University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
संस्कृत शिक्षक प्रथम भाग
Front matter
प्रोम
10
संस्कृतशित
CHECKR
प्रथम भाग
संस्कृत सीखने का सर्वोम साधन
जिसमें
वर्तमान नवीनप्रणाली के अनुसार संस्कृत-व्याकरण के
गूढ़ नियमों को सरलभाषा द्वारा सम्माया गया
है तथा नीच प्रत्येक विषय के पाणिनित
अष्टाध्यायी के आवश्यक सूत्र काशिका
की वृनिसहित दिये गये हैं। साथ २
ही विद्यार्थियों की सुगमः । के
उद्देश्य से उदाहरण भी
दिखलाये गये हैं
dাহনা
ओ पं० देवरल त्रिपाठी नैनीताल
प्रकाशक
रघुवं 'शरण दुबलिम सम्पादक भास्कर' पत्र
धेरठ शहर
मिलने का पता-
मैनेजर भास्कर प्रेम मेरठ शहर
धमवार १२७. ] संवत् १६७४
[ मूल्य !)
Printed & Palliinhelly
RAGHUVIR SHARAN DUBLIS
th; Bhaskar Press, Meerut Ciy.
प्रोम समर्पणम् श्री ६ पूज्यपाद-पण्डितप्रवर-स्वर्गीयपित- रमादत्तशर्म-चरण-सरोरुहेषु प्रोमन् ! आप का संस्कृत एवम् भारतीयभाषा के प्रति अगाध प्रेम था। आपने हिन्दी भाषा के भाण्डार को भरने के लिये अनेक परमोपयोगी ग्रन्थों का निर्माण भी किया, जो आप के नाम को चिरस्थायी एवम् पाप की विद्याप्रभा-साहित्यप्रेमादि सद्गुणों को अटल रखने के लिये पर्याप्त हैं; तथापि जिस प्रकार अनेक पुरुष अपने पितरों के स्मरणार्थ उन के नाम से धर्मशाला मन्दिर विद्यालयादि की स्थापना करते हैं उस ही प्रकार भाप के स्मृत्यर्थ मेरी यह तुच्छ कृति है। आप का पुत्र देवदत्त ओ३म ग्रन्थकार का निवेदन ऐश्वरी संस्कृतावाणी सर्व-कर्म-प्रसाधिनी। सुबोधिनीच शास्त्राणांजिहाजाड्य-विनाशिनी अधुना प्राचीन घटना एवम् पुराचीन साहित्य के अन्वेषक एवम् आर्य ( हिन्दू ) समुदाय की इच्छा संस्कृतभाषाज्ञान की प्रोर विशेष दृष्ट होती है। क्यों- कि यह निर्विवादतया सर्वमान्य है कि पुराकाल में समस्त महीमण्डल की राष्ट्रभाषा एकमात्र संस्कृत भाषा ही थी। अतः तत्कालीन विद्वन्मण्डल ने इस संस्कृत भाषा को न्याय योग,सांख्य वेदान्त, इतिहास, ज्योतिष, वैद्यक, नीति, विज्ञानादि विविध विषयों मे समलंकृत सर्वांगसुन्दर बना डाला था; माहित्य के किसी भी अंग में किसी प्रकार की त्रुटि न रक्सी थी। कोई भी साहित्य का ऐसा विषय न था कि जिस पर संस्कृतभाषा के विद्वानों ने बहुविध भाव- मय श्रेष्ठतम ग्रन्यों की रचना न की हो । अतएक प्राचीन घटनात्रों के अन्वेषणार्य एवम् पुराकालीन विशेषताओं के बोधार्थ संस्कृतभाषा के ज्ञान की अत्यावश्यकता है। इसके अतिरिक्त भारतवर्षान्तर्गत जितने शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य आदि आदि शिखाधारी सम्प्रदाय वा पन्य हैं उन सब के धर्म- अन्य संस्कृतभाषा में ही हैं। अतएव उन २ प्रत्येक ४ संस्कृतशिक्षक। . साम्प्रदायिकों को अपने २ धार्मिक सिद्धान्तों वा नियमों के पूर्णतया जानने के लिये भी संस्कृत ज्ञान की अत्यावश्यकता है, क्योंकि विना ऐसा किये उन को अपने सम्प्रदाय के समस्त सिद्धान्तों वा नियमों का पूर्णतया बोध नहीं हो सकता । उक्त २ प्रधान हेतुत्रों से प्रत्येक भारतीय को संस्कृतभाषा का कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करना अत्यावश्यक है । परन्तु आधुनिक शिक्षाविधि के समयानुकूल न होने से अधिककाल पर्यन्त कठिन श्रम करने पर भी बहुत ही कम बोध होता है। इस पर भी संस्कृत व्याकरण का अध्ययन करना तो अतीव कठिन है। इस बात को समस्त संसार के विद्वान् निर्विवादतया स्वीकृत करते हैं कि किसी भाषा का ज्ञान, उस भाषा के व्याकरणज्ञान के विना, उस भाषा को न जानने के ही समान है । किसी कवि ने कहा है कि:- शब्दशास्त्रमनधीत्य यः पुमान् वतुमिच्छति वचः सभाम्तरे । हस्तिनं कमलनालतन्तुना बधुमिच्छति मदोत्कटं वने ॥ यद्यपि बहुनार्धाषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । श्वजनो सकलं शकलं सकृच्छकृत् ॥ कधि का आशय है कि जो पुरुष शास्त्र के पढ़े सभा में कुछ बोलना चाहता है वह मानो मत्त हाथी को कमलतन्तु से विकट वन में बांधना चाहता है। फिर कवि अपने है कि “ हे पुत्र ! तू यदि अधिक नहीं भी पढ़ता है तो शब्दशास्त्र को तो अवश्यमेव पढ़ । देख, - विना शब्द. से कहता ग्रन्थकार का निवेदन। स्वजन , शब्द का उच्चारण करते समय "वजन न हो जाय एवम् सकृत् के स्थान में शकृत, सकल के स्थान में शकल न बोला जावे । "भावार्थ यह है कि स्वजन शब्द का अर्थ अपना आदमी है, परन्तु इस ही स्वजन शब्द के दन्त्यमकार के स्थान में तालव्य शकार लिख वा बोल दिया जाय तो उक्त शब्द का अर्थ कुत्ते का आदमी हो जाता है। एवम् सकृत् १ वार, शकृत्-विष्टा; सकल-ममूचा, शकल- टुकड़ा। इन शब्दों में सकार और शकार के भेदमात्र से ही अर्थ में प्रान्तर्य होजाता है । हम पहिले ही लिख चुके हैं कि अधुना संस्कृता- ध्ययन उस में भी व्याकरण का बोध करना प्रतीव क्लिष्ट है । जब चिरकाल पर्यन्त कठिन श्रम किया जाय तब कहीं कुछ बोध होता है। इसी हेतु से प्रायः आधुनिक संस्कृत के विद्वान् व्याकरणशास्त्र के अति- रिक्त अन्य ज्योतिष , भूगोल, इतिहास, विज्ञानादि विषयों पर विशेषज्ञ नहीं दीखते । उन की ऐसी दशा देख संस्कृत का प्रचार दिनोंदिन कम होता जारहा है। इन्हीं विचारों से हमारे मन ने यह संक- रुप किया कि कोई ऐसा ग्रन्थ लिखा जाय कि जिस के द्वारा संस्कृतभाषा का बोध सरलतया हो सके । उक्त प्रणानुसार ही यह पुस्तक पाठकों के सन्मुख उपस्थित की जाती है। यों तो संसार में ऐसी वस्तु कौनसी कि जिस में गुण-दोष न हों, तथापि हम में ६ संस्कृतशिक्षक। जहां तक शक्ति थी देशकालानुसार इस पुस्तक का सरल एवम् उपयोगी बनाने में त्रुटि नहीं रक्खी है । अन्त में पाठकों को इस हर्षसमाचार से सूचित करते हैं कि ग्रन्थकार के निवेदन पर इस पुस्तक का शोधनभार अंग्रेजी तथा देववाणी के पारंगत संस्कृत- साहित्य के महार्णव लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् प्राविवेक श्रीमान् पण्डित श्रीकृष्ण जोशी B. A L. L. B. महोदय ने सहर्ष स्वीकृत किया एवम् सम्यक्तया ग्रन्थ का अवलोकन तथा अशुद्धिनिष्कासन करते हुए उक्त विद्वान् महोदय ने प्रारम्भ में एक छोटी सी भूमिका भी लिखी है । इस से लेखक को पूर्ण विश्वास है कि अब यह ग्रन्थ प्रत्येक संस्कृत विद्यालयों एवम् गुरुकुल,ऋषिकुलादि सब संस्थानों के उपयोगी होगा। क्योंकि प्राचीन प्रणालीसे अध्ययना- ध्यापनेच्छुकगण इस पुस्तक के निम्नभाग में लिखें सूत्रों द्वारा अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं, एवम् नवीन शिक्षापद्धति के प्रेमी सज्जन हिन्दीभाषा में लिखे नियमों द्वारा अपने अभीष्ट को पा सकते हैं। इम के अतिरिक्त इस ग्रन्थ के द्वारा, विमा गुरु, घर में ही स्वयं पढ़ने वालों का भी बहुत कुछ उपकार होना सम्भव है। यदि पाठकों ने इसे अपनाया तो इस ग्रन्थ के अन्य भाग भी शीघ्र प्रस्तुत होंगे। निवेदक-देवदत्त त्रिपाठी नैनीताल
भूमिका
संस्कृतभाषा की उपादेयता नो निर्विवाद सिद्ध
ही है। संस्कृतभाषा जो प्राचीन आर्यो में भूमण्डल
व्यापिनी राष्ट्रभाषा थी उस में अब भी सार्वजनिक
भाषा होने की योग्यता है । कम से कम सनातनधर्म
की रक्षा के निमित्त और प्राचीन गौरव की रक्षा के
निमित्त तो यह गीर्वाण वाणी अत्यन्त ही आवश्यक
है। माधुनिक भाषाओं की यह माता है । संस्कृत
के धातु प्रत्ययों को ही आधुनिक भाषाओं में प्रयोग
करने के निमित्त नवीन २ शब्दों की रचना हो
सकती है । इस लिये मनुष्य को विशेषकर प्रत्येक
भारतवासी को संस्कृत जानना ही चाहिये ।
गीर्वाण घाणी के पवित्र स्रोत से शुद्ध विद्यामृत
जो श्री पाणिनि मुनि के मूत्र रूपी गंगोत्तरी तथा
श्री पतञ्जलि मुनि के महाभाष्य रूपी गंगाद्वार से
मिल सकता है वह अन्य स्थलों में कहां? तथापि
ग्रन्थकार श्री० पं० देवदत्त त्रिपाठी जी ने शिल्पकार
( Engineer ) बन कर उस पवित्र विद्यामृत के स्रोत
की उन्नत गिरिशिखर-दुर्गम उपत्यकाओं में प्रवेशकर
शुद्ध उद्गमस्थान ( Fountain-head ) से सर्वसाधारण
संस्कृतशिक्षः । mund के हितार्थ इस छोटी पञ्चिका रूपी कुल्या के द्वारा उसी पधित व्याकरणामृत का भारतवर्ष में घर घर पहुंचाने का विचार किया है । ग्रन्थ छोटा होने पर भी अभ्याससहित व्याकरणशिक्षा ( Practical teaching ) के उपयोगी है। इसमें जो बात सिखाई है उसी का तुरन्त प्रयोग भी वाक्यरचना उदाहरण अनुवाद इत्यादि द्वारा बताकर व्याकरण को पाक्षिकी विद्या- श्रेणी से मुक्त कर दिया है । आशा है कि इस ग्रन्य के समस्तभाग शीघ्र ही प्रकाशित हो जायगे । यदि पाठक इस ग्रन्थ की सहायता से कुछ संस्कतवाणी को सीख सकेंगे तो ग्रन्यकर्ता तथा उस के सहायकगण अपने २ को कृत- श्रीरस्तु॥ श्रीकृष्ण जोशी बी. ए. एल. एल. बी. वकील हाईकोर्ट नैनीताल कृत्य समझेंगे।
उपयोगिसूत्रसूची। ma ॥ हमने इस ग्रन्थ में जो प्रक्रम दिये हैं वे भिन्न २ अष्टाध्यायी आदि के सूत्रानुसार हैं,उन प्रक्रमों के साधार सूत्रों को साथ में नीचे लिख दिया है। परन्तु जो इस ग्रन्थ को सूत्रानुसार पढ़ना चाहें, उन्हें प्रथम निम्न. लिखित मत्र भी कण्ठस्थ कर लेने चाहिये। विना इन सूत्रों को कण्ठस्थ किये अन्य ग्रन्थस्थ सूत्रों का अर्थ लगाना वा उपयोग करना नहीं हो सकता :- अइउण् ॥ १॥ ऋलक ॥ २॥ एओङ् ॥ ३॥ ऐ- औच ॥४॥ हयवरद ॥५॥ लण ॥ ६ ॥ जम- ङणनम् ॥७॥ झभज ॥८॥ घढधष् ॥६॥ जबगडदश ॥ १०॥ खफछठथचटतव ॥ ११ ॥ कपय् ॥१२॥ शषसर् ॥ १३॥ हल्॥१४॥इतिप्रत्या- हारसूत्राणि अणादिसंज्ञार्थानि । एषामन्त्या इतः हकारादिषु अकार उच्चारणार्थः लणमध्येत्वित्- संज्ञकः ॥ भाषार्थ-उक्त भइउण * नादि १४ सूत्र अण आदि प्रत्याहार बनाने के लिये हैं । व्याकरणशास्त्र में प्रत्याहार उस को कहते हैं कि जिस में केवल दो अक्षरों के कहने से बहुत से अक्षरों का बोध होजाय, जैसे इतना कहने से अ इ उ इन तीन अक्षरों का बोध होजाता है। इन प्रत्याहारों को बनाने वा २ संस्कृतशिक्षका MauloMeautanka- उपयोग करने की रीति अगले सूत्र में बतलायेंगे। इन १४ सूत्रों में से प्रत्येक सूत्र का अन्तिम अक्षर इत्संज्ञकहै (उस इत्संज्ञक अक्षर के नीचे इस प्रकार का चिहू ( ) कर दिया गया है)। पांचवें सूत्रसे चौदहवें सूत्र तक जितने अक्षर हैं सब व्यञ्जन हैं,प्रतः इन सघ अक्षरों के साथ जो प्रकार का भी उच्चारण होता है वह केवल बोलने के निमित्त है ( क्योंकि ध्यञ्जनवर्ण विना स्वर को सहायता से नहीं बोले जा सकते । देखो इस प्रन्थ का दूसरा प्रक्रम ); परन्तु “लण” सत्र में ल के अन्त- मत का प्रकार प्रत्याहार बनाने के लिये है ॥ आदिरन्त्येन सहेता १।१ । ७१ ॥ अन्त्येनेता सहित आदिमध्यगानां वर्णानां स्वस्य च ग्राहको भवति ॥ भाषार्थ-प्रत्याहार बनाने की रीति यह है कि जो प्रत्याहार बनाना हो प्रथम जिस अक्षर से प्रत्याहार बनाना है उस को लो, फिर अन्तिम इत्संज्ञक अक्षर का ग्रहण करो, प्रत्याहार बन जायगा । उस प्रत्याहार का सादिवर्ण अन्य इत् के साथ मिलकर मध्यस्थ और स्वीय स्वरूप का भी ग्राहक होता है। यथा अस इ उ। अक्स इ उ ऋ, ल इत्यादि । यहां पर इस बात का भी ध्यान रहे कि प्रत्याहार बनाने में यदि मध्य में कोई इत्संज्ञक अक्षर उपस्थित हों तो उन का लोप हो जाता है, क्योंकि इत्संज्ञक अक्षर
उपयोगिसूत्रसूर्ची ।
की गणना नहीं होती। और यों तो प्रत्याहार बहुत
से हो सकते हैं। परन्तु ध्याकरणशास्त्र में उक्त मूों
से बने हुए केवल ४२ प्रत्याहारों का ही प्रयोग हुमा
है, जिनको हम यहां पर लिखते हैं।
प्रत्येक प्रत्याहार का वर्णज्ञान।
१ अण-अ उ ।२ प्रक-अ इ उ ऋ ल ।
३ अच-अ इ उ ऋ ल र ओ ऐ नौ । ४ अट-अ इ उ
ऋ ल ए प्रो से औ ह य व र । ५ अण-अ इ उ ऋ लु
र श्री ऐ औ ह य य र ल । ६ अम्स इ उ का
ल एलो से ह य व र ल भ म उ ण न । ७ अश=
अ इ उ क ल ए भी ऐ ह य व र ल ज म अगा
न झ भ घढ ध ज ब ग ड द । ८ अलप ६ उ
ल ए सो ऐ औ ह य व र ल अमण न झ भ घट
धन ब ग ड द ख फ छठ य च ट त क प श
ष स ह । इक- उ ऋ ल । १० इच-इ उ ऋ ल ए
श्री ऐ प्रौ । ११ इण=ई उ ऋ ज ए मा से श्री ह य
ध र ल । १२ उक-ॐ ल । १३ एङ्-ए प्रो। १४ एचए
प्रो रे नी । १५ ऐच-ऐ औ । १६ हश ह य प र ल
अम डण न म भ घढ ध ज ब ग ड द । १७
हल-ह य व र ल ज म कु ण न म भ घढ धज
व ग ड द ख फ छठ यचट त क प श ष सह। १८
यण य व र ल । १८ यम्य व र ल अम हु न ।
यञ्-य ध र ल जमण न झ भ। २१ यय-य व र ल
१२
संस्कृतशिक्षक।
जमङ ण न झ भ घढ ध ज ब ग ड द ख फ छ
ठ य च ट त क प । २२ यर्य व र ल ज म ङ ण
न म भ घ8 ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ य च ट
त क प श ष स । २३वशव र ल अम ङ ण न झ भ
घढ ध ज ब ग ड द । २४ वल-व र ल ज म अ ण
न भ भ घढध जब ग ड द ख फलठ चटत
क प श ष स ह । २५ रलर ल जम ङण न क भ
घढघ ज ब ग ड द ख फछठ थ चट तक प
श ष स ह । २६ मयन्म हुण न झ भ घढ ध ज
ब गड द ख फ छठ य च ट त क प । २७ ङम्--
ङ ण न । २८ झष झ भ घ द ध । २८ झशझ भ
घढ घ ज ब ग ड द । ३० झय-झ भ घढ ध म ब ग
ड द ख फ छठ यचट त क प । ३१ झर-झ भ घ
ढ धज म ग ड द ख फछठ य च ट त क पशष
स। ३२ झलन्झ भ घढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ य
चटत क प श ष म ह । ३३ भषभ घढ ध । ३४
जश्-न ब ग ड द ।३५ बश्- ब ग ड द । ३६ खय-ख
फ छ ठ य च ट त क प । ३७ खर-ख फ छठ य च
ट त क प श ष स । ३८ छवछ ठ य च ट त । ३८
चय-चटत कप।४० चर-चट तक प श ष स ।
४१ श=श ष स । ४२ शल-श ष स ह ॥
ये दो प्रत्याहार भी प्रयुक्त हुए हैं। ४३ अम्-
अ-मऊ-मनन ४ भस्म घ -
भ-भ घ ध न प ग -६॥
उपयोगिसूत्रसूची।
धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम् ।
आगमाः प्रत्ययादेशाः उपदेशाः प्रकीर्तिताः ॥
भू मादि धातु पाउणादि १४ मूत्र, गण,उणादि,
वाक्य, लिंग, अनुशासन, मागम, तिप आदि प्रत्यय
और आदेश को उपदेश कहते हैं ।
उपदेशेऽजनुनासिक इत् १।३।२॥
उपदेशेऽनुनासिकोऽच् “ इत् " संज्ञको भवति ।
उपदेश में जो अनुनासिक अच् ( नासिका से
बोलाजाने वाला स्वर) हो वह इत्संज्ञक होता है ।
यथा-२८ वे प्रक्रम में के प्रत्ययों में से “ सु
प्रत्यय का उकार इत् संज्ञक है ॥
हलन्त्यम् । १।३।३॥
उपदेशेऽन्त्यं हल् इत्संज्ञको भवति ॥
उपदेश में अन्तिम हल इत् संज्ञक होता है।
वें प्रक्रम
में कहे “ मिप, सिप् प्रत्ययों के
पकार की इत् संज्ञा होती है । अइउण आदि सूत्रों
में
ण् क् ङ् च् प्रादि इत्संज्ञक हैं ।
आदिर्जिदुडवः १।३।५॥
धातोराद्या:जिटुडवः इतोभवन्ति ।
धातु के आदि में जि, टु, डु इत्संज्ञक होते हैं।
यथा-“डुपचष् पाके इस धातु में " डु
की इत् संज्ञा है।
यथा-२२
A
संस्कृतशिक्षक।
व
मक्रम
में कहे
पः प्रत्ययस्य १।३।६॥
प्रत्ययस्यादिः “ष "
प " इत्संज्ञको भवति ॥
प्रत्यय के आदि का सूधन्य षकार इत्संज्ञक
होता है।
चुटू १।३।७॥
प्रत्ययाद्यौ चवर्गदवी इती भवतः ।
प्रत्यय के सादि का घवर्ग संवर्ग इत्संज्ञक
होते हैं।
यया-२८
प्रत्यय के
अफार की इत्मज्ञा है।
लशक्वतद्धिते १।३।८॥
सहितवर्जप्रत्ययाद्याः ल श कवर्गा इतोभवन्ति ॥
तद्धित को छोड़ कर प्रत्यय के आदि के ल, श
और कवर्ग इत् संज्ञक होते हैं । ( तद्धित का वर्णन
इस भाग में नहीं किया है, अन्य भागों में किया
जायगा)
यथा-२८ वें प्रक्रम के "उ, सि, उम् प्रत्यय
के डकार की इत् संज्ञा है ॥
तस्य लोपः १।३।९॥
यस्येत्संज्ञा विहिता तस्य लोपो भवति ॥
उपरोक्त सूत्रों से जिस अक्षर की “इत्" मजा
की गई है उस भक्षर का लोप हो जाता है ।
M
उपयोगिसूत्रसूची। merowinoamewomen mese यथा-" डे » प्रत्यय के डकार की इत्मज्ञा लशकतद्धिते " सूत्र से होकर इम तस्य लोपः सूच से डकार का लोप होजाता है तब केवल ए रह जाता है। अदर्शनं लोपः १ । ११६०॥ समुपस्थितस्यादर्शनं लापसंज्ञकं भवति ॥ जो विद्यमान ( मौजूद ) हो उसके लिपजाने वा न दिखाई देने को लाप कहते हैं । न विभक्ती तुरमाः १ । ३ । ४॥ विभक्तिस्था तवर्गसकारसकाराइतो न भवन्ति। विभक्ति सम्बन्धी तवर्ग, सकार, मकार इत्- संज्ञक नहीं होते ॥ इकोगुणवृद्धी १ । १।३॥ गुणवृद्धिशब्दाभ्यां यत्र गुणयुद्धी विधीयते (क्रियेते) तत्र इक इति षष्टान्त्यं पदमुपति- टते अथवा गुणवृद्धी इकेवस्थाने भवेताम् ॥ जहां गुण वा वृद्धि शब्द के द्वारा गुण वा धद्धि का विधान किया जाय वहां “ इक्” यह षष्ठय- नत्य पद उपस्थित होता है अथवा गुण वा वृद्धि इक के ही स्थान में होते हैं । सुडनपुंसकस्य १ । १ । ४३॥ सु औ जस् अम् औद् इमे प्रत्ययानि सर्वनाम- स्थानसंज्ञकानि भवन्ति नपुंसकलिङ्गवजयित्वा ।
संस्कृतशिक्षका मु, , जस् , अम्. प्रौट इन पांच पत्ययों की सर्वनामस्थान संज्ञा है। यह सर्वनामस्थान सज्ञा नपु. मक लिङ्ग को छोड़ के अन्य लिंगों में होती है । आद्यन्तौ टकितौ १ । १ । ४६ ॥ दिकितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवी भवेताम् ॥ जिस प्रागम सम्बन्धी प्रत्यय का टकार अथवा ककार इत्सजक है उसका प्रागम क्रम से आदि और अन्त में हो अर्थात् टित् का नागम आदि में और कित् का अन्त में हो। स्थानेऽन्तरतमः १।१।५०॥ प्रसंगेसति सदृशतम आदेशो भवति ॥ जहां किसी प्रादेश की प्राप्ति हो तो उस में जो बाह्याभ्यन्तरप्रयत्नादि के सम्बन्ध से अत्यन्त सदृश हो वही आदेश होता है । अलाऽन्त्यस्य ११॥५२॥ षष्ठीनिर्दिष्टान्तस्याल आदेशोभवति । षष्ठी के द्वारा निर्देश किया हुन्मा मादेश प्रन्ति- माक्षर के ही स्थान में होता है । आदेः परस्य १।१।५४ ॥ परस्य यत्कार्य विहितं तत् तस्यादेयम् । पर को जो कार्य का विधान किया माय, वह उस के मादि में जानना चाहिए ।
उपयोगिसुत्रसूची।
तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य १ । १। ६६ ॥
सप्तमीनिर्देशेन क्रियमाणं कार्यमक्षरान्तरेण
रहितस्य पूर्वस्य बोध्यम् ॥
सप्तमी के द्वारा जो किया जाने योग्य कार्य
हो वह वर्णान्तर से रहित पूर्व को हो ।
प्रत्ययस्य लुकश्लुलुपः१।१।६१॥
प्रत्ययस्यादर्शनस्यलुक,श्लुलुपइत्येताःसंज्ञा भवंति
प्रत्यय के लोप की
लुक, श्लु और लुप्, ये तीन
संज्ञाएं होती हैं ।
अचोऽन्त्यादि टि १।१।६४ ॥
अचां मध्ये योऽन्त्यः स आदिर्यस्य
तत् दिसंज्ञकं भवति।
अच् प्रत्याहार के वर्षों में से जो अन्तिम अच
है वह जिस की आदि में हो उस के साथ उस अन्त्य
प्रक्षर की टि " संज्ञा होती है ।
तस्मादित्युत्तरस्य १।१।६७॥
पञ्चमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यमक्षरान्तरेण
रहितस्य परस्य झेयम् ॥
पञ्चमी के द्वारा निर्दिष्ट जो कार्य हो यह
वर्णान्तर से रहित पर के लिये जानना चाहिये ।
तपरस्तत्कालस्य १।१। ७०॥
३
संस्कृतशिक्षक। mental per तपरो यस्मात् स च तात्परश्च समकालस्यैव संज्ञको भवति ॥ जिस से तकार परे हो अथवा जो तकार से परे असो वह अपने ही काल का ग्राहक हाता है । उच्चैरुदात्तः १ १ २ । २६ ॥ उच्चैरुपलभ्यमाना योच स उदात्तसंज्ञकः भवति जो स्वर ऊंची आवाज़ से घोला जाय उसे "उदात्त' कहते हैं। नीचैरनुदात्तः १ १२॥ ३० ॥ नीचरुपलभ्यमाना याच स अनुदात्तसंज्ञकोभवति जो स्वर नीची आवाज से बोला जाय उस को अनुदात्त' कहते हैं । समाहारः स्वरितः १ । २।३१ ॥ उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मी यस्मिन्समाहयेते स अनुदात्तसंज्ञको भवति जो मध्यम स्वर में बोला जाय अर्थात् जिम में उदात्त अनुदात्त इन दोनों धर्म का समावेश हो उस को स्वरित कहते हैं। तस्यादिप्त उदात्तमर्धहस्वम् १।२।३२॥ तस्य स्वरितस्यादावर्धहस्वमुदात्तं भवति परि- शिष्टं त्वनुदात्तम् ॥ वर्णधर्म
उपयोगिसूत्रसूची।
२४
उच्च स्वरित के ह्रस्व रूप का पूर्वार्ध उदात
माना जाता है, शेष भाग को अनुदान मानते हैं।
विप्रतिषेधे परं कार्यम् १।४।२॥
तुल्यबलविरोधे परं कार्य करणीयम् ॥
विप्रतिषेध अर्यात् तुल्यबलविरोध में पर को
कार्य फरमाय है।
धात्वादेः पः सः ६ । १।६४ ॥
धातारादेः पस्य सादेशो भवति ।
धातु
थे आदि में सूर्य य षकार हो तो उभ के
स्थान में दन्त्य भकार ही जाता है यथा षद् पातु
जो 'सहने के अर्थ में है उस के स्थान में
जाता है।
यो नः६।१ । ६५ ॥
धातोरादेः णो नः भवति ॥
के आदि में साकार हो तो उस के
स्थान में नकार हो जाता है । यथा-णी
। यथाणी धातु जो
'ले जाने के अर्थ में है इम के स्थान में ना हो जाता है।
पूर्वत्रासिद्धम् ८।२। १॥
सपादसलाध्यायों प्रतित्रिपाद्यसिद्धा त्रिपाद्यामपि
पूर्व प्रति परं शाख मसिद्ध ज्ञेयम् ।।
पाणिनि मुनि कृत व्याकरण में ८ अध्याय हैं
अतः उस का नाम अष्टाध्यायी है। प्रत्येक अध्याय
सद
यदि धातु
।
२०
संस्कृतशिक्षक।
में ४ पाद हैं। यह सूत्र अध्याय २ पाद का पहिला
ही सूत्र है, इस का अधिकार यहां से ग्रन्य समाप्ति
पर्यन्त जानना चाहिये । तिस में पूर्व के ॥ अध्याय
के समक्ष आगे के तीन पाद और इन तीन पादों में
भी पूर्व के प्रति पर को कार्य प्रसिद्ध समझा जाये।
॥ इति ॥
ओ३म्
अथ संस्कृतशिक्षकः।
स्वर
आ इ ई उ
ऊ ऋ
ऋ लू ए ऐ ओ औ ॥
व्यञ्जन
कवर्ग-क
चवर्ग-च
भ
टवर्ग-ट ठ
ढ
तवर्ग-त
द
पवर्ग-प
ब भ
64
म भवन
अन्तस्थ-य र
व
ह
ऊष्म-श ष
अनुस्वार--,
विसर्ग= :,
१-विना किसी अन्य वर्ण की सहायता से ही
जो नक्षर बोले जा सकते हैं उन को स्वर कहते हैं।
यथा-अ, इ, ए इत्यादि ॥
१-स्वयं राजन्त इति स्वराः ॥
२२ संस्कृतशिक्षक। वर-प्रा - सूचना-स्वरों के निम्न लिखित ४ विभाग हो सकते हैं । इन को पाठकों को विशेषतः स्मरण रखना उचित है:- मूलस्वर-म इ दीर्घस्वर संयुक्त स्वर-ए-अ+इ, अ+ई, प्रा+इ, मा+ई से-अ+ए, मा+ए, श्र+ऐ, पान-ऐ प्रोप---3, अ+ऊ, प्रा+उ, मा+ऊ औ-अ+ो,ना+ो,प्र+ौ,मा+ो पारिभाषिक स्वर-, ल पारिभाषिक दीर्घस्वर- २-जिन अक्षरों के उच्चारण में स्वरों की महा- यता पूर्णतःसावश्यक होती है उनको व्यञ्जन कहते हैं। यथा-क, प, च, ट, इत्यादि । ३-मुख के जिम अवयव से जिस अक्षर का उच्चा. रण होता है वह उस अक्षर का स्यान कहलाता है वह इस प्रकार है। स, सा, कवर्ग, कवर्ग,हकार और अनु- स्वार तथा विमर्ग का कण्ठ । इ, ई, चवर्ग य और श का तालु । ऋ ऋटवर्ग र और ष का मूर्धा । लु २-घराधीनन्तु व्यञ्जनम् । अन्धक भवति व्यञ्जनम् ॥ ३-अकुहविसर्जनी यानां कण्ठः, कगठनासिक्यमनुस्वार- मेके । घुयशानां तालुः । ऋदुरषाणां मूर्धा । लसुलमानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठी । वकारस्य दन्तोष्ठम् ।
प्रथम भाग। २३ , तथा वर्गों के तधग, ल और स का दन्त । उ, ऊ और पवर्ग का प्रोष्ठ । व का दस्त और प्रोष्ठ । ए,ऐ इन दो अक्षरों का कण्ठ और तालु । ओ, औ इन दो अक्षरों का कण्ठ और प्रोष्ठ । अनुस्वार और वर्गों के पञ्चमाक्षरों का नासिका स्थान भी है, वों के पहिले तीसरे पांचवें और अन्तस्थ प्रक्षर अल्पप्राण कहाते हैं । शेष व्यञ्जनों को महाप्राण कहते हैं । प्रथम व द्वितीय अक्षर, श ष स और विसर्ग को प्रघोष कहते हैं, अन्य सब घोष हैं । ४-अनुस्वार= स्वर के ऊपर और विसर्गः: स्वर के आगे लिखने की शैली प्रचलित है और इन का किसी अन्य स्वर के साथ योग हुवे विना उच्चारण न हो सकने के कारण इन की अयोगवाह संज्ञा है ॥ ५--अ, ए, प्रो इन तीनों अक्षरों की गुण संज्ञा । श्रा, ऐ, औ, इन तीनों की वृद्धि सजा है । एदेना:कगठ तालु । ओदौतीः कण्ठाष्ठम् । नासिकानुस्या- रस्य । अमढणनानां नासिका च । वर्गाणां प्रथमतृतीय. पञ्चमाः यणश्चास्पप्राणाः । इतरे महाप्राणाः । वर्गाणां प्रथम द्वितीयाः शषसविसर्जनीयाः भघोषा उत्तरेघोषवन्ताः ॥ ४-अनुस्वारविसौ इत्यचः परी प्रयोगशाइसंज्ञको है भवतः ॥ ५-प्रदेङ गुणः १ । १।२ अ, ए, ओ इत्यक्षराणि गुण- संज्ञकानि भवन्ति ।। वृद्धिरादेच १ । १ । १ । आ, ऐ, श्री प्रत्यक्षराणि पद्धिस जकानि भवन्ति ।
२४
संस्कृतशिक्षक।
६-स्वरोंके मुख्य तीन भेद हैं, हस्व, दीर्घ और
प्लुत । जिस के उच्चारण में एक मात्रा काल लगे
उसे हस्व, जिम के उच्चारण में दो मात्रा काल लगे
उस को दीर्घ, और जिस के उच्चारण में तीन मात्रा
काल लगे उम को प्लुन कहते हैं । व्यञ्जन अर्धमात्रिक
माने जाते हैं ॥
यथा ए ३" राम शब्द के अन्तर्गत मकार
में जो प्रकार है वह इस्व है, और "रा" के अन्तर्गत
जो " मा " है वह दीर्घ स्वर है, और जो राम को
पुकारने या चिताने को "ए" का प्रयोग किया गया
है । प्लुत अक्षर के आगे तीन का अंक
लिखने की शैली प्रचलित है।
लघु,
दीर्घ को गुरु तथा जिस
हस्थ के परे संयोग ( संयुक्ताक्षर ) हो उस को भी गुरु
कहते हैं ।
है वह चनुत
-हस्व को
६-एकमात्री भवेद्धस्खो द्विमात्रो दीर्घ सध्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो यो व्यञ्जनं चार्धमात्रकम् ।
9-हस्वं लघु १।४ । १० इखमक्षरं लघुसंज्ञकं भवति ।
संयोगे गुरु १।४ । ११ संयोगे परे इस्वमक्षरं गुरुसंशक
भवति । दीर्घञ्च १ । ४ । १२ दीर्घमक्षरं गुरुसंज्ञकं भवति ।
प्रथमभाग। २५ -जिन व्यञ्जनों के अन्तर्गत स्परों का व्य- वधान न हो उन की संयोग ( संयुक्ताक्षर ) संज्ञा है यया-क+व क। ख+य-रख्य। क+ष=( प ) क्ष, क्ष । त+र-त्र, स्व। ज+न(ज्ञ ) ज्ञ इत्यादि । ६-वर्गों की अतिशय मनिधि को संहिता अथवा सन्धि कहते हैं । यह एक पद में, धातु और उपसर्ग के योग में और समास में सर्वदा करनी पड़ती है । वाक्य में तो सन्धि करना न करना प्रयोक्ता की इच्छा पर निर्भर है; चाहे वह करे वा न करे ॥ १०-जिन २ अक्षरों का मौखिक स्थान और प्रयत्न समान हो वे २ अक्षर सवर्णसंजक कहलाते हैं। ११ नाममात्र को अर्थात् जो वस्तुतः कुछ अस्तित्व रखती हो उसे संज्ञा कहते हैं । इस का सम्बन्ध लिंग, वचन और कारक से होता है। - ८-हलो नम्तराः संयोगः १ । १। 9 अजि मरव्यवहिता हलः संयोगसंज्ञकाः भवन्ति । ल-परः सन्निकर्षः संहिता १ । ।। १०० वर्णानामति- शयितः सन्निधिः संहितासंशः भवति ॥ नित्या संहितैकपदे नित्याधातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु मा विवक्षामपेक्षते ॥ १०-तुल्यास्यप्रयत्म सवर्णम् १ । १ । १ तास्वादिस्था. नमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चैतद्वयं यस्य येन तुल्यं तौ मिथ सवर्णसंज्ञको भवतः । ऋल वर्णपोर्मियः सावरयं वाध्यम् । १९-सत्वप्रधानामि नमामि ( निरुक्त ) ॥
२६. संस्कृतशिक्षक। - Aware १२-लिङ्ग तीन हैं पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपंसक लिंग । सामान्यत: पुरुष के लिये पुल्लिंग, स्त्री के लिये स्त्रीलिंग और दोनों से विलक्षण वस्तु के लिये नपुंसक लिंग का प्रयोग होता है । यहां यह भी ध्यान रहे कि संस्कृतभाषा में प्रायः सब शब्द नियत- लिंग हैं जिनका विशेष परिचय लिंगानुशासन से होगा, जो इस ग्रन्थ में उचित स्थल पर दर्शाया जापगा; और यह लिंग केवल संज्ञा में ही होते हैं, क्रिया में नहीं होते । परन्तु हिन्दी भाषा में क्रिया और संज्ञा इन दोनों में लिंगों का प्रयोग होता है। १५-वचन भी तीन हैं । एकवचन द्विवचन और बहुषचन । जिस से एक व्यक्ति या पदार्थ का योध हो उस को एकवचन कहते हैं । जिस से दो का बोध हो वह द्विवचन है और जिस से दो से अधिक तीन चार पांच प्रादि का बोध हो वह बहु- वचन कहलाता है । इन पचनों का प्रयोग संज्ञा और क्रिया इन दोनों में होता है और कतिपय शब्द नियत- वचन हैं। ९२-स्तनकेशवती खो स्याल्लोमशः पुरुषः स्मृतः । उभयोरन्तरं यच सदभावे नपुसकम् ॥ १३-द्वप कयोस्विच करने १।४। २२ द्विस्वविवक्षायां द्विवचनं एकत्वविवक्षायां एकवषमं भवति । बहुषु बहु. बधनम् १ । ४ । २१ बस्वविवक्षायां बहुवचनं भवति ॥ --
प्रथम भाग।
१४-किसी प्रकार की चेष्टा वा इच्छा किंधा
ध्यापारको प्रथवा धातुओं के अर्थ को "क्रिया" कहो
हैं । यह तीनों लिंगों में समान रूप से प्रयुक्त होती
है तथा इस का सम्बन्ध काला और पुरुष से भी होता
है। लिंग इम में नहीं होते ॥
१५ केवल क्रिया में ही तीन पुरुष होते हैं (१)
प्रथम या अन्य पुरुष (२) मध्यम पुरुष और ( ३ )
उत्तम पुरुष । जहां "तुम वा प्राप" शब्द का प्रयोग
गुप्त अथवा प्रकट रीति मे करना उदिष्ट हो वह
मध्यम पुरुष कहलाता है। जिस क्रिया के द्वारा “मैं
घा हम शब्द का प्रयोग इष्ट हो वह उत्तम पुरुष
कहाता है अन्यत्र अर्थात् जिस के विषय में बात
हो वह प्रथम वा अन्यपुरुष कहलाता है ।
१४-का पुनः किया ? ईका ! का पुनगेहा! चेष्टा !
का पुनश्चेष्टा व्यापारः । सबंधा भवाछबदेरेव शम्दान्
ठयाचष्ट न किञ्चिदर्थजातं निदर्शयत्येवं जालीयका क्रियेति।
क्रिया मामधेयमत्यन्ता परिदृष्टा, अशषया पिमडीभूता
निदर्शयितुम् । यथाitinलु यिठमः ।
सामाघनुभा-
मगम्या । कोसाधमुभानः । इस मप साधनेष समिहितेषु
यदा पचतीत्येतति मा मन क्रिया । अथवा यया देवदत
पर भूस्खा पाटलिपुत्रे भति सा मन क्रिया । महाभाष्य
१।३ । १ । १ धातोरर्थः क्रियेतिरूपमालायाम् ॥
१५- युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थामिन्यपि मध्यमः
१। ४ । १०५ तिच्यायकारकवापिनि युष्मदि प्रयुज्यमाने-
संस्कृतशिक्षक। LAD ra राम १६-क्रियावाची भू " आदि शब्दों की धातु संज्ञा है। वे दश गणों में विभक्त हैं। उन गणों के नाम क्रमशः यह हैं:-१ झ्वादि २ अदादि ३-जुहो. त्यादि ४-दिवादि ५-स्वादि ६-तुदादि ७-रुधादि :-तनादि -क्रयादि १०-चुरादि । १७----संज्ञा धातु नादि के निमित्त जिनका विधान किया जाता है उनको प्रत्यय कहते हैं । अब किसी शब्द मागे व्याकरणशास्त्र के निय- मानुसार किमी प्रत्यय का विधान किया जाय तो उम प्रत्यय के परे होते हुए उस शब्द की 'प्रङ्ग संज्ञा होती है। जैसे . शब्द के भागे “ भिस् प्रत्यय का विधान शास्त्र द्वारा करें तो “ प्रत्यय के परे रहते शब्द की “ अंग संज्ञा होगी। प्रियज्यमाने च मध्यमपुरुषो भवति ॥शेष प्रथमः ।। ४ । १०८ मध्यनोत्तमयोर विषये प्रथमपुरुषो भवति ॥ भस्मद्युत्तमः १ । ४ । १०७ अस्मद्युपपदे ममामाभिधे ये प्रयुज्य मानेऽप्रयुज्य. मानेप्युत्तमपुरुषो भवति ॥ १६-भूषादयो धातयः १।३।१ कियाधाचिनो स्वादयो धातुमंज्ञकाः भवन्ति । भ्वाद्यदादिर्जुहोत्यादिर्दिवादिस्स्थादिरेव च ॥ तुदादिश्च रुधादिश्च तनक्रयादिषुरादयः ॥ १७-प्रतीयते विधीयत इति प्रत्ययम् ॥ यस्मात्प्रत्यय- विधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् १ । ४ । १३ यः प्रत्ययो यस्मात्क्रि. यते तदादि शास्वरुपं तस्मिन्प्रत्यये परे अङ्गसंज्ञकं भवति भिस् " राम
प्रथम भाग।
२४
D
१८-~जो संज्ञा विषयक प्रत्यय ( सुप् ) और
क्रिया विषयक प्रत्यय ( तिङ् ) से युक्त हों उन शब्दों
की .
पद
संज्ञा है। विना
पद " बनाये वा-
क्यादि में उनका प्रयोग नहीं किया जा सकता ।
१८-~-शब्द के अन्तिम अक्षर से पहिले वर्ण की
उपधा " संज्ञा है। जहां किसी अक्षर के स्थान में
कोई “ आदेश " किया माता है वह उस अक्षर के
स्थान में ही होता है । अर्थात् आदेश का विधान
जिस प्रक्षर के स्थान में होता है उस अक्षर का लोप
हो जाता है। " के विधान में उस अक्षर
का लोप नहीं होता ॥
प्रागम
amme
क्रिया।
२०--क्रिया सम्बन्धी धातुओं एवम् प्रत्ययों के
दो विभाग हो जाते हैं । १--परस्मैपदी और २..
१८-सुप्तिहन्तं पदम् १।४। १४ मुबन्तं तिहुन्तं च
पदसंज्ञक अधति । अपदं म प्रयुञ्जीत ।
१६-भलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा १ । १ । ६५ अन्त्यादलः यः
पूर्वा वर्णः स तपधा संकः भवति । प्रकृतिप्रत्ययोपघात.
पूर्वक यस्यादेशोभवति स आदेशः। यत् प्रकृतिप्रत्यगा.
नुपघातन आगच्चति म आगमः ।
२०-वरितशितः कत्रभिमाये किया फरले १।३ । ७२ ॥
स्वरित तोमित धातारात्मनेपदं स्यात् कर्तृगामिनि
३० संस्कृताशक्षक। an प्रात्मनेपदी । परन्तु काई उभयपदी भी हैं । इन का प्रयोग कहां किम प्रकार होता है इस के विशेष नियमों का वर्णन तो अन्यत्र करेंगे. तथापि नवीन विद्यार्थियों के समझौते के लिये यहां इतना लिख देना आवश्यक समझते हैं कि जहां क्रिया का फल सपने में आर्थात् कर्ता में जा घहां आत्म- नेपद होता है, अन्यत्र परस्मैपद जानना चाहिये । जिम पदके धातु हों तदनुसार ही धातुओं में प्रत्यय युक्त होते हैं । यह सामान्य नियम है ॥ २१--परस्मैपदी और प्रात्मनेपदी संजक प्रत्यय निम्नलिखित हैं परस्मैपदी प्रत्यय । द्विधधन बहुवचन प्रथमपुरुष নি क्रियाफले॥शेषा त कतरि परस्मैपदम् १ : ३ । ७८ ॥ आरम. मेपदयोगाद्वानो: कतरि परस्मे पद भवति ॥ २१-लिप्तमझिमिप्यस्यमिपत्रम् मस्तासांझपासा पाव मिह पहिमङ्३ि । ४ । ३ ।। इमेष्टा दलादेगाः भवन्ति । यः परस्मैपदम् ।। ४।६ ॥ लादेशा:परस्मैपद संसाः भवन्ति । कानावारमनेपदम् १४॥ १०० ॥ सङ् प्रत्याहारः शामच कामचो आत्मनेपदसंचा। भवन्ति । टन अस्मनेपदाना टेरे ३ । ४ । १९ ॥ टिनोल. स्यात्नेपदानां टेरेश्वं भवति। थाम: मे ३।४.८०॥ो. लस्य चासः मे पति । भालोहितः 9 ।२।८१ ॥ भात: परस्य हितमाकारस्य " " भवति ॥ एकवचन प्रथम भाग। य मध्यमपुरुष सि यस् उत्तमपुरुष मि वस मम् आत्मनेपदी प्रत्यय । द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष ते (त) आते ( याः ) अन्ते ( इ ) मध्यमपुरुष से (माताम्) भाये (माथाम्) ध्ये ( वहि ) अन्य पुरुष ए (अन्त ) बहे ( ध्वम् ) महे (महि) एकवचन सूचना-प्रात्मनेपद सम्बन्धी प्रत्ययों के जो रूप कोष्ठान्तर में स्थित हैं, वे सूत्रानुसार प्रत्ययों के असली रूप हैं । इन रूपों का प्रयोग लङ, लिङ, लुङ और लङ् इन ही लकारों में होता है, अन्यत्र जो रूप कोष्ठ के बाहर हैं उनका प्रयोग होता है लङ् आदि के पर्थ की जहां प्रावश्यकता होगी वहीं इनका अर्थ लिखा जायगा। यहां इनके अर्थ की कोई पावश्यकता नहीं॥ भ्वादिगणीय परस्मैपदी धातु भू-होना वद-कहसा स्मृ-याद करना दह-जलना जि जीतना मर्च-पूजना द्रु-गीला होना नीम्लेजाना क्षिनष्ट होना चर खाना, चरना पन्व-पकाना संस्कताशक्षक। २२ धातुओं और २१ वें प्रक्रम में कहे प्रत्ययों के बीच में शब्दमाधनार्थ कुछ और प्रत्यय लाने पढ़ते हैं। उन प्रत्ययों को 'विकरण' कहते हैं। सो इम प्रकार है। भ्वादिगण का विकरण "" है। अदादि एवं जुहोत्यादिगण धिकरण रहित हैं परन्तु जुहोत्यादिगण में धातु को द्वित्व हो जाता । इसी ही प्रकार दिवादिगण में " य " स्वादि में "नु" तुदादि में 'भ रुधादि में न ' तनादि उ' क्यादि में 'ना' और ना' और चुरादिगण में • विकरण लाना पड़ता है । यहां यह भी ध्यान रहे कि यह विकरण केवल वर्तमान काल ( लट् ) विध्यार्थकरूप ( लोट, लिङ् ) और अन- द्यतन भूतकाल ( लङ) में ही लाये जाते हैं अन्यत्र उक्त विकरणों का प्रयोग नहीं करना पड़ता ॥ - प्रय धातूनां संस्कृतपाठः-मू सत्तायाम् । हुपचष् पाके । अर्थ पूजायाम् । वद व्यक्तायां वाचि । दह भस्मोकरणे । द्रु गती द्रवणे च । स्मृ आध्याने । जि जगे । णी मापणे । क्षि क्षये। घर अक्षण ॥ २२-फर्तरि शप ३ । १ । ६८ कर्बर्थ सार्वधातुके परे शप धिकरणो भवति । भदिप्रतिभ्यः शपः २। ४ । ७२ लुक भवति । दिवादिभ्यः श्यन् ३ । १ । ६ दिव् इत्येवमादिभ्यो धातुभ्यः श्यन् विकरणो भवति। जुहो- त्यादिभ्यः पलुः २ । ४ । ७५ शपः प्रलु : भवति । लौ ६।१। १० लौ परे धातोर्ट्स अवतः । स्वादिभ्यः सूनुः ३ । १ । ७३ धातोः प्रथम भाग। - ए उ, ऊ" " भवति ॥ तुदा- २३ -जिस धातु का अन्तिम स्वर एवम् उपधा में ह्रस्व अथवा दीर्घ इ, उ, ऋ में से कोई अक्षर हो तो उस के स्थान में क्रमशः गुण हो जाता है । अर्थात् 'इ, ई के स्थान में " एवम् के स्थान में “ो " हो जाता है। इसी ही प्रकार ऋ' के स्थान में 'अर्' होता है, परन्तु उपधा में ह्रस्व स्वर के होने पर ही गुण होगा । यथा-जि-+ (२२)+ तिजे ( २३ )+अ+ति । नी+ ( २२ )+त:=ने ( २३ )+अ+तः । द्रु+न ( २२ ) मुञ् " इत्येवमादिभ्यो धातु यः श्नुः दिभ्यः शः ३ । १ । ७७ “तुद" इत्येवमादिभ्यो धातुभ्यः शः भवति । रुधादिभ्यः श्नम् ३ । १ । १८ “रुधिर इत्येष मा- दिभ्यो धातुभ्य: "श्नम् " भवति ॥ तनादिकम्य उः ।१। इत्येवमादिभ्यो धातुभ्यः कमश्च उ प्रत्ययः स्यात् ॥ धादिभ्यः ना ३ । १ । ८१ शुक्रोम् इत्येल- मादिभ्यो धातुभ्यः श्ना प्रत्ययो भवति ॥ सत्यापपाशरूप- वीणातूलश्लोकसेनालोमस्वचधर्मवर्ण चूर्णचुरादिभ्योणिया २५ सत्यादिभ्यो णिच् भवति ॥ सनाद्यन्ता धातवः३।१।३२ सन् क्यच काम्यच क्यङ् क्या क्लिप णिच् यङ् यक आय ईयङ् णिङ् एते सनादयः । समादयो प्रत्यया अन्ये घेषाने प्रत्ययसहितधातुसंज्ञकाः भवन्ति । पुगन्तलघूपधस्य च कर्तरि शप् ॥ २३-सार्वधातुकार्द्धधातुकयोः ७ । ३। ८४ सार्वधातुके आधंधातुकेच प्रत्यये परे हगन्तस्याङ्गस्य गुणो भवति ॥ पुग- गतलघूपधस्य ध । ३ । ८६ पुगन्तस्य लघूपधस्य धाश्येको गुणः स्यात् सार्धधातुकार्धधातुकयोः ।। ५ संस्कृतशिक्षक। +अन्ति-द्रो ( २३ )++अन्ति । भू+( २२ )+मि- भो (२३ )+म+सि । स्मृ+ (२२)+यस्-स्मर (२३)++थस् ॥ इत्यादि । २४-पदान्त स्" के भागे कोई प्रक्षर न हो तो उस के स्थान में " र " हो जाता है फिर उस र" का विसर्ग बन जाता है यथा-बद्+ (२२)+तस-वद्+म (२२)+त: (२४)-वदतः । स्मृ+अ ( २२ )+थस्-स्मर ( २३ )+म +यः (२४) स्मरथः ॥ २५-संयुक्त स्वरों के पश्चात् कोई स्वर हो तो संयुक्तस्वरों के स्थान में क्रमशः नय अव आय भाव हो जाता है ॥ यथा-जे+म+ति-नय+म+ति-जयति । भो+ अ+सि भव+अ+सि भवसि ॥ २६-अपदान्त प्रकार से गुण परे हो तो पर- रूप एकादेश होता है। २४-समजुषो रुः ८।२। ६६ पदान्तस्यमस्थ मनुष्. शब्दस्थ रुः स्यात् ॥ खरबमानयोः विजनीयः ।। १५ खरि भवसाने च पदान्तस्य रस्य विसर्गः स्यात् ॥ २५-एचोग्यवायावः ६।१।७८ ॥ एषः क्रमात् अय भव भाय आव एते अचि परे भवन्ति ।। २६-प्रतो गुणे६।१।९७ भपदान्तादतोगुणे परतःपरम्प. मेकादेशः भवति । सामान्यशावतो नूनं विशेषो बलवान् मवेत । परेणपूर्वयाधीवा प्रायशोदृश्यतामिदम् । विशेषा- विशेषयोः विशेधे कार्यसम्प्रत्ययः । महामाध्ये॥
प्रथम भाग।
३५
यथा-" दह+अ+अन्ति " यहां पर “ अन्ति
में जो प्रकार है उस में पहिला ( २२ वें प्रक्रम
से आया हुमा ) अकार मिल जाता है ।
अभिप्राय यह है कि यहां ३० वें प्रक्रम के नि-
यमानुमार दीर्घ हो जाता,परन्तु यह २६ वां प्रक्रम उस
नियम का अपवादरूप है। क्योंकि वह नियम मामान्य
( माधारणतया सब ठौर काम में आजाने वाला )
है और यह विशेष । महाभाष्यकार ने कहा है
कि सामान्य ( मामान्यतया सब ठौर लगने वाले )
नियमों में विशेष ( मुख्य २ दशाओं में प्रयुक्त होने
वाले ) नियम बलिष्ठ होते हैं जिन का वर्णन
'न ग्रन्थ में
कहीं पर पूर्व और कहीं पर सामान्य नियमों से पश्चात्
वर्णन किया हुप्रा होता है ऐसा ध्यान में रख बुद्धिमान्
को सर्वत्र सङ्गति मिलानी चाहिये । अतः यह विशेष
नियम होने से यहां पर"दह +4+अन्ति-दह + अन्ति
दहन्ति " ऐसा रूप बना ॥
२७-अन्तस्थ प्रक्षर वर्गों के पांचवें प्रक्षर एवं
झकार, भकार में से कोई अक्षर जिस सुप् वा तिङ्
सम्बन्धी प्रत्यय के प्रादि में है यदि उस प्रत्यय के
पूर्व प्रकार हो तो उस प्रकार
प्रकार के स्थान में दो
प्राकार हो जाता है।
२७-प्रतो दोघी यगि ७ । ३ । १०१ मतोङ्गस्य दीर्घः
स्यात यजादौ सार्धधातुके परे । सुपि च ७।३ । १०२
यत्रादी सुपि परे अतोङ्गस्थ दीर्घो भवति ।।
-
संस्कृतशिक्षक। - यथा-वद्+अ+मि वद्+मा+मि वदामिार्च + अ+वम अच्+आ+व: अर्चावः । पच+अ+मस-पच+ मा+साम्पचामः ॥ । सूचना-हमने जो २ उदाहरण दिये हैं वह सब वर्तमान काल सम्बन्धी क्रिया के ही हैं। विद्यार्थियों के सुभीते के लिये “भू" धातु के रूप साध कर नीचे लिखेंगे। अध्येताओं को उचित है कि उस ही प्रकार उक्त मब नियमों को लक्ष में रख अन्य धातुओं के भी रूपों को सिद्ध एवं कराठ करलें जिस से पूर्ण अभ्यास होजावे ॥ परस्मैपदी “ भू” रूप वर्तमानकाल धातु के एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष भवति भवतः भवन्ति (२१,२२,२३,२५) (२१,२२,२३,२५,२४) (२१,२२, २३,२५) वह होता है वे २ होते हैं वे सब होते हैं मध्यमपुरुष भवसि भवथ भवथः (२१,२२.२३,२५) (२१, २२, २३,२५,२४) (२१,२२,२३,२५) तुम होते हो, तुम २ होते हो, तुम सब होते हो उत्तमपुरुष भवामि भवावः भवामः (२१,२२,२३,२५,२७) (२१,२२,२३,२५,२४,२७) (२१,२२,२३,२४,२५,२७) मैं होता हूं, हम २ होते हैं, हम सब होते हैं प्रथम भाग। २७ गर्ज गरजना करो। * भ्वादिगणीय परस्मैपदी धातुसूची वस्-रहना खाद्-खाना व्रज वज-जाना नटन्नाचना त्यज छोड़ना तप-दुखी होना तज-धमकाना भाषानुवाद पचामि स्मरन्ति भवति तपसि तर्जति पचतः वदति जयसि अर्चन्ति गर्जामि वदमि दहथः द्रवथः व्रजतः नटमि स्मरथः त्यजावः नयतः द्रवामः क्षययः जयामि वसथः नयावः मैं होता हूं खादाव: संस्कृत बनाओ। मैं धमकाता हूं वह पकाता है हम सब जीतते तुम कहते हो हम दो गरजते हैं हम सब छोड़ते हैं वह ले जाता है वे सब जलते हैं वे सब नाचते हैं धातुनां सस्कृतपाठः-वस निवासे । धज व्रा गलौ । त्य हानी । तप संतापे । खाटू भक्षणे । नट नती । गर्ज शब्दे । तर्ज भसने॥ -- संस्कृतशिक्षक। mari तुम सब गीले होते हो वे दो नष्ट होते हैं हम दो जाते हैं तुम खाते हो तुम दो रहते हो तुम सब पूमते हो वे दो याद करते हैं तुम दो कहते हो को सुप संज्ञा २८-संज्ञाओं को कारकों में परिणत करने वाले किंवा विभक्तिसूचक " आदि प्रत्यय निम्न- लिखित हैं। इन का प्रयोग धातु और प्रत्ययों को छोड़ कर अर्थवान् शब्दों एवं कृदन्त तद्धिप्त और समास में सर्वदा किया जाता है । इन ही २१ प्रत्ययों सुप् " कहते हैं । विभक्तिसूचक प्रत्यय विभक्तयः एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् औ प्रम द्वितीया अम् प्रौ अस्. २८-स्वीजसमौटछष्टाभ्यांभिम उभ्याम्पस मियांभ्यम् हुमोमामयोस्सु, ४ । ङयन्तादाबन्ता- स्प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्यया भवन्ति । अर्थवदधातु- रप्रत्ययः प्रातिपदिकम् १ । २ । ४५ धातु प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च बजयित्वा अर्थवत शब्दरूपं प्रातिपदिक संज्ञकम् भवति॥ कृत्तदिनसमासाश्च १।२ । ४६ कतद्धितान्ती समामा प्रातिपदिकसंघकाः भवन्ति ॥ प्रथमा स प्रथम भाग। ३३ पा भिम भ्यस. भ्याम् भ्यस. प्रस. मोदक-लड्डू तृतीया भ्याम् चतुर्थी ए भ्याम् पञ्चमी षष्ठी ओस आम् सप्तमी छ श्रोस अकारान्त-पुल्लिङ्ग-शब्दसूची। घोड़ा छाग-बकरा युवक-जवान अगद-दवा जनक-पिता वानर-बन्दर अग्रज-बड़ा भाई दक्ष-होशियार वृष-बैल प्राप्त भोतबिर नर-मनुष्य कटाह-कढ़ाह नट-नट वृद्ध-बुढा मृप-राजा विप्र-ब्राह्मण मूर्ख बेवकूफ पण्डित-विद्वान् शिष्य विद्यार्थी गोप-ग्वाला सूद-रसोइया कोश-स जाना भिक्षुक भिखारी सिंह-शेर चन्द्र-चांद भृत्य-नौकर मुत-बेटा २८-हस्व वा दीर्घ प्रकार से परे कोई संयुक्त स्वर हो तो पूर्व पर के स्थान में तुल्यतम वृद्धि एका- देश होजाता है। अभिप्राय यह है कि यदि भ धा प्रा से परे ए भयवा ऐ हो तो पूर्वपर के स्थान में 'ऐ" इस ही प्रकार "ओ" बा "मी" इन अक्षरों २-पद्विरेचि ६।१।८८ भवादेषि परे वृद्धिरेका. देशः भवति॥ बाल-बालक पाठ सबक ४० संस्कृतशिक्षक। "अम् में से कोई अक्षर परे हो तो पूर्वपर के स्थान में "औ " होजाता है । यथा-राम+औ-रामौ॥ ३०-संयुक्त स्वरों को छोड़ अन्य स्वरों से यदि सजातीय उन ही स्वरों के हस्व वा दीर्घ रूप परे हों तो पूर्व पर के स्थान में उन स्वरों का ही दीर्घ रूप आदेश होजाता है । यथा--नर+अम् नराः ( ३०, २४ ) ॥ ३१-सूल स्वरों एवं उन के दीर्घ रूपों से ( एकवचन सम्बन्धी ) प्रत्यय परे हो तो उस (अम्) प्रत्यय का प्रकार पहिले स्वर में मिल जाता है अर्थात् अम् प्रत्यय के प्रकार का उपयोग नहीं होता किन्तु वह लुप्त होजाता है । यथा-अश्व+अम्-अश्वम् ॥ ३२-जब मूल स्वरान्त पुल्लिङ्ग शब्दों से परे मस " विभक्ति हो तो उस अस ३०-अकः सवर्ण दीर्धः ६ । १ । १८१ अकः सवर्णधि परे पूर्वपरयोः दीर्घ एकादेशः भवति ॥ ३१-अमि पूर्वः ६ । १ । १०७ अकोम्यधि पूर्वरूपमेकादेशः भवति । ३२-प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ।। १ । १०२ अकः प्रथमाद्विती- यपोरधि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः भवति ॥ तस्माच्छसो नः पुसि ६।१ । १०३ पूर्वसवर्णदीर्घात्परो यशसः सः सस्य नः स्यात् पुसि. फिर " द्वितीया की " - प्रथम भाग। ४१ प्रत्यय के प्रकार के स्थान में सूलस्वरान्त शब्द के अन्तिम स्वर को ही दीर्घ रूप प्रादेश होजाता है, फिर इस प्रकार दीर्घ हो जाने पर जो प्रत्यय का " शेष रहता है उस को "न्" होजाता है। यथा-राम+अस-रामान् । अश्व+असखान् ।। विभक्तियों का प्रयोग। ३३-कर्ता उसे कहते हैं जो क्रिया को स्वतन्त्रता से सम्पादन करता है या प्रेरणा करके दूसरे से कर- धाता है । ऐसे प्रयोजक कर्ता को हेतु भी कहते हैं । ३४-जहां पर शब्द का जो अर्थ है उस ही को दर्शाना हो पा लिङ्गमात्र ( कैपल पुल्लिङ्ग वा स्त्री- लिङ्ग अथवा नपुंसकलिङ्ग) जतलाना हो वा पचन मात्र ( एक, द्वि, बहु ) बताना हो अथवा परिमाण ही प्रकट करना हो एवम् कर्ता वा कर्म अभिहित अर्थात् जहां क्रिया का फल कर्ता वा कर्म में ही जावे वहां प्रथमा विभक्ति होती है। ३३-स्वतन्त्रः कर्ता १। ४ । ५४ क्रियायां स्वातम्येण विवक्षितोऽर्थः कर्तृ संज्ञाभवति ॥ सत्प्रयोजको हेतुश्च १।४। ५५ क: प्रयोणको हैतुसंजः कर्तृसंज्ञश्च भवति । ३४-प्रातिपदिकार्थ लिङ्गपरिमाणवधनमात्रे प्रथमा २॥ ३ । ४६ प्रातिपदिकार्यादिमात्रे प्रथमा भवति । अभिहिते कर्तरि च॥
संस्कृतशिक्षक।
मात्र में
।
॥
यथा-प्रर्यमाघ में "धर्मः ।
। लिंगमान में
नरः" (पु०), धनम् (न०), कन्या ( स्त्री० )। वचन
प्रश्वाः सिंहः मुतौ। परिमाणमात्र में
"द्रोणः । अभिहित कर्ता और कर्म में 4 शिष्यः
वदति क्रियते कटः
३५-कर्ता का जो इष्टतम हो अर्थात् जिम को
क्रिया के द्वारा सिद्ध करना चाहे वा करे एवम् क्रिया
के द्वारा कर्ता का जो अनीप्सित ( न चाहा हुवा )
हो. इस ही प्रकार जो अकथित ( दुह, याच आदि
धातु जिन में अपादानादि अविवक्षित ) हो उस
कारक की कर्म संज्ञा है।
३६-( क ) अनुक्त अर्थात् क्रियाफल मे रहित
कर्मकारक में एवम् काल और मार्गवाची शब्दों के
अत्यन्त संयोग में द्वितीया विभक्ति होती है।
यथा-नरः ब्राह्मणाम् अर्चति-मनुष्य ब्राह्मण को
पूजता है। यहां ब्राह्मण को पूजना कर्ता का इच्छित
३५-फतुरीप्सिततमं कर्भ १ । ४ । ४६ फतुः क्रियया
यदिष्टतमं गत् कर्मकारक संज्ञकं सवति॥तथायुक्तं धानीप्सितम्
१ । ४ । ५२ कर्तु: क्रिपया थदनीमिततमं तरकारकमपि
कम संतकं भवति ॥ अकथितं च १ । ४ । ५१ प्रकथितं च
यत्कारकं सत्कर्मसंतं भवति ।
२६-कर्मणि द्वितीया २ । ३ । २ अनुक्त कर्मणि द्वितीया
भवति ॥ कालाधनोरत्यन्तसंघोगे २।३ । ५ काणाध्यनोः
अत्यन्तसंयोगेऽपि द्वितीया भवति ॥
प्रथम भाग। ३ कार्य है। चौरान् पश्यति चोरों को देखता है। कण्ट- कान् लंघयति-कांटों को लांघता है। यहां चोरों को देखना कांटों को लांघना कर्ता का इच्छित नहीं, परन्तु संयोगवश देखना और कांटों को लांघना पड़ा, अतः यह कर्ता का अनिच्छित कार्य है। बालकम पन्यानम् पृच्छति-लड़ के से मार्ग पूछता है । शिष्य धर्ममनुशास्ति-शिष्य को धर्म का उपदेश करता है । यहां बालक शिष्य शब्दों में अन्य कारक अायत हैं । इस प्रकार इच्छित, अनिच्छित, और अकथित कमकारक में परिगणित होकर द्वितीया विभक्ति के ग्राहक हुए हैं । मासमधीतोनुवाकः एक महीने तक लगातार अनुवाक पढ़ा । क्रोशं कुटिला नदी- १ कोश तक नदी बराबर टेढ़ी है। यहां समय और मार्ग के अत्यन्त संयोग में द्वितीया विभक्ति हुई है। ( ख ) धातु भी तीन प्रकार के होते हैं १- अकर्मक ( २ ) सकर्मक और (३) द्विकर्मक-लज्जा ख) लः कर्मणि च भावे चा कर्म के भ्यः ३ । ४ । ६ क ।। सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च म्यरकर्मकेभ्योसावेकतरिच ॥ समासत्तास्थितिजागरणं, वृद्विक्षयमय जीवित्तमरणम् । शयमको हारुधिदीप्त्यर्थे, धातुगणनगम म माहुः दुपियाचिकचिमति शिक्षिरित्रानुपयोगनिमित्तमपूर्ववियो। अधिशासिगुणेन च यत्सयते तदकोर्तितमा चरितं कविता । मोव शोहरतेश्चापि गत्ययोगांनषेधक, द्विकमकेष ग्रहणं द्रष्ट व्यमिति निश्चयः । विपरीतन्तु यस्कर्म तस्करून कवयो विदु संस्कतशिक्षक। सत्तादि अर्यवाले अकर्मक धातु वह हैं जिन के साथ वाक्य में कम का योग नहीं होता । जैसे नृपः जागर्ति-राजा जगता है । यहां जगना रूप क्रिया का कर्मकारक में रूप नहीं होता । सकर्मक धातु वह है, जिन के साथ कर्म का योग होता है। यहां यह भी ध्यान रहे कि देश काल (समय) भाव ( प्राशय वा गुण ) एवम् अध्वगन्तव्य ( मार्ग- गन्तव्य ) के अर्थ में अकर्मक धातु भी सकर्मक हो जाती है। यथा "नृपम् जागर यति-राजा को जगाता है " यहां जगाना सकर्मक हो गया। नी, वहि, हर, एवम् गत्यर्थक धातुओं का ग्रहण द्विकर्मक में होता है अर्थात् इन धातुओं के योग में दो २ कर्म भी हो जाते हैं । कोई विद्वान् ईप्सिततम से भिन्न जो कर्म है उस की कलम संज्ञा करते हैं। अर्थात् जिम में कर्म संज्ञा के सब काम नहीं किये जाते, किन्तु द्विती- यामात्र की जाती है; अथवा जिस किसी वाक्य में लाजा, सत्ता, स्पिति, जागरण, वृद्धि, क्षय, भय, सोधन, मरण, शयम, क्रीडा, रुषि और दीप्ति इन भयों के धातु अकर्मक होते हैं । दुइ, याच, रूध, प्रच्छ, भिक्ष, चिन, अब, शाम् इन धातुभों के उपयोग के निमित्त जो भपादामादि कारकों से कुछ न किया गया हो तो सस को मकथितं च "सूत्र से कर्मसंज्ञा होती है ॥ कालभा. बाचगन्तव्या कर्म संसाधकर्मणाम् । देशश्षाकर्मणां कर्म, संजो भवतीति वक्तव्यम् ॥.
प्रथम भाग। एकवचन कर्म का कार्य हो उस के अतिरिक्त जो अन्य अप्र- धान होता है उस की कल्म संज्ञा है । जैसे भारं वहति ग्रामम् गांव को बोझा लेजाता है । यहां भार शब्द में तो कर्म पूर्णतया लक्षित है, परन्तु ग्राम में भी द्वितीया हुई, प्रत. इस की कस्म संशा है । अकारान्त पुल्लिंग नर शब्द द्विवचन बहुवचन नरः २८,२४ नरौ २८,२८ नराः २८,२८,२४ १ मनुष्य २ मनुष्य बहुत से मनुष्य द्वितीया नरम् २८,३१ नरौ २८,२८ नरान् २८,२८,३२ १ मनुष्य को, २मनुष्योंको, बहुतसे मनुष्योंको अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दसूची। अनूचान-महाविद्वान् इतिहास तवारीख अध्यापक-पण्डित इन्दुर चूहा अंश हिस्सा अत्ताप-दुःख प्रयमा . ----- उपद्रव-विघ्न आतुर रोगी प्राम्र-प्राम उपकार र भलाई आतंक रोग, भय उपचार-उपाय प्रावेदक-सायल, निवेदक एण-मृग साकाश-प्रासमान कृष्ण-किसी का नाम कंकाल अस्थिपञ्जर कठेर-दरिद्र कंटक-कांटा गज-हाथी खग-पक्षी गद-विध ४६ संस्कतशिक्षक। कण-कान चर्व चवना, रक्ष-पालना हल-जोतना चुप-चूमना अपूप-पूषा चौर-चोर कर-हाथ राम किसी का नाम शिव-ईश्वर काक-कौवा नददरिया कूप-कूप्रा भ्वादिगणीय परस्मैपदी धातुसूची* । पार्ज,सर्ज-इकट्ठा करना मूष--चोरना भृन्भरना, रखना एज-कांपना धुन्धारना लज-भूनना मथ-मथना याच-मांगना वट लपेटना हम हंसना खन् खोदना ग्ल-ग्लानि करना मलै- म्ले-मुरझाना ध्यै-सोचना उदाहरण। अश्वः व्रजति घोड़ा जाता है । बालको नयतः दो लड़के ले जाते हैं । पण्डिताः जयन्ति * अजषर्ज अमने । एज कम्पने । मजालनि भर्जमे। घट वेष्टने । घर्ष भदने । रक्ष पासाने मुष स्तेये बिलोहने । टुपम उगिरणे । म भरणे । धन धारणे । दुपाप या आयाम् । खनु अवदारणे । ग्ले वर्षक्षये । मले मलाने । ध्ये चिम्सायाम् । चष पाने । बल विलेखने । इसे इसने ॥ .. घम-उगलना
प्रथम भाग।
पण्डित लोग जीतते हैं। नरः वृषम् नयतिसादगी
बैल को लेजाता है । मोदको नयामि मैं दा लड्डुओं
को लेजाता हूं। जनकः सुतान् तजति-पिता पुत्रों
को धमकाता है।
भाषा बनाओ।
शिष्याः ब्रजन्ति । वृषौ चरतः । मूर्खः त्यजति ।
वृद्धौ वदथः । सुताः वदन्ति । नटाः नटन्ति । सिंहः
गर्जति । चौरा: क्षयन्ति । ब्राह्मण: जयति । सुतः
भवति । भृत्यः खादति । पाठम् स्मरावः । बालान्
तर्जामि । मोदकान् खादामः । कोशम् नयम्ति । सूदः
अपूपान् पचति । सूपम् पचामि । नृपः चौरम्
तर्जति । वैद्यः
: प्रगदम् नयति । शिष्याः वेदम
स्मरन्ति । ब्राह्मणाः शिवम् अर्षन्ति । युवक: नर्यात
भृत्यम् । जनकः मुतान् नयति ॥
संस्कृत बनाओ।
भिखारी जाते हैं । मूर्ख दुःखी होते हैं। राम
वसता है। दो चोर जाते हैं । बेटा पूत्रों को खाता
है । रसोइया जलता है। नौकर खजाने को ले जाते
हैं । घोड़े चरते हैं। बन्दर जाते हैं । शिष्य पाठ
को याद करते हैं । मैं आम चूसता हूं । कृष्ण
ग्रामों को
चूसता
The
संस्कृतशिक्षका 40 गण-गिनना परस्मैपदी धातुसूची*। दिवादिगणीय धातु चुरादिगणीय धातु नश-नष्ट होना कथकहना प्रस्-डरना रच-बनाना शम् फेंकना स्पृह-चाहना तुष-प्रसन्न होना गुप-घबड़ाना प्रथ=प्रख्यात करना क्रुध-क्रोध करना मृग-ढूढना तपतृप्त होना भूष-सजाना द्रु-द्रोह करना लक्षन्देखना,निशाना लगाना ( मारने की इच्छा) सूचना-हम २२वें प्रक्रम में बतला चुके हैं कि दिवादिगण का विकरण “ का विकरण प्रय " है उक्त धिकरणों के योग से उक्त गणों के धातुओं के रूपों को बना लेना विद्या- र्थियों को उचित है। यथा-नश+य+ति-नश्यति । कथ्+अय+ति- कथयति ॥ य • और चुरादिगण *धातुपाठः-श भदर्शने । त्रसी उद्वेगे। अमु क्षेपणे । तुष प्रीतो । गुप व्याकुलत्वे । क्रुध क्रोधे । तृप प्रोणने दुह जिघांसायाम् ॥ कथ वाक्यप्रबन्धने । रथ प्रतियत्ने । स्पृह ईप्साय म्। गण संख्याने । प्रथ प्रख्याने। मृग अन्वे. पणे । भूष अलंकरणे। लक्ष आलोचने ॥
प्रथम भाग। के रूप। तुम सब बनाते ही मैं बनाता है दिवादिगणीय “तुष" धातु के रूप । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमपुरुषं सुष्यति २१, २२ तुष्यतः २१,२२,२४ तुष्यन्ति २१,२२,२५ वह प्रसन्न होता है वे दो प्रसन्न होते हैं वे सब प्रसन्न होते मध्यमपुरुष तुष्यसि २१,२२ तुष्यथ:२१,२२,२४ तुप्यध २१,२२,२४ तुमं प्रसन्न होते हो तुम २ प्रसन्न होते हो तुम सब प्रसन्न होते हो उत्तमपुरुष तुष्यामि २१,२२,२७ तुप्यावः२१,२२,२७,२४तुष्यामः२१,२२,२७,२४ मैं प्रसन्न होता है हम दो प्रसन्न होते हैं हम सब प्रसन्न होते हैं चुरादिगणीय “ रच" धातु एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष रचयति २१, २२ रचयतः २१,२२,२४ रचन्ति २१, २२ वह बनाता है वे दोनों बनाते हैं। वे सब बनाते हैं मध्यमपुरुप रचयसि २१, २२ रचयथ: २१,२२,२४ रचय २१, २२ तुम बनाते हो तुम २ बनाते हो उत्तमपुरुष रचयामि२१,२२,२७रचयावः३१, २२,२७,२४रचयामः२१,२२,२१,२४ हम २ बनाते हैं। वाक्यों के उदाहरण । वृद्धौ तुष्यतः = २ बूढ़े प्रसन्न होते हैं। चौरा: न- श्यन्ति चोर नष्ट होते हैं । अध्यापकः कथयति पाठक कहता है । रामः त्रस्यतिराम डरता है। मूर्खाः क्रुध्यन्ति मूर्ख क्रोध करते हैं । यानरान् गण- यति बन्दरों को गिनता है। अगदम् रचयति प्रो. षधि बनाता है । भिक्षुकः अपूपम् पश्यति भिखारी पूवों को देखता है । जनकः सुतम् भूषयंति-पिता पुत्र को सजाता है। बालकः मोदकान् अस्यति= लड़का लड्डुओं को फेंकता है । युवक: कृष्णम् मृग- यति-जवान कृष्ण को ढूंढता है । चौरा: गुप्यन्ति- चोर घबड़ाते हैं। हम सब बनाते हैं 9 संस्कतशिक्षक। dave । भाषा बनाओ। नरः गुप्यति। रामम् मृगयसि । भिक्षुकाः अस्य- न्ति । भृत्यान् गणयामि। ब्राह्मणाः प्रथयन्ति । शिष्यान् लक्षयामः । सूपः मृगयति । वैद्यः मोदकान् गणयति। नटी कथयतः । सूर्खः सुतम् भूषयति । नृपाः तुष्यन्ति। नृपः कोशम् लक्षयति । सूदः सूपम् रचयति । रामः वृषान् मृगयति । अश्वौ मृगयावः ॥ संस्कृत बनाओ। घोर देखता है । मनुष्य प्रख्यात करता है। नौकर बनाता है । बेटे कहते हैं । प्राध्यापक घोड़ा ढूंढता है । जवान क्रोध करता है । लड़के को सजाता हूं। बुड्डा घबड़ाता है । रमोइये को ढूंढता हूं। मैं वानरों को गिनता हूं । राजा शेर को देखता है । ब्राह्मण ईश्वर को देखते हैं। भिखारी दाल को ले जाता है । तुम दवा को कहते हो। मैं दवा बनाता हूं। राम घोड़ों को गिनता है । वह भामों को चूंसता है। यह हाथियों की रक्षा करता है । राम ग्लानि करता है । मैं ईश्वर का ध्यान करता हूं। दरिद्र को देखता हूं। कृष्ण कान को भूषित करता है। कठवे डरते हैं। संज्ञा । अकारान्त नपुंस भक शब्दसूची ॥ धन-द्रध्य हृदय-दिल हिरण्य-सोना प्रथम भाग) -- गृह-घर धान्य-नाज पुण्य -धर्म, भलाई वन-जगल ज्ञान-बोध फल फल धस्त्र--कपड़ा यन्त्र-कल, मैशीन क्षेत्र-खेत तृण-घास शरीर जिस्म, देह जल-पानी आमिष-मांस नख-नाखन सुख-भाराम पुस्तक-किताब भन्न भोजन दुःख-तकलीफ़ विष-जहर नेत्र प्रांख पाप-अधर्म, बुराई नौषध-दवा गात्र-अंग, अंक पङ्कज-कमल ३७-अकारान्त नपंसकलिंग मे “ स् " (प्रयमा का एक वचन सम्बन्धी ) प्रत्यय परे हो तो उसके स्थान में “अम् हो जाता है । यथा-ज्ञान+सु% ज्ञान+अम् = ज्ञानम् ॥ ३८-नपंसक लिंग से “ सौ (प्रथमा द्वितीया का द्विवचन सम्बन्धी ) प्रत्यय परे हो तो उसके स्थान में “ई आदेश हो जाता है एवम् “अस् ३१ असोऽ७ । १ । २४ अतोनात क्लीवात्स्वमीम् भवति । ३८-मपुंसकाच्च ७ । १ । १९ कली यादोहः शी यति । भौ त्यो कार वित: संज्ञा ॥ जशशोः शिः ७ । १ । २० क्ली बात शभोः शिः भवति ॥ yि गर्वनामस्थानम् १। १ । ४२ शि इत्येतस्मनामस्थान संशक मधलि गमकम्य छ चः ७ । १ । १२ अन्तस्याऽन्तस्य ध बलीयस्य नुमा. गमो भवति सर्वनामस्थाने परे ॥ सर्वनामरूपाने नासम्बुद्वी । ४ । " मानलस्यांगस्योपधायादी( भवस्यसम्बद्धो सर्वनामस्थाने च परे ॥
५५ संस्कृतशिक्षक। (प्रथमा द्वितीया का बहुवचन सम्बन्धी) परे हो तो उसके स्थान में नि नादेश हो जाता है और " नि " से पूर्ष का स्वर दीर्घ हो जाता है । यथा--ज्ञान+औ = ज्ञान+ई। ज्ञान+मम् = ज्ञान+ नि = ज्ञानानि ॥ धन+अस् = धनानि ॥ ३८-हस्व वा दीर्घ अकार से परे मूल एवम् पारिभाषिक स्वर परे हों अथवा उन के दीर्घ रूप परे हों तो पूर्वपर के स्थान में तुल्य तम गुणादेश हो जाता है । अर्थात् अ+इ = ए । न+ई = ए । प्रा+इ = ए। प्रा+ई = ए। अ+उ =ो । प्र+ऊ : श्री। प्रो+ उ = मो। शा+ऊ = नो । ऋ परे हो तो "म" हो जाता है। यया-ज्ञान+ई = ज्ञाने। अकारान्त नपुंसक लिंग “ पुस्तक " शब्द द्विवचन पुस्तकम २८,३७,३१ पुस्तके २८,३७,३६ पुस्तकानि २८,३७ बहुतसे पुस्तक द्वितीया पुस्तकम् २८,३७,३१ पुस्तके २८,३८,३६ पुस्तकानि २८,३८ २ पुस्तकों को बहुतसी पुस्तकों को वाक्यों के उदाहरण । सुग्वम् भवति सुख होता है । बनानि दहन्ति- जंगल जलते हैं । पुस्तके मृगयामि-२ किताब ढूंढता इल-आद्गुणाः ६ । १ । ८७ अवर्णादधि परे पूर्वपरयोरे. कागुणादेयो भवति संहितायाम् ॥ एकवचन बहुवचन प्रथमा एक पुस्तक दो पुस्तक १ पुस्तक को - हूं। अन्नम् पचति-मन पचता है। नखम् भूषयामि- नाखून मजाला हूं : हिरण्यम् पश्ययः- तुम दो सोना देखते हो। फलानि नयनि-सू फलों को ले जाता है। वृद्धः वस्त्राणि अस्यति-बुड्डा कपड़ों को फेंकता है । वृषाः तृणानि चरन्ति-बैल घाम खाते हैं । भाषा बनाओ। गृहम् ब्रजति । जलम् प्रस्थति। पण्डिताः पुस्त- कानि रचर्यान्त । युवतः वस्त्राणि गणयति । रामः विषम् नयति । नरः शरीरम् भूषयति । दुखम् भवति। भूपः क्षेत्राणि गणयति । हृणानि द्रवन्ति । भृत्यः धनम् नयति । सिंहाः मामिषं खादन्ति । वृद्धौ गृहम् त्यजतः । वानरः शरीरम् त्यजति । पापम् त्य- जमि । धान्यम्, नयामि । मृहम् ब्रजामः । वानराः फलानि खादन्ति । शिष्याः पुस्तकम् स्मरन्ति । धान्यानि मृगयामः । अनूचान: पुण्यम् प्रथयति ॥ संस्कृत बनाओ। पुण्य होता है । मैं धन को लेजाता हूं । हम सब १ पुस्तक को बनाते हैं। राम खेत को जाता है। राजा धनों को चाहता है। जङ्गल जलते हैं । अधर्स नष्ट होता है। कलों को बनाता है। सोना लेजाता है। घोड़ा घास खाता है । शिष्य पुस्तकों को ले जाते हैं । अध्यापक प्रसन्न होता है । मूर्ख जाते हैं तुम बन्दरों को गिनते हो। मैं लड्डुओं को गिनता हू । तुम सब कपड़ों को बनाते हो। । ।
संस्कृतशिक्षक। विश घुमना क्रिया। * तुदादिगणीय परस्मैपदी धातु । तुद-पीड़ा देना कृष-जोतना स्पृश-छूना वृक्ष-काटना विध-विधान करना ऋच-तारीफ़ करमा क्षुर हजामत करना तृप-तृप्त होना पृच्छ-पूछना सिल-मिलना त्रुट-तोड़ना, काट डालना বি-বিনা मुच-छोड़ना स्फुर-फड़कना ४०-हम २१वें प्रकम में पतला चुके हैं कि तुदादि- गण का विकरण "" है। अतएव उक्त धिकरण को युक्त कर वर्तमानादि में रूप बना लेने चाहिएं । यहां यह शङ्का हो सकती है कि भ्वादिगण का भी विकरण "" है और तुदादि का भी । जब दोनों का विक- रण एक ही है तो फिर तुदादिगण के धातुओं को पृथक् करने की आवश्यकता क्या हुई ? अथवा इन धातूनां संस्कृतपाठः-तुद व्यथने । कृष विलेखने । ओ. प्रश्च छेदमे । तृप तृम्फ पप्ती । ऋच स्तुती । मिल प्रलेषणे । लिख अक्षरविम्यासे । स्फुर स्फुरणे । विश प्रधेशने। स्पृश संस्पर्शने। विध विधाने । क्षर घिलेखने । प्रच्छ जी सायाम् । त्रुट छेदने । मुछल्ल मोजणे ॥ ४०-सार्धधातुकमपित-काहितिष १।१।५ गिकित डित निमित्ते वग लक्षणे गुणधद्वी न सता . - * प्रथम भाग। एकवचन विशति विशता दोनों गणों के वर्तमानादि काल के रूप में कितना वा क्या भेद रहेगा? इन प्रश्नों के उत्तर में इस पुस्तक के पाठकों के निमित्त अभी यहां इतना ही लिखना पर्याप्त है कि भ्वादिगणों में २३ प्रक्रम से धातु के उपधा को गुणादेश हो जाता है, परन्तु इस गण में नहीं होता । इस के अतिरिक्त जो अन्य भेद होंगे वे यथास्थान दर्शाये जायेंगे। तुदादिगणोय परस्मैपदी "विश"धातु के रूप । द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुप विशन्ति २१, २२ २१, २२, २४ २१, २२ यह १ घुसता है वे दो घुसते हैं वे सब घुसते हैं मध्यमपुरुप विशसि विशयः विशथ २१, २२, २४ २१, २२ तुम दो घुसते हो तुम सब घुसते हो विशामि विशाव विशामः २९, २२, २७ २१, २२, २४ २१, २२, २७, २४ घुसता हम दो घुसते हैं हम सब घुसते हैं। वाक्यों के उदाहरण । औषधम् पृच्छति-दवा को पूछता है । कठेराः लज्जन्ति-दरिद्र शर्माते हैं। शिवम ऋचामि-ईश्वर की स्तुति करता हूं। इतिहासं पृच्छथ-तुम सब इतिहास को पूछते हो । कृष्णः मिलति कृष्ण मिलता है । चौरः तुदति-चोर दुःखी होता है। रामः कंका- लम् स्पृशति-राम अस्थिपञ्जर को छूता है। शिष्याः २१, २२ सुम घुसते हो उसमपुरुष मैं .
संस्कृतशिक्षका इतिहासम् लिखन्ति-विद्यार्थी इतिहास को लिखते हैं । क्षेत्रम् कृषावः- खेत हम २ जोतते हैं । इन्दुरम् मुञ्चामि-चूहे को छोड़ता हूं। भाषा बनाओ। गानम् स्पृशामि । पुस्तकम् लिखसि । कृष्णा पृच्छति । भिक्षुकाः मिलन्ति । रामः लजति । औष- धानि विधति । एणाम् मुञ्चामि । विप्राः ऋचन्ति । नेत्र स्फुरतः । कृष्णः क्षुरति । रामः विशति । नरः धान्यम् स्पृशति । अनूचाना: पुस्तकान् लिखन्ति । अध्यापकः शिष्यम् पृच्छति ॥ संस्कृत बनाओ। कृष्ण मिलता है। खेत जोतते हो । होशियार लिखते हैं । दरिद्र छूता है। पण्डित पूछता है। सायल लिखते हैं। बड़ा भाई मिलता है। नौकर कढ़ाह को पूछता है । मोतबिर विधान करते हैं । १ लांख फड़कती है । पाठक पुस्तकों को लिखते हैं । कपड़े को पछता है। सूचना-हम ८ वें प्रक्रम में बतलाचुके हैं, वाक्य में सन्धि करना, न करना प्रयोक्ता की इच्छा के साधीन है इसी हेतु बालकों के सौकरार्थ अब तक हमने जो वाक्यमाला लिखी है उन सब में सन्धि का प्रयोग नहीं किया है, परन्तु अब आगे थोड़ा २ वाक्यों में भी सन्धि करना प्रारम्भ करेंगे। जिस - प्रथम भाग। से मन्धिसम्पन्न वाक्यों का भी ज्ञान अध्येताओं को यथावत् होने लगे । २५, २६वें, ३०वें, ३६वें प्रक्रमों को भी पदान्त सन्धि के लिये म्मरगा रखना नाव: श्यक है । तरिक्त अन्य नियमों का उल्लेख प्रारम्भ करते हैं। ४१ इ उ इन स्वरों वा इनके दीर्घ सपो के प्रागे कोई प्रसवर्णी स्वर हो तो उक्त स्वरौ को क्रमशः य, व, र प्रादेश होते हैं । अर्थात् इ, ई के स्थान में "य" एवं उ, ऊ के स्थान में "व" और का ऋ के स्थान में "र" आदेश होता है ॥ यथा-पतति+प्रश्वः पतत्यश्वः ।। ४२ यदि पदान्त 'म:' से परे प्रकार एवम घोष- वर्ण हो तो उस के स्थान में प्रो. हो जाता है। यथा-नर:+व्रजति नरो व्रजति ।। ४३--पदान्त ए, ओ से भागे यदि इस्व प्रकार हो तो वह प्रकार पूर्व स्वर में मिल जाता है । ४१-इको यणधि ६।१।७१ इकास्थाने यण मयत्यधि परे। ४२-भतोरोरप्लुतादप्लुते ।। १ । १९३ भप्लुतादत्तः परस्य रोः सः भवत्यप्लुतेति परे॥ हशि च ६।१ । ११४ अप्लुतादतः परस्य रोः सः भवति इशि परे । भाद्गुणः ( ३८ ) । ४३-एछः पदान्तादति ६।१।१०० पदाम्तादेडोति. परे पूर्वरूपमेकादेशः भवति।
संस्कृतशिक्षक।
यथा-राम:+अर्चति रामो (४२) +अर्थति-
रामोर्चति (४३)॥
वाक्यों के उदाहरण।
वेदम् पठति वेद पढ़ता है। शास्त्रम् नयति-शास्त्र
को लेजाता है । पश्यत्यध्यापकम् पढ़ाने वाले को
देखता है । नेत्रे स्फुरतः दोनों प्रांख फड़कती हैं।
रामः क्षेत्रम् कृषति राम खेत को जोतता है। सृजति
हारम्-माला को बनाता है । गजम् स्पृशति-वह
हाथी को छूता है। रामः क्षुरतिराम हजामत करता
है। नरौ पृच्छतः-२ भादमी पूछते हैं।
भाषा बनाओ।
पत्रम् लिखति । हृदयम् तुदति । क्षेत्रान् कृषसि ।
चर्मकाराः धर्मम् प्राप्नुवन्ति। खादत्य गदम् । भिक्षुको
मिलति । पुण्यम् भवति । ऋचति शिवम् । सिंहाः
खादन्त्यामिषम् । नर: सृजत्यौषधम् । नृपः चौरम्
मुञ्चति । पुण्यान्यजति । चौराः मुषन्ति । नरो ग्ला-
यति । शिवम् ध्यायामि । गृहम् भरति । रामो वमति
कंकालम् पश्यामि । नरो वमति ॥
संस्कृत बनाओ।
मैं नाज भूनता हूं। कृष्ण उगलता है । कूमा
खोदता है। हायी चबाते हैं। चोर पूवों को चोरता
है। कृष्ण शर्मिन्दा होता है । कान फड़कता है ।
मृग जाता है। राम हंसता है । कौवे घुसते हैं ।
।
प्रथम भाग। ५४ मायल ( निवेदक ) दुखी होता है । हम सब ईश्वर का ध्यान करते हैं । वे कूमां खोदते हैं। वह दरिद्रों को पालता है ॥ अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दसूची । खच्च-लंगड़ा अखिल-मथ प्रधमर्ण-ऋणी अन्त:पुर-जनानखाना अभ्युदय-ऐश्वर्य जास्म निर्दय तण्डुल-चावला तृषित-प्यामा दीप दिया अलङ्कार जेवर अंशुधर सूरज प्राचार-चालचलन देश-मुल्क आदर-इज्जत आदेश-हुक्म प्राश्रमनिवासस्थान उपदेश-शिक्षा उपहार-इनाम प्रोदन-भात कट-चटाई कंठ-गला कपोल-गाल को ध-गुस्सा काल-समय देह-शरीर नायक-अग्रणी नापित-नाई पंक-कीचड़ पराक्रम बहादुरी परिणाम नतीजा पधन-हवा - प्रकाश-उजाला प्रत्यय-विश्वास प्रबल-मजबूत तारक तारा ६७ संस्कृतशिक्षक। छत्र-छाता अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दसूची । क्षधरहरूक मसान-मूखता तत्त्व-मार प्रध्ययन-पढ़ना तमर-सीमा, दिन अभिधान नाम दिवभ-दिन अश्र (मन)-प्रांसू दुर्ग-कठिनता आर लोहशलाका दुर्भिक्ष--काल आलात-अंगारा पण्य-विक्रय द्रश्य उद्यान-ब नि-बगीचा कपट धोखा परिमाण-प्रमाण,पैमाना पान--बरतन कारणासबथ भय-दुर कारागारजेलखाना कुसुम-फूल रङ्गबीज-रूपया युद्ध लड़ाई रत्न जवाहिर खनित्र-कुदाल खलन-लगाम राष्ट्र-देश वृत्त-वृत्तान्त - गीत-भजन गुच्छक-गुस्था सकट-दुःख चक्र-पहिया स्थान-जगह ४४-सकारात शब्दों से परे तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन सम्बन्धी प्रत्यय ४४-टाइमिङ्ग सामिनास्याः ३ . ११ १२ अदन्ताहादीना मिनादयः भवमित ॥ ३यः ७।१ । १३ भनीङ्गार परस्पङर्यादेश भवति ॥ मतोमिस्ऐम् । ७।१। । अदन्ताद् मिस ऐस् स्यात् ॥
प्रथम भाग। ६१ +ए- राम+म्य- रामस्य ४४ - ४५-बहुवचन सम्बन्धी ४ भयश हो तो उन के स्थान में क्रमश: इन्, य, पात्, स्य मादेश होते हैं एवम् भिम् (तृतीया का बहुवचन) के स्थान में ऐम हो जाता है ॥ यथा:- मादन+पा २८-प्रोदन+इन ४४-प्रोदनेन ३८ सूर्य+ सूर्य+ य सूर्याय २७ रामभ+मस- रामभ+प्रात्- रामभात् ३० राम+प्रस्- ह+भिस- सिंह+ सिंह+ऐस सिंहै: और " सुभ प्रत्यय परे हों तो अदन्त अंगको एकार होजाता है। यथा-रामन-भ्यन रामे+भ्यम्-गमेभ्यः ॥ ४६-चाहे समस्त स्वर, कवर्ग, पवर्ग, अन्तस्थ वर्ण, मा ( उपसर्ग ) और नुम् का अनुस्वार ये मब अलग २ अथवा यथासम्भा मिले हुए भी र वा ष वर्ण से परे हो तथा फिर उनसे परे प्रत्यय का अंग रूप अपदान्त नकार हो तो उस नकार को एकार होजाता है। यथा-नर+सा (२८)-नर+इन ( ४४ )-नरेन (३८)-नरेण इत्यादि ॥ ४५-बहुवचने मस्येत् ७।३ । १०३ झलादी बहुवचने सुप्यतोङ्गस्थ कारः भवति ॥ ४६-अट्कुक्षानुम्व्यवायेऽपि ८ । ४ । २ अट् क वर्ग पर्गमाङ्नुम एतैव्यस्तै व्यवधाने पिरषाभ्यां परस्य नस्य पोमति समामपदे ॥
संस्कृतशिक्षक। ४७ यदि " प्रोस . ( षष्ठी, सप्तमी का द्विवचन सम्बन्धी ) प्रत्यय प्रकारान्त शब्द से परे हो तो उस अन्तिम प्रकार को एकार हो जाता है । यथा -परिष्ठता (२८)+ोम्- पण्डिते(४७)+सोस् . पण्डित्+अय( २५ )+सोम-पण्डितयोः । धन+पोस् (२८)-धमे(४७)+प्रोस्-धन्+प्रया २५)+ पोस्-धनयोः ॥ ४८-मूल स्वरान्त शब्दों तथा नित्यस्त्रीलिंग- वाची दीर्घ स्वरान्त शब्दों से परे षष्ठी का "नाम" प्रत्यय हो तो इस प्राम " प्रत्यय से पूर्व “न्" का पागम होता है और इम “ न ” से पूर्व का स्वर दीर्घ भी हो जाता है । यथा-याचक्र+माम् - याचका+न्+प्राम-याचकानाम् ४८ प्रकार को छोड़ स्वरान्त कवर्गान्त तथा अन्तस्थ वर्गों से परे यदि आदेश वा प्रत्यय का अंश- रुप दन्त्य सकार हो तो उस के स्थान में मूर्धन्य षकार हो जाता है ॥ यया राम+-रामे ४५+सु-रामेषु ॥ ४१-भोसि च ७।३ । १०४ ओमि परे अतोऽस्येबारः मबति॥ ४८-स्वनद्यापो ।१।५४ हस्याम्तामद्यमता- दाबताचाडात्परस्यामो मुहागमः भवति ॥ नामि ६।४।३ नामि परे भजन्तास्य दीर्घा भवति । ४-मादेशप्रत्यययोः८।३ । ५९ रणकुश्यां परस्पापदा- मतस्यादेशः प्रत्यययायवाच यः सः मूर्धन्यादेशः भवति ।
प्रथम भाग। ३ matlamalini एकवचन रामेषु राम" शब्द के शेष रूप। द्विवचन बहुवचन तृतीया रामेण रामाभ्याम् राम १ राम के द्वारा(से,ने) २ रामों के द्वारा बहुत मे रामों से चतुर्थी रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः १ राम के लिये, रामों के लिये, बहुत से रामों के लिये पञ्चमी रामात् रामाभ्याम् रामेभ्यः १ राम से २ रामों से बहुत से रामों से षष्ठी रामस्य रामयोः रामाणाम् १ राम का २ रामों का बहुत से रामों का सप्तमी रामे रामयोः २ रामों में बहुत से रामों में कारक एवम् विभक्तियों का प्रयोग। ५०-क्रिया की सिद्धि में जो मुख्य साधन हो पर्थात् जिस के द्वारा कर्ता कार्य को सिद्ध करे उसे करण कारक कहते हैं । ५१-निम्नलिखित अर्थों में तनीया विभक्ति होती है। ५०-साधकतमं करणम् १ । ४ । ४२ क्रियापसिद्धी पत मकृष्टोपकारक करणसंपकं भवति ॥ ५१-कर्तृकरणयोस्तृतीया २।३ । १८ भममिहिते कसरि करणे च तृतीया भवति ॥ हेती २।३ । २३ हेत्वर्थ तृतीया भवति ॥ येनाधिकारः २।३ । २० येमानेन विकतेन संगिना विकारोलरूपते ततस्तृतीया भवति ॥ इत्पभूतलमणे १ राम में ।
संस्कृतशिक्षक।
द्वारा अपने
( क ) अनुत्ता कर्ता और करण में ॥
यथा-शिष्येण कृतम्-शिष्य ने किया । यहां
शिष्य अनभिहित कर्ता है हस्तेन भारं नयति-
हाथ से बोझ को ले जाता है " यहां पर हस्तेन
पद करगा कारक है, क्योंकि कर्ता
हाथ
के
लेजाने के कार्य को मिद्ध कर रहा है ॥
( ख ) हेत्वर्थ में अर्थात् जिस के होने में जो
कारण हो उस अर्थ में ॥
यया-धर्मेण सुखम्-धर्म से सुख । सत्येन यशः
सत्य से यश ॥
(ग) जिस अंग (अवयव) मे शरीर का विकार
प्रगट होता हो उस अवयव में ॥
यथा-मैत्रेण अन्धः साखों से अन्धा ।।
(घ) जिस लक्षण से जो पहिचाना जावे उस
-
लक्षण में
॥
यथा-यज्ञोपवीतेन द्विजः-यज्ञोपवीत से द्विज ।
वेदाध्ययनेन विमः-वेदाध्ययन से विम॥
(3) सह ( साथ ) वा इस के पर्यायवाची
शब्दों से युक्त अप्रधान कर्ता में ॥
यथा-पुत्रेण सह जनक: गच्छति-पुत्र के साथ
पिता जाता है।
२ । ३ । २१ कञ्चितपकार प्राप्तस्य लक्षणे तृतीया भवति ॥
मायुक्त प्रधाने २ . ३ । १८ सहान युक्त अमधाने तृतीया
भवति ॥
प्रथम भाग । ५२-कर्ता जिस के निमित्त कर्म द्वारा क्रिया करे नर्थात् कर्म से जिस का उपकार वा उपयोग किया जाय उम को सम्प्रदान कारक कहते हैं, स्पृहं धातु के उपयोग में जो ईप्सित ( इष्ठ ) हाँ एवम् क्रोध द्रोह ईर्ष्या निन्दार्थक धातुओं के प्रयोग में जिन के प्रति कोप हो उनकी भी संप्रदान कारक संज्ञा होती है। ५३ मिमलिखित अर्थों में चतुर्थी विभक्ति होती है। ( क ) सम्प्रदान कारक में ॥ यथा-बालकाय मोदकान् मृगयति-लड़के के लिये लडडू खोजता है । ( ख ) जो पदार्थ जिस प्रयोजन के लिये होता है उस निमित्त को तादर्थ्य कहते हैं । तादर्य में भी चतुर्थी विभक्ति होती है यया-भूषणाय हिरण्यम्-जेवर के लिये सोना । (ग) उत्पात की सूचना में भी चतुर्थी विभ- क्ति होती है। यथा-वाताय कपिला विद्युदातपायातिलोहिनी । पीता शस्यविनाशाय दुर्भिक्षाय सिता भवेत्॥ ५२-कर्मणा यमभिप्रेति स संप्रदानम् १ . ४ । ३२ दानस्य कर्मणा यममिति में सम्प्रदानसंज्ञो भवति ॥ अनिरा. करणास्कर्तुस्त्यागाङ्गं कर्मणेप्मितम् । प्रेरणानुमितिभ्यां at भते सम्प्रदानताम्॥ स्पृहेरी प्मितः १ । ४ । ३६ स्पृहेः प्रयोगे इष्टः सम्प्रदान संसो भवति ॥ क्रुधदुहेप्यासूयाांना यं प्रति कोपः १।४ । ३७ स सम्प्रदानमज्ञो सषति ॥ - संस्कृतशिक्षक। कपिलवर्ण की बिजली वायु के लिये, रक्त- वर्ण की धूप के लिये, पीतवर्ण की अन्नविनाश के लिये और सफ़ेद वर्ण की बिजली दुर्भिक्ष के लिये होती है । ५४-गो वियोग में निश्चल हो तथा भय किंश रक्षार्थक क्रिया के प्रयोग में भय का हेतु हो, एवम् वारणार्थक धातुओं के प्रयोग में जो ईप्मित हो तथा छिपने में जिम के प्रदर्शन की इच्छा हो उस को अपादान कारक कहते हैं । इस कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा-वृक्षास्पतति-पड़ से गिरता है। M ५३-चतुर्थी मम्प्रदाने २।३ । १३ सम्प्रदाने फारके चतुर्थी विभक्तिभवति ॥ चतुर्थी विधाने तादर्यमुपसंपा. मम् , उत्पातेन ज्ञाप्यमाने । ५४-ध्रुवमपायेऽपादानम् ।। ४ । २४ अपाये यद्भुषं नत् कारकमपादामसं भवति ॥ मीत्रामा भयहेतुः ।। ४।२५ मयार्थानां प्राणार्थानां च प्रयोगे भयहेतुरपादान- म्भवति । वारणार्थामामीप्सितः १। ४ । २७ धारणामां धातूनां प्रयोगे ईप्सितीर्थोऽपादामसंज्ञको भवति ॥ अपा. ये यदुदासीनं धलं वा यदि वाचमम् । ध्रुवमेवातदावेशा- तदुपादानमुध्यते ।। अन्तों येनादर्शनामिच्छति १ । ४ । २८ । येमादर्शन मिच्छति तदप्यपादाम भवति ॥ भपादाने पञ्चमी २ । ३ । २८ अपादाने कारके पञ्चमी विभक्तिभवति । भन्त प्रथम भाग। ६७ ६ me- ५५-कारक तथा प्रातिपदिक से अतिरिक्त स्वस्वामिभावादि सम्बन्ध को जतलाने वाला 'शेष' कहलाता है। हिन्दीभाषा में इस ही को सम्बन्ध कारक कहते हैं । इस में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा:-नृपस्य कोश:-राजा का खजाना ॥ ५६-जो किसी का प्राधार हो उस को अधि. करण कहते हैं । अधिकरण कारक में सर्वदा सप्तमी विभक्ति होती है। यथा-वनेषु सिंहा: वसन्ति-वन में शेर रहते हैं । वाक्यों के उदाहरण। युवक: हिरण्येन भूषयति-जवान जेवर में सजाता है । तृषिताय जलम् नयामि-प्यासे के लिये पानी लेजाता हूं । प्रध्यापकः शिष्याय पुस्तकम् रचयति-अध्यापक शिष्य के लिये पुस्तक को बनाता है। निवेण क्षेत्रम् खनति-कुदाल से खेत को खोदता है । उद्यानात् फलम् नयति बगीचे से फल को लेजाता है। सिंहाय प्रामिषं नयति खेर के लिये ५५-षष्ठी शेषे २।३। ५१ कर्मादिकारकेभ्योन्यः वाति- पदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः शेषः सत्र षष्ठी भवति॥ ५६ --भाधारोऽधिकरणम् ।।४ । ४५ मतुं मदर तष्ठि. क्रियाया आधाराऽधिकरणः भवति ॥ मतम्यधिकरणे घ २ । ३ । ३६ अधिकरणे सप्तमी स्यात् । धकारादूरान्ति- कार्थभ्यः ॥
संस्कृतशिक्षक। - । मांस लेजाता है उद्यानाय पंकजानि सर्जति ( पंकजान्यजत्युद्यानाय )-बगीचे के लिये कमलों को इकट्ठा करता है । रामस्य पुस्तकम् पठामि राम की पुस्तक को पढ़ता हूं। अले विशाम: हम पानी में घुसते हैं । भाषा बनाओ। सिंहात् त्रस्यति । नुप्याम्यन्नेन । भृत्यो वृषाय तृणानि नयति । नरः पापेन त्रस्यति । भिक्षुकाया. नम् मृगयामि । बालकाः मोदकेन तृप्यन्ति । गनाय पुस्तकमर्जामि । अनेन कठेरा: तृप्यन्ति । र चयत्यश्वायखलोनम् । तण्डुलान्योदनाय भवन्ति । नृपः युद्धाय दुर्गम् रचति । भयेन पृच्छति । अध्य- यनेन कालम् नयन्त्यनूचानाः। जलेन वस्त्रम् द्रवति । कृष्णः संकटे धनम् याचति। चौराः कारागारे व्रजन्ति । अपूपाय कटाहम् नयमि । रामाय गृहम् स्पृहयति । क्षेत्रनम्भवति। वानरान् वने मुञ्चामि। नखेन वृश्चति॥ संस्कृत बनाओ। कादों मे दुःख होता है । खेत में नाज होता है। नौकर पहिया लेजाता है । दुःख में धर्म रक्षा करता है॥ परस्मैपदी क्रिया * भ्वादिगणीय धातु चुरादिगणीय धातु निर्बाद-निन्दा करना शुठि-सुखाना धातूनां संस्कृतप्राठः-णिदि कुस्सायाम् । टुनदि समृ . हो । कदि ऋदि क्लदि भाडाने रोदने च । तकि कृष्णीषने ।
प्रथम भाग।
६४
चबि-चूमना
नदि मानन्द करना
मडि सजाना
कदि,क्रदि -पुकारना,
,चिल्लाना क्षपि-महना,क्षमाकरना
तकि-कठिनता से जीवन चिति-मोचना,स्मरण
ध्यतीत करना
तुदादिगणीय धातु
विदि,भिदि-टुकड़े करना कृती-काटना
वालि-चाहना.
गुजि-गंजना
काक्षि,वाक्षि,माक्षि-चाहना
५७-जो मोपधा इकारान्त धातु हैं उन के
अन्तिम इकार का लोप होकर उपधा में 'न् ' का
मागम होता है।
५८-अपदान्त न वा म मे आगे अन्तस्थ वणों
को छोड़ यदि कोई अन्य व्यञ्जन हो तो उक्त न वा
म को अनुस्वार होजाता है ।
,
धुधि पत्रसंयोगे। बिदि मिदि भवयवे। वाछि इच्छायाम् ।
गुजि मपक्त शबई । काक्षि वाक्षि माक्षि कांक्षायाम् ।
शुठि शोषणे । मष्टि भूषायाम् वर्षे छ । क्षपि क्षान्त्याम् ।
चिति स्मृत्याम् । कृती छेदने ।
५१-इदितो नुम् धातोः । १ । ५ ॥ इदितो धातोः
तुमागमः भवति ॥
५८-नश्चापदान्तस्य झलि ८।३ । २४ ॥ नस्य मस्य
चापदान्तस्य काल अनुस्वारो मयति ।।
संस्कृतशिक्षक। एकवचन ५८-ऊष्म वर्गों को छाड़ चाहे कोई भी व्यञ्जन अनुस्वार से परे हो तो उस अनुस्वार के आगे का शक्षा जिस धर्ग का है उस वर्ग का पांचवा अक्षर उन अनुस्वार के स्थान में हो जाता है। यह नियम अपदान्त में तो मवंदा और पदाना में विकरूप से ( प्रयोक्ता की इच्छानुमार ) प्रयुक्त होता है ॥ यथा-नदि+त-न+न्(५७)द+अ+ति-नन्दति । चु ब+त:-चु+न् (५७)+ब+तः चु+(५८) +o++त- चु+म+ब+तः-चुम्बत: ॥ भ्वादिगणीय “निदि” धातु के रूप । द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष निन्दति निन्दतः निन्दन्ति यह निन्दा करता है वे निन्दा करते हैं ये सब निन्दाकरसे है मध्यमपुरुष निन्दसि निन्दथ तुम निन्दा करते हो तुम २ निन्दा करते हो तुमसवपिन्दाकरते हो उत्तमपुरुष निन्दामि निन्दामः मैं निन्दा करता हूं हम २ मिन्दा करते हैं हमस्वमिन्दाकरते हैं चुरादिगणीय “ मडि " धातु के रूपं । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष मण्डयति मण्डयन्ति वह सजाता है वे दो सजाते हैं वे सब सजाते हैं ५८-अनुस्वारस्य ययि परमवर्णः ८।४। ५८ यि परे अपदान्तस्यानुस्वारस्प परसवर्णी प्रवति ॥ बा पदान्तस्य ८।४।५पदान्तस्यानुस्वारस्थ ययि पर परसवर्णों वामवति। निन्दयः मिन्दावः मण्डयतः प्रथम भाग। मध्यमपुरुष मण्डर्यास तुम सजाते हो उत्तमपुरुष मण्डयामि मण्डयथः मराडयय तुम २ सजाते हो तुम सब सजासे हो मराडयावः मगडयामः मैं सजाता हूं हमर सजाते हैं हम सब समाते है वाक्यों के उदाहरण । विप्रः शिषस् चिन्तयति-ब्राह्मण ईश्वर का स्मरण करता है । शिष्योक्षराणि मण्डति-शिष्य अक्षरों को सजाता है । सूपः जलम् शुण्ठयति-रसो. इया पानी को सुखाता है । खजेनौदनम् कृन्तति- चमचे से भात को काटता है । रामः कृष्णम् कथ- यति राम कृष्ण को कहता है ॥ भाषा बनाओ। कठेराः चिन्तयन्ति । हिरण्येन पुत्रम् मण्ड- यामि । बालकायापूपान् वाञ्छामि । सुतम् चुम्बति । कण्टकान् भिन्द्यामः । मूर्खाः निन्दन्ति । पुण्येन नन्द ति । भिक्षुकाः छागम् वाञ्छन्ति । भृत्यायैणम् कांक्षामि । कठेराः क्रन्दन्ति । नापितः क्षुरति । नृपः युद्धे पराक्रमेण रत्नानि वाञ्छति । शिष्यः पुस्तकेनेतिहामस् पठति। अभ्युदयायोपकारं विति। वने भृगाः गुञ्जन्ति । अनचानाः तुष्यन्ति ॥ संस्कृत बनाओ। पाठ याद करता हूं। तुम पुस्तक चाहते हो । वह चिल्लाता है । कृष्ण को चूमता है । नायक पुण्य के लिये पुकारता है । दुःख सहता हूं प्राध्यापक संस्कृतशिक्षक। शिष्य के कसूर को क्षमा करता है । दरिद्र अकाल में अन्न की चिम्ना करते हैं। राजा के गृह को रत्न सजाते हैं। फूलों के गुच्छों को चाहता हूं। कव्वे कांवर(कोला- हल करते हैं। नाई नाखूनों को काटता है । कीचड़ में कमल होते हैं। बुड्ढे में विश्वास होता है। लड़का उजाले में लिखता है । दरिद्र कठिनता से जीवन व्यतीत करते हैं । राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। शरीर में रोग होते हैं । नौकर छाता लेजाता है । - वन में फूल होते हैं । अब्धि-समुद्र राति-शत्रु इकारान्तपुल्लिङ्गशब्दसूची उकारान्तपुंशब्दसूची अग्नि-पाग अंशु-किरण अतिथि-मेहमान अदित्सु- कृपण अन्धु-कुमा कच्छु-खुजली अलि भौंरा कम्बु-गला ऋषि महात्मा गुरु-प्रध्यापक कपि-बन्दर गोमायु-शृगाल कृमि क्रीड़ा घरु होमद्रव्य काकारि-उल्ल तितिक्ष क्षमाशील कधिशाइर दमथ, दमथु-सजा तरवारितलवार दिध्या-दाता भानु-सूर्य हरि-किसी का नाम पशु-जानबर गिरि पहाड़ प्रथमभाग। ७३ अद्रि-पहाड़े प्रजानि-रंडवा अपटु =मूर्ख साधु-महात्मा ग्रन्थि-गांठ अणुरेणु धूलिकण धननाभि-धून परासु-मरा हुमा ६०-मूलस्वरान्त शब्दों से परे प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन एवम् बहुवचन सम्बन्धी 'नौ' और 'प्रस' प्रत्यय हों तो पूर्व स्वर को ही दीर्घ हो जाता है। अभिप्राय यह है कि प्रथमा, द्वितीया के उक्त प्रत्यय जब मूल स्वरों से परे रहते हैं, तो उन प्रत्ययों के स्थान में केवल शब्दान्त स्वर ही दीर्घ होते हैं । दीर्घ होने के पश्चात् प्रत्ययस्थ स्वर का लोप होजाता है । यथा-कपि+सौ-कवी । माधु+प्रौ-साधू । दीर्घ स्वरान्त शब्दों में केवल द्वितीया के असू प्रत्यय के ही परे रहने पर पूर्वसवर्ण दीर्घादेश नहीं होता है और स्वान्त अंग से प्रथमा विभक्ति का प्रत्यय परे रहने पर अगला नियम प्रयुक्त होता है । बहुवचन सम्बन्धी प्रस ६०-प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ( ३२ ) ॥ दीर्घाजसि ६।१। १०५ दीर्घाउन सि इचि च परतः पूर्वसवर्ण दीर्घादेशो न भवति ॥ नादिषि ६ । १ । १०४ मादिथि पूर्व मथा दोघाँ ममपति॥
संस्कृतशिक्षक।
प्रा.
६१-प्रकार को छोड़ अन्य हस्व स्वरों से प्रथमा
के
बहुवचन का
अस् प्रत्यय परे हो तो उक्त
हस्व अंग को तुल्यतम गुणादेश हो जाता है ।
यथा-कवि-+-प्रस-कवे+आस-कवयः ॥
६२-स्त्रीलिङ्ग को छोड़ इस्व इकारान्त, उका-
रान्त स्वर से परे तृतीया के एक वचन का
हो तो उक्त 'आ' के स्थान में हो जाता
है और सर्वत्र इकारान्त, उकारान्त अंग से चतुर्थी
पञ्चमी, षष्ठी के एकवचन सम्बन्धी प्रत्यय परे हों
तो हस्वान्त अंग को गुणादेश होजाता है ।
यथा-अग्नि+मा-अग्निना । कवि+एक+
ए-कवये ॥
६३-जब ए, प्रो से परे पञ्चमी, षष्ठी का "अस्"
प्रत्यय होता है तो उक्त" अस्" प्रत्यय का प्रकार पूर्व
स्वर में मिल जाता है ।
-हरि+(२८)प्रम-हरे( ६२ )+अस् हरेः ( २४ )
६१-जसि च ७ । ३ । १०९ जसि परे ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य
गुणो भवति ॥
६२-आडो माउखियाम् ७ । ३ । १२० घेः परस्य आङ्को
मा भवति खोलि विहाय । माडिति टा संज्ञा प्राचाम्॥
घेडिंति ७ । ३ । १११ घिसंशकस्य डिप्ति सुपि परे गुणो
भवति।
६३- सिङमोरच ६.१ । ११० एडो सिङ मोरति परे
पूर्वरूपमेकादेशो भवति ।।
यथा-
प्रथम भाग। ७५ . ६४-स्व इकारान्त, उकारान्त शब्द से सप्तमी का 'इ' प्रत्यय परे हो तो अंग को प्रकार प्रादेश होता है और 'इ प्रत्यय के स्थान में 'औ ' आदेश हो जाता है। यथा-हरि+इ = हर+औ = हरौ । साधु+इ साध+ौ - माधौ ॥ ६५-यहां पर अस्' प्रादि विभक्तियों जो २ कार्य कहा गया वे सब वेदों में विकल्प से होते हैं । यथा-अग्नि+म-अग्नयः, अग्न्यः । शतक्रतवः, शतक्रत्वः । पश्खे, पशवे. इत्यादि हस्व इकारान्त “हरि” शब्द के रूप। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा हरिः हरी हरयः २ हरि द्वितीया हरिम् हरी हरीन् १ हरियो २ हरियों को बहुतसे हरियों को तृतीया हरिगा हरिभ्याम् हरिभिः २ हरियों से बहुतसे हरियों से १ हरि बहुत से हरि १ हरि से ६४-प्रच्छ घः ७ । ३ । १९९ इदुद्भ्यामुत्तरस्य उरोत स्यात घेरन्तादेशश्चाकारः ॥ ६५-जमादिषु छन्द मियावचनं मक णौ चय पाया हस्क इत्येतस्मात् ॥
संस्कृतशिक्षक। चतुर्थी हरये १ हरि के लिये हरिभ्याम् २ हरि के लिये हरिभ्याम् पञ्चमी हरेः २ हरियों से हरिभ्यः बहुतसे हरियों के लिये हरिभ्यः बहुत से हरियों से हरीणाम् बहुत से हरियों का हरिषु बहुत से दरियों में षष्ठी हरेः १ हरि का मतमी हौ १ हरि में हो: २ हरियों का होः २ हरियों में १ साधु द्वितीया साधुम् तृतीया साधुना हस्व उकारान्त “ साधु " शब्द के रूप। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा साधुः साधू साधषः २ साधु बस स साधु साधू साधून १ साधु को २ साधुओं को बहुतसे साधुओं को साधूभ्याम् साधुभिः साधु २ साधुओं से बहुत से साधुओं से चतुर्थी साधये साधुभ्याम् साधुभ्यः १ साधु के लिये २ साधुओं के लिये बहुतसे साधुओं के लिये पञ्चमी साधोः साधुभ्याम् माधुभ्यः १ साधु से २ साधुओं से बहुतसे साधुओं से षष्ठी साधोः साध्वोः साधनास १ साधु का २ साधुषों का बहुतसे साधुओं का मतमी माधौ साध्वोः साधुष २ साधुथों में बहुतसे साधुओं में १ साधु में प्रथम भाग। वाक्यों के उदाहरण । अग्निना दहति-माग से जलता है। तितिक्षुः क्षाम्यति-सहनशील सहता है । चरुम् वाञ्छामि- होमद्रव्य को चाहता हूं । दिष्णुः भिक्षुकायान्नम् मृगयति-दाता भिकारियों के लिये अन्न को ढूंढना है । कचछो: अदगम् कांक्षामि-खजली की दवा चाहता हूं । हरिः घमनाभिना तुद्यनि-हरि धुएं से दुखित होता है । नृपः चौरं कारागारे विधति-राजा घोर को जेल में विधान करता है । शिष्यः गुरवे. उधोजलम् नयति-शिष्य गुरु के लिये कुएं से जल लेजाता है । दिसुर्धनमति कंजम धन को जमा करता है । भानोरंशषः प्रथयन्ति सूर्य की किरणे फैलती हैं। युद्धाय तरवारिम् कांक्षामि युद्ध के निमित्त तलवार को चाहता हूं ॥ भाषा बनाओ। काकारयः क्रन्दन्ति । गोमायू क्रन्दतः। गिरिम् रखनामि । नायकः पुष्पं स्पृशति । गुञ्जन्त्यलयः। ग्रन्थिम् कृन्तावः । आतुरः एजति । कवये रत्नानि नयति । भद्री पङ्कजानि भवन्ति । ऋषय उपकाराय पशून् रक्षन्ति । रातये तरवारिम् कांक्षामि । ऋषयः पापाद् ग्लायन्ति । अदित्सोर्धनानि नश्यन्ति । हरि: तरवारिं स्पृहयति ।मजानये क्रुध्यामि । अब्धौ पत- संस्कृतशिक्षक। Prammam ------- मगुच्याः । अग्निना बनम् दहति । अतिथयः उस्मये व्रजन्ति । कम्बम् मण्डयामि। हरिमायो:वस्यति । संस्कृत बनाओ। महात्मा जाते हैं । दाता धन को इकट्ठा करते हैं । रसोइया पूओं को बनाता है । कौवे को देखता हूं। धूम होता है। पहाड़ों को देखता हूं। महात्मा प्रमन्न होते हैं । लड़ाई के लिये तलवार लेजाते हैं । ऋषिलोग निवासस्थान में जाते हैं । शायर गीतों को बनाते हैं । पहाड़ों में महात्मा रहते हैं । भंवर गंजते हैं । वानर कोलाहल करते हैं। राजा चोरों में द्रोह करता है । हम शत्रुओं से जीतते हैं। आंख फड़कती है । धूरं मे पासू गिरते हैं । * भ्वादिगणीय आत्मनेपदी धातु । एध-बढ़ना ईक्ष देखना भाष-कहना रम्-खेलना श्लाघः-प्रशंसा करना सह-सहना * धातूनां संस्कृत पाठः-एध बढौ । ईक्ष दर्शने । भाष व्यक्तायां वाचि। रमु कोडायाम् । प्लाघ कत्थने। ष मर्षणे चेष्ट चेष्टायाम् । भिक्ष भिक्षायामलाभे लाभेच । दध धारणे। स्वाद मास्वादने । यती प्रयत्ने । वेष्ट वेष्टने । भास दीप्तो। स्फुट विकसने । यदि अभिवादनस्तुत्योः । स्पदि किञ्चिच्च- लने । स्कुदि भाप्रवयो। क्लिदि परिदेवने । लघि मोजमनिवृत्ता. अपि । सहि परिभाषणे। तुष्टि तोडने । व्यप भयसंचालनपोः ।।
प्रथम भाग। ७ स्फुट-खिलना चेष्टपेष्टा करना भिक्ष-मांगना दध--धारण करना स्वाद-चखना यत् कोशिश करना वेष्ट-लपेटना भाम्-प्रकाशित करना पदि-प्रणाम, स्तुति करना स्पदि-मन्दचलना स्कुदि-कूदना विदि-दुखी होना धि-चलना,भूखा रहना भडि-बक २ करना तुड-तोड़ना व्यय-डरना ६६-भ्वादिगणीय 'अ' विकरण से परे यदि आकारादि प्रत्यय (ऐसा प्रत्यय जिस के आदि में प्राकार है ) हो तो उस प्रत्यय के प्राकार के स्थान में “ इ" हो जाता है । यथा-ए++पातेए++इते-एधेते ॥ * ए" धातु के रूप ( वर्तमान काल में ) एकवचन द्विवचन बहुवचन एधते एधेते एधन्ते वह बढ़ता है धे २ बढ़ते हैं। वे सम बढ़ते एधसे एधध्ये सुम सब बदतेहो एधावहे एधामहे मैं बढ़ता हम सब बढ़ते हैं। ६६-सार्वधातुकमपित ।। २। ४ अपिस्मार्वधातुक डिद्वत् भवति ॥ भासो ङितः ७।२।१ अतः परस्य ङिता. इय • wala प्र० पु० म० पु० एधेये तुम २ पढ़ते हो तुम बढ़ते हो प० पु० एध हम २ बढ़ते हैं माकारस्य
संस्कृतशिक्षक।
वाक्यों के उदाहरण ।
भानुर्भासते-सूर्य प्रकाशित होता है । गुरवो
यतन्ते-गुरु यत्न करते हैं। बालका: रमन्ते बालक
खेलते हैं ।
मोदकान्स्वादन्तेऽध्यापका: पण्डित
लड्डनों को चखते हैं । वस्त्राणि दधामहे-हम सब
वस्त्रों को धारण करते हैं । भिक्षुको भिक्षेते-दो
भिखारी भीख मांगते हैं । अनूचानाः भाषन्तेः
विद्वान् कहते हैं । भत्याः भार सहन्ते-नौकर बोझ
को सहते हैं । उपकारेण श्लाघसे-तू उपकार से
प्रशंसा करता है । हरिभण्डते हरि बहुत बोलता
है । हरे भण्ड से-हे हरे ! तुम अधिक बोलते हो ।
गुरूम बन्दसे - तुम गुरु को प्रणाम करते हो ।
भाषा बनाओ।
कठेराः क्लिन्दन्ते । बालको रमेते । नदित्सवः
लवन्ते । भिक्षुकाः विष्णुभ्यः वन्दन्त । मटाः
भण्डन्ते । प्रातुराः क्लिन्दन्ते । अध्यापक: भाषते ।
बालकाः स्कुन्दन्ते । आतुरः संघते । रामः व्यथते ।
कृष्णः चेष्टते । रामम् श्लाघते ॥
संस्कृत बनाओ।
नौकर तोड़ता है। तुम वस्त्र धारण करते हो।
तुम कूदते हो । मोतबिर देखते हैं। फूल खिलते हैं
तारे प्रकाशित होते हैं । तुम सब अन्न मांगते हो।
दरिद्र प्रणाम करते । चोर डरते हैं ।
सहता हूं।
मैं
. प्रथम भाग इज्या-यज्ञ ईहा इच्छा स्त्रीलिङ्गवाची आकारान्त शब्दसूची । कन्या लड़की लता-बल मजा-रैयत मेधा-बुद्धि प्रजा-बकरी इत्या-पालकी ईर्ष्या-हसद, डाह कपर्दिका-कौड़ी उपचर्या सेवा उपदा-भेंट एडका-भेडी एला- इलायची कथा-कहानी कालिका-प्रतिमास गुटिका--गोली का देय व्याज मृत्तिका-मिट्टी गोवा, दमा-ज़मीन छुरिका-छुरी रिका-बांझ गौ ज्योत्स्ना-चांदनी रात समिना- अंधेरी रात दक्षिणा-फीस ६७-हलन्त शब्दों से परे और स्त्रीलिङ्गवाची प्राकारान्त, ईकारान्त शब्दों से परे प्रथमा के “स्" प्रत्यय का लोप हो जाता है । आया-स्त्री यथा-कन्या+स-कन्या ॥ ६७-अपक्त एकाहप्रत्ययः १।२।४१ एकास्प्रत्ययो यः सो पृक्तसंज्ञको भवति ॥ इल्यायो दीर्घात्मुतिस्यपृक्त इल ६ । १ । ६८ हलन्तात्परं दीघौं यो ड्यापौ तदन्ताच परं मुतिमील्येतदपक्तं हल लुप्यते । ११ संस्कृतशिक्षक। का । ६८-स्त्रीलिङ्गवाची साकारान्त शब्दों से परे प्रथमा, द्वितीया का " औ" प्रत्यय हो तो उस प्रत्यय के स्थान में इ " हो जाता है । तृतीया प्रत्यय वा षष्ठी, सप्तमी का प्रोस' प्रत्यय हो तो स्त्रीलिंग वाची आकारान्त अंग को एकारादेश हो जाता है । एवम् चतुर्थी से लेकर सप्तमी पर्यन्त के एकवचन सम्बन्धी प्रत्यय परे हों तो उन प्रत्ययों के पूर्व "या" का प्रागम होता है । यथा-कन्या+औ-कन्या+इ-कन्ये। कन्या+पा- कन्ये+मा-कन्यया कन्या+प्रोस् कन्ये+प्रोस= कन्ययोः। कन्या+ए-कन्या+या+ए-कन्याय ।कन्या+ अस-कन्या+या+मस-कन्यायाः ॥ ६८-स्त्रीलिंग वाची स्व धा दीर्घ स्वरान्त शब्दों से तथा पुल्लिंग में केवल · नी' शब्द से परे सप्तमी का एकवचन सम्बन्धी ४ इ प्रत्यय परे हो तो उस के स्थान में . आम् " आदेश होता है। ६०-औङ भापः ७ । १ । १८ आघन्ता दङ्गास्परस्प औङः शी स्यात् । औडियोकारविभक्तेः संज्ञा ॥ आडि चापः 9। ३ । १०५ आडि भोसि च परे भाबन्ताङ्गस्य एकारो भवति ॥ याडापः ७।३ । ११३ भापः परस्पद्विचनस्य याहागमो भवति ॥ ६९ राम्नद्याम्नीभ्यः ७।३ । १९६ नद्यन्सादाबन्ता. सोशब्दाच डेराम् भवति ॥ इदुद्भ्याम् ७।३ । ११७ दुः भ्यादीसं शकाभ्याम् परस्य रामादेशो भवति ।
प्रथम भाग। मयमा लता लता: एक बल २. बेल लताभ्याम् यथा- कन्या+( २१) इ-कन्या+(६८) या+इ- कन्या+या+साम्-कन्यायाम् ॥ आकारान्त लता " शब्द। एकवचन द्विवचन बहुवचन लते बहुतसी बेश द्वितीया लताम् लते लताः १ चेल को २ बलों को बहुतसी बेलों को तृतीया लतया लताभ्याम् लसाभिः १ येलो से २बे में बहुतमी बेलों से चतुर्थी लतायै लताभ्यः १ वेल के लिये २ बलों के लिये बहुतसी बेलों के लिये पञ्चमी लतायाः लताभ्यः २ बेखों से बहुतसी बेलों से षष्ठी लतायाः लतयोः लतानाम् १ बेल का बलों का बहुससी बेलों का लतयोः लतामु १ बेख में २ बेलों में बहुतसी बेलों में वाक्यों के उदाहरण । कन्या वाजति-लड़की चाहती है । कप- र्दिकाम् भिक्षन्ते भिक्षुका:-भिखारी कौड़ियों को मांगते हैं । मृत्तिकया पात्राणि रथयति-मिट्टी से बर्तन बनाता है । कन्याय इत्याम् नयामि लड़की के लिये पालकी लेजाता हूं । मृत्तिकाय खनित्रेण क्ष्माम् खनति-मिट्टी के लिये कुदाल से पृथिवी. को लताभ्याम् ২ ৰ ৰ सप्तमी लतायाम्
संस्कृतशिक्षक।
माम
खोदता है । छूरिका खलम् खादति-बांझ गौ खल
खाती है । अध्यापकायोपदाम् नयामि अध्यापक
के लिये भेंट को ले जाता हूं। हरिस्त मित्रायां व्रजति=
हरि अंधेरीरात में जाता है। अधमर्णः कालिकाम
नयति-कर्जदार माहधारी ध्याज को लेजाता है ।
भाषा बनाओ।
मेधायै यतन्तेऽनूचानाः । कृषकाः
नयन्ति । जाया कथाम् कथयति । प्रातुराय गुटिकाम्
रचयामि । हिरण्यायेहा भवति प्रदित्योः । इज्याय
चरूम् नयामि । ज्योत्स्नायाम् पठति शिष्यः ॥
संस्कृत बनाओ।
इलायची लाता हूं । भेड़ जाती है। परिडत
लोग कहानी बनाते हैं । रैयत का उपकार राज
लोग करते हैं। ईश्वर को प्रणाम करता हूं। ब्राह्मण
के लिये यज्ञ की फीस ले जाता हूं ॥
७०-जो तीनों लिंगों की सब विभक्तियों में
सष वचनों में एक से रहते हैं, अर्थात् जिन में किसी
प्रकार से रूपभेद नहीं होने पाता उन को प्रत्यय
कहते हैं ।
१२- सदृशं त्रिषु लिंगेषु सर्वात च विमक्तिषु ।
* वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
स्वरादिनिपातमव्ययम् १।१।३१ स्वरादयो निपा-
ताप ययसंशकानि भवन्ति।
प्रथम भाग। i amerion- . व-बहुत प्र-प्रभाव अस्तु-खैर, हो आशु-शीघ्र प्रागे तक, यतः }- भागे इव समान ईषत् कुछ अव्ययसूची। अय-अब, वा अधुना-प्रब अति-बहुत, देर अध:-नीचे प्रतीव- अलम्-जेवर, शक्ति, काफी, बस अग्रतः पारात्-दूर, नजदीक अग्रे अनु-पीछे, तुल्य, हिस्मा इदानीम्-अब मञ्जसा। शीघ्र, पन्हाय साक्षात उच्चैम ऊंचा अवश्यम-जरूर ऊर्ध्वम्-ऊपर प्रद्य-माज ते-विना अपरेयुः। एवम- ऐसा, ऐसा ही अन्येयुः -दूसरे दिन एकदा-एकवार अधरेद्युः कु-बुरा अपि भी, तौभी कदाचित् कभी किम्-क्या मातः, प्रगे-सबेरे वहिः-बाहर भोः-हे, ऐ गुलुगुधा-कष्ट, खेलना चिरम,चिरेण देर, च और, भी चिरात, चिराय देरसे जातु-कभी भी झटिति-जल्दी किञ्चित् कुछ पश्चात्-पीछे प्रायः-बहुधा तूष्णीम् चुप संस्कृतशिक्षक। तदा तब नहि,ना, -नहीं नमम-प्रगाम मा,माम्म, । -मत तथा-और तावत् तब तक तदानीम। द्राक-जल्दी नो, नेत्। नक्तम रात दिवा-दिनमें,दिन के समय नीचैः--नीचे पृथक अलग नोचेत्,नचेत्, नकिर-नहीं पुन:-फिर, पीळ तो, न हुआ तो मुहुः फिर, बारम्बार मनाक-थोड़ा यतः- क्योंकि, जिम से मो,माकिम यत् - जोकि, जो यावत् जबतक, जहां तक यथार्थम् । ठीक यथावत् । युगपत् एक साथ, विश्वतः) पूर्णतया, विश्वक । मब ओर से वेलायाम्-समय में सु-मच्छा समुपजोषम्-मानन्द श्वम् कल (आने वाला) स्वस्ति-प्राशीष,मंगल सकृत्-एकवार, तुरन्त, सदा, माय साक्षात्-प्रत्यक्ष,सामने सामि-प्राधा, छि: जल्दी,झट साफम,मार्धम्, सपदि साय तत्क्षण समम्,सवा, सह साम्प्रतम इस समय, अब, तुरन्त एक समय क्षेम कुशल सद्यः, - भूरि-बहुत प्रथम भाग। स अगले . ७१-----किसी की चिताना सम्बोधन कहाला है। इस में भी प्रथमा विभक्ति के ही प्रत्यय यक्त होते हैं, परन्तु इतना विशेष है कि सम्बोधन के नर्थ को दिखलाने के निमित्त गुणान्त अंग से परे एकवचन सम्बन्धी प्रत्यय का लोप होजाता है और यदि स्व इकारान्त, उकारान्त प्रातिप. दिकों को सम्बोधनार्थ परिणत करना हो तो एक- वचन सम्बन्धी अंग को गुणादेश होता है फिर स्” प्रत्यय का लोप हो जाता है ॥ यथा-राम+राम । हरि+स-हरे+म हरे । साधु+स् माधो+स साधो । कुछ शब्दों के सम्बोधन में रूप। एकवचन द्विवचन बहुवचन रामौ हे २ रामो हे बहुत से रामो कन्ये है लड़की हे २ लड़कियो हे ब० लड़कियो ११-स्थितस्याभिमुखीभावमा सम्धोधनं विदुः । प्राप्ताभिमुख्यः पुरुषः क्रियासु धिनियुज्यते एकवचन सम्बुद्धिः २।३ । ४६ सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धिसंज्ञ भवति ॥ एहस्यात्म माद्धः ६ । १ । ६९ एडन्ताधवान्ताच्चाङ्गदुल्लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत् ।। इस्वस्य गुणः ७ । ३ । १०८ इस्वस्य गुणो प्रति सम्बुद्धी सम्बोध घ २।३ । ४७ सम्बाधने घथमा विभक्ति. रामाः हे राम कन्याः अंधति ।।
संस्कृतशिक्षक। माध हे साधु हरे हरी हरयः हे हरि हे २ हरियो हे ब० हरियो साधी साधधः हे १ साधुभो है.व. साधुओ भाषा बनाओ। माम्प्रतम पठन्ति बालका: । सूपो बेलायाम रचयत्योदनम् । पुत्रेण माकं पिता गच्छति । नराः ययावत् यतन्ते । शु व्रति । अञ्जमा ईषत् लिखामि। विनो जातु नो याचति । अध्यापकाय नमः । कृष्णो झटिति व्रजति । रामकृष्णौ युगपत् रचयतः । प्रस्तु रामो पेष्टते । कठेरा: किञ्चित् भिक्षन्ते । मुहुर्भण्डमि। अद्य नयामि गृहे । हरिरधु ना धमति । राम ! किम् रचयसि । कृष्णः उच्चैः पठति । हरे ! पुष ! कदाचित् अगदम् नयसि । साधो ! सूपौदनम् रच. यसि ॥ संस्कृत बनाओ। हे रामः ! कृष्ण पुत्र को मजाता है । मोतबिर ठीक लिखते हैं । एक साथ फलों और फूलों के गुच्छों को राम लेजाता है । बन्दर जल्दी जाते हैं। चोर अंधेरी रात में धनों को चुपचाप चोरते हैं कृष्ण कपड़े को लपेटता है । विना हवनसामग्री के ठीक २ यज्ञ नहीं होता है । इस समय किसान खेत को जीतता है । वह कपड़े सुखाता है। बाहर दरिद्र कौड़ियां मांग रहे हैं । महात्मा उपदेश के प्रथम भाग। Hom M -पालना लिये शीघ्र जाते हैं । मनुष्य थोड़े पाप से भी लज्जित होता है । राम रात दिन ईश्वर की स्तुति करता है। * भ्वादिगणीयधातु दिवादिगणीयधातु लोक-देखना सू-उत्पन्न होना तेव, देव-खेलना री-चना, टपकना शिक्ष-शिक्षा देना वी-बरना, ग्रहणकरना सम्भ-विश्वास होना पी-पीना डी-उढ़ना दीप-प्रकाशित होना मन-जानना, मानना वह-पहुंचाना, ढोना, युज-समाधि करना लेजाना सृज-बनाना नद--गुनगुनाना युध-लड़ना लीमिलना, मिलाना ७२-जो समय अब तक नहीं बीता है वा बीत रहा है, किन्तु आगे होगा अर्थात् आने वाले * धातूनां संस्कृत पाठः-लोक दर्शने । तेव, देय देव मे । शिक्ष विद्योपादाने । स्त्रम्भु विश्वासे । ही विहायमा. गतौ । बङ् पालने । वह प्रापणे । षूद क्षरणे । णद अध्य- के शब्दे । फूड प्राणिप्रसवे । रीङ् अयणे । नीङ् वृणी- त्यर्थ । पी पाने । दीपी दीप्तौ । मग जाने । युज समाधी। मज विमर्ग । युध सम्प्रहारे । लोङ् श्लेषण । ७३-लुट् शेषे च ३ । ३ । १३ शेषे शुढे मविष्यतिकाले धातोख भवति क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा । १२ सूद-झरना
१०
संस्कृतशिक्षक।
प
के रूप
समय को " लट * अथवा भविष्यत् काल कहते हैं
यदि भविष्यत् काल के निमित्त किसी धातु
बनाने हों तो “ ति आदि २१वें प्रक्रम में कहे
प्रत्ययों से पूर्व ' स्य का पागम होता है।
-धातुओं में २१,२२वें प्रक्रम के अनुसार साये
हुये प्रत्ययों के अतिरिक्त कोई ऐमा प्रत्यय, जिम के
प्रादि में व्यञ्जनवर्ण हो, आये तो उस प्रत्यय के पूर्व
इ' का मागम होता है ।
यथा-वद्+इ+स्य+ति=षद्+r+ध्य+ति-पदि-
व्यति । दध++स्य+ते-दध+इ+व्य+ते-दधिष्यते ॥
वाक्यों के उदाहरण ।
प्राप्ताः सत्यम् कथयिष्यन्ति-मोतबिर सत्य
कहेंगे । ऋते जानान्न मुखम् भविष्यति विना ज्ञान
के मुख न होगा। नटाः नटिष्यन्ति-न नाचेंगे ।
युधका वस्त्राणि दधिष्यन्ते जवान वस्त्रों को धारण
करेंगे। नापितः रामम् क्षुरिष्यतिम्नाई राम की हजा-
मत बनावेगा। शिष्योध्यापकात् पाठम् पठिष्यति
शिष्य गुरु से पाठ पढ़ेगा ॥
स्यतासी मुलुटोः ३ । १३३ ललुटोः परत धातोः स्यतासी
प्रत्ययो वतः ॥
७३-मार्धधातुकं शेषः ३ । ४ । ११४ तिङःशितश्च
विहाय अन्यः प्रत्ययः आर्धधातुकसं जो भवति ॥ भार्थ.
धातुकस्येवलादेः ७।२ । ३५ बडादेरार्धधातुकस्यागमो
अति ॥
प्रथम भाग।
भाषा बनाओ।
राम: सामान् घूषिष्यति । बालको मोदकान्
स्थादिष्येते । नृपोन्तःपुरे मिष्यति । अधमर्णः
कालिकाम् नेष्यति । दुर्भिक्षे नराः रात्रिन्दिवमनाय
चिन्तयिष्यन्ति । तण्डुलैः सोदनम् पक्ष्यति । अध्या-
पको धनाय भण्डिष्यते । विप्राः शिवम् ऋचिष्यन्ति ।
बालको गोमायोः श्रमिष्यति । वमे कुकुमानि स्फुटि-
ध्यन्ति । रामस्य क्षेत्रम् कृष्णः हलिष्यति । मराः
पुण्येन नन्दिष्यन्ति । हरिः रज्जुम् वटिष्यति। कठेराः
नद्यां क्रन्दिष्यन्ति । सामिषं काका: लयिष्यन्ति ।
एडका डयिष्यन्ते । अनूचानःप्र गेऽक्षराणि लिखिष्यति।
तावत् बालकः पठिष्यति ॥
संस्कृत
बनाओ।
मैं ईश्वर की स्तुति करूंगा । वे कपड़ों को
काटेंगे । मूर्खता से दुःख होगा । महात्मापुरुष
प्राभ्युदय के लिये प्रयत्न करेंगे। नौकर छाता लेजा-
धेगा। मधुमक्खी गूंजेगी । मेहमान चमचों को ले
जावेंगे ॥
स्त्रीलिङ्गशब्दसूची।
मति-धुद्धि
श्रुति वेद
भूमि-ज़मीन
धुलि-धूल
मुक्ति-छुटकारा, नजात धेनु-गाय
अकपालि-धार
अग्रु=अंगुली
६२ संस्कृतशित्तक। युवप्ति-जवान स्ली अलु-छोटी गागर इष्टि यज्ञ ऋष्टि-तलवार कथा-चाबुक कुतू-कुप्पा गोधूलि संध्याकाल छिदि-कुल्हाड़ी शाति-वर्ण, वंश तमि-अंधेरी रात समिति-सभा घृत घी ( मपुर) ७४ - स्त्रीलिङ्गधाची स्व घा दीर्घ इकारान्त शब्दों से परे चतुर्थी से षष्ठी पर्यन्त के एकवचन सम्बन्धी प्रत्यय परे हों तो उन प्रत्ययों के स्वरों के स्थान में कोई तुल्यतम वृद्धि मंजक स्वर प्रादेश हो जाता है । अर्थात् प्रत्यय में । "ए" हो तो उस के स्थान में"ऐ और 'न' हो तो उस के स्थान में 'पा' हो जाता है यह नियम स्त्रीलिंगवाची दीर्घ ईकारान्त अकारान्त में तो नित्य प्रयुक्त होता है, परन्तु स्त्री- लिंगवाची हस्व इकारान्त और उकारान्त शब्दों में इम का प्रयोग करना न करना प्रयोक्ता की इच्छा पर निर्भर है ॥ यथा-मति+ए = मति+ऐ = मत्यै । धेनु+अस्- धेनु+मास्न्धेन्वाः ॥ - - - ७४-डिति हूस्वश्व १ । ४ । ६ इयङकङस्थानी स्त्री- शब्दमिनी मित्यत्रीलिजाबी दूतौ इस्वी च इतवर्णी खियां धा नदीसंजौ भवतः डिति परे ॥ आपनद्याः । ३ । ११२ नद्यन्तादङ्गात्परेषां डिसामाङागमो भवति ॥ आटुरच ६ । १ । ९० पाटोधि परे पहिरेकादेशो भवति ॥
प्रथम भाग।
१३
१५ दि सकार तवर्ग का शकार वर्ग के साथ
योग हो तो क्रम से सकार तवर्ग के स्थान में शकार
चकार हो जाता है ॥
यथा-रामम+चिन्तयति रामश्चिन्तयति ॥
७६-यदि त, द और न से परे ल हो तो त, द
और न के स्थान में लकार हो जाता है।
यथा-भिक्षकान्लक्षयमि-भिक्षुकाल्लंक्षयमि ॥
७७-यदि किमी व्यञ्जनान्त शब्द से अनुनासिक
वर्ण परे हो तो पूर्व व्यञ्जन के स्थान में तुल्यतम
अनुनासिकवर्ण आदेश हो जाता है ।
यथा-रामात्+नयति रामान्न यति ॥
७८-भकारान्त पद से कोई व्यञ्जन वर्ण परे हो
तो उस पदान्त “ म् " के स्थान में अनुस्वार हो
जाता है।
यथा-धनम् +त्यजति धनं त्यजति ॥
हस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग “अङ्कपालि” शब्द
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा अङ्कपालिः
प्रङ्कपालयः
७५-स्तोः श्चना श्चुः ।४। ४० सकारतवर्गयोः
शकारचवर्गाभ्याम् योगे शकारचव गौ भयतः ॥
१६-तोलि ८।४।६० तघर्गस्य लकारे परे परमपर्णी
भवसि।
७७-यरोनुनासिके नुनासिको बा ८।४। ४५ यरः पदा-
तस्यानुनासि परे भनुनासिको वा भवति ।
एकवचन
प्रङ्कपाली
६४ संस्कृतशिक्षक। १ धाय २ धाइयां बधाइयां द्वितीया अङ्क पालिम् अङ्कपाली अङ्कपाली: १ धाय को २ धाइयों को बधाइयों को तृतीया अङ्कपाल्या सङ्कपालिभ्याम् अंकपालिभिः १ धाय से २ धाइयों से बधाइयों से चतुर्थी अंकपास्य कपालिभ्याम् अंकपालिस्य: अंकपालये १ धायकेलिये २ धाइयों के लिये बधाइयों के लिये पञ्चमो अंकपाल्याः अंकपालिभ्याम् कपालिभ्यः कपाले: १ धाय से २ धाइयों से बधाइयों से षष्ठी नंकपाल्याः कपाल्योः सकपालीनाम् कपाले: १ धाय का २ धाइयों का बधाइयों का सप्तमी अङ्कपाल्याम् कपाल्योः कपालिषु प्रकपालो २ धाइयों में बधाइयों में सम्बोधन कपाले कपाली कपालयः हे धाय हे २ धाइयो हे बधाइयो उकारान्त धेनु " शब्द। द्विवचन बहुवचन प्रथमा धेनुः धन धेनवः १ गाय बहुतसी गाएं द्वितीया धेनुम् धेनू १ धाय में एकवचन २ गाय धेनूः प्रथम भाग। ह५ धेनुभ्याम् धेनुभ्याम् धेनुभ्यः १ गाय में १ गायको २ गायोंको ब० गायों को तृतीया धन्या धेनुभिः १ गाय से २ गायों से ब० गायों से चतुर्थी धेन्वै धेनुभ्याम् धेनुभ्यः धेनवे गायकेलिये गायों के लिये बगायों के लिये पञ्चमी धन्वाः धेनोः २ गायों से बगायों से षष्ठी धेन्वाः,धेनोः धेन्वोः धननाम् १ गायको २ गायोंको ब० गायों को सप्तमी धेन्वाम्,धेनौ धन्वोः धनषु २ गायोंमें ब० गायों में सम्बोधन धनो धेन हे गाय हे २ गायो हे ब० गायो भाषा बनाओ। अनूचानो श्रुतिम् पठति। साधवो मुक्त्यै यतन्ते। भूमौ धूलिर्भवति । युवतयो पुष्पं नयन्ति । रामः विद्या चक्रम् कृन्तति । कुतुमश्वाय नेष्यामि। भूम्याम् धेनवश्चरिष्यन्ति । अंकपालिः पृच्छति बालकान् । नायकः ऋष्टिना युद्धम् विधति व्रजिष्यन्ति । घृताय कुतुमीक्षसे । अग्रवःस्फुर्रान्त । गोधूल्यां बालकाः स्कुन्दिष्यन्ते । इष्टय भूमिम् खनति । श्रुत्या धर्मम् वदिष्यन्ति विप्राः ॥ १ गायमें धनवः - समित्याम् युवकः - संस्कृतशिक्षक। wamimana- ---- संस्कृत बनाओ। सभामों से उपकार होगा । लड़का कुरी से अंगुली को काटेगा । वृद्धों की जवान स्त्रियां नहीं होतीं। आजकल राजाओं के अनेक जवान स्त्रियां होती हैं । रात्रि में यज्ञ नहीं होता है । बुद्धिमान् बुद्धि से अन्नों को लौर रत्नों को इकट्ठा करेगा। नौकर सन्ध्याकाल में फूलों के गुच्छों को लेजावेगा। हम लोग छुटकारे के लिये प्रयत्न करेंगे। लड़के धूल से खेलते हैं । कल को नौकर अगीचे में छोटी गाग- रियों में पानी लेजावेंगे। जवान औरतें कमलों को चाहती हैं । मैं चाबुक चाहता हूं। वह तलवार से बकरे को सताता है । मैं भूमि के लिये सोचता हूं ॥ भ्वादिगणीय धातुसूची *। बुक्क-भौकना (५०) मा-तोलना (प. प०) लोच-देखना (प्रा०) क्लेश-सताना यस्=कोशिश करना ब्रीड-शरमाना क्षुभ-घबड़ा जाना भुम-तोड़ना संज्ञासूची। कुक्कुरः (पु०)-कुत्ता तृण (न०) तिनका तृप्ति ( स्त्री० ) सन्तोष धातूनां संस्कृतपाठः-बुक्क भाषणे । लांच दर्शने । क्लेश अव्यक्तायां वाघि बाधन इत्ये के। यस भये । इस सञ्चलने ॥ भृश्, भ्रश्-गिरना भ्यस डरना प्रथम भार्ग। ७८ जो आज न हुआ हो, किन्तु प्राज से पहिले हो चुका हो उसे अनद्यतन भूतकाल कहते हैं । यदि इस काल के निमित्त धातुओं के रूप बनाने हों तो धातु के पूर्व प्रकार का मागम होता है फिर धातु के नागे २१वें प्रक्रमानुसार जो ‘ति' प्रादि प्रत्यय प्राते हैं उन में से जो इकारान्त प्रत्यय (ति, अन्ति, मि ) हैं उन प्रत्ययों के अन्तिम इकार का लोप होजाता है । एवम् तस्, यस्, य और मि इन ४ प्रत्ययों के स्थान में क्रम से ताम्, तम्, त और अम् प्रादेश होते हैं । यहां यह भी ध्यान रखना चाहिये कि स्वरादि धातुओं से पूर्व प्राकार का प्रागम होता है। फिर इम आकार और अगले स्वर के स्थान में कोई तुल्यतम वृद्धि का आदेश माङ् माने । भृशु शु अधःपतने । यसु प्रयत्ने । ब्रीड लज्जायां धोदने च । भुम खराउने । se-अनद्यतने लङ् ३ । २ । ११९ अनद्यतनभूतार्थध- तेर्धातोर्लङ् भवति ॥ लुङ्लङ्लव डुदात्तः ६।४ । ७१ एतेषु परेषु अङ्गस्याडागमो भवति सचोदात्तः ॥ इतश्च ३ । ४ । १०० डितो लस्य परस्मैपदमम्बन्धिन इकारस्य नित्यं लोपो भवेत् ॥ तस्थस्थमिपांतांततामः ३।४ । १०१ डितश्चतुणी लामादयः क्रमाद्भवन्ति ॥ आडगादीनाम् ६ । ४ । ७२ अजादीनाम् धातूनामाहागमो भवति लुङादिष परेषु ॥ माटश्च ६ । १ । १० आटोऽधि परे वृद्धिरेकादेशा भवति ॥ अलोन्तस्य १।१ । ५२ संयोगान्तस्य लोपा ८।२।२३ संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपो भवति । १३ ६८ संस्कृतशिक्षक। में एकवचन धे दो हुए घे सब हुए प्रभवत होजाता है । अनद्यतनभूत को व्याकरण शास्त्र में लङ् " कहते हैं, अतः जब इम काल के निमित्त प्रात्मनेपदी धातुओं के रूप बनाने हों तो २१ मक्रम के कोष्ठान्तर के प्रत्ययों का प्रयोग करना होगा। परस्मैपदी धातु को इस काल में रूप देने पर 'अन्ति' के स्थान में 'अन् ' ही रह जाता है । अनद्यतनभूतकाल पर० “भू" धातु के रूप। द्विवचन बहुवचन मपु० अभवत् अभवताम् अभवन यह हुमा म० पु० अभवः प्रभवतम् तू हुआ तुम २ हुए तुम सब हुए उ० पु० अभवम् हम २ हुए हम सब हुए अनद्यतनभूतकाल में आ०प० “वेष्ट" धातु । द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष अवेष्टत प्रवेष्टताम नवेष्टन्त उसने लपेटा उन २ ने लपेटा उन सबनेल मध्यमपुरुष प्रवेष्टयाः प्रवेष्टेयाम् अवेष्टध्वम् सुमने लपेटा तुमरने लपेटा तुमस लपेटा उत्तमपुरुष प्रवेष्ट प्रवेष्टावहि अवेष्टामहि मैंने लपेटा हमर ने लपेटा हमसलपेटा प्रभवाव प्रभवाम मैं हुशा एकवचन प्रश्रम भाग। १६ A एकवचन ऐधन्त तुम २ बढ़े तुमस बबढे मैं बढ़ा ८०- एध ” धातु के रूप ( आ०प० ) द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष ऐधत ऐधेताम् वह बढ़ा वे २ बढ़े वे सब बढ़े मध्यमपुरुष ऐधथाः ऐधेयाम् ऐधध्वम् तू बढ़ा उत्तम पुरुष ऐधे ऐधावहि ऐधामहि हम २ बढ़े हमसबबढ़े -यदि वर्तमानकाल के रूपों में “स्म* उप- पद जोड़ दिया जाय तो यह अनद्यतनभूतकाल का ही द्योतक हो जाता है। यथा--रामः अयोध्यायाम् वमति स्म-राम भयो- ध्या में रहता था । वाक्यों के उदाहरण । घटाजलं रीयते स्म घड़े में पानी टपका। अश्व: सलिल अपीयन-घोड़े ने पानी पिया। माधुरयुज्यत-- माधु ने योग किया । ईश्वरो लोकमसृजत् ईश्वर ने लोक को रचा। नापितो माणवकं क्षुरति स्म =नाई ने बालक की हजामत की । गुरुं धर्म पृच्छामि स्म- से धर्म पूछता था । ८०-लट् स्मे ३ । २ । ११८ स्म शब्द उपपदे भूतानद्यतन- परोक्षार्थवृत्त धोतोलंट भवति अपर न च ३।२ । १९९ अपरोक्ष च भूतामद्यनमार्थवृत्तेर्धातोः स्म उपपदे लट् भवति । %3- मैं गुरु संस्कृतशिक्षक। Remory नेत्र स्फुरतः - भाषा बनाओ। अहं छत्रं स्म दधे । भृत्यो रज्जुमसृजत् । से. निकश्चौरममुञ्चत् । मनूचानोऽलिखत् पुस्तकामि । भूर्खाः अद्रुह्यन्त पण्डितेभ्यः । भानुरदीप्यत । शिष्यो गुरवे दक्षिणां यच्छति स्म । कृष्णोऽर्जुनं गीताम थयत् । प्रार्जुनो द्रोणाच्चिक्षते स्म स्म । स्वल्पमवापि धर्मस्य त्रायते मनुजं भयात् ॥ संस्कृत बनाओ। कुमारिल भट्ट पण्डित था । चिड़िया उड़ी । फल खिले थे। चोर घबराये । नदियां समुद्र में लीन हुई । ज्ञानी ईश्वर में मिल गया । राम ने पिनाक तोड़ा। मृत्यों ने कपड़ा लपेटा। ब्राह्मणों ने लडडू चखे। कछुमा मन्द २ चला । शशक कूदा और दौड़ा ॥ ८१-अम्बा वाचक शब्द और स्त्रीलिंगवाची ईकारान्त, ऊकारान्त शब्दों को यदि सम्बुद्धिसंज्ञक ( सम्बोधन में ) बनाने हों तो उन के अन्तिम स्वर को इस्व होजाता है ॥ यथा-हे प्रम्ब, हे नदि ॥ स्त्रीलिंगवाची शब्दसूची। नदी-दरिया नारी-स्त्री गौरी-किसी का नाम पत्नी-भार्या वाणी-शब्द, आवाज श्वस्त्रसास माता (मातृ)-मां वधू-बहू २१-अम्बार्थ न द्योईस्वः 9 । ३ । १०५ अम्बामा नद्या Fतानां च हूस्यो भवति सम्बुद्धौ ॥ अम्बा माता प्रथम भाग। pump प्रथमा १ नदी २ नदी १ नदी में नद्या: दीर्घ ईकारान्त “ नदी " शब्द (स्त्रीलिंग ) एकवचन द्विवचन बहुबचन नदी नद्यो बहुतसी नदी द्वितीया नदीम् नदी नदी: १ नदी को २ नदियों को बनदियों को तृतीया नद्या नदीभ्याम् नदीभिः २ नदियों में ब० नदियों से चतुर्थी नद्यै नदीभ्याम् नदीभ्यः १नदी के लिये २नदी के लिये बन० लिये पञ्चमी नदीभ्याम् नदीभ्यः २ नदियों में ब० नदियों से षष्ठी नायो: नदीनाम् १ नदी का २ नदियों का बनदियों का नद्योः २ नदियों में बनदियों में सम्बोधन नदि नद्यौ हे २ नदियो हे ब० नदियो अकारान्त “ वधू " शब्द (स्त्रीलिंग) द्विवचन बहुवचन ਬਣ १ बहू २ बहू द्वितीया वधूम् वध्वी वधूः १ नदी से नद्याः सप्तमी नद्याम् नदीषु १ नदी में नद्यः हे नदी एकवचन मथमा घध वधवः ब० बहू १०२ संस्कृतशिक्षक। १ यह को वध्धा २ बहुओं मे वध्वाः वध्या १ बहू का वध षु १ बहू में ब०बहुओंमें सम्बोधन वधु २ बहुगों को ब० बहु सोंको तृतीया वधूभ्याम् वधूभिः १ बह मे व० बहुओंमे चतुर्थी वध्ये वधूभ्याम् वाभ्यः १बहू के लिये २बहुओं के लिये बब० के लिये पञ्चमी वधुभ्याम् वधूभ्य १ वहूम २ वह नोंमे ब० बहुओंमे पष्टी वध्योः वधनाम २ बहुओं का बबहुमोका सप्तमी वधवाम् वध्योः २ बहुओं में वध्वो हे २ बहुओ हे ब० बहुमो भाषा बनाओ। अम्बा गौर्याः गृहे व्रजति स्म । श्वश्रू अभ्यमत् सिंहेन । वध काष्ठम् भुमति । माता सुतान् वायति । धैश्याः अन्नम् मायन्ते। अम्बाः सुवाणीम् सर्वदा कय- यन्ति । गिरिभ्यो गंगामानयत् भगीरथः । नार्यः नद्याम अजिष्यन्ति । कृष्णस्य पत्नी रामम् वन्दते ॥ संस्कृत बनाओ। नदी में जल है । गौरी साम के साथ गयी थी। माता ने बेटे को मजाया। राम की पत्नी मीता थी। हे मा ! प्रणाम करता हूं । हे बेटे ! तुम गौरी को हे बहू
प्रथम भाग।
१०३
-
प्रणाम करते हो वा नहीं? स्तियां नदी को जावेगा।
८२-विधि (प्राज्ञा ) निमन्त्रण ( न्योता )
सामन्त्रण ( मम्मति .) अधीष्ट (मार पूर्वक चाहना)
सम्प्रश्न ( पूछना ) प्रार्थना ( मांगना ) और आशो-
र्षाद देने के प्रार्थ में “ लोट लकार होता है।
८३-यदि लोट लकार के परस्मैपदी रूप बनाने
हों तो २१वें प्रक्रम से आये हुए “ति" और 'अन्ति'
इन दो प्रत्ययों के इकार के स्थान में उकार हो जाता
है तथा लङ् लकार के समान तम्, थम्, थ और
मिए के स्थान में ताम्, तम्, त और अम् शादेश
होते है और वः, मः के विमर्गों का लोप हो जाता है
एवम् ‘सि ' के स्थान में 'हि' भादेश होता है
८२-घिधिनिमन्त्रमा मन्त्रणा घास प्रश्न प्रार्थने लिङ्
३ । ३ । १६१ एष्यर्थेषु गिङ् भवति ॥ लोट् च ३ । ३ । ९६२
विध्य द्यथेषु धातीर्लोट् भवति ॥ आशिषि लिङ्लोटी
३ । ३ । १७३ भाशी विशिष्ट र्थे वर्तमानादातो लिंङ्लोटीभवतः
८३-एरुः ३। ४ । ८६ लोट् इकारस्य उः भवति || लोटो
लवत् ३ । ४ । ८५ लोटो लडवत् कार्य भवति । तामाद:
सनीपश्च ॥ सस्थस्थगिपां सांतार:३। ४ । १०१ उत्त.
प्रचतुणी लामादयः क्रमामयः ॥ नित्यं द्वित: ३ । ४ । Me
सकारान्तस्य जिदुत्तमस्य नित्यं लोपः ॥ से पिच्च ३।४।८७
नोटः मेहि सोपिञ्च ॥ अताहेः ६।४ । १०५ ' अतः परस्य
मेनिः ३।४।८९ लोटोमेनि: असि ।।
माहुत्तमस्य पिच्च ३ । ४ । १२ लोहुत मस्याट पिच्च ।।
हेर्लुक भवति
१०४ संस्कृतशिक्षक। पुरुष के पूर्व परन्तु प्रकार के भागे इम 'हि' का लोप होजाता है तथा 'मि' के स्थान में 'नि' होता है और उत्तम- आ " का आगम होता है । ८४-यदि चाहें तो लोट लकार के आशीर्वाद के अर्थ को प्रकाशित करने के लिये 'तु' और 'हि' इन दो प्रत्ययों के स्थान में "तात्" भी कर सकते हैं। ८५-लोट् लकार में प्रात्मने पदी रूप बनाने के निमित्त जो २१वें प्रक्रम के प्रत्यय हों उन में से जो एकारान्त प्रत्यय हैं उन के एकार के स्थान में प्राम् " होजाता है परन्तु ' से ' और “ ध्वे में के एकार के स्थान में क्रम मे “ " और " अम् मादेश होता है एवम् उत्तम पुरुष सम्बन्धी प्रत्ययों के एकार के स्थान में ऐकारादेश होजाता है । परस्मैपदी “ भू" धातु के रूप । लोट् लकार द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष भवतु, भवतात् भवताम् भवन्तु वे दोनों होवें वेसब होवें व एकवचन वह होवे ८४ तुयास्तातडा शिष्यन्यतरस्याम् ७ । १ । ३५ मा. शिषि तुह्योस्तातड्वा भवति परत्वात्सर्वादेशः॥ ८५-भामेतः ३ । ४ । ६० लोदए कारस्याम् स्यात् ॥ सघाभ्यां वामौ ३ । ४ । ९९ सवाभ्यां परस्य लोडेतः क्रमा. द्वामी भवतः ॥ एत ऐ३ । । । ९३ लोडुत्तमस्य एत ऐ भवतः
प्रथम भागें।
१०५
तू होवे
मैं होऊ
वह बढ़े
मध्यमपुरुष भव,भवतात् भवतम् भवत
तुमदोनोंहोलो तुमस बहोतो
उत्तमपुरुष भवानि
भवाव
भवाम
हम दो हो। हमसबहो।
आत्मनेपदी " एध ” धातु के रूप ।
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमपुरुष एधताम् एधेताम् एधताम्
वे दो बढे धे सब बढ़े
मध्यमपुरुष एधस्व एधेथाम् एधध्वम्
तू बढ़
तुमदोनोंबढ़ो तुमसब बढ़ो
*उत्तमपुरुष एधै
एधाव है एधामहै
हम २ बढ़े
हम सब बढ़े
वाक्यों के उदाहरण ।
नृपः जयतु-राजा जीते । धनम् उपकारण
भवतु-धन उपकार के लिये होवे । शिवः सुतम्
बायतु-ईश्वर पुत्र को बचावे । धर्मण एधै मैं धर्म
से बढू । शिष्यः पत्रम् लिखतु-शिष्य पत्र लिखे ॥
मैं बढ़
-
१५
संस्कृतशिक्षक।
सन्धिसूची।
कौमुद्यादि संस्कृत व्याकरण सम्बन्धी जितने
छोटे बड़े ग्रन्थ हैं उन में से अधिकतर ग्रन्थों में
सन्धिविभागादि प्रत्येक विषय पृयक २ रूप से
रक्खे गये हैं, परन्तु हम ने इस ग्रन्थ में ऐसा नहीं
कियाहै,किन्तु जहांपर जिमकी आवश्यकता समझी
है वहां पर वही लिखा गया है । इसमे उन कौमु-
द्यादि ग्रन्थों की शैली से इस ग्रन्थ की शैली में
बहुत कुछ भेद होगया है। अतः अब यहां पर उन
ग्रन्थों के अनुसार भी इस ग्रन्थ की शैली को
मिलाने के निमित्त तथा इस ग्रन्थ के अध्येताओं के
सौकरार्थ यहां पर सन्धिसूची पृथक दी जाती है।
यद्यपि इस सूची में आये हुए सब उदाहरणों के
सब नियम इस ग्रन्थमें यथास्थान प्राचुके हैं, परन्तु
वहां उदाहरणों की न्यूनता है । अर्थात् वहां पर
केवल एक पा दो ही ( उस स्थल में जो आवश्यक
समझा गया ) उदाहरण दिये गये हैं । अतः वहां
उक्त नियमों के अक्षर प्रत्यक्षर को स्पष्टीकरणार्थ
अधिक उदाहरणों का समावेश नहीं होसका। इन्हीं
दो हेतुओं से यहां पर सन्धिविभाग पृथकरूप
से दिया जाता है। यदि विद्यार्थिगण इस को ध्यान
पूर्वक देखेंगे तो हमारा विश्वास है कि उन को
स्वरसन्धि का ज्ञान अच्छा हो जायगा। एतदर्य
प्रथम भाग। १०७ उन को अन्य किसी विशेष ग्रन्थ के अध्ययन की प्रावश्यकता न पड़ेगी और उदाहरण भी सब ही ग्रन्थों से अधिक यहां पर सनायाम सरलतया मिल जावेंगे । व्यञ्जन एवम् विसर्गन्धि का समा- वेश द्वितीय भाग में होगा । अतिदरूप सिहरूप नियम सूत्र प्रक्रमाङ्क सहित पूर्ववर्ण परवर्ण पूर्वापरम्धान. भृतवर्ण पुरुष+अर्थ: भकः सवर्णे दीर्घः (१०) श्रा प्रा ए केद+श्रादिः कृष्ण+इच्छा परम+ईश्वरः पुरुषार्थः वेदादिः कृष्णेच्छा परमेश्वरः जन्मोत्सवः समुद्रोमिः आद्गुणः (३६) जन्म+उत्सवः श्रो भक श्रो समुद: अमिः ब्रह्म ऋषिः श्र ऋ प्रर ब्रह्मर्पिः बौकम् वृद्धिरधि (२६) P ऐ श्र श्री औ प्र श्री श्री अकः सवर्णे दीर्घ - श्राद्गुगाः ऐ ब्रा+ एकम परम + ऐश्वर्यम् परमैश्वर्यम् गुड+ प्रोदनः गुडौदनः तव + प्रौदार्यम् तबौदार्यम् यथा+ अर्थः यथाः या प्रा श्रा विद्या+श्रालयः विद्यालयः ए यथा + इच्छसि यधेच्छसि महा + ईशः महेशः महा+उरस्कः महोरस्कः गङ्गोर्मिः आ ऋ भर् महा+ ऋपिः महपिः प्रा ए ऐ क्षमा+एका समैका विद्या+ऐहिकी विद्यौहिकी भा ओ औ महा + प्रोजः मौजः मा भौ भौ रक्षा + औचित्यम् रक्षौचित्यम् प्राउ यो ऊ भो गङ्गा+अमिः वृद्धिरेचि प्रा ऐ :
संस्कृतशिक्षक। Pravad इकोयणचि (४१) । भकः सवर्णे दीर्घः यु को याचि प्रति+ एकः महती-इच्छा प्रका सवर्ण दीर्घः इको यणचि सन्धि+पत्र सन्ध्यत्र भग्नि+श्राधानम् अग्न्याधानम् प्रति+इतिः प्रतीतिः भूमि + ईशः भूमीशः भूमि + उद्धृता भूम्युद्धृता प्रति+अहः प्रत्यूहः अति+मरणम् प्रत्यृणम् य प्रत्येकः अति + ऐश्वर्यम् अत्यैश्वर्यम् श्री यो पचति + प्रोदनम् पचत्योदनम् भौ यौ कृषि + औक्षकम कृप्यौक्षकम् नदी--पत्र नद्यत्र प्रा या नदी--प्रायाति नद्यायाति महतीच्छा पृथ्वी-ईशः पृथ्वीश: सुधी-उपास्य सुध्युपास्य यू पृथ्वी-उपरा पृश्यूपरा ई मा यू कुमारी-ऋच्छति कुमायूच्छति बल्येतु सुधी-ऐश्वर्यम् सुध्यैश्वर्यम् श्रो यो पत्नी-प्रोकः परन्योकः है औ यो कुमारी-औदार्यः कुमार्योदार्य: मधु-अमृतम् मध्वमृतम् प्रा वा गुरु-प्रादेश: गुर्वादेश: इ वि वधु-इन्दति वध्विन्दति यी साधु-ईहते साध्वीहते बहु-उन्नतः बाहन्नतः बघु-जमिः बघूमिः भावू वस्वृते पध्वेति वस्त्वैक्यम् भो वो पम्वोदनम् मुष्टु X मौदनिकः मुष्ठवौदनिका व वध्वत्र बली-एतु ऐ है व अकः सवर्णे दीर्घः उ इको यणचि वसुते वधु पति वस्तु x ऐक्यम प्रभुx ओदनम् ३ औ वो वधू पत्र प्रथम भाग। १०६ वधूx इष्टिः भक: सवर्णेदीघः ऊ ऋ वृ को याचि वधु x ऐक्यम् तन्- ओजः ज औ वौ का यात ४ ईरितः ना ह साधू यासनम् साक्ष्वासनम कइ वि वविष्टिः वी वपु ४ ईक्षणम् प्रवीक्षणम् स्वयंभू x उत्सवः स्वयम्भूत्सवः भामू४ जहा भान्हा वधू मातुः ववृतुः वधु एतु वध्वेतु ववैक्यम् अ प्रोवी तन्वोजः वधू ४ औरसः वचौरसः मातृ x अनुमति: मायनुमतिः, भभारा पितृ x आज्ञा पित्राक्षा रि मातृx इच्छा मात्रिच्छा यात्रीरितः भ्रातृ उपदेशः भात्रुपदेश: स्वस जरीकृत स्वन्न सकृतम् ना भ ऋ यात ४ ऋजीपम् यात जीपम् होतृ एकत्वम् होत्रकत्वम् मा ऐ पितृ ४ ऐश्वयम् उद्गातुन श्रीक: उद्गात्रोक: श्रो रौ क्षत-नौरस्यः क्षत्रोरस्यः मे--प्रति जयति ए श्रा प्रया ते....अागता तयागता एइ अयि के-ह कायह ए ई भयी के-ईशितारः कयीशितार: ए 8 अयु ते-उद्गता तयुद्रता ए अ अयू इमे--अहिता इमहिता ऋ यू वने-ऋषयः वनवृषयः ए ए अये पुण्ये-एधांसि पुण्ययेधांसि ए ऐ अय पण्ये-ऐलेयम् पश्ययैलयम् ए प्रो भयो नगरे-धोकांसि नगरयोकासि भौ भयो शास्त्रे-औषधिः शास्त्रयौषधिः ऐ भ प्राय पत्न्यै-अकः पत्न्यायक: ऐ था भाया खजूम्यै-आज्ञा बचायायात्रा अकः सवर्णेदीर्घ: इको यणचि पित्रैश्वर्यम -- ऋ भो.रो एचो यथायाव: (२५) संस्कृतशित्तक । ऐ ह भायु ऐ Or रायो: भी ऊ भव इ भायि खत्म्यै-इच्छा लतम्यायिच्छा ऐई भायी श्रियै-ईहा श्रियायीहा श्रियै-उद्योगः श्रियायुयोग: भायू भूयै-ऊरीकृतम् भूत्यायुरीकृतम् ऐ , प्राय इत्यै-ऋत्विक हप्त्यायश्विक ऐ ए आये है-ए राय ऐ ऐ प्रायै कस्मै-ऐश्वर्यम् कस्माथैश्वर्यम् ऐ भो बायो-प्रोः ऐ भौ आयो रे-ौ रायो भो भ भव भो-प्रति भवति ओ पा श्रवा गुरो-प्राज्ञा गुरवाज्ञा ओ इ प्रवि पी-इत्र पवित्र भोई प्रवी भानो हा भामवीहा श्रो उ भव घटो-उत्ति बटवृत्तिष्ठ वायो-ऊना: वायवना: श्री भू अब वटो-क्षः वटवृक्षः भो .ए भवे गुरो-ए गुरव भो ऐ भवै प्रभो-ऐश्वर्यम् प्रभवैश्वर्यम् भो भो अवो गो-प्रोः भो ौ प्रवौ प्रभो-ौदार्यम् प्रभवौदार्यम् भौ प्रभाव पौ-प्रक: भौ भा भावा विष्णो -श्राग्रहः विष्णावाग्रहः भो इ प्रावि सख्यो-इच्छा सख्याविच्छा भोई प्रावी मित्रौ-ईर्ष्या मित्रावीया द्वायुपमिती औ ऊ भावु भूमौ-ऊषः भूमावृपः आजौ-ऋषिः भाजावृषि: औ ए भावे नौ-ए नावे भौ ऐ पावै गुरौ-ऐश्वर्यम् गुरावैश्वर्यम् भो भो प्रावो नौ-ओ: नावो: नौ औ भावो नौ-ौ नायौ h गवा: पावकः श्राव द्वौ-उपमितौ भौ प्रभाव प्रथमभाग। १११ कण्ठयतालव्या आवश्यक शब्दों के अंग्रेजी पर्यायवाचक F#fifadeIntransitive Verb. f49TU-Locative. Riff--Nasal. 9991512-Ablative. 47917 ar riter-Secondary or Indir.ct Accusative. 4599-Indeclinable. tulara 1919-IndeclinableCompound. arantino-Benedictive Mood. 590779--Prefix. 08997-Singular Number. gr-Labial. FTT-Case. -Palato-guttural. #trälau -- Labio-guttural. 60 --Guttural. offm-Nominative. 4.7792171-Active Voice. **- Accusative. ATTI-Instrumental, --Passive Voice. FYITY-Appositional Compound. f@g-Verb. 37-Conjugation or Class. zquif--Fourth class. fagiqato-Lingune-radicul. AJET 2#107-Determinative Compound. asu-Palata). Eritur - Third class. 4-Dental. Greuten-Dento-labial. SEAT-Long Vowel. faat16-Numeral Compound, faatar-Second class. द्वन्द्व समास-Copulative f6907-Dial Number. 910-Root of a verb, pappilas-Neuter Gender. 99197-Fifth class. afa-Root. 971-First class. grea---Masculine Gender. 9747-Affix, प्रधान वा मुख्यकर्म Primary or Direct Accusative. 4797-Plural Number. waniey-Intransitive Passive Voice. F-Cer:bral. qagras ( #AT)-Base #7-707749, First Preterite or Imperfect Tense. लट-वर्तमान लकार, Present Tense. faen-Gender f&t=9T1, Second Preterite or Perfect Tense. खु-सामान्यभूत, Third Preterite. 2
११२
संस्कृतशिक्षक।
E-mufasa, First or Definite Future.
--forfaqf, Conditional Mood.
El-matranfacti, Second or Indefinite Future.
MEINT, Imperative Mood.
Number.
-Letter.
agaftf-Relative Compound. 47-Class:
fafafaro-fafa, Potential Mood,
faziam-Adjective.
847-Consonanta
931-Sixth class.
#***fr-Transitive Verb:
Afir-Conjunction.
HartSeventh class.
FATH--Compound.
TFT-Dative.
BETTY-Genitive.
Arty-Vocative.
RIA-Pronoun.
alfa-Feminine Gender.
FTT-Vowel.
Na FT---Short Vowel.
-5
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