Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi

Muni Gyan · 2011/01

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प्रकृति भी
मुखर हो उठी
M
मुनिज्ञान
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प्रकाशक
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श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.) ३३४००१

प्रकृति भी मुखर हो उठी
मुनिज्ञान
प्रथम संस्करण १९८७
११०० प्रतियां
मूल्य : ७ रुपये मात्र
प्रकाशक :
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.)
मुद्रक :
जैन मार्ट प्रेस
समता भवन, बीकानेर (राज.)
--

"प्रकाशकीय"
साधुमार्ग की इस पवित्र पावन धारा को अक्षुण्ण
बनाये रखने के लिये बड़े-बडे प्राचार्यों ने अपना-अपना
महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । भगवान् महावीर के बाद
अनेक बार आगमिक धरातल पर क्रांति का प्रसंग आया
है । जिसका उद्देश्य श्रमण संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये
रखने का रहा । ऐसी क्रान्ति धारा में क्रियोद्धारक, महान्
आचार्य श्री हुक्मीचंदजी म. सा. का नाम विशेष रूप से
उभर कर सामने आता है। तत्कालीन युग मे जहां
शिथिलाचार व्यापक तौर पर फैलता जा रहा था । शुद्ध
साधुत्व की स्थिति विरल ही परिलक्षित होती थी, बड़े-२
साधु भी मठो की तरह उपाश्रयों में अपना स्थान जमाये
हुए थे । चेलों के पीछे साधुता बिखरती जा रही थी।
ऐसे युग में आचार्य श्री हुक्मीचंदजी म. सा. ने उपदेशों से
ही नहीं अपितु अपने विशुद्ध एवं उत्कृष्ट संयममय जीवन
से जन मानस को प्रभावित किया । आचार्य प्रवर केवल
तपस्वी अथवा संयमी ही नही थे वरन्' श्रमण संस्कृति के
गहरे आगमिक अध्येता श्रुतधर थे । आपके जीवन का ही
प्रभाव था कि हजारो स्त्री पुरुष आपके चरण सान्निध्य को
पाने के लिए लालायित रहते थे। 'तिन्नाणं तारयाणं' के
आदर्श आचार्य प्रवर ने योग्य मुमुक्षुओ को दीक्षित किया
और जो देशवती बनना चाहते थे,उन्हें देशवती बनाया। इस
प्रकार सहज रूप से ही चतुर्विध संघ का प्रवर्तन हो गया।
समुद्र में जिस प्रकार दूर तक गंगा का पाट दिखलाई
देता है वैसे ही जैन धर्म के समुद्र
में प्राचार्य प्रवर की यह
धारा एकंदम अलग-थलग सी परिलक्षित होने लगी । यहा से

( ४ ) ४ प्राज फिर साधुमार्ग में एक क्रान्ति घटित हुई । जिस क्रान्ति की धारा पश्चात्वर्ती आचार्यो से निरन्तर आगे बढ़ी । हमें परम प्रसन्नता है कि समता विभूति, विद्वद् शिरोमणि, जिनशासन प्रद्योतक, धर्मपाल प्रतिबोधक प्राचार्य श्री नानेश के सान्निध्य की हमे प्राप्ति हुई है । श्रद्धेय आचार्य प्रवर का व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व अनूठा एवं महनीय है। आपने एक साथ पच्चीस-पच्चीस दीक्षाएं देकर सैकड़ों वर्षों के अतीत के इतिहास को प्रत्यक्ष कर दिखाया है । ऐसी एक नहीं अनेक क्रान्तियां आचार्य प्रवर के सान्निध्य में घटित हो रही हैं । विशुद्ध संयम पालन के साथ आपके सान्निध्य में आपके शिष्य-शिष्या रूप साधु-साध्वी वर्ग ने सम्यक् ज्ञान विज्ञान की दिशा मे भी आश्चर्य जनक विकास किया है । शान्त क्रान्ति के अग्रदूत स्वर्गीय आचार्य श्री गणेशी- लालजी म. सा. की स्मृति मे श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ ने श्री गणेश जैन ज्ञान भण्डार की स्थापना की । ज्ञान भण्डार मे अनेकानेक प्रकाशित एवं हस्तलिखित ग्रन्थो का संग्रह हुआ है । हस्तलिखित अप्रका- शित ग्रन्थों का संचयन कर उन्हे भी अ. भा. सा. जैन साहित्य समिति सर्वजन-हितार्थ प्रकाशित कर रही है । इसी संकल्प की क्रियान्विति में इसे भी श्री गणेश जैन ज्ञान भण्डार से प्राप्त कर प्रकाशित करने में संघ हार्दिक सन्तुष्टि का अनुभव कर रहा है । प्रस्तुत पुस्तक का सुन्दर प्रणयन आचार्य प्रवर के अन्तेवासी सुशिष्य विद्वद्वर्य प्रोजस्वी प्रवक्ता श्री ज्ञानमुनिजी म. सा. ने किया है । श्री ज्ञानमुनिजी ने मात्र १४ वर्ष की

( ५ )
वय में आचार्य-गुरुदेव के सान्निध्य में दीक्षित होकर १६
वर्ष की वय मे परीक्षा बोर्ड की सम्पूर्ण साधुमार्गी
परीक्षाओं को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर परीक्षाबोर्ड में एक
कीर्तिमान स्थापित किया है। मुनिश्री प्रखर मेधा के धनी
होने के साथ ही प्रखर व्याख्याता है ।
मुनिश्री की प्रखर मेधा ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में
साहित्य-रचनाकर साहित्य श्री में विशिष्ट अभिवृद्धि की है।
आपश्री ने मुक्तक-संगीत-चिन्तन-इतिहास-उपन्यास-कविता
आगम आदि अनेक विध साहित्य का सर्जन एवं सम्पादन
किया है । आपकी सम्यक् ज्ञान के साथ तप सयम की
आराधना आचार्य-प्रवर के सान्निध्य मे सतत प्रगतिशील है।
हमें आपश्री के व्यक्तित्व-कृतित्व के प्रति गौरव है ।
प्रस्तुत 'प्रकृति भी मुखर हो उठी' नामक पुस्तक में
मुनिश्री ने अपने प्रखर चिन्तन के माध्यम से प्रकृतिगत
अवस्थाओ को कथात्मक शैली में प्रस्तुत करने के साथ ही
मानव को मार्मिक प्रेरणा भी दी है । इसमे जहां पाठक की
कथा-लिप्सा पूर्ण होती है वहां साथ-साथ मे आत्मा के
गुरणों का भी ज्ञान होने लगता है ।
पुस्तक लघु होते हुए भी विशिष्ट एवं उपयोगी है।
आशा है पाठक इससे लाभान्वित होगे ।
चुन्नीलाल मेहता धनराज बेताला गुमानमल चोरडिया
मन्त्री
संयोजक
अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ
साहित्य समिति
अध्यक्ष

प्रकृति भी मुखर हो उठी
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मानव के उद्भव एवं विकास
के विषय में सोचा जाय तो ज्ञात होगा कि आदिमकालीन
युग में मानव पशु की तरह जीवन व्यतीत करता था । उस
समय उसके पास रहने के लिये मकान, खाने के लिये स्वा-
दिष्ट भोजन एवं पहनने के लिये कपड़े नहीं थे । जंगलो में
इधर से उधर परिभ्रमण किया करता था । आज की तरह
का यांत्रिकी विकास उस समय नहीं था। जैन-दर्शन की
दृष्टि से आदिम कालीन युग, यौगलिक काल के रूप में प्रति-
पादित हुआ है।
मानव अपने चिन्तनशील मस्तिष्क का उपयोग
तथा आदिमकालीन युग की परिधियों को पार कर विकास
के सोपानों पर निरन्तर आगे बढ़ता चला गया और आज
भौतिक दृष्टि से बहुत कुछ समृद्ध बन चुका है । पर इस
विकास के पीछे वह नेच्युरल-प्राकृतिक जीवन से पिछड़ा ही
नहीं अपितु बहुत दूर चला गया । आज तो अधिक से अधिक
अप्राकृतिक प्रायोगिक जीवन में ही जी रहा है । खान-पान,
रहन-सहन आदि सभी कार्यों में विभाव का ही रूप विशेष
रूप से उभरता चला जा रहा है। इन वैभाविक परिणतियों
के कारण ही सुखी जीवन से वह बराबर वंचित रह रहा
है । शांत और सुखी बनने के लिये हमें विकासशील युग के
साथ ही प्राकृतिक जीवन में जीना होगा । प्राकृतिक चिकित्सा
को भी इसीलिये महत्त्व दिया गया है । आयुर्वेदिक एवं

( ७ )
ऐलोपैथिक चिकित्सा से जो रोग शांत नहीं होता, उसे
प्राकतिक चिकित्सा जड़मूल से उखाड़ कर फैक देती है,
क्योंकि मानव का रोग जहां से प्रारम्भ हुआ है, प्राकृतिक
चिकित्सा उसे वहीं ले जाकर खड़ा कर संशोधित करने का
प्रयास करती है।
उत्पत्ति के साथ ही मानव में कषाय एवं विषयों का
उभार बहुत कम प्रतीत होता है पर ज्यों-ज्यों वह दुनियां के
रंगमंच पर बढने लगता है,त्यों-त्यों उसमें विकृतियां घर करती
चली जाती है, क्योंकि उसके आसपास का परिकर उसे
लगभग अप्राकृतिक एवं विषयो से भरा मिलता है । वर्तमान
के इस वातावरण को देखते हुए कहते है कि सदियो से
मौन रहने वाली प्रकृति भी मुखर हो उठी । उसे अपनी
गोद में जीने वाले सर्वश्रेष्ठ मानव के भीतर प्रवेश करने
वाली विकृति कतई सहन नही हुई और वह भिन्न-२ तरीके
से मानव को स्वभावस्थ करने के लिये समझाने लगी।
प्रकृति के इस मौखर्य को कल्पना के आधार पर प्रस्तुत
करने का प्रयास इस 'प्रकृति भी मुखर हो उठी' के अन्दर
किया गया है । चिन्तनशील मानव को सुख की सच्ची
सुवास प्राप्त करने के लिये स्वाभावस्थ होना ही होगा । सर्प ।
कितना भी टेढ़ा-मेढा चल ले, पर बिल मे प्रवेश करने के
लिये तो उसे सीधा ही होना होगा । मानव ने भी शान्ति
को प्राप्त करने के लिये बहुत दौड़ लगा ली । भिन्न-भिन्न
तरीके से बहुत प्रयास कर लिये, फिर भी इच्छित शाति
की उपलब्धि तो नही हुई वरन् वह और अधिक अशान्त
एवं उद्विग्न बनता चला गया । अतः मानव को शांति पाने
के लिये अप्राकृतिक टेढापन छोडना होगा ।
जितने भी अतीत में महापुरुष हुए, लगभग सभी ने
अपनी आत्म-शक्ति को जागृत करने के लिये अप्राकृतिक
---

( ८ )
परिकर से हटकर प्राकृतिक क्षेत्र में रहना पसन्द किया था
अर्थात् भौतिकता की आसक्ति से हटकर अध्यात्म में रमण
किया था इसलिये परम शांति की अनुभूति की ।
पर बड़े-२ बंगलों में रईसों की तरह जीने वाला
इन्सान अपने दुःखों का अन्त नहीं कर सका । अतः शांति
को प्राप्त करने के लिये प्रकृति की मुखरता को सुनने का
प्रयास करें और उसे जीवन में स्थान दें ताकि हमारी आत्मा
का प्राकृतिक रूप उभर सकें।
समता-विभूति, अनन्त आराध्य, समीक्षण योगी,
अनल्प उपकारीगुरुदेव प्राचार्यभगवन् श्रीनानेश का पतित-पावन
कृपा वर्षण एवं सुखद सान्निध्य, मुझे साधना में सतत गति
दे रहा है । साथ ही मुनिकुमारों की ममतामयी माता,
शासन प्रभावक, परम उपकारी इन्द्रचन्दजी म.सा. के मातृ
वात्सल्य एवं उपकारों को भी विस्मृत नहीं किया जा
सकता है । दोनों महापुरुषों के प्रति असीम श्रद्धा को
संजोए, प्रस्तुत है-
प्रकृति भी मुखर हो उठी
२६-८-८६ शुक्रवार
मुनिज्ञान
महावीर भवन नया बास
ब्यावर (राज.)
卐

समर्पण
जिनके सम्यक्
साधनाशील
उत्तुङ्ग-गिरि से
प्रवाहित
समता निर्झर में
आप्लावित हो
अमरता के
पथ का
पथिक बना
उन्हीं
अनन्त-अनन्त आराध्य
गुरुदेव
आचार्य श्री नानेश
को
मुनिज्ञान
महावीर भवन, नया बास
व्यावर (राज.)
२६-८-८६
शुक्रवार

मर्यादा ही उत्तम आचरण का सुरक्षा कवच है, प्रभु महावीर का संदेश है कि आचरण की धारा सम्यक्ज्ञान के चट्टानी तटबन्धों में ही मर्यादित रहनी चाहिये । आचार्य स्वर्गीय गुरुदेव श्री गणेशीलालजी म. सा. ने श्रमण संस्कृति की सुस्थिति एवं उन्नयन के लिये शांत- क्रान्ति का अभियान चलाया, इस अभियान को प्रोजस् प्रदान करना साधुवर्ग का दायित्व है, इसके लिए साधुवर्ग को जहां साधना के पथ पर अविचल रूप से प्रारूढ़ रहना है वहीं अपनी साधनागत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति द्वारा सामान्य जन के लिए सुदृढ़ साधना सेतु का निर्माण भी करते चलना है । "शान्त-क्रान्ति" आत्म-साधना से ही परात्म-साधना के उदय का अभियान है जो प्रात्म पक्ष, परात्म-पक्ष एवं परमात्म पक्ष तीनों को उजागर करने में सक्षम है। साधु समाज ने विगत पच्चीस वर्षों में सम्यक् ज्ञानार्जन की दिशा में अच्छी दूरी तय की है, रथ बढ़ रहा है, पथ भी प्रशस्त हो रहा है".."।। ----आचार्य श्री नानेश' - १. प्रवचनांश

यत्किञ्चित्
।
.
"प्रकृति भी मुखर हो उठी" पुस्तक को मैंने आद्यो-
पान्त्य श्रवण किया । कलेवर की दृष्टि से कृशकाय होने पर
भी इसमें उल्लिखित संवाद ऐसे हैं जो जीवन को समग्रता,
सार्थकता एवं पुनीतता प्रदान करने का सामर्थ्य रखते है।
मानवजीवन की दुर्बलताओं को उजागर करके निर्दोष बनाने
की एवं सर्वोपरि अभ्युदय की दिशा का निर्देश करते हैं ।
-
-
ये सवाद आबालवृद्ध' जैन-जैनेतर सभी धर्म के अनु-
यायियों; सभी वर्गों और वर्णो के विचारवान जनों के लिए
समान रूप से उपयोगी है- उपकारी है। इनमें नैतिकता
और धार्मिकता का अद्भुत समन्वय है । लेखक का दृष्टि-
कोण जन-साधारण को ऐसा संदेश देने का रही है, जिससे
देवदुर्लभ यह मानवजीवन दिव्य और भव्य रूप मे पलट
सके । यही कारण है कि भाषा को अलकृत बनाने के झमेले
में न पड़कर अतीव सरल, सुबोध एवं सामान्य से सामान्य
योग्यता वाले पाठकों की समझ मे आ जाने वाली भाषा
का प्रयोग किया गया है ।
म
।
।
पुस्तक के लेखक श्री ज्ञानमुनिजी महाराज सार्थकनामा
है । अल्पवय मे भी उन्होंने संस्कृत-प्राकृत आदि भाषाओं
और दर्शन आगम आदि विषयों का गहरा अध्ययन किया
है । यही नहीं उनकी प्रज्ञा कुशाग्र है, वे नैसर्गिक प्रतिभा से
--

(१२)
सम्पन्न हैं । प्रस्तुत पुस्तक इस तथ्य की साक्षी है कि उन्होंने
प्रकृति का भी गम्भीर रूप में अवलोकन, चिन्तन और मनन
किया है । वे साधारण-सी प्रतीत होने वाली घटना से
कितना महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालते हैं और पाठकों के समक्ष
प्रस्तुत करते हैं, यह देखकर किसे सुखद आश्चर्य न होगा
वही सत्पुरुष ऐसा कर सकते हैं जो ज्ञान के साथ संयम की
साधना में भी निरन्तर निरत रहते हैं ।
इस पुस्तक को प्रस्तुत करने के लिए श्री ज्ञानमुनिजी
महाराज बधाई के पात्र हैं । आशा है भविष्य में भी मुनिश्री
की प्रकृष्ट प्रतिभा अन्यान्य ग्रन्थ रत्नो से साहित्य-भण्डार
को समृद्ध बनाएगी।
-~-शोभाचन्द्र भारिल्ल
वीर संवत् २५१३
चम्पानगर, ब्यावर
-

अनुक्रमणिका क्रमांक विषय पृष्ठ संख्या १. २. ३. ar rf wis w o ५ ६. ७. कुसुम और कंटक मिट्टी और कुभकार घरती का आज्ञाकारी पुत्र लोहा और लुहार मूर्ति और शैतान कलम और कागज क्रोध और मान ईश्वर और पादमी नर और वानर नदी और शैतान बादल और हवा कीचड़ और कमल दांत और जीभ प्रकाश और अधेरा चेहरा और दर्पण दारू और दारूड़िया धोबी और कपड़ा आम्र वृक्ष और खजूर वृक्ष १० ११ १२ १३ १४ . १०. ११. १२. १३. १४. १५. १७ १८ १६ २०' १७. १८. २२ ( १४ ) क्रमांक पृष्ठ संख्या विषय ताला और चाबी फूल और माली कौआ और आदमी धरती और अंबर दूध और पानी पत्थर और नदी चोर और तिजोरी खरगोश और शिकारी हल और धरती लोहा और आग शेर का मंतव्य २३ २४ २५ २६ २८ २९ ३० ३१ ३२ ३३ ३४ ३५ ३ नदी और समुद्र १६. २०. २१. २२. २३. २४. २५. २६. २७. २८. २६. ३०. ३१. ३२. ३३. ३४. ३५. ३६. ३७. ३८. ३६. ४०. ४१. ४२.. ४३. ४० ४२ ४४ ४६ गैस-सिलेण्डर हीरे का मूल्यांकन गुड मोर्निग ही गुड इवनिंग है हाथी और कुत्ता ना समझ कौन ? चातक शिशु का निश्चय ड्राइवर और गाड़ी हीटर और कूलर संघर्ष नदी और समुद्र का संगति किसकी करें ? दीपक और भास्कर नर्तकी और सितार शेर और कुत्ता ४८ ४६ ५३ ५६ (१५) न्या क्रमांक द्वष्ठ संख्या स । ४५. विषय पतंग और बालक मेंढक की बातचीत घट और पानी कछुए की इन्सान और फूल ६१ ४६. ४७. स वह रात ४८. ४६. २२ बीज का वृक्ष ६५ ६७ ६६ ७१ ७३ ७५ म. १०. ५१. ५२. ५३. २२ ३३ ३४ ७७ ५४. ८० ८२ ३८ ५६. ५७. ५८. कीचड़ और कंजूस वंश-दल का घर्षण पतंगिये की भिनभिनाहट मकड़ी का जाल सर्प का संदेश मूर्खता किसकी ? चिड़िया का संदेश गिलहरी का अथक परिश्रम मूषक का स्वार्थ कुत्ते की आदत कुत्ते की नासमझी हवा और वादल का संघर्ष चन्दन वृक्ष और सर्प इलेक्शन-सौरमण्डल का ८४ ४२ । ५६. १२ ४६ ६४ ६०. ६१. ६२. ६३. ६४. 8 १ १६ गधे की पुकार ६५. ६६. सृष्टि का विचित्र प्राणी पाषाण की महत्ता ९८ १०१ १०४ १०७ १०६

( १६ )
क्रमांक
पृष्ब संख्या
६७.
६८.
६९.
विषय
अपात्र को शिक्षा
दीपक का धुआं काला क्यों ?
वार्ताः चलनी और सुई की
लोहा, सोना कैसे बने ?
स्वार्थ आदमी का
११२
११४
११६
११८
१२०
७०.
७१.
1
-

( १ )
कुसुम और कंटक
फूल का सहवासी काटा, फूल का अधिकाधिक सम्मान
देखकर ईर्ष्यावश चीख उठा-क्यों, लोग तुम्हे ही पूछते है,
ऐसी क्या करामात है तुममे कि दूर दूर से मनुष्य ही नहीं
पशु-पक्षी भी खीचे चले आते है और तुम्हे अपनाने के लिए
लालायित रहते है । लेकिन मुझे तो अपनाने की बात तो
दूर रही छूना भी पसद नहीं करते । मुझसे इतनी अधिक
छुआछूत रखते है कि जब वे तुम्हे लेने के लिये आते है
तो बड़े सतर्फ रहते है । कही मै उनको छ न जाऊ ।
आखिर क्यो, मेरे से इतना भेदभाव रखा जाता है ?
मद मंद सुगंध बिखेरते हुए-मुस्कराते हुए फूल ने
कहा-दोस्त ! लोग इसलिए मुझे लेने के लिए आते हैं
कि मैं उन्हे भीनी-भीनी सुगंध देता हूँ। उन्हे प्रफुल्लता
एवं ताजगी से भर देता हूँ। भले वे मुझको तोडकर अलग
भी कर दे, मैं मुर्भा भी जाऊँ तो भी जीवन के अन्तिम
क्षणो तक उन्हे सुगंध ही सुगंध देता रहता हूँ इसलिये लोग
मुझे चाहते है । जव तुम भी अपने जीवन में परिवर्तन कर
लोगे तो लोग तुम्हे भी चाहने लगेगे पर तुम ऐसे हो कि
कोई तुम्हारे हाथ भी लगा दे तो इतने अधिक भड़क उठते

हो कि उसके हाथ से रक्त की धारा बह उठती है । ऐसी
स्थिति में लोग तुम्हे क्यों चाहेंगे ? उपादेय बनने के लिये
अपने में कुछ परिवर्तन तो करना ही होगा ।
"नही--नही, मै अपना स्वभाव नहीं बदल सकता।"
काटे की इस बात को सुनकर फूल ने कहा-तब तुम्हारे
साथ लोग ऐसा ही बर्ताव करेगे । तुम्हारा साथी यदि
उनके पैरों मे चुभ गया है
तो तुम्हारे साथी ही उसे
बाहर निकाल फेकेंगे। ऐसी स्थिति में तुम पैरों से भी
स्पर्श करने योग्य नही हो ।
कॉटा, फूल की सच्चाई का प्रतिकार नही कर सका
दुर्मन व्यक्ति अपने स्वभाव को बदल नही सकते है तो वे
कदापि शाश्वत रूप से उन्नति नही कर सकते है और न
उन्हे कोई चाहता है। वे अपनी ईर्ष्या की आग में ही
जलकर भस्म हो जाते है ।
4
-
२]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठ

( २ )
मिट्टी और कुंभकार
बार-बार पैरों तले कुचले जाने के कारण मिट्टी
अपने भाग्य पर रो पडी । अहो ! मै कैसी बदनसीब
कि सभी लोग मेरा अपमान करते है। कोई भी मुझे
सम्मान की दृष्टि से नही देखता और मेरे ही भीतर से
प्रस्फुटित होने वाले फूल का कितना सम्मान है । लोग उसे
गले मे माला पिरोकर पहनते हैं। भक्त लोग अपने उपास्थ
के चरणों मे चढ़ाते है । वनिताएं अपने बालो मे गूथ कर
गौरव का अनुभव करती है । क्या ही अच्छा हो कि मै भी
लोगों के मस्तक पर चढ़ जाऊँ ?
मिट्टी के अन्दर से निकलती हई आह को जानकर
कुंभकार बोला-मिट्टी बहिन ! यदि तुम सम्मान पाना
चाहती हो तो तुम्हे बहुत बड़ा सम्मान दिला सकता हूँ
लेकिन एक शर्त है।
एक क्या, जितनी भी तुम्हारी शर्ते हों, मुझे सभी
स्वीकार है । बस मुझे लोगो के पैरो तले से हटा दो,
कु भकार की बात को बीच में ही काटते हुए मिट्टी ने कहा ।

में
तो फिर ठीक है, तैयार हो जामो-कहते हुए कुभ
कार ने मिट्टी जमीन से खोदकर बाहर निकाली । गधो की
नवारी कराता हुआ उसे घर ले आया । पानी में डालकर
उसे बहुत समय तक आर्द्र (गीली) रखी । इतना ही नहीं
फिर पैरों से खूब रौदा । कष्टों को सहते हुए मिट्टी बोली-
अरे भाई ! बहुत कष्ट दे रहे हो । कब मुझे सम्मान का
पात्र बनायोगे ?
मिट्टी बहिन ! धैर्य रखो । सहते जाओ सभी । जरूर
तुम्हे इसका मधुर फल मिलेगा। कुभकार की बात सुनकर
मिट्टी कुछ नही वोली।
कुंभकार ने उसे चाक पर चढ़ाया और चाक को
तेजी से घुमाकर घड़े का रूप दिया । धूप सूखा
दिया।
कष्टों को सहते-सहते मिट्टी का धैर्य टूटने लगा तो कुभकार
बोला-बस-बस बहिन ! अव एक अग्नि परीक्षा ही बाकी
है और सभी मे तुम पास हो चुकी हो । यदि उसमें उत्तीर्ण
हो जाओगी तो सती सीता की तरह लोग तुझे भी मस्तक
पर चढ़ा लेगे । क्योंकि वह अग्नि परीक्षा पूर्ण उत्तीर्ण हुई
थी । इसीलिए सीता को लोग मस्तक झुकाकर सम्मान देते
थे, किन्तु तुम्हे तो वनिताए मस्तक पर चढ़ा कर घूमेगी ।
आखिर मिट्टी ने सब कुछ सहकर अग्नि परीक्षा भी
उत्तीर्ण कर ली । फिर क्या था । वनिताएँ उसे प्रतिदिन
नम्तक पर उठाकर इधर-उधर ले जाने लगी।
मिट्टी अपना इतना सम्मान देखकर प्रफुल्लित हो उठी।
आखिर महान् बनने के लिये कष्ट परिषह तो सहने
ही होते है।
-
४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ३ )
धरती का आज्ञाकारी पुत्र
धरती माता ने अपने सभी पुत्र-पुत्रियों को जन्म के
साथ ही सत् शिक्षाएँ दी थी। जिन्हे एक पुत्र के सिवाय
सभी अच्छी तरह से पालन कर रहे हैं परिणाम स्वरूप
उस एक के अतिरिक्त सभी सुखी है ।
वेटियों ! धरती मां ने गंगा-यमुना-सरयू को शिक्षा
देते हुए कहा था कि तुम्हे अपने पानी को सदा निर्मल
बनाए रखना है । चाहे तुम्हारे में कितनी ही गंदगी डाली
' जाए, तुम्हे गंदगी के साथ मिलकर अपने स्वभाव को नहीं
छोड़ना है।
गगा-यमुना-सरयू ने मा की बात को अक्षरश स्वी-
कार किया । इसी कारण आज भी लोग उन्हें पूजते श्रा
रहे है।
बेटे हिमालय को भी धरती मा ने शिक्षा दी थी कि
उन्हे हर तूफान में अडिग बने रहना है । वह भी मां
आज्ञा का पालन कर रहा है। लोग उसे भी गौरव की
दृष्टि से देख रहे है।
ठीक इसी प्रकार माँ ने अपने अन्यान्य संतानो को

शिक्षा देते हुए अपनी श्रेष्ठतम संतान मानव को भी शिक्षा देते हुए कहा-पुत्र ! तुम मेरे सबसे अधिक प्रिय एवं बुद्धिमान पुत्र हो । तुम अपनी बुद्धि का प्रयोग सदा परोप- कार में करोगे । दीन-दुखियों के प्रति आत्मीयता का व्यव- हार करोगे । यदि तुम मेरी शिक्षाओं को जीवन में उतार लोगे तो निश्चय ही पूरे विश्व पर तुम्हारा एकाधिकार राज्य होगा । तुम्हें वहां अमनचैन मिलेगा । जो तुम्हारे सिवाय किसी अन्य' के लिए संभव नहीं है । किन्तु मानव ने मां की आज्ञा का पालन नहीं किया इसलिए वह आज पशु से भी अधिक दुःखी जिदगी व्यतीत कर रहा है। 卐 ( ४ ) लोहा और लुहार लुहार के द्वारा बार-वार हथोड़े की चोट खाते हुए लोहा झल्ला उठा । तुम मुझे कितना ही पीट लो, मैं अपनी अक्कड़ छोड़ने वाला नहीं हूँ। जैसा हूँ वैसा ही बना रहूँगा। "तेरी यह अक्कड़ अधिक समय तक टिकने वाली नही है । एक न एक दिन तुझे मेरी इच्छानुसार पिघलना ही होगा । जानते हो आज आदमी ने तुझे और तुझसे भी ६ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी 'अधिक कठोर तत्वों को तरल बनाने की आधुनिक टेकनीक खोज निकाली है ।" हथोड़ो की चोटे लगाते हुए लुहार बोला । -- - लेकिन फिर भी जब लोहे को पिघलते नही देखा तो : लुहार क्रोध से तमतमा उठा । उसने लोहे को अग्नि में तपाना प्रारम्भ किया। कुछ ही समय के बाद लोहे की रग- रग में अग्नि प्रवेश कर गई । लोहा तपकर लाल सुर्ख हो गया । अपने शरीर को अग्नि मे इस प्रकार जलते देखकर लोहे की अक्कड काफूर हो गई । वह बोला-तुम चाहो, वैसे ढल जाऊँगा, अव तुम मुझे जलाना बंद कर दो । मार के पीछे तो भूत भी भागते हैं, बोलते हुए लुहार ने कहा- ठीक है तुम मेरी बात मान गए अब मै तुझे शीतल, कर देता हूँ। पूर्ण शाति प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को अपनी अक्कड की पकड़ छोड़नी ही होगी । 卐 आज की दुनिया में परिवर्तन हो रहा है । आदमी आदमी न रह शैतान हो रहा है । बदलते हुए रूप को देखकर लगता है सुज्ञो. मुनीम ही अब दुकान का मालिक हो रहा है ।। प्रकृति भी मुखरी हो उठी ] [७ ( ५ ) मूर्ति और शैतान कुणलता पूर्वक तरासी गई, नयनाभिराम मूर्ति रूप पाषाण को देखकर शैतान बोला-तुम कितने सुन्दर लगने लगे हो । तुम्हारी रमणीयता प्रत्येक दर्शक को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है । शिल्पकार ने अपनी कमनीय कल्पना को तुम्हारे में साकार कर दिखाया है । कितना अच्छा होता, तथाकथित सृष्टिकर्ता ईश्वर भी अपनी सुन्दर- तम कल्पनामों को मेरे मे साकार कर देता । शैतान की वात को सुनकर पापाण निर्मित मूर्ति मुखर हो उठी-देखो प्यारे ! तुम मेरे से भी अधिक रम- णीय नयनाभिराम हो सकते हो, किन्तु उसके लिये तुम्हें मेरी ही तरह समभाव पूर्वक सब कुछ सहना होगा । मूर्ति- कार ने जब मुझे सभी ओर से तरासना प्रारंभ किया, तब मैं होने वाली अत्यधिक पीड़ा को समभाव से सहती रही। कुशल शिल्पी ने मेरे अन्दर से निरर्थक तत्व निकाल फेके, तभी मैं मूर्ति रूप में निखर सकी । ठीक इसी प्रकार तुम्हारे भीतर मे रहने वाले काम-क्रोध, मद-लोभ, विपय-कषाय को गुरु रूपी शिल्पी तरासे तो तुम भी समभाव से सहते जायो । निश्चय ही तुम्हारी प्रात्मा शाश्वत रूप से रमणीय बन जाएगी ।

( ६ ) कलम और कागज अपने ऊपर पाती हुई कलम को देखते ही कागज ने कहा-जब भी तुम आती हो, मुझे सिर से लेकर पैर तक काले रंग से रंग देती हो । मेरी सारी शुक्लता और स्व- च्छता को विनष्ट कर देती हो । कलम ने कहा-देखो, मै तुम्हारी शालीनता-स्वच्छता भंग नही कर रही हूँ। बल्कि तुम्हारी उपादेयता मे निखार ला रही हूँ । जव तुम्हे मै अक्षरो की रगीनता से भर देती हूँ तो लोग तुम्हे सुरक्षित रखते है । समझदार व्यक्ति की दृष्टि में कोरे कागज का कोई विशेष महत्व नही होता । यदि इसमे कुछ न कुछ लिखा होता है तो सुन व्यक्ति अव- श्य उसे उठाता है और पढ़ने की कोशिश करता है तो भाई तुम्हारे ऊपर जितना अधिक लेखन होगा । तुम्हारी उतनी ही अधिक उपादेयता बढ़ती जाएगी । कलम की सत्य वात को, कागज ने सहर्ष स्वीकार कर ली । ऊपरी कालेपन या गोरेपन का इतना कोई महत्व नहीं है । महत्व तो उसका है कि उसके अन्तरंग में उप- योगी वस्तु क्या है ?

( ७ )
क्रोध और मान
एक ही आत्मा के साम्राज्य पर आधिपत्य जमाने वाले
क्रोध और मान परस्पर टकरा गए । क्रोध ने मान से कहा-
"छोड़ दो मेरे साम्राज्य को। आत्मा पर एक मात्र मेरा
ही आधिपत्य रहेगा ।" मान ने कहा-"नहीं । तुम हो ।
इस पर मात्र मेरा ही आधिपत्य रहेगा।" दोनों में बहुत
देर से तू तू, मै मैं होती रही । इसी बीच शैतान ने कहा--
"अरे ! ऐसे मत चिल्लायो । अगर मानव जाग गया तो
तुम दोनों को निकाल बाहर कर देगा । दोनों सहम गए ।
आखिर दोनों ने मिलकर एक रास्ता निकाल लिया । अहं.
मान से कहा-देखो । मेरा साम्राज्य अधिकतर मानव के
अन्तरंग में रहेगा और तुम्हारा साम्राज्य मानव के बहिरंग
में रहेगा । क्रोध ने मान की बात मान ली ।
आज भी अहं मानव के भीतर रहकर काम करता
है और क्रोध बाहर । किसी व्यक्ति ने किसी को अपशब्द
कहा तो अभिमान अंदर से कुंकार मारता है तो क्रोध वाहर
से चिल्ला उठता है ।
यह आपेक्षिक दृष्टिकोण है ।

( ८ ) ईश्वर और आदमी एक वार आदमी ने तथाकथित सृष्टि के कर्त्ता ईश्वर से शिकायत की । तुमने मुझे धोखा दिया है । पूरे जगत मे यह प्रचारित कर कि मानव दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है । लेकिन मै कहूँगा कि नहीं । पशु, मुझ से भी अधिक श्रेष्ठ है । जो सुख की नीद तो सोते है । जिन्हें किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक दुःख नही रहता । जब- कि मेरे साथ तून सारे ही दुःख लगा दिये हैं । ये बंगला, कार, हवाईजहाज आदि सारी सुख सामग्री तुमने हमको नही दी है । यह तो मैने अपने ही दिमाग से बनाई है । तुमने तो जो जाति पशुनो को दी है, उतनी भी हमको नही दी । मानव की अन्तर्वेदना को सुनकर द्रवित होते हुए ईश्वर बोला-देखो भाई ! मैने जो कुछ भी कहा, बिल्कुल सत्य कहा है । सारी दुनिया भी यही मानती है । मैने सुख का जितना बड़ा खजाना तुम्हे दिया है, उतना किसी को नहीं लेकिन तुम उस खजाने की ओर ध्यान न देकर सुख की खोज बाहर ही बाहर कर रहे हो । अपने प्राणों की बहुमूल्य ऊर्जा को बाहरी तत्वो मे खर्च कर रहे हो । इसी कारण दु.खी बन रहे हो । जरा बाहर से हटो-अन्तर्मुख

बनो । तुम्हें शान्ति का अखूट खजाना मिलेगा । मैंने वह
खजाना वहीं रख रखा है ।
मानव उस ओर ध्यान नहीं दे रहा है, इसलिये दुःख
का पात्र बन रहा है ।
卐
(६ )
नर और वानर
दो पथिक एक विशाल सघन-वृक्ष को देखकर थका-
वट दूर करने के लिये उसकी छाया मे बैठकर सुस्ताने लगे ।
एक पथिक ने वृक्ष पर बैठे बन्दर को देखकर दूसरे
पथिक से कहा- देखो । यह बन्दर बड़ा नकलची होता है ।
इसमे अक्कल नहीं होती। यह हर चेष्टा की नकल कर
लेता है, लेकिन उसके हानि लाभ को नहीं समझ पाता ।
दूसरे पथिक ने कहा-हां भई ! बात तो सही है।
वह नकल कर सकता है पर इसमें अक्कल नही होती ।
बन्दर इन दोनों की बातों को सुनकर चिउंका-तुम
नकलची बता रहे हो लेकिन जरा तुम अपने विषय मे भी
तो सोचो-तुम भी नकल ही कर रहे हो । अक्कल कहां
लगा रहे हो ? देखो हर आदमी रोटी खाता है, पानी
१२
२१
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

पीता है । तुम भी रोटी खाते हो, पानी पीते हो । धन कमाना, बच्चे-बच्ची पैदा करना सारे कामो में तुम भी दूसरो की नकल ही उतार रहे हो । यही नहीं पाश्चात्य संस्कृति की तो पूरी की पूरी नकल कर रहे हो । खान- पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, बोल-चाल में बस पाश्चात्य संस्कृति की ही नकल उतारने मे लगे हो । यह तो बतलायो कि तुमने किस काम मे अक्कल लगाई है । तुमने मस्तिष्क होते हुए भी अक्कल नही लगाई इसलिये तुम मेरे से भी गए बीते सिद्ध हुए हो । बन्दर की सच्चाई सुनकर दोनों ही पथिक चुपचाप उठकर रवाना हो गए । - 卐 ( १० ) नदी और शैतान हिमगिरि के उतु च शिखर से प्रवाहित हो कल-कल, छल-छल का निनाद करती हुई, सुख एवं आनंद से इठलाती नदी अपनी अपावन को पावन बनाने वाली सलिल धारा से वरती को अभिसिचित करती हुई विशाल जल राशि में अपने अस्तित्व को विलीन करने के लिये आगे बढती चली जा रही थी। नदी के इस स्वभाव को देखकर कषाय रूप कीचड़ प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ १३ । से सने, हैवानियत का रूप धारण किये शैतान ने नदी को सबोधित किया-अहो ! महद् आश्चर्यम् ! दुनियां तुम्हारे में कितना कूड़ा-कचरा, अशुचि डालती है, पर तुम अपने आप- को उससे निलिप्त रखकर अपनी परम-पवित्र धारा में ही प्रवाहित रहती हो । लोग तुम्हें पूजते है । मुझे भी लोग तुम्हारी तरह क्यों नही पूजते । नदी के कल-कल निनाद के रूप में वाणी मुखरित हुई-देखो भाई ! तुम भी निश्चित रूप से उपास्य बन सकते हो । पर लोगों की दृष्टि मे सम्मानित बनने के लिए कुछ तो अपने में रूपान्तरण लाना होगा। मेरे अन्दर कितना भी कूड़ा-कचरा प्रक्षिप्त कर दिया जाता है, ने अपने आप- उससे लिप्त नहीं करती। अपने ही स्वभाव में गतिशील रहती हूँ । इसीलिए लोग मुझे पूजते हैं । तुम भी, ऐसा ही स्वभाव अपना लो तो लोग तुम्हें भी पूजने लगेगे । सत्य है-आत्मा, विभाव से हटकर स्वभाव में पूर्ण- तया लीन हो जाती है तो संपूर्ण जगत् की उपास्य बन जाती है। ★ १४ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी ( ११ ) बादल और हवा काले कजरारे भीमकाय वादलो को देखकर आदमी भय के मारे कॉप उठा-यदि ये बादल सारे ही यही बरस पड़े तो प्रलय हो जायेगा। प्रार्थना की, मानवो ने, मेघ से-हे मेघराजा! तुम थोडा थोडा बरसो । अन्यथा तुम्हारा यह उपकार हमारे लिये घातक सिद्ध होगा । किन्तु मेघ ने एक नही सुनी और जोर से गर्जन-तर्जन करने लगा। हवा ने यह देखकर मेघ से प्रार्थना की-मेघ देवता! देखो अपना काम जनता का उपकार करना है, आप ऐसा न करे कि जिससे प्रलय की स्थिति बन जाय । घटाटोप वादल घड़घड़ाया, दुबली-पतली हवा को देखकर--जा, जा बड़ी शिक्षाएँ देने चली है, अपना काम कर । मेरे काम मे हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। कहा-मेघराज ! मैं आपके काम मे हस्त- क्षेप नही कर रही हूँ। किन्तु निवेदन इतना ही है कि आप अपने इस प्रलयंकर रूप मे कुछ परिवर्तन कर ले । लेकिन जब मेघ अपनी बात-पर ही अड़ा रहा तो हवा ने प्रलय से लोगों की रक्षा करने के लिए तूफानी रूप वारण किया कि भीमकाय वादल तितर-बितर हो गया ।

धनवान यदि अपने स्वार्थ में पड़कर गरीबों की नहीं
सुनता है तो उन गरीबों की निःसत्व सी प्रतीत होने वाली
आह भी, उसके वैभव को इसी प्रकार तितर-बितर कर
देती है ।
卐
( १२ )
कीचड़ और कमल
कीचड़ ने कमल से कहा-बड़े आश्चर्य की बात है
कि आखिर तू पैदा तो मेरे उदर से ही हुआ है लेकिन
दुनिया तेरे पास तो दौड़-दौड़ के पाती है और मुझसे दूर
भागती है । तुम्हारे प्रति आकर्षित होती है और मुझ से
घृणा करती है । आखिर ऐसा क्यों ?
कमल ने कहा--कीचड़ ! निश्चय ही तुम्हारा मेरे
पर बहुत उपकार है। मै यह उपकार कदापि नहीं भूल
सकता । लेकिन तुमने मेरे मे तो सुन्दरता और खुशबू भर
दी । पर तुम वैसे के वैसे ही दुर्गधमय और असुन्दर ही
रहे हो, जब तक तुम अपने को नहीं बदलोगी, तब तक
घृणापात्र ही बनी रहोगी ।
आज के कई उपदेशकों की वाणी सुनकर भद्रिक
आत्माएँ साधनाशील हो रही है । किन्तु वे उपदेष्टा अपने
को नहीं बदल पाने के कारण वही के वही अटके हुए है।
-१६ 1
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( १३ )
दांत और जीभ
दॉत और जीभ एकवार आपस मे टकरा गए ।
दाँतो की चोट को जीभ सहन नहीं कर पाई । खून की
धारा निकलने लगी । खून को देखकर जिह्वा क्रोधित हो
उठी । और दॉत को लताडने लगी । अरे निर्दय ! तू
जिसकी थाली मे खाता है, उसी मे छेद करता है । मेरे
लिए जो वस्तुएँ पाती है, उन्ही को तू चबाता है और मुझे
ही काटने लगा है। याद रख यदि मैंने तेरा साथ नहीं
दिया तो तू कुछ नहीं कर पाएगा ।
दॉत ने कहा-अहो जिह्वा रानी ! क्यो चिल्लाती
हो । इसमे गल्ती मेरी है या तुम्हारी ? मैं अपना काम
कर रहा था । तुम पहले ही चटखारा लेने के लिए मेरे
काम के बीच मे चली आई । यदि दूसरो के कामो मे टांग
अडायोगी तो फिर ऐसा ही फल पाोगी । याद रखो
आज तो मैंने थोड़ी ही चोट पहुंचाई है । अगर आगे से
मेरे कामो मे टाग अड़ाई तो काट के अलग करूगा ।
दॉत की जोश भरी बात को सुनकर जिह्वा सहम
गई और अपने काम में लग गई ।
दूसरों के कामो मे निरर्थक अपनी टाग अडाना निश्चय
ही स्वत: के लिए हानिकारक है ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १७

( १४ )
प्रकाश और अंधेरा
अग-जग को प्रकाशित करने वाले सूर्य के प्रखर प्रकाश
में भी अंधेरा देखकर रजनीपति उल्लू चीख उठा-अहो !
दुनिया कितनी पागल है । सभी कहते है सूर्य प्रकाश देता
है, लेकिन कहां, मैं तो अंधकार ही अंधकार देख रहा
'प्रकाश होता तो मुझे भी दिखलाई देता । सूर्य प्रकाश देता
है, यह मात्र लोगों की बकवास है ।
उदित होते हुए सूर्य ने उल्लू की चीख को सुनकर
उसे समझाया-भाई ! मैं प्रकाश देता हूँ, सारा जगत
इसका साक्षी है । तुम्हारे जैसो को छोड़कर दुनियां के किसी
भी व्यक्ति को पूछ सकते हो । रात्रि के अन्दर सोने वाले
सभी उठ बैठे है, जो कि मेरे प्रकाश का प्रमाण है ।
"मै नही मानता इसको' उल्लू ने अकड़कर कहा ।
तव सूर्य बोला-तुम मानो या न मानो, इससे मुझ
में कोई फर्क नहीं पड़ता। अन्य अनेकों के समझाने पर
भी उल्लू अपनी ही वात पर डटा रहा ।
खेर ! वह समझ ही नही सकता। क्योंकि स्वयं ही
गल्ती पर है, उसकी प्रकृति ही ऐसी है ।
दुराग्रही व्यक्ति को दुनियां की कोई भी शक्ति समझा
नहीं सकती।
१८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( १५ )
चेहरा और
दर्पण
चेहरे ने दर्पण को कहा-तुझे अपने आप पर वहुत
चमड है । चमक-चमक कर तू मुझ पर अपना रोब जमाता है,
कर तो कुछ सकता नहीं । बिब जब तुम्हारे सामने आता
है, तो ही प्रतिबिब तुम्हारे मे पड़ता है । सफाई का सारा
काम तो मानव को ही करना होता है । तू क्या करता है?
दर्पण ने बहुत ही शालीनता के साथ कहा-भाई !
इतना दर्प मत करो । आखिर तुम्हारी गंदगी तो मेरे कारण
ही दूर होती है। मेरे बिना तुम्हारी सफाई मानव भी
अच्छी तरह नही कर सकता ।
चेहरे ने कहा-नही-नही । यह तुम्हारा अभिमान
है । तेरे बिना भी मेरा काम चल सकता । दर्पण ने कहा-
ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा । आखिर एक दिन दर्पण देखे
बिना ही चेहरा मानव के साथ सभा मे जा वैठा । ज्यो ही
सभा में बैठा कि सभासदो को यह कहते हुए पाया कि-क्या
अाज तुमने अपना चेहरा दर्पण मे नहीं देखा ? कितने वब्बे
पड़े हैं चेहरे पर ?
यह सुनकर चेहरे को अपनी गल्ती महसूस हुई और
दर्पण की सत्यता जाहिर हुई ।
आज भी मानव महापुरुषो के आदर्शमय दर्पण को
नहीं देखकर अपने गरूर मे दुनिया के चौराहो पर खड़े
होकर दुःखो के थपेड़ों से अपमानित किये जा रहे है ।
न
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १६

( १६ ) "दारू और दारुड़िया" लड़खड़ाता हुया दारुडिया गटर की गंदी नालियों में गिरते हुए दारू के प्रति दहाड़ा, साले ने मेरी इज्जत मिट्टी मे मिला दी । कहां तो मैं आलीशान बंगले के मख- मली कालीन पर ऐश करता था और कहाँ इसने मुझे इस भयानक गंदगी में ला पटका है। सोचा तो मैने यह था कि वह उल्लू का पट्टा मुझे शाति देगा, किन्तु उसने तो मेरी रही सही शान्ति भी छीन ली । तब मादकता की जहरीली मुस्कराहट भरते हुए मदीरे ने कहा--क्यो बे ! अब क्यो चिल्लाता है । मैने कब कहा था-तुझे, मेरे पास आने को । तूने ही तो मुझे हंसते उछलते उदरस्थ किया था । अब जब मैं अपना प्रभाव दिखा रहा हूँ-तो तू चिल्ला रहा है ! तूने मुझे अपनाया है तो अपना पूरा काम किये बिना अब मै जा नही सकता। दारुडिया कुछ प्रतिकार कर पाता, उससे पहले ही वह भयानक दुर्गध के कारण अपनी सुध-बुध खो बैठा । बिना सोचे समझे ही मानव भौतिकता के सुनहरे आकर्षण मे फंसकर दुःखी बनता जा रहा है । २० ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( १७ )
'धोबी और कपड़ा"
धोवी के हाथो वार-बार मार खाते हुए कपड़े ने
कहा-तुम बहुत निर्दयी हो। तुम्हारे मे बिल्कुल भी रहम
नही है । मार-मार कर तुमने मुझे अधमरा कर दिया है ।
धोबी ने कहा-दोस्त जव तक तुम अपनी मलिनता
नहीं छोडोगे ! तब तक तुम इसी तरह मार खाते रहोगे।
मै तुम्हारे में हर बार स्वच्छता लाने की कोशिश करता
हूँ और तुम पुन पुन. गदे हो जाते हो !
कपड़े ने कहा-मै अपनी इस आदत को छोड़ नहीं
सकता । तो फिर मै भी तुम्हारी पिटाई नही छोड सकता।
एक सोट और लगाते हुए धोबी ने कहा ।
आत्मा भी जब तक कर्मो की गदगी नही छोडेगी ।
तब तक वह भी दु.खो से इसी तरह पिटती रहेगी।
卐
--
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ २१

( १८ ) "ग्राम वृक्ष और खजूर खजूर वृक्ष" एक दिन जंगल मे आम्र वृक्ष और खजूर वृक्ष में चर्चा चलने लगी । खजूर के वृक्ष ने कहा-अरे तुम तो निरे मूर्ख हो । ज्यों-ज्यो तुम्हारे ऊपर फल लगते है, तुम झुकते जाते हो । एक बच्चा भी तुम्हारे ऊपर से बिना कुछ परिश्रम किये फल तोड़ लेता है । ऐसी विनम्रता का आज की दुनियां में कोई सुफल नहीं मिलने वाला है । देखो ना, मैं कितनी ऊंचाइ पर फल लगाता हूँ, छोटे मोटे की बात तो दूर रही, बड़े से बड़े दक्ष व्यक्ति को भी फल पाने के लिये पसीने उतर पाते है । आम्र वृक्ष ने कहा- भैय्या । पूर्व जन्मों के अशुभ कर्मो के कारण तो हम वृक्ष बने है । यदि इस जीवन में भी थोड़ा बहुत उपकार करना नही सीखेंगें तो इस जीवन के आगामी जीवन भी निस्सार बन जाएगा । खजूर ने कुछ नहीं सुनी । वह अपनी ही अक्कड़ में तना रहा । थोड़ी ही देर मे भयानक तूफान पाया । आम्र वृक्ष की डालियां झुकी होने से वह बच गया । किन्तु खजूर वृक्ष जो अपनी ही अक्कड़ में तना हुआ था । तूफान उसे जड़मूल से उखाड़ कर भूमि-सात् कर दिया । आगामी जीवन को तो जाने दो, अभिमानी का वर्त- मान जीवन भी बिगडता जाता है । साथ, ने २२ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( १६ )
ताला और चाबी
ताले ने अकड़ते हुए चावी से कहा -अरे तू छोटोसी
मकड़ी ! तुझे शर्म नहीं आती, मेरे पेट मे घुसते हुए।
बड़ी होशियारी दिखाने लगी है लोगो को अपनी । सारे
घन का रक्षण
मैं करता
और कमाल तू दिखाती है ।
चल हट । आइन्दे मेरे पेट मे घुसने की कोशिश मत करना।
चाबी ने कहा-अरे ताले । अाज इतना बिगड़ क्यों
रहा है । तुझे अपनी ताकत पर इतना गरूर है तो ठीक
है, आज से मै तुम्हारे पास नही फटकूगी । चावी एक ऐसे
कोने मे जा दुबकी कि मानव को मिली ही नही । तव
आदमी ने आव देखा न ताव और हथोडे का प्रहार कर
दिया ताले पर । दो चार चोटो से ही ताला तड़-तड़ की
आवाज करता हुआ अपने ही अभिमान के परिणाम स्वरूप
एक और जा गिरा।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ २३

( २० )
"फूल और
माली"
से
,
खिलते हुए फूल को देखकर माली ने कहा फूल
कितने सुन्दर लग रहे हो तुम ? तुम्हारी सौन्दर्य छवी,
भीनी-भीनी सुगन्ध से भ्रमर
भ्रमर स्वत ही आकर्षित होकर
तुम्हारे पास पा रहे है ।
माली की बात को सुनकर फूल ने कहा-सच !
तुम्हारे निमित एवं मेरे उपादन ने मेरा रूप निखारा है ।
यदि मानव भी समन्वय की यह कडी सिखले तो उसका
भी जीवन उपवन खिल सकता है ।
A
आज वक्तायो मे आचरण कम हो रहा है ।
दीपक तले निरन्तर अधेरा हो रहा है ।
चौध की इस दुनिया मे मानो,
विना तराजू के ही तोल हो रहा है ।
चका
२४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( २१ )
"कौना और प्रादमी"
कौया की कॉय-कॉय सुनकर आदमी ने कहा कि
काग बहुत धूर्त और नीच जाती का पक्षी है । नीति में
भी कहा है - "पक्षिणा च वायस पक्षियो में कौया धूर्त
होता है । आदमी के मुख से अपने प्रति निन्दा युक्त वचनों
को सुनकर काग ने कॉय-कॉय करते हुए कहा-
तुम मेरी निन्दा कर रहे हो, कोई बात नहीं, लेकिन
क्या कभी तुमने अपने लिए भी सोचा है, तुम्हारा स्तर
कितना गिरा हुआ है ? मुझे खाने के लिए थोडी-सी भी
वस्तु मिल जाएगी तो मै आवाज लगा-लगाकर अपने सभी
सजातीय साथियों को एकत्रित करके फिर सबके साथ
खाऊँगा और एक तुम हो जो तुम्हे सबके सामने भी कोई
वस्तु मिल जाय तो मनुष्य जाति की बात तो दूर रही
अपने भाई को भी एक दाना नही दोगे ।
कहा मेरा स्तर और कहा तुम्हारा स्तर ? काग की
कड़वी सच्चाई को सुनकर प्रादमी मुह फेरता हुआ चुपचाप
चल पड़ा।
卐
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ २५

( २२ ) "धरती और और अम्बर" अनादि काल से एक दूसरे की ओर झाकने वाले धरती और आकाश ने एक दिन रात्रि की नीरवता में पर- स्पर वार्तालाप प्रारम्भ कर दिया । धरती ने आकाश से कहा---गगन भैया ! मुझे अनन्त काल हो गया इस प्रकार रहते रहते। मेरी छाती पर कभी पहाड बन गए तो कभी समुद्र बन गए । पहाड़ के स्थान पर समुद्र बन गए तो समुद्र के स्थान पर पहाड़ बन गए। श्मशान शहर बन गया और शहर श्मशान बन गया । लेकिन मैने किसी के साथ भी स्थायी लगाव नही रखा, इसीलिये वे सब तो ढह गए, किन्तु मै तो उसी रूप मे हूँ जिस रूप मे पहले थी । धरती की बात सुनकर अवर ने कहा-धरती वहिन! बस-बस तुम्हारी तरह ही मै हूँ । मेरे स्थान पर भी वादल बनते है, बिजलियां चमकती है, तूफान आते है, लेकिन मैं कभी भी उनसे अपना अभिन्न सम्बन्ध नही जोड़ता हूँ, अतः अन्त में मेरा निरव रूप उन सबसे हटकर प्रकट हो ही जाता है। २६ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

आश्चर्य इस बात का है कि धरती-अबर के अन्दर
कैसी भी स्थिति घटित होने पर भी वे अपना स्वरूप नही
छोड़ते है । अत. आज भी वे अपनी उसी शान मे आदमी
के सामने खड़े है । किन्तु सोचने समझने की शक्ति रखने
वाला आदमी जिससे भी जुडता है चाहे माता हो पिता हो,
भाई बहिन पत्नी कि वा धन हो बस उसी मै आसक्त बन
तन्मय हो जाता है । परिणाम स्वरूप आज तक वह अपनी
निजी शक्ति को प्रकट ही नही कर पा रहा है । इधर से
उघर सुख की फिराक मे दुःख की गलियो मे भटक रहा है।
विना नीव के मकान ढह जाता है,
बिना आधार के पानी बह जाता है ।
अन्तरंग की ठोसता नही होगी जव तक,
विना आधार का उत्थान ढह जाता है ।।
उगता हुआ सूर्य कमल को खिला रहा है,
उल्लू की आंखों को अन्धेरा दिखला रहा है।
महावीर का सदेश भी जन मानस को,
पाप और पुण्य की परिधि बतला रहा है ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ २७

( २३ )
"दूध और पानी"
से
एक दिन पानी ने
दूध कहा-वाह जनता ने
तुम्हारा बहुत अच्छा मूल्यांकन किया है तुम्हारी बहुत कीमत
है ससार मे । तुम्हें लोग पैसे से खरीदते है जबकि मुझे यों
ही मुफ्त में ले लेते हैं । यद्यपि तुम्हारे बिना लोगों का
काम चल सकता है, पर मेरे बिना नही । तथापि लोग
तुम्हे जितना चाहते है- उतना मुझे नहीं । कितना अच्छा
हो कि मै भी तुम्हारे जैसा बन जाऊं । दूध ने कहा बहुत
अच्छा । अगर तुम मेरे जैसा बनना चाहते हो तो बन सकते
हो, लेकिन तुम्हे इसके लिये कठिन साधना करनी होगी।
पानी ने कहा-अरे तुम जैसा कहो, वैसा करने
लिये तैयार हूँ । बस तुम मुझे अपने जैसा बना लो। तो
आ जाओ मेरे मे समाविष्ट हो जाओ । कर दो अपना
अस्तित्व विलीन मेरे में। अपना रूप-रंग-गध आदि कुछ भी
नहीं रहना चाहिये । दूध ने पानी से कहा ।
पानी ने वही किया। खो दिया अपना अस्तित्व दूध
में तो वह भी दूध की तरह ही मूल्यवान बन गया ।
यदि शिष्य भी अपना अस्तित्व पूर्ण रूप से गुरु चरणों
में विलीन कर दे तो उसका भी गुरुत्व निखर सकता है ।
२८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
.

( २४ )
"पत्थर और नदी"
नदी में पानी के थपेडो को खाते-खाते पत्थर को क्रोध
आ गया । और वह चिल्लाया कि तुमने तो मुझे साथ मे
इसलिये लिया था कि तुम्हे गोल--मटोल करके चमकता
हुया आकर्षक पत्थर बना दूंगा । लेकिन अब जब मै तुम्हारे
चु गल में फस गया हूँ तो तू मेरी मरम्मत किये जा रही
है, यह अच्छा नही है, निकाल दो मुझे बाहर ।
नदी ने कल-कल करते हुए बहुत शान्त भाव से कहा
अरे तू इतना चिल्लाता क्यों है ? पानी के थपेड़े तो पड़ेगे
ही बस इस थोड़े कष्ट को सहन करके फिर देखना तेरा
रूप कितना निखरता है ?
आखिर पत्थर ने नदी की बात मानली और थपेड़ो
को सहन करता हुआ नदी मे इधर से उधर लुढकने लगा।
लुढकते लुढकते वह एक दिन गोल-मटोल और चमकता
हुआ चाक्-चिक्यपूर्ण बन गया, तव नदी ने उसे तट पर
उछाल दिया ।
लोगो ने देखा और वह उन्हे पसन्द आया कर्मो को
थपेडों को भी अगर अादमी इसी प्रकार समभाव के साथ
सहन करता जाय तो एक दिन वह भी अपनी समस्त विकृ-
तियो को दूर करके अपना परम स्वरूप उजागर कर सकता है।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ २६

( २५ )
"चोर और तिजोरी"
करोड़पति सेठ की तिजोरी में करोड़ों रुपये भरे रहते
थे । तिजोरी उन सब रुपयों की रक्षा करती थी। अपने
लिये एक रुपये की बात तो दूर रही, एक दमड़ी भी खर्च
नहीं करती थी।
एक दिन रात्रि को एक चोर सेठजी की हवेली में घुस
गया और सीधा उस नोटों से भरी तिजोरी के पास पहुच
गया, 'चोर ने तिजोरी को खोलने की बहुत कोशिश की'
लेकिन जब वह नहीं खुली तो उसने तिजोरी पर हथोड़े का
प्रहार कर दिया।
हथोड़े के प्रहार से तिजोरी खड़खड़ायी और बोली
अरे तुम मुझे मार क्यों रहे हो ? मैने तुम्हारा क्या बिगाडा
है ? मैं तो रुपयों की रक्षा कर रही हूँ।
इसीलिये तो मैं तुम पर प्रहार कर रहा हूँ। क्योकि
रुपयों का उपयोग न तुम अपने लिये कर सकती हो न ही
दूसरो के लिये । ऐसा कहते हुए चोर ने पूरे जोर से एक
और हथोड़े का प्रहार कर तिजोरी को तोड़ ही डाला। जो
व्यक्ति सम्पति का न अपने लिये और न ही दूसरों के लिये
उपयोग करता है उसकी यही दशा होती है ।
३० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( २६ )
"खरगोश और शिकारी"
खरगोश अपनी जान बचाने के लिये वेतहाशा दौड़ा
जा रहा था, जगल की ओर । पीछे-पीछे शिकारी भी दौड
रहा था । आखिर नन्हा खरगोश कहा तक दौड पाता।
दौड़ता-दौडता थक गया, सोचने लगा कहां छिपू ? कहां
जाऊ ? उसके दिमाग में एक बात आई और उसने अपनी
दोनों आखे बन्द कर ली, सोचने लगा कि मै सुरक्षित हो
गया । कोई भी मुझे दिखलाई नहीं देता, अब मुझे मारने
वाला कोई नहीं है।
उस विचारे को क्या मालूम कि आखे मैने बन्द की
है । शिकारी ने नहीं । उसे तो सब दिख ही रहा है ।
पीछे-पीछे दौडते हुए शिकारी ने उसे पकड़ लिया
और यह वोलते हुए ले जाने लगा कि आखिर ठहरा तो
अज्ञानी ही, मैं जानता था, कि आखिर तू कहां तक भाग
पाएगा, आखे बन्द करके बैठ गया और पकड़ा गया ।
शिकारी की आवाज के साथ पवन चला और वृक्षो
से सू-सू की आवाज इस प्रकार निकली-अरे दुष्ट! यह तो
अज्ञानी हैं, इसलिये तुम्हारी पकड़ मे आ गया । समझदार
कहलाने वाला इन्सान तेरी भी यही हालत बनने वाली है।
तू भी धन-दौलत परिवार के गुमान मे मृत्यु से बचने के
लिये विवेक की आँख बंद करके चल रहा है, नही मालूम
तुझे भी कि मृत्यु देख रही है। वह भी तुझे एक दिन
इसी प्रकार पकड कर ले जाएगी। जिस दिन तेरी रक्षा
करने वाला कोई नही होगा ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

( २७ ) "हल और धरती" हल के तीखे नोक से उखड़ते-उखड़ते धरती कराह उठी--अरे हल ! तुम यह क्या कर रहे हो । बार-बार मेरे पेट में अपना तीखा नोक डाल-डाल कर तुमने मेरा अग- अग विदीर्ण कर डाला है । हल ने कहा-प्यारी धरती ! तुम घबराओ मत मैं तुम्हारे लिए अच्छा ही कर रहा हूँ। तुम्हारे भीतर मे रहा हुआ जो ठोसपन कठोरता है उसे निकाल रहा हूँ । जब ठोसता पूरी तरह तुम्हारे भीतर से निकल जाएगी तब देखना तुम्हारे ऊपर कैसी सुन्दर हरीतिमा छाती है । धरती ने हल की बात मान ली । सहती रही, सब कुछ सहती रही, आखिर तो सहन शीलता ने रंग दिखाया ओर सारी धरती न मानो नयनाभिराम हरी साड़ी पहन ली हो । ऐसा दिखने लगा। जो व्यक्ति अपने भीतर से कषायों की कठोरता को निकाल कर कोमल भाव मे आ जाता है, वह जन-मानस में अविस्मरणीय बन जाता है । ३२ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी HE

( २८ )
"लोहा और आग"
लोहे ने अकड कर अपनी गर्दन ऊँची करते हुए
कहा-संसार की किसी भी वस्तु मे ताकत नही जो कि
मुझे झुका सके ।
सुनकर सभी तत्व स्तब्ध रह गए । आखिर सोचने
लगे कि इसकी अकड को कैसे कम किया जाय । अग्नि ने
कहा कि यदि मानव इसे मेरे ऊपर रख दे तो मैं इतनी
तेजी से ताप लगा हूँ कि इसे झुकाने की बात तो दूर रही,
इतना तरल बना दूं कि फिर इसे जैसा चाहे वैसा मोड़
दो तो भी यह कुछ नही कर सकता । मानव ने यह बात
सुन ली । उसे लोहे से काम लेना ही था और फिर उसे
इसके झुकाने का उपाय भी मिल गया । अब क्या कहना,
बस चढ़ा दिया, लोहे को अग्नि पर और लोहा तेज ताप
को पाकर पिघलने लगा।
सारी अकड उसकी पानी मे मिल गई । सत्य है--
अभिमानी व्यक्ति को एक दिन संताप का पात्र बनना पडता है ।
नि
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ३३

( २६ )
"शेर का सन्तव्य"
एक बार जंगल के सभी पशुओ ने एकत्रित होकर
यह निर्णय कर लिया, कि हमें सिह को राजा नहीं मानना
चाहिए । हम भी सिह की तरह ही स्वतन्त्र विचरण करेगे।
जव सिह को इस बात का पता चला तो वह बोला-
मुझे तुम लोगों कि कोई अावश्यकता नही है । मेरे सेवक
के रूप में तुम रहो या न रहो । उससे मुझ में कोई अन्तर
जाने वाला नही है, मै अपना शिकार स्वयं करता हूँ और
छोटे से छोटा काम भी स्वयं करता हूँ। इसलिए मुझे
तुम्हारी आवश्यकता भी नही हैं । मेरी आजा मे रहने से
'मुझे नही तुम्हे ही लाभ है ।
मेरे स्वतन्त्र स्वावलम्वन को कोई नहीं रोक सकता ।
मै उस मानव की तरह मूर्ख नही हूँ कि नौकर हो तभी तक
वह उसका मालिक है । और नौकर चला जाय तो मालिक
‘पशु बन जाय तो ऐसा मालिक, मालिक नहीं नौकर है ।
जंगल के राजा सिह की बात सुनकर सभी पशु समझ
गए और वह पुन सिह की याना में ही रहने लगे।
३४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ३० )
नदी और समुद्र
।
मधुर कलकल निनाद करती हुई वह रही नदी को
देखकर समुद्र उफना-अरे नदी, तू थोडा सा पानी लिये
घूमती है और फिर भी इतना अधिक अभिमान का प्रदर्शन
कर रही है । देख मेरे पास असीम जलराशि होते हुए भी
मैं तेरी तरह छिछला नही हूँ । इसीलिये लोग मेरी गम्भी-
रता का बखान करते है ।
अपनी शैखी बघारते समुद्र को सरिता ने बड़े ही
स्नेह भाव से
कहा-
-समुद्र दादा यह सत्य है कि आपके
पास अपार जलराशि है और आप मे गभीरता भी है, किन्तु
यदि आप में जोरदार ज्वार पा जाय तो सृष्टि का प्रलय
अपार जलराशि के होते हुए भी प्राप
मे रहा हुअा खारापन लोगो को एक चुल्लू भर पानी भी
पीने नही देता।
मेरे पास मे क्यो न थोड़ा ही पानी हो किन्तु लोग
पीकर तृप्त होते है । खेती भी सिचित होकर धान्य देती
है । मेरी आवाज अभिमान को प्रदर्शन नही करती, अपितु
लोगों के मन को खुश करती है । नदी की कड़वी सच्चाई
सुनकर सागर मौन हो गया । बहुत धन सपत्ति भी है पर
यदि अभिमान का खारापन है तो वह संपत्ति कोई काम
की नहीं है । थोड़ी ही सपत्ति क्यों न हो, पर व्यवहार
मधुर है तो सभी आकर्षित हो जाते है ।
हो जाय । पाह
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ३५

( ३१ )
गैस-सिलेण्डर
रसोई घर में शात वैठी हुई वस्तुएँ मुखर हो उठी
और उनमे परस्पर वार्तालाप होने लगा-
चूल्हे ने कहा-मै दिन भर बाग में तप-तपकर मानवो
को गर्म-गर्म भोजन देता हूँ। मेरे तपे विना मानव को
भोजन प्राप्त नही हो सकता ।
चूल्हे की बात को सुनकर गैस-सिलेण्डर बोला- तुम
तो तपते ही हो लेकिन मैं तो मानवों को गर्म भोजन देने
के लिए अपनी शक्ति गैस को वराबर खर्च करता हूँ, तभी
वे भोजन गर्म कर सकते है। मेरे मे इतनी शक्ति है कि
अगर विस्फोट कर दू तो यह रसोई तो क्या पूरा घर
तबाह हो सकता है।
इन दोनों की वातो को सुनकर चिमटा वीच में ही
खनखना उठा-हां यह सत्य है कि गैस सिलेण्डर यदि
विस्फोट कर दे तो पूरा घर भस्म हो सकता है । लेकिन
हने सदा सर्जनात्मक काम करना है । मानव की तरह
विध्वंसात्मक काम नही । गैस सिलेण्डर सीमा मे रहकर
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

ही गैस देता है इसलिए उसका महत्व है । वैसे ही मानव
भी सदाचार, नैतिकता एवं सत्य की सीमा में चलता है तो
ही वह स्व और पर के लिए सर्जनात्मक रूप उपस्थित कर
सकता है । अन्यथा कितनी ही सपत्ति, वैभव कमाले किन्तु
सुखी नहीं हो सकता ।
चिमटे की इस खन-खनाहट के पीछे उभरे शाश्वत
सत्य को सुनकर मानव चौकन्ना जरूर हो गया फिर भी
वह आज भी उसी स्थान पर खड़ा है ।
卐
आज भारत मे धर्मो की कोई कमी नही है,
पुरान तथा कुरानों की भी कोई कमी नही है।
दीपक तले अन्धेरा लेकर चलने वाले,
धर्म उपदेष्टायो की भी कोई कमी नही है ॥
राष्ट्र की सुरक्षा शस्त्र निर्माण से नही होती,
शरीर की सुरक्षा अधिक खान पान से नहीं होती।
वासना मे सुख समझने वाले लोगो !
जीवन की सुरक्षा भोगविलास से नहीं होती।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ३७

( ३२ )
हीरे का मूल्यांकन
से
हीरे की चमचमाहट को देखकर हर व्यक्ति का मन
उसके प्रति लुभाने लगा। डायमण्ड के वाजार में बड़े-बडे
हीरक-पारखी उसका मूल्यांकन करने लगे । कोई उसकी
कीमत दस हजार वताने लगा, तो कोई वीस हजार, तो
कोई पचास हजार, तो कोई एक लाख । हीरे का मूल्य
बढता ही चला गया । हीरा, जौहरियो के एक हाथ
दूसरे हाथ में जाने लगा। सभी लोग उसका मूल्याकन क
रहै थे ।
हीरा जौहरियो को अपना मूल्याकन करते देख, एक
दन मुखर हो उठा और वोला—मेरे भाईयो ! आज मै अपन
आप मे बहुत प्रसन्नता की अनुभूति कर रहा हूँ कि में
जमीन मे से निकलकर आज इतना योग्य हो गया
सब मेरी बढ़-चढकर कीमत कर रहे है । लेकिन मुझे इतना
सब कुछ पाने के लिए बहुत बड़ी कुर्बानी करनी पड़ी है ।
मुझे जमीन से निकाल कर लोगो ने जगह-जगह से काटा
है, तरासा है, घिसा है, रगड़ा है । मुझे चमकाने के लिए
अनेक तरह के भयंकर से भयंकर कष्ट दिए हैं । लेकिन मैं
प्राप
३८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
--

सबको समभाव से सहता गया, परिणाम स्वरूप आज मैं
। प्रापके मुंह पर चढ गया हूँ।
क्या ही अच्छा हो कि मेरी कीमत करने के साथ
ही जरा आप अपनी भी कीमत कर ले । महान् बनने के
लिए केवल मानव शरीर को पा लेना ही पर्याप्त नहीं है,
अपितु जीवन के साथ जुड़े अतिरिक्त तत्वो को काट-छाट
कर अलग करना होगा । स्वार्थ, अनैतिकता, हिसात्मक
भावनाओ को दूर करना होगा । जीवन को सदाचार, नैति-
कता, सत्यता से चमकाना होगा । विलासी जीवन, कभी
भी महान् नही बन सकता ।
हीरे की इस आवाज ने जोहरियो को भी अपन आपके
लिए सोचने हेतु विवश कर दिया ।
卐
जो काट दे एक ही झटके उसे तीक्ष्ण
तलवार कहते है,
जो वनाले पर को अपना भी उसे सही
व्यवहार कहते है।
कमल की तरह निर्लेप रहकर दुनिया मे,
जो काट दे कर्म वन्धन को उसे ही शुभ--
विचार कहते है ॥
पकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ३६

( ३३ )
गुड मार्निंग ही गुडइवनिंग है
महकते उपवन में, अरुणोदय की वेला में विहंसता
हुआ कमल निरन्तर विकस्वर हो रहा था, तो कुमुदिनी
सकुचाती हुई सिकुडती चली जा रही थी।
एक पुष्प विकस रहा है तो दूसरा फूल सकुचा रहा है।
कमल, कुमुदिनी से नए उल्लास, नई उमग, नए तेज के
साथ गुड-मार्निग कर रहा है तो कुमुदिनी नई प्रसन्नता
से गुड इवनिग कर रही है । महकते उपवन में प्रवेश करते
हुए मानव ने पुष्पों की यह मुखरता देखी तो वह स्तब्ध
रह गया और वह सोचने लगा कि एक ही समय
मे
यह
दो
चात कैसे ? खिलते हुए कमल ने मानव के मूक प्रश्न को
समझा और उसका समाधान दिया-
एक ही समय, एक के लिए प्रातः काल है तो दूसरे
के लिए संध्याकाल है । क्योकि समय किसी से जुड़ा हुआ
नहीं है । जिस समय किसी की मृत्यु हो रही है, उसी समय
कोई जन्म ले रहा है । जिस समय कोई धनवान हो रहा
है, उसी समय कोई कंगाल हो रहा है । एक ही समय में
जीवन में असंख्य परिवर्तन घटित हो रहे होते है । मानव
४० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उद

इन परिवर्तनों में ही जीने और मरने लगता है । इससे वह अपने आप को अलग नहीं हटा पाता, इसलिए वह गुड- मॉर्निंग के समय ही गुड-इवनिग नही कर सकता । यही कारण है कि वह क्षण भर मे सुखी और क्षण भर में दुःखी हो जाता है। लेकिन हम सदा अपने स्वभाव से कभी च्युत नही होते है । अतः हमारे लिए एक ही समय, दो रूपों में विभक्त हो जाता है । कमल की यह आवाज, सुवास के रूप मे मानव के नासारन्ध्रो में प्रवेश करती हुई उसे कुछ क्षण के लिये सहज सुख का आभास करा उठी । * हृदय की शोभा हार से होती है, घर की शोभा परिवार से होती है । परन्तु जीवन की शोभा तो, गुरुवर तुम्हारे ही दृढ़ आधार से होती है ।। लौ को जलने के लिये दीपक का सहारा चाहिये, मीन को तिरने के लिये पानी का सहारा चाहिये । जीवन नैया को करने के लिये लिये मुझको, हे नरपुंगव नानेश पूज्यवर ! तुम्हारा सहारा चाहिये । प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ४१ पार (३४) हाथी और कुत्ता हाथी अपनी मस्त चाल से चला जा रहा था । उसका व्यान किसी की तरफ नही था । वह अपनी धुन मे ही मस्त था । पर तुच्छ प्राणी कुत्ते से यह सहा नही गया। वह सोचने लगा-यह भीमकाय प्राणी कहां से आ गया और फिर मेरी गली मे बड़ी मस्ती से चला आ रहा है । इसे जरूर यहां से भगाना चाहिए । नही तो यह मेरी गली मे अधिकार जमा लेगा । पर मै अकेला तो इससे लड़ नही सकता । क्योकि यह बहुत भारी दिखता है। अतः मै अपने साथियों को इकट्ठा करके फिर लडू । कुत्ते ने आवाज लगा कर अपने साथियो को इकट्ठा कर लिया और सब मिल- कर हाथी के पास जाकर भौ कने लगे - अरे ए कालेकलूटे हाथी ! क्यो घुस आया तू हमारी गली में, भाग जा यहां से, अन्यथा हम तुझे मार गिराएंगे । फिर से यहां आना भुला देगे । इस प्रकार वे भौ भौ करने लगे । हाथी जो अपनी मस्त चाल से चल रहा था । जब उसने कुत्ते की यह ो ों सुनी तो सोचा-कौन है ये जो मुझे ललकार रहे है। हाथी ने अपनी सूड उठाई और कुत्ते की तरफ अांख घुमाई । पर हाथी को अपनी तरफ ४२ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

देखते हुए देखकर कुत्ते दुम उठा कर भाग उठे । हाथी ने
देखा-रे, जो मेरे देखने मात्र से भाग जाते है, वे मच्छर
मेरा क्या बिगाडेगे । बस हाथी उनकी बातों का कुछ भी
प्रतिकार न कर अपनी चाल से चलता रहा । कुत्ते फिर
भौकने लगे । अब तो हाथी ने आख उठाकर भी नही देखा
कुत्ते केवल भौकते, पर पास मे नही पा सके । हाथी पर
उनके भौकने का अव कुछ भी असर नहीं हुआ।
सत्र है समझदार व्यक्ति, महान् पुरुष कभी भी तुच्छ
व्यक्तियो की अनर्गल बकवास का जबाब नही देते ।
खाना खाना सरल है, पचाना है मुश्किल,
धन चाहना सरल है, कमाना है मुश्किल ।
दीक्षित होना सरल है, निभाना है मुश्किल,
ज्ञान पाना सरल है, टिकाना है मुश्किल ।।
卐
--
बोलना सरल है, सुनना है मुश्किल,
तोड़ना सरल है जोड़ना है मुश्किल ।
चौरासी लाख योनियो मे आत्मा को,
घुमाना सरल है, खोजना है मुश्किल ।।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ४३

( ३५ ) नासमझ कौन ? हांडी में फंसे हाथ को निकालने में असमर्थ बन्दर चीऊ २ करने लगा। हुआ यों कि मटकी में चने पड़े हुए थे । जिसे देख- कर बन्दर के मुह में पानी आ गया और वह उन्हे पाने के लिये ललक उठा । कूदता-फांदता पहुंचा वहा पर और मटकी में हाथ डालकर चनों से मुट्ठी भर ली। किन्तु मटकी का मुंह छोटा होने से हाथ वापिस नही निकल रहा था। बन्दर की यह हालत देखकर प्राणी जगत ने सन- श्रेष्ठ समझदार कहलाने वाला आदमी हसा और बोला- अरे नासमझ बन्दर ! तुम्हारे लोभ ने ही तुम्हारा हाथ जकड़ रखा है । जरा चने कम करो, हाथ बाहर निकल आएगा। किन्तु बन्दर वह करने के लिए तैयार नहीं था तो आदमी उसकी मूर्खता पर हसने लगा। आदमी को अपनी हंसी उड़ाते हुए देखकर वन्दर चिऊ का-अरे समझदार इन्सान ! यह ठीक है कि मै तो ४४ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी M

नासमझ हूं, इसलिए फस गया हूं, पर तुम तो समझदार हो ।
आश्चर्य तो यह है कि तुम्हारा हाथ ही धन दौलत ऐश्वर्य
को पाने के लिए जकड़ा हुआ है । तुम अधिक से अधिक
दौलत पाने के लिए अपने पूरे जीवन को दुःख के संसार में
जकड़ते जा रहे हो । बतायो आज तक भी किसी ने दौलत
की पकड़-जकड़ से सुख पाया है ? सच्चाई में तो उत्तर यही
होगा-नही । जब तुम इतने समझदार होकर के भी उसे नहीं
छोड़ सकते हो तो तुम ज्यादा नासमझ हो या मै ?
यह कहने के साथ ही बन्दर एक झटका मारा-मटकी
फूट गई और वह चने लेकर भाग गया।
बन्दर के द्वारा यह कटु सत्य को सुनकर दुनिया के श्रेष्ठ
प्राणी मानव का मस्तक झुक गया ।
ने
तिल का ताड़ बना सकता है आदमी,
बात का बतगड़ बना सकता है आदमी ।
प्राणियों मे श्रेष्ठ बनता है, पर
फूल को भी काटा बना सकता है आदमी ।।
आकाश सभी का एक समान आधार होता है,
सर्वज्ञो के ज्ञान का एक समान विस्तार होता है।
शिष्य अविनीत हो या विनीत,
सुगुरु का तो एक समान व्यवहार होता है ।।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ४५

( ३६ )
चातक शिशु का निश्चय
सूर्य अपने तीव्र तेज के साथ भूमि को सतप्त कर
रहा था । वन्य जगत् के प्रायः समस्त पक्षी प्यास को शांत
करने के लिये बार-बार सरोवर की ओर उड़ान भर रहे थे।
लेकिन आश्चर्य ! चातक इतने दिनों से, महीनो से प्यासा
होकर भी सरोवर की ओर उड़ान भरने का रुख भी नही
कर रहा था।
पक्षियों को प्यास बुझाते हुए देखकर अाखिर शिशु
चातक का मन विह्वल हो उठा और वह भी पानी पीने के
लिए तडप उठा । उसने बड़े ही कातर ढग से अपनी मा
चातकी को निहारा । बच्चे की इस तडफन को और सरोवर
पर जाकर पानी पीने की मौन मांग को चातकी समझ गई।
उसने बड़े ही प्यार से कहा-पुत्र ! क्या तुम अपनी वंश
--परम्परा को तोडोगे ? आज तक किसी भी चातक ने भूमि
पर पड़ा पानी नहीं पीया । उसने तडफ-तड़फ कर मर
जाना पसंद किया । किन्तु भूमिगत पानी नहीं पीया ।
पुत्र ! तुम यह निश्चय करो कि पानी पीऊगा तो वर्षा
का ही, आकाश से टपकते पानी को ही पीऊंगा।
४६ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

अन्यथा मर जाऊंगा। तुम्हारा यह निश्चय जरूर रग
लाएगा । बादल बरसेंगे और तुम्हारी प्यास बुझेगी ।
बच्चे को मा के वचनो से जोश आ गया और सब
तरफ से आशाएं छोड़कर, आकाश की तरफ ही टकटकी
लगाए स्थिर हो गया। उसके निश्चय ने चमत्कार कर
दिखाया और रिमझिम-रिमझिम करता पानी आया ।
चातकी की तरह ही आदमी भी सभी अोर से सम्बन्धी
को तोड़कर मन - वचन - काया से प्रभु की भक्ति मे तल्लीन
हो जाता है तो उसमें भी परमात्म स्वरूप उभर आता
आता है । क्या हम चातक जैसे पक्षी से शिक्षा नही लेगे ?
महान् वह नही होता जो अपने ही स्वार्थ मे गिरा
रहता है.
विद्वान् वह नही होता जो उन्माद मे ही भरा
रहता है।
घवल कीति का विस्तार यो ही नही होता पुरुषो,
धनवान वह नहीं होता जो स्वार्थ मे ही
धरा रहता है ।
मात्र
आज नए-नए साहित्यो की भरमार है,
आज नए-नए विचारों का उभार है।
आचार और व्यवहार के तम्बू उखड़ते जा रहे है,
आज नए-नए परिवर्तनों का ही विस्तार है ।।
-
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ४७

( ३७ )
ड्राइवर और गाड़ी
तो पापा
तीव्र और वेग के साथ चल रही कोर मे बैठे मुन्ने
ने पापा से पूछा-पापा! गाड़ी इतनी तेज कैसे चल रही है?
पापा ने कहा- मुन्ना ! गाड़ी का ड्राइवर गाड़ी के
एक्सीलेटर को दबाए हुए है इसलिये गाड़ी तेज चल रही।
कार इधर-उधर खड्डे में नही गिरती, सीधी
सड़क पर कैसे चल रही है ? मुन्ने के इस प्रति प्रश्न को
सुनकर उसके पापा ने कहा-वेटे ! गाडी का स्टेरिग
ड्राईवर के हाथ मे है। ड्राईवर जब तक सजगता पूर्वक उसे
संभाले हुए है । तब तक गाड़ी रोड पर चलती रहेगी।
ड्राईवर की थोड़ी सी असावधानी गाड़ी को और गाडी मे
बैठने वाले लोगो के जीवन को खतरे में डाल सकती है ।
ठीक इसी प्रकार गुरु शिष्य को समझाते है-इस
शरीर रूपी गाड़ी का ड्राईवर चेतन है । जव तक चेतन
सजग है, तभी तक गाड़ी व्यवस्थित चल सकती है । चैतन्य
आत्मा की थोड़ी-सी असावधानी, जीवन की गाडी को अधः
पतन में ढकेल देती है ।
४८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ३८ ) "हीटर और एयर कंडीशन" हीटर और एयर कडीशन दोनो ने मिलकर पावर हाऊस से फरियाद की । आपने हम दोनों का रूप अलग- अलग क्यो बना दिया ? हीटर कहता है मुझ मे से उष्मा ही निकलती है, जिससे इन्सान मुझे गर्मी मे तो चाहता ही नही है, एयर कडीशन कहता है, मेरे से ठण्डक ही ठण्डक निकलती है । इस कारण इन्सान सर्दी मे मुझे नहीं चाहता है कितना अच्छा हो कि आप हम दोनो को सर्दी में उष्मा देने वाला एव गमी मे ठ-डक देने वाला पावर दे दे। ताकि हम दोनो अवस्थाप्रो मे काम आ सके । हीटर और एयर कडीशन की बात सुनकर पावर हाउस ने कहा-देखो भाइयो ! 'मै जो पावर हीटर को देता हूँ। वही पावर एयरकंडीशन को भी देता हूँ। मै तो एक समान पावर देता हूँ। मेरे पावर में कोई ठण्डा- पन या उष्णता नही होती यह तो तुम्हारी मशीन ही ऐसी है कि 'तुम मेरे पावर को अपने अपने रूप मे बदल लेते हो, यह दोप मेरा नही तुम्हारा ही है । तुम्हे अपनी पात्रता- योग्यता बदलानी होगी। प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ४६

ठीक इसी प्रकार हर प्राणी में परमात्मशक्ति समान
रूप से रही हुई है । पर कर्मों के विक्षेप से सभी प्राणी
अलग-अलग रूप मे दिखाई देते है । परमात्म रूप में कोई
असमानता नही है । पर जब तक कर्मों का विक्षेप दूर नही
हो जाता तब तक परमात्म की अभिव्यक्ति नही हो सकती।
इसीलिए अपना ही संशोधन करना होगा । अपनी पात्रता-
योग्यता इस रूप में बनाए कि हम में परमात्मा की पूर्ण
अभिव्यक्ति हो जाय'।
卐
म्यान है तो तलवार भी होनी चाहिये,
आकार है तो निराकार भी होना चाहिये।
'भक्ति करने के लिये मेरे उपासकों !
भक्त है तो भगवान् भी होना चाहिये ।।
A
टूटा हुआ सोना भी जोड़ दिया जाता है,
जुड़ा हुआ दिल भी तोड़ दिया जाता है।
पर बुद्धिमानों के द्वारा जग में,
टूटा हुआ दिल भी पुनः जोड़ दिया जाता है ।।
५० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ३६ )
"संघर्ष नदी और समुद्र का"
तटानुबंधित नदी ने जब देखा कि समुद्र-बिना किसी
तट के फैलता चला जा रहा है और हजारों तरंगे उछा-
लता हुआ ठाठे मार रहा है । उसे न कोई कहने वाला है
और नही कोई पूछने वाला है । और मुझे दोनों तटों ने
बांध रखा है । कितना अच्छा हो कि मै भी समुद्र की तरह
विराट रूप धारण कर लू । और समुद्र की विराट्ता को
विध्वंस कर दू । बिना अपनी औकात को देखे नदी भिड़
पड़ी समुद्र से, और बहुत देर तक समुद्र से संघर्ष करती
रही । पर आखिर तो हारना ही था ।
नदी ने समुद्र से भिडकर अपना अस्तित्व भी खत्म
कर दिया। चौवेजी, छब्वेजी बनने गए तो दुब्बेजी ही रह
गए । नदी का मीठा पानी भी खारा हो गया । जब तक
वह तटानुवधित थी, तब तक उसका जो महत्व लोगों की
दृष्टि मे था, वह भी खत्म हो गया । पहले लोग उसके
पानी को बहुत पीते थे, क्योकि वह मीठा था । पर नदी
समुद्र
से संघर्ष कर अपने मीठेपन को भी खत्म कर दिया।
अब उसे कोई पूछने वाला नहीं रहा ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ५१.
ने

कई महत्वाकांक्षी व्यक्ति अपनी स्थिति को नहीं सम- झते हुए अपने आपको बड़ा बतलाने के चक्कर में बड़े-बड़े व्यक्तियों से संघर्ष कर बैठते हैं। इस संघर्ष में निश्चित रूप से उनकी विजय तो नही होती, बल्कि और उन्हे मुह की खानी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति पूर्वापेक्षा और अधिक निम्न स्तर की ओर बढ़ जाते हैं । जिस प्रकार पहाड़ से टकराकर कोई व्यक्ति अपना कल्याण नहीं कर सकता, वैसे ही अपनी औकात से अधिक महत्वाकांक्षा रखने वाला व्यक्ति कभी भी जिन्दगी मे सफल नहीं हो सकता । यदि जिन्दगी को सुखमय-शान्तिमय बनाना है तो मर्यादा के तटों में रहकर चलना होगा--जिससे निर- न्तर सफलता प्राप्त हो सके । 卐 बीती बातों का रोना अब मत रोइये, रक्त से रंजित कपड़े को रक्त से मत धोइये । भौतिकता के रंगमंच पर आकर के, अमूल्य क्षणों को अब प्रमाद में मत खोइये ।। 1 जो पार करे गुरणस्थानों को उसे उत्थान कहते है, पर हित में खपादे अपने को उसे महान् कहते है । मनुष्य तो बहुत हैं दुनियां में पर, पर पीड़ा अपनी समझे उसे सही इन्सान कहते है ।। ५२ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी +

( ४० )
संगति किसकी करे ?
बडों से संगति करो पर उससे नहीं जिससे अपनी
प्रतिष्ठा ही मिट्टी मे मिल जाय । नदी ने देखा समुद्र बहुत
विशाल, विराट एव व्यापक है । अपने उदर मे अनेक रत्न
मणि-माणिक्य सजोए हुए है । समुद्र की विशालता किसी
से नापी नही जा सकती। गहरा भी इतना है कि सबको
अपने मे पचाने की क्षमता रखता है । मुझे अवश्य ऐसे
व्यक्ति से संपर्क साधना चाहिए । नदी ने समुद्र
के
गुरग
दोप
की पूरी समीक्षा किये बिना ही समुद्र से संपर्क करना प्रारम्भ
कर दिया । जव तक सामान्य मैत्री रही, तब तक तो सब
ठीक ठाक चलता रहा, पर जब नदी ने समुद्र से घनिष्ठता
के लिये हाथ बढ़ाया तो समुद्र ने एक ही झटके मे पूरी
की पूरी नदी को अपने में समा लिया । अव नदी का कोई
अस्तित्व हो नही रहा । न नाम और न हो कोई काम,
उसकी सारी प्रतिष्ठा खत्म हो गई ।
नदी की तरह कई व्यक्ति गुण-दोष का विचार किये
बिना ही कई व्यक्तियो से इतना अधिक सम्पर्क बढा लेते
है कि जिससे उनकी प्रतिष्ठा भी मिट्टी में मिल जाती है ।
बड़ो से सम्पर्क करना अच्छा है पर बडा आदमी
कैसा बड़ा हो, यह जान लेना आवश्यक है ।
-
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ५३

-
( ४१ )
"दीपक और
भास्कर"
.
कमरे 'के एक कोने में टिमटिमाते दीपक को देखकर
सूर्य ने ललकारा-- अरे मच्छर ! क्या औकात तेरी, कहाँ
दुबका है अन्दर एक कोने में जाकर और वहाँ भी पूरा
प्रकाश नहीं दे पा रहा है। देख मुझे, स्वतन्त्रता के साथ
आकाश में घूमकर पूरे अंग-जग को प्रकाशित कर रहा हूँ।
तुम्हारी नन्ही सी जान को तो
एक हवा का झोंका भी
खत्म कर सकता है । पर मेरा, हवा तो क्या, संवर्तक जैसा
भयंकर तूफान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता । मेरे अस्तित्व
से पूरी दुनियां प्रभावित है। मेरे बिना तो दुनियां का काम
ही नहीं चल सकता ।
अभिमान के वश होकर सूर्य न मालूम क्या-क्या
कहता चला गया । उसे भान नही रहा ।
पर दीपक ने बड़ी ही शान्ति के साथ टिमटिमाते हुए
भास्कर को, संबोधित किया-सूर्य नारायण ! आप जो कुछ
भी फरमा रहे है, वह सत्य है, आपके प्रकाश के मामने
मैं तो शेर के सामने मच्छर तुल्य भी हूँ। कहां आपका
विशाल प्रकाश और कहा मेरा प्रकाश । पर एक बात तो
५४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

जरूर है जो काम मै कर सकता हूँ वह काम अाप नही कर सकते । दीपक की बात सुनकर सूर्य को ताव पा गया और वह प्रचण्डता के साथ प्रकाश फैलाता हुआ बोला-अरे ओ पिद्दी तेरे मे ऐसी क्या विशेषता है कि जो तुम कर सकते हो, वह मै नही, जरा बतला तो सही ? इतने में बीच में ही आदमी आ पहुंचा और उसने चुपचाप टिमटिमाते दीपक की लौ का, बुझे अनेक दीपकों की ली से सस्पर्श कराकर उन्हे भी प्रकाश युक्त बना दिया और घर भर को दीपको से सजा दिया । अादमी के काम करके चले जाने के बाद दीपक ने बड़े ही शान्त भाव से सूर्य' से कहा- सूर्य देव ! देखा आपने अभी क्या हुआ सूर्य वोला- क्या हुआ कुछ भी तो नही । अरे सूर्य देव ! देखा नही पापने, मेरी ज्योति से मिलकर अनेक अप्रज्जव- लित दीप जगमगा उठे। मेरे जैसे प्रकाशमान हो गए । क्या आप भी अपनी तरह किसी दूसरे को सूर्य बना सकते हो। यदि नही तो फिर आपकी सारी विशेषताएं, इस विशेषता के पीछे दब जाती है । जो दूसरों को अपने समक्ष बनाएं वही वास्तव मे महान् है । ? प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ५५ ( ४२ ) नर्तकी और सितार नृत्य करती हुई नर्तकी से किसी ने पूछा-जब तुम नृत्य करना प्रारंभ करती हो, तब तो वहुत धीरे-धीरे करती हो, पर जब तुम्हारे नृत्य के साथ सितार के तार झनझनाने लगते हैं, तबले पर थाप लगती है और ज्यो-ज्यो सितार के तार तेजी से झनझनाने लगते है, तबले तेजी से बजने लगते है, त्यो-त्यो तुम्हारा नृत्य भी तेज होने लगता है और ज्यो- ज्यों सितार के तार धीरे पड़ने लगते है, त्यों-त्यों तुम्हारा नृत्य भी धीरे होने लगता है और ज्यों ही सितार की आवाज वंद हुई नही कि तुम्हारा नृत्य भी बंद हो जाता है । पाखिर ऐसा क्यों ? नर्तकी ने पूछने वाले को बहुत ही सहज रूप से समझाया--बंधुवर ! यह सत्य है कि मे सितार की झनकार के साथ ही नृत्य करती हूँ। बिना सितार की, झनकार के नृत्य नही हो सकता । सितार की झनकार का मेरे मन पर एक ऐसा असर होता है कि स्व- चालित यंत्र की तरह मेरे पैर अपने आप थिरकने लगते है और मै अपना भान भूलकर नाचने लगती हूँ। सितारों की मधुर झनकार नाचने के लिए मुझे विवश कर देती है । आदमी का मृदुल व्यवहार सामने वाले व्यक्तियों को निश्चित रूप से आकर्षित कर लेता है । मृदुल व्यवहार से बड़े से बड़े व्यक्ति को भी आकर्षित किया जा सकता है । ५६ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी 17

( ४३ )
शेर और कुत्ता
कुत्ते के भौकने और शेर के दहाड़ने मे बहुत अन्तर
। कुत्ते के भौकने का सामना किया जा सकता है, पर
शेर के दहाड़ने का नही ।
एक बार एक साहसी कुत्ता जगल मे जा पहुचा ।
वहाँ उसने झाड़ियो मे से एक विशाल आकृति देखी तो उसे
लगा कि यह कौन है ? लगभग रूप रग मे तो मेरे जैसा
ही दिखता है, पर आकार मे मेरे से बहुत बड़ा है । कुत्ते
ने ताकत आजमाने की दृष्टि से भौकना प्रारंभ किया ।
सोचा-देखते है कि इस मेरे सदृश भारी भरकम शरीर मे
कितनी ताकत है ? उस विचारे को क्या मालूम कि यह
मेरे सदृश दिखते हुए भी वहुत · विचक्षण एवं शक्ति सपन्न
है, कुत्ता नही, शेर है । जव शेर ने कुत्ते के भौकने
की आवाज सुनी तो सोचा-यह मच्छर यहा कहा आ
टपका और फिर भौ भौ करके मेरा सामना कर रहा है ।
अभी बतलाता हूँ इसे कि मैं कौन हूँ ?
शेर ने जोर ने दहाड़ मारी, पूरा जंगल काप उठा,
पर्वतो मे मानो प्रकम्पन सा पैदा हो गया । सारे प्राणी भय
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
५७]

--
से कांप उठे । बिचारे कुत्ते की तो घिग्घी बंध गई । उसने
देखा रे यह तो महाशक्ति सपन्न है । इससे सामना
करना मौत को आमंत्रण देना है । कुत्ता तो प्राण बचाने,
दुम दबाकर भाग गया ।
शेर और कुत्ते में बाह्य रूप से भले कुछ सादृश्य
दिखता हो पर इनकी वृत्ति मे बहुत बड़ा अन्तर होता है।
शेर की वृत्ति आक्रमणकारी को पकड़ती है पर कुत्ते की
वृत्ति आक्रमणकारी को नहीं, अपितु उसके शस्त्र को ही
पकड़ती है ।
अपने आपका इतना प्रदर्शन मत करो कि उतनी
शक्ति ही अपने में न हो ।
-
★
--
(
.
बहना सरल है, रूकना है कठिन,
कहना सरल है, करना है कठिन ।
आज की दुनिया को देखते हुए,
मरना सरल है, जीना है कठिन ॥
५८ ]
[ प्रकृति भो मुखर हो उठी

( ४४ )
पतंग और बालक
किशोर ने पतंग के करिणये बांधकर, उसके साथ डोरा
लगाकर उसे बड़े परिश्रम से आकाश में उड़ाया । किशोर
की मेहनत से पतंग आकाश की ऊंचाइयों को छूने लगा ।
बड़े बड़े भवन और बुद्धिमान् इन्सान सभी तो धरती पर
रह गए । पर पतंग उन सबसे ऊपर उठकर निरभ्र आकाश
का आनद लेने लगा लेकिन किशोर के हाथ मे पतंग की
डोर होने से वह जब चाहता तब पतग को इधर-उधर मोड़
देता था । ऊपर नीचे कर देता था ।
पतग को यह परतंत्रता कतई पसद नहीं आई । वह
सोचने लगा कहा तो मै इतना ऊपर पहुँच गया हूँ और
कहा धरती का इन्सान मुझे अपने हाथो नचाता है । नहीं,
मैं कभी भी इसके हाथो मे नाचना पसद नही करता, मै तो
अपनी इच्छानुसार आकाश में उन्मुक्त विचरण करूगा ।
पतंग ने अपने आपको किशोर के बंधन से मुक्त बनाने
के लिए हवा की लहरो के साथ एक झटका दिया और डोर
के बंधन से मुक्त हो गया। अब वह अपनी इच्छानुसार
उड़ने लगा । पर आश्चर्य कि अब आकाश की बुलन्दियों
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ५६

को न छूकर निरन्तर नीचे की ओर आने लगा । पतंग
ने बहुत प्रयास किया ऊपर उठने का । पर उसका सब
प्रयास निरर्थक सिद्ध हुआ । आखिर वह समय भी आ गया।
जब वह एक खड्डे में गिरकर अपने अस्तित्व को खो बैठा।
उसका सारा अभिमान मिट्टी में मिल गया ।
इन्सान भी जब उन्नति की ओर बढ़ने लगता है तब
यदि वह सही अनुशासन की डोर को बन्धन समझकर तोड़
देता है तो वह निश्चित रूप से जीवन की जिन ऊंचाइयों
पर है, वहां से गिरकर फुटपाथ पर आ जाता है ।
M:
तत्त्ववेताओं को आज कोई कमी नहीं है,
राजनेताओं की आज कोई कमी नहीं है ।
आचरणहीन जीवन जीने वाले,
क्रान्तचेताओं की आज कोई कमी नहीं है ।।
आज का युवा विनाश के कगार पर खड़ा है,
आज का युवा विकारों के महाद्वार पर खड़ा है ।
संभल नही सका तो पतन है निश्चित,
आज का युवा विचारों के कच्चे तार पर खड़ा है ।।
६० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ४५ )
मेंढक की बात-चीत
?
एक बार फूदकता-फूदकता समुद्रीय मेंढक कुएं मे
आ पहुंचा । कुएं में पहले से ही एक मेढक अपना अधिकार
जमाए हुए बैठा था। जब उसने नये मेढक को कुएं मे आते
देखा तो उसके पास गया और पूछा-तुम कहा से पा रहे
हो ? समुद्रीय मेंढक ने कहा मैं समुद्र से पा रहा हूं ।
कुए के मेंढक ने न तो कभी अपनी जिन्दगी मे समुद्र को
देखा था और न ही उसका नाम सुना था । पहली ही
वार सुना था । वह तो
यही समझ रहा था कि अगर
दुनिया में सबसे बडा जलाशय है तो मेरा यह कुप्रा ही है।
इससे वडा कोई जलाशय नही है । इसी विचार के कारण
कुए के मेढक ने एक छोटी-सी छलाग लगाई और समुद्रीय
मेढक से वोला-- क्या इतना बडा है तुम्हारा समुद्र
तव समुद्रीय मेढक ने कहा-नही, समुद्र तो इससे
वहुत बड़ा है ।
कुएं के मेढक ने थोडी और वडी छलाग लगाते हुए
कहा-क्या इतना वडा है तेरा समुद्र ! तब भी समुद्रीय
मेढक ने कहा- नहीं, मेरा समुद्र तो बहुत बड़ा है ।
कुएं के मेढक ने फिर तो पूर्व के किनारे से पश्चिम
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ६१
7

के किनारे तकं एक बहुत बड़ी छलांग लगाई और फिर
पूछा-बोल बता, क्या इतना बड़ा है तुम्हारा समुद्र ?
तव हसते हुए समुद्रीय मेंढक ने कहा-अरे भाई !
बहुत बड़ा है । उसे बतलाने के लिये तुम कितनी
भी बड़ी छलांग लगा दो पर तुम उसकी सीमा- रेखा नहीं
पा सकते ।
कुएं का मेंढक वोला-नहीं, मैं नहीं मानता कि समुद्र
इतना बड़ा है । दुनियां में सबसे बड़ा तो मेरा कुपा ही है ।
यदि तुम्हें मेरे कुएं से भी बड़ा समुद्र लगता है, तो जरा कूदकर
बतलायो कि कितनाबडा समुद्र है ?
अब क्या बतलाए उस कुएं के मेंढक को ! क्योंकि
समुद्र तो इतना बड़ा है कि मेंढक तो क्या, बड़े से बड़ा
इन्सान भी नहीं नाप सकता कि समुद्र कितना बड़ा है ।
समुद्रीय मेंढक ने कहा - भाई ! मै अपनी इन छोटी-छोटी
छलांगों से कभी नहीं बता सकता कि समुद्र कितना बड़ा है ?
बस इतना ही कह सकता हूं कि समुद्र बहुत बड़ा है ।
समुद्रीय मेंढक समझाते-समझाते थक गया पर कुएं
के मेंढक के दिमाग में यह बात नहीं जमा सका कि समुद्र
कितना विशाल है ? क्योंकि समुद्र की विशालता, कुएं का
अल्प बुद्धि वाला मेंढक सोच भी नहीं सकता ।
इसी प्रकार अल्प-प्रज्ञा, अल्प-मति वाले को विशाल
ज्ञान नही दिया जा सकता ।
६२ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ४६ )
घट और पानी
घड़े के मुह से पेट मे पहुंचते पानी को देखकर घट
अभिमान मे आकर बोला-मेरे मुह से पेट मे घुसकर तू
ठण्डा हो जाता है । यह सब मेरी वजह से है । यदि तुझे
भीतर प्रवेश न दूं तो तू कभी ठण्डा नही हो सकता ।
पानी ने कहा-घटराज ! बात तो तुम्हारी सच है
कि तुम्हारे में प्रवेश करने से मेरे मे शीतलता अधिक बढ
जाती है। पर यह भी सत्य है कि मेरा स्वयं का स्वभाव भी
शीतल होना है । उस शीतलता मे आप सहायक बन जाते
हो । यदि मेरा स्वभाव शीतल होना न हो तो मुझे ठण्डा
नहीं कर सकते । क्योकि आग का स्वभाव शीतल होना
नही है । उसे कितना भी प्रयास करने पर शीतल नहीं
किया जा सकता ।
घट को पानी की बात नहीं सुहाई, क्योकि वह तो
यह मान रहा है कि मेरे कारण ही पानी ठण्डा होता है ।
पानी को ठण्डा मै करता हूं। पर यह मेरा अहसान न मान
कर दूसरी बात करता है। घट थोड़ा रौश मे आगया और
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ६३

बोला पानी को-चल हट, इतना करने पर भी तू मेरा
अहसान नही मानता है, मै तुम्हें अपने भीतर स्थान नही
देता । थोड़ा-सा झटका हुया कि मटके के नीचे एक सुराख
हो गया, बस सारे घट ने उस सुराख के माध्यम से पानी
को बाहर निकाल दिया । सोचा अब मालूम पड़ेगी कि
ठण्डा कौन करता है उसे ?
पर यह क्या ज्यों ही पानी घड़े से बाहर निकला।
इन्सान ने
तुरन्त मटके को उठाया और एक तरफ फैक दिया।
क्योकि अब वह भी कोई काम का नहीं रहा। अनेक टुकड़ों मे
विभक्त हो, फर्श पर पड़ा घट और फर्श पर आया पानी
दोनों ही एक दूसरे का मुंह ताकने लगे ।
अपनी--२ ही बात को खीचने के कारण दोनो का
गौरव मिट्टी में मिल गया ।
एक दूसरे को लेकर चलने वाला व्यक्ति ही जीवन
की ऊंचाइयों को
छू
सकता ।
युवाशक्ति एक दुधारी तलवार है,
जिधर चाहो उधर होता वार है ।
लक्ष्य न होगा तब तक उससे,
घातक परिणामों का ही विस्तार है ।
६४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ४७ ) कछुए की वह रात सरोवर का संपूर्ण भाग पूर्ण रूप से शैवालाच्छादित था, जिधर भी दृष्पिात किया जाय, सभी ओर शैवाल शैवाल परिलक्षित होती थी । एक रात किसी बालक ने मनोरजन हेतु पत्थर का टुकडा सरोवर मे फेंक दिया। छपाक की आवाज आई और पत्थर गैवाल की हरीतिमा को छेदता हुआ भीतर प्रवेश कर गया। ठीक इसी समय एक कछुया उस छिद्र के सन्निकट ही शैवाल के नीचे इधर-उधर दौड लगा रहा था । पत्थर के कारण जब शैवाल मे छिद्र हुआ तो कछुए ने उस छिद्र से अपना मुह बाहर निकाल कर देखा- उसे अत्यन्त ही सुखद आश्चर्य हुआ-ग्रहो ! पूरा नभ चन्द्रमा और तारानों से जगमगा रहा जिनसे सुखद- शीतल प्रकाश टपक रहा था-कितना शात प्रशात वातावरण। कछुआ बहुत देर तक देखता ही रहा। उसके नन मे विचार आया कि आज तक मै तो यही समझ रहा था कि संसार केवल इस सरोवर तक ही सीमित है। पर आज मुझे ज्ञात हो रहा है कि नहीं, जो हम समझ रहे है उससे दुनिया ! - मण्डल प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

बहुत बड़ी है । क्योंन, जो मै देख रहा हूं, वह अपने
'पारिवारिक जनों को भी बतलाऊं । यह सोचकर कछुए
अपनी गर्दन अन्दर की ओर पारिवारिक लोगों के पास पहुचा ।
कहने लगा--चलो मे आपको बहुत ढाड़ी दुनिया बतलाता
हूं । जिसको आज तक हमने नहीं देखा देखकर आपको
बड़ा मजा आएगा । पारिवारिक जन भी देखने के लिये
उसके साथ चल पड़े । पर इधर छोटा सा छिद्र हवा के
झोको के कारण पुनः बद हो गया । अब वह कछुपा पूरे
सरोवर मे इधर से उधर घूमता है, पर उसे कही भी वह
'विशाल दुनिया देखने को नहीं मिली । बहुत घूमा, पर अब
उसे वह दुनिया देखने को नहीं मिली । पारिवारिक लोगों
ने भी समझा यह कहीं पागल हो गया लगता है। हम वृथा
ही इसके पीछे चले आए ।
जिन्दगी मे ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षण बहुत विरल ही
पाते हैं । उन महत्वपूर्ण क्षणों को जो व्यक्ति परिवार,
यन आदि की आसक्ति में खो देता है ! वह व्यक्ति कभी भी
अगम लोक की विशिष्ट दुनिया को प्राप्त नहीं कर सकता।
卐
धुपा आकाश को काला बना देता है,
रंगों का संयोग विचित्र चित्रशाला बना देता है ।
कुसंग के परिणामों को समझो इस युग में,
दुर्जन सज्जन को अपने रंग में मिला देता है ।
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
।
.
.
.

( ४८ )
इन्सान और फूल
मानिंग वाक (Morning Walk) करने के लिए इन्सान
प्रातःकाल उठा और बगीचे मे घूमने के लिये निकल पड़ा।
इधर-उधर घूम-घाम कर प्रकृति के सुरम्य सुवासित वाता-
वरण का आनन्द लेने लगा, इसी बीच महकते मुस्कराते
एक गुलाबी फूल के अति सन्निकट, पहुंचकर इन्सान ने देखा
फूल के अन्दर सुवास तो बहुत अभिराम है पर छोटे-छोटे
कृमि भी दौड़ रहे है ।उसे देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि
इतने सुन्दर अभिराम फूल मे भी कीड़े है ।
जिस फूल को पाने के लिये इन्सान उसके पास पहुंचा
था। उस पर कोड़ो को देख कर वह मुह मोडकर चल
पड़ा । इन्सान को इस प्रकार जाते देख कर फूल मुस्कराया
और बोला-ए सृष्टि के श्रेष्ठतम प्राणी इन्सान ! दुनिया में
तुम सर्वाधिक श्रेष्ठ माने जाते हो । मेरे मे सुगध होते हुए
भी कीड़े देख कर तुम मुह मोड़ रहे हो । पर जरा दूसरों
को देखने की बजाय अपने को ही देखो तुम्हारे भीतर कितने
कीड़े कुलबुला रहे है । बाहर से तुम अपना पॉश सुन्दर
वना लो, पर अन्दर मे स्वार्थ का कीड़ा कुलबुला रहा है,
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ६७

क्रोध का सर्प फुफकार रहा है। मोह का मगर मुह फैलाए
हुए है । क्रोध की चिंगारिया भड़क उठी है । तुम्हारे भीतर
कितने बड़े-२ भयानक विषैले जन्तु घूम रहे है । उनमें से
एक दुर्गुण रूप जन्तु भी जीवन को तबाह कर सकता है ।
जहां गुण होते है वहां अधिकाशत. कोई न कोई
दुर्गुण भी मिलता है । सभी प्रकार से पूर्ण तो कोई विरल
ही व्यक्तित्व होता है । इसलिये तुम जरा अपना देखो ।
तुमने अपनी दृष्टि को दुर्गुणदर्शी बनाली है। प्रत्येक के
दुगुण ही देखते हो इसलिये दु:खी हो । पर दृष्टि को सद्-
गुणदर्शी बनायो तो सदा हमारे जैसे मुस्कराते रहोगे । पुष्प
की अन्तः पुकार को इन्सान सुनता ही रह गया ।
विना घर्षण के प्राग नहीं निकलती,
बिना कण्ठों के राग नही बनती ।
यही कारण है कि बहुत चाहने पर भी,
बिना सुसाधना के मांग नहीं फलती ।
+
६८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ४६ ) "बीज का वृक्ष" बीज अपनी सारी स्वतन्त्रता को छोडकर वृक्ष का विशाल रूप धारण करने के लिये भूमि मे वैठ गया । भूमि की भयकर उष्मा से भी वह नही घवराया । प्रस्फुटन हुया और वही बीज अंकुरण के रूप मै दुनियां के बीचामे चला आया । अब तो मेघ ने पानी बरसा कर उसका सीचन करना प्रारम्भ कर दिया । हवा न अनुकूल रूप मे वहकर उसके प्राणो मे ताजगी भर दी। पूरी प्रकृति ने अव उत्तका सभी तरह से सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया । वीज उसी उत्साह के साथ आगे वढता चला गया । और एक दिन वह पाया कि उसके मन की मुराद पूरी हो गई । वह विशाल वृक्ष रूप मे उभर कर आकाशी-ऊचाइयो को छूने लगा । वृक्ष की इस विशालता को देखकर फुट- पाथिया इन्सान बोला-छोटा सा वीज पड़े पड़े ही हवा पानी को पाकर बढ गया है। और अव तो विशाल वृक्ष वन गया है । आदमी की बात को सुन वृक्ष ने हवा में लहराते हुए मूक अभिव्यक्ति दी । भोले इन्सान | क्या कह रहा है तू । प्रकृति भी मुखर हो उठी | [ ६६

मुझे वीज से विराट् वृक्ष बनने में बहुत कष्ट सहने पड़े है ।
सब कुछ सहने के बाद ही प्रकृति ने मुझे सहयोग देकर
आगे बढाया है ? तेरी यह कल्पना कि ऐसे पड़े पड़े ही
वृक्ष बन गया-कोरी कल्पना ही है। ऐसी कल्पना के कारण
ही तुम्हारा विकास नहीं हो पाया है। विकसित होने के
लिए पुरुषार्थ करना होगा। स्वच्छदता से हटकर सही लक्ष्य
की ओर गति करनी होगी। तभी ऐसा विशाल रूप धारण
किया जा सकेगा।
वृक्ष की इस अभिव्यक्ति ने आदमी की चेतना को
जागृत कर दिया। और वह बढ चला पुरुषार्थ की दिशा मे ।
卐
बिना दया के कोई इन्सान नहीं होता,
बिना तंतु के कोई परिधान नही होता ।
ग्रादर्शवादिता का नारा लगाने वालों,
बिना परमार्थ किये कोई महान् नही होता ।
सुगंध के बिना फूल किसी काम का नहीं होता,
प्रकाश के बिना दीपक किसी काम का नही होता ।
कैसा भी युग आ जाय भाइयो !
साधना के बिना साधक किसी काम का नही होता ।।
७० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ५० )
"कीचड़ और कंजूस"
वर्षा के कारण कीचड ने गली-गली मे अपना स्थान
लिया । लोगो का आवागमन अवरुद्ध हो गया । कीचड में
पैर न भर जाय, इस भय से लोग एक किनारे सटकर
चलते । कीचड ने देखा-वाह ! मै भी कितना महान् हूँ
कि कोई भी व्यक्ति मेरे ऊपर से नही निकल सकता । मेरा
यह रूप मेरे लिये वरदान सिद्द हो गया ।
इधर कजूम भी बोला-वाह मे भी कैसा हूँ कि मैने
ऐसी वृत्ति बना रखी है, अपनी, कि कोई भी मक्ति मेरी
संपत्ति नही हडप सकता है। यदि मेरी कंजूस वृत्ति न होती
तो मेरी सपत्ति भी कभी की समाप्त हो जाती ।
कीचड और कजूस दोनों अपनी-अपनी वृत्ति पर खुश
होने लगे । क्योंकि कीचड ने गन्दगी फैलाकर सब जगह
मच्छर ही मच्छर फैला दिये । जिनके कारण से इन्सान
परेशान हो गया ।
कजूस ने भी इधर-उधर से न्याय-अन्याय करके पैसा
इकठ्ठा कर लिया और तिजोरी मे भर लिया । और इधर
आदमी हैरान हो गया-गरीवी के कारण । भू.
लगा।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

इन्सान को दु.ख देने वाले इन लोगो की आदत प्रकृति को सहन नही हुई । सूर्य ने दूसरे दिन से ही तेजी से तपना प्रारम्भ कर दिया । सूर्य की भयंकर उष्मा को कीचड़ सहन नही कर सका और कुछ ही समय में सूखकर अपनी जिन्दगी को खो बैठा । कंजूस के पेट में दर्द पैदा हो गया । सोचा यों ही मिट जायगा । पर जब नही मिटा तो इधर-उधर सामान्य उपचार करना प्रारम्भ किया । पैसा खर्च करने की उसकी आदत नही थी। सही उपचार के विना दर्द वढता चला गया और एक दिन ऐसा झटका लगा कि कंजूस अपना विशाल मकान लाखो की संपत्ति परिवार सव कुछ छोड़कर यहा से चल बसा । दुर्गुणी की इहलोक-परलोक दोनो जिन्दगियां विग- ड़ती है। - 卐 बोलना सरल है, सुनना है मुश्किल, तोड़ना सरल है जोडना है मुश्किल । चौरासी लाख योनियो मे अात्मा को, घुमाना सरल है, खोजना है मुश्किल ।। ram *२ ] [ प्रकृति भी मखर हो उठी

( ५१ )
वंश-दल का घर्षण
जंगल मे बहुत तेज तूफान चलने लगा । बडे बडे
वृक्ष जड़ मूल से उखड़ कर गिरने लगे। कुछ पौधे नीचे
झुक गये और उन्होने तूफान को अपने से ऊपर होकर जाने
का स्वतन्त्र अधिकार दे दिया। इधर पहाड पर खड़े बॉस
के झाड़ भी तेजी से भिडभिडाये । रक्षा लरने के लिए
अपनी वे एक दूसरे में सामने का प्रयत्न करने लगे । पर
कोई बाँस एक दूसरे की रक्षा करने के लिए समर्थ नही
हुआ । ज्योही वास के पास कोई बास आया तो वह उसे
धक्के मार कर हटाने लगा। परिणाम स्वरूप एक भाई
एक भाई को आश्रय न देकर परस्पर संघर्ष करने लगे ।
संघर्प मे वे अपने आपको भूल गये । और इतनी तेजी से
भिड़ गये कि परस्पर की धर्पण से आग पैदा हो गई। उस
आग ने एक दूसरे को जलाना प्रारम्भ कर दिया । अब क्या
था, भाग को भोजन मिल गया, और वह बढ़ती ही चली
गई । देखते ही देखते सारे वंश दल को जलाकर उसने राख
कर दिया । अपने इस परिवर्तन को देखकर सब बॉस आंसू
बहाने लगे । पर दो के सघर्ष मे तीसरा लाभ उठाता ही है ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ७३

समझदार इन्सान भी इसी तरह झगड़ पड़ते है ।
भाई-भाई मे ना कुछ बात के पीछे इतना बड़ा संघर्ष हो
जाता है कि कोर्ट कचहरी पहुँच जाते है। और इस संघर्ष
में दोनों की सम्पत्ति स्वाह-समाप्त होने लगती है । और
जब परिणाम आता है तब आखे खुलती है । इस तरह का
संजर्ष दोनो को नीचे गिरा देता है ।
cho
भाई को भाई आश्रय देना सीखे, पर बांस की तरह
संघर्ष कर हानि उठाकर अपने विनाश को आमन्त्रण न दे।।
卐
सवर्तक तूफान जैसा कोई तूफान नहीं होता,
स्वयंभू समुद्र जैसा कोई समुद्र नही होता ।
दीनों के झरते आंसुओं को पोंछना सीखो,
परोपकार जैसा कोई उपकार नहीं होता ।
आज धन ही धन की दोड़ लगी है,
आज एक दूसरे की होड़ लगी है।
आज का मानव नही समझ रहा हैं कि,
अाज विनाश की ओर ही घुड़दौड़ लगी है ।।
•
४ ।
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ५२ )
पतंगिये की
भिन्नभिन्नाहट
हजार पावर के वल्ब की चमचमाती रोशनी प्रापित
हो पतगिया उसे पाने के लिए उस पर झपापात करने लगा।
ज्यो ही उसन वाब पर झपकिया त्योही बल्ब की उष्मा ने
उसे सतप्त कर भूमि पर पटक दिया । दूर से आकर्षक
लगने वाले बल्ब की सन्निकटता घातक सिद्ध हुई । कुछ
समय के अनन्तर जव पतगिये को होश आया । होश आने
के साथ ही उसकी दृष्टि पुन उसी बल्ब पर गिरी, जिससे
की उसकी यह दुर्दशा हुई थी। अपनी दुर्दशा को भूलकर
फिर से उसे पाने के लिए नादान पतंगिये ने झंपापात
किया । इस बार फिर वही हुआ जो होना था । बल्ब की
उष्मा ने फिर सतप्त किया और उठाकर भूमि पर पटक
दिया । कुछ देर बाद फिर पतगिये को होश आया तो
उसने फिर उसी वल्ब का प्रकाश पाने के लिए सब कुछ
भूल-भालकर उडान भरी और एक बार फिर से उस पर
जा पहुँचा । इस बार भी वही हाल हुआ, जो होना था ।
पत्तगिया भूमि पर आ पडा और अब फिर उस बल्ब पर
जाने के लिए छटपटाने लगा। किन्तु बार-बार के झप से
सतप्त हो जाने के कारण उसकी शक्ति खत्म हो गई । अब
उसमे झप करने की ताकत नही रही। अब वह छटपटाता
हुआ जिन्दगी के अन्तिम क्षण गिन रहा था ।
पतगिये की इस मूढता को देखकर उसी प्रकाश से
लाभ उठाने वाले समझदार इन्सान से रहा नही गया । इन्सान
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

ने उस छटपटाते पतंगिये को इ गित करके कहा-ग्रहो । यह कैसा ना समझ प्राणी है कि जिसने बल्ब पर झपापात करने से बार-बार चोट खाई है । दुखी हुआ है उसी बल्ब को पाने के लिए झंप करते-करते अब स्वयं ही अपने प्राण दे रहा है । इन्सान की बात सुनकर अन्तिम श्वास गिनता पत्त- गिया एक बार भिनभिनाया और जाते-जाते आदमी को शाश्वत सत्य संदेश सुना गया-हे सृष्टि के श्रेष्ठ समझे जाने वाले इन्सान ! निश्चित ही तुम मुझसे बहुत होशियार और बुद्धिमान हो । इसमे कोई सन्देह नही । मुझे तो यह ज्ञान नहीं था कि इस बल्ब से मुझे सन्तप्त होना पड़ेगा । मै तो यही समझ कर कि इससे मुझे सुख प्राप्त होगा । इसीलिए बार-बार झप करता रहा । पर तुम क्या कर रहे हो ? विषयों को पाने के लिए तुम्हारी दौड़ निरन्तर लग रही है । दिन रात एक कर रहे हो यह जानते हुये कि इन विषयों को यहीं छोड़कर जाना होगा और इसमे शाश्वत शान्ति भी प्राप्त नहीं हो सकेगी । फिर भी तुम इसकी आसक्ति में पड़कर अपने अमूल्य जीवन को बर्बाद कर रहे हो । ठीक है मै तो अज्ञानी हूँ ही, इसलिए वल्व पर झप करके अपने प्राण दे रहा हूँ क्योंकि मुझे नहीं मालूम था कि वल्ब मेरे लिए हानिकारक सिद्ध होगा पर तुम्हे तो विपय की हेयता मालूम है । उसके बाद भी तुम यदि उसी में आसक्त रहकर अपनी जिन्दगी वर्वाद करते हो तो बोला-कौन बड़ा अजानी है । पत्तंगिये की इस भिनभिनाहट का यह संदेग इन्सान अव तक नहीं समझ पाया । C .७६ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ५३ )
मकड़ी का जाल
आदमी जब अपनी सुरक्षा के लिए जगलो में रहना
छोडकर घर बनाने लगा। तो सृष्टि का एक विचित्र प्राणी
मकड़ी ने भी अपना घर बनाने का विचार किया । वह
सोचने लगा जव यादमी रक्षा के लिए इतना बडा घर बना
सकता है तो फिर मै भी क्यो न अपने लिए घर बना सकती
हूँ ? मै भी ऐसा मजबूत और अभेद्य प्रकार वाला घर बना-
ऊंगा कि कोई भी उसमे प्रवेश न कर सके । अादमी भी
देखता रह जाय । ऊसे भी ज्ञात हो कि बुद्धिमान वही नहीं
है दुनिया में और भी प्राणी बुद्धि से उसकी समकक्षता
वल्कि विशिष्टता रखते है ।
इधर तो इन्सान ने चूना-ई ट-पत्थर आदि एकत्रित
करके मकान बनाना प्रारम्भ किया और कुछ ही महीनो मे
मकान बनकर तैयार हो गया। आदमी ने देखा मकान तो
अच्छा बन चुका है पर इसमे प्रवेश करने के लिए शुभ
मुहूर्त देखना होगा । वह पहुंचा सीधा ज्योतिपी के पास,
मुहूर्त्त पूछने । मुहूर्त एक महीने बाद का निकला । आदमी
ने मकान को यह सोचकर वन्द कर दिया । कि एक महीने
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ७७

बाद ही इसमे प्रवेश करूंगा । इधर मकड़ी ने अपना काम
करना प्रारम्भ कर दिया । वह भी उसी मकान में प्रवेश
कर गई । और सोचने लगी मुझे इतना बड़ा मकान तो
बिना परिश्रम के ही मिल मया । अब इसके अन्दर ऐसा
मकान बनाऊंगी कि जिसमें जाने के बाद मुझे कोई मार
न सकें।
यह सोचकर उसने जाल बनाना प्रारम्भ किया ।
कच्चे तारों का ताना-बाना किया और कुछ ही देर मे एक
मजबूत मकान-जाल का निर्माण कर लिया। जिसके अन्दर
कोई भी प्रवेश न कर सके । मकड़ी में सोचा, बस अब में
शान्ति से रह सकूगी । मकड़ी ने अपने मकान में प्रवेश
किया । प्रवेश करके देखा कि अरे और तो सब तरफ से
मकान मजबूत बन गया है पर यह रास्ता तो खुला है, जिस
से मैंने प्रवेश किया है । अगर यह रास्ता बन्द न होगा तो
कोई भी चला आयेगा । मुझे इसे भी बन्द कर देना चाहिए
यह सोचकर नादान मकड़ी ने ताने बाने वुन कर वन्द कर
दिया । जब उसका मकान सभी तरफ से पैक वन्द हो गया,
तब वह सोचने लगी कि-अब मै सभी तरफ से सुरक्षित हो
गई हूँ। पर वह सुरक्षा कितनेक समय की थी। कुछ ही
देर बाद जब मकड़ी को भूख लगी तो वह बाहर पाने का
सोचने लगी, पर उसने तो दरवाजा भी वन्द कर दिया था ।
अव बाहर कैसे निकले । जाले पर पैर लगाया तो वह उसी
में फंस गई। पैर निकालने की बहुत कोशिश की पर जितगी
कोशिश की, उतनी ही तेजी से मकड़ी जाल में फंसती नली
गई । आखिर अपने ही बनाए जाल मे तड़फ-तड़फ कर
७८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

उसने प्राण छोड़ दिये । जिसे सुरक्षा के लिए बनाया था,
वही उसके लिए घातक सिद्ध हुा ।
आदमी ने जब महिने भर बाद मुहूर्त पाने पर
मकान में प्रवेश किया तो जाले मे मकड़ी को मरा पाया ।
उसने उसी समय झाडू उठाया और एक ही झपटे मे जाल
सहित मकड़ी को नीचे गिराया। लेकिन यह नही सोचा
कि जिस प्रकार मकड़ी अपने ही जाल में फंस कर मर गई
है । वैसे ही मैं भी इस मकान, परिवार, धन, दौलत, वैभव
मे आसक्त हो, शान्ति-शान्ति की चाहना करते हुये अशान्त
जीवन में ही चल पडूगा । यह मेरा निर्माण मेरे लिए ही
घातक सिद्ध होगा । मेरा एक भव नहीं अपितु भव--भव
विगाड़ने वाला बनेगा।
इन्सान यह समझे या ना समझे पर दुनिया के रंग
मंच पर यह सब घटित हो रहा है । आदमी स्वय की मौत
के लिये स्वय ही साधन जुटा रहा है ।
मानव ही अपने भाग्य का निर्माता है,
मानव ही अपने पापका प्रणेता है ।
क्या नहीं है मानव के भीतर,
मानव ही अपने आपका विधाता है
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

( ५४ )
सर्प का
सन्देश
सपेरे की वीन पर सर्प नाचने लगा । सपेरा जिस
तरह सर्प को नचाना चाह रहा था । सर्प ठीक उसके
इ गितानुसार ही नृत्य कर रहा था सर्प की इस दुनिया को
देख कर आदमी बोला-कहाँ तो यह सर्प देवता कहलाता
था । इसकी एक फुकार ही लोगो को डराने के लिए काफी
थी । आदमी डरकर इसकी पूजा करते थे । और कहा
बेचारा आज सपेरे के इशारे पर नाच रहा है । पुगी की
सुरीली आवाज के वश में होकर इसने अपनी यह दुर्दशा
बना ली है।
आदमी की बात को सुनकर नाचते सर्प ने नि.श्वास
छोड़ते हुए कहा-हे समझदार इन्सान ! तुम्हारा कहना
सर्वथा सत्य है । मैंने इस सपेरे की पुगी के वश होकर
अपनी यह दुर्दशा की है। यदि मै इसके वश नही होता
तो यह मेरी जहर की ग्रन्थि नहीं निकाल पाता और न ही
मुझे नचा पाता । आज मैं अपने अज्ञान पर पश्चाताप कर
रहा हूं । पर जरा सोचो-तुम क्या कर रहे हो । तुम
तो
सृष्टि के सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी हो । तुम्हारी क्या दशा
८० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

हो रही है । मैं तो केवल एक कान के वश मे हुआ, उस- का परिणाम भोग रहा हूँ । पर तुम तो सभी इन्द्रियो के वश मे होकर अपनी पूरी जिन्दगी ही बर्बाद करने पर तुले हो । कामोत्तेजक नित नये गाने सुनने के लिए कान सदा उत्सुक रहते हैं । प्राख से नये-नये चित्र देखने को तैयार रहते हो । नाक से सुगन्ध सूघने के लिए उतावले रहते हो मुंह मे वढ़िया से बढिया मिठाई खाना चाहते हो । शरीर अच्छा से अच्छा स्पर्ण चाहते हो । तुम्हारी पाचो इन्द्रिया निरन्तर विषयो की तरफ दौड़ रही है । ऐसी हालत मे मुझे मेरे से भी ज्यादा तुम पर तरस आती है । तुम क्या कर रहे हो ? मै तो एक कान के वश मे हुआ उसका इतना दारुण विपाक भोग रहा हूँ। और तुम पांचो इन्द्रियो के वश मे होकर चल रहे हो । तुम्हारे विपाक की कल्पना करने पर तो रोगटे खडे हो उठते है । जरा सोचो-अपने लिए । अधिकांश इन्सानो की दृष्टि दूसरो को देखने की अधिक रही है। अपनी तरफ तो उसकी दृष्टि ही नहीं जाती। सुख के लिए मानव अाग से खेल रहा है, विष वुझे बाणो को भी दृढ़ता से झेल रहा है । इतने पर भी सुखी नहीं बन पाया वह, क्योंकि, जीवन रथ को सदा उत्पथ मे ही ठेल रहा है ।। प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ८१ ( ५५ ) मूर्खता किसकी ? पक्षियों मे तोता एक ऐसा पक्षी है कि वह मानव जैसी भाषा बोल सकता है। पक्षी को मानव जैसी भाषा चोलते देख कर आदमी ने सोचा क्यों न इसे पाल-पोषकर बढ़ा किया जाय और इसे मानव की भाषा सीखा दी जाय। चस फिर क्या था । आदमी ने तोते को मानव की भाषा सिखाना प्रारम्भ किया । वोलो मीठू राम-राम सा. तो तोता बोला राम-राम सा. बोलो मीठू दो एका दो दो--दो दूनी चार तोता वोलता है-दो एका दो-दो दूनी चार । आदमी ने सोचा वाह, अव तो बहुत होशियार हो गया है तोता । अब इसे पिंजरे में रखने की क्या आवश्य- कता है क्यो न इसे समझा देना चाहिए कि बिल्ली कुत्ता कोई भी आ जावे तो उड़ जाना ताकि उसे खा न सके । यह सोचकर आदमी ने तोते को रटाया ! वोलो मीठू कुत्ता विल्ली आवे तो उड़ जाना । मीठू बोला-कुत्ता विल्ली आवे तो उड जाना । कुत्ता विल्ली आवे तो उड जाना । ८२ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी आदमी खुश हो गया। वाह अब तो तोता समझ गया है अव कुत्ते बिल्ली इसे मार नहीं सकते । यही सोचकर तोते को आदमी ने तोते को पिंजरे से बाहर निकाल दिया । तोता केवल रटना ही जानता था । उसे समझ नही थी जैसे मालिक ने समझाया वैसा उसने रट तो लिया पर समझा नही कि कुत्ते बिल्ली क्या होते है। इस ना समझी के कारण बिल्ली ने तोते को या दबोचा और वह उड नहीं सका । ची ची करता रह गया। यह देखकर उसका मालिक दौड़ा-दौडा पाया और चिल्लाया- अरे नादान ! तुम्हे इतना समझाया था। फिर भी तुम बिल्ली से नहीं वच सके । आखिर तो पक्षी ही हो । मानव की भाषा जरूर - सीख गये पर दिमाग नही पाया तुम्हारे मे मूर्ख ही रह गए। इन्सान को गुस्सा करते देखकर तोता बोला--समझ- वार इन्सान ! यह सही है कि मेरे मे दिमाग नही है, पर तुम्हारे मे तो दिमाग है ना। तुम्हे ऋषि महर्षि त्यागी महात्मा प्रतिदिन समझाते है कि इन सासारिक वस्तुग्रो ने सुख नही है, सुखाभास है। और उनके सामने हाँ भी भरते हो कि आपकी बात सत्य है । पर आज भी वही कार्य कर रहे है । जो पहले करते थे। वोलो-मूर्ख तुम हो या ? Theo प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

( ५६ )
चिड़िया का
का सन्देश
एक नन्ही सी चिड़िया वृक्ष मूल के खोखर के किना
अपने रहने के लिए जाल बनाने का प्रयास करने लगी
बड़ी मुश्किल से तिनका लाकर वह वहां लगाती और तिन
का गिर पड़ता । वह फिर से नीचे जाती तिनका लेक
माती और फिर वहा आकर लगाती । और वह फिर पड़त
ऐसा एक वार-दो बार नही अनेक बार हो गया । फिर में
त्रिड़िया ने पुरुषार्थ नही छोड़ा वह तिनका बार-बार लाक
वहा लगाने का प्रयास करती रही ।
मकडी के परिश्रम को इस प्रकार निरर्थक जाते देरा
कर आदमी ने कहा-अरे बेजान चिडिया ! क्यों वार-वार
तिनका उठा रही है । तेरे मे तिनका लगता तो है नहीं ।
तेरा परिश्रम बेकार जा रहा है ।
आदमी की इस बात को सुनकर के भी चिडिया ने
अपना परिश्रम करना नहीं छोड़ा।
वह उसी लग्न निष्ठा
के साथ परिश्रम करती रही । आखिर उसके परिश्रम ने
चमत्कार कर दिखाया । तिनका उस खोखार में जा टिका।
८४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
-ane

फिर क्या था चिडिया एक के बाद एक तिनका लगाती
चली गई। और अपने लिये एक घोंसला तैयार कर ही लिया।
घूमता-धामता आदमी फिर से उसी वृक्ष की छाव में
आकर बैठ गया । सृष्टि के श्रेष्ठ प्राणी आदमी पाया
देखकर चिडिया ने उसे सूचित किया तुमने तो कहा था न
कि मै बेकार परिश्रम कर रही हूँ।
पर लो देखो-मैने
अपना घोंसला तैयार कर लिया है । और पाराम से रह
रही हूँ। और एक तुम हो जो समझदार कहलाते हो । सब
कुछ करने में समर्थ कहते हुये भी भूखे मर रहे हो । खाने
के लिए भोजन की पूरी सामग्री ही नही जुटा पा रहे हो ।
चिड़िया के इस सदेश ने अादमी का मुह वद कर
दिया ।
TAN
दुर्गम पथ पर चलने का अभ्यासी बन गया
है यादमी,
विकट विपत्तियों को सहने का अभ्यासी बन गया
है आदमी।
पर मानव शक्ति विपरीतगामी अधिक बनी है,
संघर्षों से जूझने का अभ्यासी बन गया है आदमी ।।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

( ५७ )
"गिलहरी का अथक परिश्रम"
सृष्टि का एक प्राणी इन्सान अथक परिश्रम करके
भी जिन्दगी मे सफल नहीं हो सका । विवाह किया सुख
पाने के लिए तो पत्नी कर्कशा मिल गई। व्यापार किया
धन दाने के लिये तो प्रॉफिट के स्थान लॉस हो गया । जो
भी काम किया उसमे हानि ही हानि होती चली गई।
आखिर इन्सान अपनी जिन्दगी मे ऊब गया। वह जहां भी
चला जाता उमे दुख ही दुःख प्राप्त होता । ऐमे जिन्दगी
जीने के वजाय तो मरना अच्छा । यही सोच कर वह निकल
पड़ा, अपने घर से जंगल की ओर। चलता ही गया चलता
हो गया । बहुत दूर निकल पाया । घने जंगल को पार
करने के बाद उसे एक झरना दिखलाई दिया । थका मदा
इन्सान उस झरने के पास जा पहुचा । प्यास तो तेजी में
लग रही थी। इसलिये सबसे पहले उसने झरने का शीतल
सुमधुर जल पीकर अपनी प्यास शान्त की। उसके बाद
गीतल-वृक्ष छांव में बैठ गया और प्राकृतिक सौन्दर्य का
अवलोकन करने लगा।
इसी अवलोकन में उसने एक विचित्र वात देगी। वह
८६]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
Anrelu

यह थी कि एक नन्ही-सी गिलहरी जो झरने के पास जाती और
अपनी पूछ गोली करके स्थल-भू भाग मे आकर उसे सूखों
देती। फिर झरने के पास जाती और गिली पूछ करके स्थल
भू भाग मे आकर फिर सुखा देती । उसका यह क्रम निरन्तर
चल रहा था गिलहरी की यह स्थिति देखकर उस आदमी
से रहा नहीं गया । वह वोला ए' नन्ही-सी दुवली जान !
यह क्या कर रही हो । क्यो वार-२ झरनं मे जाकर पूछ
गीली करके सुखा रही हो । क्या कारण है, इस प्रकार
करने का ?
आदमी की आवाज सुनकर गिलहरी के पाव ठिठक
गए और उसने अादमी को पूरा और बोली-इन्सान | तुझे
क्या मतलव मै क्या कर रही हूं। तुम अपना काम करो।
मेरे काम मे हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
गिलहरी की आवाज सुनकर इन्सान ने कहा-अरी
मैं तुम्हारे कहा वाधा डाल रहा हू
? मैं तो केवल यह पूछ
रहा हूं कि तुम यहा क्या कर रही हो ?
गिलहरी-क्या तुमको दिख नही रहा है । मै झरने
का पानी अपनी पूंछ मे वार २ लेकर बाहर ला रही । यह
करना सुखाना है। इसका सारा पानी खाली करना है !
नन्ही-सी चुहिया के पहाड खोदने की तरह गिलहरी
को निरर्थक परिश्रम करते देखकर मानव ने अट्टहास करते
हुए कहा-वाह धन्य है तुम्हारा परिश्रम ।
तुम तो क्या तुम्हारी सात पीढिया भी इसी तरह
करती-२ खप जाए तो भी यह झरना सूख नही सकता।
गिलहरी-नादान इन्सान
तुम मेरी तरफ क्यो देखते
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ८७
।

हो । मैंने तो अपना लक्ष्य पुरुषार्थ बनाया है । फल की
तरफ कभी ध्यान ही नही दिया । इसलिये मै तो अपना
परिश्रम करती रहूंगी । भले झरना सूखे या न सुखे । इससे
मुझे कोई मतलब नही है ।
गिलहरी की इस अदम्य साहस भरी वात ने इन्सान
को अपने विषय में सोचने के लिये विवश कर दिया । कहां
तो यह गिलहरी जिसके सामने पहाड़ जितना काम पड़ा
तो भी नही घवरा रही है' और कहां मैं जो थोड़े से परि-
श्रम में सफलता न पाकर मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ,
। क्या मै गिलहरी से भी गया गुजरा हूं । नही-२ मुझ
ऐसा नहीं करना चाहिये । मै भी गिलहरी की तरह अदम्य
साहस एवं उत्साह के साथ काम करू गा तो एक न एक
दिन सफलता पाकर रहूगा ।
थके हारे उस इन्सान ने नन्ही-सी गिलहरी से प्रेरणा
लेकर अपन विचार बदल दिये और उत्साह एव लग्न के
साथ अपन कार्य में जुट गया ।
नन्ही-सी गिलहरी ने डूब रहे इन्सान को बचा लिया।
-
ta
१
अाज जवाहर जैसा लोकप्रिय नेता कहा रहा है ।
आज गांधी जैसा पर दुःख चेता कहां रहा है
वर्तमान की विभिपिका का बड़ा विचित्र रूप है,
अाज भामाशाह जैसा दानदेता कहां रहा है ।
hammad
[ प्रकृनि भो मुखर हो उठी

(५८)
मूषक का स्वार्थ
इवर से उधर फूदकते हुए मूपक--चूहे को एक दिन
घान्य का अक्षय भण्डार दिखाई दे गया। एक कोठे मे गेहू
ही गेहू भरे हुए थे । जिसे देखकर मूषक बहुत खुश हुआ।
और सोचने लगा 'वाह' यह अनाज मेरे हाथ लग जाय तो
जिन्दगी भर खाऊ तो भी समाप्त होने वाला नही है । पर
इस कोठे मे जाया कैसे जाय ? इसका--मुख्य द्वार तो वंद
है मूषक न कोठे के चारों ओर दौड लगाई और वह उसका
सूक्ष्मता से निरीक्षण करने लगा कि कहां छिद्र है ? देखते-
देखते आखिर उसे एक सुराख--छिद्र मिल ही गया। हालाँकि
वह था तो वहुत छोटा ही पर लोभ के वश होकर नादान
मूषक अपने शरीर को सिकोड़ कर उस सुराख से भीतर
प्रविष्ट हो ही गया ।
अव क्या था ? उसकी आखो के सामने धान्य का
अखूट भडार था । जिसे पाकर मूषक सोचने लगा। जितना
अनाज मेरे पास है, उतना मेरे किसी भी साथी के
पास नही होगा दुनिया मे मेरे से ज्यादा धनवान कौन होगा ?
अब तो मेरी जिन्दगो बहुत शान्ति से गुजरेगी । भोजन के
लिये इधर-उधर भटकना नही पड़ेगा। बिल्ली का भी डर
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ८६

नहीं है । क्योकि वह भीतर प्रवेश ही नहीं कर सकती। यहां तो बस मेरा ही एकाधिकार राज्य है। कुछ समय तक तो चहा मन की कल्पनाओ में ही उड़ता रहा । इसके बाद अनाल खाने लगा जब भी भूख लगती पेट भर खाता । दो चार दिन तक तो उसे बड़ी प्रसन्नता की अनुभूति हुई। पर आखिर पूरे कोटे में अकेला होने से कब तक उसका मन लगता । अब उसे अपने भाई दूसरे चूहों की याद आने लगी । सोचा जाऊ वहा पर और उन्है भी बताऊँ कि मेरे पास कितना बड़ा अनाज का भण्डार है । दिन भर अकेले-२ तो दिन कट ही नही पा रहा है । यह सोच कर मूषक-राज अपनी शेखी बघारने, कोठे से बोर निकलने के लिए उस सुराख के पास पहुंचे । सुराख तो पहले से ही छोटा था। तब भी जैसे-तैसे मूषक राज ने भीतर प्रवेश किया था । और अव तो पेट भर अनाज खाने से मूपकराज का शरीर भी कूल गया था । अत. सुराख बहुत ही छोटा पड़ने लगा। मुपक-राज से निकलना नहीं हो पा रहा था । यह देख कर त्तो मूषकराज बहुत घबराये । अव तो कैसे भी वहां से निक- लने की कोशिश करने लगे । उन्हे अकेलापन बहुत अखरने उगा । पर कोशिश करने पर भी निकल नही पा रहे थे । आग्निर मूषकराज ने झटके के साथ निकलने की पूरी-कोगिश की तो उस छिद्र में ही फंस गए । विचित्र दगा बन गई उनकी न वाहर जा पाए और न भीतर ही । मूपकराज तरूफने लगे । पर अब उन्हे बचाने वाला कौन था ? अाखिर प्रलोभन में आकर मूपकराज ने वहीं तडफ-२ कर अपने प्राग्ग छोड दिये । कुछ दिनों के बाद इन्सान ने याकर जब कोठा खोला ..] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

तो उसमें बदबू आने लगी । समझ गया इन्सान कि कोई
न कोई चूहा मर गया लगता है । और जब देखा कि इस
छिद्र मे फंसा हुआ है तो वह बोल पड़ा- आखिर तो मूर्ख
ही ठहरा । खा-पीकर मुस्टंड तो हो गया और अब जब
भगने लगा तो इसमें फंस गया ।
चूहे के लिए इस प्रकार के शब्द सुनकर प्रकृति भी
मुखर हो उठी । ए सृष्टि के श्रेष्ठ प्राणी यह तो ठीक है
कि चूहा मूर्ख है ! पर तुम यह क्या कर रहे हो । तुम भी
अपने ही स्वार्थ के वश होकर धन से, चन्द चांदी के टुकडों
से भण्डार को भरने मे लगे हुए हो । क्या तुम्हें मालूम नहीं
कि तुम भी इसी प्रकार उसमे अपने प्राण गंवा बैठोगे ।
चहा तो नादान था पर तुम तो समझदार हो ना !
卐
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ६१

( ५६ )
कुत्ते की
की आदत
कुत्ते अपने स्वामी के प्रति वहुत वफादार होते है ।
चोरों से अपने स्वामी की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते है । कुत्ता, आदमी के साथ या फिर अन्य किसी के
साथ बड़े स्नेह से रह सकता है पर अपने जातीय भाई
अपरिचित कुत्ते के साथ नहीं । एक वार एक गली का कुत्ता,
भटकता हुआ दूसरी गली में चला गया । उस गली के
कुत्तों ने जब उसे देखा तो स्वागत करने की बजाय, सव
भौकने लगे । सभी कुत्तों ने आकर उसे चारो तरफ से घेर
लिया और भौ-भौ करके उसे कचोटने लगे । विचारा अकेला
कुत्ता, उन सबके सामने कहां तक टिकता, अाखिर अपनी
जान बचाने के लिये वहा से भाग निकला और घूमता-
घामता अपनी गली मे पहुच गया । एक दिन उसकी गली
में उसी गली का एक कुत्ता आ गया तो इन सब कुत्तो ने
भी भौ-भौ करके उसे अपनी गली से खदेड़ दिया ।
कुत्तों की इस आदत को देखकर राह चलते हुए एक
पडित ने कहा-आखिर श्वान-कुत्ते ही तो ठहरे । कुत्ता,
कुत्ते को देखकर घूरता ही है । कभी भी एक कुत्ता, अपने
अलावा अन्य कुत्ते को देखना भी पसन्द नही करता
और यदि कोई कुत्ता भूल-चूककर आ भी जाय तो जब तक
'ग्रुप'
-६२ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

उसे वहा से वह नही निकाल देता है, तब तक शान्ति से
नहीं बैठता है।
कुत्ते ने पोथी के पण्डित से जब सपने लिए प्रतिक्रिया
सुनो तो बोला-पंडितराज ! बात तो आपकी सच्ची है ।
हमारे मे यह दुर्गुण निश्चित रूप से है । हम अपने ही
भाई को देखना पसन्द नही करते । वंसे भी हम नासमझ
है, पर आप नो दुनिया के श्रेष्ठ प्राणी हो और उसमे भी
पडित हो । आपने तो बहुत पढाई की है। हमको तो पढ़ना
भी नही आता है, पर हमने देखा है कि आप भी जब किसी
दूसरे पंडित को देखते हो तो हमारी तरह ही घुर्राते है ।
हम तो हमारे सामने कुत्ता आने पर ही घुर्राते है । सामने
न हो तो हम उसके विपय मे दूसरो के सामने कुछ नहीं
कहते हैं । पर आप तो आपके सामने दूसरा पंडित आए
या न पाए, उसके परोक्ष मे भी उस पडित की वात चलेगी
तो घर-घुराए बिना नही रहोगे, और आपकी घूर्राहट भी
बहुत तेज होती है ।
अव बोलिये पडितराज ! जब आपकी भी यही स्थिति
है तो फिर हमारे मे और आप मे अन्तर ही क्या रहा है?
पहले आप अपन दुर्गुण को निकालिये फिर हमको कुछ
शिक्षा दे तो उपयोगी रहेगा । अन्यथा आपकी शिक्षा का
हम पर कोई असर नही होने वाला है ।
कुत्ते की इस आवाज को सुनकर पडितजी का मस्तक
शर्म से नीचे झुक गया । चले थे अपनी पंडिताई वधारने
के लिये पर अब मुह बिगाड कर वहां से चल पड़े ।
इसीलिये नीतिकार ने सही कहा है-पण्डितो पण्डित
दृष्ट्वा श्वानवत् घुर्घरायते ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ६३
क

( २५ ) "चोर और तिजोरी" एक कुत्ते को कही से एक रोटी प्राप्त हो गई । अभी उसे भूख नहीं थी इसलिए उसने सोचा-यह रोटी कही गाढ दी जाय । जव भूख लगेगी तव निकालकर खा लूगा । कुत्ता उस रोटी को गाढने चल पड़ा, पर रास्ते में पानी का नाला आ गया, उसे पार करना था । अत. वह पानी में ही चलने लगा। पानी में चलते-चलते उसकी दृष्टि नीचे की ओर पड़ी तो उसने देखा कि उसकी तरह ही एक ओर कुत्ता भी रोटी लेकर भाग रहा है। यह देखकर वह सोचने लगा-क्यों न इस कुत्ते की रोटी भी छीन ली जाय, ताकि मेरे पास दो रोटियां हो जाएगी। यह सोचकर नासमझ कुत्ते ने अपने साथ चल रहे कुत्ते से रोटी छीनने के लिए मुंह खोला और भौकना चालू किया । कुत्ते ने मुंह खोला और रोटी इसके मुंह से निकल- कर नाले में जा पड़ी । अब उसके साथ रहे कुत्ते के मुंह में भी रोटी नही रही। बस, वह भौकने लगा तो वह कुत्ता भी भौकने लगा तब उसे बड़ी निराशा हुई कि उसके हाथ मे आई रोटी भी चली गई। वह निराश और उदास हो नाले से बाहर निकला । इधर समझदार इन्सान, नाले के किनारे ही खड़ा- खड़ा कुत्ते की सब हरकत देख रहा था । ज्यों ही कुत्ता पास में आया तो इन्सान बोला-वाह रे नासमझ कुत्ते । ६४ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी तुम मुझे ? तुझे यह भी मालूम नहीं कि जो कुत्ता तुम्हारे साथ मे चल रहा था, वह वास्तव में कुत्ता नहीं था, किन्तु तुम्हारी ही परछाई थी, जिसे तूने कुत्ता समझकर उसकी रोटी छीनने की कोशिश की तो अपनी रोटी भी गंवा बैठा । अपने भाई की रोटी जो छीनेगा, उसका यही हाल होगा । इसीलिए मानवो में भी जो नासमझी का काम करता है, उसे कुत्ते की उपमा दी जाती है । इन्सान की बात सुनकर गुस्से मे आया कुत्ता नौकने लगा । अरे समझदार कहलाने वाले इन्सान वदनाम कर रहे हो, पर जरा अपने गिरेबान मे भी झाक- कर देखो- तुम्हारा क्या हाल है ? चंद चादी के टुकडो को लेकर क्या तुम नही भाग रहे हो ? अपने ही भाई का धन छीनने के लिए तुम सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हो । अपनी सारी जिन्दगी को धन बटोरने मे ही बर्बाद कर रहे हो । एक दिन वह समय आ जाता है, जब इसी भाग दौड मे तुम्हारी आयु समाप्त हो जाती है । और तुम सब कुछ छोड़कर यहा से चले जाते हो । अपने स्वार्थ के पीछे भाई के साथ जितनी गद्दारी तुम कर सकते हो उतनी मै तो क्या दुनियां का कोई भी प्राणी नहीं करता। सच कहूँ तो तुम्हारे स्वार्थ की परछाई मेरे ऊपर गिर जाने से ही मैं स्वार्थी बन गया हूँ । संभव है अगर तुम्हारा साथ नही होता तो मेरा यह स्वभाव नहीं होता। इसी आवाज के साथ कुत्ता बहुत तेजी से भौकता हुमा आदमी की ओर लपका । यह देखकर आदमी ने देखा कहीं यह मुझे काट न ले यह सोच वहा से भाग खड़ा हुआ । प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ६५

( ६१ )
हवा और बादल का संघर्ष
आषाढ का मौसम, गर्मी भयंकर गिर रही थी। सभी
की दृष्टि अाकाश की ओर लगी हुई थी । प्यासा चातक
पानी के लिये तरस रहा था, किसान बीज बोने के लिए
वर्षा का बेताबी से इन्तजार कर रहा था । आखिर सभी
की प्राशायो को पूर्ण करने के लिए नभ में काले कजराले
बादल मंडरा गए ।
वादलो का नभ में एक छत्र राज्य देखकर हवा से
रहा नहीं गया, उसने सोचा--इन्हे कैसे भूमिसात् किया जाय?
ऐसे तो ये धनीभूत है, अतः शक्ति संपन्न है, ऐसी स्थिति मे
इन्हे नीचे नहीं गिराया जा सकता है ? फिर क्या किया
जाय ?
हवा ने सोचा-सृष्टि के सभी प्राणियो में सर्वश्रेष्ठ
बुद्धिमान तो आदमी है, क्यो न आदमी से ही पूछा जाय
कि बादल को आकाश से कैसे नीचे गिराया जाय ? यही
सोचकर हवा आदमी के पास पहुची और अपनी समस्या
सामने रखकर उसने समाधान माँगा ।
१६ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी
.

आदमी की स्वार्थ बुद्धि ने वादल को गिराने की तर- कीब निकाल ही ली। उसनं हवा को समझाया - देखो, बादल जब तक धनीभूत रहेगा तब तक तो इसे गिराया नही जा सकता है, हा यदि इसकी शक्ति विखंडित कर दी जाय तो इसे नीचे गिराया जा सकता है । इसके लिए तुझे यह काम करना है कि तुम बहुत तेजी से चलो । जितनी तेजी से चलोगी उतनी ही बादल की शक्ति शिथिल होती चली जाएगी और वह बिखर जाएगा, विखरने पर वह आकाण मे टिक नही सकता। हवा ने मानव की बात सुन- कर वैसा ही किया । हवा के थपेड़ो से बादल बिखर गए और कुछ ही क्षणों मे धरती पर पा गए । आदमी की स्वार्थ बुद्धि दूसरे को ऊपर उठने नही देना चाहती। का बिना आवरण के आकर्षण नही होता, विना सुशासक के सचालन नहीं होता। कर्म की विचित्रता को समझो उपासको, बिना कर्मों के जन्म-मरण नही होता ।। आम्र भी कभी-कभी मारक बन जाता है, किपाक भी कभी-कभी तारक बन जाता है । शत्रु मित्र की परिधियों को समझो भाइयों, मित्र भी कभी-कभी संहारक बन जाता है ।। प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ६७ ( ६२ ) चन्दन वृक्ष और सर्प चन्दन की भीनी-भीनी महक से पूरा उपवन महक उठा । पशु-पक्षी भी पुलकित हो उठे । सर्प तो उस सुगन्ध से इतना अधिक मोहित हुआ कि वह सब कुछ छोड़कर चन्दन के तने मे आकर लिपट गया और चन्दन की शीत- लता एवं सुगन्ध मे आसक्त वन गया । सर्प को अपने तने मे लिपटते देखकर चन्दन वृक्ष को एक बार तो विचार आया- अरे यह जहरीला जन्तु ! मेरे क्यों लिपट गया ? इसकी तो जहरीली नि श्वास भी घातक है और यदि जहर उगल दे तो विनाश निश्चित ही है । एक बारगी तो चन्दन तो चिन्तित हो गया पर दूसरे ही क्षण सोचा-ठीक है. सर्प जहरीला है तो रहने दो । पर मैं इसका जहर अपने मे ग्रहण नहीं करूगा तो मुझे कोई हानि नही हो सकती। यह मेरे तने से लिपट रहा है, लिपटने दो । भले बाहर से यह मेरे चिपका हुआ दृष्टि- गोचर हो पर भीतर से मेरी और इसकी दूरी सदा बनी रहेगी । चन्दन के वृक्ष ने यही किया, कभी भी उसके जहर को अपने भीतर प्रविष्ट नही होने दिया। एक बार आदमी १८ ] [ प्रकृति भो मुखर हो उठी

घूमता-घामता उसी उपवन आ पहुँचा । चन्दन की भीनी-
भीनी सुगन्ध से प्राकर्षित हो वह सीधा चन्दन वृक्ष के पास
पहुच गया पर सर्प को चन्दन के वृक्ष से लिपटा देखकर
ठिठक गया । और फिर सर्प को हटाने की योजना बनाने
लगा।
आदमी को प्राया देखकर सर्प ने चन्दन वृक्ष से कहा-
अरे ।
मानव अाया है मानव ! पर यह क्या । यह ठिठक
क्यों गया ? इसे तो आगे आना चाहिये था । क्या यह
तुमसे डरता है ?
तव चन्दन वृक्ष बोला-नही-नहीं । वह मुझसे नहीं
तुम से डरता है । तुम जो मेरे से लिपटे हो, इसी से वह
ठिठक गया है और तुम्हे हटाने की योजना बना रहा है ।
सर्प वोला–पर वह मेरे से क्यो डरता है ? मै भी
नो तुम्हारे साथ हूँ।
चन्दन वृक्ष बोला-तुम भले बाहर से मेरे साथ हो
पर भीतर से मेरे से अलग हो । तुम मे जहर भरा है, जब
तक तुम्हारे अन्तरग की जहरीली ग्रन्थि नहीं निकलेगी, तब
तक तुम से लोग दूर ही रहेगे ।
इधर आदमी ने सर्प को हटाने के लिए पुगी की
सुरीली आवाज छेड़ ही दी। पूरा उपवन सुरीली आवाज
से झनझना उठा । इतनी देर तक तो सर्प चन्दन वृक्ष
वात कर रहा था, पर ज्यों ही उसके कान मे पुंगी की
आवाज पड़ी, त्यों ही वह अपना भान भूल गया और चंदन
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ९६

वृक्ष को छोड़कर पुगी के सामने नाचने लगा । बुद्धिमान
इन्सान ने भान भूले सर्प का दमन कर ही दिया और चंदन
वृक्ष को भी अपने काम में ले लिया ।
जो व्यक्ति सज्जन पुरुष के साथ रहकर भी अपने
अन्तरंग से दुर्जनता नहीं छोड़ता है, वह भले बाह्य परिवेश
में सुन्दर कितना भी क्यों न
नजर आए उसे कोई नहीं
चाहता ।
जो अपना भान भूल जाता है, स्व को छोडकर पर
में रमण करता है, उसका हाल सर्प की तरह ही होता है ।
KUMAN
दीपक सहायक है, तमिस्र निशा में,
मित्र सहायक है, विपन्न दशा मे ।
अभीष्ट सिद्धि के लिए
लिए साधको,
जान सहायक है, आत्म दिशा मे ॥
-
१०० ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ६३ ) एलेक्शन सौरमण्डल का धरती पर (एलेक्शन) मतदान को देखकर एक बार आकाश-मण्डल मे रहने वाले गृह, नक्षत्र और तारा सभी सोचने लगे-अपने यहां भी एलेक्शन होना चाहिए । हमें भी स्वतन्त्र रूप से वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। आखिर सौरमण्डल मे इस बात की सरगर्मी से चर्चा होते लगी । इतने दिनो तक तो सूर्य, अपनी मनमानी करता था। वस, सर्वत्र अपनी ही धाक जमाने में तुला था । दुनिया में वस उसी की ही प्रतिष्ठा रहे, यही वह चाहता था। अपने अभ्युदय से सबको तेजोहीन वनाए हुए था । अन्य ग्रह- नक्षत्रो को अपने रौव से दवाता रहता था, पर जब सभी ने मिलकर एलेक्शन की बात उठाई तो सूर्य भी विचार में पड गया । आखिर विवश होकर उसे एलेक्शन की घोषणा करनी ही पड़ी। वैसे पाटिया तो वहुत थी पर उनमे मुख्य दो पार्टिया थी-एक सूर्य की और दूसरी चन्द्रमा की । सूर्य का चिन्ह था हाथ और चन्द्रमा का निशान था चर्खा कातती बुढिया । वस, दोनो ही पार्टिया अपना-अपना प्रचार करने लगी। सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही छोटे मोटे ग्रह-नक्षत्र-तारा सभी प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ १०१

के पास पहुंचने लगे । सूर्य, जिस किसी के पास पहुंचता
उन्हे अपने रौब से ही कहता-तुम्हे वोट मुझे देना है, यदि
तुमने वोट मुझे नही दिया तो जानते हो मेरे में कितनी
शक्ति है ? तुम्हारी नीद हराम कर दूगा । शान्ति से जीना
दुःस्वार कर दू गा । जला-जलाकर राख कर दूंगा । तुम्हारा
भला इसी मे है कि तुम मुझे ही वोट दो ।
चन्द्रमा भी अपना प्रचार-प्रसार करने के लिये सभी
के पास पहुंचने लगा। पर उसके प्रचार का तरीका सूर्य
से ठीक विपरीत था । सूर्य मे प्रचण्डता थी, अपना दबाव
था तो चन्द्रमा मे शीतलता थी और सरलता थी । चन्द्रमा
सभी से हाथ जोड़कर सौम्य-व्यवहार करते हुए कहता-
भाईयों । अपने सौरमण्डल की सुव्यवस्था की जिम्मेदारी
आप सभी पर है । अब आपको निर्णय लेने का अधिकार
दिया गया है कि--सौरमण्डल की व्यवस्था कैसे जमाई जाय?
एलेक्शन भी इसीलिए हो रहा है । मुझे इलेक्शन मे खड़े
होने के लिए आप लोगो ने ही प्रोत्साहित किया है । अतः
मुझे वोट देकर विजयी बनाने में मेरी नही आप सबकी
विजय होगी । मै आप सबको चमकने का अवसर दूंगा।
आपकी चमक मेरी चमक होगी । अव अापको क्या करना
है, यह आप पर निर्भर है ।
चन्द्रमा के इस अपनत्व पूर्ण व्यवहार ने सौर-मण्डल
के सदस्यो का मन जीत लिया। सभी ने मन ही मन
निर्णय लिया वोट तो चन्द्रमा को ही देगे ।
एलेक्शन का दिवस आ गया । सभी ने वोट दिए ।
मतगणना हुई तो जात हुआ कि ८० प्रतिशत वोट चन्द्रमा
१०२ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

के पक्ष मे थी। केवल २० प्रतिशत वोट सूर्य के पक्ष मे थे।
चन्द्रमा के विजयी होने से सौर-मण्डल की सरकार चन्द्रमा
की बनी।
सूर्य झु झला गया । अपमान का पूंट पीकर वहा से
निकला और आकाश में प्रचण्डता के साथ तपने लगा । सूर्य
के क्रोध और अभिमान को देखकर बीस प्रतिशत सदस्य भी
उसे छोड़कर चन्द्रमा के पास चले गये । दल बदल कर
लिया । अव पूरे सौर-मण्डल पर चन्द्रमा का आधिपत्य हो
गया, विचारा, सूर्य सुवह से शाम तक अाकाश मण्डल का
अकेला चक्कर लगाता है, उसके साथ कोई भी दृष्टिगत
नही होता । आदमी भी उसके प्रकाश का उपयोग जरूर
करता है, पर उसे वह भी देखना नही चाहता, क्योकि सूर्य
में अभिमान इतना है जिसमे यादमी डरता है कही ये मेरी
आखे न फोड़ दे ।
सच है जो अपने ही रौव मे रहता है उसका यही
हाल होता है।
सूर्य के छीपते ही चन्द्रमा अपने दल-बदल के साथ
आकाश-मण्डल मे आता है । खुद भी चमकता है और दूसरो
को भी चमकन का पूरा-पूरा अवसर देता है । आदमी भी
उसकी सुषमा देखकर बडा प्रसन्न होता है बार-बार उसे
देखने की इच्छा रखता है, उससे उसे गीतलता मिलती है ।
जो स्वयं भी जीता है, और दूसरो को भी जीने का
अवसर देता है, वही सच्चा नेता बनता है ।
.
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १०३

( ६४ )
गधे की
की पुकार
एक बार जंगल मे पशुओं का सम्मेलन हो रहा था ।
गाय-भैस, ऊंट-बैल, गधे-घोड़े, शेर-बकरी सभी प्रकार के
पशु एकत्रित हुए थे । और सभी अपनी-अपनी राम कहानी
सुना रहे थे । इसी बीच गधे ने अपनी वेदना व्यक्त करते
हुए कहा-भाइयों ! मेरे मन मे बहुत समय से एक दुःख
उभर रहा है जिसके कारण मेरा खाना-पीना हराम हो रहा
है । मैंने अपने दुःख को दूर करने की बहुत कोशिश की
लेकिन वह दूर नही हुआ तो मैने सोचा- मै अपनी बात
आप सबके सामने रख दू, जिससे ग्राप मेरा दु.ख दूर कर
सके । गधे की बात सुनकर सभी एक साथ वोले-गधे
भाई ! जरूर कहो, जरूर कहो । हम तुम्हारे दु ख को दूर
करने की पूरी-पूरी कोशिश करेगे ।
अपने भाईयो की हमदर्दी पर गवा संतुष्ट हुआ और
अपनी अन्तर्वेदना बतलाने लगा- भाइयों | सृष्टि का बुद्धि-
मान प्राणी मानव गधे को मूर्ख और अजानी क्यो समझता
है ? जब भी कोई व्यक्ति नासमझी का काम करके आता
है तो वह उसे गधा कहता है। गधा है गधा, इसमे बिल्कुल
१०४ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

? ? भी अक्कल नहीं है । प्रादमी ने पूरे मानव जगत् में मुझे बदनाम कर रखा है, आखिर मुझ में क्या अज्ञान है, जिससे मुझे बुद्धिहीन माना जाता है, जबकि मानव के कार्यो मे मै बहुत सहयोग देता हूँ। गधे की बात सुनकर सभी पशुओ ने कहा-बाह भाई ! बात तो तुम्हारी सच है । तुम मे मूर्खता का कोई लक्षण दिखलाई नहीं देता । बहुत सीधे और भोले प्राणी हो । फिर आदमी तुम्हे गधा क्यो कहता है ? बुद्धिहीन क्यों समझता है ? कुछ समझ मे नही आया । सभी पशुप्रो ने वहुत विचार किया पर जब वे इस बात का निर्णय न कर सके तो सोचा इस विषय मे मानव से ही पूछना चाहिये । वही बता सकता है कि बुद्धिहीन व्यक्ति को गधा कहकर क्यो पुकारता है ? इधर एक आदमी उसी रास्ते से जा रहा था। उसे देखकर घोड़ा हिनहिनाया-अरे ! आदमी जा रहा है । पूछो उसे कि हमारे भाई को गधा क्यो कहते हो तो हमारी भाषा समझता नही है । बडी समस्या है । इतने मे होशियार कौया बोला-अरे ! तोता, मानव को उसकी भाषा मे बोलकर समझा देगा। सभी ने कहा- हा-हा ठीक है । तब तोते ने पशु सम्मेलन मे खड़ी हुई समस्या को मानव के सामने रखा और उससे पूछा कि तुम मूर्ख को गधा क्यो कहते हो ? मानव ने कहा- हम मूर्ख को गधा इसलिए कहते है कि गधे मे कोई अक्कल नही होती। इतने मे गधा बीच मे ही ढेच्यू-टेच्यू करने लगा कहने लगा कि यह कैसे ? प्रकृति भी मुखर हो उठी ) [ १०५ ? पर वह

तब मानव बोला-गधा ज्यादातर कु भकार के काम में आता
है । जब गधा गुम हो जाता है, तब कुभकार उसे खड्डो मे
खोजता है क्योंकि गधा घास चरता-चरता चलता जाता है।
आगे गढ्हा है उसका भी ध्यान नहीं रखता है और उसमे
गिर पड़ता है । जिसे सामने गड्ढे का भी ध्यान न हो,
वह गधा ही होता है।
आदमी का निर्णय सुनकर सारे पशु समझ गए कि
वस्तुतः गधे में अक्कल नही होती है, वह आगे-पीछे का
सोच नही पाता है।
卐
रूप तो सुन्दर है पर कुरूपता से भरा है,
ज्ञान तो बहुत है पर अहं से भरा है ।
वर्तमान की इस दुरंगी दुनिया मे,
पोज तो बहुत अच्छा है पर बुराइयों से भरा है ।।
धागों को जोड़ा तो परिधान बन गया,
ईटों को जमाया तो मकान बन गया ।
मानवता के बिखरे करणों को जिसने भी,
अंतर में संजोया वही सही इंसान-बन गया ।।
१०६ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ६५ )
सृष्टि का विचित्र प्राणी
एक बार कुछ आदमी वन-पथ से निकल रहे थे ।
उन्होने चलते-चलते बबूल के झाड़ो के पास ऊंट को खड़े
देखा तो एक आदमी ने प्रतिक्रिया की-वाह यह सृष्टि का
कैसा विचित्र प्राणी है ? सभी अंगो से टेढ़ा--मेढा और
वेडोल है । टागे भी ऐसी लम्बी-लम्बी है कि जैसे कोई खंभे
गडे हो और खाता भी क्या है ? काटे और कुछ पत्ते ।
बड़ा विचित्र और अभद्र दिखता है यह । इसका पेट देखो
तो पूरी कोठी लगता है और गर्दन भी कैसी टेढ़ी-मेढी और
लम्बी है।
आदमी को अपने बारे मे कहते हुए देखकर ऊंट में
आवाज की और बोला-अरे बुद्धिमान् इन्सान ! बहुत हो
गया वोलते-बोलते । यह सत्य है कि मेरा शरीर टेढा-मेढा
ओर बेडोल है । पर तुम तो बड़े सीधे हो ना । तुमने
अपने बाहरी जीवन को भले ही सुन्दर-शालीन बना
रखा है पर जरा सोचो तुम्हारे भीतर में कितना टेढापन
है ? छोटी-छोटी वातों में तुनक पड़ते हो । अपने स्वार्थ
मे दूसरे का गला घोटने के लिए तैयार हो जाते हो। तुम्हारे
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १०७

व्यवहार को देखा जाय तो तुम पग-पग पर टेढे-मेढ़े चल
रहे हो । खाते भी तुम बढिया-बढ़िया पकवान हो । न मालूम
कितने प्रकार का धान्य है ? और कितनी ही प्रकार से
बनाते हो ? कितनी ही प्रकार की मिठाईया खाते हो । फिर
भी तुम दूसरो को कड़वे ही वोलते हो । और काम किसी
के भी नही आते हो । मै भले कांटे खाता हूं, फिर भी
किसी को भी कड़वा वचन नहीं बोलता हूं और तुम मानवों
के कार्यो मे पूरा सहयोग देता हूँ।
बोलो दुनिया का विचित्र और अभद्र प्राणो कौन है-
तुम हो या मै ?वाहरी टेढ़ापन जितना घातक नहीं है उतना
भीतरी टेढापन है । ऊंट के मुंह से निकली सच्ची बात
का मानव कुछ भी प्रतिकार नहीं कर सका और आगे
बढ़ गया।
मृत्यु को जग में क्रूर कराल कहते है,
निर्जीव देह को जग मे नर कंकाल कहते है ।
शरीर को नहीं आत्मा को समझना होगा,
आत्मा को ही जग मे दिव्य मशाल कहते हैं ।।
१०८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

( ६६ ) पाषाण की महत्ता जंगल मे एक विशालकाय पाषाण यों ही पड़ा था । अनेक आदमी पा रहे थे, जा रहे थे, पर किसी का भी ध्यान उस अोर नही था । अपनी इस कदर घोर उपेक्षा देखकर पाषाण तिलमिला उठा। सोचने लगा-वह छोटा-सा फूल, जिसे मूघने के लिये आदमी उसके पास पहुंच जाता है । वह छोटा सा सरोवर, पानी पीने के लिये आदमी उस पास पहुच जाता है । यह हिलता-डुलता झाड़, जिसकी छाया मे भी आदमी पहुंचता है पर मैं इतना बडा भीम- काय हूँ तो भी आदमी मेरे पास आने की बात तो दूर रही, मुझ पर दृष्टिपात भी नहीं करता। आखिर ऐसा क्यों ? क्या करू मै कि दुनियाँ के लोग मेरे पास भी दौड़े-दौड़ आने लगे । मुझे भी चाहने लगे। पत्थर ने बहुत सोचा- पर उसकी समझ मे कुछ भी नही आया । आखिर थककर उसने सोचना बंद कर दिया। पर उसके दिमाग मे यह वात वार-बार घूम रही थी- कैसे भी हो, ये लोग मुझे भी चाहे । एक बार एक आदमी जो उसी रास्ते से निकल रहा था, उसकी दृष्टि इस विशालकाय पत्थर पर पड़ी तो वह प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ १०६ विचार में पड़ गया । पहुंचा उस पत्थर के पास और उस- का सूक्ष्मता से चारों तरफ से निरीक्षण करने लगा। किसी आदमी को अपनी तरफ इस प्रकार निरीक्षण करते देखकर पाषाण ने सोचा-यह आदमी मुझे क्यों देख रहा है ? अब तक जितने भी आदमी आए वे तो बिना देखे ही आगे बढ़ते चले गए और यह तो मुझे बड़े गौर से देख रहा है । कुछ न कुछ खास बात होनी चाहिए । पत्थर मुखर हो उठा- सृष्टि के समझदार इन्सान ! तुम मुझे यो गौर से क्यो देख रहे हो ? क्या मुझ में भी कोई विशेषता है ? आदमी ने कहा-अरे वाह ! तुझ में तो बहुत विशे- षता है पर देखने वाला चाहिये । पाषाण-अरे भाई ! तुम ही एक ऐसे व्यक्ति आए हो जो ऐसा बोल रहे हो । बाकी तो तुम्हारे भाई जितने भी आए है, वे तो मुझे बिना देखे ही आगे बढ गये । आदमी-वे नही जानते, तुम्हारी विशेषताओं को । पर मैं जानता हूँ तुम्हारे मे कितनी विशेषता है ? पत्थर-अगर ऐसा है तो मेरी विशेषताओं को तुम उभार दो, जिससे सभी लोग जानने लग जाए । और मुझे भी लोग चाहने लगे। मानव-मै तो तुम्हारी विशेषताओं को उभार सकता हूँ पर उसके लिए तुम्हे कठिनतम दु.खो को सहन करना होगा । यदि तुमने दु.ख सहन कर लिये तो निश्चित ही तुम्हें ऐसा बना दूंगा कि लोग तुम्हे देखने के लिये हजारों मील की दूरी से भी दौड़े-दौड़े आवे । बड़ी-बड़ी पत्रिकाओ में तुम्हारा नाम और फोटो हो । पत्थर-वाह-वाह ! अगर इतना तुम कर दो तो मै ११० ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

से
तुम्हारा उपकार कभी नही भूलूगा। इसके लिए मुझे जितना
भी कष्ट सहना पडे, सह लूगा ।
पत्थर की इस दृढता को देखकर उस आदमी ने उसी
समय छैनी और हथौड़ा निकाला और उस विशालकाय
पत्थर को एक अत्युत्तम मूर्ति का रूप देने के लिये तरासने
लगा । जब छैनी से वह मूर्तिकार पत्थर के अतिरिक्त तत्वों
को हटाने लगा । पत्थर बार-बार की इन चोटो से कराह
उठा और बोला-अरे भाई मुझे तो भयकर वेदना हो रही
है । तब मूर्तिकार ने कहा--देखो भाई ! मैने तुम्हे पहले
ही कह दिया था कि घोर कष्ट होगा। अगर तुम इसे सहन
कर लोगे तो तुम महान् हो जाओगे । अगर इस तरह
घवराओगे तो महान् नही बन सकते ।
पत्थर ने यह निर्णय ले लिया था कि कुछ भी हो
जाय, मुझे महान् बनना है। उसने कहा--अच्छा-अच्छा
अब नही बोलूगा । तुम्हे, जो इच्छा हो सो करो । बस,
फिर क्या था ? मूर्तिकार बड़ी तन्मयता के साथ अपनी
कला को पत्थर में उभारने लगा। पत्थर, मूर्तिकार की
सारी चोंटो को समभाव से सहन करता चला गया। आखिर
मूर्तिकार की दक्षता एव पत्थर के समभाव ने चमत्कार
दिखाया और वह पत्थर एक अतीव सुन्दर आकृति मे उभर
आया । अब तो हजारो लोग उसे देखने के लिये आने लगे।
मूर्तिकार के कहे अनुसार पत्र-पत्रिकाओं मे उसके फोटो भी
छपने लगे । यह सब देखकर पाषाण प्रसन्न हो उठा ।
वस्तुत: महान् बनने के लिए दु.ख के थपेड़ों को तो
सहन करना ही होता है ।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १११

( ६७ )
अपात्र को शिक्षा
-
आकाश में घटाटोप वादल छा गए । गंभीर गर्जना
होने लगी। बिजलियां चमकने लगी और कुछ ही देर बाद
वर्षा प्रारंभ हो गई । मूसलाधार पानी पड़ने लगा । थल
भी जल परिलक्षित होने लगी। सभी मानव अपने-अपने
घरों मे दुबके हुए थे। जगल में पक्षी भी अपने-अपने घौसलो
मे बैठे प्रकृति का भयावह रूप देख रहे थे । एक वृक्ष पर
अनेक पक्षी अपने-अपने घौसलो में बैठे हुए थे । उसी वृक्ष
पर एक बन्दर भी बैठा था। वर्षों बहुत तेज हो रही थी।
इसलिए वंदर भीग रहा था । इधर पानी से भीगने के
और इधर तेज हवा के चलने से बंदर को ठण्ड लगने लगी
उसका सारा शरीर कापने लगा, दांत हिलने लगे । विचारा
जैसे-तैसे डाल को पकड़ कर बैठे हुए था।
बन्दर की यह दयनीय दशा देखकर अपने घोंसले में
बच्चो के साथ सुरक्षित रूप से बेठी मैना से रहा नही गया
और वह बोल उठी-बन्दर भाई ! तुम आये साल इसी
तरह बरसात में भीगते रहते हो, सर्दी में ठिठुरते रहते हो
कितना अच्छा हो कि तुम मेरी तरह रहने के लिये मकान
११२ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

का निर्माण कर लो। मेरे तो हाथ-पैर कुछ नहीं है-चौंच में तिनके भर-भर कर जैसे-तैसे घोंसला बनाती हूँ पर तुम्हारे तो मनुष्य सरीखी काया है । तुम तो बहुत जल्दी और बहुत मजबूत घोंसला बना सकते हो ताकि इस तरह तुम्हे ठिठुरना न पड़े। मैना ने तो वंदर को हित-शिक्षा दी थी, परन्तु बंदर पर शिक्षा का उल्टा ही असर हुआ। आखिर ठहरा तो बंदर ही । वह कब मानने लगा- मैना की शिक्षा को उसे तो तेज गुस्सा आ गया और उसने एक ही झपाटे में मैना के घौसले को तोड़ डाला और बोला - अरे दुबली जान ! छोटा मुह बड़ी बात करते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती, तुम मुझे शिक्षा देने चली हो । क्या मै नही समझता ? याद रखो । बड़ो के सामने जीभ चलाओगी तो ऐसे ही चोट खामोगी। अभी तो मैने तुम्हारा घोसला ही तोड़ा है, आइ- न्दा मेरे से जुवान लड़ाने की कोशिश की तो तेरी जान निकाल दूंगा । बन्दर की इस हैवानियत को देखकर बिचारी मैना अपने किये पर पछताने लगी । सच है, कुपात्र को शिक्षा देना निश्चित ही स्वयं के लिये हानिकारक होता है। सर्प को दूध पिलाने से जहर ही बनता है। 卐 प्रकृति भी मुखर हो उठी ] [ ११३ ( ६८ ) दीपक का धुनां काला क्यों ? है -- दीपक का रंग लाल है, उसका तेल पीले रंग का है, उसकी बाती सफेद है और उसकी लौ भी लाल है, तब उसका धुआ काला क्यो है ? आदमी के दिमाग में दीपक को देखकर यह प्रश्न खड़ा हो गया । वह यह विचार कर ही रहा था, इतने में दीपक मुखर हो उठा - ए बुद्धिमान् इन्सान ! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि मै काला-काला अंधकार खाता हूँ । मेरा भक्षण ही जब काला है तो मेरी जुगाली भी काली ही होगी। काले अंधकार को खाने से मेरा धुश्रा भी काला ही निक- लता है । तुम्हारी भी यही हालत है, भले तुम्हारा बाहर का पोश मेरे समान कितना ही सुन्दर दिखलाई देता हो, पर जैसा कर्म तुम करोगे, फल भी निश्चित रूप से वैसा ही भोगना पड़ेगा । यह कभी नही होता कि कर्म तो तुम पापमय करो और फल तुझे सुखमय प्राप्त हो जाय और कर्म करो पुण्य रूप और फल तुम्हें दुःखमय मिले । संसार का यह अटल नियम है कि- ११४ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

जैसा बोओगे-वैसा काटोगे,
जैसा बोलोगे-वैसा सुनोगे,
जैसा करोगे वैसा ही भरोगे ।
आम का बीज बोने वाला आम ही पाएगा, कविठ
कभी नहीं पा सकता और कविठ का बीज बोने वाला आम
कभी नही पा सकता । कांच के अन्दर वही रूप आएगा,
जैसा तुम्हारा है । इसलिए हे इन्सान ! मेरा भक्षण काला
है तो परिणाम भी काला ही होगा। दीपक की न्यायोचित
बात सुनकर इन्सान स्तब्ध रह गया । वह मान गया कि-
जैसा करेगे, वैसा ही भरेंगे ।
卐
* गुरु भक्ति
मन मेरा तेरी ही यादों में खोया रहे,
तन मेरा तेरे ही वादों में पिरोया रहे।
तेरे ही पथ पर बढता रहू अविरल,
हृदय मेरा तेरे ही पादो मे सोया रहे ।
अस्तित्व की विलुप्त शक्ति को तुमने ही जगाया है,
जीवन पथ प्रशस्त बनाकर जीना सही दिखाया है ।
क्या कहू मै तेरी गरिमा कही नही कुछ जाती,
शासित हो शासक बनकर शासन खूब चमकाया है ।।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]

( ६६ ) वार्ता : चलनी और चलनी और सुई सुई की एक बार चलनी और सुई दोनों में परस्पर यों वार्ता- लाप होने लगा--अपनी शेखी बघारते हुए चलनी ने सुई को कहा वाह नन्ही-सी जान ! ऊपर में छेद और नीचे तीक्ष्ण । चुभ जाय तो खून निकाल दे। फिर भी अपनी विशेषताओं का ढिढोरा पीट रही हो । चलनी की व्यंग्यात्मक बात सुनकर सुई ने अतीव शक्ति के साथ जवाब दिया--चलनी बहिन ! आज तो तुम बहुत अभिमान में आकर न मालूम क्या-क्या कहती चली जा रही हो पर कहने से पहले जरा अपने लिए कुछ सोच लिया होता तो इस प्रकार कहने का अवसर नहीं पाता । यह तो ठीक है कि तुम्हारी देह बहुत चमकदार है, पर देखो तो सही तुम्हारे भीतर सैकड़ों छिद्र नजर आ रहे है । यही नहीं, तुम्हें कोई भी वस्तु दी जाएगी तो तुम सार-सार वस्तु को अपने भीतर से निकाल दोगी और असार- असार 'वस्तु रख लोगी । प्रारंभ से ही तुम्हारी इस परंपरा ने तुम्हारे विचार भी विकृत बना दिये है । ११६ ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

से
तुम भले
बाहर
सुन्दर दिखलाई देती हो पर भीतर
में तुम्हारे सैकड़ो छिद्र है, अवगुणों का पिटारा है । पर
मुझे देखो, मेरे ऊपर एक छिद्र और नीचे तीक्ष्ण भाग,
विशेष अवस्था को लेकर है। छिद्र में डोरा लेकर मै व्यक्ति
के संकेतानुसार दो बिछुडे भाई-कपड़ों में प्रवेश कर उन्हे
एक करती चली जाती हूँ। मेरे इस छोटे से दिखने वाले
कार्य का ही परिणाम है कि आज आदमी का तन-बदन
ढका हुआ है । भले मेरा देह छोटा-सा है, फिर भी विशे-
षता युक्त है ।
सुई की बात सुनकर चलनी की सारी हेकडी मिट्टी
में मिल गई।
दूसरों के विपय मे कुछ कहने से पहले स्वयं के गिरे-
वान में झांक लेना आवश्यक है ।
*
अथक परिश्रम को जिसने जीवन मे अपनाया है ।
चिन्तन की धारा को जिसने जीवन मे बहाया है ।
झुक जाता है मस्तक मेरा ऐसे ही के चरणों में,
समता के निर्भर मे जिसने अपने को नहलाया है ।।
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ ११७

( ७० )
लोहा, सोना
सोना कैसे बने ?
कुछ पाने के लिये कुछ देना भी होगा । हम यह
चाहें कि पाने के नाम पर तो हम सब कुछ प्राप्त कर लें,
पर दें कुछ नही, यह संभव नही है ।
टनों बंद लोह एक स्थान पर पड़ा था और उसी के
ऊपर पारसमणि भी पड़ी हुई थी। पारसमणि को अपने
ऊपर पड़ी देखकर लोहे ने कहा वाह ! क्या सुयोग मिला
है । पारसमणि को संबोधित करते हुए लोहा बोला--
पारसमरिण ! मैने सुना है कि तुम्हारे स्पर्श से लोहा भी
सोने के रूप में बदल जाता है । कितना अच्छा हो कि तुम
मुझे भी सोना बना दो । पर मै तो यह देख रहा हूं कि
तुम मेरे ऊपर स्थित हो तो भी मेरा रूप तो लोहे का
है, फिर तुम्हारी शक्ति का क्या असर ।
लोहे की बात सुनकर पारसमरिण बोली--देखो भाई
लोहे ! यह सत्य है कि मै लोहे को स्पर्श मात्र से सोना
बना देती हूँ पर स्पर्श होना चाहिए साक्षात् । अगर उसमें
कोई अन्य तत्व बीच में आ जाता है तो फिर लोहा, सोना
११८ ]
[ प्रकृति भी मुखर हो उठी

नहीं बन सकता । अगर तुम्हे सोना बनना है तो तुम अपने ऊपर जितने भी यह बारदान-कपड़ों के आवरण है उन्हे हटा दो और फिर मेरी देह से थोडा सा स्पर्श करो। बस तुम्हारा सारा शरीर स्वर्णमय हो जाएगा। लोहा--पर यह तो संभव नहीं है । मैं अपने प्राव- रण को खोलकर नग्न नही होना चाहता। तुम तो मुझे यों ही सोना बना दो तो अच्छा है । पारसमणि--यह नही हो सकता। कुछ पाने के लिए तो कुछ खोना ही होगा। तुम अगर यह नही कर सकते तो सोना भी नही बन सकते । गुरु भक्ति चेतना के ऊर्ध्व स्तर पर चल रहे हो तुम, साधना के डगर पर बढ़ रहे हो तुम । बढ़ते ही जा रहे हो बढते ही जा रहे हो, उन्नति के शिखर पर बढ़ते ही जा रहे हो तुम ।। समता ही है सच्ची आराधना तेरी, समता ही है सच्ची साधना तेरी । विश्वशाति के प्रतीक हो तुम, समता ही है सच्ची विचारणा तेरी ॥ प्रकृति भी मुखर हो उठी ] ( ७१ ) स्वार्थ--प्रादमी का एकदा आदमी इंधर-उधर भटकता हुअा घोर जंगल में पहुंच गया । जंगल की सांय-साय की आवाज से उसका तन-बदन कॉपने लगा। इतने मे ही चीते की गंभीर दहाड़ सुनाई दी। इस दहाड़ ने तो आदमी के पैर ही उखाड़ दिये । वह बचने के लिये इधर-उधर देखने लगा । पास ही एक वृक्ष पर मानवाकृति बन्दर बैठा था । मानव की यह दीन हालात् देखकर उसे दया आ गई। वह जोरदार चीखा और बोला - अरे नादान इन्सान ! क्या देखता है इधर- उधर । जल्दी से चढ़ जा वृक्ष पर । चीता इसी रास्ते से आ रहा है । नहीं तो वह तुझे खा जाएगा । प्राण गवा बैठोगे तुम । बन्दर की सांत्वना भरी आवाज से आदमी के मन में जोश उभर पाया और वह बिजली सी स्फूर्ति से वृक्ष पर जा चढ़ा । बन्दर के साथ आदमी को भी वृक्ष पर देख- कर चीता उस वृक्ष के नीचे आ खड़ा हुआ और इन्तजार करने लगा कि यह कब नीचे उतरे और कव खाऊ । पर बहुत समय के इन्तजार के बाद भी जब आदमी नीचे नही १२० ] [ प्रकृति भी मुखर हो उठी

आया तो चीते ने अक्कल से काम लिया । सोने का समय
था । यादमी और बन्दर ने परस्पर निर्णय लिया । बन्दर
ने कहा---कुछ समय तक तुम सो जाओ, मैं जगता रहूँगा
फिर मै सो जाऊँगा, तुम जगते रहना । आदमी ने बन्दर
की बात मान ली।
आदमी सो रहा था, बन्दर जाग रहा था । चीता
बोला--बन्दर ! तुम वन के प्राणी हो और मै भी वन्य
प्राणी हूँ । आदमी से हमारा क्या सम्बन्ध ? आदमी होता
भी धूर्त है । विश्वासघाती होता है। अतः मेरी बात मानों
और इसे नीचे गिरा दो ।
बन्दर ने कहा--चीते ! मैं कदापि ऐसा नहीं कर
सकता। मैंने ही इसकी रक्षा की है। मै इसे नहीं गिरा-
ऊँगा । चीते के बहुत प्रयत्न करने पर भी वह तैयार नही
हुआ । तब चीते ने बन्दर के सो जाने एवं आदमी के
जगने पर आदमी को समझाना प्रारंभ किया--तुम बन्दर को
नीचे गिरा दो तो मैं तुझे छोड़ दूंगा । अन्यथा तुम पेड
को छोड़कर जा नहीं सकते और मै यही खड़ा रहूँगा ।
नीचे आते ही तुझे खा जाऊंगा।
स्वार्थी इन्सान, चीते की बातों में आ गया और बंदर
को गिराने के लिए ज्यो ही उसके हाथ लगाया कि चंचल
बंदर सजग हो गया । उसने देखा आदमी ही मुझे गिरा
रहा है । वह तत्काल एक शाखा से दूसरी शाखा पर, एक
पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता हुआ, आदमी से दूर चला गया
और बोला--
प्रकृति भी मुखर हो उठी ]
[ १२१

ऐ जगत् के श्रेष्ठ प्राणी ! नमस्कार है तुम्हें ! मैंने नही
समझा था कि आदमी, इतना धूर्त, कृतघ्न और स्वार्थी होता
है कि उसको जो रक्षा करता है, उसी को मारने पर उतारू
हो जाता है । अब तो उस आदमी की दशा देखने लायक थी।
सत्य है पर रक्षण को गौरण कर अपने ही रक्षणं में
निमग्न स्वार्थो व्यक्ति कभी भी सच्ची प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं
कर सकता ।
卐
संवर्तक तूफान जैसा कोई तूफान नहीं होता,
स्वयंभू समुद्र जैसा कोई समुद्र नहीं होता ।
दीनों के झरते आंसुओं को पोंछना सीखो,
परोपकार जैसा कोई उपकार नहीं होता ।।
ग्राज धन ही- धन की दौड़ लगी है,
आज एक दूसरे की होड़ लगी है ।
आज का मानव नहीं समझ रहा हैं कि,
आज विनाश की ओर ही घुड़दौड़ लगी है ।।
--
हो उठी
[ प्रकृति भी मुखर
१२२]
*

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Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi

Author
Muni Gyan
Title
Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi
File name
Prakrati Bhi Mukhar Ho Uthi
Text
OCR done
Citation
1987
Published
2011/01
Publisher
Shree Akil Bharatiya Sadhu Margi Jain Sang Samta Bhawan Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548923
Barcode
4990010029003.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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gX84REQFpwO
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