Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur

Dev Sastra Guru Vani

2010/06

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Front matter

पुस्तक प्राप्ति का स्थान
1 श्री विरेन्द्र कुमार जैन
(कपड़े के थोक व्यापारी)
जैना टैक्सटाइल्स
कटरा लेस्वा चादनी चौक
दिल्ली-6, फोन न. 2918797
.
2 एम. एस. जैन
107/63-सी ईस्ट आजाद नगर
कृष्णा नगर दिल्ली-110051
फोन न.2240705
पचम सस्करण
1000 प्रति
.
-
दशलक्षण के शुभावसर पर
मूल्य सदुपयोग
लेजर टाईपसैटिग
जैन कम्पयूटरस
126 वेस्ट आजाद नगर
कृष्णा नगर दिल्ली
मुद्रक
आर वी. प्रिटर
भोला नाथ नगर रामा ब्लाक
शाहदरा दिल्ली-32

आचार्य कुन्दकुन्द वाणी
१
पुण्य से धन होता है,
धन से अभिमान,
अभिमान से बुद्धिभम.
बुद्धियम से पाप होता है।
इसलिए ऐसा पुण्य
हमारे न होवे ।
२ जिस प्रकार पेड के पके फल गिरने पर पुन डाली पर नहीं जुडते,
वैसे ही जीव के कर्म भाव खिर जाने पर पुन जीव के साथ नहीं
जुडते ।
३ काम, क्रोध और मोर ज्यो-२ मनुष्य
छोडते जाते हैं, दुख
भी उनका अनुसरण करके धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं।
४ धर्म उत्कृष्ट मगल है।
अहिंसा, सयम और तप, ये धर्म हैं।
जिसका मन सदा धर्म मे रहता है,
उसका देवता भी नमस्कार करते हैं।
५ धर्म मनुष्य को स्वर्ग ले जाता है और सत्पुरूपो की सगति उसे
धर्माचरण म रत करती है।
स्वाध्याग आत्म कल्याण का साधन है।
स्वाध्याय परम तप है।
६
भारतl giri- पर्यन केन्द्र
जयपु

-
स्वाध्याय से श्रद्धा, श्रद्धा से ज्ञान, और ज्ञान से चरित्र म निर्मलता
आती है।
६ चरित्र उज्जवल बनाये रखने के लिए मोह कम करने के लिए,
ससार से विरक्ति-भाव रखने के लिए स्वाध्याय में रत रहना
चाहिए।
१० आत्मदर्शन ही तीर्थदर्शन हैं।
११ मन की परमशुद्धि सभी तीर्थों मे बडा तीर्थ है।
१२ आत्म धर्म जगसार है, यही कर्म क्षयकार।
यही सहज सुखकार है, यही भरम हरतार ।
यही धर्म उत्तम महा यही शरण धरतार।
नमन करूँ इस धर्म को, सुख-शाति दातार ।
१३ अहिसा परमोधर्म ही सच्चा जानो।
जो पर को दुख दे, सुख माने उर्स पतित मानो।
१४ सम्यक् दर्शन के बिना कोई धर्मात्मा नहीं हो सकता।
१५ अहिसा मे ही धर्म है। अहिसा आत्मा मे है बाहर नहीं । यदि मन
मे, आत्मा मे, अहिसा नहीं, तो बाहर भी केसी होगी।
१६ क्षमा वीरस्य भूषण।
१७ उत्तम क्षमा जहा मन होई।
अन्तर बाहर शत्रु न कोई।
१८ तत्वज्ञानी नरक मे भी होगा तो सुखी होगा ओर जो तत्वज्ञानी
नहीं है, वह स्वर्ग मे भी दुखी रहेगा, तत्वज्ञान परिपक्वज्ञान है,
अनुभवपूर्ण ज्ञान है, सुख देने वाला है. अमर बनाने वाला है।
१६ भाव पूजा मे मन नहीं लगता हो तो द्रव्य पूजा कितनी भी करते
चले जाइए उसका कोई महत्व नहीं है।
२० दान भी परम्परा से मुक्ति का कारण है। महावीर ने देना सिखाया
है मागना नहीं।

प्रकाशक के दो शब्द यह हमारा सौभाग्य है कि दशलक्षण पर्व के शुभ व पुण्य अवसर पर देव-शास्त्र-गुरूवाणी पूजा सग्रह नामक पुस्तक का प्रकाशन कर रहे हैं। इस पुस्तक मे नित्य पूजन व पाठ करने की सामग्री का विशेष ध्यान रखा गया है जिससे हमारी यह पीढी एक ही पुस्तक के माध्यम से धर्म लाभ उठा सके। इस पुस्तक मे नित्य पूजा व पाठ, हिन्दी भक्तामर स्तोत्र, विभिन्न चालीसा, आरती, जैन व्रत कथा एव जैन तीर्थों का समावेश किया गया है। इस पुस्तक के माध्यम से अपनी नव पीढी मे धर्म चेतना जागृत करने का प्रयास किया है। इस प्रयास मे थोडी भी धर्म चेतना (नित्य मन्दिर जो जाना, पूजन व पाठ करना, स्वाध्याय करना, आरती करना तथा भक्ष व अभक्ष का ध्यान रखना) जागृत हुई तो प्रयास सफल होगा। इस पुस्तक मे जिन विद्वानो की रचनाओ का सग्रह किया हे मैं उनका हदय से आभारी हूँ। इस प्रकाशन के माध्यम से मैं आशा करता हूँ कि युवक तथा श्रावक वर्ग मे इससे धर्म प्रेम की भावना उत्पन्न होगी तथा धर्म लाभ उठायेगे। -मदन सैन जैन विषय सूची क० विषय पृष्ठ क० विषय पृष्ठ १ मगलाष्टक स्त्रोत १ २२ श्री महावीर स्वामी जिन पूजा ६३ २ दर्शन पाठ ४ ०२३ समुच्चय महार्य ६७ ३ तीथकरो के नाम ५।२४ शाति पाठ (शास्त्रेक्ति विधि) ६८ ४ देव स्तुति ६ ३२५ विसर्जन पाठ (सपूर्ण विधि) ६६ ५ जलाभिषेक पाठ ७ २६ अर्घावली ७० ६ प्रतिमा प्रक्षल पाठ १० २७ भजन ८३ नित्य नियम पूजा ८४ ७ विनय पाठ दोहावली १३ २८ भाषास्तुति नैमिन्तक तथा पर्व पूजा २६ निर्वाण क्षेत्र पूजा ८६ ८ १५ ३० पचमेरू पूजा १० ३१ नदीश्वरद्वीप पूजा ६१ ३२ सोलहकारण पूजा ६४ ३३ दशलक्षण धर्म पूजा १०० ३२ ३४ रत्नत्रय पूजा १०५ भजन (श्री जी मै थाने) ६ पूजा पीठिका (सस्कृत १६ पूजा पीठिका (हिन्दी) ૧૬ ~११ श्री देव शास्त्र गुरू पूजा २३ (घानतराय जी कृत) १२ समुच्चय पूजा (देव शास्त्र गुरू) २८ १३ देव शास्त्र गुरू पूजा (युगल जी कृत) १४ श्री बीस तीर्थकर पूजा (भाषा) ३६ १५ समुच्च चौबीसी पूजा (वृन्दावनलाल कृत) A६ सिद्ध पूजा ४१ /१७ श्री आदिनाथ जिन पूजा ४४ १८ श्री पदम प्रभु जिन पूजा ४८ १६ श्री चद्रप्रभू जिन पूजा (देहरा) 26 श्री शातिनाथ जिन पूजा ५६ २१ श्री पार्श्वनाथ जिन पूजा ५६ ३५ श्री बाहुबली की पूजा १११ ३८ L३६ सरस्वती पूजा ११६ ३७ हस्तिनापुर तीर्थ क्षेत्र पूजा ११८ ३८ दीपावली पूजन १२२ ३६ सप्तर्षि १२६ पूजा (कविवर मनरगलाल जी) ४० पच बालयति तीर्थकर पूजा १२६ ४१ रविव्रत पूजा १३३ अन्य तीर्थकर पूजा क० विषय पृष्ठ क० पिपय पृष्ठ २२० ४२ श्री कलिकुड पार्थनाय जिन-पूजा ३७ १३ १ज्य परमेष्ठी पूजन १४६ (हाथी) अजितना १४४ २२४ ६४ क्षमावाणी पूजा १५ श्री णमोकार मत्र पूजन ६६ श्री सम्मेद शिखर पूजन ६७ श्री वापिगडल पूजा (गापा) २२७ जिा पूजा २३८ ४५ श्री सापनाथ (अर) १४८ ६८ नकार अरिष्टनिवारक विधान २४६ ६ी मादा (दर) १५१ ६६ श्री अमिन पावाथ पूजन સ્કૂલ १५७ नव देवता पूजन २५६ १६१ ७१ शाति पाठ २५६ ૧૬૬ ७२ विसर्जी २६० १७० ७३ गुरू स्तुति २६० १७४ ७४ दुख हरण विगती २६१ २६१ १८२ २६४ १८५ १७ श्री सुमति (गया) ४८ की सुपारनाथ (सापिया) ४६ चन्द्रा (पटना) ५० श्री पुष्पदत (गर) ५१ श्री शीतलनाथ (पी :) ५. श्री श्रेयास (गे) ५३ श्री वासुपूज्य (fr)) ५. श्री विलाथ (रकार) ५५ श्री अनतनाथ (11) ५ श्री धर्म (पज) ५७ श्री कुन्पुनाथ (करा) ५८ श्री अरहनाथ (मीन) ५६ श्री मल्लिनाथ (कुन) ६० श्री मुनिसुव्रतनाथ (कधुआ) ६१ श्री नमिनाथ (कमल) ६२ श्री नेमिनाथ (शख) २६४ ७५ सित्तचना की स्तुति ७६ पार्श्वनाथ स्तुति ७७ प्रात काल स्तुति ७८ सायकाल स्तुति ७६ इष्ट प्रार्थना सम्बोधन c૬ २६५ १६२ २६६ १६५ आलोचना पाठ २६७ १६६ मेरी भावना २६६ . २०५ ८२ बारह भावना (सुधरदास कृत) २७१ ८३ घारह भावना (मगतरायजी कृत) २७२ २०७ २११ ८४ मेरी चाह २७६ २१४ ८५ समाधीमरण भाषा २७७ ६३ स्वयभू स्तोत्र भाषा २१८ ८६ श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र २७६ क० विषय पृष्ठ क० विषय १ २७६ तीकाका 1ि 304 ८७ भक्तामर स्तोत्र (भाषा) (श्री प० हेमराज जी कृत) चालीसा सग्रह १०८ पाच कल्याण १०६ र मानातिनाम श्री आदिनाथ चालीसा २८५ १" ८८ चार - 177 चारातिया कम ८६ श्री पदमप्रभु चालीसा २८७ ६० श्री चन्द्रप्रभु चालीसा (तिजारा) २६६ ११२ ममामरण की गिगा ३, ६१. श्री शातिनाथ चालीसा २० १13 r' दाग ६२ श्री पार्श्वनाथ चालीसा २६३ ११४ पा" भाग C ६३ श्री महावीर चालीसा २५ ११५ प्रकार के का ३० ११६ चार चक्रवती आरती सग्रह ११ वक के fm ६४ पच परमेष्ठी की आरती ર૬૬ ११८ ३ J ६५ चन्द्रप्रभु जी मी आरती २६७ ११६ अपर गृल्गुन ६६ श्री शातिनाथ जी की आरती ર૬૯ १२० ३.3 दशलक्षण धम जैन व्रत कथा ६७ श्री महावीर स्वामी की आरती २६६ ६८ चौबिसो भगवान की आरती २६६ १२१ दशलक्षण व्रत कथा 301 ६६ आरती श्री जिनराज की ३०० १२२ अनन्त चौदश व्रतकथा ३११ १०० सरस्वती वदना ३०१ १२३ सुगध दशमी व्रत कथा ३१७ १०१ भजन-मत्र जपो नवकार ३०२ १२४ अरहत पासा केवली ३७ १०२ विनती प्रभु दर्श ३०२ १२५ आत्म कीर्तन ३२ १०३ विनती ३०३ १२६ ३३२ १०४ आरती पदमावती माता ३०३ शास्त्रजी को नमस्कार करने के कवित तीर्थों का महत्व १०५ सक्षिप्त सूतक विधि ३०४ १२७ ३३३ १२८ जैन तीर्थों की सूची ३३४ १०६ पच परमेष्ठी के नाम ३०५

श्री जिनेन्द्राय नम
o
श्री मंगलाष्टक स्तोत्र
श्रीमन्नम-सुरासुरेन्द्र मुकुट प्रद्योत-रत्नप्रमा
भास्वत्पादनखेन्दव प्रवचनाम्भोधीन्दव स्थायिन ।
ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठका साधव
स्तुत्या
योगिजनैश्च पञ्चगुरव कुर्वन्तु ते मगलम् ।।१।।
अर्थ---शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रो के मुकुटो के
चमकदार रत्नो की कान्ति से जिनके श्री चरणों के नखरूपी चन्द्रमा की ज्योति
स्फुरायमान हो रही है। और जो प्रवचन रूप सागर की वृद्धि करने के लिए स्थायी चन्द्रमा
हैं एव योगिजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं ऐसे अरिहन्त सिद्ध आचार्य उपाध्याय
और
साधु ये पाचो परमेष्ठी तुम्हारे पापो को क्षालित करें और तुम्हे सुखी करे ।।१।।
नाभेयादिजिना प्रशस्त-वदना ख्याताश्तुर्विशति
श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो ये चक्रिणोद्वादश।
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लागलधरा- सप्तोत्तरा विंशति
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषा कुर्वन्तु ते मगलम्।।२।।
अर्थ-तीनो लोकों मे विख्यात और बाह्य तथा आभ्यन्तर लक्ष्मी सम्पन्न ऋषमनाथ
भगवान आदि चौबीस तीर्थकर श्रीमान् भरतेश्वर आदि १२ चक्रवर्ती नव नारायण नव
प्रतिनारायण और नव बलभद्र से ६३ शलाका महापुरुष तुम्हारे पापों का क्षय करें और
तुम्हें सुखी करें।।२।।
ये सर्वौषधि-ऋद्धय सुतपसा वृद्धिंगता पञ्च ये,
येचाष्टाङ्ग-महानिमित्तकुशलाश्चाष्टौ विधाश्चारिण ।
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनोये बुद्धिऋद्धीश्वरा
सप्तैते सकलाचिंता मुनिवरा कुर्वन्तु ते मगलम्।।३।।
अर्थ~सभी औषधि ऋद्धिधारी उत्तम तप ऋद्धिधारी अवधृत क्षेत्र से भी दूरवर्ती
विषय के आस्वादन दर्शन स्पर्शन घ्राण और श्रवण की समर्थता की ऋद्धि के धारी
अष्टाङग महानिमित्त विज्ञता की ऋद्धि के धारी आठ प्रकार की चारण ऋद्धि के धारी
पाच प्रकार के ज्ञान की ऋद्धि के धारी तीन प्रकार के बलों की ऋद्धि के धारी और

२ देव शास्त्र गुरू वाणी बुद्धि-ऋद्धीश्वर ये साता जगत्पृज्य गणनायक तुम्हारे पापा का क्षालित कर और तुम्न सुखी बनावे । बुद्धि क्रिया विक्रिया तप बल औषध रस और क्षेत्र का भी गाड़िया के आठ भेद है।।३।। ज्योतिय॑न्तर-भावनामरगृहे मेरा कुलाद्रो स्थिता जम्वूशाल्मलि-चैत्य-शाखिषु तथा वक्षार-रूप्यादिषु। इक्ष्वाकार-गिरोच कुण्डल-नगे द्वीपे च नन्दीश्वरे, शैले ये मनुजोत्तरे जिन-गृहा कुर्वन्तु ते मडगलम्।।४।। अर्थ--ज्योतिषी व्यतर भवनवागी और वैमानिका के आवागा क मना कुलाचलो जम्मू वृक्षा और शाल्मलिवृक्षा वक्षारा विजयाओं पर्वता इभ्याकार पवता कुण्डल पर्वत नन्दीश्वर द्वीप और मानुषात्तर पर्वत (तथा रुचिक वर पर्वत) क नगी अकृत्रिम जिन चैत्यालय तुम्हार पापा का क्षय कर और तुम्ह सुयी बनाव ।।८।। कैलासे वृषभस्य निर्वृतिमही वीरस्य पावापुरे। चम्पाया वसुपूज्यसज्जिनपते सम्मेदशेलेऽहंताम्। शेषाणामपिचोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्याहत निर्वाणावनय प्रसिद्धविभवा कुर्वन्तुते मङगलम्।।५।। अर्थ--भगवान ऋषमदेव की निर्वाणभूमि-कैलाश पर्वत पर है। महावीरस्वामी की पावापुर में है। वासुपूज्य स्वामी की चम्पापुरी मे है। नेमिनाथ स्वामी की ऊर्जयन्त पवत के शिखर पर और शेष वीस तीर्थकरो की निर्वाणभूमि श्री सम्मेदशिखर पर्वत पर है जिनका अतिशय और वैभव विख्यात है। ऐसी ये सभी निर्वाण भूमिया तुम्हे निष्पाप यनादे और तुम्हे सुखी करे ।।५।। यो गर्भावतरोत्सवो भगवता जन्माभिषेकोत्सवो, यो जात परिनिष्क्रमेण विभवो य केवलज्ञानमाक् । य कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा सम्पादित स्वर्गिभि कल्याणानि य तानि पञ्च सतत कुर्वन्तु ते मडगलम् ।।६।। अर्थ--तीर्थकारो के गर्भकल्याणक जन्माभिषेक कल्याणक दीक्षा कल्याणक केवलज्ञान कल्याणक और कैवल्यपुर प्रवेश (निर्वाण) कल्याणक के देवो द्वारा सम्भावित महोत्सव तुम्हे सर्वदा माडगलिक रहे ।।६।। जायन्ते जिनचक्रवर्ति-बलभृद्-भोगीन्द्र कृष्णादयो, धर्मादेव दिगडगनाडगविलसच्छश्वद्यशश्चन्दना । तद्धीना नरकादियोनिषु नरादुख सहन्ते ध्रुवम्, सस्वर्गात् सुख-रामणीयकपद कुर्वन्तु ते मङगलम्।।७।।

३ देव शास्त्र गुरू वाणी अर्थ--दिशाओ रूपी ललनाओ के अगो पर लगे हुए चन्दन की सुगन्धि के समान शाश्वत यश पाले जिनेन्द्र देव चक्रवर्ती बलभद्र भोगीन्द्र और कृष्ण आदि जिस धर्म से उत्पन्न होते हैं और जिस धर्म के विना मनुष्य नरक आदि योनियो मे अनन्त काल तक दुख सहते रहते हैं स्वर्ग आदि सुखो से युक्त रमणीय पद को प्रदान करने वाला वही धर्म तुम सबका कल्याण करे ।।७।। सो हारलता भवत्यसिलता सतपुष्पदामायते, सम्पद्येत रसायन विषमपि प्रीति विधत्ते रिपु । देवा यान्ति वश प्रसन्नमनस कि वा बहु महे, धर्मादेव नमोऽपि वर्षतिनगै कुर्वन्तुतेमडगलम्।।८।। अर्थ--धर्म के प्रभाव से सर्प माला बन जाता है तलवार फूलो समान कोमल बन जाती है विष अमृत बन जाता है शत्रु प्रेम करने वाला मित्र बन जाता है और देवता प्रसन्न मन से धर्मात्मा के वश मे हो जाते हैं। अधिक क्या कहे धर्म से ही आकाश से रत्नो की वर्षा होने लगती है वही धर्म तुम सबका कल्याण करे।। || इत्य श्रीजिन-मडगलाष्टकमिद सौमाग्य-सम्पत्करम्, कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थडकराणामुष । से शृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनै धर्मार्थ-कामान्विता लक्ष्मीस्प्रयतेव्यपाररहिता निर्वाण-लक्ष्मीरपि।।। अर्थ---सौभाग्यसम्पत्ति को प्रदान करने वाले इस श्री जिनेन्द्र-मडगलाष्टक को जो सुधी तीर्थकरो के पचकल्याणक के महोत्सवो के अवसर पर तथा प्रभातकाल मे भावपूर्वक सुनते और पढते हैं वे सज्जन धर्म, अर्थ और काम से समन्वित लक्ष्मी के आश्रय बनते हैं और पश्चात् अविनश्वर मुक्तिलक्ष्मी को भी प्राप्त करते हैं ।।।।।

४
देव शास्त्र गुरू वाणी
|| श्री वीतरागाय नम ।।
देव-शास्त्र-गुरू वाणी
दर्शन पाठ
(मन्दिर जी मे वेदीगृह मे प्रवेश करते समय)
"ॐ जय जय जय नि सहि नि सहि नि सहि ।"
फिर भगवान के सामने खड़े होकर नीचे लिखा पाठ पढे ।
ओ३म नम सिद्धेभ्य ओ३म नम सिद्धेभ्य ओ३म नम सिद्धेभ्य ।
ओ३म जय जय जय । नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु ।
णमोकार महामंत्र
णमा अरिहताण, णमो सिद्धाण, णमो आइरियाण ।
णमों उवज्झायाण, णमो लोए सव्व साहूण ।
एसो पच णमोकारो, सव्व पावप्पणासणो ।
मगलाण च सव्वेसि, पढम होइ मगल
।
ॐ हीं अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नम ।
/ मंगल पाठ
चत्तारि मगल, अरहता मगल, सिद्धा मगल
साहू मगल, के वलिपण्णत्तो, धम्मो मगल
।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरहता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा ।
साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो, धम्मो लोगुत्तमो ||
चत्तारि सरण पव्वज्जामि, अरहते सरण पबज्जामि ।
सिद्धे सरण पव्वज्जामि, साहू सरण पबज्जामि ।।
के वलिपण्णत्त धम्म सरण पव्वज्जामि
ॐ नमो अर्हते भगवते स्वाहा, पुष्पाजलि क्षिपामि ।।
-

देव शास्त्र गुरू वाणी ५ वर्तमान २४ तीर्थकरों के नाम व चिन्ह १ आदिनाथ (बैल) ३ सम्भवनाथ (अश्व) ५ सुमतिनाथ (चकवा) ७ सुपार्श्वनाथ (साथिया) ६ पुष्पदत (मगर) ११ श्रेयासनाथ (गेडा) १३ विमलनाथ (शूकर) १५ धर्मनाथ (वज) १७ कुन्थुनाथ (वकरा) १६ मल्लिनाथ (कुम्भ) २१ नमिनाथ (कमल) २३ पार्श्वनाथ (सर्प) २ अजितनाथ (हाथी) ४ अभिन्दननाथ (बन्दर) ६ पद्मप्रभ (पद्म चन्द्रप्रभ (चन्द्रमा) १० शीतलनाथ (कल्पवृक्ष) १२ वासुपूज्य (महिष) अनन्तनाथ (सेही) १६ शातिनाथ (हिरण) १८ अरनाथ (मीन) २० मुनि सुव्रतनाथ (कछुआ) २२ नेमिनाथ (शख) २४ महावीर स्वामी (सिह) १४ अर्घ चढाने का मंत्र उदकचदनतदुलपुष्पकैश्चरूसुदीपसुधूपफलार्धकै । धवलमगलगानरवाकुले, जिनगृहे जिननाथमह यजे ।। ॐ हीं श्री अर्हत सिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्योऽयं निर्वपामीति स्वाहा। गन्धोदक लेने का मंत्र निर्मल निर्मलीकरण पवित्र पापनाशकम् । जिनचरणोदक वन्दे कर्माष्टकविनाशकम् ।। निर्मल से निर्मल अति, अघनाशक शुचिसीर । बदू जिन अभिषेककृत, यह गन्धोदक नीर ।।

૬
देव शास्त्र गुरू वाणी
'देव-स्तुति (दर्शन पाठ)
।
प्रभु पतित पावन मै अपावन, चरण आया शरण जी ।
यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरण जी ।।
तुम न पिछान्यो आन मान्यो, देव विविध प्रकार जी ।
या बुद्धि सेती निज न जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी ।।१।।
भव विकट वन मे करम वैरी, ज्ञान धन मरा हरणे ।।
तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति धरती फिरयो ।।
धन घडी यो धन दिवस यो ही, धन जन्म मरो भया ।
अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभुजी को लख लया ।।२।।
छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा पे धरे
वसु प्रतिहार्य अनन्त गुणयुत कोटि रवि छवि को हर ।।
मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आतम भयो ।
मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रक चिन्तामणी लयो ।।३।।
मै हाथ जोड नवाय मस्तक, वीनऊँ तुम चरण जी ।
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोक पति जिन, सुनहु तारन तरन जी ।।
जॉचू नहीं सुर वास पुनि नर राज परिजन साथ जी ।
'बुध' जॉचहूँ तुव भक्ति भव भव, दीजिए शिवनाथ जी ।।४।।
भगवान के दर्शन करने की स्तुति
हे देव आपका दर्शन कर, चिन्तामणि फीकी पाई है ।
अरू कामधेनु औ कल्पवृक्ष जुगनू सम पडे दिखाई है ।।१।।
हे देव आपका दर्शन कर, मन हर्ष सहित पुलकाया है ।
उस हर्ष रूप के कारण ही ऑसू मिल बाहर आया है ।।२।।
हे देव आपका दर्शन कर, चहूँ दिशा बेल फैली पाता
वो बिना फूल के फल देती, आकाश रत्न वर्षा करता ।।३।।
हे देव आपका दर्शन कर भवि जीव मुदित हो जाते हैं ।
जैसे रवि किरणे पाकर के, दल कमलो के खिल जाते हैं ।।४।।

७
देव शास्त्र गुरू
पाणी
है देव आपका दर्शन कर मम हदय कमल खिल जाता है ।
ज्यो पूर्ण चन्द्र को पाकर के, जल सागर का उमगाता है ।।५।।
मैं शान नेत्र से दर्शन कर, प्रभुमय ही में हो जाता हूँ ।
मैं राग द्वेष मोहादिक सभी, मैं निज मे लख नहीं पाता हूँ ।।६।।
जलाभिषेक पाठ
(दोहा)
जय जय भगवते सदा मंगल मूल महान ।
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु नौ जोरि जुगपान ।।
(अडिल्ल और गीता)
श्रीजिन जग मे ऐसो को बुधवत जू ।
जो तुम गुण वरननि करि पावै अन्त जू ।।
इन्द्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनि ।
कहि न सके तुम गुणगण हे त्रिभुवन धनी ।।
अनुपम अमित तुम गुणनि वारिधि ज्यो अलोकाकाश है ।
किमि धरे हम उर कोष में सो अकथ गुण मणिराश है ।।
पैजिन । प्रयोजन सिद्धि की तुम नाम ही मे शक्ति है ।
यह चित्त में सरधान याते नाम ही मे भक्ति है ।।१।।
ज्ञानावरणी दर्शन-आवरणी भने
कर्म मोहनी अन्तराय चारो हने ।।
लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान मे
इन्द्रादिक के मुकुट नये सुरनाथ मे ।।
तब इन्द्र जान्यो अवधि तें, उठि सुरनयुत वदत भयौ ।
तुम पुण्य को प्रेरयो हरि है मुदित धनपति सौं कह्यो ।।
अव वेगि जाय रचौ समवसृति सफल सुरपद को करौ ।
साक्षात् श्री अरहत के दर्शन करौ कल्मष हरौ ।।२।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ऐसे वचन सुने सुरपति के धनपति । चल आयो तत्काल मोद धारै अति ॥ वीतराग छबि देखि शब्द जय-जय कह्यो । देय प्रदच्छिना बार बार वदत भयौ ।। अति भक्ति भीनो नम्रचित है सवशरण रच्यो सही । ताकी अनुपम शुभ गति को कहन समरथ कोउ नहीं ।। प्राकार तोरण सभामडप कनक मणिमय छाजहीं । नगजडित गधकुटी मनोहर मध्यभाग विराजहीं ।।३।। सिहासन तामध्य बन्यौ अद्भुत दिपै । तापर वारिज रच्यो प्रभा दिनकर छिपै ।। तीन छत्र सिर शोभित चौंसठ चमरजी । महाभक्तियुत ढोरत हैं तहाँ अमरजी ।। प्रभु तरनतारन कमल ऊपर, अन्तरीक्ष विराजिया । यह वीतराग दशाप्रतच्छ विलोकि, भविजनसुखलिया ।। मुनि आदिद्वादश सभा के भवि जीव मस्तकनायकैं । बहुभॉति बारम्बार पूर्जें, नमैं गुणगण गायकैं ||४|| परमौदारिक दिव्य देह पावन सही । क्षुधा तृषा चिन्ता भय गद दूषण नहीं ।। जन्मजरा मृति अरति शोक विस्मय नसे । राग रोष निद्रा मद मोह सबै खसे ।। श्रम बिना श्रमजलरहित पावन, अमल ज्योति स्वरूपजी। शरणागतनि की अशुचिता हरि, करत विमल अनूपजी ।। ऐसे प्रभु की शातमुद्रा को नहन जलतै करै । 'जस' भक्तिवश मन उक्ति तें, हम भानु ढिग दीपक धरै ।।५।। तुम जो सहज पवित्र यही निश्चय भयो । तुम पवित्रता हेत नहीं मञ्जन ठयो ।। मै मलीन रागादिक मलतै है रह्यौ । महामलिन तन मे वसुविधिवश दुख सह्यौ ।।

૬ देव शास्त्र गुरू वाणी नीत्यो अनतो कान यह, मेरी अशुचिता ना गई । तिस अशुचिताहर एक तुम ही, भरहु वांछा चित ठई ।। अब अष्टकर्म विनाश सब मल, दोष रागादिक हरौ । तनरूप कारागेह तें, उद्धार शिववासा करौ ।।६।। में जानत तुम अष्टकर्म हरि शिव गये । आवागमन विमुक्त रागवर्जित भये । पर तथापि मेरो मनरथ पूरत सही नय पमाण तें जानि महा साता लही ।। पापाचरण तजि नहन करता वित्त मे ऐसे धरू । साक्षात् भी अरहत का मानो नहन परसन करू ।। ऐसे विमल परिणाम होते अशुभ नशि शुभवन्ध लें । विधि अशुभ नमि शुभ वन्धत है शर्म, सबविधि नासतें ।७।। पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं । पावन पाणि भये तुम चरननि परस तैं ।। पावन मन है गयो तिहारे ध्यान तै । पावन रसना मानी, तुम गुण गान तैं ।। पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरण धनी । मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्णभक्ति नहीं बनी ।। धनि धन्य ते बडभागि भवि तिन नींव शिवघर की धरी । वर क्षीरसागर आदि जल मणि कुम्गगरी भक्ति करी 11८|| विधन-सघन-वन-दाहन दहन प्रचण्ड हो । मोह-महातम-दलन प्रवल मार्तण्ड हो ब्रह्मा विष्णु महेश आदि सज्ञा धरो जगविजयी जमराज नाश ताको करो ।। आनन्दकारण दुख निवारण, परममगलमय सही । मोसो पतित नहि और तुमसो, पतित तार सुन्यो नहीं ।। चितामणि पारस कल्पतरू, एक भव सुखकार ही । तुम भक्ति-नोका जे चढे, ते भये भवदधि पार ही ||६|| हो ।

१० TAN देव शास्त्र गुरू वाणी तुम भवदधि तैं तरि गये, भये निकल अविकार । तारतम्य इस भक्ति को, हमैं उतारो पार ||१०|| निर्मलवस्त्र से प्रतिमाजी को साफ कर निम्न श्लोक बोलकर गन्धोदक ग्रहण करे । निर्मल निर्मलीकरण, पावनम् पापनाशम् । जिनचरणोदक वदे, अष्टकर्म विनाशनम् ।। प्रतिमा प्रक्षाल पाठ (दोहा) परिणामो की स्वच्छता के निमित्त जिनबिम्ब इसीलिए मैं निरखता, इसमे निज प्रतिबिम्ब ।। पञ्च प्रभु के चरण मे वन्दन करूँ त्रिकाल | निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल || अथ पौर्वान्हिक देववन्दनाया पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजास्तवन्दनासमेत श्री पचमहागुरूभक्तिपूर्वककायोत्सर्ग करोम्यहम् । (नौ बार णमोकार मन्त्र पढे) (छप्पय) तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे । जिनबिम्बो को नित प्रति अगणित नमन हमारे ।। श्री जिनवर की अन्तर्मुख छवि उर मे धारूँ जिन मे निज का, निज मे जिन प्रतिबिम्ब निहारूँ मैं करूँ आज सकल्प शुभ, जिन प्रतिमा प्रक्षाल का । यह भाव सुमन अर्पण करूँ फल चाहूँ गुणमाल का ।। ॐ हीं प्रक्षाल प्रतिज्ञायै पुष्पाजलि क्षिपामि | (प्रक्षाल की प्रतिज्ञा हेतु पुष्प क्षेपण करे) (रोला) अन्तरग बहिरंग सुलक्ष्मी से जो शोभित । जिनकी मगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ।। --

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१३ देव शास्त्र गुरू वाणी (रोला) जिन पतिमा पर अगृत सग जल कण अति शोभित । उगल गगन म गुण अनन्त तारे, भाषि मोहित ।। हो अमद का लक्ष्य, भेद का करता वर्जन । शुद्ध वस्त्र से जल कण का करता परिमार्जन ।। (प्रतिमा को राल परत से पोछ) (दोहा) थी जिनवर की भक्ति से दूर होय भव-भार । उर सिहासन थापिये, प्रिय चैतन्य कुमार ।। (जिन प्रतिमा को सिहासन पर विराजमान करे तथा निम्न छन्द चोलकर अर्घ्य चढाये ।) जल गधादिक द्रव्य से, पूजू श्री जिनराज । पूर्ण अर्य अर्पित कलं. पाऊँ चेतगराज ।। श्री पीरिता बिनाग आपदप्राप्तगे अर्णनिपाणीति स्वात। विनय पाठ दोहावली इह विधि ठाडो होय के. प्रथम पदे जो पाठ । धन्य जिनेश्वर देव तुम नाशे कर्म जु आठ ||१|| अनन्त चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सिरताज । मुक्ति वधू के कन्त तुम, तीन भुवन के राज ।।२।। तिए जग की पीडा हरण भवदधि गोषणहार । शायक हो तुम विश्व के. शिव सुख के करतार ||३|| हरता अध अधियार के. करता धर्म प्रकाश थिरतापद दातार हो, धरता निजगुण राश ।।४।। धर्मामृत उर जलधिसो. ज्ञानभानु तुम रूप तुमरे चरण सरोज को. नावत तिहु जग गूप ।।५।। में वन्दो 'जिनदेव को, कर अति निर्मल भाव । कर्मबन्ध के छदने, और न कछू उपाव ।।६।। ।

१४ - देव शास्त्र गुरू वाणी भविजनको भवकूपतै, तुमही काढनहार दीनदयाल अनाथपति, आतम गुण भण्डार ।७।। चिदानन्द निर्मल कियो, धोय कर्मरज मैल । सरल करी या जगत मे, भविजनको शिवगैल 1111 तुम पदपकज पूजतें, विघ्न रोग टर जाय शत्रु मित्रता को धरै, विष निरविषता थाय 11६11 चक्री खगधर इन्द्र पद, मिलैं आप तैं आप । अनुक्रम तैं शिवपद लहैं, नेम सकलहनि पाप ||१०|| तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल बिन मीन। जन्म जरा मेरी हरो, करी मोहि स्वाधीन ।।११।। पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेव । अजन से तारे प्रभू, जय जय जय जिनदेव ||१२|| थकी नाव भवदधि विषै, तुम प्रभू पार करेव । खेवटिया तुम हो प्रभू, जय जय जय जिनदेव ।।१३।। रागसहित जगमे रूल्यौ, मिले सरागी देव । वीतराग भेट्यो अबै, मेटो राग कुटेव ।।१४ ।। कित निगोद कित नारकी, कित तिर्यञ्च अज्ञान । आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर थान ।।१५।। तुमको पूजै सुरपति, अहिपति नरपति देब । धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेब 11१६।। अशरण के तुम शरण हो, निराधार आधार मैं डूबत भवसिन्धु मे, खेय लगाओ पार ||१७ ।। इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान अपनो विरुद निहारकै, कीजै आप समान ||१८|| तुमी नेक सुदष्टिते, जग उतरत है पार हाहा डूब्यो जात हो, नेक निहार निकार ||१६|| जो मै कहहूँ औरसो, तो न मिटै उरभार मेरी तो तोसो बनी, तातै करौं पुकार ।।२०।। - १५ मंग देव शास्त्र गुरू वाणी बन्दी पांचो परमगुरू, सुर गुर बन्दत जास विघन हरण मगल करण, पूरण परम प्रकाश [२१।। चौबिसो जिनपद नमो, नमो शारदा माय शिवक्म साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय ।।२२।। (मंगल पाठ) मगल मूर्ति परम पद, पच धरो नित ध्यान । हरोअमगल विश्व का, मगलमय भगवान ।।१।। मगल जिनवर पद नमो मगल अर्हतदेव । मगलकारी सिद्ध पद सो वन्दूँ स्वयमेव IR|| मगलआचारज मुनि, मगल गुरू उवझाय । सर्व साधु मगल करो, वदूँ मन वच काय ।।३।। मगल सरस्वती मात का, मगल जिनवर धर्म । मगलमय मगल करण, हरो असाता कर्म ।।४।। या विधि मगल करनते जग मे मगल होत । मंगल नाथूराम यह, भव सागर दृढ पोत ।।५।। पुष्पाजलि क्षिपेत् भजन श्री जी मैं थाने पूजन आयो, मेरी अरज सुनो दीनानाथ । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो ।।१।। जल चन्दन अक्षत शुभ लेके, तामे पुष्प मिलायो । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो IR|| चरू अरू दीप धूप फुल लेकर, सुन्दर अर्घ बनायो । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो ।।३।। आठ पहर की साठ जु घडिया, शान्ति शरण तोरी आयो । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो ।।४।। अर्घ बनाय गाय गुणमाला, तेरे चरणन शीश झुकायो । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो ।।५।। मुझ सेवक की अर्ज यही है, जामन मरण मिटावो । मेरा आवागमन छुटाओ । श्री जी, मैं थाने पूजन आयो ।।६।।

१६ देव शास्त्र गुरू वाणी पूजा पीठिका - ॐ जय जय जय । नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरिहताण, णमो सिद्धाण, णमो आइरियाण, I णमो उवज्झायाण, णमो लोए सव्वसाहूण ।। ॐ हीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नम पुष्पाजलि क्षिपामि । चत्तारि मगल-अरिहता मगल, सिद्धा मगल, साहू मगल, केवलिपण्णत्तो धम्मो मगल चत्ताारि लोगुत्तमा–अरिहता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरण पव्वज्जामि-अरिहते सरण पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्त धम्म सरण पव्वज्जामि सिद्धे सरण पव्वज्जामि, साहू सरण पव्वज्जामि, ॐ नमोऽर्हते स्वाहा पुष्पाजलि क्षिपाभि । मगल विधान अपवित्र पवित्रो वा सुस्थितो दु स्थितोऽपि वा । ध्यायेत्पञ्च नमस्कार सर्व पापै प्रमुच्यते ।।१।। अपवित्र पवित्रो वा सर्वावस्था गतोऽपि वा य स्मरेत्परमात्मान स बाह्याभ्यन्तरे शुचि ।।२।। अपराजितमन्त्रोऽय सर्व विघ्न विनाशन मगलेषु च सर्वेष प्रथम मगल मत ||३|| एसो पच णमोयारो सव्व पावप्पणासणो । मगलाण च सव्वेसि पढम होई मगल ।।४।। अर्ह मित्यक्षर ब्रह्मवाचक परमेष्ठिन सिद्धचक्रस्य सद्बीज सर्वत प्रणमाम्यहम् ।।५।। कर्माष्टक-विनिर्मुक्त मोक्ष-लक्ष्मी निकेतनम् । सम्यक्त्वादि-गुणोपेत सिद्धचक्र नमाम्यहम् ।।६।। विध्नौद्या प्रलय यान्ति शकिनी-भूत-पन्नगा विष निर्विषता याति स्तूयमाने जिनेश्वरे ।७।। (पुष्पाजलि क्षिपेत्) - --

1
देव शास्त्र गुरू
वाणी
१७
पचकल्याणक अर्घ
उदक-चदन-तदुल-पुष्पकैश्चरू-सुदीप-सुधूप-फलार्घकै ।
धवल-मगल-गान-रवाकुले जिनगृहे कल्याणमह यजे 11१।।
ओ ही श्री भगवतो गर्भ-जन्म-तप-ज्ञान-निर्वाण पच कल्याणकेभ्योऽर्थ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचपरमेष्ठी अर्घ
उदक-चदन-तदुल-पुष्पकैश्चरू-सुदीप-सुधूप-फलार्घकै ।
धवलमगलगान रवाकुले जिनगृहे जिननाथमहयजे ।।२।।
ओ ही श्री अर्हत-सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्योऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जिनसहस्रनाम अर्घ
उदकचदन तदुल पुष्पकैश्चरू सुदीप सुधूप फलार्घकै ।
धवलमगलगान रवाकुले जिनगृहे जिननाम अह यजे ।।३।।
ओ हीं श्री भगवज्जिन सहस्र नामोभ्योऽयं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजा प्रतिज्ञा पाठ
श्रीमज्जिनेन्द्र-मभिवन्द्य जगत्त्रयेश,
स्याद्वाद-नायकमनन्त-चतुष्टयार्हम् ।
श्रीमूलसघ-सुदृशा सुकृतैकहेतु,
जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि ।।१।।
स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन–पुगवाय,
स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय ।
स्वस्ति-प्रकाश-सहजोर्जिदृड मगाय
स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्भुत-वैभवाय ।।२।।
स्वस्त्युच्छलद्विमल-बोधसुधा प्लवाय,
स्वस्ति-स्वभाव-परभाव विभासकाय ।
स्वस्ति त्रिलो कविततैक-चिदुद्गमाय
स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय ।।३।।

१८ देव शास्त्र गुरू वाणी द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूप, भावस्य शुद्धिमधिकामधिगन्तुकाम । आलम्बनानि विविधान्यवलम्ब्य वल्गन्, भूतार्थ-यज्ञ-पुरूषस्य करोमि यज्ञम् ।।४।। अर्हन् पुराणपुरूषोत्तम पावनानि, वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव । अस्मिन्ज्वद्विमल-केवल-बोधवहौ, पुण्य समग्रमहमेकमना जुहोमि ।।५।। ॐ यज्ञविधि प्रतिज्ञायै जिनप्रतिमाग्रे पुष्पाञ्जलि क्षिपामि । स्वस्ति मंगलपाठ श्रीवृषभो न स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजित । श्रीसम्भव स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअभिनन्दन । श्रीसुमति स्वस्ति, स्वस्ति श्रीपद्मप्रभ । श्रीसुपार्श्व स्वस्ति, स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रभ । श्रीपुष्पदन्त स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशीतल । श्रीश्रेयान्स स्वस्ति, स्वस्ति श्री वासुपूज्य । श्रीविमल स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअनन्त । श्रीधर्म स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशान्ति । श्रीकुन्थु स्वस्ति, स्वस्ति श्री अरनाथ । श्रीमल्लि स्वस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रत । श्रीनमि स्वस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथ । श्रीपार्श्व स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवर्द्धमान । (पुष्पाञ्जलि क्षिपेत) परमर्षि स्वस्ति मगलपाठ (प्रत्येक श्लोक के बाद पुष्प क्षेपण करे) नित्याप्रकम्पाद्भुत-केवलौधा स्फुरन्मन पर्यय-शुद्धबोधा । दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधा स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।१।। कोष्ठस्थ-धान्योपममे कबीज सभिन्न-सश्रोतृ-पदानुसारि । चतुर्विध बुद्धिबल दधाना स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।२।।

- १६ देव शास्त्र गुरू वाणी सस्पर्शन सश्रवण च दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञान-बलाद्वहन्त स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।३।। प्रज्ञाप्रधाना श्रमणा समृद्धा प्रत्येकबुद्धा दशसर्वपूर्व प्रवादिनोऽष्टागनिमित्तविज्ञा स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ||४|| जधावलि-श्रेणि-फलाम्बु-तन्तु-प्रसून-बीजाकुर-चारणाहा । नभोऽडगणस्वैर-विहारिणश्च स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।५।। अणिम्निदक्षा कुशलामहिम्नि लघिम्निशक्ता कृतिनो गरिम्णि, मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्य स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।६।। सकामरूपित्व-वशित्वमैश्य प्राकाम्यमन्तर्द्धिमथाप्तिमाप्ता तथाऽप्रतीघातगुणप्रधाना स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।७।। दीप्त च तप्त च तथा महोग्र घोर तपो घोरपराक्रमस्था ब्रह्मापर घोर गुणाचरन्त स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।८।। आमर्ष-सर्वोषधयस्तथाशीर्विपा-विषा दृष्टिविष विषाश्च । सखिल्ल-विड्जल्ल-मलौषधीशा स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ।।६।। क्षीरं स्त्रवन्तोऽत्र घृत स्त्रवन्तो मधुस्त्रवन्तोऽप्यमृत स्त्रवन्त अक्षीणसवास-महानसाश्च स्वस्ति क्रियासु परमर्षयो न ||१०।। (इति परमर्षिस्वस्तिमगलविधानम ।) पूजा पीठिका (हिन्दी) ॐ जय जय जय नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु अरिहतो को नमस्कार है, सिद्धो को सादर वन्दन आचार्यो को नमस्कार है, उपाध्याय को है वन्दन ।। और लोक के सर्वसाधुओ को है विनय सहित वन्दन । पच परम परमेष्ठी प्रभु को बार बार मेरा वन्दन ॐ ही श्री अनादि मूलमत्रेभ्यो नम पुष्पाजलि क्षिपेत् । (वीर छन्द) मगल चार चार हैं उत्तम चार शरण मे जाऊँ मैं | मन वच काय त्रियोग पूर्वक, शुद्ध भावना भाऊँ मैं || श्री अरिहत देव मगल हैं, श्री सिद्ध प्रभु हैं मगल । श्री साधु मुनि मगल हैं, है केवलि कथित धर्म मगल ।। ।

२० देव शास्त्र गुरू वाणी श्री अरिहत लोक मे उत्तम, सिद्ध लोक मे हैं उत्तम । साधु लोक मे उत्तम हैं, है केवलि कथित धर्म उत्तम || श्री अरहत शरण मे जाऊँ, सिद्धशरण मे मैं जाऊँ । साधु शरण मे जाऊँ, केवलिकथित धर्म शरण जाऊँ ।। मंगल विधान अपवित्र हो या पवित्र, जो णमोकार को ध्याता है । चाहे सुस्थित हो या दुस्थित, पाप-मुक्त हो जाता है ।।१।। हो पवित्र-अपवित्र दशा, कैसी भी क्यो नहिं हो जन की । परमातम का ध्यान किये हो, अन्तर-बाहर शुचि उनकी ।।२।। है अजेय विध्नो का हर्ता, णमोकार यह मत्र महा । सब मगल मे प्रथम सुमगल, श्री जिनवर ने एम कहा ।।३।। सब पापो का है क्षयकारक, मगल मे सबसे पहला । नमस्कार या णमोकार यह, मन्त्र जिनागम मे पहला ।।४।। अर्ह ऐसे पर ब्रह्म-वाचक, अक्षर का ध्यान करूँ । सिद्धचक्र का सद्वीजाक्षर, मन-वच-काय प्रणाम करूँ ||५|| अष्टकर्म से रहित मुक्ति-लक्ष्मी के घरश्री सिद्ध न । सम्यक्त्वादि गुणो से सयुत, तिन्हे ध्यान धर कर्म वनू ।।६।। जिनवर की भक्ति से होते, विध्न समूह अन्त जानो । भूत शाकिनी सर्प शात हो, विष निर्विष होता मानो ।७।। (यहाँ पुष्पाजलि क्षेपण करे) जिनसहस्त्रनाम अर्ध्य मैं प्रशस्त मगल गानो से युक्त जिनालय मॉहि जजूं । जल चदन अक्षत प्रसून चरू, दीप धूप फल अर्ध्य सर्जे।। ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिनसहस्रनामेभ्योऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । पूजा प्रतिज्ञा पाठ (ताटक) स्याद्वाद वाणी के नायक श्री जिनको मैं नमन कराय । चार अनत चतुष्टयधारी, तीन जगत के ईश मनाय ।।

२१ देव शास्त्र गुरू वाणी मूलसघ के सम्यग्दृष्टि, उनके पुण्य कमावन काज करूँ जिनेश्वर की यह पूजा, धन्य भाग्य है मेरा आज ||१|| तीन लोक के गुरू जिन-पुगव, महिमा सुन्दर उदित हुई । सहज प्रकाश मई दृग-ज्योति, जग-जन के हित मुदित हुई।। समवसरण का अद्भुत वैभव, ललित प्रसन्न करी शोभा । जग-जन का कल्याण करे अरू, क्षेम कुशल हो मन लोभा ।।२।। निर्मल बोध सुधा सम प्रकटा, स्व-पर विवेक करावनहार । तीन लोक मे प्रथित हुआ जो, वस्तु त्रिजग प्रकटावनहार ।। ऐसा केवलज्ञान करे, कल्याण सभी जगतीतल का उसकी पूजा रचूँ आज मैं, कर्म बोझ करने हलका ।।३।। द्रव्य शुद्धि अरू भाव-शुद्धि दोनो विधि का अवलबन कर । करूँ यथार्थ पुरूष की पूजा, मन-वच-तन एकत्रित कर ।। पुरूष-पुराण जिनेश्वर अर्हन्, एकमात्र वस्तू का स्थान । उसकी केवल-ज्ञान बहि मे, करूँ समस्त पुण्य आह्वान ।।४।। (यहाँ पुष्पाजलि क्षेपण करे) स्वस्ति मंगलपाठ चौपाई ऋषभदेव कल्याणकराय, अजित जिनेश्वर निर्मल थाय । स्वस्ति करे सभव जिनराय, अभिनदन के पूजो पाय ||१|| स्वस्ति करेश्री सुमति जिनेश, पदम-प्रभ पद-पदम विशेष । श्री सुपार्श्व स्वस्ति के हेतु, चन्द्रप्रभु जन तारन सेतु ।।२।। पुष्पदत कल्याण सहाय, शीतल शीतलता प्रकटाय श्री श्रेयास स्वस्ति के श्वेत, वासुपूज्य शिव साधन हेत 1३।। विमलनाथ पद विमल कराय, श्री अनत आनद बताय । धर्मनाथ शिव शर्म कराय, शाति विश्व मे शाति कराय ||४|| कुथु और अरजिन सुखरास, शिवगम मे मगलमयआश । मल्लि और मुनिसुव्रत देव, सकल कर्मक्षय कारण एव ।।५।। श्री नमि और नेमि जिनराज, करे सुमगलमय सब काज | पार्श्वनाथ तेवीसम ईश, महावीर वदो जगदीश ६|| २२ देव शास्त्र गुरू वाणी ये सब चौबीसो महाराज, करे भव्य जन मगल काज । मैं आयो पूजन के काज, राखो श्री जिन मेरी लाज |७ ।। (यहाँ पुष्पाजलि क्षेपण करे) परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ (हिन्दी) (गीतिका) नित्य अद्भुत अचल केवल, ज्ञानधारी जे मुनी । मन पर्य य ज्ञानधारक, यति तपसी वा गुणी ।। दिव्य अवधिज्ञान धारक, श्री ऋषीश्वर को नमूं । कल्याणकारी लोक मे, कर पूज वसु विधि को वनूं ||१|| कोष्ठस्थ धान्योपम कही, अरू एक बीज कही प्रभो । सभिन्न सश्रोतृ पदानुसारी, बुद्धि ऋद्धि कही विमो ।। ये चार ऋद्धीधर यतीश्वर, जगत जन मगल करे । अज्ञान-तिमिर विनाश कर, कैवल्य मे लाकर धरे ||२|| दिव्य मति के बल ग्रहण, करते स्पर्शन घ्राण को । श्रवण आस्वादन करे, अवलोकते कर त्राण को ।। पच इन्द्री की विजय, धारण करे जो ऋषिवरा । स्व-पर का कल्याण कर, पावे शिवालय ते त्वरा ||३|| प्रज्ञा प्रधाना श्रमण, अरू प्रत्येक बुद्धि जो कही । अभिन्न दश पूर्वी चतुर्दश-पूर्व प्रकृष्ट वादी सही ।। अष्टाग महा निमित्त विज्ञा, जगत का मगल करे । उनके चरण मे अहर्निश, यह' दास अपना शिर धरे ।।४।। जघावलि अरू श्रेणि ततू, फलाबु बीजाकुर प्रसून । ऋद्धि चारण धार के मुनि, करत आकाशी गमन । स्वच्छद करत विहार नभ मे, भव्यजन के पीर हर । कल्याण मेरा भी करे, मैं शरण आया हूँ प्रभुवर ||५|| अणिमा जु महिमा और गरिमा, मे कुशल श्री मुनिवरा । ऋद्धि लघिमा वे धरे, मन-वचन-तन से ऋषिवरा ।। है यदपि ये ऋद्धिधारी, पर नहीं मद झलकता उनके चरण के यजन हित, इस दास का मन ललकता ।।६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २३ ईशत्व और वशित्व, अन्तर्धान आप्ति जिन कही । कामरूपी और अप्रतिघात, ऋषि पुगढ़ लही ।। इन ऋद्धि-धारक मुनिजनो को, सतत वदन मैं करूँ । कल्याणकारी जो जगत मे, सेय शिव-तिय को वरूँ ।७।। दीप्ति तप्ता महा घोरा, उग्र घोर पराक्रमा ।। ब्रह्मचारी ऋद्धिधारी, वनविहारी अघ वमा ।। ये घोर तपधारी परम गुरू, सर्वदा मगल करे । भव डूबते इस अज्ञजन को, तार तीरहि ले धरे ।।८।। आमर्ष औषधि आषि विष, अरू दृष्टि विष सर्वौषधि । खिल्ल औषधि जल्ल औषधि, विडऔषधि मल्लौषधि ।। ये ऋद्धिधारी महा मुनिवर, सकल सघ मगल करे । जिनके प्रभाव सभी सुखी हो, और भव-जलनिधि तरे ।।६।। क्षीरखावी मधु स्रावी घृतस्त्रावी मुनि यशी अमृतस्त्रावी ऋद्धिवर, अक्षीण सवास महानसी 11 ये ऋद्धिधारी सव मुनीश्वर, पाप मल को परिहरे । पूजा विधि के प्रथम अवसर, आ सफल पूजा करे ।।१०।। फर जोड दास गुलाब' करता, विनय चरणन मे खडा । सम्यक्त्व दरशन ज्ञान चारित्र, दीजिये सबसे बड़ा जब तक न हो ससार पूरा, चरण मे रत नित रहे । वसुकर्म क्षयकर शिव लहे, बस और कुछ नहि यह चहे ।।११।। (इति पुष्पाजलि क्षिपेत) श्री देव-शास्त्र-गुरू पूजा (घानतराय जी कृत) अडिल्ल छन्द प्रथम देव अरहन्त सुश्रुत सिद्धान्त जू । गुरू निरग्रन्थ महन्त मुकतिपुर पथ जू ।। तीन रतन जग माहि सो ये भवि ध्याइयो । तिनकी भक्ति प्रसाद परम पद पाइये ।। ॥

२४ । देव शास्त्र गुरू वाणी दोहा पूजो पद. अरहत के, पूजो गुरू पद सार पूजो देवी सरस्वती, नित प्रति अष्ट प्रकार ।। ॐ हीं देवशास्त्रगुरूसमूह । अत्र अवतर अवतर सवोषट आहान । ॐ हीं देवशास्त्रगुरूसमूह । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् । ॐ ही देवशास्त्रगुरूसमूह । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरण। गीता छन्द सुरपति उरग नरनाथ तिन कर, बदनीक सुप्रद प्रभा । अति शोभनीक सुवरण उज्जवल, देख छवि मोहित सभा ।। वर नौर क्षीर समुद्र घट भरि अग्र तसु बहु विधि नचू । अरहत श्रुत सिद्धान्त गुरू निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।। दोहा मलिन वस्तु हर लेत सब, जल स्वभाव मल छीन । जासो पूजो परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।१।। ॐ हीं देवशास्त्रगुरूसमूह जन्मरामृत्युविनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा ।।१।। जे त्रिजग उदर मझार प्राणी तपत अति दुद्धर खरे । तिन अहित हरन सुवच जिनके, परम शीतलता भरे ।। तसु भ्रमर लोभिंत घ्राण पावन सरस चदन घसि सचू । अरहत श्रुत सिद्धान्त गुरू निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।। दोहा चन्दन शीतलता करै, तपत वस्तु परवीन जासो पूजौ परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।२।। ॐ हीं देवशास्त्रगुरूभ्यो ससारतापविनाशनाय चन्दन निर्वपामीति स्वाहा ।।२।। यह भव समुद्र अपार तारण, के निमित्त सुविधि ठई । अति दृढ परम पावन जथारथ भक्ति वर नौका सही ।। उज्जवल अखडित सालि तदुल पुञ्ज धरि त्रय गुण जचू। अरहत श्रुत सिद्धान्त गुरू निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २५ दोहा तदुल सालि सुगना अति, परम अखडित बीन । जासो पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।३।। ॐ ही देवशास्त्रगुरूग्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ जे विनयवत सुभव्य उर अम्बुज प्रकाशन भान हैं । जे एक मुख चारित्र भाषत त्रिजग माहि प्रधान हैं ।। लहि कुन्द कमलादिक पहुप, भव भव कुवेदनसो वचूँ । अरहत श्रुत-सिद्धान्त गुर-निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।। दोहा विविध भाति परिमल सुमन, भ्रमर जास आधीन । जासो पूजी परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।४।। ॐ ही देवशारत्र गुरुभ्यो कागवाणविध्वसनाय पुष्प निर्वपागीति स्वाहा ॥४॥ अति सवल मद कदर्प जाको, सुधा-उरग अमान है । दुस्सेह भयानक तासु नाशन को सुगरूड समान है । उत्तम छहो रस युक्त नित, नैवेद्य करि घृत मे पचू । अरहत श्रुत-सिद्धान्त गुरू-निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।। दोहा नाना विधि सयुक्त रस, व्यञ्जन सरस नवीन । जासो पूर्जी परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।५।। ॐ ही देवशास्त्रगुरून्यो सुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा III जे त्रिजग उद्यम नाश कीने, मोह तिमिर महाबली । तिहि कर्म घाती ज्ञान दीप प्रकाश जोति प्रभावली ।। इह भाँति दीप प्रजाल कचन के सुभाजन में खचू । अरहत श्रुत-सिद्धान्त गुरू-निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ।।

२६
देव शास्त्र गुरू वाणी
दोहा
स्वपर प्रकाशक जोति अति, दीपक तम करि हीन ।
जासो पूजौं परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।।६।।
ॐ हीं देवशास्त्रगुरूभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीप निर्वपामीति
स्वाहा ।।६।।
जो कर्म-ईंधन दहन अग्निसमूह सम उद्धत लसै ।
वर धूप तासु सुगन्धताकरि, सकलपरिमलता हॅसै ।।
इह भॉति धूप चढाय नित भव-ज्वलनमाहि नहीं पचू ।
अरहत श्रुत-सिद्धान्त गुरू-निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।।
दोहा
अग्निमाहि परिंमलदहन, चदनादि गुणलीन ।
जासो पूजौं परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ।७।।
ॐ ही देवशास्त्रगुरूभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । ७ ।।
लोचन सुरसना घ्राण उर उत्साह के करतार हैं ।
मोपै न उपमा जाय वरणी, सकल फलगुणसार हैं ।।
सो फल चढावत अर्थपूरन, परम अमृतरस सचू ।
अरहत श्रुत-सिद्धान्त गुरू-निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।।
दोहा
जे प्रधान फल फलविषै पचकरण रस लीन ।
जासो पूजौ परमपद, देव शास्त्र गुरू तीन ||८||
ॐ हीं देवशास्त्रगुरूभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा ||८||
जल परम उज्ज्वल गन्ध अक्षत, पुष्प चरू दीपक धरूँ ।
वर धूप निरमल फल विविध, बहु जनम के पातक हरूँ ।।
इह भॉति अर्घ चढाय नित, भवि करत शिव पकति मचू ।
अहरत श्रुत-सिद्धान्त गुरू-निरग्रन्थ नित पूजा रचू ।।

२७
देव शास्त्र गुरू वाणी
दोहा
बहुविधि अर्घ सजोय के, अति उछाह मन कीन ।
जासो पूजौं परम पद, देव शास्त्र गुरू तीन ||6||
ॐ हीं देवशास्त्रगुरूभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ||६||
जयमाला
देव शास्त्र गुरू रतन शुभ, तीन रतन करतार ।
भिन्न भिन्न कहूँ आरती, अल्प सुगुण विस्तार ।।
पद्धरी छन्द
कर्मन को त्रेसठ प्रकृति नाशि, जीते अष्टादश दोषराशि ।
जे परम सुगुण हैं अनन्त धीर, कहवतके छयालिस गुण गभीर ।।
शुभ समवशरण शोभा अपार, शतइन्द्र नमत कर सीसधार ।
देवाधिदेव अरहत देव, वन्दौं मन वच तन करि सु सेव ।।
जिनको ध्वनि है ओकाररूप, निरअक्षरमय महिमा अनूप ।
दश अष्ट महाभाषा समेत, लघुभाषा सात शतक सुचेत ।।
सो स्याद्वादमय सप्तभग, गणधर गूंथे बारह सुअग
रवि शशि न हरै सौ तम हराय-सो शास्त्रनमो बहुप्रीति ल्गाय ।।
गुरू आचारज उवझाय साधु, तन नगन रतनत्रय निधि अगाध ।
ससार देह वैराग धार, निरवाछि तपैं शिवपद निहार ।।
गुण छत्तिस पच्चिस आठवीस, भवतारन तरन जहाज ईश ।
गुरूकी महिमा वरनी न जाय, गुरू नाम जपो मन वचनकाय ।।
सोरठा
कीजै शक्ति समान, शक्ति बिना सरधा धरै ।
'द्यानत' सरधावान, अजर अमर पद भोगवै ।।
ॐ हीं देवशास्त्रगुरूम्यो महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।
दोहा
श्रीजिन के परसाद तें, सुखी रहे सब जीव ।
यातें तन मन वचन तें, सेवो भव्य सदीव ।।
इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् ।

२८ देव शास्त्र गुरू वाणी समुच्चय पूजा श्री देव-शास्त्र गुरू विदेह क्षेत्र विद्यमान बीस तीर्थकर तथा अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी पूजा । दोहा देवशास्त्र गुरू नमनकरि, बीस तीर्थडकर ध्याय सिद्ध शुद्ध राजत सदा, नमू चित्त हुलसाय ॥ ॐ ही श्री देवशास्त्र गुत समूह | श्री विद्यमान विशति तीर्थकर समूह श्री अनतनत सिद्ध परमेष्ठि समूह । स्त्रावतरावतर सवौषट आहानन । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम | स्त्र नम सनिहितो नव भव वपट सन्धिीकरणम् । - 1 अष्टक (चाल-करले करले तू नित प्राणी श्री जिन पूजन करले रे।) अनादिकाल से जग मे स्वामिन् जल से शुचिता को माना । शुद्ध निजातन सम्यक् रत्नत्रयनिधि को नहि पहिचाना ।। अब निर्नल रत्नत्रय जल से देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीत्त तीर्थकर सिद्ध प्रमु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रात्तन्य श्री विद्यमान विशति तीर्थकरेभ्य श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिन्गे जन्नजरानृत्युविनाशनाय जल निर्वपानीति स्वाहा ॥१॥ भव आताप मिटावन की निज मे ही क्षमता समता है । अनजाने अब तक मैंने पर ने की झूठी ममता है | चन्दन सम शीतलता पाने श्री देवशास्त्र गुरु को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थकर, सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्र पुत्तन्य श्री विद्यमान विशति तीर्थड्करेन्य श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिन्गे सत्सारतापविनाशनाय चन्दन निर्वपामीति स्वाहा IRIL अक्षय पद के बिन फिरा जगत की लख चौरासी योनि मे । अष्ट कर्म के नाश करन को अक्षत तुन ढिग लाया मैं || देव शास्त्र गुरू वाणी २६ अक्षयनिधि निज की पाने अब देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ ही श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य, श्री विद्यमान विशति तीर्थकरेभ्य, श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिभ्यो, अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ||३|| पुष्प सुगन्धी के आतम ने शील स्वभाव नशाया है । मन्मथ बाणो से विंध करके चहु गति दुख उपजाया है ।। स्थिरता निज मे पाने को श्री देवशास्त्र गुरू को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूम्य, श्री विद्यमान विंशति तीर्थड़करेम्य, श्री अनन्तानन्त परमेष्ठिम्यो कामवाणविध्वसनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ।।४।। षट्रस मिश्रित भोजन से ये भूख न मेरी शान्त हुई । आतम रस अनुपम चखने से इन्द्रिय मन इच्छा शमन हुई ।। सर्वथा भूख के मेटन को श्री देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ विद्यमान श्री बीस तीर्थकर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य, श्री विद्यमान विशति तीर्थडुकरेभ्य, श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिम्यो, क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ।५।। जड दीप विनश्वर को अब तक समझा था मैंने उजियारा । निज गुण दरशायक ज्ञान दीप से मिटा मोह का अधियारा || ये दीप समर्पित करके मैं श्री देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य, श्री विद्यमान विशति तीर्थकरेभ्य, श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिम्यो, मोहान्धकारविनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ ये धूप अनल मे खेने से कर्मों को नहीं जलायेगी । निज मे निज की शक्ति ज्वाला जो राग द्वेष नसायेगी ।। उस शक्ति दहन प्रगटाने को श्री देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ। विद्यमान श्री वीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूम्य, श्री विद्यमान विशति तीर्थडकरेभ्य, श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिभ्यो, अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा।।

३० देव शास्त्र गुरू वाणी पिस्ता बदाम श्री फल लवग चरणन तुम ढिग में ले आया । आतमरस भीने निजगुण फल मम मन अव उनमे ललचाया।। अब मोक्ष महाफल पाने को श्री देव शास्त्र गुरू को घ्याऊँ। विद्यमान श्री बीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊं || ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य श्री विद्यमान विशति तीर्थडकरेम्य श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिम्यो मोक्षफलप्राप्ये फल निर्वपामीति स्वाहा ||८|| अष्टम वसुधा पाने को कर मे ये आठो द्रव्य लिए । सहज शुद्ध स्वाभाविकता से निजमे निज गुण प्रकट किए ।। ये अर्ध समर्पण करके मैं श्री देव शास्त्र गुरू को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थड्कर सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ ।। ॐ ही श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य श्री विद्यमान विशति तीर्थडकरेभ्य श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिम्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा III जयमाला नसे घातिया कर्म अर्हन्त देवा, करे सुर असुर नर मुनि नित्य सेवा । दरश ज्ञान सुख बल अनन्त के स्वामी, छियालीस गुण युक्त महा ईश नामी।। तेरी दिव्य वाणी सदा भव्य मानी, महा मोह विध्वसिनी मोक्ष दानी । अनेकान्तमय द्वादशागी बखानी, नमो लोक माता श्री जैन वाणी ।। विरागी अचारज उवज्झाय साधू, दरश ज्ञान भण्डार समता अराधू । लगन वेषधारी सुएका विहारी, निजानन्द मण्डित मुकति पथ प्रचारी।। विदेह क्षेत्र मे तीर्थकर बीस राजे, विरहमान बन्दू समी पाप भाजे । नमू सिद्ध निर्मय निरामय सुधामी, अनाकुल समाधान सहजाभिरामी ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
३१
छन्द
देव शास्त्र गुरू बीस तीर्थड्कर सिद्ध हृदय बिच धरले रे ।
पूजन ध्यान गान गुण करके भवसागर जिय तर ले रे ।।
ॐ हीं श्रीदेवशास्त्रगुरूभ्य, श्री विद्यमान विशति तीर्थकरेभ्य,
श्री अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठिभ्यो, अनर्घपदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
भूत भविष्यत् वर्तमान की, तीस चौबीसी मैं ध्याऊँ ।
चैत्य चैत्यालय कृत्रिमाकृत्रिम, तीन लोक के मन लाऊँ ।।
ॐ ही श्री त्रिकाल सम्बन्धी तीस चौबीसी त्रिलोक सम्बन्धी कृत्रिमाकृत्रिम
चैत्यालेभ्यो अर्ध. ।
चैत्य भक्ति आलोचन चाहूँ, कायोत्सर्ग अघ नाशन हेत ।
कृत्रिमाकृत्रिम तीन लोक मे, राजत हैं जिनविम्ब अनेक ।।
चतुरनिकाय के देव जजे, ले अष्ट द्रव्य निज भक्ति समेत ।
निज भक्ति अनुसार जजू मैं, कर समाधि पाऊँ शिव खेत ।।
ॐ कृत्रिमाकृत्रिम चैत्यालय सवधि जिनविम्वेभ्यो अर्घ. ।
पूर्व मध्य अपरान्ह की वेला
पूर्वाचार्यों के अनुसार ।
देव वन्दना करूँ भाव से सकल कर्म की नाशन हार ।।
पच महा गुरू सुमिरन करके कायोत्सर्ग करूँ सुख कार ।
सहज स्वभाव शुद्ध लख, अपना जाऊँगा अब मैं भव पार ।।
पुष्पाजलि क्षिपेत्
(कायोत्सर्ग पूर्वक ६ बार णमोकार मन्त्र जपे)
षोडश कारण भावना भाऊँ, दशलक्षण हिरदय धारूँ ।
सम्यक् रत्नत्रय गहि करके, अष्ट कर्म बन को जारूँ ।
ॐ हीं षोडश कारण भावना दशलक्षण धर्म सम्यक् रत्नत्रयेभ्यो अर्घ. |
श्री कैलाशपुरी पावा चम्पा गिरिनार सम्मेद जजू ।
तीरथ सिद्ध क्षेत्र अतिशय श्री चौबीसो जिनराज भजू ।।
ॐ हीं श्री चतुर्विशति तीर्थडकनिर्वाण तथा सिद्धक्षेत्रातिशयक्षेत्रेभ्यो अर्घ.।

३२ देव शास्त्र गुरू वाणी देव-शास्त्र-गुरू पूजन केवल-रवि किरणो से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अन्तर । उस श्री जिन-वाणी मे होता, तत्वो का सुन्दरतम दर्शन ।। सद्दर्शन-बोध-चरण-पथ पर, अविरल जो बढते हैं मुनिगण । उन देव, परम-आगम, गुरू को शत-शत वन्दन, शत-शत वन्दन।। ॐ हीं श्री देव शास्त्र-गुरूसमूह अत्र अवतर अवतर सोष्ट् । ॐ हीं श्री देव शास्त्र-गुरूसमूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ हीं श्री देव शास्त्र-गुरूसमूह अत्र मम सन्निहितो भव-भव वपट । इन्द्रिय के भोग मधुर-विष-सम, लावण्यमयी कचन काया । यह सब कुछ जड की क्रीडा है, मैं अब तक जान नहीं पाया ।। मैं भूल स्वय निज वैभव को पर-ममता मे अटकाया हूँ जब निर्मल सम्यक्-नीर लिये मिथ्यामल धोने आया हूँ ।। ॐ हीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा। उ-चेतन की सब परिणति प्रभु । अपने-अपने मे होती है । अनुकूल कहे प्रतिकूल कहे, यह झूठी मन की वृत्ती है ।। प्रतिकूल सयोगो मे क्रोधित, होकर ससार बढाया है । सन्तप्त हृदय प्रभु । चन्दन सम, शीतलता पाने आया है ।। * ही श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो ससारताप विनाशनाय चदन निर्वपामीति स्वाहा। उज्ज्वल हूँ कुन्द-धवल हूँ प्रभु पर से न लगा हूँ किञ्चित् भी । फिर भी अनुकूल लगे उन पर, करता अभिमान निरन्तर ही ।। जड पर झूक-झुक जाता चेतन, की मार्दव की खण्डित काया । निज शाश्वत अक्षत-निधि पाने, अब दास चरण रज मे आया ।। ॐ हीं श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो अक्षय-पद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन मे माया कुछ शेष नहीं । निज अन्तर का प्रभु, भेद कहूँ उसमे ऋजुता का लेश नहीं ।। चितन कुछ फिर सभाषण कुछ, क्रिया कुछ की कुछ होती है । स्थिरता निज मे प्रभु पाऊँ जो, अन्तर का कालुष धोती है ।। ॐ हीं श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो काम-बाण-विध्वसनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा। ।

देव शास्त्र गुरू वाणी ३३ । अब तक अगणित जड द्रव्यो से, प्रभु । भूख न मेरी शान्त हुई । तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही ।। युग-युग से इच्छा सागर मे, प्रभु । गोते खाता आया हूँ । चरणो मे व्यजन अर्पित कर, अनुपम रस पीने आया हूँ ।। ॐ श्री देव-शास्त्र-गुरूग्यो क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा। मेरे चैतन्य सदन मे प्रमु । चिर व्याप्त भयकर अधियारा । श्रुत-दीप वुझा हे करूणानिधि | बीती नहि कष्टो की कारा ।। अतएव प्रभो । यह ज्ञान-प्रतीक, समर्पित करने आया हूँ । तेरी अन्तर लौ से निज अन्तर दीप जलाने आया हूँ ।। ॐ श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा। जड कर्म घुमाता है मुझको, यह मिथ्या भ्रान्ती रही मेरी । मैं रागी द्वेपी हो लेता, जब परिणति होती है जड केरी ।। यो माव-करम या भाव-मरण, सदियो से करता आया हूँ । निज अनुपम गध-अनल से प्रभु, पर-गध जलाने आया हूँ ।। ॐ ही श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । जग मे जिसको निज कहता मैं, वह छोड मुझे चल देता है । मैं आकुल व्याकुल हो लेता, व्याकुल का फल व्याकुलता है ।। मैं शान्त निराकुल चेतन हूँ, है मुक्ति-रमा सहचर मेरी । यह मोह तडक कर टूट पडे, प्रभु । सार्थक फल पूजा तेरी ।। ॐ ही श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । क्षण भर निज-रस को पी चेतन मिथ्या-मल को धो देता है । काषायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है ।। अनुपम सुख तव विलसित होता केवल-रवि जगमग करता है । दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह ही अर्हन्त अवस्था है । यह अर्ध्य समर्पण करके प्रभु । निज गुण का अर्ध्य बनाऊँगा । और निश्चित तेरे सदृश प्रभु । अर्हन्त अवस्था पाऊँगा ।। ॐ हीं श्री देव-शास्त्र-गुरूभ्यो अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । ।

३४ देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला भव वन मे जी भर घूम चुका, कण-कण को जी भर-भर देखा । मृग-सम मृग-तृष्णा के पीछे, मुझको न मिलि सुख की रेखा ।। - (वारह भावना) झूठे जग के सपने सारे, झूठी मन की सव आशाये । तन जीवन यौवन अस्थिर है, क्षण भगुर पल में मुरझाये ।। सम्राट महाबल सेनानी, उस क्षण को टाल सकेगा क्या । अशरण मृत काया मे हर्षित, निज जीवन डाल सकेगा क्या ।। ससार महा दुखसागर के, प्रभु दुखमय सुख आभासो में । मुझको न मिला सुख क्षण भर भी, कचन-कामिनि प्रासादो मे ।। मै एकाकी एकत्व लिये, एकत्व लिये सब ही आते । तन धन को साथी समझा था, पर ये भी छोड चले जाते ।। मेरे न हुए ये, मैं इन से, अति भिन्न अखण्ड निराला हूँ । निज मे पर से अन्यत्व लिये, निज सम रस पीने वाला हूँ ।। जिसके श्रृगारो मे मेरा यह मॅहगा जीवन घुल जाता अत्यन्त अशुचि जड काया से, इस चेतन का कैसा नाता ।। दिन रात शुभाशुभ भावो से, मेरा व्यापार चला करता मानस वाणी और काया से, आस्त्रव का द्वार खुला रहता ।। शुभ और अशुभ की ज्वाला से, झुलसा है मेरा अन्तस्तल । शीतल समकित किरणे फूटे, सवर से जागे अन्तर्बल ।। फिर तप की शोधक वहि जगे, कर्मो की कड़ियाँ टूट पडे । सर्वाग निजात्म प्रदेशो से, अमृत के निर्झर फूट पडे ॥ हम छोड चले यह लोक तभी, लोकान्त विराजे क्षण मे जा । निज लोक हमारा वास हो, शोकात बने फिर हमको क्या ।। जागे मम दुर्लभ बोधि प्रभो । दुर्नय-तम सत्वर टल जावे । बस ज्ञाता दृष्टा रह जाऊँ, मद-मत्सर-मोह विनश जावे || चिर रक्षक धर्म हमारा हो, हो धर्म हमारा चिर साथी ।

देव शास्त्र गुरू पाणी ३५ देव स्तवन जग में न मारा कोई आ. हम भी न रहे जग के साथी ।। चरणो में सागा हूँ अगुवर । शीतलता गुझको मिल जावे । गुरुवार जान-लता मेरी, निज अनार्वल से खिल जावे ।। गोला करता है. गोगो से, चुस जावेगी इच्छा ज्वाला परिणाम निकलता है रेफिन, मानो पावक मे घी डाला । मेरे चरणों की पूजा से इन्दिर सुख को भी अभिलाषा । अब रामनी या प्रमु । सच्चे सुख की गी परिगापा ।। सुम तो अविकारी हो प्रमुपर । जग मेरले जग से न्यारे । एव जो तब चरणों में. जग के माणिक मोती सारे ।। (शास्त्र रतवन) सलादमी की वाणी शुभनय के सरने अरते है एस पावन नौका पर लातो. पाणी भव-वारिधि तिरते हैं । (गुरु रसवन) गावत मुरादरांक. गर नग्न स्वरूप तुम्हारा जग सी नता का साया, दिग्दर्शन करने वाला है | जव जग विषयों में रव-पार कर, गामिल निद्रा में सोता हो । आया यह शिव के टिश पग में विपकटक बोता हो । से अ-निशा का सन्नाटा, वन में वनचारी चरते हो । सय शाला निरागल मानस तुग, तत्वो का चितन करते हो । करते तप पलनदी-तट पर तस-तल वर्षा की अडियो में । समता-रस-पान किया करते सुरा-दुख दोनों की घडियो मे ।। अन्तवाला रिती पाणी, गानो झडती हो फुलझडियो । गव-बनान तल तल टूट पड़े, खिल जावें अन्तर की कलियाँ ।। तुमसा दानी क्या कोई हो, जग को दे दी जग की निधियों । दिन रात लुटाया करते हो, सम-शम की अविनश्वर मणियो ।। ॐ श्री देवशास्त्र गुरुग्यो जगमाला गापूर्णाऱ्या नि. स्वाहा । हे निर्गल देव । तुमें प्रणाम, हे ज्ञान दीप आगम | प्रणाम । है शान्ति-त्याग के मूर्तिमान, शिव पथ पथी गुरूवर । प्रणाम ।। (शति पुष्पाञ्जलि क्षिपेत) 1 गुरूवर है

३६
देव शास्त्र गुरू वाणी
श्री बीस तीर्थकर पूजा-भाषा
दीप अढाई मेरू पन, अव तीर्थकर वीस ।
तिन सबकी पूजा करूँ, मन वच तन धरि शीस ।।
ॐ हीं विद्यमानविशतितीर्थकरा । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ट ठ स्थापन ।
ॐहीं विद्यमानविशतितीर्थकरा । अत्र तिष्ट तिष्ठ ट ठ स्थापन ।
ॐ हीं विद्यमानविशतितीर्थकरा । अत्र मम सनिहितमवतमव वषट
सन्निधिकरणम् ।
इन्द्र-फणीन्द्र-नरेन्द्र-वद्य, पर निर्मल धारी
शोभनीक ससार, सारगुण है अविकारी ।।
क्षीरोदधि सम नीरसो (हो), पूजो तृषा निवार ।
सीमन्धर जिन आदि दे, वीस विदेह मझार
श्रीजिनराज हो, भवतारण तरण जिहाज ||१||
ॐ ही विद्यमानविशतितीर्थकरेम्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल
निर्वपामीति स्वाहा ||१||
तीन लोक के जीव, पाप आताप सताये
तिनको साता दाता, शीतल वचन सुहाये ।
बावन चदन सौ जजू (हो) भ्रमन तपन निरवार ||सीमन्धर.।।
ॐ हीं विद्यमानविशतितीर्थकरेभ्यो ससारताप विनाशनाय चन्दन
निर्वपामीति स्वाहा IRII
यह ससार अपार महासागर जिनस्वामी
तातै तारे बडी भक्ति-नौका जगनामी
तदुल अमल सुगधसो (हो) पूजों तुम गुणसार, I||सीमन्धर.।।
ॐ हीं विद्यमानविशतितीर्थकरेभ्योऽसयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति
स्वाहा |३||
भविक-सरोज-विकास, निद्य-तमहर रविसे हो
जति-श्रावक आचार, कथनको, तुम ही बड़े हो ।
फूल-सुवास अनेक सो (हो) पूजो मदन प्रहार, सीमन्धर.।।
ॐ हीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेम्य कामवाणविध्वसनाय पुष्प निर्वपामीति
स्वाहा ॥४॥

३७
देव शास्त्र गुरू वाणी
काम-नाग विषधाम, नाशको गरूड कहे हो ।
क्षुधा महदवज्वाल, तासुको मेघ लहे हो हो ।
नेवज बहु घृत मिष्टसो (हो) पूजो मूख विडार । सीमन्धर ।।
ॐ विचमाविशतितीर्थकरेग्यो गोगपिनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति
स्वारा II
उधम लोन न देत सर्व जगमारि भरयो है ।
मोर-महातम घोर. नाश परकाश कर्यो है ।
पूजो दीप प्रकाशसो (स) शानज्योति करतार, सीमन्धर.।।
ॐ विमानविशतितीका गोलाकारविनाशनाय दीप निर्वपामीति
स्यारा ॥
कर्म आउ सब काउ. भार विस्तार निहारा ।
ध्यान अगनिकर प्रकट, सरब कीनो निरवारा
धूप अनूपम पेवी (क) दुख जलै निरधार, सीमन्धर.।।
ॐ शिमविशतितीर्थकरेग अष्टक दानाय धूप निर्वपापीति स्वारी I७||
मिथ्यावादी दुष्ट, लोग अहंकार गरे है
सबको छिनमे जीत जैनके मेरू खरे है
फल अति उत्तमसों जजा (हो) वाछितफल दातार, सीमन्धर.।।
ॐ विरामानविशतितीकारयो गोक्षफलप्रापायफलीपानीति रवाल 1 ||
जल फल आने दरव अरघ कर प्रीति धरी है ।
गणधर इन्द्र हूंतै, श्रुति पूरी न करी है
'धानत' सेवक जानके (हो) जगते लेहु निकार || सीमन्धर ।।
ॐही विद्यमानविशतितीर्थकरेग्या अनर्घ पदप्राप्तये अर्घ.शिर्वपागीति स्वाहा || ||
जयमाला
सोरठा
ज्ञान सुधाकर चन्द, भविक-खेतहित मेघ हो ।
ग्रम-तम मान अमद तीर्थकर बीसो नमो
।।

३८
देव शास्त्र गुरू वाणी
चौपाई (१६ मात्रा)
सीमधर-सीमधर स्वामी, जुगमन्धर-जुगमन्धर नामी ।
बाहु बाहुजिन जग जन तारे, करम सुबाहु बाहुवल दारे 11111
जात सुजात सु केवलज्ञान, स्वयप्रमू प्रमु स्वय प्रधान ।
ऋषभानन ऋषभानन दोष अनन्त वीरज-वीरज कोष ।२।।
सौरीप्रभ सौरीगुणमाल, सुगुण विशाल विशाल दयाल ।
वजधार भवगिरि विज्जर हैं, चन्द्रानन-चन्द्रानन वर हैं ।।३।।
भद्रबाहु भद्रनिके करता, श्रीभुजग भुजगम हरता
ईश्वर सबके ईश्वर छाऊँ, नेमि प्रभु जस नेमि विराजै 11४11
वीरसेन वीर जग जाने, महाभद्र महाभद्र बखाने ।
नमो जसोधर जसधरकारी, नमो अजितवीरज बलधारी ।।५।।
धनुस पाचसै काय विराजै, आयु कोडि पूरब सब छाजै ।
समवशरणशोभित जिनराजा, भवजलतारन तरनजिहाजा ।।६।।
सम्यक रत्नत्रयनिधिदानी, लोकालोक प्रकाशक ज्ञानी ।
शतइन्द्रनिकरि वदित साहै, सुरनर पशु सबके मन मोहैं 11७।।
दोहा
तुमको पूजै वदना करै, धन्य नर सोय
'द्यानत' सरधा मन धरै, सो भी धरमी होय ।।
ॐ हीं विद्यमान विशति तीर्थकरेभ्यो महाय॑ निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय चौबीसी पूजा
(वृन्दावनलाल कृत)
वृषभ अजित सभव अभिनन्दन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय ।
चद पुष्प शीतल श्रेयास नमि, वासुपूज्य पूजित सुरराय ।।
विमल अनत धर्मजस उज्ज्वल, शान्ति कुन्थु अर मल्लि मनाय ।
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद पुष्प चढाय ।।
ॐ हीं वृषमादिवीरातचतुर्विंशति जिनसमूह । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं वृषभादिवीरातचतुर्विंशति जिनसमूह । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ ही वृषभादिवीरातचतुर्विंशति जिनसमूह । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

सुगन्ध भरे देव शास्त्र गुरू पाणी ३६ मुनि-मन-सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा भरि कनक कटोरी धीर, दीनी धार धरा । चीवीसो श्रीजिनचन्द, आनन्द-कन्द सही पद जजत हरत भवफद, पावत मोक्ष मही ।। ॐ ही वृषभादिवीरातेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. 1911 गो शीर कपूर मिलाय, केशर-रग भरी जिन चरनन देत चढाय, भव आताप हरी चौविसो.।। ॐ वृषमादिवीरातेभ्यो भवतापविनाशनाय चन्दन नि. IRI तन्दुल सित सोम समान, सुन्दर अनियारे मुकता फल की उनमान, पुञ्ज धरो प्यारे चौविसो.।। ॐ ही वृपमादिवीरातेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान नि. |३|| वर-कंज कदर कुरड. सुमन जिन अग्र धरो गुण-मड, काम कलक हरे चौविसो.।। ॐ ही वृषभादिवीरातेभ्यो कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. ४|| मन-मोदन-मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने रस-पूरित प्रासुक स्वाद, जजत सुधादि हने चौविसो.।। ॐ ही वृषभादिवीरातेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेध नि. ५|| तम-खांडन दीप जगाय, धारों सब तिमिर मोह क्षय जाय, ज्ञान-कला जागे ।चौवीसो.।। ॐ हीं वृषभादिवीरातेभ्यो मोटराधकार विनाशनाय दीप नि. 1|| दश गन्ध हुताशन माहि, हे प्रभु खेवत हो । मिस धूम करम जरि जाहि, तुम पद सेवत हो ।चौबीसो.।। ॐ ही वृषणादिवीरातेभ्यो अष्टकर्गदहनाय धूप नि. 11७।। शुचि पक्व सरस फल सार, सव ऋतु के ल्याओ । देखत दृग-मन को प्यार, पूजत सुख पायो ।चौबीसो.।। ॐ ही वृषभादिवीरातेभ्यो गोक्षफलप्राप्तये फल नि. 1 || जल-फल आठो शुचि-सार, ताको अर्घ करो तुमको अरपो भव तार, भवतरि मोक्ष वरो ।चौबिसो.।। ॐ हीं वृषभादिवीरातेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घ नि. 118 || तुम आगे - ४० देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला दोहा श्रीमत तीरथनाथ-पद, माथ नाय हित हेत । गाऊँ गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ।।१।। छन्द (घत्तानन्द) जय भवतमभजन जनमनकजन, रजन दिनमनि स्वच्छ करा | शिवमगपरकाशक अरिगणनाशक, चौबीसो जिनराज 'वरा ।। पद्धरी छन्छ जय ऋषभदेव ऋषिगणनमन्त, जय अजितजीत वसुअरि तुरन्त । जय सम्भव भव-भयकरत चूर, जय अभिनन्दन आनन्द पूर |1|| जय सुमति-सुमतिदायकदयाल, जय पद्म पद्मदुतितन-रसाल । जयजय सुपार्श भवपासनाश, जय चद चद तन दुति प्रकाश IR|| जय पुष्पदन्त दुतिदन्त-सेत, जय शीतल शीतल-गुण निकेत । जय श्रेयनाथ नुत-सहसमुज्ज, जय वासव पूजित वासुपूज्य ।।३।। जय विमल विमल पद-देनहार, जय-२ अनन्त गुणगण अपार । जय धर्म-धर्म शिव-शर्म देत, जय शान्ति शान्ति पुष्टी करेत।।४।। जयकुथकुथु-वादिक रखेय, जय अरजिन वसु अरि-छयकरेय । जयमल्लि मल्ल हतमोह-मल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रतशल्लदल्ल ।।५।। जय नमि नित वासवनुत सपेम, जय नेमिनाथ वृष चक्रनेम । जय पारसनाथ अनाथनाथ, जय वर्द्धमान शिवनगर साथ ।।६।। छन्द घत्तानन्द चौबीस जिनदा आनदकदा, पाप निकदा सुखकारी । तिनपद जुग-चदा उदय अमदा, वासव-वदा हितधारी ।। ॐ हीं श्रीवृषभादि चतुर्विंशति जिनेभ्यो महाध्य निर्वपामीति स्वाहा । सोरठा भुक्ति मुक्ति दातार, चौबिसो जिनराज वर । तिन पद मन वच धार, जो पूजै सो शिव लहै ।। इत्याशीर्वाद ।

देव शास्त्र गुरू वाणी ४१ सिद्ध पूजा - अष्ट करम करि नष्ट अष्ट गुण पायकैं, अष्टम वसुधा माहि विराजे जायकैं | ऐसे सिद्ध अनन्त महन्त मनायकैं, सवौषट् आह्वान करूँ हरषायमै ||१|| ॐ हीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् । अत्र अवतर अवतर सवौषट् । ॐ हीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापन । ॐ हीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् । अत्र मम सन्निहितो भववषट । छन्द त्रिभगी हिमवनगत गगा आदि अभगा तीर्थ उतगा सरवगा आनिय सुरसगा सलिल सुरगा करि मन चगा भरि भृगा ।। त्रिभुवन के स्वामी त्रिभुवननामी अन्तरयामी अभिरामी । शिवपुरविश्रामी जिननिधि पामी सिद्ध जजामी शिरनामी ।। ॐ ही श्री अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये जल निर्वपामीति स्वाहा ||१|| हरिचन्दन लायो कपूर मिलायो बहु महकायो मन भायो । जल सग घसायो रग सुहायो चरन चढायो हरषायो ||त्रिभु.।। ॐ ही श्री अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये चन्दन निर्वपामीति स्वाहा IRII तन्दुल उजियारे शशि-दुति टारे, कोमल प्यारे अनियारे । तुषखण्ड निकारे जलसु पखारे, पुज तुम्हारे ढिग धारे । त्रिभु.।। ॐ हीं श्री अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।।३।। सुरतरूकी बारी प्रीतिविहारी, किरिया प्यारी गुलजारी । भरि कचन-थारी माल सँवारी, तुम पदधारी अतिसारी । त्रिभु.।। ॐ हीं श्री अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ।।४।। पकवान निवाजे, स्वाद विराजे, अमृत लाजे क्षुत भाजे । बहु मोदक छाजे, घेवर खाजे, पूजन काजे करि ताजे ।। त्रिभुः ।। ॐ हीं श्री अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविनिर्मुक्ताय श्रीसिद्धचक्राधिपतये नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ||५||

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देव शास्त्र गुरू वाणी ४३ वृषवृन्द अमन्द न निद लहै, निरदद अफद सुछन्द रहै । नित आनन्दवृन्द बधायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो || भगवन्त सुसन्त अनन्त गुणी, जयवत महत नमत मुनी । जगजन्तुतणे अघधायक हो, सब सिद्ध नमौं सुखदायक हो ।। अकलक अटक शुभकर हो, निरडक निशक शिवकर हो । अभयकर शकर क्षायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो । अतरग अरग असग सदा, भवमग अभग उतग सदा सरवग अनगनसायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। ब्रह्मण्ड जु मडलमडन हो, तिहु दण्ड प्रचण्ड विहडन हो । चिदपिड अखड अकायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। निरभोग सुभोग वियोग हरै, निरजोग अरोग अशोग धरै । अम-भजन तीक्षण सायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। जय लक्ष अलक्ष सुलक्षक हो, जय दक्षक पक्षक रक्षक हो । पणअक्ष प्रतक्ष खपायक हो, सव सिद्ध नौं सुखदायक हो । अप्रमाद अनाद सुस्वादरता, उनमाद विवाद विषादहता । समता रमता अकषायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। निरभेद अखेद अछेद सही, निरवेद अवेदन वेद नहीं । सब लोक अलोक के ज्ञायक हो, सब सिद्ध नमौं सुखदायक हो ।। अमलीन अदीन अरीन हने, निज लीन अधीन अछीन बने । जमको घनघात बचायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। न अहार निहार विहार कबे, अविकार अपार उदार सबै । जगजीवन के मनभायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। असमध अगध अरध भये, निरबध अखध अगध ठये अमन अतन निरवायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो || निरवर्ण अकर्ण उधर्ण बली, असर्ण सुसर्ण भली । बलि मोह की फौज भगायक हो, सब सिद्ध नौं सुखदायक हो ।। अविरूद्ध अक्रुद्ध अजुद्ध प्रभू, अति शुद्ध प्रबुद्ध समृद्ध विभू । दुख हर्ण

श्री आदिनाथ जिन पूजा
नाभिराय गरूदेवि के न्दिन आदिनाा स्वागी |
सर्वार्थसिद्धितें आप पधारे मालाकमाही सिराज
इन्द्रदेव सब मिलकर आय जन्न महात्सव का काज ।
आहाना सब विधि मिल करक अपो पर प पृज पाय ।।
ॐही श्रीआदिशा णिोद्र | अन अवतर उपतर गयो ।
ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र | अन तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ शापा ।
ॐ ही श्रीआदिनाथ जिोन्द्र | अन मम सहिता व व वपट रागिधिकरणम।
क्षीरोदधि को उज्ज्वल जल ले श्रीजिनवरपद पूजन जाय ।
जन्म-जरा दुख मेटन कारन, ल्याय चढाऊँ प्रमु जी के पाय ।।
श्रीआदिनाथ के चरण-कमल पर, बलि-बलि जाऊं मनवचकाय ।
हे करूणानिधि भव दुख मेटो, याते में पूजो प्रभु पाय ।।
ॐ हीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय जन्ममृत्यु विनाशनाय जल नि ||१||
मलयागिरि चदन दाह निकदन, कचन झारी मे भर ल्याय ।
श्रीजी के चरण चढाओ भविजन, भव आतापतुरत मिट जाय ।।श्री.
ॐ हीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चदन नि. ।।२।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ४५ शुभशालि अखडित सौरममडित, प्रासुक जलसो धोकर ल्याय । श्रीजी के चरण चढाओ भविजन, अक्षय पद को तुरत उपाय ||श्री. ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षत नि. ।।३।। कमल केतकी बेल चमेली, श्रीगुलाब के पुष्प मँगाय । श्रीजी के चरण चढाओ भविजन, कामवाण तुरत नसि जाय ||श्री. ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय कागवाणविध्वसनाय पुष्प नि. |४|| नेवज लीना तुरत रस भीना. श्रीजिनवर आगे धरवाय थाल भराऊ क्षुधा नसाऊँ, जिन गुण गावत मन हरपाय ||श्री. ।। ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय शुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. ||५|| जगमग-जगमग होत दशोदिस, ज्योति रही मन्दिर मे छाय । श्रीजी के सन्मुख करत आरती, मोहतिमिर नासे दुखदाय ||श्री.।। ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्दाय गोरायकारविनाशनाय दीप नि. ।।६।। अगर कपूर सुगन्ध मनोहर, चन्दन कूट सुगन्ध मिलाय । श्रीजी के सन्मुख खेय धुपायन, कर्म जरे चहुगति मिटि जाय ।।श्री.।। ॐ श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अप्टकर्मदानाय धूप नि. ।।७।। श्रीफल और बदाम सुपारी, केला आदि छुहारा ल्याय महामोक्ष फल पावन कारन, ल्याय चढाऊ प्रभु जी पाय ||श्री. ।। ॐही श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलपदप्राप्तये फल नि. |1|| शुचि निर्मल नीर गध सु अक्षत, पुष्प चरू ले मन हर्षाय । दीप धूप फल अर्घ सु लेकर, नाचत ताल मृदङ्ग वजाय ।।श्री.।। ॐही आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ नि. 11511 पञ्चकल्याणक अर्घ सवार्थसिद्धितें चये, मरूदेवी उर आय । दोज असित आसाढ की, जजू तिहारे पाय ।। ॐरी श्री आषाढकृष्णद्वितीया गर्मकल्याणकप्राप्ताय श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य । चैत वदी नौमी दिना, जन्म्या श्रीभगवान । सुरपति उत्सव अति करा मैं पूजो धरि ध्यान ।। ॐ ही चैत्रकृष्णनवम्या जन्मकल्याणकप्राप्ताय श्रीआदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ ।

४६ देव शास्त्र गुरू पाणी तृणवत ऋधि सब छोडिके, तप धारया वन जाय । नौमी चैत्र असेत की, जजू तिहार पाय 11 ॐ ही श्री चैनकृष्णनवम्या तप कल्याणक प्राप्ताय श्रीआदिनाथ जिनन्द्राय अज़ नि. । फाल्गुन वदि एकादशी, उपज्या कंवलज्ञान इन्द्र आय पूजा करी, मैं पूजा डर थान ।। ॐ ही श्री फाल्गुकृष्ण एकादश्या नकल्याणकप्राप्नाय श्रीआदिनाय जिनन्द्राय अर्ध्य. नि. । माघ चतुर्दशि कृष्णकी, मोक्ष गये गगवान भवि जीवो को बोधि के पहुच शिवपुर थान ।। ॐ ही गाघकृष्णचतुर्दश्या गाक्षकल्याणकप्राप्ताय श्रीआदिनाथ गिटाय अर्धा नि. जयमाला आदीश्वर महाराज मै विनती तुमसे करू चारो गति के माहि मै दुख पायो सो सुनो ।। अष्ट कर्म म एक लो, यह दुष्ट महादुख देत हो । कवहूँ इतर निगोद मे मोकू पटकत करत अचेत हो ।। म्हारी दीन तनो सुन वीनती ।।१।। प्रभु कबहूँक पटक्यो नरक मे, जठ जीव महादु ख पाय हो । निष्ठुर निरदई नारकी, जठै करत परस्पर घात हो ।। म्हारी दीन तनो सुन वीनती ।।२।। प्रभु नरक तणा दुख अब कहूँ, जलै करै परस्पर घात हो । कोइ इक बाध्यो खभ सो, पापी दे मुद्गर की मार हो ।। कोइ इक काटे करोत सो, पापी अत तणी दोय फाड हो । म्हारी दीन. ||३|| प्रभु इह विधि दुख भुगत्या घणा, फिर गति पाई तिर्यच हो । हिरणा बकरा बाछडा पशु दीन गरीब अनाथ हो । पकड कसाई जाल मे, पापी काट-काट तन खाय हो । म्हारी दीन. ||४||

४७
देव शास्त्र गुरू वाणी
प्रभु मैं ऊँट बलद भैंसा भयो, जापैं लदियो भार अपार हो ।।
नहि चाल्यो जब गिर पर्यो, पापी दे सोटन की मार हो ।
म्हारी दीन. ।।५।।
प्रभु कोइयक पुण्य सजोसू, मैं पायो स्वर्ग निवास हो ।।
देवागना सग रमि रह्यो, जठै भोगनिको परकाश हो ।
म्हारी दीन. ।।६।।
प्रभु सग अप्सरा रमि रह्यो, कर कर अति अनुराग हो ।
कबहुक नन्दन-वन विषै प्रभु, कबहुक वन गृह मासि हो ।
म्हारी दीन. |७||
प्रभु इह विधि काल गमायकै, फिर माला गई मुरझाय हो ।
देव तिथि सब घट गई, फिर उपज्यो सोच अपार हो ।
सोच करत तन खिर पड्यो, फिर उपज्यो गर्भ मे जाय हो ।।
म्हारी दीन. ||८||
प्रभु गर्भ तणा अब दुख कहूँ, जढ़ सकडाई को ठौर हो ।
हलन-चलन नहि कर सक्यो, जठै सघन कीच घनघोर हो ।
म्हारी दीन. ||६||
माता खावे चरपरो, फिर लागै तन सन्ताप हो ।
प्रमु ज्यो जननी तातो भखे, फिर उपजै तन सन्ताप हो ।।
म्हारी दीन. ||१०||
औंधे मुख झूल्यो रह्यो, फेर निकसन कौन उपाय हो ।
कठिन कठिन कर नीसर्यो, जैसे निसरै जती मे तार हो ।।
म्हारी दीन. 1|११||
प्रमु फिर निकसत धरत्या पड्यो, फिर लागी भूख अपार हो ।
रोय रोय विलख्यो घणो, दुख वेदन की नहि पार हो ।
म्हारी दीन. ।।१२।।
प्रभु दुख मेटन समरथ धनी, यातें लागू तिहारे पाय हो ।
सेवक अरज करे प्रभु । मोकू भवदधि पार उतार हो ।।
म्हारी दीन. ||१३||

४८
देव शास्त्र गुरू वाणी
दोहा
श्रीजी की महिमा अगम है काई न पाव पार
मे मति अल्प अज्ञा। हा कान कर विस्तार ।।
ॐ ही श्रीआदिनाथ जिनन्द्राय महाचम शिवपासीति स्वाहा ।
दोहा
श्री विनती ऋपभ जिनश की, जा पढसी मन लाय ।
सुरगो मे सशय नही निश्चय शिवपुर जाय 11
इत्याशीर्वाद ।
श्री पद्मप्रभ जिन पूजा
श्रीधर नन्दन पद्मप्रभ वीतराग जिननाथ
विधन हरण मगल करण नमो जोरि जुग हाथ ।।
जन्म महोत्सव के लिए मिलकर सब सुरराज ।
आये कौशाम्बी नगर पद पूजा के काज ।।
परम दिगम्बर शातिमय छवि साकार अनूप ।
हम सब मिल करके यहाँ प्रभु पूजा के काज ।।
आह्वानम् करते सुखद कृपा करो महाराज ।
ॐ ही श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ ही श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् ।
ॐ ही श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।
अष्टक
क्षीरोदधि उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा ।
कचन झारी मे लेय दीनी धार धरा ।।
बाडा के पद्म जिनेश, मगल रूप सही ।
काटो सब कलेश महेश, मेरी अर्ज यही ।।
ॐ हीं श्रीपदमप्रभजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. ||१||
चन्दन केशर कपूर, मिश्रित गन्ध धरो
शीतलता के हित देव, भव आताप हरो ।।बाडो के.।।
ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन नि. IR||

४६ देव शास्त्र गुरू वाणी ले तन्दुल अमल अखड, थाली पूर्ण भरो अक्षय पद पावन हेतु, हे प्रभु पाप हरो ।।बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. ।।३।। ले कमल केतकी बेल, पुष्प धरूँ आगे । प्रभु सुनिये हमरी टेर, काम कला भागे ।(बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्ष नि. ।।४।। नैवेद्य तुरत बनाय, सुन्दर थाल सजा मम क्षुधा रोग नश जाय, गाऊँ वाद्य बजा |बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपदमप्रभजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. ।।५।। जो जगमग-२ ज्योति, सुन्दर अनियारी । ले दीपक श्रीजिनचन्द, मोह नशे भारी बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपदगप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. ||६|| ले अगर कपूर सुगध, चन्दन गन्ध महा खेवत हो प्रभु ढिग आज, आठो कर्म दहा ||बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपदमप्रभजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप नि. |७|| श्रीफल वादाम सुले य, केला आदि धरे फल पाऊँ शिवपद नाथ, अरपू मोद भरे ।।वाडा के.।। ॐ हीं श्रीपदमप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा ||८|| जल चन्दन अक्षत पुष्प, नेवज आदि मिला । में अष्ट द्रव्य से पूज, पाऊँ सिद्ध शिला ||बाडा के.।। ॐ ही श्रीपदमप्रभजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा II || अर्घ्य (चरणो का) चरण कमल श्रीपद् के, वन्दो मन वच काय अर्घ्य चढाऊँ भाव से, कर्म नष्ट हो जाय ।।वाडा के.।। ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र के चरणो मे अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।। भूमि मे विराजमान का अर्घ्य धरती मे श्रीपद्म की, पद्मासन आकार परम दिगम्बर शान्तिमय, प्रतिमा भव्य अपार ।। सौम्य शक्ति अति कातिमय, निर्विकार साकार । अष्ट द्रव्य का अर्घ्य ले, पूजो विविध प्रकार ||बाडा के.।। ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय भूमि मे स्थित अर्घ्य नि. स्वाहा ।

५० देव शास्त्र गुरू वाणी पच कल्याणक अर्घ दोहा माघ कृष्ण छठ मे प्रभो, आये गर्भ मॅझार । मात सुसीमा का जनम, किया सफल करतार श्री पद्मप्रभ जिनराज जी, मोहे राखे हो सरना । ॐ ही माघकृष्णपष्ठीदिने गर्भगगलप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्य । नि. । कार्तिक सुदि तेरस तिथि, प्रभो लियो अवतार । देवो ने पूजा करी. पूजा करी, हुआ मगलाचार ।। श्री पद्मप्रभ जिनराज जी, मोहे राखे हो सरना । ॐ ही कार्तिकशुक्लात्रयोदश्या जन्ममगलप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्य नि. । कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी, तृणवत् बन्धन तोड । तप धार्यो भगवान ने, मोह कर्म को तोड ।। श्री पद्मप्रभ जिनराज जी, मोहे राखे हो सरना । ॐ हीं कार्तिकशुक्लात्रयोदश्या तपकल्याणकप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ- जिनेन्द्राय अर्घ्य नि. । चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा, उपज्यो केवलज्ञान । भवसागर से पार हो, दिया भव्य जन ज्ञान ।। श्री पद्मप्रभ जिनराज जी, मोहे राखे हो सरना । ॐ हीं कार्तिकशुक्लात्रयोदश्या केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्य नि. । फाल्गुन वदी सु चौथ को, मोक्ष गये भगवान । इन्द्र आय पूजा करी, मै पूजौं धरि ध्यान श्री पद्मप्रभ जिनराज जी, मोहे राखे हो सरना । ॐ हीं फाल्गुनकृष्णचतुर्थी मोक्षमगलप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्य नि. ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
जयमाला
दोहा
चौतीसो अतिशय सहित, बाडा के भगवान
जयमाला श्री पद्म की, गाऊँ सुखद महान ॥
पद्धरी छन्द
जय पगनाथ परमात्म देव, जिनकी करते सुर चरण सेव ।
जय पदम-२ प्रभ तन रसाल, जय-२ करते मुनिजन विशाल ।।
कौशाम्ची मे तुम जन्म लीन, वाडा मे बहुअतिशय करीन ।
इक जाट पुत्र ने जमो खोद, पाया तुमको होकर समोद ।।
सुनकर हर्पित हो भविक वृन्द, आकर पूजा की दुख निकद ।
करते दुखियो का दुख दूर, हो नष्ट प्रेत बाधा जरूर ।।
डाफिन शाफिन सव होय चूर्ण, अन्धे हो जाते नेत्र पूर्ण ।
श्रीपाल सेठ अजन सुचोर, तारे तुमने उनको विभोर ।।
अरू नकुल सर्प सीता समेत. तारे तुमने निज भक्ति हेत ।
हे सकट मोचन भक्ति पाल, हमको भी तारो गण विशाल ।।
विनती करता हूँ बार बार, होवे मेरा दुख क्षाक्षार ।
मीना गूजर सर जाट जैन, आकर पूजें सव तृप्त नैन ।।
मन वच तन पूजे जो कोय, पावे ते नर शिवसुख जो सोय ।
ऐसी महिमा तेरी दयाल, अब हम पर भी होवो कृपाल ||
ॐ पदगप्रमजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्य निर्व. स्वाहा ।
पूजा विधि जानूं नही, नहि जानू आहान
भूल चूक वस माफ कर, दया करो भगवान ।
इत्याशीर्वाद ।
श्री चंद्रप्रभ जिन पूजा (देहरा)
स्थापना
शुम'पुण्य उदय से ही प्रभुवर, दर्शन तेरा कर पाते हैं ।
केवल दर्शन से ही प्रभु, सारे पाप मेरे कट जाते है ।

भाव उठे ५२ देव शास्त्र गुरू वाणी देहरे के चन्द्रप्रभ स्वामी, आहान करने आया हूँ । मम हृदय कमल मे आ तिष्ठो, तेरे चरणो मे आया हूँ । ॐ हीं श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर सपोपट आहानग । अत्र तिष्ट तिष्ठ ठ ठ स्थापन अन मग सनिहिता भव भव वषट सनिधिकरण । अथाष्टक मोगो मे फंसकर हे प्रभुवर, जीवन को वृथा गॅवाया है । इस जन्म-मरण से मुझे नहीं, छुटकारा मिलने पाया है ।। मन मे कुछ मेरे, जल झारी मे भर लाया हूँ । मन मे मिथ्या मल धोने को चरणो मे तेरे आया हूँ ।। ॐ हीं चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय जन्गजरामृत्यु विनाशनाय जल नि. । निज अन्तर शीतल करने को चन्दन घिसकर ले आया हूँ । मन शान्त हुआ न इससे भी तेरे चरणो मे आया हूँ ।। क्रोधादि कषायो के कारण सतप्त हृदय प्रभु मरा है । शीतलता मुझको मिल जाए हे नाथ सहारा तेरा है ।। ॐ ही चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन नि. 11R11 पूजा मे ध्यान लगाने को, अक्षत धोकर ले आया हूँ । चरणो मे पुज चढा करके, अक्षत अक्षयपद पाने आया हूँ ।। निर्मल आत्मा होवे मेरी, सार्थक पूजा तव तेरी है । निज शाश्वत अक्षयपद पाऊँ, ऐसी प्रभु विनती मेरी 11 ॐ ही चन्द्रप्रभजिनेन्द्रायप्राप्तये अक्षतान् निर्व. नि. ।।३।। पर गध मिटाने को प्रभुवर, वह पुष्प सुगधी लाया हूँ । तेरे चरणो मे अर्पित कर, तुमसा ही होने आया हूँ ।। श्रीचन्द्र प्रभु यह अरज मेरी, भवसागर पार लगा देना । यह काम अग्नि का रोग बढा, छुटकारा नाथ दिला देना ।। ॐ ही श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. ।।४।। दुख देती है तृष्णा मुझको, कैसे छुटकारा पाऊँ मैं । हे नाथ बता दो आज मुझे, चरणो मे शीश झुकाऊँ मैं ।। यह क्षुधा मिटाने को प्रभुवर, नैवेद्य बनाकर लाया हूँ । हे नाथ मिटा दो क्षुधा मेरी, भव भव मे फिरता आया हूँ ।। ॐ हीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. ।।५।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
५३
यह दीपक की ज्योति प्यारी, अधियारा दूर भगाती है ।
पर यह भी नश्वर है प्रभुवर, झझा इसकी धमकाती है ।।
हे चन्द्रप्रभु दे दो ऐसा दीपक, अज्ञान मिटा डाले ।
मोहाधकार हो नष्ट मेरा, यह ज्योति नई मन है बाले ।।
ॐ हीं श्रीचन्द्रभजिनेन्द्राय मोहाधकारविनाशनाय दीप नि. ।।६।।
शुभ धूप दशाग बना करके, पावक मे खेऊँ हे प्रभुवर ।
क्षय कर्मोका प्रभु हो जावे, जग का झझट सारा नश्वर ।।
हे चन्द्रप्रभु अन्तर्यामी, कैसे छुटकारा अब पाऊँ
हे नाथ बता दो मार्ग मुझे, चरणो पर बलिहारी जाऊँ ।।
ॐ हीं श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूप निर्व. ।।७।।
पिस्ता बादाम लवगादिक, भर थाली प्रभु मैं लाया हूँ ।
चरणो मे नाथ चढा करके, अमृत रस पीने आया हूँ ।।
करूणा के सागर दया करो, मुक्ति का मार्ग अब पाऊँ ।
देदो वरदान प्रभु ऐसा, शिवपुर को हे प्रभुवर जाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्ताय फल निर्व. ।। ||
जल चदन अक्षत पुष्प चरू, घृत से भर लाया हूँ ।
दश गध धूप फल मिला अर्घ ले, स्वामी अति हरषाया हूँ ।।
हे नाथ अनर्घ पद पाने को, तेरे चरणो मे आया हूँ
भव-भव के बध कटे प्रभुवर, यह अरज सुनाने आया हूँ ।।
ॐ हीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्ताय अर्घ निर्व. 118 ||
पञ्चकल्याणक अर्घ
जब गर्भ मे प्रभु जी आए थे, इन्द्रो ने नगर सजाया था ।
छ मास प्रथम ही आकार के, रत्नो का मेह बरसाया था ।।
तिथि चैत्र बदी पचम प्यारी, जब गर्भ मे प्रभुजी आए थे ।
लक्ष्मणा माता को पहले ही, सोलह सपने दिखलाए थे ।।
ॐ हीं चन्द्रप्रम जिनेन्द्राय चैत्र कृष्णा पचमी गर्भमगल मण्डिताय अर्घम् नि.।
शुभ बेला मे प्रभु जन्म हुआ, वदि पौष एकादशि थी प्यारी ।
श्री महासेन नृप के घर मे हुई, जय जयकार बड़ी भारी ।।

५४ देव शास्त्र गुरू वाणी पाडुकशिल पर अभिषेक कियो, सव देव मिले थे चतुरनिकाय । सो जिनचन्द्र जयो जगमाही, विघ्नहरण और मगलदाय । ॐ हीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय पौष कृष्णा एकादश्या जन्मगगलगण्डिताय अर्घम् नि. । जग मे झझट से मन ऊवा तप को ली श्रीजिन ने ठहराय पोष वदी ग्याररस को इन्द्र ने , तप कल्याण कियो हरपाय। सर्वर्तुक वन मे जाय विराजे, के लाच जिन कियो हरपाय ।। देहरे के श्रीचन्द्रप्रभु को, अर्घ चढाऊं नित्य बनाय।। ॐ ही श्री चन्द्रप्रभ जिनन्द्राय पाष कृष्णा एकादश्या तपोमगल मण्डिताय अर्घम् नि। फाल्गुन वदी सप्तमी के दिन, चार घातिया घात महान। समवशरण रचना हरि कीनी पायो ता दिन केवल ज्ञान ।। साढे आठ योजन परमित था, समवशरण श्रीजिन गगवान। ऐसी श्री जिन चन्द्रप्रभु को, अर्घ चढाए करूँ नित ध्यान।। ॐ ही श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय फाल्गुन कृष्णा सप्तम्या केवल ज्ञान प्राप्ताय अर्घम् नि। शुक्ला फाल्गुन सप्तमि के दिन, ललितकूट शुभ उत्तम थान। श्रीजिन चन्द्रप्रभु जगनामी, पायो आतम शिव कल्याण ।। वसुकर्म जिनचन्द्र ने जीते पहुचे स्वामी मोक्ष मझार। निर्वाण महोत्सबकियो इन्द्र ने देव करे सव जय जयकार ।। ॐ ही श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय फाल्गुन शुक्ला सप्तम्या मोक्षमगल नण्डिताय अर्धम् नि। श्रावण सुदी दशमी को प्रभु जी प्रकट भये देहरे मे आन। सवत तेरह दो सहस्त्र ऊपर शुभ बृहस्पतिवार ता दिन जान ।। जय जयकार हुई देहरे मे प्रकट हुए जब श्री भगवान। चरणो मे आ अर्घ चढाऊ, प्रभु के दर्शन सुख की खान ।। ॐ हीं श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय फागुन शुक्ला दशम्या देहरास्थाने प्रकट रूपाय अर्घम् नि। जयमाला हे चन्द्रप्रभु तुम जगतपिता जगदीश्वर तुम परमात्मा हो। तुम ही हो नाथ अनाथो के जग को निज आनद दाता हो।।

देव शास्त्र गुरू याणी
इन्द्रियो को जीत लिया तुमने जितेन्द्रनाथ कहाये हो।
तुम ही हो परम हितैपी प्रभु गुरु तुम ही नाथ कहाये हो।।
इस नगर तिजारा में स्वामी देहरा स्थान निराला है।
दुख दुखियो का हरने वाला श्रीचन्द्रनाम अति प्यारा है।।
जो भाव सहित पूजा करते मनवाछित फल पा जाते हैं।
दर्शन से रोग नसे सारे गुनगान तेरा सब गाते हैं।।
मैं भी हूँ नाथ शरण आया कर्मों ने मुझको रौंदा हैं।
यह कर्म बहुत दुख देते हैं. प्रभु एक सहारा तेरा है।।
फभी जन्न हुआ कभी मरण हुआ हे नाथ बहुत दुख पाया है।
कभी नरक गया कभी स्वर्ग गया, ममता-गमता ही आया है।
तिथंच गति के दुख सहे. ये जीवन बहुत अकुलाया है।
पशुगति में गार सही भारी, बोझा रख खूब भगाया है।।
अजन से चोर अघम तारे, भव सिन्धु से पार लगाया है।
सोना की सुन टेर प्रभु नाग को हार बनाया है।।
मुनि समन्तभद्र को है स्वामी, आ चमत्कार दिखलाया है।
कर चमत्कार को नमस्कार, चरणो में शीश झुकाया है।।
इस पचमकाल में है स्वामी, क्या अदगुत महिमा दिखलाई।
दुख दुखियों के हरने वाली, देहरे मे प्रतिमा प्रकटाई।।
शुभ पुण्य उदय से ही स्वामी, दर्शन तेरा करने आया हूँ।
इस मोह जाल से है स्वामी, छुटकारा पाने आया हूँ।।
श्री चन्द्रप्रमु मेरी अर्ज
सुनो, चरणो मे तेरे आया हूँ।
भव सागर पार करो स्वामी, यह अर्ज सुनाने आया हूँ।।
ॐ ॐ श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय महार्घ नि०।
दोहा
देहरे के श्रीचन्द्र को, भाव सहित जो ध्याय ।
'मुंशी पावे सम्पदा, मन वाछित फल पाय।।
इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत्।

५६ दव शास्त्र गुरु दाणी श्री शान्तिनाथ जिन पूजा स्थापना-रोडक छन्द सर्वार्थ सुविमान त्याग गजपुर में गया विश्वसन गूपात तास नन पचम चक्री गय दन द्वादम राज। में सऊं तुम चरण तिष्ठिय ज्या दुख भाज।। ॐही श्रीशान्तिनाय मिनद । भन अवतर उचतर गवारट त्याला ॐ हीं श्रीशान्तिनाथ निद्र । अन तिट तिट ट ट यापन। ॐ ही श्रीगान्तिनाग जिनद । अन गा गतिहिता 1 व बपट सन्निधिकरणम। अथाष्टक पचमउदधि तनो जन निरमल कचन कला भर हर्णय। धार देत श्रीजिन सन्मुख जन्म जग मृत दूर कराय।। शान्तिनाथ पचम चक्रश्वर द्वादश मदन तना पद पाय । तिनके चरण कमल के पूजे रोग शोक दुख दारिद्र जाय।। ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनन्द्राय जन्मजरामुत्युविनाशनाय जल नि० ।।१।। मलयागिरि चदन कदली नदन, कुकुम जल के सग घसाय । भव आताप विनाशन कारण, चरचू चरण सब सुखदाय।। शातिनाथ.|2|| ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दन नि०२|| पुण्यराशि सम उज्जवल अक्षत, शशि मरीचि तिस देख लजाय। पुञ्ज किये तुम आगे श्रीजिन, अक्षयपद के हेतु बनाय ।। शातिनाथ० ॥३॥ ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् नि०।।३।। सुर पुनीत अथवा अवनी के, कुसुम मनोहर लिए मगाय। भेट धरत तुम चरणन के ढिग, ततक्षण कामबाण नस जाय ।। शातिनाथ. ||४|| ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय कामवाण विध्वसनाय पुष्प नि०।।४।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
५७
भाति भाति के सद्य मनोहर, कीने मैं पकवान सवार।
भर थारी तुम सन्मुख लायो, क्षुधा वेदनी वेग निवार।।
शातिनाथ०11५।।
ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्द नि० ।।५।।
घृत सनेह कर्पूर लाय कर, दीपक ताके धरे प्रजार।
जगमग जोत होत मन्दिर मे, मोह अध को देत सुटार।।
शातिनाथ० ।।६।।
ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोहाधकार विनाशनाय दीप नि०।६।।
देवदारु कृष्णागर चन्दन, तगर कपूर सुगन्ध अपार ।
खेऊँ अष्ट करम जारन को, धूप धनजय मॉहि सुडार।।
शातिनाथ.|७||
ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप नि०।७।।
नारगी बादाम - सुकेला, एला दामिड फल सहकार।
कचन थान माँहि धर लाऊँ, अर्चत ही पाऊँ शिव नार।।
शातिनाथ.||८||
ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि0|1||
जल फलादि बसु द्रव्य सवारे, अर्घ चढाये मगल गाय।
'बखत रतन' के तुम हो साहिब, दीजे शिवपुर राज कराय।।
शातिनाथ. ।।६।।
ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ नि०118||
पंचकल्याणक अर्घ (छन्द उपगति)
भादव सप्तमि श्यामा, सरवारथ त्याग नागपुर आये।
माता ऐरा नामा, मैं पूजू ध्याऊँ अर्घ शुभ लाये।।१।।
ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय भाद्रपदकृष्ण सप्तम्या गर्भकल्यणकाय अर्घ ।
जन्मे तीर्थकर नाथ, वर जेठ असित चतुर्दशी सोहै।
हरिगण नावे माथ, मैं पूजू शाति चरण जुग जोहै ।।
ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठकृष्ण चतुर्दश्या जन्मकल्याणकाय
अर्घ

५५ देव शास्त्र गुरू वाणी चौदस जेठ अधियारी, कानन मे जाय योग प्रभु लीन्हा। नव निधि रत्न सुछारी, मैं बदू आत्म सार जिन दीन्हा ।।३।। ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय जेठ वदी चतुर्दश्या तपकल्याणकाय अर्घ । ३ पोष दसे उजियारा, अरि घात ज्ञान जिन पाया। प्रातिहार्य बसु धारा, मैं सेऊँ सुर नर जासु यश गाया।।४।। ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय पोष शुक्ला दशम्या ज्ञानकल्याण काय अर्घ । सम्मेद शैल भारी, हनि करि अघाति मोक्ष जिन पाई। जेठ चतुर्दशि कारी, मैं पूजू सिद्ध थान सुखदाई।।५।। ॐ हीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठकृष्णा चतुर्दश्या मोक्ष कल्याणकाय अर्घ । जयमाला छप्पय छन्द भये आप जिन देव जगत मे सुख विस्तारे, तारे भव्य अनेक तिन्हो के सकट टारे । टारे आठो कर्म मोक्ष सुख तिनका भारी, भारी विरद निहार लई मै शरण तिहारी।। तिहारे चरणन को नमू, दुख दारिद्र सताप हर। हर सकल कर्म छिन एक मे, शाति जिनेश्वर शातिकर ।।१।। सारग लक्षण चरण मे, उन्नत धनु चालीस । हाटक वर्ण शरीर दुति, नमू शाति जगदीश ।।२।। छन्द भुजगप्रयात प्रभु आपने सर्व के फन्द तोडे, गिनाऊँ कछू मैं तिनो नाम थोडे । पडो अबु के बीच श्रीपाल राई, जपो नाम तेरो भए थे सहाई।।३।। धरो राय ने सेठ को सूलिका पे, जपो आपके नाम की सार जापे। भये थे सहाई तबै देव आए, करी फूल वर्षा सिहासन बनाए । जबै लाख के धाम वही प्रजारी, भयो पाडवो पै महाकष्ट भारी।।४।। जबै नाम तेरे तनी टेर कीनी, करी थी विदुर ने वही राह दीनी ।।५।। हरी द्रोपदी धातुको खड माही तुम्हीं हो सहाई भला और नाहीं। लियो नाम तेरो भलो शील पालो, बचाई तहा ते सबै दुख टालो ।।६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी जबै जानकी राम ने जो निकारी, धरे गर्भ को भार उद्यान डारी। रटो नाम तेरो सव सौख्यदाई, करी दूर पीडा सुछिन ना लगाई।७।। व्यसन सात सेव करें तस्कराई, सु अञ्जन से तारे घडी ना लगाई। सहे अञ्जना चदना दुख जेते, गए भाग सारे जरा नाम लेते।।८।। घडे बीच मे सास ने नाग डारो, भलो नाम तेरो जु सोमा संभारो। गई काढने को भई फूल माला, भई हे विख्यात सबै दुख टाला ।।६।। इन्हे आदि के के कहाँ लो बखानो, सुनो विरद भारी तिहूँलोक जानो। अरिनाथ मेरी जरा ओर हेरी, बडी नाव तेरी रती बोझ मेरो।।१०।। गहो हाथ स्वामी करो वेग पारा, कहूँ क्या अवै आपनी मैं पुकारा । सबै ज्ञानके बीच भासी तुम्हारे, करो देर नाही अहो शाति प्यारे ।११।। छन्द घत्तानन्द श्री शातिनाथ तुम्हारी कीरत भारी, सुर नर नारी गुणमाला। 'वख्तावर ध्यावे रतन सु गावे, मम दुख दारिद सब टाला ।। ॐ श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये महाय नि०॥ अजी ऐरानन्दन छवि लखत हैं आप अरन। धरै लज्जा भारी करत थुति सो लाग चरन ।। करे सेवा कोई लहत सुख सो सार छिन मे। घने दीना तारे हम चहत हैं वास तिन मे।। इत्याशीवर्द पुष्पाजलि क्षिपेत्। श्री पार्श्वनाथ जिन पूजा गीता छन्द वर स्वर्ग प्राणत को विहाय, सुमात वामा सुत भये। अश्वसेन के पारस जिनेश्वर, चरण तिनके सुर नये।। नव हाथ उत्रत तन विराजै, उरग-लच्छन अति लसैं। थापूँ तुम्हे जिन आय तिष्ठो, करम मेरे सब नसैं ।। ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट आहानम्। ॐही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थानपन । ॐही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम् ।

६० देव शास्त्र गुरू वाणी अथाष्टक-चामर छन्द क्षीर सोम के समान अम्बु सार लाइये। हेम-पात्र धारिक सु आपको चढाइये।। पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा। दीजिए निवास मोक्ष भूलिए नहीं कदा।। ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जल नि०1१11 चन्दनादि केशरादि स्वच्छ गध लिजिए। आप चरण चर्च मोह-ताप को हनीजिए।। पार्श्व०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय ससारताप विनाशनाय चन्दन नि०|| फेन चन्द के समान अक्षतान लाइकै। चरण के समीप सार पुज को रचाय के।। पार्श्व०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान नि० ।।३।। केवडा गुलाब और केतकी चुनाइये। धार चरण के समीप काम को नसाइये।। पार्श्व०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि०।।४।। घेवरादि बावरादि मिष्ट सद्द मे सने। आप चर्ण चर्च ते क्षुधादि रोग को हने ।। पार्श्व० ।। ॐ ही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि०||५|| लाय रत्न-दीप को स्नेह-पूर के भरूँ। वातिका कपूर बार मोह ध्वातकू हरूँ।। पार्श्व०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोहाधकार विनाशनाय दीप नि०।६।। धूप गध लेयक सु अग्नि सग जारिए। तास धूप के सुसग अष्ट कर्म बारिए।। पार्श्व०।। ओ ही श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूप निर्व०।७।। खारकादि चिरभटादि रत्न थान में भरू। हर्ष धारिक जजू सुमोक्ष सौख्य को बरूँ।। पार्श्व ।। ओ ही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्व०11८|| नीर गन्ध अक्षतान् पुष्प चारू लीजिए। दीप धूप श्रीफलादि अर्घ जजीजिए।।पार्श्व०।। ओ ही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्ताये अर्घ निर्व०६||

६१
देव शास्त्र गुरू वाणी
पंच कल्याणक अर्घ (छन्द चाल)
शुभप्राणत स्वर्ग विहाए, वामा माया उर आए।
वैशाखतनी दुतिकारी, हम पूजै विघ्न निवारी।।
ॐ हीं पैशाख कृष्णा द्वितीयाया गर्भमगलमण्डिताय श्रीपार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय अर्घा
जनमे त्रिभुवन सुखदाता, एकादशी पौष विख्याता।
श्यामा तन अद्भुत राजै, रवि-कोटिक-तेज सुलाजै।
ॐ हीं पौषकृष्ण एकादश्या जन्ममगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
अर्घ०।
कलि पौष इकादशि आई, तब बारह भावना भाई।
अपने कर लोच सु कीना, हम पूर्णं चरण जजीना।।
ॐही पौषकृष्ण एकादश्या तपोमगलमण्डिताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय
अर्घ०।
कलि चैत चतुर्थी आई, प्रभु केवलज्ञान उपाई।
तब प्रभु उपदेश जु कीना, भवि जीवन को सुख दीना।।
ॐ चैत्र चतुर्थ्या केवल ज्ञान प्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घ०।
सित सातें सावन आई. शिवनारि वरी जिनराई।
सम्मेदाचल हरिमाना, हम पूजै मोक्ष कल्याना।।
ॐ ही श्रावण शुक्लासप्तम्या मोक्षमगलमण्डिताय श्रीपार्श्वनाथ
जिनेन्द्राय अर्घ।
जयमाला
पारसनाथ जिनेन्द्र तने वच, पौनभखी जरते सुन पाए।
को सरधान लह्यो पद आन, भयो पद्मावति शेष कहाए।।
नाम प्रताप टरै सन्ताप, सुभव्यन को शिव-शर्म दिखाए।
हो अश्वसेन के नन्द, भले, गुणगावत हैं तुमरे हरषाए ।।१।।
दोहा
केकी-कठ समान छवि, वपु उतग नव हाथ।
लक्षण उरग निहार पग, बन्दौं पारसनाथ।२।।

६२ देव शास्त्र गुरू वाणी पद्धरि छन्द रची नगरी छह मास अगार, बने चहुगोपुर शोभ अपार । सु कोट तनी रचना छवि देत, कगूरन पर लहकै बहुकेत ||३|| बनारस की रचना जु अपार, करी बहुभाति धनेश तैयार | तहॉ विश्वसेन नरेन्द्र उदार, करै सुख वास सुदे पटनार ||४|| तज्यो तुम प्राणत नाम विमान, भये तिनके वर नदन आन । तबै सुर इन्द्र नियोगन आय, गिरिंद करी विधि न्हौन सुजाय ||५|| पिता-घर सौंपि गए निजधाम, कुबेर करै बसु जाम सुकाम | बढे जिन दोज मयक समान, रमैं बहु बालक निर्जर आन ।।६।। भये जब अष्टम वर्ष कुमार, धरे अणुव्रत महासुखकार । पिता जब आन करी अरदास, करौ तुम व्याह वरो मम आस |७|| करी तब नाहिं कहे जगचन्द, किये तुम काम कषाय जु मद । चढे गज राजकुमारन सग, सु देखत गगतनी सु तरग ||८|| लख्यो इक रक करे तप घोर, चहूँदिशि अगनि बलै अति जोर । कहै जिननाथ अरे सुन प्रात, करे बहू जीवन की मत घात ||६|| भयो तब कोप कहै कित जीव, जले तब नाग दिखाय सजीव । लख्यो यह कारन भावन भाय, नये दिव ब्रह्मऋषीसुर आय ||१०|| तबै सुर चार प्रकार नियोग, धरी शिविका निज कध मनोग । कियो वनमाहि निवास जिनद, धरे व्रत चारित आनद कद ।।११।। गहे त] अष्टम के उपवास, गये धनदत्त तने जु अवास । दियो पयदान महासुखकार, भयी पनवृष्टि तहाँ तिहिवार ||१२।। गये तब काननमाहि दयाल, धरो तुम योग सबै अघटाल । तबै वह धूम सुकेत, अयान, भयो कमठाचर को सुर आन ||१३।। करै नभ गौन लखे तुम धीर, जु पूरब बैर विचार गहीर । कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहु तीक्षण पवन झकोर 1/१४ ।। रह्यो दसहूँ दिशिमे तम छाय, लगी बहु अग्नि लखि नहिं जाय । सुरूण्डनके विन मुण्ड दिखाय, पडे जल मूसलधार अथाय ।।१५।। तबै पद्मावति कध धनिन्द, नये जुग आय तहाँ जिनचन्द । भग्यो तब रक सु देखत हाल, लह्यो तब केवलज्ञान विशाल ।।१६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ६३ दियो उपदेश महा हितकार, सुभव्यन बोधि समेद पधार । सवर्णभद्र जहाँ कूट प्रसिद्ध. वरी शिवनारि लही वसु रिद्ध ।।१७।। जजू तुम चरण दोउ कर जोर, प्रभू लखिए अब हो मम ओर । कहै बखतावर रल बनाय, जिनेश हमे भवपार लगाय ||१८|| घत्ता जय पारस देवं सुरकृत सेव, वन्दत चरण सुनागपती । करूणा के धारी पर उपकारी, शिव सुखकारी कर्महती ।।१६।। ॐ ही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय पूर्णा नि । अडिल्ल जो पूजै मन लाय भव्य पारस प्रभु नितही ताके दुख सब जाय भीति व्यापै नहीं कितही ।। सुख सम्पति अधिकाय पुत्र मित्रादि सारे । अनुक्रम सों शिव लहै रत्न इम कहै पुकारे ।। इत्याशीर्वाद (पुष्पाजलि क्षिपेत) । श्री महावीर स्वामी जिन पूजा मत्तगयन्द श्रीमतवीर हरै भवपीर, गरै सुख-सीर अनाकुलताई । केहरि-अक अरी करदंक, नये हरि पड्कति मौलि सु आई ।। मैं तुमको इत थापतु ही प्रभु, भक्ति समेत हिए हरषाई । है करुणा धन धारक देव, इहा अव तिष्ठहु शीघ्रहि आई ।। ॐ श्रीमहावीर जिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट । ॐही श्रीमहावीर जिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापन । ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् । क्षीरोदधिसम शुचि नीर, कञ्चनमृग भरो । प्रभु वेग हरो भव-पीर, यातें धार करो ।। श्रीवीर महा अतिवीर, सन्मति-दायक हो जय वर्द्धमान गुण-धीर, सन्मति-दायक हो ।। ॐ ही श्रीमहावीर जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलनि. 11911 ६४ देव शास्त्र गुरू वाणी मलयागिरि-चन्दनसार, केसर-स ग घसो प्रभु भव-आताप निवार, पूजत हिय हुलसो ||श्रीवीर.।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदन नि. IR|| तन्दुल सित शशि-सम शुद्ध, लीनो थार भरी । तसुपुञ्जधरो अविरूद्ध, पावो शिव-नगरी ||श्रीवीर.।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान नि. ||३|| सुरतरू के सुमन समेत, सुमन सुमन प्यारे । सो मनमथ-भजन हेत, पूजो पद थारे ||श्रीवीर.।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय कामवाणविघ्वसनाय पुष्प नि. ||४|| रस-रज्जत सज्जत सद्य, भज्जत थार भरी पद जज्जत रज्जत अद्य, मज्जत भूख-अरी ||श्रीवीर. ।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. ।।५।। तम खण्डित-मण्डित नेह, दीपक जोवत हो हो । तुम पदतर हे सुख-गेह, भ्रम-तम खोवत हो ||श्रीवीर.11 ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय मोहाधकारविनाशनाय दीप नि. ६ || हरिचन्दन अगर कपूर, चूर सुगन्ध करा तुम पदतर खेवत भूरि, आठो कर्म जरा ||श्रीवीर. ।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप नि. 11७ ।। ऋतु-फल कल-वर्जित लाय, कचन-थार भरो । शिव-फल-हित हे जिनराय, तुम ढिग भेट धरो। श्रीवीर.।। ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय मोक्षफलपदप्राप्तये फल नि. || जल-फल वसु सजि हिम-थार, तन-मन-मोद धरो । गुण गाऊँ-भव-दधितार, पूजत पाप हरो श्रीवीर. ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ नि. || || पञ्चकल्याणक (राग टप्पाचाल) मोहि राखो हो सरना, श्रीवर्द्धमान जिनराय जी । गरभ साढसित छ? लियो थित, त्रिशलाउर अघ हरना ।। सुर सुरपति तितसेव करो नित, मैं पूजो भव-तरना मोहि राखो हो सरना, श्रीवर्द्धमान जिनराय जी । ॐ हीं आषाढशुक्लषष्ठया गर्भमगलमण्डिताय श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अर्घम् । नि. ।

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६६
देव शास्त्र गुरू वाणी
हरिवश सरोजनको रवि हो, बलवन्त महन्त तुम्ही कवि हो ।
लहि केवल धर्म प्रकाश कियो, अवलो सोई मारगराजतियो ।।३।।
पुनि आपतने गुणमाहि सही, सुर मग्न रहँ जितने सवही ।
तिनकी वनिता गुण गावत हैं, लय माननिसो मन भावत हैं ।।४।।
पुनि नाचत रग उमग भरी, तुव भक्ति विष पग एम धरी ।
झनन झनन झनन झनन, सुर लेत तहाँ तनन तनन ।।५।।
घनन घनन घन घण्ट बजे, दृमद दृमद मिरदग सजै ।
गगनागन-गर्भगता सुगता, ततता ततता अतता वितता ||६||
धृगता धृगता गति वाजत है, सुरताल रसाल जु छाजत है ।
सनन सनन सनन नभ मे, इक रूप अनेक जु धारि भ्रमे ।७।।
कई नारि सु बीन बजावत हैं, तुमरो जस उज्ज्वल गावत
करतालविर्षे करताल धरै, सुरताल विशाल जुनाद करें ||८||
इन आदि अनेक उछाह भरी, सुरभक्ति करै प्रभुजी तुमरी ।
तुमही जगजीवन के पितु हो, तुमही बिनु कारणके हितु हो ||६||
तुमही सब विघ्न विनाशन हो, तुमही निज आनद भासन हो ।
तुमही चित चितितदायक हो, जगमाहि तुम्हीं सब लायक हो ||१०।।
तुमरे पन मगलमाहि सही, जिय उत्तम पुण्य लियो सबही ।
हमको तुमरी शरनागत है, तुमरे गुण मे मन पागत है ।।११।।
प्रभु मो हिय आप सदा बसिए, जबलौं बसुकर्म नहीं नसिए ।
तबलौं तुम ध्यान हिए बरतो, तबलौं श्रुत चितन चित्तरतो ।।१२।।
तबलौं व्रत चारित चाहतु हो, तबलो शुभ भाव सुहागतु हो ।
तबलौं सतसगति नित्त रहौ, तबलो मम सजम चित्त गहौ ।।१३।।
जबलौं नहि नाश करौ अरिको, शिव नारि वरो समता धरिको ।
यह द्यो तबलौं हमको जिन जी, हम जाचत हैं इतनी सुनजी ।।१४।।
पत्ता
श्रीवीर जिनेशा नमित सुरेशा, नाग नरेशा भगति भरा ।
'वृन्दावन' ध्यावै विघन नशावै, वाछित पावै शर्मवरा ।।
ॐ हीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय महाघ नि. ।

देव शास्त्र गुरू वाणी ૬૭ दोहा श्री सनमति के जुगपद, जो पूजै धरि प्रीत । वृन्दावन' सो चतुर नर, लहै मुक्ति नवनीत ।। इत्याशीर्वाद (पुष्पाजलि क्षिपेत) समुच्चय अर्घ - मै देव श्री अरहन्त पूजूं सिद्ध पूजूं चाव सो आचार्य श्री उवझाय पूजूं साधु पूजू भाव सो ।।१।। अर्हन्त-गासित वैन पूनँ द्वादशाग रचे गनी पूजू दिगम्बर गुरूचरन शिव हेतु सब आशा हनी ।।२।। सर्वज्ञ भासित धर्म दशविधि दया-मय पूजूं सदा जजु भावना पोडश रत्नत्रय, जा विना शिव नहि कदा ।।३।। त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम चैत्य चैत्यालय जजूं । पन भेरू नन्दीश्वर जिनालय खचर सुर पूजित भजूं ।।४।। कैलाश श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजं सदा चम्पापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा ।।५।। चौवीस श्री जिनराज पूर्जे वीस क्षेत्र विदेह के । नामावली इक सहस-वसु जपि होय पति शिवगेह के ।।६।। दोहा जल गधाक्षत पुष्प चरू, दीप धूप फल लाय सर्व पूज्य पद पूज हूँ, वहु विधि भक्ति बढाय ।।७।। ॐ हीं महार्घ नि. । ॐ हीं भावपूजा भाववदना निकालपूजा त्रिकालवदना करे करावे भावना भावे श्रीअरहतजी सिद्धजी आचार्यजी उपाध्यायजी सर्वसाधुजी पचमरमेष्ठिभ्यो नम । प्रथमानुयोग करूणानुयोग-चरणानुयोग-द्रव्यानुयोगेभ्यो नम दर्शनाविशुद्धयादि-पोडशकारणम्यो नम । उत्तम क्षमादि दशलाक्षणिक धर्मेभ्यो नम सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक-चारित्रेभ्यो नम |जलके विषे थलके विषै आकाशे विष गुफाके विष पहाडके विष नगर नगरी विषै ऊर्ध्वलोक मध्यलोक पाताल लोक विषै विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालय जिनविम्बेभ्यो नम विदेहक्षेत्र विद्यमान वीस तीर्थकरेभ्यो नम पाच भरत पाच ऐरावत दशक्षेत्र सम्बन्धी तीस चौवीसी के सातसौ बीस जिन-राजेभ्यो नम । नदीश्वर द्वीपसम्बन्धि पावन जिन चैत्यालयेभ्यो नम । पचमेरू सम्बन्धि अस्सी ६८ देव शास्त्र गुरू वाणी जिन-चैत्यालयेभ्यो नम । सम्मेदशिखर कैलाश चपापुर पावापुर गिरनार सोनागिर मथुरा आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नम । जेनवद्रीं मूडवद्री देवगढ चन्देरी पपौरा हस्तिनापुर अयोध्या राजगुही तारगा चमत्कार जी श्रीमहावीरजी पदमपुरी तिजारा आदि अतिशयक्षत्रेभ्यो नम । श्री चारण ऋद्धिधारी सप्त परमर्पिभ्यो नम । ॐ हीं श्रीमत भगवन्त कृपावन्त श्री वृषभादि महावीरपर्यन्त चतुविशति तीर्थकर परमदेव आद्याना आधे जम्बू द्वीप भरत क्षेत्र आर्यखण्डे ..नान्नि नगरे मासानामुत्तमे मासे मासे शुभे पक्षे शुभ तिथी वासरे मुनि आर्यिकाना श्रावक श्राविकाना क्षुल्लक क्षुल्लिकाना सकल कर्म क्षमार्थ अनर्घयपदप्राप्त्य महार्घ सम्पूर्णार्घ निर्वपामीति स्वाहा । भावपूजावदनास्तवसमेत श्रीपचमहागुरूभक्ति कायोत्सर्ग करोम्य (यहाँ पर कायोत्सर्ग पूर्वक नो वार णमोकारमत्र जपना चाहिय ।) शान्ति पाठ (श्री जुगल किशोर) करे ।। शास्त्रोक्त विधि पूजा महोत्सव सुरपती चक्री करे । हम सारिखे लघु पुरूष कैसे यथाविधि पूजा धन क्रिया ज्ञान रहित न जाने रीति पूजन नाथ जी । हम भक्ति वश तुम चरण आगे जोड लीने हाथ जी ||१|| दुखहरण मगल करण आशा भरन जिन पूजा सही । यो चित्त मे सरधान मेरे शक्ति है स्वयमेव ही ।। तुम सारिखे दातार पाए काज लघु जाचू कहा मुझ आप सम कर लेहु स्वामी यही इक वाछा महा ।।२।। ससार भीषण विपिन वसुकर्म मिल आतापियो । तिस दाह ते आकुलित चित है शाति थल कहु ना लियो ।। तुम मिले शातिस्वरूप शाति करण समरथ जगपती । वसु कर्म मेरे शात कर दो शातिमय पचम गती ।।३।। जबलौं नहीं शिव लहूँ तबलौं देहु यह धन पावना सतसग शुद्धाचरण श्रुत-अभ्यास आतम भावना ।। तुम बिन अनतानत काल गयौ रूलत जगजाल मे । अब शरण आयो नाथ दुहु कर जोड नावत भाल मैं ।।४।।

।
देव शास्त्र गुरू याणी
દ૬
दोहा
कर प्रणाम के मान ते, गगन नपै फिहि गत
त्यो तुम गुण वर्णन करत, कवि पावै नहिं अत ।।
(नहीं नो बार मनोकार नत्र जपना चाहिए)
विसर्जन पाठ
(मी जुगल किशोर)
सम्पूर्ण विधि कर बीनऊ इस परम पूजन गठ म
भगनका शास्त्रीमा निषि से चूक कीनी पाठ में ।।
सो को पूर्ण सगन विधिवत तुम चरण की शरणत ।
दयों शुम्भ कर जोकि उन्मार जागन गरणत 1111
आनन स्थापा ता समिधिकरण विधान जी ।
पूरला विना याविधि जान नहीं गुणखान जी ॥
जो दाग लागों सो नसी सर तुम चरण की शरणत ।
दो सुर्ग पर सोहि कार उद्वार जामन गरणत ।।२।।
तुम सति आवागमन आनन कियो निज भाव में ।
विधि यमग निजाति सम पूजन कियो अति चाव मे ।।
कर सिर्जग भाव ही मे तुम चरण की शरणते ।
क्दा तुम कर जारि पार ज्वार जामन गरणर्ती ।।३।।
दोहा
तीन भुवन तिर काल मे, तुम सा देव न और ।
सुख कारण सफट हरण, नमों 'जुगल कर जोरि ।।
॥ इत्याशीर्वाद ||
-
आशिका लेने का दोहा
श्री जिनवर की आशिका,
आशिका, लीजे शीश चढाय
भव गव को पातक कटे, दुख दूर हो जाय ।।

७० देव शास्त्र गुरू वाणी अर्घावली । अर्घ देवशास्त्र गुरू जल परम उज्ज्वल गध अक्षत, पुष्प चरू दीपक धरूँ । वर धूप निर्मल फल विविध, बहु जनम के पातक हरूँ ।। इहि भाति अर्घ चढाय नित भवि करत शिवपकति मचू । अरहन्त श्रुतसिद्धान्त गुरू निर्ग्रन्थ नित पूजा रचू ।। दोहा वसुविधि अर्घ सजोय के, अति उछाह मन कीन । जासो पूजो परम पद, देव-शास्त्र गुरू तीन ।। ॐ हीं देवशास्त्रगुरूभ्योऽनर्धपदप्राप्तये अर्घ नि. स्वाहा । विद्यमान बीस तीर्थड्करों का अर्घ जल फल आठो द्रव्य, अरघ कर प्रीति धरी है । गणधर इन्द्रनहूते, थुति पूरी न करी है । द्यानत सेवक जानके (हो) जग” लेहु निकार । सीमधर जिन आदि दे, बीस विदेह मॅझार ।। श्री जिनराज हो, भव तारण तरण जहाज || ॐ हीं विद्यमान विशति-तीर्थकरेभ्योऽन_पदप्राप्तये अर्घ नि.। अथवा ॐ ही श्रीसीमधर-युगमधर-बाहु-सुबाहु-सजात-स्वयप्रभ-ऋषभानन अनन्तवीर्य सूरप्रभ-विशालकीर्ति-वजधर-चन्द्रानन-चन्द्रबाहुभुजगम-ईश्वर-नेमप्रभ-वीरसेन- महाभद्र-देवयश-अजितवीर्येति विशति विद्यमान तीर्थंकरभ्योऽधं नि. । अकृत्रिम चैत्यालयो का अर्घ कृत्याकृत्रिमचारूचैत्यनिलयान् नित्य त्रिलोकीगतान्, वदे भावन व्यतर द्युतिवरान् स्वर्गामरावासगान् । सद् गधाक्षतपुष्पदामचरूकै सद्दीपधूपै फलै र, नीराद्यैश्च यचे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणा शातते ।।१।। ॐ ही कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयसबधि जिनविम्बेभ्योऽयं नि. ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
७१
सिद्ध परमेष्ठी (भाषा)
जल फल वसुन्दा अरम अगदा, जजत अनदा के कदा ।
मेटो भवफंदा सब दुख्ददा,
हीराचदा तुम वदा ।।
त्रिगुवन के स्वामी विगुवन नामी, अर्तयामी अभिरामी ।
शिवपुर विभागी निजनिधि पानी, सिद्ध जजामी शिरनामी ।।
ॐो भी FIRTANT सफरकर्मविनिमुताय सिलपक्राधिपतये
।।
पॉच चालयति
सजि बमुविधि द्रमा मनोज अरघ बनावत हैं ।
चमुकर्म अनादि सयोग ताहि नशावत ।
श्री वासुपय लि नेग पारस वीर अति
ननू मग घर सन ME प्रेम पाँचौ बालयति ।।
की मनि---पारनाथ-महावीरस्वामी
बाल पारा nि. I
समुच्चय चौवीसी
जल पल आनं शिसार, ताको अर्घ करी
दुमका अरपा गपसार, भव तर मोक्ष वरी
पीचिनचन्द, आन दक द सही
पद जजरा रित गवफद पावत मोक्षगही 111
* Antarnad करेभ्योऽनपद प्राप्तये
श्री आदिनाथ जिनेन्द्र
गुति निर्मल नीर गध मुअक्षत, पुष्प चरू ले मन हरपाय ।
दीप धूप फल अर्घ सु लेकर, नाचत ताल मृदग वजाय ।।
श्रीआदिनाथ क चरणकमल पर, बलिवलि जाऊ मनवचकाय ।
। करूणानिधि भव दुख मेटो. याते में पूजो प्रशु पाय ।।
ॐ श्री आदिशाथन्निन्द्राय अनर्घपदप्रापाये अर्घ नि. ।

७२ ग शाग्ध गुरु गाणी श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय जत पत गर गज काल का गाना । तुअ गदगमजा गण्याला शिक- ।। श्री अजितजिनग नका, मावाछितदाता निमुवावाला पूजा याता जागर ॐ श्रीजित TRIPLE - । I श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय जल चदा तदुल पुष नरू दीप का फल अ किया । तुमको अरपी भावभक्तिधर ॐ ॐ ॐ शिवगनिपिया ।। सभवजिनक चरा चरचत मर आकुलता मिट जावे । निज निधि ज्ञान-दररा-सुख-वीरज निरासाय गविजन पावै । ॐही श्रीसभवनाथनिन्द्राय 37.पदप्रापय अजि. न्याहा । श्री अभिनन्दन जिनेन्द्राय अष्टद्रव सवारि सुन्दर सुजस गाय रसाल ही । नचत रचतजजो चरन जुग नाय नाय तुमालल ही ।। कलुषताय निकन्द श्रीअभिनन्द अनुपम चन्द है । पदवद वृन्द जजे प्रभु भवदन्द-फन्द निकन्द है ।। ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अय नि स्वाहा । श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय आठो दरव सजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढाय । दयानिधि हो जय जगबन्धु दयानिधि हो उज्जवल जल शुचि गध मिलाय, कचनझारी भरकर लाय । दयानिधि हो जय जगवन्धु दयानिधि हो ।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अयं नि. स्वाहा ।।

श्री शीतलनाथ जिनेन्द्राय
कभीगलादि पर पासूक दर साजै ।
नारी र गचत रज्जत राज्ज गाजे ।।
सगादिता गलगीतु या ।
गों पदाज तव शीतलनाथ देवा ।।
hiar.imamsपदप्राप्त नि. रगा ।
श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय
लगलादुलसुमन मरू अरू दीप धूप फलावली ।
पारि अर्ण सरया सरलजुग प्रभु मोहि तार उतावली ।।
अंगारानाध जिनन्द त्रिगुपन बन्द आनन्दकन्द हैं ।
दुख्दन्दमन्दनिकन्द पूरन चन्द जोति अगन्द हैं ।।
ही भासजिनेन्द्राग आर्णपदमापाये अर्ण नि. स्वाहा ।
4 अष्ट द्रा से पूज. पाऊँ सिद्ध शिला ।।
श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय
आगे दरव सवार, मनसुखदायक पावन ।
जजों अर्घ्य भरथार, विमल विमल शिवतिय रमन ।।
ॐ श्रीविमलगायजिोन्द्राय अनर्घ्यपदप्रापराये अय नि. स्वाहा ।
श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्राय
शुचि नीर चन्दन शालिशदन, सुमन चरू दीवा धरो ।
अरू धूप जुत मैं अरघ करि, कर जोरजुग विनती करो ।।
जगपूज परमपुनीत मीत, अनन्त सत सुहावनो ।
शिवकतवत महत घ्यावो, अन्ततत नशावनो
ॐही श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अयं नि. स्वाहा ।
।

श्री कुन्थुनाथ जिनेन्द्राय
जल चदन तन्दुल प्रसून यम दीप चूप लगे ।
फलजुतजजन करो मन सुख धरी हर्ग जगत फरी ।।
प्रभू सुन अरज दानकरी नाथ सुनि अग्ज दासकरी ।
जगजाल परया हो बग निकाग बॉह पकर मरी ।।
ॐ श्रीकुन्थुनाथजिनेन्द्राय अनपदप्रासय अर्ज नि. न्याहा ।
श्री अरनाथ जिनेन्द्राय
शुचि स्वच्छ पठीर, गधगहीर तदुलशीर पुष्प चलें ।
वर दीप धूप. आनन्दरूप ल फल नूप अर्घ्य करूँ ।।
प्रभु दीनदयाल अरिकुलकाल, विरदविशाल सुकुमालन् ।
हनि मम जजाल. हे जगपाल, अरगुनमाल वरमालन् ।।
ॐ हीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अयं नि. स्वाहा ।
श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय
जल फल अरघ मिलाय गाय गुन पूजो भगति बढाई ।
श्रीपदराज हेत हे श्रीधर, शरन गही मैं आई ।।
राग रोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा ।
याते शरन गही जगपतिजी, वेग हरो भवपीरा ।।
ॐ हीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा ।

७५ देव शास्त्र गुरू वाणी श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय जलगध आदि मिलाय आठो, दरब अरघ सजो वरूँ । पूजो चरनरज भगत जुत, जाते जगत सागर तरूँ ।। शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनि गुनमाल हैं । तसु चरन आनन्दभरन तारन, तरन विरद विशाल है ।। ॐ हीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय जल फलादि मिलाय मनोहर, अरघ धारत ही भय भौ हर। जजतु हौं नमिके गुन गायके, जुगपदाबुज प्रीति लगायकै ।। ॐ हीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । श्री पद्मप्रभु जी का अर्घ जल चन्दन अक्षत पुष्प, नेवज आदि मिला । मै अष्ट द्रव्य से पूज, पाऊँ सिद्ध शिला ।। बाडा के पद्म जिनेश, मगल रूप सही काटो सब कलेश महेश, मेरी अरज यही ।। ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ निर्व. । श्री चन्द्रप्रभु जी का अर्घ जल चन्दन अक्षत पुष्प चरू, दीपक घृत से भर लाया हूँ । दस गध धूप फल मिला अर्घ ले, स्वामी अति हरषाया हूँ ।। हे नाथ अनर्घ पद पाने को, तेरे चरणो मे आया भव-भव के बध कटे प्रभुवर, यह अरज सुनाने आया हूँ ।। ॐ हीं श्री चन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ नि. । श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र जलफल दरव मिलाय गाय गुन, आठो अग नमाई । शिवपदराज हेत हे श्रीपति | निकट धरो यह लाई ।। वासुपूज्य वसुपूज-तनुज-पद, वासव सेवत आई । बालब्रह्मचारी लखि जिनको, शिवतिय सनमुख धाई ।। ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ नि. ।

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७८ - देव शास्त्र गुरू वाणी सप्तर्षि जल गध अक्षत पुष्प चरूवर, दीप धूप सु लावना । फल ललित आठो द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना मन्वादि चारण ऋद्धि धारक, मुनिन की पूजा करूँ । ता करे पातक हरे सारे, सकल आनन्द विस्तां ॥ ॐहीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो अर्ध नि. । निर्वाण क्षेत्र जल गध अच्छत फूल चरू फल, दीप धूपायन धरौं । 'द्यानत' करो निरभय जगतसो, जोर कर विनती करौं ।। सम्मे दगढ गिरनार चपा, पावापुरि कैलाशको । पूजो सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि निवासको ।।१।। ॐ हीं चतुविशति तीर्थडकरनिर्वाणक्षेत्रेभ्यो अर्घ नि. । - सरस्वती जल चदन अक्षत फूल चरू, अरू दीप धूपअति फल लावै । पूजा को ठानत जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुख पावै ।। तीर्थंकर की ध्वनि, गणधर ने सुनि, अग रचे चुनि ज्ञानमई । सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन मानी पूज्यमई ।। ॐ हीं श्रीजिन-मुखोदूभव-सरस्वतीदेव्यै अर्घ नि. । श्री ऋषि-मण्डल जल फलादि द्रव्य लेकर, अर्घ सुन्दर कर लिया । ससार रोग निवार भगवन्, वारि तुम पद मे दिया । जहाँ सुभग ऋषिमण्डल विराजै, पूजि मन वच तन सदा । तस मनोवाछित मिलत सब सुख, स्वप्नमे दुख नहि कदा ।। ॐ ह्रीं सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थांय, रोग-शोक-सर्व-सकटहराय,सर्वशान्ति- पुष्टिकराय, श्री वृषमादि चौबीस तीर्थडकर अष्ट वर्ग, अरहतादि पचनद, दर्शन-ज्ञान-चारित्र, चतुर्णिकाय देव पूजित, चार प्रकार अवधिधारक श्रमण अष्ट ऋद्धि सयुक्त ऋषि बीस चार सूर, तीन ही अर्हतविम्ब दशदिग्पाल पूजित यन्त्र सम्बन्धि परमदेवाय अर्ध नि. ।

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८०
देव शास्त्र गुरू वाणी
वर पद्मवन भर पद्यमवन, बहिर पावा ग्राम ही ।
शिव धाम सन्मति स्वामी पायो, जजो सो सुखदा मही ।।
ॐहीं श्री
पावापुर सिद्ध क्षेत्राय अर्घ नि. ।
श्री सोनागिरि क्षेत्र
वसु द्रव्य ले भर थाल कचन, अर्घ दे सब अरि हनू ।
'छोटे' चरण जिन राज लय हो, शुद्ध निज आत्मा बनू ।।
नगादि नग मुनीन्द्र जहँ ते, मुक्ति लक्ष्मी पति भये ।
सो परम गिरवर जजू बस विधि होत मगल नित नये ।।
ॐ हीं श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
श्री नयना गिरि (रेशन्दीगिरि) क्षेत्र
शुचि अमृत आदि समग्र, सजि वसु द्रव्य प्रिया ।
धारो त्रिजगत पति अग्र, धर वर भक्त हिया ।।
ॐ ही श्री नयनागिरि सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
श्री द्रोण गिरि क्षेत्र
जल सु चन्दन अक्षत लीजिए, पुष्प धर नैवेद्य गनीजिए ।
दीप धूप सुफल बहु साजहीं, जिन चढाय सुपातक भाजहीं ।।
ॐ हीं श्री द्रोणगिरि सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
श्री सिद्धवर कूट क्षेत्र
जल चन्दन अक्षत लेय, सुमन महा प्यारी ।
चरू दीप धूप फल सोय, अरघ करो भारी ।।
द्वय चक्री दस काम कुमार, भवतर मोक्ष गये ।
ताते पूजो पद सार, मन मे हरष ठये ।।
ॐ हीं श्री सिद्धवरकूट सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि ।
श्री शत्रुञ्ज क्षेत्र
बसु द्रव्य मिलाई, थार भराई, सन्मुख आई नजर करो ।
तुम शिव सुखदाई धर्म बढाई, हर दुखदाई, अर्घ करो ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
८१
पाडव शुभ तीन सिद्ध लहीन, आठ कोडि मुनि मुक्ति गये ।
श्री शत्रुञ्जय पूजो सन्मुख हूजो, शातिनाथ शुभ मूल गये ।।
ॐ ही श्रीशत्रुञ्जय सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
श्री तुंगीगिरि क्षेत्र
जल फलादि वसु दरव साज के, हेम पात्र भर लाऊँ ।
मन वच काय नमू तुम चरना, बार बार सिर नाऊँ ।।
राम हनू सुग्रीवादि जे. तुगीगिरि थिरथाई ।
कोडी निन्यानवे मुक्ति गये मुनि, पूजो मन वच काई ।
ॐ ही श्री तुगीगिरि सिद्ध क्षेत्राय अर्घ नि. ।
श्री कुन्थल गिरि क्षेत्र
जल भलादि वसु दरब लेय थुति ठान के ।
अर्घ जजो तुम पाप हरो हिय आन के ।।
पूजो सिद्ध सु क्षेत्र हिये हरषाय के
कर मन वच तन शुद्ध, करमवश टार के ।।
ॐ हीं कुन्थलगिरि सिद्ध क्षेत्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
चूलगिरि (बावनगजा) क्षेत्र
सजि साँज आठो होय टाडा, हरण बाढा कथन विन ।
हे नाथ भक्तिवश मिलजो, पुर न छूटे एक दिन ।।
दशग्रीव अगज अनुज आदि, ऋषीश जहते शिव लहो ।
सो शैल बडवानी निकट, गिरिचूल की पूजा ठहो ।।
ॐ हीं श्री चूलगिरि सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
श्री गजपंथ क्षेत्र का अर्घ
जल फल आदि वसु दरब अति उत्तम, मणिमय थाल भराई ।
नाच-नाच गुण गाय गायके, श्री जिन चरण चढाई ।।
बलभद्र सात वसु कोडि मुनीश्वर, जहाँ पर करम खपाई ।
केवल लहि शिव धाम पधारे, जजू तिन्हे शिर नाई ।।
ॐ हीं श्री गजपथ क्षेत्राय अनर्थ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।

८२
देव शास्त्र गुरू वाणी
श्री मुक्तागिरि का अर्घ
जल गध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने ।
लाय चरन चढाय भविजन, मोक्षफल को पावने ।।
तीर्थ मुक्तागिरि मनोहर, परम पावन शुभ कहो ।
कोटि साढे तीन मुनिवर, जहाँ ते शिवपुर लहो ।।
ॐ हीं श्री मुक्तागिरि क्षेत्राय अनर्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि. ।
पावागढ क्षेत्र
वसु द्रव्य मिलाई भवजन भाई, धर्म सुहाई अर्घ करूँ ।
पूजा को गाऊँ अर्घ चढाऊँ, खूब नचाऊँ प्रेम भरूँ ।।
पावागिरि वन्दो मन आनन्दो, भव दुख खदी चितधारी ।
मुनि पाच जो कोड भवदुख छोड, शिवमुख जोड सुखमारी ।।
ॐ हीं श्री पावागढ सिद्ध क्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
बाहुबली स्वामी का अर्घ
आठ दरब कर से फैलायो, अर्घ बनाय तुम्हे ही चढायो ।
मेरो आवागमन मिटाय, दाता मोक्ष के श्री बाहुबली जिनराज ।
दाता मोक्ष के ।
ॐ हीं श्री बाहुबलि स्वामिने अर्घ नि. ।
उदयगिरि क्षेत्र
जल फल वसु द्रव्य पुनीत, लेकर अर्घ करूँ ।
नाचू गाऊँ इह भॉति, भवतर मोक्ष वरूँ ।
श्री उदय गिरी के शीश, गुफा अनेक कही ।
तिनमे जिन विम्ब अनूप, पूजत सौख्य लही ।।
ॐ ही उदयगिरी क्षेत्राय अर्घ नि. ।
खण्डगिरि क्षेत्र
जल भल वसु दरब पुनीत, लेकर अर्घ करूँ ।
नाचूँ गाऊँ इइ भॉति, भवतर मोक्ष वरूँ ।।

५३
देव शास्त्र गुरू वाणी
भी खण्ड गिरि के शीश, दशरथ तनय कहै ।
मुनि पर शतक शिवलीन, देश कलिग दहै ।।
ही श्री.गिरि सिलोनाय अर्थ नि. ।
तारंगागिरि क्षेत्र
सुधि आठो द्रव्य मिलाय तिनको अर्घ करो,
गन बच तन दा चदाय भवतर मोक्ष वरो ।
की तारणागिरि से जान वरदत्तादि मुनी,
सर जट कोटि परमान ध्याऊँ मोक्षधनी ।।
भी नागारि सिद्धनाय अनर्यपद प्राप्तये अर्घ नि. ।
गुणावा क्षेत्र
जल फल आदिक द्रव्य इकट्ठी लीजिए.
कचन बार धारि अरघ शुग कीजिए ।
ग्राग गुणावा जाय सुमन हर्षाय के.
गौतम स्वामी चरण जजो मन लायके ।।
30 गावा ग्राग सरावर गा मोक्ष प्राप्ताय श्री गौतम स्वागिने अर्घग
जम्बू स्वामी (मथुरा क्षेत्र)
जल फल आदिक द्रव्य आठटू लीजिए,
कर इकडी भरि थाल अर्ध
शुभ
कीजिए ।
गथुरा जम्न स्वामि मुक्ति थल जायके,
पूजिय भवि धरि ध्यान सुयोग लगायके ।।
ॐ चौरासी मथुरास्थलात गोक्षप्राप्ताय श्रीजवुरवामिने अर्घ नि. ।
भजन
नाथ । तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अव आयो ।।टेक।।
मैंढक कमल पाखडी मुख मे, वीर जिनेश्वर धायो
श्रेणिक गज के पगतल मूवो, तुरत स्वर्ग पद पायो ।
नाथ । तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अव आयो ।।१।।

८४ देव शास्त्र गुरू वाणी मैनासुन्दरी शुभमन से ती, सिद्धचक्र गुण गायो । अपने पति को कोढ गमायो, गधोदक फल पायो । नाथ । तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अब आयो ।२।। अष्टा पद मे भरत नरेश्वर, आदिनाथ मन लायो । अष्टद्र व्य से पूजा को नी, अवधिज्ञान दरशायो । नाथ | तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अब आयो ।।३।। अजन से सब पापी तारे, मेरो मन हुलसायो । महिमा मोटी नाथ तुम्हारी, मुक्तिपुरी सुख पायो । नाथ । तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अब आयो ।।४।। थकि थकि हारे सुरपति, नरपति आगम सीख जतायो । देवेन्द्र कीर्ति गुरू ज्ञान मनोहर, पूजा ज्ञान बतायो । नाथ । तोरी पूजा को फल पायो, मेरे यो निश्चय अब आयो ||५|| भाषा स्तुति तुम तरणतारण भवनिवारण, भविक मन आनन्दनो । श्री नाभिनन्दन जगतवदन, आदिनाथ निरजनो ||१|| तुम आदिनाथ अनादि सेऊँ, सेय पद पूजा करूँ । कैलाश गिरि पर ऋषभ जिनवर, पदकमल हिरदै धरूँ ।।२।। तुम अजितनाथ अजीत जीते, अष्टकर्म महाबली । यह विरद सुनकर शरण आयो, कृपा कीज्यो नाथ जी ।।३।। तुम चन्द्रवदन सु चदलच्छन चद्रपुरी परमेश्वरी । महासेननदन, जगतवन्दन चन्द्रनाथ जिनेश्वरो ।।४।। तुम शाति पाचकल्याण पूजो, शुद्ध मनवचकाय जू । दुर्भिक्ष चोरी पापनाशन, विघन जाय पलाय जू ।।५।। तुम बालब्रह्म विवेक सागर, भव्यकमल विकाशनो । श्री नेमिनाथ पवित्र दिनकर, पापतिमिर विनाशनो ॥६|| जिन तजी राजुल राजकन्या, कामसेन्या वश करी । चारित्ररथ चढि भये दूलह, जाय शिव रमणी वरी ।७।। कदर्प दर्प सुसर्पलच्छन, कमठ शठ निर्मद कियो । अश्वसेननदन जगतवदन, सकलसघ मगल कियो ||८||

.
देव शास्त्र गुरू पाणी
जिनपरी चालकपणे दीक्षा, काठमान विदारकै
श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र के पद मैं न, शिरधारिक ।।६।।
तुम पानपाता मोक्षदाता, दीन जानि दया करो
सिद्धार्थनदन जगतरदन, महावीर जिनेश्वरी 11901
छत्र तीन सोहैं सुरनर मोहै. वीनती अव धारिये ।
करजोडि सेवक वीन, प्रमु आवागमन निवारिये ।।११।।
अब शेउ भव भव स्वाभि मेरे, मैं सदा सेवक रहो ।
करणोड यो वरदान मागू, गोक्षफल जावत लहो ।।१२।।
जो एक माही एक राजै, एक माहि अनेकनो
इक अनेक की नहीं सख्या, नमू सिद्ध निरजनो ।।१३।।
चौपाई
में तुम चरणकगलगुणगाय, बहुविधि भक्ति करौं मनलाय ।
जनम जनम प्रमु पाऊँ तोहि. या सेवाफल दीजै मोहि ।।१४।।
कृपा तिहारी ऐसी होय. जामन मरन मिटाओ मोह ।
वारवार में विनती करूँ, तुम से या भवमागर तलें ।।१५।।
नाम लेत सब दुख मिटजाय, तुम दर्शन देख्यो प्रमु आय ।
तुम हो प्रगु देवन के देव, मैं तो करूँ चरण की सेव ।।१६।।
जिन पूजा त सब सुख होय, जिन पूजा सम अवर न कोय ।
जिन पूजा त स्वर्ग विमान, अनुक्रम तैं पार्वै निर्वाण ।।१७।।
मैं आयो पूजन के काज, मेरो जनम सफल भयो आज ।
पूजा करके नवाऊँ शीश, मुझ अपराध क्षमहु जगदीश ||१८||
दोहा
सुख देना दुख मेटना, यही तुम्हारी बान
मो गरीव की वीनती, सुन लीज्यो भगवान ||१६ ।।
दर्शन करते देव के, आदि मध्य अवसान
सुरगन के सुख भोगकर, पावै मोक्ष निदान ।।२०।।

५६ देव शास्त्र गुरू वाणी जैसी महिमा तुमविषै, और धरै नहि कोय । जो सूरज मे जोति हे, नहिं तारागण सोय ||२१|| तिहारे अघ छिनमाहि पलाय । ज्यो दिनकर परकाशतें, अधकार विनशाय ।।२२।। बहुत प्रशसा क्या करू, मैं प्रभु बहुत अजान । पूजाविधि जानू नहीं, सरन राख भगवान ।।२३।। नाथ नामतै, निर्वाणक्षेत्र पूजा सोरठा परमपूज्य चोबीस, जिहें जिहँ थानक शिव गये । सिद्धभूमि निशदीस, मन वच तन पूजा करौं । ॐ ह्रीं श्री चतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्राणि । अत्र अवतर अवतर सवौषट आहनम । ॐ ही श्री चतुर्विशतितीर्थडकर निर्वाणक्षेत्राणि । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ ठ । ॐ हीं श्री चतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्राणि । अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट | गीता छन्द शुचि छीर-दधि-सम नीर निरमल, कनक झारी मे भरौ । ससार पार उतार स्वामी, जोर कर विनती करौं । सम्मेदगढ गिरनार चम्पा, पावापुरि कैलाशको पूजो सदा चौबीस जिन, निर्वाण-भूमि-निवासको ।। ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो जल नि. स्वाहा ||१|| केशर कपूर सुगन्ध चन्दन, सलिल शीतल विस्तरो । भव-तापको सन्ताप मेटो, जोर कर विनती करौं । सम्मेदगढ ।। ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो चन्दनम् नि. स्वाहा ।।२|| मोती-समान अखण्ड तन्दुल, अमल आनन्द धरि तरौं । औंगुन हरौ गुण करौ हमको, जोर कर विनती करो ।।स.।। ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अक्षत नि. स्वाहा ।।३।।

८७
देव शास्त्र गुरू वाणी
शुभ फूल-रास सुवास-वासित, खेद सब मन की हरौं ।
दुख-धाम-काम विनाश मेरो, जोर कर विनती करौं ।स.।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो पुष्प नि. स्वाहा ||४||
नेवज अनेक प्रकार जोग, मनोग धरि भय परिहरौं ।
यह भूख दूखन टार प्रभुजी, जोर कर विनती करी ||स. ।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो नैवेद्य नि. स्वाहा ।।५।।
दीपक प्रकाश उजास उज्ज्वल, तिमिर सेती नहि डरौं ।
सशय-विमोह-विभरम-तम-हर, जोर कर विनती करो ||स.।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो दीप नि. स्वाहा ।।६।।
शुभ धूप परम अनूप पावन, भाव पावन आचरौं
सव कर्म पुज जलाय दीज्यो, जोर कर विनती करौं ।स.।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो धूप निर्व. स्वाहा ।।७।।
बहु फल मुगाय चढाय उत्तम, चार गतिसो निरवरो
निहचै मुकति-फल देहु मोको, जोर कर विनती करी ।।स.।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो फल नि. स्वाहा ||८||
जल गुध अक्षत पुष चरू फल, दीप धूपायन धरौं ।
'द्यानत' करो निर्भय जगतसो, जोर कर विनती करो ।।
ॐ हीं श्रीचतुर्विशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अर्घ नि. स्वाहा ||||
जयमाला
दोहा
श्री चौबीस -जिनेश, गिरी कैलाशादिक नमो ।
तीरथ महा प्रदेश, महा पुरूष निर्वाणतै ।।
चौपाई १६ मात्रा
नमो ऋषभ कैलाश पहार, नेमिनाथ गिरनार निहार ।
वासुपूज्य चम्पापुर बन्दौं, सन्मति पावापुर अभिनन्दौं ।।१।।
वदौ अजित अजितपद दाता, बदौ सम्भव भव दुख पाता ।
वदौ अभिनदन गुण नायक, वदौं सुमति सुमति के दायक ।।२।।
-

देव शास्त्र गुरू वाणी ८८ वदौं पदम मुकति पदमाकर, वदी सुपास आश पासाहर । वदौं चद्रप्रभु प्रभु चदा, वदो सुविधि सुविधि-निधि-कदा ||३|| वदौ शीतल अघ तप-शीतल, वदौं श्रेयास श्रेयास महीतल । वदौं विमल विमल उपयोगी, वदौं अनत अनत सुखभोगी ||४|| वदौ धर्म धर्म-विस्तारा, वदौ शाति शान्ति मन धारा । वदौं कुथु कुथु रखवाल, वदौं अर अरि-हर गुणमाल ||५|| वदो मल्लि काम मल-चूरन, वदौं मुनिसुव्रत व्रत पूरन । वदौं नमि जिज नमित सुरासुर, वदी पार्श्व भ्रमजगहर ॥६॥ बीसो सिद्ध भूमि जा ऊपर, शिखिर सम्मेद महागिरि भूपर । एक बार वदी जो कोई, ताहि नरक पशुपति नहि होई ।।७।। नरपति नृप सुर शक्र कहावे, तिहु जग भोग भोगि शिव पावे । विघन विनाशन मगलकारी, गुण विशाल वन्दौं भवतारी ||८|| घत्ता-जो तीरथ जावे पाप मिटावे, ध्यावे गावे भगति करै । ताको जस कहिए सपति लहिए, गिरि के गुणको बुध उचरै ।। ॐ हीं श्रीचतुर्विंशतितीर्थकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो पूर्णाऱ्या नि. स्वाहा । इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् । पंचमेरू पूजा तीर्थकरो के न्हवन जलतें, भए तीरथ शर्मदा । तातै प्रदच्छन देत सुरगन, पचमेरून की सदा ।। दो जलधि ढाई द्वीप मे, सब गनत मूल विराजहीं । पूजौं असी जिनधाम प्रतिमा, होहिं सुख दुख भाजहीं ।। ॐ हीं पचनेरू सम्बन्धि-जिन-चैत्यालयस्थ जिनप्रतिमा समूह अत्र अत्र अवतर सवौष्ट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । अथाष्टक-चौपाई अचलीबद्ध (१५ मात्रा) शीतल मिष्ट सुवास मिलाय, जलसौं पूजौं श्री जिनराय । महा सुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ८६ पाचो मेरू असी जिनधाम, सब प्रतिमा को करो प्रणाम । महा सुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।। ॐ सुदर्शनमेरू, विजयमेरू, अचलमेरू, मन्दिरमेरू, विद्युतन्मालीमेरू, पचमेरू सम्बन्धी अस्सी जिन चैत्यालेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ||१|| जल केशर करपूर मिलाय, गध सौं पूजौं श्री जिनराय । महा सुख होय, देखे नाथ परम सुख होय पाँचो.॥ ॐ ही पचमेरूसम्बन्धि चैत्त्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य भव आताप विनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा IRII अमल अखड सुगध सुहाय, अच्छत सो पूजो श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।।पाँचो.।। ॐ हीं पचमेरूसम्बन्धि चैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा ।।३।। वरण अनेक रहे महकाय, फूलसौं पूजौं श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।।पाचो. ।। ॐ हीं पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ||४|| मनवाछित बहु तुरत बनाय, चरूसौं पूजौं श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ||पाचो.।। ॐ ही पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ||५|| तमहर उज्ज्वल ज्योति जगाय, दीपसौं पूजौं श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ||पाचो. ।। ॐहीं पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।।६।। खेऊँ अगर परिमल अधिकाय, धूपसौं पूजो श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।पाचौ ।। ॐ हीं पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य अष्टकर्मदहनाय र नि. स्वाहा ॥७॥ सुरस सुवर्ण सुगन्ध सुहाय, फलसो पूजौं श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय याच ।। ॐ ही पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य मोक्षफलप्राप्तय ल नि. स्वाहा ||८||

६०
देव शास्त्र गुरू वाणी
आठ दरबमय अरघ बनाय, 'द्यानत' पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ||पाचो.।।
ॐ हीं पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्य अनर्घपदप्राप्तये अर्घ
नि. स्वाहा ||६||
जयमाला
सोरठा
प्रथम सुदर्शन स्वामि, विजय अचल मन्दिर कहा ।
विद्युन्माली नाम, पचमेरू जग मे प्रकट ||१||
केसरी छन्द
प्रथम सुदर्शन मेरू विराजे, भद्रशाल वन भूपर छाजे ।
चैत्यालय चारो सुखकारी, मन वच तन वन्दना हमारी IR||
ऊपर पॉच शतक पर सोहै, नन्दन वन देखत मन मोहै ।
चत्यालय चारो सुखकारी, मन वच तन वन्दना हमारी ।।३।।
नाढे बासठ सहज ऊँचाई, वन सुमनस शोभै अधिकाई ।
बत्यालय चारो सुखकारी, मन वच तन वन्दना हमारी ।।४।।
ऊँचा जोजन सहस छत्तीस, पॉडुकवन सोहै गिरि शीस ।
चैत्यालय चारो सुखकारी, मन वच तन वन्दना हमारी ।।५।।
चारो मेरु समान बखानो, भू पर भद्रसाल चहु जानो ।
चैत्यालय सोलह सुखकारी मन वच तन वन्दना हमारी ।।६।।
ऊँचे पॉच शतक पर भाखे चारो नदन वन अभिलाखे ।
चेत्यालय सोलह सुखकारी मन वच तन वन्दना हमारी |७||
साढे पचपन सहस उतगा तन सौमनस चार बहुरगा ।
चैत्यालय सोलह सुखकारी मन वच तन वन्दना हमारी ||८||
उच्च अट्ठाइस सहस बताये पाडुक चारो वन शुभ गाये ।
चैत्यालय सोलह सुखकारी मन वच तन वन्दना हमारी ||६||
सुर नर चारन वन्दन आवे सो शोभा हम किह मुख गावों ।
चत्यलय अस्सी सुखकारी मन वच तन वन्दना हमारी ।।१०।।

६१ देव शास्त्र गुरू वाणी दोहा पचमेरू की आरती, पढे सुनै जो कोय । 'द्यानत' फल जानैं प्रभू, तुरत महासुख होय ।। ॐ हीं पचमेरूसम्बन्धि जिनचैत्यालयस्थ जिनविम्बेभ्यो महाघ नि. स्वाहा । नंदीश्वरद्वीप पूजा अडिल्ल सरव परव मे बडो अठाई परव है । नन्दीश्वर सुर जाहि लिए वसु दरव है ।। हमे सकति सो नाहि इहाँ करि थापना पूजें जिन गृह प्रतिमा है हित आपना । ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमा समूह । अत्र अवतर अवतर सवौष्ट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । कचन-मणि मय-भृङ्गार, तीरथ नीर भरा तिहु धार दई निरवार, जामन मरन जरा । नन्दीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पुज करो वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनन्द भाव धरो ।। नदीश्वर द्वीप महान, चारो दिशि सोहे बावन जिन मन्दिर जान, सुर-नर मन मोहे ।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ||१|| भव तप हर शीतल वाच, सो चन्दन नही । प्रभु यह गुन कीजै साच, आयो तुम ठाही गनदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो ससारतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा ||२|| उत्तम अक्षत जिनराज, धरे सोहे सब जीते अक्ष समाज, तुम सम अरू को हे निदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा ||३|| पुज ૬૨ देव शास्त्र गुरू वाणी तुम काम विनाशक देव, ध्याऊँ फूलन सौ । लहु शील लक्ष्मी एव, छूटू सूलन सौं ।नदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ||४|| ने वज इन्द्रिय बलकार, सो तुमने चूरा । चरू तुम ढिग सोहै सार, अचरज है पूरा नदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ||५|| दीपक की ज्योति प्रकाश, तुम तन माहि लसे । टूटै करमन की राश, ज्ञान कणी दरसे नदी. ।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।।६।। कृष्णागरू धूप सुवास, दश दिशि नारि वरै । अति हरष भाव परकाश, मानो नृत्य करै ।।नदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप नि. स्वाहा ।।७।। बहुविधि फल ले तिहुकाल, आनद राचत है । तुम शिवफल देहु दयाल, तुहि हम जाचत हैं ।निदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा ||८|| यह अर्घ कियो निज हेत, तुमको अरपतु हो । 'द्यानत' कीजो शिवखेत, भूमि समरपतु हो ।नदी.।। ॐ हीं नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिममोत्तरे द्विपचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घ नि. ग्वाहा || जयमाला दोहा कार्तिक फागुन साढ के, अन्त आठ दिन माहि । नन्दीश्वर सुर जात है, हम पूज इह ठाहि ।।१।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
छन्द
एक सौ त्रेसठ कोडि जोजन महा,
लाख चौरासिया एक दिशि मे लहा ।
आठमो द्वीप नन्दीश्वर भास्वर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमो सुखकर ।।२।।
चार दिशि चार अजनगिरि राजहीं,
सहस चौरसिया एक दिश छाजहीं ।
ढोल सम गोल ऊपर तले सुन्दर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमो सुखकर ||३||
एक चार दिशि चार शुभ बावरी,
एक इक लाख जोजन अमल जल भरी ।
चहु दिशा चार वन लाख जोजन वर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमों सुखकर ||४||
सोल वापीन मधि सोल गिरि दधिमुख,
सहस दश महा जोजन लखत ही सुख ।
बावरी कौन दो माँहि दो रति कर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमों सुखकर ||५||
शैल बत्तीस इक सहस जोजन कहे,
चार सोलह मिलै सर्व बावन लहे ।
एक इक शीस पर एक जिनमन्दिर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमों सुखकर ।।६।।
बिब अठ एक सौ रतनमयि सोहहीं,
देव देवी सरव नयन मन मोहहीं ।
पाचसै धनुष तन पद्य आसन पर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमो सुखकर 11७ ।।
लाल नख मुख नयन श्याम अरू श्वेत हैं,
श्याम रग भौंह सिर केश छवि देत हैं ।
बचन बोलत मनो हँसत कालुष हर,
भौन बावन्न प्रतिमा नमो सुखकर ||८||

६४ देव शास्त्र गुरू वाणी कोटि शशि भानु दुति तेज छिप जात हैं, महा वैराग परिणाम ठहरात है । वयन नहि कहैं लखि होत सम्यक् धर, भौन बावन्न प्रतिमा नमो सुखकर 11६|| सोरठा नन्दीश्वर जिनधाम, प्रतिमा महिमा को कहै । 'द्यानत' लीनो नाम, यही भगति शिव सुख करै ।।१०।। ॐ ही नन्दीश्वरद्वीपे पूर्वदक्षिणपश्चिमोत्तरे द्विपचाशज्जिनालय- स्थजिनप्रतिमाभ्यो पूर्णाध नि. स्वाहा । इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् । सोलहकारण पूजा अडिल्ल सोलहकारण भाय तीर्थकर जे भये हरणे इन्द्र अपार मे रूपै ले गये । पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसो । हम हू षोडश कारण भावे भावसौ १११ ॐ हीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणानि । अत्र अवतर अवतर सवौषट आहूनम । ॐ हीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणानि -। अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ ठ । ॐ हीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणानि । अत्र मम सन्निहितोनी भवत भवत वषट। कचन-झारी निरमल नीर, पूजौं जिनवर गुण गम्भीर । परम गुरू हो, जय जय नाथ परम गुरू हो ।। दरश विशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थकर पद-दाय । परम गुरू हो, जय जय नाथ परम गुरू हो 11१11 ॐ ही दर्शनविशुद्धि १ विनयसम्पन्नता २. शीलवतेष्वनतीचार ३ अभीक्ष्णज्ञानोपयोग ४ सवेग ५ शक्तितस्त्याग ६ शक्तिस्तप ७ साधुसमाधि ८ वैयावृत्यकरण ६ अर्हदमक्ति १० आचार्यभक्ति ११ वहुश्रुतभक्ति १२ प्रवचनभक्ति १३ आवश्यकापरिहाणि १४ मार्गप्रभावना १५ प्रवचनवात्सल्य १६ इतिषोडशकारणेभ्यो नम जल नि. स्वाहा 11911

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૬૬
देव शास्त्र गुरु
गनी
सोलह अंगों के सोलह अर्घ
सवैया तेईसा
दर्शन शुद्ध न होवत जो तग ता लग जीव मिथ्याती कहाव ।
काल अनत फिरो भव में महादु खन को कटु पार न पावे ।।
दोष पचीस रहित गुण-अग्नुधि नायकदरशन शुद्ध ठरावे ।
'तान कहे नर सोहि बडो मिथ्यात्व तज जिन-मारग ध्याव ।।
ॐ ही दर्शन विशुद्धि भावसाये म 31. स्वाहा Iml
देव तथा गुरूराय तथा तप सयम गील व्रतादिक-धारी ।
पापके हारक कामके छारक शल्य-निवारक कर्म-निवारी ।।
धर्म के धीर कपाय के भेदक पच प्रकार ससार के तारी ।
ज्ञान कहे विनयो सुखकारक गाव धरो मन राखो विचारी ।।
ॐ हीं विनय सम्पन्नता भावनाय नम अधं . स्वाहा ।।२।।
शील सदा सुखकारक है अतिचार-विवर्जित निर्मल कीजे ।
दानव देव करे तसु सेव, विषानल भूत पिशाच पतीजे ।।
शील बडो जग मे हथियार, जु शील को उपमा काहेकी दीजे।
'ज्ञान' कहे नहि शील बरावर, ताते सदा दृढ शील धरीजे ।।
ॐही निरतिचार शीलव्रत भावनाय नम अर्घ नि स्वाहा ।।३।।
ज्ञान सदा जिनराजको भाषित, आलस छोड पढे जो पढावे ।
द्वादस दोउ अनेकहु भेद, सुनाम मति श्रुत पचम पावे ।।
चारहु भेद निरन्तर भाषित, ज्ञान अभीक्षण शुद्ध कहावे ।
'ज्ञान' कहे श्रुत भेद अनेक जु, लोकालोक हि प्रगट दिखावे ।।
ॐ हीं अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावनाये नम अर्घ नि. स्वाहा ||४||
भ्रात न तात न पुत्र कलत्र न सजम सज्जन ए सब खोटो ।
मन्दिर सुन्दर काय सखा सबको इसको हम अन्तर मोटो ।।
भाउ के भाव धरी मन भेदन, नाहि सवेग पदारथ छोटो ।
'ज्ञान' कहे शिव-साधनको जैसो साहको काम करे जु बणोटो।।
ॐ हीं सवेग भावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ।।५।।

६७ देव शास्त्र गुरू वाणी पात्र चतुर्विध देख अनूपम, दान चतुर्विध भावसु दीजे । शक्ति-समान अभ्यागत को, अति आदर से प्रणिपत्य करीजे || देवत जे नर दान सुपात्रहिं, तास अनेकहि कारण सीजे । बोलत 'ज्ञान' देहि शुभ दान जु, भोग सुभूमि महासुख लीजे ।। ॐ हीं शक्तितस्त्याग भावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ।।६।। कर्म कठोर गिरावन को निज, शक्ति-समान उपोषण कीजे । बारह भेद तपे सुन्दर, पाप जलाजलि काहे न दीजे ।। भाव धरी तप घोर करो नर, जन्म सदा फल काहे न लीजे । 'ज्ञान' कहे तप जे नर भावत, ताके अनेकहि पातक छीजे ।। ॐ हीं शक्तितस्तपोभावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा |७|| साधु समाधि करो नर भावक, पुण्य बडो उपजे अघ छीजे । साधु की सगति धर्म को कारण, भक्ति करे परमारथ सीजे ।। साधु समाधि करे भव छूटत, कीर्ति-छटा त्रैलोक में गाजे । 'ज्ञान' कहे यह साधु बडो, गिरिश्रृग गुफा बिच जाय विराजे ।। ॐ हीं साधुसमाधि भावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ||८|| कर्म के योग व्यथा उदई मुनि, पुगव कुन्तसभेषज कीजे । पीत कफान लसास भगन्दर, तापको सूल महागद छीजे ॥ भोजन साथ बनाय के औषध, पथ्य कुपथ्य विचार के दीजे । 'ज्ञान' कहे नित ऐसी वैयावृत्य करे तस देव पतीजे ।। ॐ ही वैयावृत्यकरण भावनायै नम् अर्घ नि. स्वाहा || देव सदा अरिहन्त भजो जई, दोष अठारह किए अति दूरा । पाप पखाल भए अति निर्मल, कर्म कठोर किए चकचूरा || दिव्य अनन्त-चतुष्टय शोभित, घोर मिथ्यान्ध-निवारण सूरा । 'ज्ञान' कहे जिनराय अराधो, निरन्तर जे गुण-मन्दिर पूरा ।। ॐ हीं अहंभक्ति भावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ||१०|| देवत ही उपदेश अनेक सु, आप सदा परमारथ-धारी । देश विदेश विहार करें, दश धर्म धरे भव-पार उतारी ।। ऐसे अचारज भाव धरी भज, सो शिव चाहत कर्म निवारी । 'ज्ञान' कहे गुरू-भक्ति करो नर, देखत ही मनमाहि विचारी ।। ॐ हीं आचार्य भक्ति भावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ||११|| ६८ देव शास्त्र गुरू वाणी आगम छद पुराण पदावत सहित तर्क वितक बखान । काव्य कथा Tव नाटक पूजा ज्यातिष वयक शास्त्र प्रमाा ।। ऐसे बहुश्रुत साधु मुगीवर जा माग टाउ भाव न आन । चालत ज्ञान घरी मागा। जु भाग्य विगत जाहि जान ।। ॐ ही या श्रुतमानित Ild in Hifi • IRI 117011 द्वादश अग उपाग सदागम ताकी निरन्तर भग्नि कराव । वेद आपग चार का' तरा अथ गल गा गाहि राव ।। पढ बहु भाव लिखा जि | अक्षर भक्ति करी ब3 पूज रयाव । ज्ञान कहे जिन आगम-भक्ति करा सदबुद्धि बहुश्रुत पाव ।। ॐही प्रवचमक्ति वनाम म 34f1. स्वाहा १३ || भाव धरे समता सब जीवसु स्तात्र पढे मुख से मनहारी । कायोत्सर्ग कर मा प्रीतसु वदन देव-तणा भव तारी ।। ध्यान धरी मद दूर करी दाउ बेर कर पडकम्मन मारी । ज्ञान' कहे मुनि सो धावन्त जु दर्शन तान चरित्र उधारी ।। ॐ आवश्यक अपरिवाणि भावनाय नग अर्घ नि रवाहा ||१४|| जिन पूजा रचो परमारथसू, जिन आगे नृत्य महोत्सव ठाणो । गावत गीत बजावत ढोल मृदग के नाद सुधाग वखाणी ।। सग प्रतिष्ठा रचो जल-जातरा सदगुरू को साहमो कर आणो। 'ज्ञान' कहे जिन मार्ग-प्रभावन, भाग्य विशेषसु जानहि जाणो ।। ॐ हीं मार्ग प्रभावनायै नम अर्घ नि. स्वाहा ।।१५।। गौरव भाव धरो मनसे मुनि-पुड्गव को नित वत्सल कीजे । शील के धारक भव्य के तारक, तासु निरन्तर स्नेह धरीजे ।। धेनु यथा निज बालक के, अपने जिय छोडि न और पतीजे । 'ज्ञान' कहे भवि लोक सुनो, जिन वत्सल भाव धरे अघ छीजे ।। ॐ ही प्रवचन-वात्सल्य भावनायै नम अर्घ ||१६ ।। जाप-ॐ ही दर्शनविशुद्धयै नम ॐ ही विनयसम्पन्नतायै नम ॐ हीं शीलव्रताय नम, ॐ ही अभीक्ष्णज्ञानोपयोगाय नम ॐ हीं सवेगाय नम ॐ हीं शक्तितस्त्यागाय नम ॐ हीं शक्तितस्तपसे नम ओ ही साधुसमाध्यै नम ओ ही वैयावृत्यकरणाय नम ओ ही अर्हदभक्त्यै नम ओ ही आचार्यभक्तयै नम ओ ही बहुश्रुतभक्त्य नम ओ ही प्रवचनभक्त्यै नम, ओ ही आवश्यकापरिहाण्य नम ओ ही मार्गप्रभावनायै नम ओ ही प्रवचनवत्सलत्वाय नम ||१६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला षोडश कारण गुण करै, हरे चतुरगति-वास पाप पुण्य सब नासकै, ज्ञान भानु परकाश ||१|| चौपाई १६ मात्रा दरश विशुद्ध धरे जो कोई, ताको आवागमन न होई । विनय महा धारै जो प्रानी, शिव-वनिता की सखी बखानी ।।२।। शील सदा दिढ जो नर पालै सो औरन की आपद टालै । ज्ञानाभ्यास करै मन माहीं, ताके मोह महातम नाहीं ||३|| जो सवेग भाव विस्तारै, सुरग मुकति पद आप निहारै । दान देय मन हरष विशेखै, इह भव जस परभव सुख देखै ।।४।। जो तप तपे खपे अभिलाषा, चूरे करम शिखर गुरू भाषा । साधु समाधि सदा मन लावे, तिहु जग भोग भोगिशिव जावै ।।५।। निशि दिन वैयावृत्य करैया, सो निहचै भव नीर तरैया । जो अरहत भगति मन आनै, सो जन बिषय कषाय न जानै ।।६।। जो आचारज भगति करै है, सो निर्मल आचार धरै है । बहुश्रुतवन्त भगति जो करई, सो नर सपूरन श्रुत धरई ।।७।। प्रवचन भगति करै जो ज्ञाता, लहै ज्ञान परमानन्द दाता । पट आवश्य काल जो साधे, सो ही रत्न-त्रय आराधै |1|| धरम प्रभाव करै जो ज्ञानी, तिन शिव मारग रीति पिछानी । वत्सल अग सदा जो ध्यावै, सो तीर्थकर पदवी पावै ।। || ॐ ही दर्शनविशुद्धयादिषोडकारणेभ्यो पूर्णाघ नि. स्वाहा । दोहा एही सोलह भावना, सहित धरे व्रत जोय । देव इन्द्र नर वन्द्य पद 'द्यानत' शिवपद होय ।।१०।। सवैया तेईसा सुन्दर षोडशकारण भावना निर्मल चित्त सुधारक धारै । कर्म अनेक हने अति दुर्धर जन्म जरा भय मृत्यु निवारै ।। दुख दरिद्र विपत्ति हरे भव-सागर को पर पार उतारै । ज्ञान' कहे यही षोडशकारण कर्म निवारण सिद्ध सुधारै ।। इत्याशीर्वाद ।

१०० देव शास्त्र गुरू वाणी दशलक्षण धर्म पूजा आडिल्ल उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव है सत्य शौच सयम तप त्याग उपाव हैं ।। आकिचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हे चहुगति-दुखते काढि मुकति करतार हैं ।।१।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्म । अत्र अवतरावतर सवौषट इत्याहनम | ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्म । अत्र तिष्ठ ठ ठ स्थापनम । ॐहीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्म । अत्र ममसनिहितो मवमव वषट सन्निधिकरणम! सोरठा हेमाचल की धार मुनि-चित सम शीतल सुरभि । भव-आताप निवार, दश लक्षण पूजौ सदा ||१|| ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय जल नि. स्वाहा 11911 चन्दन केशर गार होय सुवास दशो दिशा । भव-आताप निवार दशलक्षण दूजौ सदा । ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय चन्दन नि. स्वाहा ।२।। अमल अखडित सार, तदुल चन्द्र समान शुभ भिवः ।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय अक्षत नि. स्वाहा ||३|| फूल अनेक प्रकार, महकै ऊरध लोक लो |मव. ।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय पुष्प नि. स्वाहा ।।४।। नेवज विविध निहार, उत्तम षट-रस सयुक्त भव. ।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय नैवेद्य नि. स्वाहा ||५|| बाति कपूर सुधार दीक जोति सुहावनी मव.।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय दीप नि. स्वाहा ।।६।। अगर धूप विस्तार, फैले सर्व सुगन्धता भिव.।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय धूप नि. स्वाहा ।।७।। फल की जाति अपार घ्राण नयन मनमोहने भव.।। ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय फल नि. स्वाहा ||८|| आठो दरब सँवार 'द्यानत' अधिक उछाहसो भिव.. ॐ हीं उत्तमक्षमादिदशलक्षण धर्माय अर्घ नि. स्वाहा ।।६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१०१
अंगपूजा
.
सोरठा
पीडै दुष्ट अनेक, बॉध मार बहुविधि करें ।
धरिए छिमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा ॥
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह भव जस, परभव सुखदाई ।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहै अयानो ।।
कहि है अयानो वस्तु छीने, बॉध मार बहुविधि करें ।
घरतै निकारै तन विदाएँ, वैर जो न तहाँ धरै ।।
तै करम पूरब किये खोटे, सहै क्यो नहि जीयरा ।
अति क्रोध-अगनि बुझाय प्रानी, साम्य जल ले सीयरा ।।
ॐही उत्तम-क्षमा धर्माडगाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा 11911
मान महाविषरूप, करहि नीच गति जगत मे ।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावै प्रानी सदा
उत्तम मार्दव-गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना ।
वस्यो निगोद माहित आया, दमरी रूकन भाग विकाया ।।
रूकन बिकाया भाग-वशतै, देव इकइन्द्री भया
उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीडो मे गया ।
जीतव्य जोवन धन गुमान कहा करे जल-बुदबुदा ।
करि विनय बहु-गुन बड़े जनकी, ज्ञान का पावै उदा ।।
ॐ हीं उत्तमार्दव धर्माडगाय अर्घ्य नि. स्वाहा ।।२।।
कपट न कीजै कोय, चोरन के पुर न बसै ।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु सपदा ।।
उत्तम आर्जव-रीति बखानी, रचक दगा बहुत दुखदानी ।
मन मे हो सो वचन उचरिए, वचन होय सो तन सो करिए ।।
करिए सरल तिहु जोग अपने, देख निर्मल आरसी ।
मुख करे जैसा लखै तैसा, कपट प्रीति अगारसी ।।

१०२ देव शास्त्र गुरु वाणी हि लहै लछमी अधिक छत कर कर्म-या-विशेषता । भय त्यागि दूध विलाव पीव आपदा नहि दखता ।। ही उत्तमामा,गार Hy.in • ||३|| कठिन वचा गत पोल पर शिदा अरू अट तजि । साच जवाहर खाल गतवाटी जग म सुखी ।। उत्तम सत्य-वरत पालीज पर विश्वासघात नहि कीजे । साचे झूठे माप देखो आपा पूत स्वपारा न पखा ।। पेखो तिहायत पुरूप साच का दरव सव दीजिए । मुनिराज श्रावक की प्रतिष्ठा माच गुण लख लीजिए । ऊँचे सिहासन बेठि वसु नृप धरम का भूपति गया । वच झूठ सेती नरक पहुचा सुरग म नारद गया ।। ॐही उत्तम सत्य धर्माउगाय अयं स्वाहा ।। धरि हिरदे सन्तोष करहु तपस्या देहसा शोच सदा निरदोष धरम बढो ससार मे ।। उत्तम शोच सर्व जग जाना, लाभ पाप को बाप वखाना । आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावें सन्तोषी प्रानी ॥ प्रानी सदा शुचि शील जप-तप ज्ञान ध्यान प्रभावतें । नित गग जमुन समुद्र न्हाये, अशुद्धि दोष सुभावत॑ ।। ऊपर अमल मल भर्यो भीतर कोन विधि घट शुचि कहै । बहु देह मैली सुगुन थैली शौच-गुन साधू लहै ।। ॐ हीं उत्तम शौच धर्माडगाय अर्घ्य नि स्वाहा ।।५।। काय छहो प्रतिपाल, पचेन्द्री मन वश करो । सयम रतन सभाल, विषय चोर बहु फिरत है ।। उत्तम सजम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजै अघ तेरे । सुरग नरक-पशुगति मे नाही आलस हरन करन सुख ठाहीं ।। ठाही पृथी जल आग मारूत, रूख त्रस करूना धरो । सपरसन रसना घ्रान नैना कान मन सब वस करो ।। जिस बिना नहि जिनराज सीझे तू रूल्यो जग कीच मे । इक घरी मत बिसरो करो नित, आव जम-मुख बीच मे ।।

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१०४
देव शास्त्र गुरू वाणी
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता बहिन सुता पहिचानौ ।
सहै बान-वरषा बहु सूरे, टिकै न नैन-बान लखि कूरे ।।
कूरे तिया के अशुचि तन मे, काम-रोगी रति करें ।
बहु मृतक सडहि मसान माहीं, काग ज्यो चोचे भरें ।।
ससार मे विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा ।
'द्यानत' धरम दस पैंडि चढिकै, शिव महल मे पग धरा ।।
ॐ हीं उत्तम ब्रह्मचर्य धर्माड्गाय अर्घ्य नि. स्वाहा ।।१०।।
समुच्चय जयमाला
दोहा
दस लच्छन बदो सदा, मन वाछित फलदाय
कहो आरती भारती, हम पर होहु सहाय ॥
बेसरी छन्द
उत्तम छिमा जहा मन होई, अतर बाहिर शत्रु न कोई ।
उत्तम मार्दव विनय प्रकासै, नाना भेद ज्ञान सब भासै ।।
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुरगति त्यागि सुगति उपजावे ।
उत्तम सत्य-वचन मुख बोले, सो प्रानी ससार न डोलै ।।
उत्तम शौच लोभ-परिहारी, सतोषी गुण-रत्न भण्डारी ।
उत्तम सयम पालै ज्ञाता, नर-भव सफल करै ले साता ।।
उत्तम तप निरवाछित पालै, सो नर करम-शत्रु को टालै ।
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुर शिवसुख होई ।।
उत्तम आकिचन व्रत धारे, परम समाधि दशा विस्तारे ।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै, नर-सुर सहित मुकति फल पावै ।।
दोहा-करै करम की निरजरा, भव पीजरा विनाश ।
अजर अमर पद को लहै, “द्यानत' सुख की राश ।।
ॐ ही उत्तमक्षमा मार्दव, आर्जव सत्य शौच सयम, तप त्याग, आकिचन्य
ब्रह्मचर्य दश-लक्षण-पूर्णाऱ्या नि. स्वाहा ।।१।।

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। १०६ दव शास्त्र गुरू वाणा सम्यक दरशन ज्ञान, व्रत शिव मग तीनो मयी । पार उतारन यान, 'द्यानत' पूजौ व्रत सहित ।।१०।। ॐ हीं सम्यकरत्नत्रयाय महार्घ नि. 11१०|| इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् । सम्यग्दर्शन पूजा दोहा सिद्ध अष्ट गुनमय प्रगट, मुक्त जीव सोपान । ज्ञान चरित जिहँ बिन अफल, सम्यकदर्श प्रधान ।।१।। ॐ ही अष्टागसम्यग्दर्शन । अत्र अवतर अवतर सवौषट | ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शन | अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ ठ स्थापन । ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शन । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । सोरठा नीर सुगध अपार, तृषा हरे मल छय करै । सम्यकदर्शन सार, आठ अग पूजौं सदा ||१|| ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय जल नि. स्वाहा ||१|| जल केशर धनसार, ताप हरे सीतल करे ।सम्यक.।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय चन्दन नि. स्वाहा ||२|| अछत अनूप निहार, दारिद नाशै सुख करे ||सम्यक.।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय अक्षत नि. स्वाहा |३|| पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे ||सम्यक. ।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय पुष्प नि. स्वाहा ||४|| नेवज विविध प्रकार, क्षुधा हरे थिरता करे ।सम्यक.।। ॐ ही अष्टागसम्यग्दर्शनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।।५।। दीप ज्योति तम हार, घट पट परकाशै महा सम्यक.।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय दीप नि. स्वाहा ।।६।। धूप घ्राण सुखकार, रोग विघन जडता हरे ||सम्यक.।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय धूप नि. स्वाहा ।७।।

१०७ देव शास्त्र गुरू वाणी श्रीफल आदि विथार, निहचै सुर शिव फल करे ।। सम्यक.।। ॐ हीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय फल नि. स्वाहा ।।!! जल गुधाक्षत चारू, दीप धूप फल फूल चरू ।सिम्यक.।। ॐहीं अष्टागसम्यग्दर्शनाय अर्घ नि. स्वाहा ।।६।। जयमाला दोहा आप आप निहचै लखे, तत्व प्रीति व्यौहार । रहित दोष पच्चीस हैं, सहित अष्ट गुण सार ।। चौपाई मिश्रित गीता छन्द सम्यकदरशन रतन गहीजे, जिन वच मे सन्देह न कीजै । इह भव विभव चाह दुखदानी, परमव भोग चहै मत प्रानी ।। प्राणी गिलान न करि अशुचि लखि, धरम गुरू प्रभु परखिये । पर दोष ढकिए धरम डिगते को, सुथिर कर हरखिये ।। चउ संघ को वात्सल्य कीजे, धरम की परभावना गुण आठों गुन आठ लहिक, इहाँ फेर न आवना IR|| ॐहीं अष्टागसहित पचविंशति दोषरहितसम्यग्दर्शनाय महाघ नि. स्वाहा। सम्यग्ज्ञान पूजा दोहा पंच भेद जाके प्रकट, ज्ञेय प्रकाशन भान मोह-तपन-हर-चन्द्रमा, सोई सम्यकज्ञान ॥१॥ ॐ हीं अष्टविध सम्यग्ज्ञान । अत्र अवतर अवतर सवौष्ट् । ॐ हीं अष्टविध सम्यग्ज्ञान | अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐही अष्टविध सम्यग्ज्ञान | अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।

जयमाला
दोहा
आप आप जानै नियत, ग्रन्थ पठन व्यौहार ।
सशय विभ्रम मोह बिन, अष्ट अग गुनकार ||
सम्यकज्ञान-रतन मन भाया, आगम तीजा नैन बताया ।
अच्छर शुद्ध अरथ पहिचानौ अच्छर अरथ उभय सग जानौ ।।
1

देव शास्त्र गुरू वाणी १०६ जानौ सुकाल-पठन जिनागम, नाम गुरू न छिपाइये । तप रीति गहि वहु मौन देक, विनय गुण चित लाइये ।। ये आठ भेद करम उछेदक, ज्ञान दर्पण देखना । इस ज्ञान ही सो भरत सीझा, और सब पट पेखना ।। ॐ ही अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय पूर्णार्घ नि. स्वाहा ।। इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् । सम्यकचारित्र पूजा दोहा विषय रोग औषधि महा, दव कषाय जलधार । तीर्थकर जाको धरै, सम्यक्चारित सार ||१|| ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्र । अत्र अवतर अवतर सवौष्ट् । ॐहीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट। सोरठा नीर सुगध अपार, तृषा हरे मल क्षय करे सम्यकचारित सार, तेरह विधि पूजौ सदा । ॐ ही त्रयोदशविधसम्यकचारित्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ||१|| जल केशर धनसार, ताप हरे शीतल करे सम्यक. ।। ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यक्चारित्राय ससारतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा URU अच्छत अनूप निहार, दारिद नाशै सुख भरै ।सम्यक. ।। ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान नि. स्वाहा ॥३॥ पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे |सम्यक.।। ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ।४।। नेवज विविध प्रकार, क्षुधा हरे थिरता करे |सम्यक.।। ॐ हीं त्रयोदशविधसम्यकचारित्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।।५।।

११०
देव शास्त्र गुरु वाणी
दीप ज्योति तन-हार, घटपट परकाशै नहा नन्क.11
ॐ ही गदशदिधनन्याग्विाय महावकारदिनाशनाय टीर नि.
न्टाहा 11511
धूप घाण सुखकार
रोग विछन जडता हरे पानन्यन.11
ॐ ही व्यादिधनकान्त्रिाय स्टलन्टहनाय धूप निम्बाहा III
श्रीफल आदि विथार निहचे नुर शिव फल करे सिगळ.11
ॐ हीं गदादिधनरकान्त्रिाय नगनफलप्राप्तये फल नि.न्वाहा 111
जल गगक्षत गरू, टीप धूप फल फूल चरु पालन्यन.।।
ॐ हीं पाशविनलगन्नियनपदशप्तये च नि.स्वाहा IF]
जयमाला
दोहा
आप आप थिर नियत नय तप संयम व्यौहार !
स्वपर टग दोनों लिए तेरह यि दुखहार 1191
सन्गारित रतन नालो, पंच पाप तजि के व्रत पालो ।
पंचननिति त्रय गुपति गहीजे, नर-भव सफल करहु तन छीजे।।
छौजे सना तन को जतन यह, एक संयम पालिए ।
बहु रुल्यो नर-निगोट नाही, कणय विषयनि टालिए ||
शुम नर---जोग सुघाट आयो, पार हो दिन जात
'घानत घरन की नाव बैठने, शिवपुरी कुशलात है !
ॐ ही दशदिछ सन्यगरित्र न्हा नि वहा ।
समुच्चय जयमाला
दोहा
सन्दरशन ज्ञान व्रत, इन दिन मुकति न होय !
अन्य पंगु अरु आलसी, जुटे जलें दव लोय IPL

१११
देव शास्त्र गुरू वाणी
चौपाई (१६ मात्रा)
जापे ध्यान सुथिर बन आवै, ताके करम-बन्ध कट जावै ।
तासी शिव-तिय प्रीति वदावे, जो सम्यक्रलत्रय ध्यावे IR ||
ताओं रहगति के दुख नाहीं, सो न परै भवसागर माहीं ।
जनग-जरा-गृत दोष मिटावे, जो सम्यक्रत्नत्रय ध्यावे ।।३।।
सोई दालच्छर को साधे, सो सोलह कारण आराधै ।
सो परमातन पद उपजावे, जो सम्यक्रत्नत्रय ध्यावे ।।४।।
सोई शक्र-चनि पद लेई. तीन लोक के सुख विलसेई ।
सो रागादिक भाव वहावे जो सम्यक्रलत्रय ध्यावे ।।५।।
सोई लोकालोक निहार, परमानन्द दशा विस्तारे ।
आप तिरे औरन तिरवावे, जो सम्यकरत्नत्रय ध्यावे ।।६।।
दोहा-एक स्वरूप प्रकाश निज, वचन कह्यो नहि जाय ।
तीन भेद व्यवहार सब, 'धानत' तो सुखदाय ।।७।।
ॐही सम्यकरत्नत्रय सम्यग्दर्शनाय सम्यमानाय सम्यकचारित्राय पूर्णार्घ
नि..
इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत ।
बाहुबली स्वामी की पूजा
दोहा
कर्म अरिगण जीति के, दरशायो शिवपथ ।
प्रथम सिद्ध पर जिन लयो, भोग भूमि के अन्त ।।१।।
समर दृष्टि जल जीत लहि, मल्लयुद्ध जय पाय |
वीर अग्रणी वाहुबलि, वदो मन वच काय ।।२।।
ॐ श्रीमतगोमटेश्वर अत्र अवतर अवतर सवौषट् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ।
अत्र गग सनिहितो भव भव वषट ।

११२ देव शास्त्र गुरू वाणी अथ अष्टक चाल-जोगीरासा जन्म जरा मरनादि तृषा कर, जगत जीव दुख पावे । तिहि दुख दूर करन जिनपद को पूजन जल ले आवे ।। परमपूज्य वीराधिवीर, जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके चरणकमल को नितप्रति, धोक त्रिकाल हमारी ||१|| ॐ ही वर्तमानावसर्पिणी समये प्रथम मुक्ति स्थान प्राप्ताय कर्मारि विजयी वीराधिवीर वीराग्रणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल स्वाहा ||१|| यह ससार मरूस्थल अटवी तृष्णा दाह भरी है । तिहि दुख वारन चदन लेकै, जिन पद पूज करी है ।। परमपूज्य वीराधिवीर जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके चरण कमल को नितप्रति धोक त्रिकाल हमारी III ॐ हीं वर्तमानावसर्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा |२|| चन्दन.।। स्वच्छ सालि शुचि नीरज रज सम गध अखड प्रचारी । अक्षय पद के पावन कारन पूजै भवि जगतारी ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके चरण कमल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी ।।३।। ॐ हीं वर्तमानावसर्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा ||३|| अक्षत.।। हरिहर चक्रपति सुर दानव मानव पशु बस याकै । तिहि मकरध्वज नासक जिनको पूजों पुष्प चढाकै ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके चरण कमल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी ||४|| ॐ हीं वर्तमानावसर्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय पुष्प नि. स्वाहा ।।४।।

देय शास्त्र गुरू वाणी ११३ पुष्प.॥ दुखद त्रिजग सीवनको अति ही दोष क्षुधा अनिवारी । तिहि दुख दूर करन को चरू वर ले जिन पूज प्रचारी ।। परमपूज्य वीरासिवीर जिन बाहुबलि बलधारी जिनके चरण पागलको नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी ।।५।। ॐ मानावसर्पिणी भी गाएपति परम योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय fat स्वा11411 गोह मातम में जग जीवनसिव मग नाहि लखावै । तिरी निस्वारन दीपक कर ले जिन पद पूजन आवै ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके मरण पागल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी ।।६।। बीमा गवसर्पिणी भी बाहुबलि परग योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय दीपनि रगत 1511 जान धूप सुगध बनाकर दश दिश मे महकावै । दरा विधि वध निवारण कारण जिनवर पूजि रचावै ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन बाहुबलि बलधारी । जिनके चरण कमल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी |७|| ॐ ही वर्तमागावसर्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय पपनि स्वार 131 तरत सुवरण सुगध अनूपम स्वक्ष महाशुचि लावै । शिव फल कारण जिनवर पद की फसलो पूजि रचावै ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन वाहुबलि बलधारी । जिनके चरण कमल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी ।।11 ॐही वर्तगानावरार्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्दाय भवताप विनाशनाय फल नि. स्वाहा |1|| वसु विधि के वस वसुधा सवही परवश अति दुख पावै । तिहि दुख दूर करन को भविजन अर्घ जिनाग्र चढावै ।। परम पूज्य वीराधिवीर जिन वाहुबलि बलधारी जिनके चरण कमल को नित प्रति धोक त्रिकाल हमारी || ॐ वर्तमानावसर्पिणी श्री बाहुबलि परम योगीन्द्राय भवताप विनाशनाय अर्घ नि. स्वारा 16||

११४
देव शास्त्र गुरू वाणी
जयमाला
दोहा
आठ कर्म हनि आठगुण, प्रगट करे जिन रूप ।
सो जयवतो भुजवली, प्रथम भये शिव भूप ।।
कुसुमलता छन्द
जे जे जे जगतार शिरोमणि, क्षत्रिय वश असस महान ।
जे जे जे जग जन हितकारी दीनो जिन उपदेश प्रमाण ||
जै जे चक्रपति सुत जिनके सतसुत ज्येष्ठ भरत पहिचान ।
जे जे जै श्री ऋषभदेव जिनसो जयवत सदा जग जान 11१11
जिनके द्वितीय महादेवी सुचि नाम सुनदा गुण की खान ।
रूप शील सम्पन्न मनोहर तिनके सुत भुजबली महान ।।
सवापच सत धनु उन्नत तनु हरितवरण सोमा असमान ।
बैडूरजमणि पर्वत मानो नील कुलाचल सम थिर जान ।।२।।
तेजवत परमाणु जगत मे तिन करि रच्यो शरीर प्रमाण ।
सत वीरत्व गुणाकर जाको निरखत हरि हरषै उर आन ।।
धीरज अतुल वज सम नीरज सम वीराग्रणी अति बलवान |
जिन छवि लखि मनु शशि छबिलाजै कुसुमायुध लीनों सुपुमान ।।३।।
बालसमै जिन बाल चन्द्रमा शशि से अधिक धरे दुतिसार ।
जो गुरूदेव पढाई विद्या शस्त्र शास्त्र सब पढी अपार ।।
ऋषभदेव ने पोदनपुर के नृप कीने भुजबली कुमार ।
दई अयोध्या भरतेश्वर को आप बने प्रभु जी अनगार ||४||
राजकाज षटखड महीपति सब दल लै चढि आए आप |
बाहुबलि भी सन्मुख आए मत्रिन तीन युद्ध दिए थाप ।
दृष्टि नीर अरू मल्ल युद्ध मे दोनो नृप कीजो बलधाप ।
वृथा हानि रूक जाय सैन्य की या लडिए आपो आप ||५|

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११६ देव शास्त्र गुरू वाणी सरस्वती पूजा दोहा जनम जरामृतु, क्षय करै, हरै कुनय जडरीति । भव सागरसो ले तिरै, पूजै जिन वच प्रीति ||१|| ओ ही श्री जिन-मुखोद्भव-सरस्वति । अत्र अवतर अवतर सवौष्ठ । ओ ही श्री जिन-मुखोद्भव-सरस्वति । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ओ ही श्री जिन-मुखोद्भव-सरस्वति । अत्र सन्निहितो भव भव वषट। छीरोदधि गगा विमल तरगा, सलिल अभगा, सुखसगा । भरि कचनझारी, धार निकारी, तृषा निवारी, हित चगा ।। तीर्थकर की ध्वनि, गणधर ने सुनि, अग रचे चुनि ज्ञानमई । सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भई ।। ओ ही श्री जिन मुखोद्भव सरस्वत्यै जल निर्व. स्वाहा ||१|| करपूर मगाया चन्दन आया, केशर लाया रग भरी । शारद पद वदो, मन अभिनदो, पाप निकदो दाह हरी ।। तीर्थंकर की ध्वनि. चिदनम IR11 सुखदास कमोद, धारक मोद अति अनुमोद चदसम | बहु भक्ति बढाई, कीरति गाई, होहु सहाई मात मम || तीर्थकर की ध्वनि. [अक्षतान ।।३।। बहु फूल सुवास, विमल प्रकाश, आनद रास लाय धरे । मम काम मिटायो, शील बढायो सुख उपजायो दोष हरे ।। तीर्थंकर की ध्वनि. पुष।।४।। पकवान बनाया, बहुघृत लाया, सब विध भाया मिष्ठ महा । पूजू थुति गाऊँ, प्रीति बढाऊँ, क्षुधा नशाऊँ हर्ष लहा ।। तीर्थंकर की ध्वनि. नैवेद्य ।।५।। कर दीपक जोत, तमक्षय होत, ज्योति उदोत तुमहि चढे । तुम हो परकाशक भरम विनाशक हम घट भासक ज्ञान बढे ।। तीर्थकर की ध्वनि. दीप।६।।

११७ देव शास्त्र गुरू वाणी शुभगध दशोकर, पावक मे धर, धूप मनोहर खेवत हैं । सब पाप जलावे, पुण्य कमावे, दास कहावे सेवत है ।। तीर्थकर की ध्वनि. धूपम् ।।७।। बादाम छुहारी, लोग सुपारी, श्रीफल भारी ल्यावत हैं । मन वाछित दाता मेट असाता, तुम गुन माता, ध्यावत है ।। तीर्थकर की ध्वनि. ।फिलम् ।।८।। नयनन सुखकारी, मृदु गुनधारी, उज्ज्वल भारी मोल धरै । शुभगध सम्हारा वसन निहारा, तुम तन धारा ज्ञान करें ।। तीर्थकर की ध्वनि. ||अय॑म् ।।६।। जल चदन अक्षत फूल चरू, अरू दीप धूप अति फल लावै । पूजा को ठानत जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुख पावै ।। तीर्थंकर की ध्वनि. अर्ध्यम् ।।१०।। जयमाला सोरठा ओकार ध्वनिसार, द्वादशाग वाणी विमल । नमो भक्ति उर धार, ज्ञान करै जडता हरै ।। चौपाई पहलो आचाराग बखानो, पद अष्टादश सहस प्रमानो । दूजो सूत्रकृत अभिलाष, पद छत्तीस सहस गुरू भाष ।। तीजो ठाना अग सुजान, सहस बयालिस पद सरधान । चौथो समवायाग निहार, चौंसठ सहस लाख इक धारम् ।। पचम व्याख्या प्रज्ञप्ति दरस, दोय लाख अट्ठाइस सहस । छट्ठो ज्ञातकथा विसतार, पाँच लाख छप्पन हज्जार ।। सप्तम उपासकाध्ययनग, सत्तर सहस ग्यारहलख भग । अष्टम अतकृत दस ईस, सहस अठाइस लाख तेईस ।। नवम अनुत्तरदश सुविशाल, लाख बानवै सहस चवाल । दशम प्रश्न व्याकरण विचार, लाख तिरानव सोल हजार ।। ग्यारम सूत्र विपाक सु भाख, एक कोड चौरासी लाख । चार कोडि अरू पद्रह लाख, दो हजार सब पद गुरूशाख ।।

११८
देव शास्त्र गुरु वाणी
द्वादश दृष्टिवाद पनभेद, इकसो आठ काडि पन वेद ।
अडसठ लाख सहस छप्पन है, सहित पचपद मिथ्या हन हैं ।
इक सो बारह कोडि बखानो, लाख तिरासी ऊपर जानो ।
ठावन सहस पच अधिकाने, द्वादश अग सर्व पद माने ।।
कोडि इकावन आठ हि लाख, सहस चुरासी छह सो भाख ।
साढे इकीस श्लोक बताये, एक एक पद के ये गाये ।।
दोहा
जा वानी के ज्ञान ते, सूझ लोक अलोक ।
'द्यानत' जग जयवत हो सदा देत हूँ धोक ।।
ॐ हीं श्री जिन मुखोद्गव सरस्वतीदेव्यै महाय॑म् निर्वपामीति स्वाहा ।।
पुष्पाजलि क्षिपेत इत्याशीर्वाद ।
हस्तिनापुर तीर्थ क्षेत्र पूजा
(रचयिता-पू० आर्यिकारत्न अभयमती माता जी)
मुक्तक छद-स्थापना
हस्तिनापुर क्षेत्र महान जिसकी अद्भुत महिमा जानी ।
आदि ऋषभ प्रभु ले अहार श्रेयास प्रथम होवे दानी ।।
रत्नवृष्टि प्रभु आगन वर्षे दान कि महिमा सब जानी ।
सोमन पति श्रेयास व कौरव पाडव की यह रजधानी ।।
चौपाई
शुभ प्राचीन सुक्षेत्र प्रधान, भव्य जीव दर्शन को आन ।
शाति कुन्थ अरह चतु कल्याण जजू तीर्थ प्रभुकर आह्वान | ।
ॐ हीं श्री हस्तिनापुर सिद्ध क्षेत्र आदिनाथ-आहार, शाति कुन्थ अरनाथ
चतु कल्याण प्राप्त अत्रवतरावतर सवौषट आहानन । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ
ठ स्थापन । अत्र.मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम् ।

११६ देव शास्त्र गुरू वाणी तर्ज-मराठी अरिहंत पूजा क्षीरोदधि से सुरभि जल लाऊ स्वर्ण भृगार धार चढाऊ । जन्म मरण जरा को नशाऊ, परम पद पाऊ भजू परमेशा || पूजू हस्तिनापुर तीर्थबिशेष्या, कियो आहार ऋषभजिनेशा शाति कुन्थुजिन अरह महेशा, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा ।। ॐ हीं श्री हस्तिनापुर सिद्ध क्षेत्र आदिनाथ-आहार, शाति कुन्थ अरनाथ चतु कल्याणक प्राप्तये जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा ||१|| - . 00000 .. 4. . . अक्षत०|३|| . 00.. 0.10. .. ... New .0000000 -~- मनचगे । शुद्ध का मीर गध धिसायो, पद पकज जजू हर्षायो । भव दाह विध्वस करायो, परम पद पाऊ भजू परमेशा ।। पूजू. ।। ॐ हीं श्री० चदन० |२|| शुभ तदुल अखड चुनाऊ, प्रभु निकट सुपुज चढाऊ । सुख अक्षय सहजपुर जाऊ, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा । पूजू.।। ॐ हीं श्री० मिष्ट व्यजन व घेवर फेनी, नेवज अर्पण करू प्रभु भीनी । भूख व्याधा सभी क्षय कीनी, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा ||पूजू ।। ॐ हीं श्री० नैवेद्य० ॥४|| पुष्प बहुविध ले विरगे, भजूं जिनवर को नित काम दाह नशे बहुभगे, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा ।। पूजू.।। ॐ हीं श्री० पुष्प ॥५॥ जगमग मणिमय सुदीप जलाऊ, ज्ञान ज्योति हृदय प्रगटाऊ । सर्व मिथ्यात्व भाव हटाऊ, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा ।। पूजू.।। ॐ हीं श्री० दीप०||६|| लेऊ धूप दशाग सुगधी, खेऊ व्याप्त चहू दिशा गधी । बसु कर्म उडाय विभगी, परम पद पाऊ भनूँ परमेशा ।। पूजू.।। ॐही श्री० कल्पतरू के सरस फल लाऊ, पूजू जिनवर को उर में ध्याऊ । चारित रथ चढके शिवपुर जाऊ, परम पद पाऊ भजूपरमेशा ।। पूजू.।। ॐ हीं श्री० 0000000000000000000.00 04... 0.0 000000000 . ... ---- धूप।७॥ 000000000000000000000000000000 फला11 .00000000000000000000000000000000000000000000 १२० अर्घ्य० ॥६॥ देव शास्त्र गुरू वाणी वसु द्रव्यादि अर्ध्य सजाऊ रत्न थाली मे लेय चढाऊ मुक्ति हेतु निज पाथेय वनाऊ, परम पद पाऊ गर्जू परमेशा ।। पूजू.।। ॐ ही श्री० चौपाई शाति कुन्थु जिन वखान, गर्भ जन्म तप ज्ञान कल्याण । गजपुर कियो ऋपम आहार, जनूं चरण प्रभु हो उद्धार || -शातये शातिधारा । सोरठा वासुपूज्य जिन मल्लि, समवसरण गजपुर लसे । ध्वनि खिर भविजन हेतु ज्ञानज्योति उर मे जगे ।। -दिव्य पुष्पाजलि । जयमाला दोहा हस्तिनापुर क्षेत्र की, महिमा अपर पार भविजन के कल्याण हितु, गाऊ गुण जयमाल ।। राग जन्मे लकी मरते लकडी० हस्तिनापुर नाम निराला कैसा तीर्थ महान है । तीर्थकार कल्याण भूमि को बारम्बार प्रणाम है ।। टेक || शाति कुथ जिन अरहनाथ जी इसी पुरी मे जन्म लिया । गर्भ जन्म तप ज्ञान कल्याण कर नगरी को धन्य किया । भव्य जीव दर्शन कर जाते अतिशय पुण्य निधान है ।। तीर्थकार ||१|| ऋषभनाथ को एक वर्ष तक अतराय ने घेर लिया । पूर्व जन्म ससार से नृप श्रेयास को जातिस्मरण नवधा भक्ति आहार कराकर दान प्रसिद्ध वरवान है । तीर्थ ||२|| सप्त शतक ऋषियो के ऊपर घोरोपसर्ग महान हुआ । समतारस मे रमकर गुरुवर घोर परोषह सहन किया विष्णु मुनि उपसर्ग हटाया, धन्य धन्य सुप्रणाम है ।। तीर्थ० ।।३।। हुआ | १२१ देव शास्त्र गुरू वाणी जम्बूद्धीप नदीश्वरद्धीप व समोशरण मदिन नसिया । गुरुकुल विद्यालय औषधालय आशम आदिक शोभे घना जो भविष्य मे दर्शनीय बन पूज्यनीय सुप्रधान है । तीर्थ० ।।४।। यात्रीगण दर्शन को आकर गुण गाकर यश फेलाया । भव भवकृत दुष्कर्म नशाकर अक्षयनिधि शिव सुख पाया । 'अभयमती' को अभय करे जय तीर्थ क्षेत्र सुख धाम है । तीर्थ० ।।५।। कौरव पाडव युद्ध महाभारत का लख सब चकित हुए । चक्री सनत कुवर सुभौम अरु महापद्ध भी यहीं हुए । यशोभद्र गुरुदत्त तपस्या कर इस भू पर आन है । तीर्थ० ।।६।। नृप अशोक रोहिणी सुलोचना जयकुमार इत्यादि हुए । कार्तिक फागुन सुदि व जेठ मे मेला लख आश्चर्य किये । वासुपूज्य अरु मल्लि जिने वर समोशरण सुख खान है ।। तीर्थः ।।७।। घत्ता श्री हस्तिनापुर, नमे सुरासुर, लहे स्वर्गपुर, मुक्ति वरे । जो नित पूजन कर, भव समुद्र तर, आनद कर निज रूप धरे ।। ॐ हीं श्री हस्तिनापुर सिद्धक्षेत्रे आदिनाथ आहार शाति कुथु अरनाथ चतु कल्याण प्राप्तये जयमाला पूर्णार्ध्य० । मुक्तक छद शाति · कुथु जिन अरह चतु कल्याणक कर सुरगण ज्ञानी । केवलज्ञान भयो जब सुर रचो समोशरण शिवसुख दानी ।।१।। दिव्यध्वनि सुन भव्य जीव विभ्रम तज सम्यगुण आनी । तीनो तीर्थकर चक्रेश्वर कामदेव नत हो प्राणी ।।२|| तीनो तीर्थकर चक्रे वर कामदेव पर हो उपसर्ग महान रक्षा कर जब विष्णु कुवर ऋषि वात्सल्य अग लहे शिवथान ।।३।। दोहा हस्तिनापुर क्षेत्र का पूजन कर सुखदान । उन्नीसो चारासि सुदि फागुन बारस जान ||४|| इत्याशीर्वाद ।

१२२ देव शास्त्र गुरू वाणी दीपावली पूजन महावीर निर्वाण दिवस पर, महावीर पूजन कर लू । वर्द्धमान अतिवीर वीर सन्मति प्रभु का वन्दन कर लू ।। पावानपुर से मोक्ष गये प्रशु, जिनवर पद अर्चन कर लू । जगमग-२ दिवय-ज्योति से, धन्य मनुज जीवन कर लू ।। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को, शुद्ध भाव मन में भर लू । दीपामालिका पर्व मनाऊँ, भव भव के बन्धन हर लू ।। ज्ञान-सूर्य का चिर प्रकाश ले, रत्नत्रय पथ पर बढ लू । पर-भावो का राग तोड कर, जिन स्वभाव मे अड लू ।। ॐ ही कार्तिक कृष्ण अमावस्याया मोक्ष मडगल प्राप्ताय श्री वर्द्धमानजिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर सवौपट । ॐ हीं कार्तिक कृष्ण अमावस्याया मोक्ष मगल प्राप्ताय श्री वर्द्धमानजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ हीं कार्तिक कृष्ण अमावस्याया मोक्ष मगल प्राप्ताय श्री वर्द्धमानजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट । चिदानद चैतन्य अनाकुल, निज स्वभाव मय जल भर लू । जन्म-मरण का चक्र मिटाऊँ, भव-भव की पीडा हर लू । दीपावली के पुण्य दिवस पर, वर्द्धमान पूजन कर लू महावीर अतिवीर वीर, सन्मति प्रभु को वन्दन कर लू ।।टेक।। ॐ हीं कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल प्राप्ताय श्री वर्द्धमानजिनेन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जल नि० स्वाहा । अमल अखण्ड अतुल अविनाशी, निज चदन उर में धर लू । चारो गति का ताप मिटाऊ । निज पचम गति आदर लू ।।दीपा० ।। ॐ ही कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल मण्डितय श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन नि० स्वाहा । अजर अमर अक्षय अविकल, अनुपम अक्षयपद उर धर लू । भद सागर तर मुक्ति वधू से, मै पावन परिणय कर लू ।।दीपा० ।। ॐ कार्तिन कृष्णागावस्यायों मोक्ष मगल मडिताय श्री दर्द्धमान जिनेन्द्राय अक्षय निस्वाहा।

देव शास्त्र गुरू वाणी १२३ रूप गध रस-स्पर्श रहित निज, शुद्ध पुष्प मन मे भर लू । काम बाण की व्यथा नाशकर, मैं निष्काम रूप धर लूँ ।।दीपा० ।। ॐ ही कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल माडिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय काम-बाण विध्वसनाय पुष्प नि० स्वाहा । आत्मशक्ति परिपूर्ण शुद्ध नैवेद्य भाव उर मे धर लूं । चिर-अतिप्तका रोग नाशकर, सहज तृप्त निज पद वर लू । दीपा० ।। ॐ ही कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल मडिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्द्रा क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा । पूर्ण ज्ञान कैवल्य प्राप्ति हित, ज्ञानदीप ज्योति कर लू । मिथ्या-भ्रम-तम-मोह नाशकर, निज सम्यकत्व प्राप्त कर लू। दीपा० ।। ॐ ही कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल मडिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्दाय मोहान्धकार विनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा । पुण्य भाव की धूप जलाकर, धाति अधाति कर्म कर लू । क्रोध-मान-माया-लोभादि, मोह-द्रोह सब क्षय कर लूं ।। दीपा० ॐ हीं काार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल मडिताय श्री वर्धमान जिनेन्द्राय अष्ट कर्म दहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । अमिट अनंत अचल अविनश्वर, श्रेष्ठ मोक्ष पद उर धर लू । अष्ट स्वगुण से युक्त सिद्धगाति, सिद्धत्व प्राप्त कर लूं || दीपा० ओम ही कार्तिक कृष्णामावस्यायाँ मोक्ष मगल मडिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्दाय मोक्षफल प्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । गुण अनंत प्रगटाऊँ अपने, निज अनर्घ्य पद को वर लू । शुद्ध स्वभावी ज्ञान-प्रमावसे निज सौन्दर्य प्रगट कर लूं ।। दीपा० ॐ ही कार्तिक कृष्णामावस्यायों मोक्ष मगल मडिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्दाय अनर्घ्यपद प्राप्तये अय॑निर्वपामीति स्वाहा । पञ्चकल्याणक शुभ आषाढ शुक्ल षष्ठी को, पुष्पोत्तर तजि प्रभु आए । माता त्रिशाला धन्य हो गई, सोहल सपने दरशाए । पन्द्रह मास रत्न वर से, कुण्डलपुर में आनन्द हुआ । वर्द्धमान के गर्मोत्सव पर, दूर' शोक-दुःख द्वन्द हुआ । ॐ हीं आषाढ शुक्लषष्ठयाँ गर्भ मगल प्राप्ताय श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

१२४ दव शारत्र गुरु वाणी चत्र शुक्ल की त्रयादगी का सारी जगती धन्य हुइ । नृप सिद्धर्थराज हपाय कुण्डलपुर नन्य हुई ॥ मरु सुदर्शन पाण्डुक वन में सुगपति ने गु अभिपक । नृत्य वाद्य मगल गीता के द्वारा किया ! अतिरक । ॐ हीं चत्र शुक्ल त्रयादा ना मगल प्रातारा श्री दर्दमा निन्द्राय अर्घ्य नि० रवाहा । मगसिर कृष्णा दशमी का उर म छाया वगग्य अपार । लोकान्तिक देवो द्वारा, धन्य धन्य प्रमु जय जयकार || वाल ब्रह्मचारी गुणधारी, वीर प्रभु ने किया प्रणाम । वन में जाकर दीक्षा धारी, निज में लीन हुए गगवान ।। ॐ हीं मार्ग शीर्षकृष्ण दशम्या तपा मगल गडिताय श्री वर्द्धमान जिनन्द्राय अर्घ्य नि० स्वाहा । द्वादश वर्ष तपस्या करके पाया तुमन केवलज्ञान । कर बैसाख शुक्ल दशमी को, त्रेसठ कर्म प्रकृति अवसान || सर्व द्रव्य-गुण पर्यायो को, युगपत एक समय म जान । वर्द्धमान सर्वज्ञ हुए प्रभु, वीतराग अरिहन्त महान । ॐ हीं वैसाख शुक्ल दशम्या ज्ञान मगल मण्डिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्य नि० । कार्तिक कृष्ण अमावस्या को, वर्धमान प्रभु मुक्त हुए । आदि-अनन्त समाधि प्राप्त कर मुक्ति-रमा से युक्त हुए ।। अन्ति शुक्ल ध्यान के द्वारा, कर अघातिय का अवसान । शेष प्रकृति पच्यासी को भी, क्षय करके पाया निर्वाण || ॐ हीं कार्तिक कृष्णामावस्याया मोक्ष मगल मण्डिताय श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय अर्घ्य नि० स्वाहा । जयमाला महावीर ने पावापुरसे, मोक्षलक्ष्मी पाई थी । इन्द्र सुरों ने हर्षित होकर, दीपावली मनाई थी । केवलज्ञान प्राप्त होने पर, तीस वर्ष तक किया विहार । कोटि-कोटि जीवों का प्रमु ने, दे उपदेश किया उपकार || पावापुर उद्यान पधारे, योगनिरोध किया साकार गुणस्थान चौदह को तजकर, पहुचे भव समुद्र के पार ||

१२५
देव शास्त्र गुरू वाणी
सिद्धशिला पर हुए विराजित, मिली मोक्षलक्ष्मी सुखकर ।
जल-थल-नम मे देवो द्वारा, गूज उठी प्रभु की जयकार ।।
इन्द्रादिक सुर हर्षित आये, मन धारे मोद अपार ।
महामोक्ष कल्याण मनाया, अखिल विश्व को मगलकार ||
अष्टादश गणराज्यो के, राजाओ ने जयगान किया ।
नत-मस्तक होकर जन-जन ने, महावीर गुणगान किया ।।
तन कपूरवत उडा मेख नख, केश रहे इस भूतल पर ।
मायामयी शरीर रचा, देवो ने क्षण भर के भीतर ||
अग्निकुमार सुरो ने झुक, मुकुटानल ने तन भस्म किया ।
सर्व उपस्थित जनसमूह, सुरगण ने पुण्य अपार लिया ।
कार्तिक कृष्णा अमावस्या का, दिवस मनोहर सुखकर था ।
उषाकाल का उजियारा कुछ, तम-मिश्रित अति मनहर था ।।
रत्न-ज्योतियो का प्रकाश कर, देवों ने मगल गाये ।
रत्न दीप की आवलियो से, पर्व दीपमाला लाये ॥
सबने शीस चढाई भस्मी, पदम सरोवर बना वहा
वही भूमि है अनुपम सुन्दर, जल मन्दिर है बना वहा ॥
इसी दिवस गौतम स्वामी को, सन्ध्या केवलज्ञान हुआ ।
केवल ज्ञान लक्ष्मी पाई, पद सर्वज्ञ महान हुआ ।।
प्रभु के ग्यारह गणधर में थे, प्रमुख श्री गौतम स्वामी ।
क्षपक श्रेणी चढ शुक्लध्यान से, हुए देव अन्तर्यामी ||
देवो ने अति हर्षित होकर, रत्न ज्योति का किया प्रकाश |
हुई दीपमाला द्विगुणित, आनन्द हुआ छाया उल्लास ।।
प्रभु के चरणाम्बुज दर्शन कर, हो जाता मन अति पावन ।
परम पूज्य निर्वाण भूमि शुभ, पावापुर है मन-भावन ।।
अखिल जगत में दीपावली, त्यौहार मनाया जाता है ।
महावीर निर्वाण महोत्सव, धूम मचाता आता है ।।
हे प्रभु महावीर जिन स्वामी, गुण अनन्त के हो धामी ।
भरतक्षेत्र के अन्तिम तीर्थकर, जिनराज विश्वनामी ॥

१२६
देव शास्त्र गुरु वाणी
मेरी केवल एक विनय है, मोक्ष लक्ष्मी मुझे मिले ।
भौतिक लक्ष्मी के चक्कर में मेरी श्रद्धा नहीं हिले ।।
भव-भव-जन्म-मरण के चक्कर मैने पाये हैं इतने ।
जितने रजकण इस भूतल पर, पाये हैं प्रगु दु ख उतने ।।
अवसर आज अपूर्व मिला है, शरण आपकी पाई है ।
भेद-ज्ञान की बात सुनी है, तो निज की सुधि आई है ।।
अव मैं कही नहीं जाऊँगा, जब तक मोक्ष नहीं पाऊँ ।
दो आशीर्वाद हे स्वामी । नित्य नये मगल गाऊं ॥
ॐ हीं कार्तिक कृष्णामावरयाया निर्वाण कल्याणक प्राप्ताय श्री वर्द्धमान
मान-जिनेन्द्राय पूर्णाऱ्या नि० ।
दोहा
दीप मालिका पर्व पर, महावीर उर धार
भाव सहित जो पूजते, पाते सौख्य उपार ।
पुष्पाजलि क्षिपेत् इत्याशीर्वाद ।
सप्तर्षि
पूजा
(कविवर मनरगलाल जी)
छप्पय
प्रथम नाम श्रीमन्व दुतिय स्वरमन्व ऋषीश्वर ।
तीसरे मुनि श्रीनिचय सर्वसुन्दर चौथो वर ।।
पचम श्रीजयवान विनयलालस षष्ठम भनि ।
सप्तम जय मित्राख्य सर्व चारित्र-धाम गनि ।।
ये सातो चारण-ऋद्धिधर, करूँ तास पद थापना ।
मैं पूजू मन वचन काय करि, जो सुख चाहूँ आपना ।।
ॐ हीं चारण ऋद्धिधर श्री सप्तऋषीश्वरा । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं चारण ऋद्धिधर श्री सप्तऋषीश्वरा । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं चारण ऋद्धिधर श्री सप्तऋषीश्वरा । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट।

देव शास्त्र गुरू वाणी १२७ शुभ तीर्थ-उद्भव-जल अनूपम, मिष्ट शीतल लायकैं । भव-तृषा-कद-निकद-कारण, शुद्ध घट भरवायकै ॥ मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ । ता करे पातक हरे सारे, सकल आनन्द विस्तरूँ ।। ॐ ही चारण ऋद्धिधर श्री मन्व-स्वरमन्व-निचय-सर्वसुन्दरजयवान विनयलालस-जयमित्र ऋषिभ्यो जल निर्वपामीति स्वाहा । श्री खड कदली नद केशर, मद मद घिसायकैं । तस गध प्रसरित दिग-दिगन्तर, भर कटोरी लायक ।। मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादि चारण सप्तर्षिभ्यो चदन निः स्वाहा । अति धवल अक्षत खड-वर्जित, मिष्ट राजन भोग के । कलधौत-थारा भरत सुन्दर, चुनित शुभ उपयोग के || मन्वादि० ॐ ही श्रीमन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो अक्षतान् नि० स्वाहा । बहु-वर्ण सुवरण-सुमन आछे, अमल कमल गुलाब के । केतकी चपा चारु मरुआ, चुने निज-कर चावके ।। मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्य पुष्प नि० स्वाहा । पकवान नाना भाति चातुर, रचित शुद्ध नये नये । सदमिष्ट लाडू आदि भर बहु, पुरट के थारा लये ।। मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो नैवेद्य नि० स्वाहा । कलधौत-दीपक जडित नाना, भरित गोधृत-सारसो । अति ज्वलित जगमग ज्योति जाकी, तिमिर नाशनहारसो मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो दीप नि० स्वाहा । दिक्-चक्र गधित होत जाकर, धूप दश अगी कही । सो लाय मन-वच-काय शुद्ध, लगाय कर खेऊँ सही ।। मन्वादि । ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो धूप नि० स्वाहा । वर दाख खारक अमित प्यारे, मिष्ट चुष्ट चुनायकैं । द्रावडी दाडिम चारु पुगी, थाल भर भर लायकैं ।। मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो फल नि० स्वाहा । जल गध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना । फल ललित आठो द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना ।। मन्वादि० ॐ हीं श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्यो अर्घ्य नि० स्वाहा ।

पदरी छन्द
श्रीमा मुनिराजा महत वन पावरकी रक्षा करत ।
जय मिथ्या तम नागक पतग करुणा रन परित अग अग ।
जय श्रीस्वरमनु अकलकरूप पद भव करत नित अमर भूप ।
जय पच अक्ष जीते महा। तप तपत दह कचन-समान ।
जय निचय सप्त तत्त्वार्थ गाल तप-रमातना मन म प्रकाश ।
जय विपय-रोधसवाघ भार परपरणति नारान अचल ध्यान ।
जय जयहि सर्वसुन्दर दयाल लखि इद्रजाल्वत जगत जाल ।
जय तृष्णाहारी रमण राम निज परणति म पायो विराम |
जय आनदघन कल्याण रूप कल्याण करत सबको अनूप ।
जय मद नाशन जयगन देव निरमद विचरत सय करत सेव ।
जय जयहि विनयलालस अमान सव शत्रु मित्र जानत समान ।
जय कृशित-काय तपके प्रभाव, छवि छटा उडति आनद दाय ।
जय मित्र सकल जगके सुमित्र, अनगिनत अधन कीने पवित्र ।
जय चन्द्र-वदन राजीव-नेन कबहूँ विकथा बोलत न चैन ।
जय सातौँ मुनिवर एक सग नित गगन-गमन करते अभग ।
जय आए मथुरा पुर मॅझार तहें मरी रोग को अति प्रचार ।
जय जय तिन चरणनि के प्रसाद, सबमरी देवकृत भई वाद ।
जय लोक करे निर्भय समस्त हम नमत नित जोड हस्त ।
जय ग्रीषम-ऋतु पर्वत मॅझार नित करत अतापन योग सार ।
जय-तृषा-परीषह करत जेर, कहु रच चलत नहि मन-सुमेर ।
जय मूल अठाइस गुणन धार, तप ऊग्र तपत आनदकार ।
जय वर्षा-ऋतु मे वृक्ष-तीर, तह अति शीतल झेलत समीर ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
૧ર૬
जय शीत-काल चौपट मॅझार, के नदी-सरोवर-तट विचार ।
जय निवसत ध्यानारूढ होय, रचक नहि मटकत रोम कोय ।
जय मृतकासन वजासनीय, गोदूहन इत्यादिक गनीय ।
जय आसन नाना भॉति धार, उपसर्ग सहत ममता निवार ।
जय जपत तिहारो नाम कोय, लख पुत्र पौत्र कुल वृद्धि होय ।
जय भरे लक्ष अतिशय भडार, दारिद्रतनो दुख होय छार ।
जय चोर अग्नि डाकिन पिशाच, अरु ईति भीति सब-नासत साच ।
जय तुम सुमरत सुख लहत लोग, सुर असुर नमत पद देत धोक ।।
छन्द रोला
ये सातो मुनिराज, महातप लक्ष्मी धारी ।
परम पूज्य पद धरै, सकल जग के हितकारी ।।
जो मन वच तन शुद्ध, होय सेवै औ ध्यावै ।
सो जन 'मनरगलाल', अष्ट ऋद्धिनकौं पावै ।।
दोहा
नमन करत चरनन परत, अहो गरीबनिवाज ।
पच परावर्तननितै, निरवारी ऋषिराज ।।
ॐ ही श्रीमन्वादिचारणसप्तर्षिभ्यो पूर्णार्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपूत् ।
पंच बालयति तीर्थकर पूजा
दोहा
श्रीजिन पच अनग-जित, वासुपूज्य मलि नेमि ।
पारसनाथ सुवीर अति, पूजू चित धर प्रेम ।। १।।
ॐ हीं पचवालयति-तीर्थकरा अत्र अवतर-२ सवौषट आहानम् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् ।
अत्र मम अन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरण ।

१३० देव शास्त्र गुरू वाणी अथाष्टक शुचि शीतल सुरभि सुनीर लायो भर झारी । दुख जामन मरन गहीर, याको परिहारी ।। श्री वासुपूज्य मलि नेमि, पारस वीर अति । नमू मन वच तन धरि प्रेम पाचो बालयति ।। ॐ हीं श्री वासुपूज्य मल्लिनाथ नेमनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा । चदन केशर कपूर, जल मे घसि आनौ भव तन भजन सुखपूर, तुमकौ मैं जानौं ।। श्रीवा० || चदन।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो ससारतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा । वर अक्षत विमल बनाय, सुवरण थाल भरे । बहु देश देश के लाय, तुमरी भेट धरे || श्रीवा० ।। अक्षत ।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा । यह काम सुभट अति सुर, मन मे क्षोभ करौ । मैं लायौ सुमन हजूर, याको वेग हरौ || श्रीवा० ।। पुष्प ।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो कामबाणविनाशनाय पुष्प नि. स्वाहा । षट् रस पूरित नैवेद्य, रसना द्वय कर्म वेदनी छेद, आनन्द है भारी ।। श्रीवा० ।। नैवेद्य।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । धरि दीपक जगमग ज्योति, तुम चरणन आगे । मम मोह तिमिर क्षय होत, आतम गुण आगे ।। श्रीवा० ।। दीप ।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । ले दशविधि धूप अनूप, खो ऊँ गध मई । दशबध दहन जिन भूप तुम, हो कर्म जई || श्रीवा० ।। धूप ।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप नि. स्वाहा । पिस्ता अरु दाख बदाम, बदाम, श्रीफल लेय घने । तुम चरण जजू गुणधाम द्यौ, सुख मोक्ष तने || श्रीवा० ।। फल ।। श्री पचबालयति तीर्थकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा । सुखकारी ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१३१
सजि वसुविधि द्रव्य मनोज्ञ, अरघ बनावत है
वसु कर्म अनादि स योग, ताहि नशावत है ।।
श्री वासुपूज्य
मलि ने मि, पारस वीर अति
नमू मन वच तन धरि प्रेम पाचो बालयति ।। श्रीवा० ।। अर्घ्यम्
श्री पचवालयति तीर्थकरेग्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घम् नि. स्वाहा ।
जयमाला
।
दोहा
बाल ब्रह्मचारी भये, पाचो श्री जिनराज ।
तिनकी अव जयमालिका, कहूँ स्वपर हितकाज ||
(पद्धरी छन्द)
जय जय जय जय श्री वासुपूज्य, तुम सम जग मे नहि और दूज |
तुम महा शुक्र सुरलोक छार, जग गर्भ मात माहीं पधार ||
षोडश सपने देखे सुमात, बल अवधि जान तुम जन्म तात ।
अति हर्ष धार दपति सुजान, बहु दान दियो जाचक जनान ।।
छप्पन कुमारिका कियो आन, तुम मात सेव बहु भक्ति ठान ।
छ' मास अगाऊ गर्भ आय, धनपति सुवरन नगरी रचाय ||
तुम तात महल ऑगन मॅझार, तिहु काल रतन धारा अपार ।
वरषाए षट् नव मास सार, धनि जिन पुरुषन नयनन निहार ।।
जय मल्लिनाथ देवन सुदेव, शत इन्द्र करत तुम चरण सेव ।
तुम जन्मत ही त्रय ज्ञान धार, आनद भयो तिहु जग अपार ||
तव ही ले चहु देव सग, सौधर्म इन्द्र आयो उमग
सजि गज ले तुम हरि गोद आप, वन पाडुक शिल ऊपर सुथाप ।।
क्षीरोदधि तैं बहु देव जाय, भरि जल घट हाथो हाथ लाय ।
करि न्हवन वस्त्र भूषण सजाय, दे मात नृत्य ताडव कराय ।।
पुनि हर्ष धार हृदय अपार, सब निर्जर तब जय जय उचार ।
तिस अवसर आनन्द हे जिनेश, हम कहिबे समरथ नहीं लेश ।।

१३२ देव शास्त्र गुरू वाणी जय जादोपति श्री नेमिनाथ, हम नमत सदा जुग जोरि हाथ । तुम ब्याह समय पशुवन पुकार, सुनि तुरत छुडाए दया धार || कर ककण अरु सिर मोर बद, सो तोड भए छिनमे स्वच्छद । तब ही लौकान्तिक देव आय, वेराग्य वर्द्धनी थुति कराय ।। तत्क्षण शिविका लायो सुरेन्द्र, आरूढ भए तापर जिनेन्द्र । सो शिविका निज कधन उठाय, सुर नर खग मिल तपवन ठराय ।। कच लौंच वस्त्र भूषण उतार भए जती नगन मुद्रा सुधार । हरि केश लेय रतनन पिटार, सो क्षीर उदधि माहीं पधार ।। जय पारसनाथ अनाथ नाथ, सुर असुरन मत तुम चरण माथ । जुग नाग जरत कीनो सुरक्ष, यह बात सकल जगमे प्रत्यक्ष ।। तुम सुर धनुसम लखि जग असार, तप तपत भये तन ममत छाड । शठ कमठ कियो उपसर्ग आय, तुम मन सुमेर नहि डगमगाय ।। तुम शुक्लध्यान गहि खडगहाथ, अरि च्यारि घातिय करि सुघात । उपजायो केवल ज्ञान भानु आयो कुवेर हरि बच प्रमाण ।। की समोशरण रचना विचित्र, तहाँ खिरत भई वाणी पवित्र । मुनि सुर नर खग तिर्यच आय, सुनि निज-निज भाषा बोधपाय ।। अय वर्द्धमान अन्तिम जिनेश, पायो न अत तुम गुण गणेश । तुम च्यारि अघाती करम हान, लियोमोक्ष स्वय सुख अचलथान ।। तब ही सुरपति बल अवधि जान, सब देवन युत बहु हर्ष ठान । सजि निज बाहन आयो सुतीर, जहँ परमौदारिक तुम शरीर ।। निर्वाण महोत्सव कियो भूर, ले मलयागिर चदन कपूर । बहु द्रव्य सुगधित सरस सार, तामे श्री जिनवर वपु पधार || निज अगिनिकुमारिन मुकुट नाय, तिहरतनन शुचिज्वाला उठाय । तस सर माहीं दीनी लगाय, सो भस्म सबन मस्तक चढाय ।। अति हर्ष थकी रचि दीप माल, शुभ रतनमई दश दिश उजाल । पुनि गीत नृत्य बाजे बजाय, गुणगाय ध्याय सुरपति सिधाय ।। सो थान अबै जग मे प्रत्यक्ष, नित होत दीप माला सुलक्ष । हे जिन तुम गुण महिमा अपार, बसु सम्यक् ज्ञानादिक सुसार ।। तुम ज्ञान माहि तिहु लोक दर्ब, प्रतिबिबित हैं चर अचर सर्व । लहि आतम अनुभव परम ऋद्धि, भये वीतराग जगमे प्रसिद्ध ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१३३
है बालयती तुम सबन एम, अचरज शिव काता वरी केम ।
तुम परम शाति मुद्रा सुधार, किय अष्ट कर्म रिपु को प्रहार ।।
हम करत वीनतो बार-बार, कर जोर स्व मस्तक धार-धार ।
तुम भवोदधि पार-पार, मोको सुवेग ही तार-तार ।।
अरदास दास ये
पूर-पूर, बसु कर्म शैल चक चूर-चूर ।
दुख सहन दास अव शक्ति नाहि, गहि चरण शरण कीजे निवाह ।।
चौपाई
पॉचो बाल यती तीर्थेश, तिनकी यह जयमाल विशेष ।
मन वच काय त्रियोग सम्हार, जे गावत पावत भव पार ||
ॐ ही श्रीपच पालयति तीर्थकर जिनेन्द्रभ्यो पूर्णार्धम् नि. स्वाहा ।।
दोहा
ब्रह्मचर्य सों नेह धरि, रचियो पूजन ठाठ
पॉचो वाल यतीन का, कीजे नित प्रति पाठ ।।
इत्याशीर्वाद ।
श्री रविव्रत पूजा
अडिल्ल छन्द
यह भविजन हितकार, सु रविव्रत जिन कही ।
करहु भव्यजन सर्व, सुमन देकें सही ।
पूजो पार्श्व जिनेन्द्र, त्रियोग लगाय के ।
मिटै सकल सन्ताप, मिलै निधि आय के ||
मतिसागर इक सेठ, सुग्रन्थ मे कहा
उनसे भी यह पूजा कर आनन्द लहो ।
ताते रविव्रत सार, सो भविजन कीजिए ।
सुख सपति सतान, अतुल
निधि लीजिए ॥
प्रणमों पार्श्व जिनेश को, हाथ जोड सिर नाय ।
परभव सुख के कारने, पूजा करूँ बनाय !

. - मलयागिर १३४ देव शास्त्र गुरू वाणी रवीवार व्रत के दिना, येही पूजन ठान । ता फल सम्पत्ति को लहैं, निश्चय लीजे मान ।। ॐ ही श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट । ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् । ॐ हीं अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरण | उज्जवल जल भरके अति लायो, रतन कटोरन माहीं । धार देत अति हर्ष बढावत, जन्म जरा मिट जाहीं ।। पारसनाथ जिनेश्वर पूजो, रविव्रत के दिन भाई । सुख सम्पत्ति बहु होय तुरत ही, आनद मगल दाई ||१|| ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ||१|| केशर अति सुन्दर, कुकुम रग बनाई । धार देत जिन चरनन आगे, भव आताप नशाई पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा IRII मोतीसम अति उज्ज्वल तदुल, लावो नीर पखारो । अक्षयपद के हेतु भाव सो, श्री जिनवर ढिग धारो ||पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि. स्वाहा ।।३।। बेला अरु मचकुद चमेली, पारिजात के ल्यावो । चुनचुन श्री जिन अग्र, चढाऊँ मन वाछित फल पावो || पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्ष नि. स्वाहा ।।४।। बावर फैनी गुजिया आदिक, घृत मे लेत पकाई । कचन थार मनोहर भरके, चरनन देत चढाई पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।।५।। मणिमय दीप रतनमय लेकर, जगमग जोति जगाई । जिनके आगे आरति करके, मोह तिमिर नश जाई ।पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोहाधकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।।६।। चूरन कर मलयागिर चदन, धूप दशाग बनाई । तट पावक मे खेय भाव सो, कर्मनाश हो जाई ।पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप नि. स्वाहा ।।७।। श्रीफल आदि बदाम सुपारी, भाति-भाति के लावो । श्रीजिन चरन चढाय हरषकर, ताते शिव फल पावो ।पारस०।। ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा ||८||

देव शास्त्र गुरू वाणी
१३५
जल गधादिक अष्ट द्रव्य ले, अर्ध वनावो भाई ।
नाचन गावत हर्षभाव सो, कचन थार भराई पारस०।।
ॐ हीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ नि. स्वाहा ।। ||
गीतिका छन्द
मन वचन काय विशुद्ध करके, पार्श्वनाथ सु पूजिए ।
जल आदि अर्घ बनाय भविजन, भक्तिवत सु हूजिए ।।
पूज्य पारसनाथ जिनवर, सकल सुखदातार जी ।
जे करत हैं नर नारि पूजा, लहत सौख्य अपार जी ।
ॐ ही श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय पूर्णा निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
यह जग मे विख्यात हैं, पारसनाथ महान ।
तिन गुण की जयमालिका, भाषा करूँ बखान ।।
जय जय प्रणमो श्री पार्श्वदेव, इन्द्रादिक तिनकी करत सेव ।
जय जय सु बनारस जन्म लीन, तिहु लोक विर्षे उद्योत कीन ।।
जय जिनके पितु श्री अश्वसेन, तिनके घर भये सुख चैन देन ।
जय वामा देवी मात जान, तिनके उपजे पारस महान ॥
जय तीन लोक आनद देन, भविजन के दाता भये ऐन ।
जय जिनने प्रभुकी शरण लीन, तिनकी सहाय प्रमुजी सो कीन ।।
जय नाग नागिनी भये अधीन, प्रभु चरणन लाग रहे प्रवीन ।
तज देह देवगति गये जाय, धरणेन्द्र पद्मावति पद लहाय ।।
जय अञ्जन चोर अधम अजान, चोरी तज प्रभु को धरो ध्यान ।
जय मृत्यु भये वह स्वर्ग जाय, ऋद्धी अनेक उनने सो पाय ।।
जय मतिसागर इक सेठ जान, तिन अशुभकर्म आयो महान ।
तिनकै सुत थे परदेश माहि, उनसे मिलने की आश नाहिं ।।
जय रविव्रत पूजन करी सेठ, ता फल कर सब से भई भेंट ।
जिन-जिन ने प्रभुका शरण लीन, तिन ऋद्धि-सिद्धि पाई नवीन ।।

१३६
देव शास्त्र गुरू वाणी
जय रविव्रत पूजा करहि जेय, ते सौख्य अनन्तानन्त लेय ।
धरणेन्द्र पद्मावति हुए सहाय, प्रभु भक्त जान तत्काल आय ।।
पूजा विधान इहि विधि रचाय, मन वचन काय तीनो लगाय ।
जो भक्तिभाव जयमाल गाय, सोही सुख सम्पत्ति अतुल पाय ।।
बाजत मृदग बीनादि सार, गावत नाचत नाना प्रकार
तन नन नन नन नन नाय देत, सन नन नन नन सुर भर सो लेत ।।
तो थेई थेई थेई पग धरत जाय, छम छम छम छमघुघरू बजाय ।
जे करहि निरत इहि भात भात, ते लहहि सुक्ख शिवपुर सु जात ।।
रविव्रत पूजा पार्श्व की, करै भविक जन जोय ।
सुख सम्पत्ति इहि भव लहै, आगे सुर पद होय ।।
ॐ ही श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ निर्वपामोति स्वाहा ।
रविव्रत पार्श्व जिनेन्द्र, पूज भवि मन धरे ।
भव भव के आताप, सकल छिन मे टरे । ॥
होय सुरेन्द्र नरेन्द्र, आदि पदवी लहे
सुख सम्पति सन्तान, अटल लक्ष्मी रहे
फेर सर्व विधि पाय, भक्ति प्रभु अनुसरे ।
नाना विध-सुख भोग, बहुरि शिवतिय वरे ।।
इत्याशीर्वाद ।
रविव्रत जाप्य मन्त्र
ॐ हीं नमो भगवते चितामणि-पार्श्वनाथ सप्तफणमण्डिताय श्री धरणेन्द्र
पदमावती-सहिताय मम ऋदि सिद्धि वृद्धि सौख्य कुरु कुरु स्वाहा ।
श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथ जिन पूजा (भाषा)
अडिल्ल छन्द
हू कार अक्षरात्मक देव जो ध्यावते
देव मनुष्य पशु कृत सो व्याधि नशावते ।।
कासी ताबे पत्र पै शुद्ध लिखावते
केशर चन्दनन ता पर गध रचावते

देव शास्त्र गुरू वाणी १३७ दोहा ऐसे अनुपम मत्र को, मन वच काय सभार जे भवि पूजे प्रीति धर, हो भवदधि से पार || १ || यत्र स्थापना - चाल जोगीरासा है महिमा को थान शुद्धवर, यत्र कलिकुण्ड जानो । डाकिनि शाकिनी अगिनि चोर, भय नाशत सब दुख खानो ।। नव ग्रहो का सब दुख नाशो, रवि शनि आदि पिछानो । तिनका मैं स्थापन करहू, त्रिविध योग मन लानो ।। ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐ अर्ह कलिकुण्ड दण्ड श्री पार्श्वनाथ धरणेन्द्र पद्मावती सेवित अतुलवल-वीर्य-पराक्रम युक्त सर्वविघ्न-विनाशक,अत्र अवतर अवतर सवोपट आहानम् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम् । अथाष्टक छन्द त्रिभगी गगा को नीर अति ही शीर गध गहीर मेल सही । भर कचन झारी आनद धारी धार करो मन प्रीति लही । कलिकुण्ड सु यत्र पढ कर मत्र ध्यावत जे भवि जन ज्ञानी । सब विपति विनाश, सुख परकाशै, होवै मगल सुखदानी ।। ॐ हीं श्रीं क्लीं ऐ अर्ह कलिकुड दण्ड श्री पार्श्वनाथ धरणेन्द्र पद्मावती सेविताय अतुल बलवीर्यपराक्रमाय सर्व विघ्न विनाशनाय हम्ल्यूँ भल्यूँ रम्ल्यूं एल्यूं इम्ल्यूं ख्ल्यूं जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा 11911 क्षीरोदधि नन्दन मलया चदन, केशर और कर्पूर घसो । भर सुवरण कलशा मन अति हुलसा भय वा ताप का दुख नशो ।। कलिकुण्ड० || चदन ।।२।। नोट-प्रत्येक द्रव्य चढाते समय पूरा मत्र पढिए । शशि सम उजियारो तदुल प्यारो अणि इक सारो जुग लेवो । हो गध मनोहर रतन थार भर पुञ्ज सुकर मद तज देवो ।। || कलिकुण्ड० || अक्षत० ।।३।।

१३८ देव शास्त्र गुरू वाणी बहु फूल सुवास मधुकर राश करके आस आवत हैं । सुरतरु के लावो पुण्य बढावो काम व्यथा नश जावत हैं ।। ।। कलिकुण्ड० ।। पुष्प ।।४।। पकवान बनाए बहु घृत लाए खाड पगाये मिष्ट करे । मन आनन्द धारै मत्र उचारै क्षुधा रोग तत्काल टरे ।। ।। कलिकुण्ड० || नैवेद्य ।।५।। रतनन की जोत अति उद्योत तम क्षय होत ज्ञान बढे । अति हो सुख पावै पाप नशावै जो मन लावै पाठ पढे ।। || कलिकुण्ड० ।। दीप ।।६।। चदन कर्पूर अगर सुचूर लौंगादिक दश गध मिला । वर धूप बनाकर अगनि माहि धर, दुष्ट कर्म तत्काल जला ।। || कलिकुण्ड० || धूप ।७।। खजूर मगावो श्रीफल लावो दाख अनार बदाम खरे । पुगीफल प्यारे मन सुखकारे अन्तराय विधि दूर करे ।। || कलिकुण्ड० ।। फल ||८|| जल गध सुधारा तदुल प्यारा पुष्प चरू ले दीप भली । दश धूप सुरगी फल ले अभगी करो अर्घ उर हर्ष रली ।। || कलिकुण्ड० ।। अर्ध 116 || जयमाला सर्वज्ञ परम गुण सागर हैं, तिन पद के हरि सब चाकर हैं । सब विघ्न विनाशक सुखकर हैं, कलिकुड सुयत्र नमू वर हैं ।। नित ध्यान करें जो जन मन ला, वर पूज रचें कर यत्र भला ।।१।। सब विज० ।।२।। तिनके घर ऋद्धि अनेक भरें, मन वाछित कारज सर्व सरै । सब विघ्नः ||३|| सुर वदित हैं तिनके चरण, उर धर्म बढे अघ को हरण। । सब विघ्न० ॥४॥ .

देव शास्त्र गुरू वाणी
१३६
भय चोर अगानि जल साप मही, सब व्याधि नशै छिन मे जू सही।
सब विघ्न० ||५||
सब बन्ध खुलै छिन माहि लखो, अरि मित्र होय गुरु साच अखो।
सब विघ्न० ।।६।।
अतिसार सगहणी रोग नसे, बझा नारी लह पुत्र हँसै ।
सब विज० |७||
सब दूर अमगल होय जान, सुख सपत दिन दिन बढत मान ।
सव विघ्न० 111
इस यत्र की जे पूजा करत, सुर नर सुख लह हों मुकति कत ।।
सब विघ्न० ||
ॐ ही श्री क्ली ए अब कल्कुिण्डदण्ड श्रीपार्श्वनाथ धरणेन्द्र पदमावति-
सविताय अतुल-बलवीर्य-पराक्रमाय सर्व-विनाशनाय महाघ निर्व० स्वाहा ।
जाप्य मंत्र
ॐही श्री बली २ अ श्री पार्श्वशाय धरणेन्द्र पदमावती सेविताय ममेप्सित कार्य
कुरु कुरु स्वाहा ।
जयमाला
नागेन्द्र प्रभु के चरण नमते मुकुट प्रभा महा बढी ।
चढो पुण्य अपार सब दुख कार अघ प्रकृति घटी ।
ध्याये श्री कलिकुण्ड दण्ड प्रचण्ड पारसनाथ जी ।
तिनकी सुनो जयमाल भविजन कहूँ नवा के माथ जी ।।१।।
त्रोटक छन्द
विधि घाति हनो वर ज्ञान लहो, सब ही पदार्थ को भेद कहो ।
नित यत्र नमू कलिकुड सार, सब विघ्न विनाशन सुक्खकार ।।२।।
कुमती वसु मान विनाशत हैं, मुकती का मारग भाषत हैं ।
नित यत्र० ||३||
दुर्गति मारग का नाश करे, एकात मिथ्यात विवाद हरै ।
नित यत्र० ||४||

१४०
देव शास्त्र गुरू वाणी
निराकुल निर्मल शील धर निर्मल मुन्न लक्ष्मी का वर ।
नित यत्र० ||4||
नहीं क्रोध मान छल लाभ पाप अष्टादग दाप विमुन्त आप ।
नित यत्र० 111
हैं अजर अमर गुण के भडार सब विज विनाशक परम नार |
नित यत्र ||
नागेन्द्र नरेन्द्र सुरेन्द्र आय नमि हैं आनन्दित चित लाय ।
नित यत्र० 111
दिनेन्द्र मुनेन्द्र निशन्द्र आय पूजत नित मन न हर्ष धार ।
नित यत्र० ॥
घता छन्द
सब पाप निवारण सकट टारण, कलिकुण्ड पारस परचण्ड |
जग मे यश पाएँ, तपति आ लह मुकत जो सुख है अखड ।
प्रति दिन जो वन्दं मन आनन्द हो बलवन्त पाप सब दूर ।
सब विघ्न विनाश लहें सुखसपति दुष्टकर्म होवें चकचूर ।। अर्घ ।।
श्री पारस स्वामी अन्तर्यामी ध्यान लगायो वन माहीं ।
चर कमठ जु आयो क्रोध बढायो, परिपह कीनी अधिकाई ।
जिन मेरु समाना अचल महाना, लख नागेन्द्र ने पूज कियो ।
सुर फण मडप कीनी सुरवल हीनो हैं प्रभु को निज शीश नयो ।।
।। महाघ० ।।
सोरठा
पूजन ये सुखकार जे भवि करि हैं प्रीतिधर ।
विधि बलवत अपार, हन कर शिव सख को लहैं ।।
इत्याशीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत् ।
नोट-इस पूजा की तीन जाप हैं जो नीचे लिखी हैं-
-

देव शास्त्र गुरू वाणी १४१ (जाप्य मत्र १) ॐ श्री बली २ अर्ह कलिकुण्ड श्रीपार्श्वनाथ धरणेन्द्र पद्मावती-सहिताय अतुल- बलवीर्य-पराक्रमाय भगात्मपिया रक्ष रक्ष पर विद्या छिद छिद भिद भिद स्फ्रा सफ्री सा स्फो फरफट स्वाहा । (जाप्य मत्र २) ॐही क्ली आ श्रीपार्श्वनाथ धरणेन्द्र-पदमावती-सहिताय ममेप्सित कार्य कुरु कुरु स्वाला ।।२।। (जाप्य मत्र ३) ॐ श्री रली अहं कलिकुण्ड दण्ड-स्वामिन्नतुल-बलवीर्य-पराक्रमाय ममात्म- विद्या RE RE पर-विधा छिद छिद निद गिद स्फा स्फी स्फू रौं स्फ हू फट वारा 191 श्री पंच परमेष्ठी पूजन (राजमल पवैया भोपाल) अहंत सिद्ध आचार्य नमन, हे उपाध्याय हे साधु नमन । जय पच परम परमेष्ठी जय, भव सागर तारणहार नमन ।। मन वच काया पूर्वक करता हूँ, शुद्ध हृदय से आवाहन । मम हृदय विराजो तिष्ठ तिष्ठ, सन्निकट होहु मेरे भगवान ।। निज आत्म तत्त्व की प्राप्ति हेतु, ले अष्ट द्रव्य करता पूजन । तव चरणो के पूजन से प्रभु, निज सिद्ध रूप का हो दर्शन ।। ॐ ही श्री अरहत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु पच परमेष्ठिन । अत्र अवतर अवतर सवीपट । ॐ हरी श्री अरहत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु पच परमेष्ठिन् । अत्र तिष्ट तिष्ठ ठ ठ । ॐ ही अरहत -सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु पच परमेष्ठिन् । अत्र मग सन्निहितो भव भव वषट | मैं तो अनादि से रोगी हूँ, उपचार कराने आया हूँ । तुम सम उज्ज्वलता पाने को, उज्जवल जल भरकर लाया हूँ ।।

१४२ ॐही श्री. देव शास्त्र गुरु गाणी में जन्ग जरा मृत नाग करू एसी दो शक्ति छदय न्वामी । हे पच परम परमेष्टी प्रभु भव दुख गटा अन्तर्यामी ॥ पच परमधिमा जमरा युधिनाराना जत्म नि ग्दाहा। ससार ताप मे जत जल कर में। अगणित दुख पाए है । निज शान्त स्वभाव नहीं भाया पर कही गीत सुहाए हैं || शीतल चन्दन है भेट तुम् गगार ताप नाशा स्वामी । हे पच परम परमाढी प्रगु भव दुख मटा अन्तयामी ।। ॐही श्री पच परमष्टिगा गगामापवि. चदन रहा । दुख मय अथाह भवसागर में गरी यह गोका भटक रही । शुभ अशुभ भावकी भवरा म चतन्य शक्ति निज अटक रही ।। तदुल है धवल तुम्ह अर्पित उक्षयपद प्राप्त करू स्वामी । हे पच परम परमेष्टी प्रभु भव दुख मटो भव दुख मटो अन्तर्यामी ॥ ॐही श्री. पच परमप्टिम्या अक्षरापदप्राप्तय असतान० वाहा । नं काम व्यथा से घायल टूसुख का न मिली किचित् छाया । चरणो मे पुष्प चढाता हूँ, तुमको पाकर मन हर्षाया ।। - काम भाव विध्वस करू ऐसा दो शील हदय स्वामी । हे पच परम परमेष्टी प्रमु भव दुख मेटो भव दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ हीं श्री ..पचपरमेष्टिभ्यो कामवाणविघ्वसनाय पुष्प० नि स्वाहा । में क्षुधा रोग से व्याकुल हूँ, चारो गाति मे भरमाया हूँ । जग के सारे पदार्थ पाकर भी तृप्त नही हो पाया हूँ।। नैवेद्य समर्पित करता हूँ यह क्षुघा रोग मेटो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ ही श्री पच परमेष्ठिम्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य० नि. स्वाहा । मोहान्ध महा अज्ञानी मैं, निज आत्म स्वरूप न पहचाना । मिथ्या तम के कारण, निज आत्म स्वरूप न पहचाना ।। मैं दीप समर्पण करता हूँ, मोहान्धकार क्षय हो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुख मेटो अन्तर्यामी । ॐ ह्रीं श्री पच परमेष्ठितभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि. स्वाहा । कर्मो की ज्वाला धधक रही, ससार बढ़ रहा है प्रतिपल । सवर से आश्रव को रोकू, निर्जरा सुरभि महके पल पल ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी १४३ मैं धूप चढाकर अब आठो, कर्मो को हनन करूँ स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ही श्री. .... पच परमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप० नि. स्वाहा । निज आत्म तत्त्व का मनन करूँ, चितवन करू निज चेतन का । दो श्रद्धा ज्ञान चरित्र श्रेष्ठ, सच्चा पथ मोक्ष निकेतन का ।। उत्तम फल चरण चढाता हूँ , निर्वाण महाफल हो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुख मेटो अन्तर्यामी ॐ ही श्री....पच परमेष्ठिभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फल० नि. स्वाहा । जल चदन अक्षत पुष्प दीप नैवेद्य धूप फल लाया हूँ । अब तक के सचित कर्मो का, मैं पुज जलाने आया हूँ । । यह अर्घ समर्पित करता हूँ, अविचल अनर्घपद दो स्वामी । हे पच परम परमेष्ठी प्रभु, भव दुख मेटो अन्तर्यामी ।। ॐ हीं श्रीं .... पच परमेष्ठिभ्यो अर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा। जयमाला जय, वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, निज ध्यान लील गुणमय अपार । । अष्टादश दोष रहित जिनवर, अर्हत देव को नमस्कार ।। अविकल, अविकारी अविनाशी, लिजरूप निरजन निकाकार । जय अजर अमर हे मुक्तिकत, भगवत सिद्ध को नमस्कार || छत्तीस सुगुण से तुम मडित, निश्चय रत्नत्रय हृदय धार । हे मुक्तिवधू के अनुरागी, आचार्य सुगुरु को नमस्कार । एकादश अग पूर्व चौदह के, पाठी गुण पच्चीस धार । बाह्यान्तर मुनि मुद्रा महान्, श्री उपाध्याय को नमस्कार || व्रत समिति गुप्ति चारित्र धर्म वैराग्य भावना हृदय धार । हे द्रव्य भाव सयम मय मुनि वर सर्व साधु को नमस्कार ।। बहु पुण्य सयोग मिला नर तन जिनश्रुत जिनदेव चरण दर्शन । हो सम्यक् दर्शन प्राप्त मुझे, तो सफल बने मानव जीवन ।। निज पर का भेद जानकर मैं निज को ही निज मे लीन करू । अब भेद ज्ञान के द्वारा मैं, निज आत्म स्वय स्वाधीन करूँ ।। -निज मे रत्नत्रय धारण कर, निज परिणति को ही पहिचानें । पर परिणाति से हो विमुख सदा, निज ज्ञान तत्त्व को ही जानू ।। जब ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता विकल्प तज, शुक्ल ध्यान मैं ध्याऊँगा ।

१४४
देव शास्त्र गुरू वाणी
तब चार घातिया क्षय करके, अर्हत महापद पाऊँगा ॥
है निश्चित सिद्ध स्वपद मेरा, हे प्रभु कब इसको पाऊँगा ।
सम्यक् पूजा फल पाने को, अव निज स्वभाव में आऊँगा ।।
अपने स्वरूप को प्राप्ति हेतु हे प्रभु मेंने की है पूजन ।
तब तक चरणो मे ध्यान रहे, जव तक न प्राप्ति हो मुक्ति सदन ।।
ॐ ही श्री अर्हत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधु पच परमेष्ठिा अनर
यंपदप्रप्तये महाय निर्वपागीति स्वाहा ।
हे मगल रूप अमगल हर, मगलमय मगल गान करूँ ।
मगल मे प्रथम श्रेष्ठ मगल नवकार मत्र का ध्यान करूँ ।।
इत्यार्शीर्वाद पुष्पाजलि क्षिपेत्
श्री अजितनाथ पूजन
(छन्द अशोकपुष्पमजरी दडक तथा अर्धमजरी तथा अर्द्धनाराच)
त्याग द्वैजयन्त सार सार धर्म के अधार
जन्मधार धीर नग्र सुष्टु कौशलापुरी ।।
अष्ट दुष्ट नष्टकार मातु वैजयाकुमार ।
आयु पूर्व लक्ष दक्ष है बहत्तरै पुरी ।।
ते जिनेश श्री महेश शत्रु के निकन्दनेश ।
अत्र हेरिये सुदृष्टि भक्त पै कृपा पुरी ।।
आय तिष्ठ इष्ट देव मैं करो पदाब्जसेव ।
पर्म शर्मदाय पाय आय शर्न आपुरी ।।
ॐ ही श्रीअजितनाथ । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं श्रीअजितनाथ । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐहीं श्रीअजितनाथ। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट।
गगाहद पानी, निर्मल आनी, शौरभसानी सीतानी ।
तसु धारत धारा, तृषा निवारा, शांतागारा सुखदानी ।।
श्री अजितजिनेश, नुतनक्रेश, चक्रधरेश खग्गेश ।
मनवॉछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजो ख्याता जग्गेश ।
ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल. ।

देव शास्त्र गुरू वाणी १४५ शुचि चदन बावन, तापमिटावन, सौरभ पावन घसि ल्यायो । तुम भवतपभजन, हो शिवरजन, पूजा रजन मैं आयो ||श्री. ।। ॐ ही श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनम् नि. स्वाहा। सितखड विवर्जित, निशिपतितर्जित, पुञ्ज विधर्जित तदुल को । भवभावनिखर्जित शिवपदसर्जित, आनदभर्जित ददुल को ।।श्री.।। ॐ ही श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । मनमथमदमथन, धीरजग्रथन, ग्रथनिग्रथन ग्रन्थपति । तुअ पादकुशेसे, आदिकुशेसे, धारि अशेसे अर्चयति ||श्री.।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । आकुलकुलवारन, थिरताकारन, छुदाविदारन चरू लायो । षटरसकर भीने, अन्न नवीने, पूजन कीने सुख पायो ||श्री. ।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय चरूम नि. स्वाहा । दीपक मनिमाला, जोत उजाला, भरि कनथाला हाथ लिया । तुम भ्रमतमहारी, शिवसुखकारी, केवलधारी पूज किया ||श्री. ।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् नि. स्वाहा । अगरादिकचूरन, परिमलपूरन, खेवत क्रूरन कर्म जरैं । दशहूँदिशि धावत, हर्ष बढावत, अलिगुणगावत नृत्य करें ||श्री. ।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूपम् नि. स्वाहा । बादाम नरगी, श्रीफल पुगी, आदि अभगीसौं अरचौं । सबविघनविनाशै, सुखपरकाशै, आतम भासै भौ विरचौं ||श्री. ।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि. स्वाहा । जलफल सब सज्जै, बाजत बज्जै, गुनगनरज्जै मनमज्जै । तुअ पदजुगमज्जै सज्जन जज्जै, ते भव भज्जै निजकज्जै।।श्री.।। ॐ हीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । पंचकल्याणक (चौपाई) जेठ असित अमावशि सोहै, गर्भदिना नन्द सो मन मोहै । इन्द फनिन्द जजे मन लाई, हम पद पूजत अर्ध्य चढाई ।। ॐ हीं ज्येष्टकृष्णामावस्याया गर्भमगलप्राप्ताय श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्बपामीति स्वाहा ।

१४६
देव शास्त्र गुरू वाणी
माघ सुदी दशमी दिन जाये, त्रिभुवन मे अति हर्ष बढाये ।
इन्द फनिन्द जर्जे तित आई, हम तित सेवत हे हुलसाई ॥
ॐ हीं माघशुक्लदशमीदिने जन्ममगलमडिताय श्रीअजितनाथ-जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
माघसुदी नवमी तप धारा, भव तन भोग अनित्य विचारा ।
इन्द फनिन्द जजै तित आई, हम पद सेवत हैं सिर नाई ।।
ॐ हीं माघशुक्लनवमीदिने तपोमगलमडिताय श्रीअजितनाथ-जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पौषसुदि तिथि एकादशी सुहायो, त्रिभुवनभानु सुकेवल जायो ।
इन्द फनिन्द जर्जे तित आई, हम पद पूजत प्रीत लगाई ।
ॐ हीं पौषशुक्लएकादशीदिने ज्ञानमगलमडिताय श्रीअजितनाथ-जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पचमि चैतसुदी निरवाना, निज गुनराज लियो भगवाना ।
इन्द फनिन्द जसें तित आई, हम पद पूजत हैं गुन गाई. ।।
ॐ ही चैत्रशुक्लपचमीदिने निर्वाणमगलमडिताय श्रीअजितनाथ-जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
अष्ट दुष्ट को नष्ट करि, इष्ट मिष्ट निज पाय |
शिष्ट धर्म भाख्यो हमे, पुष्ट करो जिनराय ।।
(पद्धरी छन्द)
जय अजितदेव तुअ गुन अपार, पैं कहूँ कछुक लघुबुद्धि धार ।
दश जनमत अतिशय बल अनत, शुभ लच्छन मधुर वचन भनत ।।
सहनन प्रथम मलरहित देह, तन सौरभ शोणितस्वेत जेह , |
वपु स्वेद-बिना महरूप धार, समचतुर धरे सठान चार !
दश केवल, गमन आकाश देव, सुरभिच्छ रहे योजन सतेव ।
उपसर्गरहित जिन तन सु होय, सब जीव रहित बाधा सु जोय ।।

१४७ देव शास्त्र गुरू वाणी मुख चारि सरव विद्या अधीश, कवलाहार सुवर्जित गरीश । छाया चिनु नख फच बढे नाहि, उन्मेष टमक नहि ध्रुकुटी माहि ।। सुरकृत दश चार करो बखान, सब जीव मित्रताभाव जान । कटक विन दर्पणवत सुभूम, सब धान वृच्छ फल रहे झूम ।। पट रितु के फल फले निहार, दिशि निर्मल जिय आनद धार । जह शीतल मन्द सुगन्ध वाय, पदपकजतल पकज रचाय ।। मल रहित गान सुर जय उचार, वरपा गन्धोदक होत सार । वर धर्मचक्र आगे चलाय, वसु मगलजुत वह सुर रचाय ।। सिहासा छत्र चमर सुहात, भामडल छवि वरनी न जात । तरू उच्च अशोक स सुमन वृष्टि, धुनि दिव्य और दुन्दभि सुमिष्ट ।। दृग तान शर्म वीरज अनत, गुण छियालीस इम तुम लहत । इन आदि अनते सुगुन धार, वरनत गनपति नहि लहत पार ।। तव समवशरणमह इन्द्र आय. पद पूजत वसुविधि दरव लाय । अति गगति सहित नाटक रचाय, ताथेई थेई थेई पुनि रही छाय ।। पग नुपुर झननन झनननाय, तनननन तननन तान गाय । घनननन गन घटा घनाय, छम छम छम छम घुघरू बजाय ।। दृन दृम दृम दृम दृम मुरजध्वान, ससानदि सरगी सुर भरत तान । झट सट झट अटपट नटत नाट, इत्यादि रच्यो अदभुत सुठाट ।। पुनि वदि इन्द्र थुति नुति करत, तुम हो जग मे जयवत सत । फिर तुम विहार करि धर्मवृष्टि, सव जोग निरोध्यो परम इष्ट ।। सम्मेदथकी लिय मुकतिथान, जय सिद्धशिरोमन गुणनिधान । वृन्दावन वन्दत बार वार, भवसागरते मो तार तार || (छन्द घत्तानन्द) जय अजित कृपाला, गुनमणिमाला, सजमशाला बोधपती । वर सुजस उजाला, हीरहिमाला, ते अधिकाला स्वच्छ अती ।। ॐ ही श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय महार्य निर्वपामीति स्वाहा । (छन्द मदावलिप्तकपोल) जो जन अजित जिनेश जजै है मनवचकाई । ताको होय अनन्द ज्ञान सम्पति सुखदाई ।।

१४८
देव शास्त्र गुरू वाणी
पुत्र मित्र धनधान्य सुजस त्रिभुवनमह छावै ।
सकल शत्रु छय जाय अनुक्रमसो शिव पावै ।।
(पुष्पाजलिम् क्षिपेत्, इत्याशीर्वाद)
श्री संभवनाथ पूजन
(छन्द मदावलिप्तकपोल)
जय सभव जिनचन्द सदा हरिगन चकोरनुत ।
जयसेना जसु मातु जैति राजा जितारसुत ।।
तजि ग्रीवक लिये जन्म नगर सावत्री आई ।
सो भव भजनहेत भगत पर होहु सहाई ।।
ॐ ह्रीं श्रीसभवनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट |
ॐ ही श्रीसभवनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ ही श्रीसभवनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।
(छन्द चौबोला)
मुनिमनसम उज्वल जल लेकर कनक कटोरी मे धारा ।
जनम जरा मृतु नाशकरन कों तुम पदतर ढारो धारा ।।
समवजिनके चरन चरचते, सब आकुलता मिट जावै ।
निज निधि ज्ञान-दरश-सुख-वीरज, निराबाध भविजन पावै ।।
ॐ ही श्रीसभवनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ।
तपतदाह को कदन चदन, मलयागिरि को घसि लायो ।
जग वदन भौफदनखदन, समरथ लखि शरनै आयो ।सभवः ।।
ॐ हीं श्रीसभवनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा ।
देवजीर सुखदास कमल वासित, सित सुन्दर अनियारे ।
पुंज धरो इन चरनन आगे, लहो अखयपदकों प्यारे ||सभवः ।।
ॐ हीं श्रीसभवनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा ।
कमल केतकी बेल चमेली, चम्पा जूही सुमन वरा ।
तासो पूजत श्रीपति तुम पद, मदनबान विध्वस करा ||सभव.।।
ॐ हीं श्रीसभवनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी १४६ घेवर वावर मोदन मोदक, खाजा ताजा सरस बना । तासो पद श्रीपत को पूजत, छुधारोग ततकाल हना ||सभवः ।। ॐ हीं मीसमवनाधजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । घट पट परकाशक प्रगतमनाशक, तुम ढिग ऐसो दीप धरी । केवल जोत ज्दोत होउ मोकि यही सदा अरदास करो ||सभवः ।। ॐही पीसगनापजिन्द्राय मोहाधकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । अगर तगर कृसनागर, श्रीखडादिक चूर हुतासन मे । खेवत हो तुम चरनजलजदिग. कर्म छार जरि हैछनमे ।।सभव.।। सीपीसमवना जिनेन्द्राय अप्टकर्मविध्यसनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । श्रीफल लौंग बादाम छुहारा, एला पिस्ता दाख रमैं । लै फल प्राशुफ पूजो तुम पद, देहु अखयपद नाथ हमैं । सभवः ।। ॐहीभीसनवमाधाग्निन्द्राय गोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । जल चदन तन्दुलपुष्प चरू, दीप धूप फल अर्ध्य किया । तुनको अरपो भावभगतिधर, जै जै जै शिव रमनि पिया ||सभव.।। ॐ श्रीरामाजिोन्द्राय अनपदप्राप्तये अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द हसी मात्रा १५) माता गर्मविपं जिन आय, फागुनसित आउँ सुखदाय । सेयो सुरतिय छप्पन वृन्द, नानाविधि मैं जजो जिनन्द ।। ॐ ही फाल्गुनशुक्लाष्टम्ण गर्भमगल मण्डिताय श्रीसभवनाथ जिनेन्द्राय अध्य. । कार्तिक सित पूनम तिथि जान तीन ज्ञान जुत जनम प्रमान । धरि गिरिराज जजे सुरराज, तिन्हें मैं जजो निजहित काज ।। ॐ ही कार्तिकशुक्लपूर्णिमाया जन्ममगलमडिताय श्रीसभवनाथ जिनेन्द्राय अध्य.. मगसिर सित पून्यो तपधार, सकल सग तजि जिन अनगार । ध्यानादिक वल जीते कर्म, चर्चा चरन देहु शिवशर्म ।। ॐ ही मार्गशीर्षपूर्णिमाया तपोमगलमडिताय श्रीसभवनाथ जिनेन्द्राय अय. I 7 १५.० देव शास्त्र गुरु पाणी कार्तिक कलि तिथि चाथ महान घातियात लिय कवलज्ञान । समवशरनमह तिष्ठे देव तुरिय चिहन चर्चा वतुमेव ।। 32 ही कार्तिककृष्णचतु नागमस्तिार श्रीनवनाथ जिनदार अध्य. । चैन शुक्ल तिथि षष्ठी घोख गिर सन्दत लीना मोख | चार शतक धनु अवगाहना जजी वामपद थुतिकर घना ।। ॐ ही बनसुम्ल्पष्टया माल्तिार श्रीनानाथ निन्द्राय च | , जयमाला (दोहा) श्रीसभव के गुन अन कहि न सकत तुरराज । मैं वशभक्ति सुधीट है विनवो निज हितकाज || (मोतीयादाम छन्द) जिनेश महेश गुनेश गरिष्ट सुरासुर सेवित इष्ट वरिष्ट । धरे वृषचक्रकरे अघ चूर अतत्त्वघ्पातमनईन तूर ।। सुतत्त्व प्रकाशन शासन शुद्ध विवेक विराग बदावन बुद्ध । दयातरू-तर्पन मेघ महान कुनयगिरिगजन वनसनान ।। सुगर्भरू जन्नमहोत्सव माहि जगञ्जन आनदकद लहाहि । सुपूरब साठहि लच्छ जु आय, कुमार चतुर्थम अश रमाय ।। चवालिस लाख सुपूरब एव, निकटक राज कियो जिनदेव । तजे कछु कारन पाय सुराज धरे व्रत सजम आतमकाज || सुरेन्द्र नरेन्द्र दियो पयदान धरयो वन मे निजआतमध्यान । कियो चवघातिय कर्म विनाश लियो तब केवलज्ञान प्रकाश ।। मई समवस्रत ठाट अपार खिरै धुनि झेलहि श्री गनधार । भने षट द्रव्य तने बिसतार चहूँ अनुयोग अनेक प्रकार ।। कहे पुनि त्रेपन भाव विशेष उभै विधि हैं उपशम्य जु भेष । सुसम्यक चारित्र भेद स्वरूप अबै इमि छायक नौ सूअनूप ।। दृगौ बुधि सन्यग्चारित दान सुलभरू भोगुपभोग प्रमान । सुवीरज सजुत ए नव जान अठार छयोपशम इम प्रमान ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१५१
मति श्रुति औधि उमैविधि जान, मन परजै चखु और प्रमान ।
अचक्षु तथा विधि दान रू लाभ, सुभेगुपभोगरू वीरज साम ।।
व्रताव्रत सजम और सु धार, धरे गुन सम्यग्चारित भार ।
भये वसु एक समापत येह, इकीश उदीक सुनो अब जेह ।।
चहूं गति चारि कपाय तिवेद, छलेश्या और अज्ञान विभेद ।
असजम भाव लखो इस माहि, असिद्धित और अत्तत्त कहाहि ।।
गर्य इकबीस सुनो अव और. विभेद त्रिय पारिनामिक ठौर ।
सुजीवित भव्यत और अगव्व तरेपन एम भने जिन सब्ब ।।
तिन्हो मह तक त्यागन जोग, कितेक गहेरौं मिटै भवरोग ।
को इन आदि लहो फिर मोख, अनन्त गुनातम मण्डित चोख ।।
जजो तुम पाय जी गुन सार प्रभु हमको भवसागर तार ।
गही शरनागत दीन दयाल, विलब करो मति हे गुनमाल ||
(छन्द घत्तानन्द)
जे जे भवभञ्जन जनमनरञ्जन, दयाधुरन्धर कुमतिहारा ।
वृन्दावन वन्दत मन आनन्दित, दीजे आतमज्ञानवरा ।।
(छन्द अडिल्ल)
जो बाचें यह पाठ सरस समवतनो ।
सो पावै धनधान्य सरिस सम्पित घनो ।
सकल पाप छै जाय सुजस जग मे बढे ।
पूजत सुरपद होय अनुक्रम शिव चढे ।।
पुष्पांजलि क्षिपेत्, इत्याशीर्वाद
श्री अभिनन्दन पूजन
(छन्द मदाविलिप्तकपोल)
अभिनन्दन आनन्दकन्द, सिद्धारथ नन्दन
सवरपिता दिनन्द चन्द, जिहि आवत वन्दन ।।
नगर अजोध्या जनम इन्द नागिद जु ध्यावें ।
तिन्हें जजन के हेत थापि, हम मगल गावैं ।।

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देव शास्त्र गुरू वाणी १५३ आम निन् सदा फलादिक. पक्कपावन आनजी । मोक्षफलके हेत पूजो जोरिके जुगपानजी कलुष.।। ॐ श्रीअभिनन्दाणिोद्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । अष्टद्रव्य सवारि सुन्दर, सुजस गाय रसाल ही । नरत रचतजजो चरन जुग, नाय सुभाल ही कलुष.।। ॐ पीमिनन्दननिन्दिाय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । पंचकल्याणक (छन्द हरिपद) , शुकलछह वैशाख विषै तजि, आये श्रीजिनदेव । सिद्धारथमाता के उर मे करै शची शुचि सेव ।। रतनवृष्टि आदिक वर मगल होत अनेक प्रकार । ऐसे गुननिधिको मैं पूजो, ध्यावो बारम्बार । ॐ वैशाराशुक्लपष्ठम्या गर्गमगलगडिताय श्रीअभिनन्दन-जिनेन्द्राय अर्धग निर्वपामीति स्वाहा । माघशुक्ल तिथिद्वादशिके दिन, तीनलोक हितकार । अभिनन्दन आनन्दकन्द तुम. लीन्हो जग अवतार ।। एक महूरत नरकमाहिं हूँ, पायो सब जिन चैन । फनकवरन कपि चिन्ह धरनपद, जजो तुमैं दिन रैन ।। ॐही माघशुक्लद्वादश्या जन्गगगलगडिताय श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्राय अयं निर्वपामीति स्वाहा । साढे छत्तिसलाख सुपूरव राजभोग वर भोग । कछु कारन लखि माघशुक्ल, द्वादशिको धारयो जोग ।। पष्टम नेम समाप्त कर लिय, इद्रदत्तघर छीर । जयधुनि पुष्परत्नगन्धोदक, वृष्टि सुगन्ध समीर || ॐ हीं माघशुक्लद्वादश्या तपोमगलमडिताय श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्राय अयं निर्वपागीति स्वाहा । पौषशुक्ल चोदशिको घाते घातिकरम दुखदाय । उपजाये वरवोध जासको केवल नाम कहाय ।। समवसरनलहि बोधिधरम कहि, भव्यजीवसुखकन्द ।

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१५४
देव शास्त्र गुरु वाणी
माका भवसागरते तारा जय जय जय अभिनन्द ।।
ॐ हीं पोषशुक्लचतुदश्या तानमगलमडिताय श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जोगनिरोध अघातिघाति लहि गिरसम्मेदतें माख
मास सकल सुखरास कहे वशाखशुक्ल छठ चोख ।।
चतुरनिकाय आय तित कीन्हा भगत भाव उमगाय ।
हम पूजें इत अरघ लेय जिमि विघन सघन मिटजाय ।।
ॐ ही वैशाखशुक्लषष्ठम्या माक्षमगलमडिताय श्रीअभिनन्दनजिनन्द्राय
अध्र्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
तुंग सुतन धनु तीन सो, ओपचास सुखधाम ।
कनकवरन अवलोकिकैं, पुनि-पुनि करूँ प्रणाम ।।
(छन्द लक्ष्मीधरा)
सच्चिदानन्द सदज्ञान सद्दर्शनी, सत्स्वरूपा लई सत्सुधासर्सनी ।
सर्वआनन्दकन्दा महादेवता, जास पादाब्ज सेवे सर्फे देवता ।।
गर्भ और जन्म नि कर्मकल्यान मे, सत्व को शर्म पूरै थान म ।
वशइक्ष्वाकु मे आपु ऐसे भये, ज्यो निशाशर्दमे इन्दु स्वेच्छे ठये ।।
(छन्द लक्ष्मीवती)
होत वैराग लौकातसुर बोधियो,
फेरि शिविकासु चढि गहन निजसोधियो ।
घाति चौधातिया ज्ञानकेवल भयो,
समवसरनादि धनदेव तब निरमयो ।।
एक हैं इन्द्रनीली शिला रत्न की,
गोल गाढे दशे जोजने जन की ।
चार दिश पैंडिका बीस हज्जार है,
रत्न के चूरका कोट निरधार है ।।

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१५६
देव शास्त्र गुरू
वाणी
तासपै है सुसि घासन भासन,
जासपै है पद्म प्राफुल्ल है आसन ।
तासु पै अन्तरीक्ष विराजै सही
तीन छत्रे फिरे शीस रत्नै यही ।।
वृक्ष शो कापहारी अशोक लसै,
दुन्दभी नाद औ पुष्प खते खसै ।
देह की ज्योति सो मडलाकार है,
सात भौ भव्य तामे लखै सार है ।।
दिव्यवानी खिरै सर्व श का हरै,
श्री गनाधीश झेलैं सुशक्ति धरै ।
धर्मचक्री तुम ही कर्मवक्री हने,
सर्वशक्री नमै मोद धारै घने ।।
भव्य को बोधि सम्मेदतै श्यौ गये,
तत्र इन्द्रादि पूजे सुभक्तीमये ।
हे कृपासिधु मोपै कृपा धारिये,
घोर ससारसो शीघ्र मो तारिये ।।
(छन्द घत्तानन्द)
जै जै अभिनन्दा आनन्दकन्दा, भवसमुद्र बोर पोत इवा ।
भ्रमतमशतखण्डा भानुप्रचण्डा, तारि तारि जग रैनदिवा ।।
ॐ ही श्री अभिनन्दनजिनेन्द्राय पूर्णायं निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द कवित्त)
श्री अभिनन्दन पापनिकन्दन, तिन पद जोभवि जजै सुधार ।
ताके पुन्नभानु वर उग्गै, दुरित तिमिर फाटै दुखकार ।।
पुत्र मित्र धन धान्य कमल यह, विकसै सुखद जगतहित प्यार ।
कछुक काल मे सो शिव पावै, पढ़ें सुने जिन जजै निहार ।
पुष्पाजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।

। देव शास्त्र गुरू वाणी १५७ श्री सुमतिनाथ पूजन (कवित्त रूपक मात्रा ३१) सजमरतन विभूषण भूषित, दूषन दूषन श्री जिनचन्द । सुमतिरमारजन भवभञ्जन, सजयत तजि मेरूनरिन्द || मातु मङ्गला सकल मगला, नगर विनीता जये अमन्द | सो प्रभु दयासुधारस गर्भित, आय तिष्ठ इत हरि दुखदन्द ।। ॐ हीं सुमतिनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट् । ॐ हीं सुमतिनाथजिनेन्द्र । तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् । ॐ हीं सुमतिनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । (छन्द कवित्त तथा कुसुमलता) पञ्चमउदधि तनो सम उज्ज्वज, जल लीनो वरगध मिलाय । कनककटोरी माँहिं धारि करि, धार देहुँ सुचि मन वच काय ।। हरिहर वदित पापनिकदित, सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय तुम पदपद्म सद्मशिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय ।। ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । मलयागर धनसार घसौं वर, केशर अर करपूर मिलाय । भवतपरहन चरन पर धारो, जनम जरा मृत ताप पलाय ||हरि.।। ॐ ही श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा । शशि सम उज्ज्वल सहित गन्ध तल, दोनो अनी शुद्ध सुखदाय । सो ले अखय सम्पदाकारन, पुञ्ज धरो तुम चरनन पास ||हरि.।। ॐ ही श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत निर्वपामीति स्वाहा । कमल केतकी बेल चमेली, करना अरू गुलाब महकाय सो लै समरशूल छयकारन, जजो चरन अति प्रीत लगाय ||हरि. ।। ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । नव्य गव्य पकवान बनाऊँ, सुरस देशि दृगमन ललचाय सो लै क्षुधारोग छयकारन, धरो चरन ढिग मन हरषाय ।। हरिहर वन्दित - पापनिकन्दित, सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय तुम पदपद्म सद्मशिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय || ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यम् नि. स्वाहा । , १५८ देव शास्त्र गुरू वागी रतनजडित अथवा घृतपूरित, वा कपरमय जोति जगाय । दीप धरो तुम चरनन आगे, जातं केवलज्ञान लहाय हरि.।। ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय माहान्धकारविनाशनाय दीपम नि. स्वाहा । अगर तगर कृष्णागर चन्दन, चूरि अगनि मे दत जराय । अष्ट करम ये दुष्ट जरतु हैं, धून धूम यह तात् उडाय ।।हरि.11 ॐ ही श्री नुमतिनाथजिनन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूपम नि. स्वाहा । श्रीफल मातुलिग वर दाडिम, आम निम्बू फल प्रासुक लाय । मोक्ष महाफल चाख्न कारन पूजत हों तुमरे जुग पाय |हरि.|| ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनन्द्राय मोक्षफल्याप्तये फल्म नि. स्वाहा । जल चदन तन्दुल प्रसून चरू, दीप धूप फल सकल मिलाय । नाचि राचि शिरनाय सम्रचो जय जय जय जयजिनराय हरि.।। ॐ हीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । पंचकल्याणक (रूप गपाई) सजयत तजि गरम पधारे सावनसेत दुतिय सुखकारे । रहे अलिप्त मुळुर जिनि छाया, जजो चरन जय जय जिनराया ।। ॐ ही श्रावणशुक्ल्द्वितीयाया गर्ममगलमण्डिताय श्री सुमतिनाथजिनन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । वैसाख नौमी कह जानों, जनमे सुमति सहित त्रयज्ञानों । मानो धरयो धरम अवतारा, जजो चरन जुग अष्टप्रकारा ।। ॐ हीं चैत्रशुक्लैकादश्या जन्नमगलमण्डिताय श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । चत सुकल ग्यारसतिथिमाखा तादिन तप धरि निजरस चाखा । पारन पद्मसदन पय कीना जजत चरन हम समता मीना । । ॐ हीं चैत्रशुक्लंकादश्या तपोमगलमण्डिताय श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सुकल चेत एकादशि हाने, घाति सकल जे जुगपति जाने । समवसरनमह कहि दृषसार जजहुँ अनन्त चतुष्टयधार !! ॐ हीं चैत्रशुक्लैकादश्या ज्ञानमगल्मडिताय श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अध्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
૧૬
चेत सुकल ग्यारस निरवान, गिरि समेदते त्रिभुवन मान ।
गुनअनन्त निज निरमलधारी, जजो देव सुधि लेहु हमारी ।।
ॐ हीं चेत्रशुक्लेकादश्या मोक्षमगलमण्डिताय श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
सुमति तीनसौ छत्तिसो, सुमतिभेद दरसाय
सुमति देहु विनती करो, सुमति विलम्ब कराय ।।
दयाबेलि तह सगुननिधि, भवि-कमोद-गण-चन्द
सुमतिसतीपति सुमति को, ध्यावो धरि आनन्द ।।
पञ्च परावरतन हरन, पञ्चसुमति सित दैन ।
पञ्च लब्धिदातार के, गुन गाऊँ दिन रैन ।।
(छन्द भुजङ्गप्रयात)
पिता मेघराजा सबै सिद्धकाजा,
जमैं नाम जाको सबै दुख भाजा ।
महासूर इक्ष्वाकवशी विराजै,
गुणग्राम जाको सबै ठौर छाजै ।।
तिन्हो के महापुण्यसौं आप जाये,
तिहुँलोक मे जीव आनन्द पाये ।
सुनासीर ताही धारी मेरू धायो,
क्रिया जन्म की सर्व कीनी यथा यो ।।
बहुरि ताको सौंपि सङ्गीत कीनो,
नमे हाथ जोर भली भक्ति भीनों ।
बिताई दशै लाख ही पूर्व वाले,
प्रजा लाख उन्तीस ही पूर्व पाले ।।
कछू हेतु तैं भावना बार भाये,
तहाँ ब्रह्म लौकाँतके देव आये ।
गये बोधि ताही समै इन्द्र आयो,

૧૬૦ देव शास्त्र गुरू वाणी धरै पालकी मे सू उद्यान ल्यायो ।। नमे सिद्धि को केश लोचे सबै ही, धरयो ध्यान शुद्ध जु घाती हने ही । लयो केवल औ समौसर्न साज, गणधीश जु एक सौसोल राज ।। खिरै शब्द तामैं छहो द्रव्य धारे, गुनौपर्जउत्पादव्यय ध्रौव्य सारे । तथा कर्म आठो तनी थित्ति गाज, मिलै जासुके नाशते मोक्षराज ।। धरै मोहिनी सत्तर कोडकोडी, सरित्पत्प्रमाण तिथि दीर्घ जोडी । अवर्ज्ञानदृग्वेदनी अन्तराय, धरै तीस कोडाकुडी सिधुकाय ।। तथानामगोत कुडाकोडि बीस, समुद्रप्रमाण धरे सत्तईस । सु तैंतीस अब्धि धर आयु अब्धि, कह सर्व कर्मो तनी वृद्धलब्धि ।। जघन्य प्रकारे धरे भेद ये ही, मुहूर्तं वसू नामगोत गने ही । तथाज्ञानदृग्मोह प्रत्यूह आय, सुअन्तमुहूर्त धरै थित्ति गाय ।। तथा वेदनी बारहे ही मुहुर्त, धरै थित्त ऐसे भन्यो न्यायजुत्त । इन्हैं आदि तत्त्वार्थ भाख्यो अशेसा, लह्यो फेरि निर्वानमाही प्रवेसा ।। अनन्त महन्त सुसन्त सुतन्त, समन्द अफन्द अनन्द अभन्त । अलक्ष विलक्ष सुलक्ष सुदक्ष, अनक्ष अवक्ष अभक्ष अतक्ष ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१६१
अवर्ण अघर्ण अकर्ण,
अभर्णं अतर्ण अशण सुशर्ण ।
अनेक सदेक चिदेक विवेक,
अखण्ड सुमण्ड प्रचण्ड तदेक ।।
सुपर्म सुधर्म सुशर्म अकर्म,
अनन्त गुनाराम जैनत धर्मं ।
नमै दास 'वृन्दावन' शर्न आई,
सबै दुखते मोहि लीजै छुडाई ।।
(छन्द घत्तानन्द)
तुव सुगुन अनन्ता, ध्यावत सन्ता, भ्रमतम-भजनमार्तंडा ।
सतमतकरचण्डा, भवि-कज मण्डा, कुमति कुबल इन गन हण्डा ।।
ॐ हीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द रोडक)
सुमति-चरन जो जजैं, भविकजन मनवचकाई ।
तासु सकल दुखदन्दफन्द, ततछिन छय जाई ।।
पुत्र मित्र धन धान्य, शर्म अद्भुत सो पावैं ।
'वृन्दावन' निर्वान लहै, जो निहचै ध्यावै
पुष्पाजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
श्री सुपार्श्वनाथ पूजन
(हरिगीता तथा गीता)
जय जय जिनिन्द गनिन्द इन्द, नरिंद गुन चितन करें ।
तन हरीहरमनसम हरत मन, लखत उर आनन्द भरें ।।
नृत सुपरतिष्ठ वरिष्ठ इष्ट, महिष्ट शिष्ट पृथी प्रिया ।
तिन नन्दके पद वद वृन्द, अमन्द थापत जुतक्रिया ।।
ॐ हीं सुपार्श्वनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं सुपार्श्वनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं सुपार्श्वनाथजिनेन्द्र । अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट ।

१६२ टव शास्त्र गुरू वाणी तुम पद पृजा गावचकाय देव सुपारस शिवपुरराय । दयानिधि हो जग जगवन्धु दयानिधिध हो ।।टेक।। उज्ज्वल जल शुचि गन्ध मिलाय कचनझारी भर कर लाय । दयानिधि हो जय जगध दयानिधि हो तुम.।। ॐही श्री सपाता जिादाय जगजगत्यविनागनाय ज्लग. । मलयागरचन्दन घसि कर मार लीना भवतपभजनहार । दयानिधि हो जय जगवन्धु दयानिधि हो ।।तुम.!! ॐ ही श्री सुपा जिान्द्राय भसारतापविनाशनाय चन्दनम नि. स्वाहा । देवजीर सुखदास अखण्ड उज्ज्वल जलछालित सित मण्ड | दयानिधि हा जय जगवन्धु दयानिधि हो ।।तुम.।। ॐ ही श्री सुपाश्वनाथजनन्द्राय अक्षयपदप्राप्तय अक्षतम् नि. स्वाहा । प्रासुक सुमा सुगन्धितसार गुञ्जत अलि मकरध्वजहार । दयानिधि हो जय जगबन्धु दयानिधि हो ||तुम.।। ॐ ही श्री सुणर्श्वनाथजिन्द्राय कागवाणविध्वसनाय पुष्प नि स्वाहा । छुधाहरन नेवज वर लाय, हरो वेदनी तुम्हे चढाय । दया।नधि हो, जय जगबन्धु दयानिधि हो ।।तुम.।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवेद्य नि. स्वाहा । ज्वलित दीप भरकरि नवनीत तुम ढिग धारतु हो जगमीत । दयानिधि हो जय जगबन्धु दयानिधि हो तुम.।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनेद्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप. । दशविधि गन्ध हुताशनमाहि, खेवत कू करम जरि जाहि । दयानिधि हो जय जगबन्धु दयानिधि हो तुम.।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूप नि. स्वाहा । श्रीफल केला आदि अनूप, लै तुम अग्र धरो शिवभूप । दयानिधि हो, ज्य जगबन्धु दयानिधि हो ||तुम.।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षप्राप्तये फल नि. स्वाहा । आठो दरव सजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढाय । दयानिधि हो, जय जगबन्धु दयानिधि हो ।।तुम.।। ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । -

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१६६
देव शास्त्र गरू वाणी
बालवय रून लहि राजसख भागियो ।
भोग तल जाग गहि चार आरिको हने
धारि कवल परम धरम दुइविधि गर्ने ।।१६।।
नाशि-अरि-शण शिवनाथवासी गय,
ज्ञान-दुर्ग-शर्म-वीरज अनन्ते लये ।
सो जगतराज यह अरज उर धारियो,
धरम के नन्द को भवउदधि तारियो ।।१७।।
(छन्द घत्तानन्द)
जय करूनाधारी शिवहितकारी, तारन तरन जिहाजा हो ।
सेवक नित वदै मन आनन्दे भव भय मेटनकाजा हो ||१८||
ॐ ही श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय महाऽयं निर्वपामीति स्वाहा
(दोहा)
श्री सुपार्श्वपदजुगल जो, जजै पढे यह पाठ ।
अनुमोदे सो चतुर नर, पावै आनन्द ठाठ 11१६ ।।
पुष्पाञ्जलिम क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
श्री चन्द्रप्रभु पूजन
(छप्पय)
चारूचरन आचरन, चरन चितहरनचिहनचर,
चन्दचन्दतनचरित, चदथल चहत चतुर नर ।
चतुक चन्डचक चूरि, चारि चिदचक्र गुनाकर,
चचल चलितसुरेश, चूलनुत चक्र धनुरहर ।।
चरअचरहितू तारनतरन, सुनत चहकि चिरनद शुचि ।
जिनचदचरन चरच्यो चहत, चितचकोर नचि रचि रूचि ।।
(दोहा)
धनुष डेढसो तुड्ग तन, महासेन नृपनन्द ।
मातु लछमना उर जये, थापो चन्दजिनद ॥

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१६५ देव सास्त्र गुरू वाणी सजि आठो दरव पुनीत, आठा अग नमो । पूजो अष्टम जिन मीत, अप्टअवनी गमा ||श्री. || ॐ हीं श्रीच द्रप्रभुजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । पञ्चकल्याणक कलि पञ्चमचैत सुहात अली गरमागम मगल मोद भली । हरि हर्पित पूजत मातु पिता, हम ध्यावत पावत शर्मसिता ।। ॐ ही चैत्रकृष्णपञ्चम्या गर्भगगलप्राप्ताय श्री चन्द्रप्रभुजिनन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । कलि पौष इकादशि जन्म लयो तव लोकविष सुख थोक भयो। सुरईश जजे गिरशीश तवै, हम पूजत हैं नुतशीस अवै ।। ॐ ही पोषकृष्णेकादश्या जन्ममगलप्राप्ताय श्री चन्द्रप्रमुजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । तप दुद्धर श्रीधर आप धरा, कलि पोष अग्यारसि पर्व वरा । निज ध्यानविर्षे लवलीन भये, धनि सो दिन पूजत विघ्न गये ।। ॐ ही पौषकृष्णैकादश्या तपकल्याणकप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभुजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । वर केवलभानु उद्योत कियो, तिहुँ लोक तणो भ्रम मेट दियो । कलि फाल्गुनसप्तमी इन्द्र जजे, हम पूजहि सर्व कलक भजे ।। ॐ हीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्या केवलज्ञानप्राप्ताय श्री चन्द्रप्रमुजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । असित फाल्गुण सप्तमि मुक्त गये, गुणवन्त अनन्त अबोध भये। हरि आय जजे तित मोद धरे, हम पूजत ही सब पाप हरे !! ॐ हीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्या मोक्षमगलप्राप्ताय श्री चन्द्रप्रमुजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जयमाला (दोहा) हे मृगाकअड्कित चरण, तुम गुण अगम अपार | गणधरसे नहि पार लहि, तौ को वरनत सार || पै तुम भगति हिंये मम, प्रेरै अति उमगाय । ताते गाऊँ सुगुण तुम, तुम ही होउ सहाय ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ૧૬૬ (पद्धरि छन्द) जय चन्द्र जिनेन्द्र दयानिधान, भवकागन हानन देवप्रमान । जय गरम जनम मगल दिनन्द, भवि जीवविकाशन शर्मकन्द ।। दशलक्ष पूर्वकी आयु पाय, मनवाछित सुख भोगे जिनाय । लखि कारण है जगतै उदास, चिन्त्या अनुप्रेक्षा सुखनिवास ।। तित लौकाँतिक बोध्यो नियोग, हरि शिविका सजि धारियो अभोग । तापै तुम चढि जिन चन्दराय, ता छिनकी शोभा को कहाय ।। जिन अग सेत सित चमर ढार, सित छत्र शीस गलगुलकहार । सित रतन जडित भूषण विचित्र, सित चन्द्रचरण चरचैं पवित्र ।। सित तन द्युति नाकाधीश आप, सित शिवका काधे धरि सुचाप । सित सुजस सुरेश नरेश सर्व, सित चित मे चिन्तन जात पर्व ।। सित चन्दनगर” निकसि नाथ, सित बन मे पहुचे सकल साथ । सित सिला शिरोमणि स्वच्छ छाह, सित ता तित धारयो तुम जिनाह।। सित पय को पारण परमसार, सित चन्द्रदत्त दीनो उदार । सित कर मे सो पयधार देत, मानो बाँधत भवसिधु सेत ।। मानो सुपुण्यधारा प्रतच्छ, तित अचरज पनसुर किय ततच्छ । फिर जाय गहन सित तप करत, सित केवलज्योति जग्यो अनत ।। लहि समवसरण रचना महान, जाके देखत सब पापहान । जहं तरू अशोक शौभै उत्तड्ग, सब शोकतनो चूरै प्रसग ।। सुर सुमनवृष्टि नमतें सुहात, मनु मन्मथ तज हथियार जात । बानी जिन मुखसो खिरत सार, मन तत्त्वप्रकाशन मुकुरधार ।। जहें चौसठ चमर अमर दुरत, मनु सुजसमेघ झरि लगिय तन्त । सिहासन है जहें कमलजुक्त, मनु शिवसरवर को कमलशुक्त ।। दुदमि जित बाजत मधुर सार, मनु करमजीत को है नागर । सिर छत्र फिरें त्रय श्वेतवर्ण, मनु रतन तीन त्रयताप हर्ण ।। तन प्रभातनो मण्डल सुहात, भवि देखत निज भव सात सात । मनु दर्पणद्युति यह जगमगाय, भविजन भव सुख देखत सुआय || इत्यादि विभूति अनेक जान, बाहिज दीसत महिमा महान । ताको वरणत नहि लहत पार, तौ अन्तरग को कहै सार ।।

१७० देव शास्त्र गुरु पाणी अनअन्त गुण निजुत करि विहार धरमापदश द भव्य तार | फिर जोगनिरोधि अघाति हान मम्मदथकी लिय मुकतियान ।। वृन्दावन वन्दत शीश नाय तुम जानत हा मम उर जु माय । तातें का कही सु बार-बार मनवाछित कारज सार-सार || (छन्द घत्तानन्द) जय चन्द जिनदा आनदकदा भवमय भजन राजे हैं । रागादिक द्वन्दा हरि सब फन्दा मुकतिमाहि थिति साजै हैं ।। ॐ ही श्री चन्द्रप्रभुजिनेन्द्राय महाग्रं निवपागीति स्वाहा । (छन्द चावोला) आठो दरव मिलाय गाय गुण, जो भविजन जिनचन्द जजे । ताके भवभव के अघ भाजे, मुक्त सारसुख ताहि सज॑ ।। जमके त्रास मिट सब ताके, सकल अमडगल दूर भजे । 'वृन्दावन' ऐसो लखि पूजत, जाते शिवपुर राज रजै ।। पुष्पाजलि क्षिपेत् इत्याशीर्वाद श्री पुष्पदन्त पूजन छन्द मदावलिप्तकपोल (रोडक) पुष्पदन्त भगवन्त सन्त सुजपत तन्त गुन महिमावन्त महत कन्त शिवतियरमन्त मुन । कालन्दीपुर जनम पिता सुग्रीव रमासुत. वरत मनहरन तुम्है थापो त्रिवारनुत । ॐ अथदन्तन्निन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट । .. | पुष्पदन्तजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ - पुष्पदन्तजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट । (चाल होली की, ताल जत्त) मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदन्त जिनराय ।।टेक ।। हिमगिरिगत गगाजल भर, कचनभृग भराय ।

१७१ देव शास्त्र गुरू वाणी करम कलक निवारनकारन, जजो तुम्हारे पाय | मेरी.!! ॐ हीं भी पुष्पदतजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । बावन चन्दन कदलीनन्दन, कुकुम सग घसाय चरचों चरन हरन मिथ्यातप, वीतराग गुणगाय ।मेरी.|| ॐ हीं श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदनम् नि. स्वाहा । शालि अखण्डित सौरभमण्डित, शशिसम द्युति दमकाय । ताको पुज धरो चरननदिग, देहु अखयपदराय ।।मेरी ।। ॐ हीं श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । सुमन सुमनसम परिमलमडित. गुजत अलिगनआय । ब्रह्मपुत्रमदमंजन कारन, जजो तुम्हारे पाय ।।मेरी.।। ॐ ही श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । घेवर बावर फेनी गोझा, मोदन मोदक लाय छुधावेदनी रोगहरनको, भेट धरो गुण गाय ||मेरी.।। ॐ हीं श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । वाति कपूर दीप कचनमय, उज्ज्वल ज्योति जगाय । तिमिर मोहनाशक तुमको लखि, धरो निकट उमगाय । मेरी।। ॐ ही श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । दशवर गन्ध धनजय के सग, खेवत हौं गुन गाय । अष्टकर्म ये दुष्ट जरै सो, धूम धूम सु उडाय ।मिरी.।। ॐ श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय अप्टकर्मविध्वसनाय धूप नि. स्वाहा । श्रीफल पूगी और शुचिर भट, दाडिम आम मगाय । तासों तुम पदपदम जजतहो, तिघनसघन मिट जाय | मेरी.|| ॐ ही श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय गोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । जल फल सकल मिलाय मनोहर मनवचतन हुलसाय । तुम पदपूजौं प्रीति लायके जय जय त्रिभुवनराय ।।मेरी।। ॐ ही श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अय निर्वपानीति स्वाहा । . पञ्चकल्याणक (छन्द स्वयम्भू) नवमी तिथिकारी फागुन धारी, गरम माहि थिति देवा जी । तजि आरण थान कृपानिधान, करत सचि तित सेवाजी ।।

१७२ देव शार। गुरु वाणी रतनन की धारा परम पहारा परी मामले भाग जी । में पूजों घ्यावी गगत बहानी को गालि गव पाग जी ।। ॐ । फागुणमा गमfr, 12 श्री एनागिन्दाग अपामीति वा । मगसिर सितपच्छ परिवा गरम जना तीरथगाथा जी । तर हो निरजर येवा आय नग निज माथा जी ॥ सुरगिर वाये मगल गाणे जे प्रीति लगाई जी । में पूजा ध्यावा गगत बढावा निजगचित्त सहाई जी ।। ॐ मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाया गगगगणिताय श्री पुपदनाजिन्द्राय अपामीति रवाहा । सित गगसिर मासा तिथि सुखरासा. एकगके दिन धारा जी । तप आतमतानी आकुलतानी गौर सहित अवकाराजी ।। सुरमित्र सुदानी के घर आनी गो-पय पारन कीना है । तिनको में बन्दी पापनिकन्दों जो समतारन गीना है । ॐ मार्गशीर्षशुक्लप्रतिपदाया तपागगलगजिताय श्री पुष्पदनाजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति रवाहा । सित कार्तिक गाए दोइज धाये धाति करम परचण्डा जी । केवल परकाशे ग्रमतमनाशे सकलसार सुखमण्डाजी ।। गनराज अठासी आनन्दमासी समवसरण वृषदाताजी । हरि पूजन आयो शीश नमाओ, हम पूर्जे जगत्राताजी ।। ॐ हीं कार्तिकशुक्लद्वितीयाया ज्ञानगगलगण्डिताय श्री पुष्पदन्तजिनेन्द्राय अय निर्वपामीति स्वाहा । भादव सित सारा आठं धारा गिरिसम्मेद निरवाना जी । गुन अष्ट प्रकारा अनुपमधारा, जै जै कृपानिधाना जी ।। आयो पूज रचायो चिन्ह तहाँ कर दीना जी । मैं पूजत हो गुन धरत महीसो, तुमरे रस मे भीना जी ।। ॐ हीं भादवशुक्लअष्टम्या मोक्षमगलमण्डिताय श्री पुष्पदन्तजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । तित इन्द्र सु

. १७३
देव शास्त्र गुरू वाणी
जयमाला
(दोहा)
लच्छन मकर सुश्वेत तन, तुग धनुष शतएक ।
सुर नर वन्दित मुकतपति, नमो तुम्हे शिर टेक ||
पुहुपरदन गुनवदन जिम, सागर तोय समान
क्योकर कर अजुलिनकर, करिये तासु प्रमान ॥
(छन्द तामरस)
पुष्पदन्त जयवत नमस्ते, पुण्य तीर्थकर सत नमस्ते ।
ज्ञान ध्यान अमलान नमस्ते, चिद्विलास सुख ज्ञान नमस्ते ।।
भवमय भंजन देव नमस्ते, मुनिगनकृतपद सेव नमस्ते ।
मिथ्यानिशिदिन इन्द्र नमस्ते, ज्ञानपयोदधि चन्द्र नमस्ते ॥
भव-दुख-तरू-नि कन्द नमस्ते. रागदोष-मद-दहन नमस्ते ।
विश्वेश्वर गुनगूर नमस्ते, धर्म सुधारसपूर नमस्ते ।।
केवल ब्रह्मप्रकाश नमस्ते, सकल चराचरमास नमस्ते ।
विघ्नमहीधर विज्जु नमस्ते, जय ऊरधगति रिज्जु नमस्ते ।।
जय मकरा कृतपाद नमस्ते, मकरध्वजमदवाद नमस्ते ।
कर्म-भर्म परिहार नमस्ते, जय जय अधम अधार नमस्ते ।।
दयाधुरन्धर धीर नमस्ते, जय जय गुनगम्भीर नमस्ते ।
मुक्तिरमनिपति वीर नमस्ते, हरता भवमयपीर नमस्ते ॥
व्यय उतपति थितिधार नमस्ते, निज आधार अविकार नमस्ते ।
भव्य भवोदधितार नमस्ते, वृन्दावन' निसतार नमस्ते ॥
(छन्द घत्तानन्द)
जय जय जिनदेव हरिकृतसेव, परम धरमधन धारी जी ।
मैं पूजी ध्यावौं गुनगन गावौं, मेटो विथा हमारी जी ।।
ॐ हीं श्री पुष्पदतजिनेन्द्राय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(छद मदावलिप्त कपोल)
पुहुपदतपद सन्त जजै जो मनवचकाई ।
नाचे गावै भगति कर, शुभ परनति लाई ।।

१७४
देव शास्त्र गुरू वाणी
सौ पावै सुख सर्व इन्द्र अहमिन्द्र तनो वर ।
अनुक्रमतें निरवान लहे लिह, प्रमोट घर
(पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् इत्याशीर्वाद)
श्री शीतलनाथ पूजन
शीतलनाथ नमो धरि हाथ, सुमाथ जिन्हों भवगाथ मिटाये ।
अच्युतते च्युतमात सुनन्द के, नन्द भये पुरभद्दल आये ||
वंश इख्वाक कियो जिन भूषित, भव्यनको भव पार लगाये ।
ऐसे कृपानिधि के पद पंकज, थपतु हों हिय हर्ष बढाये ।।
ॐ हीं शीतलनाथजिनेन्द्र 1 अत्र अवतर अवतर सौषट् ।
ॐ हीं शीतलनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ ह्रीं शीतलनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सनिहितो भव भव वषट् ।
(छन्द बसततिलका)
देवापगा सुवरवारि विशुद्ध लायो ।
मुंगार हेम भरि भक्ति हिये बढायो ।
रागादिदोष मलमर्दन हेतु येवा ।
चर्चों पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा ।।
ॐ हीं श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा।
श्रीखंडसार वर कुंकुम गारि लीनों
कसग स्वच्छ घसि भक्ति हिये धरीनों रागादि.11
ॐही श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा ।
मुक्ता समान सित तदुल सार राजै ।
धारंत पुञ्ज कलिकुञ्ज समस्त भाजै Iरागादि.।।
ॐ हीं श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा ।
श्रीकेतकी प्रमुख पुष्प अदोष लायो
नौरंग जंगकरि मृग सुरग पायो Iरागादि.।।
ॐ ही श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय कानवाणविध्वसनाय पुष्पं नि. स्वाहा ।

१७५ राजै । देव शास्त्र गुरू वाणी नैवेद्य सार चरू चारू सवारि लायो । जावूनदप्रभृति भाजन शीस नायो ।रागादि.।। ॐही श्री शीतलनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । स्नेह प्रपूरित सुदीपक जोति स्नेह प्रपूरित हिये जजतेऽघ भाजै ।। रागादिदोष मलमई नहेतु येवा । चर्चा पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा ।। ॐही श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय गोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । कृष्णागल प्रमुखगध हुताष माही खेवो तवान वसु कर्म जरत जाहीं ।रागादि.।। ॐही श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय अप्टकर्मदहनाय धूप नि. स्वाहा । निन्चान कर्कटि सु दाडिम आदि धारा । सौवर्ण गघ फल सार सुपक्च प्यारा Iरागादि.।। ॐ ही भी शीतलनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा । कश्रीफलादि वसु प्रासुक द्रव्य साजै । नाचे रचे मचत वज्जत सज्ज बाजे रागादि.।। ॐ हीं श्री शीतलनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अयं नि. स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द इन्द्रवजा तथा उपेन्द्रवजा) आ वदी चैत सुगर्भ माँही, आये प्रभू मगलरूप थाहीं । से सची मातु अनेक भेवा, चर्को सदा शीतलनाथ देवा ।। ॐ हीं चैत्रकृष्णाष्टम्या गर्ममडगममण्डिताय श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । श्री माघ की द्वादशी श्याम जायो, भूलोक मे मगलसार आयो । शैलेन्द्र पै इन्द्र फनिन्द जज्जै, मैं ध्यान धरो भवदुख भज्जै ।। ॐ ही श्री माघकृष्णद्वादश्या जन्ममडगममण्डिताय श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

१७६
देव शास्त्र
गुरू
वाणी
श्री माघ की द्वादशी श्याम जानो, वैराग्य पायो भवभाव हानो ।
ध्यायो चिदानन्द निवार मोहा, च! सदा चर्न निवार कोहा ।।
ॐ हीं माघकृष्णद्वादश्या तपोमडगममण्डिताय श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
चतुर्दशी पौषवदी सुहायो, ताही दिना केवललब्धि पायो ।
शोभै समोसृत्य बखानि धर्म, चर्चा सदा शीतल पर्म शर्म ।।
ॐ ही पौषकृष्णचतुर्दश्या ज्ञानमडगममण्डिताय श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
कुवार की आठय शुद्ध बुद्धा, भये महामोक्षसरूप शुद्धा ।
सम्मेदतें शीतलनाथ स्वामी, गुनाकर तासु पद नमामी ।।
ॐ ही आश्विनशुक्लाष्टम्या मोक्षमडगममण्डिताय श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(छन्द लोलतरग)
आप अनत गुनाकर राजैं, वस्तुविकाशन भानु समाजै ।
मैं यह जानि गही शरना है, मोहमहारिपु को हरना है ।।
(दोहा)
हेम वरन तन तुग धनु, नब्बै अति अभिराम ।
सुर तरू अक निहारी पद, पुन पुन करो प्रणाम ।।
(छन्द तोटक)
जय शीलतनाथ जिनन्द वर, भवदाघदबानल मेघझर ।
दुखभूभृतभजन वज्रसम, भवसागर नागरपोतपम ।।
कुहमानमयागदलोभ हर, अरि विध्न गयद मृगिद वर ।
वृष वारिदवृष्टन सृष्टिहितू, पर दृष्टि विनाशन सुष्टु पितू ।।
समवसतसजुत राजतु हो, उपमा अभिराम विराजतु हो ।
वर बारहमेद समाथित को, तित धर्मबखानि कियौ हितको ।।

१७७ देव शास्त्र गुरू वाणी पहले महि श्री गनराज रजैं, दुतिये महि कल्पसुरी जु सगैं । त्रितिये गणनी गुन भूरि धरै, चवथे तिय जोतिष जोति भरै ।। तिय-वितरनी पनमे गनिये, छह मे भुवनेसुर ती भनिये । भुवनेश दशो थित सत्तम हैं, वसु मे वसु-वितर उत्तम हैं ।। नव मे नमजोतिष पञ्च भरे, दश मे दिविदेव समस्त खरे । नरवृन्द इकादश मे निवसैं, अरू बारहमे पशु सर्व लसैं ।। तजि वैर प्रमोद धरै सब ही, समतारस मग्न लसैं तब ही । धुनि दिव्य सुनें तजि मोहमल, गनराज असी धरि ज्ञानबल ।। सबके हित तत्त्व बखान करें, करूनामनरजित शर्म भरें । वरने षटदर्व तने जितने, वर भेद विराजतु हैं तितने ।। पुनि ध्यान उभं शिवहेत मुना, इक धर्म दुती सुकल अधुना । तित धर्म सुध्यान तणो गनियो, दशभेद लखे भ्रमकी हनियो ।। पहलो अरि नाश अपाय सही, दुतियो जिनवैन उपाय गही । त्रिति जीवविचै निजध्यावन है, चवथो सु अजीवर मावन है ।। पनमो सु उदै बलटारन है, छहमो अरिराग निवारन है । भव त्यागन चितन सप्तम है, वसुमो जितलोभ न आतम है ।। नवमो जिनकी थुति सीस धरै, दशमो जिनभाषित हेत करै । इमि धर्म तणो दश भेद भन्यो, पुनि शुक्लतणो चदु येम गन्यो।। सुपृथक्तवितर्क विचार सही, सुइकत्ववितर्क विचार गही । पुनि सूक्ष्मक्रियाप्रतिपात कही, विपरीतक्रियानिरवृत लही ।। इन आदिक सर्व प्रकाश कियो, भवि जीवनको शिव स्वर्ग दियो। पुनिमोच्छविहार कियो जिनजी, सुखसागर मग्न चिर गुनजी ।। अब में शरना पकरी तुमरी, सुधि लेहु दयानिधिजी हमरी । भव व्याधि निवार करो अबही, मति ढील करो सुख द्यो सबही।। (छन्द घत्तानन्द) शीतल जिन ध्याऊँ भगति बढाऊँ, ज्यो रतनत्रयनिधि पाऊँ । भवदद नशाऊँ शिवथल जाऊँ, फेर न भौवन मे आऊँ ।। ॐ श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय महाय॑म् निर्वपामीति स्वाहा ।

१७८ देव शास्त्र गुरू वाणी (छन्द मालनी) दिढरथ सुत श्रीमान, पञ्चकल्याण धारी । तिनपद जजै भक्तिधारी ।। सहसुख धनधान्य, दीर्घ सौभाग्य पावै । अनुक्रम अरि दाहै, मोक्षको सो सिधावै ।। पुष्पपजलिम् क्षिपेत् इत्याशीर्वाद । जुगपद्म जो श्री श्रेयांसनाथ पूजन (छन्द रूपमाला) विमलनृप विमलासुअन, श्रेयॉशनाथ जिनन्द, सिघपुर जनमे सकल हरि, पूजि धरी आनन्द । भवबधध्वसनहेत लखि मै, शरन आयो येव, थापौ चरन जुग उरकमल मे, जजनकारन देव ।। ॐ हीं श्रेयांसनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट । ॐ ही श्रेयांसनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ट ठ ठ । ॐ हीं श्रेयांसनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट । । (छन्द गीता तथा हरिगीता) कल धोतवरन उतग हिमगिरि पदमद्रहत आवई । सुरसरितप्रासुक उदकसो भरी भृड्ग धार चढावई ।। श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन वन्द आनन्दकन्द हैं । दुखदन्दफन्दनिकन्द पूरन चन्द जोति अमन्द हैं ।। ॐ ही श्री श्रेयांसनाथजिनन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि स्वाहा। गोशीर वर करपूर कुकुम नीर सडग घसो सही । भवतापभजन हेत भवदधिसेत चरन जजो सही श्रेयॉस.।। *ही श्री श्रयॉसनगथजिनन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दनम नि. स्वाहा । सितशील शशिदुत शुक्तिसुन्दर मुक्तिकी उनहार हैं । भरिथार पुञ्ज घरन्त पदतर अखयपद करतार हैं । श्रयास.।। ॐ"श्री भवामनायजिनदार अक्षयपदप्राप्तये अक्षत निर्दपामीति वाला।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१७६
सद सुमन सुमनसमान पावन, मलयतै अलि झकरें ।
पदकमलतर धरतै तुरित सो मदनको मद खकरें ।।श्रेयॉस.।।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ।
यह परममोदक आदि युतरस सवारि सुन्दर चरू लियो ।
तुम वेदनी मदहरन लखि चरचो चरन शुचिकर हियौ ।।श्रेयॉस.।।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।
सशय-विमोह-विभरमतम भजन दिनन्द समान हो ।
तातें चरनढिग दीप जोऊँ देहु अविचल ज्ञान हो ।।श्रेयॉस.।।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।
वर अगर तगर कपूर चूर सुगन्ध भूर बनाइया ।
दहि अमर जिहविर्षे चरनढिग करमभरम जराइया ||श्रेयॉस. ।।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूप नि. स्वाहा ।
सुरलोक अरू नरलोकके फल पक्व मधुर सुहावने ।
लै भगतिसहित जजो चरन शिव परमपावन पावने । श्रेयॉस.।।
ॐ ही श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा ।
जलमलयत दुलसुमनचरू' अरू दीपधू पफलावली ।
करि अर्ध्य चरचो चरनजुग प्रभु मोहि तार उतावली ||श्रेयॉस. ।।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अनर्यपदप्राप्तये अर्घ्यम् नि. स्वाहा ।
पञ्चकल्याणक
(छन्द आया)
पुष्पोत्तर तजि आये, विमला उर जेठकृष्ण षष्टीको ।
सुरनर मगल गाये, मैं पूजो नासि कर्मकाको ।।
ॐ हीं जेष्ठकृष्णषष्टया गर्ममगलमण्डिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जनमे फागुनकारी, एकादशि तीनग्यानदृगधारी ।
इख्वाकवशतारी, मै पूजो घोर विध्न दुखटारी ।।
ॐ हीं फाल्गुनकृष्णैकादश्या जन्ममगलमण्डिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

१८०
देव शास्त्र गुरू वाणी
भवतनभोग असारा, लख त्यागो धीर शुद्ध तपधारा ।
फागुनवदि इग्यारा, मै पूजो पाद अष्ट परकारा ॥
ॐ ही फाल्गुनकृष्णैकादश्या तपोमगलमडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
केवलज्ञान सुजानन, माघबदी पूर्णतिथिको देवा ।
चतुरानन भवभानन, बन्दौ ध्यावौं करौं सुपद सेवा ।।
ॐ हीं माघकृष्णामावस्या ज्ञानमगलमडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
गिरिसमेदतें पायो, शिवथल तिथि पूर्णमासि सावनको ।
कुलशायुध गुनगायो, मैं पूजो आपनिकट आवनको ।।
ॐ हीं श्रावणपूर्णिमाया मोक्षमगलमडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(छन्द लोलतरङ्ग)
शोभित गुड्ग शरीर सुजानो, चाप असी शुभलक्षण मानो ।
कचन वर्ण अनूपम सोहै, देखत रूप सुरासुर मोहै ।।
(पद्धरी छन्द)
जै जै श्रेयास जिन गुनगरिष्ठ, तुम पदजुग दायक-इष्टमिष्ट ।
जै शिष्ट शिरोमनी जगतपाल, जै भवसरोजगन प्रात काल ||
जै पञ्चमहाव्रत गज सवार, लै त्यागभाव दलबल सु लार |
जै धीरजको दलपति बनाय, सत्ता छितिमह रनको मचाय ।।
जै रतन तीन तिहुँ शक्ति हाथ, दश धरम कवच तप टोप माथ ।
जै शुकलध्यान कर खडग धार, ललकारे आठो अरि प्रचार ||
तामैं सबको पति मोह चड़, ताको ततछिन करि सहस खण्ड ।
फिर ज्ञान दरस प्रत्यूह हान, निजगुनगढ लीनो अचल थान ||
शुचि ज्ञान दरस सुख वीर्य सार, हुव समवसरणरचना अपार ।
तित भाषै तत्त्व अनेक धार, जाको सुनि भव्य हिये विचार ।।

१८१
वेश ।
देव शास्त्र गुरू वाणी
निज रूप लह्यौ आनन्दकार, भ्रम दूर करनको अति उदार ।
पुनि नय-प्रमान-निच्छेप सार, दरसायो करि सशय प्रहार ।।
तामै प्रमान जुगभेद एव, परतच्छ परोछ रजै सुमेव ।
तामैं प्रतच्छ के भेद दोय, पहिलो है सविवहार सोय ॥
ताके जुग भेद विराजमान, मति श्रुति सोहैं सुन्दर महान ।
है परमारथ दुतियो प्रतच्छ, भेद जुगम तामाहि दच्छ ।।
इक एकदेश इक सर्वदेश, इकदेश उभैविधिसहित वेश
वर अवधि सु मनपरजै विचार, है सकलदेश केवल अपार ।।
चरअचर लखत जुगपत प्रतच्छ, निरद्वन्द रहित परपच पच्छ ।
पुनि है परोच्छमह पच भेद, समिरति अरू प्रत्यभिज्ञान वेद ।।
पुनि तरक और अनुमान मान, आगमजुत पन, अब नय बखान ।
नैगम, सग्रह, व्यौहार गूढ, रिजुसूत्र, शब्द अरू समभिरूढ ।।
पुनि एवभूत सु सप्त एम, नय कहे जिनेसुर गुन जु तेम |
पुनि दरव क्षेत्र अर काल भाव, निच्छेप चार विधि इमि जनाव ।।
इनको समस्त भाष्यौ विशेष, जा समुझत भ्रमन रहत लेश ।
निज ज्ञानहेत ये मूलमन्त्र, तुम भाषे श्रीजिनवर सु तन्त्र ।।
इत्यादि तत्त्व उपदेश देय, हनि शेष करम निरवान लेय ।
गिरवान जजत वसु दरव ईश, 'वृन्दावन' नित प्रति नमत शीश ।।
(छन्द घत्तानन्द)
श्रेयास महेशा सुगुन जिनेशा, वज धरेशा ध्यावतु हैं ।
हम निशदिन वन्दै पापनिक, ज्यौँ सहजानन्द पावतु ।
ॐ हीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय महाय॑म् निर्वपामीति स्वाहा ।
(सोरठा)
जो पूजै मन लाय, श्रेयनाथ पद पद्म को ।
पावै इष्ट अधाय, अनुक्रमसौं शिवतिय वरै ।।
पुष्पांजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
Mk

१८२
देव शास्त्र गुरू वाणी
श्री वासुपूज्य पूजन
(छन्द रूप कवित्त)
श्रीमत वासुपूज्य जिनवर पद, पूजन हेत हिये उमगाय ।
थापो मनवचतन शुचि करिकै, जिनकी पाटलदेव्या माय ।।
महिष चिन्ह पद लसै मनोहर, लाल वरन तन समतादाय ।
सो करूनानिधि कृपादिष्टकरि, तिष्ठहु सुपरितिष्ठ यह आय ।।
ॐ हीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ ही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट।
(छद जोगीरासा, आचलीबध "जिनपद पूजो लव लाई)
गगाजल भरि कनककुम्भ
मे, प्रासुक गन्ध मिलाई ।
करम कलक विनाशनकारन, धार देत हरषाई ।।
वासपूज वसुपूज तनुज पद, वासव सेवत आई ।
बालब्रह्मचारी लखि जिनको, शिवतिय सनमुख धाई ।।
ॐ हीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ।
कृष्णागरू मलयागिर चदन, केशर सग घसाई ।
भवआताप विनाशनकारन, पूजो पद चित लाई ।वासु.।।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय घदन नि. स्वाहा ।
देवजीरे सुखदास शुद्ध वर, सुवरन थार भराई ।
पुञ्ज धरत तुम चरनन आगैं, तुरित अखय पद पाई ।वासु.।।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत निर्वपामीति स्वाहा ।
पारिजात सकेतानकल्पतरू-जनित सुमन बहुलाई ।
मीनकेतु मदभजनकारन, तुम पदपदम चढाई वासु.।।
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ।
नव्यगव्यआदिक रसपूरित, नेवज तुरित उपाई ।
छुधारोग निवारनकारन, तुम्हे जजो शिर नाई वासु.।।
ॐ ही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू पाणी १५३ दीपकजोत ज्दात होत वर, दशदिशमे छवि छाई । तिमिरमोहनाशक तुगको लखि, जजो चरन हरषाई ।वासु.।। ॐ मी श्रीपासुमाजिोधाय मोहायकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । दशविर गन्ध मनोहर लेकर, वातहोत्र मे डाई । अष्टकरण ये दुष्ट जरतु हैं, धूम सुधूम उडाई ।वासु.।। ही जमिन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । सुरत सुपाच सुपावन फल लै, कचनथार भराई । मोन्छ महाफलदायक लखि प्रमु. भेट धरों गुन गाई ।।वासु.।। ॐही भीमागुपूज्यविनदाय नाक्षफलप्राप्तये फलम् निर्वपामीति स्वाहा । जलफल दरव मिलाय गाय गुन, आठो अग नमाई । शिवपदराज हेत हे श्रीपति । निकट धरो यह लाई वासु.।। हामीपासुपज्यजिनेन्द्राय अनयंपदप्राप्तये अर्घ्यग नि. स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द पाईता, मात्रा १४) कलि छह आसाद सुलायो, गरमागम मगल पायो । दश में दिविते इत आये, शतइन्द्र जजे सिर नाये ।। ॐही अपाटकृष्णपण्या गर्भगगलगडिताय श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपाणीति स्वाहा। कलि चौदा फागुन जानो, जनमे जगदीश महानो । हरि मेर जजे तव जाई. हम पूजत हैं चित लाई ।। ॐ पाल्गुनकृष्णचतुर्दश्या जन्गमगलमण्डिताय श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अनिपाणीति रवाहा । तिथि चौदस फागुन श्यामा, धरियो तप श्रीअभिरामा । नृप सुन्दर के पय पायो, हम पूजत अतिसुख थायो ।। ॐ ही फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्या तपोगगलमण्डिताय श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति रवाहा । सुदि माह दोइज सोहे, लहि केवल आतम जो है । अनअन्त गुनाकर स्वामी, नित वन्दो त्रिभुवन नामी ।। ॐ ही माशुक्ल द्वितीयाया ज्ञानगगलमडिताय श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अय निर्वपामीति स्वाहा ।

१८४ देव शास्त्र गुरू वाणी सितभादव चौदशि लीनो, निरवान सुथान प्रवीनो । चम्पाथानक सेती, हम पूजत निजहित हेती ।। ॐ हीं भाद्रपदशुक्लचतुर्दश्या मोक्षमगलमडिताय श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जयमाला (दोहा) चम्पापुर मे पञ्चवर, कल्याणक तुम पाय । सत्तर धनु तन शोभनो, जय जय जय जिनराय ।। (छन्द मोतियादाम) महासुखसागर आगर ज्ञान, अनन्त सुखामृत मुक्त महान । महाबलमडित खण्डित काम, रमाशिवसग सदा विसराम ।। सुरिन्द फनिन्द खगिन्द नरिन्द, मुनिन्द ज0 नित पादरविद । प्रभू तुव अन्तर भाव विराग, सुबालहि ते व्रतशील सो राग ।। कियो नहि राज उदासरूप, सुभावन भावत आतमरूप । अनित्य शरीर प्रपञ्च समस्त चिदातम नित्य सुखाश्रित वस्त ।। अशन नहीं कोउ शर्नसहाय, जहाँ जिय भोगत कर्मविपाय । निजातम कै परमैसुर शन, नहीं इनके बिन आपद हर्न ।। जगत्त जथा जलबुदबुद येव, सदा जिय एक लहै फलमेव । अनेक प्रकार धरी यह देह, भ्रमे भवकानन मे आन न नेह ।। अपावन सात कुधात भरीय, चिदातम शुद्धसुभाव धरीय । धरैं इनसो जब नेह तबेव, सुआवत कर्म तबे वसुभेव ।। जबै तनभोगजगत्त उदास, धरैं तब सवर निर्जर आस । करै जब कर्मकलक विनाश, लहै तब मोक्ष महासुखराश ।। तथा यह लोक नराकृत नित्त, विलोकियते षटद्रव्यविचित्त । सु आतमजानन बोधविहीन, धरै किन तत्त्व प्रतीत प्रवीन ।। जिनागमज्ञानरू सजमभाव, सबै निज ज्ञान बिना विरसाव । सुदुर्लभ द्रव्य सुक्षेत्र सुकाल, सुभाव सबै जिहते शिव हाल ।। लयो सब जोग सुपुन्य वशाय, कहो किमि दीजिये तादिगवाय । विचारत यो लवकान्तिक आय, नमे पदपकज पुष्प चढाय ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
१८५
काही प्रमु धन फिया सुविचार, प्रबोधि सु येम कियो जु विहार ।
तई सौगं तन हरि साय, रच्यो शिविका चढि आप जिनाय ।।
धरे तप पाय गुपेपलयोध, दियो उपदेश सुगव्य सवोध ।
लियो किर गोमासुख रास, नमें नित भक्त सोई सुखआश ।।
(छन्द घत्तानन्द)
मित पासवपन्दत, पापनिकन्दत, वासपूज्य व्रत ब्रह्मपती ।
यसपालपडित आनन्दमण्डित. जै जै जै जैवन्त जती ।।
गुपनजिनदार माग सिपागीति स्वाहा ।
(सोरठा)
वासपूज पद सार, जजो दरवविधि भावसो ।
सो मा सुखसार, मुक्ति मुक्ति को जो परम ।।
(सुप्पाजलिग क्षिपेत् इत्याशीर्वाद)
श्री विमलनाथ पूजन
(छन्द मदावलिप्तकपोल)
सासार दिपि त्यागि, नगर कम्पिला जनम लिय,
कृतधर्मानृपनन्द, मातु जयसेन धर्मप्रिय ।
तीन लोक वरनन्द विमल जिन जिन विमल विमलकर,
थापों चरनसरोज, जजनके हेत भाव धर ।।
ॐनीकी विमलनाथरिगेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सापट ।
ही श्री विग्टनायगिन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ श्री चिमत्नागिन्द्र । अत्र गग सनिहितो भव भव वपट।
(सोरठा छन्द)
कंचन झारी धारि, पदमद्रह नीर ले ।
तृपा रोग निरवारि, विमल विमलगुन पूजिये ।।
ॐ ही श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरागृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ।
मलयागर करपूर, देववल्लमा सग घसि ।
हरि मिथ्यातममूर, विमल विमलगुन जजतु हो ।।
ॐरी श्री विगलनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनम् नि. स्वाहा ।

૧૬
देव शास्त्र गुरू वाणी
बासमती सुखदास, श्वेत निशपति को हँसें ।
पूरै वॉछित आस, विमल विमलगुन जजत ही ।।
ॐ ही श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा ।
परिजात मन्दार, सतानक सुरतरूजनित ।
जजो सुमन भरि थार, विमल विमल सुन मदनहर ।।
ॐ हीं श्री विमलनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्ष नि. स्वाहा ।
नव्य गव्य रसपूर, सुवरन थार भरायकैं |
छुदावेदनी चूर, जजो विमलपद विमलगुन ।।
ॐ ही श्री विमलनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा ।
मानिक दीप अखण्ड, गो छाई वरगो दशो |
हरा मोहतम चण्ड, विमल विमलमति के धनी ।।
ॐ हीं श्री विमलनाथजिनेन्द्राय मोहाधकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।
अगर तगर घनसार, देवदार कर चूर वर ।
खेवो वसु अरि जार, विमल विमल पदपद्मढिग ।।
ॐ ह्रीं श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा ।
श्रीफल सेव अनार, मधुर रसीले पावने ।
जजो विमलपद सार, विध्न हरें शिवफल करें ।।
ॐ हीं श्री विमलनाथजिनन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा ।
आठो दरब सवार, मनसुखदायक पावने ।
जजो अर्ध्य भुस्थार, विमल विमल शिवतिय रमन ।।
ॐ हीं श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
पंचकल्याणक
(छन्द दुतविलम्बित तथा सुन्दरी)
गरम जेठ वदी दशमी भनो, परम पावनसो दिन शोभनो ।
करत सेव सची जननीतणी, हम जजै पदपद्म शिरोमणी ।।
ॐ हीं श्री ज्येष्ठकृष्णामावस्याया गर्भमगलमण्डिताय श्री विमलनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी १८७ शुकलमाघ तुरी तिथि जानिये, जनममगल तादिन मानिये । हरि तबै गिरिराज विर्षे जजे, हम समर्चत आनन्द को सजे ॥ ॐ हीं माघशुक्लचतुर्दश्याँ जन्मगलमडिताय श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । तप धरे सितमाघ तुरी भली, निजसुधातम ध्यावत हैं रली । हरि फनेश नरेश जजै तहाँ, हम जजै नित आनन्दसो इहाँ ॐ हीं माघशुक्लचतुर्दश्या तपोमगलमडिताय श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । विमल माघरसी हनि घातिया, विमलबोध लयो सब भासिया । विमल अर्ध्य चढाय जजो अबै, विमल आनन्द देहु हमैं सबै ।। ॐ हीं माघशुक्लचतुर्दश्यों ज्ञानमगलमडिताय श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । भ्रमरसाढरसी अति पावनों, विमल सिद्ध भये मन भावनो । गिरसमेद हरी तित पूजिया, हम जजैं इत हर्ष धर हिया ।। ॐ हीं आषाढकृष्णषष्ठया मोक्षमगलमण्डिताय श्री विमलनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जयमाला (दोहा) मगन चहत उडगन गगन, छिति थितिके छह जेम । तिमि गुन वरनन वरनन, माहि होय तब केम || साठ धनुष तन तुड्ग है, हेमवरन अभिराम वर बराह पद अकलखि, पुनि पुनि करो प्रनाम ।। (छन्द त्रोटक) जय केवल ब्रह्म अनतगुनी, तुव ध्यावत शेष महेश मुनी । परमातम पूरन पाप हनी, चितचिन्ततदायक इष्ट धनी ।। भवआतपध्वसन इन्दुकर, वर साररसायन शर्मभर । सब जन्म जरामृतदाघहर, शरनागत पालन नाथ वर ।। नित सत तुमे इन नामनितें, चितचिन्तत हैं गुनमाननिरौं । अमल अचल अटल अतुल, अरस अछल अथल अकुल ।।

१८५
देव शास्त्र गुरू वाणी
अजर अमर अहर अडर, अपर अभर अशर अनर ।
अमलीन अछीन अरीन हने, अमत अगत अरत अघने ||
अछुदा अतृषा अभयातम हो, अमदा अगदा अवदातम हो ।
अविरूद्ध अक्रुद्ध अमान धुना, अतल अशल अनन्त गुना ||
अरस सरस अकल सकल, अयच सवच अमन सबल ।
इन आदि अनेकप्रकार सही, तुमको जिन सत जमैं नित ही ।।
अब मैं तुमरी शरना पकरी, दुख दूर करो प्रभुजी हमरी ।
हम कष्ट सहे भवकानन मे, कुनिगोद तथा थल आनन मे ।।
तित जामनमर्न सहे जितने, कहि केम सकैं तुमसो तितने ।
सुमुहूरत अन्तरमाहि धरे, छह चैत्रय छह छह काय खरे ||
छिति वहिण वयारिक साधरन, लघु धूल विभेदनिसो भरन ।
प्रत्येक वनस्पति ग्यार भये, छ हजार दुवादश भेद लये ।।
सब द्वै त्रय भू षठ छहसु भया, इक इन्द्रियकी परजाय लया ।
जुगइन्द्रिय काय असी गहियो, तियइन्द्रिय साठनिमे रहियो ।।
चतुरिंदिय चालिस देह धरा, पनइन्दिय के चवबीस वरा ।
सब ये तनधार तहाँ सहियो, दुख घोर चितारित जात हियो ।।
अब मो अरदास हिये धरिये, दुखदद सबै अब ही हरिये ।
मन वाछितकारज सिद्ध करो, सुखसार सबै घर रिद्ध भरो ||
(छन्द घत्तानन्द)
जय विमल जिनेशा, नुतनाकेशा, नागेशा नरईश सदा ।
भवताप अशेषा हरन निशेशा, दाता चिन्तित शर्म सदा ।।
ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय महाअर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
श्रीमत विमल जिनेस पद, जो पूजौ मन लाय ।
पू0 वॉछित आश तसु मैं पूजौं गुनगाय ||
परिपुष्पाजलिम क्षिपेत इत्याशीर्वाद ।

देव शास्त्र गुरू वाणी १५६ श्री अनन्तनाथ पूजन (छन्द कवित्त) पुष्पोत्तर तजि नगर अजुध्या जनम लियो सूर्याउर आय । सिघसेन नृप के नन्दन, आनन्द अशेष भरे जगराय ।। गुन अनन्त भगतन्त धरे, भवदन्द हरे तुम हे जिनराय । थापतु हो त्रय बार उचरिकै, कृपासिन्धु तिष्ठहु इत आय ।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिन । अत्र अवतर अवतर सवौषट | ॐ ही श्रीअनन्तनाथजिन । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ ही श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र मम सनिहितो भव भव वषट् । (छन्द गीता तथा हरिगीता) शुचि नीर निरमल गगको लै, कनकभृग भराइया । मल करम धोवन हेत मनवचकाय धार ढराइया ।। जगपूज परमपुनीत मीत, अनन्त सत सुहावनो । शिचक तवंत महत ध्यावो, अन्ततत नशावनो 11 ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम् नि. स्वाहा । हरिचन्द कदलीनन्द कुकुम, दन्दताप निकन्द है । सब पापरूजसंतापभजन, आपको लखि चन्द है ।जग.।। ॐ ही श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दनम् नि. स्वाहा । कनशाल दुति उजियाल हीर, हिमालगुलकनिते घनी । तसु पुज तुम पदतर धरत, पद लहत स्वच्छ सुहावनी । जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । पुष्कर अमरतर जनित वर, अथवा अवर कर लाइया । तुम चरनपुष्करतर धरत, सरशूल सकल नशाइया जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय कामवाणविघ्वसनाय पुष्पम् नि. स्वाहा । पकवान नैना घानरसना को प्रमोद सुदाय है सो ल्याय चरन चढाय रोग, छुधाय नाश कराय हैं ।जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । तममोह भानन जानि आनन्द, आनि सरन गही अबै । वर दीप धारो वारि तुमढिग, सुपरज्ञान जु द्यो सबै ।जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।

૧૬૦ देव शास्त्र गुरू वाणी यह गन्ध चूरि दशाग सुन्दर, धूम्रध्वज मे खेय हो । वसुकर्म भर्म जराय तुम ढिग, निज सुधातम वेय हो ।जिग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूपम् नि. स्वाहा । रसथक्क पक्क सुभक्क चक्क, सुहावने मृदु पावने । फलसार वृन्द अमद ऐसो, ल्याय पूज रचावने ||जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि. स्वाहा । शुचि नीर चन्दन शालिशदन, सुमन चरू दीवा धरों। अरू धूप जुत मैं अरध करि, करजोरजुग विनति करो ||जग.।। ॐ हीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द सुन्दरी तथा द्रुतविलम्वित) असित कातिक एकम भावनो, गरमको दिन सो गिन पावनों । किय सची तित चर्चन चावसो, हम जजे इत आनन्द भावसों || ॐ हीं कार्तिककृष्णैकप्रतिपदाया गर्ममगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जनम जेठवदी तिथि द्वादशी, सकल मगल लोकबिर्षे लसी । हरि जजे गिरिराज समाजतें, हम जर्जे इत आतम लाजत ॥ ॐ ही ज्येष्ठकृष्णद्वादश्या जन्ममगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । भवशरीर विनश्वर भाइयो, असित जेठदुवादशि गाइयो । सकल इन्द्र जजे तित आइकैं, हम जजैं इत मगल गाइक ।। ॐ हीं ज्येष्ठकृष्णद्वादश्या तपोमगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । असित चैत अमावसको सही, परम केवलज्ञान जग्यो कही । लही समोसृत धर्म धुरधरो, हम समर्चत विघ्न सबै हरो ।। ॐ हीं चैत्रकृष्णामावस्याया ज्ञानमगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । असित चैत अमावस गाइयौ, अघतघाति हने शिव पाइयो । गिर समेद जजे हरि आयकैं, हम जपद प्रीति लगाइक || ॐ हीं चैत्रकृष्णामावस्याया मोक्षमगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी ૧૬૧ जयमाला (छन्द दोहा) तुम गुण वरनन येम जिम, खविहाय करमान । तथा मेदिनी पदनिकरि, कीनो चहत प्रमान ।। जय अनन्त रवि भव्यमन, जलज वृन्द विहसाय । सुमति कोक तियथोक सुख, वृद्ध कियो जिनराय ।। (छन्द नयमालनी, चडी तथा तामरस) जै अनन्त गुनवत नमस्ते, शुद्ध ध्येय नित सन्त नमस्ते । लोकालोक विलोक नमस्ते, चिन्मूरत गुनथोक नमस्ते ।। रत्नत्रयधर धीर नमस्ते, करमशत्रु करि वीर नमस्ते । चार अनन्त महन्त नमस्ते, जय जय शिवतियकत नमस्ते ।। पंञ्चाचार विचार नमस्ते, पञ्च कर्ण' मदार नमस्ते । पञ्च पराव्रत-चूर नमस्ते, पञ्चमगति सुखपूर नमस्ते ।। पञ्चलब्धि-धरनेश नमस्ते, पञ्च-भाव सिद्धेश नमस्ते । छहो दरब गुनजान नमस्ते, छहो काल पहिचान नमस्ते ।। छहो काय रच्छेश नमस्ते, छह सम्यक उपदेश नमस्ते । सप्तविशनवनवही नमस्ते, जय केवल अपरन्हि नमस्ते ।। सप्ततत्त्व गुनभनन नमस्ते, सप्त शुभ्रगति हनन नमस्ते । सप्तभग के ईश नमस्ते, सातो नय कथनीश नमस्ते ।। अष्ट करम मलदल्ल नमस्ते, अष्ट जोग निरशल्ल नमस्ते । अष्टम धराधिराज नमस्ते, अष्ट' गुननिसिरताज नमस्ते ।। जय नवकेवल प्राप्त-नमस्ते, नव पदार्थथिति आप्त नमस्ते । दशो धरमधरतार नमस्ते, दशो बधपरिहार नमस्ते ।। विघ्न महीधर विज्जु नमस्ते, दशो बधपरिहार नमस्ते । तन कनकदुति पूर नमस्ते, इख्वाकज गनसूर नमस्ते ।। धनु पचासतन उच्च नमस्ते, कृपासिधु गुन शुच्च नमस्ते । सेही अग निशक नमस्ते, चितचकोर मृग अक नमस्ते ।। राग-दोष-मदटार नमस्ते, निजविचार दुखहार नमस्ते । सुर सुरेश-गन-वृन्द नमस्ते, 'वृन्द' करो सुखकन्द नमस्ते ।।

વર
देव शास्त्र गुरू वाणी
(छन्द घत्तानन्द)
जय जय जिनदेव सुरकृतसेव, नित कृतचित्त हुल्लासधर ।
आपदउद्धार समतागार, वीतराग विज्ञानभर
ॐ हीं श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय महाय॑ निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द मदावलिप्तकपोल तथा रोडक)
जो जन मनवचकाय लाय, जिन जजै नेह धर ।
वा अनुमोदन करै करावै पढे पाठ वर ।।
ताके नित नव होय, सुमगल आनन्ददाई ।
अनुक्रमते निरवान लहै सामग्री पाई ।।
पुष्पाजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
श्री धर्मनाथ पूजन
(छन्द माधवी तथा किरीट)
तजिके सरवारथ सिद्ध विमान, सुभान के आनि आनन्द बढायों ।
जगमातसुव्रति के नन्दन होय, भवोदधि डूबत जन्तु कढायो ।।
जिनको गुन नामहिं माहिं प्रकाश है, दासिन को शिवस्वर्ग पढायो ।
तिनके पद पूजन हेत त्रिवारसु, थापतु हूँ यह फूल चढायो ||
ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छन्द जोगीरासा)
मुनिमनसम शुचि सीर नीर, अति मलय मेलि भरि झारी ।
जनमजरामृत ताप हरन को, चरचो चरन तुम्हारी ।।
परमधरम-सिमरन धरम-जिन अशनरशरन निहारी ।
पूर्जे पाय गाय गुन सुन्दर, नाचूँ दै दै तारी ।।
ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी १६३ केशर चन्दन कदली नन्दन, दाह निकन्दन लीनो । जलसग घस लसि शसिसमशमकर, भवआतापहरीनो परम.।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा । जलज जीर सुखदास हीर हिम, नीर किरनसम लायो । पुञ्ज धरत आनन्द भरत भव-दन्द हरत हरषायो परम.।। ॐही श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । सुमन सुमन सम सुमनथाल रम, सुमनवृन्द विहासई । सुमन मथ-मदमथन के कारन, चरचो चरन चढाई ।परम. ।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । घेवर बावर अर्द्धचन्द्र सम, छिद्र सहस्र विराजै । सुरस मधुर तासो पद पूजत, रोग असाता भाजै ।परम.।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा' । सुन्दर नेह सहित वर दीपक, तिमिर हरन धरि आगै । 'नेह सुहित गाऊँ गुण श्रीधर, ज्यो सुबोध उर जागै ।परम.।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । अगर तगर कृष्णागर तरदिव, हरि चन्दन करपूर । चूर खेय जनजवनमॉहि जिमि, करम जरे वसु कूर ।।परम. ।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । आम्र काम्रक अनार सार फल, भार मिष्ट सुखदाई । सो लै तुमढिग धरहुँ कृपानिधि, देहु मोक्ष्छ ठकुराई ।परम ।। ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । आठो दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुन गाई । बाजत दृमदृम मृदड्गगत, नाचत ता थेई थाई ।परम. ।। ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । पंचकल्याणक (राग टप्पा की, चाल "खोयो रे गवार नै सारो दिन योही खोयो) पूजो हो अवार, धरम जिनेसुर पूजो हो ।।टेक।। आठै सित वैसाख की हो, गरभ दिवस अधिकार । जगजन वाँछित पूजो, पूजो हो अबार, धरम जिनेसुर पूजो हो ।। ॐ हीं श्री बैशाखशुक्लाष्टम्या गर्भमगलमण्डिताय श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

१६४
देव शास्त्र गुरू वाणी
शुकल माघ तेरस लयो हो, धरम धरम अवतार ।
सुरपति सुरगिर पूज्यो, पूजो हो अवार ||धरम. ।।
ॐ हीं श्री माघशुक्लत्रयोदश्या जन्ममगलमण्डिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा
माघ शुकल तेरस लयो हो, दुद्धर तप अविकार |
सुररिषि सुमन तैं पूज्यो, पूजो हो अबार ||धरम० ।।
ॐ हीं श्री माघशुक्लत्रयोदश्या तपोमगलमण्डिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
पौष शुकल पूनम हने अरि, केवल लहि भवतार |
गनसुर नरपति पूज्यो, पूजो हो अबार ||धरम. ।।
ॐ हीं श्री पौषशुक्लपूर्णिमाया ज्ञानमगलमण्डिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जेठशुकल तिथि चौथ की हो, शिव समेदते पाय ।
जगत पूज्य पद पूजो, पूजो हो अबार धरम.।।
ॐ हीं श्री ज्येष्ठशुक्लचतुर्थ्यां मोक्षमड्गलमण्डिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
घना कार करि लोक पट, सकल उदधि मसि तन्त ।
लिखै शारदा कलम गहि, तदपि न तव गुन अन्त ।।
(छन्द पद्धरि)
जय धरमनाथ जिन गुन महान, तुम पदको मै नित धरो ध्यान ।
जय गरम जनम तप ज्ञान जुक्त, वर मोच्छ सुमगल शर्म-मुक्त ।।
जय चिदानन्द आनन्दकन्द, गुनवृन्द
सुध्यावत मुनि अमन्द ।
तुम जीवनि के विनु हेत मित्त, तुम ही हो जगमे जिन पवित्त ।।
तुम समवसरण मे तत्त्वसार, उपदेश दियो है अति उदार ।
ताको जे भवि निजहेत चित्त, धारै ते पावैं मोच्छवित्त ।।

૧૬૬
देव शास्त्र गुरू वाणी
मैं तुम सुख देखत आज पर्म, पायो निज आतमरूप धर्म ।
मोकों अब भौभयतें निकार, निभय पद दीजे परम सार ।।
तुम सम मेरो जग मे न कोय, तुम ही तैं सब विधि काज होय ।
तुम दयाघुरघर धीर वीर, मेटी जगजनकी सकल पीर ।।
तुम नीतनिपुन बिन रागदोष, शिवगम दरसावतु हो अदोष ।
तुमरे ही नामतने प्रभाव, जग जीव लहैं शिव-दिव सुराव ।।
तातें मै तुमरी शरण आय, यह अरज करतु हो शीश नाय ।
भव वाधा मेरी मेट भेट, शिवराधासो करि भेट भेट ।
जजाल जगत को चूर चूर, आनन्द अनूपम पूर पूर ।
मति देर करो सुनि अरज एव, हे दीनदयाल जिनेशदेव ॥
मोको शरना नहिं और ठौर, यह निहचै जानो सुगुन-मौर ।
'वृन्दावन' वदत प्रीति लाय, सब विघन मेट हे धरम राय ।।
(छन्द घत्तानन्द)
जय श्री जिनधर्म, शिवहितपर्म, श्री जिनधर्म उपदेशा ।
तुम दयाधुरधर विनतपुरन्दर, कर उरमदर परवेशा ।।
ॐ हीं श्री धर्मनाथजिनेन्द्राय म्हार्य निर्वपामीति स्वाहा
(छंद मदावलिप्तकपोल)
जो श्रीपतपद जुगल, उगल मिथ्यात जजै भव
ताके दुख सब मिटहि, लहै आनन्द समाज सब 11
सुर-नर-पति-पद भोग, अनुक्रमते शिव जावै ।
वृन्दावन यह जानि धरम, जिनके गुन ध्यावै ।।
पुष्पाजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
श्री कुन्थुनाथ पूजन
(छन्द माधवी तथा किरीट)
अजअंक अजैपद राजै निशक, हरै भवशक निशकित दाता ।
मतमत्त मतड्ग के माथे मथे, मतवाले तिन्हैं हने ज्यो हरिहाता ।।

। १६६ देव शास्त्र गुरू वाणी गजनागपुरै लियो जन्न जिन्ही रवि के प्रमु नन्दन श्रीनतिमाता । सह कुन्थु सुकुन्थुनि के प्रतिपालक थापों तिन्हें जुतनक्ति विख्याता।। ॐ ही श्री कुन्थुनाथज्नेिन्द्र | स्त्र स्दतर ज्दतर सदौपट । ॐ ही श्री कुन्धुनाथजिनेन्द्र । स्त्र तिष्ठ तिष्ट ट ठ । ॐ ही श्री कुन्धुनाथजिनन्द्र । स्त्र मम सनिहितो मद मद दपट । (चाल लावनी मरहठी की लाला मनसुखराय जी कृत) कुन्थु सुन अरज दासकेरी नाथ सुनि अरज दात्तरी । भवसिन्धु परयो हो नाथ, निकारो दाँह पकर मेरी ॥ प्रभू सुन अरज दासकेरी, नाथ सुनि स्रज दासकेरी । जगजाल परयों हो देग निकारो, दाँह पकर मेरी टेक।। सुक्तरनीको उज्जल जल भरि, कनकमंग मेरी । मिथ्यातृपा निवारन कारन धरो धार नेरी कुन्यु.।। श्री कुन्धुनाथजिनेन्द्राय जन्नजरानृत्युदिनाशनाय जल्म नि. स्वाहा । बावन चंदन कदलीनन्दन, घसिकर गुन टेरी । तण्त मोहनाशन के कारन धरो चरन नेरी कुन्थु.।। श्री कुन्घुनाथजिनेन्द्राय तसारतापविनाशनाय चन्दनन् नि स्वाहा । मुक्ताफलसन उज्जल अक्षत, सहित मलय लेरी । पुञ्ज धरो तुन चरनन आगै अख्यत्तुपद देरी कुन्यु.।। श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये सतन नि स्वाहा । कमल केतकी बेला दौना सुनन सुननतेरी । सनरशूलनिरमूल हेतु प्रभु, भेट करो तेरी कुन्यु.।। श्री कुन्युनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वत्तनाय पुष्प नि. स्वाहा । घेवर बावर मोदन मोदक, मृदु उत्तन पेरी । तासो चरन जजों करूणानिधि, हरो सुधा नेरी । कुन्यु ।। श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय सुधारोविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । कचन दीपनई वर दीपक, ललित जोति थेरी । सौ लै चरन जजों भ्रमतमरवि, निज सुबोध देरी कुन्थु.।। श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय मोहान्चकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।

૧૩૭ देव शास्त्र गुरू वाणी देवदारू हरि अगर तगर करि, चूर अगनि खेरी । अष्टकरम ततकाल जरे ज्यो, धूम धनजेरी ||कुन्थु.।। श्री कुन्धुनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूप नि. स्वाहा । लोग लायची पिस्ता केला, कमरख शुचि लेरी । मोक्ष महाफल चाखन कारन, जजो सुकरि ढेरी ।।कुन्थु ।। श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा । जल चन्दन तन्दुल प्रसून चरू, दीप धूप लेरी । फलजुतजजन करो मन सुख धरी, हरो जगत फेरी ||कुन्थु.।। श्री कुन्धुनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य नि. स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द मोतियादाम) सुसावनकी दशमी कलि जान, तज्यो सरवारथसिद्ध विमान । भयो गरगागम मगल सार, जजै हम श्रीपद अष्ट प्रकार ॥ श्री श्रावणकृष्णदशम्या गर्भमंगलमण्डिताय श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यम् निर्वपानीति स्वाहा । महा वैशाख सु एकम शुद्ध, भयो तव जन्म तिज्ञानसमुख । कियो हरि मगल मन्दिर शीस, जर्जें हम अत्र तुम्हे नुत शीस ।। श्री वैशाखशुक्लप्रतिपदाया जन्ममगलमण्डिताय श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । तज्यो पटखण्ड विभौ जिनचन्द, विमोहित चित्त चितारि सुछद । धरे तप एकम शुद्ध विशाख, सुमग्न भये निज आनन्द चाख ।। श्री वैशाखशुक्लप्रतिपदाया तपोमगलमण्डिताय श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । सुदी तिय चैत सु चेतन शक्त, चहूँ अरि छै करि तादिन व्यक्त । भई समवसृत भाखि सुधर्म, जजो पद ज्यो पद पाइय पर्म ।। श्री वैशाखशुक्लतृतीयाया ज्ञानमडगलमण्डिताय श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । सुदी बैसाख सु एकम नाम, लियो तिहि द्योस अभै शिवधाम । जजे हरि हर्षित मगल गाय, समर्चतु हौं सु हिया वच काय ।। श्री वैशाखशुक्लप्रतिपदाया मोक्षमगलमण्डिताय श्री कुन्थुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा ।

१६८ देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला (छन्द अडिल्ल) पट खण्डन के शत्रु राजपद मे हने धरि दीक्षा पटखडन पाप तिन्हें टने । त्यागि तुटरशनचक्र धरमचक्री भये, करमचक्र चकचूर सिद्ध दिढ गढ लये ।। ऐसे कुन्थु जिनेश तने जिनेश तने पदपद्मको, गुन अनन्त भण्डार महासुखसमको । पूजो अर्घ्य चढाय पूरणानन्द हो चिदानन्द अभिनन्द इन्दगन वन्द हो । जय जय जय श्री कुन्थु देव, तुम ही ब्रह्मा हरि त्रिवुकेव । जय बुद्धि विदाँवर विष्णु ईस जय रमाकत शिवलोक शीस ।। जज दयाधुरधर सृष्टिपाल, जय जय जगवन्धू सुगुणमाल | सरवारथ सिद्ध विमान छार उपजे गजपुर मे गुन अपार || सुरराज कियो गिरि न्होन जाय, आनद सहत जुत भगत माय । पुनि पिता सॉपि कर मुदित अग, हरि तांडव निरत कियो अमग || पुनि स्वर्ग गयो, तुम इत दयाल, वय पाय मनोहर प्रजापाल । पठखण्डविमो भोग्यो समस्त, फिर त्याग जोग धारयो निरस्त ।। तव घाति घात केवल उपाय, उपदेश दियो सब हित जिनाय । जाके जानत भ्रम-तम विलाय, सम्यक् दरशन निरमल लहाय ।। तुम धन्य देव किरपा-निधान, अज्ञान-क्षमा-तमहरन भान | जय स्वच्छगुनाकर शुक्तशुक्त, जय स्वच्छ सुखमृत मुक्तमुक्त ।। जय भोभयभजन कृत्यकृत्य, में तुनरो निज प्रभु अशरन शरन अधार धार मम विघ्न तूलगिरि जार जार || जय कुनय-यामिनी सूर सूर, जय मनवांछित सुख पूर पूर | मम करमबन्ध दिढ चूर चूर, निज सम आनन्द दै भूर भूर ।। अथवा जवलों शिव लहौं नाहि तबलौं ये तो नित ही लहाहि । भव भव श्रावक-कुल जनम सार, भव भव सतमत सतसग धार ।। मृत्यमृत्य ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
૧૬૬
भव भव निज आतम-तत्त्व ज्ञान, भव भव तप सजम शील दान ।
भव भव अनुभव नित चिदानद, भव भव तुम आगम है जिनद ।।
भव श्रवी समाधिजुत मरन सार, भव भव व्रत चाहो अनागार ।
यह मोमो हे करूणानिधान, सब जोग मिलो आगम प्रमान ।।
जबलौं शिव सम्पत्ति लहो नाहि. तबलौँ मै इनको नित लहाहि ।
यह अरज हिये अवधारि नाथ, भवसकट हरि कीजै सनाथ ।।
(छन्द घत्तानन्द)
यह दीनदयाला वरगुणमाला, विरद विशाला सुख आला ।
मैं पूजो ध्यावी. शीश नवावो, देहु अचल पदकी चाला ।।
श्री कुन्थुनाथजितेन्द्राय महाऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द रोडक)
कुन्थुजिनेश्वर पादपदम, जो प्रानी ध्यावै
अलि समकर अनुराग, सहज सो निजनिधि पावै ।।
जो वाँचै सरदहै, करे अनुमोदन पूजा ।
वृन्दावन' तिह पुरूष सदृश सुखिया नहि दूजा ।।
पुष्पाञ्जलिम् क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।
श्री अरनाथ पूजन
(छद छप्पय)
तप तुरग असवार धार, तारन विवेक कर
ध्यान शुकल असि धार, शुद्ध सुविचार सुबखतर ।।
भावन सेना धरम, दशो
दशो सेनापति थापे
रतन तीन धर सकति, मत्रि अनुभौ निरमापे ।।
सत्तातल सोह सुभट धुनि, त्याग केतु शत अन धरि ।
इतिविध समाजे सज राजको, अरजिन जीते करम अरि ।।
ॐ हीं श्री अरनाथ जिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।

२०० देव शास्त्र गुरू वाणी (छन्द त्रिभगी) कनमणिमय झारी, दृगसुखकारी, सुरसरितारी नीर भरी । मुनिमनसम उज्जवल, जनमजरादल, सो लै पदतल धार करी ।। प्रभु दीनदयाल अरिकुलकाल, विरदविशाल सुकुमालम् । हनि मम जजाल, हे जगपाल, अरगुनमाल वरमालम् ।। ॐ ही श्री अरनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । भवताप नशावन, विरद सुपावन, सुनि मनभावन मोद भयो । तातें घसि बावन, चदनपावन, तरहि चढावन उमगि अयो । प्रभु.।। ॐ ही श्री अरनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा । तन्दुल अनियारे, श्वेत सवारे, शशिदुति टारे थार भरे । पद अखय सुदाता, जगविख्याता, लखि भवताता पुज धरे ।प्रभुः ।। ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । सुरतरू के शोभित, सुरन मनोभित, सुमन अछाभित ले आयो । मनमथ के छेदन, आप अवेदन, लखि निरवेदन गुन गायौ । प्रभु.।। ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । नेवज सज भक्षक, प्रासुक अक्षक, पक्षक रक्षक स्वक्ष धरी । तुम करम निकक्षक, भस्मकलक्षक, दक्षक पक्षक रक्षकरी ||प्रभु.11 ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । तुम भ्रमतमभजन, मुनिमनकजन, रजन गजन मोहनिशा । रवि केवलस्वामी, दीप जगामी, तुम ढिग आमी पुन्यदृशा ।।प्रभु. 11 ॐ ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । दशधूप सुरगी, गध अभगी, वहीवरगी माहि हवै । वसुकर्म जरावै, धूम उडावै, तांडव भावै नृत्य पवै ।।प्रभु.।। ॐ ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वसनाय धूप नि. स्वाहा । रितुफल अतिपावन, नयनसुहावन, रसनाभावन कर लीने । तुम विघनविदारक, शिवफलकारक, भवदधितारक चरचीने । प्रभु ।। ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । शुचि स्वच्छ पठीर, गधगहीर, तदुलशीर पुष्प चलें । वर दीप धूप, आनन्दरूप, लै फल भूप अर्घ्य करूँ ||प्रभु.।। ॐ हीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अध्यॆ नि. स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२०१
पञ्चकल्याणक
(छद चौपाई)
फागुन सुदी तीज सुखदाई, गरभ सुमगल ता दिन पाई ।
मित्रादेवी उदर सु आये, जजे इन्द्र हम पूजन आये ।।
ॐ ही श्री फाल्गुनशुक्लतृतीयाया गर्भमगलगण्डिताय श्री अरनाथजिनेन्द्राय
निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर शुद्ध चतुर्दशि सोहे, गजपुर जनम भयो जग मोहै ।
सुर गुरू जजे मेरू पर जाई. हम इत पूजे मनवचकाई ।।
ॐ ही मार्गशीर्षशुक्लचतुर्दश्या जन्ममगलगण्डिताय श्री अरनाथजिनेन्द्राय
निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर सित दशमी दिन राजै, तादिन सजम-धरे विराजै ।
अपराजित घर भोजन पाई, हम पूजें इत चित हरषाई ।।
ॐ ही मार्गशीर्षशुक्लचतुर्दश्या तपोमगलमण्डिताय श्री अरनाथजिनेन्द्राय
निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक सित द्वादसि अरि चूरे, केवलज्ञान भये गुन पूरे ।
समवसरनथित धरम वखाने, जजत चरन हम पातक भाने ।।
ॐ ही कार्तिकशुक्लद्वादश्या ज्ञानमगलमण्डिताय श्री अरनाथजिनेन्द्राय
निर्वपामीति स्वाहा ।
चैत्र कृष्ण अमावस्या सव कर्म, नाशि वास किय शिव-थल पर्म ।
निहचल गुन अनन्त भेंडारी, जजो देव सुधि लेहु हमारी ।।
ॐ हीं चैत्रकृष्णअवमास्याया मोक्षमगलमण्डिताय श्री अरनाथजिनेन्द्राय
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
बाहर भीतर के जिते, जाहर अर दुखदाय ।
ता हरकर अर जिन भये, साहर शिवपुर राय ||
राय सुदरशन जासु पितु, मित्रादेवी माय
हेमवरन तन वरष वर, नब्बै सहस सुआय ।।

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। देव शास्त्र गुरू वाणी २०३ (छन्द आर्या) अरजिनके पदसार, जो पूजै द्रव्य-भाव सो प्रानी । सो पावै भवपार, अजरामर मोछथान सुखखानी ।। (पुष्पाञ्जलि क्षिपेत, इत्याशीर्वाद।) श्री मल्लिनाथ पूजन (छन्द रोडक) अपराजिततै आय नाथ मिथिलापुर जाये, कुम्भराय के नन्द प्रजापति मात बताये । कनक वरन तन तुड्ग धनुष पच्चीस विराजैं, सो प्रमु तिष्ठहु आय निकट मम ज्यो भ्रममाजै ।। ॐ ही श्री मल्लिनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट् । ॐही श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐही श्री गल्लिनाथ जिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । (छंद जोगीरासा) सुर-सरिता-जल उज्जल लै कर, मनिभृगार भराई, जनम जरामृत नाशनकारन जजहुँ चरन जिनराई । राग रोष मद मोह हरन को, तुम ही हौ वरबीरा, याते शरन गही जगपतिजी, वेग हरो भवपीरा ।। श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । बावन चन्दन कदली नन्दन, कुकुमसग घसायौ लेकर पूजौं चरनकमल प्रभु, भवआताप नशायौ ।राग. ।। श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदनम् नि. स्वाहा । तन्दुलशशिसम उज्ज्वल लीने, दीने पुञ्ज सुहाई । नाचत राचत भगति करत ही, सुरित अखैपद पाई | राग. ।। श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा । पारिजात मन्दार सुमन, सन्तानजनित महकाई मार सुमटमद भजन कारन जजहुँ तुम्हे शिरनाई ।राग.11 श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा ।

२०४ देव शास्त्र गुरु वाणी फेणी गाझा मादन मोदक आदिक मद्य उपाई । सो ले क्षुधा निवारनकारन जजई चरन लवलाई ।राग.|| ॐ ही श्री गल्लिनायटिताटाय धुधागगविनाशनाय नैवेद्य नि. ग्दाहा । तिमिरमोह उरमन्दिर मेरे, छाय रह्या दुखदाई । तासु नाशकारनका दीपक अदभुत ज्योति जगाई ।राग.।। ॐही श्री गल्लिना जिनन्द्राय माहान्धकारविनासानाय टीप नि. स्वाहा । अगर तगर कृष्णागर चन्दन चूरि सुगन्ध बनाई । अष्टकर्म जारनको तुम दिग खवतु ही जिनराई |राग.|| ॐ ही श्री मल्लिना-जिगन्दाय स्प्टकादानाय धूप निदमागीति न्दाहा । श्रीफल लोग बदाम छुहारा एला केला लाई । मोख महाफलदाय जानिके पूजा मन हरखाई राग.।। ॐही श्री मलिनाथजिनन्द्राय क्षफलप्राप्तय फल निवमाति स्वाहा । जल फल अरघ मिलाय गाय गुन पूजो भगति बढाई । शिवपदराज हेत हे श्रीधर शरन गही में आई राग.।। ॐही श्री मल्लिनाथजिनन्द्राय अनध्यपदप्राप्तय अर्घ्य निर्वनामीति स्वाहा। पंचकल्याणक (छन्द लक्ष्मीधरा) चेत की शुद्ध भली राजई, गर्भकल्यानको द्यौसतो छाजई । कुम्भराजा प्रजापति माता तने देव देवी जजे शीश नाये घने ।। ॐ हीं चैत्रशुक्लप्रतिपदाया गर्नमगल्ममण्डिताय श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वमामीति स्वाहा । मागशीर्षे सुदी ग्यारसी राजई जन्नकल्यानको द्यौस सो छाजई । इन्द्र नागेन्द्र पूजें गिरेन्द्र जिन्हें मैं जजों ध्यायके शीश नावो उन्हे ।। ॐ ही मार्गशीर्षशुक्लैकादश्या जन्ममगलममण्डिताय श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वमामीति स्वाहा । मार्गशीर्षसुदीग्यारसीके दिना, राजको त्यागदीच्छा धरी है जिना । दान गोछीर को नन्दसेने दियौ, मैं जजो जासुके रच चर्चे भयौ ।। ॐ हीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्या तपकल्याणकप्राप्ताय श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वमामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२०५
पौषकी श्यामदूजी हने घातिया, केवलज्ञान साम्राज्यलक्ष्मी लिया ।
धर्मचक्री भये सेव शक्री करे, मैं जजौं चर्न ज्यो कर्मवक्री टरै ।।
ॐ हीं पौषकृष्णद्वितीयाया केवलज्ञानप्राप्ताय श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वगामीति स्वाहा ।
फाल्गुनी सेत पाचँ अघातीहते, सिद्ध आलै बसे जाय सम्मेदते ।
इन्द्रनागेन्द्र कीन्हीं क्रियाआयके, मैं जजो सो मही ध्यायकै गायकैं ।।
ॐ हीं फाल्गुनशुक्लपचन्या गोक्षगडगलगमण्डिताय श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वमामीति स्वाहा।
जयमाला
(छन्द घत्तानन्द)
तुअ नमित सुरेशा, नरनागेशा, रजत नगेशा भगति भरा ।
भवमयहरननेशा, सुखमरनेशा, जै जै जै शिवरमनिवरा ।।
(पद्धरि छन्द)
जय शुद्ध चिदातम देव एव, निरदोष सुगुन यह सहज टेव ।
जयममतमभजन मारतड, भवि भवदधितारनको तरड
।
जय गरभजनममडित जिनेश, जय छायक समकित बुद्ध भेस ।
चौथे किय सातो प्रकृति छीन, चौ अनतानु मिथ्यात तीन । ।
सातय किय तीनो आयु नाश, फिर नवे अश नवमे विलास ।
तिन माहिं प्रकृति छत्तीस चूर, या भाति कियौ तुम ज्ञानपूर ।।
पहिले मह सोलह कह प्रजाल, निद्रानिद्रा प्रचलाप्रचाल ।
हनि थानगृद्धिको सकल कुब्ब, नर तिर्यग्गति गत्यानुपुव्व ।।
इक वे ते चौ इन्द्रिय जात, थावर आतप उद्योत घात ।
सूच्छम साधारन एम चूर, पुनि दुतिय अश वसु करयो दूर ||
चौ प्रत्याप्रत्याख्यान चार, तीजे सु नपुसकवेद टार
चौथे तियवेद विनाशकीन, पाचे हास्यादिक छहो छीन ॥
नरवेद छठे छय नियत धीर, सातय सज्वलन क्रोध चीर ।
आढ़वे सज्वलन मान भान, नवमे माया सज्वलन हान ।

२०६ देव शास्त्र गुरू वाणी इमि घात नवे दशमे पधार, सज्वलनलोभ तित हु विदार । पुनि द्वादश के द्वय अश माहि, सोरह चकचूर कियो जिनाहिं ।। निद्रा प्रचला इक भागमाहि, दुति अश चतुर्दश नाश जाहिं । ज्ञानावरनी पन दरश चार, अरि अन्तराय पाचो प्रहार ।। इमि छय त्रेशठ केवल उपाय, धरमोपदेश दीन्हो जिनाय । नव केवललब्धि विराजमान, जय तेरमगुन थिति गुन अमान || गत चौदह मे ₹ भाग तत्र, छय कीन बहत्तर तेरहत्र । वेदनी असाताको विनाश, औदारि विक्रियाहार नाश ।। तेजस्यकार मानो मिलाय, तन पञ्चपञ्च बधन विलाय । सघात पञ्च घाते महन, त्रय अगोपाग सहित भनत || सठान सहनन छह छहेव, रसवरन पञ्च वसु फरस भेव । जुग गध देवगति सहित पुव्व, पुनि अगुरूलघु उस्वास दुव्न ।। परउपघातक सुविहाय नाम, जुत अशुभमगन प्रत्येक खाम । अपरज थिर अथिर अशुभ सुमेव, दुरभाग सुसुर दुस्सर अमेव ।। अन आदर और अजस्य कित्त, निरमान नीच गोतौ विचित्त । ये प्रथम बहत्तर दिय खपाय, तव दूजे मे तेरह नशाय || पहले साता वेदनी जाय, नर आयु मनुषगति को नशाय । मानुषगत्यानु सुपूरवीय, पञ्चेन्द्रिय जात प्रकृति विधीय || त्रसबादर परजापति सुभाग, आदरजुत उत्तम गोततापात । जस करीत तीरथ प्रकृत जुक्त, ए तेरह छय करि भये मुक्त ॥ जय गुन अनन्त अविकार धार, वरनत गनधर नहि लहत पार । ताको मै बन्दौ बारबार, मेरो आपद उद्धार धार ।। सम्मेदशैल सुरपति नमत, तब मुकतथान अनुपम लसत । 'वृन्दावन' वन्दत प्रीत लाय, मम उर मे तिष्ठहु हे जिनाय ॥ (छन्छ धत्तानन्द) जय जय जिनस्वामी, त्रिभुवन नामी, मल्ल विमल कल्यान करा । भवदद विदारन आनन्द कारन, भविकुमोद निशिईश वरा ॥ ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय महाय॑ निर्वमामीति स्वाहा । .

२०७
देव शास्त्र गुरू वाणी
(छन्द शिखरिणी)
जजें हैं जो प्रानी दरब अरू भावादि विधिसो ।
करे नानाभाति भगति थुति औ नौति सुधिसो ।।
लहै शक्री चक्री सकल सुख सौभाग्य तिनकौ ।
तथा मोक्ष जावै जजत जन जो मल्लिजिनको ।।
।। पुष्पाजलि क्षिपेत्, इत्याशीर्वाद ।।
श्री मुनिसुव्रत पूजन
(छन्द मत्तगयन्द)
प्रानत स्वर्ग विहाय लियो जिन, जन्म सु राजगृहीमह आई ।
श्री सुहमित्त पिता जिनके, गुनवान महापदमा जसु माई ।।
बीस धनू तनुश्याम छबि, कछु अक हरी वरवश बताई ।
सो मुनिसुव्रतनाथ प्रभू कह, थापतु हौं इत प्रीति लगाई ।।
ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छन्द गीतिका)
उज्ज्वल सुजल जिमि जस तिहार, कनक झारी मे झरो ।
जरमरनजामन हरन कारन, धार तुम पदतर करो ।।
शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनि गुनमाल है
तसु चरन आनन्दभरन तारन, तरन विरद विशाल हैं ।।
ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा।
भवतापधायक शातिदायक, मलय हरि घसि ढिग धरूँ ।
गुन गाय शीश नमाय पूजत, विघनताप सबै हरूँ ।शिव.।।
ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन नि. स्वाहा ।
तदुल अखडित दमक शशिसम, गमक युत थारी भरूँ ।
पद अखयदायक मुकतिनायक, जानि पद पूजा करूँ ।।शिवः ।।
ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत नि. स्वाहा ।

२०८ देव शास्त्र गुरू वाणी बेला चमेली चमेली रायवेली, केतकी करना सस जगजीत मनमथहरन लखि प्रभु तुम निकट ढेरी करूँ शिवः ।। ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय कामवाणविघ्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । पकवान विविध मनोज्ञ पावन, सरस मृदु गुन विस्तसँ । सो लेय तुम पदतर धरत ही, छुधा डाइन को हरूँ । शिव.।। ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवद्य नि. स्वाहा । दीपक अमोलिक रतन मनिमय तथा पावन घृत मरूँ । सो तिमिर मोह विनाश आतम, भासकारन ज्वै धरु शिव.।। ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । करपूर चन्दन चूर भूर सुगन्ध पावक मे धरूँ । तसु जरत जरत समस्त पातक, सार निज सुखको मसँ । शिव.।। ॐ ही श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । श्रीफल अनार सु आम आदिक, पक्व फल अति विस्तसै । सो मोक्षफलके हेतु लेकर, तुम चरन आगे धरूँ ।शिव. ।। ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । जलगध आदि मिलाय आठो, दरब अरघ सजो वरूँ । पूजो चरनरज भगत जुत, जाते जगत सागर तरूँ शिव.।। ॐ हीं श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अयं निर्वपामीति स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छद त्रोटक) तिथि दोयज सावन श्याम भयो, गरमागम मगल मोद थयो । हरिवृन्द सची पितृ मातृ जजे, हम पूजत ज्यों अघ ओघ भजे || ॐ ही प्रावणकृष्णद्वितीयाया गर्ममगलप्राप्ताय श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अy निर्वपामीति स्वाहा । वयसाख वदी दशमी वरनी, जनमे तिहि द्यौस त्रिलोकधनी । सुरमन्दिर ध्याय पुरन्दर ने, मुनिसुव्रतनाथ हमें सरने ।। ॐ ही वैशाखकृष्णदशम्या जन्नमगलप्राप्ताय श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२०६
तप दुद्धर श्रीधर ने गहियो, वयसाख वदी दशमी कहियो ।
निरूपाधि समाधि सुध्यावत हैं, हम पूजत भक्ति बढावत हैं ।।
ॐ ही वैशाखकृष्णदशम्या तपोमगलमडिताय श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
वर केवलज्ञान उद्योत किया, नवमी वयसाख वदी सुखिया ।
घनि मोहनिशाभनि मोखमगा, हम पूजि चहें भवसिन्धु थगा ।।
ॐ हीं वैशाखकृष्णदशम्या ज्ञानमगलमडिताय श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
वदि बारस फागुन मोच्छ गये, तिहुँ लोक शिरोमनि सिद्ध भये ।
सु अनन्त गुनाकर विघ्न हरी, हम पूजत हैं मनमोद भरी ।।
ॐ हीं फाल्गुनकृष्णद्वादश्या मोक्षमगलमडिताय श्री मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
मुनिगननायक मुक्तिपति, सूक्त व्रताकरयुक्त ।
भुक्तिमुक्तिदातार लखि, बन्दूँ तन मन युक्त ||
(छन्द त्रोटक)
जय केवल भान अमान धर, मुनि स्वच्छसरोज विकासकर ।
भव सकट भजन लायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
घनघातवन दवदीप्त भन, भविबोधतृषातुर मेघधन ।
नित मगलवृन्द बधायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
गरभादिक मङ्गलसार धरे, जगजीवन के दुखदद , हरे ।
सब तत्त्वप्रकाशन वायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
शिवमारगमडन तत्त्व कह्यो, गुनसार जगत्रय शर्म लह्यो ।
रूज-रागरू दोष मिटायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक है ।।
समवसृति मे सुरनार सही, गुन गावत नावत भालमही ।
अरू नाचत भक्ति बढायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।

२१०
देव शास्त्र गुरू वाणी
पगनूपूर की धुनि होत भन, झनन झनन झनन झनन ।
सुरलेत अनेक रमायक है, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
घनन घनन धन घट बजै, तनन तनन तनतान सजै ।
दृम-दृम मिरदग वजायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
छिन मे लघु औ छिन थूल वने, युत हावविभाव विलासपने ।
मुखते पुनि यो गुनगायक है, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
धृगता धृगता पग पावत है, सनन सनन सु नचावत हैं ।
अति आनन्द को पुनि पायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक है ।।
अपने भवको फल लेत सही, शुभ भावनिते सब पाप दही ।
तित ते सुखको सब पायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
इन आदि समाज अनेक तहॉ, कहि कौन सकै ज विभेद यहाँ ।
घन श्री जिनचन्द सुधायक हैं, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
पुनि देश विहार कियौ जिनने, वृष अमृतवृष्टि कियो तुमने ।
हमको तुमरी शरनायक है, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
हम पै करूना करि देव अबै, शिवराज समाज सु देहु सबै ।
जिमि होहुँ सुखाश्रमनायक है, मुनिसुव्रत सुव्रतदायक हैं ।।
भवि वृन्दतनी विनती जु यही, मुझ देहु अभैपद राज सही ।
हम आनि गही शरनायक हैं, मुनिसुव्रत सुवतदायक हैं ।।
(छन्द घत्तानन्द)
जयगुनधारी, शिवहितकारी, शुद्धबुद्ध चिद्र पपती ।
परमानन्ददायक, दास सहायक, मुनिसुव्रत जयवन्त जती ।।
ॐ हीं मुनिसुव्रतजिनेन्द्राय जयमालामहार्य्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
श्री मुनिसुव्रत के चरन, जो पूजै अभिनन्द ।
सो सुरनर सुख भोगके, पावै सहजानन्द ।
पुष्पाञ्जलिम् क्षिपेत, इत्याशीर्वाद ।

२११ देव शास्त्र गुरू वाणी श्री नमिनाथ पूजन (रोडक) श्री ननिनायजिनेन्द्र नमो विजयारथनन्दन, विख्यादेवी नातु सहज सब पापनिकन्दन । अपराजित तजि जये मिथिलापुर वर आनन्दन, तिनं सु थापो यहाँ त्रिधा करिके पदवन्दन । ॐ श्री नामिनायजिन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट | ॐहीश्री नतिजोन्द्र । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐहीश्री नमिशाजिनेन्द्र । अत्रमा सजिस्तिो भव भव वषट। (छन्द जोगीरासा) सुरनदी जल उज्ज्वल पावन, कनकगृड्ग भरो मनमावन जजतु हौं नमिक गुन गायके, जुगपदाबुज प्रीति लगायके ।। ॐ श्री नगिमाजिीन्द्राग जन्मजरागृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । हरि गल मिलि फेशरसो घसो, जगतनाथ भवातापको नसो । जजतु ही नमिके गुन गायके, जुगपदायुज प्रीति लगायके ।। ॐ श्री नमिायजिनेन्दाय गवतापविनाशनाय चन्दाम नि. स्वाहा । गुलक के सम सुन्दर तन्दुल, धरत पुञ्जसु भुञ्जत सकुल । जजतु ही नमिके गुन गायके, जुगपदायुज प्रीति लगायके ।। ॐ ही श्री नमिनापजिान्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत निर्वपामीति स्वाहा । कमल केतुकि चेलि सुहावनी, समरसूल समस्त नसावनी । जजतु ही नमिके गुन गायके, जुगपदाबुज प्रीति लगायके ।। ॐ ही श्री नमिनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । शशि सुधासम मोदक मोदन, प्रवल दुष्ट छुदामद खोदन । जजतु हाँ नमिके गुन गायके, जुगपदावुज प्रीति लगायके ।। ॐ ही श्री नमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि. स्वाहा । शुचि घृताश्रित दीपक जोइया, असम मोह महत्तम खोइया । जजतु ही नमिके गुन गायके, जुगपदावुज प्रीति लगायके ।। ॐ ही श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा ।

२१२ देव शास्त्र गुरु वाणी अमरजिह विर्षे दशगधको दहत दाहत कर्म के वधको । जजतु हाँ नमिक गुन गायके जुगपदाबुज प्रीति लगायकं ॥ ॐ ही श्री नमिनाथजिनेन्दाय अप्टकमविघ्वसनाय धूप नि स्वाहा । फल सुपक्व मनोहर पावने सकल विघ्न समूह नशावने । जजतु ही नमिके गुन गायके जुगपदावुज प्रीति लगायके || ॐ ही श्री नमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फल नि. स्वाहा । जल फलादि मिलाय मनोहर अरघ धारत ही भय भो हर | जजतु हो नमिके गुन गायर्क, जुगपदाबुज प्रीति लगायके ।। ॐ हीं श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तय अय॑म् नि स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द पाईता) गरमागम मगलधारा जुग आश्विन श्याम उदारा । हरि हर्षि जजे पितुमाता हम पूजे त्रिभुवन ताता ।। ॐ ही श्री आश्विनकृष्णद्वितीया गर्भमगलमण्डिताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जनमोत्सव श्याम असाढा दशमी दिन आनन्द बाढा । हरि मन्दर पूजे जाई हम पूजे मनवचकाई ।। ॐ ही श्री आषाढकृष्णदशम्या जन्ममगलमण्डिताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । तप दुद्धर श्रीधर धारा, दशमीकलि षाढ उदारा । निज आतम-रस झर लायौं, हम पूजत आनन्द पायौँ ।। ॐ ही श्री आषाढकृष्णदशम्या तपोमगलमण्डिताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सित मगसिर ग्यारस चूरे, चवघाति भये गुन पूरे । समवसृत केवलधारी, तुमको नित नौति हमारी ।। ॐ ही श्री मार्गशीर्षशुक्लैकादश्या ज्ञानमगलमण्डिताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । वयसाख चतुर्दशि श्यामा, हनि शेष वरी शिववामा । सम्मेद थकी भगवन्ता, हम पूजै सुगुन अनन्ता ।। ॐ हीं श्री वैशाखकृष्णचतुर्दश्या मोक्षमगलमण्डिताय श्री नमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी २१३ जयमाला (दोहा) आयु सहसदश वर्ष की, हेमवरन तन सार । धनुष पञ्चदश तुग तन, महिमा अपरम्पार ।। (चौपाई) जै जै जै नमिनाथ कृपाला, अरिकुल गहन दहन दवज्वाला । जै जै धरमपयोधर धीरा, जय भवभजन गुनगम्भीरा ।। जै जै परमानन्द गुन धारी, विश्व विलोकन जनहिकारी अशरन शरन उदार जिनेशा, जै जै समवशरन आवेशा ।। जै जै केवलज्ञान प्रकाशी, जै चतुरानन हनि भवफॉसी । जै त्रिभुवनहित उद्यमवन्ता, जै जै जै जै नमि भगवन्ता ।। जै तुम सप्ततत्त्व दरशायो, तास सुनत भवि निजरस पायो । एक शुद्ध अनुभव निज भाखे, दो विधि राग-दोष , आखे ।। द्वै श्रेणी दै नय द्वै धर्म, दो प्रमाण आगमगुन शर्मं । तीन लोक त्रयजोग तिकाल, सल्ल पल्ल त्रय बात बयाल ।। चार बन्ध सज्ञागति ध्यान, आराधन निछेप चउदान पञ्चलब्धि आचार प्रमाद, बन्धहेतु पैताले साद ।। गोलक पञ्चभाव शिव भौंने, छहो दरब सम्यक अनुकौने । हानि वृद्धि तप समय समेता, सप्तभड्ग वानो के नेता ।। सजम समुदघात भय सारा, आठ करम मद सिध गुन धारा । नवो लबधि नव तत्त्व प्रकाशे, नोकषाय हरि तूप हुलाशे ।। दशो बन्ध के मूल नशाये, यो इन आदि सकल दरशाये । फेर विहरि जगजन उद्धारे, जै जै ज्ञान दरश अविकारे ।। जै वीरज जै सूक्षमवन्ता, जै अवगाहन गुन वरनन्ता जै जै अगुरूनघू निरबाधा, इन गुनयुत तुम शिव सुखसाधा ।। ताको कहत थके गन धारी, तौ को समरथ कहैं प्रचारी । तातै मैं अब शरनै आया, भवदुख मेटि देहु शिवराया ।। बारबार यह अरज हमारी, हे त्रिपुरारी हे शिवकारी । परपरनति को बेगि मिटावो, सहजानन्द सरूप भिटावो ||

२१४
देव शास्त्र गुरू वाणी
'वृन्दावन' जाँचत शिरनाई, तुम मम उर निवसौ जिनराई ।
जबलो शिव नहि पावो सारा, तबलो यही मनोरथ म्हारा ||
(छन्द घत्तानन्द)
जय जय नमिनाथ, हो शिवसाथ, औ अनाथके नाथ सद |
ताते शिरनायौ, भगति बढाऔ, चिह चिह शतपत्र पद ||
ॐ ही श्री नमिनाथजिनेन्द्राय महाअर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
श्री नमिनाथतने युगल, चरन जजै जो जीव ।
सो
सुर नर सुख भोगवर, होवै शिवतिय पीव ।।
परिपुष्पाजलिम् क्षिपेत्, इत्याशीर्वाद ।
श्री नेमिनाथ पूजन
(छन्द लक्ष्मी तथा अर्द्धलक्ष्मीधरा)
जैति जै जैति जै जैति जै नेमकी,
धर्म अवतार दातार श्यौचैन की ।
श्री शिवानन्द भौफन्द निकन्द की,
ध्यावै जिन्हें इन्द्र नागेन्द्र ओ मैनकी ।।
पर्म कल्याणके दे नहारे तुम्ही,
देव हो एव तातै करौ ऐनकी ।
थापि हौ वार त्रै शुद्ध उच्चार त्रै,
शुद्धताधार भौ पार लेनकी
ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्र । अत्र अवतर अवतर सवौषट |
ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्र । अत्र तिष्ट तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ ही श्री नेमिनाथजिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट।
(चाल होली ताल जत्त)
दाता मोक्ष के, श्री नेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के ||ठेक।।
निगमनदी जल प्राशुक लीनौ, कञ्चनमृड्ग भराय ।
मनवचतनतै धार देत ही, सकल कलक नसाय ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २१५ दाता मोक्ष के, श्री नेमिनाथ जिनराय ।।दाता.।। ॐ ही श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल नि. स्वाहा । हरिचन्दनयुत कदलीनन्दन, कु कुमसड़ ग घसाय विघनतापनाशन के कारन, जजौं तिहारे पाय ।।दाता.।। ॐ ही श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चदन नि. स्वाहा । पुण्यराशि तुम यशसम उज्ज्वल, तन्दुल शुद्ध मगाय अखयसौख्य भोगनके कारन, पुञ्ज धरूँ गुनगाय ।।दाता.।। ॐ ही श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षत निर्वपामीति स्वाहा । पुण्डरीकतृणद्रुम को आदिक, सुम आदिक, सुमन सुगन्ध सुगन्ध मिलाय । दर्पकमनमथ भजन कारन, जजहुँ चरन लवलाय ||दाता.।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय कामवाणविध्वसनाय पुष्प नि. स्वाहा । घेवर बावर खाजे साजे, ताजे तुरित मॅगाय । क्षुधावेदनी नाश करन को, जजहुँ चरन उमगाय दाता.।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा। कनकदीप नवनीत पूरकर, उज्ज्वल जोति जगाय तिमिरमोहनाशक तुमको लखि, जजहुँ चरन हुलसाय । दाता.।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि. स्वाहा । दशविधि गन्ध मगाय मनोहर, गुजत अलिगन आय दशोबन्ध जारनके कारन, खेवो तुम ढिग लाय ||दाता.।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूप नि. स्वाहा । सुरसवरन रसना-मनभावन, पावन फल सु मगाय मोक्षमहाफल कारन पूजो, हे जिनवर तुम पाय ||दाता. ।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि. स्वाहा । जलफल आदि साज शुचि लीने, आठो दरब मिलाय । अष्टम थितिके राजकरनको जजो अड्ग वसु नाय ||दाता. ।। ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यम् नि. स्वाहा । पञ्चकल्याणक (छन्द पाईता) सित कातिक छट्ठ अमन्दा, गरमागम आनन्दकन्दा । शचि सेय शिवापद आई, हम पूजत मनवचकाई 1 ॐ हीं कार्तिकशुक्लषष्टया गर्भमगलमडिताय श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

- २१६ देव शास्त्र गुरू वाणी सित सावन छट्ठ अमन्दा, जनमे त्रिभुवनके चन्दा । पितु समुद महासुख पायो, हम पूजत विध्न नशायो ।। ॐ ही श्रावणशुक्लषष्ठया जन्ममगलमडिताय श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । तजि राजमती व्रत लीनो, सिवसावन छट्ठ प्रवीनो । शिवनारी तबै हरषाई, मै पूजै पद शिरनाई ।। ॐ हीं श्रावणशुक्लषष्टया तपोमगलमडिताय श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सित आश्विन एकम चूरे, चारो घाती अति कूरे । लहि केवल महिमा सारा, हम पूजै अष्ट प्रकारा ।। ॐ हीं आश्विनशुक्लप्रतिपदि ज्ञानमगलमडिताय श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सितषाढ अष्टमी चूरे, चारो अघातिया करे । शिव उर्जयन्ते पाई, हम पूजै ध्यान लगाई ।। ॐ ही आषाढशुक्लअष्टम्या मोक्षमगलमडिताय श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । जयमाला (दोहा) श्याम छबी तन चाप दश, उन्नत गुननिधिधाम । शख चिन्ह पद मे निरखि, पुनि-पुनि करूँ प्रणाम ।। (छन्द पद्धरी) जै जै जै नेमि जिनन्द चन्द, पितु समुदमन आनन्दकन्द । शिवमात कुमुद मनमोतदाय, भविवृन्द चकोर सुखी कराय || जय देव अपूरव मारतड, तुमकीन ब्रह्म सुत सहस खड । शिवतिय मुखजलज विकाशनेश, नहीं रही सृष्टि मे तम अशेष ।। भविभीत कोक कीनो अशोक, शिवमग दरशायो शर्मथोक । जै जै जै जै तुम गुन गम्भीर, तुम आगम निपुण पुनीत धीर ।। तुम केवल जोति विराजमान, जै जै जै जै करूनानिधान । तुम समवसरन मे तत्त्वभेद, दरशायो जाते नशत खेद ||

२१७
देव शास्त्र गुरू वाणी
तित तुमको हरि आनन्द धार, पूजत भगतीजुत बहु प्रकार |
पुनि गह्य-पह्य मय सुजस गाय, जै बल अनन्त गुणवन्तराय ।।
जै शिवशकर ब्रह्मा महेश, जय बुद्धि विधाता विष्णुवेस ।
जय कुमतिमतगनको मृगेन्द्र, जय मदनध्वातको रवि जिनेन्द्र ।।
जय कृपासिन्धु अविरूद्ध बुद्ध, जय रिद्ध सिद्ध दाता प्रबुद्ध ।
जय जगजनमनरजन महान, जय भवसागरमह सुष्टु यान ।।
तब भगति करें ते धन्य जीव, ते पावै दिव शिवपद सदीव ।
तुमरो गुन देव विविध प्रकार, गावत नित किन्नर की जु नार ।।
वर भगति माहि लवलीन होय, नाचै ताथेई थेई थेई बर्हाय ।
तुम करूणासागर सृष्टिपाल, अब मोको वेगि करो निहाल ।।
मैं दुख अनन्त वसु करम जोग, भोगे सदीव नहि और रोग ।
तुमको जग में जान्यो दयाल, हो वीतराग गुन रतनमाल ||
ताते शरना अब गही आय, प्रभु करो वेगि मेरी सहाय ।
यह विधन करम मम खड-खड, मनवाछित कारज मड-मड ।।
ससार कष्ट चक चूर चूर, सहजानन्द मम उर पूर पूर ।
निज पर प्रकाशबुधि देह देह, तजि के विलम्ब सुधि लेह लेह ।।
हम जाचत हैं यह बार बार, भवसागर ते मो तार तार |
नहि सह्यो जात यह जगत दुख, ताते विनवो हे सुगुनमुक्ख ।।
(छन्द घत्तानन्द)
श्री नेमिकुमार जितमदमार, शीलागार सुखकार ।
भवभय हरतार, शिवकरतार, दातार धर्माधार ।।
ॐ हीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय महाय॑म् निर्वपामीति स्वाहा ।
(मालिनी)
सुख धन जस सिद्धि पुत्र-पौत्रादि वृद्धि ।
सकल मनसि सिद्धि होतु है ताहि रिद्धि ||
जजत हरषधारी नेमि को जो अगारी ।
अनुक्रम अरि जारि सो वरे मोक्ष नारी ।।
(पुष्पाजलिम् क्षिपेत्, इत्याशीर्वाद)

२१८
देव शास्त्र गुरू वाणी
स्वयंभू स्तोत्र भाषा
चौपाई
राज विषै जुगलनि सुख कियो, राजत्याग भवि शिवपट लियो ।
स्वयबोध स्वयभू भगवान, बदौं आदिनाथ गुणखान ||१||
इन्द्र क्षीरसागर जल लाय, मेरू न्हवाये गाय बजाय ।
मदनविनाशक सुखकरतार, बदौंअजित अजित-पदकार IRI
शुक्लध्यानकरि करमविनाशि, घाति अघाति सकलदुखराशि ।
लह्यो मुकतिपद सुख अविकार, बदौ सभव भव दुख टार ।।३।।
माता पश्चिम रयनमझार, सुपने देखे सोलह सार ।
भूप पूछि फल सुनि हरषाय, बदौं अभिनन्दन मनलाय ||४||
सब कुवाद वादी सरदार, जीते स्यादवाद धुनि धार ।
जैनधरम परकाशक स्वाम, सुमतिदेवपद करहुँ प्रणाम ||५||
गर्भ अगाऊ धनपति आय, करी नगर शोभा अधिकाय ।
बरसे रतन पचदश मास, नमो पदमप्रभु सुख की राश ।।६।।
इन्द्र फणीन्द्र नरेन्द्र त्रिकाल, बानी सुनि सुनि होहिं खुशाल ।
द्वादश सभा ज्ञानदातार, नमो सुपारसनाथ निहार [७।।
सुगुन छियालीस हैं तुम माहि, दोष अठारह कोऊ नाहिं ।
मोहमहातम नाशक दीप, नमो चद्रप्रभु राख समीप ||८||
द्वादश विध तप करम विनाश, तेरह विध चारित्र प्रकाश |
निज अनिच्छ भवि इच्छकदान, बदौं पुष्पदत मन आन ||६||
भविसुखदाय सुरगतै आय, दशविधि धरम कह्यो जिनराय ।
आप समान सबनि सुख देह, बदौं शीतल धर्मसनेह ||१०||
समता सुधा कोपविष नाश, द्वादशाग वानी परकाश |
चारसघ-आनद-दातार, नमो श्रेयास जिनेश्वर सार ||११।।
रतनत्रय चिरमुकुट विशाल, शौभै कठ सुगुन मनिमाल |
मुक्तिनार भरता भगवान वासुपूज्य बौं घर ध्यान’ ||१२||

देव शास्त्र गुरू वाणी ૨૧૬ परम समाधि-स्वरूप जिनेश, ज्ञानी ध्यानी हित उपदेश । कर्मनाशि शिवसुख विलसत, बदौं विमलनाथ भगवत ।।१३।। अन्तर बाहिर परिग्रह डारि, परम दिगबरव्रत को धारि । सर्वजीवहित-राह दिखाय, नमो अनत वचन-मनलाय ||१४|| सात तत्व पचासतिकाय, नव पदार्थ छह द्रव्य बताय । लोक अलोक सकलपरकाश, बदौं धर्मनाथ अविनाश ।।१५।। पचम चक्रवर्ति निधिभोग, कामदेव द्वादशम मनोग । शॉतिकरण सोलम जिनराय, शातिनाथ बदौं हरषाय ||१६ ।। बहुथुति करे हरष नहि होय, निदे दोष गहैं नहि कोय । शीलवान परब्रह्मस्वरूप, बदौं कुथुनाथ शिवभूप ||१७।। द्वादशगण पूजे सुखदाये, थुति बदना करे अधिकाय । जाकी निजथुति कबहुँ न होय, बदौं अर जिनवर-पद दोय ||१८|| परभव रतनत्रय-अनुराग, इह भव ब्याह समय वैराग । बाल ब्रह्म-पूरन व्रत धार, बदो मल्लिनाथ जिनसार ||१६|| बिन उपदेश स्वय वैराग, थुति लोकात करै पगलाग । नम सिद्ध कहि सब व्रत लेहि, बदौं मुनिसुव्रत व्रत देहिं ।।२०।। श्रावक विद्यावत निहार, भगति भावसो दियो अहार बरसी रतनराशि तत्काल, बदौं नमिप्रभ दीनदयाल ||२१|| सब जीवन की बदी छोर, रागद्वेष द्वै बधन तोर । राजुल तज शिवतिय सो मिले, नेमिनाथ बदौं सुखनिले ।।२२।। दैत्य कियो उपसर्ग अपार, ध्यान देखि आयो फनधार । गयो कमठ शठ मुखकरश्याम, नमो मेरूसम पारसस्वाम ||२३।। भवसागर” जीव अपार, धरम पोत मे धरे निहार । डूबत काढे दया विचार, वर्द्धमान बदौं बहुबार ।।२४।। दोहा चौबीसो पदकमलजुग, बदौ मनवचकाय 'धानत' पढे सुने सदा, सो प्रभु क्यो न सहाय ।। (इत्याशीर्वाद) ।

२२० देव शास्त्र गुरू वाणी क्षमावाणी पूजा तनो दृढ मूल बखानो । ठानो । छप्पयछद अग क्षमा जिन धर्म सम्यक रतन सभाल हृदय मे निश्चय जानो ।। तज मिथ्या विष मूल और चित निर्मल जिनधर्मी सो प्रीति करो सब पातक भानो ।। रत्नत्रय गह भविक जन, जिन आज्ञा सम चालिए । निश्चय कर आराधना, कर्म राशि को जालिए ।। ओ ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रयाय नम अत्रावतरावतर सवौषट | अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट । - अथाष्टकम् क्षमा गहो उर जीवडा, जिनवर वचन गहाय ।।टेक।। नीर सुगन्ध सुहावनो, पद्म द्रह को लाय जन्म रोग निरवारिये, सम्यक् रत्न लहाय ||क्षमा.।।१।। प्रत्येक अग के पीछे नम बोलना है । ओ ही १ निशकितागाय नम २ निकाक्षितागाय नम ३ निर्विचिकित्सागाय नम ४ निर्मूढतायै नम ५ उपगृहनागाय नम ६ स्थितिकरणागाय नम ७ वात्सल्यागाय नम ८ प्रभावनागाय नम ६ ओ ही व्यजन व्यजिताय १० अर्थ समग्राय ११ तदुभय समग्राय १२ कालाध्ययनाय १३ उपध्यानोपन्हिताय १४ विनयलब्धिसहिताय १५ गुरूवादापन्हवाय १६ बहु मानोन्मानाय १७ ओ ही अहिसा व्रताय १८ 'सत्य व्रताय' १६ अचौर्यव्रताय २० ब्रह्मचर्यव्रताय २१ अपरिग्रहव्रताय २२ मनोगुप्तये २३ वचन गुप्तये २४ कायगुप्तये २५ ईर्यासमितये २६ भाषा समितये २७ एषण समितये २८ आदान निक्षेपण समितये २६ प्रतिष्ठापना समितये नम जल । के सर चन्दन लीजिये, स ग कपूर घसाय अलि पकति आवत घनी, बास सुगन्ध सुहाय ||क्षमा० ।।२।। ओ ही अष्टाग सम्यग्दर्शन, अष्टाग सम्यग्ज्ञान, त्रयोदश विध सम्यकचारित्रेभ्यो नम चन्दन निर्वपामि.।२।। - देव शास्त्र गुरू वाणी २२१ शालि अडित लीजिए. कचन थाल भराय जिनपद पूजो भावसो अक्षयपद को पाय क्षमा.।।३।। ही अटागसगी स्टागसम्परतान, नयोदश बिध सम्यकचारित्रेभ्यो स्मता दिपानि ||३|| पारिजात सरू केतकी, पहप सुगन्ध गुलाब पोजिन गण सरोजका पूज हरष चित चाव ||क्षमा. ।।४।। अहीस्टाTER.दरा टागसम्परा.त्रयोदश विघ सम्यकचारित्रेभ्यो न? पुप निपा IST शक्कर पृत नुरभी तनो. व्यजन षट्रस स्वाद जिनके निकट पदाय कर, हिरदे धरि आहलाद ||क्षमा.।।५।। ही ज्यादा स्टागसम्यगत त्रयोदश विध सम्यकचारित्रेभ्यो ना पागि II हाटकमय दीपक रचो. वाति कपूर सुधार शोधक घृतकर पूजिये, मोह तिमिर निरवार ||क्षमा. ।।६।। ही अगसम्बादी स्टागसम्यमान त्रयोदश विध सम्यकचारित्रेभ्यो नग दीप निर्यपामि.III कृष्णागर करपूर हो. अथवा दश विध जान जिन चरणा ढिग खेश्य, अष्ट करम की हान ||क्षमा.।७।। ओही अप्टागसमग्दर्शन अप्टागसम्यग्ज्ञान त्रयोदश विच सम्यकचारित्रेभ्यो नम धूप निर्वपामि. I७॥ केला अम्ब अनार हो, नारिकेल ले दाखा अग्रधरी जिन पद तने, मोक्ष होय जिन भाख ||क्षमा.11८|| ओही अप्टाग सम्यग्दर्शन अप्टाग सम्यग्ज्ञान, त्रयोदश विध सम्यकचारित्रेभ्यो नम फल निर्वपानि.111 जल फल आदि मिलाइके, अरघ करो हरषाय दुख जलाजलि दीजिए, श्रीजिन होय सहाय ||क्षमा. 116 || ऑ ही अप्टाग सम्यग्दर्शन,अप्टाग सम्यग्ज्ञान, त्रयोदश विध सम्यकचारित्रेभ्यो नम अयं निर्वपामि.1७11

२२२
देव शास्त्र गुरू वाणी
जयमाला
दोहा
उनतिस अग की आरती, सुनो भविक चित लाय ।
मन वच तन सरधा करो, जौ नर भव पाय ||१||
चौपाई
जैनधर्म मे शक न आनै, सो नि शकित गुण चित ठाने ।
जप तप कर फल वाछे नाही, नि काक्षित गुण हो जिस माहीं ।।२।।
परको देखि गिलान न आने, सो तीजा सम्यक् गुण ठाने ।
आन देवको रच न माने, सो निर्मूढता गुण पहिचाने ।।३।।
परको औगुण देख जु ढाके, सो उपगूहन श्रीजिन भाखे ।
जैन धर्म ते डिगता देखे, थापे बहुरि थिति कर लेखे ।।४।।
जिनधर्मी सो प्रीति निवहिये, गऊ बच्छावत् वच्छल कहिये ।
ज्यो त्यो जैन उद्योत बढावे, सो प्रभावना अग कहावे ।।५।।
अष्ट अग यह पाले जोई, सम्यग्दृष्टि कहिये सोई ।
अब गुण आठ ज्ञान के कहिये, भाखे श्रीजिन मन मे गहिये ।।६।।
व्यजन अक्षर सहित पढीजे, व्यजन व्यजित अग कहीजे ।
अर्थ सहित शुध शब्द उचारे, दूजा अर्थ समग्रह धारे |७||
तदुभय तीजा अग लखीजे, अक्षर अर्थ सहित जु पढीजे ।
चौथा कालाध्ययन विचारै काल समय लखि सुमरण धारे ||८||
पचम अग उपधान बतावै, पाठ सहित तब बहु फल पावे ।
षष्टम विनय सुलब्धि सुनीजै, वानी विनय युक्त पढलीजे ||६||
जापै पढे न लौपै जाई, सप्तमअग गुरूवाद कहाई ।
गुरूकीबहुतविनयजु करीजे, सो अष्टम अग धर सुख लीजे ||१०||
यह आठो अग ज्ञान बढावे, ज्ञाता मन वच तन कर ध्यावे ।
अब आगे चारित्र सुनीजे, तेरह विध धर शिव सुख लीजे ।।११।।
छहो कायकी रक्षा कर है, सोई अहिसाव्रत हित धर है ।
हितमितसत्य वचन मुख कहिये, सो सतवादी केवल लहिये ।।१२।।

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२२४ देव शास्त्र गुरू वाणी श्री णमोकार मंत्र पूजन ॐ णमो अरिहताण जप अरिहतो का ध्यान करूँ । ॐ णमो सिद्धाण जप कर सिद्धो का गुणगान करूँ ॥ ॐ णमो आइरियाण जप आचार्यों को नमन करूं । ॐ णमो उवज्झायाण जप उपाध्याय को नमन करूँ | णमो लोए सव्वसाहूण जप सर्व साधुओ को वन्दन । णमोकार का महा मन्त्र जप मिथ्यातम को करूँ वमन || एसो पच णमोयारो जप सर्व पाप अवसान करूँ । सर्व मगलो मे पहिला मगल पढ मगल गान करूँ || णमो कार का मत्र जपू मैं णमो कार का ध्यान करूँ । णमो कार की महाशक्ति से निज आतम कल्याण करूँ || ॐ ही श्री पच नमस्कार मत्र अत्र अवतर-अवतर सवौष्ट ॐ ही श्री पच नमस्कार मत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ हीं श्री पच नमस्कार मत्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट | ज्ञानावरणी कर्मनाश हित मिथ्यातम का करूँ अभाव । जन्म मरण दुख क्षय कर डालूँ प्राप्त करूँ निजशुद्ध स्वभाव ।। णमोकार का मत्र जपू मै णमोकार का ध्यान करूँ । णमोकार की महाशक्ति से नाथ आत्म कल्याण करूँ ॥ ॐ ही श्री पच नमस्कार मत्राय ज्ञानावरणी कर्म विनाशनाय जलम् निर्वपामीति स्वाहा। दर्शन आवरणी क्षय करने चिर अविरति का करू अभाव । यह ससारताप क्षय करने प्राप्त करूँ निज शुद्ध स्वभाव ।णिमो.।। ॐ हीं श्री पच नमस्कार मत्राय दर्शनावरणी कर्म विनाशनाय चन्दनम् नि । वेदनीय की पीडा हरने करवू पच प्रमाद अभाव । अक्षय पद पाने को स्वामी प्राप्त करूँ निज शुद्ध स्वभाव ।।णमो.।। ॐ हीं श्री पच नमस्कार मत्राय वेदनीय कर्मनाशाय अक्षतम् नि । मोहनीय का दर्प कुचलदू करलू पूर्ण कषाय अभाव । काम वाण की व्याधि मिटाऊँ प्राप्त करूँ निज शुद्ध स्वभाव ।।णमो.।। ॐ ह्रीं श्री पच नमस्कार मत्राय मोहनीय कर्म विध्वसनाय पुष्पम् नि. ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२२५
आयु कर्म से सर्वनाश हित शीघ करूँ त्रय योग अभाव ।
भुगनाधिका नारा प्राप्त कल निज शुद्ध स्वभाव ।।णमो.।।
भी र आयु का नाशाय नवयम् नि. ।
नाम वर्ग का मूल गेटा दू नष्ट कल मैं सब विभाव ।
rn स्याग दिनारा पाल # प्राप्त करू निज शुद्ध स्वभाव ।।
मनोकार को मन जणू णमोकार का ध्यान करू ।
नकार की गति से नाश आत्म कल्याण कसैं ||
श्री. आग नाशाय दीपग नि. ।
गोत्र फर्म को दना कार में कर्म प्रकृति सर करूँ अभाव ।
अष्ट कर्म शिस कर्म प्राप्त कसै निज शुद्ध स्वभाव णमो.।।
ॐ RTR 37 गोन पर्मनाशाय धूपण नि. ।
आराय मूल्य पर सर्व वष का कलें अमाव
परम जल पावामी प्राप्त कसै निज शुद्ध स्वभाव । णमो.।।
* PRIर मना कर्मनाशाय फाल्म नि. ।
परम भेद विकास प्राप्त कर करलू मैं ससार अभाव ।
पद अनए गाने को स्वामी प्राप्त कर निज शुद्ध स्वभाव । णमो.।।
ॐ नगर-रायर्धय पद प्राप्ताय अध्यम् नि ।
जयमाला
णमाकार जिन पत्र का जाप कले दिन रात
पाप पुण्य का नाश कर पाऊ मोक्ष प्रभात ।।
छयालीस गुण धारी स्वामी नमस्कार अरिहतो को ।
अष्ट स्वगुण धारी अनत गुण मडित बन्दू सिद्धो को ।।
है छत्तीस गुणों से भूपित नमस्कार आचार्यों को ।
हैं पच्चीस गुणों से शोभित नमस्कार उपाध्यायो को ।।
अगाईस मूल गुणधारी नमस्कार सव मुनियो को ।
ॐ शब्द मे गर्भित पाचों परमेष्ठी प्रभु गुणियो को ।।
सर्व मड़गलो मे सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ मगलदाता ।
ही शब्द मे गर्भित चौवीसो तीर्थडकर विख्याता ।।

२२६ देव शास्त्र गुरू वाणी णमोकार पेंतीस अक्षर का मत्र पवित्र ध्यान कर लूँ । यह नवकार मत्र अडसठ अक्षर से युक्त ज्ञान कर लूँ ।। "अर्हत् सिद्धाचार्योपाध्याय सर्व साधुनम" भज लूँ । सोलह अक्षर का यह पावन मत्र जपू दुष्कृत तज लूँ ।। छह अक्षर का मत्र जपूँ "अरहत सिद्ध" को नमन करूँ । "अ सि आ उ सा" पचाक्षर का मत्र जपूँ अघ शमन करूँ ।। अक्षर चार मत्र जप लूँ "अरहत" देव का ध्यान करूँ । 'अहम" अक्षर तीन, मत्र जप स्वपर भेद विज्ञान करूँ ।। दो अक्षर का "सिद्ध" मत्र जप सर्व सिद्धियाँ प्रगट करूँ । अक्षर एक "ॐ" ही जपकर सब पापो को विघट करूँ ॥ सप्ताक्षर का मत्र ‘णमो अरहताण" का मैं जाप करे । छह अक्षर का मत्र णमो सिद्धाण" जप भव ताप हरूँ ।। सप्ताक्षर का मत्र “णमो आइरियाण" का मैं जाप करूँ | स्पताक्षर का "णमो उवज्झायाण" जप कर मुस्काउँ ।। नौ अक्षर का मत्र "णमो लोए सव्वसाहूणं" ध्याऊँ । 'एसो पच णमोयारो' जप सर्व पाप हर सुख पाऊँ ।। नव पद या नवकार पॉच पद का मैं णमोकार ध्याऊँ । एक शतक सत्ताईस अक्षर का चत्तारि पाठ गाऊँ || "चत्तारि मगलम" श्रेष्ठ मगल है जग में परम प्रधान । "अरिहता मगलम्" पाठ कर गाऊँ निज आतम के गान || "सिद्धागगलम्" "साहू मगलम” का मैं भाव हृदय भर लूँ । "केवलि पण्णत्तो धम्मो मगलम” स्वधर्म प्राप्त करलूँ ।। "चत्तारि लोगोत्तमा" की सर्वोत्तम है परम शरण । "अरिहता लोगोत्तमा' ही से होगा भव कष्ट हरण || "सिद्धा लोगोत्तमा" सु “साहू लोगोत्तमा" परम पावन । "केवलि पण्णत्तो धम्मो लोगोत्तमा" मोक्ष साधन || 'चत्तारि शरण पबज्जामि" का गूंजे जय जय गान । 'अरिहतेशरण पव्वज्जामि" का हो प्रमु लक्ष्य महान ।। 'सिद्धेशरण पव्वज्जामि" मोक्ष सिद्धि को मैं पाऊँ । "साहूशरण पव्वज्जामि" शुद्ध भावना ही भाऊँ ||

देर शारत्र गुरू पाणी
२२७
फेवलि पण्पत्तो हामो शरण पपज्जामि" है ध्येय ।
मा : गगल शिवदाता पाचों परमेष्ठी प्रभु श्रेय ।।
गत मंत्र सिलाहित कर शुद्ध भाव से नित ध्याऊँ ।
जन परग परी का सन्यफ स्वरूप उर मे लाऊँ ।।
जो कारन में णमोकार का ध्यान करूँ ।
महा मंत्र की शक्ति पा नाथ आत्ल कल्याण करूँ ।।
or w मार गिज शुद्धातम करलू भान
गम न सिदा जमकर गे मार्ग पर कलें प्रयाण ।।
में ही भी पय नमस्कार मंत्राय पूर्णा_म नि. ।
गोलार के मन की महिमा अगम अपार
गद सति जो ध्यावते हो जाते गव पार
নাবাৰ
जाप्यमन्त्र
अभी-नमो सिनाम, मो आरियाण णमो उपज्झायाण
मारी साइन ।
श्री सम्मेदशिखर पूजन
(दोहा)
सिस क्षेत्र तीरथ परन, है उत्कृष्ट सुथान ।
शिखर सम्मेद मदा नरें, होय पाप की हानि ।।१।।
अगनित मुनि जात गये, लोक शिखर के तीर ।
तिनके पद पकज नमू, नाशी भवकी पीर ।।२।।
(अडिल्ल)
है उज्ज्वल यह क्षेत्र सु अति निरमल सही ।
परम पुनीत सुठोर महागुण ली मही
सकल सिद्धि दातार, महा रमणीक है ।
वन्, निज सुख हेत, अचल पद देत है ।।३।।

२२८
देव शास्त्र गुरू
वाणी
(सोरठा)
शिखर सम्मेद महान, जगमे तीर्थ प्रधान है ।
महिमा अद्भुत जान, अल्पमती मैं किम कहूँ ।।४।।
(चाल सुन्दर छन्द)
सरस उन्नतक्षेत्र प्रधान है, अति सु उज्ज्वल तीर्थ महान है ।
करहि भक्ति सु जे गुण गायके, लहहि सुख शिव के सुख जायकै ||५||
(अडिल्ल)
सुर नर हरि इन आदि और वदन करै ।
भवसागर से तिरे नही भव मे परे ।।
जन्म-जन्म के पाप सकल छिन मे टरै ।
सुफल होय तिन जन्म शिखर दरशन करै ।।६।।
गिर सम्मेद तै बीस जिनेश्वर शिव गये ।
और असख्या मुनि तहाँ ते सिध भये ।।
वन्दूँ मन वच काय नमूं शिर नायक
तिष्ठो श्री महाराज सबै इत आयकै ।।७।।
(दोहा)
श्री सम्मेद शिखर सदा, पूजूं मनवच काय
हरत चतुरगति दुख को, मन वॉछित फलदाय ||८||
ॐ हीं विशतितीर्थडकराणामसख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभूमि
सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र अत्र अवतर अवतर सवौषट ।
ॐ ही विशतितीर्थडकराणामसख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभूमि
सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ ।
ॐ हीं विशतितीर्थडकराणामसख्यातमुनिवराणाञ्च निर्वाणभूमि
सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट |
(गीता छन्द)
सोहन झारी रतन जडिये मॉहि गगाजल भरो ।
जिनराज चरण चढाय भविजन जन्म-मृत्यु-जरा हरो ।।

२२६ देव शास्त्र गुरू वाणी ससार उदधि उबारने को लीजिये सुध भावसो । सम्मेद गिर पर बीस जिनमुनि पूज हरष उछाव सो ।। ॐ ही विशतितीर्थडकराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम् निर्वपामीति स्वाहा। जाकी सुगन्ध थकी अहो अलि गुजते आवे घने । सो मलय सग घसाय केसर पूज पद जिनवर तने ।। भव आताप निवारने को लीजिये सुध भावसो सम्मेद गिर पर बीस जिनमुनि पूज हरष उछाव सो ।। ॐ ही विशतितीर्थड्कराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो ससारतापविनाशनाय चन्दनम् निर्वपामीति स्वाहा । अक्षत अखडित अतिहि सुन्दर ज्योति शशिसम लीजिये । शुभ शालि उज्ज्वल तोय धोय सु पूज प्रभुपद कीजिये ।। पद अक्षयकारण लेय भविजन शुद्ध निरमल भावसो । सम्मेद गिर पर बीस जिनमुनि पूज हरष उछाव सो ।। ॐ ही विशतितीर्थकराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम् निर्वपामीति स्वाहा । है मदन दुष्ट अत्यन्त दुर्जय हते सबके प्रान हो । ताके निवारण हेत कुसुम मगाय रज न धान ही ।। जाकी सुवास निहार षटपद दौरि आवै चावसो सम्मेद गिर पर बीस जिनमुनि पूज हरष उछाव सो ।। ॐ ही विशतितीर्थड्कराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो कामबाणविध्वसनाय पुष्पम् निर्वपामीति स्वाहा । रस पूर रसना घ्रान रजन चक्षु प्रिय अति मिष्ट ही । जिनराज चरण चढाय उत्तम क्षुधा होवे नष्ट ही ।। भरि थाल कचन विविध व्यजन लीजिये सुध भावसो । सम्मेद गिर पर बीस जिन मुनि पूज हरष उछाव सों ।। ॐ हीं विंशतितीर्थकराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा । त्रैलोक्यगर्भित ज्ञान जाको मोह निजवस कर लियो । अज्ञान तममे पड्यो चेतन चतुरगति भरमन कियो ।।

२३० देव शास्त्र गुरू वाणी छिन मॉहि मोह विध्वस होवै आरती कर चावसो । सम्मेद गिर पर बीस जिनमुनि पूज हरष उछावसो ।। ॐ हीं विशतितीर्थडकराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोहाधकारविनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा । शुभ अगर अम्बर वास सुन्दर धूप प्रभु ढिग खेवही । ए दुष्टकर्म प्रचण्ड तिनको होय ततछिन छेवही ।। सो धूप वसु विधि जरत कारण लीजिये सुध भावसो । सम्मेद गिरपर बीस जिनमुनि पूज हरष उछावसो || ॐ हीं विशतितीर्थड्कराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा । बादाम श्रीफल लौग पिस्ता लेय शुद्ध सम्हालही । सैकार दाख अनार केला तुरत टूटे डाल ही ।। भवि लेय उत्तम हेत सिंवके छूट विधि के दावसो । सम्मेद गिरपर बीस जिनमुनि पूज हरष उछाव सो ।। ॐ ह्रीं विशतितीर्थड्कराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा । जन्म मृत्यु जल हरै, गध आताप निवारै तन्दुल पदके अक्षय मदन कू सुमन विदारै ।। क्षुधा हरन नैवेद्य दीप ते ध्वान्त नसावै धूप दहै वसु कर्म मोक्ष सुख फल दरसावै ए वसु द्रव्य मिलायकै अर्ध्य रामचन्द्र कीजिये । कर पूजा गिरशिखर की नरभव का फल कीजिये ।। ॐ ह्रीं विशतितीर्थड्कराणामसख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यो सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्रेभ्योऽनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । प्रत्येक अर्घ्य (सोरठा) सकल कर्म हनि मोक्ष, परिवा सित बेसाख ही । जजौ चरण गुण धोख, गये समेदाचल थकी ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रज्ञानघरकूटतै श्रीकुन्थुनाथजिनेन्द्रादिमुनि छयानवे कोडाकोडी छयानवे कोडि बत्तीसलाखछयानवे हजार सातसौ बियालीस सिद्धक्षेत्रभ्यो अध नि. स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी २३१ (दोहा) जेठ सुकल चउदस दिवस, मोक्ष गये भगवान जजौं मोक्ष जिनके चरण, कर करि बहु गणगान || ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुदत्तकूटतेधर्मनाथजिनेन्द्रादिमुनि उन्नीस कोडाकोडी नौलाख नौहजार सातसौ पचानवे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । चैत सुकल एकादशी, शिवपुर मे प्रभु जाय लहि अनन्त सुख थिर भये, आतमसू लव ल्याय ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रअविचलकूटतेसुमतिनाथजिनेन्द्रादि मुनि एक कोडाकोडी चौरासीकोडि बहत्तरलाख इक्यासीहजार सातसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्तपामीति स्वाहा । जेठ सुकल चउदस दिना, सकल कर्म क्षय कीन । सिद्ध भये सुखमय रहै, हुए अष्टगुण लीन ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रशान्तिप्रभकूटः शान्तिनाथजिनेन्द्रादि मुनि नौकोडाकोडी नौलाख नौहजार नौसौनिन्यानवे सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रम्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । वदि आषाढ अष्टमि दिवस, मोक्ष गये मुनि ईश । जनँ भक्ति ते विमल प्रभु, अर्घ्य लेय नमि शीश || ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवीरकुलकूटनै श्रीविमलनाथजिनेन्द्रादि मुनि सत्तरकोडि सातलाख छहहजार सातसौव्यालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । फागुन सुदि सप्तमि दिना, हनि अघातिया राय जगत फाँस कू काटकै, मोक्ष गये जिनराय ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रप्रभासकूटते श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्रादि मुनि उनचास कोडाकोडि चौरासीकोडि बहत्तरलाख सात हजार सातसौ बियालिस सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । चैत सुकल पञ्चमि दिना, हनि अघातिया राय मोक्ष भये सुरपति जजै, मै जजहूँ गुणगाय ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसिद्धवरकूटते अजितनाथजिनेन्द्रादि मुनि एक अर्व अस्सीकोटि चौबनलाख सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । - २३२ देव शास्त्र गुरू वाणी जुगल बाग तारे प्रभु, पार्श्वनाथ जिनराय । सावन सुदि साते दिवस, लहे मुक्ति शिव जाय , || ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटः श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्रादिमुनि बियासी करोडचुरासीलाख तैंतालिसहजार सातसौबियालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । (सोरठा) हनि अघाति शिव थान, चतुर्दशी वैसाख वदि । जर्जे मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटते नमिनाथजिनेन्द्रादिमुनि नौसोकोडाकोडी एकअरब पैंतालिसलाख सातहजार नौसौ व्यालिस सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्याऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सरव करम हनि मोक्ष, चैत अमावस शिव गये । मै जजहूँ वसु धोक चतुर, निकाय सुरा जजै ॥ जजू मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ।। ॐ ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटतै अरनाथजिनेन्द्रादिमुनि निन्यानवैकोडि निन्यानवेलाख निन्यानवे हजार सिद्धपदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । (दोहा) फागुन पञ्चमि सुकल ही, शेष कर्म हनि मोक्ष । गए समेदाचल थकी, शिवपद हित गुण धोक ।। जर्जे मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटतै श्रीश्रेयासनाथजिनेन्द्रादि मुनिछयानवेकोडाकोडी छयानवेकोडि छयानवेलाखनवहजार पाँचसौवियालिस सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । गये पुष्प निरवान, भादव सुदि अष्टम दिना । पूजृ मोक्षकल्यान, सब सुर मिल पूजा करी ।। जज़ मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटतै पुष्पदन्तजिनेन्द्रादिमुनि एककोडाकोडीनिन्यानवेलाख सातहजार चारसौ अस्सी सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुल पाणी २३३ हनि अघाति जिनराय, चौथ कृष्ण फागुन विषै । जनूँ चरण गुणगाय, मोक्ष समेदाचल थकी ।। जर्जे मोक्ष कल्यान, गये समेदाचल थकी ।। सेही मीसम्मेदशियसिसक्षेत्रसुवर्णकूटतै पदमप्रभजिनेन्द्रादिमुनि निन्यानवेकोडि सतासीलाप तेतालीसहजार सातसौ नब्बे सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिमक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्यपागीति स्वाहा । हनि अघाति निरवान, फागुन द्वादशि कृष्ण ही । जजू नोक्षकल्यान, गए सुरासुर पद जजो । ॐ ही श्रीसम्मेदशियरसिद्धक्षेनसुवर्णकूटतै मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्रादि मुनि निन्यावकोजाकोली सत्तानवे कोसिनौलाख नौसौनिन्यानवै सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । शेष कर्म हनि मोक्ष, फागुन सुकल जु सप्तमी । जनूं गुणनि के धोक, गये समेदाचल थकी ।। ॐ ही श्रीसम्मेदशियरसिद्धक्षेत्रसुवर्णकूटतै चन्दप्रमजिनेन्द्रादिमुनि चौरासीकोजकोसी बात्तरकोटि अस्सीलाख चौरासीहजार पाँचसौ पचपन सिद्धपदप्राप्तन्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । गये मोक्ष भगवान अष्टम सित आसौज की देहु देहु शिवनाथ वसु विधि पद पकज जजूं ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रविद्युतवरकूटते श्री शीतलनाथतीर्थडकरादि अठारह कोडाकोडि बयालिस कोड़ि बत्तीस लाख बयालिस हजार नौ सौ पाँच सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्योऽध्य निर्वपामीति स्वाहा । (दोहा) चैत कृष्ण पूनम दिवस, निज आतम को चीन । मुक्ति स्थानक जायकै, हुए अष्ट गुण लीन ।। ॐ ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रस्वयभूकूटते अनन्तनाथजिनेन्द्रादिमुनि छयानवेकोडाकोडी सतरलाख सत्तरहजार सातसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेम्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । शेष कर्म निरवान, चैत शुकल षष्टम विष जजो गुणोध उचार, मोक्ष वरॉगना पति भये ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रधवलकूटते सम्भवनाथजिनेन्द्रादिमुनि नौकोडाकोडीवहत्तरलाखव्यालीसहजारपाँचसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अयं निर्वपामीति स्वाहा २३४ देव शास्त्र गुरू वाणी अष्टम सित वैशाख की, गए मोक्ष हनि कर्म । जजूं चरन उर भक्ति कर, देहु देहु निज धर्म ।। ॐ हीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र आनन्दकूटतैअभिनन्दनजिनेन्द्रादिमुनि बहत्तर कोडाकोडीसत्तरकोडिछत्तीसलाखव्यालीसहजार सातसौसिद्ध पदप्राप्तेभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । (चौपाई छन्द) माघ असित चउदश विधि सैन, हनि अघाति पाई शिव दैन । सुर नर खग कैलाश सुथान, पूजें मैं पूजू धर ध्यान ।। (दोहा) रिषभ देव जिन सिध भये, गिर कैलाश से जोय । मन वच तन कर पूज हूँ, शिखर नमूं पद सोय ।। ॐ ही श्रीआदिनाथतीर्थडकराद्यसख्यमुनिवराणा निर्वाणभूमिकैलाशगिरी सिद्धक्षेत्रेभ्य अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । वासुपूज्य जिनकी छबी, अरून वरन अविकार । देहु सुमति विनती करूँ, ध्याऊँ भवदधितार || वासुपूज्य जिन सिध भये, चम्पापुर से जैह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ हीं श्रीवासुपूज्यतीर्थड्कराद्यसख्यमुनिवराणा निर्वाणभूमिचम्पापुर सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । सुकल षाढ सप्तमि दिवस, शेष कर्म हनि मोक्ष । शिव कल्याण सुरपति कियो, जजू चरण गुण धोक ।। ने मनाथ निज सिद्ध भये, सिद्धक्षेत्रा गिरनार । मन वच तन कर पूजहूँ, भवदधि पार उतार ।। ॐ हीं श्रीनेमिनाथतीर्थड्करादि बहत्तरकरोड सातसौ मुनिवराणा निर्वाण भूमिगिरनारसिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । कार्तिक वदि मावस गये, शेष कर्म हनि मोक्ष । पावापुरते वीर जी, जजूं चरण गुण धोक ।। महावीर जिन सिद्ध भये, पावापुर से जोय । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर नमूं पद दोय ।। ॐ हीं श्रीवर्द्धमानतीर्थड्कराद्यसख्यमुनिवराणा निर्वाणभूमि पावासुर सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

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२३६ देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला । छेव ।। तीरथ पर सुहावनूं, शिखर सम्मेद विसाल । कहत अल्प बुधि युक्ति से, सुखदाई जयमाल (छन्द पद्धरि) जय प्रथम नमूं जिन कुन्थदेव । जय धर्म तनि नित करत सेब ।। जय सुमति सुमति सुध बुद्ध देत । जय शान्ति नमूं नित शान्ति हेत ।।१।। जय विमल न आनन्दकन्द जय सुपार्स न, हनि पास फन्द ।। जय अजित गये शिव हानि कर्म । जय पार्स करी जुग उग्र सर्म IRI पश्चिम दिस जाने टोक एव बन्दे चहुँगति को होय नर सुर पद की कौन बात पूजे अनुक्रमतै मुक्ति जात ।।३।। जय नेमि तनू नित धरूँ ध्यान जय अरि हर लीनो मुक्ति थान || जय मल्लि मदन जय शील धार । जय हस गये भव पार-पार ।।४।। जय सुमति सुमति-दाता महेश जय पद्म नमूं तमहर दिनेश ।। जय मुनिसुब्रत गुणमण गरिष्ट । जय चन्द्र करै आताप नष्ट ।।५।। जय शीतल जय भवकी आताप जय अनन्त न, नस जात पाप || जय सम्भव भव की हरो पीर । जय अभय करो अभिनन्दन वीर ।।६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२३७
पूरय दिस द्वादस फूट जान
पूजत होवत है असुभ हान ।
फिर मूल मन्दिर कू करूं प्रनाम
पावै शिवरमनी वेग धाम ।७।।
भी सिद्ध सु क्षेत्रं. अति सुख देतं. तुरत भव-दधि पार कर ।
अरिफर्म दिनासन, शिव सुख कारन, जय गिरवर जगता तार ||८||
(चाल छप्पय)
प्रथम कुन्यु जिन धर्म सुमति अरू शान्ति जिनन्दा ।
विमल सु पारस अजित पार्श्व मेटै भवफदा ||
भी नगि अरह जु मल्लि श्रेयास सुविधि निधिकन्दा ।
पदमप्रमु महाराज और मुनिसुव्रत चन्दा ।।
शीतलनाथ अनन्त किन सम्भव जिन अभिनन्दजी ।
पीस टॉक पर रीस जिनेश्वर गाव सहित नित वन्दन जी ।।१।।
ॐ विशतितीर्थलकराणागसख्यगुनि पराणाञ्च निर्वाभूमि सम्मेदशिखर
सिरोम्यो अर्को निर्वपामीति वारा ।
(चाल कवि)
शिखर सम्मेद जी के वीस टोक सब जान ।
तासो मोक्ष गये ताकी सख्या सब जानिये ।।
चज्दासौ कोडा कोडि पेंसठ ता ऊपर जोड ।
छियालिस अरव ताको ध्यान हिये आनिये ।।
चारा सै तिहत्तर कोडि लाख ग्यारासै वैयालीस ।
और सातसैं चौतीस सहस बखानिये ।।
सैकडा है सातसे सत्तर एते हुए सिद्ध ।
तिनकू सु नित्य पूज पाप कर्म हानिये ||१||
वीस टोकके दरश फल, प्रोषध संख्या जान ।
एकसौ तेहत्तर मुनी, गुणसठ लाख महान ।।

२३८
देव शास्त्र गुरू वाणी
(छन्द घत्तानन्द)
ए बीस जिनेश्वर नमत सुरेसुर मघवा पूजन कू आवै ।
नरनारी ध्या, सब सुख पाएँ रामचन्द्र नित सिर नावें ।।
(इति पुष्पाञ्जलि क्षिपेत)
श्री ऋषि-मण्डल पूजा भाषा
स्थापना
दोहा
चौबिस जिन पद प्रथम नमि, दुतिय सुगणधर पाय ।
त्रितिय पच परमेष्ठि को, चौथे शारद माय 11
मन बच तन ये चरन युग, करहु सदा परनाम ।
ऋषि मण्डल पूजा रचो, बुधि बल द्यो अभिराम ।।
अडिल्ल छन्द
चौबीस जिन वसु वर्ग पच गुरू जे कहे ।
रत्नत्राय चव देव चार अवधी लहे ।।
अष्ट ऋद्धि चव दोय सूर ही तीन जू ।
अरहत दश दिग्पाल यन्त्र मे लीन जू ।।
दोहा
यह सब ऋषिमण्डल विषै, देवी देव अपार ।
तिष्ठ तिष्ठ रक्षा करो, पूजू वसु विधि सार ।।
ओ ही वृषभादि चौबीस तीर्थकर, अष्ट वर्ग,
अर्हतादि पचपद,
दर्शनज्ञानचारित्र
रूपरत्नत्रय, चतुर्निकाय देव, चार प्रकार अवधि धारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि, चौबीस
सूर, तीन ही, अर्हत बिम्ब दश दिग्पाल यन्त्रसम्बन्धी परमदेव समूह अत्र अवतर
अवतर सवौषट् आहानन । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापन ।
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।।
(इति स्थापना)

देव शास्त्र गुरू पाणी २३६ अष्टक-विधान हरिगीता छन्द धीर उदधि समान निर्मल तथा मुनि चित सारसो । र गणिगण गीर सुन्दर तृपा तुरित निवारसो । जा सुमग मरल पिराज पूजि मन वच तन सदा । तित मगोचाधित ग्लिस सब सुख स्वप्न में दुख नहि कदा ।। जहाग पटक-नि-सम्बनिा-परम-देवाय जल 1111 गेट-प्रत्पेशल सदा हुने स्थापना के मन्त्र को भी पूरा पढा जा सकता है। कंपल सक्षिप्त मन्त्र देकर लिखा है। गल्य सन्दन लाय सुन्दर गघ सो अलि झकरै । सो ले गपिजन कुन भरिके तप्त दार सबै हरै ॥ जा तुमग पिमण्डल विराज पूजि मन वच तन सदा । लिस मनोवाधित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहि कदा ।। ही पदय-शिनासपोगमन्त्र सम्बनिा-परगदेवाय चन्दन IR1 इन्दु फिरण सगान सुन्दर जोति मुक्ता की हरैं । हाटक रकमी पारि भाविजन अखय पद प्राप्ती करें ।। जहां सुराग नापि मण्डल विराजै पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवाधित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहि कदा ।। जही सर्वोपदव-विनाश-समय यन्त्र सम्बन्धि-परमदेवाय अक्षत ।।३।। पाटल गुलार जुही चमेली मालती वेला घने । जिस सुरभित फलहस नाचत फूल गुथि माला बने । जहां सुभग ऋपि मण्डल विराजै पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवांछित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहिं कदा ।। ओही सर्वोपद्रव-विनाशन समर्थाय यन्त्र-सम्बन्धि-परग-देवाय पुष्प |४|| अर्द्ध चन्द्र समान फेनी समान फेनी मोदकादिक ले घने घृत पक्व मिश्रित रस सु पूरे लख क्षुधा डायनि हने ।। जहाँ सुमग ऋषिमण्डल विराजै पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवाछित मिलत सव सुख स्वप्न में दुख नहि कदा ।। ओही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यन्त्र-सम्बन्धि-परम देवाय नैवेद्य ।।५।। - २४० देव शास्त्र गुरू वाणी मणि दीप ज्योति जगाय सुन्दर या कपूर अनूपक । हाटक सुथाली माहि धरिके वारि जिनपद भूपक || जहा सुभग ऋषिमडल विराजै पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवाछित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहि कदा ।। ओ ही सर्वोद्रव-विनाशन-समर्थाय यन्त्र-सम्बन्धि-परमदेवाय दीप ||६|| चन्दन सु कृष्णागरू कपूर मॅगाय अग्नि जराइये । सो धूप-धूम्र अकाश लागी मनहुँ हर्म उडाइये ।। जहा सुभग ऋषिमण्डल विराजैं पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवाछित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहि कदा ।। ओ ही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यन्त्र-सम्बन्धि-परम देवाय धूप ।।७।। दाडिम सु श्रीफल आम्र कमरख और केला लाइये । मोक्ष फल के पायवे की आश धरि करि आइये ।। जहा सुभग ऋषिमडल विराजै पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवॉछित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहि कदा ।। ओ ही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यन्त्र सम्बन्धि-परम देवाय फल 1111 जल फलादिक द्रव्य लेकर अर्घ सुन्दर कर लिया । ससार रोग निवार भगवन् वारि तुम पद मे दिया ।। जहा सुभग ऋषिमडल विरा0 पूजि मन वच तन सदा । तिस मनोवाछित मिलत सब सुख स्वप्न मे दुख नहिं कदा ।। ओ ही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय यन्त्र-सम्बन्धि परम देवाय अर्घ 11511 (इति अष्टक) अर्घावली अडिल्ल छन्द वृषभ जिनेश्वर आदि अत महावीर जी ये चौबिस जिनराज हनो भवपीर जी ।। ऋषि-मडल बिच ही विषै राजै सदा पूजू अर्घ बनाय होय नहि दुख कदा ।। ओ ही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय वृषभादि-चतुर्विंशति तीर्थकर- परमदेवाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।

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२४२ देव शास्त्र गुरू वाणी भुजगप्रयात कही आठ ऋद्धि धरे जे मुनीश । महा कार्यकारी बखानी गनीश ।। जल गध आदि दे जजो चर्न नेरे । लहो सुख सबेरे हरो दुख फेरे । ओ ही सर्वापद्रवविनाशन-समर्थेभ्यो अष्टऋद्धिसहितमुनिभ्यो अर्घ । श्री देवी प्रथम बखानी । इन आदिक चौबिसो मानी । तत्पर जिन भक्ति विषै हैं । पूजत सब. रोग नशैं हैं ।। ओ ही सर्वोपद्रवविनाशनसमर्थेभ्य श्री आदि चतुविशति देविम्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । हसा छन्द यत्र विषै वरन्यो तिरकोन । ही तह तीन युक्त सुखभोन । जल फलादि वसु द्रव्य मिलाय । अर्घ सहित पूजू शिरनाय ।। ओ ही सर्वोपद्रवविनाशनसमर्थाय त्रिकोणमध्ये तीन ही सयुक्ताय अर्घ । तोमर छन्द दस आठ दोष निरवारि । छियालिस महागुण धारि ।। वसु द्रव्य अनूप मिलाय । तिन चर्न जजो सुखदाय ।। ओ ही सर्वोपद्रवविनाशनसमर्थाय अष्टादशदोष-रहिताय छियालीस- महागुणयुक्ताय अरहन्त-परमेष्ठिने अर्घ । सोरठा दश दिश दस दिग्पाल, दिशा नाम सो नामवर । तिनगृह श्रीजिन आल, पूजो मै वन्दौ सदा 11 ओ ही सर्वोपद्रवविनाशनसमर्थेभ्यो दशदिग्पालेभ्यो जिनभक्ति-युक्तेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । दोहा ऋषि मडल शुभयन्त्र के, देवी देव चितारि । अर्घ सहित पूजहुँ चरन, दुख दारिद्र निवारि ।। ओ ही सर्वोपद्रवविनाशनसमर्थेभ्यो ऋषिमडल-सम्बन्धितदेवी-देवेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । (इति अर्घावलि) देव शास्त्र गुरू वाणी २४३ जयमाला दोहा चौबीसो जिन चरन नमि, गणधर नाऊ भाल । शारद पद पकज नमू, गाऊ शुभ जयमाल ।। जय आदीश्वर जिन आदिदेव, शत इन्द्र जसें मैं करहुँ सेव । जय अजित जिनेश्वर जे अजीत, जे जीत भये भव ते अतीत ।। जय सम्भव जिन भवकूप माँहि, डूबत राखहु तुम शर्ण आहि । जय अभिनन्दन आनन्द देत, ज्यो कमलो पर रवि करत हेत ।। जय सुमति सुमति दाता जिनन्द - जै कुमति तिमिर नाशन दिनन्द । जय पगालकृत पद्मदेव, दिन रयन करहुँ तव चरन सेव । जय श्री सुपार्श्व भवपाश नाश, भवि जीवन कू दियो मुक्तिवास । जय चन्द जिनेश दया निधान, गुण सागर नागर सुख प्रमान ।। जय पुष्पदन्त जिनवर जगीश, शत इन्द्र नमत नित आत्मशीश । जय शीतल वच शीतल जिनन्द, भवताप नशावन जगत चन्द || जय जय श्रेयास जिन अति उदार, भवि कठ माहि मुक्ता सुहार | जय वासुपूज्य वासव खगेश, तुव स्तुति करि नमि हैं हमेश ।। जय विमल जिनेश्वर विमलदेव, मल रहित विराजत करहु सेव । जय जिन अनन्त के गुण अनन्त, कथनी कथ गणधर लहे न अत ।। जय धर्म धुरन्धर धर्मवीर, जय धर्म चक्र शुचि ल्याय वीर । जय शान्ति जिनेश्वर शान्तभाव, भव वन भटकत शुभ मग लखाव ।। जय कुथु कुथुवा जीव पाल, सेवक पर रक्षा करि कृपाल । जय अरहनाथ अरि कर्म शैल, तपवज खड लहि मुक्ति गैल ।। जय मल्लि जिनेश्वर कर्म आठ, मल डारे पायो मुक्ति ठाठ । जय मुनि सुव्रत सुव्रत धरन्त, तुम सुव्रत व्रत पालन महन्त ।। जय नम्मि नमत सुर वृन्द पाय, पद पकज निरखत शीश नाय । जय नेमि जिनेन्द्र दयानिधान, फैलायो जग मे तत्वज्ञान ।। जय पारस जिन आलस निवारि, उपसर्ग रूद्र कृत जीत धारि । जय महावीर महा धीरधार, भवकूप थकी जग से निकार || जय वर्ग आठ सुन्दर अपार, तिन भेद लखत बुध करत सार । जय परम पूज्य परमेष्ठि सार, सुमरत बरसे आनन्द धार ।।

२४४ देव शास्त्र गुरू वाणी जय दर्शन ज्ञान चरित्र तीन, ये रतन महा उज्ज्वल प्रवीन || जय चार प्रकार सुदेव सार तिनके गृह जिन मन्दिर अपार || वे पूजे वसुविधि द्रव्य ल्याय, मैं इत जजि तुम पद शीश नाय । जो मुनिवर धारत अवधि चारि, तिन पूजै भवि भवसिन्धु पार || जो आठ ऋद्धि मुनिवर धरन्त, ते मौप करूणा करि महन्त । चौबीस देवि जिन भक्ति लीन, वन्दन ताको सु परोक्ष कीन | जे ही तीन त्रैकोण माहि, तिन नमत सदा आनन्द पाहिं । जय जय जय श्रीअरहत बिम्ब, तिन पद पूजू मैं खोई डिब || जो दस दिग्पाल कहे महान, जे दिशा नाम सो नाम जान | जे तिनके गृह जिनराज धाम, जे रत्नमई प्रतिमाभिराम । ध्वज तोरण घटा युक्तसार, मोतिन माला लटके अपार || जे ता मधि वेदी हैं अनूप, तहाँ राजत हैं जिन राज भूप । जय मुद्रा शान्ति विराजमान, जा लखि वैराग्य बढे महान जे देवी देव सु आय आय, पूजे तिन पद मन वचन. काय | जल मिष्ट सु उज्ज्वल पय समान, चन्दन मलियागिर को महान ।। जे अक्षत अनियारे सुलाय, जे पुष्पन की माला बनाय । चरू मधुर विविध ताजी अपार, दीपक मणिमय उद्योतकार || जे धूप सु कृष्णागरू सुखेय, फल विविध भाति के मिष्ट लेय । वर अर्घ अनूपम करत देव, जिनराज चरण आगे चढेव || फिर मुखते स्तुति करते उचार, हो करूणानिधि ससार तार । मै दुख सहे ससार ईश, तुमनै छानी नाही जगीश ।। जे इह विध मौखिक स्तुति उचार, तिन नशत शीघ्र ससार भार । इह विधि जो जन पूजन कराय, ऋषि मडल यन्त्र सु चित्त लाय ।। ले ऋषि-मडल पूजन करन्त, ते रोग शोक सकट हरन्त । जे राजा रण कुल वृद्धि जान, जल दुर्ग सुजग केहरि बखान ।। जे विपत घोर अरू अहि मसान, भय दूर करै यह सकल जान । जे राजभ्रष्ट ते राज पाय, पद भ्रष्ट थकी पद शुद्ध थाय || धन अर्थी धन पावै महान, या मैं सशय कछु नाहिं जान । भार्या अर्थी भार्या लहन्त, सुत अर्थी सुत पावे तुरन्त ।। जे रूपा सोना ताम्र पत्र लिख तापर यन्त्र महा पवित्र । ता पूजै भागे सकल रोग, जे वात पित्त ज्वर नाशि शोग ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२४५
तिन गृह तें भूत पिशाच जान, ते भाग जाहि सशय न आन ।
जे ऋषि मडल पूजा करन्त, ते सुख पावत कहि लहै न अन्त ।।
जब ऐसी मैं मन माहि जान, तब भाव सहित पूजा सुठान ।
वसुविधि के सुन्दर द्रव्य ल्याय, जिनराज चरण आगे चढाय ||
फिर करत आरती शुद्ध भाव, जिनराज सभी लख हर्ष आव ।
तुम देवन के हो देव देव, इक अरज चित्त मे धारि लेव ।।
हे दीन दयाल दया कराय, जो मैं दुखिया इह जग भ्रमाय ।
जे इस भववन मैं बास लीन, जे काल अनादि गमाय दीन ।।
मैं भ्रमत चतुर्गति विपिन माहि, दुख सहे सुक्ख को लेश नाहि ।
ये कर्म महारिपु जोर कीन, जे मनमाने ते दुख दीन ।
ये काहू को नहिं डर धराय, इनौं भयभती भयो अघाय ।
यह एक जन्म की बात जान, मैं कह नक सकत हू देवमान ।।
जब तुम अनन्त परजाय जान, दरशायो ससृति पथ विधान ।
उपकारी तुम बिन और नाहि, दीखत मोको इस जगत माँहि ।।
तुम सब लायक ज्ञायक जिनन्द, रत्नत्रय सम्पति घो अमन्द ।
यह अरज करू मैं श्री जिनेश, भव भव सेवा तुम पद हमेश ।।
भव भव मे श्रावक कुल महान्, भव भव मे प्रकटित तत्वज्ञान ।
भव भव मे व्रत हो अनागार, तिस पालन तैं हो भवाब्धि पार ||
ये योग सदा मुझको लहान, हे दीनबन्धु करूणा-निधान ।
"दौलत आसेरी" मित्र दोय, तुम शरण गही हरषित सुहोय ||
नन्द छन्द घत्ता
जो पूजै ध्यावै, भक्ति बढावै, ऋषि मडल शुभ यत्र तनी ।
या भव सुख पावै सुजस लहावै परभव स्वर्ग सुलक्ष धनी ।।
ओ ही सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय रोग-शोक-सर्व-सकट हराय सर्वशान्ति-पुष्टि-
कराय, श्रीवृषभादि चौबीस तीर्थकर, अष्ट वर्ग, अरहतादि पचपद, दर्शन ज्ञान
चारित्र, चतुर्णिकाय देव, चार प्रकार अवधिधारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि सयुक्त ऋषि,
बीस चार सूर, तीनहीं, अर्हतबिम्ब, दशदिग्पाल यन्त्र सम्बन्धि परमदेवाय जयमाला-
पूर्णार्घ निर्वपामीति स्वाहा ।।

२४६
देव शास्त्र गुरू वाणी
आशीर्वाद
ऋषि मडल शुभ युत्र को जो पूजे मन लाय ।
ऋद्धि सिद्धि ता घर बसै, विघन सघन मिट जाय ।।
विधन सघन मिट जाय, सदा सुख सो नर पावै ।
ऋषि मडल शुभ यत्र तनी, जो पूज रचावै ।।
भाव भक्ति युत होय, सदा जो प्राणी ध्यावै ।
या भव मे सुख भोग, स्वर्ग की सम्पत्ति पावै ।।
या पूजा परभाव मिटे, भव भ्रमण निरन्तर ।
यात निश्चय मानि करो, नित भाव भक्तिधर ||
इत्याशीर्वाद । पुष्पाजलि क्षिपेत् ।
नवग्रह अरिष्टनिवारक विधान
प्रणम्याद्यन्ततीर्थेश, धर्मतीर्थप्रवर्तक
भव्यविध्नोपशात्यर्थ, ग्रहार्चा वर्ण्यते मया ।
मार्तण्डेन्दुकुजसोम्य सूरसूर्यकृतातका,
राहुश्च केतुसयुक्तो, ग्रहा शातिकरा नव ।।
दोहा
आदि अन्त जिनवर नमो, धर्म प्रकाशनहार ।
भव्य विध्न उपशाति को, ग्रहपूजा चित धार ||
काल दोष परभावसो, विकलप छूटे नाहि ।
जिन-पूजा मे ग्रहनकी, पूजा मिथ्या नाहि ।।
इस ही जम्बू दीप मे, रवि-शशि मिथुन प्रमान ।
ग्रह नक्षत्र तारा सहित, ज्योतिष चक्र प्रमान ।।
तिनही के अनुसार सो, कर्म-चक्र की चाल ।
सुख दुख जानै जीवको, जिन वच नेत्रविशाल ।।
ज्ञान प्रश्न व्याकरण मे, प्रश्न अग है आठ ।
भद्रबाहु मुख जनित जो, सुनत कियो मुख पाठ ।।
अवधि धार मुनिराज जो कहे पूर्वत कर्म ।
उनके वच अनुसार सौं, हरे हृदय का भर्म ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२४७
।
समुच्चय पूजा
दोहा
अर्क चन्द्र कुज सोम्य गुरू, शुक्र शनिचर राहु ।
केतु ग्रहारिष्ट नाशने, श्री जिन पूज रचाहु ।।
ओ ही सर्वग्रहारिष्टनिवारका श्री चतुविशतिजिना अत्र अवतरत
अवतरत सवौषट आहाननम् । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ ठ स्थापन ।
अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट सन्निधिकरण ।
गीता छन्द
क्षीरसिधु समान उज्ज्वल,
नीर निर्मल
लीजिये ।
चौबिस श्रीजिनराज आगे, धार त्रय शुभ दीजिये ।।
रवि सोम भूमिज सौम्य, गुरू कवि, शनितमी पूतकेतवे ।
पूजिये चौबिस जिन, ग्रहारिष्ट नाशन हेतवे ।।
ओं ही सर्वग्रहारिष्ट निवारक श्रीचतुर्विंशति तीर्थकरेभ्य पच कल्याणकप्राप्तेभ्यो
जल निर्वपामीति स्वाहा ।
श्री खण्ड कुम कुमहिम सुमिश्रित, घिसौं मनकारि चावसौं
चोबिस श्री जिनराज अधहर, चरन चरचो भाव सौं ।रवि. ।।
ओं ही सर्वग्रहारिष्ट निवारक श्रीचतुर्विंशति तीर्थकरेम्य पच कल्याणकप्राप्तेभ्यो
चन्दन निर्वपामीति स्वाहा ।
अक्षत अखण्डित सालि तदुल, पुज मुक्ताफल सम
चौबीस श्रीजिनचरण पूजत, नाश है नवग्रह भ्रम ।रवि. ।।
ओ ही सर्वग्रहारिष्टनिवारक श्रीचतुर्विंशतितीर्थकरजिनेन्द्रेभ्य पचकल्याणक-
प्राप्तेभ्यो अक्षत निर्वपामीति स्वाहा ।३।
कुद कमल गुलाब केतकि, मालती जाही जुही ।
कामबाण विनाश कारण, पूजि जिनमाला गुही Iरवि.।।
ओ ही सर्वग्रहारिष्टनिवारक श्रीचतुर्विंशतितीर्थकर जिनेन्द्रभ्य पचकल्याणक-
प्राप्तेभ्य पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ।।।
फैनी सुआली पुवा पापर, लेय मोदक घेवर ।
शतछिद्रआदिक विविध व्यजन, क्षुधाहर बहु सुखकर ।रवि. ।।
ओ ही सर्वग्रहारिष्टनिवारक श्रीचतुर्विंशतितीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्य पचकल्याणक-
प्राप्तेभ्यो नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥

२४८ देव शास्त्र गुरु वाणी मणिदीप जगमग ज्याति तमहर प्रभू आग लाइये । अज्ञाननाशक जिनप्रकाराक, मातिमिर नगाइय रवि.!! आही गवतहानिष्टनिवारक श्रीचनुर्विरितीर्थकरग्निन्दम्र पचकल्या क- प्राप्तन्यो दीप निर्वपानीति ग्वाम ! कृष्णा अगर घननार मिश्रित लाग चन्दन लइये । ग्रहरिप्ट नाशन हत मविजन धूप जिनपद खइय ।रवि.!! आहीं सपनानिष्टनिवारक श्रीगुरविगतितीर्थकरग्निन्टन्य परकल्गणक- प्राप्तन्या धूप निवपाति न्याय ६ | वादाम पिस्ता सव श्रीफल, मोच नींबू नटफल । बावीस श्रीजिनराज पूजत, मनावाति शुभ फल ।रवि.।। आही नवग्रहारिष्टनिवारक श्रीयतुरविंशतितीर्थकरजिनन्दन्य पचकल्यगक- प्राप्तन्या फल निर्वपाणीति स्वाहा । जल गय सुमन अखण्ड तन्दुल चरु सुदीप सुधूपक । फल द्रव्य दूध दही सुमिश्रित अर्घ देय अनूपक Iरवि.।। ही सर्वग्रहारिष्टनिवारक श्रीचनुरर्दिशतितीर्थकरज्निन्द्रन्य पचकल्याणक- प्राप्तन्यो अचं निवपानीति स्वाहा ।।। प्रत्येक अर्घ अडिल्ल-सलिल गधले फूल सुगन्धित लीजिए । तन्दुल ले चरु दीपक धूप खेवीजिये ।। फल ले अर्घ बनाय प्रमू पद पूजिये ।। रवि अरिप्ट को को दोष तुरत तहे धूजिये । ॐ हीं रवि अरिष्ट निवारक श्री पद्मप्रनु जिनेन्द्राय सुर्घ III जल चन्दन बहु फूल सु तन्दुल लीजिये । दुग्ध शर्करा राशि हित सु व्यजन कीजिये ।। दीप धूप फल अर्घ बनाय धरीजिये । शीस जिनेन्द्र को नवाय अरिष्ट हरीजिये | ॐ हीं चन्द्रारिष्ट निवारक चन्द्रप्रनु जिनेन्द्राय अर्घ IRII सुरभित जल श्रीखण्ड कुसुम तन्दुल मले । व्यजन दीपक धूप सदा फल सो रले ॥ वासु पूज्य जिनराय अर्घ शुभ दीजिये । मगल ग्रह को रिष्ट नाश कर लीजिये ।। ॐ हीं मौमारिष्ट निवारक वासुपूज्य जिनाय नम अर्घ ३ ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २४६ शुभ सलिल चन्दन सुमन अक्षत क्षुधाहर चरू लीजिये । मणिदीप धूप सुफल सहित बसु दरब अर्घ जु दीजिये । विमलनाथ अनन्तनाथ सु धर्मनाथ जु शातये । कुन्थु अरह जु नमि जिन महावीर आठ जिन यजे ।। ॐ हीं सौम ग्रहारिष्ट निवारक अष्ट जिनेन्द्रेभ्यो अर्ध ।।४।। जल चन्दन फूल तन्दुल मूल चरू दीपक ले धूप फल । बसु विधि से अर्चे बसुविधि चर्चे कीजे अविचल मुक्ति धर ।। ऋषभ अजित सम्भव अभिनन्दन सुमति सुपारसनाथ वर । शीतलनाथ श्रेयास जिनेश्वर पूजत सुर गुरू दोष हर ।। ॐ हीं सुर गुरू दोष निवारक वसु जिनवरेभ्यो अर्घ ।।५।। जल चन्दन ले पुष्प और अक्षत घने । चरू दीपक बहु धूप सु फल अति सोहने ।। गीत नृत्य गुण गाय अर्घ पूरन करें । पुष्पदन्त जिन पूज शुक्र दूषण हरॆ ।। ओ ही शुक्रारिष्ट निवारक पुष्पदन्त जिनाय अर्घ ||६|| प्राणी नीरादिक बसु द्रव्य ले मन वच लगाय ।। अष्ट कर्म को नाश है अष्ट महा गुण पाय हो । मुनिसुव्रत जिन पूजिये पूजिये ।। ए जी रवि सुत सहज दुख जाय प्राणी मुनिसुव्रत मुनिसुव्रत जिन पूजिये ।। ओ ही शनि अरिष्ट नाशक मुनिसुव्रत जिनेन्द्राय अर्घ ।७।। जल गन्ध पुष्प अखण्ड अक्षय चरू मनोहर लीजिए दीप धूप फलोघ सुन्दर अर्घ जिन पद दीजिए जब राहु गोचर रासि मे दुख देह दुष्ट सुभावसो || तब नेमि जिनके भाव सेति चरण पूजै चावसो । ओ ही राहु अरिष्ट नाशक नेमिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ ||८|| जल चन्दन सुमन सु लाय तन्दुल अघ हारी । चरू दीप धूप फल लाय अर्घ करो भारी ।। मै पूजो मल्लि जिनेश पारस सुखकारी । ग्रह केतु अरिष्ट निवार मन सुख हितकारी ।। ओ ही केतु अरिष्ट निवारक मल्लि पार्श्व जिनाभ्याम् अर्घ IIE || काय

२५०
देव शास्त्र गुरू वाणी
रवि शशि मगल सौम गुरू भृगु शनि राहु सुकेत ।
इनको रिष्ट निवार करे अर्चे जिन सुख हेतु ।।
ॐ हीं सर्व ग्रहारिष्ट निवारक चतुर्विंशति जिनेभ्यो अर्घ ||१०||
जयमाला
दोहा
श्रीजिनवर पूजा किये, यह अरिष्ट मिट जाय ।
पच जयोतिषी देव सब, मिल सेवे प्रभु पाय ।।
पद्धरी छन्द
जय जय जिन आदि महन्त देव, जयअजित जिनेश्वर करहु सेव ।
जय जय सभव भव भय निवार, जय २ अभिनन्दन जगत तार ||
जय सुमति सुमति दायक विशेष, जय पद्मप्रभ लख पदम लेष ।
जय जय सुपार्स हर कर्म पास, जय जय चद्रप्रभ सुख निवास ।।
जय पुष्पदन्त कर कर्म अत, जय शीतल जिन शीतल करन्त ।
जय श्रेय करन श्रेयान्स देव, जय वासुपूज्य पूजत सुमेव ।।
जय विमल विमल कर जगतजीव, जय २ अनत सुख अतिसदीव ।
जय धर्मधुरन्धर धर्मनाथ, जय शान्ति जिनेश्वर मुक्ति साथ ।।
जय कुथुनाथ शिव सुख निधान, जय अरह जिनेश्वर मुक्ति खान ।
जय मल्लिनाथ पद पद्म भास, जय मुनिसुव्रत सुव्रत प्रकाश ।
जय जय नमिदेव दयाल सन्त, जय नेमिनाथ प्रभु गुण अनन्त ।।
जय पारसप्रभु सकट निवार, य वर्द्धमान आनन्दकार ||
नवग्रह अरिष्ट जब होय आय, तब पूजै श्रीजिनदेव पाय ।
मन वच तन सब सुखसिधु होय, ग्रहशात रीति यह कही जोय ।।
ओ ही सर्वग्रहारिष्टनिवारक रीचतुर्विंशतितीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्या पचकल्याणकप्राप्तेभ्यो
महाध निर्वपामीति स्वाहा ।
चौबीसौं जिनदेव प्रभु, ग्रह सम्बन्ध विचार ।
जो पूजे प्रतयेक को, वे पावे सुख सार ।।
इत्याशीर्वाद

देव शास्त्र गुरू वाणी २५१ सर्वग्रह शान्ति मन्त्र जाहीर हो असिआउसा सर्वशान्ति कुरू कुरू स्वाहा । सात इस मन्त्र की माला फेरने से सर्वग्रहों की शान्ति होती है। श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ पूजन स्थापना है पार्वनाथ करुणानिधान महिमा महान मंगलकारी । शिव गतारी, सुख गडारी सर्वज्ञ सुखारी त्रिपुरारी तुम धर्गरोत करुणानिकेत आनन्द हेत अतिशय धारी । तुम चिदानन्द आनन्द कन्द दुख-द्वन्द फन्द संकटहारी ।। आवाहन करके आज तुम्हे अपने मन मे पधराऊगा । अपन उर के सिहासन पर गद गद हो तुम्हे विठाऊँगा ।। मेरा निर्गल गन टेर रहा है नाथ हदय में आ जाओ । मेरे सूने मन मन्दिर में पारस गगवान समा जाओ ।। सीधान पानामणिन्द्र अन अवतर अवतर सवौषट । अत्र विष्ट सिष्टमम सन्निहितो भव गव वषट सन्निधिकरणम् । गव वन में भटक रहा हू मैं गर सकी न तृष्णा की खाई । भव सागर के अवाह दुर में सुख की जल विन्दु नहीं पाई ।। जिस गाति आपने तृष्णा पर जय पाकर तृषा बुझाई है । अपनी अतृप्ति पर, अब तुमसे जय पाने की सुधि आई है ।। ओही थी अनि पार्वनाथ जिनेन्द्राय जन्ग जरा गृत्यु विनाशनाय जल निर्वपापीति रवा ॥ क्रोधित हो क्रूर कमठ ने जव नग से ज्वाला वरसाई थी । उस आत्मध्यान की मुद्रा में आकुलता तनिक न आई थी ।। विघ्नो पर वर विरोधो पर में साम्यभाव धर जय पाऊ । मन की आकुलता मिट जाये ऐसी शीतलता पा जाऊ ।। शेनी श्री शिवार पार्थाथ जिनेन्द्राय ससारतापविनाशनाय चन्दन शिर्वपागीनि साहा २१ तुमने कर्मों पर जय पाकर मोती सा जीवन पाया है । यह निर्मलता मैं भी पाऊ मेरे मन यही समाया है ।।

२५२ देव शास्त्र गुरू वाणी यह मेरा अस्तव्यस्त जीवन इसमे सुख कहीं न पाता हूँ । मैं भी अक्षय पद पाने को शुभ अक्षत तुम्हे चढाता हू ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपदाप्ताय अक्षत निर्वपामीति स्वाहा ३1 अध्यात्मवाद के पुष्पो से जीवन फुलवारी महकाई । जितना जितना उपसर्ग सहा उतनी उतनी दृढता आई ।। मैं इन पुष्पो से वञ्चित हू अब इनको पाने आया हू । चरणो पर अर्पित करने को कुछ पुष्प सजोकर लाया हू ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय कामवाण विनाशनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ।। जय पाकर चपल इन्द्रियो पर अन्तर की क्षुधा मिटा डाली । अपरिग्रह की आलोक शक्ति अपने अन्दर ही प्रगटा ली || भटकाती फिरती क्षुधा मुझे मैं तृप्त नहीं हो पाया हू । इच्छाओ पर जय पाने को मैं शरण तुम्हारी आया हू || ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ अपने अज्ञान अधेरी मे यह कमठ फिरा मारा मारा व्यन्तर विमानधारी था पर तप के उजियारे से हारा || मैं अधकार मे भटक रहा उजियारा पाने आया हू । सो ज्योति आप मे दर्शित है वह ज्योति जगाने आया हू ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोहाधकार विनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ तुमने तपके दावानल मे कर्मों की धूप जलाई है । जो सिद्ध शिला तक आ पहुची वह निर्मल गध उडाई है || मैं कर्म बन्धनो मे जकडा भव बन्धन से घबराता हू | वसु कर्म दहन के लिये तुम्हे मैं धूप चढाने आया हू ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाम धूप निर्वपामीति स्वाहा ॥ तुम महा तपस्वी शानित मूर्ति उपसर्ग तुम्हे न डिगा पाये । तप के फल ने पद्मावति के इन्द्रों के आसन कम्पाये ।। ऐसे उत्तम फल की आशा मैं मन मे उमडी पाता हू । ऐसा शिव सुख फल पाने को, फल की शुभ भेट चढाता हू ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्ताय फलम् निर्वपामीति स्वाहा ।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२५३
सपने में उपसों में तुमने समता का भाव धरा ।
आदर्श तुम्हारा अगत-या भक्तो के जीवन मे विखरा ।।
में अर दल से पूजा का शुग शाल सजा कर लाया हू ।
जो पदवी तुगो पाई है मैं भी उस पर ललचाया हू ।।
ओशो पा जिनेन्नाग अपंग शिपागीति स्वाहा !
पंचकल्याणक
वैशाख कृष्ण! दुनिया के दिन तुम वामा के उर मे आये ।
श्री अश्वसेन नृप के घर में, आनन्द गरे मगल छाये ॥
जे की शाम :ma गर्भगगल्गरिताय भी पार्श्वनाथ जिोद्राय
जपानीति सारा IRI
जब पौष कृष्ण एकादशि को, धरती पर नया प्रसून खिला ।
मूले मटके जग को, आत्मोन्नति का आलोक मिला ।।
सोही पाप एकादा रगतमप्तिाय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्धग
निर्दपामीति स्थाIRI
एकादशि पौष कृष्ण के दिन, तुमने संसार अथिर पाया ।
दीक्षा लेकर आध्यात्मिक पथ, तुमने तप द्वारा अपनाया ।।
वैशाख कृष्ण एकादशीदिने तपोगगलमलिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेद्राय
अर्धग नियंपागीति स्वारा।
अहिच्छत्र धरा पर जी गर कर, की क्रूर कमठ ने मनमानी ।
तर कृष्णा चैत्र चतुर्थी को, पद प्राप्त किया केवल ज्ञानी ।।
चह वन्दनीय हो गई धरा, दश भव का बैरी पछताया ।
देवों ने जय जयकारों से, सारा गूमण्डल गुञ्जाया ।।
ओ श्री चैत्र घतुभ दिवसे श्री अहिच्छत्रतीर्थे ज्ञानसागाज्यप्राप्ताय श्री
पार्श्वनाय जिनेन्द्राय अर्थम् निर्वपामीति स्वाहा ।
श्रावण शुक्ला सप्तमि के दिन, सम्मेद शिखर ने यज्ञ पाया ।
सुवरण गिर गद्र कूट से जव, शिव मुक्ति रमा को परिणाया।
ओ ही प्रावण शुक्ला सप्तम्यां सम्मेद शिखरस्य सुवरण भद्र कूटात मोक्ष
मंगल मण्डिताय श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्घम् निर्वपामीति स्वाहा ।

२५४ देव शास्त्र गुरू वाणी जयमाला सुरनर किन्नर गणधर फणधर योगीजन ध्यान लगाते हैं । गगवान तुम्हारी महिमा का, यशगान मुनीश्वर गाते हैं ।। जो ध्यान तुम्हारा ध्याते हैं दुख उनके पास न आते हैं । जो शरण तुम्हारी रहते हैं उनके सकट कट जाते हैं | तुम कर्मदली, तुम महावनी इन्द्रिय सुख पर जय पाई है । मैं भी तुम जैसा बन जाऊँ मन मे यह आज समाई है ।। तुमने शरीर ओ आत्मा के अतर स्वभाव को जाना है । नश्वर शरीर को मोह तजा निश्चय स्वरूप पहिचाना है || तुम द्रव्य मोह, और भाव मोह इन दोनो से न्यारे न्यारे । जो पुद्गल के निमित्त कारण वे राग द्वेष तुम से हारे || तुम पर निर्जन वन मे बरसे ओले शोले पत्थर पानी । आलोक तपस्या के आगे चल सकी न शठ की मनमानी ।। यह सहन शक्तियो का बल है जो तप के द्वारा आया था । जिसने स्वर्गो मे देवो के सिहासन को कम्पाया था ।। 'अहि' का स्वरूप धर कर तत्क्षण धरणेन्द्र स्वर्ग से आया था । ध्यानस्थ आप के ऊपर प्रमु फण मण्डप बन कर छाया था ।। उपसर्ग कमठ का नष्ट किया मस्तक पर फण मण्डप रचकर | पद्मादेवी ने उठा लिया तुम को सिर के सिहासन पर ।। तप के प्रभाव से देवो ने व्यतर की माया विनशाई । पर प्रमो आपकी मुद्रा मे तिल मात्र न आकुलता आई ।। उपसर्गों का आतक तुम्हे हे प्रभु तिल भर न डिगा पाया । अपनी विडम्बना पर बैरी असफल हो मन मे पछताया ।। शठ कमठ, बैर के वशीभूत भौतिक बल पर बौराया था । अध्यात्म आत्मबल का गौरव यह मूरख समझ न पाया था ।। दश भव तक जिसने बैर किया पीडाये देकर मन मानी । फिर हार मानकर चरणो मे झुक गया स्वयम् वह अभिमानी ।। यह बैर महा दुख दायी है यह बैर न बैर मिटाता है । यह बैर निरन्तर प्राणी को भव सागर मे भटकाता है ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २५५ जिनको भव सुखको चाह नहीं दुखसे न जरा भय खाते हैं । वे सर्व सिद्धियो को पाकर भव सागर से तिर जाते हैं ।। जिसने भी शुद्ध मनोबल से ये कठिन परीषह झेली हैं । सब ऋद्धि सिद्धिया नत होकर उनके चरणो पर खेली हैं ।। जो निर्विकल्प चैतन्य रूप शिव का स्वरूप तुमने पाया । ऐसा पवित्र पद पाने को मेरा अन्तर मन ललचाया ।। कार्माण वर्गणाये मिलकर भव वन मे भ्रमण कराती हैं । जो शरण तुम्हारी आते हैं ये उनके पास न आती हैं ।। तुमने सब बैर विरोधो पर समदर्शी बन जय पाई है । मैं भी ऐसी समता पाऊँ यह मेरे हृदय समाई है ।। अपने समान ही तुम सब का जीवन विशाल कर देते हो । तुम हो तिखाल वाले बाबा जग को निहाल कर देते हो ।। तुम हो त्रिकालदर्शी तुमने तीर्थंकर का पद पाया है । तुम हो महान अतिशय धारी तुम मे आनन्द समाया है ।। चिन्तमूरति आप अनत गुणी रागादि न तुमको छू पाये । इस पर भी हर शरणागत पर मनमाने सुख साधन आये ।। तुम रागद्वेष से दूर-दूर इनसे न तुम्हारा नाता है । स्वयमेव वृक्ष के नीचे जग शीतल छाया पा जाता है ।। अपनी सुगन्ध क्या फूल कहीं घर-घर आकर विखराते हैं । सूरज की किरणों को छूकर सुमन स्वयम् खिल जाते हैं ।। भौतिक पारसमणि तो केवल लोहे को स्वर्ण बनाती है । हे पार्श्व प्रभो तुमको छूकर आत्मा कुन्दन बन जाती है । तुम सर्व शक्ति धारी हो प्रभु ऐसा बल मैं भी पाऊगा । यदि यह बल मुझको भी दे दो फिर कुछ न मागने आऊगा ।। कह रहा भक्ति के वशीभूत हे दया सिन्धु स्वीकारो तुम । जैसे तुम जग से पार हुये मुझ को भी पार उतारो तुम ।। जिसने भी शरण तुम्हारी ली वह खाली हाथ न आया है । अपनी अपनी आशाओ का सबने वाछित फल पाया है । बहूमूय सम्पदाये सारी ध्याने वालो ने पाई है ।

२५६ देव शास्त्र गुरू वाणी पारस के भक्तो पर निधियाँ स्वयमेव सिमट कर आई हैं ।। जो मन से पूजा करते हैं पूजा उनको फल देती है । प्रभु पूजा भक्त पुजारी के, सारे सकट हर लेती है ।। जो पथ तुमने अपनाया है वह सीधा शिव को जाता है । जो इस पथ का अनुयायी है वह परम मोक्ष पद पाता है ।। ओ ही श्री अहिच्छत्र पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय महार्घ निर्वपामीति स्वाहा । 40 दोहा पार्श्वनाथ भगवान को जो पूजे धर ध्यान । उसे लोक परलोक के मिले सकल वरदान ।। इत्याशीर्वाद । पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् नवदेवता पूजन गीताछन्द अरिहत सिद्धाचार्य पाठक, त्रिभुवन वद्य जिनधर्म जिनआगम जिनेश्वरमूर्ति जिनगृह वद्य हैं ।। नव देवता ये मान्य जगमे, हम सदा अर्चा करे । आह्वान कर थापे यहाँ मन मे अतुल श्रद्धा धरे ।। ॐ ही अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधु जिनधर्मजिनागमजिनचैत्य चैत्यालयसमूह । अत्र अवतर अवतर सवौषट आहानन । ॐ ही अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापन । ॐ हीं अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधीकरण | अथाष्टक गगानदी का नीर निर्मल, बाह्य मल धोवे सदा अतर मलो के क्षालने को नीर से पूजू मुदा ।। नवदेवताओ की सदा जो भक्ति से अर्चा करे । सब सिद्धि नवनिधि रिद्धि मगल पाय शिवकाता वरे ||१|| ॐ हीं अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्य चैत्यालयेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जल | ..चन्दन...| - देव शास्त्र गुरू वाणी २५७ कर्पूर मिश्रित गध चदन, देह ताप निवारता । तुम पाद पकज पूजते, मन ताप तुरतहि वारता ।। नवदेवताओ की सदा जो भक्ति से अर्चा करे सब सिद्धि नवनिधि रिद्धि मगल पाय शिवकाता वरे |२|| ॐहीं क्षीरोदधी के फेन सम सित तदुलो को लायके । उत्तम अखडित सौख्य हेतु, पुज नव सुचढायके । नव.।।३।। ॐ हीं चपा चमेली केवडा, नाना सुगधित ले लिये । भव के विजेता आपको, पूजत सुमन अर्पण किये ।निव. ।।४।। ॐ हीं .....पुष्प.... ! पायस मधुर पकवान मोदक, आदि को भर थाल मे । निज आत्म अमृत सौख्य हेतु पूजहूँ नत भाल मैं ।निव.।।५।। .अक्षत... " नैवेद्य. Consans- । 000000000 कर्पूर ज्योति जगमगे दीपक लिया निज हाथ मे । तुअ आरती तम चारती, पाऊ सुज्ञान प्रकाश मैं ।निव. ।।६।। ॐ हीं दीप दशगध धूप अनूप सुरभित, अग्नि में खेऊ सदा । निज आत्मगुण सौरभ उठे, हो कर्म सब मुझसे विदा ।।नव.।।७।। ॐ ही....... धूप... | अगूर अमरख आम्र अमृत, फल भराऊ थाल मे । उत्तम अनूपम मोक्ष फल के, हेतु पूजू आज मैं शनिव.||८|| ॐ ही....... फल.... | जल गध अक्षत पुष्प चरू दीपक सुधूप फलार्घ्य ले । वर रत्नत्रय निधि लाभ यह बस अर्घ्य से पूजत मिले ||नव.116।। ॐ ही....... अयं... | दोहा जलधारा से नित्य मैं, जगकी शाति हेत । नवदेवो को पूजहूँ, श्रद्धा भक्ति समेत ।।१०।। शातये शातिधारा ।

२५८ देव शास्त्र गुरू वाणी नाना विध के सुमन ले, मन मे बहु हरपाय । मैं पूजू नव देवता, पुष्पाजली चढाय ।।११।। दिव्य पुष्पाजलि । जाप्य ॐ हीं अर्हत्सिद्धाचायोपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचेत्य चैत्यालयेभ्यो नम । (६, २७ या १०८ वार) जयमाला सोरठा चिच्चितामणिरत्न, तीन लोक मे श्रेष्ठ हो । गाऊ गुणमणिमाल, जयवते वर्तो सदा ।।१।। चाल-हे दीनवधु श्रीपति...- जय जय श्री अरिह त देवदेव हमारे जय घातिया को घात सकल जतु उबारे ।। जय जय प्रसिद्ध सिद्ध की मै वदना करू जय अष्ट कर्ममुक्त की मैं अर्चना करू ।।२।। आचार्य देव गुण छत्तीस धार रहे है दीक्षादि दे असख्य भव्य तार रहे है । उपाध्याय गुरू ज्ञान के धनी सन्मार्ग के उपदेश की वर्षा करे धनी ।।३।। जय साधु अठाईस गुणो को धरे सदा निज आतमा की साधना से च्युत न हो कदा ।। पचपरमदेव सदा व द्य हमारे ससार विषम सिधु से हमको भी उबारे ।।४।। जिनधर्म चक्र सर्वदा चलता ही रहेगा । जो इसकी शरण ले वो सुलझता ही रहेगा ।। जिन की ध्वनि पियूष का जो पान करेगे । भव रोग दूर कर वे मुक्ति कात बनेगे ।।५।। जैवत ये देव शास्त्र गुरू वाणी २५६ जिन चैतय की जो वदना त्रिकाल करे हैं । वे चित्स्वरूप आत्म लाभ करे है । कृत्रिम व अकृत्रिम जिनालयो को जो भजें । वे कर्मशत्रु जीत शिवालय मे जा बसे ।।६।। नव देवताओ की जो नित आराधना करे । वे मृत्युराज की भी तो विराधना करे ।। मै कर्मशत्रु जीतने के हेतु ही जजू । संपूर्ण "ज्ञानमती" सिद्धि हेतु ही भजू ।।७।। दोहा-नवदेवो को भक्तिवश, कोटि कोटि प्रणाम । भक्ती का फल मैं चहूँ, निजपद मे विश्राम |1|| ॐ हीं अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मनिजागमजिनचैत्य चैत्यालयेभ्यो जयमाला अर्घ्य .. | शातिधारा, पुष्पाजलि । गीताछंद जो भव्य श्रद्धाभक्ति से नव देवता पूजा करे । वे सब अमगल दोष हर, सुख शाति मे झूला करे । नवनिधि अतुल भडार ले, फिर मोक्ष सुख भी पाबते । सुखसिधु मे हो भग्न फिर, यहाँ पर कभी न आवते ।। || इत्याशीर्वाद । शांति पाठ शातिनाथ मुख शशि उनहारी, शील गुण व्रत सयमधारी । लखन एकसौ आठ विराजै, निरखत नयन कमल दल लाजै । पचम चक्रवर्ति पदधारी, सोलह तीर्थकर सुखकारी । इन्द्र नरेन्द्र पूज्य जिननायक, नमो शातिहित शाति विधायक RI दिव्य विटप पहुपन की वरषा, दुदुभि आसन वाणी सरसा । छत्र चमर भामडल भारी, ये तुव प्रतिहार्य मनहारी । शाति जिनेश शाति सुखदाई, जगत पूज्य पूजो सिरनाई । परम शाति दीजै हम सबको, पढे तिन्हे पुनि चार सघ को ।४।

२६० देव शास्त्र गुरू वाणी पूजे जिन्हे मुकुट-हार किरीट लाके, इन्द्रदि देव अरु पूज्य पदाब्ज जाके । सो शातिनाथ वर वश जगत्प्रदीप, मेरे लिए करहू शाति सदा अनूप ।५। सपूजको को प्रतिपालको को, यतीनको को यतिनायको को । राजा प्रजा राष्ट्र सुदेश को ले, कीजे सुखी हे जिन शाति को दे ६। होवे सारी प्रजा को सुख, बलयुत हो धर्मधारी नरेशा । होवे वर्षा समय पै, तिलभर न रहे व्याधियो का अदेशा ७। होवे चोरी न जारी, सुसमय वरतै, हो न दुष्काल भारी । सारे ही देश धारे, जिनवर वृष को जो सदा सौख्यकारी || दोहा घाति कर्म जिन नाश करि, पायो केवलराज । शाति करें ते जगत मे, वृषभादिक जिनराज || (तीन बार शाति धारा देवे) यहाँ सब लोग नौ बार णमोकार मत्र का जाप करे । विसर्जन बिन जाने वा जान के रही टूट जो कोय । तुम प्रसादतें परम गुरु सो सब पूरन होय ||१|| पूजनविधि जानूं नहीं, नहीं जाने आह्वान । और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करहु भगवान ।।२।। मत्रहीन धनहीन हूँ क्रियाहीन जिनदेव । क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव ।।३।। (आये जो देवगण पूजे भक्ति प्रमान तै अब जावहु कृपाकार अपने अपने थान 11 गुरु स्तुति अहो । जगतगुरु एक, सुनियो अरज हमारी । तुम हो दीन दयालु, मै दुखिया ससारी ||१|| इस भव वनके माहिकाल अनादि गमायो । भ्रमत चतुर्गति माहि, सुख नाहि दुख बहु पायो ।।२।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २६१ कर्म महारिपु जोरि, एक न कान करेंजी । मन माने दुख देहि, काहूसो नाहि डरेजी ।।३।। कबहू इतर निगोद कबहू नर्क दिखावै । सुरनर पशुगति माहि. बहु विधि नाच नचावै ।।४।। प्रभु इनको परसग, भव-भव माहि बुरेजी । जे दुख देखे देव । तुमसो नाहि दुरोजी ।।५।। एक जनम की बात, कहि न सको सुनि स्वामी । तुम अनत परजाय, जानत अन्तर जामी ।।६।। मैं तो एक अनाथ, ये मिलि दुष्ट घनेरे । किये बहुत बेहाल, सुनियो साहिब मेरे ७।। ज्ञान महानिधि लूटि, रक निबल करि डार्यो । इन्हीं तुम मुझ माहि, हे जिन अन्तर पारयो ||८|| पाप पुण्य की दोय, पायनि बेडी डारी । तन कारागृह माहि मोहि दियो दुख भारी ||६|| इनको नेक विगार मै कछु नाहि कियो जी । विन कारन जग बद्य, बहुत विधि बैर लियोजी ।।१०।। अव आयो तुम पास, सुन जिन सुजस तिहारो । नीति निपुण जिनराय कीजे न्याय हमारी ।।११।। दुष्टन देहु निकाल, साधुन को रख लीजे । बिनवै 'भूधरदास हे प्रभु | ढील न कीजे ||१२।। दु.ख हरण स्तुति श्रीपति जिनवर करुणा यतन, दुख हरण तुम्हारा वाना हे । मत मेरी वार अवेर करो, मोहि देहु विमल कल्याना है ।।टेक।। त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसो कछु बात न छाना है । मेरे उर आरत जो वरतें, निहचै सब सो तुम जाना है ।। अवलोक विथा मत मौन गाहो, नाहि मेरा कहीं ठिकाना है । हो राजीव लोचन सोच-विमोचन मै तुमसो हित ठाना है ||श्री १।। सब ग्रन्थनि मैं निरग्रथनि ने निरधार यही गणधार कही । जिन नायक ही सब लायक है, सुखदायक छायक ज्ञान मही ।। ।

२६२ देव शास्त्र गुरू वाणी यह बात हमारे कान परी, तब आन तुम्हारे शरन गही । क्यो मेरी बार विलम्ब करो, जिन नाथ कहो यह बात यही ।।श्री०२।। काहू को भोग मनोग करो, काहू को स्वर्ग विमाना है । काहू को नाग नरेशपती, काहू को ऋद्धि निधाना है ॥ अब मो पर क्यो न कृपा करते, यह क्या अधेर जमाना है । इन्साफ करो मत देर करो, सुख वृन्द भरो भगवाना है ||श्री० ३।। खल कर्म मुझे हैरान किया, तब तुमसौं आन पुकारा है । तुम ही समरत्थ न न्याय करो, तब बदे का क्या चारा है || खल-घालक पालक बालक का, नृप नीति यही जग सारा है । तुम नीति-निपुन त्रैलोक्यपति, तुम ही लगि दौर हमारा है ।श्री० ४।। जबसे तुमसे पहिचान भई, तबसे तुम की को माना है । तुमरे ही शासन का स्वामी, हमको शरना सरधाना है । जिनको तुमरी शरनागत है, तिनसो यमराज डराना है । यह सुयश तुम्हारे साँचे का, सब गावत वेद पुराना है ||श्री० ५।। जिसने तुमसे दिल दर्द कहा, तिसको तमने दुख हाना है । अघ छोटा मोटा नाशि तुरत, सुख दिया तिन्हे मन माना है ।। पावक सो शीतल नीर किया, औ चीर बडा असमाना है । भोजन था जिसके पास नहीं सो किया कुबेर समाना है ||श्री०६।। चितामणि पारस कल्पतरू सुखदायक ये सरधाना है । तब दासन के सब दास यही, हमरे मन मे ठहराना है । तुम भक्तन को सूर इन्द्र पदी, फिर चक्रपति पद पाना है । क्या बात कहो विस्तार बढो, वे पावै मुक्ति ठिकाना है ।।श्री० ७ ।। गति चार चौरासी लाख विषै चिन्मूरत मेरा भटका हो दीन बन्धु करूणा निधान, अबलौं न मिटा वह खटका है । जब जोग मिला शिव-साधन का तब विघन कर्म ने हटका है । तुम विधन हमारे दूर करो सुख देहु निराकुल घटका है ||श्री० ८|| गज ग्राह ग्रस्ति उद्धार लिया, ज्यो अजन तस्कर तारा है । ज्यो सागर गोपद रूप किया, मैना का सकट टाला है ।। ज्यो सूली तें सिहासन औ, वेडी को काट बिडारा है। त्यो मेरा सकट दूर करो, प्रभु मोको आस तुम्हारा है ||श्री० ६।। ज्यो फाटक टेकत पाव खुला, औ साप सुमन कर डारा है ।

देव शास्त्र गुरू वाणी २६३ ज्यो खड्ग कुसुम का माल किया, बालक का जहर उतारा है ।। ज्यो सेठ विपद चकचूरि पूर घर लक्ष्मी सुख विस्तारा है । त्यो मेरा सकट दूर करो, प्रभु मोकू आस तुम्हारा है ||श्री० १०।। यद्यपि तुमको रागादि नहीं, यह सत्य सर्वथा जाना है । चिन्मूरति आप अनत गुनी, नित शुद्ध दशा शिव-थाना है ।। तद्यपि भक्तन की भीर हरो, सुख देत तिन्हे जु सुहाना है । यह शक्ति अचिन्त्य तुम्हारी का, क्या पावै पार सयाना है ।।श्री० ११।। दुख-खडन श्री सुख मडन का तुमरा प्रन परम प्रमाना है वरदान दया जस कीरत का, तिन्हु लोक ध्वजा फहराना है ।। कमलाधरजी । कमलाकरजी, करिए कमला अमलाना है । अब मोरि बिथा अवलोकि रमापति, रच न बार लगाना है ||श्री० १२।। हो दीनानाथ अनाथ हितू जन दीन अनाथ पुकारी है । उदयागत कर्म-विपाक हलाहल, मोह विथा विस्तारी हे ।। ज्यो आप और भवि जीवन की, तत्काल विथा निरवारी है त्यो 'वृन्दावन' यह अर्ज करे, प्रभु आज हमारी बारी है ||श्री० १३ ।। सिद्धचक्र की स्तुति श्री सिद्धचक्र का पाठ करो, दिन आठ ठाठ से प्रानी, फल पायो मैना रानी टेक।। मैना सुन्दरी इक नारी थी, कोढी पति लख दुखियारी थी । माहिं पढे चैन दिन रैन व्यथित अकुलानी ।।फल पायो०।। जो पति का कष्ट मिटाऊगी तो उभैय लोक सुख पाँऊगी । नहि अजा-गल-स्तन-वत निष्फल जिन्दगानी । फल पायो। एक दिवस गई जिन मन्दिर मे दर्शन कर अति हर्षी उर मे । फिर लखे साधु निर्ग्रन्थ दिगम्बर ज्ञानी ।फल पायो०।। वेठी कर मुनि को नमस्कार, निज निन्दा करती बार बार । भर अश्रु नयन कहि मुनि सो दुखद कहानी ||फल पायो०।। बोले मुनि पुत्री धैर्य धरो, श्री सिद्धचक्र का पाठ करो । नहीं रहे कष्ट की तन मे नाम निशानी ।फल पायो०।। सुन साधु वचन हर्षी मैना, नाहि होय झूठ मुनि बैना । करके श्रद्धा श्री सिद्ध चक्र की ठानी ।फल पाया०||

२६४
देव शास्त्र गुरू वाणी
जब पर्व अठाइ आया है, उत्सव युत पाठ कराया है ।
सब के तन छिडका यत्र न्हवन का पानी ।।फल पायो०।।
भव-भोग भोगि योगीश भये, श्रीपाल कर्म हनि मोक्ष गये ।
दूजे भव मैना पावे शिव रजधानी ।।फल पायो० ।।
जो पाठ करे मन वच तन से, वे छूट जाये भव बन्धन से ।
'मक्खन' मत करो विकल्प कहे जिनवाणी ।।फल पायो०।।
श्री भगवान पार्श्वनाथजी की स्तुति
तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा ।
मेटो मेटो जी सकट हमारा । टेक
निशि दिन तुमको जपू पर से नेहा तजू ।
जीवन सारा तेरे चरणो मे बीते हमारा
मेटो मेटो० ।।
अश्वसैन के राजदुलारे, वामदेवी के सुत प्राण प्यारे ।
सब से नेहा तोडा, जग से मुह को मोडा, सयम धारा ।।
मेटो मेटो० ।।
इन्द्र और धरणेन्द्र भी आये देवी पद्मावती मगल गाये ।
आशा पूरो सदा दुख नही पावै कदा, सेवक थारा ।।
मेटो मेटो० ॥
की तो परवाह नही है स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है
मारे जामन मरण, होवे ऐसा यतन, पारस प्यारा ।।
मेटो मेटो. ।।
लाखो वार तुम्हे शीश नवाऊँ, जग के नाथ तुम्हे कैसे पाऊँ।
पकज व्याकुल भया, दर्शन बिन यह जिया लाग खारा ।।
मेटो मेटो. ||
प्रात काल की स्तुति
वीतराग सर्वज्ञ हितकर, भविजन की अब पूरो आश ।
ज्ञान भानु का उदय करो, मम मिथ्यामत का होय विनाश |||

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२६६ देव शास्त्र गुरू वाणी आतम शुद्ध हमारा होवे, पाप मैल नहीं चढे कदा । विद्या की हो उन्नति हममे, धर्म ज्ञान हू वढे सदा |८|| दोऊ कर जोडे बालक ठाढे, करे प्रार्थना सुनिए तात । सुख से बीते रैन हमारी, जिनमत का हो शीघ्र प्रभात ||६|| मात-पिता की आज्ञा पालैं, गुरु की भक्ति धरे उर मे । रहे सदा हम करतब तत्पर, उन्नति कर निज निज पुर में |१०|| इष्ट प्रार्थना भावन दिन रात मेरी, सब सुखो ससार हो । सत्य सयम शील का, व्यवहार घर-घर वार हो || टेक धर्म का प्रचार हो, अरु देश का उद्धार हो । और ये बिगडा हुआ भारत चमन गुलजार हो ||१|| ज्ञान के अभ्यास से जीवो का पूर्ण विकास हो । धर्म के प्रचार से, हिसा का जग से हास हो IRI शान्ति अरु आनन्द का, हर एक घर मे बास हो । वीर बाणी पर सभी, सार का विश्वास हो ।।३।। रोग अरु भय शोक होवे, दूर सब परमात्मा । कर सके कल्याण ज्योति, सब जगत की आत्मा ।।४।। सम्बोधन सदा सन्तोष कर प्राणी, अगर सुख से रहना चाहे । घटा दे मन की तृष्णा को, अगर अपना भला चाहे ।। आग मे जिस कदर ईधन, पडेगा ज्योति ऊँची हो । बढा मत लोभ की तृष्णा , अगर दुख से बचा चाहे ||१|| वही धनवान है जग मे लोभ, जिसके नहीं मन मे वह निर्धन रक होता है, जो परधन को हरा चाहे |RIL दुखी रहते है वह निशदिन, जो आरत-ध्यान करते हैं । न कर लालच अगर आजाद, रहने का मजा चाहे ||३|| बिना मागे मिले मोती, 'न्यामत' देख दुनिया मे । भीख मागे नहीं मिलती अगर कोई गहा चाहे ।।४।।

२६७ व शास्त्र गुरू वाणी आलोचना पाठ दोहा बन्दो पाचो परमगुरु, चौबीसों जिनराज । करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज ||१|| सखी छन्द १४ मात्रा सुनिए जिन अरज हमारी, हम दोष किए अति भारी । तिनकी अब निवृति काजा, तुम सरन लही जिनराजा ।२।। इक वे तो चउ इन्द्री वा, मन रहित सहित जे जीवा । तिन की नाहिं करुणाधारी निरदइ है घात विचारी ।।३।। समरम समारभ आरभ, मन वच तन कीने प्रारम्भ कृत करित मोदन करिकैं, क्रोधादि चतुष्टय धरिक ।।४।। शत आठ जु इमि भेदन”, अघ कीने परछेदनौं । तिनकी कहु कोलो कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी ||५|| विपरीत एकान्त विनय के, सशय अज्ञान कुनय के । वश होय घोर अघ कीने, वचत नाहि जाय कहीने ||६|| कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदयाकरि भीनी । या विधि मिथ्यात भ्रमायो, चहुगति मधि दोष उपायो ।१७।। हिसा पुनि झूठ जु चोरी, परविनितासौं दृग जोरी । आरम्भपरिग्रह भीनो पन पाप जु या विधि कीनो ||८|| सपरस रसना घ्रानन को, चखु कान विषय सेवन को । बहु करम किये मनमाने, कछु न्याय अन्याय न जाने ||5|| फल पच उदबर खाये, मधु मास मद्य चित चाहे । न हि अष्टमूलगुणधारे सेये कुविसन दुखकारे ।।१०।। दुईवीस अमख जिन गाये, सो भी निश दिन भुजाये । कछु भेदाभेद न पायो, ज्यो त्यो करि उदर भरायो ||११|| अनतानु जु बधी जानो, प्रत्याखान अप्रत्याखानो । सज्वलन चौकारी गुनिए, सब भेद जु षोडष मुनिए ।।१२।। परिहास अरति रति शोग, भय ग्लानि तिवेद सजोग । पनवीस जु भेद इम इनके वश पाप किए हम ।।१३।।

२६८ देव शास्त्र गुरू वाणी निद्रावश शयन कराई सुपने मधिदाप लगाई । फिर जागि विषय वन धायो, नानाविधि विषफल खायो ।।१४।। आहार विहार निहारा, इनमे नहि जतन विचारा । विन देखी धरी उठाई विन शोधि वस्तु जु खाई ।।१५।। तव ही परमाद सतायो बहुविधि विकलप उपजायों । कछु सुधियुधि नाहि रही है मिथ्यामति छाय गई है ।।१६।। मरजादा तुमढि ग लीनी ताहू मे दोष जु कीनी । भिन-भिन अब कैंसे कहिए तुम ज्ञान विर्षे सव पइये ||१७।। हा हा । में दुठ अपराधी त्रसजीवन राशि विराधी । थावर की जतन न कीनी उर मे करुना नहि लीनी १८|| पृथिवी बहु खोद कराई महलादिक जगा चिनाई । पुनि विन्गाल्या जल ढोल्यी, पखा तैं पवन विलोल्यो ||१६ ।। हा हा । मै अदयाचारी, व हु हरितकाय जु विदारी । तामधि जीवन के खदा हम खाए धरि आनन्दा ||२०|| हा हा । परमाद वसाई विन देखे अगनि जलाई । तामध्य जीव जे आए ते हू परलोक सिधाए ||२१।। वीध्यो अनराति पिसायो ईधन विन सोधि जलायो । झाडू ले जागा वुहारी चिवटी आदिक जीव विदारी ।।२२।। जल छानि जिवानी कीनी सो हू पुनि डारि जु दीनी । नहि जलथानक पहुचाई, किरिया विनु पाप उपाई ।।२३।। जल मल मोरिन गिरवायो कृमिकुल बहुत घात करायो । नदियान बिन चीर धुवाये कोसन के जीव मराये ।।२४।। अन्नादिक शोध कराई तामे जु जीव निसराई । तिनका नहि जतन कराया गारियालै धूप डराया ।२५।। पुनि द्रव्य कमावन काजै बहु आरम्भ हिसा साजै । किये तिसना वस अघ भारी, करुना नहि रचा विचारी ।२६।। इत्यादिक पाप अनता, हम कीने श्री भगवता सतति चिरकाल उपाई वाणी तैं कहिय न जाई ।२७।। ताको जु उदय अब आयो नाना विधि मोहि सतायो । फल भुजत जिय दुख पावै वचतें कैसे करि गावै |२८|| देव शास्त्र गुरू वाणी २६६ तुम जानत केवलज्ञानी, दुख दूर करो शिवथानी । हम तो तुम शरण लही है, जिन तारन विरद सही है |२६|| जो गाँवपती इक होवै, सौ भी दुखिया दुख खोवे । तुम तीन भुवन के स्वामी, दुख मेटहु अन्तरजामी ।।३०।। द्रौपदी को चीर बढायो, सीता प्रति कमल रचायो । अंजन से किये अकामी, दुख मेटो अन्तरयामी ।।३१।। मेरे अवगुन ने चितारो, प्रभु अपनो विरद सम्हारो । सब दोष रहित करि स्वामी दुख मेटहु अन्तरयामी ।।३२।। इन्द्रादिक पदवी न चाहू, विषयनि मे नाहि लुभाऊँ । रागादिक दोष हरीजै, परमातम निज पद दीजै ।।३३।। दोहा दोष रहित जिन देवजी, निजपद दीजै मोहि । सब जीवन' के सुखा ब, आनन्द मगल. होहि ।। अनुभव माणिक पारखी, 'जोहरी आप जिनद । ये ही वर मोहि दीजिए, चरन शरन आनन्द ।। मेरी भावना जिसने राग-द्वेष कामदिक जीते, सब जग जान लिया । सब जीवो को मोक्षमार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया ।। बुद्ध, वीर जिन, हरि हर, बह्मा या उसको स्वाधीन कहो । भक्तिभाव से प्रेरित हो वह, चित्त उसी मे लीन रहो ।।१।। विषयो की आशा नहि जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं । निज-पर के हित-साधन मे जो, निश दिन तत्पर रहते हैं ।। स्वार्थत्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं । ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं ।।२।। रहे सदा सत्सग उन्हीं का, ध्यान उन्ही का नित्य रहे । उन्हीं जैसी चर्या मे यह, चित सदा अनुरक्त रहे ।। नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नही कहा करूँ । पर-धन (नर) वनिता पर न लुभाऊँ, सतोषा मृत पिया करूँ ।।३।। - २७० देव शास्त्र गुरू वाणी अहकार का भाव न रक्खू, नहीं किसी पर क्रोध करूँ देख दूसरो की बढती को, कभी न ईर्षा-भाव धरूँ । रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य व्यवहार करूँ बने जहाँ तक इस जीवन मे, औरो का उपकार करूँ ।।४।। मैत्री-भाव जगत् मे मेरा, सब जीवो से नित्य रहे । दीन-दुखी जीवो पर मेरे, उर से करुणा स्रोत वहे ।। दुर्जन-क्रूर-कुमार्गरतो पर, क्षोभ नही मुझको आवे । साम्यभाव रक्खू मै उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ||५|| गुणीजनो को देख हृदय मे, मेरे प्रेम उमड आवे । बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे । होऊँ नही कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे । गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे ||६|| कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे । लाखो वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे ।। अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे । तो भी न्याय मार्ग ये मेरा, कभी न घबराये ।७।। होकर सुख मे मग्न न फूले दुख मे कभी न पद डिगने पावे पर्वत-नदी-श्मशान-भयानक, अटवी से नहि भय खावे || रहे अडोल-अकप निरन्तर, यह मन दृढतर बन जावे । इष्ट-वियोग अनिष्ट-योग मे, सहनशीलता दिखलावे ||८|| सुखी रहे सब जीव जगत के, कोई कमी न घबरावे । बैर-पाप अभिमान छोड जग नित्य नये मगल गावे ।। घर घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जावे । ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, मनुज-जन्म फल सब पावे ||६|| ईति भीति व्यापे नहि जग मे, वृष्टि समय पर हुआ करे । धर्मनिष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे ।। रोग-मरी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे । परम अहिसा धर्म जगत मे, फैले सर्व हित किया करे ||१०|| फैले प्रेम परस्पर जग मे, मोह दूर ही रहा करे । अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहि, कोई मुख से कहा करे | बनकर सब 'युग-वीर हृदय से, देशोन्नतिरत रहा करे । वस्तुस्वरूप विचार खुशी से, सब दुख सकट सहा करे ।।११।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२७१
बारह भावना
(भूधरदास कृत)
राजा राणा क्षत्र पति, हाथिन के असवार ।
मरना सबको एक दिन , अपनी अपनी बार
दल बल देवी देवता, माता पिता परिवार ।
मरती विरिया जीव को, कोई न राखनहार ||
दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णावश धनवान ।
कहूँ न सुख ससार मे, सब जग देख्यो छान ||
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय ।
यो कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय ।।
जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय ।
घर सम्पत्ति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय ।।
दिपै चाम चादर मढी हाड पीजरा देह ।
भीतर या सम जगत मे, और नहीं घिन गेह ।।
मोह नीद के जोर जगवासी घूमे सदा
कर्म चोर चहु ओर सरबस लूटें सुध नहीं ।।
सतगुरु देय जगाय मोह नींद जब उपशमै ।
तब कछु बनै उपाय कर्मचोर आवत रुकै ॥
ज्ञान दीप तप तेल भर, घर शोधै भ्रम छोर ।
या विधि विन निकसै नहीं, पैठे पूरब चोर ||
पञ्च महाव्रत सचरण,समिति पञ्च प्रकार ।
प्रबल पञ्च इन्द्रिय विजय, धार निर्जरा सार ||
चौदह राजु उत्तग नभ, लोक पुरुष सठान ।
तामैं जीव अनादि तै, भरमत है बिन ज्ञान ।।
धन कन कचन राज सुख सबहि सुलभ करि जान ।
दुरलभ है ससार मे, एक जथारथ ज्ञान ।।
जाचे सुर तरु देय सुख, चितत चिता रैन ।
बिन जाचे बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन ||

२७२ देव शास्त्र गुरू वाणी बारह भावना (श्री मगतराय जी कृत) दोहा छन्द बदू श्री अरहत पद, वीतराग विज्ञान । वरणू बारह भावना, जगजीवन हित जान ||१|| विष्णु पद छन्द कहाँ गये चक्री जिन जीता, भरत खड सारा कहाँ गए वह राम अरु लक्ष्मण, जिन रावण मारा । कहाँ कृष्ण रुक्मिणि सतभामा, अरु सपत्ति सगरी । कहाँ गए वह रगमहल अरु, सुवरन की नगरी ।।२।। नहीं रहे वह लोभी कौरव, जूझ मरे रन मे । गए राज तज पाडव वन को, अगिन लगी तन मे || मोह नींद से उठ रे चेतन, तुझे जगावन को । हो दयाल उपदेश करै गुरु, बारह भावन को ।।३।। १ अथिर भावना सूरज चाँद छिपे निकले ऋतु, फिर-फिर कर आवै । प्यारी आयु ऐसी बीते, पता नही पावै ।। पर्वत-पतित-नदी-सरिता-जल, बहकर नहीं हटता। स्वास चलत यो घटै काठ ज्यो, आरे सो कटता ||४|| ओस-बूद ज्यो गलै धूप मे, वा अजुलि पानी । छिन छिन यौवन छीन होत है, क्या समझै प्रानी ।। इन्द्रजाल आकाश नगर सम जन-सम्पति सारी । अथिर रूप ससार विचारो, सब नर अरु नारी ||५|| २ अशरण भावना काल-सिह ने मृग चेतन को घेरा भव वन मे । नहीं बचावन-हारा कोई यों समझो मन मे ।। मत्र यत्र सेना धन सम्पति, राजपाट छूटै । वश नहीं चलता काल लुटेरा, काय नगरि लूटै ।।६।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
२७३
चक्ररत्न हलधर सा भाई, काम नहीं आया ।
एक तीर के लगत कृष्ण की, विनश गई काया ।।
देव धर्म गुरु शरण जगत मे, और नहीं कोई ।
भ्रम से फिरै भटकता चेतन, यू ही उमर खोई ।।७।।
३ ससार भावना
जनम-मरन अरु जरा-रोग से, सदा दुखी रहता ।
द्रव्य क्षेत्र अरु काल भाव भव-परिवर्तन सहता ।।
छेदन भेदन नरक पशु गति, बँध बधन सहना ।
राग-उदय से दुख सुरगति मे, कहाँ सुखी रहना ||८||
भोगि पुण्यफल हो इकचन्द्री, क्या इसमे लाली ।
कुतवाली दिन चार वही फिर, खुरुपा अरु जाली ।।
मानुष-जन्म अनेक विपतिमय, कहीं न सुख देखा ।
पचमगति सुख मिलै शुभाशुभ को मेटो लेखा ||६||
४ एकत्व भावना
जन्मै मरै अकेला चेतन, सुख-दुख का भोगी ।
और किसी का क्या इक दिन यह, देह जुदा होगी ।।
कमला चलत न पैंड जाय मरघट तक परिवारा ।
अपने अपने सुख को रोवे, पिता पुत्र दारा ||१०||
ज्यो मेले मे पथी जन,
मिल नेह फिरें धरते ।
ज्यो तरुवर पर रैन बसेरा पछी आ करते ।।
कोस कोई दो कोस कोई उड फिर थक-थक हारै ।
जय अकेला हस सग मे, कोई न पर मारे ||११||
५ अन्यत्व भावना
मोह-रूप मृग तृष्णा जग मे, मिथ्या जल चमकै ।
मृग चेतन नित भ्रम मे उठ उठ, दौडे थक थककै ।।
जल नहीं पावै प्राण गमावै, भटक भटक मरता ।
वस्तु पराई मानै अपनी, भेद नहीं करता ।।१२।।

२७४
देव शास्त्र गुरू वाणी
तू चेतन अरु देह अचेतन, यह जड तू ज्ञानी ।
मिले अनादि यतनतें विछडै ज्यो पय अरु पानी ।।
रूप तुम्हारा सवसो न्यारा, भेद ज्ञान करना ।
जौलो पौरुष थकै न तौलो उद्यम सो चरना ||१३||
६ अशुचि भावना
तू नित पोखै यह सूखे ज्यो, धोवै त्यो मैली ।
निश दिन करै उपाय देह का, रोग दशा फैली ।।
माता-पिता-रज-वीरज मिलकर, वनी देह तेरी ।
मास हाड नश लहू राध की, प्रगट व्याधि घेरी ||१४ ।।
काना पौडा पडा हाथ यह चूसै तो रोवै ।
फलै अनत जु धर्म ध्यान की, भूमि-विष बोवै ।।
केसर चन्दन पुष्प सुगन्धित, वस्तु देख सारी ।
देह परस ते होय अपावन, निशदिन मल जारी ।।१५।।
७ आस्रव भावना
ज्यो सर-जल आवत मोरी त्यो, आस्रव कर्मन को ।
दर्वित जीव प्रदेश गहै जब, पुद्गल भर्मन को ।।
भावित आस्रवभाव शुभाशुभ, निशदिन चेतन को ।
पाप पुण्य के दोनो करता, कारण बधन को ||१६ ।।
पन-मिथ्यात योग पन्द्रह द्वादस-अविरत जानो ।
पच अरु बीस कषाय मिले सब, सत्तावन मानो ।।
मोह-भाव की ममता टारै, पर परणति खोते ।
करै मोख का यतन निरास्रव, ज्ञानी जन होते ।।१७।।
८ सवर भावना
ज्यो मोरी मे डाट लगावै, तव जल रुक जाता ।
त्यो आस्रव को रोके सवर, क्यो नही मन लाता ।।
पच महाव्रत समिति गुप्तिकर, वचन काय मन को ।
दशविध-धर्म परीषह बाइस, बारह भावन को ||१८||

देव शास्त्र गुरू वाणी
२७५
यह सब भाव सतावन मिलकर आस्रव को खोते ।
सुपन दशा से जागो चेतन, कहाँ पडे सोते ।।
भाव शुभाशुभ रहित शुद्ध-भावना-सवर भावै ।
डाट लगत यह नाव पडी मझधार पार जावै ।।१६।।
६ निर्जरा भावना
ज्यो सरवर जल रुका सूखता, तपन पडै भारी ।
सवंर रोकै कर्म निर्जरा है सोखनहारी ।।
(उदय-भोग सविपाक-समय, पक जाय आम डाली ।
दूजी है अविपाक पकावै, पालविष माली |२०||
पहली सबके होय, नहीं कुछ सरै काम तेरा ।
दूजी करै जो उद्यम करकै, मिटै जगत फेरा ।।
सवर सहित करो तप प्रानी, मिलै मुकत रानी ।
इस दुलहिन की यही सहेली, जानै सब ज्ञानी ।२१।।
१०. लोक भावना
लोक आलोक आकाश माहि थिर, निराधार जानो ।
पुरुषरूप-कर-कटी भए षट, द्रव्यनसो मानो ।
इसका कोई न करता हरता, अमिट अनादी है ।
जीव अरु पुद्गल नाचै यामैं, कर्म उपाधी है ।।२२।।
पाप पुण्य सो जीव जगत मे, नित सुख-दुख भरता ।
अपनी अपनी आप भरै शिर, औरन के धरता ।।
मोह कर्म को नाश मेट कर, सब जग की आसा ।
निज पद मे थिर होय लोक के, शीश करो वासा ||२३||
११. बोधि-दुर्लभ भावना
दुर्लभ है निगोद से थावर, अरु त्रस गति पानी ।
नर काया को सुरपति तरसै, सो दुर्लभ प्रानी ।।
उत्तम देश सुसगति दुर्लभ, श्रावककुल पाना
दुर्लभ सम्यक दुर्लभ सयम, पचम गुणठाना ।।२४।।

२७६ देव शास्त्र गुरू वाणी दुर्लभ रत्नत्रय आराधन, दीक्षा का धरना दुर्लभ मुनिवर के व्रत पालन, शुद्ध भाव करना ।। दुर्लभ से दुर्लभ है चेतन, बोधिज्ञान पादे । पाकर केवल ज्ञान, नहीं फिर इस भव मे आवे ||२५।। १२ धर्म भावना धर्म 'अहिसा परमो धर्मही सच्चा जानो । जो पर को दुख दे, सुख माने, उसे पतित मानो || राग-देष मद मोह घटा, आतम रुचि प्रकटावे । धर्म-पोत पर चढ प्राणी, भव-सिन्धु पार जावे ।२६।। वीतराग सर्वज्ञ दोष बिन, श्रीजिनकी बानी । सप्त का वर्णन जामे, सवको सुखदानी ।। इनका चितवन बार बार कर, श्रद्धा उर धरना । 'मगत' इसी जतनतें इक दिन, भव-सागर तरना ।।७।। मेरी चाह मैं देव नित अरहत चाहूँ, सिद्ध का सुमिरन करूँ । मैं सुर गुरु मुनि तीन पद ये, साधुपद हिरदय धरूं ।। मैं धर्म करुणामय जु चाहूँ, जहाँ हिंसा रच न । मैं शास्त्र ज्ञान विराग चाहूँ, जानु मैं परपच न ||१|| चौबीस श्री जिनदेव चाहूँ, और देव न मन बसै । जिन बीस क्षेत्र विदेह चाहूँ, वदिते पातक नसै ।। गिरनार शिखर समेद चाहूँ, चम्पापुर पावापुरी । कैलाश श्री जिनधाम चाहूँ, भजत भाजै भ्रमजुरी IR|| नव तत्व का सरधान चाहूँ, और तत्व न मन धरूँ । षट् द्रव्य गुन पर्याय चाहूँ, ठीक तासो भय हरूँ ॥ पूजा परम जिनराज चाहूँ, और देव न हूँ सदा । तिहू काल की मैं जाप चाहूँ, पाप नहिं लागै कदा ।।३।। सम्यक्त्व दर्शन ज्ञान चरित सदा चाहूँ भाव सो । दशलक्षणा मैं धर्म चाहूँ, महा हरख उछाव सो || २७७ देव शास्त्र गुरू वाणी मैं चित अठाई पर्व चाहूँ, महा मगल रीति सो 1॥४॥ मैं वेद चारो सदा चाहूँ, आदि अन्त निवाह सो । पाए धरम के चार चाहूँ, अधिक चित उछाह सो ।। मैं 'दान चारो सदा चाहूँ, भवन वशि लाहो लहूँ । आराधना मैं चासि चाहूँ, अन्त मे ये ही गहूँ ।।५।। भावना बारह जु भाहूँ भाव निरमल होत है । मैं व्रत जु बारह सदा चाहूँ, त्याग भाव उद्योत है । प्रतिमा दिगम्बर सदा चाहूँ, ध्यान आसन सोहना । वसु कर्म तैं मैं छुटा चाहूँ, शिव लहूँ जहँ मोहना ।।६।। मैं साधु जन को सग चाहूँ, प्रीति तिन ही सो करो ।। मैं पर्व के उपवास चाहूँ, अधर्म आरम्भ परिहरी ।। इस दुक्ख पचम काल माहीं, कुल सरावक मैं लह्यो । अरु महाव्रत धरि सको नाहि, निबल तन मैंने गह्यो ।७।। आराधना उत्तम सदा, चाहूँ सुनो जिनराज जी । तुम कृपानाथ अनाथ 'द्यानत' दया करन न्याय जी ।। वसु कर्म नाश विकास ज्ञान प्रकाश मोको दीजिए । करि सुगति मन समाधिमरन सुमवित चरनन दीजिए ||८|| समाधिमरण भाषा गौतम स्वमी बन्दो नामी, मरण समाधि भला है । मैं कब पाऊँ निश दिन ध्याऊ, गाऊ वचन कला है ।। देव धर्म गुरु प्रीति महा दृढ, सप्त व्यसन नहि जाने । त्यागि बाईस अभक्ष्य सयमी, बारह व्रत नित ठाने 11911 चक्की ऊखली चूल्हि बुहारी, पानी त्रस ने विराधै । बनिज करै पर द्रवय हरै नहि, छहो कर्म इमि साधै ।। पूजा शास्त्र गुरुन की सेवा, सयम तप चहु दानी । पर उपकारी अल्प आहरी, सामयिक विधि ज्ञानी ||२|| जाप जपै तिहु योग धरै दृढ, तनकी ममता टाएँ । अन्त समय वैराग सम्हारै, ध्यान समाधि विचारै ॥

२७८ देव शास्त्र गुरू वाणी आग लगै अरु नाव डुबै जब, धर्म विधन जब आवै । चार प्रकार आहार त्यागि के, मत्र सु मन मे ध्यावै ।।३।। रोग असाध्य जरा बहुत देखै, कारण और निहारै । बात बडी है जो बनि आवै, भार भवन को टारै ।। जो न बनै तो घर मे रहकरि, सबसो होय निराला । मात पिता सुत त्रिय को सौंपे, निज परिग्रह इहि काला ।।४।। कुछ चैत्यालय कुछ श्रावक जन, कुछ दुखिया धन देई । क्षमा क्षमा सब ही सो कहिके, मन की शल्य हनेई ।। शत्रुन सो मिल निज कर, जोरै, मैं बहु कीनी बुराई । तुम से प्रीतम को दुख दीने, क्षमा करो सो माई 1५।। धन धरती जो मुख सो माँगे सौ सब दे सतोषै । छहो काय को प्राणी ऊपर, करुणा भाव विशेषै ।। ऊच नीच घर बैठ जगह इक, कुछ भोजन कछु पे लै । दूधा धारी क्रम-क्रम तजि के, छाछ अहार पहेलै ।।६।। छाछ त्यागि के पानी राखै, पानी तजि सथारा । भूमि माहि थिर आसन माडै, साधमौ ढिग प्यारा || जब तुम जानो यह न जपै है, तब जिन बाणी पढिये । यो कहि मौन लियो सन्यास पच परम पद गहिये ।।७।। चार आराधन मनमे ध्यावै, बारह भावन भावै । दश लक्षण मन धर्म विचार, रत्नत्रय मन ल्यावै ॥ पैंतिस सोलह षट् पन चारो, दु इक वरन विचारै । काया तेरी दुख की ढेरी, ज्ञान मयी तू सारै ||८|| अजर अमर निज गुण सो पूरै, परमानन्द सुझावै । आनन्दकद चिदानद साहब, तीन जगत पति ध्यावै ।। क्षुधा तृषादिक होय परीषह, सहै भाव सब राखै । अतिचार पॉचो सब त्यागै, ज्ञान सुधारस चाखै 115|| हाड मास सब सूखि जाय सब, धरम लीन तन त्यागै । अद्भुत पुण्य उपाय स्वर्ग मे, सेज उठै ज्यो जागै ।। तहा ते आवै शिव पद पावे, विलसे सुक्ख अनन्तो । "द्यानत" यह गति होय हमारी, जैन धर्म जयवन्तो ।।१०।।

२७६ कीने । देव शास्त्र गुरू वाणी श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र नरेन्द्र फणीन्द्र सुरेन्द्र अधीश, शतेन्द्र सुपूजे भजैनाय शीश । मुनीन्द्र गणेद्र नमो जोडि हाथ, नमो देव-देव सदा पार्श्वनाथ ।। गजेन्द्र मृगेन्द्र गह्यो तू छुडावै, महा आगरौं तू बचावै । महावीरौ युद्ध मे तू जितावै, महा रोगरौं बधते तू छुडावै ।। दुखी दुख हर्ता सुखी सुखकर्ता, सदा सेवको को महानन्द भर्ता । हरे यक्ष राक्षस भूत पिशाच, विष डाकिनी विघ्न के भय अवाच । दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र महासकटो से निका, विधाता, सवै सपदा सर्व को देहिदाता || महाचोर को वज को भय निवारे, महापौन के पुजतै तू उबारै । महाक्रोध को अग्नि को मेघ-धारा, महालोभ शैलेश को वजभारा | महामोह अंधेर को ज्ञान भान, महा कर्म कातार को दौ प्रधान | किये नाग नागिन अधोलोक स्वामी, हरयो मान तू दैत्यको हो अकामी तुही कल्पवृक्ष तुही कामधेनु, तुही दिव्य चिन्तामणी नाग एन । पशु नरक के दुखतै तू छुडावै, महास्वर्गतँ मुक्ति मैं तू बसावै ।। करै लोह को हेमपाषाण नामी, रटै नामसो क्यो न हो मोक्षगामी । करै सेव ताको करैं देव सेवा, सुन बैन सोही लहै ज्ञान मेवा ।। जपै जाप ताको नहीं पाप लागै, धरे ध्यान ताके सबै दोष भागै । विना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपा से सरै काज मेरे ।। दोहा गणधर इन्द्रं न कर सकें, तुम विनती भगवान । 'द्यानत' प्रीति निहारकै, कीजे आप समान ।। भक्तामर स्तोत्र (भाषा) (अनुवादक श्री प० हेमराज जी) आदि पुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार । धरम-धुरधर परमगुरु, नमो आदि अवतार ।। सुर-नत-मुकुट रतन छवि करें, अतर पाप-तिमिर सब हरें । जिनपद बन्दो मन वच काय, भव जल पतित उधरन सहाय ।।१।।

२८० देव शास्त्र गुरू वाणी श्रुत-पारग इन्द्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव । शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनो गुन-माल |२|| विबुध-वद्य-पद मैं मति हीन, हो निलज्ज थुति-मनसा कीन । जल-प्रतिबिब बुद्ध को गहै, शशि मडल बालक ही चहै ।।३।। गुन'समुद्र तुम गुन अविकार, कहत न सुर-गुरु पावै पार । प्रलय पवन उद्धत जल जन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु ।।४।। सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ, भक्ति भाव वश कुछ नहि डरूँ । ज्यो मृगि निज सुत पालन हेतु, मृगपति सन्मुख जाय अचेत ।।५।। मैं शठ सुधी हॅसन को धाम, मुझ तब भक्ति बुलावै राम । ज्यो पिक अब-कली परभाव, मधु ऋतु मधुर करै आराव ||६|| तुम जस जपत जन छिनमाहि जनम जनम के पाप नशाहि । ज्यो रवि उगै फटै तत्काल, अलिवत नीलनिशा-तम जाल |७|| तव प्रभावतें कहूँ विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार । ज्यो जल-कमल पत्र पै परै, मुक्ताफल की युति विस्तरै ||८|| तुम गुन-महिमा हत-दुख-दोष, सो तो दूर रहो सुख पोष । पाप विनाशक है तुम नाम, कमल विकाशी ज्यो रवि धाम ।।६।। नहि अचम जो होहि तुरन्त, तुमसे तुम गुण वरणत सन्त । जो अधीन को आप समान, करै न सो निदित धनवान ||१०|| इकटक जन तुमको अविलोय, अवर विषै रति करै न सोय । को करि क्षीर जलधि जल पान, क्षार नीर पीवै मतिमान ||११|| प्रभु तुम वीतराग गुण लीन, जिन परमाणु देह तुम कीन । हैं तितने ही ते परमाणु, यातै तुम सम रूप न आनु ||१२।। कहें तुम मुख अनुपम अविकार, सुर नर नाग नयन मनहार | कहाँ चन्द्र मडल सकलक, दिन मे ढाक पत्र सम रक ||१३|| पूरन चन्द्र ज्योति छबिवत, तुम गुन तीन जगत लघत । एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार ||१४ ।। जो सुर तिय विभ्रम आरम्भ, मन न डिग्यो तुम तौ न अचभ । अचल चलावै प्रलय समीर, मेरु-शिखर डगमगै न धीर ||१५|| धूमरहित बाती गत नेह परकाशै त्रिभुवन थर एह । बात गम्य नाहीं परचण्ड, अपर दीप तुम बलो अखड ।।१६।।

२८१ देव शास्त्र गुरू वाणी छिपहु न लुपहु राहु की छाहि, जग परकाराक ही दिनमाहि । धन अनवर्त दाह विनिवार, रवि अधिक घरी गुणनार 1199।। सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित मेघ राहु अविरोह । तुम मुख कमल अपूर्व चन्द, जगत विकाशी जोति अनट ||१|| निश दिन शशि रवि को नहि काम, तुम मुख चन्द हरे तमधाम | जो स्वभावतें उपजे नाज, सजल मेघ तें कौन काज ।।१६।। जो सुवोध सोहै तुम माहि, हरि हर आदिक म सा नाहिं । जो द्युति महा रतन में होय, काच खड पायै नहिं सोय ।।२०।। (नाराच छन्द) सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया । स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया ।। कछु न तोहि देखके जहा तुही विशेखिया मनोग चित्त चोर और भूल टू न पेखिया ||२१|| अनेक पुत्रवतिनी नित विनी सपूत । न तौ समान पुत्र और मातर्त प्रसूत हैं ।। दिशा धरत तारिका अनेक कोटि को गिर्न । दिनेश तेजवत एक पूर्व ही दिशा जनै ।।२२।। पुरान हो पुमान ही पुनीत पुण्यवान हो । कहे मुनीश अधकार-नाश को सुभान हो । महत तोय जान के न होय वश्य काल के । 7 और मोहि मोखपथ देय तोय टाल के ॥२३॥ अनन्त नित्य चित्त की अगम्य ज्य आदि । असख्य सर्वव्यापि विष्णु बम हो अनादि । गोग ईश याग शान " । अनेक एक IIT रूप शुद्ध सतगारो | तुही जिनेरा दुल हैं सुबुद्धि तुही जिमेरा शगरी लगाना ॥ तुरी मिपात है सही रागोरप . गोरागो तुही प्रसिन्द roat Re महेश कामकतु -

२८२
देव शास्त्र गुरू वाणी
नमो करूँ जिनेश तोहि आपदा निवार हो ।
नमो करूँ सुभूरि लोकके सिगार हो ।
नमो करूँ भवाब्धि नीर राशि शोष हेतु हो ।
नमो करूँ महेश तोहि मोखपथ देतु हो ।।२५।।
चौपाई (१५ मात्रा)
तुम जिन पूरन गुण गन भरे, दोष गर्वकरि तुम परिहरे ।
और देव गण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय ।।२७।।
तरु अशोक तर किरन उदार, तुम तन शोभित है अविकार |
मेघ निकट ज्यो तेज फुरत, दिनकर दिपै तिमिर निहनत ||२८||
सिहासन मणि किरण विचित्र, तापर कचन वरन पवित्र ।
तुम तन शोभित किरन विथार, ज्यो उदयाचल रवि तम-हार ||२६||
कुद-पुहुप सित चमर दुरत, कनक वरन तुम तन शोभत ।
ज्यो सुमेरु तट निर्मल काति, झरना झरै नीर उमगाति ||३०||
ऊँचे रहैं सूर दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपैं अगोप ।
तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती झालरसो छवि लहैं ||३१||
दुदुभि शब्द गहर गभीर, चहू दिश होय तुम्हारे धीर ।
त्रिभुवन जन शिव सगम करै, मानू जय जय रव उच्चरै ||३२||
मद पवन गधोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप-सुवृष्ट ।
देव करें विकसित दल सार, मानो द्विज पकति अवतार ||३३।।
तुम तन भामडल जिनचन्द, सब दुतिवत करत है मन्द |
कोटि शख रवि तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करे अछाय ||३४।।
स्वर्ग मोख मारगसकेत, परम-धरम उपदेशन हेत ।
दिव्य वचन तुम खिरे अगाध, सब भाषा-गर्भित हित साध ||३५||
दोहा
विकसित सुवरन कमल दुति, नख दुति मिलि चमकाहि ।
तुम पद पदवी जह धरो, तह सुर कमल रचाहिं ।।३६ ।।
ऐसी महिमा तुम विषै, और धरै नहि कोय ।
सूरज मे जो जोत है, नहि तारा गण होय ||३७ ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी २८३ षट्पद मद अवलिप्त कपोल मूल अलि कुल झकारै तिन सुन शब्द प्रचड क्रोध उद्धत अति धारै ।। काल वरन विकराल, कालवत सनमुख आवै । ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावै ।। देखि गयद न भय करै तुम पद महिमा लीन । विपति रहित सपति सहित वरतै भक्त अदीन ।३८|| अति मद मत्त गयद कुभ थल नखन विदारै । मोती रक्त समेत डारि भूतल सिगारै ।। बांकी दाढ विशाल वदन मे रसना लोलै । भीम भयानक रूप देख जन थरहर डोलै ।। ऐसे मृग-पति पग तलैं जो नर आयो होय । शरण गये तुम चरण की बाधा करै न सोय ||३|| प्रलय-पबनकर उठी आग जो तास पटतर बमै फुलिग शिखा उतग परजलैं निरतर ।। जगत समस्त निगल्ल भस्म करहैगी मानो तडतडाट दव-अनल जोर चहु-दिशा उठानो ॥ सो इस छिन मे उपशमैं नाम नीर तुम लेत । होय सरोवर परिनमैं विकसित कमल समेत ||४०|| कोकिल कठ समान श्यामतन क्रोध जलन्ता रक्त नयन फुकार मार विष कण उगलता फण को ऊचा करे वेग ही सन्मुख धाया तब जन होय निशक देख फणपति को आया ।। जो जांपै निज पगतलैं व्यापै विष न लगार । नाग दमनि तुम नाम की है जिन के आधार ||४१।। जिस रन माह भयानक रव कर रहे तुरगम । घनसे गज गरजाहि मत्त मानो गिरि जगम।। अति कोलाहल माहिं बात जहँ नाहिं सुनीजै । राजन को परचड, देख बल धीरज छीजै ।।

- २५४ देव शास्त्र गुरू वाणी नाथ तिहारे नामतै सो छिनमा हि पलाय ज्यो दिनकर परकाश” अन्धकार विनशाय ||४२।। मारै जहाँ गय द कुभ हथियार विदारै उमगै रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तार ।। हो य तिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे । तिस रन मे जिन तोर भक्त जे है नर सूरे || दुर्जय अरिकुल जीतके जय पावै निकलक । तुम पद पकज मन बसैं ते नर सदा निशक ||४३।। नक्र चक्र मगरादि मच्छकरि भय उपजावै जामै बडवा अग्नि - दाहतै नीर जलावै ।। पार न पावै जास थाह नहि लहिये जाकी । गरजै अति गभीर, लहर की गिनति न ताकी । सुखसो तिरै समुद्र को, जे तुम गुन सुमराहि । लोल कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहि ||४|| महा जलोदर रोग, भार पीडित नर जे हैं । वात पित्त कफ कुष्ट, आदि जो रोग गहै हैं । सोचत रहे उदास, नाहि जीवन की आशा । अति घिनावनी देह, धरै, दुर्गध निवासा ।। तुम पद पकज धूल को, जो लावै निज अग । ते नीरोग शरीर लहि, छिन मे होय अनग ||४५।। पाव कठते जकर बाँध, सॉकल अति भारी । गाढी वेडी पैर माहि, जिन जॉघ बिदारी || भूख प्यास चिता शरीर, दुख' जे बिललाने । सरन नाहि जिन कोय भूप के बदीखाने । तुम सुमरत स्वयमेव ही, बधन सब खुल जाहिं । छिनमे ते सपति लहैं, चिता भय विनसाहिं ॥४६।। महामत्त गजराज और मृगराज दवानल फणपति रण परचड नीरनिधि रोग महाबल ॥ बधन ये भय आठ डरपकर मानो नाशै तुम सुमरत छिनमाहि अभय थानक परकाशै ॥

देय शास्त्र गुरू वाणी २८५ इस अपार ससार मे शरन नाहि प्रभु कोय । यात तुम पदमक्त को भक्ति सहाई होय ।।४७।। यह गुनमाल विशाल नाथ तुम गुनन सँवारी । विविध वर्णमय पुहुप गूथ मै भक्ति विथारी ।। जे नर पहिरे कठ भावना मन मे भावै मानतु ग ते निजाधीन शिवलक्ष्मी पावै ।। भाषा भक्तामर कियो, हेमराज हित हेत जे नर पटै सुभाव सो, ते पावै, शिवखेत ।।४८|| आदिनाथ चालीसा शीश नवा अरिहत को, सिद्धन करूँ प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम ।। सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार । आदिनाथ भगवान को, मन मन्दिर मे धार ।। || चौपाई ।। जै जै आदिनाथ जिन स्वामी, तीन काल तिहु जग मे नामी । वेष दिगम्बर धार रहे हो, करमो को तुम मार रहे हो । हो सर्वज्ञ वात सब जानो, सारी दुनिया को पहचानो । नगर अजुध्या जो कहलाए, राजा नाभिराज बतलाए । मरु देवी माता के उदर से, चैत वदी नवमी को जन्मे । तुमने जग को ज्ञान सिखाया, कर्मभूमि का बीज उपाया । कल्प वृक्ष जब लगे विघटने, जनता आई दुखडा कहने । सवका संशय तभी भगाया, सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया । खेती करना भी सिखलाया, न्याय दण्ड आदिक समझाया । तुमने राज्य किया नीति का, सवक आपसे जगने सीखा । पुत्र आपका भरत बताया, चक्रवर्ती जग मे कहलाया । वाहुवली जो पुत्र तुम्हारे, सबसे पहले मोक्ष सिधारे । सुता आपकी दो बतलाई, ब्राह्मी और सुन्दरी वतलाई । उनको भी विद्या सिखलाई, अक्षर और गिनती बतलाई ।

२५६
देव शास्त्र गुरू वाणी
एक दिन राजसभा के अन्दर, एक अप्सरा नाच रही कर |
आयु बहुत थोडी थी बाकी, इसीलिए वह थोडा नाची ।
जभी मर गई जिसे देख कर, झट आया वैराग्य उमड कर |
बेटो को झट पास बुलाया, राजपाट सब मे बँटवाया ।
छोड़ सभी झझट ससारी, वन जाने की करी तैयारी ।
राव हजारो साथ सिधाये, राज पाट तज वन को धाये ||
लेकिन जब तुमने तप कीना, सबने अपना रस्ता लीना ।
वेष दिगम्बर तजकर सबने, छाल आदि के कपडे पहिने ।
भूख प्यास से जब घबराए, फल आदिक खा भूख मिटाए ।
और धर्म इस भाति फैलाए , जो अब दुनिया मे दिखलाए ।।
छै महीने तक ध्यान लगाए, फिर भोजन करने को धाए ।
भोजन विधि जाने नहि कोई, कैसे प्रभु को भोजन होई ।
इसी तरह वस चलते चलते, छै महीने भोजन को बीते ।
नगर हस्तिनापुर मे आए, राजा सोम श्रेयास बताए ।
याद जभी पिछला भव आया, तुमको फौरन ही पडगाया ।
रस गन्ने का तुमने पाया, दुनिया को उपदेश सुनाया ।।
तप कर केवल ज्ञान उपाया, मोक्ष गये सब जग हर्षाया ।
अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दर, एक है मरसलगज के अन्दर ।।
उसका यह अतिशय बतलाया, कष्ट क्लेश का होय सफाया ।
मानतुग पर दया दिखाई, जजीरे सब काट गिराई ।।
राज सभा में मान बढाया, जैन धर्म जग में फैलाया ।
मुझ पर भी महिमा दिखलाओ, कष्ट चन्द्र का दूर भगाओ ।।
सोरठा
नित चालीस ही बार, पाठ करे चालीस दिन ।
खेवे धूप अपार, मरसलगज मे आय के ।।
होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जी ।
जिसके नहिं सतान, नाम वश जग मे चले ।।
॥ इति ।।

देव शास्त्र गुरू वाणी श्री पद्मप्रभु चालीसा शीश नवा अरिहत को, सिद्धन करूँ प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम || सर्व साधु और सरस्वती, जिन मदिर सुखकार | पद्मपुरी के पद्म को, मन मन्दिर मे धार ।। ।। चौपाई ।। जय श्री पद्मप्रभु गुणधारी, भविजन को तुम हो हितकारी । देवो के तुम देव कहाओ, छठे तीर्थकर कहलाओ । तीन काल तिहु जग की जानो, सब बाते क्षण मे पहिचानो । वेष दिगम्बर धारण हारे, तुमसे कर्म शत्रु भी हारे । मूर्ति तुम्हारी कितनी सुन्दर, दृष्टि सुखद जमती नासा पर । क्रोध मान मद लोभ भगाया, राग-द्वेष का लेष न पाया । वीतराग तुम कहलाते हो, सब जग के मन को भाते हो । कौशाम्बी नगरी कहलाये, राजा धारण जी बतलाये । सुन्दर नाम सुसीमा उनके, उर से स्वामी जन्मे जिनके । कितनी लम्बी उम्र कहाई, तीस लाख पूरब बतलाई । इक दिन हाथी बधा निरख कर, झट आया वैराग्य उमडकर | कातिक सुदी त्रयोदशी भारी, तुमने मुनि पद दीक्षा धारी । सारे राज पाट को तज के, तभी मनोहर वन मे पहुचे । तप कर केवल ज्ञान उपाया, चैत सुदी पूनम कहलाया । एक सौ दस गणधर कहलाए, मुख्य वज चामर कहलाए । लाखो मुनि आर्यिका लाखो, श्रावक और श्राविका लाखों । असख्यात तिर्यञ्च बताये, देवी देव गिनत नहीं पाये । फिर सम्मेदशिखर पर जाकर, शिव-रमणी कोली परणा कर । पचम काल महा दुखदाई, जब तुमने महिमा दिखलाई । जयपुर राज ग्राम बाडा है, स्टैशन शिवदासपुरा है मूला नाम जाट का लडका, घर की नीव खोदने लागा । खोदत खोदत मूर्ति दिखाई, उसने जनता को बतलाई । चिन्ह कमल लख लोग लुगाई, पद्ध प्रभु की मूर्ति बताई । मन मे अति हर्षित होते है, अपने मन का मल धोते हैं । तमने यह अतिशय दिखलाया, भूत प्रेत को दूर भगाया ।

२८८ देव शास्त्र गुरू वाणी जब गधोदक छीट मारे, भूत प्रेत तब आप बकारे । जपने से जब नाम तुम्हारा, भूत प्रेत वो करे किनारा । ऐसी महिमा बतलाते हैं, अन्धे भी ऑखे पाते हैं । प्रतिमा श्वेत वर्ण कहलाए, देखते ही हृदय को भाए । ध्यान तुम्हारा जो धरता है, इस भव से वह नर तिरता हे । अन्धा देखे गूगा गावे, लॅगडा पर्वत पर चढ जावे । बहरा सुन-सुन कर खुश होवे जिस पर कृपा तुम्हरी होवे । मै हूँ स्वामी दास तुम्हारा, मेरी नैया कर दो पारा । चालीसे को चन्द्र बनावे, पद्ध प्रभु को शीश नवावे । पूरनमल रचकर चालीसा, हे पभु ! तोहि नवावत शीशा || ।। सोरठा || नित चालीसहि बार, पाठ करे चालीस दिन । खेय सुगन्ध अपार, पद्मपुरी मे आय के ।। होय कुबेर समान, जनन दरिद्री होय जो । जिसके नाहि सतान नाम वश जग मे चले ।। श्री चन्द्र प्रभु चालीसा (तिजारा) वीतराग सर्वज्ञ जिन, जिन वाणी को ध्याय । लिखने का साहस करूँ, चालीसा सिर नाय । देहरे के श्री चन्द्र को, पूजो मन वच काय । रिद्धि सिद्धि मगल करे, विघ्न दूर हो जाये ।। ।। चौपाई ।। जय श्री चन्द्र दया के सागर, देहरे वाले ज्ञान उजागर । शान्ति छवि मूरति अति प्यारी, भेष दिगम्बर धारा भारी ! नासा पर है दृष्टि तुम्हारी, मोहनी मूरति कितनी प्यारी | देवो के तुम देव कहावो, कष्ट भक्त के दूर हटाओ । समन्त भद्र मुनिवर ने ध्याया, पिंडी फटी दर्शन तुम पाया । तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम तीर्थकर कहलावो । महासेन के राजदुलारे, मात सुलक्षणा के हो प्यारे । चन्द्रपुरी नगरी अति नामी, जन्म लिया चन्द्रा प्रभु स्वामी ।

२८६, देव शास्त्र गुरू वाणी पोष वदी ग्यारस को जन्मे, नर नारी हरषे तब मन मे । काम क्रोध तृष्णा दुखकारी, त्याग सुखद मुनि दीक्षा धारी । फाल्गुन बदी सप्तमी भाई, केवल ज्ञान हुआ सुखदाई । फिर सम्मेदशिखर पर जाके, मोक्ष गये प्रभु आप वहाँ से । लोभ मोह और छोडी माया, तुमने मान कषाय नसाया । रागी नहीं नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित उपेदशी । पचम काल महा दुखदाई, धर्म कर्म भूले सब भाई । अलवर प्रान्त मे नगर तिजारा, होय जहाँ पर दर्शन प्यारा। उत्तर दिशि से देहरा माहीं, वहीं आकर प्रभुता प्रगटाई । सावन सुदी दशमी शुभनामी, आन पधारे त्रिभुवान स्वामी । चिन्ह चन्द्र का लख नर नारी, चन्द्रप्रभु की मूरति मानी । मूरति आपकी अति उजियाली, लगता हीरा भी है जाली । अतिशय चन्द्रप्रभु का भारी, सुनकर आते यात्री भारी । फाल्गुन सुदी सप्तमी प्यारी, जुडता है मेला यहाँ भारी कहलाने को तो शशिधर हो, तेज पुञ्ज रवि से बढकर हो । नाम तुम्हारा जग मे साँचा, ध्यावत भागत भूत पिशाचा । राक्षस भूत प्रेत सब भागे, तुम सुमरत भय कोय न लागे । कीर्ति तुम्हारी है अति भारी, गुण गाते नित नर और नारी । जिस पर होती कृपा तुम्हारी, सकट भय कटता है भारी । जो भी जैसी आश लगाता, पूरी उसे तुरन्त कर पाता । दुखिया दर पर जो आते हैं, सकट सब खोकर जाते हैं । खुला सभी को प्रभु का द्वार है, चमत्कार को नमस्कार है । अन्धा भी यदि ध्यान लगावे, उसके नेत्र शीघ्र खुल जावे | बहरे भी सुनने लग जावे, पगले का पागलपन जावे । अखण्ड ज्योति का घृत जो लगावे, सकट उसका सब कट जाने । चरणो की रज अति सुखकारी, दुख दरिद्र सब नासन हारी । चालीसा जो मन से ध्यावे, पुत्र पौत्र सब सम्पति पावे | पार करो दुखियो की नैया, स्वामी तुम बिन नहीं खिवैया । प्रभु मैं तुमसे कुछ नहीं चाहूँ, दर्श तिहारा निश दिनपाऊँ ।।

ર૬૦
देव शास्त्र गुरू वाणी
।। दोहा ।।
करूँ वन्दना आपकी, श्री चन्द्रप्रभु जिनराज ।
जगल मे मगल कियो, रखो सेवक की लाज ||
(ॐ ह्री श्री चन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय नम)
श्री शान्ति नाथ चालीसा ।
।। दोहा ।।
शान्तिनाथ महाराज का, चालीसा सुखकार ।
मोक्ष प्राप्ति के लिए, कहूँ सुनो चितधार ।।
चालीसा चालीस दिन तक, कह चालीस बार ।
बढे जगत सम्पत-सुमत, अनुपम शुद्ध विचार ।।
चौपाई
शातिनाथ तुम शातिनायक, पञ्चम चक्री जग सुखदायक |
तुम्ही सोलवे हो तीर्थकर पूज देव भूप सुर गणधर ।
पञ्चाचार गुणो के धारी, कर्म रहित आठो गुणकारी ।
तुमने मोक्ष मार्ग दर्शाया, जिन गुण ज्ञान भानु प्रकटाया |
स्याद्वाद विज्ञान उचारा, आप तिरे औरन को तारा ।
ऐसे जिन को नमस्कार कर, चदू सुमत शान्ति नौका पर |
सूक्ष्म सी कुछ गाथा गाता, हस्तिनापुर जग विख्याता ।
विश्व सेन ऐरा पितु, माता सुर तिहु काल रत्न वर्षाता |
साढे दस करोड निज गिरते, ऐरा मा के आगने भरते ।
पन्द्रह माह तक हुई लुटाई, लेगए भर भर लोग लुगाई ।
भादो बदी सप्तमी गर्भाते, उत्तम सोलह स्वप्न आते ।
सुर चारो कायो के आये, नाटक गायन नृत्य दिखाये ।
सेवा मे जो रहीं देविया, रखती खुश माँ को दिन रतियाँ ।
जन्म जेठ वदी चौदश के दिन, घन्टे अनहद बजे गगन घन ।
तीनो ज्ञान लोक सुखदाता, मगल सकल हर्ष गुण लाता ।
इन्द्र देव सुर सेवा करते, विद्या कला ज्ञान गुण बढते ।

देव शास्त्र गुरू वाणी ૨૬૧ अड्ग-अड्ग सुन्दर मनमोहन, रत्न जडित तन वस्त्राभूषण । बल विक्रम यश वैभव काजा, जीते छहो खण्ड के राजा । न्याय वान दानी उपकारी, परजा हर्षित निर्भय सारी । दीन अनाथ दुखी नहीं कोई, होती उत्तम वस्तु वोई । ऊँचे आप आठ सौ गज थे, वदन स्वर्ण अरु चिन्ह हिरण थे । शक्ति ऐसी थी जिस्मानी, बरौं हजार छानवे रानी । लख चौरासी हाथी रथ थे, घोडे करोड अठारह शुभ थे । सहस पचास भूप के राजन, अरबो सेवा मे सेवक जन । तीन करोड थी सुन्दर गइयाँ इच्छा पूर्ण करें नौ निधियाँ । चौदह रत्न व चक्र सुदर्शन उत्तम भोग वस्तुएँ अनगिन । थी अडतालिस करोड ध्वजाये कुण्ड चन्द्र सूर्य समय छाये । अमृत गर्भ नाम का भोजन लाजवाब ऊँचा सिहासन । लाखो मन्दिर भवन सुसज्जित, नार साहित तुम जिनमे शोभित। जितना सुरवा था शान्तिनाथ को अनुभव होता ज्ञानवान को । चलैं जीव को त्याग धर्म पर मिलें ठाठ उनको ये सुखकर । पच्चिस सहस वर्ष सुख पाकर, उमडा त्याग हितकर तुम पर । जग तुमने क्षणभर जाना, वैभव सब सुपने सम माना । ज्ञानोदय जो हुआ तुम्हारा, पाये शिवपुर भी ससारा । कामी मनुज काम को त्यागे, पापी पाप कर्म से भागे । सुत नारायण तख्त बिठाया, तिलक चढा अभिषेक कराया । नाथ आपको बिठा पालकी, देव चले ले राह गगन की । इत उत इन्द्रर चँवर दुलावे, मगल गाते वन पहुचावे । भेष दिगम्बर अपना कीना, केश लोच पन मुष्ठी कीना । पूर्ण हुआ उपवास छठा जब, शुद्धहार चले लेने तब । कर तीनो वैराग चिन्तवन, चारो ज्ञान किये सम्पादन । चार हाथ मग लखते चलते, षटकायिक की रक्षा करते । मनहर मीठे वचन उचरते, प्राणिमात्र का दुखडा हरते । नाशवान काया यह प्यारी, इससे हो यह रिश्तेदारी । इससे मात पिता सुत नारी, इसके कारण फिरो दुखारी ।

२६२ देव शास्त्र गुरू वाणी गर यह तन ही प्यारा लगता, तरह तरह का रहेगा मिलता । तज नेहा काया माया का, हो भरतार मोक्ष दारा का । विषय भोग सब दुख का कारण त्याग धर्म ही शिव के साधन। निधि लक्ष्मी जो कोई त्यागे, उसके पीछे पीछे भागे । प्रेम रूप जो इसे बुलावे, उसके पास कमी नहीं आवे । करने को जग का निस्तारा, छहो खण्ड का राज विसारा । देवी देव सुरासुर आये, उत्सव तप कल्याण मनाये । पूजन नृत्य करे नत मस्तक गाई महिमा प्रेम पूर्वक । करते तुम आहार जहाँ हर, देव रतन वर्षाते उस घर । जिस घर दान पात्र को मिलता, घर वह नित्य फूलता फलता। आठो गुण सिद्धो के ध्या कर, दशो धर्मचित काय तपा कर । केवल ज्ञान आपने पाया, लाखो प्राणी पार लगाया । समवशरण मे ध्वनि विखराई, प्राणि मात्र समझ में आई । समवशरण प्रभु का जहाँ जाता, कोस चौरासी तक सुख पाता। फूल फलादिक मेवा आती, हरी भरी खेती लहराती । सेवा मे एत्तिस थे गणधर, महिमा मुझसे क्या हो वर्णन । नकुल सर्प मृत हरि से प्राणी, प्रेम सहित मिल पीते पानी । आप चतुर्मुख विराजमान थे मोक्ष मार्ग को दिव्यमान थे । करते आप विहार गगन मे अन्तरिक्ष थे समवशरण में । तीनो जग आनन्दित कीने, हित उपदेश हजारो दीने । पौने लाख वर्ष हित कीना, उम्र रही जब एक महीना ! श्री सम्मेद शिखर पर आए, अजर अमर पद तुमने पाये । निष्प्रह कर उद्धार जगत के, गये मोक्ष तुम लाख वर्ष के | आक सके क्या छवी ज्ञान की, जोत सूर्य सम अटल आपकी । बहे सिन्धु सम गुण की धारा, रहे 'सुमत' चित नाम तुम्हारा । || सोरठा ।। नित चालीसहिं बार पाठ करे चालीस दिन । खेये सुगन्ध अपार शातिनाथ के सामने ॥ होवे चित प्रसन्न, भय चिता शका मिटै । पाप होय सब हन्न बल विद्या वैभव बढे । (जाप-ॐ हीं अर्ह श्री शातिनाथाय नम )

देव शास्त्र गुरू वाणी
૨૬૩
श्री पार्श्वनाथ चालीसा
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम ।
उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम ।।
सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार |
अहिक्षेत्र और पार्श्व को, मन मन्दिर मे धार ||
।। चौपाई ।।
पारसनाथ जगत हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी ।
सुर नर असुर करे तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा ।।
तुमसे कर्म शत्रु भी हारा, तुम कीना जग का निस्तारा ।
अश्वसेन के राजदुलारे वामा की आँखो के तारे ।।
काशीजी के राव कहाये, सारी प्रजा मौज उडाये ।
इक दिन सब मित्रों को लेके, सैर करन को वन मे पहुचे ।।
हाथी पर कसकर अम्बारी, एक जगल मे गई सवारी ।
एक तपस्वी देखा वहाँ पर, उससे बोले वचन सुनाकर ||
तपसी ! तू क्यो पाप कमाए, इस लक्कड मे जीव जलाए ।
प्रमु ने तमी कुदाल उठाया, उस लक्कड को चीर गिराया ।।
निकले नाग नागनी कारे, मरने को थे निकट बिचारे ।
दया प्रगु के दिल मे आया, तभी मत्र नवकार सुनाया ।।
मरकर वो पाताल सिधाए, पदमावती धरणेन्द्र कहाए ।
तपसी मरकर देव कहाया, नाम कमठ ग्रन्थो मे गाया ।।
एक समय श्री पारस स्वामी, राज छोडकर वन की ठानी ।
तप करके सब कर्म खपाए, एक दिन कमठ वहाँ पर आए ||
फोरन ही प्रभु को पहचाना, बदला लेने को दिल ठाना ।
बहुत अधिक बारिश वरसाई, बादल गरजे बिजली गिराई ।।
बहुत अधिक पत्थर बरसाए, स्वामी तन को नहीं हिलाए ।
पद्मावती धरणेन्द्र भी आए, प्रभु की सेवा मे चित लाए ।।

२६४
देव शास्त्र गुरु
वाणी
पदमावती ने फन फैलाया, उस पर स्वामी को बैठाया ।
धरणेन्द्र ने फन फैलाया, प्रमु के सर पर छत्र बनाया ||
कर्मनाश प्रमु ज्ञान उपाया, समवशरण देव इन्द्र रगया !
यही जगह अहिच्छत्र कहाए, पात्र केशरी जहाँ पर आए ।
वह पण्डित ब्राह्मण विद्धाना, जिनको जाने नकल जहाना ।।
शिष्य पॉच सो सग में आए सव कट्टर ब्राह्मण कहलाए ।
पार्श्वनाथ का दर्शन पाया, सवने जैन धर्म अपनाया ||
अहिच्छत्र थी सुन्दर नगरी, जहाँ सुखी थी प्रजा सगरी ।
राजा श्री वसुपाल कहलाए वो इक जिन मन्दिर बनवाए ।
प्रतिमा पर पालिश करवाया फोरन इक निस्त्री वुलवाया ।
वह निस्त्री मांस खाता था इससे पालिश गिर जाता था ।।
नुनि ने उत्ते उपाय बताग, पारत्त दर्शन व्रत दिलवाया ।
मिस्त्री ने व्रत पालन कीना, फोरन ही रंग चढा नवीना ।।
गदर सत्तावन का किस्सा है, इक माली का यो लिक्खा है ।
माली इक प्रतिमा को लेकर, झट छुप गया कुए के अन्दर ||
उस पानी का अतिशय भारी, दूर होवे सारी बीनारी ।
जो अहिच्छत्र हृदय से ध्यावे, सो नर उत्तम पदवी पावे ।।
पुत्र सम्पदा की बढती हो, पापो की एकदम घटती हो ।
हे तहत्तील ऑवला भारी, स्टेशन पर मिलै सवारी ।।
रामनगर इक ग्राम बराबर, जिसको जाने सब नारी नर ।
चालीसे को 'चन्द्र" बनावे, हाथ जोडकर शीश झुकावे ।।
जाप (ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथाय नन ।)
|| सोरठा ।।
नित चालीसहि बार, पाठ करें चालीस दिन ।
खेय सुगन्ध अपार, अहिच्छत्र मे आय के ॥
होय कुबेर समान, जन्न दरिद्री होय जो ।
जिसके नहीं सन्तान, नाम वश जग मे चले ॥

२६५ देय शास्त्र गुरू वाणी श्री महावीर चालीसा दोहा शीश नवा अरिहन्त को सिद्धन करू प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम ।। सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार । महावीर भगवान को, मन मन्दिर मे धार ॥ चौपाई जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रमु तुम जग मे नामी । वर्धमान है नाम तुम्हारा, लगे हृदय को प्यारा प्यारा || शाति छवि और मोहिनी मूरत, शान हसीली सोनी सूरत । तुमने देष दिगम्बर धारा, कर्म शत्रु भी तुम से हारा ।। क्रोध मान और लोग भगाया माया मोह ने तुमसे डर खाया । तू सर्वत सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता ।। तुझमें नहीं राग और द्वेष, वीतराग तू हितोपदेश । तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने वच्चा-बच्चा ।। भूत प्रेत तुमसे भय खावे, व्यन्तर राक्षस सब भग जावे । महा व्याध नारी न सताये, महा विकराल काल डर खावे ।। काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयकर भारी । ना हो कोई बचाने वाला, स्वामी तुम्ही करो प्रतिपाला ।। अग्नि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भडक रही हो । नान तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठण्डी होवे ।। हिंसामय था भारत सारा, तव तुमने कीना निस्तारा । जन्म लिया कुण्डलपुर नगरी हुई सुखी तव प्रजा सगरी ।। सिद्धारथ थे पिता तुम्हारे, त्रिसला के आँखो के तारे । छोड सभी अझट ससारी, स्वामी हुए बाल ब्रह्मचारी । पचम काल महा दुखदाई, चादनपुर महिमा दिखलाई । टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दूध गिराया ।। सोच हुआ मन मे ग्वाले के, पहुचे एक फावडा लेके । सारा टीला खोद वगाया, तव तुमने दर्शन दिखलाया ।।

६६
देव शास्त्र गुरू वाणी
जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा जब तेरा ।
ठडा हुआ तोप का गोला, तब सबने जयकारा वोला ।।
मन्त्री ने मन्दिर बनवाया, राजा ने भी दरव लगाया ।
बडी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने की ठहराई ।।
तुमने तोडी वीसो गाडी, पहिया मसका नहीं अगाडी ।
ग्वाले ने जो हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया ।।
पहिले दिन वैशाख वदी के, रथ जाता है तीर नदी के ।
मीणा गूजर सब ही आते, नाच-कूद सब चित उमगाते ।।
स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का तुम मान वढाया ।
हाथ लगे ग्वाले का जब ही, स्वामी रथ चलता है तब ही ।।
मेरी है टूटी सी नैया, तुम विन कोई नहीं खिवैया ।
मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर, मैं हू प्रभु तुम्हारा चाकर ।।
तुम से मैं अरु कुछ नहीं चाहूँ, जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ ।
चालीसे को ‘चन्द्र' बनावे, वीर प्रभु को शीश नमावे ।।
सोरठा
नित चालीसहि बार, पाठ करे चालीस दिन ।
खेय सुगन्ध अपार, वर्धमान के सामने ।
होय कुवेर समान, जन्म दरिद्री होय जो ।
जिसके नहि सन्तान, नाम वश जग मे चले ।।
(ॐ ही अर्ह श्री महावीराय नम)
आरती
पंचपरमेष्ठी की आरती
इह विधि मगल आरति कीजै । पच परम पद भज सुख लीजै ।
पहली आरति श्री जिनराजा | भवदधि पार उतार जिहाजा ।।
इह विधिः
दूसरी आरति सिद्धन केरी । सुमरन करत मिटै भव फेरी ।।
इह विधि

२६७ देव शास्त्र गुरू वाणी तीजी आरति सूर मुनिन्दा । जनम-मरण दुख दूर करिन्दा ।। इह विधि चौथी आरांत श्री उज्ज्ञाया । दर्शन देखत पाप पलाया ।। इह विधि० पाचमि आरति साधु तिहारी । कुमति विनाशन शिव अधिकारी।। इह विधि छटी ग्यारह प्रतिमा धारी । श्रावक वन्दो आनन्दकारी ।। इह विधि सातमि आरति श्री जिनवाणी । धानत' सुरग-मुकति सुखदानी।। इह विधि - आठवीं आरति बाहुबली स्वामी । करी तपस्या हुए मोक्षगामी ।। इह विधि० अतिम आरति वर्द्धमान की । पावापुर निर्वाण थान की ।। इह विधि सध्या करके आरति कीजै । अपना जन्म सफल कर लीजै ।। इह विधि जो यह आरति पढे पढावे । सो नर-नारी अमर पद पावे ।। इह विधि० सोने का दीपक कपूर की बाती । जगमग जोति जले सारी राती।। इह विधिः श्रीचन्द्रप्रभु जी की आरती जय चन्द्र प्रभु देवा, स्वामी जय चन्द्रप्रभु देवा । तुम हो विघ्न विनाशक, पार करो देवा || जय० मात सुलक्षणा, पिता तिहारे महासैन देवा । चन्दपुरी में जन्म लियो, स्वामी, हो देवो के देवा ।। जय० जन्मोत्सव पर प्रभु तिहारे, सुर नर हरषाये । रूप तिहारा महा मनोहर, सब को ही भाये || जय० यौवन मे ही प्रभु तुमने, दीक्षा ली प्यारी २६८ देव शास्त्र गुरु वाणी भेष दिगम्बर धारा, महिमा है न्यारी ।। जय० फाल्गुन वदी सप्तमी को, प्रभु केवल ज्ञान हुआ । 'खुद जीओ जीने दो सवको', यह सन्देश दिया || जय० अलवर प्रान्त मे नगर तिजारा, देहरे मे प्रकटे । मूर्ति तिहारी अपने नैनन, निरख-निरख हरपे || जय० हम है प्रभु तिहारे, निश दिन गुण गाये । पाप तिमिर को दूर करो, प्रभु सुख शाति आवे || जय० मे टो भव-भव पार करो देवा तुम ही विघ्न विनाशक पार करो देवा ||जय चन्द्रप्रभु ।। श्रीशांतिनाथ जी की आरती वासा, - ओम जय जिनवर देवा प्रभु जय जिनवर देवा । शान्ति विधाता, शिव सुखदाता, शान्तिनाथ देवा ।। ओम जय० ऐरादेवी धन्य जगत मे, जिस उर आन बसे 1. विश्वसेन सुत नम मे मानो, पूनम चन्द्र लसे ।। ओम जय० कृष्ण चतुर्दश जेठ मास को, आनन्द करतारी । हस्तिनापुर मे जन्म महोत्सव, ठाठ रचे भारी || ओम जय० बाल्यकाल की लीला अद्भुत, सुर नर मन भाई । न्याय-नीति से राज्य कियो चिर, सबको सुखदाई || ओम जय० पचम चक्री काम द्वादशम, सोलहम तीर्थकर । त्रय पदधारी, तुम्ही मुरारी, ब्रह्मा, शिवशकर || ओम जय० भव तन भोग समझ क्षण भगुर मुनि व्रत धार लिए । षट्खड नवनिधि, रतन-चतुर्दश, तृण सम क्षार दिए।।ओम जय० दुद्धर तप कर कर्म निवार, केवल ज्ञान लहा दे उपदेश भविक जन बोधे, ये उपकार महा || ओम जय० शान्तिनाथ है नाम तिहारा, सब जग शान्ति करो । अरज करे हम दास चरण मे, भव आताप हरो ।। ओम जय०

देव शास्त्र गुरू वाणी
ર૬
श्रीमहावीर स्वामी चांदनपुर की आरती
ॐ जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो ।
कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानन्द विमो || ॐ जय महा०
सिद्धारथ घर जन्मे, वैभव था भारी, स्वामी वैभव था भारी।
बालब्रह्मचारी व्रत, पाल्यो तप धारी || ॐ जय महा०
आतम ज्ञान विरागी, समदृष्टि धारी ।
माया मोह विनाशक, ज्ञान ज्योति जारी ।। ॐ जय महा०
जग मे पाठ अहिसा, आप ही विस्तार्यो ।
हिंसा पाप मिटाकर, सुधर्म परचायो || ॐ जय महा०
यही विधि चादनपुर मे, अतिशय दर्शायो ।
ग्वाल मनोरथ पूरयो, दूध गाय पायो || ॐ जय महा०
प्राण दान मन्त्री को, तुमने प्रभु दीना ।
मन्दिर तीन शिखर का, निर्मित है कीना || ॐ जय महा०
जयपुर नृप भी तेरे, अतिशय के सेवी ।
एक ग्राम तिन दोनो, सेवा हित यह भी ।। ॐ जय महा०
जो कोई तेरे दर पर, इच्छा कर आवे ।
धन सुत सब कुछ पावै, सकट मिट जावै ।। ॐ जय महा०
निश दिन प्रभु मन्दिर मे, जगमग ज्योति जरै ।
सेवक भी चरणो मे, आनन्द मोद भरै ।। ॐ जय महा०
चौबीसों भगवान की आरती
थारे चरणो मे नमे चौबिसो जिनराज ।
रिखब अजित सभव अभिनदन,
सुमतिनाथ काटे भव फदन,
पद्म प्रभू महाराज ||थारे.।।
श्री सुपार्श्व को शीश झुकावे,
चन्द्र प्रभू जग फन्द छुडावे,
पुष्प दन्त महाराज |थारे.।।

३००
देव शास्त्र गुरू वाणी
शीतल शीतल करने वाले,
श्रेयास दुख हरने वाले,
वास पूज्य महाराज ||थारे. ।।
विमलनाथ के मिल गुण गाओ,
श्री अनन्त से ध्यान लगाओ,
धर्मनाथ महाराज ||थारे.।।
कुथनाथ आधार तुम्हारा,
अरहनाथ कर दे निस्तारा,
मल्लनाथ महाराज |थारे.।।
मुनिसोक्त हम शरण तुम्हारी,
नमी नेम की छवि सुखकारी,
पार्श्वनाथ महाराज थारे.।।
महावीर तुम सब गुण आगर,
दर्शन दीजै नाथ दया कर,
दया करो महाराज ||थारे. ।।
हमतो शरण तुम्हारी आए,
"प्रभू दरश करके हर्षाए,
सुधि लीजै महाराज ||थारे. ।।
आरति श्रीजिनराज की
आरति श्रीजिनराज तिहारी, करमदलन सतन हितकारी ||टेक।।
सुरनरअसुर करत तुम सेवा । तुमही सब देवन के देवा ।।
आरति श्री. ||१||
पचमहाव्रत दुद्धर धारे ।
रागरोष परिणाम विदारे ।।
आरति श्री. |२||
भवभय भीत शरन जे आये ।
ते परमारथपथ लगाये ।।
आरति श्री. ||३||

३०१ देव शास्त्र गुरू वाणी जो तुम नाम जपै मन माहीं । जनम मरन भय ताको नाहीं ।। आरति श्री. ।।४।। समवसरन सपूरन शोभा । जीते क्रोध मान छल लोभा ।। आरति श्री. ||५|| तुम गुण हम कैसे करि गाएँ । गणधर कहत पार नहि पावै ।। आरति श्री. ।।६।। करुणासागर करूणा कीजे । 'द्यानत' सेवकको सुख दीजे || आरति श्री.।। सरस्वती-वन्दना आर्यिकारत्न अभयमती माता जी श्री सरस्वती के सुमरन से मिटता भव-भव का फेरा, है वन्दन तुमको मेरा ।।टेक ।। जहा धर्म ध्यान अरू मोक्ष मार्ग का निशदिन रहता डेरा। है वन्दन तुमको मेरा।। तिनके पद पकज मे झुकती है स्वर्ग लोक की बाला। जिन की वाणी से आत्म कमल को मिलती ज्ञान की धारा ।। जहा ज्ञान धन अरू लक्ष्मी का, निशदिन शाम सबेरा। है वन्दन तुमको मेरा ।। जिनके चरणो मे आसमान के तारे निशदिन गाते। भक्ति भाव से देव इन्द्र नर-नारि शरण मे आते।। जिनके द्वारे पर सूर्य किरण का लगता रहता पहरा। है वन्दन तुमको मेरा।। जिनकी वाणी से भव-भव का मिथ्यात्व दूर भग जाता। निज तत्व प्रकाश न हो करके सम्यक्त्व पास मे आता। हे अनेकात की निर्मल गगा तट मे नर हस वसेरा। है वन्दन तुमको मेरा।।

३०२ देव शास्त्र गुरू वाणी भजन मत्र जपो नवकार के आधार, मन्त्र जपो नवकार मनवा, मन्त्र जपो नवकार। पाच पदो के पैतीस अक्षर, हैं सुख मनवा हैं सुख के आधार ।। मत्र. अरिहन्तो का समुरन कर ले, सिद्ध प्रभु का नाम तू जप ले, आचार्य सुखकार मनवा, मन्त्र जपो नवकार ।। मत्र. उपाध्याय को मन मे ध्याले, सर्व साधु को शीश नवाले, होवे भव से पार मनवा, मन्त्र जपो नवकार।। मत्र० धनहीन सुख सम्पत्ति पावे, मन वाछित हर काम बनावे, सुखी रहे परिवार मनवा, मत्र जपो नवकार ।। मत्र० रोग शोक को दूर भगावे, जन्म जरामृत दोष मिटावे, भव दुख भजनहार, मनवा मत्र जपो नवकार ।। मत्र० विनती-'प्रभु दर्श' प्रभु दर्श कर आज घर जा रहे है झुका तेरे चरणो मे सर जा रहे हैं।। टेक यहा से कभी, दिल न जाने को करता। करे कैसे जाए, बिना भी न सरता ||१|| अचरचे हृदय नयन, भर आ रहे हैं।। प्रभु० सुना तुमने तारे, अधर्म चोर पापी। न धर्मी सही, फिर भी, तेरे हैं हामी ।२।। हमे भी तो करना, अमर जा रहे है।। प्रभु०

३०३
देय शास्त्र गुरू वाणी
बुलाना यहा फिर भी, दर्शन को अपने।
सुमत तुम गरोसे, लगे कर्म हरने ।।३।।
जरा लेते रहना, खबर जा रहे हैं।। प्रभु०
हुई पूजा गक्ति, न कुछ सेवकाई।
न मदिर मे बहुमूल्य वस्तु चढाई ।।४।।
ये खाली फफत, हाथ जोड़ कर जा रहे हैं।। प्रभु०
विनती
दयालु पशु से, दया मा गते है।
अपने दुखो की, हम दवा मागते हैं।।
नहीं हम सा कोई, अधर्म और पापी।
सत फर्म हमने ना, किये हैं कदापि।
किर साथ हमे है, अपराध भारी।
उनकी रदय से, हम क्षमा मागते हैं।। दया०
प्रमु तेरी भक्ति में, मन यह मगन हो।
निजातम चितन की, हर दम लगन हो।।
मिले सत सगम, करे आत्म चिन्तन।
वरदान भगवान से, सदा मागते हैं।। दया०
दुनियों के भोगो की ना कुछ कामना है।
स्वर्ग के सुखा की ना कुछ चाहना है।।
यही एक आशा है, बन जावे तुमसे।
ये सेवक नहीं और कुछ मागते हैं।।
अपने दुखो की, हम दवा मागते हैं।। दया०
आरती पद्मावती माता
पद्मावती माता दर्शन की बलिहारियां
पार्श्वनाथ महाराज विराजे मस्तक ऊपर थारे
इन्द्र फगणीन्द्र नरेन्द्र सभी खडे रहे नित द्वारे ।१ पद.
जो जीव थारो शरणा लीनो सव सकट हर लीनो ।
पुत्र पौत्र धन सम्पत्ति देकर मगलमय कर दीनो २ पद.

३०४ देव शास्त्र गुरू वाणी डाकन शाकन भूत भवानी नाम लेत भग जाय वात पित्त कफ रोग मिटे और तन सुखमय हो जाये ।।३ पद. दीप धूप और पुष्प हार ले मैं दर्शन को आयो । दर्शन करके मात तुम्हारे, मन वाछित फल पायो ||४ पद. संक्षिप्त सूतक विधि सूतक मे देव-शास्त्र गुरू को पूजन प्रक्षालादिक करना, तथा मदिरजी की जाजम वस्त्रादि को स्पर्श नहीं करना चाहिये । सूतक का समय पूर्ण होने के बाद पूजनादि करके पात्रदानादि करना चाहिये। १ जन्म का सूतक दस दिन तक माना जाता है । २ यदि स्त्री का गर्भपात (पाचवे छठे महीने में) हो तो जितने महीने का गर्भपात हो उतने दिन का सूतक माना जाता है । ३ प्रसूति स्त्री को ४५ दिन का सूतक होता है, कहीं कहीं चालीस दिन का भी माना जाता है । प्रसूतिस्थान एक मास तक अशुद्ध है। ४ रजस्वला स्त्री चौथे दिन पति के भोजनादि के लिये शुद्ध होती है परन्तु देव पूजन, पात्रदान के लिये पाचवे दिन शुद्ध होती है । व्यभिचारिणी स्त्री के सदा ही सूतक रहता है । ५ मृत्यु का सूतक तीन पीढी तक १२ दिन का माना जाता है । चौथी पीढी मे छह दिन का, पाचवी पीढी तक चार दिन का, सातवीं पीढी मे तीन, आठवीं पीढी मे एक दिन रात, नवमी पीढी मे स्नानमात्र शुद्धता हो जाती है । ६ जन्म तथा मृत्यु का सूतक गोत्र के मनुष्य को पाच दिन का होता है । तीन दिन के बालक की मृत्यु का एक दिन का आठ वर्ष के बालक की मृत्यु का तीन दिन का माना जाता है । इसके आगे बारह दिन का । ७ अपने कुल के किसी गृहत्यागी का सन्यास मरण, वा किसी कुटुम्बी का सग्राम मे मरण हो जाय तो एक दिन का सूतक माना जाता है। ८ यदि अपने कुल का कोई देशातर मे मरण करे और १२ दिन से पहले खबर सुने तो शेष दिनो का ही सूतक मानना चाहिये । यदि

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३०६
देव शास्त्र गुरू वाणी
आठ महाप्रातिहार्य
१ अशोक वृक्ष, २ पुष्पवृक्ष देवोकृत, ३ दिव्य ध्वनि, ४ चमर, ५ छत्र,
६ सिहासन, ७ भामण्डल, ८ दुन्दभि शब्द ।
चार अनन्त अतुष्टय
अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, अनन्त वीर्य ।
चार घातिया कर्म
ज्ञानावर्ण, दर्शनावर्ण, मोहनीय और अन्तराय कर्म ।
समवसरण की ११ भूमियां
१ चैत्यभूमि, २ खातिभूमि, ३ लताभूमि, ४ उपवनभूमि, ५ ध्वजाभूमि,
६ कल्पागभूमि, ७ गृहभूमि, ८ सद्गुण भूमि, ६-१० तथा तीन पीठिका
ऐसी, ११ भूमि हैं ।
अठारह दोष
क्षुधा, तृषा, जन्म, जरा मरण, रोग, भय, मद, राग, द्वेष, मोह, चिन्ता,
रति, निद्रा, विस्मय, विषाद, खेद, स्वेद |
षोडश भावना
दर्शन विशुद्धि, विनय सम्पन्नता, शीलब्रतेष्वनतिचार, अभीक्षणज्ञानोपयोग,
सवेद, शक्तितस्त्याग, तप, साधु, समाधि, बैयाब्रत्यकरण, अहन्त भक्ति,
आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति, प्रवचन भक्ति, आवश्यका परिहान, मार्ग
प्रभावना, प्रवचन वात्सल्य ।
दश प्रकार के कल्प वृक्ष
वादित्राग पात्राग, भूषणाग, पानाग, भोजनाग पुष्पाग, ज्योतिराग,
गृहाग वस्त्राग ओर दीप्ताग ।

३०७
देव शास्त्र गुरू वाणी
वारह चक्रवर्ती
गरत महाराज, सगर, मघवा सनतकुमार, शातिजिन, कुथजिन,
अरहजिन, सुभूगि पदगनागि. हरिषेण, ब्रह्मदत्त ।
श्रावक के १७ नियम
जोजन. अचितवस्तु गृह सगाग. दिशा गमन, औषधिविलेपन, ताबलू,
पुषसुगग, नाच गीतश्रवण, स्नान. ब्रह्मचर्य, आभूषण, वस्त्र शैय्या,
औषध खानी, घोडा, चेल आदि की सवारी ।
सप्त व्यसन
दोहा
जुआ खेलना मासमद. वेश्या विसन शिकार ।
चोरी गररमनीरमन सातो व्यसन विसार ।।
अष्ट मूलगुण
पाच उदम्बर -गूलर फटूम्बर बउफल, पीपल फल, (पिलखन फल) तीन
मकार महा. मास, मधु । इनका त्याग ही मूलगुण हैं ।
दशलक्षण धर्म
उत्तम क्षमा, आर्जव, मार्जव, सत्य, शोच, सयम, तप, त्याग, आकिचन
और ब्रहाचर्य
जैन व्रत कथा
दशलक्षण व्रत कथा
दोहा
प्रथम बन्दि जिनराज को, शारद गणधर पाय।
दशलक्षणव्रत की कथा, कहू सुगन सुखदाय।।

३०८ देव शास्त्र गुरू वाणी ॥चौपाई।। विपुलाचल श्री वीरकुमार, आये भविभव भजनहार । सुनि श्रेणिक नृप बदन गयो। सर्वलोक सग आनन्द भयो ।।२।। श्रीजिन पूजे गणधर चाव। स्तुति करी जोडकर भाव।। धर्म कथा तह सुनी विचार दान शील तप भेद अपार ।।३।। भव दुखघातक दायक शर्म। भाख्यो प्रभु दशलक्षण धर्म ।। ताको सुनि श्रेणिक रूचि धरी । गुरू गौतमसो विनती करी।।४।। दशलक्षणव्रत कथा रसाल। मुझको भाखहु दीनदयाल ।। तब गुरू गौतम गणधर कही सुन जिनधुनि मे भाखी वही।।५।। खड धातु की पूर्व विदेह। मेरूतें दक्षिणदिश तेह।। सीतोदा नदि तीर जु सही। पुरी विशालाक्षा शुभ कही।।६।। भूपति प्रीतकर तह बसै। राणी प्रियकारिणी तस लसै।। सुता मृगाकरेखा तस जान । मति शेखर तस मत्रि प्रधान ।।७।। शीश प्रभा ताकी तिय सही। सुता कामसेना तस भई।। सुता मदनरेखा अवतरी। रूप कला गुण लक्षण भरी।। लक्षणभद्रनामा कृतवाल। तस तिय शशिरेखा गुणमाल ।।६।। रोहिणी कन्या ताके भई। चारो कन्या मिल सखि थई ।। शास्त्र पढी इक गुरु के पास । बढ्यो स्नेह परस्पर, जास।।१०।। रितु बसन्त आया निरधार। कन्या चारो वनहिं मझार ।। गई सु मुनिवर देखे एक। वन्दन थुति कीनी सविवेक ।।११।। चारो कन्या मुनिसो कही। तिय परजाय ज्यो छूटे सही।। एसो व्रत उपदेशहु अबै। जासौं नर तन पावै सबै । १२ ।। बोले मुनि दशलक्षण सार। यह व्रत किए होहु भव पार ।। कन्या बोली किहविध करें। किस दिन यह व्रत हम धरै।।१३।। तब गुरु बोले बचन रसाल। भादव मास कह्यो सुखमाल ।। शुक्लपचमी दिनसो लेय। अरहतदेव अभिषेक करेय।।१४।। पूजार्चन कीजे शुभ सही। जिन चौबीसतणी सुख मही।। उत्तम क्षमा आदि सुखसार । दशमो ब्रह्मचर्य गुणधार ।।१५।।

देव शास्त्र गुरू वाणी
३०६
तीन काल अतिभक्ति करो। तीन काल पुष्पाजलि धरो।।
इह विध दस वासर आचरो। नियमित ही शुभ कारज करो।।१६।।
उत्तम व्रत दश अनशन किये। मध्यम व्रत कुछ काजी लिए।।
अथवा दरा एकाशन करो। भूमिशयन ब्रह्मचर्य जु धरो।।१७।।
या विधि दश बरसहि लग करै। भावसहित व्रत विधि अनुसरे।।
फिर व्रत का उदापन करै। दान सुपात्रन को विस्तरै।।१८।।
ओषध अभय शास्त्र आहार। चार सघ को दे चित धार।।
रचि मडल पूजा कीजिए। छत्र चमर आदिक दीजिए।।१६।।
जो उद्यापन शक्ति न हो। तो दूनो व्रत कीजै लोय।।
यह व्रत पुण्यतणी भण्डार। क्रमसो परभव दे शिवसार ।।२०।।
तर चारो कन्या व्रत लियो। भक्ति भाव लखि मुनिव्रत दियो।।
यथाशक्ति व्रत पूरण कर्यो। उद्दापन विधि सो आचरो ।।२१।।
अन्तकाल वे कन्या चार। सुमरण कियो पच नवकार ।।
चारो मरणसमाधि सु कियो। दशवे स्वर्ग जन्म तिन लियो ।।२२।।
सोलह सागर आयु लही। धर्मध्यान नित सर्व सही।।
सिद्धक्षेत्र सब करहिं विहार राक्षायक सम्यक उदय अपार ।।२३।।
नाना विध सुख भोगें जहा। दुख का लेख न जानै। तहा।
यह तो कथा रही इह ठौर। आगे सुनो भई जो और ।।२४ ।।
सब दीपन मधि जवू दीप। दक्षिण लवण समुद्र समीप।।
भरतक्षेत्र राजत है तहा। आर्यखण्ड राजै शुभ जहा । ।२५।।
तामैं मालवदेश विशाल। उज्जयनी नगरी सुखसाल।।
स्थूलभद्र ताको नरपती। लक्ष्मीमति रानी गुणवती।।२६।।
क्रमसे चयकर वे सुर चार। आये रानी उदर मझार।।
प्रथम सुपुत्र देवप्रभ भयो। दूजो सुत गुणचन्द्र जु थयो।।२७।।
तीजो पद्मप्रभ बलवीर। चौथे पद्मसारथी धीर ।।
जन्म महोत्सव तिनके करे। अशुभ दोय ग्रह सबही टरे।।२८।।
पठनयोगय जब चारों भये। नृप ने गुरु समीप पठाये।।
सव विद्या पढ लीनो सार । व्याह योग्य तब भये कुमार ||२६||

३१०
देव शास्त्र गुरू वाणी
निकलप्रभ राजी सुता। चारो ने परनी गुणयुता ।।
प्रथम सुता का 'बाह्मी' नाम। दुतिय कुमारी सो गुणधाम।।३०।।
तीजी "रूपवती सुकुमाल। “मृगनेत्री' चौथी गुणसाल ।।
व्याह महोत्सव कियो अपार। सुखसो रहने लगे कुमार ।।३१।।
कुछ दिन राज कियो भूपाल। मन वैराग भयो इहकाल।।
भवतन भोग लखे निस्सार। दीक्षा ग्रहण किया सुविचार ।।३।।
बड़े पुत्र को' राज सु दियो। वन मे जाकर मुनिव्रत लियो।।
तपकर पायो केवल ज्ञान। हनि अघात पहुच्यो शिवथान ।।३३।।
सुख सो राज करै चउभ्रात। पुरजन सुख भोगै दिन रात।।
चारो भ्राता चतुर सुजान। पूरब पुण्यतणो फलमान। ३४ ।।
नितप्रति धर्मध्यान आचरै। पापकिया तै अतिशय डरै।।
इकदिन मन उपज्यो बैराग। राजपाट सब दीने त्याग।।३५।।
वन मे जाकर मुनिव्रत धार करने लगे करम सहार ।।
करत-करत तप बहु दिन गये। घाति करम सब छय कर दये।।३६।।
तब उपज्यो तिन केवल ज्ञान । सुर आये जय जय करवान ।।
कियो महोत्सव अति सुखमान । कर कल्याण गये निज थान ।।३७ ।।
विविध देश मे कियो विहार। दे उपदेश भव्यजन तार ।।
करम अघाति किये सब नास। सिद्धालय कीनो चिरवास।३८||
दशलच्छनव्रत का फल यही। पायो चारो कन्या सही।।
तातै सब जन तनमन धार। दशलच्छनव्रत धारो सार।।३६||
यह व्रतकर बहुजन सुर गये। सुरसुख भोग मुक्ति मै गये।।
गुरु गौतम गणधर यह कहीं। कर श्रद्धान व्रत धारो यही।।४०।।
भट्टारक श्री भूषण वीर। तिनके चेला गुण गम्भीर।।
ब्रह्मज्ञान सागर सुविचार। कही कथा दशलक्षन ।।
पढे सुनै जो नर यह कथा । दशलक्षण व्रत धाएँ यथा ।
दशलच्छनव्रत वृष भा जोय। सो अवश्व शिव तिय पिय होय ।।

३११
देव शास्त्र गुरू वाणी
अनंतचौदश व्रत कथा
दोहा
अनतनाथ बदा सदा, मन मे कर बहुभाव ।
सुर असुरहि सेवत जिन्हे. होय मुक्ति पर चाव ।।१
चौपाई
जबूद्वीप मैं सार। लख योजन ताको विस्तार ।।
मध्य सुदर्शन मेरु वखान। भरक्षेत्रता दक्षिण मान ।।२।।
मगध देश देशो शिरोमणि। राजगृह नगरी अति बनी।।
श्रेणिक महाराज गुणवन्त। रानी चेलना गृह शोभत ।।३।।
धनवन्त गुण तेज अपार। राजाशय महागुण सार।।
एक दिवस विपुलाचल वीर। आये जिनवर गुण गभीर ।।४।।
चार ज्ञान के धारक कहै। गौतम गणधर सो सग रहै।।
छह ऋतु के फल देखे नैन। वनसाली ने चाल्यो ऐन।।५।।
हर्ष सहित वनमाली गयो। पुष्प सहित राजा पर गयो।।
नमस्कार कर जोडे हाथ। मोपर कृपा करो नरनाथ ।।६।।
विपुलाचल उद्यान महत। महावीर जिन जहा बसत।।
सुन राजा अति हर्षित भयो । बहुत दान माली को दयो।७।।
सप्त ध्वनि वाजे वाजत। प्रजा सहित राजा चालत।।
दे प्रदक्षिवा बैठो राय। जिनवर देव कियो चित चाव।।८।।
द्वविधि धर्म को समझाय। जासो पाप सर्व जर जाय।।
खग तह आया एक तुरत। सुन्दर रूप महा गुणवन्त।।६।।
नमस्कार जिनवर को। जय जयकार शब्द उच्चर्यो ।।
ताहि देख अचरज अति कियो। राजा श्रेणिक पूछत भयो।।१०।।
सेना सहित महा गुण खानि। का यह आयो सुन्दर वानि।
बाकी वात को समझाय। ज्ञानवन्त मुनिवर गुरुराय।।११।।
गोतम वोले बुद्धि अपार। विजयागर को अतिसार।।
मनो कुम्भ राजा राजत। श्रीमती रानी को कत।।१२।।

३१२
देव शास्त्र गुरु वाणी
ताका पुत्र अरिंजय नाम! पुण्यवन्त सुन्दर गुणगम ।।
पूरब तप कीना इन जोय ।। ताको फल भुगते शुभ सोय ।।१३।।
ताली कथा कहू विस्तार। जबूद्वीप द्वीपन मे सार।।
भरतक्षेत्र तामें सुखकार ! कागल देश विराजत सार ।।१४।।
परम सुख्द नगरी तह जान। विप्र सोम शर्मा गुणखान।।
सोमिल्या भानिनी ता कही। दुख दरिद्र की पूरति महीं । १५ ।।
पूरब पाप किये अति घने। तिनके फल भुगते ही बने।।
तुन राजा याका विरतात। नगर-२ सो मनै दुखात ।।१६।।
देश विदेश फिरे सुख आश। तो हुन पार्व सुख निवात्त।।
भ्रमत-भ्रमत सो आयो तहाासमवशरण निजवर का जहा।।१७।।
दोहा
अनन्तनाथ जिन राज का, समोशरण तिहिवार।
सुरनर अति हर्षित भये देख नहाइतित्तार119-11
चौपाई
विप्र देखि अति हर्षित भयो। समोशरण वदन को गयो।।
वदि जिनेश्वर पूछे सोई। कहा पाप ने मैं कीनो होई ||१६||
दरिद्र पीडा रहै शरीर। तो तो व्याधि तरो गन्भीर।।
गणधर कहै सुनो द्विजराय। अनन्त व्रत कीजे सुखदाय ।।२०।।
तब विप्र बोल्यो कर भाय। किस विधि होई सो देहु बताय।।
किस प्रकार या व्रत को करो। कहो विधान चित्त मे धरो।२१||
भादव मास सुक्ख की खान । चौदश शुक्ल कही सुखदान।।
कर स्नान शुद्ध हो जाय । तब पूजे जिनवर सुखदाय ।।२२।।
गुरू वन्दना करै चितलाय। या विधि सों व्रत लये बनाय।।
त्रिकाल पूजन श्री जिनदेव । रात्रि जागरन कर सुख लेव ।।२३।।
गीत अरु नृत्य महोत्सव जान। धारा जिनवर करो बखान।।
वर्ष चतुदर्श विधि सो धरै। ता पीछे उद्यापन करै।।२४।।

देव शास्त्र गुरू वाणी ३१३ करै प्रतिष्ठा चोदह सार। जासो पाप होई जर छार।। झारी धरै जु अधिक अनूप । स्वर्ण कलश देव शुभ रूप ।।२५।। दीवट झालर सकल माल। और चन्दोवे उत्तम जाल।। छत्र सिहासन विधि सो करै।। तात सर्व पाप परिहरै।।२६।। चार प्रकार दान दीजिए। जासो अतुल सुक्ख लीजिए।। अत समय लेवे सन्यास।। तातै मिलै स्वर्ग का वास।।२७।। उद्यापन की शक्ति न होय। कीजै व्रत दूनो भवि लोय।। विप्र कियो व्रत विधि सो आय । सब दुख ताके गये विलाय२८|| अतकाल धरके सन्यास। तातें पायो स्वर्ग निवास।। चौथे स्वर्गदेव सा'जान। महाऋद्धि ताके जु बखान ।।२६ ।। विजयाधर गिरि उत्तम ठौर। काजीपुर पत्तन शिरमौर।। राजा तह अपराजित वीर। विजया तासु प्रिया गम्भीर।।३०।। ताको पुत्र अरिंजय नाम। तिन यह आय किए परनाम।। कचनमय सिहासन आन। तापर नृप बैठो सुखखान।।३१।। व्योम पटल विनशत लख सत। उपज्यो चित्त वैराग्य महत।। राज पुत्र को दिया बुलाय। आप लई दीक्षा शुभ भाय।।३२ ।। सही परीषह दृढ चित धार। तातें कर्म भय अति छार। घाति घातिया केवल भयो। सिद्धि बुद्धि सो पद निर्मयो।।३३।। रानी ने व्रत कीना सही। देव देह तिन अच्युत लही।। तहा सुसुख भुगते अधिकाय । तहा सो आय भयो नर राय।।३४।। राजऋद्धि पाई शुभसार। फिर तपकर विधि कीने छार।। तहा ते मुक्तीपुर को गयो। ऐसो तिन व्रत को फल लयो।।३५।। एसो व्रत करे जो कोई। स्वर्ग मुक्ति पद पावै सोई।। विनय सार गुरू आज्ञा करी। श्रावक सुजन चित्त मे धरी।।३६ ।। तब यह कथा करी मन लाय। यथा शास्त्र में वरणी आय।। विधि पूर्वक पाले जो कोय । ताको अजर अमर पद होय।।३७।। (इति अनन्त चौदश व्रत कथा समाप्त)

३१४
देव शास्त्र गुरू वाणी
सुगंध दशमी व्रत कथा
चौपाई
वर्द्धमान बदो जिनराय। गुरू गौतम वन्दो सुखदाय।।
सुगधदशमी व्रत की कथा। वर्द्धमान सुप्रकाशी यथा ।।१।।
मगधदेश राजगृहि नाम। श्रेणिक राज करै अभिमान।।
नाम चेलना गृह पटरानि। चन्द्ररोहिणी रूप समान ।।२।।
नृप
बैठो सिहासन परे। वनमाली फल लायो हरे।।
कर प्रणाम बच नृपतें कह्यो । प्रमुदित चित्त से ठाढो रह्यो।।३।।
वर्द्धमान आयो जिन स्वामि। जिन जीत्यो उद्धत अरि काम।।
इतनी सुनत नृपति उठ चला । पुरजनयुत दलबल से भला ।।४।।
समोशरण वद भगवान। पूजा भक्तिधार बहुमान।।
नर कोठा बैठो नृप जाय । हाथ जोड पूछयो सिर नाय ।।५।।
सुगन्धदशमी व्रत फल भाख । ता नर की कहिए अब साख ।।
गणधर कहैं सुनो मगधेश। जम्बूद्वीप विजयार्द्ध प्रदेश।।६।।
शिवमदिर पुर उत्तर श्रेणि। विद्याधर प्रीतकर जैनि।।
कमलावती नारि अति रूप। सुर कन्या से अधिक अनूप।७।।
सागरदत्त बसे तहा माह। जाके जिन व्रत मे उत्साह||
धनदत्ता वनिता गृह कहीं। मनोरमा ता पुत्री सही।।८।।
मुनि सुगुप्त गृह पर आइयो । देख मुनिन्द्र दुख पाइयो।।
कन्या मुनि की निन्दा करी। कुछ मन मे नहिं शका धरी।।।।।
नग्नगात दुर्गन्ध शरीर। प्रगटपनै देहि नहि चीर।।
मुख ताम्बूल हता मुनि अग। नास्यो सुख कीनो भग।।१०।।
भोजन अन्तराय जय गयो। मुनि उठ जाय ध्यान वन दियो।।
समता भाव धरै उर माहि। किचित खेद चित्त मे नाहि ।।११।।
बीती अवधि समय कुछ गयो। मनोरमा को काल सुभयो।
ग गई पुनि कुक' 'म । अपर ग्राम भई सूकरी नाम ||

देव शास्त्र गुरू वाणी ३१५ मगधसुदेश तिलकपुर जान। विजयसेन तह का नृप मान।। चित्ररेखा ता रानी कहीं। तस पुत्री दुर्गन्धा भई ।।१३।। एक समय गुरू बदन गयो। पूजा कर विनती को ठयो।। मो पुत्री दुर्गन्ध शरीर। कहो भवातर गुणगम्भीर।।१४।। राजा वचन मुनीश्वर सुनै। मुनि वृतात रायसे भने।। सब वृतात हाल जो जान । मुनि राजा सो कह्यो बखान।।१५।। सुन दुर्गन्धा जोडे हाथ। मोपर कृपा करो मुनिनाथ ।। ऐसा व्रत उपदेशो मोहि। जासो तुन निरोग अब होहि ।।१६।। दयावत बोले मुनिराय। सुन पुत्री व्रत चित्त लगाय। समता भाव चित्त मे धरो। तुम सुगन्ध दशमी व्रत करो।।१७।। यह व्रत कीजै मनवचकाय। यासो रोग शोक सब जाय।। दुर्गन्धा विनवै मुनि पाय । कहिए सविधि महामुनिराय ।।१८।। ऐसे वचन सुने मुनि जबै। तब बोले पुत्री सुन अबै।। भादो शुक्लपक्ष जब होय। दशमी दिन आराधो सोय १६ ।। अरहतदेव की भक्ति करेव । मन मे राखो श्री जिनदेव ।। शीतल जिनकी पूजा करो । मिथ्या मोह दूर परिहरो।।२०।। व्रत के दिन छोरो आरम्भ। यासो मिटै कर्म का बध ।। याके करत पाप छय जाय। सो दश वर्ष करो मन लाय|२१|| जब यह व्रत सम्पूरन होय। उद्यापन कीजै चित जोय।। दश श्रीफल अमृतफल जान । नीबू सरस सदा फल आन।।२२।। दश दीजै पुस्तक लिखवाय। इह विधि सब मुनि दई बताय।। विधि सुनि दुर्गन्धा व्रत लयो। सब दुर्गन्ध तच्छिन गयो ।।२३।। व्रत कर आयु जो पूरण करी। दशवे स्वर्ग भई अप्सरी।। जिन चैत्यालय बदन करे। सम्यकभाव सदा उर धरै।।२४।। भरतक्षेत्र मह मध्य सुदेश। भूति तिलकपुर बसै अशेष।। राजा महीपाल तह जान। मदन सुन्दरी प्रिया बखान।।२५।। दशवे दिनसो देवी आन। ताके पुत्री भई निदान।। मदनावती नाम धर तास। अति सुरूप तनु सकल सुबास ।।२६।। ।

३१६ देव शास्त्र गुरू वाणी बहुत वात को करे वखान। सुन कन्या मान्यो उन्मान।। कोशावीपुर मदन नरेन्द्र। रानी सती करे आनन्द ।।२७।। पुरूषोत्तम नृप सुन्दर जान। विद्यावत सुगुण की खान।। जो सुगन्ध मदनावलि जाय। सो पुरूषोत्तम को नरनाय ।।२८|| राजा मदन सुन्दरी बाल। सुखसो जात न जान्यो काल।। एक दिवस मुनिवर बदियो । धर्म श्रवण मुनिवर पै कियो ।।२६।। हाथ जोड पूछे तव राय। महा मुनीन्द्र कहो समुझाय।। मो गृहरानी मदनावली। ता शरीर सौरमता भली।।३०।। कौन पुण्य से सुभग सुरूप। सुर वृतासों अधिक अनूप।। राजा वचन मुनीश्वर सुने। सव विरतात राय सो भने।।३१।। जैसे दुर्गन्धा व्रत लह्यो। तैसी विधि नरपतिसो कह्यो।। सुने भवातर जोडे हाथ। दीक्षाव्रत दीजै मुनिनाथ ।।३२ ।। राजा ने जब दीक्षा लई। रानी तवै अर्जिका भई।। तपकर अन्त स्वर्ग को गई। सालम स्वर्गप्रतेन्द्र सो भई।।३३।। बाइस सागर काल जो गयो। अतकाल ता दिवसो चयो।। भरत सु क्षेत्र मगध तह देश । वसुधा अमर केतु पुरनेश।।३४।। ता गृह गेह जनम उन लह्यो। जो प्रतेन्द्र अच्युत दिव कह्यो।। कनककेतु कचन द्युति देह। वनिता भोग करै शुभ गेह।।३५।। अमरकेतु मुनि आगम भयो। कनककेतु तह बदन गयो।। सुनो सुधर्म श्रवण सयोग। तजि परिग्रह अरू भवमोग ।।३६।। घाति घानिया केवल लयो। पुनिअघ तिह तिनि शिवपुर गहो।। व्रत सुगन्ध - Tमी विख्यात । ता फल भयो सुरमियुत गात ।।३७।। यह व्रत पु नारि जो करै। तिहि दुख सकट मुनि न परै।। शहर गहैर उत्तम वास। जैन धर्म को जहा प्रकाश।।३८|| सब श्रावन व्रत सयम धरै। पूजा दानसों पातक हरे।। उपदेशी f भूषण सही। हेमराज पडित ने कही।।३६।। - जो कोय। ताको अजर अमर पद होय।। यासों भविर त्रिकाल। जो छूटै भव के भ्रमजाल ।।४०।। (ॉत , सुगन्धदशमी व्रत कथा भाषा समाप्त) मनवच पा देव शास्त्र गुरू वाणी ३१७ अरहंत पासा केवली प्रत्येक व्यक्ति के मन अपना भविष्य जानने की प्रबल इच्छा होती है और इसके लिए वह जन्म कुण्डली, हस्त रेखा या अन्य उपायो द्वारा भविष्य जानने के लिए प्रयत्नशील रहता है। इसी इच्छा की पूर्ति के लिए श्री पण्डित वृन्दावन जी काशी निवासी रचित अरहत पासा केवली यहा दी जा रही है। अत्यन्त शुद्धिपूर्वक, श्रद्धा सहित बताई हुई विधि के अनुसार कार्य करके इसके द्वारा अपने भविष्य की झाकी का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। पासा केवली से शुभाशुम देखने के लिए पवित्रता, मन मे शान्ति एव श्रद्धा होना आवश्यक है। प्रातकाल स्नानादि क्रियाओ से स्वच्छ होकर स्वच्छ वस्त्र पहिन कर किसी पाटे, चौकी पर पुस्तक को रख कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुह करके पद्मासन या अर्द्धपद्मासन से बैठे। उस समय सीधा स्वर चल रहा हो, इसका भी ध्यान रखा जाये। फिर अपने मन मे प्रश्न का विचार करे और श्री अरहत प्रभु का ध्यान करते हुए पुस्तक मे लिखे मन्त्रो का उच्चारण कर तीन बार पासा डालना चाहिए। प्रत्येक बार जो वर्ण पासा के ऊपर की ओर आए उसे लिख लेना चाहिए। इस प्रकार तीन बार मे तीन वर्ण आयेगे उनका फल पुस्तक मे देखकर विश्वास करना चाहिए, और उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए। अरहंत पासा केवली . दोहा श्रीमत वीर जिनेश पद, बन्दो शीस नवाय। गुरू गोतम के चरण नमि, नमो शारदा माय।। श्रेणिक नृप के पुण्यते, भाखी गणधर देव। जगत हेत अरहत यह, नाम केवली सेव।।

३१८
देव शास्त्र गुरू वाणी
चन्दन के पासा विषै, चारो ओर सुजान।
एक एक अक्षर लिखो, श्री अरहत विधान।।
तीन बार डारो तबै, करि वर मन्त्र उचार ।
जो अक्षर पासा कहैं, ताकी करी विचार ।।
तीन मन्त्र है तासु के, सात सात ही बार।
थि है पासा डालियो, करके शुद्ध उच्चार ।।
जानि शुभाशुभ तासुतें, फल निज हृदय नियोग।
मन प्रसन्न होय सुमरियो, प्रभु पद सेवहु जोग।।
'प्रथम मन्त्र ॐ ह्रीं श्रीं बाहुबलि लब बाहु ओ क्षीं थू क्षे ॥
क्ष क्ष उद्धर्वभुजा कुरू कुरू शुभाशुभ कथय कथय भूत भविष्यत वर्तमान
दर्शय दर्शय सत्य ब्रूहि सत्य ब्रूहि स्वाहा । (यह प्रथम मन्त्र सात बार
जप कर पासा डालना)।
'दूसरा मन्त्र - ओ ह ओ स ओ क्ष सत्य वद सत्य वद स्वाहा।
(दूसरा मन्त्र भी सात बार जपकर पासा डालना चाहिए।
'तीसरा मन्त्र
ॐ हीं श्रीं विश्वमालिनी, विश्वप्रकाशिनी
अमोघवादिनी सत्य ब्रूहि एह्येहि विश्वमालिनी स्वाहा ।
(यह भी सात बार पढकर पासा डालना)
नोट-मन एकत्र कर, विनय सहित अभिप्राय विचार कर श्री
अरहत भगवान के नाम के अक्षरो (अ, र, ह, त) का पासा तीन बार
डालना चाहिए । जो भी अक्षर पढे, उनको मिलाकर उसका फल
जानना चाहिए | जिन मार्ग मे यह बड़ा निमित्त है ।
(वृन्दावन)
अथ अकारादि प्रथम प्रकरण
अ, अ, अ-यदि ये तीन अक्षर पडे,
सुख
और कल्याण मगल
हो, सम्मान बढे, लक्ष्मी की प्राप्ति हो, व्यापार में तथा विदेश मे धन

देव शास्त्र गुरू वाणी ३१६ लाभ हो, युद्ध मे जीत हो, राज दरबार मे सम्मान मिले, सब सकट रोग, शोक, दरिद्रता का नाश हो । सब प्रकार से कल्याण हो । यह निसन्देह विश्वास करना चाहिए । अ, अ, र-इन तीनो का फल मध्यम होता है । मन का विचारा हुआ. पूर्व पाप के कारण बाधा पड़ने से शीघ्र सफल नहीं होगा । इसलिए मनवाछित फल प्राप्त करने के लिए अपने इष्टदेव श्री अरहत वीतराग भगवान की आराधना करनी चाहिए । इससे कुछ समय बाद इच्छित फल की प्राप्ति होगी । अ, अ, हं-इनका फल शुभ होता है । धन धान्य का समागम होगा । परदेश गमन से इच्छित फल की प्राप्ति होगी । भाई बन्धु से प्रेम भाव बढेगा । शत्रुओ का दमन होगा । सम्पूर्ण बाधाये दूर होगी । घर मे पुण्य के प्रभाव से सब प्रकार का मगल होगा । हे प्रश्नकर्ता । तुम्हारा विचारा हुआ शुभ है । अत शुभ फल की निश्चित प्राप्ति होगी। अ, अ, त-हे दयालु । तेरा प्रश्न शुभ है । तेरे घर मे पुत्र पौत्रादि का सुख होगा, हितैषी मित्रो से लाभ होगा । सब प्रकार के रोगादि से छुटकारा होगा । खोटे ग्रह दूर होगे । परदेश मे गए हुए भाई और मित्रो का शुभ मिलन होगा | कुल की बढवारी होगी, सज्जनो से मित्रता होगी । तेरे आगामी दिन सुख और सौभाग्य को देने वाले होगे । तू वीतराग भगवान का सदा ध्यान किया कर । अ, र, अ-तेरा विचार श्रेष्ठ है, उत्तम फल देने वाला है, प्रतिदिन आनन्द की वृद्धि होगी । पाप के उदय से तेरा नष्ट हुआ धन फिर मिलेगा, राजा द्वारा सम्मान होगा, भाई बन्धुओ से मिलाप होगा । हर प्रकार से तेरी गृहस्थी सुखी होगी, अब तेरे सब पापो का अन्त हो गया है । इसलिए धर्म के प्रभाव से सुख समृद्धि का वास होगा । तू अपने कर्तव्य कर्म मे विश्वासपूर्वक लगा रह । अ, र, र-हे भाई । तेरा पुण्य बलवान है । तुझे धन का लाभ होगा । सव स्थानो मे यश बढेगा, जहाँ भी जायेगा सम्मान पायेगा ।

३२० देव शास्त्र गुरू वाणी और सब तेरे शुभ-चिन्तक हो जावेगे । जल, अग्नि मरी आदि उपद्रव तेरा कुछ भी विगाड नहीं कर सकेगे । शत्रु वश मे होगे, सब प्रकार के सुख की प्राप्ति होगी । यह सब तेरे धर्म का प्रभाव है । इसलिए तू धर्म का पालन मत छोडना, वस तेरा भविष्य सुखमय अ, र, ह- ये तीनो वर्ण सोभाग्य सम्पत्ति के सूचक हैं। तेरा जो मनोरथ है वह सरलता से फलित होगा। जो घर मे थोडा सा क्लेश है, उसकी चिन्ता न कर। इसके लिए तू श्री महावीर प्रभु की पूजा कर, तेरे सब विघ्न दूर होगे। मन की चिन्ता दूर कर मन को एकाग्र कर, तुझे सब सुखो की प्राप्ति होगी। श्री अरहत का ध्यान कर, तुझको सब सिद्धिया प्राप्त होगी। अ, र, त- इन तीनो वर्गों के आने पर सब सुखो की प्राप्ति होती है। तुझे स्त्री, पुत्र और पश्चात् पौत्र का भी लाभ होगा। तेरे कुल की शोभा होगी। तुम जहा भी जाओगे, वहीं तुम्हारी कीर्ति बढेगी। ससार तुम्हे प्यार करेगा। तुम्हारा प्रश्न शुभ है, तुम्हारे मन मे प्रभु का ध्यान होना चाहिए। देखो तुम्हारे ललाट पर तिल का चिह्न होना चाहिए। अ, ह, अ- हे प्रश्नकर्ता । सुनो पहले तुम्हे कुछ कष्ट होगा, परन्तु शीघ्र ही वह दुख दूर होगा और दिन प्रतिदिन धन की बढबारी होगी, सज्जनो की सगति होगी। हे विचारक | तुमने जो सोचा है सो सब सफल होगा। तुम महावीर भगवान के नाम की तीनो समय (प्रात, मध्याह्न, सायकाल) एक एक माला फेरा करो। अ, ह, र- जब यह तीनो अक्षर आवे तब धन-लाभ यश लाभ पृथ्वी का लाभ हो। राजा, भाई आदि आदर करे। बिछुडे हुए भाई इष्टजनो, धनादि का लाभ हो। हे भाई । तुम धैर्य धारण करो। तुम्हे व्यापार मे, परदेश मे, सब प्रकार सुख लाभ होगा। तुम न का सशय दूर करो, और सर्व विघ्न विनाशक श्री पार्श्वप्रभु का स्मरण करो। ।

३२१ । । देव शास्त्र गुरू वाणी अ, ह, ह- ये तीनो अक्षर मिलने पर इष्टसिद्धि कठिन होती है। हे भाई । तेरा कार्य मुश्किल से ही सिद्ध होगा। तेरा वर्तमान धन भी नष्ट होता नजर आता है, क्लेश बढेगा, व्यापार मे हानि होगी। परदेश मे भी सिद्धि नहीं। इसलिए हे सज्जन | तू भगवान की पूजा भक्ति कर। जप-दान होम कर । ४१ दिन तक स्नान, शुद्ध वस्त्र पहन कर प्रात सायकाल श्री पार्श्वनाथ भगवान के नाम की ५० हजार जाप दे। इसके बाद तेरा पुण्य उदय आवेगा ओर इच्छित फल की प्राप्ति होगी। अ, ह, त- इन अक्षरो का मिलाप सब प्रकार के कल्याण और आनन्द को देने वाला है। इसलिए हे सज्जन । तुझे आज्ञाकारी पुत्र और भाइयो का समागम होगा। तुझे तेरे उद्योग मे धन, धान्य और सम्पत्ति मिलेगी। युद्ध मे तेरी विजय निश्चित है। अगर तू या तेरा सम्बन्धी बन्धन मे होगा तो छुटकारा पावेगा। इसलिए हे बुद्धिमान तू सदेह छोड। तेरा सब प्रकार से कल्याण होगा। अ, त, अ- ये वर्ण तेरे कल्याण, मगल के बताने वाले हैं। तुझे तेरे प्रयत्नो से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, सव विघ्न बाधाओ को दूर करता हुआ, पुत्र पौत्रादि के सुख को प्राप्त करेगा ओर इच्छित मणि मुक्तादि का लाभ होगा। आज से आठवे दिन तेरा भाग्य और भी अधिक श्रेष्ठ फल देने वाला होगा। अ, त, र- हे सज्जन | तेरे शुभ दिन हैं। तुझे सब मगल के सामान मिलेगे। तेरे घर पर आनन्द के बाजे बजेगे। तुझे जो प्यारे वन्धुओ की चिन्ता सता रही है, यह दूर होगी। वे धन धान्य भरे हुए हाथी के साथ सुख पूर्वक तेरे से मिलेगे। तू अपने हृदय की चिन्ता दूर कर । अव तेरे सुख के दिन हैं। अ, त, ह-हे बन्धु ! तेरा अशुभ का उदय है, कहीं लाभ दिखाई नहीं देता। कभी तो तेरा हाथ का धन और जाता दिखता है। तेरे शुभचिन्तक भाई, बन्धु स्त्री, पुत्र सम्पत्ति आदि का अनिष्ट ही दिखाई पड़ता है और चारो ओर शत्रु ही शत्रु भरे पड़े हैं। इसलिए इन विघ्नो को दूर करने के लिए तू ६१ दिन तक "ओ, हीं, अ, सि, आ, उ, सा, ।

३२२ देव शास्त्र गुरू वाणी सर्व विघ्नविनाशनाय नम स्वाहा।" इस मत्र की नित्य शुद्ध होकर ११-११ मालाओ की जाप दे, तेरा विघ्न दूर होगा और घन मे मगलाचार होगा। अ, त, त-हे भव्य जीवन । तुझे धन लाभ होगा सम्पत्ति बढेगी, सुख का विस्तार होगा। सब इच्छाए पूर्ण होगी। प्रिय बन्धु और मित्रो का मिलाप होगा, दिनोदिन लाभ ही बढेगा तू जिस तरफ भी ध्यान देगा सब तरफ सफलता ही मिलेगी। युद्ध मे वाद-विवाद मे तेरी विजय होगी। तू सन्देह मत कर। तू अपना पुण्य उदय समझ कर धीरज से कार्य कर सफलता तेरे चरणो मे है। । अथ रकारादि द्वितीय प्रकरण र, अ, अ-इन अक्षरो के पड़ने से धन, सम्पत्ति का और सज्जनो से मिलाप होता है। सोना, चादी, वस्त्र गहने, नाना प्रकार के रत्न आदि इच्छित पदार्थों की प्राप्ति अवश्य होगी। रात्रि के अन्त मे हाथी, घोडे या रथ मे चढे हुए फलो की माला पहने हुए देवताओ का विमान बैठे हुए आना दिखाई देगा। र, अ, र-हे पृच्छक | तुझे इच्छित फल की प्राप्ति होगी। तुम्हे व्यापार और खेती मे लाभ होगा। तुमसे देश और उसके निवासियो को लाभ पहुचेगा। तुम्हे परदेश मे लाभ होगा। तुम्हारे घर सुख रहेगा भयानक युद्ध मे कुलदेवी तुम्हारी रक्षा करेगी और सब प्रकार सुख का विस्तार होगा। र, अ, ह-हे भ्राता । तुम्हारे विचारे कार्य मे लाभ की आशा नही। तुमहे दुख धन का नाश, शारीरिक कष्ट होगा, तुम्हारे भाई बन्धुओ का वियोग होगा। विदेश मे भी तुम्हे सफलता प्राप्त न होगी। इसलिए शाति से अपने स्थान पर रहते हुए ही श्री जिनेन्द्रदेव की सेवा पूजा भक्ति आदि करो। इसलिए अगर २१ दिन तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक बार भोजन कर स्नान आदि कियाओ से शुद्ध होकर ॐ हीं, अ, सि, आ, उ, सा नम' इस मत्र का सवा लाख ३२३ देव शास्त्र गुरू वाणी बार जाप करो तो तुम्हारे सब सकट दूर होकर सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होगी। र, अ, त-हे सज्जन | तुम्हारा अशुभ का उदय है। चोरो द्वारा धन का चुराना, नाव मे डूब जाना, आग लगना, रोग होना आदि से अशुभ होगा। तुम्हारा किया हुआ सब उल्टा होगा, इसे कर्मों का फल समझकर तुम्हे शोक न करना चाहिए और शान्ति से भगवान का स्मरण करते हुए परोपकार की भावना से कार्य करो । कुछ समय बाद सफलता मिलेगी। र, र, अ-हे भाई । तुम्हारा मन बडा चचल है। तुम स्थिर विचार के नहीं हो। तुम धन का लाभ चाहते हो, पर अशुभ के कारण मूल का भी नाश दिखाई देता है। तुझे राजा के दण्ड, चोरो से, अग्नि से सावधान रहना चाहिए। तेरा शरीर भी निरोग नहीं रहेगा। स्त्री, पुत्र कुटुब से तेरा विछोह होगा, इन दिनो मे सदा तू शुभ काम करना। र, र, र-हे पूछने वाले । तेरा शुभ का योग है। तुझे मनवाछित फल प्राप्त होगा। तुझे धन, दौलत, जमीन, मकान, सब मिलेगे। तुझे कुटुब मेस्त्री, पुत्र, पुत्र-वधु आदि शुभ लक्षणो वाले आज्ञाकारी मिलेगे। तुझे व्यापार मे, घर मे, परदेश मे सर्वत्र बडा लाभ होगा। तेरे कार्य मे तुझे सफलता ही सफलता प्राप्त होगी। र, र, ह-दो रकार के साथ ह आने पर महाफल का लाभ होता है। आनन्द देने वाली सुख सम्पत्ति सरलता से ही प्राप्त होगी। घर मे नित्य आनन्द का राज्य होगा। नित्य धन की प्राप्ति होगी, तुम्हे जमीन, जायदाद, देश और नगरो पर भी अधिकार मिलेगा। तुम मन मे जो विचारोगे वही मिलेगा। राजा से तुम्हे सब प्रकार का लाभ होगा। इस प्रकार तुम्हारे घर मे सदा सुख का निवास होगा। र, र, त-तुमने अपने मन मे बडा बुरा सोचा है। तुमने परस्त्री की इच्छा से अनेको खोटे काम किए हैं और इसी से तुम्हारे धन का नाश हुआ है। घर मे कलह हुई है। तुमने राज दण्ड भी भोगा है।

३२४ देव शास्त्र गुरू वाणी इसलिए जब इस मार्ग को छोडकर ब्रह्मचर्य का धारण करो और शुभ कार्य करो। इसी से मनुष्य जन्म सफल होगा। र, ह, अ-ये तीनो वर्ण शुभ के सूचक हैं। स्त्री, पुत्र, धन, मान, आदि की प्राप्ति होगी। ससार मे यश बढेगा। धर्म के मार्ग में मन लगेगा । युद्ध मे विदेश मे, व्यापार मे सब जगह शीघ्र ही विजय होगी। र, ह, र-हे भाई । तुमने बडा उल्टा मार्ग पकडा है। तुमने जो सोचा है उसे मन से निकाल दो। इसके करने से लाभ न होगा, बल्कि सब प्रकार कष्ट ही होगा। तुम्हारे दुश्मन बहुत हैं, तुम्हे कहीं भी सुख न मिलेगा। इसलिए तू इस विचारे हुए कार्य को छोड दे, और ससार के सुख को व्यर्थ समझ कर सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए वीतराग भगवान के मार्ग को ग्रहण कर। र, ह, ह-हे प्रश्न कर्ता । तेरा अशुभ का उदय है। इसलिए जो भी तू करेगा उसका खोटा ही फल मिलेगा। तुम्हारे मित्र बने हुए हैं उन पर विश्वास मत करो, सब तुम्हारे शत्रु हैं, तुम्हारे धन का नाश कराने पर तुले हुए हैं। तुम धन की इच्छा करते हो, वह इस समय नहीं मिलेगा। इसलिए तुम धर्म की आराधना करो। पार्श्वनाथ भगवान की भक्ति और जाप करो उससे कुछ समय बाद सफलता मिलेगी। र, ह, त-अहो पूछने वाले । इसका क्या फल कहू । तेरा बड़ा शुभ का उदय है। तुझे विद्या की प्राप्ति, कवियो मे सम्मान, व्यवहार मे निपुणता मिलेगी, स्त्री और पुत्र का लाभ होगा। व्यापार मे धन प्राप्त होगा। भाई बन्धुओ और मित्रो से वस्त्र और आभूषणो के साथ मिलाप होगा। परिवार के सुख के लिए नित्य भगवान की पूजा कर। र, त, अ-हे पृच्छक | तुम्हारे सौभाग्य के दिन हैं तुम्हारे हृदय मे जो पुत्रादि के सुख की लालसा है, धन सुख आनन्दायक भोजन पान की इच्छा है वह सब पूर्ण होगी। तुम्हे मन्त्र तन्त्र और औषधि से सर्वत्र सफलता प्राप्त होगी।

देव शास्त्र गुरू वाणी ३२५ र, त, र-हे सज्जन | तुम शान्ति से सुनो। तुम्हारे उद्योग से पद पद पर सफलता मिलेगी। इसलिए तुम अपने कार्य में लगे रहो, तुम्हे लाभ होगा। श्री जिनराज की सेवा से तुम्हे स्त्री, पृथ्वी, धन मिलेगा। राजा द्वारा सम्मान मिलेगा। हाथी, घोडे, आभूषणो की बिना चाहे ही प्राप्ति होगी। र, त, ह-हे भाई । तुमने पहले बहुत कष्ट भोगे हैं, पर वे अब दूर हो गये। तुम्हारे हृदय मे जो धन, स्त्री, पुत्र, गहनो की चिन्ता है वह दूर होगी। शरीर के रोग, शोक और दुखो का नाश होकर जिन धर्म के प्रभाव से तेरे हृदय के सब मनोरथ पूर्ण होगे। र,त, त-हे प्रश्नकर्ता । तेरा प्रश्न अच्छा है। तेरे सब कार्य सफल होगे। इच्छित धन सम्पत्ति का लाभ होगा। तुम जो विचारोगे वह सरलता से सिद्ध होगा। यह सब धर्म का प्रभाव है इसमे सन्देह मत करो। तुम जो कल्याण के लिए तप धारण करना चाहते हो, तुम्हे उसमे भी सफलता मिलेगी। इसलिए तुम वीतराग भगवान के बताये हुए तप- के मार्ग को ग्रहण करो जिससे सच्चे और स्थायी सुख की प्राप्ति हो। अथ हंकारादि तृतीय प्रकरण ह, अ, अ-इन तीनो वर्णों का फल चिन्ताकारक है। कष्ट, चिन्ता, कार्य-विनाश, लोक निन्दा और युद्ध में पराजय, उद्योग मे असफलता मिलती है। कार्य सिद्धि के लिए जो भी प्रयत्न करते हो उसी असफलता मिलेगी। इसलिए इस समय मौन होकर कुछ समय धर्म ध्यान करो। शुभ उदय आते ही सफलता मिलेगी। ह, अ, र-यह बहुत लाभदायक पास पडा है। तुम्हारे सभी मनोरथ सफल होगे। स्त्री एव धन की प्राप्ति होगी, भाईयो से सुख पहुचेगा। हरेक कार्य मे, घर मे, विदेश मे, सर्वत्र लाभ ही लाभ होगा। तुम्हारे सब रोग शोक दूर होगे। अच्छे दिनो मे भगवान की आराधना भक्तिपूर्वक करते ही रहना क्योकि धर्म ही सदा सहायक होता है।

३२६ देव शास्त्र गुरू वाणी ह, अ, ह - हे भव्य | तुम बहुत सरल एव सीधे स्वभाव के हो। तुम मित्र और शत्रु को समान समझते हो। तुमने ऐसे लोगो के लिए अपना धन खर्च किया है। परन्तु यह कलिकाल है और तुम साधु स्वभाव वाले हो। चिन्ता मत करो, तुम्हारा अच्छा समय है, गया हुआ धन मिलेगा। पुण्य की जड सदा हरी होती है। ह, अ, त-हे प्रश्न कर्ता | तेरा शुभ का उदय है। धर्म के प्रताप तेरे सारे क्लेश और व्याधिया दूर हुई हैं, धन धान्य की प्राप्ति होगी। परदेश मे धन लाभ होगा, तुझे जो धन की चिन्ता है वह पूरी होगी और स्त्री, पुत्र आभूषण तथा सकल सुखो की प्राप्ति होगी। ह, अ, र-ये तीनो वर्ण परम लाभ के सूचक हैं । तेरे सभी इच्छित कार्य पूरे होगे, धन धान्य बढेगा। देश विदेशो मे यश फैलेगा। राज्य मे प्रतिष्ठा बढेगी। धनादि आभूषणो से सम्मान होगा। इस तरह से तुम सबके प्रिय बनोगे। ह, र, र-हे प्रश्नकर्ता | तेरे वर्तमान समय मे अशुभ उदय है, इसलिए तू दुश्चिन्ताओ मे फसा हुआ है और धन का भी नाश हुआ, परन्तु तू घबरा मत और पुण्य कार्यों मे तथा धर्म पर अटल रह शीघ्र ही लाभ होगा और देश विदेश मे सम्मान तथा मित्रो कुटुम्बीजनो से भी सुख प्राप्त होगा। ह, र, ह-हे सज्जन । तेरे पास के ये तीनो वर्ण परम शुभ हैं। तेरे को बड़ा लाभ होगा। पुत्र का विवाह होगा और धन मिलेगा। विरोधी भी मित्र बनकर भला करेगे, युद्ध मे, वाद-विवाद मे सफलता होगी। तेरा शुभ का उदय है। इसे स्थायी बनाने के लिए धर्म के कार्य कर और श्री चन्द्र प्रभु भगवान की पूजा विशेष रूप से कर उससे तेरा कल्याण होगा। ह, र, त-हे पृच्छक | तेरे मन मे कुछ चिन्ता है पर वह व्यर्थ का वहम है, तू अपने हृदय से उसे निकाल दे। तेरा सब सोचा हुआ कार्य सिद्ध होगा। उद्यम मे लक्ष्मी की प्राप्ति, मुकदमे मे देव शास्त्र ३२७ गुरू वाणी जीत होगी। किसी भी प्रकार की हानि न होगी। तू सयम और दान मे मन लगा, तेरे मन की चिन्ता नष्ट होकर तेरी गृहस्थी मे सुख का विस्तार होगा। ह, ह, अ-ये वर्ण आनन्द के सूचक हैं। तेरे पास पर्याप्त लक्ष्मी है, पुत्र पौत्रादि से सुख बढेगा। बिछुडे हुए भाई, मित्र परदेश मे सुखी हैं, ओर उनका शीघ्र ही सुखकारक मिलाप होगा। श्रीजिनेन्द्र भगवान की सेवा के प्रताप से सब प्रकार के मगल होगे और आगामी एक वर्ष बहुत धन का लाभ होगा। ह, ह, र-हे भाई । तुम्हारे सब प्रकार का आनन्द होगा तुम्हारे पुत्र के विवाह की चिन्ता दूर होगी और विवाह शीघ्र होगा। तू श्री चौबीसी जी की पूजा विधान कर उससे धन, धान्य, वस्त्राभूषण की उढवारी होगी। जहा जायगा लाभ होगा। यह सब जानते हैं कि भगवान की भक्ति से तथा जप दान से सब कार्य सिद्ध होते हैं। ह, ह, ह-इन तीनो वर्गों का फल परम लाभ का सूचक हैं। देश सुख शान्ति हो, धन की प्राप्ति हो, खोई हुई जायदाद प्राप्त हो, लडाई, झगडे मे सफलता मिले, व्यापार मे धन मिले, बन्धुओ और मित्रो से स्नेह बढे । तुम्हारे सम्पूर्ण प्रकार के आनन्द होगे, श्रद्धा से धर्म का सेवन करो। ह, ह, त-हे पूछने वाले । तुझे अच्छा लाभ होगा। तुम परदेश जानाचाहते हो, वहा तुम्हे धन लाभ होगा। खेती व्यापार नौकरी आदि मे इच्छानुसार लाभ होगा। देव, गुरू, शास्त्र के प्रभाव से ससार मे सुख के साधन, धन, धान्य सोना, चादी, आदि तुझे इच्छा नुसार मिलेगे। तू श्री महावीर प्रभु की सेवा मे मन लगा। ह, त, अ-ये तीनो वर्ण पूछने वाले के मन मे साफ प्रकट कर रहे हैं। हे पृच्छक | तू लोभ मे फसकर परधन चाहता है, यह अच्छा नहीं है। तू सन्तोष को धारण कर लोभ को त्याग कर, जो होनहार है होकर रहेगा। परन्तु कुछ समय बाद तेरे पुण्य का उदय है, उम ।

। ३२८ देव शास्त्र गुरू वाणी समय तेरा कलयाण होगा तब तक तू वीतराग भगवान की आराधना कर। ह, त, र-तेरे मन मे दूसरे के धन की आशा लगी है, तू चाहता है वह तुझे मिलेगा। धन प्राप्ति, यश की बृद्धि का समागम होगा और तेरा गया हुआ धन भी पुन मिलेगा। इस प्रकार हे सज्जन | तू जो भी विचारता है तेरा सब मनवाछित प्राप्त होगा। ऐसा समझकर हृदय की चिन्ता दूर कर दान पुण्य आदि शुभ कार्यों को कर। ह, त, ह-हे पूछने वाले । तेरा मन खोटे कर्मों में लगा हुआ है, तू चोरी से, जुए से, सट्टे से, धन चाहता है। दुख पाता है, बदनाम हो रहा है और तेरा विश्वास उठ गया है। अब तू इस मार्ग को छोड दे और ठीक मार्ग पर इच्छित कार्य पूरा कर। ह, त, त-हे मित्र | तेरे मन मे जो धन, धान्य तथा सुख सम्पत्ति से भरे हुए घर की चाह है वह सफल होगी। तू चिन्ता का त्याग कर विदेश जा। वहा तुझे मन्त्र, सम्मोहन एव और भी जितनी विद्याए हें सब प्राप्त होगी। उनसे तेरे मन की अभिलाषा पूर्ण होगी। अथ तकारादि चतुर्थ प्रकरण त, अ, अ-हे पूछने वाले । ये पासा बतलाता है कि यदि तू देव पूजा, दान पुण्यादि पवित्र कार्य करेगा। तो तुझे सब लाभ की प्राप्ति होगी। जैसे बीज के बिना वृक्ष नहीं होता, वैसे ही बिना पुण्य के सुख प्राप्त नहीं होता। तुझे पुत्र, पौत्र, धन धान्य का लाभ और व्यापार मे धन लाभ होगा। लडाई मे विजय होगी। त, अ, र-हे भाई । तेरा प्रश्न मध्य फलदाता है। तुम्हारे हृदय मे जिस स्त्री या पुरूष की चाह है, उसको छोड दो तथा त्याग दो, क्योकि स्त्री पुरूष, धन कुटुम्ब आदि होनहार के आधीन हैं। प्रभु भक्ति मे मन लगा, कुछ समय बाद तुम्हे पर्याप्त धन लाभ होगा। त, अ, ह-हे प्रश्नकर्ता । तेरे मन मे दिन रात धन की चाह रहती है, या नहीं ? परन्तु भाई । बिना पुण्य के मिले कैसे ? तेरे ये दिन ।

- त, २, २-१ सय । दुहारी चिन्ता तुमार पास से ही प्रकट nat I Trt घर मे दरिदता ने पैर जमाय ह. अत तुम रात दिन गग की पिना करते हो और उनी यो उपाय भी करत हो. किन्तु अभी ३ वर्ष तक तुमास शुम का उदय नहीं । अत उस समय के बाद ही तुने सुराकी गामणी प्राप्त होगी, उसी समय तुम किसी अन्य नये गा में लगाना | उसी से तुरे लाभ और यश मिलेगा । त रह- गज्जन । घर बहुत गुग पासा । उसके प्रताप से तुझ गर गाल्याण की गामग्री मिलेगी । जिनेन्द्र भगवान की सेवा के प्रभाव से सब विज वाधाय पल भर ग दूर होगी । धन, पुत्र, युद्ध मे विजय, भाइयों के साथ प्रेम बढेगा । घर में लडाई गडे न होगे । तुम्हारे सारे पाप सन्ताप दूर होक कल्याण की प्राप्ति होगी । तुम इस सुख को स्थायी बनान के लिए भगवान की आराधना करते रहो ।

३३० देव शास्त्र गुरू वाणी त, र, त-यह बहुत अच्छा शकुन है । तुम्हारा मन धन की चिन्ता मे दुखी है, बहुत दिन से तुम चिन्ता कर रहे हो पर अब अच्छा समय आ गया है । तुम्हे सुख की सामग्री, प्रियजनो का समागम धन लाभ होगा । यदि परदेश गमन करो तो बहुत अधिक लाग हो । वाद विवाद मे जीत सभ्य समाज मे मान और प्रतिष्ठा मिलेगी । देव गुरू धर्म मे अटल श्रद्धा रखो। त ह अ-पासा डालने पर जब ये तीन वर्ण पड़े तो वडा लाभ फल हो । सारे विघ्न और सकट दूर हो, जहा भी जाय वहीं इच्छित फल की प्राप्ति हो । धन, धान्य, वस्त्र, गाय, भैंस, घोडा आदि वैभव की सामग्री का मिलाप हो । तीर्थ यात्रा, परदेश गमन युद्ध समुद्र पार सर्वत्र सफलता ही सफलता प्राप्त होगी । इसलिए हे पृच्छक । इस कल्पवृक्ष समान फलदाता शकुन का फल भोगता हुआ तू अपने इष्टदेव की सेवा मे मन लगा । त, ह, र-हे पूछने वाले । तेरा पाप का उदय है, तेरा लिया हुआ शकुन यही बताता है, तुम दुखी हो, कष्ट पा रहे हो, तुम्हारा धन नष्ट हो गया शरीर मे भी बीमारिया हो रही हैं । पुत्र और मित्रो का वियोग हुआ है, जो भी विचारते हो उसी से कष्ट वढते हैं । तुम्हारे घर मे क्लेश पहुचाने वाली लडाकू स्त्री है या पुरूष है, और यही पाप दुख दे रहा है । इसलिए तू कुछ समय तक विपत्ति नाशक भगवान पार्श्वनाथ की पूजा कर इससे तुझे शान्ति मिलेगी । त, ह, ह-हे शकुन लेने वाले । तेरा पाप का उदय है, अत तू कुछ दिन युद्ध मे या वाद विवाद झगडे में योग मत दे इन कामो में तुझे कष्ट ही उठाना पडेगा, धन की, धर्म की हानि ही होगी । तुम्हारे घर मे कलह, लडाई, झगड़े चिन्ता का राज्य है, भाई बान्धव मित्र आदि भी शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं । इसलिए अपना खोटा समय जानकर भगवान की भक्ति करता हुआ दुख नाश करने का उपाय सोच ।

देव शास्त्र गुरू याणी ३३१ त. हं, त-हे भाई । तुम्हारा शकुन मध्यम है । इसलिए जो तुम सोचते हो वह फल न होगा । कुछ दिन ठहरना ही ठीक है । पाप का उदय समझकर चिन्ता मत करो भावी बलवान होता है । मन मे मृत्यु का भय मत करो. अशान बुद्धि को छोड दो । सुख पाने के लिए महावीर प्रमु का स्मरण करो । त, त, अ-हे प्रश्नकर्ता । तुम्हारा शुभ का उदय है, तुम्हे महान सुख मिलेगा धन धान्य का समागम होगा । राज्य में भी आदर हंगा । व्यापार मेधा पाप्त होगा । पुत्री का विवाह, साथ ही तुम्हे सुपुत्र की प्राप्ति रोगी । त, त, र-रे प्रश्नकर्ता । तुम्हारा सुकुन उत्तम है । तुमने सदा सुराही पाया है, आगे भी भाई बन्धु पुत्र, धन, धान्य की बढवारी ही होगी । विदेश में भी सुख ही मिलेगा । सक्से मित्रता और बन्धुता का गावहार रोगा । तुम्हारे शत्रु डरकर तुम्हारे मित्र हो जायेगे । घर में गार गैस घोडा आदि वाहन भी रहा करेगे । त, स, ह भाई । तुग आलस्य छोडकर उद्योग करो, तुम्हे लाभ हागा और मन की भावना पूरी होगी । तीर्थ यात्रा, पूजन विधान, सव सफल होगे । तुम्हारे घर में जो रोग शोक है वह शीघ्र दूर होगा । सब प्रकार की मांग सामग्री प्राप्त होगी । अपने मन मे किसी प्रकार का सन्देर मत कर । भगवान की भक्ति से सब सुख सामग्री सरलता से प्राप्त हो जाती है । त, त, त-हे पृच्छक । तेरा शकुन वडा कल्याणकारी है । तुम्हारे मन चाहे कार्य सिद्ध होगे । घर मे पुत्र पौत्रादि का जन्म होगा । धन बढेगा, सुख वढेगा, विवाह होगे । नष्ट हुआ धन पुन प्राप्त होगा । शत्रु शत्रुता छोडेगे । हितैषी मित्रों का मिलन होगा तुम सदा धर्म की आराधना करते रहो, यही सव सुखो का देने वाला है । इति।।

३३२
देव शास्त्र गुरू वाणी
/आत्म कीर्तन
(श्री १०५ क्षु. मनोहर लालजी वर्णी सहजानन्द)
स्वतत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता दृष्टा आतम-राम ।।टेक
मैं वह हू जो है भगवान, जो मैं हू वह हैं भगवान
अन्तर यही ऊपरी जान, वे विराग यह राग वितान ||१||
मम स्वरूप है सिद्ध समान, अमित शक्ति सुख ज्ञान निधान ।
किन्तु आस वश खोया ज्ञान, बना भिखारी निपट अजान |२||
सुख दुख दाता कोई न आन, मोह राग ही दुख की खान ।
निजको निज पर को पर जान, फिर दुखका नहि लेश निदान ।।३।।
जिन शिव ईश्वर ब्रह्मा राम, विष्णु बुद्ध हरि जिनके नाम ।
राग त्याग पहुचू निज धाम, आकुलता का फिर क्या काम ||४||
होता स्वय जगत परिणाम, मैं जग का करता क्या काम ।
दूर हट पर-कृत परिणाम, ज्ञायक भाव लखू अभिराम ||५||
शास्त्रजी को नमस्कार करने के कवित्त
(जिनवाणी की स्तुति)
वीर हिमालय से निकसी,
गुरू गौतम के मुख-कुण्ड ढरी हैं |
मोह-महाचल भेद चली,
जग की जडता तप दूर करी है ।।
ज्ञान पयोनिधि मॉहि रली,
बहु भग-तरगनि सौं उछरी है ।
ता शुचि-शारद गग नदी प्रति,
मैं अजुरि करि शीश धरी है ।।
या जग-मन्दिर मे अनिवार,
अज्ञान-अँधेर छयो अति भारी ।

३३३
देव शास्त्र गुरू वाणी
श्री जिन की ध्वनि दीप-शिखा सम,
जो नहीं होत प्रकाशन हारी ।।
तो किस भैति पदराथ-पाँति,
कहाँ रहते ? रहते अविचारी ।
या विधि सन्त कहें धनि हैं,
धनि हैं जिन-बैन बडे उपकारी ||
मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकाशवे को,
आपा पर भासवे को, भानु सी वखानी है ।
छहाँ द्रव्य जानवे को, उन्ध-विधि रानवे को,
स्व पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ।।
अनुगव बतायवे को, जीव के जतायवे को,
काहू न सतायवे को. भव्य उर आनी है ।।
जहाँ-तही तारवे को, पार के उतारवे को,
सुख विस्तारने को, येही जिनवाणी है ।।
है जिनवाणी मारती, तोहि जपो दिन रैन ।
जो तेरी शरण गहै, सो पावे सुख चैन ।।
जा वाणी के ज्ञान तै, सूझे लोकालोक ।
सो वाणी मस्तक चढो, सदा देत हो धोक ||
तीर्थों का महत्त्व
सुरेश-गुरू जी पिता जी कहते हैं कि रोज तीर्थवदना पढा करो,
बहुत पुण्य मिलता है सो तीर्थ क्या है ?
अध्यापक-हा सुरेश | तुमने प्रश्न बहुत अच्छा किया है, सभी
वालको सुनो-जिससे ससार समुद्र तिरा जाय उसे तीर्थ कहते हैं ।
इस लक्षण से तो अर्हत भगवान का धर्म ही सच्चा तीर्थ है तथा तीर्थकर
आदि महापुरूषों ने जहा जन्म लिया है या जहा से मोक्ष गये हैं या
जहा पर अन्य कल्याणक हुए हैं ऐसे पच कल्याणक स्थानो को भी

३३४ देव शास्त्र गुरू वाणी तीर्थ कहते हैं क्योकि महापुरूषो के चरणरज से वे सभी स्थान भी पवित्र हो गये हैं। नरेश-हमारी माता जी कहा करती हैं कि मनुष्य पर्याय पाकर जीवन मे सम्मेद शिखर की यात्रा अवश्य करना चाहिए । ऐसा क्यो? अध्यापक-यो तो गिरनार, चम्पापुर, पावापुर, अयोध्या, हस्तिनापुर आदि सभी तीर्थों की वदना करना चाहिये । फिर भी सम्मेद शिखर के दर्शन का एक विशेष महत्व है । 'एक बार बन्दे जो कोई ताहि नरक पशु गति नहि होई । जो एक बार भी सम्मेद शिखर के पवित्र टोको की वदना कर लेता है वह जीव उस भव से मरकर नरक गति और तिर्यचगति मे नहीं जाता है नियम से वह जीव भव्य है-अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करेगा । अत बालको । तुम्हे सम्मेद शिखर की यात्रा अवश्य करना चाहिये । जैन तीर्थों की सूची बिहार- १ श्री सम्मेदशिखर जी (मधुवन) सिद्ध क्षेत्र २० तीर्थंकरो की निर्वाणभूमि व असख्य मुनिराज मोक्ष गये । २ मदार गिरि (गिरीडीह) सिद्धक्षेत्र ३ भागलपुर तीर्थ क्षेत्र ४ चम्पापुरी (नाथ नगर) सिद्धक्षेत्र श्री वासुपूज्य जी के पॉचो कल्याणक हुए । गुणावा सिद्ध क्षेत्र गणधर गौतम स्वामी को केवल ज्ञान हुआ था । पावापुरी, सिद्धक्षेत्र भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली । राजगृही (पच पहाडी) सिद्धक्षेत्र मुनि सुव्रतनाथ की जन्मस्थली व अनेक मुनिराज मोक्ष गए । उत्तर प्रदेश- हस्तिनापुर (मेरठ) अतिशय क्षेत्र बडा गाव (मेरठ) अतिशय क्षेत्र - देव शास्त्र गुरू वाणी ३३५ बहलना (मुजफ्फरनगर) अतिशय क्षेत्र अहिक्षेत्र पार्श्वनाथ (मुरादाबाद) अतिशय क्षेत्र वाराणसी (काशी) तीर्थ क्षेत्र (भगवान सुपार्श्वनाथ व पार्श्वनाथ की जन्मस्थली) इलाहाबाद तीर्थ क्षेत्र कौशाबी तीर्थ क्षेत्र अयोध्या जी तीर्थक्षेत्र (श्रीआदिनाथ अजितनाथ अभिनदन नाथ सुमत नाथ) देवगढ (ललितपुर) तीर्थ क्षेत्र (अनत नाथ भगवानो की जन्म स्थली) सिहपुरी (सारनाथ) श्रेयासनाथ जी जन्म स्थली मथुरा सिद्ध क्षेत्र (जम्बूस्वामी व पाचसो मुनि मोक्ष गये) मध्यप्रदेश- चूल गिरि (बावन गजा) सिद्ध क्षेत्र, कुम्भकरण आदि मोक्ष गए नैनागिरि सिद्ध तीर्थ क्षेत्र द्रोण गिरि सिद्ध क्षेत्र सोना गिरि सिद्ध क्षेत्र नगानग कुमार, पाँच कोटि मुनि मोक्ष गए खुजराहो अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूवोन (गुना स्टेशन) अतिशय क्षेत्र चदेरी-अतिशय तीर्थ क्षेत्र पपौरा जी (टीकमगढ) अतिशय क्षेत्र पावागिरी (ऊन) सिद्ध क्षेत्र, स्वर्ण भद्र व असख्य मुनि मोक्ष गए सिद्धवर कूट सिद्ध क्षेत्र, २ चक्रवर्ती, १० कामदेव व अन्य मनिराज मोक्ष क्षेत्र राजस्थान- जयपुर, सागानेर, आमेर, खनिया जी तीर्थ क्षेत्र, पदमपुरि (जयपुर) अतिशय क्षेत्र, आबू पर्वत (दिलबाडा मन्दिर) तीर्थ क्षेत्र, तिजारा (अलवर) अतिशय क्षेत्र, श्री महावीर जी (हिन्डोन) अतिशय क्षेत्र, सवाई माधोपुर तीर्थ क्षेत्र, चाँद - ३३६ देव शास्त्र गुरू वाणी खेडी तीर्थ क्षेत्र, नाकोडा पार्श्वनाथ बलोतरा जोधपुर तीर्थ क्षेत्र । बगाल- कर्नाटक- गोम्मट गिरि श्रवणवेलगाले (जैनबद्री) अतिशय क्षेत्र, धर्म स्थल तीर्थ क्षेत्र, वेणूर तीर्थ क्षेत्र, मूढ बिद्री तीर्थ क्षेत्र, हुमचा (हुबुज पद्मावती) अतिशय क्षेत्र कलकत्ता तीर्थ क्षेत्र उडीसा- उदयगिरि-खण्डगिरि (भुवनेश्वर) अतिशय क्षेत्र भुवनेश्वर तीर्थ क्षेत्र महाराष्ट्र- रामटेक (नागपुर) तीर्थ क्षेत्र, अमरावती (नागपुर) तीर्थ क्षेत्र, मुक्तागिरि, सिद्धक्षेत्र ३।। करोड मुनि मोक्ष गये । कारजा तीर्थ क्षेत्र, अतरिक्ष पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र, कुथलगिरि श्री देश-भूषण मुनि जी की मोक्ष स्थली, माँगी-तुगी सिद्ध क्षेत्र रामचन्द्र जी हनुमान जी, सुग्रीव, नील व अन्य मुनि मोक्ष गये । गजपथा जी सिद्ध क्षेत्र (नासिक रोड) बलभद्रो के चरण । गुजरात- विद्यानन्दी क्षेत्र (सूरत) अनेक मुनियो के चरण हैं । पावागढ (पावागीरि) (बडौदा) रामचन्द्रजी के पुत्र व अनेक मुनिराज मोक्ष गये । पालीताना (शत्रुजय) (भावनगर) सिद्धक्षेत्र, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तीन पाडव व अनेक मुनिराज मोक्ष गये । सोनगढ (भावनगर) तीर्थक्षेत्र, गिरनारजी सिद्धक्षेत्र, श्री नेमिनाथ जी व उनके गणधर व वरदत्त व अनेक मुनिराज मोक्ष गये । तारगा सिद्धक्षेत्र (अहमदाबाद आब रोड) यहाँ से.वराग सागर व अनेक मुनिराज मोक्ष गये ।

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Dev Sastra Guru Vani

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2010/06
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Sanskrit
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