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Sanskirt Sushma Ki Tika

Shastri,sugan Lal · 2010/09

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उत्तमा परीक्षोपयोगी
१...
संस्कृत सुष्मा की टीका
'श्री सुगणचन्द्र शास्त्री, साहित्य-रत्न
प्रकार
रीगल बुक डिपो
नई सड़क,

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कम सूची ॥ पध में कथा ३३ ૪૨ 1. स्तुतिपद्यानि २. कम्बुग्रीव कथा ३. वणिक पुत्र कथा १. विप्रसनोरथ-पूर्ति कथा ५. सिंहदिलीपयोः संवादः ६. शरद् वर्णनम् ७. रक्तमुखवानर कथा वककर्कट १. कर्णस्य वदान्यता १०. समस्या पूर्ति ११. योगस्यं चमत्कारः १२. 'नीति रत्न माला १३.धनंन्त भट्ट कथा ११. पुत्रोपदेशः ११. वनवास काल १६. सोमदत्तोत्पत्ति कथा १७:अशरणा ग्राहणी १८. सुभद्रां प्रति १६.गुरु-भक्ति २७. सुफस्व मनोदशा २१ तपस्या-प्रभाव • २२. भीमस्य दयालुंता २३. वेषस्य पूजा २४. महादेव यशस्विसिंह संवादः २१. चाणक्य सूत्राणि ३६. हल्दी घाटी २७. भासुरकसिंह कथा ४७ - or यात्रा १०२

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अम्बय-(यस्य) जान्हवी मूटिन पादे वा [यः] कण्ठे श्रथ चपुपि कालः, [२] कामारि कामतातं वा कंचिद्देवं भजामहे । अर्थ-जिसके सिर पर अथवा चरणों में गंगा है [ गंगा का स्थान शिव की जटाओं में है, परन्तु पत्नी होने से उसका चरणों में भी स्थान है ] और जो शरीर और कण्ठ से काला [ नीलवर्ण ] है, उसी, काम के शत्रु अथवा काम के पिता रूप किसी देव (शिव) को भजते हैं [ उसको उपासना करते हैं। [शंकर ने काम को जलाया था, अतः वे कामशत्रु हैं। किन्तु उन्होंने ही बाद में काम पत्नी रति की प्रार्थना पर दयालु होकर उसे अनंग शरीर दिया था, चे काम के पिता भी हुए] श्रतः । - कम्बुग्रीवकथा शब्दार्थ-कस्मिंश्चिद् जलाशये = किसी तालाब में । कच्छपः- कछुआ । मित्रे = दो दोस्त, मित्र शब्द नपुंसक लिंग में दोस्त का अर्थ देता है, पर पुल्लिंग में इसका अर्थ सूर्य होता है । श्राश्रिते = पहुंचे हुए । श्रासाय = पाकर । स्व स्व-नीसंश्रयं अपने अपने घोंसलों में पाराम । कुरुतः-दो करते हैं । कृत्वा = करके । शोप मागतम् = शुष्कता को प्राप्त हुया ! तावूचतुः = वे दोनों बोले । जम्वाल शेपम् = जिसमें कोचढ़ शेप है । सञ्जातम् = हो गया । एतत् = यह । तच्छ्रे त्वा = वह सुनकर । श्राह = बोला । साम्प्रतं - अव । नास्त्यस्माकं = नहीं है हमारा .तदानीयताम् =सो लायो । अन्विप्यताम् दो । प्रभूत घने । येन = जिससे। युवां - तुम दोनों कोटि भागयोः = सिरों के भागों में। संगृहा = पकड़ कर । करिष्यावः =हम दोनों करेंगे । भवता = आपने | स्थात- व्यम् = ठहरना चाहिये । नोचेद = यदि नहीं । तव = तेरा । पातो = पतन । तथा नुष्टिते = वैसा करने परं । व्यवस्थित= स्थित, को। किञ्चित्.. पुरम् = किसी नगर को। भालोकित्तम् = देखा । ये जो । पौराः-पुरजन । ते-घे। नोयगानं ले जाये जाते हुए को । विलोक्य - देख कर । इदमूचुः= यह बोले । पतिभ्याम् =दो पक्षियों द्वारा । नीयते = ले जाया जारहा है। पश्यत=देखो। श्राकर्य = सुनकर । वक्तुसना = कहना चाहताहुआ । अोक्तौ = साधी वात में। जन लोगों ने । सएडशा-खण्ड खण्ड । कृतश्च =और कर दिया। मन्युग्रीव = शंख जैसी गर्दन वाला । अर्थ-किसी तालाब में कात्रुग्रीव नाम का कछुना है। उसके संकट विकट नाम के, हंस जाति के और उसके प्रेम की सर्वोच्च चोटी को पहुंचे हुए [इसके अत्यन्त प्रेम पात्र] दो मित्र हैं, जो नित्य ही [उस] तालाब के तीर को पाकर [वहां आकर ] उसके साथ अनेक देवताओं और ऋषियों की कहानियां कह कर, सूर्यास्त के समय में अपने अपने घाँसलों में श्राश्रय लेते है। इसकेबाद, समय बीतते बीतते वृष्टि न होने से वह सर शनैः शनैः (श्राहि- न्ना २) शुष्कता को प्राप्त हो गया [सुख गया । तब उसके [कछुवे के दुःख मं दुःग्विन हुए वे दोनों बोले, = भो लि] मिन्न ! इस तालाब में [अब] कीचड़ मात्र बच रहा है ।" यह सुन कर कन्युग्रीव बोला = "भो ! जल के अभाव होने में श्रय हमारा यहाँ जीवन नहीं रह सकता । तो भी उपाय सोचिये । सो नुम दोनों कोई मज़बूत रन्सी [हदरज्नु ] या हल्का-सा काट [लकड़ी] लायी। और कोई बहुत जल वाला तालाब भी हूँ दो, जिससे, मेरे द्वारा [उस काट को] बीच में से दान्तों में पकद लेने पर, तुम दोनों मेरे साथ इम शष्ट को दोनों सिरों में पकद कर उस तालाय पर ने जानी।" वे दोनों योले, "दोस्त ! ऐसा ही करेंगे। पर नुम चुप रहना [ मुंह न खोलना] नहीं नो लदी मे [टकर ] गिर पड़ोगे।" ऐसा किये जाने पर, जाने हुए कानुनीयने नीचे [भूमि पर स्थिन कोई नगर देखा । यहां जो पुरजन थे है [ उसको ] घेरे ले जाये जाते हुए को देखकर श्राश्चर्य पूर्वक यह बोले, "श्रोही च (पनिया) जैसी शान की कोई चीज दोपनियों द्वारा ले जाई जा रही । देवी देगी!" तिर उनके [ इस ] कोलाहल को सुन कर कम्युग्रीव बोला, "! यह कार क्या है ?" ऐसा कहना चाहता हुश्रा धक प्राधी बात में ही [ो गुन जाने में गिपड़ा और लोगान टम को बएड म्बएड । वणिक पुत्र कथा (वनिये के वेटे की कहानी) शब्दार्थ---अधिष्ठाने नगर में बस्ती में। विभव-धन । देशान्तरगम- नमना-दूसरे देश में जाने का इच्छुक । तुलासीत् =तोलने को बड़ी तखड़ी थी । निक्षेप भूतां = धरोहररूप । प्रस्थितः- चलदिया । भ्रान्त्वा = घूम- कर । मूपकैः =चूहोंने । ईदृगेवायम् =ऐसाही है यह । शाश्वतम् -नित्य स्था- यो । नद्यां नदी में । श्रात्मीयम् = अपने । स्नानोपकरणहस्तं-स्नानके साधन साबुन तेल आदि-हाथमें लियेहुए को । प्रेषय = भेज दे । शङ्कितः =डराहुया । पितृव्य - वाचा । यास्यति =जायेगा । तद्गम्यताम् = सो जानो। अथासौ = फिर वह । श्रादाय-लेकर । प्रहृष्टमना-प्रसन्नचित्त । साधं-साथ | तेनाभ्या गतेन-उस अभ्यागत के साथ । तथानुष्ठिते-ऐसा किये जाने पर । स्ना- स्वास्नान करके । प्रक्षिप्य = फेंक कर । वृहच्छिलयाच्छाद्य-वृहद् + शिलया +नाच्छाद्य, बड़ी भारी शिलासे ढककर । सत्वरं = शीघ्र । पृष्टश्च =पूछा गया। वणिजा-बनिये ने | कुत्र-कहां । मे-मेरा । श्येनेन-बाज ने । हृतः हर लिया उड़ालिया । अप्ठ्याह =श्रेठो + पाह, सेठ बोला । हतुं =हरने के लिये । शक्तोस्ति=समर्थ होसकता है । समर्पय-श्रर्पण कर, देदो । नयति: ले जाता है । दारकेण = बालक से । विवदमानौ = विवाद करते हुए । द्वायपि दोनों ही (द्वौ अपि)। तत्र वहां । तार स्वरेण = ऊँचे स्वर से । श्रब्रह्मण्यम् = अनुचित कर्म । अनेन = इसने । तमूचुः= उसे बोले । पश्यतो देखते हुए के । तच्छु त्वा =वह सुनकर (तद्-श्रुत्वा)। प्रोचुः = बोले । अभिहितम् = कहा है। भवता अापने । श्रयताम् - सुनो। मद्वचा मेरा वचन । राजस्तन हेराजन् वहां (राजन + तत्र) । हरेच्छयेनो शिकरा हरले । नात्र = यहां नहीं। आदितःप्रारम्भ से । निवेदयामास = निवेदन %3 ६ -- H- दरवाया। तैः = उन्होंने । विहस्य = हलका । तो = उन दोनों को । लम्बोध्य = समझा कर । सन्तोपिती = सन्तुष्ट किये । अर्थ-किसी नगर में एक जीर्णधन नाम का बनिये का पुत्र और वह धन के नाश (या कम) हो जाने पर विदेश गमन का इच्छुक हो कर चिन्ता करने लगा (विदेश गमन के विषय में सोचने लगा)। उसके घर में भारी लोहे की बनी हुई, पूर्व पुरखाओं द्वारा कमाई हुई (बना हुई) एक तुला थी । उसको किसी सेक के घर में धरोहर रूप में रख कर वह विदेश चल पड़ा । इनफे पश्चार देर तक, देशान्तरों में, अपनी इच्छा के अनुसार, भ्रमण करके, फिर पापने नगर में पाकर (उसी) मेठ को बोला, "हे मेट जी! दीजिये मेरी यह तुला रूपी धरोहर !” वह बोला, "श्रो ! यह तुम्हारी तुला नहीं है । (उसे ती) चूहों ने खालिका।" जीर्णधन बोला, "हे मेठ जी ! नेरा दोष नहीं, यदि चूहों ने (उसे) खा लिया है । यह संसार ऐसा ही है। यहां कुछ भी स्थायी (नित्य) नहीं है। किन्तु मैं नदी में स्नान करने के लिए जाऊँगा सो तुम अपने इस धनदेय नामक बालक को, स्नान का सामान हाय में उठाये हुए को मेरे साथ भेज दो।" वह चोरी के भय से उसने शंकिंन हुया अपने पुत्र को बोला, “बेटा, यह तेरा चाचा स्नान के लिए जायगा, मो (नुम) इसके साथ स्नान की वस्तुएं लेकर जानो"। एमके पश्चात, यह वैश्य-यालक, स्नान के साधनों को लेकर प्रसाचिन उप सभ्यागन (अतिथि) के साथ चल पड़ा । ऐसा किये जाने पर, यह गनिया नाम फरक, उस बालक को नदी की गुफा में डालकर और उसक द्वारी पर भारी शिला में गांप पर, शीत्र ही घर या गया। उस बनिये (मंट) ने मा. " अनिधि ! यता प्रो, मेरा यालक कहां है, जो तेरे साथ नदी को गया था।" वर यांना, "नही तट पर में उसे शिकरे (यान) ने निता।" मंट योना, "मिया बादी ! (मंट) क्या कहीं बाज बालक नजान से ममय हो सकता है? नी, दे मेरे गुरु को। नहीं तो में मीर में दिन (प्रार्थना) करगा।" यः बोना. " याज वालक नहीं ले जाना , वैसे ही चूद भी भारी लादे की बनी तुला को नहीं पा सकते। इसलिए, ला मेरी तुला, यदि (तुझे अपने) बालक से कुछ प्रयोजन (मतलब) है।" इस प्रकार विवाद करते हुए वे दोनों राजकुल में पहुंचे। वहाँ सेठ बड़े जोर से चिल्ला कर बोला, ' महा पाप !! महा पाप !! इस चोर ने मेरे चालक को चुरा लिया है।" तव न्यायाधिकारी उसे बोले, "अरे ! सेठ के पुत्र को दे दो!" वह बोला, "क्या करू ? (उस) बालक को बाज़ नदी तट पर से मेरे देखते देखते उड़ा ले गया। वह सुन कर वे बोले, "यापने सत्य नहीं बोला । क्या बाज बालक को ले जाने में समर्थ हो सकता है ?" वह बोला, श्रीमान् ! सुनिये श्राप मेरी वात-- जहां सहस्र लोहे की बनी तुला को चूहे खा जाते हैं, वहां हे राजन् ! वाज भी बालक को उड़ा ले जासकता है, इसमें सन्देह नहीं होना चाहिये)।" वे बोले, “यह कैसे ?' तब सेठ ने ( उन ) सभासदों के प्रागे प्रारम्भ से सारा वृत्तान्त बता दिया । इसके पश्चात् उन्होंने खूब हंसकर उन दोनों को परस्पर समझा बुझाकर, तुला और बालक को वापिस दिलवा कर सन्तुष्ट कर दिया। विप्र मनोरथ पूर्ति कथा (ब्राह्मण का मनोरथ पूरा होने की कथा) शब्दार्थ--पुनरपि = फिरभी। पुत्तलिका = पुतली । निदधाति = रखता यावत् जवतक । तावत् = तबतक । अग्रवीत् = बोली । मनुष्यवाचा = मनुष्य की वाणी से । शौर्योदार्य सत्वादिक सादृश्यम् = शूरता, उदारता, चल अादि को समानता (शौर्य + प्रौदार्य, सत्त्व + श्रादिक)। समुपविश बैठजा । वदतिस्म = कहता था। चारानाहूय = चरों को बुला कर । एकदा = एकचार । भवन्तः = आप सत्र । कुर्वन्तः = करते हुए । विलोकयन्तु - देखें । परिश्रमशागतः = घूमता हुआ आया । क्रियते = किया जाता है । कृष्णमुदकम् = काला जल ।

निःसरति = निकलता है । महति होमकुण्डे = बड़े भारी यज्ञकुण्ड में । कियन्ति =कितने ही। अतीतानि = व्यतीत होगये । ज्ञायते =जाना जाता सह = साथ । सम्भापते = वार्तालाप करता है । दृष्टम् = देखा । अवादीत् = बोला । जगदम्बिका = दुर्गा । निवसति = रहती है। इत्युक्त्वा = यह कह कर । विधाय = करके । नमस्कृत्य = नमस्कार करके । श्रवोचत् = बोला । श्रारभ्य = श्रारम्भ करके । कति = कितने । ब्राह्मणेन उक्तम् = ब्राह्मण ने कहा । कुर्यतः = करते के । वर्षशतम् = सौ वर्प । अभूत् = हो गया । नाभवत् = नहीं हुई । स्मृत्वा = स्मरण करके । अतिपत् = गिराता था। तदाऽपि तब भी (मदा + अपि) । स्वशिरः :-अपने सिर को । दास्यामि = दृगा । बुदया = विचारसे । सन्धाति = सन्धान करता है, वार करने को तानता है । वायदन्तराले = उतने ही बीच में । मृत्वा = पकड़ कर, धारण करके । अनिम = हूँ। गीस्व =मांगी और पायो । राज्ञा = राजाने । यहुकानं मयुरा समय तक । नापराध्यति = अपराध (अपकार) नहीं करता । सख. निमः = न्युन हुवा, गिरा । अस्मिन् = इस पर । तथाविधः = वैसा । पता प्रकारः = पूजाविधि । प्रसन्नोऽसि प्रसन्न हो । तयोक्तम् = उसने कहा। भायो भन्गिः । भवामि = होती हूं । भवसि = होती हो। देखें = भाग्य में । देवा - ज्योतिषी में। भेपन - श्रौषध में। याशी % मी । गादशी = यैसी । वियते = विद्यमान है। पापाणे =पस्थर में । मुदाय - मट्टी की मृति में। भाव = मन की भावना । तस्माद = इसलिये । पूग्य - पूरी फर । तर्हि तो। महाद् म एव = बड़े गृपके समान । महिला सदर । परिसमापदम् - थकावट की शान्ति को । फरोपि-कररो हो। पपरयो ।। च प्रातपे-और धूप में। परार्थे -दूसरे के लिये। पान पर है। ग्या प्रशंसा फरके। पूरयतिम्म पूर्ण करती थी। HT: गया । एमां इसकी । वि = प्रकार के को। सृष्णीम् -चुप । मामीन:-मा। %3D प्रय-शिरमी राजा जय राम दुमरी पुनली के मरयक पर (पापने) घरदार, नय तक यह पुनली उसी प्रकार मनुष्य की पाली में राजा को बोली, "हे राजन् ! विक्रमादित्य के शूरता, उदारता और क्लें आदि की समानता यदि तुझ में है, तो इस सिंहासन पर बैठजा।" भोजराज ने कहा "ऐ पुतली ! बतायो उस विक्रमादित्य के शौर्य और श्रौदार्य श्रादि की कथा ।" वह कहती है, "हे राजन् ! सुनिये ! एक बार राजा विक्रमादित्य राज्य का पालन करता हुआ, दूतों को बुला कर बोला, "हे दूतो ! श्राप सब पृथ्वी का भ्रमण करते हुए, जहाँ जहाँ भी किसी आश्चर्यजनक दृश्य या तीर्थ विशेष को देखें, उसे मुझे बतायें । मैं वहाँ जाऊँगा।" इस प्रकार समय व्यतीत होने पर, एक बार देशान्तर में घूमता हुश्रा पाया कोई दूत राजा को बोला, 'हे राजन् ! चित्रकूट पर्वत के पास तपोवन के बीच में, (एक अति सुन्दर मन्दिर है। वहाँ पर्वत के उच्चशिखर से स्वच्छ जल की धारा निकल कर बहती है। जो वहाँ स्नान करता है, वह पुरुप पुण्यवान् होता है। और भी, वहाँ कोई ब्राह्मण बड़े भारी यज्ञकुण्ड में हवन करता है, उसको (ऐसा करते हुए वहाँ) कितने वर्ष व्यतीत हो गये, यह जाना नहीं जाता। प्रतिदिन कुण्ड से बाहर निकाल कर रखी हुई भस्म (राख) पर्वताकार है (पर्वत जैसा ऊँचा ढेर लगा है)। वह ब्राह्मण किसी के साथ बात चीत नहीं करता । इस प्रकार (मैंने एक) बढ़ा श्राश्चर्यजनक स्थान देखा है" । यह सुन कर वह राजा अकेला उसके साथ उस स्थान को (पर) जाकर, अत्यन्त प्रानन्द को प्राप्त हुश्रा, बोला, "अहो ! बड़ा पवित्र है यह स्थान । यहाँ साक्षात् (प्रत्यक्ष) दुर्गा माता निवास करती है। इस स्थान को देख कर मेरा मन निर्मल हो गया" । यह कह कर वहाँ झरने के जल में स्नान करके, देवता को नमस्कार करके, जहाँ ब्राह्मण हवन करता है वहाँ जाकर (राजा) ब्राह्मण को बोला, "हे ब्राह्मण ! हवन प्रारम्भ किये कितने वर्ष हो गये ?" ब्राह्मण ने कहा "होम करते हुए मुझे सौ वर्ष हो गये, तो भी देवता (देवी) प्रसन्न नहीं ।" यह सुन कर राजा ने देवी का स्मरण करके स्वयं कुण्ड में आहुति डाली (आहुति डालता था)। तब भी देवी प्रसन्न नहीं हुई। इसके पश्चात् "अपना सिर दूंगा" इस विचार से ज्यों ही राजा (अपने) गले पर खड्ग तानता है कि इतने ही बीच में देवी खड्ग को पकड़ कर बोली, “हे राजन् ! .

(म) प्रसन्न हूँ, वर प्राप्त कर ।" राजा ने कहा, "हे देवि ! यह ब्राह्मण बहुत समय से हयन करता है, किसी के प्रति अपराध नहीं करता (किसी का अपकार नहीं करता)ौर नाही किसी नियम से पतित हुया है, तो भी इस पर (तुम) क्यों प्रसन्न नहीं होती हो ? मेरा ही अथवा कौनसा वैसा पूजा का प्रकार (टंग) है, जिसने (नुम) शीघ्र प्रसन्न हो गई हो ?" उसने कहा, "हे राजन् ! इसके चित्त में भाव (शुद्ध भक्ति भाव) नहीं है, इस लिये प्रसन नहीं होती हूँ। कहा भी है- । मन्त्र में, नीर्थ में, बामण में, देवता में, ज्योतिषी में, श्रीपध में और गुरु में, जिसकी जैसी भावना (भाव) होनी है, उसकी वैसी ही सिन्द्रि, (सफलता) होती। देवता न काल में विद्यमान है, न पत्थर में और नाहीं मिट्टी की मूर्ति में । देवता तो भार में (मन के शुन्द भाव में) विद्यमान है, अतः भाव ही (उसकी प्रसन्नता का) कारण है।" राजा बोला, “यदि मेरे ऊपर प्रपन्न हुई है जो इस नाहारण के मनोरों को पूर्ण कर ।" यह योली, "हे राजन् ! परोपकारी (किसी) बड़े भारी गृश के पमान (तू) अपने शरीर में कष्ट मद कर (दसरे के) श्रम को दूर करता है। हामी ये महान वृप सच मुच अन्य के लिए छाया करते है और स्वयं धूप में कार है । एवं दूसरों के लिए ही फजते हैं। परोपकार के लिए हो नदियो यानी, गर्ग दूध देना । वृक्ष भी परोपकार के लिए फलने है, गरीर भी परोपकार के लिए ही है। इस प्रकार गजा की मुति प्रशंसा करके, वित्री ने] ग्राम्या का मनोरथ र दिया । रामा भी अपनी नगरी की पना गया। इस कथा को सुना फर पुगनी भोज को घांनी, "राजन् ! यदि एम कारा प[मंग ] विमान है. नी स सिंहासन पर पंजा । पारा। सिंह दिलीपयोः सम्बादः (मिंद यी दिलीप का वातान्नाप ) शब्दारी: । गीय मीमार कर गणार = उटा पनियतया = fannा यदा (घ) पी मुका घोर यांच दिया या " - द्वारा । हुथा। गया है, ऐसी को। मुमोच = खोलता था। छायेव = छाया के समान । अन्वगच्छत् = पीछे चला। प्रास्वादवद्भिः = स्वाद वाले, स्वादिष्टों से । कवलैः = ग्रासों से । कण्डूयनैः = खाज करने से । दंशनिवारणैः =डांस (मच्छर) हटाने से । अन्येद्य : = दूसरे दिन । जिज्ञासमाना = जानने की इच्छा करती हुई । गंगाप्रपातान्तविरूदशंम्पां -गंगा के स्रोत के अन्त तक जिस पर घास चढ़ी हुई है, ऐसी को। प्रविवेश प्रवृष्ट हो गई । हिंस्र:=हिंसकों दुष्प्रधा = कठिनता से जिस पर विजय पायी जाय । अपरतश्च = और दूसरी ओर । गुहाशयः = गुफा में सोने वाला। अाक्रमत् = अाक्रमण कर दिया। श्राकर्य - सुन कर । निचिक्षेप=डाली, डालता था। आलोक्य = देखकर । विस्मय क्रोधाविष्टः = श्राश्चर्य और क्रोध से भरा । तूणीरात् = तरकश से। प्रायतत् = प्रयत्नकरता था । सायकक्ष एव = वाण की पूछ पर ही। तस्थौ = ठहर गया । हस्ताबरोधेन = हाथ द्वारा रोकने के साथ । विस्नापयन् - विस्मितबनाता माकुरु = मत कर । मयि = मेरे ऊपर । आरोहति'= चढ़ता है । वृपभम् = बैल को (पर)। पुरस्तात् = आगे। जलसेकेन जलसिंचन द्वारा । कण्ड्य- मानेन खजाते हुए ने । त्वक = बक्कल, चमड़ी । समुत्पाटितां = उखाड़ दी। शुशोच-शोक करती थी। कालादारभ्य =काल से प्रारम्भ करके । विधाय करके । रक्षायै रक्षा के लिये । अकागतसत्ववृत्ति=जो अपनी गोदी में गुफा में आये पशु पर निर्वाह करता हो । तदियं = सोयह । पारणा व्रतान्त भोजन, रोजा खोलना । विहाय =छोड़कर । निवर्तस्य = लौट जा। परिवादः = अपयश । देवकार्ये = देवता के या भाग्य के कार्य में । पौरुषस्यं =पुरुषार्थ का । तत्याज=छोड़ता था । जगाद = बोला । मदुक्तम् = मेरा कहा । वाच्यम् = कहना चाहिये । वदामि = कहता हूँ। इदमपि =यह भी । समक्ष =सामने। घराकी- तुच्छ बेचारी । त्यज छोड़ दे । वृत्ति = श्राहार, निर्वाह । निर्वर्त- यिस्व =पूर्ण करो । भुच्च =खाले । प्रत्युवाच = उत्तर में बोला । एकातपत्र = एकच्छत्र.। कृते=लिए । त्यक्त = छोड़ने के लिए । विवेकविकलोऽसि भले बुरे के ज्ञान में मूर्ख हो। प्रतीयते =प्रतीत होता है । कोटिशः = करोड़ों। घटोनी =घड़ा भर दूध देने वाली । गाः=गायों को । दत्वा देकर । क्षतिम् =नुकसान को । जगतः - संसार का । स्यात् = हो जाय । रक्ष = रक्षा कर । जहीहि छोड़ दे। निरीक्ष्यमाणो = देखा जाता हुआ । सामान्या 3 । ।

१२ - - साधारण । एनामाक्रमितु = इस पर श्राक्रमण करने के लिए । शन्नुवन्ति = समर्थ हो सकते । प्रहतम् प्रहार किया । निष्क्रियेण = बदले में विनियम द्वारा । विहता = बिध्नयुक्त । स्यात् = हो । क्रियार्थः = तपस्या का साधन गौ। अक्षतः ॥ यिना धाय के । रच्यम् = रमणीय को। विनाश्य = नष्ट करके । स्थातुम् - ठहरने के लिये । श्रर्हति -जंचता है योग्य होता है। थामिपस्य = मांस के । पिएटमित्र:= गोले के समान । हरये = सिंह के लिए। समुपानयन् = भेंट करता था। अवा मुखस्य = नीचे मुंह वाले के । विद्या. 12- देवताओं के कलाकार गन्धर्व श्रादि । पपात = गिरी । उत्तिष्ट = उठ । अमृगायमानम् = अमृतजैसा लगता हुए को। निशम्योत्थितः = सुनार उठा हुया । ददर्श = देखता था। प्रीता प्रसन्न । सुदक्षिणाय : मुशिश (दिलीप परनी) के लिये । निवेद्य निवेदन करके । श्रमदानन्दम् : परन अानन्द को । अविन्दत प्राप्त होता था। अर्थ -गुरु की श्राज्ञा को स्वीकार करके, सम्राट दिलीप सवेरे उटर, हिन बन्द को दूध पिला कर बाँध दिया गया था ऐसी वशिष्ठ की नन्दिनी नामर गीको यन के लिए मुन करता था (बन में चरने के लिए खोल दिया) । गता (स्वयं) दाया के समान उसके पीछे पीछे चला। इस प्रकार म्यादिष्टगों के ग्रासों द्वारा, मुजाने के द्वारा, मन्दर दूर करने सारा. गेर टीक गानों द्वारा (स्वच्छन्द घलने देकर) यह उसकी सेया में दूसरे दिन, अनुचर (मेय] के भाव को जानना चाहती हुई नन्दिनी, inोरसन्न कपि, घाम उगी हुई है ऐसी हिमालय की गुफा मगिर [पशु) मन में भी हानि नहीं कर सकी (गर हागमन में भी निरागीय नही है) यह सोचकर राजा पर मग देने में हो गया। और दूसरी ओर, गुप्ता में निवास करने सारे मम्मा (1) नन्दिनी पर प्रारमगर दिया । और तय गोपीनन यी मगर. गाने उधर टिपरी । नन्दिनी के RAम कि कांदगा और जांध में मगरधा राना गीतमा - । से तरकश से बाण निकालने का प्रयत्न करने लगा, पर उसका दायां हाथ बाण की पूंछ पर चित्रलिखित-सा जहाँ का तहाँ रह गया। इसके पश्चात्, हाथ से हटाने के साथ, क्रोध से व्यास और पाश्चर्य से चकित राजा को अत्यन्त विस्मित करता हुआ सिंह मनुष्य की वाणी में उसको बोला "हे राजन् ! परिश्रम (कष्ट) नहीं करो। मेरे ऊपर तुम्हारा बाण के प्रहार करने का परिश्रम व्यर्थ ही है । मैं कुम्भोदर नामक शिव का गण हूँ। शिव मेरी पीठपर पांव रखकर वैल पर चढ़ते हैं । सामने तुम जिस देवदार के वृक्ष को देखते हो, इसे शिव ने पुत्र के समान माना है, पार्वती ने स्वयं जल सींचने के द्वारा इसे बढ़ाया है। एक बार कपोल को खुजाते हुए जंगली हाथी ने इसका बक्कल उधेड़ दिया था। तब पार्वती ने अपने पुत्र के समान इसके लिए बहुत शोक किया, उसी समय से लेकर शिवने मुझे सिंह बनाकर इसकी रक्षा के लिए गुफा में नियुक्त कर दिया। मैं अपनी गोद (गुफा) में श्राये पशु पर जीवन निर्वाह करने वाला हूँ । सो गौ बहुत देर के बाद यहाँ आई हुई अव मेरा व्रतान्त (व्रत खोलने का ) भोजन बनेगी। अतः तुम अब लजा छोड़ कर लौट जानो, इसमें तुम्हारा अपयश नहीं है। यहाँ देवताओं के कार्य में शस्त्र या पुरुषार्थ का (कोई) प्रभाव नहीं होता है।' सिंह के इस वचन को सुनकर राजा ने लजा छोड़ दी और योला, "हे सिंह, यद्यपि मेरी कहीं बात हास्यकर होगी, तो भी कहनी चाहिये, क्योंकि आप सबके हृदय के भाव को जानते हैं। इसलिए कहता हूँ। वह शिव भी मेरे लिए माननीय हैं और यह भी गुरु का धन आँखों के सामने नष्ट होता हुआ उपेक्षणीय नहीं है (इसको उपेक्षा नहीं की जा सकती)। श्रतः तू इस बेचारी को छोड़ दे । मेरे शरीर से (तू) अपने शरीर के निर्वाह (आहार) को पूरा कर, उसके स्थान में मुझे ही खालो।" तय प्रत्युत्तर में सिंह बोला-“हे राजन् ! संसार का एकच्छत्र राज्य है, नई श्रायु है और यह सुन्दर शरीर है, इन सबको एक गाय के निमित्त छोड़ने के इच्छुक आप मुझे [अपने] भले बुरे के ज्ञान में मूह प्रतीत होते हैं। तू तो करोड़ों यह गायों को देकर इस गाय की हानि को पूरा कर देगा [कर सकोगे] । लेकिन तू जगत का स्वामी है। अतः नेरे विनाश से संसार के सर्वस्व का विनाश हो जायगा । इसलिये तू अपने शरीर की रक्षा कर । इस [ गाय ] को छोड़दे।" तब नन्दिनी के द्वारा बड़ी करणाभरी दृष्टि द्वारा देखा जाता हुवा दिलीप फिर बोला, “हे भृगराज ! [सिंह !] यह साधारण गौ नहीं है । यह कामधेनु की पुत्री कामधेनु [ सब इष्ट पढ़ायों को देने वाली दिव्य गो.] ही है । साधारण हिंसक जीव इस पर आक्रमण करने के लिए समर्थ नहीं है। तूने तो शिव के प्रभाव से इस पर प्रहार किया ! सो, मैं इसके बदले में [विनिमय में अपना शरीर देता हूँ। इस प्रकार तेरे व्रतान्त भोजन में भी विघ्न नहीं होगा और मुनि की क्रिया [ तपस्या प्रादि धार्मिक कृत्य ] श्रादि का यह साधन भी नष्ट नहीं होगा । आप भी जानते हैं कि स्वयं विना घाव खाये, रक्षणीय वस्तु को खोकर, स्वामी के आगे खड़ाहोने के योग्य नहीं होता रक्षक। अतः इसकी मुक्ति के विषय में मेरी प्रार्थना को तू स्वीकार करले।" ऐसा कह कर दिलीप ने अपने शरीर को एक मांसपिण्ड [गोले.] के समान सिंह की भेंट कर दिया । और इसके पश्चात, उसके नीचे झुके हुए मुन्य पर विद्याधरों के हाथ से गिराई पुष्प वर्षा पढ़ी [ हुई ] । इसके पश्चात- उठ पुत्र!" इस अमृतरूप वचन झी नुन कर राजा अपनी माता के समान गाय को देखता था, सिंह को नहीं। नंब प्रसन्न बनी नन्दिनी ने उसको वर प्रदान किया । सफल मनोरथ राजा उस गाय के साथ वन से प्राश्रम को अाका, गुरु और सुदक्षिणा (दिलीप पन्नी) को वर प्रदान का हाल सुनाकर परम आनन्द प्राप्त करता था। शरद वर्ण नम् शरद् ऋतु का बण न 1. काशांशुका... रूपरन्यः॥ शब्दार्थ-काशांशुका = काही [एक खेत पुष्पों का वृक्ष ] के आँचल बाली । विकच = विकसित । मनोन सुन्दर । रव%शन्द । नूपुर । । .........."मालतीभिः ॥ १ बिछुया । श्रापक्वशालि = अच्छी तरह एके हुए धान । तनुगानयष्टिः कृशशरीर वाली । प्राता= श्रागई। विषय-शरद ऋतु का नब बधू के रूपमें वर्णन किया गया है। अन्वय-सरल है। यथालिखित क्रम से है अर्थ-काशपुष्पों के आँचल बाली, विकसित कमल के समान (रूप) सुन्दर मुन्व वाली, मद माते हंसों के शब्द रूपी विधुवों के नादसे मनोरेम, खुय परिपक्व धान्यों से मनोहर और कृश शरीर वाली, रूप से रमणीय बनी हुइ शरद ऋतु नववधू के समान पाई है। ३-काशैर्मही' शब्दार्थ-शिशिरदीधितिना = चन्द्रमा से । रजन्यः = रानियां । सरितः = नदियों के । सरांसिसरोवर । सप्तच्छदैः-वृक्ष विशेषों से । वनान्ताः- वन प्रान्तभाग । शुक्ली- सफेद । मालतीभिः = चमेली की लताओं द्वारा । विषय-शरत् की स्वच्छ श्वेत प्रकृतिका वर्णन है। अन्वय-काशैर्मही, शिशिरदीधितिना रजन्यो, हंसः सरितां जलानि, कुमुदेः सरोसि, कुसुमंभारनतैः सप्तच्छदैः वनान्ताः च मालतीभिः उपवनानि शुक्ली कृतानि । अर्थ (श्वेत बना दिये का अन्वय सब के साथ करिये) काश पुष्पों मे पृथ्वी को, चन्द्रमाने रातों को , हमोंने नदियों के जलों को, कमलों ने सरोवरों को, पुप्प भार से मुके हुए सप्तच्छदों (वृक्षविशेषों) ने वन्य प्रदेशों को और मालती की लताओं ने वागों को श्वेत बना दिया है। वींज्यमानः॥ शब्दार्थ-व्योम = श्राकाश । क्वचिद् = कहीं... रजत = चाँदी । मृणाल = भिस । त्यक्ताम्बुभिः = जिन्होंने जल को छोड़ दिया है, उन्होंने अर्थात् निर्जलों ने । शतशः = सैकड़ों । प्रयातैः = चलेहुओंने । पयोदैः = मेघोंसे, द्वारा) + ३. व्योम...

१६ राजेव = राजा के समान, राजा+इच । उपवीज्यमानः- हवा किया जाता हुश्रा, जिसको पंखे श्रादि से हवा की जा रही हो। विषय-इस पद्य में कवि ने शरत् के श्वेत, अनेक दिशाओं में घूमने वाले बादलों से सुशोभित शरदाकाश की ऐसे राजा से उपमा की है जिस पर श्वेत चामरें दुलाई जा रही हों। अन्वय-क्वचित् व्योम रजत शंखमृणालगौरः, त्यक्ताम्बुभिः, लघुतया शतशः प्रयातैः, पवनवेग चलैः पयोदैः, चामरवरै रुपवीज्यमानः राजा इव संलक्ष्यते । अर्थ-कहीं पर, आकाश चाँदी शंख और मिस जैसे गौर [श्वेत] मुक्तजल [निर्जल], पवन के वेग से चंचल बने हुए और हल्केपन के कारण सैकड़ों श्रीर को चले हुए बादलों से, श्रेष्ठ चामरों की हवा लेते हुए राजा के समान दिखाई देता है। भिन्नाञ्जन... शब्दार्थ-भिन्न = व्याप्त । अञ्जन = नीलवर्ण । प्रचय = समूह । वन्धूक = एक लाल पुष्प विशेष । रचितारुणिता= बनाई है लालिमा जिसकी, ऐसी । यप्राश्च =नदी तट । प्रोत्कण्ठयन्ति = अत्यन्त उत्कण्ठित (उत्सुक) करते हैं यूनः-युवा के । विषय-शरदाकाश की स्वच्छता, चारों ओर व्याप्त नीलिमा का और लाल फूलों से सुशोभित भूमि का वर्णन है । अन्वय-भिन्नाञ्जन प्रचयकान्ति मनोज्ञं नमः, च बन्धूक पुष्प रचिता- रुणिता भूमिः, च चारु कमलावृत भूमिभागाः, वप्राश्च भुवि कस्य यूनः मनः न प्रोत्कएठयन्ति? अर्थ-(चारों ओर) व्याप्त नीलिमा की प्रभूत शोभा वाला मनोहर श्राकाश, यन्धूक पुप्पों से लाल यनी हुई भूमि, थौर सुन्दर कमलों से सुशोभित भूभाग वाले नदीतट (ये सव) संसार में किस युवा के मन को समुत्कण्ठित नहीं कर देते ? कस्ययूनः !!

५. मन्दानिला" "कोविदारः ॥ शब्दार्थ---मन्दानिल = मन्दरवायु । श्राकुलितचंचल । हिरेफ भ्रमर । मधु प्रसेका पुष्परस का सिंचन । विदारयति = फाढ़ता है। कोविदारः %3- लालकचनार । विपय--पुप्पित कोविदार का वर्णन है। अन्वय---मन्दानिलाकुलितचारुतरामशाखः,पुप्पोदरामप्रचयकोमलपल्लवाना, मत्तद्विरेफ परिपीत मधु प्रसेकश्च कोविदारः कस्य चित्त न विदारयति ? अर्थ-मन्द मन्द वायु से प्रकम्पित और श्रतएव अधिक सुन्दर शाखा के अग्रभाग वाला, जिसके कोमल दलों में पुष्पों के समूह खिले हुए हैं, मस्त भ्रमरों द्वारा जिसके मधु सिंचन (स्रवण) का पान किया जा रहा है ऐसा कोविदार(लाल कचनार) का वृक्ष किसके मन को नहीं विदीर्ण करता है ? ६. श्राकम्पयन "नभस्वान् ॥ शार्थ-श्राकम्पयन् = कॅपाता हुया । फलभरानत = फलों के भार से झुके हुए। शालिजालान् : धानों के जालों को । पानर्तयन् = नचाता हुआ । कुसुमावनम्रान् = पुप्पों से अवनत । उत्फुल्लपंकजवना = विकसित कमलों के वन वाली को। नलिनी = कमलिनी को । विधुन्वन् = कम्पित करता हुआ । यूनाम् = युवाओं का । प्रसभं = हठात् । नभस्वान् =वायु । विपय-शरत्कालीन वायु का वर्णन है, वृक्षों, कमलों और धानों के खेतों को लहराता हुया वहत्ता है। अन्चय-फलभरानत शालिजालान् श्राकम्पयन्, कुसुमावनम्रान् तरु- वरान् श्रानर्तयन्, उत्फुल्ल पंकजवनां नलिनी विधुन्वन् नभस्वान यूनां मनः प्रसभं चालयति । अर्थ-फल के भार से झुके हुए धान्यसमूहों को कम्पायमान करता हुश्रा, पुप्पों से अवनत बने श्रेष्ठ वृक्षों को नचाता हुअा और विकसित कमलों के वन वाली कमलिनी को धुनता हुआ (प्रकम्पित करता हुश्रा), वायु युवाओं के मन को.हठात् चंचल यना देता है ७ सोन्माद इंस...." 'सरांसि ॥ शब्दार्थ-सोन्माद = मदमस्त । मिथुनः = जोड़ों से । उद्गत्तवीचि- - ।

राजेव = राजा के समान, राजा+इव । उपवीज्यमानः = हवा किया जाता हुआ, जिसको पंखे श्रादि से हवा की जा रही हो। विषय-इस पद्य में कवि ने शरत् के श्वेत, अनेक दिशाओं में घूमने वाले बादलों से सुशोभित शरदाकाश की ऐसे राजा से उपमा की है जिस पर श्वेर चामर डुलाई जा रही हों। अन्वय-क्वचित् व्योम रजत शंखमृणालगौरः, त्यक्ताम्बुभिः, लघुतय शतशः प्रयातैः, पवनवेग चलैः पयोदैः, चामरवरै रुपवीज्यमानः राजा इ. , संलक्ष्यते । । अर्थ-कहीं पर, अाकाश चाँदी शंख और मिस जैसे गौर [श्वेत मुक्तजल [निर्जल], पवन के वेग से चंचल बने हुए और हल्केपन के कारण मैक हों भोर को चले हुए बादलों से, श्रेष्ठ चामरों की हवा लेते हुए राजा वे समान दिखाई देता है। भिन्नाञ्जन.. कस्ययूनः !! शब्दार्थ-भिन्न = घ्याप्त । अञ्जन = नीलवर्ण । प्रचय = समूह । वन्धूक = एक लाल पुष्प विशेष । रचितारुणिता=बनाई है लालिमा जिसकी, ऐसी यप्राश्च = नदी तट । प्रोत्कण्ठयन्ति = अत्यन्त उत्कण्ठित (उत्सुक) करते हैं यूना=युवा के। विषय-शरदाकाश की स्वच्छता, चारों ओर व्याप्त नीलिमा का और लाल फूलों से सुशोभित भूमि का वर्णन है। अन्वय-भिन्नाञ्जन प्रचयकान्ति मनोजं नमः, च बन्धूक पुष्प रचिता. रुणिता भूमिः, च चारु कमलावृत भूमिभागाः, वप्राश्च भुवि कस्य यूनः मनः न प्रोत्कएठयन्ति ? अर्थ-(चारों ओर) ज्याप्त नीलिमा की प्रभूत शोभा वाला मनोहर श्राकाश, यन्धूक पुप्पों से लाल यनी हुई भूमि, थौर सुन्दर कमलों से सुशोभित भूभाग वाले नदीतट (ये सव) संसार में किस युवा के मन को समुत्कण्ठित नहीं कर देते?

॥ ५. मन्दानिला 'कोविदारः ॥ शव्दार्थ---मन्दानिल = मन्दरवायु । श्राकुलित= चंचल । द्विरेफ= भ्रमर । मधु प्रसेकः == पुष्परस का सिंचन । विदारयति = फाढ़ता है। कोविदारः लालकचनार । विपय-पुष्पित कोविदार का वर्णन है। अन्वय---मन्दानिलाकुलितचारुतरामशाखः,पुप्पोदामप्रचयकोमलपलवानः, मत्तद्विरेफ परिपीत मधु प्रसेकश्च कोविदारः कस्य चित्त न विदारयति ? अर्थ- -मन्द मन्द वायु से प्रकम्पित और श्रतएव अधिक सुन्दर शाखा के अग्रभाग वाला, जिसके कोमल दलों में पुप्पों के समूह खिले हुए हैं, मस्त भ्रमरों द्वारा जिसके मधु सिंचन (स्रवण) का पान किया जा रहा है ऐसा कोविदार(लाल कचनार) का वृक्ष किसके मन को नहीं विदीर्ण करता है ? ६. श्राकम्पयन् """नभस्वान् ॥ शनार्थ-श्राकम्पयन = कॅपाता हुथा। फलभरानत = फलों के भार से झुके हुए । शालिजालान् = धानों के जालों को । पानर्तयन् = नचाता हुआ । कुसुमावनम्रान् = पुष्पों से अवनत । उत्फुल्लपंकजवना = विकसित कमलों के वन वाली को । नलिनी = कमलिनी को । विधुन्वन् = कम्पित करता हुआ । यूनाम् = युवाओं का । प्रसभं = हठात् । नभस्वान् = वायु । विषय-शरत्कालीन वायु का वर्णन है, वृक्षों, कमलों और धानों के खेतों को लहराता हुआ बहता है। अन्वय-फलभरानत शालिजालान् प्राकम्पयन, कुसुमावनम्रान् तरु- वान् श्रानर्तयन्, उत्फुल्ल पंकजवनां नलिनी विधुन्वन् नभस्वान यूनां मनः प्रसभं चालयति । अर्थ- फल के भार से झुके हुए धान्यसमूहों को कम्पायमान करता हुश्रा, पुष्पों से अवनत यने श्रेष्ठ वृक्षों को नचाता हुअा और विकसित कमलों के वन वाली कमलिनी को धुनता हुश्रा (प्रकम्पित करता हुश्रा), वायु युवाओं के मन को.हठात् चंचल बना देता है। ७ सोन्माद इंस.. 'सरांसि ।। : शब्दार्थ-सोन्माद = मदमस्त । मिथुनः = जोड़ों से । उद्गतवीचि.

सुशोभित तरंगित सरों पताका %D % 3D माला=उठती तरंगमाला वाले । विषय-हंस मिथुनों और कमल वनों से का वर्णन है। अन्वय-सोन्माद हंस मिथुनै रुपशोभितानि, स्वच्छ प्रफुल्ल कमलो- त्पल भूषितानि, मन्द प्रभात पवनोदगत वीचिमालानि सरांसि हृदयं सहसा उत्कएठयन्ति । अर्थ-मदमाते हंसों के जोड़ों से सुशोभित, निर्मल खिले हुए कमल और नील कमलों से सुभूषित और मन्द मन्द प्रभात कालीन वायु से जिनमें तरंगावलियाँ उठ रही हैं, ऐसे सरोवर हृदय को बलात् उत्सुक ( चंचल) कर देते हैं। ८. नष्टं धनुः "मयूराः ॥ शब्दार्थ-नष्टम् = विलीन हो गण । वलमिदः = इन्द्र का । जलदोदपु =मेंघों के बीच में । सौदामिनी = बिजली । स्फुरति = चमकती है। वियत्- श्राकाश की ध्वजा रूप । वलाका पुलों की पंक्ति । धुन्वन्ति = कम्पित करती हैं। विपय-वर्षा काल के साथ ही उसके चिन्ह भी लुप्त हो गये हैं। अन्यय-जलदोदरेपु वलभिदोर्धनुर्नप्टम्, अद्य वियत्पताका सौदामिनी न स्फुरति,बलाकाः पक्षपवन नभो न धुन्वन्ति, उन्नतमुखा:मयूग गगनं न पश्यन्ति । अर्थ-मेघों के बीच में (वर्तमान) इन्द्र धनुष विलीन हो चुका श्राकाश की ध्वजारूप विद्य त् श्राज नहीं चमकती है, हंस पंक्तियां (अपने ) पखों की हवा से श्राफाश कम्पित नहीं करतीं, ऊपर सुख उठाये मोर श्राकाश की योर (मेघों की प्राशा से) नहीं देखते । ६. नृत्य प्रयोग "कुसुमोद्गमधीः ॥ शब्दार्थ- नृत्यप्रयोग=नाचने की क्रिया । शिखिनः मोरों को । हंसा- नुपैति हंसों के पास पहुँचती हैं । मधुरप्रगीतान् =मधर गीतों वालों को। कदम्ब कुटजा जुन सर्जनीयान् =वृक्ष विशेषों के नाम हैं विदान -वृक्षविशेप'... ...... | उपगता=प्राप्तहोगई। कुसुमोद्गम श्रीः=पुष्प विकास की शोभा । शेफालिका=वृक्षविरोप' । स्वस्थस्थित-स्वतंत्रता से . ..... ! सप्त- ....

११ । स्थित । अण्डजः= अण्डों से उत्पन्न होने वाले जीव, पक्षी । प्रतिनिनादितानि -प्रतिगु जित । अन्वय-मदनो, नृत्य प्रयोग रहितान् शिखिनः विहाय, मधुरप्रगीतान् हंसानुपैति । कुसुमोद्गमश्रीः कदम्ब कुटजार्जुन सर्जनीयान् मुक्त्वा सप्तच्छदानुपगता । विषय- शरद् वर्णन है । प्राकृतिक शोभा का चित्र है । अर्थ-कामदेव नृत्य-क्रिया से रहित ( वर्षाकाल समाप्त हो जाने के कारण) मयूरों को छोड़ कर मधुर गीतों पाले हंसों के पास पागया है, (श्रा जाता है)। पुष्प विकास की शोभा कदम्य कुटज अर्जुन सर्जनीय "श्रादि वृक्ष विशेषों को छोड़ कर सलच्छदों (वृक्षविशेषी) के पास श्रागई है। १०. शेफालिका "मनांसि पुसाम् ।। शब्दार्थ-पर्यन्त =चारों ओर (पास में)। नयनोत्पलानि =नेत्र कमल | पुसाम् = पुरुषों के | प्रोत्कण्ठयन्ति = विशेष उत्कण्ठित करते हैं। मनांसि-मनों को। विषय- प्राकृतिक शोभा और वन्य जीवों का वर्णन है। अन्वय-शेफालिका कुसुमगन्ध मनोहराणि, स्वस्थस्थिताण्डजकुल प्रतिनादितानि, पर्यन्त संस्थित मृगीनयनोत्पलानि, उपवनानि पुसाम् मनांसि प्रोत्कण्ठयन्ति । अर्थ-शेफालिका (फली का वृक्ष) के फूलों की सुगन्धि से मन को हरने वाले, स्वच्छन्द स्थित पक्षी समूहों के कलरव से प्रतिगुजित, आसपास स्थित मृगियों के नयन रूपी कमलों वाले (जिनमें मृगियों के नयन कमल से खिले दिखते हैं), उपवन पुरुषों के मनों को उत्कण्ठित कर देते हैं ( किसी की याद में ) । ११. कल्हारपत्र" "विधूयमानः । शब्दार्थ-कल्हारपत्र = पुष्पविशेष । मुहुर् =यार यार | विधुन्वन् कपाता हुआ । उपेतःप्राप्त हुआ। अतितरां-अत्यन्त । पत्रान्त = पत्तों का अग्रभाग । तुहिनाम् =बर्फ के कण, श्रोसविन्दु । विधूयमानः = बिग्वेर ताहुना २० - विषय-प्रभातकालीन सुगन्धित वायु का वर्णन है । अन्वय-कल्हारपत्र कुमुदानि मुहुर्विधुन्वन्, तत्संगमात् अधिक शीतलता. मुपेतः पवनः प्रभाते पन्नान्त लग्न तुहिनाम्बु विधूयमानः अतितराम् उत्कएठयति । अर्थ-कल्हारपत्र ( वृक्षविशेष ) और कुमुदों को प्रकम्पित करती हुई उनके संयोग से और भी अधिक शीतलता को प्राप्त हुई ( डी हुई )पवन प्रभातकाल में श्रोस कणों को बखेरती हुई अत्यन्त उत्कण्ठित करती १२. सम्पन्नशालि. "प्रमादम् ॥ शव्दार्थ-सम्पन्न - वृद्धियुक्त । शालि=धान । निचयावृत=समूहो से ढके हुए । प्रचुर = बहुत । ससारसकुलैः =सारस के कुल के साथ | सीमान्त- राणि = दिशाएं,दिशामुख । जनयन्ति= उत्पन्न करती हैं। नृणाम् - मनुष्यों का । विपय-हरी भूमि, गायों और दिग्भागों का वर्णन है अन्यय—सम्पन्न शालि निच यावृत भूतलानि, स्वस्थस्थित प्रचुर गोकुल शोभितानि; सप्तारसकुलै:, हंसैः प्रतिनिनादितानि सीमान्तराणि नृणां प्रमोदम् जनयन्ति । अर्थ -अत्यन्त समृद्ध धान्यों के समूहों से ढके हुए स्थलों वाले, स्वस्थ ( हृष्ट-पुष्ट अथवा स्वच्छन्द ) स्थित गायों के बहुत समूहों से सुशोभित, सारसों के साथ हंसों के शब्दों से प्रतिध्वनित दिशात्रों के अन्तराल (दिग्भाग) पुरुषों को श्रानन्द देते हैं (श्रानन्द उत्पन्न करते १३. स्फुट कुमुद तारावकीर्णम् || शब्दार्थ-स्फुट= खिलेहुए । चितानाम् = व्याप्त हुए, हुओं के । राजहंसस्थितानाम् = जिनमें राजहंस स्थित है, ऐसों के । मरकतमणिभासा नीलम की चमक वाले से (द्वारा)। बारिणा जलद्वारा । तोयाशयानाम् = तालापो को (सरों की)। वहति धारण करता है। विगतमेधं-मेघों से रहित | श्रवकीर्ण = व्याप्त हुश्रा । विषय-चंद्र तारों से विभूपित और निर्मंघ श्राकाश की शोभा कमलों से युक्त तालायों जैसी हो रही है।

- है , अन्वय-चन्द्रतारावकीर्णम्, विगतमेवम्, व्योम, स्फुट कुमुद चितानां राजहंस स्थितानाम्, मरकत मणिभासा वारिणा भूपितानां तोयाशयानाम् , अतिशय रूपांश्रियं वहति । अर्थ-चाँद और तारों से खचित (यात) और मेघों से रहित श्राकाश खिले कमलो से भरे हुए राजहंसों से युक्त, और नीलम जैसी कान्ति वाले जल से ( जल दूर से श्राकाश के समान नीला दिखाई देता है ) अलंकृत सरोवरों की अतिशय शोभा को धारण करता है । (श्राकाश जल के समान नीला दीखता है, उसमें तारे चांद श्रादि कमलों जैसे दीखते राज हंस सरोवरों में भी हैं और आकाश में भी उड़ते हैं आदि । ) १४. शरदि कुमुद" ''ताराविचित्रम् ॥ शब्दार्थ-शरदि= शरदऋतु में ! वान्ति= बहती हैं। जलद = वादल । वृन्दसमूह । विगत कलुपम् = निर्मल । अम्भः =जल | श्येन पक्षा- जिसका कीचड़ सूख ( श्वेत हो) गया है। धरित्री पृथ्वी । तारावि- चित्रम् = तारों से विचित्र बना। विपय-प्रकृति की निर्मलता और स्वच्छता का वर्णन है । अन्वय-शरदि वायवः कुसुमसंगाद शीता वान्ति, विगतजलद वृन्दा दिगविभागाः मनोज्ञा: ( भवन्ति ), अम्भः विगतकलुपम् (भवति), धरित्री श्येन पड्का (जायते) व्योम विमल किरणचन्द्र, ताराविचित्रं (भवति)। अर्थ-शरद् ऋतु में, हचाए पुष्पों के संसर्ग से ठण्डी यहती हैं, मेघों के समूहों से रहित दिशाएं मनोहर हैं, जल निर्मल हो जाता है; पृथ्वी कीचड़ से रहित हो जाती है और प्राकाश निर्मल कान्ति लिये चन्द्र से युक्त और तारों से विचित्र ( विविधरूप वाला) हो उठता है। - , ---- रक्तसुख वानरकथा (लाल मुह वाले बन्दर की कथा ) शव्दार्थ-समुद्रोपकण्ठे == समुद्र के नजदीक तट पर । जम्बू- जामन । पादपः-वृक्ष । तत्रच = और वहां । तरोरधः =वृक्ष के नीचे । मकरः=मगर- मच्छ । सलिलात् =जलसे । निष्क्रम्य =निकलकर । तीरोपान्ते-तटके पास । न्यविशत् = बैठ गया। प्रोक्तः = कहा । ददौ देता था। तानि = उनको । गोष्ठीसुखं सहवास सुखको । अनुभूय = अनुभवकरके । भूयोऽपि =फिरभी। सुभापित =सूक्ति । नयन्तौ दोनों व्यतीत करते हुए । तिष्ठतः = दो ठहरते हैं। भक्षित शेपाणि =खाने से बचे हुओं को । प्रयच्छति = देताहै। परन्यै पत्नी के लिए । अन्यतमें =एकमें । पृष्टः- पूछ। । क्व =कहाँ । प्राप्नोपि-प्राप्त करते हो। प्राह =बोला। इमानि =इनको । अभिहितम् =कहा । अमृत- प्रायाणि =जो प्रायः अमृत जैसे हैं। ईदृशानि=ऐसे । मह्यम् = मेरे लिए। प्रयच्छ =दे । मैवं =मा एवं, मत ऐसे । वद=कह। प्रतिपन्नः = बुद्धिमान् । अपरम् = दूसरे को । व्यापादयितुंमारनेके लिए । तत्यज =इसलिएछोड़ दे। मकर्याह = मकरी(मगरमच्छी) बोली । किन = क्यों नहीं । बहुना=बहुतवातसे । प्रायोपवेशनं = अनशन से बैठना। विद्धि =जानले । ज्ञात्वा =जानकर। चिरा. यान्तं = देर से प्राते हुए को। सोद्वेगं= उद्वेग (येचैनी) से। नालपसि = पात नहीं करता । पठसि = पढ़ता है। भ्रातृ जायया भाभी ने । गृहीत्वाः पकड़कर । श्रानय = जा । नोचेत् = नहीं तो। सकासं= पास । त्वदर्थे तेरे लिये । कलहायमानस्य कलह करते हुए के । इयती=इतनी । विलग्ना- लगगई । श्रागच्छ श्रा। मर्कटः बन्दर । शक्यते समर्थ हुअाजासकताहै । तस्मात् = इसलिये तामपि = उसको भी । येन - जिससे। प्रणम्य = नमस्कार करके । गृह्णामि =ग्रहण करता हूँ या करू। पुलिन =रेतीत्तास्थान | अकृतभयः = यिना ढरे।

गच्छ चल । तत् त्वा-वह सुनकर । भद्र भला लोग । विलम्ब्यते- विलम्ब किया जाता है , त्वर्यताम् जल्दी की जाय । जजधौ-समुद्र में। प्लाव्यते-डुवाया जाता है। तदाकर्य-वह सुनकर । चिन्तयामास =सो चनेलगा । असौ यह । करोतु = करे । विश्वास्य = विश्वास दिला कर । स्मर्य- ताम् -स्मरण करो! अपकृतम् - अपकार किया। मृष्टस्य =शुन्द्र बने हुये के । दोहदः = प्रवल अभिलापा । प्रत्युत्पन्नमति चतुर बुद्धि वाला । व्याहृतम् =कहा । अर्पयामि देता हूँ। अर्पयदे। प्रापयामि पहुँचाता हूँ । निर्वयं = लौटकर । जल्पित विविधदेवतोप चार पूजः=जिसने अनेक देवताओं को पूजा सेवाअर्चना ग्रादि चोली थीं, मन्नतें मनाई थीं, ऐसा । श्रासादितवान प्राप्तकरता था। चक मणेन = चक्कर काटना या कुदाढ़ी मारना । तद् हृदयं वह हृदय । विहस्य-हंसकर । निर्भर्सयन = तिरस्कार करता हुा । धिक मूर्ख मूर्ख ! धिक्कार है । श्राशु =शीघ्र । समुत्यन्ने पु-उपस्थित होने पर,काम पड़ने पर । न हीयते=कम या नष्ट नही होती । दुर्गदुर्गम पथ को,विपत्ति या दुःख को । तरति = तैर जाताहै। जलस्थ जल में स्थित । अर्थ-किसी समुद्रतट पर एक बड़ा भारी जामन का वृक्ष है। और यहाँ रक्तमुख नाम का बानर रहता था। वहाँ उस वृक्ष के नीचे किसी समय (कभी) कराल मुख नाम का मगरमच्छ, समुद्र जलसे निकल कर तटके पास के स्थान में प्रविष्ट हो गया । तव रक्तमुख ने उस से कहा, "भो ! (ऐ!) श्राप अतिथि रूप से पाये हैं । सो, खाइये मेरे द्वारा दिये (इन) अमृत तुल्य जामन के फलों को।" ऐसा कहकर उसे उसने जामन के फल दिये (देता था)। यह भी उनको खाकर, उसके साथ, देर तक, (मित्रों की बैठक) मिलाप-सुख का अनुभव करके फिर अपने घर को पाया करता था । इस प्रकार, प्रतिदिन ही, वे वानर और मगर दोनों जामन की छाया में बैठे हुए सुन्दर वार्तालाप आदि द्वारा समय व्यतीत करते हुए, अानन्द से रहते हैं । वह मगर भी, खाने से बचे हुए, जामन के फलों को घर जाकर, अपनी पत्नी को दे देता था। फिर एक दिन उसने (पत्नी ने ) वह पुछा ( उससे पूछा) "स्वामी ! कहाँ तुम ऐसे अमृत . ।

२४ जैसे फल पाते हो ?" वह बोला, "भद्रे ! ( भली नारी) मेरा रक्तमुख नाम कां वानर परम मित्र है । वह प्रेम पूर्वक ये फल देता है" । फिर उसने (पत्नी ने ) कहा , “जो सदा ही ऐसे अमृत रूप फल खाता है, उसका हृदय (भी) अमृतमय ही होगा । सो, यदि, तेरा मुम भार्या से कुछ भी प्रयोजन (मतलब) है, तो उसका हृदय मुझे दे, जिससे उसे खाकर मैं बुढ़ापे और मृत्यु से रहित (मुक्त) हो जाऊँ ।" वह बोला, "भद्र ! ना ऐसा न कह, वह हमारा भाई बन गया है । दूसरे फल देने वाला है, इसलिये मारा नहीं जा सकता, सो तू (अपने) इस दुराग्रह को छोड़ दे।" फिर, मकरी बोली, "तूने कभी भी मेरे वचन को नहीं टाला, सो अब क्यों नहीं ( मेरा कहा) करते ? सो, बहुत (कहने ) से क्या ? यदि उसका हृदय नहीं खाती हूँ, तो मैने भूखे बैठने की ठानली है, जानले ।" इस प्रकार, उसके उस निश्चय को जानकर, चिन्ता से व्याकुल-हृदय बना "क्या करू? कैसे वह मेरे लिये वध्य हो सकता हैं(कैसे मैं उसे पा सकूँ)?" अादि सोचकर वह वानर के पाल अाया । वानर भी देर से याते हुए को उसको, व्याकुल ता से देख कर, बोला, "हे मित्र ! अाज देर से कैसे पाया है ? प्रसन्नता से वातचीत क्योंनहीं करता ? न सूक्तियाँ ही पड़ता है ?"वह बोला,"मुझे तुम्हारी भाभी ने बड़े कठोर शब्दों में कहा है, 'अरे कृतघ्न ! मुझे तू अपना मुख न दिखा, क्योंकि तू प्रतिदिन अपने मित्र के आधार से जीता है, और फिर कभी (अपना) घर दिखलाने मात्र से भी उसका बदला नहीं चुकाता है ( कभी कृतज्ञता स्वरूप उसे घर नहीं लाता)। सो, तू, आज मेरे देवर को पकड़ कर प्रत्युपकार (करने) के लिए घर ला । महों तो तेरे साथ मेरा परलोक में साक्षात्कार होगा (मरजाऊँगी)।" सो, उसके द्वारा ऐसा कहे जाने पर मैं तुम्हारे पास आया हूँ । सो, प्राज उसके साथ, तेरे लिए, कलह करते हुए मुझे इतना समय लग गया। सो, या मेरे घर को, तेरी भाभी यड़ी उत्कण्ठा के साथ (वहीं) स्थित है।" बन्दर योला, "हे मित्र ! हम तो जंगल के जीव है, और तुम्हारा घर जल में है, सो कैसे वहाँ जाया जा सकता है ? इसलिए मेरी उस भाभी कोछी यहाँ ले श्रा, जिससे प्रणाम करके उसका श्राशीर्वाद प्राप्त करूं।" . .

२५ वह योला, "हे मित्र ! समुद्र के मध्य में, रमणीय वालुकामय प्रदेश में हमारा घर है, सो मेरी पीठ पर सुख से बैठा निर्भय चल ।" वह भी यह सुन कर श्रानन्द से योला "भले लोग! यदि ऐसा है, तो क्यों देर लगाई है ? जल्दी करो! यह ले मैं तेरी पीठ पर चढ़गया हूँ।" ऐसा किया जाने पर, मगर को असीम (श्रधाइ) समुद्र में जाते हुए देख कर, भय से मन में घबड़ाया हुश्रा वानर योला, "भाई ! मन्द मन्द चलो, पानी की लहरों में मेरा शरीर इव रहा है।" वह सुनकर, मगर सोचने लगा, "यह अथाह जल में पहुंचा हुया मेरे वश में हो गया है। 'मेरी पीठ से तिल- मात्र भी नहीं चल (हिल) सकता, इसलिये कहे देता है. इसे अपना अभिप्राय (उद्देश्य , जिससे (अपने) इष्ट देवता का स्मरण करे।" और योला, "मित्र ! तू मेरे द्वारा, पत्नी के कथनानुसार विश्वास दिलाकर, वध (हत्या) के लिए लाया गया है, सो (अपने) इष्ट देव का स्मरण करो!" वह बोला, "भाई ! मैंने तेरा या उसका क्या अपराध किया है, जिसके कारण मेरी हत्या का उपाय सोचा ?" मगर बोला, "ऐ ! उसकी अमृतमय फलखाने से शुद्ध बने तुम्हारे हृदय को खाने की इच्छा हो पाई । इस कारण से ऐसा किया।" उपस्थित (हा जर) बुद्धिवाला वानर बोला, "यदि ऐसा है तो तूने मुझे वहीं क्यों नहीं बताया (कहा), जिससे, सदा से, जामन के खोखल में, मेरे द्वारा छिपाये हुए अपने हृदय को मैं भाभी के लिए दे देता ? तू मुझे हृदय से शून्य को किस लिए यहाँ ले प्राया ?" यह सुनकर मगर अानन्द के साथ, बोला, "भले- मानस ! यदि ऐसा है तो दे मुझे हृदय, जिससे वह कुपत्नी उसको खाकर अनशन से उठ खड़े ! तुझे मैं उसी जामन के वृक्ष के पास पहुँचा देता हूँ।" ऐसा कह कर, लौटकर, उसी जामन के नीचे श्रागया। जिसने विविध (अनेक) प्रकार के देवताओं की भेंट पूजाए' घोलरखी थीं (मत्रते 'मान रखी थी ) ऐसा वह वानर किसी प्रकार तीर पर पहुँचा। और फिर, लम्बी 'कुदाड़ी (उछाल) लगाकर उसी जामन के वृक्ष पर. चड़ा सोचने लगा, "अहो ! जीवन प्राप्त हुया (जान वची), मेरा तो.जैसे श्रीज पुनर्जन्म दिन हुआ है।" यह सोचते हुए को मगर बोला- ૨૬ "हे मित्र ! दे वह हृदय, जिससे तेरी भाभी खाकर अनशन से उठ खड़ी हो।" तब, हँसकर, तिरस्कार करता हुआ वानर उसको बोला, "धिक्कार है मूर्ख ! विश्वास-घातक ! क्या किसी के दो हृदय होते हैं ? सो, तत्काल, (इस) जामन के वृक्ष के नोचे से चले जाओ, फिर कभी भी यहाँ नहीं आना ।" काम के श्रा पड़ने पर जिसकी वुद्धि नष्ट नहीं होती (उपस्थित रहती है) वही दुर्ग (विपत्ति ) को पार कर सकता है, जैसे कि जल में स्थित वानर ने किया। विपत्ति में जिसको बुद्धि स्थिर रहती है, वही उसके पार जा सकता है । वक-कर्कट-कथा ( बगले और केंकड़े की कथा ) शब्दार्थ-दर्शयित्वा = दिखाकर । कुलीरेण = केकड़े ने । दृष्टः पृष्टश्च == और पूछा। कैवतः = मछुओं के द्वारा । वार्ता = बात । नगरोपान्ते = नगर के निकट । न्यापादयितव्याः =मारे जाने चाहिये । अस्मन्मरण = हमारा मरण । ज्ञात्वा=जानकर । श्राजोचितम् - विचार किया, भला बुरा सोचा । लघयते - दिखाई देता है । पृच्छ्यताम् पूछा जाय । ऊचुः बोले । प्रते-कहता जलाशयान्तरात्रयणम् = अन्य सरोवर का श्राश्रय लेना । एकैकशः = एक एक कर के । युष्मानयामि = तुम्हें ले जाता हूँ । नीत्वा = लेजाकर । स्थले = शुष्क भूमि में । पृतवान् = रख देता था। कण्टकाकीर्ण = काँटों से व्याप्त । भवतु = श्रस्तु । व्यवहरिष्यामि = व्यवहार करूंगा । तावत् = तब तक। भेतव्यम् दरना चाहिये । यावत् =जप तक । अनागतम् =न पाया हो। अभीतवत् = निर्भय के समान । प्रहर्तव्यम् = प्रहार करना चाहिये । पालोच्य =पालोचना करके । चिच्छेद = काटता था । पञ्चत्वम् = मृत्यु को। है કંઠ अर्थ-मालव देश में पद्मगर्भ नाम का सरोवर है। वहीं एक वृद्ध निर्वल यगला अपने आप को परेशान-सा दिखा कर स्थित था । वह किसी कुलीर (केंकड़े ) ने देखा और पूछा, “श्राप यहाँ भोजन त्यागे दुए क्यों ठहरे हो?" वगले ने कहा, "मछलियाँ मच्छ मेरे जीवन का कारण हैं, वे ही मछु- ओं द्वारा पाकर मारे जाने वाले हैं, यह बात मैंने नगर के निकट सुनी है, इसलिये श्राहार के निना हमारा मरण उपस्थित है (मृत्यु भा गई है) यह जान कर, भोजन का भी निरादर किया है।" इसके पश्चात् मत्स्यों ने सोच विचार किया, कि इस समय यही उपकारक प्रतीत होता है, इसलिए जैसा करना चाहिये, इसी से पूछा जाय । मत्स्य योले, "हे बगुले ! अब रक्षा का क्या उपाय है ?" यगला योला, "रक्षा का उपाय केवल अन्य सरोवर में श्राश्रय लेना है। वहाँ मैं तुम्हें एक-एक करके ले जाता हूँ।" मत्स्य बोले, 'ऐसा ही हो।" इसके पश्चात् वह यगला उन मत्स्यों को एक एक करके लेजाकर शुष्क भूनि पर रख देता रहा । केकड़ा भी (अपनी वारी में) मत्स्यों के कांटों से अभिव्याप्त उस स्थान को देख कर चिन्ता करने लगा, “हा! मैं बदकिस्मत मारा गया! अस्तु । अब समय (अवसर) के अनुसार काम करूंगा,क्योंकि- तभी तक भय से डरना चाहिये, जब तक कि वह सामने आया न हो । किन्तु सामने आये हुए भय को देख कर तो निर्भय के समान प्रहार करना चाहिये । (भय की वस्तु से परोक्ष में ही डरना चाहिये, प्रत्यक्ष में तो निर्भयता से उसका मुकाबला करना चाहिये ।) ऐसी पालोचना (विचार विमर्श ) करके कंकड़े ने उसकी (बगले की ग्रीवा (गरदन) काट खाई । वह बगला मृत्यु को प्राप्त हुआ। " - कर्णस्यवदान्यता ( कर्ण की दान शोलता) शब्दार्थ-शक्रः = इन्द्र । निवर्त्य = लौटकर । उपगम्य =समीप जाकर । याचे = मांगता हूँ । दृढप्रीतोऽस्मि = अत्यन्त प्रसन्न हूँ । कृतार्थगणना-कृत- कृत्यों की गिनती । विप्रेन्द्र = ब्राह्मणों का स्वामी। रजसा-धूलि से । 'वक्तव्यं = कहना चाहिये । भव =हो । वक्ष्ये = कहूंगा ।परिभवति तिरस्कार करता है । परिहत्य = छोड़कर । वच्यामि= कहूंगा। साध्यः = सिद्ध करने के योग्य । महत्तरां= बड़ी से बड़ी को । भवो आपके लिए । प्रदास्ये दूंगा। श्रियः = लघमीका । मद्विभवाः =मेरे ऐश्वर्य । गुणवद्...गुणवाला । अमृतकल्प -अमृत के समान । क्षीर=दूध । धारामिवर्षि =धार वर्षाने वाला । रुचितम् = इष्ट है, रुचिकर है। तृप्तवत्सा- 'नुयानम् = पेट भरा बच्चा जिसके पीछे पीछे यात्रा कर रहा है ऐसे को। अथि प्रार्थनीयम् = याचकों के मागने के योग्य को । गोसहस्र=सहस्र गाएं । मुहर्तकम् = कभी कभी पलमर को । घोड़ा । काम्बोज = देश विशेषका नाम । अनिल = वायु । जातन् = उत्पन्न हुए को । =सपदि = तुरन्त । वाजिनां घोड़ों. के । थारोदामि = चढ़ता हूँ । सरित = बहते हुए । पट्पदैः = भ्रमरों द्वारा । सेव्यमानं = सेवा किया जाता हुशा । निचय =समूह । घोपम् = शब्द । मित-श्वेत । वारणानां हाथियों के । रिपुसमरविमर्द - युद्ध में शत्रुओं को ममलने वाला । नृन्द % समूह । गज= दस्ती। अपर्याप्त असीम, अमान । कनकं = सोने को । जिल्या जीत कर । मन्दिरः =मेरा शिर 1 अविधा== पचायो २ । भतव्यम् = डरना चाहिये । प्रसीदतु = प्रसन्न हो । जनितं = उत्पन्न हुआ। निकृत्य कर किया हुआ । भेद्य =भेदन करने के योग्य । देयं देने योग्य । स्यात् = हो। भगवते श्रापके लिए । ददातु --दें। कामः-कामना। अनेक कपटवुद्धः अनेक कपट बुद्धि वाले का । 'अनुशोचितुम् = पश्चात्ताप करने के लिए। अयुक्तम् = अनुचित । गृह्यता ग्रहण करिये । दातव्यम् = देना चाहिये । पश्य-देख । श्रलम् अलम् निवारयितु-मना करने से बन्द हो जायो। कालपर्ययात् =समय बदलने से। शुष्यति = सूख जाता है। हुतं = हयन किया = काटकर पृथक करके । निष्क्रान्तः - निकल गया। किरीटमान् -मुकुटधारी । सुरद्विप = ऐरावत हाथो । श्रास्फालन = थपकी देना। कर्कशांगुलिः = कठोर उँगलियों चाला | कृतार्थ = कृतकृत्य, सफलमनोरथ । पाकशासन%इन्द्र। अर्थ=( तब ब्राह्मण रूप इन्द्र प्रवेश करता है) शक्र है मेघो ! सूर्य के साथ ही लौटका श्राप जाय । (कर्ण के पास जाकर ) हे कर्ण ! बड़ी से बड़ी भिक्षा मांगता हूँ। कर्ण-अत्यन्त प्रसन्न हूँ भगवन् ! अन्वय-अद्य अहं लोके कृतार्थ गणनायातः, राजेन्द्र मौलि मणिरंजित पाद पीठः, तु द्विजपदरजसापवित्रमौलिः, भवन्तं नमस्करोमि । मैं (कर्ण) संसार में कृत-कृत्य व्यक्तियों की गिनती में आगया। राजा महाराजाओं के सिर की मणियों से रंगे हुए चरण कमल वाला (अर्थात् जिसके पावों में राजागण सिर झुकाते हैं), किन्तु ब्राह्मणराजों की चरण धूलि से पवित्र सिरवाला, यह मैं कर्ण श्रापको नमस्कार करता हूँ। (ब्राह्मणरूप इन्द्र को कर्ण नमस्कार करता है।) शक्र- (स्वगत) मुझे क्या कहना चाहिये ? यदि “दीर्घ अायु हो" यह कहूँगा तो दीर्ध श्रायु हो जायेगी। यदि नहीं कहूँगा तो यह मूर्ख कह कर मेरा तिरस्कार करेगा। इसलिए (इन) दोनों बातों को छोड़कर (और) क्या कहूँगा ? अस्तु, जान लिया (देख लिया)। (प्रकट) हे कर्ण ! सूर्य के समान, चन्द्र के समान, हिमालय के समान, समुद्र के समान, तेरा यश (संसार में) स्थिर हो । एप यह कर्णः श्राज - - कर्ण-क्या ऐसा कहना नहीं योग्य है कि दीर्घ श्रायुवाला हो ? अथवा, यही अच्छा है। क्योंकि पुरुप को यत्नों द्वारा धर्म की सिद्धि करनी चाहिये । राज लमियां सर्प की जिव्हायों के समान चंचल होती । इसलिए केवल प्राजपालन की वृद्धि से शरीरों के नष्ट हो जाने पर, गुणधारण करते हैं (प्रजापालन में शरीर का नाश हो जानेपर गुण या यश रूपी शरीर हो अवशिष्ट रहता हैं)। भगवन् ! क्या चाहते हो, मैं क्या हूँ ? शक-यदी से यढ़ी भिक्षा चाहता हूँ। फर्ण-बड़ी से बड़ी भिक्षा श्राप को दूंगा। सुनिये मेरे ऐश्वर्यों को- (अन्वय) द्विजवर ! ते रुचितं (चेत् ) गुणवद मृतकल्प क्षीरधाराभि- चर्षि, तृप्तवत्सानुयात्रम्, तरुणं, अधिकमर्थि प्रार्थनीयं, पवित्रं, विहितकनक- शृंगं गोसहस्र ददामि ? हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! (यदि) तुम्हें रुचिकर हो, तो गुणयुक्त अमृत सदृश दूध की धारा वर्षांने वाली, (दूध पी कर) तृप्त वच्छे जिनके पीछे पीछे यात्रा कर रहे हैं, जिनके लिये याक लोग अधिक प्रार्थना करते हैं, जो युवा- वस्य में हैं, पवित्र हैं और जिनवे सींग स्वर्ण के बनाये गये हैं, ऐसी हजारों गाय दे दूँ ? (विशेष्य "गो सहस्रम्" है, जो नपुंसक लिंग में है। ऊपर के सय इसी के विशेषण है, अत: नपुसक लिंग में हैं। अर्थ सममने में ध्यान रखना चाहिये। शक-गायों का सहत्र (हजार गायें) ? मुहूर्त को ही (कभी कभी हो) दूध पीता है । नहीं चाहता कर्ण ! नहीं चाहता । कर्ण-श्या, नहीं चाहते श्राप ? यहभी मुनिये- अन्वय-रवि तुरगममानं, राजलक्ष्याः साधनं, सकलनृपतिमान्यं, मान्य काम्योजजानन, मुगुणम्, अनिल वेगं, युद्धदृष्टापदानां, वाजिनां यहुसहस्र, सपदि ते ददामि ? (विशेप्य नपुसक लिंग 'वाजिनां सहन" है, इस लिए उपर के विशेषण भी उसी लिंग में है।) सूर्य के घोड़ों के ममान (नेजस्वी और यज्ञबान , राजलक्ष्मी (राज शोभा) २ प्रधान) साधनन्प (राजाओं का बौदों के बिना काम नहीं चलता), समस्त राज-गगों के द्वारा श्रादग्गीय, माननीय काम्प्रोजदेश में टपन हए, कर्ण-क्या, सुगुणयुक्त, वायुकी-सी गति वाले, युद्ध में शत्रु के लिये श्रापदा रूप दिखाई देने वाले भनेक सहस्त्र अश्व तुरन्त तुम्हें दे दूँ ? (ब्राह्मण गऊ पसन्द करते है। उसमें अरुचि देख कर राजपी ठाठ की वस्तु घोड़ों के विषय में पूछा गया है।) शक्र-अश्व ? मुहूर्तमात्र को कभी चढ़ता हूँ। नहीं चाहता कर्ण ! नहीं चाहता। नहीं चाहते भगवान् ? और भी सुनिये- अन्वयमदसरित कपोलं पट्पदैः सेव्यमानं, गिरिवरनिचयाभ, मेघगम्भीरघोपं, रिपुसमरविमर्द, सितनखदशनानां वारणानां एतत् अनेक वृन्द ददामि ? (यहाँ भी विशेष्य "वृन्दं" नपुंसक लिङ्ग में होने से ऊपर के सब विशेषण उसी लिङ्ग में पाये हैं।) गण्डस्थल से मद यहाने वाला, भ्रमरों द्वारा सेव्यमान (भ्रमर जिम्मके चारों ओर घूम रहे हैं), पर्वतों के समूह की शोभा वाला, मेघ के समान गंभीर शब्द वाला, शत्रुओं को युद्ध में मसलने वाला, श्वेत नख और दाँतों वाले हाथियों का यह (उपस्थित) समूह दे दूँ ? शक्र-हाथी ? मुहूर्त को (कभी) चढ़ता हूँ। नहीं चाहता फर्ण ! नहीं चाहता। कर्ण-क्या नहीं चाहते श्राप ? और भी सुनिये । अपरिमाण (असीम) स्वर्ण देहूँ? शक्र-कुछ दूर जाकर, अकड़ कर जाता हूँ, नहीं चाहता कर्ण ! नहीं चाहता। कर्ण-उससे (स्वर्ण से) जीत कर पृथ्वी दे दूँ ? शक-पृथिवी का क्या करू गा ? कर्ण-उसके द्वारा अग्निष्टोम (यज्ञविशेष जो दिग्विजय करके राजा लोग करते हैं) का फल दे दूँ ? शक-अग्निष्टोम फल से क्या काम ? कर्ण-तो फिर अपना सिर दे? शक-माहिमा ! त्राहिमा ! राम, राम ! M कण १ -भय नहीं करना चाहिये । प्रसन्न होइये श्राप । और भी सुनिये- अन्वय-देवासुरैरपि अस्त्रैः सह नभेद्यम् इदं मम देह-रक्ष, अंगैः सहै। जनितम्, तथापि, यदि भगवते रुचितं स्यात्, मया प्रीत्या, कुण्डलाभ्यां सह देयम् । देवतायों के द्वारा भी (अपने) अस्त्रों से अभेद्य (जिसका देवता भी शस्त्रों से भेदन नहीं कर सकते), मेरा यह शरी। त्राण (कवच) मेरे अंगों के साथ ही उत्पन्न किया गया है (शरीर से पृथक् नहीं है, उसका अवश्य यता हुया है, तो भी, यदि भगवान् (श्रीमान्) के लिए रुचिकर हो तो, मेरे द्वारा प्रीति पूर्वक, कुण्डलों के साथ (यह) कवच भी देने योग्य है (यह कवच भी मैं प्रसन्नता से दे सकता हूँ)। शक-(हर्प से) देदो, देदो । कर्ण-(स्वगत) यही इसकी कामना है । क्या यह अनेक कपटी विचारों पाले (पट बुद्धि वाले) कृष्ण का. (कोई) उपाय (पड्यन्त्र) है ? वह भी धिकार है, पश्चाताप करना अनुचित है । सन्देह नहीं हो (प्रकट) ग्रहया कीजिये। शल्य-श्रृंगराज ! (कर्ण अंगदेश का राजा कहलाता था) नहीं देना चाहिये, नहीं देना चाहिये । -शल्यराज ! मत मना करिये । देख- अन्वय-कालपर्ययात शिक्षा क्षयं याति, मुयन्दमूला पादपा निपतन्ति, व नलस्थानगतं जलं शुष्यति, (किन्तु) हुतंच दत्तच तथैव तिष्ठति । ममय व्यतीत होने पर शिना कम (नष्ट) हो जाती है, अच्छी मजबूत जहों याले वृक्ष भी गिर पड़ते हैं और जलस्थान (सरोवर) में विद्यमान जल भी भूल जाना है, किन्तु) दिया हुआ और हवन किया हुया (यन में ढाला हुधा) वैसा ही टहरा रहता है। इसलिए ग्रहण करिये । (थक् (काट) करके देना) शक्ष.--(ग्रहण करके, स्वगत) अहा ! पालिये ये ! (निकल गया) शल्य-६ अंगराज! श्राप गलये गये । फण-किसके द्वारा ? - ! शल्य-इन्द्र के द्वारा। कर्ण-नहीं, नहीं ! इन्द्र को बल्कि मैने ठगलिया! अन्वय-हिजै अनेक यमाहुतितर्पितः, किरीटमान, दानव संघमर्दमः, सुरहिपास्फालन कर्कशांगुलिः, पाकशासनः मया खलु कृतार्थः (कृतः ), ब्राह्मणों ने अनेक यज्ञों की आहुतियों से सन्तुष्ट किया हुआ, मुकुटधारी, दैत्यों के समूह को मसलने वाला, ऐरावन को थपथपाने से कठोर उंगलियों वाला, इन्द्र मैंने कृतकृय (सफल मनोरथ,श्राभारी) कर दिया । 1 . १ समस्या-पूर्ति (कविता के एक अंश को कविता में बाँध कर पूरा करना । अथवा, मिसरे पर मिसरा जोड़ना) शब्दार्थ-एकदा-एक समय । मृगया-शिकार । श्रातः =पीदित दुःखित । निषिदच्छायस्य स्घन छाया वाले के । मूलमुपाधिशत् जड़ में वैठा था। शयाने राज्ञि-राजा के सो जाने पर । कपिभिः = यन्दरों ने । सण्यपि-सभी । चालितानि-हिलादिये । सशब्द-शब्द , के साथ । पश्यन् = देखता हुआ। घटिका मानं घढी भर । स्थित्वा = ठहर कर । परिहत्य -दूर करके । उत्थाय = उठ कर । थारुह्य-चढ़ कर । रवंशब्द को । अनुकुर्वन् = अनुकरण करत हुआ। समस्या- कविता का एक अंश । गुलुगुग्गुल-जामनों के गिरने के जैसा शब्द । पक्वानि पके हुए। कपि कम्पित शाखातः - बन्दरों द्वारा हिलाई शाखा से । तुष्ट-प्रसन्न । अदृष्ट मपिन देखा हुआ भी । शारदा असि-सरस्वती हो। पादयोः = चरणों में । मुहुमुहुः= बारबार । अर्थएक समय, शिकार में प्राकृष्ट राजा अत्यन्त ध्येथितं हुग्रा; किसी सरोवर के तट पर, सघन छाया वाले जामनः के वृक्ष के मूल में बैठगया। .

हुए देखता वहां, राजा के सो जाने पर, जामन के ऊपर, यहुत से वानरों ने सभी जामन के फलों को हिला दिया । • उनको आवाज के साथ गिरते हुश्रा, राजा घड़ी भर ठहर कर, थकावट दूर करके, उठकर, घोड़े पर चढ़कर,चल. गया। इसके पश्चात्, राजा पहिले अनुभव में पाये यन्दरों द्वारा हिलाये (जामन के) फलों के पतन के शब्द का अनुकरण करता हुआ समस्या बोला, "गुलुगुग्गुलु गुलुगुग्गुलु ।" तय कालिदास बोला- पसे हुए जामन फल, यानरों द्वारा हिलाई शाखा से, स्वच्छ जल में, गुलुगुग्गुलु............शब्द करते हुए गिरते हैं। राजा सन्तुष्ट हुमा योला,"हे सुकवि ! नहीं देखे हुए भी दूसरे के हृदय को कैसे जान लेते हो ? (जानलेता है तू ?) साक्षात् सरस्वती हो।" इस प्रकार (कहता हुथा) यार यार (कालिदास के) चरणों में गिरता था ! योगस्य चमत्कारः । (योग का चमत्कार) शब्दार्थ-येतात: यहाकया फा एक पात्र, भूत-रूप में | अपरां- इमरी को । चकयया कहता था । फलिंग विपये =कलिंग देशान्तर्गत । प्रामीन =धा । सयो:= उनके । शास्त्रज्ञ = शास्त्रों का ज्ञाता । भूत्वा = होकर । बगान प्राप्त हो गया । पिनरी=माग पिता । श्रादायः लेकर थानम्मतुः= दोनों पाये । घेत्तारं माता को। कलेयर शरीर । मन्दिव- पान् प्रन्दन फरने लगा । नर्तितयांश्च =और नाचने लगा। प्रविवेश प्रविष्ट हो गया। मुप्नोग्यिते-सोये हुए के उठने पर । परां=अत्यन्त । प्रामादितयन्ती= दोनों प्राप्त करवे धे। अभ्यु:= हुए । प्राप्त जीयन:- निसको जीवन मिल गया है। ध्यायन = ध्यान करता हुा । तस्थौ स्थित रहा । चन्द रोपा-मन्दन किया । नन =नाचा । वदतु कहे। देयः माप | T-मुन | उपानित =कमाया दुजा, प्राप्त किया हुअा। स्यकत. - .. व्यम् = छोड़ना है, छोड़ना चाहिये । विहाय =छोड़ कर । प्राप्तव्यं प्राप्त करना है, प्राप्त करना चाहिये । अर्थ-इसके पश्चात, वेताल फिर दूसरी कथा कहने लगा "कलिंग देश में यज्ञ स्थल नामक एक नगर था वहाँ यज्ञसोम नाम का एक ब्राह्मण में स्थित है, उसकी ब्राह्मणी सोमदत्ता नाम की है। उन (दानों) के प्रसस्वामी दा, नाम का पुत्र उत्पन्न हुश्रा । और, वह सय शास्त्रों का ज्ञाता से कर भाग्यघास मृत्यु को प्राप्त हो गया। तय, उसके माता पिता यहुत विधि से विलाप — करते हुए, बन्धु जनों के साथ, (अन्तिम) संस्कार के लिए, उसे लेकर श्मशान भूमि में पाये । इतने ही काल में, श्मशान में रहने वाला योगी उस ब्राह्मण कुमार को सय शास्त्रों का ज्ञाता और मनोहर शरीर वाला देख कर करुण स्वर में ऊँचे ऊँचे रोने लगा और बड़े कौतुक (तमाशे) के साथ नाचने लगा । (फिर) अचानक उठ कर, योग के द्वारा (अपने) जीर्ण शीर्ण (वृद्ध) शरीर को छोड़ कर, मरे हुए ब्राह्मण कुमार के शरीर में प्रविष्ट हो गया। कुमार के निद्रा से उठने पर उसके माता पिता परम धामन्द को प्राप्त करते थे और सब वन्धुजन प्रसन्न हुए। ब्रह्मस्वामी, जिसको जीवन प्राप्त हुआ था, सब कोगों (सुखानुभवों) को, छोट कर, योग का मान (चिन्तन) करता हुआ ठहरा (स्थित हुा) । श्मशान-वासी योगी कैसे रोका अथवा कैसे नाचा, इसका कारण श्राप (देव) यतायें ।" राजा कहता है, वेताल ! देरसे कमाये हुए (प्राप्त किये हुए, पुराने) जीर्ण शीर्ण तनु को a छोड़ना है, इससे (वह) रोया, जीर्ण शरीर को छोड़ कर, समस्त गुणों का श्राधारभूत ब्राह्मण शरीर प्राप्त करना है, इससे वह नाचा। -बेताल पच्चीसी नीतिरत्न माला । (नीति के वचनों रूपी रत्नों की माला ) शब्दार्थ-पृथिव्यां = पृथ्वी में । त्रीणि = तीन । सुभापित सुन्दरउक्ति विधीयते = की जाती है। अमृतोपमे= अमृत के तुल्य । हिते = हित में नियुके = लगाती है । अभिरमति = श्रानन्द क्रीडा करती है । अपनीय = करके । लक्ष्मी = शोभा को । तनोति = तानती है, फैलाती है। बितनोति : विस्तृत करती है। दिउ दिशाओं में। विद्वत्वं = बिहना । नृपत्व = राज्य या राजापना । कदाचन = कभी अशः - मूर्स । मुगुवपूर्वक । पाराध्य = मेवा या श्राराधना ( प्रसन्नता के योग्य । मुगारं = उससे भी अधिक मुखपूर्वक । पारागने = सेवा की जान है. प्रमा किया जाता है । लय = टुकड़ा । दुविदग्धं - वृथाभिमानी मारयति = [श करना है। विपाण = मींग । ग्वादन वाना हुया जीयमानः = जीनाया । भागधेयं = भाग्य । प्रीगयेन प्रसन्न करे । पितरं = पिता को । मनु = पति फा फलनम् = ग्री, पग्नी । प्रापदि = श्रापत्ति में समष्टियम-समान व्यवहार याला । पुगयतः-पुण्य कर्ना। लभन्ने = मा फरने । मपंप = परमों । पर विद्राणि - दुसरे के छिद्रों ( दोपों) को विश्वमायागिपिन के फल के प्राकार के । परिध्यदहटा देना चाहिये विपया = विद्या में । मन = होना दया । विन = धन । अलिमान = वेद का कारनं सोने को । यधनाः = जिन्होंने बहुत कुछ मुगा है। पारदमायु में दारि मारपर । किडगः नीकर । हमी ये दोनों = हारने शाहिये। गाट करकर । यदध्या- वापार । मदानारंगदान न करने वाले को 1 अपस्थिनम् पम्यो - ३७ (कप सहने वाला ) न हो, उसको । भर = पालन कर। कौन्तेय - कुन्ती पुत्र अजुन। प्रयच्छ दे। व्यधितस्य च्याधिग्रस्तको नीरुजस्य-नीरोगी का। श्रयवा यह । लवुचेतसाम्-छोटे दिल वालों को। वयात् = बोले, अतृत = झूठ । अप्रिय -जो अच्छा न लगे। सिद्ध्यन्ति सिद्ध होते हैं । उपैति =प्राध होती -भाग्य । कापुरुषा:-कायर लोग | आत्मशक्या- अपनी सामर्थ्य मे । यत्ने कृते-यत्न करने पर। का कौनसा । संहति = समूह । गुणत्वं रस्सी रूपको । अापन्नः के द्वारा । मतदन्तिनः = मदमस्त हाथी । वरम् = अच्छा है । तमः = अन्धकार को । हन्ति नष्ट करता है । वन्हिना=अग्नि के द्वारा । दह्यमानेन =जलाये जाते हुए ने दह्यते = जला दिया जाता है | दुप्पुत्रेण = कुपूत द्वारा । कष्ट = 1 कष्ट दायक है। परान्नं दूसरे का अन्न । चलं चञ्चल { याति-जाता है । जातेन- उत्पन्न हुए द्वारा । परिवर्तिनि: । बदलते हुए में । मृतः= मरा | जायते = उत्पन्न होता है । दैवहतं नष्ट भाग्य । पाला। विनश्यति = नष्ट हो जाता है । विपिने-बन में । कृतप्रयत्नोऽपिजिसके लिये प्रयत्न किया गया हो। विनोदेन = मन बहलाव से । धीमता=बुद्धिमानों का । जीवन्तोऽपि = जीते हुए भी । परिकीर्तिता = वर्णित किये हैं । व्याधितः = वीमारी वाला | प्रवासी = विदेश में रहने वाला । नित्यसेवकः सदा का नौकर । नर पति = राजा । द्रुप्यतां = शत्रुता को । लोके - संसार में । त्यज्यते = छोड़ दिया जाता है। पार्थिवेन = राजा द्वारा । महति = बड़े में । नृपति जनपदानां = राजा और जनता का या देश का । पृथिव्यां 'विधीयते। अर्थ -पृथिवी पर तीन ही रत्न है जल, अन्न और सुभाषित (सूक्तियां) मूखों द्वारा रत्न संज्ञा (नाम) पत्थर के टुकड़ों में की जाती है। २. संसार 'सुजनः जनः ।। अर्थ संसार रूपी कडुए वृक्ष के अमृततुल्य दो ही फल हैं-सूक्तियों के रस (आनन्द) का प्रास्वाद लेना और सजन जनों के साथ संगति । - ।

३. मातेय रक्षति विद्या॥ अर्थ-म -माता के समान रक्षा करती है, कान्ता (प्रिया ) के समान रोद दूर करके श्रानन्दनीडा करती है । शोभा बढ़ाती है और दिशाओं में (चारों प्रोर ) यशका विस्तार करती है । विद्या कल्पवृक्ष की बेल के समान क्या क्या कार्य) सिद्ध नहीं करती ? (सभी करती है) ४. विद्व-वं 'पूज्यते ॥ अर्थ-विद्वाना और राज्य ( राजा का पद ) कभी भी बराबर नहीं है। राज्य अपने देश में हो पूजा जाता है, ( किन्तु ) विद्वान् सर्वत्र पूजा जहा है। ५. अनःमुख "रजयति ॥ अन्धय-अज्ञः मुग्यमाराध्यः, विशेषतः मुखतरम् पाराध्यते, ( किन्तु ) काननवदुर्विदग्धं तं नरं ब्रह्मापि न रञ्जयति । अर्थ-मृर्ग मुग में पाराधना (मेवा ) करने के योग्य होता है और विशेषज्ञ (शिशिन) की उसमें भी अधिक मुम्ब में श्राराधना की जाती है, किन्तु भान के यो से अंश का वृथा अभिमान करने वाले (उस) मनुष्य को ब्रह्मा भी प्राश्री कर सकता। ६. माहित्य नंगीत 'पशूनाम् ॥ अध्यय-मारियांगीतकला विहीनः ( नरः) पशूनां परमं भाग धंयं मनपादपि जीयमानः पुन्द विपाहीनः साशात् पशुः भवति)। ययं-पादिग्य, संगीत और पलायों से रहिस ( मनुष्य ) पशुओं के भाय ही माकि उनके भाग्य में सिमी) नृगणों ( घास ) को न नीतीला और मांगांप रहित मापात पनुरूप है। (जो न्यान गाबाद में मून्य जीवन दिनाना है, या पशु, गापि या धार नहीं माना और गाड़ी उस गांग योर हो।) ७. का श्रीगन ...भन्ते ॥ अन्यया चरितः पितरं प्रोगन म पुत्रः, यद् भय दिल.

मिच्छति तत् कलत्रम्, यत् सुखे श्रापदिचसमक्रियं तत् मित्रम्, जगति एतत्त्रयं पुण्यकृतो लभन्ते । अर्थ-जो (अपने ) अच्छे चरित्रों से पिता को प्रसन्न करता है, वह (वस्तुतः ) पुत्र है, जो (सदैव) पति की हितकामना करती है, वह (वस्तुतः) पत्नी है, जो सुख में और आपत्ति में समान व्यवहार वाला है वह (वस्तुतः) मित्र हैं, संसार में इन तीनों को पुण्यवान् लोग ही प्राप्त करते हैं। ८. खलः शर्ष 'पश्यति । अर्थ-दुष्ट पुरुप दूसरों के जैसे (छोटे) दोपों को तो देखता है, परन्तु अपने विल जैसों ( बढ़े दोपों ) को देखता हुश्रा भी नहीं देखता। ६. दुर्जनः ...."भयंकरः ॥ अर्थ-विद्या से सुभूपित होता हुआ भी दुर्जन त्याग के ही योग्य होता है, मणि से सुशोभित भी सर्प क्या भयंकर नहीं होता । ? यस्यास्ति' 'माश्रयन्ते ॥ अर्थ-जिसका (के पास) धन है, वह मनुष्य कुलवान् है, वही पण्डित है, वेदों का ज्ञाता है और गुणज्ञ है, वही भापणकर्ता और वही दर्शन के भी योग्य है, क्यों कि) सभी गुण सोने (लचमी) का प्राश्रय लेतें हैं। (ऐसी बात दुनियां में होती जरूर है कि धन पानेपर निगुणी भी गुणी कहलाने लगता व्यक्ति, या उसमें कुछ गुण श्रा भी जाते हैं, परन्तु वस्तुतः गुण के लिए धन होने की कोई शर्त नहीं है। अतः यह एक लोक-व्यवहार के प्रति कटाक्ष ही मानना चाहिए।) १२ वयोवृद्धाः 'किंकरः ॥ अर्थ-पायु में बड़े, तप में बढ़े, और जो बहुश्रु त ( जिन्होंने यहुत कुछ सुन रखा है.) वृद्ध हैं, वे सब धन में बड़े (वृद्ध) लोगों के द्वार पर किंकर (नौकर) के रूप में ठहरते हैं ( समस्त वृद्धों से धन-वृद्ध हो बड़े हैं)। १२ द्वाविमावम्भसि 'चातपस्विनम् ॥ अर्थ-दान न करने वाले धनी को और कष्ट न पाने वाले (परिश्रम से , . M ..

... ... जो चुराने वाले ) गृहस्थी को, इन दोनों को (इनके) गले में कसकर शिला (रघर) विकर जल में फेंक देना चाहिये। १३ दरिद्रान् .....किमीपधैः ।। अर्थ- कौन्येय ! (कुन्ती पुत्र) दरिद्रों का पालन कर (उनको दे), धनी को धन न दे। बीमार के लिए श्रीपधि और पथ्य होते हैं। नीरोग को श्रौषधि पे क्या (लाभ)? २४ अयंनिज 'कुटुम्बकम् ॥ अर्थ-यह अपना है अथवा यह पराया है, ऐसी समझ (गिनती) छोटे दय वालों को होती है । उदार चरित्र वाले व्यक्तियों का तो पृथ्वीमात्र ही कुटुम्य होता है (वं संसार को अपना कुटुम्य समझते हैं)। १५ सत्यंत्र या "सनातनः। अर्थ-ग्य योले और प्रिय (प्यारा लगने घाला) योले, अमिय (युरा लगने वाला कटोर) सस्य न यौल और न प्रिय (किन्नु) यसत्य बोले, यही मया या माया धर्म है। १६ अमेहि ""मृगाः। अर्थ-कार्य यम योग में सिद्ध होते है, न कि मनोरयों (मन की दरमा माय) में । मीने हुए सिंह के मुग्य में स्ययं (पारर) मृग नहीं घुमर जाते (मगिर पग्ना परता है)। १८ जनन "कोऽत्रदोपः ॥ अर्थ-पांगी (समी) योर पुरुष को ही लघमी मिलती है। "भाग्य FAD" पद पार नी वापर गंग का परने । (इसन्निए) भाग्य को दोहरा में पार्षदर, पान परने पर (भी) यदि पिच गई। Email "मत्तदन्निनः॥ - माया भी गपुर समिति करने वाला हो। १. गो. नागपी की याद दिया न ।

१६ वरमेको 'तारागणोऽपिच ॥ अर्थ...गुणी पुत्र एक ही अच्छा है और मूर्ख सो भी नहीं। चद्रमा अकेला हो अंधकार का नाश करता है और तारों का समूह भी नहीं (अंन्धकार का 'नाश कर सकता)। २० एकेनं 'यथा ॥ 'अन्धय-वन्हिना दह्यमानेन एकेन शुष्कवृक्षण सर्वतद्वनं (तथा)दह्यते,यथा (एकेन) दुप्पुत्रेण कुलम् । अर्थ-अग्नि द्वारा जलाये जा रहे एक (ही) सूखे वृक्ष से (कारण से) वह सारा ही वन (ऐसे) जला दिया जाता है, जैसे (किंसी एक) कुपुत्र के कारण 'कुल (जल जाता है, नष्ट हो जाता है)। २१ कष्ट खलु 'परान्नंच ॥ अर्थ-मूर्खता निश्चय से कष्ट दायक है, और यौवन में दरिद्रता भी 'अवश्य (खलु शब्द का प्रकरणानुसार निश्चय, संभावना श्रादि अर्थों में प्रयोग होता है ) कष्ट रूप है । (किन्तु) कष्ट से भी अधिक कष्टकर, दूसरे के घर में निवास और दूसरे का अन्न है (परावलंबन या परवशता 'सबसे बड़ा कष्ट है)। २२ चलेवित्त "जीवंति ॥ । अर्थ-धन चंचल (क्षण स्थायो) है, मन चंचल है, जीवन और यौवन (भी) चंचल हैं, (वस्तुतः) यह सब (वस्तुएं) चंचल हैं। 'जीता केवल वही है जिसका (संसार में) यश है। (यशस्वी जीवन ही वास्तविक जीवन है)। २३ संजातो 'वंशःसमुन्नतिम् ॥ अन्वय-येनजातेन वंशः समुन्नति याति, सजातः । परिवर्तिनि संसारे को न मृतः, कोवानजायते । अर्थ-जिसके उत्पन्न होने से वंश उन्नत्ति को प्राप्त होता है, वही (वस्तुतः) उत्पन्न हुया है (उसी का जन्म सफल है)। (नहीं तो) इस बदलने वाले संसार में, कौन मरा नहीं और कौन उत्पन्न नहीं होता हैं? २४ अरक्षित 'अन्वय-दैवरक्षित (वस्तु) अरक्षितं (अंपि) तिष्ठति, दैवहतं "सुरक्षित - . . "जीवति ।।

४२ वस्तु सुरक्षित को हुई भी (अपि) विनश्यति । अनाथः, अरक्षितः विपिनेऽपि जीवति, कृत-प्रयत्नः गृहे (अपि) न जीवति । अर्थ-देव (भाग्य) द्वारा रक्षित (वस्तु) अरक्षित भी ठहरी रहती है, और भाग्य हत (जिसे भाग्य ने मार दिया है) नष्ट हो जाती है । (कमी कभी) अनाथ, अरक्षित जीव जंगल में भी जीवित रहता है, और (कभी कभी) प्रयत्न करने पर घर में भी जीवित नहीं रहता। (भाग्य पाद में पूर्ण श्रास्था प्रकट की गई है। 'कलहेनच ॥ अर्थ-युद्धिमानों का समय काव्यशास्त्र के मनोविनोद से जाता है, किन्नु मूर्ग लोगों का, व्यसन (प्य) से, नींद से और झगड़े से (समय जाता - २५ काव्यशास्त्र . ... कार्यकर्ता ॥ २६ जीवन्तोऽपि नित्यसेवकः ॥ अर्थ-व्यास जी ने (इन) पांचों-दरिद, यीमार, मूर्म, विदेश में रहने पान और मदा के सेवाको जीवित रहते हुए भी मृतक कहा है। २७ नरपति अर्थ-हिमकारी गना (मो) गंमार में शत्रुता (प) को प्राप्त हो जाता और परोपकारी मनुष्य का राजा त्याग कर देता है । मो इस प्रकार राजा भोर येग में (जनता में) ममान गिव विद्यमान होने पर कार्य कतां पति पादुनं (कठिनता से मिन्नने यात्रा) (नहीं मिल सकना) । 1 । अनन्तभट्ट कथा सामान:- मानहानि । पात:- दूनी भाग किया घा। miratefanfri । मंगवायगरपद | जौनपुर जोन देशों माया । मागणी गार। बनायाaur:जपने पिता बामगारपिा हिमा:दोगान । मांदरममा प्रधान दिर नि । धामद । पुनमान और पुरुष 20 गीर्वाण भाषया - देववाणी (संस्कृत) द्वारा । व्यवहरतिस्म-व्यवहार करते थे । भुञानः= भोजन करना हुया । श्रानय-ला। पत्न्यः = पत्नियां । तेषां उनकी । जहसुः =हँस पड़े । साकृतः-मतलब भरा, व्यंग्य भरा। पन्याश्च =और पत्नी का । लज्जावहः-लजाजनक । धीमती-बुद्धिमती । पत्युः पति के । परि भवं = तिरस्कार को । असहमाना=न सहती हुई । प्राह बोली । तान् = इनको । विहस्यते =हंसा जारहा है। मद् भी- मेरे पति ने । पदच्छेद-पदों का अलग अलग करना। तक लस्सी, छाछ को । अभिधाय = कह कर । पर्यवेपयत् =परोसती थी। अच्युत्पन्न प्रशिक्षित । रवाज्ञान मूलं = अपना अज्ञान ही जिसका मूल (कारण) है। गर्हयन् = निन्दा करता हुा । अन्तर्लजितः= अन्दर मन में लजित हुश्रा । अभिवीक्षितुम् सामने देखने के लिए। अपारयन् =समर्थ न होता हुश्रा । साधु - अच्छा, ठोक । चेदम् - और यह । उच्यते = कहा जाता है । अभिरक्षतु-चारों ओर से रक्षा करे । श्राचन्द्रतारकम् = तारों और चान्द तक, अर्थात् जब तक चन्द्र और तारे हैं । कमपि- किसीको । उपास्य = उपासना करके, सेवा करके । तत्प्रत्सादेन = उसकी प्रसन्नता से । काव्य निर्माण धुरीणः- कविता करने में धुरंधर । अजायत =बनगया । विद्वप्रियस्य विद्वान् जिलको प्रिय हैं ऐसे के । मही पते: =राजा की । निरतिशयं = श्रति गम्भीर । परिज्ञाय जान कर । परं संतुप्य = अत्यन्त संतुष्ट होकर । बहुधा=बहुत प्रकार से । सम्मान्य = सम्मान करके । इत्थं - इस प्रकार । भूपालेन राजा द्वारा । अतिवाह्य = व्यतीत करके । वन्धु दर्शन लालसः- भाइयों को देखने की इच्छा वाला | जिगमिपा-जाने की इच्छा.को । न्यवेदयत् निवेदन किया । राज्ञ राजा के लिये। अधिरोप्य % चढ़ा कर । 'विद्वद विरुदैः- विद्वत्ता की उपाधियों से । से। प्रपयामास-भेजदेता था। तुन्दिल = तोंद वाला, फूला हुअा। प्रत्य= श्रीकर । बहुमतः = बहुत माना हुना । पन्या सह पत्नी के साथ । अवसत् = रहने लगा अर्थ-दूसरे के द्वारा किया हुअा अपमान स्वाभिमानियों के लिए मंगलप्रद (सिद्ध) होता है । अनन्तभट्ट मान भंग (अपमान) के कारण ही, परम पाण्डित्य को प्राप्त हुश्रा (परम पण्डित बन गया)। ' - ।

४४ बोल देश में अनन्त भट्ट नाम का कोई कवि था। वह बालकपन में विद्या का अच्छी तरह अभ्यास करने वाला नहीं था, अर्थात् उसने बानक- पन में विद्या का अभ्यास नहीं किया था, श्रतएव अशिक्षित था । उसके दो तीन शास्त्र पढ़े लिखे सगे भाई थे । उसके घर में स्त्रियां और पुरुप मदा गन्न मापा के द्वारा व्यवहार करने थे (घरकी भाषा संस्कृत थी)। किमी दिन, भाइयों के साथ (बैठ कर) भोजन करता हुश्रा अनन्त भष्ट (अपनी) पन्नी को बोला "दधिमानय" (दही ला दधि शब्द नपुंसक लिई प्रमाहितीया के यर्थ में उसका रूप "दधि" होना चाहिये "दधि" नहीं। इसलिए "दधिमानय" अशुद्ध बोला। उसे 'दधियानय' बोलना पाहिये था ) इम (शुद्ध) शब्द प्रयोग को सुनकर उसके भाई और उनकी पनियों मन्द मन्द हम परे । माभिप्राय (व्यंग्यपूर्ण) यह हास्य उसके और 'उपही पानी के लिए यन्न लजाकर ग्रा। किन्तु (अपने) पति के तिरस्कार यो म मामी दुई नुद्धिमली उम्मको पनी उन्हें गोली, "६ ! आप मांगों के नापों मामा मा ६ ? ( ऐसे क्यों हंसते हो?) मेरे पति ने "रिमामय" गा ! नहीं "दधि मा४ प्रागय" या शब्द भेद। पाधि दी की. मामा. प्रानयला. गेमा इंद करने पर प्रयोग गुद aai |र. पारना या अभिप्राया फर का उसने पारगमकी भी सपने मा. पारगम (1) नामा. मिशिगने पार की निन्दा करता हमा, per for Enा और उनके भाइयों सादिक) मुरकी पोर Tagामग के. अगमा ही, विदेश की ११ वारदा:- मी बाई माभिमानीमा कामी शाहिये। (airav और गाभिमाल नन्द नाग तक रहना n) का Ti irii freो गरि की पामना A) मा ममता में सात गारों का साना यना, भाजपा। पापा द्विानों को पार करने वाले किसी राजा की सभा में गया। और उस (राजा) ने, इसके अत्यन्त पाण्डित्य और कवित्व को जान कर, परम सन्तुष्ट होकर , अनेक प्रकार से -सम्मान करके, उसे (कविको) अपनी सभा का प्रधान पण्डित बना दिया । इस प्रकार, उस राजा के द्वारा सम्मानित हुया, वह कुछ काल विताकर, भाइयों को देखने की इच्छा वाला, अपनी स्वदेश गमन की इच्छा का राजा के पास निवेदन करता था (स्वदेश गमन को इच्छा प्रकट को)। राजाने भी, उसको हाथी पर चढ़ा कर, अनेक विद्वत्ता सूचक उपाधियों से अलंकृत करके, मातृभूमि को भेज दिया और वह (कवि) अत्यन्त श्रानन्द में फूला हुआ अपने घर पाकर यन्धुओं द्वारा सम्मानित हुया तथा पत्नी के साथ श्रानन्द से रहने लगा। पुत्रोपदेशः ( पुत्र को उपदेश ) शब्दार्थ-क्रोन क्रमणः । अधीताशेप विद्यम् = पढ़ली हैं सारी विद्याएं जिसने ऐसे को। अनुमोदितम् = अनुमोदन किये हुए को, समर्थन प्राप्त को। अनुगम्य = पीछे पाकर । पानेतु-लाने को। वलाधिकृतं:-सेनापति को। पाहूय-बुलाकर । अतिप्रशस्ते प्रशंनीय । श्रहनि = दिन में । प्राहिणोत्: भेजता था। द्वास्थैः = = द्वार पर स्थितों के द्वारा। समावेशितः = प्रवेशित । प्रविश्य - प्रविष्ट होकर । तितितलावलंम्बित चूड़ामणिना-पृथ्वी तक लटकती हुई चूड़ामणि वाले से । राजपुत्रानुमतः = राजपुत्र द्वारा अनुमति दिया हुआ। न्यपीदत्-बैठ गया। उपसृत्य = पास जाकर । अब्रवीत् = बोला । समाज्ञापयति = श्राज्ञा देता है। नः= हमारे । सकला-सारी। सर्वोस्वायुधविद्यासु =सबशस्त्र विद्याओं में । विनिर्गमाय = बाहर पाने के लिए। अनुमतः = अनुमोदित । , उपगृहीतशिक्षजिसने सव शिक्षा प्राप्त करली है। अवगत = ज्ञात । कलाप = समूह । पौर्णमासीय = पूर्णमासी का । उद्गतं CC उदितहुएफो । जनः = लोग । जन्तु जायें । संवत्सरःवर्ष। अधिवसतः- रहते हुए का। सम्पिण्डितेन जोड़े हुए से, द्वारा। प्रवर्घसे- बड रहे हो। प्रभृति = लेकर । निर्गत्य = निकल कर । मातृभ्यः माताओं के लिए। अभि- पाच अभिवादन करके। अपगतनियन्त्रणः=जिसके ऊपर से नियन्त्रण हट गया है। अनुभव =अनुभव में ला, श्रास्वाद ले। सम्मानयादर कर । राजलोक =राजा गण को। पूजय = पूजा कर । द्विजातीन् ब्राह्मणों को। प्रजा:=प्रजात्रों को। परिपालय पालन कर । अानन्दय = अानन्द दे। अर्थ -इस प्रकार, प्रमशः, सब विद्याओं को पढे हुए, यौवनाल्ड, श्राकर श्राचार्यों (गुरुत्रों) के द्वारा अनुमोदित (अर्यात् गुरुओं द्वारा स्वीकृति दिये जाने पर ) चन्द्रापीड को लाने के लिए, राजा तारापीड ने बलाहक नाम के सेनानायक को बुलाकर, बहुत घोडों और पैदलों के साथ (उसे) मंगलमय दिन में भेज दिया । वह विद्यागृह (शिक्षणालय) में पहुंचा हुआ द्वार पर खड़े द्वार- पालों द्वारा अन्दर प्रविष्ट कराया गया। प्रवेश करके, (पणाम में) भूमितक लटकती हुई चूड़ामणि ( शिरोमणि ) वाले मिर से नमत्कार करके, राजपुत्र (चन्द्रापीड) द्वारा अनुमति (स्वीकृति) दिया हुप्रा विनय पूर्वक श्रासन पर बैठ गया । मुहूर्त भर व्हर कर, विनय दिखाता हुअा, वलाहक चन्द्रापीड के पास सरक कर बोला. "कुमार ! महाराज श्राज्ञा देते (ता) हैं, "हमारे मनोरथपूर्ण हो गये हैं। शास्त्र (तुमने) पदलिये हैं। सारी कलाएं सीखली हैं। समस्त शस्त्र विद्याओं में भारी प्रतिष्ठा प्राप्त करली है। सब प्राचार्यों ने विद्यालय से निच्लने (बाहर पाने) के लिए अनुमति देती हैं। (अबं) शिक्षा पाये हुए, समस्त कला समूहों को प्राप्त किये हुए. तुम्हें (तुझे) पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान लोग देखें (पूर्णमासी के चन्द्र समस्त कलाएं होती हैं औरचन्द्रापीर ने भी सब कताएं प्राप्त की थीं) । चिरकाल से दर्शनों के लिए समुत्सुक लोगों के नेत्र सफलता को प्राप्त हों (सफल हों)। यहां विद्यालय में रहते हुए श्रापको यह दशवां वर्ष है । पष्टम अनुभूति वर्ष में प्रविष्ट हुए हो। इस प्रकार जोड़ देने पर आप इस ६६वें वर्ष में वर्द्धमान हैं। सो, आज ले ( विद्यालय से ) निकल कर दर्शनों के लिए लालायित समस्त मातात्रों को दर्शन देकर, गुरुओं को नमस्कार करके, स्वप्न, यथेच्छ, राज्य के सुखों का अनुभव करो (कर) । ।

४७ राजागणों का सम्मान करो (कर), ब्राह्मणों की पूजा करो (कर), प्रजाओं का पालन करो (कर) और सम्बन्धियों को श्रानन्दित करो (कर)।-कादम्बरी से । वनवास-काल ( वनवास के समय-बान्मीकि रामायण से) है शब्दार्थ-सवालवृद्धाः यालकवृद्धों केसाथ । अभिदुद्राव = ओर दौड़ी। घर्तिः गर्मी से सताया,प्यासा। संयच्छ = रोकले,कसले । रश्मीन् = रातों को । याहि = चल । द्रघयाम = देखेंगे । दुर्दर्श = कठिनता से दिखाई देनेवाला।" नो-हमारा, (हमारे लिए)। वृतः = घिरा हुया, परिवारित । त्रुवन् = कहता हुआ । निर्जगाम= निकला । एकचित्तगतं == एक मन से ( रामदर्शन की इच्छा से ) गये हुए को। पुरम् = नगर को। निपपातैव-गिर पड़ा। कृत्तमूलः = जिसकी जड़ कटी हुई हो । श्रागारं प्रति -घर के प्रति । बद्धवत्सा- जिसका बच्छा बंधा हो । अभ्यधावत् = सामने होकर दौड़ी। तिष्ठ इति-ठहर यह । चक्रोश-चीखा। याहि = चल । राघवः-राम । सुमन्त्रस्यम्सुमन्त राम को रथ में बिठा कर छोढने गया था, उसके । अन्तरा-बीच में । पुनरायातं - वापिस श्राये को । नैनं = उसको नहीं, न एनं । दूर मनुव्रजेत् -दूर तक पीछे पोछे जाय । अमात्याः-मन्त्रीगण । ऊचुः- बोले। वचः-वचन । न्यवर्तत लौट गया । राज्ञः-राजा का । श्राशुवेगेन-शोन, गति वाले से । मानुषम् मनुष्यों का समूह । अर्थ-(राम को वन यात्रा के समय,नगर में और राजभवन में उपस्थित करुण दशा का वर्णन है। लोग राम के रथ को नहीं जाने देना चाहते, पीछे पीछे भागते हैं। इसके पश्चात् ( राम के रथ में बैठ कर चल देने पर ), बालक वृद्धों के साथ, परमदुःखित वह (अयोध्या ) नगरी राम की ओर ही भाग चली, जैसे गर्मी से सताया हुआ (प्यासा) पानी की ओर (भागता है)। - A C .

, ( लोगारथघाइफ को कहते हैं ) घोड़ों की रस्सियों को खींचले, प्राहिश्ता पाहिश्ता चल, (हम) राम का मुख देखेंगे, (क्यों कि यह अय) हमारे लिए दुर्लभ दर्शन वाला हो जायगा । फिर, राजा, दीन प्रात्मावाला, दीन (दुःखित ) स्त्रीजनों से परिचारित हुथा, "पुन को देखगा". ऐसा कहता हुआ घर से निकल पड़ा । किन्तु एफ मन से गये हुए नगर को देखकर श्रीमान् राजा दुःख के कारण फटे हुए ग्रल पाले (छिन्नमूल) वृक्ष के समान (भूमि पर) गिर पड़ा। राग गो माता (राम की पोर) ऐसे दौड़ी, जैसे अच्छे वाली और जिसका घामा (अमपुर पर में) बंधा है ऐसी गौ यच्छे के कारण (प्रेम) से घर के प्रति मांगती ती हुई) "ठहर," राजा चीखा, "चल चल,"यह राम बोले (ला) और इस प्रकार, सुमन्त की श्रात्मा दो 'चक्रों के बीच में फंस गई (दो विरोधी प्राज्ञाएं पाकर किंकर्तव्यविमूढ हो रहा । दो विरुद्ध गतियों वाले चक्रों के बीच में पड़ी चीज दण्ड श्रादि भी टूट जायगी किसी प्रोर नहीं घूमेगी)। "जिसे श्राप वापिस आया चाहते है, उसके पीछे दूर नक न चलिये, (दशरथ की इच्छा थी राम दसपांच दिन वन घूम कर चले श्रायें। अतः अधिक दूर जाना व्यर्थं था) इस प्रकार मन्त्रीगण महाराज दशरथ को " वचन बोले। राजा का श्रादमी (सुमन्त), राम की प्रदक्षिणा करके ( राम को पाने के लिए तैयार न पाकर ) लौट गया। किन्तु वह जन-समूह तीव्रगति वाले मन से भी नहीं लौटे ( उन्होंने मन से मी अयोध्या वापिस जाने की नहीं सोची भी और साथ लगे थे)। , . 'सोमदत्तोत्पत्ति कथा (सोम दत्त के जन्म की कहानी), शब्दार्थ-परस्मिन् -दूसरेमें । अन्ते वासो-शिष्य । देवकीर्ति = दिव्य योमा वाले को । निर्भसितमार मूर्ति काम मूर्ति को भी तिरस्कृत करने चाले को। श्रवगमय्य लाकर । श्रवादीत् =बोला । विलोलालक = चंचल वालों वाले को । निजोसंगतले - अपनी गोदी में । निधाय -रखकर । स्थविराम् = वृद्धा को । निरीक्ष्य देखकर । अवोचम् = मैं योला । उत्सृज्य - -दूर करके । अर्भकः =यालक । कान्तारं =वनको । शंकृपाटन क्षेमं = सूलको निकालने में समर्थ को। अवेचय - देखकर । अवोचत् बोली। कनीयान् - छोटा । श्रात्मजः = पुत्र । भूसुरस्य ब्राह्मण को । विवाह्य = विवाह करके । अनपत्यतया:सन्तान न होने के कारण । परिणीय विवाह कर । अल- • मत प्राप्त करता था, प्राप्त किया । सांसूर्यम् ईर्ष्या से । मिषेण बहाने से 1. श्रानीय =लाकर । तटिन्यां- नदी में । अक्षिपत् = फेंक दिया । "उद्धृत्य = ऊपर उठा कर । परेण =दूसरे से । अंम्भसिजल में - ! प्लव- माना-तैरती हुई। तरोः वृक्ष की । निधाय रखकर । उह्यमानाः यहाई हुई, उठाई हुई। कालभोगिना =काले सर्प ने । अदंशि = मैं काटली गई । मदवलम्बी भूतः - मेरा सहारा पना हुथा । भूरुहः = वृक्ष । अगमयत् = पहुँचा दिया, पहुंचा देता था '। गरलस्य = विपके । मयिमृतायां मेरे मर जाने पर शिरण्यः शरण देने वाला । शोच्यते-चिन्ता की जाती है। यंपत्तत् =गिर पड़ी । दयाविष्ट:-दया से व्याप्त । अपनेतु-दूर करने दिए। अक्षम: असमर्थ ।। अन्विप्य = ढूंढ कर । प्रत्यागच्छन् - लौटता ड्डया। उत्क्रान्तं जीविताम् =जिसका जीवन निकल गया है, मृत व्यलो- करत् = देखा, देखता था। तदनु= उसके बाद । पावक-अग्नि । विरच्य- . . । - रचकर । अगतिं = जिसकी कोई गति नहीं, उसको । वेलायां = समय में है। अश्रु ततया=न सुनने के कारण । अशक्यम् = असमर्थ, किया न जा सकने वाला। आलोच्य = विचार कर । अमात्यनन्दनस्य =मंत्री-पुत्र का है. अमि- रक्षिता संरक्षक । आनयामि= लाता हूँ। निशम्य =सुन कर । पुपोष पोषण करता था । अधिरूढानैकवाहनः = जो अनेक (घोड़े हाथी श्रादि) वाहनों पर चढ़ा है । संस्कार जात.संस्कार समूह को ।। कोविदत्वं पाण्डि- त्य को । नैपुण्यं = निपुणता को । निकर = समूह। पटल =समूह । दाच्यं चतुरता को । हारित्वं श्राकर्षण, मनोहरता को । प्रावीण्य =प्रवीणता : मातंग हाथी । पाटवं= पटुता, होशियारी । श्रायुध-शस्त्र । तत्तद् श्राचार्येभ्यः =उन उन के प्राचार्यो (विशेषज्ञों); से । लब्ध्वा =पा कर ! विलसन्त=विलास करते को। निरीच्य=देख कर ।।महीवल्लभः =राजा ।। अमन्दं =बहुत सारे को, जो कम न हो उसको । अविन्दत = भोगता था, पाता था। अर्थ-इसके पश्चात्, दूसरे दिन, उसके आश्रम में रहने वाला वामदेव का शिष्य , देवताओं की सी कीर्ति वाले, कामदेव की पूर्ति का भी निरादर करने वाले, फूल से कोमल, एक कुमार को लाकर राजा को बोला, “हे देव ! तीर्थ यात्रा की अभिलाषा से कावेरी नदी के तट पर पहुंचा मैं, चंचल वालों वाले (इस) यालक को अपनी गोदी में रख कर रोती हुई एक वृद्धा को देख कर बोला, “हे वृद्ध ! तू कौन है ? यह बालक किसके नेत्रों को आनन्द देने वाला (पुत्र) है ? वन में क्यों आई है ? शोक का कारण क्या है ?" वह (स्त्री) दोनों हाथों से अश्रु जल पोंछ कर, मुझे अपने (उसके). शोक-शूल को निकालने में समर्थ सा देख कर (जान कर) शोक के कारण को बताने लगी- "हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! राजहंस के मन्त्री सितवर्मा का छोटा भाई सत्यवर्मा, तीर्थ यात्रा के प्रसंग से इस प्रदेश में आया था । उसने किसी ग्राम में एक ब्राह्मण की काली नाम की पुत्री से विवाह करके और उसके निःसन्तान रहने से उसीकी बहिन काञ्चनकांति से परिणय करके, उससे एक पुत्र प्राप्त किया (वह पुत्र प्राप्त करता था)। एक बार (एक समय), काली ईर्षा से, मुझ धाय के साथ, इस बालक को एक यहाने सेलिाकर, इस नदी वृक्ष में लिपटे । में फेंक गई । मैं एक हाथ से बालक को (जल से) ऊपर उठा कर, दूसरे से तैरती हुई, नदी के वेग से आये हुए किसी वृक्ष को शाखा को पकड़ कर, वहाँ (उसपर) यच्चे को रख कर, नदी वेग पर चढ़ी हुई (वेग में यहती हुई) हुए किसी काल सर्प ने डसली । मेरा अवलम्ब बना हुया यह वृक्ष, इस देश में तट पर श्रा लगा (प्राया)। विष की उत्तेजना के कारण मेरे मर जाने पर, (इस) वन में कोई शरण देने वाला नहीं है, यह चिन्ता (शोक) कर रही हूँ (मेरे द्वारा की जा रही है)।" दया से व्याप्त हृदय वाले मैंने मन्त्र वल से विष दूर करने में असमर्थ होते हुए, समीप के कुञ्ज में श्रीपध विशेष को हूँढ़ कर लौटते हुए ने (उसको) मृतावस्था में देखा (मैं देखता था)। उसके पश्चात्, उसके अग्निसंस्कार को रच कर, शोक से व्याकुल हृदय वाला मैं, इस श्रनाथ बालक को लेकर, सत्यवर्मा का वृत्तान्त सुनते समय, उसके ग्राम प्रादि के नाम न सुन सकने के कारण (क्योंकि वह बिना बताये मर गई थी), उसका हूँढ़ना असम्भव सा है यह विचार कर, श्रापके मन्त्री पुत्र के श्राप अभिभावक हैं," इस विचार से श्राप के पास श्रारहा हूँ"। वह सुनकर सत्यवर्मा को परिस्थिति का अच्छी तरह निश्चय न होने से दुःखितमन राजा ने (अपने) सुमति नामक मन्त्री को सोमदत्त नाम का उसके भाई का (वह) लड़का अर्पित कर (दे) दिया (राजा पुत्र को अर्पित करता था)। वह भी. मानो उसका भाई श्रागया हो, ऐसा मानता हुश्रा, विशेष ध्यान से उसका पालन पोपण करने लगा। इस प्रकार मिले (घरके अन्य) बालक मण्डल के साथ, वालक्रीड़ा का अनुभव करता हुआ, अनेक वाहनों (सवारियों) पर चढ़ा हुआ, राजवाहन, क्रमशः मुण्डन-यज्ञोपवीत श्रादि संस्कार समूहों को प्राप्त करता था । तब सारी भाषा-लिपियों (लिखावटों) के ज्ञान को, समस्त देशों को भाषाओं के पाण्डित्य को, छः अंगों (व्याकरण, ज्योतिप, धादि) के साथ वेद समूह के ज्ञान को, काव्य नाटक उपन्यास कहानी इतिहास चित्र (आश्चर्य कर) कथा श्रादि में कुशलता को, धर्म ज्योतिष तर्क मीमांसा श्रादि समस्त शास्त्रों की चतुरता को, कौटिल्य (चाणक्य), कामन्द कीय श्रादि नीति शास्त्रों में कुशलता को, वीणा श्रादि समस्त वाद्य साधनों की दक्षता को, संगीत साहित्य .

की मनोहरता को, मणिमन्त्र घोषधि प्रादि माया प्रपञ्च (विस्तार जाल) की निपुणता को, हाथी घोड़ा श्रादि सवारियों पर चढने में पटुता को, विविध- शस्त्र प्रयोग की कुशलता को, उन उन के प्राचार्यों ( विशेपज्ञों) से प्राप्त करके, (अव) यौवन से चमकते हुए ( किन्तु ) अपने कर्तव्यों में आलस्य रहित, उस बालक-मण्डल को देखकर, राजा, “मैं अब शत्रों के लिर दुर्लभ्य हूं ( वे मेरे पास नहीं फटक सकते )" इस विचार से परम आनन्द को प्राप्त करता था। । अशरणा ब्राह्मणी (अनाथ ब्राह्मणी) शब्दार्थ-ग्रन्येद्य : दूसरे दिन । राजस्थान वर्तिनः =राजसभा में वर्तमान का । उपेत्य = पास जाकर । विज्ञापयामास—सूचित करता था । का. क्षिणी = चाहने वाली । दुर्गना = दुर्गति को प्राप्त । शिशुकद्वय संयुक्ता=दो छोटे बालकों से युक्त । द्वारि = द्वार पर । महोभृता = राजा के द्वारा । अनुज्ञाते = याज्ञा दिये जाने पर । कृशपाण्डु धूसरा = कमजोर और धूल से सनी या पाण्ड जैसी पीली । विशीर्णेन = फटे चिटे । वाससा = वस्त्र से। विधुरी कृता = व्याकुल की हुई । निनौ =सदृश । विभ्रती = उठाये हुए। प्रविवेश = प्रविष्ट हुई। लप्रश्रयं = दीनता पूर्वक । कुलजा = कुलीन । देवाद् युगपत् = =भाग्य से, एक साथ । शरणागत वसलम् = शरण में आये हुए जिसे प्यारे हैं, ऐसे को । अधुना=अव । प्रमाणम् =स्वतत्र हैं, मालिक हैं। सदयः दया से युक्त । इयं = यह स्त्री। आदिशत् = यह स्त्री। आदिशत् = श्राज्ञा दी। नीत्वा=ले जाकर । राज्ञा = राजा के द्वारा । विसृष्टां = भेजी हुई। विसर्जित । उपागतां पाल भाई को । अदधते तरां=अत्यत्य श्रद्धा करती है। युग्मागत्यां = जुड़वां सन वाली को। पश्यंती=देखती हुई। वामैकवृत्तित्व = लगातार उल्टा ही होते जाना । प्रजापतेः ब्रह्माजी का । स्नान कारिणोः स्नान कराने । . वालियों को । वेटिका: सेविकाओं को, परिचारिकाओं को । स्नपनाय - स्नाना कराने के लिये । ताभिः = उन्होंने । नापिता स्नान कराई हुई। समापित-' स्नानां जिसने स्नान समाप्त कर लिया है, ऐसी को ।। गृहीताहारं =जिसने. भोजन ग्रहण कर लिया है. उसको। महिपी == भैस और रानी । प्राह - बोली। प्रतिवक्तु = " उत्तर देने के लिये । प्रचक्रमे = उपक्रम करने लगी, चेष्टा करने लगी। निलय = घरे । स्वानुरूपौ - अपने जैसे। यज्ञार्थ भृत सम्पदः . जिस ने यज्ञ के लिए ही सम्पत्ति का संग्रह किया है, ऐसे का । तनयां पुत्री को। परिणीतवान् -विवाइ लेता था । भार्ययानुगतः=भार्या के साथ । लोकान्तरं दूसरे लोक को। धृतगर्भा =गर्भवती को। विमुच्य : छोड़ कर । जहौ छोड़ दिया। मयि श्राद शोकायां मेरे नये शोक से द्रवित होने पर दस्युभिः = चोरों ने । एव्य = पाकर ।, विलुण्ठितः लूट लिया । तिसृभिः = तीन के साथ । साध=साथ शोल • भ्रंशभयात्-स्त्रीत्वमंग के भय से । पलायिता=दौड़ ली । विदूर = बहुत दूर । तदन्विताउस (गर्भ) से युक्त । कृच्छू को पजीविनी मेहनत से गुजर करने वाली। लोकात् लोगों से।। शोलेकपाथेया केवल शील :( लजा) का पाथेय (मार्ग में खाने का भोजन ) वाली, सम्बल वाली। इह = यहां : उभौ-दोनों को प्रसूतास्मि जन्म दिया हैं । वेधसा= ब्रह्माने । अपावृतम् = खोल दिया । आपदाम् = विपत्तियों का । गति = सामर्थ्य । योपिद् भूषण स्त्रियों का अलं कार रूप । अपहाय छोड़ कर । सदसि सभा में । याचितः = माँगा । चरणान्तिकम् -चरणों का' सामीप्य: । प्रति हताः = ताड़ित, प्रहारित । विदेशगः = विदेश गया हुया । वुध्यते = जाना जाता है.. अवधार्य जानकर, निश्चय करके । प्रीता-प्रसन्न । वितळ =अनुमान करके, तर्कना करके । झटिति जल्दी से । यानाय्य - मंगवा कर । अन्वयं = कुल को । अंपृच्छत् । पूछती थी । भ्रातृ जाया- भाभी। संजातायाँ परिक्षप्त परिचय होने पर । ज्ञात-बन्धुक्षयः - जिसने भाई की मृत्यु को जान लिया है। निन्ये, ले गया। अनुशोच्य शोक करके | वालकद्वितयान्वितां-दो बालकों से युक्त को । अाश्वासयामास - आश्वासन (धैर्य) दिया । मुदन्धिता - हर्प से' युक्त नाम्नी = दो नाम | तांभ्याम् - उनके लिए । अनल्प दविण - बहुत -4 ५४ । धन को। वितीर्य =देकर । चिर सुख भाग=देर तक सुख भोगने वाला । अर्थ-दूसरे दिन, राजसभा में वर्तमान वत्सराज के पास जाकर पहरेदार ने सूचना दी, 'हे महाराज ! द्वार पर दुर्दशाग्रस्त, दो छोटे बच्चों को लिये हुए, कोई ब्राह्मणी श्रापके दर्शनों को चाहती हुई खड़ी है" । वह सुन कर, राजा के द्वारा उसके प्रवेश की स्वीकृति मिल जाने पर, वह कमजोर और पाण्डु के समान (पोले से ) वर्ण की, फटेचिटे वस्त्र से और भी न्याकुल यनी ( फटे वस्त्र में से अंग दर्शन से, संकोच के कारण) दुःख और दैन्य जैसे ( मानो दुःख और दीनता ही शरीर धारण किये हों) दोनों पालकों को उठाये हुए (राज सभा में) प्रविष्ट हुई । और उचित प्रणाम आदि जिसने कर लिए हैं ऐसी, (प्रणाम अादि करके ) वह राजा को सविनय और करुणा पूर्वक वोलो "हे देव ! मैं कुलीन ब्राह्मणी हूं । भाग्य वश इस दुर्गति को प्राप्त हुई हूं। भाग्य से मेरे ये दोनों बालक एक साथ ( जुड़वाँ) · उत्पन्न हुए । अव मैं दीन हूं । इस कारण, यहां शरण में आये हुओं को प्यार करने वाले श्रापकी शरण में पहुंची हूं । अव, श्रापको अधिकार है (श्राप चाहे जैसा करें)।" वह सुन कर दया पूर्वक राजा ने "इसको ले जाकर देवी वासवदत्ता के अर्पण करो,” प्रति हारी को ऐसी प्राज्ञा दी। इसके पश्चात् वह उसके (प्रति हारी के ) द्वारा देवी के समीप पहुंचाई गई और उन्हें पौंप दी गई। राजा के द्वारा भेजी हुई, पहरेदार के द्वारा लाई, उस ब्राह्मणी के प्रति रानी ने बहुत श्रद्धा प्रकट की। जुड़वाँ सन्तान वाली उस दीन ब्राह्मणी को देखती हुई (रानो) सोचने लगी, 'अहो, भाग्य की यह कैसो निरन्तर विपरीतता है।" फिर, स्नान कराने वाली सेविकाओं को उस ब्राह्मणी को स्नान कराने के लिए श्राज्ञा देती थी। उन्होंने ब्राह्मणी को स्नान कराया. वस्त्र दिये और सुन्दर स्वादु भोजन कराया । तब स्वस्थ मन वानी, स्नान समाप्त किये हुए तथा भोजन किये हुए उस ब्राह्मणी को रानी बोली, "किस की तू पत्नी है अथवा, तेरा वृत्तान्त क्या है ?" तब ब्राह्मणी उत्तर देने का प्रयत्न करने लगी, 'देवि ! मालव देश में कोई अग्नि दत्त नाम का ब्राह्मण था । वह लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का घर (पात्र ) था । उसके. शंकरदत्त और शान्तिकर नाम के अपने जैसे ही दो पुत्र हुए। उनमें शान्तिकर विद्यार्थी अकस्मात् अपने १५ पिता के घर से निकल कर कहीं चला गया। उसके बड़े भाई शंकरदत्त ने यज्ञ के लिये ही सम्पत्तियों का धारण करने वाले (एक) यज्ञ दत्त की कन्या से परिणय कर लिया । काल क्रम से, मेरे पति का वृद्ध पिता अग्निदत्त पत्नी के साथ परलोक को चल दिया (दोनों सासससुर मर गये) मेरा पति पितृ- -शोक से अन्धा बना तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से मुझ गर्भवती को छोड़ कर सरस्वती नदी के प्रवाह में इस (लौकिक ) शरीर को छोड़ गया (इयकर मर गया ), यह समाचार जानकर मैं असह्य- शोक के वश में (शोक विव्हला) हो गई। फिर मेरे शोक विव्हल होने की दशा में (जब कि शोक अभी गीला हरा ही था ) ही, अचानक चोरों ने श्राकर हमारा सारा घर लूट लिया। तत् काल ही, तीन (अन्य ) ब्राह्मणियों के साथ, लज्जा भंग के भय से, थोड़े से कपड़े लिये हुए भाग ली। और बहुत दूर देश को जाकर, उनके (बाणियों के ) साथ एक मास तक. मेहनत मजदूरी से निर्वाह करती हुई ठहरीन फिर लोगों से अनाथों की शरणवत्सराज के विषय में सुन कर दुःखित केवल शील ( लज्जाशीलता) का सम्वल (मार्ग का भोजन) लिए मैं यहां श्रा गई। श्राकर ही एक साथ ( इन ) दोनों पुत्रों को जन्म दिया है। शोक, विदेश और उस पर यह दुगना ( कष्ट कर ) दरिद्रता में प्रसव जन्म देना)। श्रहो! ब्रह्मा ने श्रापत्तियों का द्वार खोल दिया ( एक के बाद 'एक आने लगी)। इन बालकों को यड़ा करने ( पालने ) के लिए मेरी गनि (सामर्थ्य) नहीं है. यह विचार कर, स्त्रियों के भूपण लज्जा को छोड़ कर, मैंने, प्रवेश करके, सभा में वासेश्वर से याचना को । उनकी आज्ञा से मैंने श्राप चरणों का सामीप्य प्राप्त किया ( आपके चरणों में स्थान मिला) और (यहाँ पहुँचते ही) मेरी सारी विपत्तियाँ लौट गई, मानो द्वार पर से मार कर भगा दी गई हों। यही मेरा वृत्तान्त है । नाम से मैं पिंगलिका हूँ। हे देवि ! वह शान्तिकर (नामका) मेरा देवर विदेश को गया हुआ किस देश में रहता है, यह भी जाना नहीं जाता (ज्ञात नहीं है)।" जिसने अपना वृत्तान्त कह दिया है, 'ऐसी ( उस) को कुलीन निश्चय करके ( समझ कर ), प्रसन्न हुई रानी तर्कना करके ( कुछ सोच कर) यों योली “यहाँ शांतिकर नाम का हमारा पुरोहित है। वह विदेशी है । वह तेरा देवर ही होगा।" ऐसा कह कर, . रानी जल्दी से शान्ति कर को बुला कर उससे उसका कुल-पूछती थी ( उसने उसका वंश पूछा)। जिसको निश्चय हो गया है, ऐसी रानी ने, अपना · वंश पश्चिय दे, चुके हुए उसकोर. ( शान्तिकरको ), "यह , तुम्हारे भाई की पत्नी है," यह कर वह ब्राह्मणी , दिखाई । परिचय हो जाने पर, वन्धु की मृत्यु से. अवगत हुआ शान्तिकर . उस पुत्रवती को ले गया। वहां भाई और पिता का शोक करके दो बालकों से युक्त उसको यथायोग्य आश्वासन (-तसल्ली) दिया। प्रसन्न देवी वासव दत्ता ने भी उन बालकों के शान्ति सोम और वैश्वानस नाम. रख कर, ( तथा ) उनको बहुत,सा धन देकर, उस समस्त पुरोहितकुल को चिरकाल... के लिए सुखी कर दिया। . । T - - यमराज. सुभद्रां प्रति .( सुभद्रा के प्रति ) शब्दार्थ- सुदुर्मना=दुःखितमन वाला । अाश्वासयत् = धैर्य देता मा मत । वार्णेयि-वृष्णि ( यदु ) वंश की पुत्री। सस्नुषा = पुत्र- के साथ । निष्ठेपा=यही स्थिति, दशा । कालनिर्मिता वनाई । माशुचः =मत शोक कर । दिष्ट्या सौभाग्य से। पितुः= के। क्षात्रेण =क्षत्रियों के से । जित्वा-जीत कर। सुबहुशः = बहुत से । प्रेपयित्वा = भेज कर । पुण्यकृतां=पुण्य-वानों के। सर्व काम- = सव इच्छाओं को पूरा करने वालों को । अक्षयान् = नित्य, स्थायी । r=वेद श्रवण से। प्रजया बुद्धि से । वीरसूःवीर को जन्म देनी । वीरजा वीर से उत्पन्न, वोर पुत्री । वीरवान्धवा=वीर भाइयों वाली। पते पायेगा । सैन्धवः = सिन्धुदेश का राजा जयद्रथ । अवलेप्रस्य = । श्वः कल को। श्रोग्यसे =सुनेगी । हृतम् = हरे हुए, काटे समन्तपञ्चकाद = कुरुक्षेत्र के एक प्रदेश से। वाह्यम् = उठाया जाने लायक, । । का - - . बाहर । भव = हो जा। मा रुदः =मत रो। विशोका = शोकरहित । पुरस्कृत्य 3 सम्मान करके । प्रापयामेह =प्रात करते हैं, यहां। व्यूढोरस्कः दृढ छाती वाला । अनिवर्ती न लौटने वाला । रथप्रणुत् रथ को श्रागे हांकने वाला। वरारोहे-सुन्दरी । ज्वर=सन्ताप । 'जहि = छोड़ दे। अनुयात-पीछे पीछे चलो । हत्वा-मार कर । महारथः-जायकेला हजारों से लड़ता है। श्राश्वासय= श्राश्वासन दे । स्नुपां-पुत्र-वधू को । राज्ञि! -हे रानी। भृशम् -यहुननन्दिनि=हे श्रानन्द देने वाली ! पान अर्जुन ने । प्रतिज्ञातं = प्रतिज्ञा की, है । चिकीर्पितम् = कार्य, जिसको कोई करना चाहता । जातु कभी भी। मृषा असत्य, अन्यथा । भतु:- पति का -1 1-.२-~-अथार्जुन गृहः :"::निर्मिता - अन्वयः-अथ सुदुर्मना वासुदेवः, अर्जुन गृहं गत्वा, पुत्र-शोकातो, दुःखिता भगिनीम् आश्वसयत् । हे वाष्णोयि ! सस्नुपा कुमारं प्रति मा शोकं कुरु । हे भीए ! काल- निर्मिता सर्वेषां प्राणिनाम् एपा (एव) निष्ठा । अर्थ -फिर, दुखितमन वाला वासुदेव, अर्जुन के घर जा कर, पुत्र- शोक में व्याकुल, दुःखित बहिन को आश्वासन देने लना । हे यदुवंशिनी ! पुत्र धधू के साथ (तू) कुमार के प्रति (विषय में) शोक नहीं कर हे भयशीले ! काल के द्वारा बनाई हुई (निश्वित की हुई) सब प्राणियों को यही गति ( दशा) होती है। ३-४. कुले जातस्य' अर्थ-वीर, विशेषतः संत्रियकुल में उत्पन्न हुए तेरे पुत्र का यह सरना (उसके ) अनुरूप ( उपयुक्त ) ही है, (इस लिए ) शोक मत कर । सौभाग्य से, (अपने ) पिता के जैसे पराक्रम वाला, महारथी,. ( वह ) वीर क्षत्रिय की रीति से वीरों की अभिलपित दशा (गेति) को. प्राप्त हुआ है। ५. ६. ७.-जित्वा सुबहुशः 'तवपुत्रको ।। अर्थ-बहुत प्रकार से शत्रुओं को जीत कर और (उन्हें) मृत्यु के पास - १ ....... गतिम् ॥ , .. भेज कर (वह) समस्त कामनाओं को देने वाले पुण्यवानों के अधिनश्वर (नित्य ) लोकों को चला गया । तपस्या से, ब्रह्मचर्य से, सुने हुए ज्ञान से (या वेद से ) और बुद्धि से, सन्त लोग जिस गति ( दशा) को चाहते हैं, तुम्हारा पुत्र उसी गति को प्राप्त हुआ है (मुक्त हो गया है )। तू वीर प्रसविनी है, वीर की पत्नी है, वीर की पुत्री और वीरों यहिन है, ( इसलिए) हे शोभने ! शोक मत कर । वह( अभिमन्यु ) 4 गति को प्राप्त हुश्रा है। ८.६.१०.-प्राप्स्यते 'शस्त्रजीविनः ।। अन्वयः-असौ याल धातकः, चुद्रः, सैन्धवः, ससुहृद्गण वान् 'श्रस्यावलेपस्य फलं प्राप्स्यते । अर्थ-वह बालक का घात करने वाला, नीच, सिन्धु देश का (जयद्रथ ) भी मित्र यन्धुनों के साथ, इस अभिमान का बदला पायेगा । अन्वय--श्वः ( त्वं ) सैन्धवस्य समन्त पञ्चकाद् याह्य, हृतं शिरः श्रोप्यसे । ( अतः) विशोका भव, मारुदः । अर्थ-(वह) शूरवीर, क्षत्रिय के धर्म का सम्मान करके (' रख कर ) उस परम गति को प्राप्त हुश्रा है. जिसे यहाँ हम या अन्य : से (युन्ड, कौशल ) से जीने वाले लोग प्राप्त करते हैं। १६.-१२-व्यूढोरस्को "महारथः॥ पर्थ-दृढ़ छातीवाला, महायाहुओं वाला, (रण मे ) न लौटने वाला •(विमुख न होने वाला), श्रागे रथ हाँकने वाला, तुम्हारा पुत्र स्वर्ग को गया । { इसलिए ) हे शोभने ! सन्ताप को छोड़ दे। ( उस ) वलवान् ने अपने पिता और मातृ पक्ष (मामा श्रादि) का अनुकरण किया (जैसे वीर वे है. वैसा ही उसने याचरण किया, अपने पिता और माता के वंशों के अनुरूप)। वह महारथी शूर हजारों शत्रुओं को मारकर (स्वयं ) मारा गया ।

१३-२४-श्राश्वासय' 'तन्मृषा ॥ अर्थ-हे रानी ! पुत्र वधू को आश्वासन दे, हे क्षत्राणि ! मत बहुत शोक कर । कल अपनी अत्यन्त प्रिय यात. (जयद्रथ का शिरश्छेदन ) सुन 'कर हे श्रानन्द देने वाली ! शोक रहित हो जाना। अर्जुन ने जो प्रतिज्ञा की है, वह वैसी ही होगी, अन्यथा (अपूर्ण) नहीं होगी । जो तुम्हारा पति करना चाहता है, वह कभी भी अन्यथा • ( झूठ) नहीं होगा ( अवश्य वैसा ही होगा)। . ." गुरु-भक्ति 4 . - -पुरा=पहिले । पाञ्चाल्यं पंजाबी को। प्ररयामास= 'ग्रेरित करता था, श्राज्ञा दी। केदारखण्ड-जलस्रोत का नाम । बधान = वांध दे । सन्दिष्ट:=प्राज्ञा दिया हुआ । यध्नातुवांधने के लिए । नाशकत= समर्थ नहीं हुआ । क्लिश्यमानः क्लेशपाता हुश्रा । संविवेश प्रविष्टहो गया। -शयाने-लेटजाने पर । उदकं = जल । तस्थौ = ठहरगया, रुक गया। प्रोपितः भेजाहै । उक्तः-कहाहुश्रा । ऊचुः = योले । तान् = उनको । श्राव्हयनाय = बुलाने के लिए। चकार = करताथा । एहि श्राजा। उपतस्थे उपस्थितहुअा। प्रोवाच = बोला । संरोढुं = रोकने के लिए। अवारणीयं = अनिवार्य । निःसरद् =निकलते हुए को। संविष्टः-घुसगया। विदार्य=फाडकर । अभिवादये = नमस्कार करता हूँ। करवाणि = करू । कमर्थ = किस अर्थ (प्रयोजन) को। श्राज्ञापयतु ' = आज्ञा दो । उस्थितः =उठा है। नाम्नः = नाम से । अनुष्ठितम् = किया। शेयः कल्याण को। अवाप्स्यसि प्राप्त करेगा। प्रतिभास्यन्ति = प्रकाश • करेंगे। अनुगृहीतः = उपकृत । यथेष्ट =मन चाहे को। अपर:- -दूसरा । गाःगउओं को। अरक्षत् = रक्षा करता था। अहनि = दिन में । रक्षित्वा = • रखवाली करके । अग्रतः =आगे । नमश्चक्र - नमस्कार करता था। स्थूल- शरीरम् = मोटे शरीरवाले को। केन=किस वस्तु से । वृत्ति = पेटभरना, भोजन व्यापार । कल्पयसि रचता है. बनाता है। भैक्ष्येण-भिक्षा से । .

%3- मह्यम् = मेरेलिए । अनिवेद्य =अर्पित न करके या न बताकर । उपयोक्त- व्यम् = उपयोग करना चाहिये । चरित्वा = मांग कर । न्यवेदयत् = निवेदन करता था। अगृहात् = ले लेता था। निशामुखे' सायंकाल को । ' अशेषतः पूर्णतया, सारी। गृण्हामिले लेता हूँ। इदानीं अब । चरामि== करता हूं । न्याय्यम् = न्यायपूर्ण । यतः क्यों कि । अन्येषां दूसरों के । भैयोपजीविनां भिक्षा से जीने वालों के । वृत्तिनिरोध - उपजीविका में रुकावट को । लुब्धोसि = लोभी है । एतासां गवां-इन गउओं का । पयसा= दूध से । पयः = दूध । उपयोक्त उपयोग में लाने के लिए । श्रभ्यनुज्ञातम् श्राज्ञा दी । प्रतिज्ञाय =प्रतिज्ञा करके । न अश्नासि= नहीं खाता है। पिवलि -पीता है । फेनं = माग को। इमे =ये । उगिरन्ति = उगलते हैं, गिरा- देते हैं । त्वदनुकम्पया = तेरे ऊपर दया के कारण । पातु = पीने के लिए। श्रर्हसि = योग्य है । प्रतिश्रुत्य = प्रतिज्ञा करके । प्रतिषिदः=मना किया हुआ उपयुक्त = उपयोग करता है। अंर्कपत्राणि = आक के पत्तों को। क्षारतिक्त- कटुभिः खारे, तीखे और कडुवोंसे । वक्षुसि = आँख में । उपहतः मारा हुआ। इतस्ततः इधर उधर । भ्रमन् = घूमता हुा । नागच्छति = नहीं आने पर। अस्ताचलावलम्बिनि-अस्ताचल का अवलंबन कर लेने पर, 'सायंकाल हो श्राने पर । नायाति = नहीं पाता है। नियतं निश्चय से । अन्वेष्टव्यः = इंटना चाहिये | अश्विनी कुमारी देवताओं के दिव्य वैद्यों का नाम । स्तुहि स्तुति कर । देवभिपनी = दिव्य वैद्य | चनुमन्तं = यांखों वाला । स्तोतुं रस्तुति कने को ।। श्राजग्मतुः = श्राये । श्राहतुः=दो वोले । आवाम् = हम दोनों । अंपूपः = पूढा । अश्नुहि खाले । उत्सहे - उत्साह करता हूँ, साहस करता हूं । ऊचतुः-दो बोले । श्रावाभ्यां - हम दोनों ने । अभिष्टुताभ्याम् = स्तुति किये हुयों ने । उपभुक्तः = खालिया । गुरवे = गुरु के लिए । कुरुष्व = कर । लब्धचक्षुः = जिसको आँखें मिल गई है। सकाशं = पास | अभ्यवादयत् = वन्दना करता था । पाचचक्षे = कहता था । समादिदेशाज्ञा देता था। श्रास्यता = बैठ जायो । मुश्र पुणा = सुनने की इच्छा वाले ने, सेवा की इन्दा से । भवितव्यम् - होना चाहिये । शुभ्र पणपरः = उपदेश सुनने की' इच्दा में रत | नियोज्यमानः लगाया जाता हुया | चुत् = भूख । दुःग्नसहः %D - D । -दुःख सहने वाला ! अप्रतिकूल =सीधा, इन्कार नहीं करने वाला । परितोई प्रमाता को । जगाम-प्राप्त हुआ। अवाप = पाता था। ( पहिले शिप्य की कहानी ) अर्थ----पहिले समय में कोई धौम्य नाम का पि था। उसके तीन शिष्य थे-प्रारणि, उपमन्यु और वेद । उसने एक पांचाल देश के निवासी थारुणि को श्राज्ञा दी, "जा, बेटा ! केदारखण्ड (एक पानी का सोता) को बांध दे।" वह उपाध्याय द्वारा श्राज्ञत (श्राज्ञा दिया हुआ) पांचाल निवासी श्रारुणि, वहां जाकर, केदार खण्ड को यांधने के लिए समर्थ नहीं हुआ। यह क्लेश पाता हुश्रा उपाय सोचने लगा । "प्रस्तु, ऐसा करूंगा," यह सोच कर वह केदार खण्ड के अन्दरं प्रविष्ट होगया और उसके वहां (सोते में ) लेट जाने पर पानी रुक गया ( स्रोत के मुहाने में घुस कर लेट गया, पानी रुक गया)। तब, कमी उपाध्याय ने शिष्यों को पूछा, "पांचालीय पारुणि कहां गया ?" वे (शिष्य) उसके ( उपाध्याय के ).प्रति बोले, "भगवन् ! तुमने ही भेजा है, "जा केदारखण्ड को बोध दे,” ऐसा कहकर ।" वह ( उपाध्याय) इस प्रकार कहाँ हुश्रा उनको बोला, "इसलिए, वहां हम सब चलें, जहां वह गया है। वह ( उपाध्याय ) वहां जाकर, उसको बुलाने के लिए, शब्द करने लगा (ग्रावान देने लगा), "हे पारुणि ! पाञ्चालीय ! तू कहां है ? अा जा ।" वह प्रारणि गुरु के उस वाक्य को सुनकर, अकस्मात् उस देदारखण्ड से ऊपर उठकर, उस उपाध्याय के पास उपस्थित हुया और उसको बोला, "मैं यहां केदारखण्ड में, न रुकने लायक निकालते हुए जल को रोकने के लिए घुस गया हूं। भगवान् (आप) के शब्द को सुनकर, सहसा, केदारखण्ड को फाड़कर, आपके पास उपस्थित हुया हूँ। सो आपको अभिवादन (नमस्कार) करता हूं। आप श्राज्ञा द, क्या काम करूं।" उसके द्वारा इस प्रकार कहा हुग्रा उपाध्याय उत्तर में बोला, "क्योंकि तू केदारसएंड को फाड़कर ऊपर निकला है, इसलिए तू उदोलक (ऊपर को - उखाड़ने वाला) नाम से होगा। और क्यों कि तूने मेरे वचन को पूर्ण किया है ( पाला है), इसलिए कल्याण प्राप्त करेगा। (तुम में ) सब वेद प्रकाश करेंगे और सब धर्म शास्त्र भी।" इस प्रकार उपाध्याय से अनुग्रह और इस प्रकार कहा हुआ वह श्रारुणि मनचाहे देश या नगर को चला गया। किया हुआ ( दूसरे शिष्य की कहानी) फिर, उसी धौम्य का उपमन्यु नाम का दूसरा शिष्य था । उसको उपाध्याय ने भेजा, “वेटा! उपमन्यु ! गउओं की रखवाली कर ।" वह उपाध्याय की श्राज्ञा से गउओं की रक्षा करने लगा। और, वह दिन में गउओं की रखवाली करके शाम को गुरु के घर को श्राकर, उपाध्याय के धागे खड़ा हो कर नमस्कार करता था। उसको उपाध्याय ने स्थूल (मोटे) शरीर वाला देखा और उसे कहा, "बेटा! उपमन्यु ! किस वस्तु से भोजन व्यापार करता है (क्या खाता है)? बहुत मोटा है।" उसने उपाध्याय को उत्तर दिया , "श्रीमान् ! भिक्षा से भोजन व्यापार करता हूँ।" उपाध्याय उसको बोला, "मुझे बिना अर्पण किये भिक्षा का उपयोग नहीं करना चाहिये ।" उसने "श्रच्छा" कह कर भिक्षा करके (मांग कर) उपाध्याय के अर्पण करदी और (तव) उस उपाध्याय ने उससे सारी भिक्षा लेली। वह फिर गउयों की रखवाली करने लगा । दिन में रखवाली कर के,. गुरुकुल में श्राकर, गुरु के सामने खड़ा होकर नमस्कार करता था। उसको उपाध्याय तोभी मोटा देखकर योला, "बेटा ! उपमन्यु ! मैं पूर्णतया तेरी सारी भिक्षा लेलेता हूँ। अय किस वस्तु से भोजन व्यापार करता ? इस प्रकार कहा हुश्रा वह उपाध्याय के प्रति योला, "आपके अर्पण करके, दूसरी भिक्षा करता हूँ । उसोसे उदर पूर्ति करता हूँ।" उसके प्रति उपाध्याय योला, "यह न्यायोचित कार्य नहीं है। क्योंकि इस प्रकार तो तू अन्य भी भिक्षावृत्ति से जीने वालों की वृत्ति (उप- जीविका) में रुकावट डालता है, ऐसे वर्तमान (करता हुश्रा) तू लोभी हों। गया ।" वह "ऐसा ही सही" कह कर गउओं की रखवाली करने लगा। और रखवाली करके, फिर, उपाध्याय के घर श्राकर, उपाध्याय के सामने खड़ा हो कर प्रणाम करता था। उसको फिरभी स्थूल ही देख कर वह फिर बोला, "पुत्र ! उपमन्यु ! मैं तेरी सारी भिक्षा ग्रहण करलेता हूँ, और भी (भिक्षा) नहीं करता है। बहुत मोटा है, किस वस्तु से भोजन व्यापार करता है ? " वह उस प्रकार कहा हुश्रा उपाध्याय को बोला, "श्रीमान् ! मैं इन गउओं के दूध से वृत्ति करता हूँ (दूध पीता हूँ)" उसको उपाध्याय बोला, "दूध का उपयोग करने के लिए मैंने तुम्हें अाज्ञा नहीं दी।" वह "ऐसा ही" कह कर, प्रतिज्ञा करके, गायों की रखवाली करके, फिर उपाध्याय के घर जाकर गुरु के सामने स्थित हो नमस्कार करता था। उसको उपाध्याय स्थूल ही देख कर योला, "पुत्र उपमन्यु ! भिक्षा नहीं खाता है । न औरही (भिक्षा) करता है, दूध नहीं पीता, बहुत मोटा है। किस चीज से जीवन निर्वाह करता है ?" वह इस प्रकार कहा हुआ उपाध्याय को बोला, "भगवन् ! फेन (भाग) पीता हूँ जो ये (बच्छे) माता के थनों का हुए गिरा देते हैं।" उसको उपाध्याय ने कहा "ये गुणवान् बच्छे, तेरे ऊपर दया के कारणा बहुत माग बाहर गिरा देते हैं । सो इन बच्छों की भी जीविका में तू न्यवधान डालता है। ऐसी स्थिति में तू माग के पीने के भी योग्य नहीं है।" वह, “अच्छा" यह प्रतिज्ञा करके फिर गायों की रखवाली करने लगा इस प्रकार हटाया हुश्रा वह (अथ) भिक्षा नहीं खाता, न और (भिक्षा) करता है। दूध नहीं पीता और न माग का ही उपयोग करता है। इसके अनन्तर कभी, वन में, भूख से पीड़ित हुना वह पाक के पत्तों, को खा लेता था (उसने पत्ते खालिये)। वह उन खाये हुए, खारे तीखे कडवे श्राफ के पत्तों से आँखों में पीड़ित हुश्रा अन्धा हो गया। फिर वह अन्धा भी इधर उधर घूमता हुश्रा कुए में गिर पड़ा । फिर, उसके न माने पर, । पान करते ६४ और सूर्य के अस्ताचल पर पहुंच जाने पर, उपाध्याय शिष्यों को दोला, “उपमन्यु क्यों नहीं आता ?' उन्होने कहा, "गायों की रक्षा के लिए वनको गया है।" उपाध्याय (फिर) योला, 'उपमन्यु को मैने मना कर दिया था, वह अवस्य क्रोधित हो गया है क्योंकि इतनी देर होने पर भी नहीं पाता है। इसलिए हूंढना चाहिये। ऐसा कह कर, शिष्यों के साथ उपाध्याय वनमें जाकर उसके बुलाने के लिए अावाज देने लगा, 'हे उपमन्यु ! पुत्र ! तू कहाँ है ?" उसने उपाध्याय के वचन को सुन कर ऊँचे जोरसे उत्तर दिया, 'मैं इस कुए में गिरपड़ा हूँ।' उसको उपाध्याय ने उत्तर दिया, 'कैसे इस कूप में गिरपड़ा?' वह उपाध्याय को बोला 'याक के पत्तों को खा कर अन्धा हो गया हूँ। अतः कप में गिरपड़ा ।' उसको उपाध्याय बोला, 'अश्विनी-कुंमारों की स्तुति कर, वे दिव्य वैद्य तुझे घाँखों वाला बना देंगे।' वह उपमन्यु उपाध्याय के द्वारा ऐसे कहा हुआ अश्विनी कुमार देवताओं की स्तुति करने लगा। उसके द्वारा स्तुति किये हुए देवताओं के वैद्य (दोनों) श्रागये और उसको बोले, 'हम (दोनों) प्रसन्न हैं, यह तेरे लिए अपूप (पृट्टा चीला) है, इसको साले ।' ऐसे कहे हुए ने उसने उत्तर दिया, 'हे देवतायो ! गुरु को अर्पण किये थिना, मैं इस पूड़े का उपयोग करने का उत्साह नहीं करता (नहीं खाता)। तब उसको अश्विनी कुमार योले, 'तेरे उपाध्याय के द्वारा स्तुति किये हुए हम (दोनों) ने पहिले समय में, (तरे उपाध्याय को भी) पूड़ा दिया था। उन्नने (गुरु ने) उसे (अपने) गुरु के अर्पण किये बिना ही खालिया था, तू भी सादी कर, जैसा कि उपाध्याय ने किया था। वह इस प्रकार कहा हुग्रा, अश्विनी-कुमारों की कृपा से शाखों को प्राप्त जिसे उपाध्याय के पास श्राकर उसको नमस्कार करता था और सारा नान्त मुनाना था । वर (उपाध्याय ) इस पर प्रसन्न हो गया और बोला, जैसा कि देवताओं के वयों ने कहा था, बैडी तूं कल्याण प्राप्त करेगा। सस्न वेद और समस्त शाल वेरे लिए) प्रकाश करेंगे (तुझे उनके अर्थों का ज्ञान हो जागगा)।' उस उपमन्यु को यह परीक्षा थी।

- - फिर, उसी धौम्य का वेद नाम का अन्य शिष्य था। उसको उपा- याय ने आज्ञा दी, "पुत्र वेद ! कुछ काल यहाँ मेरे घर में ठहरो,सेवा भाव की इच्छा से रहना और मेरी सेवा करना, तेरा कल्याण हो जायगा।" वह "अच्छा" ऐसा कहकर, गुरु सेवा करने की इच्छा वाला लम्बे समय तक गुरुकुल में रहा। गुरु के द्वारा नित्य ही कार्यों में लगाया जाता हुआ, शीत, उपण . भूख और प्यास को सहने वाला, सभी जगह सप्रतिकूल (ना न करने वाला, तत्पर) था (किसी काम से विमुख नहीं होता था)। देर के बाद उस पर गुरु प्रसन्न हुश्रा। और उसकी प्रसन्नता से वह (वेद) कल्याण और समस्त ज्ञान को प्राप्त कर लेता था। चेद की यह परीक्षा थी। शुकस्य मनोदशा (तोते के मन की दशा) शब्दार्थ-अतिकष्टासु अत्यन्त कष्ट पूर्णाओं में । जीवितनिरपेक्षाः जीवन की उपेक्षा करने वाले, जीवन की अपेक्षा (यावश्यकता) न रखने वाले । मततरं-प्रियतर । जन्तूना-प्राणियों का । उपरते । उपरते-मरने पर । अविकलेन्द्रियः पूरी इन्द्रियों (शरीर) से युक्त । प्राणिमि = सांस लेता हूँ। अम्बा-माता । नियम्य =रोक कर । अाप्रसवदिवसाद् =जन्म के दिन से ले कर । परिणत वयसा-परिपकव आयु. से । सता होते हुए ने । महान्त- मपि = बड़े भारी को भी । तातेन=पिता ने । एकपदे-एकदम । श्रमी ये । अनुगच्छति =पीछे चलता है। कांचित् = किसी एक को । खली करोति = खल (दुष्ट) बना देती है। ईदृग- ऐसा । श्रायासयति कष्ट दे रही है। रवानुकारि=शब्द का अनुकरण करने वाला। कलहंसविरुतम् = राजहंस का शब्द । सारसरसितानि-सारस के कल गान, ध्वनियां। विप्रकर्षात -दूर कष्टाकट दायिनी । अनवरत = निरन्तर । करैः-किरणों से । विकिरति = बिखेरता है। वर्तते = वर्तमान है । उपनजपति उत्पन्न करना है। पांसु- से।

धूलि । भूः=भूमि । अवसन्नानि =व्याकुल । अल्यमपि थोड़े को भी। प्रलं समर्थ । श्रप्रभुः= श्रस्वामी, अनधिकारी । सीदति दुःखित होता है। उपपादयेत् करदे, बना दे। अर्थ संसार में, निश्चय से (खलु) प्राणियों की इच्छाएं अतिकष्टकर दशाओं में भी जीवन की घोर निरपेक्ष नहीं होती (मनुष्य मरना कभी नहीं चाहता)। समस्तप्राणियों की जीवन से बढ़कर अन्य कोई भी वस्तु अधिक प्रिय नहीं होती संसार में, जो कि मैं पिता के मर जाने पर भी, काम करती हुई (समर्थ) इन्द्रियों से युक्त फिर भी प्राण धारण कर रहा हूँ। मुम निर्दय और कृतघ्न को विकार है । यहो ! निश्चय से मेरा हृदय बड़ा दुष्ट है। माता के परलोक को चले जाने पर (अपने) शोक के वेग को रोक कर, (मेरे) जन्म से, परिपक (वृन्द) अवस्था में वर्तमान होते हुए ने भी पालनकरने के बड़े भारीक्लेश को भी, स्नेहवश, न गिनते हुए ने, पिता ने उन उन उपायों से जो मैं पाला, टस सबको मैने एक पद में (क्षण भर में) ही भुला दिया। ये प्राण बढ़े कंजूस हैं, जो कहीं जाते हुए उपकारी पिता के पीछे प्राज भी (अभी भी) नहीं जाते (निकल जाते) । जीयम को लालसा किसको सर्वया दुष्ट नहीं बना देती (जीवन के मोह में सभी दुष्ट हो जाते है), जो इस दशा में भी प्यास -नल की तृपा सता रही है ? अभी भी सरोवर का तट दूर ही है। जैसे कि, जल देवता के नूपुरों के शब्द जैसा राजहंसों का यह शब्द अभी भी 6 दर है; सारसों का कलरव साफ नहीं सुनाई पड़ता, कमल पुष्प की परिमल (मुगन्धि) दूर से पा रही है। दिन की यह कष्टदायिनी दशा है। जैसेकि, श्राकार के मध्य में पर्नमान सूर्य, निरन्तर अपनी किरणों (हाथों) से चमकती दुई धप को यिन्वर रहा है,वह (सूर्य) और भी अधिक प्यास उत्पन्न करता है, मृमि मन्नत (गर्म) यान वानी है। भारी प्यास से व्याकुल मेरे अंग थोड़ा मामी चलने के लिए समय नहीं है। अपने श्रापका में स्वामी नहीं है(शरीर मेरे या में नहीं है)। मेरा हृदय दुःख पा रहा है। प्राग्य भी अंधेरै को प्राप्त हो रही है (अंधेरा छा रहा है प्रांतों में)। काश ! (अपिनाम) क र प्रमा नधारते की भी मेरी मायु कर दे? .

तपस्या-प्रभावः (तपस्या का प्रभाव) शब्दार्थ-ब्रह्मतेजोवलम् = ब्राह्मतेज का वल । क्लम् =वास्तविक वल लातणिक प्रयोग है)। तेजसा-तेजने । सपुत्रदार:-पुत्र और स्त्री के साथ । पर्यटनाय -घूमने के लिए। ससैन्यः = सेना के साथ । प्रतस्थे = चलपड़ा । ररिक्रम्य परिभ्रमण कर, परिक्रमा कर । क्षेत्राणि-प्रदेशों को । संसेव्य = सेवन करके, उनका श्रानन्द लेकर । अभ्याजगाम-शोर पागया । अनामयं = कल्याण, क्षेम, कुशल । पृष्ट्वा = पूछ कर | यथार्ह = यथोचित । उपचचार-उपचार किया, सेवा की । चिकीपुः = करने की इच्छा वाला। काम-दुघा-इष्टवस्तु देने वाली। शवला-चितकवरी, अनेक रंगों वाली को। आतिथ्य संभार भरणाय =अतिथि स्वागत के साधन जुटाने के लिए, भार उठाने के लिए। कामदोग्ध्री = कामनाओं को देने वाली। पड़सोपेतं रसों से युक्त को। वटक = मिठाई विशेष । पर्यटा = पपड़ी, मिठाई विशेष । अपूपः पूड़ा, चीला । अतिरस-भोजन द्रव्य विशेप । उपस्कारः = व्यंजनों से, पदार्थों से । जनयामास उत्पन्न करती थी । उपभुज्य=खा कर । काष्ठां-कोटिको । वनस्थः = वनवासी । फलाशनः-फल भोजी । जानपदानि -नगरों को । असार्वभौम सुलभं संसार मेंदुर्लभ को । नूनं निश्चय से। स्वर्धेनोः = दिव्यगायका । विलासितम् = विलास,शोभाको । विचिन्त्य = सोचकर । सुरभिंगाय को । स्वी चिकीपुः = अपनाने की (लेने की) इच्छा करता हुआ। श्लाध्यतमेन-प्रशंसनीयतम, अत्यन्त प्रशंसनीय से। रत्नहारी - रत्नों को हरने वाला। अग्नि-होत्रादि = हवन श्रादि । निखिल समस्त । निर्वर्तन = निभाना, पूर्ण करना। नानुसेने नहीं अनुमोदन .. (हो) करता था।

६८ । - % 3D - विनिमयेन = अदलायदला से | दातु =देनेकेलिए । निर्ववन्ध =बन्धन मेंलाया, विवश किया । उपागमत् =पास प्राया, सहमत हुा । तस्मै= उसके लिए। अवनिपालः =राजा। स्वनिर्देश = अपनी श्राज्ञा । प्राविशन् प्रवेश करता हुया | पाचकर्ष = खींचता था। प्राक्रोशन्ती क्रन्दन करती हुई को। प्रेरिता -श्राज्ञता । विवुध विस्मयावहं -देवताओं को विस्मित करने वाला । विभीपणं =बहुत भयंकर । प्रायत् भयंकर । प्रावर्तत् =प्रारम्भ हुश्रा । =प्रारम्भ हुश्रा । निःशेष = पूर्ण ] श्रायुधपाणयो = जिनकेहाथ मेंशस्त्र है । अभ्यधावन् = हल्लाझिया । हिप्ठेन ब्रह्मनिष्ठ ने । हतपुत्रः = जिसके पुत्र मार दिये हैं। प्रवरः =श्रेष्ठ । भग्नदंष्ट्रः = टूटी दाद वाला । सद्यः- तत्काल । निष्प्रभतां कांतिहीनता को, मलिनता को । हत शेष = मरनेवालों में से बचे हुए को । सं प्रप्य =भेजकर । निर्वेद वैराग्य को । श्रापन्न:=प्राप्त हुया । हिमवत्पार्श्व = हिमालय के पास के प्रदेश को । अभिकासन्थाकांक्षा रखता हुअा। चचार = करता था, श्राचण करता था | साझोपाग= पूर्ण । प्रददौ देता था । सः = अहंकारी । मन्यानःमानता हुश्रा । मुमोच = छोड़ता था । कालानलोपमैः =काल.ग्नि फे महशों से । फुरस्म = सारा । नादिग्म्यः = अनेक दिशायों के लिए (श्रोर।। पलायां घभूयुः=भाग गये । विधूममिव मानो विना धूर के। उद्यम्य == रटाकर । जग्रास = प्रसनिया , नष्ट करदिये । निःश्वसन् = लम्पी सांसे छोड़ता हुश्रा । निर्वीर्यः =निः सत्व, निज । प्रशंसन प्रशंसा करता हुया । सम्पादनाय =निर्माण करने को, उत्पन्न करने को । तप्तुं तप करने को । पयोचला गया। अर्थ-त्रिय का यल धिकरणीय वल है,प्रस नेज का चल ही वस्तुनः या है। पहिले समय में, ब्राह्मण के तेज ने इत्रिय के तेज को पराजित फर दिया था। पूर्वकाल में यदा भारी रात्रिय विश्वामित्र, कमी, पुत्र स्त्री के साथ और सेना से युफ पृथ्वी का भ्रमया करने के लिए चला । यहुत से देशों की परिमा करता हुया (घूमता हुआ) श्रीर यहुन से पवित्र स्थानों का भ्रमगा करता हुश्रा, प्रमशः बामपि वशिष्ट के पाश्रम की घोर श्रागया । उस अभ्या- गत (थतिथि) महागा की कुशल मंगल पर कर, पशिष्ठ ने, 'फन्न मूल यादि के उपहारों से उनकी सेवा (अभ्यर्थना) की। फिर परिवार के साथ उसके सत्कार करने की इच्छा करता हुआ वशिष्ठ, श्रातिथ्य का भार उठाने के लिए इष्टपदार्थ देने वाली, चितकबरी नन्दिनी (दिव्य गौ) को प्राज्ञा देता था। वह इष्ट वस्तु देने वाली भी, तत्काल, पढ्सयुक्त, मोदक, स्टक (बड़ी प्रादि) पपड़ी या पापड़, पूड़ा, अतिरस ( रसगुल्ला) श्रादि अनेक भोज्यों में युक्त आश्चर्यकर, मनुष्य के लिए दुर्लभ चार प्रकार के अन्न को उत्पन्न करती थी। सपरिवार उसको खाकर, राजा तृप्ति और आश्चर्यसीमा को पहुंचा, हुश्रा (घड़ा हुआ) सोचने लगा, “यह मुनि वनवासी है, केवल कन्द मूल फल भोजी है और नाहीं इसे नागरिक वस्तुएं ही सुलभ हैं। सो, कैसे, इसने हमारा संसार में दुर्लभ ऐसा अातिथ्य सत्कार किया ? निश्चय ही, यह सय, दिव्य गौ के प्रभाव का ही चमत्कार है।" इस प्रकार सोचकर, गाय को लेमे की इच्छा करता हुआ, महर्षि को वोला. "मह ! आपके इस अत्यन्त प्रशंसनीय श्रादर सत्कार से सपरिवार मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ( तृप्ति को प्राप्त हुआ हूं )। किन्तु, जो दिव्य गाय नन्दिनी है, यह गायों में रत्नभूत है । और राजा रत्नो को हरने (लेने) वाला होता है, यह सर्वविदित है, इसलिए तुम इस नन्दिनी को मुझे दे देने में योग्य हो (तुम्हारे लिए इसे मुझे दे देना उचित है)।" यह सुनहर मुनि (वशिष्ठ ) हयन श्रादि सय (धार्मिक) कार्यों को पूर्ण करने में साधनभूत, इष्ट पदार्थ को देने वाली उस (गाय) को, उसके लिए, देने को तैयार नहीं हुअा ( हां नहीं की)। फिर उस राजा ने अपनी गाय के बदले में उस नन्दिनी को देने के लिए मुनि को बहुत प्रकार से विवश किया (वाधित किया )। तो भी मुनि सहमत नहीं हुा । फिर यह अभि- मानी राजा, अपनी यात्रा के उल्लंघन को न सहता हुअा, क्रोधाविष्ट यना, जबर्दस्ती गौ को (अपनी श्रोर) खींचता था । और वह खिंची हुई, ऊँचे ऊंचे कन्दन करती (इकारती) हुई, मुनि द्वारा श्राज्ञा दी हुई, म्लेच्छ श्रादि की अनेक सेनाएं तत्काल ही उत्पन्न करती थी। फिर दोनों सेनाओं का, देवताओं को भी विस्मित करने वाला बड़ा भयंकर युद्ध प्रारंभ हुआ। तब. क्रमशः (एक एक करके ) राजा की सेना गौ की सेना द्वारा पूर्णतया नष्ट करदी गई। इसके पश्चात् , विश्वामित्र के मौ पुत्र अत्यन्त क्रोधित हुए, हाथ में शस्त्र लिये महामा की ओर भागे (इला बोला)। उस भगवान् वशिष्ठ ने उन सबको अपनी हुंकार से ही भस्म में मिला दिया (नष्ट कर दिया)। इस प्रकार वशिष्ट द्वारा जिसके पुत्र और सेना नष्ट कर दिये गये हैं ऐसा क्षत्रियों में श्रेष्ठ (विश्वामित्र) टूटी हुई दाढ़ वाले हाथी के समान तत्काल कांतिहीन (मलि- नाभ) होगया। फिर मृतकों में से यचेहुए एक पुत्र को, राज्य का पालनकरने लिए, नगरकी भोर भेजकर, अत्यन्त वैराग्य को प्राप्त हुआ, हिमालयके पार्श्वमें जाकर महादेव की प्रसन्नता प्राप्त करने की आकांक्षा करता हुआ घोर तप करने लगा । समय के जाते जाते, प्रसन्न हुए महादेव ने उसे रहस्य के सहित पूर्ण धनुर्वेद (शस्त्रविद्या-अथर्ववेद का एक भाग) और ब्रह्मास्त्र प्रादि समस्तशस्त्र प्रदान कर दिये । उनको पाकर भारी अहंकार से भरा हुआ महर्षि वशिष्ठ को वही (शत्रु) मानता हुया फिर उसके श्राश्रम में प्राकर, दिव्य अस्त्र (जो फेंक कर मारा जाता है ) छोड़ने लगा । काल अग्नि के समान उन (शस्त्रों ) के द्वारा सारा तपोवन पूर्णतया जल गया। तपोवन में निवास करने वाले मुनिगण, मृग, पशी ठरे हुए अनेक दिशाओं को भाग गये । फिर पाश्रम को मूना देखकर, अत्यन्त क्रोधित वशिष्ठ ने, यिना धूप वाली काल को ग्नि जैसे शोर यमराज के दण्ड के समान (भयंकर ) ब्रह्म दण्ड को उठाकर विश्वामित्र द्वारा प्रयोग में लाये हुए माहेश्वर (महादेव के ) बाह्य (माया के) मादि समस्त दिव्य अस्त्रों को ग्रस लिया ( तिरोहित कर दिया)। इस प्रकार ब्राह्मण के तेज द्वारा जिसके सब दिव्य अस्त्र ग्रस लिये गये हैं, ऐसा विश्वामित्र दृट्टी हुई दालयाले हाथी के समान, लम्पी सांसे छोदता हुश्रा, नियंज (मवहीन ) और चिन्ता से व्याकुल होकर, ग्रह सेज की प्रशंसा करता मा धीर ग्रिप के तेज की निन्दा करता हुमा, प्रसस्य मास (या उरपर) हरने की तपस्या करने के लिए रानी के साथ दक्षिण दिशा को चल दिया। .

- D सीमस्य दयालुता ( भीमसेन की दयालुता) शब्दार्थ-सुतत्रय = तीन पुत्र । कलत्र = रत्री। परिवृत:=परिवारित घिरा हुआ । घटोत्कचः भीमका हिडिम्या से उत्पन्न पुत्र । सन्तापयति--संताप देता है । न गन्तव्यम् -नहीं जाना चाहिये । मोक्ष- छुटकारा । समयतः- शर्त से...... | उपवासनिसर्गार्थ-व्रत खोलने के लिए । प्रतिगृह्य-पकड़ कर । पानेतव्यःले आना चाहिये । श्रासादितः= प्राप्त कर लिया। विसर्जयविदा करो। राक्षसापद-राक्षसाधम, अधमराक्षस । अथितः मांगा हुया | मुञ्चसि =छोड़ता है। उपयास्यसि प्राप्त होगा । परिणामेन वृद्धावस्था से, परिपक्वावस्थासे । सुतापेक्षी-पुत्रोंको अावश्यकतारखने वाला। होप्यामि = हवन कर दूंगा। विधिसंस्कृतं = विधि पूर्वक । गृहीतफलेन जिस का फल मिल चुका है, ऐसे से । अभिमतः स्वीकार किया हुश्रा अनुमत । अपसर-दूर हट । ब्रवीमियोलता हूँ। न हि = योल । मोक्तु =छोड़ने के लिए । अर्हति = योग्य होता है । गृवृत्ति=पिता के व्यवहार को । ब्राह्मवा- दिभिः= =ब्रह्म ज्ञानियों ने । यास्यामिजाऊँगा । अनुस्मरन् स्मरण करता हुा । अहः योग्य। आपद विपत्ति को । इष्टतमम् = प्रियतम । कनिष्ठ-छोटा । अनिष्टः न चाहा हुआ, अप्रिय । ब्राह्मणवटोः ब्राहाण यालक का । अवा- -प्राप्त कर । अम्ब-माता । परिस्वजस्व-आलिंगन कर। स्वस्ति:- कल्याण हो । प्रकल्पितपरलोकस्य = जिसके लिए परलोक जाना निश्चित है। पिपासा-प्यास । प्रतिकारं इलाज, उपाय को। दृढव्यवसायिन् हे दृढ़ उद्योग वाले । प्रतिकामति= निकल रहा है। परिमुषिता-लूट लिये गये।

% 3D % 3D । चिरायते देर लगा रहा है । पाहूयतां बुलाइये । अतिराक्षसं-राक्षस से भी बड़कर । मर्पयतु-क्षमा कर । श्रीतुम् =सुनने के लिए। आव्हयामि बुलाता हूँ | प्राहोऽस्मि = आगया हूं। मध्यमः=योच का, दो भाइयों के बीच में होने वाला । उपगम्य-पास श्राकर | भेतव्यम् = डरना चाहिये। दिशि दिशा में । मातुल:-मामा । उपनयनाथ-विवाह के लिए। प्रस्थि- तोऽस्मि -चला हूँ । अरिष्टः= मंगल । हन्तुकामः = मारने की इच्छा वाला। अभ्युपैति सामने आता है । निग्रहिप्यामि = पकहूँगा | अपराध्यसि = अप- राध करता है । मुच्यता-छोड़ दो । द्विजसत्तमः = ब्राह्मणों में उत्तम । मुच्यते = छोड़ा जाता है। चित्रब्धं चुपचाप, शान्ति से । गुरुसुञ पुः = गुरुजनों की मेवा का इच्छुक । किल = वस्तुतः । देवतम् -देवता । गृह्यतां लेलो । प्रागेव पहिले ही। अपेक्षया-अावश्यकता से। विनिमातु-बदला करने लिए, विनिमय करने के लिए । वारितः हटाया है । परिक्रामतः = घूमते हैं पलते हैं। श्रम्बार्य माता के लिए। बाड़म् = बहुत अच्छा । उपसृत्य % पास सरक कर, जाकर । भवत्या=बापने । जात=पुत्र | जीव-जीवित रह । उन्सत्तक-पागल | प्रत्ययः पता, निश्चय । आर्यपुत्र-प्राचीन भारतीय नारियां पति को इसी नाम ले पुकारती थीं । विलोक्य = देखकर । अभिवाद- यस्व वन्दना कर । भव-हो। भवन्तं = श्रीमान् को । वृकोदर-भीम का नाम । अदृरतः-पास में ही । वित्रम्य = विश्राम करके। संभावयिप्यानः- पहुंचाने हैं, पातिव्य करते हैं। प्राश्रमपदद्वारमात्रम् = आश्रम के बाहर के द्वार तक। अर्थ-(तय तीन पुत्रों और पत्नी के साथ ब्राह्मण प्रवेश करता है भौर पीठ पीद घटोत्कच प्रविष्ट होता है।) ब्राह्मण: -अरे! यह कौन है? ब्राम्हणी-आर्य ! यह कौन हमें कट दे रहा है ? घटोत्कच-अरे बाह्मण ! ठहर, ठहर, जाना नहीं, जाना नहीं । ब्राह्मण-अरे ! मनुष्य ! क्या हमारा छुटकारा भी है ? घटोत्कच-छुटकारा है, एक शन से ! ब्राह्मण-क्या समय (क्मा शर्त)? !

मैं घटोत्कच-मेरी श्रादरणीय (तत्र भवती) माता है। उसने मुझे आज्ञा दी है, “बेटा ! मेरे उपवास खोलने के लिए, इस वन से किसी मनुष्य को पकड़ कर लाना।" इसके पश्चात् मैंने श्रापको पो लिया । एक पुत्र को विदा कर (मेरे साथ)। ब्राह्मण-दुष्ट अधम राक्षस | क्या ब्राह्मण नहीं हूँ? घटोत्कच- हे ब्राह्मणोत्तम ! यदि तू मांगा हुआ एक पुत्र नहीं देता है (छोड़ता है) तो सपरिवार क्षणभर में नष्ट हो जायगा . ( नाश को प्राप्त करेगा)। ब्राह्मण-यही मेरा निश्चय है। मैं, परिणति ( वृद्धावस्था ) से जर्जर बने हुए, कृत-कृत्य (जिसने सब कृत्य निवटा लिये हैं) और विधिपूर्वक संस्कारों से युक्त (अपने इस ) शरीर को राक्षस की अग्नि (क्रोध या भुख की) में होम कर दूंगा (जला दूंगा)। ब्राह्मणी-आर्य ! ना, ना, ऐसा मत कहो। केवल पति ही जिसका धर्म है, ऐसी का नाम पतिव्रता है । जिसका फल मिल चुका है, ऐसे इस (अपने शरीर से ) में प्रार्य की और कुल की रक्षा करना चाहती हूँ। घटो०- श्रीमती ! श्रद्धेय माता को स्त्री अभीष्ट नहीं है (स्त्री के लिए नहीं कहा)। ब्राह्मण-मैं श्रापके पीछे ( साथ ) चलता हूं। राक्षस-अरे, तू तो वृद्ध है, दूर हट । पहिला पुत्र- पिता जी ! मैं कुछ कहता हूँ। ब्राह्मण-बोल शीघ्र बोल । पहिला पुन-अपने प्राणों से मैं गुरुजनों के प्राणों की रक्षा करना चाहता हूँ । (अतः) इस कुल की रक्षा के लिए आपके लिए मुझे त्याग देना उचित है। दूसरा पुत्र-सबसे बड़ा पुत्र संसार में कुल में श्रेष्ठ होता है और पितृ- जनों का अत्यन्त प्रिय भी होता है । इसलिए, गुरुजनों के व्यवहार का स्मरण करता हुआ मैं ही जाऊँगा। तृतीय पुत्र-हे पार्यों ! ऐसा मत, ऐसा मत कहो :- ।

भीम-अनुग्रह है। श्रार्य को किससे भय ?
ब्राह्मण-सुनिये ! मैं केशवदास नाम का ब्राह्मण हूँ। उत्तर देश में
मेरा यज्ञ वन्धु नाम का मामा है। उसके पुत्र के विवाह के लिए मैं सस्त्रीक
(स्त्री के साथ ) चला
भीम-मार्ग निर्विघ्न हो। फिर बाद में ?
ब्राह्मण-तब यह राक्षस पुत्र परिजन के साथ मुझे मारने की इच्छा
वाला मेरे सामने आता है (आया)।
भीम- इस प्रकार, इसने ब्राह्मण जन के मार्ग का विघ्न कर दिया ?
अस्तु ! मैं इसको पकड़ता हूँ । ओ पुरुष ! ठहर, ठहर ।
घटो०--यह ठहरा हूं (ठहर गया हूं)।
भीम--किसलिए ब्राह्मण जन का अपराध कर रहा है ? ( इस्र) ब्राह्मणों
में उत्तम को छोड़ दो।
घटो०--नहीं छोड़ता (छोड़ा जाता)--यदि मेरा पिता भी कहे ( कहता
है) कि इसे चुपचाप (बिना लड़े-शान्ति से ) छोड़ दूं, तो भी यह
नहीं छोड़ा जा सकता (क्योंकि यह माता को आज्ञा से पकड़ा गया है।)
भीम-(स्वगत) क्या माता की आज्ञा ? पो हो, निश्चय से यह तपस्वी
गुरु-संवक है। ठीक कहा है । माता मनुष्यों की ( और ) देवताओं की भी
देवता है । (प्रकट) अरे पुरुष ! कुछ पूछना है ।
घटो-बोल, जल्दी बोल ।
भोम-किस नाम की हैं, तुम्हारी माता ?
घटो०-सुनिये, हिडिम्बा नाम की राक्षसी है ।
भीम-(स्वगत) अच्छा, हिडिम्घा का पुत्र है यह ! ऐ पुरुष ! छोड़ ।
घटो-नहीं छोड़ा जाता।
भीम-हे ब्राह्मण, ग्रहण करो अपने पुत्र का । हम इसके पीछे जायेंगे ।
द्वितीय-मत, श्राप, ऐसे-
गुरुजनों के प्राणों की रक्षा के लिए मेरे तो प्राण पहिले ही चले गये हैं,
( मैं तो मृतकशय हो चुका हूँ )। रूप और गुण से युक्त और युवा श्राप
संसार में रहें।

म भीम-श्रार्य ! मत, ऐसे मत ( कहो)। मैं क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हूं। ब्राह्मण निश्चय से पूज्यतम हैं। इसलिए (इस अपने ) शरीर से बालण- शरीर का विनिमय करना चाहता हूँ ( इसके बदले में मैं उसे वापिस लेना चाहता )। घटो०-इसे किसने हटा दिया ? भीम-मैंने। घटो -क्या तूने ? भीम-और क्या ? घटो०-तो फिर श्राप ही मेरे पीछे पायो । (दोनों घूमते हैं) यहीं ठहर ! तेरे.याने का माता के पास निवेदन कर (सूचित कर दूं)। भीम, अच्छा, जा। घटो०-(पास जाकर) माता ! यह (मैं) नमस्कार करता हूँ। श्रापका देर से अभिलपित (चाहा हुया) मनुष्य भोजन लिए ले श्राया हूं। (प्रविष्ट होकर) हिडिम्बा-पुत्र ! चिरंजीव हो । कैसा मनुष्य लाया है ? देखें तो इसको । क्या, यह मनुष्य लाना है ? घटोo-मां! कौन है यह ? हिडिम्बा-पागल, हमारा देवता है। घटो- '-क्या विश्वास? हिडिम्बा-यह विश्वास है ! श्रार्यपुत्र की जय हो ! भीम-(देखकर) यह फिर कौन है ? अरे ! देवी हिडिम्या !! हिडिम्वा-पागल ! नमस्कार कर पिता को। घटो०--पिता ! यह मैं नमस्कार करता हूँ। भीम-पुत्र ! वहुत वल और पराक्रम वाला हो। घटोल-श्रनुगृहीत हूँ। ब्राह्मण-ऐसे ! यह भीमसेन का पुत्र घटोत्कच है !! भीम-पुत्र ! श्रीमान् केशवदास को नमस्कार कर । घटो-श्रीमान को नमस्कार करता हूँ। - - । सो ब्राह्मण-पिता के समान गुणों और कीर्ति वाला वन । घटो०-दया है (आभारी हूँ)। ब्राह्मए--हे भीम ! (तुमने ) हमारे कुल की रक्षा कर दी जाते हैं। भीस-पास ही हमारा प्राश्रम है। वहीं विश्राम करके जाइये। ब्राह्मण-इस जीवनदान से (आपने हमारा) आतिथ्य कर दिया है। इसलिए अब जाते हैं। भीम-फिर दुबारा दर्शन देने के लिए, आप सपरिवार पधारिये । ब्राह्मण-बहुत अच्छा । प्रथम संकल्प होगा, (दुबारा दर्शनों के लिए)। भीम--हिटिम्बे ! इधर से । पुत्र घटोत्कच ! इधर से । पूज्य केशवदास जी का प्राश्रम के द्वार तक अातिथ्य सम्मान करेंगे(उन्हें बाहर तक पहुँचायेंगे)। वेषस्य पूजा (वेष की पूजा) शब्दार्थ-पुमान् = पुरुष। वस्त्रधरः= वस्त्र वस्त्र धारण करने वाला। अभ्यपूज्यत= पूजा किया गया । वाचाऽपि-वाणी से भी। नोपाचरत् सेवा नहीं करता था। मन्यमानः = मानता हुश्रा । परिधाय पहिन कर । प्रत्युत्थाय =स्वागत में उठकर । पाद्यमाचमनीयं = स्वागत की वस्तुएं, पान फूल चरणादोक और पाचमन । भोजनादौ-भोजन के प्रारम्भ में। स्वोत्तरीये =अपनी चादर में । महानसम् = रसोई घर को । समुपानयत् =ले श्राता था। द्विवान् -दो तीनों को । न्यतिपत् = फेंकदेता था । क्रियते= किया जाता पूर्वेद्य :=पहिले दिन । वाससः- वस्त्र के । भोजयामि भोजन कराता हूँ। भोये -खाऊँगा । वपुपा=शरीर से । अर्थ-वस्त्र (वेप भूपादि) से ही पुरुप संसार में पूजनीय (थादरणीय) बनता है। (यथा) महीन वस्त्र धारण किए हुए विद्वान, धनी के द्वारा । हैं पूजा गया।

- कोई दरिद्र विद्वान्, किसी धनिक के घर भोजन के लिए श्राया। पुराने फटे वस्त्र देखकर धनी ने वाणी मात्र से भी उसका सत्कार नहीं किया। फिर, यह विद्वान् उसमें अपने वस्त्र को ही कारण मानता हुश्रा, दूसरे दिन, महीन और स्वच्छ वस्त्र को पहिनकर उसी के घर गया। धनिक ने उसका अभ्युत्थान करके (उसके सत्कार में खड़े होकर), हाथ से हाथ को पकड़कर (हाथ मि- लाकर) धन्यवाद (कि अापने यह घर पवित्र किया श्रादि) पूर्वक उसका श्रादर किया। पांच धोने को और आचमन के लिए जल देकर, भोजन के लिए रसोई घर में (धनिक) ले आया । विद्वान ने भोजन के प्रारम्भ में, अपनी चादर को भूमि पर फैला कर, उस पर अन्न के दो तीन ग्रास फेंक दिये । वह देख कर, धनिक "ऐसा क्यों किया जा रहा है ?" यह पण्डित को पूछता था (उसने पूछा)। और वह पण्डित कहता था, "हे बुद्विमान सेठ ! पहिले दिन मैं पुराने और मैले वस्त्र धारण किये पाया था | तय वचन मात्र से भी आपने सत्कार नही किया। श्राज तो इस वस्त्र के प्रभाव से मैं आपके बहुत से सत्कारों का पात्र बना । इसलिए कृतज्ञ यना पहिले इसे खिला रहा हूं। पीछे मे मैं खाऊंगा।" वह सुनकर सेठ कुछ लज्जित हुआ। और,यह ठीक भी कहा जाता है- वस्त्र से, वपु (शरीर) से, विद्या से, वाणी और विनय से, इन पांच चकारों (वकारादि शब्दों) से रहित मनुष्य गौरव या महत्व नहीं प्राप्त करता।

महादेव-यशस्विसिंह-संवादः ( महादेव और यशवन्तसिंह का संवाद ) शब्दार्थ-यशस्विसिंह =जैसलमेर के राजा महाराज य (ज) शवन्तसिंह जी । पुण्य नगर =पूना नगर । पटभवनेषु वस्त्र गृह, खेमा तम्बू आदि । अन्यतमस्मिन् = एक में। सम्पुटीकृत्य =जोड़कर । प्रावोचत् = बोला | शिव वीर = शिवाजी महाराज | दिहत्तते देखने की इच्छा करता है। अत्र- भवतः =श्रीमान् के । उसीकृस्य स्वीकार करके | ओं = अच्छा । प्रवेशय = दाखल कर । उक्तवति=कहने पर । दक्ष = दायां । निर्दिष्टवान् = निर्दिष्ट करता था, हाथ से संकेत करता था बैठने को। बालापः= बातचीत । महादेव शिवा जी का दृत जो वस्तुतः उस रूप में स्वयं शिवाजी ही थे । प्रस्तोतव्यम् प्रस्ताव करना है। निरूप्यतां-वर्णन करिये । प्रस्तोतु प्रस्ताव करने के लिए । चिक्कणदुर्ग=चाकण दुर्ग, शिवा जी के एक किले का नाम । खिद्यते = खेद किया जाता है। उपतिष्ठतेइति = उपस्थित है इसलिए । नाभ्यस्तः = नहीं अभ्यास किया । धूर्धरः नेता जूले को धारण करने वाला बैल । राजन्वती- राजाओं वाली । अस्मादृशानां = हमारे जैसों का । स्फुटमेव = स्पष्ट रूप में हो । ग्लानः-मनमें ग्लानि लिए । वशवर्तिताकार्य वश में धर्तमान रहने का कार्य । सतां सज्जनों का । तिरस्करणीयं-तिरस्कार के योग्य | पोतकर्णधारस्य जहाज के नेता, पतवार पकड़ने वाले का । दिनेशस्य सूर्य का। प्रसृतं उत्पन्न । पाङ्ग = श्रागिनी। सिंहसंहननै शेर की सो गठन (तैयारी) पाले | पर शत-सौ से ऊपर, हजारों । त्रियमाणं =रक्षमाण, स्तुति किए जा रहे | मरुदेश =मारवाड़, मरुस्थल । पदा-पांव से । समाक्रम्य= आक्रमण करके,प्राधीन करके । श्रवरंगजीवः-खरे रंग से जीनेवाला, औरंगजेय ।

.. अनिमेषः निर्निभेष, बिनापलक झपके । विभेति = डरता है। विस्मृतात्मदेहः अपने आप को सुध बुध खोए। समपेक्षते= अपेक्षा करता है, चाहता है। विश्वस्मिन्नपि सारे में भी । क्षेमाय = कुशल के लिए । वृद्ध्यै = वृद्धि के लिए। उन्नमय्य = ऊपर उठाकर । सनान लकीर्तन = नामोच्चारण पूर्वक । धाशो- राशीन् = अशीर्वादों की झाड़ियां । शिरांमि= सिरों को। उच्छेनु = काटने के लिये । क्षुब्धम् = क्षुभित (अशान्त) हो गया। तिर्यग्वदनं टेढ़े मुख नाले को । विमनायमान = उद्विग्न को । अाल पनीयम् =यात करनी चाहिए । परिपार्टी =शैली को। क्षन्तव्यन् = क्षमा कर देना चाहिए । निरीचनमान् = देखिये । भल्लाः=भाले । भासन्ते चमकते हैं । अाझमितु =आक्रमण करने को । सादिनः=अश्वारोही लोग | समाकर्णनेन=सुनने से । मोदन्ते =प्रसन्न होते हैं । सेदिनी= पृथ्वी को । क्षालयितु =धोने के लिए। कुलावतंसं - कुलभूषण को। लुण्ठन्ति = लूटते हैं। विलोपन व्रतिनः = लुप्त करने का व्रत लिए हुए। वैरिहतकान् = दुष्ट शत्रुओं को। वर्धयितु = बढ़ाने के लिए । श्रीमति =श्रीमान् के विषय में । निरथ = व्यर्थ में । समपर्यते =समर्पि- त की जाती है। शोभते = शोभा देता है। विवेच्यः= विवेचन करने योग्य है। कण्डूयनैः खजाने के द्वारा। यापयित्वा व्यतीत करके । हीणोऽपि लज्जित भी। संवृण्वन् = छुपाता हुया । मरुराजा=मरदेश का राजा । वार सहस्र = हजार वार । आसिन्धुकूलं = सिन्धु-नदी के तट तक। विद्वा- विताः = भगादिये । जानीमहे =जानते . हैं । ईहितं = इष्ट, इच्छित । आत्मोच्छेदायैव = अपने विनाश के लिए ही । क्रियेत = किया जाय । कदर्याणां कायरों के । ऐक्यम् = एकता । निर्वहामः = कार्य · चलाते हैं, निर्वाह करते हैं । मास्मभूद् =मत न हो, चाहे न हो। यौमाकीनं = श्राप लोगों का । संवृत्तः = हुया । भावत्कं =आपका । बहकर सम्पुटः हाथ जोड़े हुए । अन्यतमः = एक । श्रङ्गीक्रियताम् = स्वीकार करिये । श्रारभ्यताम् : आरम्भ करिये । विभ्यदिव=डरता हुआ सा। सम्न प्य = भेजकर । सुश्र पते सुनने की इच्छा करता है। भारत हा भारत द्रोहियों का । प्रत्यहं = प्रतिदिन । अस्मभ्यम् = हमारे लिए । रोचते अच्छा लगता, रुचता वृत्त = चरित्र को । अनुसरति = पाचरण करता है। समीपोत = अच्छी . % 3D ।

करता है D % 3D तरह सुनता था । पाहोस्वित्-अथवा । भित्ति =दीवार को। भित्वा = फोड़ कर । व्यापारेषु = कार्यों में । अपजहार = चोरी की। लुण्ठेयुः=लूटें । प्रतिरोद्वपः = रोकना चाहिये। अपेक्ष्यते = अपेक्षा होती है । द्वष्टि-द्वेष | मुद्रया = ढंग से, रीति से । निश्वस्य =लम्बी सांस ले. अभिदधाति = कहता है । अभयं रक्षा | वाञ्छति = चाहता है । कृत प्रतिज्ञः जिसने प्रतिज्ञा की है। अन्यथा = उल्टा । विधास्यामि = करूंगा । योत्से युद्ध करूगा । योत्स्यते = युद्ध किया जायगा । विदारयिष्यते फाड़ा जायगा | वक्षः = छाती को। वसुमती पृथ्वी। स्नपयिष्यते- स्नान कराई जायगी । रोदं रोदं रो रो कर । विलुठतामपि = लोटते हुओं की भी। त्रायध्वं =रक्षा करो। रोदसी=आकाश और पृथ्वी को । रोदयतामपि = रुलातेहुओं की भी । दाराः= स्त्रियों को। सकष्ट = कष्ट देकर । धनन्ति = मारते हैं, जिवह करते हैं । दुर्विनोतानाम् =उद्दण्डों का । मर्मज्ञ = मर्म को जानने वाला । अस्माक्षाणाम् = हमारे जैसों का । प्रभवः= प्रभुलोग ही, पापड़ी । प्रमाणम् = सर्वोच्च अधिकारी । भवादृशाः = ग्राप जैसे। मन्त्रणा = सलाह । मद्य = मेरे लिए । महतां-बड़ोंका । व्र ते = कहता है। सावहेलं = अवहेलना के साथ, अपमान के साथ । सोदर्याणां = भाइयों का। सच्छल छलके साथ । सक्रौर्य =क रता के साथ । अनावदनं =न धारण करना । ईदृशीभिः = ऐसियों द्वारा । कर ग्रहणं टैक्स (जज़िया) लेना । अन्तःस्थ = अन्दरूनी। घग्तर =घोरतर । यतरः जौनसा । शयिष्यते सो जायगा । ततरः = वही। प्रशमं शान्ति को, मृत्युको । एण्यत = प्राप्त हो जायगा । गिरि गुरु = पहाड़ जैसा भारी। विचिन्त्य = चिन्ता करके । चाम्मिता = भाषण शक्ति ! वाचं यमं = जुबान चन्द, मौन । विधत्त =करती है। कर्णपरम्परया- काना-कानी, एक कान से दूसरे कान में । प्रसृता = फैलीहुई । विश्वसिमि = विश्वास करूं । प्रोच्यएवं खलु =ऐसा मत कहिये । पंकन अंकयकोचढ़ से सान | अवमानित:-अपमानित किया । युप्मा- दृशाणां = अाप (तुम्हारे) जैसों का । कलकनम् = कलङ्क लगाना । उक्तवत:= के । चक्षुपी = दोनों आँसे । उदगिरताम् = निकलते थे, उगलते न्मे, दो । पटप्रान्न = बम्ब के होरने । मामार्ट पाँचता था । प्रेम पारावार -श्राज "यूराप्लुतम् -प्रम के % 3D + %2 समुद्र के प्रवाह से डुबोया हुश्रा । श्रद्याविधिः तक । श्रालिलिनियामि = श्रालिङ्गन करना चाहता हूँ । सपदि = फौरन । भापितवान् = कहता था । अचिरादेव-शीघ्रही । समुपस्थास्यते = उपस्थित होगा । अन्तिके समीप में। नत्रीभूय -नन होकर । जानीते-जानता है। अकथत् = कहता था। 'निपुएं-होशियारी से, सूक्ष्मतया। ससंभ्रमम् = हड़बड़ाहट के साथ । याहू वाहों को । परिपस्वजे-यालिङ्गन करता था। सप्रफुल्ल नयनं = खुशी से "फूली हुई, आँखों वाले को । सगोपनं गुप्तरूप में । संललाप = वार्तालाप करता था । प्रतिनिवृत्सु = लौटने की इच्छा वाला । उदतिष्ठत् = उठ खड़ा । थालापः-यात-चीत । द्रष्टव्यम् = देखना है, देखना चाहिये । अर्थ-(अम्बिकादत्त व्यास कृत शिवराज-विजय का भाग है । शिवाजी स्वयं दूत का रूप बनाकर महादेव नाम से महाराज जशवन्तसिंह के पास श्राकर बातचीत करते हैं। जशवन्तसिंह ने मुगलों की ओर से शिवाजी पर चढ़ाई की है और पूना लेकर अपना शिविर स्थापित किये श्राक्रमण करनेको प्रतीक्षा में है।) महाराज जशवन्तसिंह पूना-नगर के शिविर (सेना का) के खेमों में से एक में चिन्ता में डूबा हुआ था। तब पहरेदार, प्रविष्ट होकर, जयजयकार के साथ, हाथ बांध कर, बोला, "महाराज ! शिववीर (शवाजी) द्वारा भेजा हुया महादेव पण्डित आपके दर्शनों की इच्छा कर रहा है।" उसको स्वीकृत कर के, 'हां, प्रविष्ट कर' महाराज के ऐसा कहने पर, पहरेदार ने भी वैसाही किया । फिर, पहरेदार के साथ, महादेव के प्रविष्ट होतेही, जसवन्तसिंह ने प्रणाम करके, बैठनेके लिए, दायें हाथ से, श्रासन स्थान का निर्देश (संकेत) किया। कुशल आदि के प्रश्न के पश्चात् उनका इस प्रकार वार्तालाप हुश्रा:- जसवन्तसिंह---पण्डितष्ठ ! महाराष्ट्र राज (शिवाजी) का पत्र तो प्राप्त कर चुका हूँ, उससे अधिक श्रापको क्या प्रस्ताव करना है (क्या कहना है) वह बताइये। महादेव महाराज ! श्रीमान् ने (शिवचीर ने) कुछ प्रस्ताव करने के लिए मैं नहीं भेजा हूँ, बल्कि शोक (खेद) प्रकट करने के लिए । .

, जसवन्तसिंह सो, क्या, पूनानगर के साथ प्रधान चाकणदुर्ग भी हारदिया, यह शोक है ? महादेव-उसके हाथ में (अन्य) बहुतसे दुर्ग हैं । अतः दुर्ग के लिए वह दुःखित नहीं होता। जसव०-तो क्या दिल्लोसम्राट के साथ युद्ध की भारी विपत्ति उपस्थित होगई है, उसका दुःख है ? महादेव-क्षत्रियराज ! विपत्ति के समय में धैर्य के त्याग का शिवाजी ने अभ्यास नहीं किया है। जसवन्तसिंह-तो क्या शोक है ? कहिये, कहिये ! महादेव-जो क्षत्रियों की धू (नेतृत्व, गाड़ी का जूया) को धारण करने वाला (नेता) है, जिससे यह पृथ्वी राजाओं वाली है, जो हमारे जैसो. के अभिमान का पान (गर्वस्थानीय) है, जो सनातन धर्म को रक्षा के लिए एकमात्र शरण है और भारतीय वीरों के मुकुटों की मणि है (सर्वोच्च है), उसीको, श्राज, महाराष्ट्र राज (शिवाजी), धर्मनाशक इन यवनों की दासता से कलंकित देखकर दुःख करता है। तब, जसवन्तसिंह तो, "(यहतो) साफ साफ ही मुझे धिक्कार रहा है, इसकारण कुछ क्रोधित हुआ, (किन्तु) "भारतदेश के शत्रु यवनों की परवशता 'दासता) का कार्य करता हूँ, यह सज्जनों के तिरस्कार के ही योग्य है," इस विचार से लज्जित (ग्लानियुक्त) हुग्रा । तब महादेव फिर वैसे कहने को प्रारम्भ हुअा, “महाराज ! स्वतन्त्रता के जहाज के कर्णधार (प्रधान नाविक), क्षत्रिय-कुलरूपी कमलों के लिए. (खिलाने वाले) सूर्यरूप, उदयपुर नरेश श्री प्रतापसिंह के वंश में उत्पन्न नारीरत्न जिसकी पत्नी है, जो सिंह जैसी शरीर की गठन वाले हजारों वीरों से स्तूयमान ( स्तुति किया ) मरुदेश के राजसिंहासन को पांव से अधिकृत करके विराजमान है, यह दिल्ली का कलंकरूप औरङ्गजेब भी, क्षिप्रानदी के तीर पर, जिसकी भुजाओं का पराक्रम देख कर, क्षणभर, निनिमेप, अपने शरीर की सुध-बुध खोये, अाश्चर्यान्वित खड़ा रह गया था, सदैव जिससे (औरङ्गजेय ) डरता है और सहायता चाहता है और इस समस्त भारतवर्ष में, नगर नगर में, ग्राम ग्राम में, घर घर में, मन्दिर मन्दिर में, नाम राजुसको कुशलता के लिए, विजय के लिए, वल वृद्धि के लिए, राज्य-सम्पन्नता के लिए, ब्राह्मण छ, हाथ (श्राकाश की श्रोर) ऊपर उठाकर, । (जसवन्तसिंह का) लेने के साथ अशीर्वादों का उच्चारण करते हैं, वही महावीर, वही भारत का रत्न, वही राजकुल का भूषण, वही राजकुल का भूषण, (पान) यवनों के 'पक्ष को लेकर अपने लोगों का ही सिर काटने के लिए तैयार हुआ है, यही देख कर महाराष्ट्र राज का हृदय अत्यन्त दुःखित हुआ है।" जसवन्तसिंह को कुछ लज्जा-से टेढ़ा मुख किये वाला और उद्विग्न (सन बिगड़े हुए) सा देख कर, [महादेव] फिर कहने लगा, “वीरश्रेष्ठ ! मैं सामान्य दूत हूँ, महाराजाओं के साथ कैसे वार्तालाप करना चाहिये, उसकी -शैली (ढंग) को भी नहीं जानता हूँ, यदि कोई अपराध हो जाय तो क्षमा कर देना चाहिये | किन्तु, देखिये, किसलिए यह युद्ध की तैयारी है ? क्यों, ये भयानक भाले चमक रहे हैं ? किसपर अाक्रमण करने को ये घुड़सवार है ? और किसको भस्म करने के लिए आपके क्रोध की यह दावानल (जो वन में से उत्पन्न होकर उसी को जलादेती है) है ? क्या, जो आपको अशीर्वाद देते हैं, जो आपकी (गौरव। महानता को. •सुनकर प्रसन्न होते हैं, उन्हीं के रक्त से पृथ्वी को धोने के लिये ? जो आपको अपने (क्षत्रिय) कुल का भूपण मानते हैं, उन्हींके वंश का नाश करने के लिए ? जो व्यर्थ में दोनों को लूटते हैं, कुलीन कन्याओं का अपहरण करते हैं, मन्दिरों को गिराते हैं, क्या उन्हीं वैदिक धर्म के नाश. करने का बीड़ा उठाये (व्रत लिये। दुष्ट शत्रु ओं की वृद्धि के लिए ? जो, विना किसी प्रयोजन के, स्वतन्त्र प्रजाओं को भी जीत कर, केवल अज्ञान व्यभिचार और अत्याचार के प्रचार के लिए, इन धूर्त यवतों के हाथों में वे देदी जाती हैं (आपके द्वारा), क्या यह अापके विषय में शोभा देता है ? [आप जो नये देश जीत कर यवनों को दे रहे हैं, क्या यह अच्छा लगता है ?] हे क्षत्रियसिंह ! मैं क्या कहूँ ? यह बात स्वयं [आपके द्वारा ही विवेचनीय [विचारणीय] है।" फिर, कुछ क्षणों को, सिर खुजलाने के द्वारा ही व्यतीत करके, मरुराज (जस०) कुछ लजित-सा भी, लजा को छुपाता हुआ-सा, शनैः शनैः बोला:- ८६ 'दूतश्रेष्ठ ! बहुत सुन्दर ! तुम्हारी भाषणशैली की मैं बहुत प्रशंसा करता हूँ। किन्तु हमने राजपूत देश के. क्षत्रियोंने, भयसे अथवा लोभसे अपनी. श्रात्मा यवनों के हाथों नहीं सौंपी है। हमने. ही, हजारों वार, खडगों से यवनों को खण्ड-खण्ड किया था, हमने ही वे बार बार सिन्धुनदी के तट तक. भगाये थे। नहीं जानपाते हैं, भगवती महामाया को क्या इष्ट है (वह क्या. चाहती है), कि हम न चाहते हुए भी अपने आपको उनके हस्तगत (हाथों में) देखते हैं । अवता, सारे ही राजपूत प्रदेश में, उनका ऐसा अधिकार है कि. उनके साथ विरोध (करना) केवल अपने विनाश के लिए ही होगा । इसलिए क्या किया जाय ? इन कायरों (यवनों) के सौभाग्य से हमारी परस्पर की एकता भी नहीं है । इसलिए जैसा उचित होता है, वैसा (निर्वाह) करते हैं।" महा.-महाराज ! राजपूत देश में श्रापका वैसा वल चाहे ना हो, परन्तु इस प्रदेश में नो यवनों का अभी भी ( इतना ) विशेष अधिकार नहीं हुया है । श्राप के आगे सब लोग कर-याद रहेंगे, यह समस्त राज्य श्राप का शिववीर को भी आप अपने सेनापतियों में से ही एक के रूप में स्वीकार करिये और दिल्ली पति के साथ युद्ध श्रारम्भ कर दीजिये। जो, राज्यसिंहा- सन को पाये हुए भी, भय करता हुप्रा सा, इधर उधर, भारी युद्धों में श्रीमान् को भेज कर, श्रीमान् का अनिष्ट ( मृत्यु) सुनना चाहता है, वह पायों ( श्राप ) के द्वारा दण्ड से ही शिक्षा देने के योग्य है ( उसे दण्डित.. कर के ही शिक्षा देना उचित है)। एकता नहीं है, इसका भी दुःख नहीं, होना चाहिये ( मत हो)। श्रीमान् (श्राप) के प्रयत्न से हो एकता का. श्रारम्भ करिये (स्वयं प्रयत्न करके एकता प्रारम्भ करिये )। शिववीर भारतीयों की परतंत्रता नहीं देखना चाहता । राज्य का लोभ तो उसके नहीं हैं । विजय होने पर, यह राज्य भी श्रापका ही हो सकता है । किन्तु, जिससे भारत के शत्र यवनों की प्रबलता से प्रतिदिन धर्म का लोप न हो, यही शिवः वोर का उद्देश्य (अभिप्राय ) है। जसवन्त०-राज्य तो हमारा भी बहुत है। हम भी लोम के. परवश नहीं हैं। और शिवा जी का उद्देश्य भी सारा प्रशंसनीय ही है। F किन्तु, शिवाजी के कार्यों में, एक ही हमें अच्छा नहीं लगता, जो कि वह चोरों लुटेरों जैसा श्राचरण करता है । महा.-महाराज ! ऐसा मत कहिये । क्या, कहीं, किसी से, आपने अच्छी तरह (प्रामाणिक रूप में) सुना कि महाराष्ट्र राज निरपराध पथिकों को लूटता है, या कि उसने किसी को दीवार फोड़ कर धन चुरा लिया है ? किन्तु इन लुटेरों के अत्याचारों को न सहता हुआ (वह), जिससे ये लुटेरे न लूटें, उन्हें ऐसा दण्ड देता है । धर्म सदैव रक्षणीय । स्त्रीत्व नश, मन्दिरों को गिराना श्रादि का घोर अत्याचार सर्वथा रोकने के योग्य है (बन्द करना चाहिये)। कहीं पर, विवशतावश, नीति विरोप (खास नीति ) का भी प्राश्रय लेने की अपेक्षा हो जाती है, तो क्या यह लुटेरापन है ? दिल्ली का कलंक (औरंग० ) तो प्रधान रूप से श्राप से ही हप करता है। आपके द्वारा भी यदि "शठ के प्रति शठता" इस नीति से, कूटनीति ही स्वीकृत- करली जाय तो क्या यह लुटेरापन होगा ? यश०-( लम्बी और गर्म साँस छोड़ कर ) अच्छा, शिवराज मुझे क्या कहता है? महा-वह श्रीमान् से सहायता और अभयदान ( रक्षा का श्राश्वासन ) चाहता है। यश०-दूतश्रेष्ठ ! दिलोश्वर के साथ प्रतिमा किये हुए मैं कैसे विपरीत पाचरण करूँगा ? (देर तक चिन्ता करके ) दिल्लीश्वर को "महा- राष्ट्रों के साथ युद्ध करूँगा," यह कह कर पाया हूँ । सो, लडूंगा। महा०-~-"सच मुच, युद्ध करोगे, अपने वंश में उत्पन्न हुओं की ही क्षत्रिय वादकों को छाती को छुरियों से फाड़ोगे, ब्राह्मणों के रक्त प्रवाह से पृथ्वी को स्नान कराओंगे और यवनों के हाथों में अधिकार सौंप दोगे ? जो, रो रोकर पाँवों में लोटते हुओं की, “यचायो यचानो !" के हाहाकार और चीत्कारों से प्राकाश और पृथ्वी को भी रुलाते हुओं की भी स्त्रियों को हर लेते हैं, यालक, वृद्धों को कष्ट दे देकर मारते हैं, उन इन उइंडों और अत्याचारियों को वल से और छल से भी, दण्ड देना परम पुण्य है, पाप नहीं । हे धर्म के मर्म के ज्ञाता! हमारे जैसों का तो केवल प्रार्थना कर देने मात्र का ही कार्य है, स्वीकार करने या तिरस्कार करने में तो स्वामी को ही अधिकार है (आप चाहे जैसा करें )। यश-पण्डित ! श्राप जैसे ( व्यक्ति ) या श्राप *सों के उपदेश ( सलाह ) तिरस्कार के योग्य नहीं होते । शिवाजी का समस्त उद्देश्य मुझे अच्छा लगता है। परन्तु श्राप ही विचारिये, प्रतिज्ञा के विरुद्ध आचरण करना क्या बड़े लोगों का ( के योग्य ) कार्य है ? महा०-महाराज! जिसको श्राप दिल्लीश्वर कहते हैं, उसी के राक्षसोचित ( राक्षसों के योग्य ) कार्यों को देखिये । अपने जन्म और पालन के कारण भूत वृद्ध पिता को अपमान पूर्वक पकड़ कर, बन्दी गृह में डालना व्या बड़े लोगों का काम है ? या, सगे भाइयों का, छल पूर्वक, क्रूरता के साथ, मारना और ऐसी ऐसी हत्यारों से भी उद्दण्ड भाव से लजा न करना, क्या यड़ों का कार्य है ? अथवा, केवल, श्रार्य (श्रेष्ठ ) स्वभाव वाले आर्य जनों को ही क्लेश देने के लिए, गोइनन काना, मूर्तियों को तोड़ना, दीन होन सनातन वैदिक धर्म वालों से केवल हमारे से ही कर (जजिया ) ग्रहण करना बड़े लोगों का कार्य है ? या किसी पुराने अन्दरूनी वैर भाव को याद , करके घोरतर युद्धों में श्राप को ही भेजना और ( ऐसे ) आपका अशुभ सोचना, क्या बड़ों का कार्य है ? "इस महाराष्ट्रीय युद्ध में, जसवन्तसिंह और शिबाजी में से जौनसा भी महावीर सो जायगा (गिर जायगा), वही ( औरं- गजेब के लिए ) पर्वत के समान भारी भारतीय महावीर शान्त हो जायगा, यह सोच कर ही अथवा श्रीमान् को यही भेजना, क्या यड़े लोगों का कार्य . यश०-(कुछ सोच कर ) दृतवर ! तुम्हारा भापण चातुर्य वलात् मुझे मूक कर रहा है । किन्तु, शिवाजी की धोखा देने की यात. हमारे देश में भी प्रतिगृह में फैली हुई है, सो कैसे, मैं उसके प्रस्तावों में विश्वास करूं ? महा.-( मानो क्रोध से ) महाराज! महाराज ! ऐसा मत कहिये । सनातन धर्म के एक मात्र रक्षक, महाराष्ट्र राज को इस प्रकार मुटे फलंक के कीचद में न मानो [गन्दा कर ] । कौन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, अथवा शूद्र उसने टगा ? और म्लेच्छों में ही प्रथया कौन सजन (उपने) अपमानित किया ?

में
उसका
हो! देव ! शोभा नहीं देता, आप जैसों के मुख से इस प्रकार कलक
गाया जाना ।" ऐसा कहते हुए के ही महादेव परिश्त के दोनों नेत्रों ने श्रीसु-
यों को दो वृन्दै गिरा दी और महादेव ने उन्हें वस्त्र के छोर से पोंछ
दिया।
तब मरुराज का भी हृदय, अचानक, प्रेम समुद्र के प्रवाह से प्राप्ला-
वित सा और मन प्रसन्न सा हो गया । महराज तव "क्ष ना करिये, श्रान से
महाराष्ट्र-राज मेरा मित्र है। अय श्रालिंगन करना ( भेटना)
चाहता हूँ। इस लिये, उस क्षत्रिय कुल भूपण को तुरन्त दिखा !" यह
कहता था।
महा०-शिवराज शीघ्र ही श्रीमान् के चरणों के समीप उपस्थित हो
जायगा।
फिर, महादेव ने झुक कर, कौन जाने, क्या उस (यश.) के कान
कहा । उसको सुनकर, यशवन्तसिंह, श्राश्चर्य के साथ, (हर्प से) प्रफुल्लित
नेत्रों वाल महादेव को निपुणता से देखकर, हड़वड़ाहट
के साथ उठ कर,
उसी प्रकार उठे हुए महादेव को, भुजाएँ पसार कर, आनन्द से श्रालिंगन
करता था। उसके पश्चात्, महादेव के साथ
भर तक गुप्त भाव
से शनैः शनैः यात चीत करता था। तब महादेव लौटने की इच्छा वाला सा
उठ खड़ा हुआ।
यश०-(द्वार के समीप जाकर ) देखना, युद्ध के विषय में जैसे वात
चीत हुई है, वैसे ही शिवाजी को निवेदन कर देना ।
महादेव पण्डित "बहुत अच्छा" कह कर चल दिया।
बैठ
कर,
मुहूर्त

। चाणक्यसूत्राणि (चाणक्य के सूत्र ) शब्दार्थ-मूलं = उत्पत्तिकारण । अर्थः=धन । इन्द्रियजयः इन्द्रिय- निग्रह ! कामासक्तस्य कामो का । निश्चित्य % निश्चय करके। अनुष्ठानन् - पूरा करना । वाक पारुष्यम्-वचन की कठोरता । विशिष्ट अधिक । ग्रारभेत = प्रारंभ करे । कार्यान्तरे = कार्य के बीच में (समय में )। दीर्घसूत्रता तुस्ती । कार्यावाप्ति = कार्य सिद्धि । चारित्रं सदाचारको । लंघयेत् = उलांये । नावन्येत = अपमान न करे । मित = परिमित । छाद्यते = ढकली जाती है । धार्यते धारण किया जाता है। लोकः = संसार । मनागपि जरा सा भी । वाधते = वाधा पहुंचाता है । हर्तव्यम् = हरना चाहिये । सुवृत्त सुचरित । ग्राह्यम् =ग्रहण करना चाहिये । श्रत्युपगार अधिक सत्कार, सेवा भाव । शकितव्यः = शंका ( सन्देह ) करने के योग्य है । विद त्रुटिको । वालिशः = मूर्स । कपोतः = कबूतर । वरः=श्रेष्ठ । अक्रोधः = क्रोध से रहित । शैलमा पर्वत जितना । मन्यते मानता है। निप्पत्ति = उत्पत्ति । स्तोतव्यः = स्तुति करना चाहिये । दिवा दिन में । निष्कृतिः - निस्तार । श्राश्रित दुग्यम् = पाश्रित जन के दुग को। श्वः = कलको । कार्यम् = करने योग्य । कुर्वीत करे। अर्थ-(१) सुग का कारण धर्म है ( धर्म से सुख मिलता है)। (२) धर्म का ( दया, पुण्य, तीर्थ यज्ञ शादि) का साधन धन है (धन के यिना ये यज्ञ यादि धार्मिक कृत्य नहीं हो सकते)। (३) धन का कारण राज्य है ( राज्य द्वारा ही सबसे अधिक धन मिल सकता है ) । () राज्य का मूल कारण इन्द्रिय-संयम है (विपयी राज्य प्राप्ति या राज्य-संचालन नहीं कर सकता) । (२) कामी व्यनि (कोई भी बढ़ा ) कार्य पूरा नहीं कर (६) वचन की कठोरता अग्निदाह से भी अधिक (जलाने वाली ) होती है। (७) पहिले निश्चय करके ( योजना बनाकर ) पीछे कार्य प्रारंभ करे (जिससे कठिनाई न भाये)। (5) कार्य के बीच में (कार्य करने के समय में ) सुस्ती नहीं करनी चाहिये । () चंचल चित्त वाले को कार्य-सिद्धि नहीं होती (स्थिर बुद्धि से ही मनुष्य कुछ कर सकता है)। (१०) कभी भी सच्चरित्रता का उल्लंघन नहीं करना चाहिये (चरित्र-भ्रष्ट नहीं होना चाहिये)। (११) गुणवान् का श्राश्रय लेने से निगुण (गुणशून्य ) भी गुण वाला बन जाया करता है। (१२, कभी भी (किसी ) पुरुप को अपमानित न करे। (१३) दुर्जन लोगों से कोई लगाव ( सम्पर्क) नहीं करना चाहिये (दूर रहना चाहिये)। (१४) परिसित नन ही (दस्तुतः ) स्वास्थ्य है (नियमित परिमित अाहार करने वाला सदैव स्वस्थ रहता है)। (१५) तृष्णा से बुद्धि ढाँप लो जाती है ( वध सला बुरा विचारने में समर्थ नहीं रहती ) । (१६) भूखों में (ले), शास्त्रार्थ ( यहस) नहीं करे ( उनका मनाना मुश्किल है)। (१७) संसार धर्म के द्वारा धारण किया जाता है (धर्म के श्राश्रय से खड़ा है। मनुष्य यदि अाज अपने मनुष्यता के धर्म को छोड़दे, तो संसार नष्ट हो जाय, मनुष्य भेड़िया बन जाय)। (१८) दया धर्म का मूल कारण है। (१६) व्यसन (ऐब ) थोड़ा सा भी वाधा (अड़चन ) उत्पन्न करता है (व्यसनी कोई काम नियम से नहीं कर सकता)। (२०) दूसरे का. धन नहीं हरना (चुराना) चाहिये । (२१) अभिमान के समान कोई (अपना ) शत्रु नहीं है (अभिमान नष्ट कर देता है)। (२२) म्लेच्छ लोगों का भी सुचरित ग्रहण करना चाहिये (उनकी भी अच्छी यात को अपनाना चाहिये )। (२३) अधिक सरकार पर शंका करनी चाहिये । (२५) मूर्ख व्यक्ति अपने दोष (त्रुटि ) को नहीं देखता, दूसरे के ही दोपों को देखता है, ( इससे उसका सुधार नहीं होता )। (२५) कल के मोर से श्राज का कबूतर. अच्छा है (जो मिले ले लेना चाहिये, कल मिलने वाले सौ रुपयों से प्राज मिल रहे पचास रुपये अच्छे हैं)। (२६) क्रोध रहित (शान्त स्वभाव का) व्यक्ति सबको नीत लेता है (क्रोध में तो भले बुरे का ज्ञान ही नहीं रहता)। (२७) सज्जन व्यक्ति तिलमान भी (किसी के ) उपकार को पर्वत जैसा (वा) १४ रूप, राणाप्रताप के बल पराक्रम से चमकने वाली, अग्नि भी जिसकी जरा सी समता नहीं करती, ऐसी हल्दी घाट कुर्ता या धोती के समाम विजज- :शालिनी हो रही है। २. श्रास्ते "समीरः ।।" न्वय इह भारतभूमि वीरः प्रतापः श्रास्ते, हे पान्थ ! चेत् हिन्दु रमि सकृन् यानतः स्याः, सम्प्रत्यपि धीरं धीरं किन्नु प्रतिवदन्निव समीरः धीर- जनम् अधीरयति । अर्थ- यहाँ भारतभूमि का वीर प्रताप विद्यमान है (श्रव भी उसकी यामा विद्यमान है), हे पथिक ! यदि हिन्दु है, तो एक बार नत-मस्तक होजा । धीरे धीरे कुछ कहती हुई वायु, अब भी धैर्यशाली जन को अधीर (ज्याकुल, चंचल ) कर देती है (राणा की यशोगाथा कहती हुई-सी वायु अब भी धीरजन को भी प्राचीन स्मृति में विचलित कर देती है)। ३. नाकातरा: ......."प्रातनोति ।।" अन्वय-"अद्यापि यत् जननी स्वतंत्रा न विहिता, (यतः) प्रिय- पारतंत्र्याः कातराः मां मा स्पृशत," इदमेव गदतीय तरूणां ततिः यत्र शाखा- कदम्ब कृतमरम् श्रातनोनि । अर्थ-"याज तक भी, जो, माता स्वतन्त्र नहीं की है, ( इसलिए) है परतन्त्रता-प्रिय कायरो ! मेरा स्पर्श नहीं करो, " ऐग्ग कहती हुई मानो वृत पंक्ति, जहाँ (हल्दी नाटी में), शापा समूहों के द्वारा उत्पन्न मर्मर शब्द को करती हैं, (नर्मर शब्द के बहाने से मानो वह ऊपर को बात कह रही है)। १. योगनगी. .."काचित् ॥ अन्यय-पथ, 'त्यनिन बने सये ! यदा कदाचिन्, “हा! बोगन- जय युग कनार नापीन प्रतापी पनयः तनयःपद्य व प्रास्ते ?" काचित् नांमाग गति।

अर्थ-"और फिर यहाँ निर्जन वन में, हे सखे ! जब कभी (प्रायः) "वीरों का अग्रणी, निर्भय युद्ध कला के समूहों वाला (जानने वाला), वह प्रतापी, नीतिवान् पुत्र, हाय ! श्राज कहाँ हैं ?" यह कहकर कोई कुररी, मानो वह मातृ भूमि हो, रोती है (कुररो की अावाज मातृ भूमे की रुदन ध्वनि कवि को प्रतीत होती है)। .५. अद्यापि यत्र 'प्रकृतिर्वधूटी ।। अन्वय-यत्र अद्यापि जननी 'मम हन्त ! राणा ! राणा!" (इति) विकला कुहूछलेन विरौति । च, अद्यापि नूनं तद्विरहिणी प्रकृतिवघटी कदापि शोभा न धारयति । अर्थ -जहाँ, आज भी, जन्म-भूमि माता "मेरा राणा, हाय ! राणा !" (कहती हुई) कोयल के व्याज से रोती है। और, आज भी निश्चय से उसी के (राणा के) विरह में वियोगिनी बनी (यहाँ की) प्रकृति रूपी वधू कभी भी शोभा धारण नहीं करती (रेगिस्तानी नीरस प्रकृति कवि को प्रतप की विरहिणी प्रतीत होती है)। ६. अद्यापि यत्र 'देवतानाम् ॥ अन्वयः-यन्न अद्यापि समधुव्रतमंकृतानि (सन्ति), लोलातखञ्जनाचित नर्तनानि (च सन्ति), अनुदिनं शुकशावकानां सत्कृजितानि सन्ति, सन्ति, किचन 'देवतातां (एतादृशं) तौर्यत्रिकम् जयति । अर्थ-जहाँ, आज भी सुन्दर भ्रमरों की संकारें हो रही है, चंचल आँखों जैसे खञ्जन पक्षियों द्वारा प्रारब्ध नृत्य हो रहे हैं, सारा दिन तोतों के बच्चों के मधुकूजन (शब्द ) हो रहे हैं और इस प्रकार एक दिव्य नृत्य शोभित हो रहा है । (कवि पतियों के सधुर नृत्यों और कलरव को दिव्य नृत्य के में देखता है) ७. पुष्पंफलं. "मातुः॥ अन्वय-पुप्पं, फल, गन्धवहः समीरः, अमला खद्योतपंक्तिः, च पिकालि- गीतिः, यत्र सरल प्रकृति प्रणीतं, पञ्चोपचारपूजन मिव मातु रस्ति । अर्थ-(पुष्प फल, पक्षी गान, दीप गन्ध से सोधी प्रकृति द्वारा किया हुआ जन्मभू का पञ्चोपचार पूजन समझता है कवि) पुष्प हैं, फल हैं, फिर सुगन्धित पवर है,त्वच्छ खद्योतों की पंक्ति है और कोयलों का गान है। (इस रूप

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६७ वरवीर वसुन्धरायाः स्वातन्त्र्यं किल संक्रीतवान्, [सा] इयं वलि-वैदिका, लोकत्र ये प्रतिविदिता [अस्ति] | अर्थ [हल्दीघाटी की वलिदान भूमि संसार में प्रसिद्ध है] जहाँ. राणा प्रताप के साथियों ने हजारों सिरों से मूल्य दान करके पार्यों को वीर भूमि को स्वतन्त्रता को खरीदा था, ऐसी. यह पार्यों की बलिवेदी [हल्दी घाटी] तीनों लोकों में अति प्रसिद्ध है। १२. वीराः ..."धरित्रीम् ॥ अवन्य-इहैव अथ चतुर्दश सहस्रमिता वीराः मृत्युशयनतलं यधा, श्रालिलिङ्ग :, किन्तु प्रशस्यतमशस्यमहीयसी स्वां सन्मातरं धरित्री मनाग नहि विजहुः । अर्थ-[मातृ भूमि के लिए हजारों वीरों के वलिदान का वर्णन है] यही फिर चौदह हजा. चोरों ने मृत्यु का सोने की रजाई के समान प्रालिंगन किया [जैसे सर्दियों में रजाई से कोई लिपटता है ऐसे । किन्तु, अत्यन्त प्रशंनीयघासों से . शोभित अपनी माता रूप भूमि को उन्होंने जरा सा भी नहीं छोड़ा। १३. अत्रैव चोर 'तृप्ताः॥ अर्थ-(रक्त की पवित्र गङ्गा का वर्णन किया गया है) ग्रहों, वीरगणों के रक्त की लाल गङ्गा, हजार धाराओं वाली होकर बही थी, जिसके दर्शन से, रमण करने से और स्नान करने से, देवताओं के साथ ऋपि भी तृप्त हो गये । (ऐसी पुण्यदायक रक्त की नदी वही)। १४. सैषा स्थली 'पामराणाम् ॥ अन्वय-एपा चकित चेतक चक्रमाणां सा स्थली, एपा कुटिल कुन्त पराक्रमाणां सा स्थली, एषा अमराणामसुतोऽपि प्रियतमा सा स्थली. (अथच) एपा नरपामराणां ज्वरकी सा स्थली अस्ति)। अर्थ-यह, चकित (भड़के हुए) चेतकको कुदाड़ियों की वह (इतिहास प्रसिद्ध भूमि है, यह तीक्ष्ण भालों के पराक्रमों के प्रदर्शन)की वह (विख्यात) भूमि है, यह देवताओं की (अपने) प्राणों से भी अधिक प्रियतमा वह (पुण्य को सन्ताप (भय) देने वाली पती) भूमि है और यह नीच पापो मनुष्यों वह (इतिहास-पूज्य) भूमि है । भासुरकसिंह कथा (भासुरकसिंह की कहानी) % 3D शब्दार्थ-धीर्यातिरेकात् = पल की अधिकता से। शशकादीन् = मसा धादि को। व्यापादय = मारता हुप्रा । नोपरराम = नहीं बन्द होता था, नहीं विधाम लेता था । बनजाः-वन में उत्पन्न । सारंग= मृग । वराह % मृश्रर । महिप-भैसा । श्रभ्युपेत्य = समसजाकर । समयधर्म = सन्धि धर्म, या शतों का धर्म। उपविष्टस्य = बैठे हुए का। समेप्यति = था जायेगा। पर्योच्छेदन = पूर्णनाश । अनुष्टीयताम् = किया जाय । अभिहिनं= कहा है । भवद्भिः- श्राप सयने । प्रतिज्ञाय -प्रतिज्ञा करके । नितिभानः = सन्तोप धारण किये । पर्यटन्ति =धृमने है। यारक्रमेण = यारी के मुनायिक, या प्रतिदिन । याति-जाता है । उपतिष्ठते हजर होगा। वासरः-दिन । समायातः-या गया। वेलातिझम-निधित समय के उल्लंघन को । गम्हता-जाते हुए ने । ददर्श -देवता था । भव्य = मुन्दर । प्रकोप्य - कुपित करके । पातयिप्यामि = गिरा दूगा। दिनशेपे - दिन की ममाति पर । नघामपठः- भूग्य में मच गले वाला । सूफागणी: मिदियोंकी, पपड़ियोंकी गुटकी को । परिलेलिहानः = चाटना हुआ। चिम्तयतः मोचते हुए. के. । धरनाय = ग्याकर । निःसत्यं =यिना पशुओं के । निपास्य = मार यर । उच्छेदयिस्यामि नष्ट कर दंगा। साबरं शीघ । दंशान्तर्गतः दारों के अन्दर । लवुनरस्य -छोटे में का। विज्ञाय -समझ कर । समं - माय । प्रागम्यन -घाला हुया । अन्तराले म्योच में । विवरान् सोह से । प्रमियताः पले । समरन = याद करो। सकारांपास । मदीयं-मेरा । । % 3D वर्तितव्यम् =वरतना चाहिये। विश्वासस्थाने विश्वस्त स्थान में, अपने घर में। धृत्वा=रखकर । द्रुततरं = शीघ्र ही। येन = जिस से । श्रावयों: दोनों में से । श्रादिष्टः = प्राज्ञा दिया हुआ । क्षिपत्वा गिरा कर । अविदित्वा =न जान कर । गन्तु =जाने के लिए । व्यापारेण कार्य से । दुर्गस्थ = दुर्ग में स्थित को । तर्हि =तो । व्यवस्थित:=स्थित हो गया। श्रासाद्य = प्राप्त करके । सोंदु सहने के लिए। मुमोच = छोड़ता था। प्रतिशब्देन प्रतिध्वनि से। द्विगुणतर:- दुगना । नादः शब्द। समुत्थितः- उठा। मत्वा=मानकर । प्रक्षिप्य = गिरा कर । परित्यक्ताः-छोड़ दिये । हष्टमना:- प्रसन्नचित्त । आनन्द्य = श्रानन्दित करके । प्रशस्यमान:=प्रशंसा किया जाता - हुआ। ? अर्थ-किसी वन में भासुरक नाम का सिंह रहता था। वह वलाधि- क्य से नित्य ही अनेक मृग शशक श्रादियों को मारता हुया भी विश्राम नहीं लेता था। फिर दूसरे दिन उस वन में उत्पन्न सय मृग सूअर, भैसा शशक श्रादि मिलकर उसके सामने जाकर बोले, "हे स्वामी ! इस सारे मृगों की हत्या से क्या (लाभ) है ? क्यों कि, नित्य ही एक मृग से भी तेरी तृप्ति (सन्तुष्टि) हो जाती है । इसलिए हमारे साथ सन्धि की शर्ते' (नियम धर्म) करली जायं । श्राज से लेकर, तेरे यहीं बैठेके खाने के लिए, जातिक्रम से प्रतिदिन एक पशु (मृग ) श्राजाया करेगा। ऐसा करने पर तेरी श्राजीविका (जीयन धारण) बिना किसी क्लेश के होती रहेगी और हमारा भी फिर सर्वनाशन नहीं होगा। सो इस राज-धर्म को किया जाय ।" फिर, उनके उस वचन को सुनकर भासुरक बोला । "अहो सच कहा श्राप लोगों ने । किन्तु, यदि मेरे यहाँ बैठे हुए के लिए नित्य ही एक मृग नहीं पाया, तो निश्चय ही, सब को खा जाऊँगा।" तब वे सब वैसे ही प्रतिज्ञा करके सन्तोप से युक्त, वहां वन में, निर्भय घूमते और एक (पशु प्रतिदिन वारी के अनुसार जाता है। बूढ़ा, या संसार से विरक्त अथवा (अपने ) पुत्र स्त्री के विनाश से भयभीत या शोक युक्त, कोई उनके बीच में से, उसके भोजन के लिए, दो पहर के समय में उपस्थित होता है । फिर, कभी, जाति के क्रम से शशक का दिन भी आ गया । वह, सघ मृगों के द्वारा cher १०० उसको लतादता हुया - भेजा हुआ, न चाहता हुआ भी शनैः शनैः चलकर, उसकी हत्या के उपाय को सोचता हुया, निश्चित समय को निकाल कर, व्याकुल हृदय वाला, जितने यहां जाता है, इतने में, मार्गमें जाते हुए उसने एक कुश्रा देखा । ज्योंही कि वह कुश के ऊपर जाता है कि कुए में अपनी परछांही देखी श्रीर देख कर उसने मन में सोचा कि "सुन्दर उपाय है। मैं शपनी बुद्धि भासुरक को कोधित करके इस कृप में गिगा दंगा।" फिर यह दिन के समास होने पर (मार्यकाल में) भासुरक के समीप पहुंचा। सिंह भी, समर्यान- फन जाने में भूख से मूग्वे गले बाला क्रोध से युक्त, (होठी पर की खुश्क ) पपरियों को चाटता हुया, सोच रहा था, 'अहो ! सवेरे खा कर सारा वन मुझे पशुओं से शून्य कर देना चाहिगे ( कर देना है )।" इस प्रकार, सोचते हुग के उपके सामने, मन्द मन्द जाकर, नमस्कार करके ससा खड़ा हो गया । फिर जलती हुई धारमा वाला भामुरक योला- 'अरे ! नीच पसे ! एक तो तू छोटा सा है और दूसरे समय बिता कर पाया । मो. इस अपराध में तुझे मार कर, सर्वरे यारे पशु-कुलों को नष्ट कर दंगा!" तर मा विनय पूर्वक बोला, "हे स्वामी ! न रा और न पशुओं काही अपराध है। यो, कारण मुनिये !" सिंह बोला, "जल्दी निवेदन कर, जब तक कि त गरी दाहों के अन्दर (मुह में) नहीं होता।" समा बोला "यामी ! प्राज मय मृगों में जातिग्रम में मुम छोटे के (भेजने के) प्रनाय की समस्कर, मैं पान मी माय भेजा था। और, फिर पाते प, मार्ग के बीच में गुका में निकल कर किसी दूसरे यहे भारी विट ने गुर, कटा { मैं कहा गया ), "अरे अरे ! तुम सब कहां ने अपने देवता की स्मरण करो ( सुम गाउँगा)।" तय मैन पहा, "हम, मां के अनुमार, यम के प्रमी भामुरक सिंह के पाम ( उसके ) भोजन के लिए " मय उसने कहा, 'यदि मा है. नी यह धन मेरा मेरे मात्र पय गगों को ग) के साथ [ मममीन के माय यरगना जागि, पर भारत जोतिर. यदि, या यहां यन में राजा है, तो [पने] बियामध्यान [1] मुरघर में छी जेर ६ ] | गोर न को सही मका, उमा गुलाश मानसर पासा, यि, जो को मनोनों में मंगर-पगम मेगना होगा, वह मर यो गग १०१ लेगा।" तब मैं उसके द्वारा प्राज्ञा दिया हुया स्वामी [ आप के पास आया हूँ। यही सपम निकल जाने का कारण है । सो, उसमें स्वामी ही प्रमाण हैं [श्राप को ही अधिकार है । ]" । वह सुनकर भासुरक बोला, "हे भले लोग ! यदि ऐसा है तो शीघ्र ही दिखा मुझे उस चोर सिंह को, जिपसे मैं मृगों पर के क्रोध को उसके ऊपर गिरा कर, स्वस्थ [ सन्तुष्ट ] हो जाऊँ ।" संसा बोला, "उसे मैंने, तो भी, बलवान् देखा है, सो उसके वल को बिना जाने हुए स्वामी का वहां जाना उचित नहीं है।" भासुरक बोला, "अरे ! तुझे इस बात से क्या ? दिखा मुझे तू उसे दुर्ग में बैठे को भी" | फिर शशक बोला, "यदि ऐसा है तो स्वामी श्रायें।" ऐसा कह कर [ चलने को ] श्रागे स्थित हो गया। फिर उसने पाते जो कुत्रा देखा था, उसी कुंए के पास जा कर [पा कर ] वह भासुरक को बोला, "स्वामी ! कौन तुम्हारे प्रताप को सहने में समर्थ है ? तुझे दूर से ही देखकर (वइ) चोर सिंह अपने दुर्गमें घुस गया है, सो या दिखाऊँ ।" भासु- रक बोला, "मुझे दुर्ग को दिखा ।" उसके बाद उसने वह कूप दिखा दिया । तय वह भी मूर्ख सिंह कूप के मध्य में जल में अपना प्रतिबिम्ब देखकर, अपना शब्द (सिंह का शब्द) करता था। तब प्रतिध्वनि की (गूज) के कारण से कूए में से दुगना हुअा शब्द उठा। फिर उस सिंह ने उस (प्रतिविम्ब) को शत्रु है, समझ कर, अपने को उसके ऊपर ( कुए में ) गिराकर प्राण छोड़ दिये । ससाभी प्रसन्न मन, सय पशुओं को (इस समाचार से ) अानन्द देकर, प्रशंसित होता हुआ, उनके साथ, वहां वनमें सुखपूर्वक रहने लगा (रहता था)। , आल्हा (इतिहास प्रसिद्ध वीर) % 3D शार्थ-चन्देल शानियों का एक प्रसिद्ध वंश । अधीश्वराभ्यां दो गजाटों के द्वारा । निपीडितः पोदित । निकाम= अत्यन्त । अभवतांदो थे मापिकी == यमाय बने । इमोइन दो को। वीर गति =वीर की गति (यु) पाना । पिन कृत्यं = पिनर का कार्य । निर्वाहितं =निवर्तित । वयस्थी = ययम्फ, बड़े हुए । प्रपारयामासतुः प्रचारित करते थे। वीर्यातिशयेन गुरना की अधिकता में। ममी मध्यं ग्राफाश के मध्य को । प्रसपतिम्मारा. सीन = श्यों को प्रयन्त तपाता था । वाहिनी = सेना । शक्तः = समर्थ । समुपता: शानुगृहीन किए गये । श्रनयोः = इन दोनों का । राज व गानेही । पुननिनिंग-पुन के ममान । पश्यनिमम देती थी। अजायम हु। ममुग्बी = छोरने के लिए। कृतप्रनिती = जिन्होंने प्रतिज्ञा की है, दी। अनंताम् = यनंमान थे (दो)। प्रगिमः = नुरुप । प्रगमेत् = प्रणाम करे । एष हो । अपरे = यूसरे । उपचक्रमुः-टपमम करते थे, प्रायोजन परत। प्रदा की। प्रतिपत्ति = विश्वास, प्रास्था । उदभासयितु पारने के लिए प्रतः= प्रारम्भ हुा । ममर-प्रत्तयोः = युद्ध सागर. -- मय गोर । समगग्निः- युन्द की याग्नि । नल एय%D गी। पारनं प्रतिदिन । अधयन = मुनी जानी थी। घमन्यन = माना जाना गा। परः = क्योंकि। मुनिगारः = कठिनता में निवारणीय । परिमनु: .. मा काग (दो)। विशाल प्र = पिनापन, प्रयन्त निanRI पिरा:- पिसार परापह। सानुगा उनी पदि पहने में प्रवृरा १०३ वाली। विजानातिस्म-जानता था। एतादृशाणां ऐसों का । यादृशः = जैसा । तादृशः वैसा। । %D % 3D मातुल:=मामा । प्रकृतिः = स्वभाव | सम्पदुत्कएँ = सम्पत्ति के उत्कर्प को । सोटु सहने के लिए । शक्नोति =समर्थ होता है । प्रसरन्ती = फैलती हुई को। यशोवल्लरी = कीर्तिलता को । उच्छेत्तु = काटने के लिए। थाचरत् = करता था । यशोवर्द्धन मन्त्रः = यश बढ़ाने का मूल मंत्र | संवृत्तः = होगया। प्रचारिता = फैलादी । सन्निहितौसमीप में स्थित । शोकाक्रान्तं = शोक से व्याकुल को । व्यधात् = करलेता था । लक्षयामि लक्षित कररहा हूँ, देख रहा हूँ। अश्रु पुरवारिप्लुते = ग्रांसुओं के प्रवाह के जल से डूये । नेत्र दोनों नेत्र । अभूताम् = होगये । कपट प्रवन्ध कुशलानां - कपटजाल के बिछाने में चतुर । यावान् -जितना | तावान् = उतना । ग्राम= समूह । स्मितरेखा मन्द हास्य । निर्गच्छति= निकलता है । मत्सरानलः = द्वेप की अग्नि । वाक् = वाणी । विनिःसरति = प्रवाह रूप से निकलती है । अवशिष्टाः = बाकी । प्रवृद्धःबदा हुश्रा । प्रत्यर्यप्रति अर्पण करके । निवापांजलि = तिलांजलि । तेभ्यः = उनके लिए। एवं विधूः= इस प्रकार का । बदति = कहता कृपापारावारे = कृपाके समुद्र में । नक्र:= नाकू । भागिनेयः = भानजा । राजापचारराजा के प्रति विरुद्ध प्राचरण विषण्णः = दुःखित । अपचारं विरुद्ध-श्राचरण, निन्दनीय आचरण । श्राधातु = रखने के लिए, करने को। (३) प्रभृतयः = श्रादि । प्रवृत्ताः-लगे हुए । प्रेक्षका: = दर्शक । अत्रा. इसी बीच में । कञ्चुकिः = अन्त:पुर में रहने वाला वृद्ध । राजाव्हानं - राजा का बुलावा । अश्रावयत्-सुनाता था | प्रकाण्डाव्हानं वे मौके के धुलावे को । श्राव्हयति=बुलाता है । प्रस्थितौ = दो चलदिये । समालपन्तः = धातचीत करते हुये । वीर सरण्या=वीरों की पद्धति से । निपीदतुः= दोनों बैठ गये । प्रार्थितं =प्रार्थना । नियोगः = नियुक्ति, कर्तव्य । अनुष्ठेयः करणीय है। प्रत्यभाषत् = पूछता था। बतिग्रीवः = टेढ़ी गर्दन किये ।

०४ - निरधारयन निश्चय करना था। निपातयति =गिराता है। श्रम = उसको। चाचां = वचनों के । श्राजाप्यताम् = याज्ञा दीजिए । ज्वलज्जटालं = जलती लाटी मे । समुगु नः = उद्यन है। प्रति भट: =मुकाबले का योद्धा । सनन्दः कटियन्द्र, तयार | भयितु = होने के लिए 1 त्वयि = तेरे में । प्रास्ताम् = अस्तु, रहने दो। प्रदेयः = देना है, देना चाहिए । मयि - मेरे ऊपर । मानयितव्यम् =माननीय । तदानृण्यं = उससे उाणता | गन्तुकामः जाने की चाहता था। रचयः-रक्षणीय । अधिष्ठाय = अाधार रखकर, एन पर प्रधिष्ठित होका | कति = कितने । वान = अथवा नहीं। सोढ़ा- मी। एकपटे एव = एक पद में ही, एक साथ ही । अशक्य = असम्भव । =gम प्रकार | प्राधानगालोबनेफ्रोध से श्रारक्त यांग्यों को। धीरं - धीरतापूर्वक । यग्नु = कहने के लिए । उपाक्रमत = उपक्रम करता था। प्रग्युपहिया - प्रत्युपकार, बदला। श्रीमद्भिः = श्रीमानाने । सनम् = तैयार । अष्टिनु -- चंष्टा करने के लिए । भावये = मानता हूँ. समझता हूँ । बालिशस्यात् = मुना में । गायु टारने की। मोदलेन-ऊदल ( अपने भाई ) के मानि-निरनता या । काले = समय होने पर । अनुभव नीयमेव भानुभव करना ही चाहिये। (१) मां ने। ममुदायिन - शनाया। नरमाय मन्या - मान ममता। गिरमि = निरपर | निचाय-पकर मदनी . माता (पामयिक प्रजाई । अंगः = मान । सो = पस यामा विद्या प्रतिकार (पाय) करने के लिए । :::: : नाना नाग। मादाग = समायो- mai मम:, ...। यामामुः = पन करने थे । दवा । सुन्न नाम की। नतीनर.- अपर । TAIT ना मा । पिना:- पन्नान -- यानुभव हाता! - यार । निया | चा:- यानगी । ..! :-- किन-श- १०५ D %E मयर वाणी । सम्मूर्छिताः टकराई हुई । उन्मादनां मदमस्ती को। श्रजनयत् = उत्पन्न करती थीं । कृषीवल = किसान । निपादिन्यः- बैठने वालियां । जगुः = गातीं थीं । हरित् = हरी । आस्तीर्णाः = बिछेहुये, व्याप्त । अधित्यका = ऊपर के भाग । पतद्धिः = गिरते हुओं के द्वारा । क्षणप्रभाभिः चन्चल, सुखदायक प्रभा वालियों से । वल्लीभिः- वेलोंसे । अलक्ष्यत - दिखाई देती थी। निपएणाः = बैठे हुए 1 काल विडम्बित एव =समय की विडम्बना [तिरस्कार से युक्त ही । पाश्रयितु -आश्रय लेने के लिए। चेष्टते-चेष्टा करता है । तदानीन्तनी = उस समय की, तत्कालीन | पणीकृताः = मूल्य यनादिये । परित्यज्यते छोड़ी जारही है। परावर्तयितु = लौटाने के लिए । अस्मान = हमें | प्रपयेत् = भेजे । इत्याशयात् =ऐसे अभिप्राय से । संयमिता:-खींचली। वल्गा:- बागें । प्रकृत्या प्रवृद्ध = स्वभाव से वृद्धिगत को । हृदि = हृदय में । निरुध्य-रोक कर । दुर्दैतोपहतेन दुर्भाग्य से ग्रस्त द्वारा । विचारवता विचारवान् के द्वारा । सक्रियते =सत्कार कियाजाता है । महोबातो महो- या से । निर्वासितौ = निकाले हुए। प्रवृत्ती प्रारम्भ हुए । उपलभ्य करके, जानकर । आनेतु-लानेके लिए । स्वभृत्यान् = अपने अनुचरों को। प्रेषयामासुः=भेजते थे । प्रेम्णा=प्रेमके द्वारा । गृहीतौ = पकड़े हुए, वाधिसकिए हुए । प्रतीयतुः = प्रति चलदिए [दो] । कृताभ्यर्थनौ-अभ्यर्थना किये हुए । प्राययतुः = प्राप्त होते थे । तौ = उन दो को। = उन दो को। श्रभ्यपेचयत् == अभिषिक्त, नियुक्त करता था। विरहित सूर्य = सूर्य से हीन । बलीयसाचलवान् द्वारा | समावृतं ढका हुथा । अपरः श्रन्योंने । “माण्डलिकराजभिः- छोटे मण्ड. लोके राजागणों के द्वारा । श्राकान्तुश्राक्रमण करने के लिए। अकारि - किया । कुतश्चित् = कहीं से । परावर्त माना = लौटती हुई। अनति दूरे = बहुत दूर नहीं, .समीप हो । गृहीतवती = लेती थी। नाविदितं- अविदित (अज्ञात ) नहीं है। कीदृशः= कैसा । न्ययुध्यन् - युद्ध करते थे। पराजिता! पराजित हो गये। जिवित्सितु मारने की इच्छा से । कथंकथमपि - प्राप्त । ऋदिनना मे । प्रातः-प्राम हुम । निवेदयामामुः = निवेदन करते थे । मृत्यति = Tमा करना है। सामूचित कर दिये। प्रासाद्य प्राप्त करके। नियनः = शिपिरपसाव । प्रात्यनिनः = नगर के छोरों पर वर्तमान ! निर्दयम् निदंगता पूर्वक । अभिमुन् = सामने मुकाबले में । मम्मदः = मुठभेद । उन्मी तिगुनी । दन-दुम देता था। प्रस्नुता = प्रा गई है । उपायान्त- = अन्य उपाय के न होने पर । मामायमाना=मास के अन्ततक की, एक मास की अवधिः-मोहलन । नदीया % उसको । श्रनुभूतवान् = अनुभव पाया। गितमन्देहा: -रहित । भूमुजः-राजा लोग। - अधिगम पाकर । भूपःगता । समानवान् = बुलाता था। गानि-गनी भी। महिना= समीपस्य । दतः- यहां से । गप्रम:- न्यस्थान का ' प्राय लेना । युगम् = उचिन । परिवाः = मादल । रियाः = अना देना चाहिये । म्याग्दः - टूट । तूणी = चुप । तुम। यार यानी । समाना = मास को । मन्त्रयन्ति = मन्ना मन्द नीम यदुन । पुरः पिलान = प्रागे पड़े हुओं को । पुरेय पीना। किमया D विजय की मांझा में। प्रदीप्त = ममुखन । मध्ये - माना है। देवनदेव्यपरामिधाना = मग नाम काय छांट कर । प्रमादनाया % माना नाहिये। माननाय - नाना चाहिये । कथितं = कहा हुमा । in | मायुयाय पान दुप। चारन्यः % माट । मिया मनावित समय पर | मनात REपाला मा. दर्शन राना था। प्रनायो - ri = नुदप्रामातुंग -- प्रागे । pant :- तुम मे frir में Him Irriffanyीसगरि पनाया। REET माग्नं गया। Ass .:...::mirminाराम - - प्रारम्भ हो गया है। दुस्प्रे घयतां कठिनता से दिखाई देने को, दुश्यता को । यातं हो गया है, चला गया है। प्रेक्षकाणां दर्शकों का। विवृत. द्वाराणि = खुले द्वारों वाले । खदेवजीवितांतू ही जिस का एक मात्र जीवन है, ऐसी को। अपहाय = छोड़ कर । प्रयासि = जाता है (त) चिराया- न्तर्हितः = देर से छुपा हुश्रा ( अदृश्य ) । धृ यन्ते = सुने जाते हैं। गमिताः स्मः = पहुंचा दिये हैं। भूयो भूयो-बार यार। याच्यमान: - प्रार्थित प्रदतः=दी है । स्वर्यताम् = शीघ्रता करिये । सहानुजेन-छोटे भाई के साथ । भुक्ताः-भोगे । कावालेन सड़ग द्वारा । हस्त मुष्टि - हाथ की मुट्ठो । त्वरितमेवं शीघ्र ही । समुदेतु उदित हो। नमो मण्डले-आकाश मण्डल में | अन्धकार कवलितम्-तम ग्रस्त । अवधेहि जानले। वक्रित ग्रीवः = टेढ़ी गर्दन किये। श्रस्थाने = अनुपयुक्त स्थान में । अनुरोधः :-श्राग्रह । निवृत्त भेव = निवट हो गया । श्रावाम् -हम दोनों । कृते लिए । जनकन = पिताने । विस्मर्तव्यम् = भूलना चाहिए । पराइ मुख: -विमुख, परे को मुख वाला । करदी भूताः = करदाता बने । प्राणानपे प्राणों की अपेक्षा ( पर्वाह ) न करने पूर्वक । वहवः न करने पूर्वक । वश्वः = बहुतसारे । प्राचाभ्याम् - हम दोनों ने निष्कासितौ निकाल दिये । द्विर्भाषते = दो यार कहता है। अभापत = बोला । अयुक्त अनुचित । उपेक्षते - उपेताकरता है। ब्राणाय:- रक्षा के लिए। सत्रातृक: भाई केसाथ । अनी कृतवान् = स्वीकार करता था। अग्रोपेक्षणम् ग्राज उपेक्षा करना । खेदयति = दुःख दे रहा है । उपेक्ष्य - उपेक्षा करके । य:-जो। अन्यत्र दूसरी जगह । पिण्ड पालितः = शरीर पोपण करने वाला । वदन्ति = कहते हैं । पूर्वे = पहिले लोग । उखुर उद्घार कर। अर्थ-(आल्हा ऊदल महोबा के इतिहास प्रसिद्ध वीर हैं, जिन की गाथाएँ अय भो, पाल्हा छन्दों में गाई जाती हैं ) चन्देल वंशीय क्षत्रियों का अन्तिम राजा परमार देव नाम का था । अव महोत्रा के नाम से प्रसिद्ध नगर में उसकी राजधानी थी। परमार देव निर्वल है, यह देख कर (इति) हस्तिनापुर और कन्नौज के राजाओं ने उसको यहुत तंग किया ( वह उन द्वारा - -- , । । कठिनता से । प्रापुः प्राप्त हुए । निवेदयामासुः = निवेदन करते थे । मृष्यति = क्षमा करता है। बताः = सूचित कर दिये । श्रासाद्य =प्राप्त करके । निवेशः = शिविर, पपाय । प्रान्तयनिनः = नगर के छोरों पर वर्तमान । निर्दयम् निर्दयता पूर्वक । अभिमुखं = सामने मुकाबले में । सम्मदः = मुटमंद । टन्मी लित - खुली । श्रतुदत = दुःख देता था। प्रस्तुता = श्रा गई है । उपायान्त- राभावे = अन्य उपाय के न होने पर | मासायसाना =मास के अन्ततक की, एक मास की । अवधिः =मोहलत । तदीया = उसकी । थनुभूतयान् = अनुभव करता था। विगतसन्देहाः =म.ह रहित । भूमुजः-राजा लोग । अधिगत्य =पाकर । भूपः = राजा । समाहृतवान् =युलाता था। राजी श्रपि =रानी भी । सन्निहिता=समीपस्थ । इतः यहां से । स्थाना न्तराश्रयणं = अन्यस्थान का श्राश्रय लेना । युक्तम् = उचित। परिखाः = खाइयां । विवेयाः = बना देना चाहिये । स्थाणुः = हू । तूणी = चुप । हन्त = दुःख है । वाक = वाणी । समर्शिता=प्राप्त को । मन्त्रयन्ति = सलाह देते हैं। अमन्द = तीव्र बहुत । पुरः स्थितान् = अागे खड़े हुओं को । पुरेव = पहिले की तरह । विजय-धिया = विजय की शोभा से | प्रदीप्त = समुज्वल । विलोक्यन्ते = देखे जाते हैं । मन्ये मानती हूँ । देवलदेव्यपरामिधाना देवलदेवी जिसका दूसरा नाम है, ऐसी । विहाय = छोड़ कर | प्रसादनीया = प्रसन्न करनी चाहिये । पानेतव्यः= लाना चाहिये । कथितं = कहा हुा । राज्ञा=रानी ने | ससाधुवादं = धन्य धन्य कहते हुए। चारणः = भाट । श्रानयनाय = लाने के लिए । यथा समये = उचित समय पर । सम्प्राप्तः = पहुंच गया । साक्षाचकार प्रत्यक्ष करता था, दर्शन करता था। प्रतीयते = प्रतीतहोता है । अकिञ्चनौ = तुच्छ । श्राप्लुता= भरी हुईं । पूरेण = प्रवाह से । श्रायुग्मन् = श्रायु वाले ! नशुभे = अशुभ में, विपत्ति में । मर्यन्ते - स्मरण किये जाते हैं। विधातृ रोपा नल पतितः = विधाता की क्रोधाग्जि मेंपड़ा हुया । रक्षिता-रक्षक । तत्रत्यानां -वहां वालों का । संरुदं घेरा हुया । निमजति = डूब रहा है। राष्ट्र -राज्य । नामशेषतां नाम मात्र याकी रह जाने को । प्रवृत्तम् उस लमय कन्या का जन्म बड़ा अनर्थकारी माना जाता था। क्योंकि कन्या के विवाह के अवसर पर युद्ध कठिनता से निवारणीय होता था । उसी काल में, थाल्हा ऊदल भी जन्म प्राक्ष करते थे। विज्ञान प्रधान समय में वीर लोगों का सम्मान स्वाभाविक ही होता है । राजा लोग विज्ञासरत थे और प्रजा उन का अनुकरण करने वाली होती हैं । न्याय क्या है, सदाचार क्या है, यह कोई नहीं समझता था । ऐवे जैसे यावरणों [ कार्यो] का जैसा फल होता है वह निश्चय से हुअा ही। थाल्हा का मामा माहल जी था। उसका विलक्षण स्वभाव किमी भी योग्य के ऐश्वर्य की उन्नति को मन से भी सहन नहीं कर सकता है। महोया प्रान्त में, पाल्हा ऊदल को कार्तिलता को दिन दिन, फैलतो देख कर, माहल जी महोदय उसको जड से उखाड़ देने के लिए प्रयत्न करने लगा । किन्तु माहल जी का यह प्रयत्न ही उनका यश (के लिए ) बढ़ाने का मूल मन्त्र बन गया ( उसकी निंदा से उनका प्रचार होने लगा)। माहल जी ने सर्वत्र आल्हा ऊदल की निन्दा फैलाई । कभी यह (माहल जी) राजसभा में भी गया। वहां पाल्हा ऊदल भी समीप में स्थित नहीं थे। राज-सभा में प्रविष्ट हुए माहल जी ने अपना मुख शोक से व्याकुल सा बना लिया । उस प्रकार बने उसको देखकर राजा बोला, "मामा ! कैसे शोकाकुल सा आपको मैं देख रहा हूं ?" राजा के वचन सुनकर माहल जी के दोनों नेत्र अश्रु प्रवाह के जल से भरे हुए हो गये (आँखों में आँसू भर श्राये )। कपट जाल रचने में चतुर लोगों को अपनी मनोभावनाओं पर जितना नियन्त्रण (अधिकार) होता है, उतना, योग के अभ्यास द्वारा इन्द्रियसमूह को वश में किये हुए (किसी ) नर व्याघ्र (पुरुप श्रेष्ठ ) को भी नहीं । उनका (कपट गुरुयों का ) हृदय चाहे शोक से व्याकुल हो, किन्तु उनके होठ पर मन्द हास्य को रेखा देखी जाती है। मन प्रसन्न होता है, ( किन्तु ) नेत्रों से आंसुओं का प्रवाह वहता ( होता ) है। मन में द्वेष को ( ईर्षा को ) अग्नि प्रज्वलित है, किन्तु वाणी श्रमृत जैसी ( उनके मुख से ) निकलती है । माहल राजा को वोला, "अापके कर पल्लव से लालित इस जनके ( मेरे ) अब कोई भी मनोरथ शेष नहीं हैं - 106 पीडित हुया)। पाल्हा श्रीर ऊदल उसकी ( राज्य ) सभा में सभासद (सदस्य) थे। बाल्य काल में ही श्रनाथ यने ये दोनों राजा परमार देव के द्वारा ही पालित पोषित हुए । परमार देव की रानी मालहन देवी ने इनको पुत्रों के समान पाला था । इनका पिता 'जसराज' नाम का था । वह किसी युद्ध में वीर गति । मृत्यु ] को प्राप्त हो जाना है। इसके पश्चात. इनके पिता का सारा कार्य [ जो कि पिना करता है ] परमार देव के द्वारा ही पूर्ण हुआ [ राजा उनका पिता बन गया ] 1 कप से वयस्क यने ये दोनों मूर्य और चन्द्रमा के समान अपनी कीर्ति [ चन्द्रिका ] का विस्तार करने लगे [ यश कमाने लगे। उस समय वल पराक्रम को अधिकता के कारण महोया नगर प्रसिद्ध हो गया। इन दोनों के प्रताप का सूर्य प्रकाश के मध्य में चढ़ा हुआ शत्रुओं को सन्ताप देता था। [ उस समा] अयोध्या और महोया के अधीश्वर की सेना के सामने क्षणभर भी ठहरने को कौन समर्थ था ? [ वह श्रविजेय थी। ] पाल्हा और ऊदल भी राजा के द्वारा श्राभारी अनुगृहीत ] किये गये, इन का विवाह भी राजा ने हो अपने ही खर्च से किया और रानी इन दोनों को पुत्र के सदृश ही देखती थी [ पुन में और इन में विशेपता अन्तर नहीं समझती थी] | इसी कारण से इन दोनों की भी राज- वंश में भारी भक्ति हो गई । राज्य की रक्षा के लिये, प्राणों को भी सुख से छोड़ने की प्रतिज्ञा किये हुए ये दोनों रहते थे । पाल्हा उदल जैसे वीर जिसके वश में रहते हैं, उसे सभी [ अपने ] प्राण की रक्षा चाहने वाले लोग नमस्कार ही करेंगे [ करें ] । अतः, अन्य सप राजा लोग परमार देव को, श्रद्धा से सम्मानित करने लगे [ उसका सम्मान करने को प्रायोजन, उप- कम, करने लगे] । महोया राज्य की प्रतिष्ठा फिर यढ़ गई । वहां का क्षीण चन्द्र [ यश ] कला से पूर्ण ( बना अय) दिशाओं को प्रकाशित करने के लिए प्रवृत्त हो गया (महोबा राज्य का यशो विस्तार चारों ओर होने लगा | उन दोनों का सदैव, युद्ध के लिए प्रवृत्त हुओं का ही समय निकल- ता था [ सदैव युद्ध व्यस्त रहते थे ] । उस समय भारत वर्ष में सब ओर शुद्ध की अग्नि भड़की हुई थी। और इसी कारण वीरों का सम्मान किया जाता है । उस समय प्रति दिवस तलवार की झंकार सुनाई पड़ती थी। - उस समय कन्या का जन्म बड़ा अनर्थकारी माना जाता था। क्योंकि कन्या के विवाह के अवसर पर युद्ध कठिनता से निवारणीय होता था। उसी काल में, आल्हा ऊदल भी जन्म प्रास करते थे। विजाम प्रधान समय में वीर लोगों का सम्मान स्वाभाविक ही होता है । राजा लोग विलासरत थे और प्रजा उन का अनुकरण करने वाली होती हैं । न्याय क्या है, सदाचार क्या है, यह कोई नहीं समझता था। ऐसे जैसे प्रावरणों [ कार्यों ] का जैसा फल होता है वह निश्चय से हुया ही। पाल्हा का मामा माहल जी था। उसका विलक्षण स्वभाव किसी भी योग्य के ऐश्वर्य की उन्नति को मन से भी सहन नहीं कर सकता है। महोया प्रान्त में, पाल्हा ऊदल की कातिलता को दिन दिन, फैलनो देख कर, माहल जी महोदय उसको जड़ से उखाड़ देने के लिए प्रयत्न करने लगा । किन्तु माहल जी का यह प्रयत्न ही उनका यश ( के लिए ) बढ़ाने का मूल मन्त्र बन गया ( उसकी निंदा से उनका प्रचार होने लगा)। माहल जी ने सर्वत्र पाल्हा उदल की निन्दा फैलाई । कभी यह (माइल जी) राजसभा में भी गया। वहां पाल्हा ऊदल भी समीप में स्थित नहीं थे। राज-सभा में प्रविष्ट हुए माहल जी ने अपना सुख शोक से व्याकुल सा बना लिया । उस प्रकार वने उसको देखकर राजा बोला, "मामा ! कैसे शोकाकुल सा श्रापको मैं देख रहा हूं ?" राजा के वचन सुनकर माहल जी के दोनों नेत्र अश्रु प्रवाह के जल से भरे हुए हो गये ( आँखों में आँसू भर आये ) । कपट जाल रचने में चतुर लोगों को अपनी मनोभावनाओं पर जितना नियन्त्रण (अधिकार) होता है, उतना, योग के अभ्यास द्वारा इन्द्रियसमूह को वश में किये हुए ( किसी) नर व्याघ्र (पुरुप श्रेष्ठ ) को भी नहीं । उनका (कपट गुरुयों का ) हृदय चाहे शोक से व्याकुल हो, किन्तु उनके होठ पर मन्द हास्य को रेखा देखी जाती है। मन प्रसन्न होता है, ( किन्तु ) नेत्रों से प्रांसुओं का प्रवाह वहता (होता ) है । मन में कैप को ( ईर्षा को ) अग्नि प्रज्वलित है, किन्तु वाणी श्रमृत जैसी ( उनके मुख से ) निकलती है । माहल राजा को बोला, "श्रापके कर पल्लव से लालित इस जनके ( मेरे ) अब कोई भी मनोरथ शेष नहीं हैं (मय पूर्ण हो गये हैं)। किन्तु, "श्रापके पाश्रय से ही यहा हुया व्यनि., उन उन (थापके) उपकारों के प्रनि तिलान्जलि समर्पित काके (भुलाका), अय, आपके विषय में ही (माथ ही) कपट करने को उद्यत हुअा है," यह जान कर, मैं अत्यन्त चिन्तित हो गया है।" परमार देव ने पूछा, "क्या, मेरे अन्न से पुष्ट होने वाले व्यक्तियों में, है कोई ऐसा ?" माहल कहना है, "देव । में हो (ई)।" चकित राजा ने पूछा, "क्या श्राप ?" माहल उत्तर देना गा, "महाराज ! क्या यताऊँ ? अापके कुरा के समुद हृदय में कोई नाकू (जन- चरजीव) प्रविष्ट हो गया है। मेरा भागजा पाल्हा । उसका (किया हुया) राज्य के प्रति अपराध मेरा ही होता है।" राजा कुछ दुःग्वित या योजा, "याहा मेरे पुत्र के समान । बड़े कष्ट से मैंने (उमे) पाला है । वह क्या श्रज मेरे विषय में कोई परयन्त्र (विद्रोह) रच रहा है ? मैं इस विषय में कोई विश्वास नहीं कर सकता।" मा ल राजा के पास सरककर (जाकर) में कुछ कहता है । है कान ३ इस समय, पाल्हा ऊदल अादि बहुत से लोग घुड़सवारी की शिक्षा के अभ्यास में लगे हुए हैं, वहाँ यहुत से दर्शक भी उपस्थित है। इसी बीच में कन्चुकि (राजमहल के वृद्ध) ने श्राकर राजमहल का बुलावा सुनाया । महाराज ! के बिना अवसर के बुलावे को सुनकर आल्हा कुछ भयभीत सा हो गया, किस निमित्त ( कारण ) से अाज महाराज बुलाता है ?" अश्व संचालन छोड़कर वे दो राजसभा को चल दिये । और, दर्शक गण परस्पर वार्तालाप करते हुए, अपने अपने घर को चले गये। राजा के समीप जाकर वीरों के ढंग में नमस्कार करके, वे दोनों यथोचित स्थान पर बैठ गये । राजा बोला, "मेरी प्रार्थना आपको दे दी जायगी।" "क्या काय (कर्तव्य) करना है"? पाल्हा ने आदर पूर्वक और विनय के साथ पूछा । पाल्हा महार.ज को ना करने में सर्वथा असमर्थ था, क्योंकि ना करना क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध है। इतना कह कर वह टेढ़ी ग्रीवा करके, अपने मामा को देखता था और निश्चय कर लेता था कि "इसने ही कोई कपट जाल रचा है ।" पाल्हा फिर राजा को बोला, "महाराज के प्रश्न करने का यह क्रम (सिलसिला) इस जन को (मुझे) सन्देह .

के समुद्र में दुवा रहा है (मेरे मन में सन्देह उठता है)। ऐसे वचन सुनने का यह जन (मैं) अभ्यासी नहीं है । जैसी इच्छा हो, प्राज्ञा दीजिये । आपकी आज्ञा से, मैं जलनी लाटों वाली अग्नि का भी श्रालिंगन करने को कटिबद्ध हूँ (भाग में कूद सकता हूँ); काल का भी प्रतिभट (विरुद्ध लड़ने वाला योद्धा) हो सकता हूं (मृत्यु से भी लड़ सकता हूँ।" राजा उसको योला, "मेरा भी तेरे में ऐसा ही विश्वास है । अस्तु नाहर नाम का घोड़ा मुझे देना है।" इस राज वचन को सुनकर पाल्हा यहुत दुखी हुा । 'यह राजाज्ञा कैमे पालन करनी चाहिये ? राजा के शोध को यदि गिन भी लिया जाय (उसको सह भी लिया जाय), तो भी ना करके क्षत्रियधर्म का कैसे तिरस्कार किया जाय ? राजा का उपकार मेरे ऊपर बहुत बडा है, किंतु धर्म के विरुद्ध राजा का वचन कैसे मान्य हो किसी क्षत्रिय वीर के द्वारा (क्षत्रिय धर्म विरुद्ध वात सकता है राजाकी)? इस शरीर को महाराज ने पाला है, सो, उसको से छोड़ कर उससे उनणता को प्राप्त करने की इच्छा वाला हूं शरीरार्पण द्वारा उऋण हो सकता हूं)। किन्तु धर्म तो सब प्रकार से रक्षणीय ही है । शस्त्र और घोड़ा, ये दोनों क्षत्रियों के याद्य प्राण रूप होते हैं, जिनके बिना वह जी नहीं सकता। इनका ही श्राधार लेकर क्षात्र धर्म ठहरता है । सो अब क्य करना चाहिये ? राजा ने मेरे ऊपर उपकार किया है. यह सत्य है. किन्तु मैंने भी तो राज-सेवा की ही है। राजसेवा के लिए अथवा मैंने कितनी श्रापत्तियाँ नहीं सहीं ? अब, उन सब को एक पाथ ही भूल कर, राजा मुमको धर्म भ्रष्ट करने को उद्यत है । (अतः) अब राजा की श्राज्ञा का पालन असम्भव है।" पाल्हा, इस प्रकार, बहुत विचार करके और माहल देव पर क्रोध से रक्त नेत्र डाल कर, धैर्यपूर्वक कहने लगा, "(यह जन) राजा की प्राज्ञा का पालन करने में असमर्थ है।" परमादेव बोला, "क्या मेरे उपकारों का यही प्रत्युपकार (बदला) है ? श्रीमान् ने यह पदवी मेरी कृपा से ही प्राप्त की है।" पाल्हा ने उत्तर दिया, "महाराज ! जानता हूं, सब जानता हूं। किन्तु, क्षत्रियधर्म के पालन को मैं प्रत्युपकार (बदला देने) से भी बड़ा मानता हूं। धर्म के विरुद्ध राजा का वचन किसी भी प्रकार से माननीय नहीं होता । देव ने शरीर पाला है, (मो) वह तो देव के कार्यों में (के लिए) कटिबद्ध है. किन्तु, धर्म के विरुद्ध आचरण करने में भी मैं अपने को असमर्थ

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१९३. अब सब सुखी हैं। और, सभी घर में बैं?, वर्श समय की शोभा को देखते हैं। ऐसे समय में, कोई भी घर से बाहर, एक पग भी चलने के लिए नहीं चाहता। समय (कालचक) की विडम्बना (हास्य-तिरस्कार ) का पात्र हो वकाल में, एक स्थान को छोदका, दूसरे स्थान का चात्रय लेने के लिए चेष्टा करता है । पाल्हा ऊदल के, माता के साथ, जन्मभूमि छोड़ने का यहो (वयो का) समय था । अपवा, उनको ताकालिक मानसिक अवस्था का वर्णन करने को कौन समर्थ हो सकता है ? जहां याज्ञापन बिताया, जिसकी रक्षा के लिए प्राणों का मूल्य लगा दिया, पान हाय ! वही (मातृ भूमि) दोड़ो जा रही है । या जन्म भूमि का त्याग फिस पनि को दुःखी नहीं करता ? "हम रूपे हुए जा रहे हैं, इमलिए, कमी राजा हमें लौटालने के लिए किमी को भेज दें," इस अभिनाय से घोड़ों की यागडोर कस ली, जिससे उनको गति मन्द हो गई । प्रकृति सौन्दर्य से बढ़े हुए शोक के प्रवाह को, किसी प्रकार, हृदय में रोक कर वे चल दिये । गुण ग्राहो लोग, सब जगइ, मिल जाते हैं। एक हत-भाग्य मूर्य के द्वारा तिरस्कृत गुणी (किमी) दुनो विचारवान् व्यक्ति द्वारा सम्म सम्मानित होता है । "पाल्हा ऊदल, महोया से बाहर निकाले हुए, अन्य देश को जाने के लिए चल दिये है," इस समाचार को पाका, यहुत से राजाओं ने उनको लाने के लिए अपने सेवक भेजे (नौकरों को भेजते थे)। उन में कान्यकुब्ज (कलौज) के राजा जयचन्द का पुत्र भी था । राजकुमार के द्वारा, प्रेम से वावित किये वे दोनों कानोज नगर की शोर चल पड़े । वहाँ महाराज के द्वारा सम्मानित और श्रादित (सस्कृत) हुए अत्यन्त प्रेम (प्रसन्नता) को प्राप्त हुए । राजा जयचन्द ने उन्हें अपने' सेनापति के पद पर अभिपिक्त (नियुक्त) कर दिया। सूर्य से रहित मेरु का शिखर घने अन्धकार से प्राच्छादित हो जाता है। आल्हा ऊदल से रहित महोबा नगर पर श्रामण करने के लिए अन्य माण्ड लिक (छोटे छोटे) राजाओं ने प्रयत्न किया । इस अवसर पर, पृथ्वीराज की सेना कहीं से लौटती हुई, मार्ग के मध्य में, महोया नगर से धोदी दूर विधान (पड़ाव) ग्रहण करती थी (पड़ाव डात तो धो)। सैनिकों का कैसा ११४ स्वभाव होता है, किसी से ज्ञात नहीं है। बिना कारण के ही, चन्देल चौहान सैनिक परस्पर लड़ पड़े। चौहान सैनिक थोरे थे, इसलिए हारे हुए, अत्यन्त क्रोध से, जगत् को नष्ट करने की इच्छा के लिए चले, बड़ी कठिनता से राजधानी को प्राप्त हुए, और निवेदन करते थे सारे यथार्थ वृत्तान्त को राजा पृथ्वीराज के पास, "हे महाराज ! कोई भी चीर थपने सैनिकों का अपमान क्षमा नहीं करता।" पृथ्वीराज ने सेनापतियों को सेना तैयार करने के लिए श्राज्ञा दो । फिर, समय पर, पृथ्वीरान सेना सहित महोया की ओर चल दिया । महोबा के समीपवर्ती स्थान को पाकर, चौहान सेना का शिविर स्थापित हुश्रा और नगर प्रान्त पर स्थित सब गायों को उन्होंने निर्दयतापूर्वक लूट लिया । चन्देलों की सेना चौहानों की सेना के सामने ( मुकाबले में ) चली । दोनों में प्रथम मुठभेड़ हुई । किन्तु चन्देलों की सेना चौहानों की सेना से हार गई । अव परमारदेव की आँख खुली । श्राहा ऊदल का अभाव बहुत दुःख देने लगा। किन्तु इस समय यह सोचना (चिन्ता) प्रयुक्त है । अन्य उपाय न होने पर, सेना तैयार करने के लिए. चन्देल राजा ने एक मास की -धि मोगी और पृथ्वीराज ने उस्की प्रार्थना स्वीकार कर ली । चौहान बा (पृथ्वीराज) सन्धि के नियमों और (अपनी) प्रतिज्ञा का अच्छी तरह पालन करता है । इस प्रतिज्ञा पालन के दोप सं या गुण से, इसने : कष्ट नहीं उठाये, ? तो भी प्रतिज्ञा पालन के व्रत को नहीं छोथा। एक मास की अवधि का यह पालन ही करेगा," इस विचार से चन्देल राजागण निःसन्देह (निश्चिन्त) हो गये । मासान्त की अवधि पाकर चन्दल राजा परमारदेव, सलाह करने के लिए सभा बुलाता था। वहां रानी भी समीप में स्थित थी। वहां किसी "यहां से किसी अन्य स्थान का श्राश्रय लेना ही इस समय उचित है।" किसी दूसरे ने कहा, “नगर के चारों ओर मजवृत खाइयां बना दंगी चाहिये।" राजा ढूंठ की तरह चुपचाप बैंटा है। इस अवसर पर रानी बोली, "दुःख है, तुम वीरों की यह वाणी (बचन) ? जिन्होंने पहिले, पराक्रम से विजयलक्ष्मी प्राप्त की थी, अब वे ही अन्य स्थान का प्राश्रय लेने के

Sanskirt Sushma Ki Tika

Author
Shastri,sugan Lal
Title
Sanskirt Sushma Ki Tika
File name
Sanskirt Sushma Ki Tika
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2010/09
Publisher
New Dehli, Ringal Book Dipoo
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
409885
Barcode
99999990070237.00
Scanning centre
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