Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sunhale Shaival

Aghe · 2011/03

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सुनहले
शैवाल
अज्ञेय की कुछ कविताए
कवि के छायाकनो से मरिडत
अक्षर प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड

स० ही० वात्स्यायन 'अज्ञेय
0
प्रथम सस्करण
१६६६
.
प्रकाशक
अक्षर प्रकाशन प्रा०लि.
दिल्ली
• मूल्य
पदहरुपये
आवरण
नरेद्र श्रीवास्तव
पुस्तक-बध
विजय बुर बाईडिंग हाउस
दिल्ली
गुचि प्रा०
नई दिल्ली

अनुक्रम ७ ओ लहर ओ एक ही कली की सन्ध्या-सकल्प ६ हमने शिखरो पर जो प्यार क्यिा ११ निरस्त्र १२ देह वल्ली १४ झील का फिनारा १७ आगन के पार द्वार १६ प्रयम किरण २० निझर २२ २५ अतिम आलोक २६ मूर्यास्त ३० साम्राज्ञी का नैवेद्य-दान ३३ दीप पत्थर का ३५ सागर पर माझ सागर पर भोर ३६ नाता रिश्ता ५५ र्वाचल ५६ वहा-रात ५८ पहेली ६० कलगी बाजरे की ६२ चांदनी जी लो चुपचाप वह नाम ६८ भीतर जागा दाता भादो की उमस ७३ नृत्य-स्मृति ७४ ऋतुराज ७६ हवाई यात्रा ऊची उडान ७८ नाम तेरा ८१ वर्षान्त ८३ चुक गया दिन ८४ बना दे, चितेरे ८७ परायी राह मेरे विचार है दीप फिर एक बार १०० निवेदन के दीप १०२ भार आगी सागर चित्र ४० हिरोशिमा ४२ ८८ खुल गयी नाव मैंने देखा एक बूद ४६ धरा व्योम ४८ बर्फ की झोर tomy 7

ओ एक ही कली की
ओ एक ही कली की
मेरे साथ प्रारब्ध-सी लिपटी हुई
दूसरो, चम्पई पंखुडी।
हमारे खिलते-न-खिलते सुगन्ध तो
हमारे बीच मे से होती
उड जायगी।
000
७. सुनहले शैवाल

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सन्ध्या सकल्प यह सूरज का जपा-फूल नैवेद्य चढ चला सागर-हाथो अम्बा तिमिरमयी को रुको सांस-भर फिर मैं यह पूजा-क्षण तुमको दे दूंगा। क्षण अमोघ है, इतना मैंने पहले भी पहचाना है इस लिए सांझ को नश्वरता से नही बांधता। कितु दान भी है अमोघ, अनिवार्य, धम यह लोकालय मे धीरे-धीरे जान रहा हूँ (अनुभव के सोपान ) और दाा वह मेरा एक तुम्ही वो है । यह एको मुख तिरोभाव- इतना भर मेरा एवात निजी है- मेरा अजित वही दे रहा हूँ मो मेरे राग सत्य में तुम्हे । ६. सुनहले पाल

ऐसे तो हैं अनेक
जिनके द्वारा
मैं जिया गया,
ऐसा है बहुत
जिसे मैं दिया गया।
यह इतना
मैंने दिया।
अल्प यह लय-क्षण
मैंने जिया।
आह, यह विस्मय ।
उसे तुम्हे दे सकता हूँ मैं |
उसे दिया।
इस पूजा क्षण मे
सहज, स्वत प्रेरित
मैंने सकल्प किया।
०००
सुनहले शेगाल •१०

हमने शिखरो पर जो प्यार किया
हमने शिखरो पर जो प्यार किया
घाटियो मे उसे याद करते रहे,
फिर तलहटियो मे पछताया किये
कि क्यो जोवन यो बरबाद करते रहे ।
शिखर तो सभी अभी हैं,
घाटियो मे भी हरियालियाँ छायी हैं,
तलहटिया तो और भी
नयी बस्तियो मे उभर आयी हैं।
पर जिस दिन सहसा आ निकले
सागर के किनारे-
ज्वार को पहली ही उत्ताल तरग के सहारे
पलक की झपक-भर मे पहचाना
कि यह अपने को कर्ता जो माना-
यही तो प्रमाद करते रहे ।
सभी कुछ तो बना है, रहेगा
एक प्यार ही को क्या
नश्वर हम कहेगे-
इसलिए कि हम नही रहेगे?
000
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निरस्त्र
.
कुहरा था,
सागर पर सन्नाटा था
पछी चुप थे।
महाराशि से कटा हुआ
थोडा-सा जल
बन्दी हो
चट्टानो के बीच एक गढिया मे
निश्चल था
पारदर्श।
प्रस्तर-चुम्वी
बहुरगी
उद्भिज-समूह के बीच
मुझे सहसा दीखा
केंकडा एक
आँखें ठण्डी
निष्प्रभ
निष्कोतूहल
निनिमेष।
जाने
मुझ मे कौतुक जागा
या उस प्रसृत सन्नाटे मे
अपना रहस्य यो खोल
आख भर तक लेने का साहस
सुनहले शैवाल • १२

M उस उदासीन ने सुना नहीं आंखो मे वही बुझा सूनापन जमा रहा । ठडे नीले लोहू मे दौडी नहीं सनसनी कोई। पर अलक्ष्य गति से वह कोई लीक पकड धीरे-धीरे पत्थर की ओट किसी कोटर मे सरक गया। . यो मैं अपने रहस्य के साथ रह गया मैंने पूछा क्यो जी, यदि मैं तुम्हे बता दूं मैं करता हूँ प्यार किसी को- तो चौकोगे? ये ठडी आंसे झपकेंगी सन्नाटे से घिरा अकेला अप्रस्तुत अपनी ही जिज्ञासा के सम्मुख निरस्त्र, निष्कवच, वध्य। औचक ? 000 १३. सुनहले शवाल देह-वल्ली देह- वल्ली। रूप को एक बार बेझिझक देख लो। पिंजरा है ? पर मन इसी मे से उपजा । जिस की उन्नीत शक्ति आत्मा है। देखो देह- वल्ली। - भव्य वीज रूपाकारो का 'निगन्धा इव किशुका'- गध के उपभोक्ता कितु कहे तो क्व हम वसत के उन्मेष को नही उस एक सकेत से पहचान सके ? कब वह नही हुआ जीवन के चिरतन स्वयम्भाव का प्रतीक ? देखो व्रीडाहीन इस कान्ति को आखो मे समेट लो। देसो रूप नाम-हीन एक ज्याति मता इयत्ता की ज्वाला अपराजिता अनावृता। सुनले शंवाल •१४

में
१५. सुनहले शैवाल
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झील का किनारा
झील का निर्जन किनारा
और वह सहसा छाये सन्नाटे का
एक क्षण हमारा।
वैसा सूर्यास्त फिर नही दिखा
वैसी क्षितिज पर सहमी-सी बिजली
वैसी कोई उत्ताल लहर और नही आयी
न वैसी मदिर बयार कभी चली।
वैसी कोई शक्ति अकल्पित और अयाचित
फिर हम पर नही छायी।
वैसा कुछ और छली काल ने
हमारे सटे हुए लिलारो पर नहीं लिसा।
वैसा अभिसचित, अभिमन्त्रित,
सघनतम सगोपन कल्पान्त
दूसरा हमने नहीं जिया।
वैसी शीतल अनल-शिखा
न फिर जली, न चिर-पाल पली,
न हमसे संमली।
या कि अपने को उतना वैसा
हमी ने दुवारा फिर नही दिया? 000
१७ • सुनहले शंवाल

ra
सुनहले शैवाल
.१८

आँगन के पार द्वार
आँगन के पार
द्वार खुले
द्वार के पार आंगन ।
भवन के ओर-छोर
सभी मिले-
उन्ही मे कही खो गया भवन।
-
.
कौन द्वारी
कौन आगारी, न जाने,
पर द्वार के प्रतिहारी को
भीतर के देवता ने
किया बार बार पा-लागन।
०००
१६ • सुनहले शैवाल

प्रथम किरण
भोर की
प्रथम किरण
फीकी
अनजाने
जागी हो
याद
किसी की-
अपनी
मीठी
नीकी।
धीरे-धीरे
उदित
रवि का
लाल-लाल
गोला
चौक कही पर
छिपा
मुदित
बन-पाखी
बोला
सुनहले शैवाल •२०

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Hea
.
दिन है
जय है
यह बहु-जन की
प्रणति,
लाल रवि,
ओ जन-जीवन
लो यह
मेरी
सकल साधना
तन की
मन की-
वह बन-पाखी
जाने गरिमा
महिमा
मेरे छोटे
चेतन
छन की। 000
२१. सुनहले शैवाल

--
निभर
आओ, इस अजस्र निर्झर के तट पर
प्रिय, क्षण-भर हम तीस
रह कर इसके स्वर मे लय पर डाले
अपने प्राणो का यह अविरल रौरव ।
प्रिय | उसकी अजस्र गति क्या कहती है ?
शक्ति ओ अनन्त । ओ अगाध ।'
प्राणो की स्पदन गति उस के साथ साथ रहती है-
'मेरा प्रोज्वल कदन हो अवाघ ।'
प्रिय, आओ इस की सित फेनिल स्मित के नीचे
तप्त किन्तु कम्पन-श्लय हाथ मिला कर
शोणित के प्रवाह मे जीवन का शैथिल्य भुला कर
किसी अनिवच, सुख से आंखें मीचे
हम खो जावे, वैयक्तिक पाथक्य मिटा कर
-~-

VT ग्रथित अंगुलियाँ, कर भी मिले परस्पर-- प्रिय, हम बैठ रहे इस तट पर। और अजस्र सदा यह निझर गाता जावे, गाता जावे, चिर-एकस्वर । - , - पर, एकस्वर क्यो? देखो तो, उडते फेनिल रजतकणो मे बहुरगो का नत्तन क्यो न हमारा प्रणय रहेगा स्वप्निल छायाओ का शुभ चिरन्तन दपण इन सब सन्देहो को आज भुला दो । क्षण की अजर अमरता मे बिखरा दो। उर मे लिये एक ललकार, सुला दो, चिर जीवन की ओछी नश्वरताएँ सब जाएँ, वह जाएँ, सब बह जाएं । - वह अजस्र वहता है निझर निझर । आओ, अजलि-बद्ध खडे हम शीश नवा लें। उठे कि सोये प्राणो मे पीडाका मर्मर- हम अपना-अपना सब कुछ दे डालें- मैं तुमको, तुम मुझे, परस्पर पा लें। मूक हो, वह लय गा लें- जो अजस्र बहुरगमयी, जैसे यह निर्झर- यह अजस्र जो बहता निझर । - 000 २३. सुनहले शैवाल सुनहले शैवाल .२४

नाता-रिश्ता
तुम सतत
चिरन्तन छिने जाते हुए
क्षण का सुख हो-
(इसी मे उस सुख की अलौकिकता है)
भाषा की पकड मे से फिसली जाती हुई भावना वा अथ
(वही तो अर्थ सनातन है)
वह सोने की कनी जो इस अजलि-भर रेत मे थी जो
धो कर अलग करने मे
मुट्ठियो से फिसल कर नदी मे बह गयी-
(उसी अकाल, अकूल नदी मे जिसमे से फिर अजलि भरेगी
और फिर सोने की कनो फिसल कर बह जायगी)
-
तुम सदा से
वह गान हो जिसकी टेक-भर
गाने से रह गयी।
मेरी वह फूस की मडिया जिस का छप्पर तो
हवा के झोको के लिए रह गया
पर दीवारें सव बेमौसम की वर्षा मे बह गयी
यही सब हमारा नाता-रिश्ता है-इसी मे मैं हूँ और तुम हो
और इतनी ही बात है जो बार-बार कही गयी
और हर बार कही जाने मे ही कही जाने से रह गयी ।
तो यो, इस लिए
यही अकेले में
बिना शब्दो के
मेरे इस हठी गीत को जागने दो, गूंजने दो
२५. सुनहले सवाल

मौन मे लय हो जाने दो,
यही
जहा कोई देखता-सुनता नही
केवल मरु का रेत-लदा झोका
डेसता है और फिर एक किरकिरी
हँसी हंसता बढ जाता है-
यही
जहा रवि तपता है
और अपनी ही तपन से जनी धूल-कनी की
यवनिका मे झपता है-
यही
जहा सब कुछ दीखता है
पर सब रग सोख लिये गये हैं
इस लिए हर कोई सीखता है कि
सब कुछ अन्धा है।
जहाँ सब कुछ साय-साय गूंजता है
और निरे शोर मे सयत स्वर धोखे से
लडखडा कर झड जाता है।
यही, यही और अभी
इस सधेसन्धि-क्षण मे
इस नये जनमे, नये जागे,
अपूव, अद्वितीय-अभागे
मेरे पुण्यगीत को
अपने अत शून्य मे ही तन्मय हो जाने दो-
यो अपने को पाने दो।
सुनहले शैवाल •२६

वही, वैसे ही अपने को पाले, नही तो
और मैंने कब, कहाँ तुम्हे पाया है ?
हां-बातो के बीच की चुप्पियो मे
हँसी मे उलझ कर अनसुनी हो गयी आहो मे,
भीडो मे भटकी हुई अनाथ आँखो मे-
तीर्थों पगडडियो मे
बरसो पहले गुज़रे हुए यात्रियो की
दाल-बाटी की बची-बुझी राखो मे |
उस राख का पाथेय लेकर मैं चलता हूँ-
उस मौन की भाषा मे मैं गाता हूँ
उस अलक्षित, अपरिमेय निमिष मे
मैं तुम्हारे पास आता हूँ,
मैं जो होने मे ही अपने को छलता है-
यो अपने अनस्तित्व मे तुम्हें पाता हूँ 1000
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माहने गया .२८

अन्तिम पालोक सध्या की किरण-परीने उठ अरुण पस दो खोले कम्पित-कर गिरि-शिखरो के उर छिपे रहस्य टटोले। देखी उस अरुण किरण ने कुल पवत-माला श्यामल- बस एक शृग पर हिम का था कम्पित कचन झलमल । प्राणो मे हाय पुरानी क्यो कसक जग उठी सहसा' वेदना-व्योम से मानो- खोया सा स्मृति-घन बरसा । तेरी उस अन्त घडी मे तेरी आँखो मे, जीवन । ऐसा ही चमक उठा था तेरा अन्तिम ऑसू कन 1 000 २६ • सुनहले शैवाल सूर्यास्त अन्तिम रवि की अन्तिम रक्तिम किरण छू चुकी हिमगिरि-भाल, अन्तिम रक्त रश्मि के नतन को दे चुके चीड-तरु ताल । नीलिम शिला खड के पीछे दीप्त अरुण की अन्तिम ज्वाल- जग को दे अन्तिम आश्वासन अस्ताचल की ओट हुए रवि । - खोल हृदय-पट तू दिखला दे अपना उल्लस प्राणोन्माद, शब्द-शब्द की कम्पन-कम्पन मे भर दे अतुलित आह्लाद, अक्षर-अक्षर हो समय बिवराने को जीवन-अवसाद- फिर भी वर्णित हुई न होगी इस की एक किरण भर छवि । स्वय उसी भैरव सौन्दर्य-नदी मे बह जा नीरवता द्वारा अपनी असफलता कह जा निरद्वेग, मीठे विपाद मे चुप ही रह जा इस रहस्य अपरिम के आगे आदर से नतमस्तक, रे कवि । 000 सुनहले शैवाल • ३० 二升中年十一月 一名: 中宁中学生。

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साम्राज्ञी का नेवेद्य-दान हे महाबुद्ध मैं मन्दिर मे आयी हूँ रीते हाथ फूल मैं ला न सकी। औरो का सग्रह तेरे योग्य न होता। जो मुझे सुनाती जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत- खोलती रूप-जगत् के द्वार, जहाँ तेरी करुणा बुनती रहती है भव के सपनो, क्षण के आनन्दो के रह सून अविराम- उस भोली मुग्धा को कॅपती डाली से विलगान सकी। जो कली खिलेगी जहां, खिली, जो फूल जहां है, जो भी सुस जिस भी डाली पर हुआ पल्लवित, पुलक्ति, मैं उसे वही पर अक्षत, अनाघ्रात, अस्पृष्ट, अनाविल, हे महायुद्ध ३३ . सुनहले शैवाल

अपित करती हूं तुझे।
वहीं-वही प्रत्येक मरे प्याला जीवन का,
वही-वही नैवेद्य चढा
अपने सुन्दर आनन्द-निमिप का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के, पदकोश
हे महायुद्ध
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दीप पत्थर का
दीप पत्थर का
लजीली किरण की
पद-चाप नीरव
अरी ओ करुणा प्रमामय
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३५० सुनहले शैवाल

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सागर पर स
बहुत देर तक हम चुपचाप
देखा किये सागर को।
फिर कुछ धीरे से बोला
'हाँ, लिख लो मन मे इस जाती हुई धूप को,
चीडो मे सरसराती हुई इस हवा को,
लहरो की भोली खिलखिलाहट को
लिख-लो सव मन मे-क्योकि फिर
दिनो तक-(क्या बरसो तक ?)-
इसी सागर पर तुम लिखा करोगे
-
सुनहले शंवाल •३६

दद की एक रेखा-
बस एक रेखा
जी, हो सकता है, मूत स्मृति भी नही लायेगी-
केवल स्वय आयेगी
एक रेखा जिसे
न बदला जा सकता है न मिटाया जा सकता है
न स्वीकार द्वारा ही डुबा दिया जा सकता है
क्योकि वह दद की रेखा है,
और दर्द
स्वीकार से भी मिटता नही है'
लोट हम आये साँझ घिरते-न-घिरते ।
पर फिर उस सागर-तट पर रात को
जगातारा
उसी पर छितरायी चन्द्रमा ने चादनी
उसी पर नभोवन होता रहा और नीला, अपलक
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-

ये भी तो लहरो पर कुछ लिखते रहे ? हमने जो लिखा था अगर वह दद है तो ये क्या लिखते है ? न सही दर्द उन मे, न सही भावना- फिर भी, निर्वेद भी, कुछ तो वे लिखते हैं ? हा कि 'दर्द है तो ठीक है (दद स्वीकार से भी मिटता नही है, स्वीकार से पाप मिटते हैं, पर दद पाप नही है।) दर्द कुछ मैला नही, कुछ असुन्दर, अनिष्ट नही, दद की अपनी एक दीप्ति है- ग्लानि वह नहीं देता। तुमने यदि दर्द ही लिखा है, भद्दा कुछ नहीं लिखा, झूठा कुछ नही लिखा तो आश्वस्त रहो हम उसे गहरा ही करेंगे, सारमय बनायेंगे, उस मे रग भरेंगे, रूप अवतरेंगे, उसे मांज-मांज कर नयी एक आभा देते रहेंगे काल भी उसे एक ओप ही देगा और । जाओ, वह लिखा हुआ दर्द यहा छोड जाओ- तुम्हे वह बार बार नाना शुभ स्पो मे फलेगा।' 000 - सुनहले शंवाल •३८

सागर पर भोर
बहुत बड़ा है यह सागर का सूना
बहुत बड़ा यह ऊपर छाया औंधा खोखल।
असमजस के एक और दिन पर, ओ सूरज,
क्यो, क्यो, क्यो यह तुम उग आये?
000
१.
र

सागर-चित्र
सूने उदधि की लहर
धीर बधिर
सूने क्षितिज का आत्मलीन आलोक
अधूरा, धूसर, अन्धा
टकराहट चट्टानो पर
थोथे थप्पड़ की
जल के
उडे झाग की चिनियाहट
गालो पर,
आँखो मे किरकिरी रेत
.
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mura
अर्थहीन मँडराते कई कोच
हकलाते-से जब-तब कराहते हलके ।
यह क्षण यह चित्र
दरिद्र?
अ मूल अमोल?
विलीयमान ? चिर?
000
४१.सुनहले शैवाल

हिरोशिमा
एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नही,
नगर के चौक
घूप बरसी
पर अन्तरिक्ष से नहीं
फटी मिट्टी से।
छायाएँ मानव-जन की
दिशाहीन
सब जोर पडी-वह सूरज
नही उगाथा पूरव मे, वह
बरसा सहसा
बीचो-बीच नगर के
काल-सूय के रथ के
पहियो के ज्यो अरे टूट कर
बिखर गये हो
दसो दिशा मे।
कुछ क्षण का वह उदय अस्त
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेनेवाली दोपहरी
फिर?
छायाएं मानव-जन की
नहीं मिटी लम्बी हो हो कर
मानव ही सब भाप हो गय ।
सुनले शैवाल •४२

Mand
iyan
........
Jana
छायाएं तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरो पर
उजडी सडको की गच पर ।
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बना कर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।
000
४३. सुनहले शैवाल

खुल
गयी नाव
खुल गयी नाव
घिर आयी सझा, सूरज
डूबा सागर-तीरे।
घुघले पडते से जल पछी
भर धीरज से
मूक लगे मंडलाने,
सूना तारा उगा
चमर पर
साथी लगा बुलाने।
सुनहले शैवाल •४४

om
*
17
1
'

मैने देखा, एक बूद
मेंने देखा
एक वूद सहसा
उछली सागर के झाग से
रंगी गयी क्षण भर
ढलते सूरज की आग से।
मुझको दीख गया
सूने विराट् के सम्मुख
हर आलोक-छुआ अपनापन
है उ मोचन
नश्वरता के दाग से।
000
सुनहले शैवाल • ४६

干

धरा-व्योम
अकुरित धरा से क्षमा
व्योम से झरी रुपहली करुणा।
सरि, सागर,
सोते-निझर-सा
उमडे जीवन
कही नही है मरना।
000
Irel
.

NA- HTTARA PROM वर्फ की झील चट-चट-चट कर सहसा तडक गये हिमखड जमे सरसी के तल पर लुढक-पुढक कर स्थिर वसन्त का आना —यद्यपि पहले नही किसी ने जाना- होता रहा अलक्षित। नयी किरण ने छुए शृग हो गये सुनहले बहते सारे हिमद्वीप । हां, गाओ, 'हेम-किरीटी राजकिशोरो का दल ४६. सुनहले शैवाल

नव-वसन्त के अभिनन्दन को मचल रहा है।'
गाओ, गाओ, गान नहीं झूठा हो सकता
1
गाओ।
पर ये हेम-मुकुट हैं केवल
दूर सूर्य के लीला-स्मित से शोभन
कौतुक-पुतले।
नीचे की हिमशिला पिघल कर जिस दिन
स्वय मिलेगी सरसी-जल मे
नव-वसन्त को उस दिन
उस दिन उस दिन
मेरा शीश झुकेगा।
क्योकि तपस्या
चमक नहीं है,
वह है गलना
गल कर मिट जाना—मिल जाना-
पाना।
000
१
सुनहले शैवाल.५०

ओ लहर
जिधर से आ रही है लहर
अपना रुख
उधर को मोड दो,
तट से बांधती हैं जो शिराएं
मोह उन का छोड दो,
वक्ष सागर का नहीं है राजपथ
लीक पकडे चल सकोगे तुम उसे
धीमे पदो से रौंदते-
यह दुराशा छोड दो।
आह, यह उल्लास, यह आनन्द
वह जाने कि जिस से
अनगिनत बाहे बढा कर
ढीठ याचक सा लिपटता अग से
मांगता ही मांगता सागर रहा है
और जिसने
जोड कर कुछ नही रक्खा-
सदा वढ-बढ कर दिया है-
जो सदा उन्मुक्त हाथो, मुक्त मन
देता रहा है,
अन्तहीन अकूल अथाह सागरका थपेडा
सदा जिसने समुद
छाती पर सहा है।
आह । यह उल्लास,यह आनन्द, वह जाने,
बहा है
५१. सुनहले शैवाल

. सनसनाता पवन जिस की लटो से छन कर थम गयी है तारिका जिस के लिए व्योम-पट पर जडी हीरे की कनी-सीज्वलित जय-राकेत-सी बन कर हर लहर ने झोर कर जिस को अनागत ज्योति का स्पादित संदेसा भर कहा है। जिधर से आ रही है लहर अपना रख उधर को मोड दो तरी सागर की सुता है सगिनी है पवन की, उसे मिलने दो ललक कर लहर से फेन के अनगिन किरीटो को झुका कर तू मुखर आह्वान कर वही उस को जय मिलेगी तो मिलेगी या मिलेगी लय, असशय तुम तरी को छोड दो बढती लहर पर' मेरा, मुझे वर जिधर से आ रही हैतू जिघर से मुझ पर थपेडे पडेंगे अविराम उधर ही तो मुक्त पारावार है। दुर्द्धर लहर तू आ। डर? कौन? किस का ? हरहराती आ, लहर, मेरी लहर, सुनहले शवाल.५२

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दूर्वाचल
पार्श्व गिरि का नम्र, चीडो मे
डगर चढती उमगो सी
बिछी पैरो मे नदी ज्यो दर्द की रेखा ।
विहग-शिशु मौन नीडो मे।
मैंने आख भर देखा।
दिया मन को दिलासा-पुन आऊंगा।
(भले ही बरस-दिन--अनगिन युगो के बाद 1 )
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमककर मिनी बोली-
'अरे यायावर । रहेगा याद
?"
५५. सुनहले शवाल

वहाँ-रात
-
पत्थरो के उन कंगूरो पर
अजानी गन्ध-सी
अब छा गयी होगी
उपेक्षित रात।
ने
बिछलती डगर-सी सुनसान
सरिता पर
ठिठक कर सहम कर
थम गयी होगी बात।
अनमनी-सी घुन्ध मे चुपचाप
हताशा मे ठगे-से
वेदना से क्लिन्न
पुरनम टमकते तारे
हार कर मुरझा गये होगे
अंधेरे मे बिचारे--
विरस रेतीली
नदी के दोनो किनारे।
रुके होगे युगल चकवे
बांध अन्तिम बार
जल पर
वृत्त मिट जाते दिवस के प्यार का-
अपनी हार का।
गन्ध-लोभी व्यस्त मौना
कोप कर के बन्द
पडी होगी मौन
समेटे पख, खीचे डक,
मोम के निज मौन में निष्पन्द ।
सुनहले शवाल.५६

별
AF
र
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१
पचमी की चांदनी
कंपती उँगलियो से
आँख पथरायी समय की
कहा तो सहज, पीछे लौट देखेंगे नहीं-
पर नकारो के सहारे कब चला जीवन ?
स्मरण को पाथेय बनने दो
कभी तो अनुभूति उमडेगी
प्लवन का सान्द्र धन भी बन
आज जावेगी।
000
लिखत को 'आज' की
फिर पोछ
'कल' के लिए
पाटी मांज जावेगी
५७ • सुनहले शैवाल

पहेली
गुरु ने छीन लिया हाथो से जाल,
शिष्य से बोले
'कहां चला ले जाल अभी?
पहले मछलियां पकड तो ला?'
तकता रह गया बिचारा
भौचक।
बीत गये युग । चले गये गुरु ।
बूढा, धवल-केश, कुचित-मुख
चेला
सोच रहा था अभी प्रश्न
'क्यो चला जाल ले?
पहले, रे, मछलिया पकड तो ला
"
सहसा भेद गयी तीखी आलोक किरण ।
'अरे, कब से बेचारी मछली
घिर अगाध से
सागर खोज रही है
-
सुनहले शैवाल.५८

- t ย- ** - -" -* * K ** : 2 -

कलगी वाजरे की
हरी बिछली घास ।
दोलती कलगी छरहरी बाजरे की ।
अगर मैं तुमको
ललाती सांझ के नभ को अकेली तारिका
अब नही कहता,
या शरद के भोर की नीहार-न्हायी कुई,
टटकी कली चम्पे की
वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मला है।
बल्कि केवल यही
ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीको के कर गये हैं कूच ।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।
मगर क्या तुम
नही पहचान पाओगी
तुम्हारे रूप के-
तुम हो, निक्ट हो, इसी जादू के-
निजी किस सहज, गहरे बोध से,
किस प्यार से मैं कह रहा हूँ-
अगर मैं यह कहूँ-
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा मे कलगी छरहरी बाजरे की ?
आज हम शहरातियो को
पालतू मालच पर संवरी जुही के फूल से
सृष्टि के विस्तार का-ऐश्वर्य का-
-
सुनहले शंवाल ०६०

।
T
औदार्य का-
कही सच्चा, कही प्यारा
एक प्रतीक
बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर
दोलती कलगी अकेली
बाजरे की।
M
और सचमुच, इन्हे जब-जब देखता हूँ
यह खुला वीरान ससृति का धना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूँ
समपित।
शब्द जादू हैं-
मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं है ।
000
६१. सुनहले शैवाल

चाँदनी जी लो
शरद चांदनी
बरसी
अंजुरी भर कर पी लो
ऊंघ रहे हैं तारे
सिहरी सरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप
क्षण मे
तुम भी जो लो।
सीच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे मे
झिपते
चेहरे पहचान
खम्भो पर बत्तियाँ
खडी है सीठी
ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन
आने-जाने।
उठी ललक
हिय उमंगा
अनकहनी
अलसानी
जगी लालसा
मीठी,
सुनहले शैवाल • ६२

-
M
3
.
खडे रहो ढिंग
गहो हाथ
बरसी
शरद चांदनी
मेरा
पाहुन मन-माने,
ओ प्रिय रहो साथ,
भर-भर कर अंजुरी
पी लो
अन्त स्पन्दन
तुम भी क्षण क्षण जी लो।
000
६३ • सुनहले शैवाल

اد
بم حم+
ج) که
گا
-

चुपचाप चुप-चाप चुप-चाप झरने का स्वर हम में भर जाय, चुप-चाप चुप-चाप शरद की चांदनी झील की लहरो पर तिर आय, चुप-चाप चुप-चाप जीवन का रहस्य, जो कहा न जाय, हमारी ठहरी आखो मे गहराय, चुप-चाप चुप-चाप हम पुलकित विराट् मे डूबे- पर विराट् हम मे मिल जाय- चुप-चाप चुप-चाऽऽप ००० ६५ • सुनहले शैवाल वह नाम यही तो गा रहे हैं पेड यही सरिता की लहर मे कांपता है यही धारा के प्रपातित बिन्दुओ का हास है। इसी से मर्मरित होगी लताएँ सिहर कर झर जायगी कलियां अदेखी मेघ धन होंगे बलाकाएँ उडेंगी झाडियों मे चिहुँक कर पछी उभारे लोम सहसा बिखर कर उड़ जायेंगे ओस चमकेगी विकोरित रग का उल्लास ले पहली किरण में । फली घुघ मे बांधे हुए है अखिल ससृति नियम मे शिव के यही तो नाम यही तो नाम- जिसे उच्चारते ये ओठ आतुर झिझक जाते हैं। कहां हैं दोनो तुम्हारे हाथ सम्पुटित कर के मुझे दो कोकनद का कोष वह गुजरित होगा पास आयो जागरित दो मानसो के सस्फुरण मे नाम वह सगीत बन कर मुखर होता है। नाम से- उस नाम से 000 सुनहले शैवाल.६६

4
ما می
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-- भीतर जागा दाता - मतियाया सागर लहराया। तरग की पखयुक्त वीणा पर पवन ने भर उमग से गाया। फेन-झालर-दार मखमली चादर पर मचलती किरण-अप्सराएँ भारहीन पैरो से थिरकी-- जल पर आलते की छाप छोड पल-पल बदलती। दूर धुघला किनारा। झूम-झूम आया, डगमगाया किया। मेरे भीतर जागा दाता बोला लो, यह सागर मैंने तुम्हे दिया। हरियाली बिछ गयी तराई पर, घाटी की पगडण्डी लजायी और ओट हुई- - PITH .

"
त
पर चचला रह न सकी, फिर उझकी और झांक गयी।
छरहरे पेड की नयी रगीली फुनगी
आकाश के भाल पर जय-तिलक आंक गयी।
गेहूँ की हरी बालियो मे से
कभी राई की उजली, कभी सरसो की पीली फूल-ज्योत्स्ना
दिप गयी,
कभी लाली पोस्ते की सहसा चौंका गयी-
कभी लघु नीलिमा तीसी की चमकी और छिप गयी ।
मेरे भीतर फिर जागा
दाता
और मैंने फिर नीरव सकल्प किया
लो, यह हरी-भरी धरती-यह सवत्सा कामधेनु-मैंने
तुम्हे दी
आकाश भी तुम्हे दिया
यह बोर, यह अकुर, ये रग, ये फूल, ये कोपलें,
ये दूधिया कनी से भरी बालियां,
ये मैंने तुम्हे दी
आंकी-बांकी रेखा यह
मेडो परछाग-छौने ये श्लिोलते,
यह तलैया, गलियारा यह,
६६. सुनहले शैवाल

सारसो के जोडे, मौन खडे पर तौलते-
यह रूप जो केवल मैंने देखा
यह अनुभव अद्वितीय, जो केवल मैंने जिया,
सब तुम्हें दिया।
.
एक स्मृति से मन पूत हो आया ।
एक श्रद्धा से आहूत प्राणो ने गाया।
एक प्यार का ज्वार दुनिवार बढ आया।
मैं डूबा नही, उमडा-उतराया,
फिर भीतर
दाता खिल आया।
हंसा, हँस कर तुम्हें बुलाया।
लो, यह स्मृति, श्रद्धा, यह हंसी,
यह माहूत, स्पर्श-पूत भाव
यह मैं, यह तुम, यह खिलना,
यह ज्वार,यह प्लवन,
यह प्यार, यह मडब उमडना-
सब तुम्हें दिया।
सब
तुम्हे
दिया।
ooo
मुनहले गैवाल.७०

1
मादो की उमस
सहम कर थम-से गये हैं बोल बुलबुल के,
मुग्ध, अनझिप रह गये हैं नेत्र पाटल के,
उमस मे बेकल, अचल है पात चलदल के,
नियति मानो बँध गयी है व्यास मे पल के ।
लास्य कर कौंधी तडित् उर पार बादल के,
वेदना के दो उपेक्षित वीर कण ढलके
प्रश्न जागा निम्नतर स्तर वेध हत्तल के--
छा गये कैसे अजाने, सहपथिक क्ल के ?
000
७१.सुनहले शैवाल

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上书
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नृत्य-स्मृति
--
याद है मुझे वह
खडहर रगशाला की मुडेर पर, खुले मे,
नृत्य विना वाद्य का
चांदनी के तार ही जब गुजरित हो उठे थे,
किलकी थी मरुतो की वाँसुरी।
किंकिणी से बुध-शुक्र,
गमक उठा था द्रुत ताल पर
हिया ये मृदग-सा।
याद है तो
गूज रहा होगा वह अभी वहाँ
साथ मिल पत्थरो मे छने हुए झरने के शोर के,
झिल्ली की सारगी,
मजीर खनकाती वन-पत्तियां ।
नीरव मृदग।
यति अन्तहीन ।
स्मरण के मच पर थिरको थो तुम,
-
कलहसिनी, जो-
कहाँ गयी?
000
७३ • सुनहले शैवाल

ऋतुराज शिशिर ने पहन लिया वसन्त का दुकूल, गन्ध वह उडे रहा पराग-धूल झूल, काँटो का किरीट धारे बने देवदूत पीत-वसन दमक उठे तिरस्कृत बबूल। अरे, ऋतुराज आ गया। ?" पूछते हैं मेघ, 'क्या वसन्त आ गया हँस रहा समीर, 'वह छली भुला गया।' किन्तु मस्त कोपलें सलज्ज सोचती- 'हमे कौन रनेह-स्पश कर जगा गया? वही ऋतुराज आ गया । A प्रस्फुटन अभी नहीं लगी हुई है आस- मुक्त हो चले अशक्त शीत-बद्ध दास । मुक्त-प्राण, सवत्राण चैत्र आ रहा- अक भेटने को तिलमिला उठे पलास क्योकि ऋतुराज आ गया सिद्धि नहीं, दौडते हैं किन्तु सिद्धिदूत-- वायु चल रही है आज स्निग्ध मन्त्रपूत । स्तब्ध प्रतीक्षमान दिग्वधूटियां- जीवन-प्रवाह बह रहा है अनाहूत । क्योकि ऋतुराज आ गया 1 + अभी सुन पडी नही परभृता की कूक, अभी कही कपी नहीं है चातकी को हूक, किन्तु क्यो सिहर उठी है रोम-रोम मे- प्यार की, अथक नये दुलार की भी भूख क्योकि ऋतुराज आ गया ? . -- आज ऋतुराज आ गया- अरे ऋतुराज आ गया। 000 सुनहले शैवाल.७४ =

हवाई यात्रा ऊँची उड़ान
यह ऊपर आकाश नही, है
रूपहीन आलोक माय । हम अचल-पख
तिरते जाते हैं
भार-मुक्त।
नीचे यह ताजी धुनी हुई रुई की उजली
बादल-सेज विछी है
स्वप्न-मसूण
या यहां हमी अपना सपना हैं ?
लेकिन उतरो
इस झीनी चादर मे है जो घुटन, भेद कर आओ।
दीखी क्या वे दूर लकीरें
धुंधली छायाएँ-कुछ काली, कुछ चमकीली,
मुग्धकरी कुछ, कुछ लहरीली ?
होती मूर्त महानगरी है
ससृति के अवतस मनुज की कृति वह
अविश्राम उद्यम की कीतिपताका ।
य
उतरो थोडा और
घनी कुछ हो आने दो
रासायनिक धुन्ध के इस चीकट कम्बल की नयी घुटन को
मानव का समूह-जीवन इस झिल्ली मे ही पनप रहा है
उतरो
थोडा और
घरापर।

..
Saal
1
,
..........
,
wiremi
देखा?
हा,
लगते ही आपात ठोस धरती का
धमनी मे भारी हो आया मानव-रक्त और कानो मे
गूजा सन्नाटा ससृति का
1
TCa
उतरो थोडा और
सांस ले गहरी
अपने उड़नखटोले की खिडकी को सोलो
और पर रक्खो मिट्टी पर
खडा मिलेगा
वहाँ सामने तुमको
अनपेक्षित प्रतिरूप तुम्हारा
नर, जिसकी अनझिप आंखो मे नारायण की व्यथा भरी है।
०००

नाम तेरा पूछ लू मैं नाम तेरा मिलन रजनी हो चुकी, विच्छेद का अब है सवेरा। जा रहा हूँ--और कितनी देर अव विश्राम होगा-~ तू सदय है, किन्तु तुझको और भी तो काम होगा। प्यार का साथी बना था, विघ्न बनने तक रुकू क्यो? समझ ले, स्वीकार कर ले यह कृतज्ञ प्रणाम मेरा । पूछ लू मैं नाम तेरा। और होगा मूख जिसने चिर-मिलन की आस पाली-- 'पा चुका-अपना चुका'-है कोन ऐसा भाग्यशाली ? इस तडित को बाध लेना देव से मैंने न मॉगा- मूर्ख उतना हूँ नही, इतना नही है भाग्य मेरा । पूछ लू मैं नाम तेरा। श्वास की हैं दो क्रियाएँ--खोचना, फिर छोड देना, कब भला सम्भव हमे इस अनुत्रम को तोड देना? श्वास की उस सन्धि सा है इस जगत् मे प्यार का पल रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ मे डाल डेरा ! पूछ लू मैं नाम तेरा-- घूमते है गगन मे जो दीखते स्वच्छन्द तारे एक आंचल मे पडे भी अलग रहते हैं विचारे- भूल मे पल-भर भले छू जायें उनकी मेखलाए- दास मैं भी हूँ नियति का क्या भला विश्वास मेरा । पूछ ले मैं नाम तेरा। प्रेम को चिर ऐक्य कोई मूढ होगा तो कहेगा- विरह यो पीडा न हो तो प्रेम या जीता रहेगा? सुनहले शवाल.७८

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2
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जो सदा बाधे रहे वह एक कारावास होगा-
घर वही है जो थके को रैन भर का हो बसेरा ।
पूछ लू मैं नाम तेरा।
प्रकृत है अनुभूति, वह रस-दायिनी निष्पाप भी है,
माग उसका रोकना ही पाप भी है, शाप भी है,
मिलन हो,
चूम लें, आयी विदा, ले राह अपनी-
मैं न पूछू, तुम न जानो क्या रहा मजाम मेरा ।
पूछ लू में नाम तेरा।
रात बीती, यदपि उसमे सग भी था, रग भी था,
अलस अगो मे हमारे स्फूर्त एक अनग भी था,
तीन की उस एकता मे प्रलय ने ताडव किया था-
सृष्टि-भर को एक क्षण-भर बाहुओ ने बाध घेरा।
पूछ लू में नाम तेरा!
सोच मत, 'यह प्रश्न क्यो जब अलग ही हैं मार्ग अपने ?'
सच नही होते, इसी से भूलता है कोन सपने ?
मोह हम को है नही पर द्वार आशा का खुला है-
क्या पता फिर सामना हो जाय तेरा और मेरा ।
पूछ लू में नाम तेरा।
कौन हम-तुम दुख-सुख होते रहे, होते रहेगे,
जान कर परिचय परस्पर हम किसे जा कर कहेगे ?
पूछता हूं क्योकि आगे जानता हूँ क्या बदा है-
प्रेम जग का, और केवल नाम तेरा, नाम तेरा ।
पूछ लू मैं नाम तेरा-
मिलन रजनी हो चुकी, विच्छेद का अब है सवेरा ।
ooo
सुनहले शैवाल .८०
(

Remungappympe 4 mirre Facham AM PANmm N - M । Time 4 क . वर्षान्त जिस दिन आया था वसन्त, उपवन मे जागी हँसी अतकित, हम सोच रहे थे ऋतुओ के अनुक्रम मे पहली मधु है, शीत, शरद् या वर्षा । जिस दिन फूटा तारा-नभ की छाती मानो हुई कटकित- हमे यही चिन्ता थी तारो की किरणें किस कारण से कंपती हैं ? जिस दिन जागा भाव, उलझते बैठे थे हम जांच रहे थे भावन, चिन्तन, कर्म-प्रेरणा के सम्बध परस्पर । ८१. सुनहले शंवाल आज- आज, हाँ- इस बालू के तट पर -(किस का तट, जो अन्तहीन फैला ही फैला दीठ जहां तक भी जाती है । ) बैठे हम अवसन्न-भाव से पूछ रहे हैं कहा गया वह ज्वार, हमारा जीवन, वह हिल्लोलित सागर कैसे, कहाँ गया ? लो मुट्ठी भर रेत उठाओ ठीक कह रहा हूँ मैं, हंसी नही है, उसे उँगलियो मे से बह जाने दो बस। यो। इस यो में ही है सब जिज्ञासाओ के उत्तर । फिर भी जिज्ञासा का उत्तर अन्त नही है जीयन का कौतूहल है अदम्य जीवन की आशा नही छोड सकती अवेषण , यह जो इतना लम्बा है कछार बालू का पार कही इस का होना ही होगा सागर की ही यह जूठन है पहुंच सके हम, बस, इतना है । साथ चले चलते रह सकते हो क्या बोलो, साथी, है क्या साहस 7 7 000 सुनहले शवाल .८२ rld. चुक गया दिन 'चुक गया दिन'--एक लम्बी मांस उठी, बनने मूक माशीर्वाद- सामने था आर्द्रतारा नील, उमड आयी असह तेरी याद हाय यह प्रति दिन पराजय दिन छिपे के बाद 000 ८३ • सुनहले शैवाल

बना दे चितेरे
बना दे, चितेरे,
मेरे लिए एक चित्र बना दे।
पहले सागर आँक
विस्तीर्ण, प्रगाढ नीला,
ऊपर हलचल से भरा,
पवन के थपेडो से आहत,
शन-शत तरगो से उद्वेलित,
फेनोमियो से टूटा हुआ, किन्तु प्रत्येक टूटने मे
अपार शोभा लिये हुए,
चचल, उत्सृष्ट,
-जैसे जीवन ।
हाँ, पहले सागर आंक
नीचे अगाघ, अथाह,
असख्य दबावो, तनावो, खीचो और मरोडो को
अपनी द्रव एक रूपता में समेटे हुए,
असख्य गतियो और प्रवाहो को
अपने अखड स्थय में समाहित किये हुए,
स्वायत्त,
अचचल,
-जैसे जीवन
सागर आक कर फिर आक एक उछली हुई मछली
ऊपर अधर मे
जहाँ ऊपर भी अगाध नीलिमा है
तरगोमियां हैं, हलचल और टूटन है,
द्रव है, दवाव है,
और उसे घेरे हुए वह अविकल सूक्ष्मता है
जिस मे सब आदोलन स्थिर और समाहित होते हैं,
सुनहले शैवाल.८४

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ऊपर अधर मे हवा का एक बुलबुला-मर पीने को उछली हुई मछली जिस की मरोडी हुई देह-वल्ली मे उस की जिजीविषा की उत्कट आतुरता मुखर है। जैसे तडिल्लता मे दो बादलो के बीच के खिंचाव सब कौंध जाते हैं- वज अनजाने, अप्रसूत, असन्धीत सब गल जाते हैं। - उस प्राणो का एक बुलबुला भर पी लेने को- उस अनन्त नीलिमा पर छाये रहते ही जिस मे वह जनमी है, जियो है, पली है, जियेगी, उस दूसरी अनन्त प्रगाढ नीलिमा की ओर विद्युल्लता की कौध की तरह अपनी इयत्ता की सारी माकुल तडप के साथ उछली हुई एक अकेली मछली। बना दे, चितेरे, यह चिन मेरे लिए आंक दे। मिट्टी को वनी, पानी से सिंची, प्राणाकाश को प्यासी उस अन्तहीन उदीषा को तू अन्तहीन काल के लिए फलक पर टोंक दे- क्योकि यह माग मेरी, मेरी, मेरी है कि प्राणो के एक जिस बुलबुले की ओर मैं हुआ हूं उदग्र, वह अतहीन काल तक मुझे ग्वीचता रहे मैं उदन ही बना रहूँ कि ---जाने कब- वह मुझे सोख ले। ००० सुनहले शैवाल .८६

परायी राहे
दूर सागर पार
पराये देश की अनजानी राहे ।
पर शीलवान् तरुओ की
गुरु, उदार,
पहचानी हुई छांहे।
छनी हुई धूप की सुनहली कनी को बीन,
तिनके की लघु अनी मनके-सी बीध, गूथ, फेरती सुमिरनी,
पूछ बैठी
कहां, पर कहाँ वे ममतामयी वाहे ?
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मेरे विचार है दीप
मेरे विचार हैं दीप
मेरा प्यार? वह भाकाश है।
वे नही देते उसे आलोक
वह भी स्नेह उनको नहीं देता।
अलग दोनो की इयत्ता है।
किन्तु उन की ओट ही
गहराइयाँ उसकी झलकती हैं
और उस के सामने ही सत्य उन का रूप
दिखता है विशद
सहसा अनिर्वचनीय।
मेरा प्यार? वह आकाश है।
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सुनहले शैवाल.८८

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फिर एक बार आज फिर एक बार मैं प्यार को जगाता हूँ खोल सब मुंदे द्वार इस अगरु-धूम गन्ध रुंधे सोने के घर के हर कोने को सुनहली खुली धूप मे नहलाता हूँ। तुम जो मेरी हो, मुझ मे हो सघनतम निविड मे मैं ही जो हो अनन्य तुम्हे मैं दूर बाहर से, प्रान्तर से, देशावर से, कालेतर से तल से, अतल से, धरा से, सागर से, अन्तरिक्ष से निास तेजस् के निगम्भीर शून्य आकर से मैं, समाहित, अन्त पूत, मन्त्राहत कर तुम्हे ओ निस्सग ममेतर ओ अभिन्न प्यार, मो धनी आज फिर एक बार तुम को बुलाता हूँ- और जो मैं हूँ, जो जाना-पहचाना, जिया-अपनाया है, मेरा है, धन है, सचय है, उस की एक-एक कनी को न्यौछावर लुटाता हूं। जिन शिखरोकी हेममज्जित उंगलियो ने निर्विकल्प इगित से जिस निास उजाले को सतत झलकाया है- उस मे जो छाया मैंने पहचानी है तुम्हारी है। जिन झीलो की जिन पारदर्शी लहरोने नीचे छिपे शवाल को सुनहला चमकाय निश्चल निस्तल गहराइयो मे जो निश्छल उल्लास झलकाया है, उस मे निर्वाक मैंने तुम्हे पाया है। भटकी हवाएँ जो गाती हैं रात की सिहरती पत्तियो से अनमनी झरती वारि बूदें जिसे टेरती हैं, फूलो की पीली पियालियां जिस को ही मुसकान छलकाती हैं, ओट मिट्टी की, असख्य रसातुरा शिराएं जिस मात्र को हेरती हैं, वसन्त जो लाता है निदाघ तपाता है वर्षा जिसे धोती है, शरद सजोता है, अगहन पकाता और फागुन लहराता और चैत काट, बाँध, रौंद, भर कर ले जाता है- सुनहले शैवाल.६० * जागना-उमगना है चीन्हना-चेतना का तुम्हारे रग रंगना है। मैंने तुम्हे देखा है असख्य बार मेरी इन आँखो मे बसी हुई है छाप उस अनवद्य रूप की। नैसर्गिक चक्रमण सारा- पर दूर क्यो मैं ही जो सांस लेता हूँ जो हवा पीता हूँ उस में हर बार, हर बार अविराम, अक्लान्त, अनाप्यायित तुम्हे जीता हूँ। घाटियो मे हंसियाँ गूजती हैं। झरनो मे अजस्रता प्रतिश्रुत होती है। पंछी ऊँऽ ची भरते हैं उडान- आशाओ का इन्द्र-चाप दोनो छोर नभ के मिलाता है। मुझ मे पर-मुझ मे--मुझ मे- मेरे हर गीत मे, मेरी हर ज्ञप्नि मे कुछ है जो काटे कसकाता, अंगारे सुलगाता है- मेरे हर स्पन्दन मे, सास मे, समाई मे विरह की आप्त व्यथा रोती है जीना-सुलगना है मेरे नासा-पुटो मे तुम्हारी गन्ध- मैं स्वय उस से सुवासित हूँ। मेरे स्तब्ध मानस मे गीत की लहर-सा छाया है तुम्हारा स्वर। और रसास्वाद मेरी स्मृति अभिभूत है । मैंने तुम्हे छुआ है मेरी मुट्ठियो मे भरी हुई तुम मेरी उँगलियो बीच छन कर वही हो- कण प्रतिकण आप्न, स्पृष्ट, मुक्त । - मैंने तुम्हे चूमा है और हर चुम्बन की तप्त, लाल, अयस्कठोर छाप मेरा हर रक्त कण धारे है। आह ! पर मैंने तुम्हे जाना नहीं। नही । मैंने तुम्हे केवल मात्र जाना है। देखा नही मैंने कभी सुना नही, छुआ नही, किया नही रसास्वाद- सुनहले शैवाल ०६२ 首 अनुभूति ओ स्वत प्रमाण ! मैंने एक चक्की । एक कोल्हू। तुम्हे जाना, समय की अजस्र धार का घुमाया हुमा केवल मात्र जाना है। पर्वती घराट् एक अविराम। देख मैं सका नहीं एक भट्ठी, एक आवा स्वत तप्त दीठ रही ओछी, क्योकि तुम समग्र एक विश्व हो। तुम्हे केवल मात्र जाना है, छू सका नही केवल मात्र तुम्हें जाना है, अधूरा रहा स्पर्श क्योकि तुम तरल हो, तुम्हे जाना है, अप्रमाद तुम्हे जपा है, वायवी हो। तुम्हें स्मरा है। पहचान सका नही तुम और मैंने देखा है- मायाविनि, कामरूपा हो। और मेरी स्मृति ने किन्तु, हा, पकड़ सका- मेरी देखी सारी रूपराशि को इकाई दी है। पकड सका, भोग सका मैने सुना है- क्योकि जीवनानुभूति और मेरी अविकल्प स्मृति ने बिजली-सी त्वरग, अमोघ एक पजा है सभी स्वर एक मूछना मे गूथ डाले हैं। -सूघा, और स्मृति ने एक जाल निरिणीय विकीर्ण सब गन्धो को अनुभूति से तो वयित कर दिया एक वृन्त मे एक ही वसन्त के । कभी, कहीं, कुछ नहीं बच के निकलता। -मैंने छुआ है और मेरे ज्ञान ने असख्य माया-मूर्तियो को जीवनानुभूति, एक पजा कि जिस में दी है वह सहति अचूक तुम्हारे साथ में भी तो पकड मे जो-मात्र मेरी पहचानी है आ गया हूँ। जिसे मात्र मैंने चाहा है एक जाल, जिस मे तुम्हारे साथ मैं भी बंध गया हूँ। -मैंने चूमा है, जीवनानुभूति और, ओ आस्वाद्य मेरी । . वलिष्ठ, । मुनहले शैवाल ०६४

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मैं हूँ, और मैं दे दिया गया हूँ, में जिया हूँ, और मेरे भीतर से जी लिया गया है, मैं मिटा हूँ, मैं पराभूत हूँ, मैं तिरोहित हू, मैं अवतरित हुआ हू, मैं आत्मसात् हूँ, अमर्त्य, कालजित् हूँ। मैं चला हूँ ले गयी है प्रत्यभिज्ञा मुझे उस उत्स तक जिस की पीयूपवी, अनवद्य, अद्वितीय धार मुझे आय्यायित करती है। हाँ, मैंने तुम्हे जाना है, मैं जानता हूँ, पहचानता हूं, साँगोपाग , और भूलता नही हूँ कभी भूल नहीं सकता। भूलता नहीं हूँ कभी भूल नही सकता और मैं विखरना नही चाहता। आज, मन्नाहूत ओ प्रियस्व मेरी । मुझ को जो कहना है, वह इस धधकते क्षण मे- वाग्देवता की यज्ञ-ज्वाला जब तक अभी जलती है मेरी इस आविष्ट जिह्वा पर, तब तक-मैं कह लू मेरे ही दाह का हुताशन हो साक्षी मेरा । पहचान कर, प्रकाश मे, दिक्प्रबुद्ध, लक्ष्य-सिद्ध । - इसी बल जहा-जहाँ पहचान हुई, मने वह ठाँव छोड दी, ममता ने तरिणी को तीर-ओर मोडा- वह डोर मैंने तोड दी। हर लीक पोछी, हर डगर मिटा दी हर दीप निवा मैंने बढ अधकार मे अपनी धमनी तेरे साथ जोड दी। मओ आहूत ओ प्रत्यक्ष अप्रतिम । मओ स्वय-प्रतिष्ठा सुनो सक्ल्प मेरा मैंने छुआ है, और मैं छआ गया हूँ मैंने चूमा है, और मैं चूमा गया हूँ, मैं विजेता हूँ, और मुये जीत लिया गया है ओ मेरी सह तिती, हमी तो सागर हैं जिस से हम किनारे हैं क्योरि जिसे हमने पार कर लिया है। सुनले शंवाल •६६

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ओ मेरी सहपायिनि,
हमी वह निर्मल तल-दर्शी वापी हैं
जिसे हम ओक-भर पीते है-
बार-बार, तृपा से, तृप्ति से, आमोद से, कौतुक से
क्योकि हमी छिपा वह उत्स हैं जो उसे
पूरित किये रहता है।
ओ मेरी सहधर्मा,
छू दे यह मेरा कर आहुति दे दूं-
हमी याजक है, हमी यज्ञ,
जिस मे हुत हमी परस्परेष्टि ।
ओ मेरी अतृप्त, दुशम्य धधक, मेरी होता,
ओ मेरी हविष्यान,
आ तू, मुझे खा
जैसे मैंने तुझे खाया है
प्रसादवत् ।
हम परस्पराशी हैं क्योकि परस्पर पोपी हैं,
परस्पर जीवी हैं।
मओ सहजमा, सह-सुभगा
नित्योढा,
सहभोक्ता,
सहजीवा कल्याणी।
०००
सुनहले दयाल .१८

31
-
।
Sen
PRATHA
है

निवेदन के दीप घनी रात मे जाग कर देखा सांझ के फीके तारे सहसा दीप्त हो आये हैं- जो आकाश साझ को एक धुंधला कांच था अब एक अन्तर्योतित सागर हो गया है जिसके नील स्फटिक जल मे न चुकने वाले स्नेह से भरे दीप तिरते हुए जगमगा रहे हैं। क्या वैसे ही नही जैसे नितान्त अकेलेपन की गहरी होती हुई रात मे निखर आता है मेरा प्रणय और विश्वास ? क्या वैसे ही नही जैसे मेरे अकेलेपन का लहराता सागर अपने मे भर लेता है तुम्हारे स्पर्शों का आलोक और उस पर कटकित हो आते हैं निवेदन के न जाने कितने दीप तुम इस रात मे जागो या न जागो इसे जानो या न जानो यह सागर उमड रहा है तुम्हारी ओर निरन्तर रात मे, सभी रातो मे, दिन मे, समी दिनो में, सध्या मे, सभी सध्या मे, पाल की गति मे, मति में अविराम तुम जानो या न जानो। अब, अब वे वाद फिर, फिर, 000 सुनहले गवाल १००

是
,
在
2

मोर आशी
भोर ।
तुम।
आशी।
जीवन है।
आशी ।
000
सुनले शवाल.१०२

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Sunhale Shaival

Author
Aghe
Title
Sunhale Shaival
File name
Sunhale Shaival
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2011/03
Publisher
Akshar Prakashan Private Limited Dehli
Language
Sanskrit
Pages
106
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551327
Barcode
4990010032079.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
gMHXs7Vu6A1
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