Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Jin Gyan Parhash

Jaskaran · 2011/08

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श्री शिनाप मम . जिन ज्ञान प्रकाश प्रवाशर- जशकरण सुजानमल चिण्डालिया । ३०८, मारमेनियन स्ट्रीट, परक्छा। मिरने का पता मुकन्दचन्द जशकरण चिण्डालिया। मु. सरदारशहर (राजपुतारा) #.१६, सीनागोग ट्रीट, (इमामगी) लाता के "मोसवाल प्रेस" मैं धावू महालवन्द वयेद द्वारा मुद्रित । चौरसियाणाद २४५७ द्वितीपाति ३..] [मूय 10.U.NP

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विपय-सूची
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संख्या
विपय पृष्टांक
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१'यो पादिनाथ स्तुति
२ पनना सती को गस
३) मगरधा मती की चौपाई
४ | लोपीजी की दुराडी
५ जिन पाजा को पीटालियो
श्री कानगपि की गुणों को टाला-
गणपति गुण मागर पहो २ नाप क्षमा घणी १८२
० पचम भर्फ मनहरु प्रगटे भिक्षु दिनकर २८३
गणनायया दीन दयालु लाल स्वामजी
ममषिध्वसन को हुण्डी
१८५
१. तपसी हुलासमलगौ स्वामी को चौटालियो २३४
११ घना परपि को सम्माय
२४५
--
-

Post
मिलने का पना
(१) मुंफन्दचन्द जशकरण चिण्डालिया।
मु० सरदारशहर (राजपुताना)
(२) जशकरण सुजानमल चिण्डालिया।
३७१३८ भारमेनियन ष्ट्रीट, कलरसा।
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विषय-सूची
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संख्या
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२
४०
विपय
पृष्टांक
भारणार
श्री पादिनाथ स्तुति
२ पनना सती को रास
३) मैपरधा सती की चौपाई
४ लोकजी की हुराडी
जिन भाजा को चौटालियो
१५३
श्री कालगपि के गुणा को ढाला-
६) गणपति गुण सागर यहोर नाय क्षमा घणी १८२
० पचम पर्के मनहरु प्रगटे भिक्षु दिनकर
८ गणनायक दीन दयालु लाल खामजी १८४
६ धमषिध्वसन को हुण्डी
१८५
१. तपस्सो हुलासमलनीस्वामी को चौटालियो २३४
११ धन्ना कपि की सम्झाय
२४५
-
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भषी मुख पति घणो, दिन दिन यधै जिम धपक
वैलफ ॥ स० ॥ २॥ पञ्जना कुमरो मोटो हुई, चितयो
ने गय चित्तमझारफ। पर वेग प्रधान तेडापियो, कहें
अञ्जना वर सपो करो रे विचारक | जब एक कई
रावण ने टीजिये, एक कहे दौजे मेघ कुमारक । ते
पुव छ राजा रावण तपो, तिपारो जीवन रूप घणो
प्रोकारक ॥ म० ॥३॥ जय एक कह दूम सामलो,
घरप पठारमें मेघकुमारक । पारिव लेसी वैराग सू ,
परप छावोस में खामी मोल मझारक तो कन्या ने
मुख किहा घफी, सघलाई कर देखो मनमे विचारफ।
मेघ कुमार ने यो मती, और विचागे कोई राज कुमा
रक स• ॥ ४ ॥ रतनपुगे तणो राजयी, राय प्रशाद
विद्याधर तामक । हनी पुव दोपतो, पवनकुमार
है हनी नामक पध्नन ने पर योग है, ए राना
'कियो यधन प्रमाणक । पिछे दृत मेल्यो तिना नगरी में,
सगमण कौधो के मोटे महापक ॥ म.1५रूपने
गुण पञ्जना तयो, मरगट हुयी के लोक में ताम।
ते पवन कुमार मिण साभल्यो, जय प्रहस्त मन्त्री ने कह
छ भामक ॥ कहे पापा मावा रुप फेर ने, नोवा ने
प्रचना तणो रुप गियगारक ॥ पौछ मतो फगै दोनू
निसया, पाय उमा मल तले तिण वारक म.

-
।
RE ॥ वि पवनी निगग्य के अनना, प्रहस्त नौवी
पानी रद्या दिष्टक। कप में जायों देयागपा, वापी
बाल जागा फायन यापक। चपका यरुण चतुर घी,
माख्या माय मगनन ममानक स.19॥ पञ्चना
वठी मिधाममा दोन पाम भनक मखिया सपा सन्दका
बम्ब पाभूपण पग धया ।
गोभ रहो जाणे पूनम
चन्दक ॥ हिय वमत माला दम उच्चरे वाईने लोग
जोडा मिनो श्रीकारक । बच्यो पवननी नाणिये,
सेहया पामा के पना नारक ॥ म. ॥ हि वोली
मावा हम उधर पहला ता वा मन चिन्तव्यो वेहक।
क्ष्या पवना नहा वाम पठारह में चारिव
लेहक। माच इन्द्री न जामता बाम छायाम मे पाममो
मोनक ॥ तिण काग्गा पा यत्रिया कन्या ने वर तो
मापियो दायाम ६ यि पनना मुण दम
उच्च वाद धन २ ते ना ती पचतारक । कम करयो
कर्ग काटन, वैमा मामो मुगति ममारक ॥ गुप
गाई जतिष पुम्प ना, पवनी मुप्पो में धया प्रति
हेपा । पातो रे नार शुनखयो, मनमाडौ उपनो क्रोध
विशेष । म. १.॥ यि परननी मन माहि चिनाये
पा रुप में कबडो भात्यन्त वाडापक । मन माहि मनी
पापपी, धित घोग्दो नहों पक. ठिकाधक । पुरुष

पराया हूँ मन करे, तो दिये करणो कोन उपायक । जो ोई तो एहने पर घण, परणो मे पाहर ज्य टु घायफ ॥ म. ॥११॥ ॥ दोहा॥ म चिन्तष विज्ञापयनगो, पाश घान्या साम । पाया नगरौ पापरी, भोगवे सुग पभिगम ॥१२॥ ॥ ढाल॥ हिवे मात पिता पञ्जना तणा, नगन निवारिया मोटे मडाणक । विवाह करवा पञ्चना सग्यो, रतनपुरी बैग मेनियो लायक ॥ महोच्छव माडियो पति घपो, वाज रहा विहां दोन मिणाणक। मगल गाये गोरडी, ऊष कर रधा कोड कल्याणका ॥ स.॥ १३ ॥ शिवराय प्रजाद सेडापिया, नान में भाषा यडा पिडा राजानक॥ हय गय ग्थ सझिया घाणा, नेतिया खान ने दियो घणो सनमानक ॥ धन साये दियो खरचया, मोटे मण्डाण सई चाल्या नानक । सामन्त दिया साये घगो, जोधा सभट सेन्या सावधामक स. ॥१४॥ पिये धौन्द यणाय फियो घयो, गेरणा पाम पिया पहरिया ताहिक । सखियां गाये रे मोहला, देव पागोप पीतुमती मातक ॥ शुग उतारै रे मैनड़ी,

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मिटानक ॥ १९ ॥ शिव पश्ननौ तोरण पाविया सो हो भन्नना ऊपर घणारे प्रभावक । नाम मुख्या हो गजो नहीं, मूल नहीं मन तेहनी चायक ॥ धवल मनल गादै गोरडो, पूरण सासु करै यहु भातफ । पिण मन में न भावे पवन ने, ये तो परणे रे पञ्जना याला दाइका ॥ सा ॥ २० ॥ रुपा तणो रेमण्डप रच्या, सोपन तयो माडी तिहा वैठक। सीजन पाट मोत्या नडयो, पञ्जना ने पवनजो बैठा है तेवक । व्य लेवे हाथ मल्यो तिहा, नयण निहाल ई अलना नारफ । पिप परन ने सूल गमे नहीं, क्षेप नागे पहिलो वात विचारक स.॥ २१॥ शिव पवननो परम्प ने उतम्या, कौषी पहरावपो पलना ना तातक । गयवर पापिया पति घणा, ताना तुरा दोधा विस्यातक । कनक रन या पापिया, पापो छ रुपा तणो या कोडक । यमत माला दामो पादि दे, पाच मे दामिया सगैषौ लो डक स. ॥ २२ ॥ धेि परणी ने रतनपुगै सचग्या, साइमो पायो तिहा प्रहाद गयक । पनना मन हा. पित घई, सामु सुमरा ना पूजिया पायक ॥ पाच सौ गाव राजा दिया, पाप्या है पामरण रतन पट मोलक। पाया घोंद ने वोन्दगी, पाया तिहा पाजते टोलक । स. ॥ २३ ॥ --

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यह ने मूपिये निज घर सूतफ ॥ मोटारे कुल गयी
उपनो, राजा हो महिन्द तो वह नानक। पनना
सू पादर कौजिये, इम कहे फेतुमसी ने राय प्रसादक
॥ स. ॥ २०॥ वापरो पापो पाशे मेलियो, पाणे
पायो वले पडो दोरक । घजना फहै नषौ पापिये,
मेन्या पाभरण पद्भुत चोरफ । खामो रे मन मान्या
नहीं, पीहर पाय ने मू करु वातक । हम कही यधय
मोफल्यो टु धरे घणो मायन सासक ॥ स. २t
डम पार यरस पीच में गया, ए फथा ऊपर ऐतोई
मबन्धक । हिवे गवण ने वरुप कटको घई, माहोमाडि
उपना पति देषक हय गय रथ सलिया घणा पाना
दखतर गोभे गेरक। शुग ने सुभट गिगारिया,
चालियो कटक पाजी रश भेरक स. २८ एक
तडो रतनपुरो पावियो, प्रहाद राय करे आपा ने
साना। पवनजी हाथ नोडी कहे, एतो, पिताजी
हम तणो काजक ॥ तुम घर बैठा नोला करो, पुन
जाया नो एह प्रमाणक। एम कहिने पायुधशाला
सघग्या, हाथ में धनुष ने लोनो के पापक ॥ स.
३. पिवनजो चालै रे कटक मे, मन माई चिन्तवे
पजना नारफ। टूर को पाय लागसा, भात्र कुभाष
देखा एक यारक यस तमाला माइरौ वैनडी, दही
२

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३५ ॥ हिवे पजना कहे सुण सुन्दगे, मोने दुख माहे टु ग्व उपनो पालक । पाणी माई करी पातलो, सासरे पोहो गई माही नाजका चारित लेवो मोने सिरै फरणी करी मार पातम काजक । नाम जपूँ जगदोग नो, तेहसू पामियै पविचल राजक ॥ स. ॥ ३६ ॥ हिव नगर घको दल सबग्यो, मारग में दूर कियो रे मलाणक । चकयो चकवी तिहा टलपले, व्यापियो तिमिर ने पाथम्यो भाषक ॥ पवनजी मन्तो ने इम कहे, पजना नो सूल न लौजिये नामक । पुरुप पराया सूं मन करे, पकवा चकयो नी परे को छै नारक ॥ स. ॥ ३७॥ मन्त्री को सुणो कुवरजी, तुमे ए बड़ी काई पापो मन में भरमक । मोटको मती है पजना, पही निशि सेवती जिन तणो धर्मक। पुरुष परायो बछे नहीं, पचन काजे तुमे काय करो क्षेपफ ! सरोवर मानतो, गुप किया गिव गामी माप विशेषक ॥स. 1३८॥ ॥ दोहा॥ मदन मुभी मन्त्री राणा, कोमन घयु नित्र वित्त । परनी मन्त्री ने कई, मुधो हमारा नित: खोटो ए कार में करगी, सताण निप्र नार। वरा से टुली, करो कप विचार।" पाशील वचन मो मन में प्यारो बसे, जाणं मलिये जाय लोक लाज रहे नहीं, मन मन में मुर्भाय ॥३॥ ॥ ढाल तेहिज ॥ हिये पवनजी कहै मुग्यो मन्वयी, इ कटक नाज कू नारी ने सतापक। पाठो बाऊ तो प्रजा इसे महेला मार लाने माहरो वापक मन्दी कहै छाना मावस्या, सेडो सेनापति कहै तूं रुखपालक । पमे यावा करीने पाछा पावस्या, तिहा लग कटयानी कौने रुखवालका ॥ स. १३८॥ हिवे प्रश्न पणे दोनू पाविया, पायी ने मनना नो उपायो किवाडक। वसन्तमाला सय उठने, उतावली बोले छै गाली दो धारक । कहै शूरो पुरुप गयो कटक मे, कोपरे लमट पायो पूण ठामक । प्रभाते ई राजा ने विनवी छोडाय देस छ तिहनी गामकस.॥४ प्रहस्त मन्दो इम उच्चर, इहा पायो छ प्रशाद नो नन्दक । पनना नो छ सिर धौ, बग विद्याधर दीपक चन्दक ॥ यमन्तमाना पावी पोलख्यो, नयण निहाली ने पामी पानन्दक । किवाड ग्बोली ने माहि लिया, यस तमाला वधावियो नरिन्दक । स.॥४१॥ -- ( : . ॥दोहा॥ पम्नना मती सिण पयसरे वेठो सामायिक माय । कर्म धर्म सभालतो, रही धर्म लय ल्याय । घससमाग्ना तिण पवसरे, साय नोड़ी कई घाम । सतौरेमामायिक तिहलिगे, गना कगै विधाम ॥१॥ ॥ ढाल तेहि देशी ॥ हिवे पश्चना सामायिक पूरी करो राय नोडो नागे पिउने पायक । पयनजी कई त मोटी सती, लोम रही पोजिन धर्म माहिक ॥ वचन वर्ग से में दुहवी, मे तगे कोधी पभाष भगाधक। साथ जोडी कर विनती, पमज्यो मतो म्हारो अपराधफ ॥ स. ॥ ४२ ॥ पञ्चना माय नमो कहे, एका पोल योलो कार्ड साम। जहयो पग सपो मोपडी, तेहलो पुरुप में स्त्री पापक हाथ जोडीने पाप उभी रहो, मधुर सहा- मपा मोन्नती देश। कई प्रालि विप किम पार्मिय, बावे पलर गालो ने कीधी मेपशम.॥१३॥ तीन दिवस गया विहां परगर्ग, विहां भाव भगति तित कधी शिषक । पाय टोले दोनगे करो, पटरम भोधन पापिया परक भाष पर है पन्ना, मौतम सू पपी मापौरोतक। पश्नोपानन्द पाम्या - घणा, पन्चना सू धरो पति घणो प्रोतक ॥ म. ॥४४॥ हिये पयनको पाश निकले, पञ्जना योलो है जोडोजी हायक । आगा रहे कदाच मारे लोक माने किम माइरो यातक ॥ तिण में मारा पिता ने अणावग्यो याहना पाभरण पाप्या अइनाणक । गहा पडे तो देवायो, मास पितादिक महु लेसी माणक ॥ स. ॥ ४५ ॥ हिये वसम्तमाना मे तेडी तिहा, पयनजी देई धपोसनमानक । माहरे पश्चना रागोमाग सिरे, प्रत्यक्ष चिन्तामण ने ममानक ॥ तू काजे लतन घणा सहना, त्रिम दांत में मोम भेना रहे हफ। जिम तूं पञ्जना ने भनी र, किम दौने घणी भोग्नायको सहयस. ॥ ४६॥ वमनामाना ने माणक मोतो दिया, पीआर धन दियो रे विशेषत्र । घणो मन्तीयो के वचन म. बमामाला हरप विगेपन । प्रहम्न मम्मी ने दम कई, पतन कोग्यो कुवानी ना सेवक । कुगनि गमे पंगा पधारयो, पाट जोरो नागी उमच्या मकर म. मोपदे पाना चालता, माई पाये पवा पुरुष दुच। मौ पुत्र पाय द वरुप ना, पागल पि भावी पुठन । दाजन कटक ये वरुण नो, मारमा वार नागे मजे पहात्र। शिकावी तणे in गयो, माया भनो मिस नो भनी हारक

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-
स०॥४८॥ हिव पोल को रे पाशी वली, नैणा मे
छूटी 2 जन तपो धारक ! में कटुफ बधन कधो कथ
ने, माटाको ने रोवे तिप धारक ॥ वसनामाला
पाय धौरव देवे, हिये पायो , सामायिक कानक।
देव गुरु धर्म हिय धरो, व्रत पश्चाताप ये लेया सभा-
लकम.॥४८॥ हिव पक्षना सती हिण पसरे,
कडागैत पाने ब्रत रमानक । फर्म धर्म सभालती,
सुले गमाये है एक विध कानक ॥ ध्यान धरे देवराम
तपो, ममार नौ नाणे कापौली मायक । बोल
मन्माय गुणे धोकडा, इण पर पाना ना दिन मायक
॥ स. ॥५. चि उदर पाधान नारी करि, पचना
मन मा रप पपा धन र कर धुपटा,
লাকি বাৰ বৰ গুৰিহ্মান্ধ। মা মা সুল
मने, पात सुपाव देवे मुकिने तक र मन
मोई पति घणो, दान देशो न गिवे खेत तक।
म. ५१ सिंगो राजा भयो विनय, सामानो
মিমা না থাকা। অন্য দুই ধৰ কাষ,
एर मधुर नगे पग न लोधी मिनापाको मन
गारमा रामे धपो कटाहाता पाडो पानीमा.
मश। पारसोती ए, परदा कारे वाक
हिर ठामस..
বাসা দিব হাম্বা

पागन्या हिये कोतुमती चानो मोटे मगडाणक । साये मोनिया नोधी घणो, मन माहे मान बहु पापक। पागे पधाउडा मेलिया, पचना मुपने हरपिरा यायक। भाव भगति करो घयो, साहमौ पाय भेव्या सासु ना पायक म. ॥५३॥ पादा मनमान दे पचना सासु नने गई निज घर मायक। पामन दोधो बैठा, हाय वीर उभी मनमुग्ण पायक ॥ कई मनुष्य સો को मीन विषयी म्हाग मनोरथ पूरिया पाया। माता पिना रम कृणा करे, मारी मासी पोदर बायो मात्रक म. ॥ ५४॥ हिरे वह ना चिन्ह देखो कारो, तुमतो गणो धम्या मन अपना पद थापा नो एवा, चिन्ह क्य दोम विपक। माटारे पाम तयो उपना, बग विद्याधर दोन पर मारक । त मागे मुझ पागन कर, उदा पाधान की उदा पिका ग्य म.. ५५॥ पवमा मता शिग पामी, पाम- पानाप पार मुक्या पाया। कटक यो कुमर पाना का विरची बागी न पापिया तायक। तीन दिमाग,धान पायन छान गया सामन। सभार पानाच पामगर्न, वि मुन्द्र मामामाम .. मापन कान मामा दम गोदता । पाय मग तीन .

C
सासरामें
पराये मुझ पुव ने तुझ किमो समेतक। चाज नगे
पाखावणो संभाभरण धौगे गे निगमन घायक ।
विषय्यो रे दूध का यको, शिव सासरा स परि पौहर
खायक ॥ स. ५७॥ सामुरा पचन कान मुख्या
पवना मन उपनो दाइक। पुन तुमारी पाशे वले,
शिक्षा नगे मुझ ने रानो घर माहिक।
मामुभी तुम सी, फहो तो ऐठ खाई में काटू दिन
गतक। घरप कमल म गिर रहो, g फल लिई
किम पर वायका म• M५८। फतुमसी राश
को पटो, पग करी ब्रोध म ठेलियो गोगा।
मोडों में उभी घई धए हड धोने पति पयो गैसक।
पनगौरह मुझ पाडपी, दि मगे म्हारा नगर नौ
सीमा विहां मगे पचना हो रहे, जिहां लगे मुझ
मापन मापी रुपनमक म..५६ सन्तमाना
२९डोकगे, बधन याने टोक से सोगा
पाभाव हागपुर ना। चार टंगाल के दम देन।
रे पडोंगो, बाजे कारण तो तहका
धमतमामा म मु म, चोर को पानी मार
नम... नि कानी पय पसानियो,
यालाई तुम्ग दौतगा। टायक । कालानी पम्न
पारापिया, कादो को मामी दोषी हा काशी

हो मम्मक गाडी, प्रचना ने वसन्तमाला बसायी
तारक । बचना पाली पौहर भणी, टुख घणो धरती
मन मायक ॥ स. ॥६॥ स्विचालियो रय उता
बालो, पायो छे वाप रागी भूम तेइक । दूर थी मेहल
मिया, मारयो रथ माझी गान्यो तेहक ॥ नार करो
पना भयो, सारयो चित्त माह चिन्तये पामक । दुष्ट
पकान मे कियो, मे बन माहे प्रजना मेली दुष
दामन म.॥२॥ हिय सांझ पडो दिन पांथम्यो,
ग्या विजयी घोर अन्धकारक । आयोहाथ सूझ नहीं,
पप बना मुझ ने कुए पाधारक ॥ नाम जपू जगदीग
मोपविध काढे टुप भागे रातक। शह मामायिक
मी पटन भूगन उम्यो शेयो परभात म. 10
पिना कर मुग सुन्दगे, मग मन में पति
पोटु पश्च। मोन कडोरे कलर चढावियो, यि
तान दम देवालम मुमता। माता मोय में मन
शिम मनमो. शिम का भाई भोजायां , वारान ।
किसान स्वामी पाईनो, तिन शिम याद
टिनगरम...॥ बमनमाना वमती दम
fmनिगमन ना पापक। तिनी
मामा मात्र तुम तपोवारक।
मता मग मी, भाई भोगाई म. मिमी

इस पी
पायक। जिहालगे सामोपाय नहो, विहां लगे पौर
बैठा रहो पापक ॥ स. ॥६५॥ िनगानी सम्चि
सधणे, गुघट काटो मे नोचोजी जोया ।
गत चालतो, नगर ना लोक सोये सष्टु कोयफ । स्वमन
विधी ए कामिनो, नाप विहुपो दौस के मारक ।
पिघाडी से प्रजा मिन्नौ घी, इस पर पोहती बाप
सुधारक स. १६६॥ पोले उमौ राखी पोलिये,
मालूम कौधौ राय ने जायक । दोनू हाय नोडो नौधो
नमी, पवना वाहिर उभी के पायक ।
राय सांभल
हरपित हुवो, नगर शिणगार ने करो
विध्यातक।
सनमुन मोकली पालखी, पाघो तेडायी गय प्रद्वाद
लो साधक ॥ स. ॥६॥ कान में छाने सेवक करे,
प्रचना सासर ने हुको तेश्क। तिया यात कही सर्व
माहने, राय संभाल दुःख व्यापियो देहक र सुरक्षागत
पाय धरणी ढल्यो, सचेत भयो कोधी क्रोध विशयक ।
म्हारा कुलमें काला लगादियो, पायवा मत यो माहरी
मोल ममारक ॥ स. पोलियो माछो भावी
कहे, तुम अपर कठो के महिन्दायक । मह पायवा
मरा यो एहने, पचन सयौ ने विलखो पायक ॥ माता
ग भवन में सचरी, पाषा पारा पग पडे तिष वारक।
मन मा दुख धरती धको, विलखी गई पावी माता

-
( २०
हारक ॥ स. ॥ ६८ ॥ मानगा सिग्य अधमरे, भागने
पघ्नना दोठो विरङ्गक । शरीर नो गा तो फिर गयो,
काला वम्य पहरण अङ्गक ॥ पहनाण दोसे के वारवा,
मयण झरे जाणे मोत्या ना बन्दक। मुख कमला
टोमे युग, नागो राने पनारे दय गयो बन्दक।
म. ॥ २० ॥ इम देखो माता धरयो ढरनो, सचेत वर्ष
गोवांगालो पाडक । इ क्यों नहीं रही रे वामको,
इन का पाण्यो म्हारा कुग्न मझारक ॥ मगा
मम्बन्धी में किम फिम, नेई कटाग ने बेदम मांगे
कुम्वक । निल दुरी पनना उपनो, दोधो के टु व में
टुल विशेषका म.॥ १॥ गपी में रोवती देनी,
दाम्या मिण पाई पनना ने पामक। पादर विकी
मी किम, माय शेडी वाई तुम तपो भागक | सास
समग नमाविया, लावियो पोडर माय मोमामा
तं पण विगोवा उपनी, हिच पापणो मूढी मति
खान म
.२०॥ यमनमाना वनतो की,
पोपत्रको ये वाली दो वाया।
परन का घरे
पारमो पर कोन्या मिामो मन मायन
तीमत्रम मो, गरगर्भ तपोए पामा ।
इम पाया या मनी धरे, पात्री पायरी गये
प: म
.17 को दोन पाय नियो,
पामतो
व

।
। মাং শীয়া ঘা লায়। সময় স্বামী যা,
অন্ত্রনা আ ম ই খায়। খায় মালা মৃিশী
মিছা, সব যিনা নি বা ই ব্য। আলী শং
না থী, খায় নবী বিঘন ঘৰ মাঘ ম
৩৪ ম বা ঘ ঘা ফিী ঘা, জিবছি ল
শাখী গায়া মা মা । এলি মন মৃন্তু যীলনী
भयप कर मुख गेवती से भून पा को था-
স্কুল, অন্ন মাষী আ হ ব্যাজ । বনী ঐ ৰ
যােনী, পাত্ত লিমানা ভনী বিথ ঠাস । ম
৫ ৩ ফি নিন মায়া ব ম ফ, বা ৪
पाप रो पापो म्भालक! घर
धर उधौ हाधा क्य नी
ষা, বড় বাণিী ধর্ম স্বয়ঃলঙ্গ অম বা অন্য
যু ব্য, আষ ও ছ ল শিষ্যা।
আয়া যায় বা নল যা ন ন ঋনী গাছে
এষা ফি ও গুছিয়া, বয়স
জিৎ গীব যুহীনা। ঘি হঠী ই অল্প
मती fon प्रोशित प्रधाम भुदिया सरक: लोको से
মামা বিন মুহ, সুনান নয়ী ই ঘৰ মায়।
আমাৰ wিহাস, যা কম হয় বা
অন্ধ • ৩৩৫ বা ২ , শাহ
ভাঙা ভং বই কি।
মঃ খং আৰু ই

२२)
नहीं, वचन बोले लोक विविध प्रकारक ॥ अञ्जना दुन
वैदे घणो, माणै वही के खडग नी धारक । टु ख मारे
टुख साले घणो, पमरस धरै मन माहि पपारक
स. ॥ ८॥ हिव पचना पा रे टलवले, अन्न व
पायो ब्राह्मण सोरक । राय कुंवगे पाणी पियो, गौतम
उत्तम निरमल नोरक । बलती पञ्जना कहै तने,
नगर माहे तो नहीं पोज पाणीक । पोल बाहिर बस
पीय ,, हा सो ? माहरा वाप नो भाषाक ॥ स. ।
०४ ॥ नगर याहिर अम्न वावरे, मञ्चना वसन्तमालाने
कह के पामक । गहन वन मोटो उजाड में, छापा
जो पर्यत विषमी ठामक ॥ जिहा सूर्य किरप न सघरे,
गत दियम नी खबर न कायक। मानुष को मुख
नहीं देखिये, तिण वन माहे तूं मुझमे ले जायक ।
स
... हिवे यमन्तमाला सिण पवमरे, पञ्चमा
नो वचन कियो परमापक। दोन भयो तिहाथी
निकम्मी, मांडी माहि दोन्नती मोजकागे पाएका उजड
बन माहि मचगे, सोयने पावत मयन महन्तक ।
पाय सर पञ्जना भयो, परवत बैठो नाय एकराव
म.॥१॥ पञ्चना वन मासे सबरो, लीक माही
मादीले एमचा पाना ने बाहिर काटने, राब
कोपी पति भूमहोत्री कामक। पाग देवाडीर पर

घी, पाया नहो दोधो किरो घर मा । पेटको
पुर्वी नेपाली, गय नो पकान गई ठकायका म.
॥८२॥ वि माता कई दामी भी जान
बोयो हो किप ठामक! दामो कई पन में गई।
सदैव सू कोपो ए काममा । म्हारी की ए उपनी,
वालप हुनो पति पयो गगक । हिवयम मार
मिहादिक विकाससो, एम चिन्ती न धरै टुव पपा-
रकम ८३॥ नित भोजन ओमती र पालिका,
मन में गमता यार होपाधारक। मन माफिया
कर घयो, गहर
नहीं उजाड में बायकन
पाणी शिम पाममी, म मन में भाप्यो घर कोई रायसी
पम धितो ने घणे चिन्ता करे, गेवळ
पाप्या भासू काढतो मोरक्ष म॥ ८४॥ त्रि
गजा राणी कगे पाय, घोन कै मुख थी एयी
वायफ । धे पिता फगे किए कारणे, पंटो पामा जोगी
नहीं है ताइक मोटी पकारक प शियो, मेयो
पाप्यो माहगे कुन मझाक ! जो पाछी पयाज १
पवना, सो नगर नो नारिया कोडे पानाचारक स.
॥८५ ॥ हिच वसन्तमाला म उधर, वाई पागे याम
छगुट गौवारक । सरखवि माता तुम
परी भायो
मे पालन दीस लिगारक। पागधन राखी एक
दीपक।

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ममियो रोक। सेरे घडी यांग शोक टलपलो हुए
घणो धरतो मन माया.. योगे मोफर
शियम तो नो साथ ये तिण नगर मझारफ। यो
पादिया पहली सहने पन पापी गे हुतो परिज्ञान
विलाप फौधी शिप पति घणे, धप से पुराप छो दिगो
संपक । पतराय पडी दगाव राग्यो सिपस यच गई
कर्मा रोगसक स. काल किशोएक
वीता पई, साधच्या पाई सि नगर मझारक।
घायो माभन सेइनी, बैगग म लोधो मनम भाग्य ।
तपस्या करी पणतप कियो, पालोर्य विना पटो
फरक । फौधा को फर्म न छुटिये मेरै घडी गधा
बरस तेरक । स०॥४२॥ सिग्य पुराले तप करो,
तुझ कर पाय नियो पवतारक । माथे पडोसाय
महे, ते पिप धोरो ना फन विधारक । पानजो वका
मृ युद्ध कगे पाश पायमो निज नगर मझारक । म.
HEST ए मा को सतोषदा पोर नको साई कारज
लिगारका बोजा माधु ने निमित भापती ना एगो
पागम विहागै हुन्ता पगारक्ष ! त्या कयो उपकार
आपने, कर दियो तिहा यो उप विहारक। भारत
पीपीपरपावार पाले में निररिवारका स.
८४॥ हिने लिए कान में विष रमे, खेमे पायरी

.
मुंजियो मिरक। जब जोर वास पाम्या घणा, धड हर
धजीगे पामिया बिहक ॥ विप हो सिह तमो गह
साभल्यो अञ्जना भग पामी तिण यारक । राम बमन
मागा इम उच्चरे, वाई देवगुरु धर्म समगे नवकारका
म. ॥६५॥ हिर बमन्तमाला विरये चढी,
मागागे कोधो मयारक । नाम जपे जगन्नाय नो, जाने
ध्यान पगो पणगारया ॥ चिटु गरा जीय समारती,
च्चार गरगा चिम्स चित्त मझारफा कर के कठो
काया हरे, पिणा मानो धर्म न ले लिगारक म.
REAn यि यममामाना इम उच्चरे, कहै अनना महा
मती निग्धारक। मोटरे गन्द ना करे, कोई
गयो पात्रो वृणधारक ॥ कोई मन्चन हुये पत्रमा
सगो सो विगा वेग म चायन्यो धायक । उपमर्ग उपनो
অব ঘা মারা যান এ হী শাখ। •
नियन मानि व्यनार यक्ष, सवारोत्रम
त्या मानानक । सेयन कह यामी मगो, पाप
गारी पायी दीय बालक । शिपम् गमा कर्म पापा
at म निम्न मार्टमा म्पनिया का तब
ममामिने भागभयो, बाटो दियो दा यम
.म.85 मानना भगो देवता जाने
दादा। मतिमा माहिरी निम्मी, बाग

पूरा मो का नहो जायक । हिप कलह उत- सो तारो, कुगले पावसी पवन कुमारक । बले मामो गे इहा पावमी, त निश्चिन्त रहे डा वन मझारफ। स•cen एहयो वचन मुगी देवता गयो, पन हे दोन रहे अनोहक ! वन फल फन तिहा पावरे, जन धर्म तो नही लोपै रे लोहफ॥ सृस व्रत पाले निगमला, पहोनिम करै छै जिन तो जापा। पस्या करे पति भाकरी, अजना काट के सचिया रामक ॥ स० ॥ १..॥ चैव माम धर अष्टमी पुप्य क्षित पायो धोकारक। गत रा माइला मोहरमा, अजना जनमियो इगुमन्त कुमारक ॥ पशुची टाली तथा अवसरे, दासो ने कहै अजना पामक । महोश्व फरसो कुम्प एहना, कटक मे गयो के पापणो खामक । स० ॥१.१॥ चादनी रात पुनम तणी, अजना कर घर बैठी है नन्दक। चञ्चल धमल मुहामणो, दोठा पामै घणो हरप चाणदक ॥ हरपे वोनाव रे मायडी, फुनर तो पड़ , लघु वैसक। तारा ने सामोरे चालुडो, जाणे के चन्द ने लेय झपटक ॥ स. ११.२॥ हिर मामी धजना तपी, सुरसेन राजा तेइनो नाम । देशान्तर माय माछो यल्यो, भामाश विमान थायो विथ ठाम वन माहें दौठी दोय बालिपार, पचरन - 1771 -सा पाना। पानो ने मोतनो नारस। जबमामो असनाने मोलमो, भेना में छटो छे जान रामो धारक ॥ स. ॥ १.३ ॥ गोलगो मित घणो भारो, पटने मामो पायो तत भजना गोम्न मिल्यो भजना रोये। पाडा गला ॥ डोल स पन्नगो हुये नहीं, बानक किन धगे गोगक। जर खोला में पैसाठी धोरणे, पा यि पूरम तुम तणो प्रागक ॥ म० ॥ १० ॥ जिना है मामा भगो माधे पायो मार पर ति में पाटो मामग यो मो मो. प में शिपतिनकामी मभानक॥ यले पार शाडो गय का घी, सिप्प कारा पाई वन ममा रमरपाो घमा, करपा न को गे मारो fRATRU म.॥ १.५॥ यि यस विमा म मया पत्रनारे गोद में रण मन्त कुमारक। दोठो वि माया ग झमया फटो मे वचन दोधो । पना तोड़ा मोया ना भू पयो पबना मुराण पो लिए वारक। तर मामा नी पुरा भयो, पार मनी पापामा म १ n पर भारी बेटे कगे, मामो योनि योन ग्मानशाको पार में शिमो, पिप जो कठे हो न देने पाग पनपत्रमा मपी, पायो हपुपारप ममारक, करे महोय प्रति घपो, माम दियो इतुमन्त कुमारफ स. ॥१.01 पजना हनु मन्त दहा रहे, पवनजी पापा के लद्वायुर्ग नायक । सिहा रावण राजा सू मुजरो फियो, जब रावण योले है एयौ पायक ! पवननी पाद राजा भयो, ये मेघ- पुरी नाय करो मेलाएक। वरुप राजा ने इटाय ने, परयो तिहा माहरी पापक म.॥१.८॥ हिवे मेवपुरी दन मनग्यो साहमा घरमै तिहां धागना महक। पि पानजी पग नहीं पातर माहो माहि मनुष्य मुषा घणा नेहा ॥ पास दिवम वियहो रह्यो, मो माहा माहे मेल मियो ताहक । पापा बरसाको गवण तणी, परनबी हरय पाम्पो मन माह म. ॥१६॥ हिव कटक पायो रे लहा भणी, राजा रावण ने कियो मुहारक। अय राषण वस्व वागा पापिया, धले पाया के गोमता घमा शिणगारक । फे एक दिन राखिया, मछे रावण सौख दोधी तिए वारक। पवनी पाद गजा भयो, से पाया के निज नगर मझारक । स. ॥ ११॥ पानजी कुगले पर पा. विया, मात पिता सई लाग्या ई पायक । जेटले माता भोजन कर लेटले पनना ने घर मायक्ष सूनारे महल मालिया देखिया, अग्ले तिहां पति पणा

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कई पवननी चाय पधारिया, नय पवना ने पीहर हुई चिन्ता पारक म. ॥ ११५ महिन्द काई । महापामियो, में दुष्ट पकारन फौधीरे लायक । हाजरिया लोस मारे घग्या, पिण डायो नही कोई चतुर मुनापक ॥ सोख नी वात कोने नहीं कहो, मनमा माईर उपनी बहु रीसम । नरफ मियाणो में बावियो हिवे टुष्ट कमा घी कम छूटीमा म. ॥११॥ हिवे पवनजी प्राय पधारिया मामन मासु पडो गिर भालक ! मैट कूटै दीनू हाय स, उदर पाधान किहा गई यालका मन माह दुख वैदै घणो, जाणे कोई जोर सू लागे छै घाणक ॥ ५ जना नो टुख वेदै घणो, तिम २ बोले के रोवती वापस०॥ ११॥ माथे सन्चा लेई चतुरहिणी, सुसरो नयाई रे साहमी जो लायक । वाह मसारी टोनू मिल्या, दोगा रे दुख धयो मन मायक ॥ जय पवननी कहे राजा मणी, तुम मुत्री ने काटी हम तौ मायक। ए दोप नही सुल माइगे, लव पाको राजा सू बोल्यो नही लायक ॥ स० ४११८६६ हिव पचनजी निज घर पागाने मग्दनिया मरदन करने कगयो नानक । बलि घोबा चन्दन चरचिया, गया यस्त पहरिया प्रधानक ॥ पछै भोजन महप पायने, परुपिया भोजन विविध प्रभावानक। पिच पचनजी कवो

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1
मन्ती तया, पञ्जना ने दोनू जोया पाल्या ? तामक
॥ स. १२३n वि महेन्द्र राजा पिण माध हुयो, बने
प्रसाद गय भायो लेई साधक । धनि माता पिण पाई
है रोवती, भाभान पुव एक मार्ग यातक ॥ पाहे
सपर कगस्या पश्चना तणी, थे तो नायो निज नगर
मझारक 1 नारो काजे लाज छोडी मति, परनजी नही
मानो वास लिगारकम.॥ १२४।। सय पर्मिया
विमाण धनापिया, यले शृरमा पुरुष फेग्या पसारक।
ठाम ठाम नावे पचना भयो, मुख स योले के पान
कुमारक ॥ नो मतो लाभ तोह नोवस , नहीं तो
पकाले कर देस फानक । देश परदेश फिरता थका,
पञ्चना मुपो छ निज मोसालक । स• ॥ १२५ ॥ जब
पयननी चाल्या के पागले, पीछे पाये , मगनो जी
साथक। जव यमन्तमाला परननी ने प्रोनच्या, कई
पञ्चना ने पायो छै तुम तणो नायक ॥ नव थाना
पाय पाय पडो, खोन्ना मे वैमाद्यो हणुमन्त कुमारफ
॥ स० ॥ १२६ ॥ वमन्तमाला आय पाय पडो, हियासू
मिडि पवन कुमारक । कहो वाई टुप तुम किम सद्या,
किम मही माहगै माय नो मारककिम करो
वनफल,बौणिया, किम कर्ग रही वन मझारक। किम
फ्ररी फाल गमावियो, किम करी पाल्यो, हणुमन्त कुमा-

याणका रक ॥ स. ॥ १७॥ स्वामीनी श्राप कटक में पधा रिया, सासरे पीहर म्हाने दियोजो छहक। तिण मू करी म्हें वन में गई, वनफल भखि ने काठिया दिहक ॥ तिहा मोटा मुनिवर भेटिया, यते देवता कोधी है हम तणी सारक । रात दिवस धर्म पालता, मामो लेई पायो दूण नगर ममारक ॥ स. ॥ १२८॥ हिवे यसन्तमाला पमे अञ्जना, पवन ने बोले छ मधुरो पाप किम कटक में सचण्या, किम सह्य राजा वरुण ना याणक॥ नव पवन कुमार इसडी कहै, मे वरुण गजा सु युद्ध कियो तेयफ । जब धाव लागा ते माजा हुवा, जीत फते कर पायो छ एथक ॥ स. nen हिने अञ्जना सती सिमा अयसरे, सास मुसरा में नागो जी पायक। जब मुसरो पाख्या पासू भरे में कलह देई ने कौवो जो पन्चायक ॥ अञ्जना पाय नमो या है, वापजो कम कगे छो बिम्नापक । दोष नहीं तुम तो पति छा मारै वोहला पापक स.। १३. ॥ वले माता पिता सू नाय मिन्नी, भाई भोजाया में पति घणो नेइक। माता पिता तेरो घया, पचना मारा पिता ने कहै सेहक ॥ थे चिन्ता करे किरा कारणे, पोतं छा मारै योहना पापक। ति कारणे, में दुप भोगया, मून न करज्यो कोई सन्ता

पक म. १७१, यि इणुपाटन घो पालिया,
प्रचना में मामे पापी घो पाया । साधे पायो .
चायवा, धतुतियो सन्चा लिई साधक साधे तो पात्रा
पति घी, ग्रानपुगे पाया मोट मण्डाप । उरंग
मन माई पति घणो, घर घर घरया के कोड कन्या-
पाक ॥ स. ॥ १३॥ हिव सीख देई मामा भणी,
पक्षना सती पवन कुमारक । मुख भोग संसार ना,
माही मागिग रही प्रीत पपारक। काल किसीक
गया पठे, राजा गणी बागे जाण्या ममारक ।
देई मनजी भयो मोट मण्डाण लोधी सयम मारक ।
स. १३३ ।। परन नरिन्द रान भोगवे, पचना गणी
सू देत विशेषक । इणुमन्त कुमार विद्या भणे, यानरी
पादि विद्या भयो भनेकक ॥ चतुर विषक्षण पति
ध्रयो, देश प्रदेश में हुशे नी विख्यातक । वसन्तमाना
रो मान पधारियो, सगलाई पछ कर तेहने यातक ।
स. ॥ १३४ ॥ शिव वरुप राजा तिष पयसरे, भामणा
पुवा ने जाणो सजोरक। थल पराक्रम देवी भामणी,
मन मांहि धर पति अभिमानक ॥ विणलहा भयो
दुत मोकल्यो गो ताही युद्ध करवा लग्यो भावक { तो
घौजा मुभट दल मोकली, तुम्हे एकर स जोषा मुम
भायक स.॥ १३५॥ रावण सेन्या मेली घणी एक

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( ४१ मजाई पायुद्धशाला नहीं तिषवागे। मपण्य राजा रे जुगवाहु भाई, माही माहि है प्यारो॥ ग.nen पाच इन्द्रो ना भोग भोगवता, नाटक पड़े दिन रंगो। विविध प्रकार नी क्रोडा करता, विषय विरोध मंडाणो । ग. nom मणग्य गजा गा भोगवता चढियो महान उदागे। तिय अवमरे मेंपरया टौठो जुगवाहु नौ नारो॥ ग. ॥८॥ रुप देवी ने राजा पचग्न पाम्यो पहो पही रप तुमागे। दृण राणी ने ई महल में गवू , मुख विनम मसारो ॥ ग• ॥६॥ माग्य गजा कर मन सुवो, नुगवार ने बुलायो। नी, ह टैग लेवण ने बायो | ग०॥ १०॥ हाथ जोडी ने नुगवा नै बोल्यो, पो तो ? थोडी कामो। राज विगलो गनसभा मे, जासू भाई तामो ॥ रा• ॥ ११ ॥ मणपथ गजा गजा हुवो, हुकुम कियो के भाई । देश किलो कायम करी पायो ले नायो फोन सलाई ॥ ग• ॥ १२ ॥ जुगवा तो उट्यो मताध सू, हरण । हुबो मन माहि। किसो कायम कर पाछी थारु, मुजरा करूला भाई ॥ ग. ॥ १३ ॥ ले फौजा जुगवाहु । चाल्यो, मजला मजला जायो। जुगवाहु तो मन में नही नाण्यो, मपरथ किया उपायो॥ • ॥ १४ ॥ मणग्य राना मेयरया कारणे मागै वस्तु मगावै । - . नम 1 ( ४२ ) गहगा नडा रा पहरण सारु, दासी रे हाथ पाचार्य ॥ ग• ॥ १५ ॥ दासो गजा रे हुकुमे छाने, वस्तु में देवे गणी ने जायो। मणपथ गजा चोज बनाया, तिणी खबर न कायो । रा. ॥ १६ ॥ मेघरमामय माहि जाण्यो धपो चाल्यो के गामो। मेंमरमा मन ऊगो जागी जेठ मिता गे ठामो, ग.॥१०॥ जाणो ने गमी करा लौधा, वस्तु आभूषण सारी। मनेही वस्तु मेलौ, जाग्यी राजा लागो म्हारो लारो रा० ॥ १८ ॥ मेणरया ने रोसज पाई, दोनो दासी न झझकागे। धणो तो म्हागे परदेश मिधायो, पडिया म्हागे लागे । ग. ॥ १८ ॥ दासो तो मन में दिलगिर हुई, गजा पास आई। मणरया तो मा गज कोप कगै ने, दोनी वस्तु वगाई | रा• ॥२.1 मगग्य गजा रात समय मे, महल भाई रे पायो। दायाजो तो जडियो दौठो, हेलो मारै छै रायो । रा. ॥ २१ ॥ मणग्धा तो मन माहि जाण्यो, मगरथ राजा पायो। यौजी तो कोई उपाय न दोसै, धुरे लपायो । रा० ॥ २२ ॥ मैणाद्या तो छाने वार ने दोनो सासु ने जपायो। अमला मसता माता नाग्रो, बैटो भोलि पायो।रा.॥२३1 पो तो माय बेटा भुगवा रो, महान पेलो कानी थारो। राका हूँ सासु - - । माता नो सामल राजा, लाग्यो ? तिणागे रा.॥ २४॥ मगरधा मन माहे लाखो पडियो राजा म्हारे । नारी । तो कासौद मेल धयो ने, वेगा पावज्यो इश श। ग.॥ २५ ॥ बीती बात लिखी कागद मे, जोवती नाणो मोने। तो पाछा धरै वेगा पावज्यो, दगो कियो थाने n n० ॥ २६ ॥ कामीद कागद दियो सताय से, अगया ने लाई । कागद याने सुगवाह बास्त्री, दगी क्यिो के भाई ॥ रा. ॥ २०॥ इम बापो ने जुगवा बलियो, टोल न कोनी काई। मुहर्त नहीं माला भावण गे, नौमित्तिये बात बताई ॥ रा. ॥ २८॥ लुगया तो डेरा वार कौना, नगरी मे नही पायो। मपाय गमागे डर जाणो ने, राणी धणी कने बायो । ग. ॥२९॥ मेघरघा मित्र पाए धपोरी, पर पुरुष प्रीस न जाणो । ब्रत पाप गे रावण মা, অল রূৰ ৪ র্থী ॥ • • মায়া तो पाती मताव सं . विध स धात सुनाई। सुगवाड़ तो मन में न धाग्यो, मारेलो मने भाई ग. अगवाहने पायो बापी ने, डर उपनी गधारे । मा- रथ राना करै विमामय, उमराव परे मारे । ग. गवाने गपी कईई, दगो करनी धागे माई। माघ ममान पर मारे, तो पालो

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मारण रो, जाय जोर पसरवाणो। सर्व प्रकार भूषा- वादे पदत्तादान में मायो॥ ग• 1 ४३ ॥ मोरा प्रौतमजो धाने मैथुन सेवण रो, विविध वाड प्रमाग्यो । मनुष्य देवता तिर्यञ्च सवन्धी, जावजीय पञ्चवायो ! रा• ॥ १४॥ मोरा प्रौतमजी याने क्रोध मान गे, माया लोभ ए च्यारी। मन मे तो ममता मती ग- ज्यो, नापजोध परिहागे । रा. ४५ ॥ मोग प्रीतम बोघे गग हेप दोई, वध करमा ग नायो । भभाम्यान पेशून्य चाडी पर परिवाद पञ्चपलायो । रा• ॥४६॥ मोग मौतमजी रति परति हम नापो, मायामोसो नही भलो। पाप पठारे विविध योमराल, मिथ्या दरबसलो ॥ ग .४७॥ भोग प्रीतमजी मरए सपो भय न पाणो, धर्म साधी करि जायो । परमव मे ते साये चालसी, गाठे वाध्यो नाप्यो । रा. ॥४८॥ मोरा प्रीतमजी घे मोह धको मन बालो, मोह में जौष मती घाली। करी भालोयाणा कारज सी ज्यू, मत राखी कोई सालो ॥ ग.॥४८॥ मोरा प्रीतम को दय हटान्ते, मनुष्य नमागे दोहेलो। इण भव में जो पुन्य करें तो, परभव सुख मुहेलो ॥ रा० ५. मोरा प्रौतमजी जाने विचारी, सुपना गै माया नायो। डाम पगो नल विन्दु जिम लाणी, मन में समता .

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१६. मपरधा मन माहिलायो पकडेलो मोने
गयो। वेष बदलने परी निकनो दासी नाम धरायो
, ॥ रा. ॥६१ ॥ डेरा माइ सं तो पार निकली, गई
उजाड र मायो । पूगे पापदा कोई नहीं माघे, गयी
र कुंवर नायो । रा• NEP॥ जिप नाया देगोटन
हुन्ता यौटता राज बधाई। विषय वियोग मे कुवर
। बायो, बोइज्यो करम कमाई ॥ रा.॥६३॥ पापी
पाहनो गयी हरये सर्व पावलो कोई सारी।
बायो ने
कुवर
सायी, ई करमा रे मारो॥ रा.
६४ा कोमान काया न कारण पडियो, पाव पड़े नही
ठायो । कुमर तो गपी निभती न बानो, पालक मेले
पन मायोn m. ॥६५॥ घोर विधाई पर समायो,
वाट विद्योती बायो। होत यागे मोहोमोरे बाया,
मप पारधी • REEN कुर मल गयो
पागो पानी नपिना मूनी काया। कठे मुवावड
कुष मास गाथे, करमा चैन दिपाया ग
.0
घा दास ने दामो हता, गधर नी धायो। दोटी
पडदा मागती, गया एकनी दायी : ग.
धाता धाता पार्ग नदी पार्ड, पारी में पाव पगाल्या।
पान करीने सारव पेठो उठी सभाना .
IEL कोपरियोग पडो मी मा, किन हिशाने

। (४८) पाई। गेहो में भमती एनमो गोपियो ॥ ग..॥ किन घर जनमो किरा पाएं गेगी काया। माहिय म्हागे मयों में लोगो में पाई। ग.100 कर विशेड़ी मात पिता ने जुगयाबभनघ भाई। अगवान ने मना मन्यो शामा के वन माहितग .0 मान भागमा गाभा आये गे, गजयिया समनाई। पति माहिमी उभी मेवो! तोर नदो गा माहिाग..॥ विपम उा। पाय वैठी नो मुख नो सिन ग्गी। मैनात टुप करतो येठो महट पची मती ग.fm झरे धपी न करै विलाप दम भर घातो फाटे । * रघा नो टु व प्रभु नाणे, येठी है सट मार्ट 17.1941 सजोग रूपी गही हुन्ती विजोग शिव वाली। विष्णो टु ग्वनी करती, पाणी रण में गेनी ॥ २६ ॥ देवो मगाई डण समार में, पिछडता का धागे। इम बायो ने सतगुरु सेयो, नाही लग्यो बाम ॥रा०॥७॥ तिण अवसर में देवता इमबार टुख करे के गयो। वैक्रिय रुप कियो हायी गे, रम माडी पाणी ॥ रा. ॥ ७८ ॥ टु ख विमाग्ण विनय कियो सृड स उशने पाणी। टुप छोडी ने दौठो, ग्मत देख राणी ॥ ग• ॥ ८ ॥ । -- जिम नि

रमत देखे राश, पथरन रमत मारो धर्म प्रकुरो
पुन्य सजोगे, पाये है नर नारी ॥ रा. ८० ॥ देवता
है कोई पर उपकारी, गयो ने सूड म झाले । नितरे
मिहा पाय निकलिया, लेफे विमाण मे मेले रा.
विद्याधर तो राजी हुघो, रूप ध्रयो एप नारी।
तुरत विमाण में पाको बनियो सुख विलसा ससारी
रा
.८२ मगरधा तो मन में जाग्यो,
बल्यो के पाशे। कुछ बाणे कुछ देग ले जाये, यो तो
मही होमे है पायो । रा
.८३ विद्याधर मे मैं-
रवा पूर, बाता किए दिस भाई। भवे तो ये माश
बलिया, काई दिल में पाई रा. १८४॥ भगवन्त में
तो दर माता, तो सरोखी मिली नारी। म जापी
में सालो बलियो, सुख विलसा ससारी ॥ रा.८५ ॥
मेघरम्या मोठे वधमे दाखवे, मगवन्त टरमा नाता।
মা র আ মিলী লু
नफो घयो दशा
करता : ग. ह. सोहर ना दाभण करता,
प्रसन्न होसौ घारौ काया। विद्याधर तो पाहो बलियो,
मेयरधारे मन भाया ॥ रा.100 समवसरणम
मेडा पाया, धिमाध स उतरिया। कर बन्दया ने सुने
ध्याख्यान, कारव सगला सरिया रा.८८॥ ग
माती देता यो, उट्यो र एमग पायो। सपना

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रा. ६८६ भरी परपदा में मपरया उठी, बोले करजोड़ी। पाजा द्यो तो स्वामी सयम लेक, टालू भवतपो खोडौ । रा• neen देव कहै धाने पाज्ञा म्हारी, ल्यो ये मयम भारी । लुगया तो उरण हयो मैंगरधा ने तारी॥ रा. ॥१.. मोने तो विद्याधर लायो परवश पात प्रशायी। का? विद्याधर को देवता, गयो विद्याधर न्हासी ॥ रा• ॥ १.१ मेंबरधा तो सयम लोधी, ज्ञान भणै गुरुपी मासै विनय करी ने पाना पाले, सुमति गुप्ति प्रकाश ॥रा. ॥१.२॥ देवता तो मन में इरपज पाम्यो, पूज्या प्रभुनी ना पायो। साधु साध्वी सर्व वादी ने, पायो जिप दिश नायो । रा०॥ १०३ ॥ देवता तो पामणे ठामे पहन्तो, मगरधा सयम पालै वालक तो मारग मे मल्यो, पामरा पुन्य रुषवाले । ग.॥ १.४॥ ना तो कोई हिन्सक नेडो पायो, नहीं कोई मदी खायो। देखी पुन्याई फे प्रभाव घी, सुकृत कीनी सहायो रा. ११.५॥ मिथिला नगरी नो पदमरघ राजा, चढियो शिशारज सोई। माम करता प. प्राधरी, पूरय सुस्त होई॥रा•॥ १.६॥ कर पसबारी राजा रण में फिरता, बोदे बौव सब कोई। रण माहि तो बालक सूतो, दीठी रांना सोई । रा११०॥ बालक नेड़ो ।

-- . . राना पाया, सूप देखने मचान पायो। पालक पुरपरन्त दौसे, राजा रे मन भायो । रा1101 म्हारा गज में पुव नहीं , म्हारे सहजे पायो। इर्ष यानक ने उसे लेज, सोपू गणो ने आयो । १.८॥ युवर लेई मे राजा पाशे गलियो, कसे राज दुवारी। पुप्पमाला राणो राय तेडावे, पुन दिने है करतारो ॥ गः ॥ ११ ॥ नय मास तो भारा रे है, देवता पितर मनायो। पापणे पूरव पुख्य कारी । कुधर सहन में भायो । ग. ॥ १११॥ अपवा राज पुव नहीं है, करो गरी प्रतिपालो। गज लायक कुवरज दोस, होमी राज मखयालो । रा• ॥ ११ ॥ भार भोलायण देई राणों ने, कुवर खोले घाखो। पुण्यवत गल में पाया पोछ, भोमिया नमो नेपालले ॥ १०॥ ११३ । भोमिया म्हारे पनमो गुना गन में पायो। भोमिया म्हारै मर्य चाकर पुमा, कोष माम दासायो । रा• ॥ ११४ ॥ नमीय कुंवर पदारण रात्रा दिन दिन पधतो होई। विशेही, ते मुलग्यो महु कोई ग. ॥११॥ अगवा ने मनग्य माग्यो, विषया ग्म रे पायो। पाश पाई मे सापन साधो, गयो मारको मायो | रा .. दोम् गना रो मरथ हो, खबर इस नगरी माई। मात पिता -

मएरधा तो निशल नाठी, तिपरी खबर न काई।
रा.॥११॥ ससार नो तो कारज कियो, राज बुग
यालम में दियो । किप में दोष न दोन रे प्रायो, करम
पापरा कियो । रा. ॥ ११८ ॥ जुगवल्लभ तो राज करै
के - घरते है चौथो पारो। दाम तणी मन मे योडी
पाये. मिप दुय परत माता रो॥रा• ॥ ११८ नमी
कुमार तो मोटो हुवो, विरह पद्यो राजा रो। नमी
कुमार में रान बैसाखो, मुख पिलसै ससारोग.
॥१२॥ गवाह सो देवता हुबो, मै एरधा सयम माने।
जुगवन्नम ने नमो भाई, दोन राज रुपवाले ॥रा.
१२१॥ पाठ काम के महा भोगवर, नोवा ने फोडा
पाई। च्यागमे तो न्यारा कोना, करतय खेल दिखाडे
॥n.॥ १२२ ।। दोन गला गज भोगवता, पटवी
पड़ी है सीमाडे। भूमि पापणी रापण सारू, करे
गाज धौराडे । रा.॥१२३॥ जुगवसम तो मन में
चायो, पायलड दिसे कठारो। देखोने म्हारो धरती
लिमी, राजविया पहारो॥ रा. १२४ ॥ जुगाम
तो फोना ले घटियो, काकड सौमे लाये । नमी राजा
मन में कोप यारी ने, मन में मगज न माने ।। ग.
।। १२५ ॥ नमोराय तो करो सजाई, बोले थाको
बापी। मरम मोसो बोले माता रो, पदियो है म

पर नास है दो,
जाणी ॥ ग. ॥१६॥ तिण भवसर में मैं
मन मे इसडी पाणी।
नहीं इठे पुन्य प्राणी ॥ ग.॥ १२७॥ घना
घातज होसो, मरसौ घणा अजाणी। यासू को
उमगार फौजे, मै परया मन पाणी॥रा.॥
फर पन्दना गुग्णी ने पूरै, भोम कहो तोह बार
दोन राजा रे राड मडी छै, इ नाई ने समभाव
ग•॥ १२६॥ माहो माहि तो कोई न इटसी,
के
घणा नौया नो घातज होसी,
पाम एक दया रा
ग.॥ १३० ॥ देखो.
गजविया गै, गुरपी तो पिण नहीं वरने। वस्तु
गे सैठी राखने, पौछे परोपकार करौजे रा...
कर वन्दना ने मे परधा चाली, ले सतिया नो
भुगवनम मू तो सैन्ध पिशण, पहेलो उप सू
रा-॥ १३२ ॥ काकड सीमा ठोड ठिकाने,
पडो है दोई। नुगवल्लभ नो लगकर पूशे, धालो
पा मोई ॥ रा.॥ १३३ ॥ मै परया सतो
गोरो, पाप तोरे पर तारी।
पार, निना पडो गत्रा गै। रा• । १३४१
तो उट्यो मताव , विनय कग्यो के मारी।
पाठ मग मामो पाईने, महासतिया कम पधाय
गज कचेडी

•॥ १३५ ।। मै परश तो कहे राजा ने, कारण
पडियो तोम्यु भारी। फौज वन्धी तो थे भेली कोनी,
में तिष म कारण विचारी || रा.॥१३६ ॥ पाय
खड म्हारी धरती लेसी, नीच चण्डाल घर लायो।
साप सामान दूप मेलो कोनो, तिष कारण घदी पायो
.रा.॥ १३० ॥ पैटा छो | रामविया रा, बोलो वोल
विचारो। पौर था अपर कौष घट पासी, यो भाई
है यागे। रा.॥ १३८॥ बात सुणी ने गजा लाग्यो,
भीमो मुख करो जोवे। भारी पचन कधी माता ने,
राजा में नहीं सोचे । रा• ॥ १३६ जुगवलभ तो कहै
माता ने, घे लौधो सयम भारो। मौत पापदा किय
विध दुई पात कहो विस्तारो।। रा० ॥ १४॥ मष
रथ राना याग पिता ने मारयो, ह रात में निकली
पाई। ननम नमी गे वन मे हुवो, ह मेल पाई वन
में भाई ।। रा. ॥ १४१॥ ती नदी में बैठी हुन्ती,
विमाय विद्याधर नो पायो। देव उचाय ने मोने माह
मेलो, इ गई समोसा मायो । ग० ॥१४२ ॥ पिता
तो धाग देवता हुबो, दागण प्रभु के पायी।
मांगी ने मैं तो मया नीश, भैय्या प्रभु रा पायो ।
रा.। १४३॥ दीन राजा रे मै वैरख सुषियो, लाडसी
माशो मारें। या पादमी मरण पामसी, तिए शारद
माता

भाई । रा०॥ १४४ ॥ जुगवल्लभ राजा ने, चिन्ता फिकर मन पाई । जुगवल्लभ तो को ने, नाय मिलूं ह भाई ॥रा०॥१४५ ॥ ठीक कै नमो राय ने, यो है म्हारो भाई। मही राजविया फेरी, तिय स मिल ह पहली नाई। ॥ १४६॥ बुगवल्लभ ने तो दियो समझाई, कने नाय । सतिया निबर मडी राना रौ, विनय साहमो पाय ॥ रा० ॥ १४७ ॥ हाय बोडीने योन्यो, महासतिया किम पाई। का सू कारण यारे, सडे भवसर माई ॥ रा०॥१४ का थार दोन गना रे, झगडो पडियो माहो माई। बन्यो तो ये मेनी कौमी, सिए कारण ह पाई। ॥१४॥ पाप माग्यो मे मा निफल मागी, शिप रे मारे। देवो ने एमहागै धरती सेसी, सनमुष माता रे ॥ ग०॥१५०॥ वेटा ये छो. ग, बोली पोन विचारी। और था ऊपर कुष पामो, माई के भी यागे। ग० ॥१५॥ मोटो मन्त्री मवर पडो अनुमा। नानीवाला जापो, पात को विम्मा ॥ रा० ॥१५२॥ वात नेगा भाग्यो, मोषो मुष करी बोधे । भारो, कमी माता ने, गामेनी सोचे ॥रा०॥ । 1

नमो राजा तो मन माहि जाग्यो, जुगवासभ गजा म्हारी
भाई। मे सनेह धगे टोनू बेटा रो, तिष म मावी
पाई। रा• । १५४ । नमी गना तो मिलण चाल्यो,
जुगवालम सामो लाई।
हरम भाव में थाइ पसागै,
मिलिया दोन भाई 11 रा.॥ १५५ ॥ एकए हायो रे
होटं बैठा जुगवहम नमी भाई। गवलभ रा डेरा
कानी, हुई पव हरप सवाई | रा. ॥ १५६ ॥ लोक
लडाई रो याता करता, लडता होडा होही। लोका
मन मे पचान पाम्या काई किया इण मोडी ॥रा.
११५० । वैर मिटाय ने मेल करायो, घणा लोक हुषा
घणा जपा रामाया मडता, राध्या
के
माजी ।। रा.॥ १५॥ लोक राजा रे कुशलज हुवी,
घर घर इग्य वधाई। भलो होम्यो दूण सती करी
यश लोधौ नग माई रा॥१५८ ॥ गन्न कडी में
पाई वैठा
जुगवल्लभ नमो भाई। बुगवल्लभ मुख
पधिर बायो मेधैरागरो मन मे पाई। रा० १६.॥
जगवाजम
कई मोने दीक्षा लेप द्यो, गज कगे महा-
रायो । राज ऋदि ने सर्व सम्पदा मै याने भोलायो।
ग. ॥ १६॥ जुगवलभ तो दौमा सोधी, हरप धषी
मन माई। भाई विशेहो दुख गै लहरां, नमी कुमर
ने पाई। रा. १६२॥ नमो गजा तो रान कर के,
रानी।
इण
।

वाना। गणी एक मौ पाठो। हुयो नाटक ने घुरै नगाग दोन गज गे पाटो । ग• ॥ १६३ ॥ दाघ ज्वान जोग करीने, लेमी मयम भागे। इन्द्र परीक्षा कर पामी उगध्ययन सिम्तागे॥ ग. ॥ १६४ ॥ दोन भाया रे मैन कगयो मैगाया पाकी पाई । गुरषो पाय लागर्न, विध { वात सुणाई ॥ रा• ॥ १५॥ मोटा गजा र मन कगयो गवी घणा गै वात्रो। मचाया ना गुण बागी ने, गुग्गी हुई है गजी ग. ne त्सोम हमार पाग्या माहे, गुग्गी चन्दन तिना पाट पदयो पाई गिष्यगो रतनाने माना ॥ ग• ॥ १६॥ चंडानी ने माते पुवी, मगरत पाप वावायी। चनगा मगावती तोजी प्रभावतो, चायो गिवार गयो । ग. ॥ १८॥ पाचवों पदमा वती कठो मनमा जठा मातमी आणो। मस्ट पर्ज मतो गोम्नत्र गच्या दमयनानम्न गयो । ग.१५॥ प्रभूना मतो महिमत गन्ना नो बेटो, विवो मरे बन माक्षिा मारट पचा मतो गोमा गम्ची, यम चौता मारि ग ... मतो ट्रीमदी पांग यग मोदी नग मार। मोटा गत्रा गति गैर मिटायी पाया गेपधिवाग• ॥१॥ Er ममत्रत कमी मनुष्य प्रमाग मत मोज्यो।

। जिन गामन में जिम मपाधा कोनी, तिम मक्ष कोई कोग्यो, ॥ ग. ॥१०२॥ मपाया तो दोधा नई मन शह मयम पाल। जिन मारग म नाम दीपायो, भव- टुषण महटाने ॥ ग. ॥ १७३ ।। पाद्या तो फुग्म तारक हुई मज्या पाप गैगवी। विवो मची पिप मौन न माग्यो भगवत तहमा माग्यो । ग. ॥१४॥ जगवा में मगरधा मती जुगलम नमो भाई। च्यागं रो तो कारज सौधो, मणग्य दुर्गति माहिरा. ॥ १०५ ॥ व्यसन मातमौ पानागै नो नोष घात घर हाणी । मणग्य राना नग्फ परन्तो कुयग वाध प्राणी ॥ ग.॥ १०६ ॥ एक कुव्यमन मणरथ मैव्यो वाम मलियो मसारी। मातू कुव्यमन जे सेवे प्राणी तिण में दुख पपागे । ग•॥१०॥ विषया रस से विष मम नागो ने, मतगुरु सेवा की। मणरथ गजा नी वात मुग्यो ने, परनारी सङ्कन कोले ॥ ग. ॥ १७ ॥ दान गोल सप मयम पालो, दोषण मगला टालो। दया धर्म गै ममता पाणी, शह पाचार ते पालो ग॥१७॥ धर्म दयाम पोषली भाप्यो, से माधो कर भाणो। ले ज्ञानी सवैभव प्राणी से पामे निरवायो ग. ॥१८०॥ जप तप मंयम पालो भाई, विषय विकार गमाई। जीव जिक तो शिव मुख पार्य, योपोर वचन मन नाई ॥ग ॥१८॥ .

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जिन वाणी सुन मान लियो पव, सब पापों से छुडाना मुझे । स. ॥५॥ भाव दया यही स पर को, सुध निव घर को लगाना मुझे ॥ स. ॥ ६ ॥ उलझ रहो मोह फर्म बाल में, मुमति दे सुलझाना मुझे ॥ १०॥ ७ मकित ब्रस पायो हुलमायो, पायो भरण निभाना मुझे ॥ स. १८॥ गुलाबचन्द पानन्द भयो पति, सुख मे मुख पर पाना मुझे। म॥ ६ ॥ ॥ सोरठा॥ महर तारण माहिरे लोका राजगती बनी। मरुप रुपचन्द ताहिर तेहना उपाथय पकौ ॥१॥ विक्रम मषत् जान रे, पठारह सत गुणतोस मे। गद प्ररूपण मान रे, टेखी पूर्व तिहातिम निदोर तिष पनुसार देख में, सूव तणा नेह पाठ युत । न्याय महित मुविशेष र, कह जिज्ञासु कारणे ॥ ३ ॥ ॥ अय हुण्डी को बोल॥ तीन ही काल ग भाव केवल ज्ञानी दीठा, कोई जोव ने नव तत्व राजाण पणा विना ससार समुद्र सं तिरता दीठो नहीं। साव सूत्र सूयगदाग अध्य. पन १२ गाया १६वीं। .

भूत मरियम और दमाननीना रमाएको
॥दोहा॥
गोन कान ग भावना, जाणक क्षेपनी मोय ।
नव तस्य जाण्या पिना, सिग्या न देवा कोय ॥
यया पम्यिरा वस्तु ना साता नेसा सत।
से बुहा पर सार का, कर कर्म नो पा२॥
धा सुयगडाग कचो, मध्ययन बाग्मा मां।
तल यया तथ्य जानिये, सोलमी गाथा तालि।
॥ सूत्र पाठ॥
411 मणा गया, मागम्म प्रायति नहा गया।
मग म मात्र या दुशत प्रत माति ।
० नम्बश्य मुत्र हताह म... miss
भापाथ॥
पारा rfen यी धोरा तय माना ना
पुदमन यांना मानते रामा
भाना मत है। मामलों का जानने समुनि हाता है।
॥ पोल दुमरा ।।
गांग का कही जीव गरि २ अजीय रागि।
संपर्ग गांग को, जिगा ने मात्र निन्दया में यह
निन्दा कया। मा. मु. उबयाई प्रम थे।

॥दोहा॥ गणि दोय जिनवर कही नीव पजीष नोय दतीय राशि कोई कहे, ना तो निम्हव होय । उवाई सूवे को, प्रग्न उन्नीसवें जान । मिथ गगि तीजी कहे, ते मात निन्दव मे मान ॥५॥ एक समय कार्य न हुदै बहु पत्ता यह गैरख । औष, एक प्रदेश में, हितोय निम्ह इम देव ॥६॥ माधु लि साध नहीं, उसीय निम्हय दूम माम! चौथू निम्हद इम कई चिटुगति क्षण २ नाग ROM एक समय दो किरिया हुवे, पक्षम निम्हव राह! छट्ठा नीव पजीव मिल, तोजी गशि कहHER कर्म सर्व कंचुकि परे, जोर तणे लागन्त । নাম নি লাঘৰী দঃ এন্ধান ঘিাষনা 821 . ॥ सूत्र पाठ ॥ मन र गामागर ागर जाम सवियप, हिका मति तबहाबाहुरक्षा की मिया, रतिया, सामुरिक्षण, दोकिरिया नसगिया सन्नहिया, इस ते सत्त एलप गिया। २० उपवाई प्रदान भावार्थ ये जो माम भागर पार सनिवप में जो निय होते है सोहन है- बहुत समय में गाय होय एक समय म नहीं होय जमान्] ----

इस प्रकार
२ प प्रारा में जोर है, पेमा माननेयाला [तोसगुमर) ३
से देश के कई साधूपना है या नहीं | अपादाचाय के शिया
४ नापारिया गतिका क्षण में बिनाश होता है [ मणि
५ ममय में दो किरिया लगती है ऐमा मानने याका [गगना
यन् जीगराशि १ अजीय राशि २ जीवाजीरराव यो हीन पर
माननयाग गांट मदिगपत् . जैसे सप को है पैम यो
बन गत ऐमा मानन याला
मत छिपानमा धानों के हिय होते है।
॥ बोल तीसरा ॥
जोर अजीर प्रम म्यागर जाणे नहीं निण
पापादपद्यश्यामा सया, साग्य सूत्र भगाना
गनर ७ का उद्देश्य २ ग।
॥ दोहा॥
और अनीय त्रामो ना, बम म्यावर नो जाय।
वाग कर मारम राणा संहना छेद
मतम गई भगवती, द्वितीय उपम ।
वाया दिन व्रत्रिम रथे, मंदा मात्रयी व 1
। मूत्र पाट।
44 AM
-
AR HA

॥ भावार्थ ॥ जो म मापी पावत् सर्प मोर माग्ने प्रत्याख्यान है, विग्नु ऐमा नहीं जाने दियदजीय है, यह मनोय है पद नाम है, पर शायर है, ऐसा मनानी सर्व प्राण भूत जोर सत्य माग्ने रे याग लिये का उस दुपयक्याण , चिन्तु सुनन्यायान नहीं । ॥ बोल चौथा ॥ जीव भजीव ने जाणे नहीं, जीप अजोव दोना ने जार्ग नहीं तिण ने सयमरी ओलखणा नहीं। साग्य सू० दशवकालिक अध्ययन ४ गा० १२ वीं। ॥ दोहा॥ दशकालिक में कयो तयं पध्ययने ताहि । जीव पजीव जाणे नही, धारवों गाया माहि ॥१२॥ जौष पनीव पजाणतो, तमु संयम किम शेय । नापी त्याग कियां यफा, धारिष गुण पवलोय ॥१३॥ ॥सून पाट॥ जो जीव विन यापाइ अजीव पिन यायाइ जीवा जीको अपामातो, का सो नाहीय सयम ॥१२॥ दशकारिक ०४ गाथा १२ ॥ भावार्थ॥ जो जीव को भी नहीं जाने, अजोय को भी नहीं जाने। जीपों अजीयों को ही नहीं सो उसने संयम नहीं है । अर्थात् जीयाजीप आने शिना संयम नहीं 1 ।

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॥ सोरठा ॥ एक पाठ न परे, कई जन हां हम यो देख मोधार्थ रे, तो रामु एकान्त पाप हुवे ॥२३॥ पयवा तमु गुरु नान , दियां मित्य्याव न पाप यदि पनुकम्पा पान रे देव तो तमु पाप नहीं ॥२४॥ इम निज मत पनुमार रे मूव विकह ले को कह। पिण तमु उत्तर मार रे बुद्धिवन्त न्याय विचारिये ॥२५॥ न को सूते एम रे, मोक्षार्थी दा गुरू समझ । सोनिज मन धौ को कमरे,भावार्थ समझ्या विना।। सया रुप के नेह, पसयतो ना भेषयुस । तमु गुरु किम जाणेहरे, श्रावक ने भगवान ग ॥२७॥ पलि दीप सहित किम देय रे, थावक गुरु जायी करी। न्याय विचारिलेय रे पक्षपात चित्त छाडि फरि॥२८॥ पल्प चाय बन्धाय रे असूभतो दिया साधु ने। तीना ठाणा माय रे, वलि ठाम २ सिद्धान्त मे ॥२६॥ दोष सहित दिया ताहिरे, पाप हुये पिण धर्म नहीं। देखो पागम माहिरे, पसूझता थी पुण्य नहीं ॥३॥ जो गुरु नागी सामरे, कदा निर्दोष देखें तस। तो पाप एकान्त विमासरे पहा कहोफिय कारणे ॥३१॥ न देक पथ तीर्थों प्रसिह रे, वलि देवाक नहीं। .

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- बोसम भाव न सहहरे, तो पाप एकान्ते हुवै । दहा मुनिर किस्यू गिणेहरे,एकान्त पाप मिथ्यात्वन।४४ वलि धुर शतक निहाल भष्टम उद्देशे कधू । पनती मे एकान्त पालन, एकान्त पण्डित साधुने ४५॥ पटम मतक रे माहिरे, छठे उद्देशै भगवती। तथा रुप सयति ताहिरी, दिया एकान्त निर्जग हुवै ॥४६॥ जो एकान्त नू जेहरे छहलो भेद एक हो कहै । तो ठाम २ सवेरे, एकान्त पर्घ रोइल किस्यू ॥४०॥ যি म एकान्त पाप पसयती प्रविति ने। दोधा जिन को पाप र पाठ माहि प्रगट मणे ॥४८॥ एक पन्त दो भन्द रे, नेश्ना पर्य के एक हि फेवन लबरे, पन्त तेह निसय नापयो १४६॥ छट्टा काण्ड मझार, नवम योशे देवानो। पन्त वह निराय धार हम नाम माना वि॥५॥ तिराम भगवती माहिरे दिया पमति पविरति में। एकान्त पाहिज धायरी, प्रभु पाध्यो सत्य है ॥५॥ जपा ॥ बोल आठवा।। शास्वता प्रशाम्बतागे बघर नहीं तिने पोध सहित कया। मा० स० सयगडाग भ० उ०२ गाथायो।

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परमया मेष साधना पाप मोर मगध के कारण मशाग। " बोल बारहवा ।। भगवान श्री महावीर स्वामी ठहो आहार पणा दिना रोनीपन लियो क्या। मासू०प्र० भाना- गह अध्ययन : उद्देशा ४ गा० १३ वीं। ॥ दोहा ॥ घणा दिना रो नोपन , शीतल वासो पिगष्ट । गान्ति भाव धरि लेवता, महावीर गुपमण्ड ॥६॥ प्रथम पह में देखल्ली पटम (नवम) अध्ययन उदार। घोया उद्देगा विषे, तेरवी गाया सार ॥ ६ ॥ ॥ सूत्र पाठ॥ मुहया पुरुषामाय पिंड पुराण कुम्मास । भदु रकम दुलागा, मदे पिंड दा दरि॥ भावार्थ ॥ भगना महापौर म्यामी एनस्यपन में मौजा हया समा उहा पुषणा पन दिनों हा रांधा हुवा उहरका तथा पुराने पाय का बना हुमा निरम पान्य का बना हुमा माहार मिलने से शान्ति मास मोगयत यदि नहीं मिला तो भी शान्ति माष सेहत। ॥ बोल तेरहवा॥ केवल ज्ञानी री प्ररूपणा विना माए भापरी प्ररूपणा करे तिण ने किञ्चित् मात्र जाणपणो नहीं। सा० स० सूयगडाग अ० १ उ० २ गाथा १४ वीं। ॥दोहा॥ धावनी प्रसया धर्म विन अपनी मति पनुसार। प्ररूपय जेहने, जाय पणी न लिगार ॥ भक र माइण यमण वलि, कहै महश सर्य बार। पिण प्राणो सहु लोक मे, रोहना मेड पजाय ॥१॥ से किञ्चत नहीं लापता, धुर सूयगडाग माहि। प्रथम पध्ययने नाणिये दितीय उद्देथे ताहि ।सून पाठ। ममणा एगे, सब नाण सय पए। सब लोगे जे पाणा, न ते पाया किपणे ॥१॥ भावार्थ जगत में एक २ मण ब्राह्मण ऐगे है सो कहते हैं हम सबै भार पातु माक में मर्य प्राणी है उन्हे ये विचित्र मात्र नही निय मतानुमार एक २ घमण प्रमाण पहले है हम जमीनु उन्हें विचित् मात्र जापापना नहीं है। ॥ बोल चौदहवा ॥ भात्र ने देशाज्ञानी प्ररुप्या धर्म विना धर्म मानणा नहीं। मा०मू० उययाईप्र. माहणा म ॥ मथान २.वा।

॥दोहा॥
श्रावक सत्य करि मानता वाली भापित धर्म ।
टूषो धर्म न मानयो, एह जिन भासन मर्म
नियंन्य वचनज प नियन्य प्रवचन परमार्थ ।
पन्य वन ने पिए इम फहे, प्रवचन विना पनय ६६
लाध्या पत्रा पर्व पूछ कर, धारया विनय सहित ।
परिय परिप मना तस, प्रेम राग F IN NEOn
सव उपवाई में फयो, प्रग्न बोसमें ठोक ।
मक रहित जिन वचन में, त्यांने मुक्ति नजोक MCN
॥सन पाठ॥
निगम पार निम्मरिया पिपलिया मिबितिक्षा
कहा Terपुरिदा finar, बिलिदह aft
मानुरागरण मोवि परदोर परम
कम पहे।
ए.पा.२.पा।
1
সাপ্তা
पेनियर मैं नि we ratam
रहिमपात
पागल देव सोपान
प। विपिल पानासा frant
परम परमम्दामी ! मnt पाप?
rr . पूरनों पारे सन्मुख और
रियसलापनि Rifa

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। भावार्थ । जिन भवनों में गड्ढा महीं हरै अपात् भगवान म एप शरीर में मनन्ने शीय भादि अनेक पाने पही है सो सत्य है। २ निविय मथात् जो अन्य मतयार पहने थद मी टोग होगा ऐसी पौटान परे। ३ नियितिगिच्या याना जो तप नियमादिभरणा करता सो दायक होगा या महा एमी विचारणा नहीं करें। ४ असूट दिहिय अथात् मन्य मन वागेकी अनेक प्रचार प्रकपणा हो देखये उनकी सरप खयाल नपरे। ५ बह पानी गुणयन्त पुरषों के गुणगान कर। ६ पिरि रणे मथात् सम्यगन्ध में पिर है। • पसल पानी पट कारों के जायों पे धान्मन्य भार पायें। ८ प्रमायना भान जैन धर्म की प्रभापनाकर सम्यक्त्व के आठ भाचार गई है। ॥ वोल मोल्हवा ॥ केवलज्ञानी ग वचनारी बार नहीं जिकारे घणो वाल मरण अकाम मरण होमी। उत्तराध्ययन भ० ३६ गा० २६० वीं। ॥दोहा॥ ने जिन बचन नाणे नही, दाल मरण तसु जाय । घणाभकाममरणे मरे, उत्ताध्ययन छत्तिसमे पिछाण।०३ ॥ सूत्र पाठ॥ पान मरयाणि नमो, प्राम मरणापि चाप बदसो । मरिक्षति त पराया, लिए घयण क न याति ॥२०॥ मा० सुत्र

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(१) ॥दोहा॥ फेवलियारो पाचार सो, छमम्घ रोपाचार । फलिया रोपनाचार ते, छाम्प रो पनाचार Ho५॥ कुगन्न पुरुपज क्षेपानी, नहाँ बन्धाय मूकाय । जधारभ्यो तिम पारभे, ते वुद्धिवन्त कहाय ॥६॥ प्रथम पाचारड़े कधी, टूने अध्ययन उदार । घट्टा उद्देशा विषे, निपुण न्याय पवधार ॥७७ ॥ । सूत्र पाठ। मुसल पुण यो पढ़े हो मुझे म प्रारम्म प अपारम्म भगा रहा चयभारम्भ घ्य छण परिलाय लोग सनसनसो। आचाराम०२३०६ टा भावार्थ परन्दा मरान पन्धे हुये महीं, पूटे हुव नहीं जैसे घे धर्तदाय पैस करमा मोर जैसा उनका भाचरण नहीं है पेसा नहीं भाचर। अपात् मयम मिया जैसी फेवलियों का सादा भरवरियों का है। हिसा मपासाको जान उनका परिहार करना। ॥ बोल उन्नीसमा॥ बत्तख्या ३ कही १ स्व समय बत्तबया, २ पर समय पत्तध्वया। स्व समय बत्तत्रया की तो माधु आज्ञा दे तथा मानण योग है, पर समय बत्तम्बया में सात भवगुण काया-~- १ अनर्थ, २ अहित ३

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पागम वष ते स्व समय, तेहिज मानण योग। बता पा शास्व नी, नाणो ताम भयोग ८६॥ नैगम समा व्यवहार , पलता तौन स पर मिथ इम वप हुवे, सूत्र टोय लोन ॥८॥ गब्दादिक व नयतिका, इच्छे वालता एक । व ममय रोहिल सत्य है, पर ते सहु पविवेक ८८ . ॥ सूत्र पाठ॥ मशितवदया। पत्तवया तिषिहा पता तबहा-- १ ससमय बत्तजया, २ पर समय यताया,३ ससमय पर समय बचन्नया मलित सममय बत्तनया सममय तनया-जत्था समय पाप पिजति पण्य विधति परमिति सदनि दसिमा उपासना सत सममय बताया। मति पर समय पलाया। उत्पण पर समय मानिति बार उपदाप्तिर्वात सत पर समय बत्त- खया। मक्ति सममय पर समय बत्तवया अत्यण ससमय पर समय पापविमति जाव उपदसि जति सत ससमय परममय बत्तख्या सायिको न भोक पत्तवय इति । तय गम मगह यवहारो तिषित परतलय इति तनहा-समय पत्तन्वय पर समय पत्तन्वय समय पर समय पतनया उग्नु सुभो दुविह पत्तत्रय दातबहा- समय पत्तदय पर समर बलवय तस्वण जामा मसमय परतवया सा सममय रिहाना, सा परसमय पत्तप्पा सा पर समय पारिद्वारा सम्हा दुमिहा परतन्धया परिय तिविहा बत्तखया । तिमि सदा नया

ममय पनाध्यता।
राग सममय पत्ताय इति त्यि पर समय क्लवया, कहा।
जम्हा परसमय ? भणटे २ अहेड, ३ अमम्भाव, ४ परिण,
५ उम्मग्गे, । अणुवम, ७ मिग्या दसण, भितिकटु तम्हा मन
मममय दत्तव्यया गरिथ पर समय यत्त ग्या, सेत बरतनया ।
अनुयोग द्वारा
। भावार्थ।
प्रश्न-पत्नय्यता कितने प्रकार की है। उत्तर-यतथ्यता तब
प्रकार का मा पहते हैं-१ म्व समय, २ पर समय, ३ और मार
म्यममय यतव्यता रिसे कहते हैं। वममा
मथात् म्वमा जिन प्रणीत सूत्रा का समेष से कहे विस्तार पूर्वक करे
प्राणा कर, शम्तादि र दशाये, प्रपया में उपदिशे, विरोध कर
शाय मा सममय यत्तप्यता।" अहो भाया पर समय चक्रव्यमा
किमत"जा मम्य मत शाल उन प्रकार सामान्य प्रकार
कहे, प्रकाशनको विस्तार से पहे. विशेष कर दीय
गदिश यह पर ममय बनाता है। स्वपर समय पतष्यता का
नाता है। जोम्पमत के शानों और परमत के शादों को शामि
गोको यात् उपदिश, मा म्यपर समय यतथ्यता है।" भर गया
काममामात-गम मंद और व्यवहार यह तीन मकान
पमप्यतामा मान भौर मु मूत्र मय दो प्रकार का यमध्यता
माने समय मौर पर ममय बनायता । परुनु दोनों का
मित्र वष्यता का नहीं मानल्योंकि होम्स ममय बनायता
हम नमन में बतान, मोर जो पर समय यमगता है उसे
मन में ना मग नागरी पनपता है।
भोमन ल मूल मय कयर एष ससमय वनमाला
हैमले ए पर ममय पान का नहीं हो कि
पा ममम पसना उमने म भनु प्रमाण
मोर
.

रिसा रहित है उमार्ग है उपदश है, मिरच्या दशन है। दोर पर शास में। अत एक स्व समय पश्यता हो । पाध्यता नहीं । ॥ बोल बीसवा ॥ देवली प्ररूपियो धर्म एकान्त प्रधान मा० म० प्र० सयगडाग भ० ६ गा० ७। ॥ दोहा॥ फेवल जानी भापियो सहिज धर्म एकान्त । धुर मूयगडागे 8 सप्तमी गाया dan2॥ प्रधान धर्म श्री मिन कधो तमु नेता वर्षमान । गोभे महु देश विचे एन्द्र ममा गुण मान ६.1 मव नेता में येष्ट है काश्यप गोव उत्पन्न । दय धर्म जिनवर कधी, स्त्रि धर्म मुमन ॥५१॥ ॥ सूत्र पाट॥ तर - मुली मान। Purर मामा मम्म" free frre | गुन्गासंग मध्यपनar भाग मन पर डिनोगमा नोरा मुरा Are FAIRTE चारों में में सुनी।

॥ बोल इकोसमां ॥ केवली प्ररूप्यो धम यथार्थ सरल शुद्ध मा कपटाई रहित कया। सा० सू० सूयगडाग भई गाथा. ॥दोहा॥ धम यथा तय्य पाखियो जेह माहगा मतियन्त । कपट रहित तेह साल है, जिनोत धर्म म सन्ता प्रथम मृयगडांगे कयो, नवम अध्ययन र माहि। पहिलो गाया में विपे, जिन को धर्म कहाहि ॥ ॥ मूत्र पाठ॥ कमरम्म सम्माय मारण मति मता। प.धम्म जा तण, निदायो त सुण में ॥१॥ प्र. मूत्र तांगमयम अध्यपने माग भावार्थ মগ গগস মন না চায় লিখাৰ সুৰ धमनी-मामात मार मा लागि मनारदमादा परकी। ॥ बोलवावीमवां ॥ बित करनी विधिन मात्र हिंसान ही कासगी शान से मार कही। मा० स०प्र० सयगड- भयपन 2. गापा.. यीं। n

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सो पर्षे कर्म धय को, पामे मोघ प्रधाम ।
पीपा सराध्ययन में, एटम गाया बान १.१
त्रिपाठ
Furthere arert frrrrMIC
गिराध्यपक्ष..
॥ भावार्थ
भRAL Uran भाना for RAKगरमा
HTTTTRatern) रोउनमा एR Cer
rrent gram पारा Rogo net
मी (
Gun गुरास या
A trent at maret
॥ पोल पचीसा॥
पापा पमना सपमान वा
RI मूएशारिश से।
॥ दोहा॥
TRA # पो भए ।
yrrrrrr FTEINE TE
rin
-

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॥ भावार्थ ॥ बोल सतावीसवा ॥ घाल मरण री प्रशसा करे करावे अनुमोदे तो प्रायश्चित कयो । सा० सू० निशीथ उद्देशे ११वें। ॥दोहा॥ मुनिवर वाल मरण सयौ, करे प्रशसा कोय । करता प्रसे पनुमोदिया, दह निगौष मे लोय ॥१५॥ ॥ सूत्र पाठ॥ थाभ परयाणि वा पससइ पसस त वा साइन्म। निशीप उद्देशा था। । बाल मरण मर्यात विना मनशन पिये मिथ्या सहित मरे उसको मशसा परेरा और उस अनुमोदन करतो प्राधित। "बोल अठावीसवां ॥ जो साधु गृहम्य ने अणतीर्थी ने १ मसाण, २ पाण ३ खादिम, ४ स्वादिम, ५ वस्त्र, ६ पात्र, ७ कम्बल, ८ पाय पुच्छण, ये भाठ पोल देव देवावे देता ने भलो जाणे तो चौमासी प्रायश्चित क्यो। सामू निशीय उद्देशे १५३। ॥दोहा॥ पन्य सौर्थि वा एहस्य ने, घ्यार प्रकार पसार । पल पाव कम्मल वली, पाय पुच्छयो धार १.६

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. विराधक जानादिक सपो, विषय लम्पटी जान। २ पदूमौ राई ने बुमो कई प्रायश्चित तमु मान ११.. निगीय उगे मोनइये, तेरम पषदम बोल । निन्दा करि गुपपन्त नौ, गुण तहनामत पोल ॥१११॥ ॥सून पाठ॥ चिन्ता राया मी गाय काम। पण माय मराइस समय निर्गपगmail भावार्ध मोरापान राम गुल पार न सनगर भणी परपरे मोर भासा गया को पिप गोरमी र होममी पनि ॥ बोल तीसरा ॥ পদ দধু যা मर्गा माधुश ग्थानक नहीं या नहीं, देना प्रने भला जागे नहीं, नोप्राधिन छायो। सा०म० निगीय संगे। ॥ बोल एकतीसरा ॥ मांगी माजी हार मागे पसीने म्यान नहीं, देगार नहीं देनांप्रने नहीं मा प्राधिन का। मा० निगीप में 1

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जो विराधक नानादिक तयो, विषय लम्पटी जान । से पसौराई मे वृसो कहे, प्रायरित तसु मान ॥१०॥ निशीय उद्देशे सोलहवें, सेरम वदम बोल । निन्दा करि गुणवन्त नी, गुण तेहनामत पोल ॥११॥ ॥ सूत्र पाठ॥ जमिन दूर्मा राया धूमी रायइप १४ पद त वा साइजह । मिमा मधूमगाइप धूमराइय चदई वद त साइजह । निशीप उदया १६ यां। भावार्थ ॥ साधु चूसी राया भयान्न दशन बारित्रगुण धारक अपने से परे मुनिराज का अयूसी राया कद मोर ममा राया जो रिपथ परी को पूती गपापहे तो चौमासी प्राधित । ॥ बोल तीसवा ॥ मरोग्या साधु होकर सरेया साधुवा ने स्थानक देवे नहीं देवाचे नहीं, टेता प्रने भलो जाणे नहीं, ता प्रायश्चित क्यो। सा०म० निशीथ उद्देशे १७३। ॥ बोल इफ्तोसवा ॥ मरोग्बी माधी होकर सम्वी साध्वी ने स्थानक देवे नहीं, देयावे नहीं देना प्रने भग्ना जाणे नहीं नो प्रायश्चित कम्यो। मा०म० निशीय उदंगे

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चों या गृहस्प को देख कर उनमा मस्ता वस्त्रादि से कि परिषयावृत्य परे, कराये, करते हुए पो मनुमोदना फरे, तो भाप ॥ बोल तेतीसवा तथा चौतीसवा ॥ माध माप रहता होय जिण स्थानक में न्यातीला पा भगा न्यानोला, श्रावक वा यावा ने भावो रान वा माधी रात राखें ता प्रायश्चित्त भारे। मा० म. निशीथ उदशे - घोल १२वें। माघु रहता हाय जिण स्थानक में न्यातीला वा परान्यानोला धावक वा अप्रावक, भावी गत वा भायो गत रहे उणा ने नहीं निषेधे ता प्रायश्चित मा० सू. निशीथ उशे = योल १३।। ॥दोहा॥ माधु बमै तिष म्यान में, निज न्याती प्रते जान । पिश पपन्यासी प्रत, गध्यो दण्ड पिशन ॥१३॥ कोपयश लि पशावक जो शेय । भरका पर्ध राति मे गध्या प्रायश्चित्त जोय ॥१४॥ मान रहा या प्रते नहीं निषेध नाम । नियोय उद्देगे पाठ, प्रायक्ति को बाम १२५ सत्र पाठ नाम Am PTETr

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तोपों या गृहस्थ को देख कर उनका मस्ता वस्त्रादि से दकि त्यादि षयावृत्य पपरापे, करते हुए पो अनुमोदना फरे, तो प्राप भित्ता ॥ बोल तेतीसवा तथा चोतीसवा ॥ साध आप रहता होय जिण स्थानक में न्यातीला वा भग्ण न्यानोला धारक वा यावर ने भाखो रात वा माधो रात, राग्वे ता प्रायश्चित्त भारे। सा० स० निशीथ उद्दशे - बोल १२वें। माधु रहना होय जिण स्थानक में न्यातीला वा भण न्यातोला श्रावक वा अप्रावक, प्राग्वी गत वा माधो गन रहे उणा ने नहीं निषेधे तो प्रायश्चित्त भावे । मा० सू० निशीथ उदेशे = योल १३ ३ । ॥दोहा॥ साधु वमै सिप म्यान में, निज न्याती प्रते नान । पया पन्चासौ प्रते, गध्या दगड पिशन १२३॥ श्रावक हो पघा वलि पथापक नो होय । सत्र वा पर्ध गवि मे गध्या प्रायरित जोय ॥१२४॥ उमहिन्न रहता हुया प्रते नहीं निषेधे तास । निगोय उद्देशै पाठ, प्राययित वयो बास ॥१५॥ ॥ सून पाठ॥ समित्याग भाग आमर या मर या

साधु
।
(१८)
अतो उपस्सयस अ वराय, कसिण क्राय, सवसायेइ, सबसा वता
साइनइ॥२२॥ ज भिररसूत न पडियाक्वा न पडियाइश्य त
वा, साइजई॥१३॥
स. निशीथ उद्देशे ८।
॥ भावार्थ
जो ज्ञातीने तथा अशातीने, धारक ने तथा अधारकने माप
जिस स्थान में रहते हों उसी स्थान में सर्व रात्रि अथवा अर्द्ध गरि उनके
साथ रहे यारन् अनुमोदे तो प्रायश्चित्त । रहते हुए को न निषेधे अर्थात्
मना न करे तो प्रायश्चित आये।
॥ सोरठा ॥
एक स्थान इक कल्प रे, तिण में ग्रहस्थी ने मुनौ।
राख्या प्रायथित जल्प रे, गई तथा मर्व राति तक।१२६॥
एक पागण उपरान्त रे, सामायक पौपध ग्रहो करे ।
से ठाम २ विग्तन्त रे, सच देख निर्णय करो ॥१०॥
॥ बोल पैतीसवा ॥
सावध दान की प्रशसा कर तिण ने प्राणी
जीवा को बध यछणहारो कहा। सा. सू. सूयग-
डाग अ. ११वें गा. २. वी।
॥दोहा॥
नो सासारिक दान से, करे प्रशसा कोय ।
वध बछे षट् काय न, सूयगडागे जोय ॥१२॥

पध्ययन इग्यारह ने विषे, वीसमों गाया माहित निषेधिया वर्तमान में, उत्ति रद कहाहि ॥२८॥ स्त्र पाठ॥ जय पाय पससति पर विधन्ति पालियो । जयमा परि सहति, पितिष्य रति त ॥१३011 भावार्थ जो दान को प्रशंसा परमो माणो जीयो पापा, भौर जो घसमान में निधपरेको नयारे की प्रतिकार परे। ॥ सोरठा ॥ पहा को प्रय कर रे सावध शब्द नही पाठ में। समुचे दान कह रे, ससु उत्तर पागे सुणो ॥१३॥ छडु काय गे घात रे, मुनि ने देता नहि हुवे । से निरवदा साक्षातरे लिय मे प्रगमा हुनगह ९३९ दान गोन तप माष रे, च्यार मार्ग यह मुक्तिरा। त निरपद्य ठहरावरे, करैनिन पाजामहित जो ॥१३२ शोर पधिकरण नाहिरे, पोहर है पट काय ना। यायचोव लग साहिरे, मुनि रे हिसा त्याग ॥१३३॥ तस दौधा पुण्य लान रे, प्रशुभ कर्म पिए क्षय हुये। दिया सुपात्र दान रे, थावक रे व्रत वारमू ॥१३४॥ टुनम कया जिनराय रे, शह दान दाता तिका । दोधा शुभ गति जायचे, दशवकाग्निक विप्रै कयो।१३५ मुमुग्व प्रमुख दश ताय रे मुनि ने दान देई करौ। एकायतारौ थार रे, केदक तिण भव मोक्ष मे ॥१३३॥ पञ्चम भङ्ग पिछाण रे, पटम गत उद्देश यत् । सथाप मुनि ने नाप रे, थावक पडिन्नामे तमु ॥१३॥ एकान्त निर्जरा होय रे, किञ्चिरामान पिग्ण पाप नहीं। पुण्य यन्ध अयलोय रे, ठाम ठाम सवे कधो ॥१३८] स्थाना नवम नाय रे, नय विधि पुख्ख बन्धे कयो। निर्वदा नयी पयलोय र, मुनि ने काल्प ते कन्या ॥१३८॥ नमस्कार किया जाहिरे, हम निर्दोप पत्र दिया। पुख्य राखो बन्ध थाहि रे, नप हो सरीखाजाधिये ॥१४॥ से माटे दूहा जान निरवा दान न लेखयो। वोममा कयोसमो पिशण गाधादेव निर्णय करो। पम्ति नास्ति ये टोय रे, पुण्ण पाप नी नहीं कई वर्तमान म लोय रे, पूशा यौ मुनि नहीं वदे ॥१४२॥ सेम दहा पपधार रे, निषेधियां यत्तमान में। कान्ति सम्दे धार , क्रिया तह वर्तमान रौ ॥१४॥ कियां प्रशसा सोयरे वर यछणहारा को। प्रत्यक्ष हौ पालोय रे, सारदा दान यह जाययो १४४॥ ठाम - शिनगय रे, कुपात दान सणा कया। माल कडुपा पधिकाय रे. पचपात तम सामन्द्रो ॥१४५॥ मगा मोटा ने देख रे, गौतम निनमे पाय करि ।

टुख विपाक में लेख रे पूशो कि दवा दुणे ॥१४॥ सूत्र भगवतो माहिरे, पटम शतक देपुलो। छ? उद्देमे ताहिर, पसंयति अविरति मे ॥१४॥ पाप एकान्त में घायरे, सचित चित पडिलाभियो। निराकिञ्चित नाहिरे, प्रत्यक्ष पाठ विप गयो १४८॥ राथा सूयगडापा, नवम अध्ययन तेवोसमौ । गाया में इम लेश, साधु दिन पमेरा प्रते ॥१४॥ दान देवो पधार रे, कार पाप तणो तिको । भनय हेतु समार रे, इत्यादिक वह सूत्र में ॥१५॥ पलि पानन्द श्रावक वान रे, पन्य सोर्यो में देख रा। कौधा छ पसखान रे, मप्तम पङ्गे देखल्यो ।१५१५ लो फन्त न कई कदरे, मापदा दान राणा पशुभ । तो मवि किमलाणेहरे, मुपाव कुपावज दान ने १५२॥ निधिया वर्तमान पन्तगय लागे राम पनि प्रतिवेदक वानरे, दान लेण वाला तपो ॥१५॥ प्रशसिया ज दान रे, प्राय घात वाचक फयो। सो ते दोधा दानरे, से हिंसक किम नहीं हुये ॥१५॥ मुनि पिन पर शरीर रे, अधिकाए पट काय ने। तसुतीखो किया मोरर, हिसादिक कारख तयो ।१५५॥ पवत माहि देहर, सेवे ते पिव पविग्स में। दृषी पासघ सेवेकरे, तिपयो न हुवे पस्त्र वध HEL ( १०२) कोई कहे शुभ परिणाम रे, दान देण वाला तणा। तिण सूं पुण्य बन्ध ताम रे, तसु उत्तर हिये विचारिये साता बछो एक रे, धुर पासव सेवावियो। टूनो वोल अन्नोक रे, टु व टूजा गे मेटियो ।१५८॥ तीजो घोरौ कगय रे, पर साता परिणाम से । इक मैथुन सेवाय रे, माता रा परिणाम से ॥१५८॥ इम परिग्रह रखवाय रे, हित पच्छौ मल भाव से । यह पचास्रय न्याय रे, बुदिवस हिये विचारिये ॥१६॥ धुर पचम रे माहि रे, धर्म पुण्य नो होय तो। विचना तिण में ताहिरी, धर्म पुण्य पिप जानवो ॥१६॥ न हु शुम परिणाम रे, पचासव सेवायता। जिन पानाबिन कामरे, कौधा थो धर्म पुण्य नहीं ॥१९॥ तिष स लौकिक दान रे, प्रशसमो नहीं मुनि भगो। प्रशसिया यो जान रे, वृच्छक प्राणी यध सा ॥१६॥ ।। बोल उत्तोसवा॥ विषय सहित धम पुरो, जिम ताल पुट जहर पाया, कुरोति से हाथ में शन लिया, कृविधि मत्र जपिया मरण पामें, निम इन्द्रियों को विषय सहित धर्म प्ररूपे ते घणा जन्म मरण पधारे। मा. सू. उत्तराव्ययन भ.२. गा.2।

॥ दोहा ।। जिम विष खाया तानपुट कुविधि गम्ब हाथ मझार । मन्त कुर्गति पियां यका, पामे मग तिशर ॥१६॥ तिम विषय सहित ने धर्म के, प्ररूपियां समु जान । टु खदाई होवे घयो, बन्म मरण बहुमान ॥१६५॥ उत्तराध्ययन में दिन कन्यो, बोसमाध्ययन रे माहि। पार घालौसी गाह मे, सिमा धर्म टु सदाय ॥१६॥ ॥ सुध्र पाट। निमतु पाय कामररणर सत्य वह कुग्गाहिय । एमो विधम्मा विसमोर या हर पयामाया पिर उत्सराध्ययन २०२०। ॥ भागार्थ ॥ समारपट जहर पीने से, दुर्शिर शम्न ग्रहण करने से और पुराति से घेतारादि मन्त्र जपन से, मृत्यु मात्र हो। म इन्दिप विश्प सहित धर्म प्रापना करने से जन्म मरणादि का वृद्धि हो तपा दु छदाई ॥ वोल सैतीसवा ॥ भाषा २ कही १ माराधक, २ पिराधका चिरा धक भाषा में औगुण ४ वटा यथा-१ भसयम, २ अविरत, ३ अडियाई, ४ अपचक्वाण पाप कर्म सा• स. पनवणा पद ११वें।

(१०५) ॥ दोहा ॥ दोय प्रकारे नायवी, भापा ने बोलेह । पागधक प्रथमा कहो, द्वितीय विराधक मे ॥१६णा सउपयोग यथोता ने, से भागधक नान । विगधका लेग पर पछे, विन उपयोग पयुक्त पिछान पगुप चार तिष मे पछे, असयम पव्रत पयलीय । पप्रतिहत पपञ्चकवाण इम, मन्नयणा दग्यारह बोय । . सुन पाठ॥ इयाद मत सरि मामामायाइ भासमाम प्रागह विंग- हा । गोयमा श्ययाइ चत्तारि मामानायाइ पाउस मासमाग बाराह" या विगहा तग पर अमजय, पविण प्रपडिहत प्रपथपाय पान - मम्म। पारणा पदयो। ॥ भागार्थ॥ है भगवान् यह चार भाषा जानि भापते हुए भारापकर या गिफ' हे गौतम या चार प्रसारको मारा उपयोग सहित जमे की जैसे बोले तो भाराधन है विरार नदी। इमफे उपरात असयम, मयिरत, मप्रतिहत पाप कर्मों का गम यालान ॥ बोल अडतीसवा ॥ मिभ भाषा वाल्या महा माहनीय कर्म बंधे। सा• मू• दशाश्रुतम्य ध अध्ययन में बोल हैं।

॥दोहा॥
मिथ भाषा बोल्या यका, महा मोहनीय वन्ध ।
नवमे बोले पाखियो, यो दगाथुप्त स्कन्ध ॥१७॥
खाणतो परिपध विपे, साच झूठ विहु मेल ।
योले कपट सहित ने, मिय वच कुकला खेल ॥१०॥
॥ सूत्र पाठ॥
जाय माय परिमर सथ मोमाइ भामण
अमीय कम पुरिम महा मोह पकुव्या ॥६
दशातस्कन्ध भ..
॥ भावार्थ
जो जानता है कि यह मूठ है तो मा ममा में बैठ पर मिथ माग
भवान् माय भूठा निणय न हाय पेमा भाग पाले सत्यासत्य
माश बाल शो वृदिर मो महा माहनाय पर्म उपाजन परला
॥ वोल उनचालीसवा ।।
मिभ भाषा छोड़े छुड़ावे निणने समाधि कही।
सा० सू०प्र० सूयगडाग भ० १० वें गा• १५ वीं
॥दोहा॥
वचन गुप्ति प्राप्त मुनो, परम समाधिवत ।
छोडे छोडावे मित्र वच, शुभ लेम्या धर सन्त ॥१०॥

॥ ॥ घर छावे नहीं महा ऋपि, नही छयावे जेह । वर्ने सग स्त्री तणो, दशम सूयगडाअगेह ॥१७॥ । सूत्र पाठ॥ गुत्तोष यय समाहि पत्तो लेम समाहर्ट्स परिवयमा । गिह न छाये गावि छायजा समिम्स मात्र पयह पयासु ॥१॥ भावार्थ घचन गुप्तिपत अर्थात् सारय पचन गोपने पाले समाधि मोर शुभ लेश्या के धारक अपन रहने के रिये घर छाये नहीं अन्य से छराये नहीं समभाव धारण करता हुआ मित्र भाषा का त्याग करे। ॥ बोल चालीसवा॥ मिश्र भाषा तथा असत्य भाषा सर्व प्रकारे छोड़नी कही सत्य और व्यवहार भाषा बोलनी कही। सा. सू० दशकालिक अ. ७ गाथा १ ली। ॥ दोहा ॥ सर्व प्रकार असत्य मिथ, नहीं बोले मुनि वैण। सत्य व्यवहार ही भाषवे, च्यार भाषा मे सैण ॥१७४' दगबैकालिक मे कयो, सप्तमध्ययने खच्छ । पहली गाया में विपे, सौखे सविनय वच्छ ॥१०॥ ॥सून पाठ॥ चउपद खनु मासाग, परिममाण पगार । नायतु विणय मिक्वदाय मासिन सबसी ॥१॥ दगकारिक भ..या।

॥भावार्थ ।। चार प्रकार की भाषा है निसमें सत्य और ध्यपहार तोनिय पूषक साप, पिन्तु असत्य और मिथ्र भाषा सर्वथा प्रकारे मदीं पोते। ॥ वोल इकचालीसवा ॥ मिथ भाषा रा धणी गे वचन अवक्तव्य कहा, अणविमासी वोलनहार कह्या, अज्ञाननादी करो, पूछया गे जवार देवा असमर्थ क्यो, मिश्र धर्म प्ररूपणे वालो भाप रो मत थापा भणी छलवल माडतो कहा। सा० सू०प्र० सुयगडाग अध्ययन १२ वें गा० ५ वीं। ॥ दोहा ॥ मिथ भाव प्राप्त घको, मिथ न बोलणहार । वोले विना विचारियो, पज्ञान यादी धार ॥१७॥ बाव देवा समरथ नहीं, पूशा थी अवलोय । मिथ धर्म प्रते स्थापवा, छल बल माडै सोय ॥१७॥ थारम पक्रिया मान कर, फुन प्रकृति क्षय मुक्ति । इम इक पख इम दोय पम्व, साम्य दर्शनी उक्ति ॥१८॥ परोह कयो हादशध्ययमे पेख । मिथ वक्ता पषत है, पचमी गाथा पेख ॥१७॥ प्रथम

॥ सूत्र पाठ
FRm मार गिरा नहीप, मे मुम्म हर प्रणाणाई।
TM इममेग पात पाहमुदनाय तगाम||५||
प्रत्र हतांग द्वादशमध्यपने ।
॥ भायाथ॥
मित्र मागको प्रा प्रश्नाने पारेको उत्तर देने में भसमय
ra. मोर मोन धारण बात है, ये मामलादी भीमायहे, कभी
mar Maमी पण पक्षी, मी वा पक्षी हान है। भोर
निल माना मत मापनपत है।
॥ बोल बयालीमया ॥
मागे पाशा बारे धम प्रतिगान काम
भाग में गूता काया, हिन्मा ग करणहार कया।
मा० म.प्र.भानागग अध्ययन ६ उपशाह था।
॥ दोहा ॥
मार गे पादा दिना, पडे धर्म उदार।
शाम भैग में पतिवा, हिमा । बाप.
मग कमी पटमध्ययन ममार।
सा गा वि माभनी विना
अपमानमत्र माना।
मत में, माघ

हे काम भोग यो छता मुर्शित विषय मझार । समाधि मार्गजिन भापियो से नहीं सेवे लिगार ॥१८॥ पार्य ष शह माधु समु, शिक्षा दे फिण वार । तो हनी निन्दा करे, वे हिगुण मूर्व इम धार ॥१८॥ ॥ मूत्र पाठ॥ पमिला ममिलाप त गो ति मर मारा भग्वायत भाच शिसम्म मममा शिविरमामो,गणिसम्मन ममताभ- माया गिमा सो पपणा समाहि माधामको मय ना मापार र परमपति । मीन मता उपमना मला गपमाया पापा मम्म वितिया संगम पाया। भाचारगि पटमध्यपने गनुर्घोदिया। ॥ भावाथ॥ विना सारा माहामा भनागपतंदुए रिग्य परी दोषर उनमें हिसार में परत माननाय उगा पार पिपारा मापारमा महसय पार पातु गुगता मनाप मोर मार्ग में मरों का मनस गुना में मसिन रोषा दिने मोरपनमा मारिता मध मानन महीं पाता परिन् माय पनलिगुपति ने मरमानाहिसा REVIE दुर गुमे अप रिसर, मन्द रिपार मारने वाले मापुसार निम्न में हरमा पपुगुने ।

॥ दोहा ॥ पनि तिगहिज उद्देगे करो, धर्म का पाना यार । प्राग मोय हिसक शिका, पमयम भर्थी धार ॥१८५॥ पधमार्थी यान से पारमार्थी जेह। कर्मनाये प्राणों में भग्नी माणता ॥ टुकार धर्म जिनवर कयो, से पालन ममर्थ नाहि । तब तम कर प्रयहनना तत्पर हिमा माधि ॥१८॥ पाना वाहिर यई धर्म प्ररुप एम। मिन पाना नहीं मानतो, भ्रष्ट किया निशनमा . ॥ सूत्र पाठ॥ ग्राम तमाम गाम वाल प्रारमी अणुवा माग हा पाण या याममा बाग माया था धम्म 744 31 सरगमग fifraPati नामाचार्गग मर पटमध्ययन ) ॥भावाथ। मगर मनकामनाममा rfantryमामा मलमा Taara Harant म घर माना faran अनाtan army ॥ वोल तियालीसवा ॥ आज्ञा चाहिर धर्म कहसी तिण रा तप भने नियम भ्रष्ट कह्या निण ने मूर्व कह्यो, ससार से पार पामतो नहीं क्यो। मा• सू• भाचाराग अध्ययन २ उद्देशो २॥ ॥ दोहा ॥ फहसी धर्म पाजा विना, तिणरा तप भरु नेम । मर कच्चा धुर पल मे हितोय अध्ययने ण्म ॥१८॥ दृजे उद्देशे देखल्यो, परिसह उपसर्ग पाय । पाजा वाहिर होयफे शिथिन्न घई मोइ वर्ताय ॥१८॥ कई में पपरियही पळू , पिण भोग मिल्या भोगाय । तथा भोग मिल्नवा तणा, करत अनेक उपाय ॥१८॥ ते भेष नजावं साधु नू, सेवे काम विकार । वार २ मोह मै फस्या, ने नही पामे पार ॥१८२॥ ॥ सूत्र पाठ॥ भमायाय पुढावि, योगिह ति मदा मोहम पाउडा अपरिग्गहा मविस्मामा समुहाग लद काम श्रमिगाहेति, श्रणाणा मुपियो पडि- ल-ति, सत्य मोह पुणा पुणो सपण गो पाराण | भाचाराग द्वितीयध्यपन द्वितीय उद्देश। ।। भावार्थ॥ माना मर्च जीव परारह उपसर्ग भाने से आज्ञा याहिर हाक सयम से भ्रष्ट होते हैं, और कहते हैं हम अपरिग्रही है दीपा ऐके मुनि फा घेश लजाते है, काम भोग प्राप्त होने से अभिप्रहण करते हैं कामादि प्राप्त करने को उपाय करते रहते हैं इस तरह आशा याहिर धर्म कहने वाले जो हैं वे धार २ माह में से हुए मंमार का पार नहीं पाते। ॥ बोल चमालीसवा ॥ प्राज्ञा वारे उद्यम, आज्ञा माहि पालस्य, ए दो बोल मत होज्यो, यह कुशल पुरुप भगवान् की श्रद्धा छ । मा० स० आचागग अ० ५ उ ६ । ॥ दोहा ॥ कुशल पुरुष महावीर नी यह श्रद्धा हे मार । पाजामे उद्यम सदा, नहि उद्यम पाता वार ॥१८॥ उद्यम भाजा बाहिरै, आजा मे पालस्य । यह दोन मत होयज्यो, दम भाष्यो कुशलम्म ॥१६४॥ धुर पाचागर्ग कयो, पचम पध्ययन पेग्न । छट्ठा उद्देशा विषै, जिन दर्शन ड्रम लेख ॥१५॥ ॥ सूत्र पाठ॥ अग्यागा साहाण, प्राणाप ग निस्सहाण । त त माहो, यकुममम्स मपा॥ भावाराष्ट्र पंचम अध्ययने परमोदेतो। भावार्थ ।। ॥ किनर आशा वाहिर पिरान प्रवृति में इधमा यतत है और कितना जिनामानुार प्रवृत्ति में निग्यमा हात है मत यह दोनों अथात् मामा में मालस्य और भासा पाहिर उद्यम कभी न होये, यही कुरान पुरुष भगवान महावीर का दशन है। ॥ वोल पैंतालीसवा॥ प्रवचन से विरुद्ध प्ररूपने वाला ने भगवान निन्हव कह्यो । सा० सू. उववाई प्रश्न १६ वें। ॥दोहा॥ प्रवचन विरुद्ध प्ररूपणा करै ते निम्हय धार । सूत्र उपवाई में कयो उन्नोसवा प्रश्न मझार ॥१६॥ सप्त निन्हव प्रवचन तणा भाष्या थी जगतार । करता शुद्ध प्ररुपणा थहा तास पमार ॥१६॥ सूत्र पाठ। इच त सत्त पय णियहका । उवाईप्रस १६ । । भावार्थ यद सातों प्रावन के निन्य है। इति । ॥ बोल छयालीसवा।। राग द्वेप दोन पाप कह्या दोना से न्यारा रहे सो ससार मे नहीं स्ले सा० सू० उत्तराध्ययन म. ३१ वेंगाधा ३री।

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पाणिया नी परे घणो झरसी। मा० सू० सूयगडाग अ०३ उद्देशो ४ गाथा दठी। ॥दोहा॥ साता दिया साता हुवे, इम को कहै अविचार । तिण ऊपर पट वोल इम, भाष्या थी जगतार ॥२०॥ शाक्यादिक इक एक ने, वा स्वतीर्थो नेह । परिषह धो डरता थका, ते ने दम भारोह ॥२०१॥ साता से साता हुवै, एम कह ने कोय । ते पार्य मार्ग से वेगला, समाधि से पलगा होय ॥२०२॥ पलि हेलण हार जिन धर्म ना, ते पल्प सुखारे काज । घणा सुखां मे हारता, अछे अमोक्ष गे कान ॥२.३॥ लोह वापिया नौ परे, घणा झूग्सौ नेह । साता दिया साता हुवै, ने कोई एम वदेह ॥२०४॥ ॥ सूत्र पाठ ॥ इह म गउ मासति, सात सातेण विमति । ज तत्य पारिध मग्ग परम च समाहिए ॥६॥ माण्य पर मचता, अपण लुपहा बहु । पतस्स प्रमोमा", अय हारित सूरह ॥७॥ ॥ भावार्थ ॥ यहा एक एक ऐसा कहते हैं कि साता से साता होती है अर्थात् सुध देने से सुक्ष होता है। ऐसा पहनेगले आर्य मार्ग से पृथक् है।

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( १९६) ॥ बोल अडतालीसवा ॥ साधु होकर अनुकम्पा रे वास्ते स जीवा ने वाधे यथावे याधताने अनुमोदे, तथा अनुकम्पा करि घध्या जोश ने छोड़े छोड़ावे छोड़ता प्रते भलो जाणे तो चौमासी प्रायश्चित। सा० सू० निशाथ उ. १२ वें, बोल १ तथा २रे। ॥दोहा॥ मुनि पनुकम्पा पाण कर, वस नौवा ने नोय । पादिक पाश करो बाधै वधावे कोय ॥२३५॥ पथवा वन्धिया देख कर, छोडे छोडावै तास । वाध्याछोडया भलो जाणिया, प्रायश्चित चौमास १२३६॥ निशीथ उद्देशै वारमै, पहले दूले बोल । यह करुणा पासा बाहर है, पाव हिया गे खोल ॥२३०॥ ॥ सुन पाठ। जे मिक्व फोनुण पडियार, अररिय तस पागा जाय । तण यसएणका मुज पासपणवा चम्म पासण्या रजु ।। सामरणका पुच पामराणवा षषद ३१ त साइबई | अमिाखू पचल्य वा मुयई मुय त का साइमइ ॥२॥ (निग्रोय उद्देरो १२) ॥ भावार्थ ॥ साधु अनुकम्पा के लिये अन्य प्रस प्राणियों को नाति अपात् प्रस जीरों को घास को डोरी से, चमडे का दोरी से, रजा की डोरी से, इत्यादिक डोरियों से बाधे यधारे यांधते को अनुमोदे तो चौमासी प्रायश्चित्त ॥१॥ ऐसे ही बंधे हुवे त्रम जानों को देख कम्पा परखे छोटे छोडाने और अनुमोदे तो चौमासिक प्रायधिस ॥२॥ ॥ सोरठा शब्द अर्थ भन्न नेह रे, ते फेक दहा इम कहै। कोलुण दौन भावहरे, बाध्या छोद्या दड है ॥२३८॥ सतोत्तर विज कयो एथ रे, दीन भाव इहा स्यू वम प्रति याध्या तेथ रे, गरौब भाव होवे किण तयो । मुनिवर दोनज होय रे, वस वाधे किय कारणे । कदा दोन बस लोय रे तो माधु अनुकम्प करि ॥२४॥ तथा वधिया प्रति देख रे, दीन पणो मुनि स्य करे। जो दीन पनुकम्पा लेख रे, सावद्य तिण सू प्रायश्चित कधो न्याय दृष्टि पवनोय रे, लघु चूर्णि जिन दास कृत । तिहा कोस्लुष गन्दे जोय रे कोलुण अनुकम्प पर्थ ॥२४२॥ ॥ जिनदास आचार्यकृत लघुचूर्णिका ।। भिक्य पुत्र भणिमो कालूणनि-कास्य अनु- कम्पा प्रतिज्ञाया इत्यर्थ ।

। सोरठा ।। it कहे कौतुइन काम रे कोन्नुप गन्द तयो परय । को कोसन कौतुहल यावर सहपाठ न्यारो पर्छ।२४३॥ मतदगम उहे रे, निगीय मूव में देहिये। बाधे वा छोडेगर, कोजन पडियाए तिला गद है । तिहां कौतुइन निमित्त मुनि वम प्राणो देव फर। बांध छोडे पसरे, तो प्राययित के मुनि भषा १२४५॥ मूष पाट मोडल रिया एणयम पायनितमा काम- परामर faar ॥ सिमोरच परत मुरता॥ निशीप.१७ भावाय॥ imgोरन निमित भय म मालिका l मे पास दो धार पनि ममो माप frrate पुगेन भय प्रम दयों ने मातोभा जामा प्राधिन-1 ॥ सारठा ॥ कोतुन कात्र मुनिराधरे वाया घोडा पम प्रति । दाइ कमी प्रमात्र मता हेग निगोयमें, मारमा दहेग मभार रे सोमय से पनुश्म्य करि। ।

-
( १२२ )
वाध्या खोल्या दड धाररे, वस नौवा प्रते, पाखियो।
इम विहु स्थाने नोय रे,माठ गब्द छै नूनुभा।
कोलुण अनुकम्प होय रे, कोऊल ते कौतुहल कयो ।
वस जीवा रे माहिरे, मनुष्य तिर्यञ्च सहु भाविया ।
तसु अनुकम्पा ल्याहि रे, वाधे खोले मुनो तदा ॥२४॥
प्रायथित कयो तिहिबार रे, सूव वचन ते सत्य है।
ग्रहम्थ नौ सार सभार रे, सावध नान मुनि नहीं करे ।
ग्रहस्थ तणो जे काम रे, ते करवू कल्पे नही।
कदा अकल्पनौक ठाम रे, पाम्या ग्रहस्थ मनुकम्प करि ॥
तेलादि मईन कह रे, मुनि तनु शान्ति पमायवे ।
यह दोष उपजेहरे, द्वितीय श्रुत स्कन्धे धुर भगे ॥२५२॥
तिहा पिण कोलुण हो शब्द रे, तमु पनुकम्पा अर्थ है।
एम इहा मिगा लब्द रे, कचो कोलुण शब्द सारखो।
तथा अजोयिका निमित्त रे, पर्थ करे कोलुण सग्यो ।
से मिण है विपरीत र, दूहा मुनि ने काई पाजीविका ।
किहा हो न सत्र विषेहरे, कोलुण ते पाजीविका ।
न सूचार्य न जाणहरे, से मन कल्पित पर्थ करे ॥२५॥
पनि कई इम वाय रे पनुकम्प सापद्य न हुवे।
निषदा हो कहियाय रे, ततोत्तर न्याय विचाग्यि ॥२५॥
पनुकम्पा रे काज रे, देवकी ना पट सुत प्रते।
सलमा घरे ममाज रे, मेल्या हरण गपि मुर ॥२५॥

(१२) पनुकम्पा चित्त पाप रे डोलहो पूर्ण कियो देवता। जाता सूत्र पखापरे अभय कुमार तो सदा॥२५८॥ यौनया ईट उपार रे मेली बदतणे घरे। पसगट सत्र मझार रे पनुकपा फरि सहनी ॥२५६॥ भोग प्रार्थना कीध रे, रयणा देवी जिन पि प्रसे। है पनुकम्पा फरी प्रसिद्धगे, ज्ञाता नवमाध्ययन मे ॥ इत्यादिक वा ठाम रे, पनुकम्पा करीने वह। कौधा सावदा कामरे, से सब मनुफम्य इम ॥२६॥ सासारिक उपकार रे, नई यो मुनि न्याग गया। यो जिन पाजावार कार्य किया प्राययित हुये।२६२k तेम दहा पवनीय रे, पनुकम्या अर्धे मुनि । बम बाध मझे कोय रे, तो चौमामो प्रायशित ॥२६३॥ - ॥ वोल उनचासवा॥ मोद रो मार्ग जाणे नहीं तिरण ने श्री भगवान् रो माला रो लाभ नहीं। मा० सू० प्रथम भाचा. . गग अ०४३०४। ॥ दोहा ॥ मोघ मार्ग जाणे नहीं, प्रथम पाचागग माधि। लाभ नहीं जिन पाए में, सूर्य पध्ययने नाहि Reem ( १२५ ) उद्देगा चोया रिपे भाथ्यो थी जिनराय । मोक्षाभिनायौ यौर ने, मार्ग विकट कहियाय ॥२६५॥ तिष संसप थौ निज सनु, लोही मांम सुकाय । ब्रह्मचर्य यमये करी माननीय कहयाय ॥२६६॥ प्रथम इन्द्रिया वण कगै पिण मोड उदय से बाल । विषयामत होया यकी न ससे बन्धन टान ॥२६॥ वनि प्रपञ्च करै घणो, एल्यो पुरुप पयाण । मोह तिमिर में यत्ततो, किम मामे जिण पाय ॥२६८॥ ॥ सून पाठ॥ दुग्णु पग मग्गा वीरागा अमियर गामीयो विनिमय मागिय म पुग्मि या यो आयाग्गिज यागि जे पुग्णाति समु. म्मय मिना बमपरमि गान पमिदन पायाप सोय गय वाले प्रसारित वाण अगाभिनन मओ। तममि अपित्रागा भो मायाण माय नम प्रो मायागंग मचे प्रथम श्रुतम्बत् गार्य अध्यपने । ॥ भावार्थ॥ मुन्दि गरने का वीर पुग्यो न मार्ग कुन ही पनि मानिय है मुनि पापा ममका गुमा पुल मर पारामारामत ये मत प्रान बार 47 पुरुष मयत है। और जापु गुरुभल मैं माया दिपर मोम में भाग भारद (R) पुषिमा व्यनगी घटने और प्रपचरहिन नहीं होते । मन ऐसे मजान पुरुष को मोहमय मन्धपार में पर्तते हुए, मगधान की माहा का राम नहीं होता है। ॥ घोल पचासवा ॥ गाह्मण ने जिमाया तमतमा कही। सा० सू० उ०प्र० १४ गाथा १२ । ॥ दोहा ॥ विप्र जिमाया तमतमा, कधो भृगु ना पुत्र । उत्तराध्ययने धवटमे, गाथा याग्मी मूव ॥२६८ वेद भस्था नहीं वाण भरण, नहीं पातम उद्दार । भोजन जिमाया तमतमा, पहोंचे नरक मझार १२७०॥ मुत माया नहीं शिव गति, ते माटे पवधार । एहम्याथम नहीं रहा हमे, लेम्या सयम भार ॥२०॥ ॥ सूत्र पाठ धया पहिया न भवति तापा, मुत्ता दिया निति तमतमगा। पायाय पुता न यति तापा, को शाम त प्रणा मन्नन राय ॥१२॥ उत्तराध्ययने २०१४॥ ॥ भावार्थ पद पन्ने से हो बाण शरण नहीं होता मोजन देने से तमलमा में जाने है और पुरादि होने से ससार समुद्र नहीं तिल, मनु महोतातजी तुम्हारे पचनों को कैम स्वीकार ।

(१२६ )
॥ मारठा
॥
इहा काई यति लगायर कहै भृगु मुत तो गृहम्य छा।
तमु यच मेम मनायर या तमातम मित्य्यात हुवे ॥२०२०
तसु उत्तर मुविचार र न्याय दृष्टि भयलोकिये।
इग्यारहवो गाथा मझार र भगवन् गणधर दम कयो।
बाल बचन विमाम र य पदै इम पाखियो ।
तो मिय्या च किम तास रे गगाधर तास सरावियो।
माचा मुत वच मान र भृगु पिग सयम लियो।
जिन मत माचो जान र निज मत खोटो शहियो ।२०५॥
कह हवै मिथ्यात र धम श्रद्धी जिमाविया ।
ने लग्न पिगा थात र पाप बन्ध भोजन दिया ॥२०॥
प्रवचरा र मझार र अन्धकार अन्धकार के
गरवादि नरक विस्तार र तमतमा न अर्थ दूम ॥२७॥
॥ बाल इकावनवा ॥
भाजिता विना विप्रा नयन्ति तम सापियत्त
मम्नग्मिन् गद्र गंग्वादिके नरकेण वाक्यालकारे ।
। सोरठा॥
तथा मृयगडापन मझार, भाद्र मुनि पिण इम कयो।
हिताय श्रुतस्कन्धे धार र पध्ययन छट्ठा ने विधे ॥२०॥

( १२७ ) सातक दोय इबार रे, विषयाशत विप्रा प्रते। बाव नरक मझार रे, भोजन लिमाया इम कयो ।२८॥ मास लोलुपो जहरे एकान्त पर्थी रहाण रा। घा ममता तेहरे पेट भराई कारणे RCon मन क्रिया न पालेहरे, हिसा धर्म प्रशंसता। थलि निषेधना ते कोरे, प्रधान दया धर्म तेइनी ॥२८॥ हौनाचारी एक पहया प्रतेने नौमावता। जावे नरक मझार रे मुरावतार निहा हो यो २८॥ ॥ सूत्र पाठ॥ मिणाय गाए तुप्रा य महाम, ज भोग शिति दुलाल पाए। स गधा लोलुग सपगाद, तिव्या मिनावी एग्गाहि मा ४४|| दयावर धम्म उगद माये, वहावह धम्म पसस माय । गापि मोय प्रया मसीन, णिणि सजाइ काहिं ॥४॥ सूत्र मांग दिन धृतः पटमध्ययने। ॥ भा॥ माई कुमार मुनिका ग्राह्मणों न पहा कि दो हजार दिनों को जिमाने स पुण्य स्न्ध उपार्जन के दरता होता है। सर माई कुमार मुनि ने उत्तर दिया कि जा दो हजार मातक धामिष्यार्थी पहा घय रिया रहित घर २ में मिक्षा मांगनगाले कुपात्र प्राणोंपोजिमाने मे महा लान पेदना पालो नरक में जाते है। क्योंकि जो प्रधान दया धर्म है उसका तानिन्गरते है और हिंसा धर्म की प्रशंसा करते १ऐसे मा को मी मोजन गने में सुरगनि को जहां हो रही पातु नरक गति प्राप्त होती है। - ( १२८ ) बोल बावनवा ॥ ॥ साधु रे सर्व थकी अठारह पाप रा त्याग छ पिण देश थकी नहीं। ॥ दोहा॥ सर्व प्रकारे त्यागिया, पाप अठारह जान । उपवाई प्रश्न इकोस साधु महा गुणखान ॥२८॥ गामागर परु नगर मे, यावत् सन्निवेश । दूक २ मनु एहवा पछे सामलजो सुविशेष ॥२४॥ प्रणारभ अपरिग्रही, धार्मिक धर्म इष्ट । यावत् धर्म नौ वृत्ति कल्प, सुशील सुब्रतो शिष्ट ॥२८५॥ पानन्दकारी मुनि तिका, सर्व प्राणातिपात । यावत् सर्व परिग्रह थको, निवत लेह सुजात ॥२६॥ क्रोध मान माया परु, नोम थको मुनि तेह । जाप मिथ्या दर्शन गल्य थो, प्रति विरत्या के तेह ॥२८॥ सब भारम्भ समारम्भ वलि, करण करावण नाण। पचन पचावन देहना, सर्वथा किया पचखान ॥२८॥ कूटप पीटप सर्जना ताडन वध पने बन्ध । परि केगें थौ निहत यया छोड दिया सर्व धन्ध २८८ सर्व यको म्हावा तया, बलि मईन पौठो नान । सैल विलेपन आदि ना, हे त्या पचताण ॥e.॥ - ( १२१) . गद म्पर्श राम रुप गन्ध, माना ने पलदार। मर्व प्रकाराडिया सावदा योग व्यापार २८॥ फार परिताप पर माणि ने, होये नेह उपाय । याचीव निवां से थी, से पपगार फहाय २८२॥ हरिया भाषा समिति युत, निन्य पधनन तन्त । तमु पागे करफे मुनि, विचर महा गुपरन्त ॥२८३॥ सूत्र पाठ मम गामागर नार बार सरिससस मगुणा भनि तहा- पारमा, िमिया, महा पाए पर वित्तिाप मरा, पुमोमा पुष्पपरिया माशायदाभो पहि रिया बापाको Eि पहिरिया, मला पाहायो मालामायादमय मनापारिस समा का बारम्भ मरम्मा दिगिया, मनास पर बगाएर Re Rमाको पद रिक्षा मा हर परमर लाएर सिमा भारा सम्मा मरण-नरम गरमदाना- तो परदेशापरा पता पर पद परियनrma हामाया त म मामा मन Pारद mint TTER - ॥ भावार्थ ॥ चे जो ग्राम आगार यावत् सनिश में मनुष्य होते हैं ताया मईया छयों ही पायों के आरम्भ रहित, सर्वथा मृपावाद रहित सर्वथा अदत्त रहित, सर्वथा मैथुन रहित सर्वथा धातु मात्र परिप्रद रहित हाते हैं, जिन्हों को धर्म हो इष्ट है यारत् धर्म की वृत्ति एयर हुए पिच ग्ते है ये सुशीठ शुद्धाचारी सुरती अच्छा फाय कर आनन्द माननेवारे मा प्रसार तोन करण तीन योग से प्राणातिपात से निवृत्त हुए यारन् परिग्रह निवृत हुए तेसे हो सई प्रकार से कोष मान माया लोम या मिथ्या दर्शन शत्य सत्त हुए, सर तरह मारम्भ समारम्भ मे निवृत्त हुए पच पचन पचारनादि मिया से निवृत्त हुए सब तरह से करत पाटन तजन तान बध बन्धन देश से निवृत्त हुए, पव सथ सरह से मान, पाटी मदन तिल्यादि यिरेपन से निवृत, शब्द स्पर्श रूप गन्य माग अकार आदि से सरत नित्त हुये और भी सायच काम योगापाधि कम से अन्य प्राणीको परिताप होय ऐसे फाय्य सेनाथ जार पायन्त सयथा निवृत्त हुप ये भणगार यानी साधू होत है,येईया ममितिग्न भाषा समितियन्त यार जिन प्रणात निग्य प्रमान को भाग पर उन अनुगामा वन पिचरत है। ॥ माधु रा भड उपकरण परिग्रह में नहीं क्या मूर्या गसे ता परिग्रह लागे इम क्यो दशकालिक १०६ गाया २१ वीं। ॥दोहा॥ वम्व पात्र में कम्बल, पाय पश्या पाटि । मयम नन्ना पर्य मुनि, धारे तन पममाधि ॥२६४॥ बोल बावनवा ॥ 1 सा० सू० परिग्रह माहि नहीं भयो जात पुव महावोर । थिो परियह कयो महा ऋपि गुण धौर ॥२६॥ गवैकालिक देखन्नो छट्ठा अध्ययन मझार। इफावोसमी गाथा मझे, भाम्यो यो नगतार ॥२८६॥ ॥ सूत्र पाठ॥ बपि पत्य व पाय घा, कान पाय पुदण। त पि सबम लहा, धारति परि हरति य ॥२०॥ न सो परिग्गहो दुटो, नाय पुत्तर ताइणा । मुग्धा परिग्गहो दुचो इन पुत्त महिमिणा ॥२१॥ दरायफारिक म०६ गा० २१॥ ॥ भावार्थ जो पात्र या पात्र म्यल पायपूटना आदि सयम् पन्नाथ रले सो परिग्रह में नहीं धी सातपुत्र महापार स्यामा ने कहा है यदि उन पैच्छित मार सारे तो परिग्रह में है ऐसा महर्षियों ने पहा है। ॥ बोल तिरेपनवा ॥ साधु रे नव कोटी पच्चम्वाण क्या। सा० सू० दशकालिक अ०४। ॥ दोहा॥ विविध २ नव कोटि से, माधु रे पचवाय । दशकालिक में कयो, चतुर्थ अध्ययने नाण PROM

.
पड़ जौय निकाये प्रते, हणे इणावे नाहि ।
पनुमोदे न हमारा प्रति मन यच काया ताEि२६८
॥ सूत्र पाठ॥
यहि हपा जी निकायाण नेर सयदड समारम्भेजा नाहि
दएई ममारम्भेजा, दय' समार मते मि अत्रेन समणु नाणेमा मात्र
lam तिनिहगार मणेगा पाया कायणं न रेमि 7 पारसमि की
An प्रयन मणु आगामि ।
पराकालिक अध्ययन ।।
॥ भावार्थ॥
इन पद् जीय निकाय मारम्भ कर नहीं अन्य प्रारम्भ
परमही और कान पाको भया जान म मन यथन कापा से
पापाय पर्यन येमाबानां अन्य समाये नहीं करता भव्या
जानकी महादसाबाट पम्मान है।
॥ बोल चौपनवा॥
माचारजनी थाना गिना माहार करे करता ने
भता जागे नो प्रायश्चित करना। सा० स० निशीथ
३० ट्यात २२वा।
॥ दोहा ॥
पचायनी पामा बिमा पापिन दोधा पारा
धे
माधु श्री भोग, प्रास्ति तमुधार

इम को सूब निग्रोध में, चौधे उद्देशे मझार । गुरु पाता विन भोगव्या, पाम्यो दण्ड धदार १३.॥ ॥ सूत्र पाठ॥ अभिनयू पापरिय पदित थाहार माहारतवा साइनइ । निरय उईशा ४ योल २२ यो। भावार्थ ॥ साथ भाचार्य के बिना दिये धारों प्रकार का माहार परेकाते पो मला जाने तो प्राधिता ॥ बोल पचपनवां ।। पुण्य पाप से जीवने पचतो दीठो कह्यो । सा० सु० उचराध्ययन अ० १० गाथा १५ वीं। ॥ दोहा॥ पुन्य पाप से बीव में, पचतो देख्यो सोय । दशम उत्तराध्ययन में, पनरमी गाघा बोय ॥३०॥ भव ससार ससरद, शुभाशुभ कर्म प्रभाव । प्रमाद वहोल पणे करड, न नाणे तिग्णगे दाय ३०२॥ ॥ सूत्र पाठ॥ मय मा ससार, ससरह हा मुहहि कम्महि । औदो पमाय बहलो, समय गोयम मा पमा ॥ उत्तराध्ययन ( १३४ ) ॥ भावार्थ ऐसे मर ससार में प्रमादो जीर शुभाशुम कम पर परिभ्रमण करता है। इसलिये है गौतम समय मात्र भी प्रमाद मत फर। ॥ वोल छप्पनवा ॥ पुन्य पाप ने सपावणा कह्या। सा० सू० उत्त- अ० २१ वे गाथा० २४ वीं। ॥ दोहा ॥ पुन्य पाप बेह भणी, खपाषण सुविशाल । उत्तराध्ययने इकबोसम, चौबौसमी गाथा न्हाल ॥३०३॥ विविध खपाया शीघ्र ते, पुन्य पाप असराल । अपुनरागम गति लही, भवाब्धि तरयो समुद्रपाल ॥३.४॥ ॥ सूत्र पाठ॥ दुमिह खार जय पुण्णा पाव निरगणे सो विषमुके। तरिता समुह य महामवोध, समुद्द पाले अपुणागम गा तिमि ।। उ० अध्य० २१ गाः २४ थीं। । भावार्थ ॥ पुन्य पाप दोनों का क्षय पर शेरेसो अस्था को प्राप्त हो महा ममारिफ भय समुद्र है उसे तैर कर पुन पापिस न माना पदे ऐसी जो सिद्ध गति है सो समुद्रपाल मुनि प्राप्त हुये।

॥ बोल सतावनवां ॥ उसन्ना पामत्या अर्थात् ढीला शिथिलाचारी ने वन्दना करे प्रशसा करे क्रावे करता ने भलो जाणे तो प्रायचित क्ह्यो। सा० सू० निशीथ उद्देश १३ बाल ४२१३ २४-४५ ॥ ॥दोहा॥ ने मुनि पामत्या प्रते, वन्दना करै कराय । करतान भन्नो वापिया चौमासी प्राययित पाय ॥३.५॥ दोपो मूल उत्तर गुणे ते उसना फवाय । तहने पिण वाया थका, इमहिन दण्ड सुपाय ॥३०६॥ वलि पासत्या उसन्ना तपो, करै प्रशसा कोय । प्रायशित चौमामी तस निशोध तेरहवें जोय ॥३०॥ ॥ सूत्र पाठ॥ भिक्खू पामत्य २१ पात वा साद ॥१२॥ मिक्स् पालय पममति पमस त पा साइज ॥३॥ ज भिक्य उसयां बदर यदत्त वा साइग्बइ heen व भिम उम पम पम पा साइज ॥४॥ निशाप उ०१३॥ - भावार्थ जो भिक्षु पासत्या भयाद शिपियवा से पन्दे पदावे अनुमेरे वो प्राधित जो मिल शिधिगवारा काशसा करें कराये अनु मादे तो प्रायश्चित ॥४३॥ जो मिक्षु उसन्ना यानी म्ल उत्तर गुणों में दोष लगाने वाले को पदे चन्दारे अनुमादे तो प्रायधित nean जो मिथु उसना की प्रशंसा पर करावे अनुमोदे तो प्रायश्चित । - ॥ बोल अठावनवा ॥ जो माधु ग्रहस्थ की ओषधि करे करावे करता प्रते अनुमोदे तो प्रायश्चित । सा० सू० निशीथ उ० १२ वें बोल १७ वू । ॥दोहा॥ गृहस्थ नौ पौषध करै, जो माधु मुनिराय । निशोध उद्देशे वारहवे, दड को जिनगय ॥३०॥ ॥ सूत्र पाठ॥ अभिवम् गिहि तिगिच्छ करइ कर ते वा साइभइ ॥१७॥ भावार्थ जो साधु प्रहस्थ को औरधि पर परारे परते पो अनुमोदे शो प्राधित। ॥ वोल उणसठवा ।। सामायक दो कही १ भागार सामायक २ प्रणागार मामायक। सा० सू० ठाणाग ठाणे २

।। दोहा॥
सामायक दो विध को, भागार पने प्रणागार ।
स्थानाग ठाणे दूसरे, तीला उद्देशा मभार ॥३०॥
भागार सामायक ग्रहस्थ रे करें पागार सहित ।
पणागार पपगार रे, ते भागार रहित ॥३१॥
॥सूत्र पाठ॥
दुविह सामाइए पपणन तबहा -भागार सामाइए चव अणा-
गार सामाइ चा ।
स्थानांगे द्वितीय स्थाने।
।। भावार्थ।।
दो प्रकार की सामायिक कहा तयथा--आगार सामायिक अयान्
प्रदाय धावर के मुहचादिर का मयाद सहित सामायिष। दूसरा
अणागार सामायिक यानी साधु के जो महान रूप यायनावन पर्यन्न
सा भागार रहित।
वोल साठवा ॥
॥
चारित्र दोय कहा-१ भागार चारित्र २ श्रणा
गार चारित्र । सा० सू० म्यानाग ठाणे २०१।
।। दोहा ॥
धारित धर्म हिविध कधी, पागार पणागार जाण ।
स्थानाग ठाणे दूसरे. पहले उद्देशे पिशाण ॥३११॥

(१३८ ) ॥सून पाठ॥ परित धम्मे दुहे पपणते त जहा ~~भागार परिच पम्मे पा पगार परित धमो च।। ५० स्थानाङ्ग द्वितीय स्थाने। ॥ भागार्य ॥ গালি গম পা ম ম বা মাংবাগি নী গ मगतान प्रत भादरे अणागार मारित्र धर्म सोपा प्रम का मायागकर महारत भादरे । ॥ बोल इकसठयां ॥ घम दाय काया-शुन धर्म १, चारित्र धर्म मा० मूठागाहटी०२ उ०। ॥ दोहा ॥ दीय धम मिन पापिया, शुत पारिव उदार । थत से पागम विन कथित, पारिव ते व्रत धार ॥१२॥ म्यानाग म्यान टूमा, प्रथमा उहंगे ममार। पाने पचाममा ने विष, कधी धर्म पिनार ॥२१॥ "मूत्र पाठ॥ 1" 4.1. गुभधम्म सरितधामना) टागटा.३ "मावाय॥ PrRaut का ध्या- प्रतपाल, जतिपनमा ॥ बोल वासठवा ।। कर्म सपायरो करणी दोय कही सयम, और तप। सा०सू० उत्तराध्ययन म०२८ वेगाथा ३६ वीं। ॥ दोहा ॥ करणौ कर्म खपायवा, दोय कही जिनराय । उत्तराध्ययन पठवीसमें छत्तीमयों गाया साय ॥१४॥ पूर्व सचित कर्म ते, तम सयम यो युपाय। हौन करण सब दु ख ती, महामपि कापी कराया । सूत्र पाठ। aur पुल पम्मा. सबमेय तपाय। सन दुम पहीपा, पदमति महसियो तिमि ॥३६॥ उत्तराध्यपन २८यो। ।। भावार्थ ॥ শৰ সৰাধম ম গীরা গঙ্গা প্রথম গ্রিস নদী নী क्षयर और कमरा सरयु का संघ दुखों से रहिताय मशर करणोपरा । बोल तिरेसठवा। मार्ग दोय कस्सा-भगवान रोप्ररूप्यो मार्ग और पावडिया रोप्राप्यो मार्ग २१ सा० सू० उ० प्र०३३ वेंगा०६३ वीं।

(१४० )
॥दोहा॥
दोय मार्ग है जगत में, इफ पाखंडी कवाय ।
क्षितीय मार्ग है जिन कथित, ते परमसुखदाय ॥३१॥
उत्तगध्ययन तेयोसये, योगी श्रमण पूस्त ।
तय गोयम इह विधि कयो, ते सुणिज्यो धरि खस ॥३१६॥
कुप्रयचन पाखडो ना, सर्व उन्मार्ग गछत ।
मन्मार्ग जनिन कधो उत्तम मार्ग से संत ॥३१० ॥
॥ सूत्र पाठ ॥
कु पञयण पासयडी सब उम्मग्ग पहिया ।
सम्मग तु जिणायसाय समाग हि उत्तम ॥३॥
भागर्थ।
कुपवरन है मो पाडियों काहा हुआ माग है उसमें जाने
पाले सर्व पुमार्ग जारी है और जो जिनध्य का फहा हुआ है सो
समार्ग है सोही उत्तम अर्थात् धेट है।
॥ बोल चौसठवा
सवर गुण अने प्रास्त्रव गुण जुदा २ काया ।
सा० सू०प्र० आचाराह अ०४ उ०२।
॥ दोहा॥
संयर गुण न्यारो कयो पासव गुण क यो न्यार ।
प्रथम पाधाराग चतुर्थ थे, युधित करो विधार ॥३१॥

नेह पासव हार छ, से रोक्या सयर याय । खोल्या पास होत है, हम गुणा अलग कहाय ३१८॥ फर्म धना हेतु ते प्रवत्या भासव होय । तमु त्याग किया मवर वे, इम जुदा २ गुण जोय ५३२०॥ पासप नू पणासव हुवे, पथासव न पासव । प्रथमें बिग २ भाव में, पृयक २ गुण सर्व ॥३२१॥ ॥ सून पाठ ॥ भासात परिसन्या, जे परिसरान पासा, ज प्रणामना ते परिमनाये परिमन्ना तमणामना । . 4. प्राचारा.3०२) भावार्थ शोषमे बाधने में हेतु है घेर्म क्षपान के पा सकन के हेतु हो सकते है. जाफम क्षाने के यारोपन व हेतु है पप यांधने के हेतु हो आते है, सपा जिनन कर्म बांधने के हेतु है ये परन के हेतु हो जात है मौर जितने कसे राक्न के हतु है प शाधन हेतु हो जात है अर्थात जिन कारणों सेगम बघत है यारद्वार और उन्हीं का स्वाग करने से पहा संपर हो जात-जैस मित्स्यायना मिरण्यात आy ৪, ধিনা না ঘামাবিথ আধা, গ মিলেৰী त्या पासम अदना सम्पत्य सवा द्वार सासद हिन्साका स्याग कर सो महिसासर द्वार है, तात्पर्य कम माने के जोवार सो खुल्ले बार है उनको वध करे सो सर है, इस प्रकार भामर और संबर का गुण मलग है।

॥ बोल पैसठवा ॥ करणा न्यार कही-इह लोक र हित १, पर- नाक र हित २ कानि वगण शब्द व पूजा श्लाघा रे हित ३ निरजग र हित । इगा न्यार प्रकार में से एकान्त कम निजग र हित तप करणो कयो। सा० म० दशवकालिक अ० ० उ० ४। ॥ दोहा॥ करणा च्यार प्रकार ना कही दशकालिक माहि। नवमा अध्ययन म विष चौध उद्देश ताहि ॥३२२॥ इह नाक पथ तप नहि कर वलि नहा परलोक ने हेत। वगा वाधा शब्दादि निमित न कर तप समेत ॥३२॥ एकान्त निजग काग्गा तप करगी कयो सोय । ममाधि हव चौथ पर तमु गुण शौशे जोय ॥३२४॥ नित्य विविध गुण होत हैं पास रहित तप पामत। निरजग पथा पाप तय कर तप ममाधि सदा सयुक्त। ॥ मत्रपाठ॥ नुन 44 मार न ह! –नो इह लोगठ्या 411 महिहिना नोकिति वरण पर 4M स्या 4-मा निजाया तब महि हिना च14 त्यामनागा विविड गुण तोरण्य निग, ना मार निरासा निहिल, तर साघुबर पुराण का उसोसमा तर समाहित दशकारिफ म. १०४॥ ॥ भावार्थ। चार प्रसार ER समाधि कहा-स स्टोक के सुखों के लिये रूप नहीं करे,पालमुषों के लिये तय नहीं करे, पौर्तिपणे शाद लाया के लिये रुपन पर एकान्त निरजरा का भी हो सप करे, धतुर्य पद जो निरजरायों रोष सप बरे जिममा गुण श्लोक में पहा सोमाले -- ममाधि में सदा युक्त सांसारिप भाशा रहित निजका अर्थी, पूर्व हा पापों का नाश पाता है। ॥ वोल छासठवा ॥ प्रज्ञा दोय कही ज्ञान प्रज्ञा १, पचावाण प्रज्ञा २, ज्ञान प्रज्ञा करी जाणे और पचखाण प्रज्ञा करी पचखाण करे। सा० सू० भाचारह प्र० श्रु०१०१॥ ॥दोहा॥ दीय प्रकार वर्णयों प्रजा ने बुद्धि मान । लाणे जान प्रज्ञा करी, प्रत्याख्यान पचवान ॥३२६॥ धुर पापारागे कायो, धुर पध्ययन मझार | शिविध प्रना इधकार नू, बुद्धिवत करे विचार ॥३२॥ ममत्री क्रिया भेद प्रत, हिविध प्रज्ञा यो जेह। समझ कर्मकारण भयो, दूर रहे मुनि गुण जेहा३२८॥ .

॥ सूत्र पाठ॥
जस्स ते लोग सि कम्म समारम्भा परिपणया भवति, सेहु मुणी
त्तिवमि ।
प्राचारंगभ.१०।।
॥
भावार्थ
॥
समस्त पस्तुमों के जानने वाले भगवान संघलमान से साक्षात
देखके उपरोक्त जो प्रियाओंके भेद बताये तथा दो प्रकार की प्रज्ञा बताई
उन्हें अच्छी तरह समझ के फों के कारणों से दूर रहै सो मुनि कहलाते
धम २,
॥ बोल सडसठवा ॥
धर्म दोय' कह्या-आगार धर्म १, अणागार
सा० सू० उवाई समवशरण इधकार में।
॥दोहा॥
धर्म दोय प्रकार नूं, कयो उववाई माहि ।
भागार ने पगार री ते व्रत में धर्म कहाहि ॥२६॥
तर्य प्रकारे मुण्ड हो,, भागार ते अणगार ।
या पानीकार करि, अणागार धर्म धार ॥३३ ॥
हिन्मा सर्व प्रकार से मृषा सर्व प्रकार ।
चोरी मैथुन परिग्रह, सर्व प्रकार निधार ॥३३१॥
सर्व प्रकारे त्यागियो, रात्रि भोजन नेह ।
पहो पायुष्यमान ते, पणागार मामाद कहे ॥३३२॥

ये धर्म मोध्या मठिया, निर्गन्ध नियनो वान। से भागधक धिन पाप ना, म भाच्यो भगवान ॥३३३३ पागार धर्म द्वादन विध, पास्यो श्री विनराय। पञ्च पावत सोन गुण, ध्यार सिवा व्रत माय १३३४॥ हिमा झूठ पदात फुन, मेधुन परिप मान । म्यून पको त्यागन किया, ले पच अणुव्रत मान ॥३३५॥ दिगि उपभोग परिभोग नी, कीधी में मयांद। दिगम्या पन दड से, यह तीन गुण द्रत लाध ॥३३६ ॥ सामाई देशावगामियं पोपा पतिपि स विभाग। व्रत ए हैं, मर्य द्वादश ब्रत साग ३३१ पपथिम मा मलेच झमए कान्त । पागार मामाई धर्म ये, हो पायुषामन्त ३३८॥ हि धर्म में जठिया, मोख्यो या व्रत धर्म। বিধ খাদ্ধ পান্ধিা, ম খা খা অম १३३८॥ पवित नितिया, ते या धर्म। धर्म नागार में, या जिन मामन मर्म १३४॥ ॥ रुम पाट॥ भRTHI m mrrya.. र मरहम मा NEFrferome Rera IITErrup गगे सुमार, ला दाद मागे मायाम मेरममा, समायो परिग्गाहाम्रो परमण, सबानो राई भोषणा को वरमया, मयमाउसो प्रणगार सामाइप धम्म पणते, यमरस धम्मसा सिला द्विर मिर्णय गिगयिरा विहरमाणे माया मारा भाति । भागार धर्म वापस रिह पाइसाइ त जहा-पचमगुण- या तिपि गुग्यता पत्तारि सिसा क्याइ, पयमयुमपाइ त बहा- गानो पाया पायानो वेरमया मानो मुमातायायो परमा, पात्रो अदिता दायामो वैरमण, सदारा सतोस इण्यापरिमाय भूलाभो पस्ि ग्रामो रमण, तियिा गुपययाइ त जहा-दिसियय, उपभोग परिमोगपरिमाया, प्रणय वरमयो पत्तारि लिया क्या त जहा--- सामाश्य दमानगासिय पोसहोरवासे, अतिहि स विमागो, अपश्चिम मरांतिया सोरणा असणाराहया। अयमाउसो पगार सामाइ" पम्मे पयसे, एयग पम्मरस सिगास उहि समयमामा समयो- पामिया विहरमाण माया पाराह भवति । ॥ भावार्थ ॥ धम दो प्रकार महा मो यादले है-गागारिक धर्म तो गुलाम में रहना हुमा धम पार मणागारिक धर्म गृहाणामस्सगकर साधु धर्म पाले मो निधय र मर्यया प्रकार मुण्ड हाव भागार सपना गार माया प्रकार प्रामातिगत से निकृत, मण्यार गुरव सेमिन, सया प्रहार घी से नियने साया प्रकार जो संग स मन माया यर परिश से मिले सर्षया प्रकार व मेनस निरमायुष्यमान पर अगणार सामा पर्मण्या, पहो धर्म मोसो पम में से साय तथा मापा रोल पंचम समपाले एए विगत !! भागार - बाद महाराहा सो कहते है -पच माधत तीन गुप प्रत प्यार सिमा प्राय प्रकार द्वादश प्रत प धर्म पहा सो पहते है-स्पर से प्राणातिशत से निवृत्ते । स्यूरसे मुराद से निवृत्त २, स्थूल से चोरी कर्म से निय ३, व खो से दो सतोष भयोत पर सी के त्याग, स्पूर से परिप्रद से निवृते ५, (उपरोछ पच मयत क) सीन गुण प्रा रस -दिशि मयार भयात् दयों दिशा में मयाद उसात जाने का स्था उपभग परिभोग का माद , यन दर परिहार (प्यार ত্তি বা র লাল ষে সা} ম্যাথ বন্ধে যুদ্ধ সমাজ सापच जोगों के स्वाग! देशायकासी पाल की मर्याद करके रडा ममा साप ोगों को स्थाणे १०, पोपट उपवास १६, मनियस যিমাণ খা যায় না, শিখা ধা সিখুল থাই খায় কান २१५स प्रकारमाधम पासता हुमा मन्तेि सलेपना सधारा दिक स्तों में कोई दोष लगा हो उसका मायधित लेने मारामक हाना पेमा प्रमयो धर्म भावक धारिरीने साधासो धर्म में 2 ६, साधम में विचरते हुए शिन पाशा का माधक होते हैं। सोरठा पञ्च महावत रूप रे, मुनि न धर्म इहां फयो। भादग ब्रत सरूप रे, शावक धर्म ग्रिन पापियो १३४१॥ कई क पारमू व्रत रे, पतिथि ते पायां प्रते। देव सचित पवित रे, ते पिण श्रावक धर्म है ॥३४२ एम मूत्र विपरोत रे, पर्य कर निज मन थकी। तसु उत्तर सुयदोस गे, बुद्धिवन्त हिये विचारिये ॥३४॥ पन घट्या व्रत होय रे, तो अबत में देवता।

. . - (१४८ बत्ति धर्म किम जोय रे, पत्रत सेवाया थका ३४४॥ ठाम २ सिद्धान्त रे, बारम व्रत थावक वर्ण । समय नियन्य में सरारे, दान देवउदै प्रकार ने ४५ प्रासूक दोष हिरा रे, मुनो प्रते प्रतिनाभयो। विधर के इण रोरा रे, रो बाग्म व्रत सूर्ये करो ॥३४६॥ पनि देवगुम धर्म कामरे, हिन्मा कर पटकाय नों। धर्ममको जिनगमरे, भागार धर्म विप हा॥३४७ वोल अड़सठना॥ प्यान च्यार काया-पान ध्यान, रोट ध्यान, धर्म ध्यान, शुक्र ध्यान । मा० सूत्र उपाई ममत्र गुग्ण इधकार में। ॥ दोहा॥ ध्या ध्यान दिन कधा, पात मेरो ध्यान। धर्म ध्यान तामगे, चौथो गया ध्यान ॥३८॥ ममगार TET में, सप वन माहि। पानं गैट ना ध्यावी, मुत्र उभाई नाहि ॥३४८ ॥ मूत्र पाठ॥ *dि- rai-1-प्रमा - . ॥ भावार्थ। ध्यान कितने ! ध्यान व्या प्रकार के प्रकऐ मान्यानो ध्यान २. पर ध्यान गुमान | । घोल उणसत्तरवा ॥ साधु असयती ने उभा रहे, बैंठ, सो, भाव, जात्र, काम कर, इम न कहे। मा० स० दशका- लिक अ.७ गा.४७ धीं। ॥दोहा॥ पसयतो ने नहि कई, छमी रह वा वैस । सयन पाव परु नाय न, कार्य कर दूम न कहेस ॥३५॥ सावदाकारी धन इम, न कई प्रज्ञावन्त । घोर बोर ले सयसी, दम माख्यो भगवन्त ॥३५१॥ दशकालिक पाखियो, सप्तम् अध्ययन ममार गाथा संतानोसमी बुद्धिवन्त फरा विचार ॥३५२२ ॥ सूत्र पाठ तहमा सरर पौरा, माह पर हिता। सप चिट याहिति, न भासन परम ॥४॥ दरारालिक ..। ॥ भावार्थ ॥ से हासा असपना को पेटो ऊग भागे जायो भमुक माet परो ऐमा साबय मापा प्रशारम बद। M है ॥दोहा॥ . . ए गुणोत्तर बोल दम,पाध्या धागम माय । लोकाजो सग्रह किया, सिण सू लोका हुण्डी काय ३३५३॥ प्रगटे पञ्चम् परं में, भिक्षु महा गुण धार । श्रो जिन पाना गिर धरी, प्रगट कियो उजियार ॥३५४३ यथा तथ्य पोलग्वापियो, यह प्रभु तेरापन्य । पाने महाव्रत पञ्च समिति, तीन गुप्त निर्यन्य १३५५५ हिमा धर्म उयापियो, दयामयी धर्म दिमाय । कापी करवी एकसी, पागम न्याय यताय ॥३५६॥ यो जिन धर्म पनादि गे, हुपा पनन्त परिहन्त । सलिम माघ्यो तिम कधो, निगक सू मितु सन्त ॥३५॥ सम् पट भारोमानजी, तो पाट पिराय। वयगणि चौथे पाट वर, पडित प्रसिद्ध काय ॥३५॥ माया मम मघवा गयो, पचम् पट प्रबलोय । पाट छठे माया भन्ना, मतम् डान गपोवर बोय ॥३५॥ वत्तमान गामन धणे पष्टम पाटनान । मुपा दाता मुरता मर्मा, कालगायो गुपवान ॥३६॥ दिन द्विजान नो, पात्रि गुप इधशाय । दिन • मुग मम्पति वटै, मगुरु त मुपमाय ॥३५१५ - মি দান ५३६४ दिन २ कादि सम्पन, वीर्य लधि प्रगटाय । दिन र सहि पटै सिहि मैडो धाय ॥३६२॥ समकित व्रत सुध पालिया, सोझे वाञ्छित कान । दुख दोहग दूरा टले, पामे पविचल राज ॥३६शा- নয়ায় कृत, पन्य माहि पधिकाय । थारु न्याय यताविया, मगट पणे सुखदाय १३६४ संसु पनुसारे मैं इता, दोहा सोरठा माधि। न्याय कधो किञ्चित पणें, देख र करि ताEिEN सूव पाठ ले जिम कथा, ते तिम लिखा इर्ष स्थान पोशषक पाया हुबे, सोमिछामि टुझड जाना३६६ पघर लघु दोर्धादि नू, नहि मुज ज्ञान विशेष । लघु बुद्धि माफक रची, सोरठ दोहा कहेस ॥३६॥ तिण सू पण्डित बन निशे, वाचि न करस्यो हास्य । गुण यादो गुणवन्त , सदा पळू में दास ३६८ श्रमणोपायक यमण नू, यो जिन मत में सोर। समकिस धर्म साधर्मो फुन, श्रावक , लधु वीर ॥३६८१ श्रो श्री काल गयमति, प्रसपो मेम विनन्द । तसपनुयह दिन दूधक, गुलाववन्द पानन्द ॥३०॥ गत उन्नोस तियांसिये, विक्रम सम्बत् ११ । बोड़ रचौ हुण्डी सपो, बयपुर नगर विपेड ॥३०॥ ,

॥ कला॥
(बाल गीत छन्द)
गुण रयन घयन जिनेश फेरा, अति भलेरा
जानिये। में कहा, जे जिम सत्य तथ्य, सुमध्य पश्य
पानिये । धरि मामता प्रतीति रोति, विनीत केरी
भानिये। सुगुरु धाया सर्व साचा अधिक भाया
मानिये
1१1 तज कपट लपट मिथ्यात नों, निज
माथिदी सुध ल्याविये । अनत घटायी त घढावी,
मातम भाव धारिये । सुप सम्पदा निज घर घणी,
गुणत ना गुण गाविये। कहे गुनानचन्द मानन्द
भति ही, मुगुरु सेया पाविये ॥ २ ॥

पी
महाराज श्री श्री १०८ धामीषणजी re.
अथ जिन अाज्ञा को चौढालियो
RTE दोहा EDITORIA
फेई पाडण्डी नेन ग, साधु नाम धाय । ते पाप
कई जिन पाज्ञामझे, कडा कुहत लगाय १॥ पाहार
पाली साधु भोगवे, से प्रोजिन पाता महित । तिष में
प्रमाद ने पद्रत कई, स्यारी श्रद्धा घपो विपरीत ।
पति वस्य पाव फामनी इत्यादिक उपधि पक।
जिन पासा स्य भोगवे, सिमे पाप कई ने दिना
a ta যা লিল ধর্ম পা পিঠা, মিন পান্না
মিত্ব দ্বন্দী লাঞ্চ। সি এফ বাসা বা, যার
का जिन पामकई नदी र तिल
माधु न, पान्नागिन पापा पा प्रत्यक्ष मिा देउल्यों
राधा तो पिए पाय ॥ ५॥ इत्यादिव ने योग
मझे पानादेशिनराय: बठे fr
मारे बोररी,
तठे पाप मागे पाय म कोपिन पाया
मझे. यामे पाप एनाविरोणाल बिन गया
सरन्यो मतिशत
.

॥ ढाल १लो॥ - (मरियण सेरे माघ मयाणा-एदेशी) जे जे कारज जिन आजा सहित है, से उपयोग सहित करै कोय । ते कारज करता घात होवै निवागे तिणरो साधुन पाप न होय रे ॥ भनियग्ण जिन भागन्या मुखकारी ॥१॥ जौवा तणी घात हुई साधु यो, त्यागे साधु मे पाप न लागै। बिन पागन्या मिष लोपो न कहिजे, वले साधु गे व्रत न भागै रे ॥२॥ पा इचरज वालो वात उघाडी, काचा हिये कम समाये । ज्या जिन भाजा पोलखी नही पूरी, ने बिन भासा मे पाप यताय ॥३॥ नदी उतरै अघ शर माधु ने पाजा दे थोजिन पाप। जो नदी उतरता पाम हो तो पाजा दे त्याने पिण पाप रे ॥४॥ छद्मास्य माधु नदी उत्तर नय, त्याने केवलो आज्ञा दे सोय । पोस पिग फेवनी नटी उत्तरै छै, पाप हुसौ तो दोया ने होय रे ॥ ५ ॥ ने नदो उतरे है केवल जानौ, त्याने पाप न लागै लिगा। तो छाम्य ने पाप किण विध मागे, पा दोया रो एक पाचार ॥ ६ ॥ छद्मम्य कवली नदी उतर जय दोया स्य होवे जौधागे घात। जो जीव मुपा त्यागे पाप लागे तो, दोया ने लागे में

प्राणातिपात 10 केबल जानी नदी उत्तरे त्याने
पाप न लागै कोय । तो छाम्य माधु नदौ उतरे अध
त्याने पिण पाप नाय रे॥८॥ कोई कहे मेवानी ने
तो माप न लागै, नदी उतरता नोग रहे शह।
पिण छाम्प ने पाम लागै नदी रो पा प्रत्यन बात
विभER लिण विध कैवलौ नदी उतरै जिम
प्रस्थ को उत नाही। तो खामी छ तिबरे या
समति में पिण खामो नहो कर्तव्य माहि..॥
ने खामी पड़े से पजाण पणो के, दरिया बहि पडि-
कमको याम । पले पधिको ग्वामी बाण इयर्या ममिति
म, तो प्रायसित ले उतारै माप रे ११॥ माधु
छनस्थ नदी उतरे से शर्तव्य मावज म जाणो कोय।
को साधन हो तो सजम भागे, विराधक गै पास
होय रे ॥१०॥ भाग नदी उसाता पनन्त साधा ने,
अमनो के केवल जान । त्या नदी माहि पाउपो पूगे
करीने, पहोता पञ्चमी गति प्रधान 30 कोड
कई माधु नही उतर त्यारे इससे हिन्मा है
पागार । ति रो पाप मागे पिच ब्रत न मार्ग,
क से मृट गिधा ४ ची साधु हिन्मा गे
पागा होये तो नदी उताता मोक्ष न मारे। हिमा
रो भागार ने माप नागै धव, घबटमी गुण्ठायो न
इम

पाव रे ॥ १५ ॥ कोई कहै नदी उतरै जब साधु ने नागै धमन्य हिन्मा परिहार । तिणरो प्रायथित लिया पिन शुद्ध नहीं है। दम कहै तिवरे हिय छै पन्धारी ॥ १६ ॥ जो नदी उतग्या रोप्रायथित विन लोधी, साधु शुद्ध नहीं थावै। तो नदी माहि साधु मरै ते अशुद्ध हैं, ते मोक्ष माहि क्यु का नायै रे ॥ १७ ॥ साधु नदी उसग्या माहे दोष हुबै तो जिन भागन्या दे नाही। जिन भागन्या देतिहा पाप नहीं है थे मोच देखो मन माहि रे ॥ १८॥ नदी उत्तरे त्याने ध्यान किसो छै, किसी लेण्या किसा परिणाम । बोग किसा अध्यवसाय किसा है, भला भुण्डा पिठायो ताम रे ॥ १८ ॥ ए पाच मला है तो जिन पाना है, माठा में जिन भाना न कोय। पाचूं माठा स्यूं त पाप लागै छ, पाचूं मना स्यूं पाप न होय रे ॥ २० ॥ छनम्य ने फेवली नदी उतरै जम, लारै छाम्य कवली पागे। छमस्थ उतरे के काली पाता म्यु, त्याने पाप किमै लेखे नागे रे ॥ २१॥ जिन शासण घ्यार तोर्थ माहि, जिन भागन्या के मोटी। कोई जिन पागन्या माहि पाप बताये सिथ के खोटी रे!u दवगे दाधी भाय पडे अन्न माति, पिप बस्न मांहि लागी माय। तो किसी .

ठोड वो करै ठढाई, किसी ठोड साता शे ताय रे
॥ २३ ॥ ज्यु जिए पाना माहि पाम होवे तो किण गै
पाज्ञा माहे धर्मों। किण री भाजा पाल्या शुद्धति
जाये । किणी पाजास्य कट कर्मो रे ॥ २४ ॥ छाटा
पाचे छै तिष माहि साधु मात गे परठे दिसा नाय ।
तिले पिए जिनौ रौ पाजा, तियमे कुष्प पाम
पता रे ॥ २५ ॥ माधु गते लघु वडी नीत दोनू ही,
पाठप बावे अशाहिद घले सिध्याय फरै गते धानक
धार, भावै पारे पशया माहिर ॥ २६ ॥ इत्यादिक
साधु गते काम पडे जय, पाया पावै ने ना तिणने
মিষ ঈ লিবলী আয়, মির্ন স্কু যা শনাই ।
॥ २७॥ रासे पशया पपकाय पडे के निणरी धात
साधु यी पाय। पो पिण न्याय नदी निम बायो।
लिए पाप किसी विध थाय रे ॥२८॥ नदी माडि
बहती साधी ने साधु गदै हाथ सभावै । ति माहि
मिण निनजी री पाना तिषमे कुण पाप बताये रे
IPL इयां समिति धालता साधु स्यं , कदा लौर
सणी होवे धात । वे जीव सुधा गे पाप साधु में, लागे
नहीं पशमात रे । ३. मी या समिति विना साधु
धाले, कदा नोव मरे नवि कोय । ती पण साधु ने
हिन्सा बज काय रौ लागे । कर्म तपी धध होयरे
-

॥ जब कोई पाप था । ॥ नाव मा निष्ठा पाप न लागा न मुभा शिका नागी पापा । जिगा आना मभाली निगा माता जोवी निगा पाना म पापम थापा र ॥ ३० ॥ कह डम्या मालया चाल्या बिन माध ने किम यहि गव । नगन्नगा चान्नगाग का नहीं जिन माता चालवा विन ता बहगवगा ना 1 1 3३ ॥ वठी हाये तो उठ वडगाव उभा हाव ता 18 बहग। बैठन उठण गै नर जिन पाना ता वाग्मी व्रत फेम निपजावी भाजन पाना बार पाप हावतो हालण माधा न वहगया रो धर्म ते चावड फार इमडा वरचा ल्याब र १३11 कोई कह चान्नगागाजिन पाता नाडा ताहो चाल बहराया जिगा अागन्या बिन चाल्या तिण ने, लागी दुगा विध कुहत नगाये जन पासा बाग। हिवे बिन पागन्या माहिम यहगा ग य जान हिया माहे धागे ॥ मन वचन काया ग जोग तोन हो सापद्य 'नवा जागा। निवदा जागा ग याजिन आना, तिथी काना पिकागा र ॥ जाग नाम व्यापार तयों के तमन्ना न भगडा व्यापार । भम्ना जागा गै जिन पाता माठा जाग जिन प्रागन्या बार ॥३६॥ मन पाप कमर । 3 माह + वन काया मला बतायो, एइम्ध ने कई जिनगयो । काया भपी किए विध प्रववि तिष गे विध को चित्त माया ४॥ निषा कर्तव्य री श्री অন খাদ্য সি নব ন জাযা শীত কাল। বিশ্ব নী ই মা ক্লিন আরা, মিথ আনন্ম ন ফা गोधाप रे ४१॥ माधा ने पाहार हाथा म्यू पर- वे, उठ बैठ वगधै कोय । से धहरावण रो कर्तव्य ना तिथ में शौनिन पागन्या होय ॥ ४२ ॥ नपा कर्तव्य गृहम्पी कर थे, त्याने पागन्या है जिन- त्य ! ने कर्तव्य तो काया स्य करमी पिण न कहै ये लावो काय रे॥४३॥ निर्वद्य कर्तव्य गे पागन्या मेधा पाप न लागै कोय । हालग चालणगै पागन्या धा, राहय स्यू सभोग होय रे ॥ ४४ ॥ वमो सुयो उभी रही ने जावो, एडम्य में माधु न कई पाम । गर्यकालिक र मातम अध्ययन, संतालीममा गाथा ताम:४५॥ उभा रो कर्तव्य वैठा रो कर्तव्य करणो कई जिनगय । पिय वैठए उठण रो नहीं कई रहस्य ने थे विचार देवो मन माय रे ॥ ४६॥ नर्षा कर्तव्य में पागन्या दोधा निर्वध धालयोने नाई भायो। कर्तव्य छोडने पालण गै पाता दे तो एहस्य गे ममागी छायो ४० एहस्थी हार पद्यो कपडादिक, जय साधु सूं नाणी नावे माहि। नय कोई रहस्य भेलो करै कपडादिक, साधु ने मारग दे ताहिर ncp साधा ने मारग देवै नायगा पावण रो, ते कर्तव्य निर्वद्य चोग्यो । जो कपडादिक रे काम, भेलो करे सो सायद्य काम छै देखो रे ॥ ४६॥ तिण स्य साधु कहे रहस्य ने म्हाने जायगा दो नावामाशि। मिण कपडाटिक भेलो कगे मावट ने, इसडी न काढे याई रे ॥५॥ गृहस्थ गे उपधि करै पागो पारी, वैमया सोययादिक रे काम। ते पिण कर्तव्य निर्वा नाणो, नहीं उपधि ऊपर परिणाम रे ॥ ५१ ॥ क्षेई यो जिन पागन्या बार पजानी, धर्म कर के साम । से भोना लोका ने भ्रम मे पाई लेद पनक योलागे नाम रे ॥५२॥ यावफ गे माही माहि करै प्रियावच, वले माता पूछ ने पूशये। तिण में श्री जिन पाया मुम्न न दिम, तिय माहे धम बतावै ॥ ५३ ॥ श्रावक गे माही महि व्याश्च कोधी, सिप दियो गोरी छय काया गे गम्य सोवो कौधो तिण स्यूं पाना न दे जिनगन रे॥५४॥ गृहम्यो रौ व्यावच कोधी तिण रे, पठाइसमू पणाचार । साता पूशा गे पयाचार सोनमू, सिधौ धर्म नहीं है निगागरे ॥५५॥ गगेगदिक ने श्रावक पूजे मातगटिश ने पग्ठे पूमे। माना

इत्यादिक कारन से नहीं निन पाना, धर्म फई त्याने
सपलो न सूबे रे ॥ ५६ ॥ अरोर पूलै मातरादिक
परठे ते तो शरीरादिक्ष रो काज | Rो धर्म तो ए
कार्य हुवे तो, पागन्या देता जिनराज रे। ५६ ॥ बो
पुरषो पाठपोन कर बायफ सो काया यिर रापो
एक ठाम । पिए हतादिश में पिन पलाया रहयो नावे
साम रे ॥ ५८ लघु पडी नीत तो पयाधा, खमी
उमपो न पाय ताम! पूजे परठे सौर सारदा कर्तव्य
है, जिन पाता रोनधि काम ₹५६॥ कदा घोडी
बुधि त्याने समझ न पड़े तो राखो जिप प्रतीत ।
গী মাঃ মাম খান্না ব্যাং ঘর্ম সঙী ৰ হৃষে
নীয় • ? ভিন খান আঃ রাম ঃ ই,
গ্রী গ ঘ ৫ মাঠী। প্রিল মান্না বা প্রম
फो, त्यारी पाई पास पाडी पाटी ६१ जिन
पागन्या माई पाम करता भूव मन लाई। बसे
ঘন অং মিন যা ধা, য বমি যাভিয়া ৪
पार ६२० मिन पागन्या माई पाप कह से दुई
कर कर तापी। इसे धन कई निन्या पार
ते तो पूरा नाम पठागने वर्ष
रहतास ठ सद तोर महशर ! भिन पागा
उत्तयार का कोड कोधी । पर उपगार its

सावदा ॥ दोहा ॥ जिण शासप मे आजा वडी, पोलखै ते बुद्धिवान। ज्या निण पाजा नवि भोलखौ, ते जौय के विकल समान ॥ १ ॥ दोय करणो ससार में, निर्वा जाण। निर्वद्य मे जिण पागन्या, तिण तूं पामै पद निर्वाण ॥ २ ॥ सावध करणो ससार नौ, तिण में जिष भागन्या नहीं होय। कर्म बधै छै तेह थी, धर्म म जाणो कोय ॥३॥ किहा २ के जिण भागन्या, किशोर पागन्यां नाह। बुद्धियन्त करो विचारणा, निरणों करो घट माह॥४॥ ॥ ढाल दूजी ॥ (परिहारा हो धो पूज्यजी रे नाम री-पदेशी) कोई फर पचखाय नौकारसो तिण री भागन्या दो जिन पाप हो । खामोजौ । कोई दान दे लाखा ससार मे, पूया पाप रहो चुपचाप हो। स्वामीजी : बलिहारी हो, इ बलिहारी ही थी जिनजौ रौ पागन्यो ॥ १ ॥ जिन पाजा सहित नौकारसी, कौधा कटे सात पाठ कर्म हो । सा• ॥ कोई दान दे लाखो ससार में, ते तो पाम गे भाथ्यो नहों धर्म हो । खा०॥ ई॥२॥ पन्तर मुइतं त्यागै एक भूगहो, तिण री पागन्यां दो जिनरान हो वा. कोई जौष छुडावे लाया दाम है। सहे पाप रहो मौन साझ खा• ॥ ॥ ३ ॥ पर मुहर्त त्यागै एक भूगडी ते तो पाप गे सिखायो है धर्म से स्वा• ॥ तिय स्यू कर्म कटै तिण बौर रा, उत्कृष्टो पामें सुख परम हो । खा. ॥ ॥ ४ ॥ कोई घोष छुडावे लाया दाम दे से तो भाप रो सिखायो नहीं धर्म होता. पो तो उपकार ससार नो तिप कटता न वाख्या पाम कर्म हो । खा. ॥ ॥ ५ कोई साधां में हिरा एक सिपकानो, सिणगे पाजाटो पाप साच्यात होता. कोई श्रावक निमावै कोहागमे तिष गैपासान दो पगमात को ॥ स्वा. ॥ ६ ॥ साध में वहिरा एका तिणकलो, सिप रे पारमू बत कधो पाप हो । बा• ॥ तिष स्य কান্নাঘী খায় স্বর্ণ এই যে অাল্লা মিখ । पाप हो । सा• ॥ uor कोई पापका जीमावे कोडा न्यूत ने, ते तो मापद्य कामो मायो पार को सा. उएव काय मात्र पोपियो तिथलागो के एकस पाप हो । सा॥ कोई फरै ध्यावध शावका तणी, तठे पिए पाप रे है मौन हो । स्वा.. सौखो कोषो के मन छ काय नो, ते कर्तव्य बाटो पाम बवून ही स्वा• ॥ue 1 कोई उघाडे मुख . कर्म हो। स्वा.॥ भणे के सिद्धन्त ने, कोडागमे गुणै छै नवकार हो ॥ खा• ॥ तिण में पाप तणो पागन्या नहीं, तिण में धर्म न सरळू लिगार हो । सा•॥ ॥१०॥ उघाडे मुख गुणे के नवकार ने तिण वाउकाय माया प्रसस्य हो ॥ स्वा० ॥ तिण में धर्म थद्दे ते भोला थका, त्यारे लागा कुगुरा रा डक हो । स्वा. ॥ ॥११॥ बैग स्यूं गुणे एक नयकार ने तिण स्यू कोड मारा कटे तिग में श्राप तणी के पागन्या तिण निये की निर्जरा धर्म हो वा ॥१२॥ कोई साधु नाम धराय ने, प्रशसे के सापद्य दान हो ॥ स्वा• ॥ त्या भेष भायो भगवान रो, त्यारे घट मा घोर पन्जान जो स्वा. ॥ ॥ १३ ॥ मौन की है साधु में सायद्य दान मे, ते तो पतराय पडती वाच हो । खा• ॥ तिण गे फल तो सूत्र में बतायियो । तिषगेडियन्त करसो पिशाय हो । स्वा• ॥ ॥१४॥ प्रदेगो राजा कहै कैगी स्वाम मे, म्हार तो चढतो वैराग हो । स्वा." म्हारे सात सहस गाय खालसे, तिथरा करू च्यार भाग होता. । १५ । एक भाग गया निमते करूं, दो भाग करु खजान हो ता. तोना भाग घोडा हायौ निमत करू, भाग करू देवा दान होता.॥॥ १६ ॥ चार्य m A r ति - rd s- भाग सापय कामों नापनें, मौन साझी रघा केशी खाम हो । स्वानो उ किणहिक में धर्म जाणता, तो तिण रौ करता प्रशसा ताम होखा IEaton सावदा कर्तव्य ध्यास भाग राज रा, त्यामें बौवा री हिसा पत्यन्त हो । खा. ॥ तिष स्यू ध्यास घरावर जाए ने, मौन साझी रघा मतियन्त हो । स्वा.॥ १८॥ दान देवा मडाई दानशाल मै, प्रदेशी नामे राजान हो । खा• । सात सहस हुन्ता गांव खालसे, तिपरी चौधो पाती रो देवा दान हो । स्वा. १८॥ चार भाग कर पाप न्यारी हुवो, तिय नायो ससार नो माग हो।खा. तिण तिघन कौधोतिष राजरो, रधो मुक्ता स्यू सन्मुख लाग हो । म्या.॥ इ.२०॥ भो तो दान पौरा ने भोलाय ने, तिष पूरी न दिसै बात हो । सा० ॥ चवदे प्रकार रो टान साधने से तो रास्यो निज पीता रे हाय हो । स्वा. इ॥ २१॥ चौथो भाग दान वालो करो, नहीं राम्यो पोता रे हाय हो । स्वा. ॥ तीन भाग ज्यू दूणने पिण थामियो, छ५ काय बौवा गैबाली धात होला.इ. २२॥ साढा सतरै सो गाव दान तालक, दिन र प्रते मठेरा पाच गाव हो । खा. यारे शंसल री धान रथाय ने, दानशाला मंडाई ठाम है। m Pr . स हासल पायो हुवे ठाम हो ॥ स्वा• ॥ ॥३॥ टालवा गाव जागौग्यो खालसे, ते तो चौथे पारेरा छा गाव हो । स्वा. । हासल पिण पावतो जाणज्यो घणो मे पण हुन्ती धो पमाम हो । खा. ॥ ई. ॥ २४ ॥ एक एक गाव रो दश सहस मण रे उन्मान हो ॥ स्वा० ॥ दिन २ प्रते मठेरा पाच गाव रो, को पछास हजार मण धान शे॥ स्वा० ॥छ । २५ ॥ चूण लेखै एक बरस तणो, पूणा दोय क्रोड मण धान हो । स्वा. ॥ पधिको पोछो तो पाप माथी राधा, पटकल स्यू कधी उम्मान हो । स्वा• ॥ ॥ २६ ॥ पाणी पाच क्रोड मया रे पासरे, पूणा दोय क्रोड मण गध्यां धान हो स्वा०॥ पग्न एक क्रोड मण बाणभ्यो लाखा मप रे उन्मान हो । स्वा. ॥ ॥रणा नित्य धान हजारा मण राधता, पग्न पापी इजारा मण नाण हो । स्वा० ॥ मणा यधरूण पिण लागती, घाउकाय रोवोत घमसाण हो ॥ स्वा०॥५२८ ॥ सयारादिक पनेक पापो मझे, बले बनस्पति पाणी माय हो । म्या. धान इजारा मा राधता, तिहां पनेक मुचा वसकाय हो । स्वा.॥ ६ ॥ २६ ॥ दिन २ प्रते मारे छव काय ने बले पनन्त जीवा से करै घात हो॥ स्वा.॥ त्यारी हिन्ना रो पाप गौणे + है 4 1 नहीं, स्यारे हिन्सा धर्म गै मिथ्यात हो । खा.॥ {{ ३. एहवा दुष्ट हिन्मा धर्मी लोवडा कई बाणे पज्ञानी साधो विपर घट माहि घोर पन्धार है, ते तो नियमा निये के पमाघ । म्या. ३१॥ ई बीच खुषाया मे पुन्य कहै कई मिथ कई है मूठ हो । स्वा• ॥ ए दो, बूडा पापडा, कर २ मिथ्यात रो रुट हो । स्वा.॥॥ ३२ ॥ जीव खाधा खुवाया भलो जाणिया, तौनू हो करपा है पाप हो । स्वा. ॥ पायदा प्ररूपी के पाप रो, से पिए देने है पनानी प्रत्याप शे॥ स्वा० ॥छ ॥३॥ क्षेडू मोव सुधावे के इना, धोखा कई पचानी परिणाम हो। स्था. कई धर्म मिथ वे नहीं, लोष जुवाया दिना ताम हो। स्वा.॥ ॥३४॥ नीष पाषण रा परिधाम छै पति बुरा, खुवावध गमिष पोटा परिणाम | स्वा॥ यूँही भोला ने हाथै भम में, ले ले परिणामा रो नाम हो । स्वा. ॥ ॥ ३५॥ कई कई नोवा ने माया पिना, धर्म न दुबै ताम हो । स्वा. ॥ ौष माया रो पाप लागे नों, घोडा पाहिजे निज परिणाम हो ॥ स्वा.॥६॥३६॥ क्षेई कई खोवा ने मारसा विना, मिथ न हुवे वासी ॥ स्वा• ॥ से खीव मारपरी सानो फर, ले ले परि- 1 . - --- . रो मौन हो। स्वा.॥ ( १६८) पामा रो नाम हो । स्वा. ॥ ॥ ३०॥ कर धर्म मे मिश्र करया भणी, य काय रो कर घमसायो ॥ स्वा.॥ सिप रा परिणाम चोखा कया था, पर भीया रा छटै प्राण हो । स्याः ॥ ॥ ३८॥ जिस पोनव लोधी पाप रोपागन्या पोलख लोधी पापरी मीन हो । स्था.॥ शिव पापने मिण पोलाव लिया, शिप रे टलमो माठी २ नन हो । स्था• ॥5॥३८॥ तिन पाना नवि पोनावी पाप रौ, भोग्नावी नयि पाप तिष पापने मिव पोलत्या मावि, तिवरे यधमो माठो माठी जन हो । स्वा० ॥ इ॥ ४॥ ई मिव पाना मारे धर्म है, पाना मांड कहे पाप हो ॥ स्वा०॥ ते दोन विध वूडा वापडा, कडी कर कर अनानी विलाप हो। म्या.॥६॥४१॥ पाप रो धम पापपागन्यां मझे ना पाप गे पाना पार हो। स्वा.॥ शिव धर्म विप पागन्यां बार कहे, सेतो पूग मूट गिवार मा... ४२ पाप पयमा देपर्ग पातिवा पार परमर देखो माझी मौन हो ।म्या.॥ f पार तो पागन्या नवि, कायो नायक बन म्या .. मेष धायां मार दान पापियो, तिर दान म्यं दया इत्याप वाया।

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तिण सं लागे के पाम कम रे ॥ श्री ॥७॥ जिन भाष्या
में जिनजी री पागन्यां गोगरी भाष्या में पोर वाण
रे शिप म्यं जीय गद्द गरा जाये नहीं वले पाप लागे
पाप ॥ यो॥८॥ यग्नो भाप्यो धर्म मैगनोक
है, मोहित इसम जागरे । गरगो पिणा न्यो इप धर्म
गतिगा में यो जिन पासा प्रमाणारे । यो॥
ठाम २ मुव माहे देषम्यो कयनी भाष्यो ते धर्म है।
मौन माझे तिज धर्म को नहीं, मौन साझे शिक्षा पाप
कर्म ॥ श्री... मीन मागियो धर्म माठो घणो
भेष धाग्यां पप्या भागारे। गांच ३ युडे हे बापडा,
मृव ग म पनागा रे॥यो ।। ११ ॥ धर्म में शुम
दोन ध्यान में, बिना पाना दोगी वाई वार । भात
गेट ध्यान माठा विज, यानं ध्याये है पाशा पारी
यो। मित्र पन गक लम्या भग्नो, याम बिन
पगन्या ने नियंग धम । तीन माठो मग्या में
पामा न* तिरका माप कम । यो १३॥
च्चार माध्या आम वाया घ्यार गाथा का
बिनायो। एमगलानि पागन्या मझ पाना
गि पो पातु म
बायो।"
freमनि पारा, माठा frपाम पाहा
मला परम पित्रे, माढा पर

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( १७६ ) पजान छोडने ज्ञान भादग्यो,माठी क्रिया छोडौ माठौ नान रे। भलो क्रिया ने सोधु पादरी, जिप पाजा स्यू चतुर सुजान रे॥श्रो ॥ ४. ॥ मिय्यात छोड सम्यक्त मादयो, अबोध छोड पादयो बोध रे। उन्मार्ग छोड सुन्मार्ग लियो, विण स्यू होसी पातमा शब रे ॥ श्रो ॥ ४१ ॥ आठ छोडे ते जिन उपदेश स्यूं पाप कर्म तयो बध नाण रे। जिण पाना स्यूं पाठ पादस्या तिण स्यू पामै पद निर्वाण रे ॥ श्री ॥ ४२ ॥ ठाम २ सूत्र मे देखल्यो, जिय धर्म जिण आजा में नाण रे। ते मृट मिथ्याती जाणे नहौ, युही बुडे छै कर कर ताण रे ॥ ४३ ॥ इ कहि कहि मे कितरो कडू, पागन्या वारै नही धर्म सुल रे कहै तेइना, श्रद्धा कण विना नाणो धूल रे श्रौ॥४४॥ ॥दोहा॥ भेषधागै विगरायल जैन रा, ते कूड कपट रौ खान। ते पागन्या वारै धर्म कहै त्यारे घट में घोर पजान ॥ १॥ त्याने ठोक नहौ निन धर्म रो, जिय पाना रौ पिण नवि ठीक । त्याने परिवार विवेक विकल मिल्या, त्यामे बानै पूज मेढौक ॥ २॥ से घडा कट जु पागै चलै लारै चलै नेम कतार पागन्या वारै धर्म क 1 पोहना वृडे है वापडा, बडा बूढा रो मार ॥ ३ ॥ हिये यले विशेष जिन पागन्या पोलखजो बुद्धिवान । तियरा भाव भेद प्रकट करू, ते सुखज्यो मुरत दे कान ॥ ४॥ ॥ ढाल चौथो॥ (अकुपरबाहै पम्मर मुणो-परेशी) माधु सामायक व्रत उच्चरै तिा मे सावध ग पचपाय। भविफ अन् हो। तेहिज सापद्य गृहम्म कर. तिच मे घी मिन धर्म म बाप भविक जन हो। श्रो दिन धर्म लिन पागन्या विहाnt घावक सामायक पोसो कर तिण में पिना मावा ग पचावाण म. ॥ हिज मावा फामो छटो करे, तिष में पिण दिन धर्म म जाण ॥ भ.॥०॥ श्रो॥ धर्म कई साधु जिन भागन्या मझे पाजा यारे धर्म की, ते मूद म. तिण यो जिन धर्म न पोनस्यो, तिरा मालो मिथ्यातरी कट म. ॥ ३ ॥यो। जिन धर्म रोजिन पागन्या देवे, मिण धर्म मोडावै जिनराय म.॥ पाना! पार धर्म किप सोमावियो, तिथ री पाना देव कुप साय ॥ भ• ॥ ४॥ यो फेई पागन्या वारै मिय कहै, कई धर्म पिच कई पाजा दार ॥ भ. तिए ने पूशेजे पो धर्म किण कयो, तिथ रो नाम सं-चौडे यताय , •॥५॥ यो इण मित्र ने धर्म गे कुप धपो, तिण . २३ .

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गै पाना कुण दे जोधा हाय ॥ भ. n देवगुरु मौन
साझ न्यारा हुथे, इण री उत्पत रो कुण नाय ॥ भ.
॥ ६ ॥ श्री। कोई वेश्या रा पुष ने पुश करे, थारी
मा कुप मे कुण तात ॥ म. ॥ नव उ नाय बताये
किण वापरो, ज्यू पा मिश्र वाला गै छै बात ॥ भ.
॥ ७॥ श्री। वेश्या रा पङ्ग जात नो उपनो, तियरो
कुण हुवै उदेरि ने वाप ॥ म. ॥ ज्यू पाज्ञा वारै धर्म
ने मिश्र से जिण धर्मी फरसो कुण थाप ॥ भ.ne
॥ श्री ॥ वैश्या रे पान नात नो उपनो, उण लखणो हु
उदेरि मे बाप ॥ भ० ॥ ज्य जिन भागन्या वारै धर्म ने
मिश्च रो, कई करै छै पापण्डी थाप ॥ भ• ॥८॥ यो॥
कोई कहै म्हरो माता वै वामाडो, सिण रोहळू
पातम नास ॥ भ• ॥ ज्यूं मुरख कहै जिन पागन्या
पिना, करणी कीधा धर्म साख्यात ॥ भ• ॥१०॥ श्री॥
वाप विण येटो निये हुवै नहौं, ज्यू जिन पाज्ञा विना
धर्म न कोय ॥ भ.॥ लिन पाना होसी तो जिन धर्म
है, पाना पिना धर्म न होय ॥ भ. ॥१४॥ थी।
मा पिन पेटा रो बन्म हुबै नहीं, जन्मे ते वाम न
होय ॥ भ• ॥ ज्यू जिन पाता विना धर्म हुवै नहीं,
निम पाज्ञा तिहा पाप न कोय ॥ भः ॥ १२॥ थौ ।'
गंधु पखी ने -चोर दोन भणी, गमती लागै पन्धारी

( १७६ )
रात ॥ भ•॥ यू भारी कमा जीप सेने, निन
पाना वाहरलो धर्म सभात म. १३ ॥ श्री
काग निमोलो में रति करे, भण्डसूरा गे मोटो पाथै
दाय ॥ भ• ॥ ज्यू काग भण्डसग जया मानवी,
रिझे पाना वाइरली फरी मायभ. ॥१४॥ योग
पोर परदारा सेवप कुगौलिया, से तो मेरी बोये
दिन रात भ• ॥ ज्यू पाजा बाहर धर्म अदायवा,
अन्धो कर कर पानी मात । भ•॥ १५॥ श्रीर
नगरवादिकपाता मागे नहीं, से सो पपइन्दा प..
मौत । भ.। ज्यू फेरें जिन पागन्यो दिन करतो
करे, ते पिस करपीरिममेत म. ॥ १६ ॥ यो।
टुष्ट बोष मंत्रारीने चितरा, इलk करे पर मौतों
गेधात भ• I मिय यहा रापो, दल
स्यू धाले विकलो रे मिधात म. ॥ २०॥ यो।
विगगयन हुदा न्यात पारे कर, ते गिगयत फिरे
न्यात बाहर. ताशे धर्म जिम गया
पारसी, सिर में दर्द मत वारी मनोधारम.
। न्यात बार ने न्यात मारें नहो, हिप
শখি না হয় না • সি কান্না বিনা
भर्मयोग पुगे नही मन मतम..
१८ दो रासाशिन द्वारी अमो

जिन माता रा काम न कोय ॥ भ ॥ तो मन मानने
करणो करसों तेइने, सगली कारणी किया धर्म होय।
म० ॥२०॥ थी । जिग पाता बाहेरलो करलो किया,
माम नहो लागै ने धम थाय ॥ भ.॥ तो किष करणी
सू पाप निपजे, जिमा करणो रो तू नाव वताय
॥ भ• ॥ २१॥ थो॥ जान दर्शन पारित तप, ए
ध्यासही माझा माय ॥ भ० ॥ या धारा माहे तो
धर्म जिण कधो, यो विना पौर नाव घताय ॥ भ. ॥
२२ ॥ थी।
धम पूश्या रो जाव न उपजे, झूठ बोले
बणाय वपाय ॥ भ.॥ विकलां ने विगोवण पापिया,
जिन पाता' बारे धर्म यदाय भ० ॥ २३ ॥ थो ।
पागन्यां वारै धर्म कहे, ते पिण भागन्या वार
भ• ॥ इण सरधा सू बूडे छै वामडा, से भव २ मे
कोसी खथार ॥ भः ॥ २४॥ यो जिन भागन्या बारे
धर्म कहे, ते विगरायल जैन रा नाण ॥ भ० ॥ त्यारौ
'यमिन्तर फूटो माइलो, ते पधारे उगो कहै भाग
भ० ॥ २५ ॥ श्रो'। यो जिन पागन्या विन करणी
करे, से तो टुरगत रा पागोवाण । म । जिन पाना
सहित करणो करे, तिण स्यू पामे पद निग्वाण ॥ भ.
'॥ २६॥ श्रो' पाता वारे धर्म कहै हमी, नोड
'कोधो छ खैरवा मभार म. संमत पठारे चालो-
.

( १८१ ) समें, पासी विद पाचम घाबर बार ॥ भ. ॥२०॥ यो जिन धर्म जिन पागन्या शिक्षा ॥ इति जिन पान्ना को चोढामियो ममाप्त।

॥हा॥
गार आगण 'ला बाग लगायियोजी राज कुमार मिस भायो हो
पर याद गहा ग तो ग गजगे गुथाप (एदेशी)
म पाटोधर मादृश जिनयर जिम दूण भरत में
हा म्वाम । काल गणोश्वर मोहै हो मन मोइत स्वामी
मर नर भविनन मह तथा ॥ गणपति गुणसागर पहो
• नाय नमा घणो । गणिपर तोगैसावलौ सोम्य सूरत
हट जति -1 वाम। जम चकोरा धन्दा हो तिम भवि
तुझ जादै हपित होये पति घपा ग• ॥१॥ वय
विसको बामो कागा कुक्षे प्रवतग्या हो खाम । माता
भगिनी माय हा घोटामर माहौं चमानौसे प्रस धग्या
॥ काम हा पाट विगम्या नाहनू नयर में ही
म्बाम । मध्यिन्न जश बतायो हो जगताधिप स्वामी।
गगा मपि ग्यगा पति भया । ग.॥२॥ पच परसे
- स्वामी मघन झडी जम्नधार ज्यू हो खाम । सुण २
भयो मन हा चित तर्ष पायगडौ तस्कर थी जिप
॥ पटापद पैखी कठौरव जिम विकतो
का म्बाम । पत्रक त्रिम रवि देखी हो तिम गपि तुझ
निादी पावडा मान्न घणा ॥ ग.nanगद बोध
मगतमा

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- महागज ए। भाज है, यलिहारी तय नामनी ए . उगणौसे पचासो वर्षे ए, गणि गुण गाया हर्षे ए। सरस ए, चम्पालाल हुलसायने ए॥७॥ ॥ ढा॥ (गोयमनी शिय सयाना लाल गोयमा-एदेशी) भिक्षु गणि भर्स मझारो लाग्न, स्वामजी । भयो, भाग्य उदय पत्तारोको। गय नायक दीन दयाल लाग्न म्यामजी । ए तो शरणागत प्रसिपालुजी । गण नायकः ॥ १॥ जिन वध धारी सुखदायो लाल, बाम ली। वह भविजन वोध पमायोजी गय ॥२॥ वा मोमा बह विध बाधी लाल, स्वा.। गिय यधु मूं प्रौती माघौगो ॥३॥ तम सिह पाट सुखदायो लाल बा। काम्न गपि जन मन भायोनी ॥ ४॥ मृगराज तपो पर गालाग्न, मा. । फेरर पायगडी मन लाजमी ५॥ पशो निम मभा मझागे लान, स्वाः । कर धाति गव नियो धागेमो॥६॥ घन ग्व सुम्प मारग नाचे मान, म्वा । तर गिग तैम भधि गनो गणि पर पचन मुखदायो नाम्न, सा०। मुझ मन मधुयार मनोमायोत्री गोइय निधि चन्द सुहायो लान, मा. मिरा मतमो गुप गायोमो॥ गय नायक टोन टयानु नान वानजोर

श्री जयाचार्य कृत--
भ्रम विध्वसन की हुण्डी।
मिथ्यातिक्रियाऽधिकारः।
५ पाल सपस्वी में सुमाव दान, दया, गोलादि कगै
मोधमार्ग नौ देश यकी पागधक कयो ।
(माय स्व मगयती श०८३०१७)
२ प्रथम गुप्पठाया नो धयो मुमुख नामे गायापति,
सुदन नामा पपगार ने सुपाव दान देई परित
ससार करो मनुष्य नो भाउयो वाध्यो।
(सात सूत्र मुनायिपार म.)
३ मेघकुमार को बीष मिथ्याती थको आयो से भव में
सुसला रौ दया पाली परित ससार कौधो।
(यात सूत्र हाता म०१)
४ गोशाला नो धावक सकहालपुव, भगवान ने विष
प्रदिक्षणा देई वदना कोधी।
(उपाय..)
• ५ मिथ्यातो ने भनी करणी लेखे सुनती कनो के
(सान सूत्र उत्तराध्यपन भ.गा.२०)
।
२४

६ क्रियावादी सम्यग्दृष्टि (मनुष्य तिर्यच) एक वैमा- णिक टाल घोर पाऊयो न धाधै। (साख सूत्र भगवती ३.३०१) ७ मिथ्यातो मास २ खमण तप कर तथा सुई नौ पावै तेतलान भन्न नो पारयो करै, पित्र सम्यग्दृष्टि ना चारित धर्म नौ सोलमी कला पिच नाय तेहनो न्याय । (उत्तराध्ययन म. गा०४४) ८ मिथ्याती मास २ खमण तम करे, पिण माया थी पनन्त ससार रुले। (सूयगडाग धृप्तस्य य१म०२३०१ गा०६) है जीव पजीव जाणे नहीं सहना पचखाण दुपच्च- रखाग कया हनो न्याय । (भगवती श०० उ०३) १. भगवत दीक्षा लिया पहली, २ वर्ष भामा (पधिका ) घर मे विरक्त पणे रधा तथा काची पाणी न भोगव्यो। (प्रथम भावाराग म.१.१ गा०११) ११ ले तत्त्व ना पनाप मिय्याती, त्यारो पशुद्ध प्राक्रम हे ते ससार नो कारण है। पिण निर्जरा नो कारण नयो ( पिय शुद्ध प्राक्रम तो निर्जरा

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तेहगे पादेश भागार ५ पटवी कान्तार ने विप पागार ६ ए छव छगडी पागार गया तो पीता रोकचाई जाणो ने राख्या। (उपाशक दशांग ०१) ३ तथा रूप ले पसयतो ने फासू भफासू सकती पसूझतो प्रशनादिक दीधा एकान्त पाप निर्जग, नथी। - (भगवती श०८३०६) ४ ने साधु कष्ट उपना एम विचारै। परिहन्त भगवन्त निरोगी काया ना धणी, पोता ना कर्म खपावा ने उटैग ने तप करै । तो इ लोच ब्रह्म- धर्यादिक भनेक रोगादिक नौ वेदना, किम न सहूं। एतले मुझ ने वेदना सम भावे न सहता, एकान्त पाप कर्म हुये तो पदना समभावे सहता, एकान्त निर्जरा हुये। (टागोगटाणे ४३०३) ५ साधु नो हेला निन्दा करतो पशनादि देवै तिक्षा 'पडिलाभित्ता" माठ कन्यो। (मगरती श०६) (क) गया साधु ने बदना नमस्कार करतो- यशो

(क) पनि श्रावक पिण विप्र जिमाडे तिज पर
बालमर्ण थो धनता नर्क ना भाव। तेइनो
न्याय।
(मरगती श०२४०१)
१३ ने सावध दाम प्रगसै केही छ कफाय नो वध नो
वकगार कयो। भने पत्तमान काले निषेध
त्याने पसराय नो पाडणहार कयो। ते माटे
साधु ने वर्तमान मे मौन राखिव की।
(यगडाग ०१०११ गा०२०,२१)
१४ दान देये लये, इसो वर्तमान देखी गुण दूषण
करणो महौं।
(सूयगडांग ०२ भ०५ गा. ५)
१५ नन्दप मणिहारो दानशालादिन नो घणो पारम्भ
करो मरौने पोतारी वावडी मेन डेडको थयो।
(हाता म.१७)
१६ भगवान दश प्रकार ना दान प्ररूप्या। (सावा
निवंद्य पोलखया)।
(टाणा ठाणे.)
१० दग प्रकार नो धर्म को ( सावध निर्वद्य भोग्न
सपा) अमे दश प्रकार ना स्थविर कच्चा लौकिक
लोकोत्तर यि बापवा।
(टापा टाणे १०)

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-
११२४ भात पाणी यो पोप्या धमाधम नो न्याय !
(उपाशक्दशा अ०१)
२५ सुगिया नगगे ना थावक्षा नौ उघाडा वारणा रौ
न्याय
(भगरतो श.२७.५टीका में)
२६ थावक ना त्याग ते व्रत पने भागार से पत्रत ।
( उपचाई प्रश्न २० तथा सूयगडांग ०२ मा२)
२७ दश प्रकार ना शस्त्र कद्या तिण मे भगत ने भाव
शस्व कयो।
(ठाणांग टागे."
२८ मे थायक देगथको मियत्या पने देगथको पचखाण
कौधा तिणे कगै देवता याय। मिण पव्रत यो
देवता नौ।
(भगपती २०१३.८)
२९ साधु ने सामायक में पश्राियां सामायक न भाग
तेहनो न्याय ।
(भगवती श.८३.५)
३. थावक निमा तिव ऊपर महावीर पावनाय ना
माधु नो न्याय मिले नहीं।
(उत्तराध्यान भ०१५ गा."
१३. पमोचा क्षेवनी, पन्यन्निगी यका पाते तो दोच्या

न देवे। पिण पने पास दोया सेवा नो उपदेश
-
( मगरता ०3०३१)
१२ पभियाधारौ पने परिहार विशुद्ध पारिवियों
कारण पधा प्रनेग माधु ने पशनादि देखें
। पहत्या 30 पोर २७)
३३ याम्यादिक ने टो माधु ममार भ्रमण नो हेतु
वापी छोडो।
(मृगगडाग ०१ गा.३)
३४ राजयो ने दान दिया पने देता नै अनुमोद्या
चौमासी माथित कन्यो।
(निशाय उ०१५ चाल ७४७१)
३५ पापन्द ने सधारा में पिप रहस्य को।
(उपाशा म.)
२६ एहस्य नो व्यावध किया, कराया, पनि पनुमोद्या
२८मो पणाचार कधो।
(कालिक म.३ गा."
३७ ग्यारमी पडिमा में मिण प्रम वध वृस्यो नयो।
(शाभत धमा
३८ पडिमाधारी कल्प जपर पम्मड सन्यामोना
कल्पमो न्याय।
(उपमा मम १५३

३६, अनेग सन्यासी नो कल्प। (उपचाई मन्न १२) ४० वर्ण नाग नतुमो सग्राम में गयो तिहा एहयो पभिग्रह धाखो-कल्पै मुझने जे पूर्व इयै तेहने इगयो। जे न हो सेहने न इथयो । (भगवती श...) ४१ ने एक अन्यतीर्थो थकी गृहस्थ श्रावक देश बते करी प्रधान पने सौ श्रावक यकी साधु सर्व व्रते करी प्रधान । - (उत्तराध्ययन ०५ गा०२०) ४२ थाक नो पात्मा प्राधिकरण कही है। प्राधिकरण से छयकाय नो थम्व जाणवो। (भगयतो श०.३०१) (क) भरतजी के घोडे मे ऋषि को उपमा दोधी तिमहिन थावक में समय भुया' कयो पिच से देशथको उपमा नाणवी। (जम्बू बीप प्रशसि) ४३ च्यार व्यापार कच्चा-मन, वचन, काया पौर उम- करण । ए च्यारु व्यापार सन्नी पधेन्द्रियरे कमा। ए च्यार भूडा व्यापार पिच १६ दण्डक सनी पचेन्द्रियरे का। पने ए च्या भला व्यापार तो मयतो मनुष्याइन कया। (टाणांग टाणे ४.१)

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साधु पोतानी
( २०२ )
अनुकम्पा
कर पिण अनेग नौ
अनुकम्या न करें।
(टाणांग ठाणे ४३०४)
२४ भन्यतीर्थी तथा गृहस्य मार्ग भूलामे साधु मार्ग
बतावै तो चौमामो प्रायथित पायै
(निशीय उ०१३ बोल २५)
२५ हिन्मादिक भकार्य करता देखो, धर्मउपदेश दें
समझाययो तथा पपयोव्यो रहे तथा उठी एकान्त
जावणा कयो।
टाणांग टा०३०३)
२६ माधु पनेरा नोया ने भय उपजाये, तो प्राययित
कयो।
(निशीय उपयो-६४)
२० रहस्य नी रक्षा निमित्त मन्वादिक किया पनि
अनुमोद्या चौमासी प्रायथित कयो।
(निशीय उ०१३ बोल १७)
२८ घनयोपिया, पोपा में माता ने वचाविधा उठ्यो
तो व्रत नियम भाग्या कधा।
(उपराएदशा म.३)
२६ नावा में पाणी पावतो देवी साधु ने एहम्य प्रत
बतावणी नहीं।
(भाचार्गग ०१ ०३.१)

३. साधु पनुकम्पा पाणी वस जीष ने बाधै यधावै
तथा बाधते प्रसे भलो नाप तथा बधिया नौवा ने
अनुकम्पा पापी छोडे, छुडावै शेडते में भलो
माणे तो प्रायथित कधी।
(निशाथ उ०१२ योल १२)
३१ माधु कुतूहल निमित्त वम नीव ने पाधै बधाये
पने छोडै छुडाय तो प्रायथित कधो।
(निशीथ उ०१७ योल १२)
२२ ले माधु पश्चाताप भागे भने भागता ने पनुमोदै
तो दण्ड कयो।
(निशीय ३०१२ बाल ३४)
३३ ग्राम्य साधु नौ पनुकम्पा पायो तैलादि मर्दन
करै तिहा 'कोनुण पडियाए' पाठ कयो।
(भाचा ध्रु०२० २३.१)
३४ हरिणगयेषौ सुनसा नी भनुकम्पा कौधौ ।
(मन्तगद वर्ग ३ म०८)
३५ कृपानी डीशगनी अनुकम्पा करी ईध उमाडौ।
(मन्तगद धर्ग३०८)
२६ इरिक्षणो नौ पनुकम्पा पायौ यो विपा ने जधा
पाडा
(उत्तराध्ययन अ० १२ गा०८स २५ नाई)

। २०४ )
३७ धारणी राणौ गर्भनी अनुकम्पा भाषी मन गमता
अशनादिक खाया।
(माता म०१)
३८ अभयकुमार नो अनुकम्पा पाणी देवता मेह वा-
मायो।
(शाता ०१)
३६ जिन ऋषि करुणा पायो ग्यणा देवी रे माहमो
लोयो।
(शाता म.)
४. प्रथम पासव हार ने करुणा रहित कयो।
(मन व्याकरण ०१)
४१ करुणा महित जिन क्रषि ने ग्यणा देवो दया रहित
पग्थिामे करि हण्यो।
माता म.)
४२ सूयाभ देवता रो नाटक रुप भक्ति कही।
(राय प्रतणी)
४३ य छावा ने कन्धा पाद्या ते हरिगौनी व्यावच
की।
। उत्तराध्ययन अ० १२ गा.१२)
४४ भगवान गौतल तेज लब्धि करी गोगाले ने बचायो
तिहा 'अणुकम्पबढाए' पाठ कयो।
(मगपती श०१५)

लब्धि अधिकार
१ क्रिय तथा जम लब्धि फोद्या जघन्य ३ उत्कृष्टी
५ क्रिया कही।
(पन्नरणापद ३)
• पाहारिक लब्धि फोधा अधन्य ३ उत्कृष्टौ ५ क्रिया
की।
(पनवा पर
३ पाहारिक नन्धि फोडे तिपने प्रमाद पायो पधि-
करण कयो।
(भगपती ११.१०
४ मंधाचार पधवा विद्याचार सब्धि फोडी विना
पालोया मरे, तो विराधक कयो।
(मगरती ०२..)
५ क्रिय लधि फोर्ड तिदने मायौ कमी पने
पालीयां बिना मरे, तो विराधक को।
(भगवती...)
। मात प्रकार प्रम्य या मात प्रशारे बनो
(Pari)
० एमड मन्यामी पकिय ममि फोडो मौजा

( २०६ ) पारणो कौधो से लोका ने विस्मय उपजाया भगी। (उपयाई प्रश्न १५) ८ साधु अनेरा ने विस्मय उपजावै तो चौमासी प्राय- थित कन्यो। (निशीय उ०११) मायनिताऽधिकारस। १ सोही पगार मोटे २ शन्दे रोयो। (भगवनी श. १५) २ पदमुत्ते साधुपाणी में पावी तराई। (भगवती श०५३०४) ३ रहनेमी, गजमतो ने विषय रूप वचन बोल्यो। (उत्तराध्ययन अ०२२ गा०३८) ४ धर्मघोषना साधा नागयौ ब्राह्मणी ने बाजार में हेलो निन्दी। (माना ०१) ५ सेलक ऋपि ने उसन्नी पासत्यो कयो। (शाता म०५)

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। २.८
१४ सय भयो नीव मोक्ष नास्य ।
(मगधती श० १२३०२॥
१५ पुगनास्तिकाय में ८ म्पर्ग कच्चा।
(भगवती श. १२०५)
गोशालाधिकारः।
।
-
। भगवत गौतम ने कच्ची- गौतम । गोशाग्ने
मोन को तुम्हे माग धमाचार्य पने पापगे
धमातेवामी गिष्य । तिवार में पत्रोकार कोधु ।
(भगवती श०१५)
२ मांनुभूति, मुनघव मुनि गोगाम्ना ने कभी-
गोगाम्ना। ताने भगवान मंडो । सोने भगशन
प्रया ढोधी। तोने गिष्य कियो । तीने मिम्बायो
पने तोने वायुति कियो। तं भगवान मुंत्र
শিা অভিন্ন?
(भगवा.)
३ मगवान पिस कपा-मामाना। में तीने प्रया
-
दोधी।
(मगरली.)
गोगामा ने गिय की!

गुणानाधिकार
१ गयधरा भगवान ना गुण किया।
(मायाराम ध्रु०१०१३०४ गाथा ८)
२ भगवान, साधा ना भनेक गुण किया।
(उवई प्रम)
३ कोषक ने माता पिता नो विनोत कयो।
(उरा)
४ शाशका ने धर्म ना करणार का।
(उपवाई सन २०)
५ गौतम ना गुण कया।
(मगाती १० १3०१)
लेख्याधिकारः
१ इनस्य तौहर में कषाय कुगोल नियण्ठो कयो।
(मगयता श०२५३०६)
२ कषाय कुमोल नियण्ठा में छ लेध्या कहो।
(मगरती प्रा० २५ ३०६)
३ सामायक चारित दोस्वामनोय चारित्र में छ
लेण्या पाये।
(मगधना ०२५३००)
,

( २१०)
४ छ लेण्या ना लक्षण।
(आरश्यक ०४)
५ च्यार जानवाला साधु मे पिण कृष्ण लेश्या कही
छ।
(पन्नपणा पद १७३०३)
६ कृष्ण, नोल पने कापोत लेण्या मे च्यार जान नी
भजना की।
(भगवती श०८ उ०२)
७ कृष्णादिक तीन लेण्या प्रमादी साधु में हुये ।
(भरगती श०१३०१)
८ तेज़ पद्म लेण्या मरागी में हुये।
(मगरती श०१३०२)
१ सयतों में पिण कृष्ण लेश्या हुये।
(पन्नरणा पद १७ उ०१)
यावृत्ति अधिकारः ।
१ यचे छावाने कधा पाद्या ते हरफशो नी व्यायम
कही।
{ उसराध्ययन अ० १२ गा०१२)
२ सूयाम देव नौ नाटक रूप भक्ति कही।
(राय प्रसंणी)

३ भगवान ना पदोपाना हाह लिए करी देवता
ग्रहण करें।
(जम् डीप प्रमति)
४ थीम पोल करी तीधार गौव धधै।
(शाता म०८)
५ माता दिया साता इथे इम कई त पार्य मार्ग घौ
पालगो। ममाधि मार्गधी न्यारी। जिन धर्म में
इलया गे करणार। पल्प मुखारे पर्चे घणा
मुखा रोकारपहार। ए पसत्य पक्ष पण कांडये
करी मोक्ष । लोह नौ पर घणो
झरसी।
(ध्यमांग ०१ ०३ उ०४ गा००)
६ माच स्थानकी कगै घमण नियन्य ने महा निर्ना
हुवे। तिहा कुल गण मघ माधर्मी साधु ने
(टाणांग टाणे ५.१)
७ दश प्रकार नौ व्यावध साधुरैइज कही।
( ाणा टाणे १.)
पुन दश प्रकार नो व्याषष साधुरैपन कही।
(उसलाई)
८ माधु ना समुदाय ने गण सघ कयो।
(भगवती श०८३०८)

।
( २१२ )
१० सावध व्यावच पर भिक्षुगणिराज कृत वार्तिका
कहै के
११ साधु नौ अर्श छदै तिण वैद्य ने क्रिया कहो।
(भगवती श० १६०३)
१२ साधु अन्यतीर्थी तथा ग्रहस्थ पास पथ छेदावै
तथा कोई भनेरा साधुनी पर्ण छेदता अनुमोदै
तो मासिक प्रायथित पावै।
(निशोथ उ० १५ योल ३१)
१३ साधु गे गूमडो ग्रहस्य छेदै सो साधु ने मने करी
अनुमोदनो नही तथा वचन भने काया कगै
करावै नही।
(आचारांग धु० २०१३)
विनयाऽधिकारः।
१ दोय प्रकार नो विनय मूल धर्म कयो साधु ना
पञ्च महाबत ते साधु नो विनय मूल धर्म पने
श्रावक ना १२ व्रत तथा ११ पडिमा ते थावक नो
विनयमूल धर्म।
(शाता म०५)

( २१३)
२ पाडुराजा भने पाच पाण्डव माता कुन्ता सहित
नारद से विप्रदक्षिणा देई वन्दना नमस्कार कियो
घणो विनय कियो।
(शाना स०१५)
३ जिम पाणु नारद नो विनय कियो तिमहिल कृष्णा
पिण नारद नो विनय कियो।
(ज्ञाता अ०१६)
४ माधु गृहस्थादिक ने वादतो घको अशनादिक
नाचे नहीं।
(दशयेफाल्पि ० ५ उ०२ गा० २६)
५ पम्वड ने चेना धर्माचार्य कहो नमोरघुण गुण्यो ।
(उयचा म०१३)
६ धमाचार्य ने साधु कया।
(गयमसेणी
७ भरत चक्रवर्ती चक्र रब ने नमस्कार कियो।
(जम्बूदीप प्रमाप्ति)
८ तीर्घहर जन्म्या ते द्रव्य तौहरने इन्द्र नमोरघुण
गुण नमस्कार करें।
(जम्बूद्वीप प्रति)
८ इन्द्र एहवू कयो ने तीर्घहर नौ जन्म महिमा
फर ते म्हारो नौत पाचार पिए ये महिमा
धर्म हेतु कर हम नधो को।
(जम्मूदाय प्रति

१. सौर्थवार नी माता में इन्द्र प्रदक्षिणा देई नमस्कार
(जम्यूनीष)
११ परिहमादिक पाच पदानेज नमस्कार करयो
कायो।
(गन्द प्रति गा३२)
१२ मानुभूति पगागार गागाल में यमणा मारण नो
हिन विनय करवा कन्यो।
(मगाता ...)
१३ पठारह पाप में निवर्स हम मागा कया।
(गगन ०१५)
१४ मार नाम माधुरोहित्र कधी।
(भूगगडांग 5.भ..)
१५ वम म्यावर विवि नमोहन माल को
तया पर भी पशमवण माहबना बताया।
(अयान म.५, गा)
" ममम माउप म पतिथि नी माम को।
(भनुप'गam)
१०पार, परमा नाम बगे बीनाको को-
वाय। धार्मि। धर्म
प्रिय दानामा परी बीमारी
(प्र.३ ४."
-

पुण्याऽपिफागः।
,
पापाचो।
(arterfire.)
• गाहा
न्याय कर।
. पाप गोमin on लोधी।
Moreiv)
४ पपुण्ण मा yiम) प्रमाद को
मगर मम
(dunia.५)
५ या मी तु यम को।
(पन ..."
(पामा मे पण पर्यात पमयम करी छोय नाक
में अपने
(भगवा ०४१०१)
० नम्फ नातु ने नरक कहीं।
(उमाध्यापन witmec)
मग मरिमा पसानी ने मृग कयो।
(सापन म. गा०५)

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२१७)
१. क्रोधादिक ने भाव सयोगी कया ।
(अनुयाग द्वार)
११ क्रोधादिक ने भाव लाभ कयो।
(अनुयोग द्वार)
१२ अकुशल मनमे सुधयो कयो।
( उपराई)
१३ माठा भाव यो जानादिक ख।
( अनुयोग द्वार)
१४ पासव मे, मिथ्या दर्शनादिक ने नौवरा परिणाम
कधा।
ठाणाह
ठाणे)
सम्बराधिकार
१ पच सम्पर हार प्ररूप्या ।
(डार्णाग ठाणे ५३०२ तथा समवाया स०५)
२ बीष राजानादिफ छय लक्षण कया।
(उत्तराध्ययन अ०२८ गा० ११ १२)
३ चारित ने नौव गुण परिणाम कया।
(अनुयोग द्वार)
।४ मखर ने पात्मा कही।
(मगधनी २०१०)
२८

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आज्ञाऽपिकारः
--
धोतराग ना पग यकी बौष मा इयर्या क्रिया
(भा. १८३०८)
मम्यक मानता ने पसम्यक् पिप सम्यक् ।
(माचाग ५.१ ५.५)
(4) तीन उदय ना लेप लगावे तिपने मवली
दोष फली।
(दातम्म्म.)
पाप मोटी नदी एश माम मे ये वार पयश तीन
दार उतरवो यरूपे महो।
माधु
ननदो उतरवो को।
मयाराग.२.१.२"
पारी में मतो थको माध्यो नै माधु बाहिर कार्ट
तोपामा उल नौ।
गति में मिभापदिय बाहिर बारी
(स.)
--

। २२० )
जिनक आहागऽधिकारः ।
. रगडा पाहार भागधगणा कया।
उत्तरायपन म.गा०१२)
२ भगवन्त ठगडा ग्राहार लाधा कधा।
( भाग श्रु०१०१३०४)
३ धन्न अगागार न्हाविता पाहार नियो।
(भनुपर उयपाई)
अरम निरम तथा गातनादिक पाहार भोगयो।
मा नहप न फरिया।
( प्रश्न व्यापरण ०१.)
मृत्र पठनाऽधिकारः।
माधनहज मूव भगवा गे पाता दीधी।
(प्रश्न व्यापरण म.)
। माध मब भगो विगग मयादा कही।
(व्ययहार ०१०)
। अन्य तार्था न तथा गृहम्या न माधु सूव रूम बाचणी
देवे तथा दता न पनुमाद तो प्रायथित कयो।
(निशीय ०१५)

४ पाचार्य उपाध्याय नौ अगदोधी वाचणौ ग्रहै, तो
प्रायसित कयो।
(निशीथ उ०१६)
५ तीन नया वाचणो देवा भयोग्य कया।
(टाणा, ठाणे ३३०४)
६ थावका ने पर्थ रा नाण कया।
(उयवाई प्रम २०)
७ निगन्य ना प्रवचन ने सिद्धान्त कया।
(सूयगडाग धु०२ अ०२)
८ साधुनेदून शुद्ध धर्म ना प्ररुपणहार कया।
(सूयगडा० १ २० २१ गा० २४)
६ पभाजन ने सूब सिखावे त्याने परिहन्त नो पाना
ना उलड्नहार कया।
(सूर्य प्राप्ति पादु०२०)
१. अर्थ ने पिण सूय धम्मे' कयो।
(ठाणाङ्गटा०२३०१)
११ सूद पायी तीन प्रत्यनीक कया।
(भगवती श.८३०८)
१२ पवेन्द्रिय ना उपयोग ने श्रुत कयो।
(पत्ररणा पद २३४०२)
१३ भावथुत ना १. नाम पर्यायवाची कथा।
(अनुयोग र

। २२ )
निरकप क्रियाधिकारः।
-
-
१ पठारह पाप सं निवत्या कल्याणकारी कर्म बधे
(भगवती श०.०१०)
२ वन्दना करता नोच गोव खपाये।
(उत्तराध्यपन म०२॥ बोल १.)
३ धर्मकथा में शुभ कम यन्धे
(उत्तराध्ययन अ.२६ बोल २३)
४ व्यायच किया सोहर गोव बधै
(उत्तराध्ययन प्र० बाल)
५ तीन प्रकार गुम दोघायु वधे ।
(भगवती श.५७.६)
८ दग प्रकार कल्याणकारी कर्म बंधे।
(सांग टाणे १.)
० पठारह पाप सैया कर्कग वेदनीय कर्म बंधे पने
१८ पाप म निषस्या पारंग वंदनीय कर्म मध।
(माकी...
पोम पोलां वर्ग सोधर मोज गये
(ना.)
र प्राथ, मूत जोत्र, मतदुपहियां माता
बदनो धर्म ।

१. पाठ कर्म निपनापा नौ करपी नदी २ कही।
(मगरती ४०८ उ०.)
११ धर्म चि पगार ने तुम्बो परठवा नौ पाना
दीधी।
(माता म०१६)
१२ भगवान साधा ने गोगाले चर्चा करने की
पात्रा दौधौ तथा सर्वानुभूति ने विनीत कयो।
(भगवता श. १५)
१३ गुरु नो पाना पागधै तिष में विनीत कायो।
(उत्तराध्यपन भ.१०२)
नियन्याहाराऽधिकार
१ साधु प्राधा पाहार भोग तो ० कर्म टोना
पाडे।
(भपगटी०१३०१)
२ जान दर्शन पारित महया में पर्ये साधु पाहार
करें।
(साता म.२)
३ साधु मोक्ष ने पर्थे पाहार करें।
(MRI म.१८)

। २२४)
४ साधु नयणा तूं पाहार करे तो पाप कर्म बधै
नहीं।
(राकालिक ०४ गा०८)
५ साधु ना पाहार नौ इति असापद्य कही।
(दशकालिक म०५०१ गा. १२)
६ निर्दोष पाहार ना लेषाहार तथा देवणहार दोनों
शह गति में ना।
(दशकारिक म०५३०१ गा० १.०)
७ छव स्थानके करौ साधु पाहार करै तो पाना
उलधै नहीं।
(ठाणांगठा.)
निग्रन्य निद्राऽधिकार।
१ माधु रे यवाई कगे मावता पाप बंधे नहीं।
(दरावारिस ०४ गा.८)
२ "मुत्ते' नाम निद्रावत नौ है।
(रायकारिक म..)
वारक मुतो कांश वागतो खप्न देखें।
४ मिया धागे मार सोवो पौग्मो में निद्रामके।
(उत्तरायपन म.२५ गा1८)

५ पायो मे किनारे निद्रादिक कार्य करना कल्यै
नहीं।
(पृह कल्प उ०१ मोल ११)
६ पन्तर घर में निदा लेणो कल्यै नहीं।
(वृहत्वल्प३०३ पाल २६)
७ साधु मे भाव निदाइ करी नागतो कायो।
(भाचारामधु०१ २०३३०१)
एकाकि साधु-अधिकारः।
१ यामादिक का घश निकाल पैसार हुनै रिश
ঘন্য আমরা প্রায় স্থান ল মিথ বন্ধান্ধি
पणे न कल्प
(परहार ३०६)
२ यामादिक तथा मायादिक ने विपे घणा निकाल
पैमार हुवै तिहा पहनुया ते निगाध ना प्रमाण
त्याने एकाकि पणेन कल्प।
(प्यपदार ०६)
३ ग्रामादिश ना जुदा २ निकाल हु सिहा साधु
साध्वो न भेलो रहियो फल्ये।
(पृहत्यास उपयोट ५)

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-
१. गग द्वेष ने पमा एकलो कमो हि पिण
भिख्यामा में उलङ्गो न जाय ।
(उतराध्ययन ०१ गा.१२)
११ राग द्वेष ने पभाव एकलो कहो।
(उतराध्ययन म१गा०१.)
१२ जे राग द्वेष ने पभावे नानादि सहित एक्लो
विचरस्यु इम विचारो दोधा लेवे।
(मयमांग ४.१ भ०५३०१ गा)
१३ घर छाडो राग द्वेष ने प्रभाव एकन्नो विचर।
(उत्तराध्यया भागा०१६)
२४ तीन मनोरथ में चिन ने शिवारे एकलो
घई दाविधि यति धर्म धारो विचास्यू तेह नो
१५ गुरु कहो- विष्य में एकलपपोम होम्यो।
(भायाग.१०५३०४)
उद्धार पासमताधिकार
१ बडो नोति या लघु नोति पाठी ने पन्चे फरी
पूछे नही तथा पूया ने पामोदे नहो, यो प्राय
थित कनो।
(निरोप उ०४ बोल "

(२२८
-
२ उपार पामण पाठो काटादिपी करो पूशा
प्रायधिरा।
(शिपउ०४ पोल १३८)
३ उचार मासण पाठो ने शुचि न लेये पयवा
सठे चार ऊपर शघि लेवे पघया पति दूर
जाई शुचि लेये तो प्रायशित पाये
(शोध ०४ पोल १३६ से १४१)
४ दियसे तथा रावि तथा यिकाले पोता ना पावे
साधु
ने पावे उधार पासपग परठवीं
सूर्य रो ताप न पाघे तिहां म्हाणे तो दगड
पायै
(शोध ०३ योल ८२)
५ धन्नो सार्थवाह विजय घोर साथे एकान्ते नाई
उचार पासषण परठ्यो कयो।
(ता.२)
तथा पनेरा
कषिताधिकारः।
तीर्थइर ना जेतना साधु दु ते ४ बुद्धिई करो
सिराला पहन्ना करै।
(मन्दी पान पर्णन)

२ मतिजान ना दोय भेद १ श्रुत निशिरा र पथुरा
निशिता विहा के सूब चिना हो ४ बुद्धिा फगे
सूव सू मिलतो पर्य ग्रहण करै, सून विना हो
बुद्धि फेलावे ते भात निश्चित मतिज्ञान नो भेद
को छ। वनो कयो पूर्व दोठी नहीं सुण्यो
नही ते अर्ध तत्काल ग्रहण करै ते उत्यात नौ
बुद्धि पश्रुत निश्रित मतिज्ञान नो भेद कयो।
(साल पूर नदी)
३ ने भारत रामायणादिक मिथ्या दृष्टिना कौधा ते
मिथ्या दृष्टिरे मिथ्याल पपे ग्रह्या पर्ने सम्यग्राष्टि
सम्यक्त पणे गया।
(साब पूर नन्दी)
४ चार प्रकार ना काय कक्षा १ गयध२पा.
बन्ध ३ कथाकरी ४ गायवेकरो।
(Mrrenext.४)
५ गाथा करी वाणी करो, वाणी कयो एज्यु
कयो।
(इसराध्ययन २०१३ गा.१२)
६ बाजा र लारै ताल मेलो गाया दाइ कयो।
(निशा उ०१७ थाल १४.)

अल्पसाफ कहू निजराऽधिकारः।
--
१ नो श्रावक साधु ने सचित पने पसूझतो देवे, तो
अल्प पाप बहु निर्जरा हुवै तेह नो न्याय ।
(भगनती श०८ उ०६)
२ साधु ने अप्राशुक प्रणेपणोक पाहार दोधा पल्पा
युप वान्धै।
(भापती श०५३०)
३ साधु रे अशुद्ध माहार भभक्ष कयो।
(मगरती श. १८३०१०)
४ थायक ने प्राशुक एषयोक ना देवणहार का।
(उपाइ मन २०)
५ पानन्द श्रावक कन्यो कल्पे मुझ ने श्रमण नियन्थ
मे प्राशुक एपणोक भशनादिक देवो।
(उपासक दशा ०१)
(क) पाधा कर्मी अने प्रसूझतो पाहार ए निर्वद्य
है एहयो मन में धारै राधा प्ररूपे ते बिना
पालोया मर तो विराधक को।
(भगवती श०५०)
(ख) जे श्रावक प्राशुक एप पौक पशनादिक साधुमे
देई समाधि उपजावे, तो पायो समाधि पाव ।
(भगरती श...१)

६ शुद्ध व्यवहार करी मे पाधाकर्मी लियो निर्दोश
भाषी ने तो पाप न लागे।
(सूरगडा०२३०५०८६)
(क) वौतम बोयर घाले तेहयो कुक्क टादिक ना
पण्डादिक जीव हशीने तह ने मिण मापन
लागे। मुख्य नौ क्रिया लागे शुइ उपयोग
माटे।
(मगरती २०१८ ०८)
(ख) साधु याद फरी चालता बोध इपीने सो
सहन पिच माप न लागे। हावारी कामी
नहातमाटे।
(एपगाग ०१ ०४३०५)
० पल्प (नहीं) वर्षा में भगवान विहार कीधी।
(भगतो ४०१५)
८ पल्प प्रारी घोज जिहा ते म्यानमे साधु ने
पाहार करयो।
(उतराध्ययन १ गा०६५)
१ पल्प प्राथ योगादिक होवे तिय स्थान के शुद्ध
करी पाहार करवो
(आगरोप र म १३०१)
१. साधु रे वर्षे कियो उपाययो भोगवे तो महा-
माय क्रिया लागे। दोय पक्ष रो संशबहार यो

भने गुहस्य पोता रे अर्धे कोधो उपाथयो साधु
भोगबै तो एक शुद्ध पक्ष रो सेवणहार कयो भने
अल्प सावद्य क्रिया कही।
(आचारांग धु०२०२३०१)
-
कपाटाइधिकार
१ किमाड सहित स्थानक मन करी ने पिण वाणी
नही।
(उत्तराध्ययन अ०३५)
२ थोडो उघायो पिग्ण किमाड धणो उघायो हुवे
तेह ने पिण 'मिच्छामि टुक्कड' देवे।
(आवश्यकभ०४)
३ जागा न मिले तो सूनाधरने विधे रयो साधु
किमाड नडे उधाडे नहीं।
(सयगडांग श्रु०११०२३०२ गा०१३)
४ कण्टक बोदिया ते काटा नो साखा करी वारणो
ढो हुनै तो घणो नी भाजा मागो ने पूजकर
हार उघाडणो।
(थावाग ध्रु०२१०१३०५)
५ एहयो स्थानस साधु ने रहिमो नही ले उपाश्रय
माही लघु ग्रोति तथा बडो नोति मरठण से

धागा न कुवै पने गृहम्य वारला फिमाड पडता
पुबै शिधा पति ने पिम पाया पोडता किमाड
खोलना पडे ते जुला देखि मारे सम्कर पाये
बताया न बताया पाए उपनता कन्ना सर्व दोष
में प्रथम दीप किमाइ खोलने को कहो तिय
कारण साधु ने फिमाड खोलनो पड़े एहवे स्वान
के रहियो नहीं।
(मावाग ०२५०२३०२)
६ साध्वी ने उघाडे वारने रहियो नहीं किमाड न
हुये तो मोता नौ पनडी यांधी ने रहियो, पिष
उधाडे पारने रहियो नही कल्पगौलादि निमसे
किमाड मडयो पर्म साधु ने उघाड़े वारणे रहियो
कला।
(परस्पाप १)
नि सम्पूर्णम् ।
३०

तपस्वी हुासमलजी स्वामी को चौढालियो। RAL- ॥ दोहा ॥ गामन मायक वीर जिन, यो गोयम गधार । नमस्कार तमु फरि कई, तपसी गुण पधिकार ॥१॥ या भिक्षु मट पटम, काल गणि सिरताज । ताम प्रमाद प्रारभ्या, मिह होत मय काज ॥२॥ रस टुपम कनिशानमें, उत्तम बोव उदार । पम्प पवसर भाम्याग, मफल करमा समार ॥२॥ ग्टत मामलो मन थकी, कटत सास पधगम । घटत टुप भवभव तथा, पटत मुख पविनाग ॥४॥ बाड शना नही दर पिप, मध भक्ति वर प्राम। ग्ध करवटरमार दिम, करत मुनि गुचगान ।। ॥ ढाल पहली ॥ मियम गुणी-पी) प्रत टटो नित ममपिय, कार मुनि नाम गुप- पान । धिर मन नि यो वर्या, वार्ड पामे पश्चिम

स्त्राना
धिम्या गुण
वधा तप धारोजी, भारोमो
होजी ए तो मेषत मरण होत धनी पपगारोनी,
साहस का पारीबी ११॥ उगयोसै संतालीस में,
कार्तिक दशमी धन। सिद्ध योग सिह लगन में, कांधू
परसब्यो पुव रखा साम• ॥२॥ बंगापी कुल मिलक
सम काई सातवारीमल ।
मास तौजा घर उपना
काई साउनू पुख्य प्रवल आशा रतनचन्दनी गोलछा धी
मानू संग शुभ लग्न। इकसठ मा सुद पधमी, दम्पति
सम देव मगन ॥ ४ ॥ वधु वय विरता म राधा,
पाल सम्बन्ध निम धाय । फर्म पध भय पति घणे
काई याम्य पार माय ॥ ५ । बैठ दुकान पिको
कर, काई कलकता महा बाजार। दोस होम करी
यानता, कार्ड यो नो पघमार समयसार
जापी करो, काई करता पाविक राग। घडी घडी
मा बा दफा काई पाहा पापो ना त्याग ROR लही
पसरजिन धर्म नो, काई मर्म कई समझाया कर्मचार्ग
হামলা, শরাব লি সায়ন বলল চুলায়
मल, फाई फार्म नाम पिए मार्यमय मनारयो, रह
कि भार उर पाप : एकदा देगी पावता
काई रेल टुर्घटना देश। हट सिधागीलनी कार्ड
पायो थेराग विमेष... यौवन वय
वियो,
-

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( 1२४०) पाधर्म नौ, काई पारणा सेयीस पाय। मिलिया ट्रय दश सूजताजी, लहै एक ट्रय मुनिराय ॥ ४ ॥ चिणा सेक्योडा होला गहूजी, काई भौजी चिणा को दाल । घाट मको खिष बाजरोजी, पुन चायल मूग मिसाल फलका जो अरु गेडू तणाजी, काई ढोकला थलो निहाल | एह दश व मिल्या तकाजी, लिया दोषण जग कर टाल ॥ ६ ॥ सायन शुझा चौथ मे जो, काई पारयो पाच नोभाय । रावे गर्म प्रयोग यो जी, काई वेदन उत्पती याय ॥on यहुल पणे पचेतनाजी, कोई दोय दिना रे माय । लह चेतना खाम भणेजी, मम पौषधि नाहि देवाय ॥ ८॥ पूरय पुण्य उदय थकी लो, मुझ छठ दिन दर्शन याय । पमिलापा बहु दिन तोत्री, यई पूरण चित्त षिकसाय ॥६॥ खाम सुपार्व कधापकाजी, बामौ मुझ बन्दया खोकार । पूरे गप- पति गप सपानी, बाई प्रेम धरी समाचार ॥१॥ कई सिह तप छ माननी दो, फाई करण पार पातरिक्ष । पिण ते नहीं दिसे होवतो वी, काई मुझ मन पा पधिक ॥ ११॥ भाव बहुविध भावनामी, काई एशत पाभव दिए। पौषधि ना लहे दृढ मनेत्री, काई धपत नाप निन इष्ट ॥ १२॥ कछु साता पिण दन्तरोत्री, काई कारण पधिको थाय । पिप माइसिक . -- पणो धोनी, काई देशरा लन मन भाय ॥ १३ ॥ सावन मुद एकादशी मी काई पारशे पट दिन माप पाहार लेत सन वेदनावो, देवी कोध घ्यार पचवाएं ॥ १४॥ पारस दिन उग्या पहलेजो, कयो पाचोरामजी में सोय । भाया प्रते पूशे तुमेजो, एह उगमी विधी कुर होय ॥ १५ ॥ दिन उदय सड़ बन प्रतेजी, स्वामी दर्श दिये हितकाल । भरनारी मदइ यो मौ, काई भेच्या मुनि गुरु विहान १६॥ साधन सुका बादशी वी, पजे प्रात पनुमान | सन्म सिंह लम्न पायां घशायो, खामी माता व विमान ॥ १० ॥ नागरिक धन व परमतोषी, काई म मुष वय वयकार: एा तपसौ टुर्लभेवी, काई उपायो पथम पार ॥११ माटो पहाड रकमठ पपीतोकाई धापो देव पिमान। राब लशन म मध घ्याषी, धन मधीमी पनुमान her चार बने गद गुलसनेत्रो, कार देशात पर- धन हन्द । दाग पन्दा त गोपानी, कार ससा- रिख एन्द तुम गुर प्रतिशिल म पोत्री, कोई पति दिव उरमान पण्डित मरए पयो भलो वी, पातोशी टाल में दान : २१. - १

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भावे वग विरला शूर । व्रत रस दिव्य राखया, रशा कर्म रन यो दूर ॥ on बैगग्य मय उद्यान मे, फाई विषया मुनि शुभ ध्यान। सन्याय ध्यान सरोवरे, काई भल्या महामतिमान ॥८॥ विनय विवेमा विचारना, साई पाप तमो सिरोकार । पाल्यो अधिया वैराग सुं खा, काई व्रतगन ब्रह्मचार ॥६॥ पागम पर्ध नौ धारणा, वह वाचण मन पान्तरिक । जाखा सार सुख मुसना बो, काई पनित्य जाण्या पुद्गलोक ॥१०॥ वचन रचन पर्या विषे, काई यर तोरडो उपयोग। विगय बहुल पो छोडसाजो, काई काटस भवभय रोग ॥ ११ ॥ ध्यावे ले तुम पही निणाजी, काई तेह परवल पुण्य जोग। चाप चिन्तामणि समोली काई पूरण पाय मनोग्य ॥ १२ ॥ शोजिन धौर पखापियो, कार्य धन धनो पपगार । गपि गुप तुम पनुमोदना काई करो मन पधिक उदार ॥ १३ ॥ पानन्द करण शग्य भलो, तुम बीयन पर उपगार। मन्वायर जिम नाम तुम, काई भगरा मने सुखकार ॥ १४॥ यालक मा जिम मात में, काई लोलुप धन पमिलाय। पतिव्रता पिउ मन पसे, जिम वाम नाम उरवास ॥ १५ ॥ घातक खातो बून्द नो, इछुक दृढ गौर न गन । स्मरण पन्न पल ध्यावता, जिम शुभर फटलो पन ॥ १६ ॥ देयो

(२४४ )
ध्यार कहि भलौली, काई चाइस आत एक चाला
शहर कलकत्ता मायनेजी, काई एकही चौथी ढाल
॥ १०॥ पोइ सुद टूज छियासिये, सौस अग्रेजी
भाज । सरस हयं गुप गाविया तुम मामाज नमाज
धुर

॥ धन्ना ऋाप की सज्माय ।।। - योलिनषाधीरे धन्ना, पमियममापी मोगनन्दन। मनडै तो मानौ रे नन्दन ताहरे ॥ १॥ त पतहि वैगी रे धना धरमनो गगी मोग नन्दन । महारो तो मनडो रे किम परपावसू ॥ २॥ दश दिगि दौमै धना, तो विन सुनी मोरा नन्दन। पनुमति देता रे लोभ ष नहीं ॥३॥ वतोस नारी हो धन्ना, पहि पियागे मो. वाणी तो वोले रे मधुर मुहामणी ॥४॥ बालक तो रमणी रे धन्ना, वय मिण समणी मो.। गजगति चाले चाल सुहामको ॥ ५ ॥ ए घर मन्दिर हो धना, ए मुख सन्या, मो•। कोड बत्तीस धननो त धणी ॥ ६ ॥ ए धन माणो रे धन्ना, पय पिया माणो, 1.1 भोगवी लेग्यो रे भोग मुहामणा ॥ ॥ व्रत पति दोहिलो रे धना, नहि है मोहलो, मो. । सुगम नहीं छ रे माध कहावो।८। घर २ रौ भिक्षाही धन्ना, गुरु तणी शिक्षा, मो०। कहणी रे रहो नहीं मो. नामी

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Jin Gyan Parhash

Author
Jaskaran
Title
Jin Gyan Parhash
File name
Jin Gyan Parhash
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2011/08
Publisher
Kalkatta,pavit Press
Language
Sanskrit
Pages
242
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313893
Barcode
99999990311275.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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