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ब्रहमानन्द
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योग-साधन-माला वर्ष २ पुष्प - sastestastestatestant .प.मा..... २३.blo एक अंगनू सं०....... ...१...24. गुगल पन्थालय कांगडी. Airwa antantDARNADANA "EMADARoma MASTARAMINISTRATIREMIRMIRAL ब्रह हमानन्द लेखक और प्रकाशक- HALFANARTNERINASIANPATRAPARAMANAVARATRAMES श्री स्वामी अभयानन्द सरस्वती, योगमण्डल 'गुरुकुल' काशी। श्रावण १६८० वै०] [मूल्य !) मा० ARRIASANASNASPARASANNASPARVASPASTANTREASURE 'ब्रह्मानन्द की विषय सूची - पृष्ठ T ... ... ... ५ सं० विषय १ गुरुमन्त्र २ आनन्दों का विवरण ३ श्रानन्द स्वरूप ब्रह्म' के ज्ञान का फल ४ नास्तिकों के बचन ५ श्रास्तिकों के बचन ६ सन्तोषी जनों के अानन्द ७ परमात्मा सप्रेम की पराकाष्ठा - ब्रह्म प्राप्ति के उपाय ६ मुमुक्षु की सप्तपदी १० ब्रह्म दर्शन ११ ब्रह्मानन्द की अवस्था १२ ब्रह्मस्तुति १३ उपासको के कष्ट सहने का परं लाभ १४ भजनानन्द ... १५ ममता का त्याग १६ महाराज प्रेम जिज्ञासु का उपाख्यान ... ... ६ ... ... ... ... ११ ... ... ... ... " * ओ३म् * *ब्रहमानन्द fcrr गुरुमंत्र ओशम् । भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो- देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ॥ प्रमाणीकरण" करै ॥ यजु०अ०३६ मं०॥. * दोझ * गायत्री गुरुमंत्र का, करो मानसिक जाप । अर्थ विचारो हदय में, होय बुद्धि निष्पाप ॥ * ठुमरी * (ध्रुव )= जो 'ओ३म् ' भजै, नित ध्यान धरै । भगवान उसै, सुखदान (१) 'भूः, जो जीवित, संसार करें। प्राणों से प्रिय, जग प्यार करै ।। जन को दुख, सागर पार कर सुख वृष्टि भुवः, सुख खान करै ॥१॥ (२) जो आनन्दमय, 'स्वः' व्यापक है। प्राधार वही, जगधारक है॥ वह सर्व नियामक, पालक है। सुख घ.मो सुख, सन्दान करें ॥ २॥ - दे धी दान . [ २ ] (३) उसको 'तत्' जो, 'सवितुः सब को । उत्पादक औ, बलदा भव को ।। अति ग्राह्य 'वरेण्यम्', मानव को। ज्ञान प्रभू, प्रशान हरै ॥३॥ (४) धिज्ञान स्वरूप, पवित्र सदा। 'भर्गः' 'देवस्य', गुरुं सुखदा ।। ध्याते हम 'धीमहि ध्रुव बुधिदा। बुध बुद्धि ‘धियः' अवधान करै ॥४॥ (4) जो सविता, उत्पात हरै। 'नः ' हमरी मति, अवदात करै॥ प्रचोवदयात्', करै। कृपया जगदीश, सुजान करै ॥५॥ १ सन्दान-दान देना, २ ग्राह्य = जो ग्रहण करने योग्य है, बुध = बोध स्वरूप, ४ अवधान= सावधान, ५ अवदात=' शुद्ध, ६ धी-बुद्धि। <3 आनन्दों का विवरण 8% वृहदाण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद में जहां प्रानन्दों को सातिशय कथन किया गया है । लिखा है कि मनुष्य का आनन्दं यह है कि वह युवा हो, बलिष्ठ हो और अधीत सास्त्र भी हो, इतनाही नहीं किन्तु पुष्कल धनवाला भी हो, यह साधारण मनुष्य के आनन्द की सीमा है, इससे शतगुना श्रानन्द गन्धर्व को होता है जो परमात्मा सम्बन्धी सामवेदादि के गायन को अन्यन्य भक्ति से गाता है, जो वेद का यथार्थ वेत्ता किसी कामानल से दग्ध न हो उसको भी वैसाही भान- न्द होता है, जो ब्रह्मवेत्ता होकर परमात्मा का गायन करता है उसका नाम " देव गन्धर्व " है, उनसे सौगुना श्रानन्द उनको होता है जो वैदिक कर्म करने में निपुण हैं, उनसे सौगुना मानन्द उनको है जो पूर्व प्रारब्ध कर्मों से ही देव भाव को [ ३ ] प्राप्त होकर ब्रह्म विद्यादि दिव्य गुणों को प्राप्त हुए हैं और उनसे सौगुना श्रानन्द उनको अधिक है जिनका देव भाव ऐहिक कर्मजन्य तथा प्रारब्ध कर्मजन्य नहीं किन्तु जो चिरका. लसे ही स्व स्वभाव से शुद्ध है, उनसे सौगुना आनन्द ऐसे देवों के अधिपति “ इन्द्र " का है, “ इन्द्र " यहां किसी अलो- किक देव विशेष का नाम नहीं किन्तु दिव्य गुणोंवाले पुरुषों के राजाका नाम “इन्द्र" है, उससे सौगुना आनन्द वृहस्पति नाम विद्वान को, उससे सौगुना अानन्द चक्रवर्ति राजा को और उससे सौगुना अधिक आनन्द ब्रह्म को होता है। 'भाव'-यह है कि साधारण मनुष्य से लेकर प्रजापति पर्यन्त यहां सब आनन्दों को सातिशय निरूपण किया गया है अर्थात् एक से दूसरे का आनद कही बढ़कर और यह अति शयता ब्रह्म में जाकर समाप्त हातो है, कामना रहित वेदवत्ता का प्रानन्द जो ब्रह्मा के श्रानन्द समान कथन किया है वह ' ब्रह्मानंद' है, या या कहो कि कामना रहित पुरुष ब्रह्मानंद का उपभाग करता है, वास्तव बात यह है कि सर्वोपरि आनंद एकमात्र ब्रह्म का है और सब उसी के प्रानंद से श्रानदित होते है। 83 आनन्द स्वरूप ब्रह्म के ज्ञान का फल जो अधिकारी पुरुष देह से लेकर सूर्य पर्यन्त सब लोक लोकान्तरों में परमात्मा को एक समझता है यह अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोशों का (जिनका वर्णन योगमण्डल गुरुकुल काशी द्वारा प्रकाशित "आत्मयोग" नामी पुस्तक में किया गया है ) इनसे परमात्मा को पृथक समझ कर श्रानंदमय ब्रह्म को प्राप्त होता है, या यों कहा कि परमात्मा का एकत्वदर्शी नाना देववाद तथा उसके नाना भेदों में न फसकर परमात्मा को सर्वत्र परिपूर्ण एकरस देखता है।
[ ४ ] 82 नास्तिकों के बचन > जो धन के प्रमाद से मूढ़ हैं जिनके ध्यान में यहीं लोक एरलोक कुछ भी नहीं और देहत्याग के अनन्तर जिनके ध्यान में प्रात्मा का प्रारितत्व नहीं पाता बह बारम्बार मृत्यु की पास में फसते हैं. कयोंकि महामाया के प्रभाव से उनके यही बिचार बने रहते हैं:- सवैया जहँ खानन पानन ती सुख है, यह मोक्ष कहो कत पावत कामा। परलोक नहीं सुख होय कहां, उलटे सुननार तजावत वामा । जगवंचन के हित व्योत रची, जन धूरत वेद धरे तिहि नामा । श्रद्धा सुन यो पथ बेद तजे, सुपर डिन के बस ढगई बामा ॥ * आस्तिकों के वचन 80%> भव भोग विलास रहेन सदा. इस जीवन प्रारुणि तुच्छ निहारा । गण इन्द्रिय दाह करे विषयान, लजाय पड़े भवसागर धारा ॥ वस्तु विवेक करें जनजो, तिनके मन में यह होत बिचारा। जब भौन तजे सुखमौन भजे, शठ सूझत तोहि तभी जगसारा ॥ इस प्रकार वस्तु विचार के भाव उपनिषद् में बलपूर्वक भरे हैं। जिनके पुरुष महामोह के फंदे में कदापि नहीं फंसता, क्योंकि वह ऐसाही वस्तु विचार करता है । यथाः- " जो परमात्मा, प्रकृति तथा जीयों के मध्य नित्यों में नित्य और चेतनों में चेतन है ऐसा समझता है उसी को श्रात्मस्थ जानने से शान्ति होती है" अन्यथा नहीं। १३ सन्तोषोजनों के आनन्द 88 सवैया। जो फल थे तन मानव के, बह लाभ किये हमने अब सारे। आनन्दधाम सुधानिधि को, लख दूर भये भव के भय सारे ॥ अनुष्टान से .
.
[ ५ ]
क्षुद्र नदी सम मेट दिया वपु, ब्रह्म पयोनिधि माह पधारे ।
प्रत्यक रूप भई समता, धन धाम धरा अब नाह हमारे ॥
सुत के हित प्यार करे जग में, कहु कौन करे धन के हित प्यारा।
हित नारन प्यार करे जग में, इम ढूंढ लिया हमने भव साग ।
हित बातम प्यार करें सबही, यह आतम है सबसे प्रतिप्यारा।
वह प्रानन्द रूप पयोनिधि है, उसकेबिन और नहीं काउप्यारा॥
वसु प्रण हो वसुधा सगरी, पुन
और पदारथ हो सुखकारी।
गजगामिनि भामिनिहो मधुरी.मुखकोछविचन्द्रकलाजिनटारी ।।
शुभ व्यंजन होहि प्रहार घन, जिनके रससे तन पुष्टि अपारी।।
सुख पातम नाह लहे जब लो,तब होहि हलाहल के सम चारी॥
यह अानन्द नाह मिल धन स.ओर नाह मिल वह त्याग कमाये ।
तन तीरथ त्याग करे नमिले नमिले-हरि के पुर देह तपाये ॥
घन कानन घार निवास करे-अथवा गिरि कन्दर माह बसाये
रति प्रातम एक सुसाधन है, पर जो रति नाह सुनाइ तपाहये ।
इसी भाव का गीता में इस प्रकार वर्णन किया है, कि:-
यस्त्वात्म रात वस्या दात्मत्टप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्ठस्तस्य कार्य न विद्यते ।।
गी।।३।६७॥
जो पुरुष उक्त प्रात्मदेव की प्रीति में रत है और एकमात्र
उसकी तृप्ति से तृप्त है उसके लिये मनुष्य जन्म का फल
रूप कोई कत्तव्य शेष नहीं रहता।
यह वह प्रात्म तत्व है जो प्रात्मदर्शी के लिये दक्षिणोत्तर,
पूर्व पश्विम तथा नीचे ऊपर सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है, इस
आनन्द सागर में निमग्न हुआ आत्तदर्शी अमृतभाव को
प्राप्त होता है।
७० परमात्मा से प्रेमकी पराकाष्टा ६०%
जब मनुष्य में परमात्मा की ओर प्रेम इतनी उच्च
[ ६ ]
अवस्था में पहुँचता है, कि दुनिया के सारे प्रेम इकठठे होकर
उसी एक परमात्मा की ओर लग जाते हैं, तब भी मनुष्य
अपना सब कुछ उसी परमात्मा को कहने लगता है। इसी
प्रेम में मग्न पुरुष का यह बचन है
"त्वमेव माता च पिता त्वमेव.
श्चसखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव
सर्व मम देव देव ॥
त्वमेव बन्धु
" सबैका
मात तुही गुरु तात तुही मित्र भ्रात तुही धन धान्य भंडारो।
ईश तूही जगदोश तूही मम शीश त्ही प्रभु राखन हारो ॥
राव तुही उमराव तूही मम भाव तूही मम नयन को तारो।
सार तूही कर्तार तूही घरबार तूही परिवार हमारो ॥
प्रमी जन यदि अपने प्र म पात्र को पाकर सब कुछ न
भूल जाय, तो वह प्रेमी नहीं हो सकता । प्रमी वही है, जो
अपने प्रेमास्पद की चाह में हो सब कुछ भूला दे और उसको
पाकर तो अपने प्रापे से भी बेखबर हो जाये।
ॐ ब्रह्मप्राप्ति के उपाय
वेदान्त शास्त्र में ब्रह्म प्राप्ति के चार साधन बतलाये हैं।
(१) श्रवण = सुनना, (२) मनन = मनसे विचार करना,
(३) निदिध्यासन प्राप्ति का उपाय वा कर्म, (४) साक्षा
दर्शन । चारों साधनों को निम्न प्रकार छंद में
देखिये।
हरिगीतिका छंद
हैं दूध घी जैस मिले त्यो श्रात्मा परमात्मा।
इस मर्म का ज्ञाता सदा हो अभय रत धर्मात्मा ॥
D
त्कार :
"
[ ७ ] प्रत्यक्षवादी नास्तिक है पूछता प्रभु का पता । दे दूध कर में आस्तिक कहता है घी इसमें बता ॥ १॥ सब गुप्त घृत प्रत्यक्ष करने के सुसाधन दक्षनर । सद युक्ति से संयुक्त कर घी वह खिलाता शीघ्रतर ॥ प्रिय वत्स ऐसे चित्तधर जैसे मिले घृत तुल्य हर । गुरु को सगझगो कष्ट हर गुरु मुख समझथन सौम्यवर॥२॥ हो दोग्धा श्रद्धालु सद् जिज्ञासु जापक शुद्ध चित् । फिर कान केले पात्र में दुहु दूध हरि गुण वेद वित् ॥ मन रूप हाँडी में पका धर देह चूल्हे पर सुचित । इंधन विषय का फूंकना योगाग्नि में जानो उचित ॥ ३ ॥ समुचित व्यजन अभ्यास से है दीप्त करना आगका । जलकर विषय पक जाय पय जल वायु फिर वैरागका। फिर चित्त मथनी में जमा जामन दे गुरु अनुराग का । पय ज्ञान जब जम हो दही बट रज्जु त्रय गुण.भाग का ॥४॥ क्योली पकड़ दृढ़ धारणा की गाड़ खम्बा ध्यान का। फिर ले रई सुसमाधिकी मन्थन करो दधि ज्ञानका ॥ ब्रह्मोपमा मसका मिले हो पथ सरल संयोग का । सिद्धान्त, साधन है यही वेदान्त दशन,योग का ॥ ५ ॥ इस छन्द में ऊपर कहे चारों साधन आगये । (१) ब्रह्म के गुणों का श्रवण श्रोत्र द्वारा किया है। जिनमें कानों को दूध दोहने का पात्र और ईश्वर गुणों को दूध से उपमा दी गई है। (२) मन को हाँडो में दूध पकाना मनन है। अर्थात् कानों से सुने हुए ज्ञान को मन में मनन (विचार) करके परिपक्क करना चाहिए । (३) समाधिको रई से दृढ़ ज्ञान रूपी दही को मथन करना निदिध्यासन है। (४) मसका रूप ब्रह्म को अनुभव करना साक्षात्कार है। .
[ २ ]
* मुमुक्षु की
सप्तपदी
* छन्द *
( १
था मुग्ध रमणी रूप पर, अत्यन्त विषया सक्त था।
परिहास हास-विलास में, प्रणयों हृदय अनुरक्त था ।
जब एक पद आगे बढ़ा, 'काम' मन से धो गया।
तो व्यक्ति गत शौन्दर्य क्या, संसार सुन्दर हो गया ।
( २ )
सुख में हुई अत्यल्प यदि वाधा, लगी तन काँपने ।
हो लाल, मल कर कर, रगड़ने रद, लगा उर हाँपने ॥
पद दूसरा ज्योंही धरा, त्योरी न वह बदलो रही ।
रिपु 'क्रोध' हटने के हृदय से, शान्ति मय देखी मही ।
( ३ )
सम्पत्ति नाना भाँति की, मैंने कमाई चाव से ।
तोभी न छूटी वासना, बढ़ती गई मृदु भाव से ॥
रक्खा चरण जव तीसरा,नाहि लोभ' से नातारहा।
ममता मिटी, नि:सीम अब, सन्तोष-धन भाता अहा॥
.
कांता, सुता, सुत, धाम, धन, परिवार प्यारा जानकर ।
लोलुप रहा उनमें सदा, सर्वस्त्र अपना मान
वैराग्य के चौथे चरण में, 'मोह' का परदा हटा ।
चिद्भानु-किरणों से घटी, अज्ञान तम का घन-घटा ॥
( ५ )
सर्वज्ञ हूँ, बलवान हूँ, गुणवान, सज्जन. मान्य हूँ।
थी भावना, संसार में,
सर्वाग्रगण्य वदान्य हूं ।।
मद' पाँचवे पद पर मिटा, अल्पक्ष जाना जीव है।
अभिमान तज देना, परम पुरुषार्थता की नीव है !!
[ 8 ] . . मुझसे न कोई श्रेष्ठ हो, चिन्ता बनी थी वित्त में। उत्कर्ष नहिं सहता किसी का, ज्ञान बल वा वित्त में ॥ 'मत्सर' मराधरते छटापद. मित्र-रिपु सम हो गये। वसुधा-कुटुम्बी वन गया, दुर्भाव मन के खो गये ।। ( ७ ) आगे निकल आये, छहो रिपु दीन पीछे रह गये । निर्द्वन्द, बन्धन रहित , शुचि, अद्वैत-हृद में बह गये ॥ सप्तम चरण धरते, मिली वह मुक्ति त्रिभुवन सुंदरी। सब भर भरापुर है आनंद ! हरि माया हरी ॥ * ब्रह्मदर्शन 8 ब्रह्मदर्शी जब आँख खोलकर बाहर की ओर देखता है तो इस ब्रह्माण्ड में बसा हुआ उस ब्रह्म को देखता है, वह देखता है "ब्रह्म ही यह अमर सामने है, ब्रह्म पीछे है, ब्रह्म दाई ओर है, ब्रह्म बाई ओर है।" नीचे ऊपर फैला हुधा मानो यह सुन्दर सारा ब्रह्म ही है । ( मुण्डक २॥ २॥ ११ ) यहां वह उस ब्रह्म को ब्रह्माण्ड के साथ देखता है, पर जब वह इसमें मग्न हो जाता है, तो प्रात्मा में उसके केवल स्वरूप को देखता है। "जय योग युक्त होकर दीप के सहश आत्म तत्व से ब्रह्म तत्त्व को देख ले, जो अजन्मा, अचल, सब तत्वों से शुद्ध है। तब उस देव को जान कर सब फांसों से छूट जाता है। ( श्वेता० ३० २० १५)॥ अब उसको प्रकृति नहीं जकड़ सकती, क्योंकि वह इसके बन्धनों से परे पहुंच गया है, इसीलिये अब वह “निरञ्जनः परमंसाम्यमुपैति” (मुण्डक० ३॥१॥३) ब्रह्म के परम समता को प्राप्त हुआ है। अब प्रकृति उसके सामने वही हकीकत रखती है, जो इसकी ब्रह्म के सामने है। इसी लिये कहा है कि "ब्रह्म वेद ब्रह्मैवभवति" (मुण्डक शराई) - .
[ १० ] जो पुरुष उस परब्रह्म को जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है अर्थात् वह ब्रह्म के धर्मों को धारण करके ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है । “यथा नघः स्यन्दमानाः समुद्रऽस्तंगच्छन्ति नाम रूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमु. पैति दिव्यम्” ( मुण्डक० ३।२।८ ) अर्थात् जिस प्रकार नदियां अपने नामरूप को धारण करके बहती हुई समुद्र में जाकर लीन हो जाती हैं और वहां अपने नामरूप को छोड़ कर समुद्र ही कहाता है इसी प्रकार मुमुनु पुरुष नाम रूप से रहित हुश्रा उस प्रकाश स्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। <3 ब्रह्मानन्द की अवस्था : * कवित्त* " सञ्चाविश्व नहीं, नहीं गृह कहीं, है मृत्यु सञ्ची नहीं। कुम्भीपाक नहीं कहीं यम नहीं, दुष्कर्म कोई नहीं ॥ आधि व्याधि नहीं, न मुर्ख गति है, जजाल सीमा नहीं। ब्रह्मानन्द निमग्न चित्त जब हो संसार माया नहीं ॥" 8. ब्रह्मस्तुति - नमस्ते सतेते जगत् कारणाय, नमस्ते चिते सर्व लोकाश्रयाय । नमाद्वैत तत्त्वाय मुक्तिप्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय ॥१॥ त्वमेकं शरण्यं त्वमेकंवरेण्यम्, त्वमेकं जगद्धारकंस्वप्रकाशम् । त्वमेकं जगत्कर्तृ पात्र प्रहर्तृ. त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम्॥२॥ भयानां भयं भीषणं भीषणानां,गति प्राणिनां पावनं पावनानाम् । महोच्चैः पदानां नियन्तृत्वमेकं, परेशां परं रक्षणं रक्षणानाम् ॥३॥ वयंत्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो, वयंत्वां जगत्लातिरूपं नमामः । सदेकं निधानं निरालम्बमीशं भवाम्भोधिपोतं शरण्यं ब्रजामः॥४॥ विदुर्यनचित्तेन्द्रियाणीन्द्रियेशं,विजानाति यस्तानि नित्यनियन्ता। जगत्साक्षिणं व्यापक विश्ववन्ध,चिदानन्द रूपं तमीशं प्रपद्यो॥५॥ .
[ ११ ] अणोरप्यणीयान्मायो महीयान् ,रविन्दुग्रहैर्योभगोलादिकर्ता। यईशोहिस्टष्ट्यादि मध्यान्तसंस्थः,चिदानन्दरूपंतमीशंप्रपद्य ॥६॥ यतो जायते विश्वमेतत् समस्तं,स्थितं यत्र यस्मिल्लयंयाति काले । अनादि विभुंचादिमध्यान्त शून्यं, चिदानन्दरूपं तमाशं प्रपद्ये ॥७॥ बशे यस्य विश्वं समस्त सदास्ते,यदा भासतो भातियद्वै विचित्रम्। न जनन्तियं तत्वतोयोगिनोऽपि,चिदानन्द रूपं तमीशं प्रपद्ये ॥८॥ ॐ भजन 88 नमो सृष्टिकर्ता नमो हे विधाता, नमो सच्चिदानंद आनंददाता। नमांदीनोंकेदुःखहरलेनेवाले,नमोविश्वभनिमोजनकेत्राता॥१॥ करोशुद्ध निर्मल मेरी आत्माको.यही मांगता नित्य सायं व प्राता । मुझे तीन तापों में अब नातपात्रो,मैं तंग होरहा गम उठाता२॥२॥ तुम्हारेसिवाकौनरक्षकहै मेग,जगत्स्वारथीहै न कोई मित्रभ्राता। भंवरवीचनैयाण्डीनाथमेरी,पड़ा काल के चक्र में चक्रवाता॥३॥. दयासिंधुहेदीनबन्धु दयाकर, न क्योंशीघ्रसुखरूपरस्तादिखाता। तेरेदरपैश्रा मेव्याकुलपड़ाहूँ,नक्योइसकादु:खदर्दसारेमिटाता४ *उपासकों के कष्ट सहन करन का परंलाभ वृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ५ ब्राह्मण १२ में लिखा है:-“ एतद्वै परमं तपो यद् ब्याहितस्तप्यते । परम ५ हैवलोकं जयति य एवं वेद । ००० ॥१॥ यह परम ( सव से बढ़कर ) तप है, जो रोगी होकर तपता है ( दुःख भोगता है ) जो यह जानता है, वह परम लोक को जीतता है । अर्थात् उपासक बीमारी को तप समझे ननिन्दे, न निराश हो । और उसके दुःख को ऐसा ही ध्यान करे जैसा कि तप करने में दुःख होता है। जो ऐसा ध्यान करता है, वह इस दुःख से फल लाभ करता है। जो उसको बड़ा भारो तप करने में दुःख उठाने का होता है । यह पर- मतप है, जो मरे हुए को जंगल की ओर ले जाते है । ( यह . । .
[ १२ ]
तप उस तप के बराबर है, जो ग्राम को छोड़ कर जंगल में
रहना है) जो यह जानता है, वह परम लोक को जीतता है
बह परम तप है, जो मरे हुए को आग पर रखते हैं । ( यह
उस तप के बराबर है, जो आग में पविष्ठ होना है)। जो यह
जानता है, वह परम लोक का जीतता है॥१॥
ईओ३म्
* भजनानन्द
४०१ १ तोटक छन्द -
'भजो भजओ भजओं संततम् । यह जीवन है अतिअल्पतरम्॥१॥
यह मत्र सुदुर्लभ वेद कृतम्। युग चारहु म ऋषि देव धृतम्॥२॥
सब मंत्र शिरामणि जाप वरम्। मन शुद्ध करं भव भोतिहरम्॥३॥
श्रुतितंत्र पुराण समस्त कहैं । बिना सब मंत्र अशुद्ध रहे ॥४॥
यह ईश्वरवाचक नाम नरो । सच में यह श्रेष्ट विचार कगे॥५॥
गिरि
गहू
में सरिता तट में। बन में जन में सबही पल में ॥६॥
ऋषि योगियती नर कोविद जो। करते जपाश्रति पूजितजो॥७॥
अब त्याग करो मन संशय को । गहिले हु सुमंगल ओं पदको॥८॥
सुख में दुख में प्रभुको भाजयो । न कदापि उस मन से तजियो॥६॥
मुख मोड़हुना करुणा करस । प्रिय वान्धमित्र वही सबसे॥१०॥
गातमुक्ति वही धनधान्य वही । पितु मातु वही गुरुदेव वहीं ॥११॥
प्रभु दहि सुवु द्ध प्रदीप वरम्। मन पाप कटे विन्शेतिमिरम्॥१२॥
अबलोलिस कोम हिमाखदाखमोचन मंगलशान्तिप्रदम् १३॥
करुणा करतू हम पापी सदा। दृग पाति कौ प्रभुहो सुखदा ॥१४॥
शरणागत याचत रक्ष विभा । जय जयओजयनाथ प्रभो॥१५॥
शिवशंकर शंकर को शरणम् मनप्ले सुभिरे दुखके हरणम् ॥१६॥
[ १३ ] भाई। १.१२ प्रभाती > अब तो प्रभात भई सन्ध्या कर चकवी प्रानन्द भई कमलन अति मुक्त भई॥ चरने सब धेनु गई प्रकटी अरुणाई ॥अब०॥ पक्षिन मिलकियो शोर उपवन बन चहूँ और। प्रोषित पति भई चकोर कुमुदिन कुम्हलाई ॥ पथिक चलत शब्द होत सूरज कि प्रकट ज्योति। फोको भयो शशि उदोत पढ़े बट समुदाई । पवन बहत मन्द २.शीतल है अति सुगंध । हवन यज्ञ कर प्रवन्ध पाठक हरपाई ॥ अब० ॥ 3३ भजन 88 मन अब सायं सन्ध्या करो रे ॥टेक॥ सूर्य अस्त भयो भौंर कमल बीच, खग बोलत तरु पररे। धेनु आई गृह धूल उड़त है तिमिर छायो घर २ रे ॥ १ ॥ दीपक बारो शुद्ध सनेह सो, चकवी चली है उधर रे। 'प्राणायाम कर गायत्री जप ओ३म् नाम चित धर रे ॥२॥ हवन यज्ञ कर स्वाहा २ हो ध्वनि जिधर तिधर रे। दिन तेरा सब झगड़ों में बीता पाठक प्रभु को सुमर रे ॥ ३ ॥ १४ भजन श्रावो जी करें नित्य संध्या हवन ॥ टेक ॥ सन्ध्या से हो अन्दर शुद्धि अहंकार मन चित और बुद्धि। सवको मिलाकर अन्तःकरण ॥ आयोजी०॥ एक प्रणव से ध्यान लगावो. प्राणायाम कर मन ठहरायो । तब होवै सब इन्द्रिय दमन ॥ आ० ॥ इसके बाद फिर हवन रचाश्रो प्राणीमात्र को सुख पहुँचानो। .
[ १४ ] शुद्ध होवे जल अन्न पवन ॥ श्रावो जी०॥ पञ्चयक्ष जो नित्य कर्म है प्राणी मात्र की रक्षा धर्म है। धर्म करें नित चारो वरण ॥ पात्रो जी० ॥ बासुदेव कर भक्ति उसकी महिमा जग में दीखे जिसकी। उस ही प्रभु की आओ शरण ॥ श्राश्रो जी॥ ४ ५ सन्ध्यार्थ शिखरिणी 80% प्रभू शन्नोदेवी सकल जग ज्योतिःकरत जो। तुम्ही सर्वव्यापी परम पद दाता जगत् का ॥ मनिच्छा सिद्धी हो जनहि सुखदाता महत् हो। महाशान्तो रूपी हमाहि पर वर्षा नित करो ॥ १ ॥ प्रभू जी वाणी को महत् यश दो औ बलभि दो। यही दो प्राणों को चखन श्रुति नाभिःहृदय को ॥ यही दो प्रीवा को भुजन शिर को भी सुखि करो भली भांती जिस्स जगत् कर कामों मह लगों ॥ २ ॥ तु प्राणों से प्यारा करहु शुचि मोरा शिर प्रभो। विनाशी दुःखों के करहु शुचि गोरी चलन जो ॥ सुखों के हो दाता करहु शुचि ग्रीवा जनन को। प्रभू सर्वेश्वर हो करहु शुचि मोरा हृदय को ।। पिता त्राता धाता करहु शुचि नाभिःमम तुही । तपानेवाले हो करहु शुचि मारे पद यही ॥ प्रभू सद्रूपी हो करहु पुनि मोरा शिर शुचिः । महत् सर्वव्यापी करहु शुचि इन्द्रियगण रचि ॥ ३ ॥ तु प्राणों से प्यारा कहहि श्रुति ओंभूः इसलिये। विनाशी दुःखों के सुखद विभुवः स्वः वसहिये । महान सर्वाधारा जगपितु यासों यह जना । तपान वाले हो अमृप तप सत्यं इमि भना ॥ ४ ॥ भू विज्ञानी की प्रकृति श्रु ति सामर्थहि बने। + [ १५ ] महारात्री पृथ्वी समुद नभ प्रापः घटि बिने । प्रकाशी धाता में रवि शशि प्रकाशी पुनि बना। यथा पूर्व कल्पं सबहि नभ लोकों को रचा ॥ ५ ॥ मुखाग्रे विज्ञानी नृपति रवि रूपाधिपति हो । श्रुति के वाणों से किरन सन अज्ञान तमसौ ॥ करो मेरी रक्षा करहु वश में दुष्ट जनको । नमस्ते हो तोको गुणहिं तब जेते सयन को ॥ दिशा दाई राजा विभव युक्त तिर्छ पथिक सों। सदा बाणों द्वारा महत् ऋषि रूपी विदित जो ॥ करो मेरी रक्षा करहु वश पापी जनन को । नमस्ते हो तोको गुणहिं तव जेते सबन को ॥ दिशा पृष्ठे राजा जगत्पति सर्वोत्तम यदा । दवा के बाणों से गरलमय सो सन सदा ।। करो मेरी रक्षा करहु बश पापी जनन को। नमस्ते हो तोको गुणहि तब जेते सबन को । प्रभू शान्तिः रूपी जगत्पति बाई दिश मुदा । तडित् के बाणों से पवन दुखदाई हनसदा ॥ करो मेरी रक्षा करहु वश पापी जनन को । नमस्ते हो तोको गुणहिं तव जेते सबन को ॥ अहो सर्वब्यापी जगत्पति पृथ्वी दिश विभू । सदा तू सपों से वनसपति बाणों लन प्रभू ॥ करो मेरी रक्षा करहु वश पापी जनन को । नमस्ते हो तोको गुणहिं तव जेते सबन को॥ महान् सर्वाधाग उपरि दिश में भी रम रहा । तु वर्षा बाणों से खुजलि सन व्याधीगमन सों ॥ करो मेरी रक्षा करहु बश पापी जनन को। नमस्ते हो तोको गुणहिं तव जेते सबन को ॥ ६ ॥ प्रकाशी देवों में अचर चर प्रात्मा मुदवरे । .
[ १६ ]
सदा से है वोही अबुध तम से भी अति परे ॥
उसे ही श्रद्धा से लखित रहुं मैं शान चख सो ।
तुम्ही हो सर्वोत्तम मितहु प्रभूमोसे विमुख सो ॥
श्रति जो वेदों की किरन लखि सृष्टी नियम सों
प्रकाशी सर्वोत्तम विदित रविसो हो सुगम सों ॥
उसी से प्रार्थी हो दरस करिहै विश्व तिहिको ।
सभी देखें विद्या निघम जग जाने सबहि को॥
महाअद्भुत रूपो स्वयम् परकाशी बलि प्रभू ।
सभोका है प्यारा सुजन गुरु जो है महविभू ॥
प्रकाशी विद्युत् का अचर चर व्यापो जगत् जो ।
वही विद्वानों के हृदय भलि भांति बसिरहो ॥
प्रभू द्रष्टा स्वामी परम हितकारी सुजन के।
वही सर्वब्यापी प्रथम रह सृष्टी प्रलय से॥
दया सो ताहीकी वयस शतलो जोवन मिले।
सुने गावे जी अधिक जिय ऐसा फिर करें ॥ ७ ॥
प्रकाशी सर्वानमा सबन सुख दाता जग पिता ।
बचे दुष्कर्मो
से ग्रहण करिवेयोग्ब सबका ॥
उसे निश्चय करके धरहिं निज प्रात्मा में सदा ।
हमारी बुद्धिः को तु प्रभु शुभ कामों में लगा ॥ ८ ॥
'नमस्ते हो तोको जगत् सुख दाता शिव तुहि ।
नमस्ते होतो अमित मुदधाता जन मही ॥
नमस्ते हो तोको सुभग वर कल्याण करिहो।
तुही मुक्ती दाता प्रमुद सुख रूपी प्रभु नमो ॥ ६ ॥
*१६ भजन 8-
प्रभुजी शिव संकल्प करो मन मेरा ॥ टेक ॥
यह मन मेरा अति शीघ्र गामी, भ्रमता फिरे घनेरा।
रात दिन और स्वप्न जागनें, डालन साँझ सवा ॥ १ ॥
[१७ ] , ज्योतियों में है ज्योति अद्भुत्, यज्ञों का है बसेग। अपूर्व शक्ति प्रजा में व्यापक, कर्म कमाई, जास धोरा ॥ २ ॥ प्रज्ञा बुद्धि घृतिः जाके भीतर, ज्योतिः हैं भपूग। जाके बिना काई व.में न स्झे, ऐसा मना है मेरा ॥ ३ ॥ मृत भविष्यत् वर्तमान में, जिसने तना बवेग । साप्त होता जासे यज्ञ रचावें, सो अमृत मन मेरा ॥ ४ ॥ ऋगयजु लाम पिरोए जिसमें, चक्र नाभि जू एरा। सारा जगत् व्यापक जिसमें, पंसा मना है मेरा ॥ ५ ॥ हद स्थान में स्थित होकर, जो कभी न होता जी । बन सुसारथि शीनाकी छह, हो रहा ता मंग॥ ६ ॥ 'अभय' व हे सुनो मम प्यारो, ह शुद्ध करन का बेला । यदि अब चूका (फर पछताश्री, जोगा शोक घनेरा ॥ ७ ॥ < ७ भजन 83> .. तुही है सन्तान तुही है अनूपम । तू राज्यों का अधिराज सरकार उत्तम ॥ १।। छोटासा वसग है व्राएड उसका । जोतेराशयाधामदरबार उत्तम ॥२॥ पवन देवता तेरा पंखा कुली है । वा भरे पानी पनिहार उत्तम ।। ३ ।। अँगीठी जगाने पै नोकर है अग्नि । सूर्य का दीपक जगे हार उत्तम ॥ ४ ॥ फुलवारी का फर्श कोमल से कोमल । बना बेल बूटे का गुलनार उत्तम ॥ ५ ॥ पुष्पावली है लवेडर की शीशी । ऋतुराज है तेरा मलियार उत्तम ॥६॥ तेरी लाइब्रेरी में पुस्तक मुकद्दस । मिले सृष्टि के प्रादि में चार उत्तम ।। ७ ।।
. [ १८ ] ऐश्वर्य तेरा अपरिमित है इतना । करें किस बुद्धि से विस्तार उत्तम ॥ ८ ॥ अखण्ड एकरस की लगी हमको प्यासा। अमीरस पिलाकर करो प्यार उत्तम।।६।। 3८ भजन.88- जोजन सुक्ख समाधि ल हेगा। पृथिवी परम पुनीत पलंग पर, सुखके शयन करेगा। हरी घास मखमल को विस्तर, तकिया हाँथ बनेगा ॥१॥ तारे भरे गगन मंडल को तम्बू इव समझेगा। जगत् प्रकासक चन्द्र दीपसम, ताहि प्रकाश करेगा ॥२॥ वायु प्रवाह दिशा दशहूको, त्रिविध समीर दुरेगा। मनकी वृत्ति सुघर वानतासंग, प्रफूलित मन बिहरेगा ॥३॥ वल्कल वस्त्र और फल भोजन, जल को पान करेगा। धन सद मतवारे पुरुषन के, कयों कटुवाक्य सहेगा ॥ ४ ॥ 'अभयानंद' भक्ति प्रभु में ज्यहि सुख शान्ति मिलेगा। राज्यादिक प्राकृत सुख जते, तृणवत् तुर्त तजेगा ॥ ५॥ -83 8 सिद्धोदगार > कुछ नहीं. कुछ में समाया कुछ नहीं। कुछ न कुछ का भेद पाया कुछ नहीं । एक रस कुछ है नहीं कुछ दूसरा। कुछ नहीं विगड़ा बनाया कुछ नहीं ॥ कुछ न उलझा कुछ नहीं की जाल में। कुछ पड़ा पाया गमाया कुछ नहीं ॥ कुछ गया कुछ और से कुछ और ही। जान कर कुछ भी जनाया ? कुछ नहीं ॥ कुछ न मैं, तू कुछ नहीं, कुछ और है। कुछ नहीं अपना, पराया कुछ नहीं ॥ , .
[१६] ว निधि मिली जिसको न परमानन्द की। उस अबुध के हाथ आया कुछ नहीं ॥ वह वृथा अनमोल जीवन खो रहा। धर्म धन जिसने कमाया कुछ नहीं ॥ अब निरन्तर मेल "शकर" से हुश्रा । कर सकी अनमेल माया कुछ नहीं ॥ * दोहा* है तो कहो तो है नहीं, नाहीं कही तो है। है और ना के बीच में, जो कुछ है सा ह ॥ - ममताका त्याग 83> aisseरम पूज्य महर्षि पतञ्जलि जी ने ब्रह्मानन्द प्राप्ति के प लिये आपने योग का सारांश चित वृत्तियों का एकाग्र करना ही बतलाया है, क्योंकि जब चित्त एकाग्र होजाता है उसमें से ममता निकल जाती है ममता के दुर हो जाने से प्रभु का ध्यान सरल हो जाता है, इसके अनेक उदाहरण है। उनमें से एक को उपयोगा जान कर लिखते हैं। 83 महाराज प्रम जिज्ञासु का उपाख्यान 88 * स्थान प्रानन्द नगर में प्रेम जिज्ञासु की प्रमपरिपद * ऋतुराज के शासन काल में मध्याह्न के समय निग्मांशु की तीव्र किरणों अपना पूर्ण प्रकाश दिगन्त में फैला रही है । ऐसे सुन हरे समय में धम कुन कमल दिवाकर प्रजा वत्सल श्रामान प्रम जिज्ञासु महाराज की न्याय परिषद लगा हुई है। न्याय, धर्म, विद्या सभा के व्यव. शामक, सचातक, पालक, आमात्य-सचिव, सेनापति तथा अनेक देशों के दृत श्रोर प्रजा. वर्ग के प्रतिनिधि उत्तमोत्तम वस्त्रारण धारण किये हुगे अपने २ काम की पुस्तक वही खाने सामोरे हुए ययाचित ७ [..] स्थान पर विराजमान हैं। महाप्रासाद में चित्र विचित्र के श्रासन विछ रहे हैं । खसकी सही लग रही है. गुलाब केवड़े के जल का छिड़काव हो रहा है। इन सब सुखमय साधनों के कारण राज समिति स्वर्ग समान दीप्यमान दीखती है इधर धर्म व्यवस्था की चरचा हो रही है कि द्वारपाल श्राता है। द्वारपाल-महाराज की जय हो। महामुनि पाराशर पधारे है। राजा-(श्रामात्य वर्ग से ) ऋषिवर को राज सभा में सादर लाओ। “योग परायण ऋषि शिरोमणि पाराशर का प्रवेश राजा-(आगे बढ़ कर ) गुरुवर के चरण कमलोंको प्रणाम हे। ऋषि-राजन् कल्याण हो, धर्म, धन, सन्तान की वृद्धि रहे, न्याय, दया भाव द्वारा प्रजा प्रसन्न रहे। राजा-अर्घ्य पाद्य की यथाविधि विधान क्रिया करके विष्टर विछाता है और ऋषि को पालनासान कर विनीत विनय सुनाता है। ऋषि -राजन् जो इच्छा हो सो कहो यथा सम्भब उसका उत्तर दिया जायेगा राजा--संसार के बन्धन में फंसकर चित्त उद्विग्न एवं मन खिन्न रहा करता है भिन्न भिन्न मांति की भव भौति चित्त को चलायमान और मन को दुखी रखती हैं अतः कृपया चित्त शांति चिदानन्द प्राप्ति का साधन उपदेश कीजिये। ऋषि-राजन् । सन्तान के समान प्रजा का पालन करो। यथा सम्भव उनके क्लेशों को हरो। दसवां भाग कर लो. जो कर लो प्रजा कीरक्षा, शिक्षा में व्यय करो। ब्राह्मण, क्षत्रो, वैश्य, शू द्र, आर्य, दस्यु, गोरे, काले तथा स्वदेशी विदेशी में भेद बुद्धि न रक्खो जीवन में यश कीर्ति और परलोक में अक्षय सुख ।
' । २१ । - के भागी बनो, इसी में सर्व प्रकार कल्याण है । जिस राजा की प्रजा सुखी रहती है वह राजा स्वर्गगामी, प्रजा को दुखी रखने वाला राजा अवश्यमेव नर्कगामी होता है। यथा- जो नृप राम जा हितकारी ! बसे स्वर्ग में रहै सुखारी ॥ जासु राज बस प्रजा दुखारी । सो नृप अवशिनरक अधिकारी और राज्य से बढ़ कर और सुख क्या हो सकता है। राजा-महाराज यो तो आपका शोतल वचन सत्य ही है। आपके पूर्व पुरुषाओं के सत्योपदेश से अनुशासित होकर हमारे पूर्वज सदा प्रजा पालन में तत्पर रहे । एवम् इस सेवक से भी श्रीगुरुजी महाराज के आशीर्वाद से कोई कार्य प्रजाहित के प्रति- कूल नहीं बन सका । परन्तु इसका फल परलोक में राज प्राप्ति रूप क्षणिक सुख के अतिरिक्त भार कुछ नहीं है। अतः परमा- नन्दप्राप्ति का उपदेश करें। ऋषि-जो संसार का सुख त्यागो तो परमार्थ प्राप्त हो। क्योंकि दो नावों का सवार डूब जाता है। .. राजा-गुरुजी आप का राजकुमार अभी छोटा है लिख पढ़ कर कुछ बड़ा और चतुर तथा राज्य का भार उठाने के योग्य हो जाये तो उसका विवाह करके गज काज उसको सोपदं और स्वयं ईश्वरोपासना में ध्यान लगाऊँ। ऋषि-राजन् . हमने कहा था कि राज्य से बढ़ कर और कोई सुख नहीं सो को प्राप्त है। परलोक किंसने देखा है। इसके अतिरिक्त ईश्वर में श्राप को सत्य श्रद्धा, अटल विश्वास तथा पूरा प्रेम भी नहीं है। अभी पुत्र षणा, वित्तषणा, लोकैपणा से चित्त उपराम भी नहीं हुआ है। अतः पुत्र तथा प्रजा का न्याय से पालन करो यही बहुत है। आगे को ईश्वर प्राप्ति का नाम न लेना। 83 कविबचन ऋषि के इस वाक्य ने बिजली कासा प्रभाव डाला संसार . वह तुम
वासना रूप कूड़ा करकट भस्म हो गया मन में पछताया और
संसार सुख त्याग कर ईश्वराधन का दृढ़ संकल्प करके बोला।
राजा-महाराज-मैंने
राज पाट पुत्र प्रजा प्रादि सबको छोड़ा
मुझे ब्रह्म प्राप्ति का उपदेश करें और राज प्रबन्ध भार अपने
शिर धरें।
ऋषि-राज काज का बोझ हम ने अपने शिर पर लिया
जो कुछ जानते हैं उपदेश भी करेंगे पर राजन् यह तो बताइये
कि आप अपने खान पान का क्या प्रबन्ध करेंगे। बिना भोजन
ईश भजन नहीं हो सकता।
राजा-मैं राज पुत्र होकर भिक्षा तो मांग नहीं सक्ता
वरन् हाथ से परिश्रम कर के निर्वाह कर लूँगा।
ऋषि-क्या काम करोगे।
राजा-घास खाद कर दो रोटी पैदा कर लूंगा।
ऋषि-तुम को घास खोदनी आती है कभी खोदी है ?
राजा-घास कभी खोदो तो है नहीं, न खोदनी पाती है। पर
समय पड़े पर इसे भी कर लूंगा। राजा नल ने विपत्ति काल में
तेली की पाट हांकी थी; सत्यव्रती हरिश्चन्द्र ने श्वपच का
पानी भर कर अपना समय विताया तथा धर्म निभाया था
में भी सब कुछ कष्ट सह लूगा ।
नोट-दुर क्यों जावे वर्तमान शताब्दी में परोपकार के
कारण स्वर्गीय लोकमान्य तिलक तथा सत्याग्रही परम तपस्वी
महात्मा गाँधी, देशभक्त भारत केशरी लाला लाजपतराय तथा
मौलाना हसरत मोहानी पूभृति अनेक देश भक्तों तथा धर्म
वीरों ने जेल में पड़कर अनेक कष्ट सहे; तथा सहस्रों भारत
सपूत मशीनगन, बम्ब का शिकार बने कतिपय ने फांसी
पाई पहले समय के लोग तो आत्मिक बल में आज कल के
लोगों से कहीं बढ़ कर थे।
ऋषि-राजन् घास खोदने में वड़ा कष्ट होता है जब भाप
.
[२३] अभ्यास करने बैठेंगे तो वे कष्ट सामने खड़े हो जायेंगे इस- लिये ईश्वरमें ध्यान न जमेगा और कुछ उपाय बतलाइये । राजा-महाराज लकड़ी तोड़ कर बेच लूगा इससे पेट पालूगा। ऋषि-लकड़ी तोड़ने में घास खोदने से भी अधिक कष्ट है। गजा-किसी की गठरी ढोकर निर्वाह कर लुगा । ऋषि-राजन् यह काम वड़ा कठिन तथा निकृष्ट है। राजा-तो महाराज जबकि आप मेरे गुरु और शुभचिन्तक और परम पद को महायात्रा के योगाभ्यास द्वारा पथ प्रदर्शक हैं, वहाँ मेरे जीवन यात्रा को लिये योग क्षेम की सामग्री का उपदेश न करेंगे। क्योंकि मेरा सर्वप्रकार का भार महाराज पर निर्भर है। ऋषि-यह भी हम सब बतावेंगे; परन्तु राजन यह तो वतावे कि आपने सच मुच हमको अपना राज पाट दे दिया। राजा हां हां मैंने राज्य श्री गुरुवर के चरण कमलों में समर्पण कर दिया। ऋषि-मंत्री कोषाध्यक्ष सेनापति आदि राज्य प्रबन्धक गण से । क्यों भाई तुम साक्षी हो कि राजा ने राज्य हमको दे दिया। मंत्री वर्ग-हाँ महाराज हम साक्षी हैं ऋषि-(गजा तथा गज सभासदों) से अब राज किसका? राजा तथा समस्तसभासद-महागज प्रापका। ऋषि-(गजा ले तो हम आपको जीवन निर्वाह की वृत्ति बताते हैं। राजा-महाराज की महती कृपा होगी। ऋषि--राजन् कल से तुम हमारी नोकरी करलो। राजा-बहुत अच्छा महाराज। ऋषि-क्या बेतन लोगे? ।
[२४ ] राजा-श्राधसेर श्राटा। ऋषि-हमने आध सेर भाटा, आध पाव बूग, छटाँक भर घी तथा प्राध सेर दूध और पाव भर ऋतु के फल श्राप को नित्य प्रति का बेतन नियत किया। राजा-महाराज की बड़ी दया है अब उचित सेवा बताइये। ऋषि-राजन् सेवा यह है कि ठीक दस बजे से चार बजे तक गुरु के सिंहासन पर बैठ कर प्रजा का पालन न्याय तथा राज सेना और राज्यकोष आदि राष्ट्र सम्बन्धी सब काम करने होंगे, जिनको आप अच्छी तरह करना जानते हैं। ठीक चार बजे राज काज समाप्त कर के अपनी नौकरी ले खाबो पीवो । योगाभ्यास करो मौज उडायो । कहो कैसी सरल सेवा है। कैसा निष्काम काम है। जी लगा कर करो वर्ष दिन के पश्चात् हम सब लेखा जोखा आकर जांच लिया करेंगे। राजा-गुरु की प्राज्ञा शिरोधार्य है। मन्त्रोपदेश तथा भोजन पबन्ध कीजिये । कवि-गुरुजी राजा को 'श्रोम्' का जाप योगाभ्यास की युक्ति प्रात्म भोजन को और वैश्य की दुकान शरीर भोजन को वताते और अपने प्राश्रम को जाते हैं। ( इति प्रथमाङ्क समाप्तः) पाठक वृन्द ! विचारिये ऋषि राजा से क्या ले गये। कहने को तो राजा से राज लिया, पर वास्तव में राज श्राप नहीं ले गये वरन राजा को सौंप गये. ले गये तो केवल एक ममता ले गये । अर्थात् राजा के चित्त से यह अभिमान दूर करा गये, कि मैं राजा हूं यह शिक्षा दे गये, कि राजा लोग राज के स्वामी नहीं वरन प्रजा के सेवक हैं। प्रजा की सेवा करते २ ईश्वर के सेवक बन जाते हैं। इसी से मोक्ष का अधिकार प्राप्त हो जाता हैं जो मनुष्य जन्म का मुख्य उद्देश्य है। प्रिय पाठक वृन्द ! हम आपको प्रथमाङ्क में सुना चुके हैं कि [ २५ ] राशर ऋषि राजा प्रेम जिज्ञासु से अस्मिता लेकर सन्तोष देकर गजा से सेवक बना कर चले गये। दूसरे दिन राजा अपने नित्य कर्म योगाभ्यासादि से निवृत्त होकर नित्य की भांति सिंहासन पर बैठा । बैठते ही यह विचार उत्पन्न हुआ, कि कल तक तो मैं राजा था आज नोकर हूं अब से ऐसा काम करुं कि प्रजा के सब लोग मुझ से प्रसन्न रहे कोई शिकायत न करें जिससे गुरूजी अप्रसन्न हो। इस प्रकार राज की सेवा करते २ बहुत काल बीत गया। पुत्र बड़ा हो गया । ऋषि की प्राज्ञा से राजा ने उसका विवाह भी कर दिया। राजा के निप्काम भाव की ख्याति राजर्षि जनक राज के समान घर २ होने लगी जिससे राजा का नाम निमाही पूसिद्ध हो गया राजा के ब्रह्माज्ञान का प्रभाव-रानी, गजकुमार, राजकुमार की प्यारी बधू, दासी तथा समस्त पूजा बर्ग पर भी पड़ा जैसा कि कहावत पूसिह है ( यथा राजा तथा पूजा ) स्तु, पाठको ! श्राप नगर की वायु तथा कलरव कलकल से विकल हो गये होंगे इसलिये चलिए हम आप का ऋषियों की तपोभूमि में ले चले वहां ऋषियो के अग्निहोत्र से सुगन्धित सौरभ समार का आस्वादन करावें और पक्षियों के कल निनाद के साथ वंद पाठा ब्रह्मचारियों का सामगान सुनवाये तरुण ऋतु राज के योवन काल में जब योगीश्वर द्विजराज निशानाथ गोतम या (निशासर्व भूतानां सा निशा जागतेमुनिः) की किम्बदन्ति अनुसार प्रकृति पुस्तक का पाठ समाप्त कर उड़गण मनके वाली मुक्त माला द्वारा प्रणव के बाचक त्रिव. र्णात्मक एकाक्षर ओङ्कार के वाच्यार्थ समस्त संसार के सृष्टि, स्थिति, संहार के निमित्त कारण पूम परायण, भव भय भंजन, जन मन रञ्जन परब्रह्म परमात्मा को अर्थ भावना में जाग्रण करके थकित हो गया। और तारावली जाजल्व माला को ऊषा बेला की ललित लावण्य लाल थैली में डालकर (भुवन [२६ ] झानं सूर्ये संयमात् । चन्द्रे तारा व्यूह ज्ञानम् । ध्रुवे तद्गति ज्ञानम् ) वाले गम्भीर शब्दार्णव से सत्यार्थ के प्रकाशमान समु. ज्वल मोती निकालने के लिये सूत्र त्रयकी त्रिबेणी में निमग्न हुअा अर्थात् चित्त को हदहर यमुना में धारण कर. सुरसरि रूप ध्येय में ध्यान धर, सरस्वती समाधि साध संयमार्थ, अस्ता- चल गुफा में जा घुसा। किम्बा प्रकृति पुत्रों अर्थात् पुष्पित पोढ़ पौधों, मरल सुवासित फलों, कलित कलियों कुसुमित कुलमों ललिन दलों, हरित पत्रों, नवांकुरित कोपलो, जर्जरित जड़ों को नैसर्गिक सरप स्वरस प्रदान कर। और प्राकृति प्रकृति तथा विषय ग्राहिणी बुद्धि वाले अमर अपत्यों अर्थात् सारस, सर्प, सिंह. दादुर, मोर, चातक चकोर, करिवर कूकर, मत्स्य. शूकर, भृङ्ग, पतंग श्रादि पशु पक्षियों जीव जन्तुओं एवम् कर चोगे, कर नस्कगे, पेटार्थी अभक्ष्य भक्षकों, स्वार्थी स्वत्व रक्षकों, निर्दयी निशाचगे, पोच पिशाचों, पामर व्यभि- चारियों निरंकुश मद्यपों, रसिक स्नेही सहवास रससनी सामान्य वनिता रमणियों तथा इनके जार नारकी नर पशुओं को सांसारिक विषय रसास्वादन द्वारा सन्मान कर, तथा योग साधन युक्त साधको समाधि सिद्ध साधुओं. संसार त्यक्त उपा. सको,निद्रात्यक्त योगियों,जीवनमुक्त सद भक्तों को श्रद्धा,विश्वास साहस साधना समाधि का प्रशस्तसुपाठ पढ़ा अमानसिक सुर्दु. र्लभ सुख प्राप्तिद्वारा चित्त समाधान कर अर्थात् योगियों से योग करा कर, भोगियों को भोग भुगा कर, रोगियों का रोग घटा कर, वियोगियों को वियोग बढ़ा कर. तरुण हरिण का मान हरता. वायु को हवा बताता, प्रांधी को फंक से उड़ाता, विजली को पीछे छोड़ता, छलावे को छलता. मनो वेग का अनुकरण करता हुश्रा, अपनी छबीली छटा दिखाकर लम्बी २ छलांग भर कर रात का जागा हारा भागा थका छपा कर (चन्द्रमा) अपने छपर खट में पड़ कर गाटा किरण किकारी लगो ताश , [२७] . , , . बादले की देदिप्य सुन्दर चादर में सुखकर मुख छिपा कर लोगया ( प्रातः काल हो गया) और सम्राट भुवन भास्कर भरद्वाज दिव्य द्यौलोक रूप आलोक महल से निकल मनोहा- रिणी किरण रूप सप्त अश्व जुड़े चित्र विचित्र रंगों से रंगे रथ पर सवार हो अरिष्टोः यज्ञ के अनुष्ठानार्थ दीक्षित होने के लिये उदया चल रुप ज्योतिष्मती जाजल्बमान वेदी पर विरा- जमान हाने के निमित्त चल दिया। अभी राजर्षि निर्मोही राजा ने स्वाध्याय साराधि साध कर दो घण्टे विश्राम किया था कि, इतने में प्रातः कालीन बाजे बजे, बन्दी जन विरदावली उचारने लगे, ब्रह्म परायण ब्राह्मण उच्च नाद से स्वरसहित वेदध्वनि करने लगे। यथा:-- ओ३म् । प्रातारग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना , प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पति प्रातस्सोम मुत रुद्रं हुवेम ॥ अर्थ-हम सब लोग प्रातःकाल में उस ( अग्नि ) पूज- नीय प्रकाश स्वरूप ( इन्द्र ; परमैश्वर्यवान् ( मित्र ) सखा ( वरुण ) वग्ने योग्य उपास्यदेव (अश्विना ) वेद विद्या के अध्यापक तथा उपदेशक ( भग) ऐश्वर्यशाली ( पूषण ) पुष्टि कर्ता ( वृहस्पति ) घेद के रक्षक ( सोम ) सुखदायक ( उत) और ( रुद्र ) दुष्टों को दण्ड देकर रुलानेवाले न्यायाध श परमात्मा की ( हुवेम) स्तुति करते हैं । इत्यादि । इस श्रोत्र पाबन श्रुति ध्वनि को श्रवण कर पक्षियों के कलरव के साथ समग्र नगर के द्विज, शूद्र, नरनारी, युवा बालक, राजा पूजा जागे। शौचादि नित्य कृत्य से निवृत्ति होकर ब्रह्मयज्ञ ( सन्धोपासन ) के उपरान्त देव यज्ञ (अग्निहोत्र) में संलग्न हुए। अस्तु । निष्काम युवराज कामजीत सर्व श्रेष्ठ काम से विश्राम पा एक मनोभिराम कामदार को साथ ले योगाश्रम के रम्याराम की ओर चले। ऋतुपति पावन बसन्त की पुण्य .
[२८] पभात है इधर ग्राम नगर वन उपवन में परम पुरुष के प्यारे पुत्रों ने “ पावकायस्वाहा, पवमानाय स्वाहा” आदि पवित्र मंत्रों द्वारा ऋतु की सामग्री और घृतादि ले सानवी होम का समारम्भ किया है उधर प्रकृति की पुत्रियों (दैवी शक्तियों) द्वारा ( वसन्तोऽस्यासोदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ) शुद्ध श्रुति के अनुसार देवी यज्ञ का पथम सबन पारम्भ हुआ है । इधर होम के धूम से धूसरित उधर पकृति पुष्प पांति की सुगन्धित से सुवासित शीतल सुखमय समीर सुगन्धि से आच्छादित हो चल रही है। तमोभूमि से गगन की ओर उठता हुश्रा धूम ऐसा सुहावना लगता है मानो कस्तूरिया गियों की डार गिरिलंग पर सुगन्ध की खोज में इधर उधर छलांग भर रही है । पावन पवन के झोकों से उपवन के पादप झूम रहे हैं मानों पुराने योगी ईश्वर प म में मस्त होकर योग निद्रा से चौंक पड़ते हैं । पर्वत पर से पवित्र पानी पूपात होकर पहाड़ी के पैरों पर पड़ कर पत्थरों से टकरा कर हर हर जलरव करता हुश्रा बहता है मानों कोई मस्ताना योगी हरि भक्ति से रंगा हुश्रा उच्च हर हरहर हर शब्द कहता है। हरे भरे पुष्पित तरुवरों से वायु वेग से जो जलरव करते हुए उज्वल जल पर पुष्प वृष्टि हो रही है। मानों महात्मा गान्धी सरीखे कर्म योगियों के सद उपदेश पर मुग्ध होकर भारतीय देव मण्डली पुष्प वर्षा कर रही है । वृक्षों पर पक्षियों की डार और पर्वता भूमि पर हरिणों की लंगार स्वच्छन्दता के साथ कलरव करती हुई विचर रही है। मानो जीवनमुक्त संयम सिद्धि योगियों की मण्डली जोवों की मुक्ति का उपदेश कर रही हैं। योगाश्रम आ पहुँचा । बटुक गण वेदध्वनि में निमग्न भोगियों को संसार त्याग कर योग की ओर आकर्षित कर रहे हैं । वेद- पाठी ब्रह्मचारियों के वेदनाद के साथ दादुर मधुर फल निनाद कर रहे हैं। मानों योग भ्रष्ट तपस्वी पूर्व संस्कारों के उदय होने [२६] - । है पर प्रेम पूर्वक वेद का स्वाध्याय कर रहे हैं । कुमार धीरे धीरे प्रकृति छटा का रहस्य देखते हुए योगाश्रम के पास जा पहुँचे। दूसरा अंक आनन्द भिक्षु के श्राश्रम में राजकुमार कामजीत का प्रवेश। राजकुमार-योगीराज को प्रणाम करता हूँ। भिनु -कल्याण हो, कैप्से पाना हुआ । कुशल तो है। कुमार-योगी महात्माओं के दर्शन और सत्लङ्ग के लिये। भिक्षु-धन्य है आइये विराजिये यह योगियोका कुशाशन है। कुमार-प्रणाम करके श्रासन पर बैठता है। भिक्षु-राजकुमार का प्रातिथ्य सम्मान कर । कहिये श्रापका शुभ नाम क्या है किस प्रजा पालक के सुपुत्र कुमार-सेवक का नाम कामजीत है इसके पूज्य जनक का जन्म नाम तो महाराज प्रमजिज्ञासु था पर साम्प्रत्तिवे निरी के नाम से प्रसिद्ध है। भिक्षु-मन ही मन में देवो राजा लोग कैसे असंतोषी, अभिमानी तथा स्वार्थी होते हैं कि महाराजाधिराज, सम्राट, अन्नदाता की उपाधि रखते हुए, साधुओं की भी प्रशस्ति पार ही धारण कर बैठे। प्रकाश में राजा होका निर्माही बोत राग । युवाराजकुमार होकर कामजीत यह दो विरुद्ध गुण अग्नि जल के समान समझ में नहीं पाते। कुमार-जो हो पर हम लोगों का नाम ऐसा ही प्रसिद्ध है। साधु-कुमार क्या अपना अंगरखा देकर हमारे यहाँ बैट सक्त है। कुमार-क्यों नहीं पर यह वस्त्र मेरे पहने हुए हैं भिक्षु-कुछ संशय न कीजिये अँगरखा मुझे दीजिये ।
[३०] कुमार- -अँगरखा मितु जी को भेट करता है। साधु, सेवक को साथ लेकर नगर को जाते हैं। ॥ इति द्वितीयांकः॥ अानन्द भिक्षु का राजकुमार का घस्त्र फाड़ कर और किसी मृत पशु के रुधिर में रंग कर परीक्षार्थ नगर को जाना। 83 तीसरा अंक स्थान प्रानन्द नगर का राज प्रासाद। (आनन्द भिक्षु-द्वार पाल से, हम कामजीत की परिचारिका से मिलना चाहते हैं द्वारपाल-जो श्राज्ञा महाराज, दाली उपस्थित है। भिक्षु-दासी से दोहा:- सुनेकमेरी कामकी, महा निकम्मी बात ॥ काम कुमर को सिंहने, वधा हाय दैवात ॥ दासी दोहा-मैं नहि बांदा काम की, नहीं काम से काम ॥ नदी नाव का सङ्ग है, पार लगाव राम ॥ भिक्षु-यह परिचारिका बड़ी स्वार्थ साधका है इसको" स्वामी के मरने का कुछ शोक नहीं। सत्य है। दाहा-स्वार्थ सिन्धु संसार है। इसका क्या अपराध । वह मतलब का यार है। जिस में प्रम अगाध ॥ प्रकाश में-दासी तुझे राजकुमार का कुछ तो मोह चाहिये पर क्यों हो सच कहा है। कोई मरे न तेरी हानी । चेरी छोड़ न होगी रानी ॥ विवेकमती-महाराज जिसका समय आजाता है वही जाता है फिर शोक करना अनावश्यक है। यथा । श्लोक-एके वृक्ष समारूढ़ा, नाना पक्षि विहङ्गमा: । प्रभाते दिद्शिं यान्ति, का कस्य प्रति वेदना ॥ अर्थ =एक वृक्ष पर सायङ्काल अनेक प. विश्राम लेते हैं, . ।
[३१] बीच हुश्रा प्रातः काल अपनी २ दिशा को उड़जाते हैं, कोई किसी के लिये रोता पीटता नहीं है । ऐसे कामजीत अपना काम पूरा करके चल बसा कभी हम भी चले जावेगे। भिक्षु-बांदी से-अच्छा तो काम जीतकी भार्याके पास ले चला दासी-बहुत अच्छा महाराज देखिये राजकुमार का रम्य हरम्य है यह राजकुमार की पत्नी ज्ञानवती देवी हैं ! भिक्षु-ज्ञानवती से दोहा- सुनरी कामनि कामकी , काम कला अनुरक्त । केहरि ने खाये कुमर तव पति हरि के भक्त ॥ ज्ञानवती-दोहा- पका को जग में जने . हुआ संयोग। नदी नाव का सङ्ग है , होता अन्त वियोग । भिक्ष-स्वगत, यह नव युवती बड़ी कठोर है । इसको पति वियोग की तनिक वेदना नहीं। प्रकाश में--गनी पति की अशुभ मर्म भेदी वार्ता सुन कर तुम्हारा मन तनिक भी खिन्न नहीं हुआ, यह देख कर हम को बड़ा विस्मय है। ज्ञानवती-साधु से, शोक सन्ताप अशानियों को होता ज्ञानियों को नहीं। किसी कवि ने कहा है। श्लोक-संसारे धन काष्टानि, नद्यां वहति संव्यमे । सयोगेन वियोगेन, का कस्य प्रति वेदना ॥ अर्थ-जैसे नदी में बन की लकड़ी इधर उधर से बह कर परस्पर मिल जाती फिर पानी की नरंगो से अलग अलग हो कर बहने लगती है ऐसे ही स्त्री पुरुषों का बीच का क्षणिक संयोग है इसके लिये पश्चात्ताप निरर्थक है। भिक्षु-दासी से, अच्छा, अब कामजीत की माता के पास . ले चल।
[ ३२] - बाँदो -बहुत अच्छा महारानी निवृत्तिप्रिया देवी बैठी हैं। भिक्षु-महारानी से- सुनरी माता काम की. दारुण दुख मय बात । कामजीत की देह का, किया सिंह ने घात ॥ माता-मेरे घर में देव वश हुश्रा कुमर उत्पन्न । हरि के न्याय विधान में, रहनी सदा प्रसन्न ॥ "भिक्षु-मनमे-माता तो स्त्री से भी विलक्षण निकली माता के तो शरीरका भाग पुत्र होता है । पुत्रको पोडा नाक्षात् अपनो पीड़ा है पर आश्चर्य है कि जनजी का अपने जने पुत्र का तनिक भी प्रेम नहीं है । प्रकाश-महारानी श्राप सरीखी धैर्यवती हमने कोई माता नहीं देखी कि पुत्र के वियोग में जिसके वित्त पर तनिक चोर न लगे। महारानी-साधु जी अज्ञानियों को मोह होता है । ज्ञानी वहीं है जो सुख दुख जीवन मरण में सपान रहै । जब पुत्र जी नही सक्ता अतः शाक कार्य है । किसी कवि न कहा है। श्लोक-अयाचिते मया गर्भ,दासगरः कृतः । अयातिच पुनर्याति का कम्य प्रति बेदना ॥ अर्थ-विना मांगे ईश्वर की दया से गर्भ में इम पुत्र ने जन्म धारण किया जो इस संसार में अता है जाता है फिर शोक करना अनावश्यक है। भिक्षु-बांदी से अच्छा महाराज के दर्शन और करा दो। दासी-चलिये-महागज के पास भी ले चलूँ । दूर से महाराज का योगाश्रम दिखा कर बोली कि यह महाराज का समाधि साधन का श्रानन्द सदन है वहाँ मुझे जाने को प्राज्ञा नहीं आप स्वयं चले जावे। ०१ चतुर्थीक महाराज प्रेमजिज्ञासु प्रसिद्ध निर्मोही राजा का समाधिसद- न में योगी आनन्द भिक्ष का प्रवेश ।
[ ३३ ]
.
राजा-उठ कर प्रणाम करके बिराजिये।
भिक्षु-धर्म, धन, सन्तान, प्रजा की वृद्धि हो।
राजा-कुशल मंगल है।
भिक्षु-और तो सब कुशल है परन्तु ।
राजा-परन्तु क्या।
भितु---ठण्डा श्वाँस भर कर ।
दोहा-काम कुमार कुलीन के, सुनो पिता निष्काम |
किया सिंहने काम का, खाकर काम तमाम ॥
राजा-उसकी इतनी आयु थी सुनो तपोधन धीर ।
त्याग योग सुख फिर रहे, तुम्हें पड़ी क्या भीर ॥
आप योग साधन कीजिये वा संसार का सुधार । इधर
उधर मारे मारे फिरने में कुछ सार नहीं कालवली से बड़े बड़े,
बलवान देवता, अवतार, वली पैगम्बर सब लाचार हैं। किसी
कधि ने मेरे कथन की पुष्टि में कैसा सार बचन कहा
श्लोक-मातुलो यस्य गोविन्दः पितुर्यस्य धनुर्धरा।
अभिमन्युस्त्यजः पाणः, का कस्य पूति वेदना ।।
अर्थ-जिसका मामा श्री कृष्ण ओर पिता गाण्डीव धनुष
धारी भर्जुन हो ऐसा अभिमन्यु भी मरगया। फिर मेरा पुत्र
किस गिन्ती में है। और किसकी कहे स्वयं श्रीराम कृष्ण जोई.
श्वर के अवतरमानेजाते है वेभीमरगये हिरण्याक्ष आदि जोअन.
मास्मि कहते थे वे मरे। ईसामसीह जोखुदाकेखासबेटेबनते थे
सूली पर चढ़े । मुहम्मद साहिब जो खुदा के खास महबूब थे
वे भी मृत्यु से न बचे तो हम तो बहुत तुच्छ जीव हैं। अब
इन झगड़ों को छोड़ कर ऐसा उपाय कीजिये और हम लोग
को सिखलाइये जो एक बार मर कर बार बार न मरे
साधु-धन्य राजन् भाप बड़े ज्ञानी, सन्तोषी, तपस्वी तथा
निर्मोही हैं । भाप तो जीवन मुक्त हो चुके । भापके पूभाव से ।
।
[ ३४ ]
श्रोतके पुत्र, परिवार, दास दामी सही ज्ञानी हो गये। मैंने
श्राप के परिवार की परीक्षा करलो श्राप का पुत्र जीवित है
हमारे पाश्रर पर बैठा है मैंने उपका बन्न फाड़ डाला है।
नवीन भेजकर कुमार को बुला लीजिये।
राजा---बहुत अच्छा, वस्त्र भेजता हूँ।
राज कुमार का आना।
राज कुमार---पूज्य पिता तथा योगी राज, दोनों गुरु जनों
को अभिवादन करता है।
दोनों-प्राशिद देते हैं। आयुष्मान् सौम्य, समाधि साध
कर जीवन
मुक्त
भि नु-महाराज आप गुरुदेव कौन से तपोधन हैं।
राजा-पीतराग महर्षि पाराशर योगीराज ।
लिनु-वे तो हमारे भी गुरु हैं, पर हम को यह सिद्धि
प्राप्त नहीं हुई।
गेजा-पह परमात्मा-गुरु की कृपा तथा पूर्व संचित
कमाई का फल है।
भिनु-राजा आप का कल्याण हो अब हम भी गुरु देव
के दर्शनार्थ जाते हैं।
बनो।
साधु का जाना। पटाक्षेप ॥ ओ३म्शम् ।।
शिवशंकर मिश्र, द्वारा, भारत-प्रेस, काशी में मुद्रित ।
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