजा के धर्मज्ञ वाक्य निपुण, सुशील, सुवंशी | कभी नहीं जीत सकता । इसलिये हे कुरुवंश-वद्धन ! पुरोहित होता है वह अवश्य इस लोक में जय पाकर यह निश्चय जानना कि जिस राज्य की कार्य चिन्ता परलोक में स्वर्ग-सुख भोगता है । राजा को न मिले | में ब्राह्मण की प्रधानता रहती है उस राज्य की सदी हुए पदार्थ के मिलने और मिले हुए पदार्थ की रक्षा रक्षा होती है ||७८1८०॥ आदिपर्व का एक सौ बहत्तर अध्याय समाप्त हुआ। अथ त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७३ ॥ अर्जुन उवाच-तापत्य इति · यद्वाक्यमुक्तवानसि मामिह । तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम् ॥ १ ॥ एक सौ तिहत्तर अध्याय ॥ १७३ ॥ अर्जुन ने कहा-हे मित्र ! तुमने मुझको तापत्य कहा जानना चाहता हूं कि तापत्य शब्द का wrorrrrrorizroorrrrrrrror Kockrook order [ आदिपर्व 10000 o200000 cocoroxoxokokorpkoirorce ८२० महा भारत aravad तपती नाम का चैषा तापत्या यकृते वयम् । कौन्तेया हि वयं साधो तत्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ २ ॥ वंशम्पायन उवाच-एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ॥ ३ ॥ गन्धर्म उवाच-हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् । यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति तद्वचः । तत्तेऽहंकथयिष्यामि शृणुप्लैकमना भव य एप दिवि धिप्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा । एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता विवस्वतो वै देवस्य साकियवरजा विभा । विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती नपसा युना न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी । नाऽप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन सुविभक्ताऽनवद्याही स्वसितायतलोचना स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेपा चैव भामिनी ॥ ९ ॥ न तस्याः सदृशं कंचित्रिषु लोकेषु भारत । भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ॥ १०॥ अर्थ क्या हे । हम कुन्ती की सन्तान है इम हेतु निस देवता ने अपने तेज से आकाशमण्डर को कौन्तेय करके प्ररयात है। तपती क्सिका नाम है भर पिया है उसकी तीनों रोकों में प्रशासन तम्बिनी जिससे हम तापत्य कहके पुमारे जा सकें । इसका तपती नामवारी कन्या थी। वह सावित्री की बोटी सचा व जानने की इच्छा है । वैशम्पायन ने कहा बहन थी। उसके अंग प्रत्यक्ष बहुत ही सुडौल और अर्जुन के ये वाक्य सुनकर वह गन्धर्व उन्हें पहरे गठे हुए थे । नेत्र विशाल थे और रूप अनोखा था। का इतिहास सुनाने लगा। उमने कहा कि हे बुद्धिमानों वह सदानारिणी मुशीग और सु दरपधारिणी थी। में श्रेष्ठ कुन्ती पुन ! मैं तुम्हारे आगे यह प्रचीन क्या कोई देवता, असुर, यक्ष, राधम, गन्धर्व अदि की मरना है। मैंने निकारण तुम्हें तापत्य कहा सो कन्या या कई अम्मरा काम उभी रावरी नहीं मुनो ॥१॥५॥ कर सकती थी। मूर्य नागयण को तीनों गा में । Hero- ८२१ महा भारत अध्याय १७३ ] oooo oca coooooo5/ संप्राप्तयौवनां पश्यन्देयां दुहितरं तु ताम् । नोपलेभे ततः शान्ति संप्रदानं विचिन्तयन् ॥ ११ ॥ अथर्भपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृपभो वली सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा अय॑माल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः । नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ॥ १३ ॥ शुश्रूपुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दनः अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ॥ १४ ॥ ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणाऽसदृशं भुवि तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥ १५ ॥ दातुमैच्छत्ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ॥ १७ ॥ यथाऽर्चयन्ति चाऽऽदित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ॥१८॥ रूप, भील, गुण और ज्ञान में उसके योग्य वर धर्मज्ञ और अप्रतिम रूपवान् जानकर तपती के योग्य खोजने पर भी नहीं मिला ॥६॥१०॥ पति समझा। हे कुरु-नन्दन ! तय प्रसिद्ध वंश में इधर कन्या भी जवान हो आई। कन्या का उत्तन्न श्रेष्ठ राजा संवरण को ही सूर्य ने कन्या देने शीघ्र विवाह करना आवश्यक था, परन्तु कोई यर का निश्चय कर लिया। हे पार्थ! सूर्य जैसे अपने नहीं देख पड़ता था। सूर्य इमी चिन्ता से व्याकुल उज्ज्वल तेज से स्वर्ग को प्रकाशित करते हैं वैसे दो गये । उन दिनों राजा ऋक्ष के पुत्र, कुरुश्रेष्ठ, ही संवरण का तेज पृथ्वी पर फैला हुआ था बलवान् संवरण सूर्य की उपासना किया करते थे। ॥११॥१७॥ विना अह द्वार पौरवनन्दन संवग्ण सेवाशील नियम- वेदपाठी ब्राह्मण जमे उदय हो रहे सूर्य की आराधना युक्त और शुचि होकर शुद्धचित्त से भक्तिपूर्वक नाना करते है वैसे ही ब्राह्मणों के सिवा सय वर्ण की प्रजा प्रकार की तपम्या, उपवास और नियम.तथा अर्थ, , संवरण की पूजा करती थी । शत्रुओं के लिये गजा माला, गंध और दूसरे उपहार देकर दीप्यमान सूर्य का तेज मूर्य से भी बढकर अमय था और मित्रों की नित्य उपासना करते थे। सूर्यदेव ने उनको कृतज्ञ, को उनी मूर्ति चन्द्रमा से भी यहार मानन्द -- -Mrini ८२२ महा भारत [ आदिपर्व oooooo Jooxoco - - coocococokokokobocokokor स सोममतिकान्तवादादित्यमतितेजसा वभूव नृपतिः श्रीमान्सुहृदां दुहृदामपि ॥ १९ ॥ एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपती तपनः स्वयम् ॥ २० ॥ स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ॥ २२ ॥ स मृताश्वश्वरन्पार्थ पद्यामेव गिरौ नृपः ददर्शाऽसदृशी लोके कन्यामायतलोचनाम् ॥ २३ ॥ स एक एकामासाद्य कन्यां परवलार्दनः । तस्थो नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ॥ २४ ॥ स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् । पुनः सतर्कयामास रखेंभ्रष्टामिवप्रभाम् ॥ २५॥ वपुपा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः । प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवाऽमलाम् ॥ २६ ॥ गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन्स्थिता स्वसितलोचना । विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरणमयी ॥ २७॥ देनेवारी थी । हे कुरु न दन । सरण के ऐसे रूप, प्रशम्तनेत्रा अनुपम रूपवाली एक कन्या उनको चरित्र और गुणों को देखकर सूर्य ने स्वय उन्ह | दिखाई दी ॥२१॥२३॥ अपनी कन्या तपती का पति बनाना चाहा॥१८॥२०॥ शत्रुनाशी भूपश्रेष्ठ उस अकेली कन्या को देखकर हे अर्जुन ! इसके उपरान्त एक समय परम उसकी ओर देखते खड़े रहे । उसकी सुन्दरता पराक्रमी गजा सवरण पहाड़ के पास ही एक वा में देखकर राजा ने समझा कि यह साक्षात् लक्ष्मी है । शिकार खेलने को गये । उस पहाड़ी स्थान में | उसकी प्रभा देखरर उन्हें यह धोखा हुआ कि यह घूमते घूमते उनका घोड़ा भूख और प्यास से व्याकुल साक्ष त् सूर्य की प्रभा है । उसके शरीर और तेज होकर मर गया। घोड़े की मृत्यु हो जाने पर राजा । बोदेखकर उन्होंने उसे अग्निशिखा समझा। प्रसन्नता उस पहाड़ीम्थान में पैदल ही घूमने लगे। तब वहा और काति से यह उन्हें निर्गर चन्द्रारा जान पड़ी। Mr.worcRJAJArrorror ८२३ vodo . अध्याय १७३ ] महा मारत oweremrowon nirome तस्या रूपेण स गिरिर्वेपेण च विशेषतः । स. सवृक्षापलतो हिरण्मय इवाऽभवत् अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योपितः अवाप्तं चाऽऽत्मनोमेने स राजा चक्षुपः फलम् ॥ २९ ॥ जन्मप्रभृति यत्किंचिद् दृष्टवान्स महीपतिः रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन ॥३०॥ तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ॥ ३१ ॥ अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुपम् । लोक निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ॥ ३२ ॥ एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसंपदा कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा तां च दृष्ट्वैव कल्याणी कल्याणाभिजनो नृपः । जगाम मनसा चिन्तां कामवाणेन पीडितः ॥ ३४ ॥ दह्यमानः स तीवेण नृपतिर्मन्मथाग्निना अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ॥३५॥ कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि । कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ॥ ३६ ॥ वह कमल नयनी पर्वत के एक स्थान पर खड़ी थी। थीं वे सब उन्हें इस रूप के आगे तुच्छ जान पड़ने दूर से देखने से जान पड़ता था कि वहा कोई सोने । लगीं ॥२९॥३०॥ की मूर्ति किसी ने खड़ी कर दी है। उसके रूप उन्होंने मन में कहा कि जान पड़ता है, विधाता और वेप की चमक से उस पर्वत के वृक्ष और शिराएँ ने देवता और मनुप्य आदि सब जीवों की सुन्दरता सोने की सी जान पड़ती थीं ॥२४॥२८॥ को मथकर इस परमसुन्दरी स्त्री को बनाया है। राजा उसको देखकर मन ही मन में तीनों लोकों राजा सब सुध बुध भूनकर मोहित होकर उसकी की स्त्रियों का अनादर करने लगे। उन्होंने मन में और से अपनी दृष्टि को नहीं हटा सके । गजा सोचा कि आज उनके नेत्र सफल हुए । जन्म से , संचरण अद्विनीय सुन्दरी उस कन्या के बारे में इमी लेकर अबतक जितनी मनोहर वस्तुएँ उन्होंने देवी तरह मन में तर्क वितर्क कर रहे थे । उस मुन्दरी ८२० महा मारत [ आदिपर्व acocococ । coomkoooo ॥४२॥ त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता विभूषणमिवैतेषां भूपणानामभीप्सितम् न देवी नाऽसुरीं चैव न यक्षी न च राक्षसीम् । न च भोगवतीं मन्ये न गन्धर्वी न मानुपीम् ॥ ३८ ॥ या हि दृष्टा मया काश्चिच्छूता वापि वराङ्गनाः । न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात्कान्ततरं तव वदनं पद्मपत्राक्षं मां मनातीव मन्मथः ॥ ४० ॥ एवं तां स महीपालो चभापे न तु सा तदा । कामात निर्जनेऽरण्ये प्रत्यभापत किंचन ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्याऽऽयतेक्षणा । सौदामिनीव चाऽभ्रेषु तत्रैवाऽन्तरधीयत तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः वनं वनजपत्राक्षी भ्रमन्नुन्मत्तवत्सदा ॥ ४३॥ अपश्यमानः स तु तां वहु तत्र विलप्य च निश्चेष्टः पार्थिवश्रेष्ठो मुहूर्तं स व्यतिष्ठत ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्याने त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ । काया को देखते ही राजा कामदेव के वश होकर | मैंने जितनी देवकन्या, असुर कन्या, राक्षसान्या, विहल हो उठे। काग की आग में जल रहे राजा ने गन्धर्वकन्या, अप्सरा और अन्यान्य सुन्दरी स्त्रियां ढिठाई करके उस लजीली सुन्दरी से कहा-हे सुन्दरी! देखी हैं उनमें से कोई भी मुझे तुम्हारे समान सुन्दरी तुम कौन और किस की कन्या हो ? यहां क्सिलिए नहीं जान पड़ती। हे चन्द्रमुखी ! मैने जब से तुम्हारे इस चन्द्रमा से भी अधिक मनोहर मुख और कमल- है मनोहर मुसकानवाली ! तुम किसलिये इस दल-तुल्य नयनों को देखा है तभी से कामदेव मुझे सूनसान वन में अकेली विचर रही हो? तुम साह- सता रहा है ॥३७॥४०॥ कामयश राजा ने निर्जन वन में उस कुमारी से परन्तु मेरी समझ में तुम्हारे लिये इनके पहनने की यो कहा, परन्तु उसने राजा को कुछ भी उत्तर नहीं आवश्यकता नहीं । इन गहनों से तुम्हारी शोभा दिया। उन्हें काम मे पीड़ित दंगार मा म नहीं है, तुमसे इन्हीं की शोभा है । हे मन्दामिनी । विजली यादों में छिप जाती है यमे ही, यह अदृश्य इसतरह खड़ी हुई हो ? ॥३१॥३६॥ मुन्दरी हो । यद्यपि तुमने ये गहने पहन रखे हैं rroroor.rrorvrs ८२५ महाभारत अध्याय १७४ ] Toot हो गई। उसे देखने के लिये राजा चारों ओर घूमने | एक जगह बैठकर विलाप करते-करते निश्चेष्ट से लगे; परन्तु सार वन में घूमकर भी उन्होंने उस हो गये ॥४१॥४४॥ कमल-नयनी सुन्दरी को न देख पाया । तव वे आदिपर्व का एक सौ तिहत्तर अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतु मप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ।। गन्धर्व उवाच-अथ तस्यामदृश्यायां नृपतिः काममोहितः । पातनः शत्रुसङ्घानां पपात धरणीतले तस्मिन्निपतिते भूमावथ सा चारुहासिनी । पुनः पीनायतश्रोणी दर्शयामास तं नृपम् ॥ २ ॥ अथाऽऽवभाषे कल्याणि वाचा मधुरया नृपम् । तं कुरूणां कुलकर कामाभिहतचेतसम् उवाच मधुरं वाक्यं तपती प्रहसन्निव उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते न त्वमहस्यरिन्दम ॥ ४ ॥ मोहं नृपतिशार्दूल गन्तुमाविष्कृतः क्षितौ । एवमुक्तोऽथ नृपतिर्वाचा मधुरया तदा ददर्श विपुलश्रोणी तामेवाऽभिमुखे स्थिताम् । अथ तामसितापाङ्गीमावभापे स पार्थिवः मन्मथाग्निपरीतात्मा संदिग्धाक्षरया गिरा साधु त्वमसितापाणि कामात मत्तकाशिनि ॥ ७ ॥ भजस्व भजमानं मां प्राणा हि प्रजहन्ति माम् । त्वदर्थ हि विशालाक्षि मामयं निशितैः शरैः ॥ ८ ॥ एक सौ चौहत्तर अध्याय ॥ १७४ ।। गर्ग ने कहा हे अर्जुन ! गजा मवरण इसके पृथियों पर विग्यान हो । तुमको ऐमा मोह करना परिर उसके वियोग में माहित होकर पृथ्वी पर गिर उचित नहीं है । अब तुग उट बड़े हो ॥१४॥ पड़े। उनकी यह दगा देसार उम मुन्दरी कन्या राना उमी मधुर वाणी सुनकर और उसकी ने फिर राजा को अपना दर्शन दिया और अत्यन्त अपने सन्गुम्य गड़ी हुई देगार टमके गुन्दर मधुर वाणी मेहमती हुई चोरी कि हे राजा 'तुम बरा का दमने रंगे। तब कामारी से पीड़ित टम rrierries - - ८२६ महाभारत [ आदिपर्व marpornvernoramadomonrnorewereomorrowronorm कामः कमलगर्भाभे प्रतिविध्यन्न शाम्यति दष्टमेवमनाक्रन्दे भद्रे काममहाहिना सा वं पीनायतश्रोणि मामाप्नुहि वरानने । स्वदधीना हि मे प्राणाः किंनरोद्गीतभापिणि ॥१०॥ चारुसर्वानवद्याङ्गि पझेन्दुप्रतिमानने न ह्यहं त्वते भीरु शक्ष्यामि खल्लु जीवितुम् ॥ ११ ॥ कामः कमलपत्राक्षि प्रतिविध्यति मामयम् तस्मात्कुरु विशालाक्षि मय्यनुक्रोशमङ्गाने ॥ १२ ॥ भक्तं मामसितापानि न परित्यक्तुमर्हसि । त्वं हि मां प्रीतियोगेन त्रातुमर्हसि भाविनि ॥ १३ ॥ स्वद्दर्शनकृतस्नेहं मनश्चलति मे भृशम् न त्वां दृष्ट्वा पुनरन्यां द्रष्टुं कल्याणि रोचये ॥ १४ ॥ प्रसीद वशगोऽहं ते भक्तं मां भज भाविनि । दृष्ट्वैव स्वां वरारोहे मन्मथो भृशमंगने अन्तर्गतं विशालाक्षि विध्यति स्म पतत्रिभिः । भन्मथानिसमुद्भूतं दाहं कमललोचने राजा ने उससे विनयपूर्वक कहा-हे सुन्दर नेत्रों- हे पद्मपत्राक्षि ! कामदेव मुझे घायल कर रहा है । वाली सुन्दरी ! मै तुमको चाहता हूं; तुम मुझे इसलिये हे रूपवती युवती ! तुम मुझपर करा स्वीकार करो। मेरे प्राण निक्ले जा रहे है । है करी । मै तुम्हारा अनुगत होकर रहूंगा । मुझको विशालाक्षि, हे कमल के समान रङ्गवाली ! यह त्याग देना तुमको उचित नहीं है। हे सुन्दरी ! देखो, कामदेव तुम्हारे कारण मेरे हृदय में तीक्ष्ण प्रेम दान करके मेरी रक्षा करना ही तुम्हाग व्य याण मार रहा है ॥५॥८॥ है । तुम्हें देखकर स्नेह से मेर। चित विहल हो रहा किसी तरह उसका वेग मेरे रोके नहीं रुक्ता । है । हे कल्याणि ! तुम्हारी सुन्दरता देखकर दूर्मा है प्रसन्नमुखी ! कामरूपी विपैला साँप मुझे काट मी को देखने का मेरी अभिलाषा नहीं होती रहा है । हे चन्द्रमुखी ! तुम उस कठोर सर्प विप ॥१२॥१४॥ से मेरी रक्षा करो। हे निरकण्टी, हे कमर मुसा ! हे सुन्दरी ! मैं तुम्हारे वश में हूं। तुम मुझ- मेरा जीवन अब तुम्हारे हाथ में है ॥९॥१२॥ पर प्रसन्न होओ। मैं नुमपर अनुराग रखना और है सुन्दरी ! तुम्हारे बिना मैं नहीं जी सकूँगा। तुम्हारा अनुगत हूं; इसलिये मुझं अनीकार करे। Inymy.or JoomyN orror महा मारत अध्याय १७४ ] Oscacy conococococooco0010coo koicoco0000070 प्रीतिसंयोगयुक्ताभिरद्भिः प्रह्लादयस्व मे पुष्पायुधं दुराधर्ष प्रचण्डशरकार्मुकम् ॥१७॥ त्वद्दर्शनसमुद्भूतं विध्यन्तं दुःसहैः शरैः उपशामय कल्याणि आत्मदानेन भाविनि ॥ १८॥ गान्धर्वेण विवाहेन मामुपैहि वरांगने विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥ १९ ॥ तपत्युगाच-नाऽहमीशाऽऽत्मनो राजन्कन्या पितृमती ह्यहम् । मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्याचस्व पितरं मम यथा हि ते मया प्राणाः संगृहीता नरेश्वर । दर्शनादेव भूयस्त्वं तथा प्राणान्ममाहरः न चाऽहमीशा देहस्य तस्मान्नृप्रतिसत्तम समीपं नोपगच्छामि न स्वतन्त्रा हि योषितः ॥ २२ ॥ का हि सर्वेषु लोकेपु विश्रुताभिजनं नृपम् । कन्या नाऽभिलपेन्नाथं भर्तारं भक्तवत्सलम् ॥ २३ ॥ तस्मादेवंगते काले याचस्व पितरं मम आदित्यं प्रणिपातेन तपसा नियमेन च ॥ २४ ॥ हे विशारक्षि! जब से तुमको देखा हे तभी से कामदेव हे महाराज ! मैं कुमारी हू । मेरे पिता विद्यमान है। मेरे ममन्थरों में याण मार रहा है। हें कमलनयनी। इसलिये मै म्याधीन नहीं। यदि आप सनमुन मुझपर मेरा शरीर कामारी से जल रहा है ॥१५१६॥ शशार प्रेम करने रंग हैं तो मेरे पिता से मेर रिये तुम प्रेम मये ग के जल से उसशे ठण्डा कर दो। प्रार्थना कीजिए ॥१९॥२०॥ दे सुन्दरी ! तुम्हारे दर्शन से प्रनण्ड भयानक है नरन थ ! मैंने निम प्रकार आपके मन को धनुप धारण करने वाला कामदेव उत्तम होकर हर रिया है उमी प्रकार मापी देखते दी मेरे चिरा अमल याणों की नोट से बड़ी निर्दयता के साथ को चुरा लिया है। किन्तु दे गृश्रेिष्ठं । अपने शरीर मुझे घायल कर रहा है । नुम मेरे अर्ध न होर पर मुझे कोई अधिकार न होने के कारण में आपको उस कामदेव को शान्त करो ॥१७॥१८॥ नहीं मज सस्ती। पिया कमीकमी दशा में गाधीन दे मुन्दरी ! तुम गर्धा विधि के अनुसार मुझमे नहीं होनी ॥२१॥२०॥ विवाद पर रोक्योकि कहा कि सर विवादी पान यह नदंगी कि अपने ममान से गधा विाहही? 1 तपती ने कहा वि प्रमिद, शामर, अन्सेपुर में सन, मल. - ८२८ महाभारत [ आदिप romoooo Moo0005030scoraikocs । स चेत्कामयते दातुं तव मामरिसूदन भविष्याम्यद्य ते राजन्सततं वशवर्तिनी ॥ २५ ॥ अहं हि तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता अस्य लोकप्रदीपस्य सवितुः क्षत्रियर्षभ ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चतरथपर्वणि तपत्युपाख्याने चतु सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७४ ।। वत्सल राजा उसका स्वामी हो ? अतएव इस समय करने को सम्मत होवे तो मै सदा आपके वशाभूत मुझे जाने दीजिए और मेरे पिता आदित्य को प्रणाम, रहूगा । हे क्षत्रियश्रेष्ठ ! मेग नाम तपती ह । मै तपस्या, व्रत पूजा आदि से सन्तुष्ट करके उनसे मेरे | लोक प्रकाशक आदित्य की कन्या और सावित्रा की रिये प्रार्थना कीजिए ॥२३॥२४॥ छाटी बहन हू ॥२५/२६॥ हे शत्रुनाशी महाराज ! यदि पिता मुझको दान आदिपर्व का एक सौ चौहत्तर अध्याय समाप्त हुआ । अथ पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७५ ॥ गन्धर्व उपाच-एवमुक्त्वा ततस्तूर्णं जगामोर्ध्वमनिन्दिता । स तु राजा पुनर्भूमौ तत्रैव निपपात ह अन्वेषमाणः सबलस्तं राजानं नृपोत्तमम् । अमात्यः सानुयात्रश्च तं ददर्श महावने ॥ २ ॥ क्षितौ निपतितं काले शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् । तं हि दृष्ट्वा महेष्वासं निरस्तं पतितं भुवि ॥ ३ ॥ बभूव सोऽस्य सचिवः संप्रदीप्त इवाऽग्निना । त्वरया चोपसंगम्य स्नेहादागतसंभ्रमः तं समुत्थापयामास नृपति काममोहितम् भूतलाद्भूमिपालेशं पितेव पतितं सुतम् एक सो पचहत्तर अ याय ॥ १७५ ॥ गन्धर्व ने कहा इतना कहकर वह सुदरी स्वर्ग को उसने देखा, हटकर गिरे हुए इन्द्र धज के समान चली गई राजा पिर उमीतरह व्याकुर होकर पृ.की राना पृ.पा पर पड़े है । उम बड़े चापधारी राना को पर गिर पड़े। उसी अवमर में वहा उस राजा का बिा अश्व पृ.वी पर पड़े देगर मत्री को बड़ा मन्त्री सेना सहित राजा को हूँढता हुआ आन पहुँच।। । दुख हुआ । आर सम्मानपूर्वक बैग से पास जाकर Mirror arina - acrania । अध्याय १७५ 1 महाभारत oxmromanxexesamoron roovecaca प्रजया' वयसा 'चैव वृद्धः कील् नयेन च । अमाय॑स्तं समुत्थार्य बभूव विगतज्वरः ॥.६:॥ उवाच चैन कल्याण्या वाचा मधुरयोस्थितम्.। मा भैर्मनुजशार्दूल भद्रमस्तु तवाऽनघ । . ।।.७७ क्षुत्पिपासापरिश्रान्तं तर्कयामास वै' नृपम् ।। पतितं'पातनं संख्ये शात्रवाणां महीतले ॥ ८ ॥ वारिणां च सुशीतेन शिरस्तस्याऽभ्यषेचयत् अस्पृशन्मुकुटं राज्ञः पुण्डरीकसुगन्धिना तनः प्रत्यागतप्राणस्तद्वलं बलवान्नृपः सर्व विसर्जयामास तमेकं सचिव विना ॥ १०,, ततस्तस्याऽऽज्ञया राज्ञों विप्रतस्थे महद्वलम् स तु राजा गिरिप्रस्थे तस्मिन्पुनरूपविशत् ॥ ११ ॥ नंतस्तस्मिन्गिरिवरे, शुचिर्भूत्वा कृताञ्जलिः आरिराधयिषुः सूर्य तस्थावूर्ध्वमुखः क्षितो ॥ १२ ॥ जगाम मनसा चैव वसिष्ठमृपिसत्तमम् पुरोहितममित्रघ्नस्तदा संवरणो नृपः ॥ १३ ॥ नक्तंदिनमथैकत्र स्थिते तस्मिञ्जनाधिपे अथाऽजगाम विप्रर्पिस्तदा द्वादशमेऽहनि ॥ १४ ॥ काम से गोदित भूपार श्रेष्ठ को इसप्रकार पृथ्वी पर से उसके मिट्टी में सने हुए और मुकुट से बालरी मे उठाया कि जैसे रिता पुत्र को उठाता है ॥११५॥ शिर को धोने लगा। जन महावरी राजा का चित्त वह मन्त्री बुद्धिमान् , कीर्तिशाली, नीति का म्वस्थ हुआ तब उन्होंने फेयल उस मनी को अपने जानकार और वृद्ध था। राना को उठाार और उन्हें पास रहने देर सब सेना को वहां से जाने की जारित देसार उसीचिन्ता दर हुई । उमने सर्चत आज्ञा दे दी ॥१०॥ होकर पेठे हुए राजा से मधुर वाणी से कहा- • राजा की भाजा से सब मेना नगर को चरी गई। है नरश्रेष्ठ, हे निष्पाप । आप रोद को छोड़िए । तर राजा उसी पन के शिखर पर बैठकर पवित्रता आपा मगर हो। उस शत्रुनाशी राजा को थमा माता पूर्वक हाथ जोड़े, मूर्य की और मुख करके, उनी और भूमाप्यामा ममझार वह मगन्ध ठडे जर आगमना करने रंगे। गना ने मनी मन में worizorea -- . Pr ८३० महा मारत [ आदिपर्व 400ccolococcorrorce -~->concore स विदित्वैव नृपति तपस्या हृतमानसम् दिव्येन विधिना ज्ञात्वा भावितात्मा महानृषिः ॥ १५ ॥ तथा तु नियतात्मानं तं नृपं मुनिसत्तमः । आवभाषे स धर्मात्मा तस्यैवाऽर्थचिकीर्पया ॥ १६ ॥ स तस्य मनुजेन्द्रस्य पश्यतो भगवानृपिः । ऊर्ध्वमाचक्रमे द्रष्टुं भास्कर भास्करद्युतिः । ॥ १७ ॥ सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चाऽऽत्मानं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥ तमुवाच महातेजा विवस्वान्मुनिसत्तमम् । महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम् ॥ १९ ॥ यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर तत्ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यारसुदुष्करम् ॥ २० ॥ एवमुक्तः स तेनर्विसिष्ठः प्रत्यभापत प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तं महातपाः ॥ २१ ॥ वसिष्ठ उवाच-यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता । तां त्वां संवरणस्याऽर्थे वरयामि विभावसो ॥ २२ ॥ स हि राजा बृहत्कीर्तिधर्मार्थविदुदारधीः युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहङ्गम ॥ २३ ॥ अपने, शत्रुओं को मन्त्र बल से नष्ट करनेवाले | के सर्माप पहुचकर वसिष्ठ ने हाथ जोड़कर प्रसन्नता- प्रतापी पुरोहित वसिष्ठ ऋपि को स्मरण किया। पूर्वक कहा-हे भगवन् ! मैं वसिष्ठ हूं । सूर्यदेव ने अनन्तर दिन-रात इस प्रकार सई रहने पर बारहवें संतुष्ट होकर कहा-हे महर्षि ! आपका आना शुभ दिन वमिष्ठ जी वहां आये । वह विशुद्धात्मा धर्मशील हो । कहिए, आप क्या चाहते है । हे महाभाग! महर्पि योगबल से उस संयतचित्त राजा का चित्त आप जो मुझमे मांगंगे वह दुरंभ होने पर भी, मै तपती से हरा हुआ जानकर उसका कार्य पूरा करने आपको अवश्य दृगा। यह सुनकर महातपम्धी वसिष्ठ के लिये समझाने लगे॥११॥१६॥ ने सूर्य को प्रणाम किया और कहा ॥१७॥२१॥ फिर वे उसी समय सूर्यदेव से मिलने के लिये सावित्री की छोटी बहन तपती नाम की जी उनके आगे आनाशमार्ग से चल दिये । सहस्रांशु आप की कन्या है उमे में आपसे, राजा संवरण के Mirr> म हा भारत अध्याय १७५ ] concoconcor0 cococococorcorcoook इत्युक्तः स तदा तेन ददानीत्येव निश्चतः । प्रत्यभापत तं विप्रं प्रतिनन्द्य दिवाकरः ॥ २४ ॥ वरः संवरणो राज्ञां त्वमृषीणां वरो मुने । तपती योपितां श्रेष्ठा किमन्यदपवर्जनात् ॥ २५ ॥ ततः सर्वानवद्यागी तपती तपनः स्वयम् । ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय महात्मने ॥ २६ ॥ प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्पिस्तपती तदा वसिष्टोऽथ विस्तृप्टस्तु पुनरेवाऽऽजगाम ह ॥ २७ ॥ यत्र विख्यातकीर्तिः स कुरूणामृपभोऽभवत् । स राजा मन्मथाविष्टस्तद्गतेनांऽतरात्मना ॥ २८ ॥ दृष्ट्वा च देवकन्यां तां तपती चारुहासिनीम् । वसिष्टेन सहाऽऽयान्ती संहृष्टोऽभ्यधिकं बभौ ॥ २९ ॥ रुरुचे साऽधिकं सुधूरापतन्ती नभस्तलात् । सौदामिनीव विभ्रष्टा द्योतयन्ती दिशस्त्विया ॥ ३० ॥ कृच्छ्राद द्वादशरात्रे तु तस्य राज्ञः समाहिते । आजगाम विशुद्धारमा वसिष्ठे। भगवान्नृपिः ॥ ३१ ॥ लिये, मांगता हू। हे आकाशपति ! वह राजा सवरण सूर्यनागयण ने अपनी इच्छा से, राजा संवरण के अति कीतिशारी, धर्मार्थ तत्वों का जाननेवाला , लिये, वह कन्या महात्मा वसिष्ठ को अर्पण कर दी। और उदाग्बुद्धि है। इसलिये वह आपकी कन्या के उस कन्या को लेकर, सूर्य से विदा हो, महर्षि घर होने के योग्य है ॥२२॥२३॥ यसिष्ठ राजा संवरण के पास आये । ममिद्ध यशम्बी सूर्य ने पहले ही संवरण को अपनी काया देने कौरव-श्रेष्ठ राजा संवरण कामयश होकर एकाग्रचिव का निश्चय कर रखखा था। इस समय वमिष्ठ की में तपती का ही ध्यान कर रहे थे। देव-कन्या तपती प्रार्थना सुनकर अंदर के साथ उन्होंने कहा-हे को साथ लिये वमिष्ठ को आने देसकर आनन्द के महर्षि ! मैं जानता है कि राजा सवरण सब राजाओं मारे राजा का मुग्पकमल गिल उटा ॥२६॥२९॥ में ठहै।आप भी सब प्रापियों में प्रधान है। तपनी यादल में गिरी हुई पिजरी जिमप्रकार दगी दिगा के समान सुन्दर स्त्री भी दुमरी नहीं है। इस कारण को उजाले से छा देनी बसही गुन्दरी तपनी ने मी दशा में ऐसे योग्य पुरप के कहने को मान आगे उनरका अपनी मामा से दिशामों को लगे में आपचिही पयादी साती है ॥२४॥२५॥ मुशोभित किया। राजा का पारह रात्रियों का कटोर - -20 -[ आदिपर्व - . 1 , . ।. । ८३२ म हा भारत oysyvosiocudogo dobu dorucara तपंसाऽऽराध्य वरदं देवं गोपतिमीश्वरम् .. । : लेभसंवरणो भायाँ वसिष्ठस्यैव तेजसा ततस्तस्मिगिरिश्रेप्टे 'देवगन्धर्वसेवितेने । जग्राह विधिवत्पाणिं तंपत्योः स नर्यभः ॥ ३३ ॥ वसिष्ठेनाऽभ्यनुज्ञातस्तस्मिन्नेव धराधरे ।. सोऽकामयत राजपिविहर्तुं 'सह भार्यया ॥ ३४ ॥ ततः पुरेच राष्ट्रे च धनेपूपवनेषु च । आदिदेश महीपालस्तमेवं संचिवं तदा नृपति' स्वभ्यनुज्ञाप्य वसिष्ठोऽथाऽपचक्रमे सोऽथ राजागिरौं तस्मिन्विहाराऽमरो यथा ततो द्वर्दिश वर्षाणि' काननेषु वनेषु • च रेमेतस्मिनिगरी राजा तथैव सह । भार्यया ॥ ३७॥ तस्य राज्ञः पुरे तम्मिन्समा द्वादश सत्तम न वर्ष सहस्राक्षी राऐ चैवाऽस्य ‘भारत ॥ ३८ ॥ ततस्तस्यामनावृष्टयां प्रवृत्तायामरिन्दम । प्रजाः क्षयमुपाजग्मुः सर्वाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥ ३९ ॥ तस्मिंस्तथाविधे काले वर्तमाने सुदारुणे - ।.। . नाऽवश्यायः पपातोव्यां ततः सम्यानि नारुहन् ॥ ४० ॥. नियम अन्त, होने पर विशुद्धात्मा भगवान् ऋपि सभी स्थानों के शासन का काम राजा ने मन्त्री चसिष्ठ वहीं आये। तपस्या के द्वारा पृथ्वीनाथ भगवान् को सौप दिया.. वसिष्ठ जी राजा से विदा होकर सूर्य की आगधना करके, वसिष्ठ की सहायता से, अपने स्थान को चले गये । इसके उपरान्त महाराज राजा ने स्त्री प्राप्त गी॥३०॥३२॥ सेवग्ण उसी पर्वत पर देवता की तरह विहार करने इसके पश्चात् उन्होंने वसिष्ठ की आज्ञा से देव- लंग ॥३५॥३६॥ - । वृद्ध गन्धको समयाव कन्येजित हुए उस अाचा पर्ववेदः | । ३६ वर्ष तक उस पर्वत के वन-और - पर तपती से विधिपूर्वक विवाह किया ॥३३॥३४॥ उपवनों में बिहार किया था। हे भारतश्रेष्ठ! सहस- वसिष्ठ से आश लेकर वे उसी पर्वत पर विहार नेत्र इन्द्र ने उनकी राजधानी और राज्य में बारह करने को रह गये। नगर, राज्य, वन, उपवन आदि वर्ष तक वर्षा नहीं की ॥३७३८|| . hori.hd Occo/ 5o4 Door अध्याय १७५ ] महा भारत ८३३ poroorced ततो विभ्रान्तमनसो जनाः क्षुद्भयपीडिताः । गृहाणि संपरित्यज्य बभ्रमुः प्रदिशो दिशः ॥ ४१ ॥ ततस्तस्मिन्पुरे राष्ट्रे त्यक्तदारपरिग्रहाः परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जनिरे जनाः ॥४२॥ तत्क्षुधातनिराहारैः शत्रभूतैस्तथा नरैः अभवत्प्रेतराजस्य पुरं प्रेरिवाऽऽवृतम् ॥ ४३ ॥ ततस्तु तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृपिः । अभ्यवर्पत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ४४ ॥ तं च पार्थिवशार्दूलमानयामास तत्पुरम् तपत्या सहितं राजन्व्युपितं शाश्वतीः समाः । ततः प्रष्टस्तत्राऽऽसीद्यथापूर्वं सुरारिहा ॥४५॥ तस्मिन्नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः प्रववर्ष सहस्राक्षः सस्यानि जनयन्प्रभुः ॥ ४६॥ ततः सराष्ट्रं मुमुदे तत्पुरं परया मुदा तेन पार्थिवमुत्येन भावितं भावितात्मना ॥ ४७ ॥ ततो द्वादश वर्वाणि पुनरीजे नराधिपः तपत्या सहितः पन्या यथा शच्या मरुत्पतिः ॥ ४८ ॥ हे शत्रुनाशी! तब वृष्टि न होने से स्थावर जङ्गम होकर प्रेत रान के नगर के समान प्रेत पूरित प्रतीत और सर प्रजा का क्षय होने लगा। उस दारण होने लगा। हे राजन् ! मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ उनके दुर्भिक्ष के समय पृ.वी पर ओस भी नहीं गिरती राज्य को उस दशा में देसकर उसे रक्षा करने की थी । इस कारण किसी प्रकार का कोई अन नहीं चेष्टा करमे लगे। वे यारह वर्ष के बाद उनको और उपर हुआ ॥३०॥४०॥ तपती को नगरी में रे आये । महाराज सवरण जय तब भून्य से व्याकुर सर प्रजा अपने घर द्वार नगरी में पहुचे तर इन्द्र भगवान् पहरे की तरह छोड़कर देश-देशन्तरों में मारी मारी फिरने रगी। वर्षा करने रंगे । पिर बहुत सा अ7 उपजने लगा। राज्य और रानधानी के रोग सदा भूमे रहने के गना को अपने राज्य की भगई ग रगा देराकर कारण आपस की गर्यादासोकर स्त्री पुत्र दि परिवारों नगर और राष्ट्र की प्रजा बहुत ही प्रसन्न हुई। इद्राणी को छोरने रंगे ॥४१॥४२॥ के साथ इद्र ने नम यज दिया था से ही तपती के यह देश गमे तथा मुर्शाये हुए जना से पूरित साथ सवाण ने बारह वर्ष कायज्ञ क्यिा ॥४३॥१८॥ -r" JAPATrry ८३४ म हा भारत [ आदिपर्व Hoice CHOOT20" .---- गन्धर्व उवाच-एवमासीन्महाभागा तपती नाम पौर्विकी तव वैवस्वती पार्थ तापत्यस्त्वं यया मतः ॥ ४९ ॥ तस्यां सजनयामास कुरुं संवरणो नृपः तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन ॥ ५० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्यान समानौ पञ्चमात्यधिकशततमोऽध्यायः ।।१७५।। गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! उस तफ्ती नाम्नी पुत्र को जन्म दिया था। उम कुरुवंश में तुम्हारे तपन-कन्या के वंश में तुमने जन्म लिया है, इमी जन्म लेने के कारण तुम तापत्य कह जा सकते हो लिये तुमको 'तापत्य' कहा है। हे शत्रुओं के सन्ताप ॥४९॥५०॥ देनेवाले ! राजा संवरण ने उस तपती से कुरु नामक आदिपर्व का एक सौ पचहत्तर अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ पट्मप्तत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १७६ ।। वैशम्पायन उवाच-प्त गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत्तदा भरतर्षभ । अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाऽऽवभौ ॥ १ ॥ उवाच च महेष्वासो गन्धर्व कुरुसत्तमः जातकोतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोवलात् ॥ २ ॥ वसिष्ठ इति यस्यैतहपे म त्वयेरितम् एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत्तद्दस्व मे य एप गन्धर्वपते पूर्वेपां नः पुरोहितः आसीदेतन्ममाऽऽचक्ष्व क एप भगवानृषिः ॥ ४ ॥ गन्धर्व उवाच-ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः । तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावरैरपि एक सौ रिहत्तर अध्याय ॥१७६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे भरतश्रेष्ठ ! महायली ऋपि का नाम लिया, जो हमारे पूर्व पुरुष संवरण कुरश्रेष्ठ अर्जुन उस गन्धर्व से पूर्वोक्त वृत्तान्त सुनकर के पुरोहित थे, वे कौन है ! मैं सुनना चाहता है, बहुत प्रसन्न हुए और उनका मुख चन्द्रमा के समान तुम कहो ॥१.४॥ चमकने लगा। वसिष्ठ जी के तपोवल के वृत्तान्त को गन्धर्य ने कहा-वसिष्ठ जी ब्रह्मा जी के मानसिक पुन मुनकर उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ। उन्होंने फिर , और अस्न्धी के पति थे। काग औस्माध को देवता गन्धर्व से कहा-हे गन्धर्वराज ! तुमने जिन वसिष्ठ भी नहीं जीत सकते; परन्तु वसिष्ठ ने अपनी तपस्या - - - - orarococonconcense अध्याय १७६ ] महा मारत ammaroom coccacucoes कामक्रोधावुभौ यस्य चरणो संववाहतुः । इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते । यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः ॥ ६ ॥ विश्वामित्रापराधेन धारयन्मन्युमुत्तमम् पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत् विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम् । मृतांश्च पुनराहतुं शक्तः पुत्रान्यमक्षयात् ॥ ८ ॥ कृतान्तं नाऽतिचक्राम वेलामिव महोदधिः । यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः ॥ ९ ॥ इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम् । पुरोहितमिमं प्राप्य वसिष्ठमृपिमत्तमम् ईजिरे ऋतुभिश्चैव नृपास्ते' कुरुनन्दन स हि तान्याजयामास सर्वान्नृपतिसत्तमान् । ब्रह्मर्पिः पाण्डवश्रेष्ठ वृहस्पतिरिवाऽमरान् ॥ ११ ॥ तस्माद्धर्मप्रधानात्मा वेदधर्मविदीप्सितः ब्राह्मणो गुणवान्कश्चित्पुरोधाः प्रतिदृश्यताम् ॥ १२ ॥ के बल से इन दोनों शत्रुओं को जीत लिया था। इक्ष्वाकुवंग के राजाओं ने उन जितन्द्रिय महात्मा काम और क्रोध दोनों उनके पैर दावा करते थे । को अपना पुरोहित बनाकर हीमारी पृवी का राज्य इन्द्रियों को वश में करने के कारण ही वे वसिष्ठ प्राप्त किया है । वह नरपति वसिष्ठ ऐसे पुरोहित नाम से प्रसिद्ध हुए। विक्षामित्र ने बड़ा भारी । की कृपा और सहायता मे ही अनेक यज कर सकते उनका अपराध क्यिा था परन्तु उन्होंने सब प्रकार हैं। हे पाण्डवश्रेष्ठ | बृहम्पति जमे देवताओं को से ममर्थ होने पर भी विश्वामित्र के वंश का नाश यज कराते है वैसे ही वर्षि वमिष्ठ ने श्वायुवंग नहीं किया ॥५॥६॥ के राजाओं को यज्ञ कराये है ॥१०॥११॥ यद्यपि पुत्रों के शोक मे दुसी हुप. परन्तु विश्वामित्र इम कारण तुम अपना पुरोहित यनाने के लिय का नाश करने को कोई कर्म नहीं किया और अपने किसी श्रेष्ठ धर्मात्मा, वेदन, गुणी ब्रामण की खोज मरे हुए पुत्रों को यमपुरी से लाने को भी समर्थ थे करो। हे अर्जुन ! पी जय करने की इच्छा परन्तु उन्होंने समुद्र के समान काल की मर्यादा को मावाल क्षत्रिय को राज्यवृद्धि के लिये पहले पुगेदित उहंशन नहीं किया ॥७९॥ नियुक्त करना चाहिये । क्योंकि पृथ्वी के जीतने की coccole rrrrrrronorynorr rrrrr Zoox docoo महाभारत [ आदिपर्व Manieunioreamon oycocacon क्षत्रियेणाऽभिजातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता । पूर्व पुरोहितः कार्यः पार्थ राज्याभिवृद्धये । महीं जिगीपता राज्ञा ब्रह्म कार्यं पुरःसरम् ॥ १३ ॥ तस्मात्पुरोहितः कश्चिद्गुणवान्विजितेन्द्रियः विद्वान्भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्ववित् ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथसर्वणि पुरोहितकरणकथने पद्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ इच्छा रखनवाले राजा का ब्राह्मण को सामने रखना जितेन्द्रिय, विद्वान्, धर्म-अर्थ-काम के मर्म को जानने- उचित है । इसलिये मैं चाहता हूं कि एक गुणी, वाला ब्राह्मण तुम्हारा पुरोहित हो ॥१२॥१४॥ आदिपर्व का एक सौ छिहत्तर अध्याय समाप्त हुआ । अथ सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ।। अर्जुन उवाच-किंनिमित्तमभूद्वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत् ॥ १ ॥ गन्धर्य उवाच-इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत्तन्निबोध मे कान्यकुब्जे महानासीत्पार्थिवो भरतर्षभ गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्याऽऽत्मसंभवः ॥ ३ ॥ तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धवलवाहनः विश्वामित्र इति ख्यातो बभूव रिपुमर्दनः ॥ ४ ॥ स चचार सहामात्यो मृगयां गहने बने ।। मृगान्विध्यन्वराहांश्च रम्येपु मरुधन्वसु एक सौ सतहत्तर अध्याय ॥ १७७ ।। अर्जुन ने कहा-हे गर्म ! दिव्य आश्रग में देश में गाधि नाम के एक महाबली महापरामागी रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठ में क्योंकर आपस प्रसिद्ध राजा थे । वे कुशिक के पुत्र थे । धर्मात्मा मे शत्रुता हुई यह तुम हमसे कहो। गन्धर्व ने कहा गाधि के भी एक शत्रुदमन लोक-प्रसिद्ध पुत्र उरान्न हे अर्जुन ! यह वसिष्ठ का आख्यान सब लोगों में हुआ । उनका नाम विश्वामित्र रखा गया । उन पुराण कहा जाता है । मैं आदि से अन्त तक यह विश्वामित्र की अनगिनत सेना तथा वाहन थे ॥११॥ कथा तुमसे कहता हूं, सुनो। हे भरतश्रष्ठ! कान्यकुब्ज । विश्वामित्र को अहेर खेलने का बड़ा शौक-या। - 20501016 20.1000 07o7o70700Jorum अध्याय १७७ ] महाभारत Madhoorcoro Joycycoohoyoooooo cococcc. व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः । आजगाम नरश्रेष्ठ' वसिष्ठस्याऽऽश्रमं प्रति तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया पाद्यार्थ्याचमनीयस्तं स्वागतेन च भारत तथैव परिजग्राह वन्येन हविपा तदा तस्याऽथ कामधुग्धेनुर्वसिष्टस्य महात्मनः उक्ता कामान्प्रयच्छेति सा कामान्दुह्यते सदा ॥ ९ ॥ .ग्राम्यारण्याचौपधीश्च दुदुहे पय एव च पड्स चाऽमृतनिभं रसायनमनुत्तमम् भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च । लेह्यान्यमृतकल्शनि चोप्याणि च तथाऽर्जुन । रत्नानि च महाहीणि वासांसि विविधानि च ॥ ११ ॥ तैः कामः सर्वसंपूर्णैः पूजितश्च महीपतिः । सामात्यः सवलश्चैव तुतोप स भृशं तदा ॥ १२ ॥ पडुन्नतां सुपारिं पृथुपश्चसमावृताम् मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम् ॥ १३ ॥ वे अपने गन्त्री के साथ मृगों और सुअरों का शिकार | कामधेनु गौ थी । मागते ही सब अभिल्पित वस्तुए करते हुए मरुभूमिया, मैदानी और घने वनों में देने की उसमें शक्ति थी। उस दिन वसिष्ठ को कामना घूमते फिरते थे । हे राजन् ! वे एक दिन मृग के के अनुसार कामधेनु को दोहने पर गाव नगर तथा पीछे दौड़ने से थककर, प्यासे होकर, वसिष्ठ के वन की औषधिया ( अन्न ) दूध, अमृत के समान आश्रम में जा पहुने । ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने नरश्रेष्ठ । स्वादिष्ट छ रसों के आहार, पेय (पीने की सामग्री), विश्वामित्र को आते देखकर अतिथि की सेवा के । चर्पा ( चबाने की सामग्री ), चोप्य ( चूसने की लिये स्वागत किया ॥५७|| सामग्री ), और रेह्य ( चाटने के ) पदार्थ और बड़े हे भारत 1 उन ऋपि ने कुशलक्षेम पूछकर कीमती वस्त्र और रत्न आदि प्राप्त हुए । मन्त्री और पाद्य, अध्यं आचमनीय बनैले फल-मूल और पुरोदास सेना सहित राजा ने उन सब काम्य वस्तुओं से सस्कृत आदि भोजन की सामग्री देकर उनका भातिय सत्कार होकर अनि सने प प्राप्त किया। और उस मनोरमा क्यिा । हे अर्जुन ! महात्मा वसिष्ठ के पास एक । कामधेनु को देसार बड़ा अचरज माना ।।८।१२।। .. - - । -orrora0- Prorani.poaran:
८३८ म हा भारत [आदिपर्व cokoicoconococococococor - सुवालधिं शकुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम् । पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् ॥ १४ ॥ अभिनन्द्य स तां राजन्नन्दिनी गाधिनन्दनः । अब्रवीच भृशं तुष्टः स राजा तमृपिं तदा ॥ १५ ॥ अर्बुदेन गवां ब्रह्मन्मम राज्येन वा पुनः नन्दिनीं संप्रयच्छस्त्र भुक्ष्व राज्यं महामुने ॥ १६ ॥ वसिष्ठ ज्याच-देवतातिथिपित्र) याज्यार्थं च पयस्विनी अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनाऽपि तवाऽनघ ॥ १७ ॥ विश्वामित्र याच -क्षत्रियोऽहं भवान्विप्रस्तपः स्वाध्यायसाधनः ब्राह्मणेषु कुनो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् । स्वधर्म न प्रहास्यामि नेप्यामि च बलेन गाम् वसिष्ठ उवाच -बलस्थश्चाऽसि राजा च वाहुवीर्यश्च क्षत्रियः । यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय ॥ २० ॥ गन्धर्व उवाच-एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो वलादिव । हसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् ॥ २१॥ उम कामधेनु के शरीर की बनावट बहुत सुन्दर कहा-हे अनघ ! दुधारी नन्दिनी देवता, अतिथि, थी । उसका मेरुदण्डपृछ और चारों थन ऊचे, पितर और यज्ञ के लिये रक्खी हुई है । इसलिय पार्श्व और ऊरु सुन्दर, कान और माथा बड़ा, आखें आपका सारा राज्य लेकर भी मै इसको नहीं दे बड़ी और मेंडक के समान ऊंची, पूछ मनोहर, दोनों सकता ॥१६॥१७॥ कान कीलों के समान, सींग देखने में बहुत ही सुन्दर इसपर विश्वामित्र ने कहा-गै क्षत्रिय इं, और और शिर, गला मोटा और चौड़ा था। हे राजन् ! आप तपस्वी वेद पढ़नेवाले ब्राह्मण है। यही आपका उस मधुर नन्दिनी नानी कामधेनु को देखार राजा अस्त्र है । मैं दम करोड़ गायें देकर इसे लेना चाहता गाधिकुमार ने अति सतुष्टनित्त से उसकी प्रशंसा कर । हूं । यदि इसपर आप प्रसन्न न होंगे तो ग क्षत्रियधर्म ऋपि से कहा ॥१३॥१५॥ के अनुसार यह गाय आपसे छीन लंगा ॥१८॥१९॥ हे ब्रह्मन् ! आप मुझसे दस करोड़ गौ लेकर मुझको वसिष्ठ ने कहा-हे राजन् ! आप बलान् और यह नन्दिनी दीजिए अथवा हे महामुनि ! नन्दिनी राजा हैं। क्षत्रियवंश में जन्म लेने के कारण आप में को देखकर मेरा सारा राज्य लेकर भोगिए । वसिष्ठ ने याहुबल भी है । इसलिये आपकी जो इच्छा हो यही IMINA...
*- •oycocor andoa अध्याय १७७ ] महा भारत niroin कशादण्डप्रणुदितां काल्यमानामितस्ततः हभायमाना कल्याणि वसिष्ठस्याऽथ नन्दिनी ॥ २२ ॥ आगम्याऽभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी । भृशं च ताड्यमानावे न जगामाऽऽश्रमात्ततः ॥ २३ ॥ वसिष्ठ आच-शृणोमि ते वं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः । हियसे त्वं वलाद्भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि । किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान्त्राह्मणो ह्यहम् ॥ २४ ॥ गन्धर्व उवाच-सा भयान्नन्दिनी तेषां चलानां भरतर्षभ । विश्व मित्रभयोद्विग्ना वसिष्टं समुपागमत् ॥ २५ ॥ गोपाच-कशापदण्डाभिहतां क्रोशन्ती मामनाथवत् । विश्वामित्रवलै|रर्भगवन्किमुपेक्षसे ॥ २६ ॥ गन्धर्य उवाच-नन्दिन्यामेवं क्रन्दन्त्यां धर्पितायां महामुनिः । न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतवतः ॥ २७॥ वमिष्ठ उवाच-क्षत्रियाणांवलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा वलम् । क्षमा मां भजते यस्माद् गम्यतां यदि रोचते ॥ २८॥ कीजिए । कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार करने की और धर्म है ॥२२॥२४॥ आपके लिये आवश्यकता नहीं ॥२०॥२१॥ गन्धर्व ने कहा-हे भरतश्रेष्ठ! नन्दिनी विश्वामित्र गन्धराम ने कहा-हे अर्जुन ! वसिष्ठ के ये । और उनकी सेनाओं के भय से घबगार वसिष्ठ के वाक्य सुनकर विश्वामित्र सूर्य और चन्द्रमा के समान बहुत पास आ गई और बोली-हे भगवन् ! में विश्वामित्र उजली नन्दिनी गाय को इधर-उधर बांधकर कोड़ों की भयानक सेनाओं के कोड़ों की मार से घायल और टण्डों से मारते हुए हरकर ले चले । नन्दिनी । होकर अनाथ के समान रो रही है । आप मेरी क्यों यां-बां शब्द करती हुई भगवान् ऋपि वसिष्ठ के उपेक्षा कर रहे है । ॥२५॥२६॥ सामने आकर ऊचा मुह करके खड़ी हुई और बहुत गन्धर्व ने कहा व्रतधारी वसिष्ठ जी नन्दिनी को सताए जाने पर भी उस आश्रम से नहीं गई। तब रात और विश्वामित्र के सिपाहियों की भयानक मार वसिष्ठ ने कहा-हे नन्दिनी ! तुम्हारे इस आर्गनाद । साने देखकर भी धर्य से नहीं डिगे। उन्होंने कहा- को मैं सुन रहा है। विश्वामित्र तुम्हें मार-मारकर है नन्दिनी । क्षत्रियों का बल तेज है और ब्राह्मणों निबन कर रहे है, यह गी मै दस रहा है। परन्तु का बल क्षगग। इमसे मै क्षमा को नहीं छोड़ मक्ता। क्या करं, में ब्रह्मण हूं; क्षमा करना ही मेरा स्वभाव यदि तुम चाहो तो जाओ ॥२७॥२८॥ -orrrrrrrrrrrrrrrrr.
म हा भारत [ आदिपर्व PI2300. Zooz0570700/cooz नन्दिन्युवाच-किं नु त्यक्ताऽस्मि भगवन्यदेवं वं प्रभाषसे । अत्यक्ताऽहं त्वया ब्रह्मन्नेतुं शक्या न वै वलात् ॥ २९ ॥ बमिष्ट चवान-न वा त्यजामि कल्याणिस्थीयतां यदि शक्यते । दृढेन दाम्ना वठ्ठप वत्सस्ते ह्रियते वलात् ॥ ३० ॥ गन्धर्व उवाच-स्थीयतामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पंयस्विनी । ऊर्धाञ्चितशिरोग्रीवा प्रवभौ रौद्रदर्शना क्रोधरक्तक्षणा सा गौहम्भारवघनस्वना विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः ॥ ३२ ॥ कशापदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः क्रोधरक्तक्षणा क्रोधं भूय एव समादधे ॥ ३३ ॥ आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्वभौ अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ॥ ३४॥ असृजत्पस्वान्पुच्छात्प्रस्रवाद् द्राविडाञ्छकान् । योनिदेशाच्च यवनाशकृतः शवरान्वहुन् मूत्रतश्चाऽसृजत्कांश्चिच्छवरांश्चैव पार्श्वतः पौण्ड्रान्किरातान्यवनान्सिहलान्वर्वरान्खसान् ॥ ३६ ।। नन्दिनी ने कहा-हे भगवन् ! आप यह क्या रूप को देखकर विश्वामित्र की सेना डर के मारे कह रहे हैं ? आपने क्या मेरा स्नेह छोड़कर मुझे | इधर-उधर भागने लगी ॥३१॥३२॥ त्याग दिया ? आप यदि त्याग न करें तो बलपूर्वक सिपाही उसे बांधकर कोड़ों से मार रहे थे, इसमे कोई भी मुझे नहीं ले जा सकता । वसिष्ठ ने कहा- नन्दिनी और भी क्रोधित हुई । क्रोध के मारे उसका हे नन्दिनी । मै तुमको नहीं त्यागता हु । यदि तुम | शरीर दोपहर के सूर्य के समान देख पड़ने लगा। रह सको तो रह जाओ परन्तु वह देखो, तुम्हारे पछड़े | कुपित नन्दिनी पूँछ से बार-बार बड़े-बड़े अङ्गारों की को कठिन रस्सी से बांधकर सिपाही ले जा रहे है | वृष्टि करने लगी ॥३३॥३४॥ ॥२९॥३०॥ इसके पश्चात् उसकी पूंछ से पहव, थनों से द्राविड़ गन्धर्व ने कहा-वसिष्ठ के ये वचन सुनते ही और शक, योनि से यवन, गोबर तथा मूत्र से शबर नन्दिनी ने आंखे लाल करके बड़ा भयानक रूप धारण | और मुँह के फेने से पौण्ड, किरात, सिंहल, यर्जर, किया । उसकी गर्दन के बाल खड़े हो गये । यह खस, चिबुक, पुलिन्द, चीन, हून, केरल तथा अन्यान्य गर्दन उठाकर बार-बार चिल्लाने लगी। उसके भयानक अनेकानेक म्लेच्छ-जातियां उत्पन्न हुई। विश्वामित्र Mirrories >>r.ornorrho505051 cooo Vo2eo.cok । circrcococoncolorencesco अध्याय १७७ ] महाभारत ८४१ merocreocom चिचुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान्हूणान्सकेरलान् । ससर्ज फेनतः सा गोर्लेच्छान्वहुविधानपि ॥ ३७ ॥ तैर्विसृष्टैमहासैन्यैर्नानाम्लेच्छगणैस्तदा नानावरणसंछन्नै नायुधधरैस्तथा अवाकीर्यत संरब्धैर्विश्वामित्रस्य पश्यतः एकैकश्च तदा योधः पश्चभिः सप्तभिवृतः ॥ ३९ ॥ अस्त्रवण महता वध्यमानं चलं तदा प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः ॥४०॥ न च प्राणैर्वियुज्यन्ते केचित्तत्रास्य सैनिकाः । विश्वामित्रस्य संक्रुद्धैर्वासिष्टभरतर्षभ ॥ ४१ ॥ सा गौस्तत्सकलं सैन्यं कालयामास दूरतः । विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं काल्यमानं त्रियोजनम् ॥ ४२ ॥ कोशमानं भयोद्विग्नं त्रातारं नाऽध्यगच्छत दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं ब्रह्मतेजोभवं तदा ॥४३॥ विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निविपणो वाक्यमब्रवीत् । धिग्वलं क्षत्रियवलं ब्रह्मतेजोवलं बलम् ॥४४॥ वलावलं विनिश्चित्य तप एव पर वलम् स राज्यं स्फीतमुत्स्सृज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम् ॥ ४५ ॥ के देखते ही देखते उन कवच और अस्त्र शस्त्र धारण भी विश्वामित्र के किसी सिपाही की हत्या नहीं की। किये क्रोधित म्लेच्छों ने प्रकट होकर उस स्थान को ! उस नन्दिनी ने इसप्रकार विश्वामित्र की सारी सेना को छा लिया ॥३५:३८॥ दूर भगा दिया । विश्व मित्र के सब सिपाही डर से उनमें से पांच-पांच वा सात-सात ने विश्वामित्र घबराये हुए आर्तनाद करते-करते तीन योजन तक के एक-एक योद्धे को घेर लिया। आगे विश्वामित्र भाग गये ! उन्हें अपनी रक्षा करनेवाला कोई न देख के देखते ही देखते उनकी सेना उन मच्छों की पड़ा । तब विश्वामित्र ने ब्रह्मतेज की उस बड़ी गहरी शात्रवृष्टि से घायल होकर और भय खाकर अश्चर्यलीला को देखकर क्षत्रियधर्म से विरक्त होकर इधर-उधर भागने लगी ॥३९४०॥ यह कहा कि क्षत्रिय के बल को धिकार है। असल है भरतश्रेष्ठ ! वमिष्ठ की सेना ने कुपित होर में ब्राह्मग का बल ही चल है ॥४१॥४४॥ rocorroron ८४२ म हा भारत [ आदिपर्व CYDORODJAVOID DOUROcocororo भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे । स गत्वा तपसा सिद्धि लोकान्धिष्टभ्य तेजसा ॥४६॥ तताप सर्वान्दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् । अपिवञ्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चत्ररथपर्वणि वासिष्ठेविश्वामित्रपराभवे समसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥ बल के बारे में विचार करके यही कहना पड़ता से सिद्धि प्राप्त कर ली। अब वे क्षत्रिय से ब्राह्मण है कि तप का वल सब बों से बढ़कर है । यह | हो गये । उनका प्रचण्ट तेज तीनों. लोकों में व्याप्त निश्चय करके विश्वामित्र ने अपने बड़े मारी.राज्य, | हो गया । वे आने तप के तेज से तीनों लोकों को प्रज्वलित राजलक्ष्मी और भाग के पदाथों को लात तपाने लगे। उन्हें अन्त को इन्द्र के साथ सोम-रस मारकर तपस्या में ही मन लगा दिया। उन्होंने तपस्या | पीने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ॥४५/४७॥ आदिपर्व का एक सौ सतहत्तर अध्याय समाप्त हुआ । Corcocoror अथ अष्टसाप्नत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ।। गन्धर्व व्याच- -कल्मापपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह । इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसाऽसदृशो भुवि ॥ १ ॥ स कदाचिद्वनं राजा मृगयां निर्ययो पुरात् । गान्विध्यन्वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः तस्मिन्बने महाघोरे खगांश्च बहुशोऽहनत् । हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः ॥ ३ ॥ अकामयत्तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान् । स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ॥ एक सौ अठहत्तर अध्याय ॥ १७८ ॥ गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न लगे । उन्होंने वहां बहुत से गैडे भी मारे । देर तक एक कल्माषपाद नाम के बड़े तेजस्वी राजा हो गये परिश्रम करने से थके हुए राजा शिकार खेलना है । एक दिन वह राजा, शिकार खेलने के लिये, छोड़कर वहां से लौटे ॥१३॥ नगर से निकलकर वन में पहुचे और वहां घूम-घूमकर इसके पहले प्रतापी विश्वामित्र ने उनको यजमान मृग, वाराह आदि जङ्गली जानवरों का शिकार करने बनाना चाहा था । युद्ध में अजेय राजा कल्माषपाद । irrrorroroooooz.orrrore 22oirala ८४३ महा भारत अध्याय १७८ ] 2oA तृपार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि अपश्यदजितः संख्ये मुनि प्रतिमुखागतम् ॥ ५ ॥ शक्तिं नाम महाभागं वसिष्टकुलवर्धनम् ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद्विसिष्ठस्य महात्मनः अपगच्छ पथोऽम्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् । तथा ऋषिरुवाचैवं सान्त्वयश्लक्ष्णया गिरा ॥ ७ ॥ मम पन्था महाराज धर्म एप सनातनः । राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः । अपसऽपसर्पति वागुत्तरमकुर्वताम् ऋपिस्तु नाऽपचकाम तस्मिन्धर्मपथे स्थितः । नापि राजा मुनेर्मानात्क्रोधाचाऽथ जगाम ह ॥ १० ॥ अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृर्षि नृपसत्तमः जघान कशया मोहात्तदा राक्षसवन्मुनिम् कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्छितः ॥ १२ ॥ हंसि राक्षसत्रद्यस्माद्राजापसद तापसम् तस्मात्त्वमद्यप्रभृति पुरुपादो भविष्यसि को उस समय भूख और प्यास ने बहुत सता रक्खा का कत्तळ है । यह मेरी राह है, मुझे जाने दीजिए था। ये बहुत ही तग जगली राह से चले जा रहे ॥४८॥ थे। जिधर राजा जा रहे थे उघर से ही महात्मा इसतरह वे दोनों "राह छोड़ दो, राह छोड़ दो" यमिष्ठ के पुत्र शक्ति आ रहे थे। वसिष्ठकुल के कहकर झगड़ा करने लगे । ऋपि धर्म के मार्ग में बढानेवाले महाभाग शक्ति महात्मा वसिष्ठ के सौ स्थित वहा से पीछे नहीं हटे और राजा ने भी मान पुत्रों में से बड़े थे । उनको देखकर राजा ने कहा और क्रोध के वश मुनि को रास्ता नहीं दिया ॥२॥१०॥ कि तुम इधर न आओ, मैं इधर से जा रहा है। अनन्तर ऋषि के राम्ता न छोड़ने पर राजा ने ऋषिपुत्र शक्ति ने मधुर वाणी से समझाकर राजा मोह से राक्षम की भाति उनके कोड़े मारे । कोढ़ा से कहा-हे महाराज ! ब्राह्मणी को राम्ता दना राजा लगते ही क्रोधान्ध होकर शक्ति राजा को शाप c5c 2ni rohiniprrorrrororarror ८४४ म हा भारत [ आदिपर्व aormirmo5050. 200010010050soovco0 oorconomoronoroxercrazarovarovo. मनुष्यापाशते सक्तश्चरिप्यसि महीमिमाम् । गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ॥ १४ ॥ ततो याज्यनिमित्तं तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः । वेरमासीत्तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत तयोविवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १६ ॥ ततः स बुबुधे पश्चात्तमृषि नृपसत्तमः ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठामिव तेजसा ॥ १७ ॥ अन्तर्धाय ततोत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत । तावुभावतिचक्राम चिकीर्पन्नात्मनः प्रियम् ॥ १८ ॥ स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः । जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम । विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिदेश नृपं प्रति ॥ २०॥ शापात्तस्य तु विप्रविश्वामित्रस्य चाऽऽज्ञया । राक्षसः किंकरो नाम विवेश नृपति तदा २१॥ रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः । विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत्तस्माद्देशादरिन्दम ॥ २२॥ दिया-हे नीच राजा ! तूने राक्षस की तरह मुझे | करते देखकर उनके समीप पहुच गये थे ॥१५॥१६॥ कोड़ा मारा है इसलिये आज से तू राक्षस होगा। परन्तु पाम पहुचने पर उन्होंने शक्ति को पहचाना तू मनुष्य मास खाता हुआ पृथ्वी पर घूमेगा । ले जा, कि ये पिता के समान तेजस्वी वसिष्ठ के पुत्र मै राह छोड़े देता हू । वीर्य शक्ति-गाली शक्ति ने तब अपना प्रिय प्रयोजन सिद्ध करने के लिये वे राजा को इसतरह का घोर शाप दिया ॥११॥१४॥ दोनों से छिपकर आड़ में हो गये ॥१७॥१८॥ राजा कल्माषपाद को अपना यजमान बनाने के शक्ति का शाप सुनार राजा कल्माषगद बहुन लिये अब से पहले विश्वामित्र ओर वमिष्ठ की परस्पर भयभीत हुए और शक्ति की शरण में जाकर उ हें शत्रुता हो चुकी थी । हे अर्जुन ! उग्रतपस्वी प्रतापी मनाने लगे। हे कुरुश्रेष्ठ ! तब उन राजा के भाव विश्वामित्र इस समय शक्ति के साथ राजा को झगड़ा | को समझकर विश्वामित्र ने एक राक्षस को उनके है Hovojra 000000000 omcorosporn - अध्याय १७८ ] म हा भारत boorce ततः स नृपतिस्तेन रक्षसाऽन्तर्गतेन च । वलवत्पीडितः पार्थ नाऽन्वबुध्यत किंचन ॥ २३ ॥ ददर्शाऽथ द्विजः कश्चिद्राजानं प्रस्थितं वनम् । अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा २४ ॥ तमुवाचाऽथ राजपिजिं मित्रसहं तदा आस्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्त प्रतिपालयन् ॥ २५॥ निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् । इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थो स द्विजसत्तमः ॥ २६ ॥ तनो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम् । निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः ॥ २७॥ ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् । उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम् ॥ २८ ॥ गच्छामुग्मिन्वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते । अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसनापपादय गन्धर्ष उचाग-एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्याऽऽमिपं क्वचित् । निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ॥ ३० ॥ शरीर में घुमने की आज्ञा दी ॥१९॥२०॥ राना कल्माषपाद ने उससे कहा हे ब्रह्मन् ! आप किङ्कर नामक राक्षस, शक्ति के शाप और विश्वामित्र थोड़ी देर यहा ठहरिए। मै लौटकर आपको आपकी की आज्ञा से, राजा के शरीर में घुस गया। हे इच्छा के अनुसार भोजन दूगा । अब राजा वहा से शत्रुदमन ! राक्षम जब राजा के शरीर में प्रवेश कर चल दिये और वह ब्राह्मण वहीं बेठकर उनके लौटने चुका तब इष्टसिद्धि हो जाने पर विश्गमित्र वहा से की राह देखने लगा ॥२५।२६॥ चल दिये ॥२१॥२२॥ हे अर्जुन महानुभावराजा अपनी इच्छा के अनुसार हे अर्जुन ! शरीर में राक्षम के प्रवेश करने पर जी भर घूमकर अपने घर गये और भोजन आदि राजा की मति पलट गई । वे ऐसे भ्रान्त हो गये करके रनिवास म सो रहे । आधी रात के समय राजा कि कर्तव्य अक्तव्य का कुछ भी निश्चय न कर को याद आई कि मै भोजन देने के लिये कहकर सके । वे वहा से वन की ओर चल पड़े । वन में उस ब्राह्मण को वन में बिठा आया है । उसी समय जाते समय एक भूखा ब्राह्मण उन्हें मिल । उसने उठकर रसोइये को बुलाकर उन्हाने आज्ञा दी कि उनसे साने के लिये मास ओर अन्न मागा॥२३॥२४॥ तुम शीघ्र उस वन मे जाओ । एक ब्राह्मण बेठा 1 roriesosironiri ८४६ महा भारत [ आदिपर्व 50MANOJOOJoJO770coloJo3050ror Cororor Jouryu राजा तु रक्षसाऽऽविष्टः सूदमाह गतव्यथः । अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः नथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् । गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ॥ ३२ ॥ स तरसंस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै तस्मै प्रादाब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने ॥ ३३ ॥ स सिद्धचक्षुपा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः । अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३४ ॥ ब्राह्मण उवाच -यस्मादभोज्यमन्नं में ददाति स नृपाधमः । तस्मात्तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ॥ ३५ ॥ सक्तो मानुपमासेषु यथोक्तः शक्तिना तथा । उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम् ॥ ३६ ॥ द्विग्नुव्याहृतो राज्ञः स शापो वलवानभूत् । रक्षोवलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाऽभवन्नृपः ॥ ३७॥ ततः स नृपतिश्रेष्ठो रक्षसाऽपहृतेन्द्रियः। उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत ॥ ३८ ॥ हुआ मेरी राह देख रहा हागा । उसे खाने के लिये ) पहुचा । वहा जाकर उमने अन्न ओर वह खाने के तुम अन्न और मास दे आओ ॥२७२९॥ अयोग्य नर मास तपस्नी को दे दिया ॥३०॥३३॥ गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! राजा की आज्ञा उम माम को देखकर तपस्वी ब्राह्मण अपने पाकर रसोइया मास की खोज करने लगा। उस दिव्य ज्ञान के द्वारा जान गये कि यह मनुष्य का समय कहीं मास न मिलने से चिन्तित रसोइये ने मास है । क्रोध के मारे ऋषि की आखें लाल हो राजा से आकर सब हाल कहा । राजा के शरीर में | गई। उन्होंने कहा यह अन्न और मास में नहीं तो राक्षस घुसा हुआ था। उन्होंने कुछ भी सोच खा सकता। उस नीच राजा ने मुझे खाने के अयोग्य विचार न करके रसोइये से बारम्बार कहा-तुम आहार भेजा है इसलिये वहीं, शक्ति के शाप के मनुष्य का मास राकर उस ब्राह्मण को खिलाओ। अनुसार, मनुष्य मास भक्ष्ण करता हुआ पृथ्वी पर लाचार होकर 'बहुत अच्छा' कहकर वह रसोइया | विचरेगा । उसे देखते ही लोग डरकर भागने लगेंगे जलादों के यहा गया, वहा से देखटके मनुष्य का ॥३४॥३६॥ मास लाकर, पकाकर, उस भूखे ब्राह्मण के पाम शक्ति का शाप इस प्रकार दोहराया जाकर और Karohorrororor. - accorere mor-viomorrhowroomri- ८४७ cococon अध्याय १७८ ] महा मारत onomorrocomotoreconomoooo यस्मादसदृशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया । तस्मात्ततः प्रवर्तिप्ये खादितुं पुरुपानहम् ॥ ३९॥ एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयुज्य च शक्तिं तं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम् ॥ ४० ॥ शक्तिं तं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनः पुनः । वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद्रक्षः संदिदेश ह ॥४१॥ स ताशक्त्यवरान्पुत्रान्वसिष्टस्य महात्मनः । भक्षपामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ४२ ॥ वसिष्टो घातिताश्रुत्वा विश्वामित्रेण तान्सुनान् । धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम् ॥ ४३ ।। चक्रे चाऽऽत्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तमः । नवेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः ॥ ४४ ॥ स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवाऽपतत् . ॥ ४५ ॥ न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव तदाऽग्निमिन्द्वं भगवान्संविवेश महावने भी प्रबल हो उठा । राजा शरीर में घुमे हुए राक्षस पशुओं को मारकर खा जाता है वैसे ही वह राक्षस, कंबल से अचेत हो गये। वे वन में विचरने लगे। विश्वामित्र की आज्ञा से, शक्ति के छोटे भाइयों को थोड़े ही समय में एक दिन वन में फिर उनकी भेंट मार-मारकर खाने लगा ॥४११४२॥ शक्ति से हो गई । उनको देखकर राजा ने कहा-- विश्वामित्र की प्रेरणा से अपने पुत्रों के मरने का तुमने मुझे अनुचित शाप दिया है, इस कारण पहले हाल जानकर भी वसिष्ठ जी ने अपने क्रोध और. तुम्हीं को खाकर मनुष्य-मास खाने का आरम्भ शोक के वेग को वैसे ही रोक रखा जैसे बड़े-बड़े करता हू । बस, बाघ जसे अपने शिकार पर टूटता पहाड पृथ्वी को धारण किये हुए है । मुनिश्रेष्ठ है वैसे ही झपटकर, राजा ने शक्ति को पकड़ लिया । वसिष्ठ ने शोक के मारे आत्महत्या करने का विचार वे उन्हें मारकर खा गये ॥३७॥४०॥ किया, परन्तु क्रोध करके कुशिकवंश के नाश का विश्वामित्र वसिष्ठ पुत्र शक्ति को मरते देखकर इरादा नहीं किया ॥४३१४४॥ ६ बार-बार राक्षस को यसिष्ठ के ही पुत्रों को खाने की ऋषि वसिष्ठ मुमेरु के शिखर पर मे नीचे कृद आज्ञा देने लगे । क्रोध करके सिंह जैसे छोटे-छोटे पड़े, परन्तु उनके तनिक भी चाट नहीं लगी। उनका । मै prror- 3.5mm rom ८४८ महाभारत [ आदिपर्व ooozoolod तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशनः दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत्ततः ॥४७॥ स समुद्रमभिप्रेक्ष्य शोकाविष्टो महामुनिः । बवा कण्ठे शिलां गुर्वी निपपात तदाऽम्भसि । स समुद्रोमिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः ॥ १८ ॥ न ममार यदा विप्रः कथंचित्पेशितव्रतः जगाम स ततः खिन्नः पुनरेवाऽऽश्रमं प्रति ॥ ४९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठपसिष्ठशोके अष्टमातत्यधिकशततमोऽध्याय ॥१५८१ पत्थरों के देर पर गिरना मानों रुई पर गिरने के सदृश तब गोक से व्याकुल मुनि गले में बड़ा भारी पत्थर हुआ। हे अर्जुन ! तब वे जङ्गल में लगी हुई बांधकर समुद्र के जल में कूद पड़े परन्तु फिर भी भयानक आग के भीतर घुम पडे । परन्तु उस जलती डूने नहीं । लहरों ने उन्हें किनारे पहुंचा दिया । हुई आग ने वेग से जलने पर भी उनको नहीं जलाया। तव किसी प्रकार अपनी मृत्यु न होने पर वह दुखी हे शत्रुनाशी । उनको वह आग ठण्डी जान पड़ी। चित्त मे आश्रम को रौट गये ॥४५॥४९॥ आदिपर्व का एक सो अठहत्तर अध्याय समाप्त हुआ। ! -o- अथ नवसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥ गन्धर्व उवाच-ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं रहितं तैः सुतैमुनिः । निर्जगाम सुदुःखार्तः पुनरप्याश्रमात्ततः सोऽपश्यत्सरितं पूर्णा प्रादृट्काले नवाम्भसा । वृक्षान्बहुविधान्पार्थ हरन्ती तीरजान्वहून् अथ चिन्तां समापेदे पुनः कौरवनन्दन । अम्भस्यस्यां निमजेयमिति दुःखसमन्वितः ॥ ३ ॥ एक सौ उनासी अध्याय ॥ १७९ ।। गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन | आश्रम को पुत्रों से भरी हुई एक नदी, प्रवाह के वेग से, किनारे से खाली देखकर दुखित वसिष्ठ ऋषि फिर वहां के नाना प्रकार के वृक्षा को उखाड़कर गिराती हुई से चल दिये । हे कौरवनन्दन अर्जुन ! आश्रम से बह रही है । दुखित ऋषि ने फिर उमके जल में बाहर आकर उन्होंने देखा कि वर्षाकाल के जल डूक्कर आत्महत्या करने का विचार किया॥१३॥ voicors0350mm F00 ८४९ महा भारत अध्याय १७२ ] poorosco cococoroo accoc. ततः पाशैस्तदाऽऽत्मानं गाढं बवा महामुनिः । तस्या जलें महानद्या निममज्ज सुदुःखितः ॥ ४ ॥ अथ च्छित्वा नदी पाशांस्तस्याऽरिवलसूदन । स्थलस्थं तमृपिं कृत्वा विपाशं समवास्मृजत् ॥ ५ ॥ उत्तनार ततः पाशैविमुक्तः स महानृषिः विपाशेति च नामाऽस्या नद्याश्चके महानृपिः ॥ ६ ॥ शोके बुद्धिं तदा चक्रे न चैकत्र व्यतिष्ठतः । सोऽगच्छत्पर्वतांश्चैव सरितश्च सरोसि च दृष्ट्वा स पुनरेवपिनदी हैमवती तदा चण्डग्राहवती भीमा तस्याः स्रोतस्यपातयत् ॥ सा तमग्निसमं विप्रमनुचिन्त्य सरिद्वरा शतधा विद्रुता यस्माच्छतदुरिति विश्रुता विश्रुता ॥ ९ ॥ ततः स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राऽप्यात्मानमात्मना । मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाऽऽश्रमं ययौ ॥ १० ॥ स गत्वा विविधाशैलान्देशान्वहुविधांस्तथा । अदृश्यन्त्याख्यया वध्वाऽथाऽऽश्रमेऽनुस्मृतोऽभवत् ॥ ११ ॥ अथ शुश्राव संगत्या वेदाध्ययननिस्वनम् । पृष्ठतः परिपूर्णार्थं पभिरहेरलंकृतम् ॥ १२ ॥ तब वे गम्सियों से अपने हाथ-पैर बाधकर उस मवरी से भयङ्कर हैमवती नदी में कूद पड़े ॥७॥ नदी में कूद पड़े। हे शत्रुदमन ! नदी ने अपने वेग मुनि को अग्नि के समान तेजम्बी देखकर वह से मुनि के बन्धन को तोड़कर उन्हें किनारे पर फेंक । नदी सैंकड़ों घागओं से इधर-उधर मानों भाग चली। दिया। वन्धन से छूटे हुए मुनि उठ खड़े हुए। उन्होंने . इसी कारण तब से उसका नाम शद्ध पड़ा। उस वार उस नदी का नाम विपाशा स्वखा ॥४.६॥ भी अपने को किनारे पर देखकर मुनि ने सोचा कि अनन्तर वह शोक से विकल होकर एक स्थान | मेरा मरना असम्भन देख पड़ता है । इससे वे फिर पर रह नहीं सके, पर्वत, नदी और तालों में घूमते आश्रम को लौट गये ॥९॥१०॥ फिरने लगे। इसतरह घूमते-घूमते महर्षि वसिष्ठ एक अनेक पर्वतों और देशो को लापकर वे अपने दिन फिर भयानक ग्राह आदि जल जन्तुओं से पूर्ण, आश्रम की ओर जा रहे थे कि आश्रम के पास - ८५० महा भारत [ आदिपर्व, ते । अनुव्रजति को न्वेप मामित्येवाऽथ सोऽब्रवीत् । अहमित्यदृश्यन्तीम सा स्नुपा प्रत्यभाषत शक्तेर्भार्यामहाभाग तपोयुक्ता तपस्विनी वसिष्ठ उपाच--पुत्रि कस्यैप साङ्गस्य वेदस्याऽध्ययनस्वनः पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मया श्रुतः ॥ १४ ॥ अदृश्यन्त्युवाच-अयं कुक्षौ समुत्पन्न: शक्तेगर्भः सुतस्य समा- द्वादश तस्येह वेदानभ्यस्यतो मुने गन्धर्व उबान-एवमुक्तस्तया हृष्टो वसिष्ठः श्रेष्टभागृपिः अस्ति संतानमित्युक्त्वा मृत्योः पार्थ न्यवर्तत ॥ १६ ॥ ततः प्रतिनिवृत्तः स तया वध्वा संहाऽनघ । कल्मापपादमासीनं ददर्श विजने वने ॥ १७॥ स तु दृष्ट्वैव तं राजा कुद्ध उत्थाय भारत । आविष्टो रक्षसोग्रेण इयेपाऽत्तुं तदा मुनिम् ॥ १८ ॥ अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः । भयसंविग्नया वाचा वसिष्ठमिदमब्रवीत् अदृश्यन्ती नाम की शक्ति की स्त्री उनकी पुत्रवधु गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन | भाग्यवान् ऋषिश्रेष्ठ उनके पीछे हो ली। ऋपि पास ही थे। उन्हें अपने वसिष्ठ अदृश्यन्ती की उस बात को सुनकर बहुत पीछे छ. अङ्गों से अर ड्कृत स्पष्ट वेदमन्त्रों का पाठ प्रसन्न हुए । 'मेरे वंश को चलानेवाला है। यह सुन पड़ा । तब उन्होंने पूछा- मरे पीछे कौन आ कहकर उन्होंने आत्महत्या करने का विचार छोड़ रहा है ? अदृश्यन्ती ने कहा-हे भगवन् ! मै शक्ति दिया । हे अनघ ! अब मुनि अपनी बहू के साथ की तपोयुक्त तपस्विनी स्त्री अदृश्यन्ती, आपकी | आश्रम में जाने के लिये आग बड़े । आगे बढ़ने पर पुत्रवधु हूं ॥१॥१३॥ उन्हें निर्जन वन में बैठे हुए गक्षसयुक्त राजा वसिष्ठ ने कहा-हे पुत्री। पहले शक्ति के मुँह से कल्माषपाद देख पड़े ॥१६॥१७॥ मै जैसे पेदपाठ सुनता था वैसे ही स्वर से यह कौन हे भारत ! उस कठोर राक्षसयुक्त राजा क्रमापपाद साग वेदमन्त्रों का उच्चारण कर रहा है ? अदृश्यन्ती | ने मुनि को देखकर उसीक्षण मोध से उठकर खा ने कहा-हे मुनिवर ! आपके पुत्र शक्ति के वीर्य से जाना चाहा। अदृश्यन्ती ने सामने निष्ठुर राक्षम रूप उत्पन्न बालक ही ये मन्त्र पढ़ रहा है। उसे मैने बारह राजा को देखकर डर से व्याकुल होकर वसिष्ठ से वर्ष से गर्भ में ही धारण कर रक्खा है ॥१४|१५|| कहा-हे भगवन् ! देखिये यमराज की तरह भयानक ororocornocom vcyrror Com Aurorrore -50000corc500 गन्धर्व उवाच- अध्याय १७९ ] महा भारत ८५१ wcomracicored असौ मृत्युरियोग्रेण दण्डेन भगवन्नितः प्रगृहीतेन काप्टेन राक्षसोऽभ्येति दारुणः तं निवारयितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन । त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ॥ २१॥ पाहि मां भगवन्पापादम्माद्दारुणदर्शनात् राक्षसोऽयमिहाऽत्तुं वै नूनमावां समीहते ॥ २२ ॥ वमिष्ठ उवाच-ग भैः पुत्रि न भेतव्यं राक्षसात्तु कथंचन । नैतद्रक्षो भयं यस्मात्पश्यसि त्वमुपस्थितम् ॥ २३ ॥ गजा कल्माषपादोऽयं वीर्यवान्प्रथितो भुवि । स एपोऽस्मिन्वनोद्देशे निवसत्यतिभीपणः ॥ २४॥ च-तमापतन्तं संप्रेक्ष्य वसिष्ठो भगवानृषिः वारयामास तेजस्वी इंकारेणैव भारत ॥ २५॥ मन्त्रपूतेन च पुनः स तमभ्युक्ष्य वारिणा । मोक्षयामास वै शापात्तस्माद्योगान्नराधिपम् ॥ २६ ॥ स हि द्वादश वर्षाणि वसिष्ठस्यैव तेजसा । ग्रस्त आसीद् ग्रहेणेव पर्वकाले दिवाकरः ॥ २७ ॥ रक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद्वनं महत् । तेजसा रञ्जयामास सन्ध्याभ्रमिव भास्करः ॥ २८ ॥ यह राक्षस डण्डा ताने हुए हमारी ही ओर चरा राजा कल्माषपाद शाप-वश ऐसा भयानक रूप धारण आ रहा है । हे महाभाग, हे श्रेष्ठवेदज्ञ ! आपके / किये इस निर्जन वन में रहते हैं ॥२३॥२४॥ सिरा इसे हटानेवाला इस पृथ्वी पर कोई नहीं है। गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! तेजस्वी भगवान् इस घोररूप राक्षस से आप मेरी रक्षा कीजिए । मुझे ऋषि वसिष्ठ ने उनको आ गिरते देख कर बड़े ऊँचे जान पडता है कि यह पापी हम दोनों की हत्या स्वर से रोका । आगे मन्त्र से पवित्र दिये हुए जल करने की ताक में है ॥१८॥२२॥ से उनको नहलाकर उस घोर शाप से मुक्त किया वसिष्ठ ने कहा-हे पुत्री ? तुम इस राक्षस से ॥२५॥२६॥ बिलकुल न डरो । जिसे देखकर तुम डर रही हो वह राजा बारह वर्ष तक वसिष्ठ पुत्र शक्ति के वह राक्षस नहीं है । ये तीनों रोकों में प्रसिद्ध पराक्रमी । तेज से इस प्रकार ग्रसित थे कि जिस प्रकार सूर्य - orororarrorry rrrummyramin cok Foonacococioooornarra ८५२ महा भारत [ आदिपर्व ~ प्रतिलभ्य ततः संज्ञामभिवाद्य कृताञ्जलिः उवाच नृपतिः काले वसिष्टमृषिसत्तमम् ॥ २९ ॥ सौदासोऽहं महाभाग याज्यस्ते मुनिसत्तम । अस्मिन्काले यदिष्टं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३०॥ वसिष्ठ उवाच-वृत्तमेतद्यथाकालं गच्छ राज्यं प्रशाधि वै ब्राह्मणं तु मनुप्येन्द्र माऽवमंस्थाः कदाचन ॥ ३१ ॥ राजोवाच-नाऽवमस्ये महाभाग कदाचिद्राह्मणपभान् । वन्निदेशे स्थितः सम्यक्पूजीयप्याम्यहं द्विजान् ॥ ३२ ॥ इक्ष्वाकूर्णा च येनाऽहमनृणः स्यां द्विजोत्तम ।। तत्त्वत्तः प्राप्तुमिच्छामि सर्ववेदविदांवर अपत्यमीप्सितं मह्यं दातुमर्हसि सत्तम शीलरूपगुणोपेतमिक्ष्वाकुकुलवृद्धये ॥ ३४॥ गन्धर्व वाय-ददानीत्येव तं तत्र राजानं प्रत्युवाच ह वसिष्ठः परमेष्वासं सत्यसंधो द्विजोतमः ततः प्रतिययौ काले वसिष्ठः सह तेन वै ख्यातां पुरीमिमां लोकेप्वयोध्यां मनुजेश्वर ॥ ३६ ॥ राहु से ग्रसित होता है । अब शाप से मुक्त होकर करो । मैं तुमको यही आज्ञा देता हूं कि अब कभी ऐसे तेज से उस बड़े वन को सुशोभित किया कि ब्राह्मण का अनादर न करना । राजा बोले-हे ब्रह्मन् । जैसे सूर्यदेव सन्ध्या-काल के बादल को रंग देते हैं मै अव भूल कर भी ब्राह्मणों का अपमान न करूंगा। ॥२७.२८॥ | आपकी आज्ञा अनुमार सदा ब्राह्मणों की पूजा तब राजा ज्ञान प्राप्त कर प्रणामपूर्वक दोनों हाथ और सत्कार करता रहूंगा ॥३१॥३२॥ जोड़कर ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ से बोले-हे महाभाग ! मै है द्विजश्रेष्ठ ! आप कृपा करके इक्ष्वाकुवंश की सुदास राजा का पुत्र आपका यजमान हूं। हे मुनिश्रेष्ठ! | वृद्धि के लिये मुझे एक, मेरी इच्छा के अनुरूर, कहो अब आपकी क्या इच्छा है मैं उमको पूरी कर रूम-गुण-शोलवाला पुत्र दीजिए । इक्ष्वाकुवंश के ६ देता हूं ॥२९॥३०॥ | पितरों का ऋण चुकाने के लिये मैं आपसे यह वसिष्ठ बोले-हे नरश्रेष्ठ ! मेरी जो इच्छा थी, प्रार्थना करता हूं ॥३३॥३४॥ वह काल के क्रम से पूरी हो गयी है । अब तुम | गन्धर्वराज चोले-हे अर्जुन ! सत्यवादी वसिष्ठ अपने नगर को जाओ और अपने राज्य का पालन ऋषि ने राजा को पुत्र देना स्वीकार कर लिया । - । 0mror>rono ८५३ oocolor Horooooooo ocococokok.cocococorpro । अध्याय १७९ ] म हा भारत na तं प्रजाः प्रतिमोदन्त्यः सर्वाः प्रत्युद्गतास्तदा । विपाप्मानं महात्मानं दिवौकस इवेश्वरम् ॥३७॥ सुचिराय मनुष्येन्द्रो नगरीं पुण्यलक्षणाम् । विवेश सहितस्तेन वसिष्ठेन महार्पिणा ददृशुस्तं महीपालमयोध्यावासिनो जनाः पुरोहितेन सहितं दिवाकरमिवोदितम् स च तां पूरयामास लक्ष्म्या लक्ष्मीवतां वरः । अयोध्यां व्योम शीतांशुः शरत्काल इवोदितः ॥ ४० ॥ संसिक्तमृष्टपन्थानं पताकाध्वजशोभितम् मनः प्रह्लादयामास तस्य तत्पुरमुत्तमम् ॥४१॥ तुष्टपुष्टजनाकीर्णा स पुरी कुरुनन्दन अशोभत तदा तेन शक्रेणेवाऽमरावती ॥ ४३ ॥ ततः प्रविष्टे राजर्षो तस्मिंस्तत्पुरमुत्तमम् । राज्ञस्तस्याऽऽज्ञया देवी वसिष्ठमुपचक्रमे ॥ ४३ ॥ महर्षिः संविदं कृत्वा संबभूव तया सह । देव्या दिव्येन विधिना वसिष्ठः श्रेष्ठभागृपिः ॥ ४४ ॥ इसके उपरान्त, उसी प्रतिज्ञा के अनुसार, महर्षि सौम्य शोभायुक्त राजा कल्माषपाद ने अयोध्या वसिष्ठ राजा के साथ जगत्पसिद्ध अयोध्या नगरी नगरी को राजलक्ष्मी से फिर सुशोभित कर दिया ॥३९॥४०॥ देवगण जैसे इन्द्र के दर्शन के लिये चलें वैसे उस उत्तम नगरी में ध्वजा और पताकाएँ खड़ी ही सब नगर-निवासी शापमुक्त राजा कल्माषपाद की गई थीं। साफ़ सुथरी सड़कों पर छिड़काव को देखने के लिये प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर किया गया था। इससे वह दर्शकों के चित्त को से चले । नरश्रेष्ठ राजा बहुन वर्षों के बाद, फिर प्रसन्न करने लगी । हे कुरुनन्दन ! तब हृष्ट-पुष्ट महर्षि वसिष्ठ के साथ, पुण्य लक्ष्णों वाली राजधानी लोगों से पूर्ण वह नगरी राजा कल्माषपद से इस के भीतर गये ॥३७॥३८॥ प्रकार शोभा पाने लगी कि जिस प्रकार अमरावती अयोध्या-वासियों ने देखा कि पुरोहित-सहित अमरनाथ से सुशोभित होती है ॥४१॥४२॥ राजा, तेजस्वी सूर्य समान, प्रकाशमान हो रहे इसके पीछे राजा की रानी गजा की आज्ञा से हैं । शरद ऋतु में उदय हुए चन्द्रमा के समान वमिष्ठ जी के पास गई । वसिष्ठ जी ने उसके साथ । को गये ॥३५॥३६॥ orrohoron zrrr-rs-rrr- - ८५४ महा भारत [ आदिपर्व orrorerooooooooconomorooroorkoreacocon ततस्तस्यां समुत्पन्ने गर्भे स मुनिसत्तमः । राज्ञाऽभिवादितस्तेन जगाम मुनिराश्रमम् ॥ ४५ ॥ दीर्घकालेन सा गर्भ सुषुवे न तु तं यदा । तदा देव्यश्मना कुक्षि निर्विभेद यशस्विनी ॥ १६ ॥ ततोऽपि द्वादशे वर्षे स जज्ञे पुरुषर्षभः अश्मको नाम राजर्षिः पौदन्यं यो न्यवेशयत् ॥ ४७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिप्ठे मौदाससुतोत्सत्तौवूनाशत्यधिकशततमोऽध्यायः १७६ विधि के अनुसार संग किया और जब उसके गर्भ | अर्थात् पत्थर की चोट से कोख को फाड़ डाला। रह गया तब वहां से वमिष्ठ जी राजा से आदरपूर्वक | इसलिये बारह वर्ष तक गर्भ में स्थित उन पुरुपश्रेष्ठ विदा होकर अपने आश्रम को गये। इधर बहुत | ने अश्मक नामक राजर्षि होकर जन्म लिया । समय बीत जाने पर भी रानी के गर्भ से पुत्र नहीं | राजर्षि अश्मक ने पौदन्य नाम का नगर बसाया उत्पन्न हुआ । तब यशस्विनी राजरानी ने अक्षम था ॥४३॥४७॥ आदिपर्व का एक सौ उन्नासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ आशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ।। गन्धर्व उवाच-आश्रमस्था ततः पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत । शक्तेः कुलकरं राजन्द्वितीयमिव शक्तिनम् ॥ १ ॥ जातकर्मादिकांस्तस्य क्रियाः स मुनिसत्तमः । पौत्रस्य भरतश्रेष्ठ चकार भगवान्स्वयम् परासुः स यतस्तेन वसिष्ठः स्थापितो मुनिः । गर्भस्थन ततो लोके पराशर इति स्मृतः ॥ ३ ॥ अमन्यत स धर्मात्मा वसिष्ठं पितरं मुनिम् । जन्मप्रभृति तस्मिस्तु पितरीवाऽन्ववर्तत एक सौ अस्सी अध्याय ॥ १८॥ गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! अब आश्रम में वह बालक जब गर्भ में था तभी वमिष्ठ ने पुत्र- रहनेवाली अदृश्यन्ती ने शक्ति के ही समान तेजस्वी | शोक से आत्महत्या करनी चाही थी। किन्तु उस और शक्ति के वंश को चलानेवाला एक पुत्र उत्पन्न बालक को गर्भ में स्थित जानकर उन्होंने अपना किया। हे भरतश्रेष्ठ ! भगवान् वसिष्ठ ने स्वयं उस वह विचार छोड़ दिया। इसी कारण वसिष्ठ ने उस पोते के जातकर्म आदि संस्कार किये ॥१२॥ बालक का नाम पराशर (पराशु मरने के लिये coholesonoraroo pr.com.ins 00scoconoor0000coco Scoroscop . अध्याय १८० ] महा भारत rareroora स तात इति विप्रर्पि वसिष्टं प्रत्यभाषत । मातुः समक्षं कौन्तेय अदृश्यन्त्याः परंतप ॥ ५ ॥ तातेति परिपूर्णार्थं तस्य तन्मधुरं वचः अदृश्यन्त्यश्रुपूर्णाक्षी शृण्वती तमुवाच ह ॥ ६ ॥ मा तात तात तातेति बह्येनं पितरं पितुः रक्षसा भक्षितस्तात तव तातो वनान्तरे ॥ ७ ॥ मन्यसे यं तु तातेति नैप तातस्तवाऽनघ आर्य एप पिता तस्य पितुस्तव यशस्विनः ॥ ८ ॥ स एवमुक्तो दुःखार्तः सत्यवापिसत्तमः सर्वलोकविनाशाय मतिं चक्रे महामनाः ॥ ९ ॥ तं तथा निश्चितात्मानं स महात्मा महातपाः । ऋपिब्रह्मविदां श्रेष्ठो मैत्रावरुणिरन्त्यधीः वसिष्ठो वारयामास हेतुना येन तच्छृणु ॥ १० ॥ गमिष्ठ उवाच-कृतवीर्य इति ख्यातो वभूव पृथिवीपतिः याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभः ॥ ११ ॥ तैय्यार को। आशासन-=ढाढस बँधानेवाला) रक्खा। पिता रितामह है ॥८॥ धर्मात्मा पराशर जन्म से मुनि वसिष्ठ को पिता सत्यवादी, मापश्रेष्ठ, महायशस्वी पराशर यह जानकर उनपर पिता के सदृश व्यवहार क्यिा सुनकर बहुत ही दुखित और क्रोधित हुए। वे करते थे । हे शत्रु-मथन कुन्तीनन्दन ! एक दिन , उसी समय सब लोकों का नाश करने को तैय्यार उन्होंने माता अदृश्यन्ती के सामने विप्रर्षि वसिष्ठ । हुए। यह देखकर, महातपम्बी, श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी, को पिता करके पुकारा । अदृश्यन्ती उनको मीठी | बुद्धिमान् वसिष्ठ ने पराशर को ऐसा करने से रोक- चोली में स्पष्टरूप से पिता कहते सुन करके आखों कर शान्त कर दिया। जिस कारण उन्होंने पराशर में आसू भरकर बोली ॥३६॥ को शात किया सो मैं तुमसे कहता हू, सुनो । हे बेटा ! ये तो तुम्हारे पिता के पिता दादा ॥९॥१०॥ हैं, इसलिये तुम इन्हें पिता मत कहा करो। हे पुत्र ! वसिष्ठ ने पराशर से कहा-पृथ्वी पर कृतवीर्य तुम्हारे पिता को तो वन में एक राक्षस ने खा नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। वे वेदज्ञ भृगुवंशी लिया है । हे अनघ ! जिनको तुम पिता समझते। महर्पियों के यजमान थे। उन्होंने यज्ञ के अन्त हो वे तुम्हारे पिता नहीं, तुम्हारे यशस्वी पिता के | होने पर उग्र स्वभाव के ब्राह्मणों को बहुत सा धन । । Dorc000070 । monorrorocococococorocorn [ आदिपर्व । 00/cocococco sooooooorescooar00 . ८५६ म हा भारत -roomrooreoroormireoncocoronaacrore स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च । सोमान्ते तर्पयामास विपुलेन विशाम्पते ॥ १२ ॥ तस्मिन्नृपतिशार्दूले स्वर्यातेऽथ कथंचन वभूव तत्कुलेयानां द्रव्यकार्यमुपस्थितम् ॥ १३ ॥ भृगूणां तु धनं ज्ञात्वा राजानः सर्व एव ते । याचिष्णवोऽभिजग्मुस्तांस्ततो भार्गवसत्तमान् ॥ १४ ॥ भूमौ तु निदधुः केचिद्भगवो धनमक्षयम् ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम् ॥ १५ ॥ भृगवस्तु ददुः केचित्तेपां वित्तं यथेप्सितम् । क्षत्रियाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात् ॥ १६ ॥ ततो महीतलं तात क्षत्रियेण यदृच्छया खनताऽधिगतं वित्तं केनचिट्टगुवेश्मनि ॥ १७॥ तद्वित्तं ददृशुः सर्वे समेताः क्षत्रियर्षभाः । अवमन्य ततः क्रोधामृगूस्ताशरणागतान् निजघ्नुः परमेष्वासाः सर्वांस्तान्निशितैः शरैः । आगर्भादवकृन्तन्तश्चेरुः सर्वां वसुंधराम् ॥ १९ ॥ और रत्न देकर सन्तुष्ट किया था ॥११।१२।। खोज में पृथ्वी खोदने लगे । खोदते-खोदते एक इसके पश्चात् उस राजा कृतवीर्य के स्वर्ग को क्षत्रिय को एक ब्राह्मण के यहा पृथ्वी के नीचे धन सिधारने पर उनके वश के राजाओं को धन की | देख पड़ा । सब क्षत्रियों ने वहा पर एकत्र होकर आवश्यक्ता हुई । तब वे राजा यह जानकर कि उस धन को देखा । ब्राह्मणों ने झूठ कहकर, कि भार्गवों के पास बहुत धन है याचक की भाति । हमारे पास धन नहीं है, हमको धोसा दिया-यह उनके पास गये ॥१३॥१४॥ सोचार कुपित कृतवीर्यवश के क्षत्रिय शरणागत भृगुवशियों में से किसी-किसी ने धन को, बचाने भृगुवशियों का अपमान करने लगे। वे तीक्ष्ण वाणों के लिये, पृथ्वी के नीचे गाढ़ दिया और किसी से मारकर सभी भृगुशियों को यमराज के यहा किसी ने क्षत्रियों के डर से अपना धन अन्य ब्राह्मणों । भजने लगे । यहा तक कि वे भार्गवों के गर्भ में को दे डाला । किसी किसी ने सोच विचारकर उन स्थित बालकों को भी नष्ट करने लगे। क्षत्रिय लोग क्षत्रियों को अपना धन दे भी दिया ॥१५॥१६॥ अप्रसन्न होकर जब इसतरह भृगुश का नाश भृगुवशी ब्राह्मणों के यहा क्षत्रि लोग धन की | करने लगे तब भृगुवंशी ब्राह्मणों की स्त्रिया डर के - 03ooncoconcococonoroscocococococo/ Lor 7070-07ompic । अध्याय १८० ] महा भारत orosrooooonom तत उच्छिद्यमानेषु भृगुप्वेवं भयात्तदा भृगुपन्यो गिरि दुर्ग हिमवन्तं प्रपेदिरे ॥ २०॥ तासामन्यतमा गर्भ भयाद्दभ्रे महौजसम् । ऊरुणैकेन वामोरूर्भर्तुः कुलविवृद्धये ॥ २१ ॥ तद्गर्भमुपलभ्याऽऽशु ब्राह्मणी या भयार्दिता । गत्वैका कथयामास क्षत्रियाणामुपह्वरे ॥ २२॥ ततस्ते क्षत्रिया जग्मुस्तं गर्भ हन्तुमुद्यताः । ददृशुर्वाह्मणी तेऽथ दीप्यमानां स्वतेजसा ॥ २३ ॥ अथ गर्भः स भिवोरं ब्राह्मण्या निर्जगाम ह । मुष्णन्दृष्टीःक्षत्रियाणां मध्याह्न इव भास्करः ॥ २४ ॥ ततश्चक्षुर्विहीनास्ते गिरिदुर्गेषु वभ्रमः ततस्ते मोहमापन्ना राजानो नष्टदृष्टयः ब्राह्मणी शरणं जग्मुर्दृष्टयर्थं तामनिन्दिताम् ॥ २५ ॥ ऊचुश्चैनां महाभागां क्षत्रियास्ते विचेतसः ज्योतिःप्रहीणा दुःखार्ताः शान्तार्चिप इवाऽग्नयः ॥ २६ ॥ भगवत्याः प्रसादेन गच्छेत्क्षत्रं सचक्षुपम् उपारम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मिणः ॥ २७॥ मारे हिमाचल पर्वत के गुप्त स्थानों में भागकर अपनी प्रज्वलित हो रही है ॥२१॥२३॥ रक्षा करने लगी ॥१७॥२०॥ उसी समय वह गर्भ में स्थित बालक उस ब्राह्मणी उनमें एक ब्राह्मणी के गर्भ था। वह डर के मारे की ऊह को फोड़कर बाहर निकल आया । उस बहुत समय तक अपने गर्भ को ऊरु (मोटी जाँघ) तेजस्वी बालक ने दोपहर के सूर्य के ऐसे अपने तेज में रक्खे रही। उसने अपने पति के वंश की रक्षा से उन क्षत्रियों को अन्धा कर दिया । दृष्ट न रहने करने के लिये ही यह काम किया था । अनन्तर से घबराये और टरे हुए क्षत्रिय वुझी हुई अमि के एक ब्राह्मणी ने उस गर्भ का वृत्तान्त जानकर डर के समान शान्त हो गये । तब वे दुःखित होकर फिर मारे क्षत्रियों के यहां सब हाल कह दिया । क्षत्रिय । दृष्टि पाने के लिये उसी ब्राह्मणी की शरण में आये । लोग यह सुनते ही उस गर्भ को नष्ट करने के लिये उन्होंने कहा-हे कल्याणरूपिणी ! हमने बड़ा भारी तैयार होकर चले। उन्होंने उस स्थान में पहुंचकर पार किया है; परन्तु अब हम तुम्हारे आगे एक-मत देखा कि वह ब्राह्मणी अपने तेज से अग्नि के समान होकर ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करते हैं । तुम्हारे roo10 ८५८ महा भारत [ आदपत्र 209rrrroccmo Hocococococon oroscoxorcoconcomco सपुत्रा वं प्रसादं नः कर्तुमर्हसि शोभने पुनदृष्टिप्रसादेन राज्ञः संत्रातुमर्हति ॥ २८॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौवोपाख्याने आशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८०:। प्रसन्न होने से ही हम सब क्षत्रिय फिर आंखों की राजाओं की रक्षा करो, यही हमारी प्रार्थना है ज्योति पा सकते हैं । हे देवी! अपने पुत्र-सहित ॥२४॥२८॥ तुम, हम लोगों पर, कृपा करो। फिर दृष्टि देकर इन आदिपर्व का एक सो अस्सी अध्याय समाप्त हुआ । अथ एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥ ब्राह्मण्युवाच-नाऽहं गृह्णामि वस्ताता दृष्टी ग्मि रुपान्विता । अयं तु भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः ॥ १ ॥ तेन चक्षूपि वस्ताता व्यक्त कोपान्महात्मना । स्मरता निहतान्वन्धूनादत्तानि न संशयः गर्भानपि यदा यूयं भृगूणां नत पुत्रकाः तदाऽयमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः पडङ्गश्चाऽखिलो वेद इमं गर्भस्थमेव विवेश भृगुवंशस्य भूयः प्रियचिकीर्पया मोऽयं पितृवधाव्यक्तं क्रोधाद्वो हन्तुमिच्छति । तेजसा तस्य दिव्येन चक्षूपि मुपितानि वः ॥ ५ ॥ तमिमं तात याचध्वमौर्वं मम सुतोत्तमम् । अयं वः प्रणिपातेन तुष्टो दृष्टीः प्रमोक्ष्यति ॥ ६ ॥ एक सौ इक्यासी अध्याय ॥ १८१ ।। ब्राह्मणी ने कहा-हे बेटो ! न तो मैंने तुम्हारी | हे पुत्रो ! जब तुम लोगभार्गवों के गर्भ में स्थित दृष्टि नष्ट की है और न मुझे तुमपर क्रोध है । बालकों को भी नष्ट करने लगे तब से मैने सौ वर्ष मेरी जांघ से पैदा हुआ यह भृगुवंशी कुमार तुमपर तक यह गर्भ धारण किया है। भृगुवंश का भला करने क्रोधित हुआ है । हे वेटो ! इस महात्मा बालक ही के लिये छः अओं से युक्त सम्पूर्ण वेद इस बालक ने बन्धुओं का नाश स्मरण कर क्रोधित चित्त से | के हृदय-मन्दिर में प्रविष्ट हुए हैं ॥३॥४॥ तुम्हारी आंखें हर ली हैं ॥१२॥ इस बालक ने पितरों के वध के कारण निश्चय •roverconcercocococorraiwar .
3000 roconazoor cc. carorcorcoin अध्याय १८१ ] म हा भारत or.rococree वसिष्ठ उवाच-एवमुक्तास्ततः सर्वे राजानस्ते तमूरुजम् ऊचुः प्रसीदेति तदा प्रसादं च चकार सः ॥ ७ ॥ अनेनैव च विख्यातो नाम्ना लोकेषु सत्तमः । स और्व इति विप्रपिरूलं भित्त्वा व्यजायत ॥ ८ ॥ चक्षुपि प्रतिलब्ध्वा च प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः । भार्गवस्तु मुनिमेंने सर्वलोकपराभवम् स चक्रे तात लोकानां विनाशाय महामनाः । सर्वेपामेव कात्स्न्येन मनः प्रवणमात्मनः इच्छन्नपचितिं कर्तुं भृगूणां भृगुनन्दनः सर्वलोकविनाशाय तपसा महतैधितः ॥ ११ ॥ तापयामास ताँल्लोकान्सदेवासुरमानुपान् तपसोग्रेण महता नन्दयिष्यन्पितामहान् ततस्तं पितरस्तात विज्ञाय कुलनन्दनम् । पितृलोकादुपागम्य सर्व ऊचुरिदं वचः पितर ऊचु-और्व दृष्टः प्रभावस्ते तपसोग्रस्य पुत्रक प्रसादं कुरु लोकानां नियच्छ क्रोधमात्मनः ॥ १४ ॥ ही तुम लोगों को नष्ट करने की इच्छा की है हुए ॥७॥८॥ इमी के दिव्य तेज के बल से तुम्हारी आँखें नष्ट हुई इसप्रकार आंखों की ज्योति पाकर सब क्षत्रिय हैं । इसलिये हे पुत्रो ! तुम लोग इस मेरी जांघ से अपने-अपने स्थानों को लौट गये । उधर सब लोगों पैदा हुए बालक से ही प्रार्थना करो। वह तुम्हारी को परास्त करने के विचार से महानुभाव भृगुनन्दन प्रार्थना और प्रणाम से प्रसन्न होकर आंखें दे सकता और्य ने तीनों लोकों को नष्ट करने का निश्चय कर लिया । अपने पूर्वज भृगुवंशी ऋषियों के नाश का वसिष्ठ जी कहते है-यह सुनकर वे सब क्षत्रिय बदला लेने के लिये, सब लोकों के नाश के उद्देश मिलकर उस बालक की स्तुति करने लगे । उनकी से, ये घोर तप करने लगे । अपने पुरखों की प्रसन्नता स्तुति से प्रसन्न होकर उस बालक ने कृपा की । के लिये वे ऐसा कठोर तप करने लगे कि उससे क्षत्रियों की दृष्टि फिर जैसी की तैसी हो गई । इन देवता, दैत्य और मनुष्य सब तप उठे ॥९॥१२॥ साधुश्रेष्ठ विर्षि ने ऊह को फोड़कर जन्म लिया अपने कुल का मुख उज्जवल करनेवाले और्व था, इसलिये वह और्व नाम से पृथ्वी में प्रख्यात | के अभिप्राय को जानकर उनके पूर्वज स्वर्गलोक से है ॥५॥६॥ । or Jcom ० म हा भारत [ आदिपर czcooooooookoroscope ०.cooclob concotocococonokokarorarok नाऽनीशैर्हि तदातात भृगुभिर्भावितात्मभिः । वधो ह्युपेक्षितः सर्वेः क्षत्रियाणां विहिंसताम् ॥ १५ ॥ आयुपा विप्रकृप्टेन ‘यदा नः खेद आविशत् । तदाऽस्माभिर्वधस्तात क्षत्रियैरीप्सितः स्वयम् ॥ १६ ॥ निखातं यच्च वै वित्तं केनचिभृगुवेश्मनि । वैरायैव तदा न्यस्तं क्षत्रियान्कोपयिष्णुभिः ॥ १७ ॥ किं हि वित्तेन नः कार्य स्वर्गेप्सूनां द्विजोत्तम । यदस्माकं धनाध्यक्षः प्रभूतं धनमाहरत् ॥१८॥ .यदा तु मृत्युरादातुं न नः शक्नोति सर्वशः । तदाऽस्माभिरयं दृष्ट उपायस्तात संमतः आत्महा च पुमांस्तात न लोकाँल्लभते शुभान् । ततोऽस्माभिः समीक्ष्यैवं नात्मनात्मा निपातितः ॥ २०॥ न चैतन्नः प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि । नियच्छेदं मनः पापात्सर्वलोकपराभवात् ॥ २१ ॥ मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान्सप्त पुत्रक । दूपयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्यवारणे एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ । उनके पास आकर कहने लगे-हे बेटा और्व । और जो धन हमारे मकानों में खोदने से निकला तुम्हारे. उग्र तप का प्रभाव हमने देख लिया। अब था वह हमने आप ही क्षत्रियों से वैर करने के लिये तुम अपने क्रोध को शान्त करके सब लोगों पर कृपा गाड़ दिया था । हमको धन की कुछ इच्छा न थी। करो ॥१३॥१४॥ हमारे धनाध्यक्षों ने ही वह धन ले लिया । हमको हे बेटा ! क्षत्रिय लोग जब नाश करने लगे तब ! तो स्वर्ग की चाहना थी ॥१७.१८॥ हम भृगुवंशियों ने उनके उस कार्य की उपेक्षा की, हमने यह उपाय इसलिये किया था कि हमको इससे यह न समझना कि हम लोग क्षत्रियों को | अपने आप मरने का कोई उपाय नहीं दीखता था । दण्ड देकर अपनी रक्षा न कर सकते थे । हम सब जो मनुष्य आत्महत्या करता है उसकी सद्दति नहीं बड़ी आयु होने के कारण संसार में रहते-रहते दुःखी | होती। इससे हमने आपको अपने हाथ से नहीं मारा हो गये थे और अपने आप अपना नाश क्षत्रियों ॥१९॥२०॥ के हाथ से चाहते थे ॥१५॥१६॥ हे बेटा ! तुम जो यह क्षत्रियों और सब लोकों , ८६१ महा भारत अध्याय १८२ ] 1050700 mcool . का संहार करने के लिये उद्योग कर रहे हो सो हमें । लोकों की हत्या मत करो। यह क्रोध तप और तेज पसन्द नहीं । सब लोकों को नष्ट करने का विचार को नष्ट करनेवाला है । इसलिये इसको चित्त से छोड़ दो। यह महापातक है । क्षत्रियों और सब दूर करो ॥२१॥२२॥ आदिपर्व का एक सोक्यासी अध्याय समाप्त हुआ। . .. अथ द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ।। आर्व उवाच-उक्तवानस्मि यां क्रोधात्प्रतिज्ञां पितरस्तदा । सर्वलोकविनाशाय न सा मे दितथा भवेत् ॥ १ ॥ वृथारोपप्रतिज्ञो वै नाऽहं भवितुमुत्सहे अनिस्ती! हि मां रोपो दहेदग्निरिवाऽरणिम् ॥ २ ॥ यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति । नाऽलं स मनुजः सम्यक्त्रिवर्ग परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥ अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिक्षिता । स्थाने रोपः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः ॥ ४ ॥ अनौपमहमूरुस्थो गर्भशय्यागतस्तदा आरावं मातृवर्गस्य भृगूणां क्षत्रियैर्वधे संहारो हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमः आग च्छेदनात्क्रान्तस्तदा मां मन्युराविशत् ॥ ६ ॥ संपूर्णकोशाः किल मे मातरः पितरस्तथा भयारसर्वेषु लोकेषु नाऽधिजग्मुः परायणम् ॥ ७ ॥ एक सौ बयासी अध्याय ॥ १८२ ।। और्व ने कहा-हे पितरो ! मैने क्रोधित होकर जो उसको रोक लेता है वह कभी पूरी रीति से सर्व लोकों के विनाश के लिये जो प्रतिज्ञा की है, | धर्म, अर्थ, काम इन तीन वर्गों को पालन नहीं कर वह कभी व्यर्थ नहीं होगी; मै व्यर्थ क्रोध और • सकता । ठीक अवसर पर किया गया क्रोध व्यर्थ प्रतिज्ञा करना नहीं चाहता। यदि मै इम अशिष्ट पुरुषों का दमन और शिष्ट पुरुषों की रक्षा प्रतिज्ञा को पूरी न करू, तो क्रोध की आग मुझको करता है । इस कारण जिसे सबको जीतने की इच्छा इसप्रकार जलावेगी जैसे आमि वन को जलाता है हो उसे क्रोध की उपेक्षा न करनी चाहिये ॥३॥ ॥१॥२॥ जब मैं माता की ऊरु-गर्भशय्या-में था तब यदि क्रोध किसी कारण से आ भी जाय तो | मैने क्षत्रियों के हाथों से मारे जा रहे भार्गवों के >consoorihorraco ८६२ महाभारत [ आदिपर्व o-0705oorkooocol00.00000crosoooooo Poscocokorako तान्भृगूणां यदा दारान्कश्चिन्नाऽभ्युपपद्यत । माता तदा दधारेयमूरुणकेन मां शुभा प्रतिद्धा हि पापस्य यदा लोकेषु विद्यते । तदा सर्वेषु लोकेषु पापकृन्नोपपद्यते यदा तु प्रतिपेद्धारं पापो न लभते क्वचित् । तिष्ठन्ति वहवो लोके तदा पापेषु कर्मसु ॥ १० ॥ जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान्न नियच्छति । ईशः सन्सोऽपि तेनैव कर्मणा संप्रयुज्यते ॥ ११ ॥ राजभिश्चेश्वरेश्चैव यदि वै पितरो मम शक्तैन शकितास्त्रातुमिष्टं मवेह जीवितम् ॥ १२ ॥ अत एषा-हं कुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम् । भवतां च वचो नाऽलमहं समभिवर्तितुम् ॥ १३ ॥ ममाऽपि चेद्भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत् उपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद्भयम् ॥ १४ ॥ यश्चाऽयं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति । दहेदेप चं मामेव निगृहीतः स्वतेजसा वध से दुःखी माताओं का आर्चनाद सुना था । नष्ट करनेवाला हो तो कोई भी पाप कर नहीं सकता। भार्गव ब्राह्मणों को मारने पर जिस समय अधम यदि लोकों में कोई पाप-कर्ग का नष्ट करनेवाला क्षत्रिय उतारू हुए और उन्होंने गर्भ के बालकों ' नहीं हो तो बहुतरे पाप-कर्म में प्रवृत्त होते हैं ।।९।१०॥ तक को नहीं छोड़ा उसी समय मुझे क्रोध आया | जानकर और शक्ति रहने पर भी जो कोई था ॥५॥६॥ पार का दमन नहीं करता वह, जितेन्द्रिय और मेरे वंश के पिता और माताएँ अत्यन्त शोक प्रभावशाली होने पर भी, उस पाप का भगी होता से व्याकुल होकर, बाल खोले हुए, डर के मारे है । राजा या अन्यान्य समर्थ लोगों ने शक्ति रहने चारों ओर भागती फिरी, उन्हें कहीं ठिकाना नहीं पर भी प्राणों को प्यारा समझकर मेरे पितरों और मिला । किसी ने जब भृगुवंश की स्त्रियों को माताओं की रक्षा नहीं की ॥११.१२॥ ठिकाना नहीं दिया तय माना मुझे अपनी अह में इसी कारण मैं सबपर कुपित होकर सबका संहार रखकर मेरी रक्षा करती रहीं ॥७.८॥ करने को उतारू हुआ हूं। मुझमें ऐमा करने की देखो, इस मण्डल में एक मनुष्य पाप-कर्म का शक्ति है। इसी कारण मै आप लोगों की इस आज्ञा , cos - अध्याय १८२] महा भारत radhe भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम् । तस्माद्विधध्वं यच्छ्यो लोकानां मम चेश्वराः ॥ १६ ॥ पिनर उचु -य एप मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्टिताः ॥ १७ ॥ आपोमयाः सर्वरसाः · सर्वमापोमयं जगत् । तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम ॥ १८ ॥ अयं तिष्ठतु ते विप्र यदीच्छसि महोदधौ । मन्युजोऽग्निदहन्नापो लोका ह्यापोमयाः स्मृताः ॥ १९॥ एवं प्रतिज्ञा सत्येयं तवाऽनघ भविष्यति न चैवं सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम् ॥ २० ॥ वसिष्ठ उवाच-ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालये । उत्ससर्ज स चैवाप उपयुक्त महोदधौ ॥ २१ ॥ महदयशिरो भूत्वा यत्तद्वेदविदो विदुः वमग्निमुद्गिरन्वक्त्रापिवत्यापो महोदधौ को मानने में लाचार हू । मैं समर्थ होकर भी यदि । लोगों का जीवन है । इसतरह तुम्हारी प्रतिज्ञा भी इस कुकार्य की परवा न करूंगा तो ऐसे दुष्ट पापियों मिथ्या न होगी और सब लोकों का नाश भी न के अत्याचार से मुझे भी खटका होगा ॥१३॥१४॥ होगा। तुम्हारा कल्याण हो । सब रस जलमय हैं यह मेरे क्रोध का अग्नि सब लोकों को जलाने और सब जगत् जलमय है । इसलिये हे द्विजश्रेष्ठ ! के लिये उद्यत है । मै यदि इस समय इसे रोकूगा | तुम अपने इस क्रोध की आग को जल में स्थापित तो अपने तेज से आप ही मुझे जलना पड़ेगा। करो। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो यह अग्नि महासागर हे प्रभुगण ! मैं जानता हू, कि आप रोग सभी के भीतर रहकर जल को जलाया करे । हे विप्र ! लोकों का हित चाहनेवाले हैं। इससे आप मुझे ऐसी सब रोकों का जीवन जल ही है । हे अनघ । ऐसा आज्ञा दीजिए, जिससे मेरा और सब लोकों का भला करने से तुम्हारी प्रतिज्ञा मिथ्या न होगी और देवता हो । आप मेरे और सभी लोकों के स्वामी है | आदि सब लोगों का भी अभिष्ट न होगा॥१७॥२०॥ ॥१५॥१६॥ वसिष्ठ जी कहते है-तब और्व ने अपने क्रोध पितरों ने कहा-हे बेटा ! यह जो तुम्हारे क्रोध से उपजे हुए अमि को समुद्र में छोड़ दिया। वही का अमि सब लोगों को जगने के लिये तैय्यार है अग्नि सदा समुद्र के जल को सोखता रहता है। उसे तुम जल में स्थापित करो, क्योंकि जल में सभी । वेद के जानकार ब्राह्मण रोगों का कहना है कि ॥ २२ ॥ . royericrorruaarirrorseirrrorrorore oolcohoo.co गन्धर्व उवाच- - oconcococcorcocor ८६४ म हा भारत [ आदिपर्व wereorevereremocrinorm yoorcococo तस्मात्त्वमपि भद्रं ते न लोकान्हंतुमर्हसि पराशर पराँल्लोकाञानज्ञानवतां वर ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चत्ररथपर्वण्योर्वोपाख्याने द्विशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८६ ।। वही क्रोध, घोड़े के मुँहवाला (बाड़वानल) होकर, पराशर ! तुम सब लोकों को जलाकर नष्ट करने मुंह से आग उगलता हुआ समुद्र के जल को का यह बुरा विचार छोड़ दो । तुम्हारा कल्याण सोखता रहता है । इसी कारण हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो ॥२१॥२३॥ आदिपर्व का एक सौ वयासी अध्याय समाप्त हुआ । अथ त्रिशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ च-एवमुक्तः स. विप्रर्षिर्वसिष्ठन महात्मना न्ययच्छदात्मनः क्रोधं सर्वलोकपराभवात् इजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः ऋपी राक्षससत्रेण शाक्तयोऽथ पराशरः ततो वृद्धांश्च वालांश्च राक्षसान्स महामुनिः । ददाह वितते यज्ञे शक्तंर्वधमनुस्मरन् न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् । द्वितीयामस्य मा भाङ्क्ष प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ॥ ४ ॥ त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन्महामुनिः । आसीत्पुरस्ताद्दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तिजः । तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये एक सौ तिरासी अभ्याय ॥ १८३ ॥ गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन ! वेदन पुरुषों में श्रेष्ठ । होना स्मरण कर उस यज्ञ में बालक से लेकर बुढे महातेजस्वी महर्षि पराशर ने महात्मा वसिष्ठ की तक सम्पूर्ण राक्षसों को जलाने लगे । वसिष्ठ ने यह सब बातें सुनकर अपना सब लोकों को परास्त यह समझकर कि उनकी दूसरी प्रतिना भग करना करने का क्रोध त्याग दिया। वह सब वेदों के | उचित नहीं है, उनको राक्षस-वध करने से नहीं जानकारों में श्रेष्ठ बड़े तेजस्वी शक्तियुक्त महर्षि | रोका ॥१४॥ पराशर राक्षस-यज्ञ करने को प्रवृत्त हुए । अनन्तर प्रज्वलित तीन अग्मियों के बीच उस महायज्ञ के आरम्भ होने पर शक्ति का नष्ट | बैठे हुए पराशर चौथे अमि के समान जान पड़ने यनमण्डप roes म हा भारत अध्याय १८३ ] 00cco Toyooo 2050move cooooooo More तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ॥ ७ ॥ ततः परमदुष्प्रापमन्यपिरुदारधीः समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः । तत्राऽऽजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥ ९ ॥ पुलस्त्यस्तु वधात्तेषां रक्षसां भरतर्षभ उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिन्दमम् ॥ १० ॥ कञ्चित्ताताऽपविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक अजानता मदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ॥ ११ ॥ प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि । नैप तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥ १२ ॥ शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन्कुरुपे वं पराशर शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नाऽतिक्रान्तुमिहाऽर्हसि । प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ लगे। उस विशुद्ध यज्ञ में हवन का आरम्भ होने कर महर्षि पुलस्त्य ने पराशर से कहा-हे बेटा ! पर आकाश मेघों के रहने पर जैसे सूर्य की आभा इन निर्दोष और तुम्हारे पिता की हत्या का कुछ भी से प्रकाशित हो उठता है वैसे ही, उस अग्नि के हाल न जाननेवाले राक्षसों की हत्या करके क्या प्रकाश से चमकने लगा । वसिष्ठ आदि मुनियों को तुम्हें प्रसन्नता होती है ? इससे क्या तुम्हारा विघ्नभय तेज से प्रकाशमान् महर्षि पराशर दूसरे सूर्य के दूर होगा ? मेरे वंश का नाश करना तुम्हारे लिये समान जान पड़े। हे शत्रुदलन ! तब दूसरे के द्वारा उचित नहीं है । हे बेटा ! तपस्वी ब्राह्मणों का धर्म पराशर इस यज को न रोकेंगे यह जानकर, उस ऐसा नहीं है ॥२॥११॥ यन को समाप्त कराने के लिये उदार बुद्धि महर्पि हे पराशर । शान्ति ही ब्राह्मणों का श्रेष्ठ धर्म है। अत्रि वहां पर आये ॥५॥८॥ इसलिये तुम उसी धर्म को ग्रहण करो। तुम ब्राह्मण-श्रेष्ठ उनके पीछे राक्षसों की रक्षा कराने के लिये पुलस्त्य, होकर यह अधर्म कर रहे हो । तुम्हारे पिता शक्ति पुलंह और बड़े भारी याज्ञिक क्रतु नाम के महर्षि धर्मात्मा पुरुप थे । उन्होंने जो नहीं किया वह करके भी आये । हे अर्जुन ! राक्षसा का नाश होते देख उनका अपमान और मेरे वंश का नाश करना तुम्हें ecow 30007-207ooo- महाभारत [ आदिपर्व Korosroomorrores शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् । आत्मजेन स दोषेण शक्तिींत इतो दिवम् ॥ १५ ॥ न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने । आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाऽभवत् ॥ १६ ॥ निमित्तमात्रस्तत्राऽऽसीद्विश्वामित्रः पराशर राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ॥१७॥ ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने । ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ॥ १८ ॥ सर्वमेतद्वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने रक्षसां च समुच्छेद एप तात तपस्विनाम् ॥ १९ ॥ निमित्तभूतस्त्वं चाऽत्र ऋतौ वासिष्टनन्दन । तत्सत्रं मुश्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ॥ २०॥ गन्धर्व उवाच-एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्टेन च धीमता तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ॥ २१ ॥ सर्वराक्षससत्राय संभृतं पावकं तदा उत्तरे हिमवत्पाबें उत्ससर्ज महावने ॥ २२ ॥ स तत्राऽद्याऽपि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च । भक्षयन्दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्यण्यौर्वोपाख्याने त्रिशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८३ ॥ उचित नहीं । हे वसिष्ठवंशज ! शक्ति के शाप से और महामुनि वसिष्ठ के शक्ति से छोटे जो ही वह दुर्घटना हुई थी। अपने ही दोप से तुम्हारे सब पुत्र थे वे भी देवताओं के साथ परम आनन्द पिता शक्ति की मृत्यु हुई है ॥१२॥१५॥ भोग रहे हैं। हे महामुनि । वसिष्ठ जी यह सब हे मुनिवर ! कोई भी राक्षस उनको भक्ष्ण नहीं जानते हैं । हे पराशर ! इस यन में निर्दोष राक्षसों कर सकता था। वे आप ही शाप देकर अपनी मृत्यु का जो नाश हो रहा है तुम केवल उसके निमित्त का कारण हुए थे । हे पराशर ! विश्वामित्र भी इस ही बन रहे हो। अब तुम इस घोर यज्ञ को समाप्त दुर्घटना का कारण हो गये । तुम्हारे पिता की । करो। तुम्हारा कल्याण हो ॥१८॥२०॥ हत्या करनेवाले कल्माषपाद इस समय स्वर्ग-मुख गन्धर्व ने कहा-हे अर्जुन | महामुनि वसिष्ठ भोग रहे हैं ॥१६॥१७॥ और अत्रि ने भी पुलस्त्य के कहने का अनुमोदन orororororor ८६७ अध्याय १८४ ] म हा भारत oooood किया । तब पराशर ने उस यज्ञ को बीच में ही । दिया। वह आम अब तक समय-समय पर वहां समाप्त कर दिया । राक्षसों के नाश के लिये उन्होंने के राक्षसों, वृक्षों और पत्थरों को जलाता हुआ देख जिस अग्नि को प्रज्वलित किया था उसे उन्होंने पड़ता है ॥२१॥२३॥ हिमाचल के उत्तर-तट पर स्थित महावन में छोड़ आदिपर्व का एक सौ तिरासी अध्याय समाप्त हुआ। .. अथ चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥ अर्जुन उवाच-राज्ञा कलमापपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै संनियोजिता ॥ १ ॥ जानता वै परं धर्म वसिष्ठेन महात्मना । अगम्यागमनं कस्मात्कृतं तेन महर्पिणा ॥ २ ॥ अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे । एतन्मे संशयं सर्व छेत्तुमर्हसि पृच्छतः गन्धर्य उवाच-धनञ्जय निवोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । वसिष्ठं प्रति दुर्धर्षं तथा मित्रसहं नृपम् ॥ ४ ॥ कथितं ते मया सर्व यथा शप्तः स पार्थिवः । शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिष्ठेन महात्मना स तु शापवशं प्राप्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । निर्जगाम पुराद्राजा सहदारः परन्तपः अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे नानामृगगणाकीर्णं नानासत्वसमाकुलम् एक सौ चौरासी अध्याय ॥ १८४ ॥ अर्जुन ने कहा-हे मित्र ! राजा कल्माषपाद ने कहा-हे अर्जुन ! तुमने उस प्रजापालक राजा ने वंदन पुरुषों में श्रेष्ठ अपने गुरु वसिष्ठ के पास और वसिष्ठ के विषय में जो कुछ पूछ वह कहता पुत्र उत्पन्न करने के लिये अपनी स्त्री को क्यों भेजा ? हूं, सुनो । हे भरतश्रेष्ठ ! वसिष्ठ-पुत्र महात्मा शक्ति महात्मा वसिष्ठ ने ही धर्मात्मा होकर क्यों अगम्या ने जिस प्रकार शाप दिया था वह मैने सब सुना स्त्री को स्वीकार किया ? ॥१२॥ दिया है ।।३.५॥ यह काम तो अधर्म का था; फिर वसिष्ठ ने वह शत्रुमथन राजा शापग्रस्त होकर क्रोधयुक्त कैसे किया ? तुम मेरे संशयों को दूर करो । गन्धर्व नेत्र से स्त्री के साथ नगर से निकले । आगे निर्जन - ८६८ म हा भारत [आदिपर्व co0700105030050.orchoolcocococorco YASCOSOCOCO नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृत्तम् अरण्यं घोरसनादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् स कदाचिक्षुधाऽऽविष्टो मृगयन्भक्ष्यमात्मनः । ददर्श सुपरिक्लिष्टः कस्मिंश्चिन्निर्जने वने ॥ ९ ॥ ब्राह्मणं ब्राह्मणी चैव मिथुनायोपसंगतो तौ तं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थों प्रधावितौ ॥ १० ॥ तयोः प्रद्रवतोर्विप्रं जग्राह नृपतिबलात् दृष्ट्वा गृहीतं भर्तारमथ ब्राह्मण्यभाषत शृणु राजन्मम वचो यत्त्वां वक्ष्यामि सुव्रत । आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोके परिश्रुतः ॥ १२ ॥ अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ॥ ऋतुकाले तु संप्राप्ते भर्तृव्यसनकर्शिता अकृतार्था ह्यहं भर्ती प्रसवार्थं समागता ॥ १४ ॥ प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्ताऽयं मे विसृज्यताम् । एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत् ॥ १५ ॥ वन को जाकर स्त्री के साथ घूमने लगे । शापग्रस्त ब्राह्मणी ने जब देखा कि राजा ने उसके पति को राजा अनेक प्रकार के मृगों से भरे, और भाति-भाति पकड़ लिया है तब वह दीनता के साथ कहने लगी- के वनैले जीवों से पूरे, नाना प्रकार के वृक्ष और । हे सुवृत महाराज ! मैं जो आपसे कहती हूं उसपर गुल्मलताओं से ढके और घोर शब्द से गृजते हुए ध्यान दीजिए । यह सब लोकों में प्रसिद्ध है कि उस बड़े वन में घूमते हुए बहुत क्षुधित हुए ॥६॥८॥ आपने सूर्यवंश में जन्म लिया है ॥११॥१२॥ वह भोजन की सामग्री ढूंढते हुए बहुत थक आपने कभी धर्म के पालन में असावधानी नहीं गये थे कि ऐसे समय में देखा कि उस वन के एक की। आप सदा गुरुजन की सेवा करते रहे है । निराले स्थान में एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुन- 'इसलिये शाप से प्रसित होकर ऐसा निठुर पापकर्म कर्म में प्रवृत्त है । वे राजा को देख करके ही काम { करना आपको उचित नहीं। मेरे पति के पुत्र नहीं पूरा न होने पर भी अति भयभीत चित्त होकर वहां । है । इसलिये पति को चिन्तित देखकर मैं सदा से उठ भागे ॥९॥१०॥ व्याकुल रहती हूं। इसी कारण इस समय मेरा राजा ने दौड़कर ब्राह्मण को पकड़ लिया । ऋतुकाल आ जाने पर मै पति से मिल रही थी परन्तु Paroodcococcore.oroscocono50s ८६९ म हा भारत अध्याय १८४ ] 203 Hozooozooooovcoc.205 । भर्तारं भक्षयामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् । तस्याः क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन्भुवि ॥ १६ ॥ सोऽग्निः समभवद्दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् । ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥ १७॥ कल्माषपादं राजर्पिमशपद्ब्राह्मणी रुपा यस्मान्ममाऽकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥ १८ ॥ प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः । तस्मात्त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥ १९ ॥ पत्नी मृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्षसि जीवितम् । यस्य चर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥ २० ॥ तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति । स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ॥ २१ ॥ एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमागिरसी शुभा । तस्यैव संनिधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ॥ २२ ॥ वसिष्ठश्च महाभागः सर्वमेतदवैक्षत ज्ञानयोगेन महता तपसा च परन्तप ॥ २३॥ मेरा मनोरथ सफल नहीं हुआ है ॥१३॥१४॥ मारकर खा लिया। इसी कारण तू जव ऋतुकाल में इमलिये हे भूपश्रेष्ठ ! आप कृपा करके मेरे । स्त्रीसग करने को उद्यत होगा उसी समय मेरे शाप पति को छोड़ दीजिए । ब्राह्मणी यह सब कहती ' मे तेरी मृत्यु हो जायगी । तुमने जिन महर्षि के हुई रोने लगी परन्तु राजा ने निर्दयता से उसके पुत्रों को नष्ट क्यिा है तुम्हारी स्त्री उन्हीं से मिल- पति को इसप्रकार खा लिया कि जैसे व्याघ्र कर पुन प्रवम करेगी । । हे नृपाघम ! उसी पुन से मृग को साता है । तब ब्राह्मणी ने क्रोध के मारे तेरे वश की रक्षा होगी ॥१५॥२१॥ वी पर जो आसू गिराये उनमे जरनी हुई आग अहिरा के वश में उसन्न और शुभ रक्ष्गों से बनकर उस स्थान में उजारा हो गया । आगे पनि युक्त यह वादागी राजा को यह शार देकर उनके के नाम से कातर ब्राह्मणी ने केध करके राजा सामने ही जरती हुई आग में जा घुसी।हे शनुमथन ! कल्मापद को मार दिया-हे नीच राजा ' तूने मेरी महाभाग वसिष्ठ को अपने तपांबर और दिव्य ज्ञान इच्छा को पूर्ण नहीं होने दिया और मेरे आगे ही के प्रभाव से उमी ममय यह मब वृत्तान्त माइम हो निर्दयता के साथ मेरे प्योर अनियशवन्त पति को गया था ॥२२१२३|| -ror.orrorarrorarororer:
८७० : शाप महा भारत [ आदिपर्व propororeheoroxoooooorn0007eocococococokor मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः ऋतुकालेऽभिपतितो मदयन्त्या निवारितः ॥ २४ ॥ न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः । देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा संभ्रान्तोनृपसत्तमः । 'तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यभृशं तदा ॥ २५ ॥ एतस्मात्कारणाद्राजा वसिष्ठं संन्ययोजयत् । स्वदारेषु नरश्रेष्ट शापदोषसमन्वितः ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वामिष्ठोपाख्याने चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ।। अनन्तर बहुत दिन पीछे जब राजा कलमाषपाद न था परन्तु स्त्रो के कहने से उन्हें स्मरण हो आया । गये तब ऋतुकाल में अपनी स्त्री से तब वे बहुत व्याकुल और दुःखी हुए। हे नरश्रेष्ठ! समागम करने को तैय्यार हुए। उनकी रानी मदयन्ती इसप्रकार ब्राह्मणी का शाप होने के कारण राजा को साथ रहने के कारण, ब्राह्मणी के शाप का हाल । ने अपनी स्त्री में वसिष्ठ के द्वारा पुत्र उतान्न कराया मालम था । इससे उसने राजा को वैसा करने से । ॥२४॥२६॥ रोका । कामवश राजा को ब्राह्मणी का शाप याद आदिपर्व का एक सौ चौरासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ पञ्चशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥ अर्जुन उवाच-अस्माकमनुरूपो वै यः स्याद्गन्धर्व वेदवित् । पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव गन्धर्व त्याच-यवीयान्देवलस्यैष बने भ्राता तपस्यति धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणीवं यदीच्छथ ॥ २ वैशम्पायन उवाच-ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेयं प्रददौ तद्यथाविधि गन्धर्वाय तदा प्रीतो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३ ॥ एक सौ पचासी अध्याय ॥ १८५ ॥ अर्जुन ने कहा-हे गन्धर्व! तुम सब जानते हो। रहे हैं । तुम चाहो तो उनको अपना पुरोहित बना इसलिये मैं पूछता हूं कि वेद जाननेवाले कौन लो। वैशम्पायन ने कहा-अनन्तर अर्जुन ने प्राह्मण हमारे पुरोहित होने के योग्य हैं। गन्धर्व ने प्रसन्नता के साथ विधिपूर्वक उस गन्धर्व को दिव्य कहा-हे अर्जुन ! इस वन में उत्कीचक नाम तीर्थ अमेय अत्र देकर कहा कि हे गन्धर्वश्रेष्ठ! जी पर देवल के छोटे भाई धौम्य नामक ऋपि तप कर घोड़े तुम हम लोगों को देना चाहते हो उन्हें अभी Mora- ८७१ महाभारत अध्याय १८५ ] rooooooo 0500000000 -- ->rororicorn - - त्वय्येव तावत्तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम कार्यकाले ग्रहीष्यामःस्वस्ति तेऽस्त्विति चाऽब्रवीत्॥४॥ तेऽन्योन्यमभिसंपूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह । रम्याद्भागीरथीतीराद्यथाकामं प्रतस्थिरे तत उत्कोचकं तीर्थ गत्वा धौम्याश्रमं तु ते । तं वचः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय भारत ॥ ६ ॥ तान्धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः । मातृपष्ठास्तु ते तेन गुरुणा संगतास्तदा ब्राह्मणं तं पुरस्कृत्य पाञ्चाली च स्वयंवरे ॥ ८ ॥ पुरोहितेन तेनाऽथ गुरुणा संगतास्तदा नाथवन्तमिवाऽऽत्मानं मेनिरे भरतर्षभाः स हि वेदार्थतत्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः तेन धर्मविदा पार्था याज्या धर्मविदः कृताः ॥ १० ॥ वीरांस्तु स हि तान्मेने प्राप्तराज्यान्स्वधर्मतः । बुद्धिवीर्यवलोत्साहैयुक्तान्देवानिव द्विजः अपने पास ही रहने दो। काम पड़ने पर हम लोग किया । धौम्य ऐसे पुरोहित को पाकर पाण्डवों को तुममे ले लेंगे । अव अर्जुन ने वह विद्या उस गन्धर्व निश्चय हो गया कि अब हम राज्य, राजलक्ष्मी और स्वयंवर में द्रौपदी को अवश्य जीत सकेंग ॥५॥८॥ इसके उपरान्त वह गन्धर्व पाण्डवों से विदा धौम्य ऐसे पुरोहित को पाकर पाण्डवों ने अपने होकर अपने स्थान को चल दिया और पाण्डव लोग को नाथयुक्त समझा। क्योंकि वेदार्थ तत्त्व जानने- उससे विदा होकर गंगा-पार हो आगे बढे। वहां वाले, उदारबुद्धियुक्त वह ऋपि उनके गुरु हुए । से चलकर पाण्डव उत्कोचक तीर्थ पर पहुंचे । वहा धर्म जाननेवाले सब विषयों के जानकार उन द्विज ध.म्य के आश्रम में पहुंचकर उन्होंने धौम्य से ने भी उनके गुरु स्वरूर नियुक्त होकर उनको अपना पुगेहित होने के रिय प्रार्थना की । वेदन यजमान बनाया ।।९।१०॥ ब्राह्मणों में श्रेष्ठ धीग्य ने बनैले कन्द-मूल-फल उन्होंने युद्ध, वीर्य, घर और उत्माह से युक्त आदि से उनकी पूजा कर पुरोहित होना स्वीकार देवों के सदृश उन वीरों को अपने धर्म के अनुसार से ले ली ॥१४॥ A ८७२ महा भारत [ आदपर्व o2057001 Ooo. zoood oca .. कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास्तं स्वयंवरम् ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि धौम्यपुरोहितकरणे पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१८५॥ समाप्तं चत्ररथपर्व। राज्य पाये हुए समझा।उन ब्राह्मण के स्वस्त्ययन करने पांचाल देश को जाने के लिये तैय्यार हुए ॥११॥१२॥ के उपरान्त मानवश्रेष्ठ पाण्डव उनको साथ लेकर आदिपर्व का एक सौ पचासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ पट्शीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६।। अथ स्वयंरपर्ष। वैशम्पायन उवाचततस्ते नरशार्दूला भ्रानरः पञ्च पाण्डवाः । प्रययुद्रौपदी द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥ १ ॥ ते प्रयाता नव्याघ्राः सह मात्रा परन्तपाः । ब्राह्मणान्ददृशुर्मार्गे गच्छनः सङ्गतान्यहून् त ऊचुर्ब्राह्मणा राजन्पाण्डवान्ब्रह्मचारिणः । क्व भवन्तो गमिष्यन्ति कुतो वाऽभ्यागता इह । ३ ॥ युधिष्ठिर उवाच-आगतानेकचकायाः सोदर्यानेकचारिणः भवन्तो वै विजानन्तु सहमात्रा द्विजर्षभाः॥ ४ ॥ ब्राह्मणा ऊचु –गच्छताऽयैव पञ्चालान्द्रुपदस्य निवेशने स्वयंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः एकसार्थप्रयाताः स्म वयं तत्रैव गामिनः तत्र ह्यद्भुतसंकाशो भविता सुमहोत्सवः एक सौ छयासी अध्याय ॥ १८६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अब ! देखकर उनसे पूछा-तुम लोग कहां से आ रहे हो कुरुश्रेष्ठ पाचों पाण्डव धौम्य और माता कुन्ती को और कहां जा रहे हो ! युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-हे साथ लेकर पाञ्चाल देश के स्वयम्वर और महोत्सव ब्राह्मणों ! हम पांच भाई है । अपनी माता को साथ को और पाञ्चाली द्रौपदी को देखने के लिये वहां लिये अब एक्चका नगरी से आ रहे हैं ॥३॥४॥ से चल दिये । जाते-जाते राह में उन्होंने देखा यह सुनकर ब्राह्मणों ने कहा-तुम सब आज कि कुछ ब्राह्मण उधर ही जा रहे है ॥१२॥ ही पांचाल देश में द्रुपद की राजधानी में चले। हे राजन् ! उन ब्राह्मणों ने ब्रह्मचारी पाण्डवों को ! वहां बड़ा मारी स्वयम्बर होगा । उसमें ब्रामणों . - rro.y-305 rochroomcorroraro" महाभारत अध्याय १८६ ] Poooooor000 207coda oncoconce यज्ञसेनस्य दुहिता द्रुपदस्य महात्मनः वेदीमध्यात्समुत्पन्ना पद्मपत्रनिभेक्षणा दर्शनीयाऽनवद्याङ्गी सुकुमारी मनस्विनी धृष्टद्युम्नस्य भगिनी द्रोणशत्रोः प्रतापिनः यो जातः कवची खड्गी सशरः सशरासनः ।। सुसमिद्धे महावाहुः पावके पावकोपमः स्वसा तस्याऽनवद्यागी द्रौपदी तनुमध्यमा । नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रवाति वै ॥ १० ॥ यज्ञसेनस्य च सुता सुतां स्वयंवरकृतक्षणाम् गच्छामो वै वयं द्रष्टं तं च दिव्यं महोत्सवम् ॥ ११ ॥ राजानो राजपुत्राश्च यज्वानो भूरिदक्षिणाः । स्वाध्यायवन्तः शुचयो महात्मानो यतव्रताः ॥ १२ ॥ तरुणा दर्शनीयाश्च नानादेशसमागताः महारथाः कृतास्त्राश्च समुपैष्यन्ति भूमिपाः ॥ १३ ॥ ते तत्र विविधान्दायान्विजयार्थं नरेश्वराः प्रदास्यन्ति धनं गाश्च भक्ष्यं भोज्यं च सर्वशः ॥ १४॥ और याचकों को बहुत सा धन भी दिया जायगा। का स्वयम्वर होगा। द्रौपदी के सुकोगल गरीर से हग भी वहीं जा रहे है । आमओ, हम लोग और नीले कमल की मुगन्ध निकलकर आसपास काम तुम रोग एक साथ ही वहाचलें । वहा अद्वितीय भर तक फैल रही है ॥७॥१०॥ अद्भुत उत्सव होगा ||५/६॥ वही यज्ञसेन की कन्या द्रौपदी समा में स्वयंवर पांचालनाथ महात्मा यनसेन राजा द्रुपद के के लिये उपस्थित होगी । हम उस द्रौपदी और फैमल दल के समान विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरी | उमके सुन्दर स्वयम्वर के महोत्सव को ही देसने कन्या है । वह अग्नि की वेदी से उत्तन हुई है। जा रहे हैं । यहां दूर-दूर के दंगों से बहुत से यज उसके शरीर की गठन बहुत ही मुडौल है । वह करनेवाले, ब्रामणों को अमित दक्षिणा देनेवाले, देखने में बहुत ही सुन्दर है। जो द्रोण के शत्रु महाबाहुः नित्य वेद का साध्याय करनेवाले नौजवान राजा पृष्टगा कवच, खा और धनुष धारण किये हुए और राजमार आवेगे। वे आपम में एक दूसरे से ही साक्षात् अग्नि के समान यन के अग्निकुण्ड से । यहार प्रगसा प्राप्त करने की इच्छा से धन, स्न, प्रकट हुए हैं उन्हीं की बहन सर्वानमुन्दरी पदी गाय और तरह-तरह के खान पान के पदार्थ दान 20.00 ८७४ महाभारत [ आदपर्व roeocoooooo 70000000000000000 - प्रतिगृह्य च तत्सर्वं दृष्ट्वा चैव स्वयंवरम् । अनुभूयोत्सवं चैव गमिष्यामो यथेप्सितम् ॥ १५ ॥ नटा वैतालिकास्तत्र नर्तकाः सूतमागधाः नियोधकाश्च देशेभ्यः समेष्यन्ति महावलाः ॥ १६ । एवं कौतूहलं कृत्वा दृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च । सहाऽस्माभिर्महात्मानः पुनः प्रतिनिवय॑थ ॥ १७ ॥ दर्शनीयांश्च वः सर्वान्देवरूपानवस्थितान् समीक्ष्य कृष्णा वरयेत्संगत्यैकतमं वरम् ॥ १८ ॥ अथ भ्राता तव श्रीमान्दर्शनीयो महाभुजः । नियुज्यमानो विजये संगत्या द्रविणं बहु आहरिष्यन्नयं नूनं प्रीतिं वो वर्धयिष्यति युधिष्ठिर उवाच-परमं भो गमिष्यामो द्रष्टुं चैव महोत्सवम् भवद्भिः सहिताः सर्वे कन्यायास्तं स्वयंवरम् ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवागमने पडशीत्याधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ । करेंगे । हम ब्राह्मण लोग उनसे सब पदार्थ पायेंगे । और देखने में बड़े ही सुन्दर हो। इसलिये हमको फिर स्वयंवर और स्वयंवर के भारी उत्सव को देख जान पड़ता है कि द्रौपदी यदि तुम लोगों को देख चुकने पर अपने-अपने घर को लौट जायगे ॥११।१५।। पावेगी तो तुममें से एक को अपना पति स्वीकार कर इसके अतिरिक्त वहां अनेक देशो के नट, | ले तो असम्भव नहीं। जान पड़ता है, तुम्हारे महाभुज भाति-भाति के रूप धारण करनेवाले, वैतालिक मंगल | ( अर्जुन की ओर इशारा करके ) रूपवान् भाई चाहें गानेवाले, सूत पुराण की कथा कहनेवाले, मागधवश दिग्विजय करके बहुत सा धन प्राप्त कर सकते है। की वंशावली कहनेवाले महाबली योद्धा और नाचने | युधिष्ठिर ने कहा-अच्छी बात है। उस कन्या के गानेवाले लोग आगे । हे महात्माओ! तुम सब तरह स्वयम्वर और महोत्सव को देखने के लिये हम भी के तमाशे देखकर और दान ले करके हमारे साथ चलेंग ॥१६॥२०॥ लौट आना । तुम पाचों भाई देवों की तरह तेजस्वी आदिपर्व का एक सोछयासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ सप्तशीत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १८७ ।। वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ताः प्रयातास्ते पाण्डवा जनमेजय राज्ञा दक्षिणपञ्चालान्द्रुपदेनाऽभिरक्षितान् ॥ १ ॥ Prorserrrrrrrrr.worryrir ८७५ महा भारत अध्याय १८७ ] •02050concoconooncocor00core Hoooo acock । ततस्तेषु महात्मानं शुद्धात्मानमकल्मपम् ददृशुः पाण्डवा वीरा मुनि द्वैपायनं तदा तस्मै यथावत्सत्कारं कृत्वा तेन च सत्कृताः । कथान्ते चाऽभ्यनुज्ञाताः प्रययुद्रुपदक्षयम् पश्यन्तो रमणीयानि वनानि च सरांसि च तत्र तत्र वसन्तश्च शनैर्जग्मुर्महारथाः स्वाध्यायवन्तः शुचयो मधुराः प्रियवादिनः । आनुपूर्येण संप्राप्ताः पञ्चालान्पाण्डुनन्दनाः ॥ ५ ॥ ते तु दृष्ट्वा पुरं तच स्कन्धावारं च पाण्डवाः । कुम्भकारस्य शालायां निवास चक्रिरे तदा ॥ ६ ॥ तत्र भैक्ष्यं समाजन्हुाह्मणी वृत्तिमाश्रिताः तान्संप्राप्तांस्तथा वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित् ॥ ७ ॥ यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद्विवृणोति सः ॥ ८॥ सोऽन्वेषमाणः कौन्तेयं पाञ्चाल्यो जनमेजय । दृढं धनुरनायम्यं कारयामास भारत एक सौ सत्तासी अध्याय ॥ १८७ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! उन अच्छे, पवित्र, सुन्दर दर्शन, मीठी वाणी बोलनेवाले ब्राह्मणा के ये वचन सुनकर उन्हीं के साथ पाचों महारथी पाण्डव इसतरह चलकर स्वयम्बर के समय पाण्डा राजा द्रुपद से शासन दिये जाते हुए द क्षणीय | से पहले ही पाञ्चाल देश में पहुच गये ॥१५॥ पाचार देश की ओर चले। राह में उन वीरों को और यहा सेना के रहने के स्थानों को देखते शुद्ध हृदय निष्पाप महात्मा वेदव्यास जी मिले। हुए नगर के भीतर एक कुम्हार के घर में डेरा किया। उन्हें देखकर पाण्डवों ने प्रणाम और पूजन किया। वहा पर पाण्डव ब्रह्मणवृत्ति से भिक्षा मागकर रहने और वे भी उनसे सत्कार किये जाकर नाना वा राप लगे और उनके आने का हाल किसी ने नहीं जाना के पीछे उनकी आज्ञा से द्रुपद के नगर की ओर ॥६॥७॥ के राजा द्रुपद चले राह में उन्हें सैकड़ों मनोहर वन और सरोवर मन में सदा यही इच्छा थी कि मिले । उन मनोहर स्थानों में ठहर-ठहरकर पाण्डर उनी कन्या द्रौपदी के पति अर्जुन ही हो परन्तु रोग धीर धीरे आगे यदने रगे । म्याय में नियुक्त, वे अपनी यह इच्छा किसी के आगे पाट न करने Proom orokokokokok ८७६ म हा भारत [ आदिपर्व womame.comenormonound यन्त्रं वैहायसं चापि कारयामास कृत्रिमम् । तेन यन्त्रेण समितं राजा लक्ष्यं चकार सः द्रुपद उवाच-इदं सज्यं धनुः कृत्वा सजैरेभिश्च सायकैः । अतीत्य लक्ष्यं यो वेद्धा स लब्धा मत्सुतामिति ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-इनि स द्रुपदो राजा स्वयंवरमघोषयत् । तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः स समीयुस्तत्र भारत ॥ १२ ॥ ऋपयश्च महात्मानः स्वयंवरदिदृक्षवः दुर्योधनपुरोगाश्च सकर्णाः कुरवो नृप ॥ १३ ॥ ब्राह्मणाश्च महाभागा देशेभ्यः समुपागमन् ततोऽर्चिता राजगणा द्रुपदेन महात्मना उपोपविष्टा मञ्वेषु द्रष्टुकामाः स्वयंवरम् ततः पौरजनाः सर्वे सागरोद्भूतनिःस्वनाः शिशुमारशिरः प्राप्य न्यविशंस्ते स्म पार्थिवाः । प्रागुत्तरेण नगराभूमिभागे समे शुभे समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः थे । हे राजा जनमेजय ! अपनी इस इच्छा को पूर्ण | राजा द्रुपद के ऐसे स्वयम्बर की सूचना देने पर करने के लिये पाण्डवों की खोज कर रहे द्रुपद ने एक, राजा लोग उसे सुनकर वहां आने लगे ॥११॥१२॥ हरएक से न झुकाया जा सकनेवाला, दृढ धनुप और अनेक देशों से महात्मा महर्षि लोग, महाभाग और एक कृत्रिम यन्त्र बनवाया था ।.ऊपर उस ब्राह्मणगण और कर्ण तथा दुर्योधनादि कौरव स्वयम्बर चक्राकार घूम रहे यन्त्र को टॅगवाकर उन्होंने उसके । के देखने के लिये आ पहुंचे । महात्मा राजा द्रुपद ऊपर एक कृत्रिम मच्छली रखवा दी ॥८॥१०॥ ने उन सब भूपालों का सत्कार किया ॥१३॥१४॥ इसके उपरान्त चारों ओर यह डौडी पिटवा दी स्वयम्वर के दिन राजा लोग स्वयम्वर देखने के कि जो वीर इस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढावेगा और | लिये सजे हुए ऊँचे मञ्चों पर जा-जाकर बैठने लगे। वाण चलाकर उस वाण को इस घूम रहे चक्रयन्त्र उनके बैठने के लिये ईशान कोण में मञ्च बने हुए के भीतर से रुघाकर मच्छली का निशाना उड़ा देगा । थे, उन्हीं पर वे विराजमान हुए । नगरवासी प्रजा उसी को मेरी कन्या मिलेगी । द्रुपद को विश्वास था और अन्यान्य दर्शक भी आकर यथा स्थान बैठे । कि अर्जुन के सिवा और किसी में यह दुष्कर कार्य उस भीड़ का कोलाहल उमड़े हुए समुद्र के न हो सकेगा । वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! शब्द के समान सुन पड़ रहा था ! नगर के सामने 5500ocoocru 200 अध्याय १८७ ] महाभारत 100000 roenormooloo00103ococoom - प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः वितानेन विचित्रेण सर्वतः समलंकृतः ॥१७॥ तूर्योघशततंकीर्णः पराागुरुधूपितः चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामोपशोभितः. ॥१८॥ कैलासशिखरप्रख्येनभस्तलविलेखिभिः सर्वतः संवृतः शुभैः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रयैः ॥ १९ ॥ सुवर्णजालसंवीतर्मणिकुहिमभूपितैः सुखारोहणसोपा महासनपरिच्छदैः स्रग्दामसमवच्छन्नर रगुरूत्तमवासितैः हंसांशुवर्णेहुभिरायोजनसुगन्धिभिः ॥ २१ ॥ असंवाधशतहारैः शयनासनशोभितैः वहुधातुपिनन्द्राहिमवच्छिखरैरिव ॥ २२ ॥ तत्र नानाप्रकारेषु विमानेपु स्वलंकृताः स्पर्धमान स्तदाऽन्योन्यं निषेदुः सर्वपार्थिवाः ॥ २३ ॥ तत्रोपविष्टान्ददृशुर्महासत्वपराक्रमान् राजसिंहान्महाभागाकृष्णागुरुविभूषितान् ॥ २४ ॥ ही समतल विशुद्ध पूर्व उत्तर के ईशान कोण की मञ्चों या महलों में सुनहरे पर्दे पड़े थे और मणिमण्डित भूमि में सभा मण्डप बना था ॥१५ १६॥ थैठकें बनी हुई थीं। उनपर चढने को सुन्दर-सुन्दर उसके चारों ओर सुन्दर भवन बनाये गये थे सीठिया पनी हुई थीं। उनमें बहुत कीमती आसन चारों और परकोटा और खाई बनया दी गई थी। पिछे हुए थे ॥१९॥२०॥ द्वार पर सुन्दर बन्दनवार बंधी हुई थी और चित्र उनका सब सामान राजसी था। उनपर मालाएँ विचित्र चदोये तना दिये थे। सैकड़ा तुम्ही और टगी हुई थी और वहा उत्तम गुरु की सुवास छई नगाड़े वहा बज रहे थे । अगुर धूप की सुगन्ध चागें हुई थी । वे हस के समान सफेद देख पड़ते थे। ओर फैल रही थी। चारों ओर चन्दन के जल से एक एक भवन के सैंकड़ों द्वार थे। उनके भीतर छिड़काव हो रहा था । सब जगह फूलों की माला जाने की रोक टोक बिलकुल न थी। उत्तम पर बंध रही थीं ॥१७१८॥ और खाने पीने की समप्रिया सत्र में रक्खी हुई थीं। सब स्थानों पर पैलास शिखर ऐसे ऊँचे मनोहर | सब भवन तरह-तरह की धातुओं के रगों से र मच और महल गानों आकाश को छू रहे थे । उन हुए होने के कारण हिमाचल के शिखर से जान - 3rnymJoshimroJr."
८७८ महा भारत [ आदिपर्व Taoiconomooooooo500 । .. :kokomococokomorrocorrorkorerror महाप्रसादान्ब्रह्मण्यान्स्वराष्ट्रपरिरक्षिणः प्रियान्सर्वस्य लोकस्य सुकृतै कर्मभिः शुभैः ॥ २५ ॥ मञ्चेषु च परायेषु पौरजानपदा जनाः कृष्णादर्शनसिध्यर्थं सर्वतः समुपाविशन् ब्राह्मणस्ते च सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन् । ऋद्धिं पञ्चालराजस्य पश्यन्तस्तामनुत्तमाम् ॥ २७ ॥ ततः समाजो ववृधे स राजन्दिवसान्वहून रत्नप्रदानबहुलः शोभितो नटनर्तकः ॥ २८ ॥ वर्तमाने समाजे तु रमणीयेऽहि पोडशे । आप्लुतांगी सुवसना सर्वाभरणभूषिता ॥ २९ ॥ मालां च समुपादाय काञ्चनीं समलंकृताम् । अवतीर्णा ततो रई द्रौपदी भरतर्षभ ॥ ३० ॥ पुरोहितः सोमकानां मंत्रविबाह्मणः शुचिः । परिस्तीर्य जुहावाऽग्निमाज्येन विधिवत्तदा ॥ ३१ ॥ सतर्पयित्वा ज्वलनं ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च । वारयामास सर्वाणि वादित्राणि समन्ततः ॥ ३२ ॥ पड़ते थे ॥२१॥२२॥ की अनुपम समृद्धि और ऐश्वर्य को देखने लगे। परम्पर एक दूसरे के साथ ईर्षा सी करके अनेक | हे राजन् ! इसतरह पन्द्रह दिन से जुड़ रहा वह प्रकार के कपड़ों और गहनों से सजे हुए राजा लोग समाज दिन-दिन बढ़ता ही जा रहा था। अनेक प्रकार उन मनोहर विमानों पर बैठने लगे। उन महावली, | के नट और नाचनेवाले आकर अपना करतब दिखाने महापराक्रमी, महाभाग्यवान् , कृष्णागुरु और चन्दन थे। उनको यहुत सा धन मिलता था ॥२७॥२८॥ के अंगरागों से शोभित, प्रसन्न होकर बहुन उपकार हे भरतश्रेष्ठ ! सोलहवें दिन म्नान करके बढ़िया करनेवाले, ब्राह्मणों के हितकारी, अपने राज्य की रक्षा कपड़े और गहने पहनकर, सोने की जयमाला हाथ करनेवाले और शुभ सुकृत कमों के द्वारा लोक-प्रिय में लिये, द्रौपदी उम रंगभूमि में आई ॥२९॥३०|| नरपतियों को देखते हुए पुरवासी लोग, द्रौपदी के तय चन्द्रवंश के पुरोहित ने मन्त्र पढ़कर आणि दर्शन की अभिलापा से, अपने-अपने मञ्चों पर बैठने में पी का हवन और ब्राह्मणों के साथ स्वस्त्ययन-पाठ लगे ॥२३॥२६॥ आरम्भ किया। इसतरह हवन के द्वारा अग्निदेव को पाण्डव भी ब्राह्मणों के मध्य में बैठकर राजा द्रुपद सन्तुष्ट करने के उपरान्त सब बाजों का बजना रोक्या - rood अध्याय १८८ ] महाभारत ८७९ 50oooor cocoxove निःशब्दे तु कृते तम्मिन्धृष्टद्युम्नो विशांपते । कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥ ३३ ॥ रंगमध्ये गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम् ॥ ३४ ॥ इदं धनुर्लक्ष्यमिमे च वाणाः शृण्वन्तु मे भूपतयः समेताः । छिद्रेण यन्त्रस्य समर्पयध्वं शरैः शितैयामचरैर्दशाधैः एतन्महत्कर्म करोति यो वै कुलेन रूपेण वलेन युक्तः तस्याऽद्य भार्या भगिनी ममेयं कृष्णा भवित्री न मृपाब्रवीमि ॥ ३६ तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः पश्चादिदं तो भगिनीमुवाच । नाम्ना च गोत्रेण च कर्मणा च संकीर्तयन्भूमिपतीन्समेतान् ॥३७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपाणि धृष्टद्युम्नवाक्ये सताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥ दिया गया ॥३१॥३२॥ सत्कुल, रूप और बल से युक्त पुरुष इन पांच वाणों हे पृथ्वीनाथ! बाजा बन्द होने पर जब समा-मण्डप के द्वारा इस यन्त्र के भीतर से इस निशाने को में सन्नाटा छा गया तब धृष्टद्युम्न ने द्रौपदी के साथ काटकर गिरा देगा उसी अद्भुत कर्म करनेवाले को रंगभूमि में खड़े होकर मेघ के समान गम्भीर शब्द से मेरी बहन यह द्रौपदी प्राप्त होगी । अब द्रुपद के स्पष्ट-स्पष्ट यों कहा-हे एकत्र हुए नरपतियो । तुम पुत्र धृष्टद्युम्न अपनी बहन को जमा हुए राजाओं में सब एकाग्र होकर सुनो । यह धनुष, ये पांच बाण से हर एक का नाम, गोत्र और उनके कार्य बतलाने और यह निशाना है । मै मिथ्या नहीं कहता; जो लगे ॥३३॥३७॥ आदिपर्व का एक सौ सत्तासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १८ ॥ वृष्टान वाच-दुर्योधनो दुर्विपहो दुर्मुखो दुष्प्रधर्षणः विविंशतिर्विकर्णश्च सहो दुःशासनस्तथा युयुत्सुर्वायुवेगश्च भीमवेगरवस्तथा उपायुधो बलाकी च करक युविरोचनः एक सौ अट्टासी अध्याय ॥ १८८॥ धृष्टद्युम्न ने कहा- हे बहन ! यह देखो, दुर्योधन, सह, दुशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेग, मीमरव, दुर्विपद, दुर्मुख, दुप्पधर्षण, विविंशति, विकर्ण, उग्रायुध, बलाकी, कनकायु, विरोचन, कुण्टक, - । roronoryncro म हा भारत [ आदिपर्व o 00000000.0hoooooooooococorecca - कुण्डकश्चित्रसेनश्च सुवर्चाः कनकध्वजः नन्दको वाहुशाली च तुहुण्डो विकटस्तथा ॥ ३ ॥ एते चाऽन्ये च बहवो धार्तराष्ट्रा महाबलाः । कर्णेन सहिता वीरास्त्वदर्थं समुपागताः असंख्याता महात्मानः पार्थिवाः क्षत्रियर्षभाः । शकुनिः सौबलश्चैव वृषकोऽथ बृहद्वलः एते गान्धारराजस्य सुताः सर्वे समागताः । अश्वत्थामा च भोजश्च सर्वशस्त्रभृतां वरौ समवेतौ महात्मानौ त्वदर्थे समलंकृतों बृहन्तो मणिमांश्चैव दण्डधारश्च पार्थिवः सहदेवजयत्सेनौ मेघसन्धिश्च पार्थिवः विराटः सह पुत्राभ्यां शङ्खनैवोत्तरेण च वार्धक्षेमिः सुशर्मा च सेनाविन्दुश्च पार्थिवः । सुकेतुः सह पुत्रेण सुनाम्ना च सुवर्चसा सुचित्रः सुकुमारश्च वृकः सत्यधृतिस्तथा । सूर्यध्वजो रोचमानो नीलश्चित्रायुधस्तथा ॥ १० ॥ अंशुमांश्चेकितानश्च श्रेणिमांश्च महाबलः समुद्रसेनपुत्रश्च चन्द्रसेनः प्रतापवान् जलसन्धः पितापुत्रौ विदण्डो दण्ड एव च पौण्ड्रको वासुदेवश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १२ ॥ चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, नन्दक, बाहुशाली, | धारियों में श्रेष्ठ महात्मा अश्वत्थामा और भोज भी तुहुण्ड, विकट और अन्यान्य महाबली घृतराष्ट्र के | तुम्हारे लिये अनेक गहने पहने इस समाज में आये पुत्र कर्ण को साथ लिये हुए तुम्हारे वास्त यहां | है । राजा वृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, पर बैठे हैं ॥१४॥ जयसेन, मगधराज, मेघसन्धि, विराट् और उनके और भी अगणित क्षत्रिय-श्रेष्ठ महात्मा राजा लोग | दोनों पुत्र शह और उत्तर, वार्धक्षगी सुशर्मा, आये हैं । यह देखो, गान्धारराज सुचल के पुत्र | सेनाबिन्दु, मुकेतु और उनके दोनों पुत्र सुवर्चा शकुनि, वृपक और वृहद्दल आये हैं । ये शस्त्र- ! और मुनामा, मुनित्र, मुकुमार, वृक, सत्यति, - ra ८८१ महाभारत अध्याय १८८ ] oooo boorce 10500050orosconcocono. - кәскускокоса - woozoooo कलिङ्गस्ताम्रलिप्तश्च पत्तनाधिपतिस्तथा मद्रराजस्तथा शल्यः सहपुत्रो महारथः ॥ १३ ॥ रुक्माङ्गदेन वीरेण तथा रुक्मरथेन । कौरव्यः सोमदत्तश्च पुत्रश्चाऽस्य महारथः ॥१४॥ समवेतास्त्रयः शूरा भूरिभूरिश्रवाः शलः सुदक्षिणश्च काम्बोजो दृढधन्वा च पौरवः ॥ १५ ॥ वृहद्वलः सुपेणश्च शिविरौशीनरस्तथा पटचरनिहन्ता च कारूपाधिपतिस्तथा संकर्षणो वासुदेवो रौक्मिणेयश्च वीर्यवान् । साम्वश्च चारुदेष्णश्च प्रायग्निः सगदस्तथा ॥१७॥ अक्रूरः सात्यकिश्चैव उद्धवश्च महामतिः कृतवर्मा च हार्दिक्यः पृथुर्विपृथुरेव च विदूरथश्च कङ्कश्च शंकुश्च सगवेपणः आशावहोऽनिरुन्द्वश्च समीकः सारिमेजयः वीरो वातपतिश्चैव झिल्ली पिण्डारकस्तथा उशीनरश्च विक्रांतो वृष्णयस्ते प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ भगीरथो वृहत्क्षत्रः सैन्धवश्च जयद्रथः बृहद्रथो वाहिकश्च श्रुतायुश्च महारथः सूर्यधज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान् , निहन्ता, कारूपनरेश तथा सङ्कर्षण, वासुदेव कृष्ण, चकितान, महाबली श्रेणिमान् , समुद्रभेन के प्रतापी रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्न के पुत्र चन्द्रमेन, जलसन्ध, विदण्ड और उनके पुत्र पुत्र अनिरुद्ध, गद, अकर, सात्यकि, महामति उद्धव, पौण्डक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिङ्ग- कृतवर्मा, हार्दिक्य, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कङ्क, शंकु, नरेश, ताग्रलिप्त, पत्तनाधिपति, मद्रराज शल्य और । गवेषण, आशावह, निरुद्ध, समीक, सारिमेजय, वीर• उनके पुत्र महारथी वीर रुक्मागद और स्क्मरथ, वातपति, झिल्ली, पिण्डारक और उशीनर आदि कुरुवंशी सोमदत्त और उनके महारथी पुत्र, भूरि, , प्रमिद्ध वृष्णिवंश के यादव, भगीरथ, वृहत्क्षत्र, भूरिश्रया, शूरशल, सुदक्षिण, काम्बोज,पौरव दृढधन्वा, सिन्धुगज, जयद्रथ, वृहद्रथ, वाहीक, महारथी वृहल, सुपेण, उशीनर के पुत्र शिवि, पटञ्चर श्रुत'यु, उलूक, कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् , दण्ड, महा भारत [ आदिपर्व 7303o30700cdoot -oracocorrurcorcococoic उलूकः कैतवो राजा चित्राङ्गदशुभांगदौ । वत्सराजश्च मतिमान्कोसलाधिपतिस्तथा शिशुपालश्च विक्रान्तो जरासन्धस्तथैव च ॥ २२ ॥ एते चाऽन्ये च बहवो नानाजनपदेश्वराः । स्वदर्थमागता भद्रे क्षत्रियाः प्रथिता भुवि ॥ २३ ॥ एते भेत्स्यन्ति विक्रान्तास्त्वदर्थे लक्ष्यमुत्तमम् । विध्येत य इदं लक्ष्यं वरयेथाः शुभेऽद्य तम् ॥ २४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयम्परपर्वणि राजकीतने अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ । वत्सराज, कोशलनरेश, शिशुल, पराक्रमी जरासन्ध जो इस लक्ष्य का विद्ध करेगा उसी को तुम पति-रूप और अन्यान्य जगत्प्रसिद्ध गजा लांग तुम्हारे लियस वरण करना ॥५॥२४॥ यह निशाना बेधने का यहां आय है । हे शुभे ! । आदिपर्व का एक सौ अट्टासी अध्याय समाप्त हुआ। अथ ऊननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८९ ॥ वैशम्पायन उवाच-तेऽलंकृताः कुण्डलिनो युवानः परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्राः । अस्त्रं बलं चात्मनि मन्यमानाः सर्वे समुपेतुरुदायुधास्ते ॥ १ ॥ रूपेण वीर्येण कुलेन चैव शीलेन वित्तेन च यौवनेन । समिद्धदर्पा मदवेगभिन्ना मत्ता यथा हैमवता गजेन्द्राः ॥ परस्परं स्पर्धया प्रेक्षमाणाः संकल्पजेनाऽभिपरिप्लुताङ्गाः । कृष्णा ममैवेत्यभिभापमाणा नृपासनेभ्यः सहसोदतिष्ठन् ॥ ३ ॥ तेक्षत्रिया रंगगताः समेता जिगीपमाणा द्रुपदात्मजां ताम् । चकाशिर पर्वतराजकन्यामुमा यथा देवगणाः समेताः ॥ ४ ॥ एक सा नवासी अध्याय ॥ १८९ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके से उठने लगे । सभी रूप, पराक्रम, कुल,शील पश्चात् अनक गहनों से सजे हुए, कानों में कुण्डल विभव और जवानी के गर्व से भरे पहने, नौजवान राजा लोग मानों परम्पर ईपी करके कपोलों से मदजल बह रहा हो उस हिमालय अपने को ही महाबली और अस्त्र-शिक्षा में बेजोड़ | प्रदेश के मस्त हाथी के समान ये राजा झूम जानकर हथियार उठाये हुए अपने-अपने आसन रहे थे ॥१२॥ थे। जिसके amorrorarrori.r>-Jr.ory अध्याय १८९ ] महाभारत ८८३ raneprooooo 20000 coroorcoicinco .. कन्दर्पवाणाभिनिपीडिताका कृष्णागतैस्ते हृदयनरेन्द्राः । रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं द्वेषं प्रचक्रुः सुहृदोऽपि तत्र ॥ ५ ॥ अथाऽऽययुर्देवगणा विमाने रुद्रादित्या वसवोऽथाऽश्विनौ च । साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च ॥ ६ ॥ दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च देवर्पयो गुह्यकाश्चारणाश्च । विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च गन्धर्वमुख्याः सह साऽप्सरोभिः ॥ ७ ॥ हलायुधस्तत्र जनार्दनश्च वृष्ण्यन्धकाश्चैव यथाप्रधानम् । प्रेक्षा स्म चक्रुर्यदुपुङ्गवास्ते स्थिनाश्च कृष्णस्य मते महान्तः ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा तु तान्मत्तगजेन्द्ररूपान्पश्चाभिपद्मानिव वारणेन्द्रान् । भस्मावृतांगानिव हव्यवाहान्कृष्णः प्रदध्यौ यदुवीरमुख्यः ॥ ९ ॥ शशंस रामाय युधिष्ठिरं स भीमं सजिष्णुं च यमौ च वीरौ । शनैः शनैस्तान्प्रसमीक्ष्य रामो जनार्दनं प्रीतमना ददर्श ह ॥१०॥ अन्ये तु वीरा नृपपुत्रपौत्राः कृष्णागतैनॆत्रमनः स्वभावैः व्यायच्छमाना ददृशुर्न तान्दै संदष्टदन्तच्छदताम्रनेत्राः ॥११॥ परस्पर एक दूसरे की ओर ईपी के साथ देखकर । गुह्यकगण, चारणगण, विश्वावसु, नारद, ऋषि, पर्वत "द्रोपदी मेरी ही होगी" कहते हुए वे अपने अपने और अप्सराओं सहित तुम्बुरु आदि प्रधान प्रधान आसन से उठ खड़े हुए ! कृष्णा को प्राप्त करने गन्धर्व भी उस समाज में आये । और सब राजा तो के सङ्कल्प से सभी उत्साहित हो उठे । द्रौपदी को उठकर द्रौपदी को प्राप्त करने के उद्योग में लग गये, प्राप्त करने की अभिलापा से रगभूमि में जमा हुए ! परन्तु महारमा कृष्ण की सम्मति के अनुमार बलदेव वे राजा लोग पार्वती को पाने के लिये एकत्र हुए और कृष्ण जिनके मुखिया थे वे वृष्णि और अन्धक देवताआ के समान जान पड़ने लगे ॥३४॥ वश के यादव अपने अपने स्थान पर ही बैठे-बैठे द्रौपदी को देखते ही सब राजा रीझर काम प्रश तमाशा देखने लगे । यदुवीरों म प्रधान कृष्ण ने हो गये थे । उसको प्राप्त करन के लिये मित्र और । रक्ष्मी के अभिमुख स्थित गजराज और राख में छिपी नातदार राजा भा परस्पर एक दूसरे को डाह और हुई आग के समान पानों पाण्डवों को देखकर द्वेष की दृष्टि से देखने लगे। इसी समय स्ट्रगण, अनुमान से पहच न लिया और फिर बल्देव से आदित्यगण, बसुगण,दोना अश्विनीकुमार,साध्यगण, धीरे से कहा कि वे पाचों पुरुपसिंह अवश्य युधिष्ठिर, मरुद्गण, यमराज, कंचर आदि देवता अपने रथों भाम, अर्जुन, नकुल और सहदेव है । तब बर राम पर बैठकर वहा आये ॥५॥६॥ ने भी धीर धीरे उनकी ओर देखकर प्रसन्नता प्रकट दत्याण, सुरणंगण, महोरगगण, देवपिगण, करते हुए कृष्ण की ओर देखा ॥७॥१०॥ Porror com ८८४ महाभारत [ आदिपर्व 05c00000 00oor0000.000000co -4 तथैव पार्थाः पृथुवाहवस्ते वीरौ यमौ चैव महानुभावौ । तां द्रौपदी प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे कन्दर्पबाणाभिहता बभूवुः ॥ १२ ॥ देवर्षिगन्धर्वसमाकुलं तत्सुपर्णनागासुरसिद्धजुष्टम् दिव्येन गन्धेन समाकुलं च दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणम् ॥ १३ ॥ महास्वनैर्दुन्दुभिनादितैश्च बभूव तसंकुलमन्तरिक्षम् विमानसंवाधम भूत्समन्तात्सवेणुवीणापणवानुनादम् ॥ १४॥ ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च । सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्यद्रोणायनिक्राथसुनाथवकाः ॥ १५॥ कलिंगवंगाधिषपाण्डयपौण्ड्रा विदेहराजो यवनाधिपश्च अन्ये च नानानृपपुत्रपौत्रा राष्ट्राधिपाः पङ्कजपत्रनेत्राः किरीटहाराङ्गादचक्रवालैर्विभूपिताङ्गाः पृथुवाहवस्ते अनुक्रम विक्रमसत्वयुक्ता बलेन वीर्येण च नर्दमानाः ॥ १७॥ तत्कार्मुकं संहननोपपन्नं सज्यं न शेकुर्मनसाऽपि कर्तुम् ते विक्रमन्तः स्फुरतादृढेण विक्षिप्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः ॥ १८ ॥ विचेष्टमाना धरणीतलस्था यथावलं शैक्ष्यगुणक्रमाच्च गतौजसः स्रस्तकिरीटहारा विनिःप्वसन्तः शमयांवभूवुः ॥ १९ ॥ और-और राजा, राजाओं के बेटे और पोते अपने / नगाड़े बजाते हुए स्वयम्बर समाज पर फूलों की वर्षा नत्र, मन और स्वभाव को द्रौपदी में लगाकर उसको करने लगे। आकाश में जमा हुए असंख्य रथ एक लेने के जोश से होठों को काटने हुए लाल-लाल | दूसरे से सटे हुए थे। रथों पर स्थित दर्शक बांसुरी, नेत्र किये द्रौपदी को ही बारम्बार देख रहे थे । इस | वीणा, मृदा आदि वाजों को मधुर स्वर से बजाने कारण उनमें से किसी ने पाण्डवों की ओर देखा लगे ॥१३॥१४॥ तक नहीं । पृथुबाहु पृथापुत्र युधिष्ठिर भीम और भय किरीट, हार, गजुल, चक्रवाल आदि गहने, अर्जुन तथा महानुभाव वीर नकुल और सहदेव ये पहने, महाबाहु, महाबली, बल और वीर्य के घमण्ड सब भी उस समय द्रौपदी को देखकर मदनबाण से | से भरे हुए कर्ण, दुर्योधन, शाल्प, गल्य, अश्वत्थामा, घायल हुए थे ॥११॥१२॥ काय, सुनीय, वक्र, कलिंगराज, वगनरेश, पाण्य- .हे राजन् ! अन्तरिक्ष में दिव्य गन्ध लगाये हुए ! नरेश, पाण्डनरेश, विदेहनरेश, यवनाधिा और देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, नाग, अतुर, सिद्ध आदि की अन्यान्य अनेक देशों के स्वामी राजा और राजकुमार भीड़ हो गई। ये लोग आकाश में प्रसनतासूचक द्रौपदी को प्राप्त करने के लिये -अपना-अपना पर अध्याय १८९ ] म हा भारत ॥ हाहाकृतं तदनुषा दृढेन विस्रस्तहारांगदचक्रवालम् कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तकामं राज्ञां तदा मण्डलमार्तमासीत् ।। २० ।। सर्वान्नृपास्तान्प्रसमीक्ष्य को धनुर्धराणां प्रबरो जगाम उद्धृत्य तूर्ण धनुरुद्यतं तत्सज्यं चकाराऽऽशु युयोज वाणान् ॥ २१ ॥ दृष्ट्वा सूतं मेनिरे पाण्डुपुत्रा भित्वा नीतं लक्ष्यवरं धरायाम् । धनुर्धरा रागकृतप्रतिज्ञमत्यग्निसोमार्कमथाऽर्कपुत्रम् ॥ २२ ॥ दृष्ट्वा तु तं द्रौपदी वाक्यमुच्चैर्जगाद नाऽहं वरयामि सूतम् । सामर्पहासं प्रसमीक्ष्य सूर्य तंत्याज कर्णः स्फुरितं धनुस्तत् ॥ २३ ॥ एवं तेषु निवृत्तेपु क्षत्रियेषु समन्ततः चेदीनामधिपो वीरो बलवानन्तकोपमः ॥२४॥ दमघोपसुतो धीरः शिशुपालो महामतिः धनुरादायमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ॥ २५॥ ततो राजा महावीर्यों जरासन्धो महाबलः धनुपोऽभ्याशमागत्य तस्थौ गिरिरिवाऽचलः ॥ २६ ॥ धनुपा पीड्यमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् । तत उत्थाय राजा स स्वराष्ट्राण्यभिजग्मिवान् ॥ २७ ॥ और कौशल दिखाने रगे। परन्तु वे मन से भी उस तव सर राजाओं को बल-हीन देखकर धनुप- धनुष पर पत्यश्चा चढाने में समर्थ नहीं हुए ॥१५॥१८॥ धारियों में श्रेष्ठ कर्ण ने शीघ्र ही धनुष को उठाकर क्रमश ये अपने घर, शिक्षा और गुण के अनु उसपर वाण चढाया । अनि, चन्द्र और सूर्य के सार धनुप चढाने में विक्रम दिखाने की चेष्टा करने तुल्य मूर्य-पुत्र कर्ण को उत्साह के कारण सफलता पर उस धनुप के झटके से पृ.पी पर गिर-गिरकर प्राप्त करते देखकर पाण्डवों ने समझा कि यस अर गटने लगे। उनके सिर से मुकुट और कण्ठ से वह रक्ष्य कटकर पृथ्वी पर गिरा ही चाहता है हार गिर पड़े । अन्त को रम्बी-लम्बी साँसे लेकर इसी बीच में द्रोपदी ने खड़े होकर बड़े ऊँन पर वे सब धनुष नहाना छोड़कर अपने-अपने स्थान | से कहा-"मैं इम सूतपुत्र के साथ स्वयम्बर में पर पेठ गये । जिन के मुकुट और हार म्यान-प्रष्ट विवाह न गी" | यह सुनकर सूतपुत्र कर्ण ने होकर गिर गये थे वे राजा ई पदी के पाने की कोध-सूनक हंसी हमार और सूर्य की ओर देखकर आमा छोड़कर हाय-हाय करते हुए शोक प्रकट वह प्रकाशमान् धनुष यहीं रख दिया ॥२१॥२३॥ मरने रंगे ॥११॥२०॥ सभा में उपस्थित राजाओं में से पानी के बेट - - com [आदिपर्व ८८६ म हा भारत roororeoroncoreoroorOcto7000vorocko0OOccor ततः शल्यो महावीर्यों मद्रराजो महाबलः । तदप्यारोप्यमाणस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ॥ २८ ॥ तस्मिंस्तु सम्भ्रान्तजने समाजे निक्षिप्तवादेषु जनाधिपेषु । कुन्तीसुतो जिष्णुरियेष कर्तुं सज्यं धनुस्तत्सशरं प्रवीरः ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजपराङ्मुख उननवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८९ ॥ जाने पर अन्त को महावी, महापराक्रमी चेदि-नरेश भी कुछ ही जांघों तक धनुष को उठाया और शरों दमघोष के पुत्र शिशुपाल उस धनुप पर डोरी चढ़ाने के न चढ़ने से उसे पृथ्वी पर धर दिया। इसप्रकार को चले। चेष्टा करते ही वे धनुप के झटके से दोनों | अपमानित होकर सब राजाओं के निवृत होने पर घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़े ॥२४॥२५॥ रङ्गभूमि में उपस्थित समाज आस्थिर हो उठा । तब तब महाबली महाराज जरासन्ध धनुष के पास कुन्ती के पुत्र वीरश्रेष्ठ अर्जुन उस धनुप पर डोरी और पहुंचे । वे भी शिशुपाल की तरह विफल होकर | वाण चढ़ाकर लक्ष्य-बैध करने के लिये उठे । घुटनों के बल गिर पड़े ॥२६॥२७॥ ॥२८॥२२॥ तत्पश्चात् महाविक्रमी, मद्रदेश के राजा शल्य ने आदिपर्व का एक सौ नवासी अध्याय समाप्त हुआ। . । - अथ नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ।। वैशम्पायन उवाच-यदा निवृत्ता राजानो धनुषः सज्यकर्मणः । अथोदतिष्टद्विप्राणां मध्याजिष्णुरुदारधीः उदकोशन्विप्रमुख्या विधुन्वंतोऽजिनानि च दृष्ट्वा संप्रस्थितं पार्थमिन्द्रकेतुसमप्रभम् केचिदासन्तिमनसः केचिदासन्मुदान्विताः आहुः परस्परं केचिन्निपुणा बुद्धिजीविनः एक मौ नव्ये अध्याय ॥ १९० ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धनुष | उदास हो गये कि यह ब्राह्मण भी विफल-प्रयत्न होकर चढ़ाने के उद्योग से एक-एक करके सब राजाओं के । हम ब्राह्मणों की हंसी करायेगा। और कुछ बामण यह हट जाने पर ब्राह्मणों के बीच से वीर अर्जुन उठ । सोचकर प्रसन्न हुए कि यदि यह ब्राह्मण इस अद्भुत खड़े हुए । प्रधान-प्रधान ब्राह्मण लोग बादलसमान ' कार्य में सफलता प्राप्त कर लेगा तो ब्राह्मणों की कीर्ति प्रकाशयुक्त अर्जुन को जाते देख कर मृगचर्म हिलाते , बढ़ेगी । ब्राह्मणों में से जिन्हें अपनी बुद्धि का अभिमान हुए कोलाहल करने लगे। कुछ ब्राह्मण यह समझकर था वे आपस में रहने लगे कि धनुर्वेद के जानकार -- । cocococcorrecorrorosco.ors, अध्याय १९०] म हा भारत ८८७ 2000 yoo04 यत्कर्णशल्यप्रमुखैः क्षत्रियर्लोकविश्रुतैः नाऽऽनतं बलवद्भिर्हि धनुर्वेदपरायणैः ॥ ४ ॥ तत्कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्वलीयसा बटुमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः ॥ ५ ॥ अवहास्या भविष्यन्ति ब्राह्मणाः सर्वराजसु । कर्मण्यस्मिन्नसंसिद्धे चापलादपरीक्षिते यद्यप दर्पाद्धर्षाद्वाऽप्यथ ब्राह्मणचापलात् प्रस्थितो धनुरायन्तुं वार्यतां साधु मा गमत् ॥ ७ ॥ ब्राह्मणा ऊचु-नाऽवहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः। न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥ केचिदाहुर्युवा श्रीमान्नागराजकरोपमः पीनस्कन्धोरुवाहुश्च धैर्येण हिमवानिव सिंहखलगतिः श्रीमान्मत्तनागेन्द्रविक्रमः संभाव्यमम्मिन्कर्मेदमुत्साहाचाऽनुमीयते शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्तः स्वयं व्रजेत् । न च तद्विद्यते किंचित्कर्म लोकेषु यद्भवेत् ॥ ११ ॥ और मुशिक्षित कर्ण, शल्य आदि जगप्रसिद्ध क्षत्रिय लोग हमसे मनुता भी न रक्खेंगे ॥१७॥ ही जब इस धनुप को नहीं झुका सके तब यह कुछ ब्राह्मणों ने कहा-यह सुन्दर युवक हाथी अत्रविद्या में अनाड़ी, दुर्वल-हृदय ब्राह्मण बालक कैसे | के पाठे के समान पुष्ट और चली देख पड़ता है। इस काम को कर सकेगा बालसुरभ चचरता के | देखो, इसकी भुजाएँ हाथी की सूड के सदृश है। कारण विना विचारे यह ब्रह्मचारी इस कार्य के लिये । जाय, कथा और भुजा बड़ी पुष्ट हैं। और धैर्य आगे बढा है। अवश्य ही यह बालक दर्प, हर्ष या हिमाचल पहाड़ का सामालम होता है। चाल इसकी ब्राहाणमुनम चश्चलता के कारण धनुष पर दोरी चदाने सिंह के समान और पराक्रम मतवाले हाथी का सा को तैय्यार हुआ है। कार्य सिद्ध न होने पर हम सब । है । इसके उत्साह को देखकर अनुमान होता है ब्राह्मणों को इस राजमण्डली के आगे उपहास-पात्र कि यह इस अद्भुत कार्य में सफरता प्राप्त कर ले बनना पड़ेगा । इसलिये इम ब्रह्मचरी को रोक देना तो कुछ आश्चर्य नहीं ॥८॥१०॥ ही ठीक है । ऐसा करने से न तो राजसमाज में इसके मारी उत्साह से ही इसकी शक्ति का पता हमारी हसी होगी और न अपमान ही होगा । राजा लगता है। यदि यह अमत्त होता तो इसतरह rsions [ आदिपर्व peorooracaoor ८८८ महाभारत Sood posic ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु अभक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः दुर्बला अपि विप्रा हि वलीयांसः स्वतेजसा । ब्राह्मणो नाऽवमन्तव्यः सदसद्वा समाचरन् ॥ १३ ॥ सुखं दुःखं महद्धस्वं कर्म यत्समुपागतम् । जामदग्न्येन रामेण निर्जिता क्षत्रिया युधि ॥ १४ ॥ पीतः समुद्रोऽगस्त्येन अगाधो ब्रह्मतेजसा । तस्माद् ब्रुवन्तु सर्वेऽत्र वटुरेप धनुर्महान् ॥ १५ ॥ आरोपयतु शीघ्रं वै तथेत्यूचुद्धिजर्षभाः । एवं तेषां विलपतां विप्राणां विविधा गिरः ॥ १६ ॥ अर्जुनो धनुपोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाऽचलः । स तद्धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाऽकरोत् प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् । कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चाऽर्जुनो धनुः ॥ १८ ॥ यत्पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रराधेयदुर्योधनशल्यशाल्वैः तदा धनुर्वेदपरैर्नृसिंहैः कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात् ॥ १९ ॥ उठकर कभी न जाता । मनुष्य, देवता और असुर, यह ब्राह्मणकुमार झटपट इस धनुप को चढ़ाकर आदि में कोई ऐसा काम नहीं है जो ब्राह्मणों से | लक्ष्य-बंध कर ले। तब सब ब्राह्मणों ने मिलकर साध्य न हो । यद्यपि ब्राह्मण जल, वायु, फल खाने । ऐसा ही हो' कहकर इस कथन का अनुमोदन किया और दृढ़ व्रतों के करने से निर्मल होते हैं परन्तु ॥११॥१५॥ उनका तेज बड़ा बलवान होता है । ब्राह्मण चाहे वैशम्पायन ने कहा-हे राजन्! इधर ब्राह्मण लोग सत्कर्म करे चाहे असत्कर्म, तथापि यह सोचकर कि आपस में इसतरह बातचीत कर रहे थे, उधर वह उपस्थित सुखदायक या दुःखजनक और छोटे | अर्जुन उस धनुष के पास जाकर पर्वतराज के समान या बड़े काम को नहीं कर सकता, उसका अपमान खड़े हो गये । फिर उस धनुष की प्रदक्षिणा करके कभी न करना चाहिये । देखो, परशुराम ने युद्ध में. उन्होंने वरदानी महादेव को प्रणाम किया। इसके क्षत्रियों का इयोस वर नाग किया है और अगस्त्यमुनि पश्चात् मन ही मन में श्रीकृष्ण को स्मरण करके ने ब्रह्मतेज के प्रभाव से अथाह समुद्र को पी लिया । अर्जुन ने उस धनुप को उठा लिया। रुक्म, सुनीथ, है । इस कारण आप सब वामग आशीर्वाद करें कि कर्ण, दुर्योधन, शल्य और शाल्व आदि धनुर्वेद - बक, ocio-0010 Poor.ooooz.iorical सम्पर-ममार में अर्जुन का लक्ष्य को बंधकर दोपदी से प्राप्त करना ।
- 200004 अध्याय १९० महाभारत ८८९ soonrowood तदर्जुनो वीर्यवतां सदर्पस्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः । सज्यं च चक्रेनिमिपान्तरेणं शरांश्च जग्राह दशार्धसङ्घयान् ॥ २०॥ विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च च्छिद्रेण भूमौ सहसाऽतिविद्धम् । ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः समाजमध्ये च महान्निनादः ॥ २१ ॥ पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः। चैलानि विव्यधुस्तत्र ब्राह्मणाश्च सहस्रशः ॥२२॥ विलक्षितास्ततश्चक्रुर्हाहाकारांश्च सर्वशः न्यपतंश्चात्र न भसः समन्तात्पुष्पवृष्टयः ॥ २३ ॥ शताङ्गानि च तूर्याणि वादकाः समवादयन् । सूतमागधसंघाश्चाऽप्यस्तुवंस्तत्र सुस्वराः ॥ २४ ॥ तं दृष्ट्वा द्रुपदः प्रीतो वभूव रिपुसूदनः सह सैन्यैश्च पार्थस्य साहाय्यार्थमियप सः ॥ २५ ॥ तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृद्धे युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । आवासमेवोपजगाम शाधं साधयमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम् ।। २६ ।। विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा पार्थं च शकप्रतिमं निरीक्ष्य। आदाय शुक्लाम्बरमाल्यदाम जगाम कुंतीसुनमुत्स्मयन्ती ॥ २७ ॥ के पूरे पण्डित श्रेष्ठ क्षत्रिय राजा लोग विशेष यत्न के पूलों की वर्षा करने लगे। सहस्रों ब्राह्मण अपने करके भी जिस धनुष पर डोरी नहीं चढा सके उसी वस्त्रों के केर उड़ाते हुए उठ खड़े हुए। जो लोग धनुष पर विष्णु के समान प्रनारशाली इ द्र के पुत्र लक्ष्य को विद्ध नहीं कर सकते थे वे लजित होकर चारों अर्जुन ने पराक्रमी राजाओं पर दर्षभरी दृष्टि डालते । और हाय हाय करने लगे। समाज में आकाशमण्डल हुए, दमभर म प्रत्यच्चा चढा दी। इसके पश्चत् से चारों ओर इतने पूल बरसे कि पृथ्वी पर पूल ही उन्होंने वे पाच वाण भी रठा रिये । वाण चढाकर पर देख पड़ने लगे । सैकहाँ अङ्गवाली तुरही और अर्जुन ने बड़ी चतुराई के साथ उस निशाने को उड़ा | अन्यान्य बजे बनने लगे । सूत मागध लोग भीठे दिया ॥१६॥२०॥ घर से स्तुति गाने लगे । अर्जुन को देखकर शत्रु वह मन्डली का र६५ कटकर उसी चक्रयन्त्र के भातर मथन राजा द्रुपद बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजाओं सेयी पर गिर पड़ा । उसी समय आकाशमण्दल को गड़बड़ करने के लिये तैयार देखकर अपनी सेना और समाज में बड़ा भारी कोराहर मच गया । से अर्जुन की सहायता करनी चाही। जन वह मारी दरता रोग शत्रु कुलमाशी अर्जुन के सिर पर वर्ग कोलाहर आरम्भ हो गया तर धर्मात्मा युधिष्ठिर, [ आदिपर्व 225ccc महाभारत သော स तामुपादाय विजित्य रङ्गे द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः । रङ्गान्निरकामदचिन्त्यकर्मा पत्न्या तथा चाऽप्यनुगम्यमानः ॥ २८॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि लक्ष्यच्छेदने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥ नकुल और सहदेव को साथ लेकर, अपने डेरे की | गले में डाल दी । अद्भुत कर्म करनेवाले अर्जुन ओर चल दिये । उधर द्रौपदी ने लक्ष्य को कटकर इसप्रकार उस स्वयम्वर-समाज में द्रौपदी को जय कर, गिरा हुआ देखते ही सफेद माला हाथ में लिये हुए द्विजातियों से सत्कृत होकर रङ्गभूमि से बाहर निकले । इन्द्र-तुल्य अर्जुन के पास आकर वह माला उनके । द्रौपदी भी अर्जुन के पीछे-पीछे जाने लगी ॥२१॥२८॥ आदिपर्व का एक सौनचे अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९१ ।। वैशम्पायन उवाच-तस्मै दिसति कन्यां तु ब्राह्मणाय तदा नृपे । कोप आसीन्महीपानामालोक्याऽन्योन्यमन्तिकात् ॥ १ अस्मानयमतिक्रम्य तृणीकृत्य च संगतान् । दातुमिच्छति विप्राय द्रौपदी योषितां वराम् ॥ २ ॥ अवरोप्येह वृक्षं तु फलकाले निपात्यते निहन्मैनं दुरात्मानं योऽयमस्मान्न मन्यते ॥ ३ ॥ न ह्महत्येष समानं नापि वृद्धक्रमं गुणः हन्मनं सह पुत्रेण दुराचारं नृपद्विषम् अयं हि सर्वानाहूय सत्कृत्य च नराधिपान् । गुणवद्भोजयित्वाऽन्नं ततः पश्चान्न मन्यते ॥ ५ ॥ एक सौ इक्यानवे अध्याय ॥ १९१ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! राजा काट डाले । इसलिये आओ, हम सर अपना द्रुपद जब ब्रामण (अर्जुन ) को कन्या देने के लिये | निरादर करनेवाले दुरात्मा द्रुपद को मार डालें । यह तैय्यार हुए तब राजा लोग क्रुद्ध होकर परस्पर एक | राजाओं में शत्रुता करनेवाला दुराचारी द्रुपद अपने दूमरे की ओर देखने लगे। वे आपस में कहने | गुणों के कारण वृद्धा का सम्मान पाने के योग्य लगे-हम इतने राजा यहां मौजूद है परन्तु राजा नहीं है । आओ, हम इसको और इसके पुत्र धृष्टद्युम्न द्रुपद हम सबका अनादर करके द्रौपदी एक ब्राह्मण को भी मार डालें। दुरात्मा ने हमको बुलाया; पहले को देना चाहते हैं । यह द्रुपद का काम वैसा ही उत्तम भोजन कराये और सत्कार किया; परन्तु अब है जैसे कोई वृक्ष को लगाकर फलने के समय उसे यह हम सबका अपमान करने को तैय्यार है । ये - ooooooooo ००.000000505om अध्याय १९१] महाभारत अस्मिन्नाजसमावाये देवानामिव सन्नये किमयं सहर्श कंचिन्तृपति नैव दृष्टवान् ॥ ६ ॥ न च विप्रेषधीकारो विद्यते वरणं प्रति । स्वयंवरः क्षत्रियाणामितीयं प्रथिता श्रुतिः ॥ ७ ॥ अथवा यदि कन्येयं न च कश्चिद् बुभूपति । अन्नांवेनां परिक्षिप्य याम राष्ट्राणि पार्थिवाः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणो यदि चापल्याल्लोभादा कृतवानिदम् । विप्रियं पार्थिवन्द्राणां नैप वध्यः कथंचन ॥ ९ ॥ ब्राह्मणार्थं हि नो राज्यं जीवितं हि वसूनि च । पुत्रपौत्रं च यच्चाऽन्यदस्माकं विद्यते धनम् ॥ १० ॥ अवमानभयांचव स्वधर्मस्य च रक्षणात् स्वयंवराणामन्येषां मा भूदेवंविधा गतिः इत्युक्त्वा राजशार्दूला हृष्टाः परिघवाहवः । द्रुपदं तु जिघांसन्तः सायुधाः समुपाद्रवन् ॥ १२ ॥ तान्गृहीतशरावापान्क्रुद्धानापततो वहून् द्रुपदो वीक्ष्य संत्रासाब्राह्मणाञ्च्छरणं गतः सब देवतुल्य राजा यहा एकत्र हैं। द्रुपद ने इम के लिये हैं । ब्राह्मण के लिये हम इन सब वस्तुओं राजमण्डली में क्या एक को भी अपनी कन्या का त्याग कर सकते हैं ॥१११०॥ योग्य नहीं समझा ? यह प्रसिद्ध कहावत है कि द्रुपद को दण्ड देना हमारा कर्तव्य इसलिए है स्वयम्बर क्षत्रियों के लिये ही बनाया गया है। इसमें जिसमें हमारा अपमान न हो, हमारे धर्म की रक्षा मारण का अधिकार नहीं है। फिर भी यदि हो, और अन्य स्वयम्बरों की भी ऐमी दशान हो। यह कन्या किसी राजा को पति न बनाया चाहे तो यह कहकर सब राजा लोग अपने-अपने हथियार इसको जलती हुई आग में छोड़ कर हम अपने-अपने । ले लेकर द्रुपद को मारने के लिये उनकी ओर राज्यों को चल देंगे। इस ब्रामण ने यद्यपि चपलता दी १११।१२।। के कारण, या लोभ के कारण हम रोगों का भप्रिय उन फ्रोध से अन्ध हुए हुए राजाओं को अपनी किया है तो भी इमको मारना किसीमकार उचित - ओर झपटते देगार डर के मारे द्रुपद प्रामणों नहीं है। क्योंकि हमारा राज्य अर्थ, जीवन, पुन, की भरण में गये । मदोन्मत गजराजों की भान्ति पौर और दूसरे जो कुछ धन है, यह सची असो वेग से आ रहे राजाओं को रोकने के लिये गनुदमन । । oririrSalamwrovernmrorprior- ८९२ म हा भारत [ आदिपर्व color 0000० Doodanco2000 000054 .. वेगेनाऽऽपततस्तांस्तु प्रभिन्नानिव वारणान् । पाण्डुपुत्रौ महेष्वासो प्रतियातावरिन्दमौ ततः समुत्पेतुरुदायुधास्ते महीक्षितो वद्धगोधांगुलित्राः जिघांसमानाः कुरुराजपुत्रावमर्पयन्तोऽर्जुनभीमसेनौ ततस्तु भीमोद्भुतभीमकर्मा महावलो वज्रसमानसारः उत्पाट्य दोभ्या द्रुममेकवीरो निष्पत्रयामास यथा गजेन्द्रः ॥ १६ ॥ तं वृक्षमादाय रिपुप्रमाथी दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य पार्थस्य पार्थः पृथुदीर्घबाहुः तत्प्रेक्ष्य कर्माऽतिमनुष्यबुद्धिर्जिप्णुः स हि भ्रातुरचिन्त्यकर्मा विसिस्मिये चापि भयं विहाय तस्थौ धनुर्राह्य महेन्द्रकर्मा ॥ १८ ॥ तत्प्रेक्ष्य कर्माऽतिमनुष्यबुद्धिर्जिष्णोः सहभ्रातुरचिन्त्यकर्मा दामोदरो भ्रातरमुग्रवीर्यं हलायुधं वाक्यमिदं वभापे य एष सिंहर्षभखेलगामी महद्धनुः कति तालमात्रम् एपोऽर्जुनो नाऽत्र विचार्य मस्ति यद्यस्मि संकर्षण वासुदेवः ॥ २० ॥ यस्त्वेष वृक्षं तरसाऽवभज्य राज्ञां निकारे सहसा प्रवृत्तः । घृकोदरान्नाऽन्य इहेतदद्य कर्तुं समर्थः समरे पृथिव्याम् ॥ २१ ॥ श्रेष्ठ योद्धा भीमसेन और अर्जुन धनुष लेकर खड़े दण्ड लेकर खड़े होते हैं । असाधारण बुद्धिमान् हो गये ॥१३॥१४॥ और इन्द्र के समान अद्भुत कर्म करने की शक्ति- तब उँगलियों में गोह के चमड़े के अंगुलित्र वाले अर्जुन अपने भाई का यह अरौकिक कर्म पहने गजा लोग कुपित होकर, शस्त्र तानकर, भीम देखकर बहुत विस्मित हुए और निर्भयभाव से धनुष और अर्जुन को मारने के लिये उनकी ओर झुक हाथ में लिये आक्रमणकारी राजाओं का सामना पड़े । अनन्तर वज़ के समान कठोर महाबली करने के लिये खड़े होकर विपक्षियों के आक्रमण आश्चर्य डरावने कार्य करनेवाले अद्वितीय वीर की बाट देखन लगे । अलौकिक बुद्धिमान् और भीमसेन ने उन्मत्त गजराज की तरह हाथों से एक अद्भुत कर्म करनेवाले कृष्ण ने अर्जुन और भीमसेन वृक्ष उमाइकर पत्रों से खाली किया॥१५॥१६॥ के असाधारण कामों को देखकर अपने माई बड़े और शत्रुमथन दीर्घमुज पृथा-नन्दन उस पत्रों से • पराक्रमी वलभद्र जी से कहा-हे सहर्षण ! यह जो खाली पेड़ को ले कर पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन के सम्मुख सिंह के समान गति से अपने पराक्रम को प्रकट इसप्रकार खड़े हो गये कि जमे यमराज क्टोर कर रहे पुरुष कुछ कम पांच हाथ के धनुष को rrrrJohorimirire.in vn- अध्याय १९२] म हा भारत ८९३ योऽसौ पुरस्तात्कमलायताक्षस्तनुर्महासिंहगतिविनीतः गौरः प्रलम्बोज्ज्वल चारुघोणो विनिःस्मृतः सोऽच्युत धर्मपुत्रः ॥ २२ ॥ यौ तौ कुमाराविव कार्तिकेयो द्वावश्विनेयाविति मे वितर्कः मुक्ता हि तस्माजतुवेइमदाहान्मया श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च ॥ २३ ॥ तमत्रवीन्निलतोयदाभो हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः प्रीतोऽस्मि दृष्ट्वा हि पितृवसारं पृथां विमुक्तां सह कौरवाग्न्यैः ।। २४ ॥ इति श्रीगन्गहाभारने आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि कृष्णाक्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ।। खींच रहे है वे अर्जुन है । यदि मैं वासुदेव का कार्तिकेय के समान सुन्दर है अश्विनीकुमार के पुत्र हू तो मेरा यह अनुमान झूठ नहीं हो सकता अंश से उत्पन्न नकुल और सहदेव है । मेरा यह ॥१७२०॥ अनुमान टीक है, क्योंकि मैंने सुना है, कुन्ति- और, जो बलपूर्वक वृक्ष उखाड़कर राजाओं का सहित पांचों पाण्डव लाक्षाभवन की आग से बचकर सामना करने के लिये खड़े है वे भीमसेन है । निकल गये है । जलहीन मेघ के समान गोरे भीमसेन के सिवा और कोई युद्ध-भूमि में ऐसा ! यलदेव ने कृष्ण के इस अनुमान पर विश्वास करके अद्भुत कर्म नहीं कर सकता । जो कमल-जयन, 1-हे माई ! जतुगृह से छुटकारा पाये हुए सिंह की सी च ल से चलेनवाले, गोरे , लम्बे डील पाण्डवा को देखकर और अपनी बुआ कुन्ती के के, न्म्र, युछ लम्बी नाकवाले पुरुष पहले ही रंग-भूमि । जीवित रहने का वृत्तान्त सुनकर मै बहुत प्रसन्न से निकल गये है ये युधिष्ठिर हैं ॥२१॥२२॥ हुआ ॥२३॥२४॥ वे दोनों कुमार जिनकी सूरत ए सी और आदिपर्व का एक सौ इक्यानवे अध्याय समाप्त हुआ । कहा- अथ द्विनल्यधिकशततमोऽध्याय ॥१५॥ वश पायन आर-अजिनानि विधुन्वन्तः करकांश्च द्विजर्षभाः । उचुस्ते भी कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १ ॥ तानेवं वदनो विप्रानर्जुनः प्रहमन्निव उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं निष्ठन पार्श्वनः एक सोयानये अध्याय ॥१२॥ देशाशयन ने कहा-हे रामा जनमेजय ! उस लंग-तुम दाना नहीं, हम मब तुम्हारी और होकर ममग अपने मृगनर्म और कमण्डलुओं को हिलाते गत्रुओं मे युद्ध करेंगे। उनके ये वाक्य सुनकर और उछारते हुए ब्रह्मण लोग अर्जुन से कहने अर्जुन ने हसते हुए कहा-आप लोग हमारे पास -~- महाभारत [ आदिपर्व 1001 co००cooooooooooorcool .. - तमेवंवादिनं तत्र फाल्गुनः प्रत्यभापत नाऽस्मि कर्ण धनुर्वेदो नाऽस्मि रामःप्रतापवान् ॥ २० ॥ ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्टः सर्वशस्त्रभृतां वरः । ब्राह्मे पौरंदरे चाऽस्त्रे निष्टितो गुरुशासनात् । स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वै वीर स्थिरो भव ॥ २१ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धाको न्यवर्तत । ब्राह्म तेजस्तदाऽजय्यं मन्यमानो महारथः ॥ २२ ॥ अपरस्मिन्वनोद्देशे वीरौ शल्यवृकोदरौ वलिनौ युद्धसंपन्नौ विद्यया च वलेन च ॥ २३ ॥ अन्योन्यमाह्वयंतो तु मत्ताविव महागजौ । मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम् ॥ २४ ॥ प्रकर्पणाकर्षणयोरभ्याकर्पविकर्षणैः आचकर्पतुरन्योन्यं मुष्टिभिश्चापि जघ्नतुः ॥ २५ ॥ ततश्चटचटाशब्दः सुघोरो ह्यभवत्तयोः पाषाणसंपातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ॥ २६॥ मुहूर्त तो तदाऽन्योन्यं समरे पर्यकर्षताम् बड़ी प्रसन्नता हुई । तुम साक्षात् धनुर्वेद अथवा वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् । कर्ण ने यह परशुराम या इन्द्र या विष्णु कौन हो जो इम सुनकर सोचा कि ब्रह्मतेज को जीतना असम्भव है. ब्रामणयेप में अपने आपको छिपाये हुए हो? मेरे । इसलिये वह युद्धभूमि से हट गया। दूमरी और क्रोध करने पर युद्ध में मेरे सम्मुख सिवा इन्द्र और विद्या और बल से युद्ध में पडित उन्मत्त हाथी के अर्जुन के और कोई नहीं ठहर सकता है॥१६॥१९॥ समान बरी धीर वृकोदर और राजा शल्य युद्ध कर्ण के ये वचन सुनकर अर्जुन ने कहा-हे करने लगे ॥२२॥२३॥ कर्ण ! मैं न तो धनुर्वेद हू और न परशुराम । मै वे दोनों एक दूमरे को पुकारकर मुट्टी और तो योद्धाओं में श्रेष्ठ, प्रधान शस्त्रधारी ब्राह्मण हू । घुटनों से मारते हुए कभी दूर फेकने, कभी आगे मैने अपने गुरु से विधिपूर्वक ब्रह्मास और इन्द्रास सींचने, कभी सामने ललकारते, कभी झपट के एक प्राप्त किया है । हे वीर ! मै युद्ध में तुमको जीतने ! दूसरे को पकड़ने और कभी धूमा मारने लगे के लिये खड़ा हुआ है । तुम मेरे आगे सँभलार ॥२४॥२५॥ रहो [अथवा हार मानकर हट जाओ] ॥२०॥२१॥ वज के समान उनके अतों में घूमे लगने से coomcoccoot अध्याय १९२ ] महाभारत Pcocoromoon a.oroooooooooooooo Vicoloooo ततो भीमः समुक्षिप्य बाहुभ्यां शल्यमाहवे । अपातयत्कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणा जहसुस्तदा ॥२७॥ तत्राऽऽश्चर्य भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः यच्छल्यं पातितं भूमो नाऽवधीद्वलिनं वली ॥ २८ ॥ पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते । शक्षिताः सर्वराजानः परिवबुवृकोदरम् ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणपभो । विज्ञायता क्वजन्मानौ क्वनिवासी तथैव च ॥३०॥ को हि. राधासुतं कर्ण शक्तो योधयितुं रणे । अन्यत्र रामादद्रोणाद्वा पाण्डवाद्वा किरीटिनः ॥ ३१ ॥ कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्कृपाद्वापि शरद्वतः को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोधयितुं रणे ॥ ३२ ॥ तथैव मद्राधिपति शल्यं चलवतां वरम् बलदेवाहते वीरात्पाण्डवाद्वा वृकोदरात् ॥ ३३ ॥ वीराद् दुर्योधनाद्वान्यः शक्तः पातयितुं रणे । क्रियतामवहारोऽस्माद्युद्राब्राह्मणसंवृतात् ॥ ३४ ॥ घोर 'चटपट' शब्द हो रहा था। पत्थर के प्रहार में कहने लगे-वे दोनों ब्राह्मण धन्य हैं । पूछो तो, की तरह दोनों वीर परस्पर कठोर प्रहार कर रहे थे। ये कहां पैदा हुए है और कां रहते हैं ? ॥२८॥३१॥ थोड़ी देर उन दोनों में युद्ध होता रहा उपगम्त परशुराम, द्रोणाचार्य, या पाण्डव अर्जुन के भीमसेन ने शल्य को उठाकर पृथ्वी पर दे मरा सिवा और कौन राधाकुमार कर्ण से लड़ सकता है ? और वह लजिन होर चला गया । ब्राह्मण यह देवकीनन्दन कृष्ण और कृपाचार्य के सिवा दुर्योधन देखकर हँसने लगे ॥२६॥२७॥ का ही कौन सामना कर सस्ता है! बलभद्र. पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन ने इसके सिवा एक अद्भुत पाण्डव भीमसेन और दुर्योधन के सिवा युद्ध में काम यह भी किया कि शल्य को पटककर भी शल्य को ही कौन पछाड़कर नीचा दिखा सकता गार नहीं डाय। शल्य के पछड़ जाने पर और है ! परन्तु इन ब्राह्मणों ने यह सब कर दिखाया । कर्ण के युद्ध से हट जाने पर बचे हुए राजा लोग इसलिये हे भाइयो । बामणों से युद्ध करना ठीक पात ही डरे और युद्ध का इरादा छोड़ भीमसेन नहीं । इस युद्ध से हर जाना ही ठीक जंचना है को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये । वे आपस ॥३२॥३॥ HAYAormco ८९८ म हा भारत [ आदिपर्व Pos0cco0 ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधापि नित्यदा । अथैतानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत् ॥३५॥ तांस्तथावादिनः सर्वान्प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान् । अथान्यान्पुरुषांश्चापि कृत्वा तत्कर्म संयुगे ॥३६ ॥ वैशम्पायन उवाच-तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः । निवारयामासं महीपतीस्तान्धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान् ॥ ३७॥ एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धायुद्धविशारदाः यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणेता । इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्राऽऽसन्समागताः ॥ ३९॥ ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नों रौरवाजिनवासिभिः कृच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनञ्जयो ॥ ४० ॥ विमुक्तो जनसंवाधाच्छत्रुभिः परिविक्षतो कृष्णयाऽनुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ॥ ४१ ॥ पौर्णमास्यां घनर्मुक्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ । तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मण चाहे अपराध भी करें तो भी सदा उनकी राजा लोग अचरज मानते हुए अपने-अपने देश रक्षा करनी चाहिये । आओ, पहले इन का ठीक ठीक को चल दिये । स्वयम्वर-ममाज में जो और लोग हाल मालम करें, पीछे यदि ये युद्ध करना चाहेंगे । आये थे वे भी यह कहते हुए अपने घरों को तो हम भी प्रसन्नता से युद्ध करके अपने धर्म का रौट गये कि द्रौपदी आज स्वयम्बर में ब्राह्मणों पालन करेंगे। वैशम्पायन ने, कहा-हे राजन् ! | ने वरी है। और वे दोनों वीर पाण्डव अर्थात् भीमसेन का यह अद्भुत काम देखने से श्रीकृष्ण | अर्जुन और भीमसेन ब्राह्मणों से घिरे हुए द्रौपदी को निश्चय हो गया कि ये दोनों कुन्ती के पुत्र को साथ लिये हुए मनुष्यों की वाधा से निर्भय अर्जुन और भीमसेन हैं । तब श्रीकृष्ण ने नम्रता होकर इसप्रकार से चले जैसे पूर्णिमा के दिन बादलों पूर्वक यह कहकर कि “इस ब्रामण ने धर्म के के हट जाने पर सूर्य और चन्द्रमा चलते हुए दीख अनुसार ही द्रौपदी को प्राप्त किया है," उन पड़ते है। इधर भिक्षा का समय टल जाने पर जय राजाभों को युद्ध करने से रोक दिया ॥३५॥३८॥ | पाण्डव नौटकर न आये तब पुत्रस्नेह के कारण इसप्रकार श्रीकृष्ण के मना करने को मानकर व्याकुल कुन्ती तरह-तरह से पुत्रों के अनिष्ट के corrarrorozooyemor.rrorrrrrrrrn M अध्याय १९३ ] म हा भारत Moo cooo o20050000 । अनागच्छत्सु पुत्रेपु भेक्ष्यकालेऽभिगच्छति । धार्तराष्ट्रर्हता न स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैदृढवैरिभिः विपतिं मतं जातं व्यासस्याऽपि महात्मनः ॥ ४४ ॥ इत्येवं चिन्तयामास सुतस्नेहावृता पृथा ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसंप्लुते महत्यथाऽपराहे तु धनैः सूर्य इवाऽऽवृतः । ब्राह्मणेः प्राविशत्तत्र जिष्णुर्भागववेश्म तत् ॥ ४६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवप्रत्यागमने द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२ ॥ बारे में सोच-विचार करने लगी । वे मन में कहने । उन्होंने क्यों हमको इस देश में आने को कहा लगी-धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पहचानकर क्या किसी- ॥३९॥४४॥ तरह मेरे वीर पुत्री की हत्या कर डाली है ! या कुन्ती पुत्रम्नेह से इसप्रकार सोच रही थी, कि वैर को कभी न भूलनेवाले भयानक मायावी राक्षसों। ऐसे सगय में मेघमण्डली से घिरे हुए सूर्य के समान, के हाथ में पड़कर मरे पुत्र मारे गये ! अथवा ब्राह्मणों से घिरे हुए, अर्जुन यहुत रात बीते, उस और किसीतरह उनकी मृत्यु हो गई । महात्मा । कुंभार के घर पहुंचे ॥१५/४६|| व्यास जी की भी कमी उलटी वुद्धि हुई थी । आदिपर्व का एक सौ यानत्र अध्याय समाप्त हुआ। अथ विनवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९३ ।। वैशम्पायन वाप-गत्वा तु ता भार्गवकर्मशालां पार्थो पृथा प्राप्य महानुभावो । तां याज्ञसेनी परमप्रतीतो भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्यो ॥१॥ कुटीगता सा वनवेक्ष्य पुत्रौ प्रोवाच भुक्तति समेत्य सर्वे । पश्चाच्च कुन्तीप्रसमीक्ष्य कृष्णां कष्टं मया भापितमित्युवाच ।। एक मोतिरानवे अध्याय ॥ १९३ ॥ वैशम्पायन ने कहा- हे राजा जनमेजय ! महानु- घर के भीतर थीं, कुछ न देखकर के ही बोली-हे भाव नरभेष्ठ भीम और अर्जुन, कृष्णा को साथ लिये 'पुत्रो ! तुम सब मिलकर उस भिक्षा को खा लो; पीछे हुए उस कुंभार के घर पहुने । प्रसन्नतापूर्वक कृष्णा को देखकर बोली कि हा। मैंने विना-समझे प्रवेश करते ही उन्होंने अपनी माता कुन्ती से कहा- बूझे यह क्या कर डाला ! अधर्म के डर से चिन्तित हे माता ! हम भिक्षा लेकर आ गये । कुन्ती तय कुन्ती, द्रौपदी का हाथ पकड़कर युधिष्ठिर के पास Forcycholoporoom ९०० महा भारत [ आदिपर्व cook 000cd ॥ साऽधर्मभीता परिचिन्तयन्ती तां याज्ञसेनी परमप्रतीताम् । पाणौ गृहीत्वोपजगाम कुन्ती युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ॥ ३ ॥ कुन्त्युवाच इयं तु कन्याद्रुपदस्य राज्ञस्तवाऽनुजाभ्यां मयि सन्निविष्टा। यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं समेत्य भुंक्तेति नृप प्रमादात् मया कथं नाऽनृतमुक्तमद्य भवेत्कुरूणामृपभ ब्रवीहि । पञ्चालराजस्य सुतामधर्मों न चोपवर्तत न विभ्रमेच ॥ ५ ॥ वैशम्पायन उवाच-स एवमुक्तो मतिमान्नृवीरो मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा । कुन्तीं समा श्वास्य कुरुप्रवीरो धनञ्जयं वाक्यमिदं वभापे त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री ।। प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह गृहाण पाणिं विधिवत्वमस्याः ॥ ७ ॥ अर्जुन वाच-मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः । भवान्निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो महावाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥ अहं ततो नकुलोऽनन्तरो मे पश्चादयं सहदेवस्तरस्त्री वृकोदरोऽहं च यमौ च राजन्नियं च कन्या भवतो नियोज्या ॥ ९ ॥ एवं गते यत्करणीयमत्र धर्म्य यशस्यं कुरु तद्विचिन्त्य । पाञ्चालराजस्य हितं च यत्स्यात्प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥ गई और कहने लगी-हे बेटा ! यह राजा द्रुपद की | तुम्हीं ने अपने बाहुबल से प्राप्त किया है । तुम्ही कन्या है। इसे लाकर अर्जुन और भीम ने मुझे | से इस राजकुमारी की शोभा होगी। इससे अग्नि अर्पण किया था। मैने भी इस रहस्य को बिना जाने जलाकर विधिपूर्वक तुम्ही इसका पाणिग्रहण करो। भिक्षा समझकर, अपनी समझ से उचित आज्ञा दे दी | अर्जुन ने कहा-हे नरेन्द्र ! आप मुझको अधर्म में न कि तुग भाई मिलकर भिक्षा को खा लो । हे कुरुश्रेष्ठ! डालें, जैसी आज्ञा करते है यह धर्मयुक्त नहीं है । अब तुम ऐसा उपाय बताओ जिसमें मेरा वचन भी पहले आप, फिर अद्भुत कर्म करनेवाले भीमसेन, फिर मिथ्या न हो और इस पांचाल राजा की कन्या मैं फिर नकुल और फिर सहदेय, इस क्रम से हम को भी अधर्म होने से खिन्न न होना पड़े ॥१५॥ पांचों राजपुत्री द्रौपदी का पाणिग्रहण करेंगे । हे वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! माता के ये राजन् ! भीमसेन, मैं, नकुल, सहदेव भार यह वचन मुनकर धर्मराज युधिष्ठिर थोड़ी देर तक सोचते राजकन्या, हम सब आपके वशवर्ण और आशा रहे । इसके पधात् कुन्ती को आश्वास देकर उन्होंने पर चलनेवाले हैं। इस दशा में जो कर्तव्य हो, अर्जुन से कहा-हे-माई ! राजकुमारी द्रौपदी को जिससे धर्म और यश की रक्षा होजैसे पांचालराज । Oo Grocebcs" 7000 CAFo/ na 1A विश्वामिन का नन्दिनी को ले जाने की चेष्टा करना और नन्दिनी के क्रोध से विश्वामित्र की सेना का भाग जाना ।
अध्याय १९३ ] महा भारत ९०१ zcom/ Occocolroocrococo coleicolo । corrcvrs .. - वैशम्पायन उवाय-जिप्णोर्वचनमाज्ञाय भक्तिस्नेहसमन्वितम् दृष्टिं निवेशयामासुः पाञ्चाल्यां पाण्डुनन्दनाः ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा ते तत्र पश्यन्ती सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् । संप्रेक्ष्याऽन्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन् ॥ १२ ॥ तेषां तु द्रौपदी दृष्ट्वा सर्वेपाममिताजसाम् संप्रमध्येन्द्रियग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ॥ १३ ॥ काम्यं हि रूपं पाञ्चाल्या विधाना विहितं स्वयम् । बभूवाऽधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ॥ १४॥ तेवामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः द्वैपायनवचः कृत्स्नं सम्मार मनुजर्षभः ॥ १५॥ अब्रवीत्स हि तान्भ्रातृन्मियो भेदभयान्नृपः सर्वेषां द्रोपदी भार्या भविष्यति हि नःशुभा ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच-भ्रातुर्वचस्तत्प्रसमीक्ष्य सर्वे ज्येष्ठस्य पाण्डवस्तनयास्तदानीम् । तमेवार्थं ध्यायमाना मनोभिः सर्वे च ते तस्थुरदीनसत्त्वाः ।। १७ ।। वृष्णिप्रवीरस्तु कुरुप्रवीरानाशंसमानः सहरौहिणेयः जगाम तां भार्गवकर्मशालां यत्राऽऽसते ते पुरुषप्रवीराः ॥ १८ ॥ द्रुपद का हित हो, वही मान कर भाप हमें उचित नीयका रचा था। द्रौपदी का रूप अन्यान्य सुन्दरी आजा दीजिए। हम लोग आपकी आज्ञा का पालन त्रियों के का से कहीं अधिक मनोहर था । करगे ॥६॥१०॥ मनुष्यश्रेष्ठ कुन्नी-पुत्र युधिष्ठिर छटे भाइयों के वैशम्पायन ने कहा-हे गजन् ! अर्जुन की आकारों को देखकर उनके हृदय के भार को सगशा भक्तिपूर्ण ग्नेह, रम भरी याने मुनकर पाण्डवों ने गये। उन्हें व्यामदय का कहना भी म्मरण हो माया राजकुमारी द्रौपदी की ओर देखा और पानारी ॥१४॥१५॥ भी उनकी ओर दमोलगी। द्रौपदी ने मव भाइया इसके मिया उन्होंने यह भी सोचा कि द्रोपदी पा विधनुरा रिया । मय भाइयों के हृदय में केरियम इयों में कहीं बिगाड़ न पैदा हो जाय। प्रोपदी का रायम गया । सयं दया पर कामदेव यह मांच विचारकर युधिष्ठिर ने कहा-अच्छी बात न अपना अधिकार जमा रिया॥११॥१३॥ है, माना की आशा के अनुमार गुम रक्ष्णोंगारी ऐसा ना कुछ विनित्र नहीं क्योंकि विधाना दादी हम पाचां माइयों की श्री होगी विटापायन मानों आपही भने हाथों में पानी का TR ने कहा-द गजन् ! यह बात सुनकर गय माइयों - ocom 00000000000 ९०२ महाभारत [ आदिपर्व maraimer तत्रोपविष्टं पृथुदीर्घबाहुं ददर्श कृष्णः सहरौहिणेयः । अजातशत्रु परिवार्य तांश्चाऽप्युपोपविष्टाज्वलनप्रकाशान् ॥ १९ ॥ ततोऽब्रवीद्वासुदेवोऽभिगम्य कुंतीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् । कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ युधिष्ठिरस्याऽजमीढस्य राज्ञः २० ।। तथैव तस्याऽप्यनुरोहिणेयस्तौ चापि हृष्टाःकुरवोऽभ्यनन्दन्। पितृष्वसुश्चापि यदुप्रवीरावगृह्णतां भारतमुख्यं पादौ ॥ २१ ॥ अजातशत्रुश्च कुरुप्रवीरः पप्रच्छ कृष्णां कुशलं विलोक्य । कथं वयं वासुदेव त्वयेह गूढा वसन्तो विदिताश्च सर्वे ॥ २२ ॥ तमब्रवीद्वासुदेवः प्रहस्य गूढोऽप्यग्निायत एवं राजन् । तं विक्रम पाण्डवेयानतीत्य कोऽन्यः कर्ता विद्यते मानुषेषु ॥ २३ ॥ दिष्ट्या सर्वे पावकाद्विप्रमुक्ता यूयं घोरात्पाण्डवाः शत्रुसाहाः । दिप्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् २४ ॥ भद्रं वोऽस्तु निहितं यद्गुहायां विवर्धध्वंज्वलना इवैधमानाः। मा वो विद्युः पार्थिवाः केचिदेव यास्यावहे शिबिरायैव तावत् । सोऽनुज्ञातः पाण्डवेनाऽव्ययश्रीः प्रायाच्छीघ्र बलदेवेन सार्धम् २५॥ इति श्रीमन्माभारते आदिपर्वणि स्वयम्बरपर्वणि रामकृष्णागमने विनवत्यधिकशततमोऽध्याय. ॥ १९३३ ने प्रसन्न होकर अपने मन में उस बात को घर बलराम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। हे भारतश्रेट ! लिया । इधर अनुमान से अर्जुन और भीम आदि अनन्तर यदुवीर राम और कृष्ण ने अपनी बुआ को पाण्डपुत्र समझकर कृष्णचन्द्र जी उनके पीछे- कुन्ती के पैर छुए । कुगल-प्रदन हो चुकने पर पीछे, बलदेव को साथ लिये उसी कुंभार के घर युधिष्ठिर ने कृष्ण से कहा-हे वासुदेव ! हम यहां पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा, अग्नि के पर छिपे हुए रहते है। फिर तुमने किसतरह हमें समान तेजम्यी पाण्डव बड़े भाई युधिष्ठिर के पास पहचान लिया ? ॥२१॥२२॥ चठे हुए है । तप अजमीद राजा के वंश में उत्सन्न, श्रीकृष्ण ने हंसकर कहा-हे महाराज ! अग्नि धार्मिक श्रेष्ठ, कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर के पास पहुंचकर भी कहीं छिपाये से छिपती है ! पाण्डवों के सिवा श्रीकृष्ण ने उनके पैर छुए और कहा हा-मैं वसुदेव पृथ्वी पर और कौन ऐमा पुरुष है जो इसपकार का पुत्र कृष्ण ई ॥१६॥२०॥ पराक्रम दिखा सके ! हमारे लिये बड़े सौभाग्य की इसके पश्चात् वरूदेव जी ने भी वैसा ही बात है कि गदगन पाण्डव आग से बनकर जीत- किया । पाण्डव लोग अपने यन्धु श्रीकृष्ण और जागने मौजूद हैं । बड़े सौभाग्य की बात है कि 7COViJric.
अध्याय १९४ ] महा भारत 21 दुरात्मा दुर्योधन की इच्छा पूरी नहीं हुई । आप न सके। अब आज्ञा दीजिए, हम दोनों भाई अपने का मगल हो । आप लोगों के अभ्युदय के दिन डेरे को जाय । अनन्त ऐश्वर्य से सम्पन्न कृष्णचन्द्र, अभी समय की कन्दरा में छिपे हुए है । आप लोग युधिष्ठिर आदि पाण्डवों से विदा होकर, शीघ वहा इसीतरह आग के समान बढते रह । मै यही से चल दिये ।।२३।२५|| चाहता है कि अभी कोई राजा आप को पहचान आदिपर्व गाएक मोतिरानवे अध्याय समाप्त हुआ। ॥ -- - अथ चतुरनपत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९४ ॥ वैशम्पायन उवाच-धृष्टद्युम्नस्तु पाञ्चाल्यः पृष्टतः कुरुनन्दनौ । अन्वगच्छत्तदा यान्तौ . भार्गवस्य निवेशने ॥ १ ॥ सोऽज्ञायमानः पुरुषानवधाय समन्ततः स्वयमारान्निलीनोऽभृद्भार्गवस्य निवेशने सोयं च भीमस्तु रिपुप्रमाथी जिष्णुर्यमौ चापि महानुभावो । भेक्ष्यं चरित्वा तु युधिष्ठिराय निवेदयाञ्चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ३ ॥ ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजा तामुवाच काले वचनं वदान्या स्वमग्रमादाय कुरुष्व भद्रे बलिं च विप्राय च देहि भिक्षाम् ये चाऽन्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः परिधता ये परितो मनुष्याः । नतश्च शेपं प्रविभज्य शीघ्रमर्धं चतुर्धा मम चाऽऽत्मनश्च अर्धं तु भीमाय च देहि भद्रे य एष नागपभतुल्यरूप: गोगे युवा संहननोपपन्न एपो हि वीरो बहुभुक्सदैव ॥ ६ ॥ एक सौ चारानवे अभ्याय ॥ १९४ ।। वैशम्पायन ने कहा हे राजा जनमेजय । कुरु- भिक्षा में मिली हुई मामग्री लाकर युधिष्ठिर के आगे नन्दन भीम और अर्जुन जब कुंभार के घर को जा रख दी । तम कुन्ती ने द्रौपदी से कहा-हे भने । रहे थे, उस समय पाचार कुमार धृष्टद्युम्न उनके तुम इस भिक्षा में प्राप्त अन्न से पहले देवताओं की पीछे पीछे छिपकर गये थे । वह साथियों को सावधान पूजा करो, ब्राह्मणों को भिक्षा दो, अतिथि-अभ्यागत कर पाण्डवों और दूमरा के न जानते उसके निकट | और और जो कोई भोजन की इच्छा से आया हो किमी एक स्थान में छिरे थे॥१२॥ । उसे भोजन कराओ। फिर जो अन्न बचे उसके दो सन्ध्या के समय महाबली भीम, अर्जुन, नकुल हिम्से करो। उसमें से एक हिस्सा इन गजराज- और सहदेव भिक्षा मागकर घर आये ! उन्होंने सदृश उन्नत, गौरवर्ण, युवा, वीर भीमसेन को । rrzAHAmrirar महा भारत [ आदिपर्व PcoooA zoo00000.00oloococo cocor सा हृष्टरुपेव तु राजपुत्री तस्या वचः साधु विशङ्कमाना यथावदुक्तं प्रयकार साध्वी ते चापि सर्वे वुमुजुस्तदन्नम् कुशैस्तु भूमौ शयनं चकार माद्रीपुत्रः सहदेवस्तरस्वी । यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् ॥ ८ ॥ अगस्त्यशास्तामभितो दिशं तु शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् । कुन्ती पुरस्तात्तु बभूव तेषां पादान्तरे चाऽथ बभूव कृष्णा ॥ ९ ॥ अशेत भूमौ सह पाण्डुपुत्रैः पादोपधानीव कृता कुशेषु । न तत्र दुःखं मनसापि तस्या न चाऽवमेने कुरुपुङ्गवांस्तान् ॥ १० ॥ ते तत्र शूराः कथयाम्बभूवुः कथा विचित्राः पृतनांधिकाराः अस्त्राणि दिव्यानि रथांश्च नागान्खड्गान्गदाश्चापि परश्वधांश्च ॥ ११ ॥ तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम् । शुश्राव कृष्णां च तदा निषण्णां ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः ॥ १२ ॥ धृष्टद्युम्नो राजपुत्रस्तु सर्व वृत्तं तेषां कथितं चैव रात्रौ । सर्व राज्ञे द्रुपदायाऽखिलेन निवेदयिष्यंस्त्वरितो जगाम ॥ १३ ॥ पाञ्चालराजस्तु विषण्णरूपस्तान्पाण्डवानप्रतिविन्दमानः धृष्टद्युम्नं पर्यपृच्छन्महात्मा क सा गता केन नीता च कृष्णा ॥ १४ ॥ खिलाओं; क्योंकि ये नित्य सबसे अधिक भोजन लेटने पर भी न तो द्रौपदी दुखित हुई और न करते हैं । फिर जो एक हिस्सा बचे उसके छ उसके हृदय में पाण्डवों के प्रति अनादर का भाव भाग कर डालो । उनको मैं, तुम और ये चारों । ही उत्पन्न हुआ ॥९॥१०॥ भाई भोजन करेंगे ॥३॥६॥ वीर्यशाली पाण्डव लेटकर रथ, हाथी, खड्ग, गदा, राजपुरी सती द्रौपदी ने उनकी उस श्रेष्ठ यात का परश्वध, दिव्यास्त्र और सेना आदि के विषय में कोई विचार न करके ही आनन्दित चित से उसको तरह-तरह की बातें करने लगे । छिी हुए धृष्टद्युम जो कहा गया था, वह पूरा किया। इसके पीछे भी मन लगाकर उनकी बातचीत सुनने रहे । धृष्टद्युम सबने मिलकर भोजन किया। भोजन करके अपनी सेवकों ने और उन्होंने दया कि द्रोपदी भी एकाम मृगछाला चिछाकर सब लोग रेट रहे । वीर पाण्डव होकर उनकी मातचीत सुन रही है ॥११॥१२॥ दक्षिण की ओर सिर करके सोये ||७८॥ धीरे-धीरे सवेरा हो गया । तर रात्रि को पारी उनके सिर की आर कुन्ती और पांव की और में जो बातचीत हुई थी यह द्रुपद को मुनाने के द्रोपदी सोई । कुशों की शय्या पा, पैरों के पास लिये धृष्टद्युम्न शीघ्र यहां से निकलकर राजभवन . 5.
अध्याय १९५] महा भारत ९०५ . कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन वैश्येन वा करदेनोपपन्ना । कञ्चित्पदं मूर्ध्नि न पङ्कदिग्धं कञ्चिन्न माला पतिता श्मशाने ॥ १५ ॥ कञ्चित्सवर्णप्रवरो मनुष्य उद्रिक्तवर्णोऽप्युत एव कञ्चित् । कञ्चिन्न वामो मम मूर्धि पादः कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ॥ १६ ॥ कञ्चिन्न सप्स्ये परमप्रतीतः संयुज्य पार्थेन नरर्षभेण वदस्व तत्तेन महानुभाव कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाऽद्य ॥ १७॥ विचित्रवीर्यस्य सुतस्य कच्चित्कुरुप्रवीरस्य ध्रियन्ति पुत्राः कञ्चित्तु पार्थेन यवीयसाऽद्य धनुर्रहीतं निहितं च लक्ष्यम् ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नप्रत्यागमने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९४ ॥ स्वयम्वरपर्व समाप्तं च । को चल दिये । पाण्डवों का पता लगाने में असमर्थ द्रौपदी को ले जानेवाला पुरुप क्षत्रिय या वर्ण- होने के कारण महात्मा द्रुपद बहुत ही व्याकुल श्रेष्ठ ब्राह्मण ही है न ? यदि मेरी कन्या को जीतकर हो रहे थे । धृष्टद्युम्न ज्योंही द्रुपद के पास पहुंचे | ले जानेवाला पुरुष पाण्डु पुत्र अर्जुन है तो मुझे त्योही उन्होंने पूछा--हे वेटा ! कृष्णा को ले जाने- किसी प्रकार का सन्ताप नहीं है । हे महानुभाव ! चाला पुरुप कौन है ? वह कहा गई । किसी नीच शीघ्र कहो, मेरी कन्या को जीतकर कौन ले गया जाति वा शूद अथवा 'कर' देनेवाले वैश्य ने मेरी है । क्या कुरुकुल-तिलक महाराज विचित्रवीर्य के कन्या को ले जाकर मेरे सिर पर लात तो नहीं पुत्र राजा पाण्डु के लड़के अभी तक जीवित हैं ? मारी है । सुगन्धित माला श्मशान में तो नहीं । क्या अर्जुन ने ही धनुष चढ़ाकर उस लक्ष्य को फेंकी गई ? ॥१३॥१५॥ | गिराया है ! ॥१६॥१८॥ आदिपर्व का एक सौ चोरानवे अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ पश्चनवत्यधिकशततमोऽध्याय ।। १९५ ।। अथ वैवाहिक पर्व । वैशम्पायन उवाच-ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः पित्रे शशंसाऽथस राजपुत्रः धृष्टद्युम्नः सोमकानां प्रवाँ वृत्तं यथा येन हृता च कृष्णा धृष्टद्युम्न उवाच-योऽसौ युवा व्यायतलोहिताक्षः कृष्णाजिनी देवसमानरूपः । यः कार्मुकाम्यं कृतवानधिज्यं लक्ष्यं च यः पातितवान्पृथिव्याम् ॥ २ ॥ एक मौ पञ्चानवे अध्याय ॥ १९५ ।। वैशम्पायन ने कहा-दे राजा जनमेजय ! चन्द्र- मुनर प्रसन्नचित से सब हाल कहने लगे कि वंशियों में श्रेष्ठ राजपुत्र धृष्टद्युम्न पिता के ये वचन द्रौपदी को कौन ले गया है और इस सम्बन्ध में । - महा भारत [ आदिपर्व Doooooooooooooococoo000 असजमानश्च ततस्तरस्वी वृनो द्विजाग्यैरभिपूज्यमानः । चक्राम वजीव दितेः सुतेषु सर्वेश्च देवैर्ऋपिभिश्च जुष्टः कृष्णा प्रगृह्याऽजिनमन्वयात्तं नागं यथा नागवधूः प्रहृष्टा । अमृष्यमाणेषु नराधिपेषु क्रुद्धेषु वै तत्र समापतत्सु ततोऽपरः पार्थिवसङ्घ मध्ये प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् प्रकालयन्नेव स पार्थिवौघान्क्रुद्धोऽन्तकः प्राणभृतो यथैव तो पार्थिवानां मिपता नरेन्द्र कृष्णामुपादाय गतौ नराग्यौ । विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यों वाह्यां पुराद्भार्गवकर्मशालाम् ॥ ६ ॥ तत्रोपविष्टार्जिरिवाऽनलस्य तेषां जनित्रीति मम प्रतर्कः । तथाविधरेव नरप्रवीररुपोपविष्टेस्त्रिभिरग्निकल्पैः तस्यास्ततस्तावभिवाद्य पादावुक्ता च कृष्णा त्वभिवादयेति । स्थितांच तत्रैव निवेद्य कृष्णां भिक्षाप्रचाराय गता नराग्न्याः ॥ ८ ॥ तेषां तु भैक्ष्यं प्रतिगृह्य कृष्णा दत्त्वा वलिं ब्राह्मणसाच्च कृत्वा । तां चैव वृद्धा परिवेष्य तांश्च नरप्रवीरान्स्वयमप्यभुंक्त क्या-क्या घटना हुई है । धृष्टद्युम्न ने कहा-हे | प्राणियों का नाश करते है वमे-एक बड़ा भारी महाराज ! वे बलवान् पुरुष जिनका स्वरूप देवताओं वृक्ष उखाड़कर उसके प्रहार से शत्रुसेना को चौपट का सा आंखें बड़ी-बड़ी और लाल लाल थी और / करने लगा । हे नरनाथ ! यह देखकर सब राजा काला मृगचर्म लिये हुए थे जिन्होंने लक्ष्य भेदर र लोग चकरा गये और युद्ध मे विमुख हो गये । पृथ्वी पर गिरा दिया था वे राहम किसी से नहीं तब वे दोनों वीर चन्द्रमा और सूर्य की भान्ति किसी से उन्होंने विशेष बातचीत नहीं की। सोहते हुए कृष्णा को लेकर एक कुंभार के घर वे से द्रौपदी को लेमर ब्राह्मणा सहित में जा घुमे । यहां अग्निशिखा के ममान तेजस्विनी इसप्रकार से चले जाते थे जैसे इन्द्र सब देवता एक वृद्धा स्त्री बैठी हुई थी। उसके पास अग्नि- और ऋषियों के साथ जाते हैं । सर्प की स्त्री जैसे सदृश तेजस्वी तीन वीर पुरुष और बैठे थे । मेरी सर्पराज के पीछे चले वैसी ही प्रसन्नता-पूर्ण नै पदी समझ में वह स्त्री उनकी माता होगी। इन दोनों उनी काली मृगछाला का कोना पकड़े पीछे-पीछे चीरों ने उसके पास पहुचकर उसके चरणों में जा रही थी। यह देखकर राजा लोग न सह सके। प्रणाम किया और द्रौपदी से भी प्रणाम करने के वे क्रुद्ध होकर युद्ध करने के लिये उनके पीछे दौड़े। लिये कहा । द्रौपदी को उस स्त्री के पास यह तव और एक भीमरूप वीर पुरुष उन राजाओं कहकर बिठा दिया कि यह 'भिक्षा है; फिर वे के आगे आकर-कुपित यमराज जैसे दण्डपहार से दोनों वीर और उस स्त्री के पास बैठे हुए तीन । मिले; स्वयम्पर --- PAN अध्याय १९५ ] म हा भारत ९०७ Doc•7000pco" सुप्तास्तु ते पार्थिव सर्व एव कृष्णा च तेषां चरणोपधाने । आसीत्पृथिव्यां शयनं च तेषां दर्भाजिनामास्तरणोपपन्नम् ॥ १० ॥ ते नर्दमाना इव कालमेघाः कथा विचित्राः कथयांवभूवुः । न वैश्यशूद्रोपयिकीः कथास्ता न च द्विजानां कथयन्ति वीराः ॥ ११ ॥ निःसंशयं क्षत्रियपुङ्गवास्ते यथा हि युद्धं कथयन्ति राजन् । आशा हि नो व्यक्तमियं समृद्धा मुक्तान्हि पाजशृणुमोऽग्निदाहात् ॥ १२ ॥ यथा हि लक्ष्यं निहितं धनुश्च सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य । यथा हि भापनि परस्परं ते छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ॥ १३ ।। वैशम्पायन उवाच-ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः पुरोहितं प्रेपयामास तेपाम् । विद्याम युप्मानिति भापमाणो महात्मनः पाण्डुसुताः स्थ कञ्चित् ।। १४ ।। गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा गत्वा प्रशंसामभिधाय तेपाम् । वाक्यं समयं नृपतेर्यथावदुवाच चाऽनुक्रमविक्रमेण विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः पञ्चालराजो वरदो वराहाः । लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा हर्पस्य नाऽन्तं प्रतिपद्यते सः ॥ १६ ।। पुरुषों में से दो पुरुष, चार जने भिक्षा मागने के क्षत्रिय है । हे पिता ! इसमें सन्देह नहीं है, कि रिये नगर में आये । भिक्षा मागकर जब वे रोटे हमारी आशा पूरी हुई है। सुना जाता है कि पाण्डव तब द्रौपदी ने उस भिक्षा की सामग्री में से कुछ अन्न अग्नि से बचकर निकल गये है ॥१॥१२॥ लेकर उससे देवताओं की पूजा की और ब्राह्मणों जिसतरह उस वीर पुरुष ने बलपूर्वक धनुष को भिक्षा देकर अतिथि सत्कार भी किया। फिर को उठाकर चहा रिया और चतुराई के साथ जितना अन्न बचा उसमें से उस वृद्धा स्त्री को । निशाना काटकर गिरा दिया और जिसतरह की और उन पाच पुरुषों को भोजन कराकर द्रौपदी बातचीत उनमें होती है, उससे स्पष्ट जान पड़ता ने भी भोजन किया । हे नरनाथ ! इसके पश्च त् , है कि वे छिपे हुए पाण्डव ही हैं । पाचौ भाई पृथ्वी पर कुशासम और मृगचर्म बिछाकर सब माना कुन्ती के साथ वेप बदले हुए घूम रहे हैं। रोग लेट रहे । कृष्णा भी पात्रों की तरफ रेट वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! इस समाचार से गई। तब वे पीर काले बादल के समान गम्भीर राजा द्रुपद को बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने उसी स्वर से आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे। समय अपने पूज्य पुरोहित को पाण्डवा के पास भेजा। वे जो बातें कर रहे थे ये कभी ब्राह्मण, वैश्य वा । पुरोहित से कह दिया-आप उन लोगों के पास शूद्र जाति की नहीं हो सकती । वे तो युद्ध की | जाकर पूठिएगा कि तुम लोग महात्मा पाण्डु की ही बात करते थे। इसलिये निम्सन्देह वे कोई श्रेष्ठ सन्तान हो या नहीं ? हम तुम्हारा परिचय लेना । 0wooook colosovoweyo ९०८ म हा भारत [ आदिपर्व Cocol अख्यात च ज्ञातिकुलानुपूर्वी पदं शिरःसु द्विषतां कुरुध्वम् । प्रह्लादयध्वं हृदयं ममेदं पंचालराजस्य च सानुगस्य ।। १७ ॥ पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः प्रियः सखा चाऽऽत्मसमो बभूव । तस्यैष कामो दुहिता ममेयं स्नुषां प्रदास्यामि हि कौरवाय ॥ १८ ॥ अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः । यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहुर्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् कृतं हि तत्स्यात्सुकृतं ममेदं यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् । अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥ २० ॥ समीपतो भीममिदं शशास प्रदीयतां पाद्यमध्य तथाऽम्मै । मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञस्तस्मै प्रयोज्याऽभ्यधिका हि पूजा ॥ २१ ॥ भीमस्ततस्तत्कृतवान्नरेन्द्र तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् । सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥ २२ ॥ पञ्चालराजेन सुता निस्सृष्टा स्वधर्मदृष्टेन यथा न कामात् । प्रदिष्टशुल्काद्रुपदेन राज्ञा सा तेन वीरेण तथाऽनुवृत्ता ॥ २३ ॥ चाहते है ॥१३॥१४॥ हृदयमन्दिर में सदा यह कामना रहती थी कि राजा की आज्ञा से राजपुरोहित ने पाण्डवों के । महाभुज अर्जुन धर्मानुसार उनकी कन्या को व्याहें । पास जाकर विधिपूर्वक हर एक की प्रशंसा करके राजा यदि सचमुच ऐमा ही हुआ हो, तो उनके लिये का सन्देसा यों कहा-हे श्रेष्ठ वीरो ! राजा द्रुपद बड़ा हित, पुण्यपूरित, यशयुक्त और सुकृत हुभा आप लोगों का नाम, कुल और निवास-स्थान है॥१९॥२०॥ जानना चाहते है । इन वीर पुरुष को लक्ष्य-बैध । पुगेहित के नम्रभाव से यह सच कह चुकने करते देखकर उन्हें बड़ा हप हुआ है ॥१५॥१६॥ पर युधिष्ठिर ने अपने पास बैठे हुए भीमसेन से अब आप लोग अपनी जाति, कुल आदि बना- कहा-हे भाई ! पाद्य, अर्घ्य आदि देकर इनका कर राजा को, उनके अनुचरों को और मुझे सरकार करो । ये राजा द्रुपद के पुरोहित, बड़े करके शत्रुओं के सिर पर पैर रखिए । महाराज माननीय हैं; विशेषरूप से इनकी पूजा करनी चाहिये। पाण्डु हमारे राजा द्रुपद के, आत्मा के समान, प्योरे : हे नरनाथ ! भाई की आज्ञा से भीमसेन ने अच्छी- मित्र थे । इसी कारण राजा को यह इच्छा थी । तरह भक्तिपूर्वक पुरोहित की पूजा की पूजा पाकर कि उनकी कन्या द्रौपदी उनके मित्र के पुत्र की पुरोहित जब प्रसन्नतापूर्वक आसन पर बैठ गये तब पत्नी हो ॥१७॥१८॥ युधिष्ठिर ने कहा-हे ब्राह्मण ! पाचाचलपति ने अपनी हे अनिन्दित रवान् वीरो ! रामा द्रुपद के । इच्छा से बेटी नहीं दी। उन्होंने अपने धर्म के अनुमार - प्रसन्न -- Horosovomewooornove अध्याय १९५] महा भारत Joc.0000 न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा न चापि शीले न कुले न गोत्रे । कृतेन सज्येन हि कार्मुकेण विद्धन लक्ष्येण हि सा विसृष्टा ॥ २४ ॥ सेयं तथाऽनेन महात्मनेह कृष्णा जिता पार्थिवसङ्घमध्ये । नैवं गते सोमाकिरद्य राजा संतापमहत्यसुखाय कर्तुम् ॥ २५॥ कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः स चापि संपत्स्यति पार्थिवस्य । संप्राप्यरूपां हि नरेन्द्रकन्यामिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये न तद्धनुर्मन्दवलेन शक्यं मौा समायोजयितुं तथा हि । न चाऽकृतास्त्रेण न हीनजेन लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥ २७॥ तस्मान्न तापं दुहितुनिमित्तं पञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य । न चापि तत्पातनमन्यथेह कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥२८॥ एवं ब्रवीत्येव युधिष्ठिरे तु पञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः । तत्राऽऽजगामाऽऽशु नरो द्वितीयो निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥ २९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पुरोहितागमने पंचनयत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९५ ।। लक्ष्य-ध की शर्त करके कन्या देने का विचार किया रहे हैं ॥२५॥२६॥ था । इन चीर पुरुष ने उसी शर्त को पूरा करके इसके सिवा निर्बल या कम बलवाला पुरुप उस उनकी कन्या प्राप्त है । इस समय ये वीर पुरुप धनुप पर कभी प्रत्यश्चा नहीं चढ़ा सकता और अपनी जाति, कुल, शील आदि के बारे में कुछ नीच कुल में उत्पन्न अथवा अस्त्रविद्या न जाननेवाला कहना नहीं चाहते । ॥२१॥२४॥ पुरुप कमी उम लक्ष्य को बंधकर पृथ्वी पर नहीं इन महात्मा ने राजा की इच्छा और प्रतिज्ञा गिरा सकता । इसलिये, और इसलिये कि उस के अनुसार ही मर राजाओं को जानकर उनके सश्वर के कार्य को पृथ्वी ए कोई मिथ्या नहीं बीच में कृष्णा को प्राप्त किया है । चन्द्रवंशी राजा कर सकता, राजा द्रुपद को अपनी कन्या के लिये द्रुपद को ऐसी दशा में शोक करना उचित नहीं; पछतावा या खेद करना उचित नहीं । युधिष्ठिर क्योंकि उससे दुःख के सिवा और कुछ लाभ नहीं हो ऐसा कह ही रहे थे कि द्रुपद के एक दूत ने आकर सकता; किन्तु मेरे विचार से उनकी पहले की इच्छा सूचना दी कि राजभवन में भोजन तैय्यार है भी पूरी होगी । हे ब्रह्मण ! इस राजकन्या को हम २७/२९॥ अपने अनुरूप और सुन्दर रणों से युक्त देख आदिपर्व का एक सौ पञ्चानवे अध्याय समाप्त हुआ। Promovrorijnory Prorooooooooooooooo roorma
९१०
म हा भारत
[ आदिपर्य
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अथ पग्नवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९६ ॥
दूत उवाच-जन्यार्थमन्नं द्रुपदेन राज्ञा विवाहहेतोरुपसंस्कृतं च
तदाऽप्नुवध्वं कृतसर्वकार्याः कृष्णां च तत्रैव चिरंजकार्यम् ॥ १ ॥
इमे रथाः काञ्चनपद्मचित्राः सदश्वयुक्ता वसुधाधिपार्होः ।
एतान्समारुह्य परैत सर्वे पञ्चालराजस्य निवेशनं तत्
वैशम्पायन उवाच-ततः प्रयाताः कुरुपुङ्गवास्ते पुरोहितं तं परियाप्य सर्वे ।
अस्थाय यानानि महान्ति तानि कुन्ती च कृष्णा च सहैकयाने ॥ ३ ॥
श्रुत्वा तु वाक्यानि पुरोहितस्य यान्युक्तवान्भारत धर्मराजः ।
जिज्ञासयैवाऽथ कुरूत्तमानां द्रव्याण्यनेकान्युपसंजहार
फलानि माल्यानि च संस्कृतानि वर्माणि चर्माणि तथाऽऽसनानि ।
गाश्चैव राजन्नथ चैव रज्जूर्वीजानि चाऽन्यानि कृषीनिमित्तम् ॥ ५ ॥
अन्येषु शिल्पेपुच यान्यपि स्युः सर्वाणि कृत्यान्यखिलेन तत्र ।
क्रीडानिमित्तान्यपि यानि तत्र सर्वाणि तत्रोपजहार राजा
वर्माणि चर्माणि च भानुमति खड्गा महान्तोऽश्वरथाश्च चित्राः ।
धपि चाऽग्न्याणि शराश्च चित्राः शक्त्य॒ष्टयः काञ्चनभूपणाश्च ॥ ७ ॥
प्रासा भृशुण्ड्यश्च परश्वधाश्च सांगामिकं चैव तथेह सर्वम् ।
शय्यासनान्युत्तमवस्तुवंति तथैव वासो विविधं च तत्र
एक मौ च्यानवे अध्याय ॥ १९६ ।।
दूत ने कहा-महाराज द्रुपद ने विवाह और ने पुरोहित को विदा कर दिया। फिर एक रथ पर
कन्यादान करने के अभिप्राय से बरातियों के लिये | कुन्ती और द्रोपदी को बिठाकर आप भी उत्तम
सुन्दर भोजन की सामप्रिया तैय्यार कराई है । रथों पर सवार होकर राजमवन को चले। इधर
आप लोग नित्यकृत्य समाप्त करके कृष्णा को साथ पुरोहित के मुँह से धर्मराज युधिष्ठिर की सब बातें
लेकर वहा शीघ्र पधारिए। सोने के कमलों से सुनकर द्रुपद ने उनकी जाति की जाच के लिये
सुहावने, राजाओं की सवारी के योग्य, ये स्थ अनेक प्रकार की उपहार की सामग्रिया रखवा दी।
खड़े हैं । इनमें उत्तम घोड़े जुते हुए है। आप चारों वणों के योग्य विविध फल, सुन्दर-सुन्दर
इनपर चढ़कर महाराज द्रुपद के भवन में पधारें मालाएँ, कवच, ढाल, आसन, गाय, रम्सी, बीज,
॥१॥२॥ खेती के सामान, अनेक प्रकार की कारीगिरयों के
वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! कुरुश्रेष्ठ पाण्डवों औजार और खेल के सामान रपे गये ॥३६॥
। अध्याय १९६ ] महाभारत greiroe कुंती तु कृष्णां परिगृह्य साध्वीमन्तःपुरं द्रुपदस्याऽविवेश । स्त्रियश्च तां कौरवराजपत्नी प्रत्यर्चयामासरदीनसत्वाः ॥ ९ ॥ तान्सिहविक्रान्तगतीन्निरीक्ष्य महर्षभाक्षानजिनोत्तरीयान् । गूढोत्तरांसान्भुजगेन्द्रभोगप्रलम्बवाहून्पुरुषप्रवीरान् राजा च राज्ञः सचिवाश्च सर्वे पुत्राश्च राज्ञः सुहृदस्तथैव प्रेष्याश्च सर्वे निखिलेन राजन्हर्ष समापेतुरतीच तत्र ते तत्र वीराः परमासनेषु सपादपीठेष्वविशङ्कमानाः यथानुपूर्व विविशुनराग्यास्तथा महाहेषु न विस्मयन्तः ॥ १२ ॥ उच्चावचं पार्थिवभोजनयिं पात्रीपु जाम्बूनदराजतीपु दासाश्च दास्यश्च सुमृष्टवेपाः संभोजकाश्चाऽप्युपजन्हुरन्नम् ॥ १३ ॥ ते तत्र भुक्त्वा पुरुषप्रवीरा यथाऽऽत्मकामं सुभृशं प्रतीताः । उत्क्रम्य सर्वाणि वसूनि राजन्साङ्ग्रामिकं ते विविशुवीराः ॥ १४ ॥ तल्लक्षयित्वा द्रुपदस्य पुत्रो राजा च सर्वैः सह मन्त्रिमुख्यैः । समर्थयामासरुपेत्य हृष्टाः कुन्तीसुतान्पार्थिव राजपुत्रान् ॥ १५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि घाहिकपर्वणि सांप्रामिकद्रव्यग्रहणे पण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥ इनके सिवा एक स्थान पर अलग कवच, ढाले, सब वहुत प्रसन्न हुए ॥९॥११॥ उत्तम तलवारे,घोड़े, विचित्र रथ, श्रेष्ठ धनुष,तरह-तरह वे नरश्रेष्ठ वीरगण बिना आश्चर्य और निडर चित्त के वाण, शक्ति,ऋष्टि, सुधणं से भूपित प्रास, भुशुण्डी, से अलग-अलग पाद-पीठ-युक्त अति सुन्दर मूल्यवान् परश्वध और अन्यान्य युद्ध के सामान, उत्तम पलङ्ग आसनों पर बड़े छटे के क्रम से जा बैठे । तब आसन आदि तथा तरह-तरह के बहुत कीमती, स्वच्छा मुन्दर वस्त्र पहने हुए दाम-दामीरापा मोते वरन भी रक्खें गये ||७1८1) के वर्तनों में राजाओं के योग्य अनेक प्रकार की अनन्तर कौरवराजपत्नी कुन्ती सती द्रौपदी को भोजन की सामग्री लाये । हे महाराज ! नरश्रेष्ठ लेकर राजा द्रुपद के अन्त पुर में गई । प्रभावशालिनी पाण्डव, अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार, उन सब अन्त.पुर की स्नियों ने कौरवराजरानी का यथोचित वस्तुओं को खाकर बहुत प्रसन्न हुए। अब आय आदर सत्कार किया । हे राजन् ! इधर सिंह की विलास की सामग्रियों को छोड़कर उन्होंने युद्ध की तरह चलनवाले, बड़े चैल की ऐसी रोचीरी ! सामग्री ही ग्रहण की। हे राजन् ! यह देखकर आंखोवाले, कृष्णाजिनधारी, भरे और उभेर कन्धों- 'द्रुपद, उनके पुत्र और मन्त्रियों को निश्चय हो गया वाले, महाबाहु, पुरुष-श्रेष्ठ पाण्डवों को देखकर राजा कि ये पाण्डव हो है ॥१२॥१५॥ द्रुपद, उनके मन्त्री, पुत्र, मित्र और नौकर-चाकर आदिपर्व का एक सौ छियानवे अध्याय ममान हुआ। priorvomorrocorolcomZyroin ९१२ म हा भारत [ आदिपर्व अथ सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥१९७ ।। वैशम्पायन उवाच-तत आहूय पाञ्चाल्यो राजपुत्रं युधिष्ठिरम् । परिग्रहेण ब्राह्मण परिगृह्य महाद्युतिः पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम् कथं जानीम भवतः क्षत्रियान्ब्राह्मणानुत ॥ २ ॥ वैश्यान्वा गुणसंपन्नानथवा शूद्रयोनिजान् । मायामास्थाय वा विप्रांश्चरतः सर्वतो दिशम् ॥ ३ ॥ -कृष्णाहेतोरनुप्राप्तान्देवान्सन्दर्शनार्थिनः ब्रवीतु नो भवान्सत्यं संदेहो ह्यत्र नो महान् ॥ ४ ॥ अपि नः संशयस्याऽन्ते मनः संतुष्टिमावहेत् । अपि नो भागधेयानि शुभानि स्युः परंतप ॥ ५ ॥ इच्छया ब्रूहि तत्सत्यं सत्यं राजसु शोभते । इप्टापूर्तेन च • तथा वक्तव्यमनृतं. न तु श्रुत्वा ह्यमरसंकाशं तव वाक्यमारिंदम ध्रुवं विवाहकरणमास्थास्यामि विधानतः युधिष्ठिर उवाच-मा राजन्विमना भूस्त्वं पाञ्चाल्य प्रीतिरस्तु ते । ईप्सितस्ते ध्रुवः कामः संवृत्तोऽयमसंशयम् ॥ ८ ॥ एक सौ सत्तानवे अध्याय ॥ १९७ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । अब मन को सन्तोष प्राप्त हो; हमारे भाग्य अच्छे निकलें। द्रुपद ने युधिष्ठिर को अपने पास बुलाकर ब्राह्मणाचित आप अपनी इच्छा से सच्चा परिचय देकर हमें कृतार्थ स्वागत करके कहा-हम कैसे जानें कि आप लोग | कीजिये । [ हमारा तो अनुमान है कि आप कोई कौन हैं ! आप ब्राह्मण हैं या क्षत्रिय, गुणी वैश्य | क्षत्रियकुलभूपण ही हैं। ] राजाओं के लिये सच है, अथवा शूद्र हैं ! कृष्णा को देखने और पाने की | बोलना ही शोभा देता है । झूठ बोलने से पुण्य क्षण इच्छा से आये हुए आप लोग अपनी माया से हो जाता है । इसलिये झूठ न बोलना । हे निष्पाप मनुष्य-रूपधारी देवता तो नहीं हैं ? आप अपना देवतुल्य, शत्रुमथन ! आपके उत्तर ठीक-ठीक परिचय देकर हमारे संशय को दूर कर विधिपूर्वक विवाह की तैय्यारी कराऊँगा ||५|७|| दीजिए ॥१४॥ युधिष्ठिर ने कहा-हे पाश्चालनाथ! आप घयराइए इस संदेह के दूर होने पर, ईश्वर करे, हमारे नहीं; प्रसन्न इजिए । आप निश्चय जानिए कि - . सुनकर मैं roooooooorconorosco.ororoochron202005 अध्याय १९७ ] महा मारत ९१३ Coconc 0.0/0ook 25oJoo50501 वयं हि क्षत्रिया राजन्पाण्डोः पुत्रा महात्मनः । ज्येष्ठं मां विद्धि कौन्तेयं भीमसेनार्जुनाविमौ ॥ ९ ॥ आभ्यां तव सुता राजन्निर्जिता राजसंसदि । यमौ च तत्र कुन्ती च यत्र कृष्णा व्यवस्थिता ॥ १० ॥ व्येतु ते मानसं दुःखं क्षत्रियाः स्मो नरर्षभ । पद्मिनीव सुतेयं ते हृदादन्यहृदं गता ॥ ११ ॥ इति तथ्यं महाराज सर्वमेतब्रवीमि ते भवान्हि गुरुरस्माकं परमं च परायणम् ॥ १२ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः स द्रुपदो राजा हर्षव्याकुललोचनः प्रतिवक्तुं मुदा युक्तो नाशकत्तं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥ यत्तेन तु स तं हर्षं संनिगृह्य परंतपः अनुरूपं तदा वाचा प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥ पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुताः पुरात् । स तस्मै सर्वमाचख्यावानुपूर्येण पाण्डवः ॥ १५ ॥ तच्छ्रुत्वा द्रुपदो राजा कुन्तीपुत्रस्य भापितम् । विगर्हयामास तदा धृतराष्ट्रं नरेश्वरम् आपकी इच्छा सचमुच पूरी हुई है। हे महाराज ! वैशम्पायन जी बोले-हे महाराज ! युधिष्ठिर के हम क्षत्रिय वशी महात्मा राजा पाण्डु के पुत्र है। मैं | ये वचन सुनते ही द्रुपद की आखों में आनन्द के सबमें बड़ा युधिष्ठिर ह । गजसमा में राजाओं को आसू भर आये । उन्होंने युधिष्ठिर से कुछ कहना चाहा, हराकर आपकी कन्या को ले जाने वाले ये दोना । परन्तु आनन्द के वेग से उनका गला भर आया वे वीर भीमसेन और अर्जुन हैं। वे दोना छोटे भाई कुछ कह न सके । इसके पश्चात् शत्रुमथन द्रुपद नकुल और सहदेव हैं। हमारी माता कुन्ती कृष्णा न बड़ी मुशिल से उस आनन्द के आवेश को के साथ आपके अन्त पुर में है । ॥ ८॥१०॥ सभालकर उचित वाक्यों से उनका अभिनन्दन किया। अब आप हमे क्षत्रिय ज नकर अपने मन से | फिर उन्होंने वारणापत नगर से, जतुगृह से, भाग चिन्ता हटा दीजिए। आपकी कन्या, पद्मिनी की निकलने का सब हाल पूछा और युधिष्ठिर ने वर्णन तरह, एक सरोवर से दूसरे सरोवर म पहुच गई । किया । धर्मात्मा महाराज द्रुपद ने युधिष्ठिर के मुख्य हे महाराज ! आप हमारे गुरु और परमगति है। से सब वृत्तान्त सुनकर राजा धृतराष्ट्र की बड़ी निन्दा जोसच बात थी सो मैने आपसे कह दी॥११॥१२॥ की ॥१३॥१६॥ । Joo. mooooo boorcoooozoooo ९८ 1000- फिर युधिष्ठिर को दिलासा देते हुए द्रुपद ने उनको युधिष्ठिर ने कहा कि हे राजन् ! मुझे मी करना होगा। द्रुपद ने कहा-हे वीर! दिया । उसी में कुन्ती, द्रौपदो और युधिष्ठिर आदि कीजिए; अथवा भाइयों में से जिसको आम पाण्डव सुख से रहने लगे। राजा दृपद नित्य विधिपूर्वक । द यही कृष्णा का पाणिग्रहण करे ॥२१॥३॥ संदद दूर हो जाने पा, पुत्रों से मनाह करके, दुगद भाइयों की धर्मपत्नी होंगी। हमारी । मुहर्त में द्रौपदी | पाणिग्रहण करें। अभी स बाहु-बल से इस कन्या म हा भारत rceracomicon 2000cdoo आप ही विधिपूर्वक मेरी कन्या का एवं प्रव्याहृतं पूर्व मम मात्रा विशांपते ॥ २३ ॥ आश्वासयामास च तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । प्रतिजज्ञे च राज्याय द्रुपदो वदतां वर ततः कुन्ती च कृष्णा च भीमसेनार्जुनावपि । यमौ च राज्ञा संदिष्टं विविशुर्भवनं महत् ॥ १८ ॥ तत्र ते न्यवसन्राजन्यज्ञसेनेन पूजिताः प्रत्याश्वस्तस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तम् ॥ १९ ॥ गृह्णातु विधिवत्पाणिमद्याऽयं कुरुनन्दनः पुण्येऽहनि महावाहुरर्जुनः कुरुतां क्षणम् ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-तमब्रवीत्ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिरः ममाऽपि दारसम्बन्धः कार्यस्तावद्विशांपते द्रुपद उवाच--भवान्वा विधिवत्पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम यस्य वा मन्यसे वीर नस्य कृष्णामुपादिश ॥२२॥ युधिष्ठिर उवाच-सर्वेषां महिषी राजन्द्रौपदी नो भविष्यति । . ॥ २१॥ अहं चाऽप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः । पार्थेन विजिता पा रत्नभूता सुता तब ॥२४॥ उनका राज्य दिला देने की प्रतिना की। अब दृपद ने पाण्डवों के रहने के लिये एक सुन्दर भवन प पाण्डवों का आदर-सत्कार करने लंग । इमप्रकार ने युधिष्ठिर से कहा-अब कुरुनन्दन अर्जुन शुभ मी ही आज्ञा दे च युधिष्ठिर ने कहा-हे महात्मा ! ती देव-पूजा आदि श टत्सव और कुलाचार किया जाना नाहिये ॥१७॥२०॥ मम्पायन ने कहा- महागज ! तब धर्मात्मा अध्याय १९७ ] महाभारत .. एप नः समयो गजनतस्य सह भोजनम् । न च तं हातुमिच्छामः समय राजसत्तम ॥ २५॥ सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति । आनुपूर्येण सर्वेपां गृह्णातु ज्वलने करान् करान् ॥ २६ ॥ द्रुपद उपाच-एकस्य बढ्यो विहिता महिप्पः कुरुनन्दन नैकस्या वहवः पुंसः श्रूयन्ते पतयः क्वचित् ॥ २७ ॥ लोकवेदविरुद्धं त्वं नाऽधर्म धर्मविच्छुचिः कर्तुमर्हसि कौन्नेय कस्मात्ते वुद्धिरीदृशी ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर उवाच-सूक्ष्मो धर्मों महाराज नाऽस्य विद्मोवयं गतिम् । पूर्वेपामानुपूर्येण यातं वाऽनुयामहे न मे वागनृतं प्राह नाऽधर्मे धीयने मतिः । एवं चैव वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम् एप धर्मो ध्रुवो राजश्चरैनमविचारयन् मा च शङ्का तत्र ते स्यात्कथंचिदपि पार्थिव ॥ ३१ ॥ द्रुपद उगाच -वं च कुन्ती च कौन्तेय धृष्टद्युम्नश्च मे कथयन्वितिकर्तव्यं श्व काले करवामहे ॥ ३२॥ रत्नरतु राते हैं उसको हमयर भाई भोगते हैं। वेद विरुद्ध, रोक्-विरुद्ध काम करना आपको उनित इमलिये है नरश्रेष्ठ । हम अपने उस नियम के नहीं । आपको यह बुद्धि केस हुई 1 ॥२७.२८॥ पिरत कुछ नही कर सकते । कृष्णा हम पाचा युधिष्ठिर ने कहा-हे महाराज ! धर्ममार्ग सूक्ष्म भाइयों की धर्मपत्नी होगी । अग्नि को साक्षी है, उसकी गति हम समझ नहीं सकते । पूर्वपुरुष करके, बड़े छोटे के क्रम के अनुसार, हम पाचों जिस राह पर चले हैं उसी पर हम चर भर सकते भाइयों के साथ दीपदी का विवाह होना चाहिये है। हम कभी झूठ नहीं बोलते । हमारी प्रवृत्ति ॥२३॥२६॥ कभी अधर्म में नहीं होती । हे राजन् ! हमारी या मुनकर द्वाद ने कहा है कुरुनन्दन । शास्त्र माना की यही आजा है और हमारी भी यही मम्मति की विधि में एक पुरुष की अनेक स्त्रिया नो हुआ है कि कृष्णा हग पाचां भाइयों की धर्मपत्नी हो । करती है, परन्तु हमने यह सुना भी नहीं कि एक हमने यह यान धर्म ही के अनुमार कही है। आप पत्री के अनेक पति हो सकते हैं। है कुन्तीपुर। सोच विचार किये बिना यही कीजिए ॥२९॥३०॥ आप तो जानी और यह पता है फिर ऐमा ६ नाय | आपको इस विषय में मिमी- सुतः ।
९१४ महा भारत [ आदिपर्व 00200cod - आश्वासयामास च तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । प्रतिजज्ञे च राज्याय द्रुपदो वदतां वर ॥१७॥ ततः कुन्ती च कृष्णा च भीमसेनार्जुनावपि । यमौ च राज्ञा संदिष्टं विविशुर्भवनं महत् ॥ १८ ॥ तत्र ते न्यवसन्राजन्यज्ञसेनेन पूजिताः प्रत्याश्वस्तस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तम् ॥ १९ ॥ गृह्णातु विधिवत्पाणिपद्याऽयं कुरुनन्दनः पुण्येऽहनि महावाहुरर्जुनः कुरुतां क्षणम् ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-तमब्रवीत्ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिरः ममाऽपि दारसम्बन्धः कार्यस्तावद्विशांपते द्रुपद उवाच-भवान्वा विधिवत्पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम यस्य वा मन्यसे वीर नस्य कृष्णामुपादिश ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर वयाच-सर्वेषां महिषी राजन्द्रौपदी नो भविष्यति । एवं प्रव्याहृतं पूर्व मम मात्रा विशांपते ॥ २३ ॥ अहं चाऽप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः । पार्थेन विजिता चैपा रत्नभूता सुता तव ॥ २४ ॥ फिर युधिष्ठिर को दिलासा देते हुए द्रुपद ने उनको युधिष्ठिर ने कहा कि हे राजन् ! मुझे भी विवाह उनका राज्य दिला देने की प्रतिना की। अब करना होगा । द्रुपद ने कहा-हे वीर । तो फिर द्रुपद ने पाण्डवों के रहने के लिये एक सुन्दर भवन आप ही विधिपूर्वक मेरी कन्या का पाणिग्रहण दिया । उसी में कुन्ती, द्रौपदो और युधिष्ठिर आदि कीजिए; अथवा भाइयों में से जिमको आप अनुमति पाण्डव सुख से रहने लगे। राजा द्रुपद नित्य विधिपूर्वक | दें यही कृष्णा का पाणिग्रहण करे ॥२१॥२२॥ पाण्डवों का आदर-सत्कार करने लगे । इमप्रकार युधिष्ठिर ने कहा-हे महात्मा । द्रौपदी हमसब संदेह दूर हो जाने पर, पुत्रों से सलाह करके, द्रुपद भाइयों की धर्मपत्नी होगी। हमारी गाता पहले ने युधिष्ठिर से कहा-अब कुरुनन्दन अर्जुन शुभ ऐसी ही आज्ञा दे चुकी हैं। अर्जुन ने अपने मुह में द्रौपदी का पाणिग्रहण करें। अभी से बाहु-बल से इम कन्या-रत्न को प्राप्त किया है। देव-पूजा आदि का उत्सव और कुगनार किया | मेरा और भीममेन का अभी विवाह नहीं हुभा जाना चाहिये ॥१७॥२०॥ हमारा भी समानरूप से इस कन्या-रन में हिस्सा पैगम्पायन ने कहा- हे महागज ! तय धर्मात्मा है। हमारा सयका नियम यह है कि जो कोई अध्याय १९७ ] महाभारत conc50000100oor एप नः समयो राजननस्य सह भोजनम् । न च तं हातुमिच्छामः समयं राजसत्तम सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिपी नो भविष्यति आनुपूर्येण सर्वेषां गृह्णातु ज्वलने करान् ॥ २६ ॥ द्रुपद उपाच-एकस्य वयो विहिता महिप्यः कुरुनन्दन । नैकस्या बहवः पुंसः श्रूयन्ते पतयः कचित् ॥ २७॥ लोकवेदविरुद्धं त्वं नाऽधर्म धर्मविच्छुचिः कर्तुमर्हसि कौन्तेय कस्मात्ते बुद्धिरीदृशी ॥ २८ ।। युधिष्ठिर उवाच-सूक्ष्मो धर्मो महाराज नाऽस्य विद्मोवयं गतिम् । पूर्वेपामानुपूर्येण यातं वाऽनुयामहे ॥ २९॥ न मे वागनृतं प्राह नाऽधर्मे धीयते मतिः एवं चैत्र वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम् एप धर्मो ध्रुवो राजश्चरैनमविचारयन् मा च शङ्का तत्र ते स्यात्कथंचिदपि पार्थिव ॥३१॥ द्रुपद उवाच --खं च कुन्ती च कौन्तेय धृष्टद्युम्नश्च धृष्टद्युम्नश्च मे सुतः । कथयन्वितिकर्तव्यं श्व. काले करवामहे ॥ ३२ ॥ रसरातु राने हैं उसको हममय भाई भोगते है। वेद बिरुद्ध, लोक-विरुद्ध काम करना आपको उचित इसलिये है नरश्रेष्ठ ! हम अपने उस नियम के नहीं । आपकी यह बुद्धि कैसे हुई । ॥२७॥२८॥ विपरत कुछ नहीं कर सकते । कृष्णा हम पाची युधिष्ठिर ने कहा-हे महाराज ! धर्ममार्ग सूक्ष्म भाइयों की धर्मपत्नी होगी । अग्नि को साक्षी है, उसकी गति हम समझ नहीं सकते । पूर्वपुरुष करके, बड़े छोटे के क्रम के अनुमार, हम पाचों जिस गह पर चले हैं उसी पर हम चल भर सकते भाइयों के साथ द्रौपदी का विवाह होना चाहिये हैं। हम कभी झूठ नहीं बोलते । हमारी प्रवृत्ति ॥२३॥२६॥ कभी अधर्म में नहीं होती । हे राजन् ! हमारी यह सुनकर द्रुपद ने कहा है कुरुनन्दन ' शास्त्र माता की यही आजा है और हमारी भी यही मम्मति की विधि में एक पुग्ण की अनेक स्त्रिया नो हुआ है कि कृष्णा हम पांचों भाइयों की धर्मरली हो । मरनी, पान्तु हमने यह सुना भी नहीं किएक हमने यह बान धर्म ही के अनुसार कही है । आप स्त्री के अनेक पति हो सकते हैं । हे कुन्तीपुत्र! सोच-विचार दिये बिना यही कीजिए ॥२१॥३०॥ आप नो पानी और बड़े धर्मात्मा हैं फिर ऐमा है व नाथ ! आपको इस शिपय में किमी.
९१६ महा भारत [ आदिपर्व D०० 0000na coccalcoo वैशम्पायन उवाच-ते समेत्य ततः सर्वे कथयन्ति स्म भारत अथ द्वैपायनो राजन्नभ्यागच्छद्यदृच्छया ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥ तरह कुछ शङ्का न करनी चाहिये । द्रुपद ने कहा जायगा। वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! इसके हे कुन्तीपुत्र ! आप पहले कुन्ती और मेरे पुत्र पश्चात् सब लोग मिलकर इस बारे में विचार करने धृष्टद्युम्न के साथ सलाह करके कर्तव्य का निश्चय लगे। इसी समय भगवान् वेदव्यास इच्छानुसार वहा कर लीजिए! जो निश्चय होगा वही कल किया पर आ गये ॥३१॥३३॥ आदिपर्व का एक सौ सत्तानवे अध्याय समाप्त हुआ। अथ अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९८ ।। वैशम्पायन उवाच- च-ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाश्चाल्यश्च महायशाः । प्रत्युत्थाय महात्मानं कृष्णं सर्वेऽभ्यवादयन् ॥ १ ॥ प्रतिनन्य स तां पूजा पृष्ट्वा कुशलमन्ततः । आसने काञ्चने शुद्धे निषसाद महामनाः ॥ २ ॥ अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनाऽमिततेजसा आसनेषु महापु निषेदुर्दिपदां वराः ततो मुहूर्तान्मधुरा वाणीमुच्चार्य पार्पतः पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थं विशांपते ॥ ४ ॥ कथमेका वहूनां स्याद्धर्मपत्नी न सङ्करः एतन्मे भगवान्सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम् व्यास उवाय -अस्मिन्धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके यस्य यस्य मतं यद्यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ॥ ६ ॥ एक सौ अट्ठानवे अध्याय ॥ १९८ ॥ वैशम्पायन बोले-हे राजा जनमेजय ! व्यास जी पाण्डव भी अपने-अपन आसनों पर बैठ गये। है को आते देखकर द्रुपद और पाण्डव उठ खड़े हुए। पृथ्वीनाथ ! पृपराज पुत्र राजा पाञ्चाल ने क्षगमर सबने प्रणाम करके उनका पूजन किया। महामनम्बी पीछे मधुर वचन कहक महात्मा ऋषि से द्रौपदी के महर्षि व्यास उनकी पूजा ग्रहण करके कुशल-प्रश्न सम्बन्ध में प्रश्न किया ॥३॥४॥ के उपरान्त सुवर्ण के आसन पर बैठे ॥१२॥ हे भगवन् । एक स्त्री अनेक पुरुषों की धर्मपत्नी अब उनकी आज्ञा पाकर राजा द्रुपद और कैसे हो सकती है ! इस बारे में आप हम सबकी - । porrorror oomcoozos : - अध्याय १९८] महा भारत ९१७ mewwereciprereoverrer द्रुपद उवाच-अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः । न धेका विद्यते पत्नी वहूनां द्विजसत्तम न चाऽप्याचरितः पूर्वरयं धर्मों महात्मभिः । न चाऽप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन ततोऽहं न करोम्येन व्यवसायं क्रियां प्रति । धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे स्वयम् ॥ ९ ॥ धृष्टद्युम्न उपाच-यवीयसः कथं भार्या ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ । ब्रह्मन्समभिवर्तेत सवृत्तः संस्तपोधन ॥ १० ॥ न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद्गति विद्मः कथंचन । अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते ॥ ११ ॥ कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मस्ततोऽयं न व्यवस्यते पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर उवाच-न मे वागनृतं प्राह नाऽध धीयते मतिः । वर्तते हि मनो मेऽत्र नेपोऽधर्मः कथं वन ॥ १३ ॥ श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी । ऋपीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा टीक ठीक व्यवस्था दीजिए । व्यास जी ने कहा भरा हुआ प्रतीत हो रहा है । उसके पीछे धृष्टद्युम्न वेद और लोकाचार में प्रसिद्ध न रहने से यह धर्म । ने कहा -हे ब्रह्मन् ! आप ब्राह्मणों में श्रेष्ठ और लोप हो गया है, परन्तु इस विषय में तुममें से तपोबल से बली हैं, कहे तो सही, कि बड़ा भाई किसका क्या मन है, सुना चाहता हू ॥५॥६॥ सच्चरित्र होकर क्या कर छोटे भाई की स्त्री से मिल दुपद ने कहा- द्विजश्रेष्ठ ! मै तो हम कर्ग सकता है ॥९॥१०॥ को रोक और धर्म के विपरीन जानता हू। कहीं इसमें मन्देह नहीं कि धर्म की गति सूक्ष्म होने ऐसा नहीं हुआ है कि एक स्त्री बहुत से मनुष्यों के कारण हम उस नहीं जान • सस्ते परन्तु अधर्म की पत्नी हुई हो और न किसी महात्मा ने ऐमा को धर्म भी नहीं मान सकते। इसीलिए हम ऐसे पहले किया है । यह सर्वथा अधर्म है और विद्वानों लोग ऐमा काम का अनुमोदन नहीं कर सकते। को अधर्म कमी न करना चाहिये ॥७८॥ मैं यह सम्मति नहीं दे सकता कि द्रौपदी पांच इसलिये मैं इस काम में हाथ डालने का साहम पुरुषों की पत्नी हो ॥११॥१२॥ नहीं कर सकता है, यह धर्म मुझको मदा सन्देह से युधिष्ठिर ने कहा-मने न कभी झूठ ही - ९१८ महा भारत [ आदिपर्व 1024010004 - तथैव मुनिजा वाी तपोभिर्भावितात्मनः । संगताऽभूद्दश भ्रातृनेकनाम्नः प्रचेतसः गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धयं धर्मज्ञसत्तम गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः सा चाऽप्युक्तवती वाचं भक्ष्यवद्भुज्यतामिति । तम्मादेतदहं मन्ये परं धर्म द्विजोत्तम ॥ १७॥ कुन्त्युवाच-एवमेतद्यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः अनृतान्मे भयं तीनं मुच्येऽहमनृतात्कथम् ॥ १८ ॥ व्यास उवाच अनृतान्मोक्षसे भद्रे धर्मश्चैप सनातनः न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम् ॥ १९ ॥ यथाऽयं विहितो धर्मों यतश्चायं सनातनः । यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-तत उत्थाय भगवान्व्यासो द्वैपायनः प्रभुः । करे गृहीत्वा राजानं राजवेशम समाविशत् ॥ २१ ॥ पाण्डवाश्चाऽपि कुन्ती च धृष्टद्युम्नश्च पार्पतः । विविशुर्यत्र तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ ॥ २२ ॥ कहा और न अधर्म में मेरी प्रवृत्ति ही हो सकती । की तरह, द्रौपदी को ग्रहण करो । इस कारण मुझे है। मेरी समझ में तो हम पांचों के साथ विवाह तो यही परमधर्भ जान पड़ता है । कुन्ती ने कहा- होना धर्म के विपरीत नहीं है। हमने पुराणों में धर्मात्मा युधिष्ठिर ने ठीक कहा है। में मिथ्या वचन भी सुना है कि जटिला नाम गौतम कुल की ऐसी से बहुत डरती हूं । मेरे वचन को झूठ न होने धर्मात्मा स्त्री के साथ सात ऋपियों का विवाह देने का इसके सिवा और क्या उपाय है ॥१७॥१८॥ हुआ था ॥१३॥१४॥ व्यास जी ने कहा-हे भद्र ! तुमको झूठ बोलने और वाी नाम एक ऋपि की पुत्री से प्रचेता । के पाप में लिप्त न होना होगा । जो तुमने कहा नाम दस भाइयों से विवाह हुआ था । हे धर्मज्ञ ! है वह सनातनधर्म के अनुकूल है। अब व्यास पडे-यूदों की आज्ञा का पालन ही धर्म समझा जी ने द्रुपद से कहा-हे पांचाल ! मै सब के आगे जाता है। माता के समान बड़ा कोई नहीं है । अपनी सम्मति नहीं दे सकता। आभा, मैं एकान्त का दर्जा सबसे बढ़कर है ॥१५॥१६॥ में तुम्हारे आगे इमी सम्बन्ध की एक कथा कहूंगा। उन्होंने आना दी है कि तुम सब माई, भिक्षा तुम चिन्ता न करो । धर्म की व्यवस्था के अनुसार PooJ००० - मा Pramod अध्याय १९९ ] महाभारत cocono. leoneo0itcoieko 100000000000002 ततो द्वैपायनस्तस्मै नरेन्द्राय महात्मने आचख्यौ तद्यथा धर्मो बहूनामेकपत्निता ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्माइभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टनरत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९८ । इसे सनातनधर्म ही मानना चाहिये । युधिष्ठिर ने भवन के भीतर एकान्त स्थान में ले गये । पीछे जो कहा है वही धर्मयुक्त है। इसमें किसीपकार | से पाण्डव, कुन्ती और धृष्टद्युम्न भी वहां पहुंच गये । का संदेह नहीं ॥१९॥२०॥ तब व्यास जी राजा द्रुपद के आगे कहने लगे कि वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! अनन्तर व्यास एक पत्नी के अनेक पति होना क्यों धर्म है जी उठ सड़े हुए और राजा का हाथ पकड़कर उन्हें ॥२१॥२३॥ आदिपर्व का एक सौ अट्ठानवे अध्याय समाप्त हुआ । 297ore अथ नवनवत्यधिकशततमोऽध्याय ॥ १९९ ।' व्यास उवाच-पुरा वै नैमिषारण्ये देवाः सत्रमुपासते तत्र वैवस्वतो राजञ्छामित्रमकरोत्तदा ततो यमो दीक्षितस्तत्र राजन्नाऽमारयत्कंचिदपि प्रजानाम् ततः प्रजास्ता बहुला बभूवुः कालातिपातान्मरणप्रहीणाः ॥ २ ॥ सोमश्च शको वरुणः कुबेरः साध्या रुद्रा वसवोऽथाश्विनौ च । प्रणेतारं भुवनस्य प्रजापति समाजग्मुस्तत्र देवास्तथाऽन्ये ॥ ३ ॥ ततोऽत्रुवन्लोकगुरुं समेता भयासीनान्मानुपाणां विवृद्धया । तस्माद्भयादुद्विजन्तः सुखेप्सवः प्रयाम सर्वे शरणं भवन्तम् ॥ ४ ॥ एक सौ निम्नानवे अध्याय ।। १९९ ॥ श्री व्यास जी ने कहा हे राजा द्रुपद ! पूर्व समय रुद्रगण, यमुगण, अश्विनीकुमार आदि सय देवता में देवताओं ने नैमिषारण्य क्षेत्र में एक यज्ञ आरम्भ मिलकर मृष्टिकची प्रजापति ब्रमा के पास पहुंचे । किया था । उस यज्ञ में सूर्य के पुत्र यमराज को सब ने ब्रह्मा जी से कहा-हे भगवन् । मनुष्यों की यज्ञ के पशुओं के मारने के काम पर नियत किया वहीतरी देखकर हमें पड़ा डर लग रहा है। उनकी था। बहुत दिनों तक दीक्षित रहने के कारण से बढीतरी देखकर हम लोग बहुत ही चिन्तित और किसी ससारी जीव की मृत्यु नहीं हुई। और इस घबराये हुए है । हम आपकी शरण में इसलिये कारण से सब ससार के मनुष्य आदि यहुन बह आये हैं जिसमें हमारा यह डर और चिन्ता दूर गये ॥१॥२॥ हो तथा हम सुनी हो ॥३॥४॥ अनन्तर चन्द्रमा, इन्द: वरुण, कुरेर, मा-यगण, ब्रह्मा ने कहा-मनुष्यों से तुमको क्या डर।
९२० महाभारत [ आदिपर्व chc Zoooooooooooo2050 पितामह उवाच-किं वो भयं मानुषेभ्यो यूयं सर्वे यदाऽमराः । मा वो मर्त्यसकाशादै भयं भवितुमर्हति देवा ऊचुः-मां अमाः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन । अविशेपादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहाऽऽगताः भगवानुवाच-चैवस्वतो व्याप्तः सत्रहेतोस्तेन त्विमे न म्रियन्ने मनुष्याः। तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये सत एपां भवितैवाऽन्तकालः वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता वीर्येण युष्माकमुत प्रवृद्धा सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले न तत्र वीर्य भविता नरेषु ॥ ८ ॥ व्यास उवाच-ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं श्रुत्वा जग्मुर्यत्र देवा यजन्ते । समासीनास्ते समेता महावला भागीरथ्यां ददृशुः पुण्डरीकम् ॥ ९ ॥ दृष्ट्वा च तद्विस्मितास्ते बभूवुस्तेपामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम । सोऽपश्यद्योपामथ पावकप्रभा यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ॥ १० ॥ सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी गङ्गां देवीं व्यवगाह्य व्यतिष्ठत्. । तस्याऽश्रुविन्दुः पतितो जले यस्तत्पद्ममासीदथ तत्र काञ्चनम् ॥ ११ ॥ तुम अमर हो, और मनुष्य मरणशील हैं। इसलिये का कुछ यश नहीं चलेगा । व्यास जी बोले-अपने मनुष्यों से डरना तुम्हारे लिये ठीक नहीं । देवताओं पूर्व-पुरुष ब्रह्मा के ये वचन सुनकर सब देवता उस ने कहा-हे महाराज ! अब मनुष्य भी न मरने से यनमण्डप में लौट आये जहां देवता यज्ञ कर रहे अमर होने की तुल्य हो गये हैं । इससे देवता थे। इसके पश्चात् एक दिन सब देवता एक जगह और मनुष्यों में कुछ भेद नहीं रहा । कुछ भेद -बैठे हुए थे कि उन्होंने देखा, गङ्गा की धारा में न रहने के कारण ही हम इतना व्याकुल हो रहे एक सोने का कमल बहता चला जा रहा है ॥७॥२॥ हैं । इस समय हम आपके पास इसीलिये आय उसे देखकर सबको बहुत अचरज हुभा । सब हैं कि हमारी विशेषना बनी रहने का आप उपाय में प्रधान और वीर इन्द्रदेव उस पुष्प का ठी. कीजिए ॥५॥६॥ ठीक वृत्तान्त जानने के लिये चल पड़े। गंगा की यह सुनकर ब्रह्मा ने कहा-यमराज इस समय घारा जिस स्थान से निकलती है वहां पहुंचकर यन में लगे हुए है, इसी से मनुष्यों की मृत्यु नहीं ' इन्द्र ने एक अग्निशिखा के समान तेजस्विनी सी होती । सत्रयज्ञ के समाप्त होने पर वे मनुष्यों का को देखा। वह स्त्री रोती हुई जल की चाह से नाश करेंगे। शरीर (रोग आदि ) तुम्हारे वीर्य के गहा के भीतर खड़ी हुई थी। उसकी आंखों से द्वारा बढ़ने, पर या विभक्त होने पर, उसी के द्वारा जो आंसू की बूंदें गिरती थी वही मुवर्ण-कगल मनुष्यों का नाश होगा । उसपर मनुष्यों की शक्ति बन जाते थे । यह आश्चर्यलीला देसार इन्द्र - 7MXP अध्याय १९९.] महाभारत ९२१ .. तदद्भुतं प्रेक्ष्य वजी तदानीमपृच्छत्तां योपितमन्तिकाद्वै । का त्वं भद्रे रोदिपि कस्य हेतोर्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ॥ १२ ॥ स्ट्युवाच-त्वं वेत्स्यसे मामिह याऽस्मि शक यदर्थं चाऽहं रोदिमि मन्दभाग्या। आगच्छ राजन्पुरतो गमिष्ये द्रष्टासि तद्रोदिमि यत्कृतेऽहम् ॥ १३ ॥ व्यास आच-तां गच्छन्तीमन्वगच्छत्तदानीं सोऽपश्यदारात्तरुणं दर्शनीयम् । सिंहासनस्थं युवतीसहायं क्रीडन्तमगिरिराजमूर्ध्नि तमब्रवीद्देवराजो ममेदं त्वं विद्धि विद्वन्भुवनं वशे स्थितम् । ईशोऽहमस्मीति समन्युरब्रवीद् दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ॥ १५ ॥ क्रुद्धं च शक्रं प्रसमीक्ष्य देवो जहास शक्रं च शनैरुदैक्षत । संस्तम्भितोऽभूदथ देवराजस्तेनेक्षितः स्थाणुरिवाऽवतस्थे ॥ १६ ॥ यदा तु पर्याप्तमिहाऽस्य क्रीडया तदा देवीं रुदती तामुवाच । आनीयतामेप यतोऽहमारान्नैनं दर्पः पुनरप्याविशेत ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तया तु त्रस्तर पतितोऽ ऽभूद्धरण्याम् । तमब्रवीद्भगवानुग्रतेजा मैवं पुनः शक्र कृथाः कथंचित् ॥ १८ ॥ निवर्तयनं च महाद्रिराजं चलं च वीर्य च तवाऽप्रमेयम् । छिद्रस्य चैवाऽऽविश मध्यमस्य यत्राऽऽसते त्वद्विधाः सूर्यभासः ।। १९ ॥ उस स्त्री के पास गये और पूछने लगे-हे भद्रे! चौसर खेल रहा है । इन्द्र के यहां पहुंचने पर भी तुम कौन हो ! क्यों रो रही हो। मैं इसका ठीक उस युवक ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया । इस ठीक हाल जानना चाहता हू ॥१०॥१२॥ कारण इन्द्र को क्रोध चढ़ आया । उन्होंने कोष से उस स्त्री ने कहा-है देवराज ! में बड़ी अभागी भरी दृष्टि से उस युवक की ओर देखकर बई उच्च हूं, तुम मेरे साथ चरो, तो जान सकोगे कि मैं म्बर से कहा-हे पुरुप ! तुमको मालूम होना चाहिये कौन और क्यों रो रही है । हे महाराज ! तुम मेरे कि यह मुवन मेरा है, इस कारण मेरे ही अधीन साथ-साथ आओ, मैं तुम्हारे आग चलनी हू मेरी है । मैं ईश्वर हूं। इन्द्र के गर्व से भरे बचा रुलाई का कारण तुम देख लोगे । व्यास जी बोले- सुनकर उस देवता ने मुसकराकर इन्द्र की ओर देवराज तर स्त्री की यह बात सुनकर उसके देखा । इन्द्र उसके देखते ही जड़ की तुल्य सड़े पीट-पीछ नर ने रगे। आगे कुछ दूर जाकर पास के सड़ रह गये । चीमर का रोल जय समाप्त हो ही हिमाचल की चोटी पर देखा कि एक परम नुका तर उस युवा पुरुप ने उमरो रही स्त्री मे मुन्दर युवा पुम्प युवती के साथ सिंहासन पर बैठा हा- इन्द्र की मेरे पाम ले आ। मैं वही मंगा ९२२ महा भारत [ आदिपर्व poo० स तद्विवृत्य विवरं महागिरेस्तुल्यद्युतींश्चतुरोऽन्यान्ददर्श स तानभिप्रेक्ष्य वभूव दुःखितः कच्चिन्नाऽहं भविता वै यथेमे ॥ २० । ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच । दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो यन्मां वाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ॥ २१ ॥ उक्तस्त्वेवं विभुना देवराजः प्रावेपताऽऽतॊ भृशमेवाऽभिपङ्गात् । स्रस्तैरङ्गैरनिलेनेव नुन्नमश्वत्थपत्रं गिरिराजमूर्ध्नि ॥ २२ ॥ स प्राञ्जलि वृषवाहनेन प्रवेपमानः सहसैवमुक्तः उवाच देवं बहुरूपमुग्रं द्रष्टाऽशेषस्य भुवनस्य त्वं भवाऽद्य ॥ २३ ॥ तमत्रवीदुग्रवाः प्रहस्य नैवंशीलाः शेषमिहाऽऽप्नुवन्ति एतेऽप्येवं भवितारः पुरस्तात्तस्मादेतां दरीमाविशाऽत्रैव शेष्त्र ॥ २४ ॥ तत्र ह्येवं भवितारो न संशयो योनि सर्वे मानुपीमाविशध्वम् । - तत्र यूयं कर्म कृत्वाऽविषह्यं वहूनन्यान्निधनं प्रापयित्वा ॥ २५ ॥ आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकं स्वकर्मणा पूर्वजितं महाहम् सर्व मया भापितमेतदेवं कर्तव्यमन्यद्विविधार्थयुक्तम् ॥ २६ ॥ जिससे फिर उसके शरीर में गर्व का भाव प्रवेश न क्योंकि तुमने अभी मूर्खता के कारण मेरा अपमान कर सके । उस स्त्री ने आकर जैसे ही इन्द्र के | किया है । ॥१९॥२१॥ शरीर में हाथ लगाया वैसे ही चे पृथ्वी पर गिर रुद्र के यह कहने पर, पर्वत के शिखर पर लगे पड़े । तब उग्र तेजवाले युवकरूप भगवान् शङ्कर पीपल के पत्ते की तरह, टर के मारे इन्द्र कांपने ने उनसे कहा ।।१३।१८॥ लगे। वे बैल पर चढ़े महादेव जी से एकाएक हे इन्द्र ! अब कभी ऐसा न करना । तुम्हारा | ऐसी कटीली बात सुनकर थरथराये हुए दोनों हाथ घल और वीर्य बहुन अधिक है। इसलिये इस वही जोड़ कर अनेक रूप धारण करनेवाले उन कठोर भारी शिला को उठाकर नीचे की कन्दरा में जाओ। देव से बाले ॥२२॥२३॥ वहां तुम्हारे ऐसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी और भी इन्द्र हे आदिनाथ ! तुम चराचर सहित विश्व के हैं । इन्द्र ने वह शिग हटाकर देखा कि गुफा के देखने वाले हो, तुम सब कुछ जानने हो । तर कठोर भीतर उन्हीं के ऐसे और भी चार इन्द्र मौजूद है। तेजस्वी महादेव जी हमकर बोले-मे उगपर कभी उन्हें देख कर इन्द्र बहुत ही दुःखी हुए और सोचने प्रसन्न नहीं होता, जो लोग एसा अहंकारी स्वमाय लगे कि क्या मेरी भी इनकी ऐसी दशा होगी। तव रखते हैं। देखो, ये चारों पुरुष भी पहले तुम्हारे शकर ने क्रोध से भी दृष्टि से भयकर भाव प्रकट ऐसा कर्म कर चुके हैं और उसे इस दिशा को फरके कहा- तुम इसी कन्दरा के भीतर जाओ; पहुंचे हैं । इसलिये तुम भी इन्हीं की तरह इस पहाड़ ।
COcroc - अध्याय १९९ ] महाभारत ९२३ rood पूर्वेन्द्रा ऊचुः-गमिष्यामो मानुषं देवलोकाहुराधरो विहितो यत्र मोक्षः । देवास्त्वस्मानादधीरजनन्यां धर्मों वायुर्मघवानश्विनौ च अस्त्रैर्दिव्यैर्मानुपान्योधयित्वा आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकम् व्यास उवाय-एतच्छ्रुत्वा वज्रपाणिर्वचस्तु देवश्रेष्ठं पुनरेवेदमाह वीर्येणाऽहं पुरुष कार्यहेतोर्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम् ॥ २८॥ विश्वभुग्भूतधामा च शिविरिन्द्रः प्रतापवान् शान्तिश्चतुर्थस्तेषां वै तेजस्वी पञ्चमः स्मृतः कामं भगवानुग्रधन्वा प्रादादिष्टं सन्निसर्गाद्यथोक्तम् तां चाप्येषां योपितं लोककान्तां श्रियं भायाँ व्यदधान्मानुपेषु ॥ ३० ॥ तैरेव सार्धं तु ततः स देवो जगाम नारायणमप्रमेयम् अनन्तमव्यक्तमजं पुराणं सनातनं विश्वममन्तरूपम् स चापि तद्वयदधात्सर्वमेव ततः सर्वे संवभूवुर्धरण्याम् स चापि केशौ हरिरुद्धवह शुक्लमेकमपरं चापि कृष्णम् की कन्दरा में पड़े रहो ॥२१॥२५॥ ने शम्भु के वचन सुनकर कहा-भै देवकार्य के लिये, इसके पश्च त् तुम सबको और इस स्त्री को । अपने वीर्य से, पांचवां पुरुप उत्पन्न करके पांच मनुष्ययोनि में उत्पन्न होना पड़ेगा। यह स्त्री तुम्हारी पुरुषों की पूर्ति कर दूंगा । हे महाराज ! इन पांच धर्मपत्नी होगी । वहां तुम अद्भुत कार्य और इन्द्रों में से पहले का नाम विश्वभुक्, दूसरे का असहय प्राणियों का नाश करके फिर अपने कर्म के भूतधामा, तीसरे का शिवि, चौथे का शान्ति और बल से पूर्वोपार्जित इन्द्रलोक में आ जाओगे। मेरा पांचवे का नाम तेजस्वी था । इन इन्द्रों ने अपने- यह कथन बिलकुल सच है। इसके अतिरिक्त | अपने स्वभाव के अनुसार जैसी इच्छा की वैसी ही मनुष्य-लोक में तुमको देवताओं के प्रयोजन से और | आज्ञा शङ्कर ने दी । वह जो सुन्दरी स्त्री रो रही भी अनेक काम करने पड़ेंगे। तब पहले के इन्द्र थी उसे, शङ्कर ने, मनुष्यलोक में उत्पन्न होकर लोग बोले-हे देव ! जिस मनुष्यलोक में मोक्ष । पांचों इन्द्रों की स्त्री होने के लिये आना दी प्राप्त होना दुर्लभ है वहां हम अवश्य जायेंगे, परन्तु २८॥२९॥ हमारी प्रार्थना यह है कि धर्म, वायु, इन्द्र और अब इन सबको साथ लेकर भगवान् शहर अधिनीमार से हमारी उत्पति हो तथा दिव्य अत्री । अप्रेमय, अनन्त, अव्यक्त, अज, पुराण, सनातन, फे द्वारा मनुष्यों से युद्ध करके हम इन्द्रलोक में विश्वरूप, अनन्तरूप, नारायण के समीप गये । रीट आवे ।।२६।२७॥ उन्होंने भीमदर के इस काम का अनुमोदन किया। व्यास जी बोले-हे राजन् ! नये आये हुए इन्द्र ' चे इन्द्र पृथ्वी पर मनुष्ययोनि में उत्पन्न हुए । NADAV HDHD05/03 ९२४ महाभारत [ आदिपर्व तौ चापि केशौ निविशेतां यदूनां कुले स्त्रियौ देवकी रोहिणीं च । तयोरेको वलदेवो बभूव योऽसौ श्वेतस्तस्य देवस्य केशः । कृष्णो द्वितीयः केशवः संवभूव केशो योऽसौ वर्णनः कृष्ण उक्तः॥ ३३ ॥ ये ते पूर्व शक्ररूपा निवद्धास्तस्यां दयाँ पर्वतस्योत्तरस्य इहैव ते पाण्डवा वीर्यवन्तः शक्रस्यांशः पाण्डवः सव्यसाची ॥ ३४ ॥ एवमेते पाण्डवाः संवभूवुर्ये ते राजन्पूर्वमिन्द्रा बभूवुः लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा भार्या यैषा द्रौपदी दिव्यरूपा ॥ ३५ ॥ कथं हि स्त्री कर्मणा ते महीतलात्समुत्तिष्ठेदन्यतो दैवयोगात् । यस्या रूपं सोमसूर्यप्रकाशं गन्धश्चाऽस्याः क्रोशमात्रात्प्रवाति ॥ ३६ ॥ इदं चाऽन्यत्प्रीतिपूर्व नरेन्द्र ददानि ते वरमत्यद्भुतं च दिव्यं चक्षुः पश्य कुन्तीसुतांस्त्वं पुण्यैर्दिव्यैः पूर्वदेहरुपेतान् ॥ ३७ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततोव्यासः परमोदारकर्मा शुचिर्विप्रस्तपसा तस्य राज्ञः । चक्षुर्दिव्यं प्रददौ तांश्च सर्वान्नाजाऽपश्यत्पूर्वदेहेर्यथावत् ततोदिव्यान्हेमकिरीटमालिनः शक्रप्रख्यानपावकादित्यवर्णान् । बद्धापीडांश्चारुरूपांश्च यूनो व्यूढोरस्कांस्तालमात्रान्ददर्श भगवान् हरि ने भी अपने सिर के दो बाल उखाड़े। हे राजन् ! तुम नहीं जानते कि देव-कार्य न उनमें एक श्वेत और एक काला था ॥३०॥३२॥ होता तो यह तुम्हारे यज्ञ के अन्त में पृथ्वीतल से इन दोनों कशों को उन्होंने यदु-कुल में रोहिणी कैसे उसन्न हो सकती थी ! यह तुम्हारी कन्या और देवकी के गर्भ में स्थापित कर किया। श्वनकैश अलौकिक सुन्दरी और चन्द्र-सूर्य के समान तेजस्विनी से बलराम और काले केश से कृष्ण का जन्म है। इसके शरीर से निकली हुई कमल की सुगन्ध हुआ है । जो चारों इन्द्र पहले से पर्वत की कन्दरा । आस-पास कोस भर तक फैली रहती है । यदि ऐगा में पड़े थे वे युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव हैं। न होता तो ऐमी अद्भुत घटना का होना बिलकुल सव्यसाची अर्जुन इन्द्र के अंश से उत्सन्न हुए है। असम्भव था । हे नरनाथ ! मैं प्रीतिपूर्वक तुमको हे महाराज ! ये पांचों पाण्डव यही पांचों इन्द्र है। अति आश्चर्य दिव्य नेत्रों का वर देता हूं, उससे यह दिव्य रूपवाली कृष्णा उसी रोनेवाली स्त्री : तुम कुन्तीपुत्रों को दिव्य और पवित्र पहले की रक्ष्मी का अवतार है । इन धीर पाण्डवों की देह में देख लोगे ॥३६॥३७॥ म्त्री होने के लिये शार ने पहले से ही आना दे दी वैशम्पायन ने कहा-अनन्तर दे ॥३३॥३५॥ पवित्ररूप बामण व्यासदेव ने अपने तपोरल के प्रभाव उदार-हदय corne.orrhoiNonora अध्याय १९९] महा मारत ९२५ - दिव्यैर्वस्त्रैररजोभिः सुगन्धैर्माल्यैश्चाग्यैः शोभमानानतीव । साक्षालयक्षान्वा वसूंश्चापि रुद्रानादित्यान्वा सर्वगुणोपपन्नान् ॥ १० ॥ तान्पूर्वेन्द्रानभिवीक्ष्याऽभिरूपान्शकात्मजं चेन्द्ररूपं निशम्य । प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च दिव्यां मायां तामवेक्ष्याऽप्रमेयाम् ॥ ४१॥ तां चैवाग्या स्त्रियमतिरूपयुक्तां दिव्यां साक्षात्सोमवह्निप्रकाशाम् । योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः पत्नी मत्वा दृष्टवान्पार्थिवेन्द्रः ॥ ४२ ॥ स तदृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य । नैतचित्रं परमर्प स्वयीति प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ॥ ४३ ॥ व्याम उवाच-आसीत्तपोवने काचिपेः कन्या महात्मनः नाऽध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ४४ ॥ तोपयामास तपसा सा किलोग्रेण शङ्करम् तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वयम् ॥ ४५ ।। सैवमुक्ताऽब्रवीत्कन्या देवं घरदमीश्वरम् पति संर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ॥ ४६॥ से राजा को दिव्य दृष्टि दी । उम दृष्टि से राजा | प्रभाशालिनी, म्ग्री-रत्न, द्रौपदी के तेज को देखकर को पांचों पाण्डव अपने पूर्व-रूप में देव पड़े ।। द्रुपद ने मान लिया कि यह पाण्डवों की पत्नी होने उन्होंने देखा कि वे सचमुच इन्द्र हैं । उनके माथे के योग्य है ।।४११४२॥ पर सुवर्ण-मुकुट और गले में दिव्य मालाएँ हैं । यह सब आश्चर्य देखकर राजा ने सत्यवती-पुत्र उनके शरीर का रस और तेज अग्नि तथा सूर्य के । व्यास के पाव छुए और कहा-हे ऋपिश्रेष्ठ । समान है। उनके सर ) में अनेक गहने पड़े। आपके तपोबल के लिये कुछ भी विचित्र नहीं है । हुए हैं। ये सुन्दर रूप से सजे, तरुण, विशाल व्यास जी ने पमन्नतापूर्वक फिर द्रुपद से कहा- -इसके छातीवाल और पान हाथ से कुछ कम ऊंच हैं । ये अतिरिक्त द्रौपदी के पांच पति होने का और भी सब साफ दिव्य बान और मुगन्धित माला पहने एक कारण मुनो । एक तपोवन में किसी गहात्मा हुए है । हे राजन् राजा द्रुपद पाण्डवों को साक्षात् ऋषि की एक कन्या थी । यह अत्यन्त मुन्दरी निरोगन या यमुगण, स्वगण, अमवा आदित्यगण थी परन्तु उसे कोई वर (पति) नहीं मिला । पनि के समान देखकर और इन्द्र-पुत्र अर्जुन को सास त् के लिये उन तप करके उस कन्या ने शंकर को प्रमा इन्द्ररूपी देख कर यहुन विम्मित और प्रसन्न हुए किया । शकर ने प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक पदा- ॥३८.४०॥ हे भद्रअपनी इच्छानुसार वर मागी ॥४३॥४५॥ फिर गांधारी चन्द्रमा और अमि के समान शंकर के ये वनन मुनर टम कन्या ने "राब । . co05020050 Mood Pooooooncc - - Horrororo ९२६ महाभारत [ आदपर्व poroncernme ददौ तस्मै स देवेशस्तं वरं प्रीतमानसः । पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति शङ्करः ॥४७॥ सा प्रसादयती देवमिदं भूयोऽभ्यभाषत एक पतिं गुणोपेतं त्वत्तोऽहामीति शङ्कर ॥४८॥ तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः । पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः ॥ ४९ ॥ तत्तथा भविता भद्रे वचस्तद्भद्रमस्तु ते देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद्भविष्यति द्रुपदैषा हि सा जज्ञे सुता वै देवरूपिणी । पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्वत्यनिन्दिता ॥ ५१ ॥ स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थं तु समुत्पन्ना महामखे । सेह तप्त्वा तपो घोरं दुहितृत्वं तवाऽऽगता ॥ ५२ ॥ सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा । स्रष्टास्वयं देवपत्नी स्वयंभुवा श्रुत्वा राजन्द्रुपदेष्टं कुरुष्व ॥ ५३॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१६९ गुणों से युक्त पति दीजिए, पति दीजिए" कहकर हे राजा द्रुपद ! वह देवरूपिणी कन्या ही बारम्बार प्रार्थना की । शंकर ने भी प्रसन्न होकर तुम्हारी कन्या हुई है। इसको पांच पुरुषों की उसे पर दिया हे भद्रे ! तुम्हारे पांच पति होगे पत्नी होना पड़ेगा, यह बात पहले से ही निश्चित ॥४६॥४७॥ | हो चुकी है । यह वही स्वर्ग-लक्ष्मी पाण्डवों के इससे उस कन्या ने फिर कहा-हे शंकर ! मै लिये तुम्हार महायज्ञ से प्रकट हुई है । कठिन तपस्या. आपसे गुणशीलयुक्त एक ही पति की प्रार्थना करती | करने के उपरान्त वही कुमारी तुम्हारी कन्या हुई हूं। सन्तुष्ट देवदेव महादेव ने कहा-हे भद्रे !तुमने है । यह देव-सुन्दरी अपने कर्म के अनुसार ही यह कहकर कि पति दो, पति दो, मुझसे पाच वार पांच पुरुषों की पली होने के लिये उत्पन्न हुई है । हे प्रार्थना की है इसलिये जैसी तुमने प्रार्थना की है | महाराज द्रुपद ! यह जानकर तुम इसका विवाह वैसा ही होगा । इस शरीर में नहीं, दूमेरे जन्म में | पांचों पाण्डवों से कर दो ॥५१॥५३॥ तुम्हारे पाच पति होंगे ॥४८॥५०॥ आदिपर्व का एक मानिनानवे अध्याय ममाप्त हुआ। morvoruriyorproovymyr pono अध्याय २०० ] म हा भारत ९२७ 43oooooooo अथ द्विशततमोऽध्यायः ॥ २००॥ द्रुपद उवाच श्रुत्वा वचस्तथ्यमिदं महार्ह नष्टप्रमोहोऽस्मि महानुभाव । अश्रुत्वैवं वचनं ते महर्षे मया पूर्व यतितं संविधातुम् । नैव शक्यं विहितस्याऽपयानं तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥१॥ दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीयः स्वकर्मणा विहितं नेह किंचित् । कृतं निमित्तं हि वरकहतोस्तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥ २॥ तथैव कृष्णोक्तवती पुरस्तान्नैकान्पतीन्मे भगवान्ददातु । स चाप्येवं वरमित्यब्रवीत्तां देवो हि वेत्ता परमं यदत्र यदि चैवं विहितः शङ्करेण धर्मोऽधर्मों वा नाऽत्र ममाऽपराधः । गृह्णन्तिमे विधिवत्याणिमस्या यथोपजोपं विहितैषां हि कृष्णा ॥ ४ ॥ वैशम्पायन वयाच-ततोऽब्रवीद्भगवान्धर्मराज पुण्याहमयैव युधिष्ठिरोति । अद्य पौण्यं योग्यमुपैति चन्द्रमाः पाणिं कृष्णायास्तं गृहाणाऽद्य पूर्वम् ॥५॥ ततो राजा यज्ञसेनः सपुत्रो जन्यार्थमुक्तं बहु तत्तदग्न्यम् । समानयामास सुतां च कृष्णामालाव्य रत्नबहुभिर्विभूप्य ॥ ६ ॥ आदिपर्व का दो सौ अध्याय ॥२०॥ द्रुपद ने कहा-हे ब्रह्मन् ! आपके इन वचनों धर्म हो या अधर्म, मैं बिना कुछ सोच-विचार किये को न सुनने के कारण मै इमतरह का काम यह कार्य करने को तैय्यार हूं । पूर्व विधान के करने में हिचकता था । परन्तु अब मुझे कुछ भी अनुसार द्रौपदी इन पांचों भाइयों की पत्नी हो, आपत्ति नहीं है। दैव-विहित होनी को कोई । ये पांचौ भाई विधिपूर्वक द्रौपदी से विवाह करें साल नहीं सकता । भाग्य की गांठ को कोई काट ॥३॥४॥ नहीं सकता । अपने कर्म के फल को भी कोई बदल वैशम्पायन कहते हैं कि हे महाराज! अब भगवान् नहीं सकता। मने एक ही पुरुष के लिये लक्ष्य व्यास ने धर्मराज से कहा-हे युधिष्ठिर ! आज रचना कराई थी; परन्तु देवयोग से वही लक्ष्य-ध शुभ दिन और शुभ मुहर्त है। पुण्य नक्षत्र से आज अनक पति होने का कारण हो गया ॥१२॥ चन्द्रमा का योग है । तुम सबसे पहले द्रौपदी से पहले जन्म में द्रौपदी ने भी शर से कई बार विवाह करो । तब द्रुपद और उनके पुत्रों ने विवाह पति मांगा और शकर ने उसको पांच पति दिय । की सब बहुमूल्य सामग्री एकत्र करने का प्रबन्ध इस विषय में वही शंफर धर्म-अधर्म के जिम्मेवार किया। द्रौपदी को नहला-धुराकर उत्तम वस्त्र और है । यदि भगवान शंकर ने ही ऐसा विधान किया आभूषण पहनाये गये । इसप्रकार अरंकन होने पर है तो मेरे लिये इसमें कुछ मी पाप नहीं हो सकता। कृष्णा चौक पर लाई गई । ॥५॥६॥ Norona ९२८ म हा भारत [ आदिपर्व zcolo ततस्तु सर्वे सुहृदो नृपस्य समाजग्मुः सहिता मन्त्रिणश्च । द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता द्विजाश्च पौराश्च यथाप्रधानाः ॥ ७ ॥ ततोऽस्य वेश्माग्यजनोपशोभितं विस्तीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् । वलौघरत्नौघविचित्रमावभौ नभोयथा निर्मलतारकान्वितम् ॥ ८ ॥ ततस्तु ते कौरवराजपुत्रा विभूपिताः कुण्डलिनो युवानः । महाहवस्त्रा वरचन्दनोक्षिताः कृताभिषेकाः कृतमङ्गलक्रियाः ॥ ९ ॥ पुरोहितेनाऽग्निसमानवर्चसा सहैव धौम्येन यथाविधि प्रभो । क्रमेण सर्वे विविशुस्ततः सदो महर्षभा गोष्ठमिवाऽभिनन्दिनः ॥१०॥ ततः समाधाय स वेदपारगो जुहाव मंत्रैवलितं हुताशनम् । युधिष्ठिरं चाप्युपनीय मन्त्रविन्नियोजयामास सहैव कृष्णया ॥११॥ प्रदक्षिणं तौ प्रगृहातपाणी परीणयामास स देदपारगः । ततोऽभ्यनुज्ञाय तमाजिशोभिनं पुरोहितो राजगृहाद्विनिर्ययौ ॥१२॥ क्रमेण चानेन नराधिपात्मजा वरस्त्रियस्ते जगृहुस्तदा करम् । अहन्यहन्युत्तमरूपधारिणो महारथाः कौरववशवर्धनाः ॥१३॥ इदं च तत्राऽद्भुतरूपमुत्तमं जगाद देवर्षिरतीव मानुपम् महानुभावा किल सा सुमध्यमा वभूव कन्यैव गते गतेऽहनि ॥१४॥ राजा के इष्ट-मित्र, बन्धु-बान्धव, मन्त्री, ब्राह्मण } पहने, कुण्डलों से अलकृत, नवयुवक, महामूल्य पुरोहित, पुरवासी आदि सब विवाह को देखने के | वस्त्रों से शोभित पांचों पाण्डव, गोशाला में बड़े लिये, प्रसन्नचित्त से अपनी-अपनी प्रधानता के बली श्रेष्ठ बैलों के समान, उस आँगन में आकर अनुसार मिलकर आने लगे। राज-भवन का आँगन | उपस्थित हुए ॥९॥१०॥ पद्म आदि जल से उपजे हुए अनेक फूलों की अमि के समान तेजस्वी पुगेहित धौम्य उनके बड़ी-बड़ी माला से सजा था, सम्मानित जनों के आगे थे । इसके पश्चात् वेद-पाठी पुरोहित धौम्य शुभागमन से उसकी अपूर्व शोभा हुई । वह राज- | ने वेदी पर प्रचलित अग्नि की स्थापना की, उसमें भवन उस समय उन मनुष्यों और बहुत मन्त्र पढकर हवन किया और फिर द्रौपदी का हाथ और मणियों के रक्खे जाने के कारण से ऐसा प्रकाशित | युधिष्ठिर को पकड़ा दिया । फिर अमि की प्रदक्षिणा दीखने लगा जैसा आकाश तारागणों के उदय होने कराकर विवाह-कर्म कर दिया। उस दिन सब से मालूम होता है | लोग विदा होकर अपने-अपने घर चले गये । है अव म्नान और स्वस्त्ययन के उपरान्त आभूषण महाराज ! इस तरह क्रम से पांचों पाण्डवों ने एक-एक रल rrocorecor promove.xn अध्याय २०१ ] महा मारत ९२९ recrowar कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ महारथेभ्यो बहुरूपमुत्तमम् । शतं रथानां वरहेममालिनां चतुर्युजां हेमखलीनमालिनाम् ॥१५॥ शतं गजानामपि पद्मिनां तथा शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् । तथैव दासी शतमग्न्ययौवनं . महाहवेपाभरणाम्बरस्रजम् ॥१६॥ पृथक्पृथदिव्यदृशां पुनर्ददौ तदा धनं सौमकिरग्निसाक्षिकम् । तथैव वस्त्राणि विभूषणानि प्रभावयुक्तानि महानुभावः ॥१७॥ कृते विवाहे तु ततस्तु पाण्डवाः प्रभूतरत्नामुपलभ्य तां श्रियम् । विजन्हुरिन्द्रप्रतिमा महावलाः पुरे तु पाञ्चालनृपस्य तस्य ह ॥१८॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि सांप्रामिकद्रव्यग्रहणे द्विशततमोऽध्यायः ॥२०॥ दिन पाणिग्रहण करके कृष्णा को अपनी धर्मपत्नी के समान और बिन्दुजाल से सुशोभित एक सौ हाथी बनाया । इस विषय में महर्फिव्यास ने एक और अद्भुत और बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणों से मलकृत बात कही है कि पहले दिन विवाह होने पर भी । एक सौ जवान दासियां हरएक दामाद को द्रुपद दूसरे दिन फिर कृष्णा कन्या-भाव को प्राप्त हो जाती ने दी । इसके अतिरिक्त अमि को साक्षी करके थी ॥११॥१४॥ उन्होंने और भी बहुत सा धन, वस्त्र और अलंकार इसमकार पाचों पाण्डवों के साथ द्रौपदी का पाण्डवों को दिये । इसप्रकार इन्द्र-तुल्य महारथी विवाह हो जाने पर द्रुपद ने उनको बहुत से रन, । पाण्डव विवाह के पश्चात्, अपार सम्पत्ति और स्त्री- धन और श्रेष्ठ सामप्रिया दहेज में दी। रत्न-जड़ित । रत्न द्रौपदी को प्राप्त करके, द्रुपद के ही यहां सुम्प रामों और लगामोंवाले चार-चार घोड़ों से युक्त से रहने लगे ॥१५॥१८॥ एक सौ उत्तम रथ सुवर्ण की चोटीवाले पहाड़ आदिपर्व या दो मा अध्याय ममाप्त हुआ | अथ एकाधिरद्विशतनमोऽध्याय ॥ २०१॥ वैशम्पायन उयाप-प प-पाण्डवैः : सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह । न बभूव भयं किंचिद्देवेभ्योऽपि कथंचन ॥१॥ कुन्तीमासाद्य ता नायों द्रुपदस्य महात्मनः । नामसंकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादो स्वमूर्धभिः॥ २॥ आदिपर्य या दो मो एक अध्याय ॥२०१ ॥ विशम्पायन ने कहा-द गजन् ! पाण्डवों से होकर रहने रंगे । महात्मा द्रुपद की गनियों ने, सम्बन्ध होने पर राजा द्रुपद देवताओं से भी निर्भय अपना-अपना नाम लेकर, कुन्ती के पैरों पर मिर , wwwrarJr.umr.mecome - oscomcucorceococcok ९३० म हा भारत [ आदिपर्व corociou owereowwecreampreranee कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गाला । कृताभिवादना श्वश्चातस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥ रूपलक्षणसंपन्नां शीलाचारसमन्विताम् द्रौपदीमवदप्रेम्णां पृथाऽऽशीर्वचनं स्नुपाम् ॥ ४ ॥ यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले ॥ ५ ॥ यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाऽप्यरुन्धती यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु ॥ ६ ॥ जीवसूर्वीरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता सुभगा भोगसंपन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता अतिथीनागतान्साधून्वृद्धान्बालांस्तथा गुरून् । पूजयन्त्या यथान्यायं शश्वद्गच्छन्तु ते समाः ॥ ८॥ कुरुजाङ्गलमुख्येषु राष्ट्रेषु नगरेषु च अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपति धर्मवत्सला ॥९॥ पतिभिर्निजितामुर्वी विक्रमेण महावलेः कुरु ब्राह्मणसात्सर्वामश्वमेधे महाकतो पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुणान्विते । तान्याप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतम् ॥ ११ ॥ रखकर प्रणाम किया । रेशमी वस्त्र पहने हुए द्रौपदी । अपने पतियों से करना ।।५।६।। भी सास को प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए नम्रभाव हे भद्रे ! मैं आशीर्वाद देती हूं कि तुम चिरजीविनी. से उनके आगे खड़ी हो गई। तब प्रेम प्रकट करती वीर पुत्रों की माता, बहुत बन्धु-बान्धवोंवाली, हुई कुन्ती ने सुशीला, सदाचारिणी,पुत्र-वधू द्रौपदी सौभ ग्यवती, धर्मपत्नी और पतिव्रता होकर सब सुख को आशीर्वाद देते हुए कहा ॥१४॥ भोगी। अतिथि, अभ्यागत, साधु, बूढ़े और बालकों इन्द्राणी ने इन्द्र से; म्वाहा ने अमि से; रोहिणी की आव-भगत और पालन करने में ही तुम्हाग ने चन्द्र से, दमयन्ती ने नल से, भद्रा ने कुचेर से, समय चौते ॥७॥८॥ अरुन्धती ने वसिष्ठ से और लक्ष्मी ने नारायण से तुम्हारे पति कुरुजाल प्रदेश के प्रधान-प्रधान जैसा व्यवहार किया है वैसा ही व्यवहार तुम भी । नगरों और राष्ट्रों के राजा हो और उनके साथ ही czoor >rynx -07ocococococc - - अध्याय २०१] म हा भारत vermireorea यथा च त्वाऽभिनन्दामि ववद्य क्षीमसंवृताम् । तथा भूयोऽभिनंदिप्ये जातपुत्रां गुणान्विताम् ॥ १२ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च ॥ १३ ॥ वासांसि च महात्णि नानादेश्यानि माधवः । कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च ॥ १४ ॥ शयनासनयानानि विविधानि महान्ति च वैदूर्यवजचित्राणि शतशो भाजनानि च रूपयौवनदाक्षिण्यरुपेताश्च स्वलंकृताः प्रेप्याः संप्रददौ कृष्णो नानादेश्याः सहस्रशः ॥ १६ ॥ गजान्विनीतान्भद्रांश्च सदश्वांश्च स्वलंकृतान् । रथांश्च दान्तान्सौवर्णैः शुभैः पट्टैरलंकृतान् ॥ १७ ॥ कोटिशश्च सुवर्ण च तेषामकृतकं तथा वीथीकृतममेयात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः तत्सर्व प्रतिजग्राह धर्मराजो युधिष्ठिरः मुदा परमया युक्तो गोविंदाप्रियकाम्यया इनि श्रीगन्महाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नप्रत्यागमने एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०१॥ चैवाहिकपर्व समाप्तं च । सनी के पद पर तुम्हारा अभिषेक हो । महावरी वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! पाण्डवों का विवाह तुम्हारे पति अपने पाहु-बल से सारी पृथ्वी को जीत हो जाने पर-मेंट के तौर पर-श्रीकृष्णचन्द्र ने लें और तुम यह पृटरी अश्वमेध महायज की दक्षिणा वैदूर्य-मणि से जड़े मुवर्ण अलंकार, कीमती कपड़े, में प्रामणों को दान करी ॥१०॥ अनेक देशों के बने हुए नरम कम्बल और दुशाले, हे गुणवती! पृथ्वी पर जितने रल-पदार्थ व तरह-तरह की अच्छी से अच्छी सेज आसन और तुम्दै प्राप्त हों और सौ वर्ष तक तुम उनका उपभोग यान, वैदूर्य से झलस्ते दौर से गचिन सैकड़ों वर्तन, करो। यह ! आज विवाद के वस्त्र पहने देसकर विमाये पढ़ाये मुन्दर रक्षणवाले अनेक गजराज, मैने जमे तुम्हें बधाई दी है वैसी ही, इंदर चांदगा गहनों से सजे हुए उत्तम पोहे, मुन्दर वर्ण ऊचे-उचे तो, शी ही तुम्हारे पुत्र उत्सल होने पर मैं तुम्हाग अच्छे दातवाले घोड़ों से जुते हुए स्थ, कामोदर अभिनन्दन गी॥११॥१२॥ श्री रान में निराहुमा शुद्ध सुवर्ण मेना।
९३२ म हा भारत [ आदिपर्व coooooooooox 100colooco/cd coccoomcocococococor उन्होंने पाण्डवों की सेवा के लिये रूपयौवनवती- | भी दी। धर्मराज युधिष्ठिर ने कृष्ण की प्रसन्नता के चतुर-अलंकृत अनेक देशों की सैकड़ों जवान दासियां | लिये खुशी से वह सव सामग्री ले ली ॥१३॥१९॥ आदिपर्व का दो सौ एक अध्याय समाप्त हुआ। अथ द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ।। अथ विदुरागमनपर्व । वैशम्पायन उवाच-ततो राज्ञां चरैराप्तैः प्रवृत्तिरुदनीयत । पाण्डवैरुपसंपन्ना द्रौपदी पतिभिः शुभा ॥१॥ येन तद्धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना । सोऽर्जुनो जयतां श्रेष्ठो महावाणधनुर्धरः ॥ २ ॥ यः शल्यं मद्रराजं वै प्रोरिक्षप्याऽपातयदली । त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षण पुरुषात्रणे ॥३॥ न चाऽस्य संभ्रमः कश्चिदासीत्तत्र महात्मनः । स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः ॥ ४ ॥ ब्रह्मरूपधराञ्श्रुत्वा प्रशान्तान्पाण्डुनन्दनान् । कौन्तेयान्मनुजेन्द्राणां विस्मयः समजायत ॥५॥ सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता । पुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः ॥ ६ ॥ धिगकुर्वस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् । कर्मणाऽतिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै दो सौ दो अध्याय ॥ २०२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-इसके पश्चात् सब राजाओं शत्रुसेना का सहार करनेवाले भीमसेन है ॥१४॥ को अपने-अपने दूतों से यह खबर मिल गई कि हे महाराज ! शान्त ब्राह्मण वेषधारी वे पाण्डव शुभ लक्षणोंवाली द्रौपदी का विवाह पांचों पाण्डवों ही थे, यह सुनकर राजाओं को बड़ा अचरज हुआ। के साथ हुआ है । जिन महात्मा वीर पुरुष ने उन्होंने सुन रुखा था कि अपने पुत्रों के साथ धनुष को चढ़ाकर लक्ष्य को विद्ध किया था वही कुन्ती आग में जलकर मर गई । इस समय पाण्डवों विजय प्राप्त करनेवालों में श्रेष्ठ महाधनुर्द्धर अर्जुन का पता पाकर उन्होंने समझा कि पाण्डवों का मानों हैं। जिन महाबली पुरुप ने क्रोधित होकर युद्धभूमि नये सिरे से जन्म हुआ ॥५॥६॥ में शल्य को पटक दिया था और बेखटके वृक्ष आगे वे पुरोचन का किया बड़ा निष्ठुर र्म उखाड़कर राजाओं के छक्के छुड़ा दिये थे वही स्मरण करके कौरव धृतराष्ट्र और भीम को धिकार :0oocloproxicolor अध्याय २०२ ] महा भारत ९३३ 305czcook. वृत्ते स्वयंवरे चैव राजानः सर्व एव ते । यथागतं विप्रजग्मुर्विदित्वा पाण्डवान्वृतान् ॥ ८ ॥ अथ दुर्योधनो राजा विमना भ्रातृभिः सह । अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च विनिवृत्तो घृतं दृष्ट्वा द्रौपद्या श्वेतवाहनम् । तं तु दुःशासनो ब्रीडन्मन्दं मन्दमिवाऽब्रवीत् ॥ १० ॥ यद्यसी ब्राह्मणो न स्याद्विन्देत द्रोपदी न सः । न हि तं तत्वतो राजन्वेद कश्चिद्धनञ्जयम् ॥ ११ ॥ दैवं च परमं मन्ये पौरुपं चाऽप्यनर्थकम् । धिगस्तु पौरुषं तात धियन्ते यत्र पाण्डवाः एवं संभापमाणास्ते निन्दन्तश्च पुरोचनम् । विविशुहस्तिनपुरं दीना विगतचेतसः जस्ता विगतसंकल्पा दृष्ट्वा पार्थान्महाँजसः । मुक्तान्हव्यभुजश्चैव संयुक्तान्द्रुपदेन च ॥१४॥ धृष्टद्युम्नं तु संचिन्त्य तथैव च शिखपिडनम् । द्रुपदस्याऽऽत्मजांश्चाऽऽन्यान्सर्वयुद्धविशारदान् ॥ १५ ॥ देने लगे । हे राजन् ! म्वयम्वर के उपरान्त राजाओं हे भाई! धनञ्जय ब्राह्मण येय में न होता तो कभी को जब यह मालूम हो गया कि द्रौपदी का विवाह द्रौपदी को प्राप्त नहीं कर सकता था। हे राजन् ! पाण्डवों के साथ हुआ है तब वे अपने अपने देशों उस समय किमी को भी न मालम हुआ था कि वह को चल दिये ७८॥ अर्जुन है। मेरी समझ में भाग्य ही सबसे बढ़कर है, म्वयम्बर में लक्ष्य-ध करके कृष्णा को अर्जुन पौरुप से कुछ नहीं होता । पारप को विधार है; ने प्राप्त किया है और उसका विवाह पाची पाण्डवो क्याकि हम लोग पारूप का आश्रय लेकर पाण्डवों फे साथ हुआ है, यह खबर पाकर दुर्योधन को बड़ी को चौपट नहीं कर सके ॥११॥१२॥ चिन्ता और दुख हुआ। द्रौपदी के पति अर्जुन हुए, हे महाराज ! इसतरह यातचीत करते-कराते यह जानकर यह बहुत ही राचिन तथा उदाम हुआ दुर्योधन मादि, पुगेनन की असावधानी की निन्दा और अश्वत्थामा, गनि, कर्ण और कराचार्य आदि करते हुए,हस्तिनापुर पहुंच गए । अपना इरादा चौपट के साथ अपने नगर कोरीट गया। निलंच दुनामन होने मे व दुस के कारण कि-य-विमूढ़ से मे गन्द-मन्द म्यासे कहा ॥२॥१०॥ हो गये । अपि से बचकर पाण्डव लोग दुपद से ९३४ महाभारत [ आदिपर्व colod mo cocood - cococ00 विदुरस्त्वथ तां श्रुत्वा द्रौपदी पाण्डवैर्वृताम् । वीडितान्धार्तराष्ट्रीश्च भग्नदर्पानुपागतान् ॥ १६ ॥ ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशांपते । उवाच दिष्ट्या कुरवो वर्धन्त इति विस्मितः ॥ १७ ॥ वैचित्रवीर्यस्तु नृपो निशम्य विदुरस्य तत् । अब्रवीत्परमप्रीतो दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ १८ ॥ मन्यते स वृतं पुत्रं ज्येष्ठं द्रुपदकन्यया दुर्योधनमाविज्ञानात्प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरः अथ स्वाऽऽज्ञापयामास द्रौपद्या भूषणं बहु आनीयतां वै कृष्णेति पुत्रं दुर्योधनं तदा ॥ २० ॥ अथाऽस्य पश्चाद्विदुर आचख्यौ पाण्डवान्वृतान् । सर्वान्कुशलिनो वीरान्पूजितान्द्रुपदेन ह तेषां संवन्धिनश्चाऽन्यान्बहून्वलसमन्वितान् । समागतान्पाण्डवयैस्तस्मिन्नेव स्वयंवरे ॥ २२ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-यथैव पाण्डोः पुत्रास्तु तथैवाऽभ्यधिका मम यथा चाऽभ्यधिका बुद्धिर्मम तान्प्रति तच्छृणु ॥ २३ ॥ जा मिले हैं, यह जानकर दुर्योधन आदि बहुत डर । बड़ी बात ! हे भारत 1 नेत्र-हीन राजा धृतराष्ट्र ने धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रुपद के अन्यान्य युद्ध-कुशल यह समझा कि द्रौपदी मेरे बड़े बेटे दुर्योधन की पुत्रों के पराक्रम को याद करके वे बहुत ही शङ्कित । दुलहन हुई है, इसलिये उन्होंने पुत्र-वधू द्रौपदी और व्याकुल हुए ॥१३॥१५॥ के लिये तरह-तरह के गहने भेजने की आज्ञा दी परन्तु विदुर को यह सुनकर बड़ा हर्ष हुआ कि । और कहा कि द्रौपदी-सहित दुर्योधन को मेरे पास पाण्डवों ने द्रौपदी को पाया है और उससे धृतराष्ट्र । ले आओ ॥१६॥२०॥ के पुत्रों को लजित होना पड़ा है- उनका दर्प चूर्ण परन्तु पीछे से जब विदुर से म लूम हुआ कि हो गया है । विदुर ने धृतराष्ट्र के पास जाकर आश्चर्य द्रौपदी ने युद्ध कुशल वीर पाण्डयों को अपना पति और प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा-बड़े भाग्य की म्वीकार किया है, दृपद ने उनका सूत्र आदर- बात है कि कौरवों का बोलबाला हुमा । राजा सत्तार किया, और म्वयम्बर में उपस्थित अनेक विचित्रवीर्य के पुत्र विदुर का यह वचन सुनकर आत्मीय जनों से मिलकर आनन्द से के आनन्द प्रष्ट करते हुए कह उठे-बड़ी बान । यहां है। तब धृतराष्ट्र ने कहा है विदुर ! पाण्टु के corroccccccc । jra-.-." JAWAZ अध्याय २०२] म हा भारत ९३५ 0000conomcao5000%e00000 - यत्ते कुशलिनो वीरा मित्रवन्तश्च पाण्डवाः । तेषां संवन्धिनश्चाऽन्ये वहवश्च महाबलाः ॥ २४ ॥ को हि दुरुपदमासाद्य मित्रं क्षत्तः सबान्धवम् । न बुभूपेद्भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिवः ॥ २५ ॥ वैदाम्पायन उवाच-तं तथा भाषमाणं तु विदुरः प्रत्यभापत नित्यं भवतु ते बुद्धिरेषा राजञ्छतं समाः इत्युक्त्वा प्रययौ राजन्विदुरः स्वं निवेशनम् ॥ २६ ॥ ततो दुर्योधनश्चापि राधेयश्च विशांपते धृतराष्ट्रमुपागम्य वचोऽवनामिदं तदा ॥ २७॥ संनिधी विदुरस्य त्वां दोपं वक्तुं न शक्नुवः विविक्तमिति वक्ष्यावः किं तवेदं चिकीर्पितम् ॥ २८ ।। सपत्नवृद्धिं यत्तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः अभिप्टोपि च यरक्षत्तु. समीपे द्विषतां वर ॥ २९॥ अन्यस्मिन्नृपकर्तव्ये स्वमन्यत्कुरुपेऽनघ तेषां वलविघातो हि कतय॑स्तात नित्यशः ॥३०॥ ते वयं प्राप्तकालस्य चिकीपा मन्त्रयामहे । यथा नो न ग्रसेयुस्ते सपुत्रवलवान्धवान् इति भीमन्माभारते आदिपर्वणि विदुरगमनपर्वणि दुर्योधनवाक्ये द्वयधिकद्विशततमोऽध्याय ॥ २०२। पुत्रको मै अपने पुगों से भी बदकर प्यार करताकहा-पिदुर के आगे हम अपनी कूटनीति का हाल है । इस समय यह सुनकर मुझं और भी प्रसन्नता आपसे नहीं कह सकते । हे पिना जी! क्या भाप हुई कि वे मित्र और महावरी सम्बन्धी को पार शत्रुओं की बढीतरी में अपनी वटीतरी समश रहे हैं। कुशलपूर्वक जायित हैं । राजलक्ष्मी मे भ्रष्ट कौन हैं नम्बर 1 क्या आप विदुर से विपक्षियों की प्रशसा राजा महागज द्रुपद का आश्रय पार महज ही कर रहे थे। हे पाप-रहित महाराजजहा जैमा काम अपनी उति नहीं कर सकता ॥२१॥२५॥ करना चाहिये आप उसका विपरीत करते हैं। हमें विदुर ने कहा है राजन् । मैं इश्वर में प्रार्थना नित्य पाण्डरों का बल नष्ट करने की धुन में लगे परतार किज मभर आप की ऐसी ही बुद्धि रहना चाहिये | अभी समय है। हमें अभी से इसके चनी रहे। हे राना जनगेजय विदुर के चरे जाने रिये कोई उपाय सोचने की चेष्टा करनी चाहिये पर दुर्गापन और कर्ण ने घर के पाम मात्र जिममें आगे चर वे पुरयल सन्धर मदिन हम - Jc.inwry- महा भारत [ आदिपर्व coooooooo Dococococcolcoreo20000 ॥२६॥३१॥ cocococcoom - लोगों को अपने अधीन या नष्ट न कर सकें। हमारे राज्य को छीनकर अपने अधिकार में न कर सकें आदिपर्व का दो सौ दो अध्याय समास हुआ । अथ त्रयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-अहमप्येवमेवैतच्चिकीर्वामि यथा युवाम् विवेक्तुं नाऽहमिच्छामि त्वाकारं विदुरं प्रति ॥ १ ॥ ततस्तेषां गुणानेव कीर्तयामि विशेषतः नाऽवबुध्येत विदुरो ममाऽभिप्रायमिङ्गितैः ॥ २ ॥ यच्च वं मन्यसे प्राप्तं तद्ब्रवीहि सुयोधन राधेय मन्यसे यच्च प्राप्तकालं वदाऽऽशु मे दुर्योधन उवाच-अद्य तान्कुशलैविप्रैः सुगुप्तैराप्तकारिभिः कुन्तीपुत्रान्भेदयामो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ अथ वा द्रुपदो राजा महद्भिर्वित्तसंचयः पुत्राश्चाऽस्य प्रलोभ्यन्ताममात्याश्चैव सर्वशः ॥ ५ ॥ परित्यजेद्यथा राजा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् अथ तत्रैव वा तेषां निवासं रोचयन्तु ते ॥ ६ ॥ इहैपां दोपबद्वासं वर्णयन्तु पृथक्पृथक् ते भिद्यमानास्तत्रैव मनः कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥ ७ ॥ दो सौ तान अध्याय ॥ २०३ ।। धृतराष्ट्र ने कहा-तुम दोनों (दुर्योधन और कर्ण) | समझो वह बतलाओ । दुर्योधन ने कहा- हे महाराज! जो करना चाहते हो वही मेरी भी इच्छा है । इस समय कपट वेषधारी ब्राह्मणों को पाण्डवों के परन्तु मै आकार से भी विदुर के आगे यह अपने । पास भेजार कुन्ती और मादी के बीच आपम में मन का भाव प्रकट नहीं करना चाहता । विदुर बिगाड़ करा देना चाहिये; या बहुन सा धन देकर मेरे आकार से भी मेरे अभिप्राय को न समझ सके, राजा द्रुपद और उनके पुत्रों तथा मन्त्रियों को इसीलिये सदा मै उनके आगे विशेष रूप से पाण्डवों ! लोभ के फन्दे में फंसाकर मिला लेना चाहिए। के गुणों का वर्णन किया करता हू । हे दुर्योधन! नहीं तो यह चेष्टा करनी चाहिये कि राजा द्रुपद तुम्हारी समझ में इस समय जो कर्तव्य हो वह मुझसे पाण्डवों को त्याग देवें; अश्वा ऐसा किया जाय कहो । हे वर्ण ! तुम भी जो काम समय के अनुकूल कि हमारे भेजे हुए ब्राह्मण, अलग-अलग मिलकर wcomcucicar - Tooooooo -o0.00 महा मारत अध्याय २०३ ] o2000 ocvoicco - o500c - अथवा कुशलाः केचिदुपायनिपुणा नराः इतरेतरतः पार्थान्भेदयन्त्वनुरागतः व्युत्थापयन्तु वा कृष्णां वहुत्वात्सुकरं हि तत् । अथवा पाण्डवांस्तस्यां भेदयन्तु ततश्च ताम् ॥ ९ ॥ भीमसेनस्य वा राजन्नुपायकुशलैनरैः मृत्युर्विधीयतां छन्नैः स हि तेषां चलाधिकः ॥१०॥ तमाश्रित्य हि कौन्तेयः पुरा चाऽस्मान्न मन्यते । स हि तीक्ष्णश्च शूरश्च तेपां चैव परायणम् ॥ ११ ॥ तस्मिस्त्वभिहते राजन्हतोत्साहा हतौजसः यतिप्यन्ते न राज्याय स हि तेषां व्यपाश्रयः ॥ १२ ॥ अजेयो ह्यर्जुनः सङ्ख्ये पृष्टगोपे वृकोदरे तमृते फाल्गुनो युद्धे राधेयस्य न पादाक् ॥ १३ ॥ ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत् । अस्मान्वलवतो ज्ञात्वा न यतिप्यन्ति दुर्वलाः ॥ १४ ॥ हस्तिनापुर में रहने के कल्पित दोपों का वर्णन करके । और पाण्डयों के बीच भेद-नीति का प्रयोग करना पाण्डवों को पाञ्चाल देश में ही रहने की सलाह ' चाहिये। अथवा उपाय सोचने में और उसके अनुसार दें। ऐसा करने से पाण्डव लोग पाञ्चाल देश में कार्य करने में होश्यिार मनुष्यों को भेजकर उनके ही रहेंगे ॥१७॥ द्वारा गुप्तरूप से किसी तरह धोखा देकर भीमसेन अथवा हमारे भेजे हुए कुछ कार्य-चतुर बुद्धिमान् को मरवा डालना चाहिये ८1१०॥ पुरुप पाण्डवों के पास जाकर रहें, अपने ऊपर उनका भीमसेन ही उन समें अधिक बलशन है। भीम विश्वास और प्रीति बढ़ावें और फिर पांचों भाइयों में के भरोसे पर ही युधिष्ठिर यहां रहकर हमको कुछ न परम्पर झगड़ा पैदा करा दें या पाण्डयों की ओर से ममझते थे । शूर भीमसेन का स्वभाव तीखा है। द्रौपदी को भड़का दें । कृष्णा के अनेक पनि है, पाण्डवों को एकमात्र उन्हीं का सहारा है। हे महारान! इसलिये यह काम बड़ी सुगमता से हो सकता है। भीमसेन की मृत्यु होने में पाण्टव रोग सहाय-हीन, कृष्णा यदि एक से कम और दूसरे से अधिक प्रेम निबल हो जायेंगे । फिर उनमें वैमा टत्माद या परेगी तो भाइयों में फूट सहज ही हो सगी । तंज न रहेगा। नव वे राज्य पाने की भी चरा न अथवा पाण्डवों में मे ही प्रत्येक को यह कहकर परेंगे । महायता के लिये भीमसेन जब अर्जुन के भरता दें कि द्रोपदी सबमे अधिक प्रेम करती है, पास रहते हैं नप कोई भी अर्जुन को पराम नहीं केवल तुम्ही को नहीं चाहती । इम्प्रभार द्रोपदी र मकना । युद्ध-म्धन में मीममन के न रहने में xooooooxccooo - JOOCOOMO COCODYCO ९३८ . महाभारत [ आदिपर्व orcroroora इहाऽऽगतेषु वा तेषु निदेशवशवर्तिपु प्रवर्तिप्यामहे राजन्यथाशास्त्रं निवर्हणम् ॥ १५ ॥ अथ वा दर्शनीयाभिः प्रमदाभिर्विलोभ्यताम् । एकैकस्तत्र कौन्तेयस्ततः कृष्णा विरज्यताम् ॥ १६ ॥ प्रेष्यतां चैव राधेयस्तेपामागमनाय चै तैस्तैः प्रकारेः सनीय पात्यन्तामाप्तकारिभः ॥ १७ ॥ एतेषामप्युपायानां यस्ते निर्दोषवान्मतः तस्य 'प्रयोगमातिष्ठ पुरा कालोऽतिवर्तते यावद्धयकृतविश्वासा द्रुपदे पार्थिवर्षभे तावदेव हि ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम् ॥ १९ ॥ एपा मम मतिस्तात निग्रहाय प्रवर्तते साध्वी वा यदि वाऽसाध्वी किंवा राधेय मन्यसे ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनपर्वणि दुर्योधनवाक्ये त्रयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२०॥ अर्जुन कर्ण का चौथा अंश भी नहीं हो सकता । यहां आ जायगे तब विश्वासी पुरुषों के द्वारा पहले भीमसेन के बिना दुर्बल पाण्डव अपने को बल की तरह किसी न किसी उपाय से उनको मरवा वर्जित और हमको अधिक बलवन्त जानकर राज्य डालना होगा ॥१६॥१७॥ पाने का प्रयल नहीं करेंगे। परन्तु यदि वे यहां हे पिता जी ! इन सब उपायों में से आपकी आकर हमारे अधीन और आज्ञानुसारी होवें, तो समझ में जो दोपरहित जान पड़े वही करें । देर- हम उनपर नीति-शास्त्र के अनुसार दण्ड देने को | न' कीजिए, समय निकलता जा रहा है । जबतक प्रवृत्त होंगे ॥११॥१५॥ पाण्डवों का द्रुपद को और द्रुपद पाण्डवों को अथवा हर एक पाण्डव के पास परमसुन्दरी अच्छी तरह विश्वास नहीं हो जाता तभी तक हम स्त्रियां भेजनी चाहिये । वे जाकर अपने रूप और पाण्डवें। का नाश कर सकते है । उसके बाद पाण्डवों हाव-भाव से पाण्डवों के मन को अपने ऊपर आसक्त का निग्रह न किया जा सकेगा। पिता जी । करने की तदबीर करेंगी । इसप्रकार कृष्णा को | मेरी समझ में तो यही आता है । आप विचारकर पाण्डवों से विमुख कर देना और चिढ़ा देना भी देख लीजिए कि यह मेरी सम्मति अच्छी है या बुरी। हमारे लिये अच्छा होगा। अथवा पाण्डवों को यहीं क्यों कर्ण । तुम क्या समझने हो? मेरी यह सम्मति ले आने के लिये कर्ण को भेजना चाहिये । वे जय } अच्छी है या बुरी ! ॥१८॥२०॥ आदिपर्व कादो सौ तीन अध्याय समाप्त हुआ । । -ovcornerrorrormorrorrorrowr.com अध्याय २०४ ] म हा भारत 100003cords - अथ चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय ॥६०४ ॥ कर्ण उवाच- दुर्योधन तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः न ह्युपायेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुवर्धन ॥ १ ॥ पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मरुपायैर्यतितास्त्वया . निग्रहीतुं तदा वीर न चैव शकितास्त्वया इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव वाधितुम् जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते । नोपायसाध्याः कौन्तेया ममैषा मतिरच्युत ॥ ४ ॥ न च ते व्यसनेयोक्तुं शक्या दिष्टकृतेन च शकिताश्चप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम् परस्परेण भेदश्च नाऽऽधातुं तेषु शक्यते एकस्यां ये रतः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम् ॥ ६ ॥ न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदयितुं परैः । परियनान्वृतवती किमुताऽद्य मृजावतः दो सौ चार अध्याय ॥२०४॥ कर्ण ने कहा-हे दुर्योधन ! तुम्हारी यह सम्मति नहीं हो सकता। तुम किसी तरह उन्हें लोम के मुझे भली नहीं जान पड़ती। हे कुरुनन्दन ! इम वश भी नहीं कर सकते; क्योंकि वे पांचों भाई समय ऐसे कुटिल उपायों पाण्डवों का निग्रह जितेन्द्रिय हैं और सबको अपना पैतृक राज्य पाने नहीं किया जा सकता । है वीर ! तुम पहले ही की प्रबल इच्छा है। उन भाइयों में आपस में इसतरह के अनेक तुन्छ और गुप्त उपायों से काम बिगाड़ कर देना भी शक्ति के बाहर है; क्योंकि ले चुके हो; परन्तु तुम्हारा कोई उपाय भी कारगर जो एक ही स्त्री में अनुरक्त हैं उन में आपस में नहीं हुआ। हे राजन् । जब वे बालक, सहाय-हीन बिगाड़ नहीं हो सकता ॥१६॥ और तुम्हारे पास ही ये तभी तुम उनका कुछ पिसी को भेजकर तुम पाण्डवों की ओर से अनिष्ट नहीं कर सके । इस समय तो उनके अनेक कृष्णा के मन में द्वेष नहीं पैदा कर सकते-द्रोपदी सहायक है। ये खुद सयाने और समर्थ हो गये हैं। उनसे विमुख नहीं हो सकती; क्योंकि पाण्डय जय और तुम से दूर भी है। इससे मेरी समझ में अब यही दी युग दालन में थे तब दोपदी ने उन्हें मे उपायों का उपभोग करने से उन निग्रह स्वीकार किया है। फिर अब तो राजाओं के ९४० महा भारत [ आदिपर्व poozooxo000000000cozooooooooooo ooconod - Scoredcorercore ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता । तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदयितुं क्षमा ॥ ८ ॥ आर्यवतश्च पाश्चाल्यो न स राजा धनप्रियः न संत्यक्ष्यति कौन्तेयात्राज्यदानैरपि ध्रुवम् ॥ ९ ॥ तथाऽस्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् तस्मान्नोपायसाध्यास्तानहं मन्ये कथंचन इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशांपते तावत्प्रहरणीयास्ते तत्तुभ्यं तात रोचताम् ॥ ११ ॥ अस्मत्पक्षो महान्यावद्यावत्पाञ्चालको लघुः तावत्प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय ॥ १२ ॥ वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि च कुलानि च । यावन्न तेषां गान्धारे तावद्विक्रम पार्थिव ॥ १३ ॥ यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः । सहपुत्रैमहावीर्यस्तावद्विक्रम पार्थिव ऐसे वस्त्र और आभूषण पहनकर आनन्द से रहते हे पुरुषश्रेष्ठ महाराज | इस समय हम एक ही हैं। स्त्रियों में स्वाभाविक चाह यह होती है कि वे उपाय कर सकते है । वह यह कि पाण्डवों की अनेक पुरुषों की इच्छा कर सकती हैं, सो द्रौपदी जड़ जमने के पहले ही तुम उनपर चढ़ाई कर दो। को यह भी प्राप्त है । इसलिये उसको विमुख करने | हे पिता ! मैं चाहता हू, तुम मेरी इम सम्मति को का यह अवसर भी तुम्हारे हाथ नहीं लग सकता पसन्द करो। अभी द्रुपद का पक्ष निर्वल और ||७/८॥ हमारा पक्ष प्रबल है। इससे अभी तुम युद्ध ठान उधर राजा द्रुपद बड़े ही धर्मात्मा हैं। उन्हें दो ॥११॥१२॥ धन प्यारा नहीं। सारे राज्य के दे डालने का हे महाराज गान्धारी-नन्दन ! पाण्डवों के वाहन, प्रलोभन दिखाये जाने पर भी वे पाण्डवों को न मित्र और वंश पूर्णरूप से बढ़ने के पहले ही तुम छोड़ेंगे । द्रुपद के गुणो पुत्र भी पाण्डवों को बहुत युद्ध ठानकर अपना पराक्रम प्रकट करो। राजा चाहते हैं । इसलिये मेरी समझ में भेद-नीति से द्रुपद अपने पराक्रमी पुत्रों के साथ युद्ध की तैयारी या गुप्त उपायों से पाण्डवों का नाश सर्वथा असम्भव न करने पावे; तुम पहले ही पाण्डवों पर चढ़ाई है ||७१०॥ कर दो ॥१३॥१४॥ orona rolourc.75 airira Ammona
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अध्याय २०४]
महा भारत
९४१
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यावन्नायाति वार्णेयः कर्पन्यादववाहिनीम्
राज्यार्थे पाण्डवेयानां पाश्चाल्यमदनं प्रति ॥१५॥
वसूनि विविधान्भोगात्राज्यमेव च केवलम्
नाऽत्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे कथंचन ॥ १६ ॥
विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना
विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान्पाकशासनः ॥ १७॥
विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रियस्य विशांपते
स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ॥ १८ ॥
ते बलेन वयं राजन्महता चतुरादिगणा
प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानयामेह पाण्डवान् ॥ १९ ॥
न हि साना न दानेन न भेदेन च पाण्डवाः ।
शक्याः साधयितुं तस्माद्विक्रमेणैव ताञ्जहि ॥ २० ॥
तान्त्रिक्रमेण जित्वेमामखिला भुव मेदिनीम् ।
अतो नाऽन्यं प्रपश्यामि. कार्योपायं जनाधिप ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच-श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत्
उपपन्नं महाप्राज्ञे कृनास्त्रे सूतनन्दने
स्वयि विक्रमसंपन्नमिदं वचनमीदृशम् ॥ २३ ॥
यादवों की सेना लेकर पाण्डवों को राज्य दिलाने । विक्रम ही शूगें का धर्म है ॥१७॥१८॥
के लिये कृष्ण द्रुपद के यहां न आने पायें; पहले इसलिये आओ, हम सब चतुरक्रिणी सेना साथ
हो तुम अपना पराक्रम प्रकट करो । पाण्डवों के लेकर द्रुपद के नगर पर चढाई कर दें और द्रुपद
उपकार के लिये कृष्ण तरह-तरह के मांग, धन को जीतकर पाण्डवों को यहां पकड़ लावें। साम,
और राज्य को छोड़ सस्ते है ॥१५॥१६॥ दान या भेद के द्वारा पाण्डव नष्ट नहीं किये जा
है महाराज ! राजा भरत ने पराक्रम से ही पृथ्वी- सकेंगे । इसलिये विक्रम ही से उनका मने प्रकार
गण्डल का साम्राज्य प्राप्त किया था। इन्द्र ने पराक्रम नाश करो ॥१९॥२०॥
से ही तीनों लोकों का आधिपत्य पाया है। हे राजेन्द्र! विक्रम दिखाकर उनको हराकर इस सम्पूर्ण धरती
क्षत्रियों को विक्रम दिखाना ही प्रशंमा के योग्य है। पर राज्य करते रहो हे राजन् ! मुझे इसके बिना कार्य
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॥ २२॥
९४२ महाभारत [ आदिपर्व cooooooooooooor porocc भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च युवां न कुरुतं बुद्धिं भयेद्या नः सुखोदया ॥ २४ ॥ तत आनाय्य तान्सर्वान्मंत्रिणः सुमहायशाः । धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनपर्वणि धृतराष्ट्रमन्त्रणे चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ।।२०४।। पूरा करने का कोई दूसरा उपाय नहीं दीखता । | है कि तुम और दुर्योधन दोनों भीष्म, द्रोण और विदुर वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! कर्ण के ये वचन के साथ फिर सलाह करके एसा निश्चय करो जिससे सुनकर प्रतापी धृतराष्ट्र ने पहले उसकी बडी प्रशंसा की हम लोगों को सुख प्राप्त हो । इसके पश्चात् भीम और फिर कहा-हे सूनपुत्र कर्ण ! तुम बडे बुद्धिमान् आदि मन्त्रियों को बुलाकर इस विषय में महाराज और अस्त्रविद्या में पण्डित हो। ऐसे विक्रम-उत्साह धृतराष्ट्र सलाह करने लगे ॥२१॥२५॥ पूर्ण वचन तुम्हारे योग्य ही है परन्तु गेरी यह इच्छा आदिपर्व का दो सौ चार अध्याय ममाप्त हुआ ॥ अथ पश्चाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥५॥ भीष्म उवाच-न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम् गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीलुता मम यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव यथा च मम राज्ञश्च तथा दुर्योधनस्य ते तथा कुरूणां सर्वेपामन्येषामपि पार्थिव एवं गते विग्रहं तैर्न रोचे संधाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः । तेषामपादं प्रपितामहानां राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ॥ ४ ॥ आदिपर्व का दो सौ पांच अध्याय ॥ २०५ ॥ भीम ने कहा-हे धृतराष्ट्र ! पाण्डवों के माथ । की रक्षा करना मेरा धर्म है वैसे तुम्हाग भी है । युद्ध करना मुझे पसन्द नहीं । मेरे लिये भाप और हे धृनगष्ट्र ! इस कारण मुझे, तुम्हें दुर्योधन और पाण्दु दोनों ही समान हैं। मेरे लिये जैसे गान्धारी अन्यान्य कौरवों को पाण्डवों की रक्षा करनी चाहिये । के बेटे है वैसे ही कुन्नी के भी पुत्र हैं । मैं दोनों ' एसी दशा में पाण्डवों से वैर या युद्ध करने का को एममा प्यार करता हूं । इमलिये जसे पाण्डवों , अनुमोदन मैं नहीं कर सकता। हे महाराज ! मेरी .. - MAJc7424 M- अध्याय २०५] महा मारत ९४३ - - ॥ - दुर्योधन यथा राज्यं त्वमिदं तात पश्यसि मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥ यदि राज्यं न ते प्राप्ताः पाण्डवेया यशस्विनः । कुत एव तवाऽपीदं भारतस्याऽपि कस्यचित् ॥ ६ ॥ अधर्मेण च राज्यं वं प्राप्तवान्भरतर्षभ तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः मधुरेणैव राज्यस्य तेषामधं प्रदीयताम् एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च अतोऽन्यथा चेस्क्रियते न हिनं नो भविष्यति । तवाऽप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥ कीर्तिरक्षणमातिष्ट कीर्तिर्हि परमं बलम् नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् यावत्कीर्तिमनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति तमिमं समुपानिष्ठ धर्म कुरुकुलोचितम् अनुरूपं महाबाहो पूर्वपामात्मनः कुरु ॥ १२ ॥ सम्मति यही है कि चीर पाण्डयों से मेल करके तुम को बाँट दो। हे पुरुषव्याघ्र ! ऐमा करने से सबका आधा गग्य उनको बाँट दी । हम गज्य में उनके मंगल होगा ||७1८|| पुरू-श्रेष्ठ पिना और पितामह का भी हिम्सा ॥११॥ यदि इसके विरुद्ध करोगे तो दम लोगों का धृतराष्ट्र से यो कटकर मी जी दुर्योधन से मंगल न होगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सदा कहने लगे-हे येटा दुर्योधन ! तुम जमे इम राज्य के लिये तुम्हारी भकी िफल जायगी। ई गापारी- को अपने पाप-दाद का समझने हो धेगे दो पाण्डय नन्दन ! तुग कीरिकी रक्षा करने का प्रयल से। भी समझते है । यदि यह राज्य पाण्डव नहीं पा इम भूमण्डल में कीजिदी पाम पर है। जिमना रामने तो तुम अथवा कोई दूसरा भरत-यश का यग नहीं है उसका जीना हव्यर्थ ॥१०॥ पुरपदी से पा सकता है। ॥५६॥ है कोय ! जब तक मनुष्य की रहनी है अधर्म से यह राज्य तुमने पाया परन्तु तुममे तब तक यह मा जाने पर भी जीना रहा। पालेदी इमार उनका अधिकार है। मी ममश परन्तु है गान्ध ग-नन्दन! निमकी कल में मदी आना दकिपमाला गापा र पाण्डका जानी है यह मपिन रहने पाभी मर के समान है। - ९४४ महा भारत [ आदिपर्व 2000coconoooooooooo - ForseDKI 3010705orie50 दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा। दिप्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययंगतः ॥ १३ ।। यदा प्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥ १४ ॥ लोके प्राणभृतां कंचिच्छत्वा कुन्ती तथागताम् । न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत्पुरोचनम् । यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोपेण गच्छति ॥ १५ ॥ तदिदं जीवितं तेषां तव किल्विषनाशनम् संमन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥ न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन पियोंऽशः शक्य आदातुमपि वनभृता स्वयम् ।। १७ ।। ते सर्वेऽवस्थिता धमें सर्वे चैकचेतसः अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ॥ १८ ॥ यदि धर्मस्त्वया कार्यों यदि कार्य प्रियं च मे । क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेपामधू प्रदीयताम् ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनपर्वणि भीष्मवाक्ये पश्चाधिकद्विशततमोऽध्याय. ॥२०५॥ इमलिये हे महाभुज ! तुम कुरुवश के योग्य धर्म दिया, उस काम के लिये लोग तुम्हीं को दोषी का पालन करो; पूर्व-पुरुषों के और अपने योग्य ठहराते थे । हे महाराज ! इस समय पाण्डवों सहित काम करो ॥११॥१२॥ कुन्ती के जीवित रहने की खबर से तुम्हारी यह यह हमार बड़े सौभाग्य की बात है कि कुन्ती अकीर्ति मिट गई । इसलिये तुम उनके जीवित रहने सहित पाण्डुपुत्र अभी जीवित हैं । यह हमारा ही पर आनन्द प्रकट करो। हे कुरुनन्दन । उन सब सौभाग्य है कि पापात्मा पुरोचन का मनोरथ सफल वीरों के जीवित रहने से स्वयं इन्द्र भी उनके पैतृक नहीं हुआ और वह यमराज के घर को जा पहुंचा। राज्य को लेने की समर्थ नहीं रखते ॥१५.१७॥ जर से मैंने सुना था कि पाण्डव अपनी माता सहित वे परस्पर एक हृदय और हिले मिले हुए है। आमि में जलकर मर गये तब से शोक के मारे मेरी। वे सब धर्मनिरत हैं। उनका भी इस राज्य में बुद्धि भ्रष्ट सी हो गई थी ॥१३॥१४॥ समान भाग है। वे अधर्म-पूर्वक इस राज्य से निकाले हे पुरुषव्याघ्र ! पुत्रों-सहित कुन्ती के गये 1 उन्हें इस राज्य में भाग अवश्य मिरना हाल सुनकर लोगों ने पुरांचन को वैसा दोष नहीं चाहिये । हे दुर्योधन ! यदि तुगको धर्म की रक्षा । का c002 --0- अध्याय २०६ ] महा भारत ९४५ wood करनी उचित हो, यदि तुमको मेरा प्रिय-कार्य तो पाण्डवों को आधा राज्य दे दो ॥१८।१९।। करना हो और यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो आदिपर्व का दो सौ पांच अध्याय समाप्त हुआ । अथ पडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६॥ द्रोण उवाच- मन्त्राय समुपानीतेधृतराष्ट्रहितैर्नृप धर्म्यमयं यशस्यं च वाच्यमित्यनुशुश्रुम ममाऽप्येया मतिस्तात या भीष्मस्य महात्मनः। संविभज्यास्तु कौन्तेया धर्म एप सनातनः ॥ २ ॥ प्रेष्यतां द्रुपदायाऽऽशु नरः कश्चित्प्रियंवदः । बहुलं रत्नमादाय तेषामर्थाय भारत मिथः कृत्यं च तस्मै स आदाय वसु गच्छतु । वृद्धिं च परमां ब्रूयात्वत्संयोगोद्भवां तथा संप्रीयमाणं त्वां याद्राजन्दुर्योधनं तथा असकृद् द्रुपदे चैव धृष्टद्युम्ने च भारत उचितत्वं प्रियत्वं च योगस्यापि च वर्णयेत् । पुनः पुनश्च कौन्तेयान्माद्रीपुत्रौ च सान्त्वयन् ॥ ६ ॥ हिरण्मयानि शुभ्राणि बहून्याभरणानि च वचनात्तव राजेन्द्र द्रौपद्याः संप्रयच्छतु आदिपर्व का दो मौ छ अध्याय ॥२०६ ॥ इसके पश्चात् द्रोणाचार्य ने कहा-हे महाराज | प्रसन्नता के लिये उसके हाथों बहुत से रन आदि धृतराष्ट्र ! मैंन सुना है कि हितचिन्तक मन्त्री यदि । भेजिये । वह पाण्डवों के लिये और द्रौपदी के लिये सम्मति के लिये बुलाये जाय तो उनको धर्म, अर्थ तरह-तरह के मूल्यवान् उपहार ले जाकर बार-बार और यश बढ़ानेवाली सलाह देनी चाहिये । हे केह-हे महागज द्रुपद ! आपके और आपके प्रतापी महाराज! भीष्म ने जो सम्मति दी है यह मेरे मत के पुत्र धृष्टद्युम्न साथ सम्बन्ध होने के कारण राजा अनुकूल है। सनातनधर्म के अनुसार कहना पड़ता धृतराष्ट्र और दुर्योधन को बड़ी प्रसन्नता हुई है । है कि पाण्डवों को इस राज्य में हिम्सा देना चाहिये । वे इस बात में अपने को श्रीमन्त समझते हैं ॥१४॥ पाण्डवों को लाने के लिये किसी मीठा बोलनेवाल आपके साथ वैवाहिक सम्बन्ध होना उनके लिये मनुष्य को दुपद के यहां मेजिये । पाण्डवों की सर्वथा योग्य और आनन्द का विषय है । है ॥ ७ ॥ 1 002 . ९४६ महा भारत [ आदिपर्व woocceroooooooooor तथा द्रुपदपुत्राणां सर्वेषां भरतर्षभ पाण्डवानां च सर्वेषां कुन्त्या युक्तानि यानि च ॥ ८ ॥ एवं सान्त्वसमायुक्तं द्रुपदं पाण्डवैः सह उक्त्वा सोऽनन्तरं ब्रूयात्तेपामागमनं प्रति ॥ ९ ॥ अनुज्ञातेषु वीरेषु वलं गच्छतु शोभनम् दुःशासनो विकर्णश्चाऽप्यानेतुं पाण्डवानिह ॥ १० ॥ ततस्ते पाण्डवाः श्रेष्ठाः पूज्यमानाः सदा त्वया । प्रकृतीनामनुमते पदे स्थास्यन्ति पैतृके एतत्तव महाराज पुत्रेषु तेषु चैव हि वृत्तमापयिकं मन्ये भीष्मेण सह भारत ॥ १२ ॥ कर्ण ज्वाच- योजितावर्थमानाभ्यां सर्वकार्येष्वनन्तरी न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेयः किमद्भुततरं ततः ॥ १३ ॥ दुष्टेन मनसा यो वै प्रच्छन्नेनाऽन्तरात्मना ब्रूयान्निः श्रेयसं नाम कथं कुर्यात्सतां मतम् ॥ १४ ॥ न मित्राण्यर्थकृच्छ्रेपु श्रेयसे चेतराय वा विधिपूर्वं हि सर्वस्य दुःखं वा यदि वा सुखम् ॥ १५ ॥ महाराज! इसके पश्चात् वह पुरुष कुन्ती और माद्री के पर बैठे । आप उनका आदर करते रहें। सारी प्रजा पुत्रों को दिलासा दे । द्रौपदी के लिये तरह-तरह के | की यही इच्छा है कि पाण्डव लोग पैतृक राज्य जड़ाऊ सोने के गहने भेजने की आज्ञा दीजिये । प्रा करें । हे महाराज राष्ट्र रमेश और भीम आपकी आज्ञा के अनुसार आपके भेजे हुए लोग का यह मत है कि आपके पुत्ररूपी उन पाण्डवों से वस्त्र और आभूषण ले जार द्रुपद के पुत्रों को, ऐमा व्यवहार ही आपको करना चाहिये ॥९॥१२॥ कुन्ती को और पाण्डवों को दें ॥५॥८॥ द्रोण के ये वचन सुनकर कर्ण ने कहा-हे है भरतश्रेष्ठ ! इसप्रकार द्रुपद को प्रसन्न और महाराज ! आपसे धन और मान पानेवाले और शांत कर चुकने पर आपके भेजे हुए लोग पाण्डवों सब कामों में अन्तरा पुरुष ही यदि आपकी मलाई को यहां लाने का प्रस्ताव उनके आगे करें । द्रुपद न सोचें तो इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य हो जम अनुमोदन करें तब दुःशासन और विकर्ण सेनादि सकता है ! कोई पुरुप यदि अपने हृदय के भाव साथ लेकर पाण्डयों को लाने के लिये वहां जायें।' को छिराकर बुरे इरादे से अमहल को गंगल बताये पाण्डव वहां से आकर अपने पैतृक राजसिंहामन और वैसा ही करने की सलाह दे तो सजनों का Jsis.mrani अध्याय २०६] महाभारत ९४७ 20200 2000000000000000030x कृतप्रज्ञोऽकृतप्रज्ञो वालो वृद्धश्च मानवः ससहायोऽसहायश्च सर्व सर्वत्र विन्दति श्रूयते हि पूरा कश्चिदम्बुवीच इतीश्वरः आसीद्राजगृहे राजा मागधानां महीक्षिताम् ॥ १७ ॥ स हीनः करणैः सर्वेरुच्छ्वासपरमो नृपः अमात्यसंस्थः सर्वेषु कार्येप्वेवाऽभवत्तदा तस्याऽमात्यो महाकर्णिबभूवैकेश्वरस्तदा स लव्धवलमात्मानं मन्यमानोऽवमन्यते स राज्ञ उपभोग्यानि स्त्रियो रत्नधनानि च । आददे सर्वशो मूढ ऐश्वर्यं च स्वयं तदा ॥ २०॥ तदादाय च लुब्धस्य लोभाल्लोभोऽप्यवर्धत । तथा हि सर्वमादाय राज्यमस्य जिहीपति ॥ २१ ॥ हीनस्य करणैः सर्वेरुच्छ्वासपरमस्य च यतमानोऽपि तद्राज्यं न शशाकेति नः श्रुतम् ॥ २२ ॥ किमन्यद्विहिता नूनं तस्य सा पुरुपेन्द्रता यदि ते विहितं राज्यं भविष्यनि विशांपते ॥ २३ ॥ कहना यही है कि समझदार पुरुष को वह कभी न उस मन्त्री का नाम महाकर्णि था । यही मन्त्री करना चाहिये । स्वार्थ-सम्बन्धी कप्ट के अवमर पर राजा के सर्वस्य का स्वामी बन बैठा । कुछ दिनों में मित्र-नामधारियों से कल्याण या अ-कल्याण की आशा अपने को प्रबल समझकर वह राजा का अनादर करने न करनी चाहिये । दुःख और सुख का मिलना लगा। मूढ राजा के धन-रन और स्त्रियों पर भी अपना तो भाग्य के आधीन है । मनुष्य चाहे वृद्ध, बालक, अधिकार करके वह आपही ऐश्चर्य भोगने लगा। इन ज्ञानी अथवा अज्ञानी सहायता सहित अश्या रहित सब वस्तुओं को पाकर उस लोभी का लोम और कंगा ही हो जहां रहता है अपने कर्म के अनुमार | भी कह गया । तब वह राजा से राज्य भी छीन मेग भोगता है । मैंने सुना है, पहले राजगृह में लेने की चेष्टा करने लगा परन्तु राजा के यो निकम्मे एक मगध देश के नरेश थे । उनका नाम अम्बुवीच और प्रभाव-हीन होने पर भी, अनेक चेष्टा करके था। वे राज्य का कुछ भी कार्य न कर सकते थे, मो, वह दुष्ट गन्त्री अपने विचार में कार्यन [पड़े-पड़े खरीटे लिया करते थे । ] उनका सर हो सका ॥१९॥२२॥ काम मन्त्री के हाथ में या॥१३॥१८॥ इस घटना को देखकर हमके सिवा भार क्या -wavorni ।
९४८ महा भारत [ आदिपर्व oooo. boo०००० -- मिषतः सर्वलोकस्य स्थास्यते त्वयि तद् ध्रुवम् । अतोऽन्यथा चेद्विहितं यतमानो न लप्स्यसे ॥ २४ ॥ एवं विद्वन्नुपादत्स्व मन्त्रिणां साध्वसाधुताम् । दुष्टानां चैव बोद्धव्यमदुष्टानां च भाषितम् ॥ २५ ॥ द्रोण उवाच- विद्म ते भावदोषेण यदर्थमिदमुच्यते दुष्ट पाण्डवहेतोस्त्वं दोपमाख्यापयस्युत ॥ २६ ॥ हितं तु परमं कर्ण ब्रवीमि कुलवर्धनम् । अथ त्वं मन्यसे दुष्टं ब्रूहि यत्परमं हितम् . ॥ २७ ॥ अतोऽन्यथा चक्रियते यब्रवीमि परं हितम् । कुरवो वै विनक्ष्यन्ति चिरेणैव मे मतिः ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनपर्वणि द्रोणवाक्ये पडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२०६।। कहा जा सकता है कि वह राज्य उस राजा को | सुनकर द्रोणाचार्य ने कहा-हे दुष्ट ! मैं तेरे दोप- ही बदा था, मन्त्री को नहीं । हे महाराज ! यदि युक्त भाव को पहिचानता हूं। तू पाण्डवों से वैर- विधाता ने आपके भाग्य में राज्य का भोग लिख | भाव रखने के कारण से ऐसे दोपयुक्त वचन कहता रक्खा है तो, सारा संसार ही क्यों न शत्रु बन जाय, है । परन्तु हे कर्ण ! मैने तो अपनी समझ में कौरव- वह आपके हाथ से नहीं जा सकता। और, यदि राज्य वश की रक्षा और हित के लिये ही ऐसी सलाह करना भाग्य में नहीं बदा है तो यल करने दी है। यदि तू हमारी सलाह को अनिष्टकारिणी पर भी आप राज्य को अपने अधिकार में नहीं रख समझता है तो जिससे तू राजा और राज्य की सकते ॥२३॥२४॥ भलाई समझता हो वह कह । परन्तु इसप्रकार हे निपुण ! आप मन्त्रियों की सलाह देता हूं कि मैने और भीष्म ने जो सलाह दी है के अच्छे-बुरे होने का निर्णय कीजिए । कौन दुष्ट उसके विपरीत काम करने से शीघ्र ही कौरववंश है और कौन हित की बात कहता है, यह मी का नाश होगा ॥२५॥२८॥ आपको जान लेना चाहिये । कर्ण के ये वाक्य आदिपर्व का दो सौ छः अध्याय समाप्त हुआ ! यह अथ सप्ताधिद्विशततमोऽध्याय ||२०७॥ विदुरत्याच -- राजन्निःसंशयं श्रेयो वाच्यस्त्वमसि वान्धवैः । न वशुश्रूपमाणे वै वाक्यं संप्रतितिष्ठति rororrorecorarorosof अध्याय २०७] महा मारत ९४९ प्रियं हितं च तद्वाक्यमुक्तवान्कुरुसत्तमः भीष्मः शान्तनवो राजन्प्रतिगृह्णासि तन्न च तथा द्रोणेन बहुधा भापितं हितमुत्तमम् । तच्च राधासुतः कणेमन्यते न हितं तब चिन्तयश्च न पश्यामि राजस्तव सुहृत्तमम् आभ्यां पुरुपसिंहाभ्यां यो वा स्यात्प्रज्ञयाऽधिकः॥ ४ ॥ इमो हि वृद्धौ वयसा प्रज्ञया च श्रुतेन च समौ च त्वयि राजेन्द्र तथा पाण्डुसुतेपु च ॥ ५ ॥ धर्मे चाऽनवरौ राजन्सत्यतायां च भारत रामाद्दाशरथेश्चैव गयाच्चैव न संशयः न चोक्तवन्तावश्रेयः पुरस्तादपि किंचन न चाऽप्यपकृतं किंचिदनयोलक्ष्यते त्वयि ॥ ७ ॥ तावुभौ पुरुषव्याघ्रावनागसि नृपे त्वयि न मन्त्रयेवां स्वच्छ्रेयः कथं सत्यपराक्रमी प्रज्ञावन्तौ नरश्रेष्ठावस्मिल्लोके नराधिप स्वन्निमित्तमतो नेमो किंचिन्जिा वदिष्यतः ॥ ९ ॥ दो सौ सात अध्याय ॥ २० ॥ विदुर ने कहा-हे महाराज धृतराष्ट्र ! इट-आत्मीय बढकर जानकार और आपका सर्वोत्तम मित्र कोई बान्धवों का कर्तव्य है कि वे निधड़क आपको नहीं देख पड़ता ॥३॥४॥ दित की सलाह दें। परन्तु आप सचमुच सुनना वे दोनों महापुरुष अवस्था, बुद्धि और शास्त्र-ज्ञान नहीं चाहते, इसी से वे हित के वचन आपके हृदय आदि सभी बातों में बड़े हैं। हे राजन्द्र ! ये आपको, में स्थान नहीं पाते । कुरुश्रेष्ठ वृद्ध भीम जी के आपके पुत्रों को और पाण्डवों को बराबर स्नेह की वचन प्रिय और हितकारी हैं परन्तु आप उन्हें दृष्टि से देखते हैं । धर्म और सचाई में ये दसरथ ग्रहण नहीं करते ॥१२॥ के पुत्र राम या महाराज गय से किसी अश में कम इसतरह द्रोणाचार्य ने भी उत्तम और हित के नहीं । इन्होंने आपको न तो मी सलाह दी है वचन कहे है परन्तु कर्ण उनके उपदेश को हित और न स्टोर वचन कहे हैं । इन्होंने कभी आपके की यात ही नहीं मानते । हे राजन् ! मैंने सूब अनिए की चेष्टा भी नहीं की। आपने कभी इन सोचकर देख लिया है। मुझे भीग और द्रोण से दोनों महापुरुषा का मुछ अपराध भीनहीं पिया। - resocord ९५० महा मारत [ आदिपर्व . sokoreovcoccoocorce इति मे नैष्ठिकी बुद्धिर्वर्तते कुरुनन्दन न चाऽर्थहेतोधर्मज्ञौ वक्ष्यतः पक्षसंश्रितम् ॥ १० ॥ एतद्धि परमं श्रेयो मन्येऽहं तव भारत दुर्योधनप्रभृतयः पुत्रा राजन्यथा तब तथैव पाण्डवेयास्ते पुत्रा राजन्न संशयः तेषु चेदहितं किंचिन्मन्त्रयेयुरतद्विदः मन्त्रिणस्ते न च श्रेयः प्रपश्यन्ति विषेशतः अथ ते हृदये राजन्विशेषः स्वेषु वर्तते अन्तरस्थं विवृण्वानाः श्रेयः कुर्युनं ते ध्रुवम् ॥ १३ ॥ एतदर्थमिमौ राजन्महात्मानौ महाद्युती नोचतुर्विवृतं किंचिन्न ह्येष तव निश्चयः यच्चाऽप्यशक्यतां तेषामाहतुः पुरुषर्षभौ तत्तथा पुरुषव्याघ्र तव तद्भद्रमस्तु ते कथं हि पाण्डवः श्रीमान्तव्यसाची धनञ्जयः शक्यो विजेतुं संग्रामे राजन्मघवतापि हि फिर ये पुरुषश्रेष्ठ आपको बुरी सलाह क्यों देंगे? | करने की आपको सलाह देते है वे मन्त्री कहलाने के योग्य ही नहीं । कम से कम यह अवश्य कहा हे महाराज ! इस लोक में ये दोनों पुरुष-श्रेष्ठ | जा सकता है कि वे हित की सलाह आपको नहीं विद्वान् और बुद्धिमान् माने जाते है । इसलिये ये । दे रहे है । इसके सिवा, यदि आप सचमुच ही मन में कपट रखकर आपको बुरी सलाह कभी नहीं हृदय में अपने पुत्रों का पक्षपात रखते हों तो भी दे सकते । हे कुरुनन्दन ! मुझे दृढ़ विश्वास है कि | आपके हृदय के भाव को सबके आगे प्रकट करने- ये दोनों धर्मज पुरुष भी एक पक्ष की कोई बात वाले लोग आपके हितचन्तक नहीं कहे जा सकते । न कहेंगे ॥२॥१०॥ इसी कारण इन दोनों महातेजस्वी महात्माओं ने मै निश्चय के साथ कहता हूं कि ये महापुरुष जो खुलासा करके कुछ नहीं कहा। हे भाई ! वे दोनों सलाह दे रहे हैं उसी के अनुसार काम करने में आपका महात्मा आपको ठीक सलाह दे रहे है । परन्तु आप भला और अभ्युदय होगा।हे राजन् ! दुर्योधन आदि। उसे निश्चितरूप से स्वीकार नहीं करते । इनके इस के समान पाण्डव भी आपके पुत्र ही है। जो मन्त्री कहने को आप मिथ्या न समझिए कि पाण्डवों को इम बात को जानकर भी पाण्डवों का कुछ अनिष्ट | परास्त करना सर्वथा असम्भव है । आपका भला ॥५॥८॥ 5rocoreoran अध्याय २०७] म हा भारत ९५१ 000 । - भीमसेनो महावाहु गायुतवलो महान् कथं स्म युधि शक्येत विजेतुममरैरपि तथैव कृतिनी युद्धे यमौ यमसुताविव कथं विजेतुं शक्यौ तौ रणे जीवितुमिच्छता ॥ १८ ॥ यस्मिन्धृतिरनुक्रोशः क्षमा सत्यं पराक्रमः नित्यानि पाण्डवे ज्येष्ठे सजीयेत रणे कथम् ",१९॥ येपा पक्षधरो रामो येषां मन्त्री जनार्दनः किं नु तेरजितं संख्ये येषां पक्षे च सात्यकिः ॥ २० ॥ दुपदः श्वशुरो येषां येषां श्यालाश्च पार्वताः धृष्टद्युम्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रुपदात्मजाः ॥ २१ ॥ सोऽशक्यतां च विज्ञाय तेपामग्रे च भारत दायाद्यतां च धर्मेण सम्यक्तेषु समाचर इदं निर्दिष्टमयशः पुरोचनकृतं महत् तेषामनुग्रहेणाऽद्य राजन्प्रक्षालयाऽऽत्मनः ॥ २३ ॥ तेपामनुग्रहश्वाऽयं सर्वेषां चैत्र नः कुले जीवितं च परं श्रेयः क्षत्रस्य च विवर्धनम् हो । आप विचार कर देखिये, साक्षात् इन्द्र भी युद्ध पुत्र युधिष्ठिर को क्या कोई परास्त कर सकता है स्थल में सव्यमाची (दाहिन और बायें दोनों हाथों बलराम जिनके पक्ष में है और कृष्ण तथा सात्यकि से वाण चला मानवाले ) अर्जुन को क्या परास्त जिनके सहायक है वे युद्ध में किसे नहीं परास्त कर कर सकते है ।।११।१६॥ सकते ? राजा द्रुपद उनके ससुर हैं और प्रतापी महावाहु भीमसेन में दश हजार हाथियों के धृष्टद्युम्न आदि वीर राजकुमार उनके साले हैं।१९।२१॥ इतना बर है । देवता भी क्या उनको युद्ध में पछाड़ हे राजन् ! वे अजेय हैं और धर्मानुमार हिम्सेदार सस्ते है ? अश्विनीकुमार के समान प्रतापी और है। यह जानकर लेश उठ खड़े होने के पहले ही युद्ध-कुशल नकुल और महदेव को, जीवित रहने राज्य में हिम्सा देकर पाण्डवों के साथ उचित वाव की इच्छा रखनेवाला, कोन पुरुप युद्ध में जीतने कीजिए । पुरोचन की करतून से आपका अयश की हिम्मत कर सकता है । ॥१७॥१८॥ जड़ पकड़ रहा है । पाण्डवों पर कृपा करके आप धैर्य, दया, क्षमा, सत्य, पराक्रम आदि गुण उस कर को झटपट घो डारिए ॥२२॥२३॥ जिनमें स्थिर रूप से वर्तमान है उन पाण्टु के महे पाण्डरों पर कृपा करने से हम सरका और ९५२ म हा भारत [ आदिपर्व poooor xcxco00000 - . द्रुपदोऽपि महानाजा कृतवैरश्च नः पुरा तस्य संग्रहणं राजन्स्वपक्षस्य विवर्धनम् बलवन्तश्च दाशाही बहवश्च विशांपते यतः कृष्णस्ततः सर्वे यतः कृष्णस्ततो जयः यञ्च साम्नैव शक्येत कार्य साधयितुं नृप को दैवशप्तस्तत्कार्यं विग्रहेण समाचरेत् ॥ २७ ॥ श्रुत्वा च जीवतः पार्थापौरजानपदा जनाः वलवद्दर्शन हृष्टास्तेषां राजप्रियं कुरु ॥ २८॥ दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चाऽपि सौबलः अधर्मयुक्ता दुष्प्रज्ञा वाला मैषां वचः कृथाः ॥ २९ ॥ उक्तमेतत्पुरा राजन्मया गुणवतस्तव दुर्योधनापराधेन प्रजेयं वै विनक्ष्यति ॥ ३०॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनपर्वणि विदुरवाक्ये सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२०७।। वंशभर का भला होगा; जीवन की रक्षा होगी । को लड़ाई से सिद्ध करना न चाहेगा ॥२६॥२७॥ इससे आपका क्षत्रिय-तेज और बल भी बढ़ेगा । कुन्ती के पुत्र जीवित है, यह खबर पाकर सब द्रुपद एक प्रधान राजा है । अब से पहले हमारे | प्रजा उन्हें देखने के लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो साथ उनका वैर भी हो चुका है ! उनसे मेल कर रही है । हे राजन् ! आप उनका प्रिय कीजिए । लेने से संसार में हमारा पक्ष सबल हो जाएगा दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि सब अधार्मिक, ॥२४।२५॥ | कुसमझ और बालक हैं । इसलिये आप उनके कहे हे राजन् ! यादव लोग भी बड़े वली और के अनुसार काम न कीजिएगा । हे राजन् ! यह अससय हैं । पाण्डवों से मेल कर लेने से वे भी मैं आपसे पहले कह चुका है और अब फिर कहता हमारे अनुकूल हो जायेंगे । जिस पक्ष में कृष्ण रहेंगे कि जो आप हित की पात न मानेंगे तो अकेले उघर ही वे भी होंगे और कृष्ण जिस पक्ष में होंगे दुर्योधन के दोष से आपके सब पुत्रों का, वंश का, उसी पक्ष की विजय होंगी। यदि दैव का कोप न क्षत्रियों का और प्रजा का नाश हो जायगा । हो तो कोई भी मनुष्य मेल से हो सकनेवाले काम ॥२८॥३०॥ आदिपर्व का दो मी सात अध्याय समाप्त हुआ । - -10 rocuroraconor.onnororo -warriorria अध्याय २०८ ] म हा भारत ९५३ 3700-25000000000 ocomooooooooooozoico । occscorcocosic: अथ अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२०८ ।। हतराष्ट्र उवाच-भीपमः शान्तनवो विद्वान्द्रोणश्च भगवानृषिः हितं च परमं वाक्यं त्वं च सत्यं ब्रवीपि माम् ॥ १ ॥ यथैव पाण्डोस्ते वीराः कुन्तीपुत्रा महारथाः तथैव धर्मतः सर्वे मम पुत्रा न संशयः यथैव मम पुत्राणामिदं राज्यं विधीयते तथैव पाण्डुपुत्राणामिदं राज्यं न संशयः क्षत्तरानय गच्छेतान्सह मात्रा सुसस्कृतान् तथा च देवरूपिण्या कृष्णया सह भारत ॥ ४ ॥ दिप्ट्या जीवन्ति ते पार्था दिष्ट्या जीवतिसा पृथा। दिप्ट्या द्रुपदकन्यां च लब्धवन्तो महारथाः दिष्ट्या वर्धामहे सर्वे दिष्ट्या शान्तः पुरोचनः । दिष्ट्या मम परं दुःखमपनीतं महायुते वैशम्पायन याच-ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत समुपादाय रत्नानि वसूनि विविधानि च द्रौपद्याः पाण्डवानां च यज्ञसेनस्य चैव ह आदिपर्व का दो सौ आठ अध्याय ॥ २०८ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा है विदुर महाराज शान्तनु के की बात है कि पाण्डव कुशल से जीते-जागते इस पुत्र भीष्म विद्वान् है और द्रोणाचार्य भी ऐश्वर्य पृथ्वी पर माजूद हैं । कुन्ती का जीवित रहना भी माली प्रापि हैं । तुम भी मेरे हित के करनेशले कम सुनी की बात नहीं। इसे भी मैं अपना भाग्य हो । तुम लोग सत्य कर रहे हो। पाण्डव जैसे ही समझता है कि पाण्डवों को म्बीरन कृष्णा पाण्टु के पुत्र हे से ही धर्मानुमार वे मेरे भी है। प्राप्त हुई है। बड़े आनन्द और भाग्य की बात है मेरे पुन मे इस राज्य के अधिकारी है वैसे ही वे किपाण्डवों के जति यच जाने से हमारे बुर की वृद्धि भी है। हममें किमी प्रकार का संदेह नहीं । है हुई और दुष्ट पुरोचन का मनोरथ सफल नहीं विदुर । तुम जाभी, और विशेष प्रकार के साथ हुआ । पाण्डयों के वियोग का महादु ग जाना पाण्डवों को, उनकी माता कुन्ती को और धर्मपत्नी रदा, यह मेरा परम सौभाग्य है ॥१६॥ देवी कृष्णा को यहाँ ले माओ। यह बड़े मौभाग्य चगायन ने कहा -हे राजन् ! अब धृतराष्ट्र - ९५४ म हा भारत [ आदिपर्व । .. cococcarcoscoconce - .. ochorancorecora तत्र गत्वा स धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः द्रुपदं न्यायतो राजन्संयुक्तमुपतस्थिवान् स चापि प्रतिजग्राह धर्मेण विदुरं ततः चक्रतुश्च यथान्यायं कुशलप्रश्नसंविदम् ॥ १०॥ ददर्श पाण्डवांस्तत्र वासुदेवं च भारत स्नेहात्परिष्वज्य स तान्पप्रच्छाऽनामयं ततः तैश्चाऽप्यमितबुद्धिः स पूजितो हि यथाक्रमम् । वचनाद्धृतराष्ट्रस्य स्नेहयुक्तं पुनः पुनः ॥ १२ ॥ पप्रच्छाऽनामयं राजंस्ततस्तान्पाण्डुनन्दनान् । प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च ।। १३ ॥ पाण्डवानां च कुन्त्याश्च द्रौपद्याश्च विशांपते द्रुपदस्य च पुत्राणां यथा दत्तानि कौरवैः ॥ १४ ॥ प्रोवाच चाऽमितमतिः प्रश्रितं विनयान्वितः द्रुपदं पाण्डुपुत्राणां संनिधो केशवस्य च विदुर उवाच राजञ्च्छृणु सहामात्यः सपुत्रश्च वचो मम धृतराष्ट्रः सपुत्रस्त्वां सहामात्यः सबान्धवः ॥ १६ ॥ की आज्ञा से महात्मा विदुर रथ पर चढ़कर पाण्डवो | उचित था उस तरह, विदुर का पूजन और सरकार के पास राजा द्रुपद की राजधानी में गये । सब किया । इसके पश्चात् विदुर ने धृतराष्ट्र की ओर शास्त्रों के जानकार विदुर कृप्पा के लिये, द्रुपद के से अच्छी तरह बार-बार पाण्डवों से कुशल-समाचार लिये और पाण्डवों के लिये तरह-तरह के रत्न और पूछे । फिर कौरवों ने जो जिसे देने को दिया श्रेष्ठ उपहार लेकर पाञ्चाल-राजधानी में पहुच । वहां था उसी के अनुसार बुद्विमान् विदुर ने पाण्डव, सबसे पहले वे राजा द्रुपद से मिले और उनसे | कुन्ती, द्रुपद, द्रुपद के पुत्र और द्रौपदी को अनेक हाथ मिलाया । राजा द्रुपद ने भी विधिपूर्वक विदुर । उपहार और रत्न अर्पण किये । इसके पश्चत् नम्र का सत्कार किया । दोनों ने परस्पर कुशल-प्रश्न भाव से महात्मा विदुर ने, कृष्ण और पाण्डवों के किया ॥१०॥ आगे ही, विनीत द्रुपद से कहा ॥११।१५।। विदुर ने वहां कृष्णा को और पाण्डवों को भी हे राजन् ! आप अपने मन्त्री और पुत्रों के साथ देखा । आनन्द के साथ उनको गले लगाकर विदुर । एकाग्र होकर जो मैं कहता हूं उसे सुनिए । अपने ने कुशल-समाचार पूछे । उन्होंने भी, जिसे जैसा | पुत्र और मन्त्रियों-सहित राजा धृतराष्ट्र ने आपके - - - rorororroroork roomrooposaro अध्याय २०८ ] महाभारत 00070070070dcoconoconocore 000000000103 : सह सर्वशः reOcccore अब्रवीत्कुशलं राजन्प्रीयमाणः पुनः पुनः प्रीतिमांस्ते दृढं चापि संवन्धेन नराधिप तथा भीमः शान्तनवः कौरवैः कुशलं त्वां महाप्राज्ञः सर्वतः परिपृच्छति ॥ १८॥ भारद्वाजो महाप्राज्ञो द्रोणः प्रियसखस्तव समाश्लेपमुपेत्य त्वां कुशलं परिपृच्छति धृतराष्ट्रश्च पाश्चाल्य त्वया सवन्धमीयिवान् कृतार्थ मन्यतेऽऽत्मानं तथा सर्वेऽपि कौरवाः ॥ २०॥ न तथा राज्यसंप्राप्तिस्तेषां प्रीतिकरी मता । यथा संवन्धकं प्राप्य यज्ञसेन त्वया सह ॥ २१॥ एतद्विदित्वा तु भवान् प्रस्थापयतु पाण्डवान् । द्रष्टुं हि पाण्डुपुत्रांश्च स्वरन्ति कुरवो भृशम् ॥ २२॥ विप्रोपिता दीर्घकालमते चापि नरर्षभाः उत्सुका नगरं द्रष्टुं भविष्यन्ति तथा पृथा ॥ २३ ॥ कृष्णामपि च पाञ्चालीं सर्वाः कुरुवरस्त्रियः । द्रष्टकामाः प्रतीक्षन्ते पुरं च विषयाश्च नः ॥ २४ ॥ स भवान्पाण्डुपुत्राणामाज्ञापयतु मा चिरम् गमनं सहदाराणामेतदत्र मतं मम ॥ २५ ॥ कुगल समाचार पूछे है। हे महाराज ! आपके साथ समझ रहे हैं ।।१०॥२०॥ विवाह-सम्बन्ध होने से सबको बड़ी प्रसन्नता हुई हे यज्ञमेन ! आपके सम्बन्ध से उनको असी है। बड़े बुद्धिमान् वृद्ध मीप्रपितामह और अन्यान्य प्रमन्नता हुई है बसी राज्य के राम से भी नहीं प्रधान कारकों ने आप उशल समाचार पूछ है। हो सकती। यह सब जानकर आप पाण्डवों को ॥१६॥१८॥ हस्तिनापुर भेजने की तैयारी कीजिए। कौरव लोग भारद्वाज के पुत्र महात्मा द्रोणाचार्य ने भी पाण्डयों को देखने के लिये अत्यन्त उत्कण्टिन हो सिनपूर्वक आपके शुभार-समाचार पूछ है । हे रहे है १२११२२११ पामार राज ! आपके साथ सम्बन्ध हो जाने से ये पुरपश्रेष्ठ पाण्डव बहुत दिनों से अपने देश राजा धराट और अन्य कौरव अपंग को हतार्थ को छोड़े हुए है । इममे जान पड़ना है, उन्तीसहित - rrrrrr महा भारत [ आदिपर्व booc0004 00102074 । . द्रुपद उवाच- निस्सृष्टेषु त्वया राजन्पाण्डवेषु महात्मसु ततोऽहं प्रेषयिष्यामि धृतराष्ट्रस्य शीघ्रगान् आगमिप्यन्ति कौन्तेयाः कुन्ती च सह कृष्णया ॥ २६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि विदुरामनपर्वणि विदुरसंवादे अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८ ॥ समाप्तं च विदुरागमनपर्व । ये भी अपने देश को देखने के लिये उत्कण्ठित है । विदा कर दीजिए । हे महाराज ! आप ज्योंही हमारे नगर और राष्ट्र में प्रधान-प्रधान कुरु-कुल | महात्मा पाण्डवों को जाने की आज्ञा देंगे त्योंही मै की स्त्रिया भी द्रौपदी को देखने के लिये उत्सुक महाराज धृतराष्ट्र के पास दूत के मुँह से यह खबर होकर उनके पहुंचने की राह देख रही है ॥२३॥२४॥ भेज दूंगा कि कुन्ती और कृष्णा को साथ लेकर इसलिये देर न करके पली-सहित पाण्डवों को पाण्डव रवाना हो गये ॥२५॥२६॥ आदिपर्व का दो सौ आठ अध्याय समात हुआ ।। अथ नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥ अथ राज्यलाभपर्व। -एवमेतन्महाप्राज्ञ यथाऽऽत्थ विदुराऽद्य माम् ।. ममाऽपि परमो हर्षः संवन्धेऽस्मिन्कृते प्रभो गमनं चापि युक्तं स्याद् दृढमेषां महात्मनाम् । न तु तावन्मया युक्तमेतद्वक्तुं स्वयं गिरा यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभो रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः एतौ हि पुरुषव्यानावेषां प्रियहिते रतौ युधिष्ठिर उवाच-परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तंत्करिष्यामहे वयम् ॥ ५ ॥ दो सौ नव अध्याय ॥ २०९ ॥ राजा द्रुपद ने कहा-हे महाप्राज्ञ विदुर जी ! सकता हू ॥१२॥ आपने जो कुछ कहा वह ठीक है। यह सम्बन्ध होने. कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और पुरुषश्रेष्ठ से मुझ भी कम हर्ष नहीं हुआ । इन महात्मा पुरुषों । नकुल तथा सहदेव की यदि सम्मति हो, और का अपने राज्य में जाना उचित और आवश्यक होने कृष्ण बलराम की भी इच्छा हो तो पाण्डव जा पर भी मैं कैसे अपने मुख से यह बात इनसे कह सकते है क्योंकि कृष्ण और बलराम दोनों भाई ॥ - cooooooo coooooooooooconceroooooooozoad 5Morc0/5 । अध्याय २०९ ] महा मारत ९५७ ormirrore वैशम्पायन उवाच-ततोऽब्रवीद्वासुदेवो गमनं रोचते मम यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् द्रुपद उवाच-यथैव मन्यते वीरो दाशार्हः पुरुषोत्तमः प्राप्तकालं महावाहुः सा बुद्धिनिश्चिता मम यथैव हि महाभागाः कौन्तेया मम सांप्रतम् । तथैव वासुदेवस्य पाण्डुपुत्रा न संशयः न तयायति कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्टिरः । यथैपां पुरुपव्याघ्रः श्रेयो ध्यायति केशवः वैशम्पायन उवाच-ततस्ते समनुज्ञाता दुपदेन महात्मना पाण्डवाश्चैव कृष्णश्च विदुरश्च महीपते आदाय द्रोपदी कृष्णां कुन्ती चैत्र यशस्विनीम् । सविहारं सुखं जग्मुनगरं नागसाहयम् श्रुत्वा चाऽप्यागतान्वीरान्धृतराष्ट्रो जनेश्वरः प्रतिग्रहाय पाण्डनां प्रेषयामास कौरवान् ॥१२॥ विकणं च महेष्वासं चित्रसेन च भारत द्रोणं च परमेष्वास गौतम कृपमेव च इनके प्रिय, इष्ट और सदा हितचिन्तक है ||३४|| पुरुषसिंह के शव जैसी पाण्डवों की माल कामना युधिष्ठिर ने कहा- हे राजन् ! हम पांनी माई करने है यमी युधिष्ठिर भी नहीं कर मक्ते । आपक अधीन है । आप पसन्नतापूर्वक हमको जो वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! अय महात्मा आज्ञादेंगे उमापारन हम महर्ष करेंगे सम्मायन दुद में माता लेार-उनसे विदा दोकर-पाण्डव, कहा- मेरी सराह है कि इन्द बहा जाना चाहिये, गण, चिदर, कुन्नी और द्रौपदी सब वारणायन या फिर सर धमों के माता राजा द्रुपद की जो नगर की चल दिये । मह में सैर करते हुए सब सलाददो यह करना नादिये || लोग मुम्बपूर्वक चले ॥९॥१२॥ माद ने कहा इस काल के अनुमार वीर महा वार प.ण्डय आरहे ६ या, सूनना पाकर उनका व गुपोषण यादवों ने जमा विनारा मेरी समझ मागन कराने के लिय गुरगष्ट ने महापनुदाविरुण, में ही टीम ममय महामाग प.पटव चित्रमेन और अन्यान्य कौरवों को मंजा। उनक मेरेग्नेह के मात्र से ही इस में मदद नहीं है माय मानार्ग और कर.चार्य भी गये ॥१२॥१३॥ पुगत यामुदेव के भी निद के पात्र ७८॥ card comcrcocoomer - । ९५८ महाभारत [आदिपर्व prememeworommonweonomreonoreormer तैस्ते परिवृता वीराः शोभमाना महाबलाः । नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा ॥ १४ ॥ कौतूहलेन नगरं दीप्यमानमिवाऽभवत् तत्र ते पुरुषव्याघ्राः शोकदुःखविनाशनाः ॥ १५॥ तत उच्चावचा वाचः पोरैः प्रियचिकीर्षुभिः । उदीरिता अशृण्वंस्ते पाण्डवा हृदयंगमाः अयं स पुरुषव्याघ्रः पुनरायाति धर्मवित् यो नः स्वानिव दायादान्धर्मेण परिरक्षति अद्य पाण्डमहाराजा वनादिव जनप्रियः आगतः प्रियमस्माकं चिकीर्षुर्नाऽत्र संशयः ॥ १८ ॥ किं नु नाऽद्य कृतं तात सर्वेषां नः परं प्रियम् । यं नः कुन्तीसुता वीरा नगरं पुनरागताः ॥ १९ ॥ यदि दत्तं यदि हुतं विद्यते यदि नस्तपः तेन तिष्ठन्तु नगरे पाण्डवाः शरदां शतम् ततस्ते धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य च महात्मनः । अन्येषां च तदहीणां चक्रुः पादाभिवन्दनम् ॥ २१ ॥ . कृत्वा तु कुशलप्रश्नं सर्वेण नगरेण च न्यविशन्ताऽथ वेश्मानि धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ २२ ॥ पाण्डवों के नगर के पास, ये सब रोग मिले।] का ध्यान पिता रखता है । जान पड़ता है, मानी इन लोगों से घिरे हुए पाण्डवों ने धीर धौर हस्तिनापुर | आज महाराज पाण्डु हमारा प्रिय करने के लिये में प्रवेश किया । कौतूहल के मारे नगर-निवासी वन से लौट आ रहे है ।।१६।१८॥ मानों फटे पड़ते थे। पाण्डवों को देखकर प्रजा का आज कुन्ती के पुत्र फिर नगर में आ पहुंने, शोक और दु ख दूर हो गया ॥१४१५|| इससे बढ़कर इष्ट-सिद्धि और क्या हो सकती है ? उन्होंने सुना कि हितैपी प्रजागण ऐसे हृदय- यदि हमने दान, होम, तप आदि पुण्यम किये हारी वचन आपस में कह रहे है कि ये वही नरश्रेष्ठ है तो उसी पुण्य के फल से पाण्डब इस नगरी में धर्मात्मा पुरुष (युधिष्ठिर) फिर आ रहे है जो जीवन भर रहे ॥१९॥२०॥ हमारी रक्षा ऐसे किया करते थे जैसे पुत्र की रक्षा इसके पश्चात् पाण्डवों ने गहरों के समीप wearroornin । ॥ २० ॥ - JC अध्याय २०९ ] यहा मारत ooo Scoreovcocours वैशम्पायन उवाच- विश्रान्तास्ते महात्मानः कंचित्कालं महावलाः । आहूता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-भ्रातृभिः सह कौन्तेय निवोध गदतो मम पुनर्नो विग्रहो मा भूखाण्डवप्रस्थमाविश न च वो वसतस्तत्र कश्चिच्छक्तः प्रबाधितुम् । संरक्ष्यमाणान्पार्थेन त्रिदशानिव वज्रिणा अर्धं राज्यस्य संप्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविश ॥ २५ ॥ -प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च प्रतस्थिरे ततो घोरं वनं तन्मनुजर्षभाः ॥ २६ ॥ अर्धं राज्यस्य संप्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविशन् ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः ॥ २७॥ मण्डयांचक्रिरे तद्वै पुरं स्वर्गवदच्युताः ततः पुण्ये शिवे देशे शांतिं कृत्वा महारथाः नगरं मापयामासुट्टैपायनपुरोगमा: सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलंकृतम् प्राकारेण चं संपन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च ॥ ३० ॥ पहुँचकर धृतराष्ट्र, महात्मा भीष्म और अन्यान्य और तुम में फिर किसी तरह का झगड़ा न हो, कुरुकुल के युद्ध मनुष्यों के चरणों में प्रणाम किया। इसलिए तुम खाण्डवप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाकर फिर सारे नगर के लोगों से मिलकर उनके कुशल वहां रहो ॥२३॥२४॥ समाचार पूछे । अब पाण्डव लोग धृतराष्ट्र की आज्ञा आधा राज्य लेकर तुम वहां राज्य करो। मर्जुन से अपने महलों में जाकर रहने लगे ॥२१॥२२॥ की संरक्षा में वहां रहते समय तुम्हें कोई कष्ट न महात्मा महारली पाण्डवों के कुछ काल दे सकेगा जैस कि इन्द्र की प्रमुखता में देवताओं विश्राम करने के पीछे राजा धृतराष्ट्र और शान्तनु- से कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता । वैशम्पायन ने पुत्र भीष्म ने उनको अपने पास बुलाया । अनन्तर कहा-हे राजन् ! अब कृष्ण सहित पाण्डवों ने उनके आने पर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा खाण्डवप्रस्थ में जाकर उसी को साया । व्यास हे कुन्तीपुत्र ! मै जो कहता हूँ सो सुनो; तुम्हारे आदि ब्राह्मणों ने शास्त्र की विधि के अनुसार भाई भी सुने ! दुर्योधन आदि तुम्हारे भाइयों में | शांतिपाठ-पूर्वक मापफर राजभवन की नींव डाली। VaROOOOO - alo c.cono7o7o70. oooodoora म हा भारत [ आदपर्व 07A cिomco - orrierciccccwrocir. cocococcorcarorcircd शुशुभे तत्पुरश्रेष्टं नागैर्भोगवती यथा द्विपक्षगरुडप्रख्यारैः सौधैश्च शोभितम् गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमैः विविधैरतिनिर्विद्धः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः ॥३२॥ शक्तिभिश्चाऽऽवतं तद्धि द्विजिह्वरिव पन्नगैः तल्पैश्चाऽभ्यासिकैयुक्तं शुशुभे योधरक्षितम् ॥ ३३ ॥ तीक्ष्णाकृशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् । आयसैश्च महाचक्रः शुशुभे तत्पुरोत्तमम् ॥ ३४ ॥ सुविभक्तमहारथ्य देवतावाधर्जितम् विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैभवनोत्तमः ॥ ३५॥ तत्त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचन मेघवृन्दमिवाऽऽकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम् ॥ ३६ ॥ तत्र रम्ये शिवे देशे कौरवस्य निवेशनम् शुशुभे धनसंपूर्ण धनाध्यक्षक्षयोपमम् थोड़े ही समय में वह नगर स्वर्ग के समान सजकर | तैनात थे। तेज अकुश, शतघ्नी (तोप) और शोभित हो गया । युधिष्ठिर ने राजधानी का अन्यान्य युद्ध-यन्त्र जहा-तहा रखे हुए उसे किसी नाम इन्द्रप्रस्थ रक्खा । समुद्र के समान गहरी प्रतापी वीर राजा का निवास स्थान बता थे ॥ खाई और आकाश को छू रही, चन्द्रमा के समान ३२॥३४॥ सफेद, दूर से सफद बादल के समान जान पड़ने सड़कें सब चौड़ी, सीधी और साफ-सुथरी थीं। चाली चहार दीवारी से घिरी हुई वह नगरी नागों वहा किसी प्रकार की दैवी बाधा नहीं देख पड़ती से भोगवती पुरी के समान शोभा को प्राप्त हुई। दो थी । हे महाराज ! अत्यन्त उज्ज्वल तरह-तरह के पखवाले गरुड पक्षी की तरह जान पड़ रहे नगर के उत्तम भवनों से परिपूर्ण वह नगरी देवपुरी के फाटक और ऊँचे ऊँचे महल दूर से देख पड़ते समान शोभित हुई । उस इन्द्रप्रस्थ नगर में मनोहर थे ॥२५॥३१॥ मङ्गलमय स्थान पर पाण्डवों के महल अनन्त धन- मन्दगचल और मेघों के समान गोपुर (फाटक रन से भरे-पुरे धनपति कुबेर के भवनों के समान के ऊपर की इमारत) उस नगर को छिपाये हुए एश्वर्य-सम्पन्न होकर बिजली की माला से युक्त थे । जगह-जगह पर अस्त्र-शिक्षा के अखाड़े बने मेघमण्डली के समान देख पड़ते थे ॥३५॥३७॥ हुए थे । दो जीभवाले सापों के समान लपलपा नगर के बनकर तैय्यार हो चुकने पर और पाण्डवों रही बर्छया लिए हुए योद्धा उसकी रक्षा के लिए के रहने लगने पर सस्कृत, प्राकृत आदि अनेक 5monoco.ococonomoo2050yooozin अध्याय २०९ ] महा भारत ९६१ ocoolcodcoconococococcorcoc.3000coveoooooooook - omomcorn .. तत्राऽगच्छन्द्विजा राजन्सर्ववेदविदां वराः निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा ॥३८॥ वणिजश्चाऽययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः । सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाऽभ्यागमस्तदा उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः आम्रराम्रातकै पैरशोकैश्चम्पकैस्तथा ॥४०॥ पुन्नागैर्नागपुप्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः ॥ ४१ ॥ मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितः प्राचीनामलकैलेंौधेरङ्कोलेश्च सुपुष्पितैः ॥ ४२ ॥ जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुजकैरतिमुक्तकैः । 'करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्दुमैः नित्यपुष्पफलोपेत नाद्विजगणायुतैः मत्तवहिणसंघुष्टेः कोकिलैश्च सदामदैः ॥४४॥ गृहैरादर्शविमलेर्विविधैश्च लतागृहैः मनोहश्चित्रगृहैस्तथा जगतिपर्वतैः वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः ॥ ४६॥ प्रकार की भरपाओं को जाननेवाले अनेक देशों के तमाल, वकुर, मनोहर पुगेवाली केतकी, फलों से लोग और सब वेदों के जानकार ब्राह्मण आकर रदे हुए आमले, लोध्र, उत्तम फलोवाले अकोल, उस नगरी में बसने लगे। सैकड़ों मेठ साहूकार जामुन, पाटर, कैनर, पारिजात (मन्दार) माधवी बनिये धन कमाने की इच्छा से दूर-दूर से वहा लता और सदा फूलने-फलनेवाले अन्य वृक्ष लगे आने लगे । तरह-तरह के श्रेष्ठ कारीगर आकर थे । उन बागों में वृक्षा की डालियों पर मस्त रहने लगे ॥३८॥३९॥ मोर, मद मत्त कोकिला, और अन्य अनेक प्रकार नगर के चारों और अनेक मनोहर बाग स्ग के पक्षी बोलते तथा कलोलें करते थे । तरह-तरह गये । उन बागों में आम, आम्रातक, कदम्ब,अशोक, के शीशमहल, रताकुञ्ज, चित्रशाला, नकली पहाड़, चम्पा, पुन्नाग, नागपुप्प, लकुच, पनश, शाल,नाल, स्वच्छ जल से भरी (नहरें ) बावलिया, कारण्डकraceremorrorarororexorroomeromererozosmarad ..
९६२ म हा भारत [ आदिपर्व 900OM To000000010.01ooloocolococo .. - हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुवहूनि च ॥४७॥ तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशता महत् पाण्डवानां महाराज शश्वत्प्रीतिरवर्धत ॥४८॥ तत्र भीप्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयने ते पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः ॥४९ ॥ पञ्चभिस्तैमहेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समन्वितम् शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठ नागैर्भोगवती यथा ।। ५० ॥ तां निवेश्य ततो वीरो रामेण सह केशवः ययौ द्वारवती राज-पाण्डवानुमते तदा ॥ ५१ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि राज्यलम्भपर्वणि पुरनिर्माणे नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।।२०९|| चक्रवाक आदि पक्षियों से परिपूर्ण और मैदान में । भीम से धर्मानुसार आधा राज्य पाकर, इन्द्रप्रस्थ भरी हुई झीलें, सफेद-लाल-नीले सुगन्धित कमलों | बसाकर, पाण्डव दिन-दिन उन्नति करने लगे। उन से शोभित सरोवर उस नगर की शोभा को और | इन्द्रतुल्य पांच वीरों से वह श्रेष्ठ नगरी नागराजों से भी बढ़ा रहे थे ॥४०॥४७॥ रक्षित भोगवती पुरी के समान समृद्धिशालिनी हुई। हे महाराज ! उस पुण्यशील जनों से पूरित हे महाराज ! पाण्डवों को इसतरह राज्य दिलाकर महान् प्रदेश में जाकर पाण्डवों का आनन्द दिन उनसे विदा होकर कृष्ण और बलराम द्वारका पुरी पर दिन बढ़ने लगा । राजा धृतराष्ट्र को चल दिये ।।४८॥५१॥ आदिपर्व का दो सौ नत्र अध्याय समाप्त हुआ | अथ दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२१०॥ जनमेजय उवाच-एवं संप्राप्य राज्यं तदिन्द्रप्रस्थं तपोधन अत ऊचं महात्मानः किमकुर्वत पाण्डवाः सर्व एव महासत्वा मम पूर्वपितामहाः 'द्रौपदी धर्मपत्नी च कथं तानन्वर्तित ॥ २ ॥ दो सा दस अध्याय || २१० ॥ राजा जनमेजय ने कहा-हे तपोधन ! मेरे पाकर फिर क्या किया ? उनकी धर्मपत्नी द्रौपदी पितामह पाण्डवों ने इसप्रकार इन्द्रप्रस्थ का राज्य उनके साथ कैसा व्यवहार करती थीं ? महाभाग्यवान् और महात्मा wo-cocoracicococcomoooooooooooromorromoto अध्याय २१० ] महाभारत ९६३ ococcikscorcaroorn 205rrorsrror: कथं च पय कृष्णायामेकस्यो ते नराधिपाः वर्तमाना महाभागा नाऽभियन्त परस्परम् ॥ ३ ॥ श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्व विस्तरेण तपोधन । तेषां चेष्टितमन्योन्यं युक्तानां कृष्णया सह ॥ ४ ॥ यसपागन गाम-धृतराष्ट्राभ्पनुलानाः कृष्णया सह पाण्डवाः रोमिरे खाण्डवप्रस्थे प्राप्त राज्याः परंतपाः प्राप्य राज्यं महातेजाः सत्यसन्धो युधिष्टिरः । पालयामाम धर्मण पृथिवीं भ्रातृभिः सह जितारयो महाप्राज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः मुदं परमिकां प्रामास्तत्रोपुः पाण्डुनन्दनाः ॥ ७ ॥ कुर्वाणाः पोरकार्याणि सर्वाणि पुरुषर्षभाः आसांचकुर्महाहेषु पार्थियेप्वासनेषु च अथ नेपूरविष्टेषु सर्वेष्वेव महात्मसु नारदस्त्वथ देवर्पिराजगाम यदृच्छया आसनं रुचिरं तसमें प्रददो स्वं युधिष्ठिरः देवरुपविष्टस्य स्वयमयं यथाविधि प्रादाद्युधिष्ठिरो धीमात्राज्यं तस्मै न्यवेदयत् प्रतिगृह्य तु तां पूजामृपिः प्रीतमनास्तदा नोन्द्र पाण्टर एक स्त्री में भामा होने पर भी मजा का पालन करने लगे। युधिष्ठिर के सभ कैसे विराध से कर रहे । मैं विनापूर्वक यह गाई शत्रुओं को वम में करके धर्म का पालन मुनना चाहता हूँ । कृष्णा को पाने के उपरान्त ये करने हुए बड़े आनन्द से वहीं रहने लगे । एक परम्परमा वन व परत रहे; मा कृग करके दिन पुस्पश्रेष्ठ पाण्डव राजाओं के योग्य बहुमूल्य कहित । वशम्पायन ने कहा- शत्रुमथनेहारे पाण्डव आसना पर सभा में बैठे राज-काज कर रहे थे, राज्य पार धृतराष्ट्र की आज्ञा से इन्द्रपथ को इमी समय घूमते-घामते नारद मुनि वहां आ गये । वमाकर वहां द्रौपदी साथ मुस से विहार करने । युधिष्ठिर ने उठकर उन्हें बैठने के लिए सुन्दर लगे। महाते जम्बी, सत्यवादी, राजा युधिष्ठिर राज्य बहुमूल्य आसन दिया। नारद जी के बैठ जाने पर पाने के बाद भाइयों की सहायता से धर्म के अनुसार अपने हाथ से अर्थ आदि देकर सरकार करने के codcyrror Zerocroror-Krrorecor ९६४ म हा मारत [ आदिपर्व opcoroscope Jozooozcor 00200 आशीभिर्वर्धयित्वा च तमुवाचाऽऽस्यतामिति । निपसादाऽभ्यनुज्ञातस्ततो राजा युधिष्ठिरः कथयामास कृष्णायै भगवन्तमुपस्थितम् श्रुत्वैतद् द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता ॥ १३ ॥ जगाम तत्र यत्राऽऽस्ते नारदः पाण्डवैः सह । तस्याऽभिवाद्य चरणो देवधर्मचारिणी ॥ १४ ॥ कृताञ्जलिः सुसंवीता स्थिताऽथ द्रुपदात्मजा तस्थाश्चापि स धर्मात्मा सत्यवागृषिसत्तमः आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः । गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम् ॥ १६ ॥ गतायामथ कृष्णायां युधिष्ठिरपुरोगमान् विविक्ते पाण्डवान्सर्वानुवाच भगवानृपिः ॥ १७ ॥ नारद उवाच-पाश्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी यथा वो नाऽत्र भेदः स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ १८ ॥ सुन्दोपसुन्दा हि पुरा भ्रातरौ सहितावुभौ आस्तामवध्यावन्येषां त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ॥ १९ ॥ पश्चात् युधिष्ठिर ने उन्हें राज्य के कुशल-समाचार आदि पाण्डवों से नारद ने कहा-यशस्विनी द्रौपदी सुनाये ॥१॥१०॥ तुम सब की एकमात्र धर्मपत्नी है । इस कारण युधिष्ठिर की पूजा को स्वीकार करके देवर्षि नारद उसके सम्बन्ध में तुम लोग एक नियम कर लो बहुत प्रसन्न हुए, फिर उन्होंने आशीर्वाद देकर जिसमें आपस में कुछ झगड़ा न हो ॥१७॥१८॥ उनसे बैठ जाने के लिए कहा। ऋषि की आज्ञा सुनो, पूर्व समय में सुन्द और उपसुन्द नाम के से बैठकर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के पास आने की। दो भाई एकत्र रहते थे । उनमें परस्पर बड़ा मेल ख़बर कहला भेजी। खबर पाते ही पवित्र होकर | होने के कारण कोई भी उनका सामना या उनपर द्रौपदी नारद के पास आई और उनके पांव छूकर हमला न कर सकता था । वे दोनों एक साथ हाथ जोड़कर सिर ढके हुए सामने खड़ी हो गई। राज्य करते थे; एक घर में रहते, एक ही पलंग धर्मात्मा, सत्यवादी, ऋषिश्रेष्ठ नारद जी ने द्रौपदी पर सोते और एक ही वर्तन में खाते-पीते थे । को आशीर्वाद देकर जाने की आज्ञा दी॥११॥१६॥ परन्तु अन्त को एक ही स्त्री तिलोचमा में दोनों. १ द्रौपदी के चले जाने पर एकान्त देख युधिष्ठिर आसक्त हो गए और उसी के कारण एक दूसरे के cocal 5/0wcocoooz070.
अध्याय २११ ] महा मारत co.oooo Mo00000200 एकराज्यावेकराहावेकशय्यासनाशनौ तिलोत्तमायास्ती हेतोरन्योन्यमभिजनतुः रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीति भावकम् यथा वो नाऽत्र भेदः सयात्तत्कुरुष्व युधिष्टिर ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर उवाच-सुन्दोपसुन्दावसुरौ कस्य पुत्रौ महामुने उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चाऽन्योन्यमनताम् ॥ २२ ॥ अप्सरा देवकन्या वै कस्य चैपा तिलोत्तमा यस्याः कामेन संमत्ती जन्नतुस्तौ परस्परम् ॥ २३ ॥ एतत्सर्वं यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन्परं कौतूहलं हि नः इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि राज्यलंभपर्वणि युधिष्ठिरनारदसवाद दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२१०॥ पाणों का शत्रु बन गया ॥१९॥२०॥ मार डाला था ॥२१॥२२॥ इसलिये हे युधिष्ठिर । तुम नियम स्थापित करके और जिस स्त्री के लिए उन्होंने एक दूसरे को परस्पर के हेलमेल और अनुराग को बनाए रखने का मार डाला था, वह तिलोत्तमा किस की कन्या थी? यन करो जिससे तुम भाइयों में आपस में फूट न यह बाला अप्सरा थी या देवकन्या ? हे ब्रह्मन् ! पड़ सके । युधिष्ठिर ने कहा-हे मुनिवर ! सुन्द और मैं यह सब वृत्तान्त विस्तार से सुनना चाहता हूँ। उपमुन्द किसके पुत्र थे ? क्योंकर उनमें आपस का २३/२४॥ भेद हो गया और क्यों कर उन्होंने एक दूसरे को आदिपर्व का दो सी दस अध्याय समाप्त हुआ। ccoccszooorcare नारद उवाच- अथ एकाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥ २११ ॥ शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम् भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथावृत्तं युधिष्ठिर महासुरस्याऽन्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत् ॥ २ ॥ दो सौ ग्यारह अध्याय ॥ २११ ॥ नारद मुनि ने कहा-हे पृथापुत्र युधिष्टिर ! यह असुरराज हिरण्यकशिपु के वंश में निकुम्भ नाम पुगना इतिहास में पूरा-पूरा कहता हूं, सुनो। का महाबली और प्रतापी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसके corporroo Od-codeocooooolcoroscope महा भारत [ आदिपर्व oned तस्य पुत्रौ महावीर्यों जाती भीमपराक्रमौ । सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणो क्रूरमानसौ तावेकनिश्चयौ दैत्यावेककार्यार्थसंमती निरन्तरमवर्तेता समदुःखसुखावुभौ विनाऽन्योन्यं न भुञ्जाते विनाऽन्योन्यं न जग्मतुः । अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदी एकशीलसमाचारौ द्विधवैकं यथा कृती तो विवृद्धी महावीर्यो कार्येष्वप्येकनिश्चयो त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायकनिश्चयम् दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥ ७ ॥ तो तु दीर्पण कालेन तपोयुक्तौ वभूवतुः क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणी मलोपचितसाही वायुभक्षी बभूवतुः •आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठायधिष्टितो ऊर्ध्ववाहू चाऽनिमिपो दीर्घकालं धृतवती तयोस्तपः प्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाऽभवत् बड़े पराक्रमी, बड़े वीर्यवन्त, क्रूर और दारुण पुत्र हर काम में एक बुद्धि रखनेवाले वे दो बई उत्सन्न हुए । उन दो दैत्यराज पुत्रों में एक का वीर्यवन्त भाई क्रम से बढ गये ॥५६॥ नाम सुन्द और दूसरे का उपसुन्द था । दोनों के उन दोनों ने मिलकर तीनों लोकों को जीतने अभिप्राय, काम, उद्देश्य, सुख और दु.ख एक ही | की इच्छा की । इसके लिए गुरु के उपदेश से प्रकार के थे ॥१४॥ विन्ध्याचल पर जाकर वे घोर तप करने लगे। ये वे दोनों एक दूसरे को प्यारी बोली बोलते और । भूख और प्यास का कष्ट सहन करते थे । जटा एक दूसरे का प्रिय कार्य करते थे । एक भाई के और वलाल धारण किये हुए थे । उनके शरीरी बिना दूसरा भाई न तो कहीं जाता था और न पर ढ़ेरों मिट्टी जम गई । वे केवल वायु भक्षण कुछ खाता पीता था । उन दो भाइयों के स्वभाव करते थे । अन्त को वे अपने शरीर से माम काट और व्यवहार में भेद न रहने के हेतु जान पड़ता काटकर हवन करने लगे ||७|| था कि मानों एक मनुष्य दो भागों में बँट गया है। फिर केवल अँगूठों के बल खड़े होकर उन्होंने procodcorrboo0ion cooooore ९६७ महा भारत अध्याय २११ ] colo 2050 - .. ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः तपोविघांतार्थमथो देवा विनानि चक्रिरे रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभी पुनः पुनः । न च तो चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतो ॥ १२ ॥ अथ मायां पुनर्दवास्तयोश्चकुर्महात्मनोः भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चाऽऽत्मजनस्तथा ॥ १३ ॥ प्रपात्यमाना वित्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥ १४ ॥ आभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुकुशुः । न च तौ चक्रतुर्भद्रं व्रतस्य सुमहावतो ॥१५ ।। यदा क्षोभं नोपयाति नाऽऽर्तिमन्यतरस्तयोः ततः स्त्रियस्ता भूतं च सर्वमन्तरधीयत ततः पितामहः साक्षादभिगम्य महासुरौ वरेण च्छन्दयामास सर्वलोकहितः प्रभुः ॥१७॥ ततः सुन्दोपसुन्दौ तौ भ्रातरौ दृढविक्रमौ । दृष्ट्वा पितामहं देवं तस्थतुः प्राञ्जली तदा तप किया । ऊर्ध्वबाहु होकर सूर्य की ओर एकटक | लिया । कोई माता, कोई बहन, कोई भार्या निहारते हुए उन्होंने खड़े-खड़े तप किया । बहुत या अन्यान्य आत्मीय बन्धुओं का वेश धारण करके दिनों तक इसप्रकार तप करते रहने से उनके भागता हुआ उनके समीप आकर उनका नाम तप के प्रभाव से विन्ध्य पर्वत तक तप उठा । लेकर आर्तनाद करते और "बचाओ, बचाओ" उससे धुआं निकलने लगा। यह अद्भुत घटना कहकर पीछे त्रिशूल हाथ में लिये खेदे आ रहे राक्षस हुई । उनकी ऐसी कठोर तपस्या देखकर देवता से बचाने के लिये प्रार्थना करने लगा । पाकुलता डरे । उनके तप में विघ्न डालने के लिये वे तरह के मारे उनके बाल बिखरे हुए और वस्त्र तथा तरह के उपाय करने लगे। रत्नों का प्रलोभन दिया। आभूपण स्थान-प्रष्ट हो रहे थे । इतने पर भी उन गया । बारम्बार सुन्दर स्त्रियों को भेजकर उन्हें । सुन्द और उपसुन्द असुरों ने तपस्या करना लुभाने की चेष्टा की गई परन्तु किसी तरह वे | नहीं छोड़ा ॥१३॥१५॥ तपस्या से नहीं डिगे ॥१०॥१२॥ जब किसी तरह उनके चित्त में दु ख या क्षोभ इसके पश्चात् देवताओं ने माया-बल का आश्रय नहीं देख पड़ा तब वे बियां, प्राणी और राक्षम proomeyram rolor Woyok महा भारत [ आदिपर्व 20ooooooeio oooooooo । ऊचतुश्च प्रभुं देवं ततस्तो सहितौ तदा आवयोस्तपसाऽनेन यदि प्रीतः पितामहः मायाविदावस्त्रविदो वलिनौ कामरूपिणौ उभावप्यमरी स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः ॥ २० ॥ ब्रह्मोवाच-- ऋतेऽमरत्वं युवयोः सर्वमुक्तं भविष्यति अन्यवृणीतं मृत्योश्च विधानममरैः समम् ॥ २१ ॥ प्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः युवयोहेंतुनाऽनेन नाऽमरत्वं विधीयते ॥ २२ ॥ त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भयामास्थितं तपः हेतुनाऽनेन दैत्येन्द्री न वा कामं करोम्यहम् ॥ २३ ॥ सुन्दोपसुन्दावूमतुः-त्रिषु लोकेषु यद्भूतं किंचिरस्थावरजङ्गमम् सर्वस्मान्नौ भयं न स्याहतेऽन्योन्यं पितामह ॥ २४ ॥ पितामह उवाच-यत्प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद्ददानि वाम् मृत्योर्विधानमेत्तच्च यथावद्वा भविष्यति ॥ २५ ॥ आदि सब अदृश्य हो गये । इसके पश्चात् सब के तुम और सब देव-मुलभ पदार्थ माँग सकते हो हितचिन्तक, सब के ईश्वर, सब के पितामह ब्रह्मा ने ॥२१॥२२॥ स्वयं उन दोनों महावीरों के सामने आकर उनसे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिये तुमने यह वर मांगने को कहा । महाबली, दृढपराक्रमी सुन्द | अद्भुत तप किया है, इसलिए मै तुमको अमर और उपसुन्द दोनों भाई प्रभु पितामह देव को नहीं कर सकता । तुमने तीनों लोकों को जीतकर देखकर दोनों हाथ जोड़कर खड़े हुए ॥१६॥१८॥ वश करने की इच्छा से यह घोर तप किया है। और दोनों एकत्र होकर बोले कि हे विभो । | इस कारण मै तुम्हारी अमर होने की इच्छा पूरी न हमारी तपस्या में यदि आप प्रीति रखते है और करूँगा। सुन्द और उपसुन्द ने कहा-हे पितामह । प्रसन्न हुए है तो हमको यह वर दें कि हम दोनों तो फिर यह वर दीजिये कि तीनों लोकों में जितने माया के जानकार, अस्त्र के जानकार, बली, काम चर और अचर पदार्थ हैं उनमें किसी से भी हमें रूपी और अमर हो सकें ॥१९॥२०॥ मृत्यु का डर न हो । यदि हम कभी मर सकें तो ब्रह्मा ने कहा-केवल अमर होना छोड़कर | परस्पर एक दूसरे के हाथ से ही मेरे ॥२३॥२४॥ तुमने जो कुछ माँगा है वह तुमको प्राप्त होगा। पितामह ने कहा-अच्छी बात है, मै तुमको अमर होना देवताओं की विशेषता है । इसके सिवा यही वर देता हूं तुम्हारी मृत्यु इसीतरह होगी । Donrovowerrorarorowroom अध्याय २११ महाभारत ९६९ pheocoroorcooooooo . नारद उवाच- ततः पितामहो दत्वा वरमेतत्तदा तयोः निवर्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २६ ॥ लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तो भ्रातरावभौ अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गती ॥ २७॥ तो तु लव्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामो मनस्विनी सर्वः सुहृजनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजग्मिवान् ॥ २८॥ ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनी संवभूवतुः । महार्हाभरणोपेतो विरजोऽम्बरधारिणी अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम् । नित्यप्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृजनः ॥३०॥ भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति । गीयतां पीयतां चेति शब्दश्चाऽऽसीद् गृहे गृहे ॥ ३१ ॥ तत्र तत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितः हृष्टं प्रमुदितं सर्व दैत्यानामभवत्पुरम् ॥ ३२ ॥ तैस्तैर्विहारैर्वहुभिर्देत्यानां कामरूपिणाम् समाः सक्रीडतां तेपामहरेकमिवाऽभवत् ॥ ३३ ॥ सते श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि राज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपमुन्दोपाख्याने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय: २११ नारद जी कहते हैं-मुन्द और उपसुन्द को यह । इसके पश्चात् उन्होंने सर्वकालीन-अकाल-कौमुदी घरदान देकर और तपस्या बन्द कराकर ब्रह्मा जी । महोत्सव करना प्रारम्भ किया ॥२७॥३०॥ अपने लोक को चले गये ॥२५॥२६॥ उनके बन्धु-बान्धव भी परम प्रसन हुए। भोजन दोनों माई भी तीनों लोकों में किसी के हाथ करो, दान करो, आमोद-प्रमोद करो, गीत गामो, से न मर सकने का वर पाकर अपने घर को गये। मदिरा पियो, इत्यादि शब्द प्रत्येक घर में नित्य उनके यन्धु-बान्धव मनोरथ पूरा होने से उन्हें सन्तुष्ट । सुन पड़ने लगे । हर्ष की तालियां बजने का गन्द देखकर परत प्रसस हुए ! उन दोनों भाइयों ने तम नगर में गूंज उठा । इसतरह के आमोद-प्रमोद में जटाएँ पटाकर देश बनवा डाले और अच्छी तरह दैत्यों ने एक दिन की तरह अनेक वर्ष बिता दिये स्नान करके बहुमूल्य वम और आभूषण पहने । ॥३१॥३३॥ आदिपर्य या दो सो ग्यारह अध्याय समाप्त हुआ। rvarsiovc.wcomrooreoni ९७० म हा भारत [ आदिपर्व Poooooooo । - अथ द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२१२ ।। नारद उवाच-उत्सवे वृत्तमात्रे तु त्रैलोक्याकांक्षिणावुभौ मन्त्रयित्वा ततः सेना तावज्ञापयतां तदा सुहृद्भिरप्यनुज्ञातौ दैत्यैर्वृद्धैश्च मन्त्रिभिः कृत्वा प्रास्थानिकं रात्रौ मघासु ययतुस्तदा गदापहिशधारिण्या शूलमुद्गरहस्तया प्रस्थितौ सह वर्मिण्या महत्या दैत्यसेनया . ॥ ३ ॥ मङ्गलैः स्तुतिभिश्चापि विजयप्रतिसहितैः चारणैः स्तूयमानौ तौ जग्मतुः परया मुदा तावन्तरिक्षमुत्प्लुत्य दैत्यो कामगमावुभौ देवानामेव भवनं जग्मतुर्युद्धदुर्मदौ तयोरागमनं ज्ञात्वा वरदानं च तत्प्रभोः हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्ब्रह्मलोकं ततः सुराः ताविन्द्रलोकं निर्जित्य यक्षरक्षोगणांस्तदा खेचराण्यपि भूतानि जन्नतुस्तीत्रविक्रमौ अन्तर्भूमिगतान्नागाञ्जित्वा तौ च महारथौ समुद्रवासिनौ सर्वा म्लेच्छजातीविजिग्यतुः दो सौ बारह अध्याय ।। २१२ ॥ नारद जी ने कहा कि अकाल कौमुदी के कवच पहने दैत्यों की बड़ी भारी सेना उनके साथ महोत्सव के अन्त होने पर तीनों लोकों के अधिकार | चली । दोनों दैत्यराज चारणों की विजयसूचक लाभ करने के अभिलापी होकर दोनों भाइयों ने मागलिक स्तुति पाठ से प्रशंसित होकर परम हर्पपूर्वक युक्तिकर सेनाओं को सजने की आज्ञा दी । उनके | जाने लगे ॥३॥४॥ आत्मीय, सुहृद् और बड़े बूढे दैत्यों ने उनके इस कामचारी और युद्ध में अजय दोनों भाई पहले विचार का अनुमोदन किया । तव यात्रा के पहले भाकाश-मार्ग होकर देवताओं को जीतने के लिये दिन यात्रा-सम्बन्धी स्वस्त्ययन मङ्गल करके दूसरे | स्वर्ग में पहुंचे । उनको ब्रह्मा से वरदान मिलने की दिन मघा नक्षत्र में वे दिगविजय के लिये रवाना और उनके आने की सूचना पाकर सब देवता ब्रह्मलोक को भाग गये । वे भीम-पराक्रमी दोनों गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर आदि शत्र लिये, | भाई इसप्रकार सहज ही इन्द्र-लोक को जीतकर हुए ॥१॥२॥ । orcropoleoooooooooooooooozer अध्याय २१२ महा मारत. ९७१ Docomodoo oo.ooooooo 2030 ततः सर्वां महीं जेतुमाधावुग्रशासनौ सैनिकांश्च समाहृय सुतीक्ष्णं वाक्यमूचतुः राजर्षयो महाय हव्यकव्यर्द्विजातयः तेजोवलं च देवानां वर्धयन्ति श्रियं तथा तेषामेवं प्रवृत्तानां सर्वेषामसुरद्विषाम् संभूय सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः एवं सर्वान्समादिश्य पूर्वतीरे महोदधेः कुरा मतिं समास्थाय जग्मतुः सर्वतोमुखौ ॥१२॥ यज्ञैर्यजन्ति ये केचिद्याजयन्ति च ये द्विजाः तान्सर्वान्प्रसभं हत्वा वलिनी जग्मतुस्ततः आश्रमेवग्निहोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् । गृहीत्वा प्रक्षिपन्त्यप्सु विश्रब्धं सैनिकास्तयोः ॥ १४ ॥ तपोधनैश्च ये क्रुद्धः शापा उक्ता महात्मभिः नाऽऽक्रामन्त तयोस्तेऽपि वरदाननिराकृताः नाऽऽक्रामन्त यदा शापा वाणा मुक्ताः शिलास्विव । नियमानसंपरित्यज्य व्यद्रवन्त द्विजातयः बड़े प्रसन्न हुए ॥५॥६॥ का आहार) देकर देवगण के तेज, बल और इसके पश्चात् यक्ष, राक्षस आदि अन्यान्य समृद्धि को बढ़ाया करते हैं ॥९॥१०॥ भाकाशचारी लोगों को भी उन्होंने हराया, फिर अपने इस काम से वे असुरों के शत्रु हैं । इस- पाताल-लोक में जाकर उन महारथियों ने नागों को लिये आओ, हम सब मिलकर, जिसतरह हो सके, जीता । इसके उपरान्त समुद्र तट के देशों में रहने- उन सबका नाश करें । दोनों भाई महासागर के याले ग्लेच्छों को भी उन्होंने अपने अधीन कर लिया पूर्व-तट पर इसतरह की आज्ञा सच साथियों को ॥७॥ देकर फर बुद्धि से पृथ्वी पर चारों और फिरने इसप्रकार अन्य लोकों को जीतकर वे सारे लगे । जो ब्राह्मण स्वयं यज्ञ कर रहे थे या औरों पृथ्वीमण्डल को अपने अधीन करने की चेष्टा में से करा रहे थे उन सबको बलपूर्वक मारते हुए वे लग गये । उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर प्रपल अमर विचरने लगे। उन दैत्यों के विश्वासी आज्ञा दी कि देखो, ब्राह्मण और राजर्षि लोग ही। सैनिक वाममों के यहां अमिहोत्र के अमि को हव्य (देवताओं का माहार) और कन्य (पितरों देखते ही उठाकर जल में फेंक देते थे ॥११॥१४॥ cord ९७२ महा मारत [ आदिपर्व coooo 000000cooooo पृथिव्यां ये तपः सिद्धा दान्ताः शमपरायणाः । तयोर्भयाद्दद्रुवुस्ते वैनतेयादिवोरगाः' ॥ १७॥ मर्थितैराश्रमर्भग्नैर्विकीर्णकलशत्रुधैः शून्यमासीजगत्सर्व कालेनेव हतं तदा ॥१८॥ ततो राजन्नदृश्यद्भिर्ऋषिभिश्च महासुरौ उभौ विनिश्चयं कृत्वा विकुर्वाते वधैपिणी प्रभिन्नकरटौ मत्ती भूत्वा कुञ्जररूपिणो संलीनमपि दुर्गेपु निन्यतुर्यमसादनम् ॥ २० ॥ सिंहो भूत्वा पुनर्व्याघो पुनश्चाऽन्तर्हितावुभौ । तैस्तैरुपायैस्तो क्रूरावृषीन्दृष्ट्वा निजघ्नतुः निवृत्तयज्ञस्वाध्याया प्रणटनृपतिद्विजा उत्सन्नोत्सवयज्ञा च बभूव वसुधा तदा ॥ २२ ॥ हाहाभूता भयार्ता च निवृत्तविपणापणा निवृत्तदेवकार्या च पुण्योद्वाहविवर्जिता ॥ २३ ॥ निवृत्तकृषिगोरक्षा विध्वस्तनगरानमा अस्थिकङ्कालसंकीर्णा भूर्वभूबोगदर्शना ॥ २४ ॥ किसी तपस्वी ने यदि क्रोध करके कुछ शाप कलश-कमण्डलु-वों से पूर्ण देख पड़ने लगे। भी दिया तो ब्रह्मा के घरदान के प्रभाव से वह उन प्रलयकाल में इस संसार की जो दशा होती है वहीं दैत्यों का कुछ भी न कर सका । जब शिला पर उस समय हो गई। इसप्रकार जब कोई ऋषि कहीं मारे हुए वाण की तरह शाप भी निष्फल हो गये देखने को भी न रह गया तब दोनों भाई खोज- तब सब ब्राह्मण अपने व्रत-नियमों को छोड़कर | खोजकर दुर्गम स्थानों में छिपे हुए ऋपियों का इधर-उधर भागने लगे ॥१५॥१६॥ नाश करने लगे। कभी मदमत्त हाथी का रूप पृथ्वी पर जितने तपस्वी, सिद्ध, शान्त और | रखकर, कभी सिंह और बाघ बनकर वे दुर्गम जितेन्द्रिय ब्राह्मण ऋषि थे वे, गरुड़ के डर से नागों स्थानों में छिपे ऋषियों की हत्या करने लगे। इस- की तरह, उन दैत्यों के डर से भागने लगे। थोड़े | प्रकार मायारूप से ऋषियों का नाश करके वे उस ही समय में संसार मनुष्यों से खाली हो गया ॥ स्थान से अन्तन हो जाते थे। क्रूरप्रकृति निशाचर ॥१७॥१८॥ इसतरह ऋपियों का नाश करते हुए फिर रहे थे। सब आश्रम नष्ट-भ्रष्ट और ऋषियों के टूटे-फूटे अब यज्ञ कौन करता है वेदध्वनि भी बन्द हो गई। mczoooooo 200.0705oo cooho000 .. अध्याय २१३ ] म हा भारत rrrocricrored निवृत्तपितृकार्यं च निर्वष्टकारमङ्गलम् जगत्प्रतिभयाकारं दुप्प्रेक्ष्यमभवत्तदा ॥ २५॥ चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तारा नक्षत्राणि दिवौकसः । जग्मुर्विपादं तत्कर्म दृष्ट्वा सुन्दोपसुन्दयोः ॥ २६ ॥ एवं सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि राज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दापाख्याने द्वादशाधिक द्विशततमोऽध्यायः २१२ राजाओं और ब्राह्मणों का नाश हो गया। यज्ञ और । के उजड़ जाने और सब जगह हड्डियों के देर लग उत्सव आदि का नाम तक नहीं रह गया । सब जाने से. यह पृथ्वी बहुत ही भयानक हो उठी। और डर के मारे हाहाकार मच गया। खरीदना- सुन्द और उपसुन्द के इस काम को देखकर चन्द्र, वेचना आदि बाजार का कारोबार बन्द हो गया। सूर्य, ग्रह, तारागण, और आकाश-स्थित नक्षत्र भी सब देवकार्य पुण्यकार्य और विवाह आदि सस्कार । विवाद से मलिन हो उठे। दोनों दैत्यों ने इसप्रकार बन्द हो गये ।।१९।२४॥ ऋर कर्म से सब दिशाओं को जीतकर, निष्कण्टक पितृकार्य बन्द हो जाने से वषट्कार, स्वधा । होकर, कुरक्षेत्र में अपनी सेना का अड्डा बनाया आदि शब्द कहीं न सुन पड़ते थे। खेती के काम ॥२५॥२७॥ और गौरक्षा भादि बन्द हो जाने, नगरों और आश्रमों आदिपर्व का दो सौ बारह अध्याय समाप्त हुआ ॥ अथ त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥ २१३ ॥ ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः जग्मुस्तदा परामाति दृष्ट्वा तत्कदनं महत् ॥ १ ॥ तेऽभिजग्मुर्जित क्रोधा जितात्मानोजितेन्द्रियाः । पितामहस्य भवनं जगतः कृपया तदा ततो ददृशुरासीनं सह देवैः पितामहम् । सिद्धवार्षिभिश्चैव समन्तात्परिवारितम् दो सौ तेरह अध्याय ॥ २१३ ॥ श्री नारद जी ने कहा-हे पाण्डयो ! उन दोनों । जितात्मा और प्रोध को जीतनेवाले प्रापि रोग दैत्यों के कारण से सब महर्षि सिद्ध और देव सब जगत् पर कृपा करके ब्रह्मा जी के पास गये । ऋपियों को पड़ा दुःख हुआ और वे सर जितेन्द्रिय, ' वहा जाकर देखा कि सिद्धर्पि और ब्रमर्षिगण की नारद उपान- 701020100107o. rcle701007/ 2orma [ आदिपर्व cardiosraecoveso ९७४ महा भारत reoromorroreovercomederere तत्र देवो महादेवस्तत्राऽग्निर्वायुना सह चन्द्रादित्यौ च शक्रश्च पारमेष्ठ्यास्तथर्पयः वैखानसा वालखिल्या वानप्रस्था मरीचिपाः । अजाश्चैवाऽविमूढाश्च तेजोगस्तिपस्विनः ऋषयः सर्व एवैते पितामहमुपागमन् ततोऽभिगम्य ते दीनाः सर्व एव महर्षयः ॥ ६ ॥ सुन्दोपसुन्दयोः कर्म सर्वमेव शशंसिरे यथा हृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च न्यवेदयंस्ततः सर्वमखिलेन पितामहे ततो देवगणाः सर्वे ते चैव परमर्पयः तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदयन् ततः पितामहः श्रुत्वा सर्वेषां तद्वचस्तदा मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम् । तयोर्वध समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥ १० ॥ दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः । स्मृज्यतां प्रार्थनीयका प्रमदेति महातपाः पितामह नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥ १२ ॥ मण्डली के बीच में ब्रह्मा जी विराजमान है। इसी काम किये, सो सब मुनियों ने कह सुनाये ॥१७॥ अवसर पर देवों के देव महादेव, इन्द्र, अग्नि, वायु, इसके पश्चात् देवताओं ने भी वही बातें कहीं। चन्द्र, आदित्य आदि देवता, परमेष्ठी पद को प्राप्त सबका कथन सुनकर कर्तव्य के बारे में क्षणभर और वैखानस, वालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचि, अज, तक ब्रह्मा जी सोचते रहे । इसके उपरान्त उन्होंने अविमुग्ध और तेजोगर्भ आदि भिन्न-भिन्न तपस्वी दैत्यों के वध का उपाय सोचकर उसी प्रयोजन से ऋषि भी वहां आ गये । सब महर्पियों ने ब्रह्मा के | विश्वकर्मा को बुलाया ॥८॥१०॥ पास जाकर सुन्द और उपमुन्द के भयङ्कर क्रूर विश्वकर्मा के आने पर महानुभाव पितामह ने कामों का वृत्तान्त कह सुनाया। दैत्यों ने जिसत्तरह, उनको आज्ञा दी कि तुम एक अत्यन्त स्वरूपवान्, प्रजा को चौपट किया और अन्य-अन्य जो निष्ठुर | सभी को लुभा देनेवाली स्त्री उतन्न करो । विश्वकर्मा caracororónyoYCH ॥ ११ ॥ icox czcooooomnax Zerotonovo.
rro/04 1000Koos अध्याय २१३ ] म हा भारत ९७५ woman त्रिषु लोकेषु यत्किंचिद्भूतं स्थावरजङ्गमम् । समानयदर्शनीयं तत्तद्यत्नात्ततस्ततः कोटिशश्चैव रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशयत् । तां रत्नसंघातमयीमसृजद्देवरूपिणीम् सा प्रयत्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाऽप्रतिमाऽभवत् ॥१५॥ न तस्याः सूक्ष्ममप्यस्ति यद्गात्रे रूपसंपदा । न युक्तं यत्र वा दृष्टिन सज्जति निरीक्षताम् सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती जहार सर्वभूतानां चक्षूपि च मनांसि च तिलं तिलं समानीय रत्नानां यद्विनिर्मिता तिलोत्तमेति तत्तस्या नाम चक्रे पितामहः ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् । किं कार्यं मयि भूतेश येनाऽस्म्यद्येह निर्मिता ॥ १९ ॥ पितामह त्याच-गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे । प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ॥ २० ॥ ने ब्रह्मा की इस आना को स्वीकार करके उन्हें कोई ऐसी बात या जगह न थी जो रूप-हीन हो प्रणाम किया। इसके पश्चात् सूब सोच विचारकर या जिसमें दर्शक की आँखें गहन जायें या उसके वे एक विरोफन्दी स्त्री की रचना में लग गये। शहीर भा में कोई ऐसा सूक्ष्म स्थान भी न था कि ॥११।१२। जिसपर देखने वाले की ऑरा पड़ने से उसके अपूर्व विरोक में जो कुछ चर और अचर के बीच रूप की शोमा में फैम नहीं जाता था ॥१५॥१६॥ उत्तम और दर्शनीय पदार्थ है उन सबके सौन्दर्य वह सुन्दरी कामरूपिणी रक्ष्मी की तरह सभी का साराश लेकर उसके द्वारा विश्वकर्मा ने एक रोगों के मन और दृष्टि को अपनी और सींच मुन्दरी को बनाया । उसके शरीर में उन्होंने करोड़ों रेनेवाली हुई । रनों का तिल-तिल सौन्दर्य चुनकर रसों का समावेश कर दिया ॥१३॥१४॥ उसकी रचना हुई, इसी से विधाता ने उसका नाम रखमरी देवरूपिणी वह युवती त्रिभुवन-मुन्दरी तिरोउमा रस दिया ॥१७॥१८॥ हुई। विश्वकर्मा ने बड़े यन और तत्परता के साथ इसके पश्चात् तिलोत्तमा ने दोनों हाथ जोड़कर उसको बनाया। उसके शरीर में तिल भर भी। ब्रह्मा जी से कहा-हे प्रजापति ! मेरे लिये क्या करने pirn ९७६ महा भारत [ आदिपर्व 100a0c coloocok coroo , corrororakorakorkore त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसंपत्कृतेन वै विरोधः स्याद्यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥ २१ ॥ नारद उवाच- सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम् चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥ प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः देवाश्चैवोत्तरेणाऽऽसन्सर्वतस्त्वृषयोऽभवन् ॥ २३ ॥ कुर्वन्त्यां तु तदा तत्र मण्डलं तत्प्रदक्षिणम् इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान्धैर्येण प्रत्यवस्थितौ ॥ २४ ॥ द्रष्टुकामस्य चाऽत्यर्थं गतायां पार्श्वतस्तथा अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःस्मृतं मुखम् ॥ २५॥ पृष्टतः परिवर्तन्त्या पश्चिमं निःस्मृतं मुखम् गतया चोतरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ॥ २६॥ महेंद्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः रक्तान्तानां विशालानां सहस्र सर्वतोऽभवत् ॥ २७ ॥ एवं चतुर्मुखः स्थाणुमहादेवोऽभवत्पुरा तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः की आज्ञा है ? मैं किसलिये बनाई गई हूं ! ब्रह्मा की ओर और अन्यान्य देवताओं के मुँह उत्तर की ने कहा-हे तिलोत्तमा ! तुम सुन्द और उपसुन्द | ओर थे। ऋपि लोग मण्डलाकार बैठे थे इसलिये दोनों असुरों के यहां चली जाओ, वहां जाकर | उनके मुँह चारों ओर थे । तिलोत्तमा जब देव-मण्डली सुन्दर रूप दिखाकर उनको लुभाने की चेष्टा करो की प्रदक्षिणा करने लगी तब औरों की कौन कहे, ॥१९॥२०॥ | महादेव और इन्द्र का भी धर्य जाता रहा ॥२३॥२४॥ हे भद्रे ! तुम अपनी रूप-सम्पति और कार्य पीठ की और जब तिलोत्तमा पहुंची तब उसे कुशलता के द्वारा उन दोनों भाइयों में फूट डालने | देखने के लिये शंकर के पीछे की ओर एक कमलदल- का उपाय करो । नारद जी कहते है-हे धर्मराज | सदृश नेत्रों से सुन्दर मुख उत्पन्न हो गया। इसीतरह युधिष्ठिर ! 'जो आज्ञा' कहकर तिलोत्तमा ने ब्रह्मा दाहने-बायें तिलोत्तमा के पहुंचने पर उस-उस ओर की आज्ञा को स्वीकार किया। फिर ब्रह्मा को प्रणाम | और भी उनके दो मुख उत्पन्न हो गये ॥२५॥२६॥ करके उसने देवताओं की प्रदक्षिणा की ॥२॥२२॥ इन्द्र के भी पीछे, आसपास और सामने हजारों ब्रह्मा पूर्वमुख बैठे थे । महादेव का मुँह दक्षिण | विशाल अरुण नेत्र हो गये। इसप्रकार पहले महादेव - rooooooooo co अध्याय २१४ ] महा भारत হতও 30024 तथा देवनिकायानां महीणां च सर्वशः मुखानि चाऽभ्यवर्तन्त येन याती तिलोत्तमा ॥२९॥ तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम् । सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम् गच्छन्त्या तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः कृतमित्येव तत्कार्य मेनिरे रूपसंपदा तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः सर्वान्विसर्जयामास देवानृपिगणांश्च तान् इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि राज्यलम्भपर्वणि तिलोत्तमाप्रस्थापने त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्याय.॥२१३॥ चतुर्मुख और इन्द्र सहस्रनेत्रधारी हुए हैं ।।२७।२८॥ अब तिलोतमा अपना कार्य करने के लिये चल इसतरह तिलोत्तमा जिधर पहुंचती थी उधर हो । दी । उसके रूप की शोभा देखकर देवताओं और सब देवता और ऋपि अपना मुंह कर लेते थे। ऋपियों ने समझ लिया कि अब कार्य सिद्ध हो गया। लोक-पितामह ब्रह्मा के सिवा उस समा में बैठे हुए तिलोत्तमा के चले जाने पर लोक-रक्षक ब्रह्मा जी ने सभी महात्मा स्त्री की और अनुराग भरी दृष्टि से । देवताओं और ऋपियों को भी जाने की आज्ञा दी पार-बार देखने लगे ॥२९॥३०॥ ॥३१॥३२॥ आदिपर्व का दो मौ तेरह अध्याय समाप्त हुआ । अथ चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥ नारद उवाच- जित्वा तु पृथिवी दैत्यो निःसपत्नी गतव्यथौ । कृत्वा त्रैलोक्यमव्ययं कृतकृत्यो बभूवतुः देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतो यदा न प्रतिपेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजातेऽमराविव दो सौ चौदह अध्याय ॥२१४ ॥ नारद जी ने कहा-हे पाण्डवो ! इधर दोनों श्रेष्ठ रनों को पाने से अपने को कृतकृत्य समझकर मुन्द और उपमुन्द दैत्य पृथ्वी को जीतकर निश्चिन्त ! वे असीम आनन्द मनाने लगे। कोई वेरी और भाव से निष्कण्टक राज्य कर रहे थे। देवता, विरोध करनेवाला न रह जाने पर दोनों दैत्य विलासी गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग, मनुष्य आदि के विविध और मालसी हो गये । वे देवताओं के समान मुस - २ ॥
९७८ महा भारत [ आदिपर्व oooo - . स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः । पानश्च विविधैर्हयैः परां प्रीतिमवापतुः अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च यथेप्सितेषु देशेषु विजबातेऽमराविव ततः कदाचिद्विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निपीदतुः ततो वादित्रनृत्याभ्यामुपातिष्ठन्त तौ स्त्रियः गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती वेषमाक्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा नदीतीरेषु जातान्सा कर्णिकारान्प्रचिन्वती शनैर्जगाम तं देशं यत्राऽऽस्तां तो महासरी ॥ १० ॥ तो तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ दृष्दैव तां वरारोहां व्यथितौ संवभूवतुः ॥ १२ ॥ से विहार करने लग गये। माला, चन्दन, स्त्री, | आसनों पर विराजमान हुए । स्त्रिया स्तुति-सयुक्त सुन्दर खाने चबाने और चूसने की सामग्री इन सब मधुर गीत गाकर, बाजे बजाकर और नाच कर उन्हें तरह तरह की वस्तुओं से अति आनन्द भोगने प्रसन्न करने लगी दी इसी बीच में तिलोत्तमा केवल एक राल वस्त्र वे महल के बागों में, पहाड़ों पर, वनी में और पहने, मद विहल रेप बनाये, नदी के किनारे किनारे अन्यान्य मनोहर स्थानों में इच्छानुसार राज्य के क्नेर के पत्रों को चुनती हुई धीरे धीरे उसी ऐश्चर्य का सुख भोगने और क्रीड़ा करने लगे । स्थान पर आई जहा दोनों परम प्रतापी दैत्य बैठे एक दिन दोनों भाई फूले हुए शार वृक्षों से विहार कर रहे थे । उत्तम मदिरा पीने के कारण शोभित, शिलामय, समतर, विन्ध्याचल के स्थानों । दोनों माइया की आखें राल हो रही थीं। सुन्दरी में विहार करने के लिए गये । यहा मन भोग की तिलोत्तमा को देखते ही दोनों कामयश हो उठे। सामग्री ले जाने का प्रबन्ध भी किया गया। दोनों कामदेव अपने वाण चराकर उन्हें सताने स्गा ॥ भाई श्रेष्ठ स्त्रियों के साथ वहा पहुँचकर उत्तम ।।९।११॥ गे ॥१४॥ Arrrrrrrrror. mriornmoooo
नाना भाया म गिध पैला करने के नितिनमा का मां पाम आना।
मुन्न
और उपमुन्द
Domocrore ९७८ म हा भारत [ आदिपर्व roid स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः । पानश्च विविधैर्हयैः परां प्रीतिमवापतुः अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च यथेप्सितेषु देशेषु विजह्वातेऽमराविव ततः कदाचिद्विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ वरासनेपु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निपीदतुः ततो वादिननृत्याभ्यामुपोतिष्ठन्त तौ स्त्रियः गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती वेषमाक्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा नदीतीरेषु जातान्सा कर्णिकारान्प्रचिन्वती शनैर्जगाम तं देशं यत्राऽऽस्तां तौ महासरी ॥ १० ॥ तो तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ संवभूवतुः ॥ १२ ॥ से विहार करने लग गये ।' माला, चन्दन, स्त्री, | आसनों पर विराजमान हुए । स्त्रियां स्तुति-संयुक्त सुन्दर खाने चबाने और चूसने की सामग्री इन सब मधुर गीत गाकर, बाजे बजाकर और नाचकर उन्हें तरह-तरह की वस्तुओं से अति आनन्द भोगने प्रसन्न करने लगी ॥५॥८॥ लगे ॥१४॥ इसी बीच में तिलोत्तमा केवल एक लाल वस्त्र वे महल के बागों में, पहाड़ों पर, वनों में और पहने, मद-विह्वल वेप बनाये, नदी के किनारे-किनारे अन्यान्य मनोहर स्थानों में इच्छानुसार राज्य के कनेर के फूलों को चुनती हुई धीरे-धीरे उसी ऐश्वर्य का सुख भोगने और क्रीडा करने लगे । स्थान पर आई जहां दोनों परम प्रतापी दैत्य वैठे एक दिन दोनों भाई फूले हुए शाल-वृक्षों से | विहार कर रहे थे । उत्तम मदिरा पाने के कारण शोभित, शिलामय, समतल, विन्ध्याचल के स्थानों | दोनों भाइयों की आंखें लाल हो रही थीं । सुन्दरी में विहार करने के लिए गये । वहां सब भोग की तिलोत्तमा को देखते ही दोनों कामयश हो उठे। सामग्री ले जाने का प्रबन्ध भी किया गया। दोनों कामदेव अपने वाण चलाकर उन्हें सताने लगा ॥ भाई श्रेष्ठ स्त्रियों के साथ वहां पहुँचकर उत्तम ॥९॥११॥ 7070oyo900 । oror.5-5-ocome205070070070 अध्याय २१४ ] महा मारत ९७९ 7000 100100620 200200.4 । concoconca ॥१५॥ CcJA तावुत्थायाऽऽसनं हित्वा जग्मुतुर्यत्र सा स्थिता । उभौ च कामसंमत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ॥ १२ ॥ .दक्षिणे तां कर सुध्र सुन्दो जग्राह पाणिना उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणी तिलोत्तमाम् ॥ १३ ॥ वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन चलेन च धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ॥ १४ ॥ सवरेतैर्मदैमत्तावन्योन्यं भृकुटीकृतौ । मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभापत मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत नेपा तब ममैति ततस्तौ मन्युराविशत् तस्या रूपेण संमत्तौ विगतस्नेहसौहृदो तस्या हेतोगदे भीमे संगृहीतामुभौ तदा प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तो काममोहितो ॥१८॥ अहं पूर्वमहपूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः तो गदाभिहतो भीमो पेततुर्धरणीतले दोनों माई उठकर तिलोतमा के पास पहुँचे । यह स्त्री मेरी है, तुम्हारी नहीं । इसलिये तुम्हारी और काम से अन्धं हुए-हुए उससे अपने को ! बहू के बराबर है । इसप्रकार तिलोचमा के रूप अनीकार करने की प्रार्थना करने लगे । ज्योही पर मुग्ध होकर दोनों असुरों ने परस्पर के स्नेह सुन्द ने उसका दाहिना हाथ पकड़ा त्योंही उपमुन्द } और सौहार्द को तिलाञ्जलि दे दी। दोनों को ने उसका बायां हाथ पड़ लिया। वर-लाम, बल क्रोध चढ़ आया। इसके पश्चात् काम से मोहित धन-रल आदि का गर्व और मदिरापान का नशा, दोनों दैत्य दो मयानक गदायें हाथ में लेकर फिर कामदेव का उन्माद, इन सब बातों ने उनको तिलोत्तमा के लिये परस्पर युद्ध करने लगे । वे एकदम विचारशून्य कर दिया । उन्दै अपने हिन.' परस्पर कहने लगे-में पहले हमे ग्रहण करूँगा, में भदित का ध्यान तक न रहा। ये परस्पर शोध से। पहले इस प्राप्त करेगा। गदामों की चोट से भैहे चदार-झगड़ा करने लगे ॥१२॥१५॥ । उनके शरीरों में घाय हो गये और रक्त यह चला। मुन्द ने कहा-हे उपमुन्द ! सवादार ! मेरी अन्त को परम्पर गदा की चोट से निविदार श्री तुम्हारी गाला के समान है। उसमुन्द ने कहा- दोनों देस्य स्वर्ग से प्रष्ट सूर्य के समान पृथ्वी पर 0000000 Prorozo2050 cicscor ॥१५॥ अध्याय २१४ ] महा मारत ९७९ 0000oroorcoror तावुत्थायाऽऽसनं हित्वा जग्मुतुर्यत्र सा स्थिता । उभौ च कामसंमत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ॥ १२ ॥ दक्षिणे तां कर सुध्र सुन्दो जग्राह पाणिना उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम् ॥ १३ ।। वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन वलेन च धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ॥१४॥ सवेरेतैर्मदैमत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृती मदकामसमाविष्टों परस्परमथोचतुः मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभापत मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभापत ॥ १६ ॥ नेपा तब ममैषेति ततस्तो मन्युराविशत् तस्या रूपेण संमत्तौ विगतस्नेहसौहृदो तस्या हेतोगदे भीमे संगृहीतामुभी तदा प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तो काममोहितो अहं पूर्वमहंपूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः तो गदाभिहती भीमौ पेततुर्धरणीतले दोनों भाई उठकर तिलोत्तमा के पास पहुँचे । यह स्त्री मेरी है, तुम्हारी नहीं। इसलिये तुम्हारी और काम से अन्धे हुए हुए उससे अपने को बहू के बराबर है । इसप्रकार तिरोतमा के रूप अहीकार करने की प्रार्थना करने लगे । ज्योंही पर मुग्ध होकर दोनों असुरों ने परम्पर के स्नेह सुन्द ने उसका दाहिना हाथ पकड़ा त्योंही उपमुन्द और सौहार्द को तिराजलि दे दी। दोनों को ने उसका पाया हाथ पकड़ रिया । वर-राम, बल क्रोध चढ आया। इसके पश्चात् काम से मोहित धन-रन आदि का गर्व और मदिरापान का नशा, ! दोनों दैत्य दो भयानक गदायें हाथ में लेकर फिर कामदेव का उन्माद, इन सब बातों ने उनको तिलोत्तमा के रिये परम्पर युद्ध करने लगे । वे एकदम विचारशून्य कर दिया। उन्हें अपने हित परम्पर कहने लगे-म पहले इमे ग्रहण करूँगा, मैं अहित का ध्यान तक न रहा। वे परम्पर बांध से पहले इसे प्राप्त करूँगा। गदाओं की चोट से मैंहें चदार-झगड़ा करने रंगे ॥१२॥१५॥ । उनके शरीरों में घाव हो गये और रक्त यह चरा। सुन्द ने कहा-है उपसुन्द ! मवरदार ! मेरी अन्त को परम्पर गदा की चोट से निर्जीव होकर स्त्री सुम्दारी माता के समान है। उपसुन्द ने कहा- दोनों दैत्य म्बर्ग से प्रष्ट सूर्य के समान पृथ्वी पर roozoo50005.
९८० महा मारत [ आदिपर्व coacoooooo . - - रुधिरेणाऽवसिक्ताङ्गो द्वाविवाऽकौं न भश्च्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥ पातालमगमत्सर्वो विषादभयकम्पितः ततः पितामहस्तत्र सह देवैमहर्षिभिः आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् । वरेण च्छन्दयामास भगवान्प्रपितामहः ॥ २२ ॥ वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः आदित्यचरिताँल्लोकान्विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥ तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन एवं तस्यै वरं दत्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥ इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः नारद उवाच- एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थ वेकनिश्चयो तिलोत्तमार्थ संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः तस्मादब्रवीमि वः स्नेहात्सर्वान्भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥ यथा वो नात्र भेदः स्यात्सर्वेषां द्रौपदीकृते ' तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत्प्रियमिच्छथ गिर पड़े ॥१६॥१९॥ वर देकर और इन्द्र को तीनों लोकों का अधिकार तब उनके मित्र दैत्य और दैत्यों की स्त्रियां | सौंपकर ब्रह्मलोक को सिधारे । श्रीनारद जी बोले- भागकर पाताल को चली गई। अब विशुद्धात्मा हे भरतवश श्रेष्ठो ! एक हृदय और परस्पर अत्यन्त भगवान् पितामह तिलोत्तमा के सत्कार के लिये ही हिल-मिले रहने पर भी तिलोत्तमा के कारण सुन्द देव और महर्षियों के साथ वहा आ पहुँचे । और उपसुन्द ने परस्पर क्रुद्ध होकर आप ही अपना भगवान् पितामह ने वहां पहुंचकर तिलोतमा को वर विनाश कर लिया। इससे हे पाण्डवो ! मै तुमपर देना चाहा । वह वर देना स्वीकार कर उससे अनुराग और स्नेह रखने के कारण कहता हूँ कि यदि बोले-हे भामिनी ! जिन लोकों में सूर्यदेव भ्रमण तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो ऐसा उपाय करते हैं उन सब में तुम विचर सकोगी। तुम्हारा कर लो जिसमें द्रौपदी के कारण तुममें झगड़ा होने इतना तेज होगा कि कोई पुरुष तुमको देर तक का अवसर ही न आये। वैशम्पायन ने कहा-हे नहीं देख सकेगा ।।२०।२३॥ जनमेजय ! महात्मा महर्षि नारद के ये वचन सर्व लोकों के पितामह प्रभु हिरण्यगर्भ ऐसा | सुनकर सब पाण्डवों ने उनके कथन का अनुमोदन ॥ २७ ॥ Pc00 poooooor अध्याय २१५ पदा मारत ProceO1400scoooo concercore - वैशम्पायन आच-एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महार्पणा समयं चक्रिरे रास्तेऽन्योन्यं वशमागताः समक्षं तस्य देव रदस्याऽमितौजसः द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत् । स नो द्वादशवर्याणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥ २९॥ कृते तु समये तस्मिन्पाण्डवैर्धर्मचारिभिः नारदोऽप्यगमत्प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥ ३० ॥ एवं तैः समयः पूर्व कृतो नारदचोदितैः न चाऽभिद्यन्त ते सर्वे तदाऽन्योन्येन भारत ॥३१ ॥ पनि श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि राज्यलंभपर्वणि मुन्दोपमुन्दोपाख्याने धतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय. २१४ समाभं च राज्यलम्भपर्य। किया और उनके आगे ही यह प्रतिना की कि रहकर उसका प्रायधित करना पड़ेगा। धर्मात्मा एक नियमित समय तक हरएक भाई के पास पाण्डब जब इसमकार मतिज्ञा कर चुके तर महात्मा दोपदी रहेगी। एक भाई जब द्रौपदी के साथ नारद उनसे विदा होकर यथेष्ठ स्थान को चल एकान्त में बैठा होगा तर दूसरा भाई वहा न दिये । हे जनमेजय ! नारद जी की आज्ञा से ऐसा जायगा । यदि कोई यहां जाकर दोनों के एकान्त-नियम कर लेने से ही कृष्णा के कारण पाण्डवों में यास को देस लेगा तो उसे पारह वर्ष तक वन में परम्पर विरोध नहीं हुआ ॥२४॥३१॥ आदिपर्व का दो सौ चौदह अध्याय समाप्त हुआ। vow-. Succicacs अय पदशाधिद्विशततमोऽध्याय ॥ २१५॥ अथार्जुनपनामपर्य। पैशम्पायन उराम एवं ते समयं कृत्वा न्यबसंस्तन पाण्डवाः वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीक्षितः तेषां मनुजसिंहानां पभानाममितौजसाम् बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी दो मी पन्द्रह अगाय ॥२१५ ।। पायन ने कहा- राजा जनमेजय ! इस की कग में रने रंगे। आना-कारिणी द्रौपदी मारा नियम + पाण्डव रोग इन्द्रमाय में मंगल पांचों महापरी गनुन्य-घेष्ठ पाण्डवों को गहने हुए अत्रविधा के पत्र में अन्य राजाओं पना हुई । वाया भाई दीदी को पार परम ९८२ महा भारत [ आदिपर्व 2207oolcoxoozoooooo xxxxxxxx comcccc - 30003rakar - ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः । बभूव परमप्रीता नागैरिव सरस्वती वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु व्यवर्धन्कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः अथ दीर्पण कालेन ब्राह्मणस्य विशांपते कस्यचित्तस्करा जन्हुः केचिद्गा नृपसत्तम ह्रियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणः क्रोधमूञ्छितः । आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत्स पाण्डवान् ॥ ६ ॥ ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः प्रसह्य चाऽस्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्वाक्षैः प्रलुप्यते । शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाऽभिमर्दति ॥ अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् तमाहुः सर्वलोकस्य समय पापचारिणम् ब्राह्मणस्वे हृते चोरेर्धर्मार्थे च विलोपिते रोरूयमाणे च मयि क्रियतां हस्तधारणा ॥ १० ॥ वैशम्पायन उवाच-रोरुयमाणस्याऽभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः संतुष्ट हुए । सरोकायुक्त वन और हस्तीगण जिस खाण्डवप्रस्थ में भाकर पाण्डवों को भला-बुरा कहने प्रकार एक दूसरे का सौभाग्य बढ़ाते हैं, वैसे ही लगा ॥५॥६॥ द्रौपदी और उसके पांच पति एक दूमरे की प्रीति | उसने कहा-दुष्ट नीच निष्ठुर लुटेरे जबरदस्ती बढ़ाने लगे । महात्मा पाण्डवों के धर्मपथ पर चलने । हमारी गायें लेकर हमारी सीमा के बाहर जा रहे से फौरव मात्र ही दोष की आंच से बचकर मुखपूर्वक है। हे पाण्डवो ! तुम उनका पीछा करो। शान्त वृद्धि पाने लगे ॥१४॥ स्वमावयाले ब्रह्मण के घी को कौवे खा रहे हैं, हे राजन् ! कुछ समय बाद चारों ने किसी ब्राह्मण नीच गीदड़ सिंह की खाली गुफा में उत्गत कर की गायें चुराई । चोरों को गो-धन लेकर जाते देख रहे हैं |८|| मातस्वर से विलाप करता हुआ कुपित ब्राह्मण परन्तु राजा रक्षा न करके केवल आय का छटाभाग Jo sroom
अध्याय २१५ ]
महाभारत
९८३
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श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् ।
आयुधानि च यत्राऽऽसन्पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥
कृष्णया सह तत्राऽऽस्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः
संप्रवेशाय चाऽशक्को गमनाय च पाण्डवः
तस्य चाऽऽर्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः।
आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥
हियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणस्य तपस्विनः
अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान्स्यान्महीपतेः
यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम्
अनास्तिक्यं च सर्वेपामस्माकमपि रक्षणे
प्रतितिप्टेत लोकेऽस्मिन्न धर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः
अजातशत्रोनृपतेर्मयि चैवाऽनृतं भवेत् ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु बनवासो भवेन्मम
सर्वमन्यत्परिहृतं धर्पणातु महीपतेः
प्रभा से लेता है। ऐसे राजा को शास्त्र ने अहितकारी नहीं जा सके । इधर ब्राह्मण उन्हें पूर्वोक्त दीन
और पापाचारी कहा है । लुटेरे ब्राह्मण के धन को । वचनों से बार-बार सहायता के लिये पुकार रहा
हरे लिये जाने हैं, धर्म-कर्म का लोप हो रहा है और था। इस कारण असमञ्जस में पड़े हुए शोक से
मैं भी रो रहा है । इस समय हाथ पकड़कर मुझे व्याकुल अर्जुन यो सोचने लग-मुटेरे इस ब्रामण
का धन लिये जाते हैं। इस तपम्वी के आँसू पोंछना
वैशम्पायन ने कहा पाण्डुपुत्र अर्जुन ने पाय
मेरा निश्चित कर्तव्य है । इसकी उपेक्षा करने से
ही बार-बार विलाप कर रहे साक्षण के पूर्वोक वाक्य मी राजा को बड़ा अधर्म होगा । यदि में आज
मुने । मुनते ही उन्होंने "डरो मत" कहकर ब्राह्मण दर पर रो रहे इस ब्रामण की रक्षा न करगा तो
का दादम बंधाया। हे महाराज ! परन्तु जिम घर इस पृथ्वी पर रक्षा करने में असमर्य' या 'माक्षण
महात्मा पाण्टयों के अस्त्र-शस्त्र थे उसी घर में की रक्षा-रूप क्षत्रिय के धर्म में अपद्धा रम्बनवाने
धर्मराज युधिष्ठिर द्रोपदी के माय एकान्त में बैठे रहलाने से हम सबको बड़ी निन्दा होगी, अधर्म
दुए थे । नियम के अनुसार अर्जुन उस पर के भीतर भी होगा । इधर यदि में राजा को अपना करके
।
उबारो ॥१॥१०॥
९८४ महा भारत [ आदिपर्य zoococoooooo । aocood - अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २०॥ एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः अनुप्रविश्य राजानमापृच्छय च विशाम्पते ॥ २१ ॥ धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत ब्राह्मणाऽऽगम्यतां शीघ्रं यावत्परधनैषिणः ॥ २२॥ न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद्गच्छावहे सह यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्तान्दनं तव ॥ २३ ॥ सोऽनुसृत्य महावाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी शरैविध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद्धनम् ॥ २४ ॥ ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः ततस्तद्गोधनं पार्थों दत्वा तस्मै द्विजातये आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनञ्जयः सोऽभिवाद्य गुरून्सर्वान्सर्वेश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥ धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश में प्रभो समयः समतिकान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७॥ घर में जाऊँगा तो प्रतिज्ञा भग का पाप होगा । हाथ से गो-धन का उद्धार कर लायें । अब कवच उसके प्रायश्चित्त के लिये मुझ वन जाना होगा । पहने, धनुष हाथ में लिये, रथ पर सवार अर्जुन ने परन्तु 'ब्राह्मण की रक्षा न करने से राजा के अपमान' | लुटेरों का पीछा किया ! शीघ्र ही वाणों के द्वारा का खयाल करके मैं किसी रुकावट को न मानेगा । चोरों को मारकर, उनसे गाये छीनकर अर्जुन ने चाहे अधर्म हो, चाहे प्राण जाये और चाहे वन ब्राह्मण के हवाले कर दी ॥२।२४।। जाना पड़े, मै शस्त्र लेने इस घर में अवश्य जाऊँगा, इसप्रकार ब्राह्मण को उसकी गायें लौटाने से क्योंकि शरीर की अपेक्षाधर्म ही श्रेष्ठ है ॥१॥२०॥ यशस्वी होकर अर्जुन अपने नगर में लौट आये। कुन्ती के पुत्र अर्जुन यह निश्चय करके उस फिर गुरु-जनों को प्रणाम करके और उनसे अभिनन्दन घर में गये, राजा से पूछकर धनुष लिया, फिर पाकर धर्मराज से उन्होंने कहा-हे प्रभो 1 मुझे ब्राह्मण के पास आकर बोले-हे ब्राह्मण ! शीघ्र | प्रतिज्ञा-भङ्ग का पाप दूर करने के लिये कोई व्रत आओ, पराये धन के लोभी नीच लुटेरे अभी अधिक बताइये । मैंने आपको एकान्त में देख कर प्रतिज्ञा- दूर नहीं गये हैं, आओ हम दोनों चलकर उनके भा का पाप किया है, इसलिये वन को जाऊँगा। aorarorowwwcomooonawarnamoecorroraoor - अध्याय २१५ महा मारत 200004 - । वनवासं गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् कथमित्यब्रवीद्वाचा शोकातः सज्जमानया युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् उवाच दीनो राजा च धनञ्जयमिदं वचः प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ अनुप्रवेशे यद्वीर कृतवांस्त्वं ममाऽप्रियम् सर्व तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः ॥ ३२ ॥ निवर्तस्व महावाहो कुरुष्व वचनं मम न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥ अर्जुन उवाच-न व्याजेन चरेद्धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् न सत्याद्विचलिप्यामि सत्येनाऽऽयुधमालभे ॥ ३४॥ येशम्पायन उवाच-सोऽभ्यनुज्ञाप्य राजानं वनचर्याय दीक्षितः वने द्वादश वर्षाणि वासायाऽनुजगाम ह इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वण्य नतीर्थयात्रायां पञ्चदशाधिकद्विगततमोऽध्यायः२१५ हम लोगों में ऐसा ही नियम हो चुका है । एकाएक बैठा हो तो छोटा भाई वहा जा सकता है | हां, भाई के मुंह से ऐसे अप्रिय वचन सुनकर राजा बड़े भाई का छोटे के घर में जाना नियम के विरुद्ध युधिष्ठिर को बड़ा शोक हुआ । उन्होंने कुछ टूटी है। अतएव हे महाबाहो ! तुम इस विचार को फूटी बातों में कहा कि क्यों ! फिर अत्यन्त व्याकुल दूर कर दो। मेरी बात सुनो । तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होकर उन्होंने अपने भाई अर्जुन से कहा- हे निष्पाप} हुआ, तुमने मेरा अपमान भी नहीं किया । अर्जुन यदि मेरे कहने को तुम प्रमाण मानते हों तो जो ' ने कहा-मैने आपके ही मुंह से सुना है कि धर्म में छल में कहता हूं यह सुनो ॥२५॥३०॥ । नहीं करना चाहिये । इस कारण मैं सत्य से पीछे है वीर ! तुमने घर के भीतर आकर मेरा जो नहीं हहँगा। वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय । मुछ अपिय किया है उसे मैं क्षमा करता हूं। मेरे इसके पश्चात् अर्जुन ने वन-यात्रा की दीक्षा ली अन्तःकरण में किचित मात्र भी क्रोध नहीं है। फिर राजा युधिष्ठिर से निवेदन करके वे बारह वर्ष यहा माई यदि अपनी स्त्री के साथ एकान्त में के लिये वन में रहने को चल दिये ॥३१॥३५॥ आदिपर्व का दो सौ पन्द्रह अध्याय समाप्त हुआ। - । ९८६ महा मारत [ आदिपर्व 0000.00000000000cocooo-orc अथ पोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥ वैशम्पायन उवाच-तं प्रयांतं महावाहुं कौरवाणां यशस्करम् अनुजग्मुर्महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः वेदवेदांगविद्वांसस्तथैवाऽध्यात्मचिन्तकाः भैक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ॥ २ ॥ कथकाश्चापरे राजश्रमणाश्च वनौकसः दिव्याख्यानानि ये चापि पठन्ति मधुरं द्विजाः ॥ ३ ॥ एतैश्चाऽन्यैश्च बहुभिः सहायैः पाण्डुनन्दनः वृतः श्लक्ष्णकथैः प्रायान्मरुद्भिरिव वासवः रमणीयानि चित्राणि वनानि च सरांसि च सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत पुण्यानपि च तीर्थानि ददर्श भरतर्षभ स गङ्गाद्वारमाश्रित्य निवेशमकरोत्प्रभुः तत्र तस्याऽद्भुतं कर्म शृणु त्वं जनमेजय कृतवान्यद्विशुद्धात्मा पाण्डूनां प्रवरो हि सः निविष्ट तत्र कौन्तेये ब्राह्मणेषु च भारत अग्निहोत्राणि विप्रास्ते प्रादुश्चक्रुरनेकशः दो सौ सोलह अध्याय ॥ २१६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-कुरु-वंश के यश को बढ़ाने- | रमणीय विचित्र वन, सरोवर, नदी, समुद्र, भांति-भांति वाले महाबाहु अर्जुन जब रवाना हुए तब सम्पूर्ण के देश और पुण्यतीथों को देखा । अन्त को गंगाद्वार वेद-वेदाङ्ग के जाननेवाले, अध्यात्म की चिन्ता | में पहुंचकर कुछ दिन वहीं रहने का निश्चय किया। करनेवाले, भिक्षा की वृत्तिवाले भगवद्भक्त ब्राह्मण हे जनमेजय ! विशुद्धात्मा अर्जुन ने उन वेद-वेदाङ्ग तथा पुराण की कथा कहनेवाले वनवासी श्रमण के जाननेवाले ब्राह्मणों के साथ रहकर जो-जो अद्भुत सुन्दर उपाख्यान सुनानेवाले अन्यान्य ब्राह्मण उनके कर्म किये उन्हें कहता हूं, सुनो। हे भारत ! कुन्ती. पीछे चले । इनसे और अन्य पुरुपों से घिरे हुए पुत्र अर्जुन ने जब वहां रहने का विचार किया तब अर्जुन देवताओं की मण्डली से घिरे हुए इन्द्र की ब्राह्मणों ने स्थान-स्थान पर अमिहोत्र स्थापित तरह अनेक मनोहर कथाएँ कहते-सुनते चले ॥१४॥ किया। वे अमिहोत्र के अग्नि सदा घृत (, हवि ) भरतवंश चूड़ामणि अर्जुन ने जाते समय सैकड़ों की आहुतियों से प्रज्वलित रहते थे। अमिहोत्र के - circroooozooooooor00702003corozooozooyoverb , RAJARAMESear.kiranamamalinbiafmaOHamatlabowin- अर्जुन का हरिद्वार में उत्पी नाम नागान्गा में विवाह होना ।
ooooooooooo अध्याय २१६ ] महा मारत Pooroord तेषु प्रबोध्यमानेषु ज्वलितेषु हुतेषु च कृतपुष्पोपहारेषु तीरान्तरगतेषु च कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्नियतैः सत्पथे स्थितैः शुशुभेऽतीव तद्राजन्गङ्गाद्वारं महात्मभिः ॥१०॥ तथा पर्याकुले तस्मिन्निवेशे पाण्डवर्षभः अभिषेकाय कौन्तेयो गङ्गामवततार ह तत्राऽभिषेकं कृत्वा स तर्पयित्वा पितामहान् । उत्तितीर्घजलाद्राजन्नग्निकार्यचिकीर्पया ॥ १२ ॥ अपकृष्टो महावाहुर्नागराजस्य कन्यया अन्तर्जले महाराज उलूप्या कामयानया ददर्श पाण्डवस्तत्र पावकं सुसमाहितः कौरव्यस्याऽथ नागस्य भवने परमार्चितम् ॥ १४ ॥ तत्राऽग्निकार्य कृतवान्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः अशङ्कमानेन हुतस्तेनाऽतुष्य द्भुताशनः अग्निकार्य स कृत्वा तु नागराजसुतां तदा प्रहसन्निव कौन्तेय इदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥ किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भाविनि कश्चाऽयं सुभगे देशः का च त्वं कस्य चात्मजा ॥ १७॥. स्थान फूल और मालाभों से शोभित रहते थे । इन काम के वश होकर उनको जल में घसीट ले गई महात्माओं के वहां रहने से गंगाद्वार की शोभा ॥११॥१३॥ और भी अधिक हो गई ॥५॥१०॥ तब उन्होंने कोग्य नामक सर्पराज के भवन में अर्जुन का आश्रम इसप्रकार श्रेष्ठ मुनियों और जाकर अग्नि को, देखा । यह देखकर उन्होंने महर्षियों से शोभित था । एक दिन अर्जुन स्नान बेखटके वहां हवन किया। इससे अमिदेव बहुत प्रसन्न करने के लिये गंगाजी के भीतर उतरे। हे महाराज! हुए। भनि-कार्य हो जाने पर मुसकराते हुए अर्जुन यह नहा-धोकर पितरों का तर्पण कर आगे कार्य । ने नागकन्या से कहा-हे भाविनि ! तुमने यह कैसा के लिये जल से उठना चाहते थे कि ऐसे समय में साहस किया ! हे भीरु सुमगे! यह कीन देश है! पाताल के नीचे रहनेवाली उलूपी नानी नागराजपुनी तुम कौन और किसकी कन्या हो । ॥१४॥१७॥ - ooooovesovereio707omezooye ९८८ महा मारत [आदिपर्व cocooooo - - picococc. ॥ २३ ॥ उलूप्युवाच- ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः तस्याऽस्मि दुहिता राजन्नुलूपी नाम पन्नगी ॥१८॥ साऽहं त्वामभिपेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् दृष्ट्वैव पुरुषव्याघ्र कन्दर्पणाऽभिमूर्छिता तां मामनग्लपितां त्वत्कृते कुरुनन्दन अनन्यां नन्दयस्वाऽद्य प्रदानेनाऽऽत्मनोऽनघ ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच- ब्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशवार्षिकम् धर्मराजेन चादिष्टं नाऽहमस्मि स्वयं वशः ॥ २१ ॥ तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिण अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कहिचित् ॥ २२॥ कथं च नाऽनृतं मे स्यात्तव चापि प्रियं भवेत् । न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्यां भुजङ्गमे उलूप्युवाच जानाम्यहं पाण्डवेय यथा चरसि मेदिनीम् यथा च ते ब्रह्मचर्यमिदमादिष्टवान्गुरुः ॥ २४॥ परस्परं वर्तमानान्द्रुपदस्याऽऽत्मजां प्रति यो नोऽनुप्रविशेन्मोहात्स वै द्वादशवार्षिकम् ॥ २५॥ उलूपी ने कहा-हे महाराज ! ऐरावत के वंश में इधर तुम्हारा प्रिय करने की भी मुझे इच्छा है । उत्पन्न कौरव्य नाम एक नाग है । मै उसी की मैने पहले कभी झूठी बात नहीं कही । इसलिये कन्या हूं । मेरा नाम उलूपी है । हे पुरुषव्याघ्र अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं? ऐसा करो तुम स्नान करने के लिये जब गंगा जी में उतरे तब जिसमें मुझे झूठ बोलने का पाप भी न हो, तुम्हारा मैं तुम्हें देखकर कामदेव के वश हो गई। हे ! प्रिय भी हो और धर्म की रक्षा भी होजाय ॥२१॥२३॥ कुरुनन्दन ! मेरा विवाह नहीं हुआ, मै किसी से उलूपी ने कहा-हे पाण्डव ! तुम जिस तरह पहले मिली नहीं, अब तुम्हारे ही कारण मैं काम पीड़ा पृथ्वी पर घूम रहे हो और तुम्हारे बड़े भाई ने सह रही हूं । हे अनघ ! अब तुम मुझे आत्मदान जिस कारण तुम्हें ब्रह्मचर्य-पालन की आज्ञा दी है करके आनन्दित कगे ॥१८॥२०॥ वह सब मै जानती हूं। तुम सबने एक नियम अर्जुन ने कहा-हे भद्रे ! धर्मराज युधिष्ठिर ने मुझे किया था कि तुममें से किसी के भी द्रौपदी के पास बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहने की आज्ञा दी है। एकान्त में रहते समय यदि दूसरा वहां पर भूल से मैं स्वाधीन नहीं हूं। हे जल में विहार करनेवाली! | पहुंच जायगा तो वह बारह वर्ष तक वन में रहकर । omo.or remo0 ९८९ म हा भारत अध्याय २१६ ] roco10100oones ! - वने चरेद्ब्रह्मचर्यमिति वः समयः कृतः तदिदं द्रौपदीहेतोरन्योन्यस्य प्रवासनम् ॥ २६ ॥ कृन वास्तत्र धर्मार्थमत्र धर्मों न दुष्यति परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचन ॥ २७॥ कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याव्यतिक्रमः।। २८ ॥ स च ते धर्म एव स्याद्दत्वा प्राणान्ममाऽर्जुन । भक्तां च भज मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो न करिष्यसि चेदेवं मृतां मामुपधारय प्राणदानान्महावाहो चर धर्ममनुत्तमम् ॥ ३०॥ शरणं च प्रपन्नाऽस्मि वामद्य पुरुषोत्तम दीनाननाथान्कौन्तेय परिरक्षसि नित्यशः साऽहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता ॥ ३१ ॥ याचे त्वां चाभिकामाहं तस्मात्कुरु मम प्रियम् । स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पन्नगेश्वरकन्यया कृतवांस्तत्तथा सर्व धर्ममुद्दिश्य कारणम् ब्रह्मचर्य का पालन करेगा ॥२४॥२५॥ | और मानती हू । अतएव तुम मुझे ग्रहण करो, दौपदी के रिय ही तुमको वन में आर ब्रह्मचर्य साधुआ का यही मत है। हे प्रभो ! यदि तुम मेरा का पालन करना पड़ा है। तुमने वहा धर्म का कहा न करोगे तो मैं अपने प्राण दे दगी। हे आचरण रिया है । यहा मेग कहा करने से पूछ । पुस्पोत्तम महाभुज ! आज मैंने तुम्हारी शरण री है भी धर्म की हानि न होगी। हे मुन्दर नेत्रवार पुस्प! मुझको प्रण देकर परम धर्म उपार्जन करो। हे दुखी रोगों की रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है । कुन्ती-पुत्र ! में अनाथ और दीन होकर बार-बार मेरी रक्षा करने से तुम्हारा धर्म नष्ट न होगा और रेती हुई तुम्हारी शरण लेनी ह और कागवश यदि ऐमा करने से धर्म में कुछ व्यतिक्रम भी हो होर तुम्हारे मिलने की प्रार्थना कर रही हैं। तुम तो कोई चिन्ता नही। उसे मी धर्म ही मानना भी दीनों और अनायों की सदा रक्षा करते हो हम होगा, क्योंकि, मेरी प्रार्थना म्वीकार करके मुझे तुम रिये तुमको मेरा प्रिय करना चाहिये । इमलिये तुम पाण दारोगे । हे अर्जा! मैं तुम्हें बहुत चाहनी आत्मसमर्पण करके मेरी इच्छा पूरी करो ॥२६॥३२॥ - "urin JAryko ro ९९० म हा भारत [ आदिपर्व ०007ocoo7000000000010.10ooo Ho200carce स नाग भवने रात्रि तामुपित्वा प्रतापवान् उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ॥ ३४ ॥ आगतस्तु पुनस्तत्र गंगाद्वारं तया सह परित्यज्य गता साध्वी उलूपी निजमन्दिरम् ॥ ३५ ॥ द्वा वरमजेयत्वं जले सर्वत्र भारत साध्या जलचराः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि उलूपीसंगे पोड गधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२१६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ! नागराज को लौट आये | पतिव्रता उलूपी भी उन्हें वहीं पुत्री के प्रतापी अर्जुन से ऐसी बात कहने पर छोड़कर अपने घर चली गई । जाते समय उसने अर्जुन ने धर्म के उपदेश से उसका मनमाना | अर्जुन को वर दिया कि तुम जलचर-मात्र के लिये सम्पूर्ण कार्य पूरा किया । कौरव्य नाग के यहां | अजेय होगे और वे सब तुम्हारे अधीन रहेंगे। उस रात भर रह कर अर्जुन प्रातःकाल फिर गंगाद्वार ॥३३॥३६॥ आदिपर्व का दो सौ सोलह अध्याय समास हुआ। ouTOScokohororocorarotococonoxi - अथ सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२१७ ।। वेशम्पायन उवाच-कथयित्वा च तत्सर्व ब्राह्मणेभ्यः स भारत । प्रययौ हिमवत्पावं ततो बज्रधरात्मजः अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम्' । भृगुतुंगे च कौन्तेयः कृतवाशौचमात्मनः प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत्कुरुसत्तमः हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः । दृष्टवान्पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च दो सौ सत्रह अध्याय ॥ २१७ ॥ वैशम्पायन ने कहा-इन्द्रपुत्र अर्जुन ने आश्रम स्नान आदि करके शुद्ध हुए। वहां उन्होंने ब्राह्मणों में पहुंचकर ब्राह्मणों से सब वृत्तान्त कहा-वहां से को सहस्रों गऊ और स्थान पुण्य किये ॥१३॥ ये हिमाचल पर्वत की ओर चले । अगस्त्यवट, इसके पश्चात् पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हिरण्यबिन्दु वशिष्ठ पर्वत और भृगुतुङ्ग पर्वत पर पहुचकर अर्जुन | तीर्थ में गये । वहा स्नान किया और अनेक पुण्य- Knoroorcopcorocokochooroscococoo7c7c ९९१ महाभारत अध्याय २१७ ] poood COc04 rcorrore अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत प्राची दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥ आनुपूर्येण तीर्थानि दृष्टवान्कुरुसत्तमः नदी चोत्पलिनी रम्यामरण्यं नैमिपं प्रति नन्दामपरनन्दां च कौशिकी च यशस्विनीम् । महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥ ७ ॥ एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाऽऽश्रमान् । आत्मनः पावनं कुर्वन्ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥ ८॥ अङ्गवद्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् । जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ ९ ॥ दृष्ट्वा च विधिवत्तानि धनं चापि ददौ ततः । कलिङ्गगमद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । सहायरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च वनानि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥ १२ ॥ स्थानों के दर्शन किये । वहा से ब्राह्मणों के साथ | दर्शन कर उन स्थानों में ब्राह्मणों को धन दान चरकर वे पूर्व दिशा को देमने के रिये रवाना किया । हे भरतनन्दन | जो सब प्रामण अर्जुन के दुए ॥४॥५॥ साथ जा रहे थे ये रिंग राज्य के द्वार अर्थात् हे भारत ! ये कम से तीयों को देसने रंग, यहा की पर्वत-मन्धि तक जाकर उनकी भाशा से नैमिपारण्य से बहती हुई सुन्दर उत्सलिनी नदी, रौट गये । कुन्तीपुत्र वीर धनजय बामणों की गया और यशस्विनी महानदी गगा, कौशिकी, नन्दा आज्ञा से थोई मनुष्यों को साथ लेर समुद्र की और अमरनन्दा और अन्यान्य तीर्थ तथा आश्रमों और चले ॥९॥१०॥ के दर्शन करने हुए आत्मा को पवित्र कर प्रामणों मा भनेक देश और रमणीय भवनों को को अनेक धन दान किये ॥६॥८॥ देसतेन्दसन ये करिंग देशको राप गये। फिर मग, बंग, कलिंग देगा में जितने तीर्थ और उन्होंने अनेक तापमों की निवाम मूगि महेन्द्र पर्वत पवित्र स्थान, उन्होंने उन स्थानों में जा उनका के दर्शन किये । हमीतरह पर मद के cScrioHD ।
९९२ म हा भारत [ आदिपर्व oroscood pco05Ayhorsror oroxdhokorarorcarrorairarovaruraricorn महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । अभिगम्य महावाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् मणिपूरेश्वरं राजन्धर्मज्ञं चित्रवाहनम् तस्य चित्रागदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥ १५ ॥ तां ददर्श पुरे तस्मिन्विचरन्ती यदृच्छया । दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम् ॥ १६ ॥ अभिगम्य च राजानमवदत्स्त्र प्रयोजनम् । देहि मे खल्विमा राजन्क्षत्रियाय महात्मने ॥ १७ ॥ तच्छुत्वा त्वब्रवीद्राजाकस्य पुत्रोऽसि नाम किम् । उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः तमुवाचाऽथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः राजा प्रभजनो नाम कुलेऽस्मिन्संबभूव ह ॥ १९ ॥ अपुत्रः प्रसनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ईश्वरस्तोपितः पार्थ महादेव उमापतिः स तस्मै भगवान्प्रादादेकैकं प्रसवं कुले किनार व मणिपुर में पहुचे। वहा जितन तीर्थ और मै महात्मा क्षत्रिय का पुत्र हू | आप मुझे यह पवित्र स्थान थे उन्हें देखकर वे अन्त को राजा के कन्या दे दीजिए ॥१६॥१७॥ पास गये । उस राजा का नाम चित्रहन था। वे अर्जुन के वचन सुनकर राजा ने पूछा-तुम बड़े ही धर्मात्मा थे ॥११॥१५॥ किसके पुत्र हो, तुम्हारा नाम क्या है ? अर्जुन ने चित्राङ्गदा नाम की उनके एक सर्वाङ्ग सुन्दरी कहा-मै कुन्ती का पुत्र पाण्डर इ, मेग नाम अर्जुन कन्या थी । वह कन्या एक दिन अपनी इच्छा से | है । राजा ने कहा-हे पुरुषश्रेष्ठ ! पहले हमारे वश नगर में विचर रही थी । उसी समय अर्जुन ने उसे | में प्रयञ्जन नाम के एक राजा थे । उनके कोई पुत्र देखा । वे उस कन्या को देखकर काम के वश में नहीं हुआ। तब उन्होंने पुत्र की इच्छा से अत्यन्त हो गये और अपनी अभिलाषा पूरी करने के लिये उग्र तपस्या करके देव-देव शङ्कर को प्रसन्न क्यिा राजा चित्रवाहन के पास पहुचकर बोले-हे महाराज! ॥१८॥२०॥ । 7cyoicror, Mopoorrys.50:
९९३ म हा भारत अध्याय २१८ ] 000000000 122 एकैकः प्रसवस्तस्माद्भवत्यस्मिन्कुले सदा तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥ २२ ॥ एका तु मम कन्येयं कुलस्योत्पादनी भृशम् ।। पुत्रो ममाऽयमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥ २३ ॥ पुत्रिकाहेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥ २४ ॥ एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव • ॥ २५॥ स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च उवास नगरे तस्मिंस्तिस्त्रः कुन्तीसुतः समाः ॥ २६ ॥ तस्यां सुते समुत्पन्ने परिष्वज्य वराङ्गानाम् । आमन्न्य नृपति तं तु जगाम परिवर्तितुम् ॥ २७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनयनवासपर्वणि चित्रांगदासंग्रमे सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२१७।। हे अर्जुन ! भगवान् शङ्कर ने इसप्रकार प्रसन्न उत्पन्न होगा उसे मैं ले लगा। यह मेरा वंशधर होकर उन्हें वर दिया कि तुम्हारे वंश में सब के होगा। मेरी कन्या का यही शुल्क है। यदि तुमको एक-एक पुत्र हुआ करेगा । तब से हमारे वंश में यह रुंचे तो इसे ग्रहण करो । अर्जुन ने राजा का हरएक के एक-एक पुत्र होता आता है। मेरे कहना मान लिया। चित्राङ्गदा के साथ उनका पूर्वजों में हरएक के पुत्र उत्पन्न हुआ परन्तु मेरे विवाह हो गया । तीन वर्ष तक अर्जुन वहां रहे। यह एकमात्र कन्या हुई है । मै इसे पुत्र ही समझता अन्त को चित्रानदा के गर्भ से पुत्र उत्पन्न होने पर हूं ॥२१॥२३॥ उससे मिलकर और राजा से अनुमति लेकर अर्जुन इसीलिये मैंने इसे 'पुत्रिका' बनाया है । हे । फिर तीर्थ यात्रा के लिये चल दिये ॥२४॥२७॥ भरत-श्रेष्ठ ! तुम्हारे वीर्य से इसके पहले जो पुत्र आदिपर्व का दो सौ सत्रह अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ १८ ॥ वंशम्पायन उवान-ततः समुद्रे तीर्थानि दक्षिणे भरतर्षभः अभ्यगच्छत्सुपुण्यानि शोभनानि तपस्विभिः ॥ १ ॥ सौ अठारह अन्याय ॥२१८ ॥ वैशम्पायन ने कहा-अनन्तर भरतवंश-श्रेष्ठ अर्जुन दक्षिण समुद्र के किनारे के पवित्र तायों में । - Hocom.07070070%ovem050:
९९४ महा भारत [ आदिपर्व oro Too.cooccoooooo Vocola-Kocococre - वर्जयन्ति स्म तीर्थानि पञ्च तत्र तु तापसाः । अवकीर्णानि यान्यासन्पुरस्तात्तु तपस्विाभः ॥ २ ॥ अगस्त्यतीर्थ सौभद्रं पौलोमं च सुपावनम् । कारन्धमं प्रसन्नं च हयमेधफलं च तत् भारद्वाजस्य तीर्थं तु पापप्रशमनं महत् एतानि पञ्च तीर्थानि ददर्श कुरुसत्तमः विविक्तान्युपलक्ष्याऽथ तानि तीर्थानि पाण्डवः । दृष्ट्वा च वय॑मानानि मुनिभिर्धर्मबुद्धिभिः ॥ ५ ॥ तपस्विनस्ततोऽपृच्छत्प्राञ्जलिः कुरुनन्दनः तीर्थानीमानि वय॑न्ते किमर्थं ब्रह्मवादिभिः ॥ ६ ॥ तापसा ऊचुः-ग्राहाः पञ्च वसन्त्येषु हरन्ति च तपोधनान् । तत एतानि वय॑न्ते तीर्थानि कुरुनन्दन वैशम्पायन आच-तेषां श्रुत्वा महावाहुर्वार्यमाणस्तपोधनैः जगाम तानि तीर्थानि द्रष्टुं पुरुषसत्तमः ततः सौभद्रमासाद्य महर्षेस्तीर्थमुत्तमम् विगाह्य सहसा शूरः स्नानं चक्रे परंतपः ॥ ९ ॥ अथ तं पुरुषव्याघ्रमन्तर्जलचरो महान् जग्राह चरणे ग्राहः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् ॥ १० ॥ गये । उन तीर्थों में तपस्वी लोग रहते थे। वहां आप ब्रह्मज्ञानी मुनि लोग इन पांच तीथों में पर पांच तीर्थ थे । इन पाच तीर्थों के आमपास नहाते-धे ते क्यों नहीं ॥१६॥ अनेक तपस्वियों के आश्रम थे परन्तु कोई भी तपस्वी तपस्वियों ने कहा-हे कुरुनन्दन ! इन पांच तीर्थों उन तीर्थों में नहाता न था । उन तीथों के नाम में पांच ग्राह रहते है । जो कोई मनुष्य उनमें स्नान अगस्त्य तीर्थ, सौभद्र तीर्थ, पौलोम तीर्थ, अश्वमेध का करने जाता है वे उसको खींच कर ले जाते है। इससे फल देनेवाला स्वच्छ करान्धम तीर्थ और पापनाशक उन तीर्थों पर जाना मना है । वैशम्पायन कहते भारद्वाज तीर्थ थे । पाण्डव अर्जुन ने ये तीर्थ तो है-हे जनमेजय ! महाबाहु, पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन तपस्वियों देखे परन्तु धर्म-बुद्धि मुनियों को इन तीर्थों में नहाते । के ये बचन सुनकर भी उन तीथों को देखने के न देख नम्रभाव से हाथ जोड़कर पूछा-हे तपस्वियो! ! लिये चले । तपस्वियों ने बहुन रोका, परन्तु वे - cocotoox proooooooozchoooooooom.
वलिनां वरः -- अध्याय २१८ म हा मारत ९९५ Dorcoa onored स तमादाय कौन्तेयो विस्फुरन्तं जलेचरम् । उदतिष्ठन्महावाहुर्बलेन उत्कृष्ट एव ग्राहस्तु सोऽर्जुनेन यशस्विना वभूव नारी कल्याणी सर्वाभरणभूषिता ॥ १२ ॥ दीप्यमाना श्रिया राजन्दिव्यरूपा मनोरमा । तदद्भुतं महद् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः तां स्त्रियं परमप्रीत इदं वचनमब्रवीत् का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी ॥ १४ ॥ किमर्थं च महत्पापमिदं कृतवती पुरा वर्गोवाच -अप्सराऽस्मि महावाहो देवारण्यविहारिणी ॥१५॥ इष्टा धनपतनित्यं वर्गा नाम महावल मम सख्यश्चतस्रोऽन्याः सर्वाः कामगमाः शुभाः ॥ १६ ॥ ताभिः सार्धं प्रयाताऽस्मि लोकपालनिवेशनम् । ततः पश्यामहे सर्वा ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १७॥ रूपवन्तमधीयानमेकमेकान्तचारिणम् तस्यैव तपसा राजस्तद्वनं तेजसा वृतम् किसी तरह नहीं रुके ॥७॥८॥ अत्यन्त सन्तुष्ट अर्जुन ने उससे पूछा-हे सुन्दरी ! वे पहले सुभद्र महर्षि के श्रेष्ठ तीर्थ में पहुंचे । तुम कौन हो तुम्हें यह जलचर योनि कैसे मिली ? वहां जल में उतरकर उन्होंने नहा लिया । इसी तुमने पूर्व जन्म में कौन ऐसा घोर पाप किया चीच में जल के भीतर से एक भयानक मगर ने था॥१२॥१४॥ उनका पैर पकड़ लिया । महाबली, महाबाहु अर्जुन वर्गा ने कहा-हे महावली, महाभाग ! मैं देव-वन उस मगर को जीवित अवस्था में ही घसीटकर में विहार करनेवाली अप्सरा हूँ । मेरा नाम वर्गा जार निकाल लाये ॥९॥२१॥ है । कुबेर जी मुझे बहुत चाहते हैं । मेरी चार हे महाराज ! ज्योंही अर्जुन उस मगर को सखिया और हैं । ये सब चाहे जहां जा सकनेवाली किनारे पर लाये त्याही वह मगर का शरीर छोड़कर हैं । उन चारों ससियों के साथ में एक दिन कुबेर सब गहने पहन सुन्दर लक्षणोंवाली एक स्त्री हो जी के दर्शन करने जा रही थी। मैंने राह में देम्वा गया । वह द्विजरुपिणी मनोरमा स्त्री अपनी कान्ति कि एक वन में एक ब्रह्मचारी सन्तुष्ट ब्राह्मण एकान्त से जगमगा रही थी। इस भारी आश्चर्य को देखकर में बैठे वेद पढ़ रहे हैं ॥१५॥१७॥ chrrr- महाभारत [ आदिपर्व Kocococon oooooz.co० JCoooz आदित्य इव तं देशं कृत्स्नं सर्व व्यकाशयत् । तस्य दृष्ट्वा तपस्तादृग्रूपं चाऽद्भुतमुत्तमम् ॥ १९ ॥ अवतीर्णाः स्म तं देशं तपोविघ्नचिकीर्पया अहं च सौरभेयी च समीची बुवुदा लता ॥ २० ॥ योगपद्येन तं विप्रमभ्यगच्छाम भारत गायन्त्योऽथ हसन्त्यश्च लोभयित्वा च तं द्विजम् ॥ २१ ॥ स च नाऽस्मासु कृतवान्मनो वीर कथंचन नाऽकम्पत महातेजाः स्थितस्तपसि निर्मले ॥ २२ ॥ सोऽशपत्कुपितोऽस्मासु ब्राह्मणः क्षत्रियर्षभ । ग्राहभूता जले यूयं चरिष्यथ शतं समाः ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि तीर्थप्राविमोचने अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः२१८ हे नरश्रेष्ठ | उन तपस्वी का तेज सूर्य के समान के पास गई । हे वीर | हम यब गाकर और हँस- सारे वन को प्रकाशित किये हुए था। उनकी वैसी कर उन्हें लुभाने की चेष्टा करने लगी परन्तु उन उग्र तपस्या और अनुपम रूप को देख कर हम सब मुनि का मन हमें देख कर तनिक भी नहीं डिगा । उनके तप में विघ्न डालने के लिये आकाश-मार्ग | घोर तपस्या में स्थित वे महात्मा कामयश न होकर से नीचे उतरीं ॥१८॥१९॥ कुपित हो उठे। उन्होंने हमें शाप दिया कि तुम तश्रेष्ठ ! मै, सौरभेयी, समीचि, बुख़ुदा | मगर होकर जल के भीतर सौ वर्ष तक रहोगी और लता ये पांचों सखियां एक साथ उन मुनिवर ॥२०॥२२॥ आदिपर्व का दो सौ अठारह अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ ऊनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥ वर्गोवाच-ततो वयं प्रव्यथिताः सर्वा भारतसत्तम अयाम शरणं विप्रं तं तपोधनमच्युतम् रूपेण वयसा चैव कन्दर्पण च दर्पिताः । अयुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज ॥ २ ॥ दो सौ उन्नीस अध्याय ॥ २१९ ॥ वर्मा ने कहा-हे भरतश्रेष्ठ ! अनन्तर हमने | की शरण लेकर कहा-हे तपोधन ! हमने रूप, दुःखित होकर उन स्थिर चित्तवाले तपोधन ब्राह्मण | यौवन और काम के अहङ्कार से यह अनुचित poocococcool 2000 -5000
९९७
म हा भारत
अध्याय २१९ ]
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एप एव वधोऽस्माकं सुपर्याप्तस्तपोधन
यद्वयं संशितात्मानं प्रलोव्धुं त्वामिहाऽऽगताः ॥ ३ ॥
अवध्यास्तु स्त्रियः सृष्टा मन्यन्ते धर्मचारिणः ।
तस्माद्धर्मेण वर्ध त्वं नाऽस्मान्हिसितुमर्हसि ॥ ४ ॥
सर्वभूतेषु धर्मज्ञ मैत्रो ब्राह्मण उच्यते
सत्यो भवतु कल्याण एप वादो मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनम् ।
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मतस्मात्त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तः स धर्मात्मा ब्राह्मणः शुभकर्मकृत् ।
प्रसादं कृतवान्वीर रविसोमसमप्रभः
प्राह्मण नवाच--शतं शतसहस्रं तु सर्वमक्षय्यवाचकम्
परिमाणं शतं वेतन्नेदमक्षय्यवाचकम्
यदा च वो ग्राहभूता ग्रहन्तीः पुरुषाञ्जले ।
उत्कर्पति जलात्तस्मात्स्थलं पुरुषसत्तमः
तदा यूयं पुनः सर्वाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ
अनृतं नोक्तपूर्व मे हसताऽपि कदाचन ॥ १०॥
कार्य किया है । हे द्विज ! इसलिये हमें क्षमा करो। ब्राह्मण अप्सराओं की यह बात सुनकर प्रसन्न हुए
आप जैसे जितेन्द्रिय महात्मा को लुभाने के लिये और बोले- 'शत' और 'सहस' सदा अनन्त
यहां आना ही हमारे लिये काफी दाउवध हो चुका । संख्या के वाचक हैं परन्तु मैंने जो यहां 'शत'
धर्म शास्त्र के जाननेवालों ने कहा है कि स्त्री का (सौ) शब्द का प्रयोग किया है उससे ठीक सौ
वध न करना चाहिये ॥१४॥
वर्ष तक तुम्हें शाप भोगना पड़ेगा; असंग्य वाँ
हे धर्मज्ञ ! सुना है कि ब्राह्मण सभी जीवों के तक नहीं ॥७॥८॥
मित्र होते हैं । इस समय यही कहावत सत्य हो । तुम मगर की योनि पाकर उन मनुष्यों को
शरणागत की रक्षा सज्जन करते ही हैं। हम पाद रोगी जो म्नान आदि करने के रिये पानी
आपकी शरण में आई हैं. इसलिये क्षमा कीजिए में उतरंग । जब कोई पुम्पश्रेष्ठ तुमको जल से बाहर
स्थल में निकाल रेगा तब तुम्हें फिर अपना पहला
वैशम्पायन ने कहा-हे वीर! अनन्त सूर्य चन्द्रमा रूप मिल जायगा। मैने इसी में भी कभी मूठ नहीं
को उजरा रखनेवाले, शुभ कर्म क्थेि धर्मात्मा वह कहा । मेरा कदा सत्य ही होगा ॥२॥१०॥
-
॥५॥६॥
९९८ महाभारत [ आदिपर्व oromcolooconomonococcozooomor ooooooooo । - तानि सर्वाणि तीर्थानि ततः प्रभृति चैव ह नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्याति यास्यन्ति सर्वशः । पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीपिणाम् ॥ ११ ॥ वर्गोवाच-ततोऽभिवाद्य तं विप्रं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । अचिन्तयामोऽपमृत्य तस्माद्देशात्सुदुःखिताः ॥ १२ ॥ क्क नु नाम वयं सर्वाः कालेनाऽल्पेन तं नरम् । समागच्छेम यो नस्तद्रूपमापादयेत्पुनः ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत दृष्टवत्यो महाभागं देवर्पिमुत नारदम् ॥ १४ ॥ संप्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्पिममितद्युतिम् अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म वीडिताननाः ॥१५॥ स नोऽपृच्छदुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम् । श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत् दक्षिणे सागरानूपे पञ्चतीर्थानि सन्ति वै पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरम् ॥ १७ ॥ तत्राऽऽशु पुरुपव्याघ्रः पाण्डवेयो धनञ्जयः मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः ॥ १८ ॥ तुम्हारे छुटकारा पाने पर तब से वे सब तीर्थ, आनन्द हुआ । हे अर्जुन । उन्हें नमस्कार करके नारी तीर्थ नाम से प्रख्यात होका साधुओं के तारने लज्जा से सिर झुकाये हुए हम उनके सामने खड़ी वाले और पुण्यदायी बनेगे । वर्मा ने कहा--अब हो गई ॥११॥१५|| हमने प्रणाम करके उन ब्राह्मण देवता की प्रदक्षिणा उन्होंने हमारे दु ख का कारण पूछा । हमने भी की । फिर अत्यन्त दुख के साथ उस स्थान से सब हाल कह सुनाया। सब वृत्तान्त सुनकर उन्होंने हटकर हम पाचों सोचने लगी कि कब, कहा, हम कहा-दक्षिण समुद्र के किनारे पवित्र और रमणीय थोड़े ही दिनों में उस मनुष्य के दर्शन पावंगी, पाच तीर्थ है। उस स्थान को पञ्चतीर्थ कहते हैं । जिसके समागम से हमें फिर अपना पहला रूप प्राप्त तुम शीघ्रता से वहीं जाओ ॥१६॥१७॥ होगा । हे भरतश्रेष्ठ | दमभर हम इसी चिन्ता में उस स्थान में शुद्धात्मा पुस्पश्रेष्ठ पाण्डुपुत्र अर्जुन डूबी रहीं । इसी समय हमें देवर्षि नारद देख पड़े। तुमको इस दु ख से नि सन्देह बचावेंगे । हे वीर! परमतेजस्वी उन महर्षि को देखकर हमको बड़ा । महर्षि नारद के ये वचन सुनकर हम सब यहा 0pcakanpranior ९९९ महा मारत अध्याय २१९ ] mo04 1010 prooooooo promosomcore तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमितो गताः । तदिदं सत्यमेवाऽद्य मोक्षिताऽहं त्वयाऽनघ ॥ १९ ॥ एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः। कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-ततस्ताः पाण्डवश्रेष्ठः सर्वा एव विशाम्पते तस्माच्छापाददीनात्मा मोक्षयामास वीर्यवान् ॥ २१ ॥ उत्थाय च जलात्तस्मात्प्रतिलभ्य वपुः स्वकम् । तास्तदाऽप्सरसो राजन्नदृश्यन्त यथा पुरा ॥ २२ ॥ तीर्थानि शोधयित्वा तु तथाऽनुज्ञाय ताः प्रभुः । चित्राङ्गदां पुनर्द्रष्टुं मणिपूरं पुनर्ययो ॥ २३ ॥ तस्यामजनयत्पुत्रं राजानं वभ्रुवाहनम् तं दृष्ट्वा पाण्डवो राजश्चित्रवाहनमब्रवीत् ॥ २४ ॥ चित्राङ्गदायाः शुल्कं त्वं गृहाण वभ्रुवाहनम् । अनेन च भविष्यामि ऋणान्मुक्तो नराधिप ॥ २५ ॥ चित्राङ्गन्दा पुनर्वाक्यमब्रवीत्पाण्डुनन्दनः इहैव भव भद्रं ते वर्धेथा बभ्रुवाहनम् इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्राऽऽगत्य रंस्यसि । कुन्तीं युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ ॥ २७ ॥ आई थीं। हे निष्पाप ! आज नारद का कहना इसप्रकार अर्जुन उन पश्चतीयों को सुधारकर सच हुआ। आपने मेरा उद्धार किया।हे अर्जुन ! उन अप्सराओं को विदाकर चित्राङ्गदा को देखने मेरी वे चारों सखियां अभी उसी रूप में जल के के लिये फिर मणिपुर को गये । अर्जुन ने चित्रामदा भीतर हैं। आप उनका भी उद्धार कीजिये ॥१८॥२०॥ के गर्भ से बनवाहन नामक पुत्र उत्पन्न किया। वैशम्पायन कहते है-हे जनमेजय ! पराक्रमी, वही पुत्र मणिपुर का राजा हुआ । उन्होंने राजा पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन ने अन्त को उन चारों अप्सराओं चित्रवाहन से कहा कि आप इस बालक को ले का भी उद्धार किया । हे महाराज ! अप्सराएँ लीजिए जिसमे मै ऋण से मुक्त हो जाऊँ ॥२३॥२५॥ जल से निकलकर अपने-अपने शरीर को पाकर फिर उन्होंने चित्रागदा से कहा कि तुम यहीं फिर पहले की ही ऐसी सुन्दरी हो गई ।।२१।२२॥ रहकर पवाहन का पालन-पोपण करो । जब मैं ynxrororrorororystyr १००० म हा मारत [ आदिपर्व zcooooooooorcoo00ore.2000000000 1 आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च वान्धवान् । बान्धवैः सहिता सर्वैनन्दसे स्वमनिन्दिते धर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः । जित्वा तु पृथिवीं सर्वा राजसूयं करिष्यति ॥ २९ ॥ तत्राऽऽगच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः । वहुनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता ॥ ३०॥ एकसाथ प्रयाताऽसि चित्रवाहनसेवया द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः 11 ३१ ॥ वभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो महीचरः तस्माद्भरस्व पुत्रं वै पुरुपं वंशवर्धनम् ॥ ३२ ॥ चित्रवाहनदायादं धर्मात्पौरवनन्दनम् पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात्पालय सर्वदा ॥ ३३ ॥ विप्रयोगेन संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते । चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा गोकर्णमभितोऽगमत् ॥ ३४ ॥ आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम् यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम् ॥ ३५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि तीर्थयानाया ऊनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२१९॥ इन्द्रप्रस्थ में रहने लगू तव वहा आ जाना । वहा का वश बढायेगा इससे तुम इसका पालन करो माता कुन्ती और मेरे भाइयों तथा कुटुम्बियों को तुम बिछोह का दु ख न मानो । वहा से अर्जुन देखना और आराम से रहना ! मेरे बड़े भाई | गोकर्ण क्षेत्र को चले । वह शर का आदि स्थान सत्यवादी राजा युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करेंगे । उस | है । उसके दर्शन से ही मुक्ति मिलती है । पापी यज्ञ में सभी राजा आवेंगे। उस समय तुम्हारे पिता मनुष्य भी वहा जाने से अभयलोक को प्राप्त भी भेंट लेकर वहा आगे ! उन्हीं के साथ तुम आना। होता है ॥२६॥३५॥ बभ्रुवाहन हमको बहुत प्रिय है, यह तुम्हारे पिता आदिपर्व का दो सौ उन्नीस अध्याय समाप्त हुआ।। roserodeonococoomo.searorora med zcom १००२ महा मारत [ आदिपर्व orosordoor ००० - caroo पूर्वमेव तु कृष्णस्य वचनात्तं महीधरम् पुरुपा मण्डयाञ्चक्रुरुपजग्मुश्च भोजनम् प्रतिगृह्याऽर्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः सहैव वासुदेवेन दृष्टवान्नटनर्तकान् ॥ १० ॥ अभ्यनुज्ञाय तान्सर्वानर्चयित्वा च पाण्डवः सत्कृतं शयनं दिव्यमभ्यगच्छन्महामतिः ततस्तत्र महाबाहुः शयानः शयने शुभे । नदीनां पल्बलानां च पर्वतानां तथैव च । आपगानां वनानां च कथयामास सात्वते ॥ १२ ॥ एवं स कथयन्नेव निद्रया जनमेजय कौन्तेयोऽपि हस्तस्मिञ्शयने स्वर्गसंनिभे ॥ १३ ॥ मधुरेणैव गीतेन वीणाशब्देन चैव ह प्रबोध्यमानो बुबुधे स्तुतिभिर्मङ्गलैस्तथा स कृत्वाऽवश्यकार्याणि वाणेयेनाऽभिनन्दितः । रथेन काञ्चनाङ्गेन द्वारकामभिजग्मिवान् अलंकृता द्वारका तु बभूव जनमेजय कुन्तीपुत्रस्य पूजार्थमपि निष्कपटकेष्वपि की सामप्रिया वहा मौजूद कर दी । पाण्डु नन्दन नींद आने पर वे सुख से सो गये ॥११॥१३॥ अर्जुन ने कृष्ण के साथ वहा पहुच कर सब रत्री व्यतीत हा गई । प्रात काल मधुर गीत, अतिथि सत्कार स्वीकार किया । फिर भोजन करके वीणा और स्तुतिपाठ के शब्दा से अर्जुन की आँख उन्होंने कृष्ण के साथ नटों की कलाएँ और नाचने खुली । वे परङ्ग से उठ बैठे। वैसे ही यादव-तिलक वालियों का नाचना गाना देखा सुना ॥८॥१०॥ कृष्ण ने आकर उनसे पूछा-कहो, रात को अच्छी आगे महामति पाण्डव ने यथोचित सरकार और नींद आई थी न ? अर्जुन स्नान आदि आवश्यक सम्मान के साथ उन सबको विदा किया । सबको कामों से छुट्टी पाकर स्थपर चढकर द्वारका पुरी को विदा करके वे सुन्दर कोमल विछने पर सोने के | चले ॥१४:१५|| रिय गय । पलँगों पर दोनों मित्र लेटे। अर्जुन अपने हे राजा जनमेजय ! कुन्ती पुत्र अर्जुन के सम्मान देख हुए अनेक स्थान, नदी, पर्वत ओर वन आदि | के रिय द्वारका पुरी के बाग, घर और सड़कें आदि का वर्णन करने लगे। हे राजा जनमेजय ! फिर सब स्थान सजाये गये थे। द्वारका के रहनेवाले " orrecorcocococorosnacscircle 0-0010 १००३ म हा भारत अध्याय २२१ ] oooooooooooooo 2ooooo cokoc4 दिक्षन्तश्च कौन्तेयं द्वारकावासिनो जनाः । नरेन्द्रमार्गमाजग्मुस्तूर्णं शतसहस्रशः अवलोकेषु नारीणां सहस्राणि शतानि च भोजवृष्ण्यन्धकानां च समवायो महानभूत् ॥ १८ ॥ स तथा सस्कृतः सर्वे जवृष्ण्यन्धकात्मजैः । अभिवाद्याऽभिवाद्यांश्च सर्वेश्च प्रतिनन्दितः ॥ १९ ॥ कुमारैः सर्वशो वीरः सत्कारेणाऽभिचोदितः । समानवयसः सर्वानाश्लिष्य स पुनः पुनः ॥ २० ॥ कृष्णस्य भवने रम्ये रत्नभोज्यसमावृते उवास सह कृष्णेन बहुलास्तत्र शर्वरीः ।। २१ ॥ ज्ञात श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवामपर्वणि अर्जुनद्वारकागमने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय. २२० समानं च अर्जुनवनवामपर्व । सहस्रो मनुष्य अर्जुन को देखने के लिये घरों से किया, तथा बराबरवाले हमजोलियों को गले लगाकर बाहर निकलकर एकत्र हो गये । सहस्रा स्त्रियां प्रसन्न किया । वृष्णि, भोज और अन्धक-वंश के अपने महलों पर खड़ी थी १६॥१७॥ सब यादवों ने प्रसन्नता प्रगट करते हुए अर्जुन का भोज, वृष्णि और अन्धक-वंश के यादवों की स्वागत किया । फिर अनेक रत्न, धन और भोजन बड़ी भारी भीड़ थी । यादवों ने इसतरह बड़ी की सामग्री से परिपूर्ण वासुदेव के घर में जाकर धूमधाम से अर्जुन का स्वागत किया । अर्जुन ने अर्जुन ठहरे और दोनों मित्र एक ही जगह कई पूजनीय पुरुषों को प्रणाम और पूजा से प्रसन्न किया, रात्रियों तक रहे ॥१८॥२१॥ बालको को आशीर्वाद और अभिनन्दन से सन्तुष्ट आदिपर्व का दो सौ बीस अध्याय ममाप्त हुआ। ॥ अथ एकविंशत्याधिकद्विशततमाऽध्याय ॥२२१ ॥ अथ सुभद्राहरणपर्व वैशम्पायन उवाच-ततः कनिपयाहस्य तस्मिन्नेवतके गिरौ । वृष्ण्यन्धकानामभवदुत्सवो नृपसत्तम दो सौ इक्कीस अध्याय ॥ २२१ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! फिर यादवों ने कुछ दिनों तक एक उत्सव किया। वीर रैवतक पर्वत पर वृष्णि, मौज और अन्धक वश के यादवों ने उस पहाड़ी उत्सव में हजारों ब्राह्मणों को zcooc [ आदिपर्व Ho.oooooo Hoooooooo - Cococoroccocokcoconcoococcorcixoc .८ - महा भारत booroorcom तत्र दानं ददुर्वीर ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः भोजवृष्ण्यन्धकाश्चैव महेन्द्रस्य गिरेस्तदा ॥ २ ॥ प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्ततः स देशः शोभितो राजन्कल्पवृक्षश्च सर्वशः वादित्राणि च तत्राऽन्ये वादकाः समवादयन् । ननृतुनर्तकाश्चैव जगुर्गेयानि गायनाः अलंकृताः कुमाराश्च वृष्णीनां सुमहौजसाम् । यानेहर्हाटकचित्रैश्च चञ्चूर्यन्ते स्म सर्वशः पौराश्च पादचारेण यानरुच्चावचैस्तथा सदाराः सानुयात्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ततो हलधरः क्षीवो रेवतीसहितः प्रभुः अनुगम्यमानो गन्धर्वैरैचरत्तत्र भारत तथैव राजा वृष्णीनामुग्रसेनः प्रतापवान् अनुगीयमानो गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसहायवान् ॥ ८ ॥ रोक्मिणेयश्च साम्बश्च क्षीबो समरदुर्मदौ दिव्यमाल्याम्बरधरौ चिजहातेऽमराविव धन रन आदि दिये । हे राजन् ! उस पहाड़ के भारत ! वारुणी के मद मे मत्त रेवती सहित हलधर चारों ओर की जगह रत्नो से शोभित और बड़े-बड़े | बरभद्र भी वहा घूम रहे थे । गन्धर्व लोग गुण भवनों से अल्ड्कृत कर दी गई थी ! कल्पवृक्ष के गाने हुए उनके पीछे चले जा रहे थे। वृष्णिाशी समान उन भवनों से अन्न वस्त्र आदि अनेक पदार्थ यादवा के राजा प्रतापी उग्रसेन भी हजारों स्त्रियों इच्छा के अनुसार प्रार्थियों को मिलते थे । अनेकों | के साथ पहाड़ की सैर कर रहे थे । गन्धर्व और लोग बाजे बजाते थे, नाचनेवाले नाच और गानेवाले उदीजन पीछ पीछे उनके गुणों का बखान करते गाते थे । महातेजस्वी वृष्णिवशी यादवों के बालक जा रहे थे ॥१८॥ बहुत से गहने पहनकर, सुवर्णमण्डित श्रेष्ठ रथों युद्ध म कठोर महाबीर बलदेव नन्दन और पर चढकर, चारों ओर फिरने लगे। हजारों पुरवासी | कृष्ण के पुत्र साम्ब भी देवताओं के समान बदिया भी अपनी स्त्रियों, बाल बच्चा और परिवारों को साथ वस्त्र, माला और गहने आदि पहन कर इधर उधर लेकर वहा पहुंचे। कोई पैदल, कोई अच्छे और टहल रहे थे । इसीतरह अक्रूर, सारण, गद, बभ्रु, कोई मामूली रथों पर चढकर सैर कर रहा था। हे | घिदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु, विपृथु, सत्यक, on color ovoovcorror Homehore १००५ महाभारत अध्याय २२१ ] co000005 oooooor oooz - corrococs अक्रूरः सारणश्चैव गदो वभ्रुर्विदूरथः निशठश्चारुदेष्णश्च पृथुर्विपृथुरेव च सत्यकः सात्यकिश्चैव भडकारमहारवी हार्दिक्य उद्धवश्चैव ये चाऽन्ये नाऽनुकीर्तिताः ॥ ११ ॥ एते परिवृताः स्त्रीभिर्गन्धर्वैश्च पृथक्पृथक् तमुत्स रैवतके शोभयाञ्चक्रिरे तदा चित्रकौतूहले तस्मिन्वर्तमाने महाद्भुते वासुदेवश्च पार्थश्च सहिती सहितौ परिजग्मतुः ॥ १३ ॥ तत्र चक्रममाणौ तौ वसुदेवसुतां शुभाम् । अलंकृतां सखीमध्ये सुभद्रां ददृशुस्तदा ॥ १४ ॥ दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजायत तं तदैकाग्रमनसं कृष्णः पार्थमलक्षयत् अब्रवीत्पुरुषव्याघ्रः प्रहसन्निव भारत बने चरस्य किमिदं कामेनाऽऽलोड्यते मनः मर्मपा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरा सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता । यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम् ॥ १७ ॥ सात्यकि, भाकार, महारथी हार्दिक्य, उद्धव और अर्जुन उस कोमलाङ्गी वाला को देखते ही अन्य अनेक श्रेष्ठ यादव अलग-अलग अपनी स्त्रियों मदनवाण से मोहित हुए । हे भारत ! पुण्डरीकाक्ष को साथ लिये घूमकर उस उत्सव की शोभा को कृष्ण उसके मनको सुभद्रा पर बहुत चलते देखकर पहा रहे थे । अनेक गन्धर्व और बन्दीजन उनके हसकर बोले कि यह क्या ' कामदेव ने वनचारी पछि-पीछे उनके गुणों का और प्रताप का बखान मनुष्य को भी नहीं छोड़ा ॥१५॥१६॥ करते जा रहे थे ।।९।१२॥ हे अर्जुन ! यह सुन्दरी मेरी बहन है। मेरे अद्भुन ढङ्ग से चारों ओर मेला-तमाशा शुरू भाई सारण और यह एक माता की सन्तान है। होने पर वासुदेव और अर्जुन एक साथ वहा यह मेरे पिता की बहुत प्यारी न्या है । इसका उपस्थिन हुए। चारों ओर फिरते-फिरत अर्जुन ने नाम सुभद्रा है यदि इससे विवाह करने की इच्छा अनेक गहनों से सजी हुई वसुंदर की कन्या सुभद्रा हो तो कहो । मै म्वय पिता जी को एक जगह देखा ॥१३॥१४॥ कर सकता हू । अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण ! एक - । यह प्रस्ताव -Pra-..- rohorirpor-50 महा मारत [आदिपर्व Koco. - rokomcore । अर्जुन याय-दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा रूपेण चैपा संपन्ना कमिवैपा न मोहयेत् ॥ १८ ॥ कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद् ध्रुवम् । यदि स्यान्मम वार्ष्णेयी महिपीयं स्वसा तव ॥ १९ ॥ प्राप्तौ तु क उपायः स्यात्तं ब्रवीहि जनार्दन । आस्थास्यामि तदा सर्व यदि शक्यं नरेण तत् ॥ २० ॥ वासुदेव उवाच -स्वयंवरः क्षत्रियाणां विवाहः पुरुपर्षभ स च संशयितः पार्थ स्वभावस्याऽनिमित्ततः ॥ २१ ॥ प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रियाणां प्रशस्यते विवाहहेतुः शूराणामिति धर्मविदो विदुः ॥ २२ ॥ स स्वमर्जुन कल्याणी प्रसह्य भगिनी मम हर स्वयंवरे ह्यस्याः को वै वेद चिकीर्पितम् ॥ २३ ॥ ततोऽर्जुनश्च कृष्णश्च विनिश्चित्येतिकृत्यताम् शीघ्रगान्पुरुपानन्यान्प्रेषयामासतुस्तदा ॥ २४॥ धर्मराजाय तत्सर्वमिन्द्रप्रस्थगताय वै श्रुत्वैव च महावाहुरनुजज्ञे स पाण्डवः ।। २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपगि युधिष्ठिरानुज्ञाया एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२२१॥ तो यह वसुदेव की कन्या और तुम्हारी बहन है, कृष्ण ने कहा-हे पुरपश्रेष्ठ अर्जुन ! क्षत्रियों के दूसरे असाधारण सुन्दरी है। इसलिये किसका यहा कन्या का स्वयम्बर करने की चाल है किन्तु मन इसे देखकर विवाह करने के लिये न डोल इसतरह तुम्हारी इच्छा पूरी होने में सदेह है, उठेगा ॥१७॥१८॥ क्योंकि मनुष्यों की रचि जुदी-जुदी होती है । जो यह तुम्हारी बहन सुभद्रा मेरी पत्नी हो तो | यह निश्चय नहीं कि म्यम्वर में सुभद्रा तुम्ही को मुझे सारी पृथ्वी का साम्राज्य पाने की ऐसी खुशी पसन्द करेगी । क्षत्रियों में कन्या को बरपूर्वक होगी। मैं समझूगा, मुझे सब कल्याण प्राप्त हो | हरकर उससे विवाह करने की भी रीति है । धर्मज्ञ गये । हे जनार्दन । बताओ, मै किस उपाय से इस | लोगों का कहना है कि वीर पुरुषों के लिये ऐसा सुन्दरी-रत्न को प्राप्त कर सकता हू ? जो मनुष्य | ही विवाह प्रशसनीय है । इसलिये हे मित्र अर्जुन ! की शक्ति के बाहर न हो तो वह उपाय करने के तुम मेरी इस कल्याणरूपिणी बहन को स्वयम्वर से लिये मैं सब तरह तैयार हू ॥१९॥२०॥ बरपूर्वक हर ले जाओ। मेरी सम्मत्ति यही है । - orolo.dowowKoinheroine co १००७ महा भारत अध्याय २२२ ] Oce Homosco० इसमें कोई कुछ रुकावट नहीं डाल सकेगा; क्योंकि ! के पास यह समाचार देने के लिये भेजा । धर्मराज पहले से तुम्हारे हृदय के इस भाव को कोई क्या ने यह सूचना पाकर अर्जुन और श्रीकृष्ण के विचार जान सकेगा ? अर्जुन और श्रीकृष्ण ने इसतरह का अनुमोदन करते हुए अनुमति दे दी ॥२१॥२५॥ सलाह करके उसी समय शीघ्रगामी दूतों को धर्मराज आदिपर्व का दो सौ इक्कीस अध्याय समाप्त हुआ । --० अथ द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२॥ वैशम्पायन पाच-ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम् कृष्णस्य मतमादाय प्रययो भरतर्षभः रथेन काञ्चनांगेन कल्पितेन यथाविधि शैव्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ॥ ३ ॥ सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतरवनादिना ज्वलिताग्निप्रकाशेन द्विषतां हर्पघातिना संनद्धः कवची खड्गी बद्रगोधाशुलित्रवान् । मृगयाव्यपदेशेन प्रययौ पुरुषर्षभः सुभद्रा स्वथ शैलेन्द्रमभ्ययैव हि रैवतम् देवतानि च सर्वाणि ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ॥ ६ ॥ दो सौ वाईस अध्याय ॥ २२ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! युधिष्ठिा । शैव्य और सुग्रीव नाम के घोड़े जुते हुए थे । वह के सहमत होने का समाचार दूतों के द्वारा अर्जुन रथ घटों और जालों से सुशोभित हो रहा था। को मिल गया। उन्हें मालूम हुआ कि देवी-पूजन | उसमें अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे । के लिये सुभद्रा रैवतक पर्यन पर गई है । उसको । उसके पहियों की घरघराहट मेघ गर्जन के समान हरने के लिये वही ठीक समय जानकर अर्जुन ने । प्रचण्ड थी । वह रय अग्नि के तुल्य प्रकाशमान हो श्रीकृष्ण से अपना विचार प्रकट किया। उन्होंने । रहा था। उसे देखकर शत्रु लोग भय से विहल श्रीकृष्ण से सलाह करके कर्तव्य का निश्चय किया। हो उठने थे। उसी रथ पर बैठकर अर्जुन अहेर फिर वे श्रीकृष्ण की अनुमति से उन्हीं के रथ पर खेलने के बहाने रवाना हुए। पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन कवच सवार हुए। उस सुवर्णमण्डित श्रेष्ठ रथ में अलङ्कृत । पहने, गोह के चमड़े के अंगुलित्राण पहने, कमर । mooooozoimozoy Homeone.
महा भारत [ आदिपर екскускусококах: प्रदक्षिणं गिरेः कृत्वा प्रययौ द्वारको प्रति तामभिद्रुत्य कौन्तेयः प्रसह्याऽऽरोपयद्रथम् । सुभद्रां चारुसागी कामबाणप्रपीडितः ततः स पुरुषव्याघस्तामादाय शुचिस्मिताम् । रथेन काञ्चनांगेन प्रययो स्वपुरं प्रति ८॥ ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः । विक्रोशन्तोऽद्रवन्सर्वे द्वारकामभितः पुरीम् ॥ ९ ॥ ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् । सभापालस्य तत्सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम् ॥१०॥ तेषां श्रुत्वा मभापालो भेरी सांनाहिकी ततः । समाजघ्ने महाघोपां जाम्बूनदपरिष्कृताम् क्षुब्धास्तेनाऽथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकोस्तदा । अन्नपानमपास्याऽथ समापेतुः समन्ततः ॥ १२ ॥ तत्र जाम्बूनदाङ्गगनि स्पास्तरणवन्ति च माणिविद्रुमचित्राणि अलिनाग्निप्रभाणि च ॥ १३ ॥ भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ॥ १४ ॥ में तरकस और तलवार बाधे हुए थे ॥१॥५॥ रगे। सैनिक रोग सुभद्रा को अर्जुन से पकड़े उधर सुभद्रा ने पर्वतराज रैवतक पर जाकर जाते देख कर चिल्लाते हुए द्वारका नगरी की ओर देव पूजन और अन्य देव कार्य करने के उपरान्त । दौड़े। सब मिलकर सुधर्मा समा में गये । उन्होंने पर्वत की प्रदक्षिणा की। ब्राह्मणो ने शान्ति और । सभापाल से अर्जुन के पराक्रम और साहस का सब स्वस्ति के मन्त्र पढे । इसके पश्च त् सुभद्रा की हाल कहा । उमके वचन सुनकर सभापाल ने सोने सवारी द्वारका को चली । इसा बीच में अवसर से मढा हुआ, बड़े घोर शब्दवाला, युद्ध का डका पाकर कामदेव के चाणों से पीड़ित अर्जुन ने पाम । बजवा दिया । उस शब्द को सुनकर खाना-पीना जाकर बलपूर्वक सुभद्रा का हाथ पकड़ लिया और । वगैरह जरूरी काम भी छोड़कर भोज, अन्धक और उसको उठाकर अपने रथ पर बिठा लिया ॥६|| वृष्णिवश के सब यादव चारों ओर से वहा आने पुरुषव्याघ्र अर्जुन इसप्रकार से सुन्दरी सुभद्रा लगे ।।८।१२॥ को लेकर सुवर्ण-रथ पर अपने नगर की ओर जाने तेज अग्नि जिस प्रकार अपना आधार इन्धन Horoine 20/ oro 05oyoy महा भारत अध्याय २२२ ] 2colod cocood 9coomc. ॥ २० ॥ तेषां समुपविष्टानां देवानामिव संनये आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ॥ १५ ॥ तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहंकृताः योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च धनूंपि च महार्हाणि कवचानि वृहन्ति च ॥ १७ ॥ सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद्रथान्योजयतेति च स्वयं च तुरगान्केचिदायुञ्जन्हेमभूषितान् रथेष्वानीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत्तुमुलं महत् ॥ १९ ॥ वनमाली ततः क्षीवः कैलासशिखरोपमः नीलवासा मदोरिसक्त इदं वचनमब्रवीत् किमिदं कुरुथाऽप्रज्ञास्तूष्णीभूते जनार्दने । अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥ २१ ॥ एप तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः यदस्य रुचिरं कर्तुं तत्कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥ २२ ॥ पकड़ लेता है, वैसे ही महारथी पुरुषव्याघ्र वृष्णि उनमें से किसी किसी ने कहा कि तुरन्त रण अन्धक लोग परम सुन्दर चादरा से आच्छादित की तैयारी करो, किसी-किसी ने कहा कि प्रास मणियों से खचित अमि के उजाले समान चमकीले | लाओ, किसी-किसी ने कहा कि मूल्यवान् शासन सैंक्ड। सुनहले सिंहामनों पर जा बैठे ॥१३॥१४॥ और बड़े-बड़े कवच लाओ। किसी-किसी ने चिल्लाकर उनमे वह सभा देवमण्डली से शोभित इन्द्र की सारथी को पुकारकर कहा कि तुरन्त रथ जोतो । सभा जैसी मालूम हुई । सब लोग जब आसनों पर कोई-कोई अपने हाथ से ही सोने के गहनों से बैठ चुके तय सभापाल ने सुभद्रा के हरे जाने का अरड्कृत घोड़ों को रथों में जोतने लगे। तब रथ, ममाचार लेकर आये हुए सैनिकों को सामने करके कवच, ध्वजा आदि युद्ध की सामग्री लाने के लिये सब हाल कहा । सब वृत्तान्त सुनकर क्रोध के मारे वीरों का कोलाहल होने लगा। अनन्तर कैलास पर्वत यादवों की आँखें लाल हो आई । वे सब मानी थे, के समान गोरे और ऊँचे, मदिरा पिये हुए नीलाम्बर इस कारण अपने इस अपमान को न सह सके। और वनमाला धारण किये हुए बलदेव ने कहा- सब उठ खड़े हुए ॥१५॥१६॥ जनार्दन कृष्ण तो कुछ कहते ही नहीं ॥१७॥२०॥ roo507c5 coryron महा भारत [ आदिपर्व 7 YMay ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा ग्राह्यरूपं हलायुधात् । तूष्णीं भूतास्ततः सर्वे साधु साधिति चाऽत्रुवन् ॥ २३ ॥ समं वचो निशम्यैव बलदेवस्य धीमतः । पुनरेव सभामध्ये सर्वे ते समुपाविशन् ततोऽब्रवीद्वासुदेवं वचो रामः परंतपः किमवायुपविष्टोऽसि प्रेक्ष्यमाणो जनार्दन ॥ २५ ॥ सत्कृतस्त्वत्कृते पार्थः सर्वैरस्माभिरच्युत न च सोऽर्हनि तां पूजां दुर्बुद्धिः कुलपांसनः ॥ २६ ।। को हि तत्रैव भुक्त्वाऽन्नं भोजनं भेत्तुमर्हति । मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुपः क्वचित् ॥ २७ ॥ इच्छन्नेव हि सम्बन्धं कृतं पूर्व च मानयन् । को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ॥ २८ ॥ सोऽवमन्य तथाऽस्माकमनादृत्य च केशवम् । प्रमह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥ २९॥ कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम मर्पयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ॥३०॥ फिर तुम ऐसी नासमझी क्यों कर रहे हो ? हा कारण हम सब ने अजुन का इनना आदर सत्कार इनका अभिप्राय न जानकर ही तुम कंध के मार किया था, पर वह दुर्बुद्धि कुरागार वैसी पूजा गर्जन कर रहे हो । ये महामनि कृष्ण पहले अपनी और सरकार के योग्य नहीं है । जा सुपशी करके इच्छा प्रकट कर लें, उसके बाद हम इन्हीं क अपना परिचय देता है वह कभा अन्न खार अन्न विचार के अनुमार काम करेंगे । बलभद्र के ये के वर्तन को फाड़ नहीं सकता है । यद्यपि ऐसा उचित और मनोहर वचन सुनकर सब यादव शात वैवाहिक सम्बन्ध बनाने को मन चाहता है तो भी हो गये । साधु, साधु, कहर बरभद्र की बडाई कोई एश्वर्य चाहने वाला पहले का उकार स्मरण करने के पश्चात् वे लोग फिर सभा में जा बैठे । कर ऐसे साहस के काम में हाथ नहीं डालता है तव शत्रुमर्दन राम ने वासुदेव से कहा-हे जनार्दन ! ॥२६॥२८॥ तुम यह सब देख सुनकर भी चुपचाप क्यों बैठे अर्जुन ने आज पहले के सब हमारे किये हुए हो ॥२१॥२५॥ उपकारों को भुगर हम रोगों का अपमान और हे अच्युन ! अर्जुन तुम्हारा मित्र है। तुम्हारे तुम्हारा अनादर किया है। वह अपनी मौत के m 0crore अध्याय २२३ ] म हा भारत wroorninrarororororaroranrowonrrorconom: अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुन्धराम् । न हि मे मर्पणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥३१॥ तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् । अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मुभद्राहरणपर्वणि बलदेवक्रोधे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२ ।। सुभद्राहरणपर्व समाप्नं च । समान सुभद्रा को जबर्दस्ती राह से हर ले गया है। ही इस पृथ्वी को कौरवों से खाली कर दूंगा। मेघ हे गोविन्द ! उसने मेरे शिर पर लात मारी है। और डके के समान गम्भीर शब्द से कुपित बलदेव इस कारण मैं उसके इस काम को किसी तरह नहीं जब इसतरह गरजने लगे तब वृष्णि, भोज और सह सकता। सांप को यदि केई लात मारे तो अन्धक वंश के सब यादवों ने उसका अनुमोदन क्या कभी वह उसे सह सकता है ? मैं आज अकला किया ॥२९॥३२॥ आदिपर्व का दो सौ बाईस अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३ ॥ अथ हरणाहरणपर्व । वैशम्पायन वान-उक्तवन्तो यथावीर्यमसकृत्सर्ववृष्णयः ततोऽब्रवीद्वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुतम् नाऽवमानं कुलस्याऽस्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान् । ' समानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः अर्थलुब्धान्न वः पार्थो मन्यते सात्वतान्सदा । स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चाऽपि पाण्डवः प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत्कोऽनुमन्यते विक्रयं चाऽप्यपत्यस्य कः कुर्यात्पुरुषो भुवि ॥ ४ ॥ दो मी तेईम अध्याय ।। २२३॥ वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ! वृष्णिवश अर्जुन हम लोगों को धन का लोभी नहीं जानते। के सब यादयों ने अपने अपने पराक्रम का वर्णन उन्होंने स्वयम्बर की राह इससे नहीं देखी कि करके बलभद्र की बातों का ही समर्थन किया । उसमें सुभद्रा के मिलने में सन्देह था । हे भाई । सब के अन्त में कृष्णचन्द्र धर्म और अर्थ से युक्त गाय की तरह कन्यादान मांगना भी वीर क्षत्रियों वाक्य कहने रंगे-अर्जुन ने हमारे वंश का अपमान की शोभा नहीं देता है और न कन्या को मोल नहीं बल्कि अधिक मान ही किया है। पाण्डव लेना अच्छा है ॥१४॥ ororsra xcsevcxovex०, १०१२ म हा भारत [ आदिपर्व coroor oolc.mco 1 Foo.cacaxaacotoonconocococcorce ron एतान्दोपांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः । अतः प्रसह्य हृतवान्कन्यां धर्मेण पाण्डवः ॥ ५ ॥ उचितश्चैव संवन्धः सुभद्रा च यशस्विनीम् । एप चाऽपीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानिति ॥ ६ ॥ भरतस्याऽन्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः । कुन्तिभोजात्मजापुत्रं को बुभूपेत नाऽर्जुनम् ॥ ७ ॥ न च पश्यामि यः पार्थ विजयेत रणे बलात् । वर्जयित्ता विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम् अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष स च नाम रथस्ताङ् मदीयास्ते च वाजिनः ॥ ९ ॥ योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत् । तमभिद्रुत्य सान्वेन परमेण धनंजयम् न्यवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः ॥ १० ॥ यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद्गच्छेत्स्वकं पुरम् । प्रणश्येद्वो यश. सद्यो न तु सान्त्वे पराजय. तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा चक्रुर्जनाधिप निवृत्तश्चाऽर्जुनस्तत्र विवाहं कृतवान्प्रभुः ॥ १२ ॥ उषित्वा तत्र कौन्तेयः संवत्सरपराः क्षपाः विहृत्य च यथाकाम पूजितो वृष्णिनन्दनैः ॥ १३ ॥ इससे उन्होंने इन सब बातों में दोप समझकर पाम है, और वे स्वय युद्ध में बड़ी फुर्ती से लडने- धर्मपूर्वक सुभद्रा को हरा है । अर्जुन सुभद्रा के | वाले योद्धा हैं । उनकी बराबरी या सामना कौन योग्य ही है । क्योंकि वे भरत जी और शातनु के । कर सकता है ? इसलिये मेरा विचार यह है कि वश में उत्पन्न हुए है । भला ऐसा कौन होगा जो तुम तुरन्त दौड़कर प्रसन्नचित्त से धनञ्जय की अर्जुन के साथ अपना सम्बन्ध न करना चाहे । मुझे ढ ढम देकर लौटा लाओ ॥९॥१०॥ पूर्ण विश्वास है कि महादेव के सिवा और कोई अर्जुन यदि वे बरपूर्वक तुम सबा को परास्त करके को युद्ध में परास्त नहीं कर सकता ॥१८॥ अपनी राजधानी में चले जायेंगे तो आज ही तुम्हारा फिर हमारे घोड़े और रथ इस समय अर्जुन के | यश लोप हो जायगा, टाटस देने से तुम्हारी पराजम - । .. orce croeiodcoconor oroscz/ cycir १०१३ महाभारत 'अध्याय २२३ ] 000000roine । पुष्करे तु ततः शेषं कालं वर्तितवान्प्रभुः । पूर्णे तु द्वादशे वर्षे खाण्डवप्रस्थमागतः ॥ १४॥ अभिगम्य च राजानं नियमेन समाहितः । अभ्यर्च्य ब्राह्मणान्पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् ॥ १५ ॥ तं द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात्कुरुनन्दनम् तत्रैव गच्छ कौन्तेय यत्र सा सात्वतात्मजा ॥ १६ ॥ सुबद्धस्यापि भारस्य पूर्ववन्धः श्लथायते । तथा बहुविधं कृष्णां विलपन्ती धनंजयः ॥ १७ ॥ सान्त्वयामास भूयश्च क्षमयामास चाऽसकृत् । सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेयवासिनीम् पार्थः प्रस्थापयामास कृत्वा गोपालिकावपुः साऽधिकं तेन रूपेण शोभमाना यशस्विनी ॥ १९ ॥ भवनं श्रेष्ठमासाद्य वीरपत्नी वराङ्गना ववन्दे पृथुताम्राक्षी पृथां भद्रा यशस्विनी ॥ २० ॥ तां कुन्ती चारुसर्वाङ्गीमुपाजिघूत मूर्धनि । प्रीत्या परमया युक्ता आशीभिर्युञ्जताऽतुलम् ॥ २१ ॥ नहीं होगी। हे जनमेजय ! यादों ने वासुदेव की द्रौपदी अर्जुन को बहुत चाहती थी इसलिये यह बात सुनकर उसके अनुसार कार्य किया । उसने कुछ क्रोध प्रगट करके कहा-हे कुन्तीपुत्र ! यादवों की पूजा स्वीकार करके अर्जुन लौट आये । तुम यहा क्यों आये हो ? यादव-नन्दिनी सुभद्रा के वहीं सुभद्रा के साथ उनका विवाह कर दिया गया। पास जाओ । रम्सी से बधी वस्तु के ढेर पर एक इसके पश्चात् वे एक वर्ष तक बड़े सुख से द्वारका और भी कठिन बधन डालने से पहले का बघन पुरी में रहे ॥११॥१३॥ अवश्य ही ढीला हो जाता है । धनञ्जय द्रौपदी अन्त को उन्होंने पुष्कर क्षेत्र में जाकर शेष । को इसप्रकार विगप करते देखकर बार-बार समझाने समय बिताया । जब बारह वर्ष का समय व्यतीत ' लगे और बार-बार क्षमा मागी, उसका क्रोध शात हो गया तब वे फिर लौटकर खाण्डवप्रम्थ में आय ।। किया। इसके पश्च त् उन्होंने लाल रेशमी वस्त्र इसप्रकार अपने नगर में पहुनार अर्जुन ने नम्रता पहन रही सुभद्रा को ग्यालिन के वेश में अन्त पुर के साथ युधिष्ठिर को प्रणाम किया और ब्राह्मणों की में भेज दिया । अत्यन्त रूपवती, यगम्बिनी, पूजा की फिर ये द्रोपदी के पास गये ॥१४॥१५॥ कमलनयनी, वीरपत्नी उस मुभद्रा ने परम सुन्दर overnmoyozozoi" १०१४ महा भारत [ आदिपर्व coconodeoroor otoscook - Poscoccused ततोऽभिगम्य त्वरिता पूर्णेन्दुसदृशानना । ववन्दे द्रोपदी भद्रा प्रेप्याऽहमिति चाऽब्रवीत् ॥ २२ ॥ प्रत्युत्थाय तदा कृष्णा स्वसारं माधवस्य क । परिष्वज्याऽवदप्रीत्या निःसपनोऽस्तु ते पतिः ॥ २३ ।। तथैव मुदिता भद्रा तामुवाचैवमस्विति ततस्ते हृष्टमनसः पाण्डवेया महारथाः कुन्ती च परमप्रीता बभूव जनमेजय श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः संप्राप्तं खं पुरोत्तमम् ॥ २५ ॥ अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा आजगाम विशुद्धात्मा सह रामेण केशवः ॥ २६ ॥ वृष्पयन्धकमहामात्रैः : सह वीरैर्महारथैः भ्रातृभिश्च कुमारैश्च योधैश्च बहुभिर्वृतः सैन्येन महता शोरिरभिगुप्तः परंतपः तत्र दानपतिर्धीमानाजगाम महायशाः । अक्रूरो वृष्णिवीराणां सेनापतिमरिन्दमः अनाधृष्टिमहातेजा उद्धवश्च महायशाः ॥ २९ ॥ साक्षाद् बृहस्पतेः शिष्यो महाबुद्धिर्महामनाः । सत्यकः सात्यकिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः भवन में पहुंचकर पहले कल्याणी कुन्ती के निकट ! लिया और "तुम्हारे पति शत्रुशून्य हो" कहकर जाकर उनके पाव को प्रणाम क्यिा ॥१६॥२०॥ आशीर्वाद दिया। सुभद्रा ने भी प्रसन्न होकर नई वधु को देखकर कुन्ती बहुत प्रसन्न हुई।। कहा- ईश्वर करे, ऐमा ही हो। हे राजा जनमेजय ! बड़े स्नेह के साथ उन्होंने सर्वाङ्गसुन्दरी सुभद्रा का | अर्जुन के आ जाने से महारथी पाण्डवों को और सिर चूमकर आशीर्वाद दिये । अनन्तर पूर्ण चन्द्रमा कुन्ती को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥२३।२५|| के समान मुखवाली सुभद्रा ने वेग से द्रौपदी के पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन के खाण्डवप्रस्थ नगर में पास जाकर उसको प्रणाम किया और कहा कि पहुंचने की सूचना पाकर श्रीकृष्ण, बलभद्र के साथ, मै तुम्हारी दासी आई हू । ॥२१॥२२॥ खाण्डवप्रस्थ को गये । उनके साथ युद्धविद्या में कृष्णा ने उसीक्षण उठकर सुभद्रा को गले लगा | पंडित सब महारथी वीर वृष्णि-अन्धक-भौजवंश के - - cococoomcoleo 6.cockor0- raokok १०१५ - Zooxoosic. अध्याय २२३ ] महा भारत croroonr 200000 Ocroorcorcocotoo प्रद्युम्नश्चैव साम्वश्च निशठः शङ्कुरेव च चारुदेष्णश्च विक्रान्तो झिल्ली विपृथुरेव च । सारणश्च महावाहुर्गदश्च विदुषां वरः एते चाऽन्ये च बहवो वृष्णिभोजान्धकास्तथा । आजग्मुः खाण्डवप्रस्थमादाय हरणं बहु ॥ ३२ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा श्रुत्वा माधवमागतम् प्रतिग्रहार्थं कृष्णस्य यमौ प्रास्थापयत्तदा ॥ ३३ ॥ ताभ्यां प्रतिगृहीतं तु वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत् । विवेश खाण्डवप्रस्थं पताकाध्वजशोभितम् ।। ३४ ॥ संमृष्टसिक्तपंथानं पुष्पप्रकरशोभितम् चन्दनस्य रसैः शीतैः पुण्यगन्धैर्निषेवितम् ॥ ३५ ॥ दह्यताऽगुरुणा चैव देशे देशे सुगन्धिना हृष्टपुष्टजनाकीर्णं वणिम्भिरुपशोभितम् ॥ ३६ ॥ प्रतिपेदे महावाहुः सह रामेण केशवः वृष्ण्यन्धकैस्तथा भोजैः समेतः पुरुषोत्तमः ॥ ३७ ॥ संपूज्यमानः पोरैश्च ब्राह्मणैश्च सहस्रशः विवेश भवनं राज्ञः पुरन्दरगृहोपमम् ॥३८ यादव, उनके भाई और पुत्र तथा सब सेना भी लेने के लिये युधिष्ठिर ने नकुल और सहदेव को वहा गई ॥२६॥२८॥ भेजा 1 दोनों भ इयों ने जाकर कृष्ण और बलराम वृष्णिवशी यादवों के सेनापति शत्रुदमन अक्रूर, ! की अगवानी की। खाण्डवप्रस्थ पताका और ध्वजाओं महातेजस्वी अनाधृष्टि, साक्ष त् बृहस्पति के चेले ' से शोभित था, साफ सड़कें छिड़काव से ठण्डी थीं; बड़े यशोवत उद्धव, अति बुद्धिमान् महानुभव म्थान-स्थान पर फुगे की मालाएँ लटक रही थीं। सत्यक, सात्यकि, सात्वत, कृतवर्मा, प्रद्युम्न, साम्ब, शीतल चन्दन और जल रहे अगुरु की सुगन्धि निशठ, शकु, विक्रमी चारुदेष्ण, झिल्ली, विपृथु, महक रही थी, जहा-तहा हृष्ट-पुष्ट मनुष्य और धनी सारण और महाभुज गद और अनेक वीर तथा श्रेष्ठ सौदागर विद्यमान थे। ऐसे खाण्डवप्रस्थ में कृष्ण विद्वान् प्रधान यादव भी खाण्डवप्रस्थ में आये । ने अपने साथियों समेत प्रवेश किया। बलभद्र को आगे किये हुए श्रीकृष्ण वृष्णि, अन्धक और भोज- श्रीकृष्णचन्द्र के आने का समाचार पाकर उन्हें वश के यादवों के साथ राजभवन में पहुंचे। नगर ॥२९॥३२॥ cococrocoron avranocooorocanar5ornoz05 महा मारत [ आदिपर्व cocococo cono । . - पाण्डुसागरमाविद्धः प्रविवेश महानदः पूर्णमापूरयस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् प्रतिजग्राह तत्सर्व धर्मराजो युधिष्ठिरः पूजयामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ॥ ५७।। ते समेता. महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः । विजन्हुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ॥ ५८॥ तत्र तत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितैः यथायोगं यथाप्रीति विजन्हुः कुरुवृष्णयः एवमुत्तमवीर्यास्ते विहृत्य दिवसान्वहून् पूजिताः कुरुभिजग्मुः पुनरवतीं प्रति रामं पुरस्कृत्य ययुर्वृष्ण्यन्धकमहारथाः रत्लान्यादाय शुभ्राणि दत्तानि कुरुसत्तमः वासुदेवस्तु पार्थेन तत्रैव सह भारत उवास नगरे रम्ये शक्रप्रस्थे महात्मना व्यचरद्यमुनातीरे मृगयां स महायशाः मृगान्विध्यन्वराहांश्च रेमे साधं किरीटिना ॥ ६३ ॥ अससय मनुष्य जलप्रवाह के समान जान पड़ते वहां एकत्र होकर आनन्द लूटने लगे ॥५७.५८॥ थे । वस्त्र-कम्बल आदि लहरों की लीला दिखा रहे वे अपनी-अपनी प्रीति के अनुसार वहां जगह- थे। महागजराजों की उपमा ग्राह आदि जल-जन्तुओं जगह में बड़े-बड़े यानों पर घूम और ताल बजाकर से दी जा सकती थी। पताकाएँ सेवार के समान नाचने गाने का बड़ा कोलाहल मचाते हुए यथा- देख पड़ती थीं। पाण्डवों का बनाना यों ही भरा-पुग योग्य विहार करने लगे । श्रेष्ठ वीर यादवगण कुछ था; इस समय उसके और भी समृद्धिशाली बनने समय तक इसीतरह विहार करके कौरवों से विदा से शत्रुओं का डर बिलकुल न रहा ॥५४॥५६॥ होकर और मूल्यवान् भेटें लेकर द्वारका पुरी को वह सब सामनी म्वीकार करके युधिष्ठिर ने चल दिये ॥५९।६१॥ महारथी गृष्णि-भोज-अन्धकवंश के, यादवों का हे भारत ! महात्मा कृष्ण और कुछ समय के उचित सम्मान और सत्कार किया। अनन्तर पुण्य- लिये अर्जुन के पास उस सुन्दर इन्द्रप्रस्थ नगरी वन्त जन जिस प्रकार देवलोक में विहार करते है ' में ही रह गये । ये अर्जुन के साथ यमुनातट के वैसे ही महात्मा युरु, वृष्णि और अन्धक वंशी लोग वनों में मृग, याराह आदि का शिकार करते हुए - horor.orry mooooo . अध्याय २२३ ] महाभारत roomooooroom ततः सुभद्रा सौभद्रं केशवस्य प्रिया स्वसा । जयन्तमिव पौलोमी ख्यातिमन्तमजीजनत् ॥६४ ॥ दीर्घबाहुं महोरस्कं वृपभाक्षमरिंदमम् सुभद्रा सुषुवे वीरमभिमन्यु नरर्पभम् अभिश्च मन्युमांश्चैव ततस्तमरिमर्दनम् अभिमन्युमिति प्राहुरार्जुनि पुरुपर्पभम् स सात्वत्यामतिरथः संवभूव धनञ्जयात् । मखे निर्मथनेनेव शमीगर्भाद्भुताशनः ॥ ६७॥ यस्मिाते महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अयुतं गा द्विजातिभ्यः प्रादान्निष्कांश्च भारत ॥ ६८ ॥ दयितो वासुदेवस्य वाल्यात्प्रभृति चाऽभवत् । पितॄणां चैव सर्वेषां प्रजानामिव चन्द्रमाः ॥ ६९ ।। जन्मप्रभृति कृष्णश्च चक्रे तस्य क्रियाः शुभाः । स चाऽपि ववृधे वालः शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ ७० ॥ चतुष्पादं दशविधं धनुर्वेदमरिंदमः अर्जुनाद्वेद वेदज्ञः सकलं दिव्यमानुपम् ॥ ७१ ॥ विचरते थे । इन्द्राणी के गर्भ से जैसे जयन्त उत्पन्न हे भारत ! उस बालक के जन्म होते ही बड़े हुए थे वैसे ही सुभद्रा के गर्भ से एक बालक उत्पन्न तेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को दस हजार हुआ। वह बालक दीर्घ बाहु, चौड़ी छातीवाला, गारे दी, और बहुत सा सोना, रत्न, धन आदि बड़े बड़े नेत्र आदि अङ्गों से शोभित और पुरुषश्रेष्ठ, का भी दान किया । चन्द्रमा जिस प्रकार प्रजाओं शत्रुओं का विनाश करनेवाला हुआ। उस बालक का प्यारा है वैसे ही अभिमन्यु बालकपन से पिता, का नाम अभिमन्यु रक्खा गया ॥६२।६५।। चचे और वासुदेव के प्यारे बने । श्रीकृष्ण ने उनके अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु 'अभी' अर्थात् निर्भय । सय शुभ जात-कर्म किये थे। वह असाधारण बालक और 'मन्यु' अर्थात् क्रोधी थे, इसीसे उनका नाम शुक्ल तिथि के चन्द्रमा के समान दिन पर दिन अभिमन्यु पड़ा । यज्ञ में शमीवृक्ष की दो लकड़ियों । बढने लगा ॥६८७०॥ की रगड़ से जैसे अमि उपजता है, वैसे ही अर्जुन । वेद के जानकार शत्रुनाशी अभिमन्यु ने चार और सुभद्रा के समागम से उस महारथी अभिपन्यु प्रकार की धनुर्विद्या अर्थात् मन्त्रमुक्त जिसका का जन्म हुआ ॥६६।६७॥ प्रयोग किये जाने पर सहार न हो १ पाणिमुक्त . 0000 oycocorecardcocoronocococoo महा भारत [ आदिपर्व Pooooooo res.5050.com युधिष्ठिरस्तु रामेण समागम्छद्यथाविधि मूर्ध्नि केशवमाघ्राय वाहुभ्यां परिषस्वजे ॥ ३९ ॥ तं प्रीयमाणो गोविन्दो विनयेनाऽभिपूजयन् । भीमं च पुरुषव्याघू विधिवत्प्रत्यपूजयत् ॥ ४०॥ तांश्च वृष्ण्यन्धक श्रेष्ठान्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रतिजग्राह सत्कारैर्यथाविधि यथागतम् ॥ ४१ ॥ गुरुवत्पूजयामास कांश्चित्कांश्चिद्वयस्यवत् कांश्चिदभ्यवदत्प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ॥ ४२ ॥ तेषां ददौ हृषीकेशो जन्यार्थे धनमुत्तमम् । हरणं वै सुभद्राया ज्ञातिदेयं महायशाः स्थानां काश्चनाहाना किंकिणीजालमालिनाम् । चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलशिक्षितैः सहस्रं प्रददौ कृष्णो गवामयुतमेव च श्रीमान्माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् ॥ १५ ॥ वडवानां च शुद्धानां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् ददो जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूपितम् ॥ ४६ ॥ तथैवाऽश्वतरीणां च दान्तानां वातरंहसाम् । शतान्यजनकेशीनी श्वेतानां पञ्च पञ्च च ॥ ४७॥ रहनेवारों और ब्राह्मणों ने उनका बड़ा आदर किया। भाति प्रणाम किया,किपी-किमी से पराया अवस्या- युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक बरसा को गले से लगाया। वारों के सदृश व्यवहार किया और किसी किसी पिर श्रीकृष्ण को गले से लगाकर उनका सिर को प्रेमालाप से सम्मानित किया और किसी किसी सूंघा ॥३३॥३०॥ ने उनको प्रणाम किया ॥४०॥४२॥ कृष्ण ने विनयपूर्वक सरकार करके युधिष्ठिर को श्री कृष्णचन्द्र ने विवाह की रीति के अनुमार सतुष्ट दिया, पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन को भी प्रणाम वर की और के रोगों को अच्गे धन दिये और किया । इसके पश्चात् पाण्डस्येष्ठ युधिष्ठिर ने आप मुभद्रा को झानियों के देने योग्य यानुक (दंद) हुए. वृष्णि अन्धा मोमबाग पं यादवों की भी । के मम्स में धन दिया । उन्होंने पाण्डाको आव-गगन की। उदांग रिमी किमी को गुरु की मुमिक्षित सारथी समन चार घोरवाल हिमोगल - J १०१७ म हा भारत अध्याय २२३ ] Orconooo:00 coooooo - स्नानपानोत्सवे चैव प्रयुक्तं वयसान्वितम् स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् ॥ १८ ॥ सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलंकृताम् परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ॥४९॥ पृष्ठ्यानामपि चाश्वानां वाहिकानां जनार्दनः । ददौ शतसहस्राख्यं कन्याधनमनुत्तमम् कृताकृतस्य मुख्यस्य कनकस्याऽग्निवर्चसः । मनुष्यभारान्दाशार्हो ददौ दश जनार्दनः ॥ ५१ ॥ गजानां तु प्रभिन्नानां विधा प्रस्रवतां मदम् । गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ५२॥ क्लुप्तानां पटुघण्टानां चारूणां हेममालिनाम् । हस्त्यारोहैरुपेतानां सहस्रं साहसप्रियम् रामः पाणिग्रहणिकं ददौ पार्थाय लागली । प्रीयमाणो हलधरः संवन्धं प्रतिमानयन् ॥५४॥ स महाधनरलौघो वस्त्रकम्बलफेनवान् महागजमहाग्राहः पताकाशैवलाकुलः माला से सुहावने एक हज़ार सुनहले रथ, मथुरा इसके अतिरिक्त सोने के देर के ढेर अर्पण किये देश की तेजम्वी बहुत दूध देनेवाली दस हज़ार और सोने के जड़ाऊ गहने भी बहुत से दिये गायें दी ! सुवर्ण से अलडकृत, चन्द्रमा के समान जिनके मस्तकों से मद की धाराएँ निकल रही थी सफ़ेद रश की हज़ार घोड़ियां दी। पांच सौ सफेद ऐमे पर्वत के शिखर के समान, युद्ध से न भागने- और पांच सौ काले रङ्गवाले सिखे सिखाये एक वाले, घण्टा और सोने की जंजीरों से सजे हुए, इनार खच्चर दिये । स्नान, खानपान और उत्सव , हौद आदि सामान से युक्त महावत समेत हज़ार के समय सेवा के लिये गोरे रङ्ग की, सुन्दर केश मम्त हाथी भी दिये ॥५१॥५३॥ वाली, सुन्दर प्रभाववाली,सोने के गहनों से अलकृत, बलराम ने अर्जुन और मुभद्रा के विवाह के निरोग और सेवा के कामों में बड़ी चतुर हजार , बारे में अनुमति देकर यह सब विवाह के उपहार दासियां दी । सवारी के योग्य बाहीक देश के सैकड़ों की सामग्री युधिष्ठिर को दी। वह दहेज की सामग्री हनारों घोडे, भांति-भांति के कीमती वस्त्र और नदी के प्रवाह के समान पाण्डव-भवनरूपी महा- कम्बल आदि भी दिये ॥४३॥५०॥ सागर में रक्खी गई। महारत्न-धन को लिये जा रहे - "ro. 70/- 500 rorirsrrorarcini १०२० म हा भारत [आदिपर्व Zooloococco0050000roo 200 cooooo - विज्ञानेष्वपि चाऽस्त्राणां सौष्ठवे च महावलः । क्रियास्वपि च सर्वासु विशेपानभ्यशिक्षयत् ॥ ७२ ॥ आगमे च प्रयोगे च चके तुल्यमिवाऽऽत्मना । तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनंजयः सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् दुर्धर्षं वृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ॥ ७४ ॥ सिंहदर्प महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम् मेघदुन्दुभिनिघोपं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ॥७५॥ कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्य रूपे तथाऽऽकृतौ । ददर्श पुत्रं बीभत्सुमघवानिव तं यथा ॥ ७६ ॥ पाञ्चाल्यपि तु पश्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा । लेभे पञ्च सुतान्वीराज्श्रेष्ठान्पञ्चाचलानिव ॥७७ ॥ युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात् अर्जुनाच्छुतकर्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ॥ ७८ ॥ अर्थात् वाण आदि से युद्ध करना २ मुक्तामुक्त ! बातें विशेष रूप से सीख ली । अत्रों के लेने और अर्थात् प्रयोग और सहार जिसमें दोनों हों ३ अमुक्त , छोड़ने के काम में अपने पुत्र अभिमन्यु को ठीक अर्थात् मन्त्र की साधना से ४ और दशविधि " अपने ही समान निपुण देखकर अर्जुन को बड़ी अर्थात् आदान वाण को रेना १ संधान वाण प्रसन्नता हुई । अभिमन्यु सब शास्त्रों के ज्ञाता, सब चढाना २ मोक्ष वाण चलाना ३ विनिवर्त्तन चलाये सुलक्षणों से युक्त, दुर्द्धर्ष, बैल के समान ऊचे और हुए वाण को लौटा लेना ४ स्थान सधान के समय पुष्ट कन्धोंवाले, फन उठाये सर्प के समान भाषण, त्रिज्या के बीच को जानना ५ मुष्टि तीन या चार सिंह के समान रोबीले, बड़े चापधारी, मस्त हाथी उँगलियों से पकड़ना ६ प्रयोग उँगलियो बीच | की तरह चलनेवाले, शूरता वीरता में श्रीकृष्ण के •में वाण लगाना ७ प्रायश्चित्त हथेली आदि को ही तुल्य थे । उनका मुख पूर्ण चन्द्र के समान शत्रु के मारे हुए अथवा अपने वाण मे बचाना ८ सुन्दर और वाणी मेघ और नगाड़े के शब्द के मण्डल घूम घूमकर रथ पर से वाण मारना ९ ममान गम्भीर थी। इन्द्र जैसे अर्जुन को स्नेह की रहस्य एक ही बार में अनेक रक्ष्यों को भेदना १० दृष्टि से देखकर प्रसन्न होते थे, वैसे ही अभिमन्यु और ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य अम्ब और खड्ग आदि को देख कर अर्जुन प्रसन्न हुए ॥७११७६॥ मानुष अत्र अर्जुन से सीखे । महावरी अभिमन्यु शुभ लक्षणों से युक्त द्रौपदी ने भी पाच पतियों ने असमान, फुर्ती, होशियारी आदि युद्ध की सब से पाच पर्वत के समान बड़े वीर पाच पुत्र प्राप्त in-ooro Hovojpur १०२१. महा मारत अध्याय २२३ ] morcococco0 mroscomc00 .. सहदेवाच्छ्तसेनमेतान्पञ्च , महारथान् पाञ्चाली सुपुवे वीरानादित्यानदितियथा शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यं तमृचुर्विप्रा युधिष्ठिरम् । परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वयम् ॥८॥ सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम् सुतसोमं महेवासं सुपुवे भीमसेनतः ॥ ८१ ॥ श्रुतं कर्म महत्कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत् ॥८२ ॥ शतानीकस्य राजपः कौरव्यस्य महात्मनः । चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलं कीर्तिवर्धनम् ॥८३ ॥ ततस्त्वजीजनकृष्णा नक्षत्रे वह्निदेवते सहदेवात्सुतं तस्माच्झतसेनेति तं विदुः ॥ ८४ ॥ एकवान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः ॥५॥ जातकर्माण्यानुपूर्व्याच्चूडोपनयनानि च चकार विधिवद्धोम्यस्तेषां भरतसत्तम किये । अदिति ने जैसे देवों को प्रसव क्यिा था, ने बहुत से प्रसिद्ध कर्म करके लौटने पर यह पुत्र वमे ही पाञ्चाली ने युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीमसेन उत्पन्न किया है, इमलिये उनके पुत्र का नाम श्रुतकर्मा से सुतमोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक रखते है । कुरुवश की कीर्ति बढ़ानेवाले एक और सहदेव से श्रुतसेन ये पाच महारथी वीर पुत्र शतानीक नाम के प्रतापी राजा हो गये हैं; नकुल प्रसव किये ॥७७१७९॥ अपने पुत्र का नाम उन्हीं के नाम पर रखना चाहते व झणों ने युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज | शाम हैं, इसलिये उसका वही नाम होगा । द्रौपदी ने के अनुसार आपके पुत्र के लक्षण देखने से जान कृत्तिका नक्षत्र में सहदेव के पुत्र को उत्सन्न किया पड़ता है कि यह शत्रुओं के प्रहार सहने में विन्ध्याचल है, इसलिये उसका नाम श्रुतसेन होगा ।।८०८४॥ पर्वत के समान अटल होगा, इसलिये हम उसका हे महाराज ! द्रौपदी के कुमारों में हर एक ने नाम प्रतिविन्ध्य रखते है । भीममेन ने सहस्र सोमयज्ञ एक दूमरे से वर्ष-वर्ष भर पीछे जन्म लिया था। करके चन्द्र-सूर्य के समान तेजम्वी पुत्र पाया है, वे सब एक दूसरे के हित चाहनेवाले और यशोवत इसलिये उसका नाम सुतसोम रखते हैं । अर्जुन हुए थे । हे भरतवशश्नष्ठ ! पुरोहित धौम्य ने विधि- । । oo06 auroconore pachers १०२२ महा भारत [ आदिपर्व 5c000000 100000oooooooo DOORE कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः जगृहुः सर्वमिष्वस्त्रमर्जुनादिव्यमानुपम् ॥ ८७॥ दिव्यगर्भोपमैः पुत्रैयूंढोरस्कैमहारथैः अन्विता राजशार्दूल पाण्डवा मुदमाप्नुवन् ॥ ८८ ॥ शत श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हरणाहरणपर्वणि त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२३ । समाप्तं च हरणाहरणपर्व । पूर्वक उनका जातकर्म आदि सस्कार एक के बाद की। हे जनमेजय । देव-कुमारों के समान महारथी दूसरा, उसी रीति से सब कराया ॥८५।८।। चालकों को पाकर पांचों पाण्डव परम प्रसन्न हुए । अनन्तर सुचरित्र बालकों ने वेद पढ़कर अर्जुन ॥८७/८८॥ से सब दिव्य और मानुपी अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त आदिपर्व का दो सौ तेईस अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतुर्विशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥ २२४ ॥ अथ साण्डवदाहपर्व ॥ वैशम्पायन उवाच-इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान्नराधिपान् । शासनाद्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत्सुखम् । पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः स समं धर्मकामार्थान्सिपेवे भरतर्षभ त्रीनिवात्मसमान्वन्धूनीतिमानिव मानयन् तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव वभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिवः अध्येतारं परं वेदान्प्रयोक्तारं महाध्वरे रक्षितारं शुभाँल्लोकॉल्लेभिरे तं जनाधिपम् ॥ दो सौ चांवीस अध्याय ।। २२४ ।। वैशम्पायन ने कहा है भरतश्रेष्ठ ! राजा धृतराष्ट्र पाकर सुख से विराजता है, वैसे ही सब प्रजा और भीष्म जी की आज्ञा से इन्द्रप्रस्थ में रहकर युधिष्ठिर को अपना राजा पाकर सुख और स्वच्छन्दता पाण्डव लोग दिन पर दिन और-और राजाओं को के साथ रहने लगी। महाराज युधिष्ठिर धर्म, अर्थ जीतकर अपनी समृद्धि बढ़ाने लगे । आत्मा जैसे और काम इन तीनों को इसप्रकार से सेवन किया पवित्र कमों और शुभ रक्षणों से युक्त शरीर को करते थे जैसे कोई अपने भाई-बन्धु की सेवा किया .. cocococococco - :00 - 75100 १०२३ अध्याय २२४ ] महा भारत oor 10010 corooroor oncoconcocoreoccolkoice अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः वर्धमानोऽखिलोधर्मस्तेनाऽऽसीत्पृथिवीक्षिताम् ॥ ६ ॥ भ्रातृभिः सहितो राजा चतुर्भिरधिकं वभौ । प्रयुज्यमानैर्विततो. वेदैरिव महाध्वरः तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योंपतस्थिरे । बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवाऽमराः ॥ ८ ॥ धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवाऽमले प्रजानां रोमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च ॥ ९ ॥ न तु केवलदैवेन प्रजाभावेन मिरे यद्वभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥ १० ॥ न ह्ययुक्तं न चाऽसत्यं नाऽसह्यं न च वाऽप्रियम् । भाषितं चारुभापस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ॥ ११ ॥ स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च चिकीर्षन्सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम ॥ १२ ॥ तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः । अवसन्पृथिवीपालांस्तापयन्तः स्वतेजसा ॥ १३ ॥ करता है । धर्म, अर्थ और काम मानों यह देह किया करते है, वैसे ही धौम्यादि बृहस्पति सदृश धरकर पृथ्वी पर उतर आये थे, राजा युधिष्ठिर प्रधान-प्रधान ब्रह्मणगण उनको चारों ओर घेरकर मानों उनमें एक चौथे बनकर शोभा पाने लगे ॥१४॥ उपासना करते थे ॥८॥ प्रजा ने उन राजा को अच्छे वेदपाठी, बड़े पूर्णचन्द्रमा समान निर्मल धर्मराज युधिष्ठिर की यज्ञकारी और सम्पूर्ण पुण्यवन्त प्राप्त किया था । और प्रजा के नेत्र और मन दोनों समान रूप से उनके साम्राज्य के दिनों में अन्य राजाओं की झुक पड़े थे। यही नहीं, कि प्रजा उनको राजा ही लक्ष्मी न टलती, चित्त परब्रह्म की ओर झुक और जानकर प्रेमी बनी थी, बल्कि वह ऐसे-ऐसे ही धर्म बहुत वृद्धि पर था ॥५॥६॥ कार्य में दत्तचित्त होते थे कि जिनसे प्रजा को जिस प्रकार प्रयुज्यमान चतुर्वेद से फैला हुआ सन्तोप मिले ॥९।१०॥ बड़ा यज्ञ सुशोभित होता है, वैसे ही धर्मराज युधिष्ठिर वह बुद्धिमान् बड़े पाण्डव मीठी बोली बोलते चार भाइयों से और भी अधिक सुहाने लगे । जिस | थे, उनका वचन कभी झूठा, युक्ति के विरुद्ध असद्य प्रकार देवगण प्रजापति जी को घेरकर उपासना वा अप्रिय नहीं होता था। हे भरतश्रेष्ठ ! वह बड़े । coconn coommocc.
१०२४ महाभारत [ आदिपर्व mcoocod ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत् । उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुना प्रति ॥ १४ ॥ सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन सायाहे पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन ॥१५॥ वासुदेव उपाच-कुन्तीमातर्ममाऽप्येतद्रोचते यद्वयं जले सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच-आमन्त्र्य तो धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत । जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृजनवृतौ ततः विहारदेश संप्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरंदरपुरोपमम् भक्ष्यभॊज्यैश्च पेयैश्च रसवद्भिर्महाधनैः माल्यैश्च विविधैर्गन्धेर्युक्तं वार्ष्णेयपार्थयोः ॥ १९ ॥ विवेशाऽन्तःपुरं तूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः यथोपजोपं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ॥ २० ॥ स्त्रियश्च विपुलोण्यश्चारुपीनपयोधराः मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः ॥ २१ ॥ तेजस्वी युधिष्ठिर इसतरह सब लोगों का और अपना इष्ट-मित्रों के साथ चलकर जल-विहार का आनन्द हित करते हुए प्रसन्नता और सन्तोष के साथ अपने प्राप्त करें ॥१४॥१६॥ नीवन का समय विनाने लगे । पाण्डवों को इस वैशम्पायन ने कहा-हे भारत ! ऐमी सलाह प्रकार आनन्दित और सन्ताप-हीन देखकर उनके करके अर्जुन और कृष्ण ने धर्मराज से आज्ञा ली। तेज और प्रतार से दुष्ट राजा लोग दुखी होने | फिर बन्धु-बान्धवों के साथ दोनों यमुना-तट को लंग ॥११११३॥ चल दिये । सब लोग वहा से चलकर विहारभूमि कुछ दिनों के व्यतीत होने पर अर्जुन ने श्रीकृष्ण में पहुंने । यहां पर अनेक से कहा-हे मित्र ! आजकल गर्मी की ऋतु है मेरी थे। अनेक भवनों से वह स्थान इन्द्र की पुरी के इच्छा यह है कि हम और आप दोनों सुहृजनों । समान जान पड़ता था । उन भवनों में स्वादिष्ट को साथ लेकर यमुना-तट पर चलकर विहार करें, · खाने-पीने की चीजें गरी पड़ी थी और बहुमूल्य सन्ध्या को लौट आयेंगे। श्रीकृष्ण ने कहा-हे कुन्ती- रल, सुगन्धित पदार्य तथा पुष्पमाला आदि सम पुन ! मेरा भी जी चाहता है कि हम सब अपने सामान रकम्पा था । वहा पहुंचकर श्रीकृष्ण और - प्रकार के वृक्ष लगे v-0mAJ १०२५ महा मारत अध्याय २२४ ] c 10201000 ko0 वने काश्चिजले काश्चित्काश्चिद्वेश्मसु चाङ्गनाः । यथादेशं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः ॥ २२ ॥ द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च 'प्रायच्छता महाराज स्त्रीणां ते स्म मदोत्कटें ॥ २३ ॥ काश्चित्प्रहृष्टा ननृतुचकुशुश्च तथा पराः 'जहसुश्च परा नार्यः पपुश्चान्या वरासवम् ॥ २४ ॥ रुरुधुश्चाऽपरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ॥ २५॥ वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः । शब्देन पूर्यते ह स्म तद्वनं सुमहर्द्धिमत् ॥ २६ ॥ तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ समीपं जग्मतुः कंचिदुद्देशं सुमनोरमम् ॥ २७॥ तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णो परपुरंजयो महाहासनयो राजस्ततस्तो सन्निपीदतुः तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च वहूनि कथयित्वा तो रेमाते पार्थमाधवो ॥ २९ ॥ अर्जुन के साथी लोग सुख से खेलने कूदने लगे । । रोने भी लगी। कोई-कोई आपस में हँसी-दिल्लगी ॥१७॥२०॥ और रहम्य की बातचीत करने लगी। सब लोग स्थूलकुचाबाली सुन्दर नितम्मिनी, मतवाली चाल अपनी-अपनी रुचि के अनुसार आमोद-प्रमोद कर चलती युवती श्रीकृष्ण और अर्जुन की आजा से रहे थे । ॥२३।२५।। खेल में प्रवृत्त हुईं। कोई वन में, कोई जल में और बसी, बीणा, मृदङ्ग आदि का मनोहर शब्द कोई घर में प्रीति के साथ विहार करने लगी। उस वन में और समृद्धिशाग भवनों में गूंज रहा ॥२१॥२२॥ था। हे महाराज ! इमतरह बड़ा भारी उत्सय हे महाराज ! तब द्रोपदी और सुगद्रा मद से आरम्भ होने पर महात्मा, शत्रुनगर के जयकारी मतवाली बनकर उन सब स्त्रियों को वस्त्र और गहने धनन्जय और श्रीकृष्ण दोनों मित्र निकट के एक देने लगी । कुछ स्त्रिया नाचने लगी, कुछ हंसने मुन्दर स्थान में बहुमूल्य आसनों पर बैठकर उस लगी और कुछ मदिरा पीने लगी । मद में उन्मत्त उत्सव की लीला को देखने लगे ॥२६॥२८॥ होकर कोई-कोई आपस में मार-पीट करने और वे उस स्थान में अतीय विक्रम के सम्बन्ध में १०२६ म हा भारत [ आदिपर्व 30000 । । तत्रोपविष्टौ मुदितो नाकपृष्ठेऽश्विनाविव । अभ्यागच्छत्तदा विप्रो वासुदेवधनञ्जयौ ॥ ३० ॥ बृहच्छालप्रतीकाशः प्रततकनकप्रभः हरिपिंगोवलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः ॥ ३१ ॥ तरुणादित्यसंकाशश्चीरवासा जटाधरः पद्मपत्राननः पिंगस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ३२ ॥ उपस्सृष्टं तु तं कृष्णो भ्राजमानं द्विजोत्तमम् । अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि ब्राह्मणरुप्यनलागमे चतुर्विशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः२२४ और दूसरी भांति-भांति की कथा कहते-सुनते हुए था । तपे हुए सुवर्ण की सी उनके शरीर की क्रान्ति खेलने लगे । जिस प्रकार देवलोक में दोनों आश्विनी-थी। पिाल रश की उनकी जटाएँ और दादी-मूछे कुमार एकत्र विराजते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण और थीं। वे वत्कल पहने, सूर्य के समान तेजस्वी थे। अर्जुन प्रमुदित मन से उस स्थान में बैठे हुए थे। उन अलौकिक तेज से प्रदीप्त ब्राह्मण को अपने ॥२९॥३०॥ सामने देखकर श्रीकृष्ण और अर्जुन उठ खड़े इसी समय एक ब्राह्मण देवता उनके सामने हुए ॥३१॥३३॥ आये । बड़े शालवृक्ष के समान लम्बा उनका डील । आदिपर्व का दो सौ चौवीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२५ ॥ बैशम्पायन उवाच-सोऽब्रवीदर्जुनं चैव वासुदेवं च सात्वतम् । लोकप्रवीरौ तिष्ठन्तौ खाण्डवस्य समीपतः ॥ १ ब्राह्मणो बहुभोक्ताऽस्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा । भिक्षे वार्ष्णेयपार्थो वामेकां तृप्तिं प्रयच्छताम् ॥ २ ॥ एवमुक्तो तमनां ततस्तो कृष्णपाण्डवो केनाऽन्नेन भवांस्तुप्येत्तस्याऽन्नस्य यतावहे ॥ ३ ॥ दो सौ पचीस अभ्याय ॥ २२५ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अनन्तर वीरों में श्रेष्ठ, इस खाण्डव वन के पास बैठे हुए बामण-रुपधारी अमि ने श्रीकृष्ण जी महाराज और हो। मैं खानेवाला ब्राह्मण ई; सदा अमित अर्जुन से कहा-तुम दोनों महापुरुष संसार के सप भोजन किया करता हूं। अब तुमसे मिक्षा मांगता ०- - Cococci 0000000mAVodeocaresol १०२७ महा मारत अध्याय २२५ ] Pococoloo0004 एवमुक्तः स भगवानववीत्तावुभौ ततः भापमाणौ तदा वीरौ किमन्नं क्रियतामिति ॥ ४ ॥ ब्राह्मण उवाच-नाऽहमन्नं बुभुक्षे वै पावकं मां निवोधतम् । यदन्नमनुरूपं मे तावां संप्रयच्छतम् इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति न च शक्रोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ॥ ६ ॥ वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा । सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् -तत्र भूतान्यनेकानि रक्ष्यन्तेऽस्य प्रसङ्गतः । तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ॥ ८ ॥ स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति । ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ॥ ९ ॥ स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्यां समागतः । दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया युवां दकधारास्ता भूतानि च समन्ततः । उत्तमास्त्रविदौ सम्यक्सर्वतो वारयिष्यथः है कि तुम रोग भोजन देकर मुझको प्रसन्न करो। इन्द्र का सखा तक्षक नामक सर्प अपने साथियों ॥१२॥ । के साथ इस वन में रहता है। इसी कारण वज्रपाणि वीर अर्जुन और श्रीकृष्ण ने उनके ये वचन इन्द्र सदा इसकी रक्षा किया करते हैं । उसी तक्षक सुनकर कहा-कहिये, कैसा भोजन करने से आपकी के साथ और भी बहुत से प्राणी इस वन में निडर सृप्ति होगी, हम उसका प्रयत्न करेंगे । वे सा बने रहते हैं । उन्हें भस्म करने की इच्छा रहने अन्न बनवायेंगे, इस विषय में आपस में बात-चीत पर भी मैं इन्द्र के प्रभाव से कुछ नहीं कर सकता। कर रहे थे, कि ऐमे समय में उस ब्रामण रूपधारी वे मुझे जब प्रवरित देखने है तर मेघों से जल अपि ने अर्जुन से कहा-मैं साधारण अन्न खाना की वर्षा करके मुझे गान्न कर देते हैं । इस कारण नहीं चाहता हु । मैं अमि हु, जो मन मेरे योग्य बड़ी इच्छा होने पर भी में खाण्डव वन को जला दो यही मुझको दो ॥३॥५॥ नहीं सकता । तुम दोनों वीर अस्व-विधा में निपुण देवराज इन्द्र सदा इस खाण्डव वन की रक्षा हो। यदि तुम मेरी सहायता करो तो में इस वन करते है, इसी से में इमे मम्म नहीं कर सकता। को जरा ढाल तुम ऐमा कर सकी तो मैं खाण्डव -- TAMCHOJ १०२६ महा भारत [ आदिपर्व जनमेजय उवाच-किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति । रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्वसमायुतम् न ह्येतत्कारणं ब्रह्मन्नल्पं संप्रतिभाति मे यद्ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥ १३ ॥ एतद्विस्तरशो ब्रह्मश्रोतुमिच्छामि तत्वतः खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥ १४ ॥ वैशम्पायन उवाच-शृणु मे ब्रुवतो राजन्सर्वमेतद्यथातथम् 1. यन्निमित्त ददाहाऽग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥१५॥ हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृपिसंस्तुताम् । कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥ १६ ॥ पौराण. श्रूयते राजनराजा हरिहयोपमः श्वेतकिर्नाम विख्यातो बलविक्रमसंयुतः ॥ १७ ॥ यज्वा दानपति/मान्यथा नान्योऽस्ति कश्चन । ईजे च स महायज्ञैः क्रतुभिश्चाऽऽप्तदक्षिणैः ॥ १८ ॥ तस्य नान्याऽभवद् बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेपु च वन को जलाकर उस आहार से अच्छीतरह तृप्त । जलाया गया वह मुझसे कहिये ॥१२॥१४॥ हो जाऊँगा । मैं तुम से यही अन्न चाहता है । वैशम्पायन ने कहा-हे नरनाथ ! मपियों के मेघों से गिरी हुई जल-धारा को, और जो अपि । मुख से मैंने जो साण्डर दाह का ऐतिहासिक यहा से भाग जाना चाहें उनको तुम अपनी अद्भुत वृत्तान सुना है उसे कहता हू, सुनी । हे महाराज! अस विद्या से रोक रखना ॥६।११।। | पुगणों में वर्णन किया गया है कि पूर्व समय में राजा जनमेजय ने कहा-है ब्रान् । अनि ने एक बड़े बरपान् आर इन्द्र की उपमा रखनेवाले इन्द्र के द्वारा सुरक्षित और अनेक प्राणियों के । श्वनकि नामक राजा थे। उनके सदृश ध मान्, दाता निवास म्यान खाण्डव वन को जाने की इच्छा । और यज्ञशारी कोई दूसरा नहीं था। उन्होंने बहुत क्यों की उन्होंने प्रोधित होकर यदि खाण्डय यन दक्षिणा दे देकर जोतिष्ठोम आदि यन और देवयन को जलाया तो उसका अवश्य कोई विगेप कारण आदि पाच महायन किये थे ॥१५॥१८॥ होगा। देब्रहान् ! मैं इसको विस्तार के साथ मुना हे महाराज ! उनकी प्रवृति सदा केरल कार्य चाहता है । इमरिय निस कारण से ग्वाण्डव वन करने, यजों के अनुष्ठान और दान आदि पुण्यकों । 70 १०२९ 'अध्याय २२५ ] ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवीजे स भूमिपः । ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥ २० ॥ कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्तं नराधिपम् । ततः प्रचोदयामास ऋत्विजस्तान्महीपतिः ॥ २१ ॥ चक्षुर्विकलता प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् ततस्तेषामनुमते तद्विप्रेस्तु नराधिपः ॥ २२ ॥ सत्रं समापयामास ऋत्विम्भिरपरैः सह तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित्कालपर्यये ॥ २३ ॥ सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल ऋविजो नाऽभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥ २४ ॥ स च राजाऽकरोयत्नं महान्तं ससुहृजनः प्रणिपातेन सान्वेन दानेन च महायशाः ॥ २५ ॥ ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः । ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः स चाऽऽश्रमस्थानराजर्पिस्तानुवाच रुपान्वितः । यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूपायां न च स्थितः ॥ २७ ॥ के सिवा और तरफ़ नहीं थी। बुद्धिमान् राजा के | वर्ष में समाप्त होनेवाला महायज्ञ करने की इच्छा ऋविजों के साथ बहुत दिनों तक यन करने पर प्रगट की, परन्तु पुगेहित वह यज्ञ कराने को तैयार ऋविजों ने धुएँ से घबराकर और उदास होकर नहीं हुए । तब अपने आत्मीय स्वजनों के साथ चे उस राजा को छोड़ दिया । ब्राह्मणों को जाते देख महाराज पैरों पड़कर, खुशामद करके और बहुत बारम्बार प्रवृत्तिमार्ग और कर्मकाण्ड की प्रशसा के सा दान देकर, अनेक उपायों से उन ब्राह्मणों को वाक्य कहकर राजा ने उन्हें बुलाने की चेष्टा की, प्रसन्न और राजी करने का यत्न करने लगे। आलस्य पर उन्होंने फिर आकर यन कराना स्वीकार नहीं । छोड़ कर तत्परता के साथ राजा ब्राह्मणों के पीछे पड़ किया। तब राजा ने उन ऋत्विजों की सलाह लेकर । गये । परन्तु उन परम तेजस्वी पुगेहितों ने किसी दूसरे ब्राह्मणों को बुलाया और उन पुरोहितों के प्रकार उनका मनोरथ सिद्ध नहीं किया। तब उन द्वारा, आरम्भ किये हुए, यज्ञ को समाप्त किया राजर्षि ने कुछ क्रोधित होकर आश्रमों में रहनेवाले ॥१९॥२२॥ विषों से कहा-हे ब्राह्मणो ! यदि मैं पतित हो जाऊँ, कुछ समय व्यतीत हुआ गजा ने फिर एक सौ अथवा आप लोगों की सेवा-शुश्रूपा न करूं तो मुझ . - ovomomosomomoze vomororescio505coorce महा मारत [ आदिपर्व ope orucocorrockooooracoccor आशुत्याज्योऽस्मि युष्माभिाह्मणैश्च जुगुप्सितः। तन्नाऽर्हथ क्रतुश्रद्धां व्याघातयितुमद्य ताम् ॥ २८ ॥ अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमाः । प्रपन्न एव वो विप्राः प्रसादं कर्तुमर्हथ ॥ २९ ॥ सान्त्वदानादिभिर्वाक्यैस्तत्त्वतः कार्यवत्तया प्रसादयित्वा वक्ष्यामि यन्नः कार्य द्विजोत्तमाः ॥ ३० ॥ अथवाऽहं परित्यक्तो भवद्भिर्द्वषकारणात् ऋत्विजोऽन्यान्गमिष्यामि याजनाथ द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥ एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स पार्थिवः यदा न शेकू राजानं याजनार्थं परंतप ॥ ३२ ॥ ततस्ते याजकाः क्रुद्धास्तमूचुनृपसत्तमम् तव कर्माण्यजस्रं वै वर्तन्ते पार्थिवोत्तम ॥ ३३ ॥ ततो वयं परिश्रान्ताः सततं कर्मवाहिनः श्रमादस्मात्परिश्रान्तान्स स्वं नस्त्यक्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥ चुद्धिमोहं सम्गस्थाय स्वरासंभावितोऽनघ गच्छ रुद्रसकाशं वं स हि त्वां याजायष्यति ॥ ३५ ॥ निन्दित को आप लोग त्याग दे सकते है ।।२३।२७॥ के लिये समझा बुझाकर दान दे उनको प्रसन्न कर किन्तु जय मै न तो पतित हू और न आप अपना काम उनको सच सच जिताकर अभिलाषा लोगों की सेवा तथा सरकार से विमुख ही हू तय सिद्ध कर लगा । इतना कहकर राजा चुप हो रहे अन्यायपूर्वक मुझे छोड़देना या यज कराना अम्बीकार ॥२८॥३१॥ करके पुण्यकार्य में विघ्न डालना कभी आप रोगा अन्त को परोहितों ने जब समझ लिया कि ये के योग्य कार्य नहीं कहा जा सकता । मै आपकी उस समय बहुत थके हुए होने के कारण राजा को शरण लेता हू, सो आप मुझपर प्रसन्न हावें। दे यन कराने में असमर्थ हैं, तब उन्होंने भी कुछ नामणश्रेष्ठो ! मैं समझाकर आपसे कहता हू, मेरा कुपित होकर राजा से कहा-हे राजन् ! आप देवताओं कार्य करना आप रोग म्वीकार कर लें । यदि किसी की प्रसन्नता के लिये सदा यश-हवन आदि कर्म विद्वपभाव के कारण आप रोग मेरा त्याग करते किया ही करते हैं । हम रगातार आपका कार्य है, तो मुझको राज्य कार्य के लिये अन्य पुरोहितों करते करते थक गये हैं । हम आपको अभी यर के पास जाना पड़ेगा और अपना कार्य पूरा करने नहीं करा सकेंग, आप हमें छोड़ दीनिए । आप । Moror- -o2oscomicror-rrrorrore १०३१ महा भारत अध्याय २२५ ] ooo "0002 . साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वतकिर्नृपः कैलास पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः आराधयन्महादेवं नियतः संशितव्रतः उपवासपरो राजन्दीर्घकालमतिष्ठत ॥ ३७॥ कदाचिद् द्वादशे काले कदाचिदपि पोडशे । आहारमकरोद्राजा मूलानि च फलानि च ॥३८॥ ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन्स्थाणुरिवाऽचलः पण्मासान भवद्राजा श्वेनकिः सुसमाहितः ॥ ३९ ॥ तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत्तपः शंकरः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ॥४०॥ उवाच चैनं भगवास्निग्धगम्भीरया गिरा प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप ॥ ४१ ॥ वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्याऽमिततेजसः ॥ ४२ ॥ प्रणिपत्य महात्मानं राजर्पिः प्रत्यभापत यदि मे भगवान्प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ४३ ॥ मोहवश यज्ञ करने के लिये अभी तैयार हैं और नहीं लगती थी, वे ऊपर को हाथ उठाये हुए खड़े थे जल्दी कर रहे हैं, इसलिये दूमरा पुगेहित कर ॥३२॥३९॥ लीजिए । आप रुद्र के पास जाइए, यही आपका हे भारत ! राजा श्वेताकि की इस घोर तपस्या कार्य सिद्ध करेंगे । ऋपियों के ये आक्षेप-पूर्ण । से भगवान् शङ्कर उनपर प्रसन्न हो गये । उन्होंने वचन सुनकर राजा को भी क्रोध आ गया । तब वे प्रगट होकर राजा को दर्शन दिये और कहा-हे वहा से चलकर कैलास पर्वत पर गये । हे महाराज ! राजन् ! मै तुम्हारी तपम्या से बहुन प्रसन्न हुआ उन्होंने वहा नियमयुक्त, व्रतशील और उपवास में हु। तुम्हारा मंगल हो । अब तुम अपनी इच्छा के नियुक्त होकर बहुत दिनों तक महादेव जी की । अनुमार मुझमे वर मागो । राजर्षि श्वेताक ने अति आराधना की। राजा कभी बारह पहर के वाद और ' तेजस्वी महात्मा गङ्कर के ये वचन सुनकर कभी सोलह पहर के बाद केवल कन्द मूल-फल कहा-हे सुरेश्वर ! हे देवनाथ ! आपको सब लोग खा लेते थे । फिर छः मास तक अचल खम्भे की । पूजनीय ममझकर प्रणाम करते है । आप यदि । तरह खड़े रहकर उन्होने तप किया । उनकी पलक मुझपर प्रसन्न हुए है तो मेरे पुरोहित होकर मुझे । : cococ Horrororrorakorry- Zooo - १०३२ महाभारत [ आदिपर्व movaroronworoncommonoconcincore स्वयं मां देवदेवेश याजयस्व सुरेश्वर एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञा तेन प्रभापितम् ॥४४॥ उवाच भगवान्प्रीतः स्मितपूर्वमिदं वचः नाऽस्माकमेतद्विषये वर्तते याजनं प्रति ॥ ४५ ॥ त्वया च सुमहत्तप्तं तपो राजन्वरार्थिना याजयिष्यामि राजंस्त्वां समयेन परंतप रुद्र उपाच- समा द्वादश राजेन्द्र ब्रह्मचारी समाहितः सततं वाज्यधाराभिर्यदि तर्पयसेऽनलम् ॥४७॥ कामं प्रार्थयसे यं त्वं मत्तः प्राप्स्यसि तं नृप । 'एवमुक्तस्तु रुद्रेण श्वेतकिर्मनुजाधिपः ॥४८॥ तथा चकार तत्सर्व यथोक्तं शूलपाणिना पूर्णे तु द्वादशे वर्षे पुनरायान्महेश्वरः ॥४९॥ दृष्ट्वैव च स राजानं शंकरो लोकभावनः उवाच परमप्रीतः श्वेतकिं नृपसत्तमम् तोपितोऽहं नृपश्रेष्ठ स्वयेहायेन कर्मणा याजनं ब्राह्मणानां तु विधिदृष्टं परंतप अतोऽहं त्वां स्वयं नाऽद्य याजयामि परंतप ममांऽशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तमः ॥ ५२ ॥ यज्ञ कराइए ॥४०॥४३॥ करूँगा ! राजा ने मीकार कर लिया। उन्होंने राजा के ये वचन मुनकर भगवान् रुद्र प्रसन्न । बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत से रह करके अखण्ड हुए । उन्होंने हँसकर कहा-हे राजन् ! यज्ञ कराने ' घी की धार से अमिदेव को तृप्त किया । बारह का हम देवताओं को अधिकार नहीं है परन्तु तुमने वर्ष समाप्त हो चुकने पर राजा फिर कैलास पर्वत पर इसी इच्छा से कठोर तप किया है, इमरिये एक भगवान् भूतनाथ के पास गये ॥४४॥१९॥ नियम पर मैं तुमको यक्ष कराऊँगा । यदि तुम उन्हें दंयकर शङ्कर यहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने चारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकाग्रता कहा-हे राजन् ! मैं तुम्हारे इस कार्य से पहुन के साथ असण्ड घी की धारा से दिन-रात अमि संतुष्ट हुआ हूं । परन्तु हे शत्रुदमन ! शास्त्र की को तृप्त कर सको तो मैं तुम्हारी यह इच्छा पूरी विधि के अनुसार ब्राह्मणों को ही यज्ञ कराने का - । । c.vorrec Jcoicwml १०२३ म हा मारत अध्याय २२५ ] roacooocore दुर्वासा इति विख्यातः स हि त्वां याजयिष्यति । मन्नियोगान्महातेजाः संभाराः संभ्रियन्तु ते ॥ ५३ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रेण समुदाहृतम् स्वपुरं पुनरागम्य संभारान्पुनरार्जयत् ततः संभृतसंभारो भूयो रुद्रमुपागमत् संभृता मम संभाराः सर्वोपकरणानि च स्वत्प्रसादान्महादेव श्वो मे दीक्षा भवेदिति । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ५६ ॥ दुर्वाससं समाहृय रुद्रो वचनमब्रवीत् एप राजा महाभागः श्वेतकिजिसत्तम एनं याजय विप्रेन्द्र मन्नियोगेन भूमिपम् । बाढमित्येव वचनं रुद्रं त्वृपिरुवाच ह ततः सत्रं समभवत्तस्य राज्ञो महात्मनः यथाविधि यथाकालं यथोक्तं बहुदक्षिणम् ॥ ५९ ॥ तस्मिन्परिसमाप्ते तु राज्ञः सत्रे महात्मनः दुर्वाससाऽभ्यनुज्ञाता विप्रतस्थुः स्म याजकाः ॥ ६० ॥ अधिकार है । मैं स्वय इस समय तुम्हें यज्ञ नहीं को याद किया। उनके पहुचने पर रुद्र ने कहा-हे करा सकता । पृथ्वी पर दुर्वासा नाम से प्रख्यात विपर! इन महीपाल का नाम श्वेताकि है। तुम मेरी महाभाग एक द्विजोत्तम हैं, वह मेरा ही अश आज्ञा से इन्हें यज्ञ कराओ। ऋषि ने स्वीकार कर मेरी आज्ञा से वही तुमको यज्ञ करावेंगे । तुम लिया ॥५४॥५८॥ यज्ञ की सामग्री एकत्र करो ॥५०५३॥ इसके पश्चात् राजा श्वेतकि की इच्छा के अनुमार रुद्र की आज्ञा से राजा श्वेतकि लौटकर राजधानी दुर्वासा ने वह महायज्ञ आरम्भ किया। सौ वर्ष के में आये । उन्होंने सब यज्ञ की सामग्री इक्ट्ठी की। बाद वह यज्ञ समाप्त हुआ । यज्ञ के समाप्त हो सामग्री एकत्र करके वे फिर रुद्र के पास गये । । चुकने पर जो सब बड़े तेजस्वी याजक और सदस्य उन्होंने कहा-हे प्रभा महादेव ! मैने सब सामग्री लोग उसमें दीक्षित हुए थे दुर्वासा की आना से एकत्र कर ली है; अब मेरी इच्छा पूरी कीजिए । अपने अपने घर को चले गये । अन्त को महात्मा मैं कल ही यज्ञ की दीक्षा लेना चाहता है। महात्मा । दुर्वासा भी अपने आश्रम को पधारे।।५९/६०॥ राजा के ये वचन सुनकर भगवान् रुद्र ने दुर्वासा । 0.757074 moeonirrorosorrorrcoccorron. oonsi १०३४ महाभारत [ आदिपर्व oroo १८.mcorosopoorcoooc07- - - Co505oCoocom rococcccccok ये तत्र दीक्षिताः सर्वे सदस्याश्च महौजसः सोऽपि राजन्महाभागः स्वपुरं प्राविशत्तदा ॥ ६१ ॥ पूज्यमानो महाभागैाह्मणैर्वेदपारगैः वन्दिभिस्तूयमानश्च नागरैश्चाऽभिनन्दितः एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः कालेन महता चाऽपि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥ ६३ ॥ ऋत्विग्भिः सहितः सर्वःसदस्यैश्च समन्वितः । तस्य सत्रे पपौ वह्निहविर्वादश वत्सरान् ॥ ६४ ॥ सततं चाऽऽज्यधाराभिरकात्म्ये तत्र कर्मणि । हविपा च ततो वह्निः पगं तृप्तिमगच्छत न चैच्छत्पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत्प्रकाशते ततो भगवतो वहेर्विकारः समजायत तेजसा विप्रहीणं च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥ ६७ ।। स लक्षयित्वा चाऽऽत्मानं तेजोहीनं हुनाशनः । जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥ ६८ ॥ तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् . भगवन्परमा प्रीतिः कृता मे श्वेतकेतुना पुरवासियों ने राजाओं में श्रेष्ठ श्वेतकि का अग्नि का रङ्ग फीका पड़ गया, उनका प्रकाश भी अभिनन्दन किया, मागधों ने स्तुति की और धीमा हो गया। हे महाराज ! उस भारी यज्ञ में वेदपाटी ब्राह्मणों ने आदर किया। बहुत समय बीतने । अपरिमित घी पीकर भगवान् हुताशन को विकार पर वह राजा अपने सदस्यों और प्रविजों के साथ ! हो गया। दिन पर दिन तेज से हाथ धोने लगे। स्वर्ग को सिधारे । राजा के यज्ञ में लगातार बारह उनके मन में ग्लानि जान पड़ने लगी। वह अपने वर्ष तक अमि ने पी पिया था। इतना अधिक ! को कम तेजस्वी होते देखकर सर्व लोकों से पूजे धी पी लेने में अगिदेव यहां तक तृप्त हो गये कि जाते हुए पवित्र ब्रह्मलोक में गये ॥६१६८॥ अन्य किसी का दिया हुआ हवि ग्रहण करने की वहां बैठे हुए ब्रह्मा जी के पास जाकर अमि उनमें सामभ्यं न रह गई । अति भोजन के मारे ने कहा-हे जगत्पते ! अब में तेजरहित भार दुर्वक १०३५ महा भारत अध्याय २२६ ] pooo प अरुचिश्चाऽभवत्तीबा तां न शक्नोम्यपोहितुम् । तेजसा विप्रहीणोऽम्मि वलेन च जगत्पते ॥ ७० ॥ इच्छेयं त्वत्प्रसादेन स्वात्मनः प्रकृति स्थिराम् । एतच्छ्रुत्वा हुतवहाद्भगवान्सर्वलोककृत् ॥ ७१ ॥ हव्यवाहमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव स्वया द्वादश वर्षाणि वसोर्धाराहुतं हविः ॥ ७२ ॥ उपयुक्तं महाभाग तेन त्वा ग्लानिराविशत् । तेजसा विप्रहीणत्वात्सहसा हव्यवाहन ॥ ७३॥ मा गमस्त्वं व्यथां बहे प्रकृतिस्थो भविष्यसि । अरुचिं नाशयिष्येऽहं समयं प्रतिपद्य ते ॥ ७४।। पुरा देवनियोगेन यत्वया भस्मसात्कृतम् आलयं देवशत्रूणां सुघोरं खाण्डवं वनम् ॥ ७५ ।। तत्र सर्वाणि सत्वानि निवसन्ति विभावसो । तेषां व मेदसा तृप्तः प्रकृतिस्थो भविष्यसि ॥ ७६ ॥ गच्छ शीघ्र प्रदग्धुं स्वं ततो मोक्ष्यसि किल्विपात् । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं परमेष्ठिमुखाच्च्युतम् ॥ ७७ ।। उत्तमं जवमास्थाय प्रदुद्राव हुनाशनः आगम्य खाण्डवं दावमुत्तमं वीर्यमास्थितः । सहसा प्राज्वलच्चाऽग्निः क्रुद्धो वायुसमीरितः ॥७८ ।। हुआ हू; आपकी कृपा से अपनी पूर्वप्रकृति को जायगा । हे अग्नि ! पूर्व समय में तुमने देवताओं पाना चाहता हा सर्व लोकों के विधाता ब्रह्मा अग्नि की आज्ञा के अनुसार, उनके शत्रु असुर आदि के ये वचन सुनकर मुसकराकर कहने लगे-हे की वासभूमि जिस कठोर खाण्डव वन को भस्म महाभाग ! तुमने बारह वर्ष तक लगातार वसुधारा । किया था, अब उस स्थान में अनेक प्रकार के पात्र से गिर रही घी की धारा को पिया है । इसीसे प्राणी रहते है, तुम उनकी चर्बी से तृप्त होकर तुम इस दशा को प्राप्त हुए हो । हे हव्यवाहन ! ' अपनी प्रकृति को प्राप्त कर सकोगे, सो उस खाण्डव तुम तेज से हीन होने कारण खेद न करो। वन को जलाने के लिये शीघ्र जाओ। उसको जलाने तुम्हें अपना पहले का तेज और स्वास्थ्य फिर मिल से तुम्हारी यह ग्लानि दूर हो जायगी ॥६९।७६।। arokar roors-oce >comre म हा भारत [ आदिपर्व com प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः । परमं यत्नमातिष्ठन्पावकस्य प्रशान्तये ॥ ७९ ॥ करैस्तु करिणः शीघ्र जलमादाय सत्वराः सिषिचुः पावकं क्रुद्धा शतशोऽथ सहस्रशः सहस्रशः ॥८०॥ बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसंततिम् मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ ८१ ॥ तथैवाऽन्यानि सत्वानि नानाप्रहरणोद्यमः विलयं पावकं शीघ्रमनयन्भरतर्षभ ॥ ८२ ॥ अनेन तु प्रकारेण भूयोभूयश्च प्रज्वलन् । सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ॥ ८३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२२५।। पितामह ब्रह्मा के मुख से ये बचन सुनकर | सिरोंवाले सर्प क्रोध स अधीर होकर झटपट मस्तकों अग्निदेव वहां से चल दिये और शीघ्र ही खाण्डव के द्वारा जल ला-लाकर अग्नि पर डालने लगे वन में पहुंचकर वायु की सहायता से प्रज्वलित हो । हे भरतकुलप्रदीप ! इसतरह और-और प्राणियों ने उठे। खाण्डव वन के रहनेवाले सब प्राणी उस वन भी पानी और धूल आदि अनेक उपायों से शीघ्र को जलते देखकर आग बुझाने के लिये अपनी आग बुझाई । हे हव्यवाहन ! अग्नि ने सात बार अपनी शक्ति के अनुसार प्रयत्न करने लगे। सैकड़ों | प्रज्वलित होकर खाण्डव वन को जलाना चाहा, सहस्रों हाथी क्रोध कर शीघ्रता के साथ सूंड से पर प्राणियों ने (और इन्द्र ने ) उन्हें बुझा दिया। तुरन्त जल उठाकर सींचने लगे । बड़े-बड़े बहुत ||७७८३॥ आदिपर्व का दो सौ पच्चीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय. ॥ २२६ ।। वैशम्पायन उवाच-त तु नैराश्यमापन्नः सदा ग्लानिसमन्वितः पितामहमुपागच्छत्संक्रुद्धो हव्यवाहनः तच्च सर्व यथान्यायं ब्रह्मणे स न्यवेदयत् । उवाच चैनं भगवान्मुहूर्त स विचिन्त्य तु ॥ २ ॥ दो सौ इब्जीम अध्याय ॥ २२६ ॥ वैशम्पायन जी बोले-हे महाराज ! ग्लानि और के बारे में निराश हो गये तब यहुत ही क्रुध होकर अजीर्ण से पीड़ित अग्नि जब खाण्डव वन जलाने ब्रह्मा के पास फिर गये। उन्होंने उनको सत्र वृत्तान्त । .. oclic अध्याय २२६ ] महा मारत oolcanoon उपायः परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेऽनघ कालं च कंचित्क्षमतां ततस्त्वां वक्ष्यतेऽनल ॥ ३ ॥ भविष्यतः सहायौ तौ नरनारायणौ तदा ताभ्यां लं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन ॥ ४ ॥ एवमस्त्विति तं वह्निब्रह्माणं प्रत्यभापत संभूतो तो विदित्वा तु नरनारायणावृपी कालस्य महतो राजस्तस्य वाक्यं स्वयंभुवः । अनुस्मृत्य जगामाऽथ पुनरेव पितामहम् ॥ ६ ॥ अब्रवीच तदा ब्रह्मा यथा स्वं धक्ष्यसेऽनल । खाण्डवं दावमद्येव मिपतोऽस्य शचीपतेः ॥ ७ ॥ नरनारायणो यौ तौ पूर्वदेवी विभावसो । संप्राप्तौ.मानुषे लोके कार्यार्थ हि दिवौकसाम् ॥ ८ ॥ अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते । तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपतः तो त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च । ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशेरपि तो तु सत्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः । देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः ॥ ११॥ एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थ वभ्यभाषत ॥ १२ ॥ कह सुनाया । भगवान् ने पलभर सोचकर कहा कि अग्निदेव राह देखने लगे । वहुत समय बीत जाने हे अनघ ! मैने इसका एक अच्छा उपाय निश्चय पर ब्रह्मा जी की बात का स्मरण करके अग्निदेव किया है; उससे तुम इन्द्र के सामने ही खाण्डव जब फिर उनके पास पहुंचे तव उन्होंने कहा-हे वन को जला सकोगे । हे अग्नि ! नर-नारायण विभावसो ! नर-नारायण ने देवकार्य के लिये नाम से प्रसिद्ध सनातन ऋषियों की सहायता से मर्त्यलोक में अवतार लिया है। वे वहां अर्जुन और तुम्हारा कार्य सहज ही हो जायगा । अभी कुछ कृष्ण के नाम से प्रसिद्ध हैं। अब वे दोनों खाण्डव समय तक प्रतीक्षा करो। ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर वन के पास बैठे हुए हैं। तुम खाण्डवदाह के लिये acroc cakaconce >>>rore roycyrromo १०३८ महाभारत [ आदिपर्व Cocococore तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम तच्छ्रुत्वा वचनं स्वग्नेर्वीभत्सुर्जातवेदसम् ॥ १३ ॥ अब्रवीन्नृपशार्दूल तत्कालसदृशं वचः दिधद्धं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः ॥ १४ ॥ अर्जुन उपाच-उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च । यैरहं शक्नुयां योद्धमपि वज्रधरान्वहून् धनुर्मे नास्ति भगवन्वाहुवीर्येण संमितम् कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद्विषहेन्मम ॥ १६ ॥ शरैश्च मेऽर्थो वहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः न हि वोढुं रथः शक्तः शरान्मम यथेप्तितान् ॥ १७ ॥ अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान्वातरंहसः रथं च मेघनिघोपं सूर्यप्रतिमतेजसम् . तथा कृष्णस्य वीर्येण नाऽयुधं विद्यते समम् । येन नागान्पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे उपायं कर्मसिद्धौ च भगवन्वक्तुमर्हसि निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने ॥ २० ॥ उनसे सहायता मागो । तब, देवताओ से रक्षित | मेरे पास नहीं है। फिर शीघ्र वाण चलाने. होंगे, होने पर भी, उस वन को तुम जला सकोगे । इसलिये बहुत से वाणों की आवश्यकता है। मेरे पितामह के ये वचन सुनकर अग्निदेव अर्जुन और पास जो रथ है, वह भी यथेष्ट वाणों के बोझ को कृष्ण के पास गये ।।११२॥ नहीं लाद सकता । इस कारण वायु के समान तेज हे राजा जनमेजय अग्नि ने उनके पास जाकर जानेवाले श्वेत रक्ष के दिव्य घोड़ों से युक्त, चरने जो कुछ कहा, सो मैं पहले ही सुना चुका है। ममय मेघ के समान गम्भीर शब्द करनेवाला, सूर्य तर, इन्द्र की इच्छा न होने के कारण, खाण्डा के समान नमकीला रथ भी चाहिये । और, इन वन जलाने में असमर्थ अग्नि से अर्जुन ने यो श्रीकृष्ण के भुजबीर्य के योग्य कोई अमर नहीं है समयोचित कहा-हे भगवन् ! मेरे पास अनेक दिव्य | कि जिमसे ये रणभूमि में नागों और पिशाचों को अम है। उनकी सहायता से मैं वज्रधारी सैकड़ों गिरा सकें। अतएव हे भगवन् ! ऐमा उपाय बताइए इन्द्रों से युद्ध कर सत्ता है, किन्तु उस घोर युद्ध के । जिसमे हम आपका कार्य सिद्ध कर सके । इस बाहुबल को सभाल सकनेवाला धनुष महारन में वर्षा करते हुए इन्द्र को रोकने के रिये - - समय मेरे crosoyra/cour 7ccoro के ये वचन सुनकर भगवान् धूमकेतु हुनाशन ने दो तस आपके पास हैं उनको हमें दीजिए चार वरुण ने वह सब सामग्री देना म्वीकार कर पिया। महाभारत अध्याय २२७ ] rooooo coco.ooo oncokoooxo००० पौरुषेण तु यत्कार्य तत्कर्तारौ स्व पावक करणानि समर्थानि भगवन्दातुमर्हसि ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे पड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२६॥ युद्ध का सामान चाहिये । पौरुप का जो कार्य है | युद्ध करने के लिये जिन उपकरणों की आवश्यकता वह करने के लिये हम दोनों तैयार है। परन्तु । हो वह आप हमको देवें ॥१३॥२१॥ आदिपर्व का दो मौ छब्बीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२२७ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तः स भगवान्धूमकेतुर्हताशनः चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम् स च तञ्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् ॥ २ ॥ तमब्रवीद्धूमकेतुः प्रतिगृह्य जलेश्वरम् चतुर्थं लोकपालानां देवदेवं सनातनम् सोमेन राज्ञा यहत्तं धनुश्चैवषुधी च ते । तत्प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ॥ ४ ॥ कार्यं च सुमहत्पार्थों गाण्डीवेन करिष्यति । चक्रेण वासुदेवस्य तन्ममाऽद्य प्रदीयताम् ॥ ५ ॥ ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभापत तदद्भुत महावीर्यं यशःकीर्तिविवर्धनम् दो सौ सत्ताईस अध्याय २२७ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अर्जुन कहा राजा सोम का दिया हुआ जो धनुप और जल में रहनेवाले, जलनाथ, ,अदिति नन्दन, लोकपाल . उम रथ को भा दीजिए जिसकी धजा में वानर वरुण को देखने की इच्छा से उन्हें स्मरण किया। का चिन्ह है । उस गाण्डीव धनुष से अर्जुन बार जल के ईश्वर वरण उनका स्मरण करना जानकर उनके चक्र से श्रीकृष्ण जी बड़े भारी कार्य को करेंगे । सम्मुख मा पहुचे । चौथे लोकपाल सनातन देव अब वरण देवता ने महावीर्य-युन, यश को। वरुण का यथोचित आदर करके अग्नि ने उनसे womaa म हा भारत [ आदिपर्व ooloorx 707o7oo सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च सर्वायुधमहामात्रं परसैन्य प्रधर्षणम् एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् चित्रमुच्चावचैवर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमत्रणम् देवदानवगन्धर्वः पूजितं शाश्वतीः समाः प्रादाच्चैव धनूरत्नमक्षय्यौ च महेषुधी रथं च दिव्याश्वयुजं कपिप्रवरकेतनम् उपेतं राजतरश्चैर्गान्धहेममालिभिः पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवायुसमैर्जवे सर्वोपकरणैर्युक्तमजय्यं देवदानवैः भानुमन्तं महाघोषं सर्वरत्नमनोरमम् ससर्ज यं सुतपसा भौमनो भुवनप्रभुः ॥ १२ ॥ प्रजापतिरनिर्देश्यं यस्य रूपं वेरिख यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजयत्प्रभुः ॥ १३ ॥ नवमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिया आश्रितो तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमावुभौ ॥ १४ ॥ बढानेवाला, सब शस्त्रों से अभेद्य, सब शस्त्रों को और सब उपकरणों से भरा और देव दानवों से फाट देनेवाला, शत्रु की बड़ी भारी सेना को नष्ट । अजेय, जिसकी गड़गड़ाहट बड़ी दूर से सुनाई देती करतेमाल, सरोद्धा के राज्य को रवाशाला, सैकड़ों है, जिसको भुरन के प्रभु प्रजापति शिवमी में हजारों चाप का सामना करने पर भी न टूटने पूटने- बड़ी तपस्या से बनाया था, जिसका रूप सूर्य सदृश वाला, रङ्ग रिग के सुन्दर सुन्दर वर्णों से रगा, । दृष्टि से देखने के अयोग्य, जिसपर चढकर प्रभु मनोहर और जिसकी पूजा देव-दानव-गन्धर्व सदा सोम ने दानवों को परास्त किया था, जिसका उजाला किया करते है, ॥१८॥ बहुत अधिक है, जिसके रिण दूर से अनुभव ऐमा ही अद्भुत गाण्डीव धनुष तथा दो अक्षय होने है, जो आकाशतल के नये बादल के समान तर्कस अर्जुन को दिये । जो रथ मन और पवन देस पड़ता है, जिसके ऊपर इन्द्र धनुष सदृश की भाति वेगवान्, पाण्डुवर्ण बादल सदृश चादी 'गोभायमान् मनोहर परम सुन्दर सुनहले झण्डे की की नाई उजारे पारा, सुवर्ण सुशोभित गन्धर्वो के लाड़ी के ऊपर सिंह शार्दूल समान पराक्रमी मुन्दर नगर के घोड़ों से म्बीचा जाता है, जो दिव्याम्य दिव्य चन्दर मानों सर्व लोकों को जनगने की इच्ण -- yrrarry-in- अध्याय २२७ ] महा भारत 03ompoo070200500re poroorce more तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूलकेतनः दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्त्यशोभत । ध्वजे भूतानि तत्राऽऽसन्विविधानि महान्ति च ॥ १६ ॥ नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति । स तं नानापताकाभिः शोभितं रथसत्तमम् ॥ १७ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य देवतेभ्यः प्रणम्य च संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलिनकः ॥ १८ ॥ आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा तच्च दिव्यं धनुः श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ १९ ॥ गाण्डीवमुपसंगृह्य वभूव मुदितोऽर्जुनः हुताशनं पुरस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् ॥ २० ॥ जग्राह वलमास्थाय ज्यया च युयुजे धनुः । मौव्यां तु योज्यमानायां बलिना पाण्डवेन ह ॥ २१ ॥ येऽशृण्वन्कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः । लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाऽक्षय्ये महेपुधी ॥ २२ ॥ बभूव कल्यः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः से विराज रहा है, और वजा पताका में प्रगटित पर सवार हुए। पहले ब्रह्मा ने जिसे बनाया था भाति-भाति के भूना के गम्भीर कोलाहल को सुनकर उस दिव्य गाण्डीव धनुष को पार अर्जुन के शत्रुसेना की चैनना जाती रहती है ॥९१६॥ आनन्द का ठिकाना न रहा । अग्नि को प्रणाम वरण जी ने ऐमा कपिवर सहित जायुक्त रथ करके अर्जुन ने उस धनुष को हाथ में लिया और दिया। कवन, खड्ग, उँगलियों में अङ्गुस्त्रिाण उम पर डोरी चदाई । वरी अर्जुन ने जिम समय आदि पहने हुए अर्जुन ने पहले उस रथ की उंय शुसाकर उस पर डोरी चदाई उस समय उसका प्रदक्षिणा की, फिर देवनाओं का मणाग दिया। शब्द निमने सुना उमी का हृदय काँप रटाइम विमान पर पुण्यात्मा पुष्प मे घटत है वही प्रकार दिव्य धनुप, रथ और दो अक्षय तक्म पार अर्जुन मी अनेक पताओं से युगामित उम रथ अर्जुन बहुन मन हुए। उन्हें निधय हो गया कि Air १०४२ महा भारत [ आदिपर्व recipe 200ococco० ye. - orcinedcinnamrowaro - आग्नेयमस्त्रं दयितं स च कल्पोऽभवत्तदा अब्रवीत्पावकश्चैवमेतेन मधुसूदन अमानुपानपि रणे जेप्यास त्वमसंशयम् अनेन तु मनुष्याणां देवानामपि चाऽऽहवे रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाऽधिकस्तथा । भविष्यसि न संदेहः प्रवरोऽपि निवर्हणे ॥ २६ ॥ क्षिप्तं क्षिप्त रंणे चैतत्त्वया माधव शत्रुपु हत्वाऽप्रतिहतं सङ्ख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ॥ २७ ॥ वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्त्रनाम् दैत्यान्तकरणी घोरां नाम्ना कौमोदकी प्रभुः ॥ २८ ॥ ततः पावकमबूतां प्रहृष्टावर्जुनाच्युतो कृतास्त्रौ शस्त्रसंपन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ॥ २९॥ कल्यौ स्वो भगवन्योभुमपि सर्वेः सुरासुरैः । किं पुनर्वत्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सुना । ३०॥ अर्जुन उवाच-चक्रपाणिर्हपीकेशो विचरन्युधि वीर्यवान् त्रिषु लोकेषु तन्नाऽस्ति यन्न कुर्याजनार्दनः ॥ ३१ ॥ अब अच्छीतरह खाण्डवदाह के काम में अग्नि की | फेंका जाय तो भी बिना रुकावट शत्रुओं का नाश सहायता कर सकेंगे। अनन्तर अग्नि ने श्रीकृष्णचन्द्र करता हुआ फिर आपके हाथ में आ जायगा । को दिव्य चक और प्रिय आमेय अस्त्र दे दिया । ॥२४॥२६॥ चक्र और अस्त्र पाकर श्रीकृष्ण भी अग्मि की सहायता वैशम्पायन कहते हैं-हे राजन् ! अनन्तर वरुण करने को तैयार हो गये ।।१७।२३॥ ने प्रसन्न होकर दैत्यकुलनाशी, घोररूपी वज समान अब अग्नि ने उनसे कहा-हे मधुसूदन ! आप गरजनेवाली, 'कौमुदकी' गदा उनको दी। इसप्रकार युद्धस्थल में इस अस्र से मनुष्यों के अतिरिक्त ध्वजा, रथ और शस्त्र पाकर श्रीकृष्ण और अर्जुन असुर आदि अन्य प्राणियों को भी परास्त कर ने कहा-हे अग्निदेव ! अब हम सब देवताओं और सकेंगे, इसमें संदेह नहीं । आप रणस्थल में इम दैत्यों से एक साथ संग्राम कर सकते है । सांप की चक्र से देव, दानव, राक्षस, पिशाच, नाग और रक्षा के लिये यदि अकेले इन्द्र आयेंगे तो उनसे मनुष्य इनसे निःसंदेह अधिक शक्तिशाली होगे । | लड़ना तो कोई बड़ी बात नहीं ॥२७॥२९॥ हे माधव ! यह अम्मा यदि शत्रुदल पर बार-बार , अर्जुन ने कहा-हे अमिदेव! तीनों लोकों में ऐसा । .. 4 - rrorshi0niraractervc. C १०४३ महा भारत अध्याय २२८ ] Scoooo acto4 3oor गाण्डीवं धनुरादाय तथाऽक्षय्ये महेषुधी । अहमप्युत्सहे लोकान्विजेतुं युधि पावक सर्वतः परिवार्यव दावमेतं महाप्रभो कामं संप्रज्वलाऽयैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तः स भगवान्दाशार्हेणाऽर्जुनेन च तेजस रूपमास्थाय दावं दग्धं प्रचक्रमे ।। ३४ ॥ सर्वतः परिवार्याऽथ सप्तालिनस्तथा ददाह खाण्डवं दावं युगान्तमिव दर्शयन् ॥ ३५ ॥ प्रतिगृह्य समाविश्य तदनं भरतर्षभ मेघस्तनितनिर्घोपः सर्व भूतान्यकम्पयत् ॥ ३६॥ दह्यतस्तस्य च वभौ रूपं दावस्य भारत मेरोरिव नगेन्द्रस्य कीर्णस्यांशुमतोंऽशुभिः ॥ ३७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपर्वणि साण्डवदाहे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२७॥ पदार्थ ही नहीं है, कि जिसे वीर्यवन्त चक्रपाणि । रूप धारण करके उस वन को जलाने लगे । सात जनार्दन रणस्थल में टहलते हुए इस चक्र से मार जिहाएँ (शिखा) फैलाकर चारों ओर से घेरकर नहीं सकेंगे। मै भी यह अक्षय तर्कस और गाण्डीव दावानल के रूप से जब वे उस वन को जलाने धनुष लेकर मम्पूर्ण लोक परास्त करने का साहस लगे तब प्रलयकाल सा जान पड़ने लगा । अग्नि कर सकता है। इसलिये अब आप आज ही अपनी के प्रज्वलित होने मे चारों ओर मेघ गर्जन का सा इच्छानुमार इस बड़े वन को सम्पूर्ण रूप से घेरकर घोर शब्द सुन पड़ने लगा। वह प्रचण्ड रूप देखकर जलाइये; हम अपकी सहायता करने को तैयार सब प्राणो थरथगने लगे । आग से जलते हुए उस वन की वैसी ही शोभा हुई जैसी सूर्य की किरणों वैशम्पायन कहने हैं महात्मा अर्जुन और से व्याप्त सुमेरु पर्वत की होती है ॥३३॥३६॥ श्रीकृष्ण चन्द्र के ये बचन सुनकर अनिदेव तेजोमय आदिपर्व का दो मो सनाईम अध्याय ममाप्त हुआ। है ॥३०॥३२॥ अथ अष्टाविंशत्यधिद्विशततमोऽध्याय ॥२२८ ॥ वैशम्पायन उवाच-तो रथाभ्यां रथिश्रेष्ठ दावस्योभयतः स्थितो । दिक्षु सर्वासु भूतानां चक्राने कदनं महत् ॥ १ ॥ Arrrrrrrrrrrrrrror Jy- १०४४ म हा भारत [ आदिपर्व Coloocoroonoco Doc.2000dooooooooo .. । Decozoooozcooproce यत्र यत्र च दृश्यन्ते प्राणिनः खाण्डवालयाः । पलायन्तः प्रवीरो तो तत्र तत्राऽभ्यधावताम् ॥ २ ॥ छिद्रं न स्म प्रपश्यन्ति रथयोराशुचारिणोः । आत्रिद्धाविव दृश्येते राथिनौ तौ रथोत्तमो खाण्डवे दह्यमाने तु भूतानि शतसङ्घशः । उत्पेतुभैरवान्नादान्विनदन्तः समन्ततः दग्धैकदेशा बहवो निष्टप्ताश्च तथाऽपरे स्फुटिताक्षा विशीर्णाश्च विप्लुताश्च तथा परे ॥ ५ ॥ समालिंग्य सुतानन्ये पितॄन्भ्रातृनथाऽपरे त्यक्तुं न शेकुः स्नेहेन तत्रैव निधनं गताः ॥ ६ ॥ संदष्टदशनाश्चाऽन्ये समुत्पेतुरनेकशः ततस्तेऽतीव घूर्णन्तः पुनरग्नौ प्रपेदिरे ॥ ७ ॥ दग्धपक्षाक्षिचरणा विचेष्टन्तो महीतले तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते विनश्यन्तः शरीरिणः जलाशयेषु तप्तेषु क्वाथ्यमानेषु वह्निना गतसत्ताः स्म दृश्यन्ते कूर्ममत्स्याः समन्ततः ॥ ९ ॥ दो सौ अट्ठाईस अध्याय ॥ २८ ॥ वैशम्पायन कहते है--हे राजा जनमेजय । अनन्तर | किसी-किसी का एक-एक अङ्ग जल गया, कोई-कोई रथियों में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन स्थपर चढकर अधिक ऑच में झुलसकर गिर गया। किसी-किसी उस वन के चारों ओर घूम-घूमकर भाग रहे असुर, जीव की आखें फूट गई । कोई-कोई दुबला हो पिशाच आदि का नाश करने लगे । जिधर खाण्डव गया। कोई भय से दौड़ने लगे। किसी-क्सिी वन के रहने वाले प्राणी भागते देख पड़ते थे उधर प्राणी ने बच्चे से, किसी-किसी ने पिता से, किसी-किसी ही ये दोनों वीर दौड़ते थे ॥१२॥ ने भाई से लिपटकर वांसस्थल ही में प्राण छोड़े, इतनी तेजी के साथ श्रीकृष्ण और अर्जुन चीं पर स्नेहवश उनको छोड़ नहीं सके ॥३६॥ की तरह अपने रथों को चारों और फिरा रहे थे कोई-कोई दात से दांत पीसता अनेक बार गिरता कि दोनों रथ एक में सटे हुए से जान पड़ते थे। पड़ता और बहुत चकर खाता फिर आग में गिरने खाण्डव यन के जलन से सैकड़ों हजारों प्राणी बड़ा । लगा। जिनके पङ्ख, आख, पाव आदि अन जल कोलाहल मचाते हुए चारों और गिरने लगे गये थे ऐसे बहुत से पक्षी और पशु आदि शरीर- . 1 ~ur १०४५ म हा भारत अध्याय २२८ ] co०० .. शरीरैरपरैर्दीप्तदेहवन्त इवाऽग्नयः अदृश्यन्त वने तत्र प्राणिनः प्राणसंक्षये ॥ १० ॥ कांश्चिदुत्पततः पार्थः शरैः संछिद्य खण्डशः पातयामास विहगान्प्रदीप्ते कृष्णवर्मनि ते शराञ्चितसर्वाङ्गा निनदन्तो महारवान् ऊर्ध्वमुत्पत्य वेगेन निपेतुः खाण्डवे पुनः ॥ १२ ॥ शरैरभ्याहतानां च सङ्घशः सम वनौकसाम् । विरावः शुश्रुवे घोरः समुद्रस्येव मथ्यतः ॥ १३ ॥ वह्नश्चापि प्रदीप्नस्य खमुत्पेतुर्महार्चिपः जनयामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम् ॥ १४ ॥ तेनाऽर्चिपा सुप्ततप्ता देवाः सर्पिपुरोगमाः । ततो जगमुर्महात्मानः सर्व एव दिवौकसः । शतक्रतुं सहस्राक्षं देवेशमसुरार्दनम् देवा ऊचु-किंन्विमे मानवाः सर्वे दह्यन्ते चित्रभानुना । कञ्चिन्न संक्षयः प्राप्नो लोकानाममरेश्वर ॥ १६ ॥ धारी वहां स्थान-स्थान पर तड़पते देख पड़ समुद्र मथने के समय जैसा भयानक शब्द हुमा था वैसा ही भयानक शब्द उन वाणों से घायल वन के भीतर के जलाशयों का पानी अग्नि से | और अग्नि से प्रचलित पक्षियों का सुन पड़ने लगा। तपने और उबलने लगा। उनके भीतर रहनेवाले आकाश-मण्डल तक उठती हुई अग्नि की बड़ी-बड़ी क्छुए, मछली आदि जीव इधर-उधर मरे दिखाई | शिखायें देखकर स्वर्ग आदि लोकों के निवासी देवता देने लगे । उस वन में देहियों की जो सब देह भी बहुत घबरा गये ॥१३॥१४॥ जली यह सब जली देह मानों भाति-भांति की अनन्तर महात्मा देवगण आग की गर्मी से अग्निदेह के समान प्रतीत होती थी ॥९॥१०॥ अत्यन्त तपकर जब घबरा उठे तय, ऋपियों को उस वन से जो सब पक्षी उछल रहे थे, अर्जुन आगे करके, असुर-शत्रु इन्द्र के पास गये । वहां उनको वाणों से टुकड़े-टुकड़े कर जलते हुए अग्नि जाकर उन्होंने कहा-हे देवगज 1 ये प्रचण्ड अग्निदेव में गिराने लगे। वे प्राणी देह काटे जाने से बड़ा क्या सम्पूर्ण मनुष्य-लोक को भस्म कर डालेंगे ? कोलाहल मचाते हुए वेग से कुछ ऊपर चढकर क्या हम लोगों के लोकों के भी प्रलय का समय फिर उस खाण्डव वन ही में गिरने लगे ॥११॥१२॥ आ गया है ? ॥१५॥१६॥ रहे थे ||७८॥ । Home24 175722 ocomod Corok १०४६ महा भारत [ आदिपर्व 50wcorrcom X cono co004 porncornvrokoleso - वैशम्पायन उवाच-तच्छुत्वा वृत्रहा तेभ्यः स्वयमेवाऽन्ववेक्ष्य च । खाण्डवस्य विमोक्षार्थ प्रययौ हरिवाहनः ॥ १७ ॥ महता रथवृन्देन नानारूपेण वासवः आकाशं समवाकीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः ततोऽक्षमात्रा व्यस्सृजन्धाराः शतसहस्रशः चोदिता देवराजेन जलदाः खाण्डवं प्रति ॥ १९ ॥ असंप्राप्तास्तु ता धारास्तेजसा जातवेदसः ख एव समशुष्यन्त न काश्चित्पावकं गताः ॥ २० ॥ ततो नमुचिहा क्रुद्धो भृशर्चिष्मतस्तदा पुनरेव महामेधैरम्भांसि व्यसृजद्वहु ॥ २१ ॥ अर्चि/राभिसंबद्धं धूमविद्युत्समाकुलम् बभूव तद्वनं घोरं स्तनयित्नुसमाकुलम् ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि इन्द्रक्रोधे अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥ वैशम्पायन कहते है-हे राजन् ! देवताओं के | में ही सूख जाने लगा; आग तक एक भी बूंद न मुख से अग्नि के प्रचण्ड होने का हाल सुनकर | पहुंच सकी ॥१९॥२०॥. और आप भी वह दृश्य देखकर इन्द्रदेव खाण्डव तव नमुचि दैत्य को मारनेवाले इन्द्र अधिक वन की रक्षा करने को चले। देवराज इन्द्र अनेक । कुपित होकर फिर बड़े-बड़े बादलों से अग्नि के रूपोंवाले मेघों से आकाशमण्डल को व्याप्त करके ऊपर बहुत जल वपीने लगे । अग्नि की शिखाओं ज़ोर से जल की वर्षा करने लगे । सैकड़ों बादल और जल की धाराओं से पूर्ण उस वन के ऊपर देवराज की आज्ञा से खाण्डव वन पर रथ के पहिये । धुआँ छाया हुआ था । बादलों के दल से बार-बार की लकड़ी के समान मोटी धार से जल वर्षाने । बिजलियां चमक रही थीं। उम वन का दृश्य लगे। किन्तु अग्नि के प्रचण्ड तेज से वह जल राह । बहुत ही भयानक हो उठा ॥२१॥२२॥ आदिपर्व का दो सौ अट्ठाईस अध्याय समाप्त हुआ।। अथ ऊनत्रिंदात्यधिसद्विशततमोऽध्यायः ।. २२९ ।। । वैशम्पायन याच-तस्याऽथ वर्पतो वारि पाण्डवः प्रत्यवारयत् । शरवर्षेण वीभत्सुरुत्तमात्राणि दर्शयन् दो सा उनतीम अध्याय ॥२२९ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! देवराज इन्द्र को इसप्रकार जल की वर्षा करते देखकर पाण्टुनन्दन । -- Coric coo - - - अध्याय २२९ ] म हा भारत १०४७ promorcrorod खाण्डवं च वनं सर्व पाण्डवो बहुभिः शरैः । प्रच्छादयदमेयात्मा नीहारेणेव चन्द्रमाः न च स्म किंचिच्छनोति भूतं निश्चरितुं ततः । संछाद्यमाने खे वाणरस्यता सव्यसाचिना तक्षकस्तु न तत्राऽऽसीन्नागराजो महाबलः दह्यमाने वने तस्मिन्कुरुक्षेत्रं गतो हि सः अश्वसेनोऽभवत्तस्य तक्षकस्य सुतो वली स यत्नमकरोत्तीनं मोक्षार्थं जातवेदसः न शशाक स निर्गन्तुं निरुद्धोऽर्जुनपत्रिभिः । मोक्षयामास तं माता निगीर्य भुजगात्मजा ॥ ६ ॥ तस्य पूर्व शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगार्यते निगीर्यमाणा साऽकामसुतं नागी मुमुक्षया ॥ ७ ॥ तस्याः शरेण तीक्ष्णेन पृथुधारेण पाण्डवः । शिरश्चिच्छेद गच्छन्त्यास्तामपश्यच्छचीपतिः तं मुमोचयिपुर्वजी वातवर्पण पाण्डवम् । मोहयामास तत्कालमश्वसेनस्त्वमुच्यत भर्जुन ने अपन उप अमां की सहायता से उस नाग-नन्दिनी ने टंग छुराने का एक यन किया। वर्षा को रोक दिया। जमे चन्द्रमा ओम में जगत यह उमे निगर गई । उमे मिर की ओर से निगलकर कोला देते हैं येमे ही महावीर अजुन अपने पंछ की और निगलने-निगरने यह आसाममार्ग से पाणों से सम्पूर्ण मण्डन यन को छा दिया । बन निकल रही थी । उमे जाने देष अर्जुन ने चौड़ी के ऊपर का आकारामण्डल मयमाची धनायके नाक्यागनापण यात मार उमामिर बाट याणों से हमारा गया कि कोई प्रणा उभा दिगा । इन्द्र ने यह देगार अश्वमग को मनाने मे निकलन गरी महारी मांग न उम के लिये शिा परन नगर अर्जुन को मोह समय रक्षेत्र की गगा हुआ था ॥११॥ महागा टगी ममय, भरमर पार, गानाक उमा पुत्र परी अमन गाण्डर पन में ही हमारी में अमन नि मागा । इमार धागा भा। ना उगपुर ने भगिनिानने की देर नाग निकर गया। हम बात को भार इन पसीना पानु भजुन यानी भरट की माया को दंगार अनन की भी मी माघ मरे पर निसनदी समीनार चा पाया, में भाग में जा पक्षियों कभी ।
१०४८ महा भारत [ आदिपर्व poczoooococ 700200 ocol00700cccc0000000 ocorororoscocoroscorcha तां च मायां तदा दृष्ट्वा घोरां नागेन वञ्चितः । द्विधा त्रिधा च खगतान्प्राणिनः पाण्डवोऽच्छिनत् ॥ १० ॥ शशाप तं च संक्रुद्धो वीभत्सुर्जिह्मगामिनम् पावको वासुदेवश्चाऽप्यप्रतिष्ठो भविष्यसि ततो जिष्णुः सहस्राक्ष ख वितत्याऽऽशुगै शरैः । योधयामास संक्रुद्धो वञ्चनां तामनुस्मरन् ॥ १२ ॥ देवराजोऽपि तं दृष्ट्वा संरब्धं समरेऽर्जुनम् खमस्त्रमसृजत्तीवं छादयित्वाऽखिलं नभः ततो वायुमहाघोषः क्षोभयन्सर्वसागरान् वियत्स्थो जनयन्मेघाञ्जलधारासमाकुलान् ततोऽशनिमुचो घोरास्तडित्स्तनितनिःस्विनान् । तद्विघातार्थमसृजदर्जुनोऽप्यस्त्रमुत्तमम् ॥ १५ ॥ वायव्यमभिमन्याऽथ प्रतिपत्तिविशारदः तेनेन्द्राशनिमेघानां वीर्योजस्तद्विनाशितम् ॥ १६॥ जलधाराश्च ताः शोपं जग्मुर्नेशुश्च । विद्युनः । क्षणेन चाऽभवद्वयोम संप्रशान्तरजस्तमः सुखशीतानिलवहं प्रकृतिस्थार्कमण्डलम् निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग्विविधाकृतिः ॥ १८ ॥ टुकड़े-टुकड़े करके आग में गिराने लगे ॥५॥१०॥ लिया । इसके पश्चात् पवन ने बड़े शब्द के साथ कुद्ध होकर अर्जुन, श्रीकृष्ण और अमि ने फैलकर सम्पूर्ण समुद्र में हलचल मचा कर आकाश अश्वसेन नाग को शाप दिया कि तू जगत् में प्रतिष्ठा- में जलधारा वर्षानेवाले बादलों को पैदा किया। उन हीन होकर रहेगा। अब इन्द्र के धोखा देने की सब बादलों से उस स्थान में विजली वज्राघात और बात को म्मरण करके अर्जुन अत्यन्त कुपित होकर गड़गड़ाहट के साथ जलधारा वर्षने लगी। प्रतिविधान तीक्ष्ण और शीघ्रगामी वाण चलाकर उनसे युद्ध | की शक्ति रखनेवाले अर्जुन ने उन सव को दूर करने लगे ॥११॥१२॥ करने के लिय सुन्दर यायव्यास्त्र मन्त्र पढ़कर छोड़ा, देवराज ने भी उनको युद्ध में कटिबद्ध देखकर उससे इन्द्र के उस बज बादलों का वीर्य अपना तीक्ष्ण अस्व छोड़कर भामाशमण्डल को छा तथा तेज नष्ट हुआ ॥१३॥१६॥ - - .. 7.5cmvr00000 -mosozore12--0oro १०४९ पहा भारत अध्याय २२९ ] 2000 . सिच्यमानो वसौघेस्तैः प्राणिनां देहनिःसृतैः । प्रजज्वालाऽथ सोऽर्चिष्मान्स्वनादैः पूरयञ्जगत् ॥ १९ ॥ कृष्णाभ्यां रक्षितं दृष्ट्वा तं च दावमहंकृताः खमुत्पेतुर्महाराज सुपर्णाद्याः पतत्रिणः ॥ २० ॥ गरुत्मान्वजसदृशैः पक्षतुण्डनखैस्तथा प्रहर्तुकामो न्यपतदाकाशात्कृष्णपाण्डवों ॥ २१ ॥ तथैवोरगसङ्घाताः पाण्डवस्य समीपतः उत्सृजन्तो विषं घोरं निपेतुर्बलिनाननाः ॥ २२ ॥ तांश्चकत शरैः पार्थः स्वरोपाग्निसमुक्षितैः विविशुश्चाऽपि तं दीप्तं देहभावाय पावकम् ॥ २३ ॥ ततोऽसुराः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः उत्पेतुर्नादमतुलमुत्सृजन्तो रणार्थिनः ।। २४ ।। अयःकणपचक्राइमभुशुण्ड्युद्यतवाहवः कृष्णपार्थों जिघांसन्तः क्रोधसमूछितौजसः ॥ २५ ॥ तेषामतिव्याहरतां शस्त्रवर्ष प्रमुश्चताम् प्रममाथोत्तमाङ्गानि वीभत्सुनिशितैः शरैः ॥ २६ ।। और जलधारा सूखी तथा बिजली नष्ट हुई श्रीकृष्ण और अर्जुन पर वज्रमदृश पलों, चोंचों पलभर में आकाशमण्डल गर्द और अन्धेरी से साफ और नखा का वार करने के लिये आकाश से गरुड़ हो गया । सुखदाई ठण्डी हवा चलने लगी । सूर्य उनपर झपटं । बड़े-बड़े विषधर सर्प गुख से विष मण्डल पहले के समान उज्ज्वल रूप से प्रगट हो ' उगलते हुए उन दोनों की ओर चले। परन्तु अर्जुन गया । यह देखकर अमिदेव निर्भय हो गये और ने क्रोधित होकर अपने वाणों से उनके टुकड़े-टुकड़े प्रसन्न होकर सब जीवों के अङ्ग से निकली हुई कर डाले। इससे वे अग्नि में गिर-गिरकर भम्म होने चर्चा को पीकर बड़े तेज से वन को प्रज्वलित करने लगे। इसके पश्चात् अमुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और लगे। हे महाराज ! श्रीकृष्ण और अर्जुन को नागगण युद्ध करने के लिये भयानक शब्द से इसप्रकार दावानल की सहायता करते देखकर उस गते और हाथों में 'अय कणप' अर्थात् गोलियों वन के रहनेवाले गरुड़ आदि पक्षी बहुत क्रोध से भरा हुआ गोला और चक्राश्म अर्थात् एक यन्त्र करके भामाशमार्ग को उड़े और वहा से इन दोनों जिसको घुमाने से पत्थर दूर तक फेंके जा सकते वीरों पर वार करने के लिये टूट पडे ॥१७२०॥ है और भुशुण्डी अर्थात् चमड़े डारियों-सहित Horce woocrcmomroo १०५० महा भारत [ आदिपर्व । Cocorcococore कृष्णश्च सुमहातेजाश्चक्रेणाऽरिवनाशनः दैत्यदानवसङ्घानां चकार कदनं महत् ॥ २७॥ अथाऽपरे शरैर्विद्धाश्चक्रवेगेरितास्तथा वेलामिव समासाद्य व्यतिष्ठन्नमितौजसः ॥ २८ ॥ ततः शक्रोऽतिसंकुद्धस्त्रिदशानां महेश्वरः पाण्डुरं गजमास्थाय तावुभौ समुपाद्रवत् ॥ २९ ॥ वेगेनाऽशनिमादाय वज्रमस्त्रं च सोऽसृजत् । हतावताविति प्राह सुरानसुरसूदनः ॥३०॥ ततः समुद्यतां दृष्ट्वा देवेन्द्रेण महाशनिम् । जगृहुः सर्वशस्त्राणि स्वानि स्वानि सुरास्तथा ॥ ३१ ॥ कालदण्डं यमो राजन्गदां चैव धनेश्वरः पाशांश्च तत्र वरुणो विचित्रं च तथाऽशनिम् ॥ ३२ ॥ स्कन्दः शक्तिं समादाय तस्थौ मेरुरिवाऽचलः । ओपधीर्दीप्यमानाश्च जगृहातेऽश्विनावपि ॥ ३३ ॥ जगृहे च धनुर्धाता मुसलं तु जयस्तथा पर्वतं चाऽपि जग्राह क्रुद्धस्त्वष्टा महाबलः ॥ ३४ ॥ एक पत्थर आदि फेकने का यन्त्र और-और अनेक । चीट से घूमते हुए तिनके स्थिर होते हैं ॥२७॥२८॥ प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिये हुए अर्जुन और श्रीकृष्ण अनन्तर देवों के अधीश असुरों के नाश के मारने को वहां आये और अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा | करनेवाले इन्द्र बहुत ही कुपित होकर सफ़द गजराज करने लगे । उन्हें गालियां और कठोर वचन कहते । ऐरावत पर चढ़कर श्रीकृष्ण और अर्जुन की ओर और शस्त्रों की वर्षा करते देखकर अर्जुन उमी , दौड़े । इन्द्र ने अपना अमोघ अस्त्र बज्र अर्जुन दम अपने तीक्ष्ण वाणों से उनके सिर काटने लगे। और श्रीकृष्ण पर चलाने के लिये तान कर देवताओं ॥२१॥२६॥ से कहा-अभी में इन दोनों को मारे डालता है। शत्रुकुलनामी बड़े तेजम्बी श्रीकृष्ण भी अपने बस, उन्होंने वजास्त्र छोड़ दिया। इन्द्र को वनात्र दिव्य चक्र को चलाकर उन सब दैत्यों और दानवों छोड़ने देखकर सब देवता अपने-अपने अस्त्र लेकर का नाश करने लगे। कोई-कोई अति यली दैत्य दानव । अर्जुन और श्रीकृष्ण की ओर झपटे। हे महाराज! शरों से विद्ध और चक्र से घायल हो उत्साह छोड़ यमराज कालदण्ड लेकर खड़े हुए, कुबेर ने गदा ऐमे चुप हुए, कि जैसे जल के सोते में लहर की 'ली, वरुण ने पाश और विनित्र बज लिया, मन्द - Ju अध्याय २२९ ] म हा भारत १०५१ CoO4 Soo 00000000000000calcord - अंशस्तु शक्तिं जग्राह मृत्युर्देवः परश्वधम् । प्रगृह्य परिघं घोरं विचचाराऽयमा अपि मित्रश्च क्षुरपर्यन्तं चक्रमादाय तस्थिवान् । पूपा भगश्च संक्रुद्धः सविता च विशांपते आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशाः कृष्णपाएँ प्रदुद्रुवुः रुद्धाश्च वसवश्चैव मरुतश्च महावला: विश्वेदेवास्तथा साध्या दीप्यमानाः स्वतेजसा । एते चान्ये च बहवो देवास्तौ पुरुपोत्तमो कृष्णपार्थो जिघांसन्तः प्रतीयुर्विविधायुधाः । तत्राऽद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे युगान्तसमरूपाणि भूनसमोहनानि च तथा दृष्ट्वा सुसंरब्धं शक देवैः सहाच्युतौ ॥४०॥ अभीती युधि दुर्द्धपों तस्थतुः सज्यकार्मुको । आगच्छतस्ततो देवानुभौ युद्धविशारदौ ॥ ४१ ॥ व्यताडयेतां संक्रुद्धौ शरैर्वोपमैस्तदा असकृद्भग्नसंकल्पाः सुराश्च बहुशः कृताः शक्ति लेकर अचल गिरि मेरु की भांति खड़े हुए, तथा अन्य अनेक देवता अपने-अपने अब लेकर दोनों अश्विनीकुमार हाथों में दीप्यमान औषधि | पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण और अर्जुन को मारने की लेकर खड़े हुए, धाता ने धनुप लिया, जय ने मूमल । इच्छा से उनकी ओर दौड़ पड़े ॥३६॥३९॥ लिया, महाबली घटा ने पर्वत उठाय', ने उस समय वहां युद्ध के मैदान में प्राणियों को शक्ति और मृत्यु ने परश्चय हाथ में लिया । अर्यमा घबरा देनेवाले वही सब उत्पात देख पड़ने लगे, जो भयानक परिघ लेकर घूमने लग ॥२९॥३५॥ प्रलय के समय दिखाई पड़ते है । युद्ध में अति मित्र नाम के आदित्य ने छुरे की धार के समान कठोर अर्जुन और श्रीकृष्ण देवों के साथ इन्द्र को तीक्ष्ण चक्र हाथ में लिया। हे राजन् ! भग, पूपा । युद्ध में सब प्रकार से सन्नद्ध देखकर सज्य शासन और सविता नाम के आदित्य भयानक धनुष और लेकर निर्गय और अदलवित से खड़े हुए। युद्ध में निस्विंश लेकर क्रोध से श्रीकृष्ण और अर्जुन की दक्ष वे दोनों वीर सब आये हुए देवों को पज और दो । अपने तेज से जलनेवाले महाबली समान वाणों से क्रोधपूर्वक सब प्रकार से पछाड़ने रुद्रगण, वसुगण, मरहण, विश्वेदेवा और साध्यगण लो ॥४०॥४॥ : अश - Mm १०५२ म हा भारत [ आदिपर्व o20scooo 000000000000 oloococca Ocrososomioxoswwwxas भयाद्रणं परित्यज्य शकमेवाभिशिश्रियुः दृष्ट्वा निवारितान्देवान्माधवेनार्जुनेन च आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनयो नभसि स्थिताः शक्रश्चापि तयोर्वीर्यमुपलभ्योऽसकृद्रणे ॥ ४४ ॥ बभूव परमप्रीतो भूयश्चैतावयोधयत् ततोऽश्मवर्ष सुमहद्व्यसृजत्पाकशासनः भूय एवं तदा वीर्य जिज्ञासुः सव्यसाचिनः । . तच्छरैरर्जुनो वर्ष प्रतिजन्नेऽत्यमर्पितः विफलं क्रियमाणं तत्समवेक्ष्य शतक्रतुः भूयः संवर्धयामास तद्वर्ष पाकशासनः ॥४७॥ सोऽश्मवर्ष महावेगैरिपुभिः पाकशासनिः विलयं गमयामास हर्षयन्पितरं तथा तत उत्पाट्य पाणिभ्यां मन्दराच्छिखरं महत् । सद्रुमं व्यसृजच्छको जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥ ४२ ॥ ततोऽर्जुनो वेगवद्भिलितायैरजिह्मगैः शरैविध्वंसयामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा गिरेविशीर्यमाणस्य तस्य रूपं तदा वभी सार्कचन्द्रग्रहस्येव नभसः परिशीर्यतः ॥ ५१ ॥ श्रीकृष्ण और अर्जुन ने तरह-तरह से देवताओं । वे उस समय सव्यसाची धनञ्जय के पराक्रम की के इरादे को पूरा नहीं होने दिया। तब सब देवता । और भी परीक्षा करने के लिये पत्थरों की वर्षा डरकर युद्धभूमि छोड़कर इन्द्र के पास लौट गये। करने लगे । अर्जुन ने क्रोध करके उस पत्थरों की श्रीकृष्ण और अर्जुन ने देवताओं को पछाड़ दिया, वर्षा को अपने वाणों की वर्षा से रोका । इन्द्र यह देखकर आकाश में स्थित मुनियों को बड़ा पत्थर की वर्षा को विफल देखकर फिर और भी आश्चर्य हुआ। युद्ध में बार-बार अर्जुन और श्रीकृष्ण अधिक गिराने लगे। इन्द्र पुत्र महाबली अर्जुन ने किर के बाहु-वल और पराक्रम का परिचय पार इन्द्र भी उस पत्थरों की यपी को विफल करके अपने मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। ये फिर उनमे युद्ध । पिता को प्रसन्न कर दिया ॥१४॥४८|| करने लग ॥४२॥४३॥ अनन्तर महेन्द्र ने, पाण्डपुत्र को मारने की इच्छा - rce.orrer --- cod .. अध्याय २३० ] महाभारत १०५३ ooreover merorea तेनाऽभिपतता दावं शैलेन महता भृशम् । शृतण निहतास्तत्र प्राणिनःखाण्डवालयाः ॥ ५२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपणि देवकृष्णार्जुनयुद्ध ऊनत्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः २२९ से, दोनों हाथों से मन्दराचल पर्वत वृक्ष-सहित एक समान पृथ्वी पर गिरने लगे। वह पर्वत का शिखर बड़ी भारी चोटी को उखाड़कर फेंका । अर्जुन ने टुकड़े-टुकड़े होकर गिरा तो उसके नीचे दबकर वेग से सीधे जानेवाले तीक्ष्ण प्रदीप्त वाणों से उस भी खाण्डव वन के निवासी बहुत से प्राणी मर पहाड़ की चोटी को सैंकड़ो खण्डों में तोड़ डाला। गये ॥४९.५२॥ वे टुकड़े आकाश से चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र आदि के आदिपर्व का दो सौ उनतीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ त्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० । वैशम्पायन उवाच-तथा शैलनिपातेन भीपिताः खाण्डवालयाः । दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्क्षवनौकसः .द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा । मृगाश्च महिपाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा समुद्विग्ना विससृपुस्तथाऽन्या भूतजातयः तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ उत्पातनादशब्देन संत्रासितमिव स्थितम् ते वनं प्रसमीक्ष्याऽथ दह्यमानमनेकधा कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्वणम् ॥ ४ ॥ तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव दो सौ तीम अध्याय ॥ २३० ॥ वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! खाण्डव | श्रीकृष्ण तथा अर्जुन धनुष ताने खड़े हैं । चारों वन के रहनेवाले दानव, राक्षस, तेंदुए, रीछ, ओर से जलाते हुए अग्नि को और मारने के लिये मस्त हाथी, शार्दूल, सिंह, बाघ, मृग, भैमे, पक्षी और , उद्यत श्रीकृष्ण और अर्जुन को देखकर वे सब जीव भूतगण आदि उस पर्वत-शिखर के गिरने से घबराकर भयङ्कर शब्द करने और चिल्लाने लगे। उन सब बाहर निकलकर भागने लगे। उन्होंने देखा कि । वनैले जीवों के भयानक शब्द और अमि की चट चारों ओर प्रचण्ड आग जला रही है, और चटाहट से आकाशमण्डल ऐमे गूंजने लगा कि जैसे rrowoyoroeyevoweredeoroorrorecor २ ॥ । 20porn १०५४ म हा भारत [ आदिपर्व 200002007 .. oecootnalatorcouccinatomoporoscores orcorcd pancroaccorree ततः कृष्णो महाबाहुः खतेजोभास्वरं महत् । चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः ॥ ६ ॥ तेनाऽऽर्ता जातयः क्षुद्राः सदानवनिशाचराः । निकृत्ताः शतशः सर्वा निष्पेतुरनलं क्षणात् ॥ ७॥ तत्राऽदृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः । वसा रुधिरसंपृक्ताः सन्ध्यायामिव तोयदाः ॥ ८॥ पिशाचान्पक्षिणो नागान्पशृंश्चैव सहस्रशः निश्चरति वार्ष्णेयः कालवत्तत्र भारत क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्याऽमित्रघातिनः । छित्त्वाऽनेकानि सत्वानि पाणिमेति पुनः पुनः ॥ १० ॥ तथा तु निम्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा समेतानां तु सर्वेषां देवतानां च सर्वशः विजेता नाऽभवत्कश्चित्कृष्णपाण्डवयोमधे ॥ १२ ॥ तयोबलात्परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः नाऽशक्नुवशमयितुं तदाऽभवन्पराङ्मुखाः ॥ १३ ॥ शतक्रतुस्तु संप्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा बभूव मुदितो राजन्प्रशंसन्केशवार्जुनौ मेघ गर्जने से गूजता है। अनन्तर महाबाहु श्रीकृष्ण हे भरतश्रेष्ठ ! सहस्रों विशाच, नाग, पशु, पक्षी ने उनको मारने के लिये अपने तेज से जरता हुआ आदि का नाश करते हुए वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण अति ऊँची नोकवाला बड़ा भारी चक्र उठाया॥१६॥ यमराज के समान इधर-उधर विचरने लगे। शत्रु- उस चक्र के प्रहार से पीड़ित और टुकड़े-टुकड़े | दमन श्रीकृष्ण का चक्र बार-बार उनके हाथ होकर दानव, पिशाच, राक्षम और सब जाली | छूटर असहय प्राणियों का सहार करके उनके जीव आग में गिरने तथा भम्म होने लग । श्रीकृष्ण हाय में आ जाता था। इसमकार पिशाच, नाग, के चक्र से कटे-फटे और वर्षी तथा रक्त से लथपथ राक्षस आदि का नाश करने से उम समय सय हो रहे काले-मलटे दैत्यगण सन्ध्याकाल के बादलों प्राणियों के ईश्वर श्रीकृष्ण का रूप यहुन ही म्या के समान जान पड़ने लगे ॥७८॥ देख पड़ने लगा ॥२॥११॥ से Arr.914 महाभारत अध्याय २३० ] 0020 050 cococococoroo ॥ २० ॥ निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाऽशरीरिणी शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःखना न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः । दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ ॥१६॥ न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव वासुदेवाणुनावेतौ निवोध वचनान्मम नरनारायणावेतो पूर्वदेवौ दिवि श्रुती भवानप्यभिजानाति यद्वीयर्यो यत्पराक्रमौ नैतौ शक्यौ दुराधर्षों विजेतुमजितो युधि । अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिंनरपन्नगैः तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव दिष्टं चाऽप्यनुपश्यैतत्खाण्डवस्य विनाशनम् ॥ २१ ॥ इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः क्रोधामो समुत्सृज्य संप्रतस्थे दिवं तदा ॥ २२ ॥ आये हुए देवताओं में से एक भी कृष्णार्जुन हे महेन्द्र ! तुम निश्चय जानो कि इन श्रीकृष्ण के युद्ध में जय नहीं पा सका । देवताओं ने जब और अर्जुन को कोई किसी प्रकार युद्ध में परास्त देखा कि कृष्णार्जुन के बाहुबल से उस वन को नहीं कर सकता। ये दोनों महापुरुष देवलोक में बचाने के लिये दावानल वुझाना उनकी शक्ति से प्रशसित पुरातन देव नर और नारायण है । इनका बाहर है तब वे पीठ दिखाकर चले गये ।।१२।१३।। । बल और पराक्रम जैसा है सो तुम भी जानते हो हे महाराज ! देवताओं को मुख मोडते देखकर ॥१६॥१८॥ देवराज इन्द्र प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण और अर्जुन की ये युद्ध में अजय और दुर्द्धर्ष हैं, इनको पराजय प्रशंसा करने लगे। देवता और इन्द्र भी जब युद्ध करना सर्व लोकों में किसी की सामर्थ्य नहीं है। से लौट पडे तब आकाश-वाणी हुई-हे इन्द्र। ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ देवता, असुर, यज्ञ, तुम्हारा सखा सर्पगज तक्षक मारा नहीं गया, राक्षस, गन्धर्व, मनुष्य, किन्नर, नाग आदि सब के खाण्डवदाह के समय वह कुरुक्षेत्र को चय माननीय और पूजनीय है । इसलिये हे इन्द्र । गया था ॥१४॥१६॥ युद्ध बन्द कर दो, और देवताओं को साथ लेकर 02270. >>>>>> १०५६ महाभारत [ आदिपर्व corro Zoolod OMG. .. तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ॥ २३ ॥ देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः ॥ २४॥ देवराजे गते राजन्प्रहृष्टो केशवार्जुनौ निर्विशङ्क वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा ॥ २५॥ स मारुत इवाऽभ्राणि नाशयित्वाऽर्जुनःसुरान् । व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् ॥ २६ ॥ न च स्म किंचिच्छक्नोति भूनं निश्चरितुं ततः। संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ॥ २७॥ नाऽशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् । निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धं चापि कुतो रणे ॥ २८ ॥ शतं चैकेन विव्याध शतमेकं पतत्रिणाम् व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात्कालहता इव न चाऽलभन्तं ते शर्म रोधःसु विपमेषु च पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाऽप्यजायत ॥ ३० ॥ अपन लोक को जाओ। यह खाण्डवदाह विधाता तीक्ष्ण वाणों मे खाण्डव वन के रहनेवाले जीवों को की इच्छा से ही हुआ है ॥१९॥२१॥ मार-मारकर काट-काटकर आग में गिराने लगे। यह सुनकर उसे ठीक जानकर इन्द्र कोष त्यागकर कोई प्राणी उनके वाणों से बच कर वहां से निकलकर स्वर्गलोक को चल दिये । हे राजन् ! अपने स्वामी जा नहीं सका । बड़े बड़े महाबली प्राणियों का इन्द्र को जाते देखकर देवसेना के साथ प्रधान- अर्जुन से लड़ना तो दूर रहा, वे उनकी ओर देख प्रधान देवता भी उनके पीछे चले गये । इधर वीर भी नहीं सके । अर्जुन कभी एक वाण से सी अर्जुन और श्रीकृष्ण ने सेनाओं को और इन्द्र को प्राणियों को मार गिराते थे और कभी सौ वाणी मुख मोड़ते देखकर सिंहनाद किया। हे महाराज ! सं एक प्राणी को घायल करते थे । मानों साक्षात फिर ये दोनो वीर निर्भप होकर खाण्डन वन को काल के ही हाथ से मारे गये वे प्राणी मर-मरकर जलाने लंग ॥२२॥२५॥ अग्नि का आहार बनते जाते थे ॥२६॥२०॥ पवन जैसे बादलों को हटा देती है, वैसे ही क्या नदीतट, या विषम दुर्गम स्थान या देवताओं को मगा देने के बाद वीर अर्जुन अपने | इसमान भूमि, कहीं उस वन में वहां के प्राणियों orror ocorn । अध्याय २३० } महा मारत १०५७ preranasrewer भूतसंघाश्च वहवो दीनाश्चकुर्महास्वनम् रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ॥ ३१ ॥ तेन शब्देन वित्रेसुर्गगोदधिचरा झपाः विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनोंकसः ॥ ३२ ॥ न स्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् । निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद्योढुं कुतः पुनः ॥ ३३ ॥ एकोयनगता येऽपि निप्पेतुस्तत्र केचन राक्षसा दानवा नागा जने चकेण तान्हरिः ॥ ३४ ॥ ते तुं भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद्गतासवः पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीते वसुरेतसि ॥ ३५॥ स मांसरुधिरोघेश्च वसाभिश्चापि तर्पितः । उपर्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।। ३६ ॥ दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च संप्रदीप्तमहाननः दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन्प्राणभृतां वसाः ॥३७ ॥ तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुनाशनः । बभूव मुदितस्तृप्तः परां निवृतिमागतः ॥३८॥ की जान नहीं बची। सभी जगह आग उनका पीछा जो राक्षस, दानव और नाग मिलकर अर्जुन करती और उन्हें भाग कर डालती थी । प्राणियों और श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने चरते भी थे शुण्ड व्याकुल होकर निठाने लगे। उन्हें कृष्ण अपने चक्र मे गार ढालते थे। चक के मस्त हाथी, हरिण, तंदुए आदि पशुओं का गेना- वेग से किमी का शरीर फट गया, किसी का सिर पाटना उस यन मर में गूंज उठा। उन प्राणियों कट गया। बड़े-बड़े शरीरधारी प्राणी इसतरह मृत्यु और पशु पक्षियों के रोने-निसान का शद मुनकर को प्राप्त हो-होकर जल रही श्री में गिर-गिरकर महुन दर पर गना के और ममुद भीतर रहनताले मम्म हो रहे थे ॥३४॥३५॥ माली आदि जल के जीप, विधाघर और आसपास दर के देर मांग, रक्त और नी में गृह के नया सालों में रहनेवाले जीव हा से व्याकुल हो की माला बिना धुणे की टोकर ठार माकाश तक स्टे महाराज ! कृष्ण और अर्जुन में युद्ध पचने लगी। आग की ऑम, जिल्ला, मुम्प और कारना तो कहां. उनसी और कोई रष्टि मार मी शिम्पं समरिन हो रही थी। उन दोनों वारी देमनही सकता था ॥३०॥३३॥ महायता मे नियों की ओर रत. अमृत मुण्ड के ।
१०५८ महा मारत [ आदिपर्व cooroscope 1 ." तथाऽसुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् । विप्रद्रवन्तं सहसा · ददर्श मधुसूदनः ॥ ३९ ॥ तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः शरीरवाअटी भूत्वा नदन्निव. बलाहकः विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् । जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥४१॥ अभिधावाऽर्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाऽब्रवीत् । तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनञ्जयः ॥ ४२ ॥ प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थों दयापरः ॥ ४३ ॥ तं पार्थेनाऽभये दत्ते नमुचेतरं मयम् न हन्तुमैच्छद्दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४४ ॥ वैशम्पायन उवाच-तद्वनं पाचको धीमान्दिनानि दश पञ्च च ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४५ ॥ तस्मिन्वने दह्यमाने पडग्निर्न ददाह च अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शाहकांस्तथा ॥ ४६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डयदाहपर्वणि मयदानवत्राणे त्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० की तरह पीकर अनिदेव बहुत ही प्रसन्न और तृप्त अर्जुन को शरणागत पर दया आ गई। उन्होंने उसे हुए । अनन्तर एकाएक श्रीकृष्ण ने देखा कि तक्षक जीवन-दान करके कहा डरो मत । अनन्तर नमुचि के स्थान से मय नाम का दानव भागा जा रहा है | के भाई के उस दैत्य को ढाढस देने पर श्रीकृष्ण ने और वायु जिनके सहायक हैं वे अग्निदेव सशरीर फिर उसे मारना नहीं चाहा और अमि भी जलाने जटाधारी होकर बादल की तरह गरजते हुए, उसे को प्रवृत्त नहीं हुए । वैशम्पायन कहते हैं-हे राजन् ! जलाने को, पीछा कर रहे है । दानवों के विश्वकर्मा अग्नि ने अर्जुन और श्रीकृष्ण द्वारा इन्द्र से रक्षित मयासुर को भागते देख, उसे मारने के लिये चक्र | होकर पन्द्रह दिन में उस वन को जलाया । उठाकर श्रीकृष्ण खड़े हो गये। मयदानव ने उनको | हे महाराज ! उस वन को जलाने समय अग्नि ने चक्र उठाते और अमि को निगलने की इच्छा करते अश्वसेन नाग, मयदानव और चार शाईक नामक देखार कहा कि हे अर्जुन ! दौड़ो, मेरी रक्षा करो। | पक्षियों को नहीं जलाया ॥३६॥४६॥ आदिपर्व का दो सौ तीम अध्याय समास हुआ ॥ । Jrootoro-0-0-0:2550 - अध्याय २३१ ] महाभारत 200 nc.000000000000000007om अथ एकत्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ।। २३१ ।। जनमेजय उवाच-किमर्थं शाकानग्निर्न ददाह तथागते तम्मिन्बने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत्प्रचक्ष्व मे अदाहे ह्यश्वप्तेनस्य दानवस्य मयस्य च कारणं कीर्तितं ब्रह्मशाइकाणां न कीर्तितम् ॥ २ ॥ तदेतदद्भुतं ब्रह्मशाईकाणामनामयम् कीर्तयस्वाऽग्निसंमदें कथं ते न विनाशिताः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच-यदर्थ शाकानग्निर्न ददाह तथागते तत्ते सर्व प्रवक्ष्यामि तथाभूतमरिंदम । धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः आसीन्महर्पिः श्रुतवान्मन्दपाल इति श्रुतः ॥ ५ ॥ स मार्गमाश्रितो राजन्नृपीणामूर्ध्वरेतसाम् । स्वाध्यायवान्धर्मरतस्तपस्वी विजिनेन्द्रियः स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥ ७ ॥ स लोकानफलान्दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान्दिवौकसः दो सौ इयतीस अभ्याय ।। २३१ ॥ राणा जनमेजपा ने कहा है शान् ! उस साण्डर । राईकी को नहीं बताया कद मापसे कहता , वन को जराने के समय उस दशा में अग्नि ने | सुनो। हे महाराज ! एक मन्दपाल नाम से प्रति माईक पक्षियों को क्यों नहीं जलाया : मधमेन तपम्बी, विद्वान् , प्रधारी, धार्मिक पुरुषों में श्रा नाग और मयदानव को न जलाने का कारण तो ' महर्षि थे । वे स्वाध्याय में नियुक्त और नितेन्द्रिय आप कह नुके है, पर शाक पक्षियों के पवने का | होकर सदा तपस्या और धर्म करते थे। वे करता कारण नहीं कहा । हे अनन् । इन पक्षियों का प्रपियों का मन धारण किये हुए थे । दे भरत! रचना मुझको अचरज सा जान पड़ता है। आप अन्त को शरीर छोड़ कर के विरोम को गये किन्तु कृपा करके कहिए कि उस भयानक अगि-दाह से ' वहा उन्हें अपने किये धर्म-कर्म और तप का कुछ ये पक्षी से पच गये । वैशम्पायन ने कहा- भी फल न मिला। उग महर्षि ने अपनी कटोर देशत्रुदमन ! उस दशा में हुतागन ने जिम कारण सपम्या से उपार्जन किये हुए लोक में न जाने पर - - । jir37.2" महाभारत [ आदिपर्व horoce com poocd . , मन्दपाल उवाच--किमर्थमावृता लोका ममैते तपसाऽर्जिताः । किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत्कर्मणः फलम् ॥ ९ ॥ तत्राऽहं तत्करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् फलमेतस्य तपप्तः कथयध्वं दिवौकसः देवा उचु-ऋणिनो मानवा ब्रह्मञ्जायन्ते येन तच्छृणु । क्रियाभिब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः तदपाक्रियते सर्व यज्ञेन तपसा सुतैः तपस्वी यज्ञकृच्चापि न च ते विद्यते प्रजा ॥ १२ ॥ त इमे प्रसवस्यार्थे तब लोकाः समावृताः प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥ १३ ॥ पुनाम्नो नरकारपुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः तस्मादपत्यसंताने यतख ब्रह्मसत्तम ॥ १४ ॥ वैशम्पागन प्रथाच-तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम् । क नु शीघ्रमपत्यं स्याद्वहुलं चेत्यचिन्तयत् स चिन्तयन्नभ्यगच्छत्सुबहुप्रसवान्खगान् शाहिको शाईको भूत्वा जरितां समुपेयिवान् ॥ १६ ॥ धर्मराज के पास बैठे हुए देवताओं से पूछा-मेरी किये हैं; किन्तु तुम्हारे पुत्र नहीं है । इसी कारण तपस्या से उपार्जन किया हुआ पुण्यलोक क्यों | तुम उन पुण्यलोकों में नहीं जा सकते जहां तुमको रुका है ? जिन कमों के करने से इन सब पुण्यलो को जाना चाहिए था । तुम पुत्र उसन्न करो, तो फिर में जाया जाता है क्या मैने उन कमों को नहीं किया उन श्रेष्ठ लोकों में जाकर सुख भोगांगा हे वनश्रेष्ठ! है ? हे देवताओ । जिस कारण मुझे मेरे तप का श्रुति है कि पुत्र पिना को पुन नामक नरक से फल नहीं मिलता वह आप मुझ से कहिए । मै बचाता है । इमलिये अब तुम पुत्र उत्सन्न करने का उसका यल रुगा ॥१॥१०॥ यत करो ॥११॥१४॥ देवताओं ने कहा-दे नमन् ! जन्म के समय वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! देवताओं के ये से ही मनुष्य पर देवताओं, पियों और पितरों वचन सुनकर मन्दपाल सोचने लंग कि किम यानि का ऋण होता है । या, तपस्या और पुत्र उसमें जाने से मैं शीघ्र बहुन से पुत्र उरान कर सांगा। करने से इन तीनों नाणों से छुटकारा मिलता है। अन्न को यह निधय करके कि पक्षी यादी तुमने तप भी बहुत किया है और यज्ञ भी भोर | दिनों में बहुत से पुन उत्पन्न करते हैं, ये नाक DApapr.sr Proroncorroroo .. अध्याय २३१ ] महा भारत १०६१ marocied तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः तानपास्य स तत्रैव जगाम कपितां प्रति ॥ १७॥ वालान्सुतानण्डगतान्सह मात्रा मुनिर्वने तस्मिन्गते महाभागे लपितां प्रति भारत अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता वह्वचिन्तयत् तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृपीनण्डगतान्वने न जहाँ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान् । बभार चैतान्संजातान्स्ववृत्त्या स्नेहविक्लवा ।॥ २०॥ ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृपिः मन्दपालश्चरंस्तस्मिन्बने लपिनया सह तं संकल्पं विदित्वाऽग्ने त्वा पुत्रांश्च वालकान् । सोऽभितुष्टाव विपिाह्मणो जातवेदसम् पुत्रान्प्रति वदन्भीतो लोकपालं महौजसम् ॥ २२ ॥ मन्दपाल ज्याच-वमने सर्वलोकानां मुखं वमसि हव्यवाट् । त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ॥ २३ ॥ स्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुत्रिविधं पुनः त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् ॥ २४ ॥ पक्षी हो गये। जरिता नाम की शाहिका से सहवास वृत्ति के सहारे दाने आदि चुन ला करके स्वयं करके, उसके गर्भ से, उन्होंने नार ब्रह्मज्ञानी पुत्र खाती थी और उन बच्चों की रक्षा किया करती उत्पन्न किये । इसके पश्चात् वह अण्डों में स्थित थी॥१५॥२०॥ बच्चों को उनकी माता के साथ उस बन ही में अनन्तर ऋपि मन्दपाल ने लपिता के साथ उस छोड़कर लपिता नाम की दृमरी शामिका के पास वन में चरते हुए देखा कि विप्र रूपधारी अमि गये । हे भारत ! उन महामाग के पिता के पास म्वाण्डर बन जराने को भा रहा है, ब्रह्म के जानकर चले जाने पर जरिता पुत्रों के स्नेह से कातर होकर विपि महातेजम्बी मन्दपाल उनका यह अभिप्राय अनेक प्रकार की चिन्ता करने लगी। मपि के उम समझकर अपनी संतानों को पालक जानकर उनके खाण्डर वन में उन अण्डों में स्थित बच्चों को छोड़ने ! रिये उनसे विनय करने की इच्छा से भय खाकर पर भी जरिता पुत्रशोक से कातर होर त्यागने । स्तुति करने रंगे ॥२१॥२२॥ के अयोग्य उन यचों को छोड़ नहीं सकी। वह उन्होंने कहा-हे ममिदेव! तुम सर्व लोकों के orcoroncerkohorcococc महा भारत [ आ 4 လာ त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः । त्वदृते हि जगत्कृत्स्नं सद्यो नश्येद्भुताशन ॥ २५ ॥ तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् । गच्छन्ति सह पत्नीभिःसुतैरपि च शाश्वतीम् ॥ २६ ॥ स्वामने जलदानाहुः खे विषक्तान्सविद्युतः । दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ॥ २७ ॥ जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते 11 तवैव कर्म विहितं भतं सर्वं चराचरम् ॥ २८ ॥ त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् । त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत्संप्रतिष्ठितम् ॥ २९ ॥ त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः । त्वमश्विनी यमौ मित्रःसोमस्त्वमसि चाऽनिलः ॥ ३०॥ वैशम्पायन उवाच-एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः तुतोप तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते तमत्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिहव्यवाहनम् प्रदहन्खाण्डवं दावं मम पुत्रान्विसर्जयं ॥ ३२ ॥ मुखस्वरूए हुए हो। तुम हवन के पदार्थ ग्रहण किया लोग तुमको विद्युत के साथ आकाश में स्थित मेघ करते हो। हे पावक ! तुम गुप्त रूप से सब प्राणियों कहते हैं । हे पावक! तुमसे शिखायें निकलकर सर्व के भीतर विराजमान हो। विद्वान् लोग तुम्हें एक प्राणियों को जलाती हैं । है महाधुने ! कर्मों का भी कहते हैं और तीन रूपोवाला भी मानते है । वे विधान करनेवाला वेद तुम्हारा ही वचन है, और तुम्हारे आठ रूपों की कल्पना करके यज्ञ किया | ये सब स्थावर जद्गम आदि जीव तुम्हीं से बने हैं । करते हैं ॥२३॥२४॥ ॥२५॥२८॥ है हुताशन ! महर्षियों का कहना है कि तुम्ही ह भन्नि ! तुम्ही ने पहले जल की सष्टि की है ने इस संसार को रचा है । यदि तुम न होते तो और यह सब जगत् तुम्हीं में स्थित है । सब हव्य यह जगत् नष्ट हो जाता। स्त्री पुत्रों के साथ ब्राह्मण और कव्य (देवताओं और पितरों का आहार) पूर्णरूप लोग तुम्ही को प्रणाम करके अपने कर्मों से प्राप्त से तुम्हीं में प्रतिष्ठित है। हे देय ! तुम्ही दहन, शाश्वत लोकों को जाते हैं। हे अग्नि ! पण्डित तुम्ही विधाता, तुम्ही वृहस्पति, तुम्ही दोनों अधिनी- ।
अध्याय २३२ ]
महा भारत
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तथेति तत्प्रतिश्रुत्य भगवान्हव्यवाहनः
खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि शाहकोपाख्याने एकत्रिंशत्याधिकद्विशततमोऽध्याय २३१
कुमार, तुम्ही अर्क, तुम्ही सोम और तुम्हीं पवन | देता हू । मन्दपाल दोनों हाथ जोड़कर बोले-हे
स्वरूप हो ॥२९॥३०॥
हव्यवाहन | तुम जब खाण्डव वन को जलामोगे
वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज ! अति तेजस्वी तब मेरे बच्चों को न जलाना । भगवान् हव्यवाहन
मन्दपाल मुनि के इसप्रकार अग्नि की स्तुति करने ने यह स्वीकार कर लिया । फिर वे ठीक समय
पर अग्नि उनपर प्रसन्न हुए और प्रीतिपूर्वक उनसे पर खाण्डव वन जलाने की इच्छा से प्रज्वलित हो
हा-बोलो, तुम्हारी क्या इच्छा है ? मैं पूरी कर उठे ॥३१॥३३॥
आदिपर्व का दो सौ इकतीस अध्याय समाप्त हुआ।।
कहा-
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अथ द्वात्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ॥२३२ ॥
वैशम्पायन उवाच-ततः प्रज्वलिते वही शाईकास्ते सुदुःखिताः ।
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाऽधिजग्मुः परायणम् ॥ १ ॥
निशम्य पुत्रकान्वालान्माता तेषां तपस्विनी ।
जरिता दुःखशोकार्ता विललाप सुदुःखिता
जरितोवाच-अयमग्निर्दहन्कक्षमित आयाति भीपणः
जगत्सन्दीपयन्भीमो मम दुःखविवर्धनः
इमे च मां कर्पयन्ति शिशवो मन्दचेतसः
अवहश्चिरणेहींनाः पूर्वेषां नः परायणाः
त्रासयंश्चाऽयमायाति लेलिहानो महीरुहान् ।
अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम
दो सौ पत्तीम अध्याय ॥ २३ ॥
वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! जर हो, विराप करती हुई कहने रगी ॥१२॥
खाण्डव वन मे अग्नि ने प्रचण्ड रूप धारण किया
मेग दु ख बढानेवाग यह भयानक अग्नि वन
तब वे शाक पक्षी बहुत ही घबराये और दुखित को जलाता हुआ सब म्यान म उजाला करता डरावने
हुए। उन्हें अपनी रक्षा का कोई उपाय न सूझ स्वरूप में आ रहा है। मेरे छोटे-छेटे वों के पह
पड़ा। उनकी तपम्विनी माना जारिता, उन बच्चों नदी उगे, ये उड़ नहीं सकते और अनान है।
को बहुत छोटे देखकर दु ख भार शोक से पीड़ित यही अपने पिना भीर पूर्वपुरुषों की गति है ॥३४॥
१०६४ म हा भारत [ आदिपर्व ore20-coooooo 050coco2050>>x rezor oroooo आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना । न च त्यक्तमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥ ६ ॥ कं तु जह्यामहं पुत्रं कमादाय व्रजाम्यहम् । किं नु मे स्यात्कृतं कृत्यं किं वा मन्यत पुत्रकाः ॥ ७ ॥ चिन्तयाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किंचन । छादयिष्यामि वो गात्रैः करिष्ये मरणं सह ॥ ८ ॥ जरितारौ कुलं ह्येतज्ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् सारिसृक्कः प्रजायेत पितॄणां कुलवर्धनः स्तम्वमित्रस्तपःकुर्याद् द्रोणो ब्रह्मविदां वरः ।। इत्येवमुक्त्वा प्रययौ पिता वो निघृणः पुरा ॥१०॥ कमुपादाय शक्येयं गन्तुं कप्टाऽऽपदुत्तमा किं नु कृत्वा कृतं कार्य भवेदिति च विह्वला । नाऽपश्यत्स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदाऽनलात् ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं ब्रुवाणां शास्तेि प्रत्यूचुरथ मातरम् । स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पन यत्र न हव्यवाद् ॥ १२ ॥ अम्मास्विह विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव स्वयि मातर्विनष्टायां न नः स्यात्कुलसन्ततिः ॥ १३ ॥ इस कारण ये मेरे हृदय को अपनी ओर खींच का कोई उपाय नहीं देखती । बस, मै तुमको अपने रहे हैं। यह अग्नि धीरे धीरे वृक्षों को भस्म करता शरीर से ढककर तुम्हारे साथ ही जल मरूँगी ॥५1८॥ और भय दिलाता इधर आ रहा है। मेरे बच्चे, तुम्हारे निर्दयी पिता ने पहले जाते समय कहा पड्ड न निकरने के कारण, भाग नहीं सकते । था कि मेरे चार पुत्रों में ज्येष्ठ जरित रि नामक पुत्र और मुझ में भी इतनी सामथ्र्य नहीं है कि इनको | से वश प्रतिष्ठिन होगा । सारिसृप नागक पुत्र सन्तान पर इस विपति के समुद्र से भाग सकू, इनको | उत्पन्न करके पितरो के कुल को बनायेगा ।स्तम्वमित्र छोड़कर भाग भी नहीं सकती हू । हाय, मेरा हृदय नामक पुत्र तपस्या करेगा और द्रोण नामक प्रशसित माना फटा जा रहा है। किस बच्चे को ले जाऊँ,रिसे पुत्र वेद में पण्डित होगा ॥२॥१०॥ छोड़ जाऊँ । क्या मैं, जिससे पुत्रों को भी और हे पुत्रो ! इस समय यह पीड़ाजनक महा सवट अपने को भी पना सयूँ । हे बेटो! तुम क्या मामने खड़ा है। किसे लेकर भागें । किसनाह विचारते हो । मैं तो सोच समझार तुम्हारे बचने हनात्य होसकूँगी। वैशम्पायन ने कहा- महाराज! ।
१०६५ महा मारत अध्याय २३२ ] Donc.2050 proo70076 - । . अन्ववेश्यैतदुभयं क्षेमं स्याद्यत्कुलस्य नः तद्वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत्तव ॥ १४ ॥ मा त्वं सर्वविनाशाय स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः । न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ॥१५॥ जरितोवाच -इदमाखोषिलं भूमौ वृक्षस्याऽस्य समीपतः । ताविशब्धं त्वरिता वरत्र न वो भयम् ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः । एवं प्रतिकृतं मन्ये चलतः कृष्णवर्त्मनः ॥१७॥ तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहन्तुं पांसुसंचयम् । रोचतामेष वो वादो मोक्षार्थं च हुताशनात् ॥ १८ ॥ शाईका ऊचु-अवन्मिांसभूतान्नः क्रयादाखुर्विनाशयेत् । पश्यमाना भयमिदं प्रवेष्टुं नाऽत्र शक्नुमः ॥ १९ ॥ कथमग्निर्न नो धक्ष्येत्कथमाखुन नाशयेत् कथं न स्यात्पिता मोघः कथं माता ध्रियेत नः ॥ २० ॥. जरिता इसप्रकार तरह-तरह की चिन्ताओं से विहल | हो जायगा ॥११॥१५॥ हो उठी। अपनी बुद्धि से यह अपने पुत्रों की रक्षा जरिता बोली-हे पुत्रो ! इस वृक्ष के पास धरती का कोई उपाय ठीक नहीं कर सकी। माता के इस के भीतर एक चूहे का बिल दीख पड़ता है; तुम विलाप को सुनकर शाईक पक्षी कहने लगे-हे गाता झटपट उसके भीतर चले जाओ। वहां तुम्हें आग तुम पुत्र-स्नेह का विचार न करके ऐसी जगह उड़ का भय नहीं रहेगा । तुम्हारे इसमें जाने पर मैं जाओ, जहा आग का भय न हो । हे माता | हम मिट्टी से इस बिल का मुंह बंद कर दूंगी। अय जल जायेंगे तो तुम्हारे और मी पुत्र उत्पन्न हो । प्रचलित अमि से बचने का यही एक उपाय देखती सकेंगे किन्तु जो तुम न रहोगी तो फिर वंश-रक्षा की है। जब आग बुझेगी तब मैं आफर बिल के मुँह आगा नहीं। हे माता ! इम समय यह समय से राख का देर हटा दूंगी । तुम अमि से पचने उपस्थित है कि जिममें कुल का भला समझो वही के लिये मेरा कहा मान लो ॥१६॥१८॥ करो। सोच रो, हमारे साथ अपनी भी जान देना शानिकों ने कहा-हमारे अभी तक पह नहीं टीक है, या हमें छोड़कर अपनी जान बचा लेना उग; हम केवल मास के पिंड हैं । इमलिये मांस अच्छा है । तुम पुत्र-स्नेह का विचार छेड़ दो; खान वाले चूहे अवश्य हमको नष्ट करेंगे, इस भय गमता करने से सत्यानाश हो जायगा । स्वर्गलोक की बात को जान-बूझकर हम इसके भीतर घुम पहुंचने वाले पुत्र के ममिलापी पिता का उद्देश नष्ट नहीं सकते। इस समय हमें अपनी रक्षा का कोई - mAhDCM महा भारत [ आदिपर्व KOS विल आखोर्विनाशः स्यादग्नेराकाशचारिणाम् । अन्ववेश्यैतदुभयं श्रेयान्दाहो न भक्षणम् ॥ २१ ॥ गर्हितं मरणं नः स्यादाखुना भक्षिते विले । शिष्टादिष्टः परित्यागः शरीरस्य हुताशनात् ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपणि जरितापिलापे द्वात्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३॥ ऐसा अच्छा उपाय नहीं देख पड़ता, जिससे आग | विषय मे समझ बूझकर देखने से यही युक्ति होती हमें जलावे नहीं, चूड़ा हमें खाय नहीं, पिता का | है, कि अमि से जल मरना अच्छा है; चूहे से पुत्र उत्पन्न करने का उद्देश नष्ट न हो और हमारी खाय जाना उचित नहीं है । क्योंकि पवित्र अग्नि माता भी बच जाय । इससे अवश्य हमारी मौत का के मुख में जाने से सद्गति होगी। बिल में चूहे समय आ गया है । बिल में चूहा खा जायगा, से खाय जाने से अनुचित मृत्यु होगी ॥१९॥२२॥ बाहर आग जला देगी। इन दोनों मृत्युओं के आदिपर्व का दो मौ बत्तीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ प्रयस्त्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २३३ । जरितोवाच-अस्माद्विलान्निष्पतितमाखु श्येनो जहार तम् । क्षुद्रं पद्भयां गृहीत्वा च यातो नाऽत्र भयं हि वः ॥ १ ॥ शाईका उचुः-न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाऽऽखुं कथंचन । अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः संशयो वह्निरागच्छेद् दृष्टं वायोनिवर्तनम् । मृत्युनों विलवासिभ्यो बिल स्यान्नाऽत्र संशयः ॥ ३ ॥ निःसंशयारसंशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ ४ ॥ दो सौ तेंनीस अध्याय 11 २३३ ।। जरिता बोली-इस गढ़े से एक छोटा चूहा निकला पाते हैं । फिर यहां अग्नि के आने में भी तो सन्देह था, एक बाज भाकर पावों से उसे पकड़ ले गया है। है। क्योंकि उल्टी हवा चले तो अग्नि उधर ही अब इस बिल के भीतर तुमको खटका नहीं है। लौट जा सकती है । इमलिये बिल में रहने से शाईकों ने कहा-मालूम नहीं, वह पक्षी चूहे को निश्चय ही हमारी मृत्यु होगी और बाहर रहने से उठा ले गया है या नहीं। यदि ले भी गया हो तो मृत्यु होने मे सन्देह है । हे माता । जहां निश्चन इस बिल के भीतर और अधिक चूहे भी तो हो । मृत्यु है वहां की अपेक्षा जहां अनिश्चित मृत्यु है ondroin procool30 - - 700cc000emoder, अध्याय २३३ ॥ म हा मारत १०६७ -ocoronco aroroorroroon 207302050 rcsevcrico जरितोवाच-अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पतांवरम् विलादा समादाय श्येनं पुत्रा महावलम् ॥ ५ ॥ तं पतन्तं महावेगा स्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् । आशिपोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूपिकं विलात् ॥ ६ ॥ यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥ स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाऽऽखुः पतत्रिणा । तदाऽहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गहम् ॥ ८ ॥ प्रविशध्वं चिलं पुत्रा विश्राब्धा नास्ति वो भयम् । श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुमहात्मना ॥ ९ ॥ मार्गिका ऊचुन विद्महे हृतं मातः श्येनेनाऽऽखुं कथंचन । अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥ जरिनोवाच-अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूपिकम् । नाऽस्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥ शाईगका अचु-न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेधा भयाद्धि नः । समाकुलेषु ज्ञानेपु न चुद्धिकृतमेव तत् यहीं रहना अच्छा है। इस कारण न्याय के अनुसार / मैं उससे विदा होकर घर को लौट आई।हे यहो। तुमको आकाश हो को उड़ जाना उचित है। अब तुम बेखटके इस बिल में जानो। यहां बाद तुम्हारा पिन क ले जुमा और अच्छे पुत्र का कुछ नया नही है। महात्मा बनने मेरे सामने ही सकोगी ॥१४॥ चूह को खा डाला या । शाहकों ने कहा-हे माता ! जरिता बोली-द । । जब महापराक्रमी पक्षी- हमने नहीं देखा, कि याज चूहे को हर ले गया है। राज याज बिल से चूर को लेकर भागा था तब 'इमलिये विशेष न जानार बिल में घुस नहीं सकते। मैंने उसे देखा था। बिल से चूहा ले जाने के कारण । [1८1१०॥ में उसके पीछे गई और मैने उसे आशीर्वाद दिया जरिता बोली! हे बेटी ! तुम मेरा कहा मान कि हे पक्षीराज ! तुमने हमारे शत्रु को मार डाला, लो। तुम्हें कुछ भी भय नहीं है। क्योंकि मैं जानती इसलिये तुम स्वर्गलोक में स्वर्णमय शरीर धारण इ, कि बाज चूहे को हर ले गया है । शाको ने करके रदो ॥५॥ कहा-हम लोग यह नहीं समझते कि सममूल जर उस राज ने चूहे को भक्षण कर रियातर बोलकर हमारा मय मगाती हो, क्योंकि बुदि ठिगने 1 roosrood महा मारत [ आदिपर्व rc cooora 2000 । न चोपकृतमस्माभिर्न चाऽस्मान्वेस्थ ये वयम् । पीड्यमाना विभय॒स्मान्का सती के वयं तव ॥ १३ ॥ तरुणी दर्शनीयाऽसि समर्था भतुरेपणे अनुगच्छ पर्ति मातः पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ १४ ॥ वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् । अथाऽस्मान्न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ता ततः शाही पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे । जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्रेरनामयम् ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात्वरितो हव्यवाहनः यत्र शाही बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ॥ १७ ॥ ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहङ्गमाः । जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपर्वणि शापाख्याने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः २३३ न रहने पर जो काम किया जाता है, वह ज्ञान से हम भी अग्नि में जलकर पवित्र लोक को नहीं होता है ॥११॥१२॥ जायँगे । यदि अग्नि ने हमें नहीं जलाया तो तुम देखो, तुम्हारा हमने कभी कोई उपकार नहीं फिर हमारे पास आ जाना । वैशम्पायन ने कहा- किया और तुम यह भी नहीं जानती कि हम है राजन् ! शार्की पुत्रों से यह बात सुनकर, उन्हें कौन है । फिर तुम क्यों इतना कष्ट उठाकर हमको उस खाण्डव वन में छोड़कर तुरन्त उस हिस्से में बचाने की चेष्टा कर रही हो ? देखो, न तो तुम चली गई जहां अग्नि का भय न था ॥१५/१६॥ हमारी कोई हो और न हम तुम्हारे कोई लगते हैं। इसके पश्चात् अग्नि वेग से और तेज शिखाएँ हे माता ! तुम युवती और रूपवती हो और पति | लिये गन्दपाल के पुत्र शाकों के घोंसले के पास हूँढ़ने की सामर्थ्य भी रखती हो। इसलिये तुम आये । तब उन पक्षियों ने प्रज्वलित अग्नि को पति के पीछे जाओ, तुम फिर श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न कर देखा, और उनका बड़ा भाई जरितारि उस अग्नि सकोगी ॥१३॥१४॥ को सुना-सुनाकर कहने लगा ॥१७॥१८॥ आदिपर्व का दो सौ तेतीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतुरिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ।। जरिनारियाण-पुरतः कृच्छकालस्य धीमाजागर्ति पूरुपः । स कृच्छ्रकालं संप्राप्य व्यथां नैवेति कहिचित् ॥ १ ॥ । Prominhr.pc-1csirserveveoroom c.2000 Zoolo7002050 अध्याय २३४ ] महा भारत conomroomopornoone यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नाऽवबुध्यते । स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विदन्ते महत् ॥ २ ॥ सारिसूफ उवाच--धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः । प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः ॥ ३ ॥ स्तम्यमित्र उवाच-ज्येष्टस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः । ज्येष्ठश्चन्न प्रजानाति कनीयान्कि करिप्यति ॥ ४ ॥ द्रोण वाच-हिरण्यरेतास्त्वरितो ज्वलन्नायाति नः क्षयम् । सप्तजिह्वाननः कूरो लेलिहानो विसर्पति वैशम्पायन उवाच-एवं संभाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः । तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाऽग्निं शृणु पार्थिव पार्थिव ॥ ६ ॥ जरिनारिरुवाप-आत्माऽसि वायोजलन शरीरमति वीरुधाम् । योनिरापश्च ते शुक्र योनिस्त्वमसि चाऽम्भसः ॥ ७ ॥ ऊर्च चाऽधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पावतस्तथा । अर्चिपस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा मारिसृप, उवाच-माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः पक्षा जातानैव नो धूमकेतो। न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्यस्तस्मादस्मास्त्राहि वालांस्त्वमग्ने ॥ ९ ॥ दो मौ चौंतीस अध्याय ॥ २३४ ।। जरितारि ने कहा-ज्ञानी पुरुष मृत्युकाल के । सङ्कट से बचाता है। क्योंकि वही उनका रक्षक है । पहले से जागते रहते हैं । उनको कभी मृत्यु की जो बड़ा माई रक्षा न कर मके तो छोटे भाई क्या पीडा सहनी नहीं पड़ती । अचैतन्य अर्थात् ज्ञान- । कर सकते हैं ? ट्रेण ने कहा- यह कर कर्म करने- हीन पुरुष मृत्युकाल आ जाने पर सोते के वाला सात मुख और सात जीगावाला अग्नि जल्दी समान रहता है, उसको मृत्यु की पीड़ा भोगनी से प्रज्वलित होता और जलाने के लिये आगे यदना पड़ती है, और वह मोक्ष को नहीं यह साता है। हुमा हमारे घामले पर आ रहा है। यम्पायन सारिसर में जरितारि से कहा- हमारा यह प्राण का कहते हैं-हे महाराज ! मन्दपल के पुन परम्पर पोश आ गया है। तुम धौर और बुद्धिमान हो । यो कहकर, नम्र होकर, स्तुति करने लगे ॥३॥६॥ तुम्ही हमारी रक्षा करो; क्योंकि यहुतेरों में से एक जरितारि ने कहा- तुम वायु की आत्मा हो। तुम ही पुरुष बुद्धिमान् और सूर होता है ॥१२॥ लताओं और वृक्षों की देह हो। जल तुम्हारा शुक्र स्तम्यमित्र ने कहा-बड़ा भाई छोटे भाइयों को है और वह तुम्ही से प्रगट हुआ है। महावीय । ।
१०७० म हा भारत [ आदिपर्व oconoro यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः तेन नः परिपाहि त्वमान्नः शरणैषिणः ॥१०॥ त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो नाऽन्यस्तप्ता विद्यते गोपु देव । ऋषीनस्मान्वालकान्पालयस्व परेणाऽस्मान्प्रेहि वै हव्यवाह ॥ ११ ॥ स्तम्बमित्र उवाच-सर्वमग्रे स्वमकस्त्वयि सर्वमिदं जगत त्वं धारयसि भूनानि भुवनं त्वं विभर्पि च ॥ १२ ॥ स्वमग्निहव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः मनीषिणस्त्वां जानन्ति वहुधा चैकधापि च ॥ १३ ॥ सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान्हव्यवाह काले प्राप्ते पचसि पुना समिद्धः । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूतिस्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥ १४ ॥ द्रोण उवाच-त्वमन्नं प्राणिभिर्भुक्तमन्तभूतो जगत्पते नित्यप्रवृद्धः पचसि त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ १५॥ सूर्यो भूत्वा राश्मिभिर्जातवेदो भूमेरम्भो भूमिजातान्रसांश्च । विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले वृष्ट्या सृष्ट्या भावयसीह शुक्र ॥ १६ ॥ तुम्हारी शिखा सूर्य के उजाले के समान ऊँचे नीने अकेले सम्पूर्ण ब्रह्माण्डस्वरूप हो । तुम्हीं पर यह पीछे किनार और सब जगह फैली रहती है ||७८॥ सम्पूर्ण जगत् विराजमान है । तुम सब जीवों की सारिसृप ने कहा-हे धूमकेतु ! हमारी माता रक्षा करते हो। तुम 'तेज' नामक पदार्थ हो। तुम चली गई और पिता जी को भी हम नहीं पहचानते । हव्य वहन करने वाले और सर्वोत्तम हव्य हो । अभी तक हमारे पड्स नहीं उगे | हम बिलकुल पण्डित रोग तुमको कारण रूप से ए रूपी और बच्चे हैं । हे अमि ! इस समय तुम्हारे सिवा और कार्य रूप में बहुरूपी जानते है । हे हव्यवाहन अमि! कोई हमारी रक्षा करनेवाला नहीं; इसलिये तुम तुम पहले सृष्टि को रचते हो, आगे समय भाने हमारी रक्षा करो। हे अग्नि । तुम्हारा जो कल्याण पर तुम्हीं बढकर फिर उनका नाश करते हो । इस- कारी रूप और सात शिखा हैं, उन्हीं से हम भय लिये तुम्ही सम्पूर्ण भुवन का उत्पत्ति-स्थान हो और खाय और शरण लिये हुओं को बचाओ ॥९॥१०॥ प्रलय-स्थान भी तुम्ही हो ॥११॥१४॥ हे जातवेद ! तुम अकेले ही ताप फैलाते हो। द्रोण ने कहा-हे जगत्पते ! तुम प्राणियों के किसी किरण को तुम्हारे बिना ताप पहुचानवारा शरीर के भीतर रहकर, बहार, उनके खाये हुए कोई नहीं है। हे हव्यवाहन ! हम ऋषि की सन्तान अन्न को नित्य पचाते रहते हो। इसलिये तुमको हैं, हमारी रक्षा करो। हमारे यहा से अन्य स्थान हीसप प्राणियों के जीवन का आधार कहना चाहिये। को जाओ । स्तम्पमित्र ने कहा है अमि ! तुम | है शुक्र ! हं जातवेद! तुम सूर्यस्वरूप रनकर किरण .
अध्याय २३४ ] म हा भारत oood स्वत्त एताः पुनः शुक्र वीरुधो हरितच्छदाः । जायन्ते पुष्करिषयश्च सुभद्रश्च महोदधिः ॥ १७ ॥ इदं वै समं तिग्मांशो वरुणस्य परायणम् शिवस्त्राता भवाऽस्माकं माऽस्मानय विनाशय ॥ १८ ॥ पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्मन्हुताशन । परेण प्रेहि मुश्चाऽस्मान्सागरस्य गृहानिव वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना द्रोणमाह प्रतीतारमा मन्दपालप्रतिज्ञया ॥ २० ॥ अनिम्याच-ऋषिद्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्मैतद्वधाहृतं त्वया ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते विद्यते भयम् ॥ २१ ॥ मन्दपालेन वै यूयं मम पूर्व निवेदिताः वर्जयेः पुत्रकान्मा दहन्दावमिति स्म ह ॥ २२॥ तस्य तद्वचनं द्रोण वया यच्चेह भापितम् उभयं मे गरीयस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते । भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते ब्रह्मन्स्तोत्रेण सत्तम ॥ २३ ॥ से भूमि में उपजा हुआ सब रस और धरती में | हैं-अमज्ञानी द्रोण के ये वाक्य सुनकर अभि बहुत स्थित जल लेकर समय-समय पर फिर उसे वृष्टि । प्रसन्न हुए। उन्हें याद भा गया कि वे मन्दपाल द्वारा छोड़कर सब अनाज उपजाते हो ॥१५:१६॥ से उनके पुत्रों को बना देने की प्रतिज्ञा कर चुके हे शुक्र ! हरी लताएँ, वृक्ष, सरोवर और समुद्र । है ॥१९॥२०॥ तुम्हीं से उत्पन्न होते हैं । हे तीक्ष्ण किरणोंवाले ! अमि ने कहा-हे द्रोण | तुम ऋषि हो; तुमने हमारा यह शरीर रसपाही इन्द्रिय के अधीश्वर जो कहा यह वेदस्वरूप है । तुम्हारी अभिलाषा पूरी जलपति वरुण का निवासम्यान है । जल को उत्सन कम्मा । तुम चिन्ता न करी । पहले मन्दपाल करनेवाले होने के कारण हमारे लिये भी तुमको ऋषि ने तुम्हारे लिये मुझसे कहा था 6ि"जय तुम गलमय होना चाहिये । तुम हमारी रक्षा करो; खाण्डव वन को जलाओ तर मेरे पुत्रों को न हमे नए न करो । ॥१७॥१८॥ जलाना" ॥२१॥२२॥ पिनत्र ! हे लोहितग्रीव हे कृष्णवर्मा, है द्रोण ! मन्दपार की उस प्रार्थना और तुम्हारे ६ हुताशन ! तुम हमसे दूर रहो । सागर के पास इस निवेदन को माननीय समझना हो, को घर के समान हमें छोड़ो । वैशम्पायन कहते / में और क्या तुम्हारा उपकार कर ! हे ब्रमश्रेष्ठ । " 0000000co203 १०७२ म हा भारत [ आदिपर्व parcomorporochroncoreclerordion द्रोण उवाच-इमे मार्जारकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः एतान्कुरुष्व दग्धास्त्वं हुताशन सवान्धवान् ॥ २४ ॥ तथा तत्कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शाईकान् । ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय ॥ २५ ॥ झते श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि शागोपाख्याने चतुस्त्रिशदधिकद्विशततमोऽध्यायः २३४ तुम्हारी इस स्तुति से मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूं। तुम्हारा । हे राजन् ! उन शार्गक बालकों से विदा होकर, मंगल होगा | द्रोण ने कहा-हे हुताशन अग्नि! अग्नि ने उनके शत्रु बिलावों को भस्म कर डाला। ये सब बिलाव नित्य हमें सताते हैं । इसलिये तुम फिर वहां से वन को जलाते हुए वे आगे बढ़े । उन्हें वंश-सहित जलाओ । वैशम्पायन कहते है- ॥२३॥२५॥ आदिपर्व का दो सो चौतीस अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ पञ्चत्रिंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥ वैशम्पायन उवाच-मन्दपालोऽपि कौरव्य चिन्तयामास पुत्रकान् । उक्त्वाऽपि च स तिग्मांशुं नैव शर्माऽधिगच्छति ॥ १ ॥ स तप्यमानः पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत् कथं स्वशक्ताः शरणे लपिते मम पुत्रकाः ॥ २ ॥ वर्धमाने हुतवहे वाते चाऽऽशु प्रवायति असमर्था विमोक्षाय भविष्यन्ति ममात्मजाः ॥ ३ ॥ कथन्त्वशक्ता त्राणाय माता तेषां तपस्विनी। भविष्यति हि शोकार्ता पुत्रत्राणमपश्यती कथमुड्डीयनेऽशक्तान्पतने च ममात्मजान् संतप्यमाना बहुधा वाशमाना प्रधावती दो सौ पैंतीम अध्याय ॥ २३५ ।' वैशम्पायन ने कहा-हे कौरव्य ! इधर वह है । जिस समय हवा का सहारा पाकर आग गन्दपाल तेज प्रकाशवान् अग्नि से पैसा वचन कहने प्रचण्डसूप धारण करेगी उस समय मेरे पुत्र अपने पर भी पुत्री के लिये सोच में रहे, वे किसीप्रकार मन को आग के पास से न बचा सकेंगे। तपस्विनी को स्थिर नहीं कर सके । अन्त में उन्होंने लपिता से जरिता पुत्रों के बचने का उपाय न देखकर शोक कहा-हे सविता ! मालूम नहीं, मेरे पुत्र किम दशा से बिहल हो उठेगी ॥१४॥ में है। क्योंकि अभी उनमें उड़ने की शक्ति नहीं क्योकि ऊपर उड़ने में असमर्थ रयों के लिये - । --- wrrowrimrosiroccoronpron अध्याय २३५ ] महा मारत १०७३ - जरितारिः कथं पुत्रः सारिसृक्कः कथं च मे । स्तम्बमित्रः कथं द्रोणः कथं सा च तपस्विनी ॥ ६ ॥ लालप्यमानं तमृषि मन्दपालं यथा बने लपिता प्रत्युवाचेदं सासूयमिव भारत न ते पुत्रेश्ववक्षाऽस्ति यानृपीनुक्तवानसि तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद्भयम् ॥ त्वयाऽग्नौ ते परीताश्च स्वयं हि मम संनिधौ । प्रतिश्रुतं तथा चेति चलनेन महात्मना लोकपालो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति । समक्षं वन्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम् ॥ १० ॥ तामेव तु ममाऽमित्रां चिन्तयन्परितप्यसे । ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराऽभवत् ॥ ११ ॥ न हि पक्षवता न्याय्यं निःलेहेन सुहृजने । पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेनाऽऽत्मा कथंचन ॥ १२ ॥ गच्छ स्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुपाश्रिता सन्ताप करती हुई यह दौड़ा-दौड़ी फिरेगी । गेरा । ही होगा" कहकर उस बात को मान लिया था। पुत्र जरितारि कैसे जी सकेगा ! सारिसव. के ही वे लोकपाल होकर कमी प्रतिज्ञा के विरुद्ध काम न प्राण किस तरह बचेंगे ! म्तम्यमित्र और द्रोण या करेंगे। इस कारण पुत्रों की ओर से तुम निश्चिन्त मेरी तपस्विनी स्त्री के प्राण कैसे रखेंगे ! ॥५६॥ । हो ॥२॥१०॥ हे भरतश्रेष्ठ वन में इसतरह महर्षि मन्दपाल वास्तव में तुम्हारा मन पुत्रों की रक्षा के लिये को खी और पुत्रों के लिये विलाप करते देखकर व्याकुल नहीं है; तुम तो उस मेरी सौंकन और शत्रु लपिता ने देषवश होकर कहा-तुमने जिन पुत्रों का जरिता को याद करके ही व्याकुल हो रहे हो। नाम लिया उनके लिये तुम्हें क्या चिन्ता है । वे पहले जरिता के ऊपर तुम्हारा जैसा म्नेद था वैसा तेजस्वी और वीर्यवन्त । अमि से उन्हें भय इस समय मेरे ऊपर नहीं है । जिमके दो पक्ष नहीं है ||७1८1 या जो सहायवान् और समर्थ है वह पुत्र भादि तुमने स्वयं उन पुत्रों की रक्षा के लिये अमि मुहवन के क्लेश को, स्नेह के मोरे, उपेक्षा की दृष्टि से प्रार्थना की थी। महात्मा हुताशन ने भी "ऐमा से नहीं देख सकता । इससे तुम इस समय जिसके १०७४ महा मारत [ आदिपर्व cococoz noor00000074 (cा . मन्दपाल उवाच-नामेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे । अपत्यहेतोर्विचरे तञ्च कृच्छ्रगतं मम भूतं हित्वा च भाव्यथें योऽवलम्बेत्स मन्दधीः। अवमन्यत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १५ ॥ एप हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानो महीरुहान् आविग्ने हृदि संतापं जनयत्याशिवं मम वेशम्पायन उवाच-तस्माद्देशादतिक्रान्ते ज्वलने जरिता पुनः । जगाम पुत्रकानेव जरिता पुत्रगृद्धिनी सा तान्कुशलिनः सर्वान्विमुक्ताञ्जातवेदसः । रोरूयमाणान्ददृशे बने पुत्रान्निरामयान् अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनासा पुनः पुनः । एकैकश्येन तान्सन्क्रिोशमानाऽन्वपद्यत ततोऽभ्यगच्छत्सहसा मन्दपालोऽपि भारत । अथ ने सर्व एवैनं नाऽभ्यनन्दस्तदा सुताः ॥ २० ॥ लालप्यमानमेकैकं जरितां च पुनः पुनः । न चैवोचुस्तदा किंचित्तमृपिं साध्वसाधु वा ॥ २१ ॥ लिये शोक कर रहे हो उसी जरिता के पास जाओ। मेरे विकल हृदय में सन्ताप और अमाल की मैने विना समझे जैसे कुपुरुष का आश्रय लिया था आशङ्का ही उत्पन्न होती है ॥११॥१६॥ वैसे ही अकेली रहकर उसका फल भोगूंगी। मन्दपाल वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! अनन्तर ने कहा-तुम मुझे जैसा समझ रही हो मैं वैसा अग्नि के शार्गकों के घोंसले को छोड़कर आग नहीं हु । मैं उस भाव से नहीं घूमता-फिरता हु। बढने पर जरिता रोती पीटती हुई तथा पुत्रों को मैं केवल सन्तान उत्पन्न करने के लिये ऐसे फिर हूँढती फिरती वहा जा पहुची और देखा कि सब रहा है। इस समय मेरे वही पुत्र प्राण सङ्कट में पुत्र आग से बच गये हैं और कुशलपूर्वक जीते जागते पड़े हैं। जो कोई बीती बात को छोड़कर भावी हैं। माता को देखकर वे बच्चे रोने लगे । जरिता विषय की वासना रखता हे उस भूद की निन्दा भी उन्हें देखकर रोने लगी, पर ये आसू आनन्द होती है । इसलिये तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो।। के थे । बच्चों को बार-बार चिल्लाते देखकर जरिता में पुत्रों के लिये बहुत उदास हो रहा है। यह ने पास आकर उनको छाती से लगा रिया। ) प्रज्वलित अग्नि वृक्षों को जला रहा है । इमे देखकर ॥१७११०॥ ricorrukooooz ।
अध्याय २३५ ] महा मारत cococoo2007 मन्दपाल उवाच-ज्येष्ठः सुतस्ते कतमः कतमस्तस्य चाऽनुजः । मध्यमः कतमश्चैव कनीयान्कतमश्च ते ॥ २२॥ एवं ब्रुवन्तं दुःखातं किं मां न प्रतिभाषसे । कृतवानपि हि त्यागं नैव शान्तिमितो लभे ॥ २३॥ जरितोवाच-किं नु ज्येष्ठेन ते कार्य किमनन्तरजेन ते किंवा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः ॥ २४ ॥ यां वं मां सर्वतो हीनामुत्सृज्याऽसि गतः पुरा। तामेव लपितां गच्छ तरुणी चारुहासिनीम् ॥ २५ ॥ मन्दपाल उवाच-न स्त्रीणां विद्यते किंचिदमुत्र पुरुषान्तरात् । सापत्नकमृते लोके नाऽन्यदर्थविनाशनम् ॥ २६ ॥ वैराग्निदीपनं चैव भृशमुद्वेगकारि च सुव्रता चाऽपि कल्याणि सर्वभूतेषु विश्रुता ॥२७॥ अरुन्धती महात्मानं वसिष्ठं पर्यशङ्कत विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रियहिते रतम् ॥ २८ ॥ सप्तर्पिमध्यगं वीरमवमेने च तं मुनिम् अपध्यानेन सा तेन धूमारुणममप्रभा लक्ष्यालक्ष्या नाऽभिरूपा निमित्तमिव पश्यति ॥ २९ ॥ हे मारत ! इसी समय महर्षि मन्दपाल एकाएक मुझे शान्ति नहीं मिली । जरिता ने कहा-तुमको वहां पर आ गये । उन्हें देखकर उनके पुत्रों ने बड़े बेटे, दूमरे बेटे, तीसरे बेटे और छोटे बेटे से आनन्द नहीं प्रगट किया। ऋषि ने बार-बार हर क्या प्रयोजन है ! मुझे सब यातों में निकृष्ट देखकर एक पुत्र से और जरिता से कुशल-प्रश्न किया । पहले तुम जिसके पास गये थे उसी परमसुन्दरी पर उन्होंने अच्छा या बुरा कुछ भी उत्तर न दिया। लपिता के पास जाओ ॥२३१२५|| तर मन्दपाल ने जरिता से कहा-इनमें कौन तुम्हारा । मन्दपाल ने कहा- दूमर पुरुष के पास जाने से बड़ा बेरा, कौन दुमरा, कौन तीसरा, और कौन स्त्रियों का परलोक बिगड़ता और सौंकन रहने से छोटा है ॥२०॥२२॥ उनको संसार का सुख नहीं मिलता; सदा जी जलता में शोक से व्याकुल होकर पारम्बार तुमसे यही रहता है। सप्तर्षि के बीच में स्थित प्रापिष्ट पूछता हूं; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देती ! में महानुभाव वसिष्ठ अत्यन्त सञ्चरित्र और स्त्री का तुमको छोड़कर यहां से चला गया था सही, पर प्रिय तथा हित करने में लगे रहते थे; तो भी सर्व 7.mrwArrolor:
१०७६ महा भारत [ आदिपर्व अपत्यहेतोः संप्राप्तं तथा त्वमपि मामिह । इष्टमेवं गते हि त्वं सा तथैवाऽद्य वर्तते ॥३०॥ न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन । न हि कार्यमनुध्याति. नारी पुत्रवती सती ॥ ३१ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते स च तानात्मजान्सर्वानाश्वासयितुमुद्यतः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि साण्डवदाहपणि शाोपाख्याने पश्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३५॥ लोकों में प्रशंसित पतिव्रता अरुन्धती ने वसिष्ठ के । ही के लिये तुम्हारे साथ रहा था । आज तुम मेरे चरित्र पर सन्देह किया और व्यभिचारी समझकर साथ अरुन्धती का ऐसा व्यवहार कर रही हो। उनका अनादर भी किया। वह घृणित विचार करने । स्त्रीजाति को भार्या समझकर उसपर विश्वास करना से ही वे कल्याणी अरुन्धती, धुंधले लाल रङ्ग के ठीक नहीं। स्त्रियां पुत्रवती होने पर पति की सेवा आदि समान प्रभाववाली, गुप्त वेपवाली, कभी दृश्य और कार्यों को आवश्यक कर्तव्य नहीं समझती । वैशम्पायन कभी अदृश्य होकर दुनिमित्त की तरह आकाश कहते है-हे राजन् ! इसके पश्चात् उनके पुत्र उनकी में देख पड़ती है ॥२६॥२९॥ उपासना में प्रवृत्त हुए; वह भी उन पुत्रों को दिलासा वसिष्ठ जैसे अरुन्धती के अनिष्ट नहीं थे मै भो देने लगे ॥३०॥३२॥ वैसे ही तुम्हारा अनिष्ट नहीं हू । मै केवल सन्तान आदिपर्व का दो सौ पैतीस अध्याय समाप्त हुआ। अथ पत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥ मन्दपाल उवाच-युप्माकमपवर्थ विज्ञप्तो ज्वलनो अग्निना च तथेत्येवं प्रतिज्ञातं महात्मना ॥ १ ॥ अग्नेर्वचनमादाय मातुर्धर्मज्ञतां च वः भवतां च परं वीर्य पूर्व नाऽहमिहाऽऽगतः ॥ २ ॥ न संतापो हि वः कार्यः पुत्रका हृदि मां प्रति । ऋपीन्वेद हुताशोऽपि ब्रह्म तद्विदितं च वः दो सौ छत्तीम अध्याय ॥२३६ ॥ इसके पीछे मन्दपाल ने अपने पुत्रों से कहा-मैने ली थी । अग्नि की उस प्रतिना पर भरोसा करके पहले ही अग्निदेव से तुम्हारे छुटकारे के लिये प्रार्थना मैं पहले यहां नहीं भाया। तुम्हारी माता की धर्म- की थी, और उन्होंने तुम्हें न जलाने की प्रतिमा कर निष्टा और तुम्हारी प्रबल शक्ति पर भी मुझे विश्वास -- - •oncocc Foroococorosco 0070 carcace ॥ अध्याय २३६ ] महाभारत १०७७ boor वैशम्पायन उवाच-एवमाश्वासितान्पुत्रान्भार्यामादाय स द्विजः । मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह भगवानपि तिग्मांशुः समिद्धः खाण्डवं गतः । ददाह सह कृष्णाभ्यां जनयजगतो हितम् ॥ ५ ॥ वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः । जगाम परमां तृप्ति दर्शयामास चाऽर्जुनम् ॥ ६ ॥ ततोऽन्तरिक्षाद्भगवानवतीर्य पुरंदरः मरुद्गणैर्वृतः पार्थ केशवं चेदमब्रवीत् कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम् वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेप्विह ८ ॥ पार्थस्तु वरयामास शकादत्राणि सर्वशः । प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः ॥ ९ ॥ यदा प्रसन्नो भगवान्महादेवो भविष्यति तदा तुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवाऽस्त्राणि सर्वशः ॥ १० ॥ अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम् ॥ ११ ॥ था कि उसके कारण तुम आग से बच जाओगे । भगवान् इन्द्र भी देवताओं के साथ आकाशमण्डल हे पुत्रो ! तुम मेरे न आने के कारण दु ख न करो। से उतरकर पृथ्वी पर आये | उन्होंने अर्जुन और अग्नि भी ऋषियों को जानते है और ये भी जानते श्रीकृष्ण से कहा-जिस काम को देवता भी सहज हैं कि तुम ब्रह्मज्ञानी हो। वैशम्पायन ने कहा-हे में नहीं कर सकते थे, वह काम तुमने किया है। राजन् ! ऋषि मन्दपाल इमतरह पुत्रों को समझा मै तुमपर प्रसन्न हूं। तुम वर मांगो । यद्यपि पुरुष बुझाकर अपनी स्त्री जरिता को साथ ले उम जगह के लिये वह दुर्लभ हो तो भी तुमको दूंगा ॥१८॥ से दूसरे स्थान को चल दिये ॥१४॥ तब अर्जुन ने इन्द्र से सब अस्त्र मांगे। देवराज भगवान् अग्नि ने इसप्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुन | ने भी यथासमय उन अत्रों के देने का वाइदा करते की सहायता से जगत् के हित के निमित्त खाण्डव वन हुए कहा-हे पाण्डव ! जिस समय भगवान् महादेव को जलाया । उस स्थान में चर्बी और मेदा की तुमपर प्रसन्न होंगे उसी समय में भी तुमको सब नदियां पीकर अग्निदेव तृप्त और प्रसन्न हुए । फिर अम्र दे दंगा । हे कुरुनन्दन ! जब वह समय वे ब्राह्मण के रूप में अर्जुन के सामने आये । आवंगा तब मुझको मालूम जायगा । तप करके coorcord conocoroscocoreococorce [ आदिपर्व coco700x .- Poorcoticonovercocreak १०७८ म हा भारत wronomedia आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः । मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीप्यसि धनंजय ॥ १२ ॥ वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् । ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते एवं दत्वा वरं ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः । हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥ १४ ॥ पावकश्च तदा दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् । अहानि पञ्च चैकं च विरराम सुतर्पितः ॥ १५ ॥ जग्ध्वा मांसानि पीत्वा च मेदांसि रुधिराणि च । युक्तः परमया प्रीत्या तावुवाचाऽच्युतार्जुनौ ॥ १६ ॥ युवाभ्यां पुरुषाग्न्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् । अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ॥ १७ ॥ एवं तौ समनुज्ञातो पावकेन महात्मना अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मयस्तथा परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽपि भरतर्षभ रमणीये नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपणि प्रदाने पनिशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २१६ ॥ समाप्तमिदं खाण्डयदाहपर्य || समाप्तं चादिपर्व ।। तुम मुझसे सब आग्नेय अस्त्र, वायव्य अस्त्र और आहार से तृप्त होकर प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण और मेरे अस पास करेग ५०३१२१ अर्जुन से बोले-जुम दोनों की और पुरुषों में सप्ट अब वासुदेव ने भी इन्द्र से प्रार्थना की, कि हो। तुम्हारी सहायता से ही मै जी भरकर भोजन अर्जुन से उनकी मित्रता सदा बनी रहे । बुद्धिमान् करके तृप्त हुआ हूं। मैं तुमको वर देता हूं कि श्रीकृष्ण को देवगज ने यह वर दिया । इसप्रकार तुम्हारी गति न रुकेगी अर्थात् तुम अपनी इच्छा उन दोनों को वर देकर और अग्नि से सम्भापण के अनुसार जहां चाहोगे वहीं जा सकोगे । इसके करके इन्द्रदेव देवलोक को गये । हे महाराज । पश्चात् अर्जुन, श्रीकृष्ण और मयदानव ये तीनों अभिदेव मृग-पक्षी आदि प्राणियों से भरे खाण्डव पुरुप कुछ देर इधर-उधर टहलकर सुन्दर यमुना नदी वन को पन्द्रह दिन तक लगातार जलाकर शान्त के तट पर एक जगह बैठ गये ॥१३॥१९॥ हो गये । वह रक्त, मैदा, मांस, चर्वी आदि के आदिपर्व का दो सौ छत्तीस अध्याय समाप्त हुआ। ne आदिपर्व समाप्त हुआ - rorsroozoir.com