Bharti Bhawan Library Allahabad

Mimansa Darshanam

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* ओ३म्
গীর্কি জালালগুলি স্বীবন্ত
भीमांसा दर्शनम्
[ मूल संस्कृत और भाषानुवाद सहित ]
Raaheen
मिलने का पता:-
देहाती पुस्तक भंडार,
चावड़ी बाजार, दिल्ली-६
फोन : २६१०३०
8
प्रथमवार १५००]
[मूल्य

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Roma
प्रकाशक
যনিধি গঙ্কাল
दरीबा कला, देहली।
सर्वाधिकार सुरक्षित है।
मूल्य ६) रुपया
प्रथम संस्करण
मुद्रका
सार्वदेशिक प्रेस,
दरियागंज, दिल्ली-७

3222 SE महर्षि जैमिनि प्रणीत मीमांसा-दर्शनम् 184-8000mina प्रथमोऽध्यायः प्रारभ्यते सं०-महर्षि जैमिनि अभ्युदय और मोक्ष की प्राप्ति के लिये वेदोक्त धर्म का प्रतिपादन करते हैं। अथातो धर्मजिज्ञासा ॥१॥ प० -अथ) वेदाध्ययन के अनन्तर (धर्म जिज्ञासा) धर्म जानने की जिज्ञासा (अतः) अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्ति का साधन है। मा० जन्मान्तर में मनोवांछित कार्यों का उदय और दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति द्वारा परमानन्द प्राप्ति, दोनों धर्म से प्राप्त होते हैं अतः धर्म की अभिलाषा होनी ही चाहिये। सं०-धर्म का लक्षण क्या है। चोदनालचणोऽर्थो धर्मः ॥२॥ प० ऋ०-(चोदना लक्षण:) विधान में आया (अर्थः) भाव (धर्मः) कहा जाता है।

माळ-वेद में जिस जिस कर्म के करने की प्रेरणा हो यह धर्म का लक्षण है अर्थात् जिससे जन्म जन्मान्तर में परमानन्द मिले ভন বহু মানবিক কক ক্ষা স্কুল অফ া বন্ধুয়া গ্লানিলা चाहिये। संक-धर्म प्रमाण की परीक्षा की स्थापना करते है। तस्य निमित्तपरीष्टिः ॥३॥ ५० ऋ० (तस्य) उस वेदोक्त धर्म की (निमित्त परीष्टिः) प्रमाण परीक्षा है। भा०-धर्म के विषय में केवल वेद ही प्रमाण है अतः प्रमाण परीक्षा की स्थापना श्रेष्ठ है। सं०-प्रत्यक्ष प्रमाण धर्म में काम नहीं आता। सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्म तत्प्र- त्यक्षमनिमित्त विद्यमानोपलम्भनत्वात् ॥४॥ ५० ऋ०- (पुरुषस्य) पुरुष को (इन्द्रियाणां) इन्द्रियों का (सत्सम्प्रयोगे) कार्य वस्तुओं से संयोग होने पर (बुद्धि जन्मः) जो ज्ञान होता है (तत्) उसका नाम ही (प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष है। वह (अनिमिन्त) धर्म में प्रमाण नहीं क्योंकि (विद्यमानो- पलम्भनत्वात् ) वह विद्यमान पदार्थों का इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होता है। भा-आभ्यन्तर और बाह्य उभय भेद इन्द्रियों के होते हैं यह इन्द्रियां अपने अपने विषय से सम्बन्ध उत्पन्न कर तत् तत् पदार्थ का बोध कराती हैं और इसी सम्बन्ध के ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाण माना है। परन्तु अतीन्द्रिय वस्तु का ज्ञान किस प्रकार । हो, जहां इन इन्द्रियों का सम्बन्ध ही नही है प्रत्यक्ष प्रमाण धर्म में सर्वथा लागू नहीं होता। इसी प्रकार न अनुमान प्रमाण काम में लाया जा सकता है क्योंकि अनुमान का भी दृष्टान्त में नियम से सम्बन्ध माना जाता है और उसके दुसरे अज्ञात सम्बन्धि का ज्ञान उद्गत् होना अनुमान होता है परन्तु अतीन्द्रय पदार्थ में तुलनात्मक धर्म अनुमान से इसलिये परे होता है कि जिसका प्रत्यक्ष नहीं उसका अनुमान कैसा! सं०-अतः शब्द और अर्थ का नित्य सम्बन्ध होने से वेद स्वतः प्रमाण है। उसको कहते हैं। औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञान मुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेचत्वात् ॥५॥ प० ऋ० (शब्दस्य) वेद वाक्यों में प्रत्येक पद (अर्थन) व अर्थ से (औत्पत्तिकः) स्वाभाविक ( सम्बन्धः) सम्बन्ध रखता (तस्य) धर्म के (ज्ञान) यथार्थ ज्ञान का साधन (उपदेशः) ईश्वरो- पदिष्ट होने से (च) तथा (अनुपलब्वे, अर्थ) प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अप्राप्त (अव्यतिरेक.) व्यभिचारी और विरोधी नहीं है (बादरायणस्य) व्यास जी के मत में तत्] वह वचन [अनपेक्ष- स्यात् ] अपने अर्थ सत्यता के कारण [प्रमाणं] धर्म में स्वतः प्रमाण है। संक-शब्द निल्य है, अतः पूर्व पक्ष करते हैं। कमैके तत्र दर्शनात् ॥६॥ 3 २० मा एक कोई कमी शब्द को कार्य मानते हैं। वन शब्द में [दर्शनात अमल पाया जाता है। भाजो बस्तु यत्न से प्राप्त होने वाली है वह अनित्य होगी জুন লিঅফ কই হাত খরী অল ইঞ্জিভীবা উ অ সুস্থ স্বালিং हो जायेगा क्योंकि वह कार्य हो गया इससे अनित्यता Par सं०--पुनः सनित्यता दिखलाते है। अस्थानात् ॥७॥ 4 [थास्थानात नहारने वाला होने से भी भा-नित्य वस्तु स्थिर होती है शब्द उच्चारण काल अनन्तर नहीं रहता अतः बानित्य सिद्ध है। सं०-दूसरा अनित्यता हेतु यह भी है। करोति शब्दात् ।। ५० करोति शब्दात् ] देवदत्त ने शब्द किया इस विषय व्यवहार से भी इसकी अनित्यता होती है। सं०-और हेतु से भी अनित्यता है। सत्त्वान्तरे च योगपद्यात् ॥ प० ऋ०-[ सत्त्वान्तरे च] इस तथा अन्य देशस्थ पुरुष में [योगपद्यात् ] एक ही समय में प्राप्ति होने से भी शब्द अनित्य है। मा०-एक शब्द अनेक देशान्तर में मिलने से भी उसकी अनित्यता देखी जाती है जो देवदत्त यहां 'गो' शब्द कह रहा है देशान्तर में शिवदत्त भी 'गौ' शब्द कहता है अतः यदि एक नित्य शब्द होता तो एक काल में ही, एक अथवा अनेक देश में दो व्यक्तियों में उसकी समान उपलब्धि न होती। अतः शब्द नाना है और नाना होने से अनित्य भी हैं सं०-अन्य हेतु भी दिया जाता है। प्रकृति विकृत्योश्च ॥१०॥ प० ऋ०-[च तथा प्रकृति विकृतयोः प्रकृति या विकृति के कारण शब्द अनित्य है। भाo-शब्द में एक अक्षर के स्थान में दूसरा आने अर्थात् आगम और लोप होने से भी अनित्य है क्योंकि प्रकृति विकृति रूप होता रहता है अतः शब्द अनित्य है। सं०-और भी हेतु हैं। वृद्धिश्च कर्तृभूम्नाऽस्य ॥११॥ ५० ऋ०-[च] तथा [क भूम्ना अधिक शब्द बोलने वालों के कारण से [अस्य] शब्द के वृद्धि] बढ़ते देखे जाने से भी शब्द अनित्य है। मा०-पुरुष प्रयत्न से वृद्धि को प्राप्त होने वाली वस्तु अनित्य होती है। शब्द भी पुरुष प्रयत्न से बढ़ता है, अतः अनित्य है। सं-अब इन सब का उत्तर दिया जाता है। समन्तु तत्र दर्शनम् ॥१२॥ प० ०-[] किन्तुतिननित्य तथा अनित्य मानने वालों में [दर्शनम्] शब्द का क्षणमात्र दर्शन होना सम] समतुल्य है भा० अनित्यवादी शब्द को प्रयत्न से उद्भूत मानते हैं और नित्यवादी के भी मत में प्रयत्न से उद्भूत है अतः दोनों मतों है में उत्पन्न और उभूत प्रकट होने के आगे क्षण की समा आता है अतः वह प्रयत्न सिद्ध शब्द नित्य है। হন মুখ ঘ ানুষ মূল্প ক্ষ ভ ল ভ তলক্ষা ভাষা। सतः परमदर्शन विषयानागमात् ॥१३॥ प०० सतः] शब्द के होने से [श्रदर्शन] जो दूसरे क्षण में दर्शन न होना यह [प] केवल [विषयानागमात् ] शब्द के व्यंजन न होने से मा०-जो यह कहा गया कि उच्चारण के अनन्तर शब्द नहीं रहता अतः वह अनित्य है, यह समीचीन नहीं । उसका उस समय अदर्शन नहीं है किन्तु उसका अभिव्यंजक बोलने बाला न रहने से प्रतीत नहीं होता। अतः शब्द नित्य है। सं० आठवें के पूर्व पक्ष का उत्तर यह प्रयोगस्य परम् ॥१४॥ १० ऋ०-(परम्) किन्तु (प्रयोगस्य) पचति, करोति, क्रिया आदि उच्चारण के मात्र से हैं। मा- पचति पकाता है, 'करोति करता है यह क्रियायें उच्चारण के अभिप्रायः से हैं बनाने के नहीं अर्थात् उसका मूल कर्ता है अतः शब्द नित्य है। आदित्यवद्योगपद्यम् ॥१५॥ प० -( यौग पद्यम् ) एक शब्द का अनेक देशों में समकाल में होना [ आदित्यवत् ] जैसे सूर्य के समान समझना। भा-जैसे एक सूर्य एक समय में अनेक देशों में समकाल में दिखाई देता है इसी प्रकार शब्द स्वरूप से नानात्व को प्राप्त नहीं अतः नित्य है। सं० दशवें सूत्र का उत्तर यह है। शब्दा-तरमविकारः ॥१६॥ - अविकार:] जहाँ ई के स्थान में या होता है वह লিঙ্কাৰ নহ লছ কিন্তু হালাল) অন্ধা ই স্কুল ছাত की ओर है। भाग-'य' अक्षर यदि इअक्षर का विकार होता तो यकार के ग्रहण में इकार का नियम पूर्वक प्रहण होना चाहिये था क्योंकि जिसका जो विकार है वह अपनी प्रकृति के ग्रहण में नियम रखता है अतः यकार इकार का विकार नहीं केवल शब्दान्तर भान है। सं०-ग्यारहवें सूत्र का उत्तर यह है। नादवृद्धि परा ॥१७॥ अ० ऋ०-(नाद अद्धि परा) अधिक बोलने वालों के कारण नाद की वृद्धि है शब्द की नहीं। भाव०-सावयव पदार्थ घटता बढ़ता है न कि निरवयव, शब्द निरवयव है अतः वृद्धि रहित है अतः नाद नित्य है। सं०- अब शब्द की नित्यता सिद्ध करते हैं। नित्यस्तु स्यादर्शनस्य परार्थत्वात् ॥१८॥ प्र000-(नित्य) शब्द नित्य(स्यात) है (तू) अनित्य नहीं(दर्शनस्य) उसका उच्चारण (परार्थत्वात्) श्रोता के ज्ञान के लिए होने से। मा०-यदि शब्द न बोला जाता तो श्रोता को कुछ भी लाम न होता, अर्थ के ज्ञान का कारण शब्द माना है।

ri भ Bul.sae Man Panta संशब्द की नित्यता में अन्य हेतु भी है। सर्वत्र योगपद्यात् ॥१॥ पक्र०-(सर्वत्र) सब शब्दों में (योगपद्यात्) एक ही समय में प्रत्यमिता होने से। भा-जिलको पूर्व देखा आवे और फिर वही देखा जाये ऐसी प्रत्यभिज्ञा किसी भी प्रमाण से नहीं हट सकती अनुः शब्द स्थायी है क्षणिक नहीं अतः नित्य है। सं०-और भी शब्द के नित्यत्व का हेतु देते हैं। संख्याभावात् ॥२०॥ 40 90--(संख्याभावात् ) संख्या के भाव (होने) से भी शब्द नित्य है। मा-उच्चारण करने वाले ने एक शब्द कई बार कहा, यह भी शब्द के नित्यत्व में प्रमाण है। सं०-शब्द के नित्य होने में और हेतु। अनपेचत्वात् ॥२१॥ ५० ऋ०-(अनपेक्षत्वात् ) शब्द का नाश हो गया इसका कारण न जानने से भी वह नित्य है। मा-घट टूट गया, पट फट गया। इसके फट जाने पर फूट जाने पर भी, नाश का ज्ञान है और पूर्व भी था, कि टूटे कटेगा परन्तु शब्द नाश कारण नहीं जाना गया अतः शब्द निरवयव है और उसके लाश का कारण नहीं जानने से वह Mussiesham RAM सं०-- शब्द वायु का कार्य है अतः उसकी उत्पत्ति होने से अनित्य है। प्रख्याभावाच्च योगस्य ॥२२॥ ५० -(योगस्य) शब्द में वायु के अंश होने से (प्रख्याभावात् ) अवरणेन्दिय प्रत्यक्ष न होने से (च) एवं त्वचा इन्द्रिय से शब्द स्पर्श प्रत्यक्ष नहीं होने से। भा-जो जिसका कार्य है उसका उसके अवयवों से सम्बन्ध होता है जैसे तन्तु का पट का अवयव से सम्बन्ध है अतः यदि शब्द वायु का कार्य होता तो श्रवणेन्द्रिय से शब्द में वायु के अवयवों का सम्बन्ध प्रत्यक्ष होता परन्तु ऐसा नहीं है अतः शब्द वायु का कार्य नहीं। दूसरे वायु का स्पर्श गुण मी उसमें नहीं क्योंकि त्वचा को प्रत्यक्ष नहीं है। -शब्द के नित्यत्व में अन्य हेतु । लिङ्ग दर्शनाच्च ॥२३॥ एक क्र--(च) तथा (लिङ्ग दर्शनाच्च) वेद में शब्द के नित्य चिन्ह मिलने से भी मा०-पूर्व पुण्यों के प्रभाव योग्यता वश ऋषियों ने ईश्वर की प्रेरणा से अपने हृदय में बेद शब्द पाया इससे भी शब्द का नित्यत्व अबाधित प्रमाण है। सं०-कहते हैं कि शब्द तथा शब्दार्थ नित्य हो मी तो भी वेद बाक्ष्य धर्म में प्रमाण रूप नहीं। उत्पत्तौ वाऽवचनाः स्युरर्थस्या तनिमिच- त्वात्॥२४॥ प० ऋ:-(वा) पूर्व पक्ष स्थापक है। (उत्पत्ती) शब्द एवं मा E LINK Mama शब्दार्थ सम्बन्ध नित्य होने से बैद वाक्यस्थ पदों से पदार्थ बोध यद्यपि हो मी तो भी (अवचनाः स्युः) वाक्वार्थ बतलाने जाले नहीं (अर्थस्य) कारखा कि अर्थ का ज्ञान (अतन्निमित- त्वात् ) बाक्य से होता है पदों से नहीं। मा०पद पदार्थ का सम्बन्ध नित्य है वर्ण समुदाय मी नित्य है अतः पदों से पदार्थज्ञान अन्य की अपेक्षा से भी होगा परन्तु पद समुच्चय रूप वाक्य और उसके अर्थ का नित्य सम्बन्ध नहीं होता कारण कि वाक्यार्थ पदार्थों के विचित्र होता है और पद का पदार्थ से सम्बन्ध होता है यार्थ से नहीं। सं०--इसका समाधान करते है तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायोऽर्थस्य तन्नि- मिचत्वात् ॥२५॥ (तद्भूतानां ) स्व-अर्थों में वर्तमान पदों का (क्रियार्थन) क्रियावाची पदों के साथ (समाम्नायः) पाठ होने से उनके समुदाय से ही वाक्यार्थ का ज्ञान होता है (अर्थस्य) वाक्यार्थ ज्ञान की उत्पत्ति में (सन्निमित्तत्वात ) पदार्थ ज्ञान ही एक कारण है अन्य नहीं। मा-जिस पद में क्रिया हो वह वाक्य अन्यथा वाक्य नहीं बनता। पदों का अपने अर्थों से नित्य सम्बन्ध है। बिना पदार्थों के वाक्वार्थ कोई वस्तु नहीं, यह क्रिया पद से स्वयं बनता है अतः वेद वाक्य अपने अर्थ बोध कराने में अन्य के आश्रित नहीं। अतः वह स्वतः प्रमाण है। सं०-पदों से पदार्थ ज्ञान सम्भव है न कि वाक्यार्थ का। S Sharma SMA COACETI SAROVARI ISHAN 500 लोके सनिय-मानयोगसन्निकर्मः स्यात् ॥२६॥ 2 70-(लोके) सुथालोक में (सनियमान) नियम से सम्बन्ध होने से वेद में भी (प्रयोगसन्निकर्षः) गुरु परम्परा से पद पदार्थ सम्बन्ध जान कर बाश्चार्थ की उत्पत्ति (स्थान) मा०-पद एवं पद पदार्थ सम्बन्ध ज्ञान वाच्यार्थ ज्ञान का कारण है उसी प्रकार गुरू परम्परा से बेद में भी पद पदार्थ सम्बन्ध ज्ञान से सुख की कामना के लिचे अति होनादि कार्य है। बन्योंकि वेद वाक्य उपकांक्षा, योग्यता, सन्निधि और तात्पर्य के बोधक है। सं०- वेद वाक्य अपने अर्थ बोध कराने में अन्च की अपेक्षा नहीं चलते अतः स्वतः प्रमाण है और अपौरुषेय भी है। वेदांश्चके सनिक पुरुषास्याः ॥२७॥ बुक (च) और (एक) कोई २ (वेदान ) वेदों को अनित्य मानते है और (पुरुषाख्याः) बनाने वाले पुरुषों के नाम का (सन्निकर्ष) सम्बन्ध होने से। मा०-वेदों में ऋषियों के नाम पाये जाने से प्रतीत होता है। कि रहीं ऋषियों के बनाये हैं अतः अपौरुषेय नहीं। और भी हेतु है। अनित्यदर्शनाच्च ॥२८॥ १० (च) और ( अनित्य दर्शनात् ) जन्म मरण धर्म बाद सुरुषों के नाम वेदों में हैं, अतः वह पौरुषेय हैं। मेसे भी नाम आते हैं कि जिनका अस्तित्व इस भू-- 14 T म (१२) भएडल पर कभी भी न था अतः यह पीछे रचे गये है आदि सृष्टि में भी नहीं अतः पौरुषेय हैं। सं-समाधान करते हैं। उक्त तु शब्दपूर्वत्वम् ॥२९॥ ५००-(तु) पूर्व पक्ष के खण्डनार्थ है (शब्द पूर्वत्वम् ) वेद रूप शब्द में नित्यत्व ( उक्त) पूर्व ही कह पाये हैं। मा०-वेद को पिछले सूत्र में नित्य सिद्ध कर आये हैं पुनः उस के अनित्यत्व की शंका ही निरर्थक है। वेद अपौरुषेय एवं नित्य है अनित्य नहीं। सं०--जिन व्यक्तियों के नाम वेद में हैं उनका कारण । आख्याः प्रवचनात् ॥३०॥ ५० ऋ०-(आख्याः) वेद में नामादि (प्रवचनात्) अध्ययन अध्यापन के कारण है। भा--जिस ऋषि ने जिस वेदमंत्र का चिरकाल तक लायसन्स अथवा अध्यापन कराया है वह उस के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सं०-वेदों में अनित्य पुरुषों के नाम हैं इसका समाधान । परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ॥३१॥ ५० ऋ०-(तु) किन्तु जो शब्द वेदों में आये हैं वह (परं) केवल (श्रुतिसामान्यमात्रम्) शब्द सामा- न्य मान्न के अतिरिक्त कुछ नहीं। मा०--इन शब्दों के अर्थ देखने से ज्ञात होता है कि यह नाम नहीं किन्तु शब्द मात्र हैं और यौगिक अर्थ को बतलाते हैं। BRATEarne mari BAR HE प nance RASTAccusa Faralia awLISH भुज्युः आदि अतः वेद पौरुषेया नहीं। सं0--वेद में जन्म मरण - शील मनुष्यों के नाम नहीं, तो भी प्रमाण नहीं हो सकते। क्योंकि उसमें असम्बद्ध बातें हैं यह भी कृते वा विनियोगस्यात्कर्मणःसम्बन्धात् ॥३२॥ प० ऋ०-या शब्दशका निवारणार्थ है। (कृते) वहां यक्ष कर्म करने के लिये विनियोगः] प्रेरणा [ स्यात् ] है। [कर्मणः] यज्ञ रूप कर्म का [ सम्बन्धात्] सम्बन्ध है। मा०-वेदों में यज्ञ रूप को करने की प्रेरणा है और कर्म का जीव के साथ सम्बन्ध भी है जैसे “यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञ मतन्वत [अथर्व १६ । ११६] विद्वानों ने परमात्मा की दी हुई वस्तु से यज्ञ को विस्तार दिया आदि असम्भव बातें नहीं किन्तु सार्थक कर्म करणीय है अतः वेद सर्वथा स्वतः प्रमाण है। अथ मीमांसा दर्शने प्रथमाध्याये प्रथम पाद समाप्तम् ।। MAHARSamiman * अथ द्वितीय पादः प्रारभ्यते सं० शब्द, शब्दार्थ और उसके सम्बन्ध को नित्य करते हुए चेद स्वतः प्रमाण बतलाये। अब कर्म के ठीक - ठीक अर्थ न देने वाले चास्यों के सम्बन्ध में कहते हैं।

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আত্মহত্যা নির্থসংখলা
तस्माद नित्यमुच्यते ॥१॥
40 -- [आम्नायस्या] वेद के [क्रियार्थत्वात् कर्म का
बोधक होने से वह [अतदर्थानां] जिनसे अर्थ बोध नहीं
होता वह ( अानन्यम् ) अर्थहीन कर्म हैं [तस्मात् ] वह
(अनित्यम्) अर्थात् अप्रमाण (उच्यते) कहे जाते हैं।
भा--कुछ ऐसे वाक्य वेदों में आते है कि जिनके अर्थ ही
नहीं हैं। अतः यह दोष होने से प्राणी के लिये उपादेय
नहीं क्योंकि उसमें कर्तव्य का उद्बोधन किया ही नहीं गया ।
अतः अप्रमाण है क्योंकि जिस में वस्तु प्रयोग विधि नहीं
और वस्तु स्वरूप मात्र बतलाये हैं बह सिद्धार्थ कहलाते हैं
नकि अनर्थ वाक्य समूह ।
शास्त्रदृष्टविरोधाच्च ॥२॥
सं०--और भी कथन करते हैं कि:--
तथा फलामावा ॥३॥
५० ऋ०-( फलामावात् ) सिद्धार्थ बोधक ज्ञान वाक्य से प्रवृत्ति
निवृत्ति रूप कोई फल भी नहीं निकल सकता ( तथा ) अतः
अप्रमाण है।
मा--जिन वाक्यों से पुरुष, प्रवृत्ति और निवृत्ति का ज्ञान
प्राप्त करे वही प्रमाण है। सिद्धार्थ वाक्यों में यह कुछ नहीं
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सं०--और भी हेतु है।
अन्यानर्थस्यात् ॥४॥

HTHANI
(१५)
।
१० ऋ०-[पन्य अनर्थ क्या अर्थ रहित होने से सिद्धार्थ
बोधक वावन्य प्रमाण है।
ro-वेदों में जो वचन हैं उनका कुछ भी अर्थ नहीं। जब
तक उनका विधान न बतलाया गया हो। केवल उपदेश
से लाभ नहीं जब तक कि क्रिया करने की विधि न बतलाई
जावे। वह वेदों में न होने से प्राणी को उससे कोई लाम
नहीं।
सं०-वाक्यों के प्रमाण से भी।
अभागि प्रतिषेधाच्च ॥५॥
प० क्र०-[च] और [अभागिप्रतिषेधात् ] अप्राप्त का निषेध
करने ले।
था जो अनुपलब्ध उसका निषेध पाये जाने से सिद्धार्थ
बतलाने वाले वेद वाक्य अप्रमाण हैं ।
सं०-और भी हेतु देते हैं।
अनित्यसंयोगात् ॥६॥
प० - [अनित्य संयोगात् ] अनित्य जन्म मरण पदार्थों
का वर्णन होने से।
भा-वेदों में जरा जन्म भरण पुनर्जन्म अनित्य बातें हैं इस
लिये भी अप्रमाण हैं
सं०-इसका समाधान।
विधिनात्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधिनां
स्युः॥७॥

40 - [विधिना विधि वाक्यों की स्तुत्यर्थेन] पुरुष प्रवृत्ति अपेक्षित स्तुतिय [विधिना विधिवाक्य मिश्रित [एकवाक्य- स्वात् ] एक वाक्यता से स्तुति विधान बोधक [स्युः] विधि- वाक्य प्रमाण है [तु] अतः अप्रमाण नहीं हो सकते । भा-विधि - वाक्य • कर्तव्यताबोधक वाक्य होते है न कि सिद्ध। परन्तु विधिवाक्य में पुरुष प्रवृत्ति आपेक्षित स्तुतियां होती है एवं सिद्ध वाक्यों में फलाकांक्षा होती है वह अतः फलवान विधिवाक्य से मिलकर आपेक्षित विधि में अर्थ की स्तुति करके कर्तव्यार्थ बतलाते हैं न कि सिद्धार्थ । यह वाक्यों से मिलाकर बाक्यता मिलती है अतः कोई अप्रमाण दोष नहीं पाता क्योंकि विधि वाक्य जिस कत्र्तव्य का अर्थ विधान करता है, उसी का सिद्धार्थ बोधक वाक्य भी समर्थन करता है, अतः विधिवाक्यबत् प्रमाण है। सं०-और मी प्रमाण देते हैं। तुल्यं च साम्प्रदायिकम् ॥६॥ ५० ऋ०-च] और [साम्प्रदायिकम् ] सृष्टि काल से तुल्य] Saath भाल-सृष्टि के प्रारम्म से विधि और सिद्ध वाक्यों की गुरुशिष्य परम्परा होने से भी समान रीति से प्रमाण है। सं०-शास्त्र विरोध का परिहार करते हैं। अप्राप्ता चानुपपत्तिः प्रयोगे हि विरोधस्स्यान्छ- ब्दार्थस्त्वप्रयोगभूतस्तस्मादुपपद्यत ॥४॥ प० ऋ० प्रयोगेहि ] स्थूल दृष्टि से समझ में आने वाले अर्थ में वाक्यार्थ होने से [विरोधः] विरोध [ स्यात् ] होवे - परन्तु शब्दार्थस्तु] यह अर्थ तो [अप्रयोगभूतः ] वाक्यार्थ विषयहीन होने से अन्य अर्थ का द्योतक है (तस्मात् ) इस कारण (अनुपपत्तिः) वेद वाक्यों का पारस्परिक विरोध युक्त अनुपपत्ति दोष (अप्राप्ता) न होने से भी कारण कि (उपपद्यते) उक्त वाक्य का विरोध रहित अर्थ है। भाव-वेद वाक्यों में ऐसा विरोध दीखने से कि कहीं ईश्वर को कहा कि यह सब पुरुष हैं और कहीं यह सब उसकी महिमा है" यह स्थूल दृष्टि से ही है क्योंकि वहां यह नहीं कहा गया कि बस इतना ही पुरुष” है और है ही नहीं। किन्तु कहा तो यह है कि यह सब पुरुष विभूति होने से है। अतः तात्पर्य का विषयीभूत अर्थ का अन्तर होने से वाक्यों का कोई परस्पर विरोध नहीं। अत: कोई वाक्य- प्रमाण हीन भी नहीं। सं०-सिद्धार्थ बोधक वाक्यों में विधेयार्थ वायों की प्रशंसा से विधि बाक्य युक्त वाक्य से अर्थी करना यह ठीक नहीं क्योंकि मिन्नाथ के बोधक होने से और सब विधेयार्थ की ही प्रशंसा न करने से शंका होती है। गुणवादस्तु॥१०॥ प००-(तु) शब्द शंका परिहारा है (गुरणवादः) जों स्तुतिवाद बतलाया है वह गुणवाद है । भा-सिद्धार्थ बोधक वाक्यों से सर्वत्र विधेयार्थ की स्तुति पाई जाती है यह गुणवाद ही है मुख्य वाद नहीं। क्योंकि कहीं यह विधेयार्थ का स्तवन करते हैं और कहीं उससे भिन्नार्थ का भी कथन करते हैं अतः दोष नहीं। सं०-वेदों में ब्राह्मणादि चारों वर्गों को परमात्मा का अङ्ग भा UPyara S (१८) बतलाया है यह समीचीन नहीं क्योंकि वह अशरीरी हरनामें अवयन नहीं रूगत्मायात्॥११॥ ५००--(भायात्) बहुधा वेदों में रूपात ) रूपक अलं- कार से वर्णन है। मा--जहाँ २ मुखादि अवयव से परमात्मा का निरूपण वेदों में हैं वह रूपकालंकार से है। वास्तव में उसका शरीरी वर्णन अशरीरी के समान निर्दोष है। सं०-इसमें तो प्रत्यक्ष विरोध है। दूरभूयस्मात् ॥१२॥ ५० क्र०-( दूरभूयस्त्वात् ) स्थूलार्थ करने से नेत्र और सूर्य की दूरी अर्थात् कारण कार्य भाव असम्भव प्रतीत होगा! मा०-जहां कहा है कि उस परमात्मा के नेत्रों से सूर्योत्पत्ति हुई यह स्थूल करना प्रत्यक्ष विरोध का प्रमाण है क्योंकि नेत्रों से सूर्य जैसे दिव्य पदार्थ की उत्पन्ति असम्भव है केवल वहां यही अर्थ है कि परमात्मा के चक्ष सघश दिव्य सामर्थ्य से सूर्योत्पत्ति हुई इस अर्थ में विरोध भी नहीं Hira STHAND HANDA SPREE Sapana NEMA 2010 सं०- उसकी यदि चक्षसदृश दिव्य सामय से सूर्योत्पत्ति माने तो फिर यह क्यों कहा कि वह चनुलश अपराधात्कत्तुश्च पुत्रदर्शनम् ॥१३॥ ५० ऋ०-(अपराधात्) स्थूल दृष्टि के अपराध से (कत्तः) अजायत क्रिया के कर्ता सूर्य का ( पुत्रदर्शनम् ) पुत्र अर्थात् आर्य रूप से (ब) बन का कारण रूप से दर्शन होता है। आठवक्ष और सूर्य परस्पर पिता पुत्र अथवा चक्षः सूर्य का कारण अथवा सूर्य चक्ष का कार्य नहीं किन्तु परमात्मा सर्व पिता है, और केवल स्थूल दृष्टि से सूचे चक्षु का का प्रतीत होता है यथार्थ में ऐसा है नहीं। प्राकालिकेसा ॥१४॥ ५० ऋ०-भाकालि क्रेता) एक ही काल में प्राणी मात्र की मोक्ष की इच्छा पाये जाने से । प्राणी मान मृत्यु से पार होना चाहता है इसलिये वेदों ने बताया है कि बिना उसे जाने अन्य कोई मुक्ति मा नहीं है। इस बाक्य में सब फलों के महान फल मुक्ति का वर्णन है न कि कर्म जन्य फल को निस्स्तार कथन के अभिप्राय -इसमें युक्ति यह है विद्याप्रशंसा ॥१५॥ प -(विद्या प्रशंसा) विद्या का यश होने से। मा-वेद वाक्यों में बिना उसके जाने मृत्यु से पार होना कठिन है आदि में जो मृत्यु को पार करना ब्रह्म विद्या का फल कहा है इससे तो महत्व बढ़ता है न कि अन्य फलों के बोधक वेद वाक्यों की निरर्थकता है। अर्थात् जिस २ कर्म का जो - जो फल वेद वाक्य बतलाता है वह अवश्य कर्तव्य कर्म है और उसका फल भी है परन्तु मोक्ष प्राप्ति ब्रह्मा विद्या से ही होती है जो वेदों में ही बतलाई हैं अतः की करो।

LE मा-मृत्यु Epto BSTRANESH Humina Mo-किसी विशेष को भोला निवाधिकार है अथवा सब को। सर्वत्वमाधिकारिकम् ॥१६॥ प० ऋ०-(अधिकारिकम् ) ब्रह्म कर्म का अधिकार (सर्वत्वम् ) सब को एकसा है। से सा छूटना चाहते हैं उसका उपाय एक ब्रह्म विद्या ही है और जब ब्रह्म ज्ञानी हो जाता है तो परमात्मानिष्पक्ष हैं और यह समानाधिकार का उपदेश ब्रह्मा की ही भोर उसके समान भाव से सब को अधिकार कहा गया है। सं०-ब्रह्म विद्या द्वारा मृत्यु से छुटकारा नहीं किन्तु वेदोक कर्म करने से ही होता है। फलस्य कर्मनिष्पत्तेस्तेषां लोकवत्परिणामतः फलविशेषस्स्यात् ॥१७॥ प० ऋ०-(फलस्य ) फल विशेष की (निष्पत्तेः) कर्म से सिद्धि होने से मृत्यु से छुटकारा नही (तेषां) उनके कर्मों का (फल विशेषः) विशेष फल है ( स्यात् ) है वह ( लोकवत ) सांसारिक कम जन्य फल समान (परिणामतः) बदलने वाला है। भा०-सांसारिक कर्म परिणामी (बदलने वाले ) हैं इसी भांति वैदिक कर्मफल भी परिछिन्न हैं। इन दोनों में भेद यह है कि सांसारिक कर्मफल स्थायी नहीं और वैदिककर्म चिरकाल ठहरे रहते हैं। अन्त्ययोर्यथोक्तम् ॥१८॥ Pr-swas Hangh Raute Shovies ५००-(श्रन्त्ययोः) पांचवें और छठवें सूत्र में अन्त के दोनों पूर्व पक्षों का समाधान किया गया है (यथोक्तम् ) उसी प्रकार समझना चाहिये। भा०-जैसे छठे सूत्र का समाधान पूर्व पाद के ३१ में सूत्र में किया है वैसे पांचवें सूत्र का समाधान यह है कि परमात्मा की मूर्ति किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होती परन्तु चेतनता रूपधर्म की तुल्य योग्यता से जैसे जीव का मूर्ति (शरीर) अल्पज्ञों ने माना है उसी प्रकार वर की मूर्ति कल्पना भी करती है। अन्यथा वेद ईश्वर की (प्रतिमा) नहीं मानते जैसे न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यशः। सं०-अति स्पष्ट अर्थ बोधक सिद्धार्थ वेद वाक्यों को प्रामाणिक मानने के हेतु कहते है । विधिर्वा स्यादपूर्ववाद्वादमात्रं बनर्थकम् ॥१६॥ प० ऋ०-(व) पूर्व पक्ष प्रतिपादक है (विधिः) स्पष्ट अर्थ वाले वाक्यों में सिद्धार्थ बोधक विधि की क्रिया ( स्यात् ) है क्योंकि (अपूर्व स्वात् ) क्योंकि उनका भी अपूर्व ही अर्थ विधि वाक्य समान है। यदि उन्हें (वाद मात्रं हि) केवल सिद्धार्थ बोधक मात्र ही मानेगे तो वह (अनर्थ कम्) अप्रमाण हो जायेंगे। मा०-यजुर्वेद अ ३२॥ १ के इस मन्त्र में कि वह परमात्मा अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, आप और प्रजापति हैं उसी की उपासना करो । यह बाक्य तो हो गये परन्तु इसकी विधि कल्पना किये बिना अपूर्व अर्थ का लाभ कैसे होगा अर्थात् विधि कल्पना अवश्य होनी चाहिये और यदि " MADNE HERA LATI माया का लाभ नहीं लेना है केवल बाद (कथन) मात्र ही मानली तो वह निरर्थक शत्रमाण हो जायेगे परन्तु बुद्धि पूर्वक कहे गये वाक्य निरर्थक और अप्रमाण नहीं कहे जा सकते अतः विधि कल्पना होनी ही चाहिये। -अब सिद्धान्त सम्बन्धी आशंका करते है। लोकवदिति चेत् ॥२०॥ १० ऋ० लोकवत् ] यह कथन सांसारिक कथन के समान है इसलिये विधि - कल्पना व्यर्थ चेत् ] यदि [इति] निश्चय दूर्वक नहीं। मा:-औसे संसार में जब कोई वस्तु क्रय - चिन्य में आती है, तब उसकी प्रशंसा और मूल्य निश्चित् होता है. इसी प्रकार यजुर्वेद के इल मन्त्र में केवल स्तुतिवाद मात्र है अतः विधि कल्पना की आवश्यकता नहीं। सं०-इस शंका का समाधान यह है। न पूर्वत्वात् ॥२१॥ ५० करन] यह कथन ठीक नहीं इसलिये कि [पूर्वत्वात् ] सांसारिक स्त्युत्यवाक्यों में प्रसिद्धार्थ ही कहा जाता है किसी अलौकिक अर्थ का कथन नहीं होता। आ०-यजुर्वेद वाच्य में जो अपूर्व ( अलौकिक ) अर्थ है यह सांसारिक बाद में नहीं है ऋतः लौकिक से विलक्षण अर्थ कथन होने से विधि-कल्पना अनिवार्य है। सं0-इसका समाधान यह है। उक्त तु वाक्यशेषत्वम् ॥२२॥ virate (२३) प० क 'तु' पद पूर्वपक्ष हटाने को है। (वाक्य शेषत्वम्) ऐसे सिद्धार्थ बोधक वाक्यों को विधि वाक्यों का अंग उक्त " मा०-सिद्धार्थ बोधक वाक्य विधान किये गये अर्थ की प्रशंसा द्वारा विधि वाक्य का ग बन कर अर्थ बोध कराते हैं उसी प्रकार अति स्पष्ट अर्थ वाले सिद्धार्थ बोधक वचन मी विधि वाक्य का अंग होकर अर्थ बोध कराते हैं वहां विधि कल्पना अत्यावश्यक होती है। सं-इसमें यह युक्ति है। विधिश्चानर्थकः कवचिचस्मात् स्तुतिः भतीयेत तत्सामाभ्यादितरेषु तथात्वम् ॥२३॥ ५० ऋ-(च) यदि (विधिः) उसमें विधि कल्पना की तो वह उन वाक्यों में (अनर्थकः) बर्थ नहीं देगी क्योंकि (क्वचिततस्यात) सिद्धार्थ बोधक वाक्यों से कहीं २ स्पष्ट रूप से प्रशंसा (प्रतीयेत) पाई जाती है (तत्) अतः (सामा-- न्यात् ) सब वाक्यों के समान होने से जिन में स्पष्ट स्तुति नहीं पाई जाती (इतरेष) उन वाक्यों में भी (तथात्वम् ) विधि की अपेक्षा स्तुति कल्लना अति श्रेष्ठ है। मा-कहीं कहीं सष्ट स्तुति पाई जाती है और विधि नहीं प्रतीत होती । अतः जहाँ स्पष्ट रूप से स्तुति न मिले वहां सिद्धार्थ बोधक वाक्य की भांति स्तुति कल्पना करना लघुपन है उससे तो वाक्यों में विधि की कल्पना कर लेना चाहिये अतः विधि कल्पना से स्तुति कल्पना श्रेष्ठ है। सं०-पुनः उक्ति देते हैं।

प्रकरण सम्भवनापकों व कल्प्येत विध्यानर्थ- क्यं हितं भति॥३४॥ Top०-(अकरणे) जिस प्रकरण का बाक्य है उसमें (अपकर्णः) स्तुति ( सम्भवत) स्पष्ट पाये जाने से (नकल्दयेत् ) विधि करना नहीं चाहिये (हि) क्योंकि तम्प्रति] उस स्तुति के सम्मुख [विध्यानर्थवयं] विधि कल्पना वृथा है। माo-वाक्य जिस कथन के उद्देश्य से है उससे भिन्न अर्थ का वह कदापि नहीं कहता, जो प्रकरण के देखने से प्रतीत होता है। जहां प्रकरण में उपासना विधि में उपास्य परमात्मा की स्तुति का सिद्धार्थ बोधक वाक्य विस्पष्ट रूप से निरूपण कर रहे है। वहां विधि कल्पना अप्रासंगिक है यहां तो उपासना विधि ही अंग मान कर विहित कर्म अर्थ] की स्तुति कल्पना ही उत्तम है। सं०-विधि कल्पना से ऐसे स्थानों में दोष आता है। विधौ च वाक्यभेदः स्यात् ॥२५॥ प० ऋ०-[च] तथा [विधौ ] उन बाक्यों में विधि कल्पना करने से [वाक्य भेदः] अर्थ भेद से बाक्य भेद [स्यात् ] हो जावेगा। मा० जिन मन्त्रों में परमात्मा की अपरिमित शक्तियों का वर्णन है यदि उन में विधि कल्पना की जावेगी तो वह स्तुति उससे भिन्न विहित कर्मों का भी निरूपण करेंगे परन्तु ऐसा करने से वहां वाक्य भेद रूप दोष आता है। क्योंकि नियम यह है कि शब्द, ज्ञान्न, और क्रिया एक ही कार्य को करते हैं। अन्य को TA pad AMITION (३५) माहीं नाथात् जिस शब्द से जो अर्थ निकला अथवा जिन ज्ञान में जो अर्थ जाना अथवा जिस क्रिया से जो कार्य सिद्ध किया वह एक शब्द अन्य अर्थ को नहीं कहेगा, न ज्ञान ही दूसरे अर्थ का बोधक होगा न क्रिया ही अन्य कार्य की साधिका होनही । अतः विधिबा कल्पना न करके विधि वाक्य काबा मानना ho... हेतु पद सिद्धार्थ बोधक वाक्यों को प्रमाणित हेतु स्यादर्थवत्त्वोपपत्तिभ्याम् ॥२६॥ 40 --(वा) पूर्व पक्ष का द्योतक है (हेतु.) तृतीयाविमति बाले पद के अर्थ का बोधक ( स्यात् ) है क्योकि (अर्थ बत्वो भापतिभ्यां ) वह वाक्य अर्थ एवं उपपत्ति वाले हो सकते हैं अन्यथा नहीं। आक-यजुर्वेद अध्याय ३१११६ में 'चना यज्ञमयजन्त देवा' इस तृतीय विमक्ति युक्त "यज्ञेन इस वेद वाक्य में यह कहा गया कि 'यज से यज्ञ रूप परमात्मा का पहले विद्वान् पूजन करते थे तो क्या यहां परमात्म पूजन का या साधन । यजुर्वेद अ० १४०१२ में कुर्वन्ने वेहकारित" इस मन्त्र में कि वेद विहित कर्मों को करता हुआ मनुष्य १०० वर्ष जीने की इच्छा करें। इस कार्य विधि से विहित यज्ञादि रूपा कर्म विधान की स्तुति करते हैं। इन दोनों मन्त्रों में स्पष्ट बता दिया एक मन्त्र "यज्ञ रूप परमात्मा के पूजन का साधन यज्ञ है यह मानना है। और यह हेतुक अर्थ सम्पूर्ण बाक्य के अर्थ को सार्थक बनाता है परन्तु दूसरे में केवल वेद विहित कर्मों के करने का आदेश मात्र किया वहां कोई विधि नहीं यज्ञ अर्थात् 7 ESH দুখজাগ্রস্থ ত তুলেল শুরু হল ? এ লিষ্টি - ৪ विषय एका प्रकरण अनुहा है। दूसरा सन्न उसी करदे को १०० यानी ধঃ ংলা ঃ কায়ছয় হয়ে উ হেন্ত লাল শাস্তি শুনে ভী बसलाई । इसलिये मशा या प्रकरणानुकूल ही अर्थ किया Our इसका समाधान करते हैं। स्तुतिस्तु शब्दपूर्वस्वादचोदना च तस्य ॥२७॥ पा090-'तु° पूर्व पक्ष के हटाने को आया है । (स्तुतिः) ऐसे शाक्य में कर्म-विधि से विहित कर्तव्य कर्म यज्ञादि कम बना महत्ता बतलाते हैं। क्योंकि स्तुति महत्वार्थ (शब्द घूई स्वान्) साधन विधि के अनुकूल ही होगा। (च) और ऐसे वाक्यों में (तस्य) यज्ञ की (अचोदना) प्रेरणा अथवा विधि नहीं बतलाई। मा-परम्परा के शिष्टाचार से यज्ञ की प्राप्ति है अतएव उसे कर्तव्य कर्म कहा है वहां साधान रूबीकार करने के स्थान में ऐसे वाक्यों में स्तुति अथवा महत्व ही मानना उत्तम है क्योंकि 'कुर्वन्नेवेह' इस मन्त्र में कर्म विधि कही गई है उसमें केवल पुरुष प्रवृत्ति के लिये प्रेरणा है और इसी अर्था सो संगति बैठती भी है क्योंकि जहां यज्ञादि रूप कर्मों के महत्व कहे गये हैं वहां यज्ञ को परमात्मा के पूजन का साधन भी अतलाया होता है अतः साधन' के स्थान में स्तुति मानना ही समीचीन है। सं०--इस में यह सन्देह रहता है। अर्थे स्तुतिरन्याय्येति चेत् ॥२८॥ tel inglend Matee SHING SEAR ७ Ja0-(अणे ) फल न होने से (स्तुतिः) महत्व कल्पना (अन्याया) न्याय युक्त नहीं (चेत् ) यदि (इति) है जो आस-जिस वाल्या मैं स्तुति का पालन दिखाई दे उसकी कल्पना --सका समाधान अर्थस्तु विधिशेशत्वाचाथा लोके ॥२॥ ए००-'तु पद शंका निवारणार्थ है (विधिशेषत्वात् ) ऐसे आकयों का विधि आय का अगा होनाही (अर्थः) स्तुति की कल्पना का मजा है (यथा) जिस प्रकार (लोके ) सांसा- रिक बास्यों में विधि बाक्य का होना स्तुति का मा-जिस प्रकार विधेच अर्थ के महत्व को बतलाने वाले सिद्धार्थ बोधक वाक्य विधि बाय का ग कहे जाते हैं ऊही कार देश में भी है अतः वेदों में स्तुति कल्पना कोई व्यय की बात नहीं क्योंकि ऐसे काबय चिकि बाक्य के अंगण होने भरे ही थे बाले होते हैं। से-ऐसा मान लेने पर युक्ति देते हैं । यदि च हेतुरवतिष्ठत निर्देशात्सामान्यादिति वेदव्यवस्था विधिनां स्यात् ॥३०॥ १० -(च) और यदि हेतुः) उक्ततृतीया विभक्ति युक्त यज्ञेन हेतु वाकई में जहां यज्ञ को ही पूजन का साधन कहा था माना आया तो उसका साधक के अभाव से ठहरना असंभव है अतः (निर्देशास सामान्यातू । हत्तीय विमति रूप सामान्यनिर्देश से (अवातिष्ठा ) हरनेवाला (वेत.) यदि (इति) तो (विधिना) विधि और विधि की व्यवस्था) अस्तव्यस्तता ( स्यात् । ~ অঙ্গ এই অভঃ পড়া হল নখ বা ক্ষ = ২ परन्तु उसका साधक नहीं बतलाया। -वेद मन्त्रों का पठन पाठन मात्र पुरुय है अथवा अर्थ सहित स्वाध्याय का भी विधान है। तदर्थ शास्त्रात् ॥३१॥ T० ऋ० (तत्) वेदों का अर्थ सहित स्वाध्याय करना क्योंकि ( अर्थ शास्त्रार्थ ) वेद मनुष्य मात्र के लिये पुरुषार्थ चतुष्टय का विवेचन करता है। भाo-धर्म अर्थ काम और मोक्ष कैसे प्राप्त हो इसके लिये वेद का प्रकाश हुआ है यदि वेद अर्थ सहित न पढ़ा गया तो मनुष्यों को चारों फलों की प्राप्ति के उपाय कैसे प्राप्त होंगे इसलिये अर्थ सहित वेदाध्ययन करना चाहिये। सं०-इसमें एक हेतु और भी है। वाक्य नियमात् ॥३२॥ १० ऋ०-(वाक्य नियमात् । प्रत्येक मन्त्रों के साथ ऋषियों का नाम पाये जाने से वेदों का अर्थ सहित ही स्वाध्याय Rai PLE MERO ठीक है । भा०-जो वेदमन्त्रों के साथ ऋषि हैं उनका यह अर्थ है कि अमुक ऋषि ने विधिवत् मन्त्रों को विचार कर प्राणियों के জায় লিষ্ট নিন ফিকা। কি অ মৃ তরুন । SHITO to-इसमें दूसरा हेतु भी है। बुद्धशास्त्रात् ॥३३॥ प० ० (बुद्ध शास्त्रात्) ज्ञान को देने वाला वेद ही एक शास्त्र है। उसका अर्थ सहित ही स्वाध्याय करना चाहिये वेद ही एक मात्र ऐसा है कि जिसने मादि सूचि में मनुष्य को ज्ञान दिया अतः उसका अर्थ सहित स्वाध्याय होने लेही ज्ञान का प्रकाश संसार में फैल सकता है। संकइसमें पूर्व पर यह है कि:-- अविद्यमानवचनात् ॥३४॥ १० ऋ०--(अविद्यमानवचनात् ) अर्थ सहित स्वाध्याय करना आवश्यक नहीं क्योंकि उन में विद्यमान पदार्थों का वर्णन है। मा०-वेदों में कुछ ऐसे भी पदार्थों का वर्णन है कि जिनके ज्ञान से मनुष्य को कोई लाम नहीं जैसे ऋग्वेद ८।४। १७१ के सहल शीर्षा पुरुषः' में कहा कि उसके हजार सिर, हजार पांव और हजार आंखे हैं अतः अर्थ सहित पठन पाठन से क्या लाभ ! इसमें संख्या दोष भी है। जब हजार सिर होगहे तो दो हजार आँखे होगी बहां हजार आँखे ही कही है। सब-और मी हेतु देते हैं।

अचेतनेऽर्थवन्धानात् ॥३॥ मा अचेतने) जड पदार्थ बन्धनात्) पन्ने अर्थ से बने हुए बेड पठन पाठन्द्र के ओच्या नहीं। मा ऋग्वेद ८१४१ ११ १२३ में इस अन्न का किलिमुत्तमा स्योषधे” अर्थात हे औषषित श्रेष्ठ है इस औषधि रूप जड़ सदार्थ को सम्बोधन करके प्रतिपादन किया हुआ अर्था सर्वथा असंगत होता है। संसार में चेतन पदार्थ को सम्बोधन किया करते हैं जड़ को नहीं अतः अर्थ सहित अध्ययन से जन्म -तीसरा हेतु और भी दिया जाता है। अर्थविप्रतिरोधात् ॥३६॥ ५० ऋ०- (अर्थ विप्रतिशेधात) परस्पर विरोध अर्थ का कथन करने से भी बेद का अर्थ सहित पठन पाठन ठीक नहीं। मा० ऋग्वेद ११६॥ १६॥ १० इस मन्त्र में कि "अदिति चौरदि- तिरन्तरिक्षम् में जो यह बताया कि गादिति ही चौ और वही अन्तरिक्ष है इसमें परस्पर विरोध मिला क्योकि धौ ही अन्तरिक्ष है यह कैसे हो सकता है। अन् रिक्ष और छौ में बड़ा अन्तर है অন্তঃ আ লিক শুল্য। पाठन से कोई लान नहीं। Fo- और भी हेतु देते हैं। स्वाध्यायवदवचनात् ॥३७॥ 40- स्वाध्याय वद वचनात् ) बेह के पठन पाठन का जिन वाक्यों में विधान है उनके अर्थ सहित पठन पाठन का भी विधान्य नहीं मिलता। इस कारण अर्थ सहित पठला पालन ठीक नहीं। গা? ~~-গুলি ল ক্লাহ্মা কি ‘ ফাযীলতঃ চালু ছয় वान को बेद पढ़ना चाहिये । इस पठन पाठन के बादेश में মন্ত্রী ক্ষার্থী হাজির জাত কা মাহা না ই ক লিখা ছিল मार्थ युक्त पठन पाठन छानावश्यक ही है। -और सी हेतु देते हैं। अविज्ञेयात् ॥ ३॥ (प्राविक यात् बेदी के अर्थ भी जाने योग्य न होने से अर्थ सहित पाठन पाठन वृथा है । मा०-वेदों में आदि अनेक ऐसो मन्त्र है कि जिनका कोई अमर्थ ही नहीं बनता आतः अर्थ सहित स्वाध्याय ठीक ख०--इसमें एक हेतु यह भी है। अनित्यसंयोगान्मन्त्रानर्थस्थम् ॥३॥ १० ऋ०-(अनित्यसंयोगात् ) अनित्य पदार्थों में जैसे जन्म मरण जरा यौवन आदि पदार्थों का सम्बन्ध मिलने से ( मानर्थक्यम् ) मन्त्रों का अर्थों सहित पाठ करना निर- मा०-वेदों में देशों और मनुष्यों के नाम दीखते हैं इसलिये ईश्वरोक होने में भी सन्देह है अतः वेदों का अर्थ सहित पठन-पाठन वृथा ही है। सं०-इन हेतुओं का समाधान देते हैं।

७ अनिशिष्टस्तु वाक्याय ॥४० तु पद पूर्व पक्ष के निवेश के लिये है अवि.. शिरः) लोक और बेद में वाचाय) बाया के अर्थ का आपन एक साही माना जाता है। मालोक और वेद में बालय के अर्थों का एक सा ही ज्ञान होता है जैसे लोक में यौगिक शब्दार्थ धातु आदि प्रत्यक्ष के ज्ञान से जाने जाते हैं उसी प्रकार बेद में भी ऐसा ही है। अतः अर्थ सहित पठन पाठन से ही लास होता है। इस कारण श्री सहित खेदों का वाध्याया जाम मीच अर्थ सहित पठन पाठनमें और भी हेतु देते है। गुणार्थेन पुनः श्रुति ॥४१॥ ५० ऋ०-( अतिः) वेद पुनः) यतः (गुणाणन) अनेक गुमा बाले अर्थों से युक्त हैं अतः उनका पठन पाठन अर्धा युक्त होना चाहिये। मा-वेद का एक एक शब्द अनन्त लाभदायक है। यह सब सत्य विद्याओं का भंडार है अतः जब तक उसे अर्थ सहित न पढ़ेगे उससे लाम ही क्या होगा अतः जेल को अभी साहित ही पढ़ाना चाहिये -इसी को पुनः कहते हैं। परिसंख्या ॥४२॥ ५० ० ( परिसंख्या) वेद का अर्थ सहित पठन पाठन होने कर्तव्य कर्मों का ज्ञान और अकर्तव्या कमों के त्याग का g ச 22 N BHASTHAN पता लगता है। भा०-सुख दुःख कर्तव्य तथा अकर्तव्य कों पर निर्भर है। कौनले शुम और कौन से अशुभ कर्म है इसका बिना सत्र ईश्वर के उपदेश किये बोध नहीं हो सकता। अतः कव्याकर्तव्य कमाँ के ग्रहण तथा त्याज्य के ज्ञानार्थ वेद को अर्थ सहित ही पढ़ना चाहिये। सं...इस पर यह आपत्ति की जाती है। अर्थवादो बा ॥४३॥ या कावा' आशंका निमित्त प्रयोग किया गया (अर्थ- बादः) यह अर्थवाद है कि शुभ कर्म करने से सुख और अशुभ से दुःख होता है। मा०-- यह कहना ठीक नहीं कि सुख दुःख शुभाशुभ कमाँ पर आधारित है क्योंकि लोक में इसके विपरीत देखा इस शंका का उत्तर यह है। अविरुद्ध परम् ॥४४॥ प - ( अविरुद्ध) शुभाशुभ कर्मों के करने से दुः अथवा सुख होता है यह बात लोक और वेद से सम्मल है । अतः यह बात उत्तम होने से ग्रहण करने योग्य मा.इसे अर्थवाद नहीं कहा जा सकता कि शुभ कर्म से सुख और अनिष्ट कर्म से दुःख होता है क्योंकि वेद में तो उपदेश और प्राप्त पुरुषों में इसका आचरण मिलता है इसलिये इष्ट कर्म लाभदायक और अनिष्ट हानि-- 6 और समाधान करते है। संगपो कर्मगहानुपलम्मः संस्कारत्वात् ॥४५॥ ५० --(संप्रेक) वेद के हजार सिर और हजार नेन वाले सन्ज में (कर्म महानुपलम्सः) अविद्यमान अर्थों का कहना कोई दोष नहीं क्योंकि (संग्कारत्वात् ) वह मनुष्य बुद्धि को सुसंस्कृत करने के लिये कहा गया है। मा-वेद में मुख्य और गौण अर्थ को लेकर उपदेश किया गया है और यही कारण है कि इसमें अविशमा अर्थ का मान होता है वास्तव में ऐसा है नहीं। अतः वेद को अर्थ सहित ही पढ़ने से यह प्रम दूर हो सकता है संक-एक और समाधान करते हैं। अभिधानेऽर्थवादः ॥४६॥ 40 30-(अभिधाने) जो अचेतन पदार्थों को सम्बोधन करके कहा गया है उसमें तो (अथवादः) अर्थवाह है। मा०--जहां यह आये कि हे सोम औषधे ! तू सब औषर--- धयों में उत्तम है। इसे जड़ से बातचीत करना नहीं कहा जाता किन्तु सोम औषधि के उत्तम गुणों का वर्णन करना है क्योंकि श्रवण इन्द्रिय हीन होने से जड़ में कोई साबोधन नहीं हो सकता। सं०-अतः समाधान करते हैं। गुणादप्रतिषेधः स्यात् ॥४७॥ ५००-(अप्रतिषेधः स्यात् ) अर्थों में कोई परस्पर विरोध नहीं (गुण) वृत्ति से। मा०-वेद में यह कहा गया कि अदिति ही धौ है और Faccosadi লজ্জাব হুক খুয্যে জুয়ি লজ্জা কা জ্বলন্ত ফিন্যা জ্ঞা সক্ষা কি চাই লা ম ক হ মাত না লাল কা স্থা होता है या हरित कपि सैन्धव, आदि होने से परस्पर अनेक मों के यथास्थान संगति करने से होते हैं जैसेही वेद में जानने चाहिये। पछल-पुनः समाधान करते हैं। विद्यावचनमसयोगात् ॥४॥ पा० ० ( विद्याऽवचनम् ) विधि में अर्थ सहित पठन पाठन का न कहा जाना यह (बासंयोगात् ) उसके वाचन की समाप्ति मा०दि विद्या में अर्थसहित पठन पाठन का विधान नहीं है तो उसका यह भाव लेना कि वेद अर्थ सहित न पढ़ा जादै ठीक नहीं क्योंकि अध्ययन शब्द का मन ही, साथै साहित पठन- --एक और समाधान करते है। सतः परमविज्ञानम् ॥४९॥ घ0 o (अविज्ञाना) जिन मन्त्रों में अर्थ का अविज्ञान बतलाया है बह (सतः परविद्यामान अर्थ काही जानना मा०महाँ वेदों में श्री समझ में न आवै यहाँ अपनी अविद्या ही समझनी चाहिये मन्त्रों का कोई दोष नहीं बन्योंकि उनके अर्थ हो सकते हैं और उनके अर्थ बुद्धि पूर्व है। -पुनः समाधान करते है।

उक्ताश्चाऽनित्यसंयोगः ॥५०॥ 40 (चित्य संयोगः) जन्म मरणा वाले विपन्न वेद में हैं इसका समाधान ( उक्तंच) पीछे और भी कह ही दिया है। मा-वेदों में जहां मनुष्य अथवा गांवों के नाम आये है वह सामान्य संज्ञा है किसी व्यक्ति विशेष वा श्राम विशेष को लक्ष्य करके नहीं कहे गये हैं और ऐसा ही सर्वत्र जानना चाहिये। सं०-अब स्वपक्ष परिपुष्ट करने को युक्ति देते हैं। लिङ्गोपदेशश्च तदथत्वात् ॥५१॥ प० ।-(लिङ्गोपदेशः) वेद मन्त्र से परमात्मा के चिन्हों का वर्णन आया है वह (च) और भी ( तदर्थवत् ) उसे (वेद) को अर्थ सहित पढ़ने पढ़ाने का साधक समझना चाहिये भा०-यजुर्वेद ४०१४ में बतलाया है कि वह कमी कंपन नहीं करता तथा एक ही है" इसमें अकंपन और एक ही है यह दो विशेषण परमात्मा के लिये होने से बिना अर्थ सहि वेद कैसे जाने जा सकते हैं और उनके अज्ञान से विशेष्य का भी ज्ञान नहीं हो सकता। संग-पूर्वोक्त अर्थ में युक्ति देते हैं। ऊहः ॥५२॥ प० ऋ०-(ऊहः) सर्क से भी। भा- ऋग्वेद में कहा गया है कि वह परमात्मा प्राणदाता और 16 SATIRADE SAOMIC (३७) पिता है। प्रश्न यह है कि जो प्राण दाता नहीं वह पिता भी नहीं हो सकता अब इसका स्पष्ट कार्य बिना तर्क के नहीं हो सकता। अतः वेदों को अर्थ लाहित ही पढ़ना चाहिये। सं-पुनः और भी युक्ति देते हैं। विधिशब्दाश्च ॥५३॥ प० क्र--(विधि शब्दाः विधि) विधि वाक्यों (च) में भी वेदों के अर्थ सहित पढ़ने पढ़ाने की आज्ञा पाई जाती है। आ०-यजुर्वेद में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीते रहने की आज्ञा हैं। यह ज्ञान तब तक न हो सकेगा कि जब तक अर्थ सहित विधि विधान युक्त कर्मानुष्ठान न किया जावेगा। परन्तु यह सब वेद के अर्थ सहित पठन पाठन से ही जाना जा सकता है अन्य किसी प्रकार से नहीं। इति मीमांसादर्शने प्रथमाध्यास्य द्वितीयः पादः । HEART # ভঙ্গী ইজু ও স্থা সুস্বচ্ছাত্যে স্বীঅন্যকেঃ গাই । এ অল ক্ষায় ব ক = ইনি স্বল? অনুলঃ আ!ি গণ হত্যাক্ত লা সুস্থ সু কালৰ ছাল স্ব সাহা গল্পী লিচু ছাল উদাহছুক্ষন অ বিন্যই অত জ্বলে স্থাষাৰভাগী ॥৭ অগু = ইক ল র (খাজুলহাসু, ঈক্ত উক্ত ) াঞ্জাহিঙ্কা হই আস্থা ও বিঃ আয়! গ্যজ্জা ও স্কুল- ব্রহ্মা, হালুস্বসম্বার । জ?= ল ক খুবঃ সঞ্চান ী এক দ ল লহী সাক্সালিঙ্ক কী ছিল উক্ত সিল সাজা প্রায় কানায় কী ঃ জ্বীন ই স্বসস্তাখা । –ভক্ষ? দুঙ্গাঞ্জাল যুদ্ধ হই । থি লা নুমালালাগলাগলা আর ২ অe --গণি, জা) চিল্লান্ত জুম্ম হাভি { জন্য স্বাথ্যাল সুন্দৰ ষ্ট ভুগ ক্ষত্তি স্মাকি কি হয় ? (গলা } জায়ণ সুল (সা) উত্তাল হল ক স্থাহ্য । ক্লাস ৯ ৰ ক্ষী : মুন্নী গাল। অা জুব অহু লহু कह सकते कि वेदानकूल होने से ब्राह्मण अन्य प्रमाण है ही नहीं। उन्हें भी परतः प्रमाण में माना गया है, क्योंकि ब्राह्मण s এক छान्यों के कती ऋषि थेनकि ईश्वर । सॉक जो ब्राहय वेदानुकूल नार्थ प्रतिपादक है वह प्रमाण और গ গ্লসা । विरोधे वनपेक्ष्यं स्यादति हनुमानम् ॥३॥ १० ० (बिरोके) वेद और ब्राह्मणों का परस्पर विरोध होने पर ( अनुमान) शतपथादि ब्राह्राण (अनपेक्ष्य ) अप्रमार है। (तु) किन्तु ( असति, हि ) अविरुद्ध होने पर वह प्रमाण (स्यात् ) है। मा--जिसका वेदों में निरूपण किया है और यदि उसका স্থায় নিয়াজুল লী জন বী অন্ধ জুয়ঃ সায় परन्तु वेदानुकूल होने पर प्रामाणिक कहे जा सकते हैं। सं०-वेदों के अनुकूल होने से प्रमाण और और विरुद्ध होने से अप्रमाण है तो ब्राहारण ग्रन्थ परतः अमारा क्यों माने जावें। हेतुदर्शनाच्च ॥४॥ एक० (ऋषि) प्रोक होने के सिवाया (हेतु दर्शनाच्च) छेदों की व्याख्या र कारण से भी उन्हें परतः प्रमाण में लिया है। জানুৱষ ঈ ন্দি হীন ই বুলন্ত বিহীন অন্ধ कि वह वेदों की व्याख्या है और जिसकी जो व्याख्या होती है वह उसके छानुसार होने से प्रमाण और प्रतिकूल होने से अप्रमाण होती है। सं०-क्या ब्राह्मण सर्वथा वेदानुकूल है। asa शिष्टाकोऽनिरुदयि बेत ॥५ प -( शिष्टाकोणे) उसे शिविता किनी विरोध के माना है कि (अविरूद्ध )बह सर्वमा बहानकूल है यदि ऐसा करोगे तो ठीक नहीं। आ.जो वेदविहित कर्मों के करने वाले हैके शतपथादि बामणो को मानपूर्वक स्वीकार करते हैं यदि यह वेदविसद्ध होने तो इस प्रकार उनका ब्रहण न होता। अतः वह बेदानु- कूल होने से वेद तुल्य प्रमाण है। सं०-इसका समाधान करते हैं। ল স্থা?ঙ্গকাহিঙ্গাযালী ॥ घा ऋ०-(न) यह ठीक है। ( शाल्न परिभागा त्यात ) ईश्वर रचित होने से केवल बेद ही स्थान पर हो सकते है। HD मातस्माद्यज्ञास हुतः मन्त्र में चारों वेदों की उस परमात्मा से उत्पन्ति मानी गई है। शतपथादि ब्राह्मणों की नहीं, इस-- लिये वेद स्वतः प्रमाण और तदनुकूल होने से नारायण परतः সত্যি । संo यहि ऋषियों के ब्राह्मण अन्य मान्य है तो वेदवत् ब्राह्मण क्यों नहीं माने जाते। अपि वा कारणग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन् ॥७॥ प० अपि बा) शंका निवारणार्थ प्रयोग है (कारण प्रहणे) नेद विरूद्ध का ग्रहण न किये जाने से (प्रयुक्तानि) बनाये हुए होने से (प्रतीयेरन् ) प्रमाण माने हैं।

भा-पि आदरणीय है परन्तु फिर भी मनुष्य होने से उन में श्रम होना गम्भव है। अतः उनके रचे हुए ब्राहाण ग्रन्थ वेदानुकूल होते हुये भी स्वतः प्रमाण न होकर परतः ॐ - सं०- अब इसी में हेतु देते हैं। तेष्वदर्शनाद्विरोधस्य समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ॥ प० ऋ०-( तेषु) उन ब्राह्मण अन्यों में (विरोधस्य) वेद के विरुद्ध (श्रदर्शनात् ) न होने से तथा समा] बेद तुल्य ही (विप्रति पत्तिः) पदार्थ विज्ञान (स्यात् ) है। भ-जो बेदों में पदार्थ विज्ञान है वैसा ही इन ब्राह्मणों में व्याख्या रूप विद्यमान है अतः जिन ब्राहाणों की विषयानु- कूल संगति मिलती है वह प्रमाण ही है परन्तु असंगति होने पर अप्रमाण है। सं०-ब्राहाण ग्रन्थों में संध्यादि अग्निहोत्र कर्म कर्तव्य विस्तार से कहा है परन्तु वेदों में नहीं। अतः विस्तार होने से भी अह प्रमाण नहीं। शास्त्ररथा वा तन्निमित्चत्वात् ॥४॥ प० क (वा) का प्रयोग सिद्धान्त प्रयोजन से है ( शास्त्रस्था) वेदों में कहे हुओं का ही ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यान है कोई स्वतन्त्र निरुपण नहीं क्योंकि (तन्नि मित्त स्वात्) बह बेदमूलक है। मा-ब्राहाणों मैं सन्ध्यादि अग्निहोत्र का निरूपण कपोल NAANINDRARALER कालिपल नहीं किन्तु बेदानुकूल है। जिसे वेदों में कलव्य कई बतलाया। उन्हीं की आप अन्यों ने विस्तार पूर्वक व्याख्या है अतः माहारण बोदानुकूल होने से प्रमाण है। राहारा नाथों में विधि अर्थवाद आदि कई प्रकार के विषय कहे गये हैं इन में विकास को प्रमाण माना जाने । चोदितं तु प्रतीयेताऽ.वराधात् प्रमाणेन ॥१०॥ प ---(चोदित) विधि अनमार (तु) ही ( प्रमागोन) बेद के साथ (अविशेधात) विरोध न होने से ( (प्रतीयेन्) प्रमाण मानना चाहिये। माल-ब्राहाणों में विधि, अर्थवाद आदि कतिपय प्रकारों से प्राथों को विस्तार दिया गया है वहां विधि शरदों में जो-जो कहा गया है वह बेदानुकूल होने से अनुष्ठान कर्म करने योग्य है वह प्रसंगवश कहा गया है। --- कल्प सूत्र भी वेदाङ्ग होने से परतः नमाण कयों --1E3. AAREEFM प्रयोगशास्त्रमिति चेत् ॥११॥ १० --(प्रयोगशास्त्र) वेद विहित धर्मों का यथार्थ अन-- ष्ठान के बतलाने वाले कल्प सूत्र तो घेद सहश स्वतः प्रमाण हैं (चेत्) यदि ( इति) ऐसा कहो तो असंगत है। भाo--कल्प सूत्र वेदोक्त कर्मानुष्ठान का बोध कराते है तो कल्प सूत्रों को वेदानुकूल होने से स्वतः प्रमाण मान लेने में क्या हानि है. यह प्रश्न किया गया है। सं०- इसका समाधान ।

नऽसब्जियमात् ॥१२॥ १० ऋ (न) कल्प सूत्र वेद तुल्या प्रमाण नहीं क्यों कि । असन्नियमात् ) उनमें अवैदिकत्व का भाव भी मिलता है । मा०. वेदों के समान कल्प सूत्रों में सच्चे अर्थ नहीं मिलते। क्योंकि जो बात वेदों में नहीं उनका कल्प सूनों में वर्णन होने से काल्पनिक है। अतः वह स्वतः प्रमाण नहीं के भी बाहरणों के सदश ही परतः प्रमाण रहेंगे। सं ---इसमें यह युक्ति है। अवाय शेष ११३॥ १० Fe]ल्या सूत्रा स्थलः आमाण नहीं क्योंकि अचा- অ-স্ব মাছ ভাল ষ্টাঃ জিম্মি জন্য স্মীয় উলঙ্কা তারি ভ্রাম্পত্য Omanta आवेदों में कर्मानुष्ठान करने की कार सिखती है कौं के फल के प्रशस्नात्मक बाबा हैं वैसे अल्प सूत्रों में नहीं उनमें लो केवल कर्म फलों के प्रकार काही बोल है अतः वेद सहश स्वतः सभाप माहीं शुन: एक और युक्षि यह भी है। सर्वत्र च प्रयोगात्सन्निधानशास्त्राच्या 1980 १० - सर्वत्र] सम्पूर्ण कल्प सूत्रों में [ सन्निधान शास्त्रात्] अर्थ की योग्यता से छाति समीपस्थ वेदार्थ के प्रयोगात ] विरुद्धार्थ प्रयोग के मिलने से च] वह वेद सदृश स्वतः अमारण आल्य सूत्र ऋषियों के रचे हुए है वह बेद के निकटतम EMENT होते हुए भी उनमें ऐसे कार्य किये है कि जो स्वसत निरूपण दिलता है। अतः कल्पसूत्र परतः प्रमाण में पा सकते हैं स्वतः प्रमाा में नहीं संभ-शिष्टाके वाचरण के अनसार माचा व्यवहार को प्रमाणित करते है। अनुमानमवस्यानार तसंयुक्त प्रमाण- स्यात्॥१ थ० ० (अनुमान व्यवस्थालात ) स्मृति तथा शिष्टाचरण ইহা শান্ত স্কীহ নারী খুন-গাল্ডিলা দুইল চে গাখ যা (तत्संयुक्तं) वह उसी व्यवस्था के साथ सम्बन्ध रखता हुन्या (प्रमाणं) प्रमाण है। ---स्मृति जिस देश जिस काम और जिस अवस्था में शिष्ट पुरुषों द्वारा बनी उसी में उसका अनुसरण करना चाहिये न कि अन्य भी सर्वत्र करें सं०-इसका समाधान यह है। अपि वा सर्वधर्मः स्यातल्यायत्वाद्विधानस्य । ५० ऋ०-(अपि वा ) 'वा' शब्द पूर्व पक्ष के निराकरण के लिये है (तत्) मनुस्मृति और शिष्टाचार से (सर्वधर्मः) मनुष्यमात्र का एक समान अ चरणीय धर्म (स्यात् है क्योंकि ( विधानस्य ) स्मात अर्थ और शिष्टों का आचरण (न्यायत्वात् ) सर्वथा ठीक है। माछ-मानव धर्मशास्त्र में जिसका विधान है और जो सना- तन से शिष्ट पुरुषों के आचरण हैं वह सर्वथा वेदानुकूल मा० । LINEERI ANTEEEET । होने से मान्य है। अतः वह मनुष्य मान्न के लाम के लिये हैं किसी जाति, देश, काल व अवस्था विशेष के लिये ही नहीं। सं-जहां स्मृति अथवा शिष्टों के अनुसार आचरण करते हुए न रह सकें वहां क्या कर्तव्य है। दर्शनाद्विनियोगः स्यात् ।।१७।। प० ऋ०-(दर्शनात ) वैदिक ज्ञान से (विनियोगः ) स्मार्ट शिष्टाचार की स्थापना (स्यात् ) होती है। मा-जिस देश में वेदोक्त धर्म और तदनुकूल शिष्टाचरण न रहा हो वहां पुनः शिष्टाचार स्थापित किया जाना चाहिये। सं०-~-जहाँ वैदिक शृङ्खला न रही हो वहाँ क्या कर्तव्य है. लिङ्गभावाञ्च नित्यस्य ॥१६॥ प० --(नित्यस्य) वैदिक धर्म नित्य होने से सनातन है उसका नाश नहीं हो सकता। (लिंगा मावात् ) सनातन के नाश का कोई प्रमाण हेतु नहीं मिलता । भा-वेद अनादि ज्ञान है उसका नाश नहीं होता। मनुष्यों की रज तम बुद्धि भेद से अर्थ और आचरण के कारण उत्थान और पतन होता रहता है। अतः वेदानकूल जीवन बनाने से वह सात्विक बुद्धि, पवित्र भाचरण और अर्थ पुन: प्रचलित हो सकते हैं। सं०-जिस देश के जो आचरणीय प्रन्थ वहां के लिये अनुकूल है अन्य देशों में उनकी अनकूलता FAAKANGNANT प्राख्या हि देशहयोगात् ॥१॥ TO TO... (या) नाम (हि) मी (देशसंयोगात ) देश विशेष के सम्बन्ध है। मा वैदिक धर्म के प्रचारक ऋषि आदि काल में जिस देश मैं गए वहां से ही सर्वत्र वह वेदोक्त धर्म कला । उसी के अनुसार स्मृत्ति अन्श बने, और सदनुकूल ही शिष्टों के आचरण बने। ०-इसमें यह अाशंका है। न. स्याद शा-तरोचिति चेत् ॥२०॥ प -- देशान्तरेषु) यदि मारन धमे केवल देश योग से है तो (न) ऐसा नहीं (स्यात) होना चाहिये (चेत् । बाद (इति) ऐसा कहो ठीक नहीं। --किसी वस्तु से किसी वस्तु के नाम का तब तक सम्बन्ध रहता है जब तक वह बनी रहे, बाद को बह नहीं रहता इसी प्रकार इमारत धर्म' अन्यत्र जाने से उसी देश के नाम से होना चाहिये। संo-इस आपत्ति का निराकरण करते है। स्याद्योगाख्या हि माथुरवत् ॥२१॥ ५० ऋ०-( योगाख्या, हि) निश्चय भारत के साथ योग होने से ( स्यात् ) है जैसे (माथुरवंत) मथुरा निवासी माथुर बहलाये।

. [४७] -भारत में जन्म लेने से श्रादि ऋषि भारतीय ऋषि कहलाये। यह किसी भी देश में आवागमन में रहें भारतीयता शून्य नहीं रह सकते। सं०-इस में आशंका करते हैं। कर्मधर्मों वा प्रवणवत् ॥२२॥ बा' शंका सूचक शब्द है। (कर्मधर्मः) ऋषियों के नाम के साथ देश बोधक शब्द का योग वेदोक्त कर्म का का अङ्ग है (प्रवरणवत्) प्रवण के समान ! ला-जैसे यह विधि है कि "प्राचीन प्रवेण वैश्व देवेन-- यजेत् ” अर्थात् प्राचीन प्रवण देश में वैश्य देव नामक यज्ञ करें जिस प्रकार यहाँ वैश्वदेर का प्राचीन प्रवण देश आग बत जाया गया उसी प्रकार वेदोक्त कर्मानुष्ठान कर्तव्य योग्य fमरतवर्ष ही है अतः यह भारतीय धमे होने से उन्हीं से कर्तव्य है अन्य से नहीं। Ho-इसका समाधान यह है। तुल्यं तु कर्तृधर्मेण ॥२३॥ पा) क्र-'तु' आशंका निवारणार्थ है (कत धर्मेण) देश विशेष. को कर्म का अंग मान लेना. काले गौरे कर्ता के अग स्वीकार के [चुल्य] सदृश हैं। मा० कर्म कर्ता के काले गोरे अंग पर ध्यान देना जिस प्रकार व्यर्थ है क्योंकि उसका कर्मानुष्ठान से क्या सम्भन्ध वाह वैदिक होना चाहिये चाहे वह काला हो चाहे गोरा बहा रंग का प्रश्न ही नहीं इसी प्रकार देश विशेष को कर्म का अंग मानना वृथा है।

क मार AURA attes Harior HHI alo-1पद प्रयोग--सिद्धि में कहते हैं। प्रयोगापत्यशास्त्रत्वाच्छब्देषु न व्यवस्था स्यात् ॥२४॥ --( अयोगोत्पत्त्य शास्त्रत्वात् ) शुद्ध पद की सिद्धि में व्यावरण की अप्रामाणिकता से ( शब्देषु) शुद्ध तथा अशुद्ध शब्दों में व्यवस्था) शुद्ध शब्द प्रयोग की व्यवस्था (न! स्थ्यान्न ) नहीं हो सकती मा-गो शब्द शुद्ध और गावी, गौणी- आदि अशुद्ध है यह व्याकरण ही बता सकती है परन्तु शुद्ध पद की निष्पत्ति में बेद मूलक व्याकरण न होने से अप्रमाण है अतः शुद्ध तथा अशुद्ध शब्द का प्रयोग करना उसके नियम से ठीक नहीं। सं०-उस पक्ष का समाधान करते हैं। शब्दे प्रयत्लनिष्पत्तेरपराधस्य भागित्वम्॥२५॥ ५० ऋ०-(शब्दे) सर्वथा शुद्ध शब्द का प्रयोग हो क्योंकि (प्रयत्न निष्यन्तेः अपराधस्य) उसके प्रयोग करने से अपने ही पुरुषार्थ से साध्य पाप का (मागित्वम् ) मागी होना पड़ता है। मा-शब्द शास्त्र वेद मूलक है। महा माध्यकार श्री पतंजलि ने लिखा है कि अशुद्ध कमी मी न बोले उसका बोलने वाला म्लेच्छ हो जाता है। सं०-और भी युक्कि देते हैं। अन्यायश्चानेकशब्दत्वम् ॥२६॥ ५० ऋ०-(अनेक शब्दत्वम्) एक शब्द के निमिच समानार्थ 5523 अनेक शब्दों को मानना (अन्यायः) अन्याय है। माo-ार्थ बोध शुब्दाधीन है। यदि वह एक ही शब्द से होता हो तो उसके लिये समानार्थक अनेक शुद्ध अथवा अशुद्ध शब्द गढ़े जावे जैसे जिसके पाले में सासना (कम्बल) लटकता हो वह गौरूष अर्थ का व्यञ्जन गोशब्द पर्याप्त है गौणी, गावी आदि अपभ्रंश तथा शुद्ध अशुद्ध शब्द का मानना अलमी- सं०-- शुद्धाशुद्ध शब्द का ज्ञान कैसे हो । तत्र तत्त्वमभियोगविशेषात्स्यात ॥२७॥ प - (त्र) शुद्ध तथा प्रशद्ध अनेक शब्दों में ( तत्वं) शुद्ध शब्दार्थ ज्ञान (अभियोग विशेषात् ) व्याकरण के अभ्यास से (स्यात) होता है। मा०-गो शब्द शुद्ध और गावी, गौशी आदि अशद्ध अपभ्रंश है. यह ज्ञान व्याकरण अध्ययन से होता है अतः शुद्धाशुद्ध ज्ञान के लिये व्याकरण का पढ़ना आवश्यक है ! अशुद्ध शब्द कैसे बने और उनसे गो रूप अर्थ का ग्रहण कैसे होने लगा। तदशक्तिश्चानुरूपत्वात् ॥२८॥ पक्र--(तत्) गौ शब्द के गौणी गावी आदि अपभ्रंश अशुद्ध शब्द (अशक्तिः) व्याकरणानुसार शद्ध शब्द न जानने की शक्तिहीनता ही है (च) और ( अनुरूप स्वात् ) गो शद के समान होने से उससे गौरूप अर्थ का बोध कर लिया। मा ---पूर्व काल में किसी ने गौ शब्द उच्चारण करने के स्थान में व्याकरण ज्ञान की न्यूनता के कारण शुद्धोंच्चारण न कर सं०-यह AHARASHIAN লঃ থংহ এর কু'ক্য হয়ে এক মা হচ্ছে কি না হাত दूसरों ने भी सुने और प्रोत्तर इसी प्रकार स्थान पाले गये और गौ शब्द के अपनश होने से गोत्व दर्थ बोध में प्रयुक्त होने लगे। सं०-इसी को पुनः दृष्टान्त सेलिकपणा करते हैं। एकादेशमाञ्च विभक्तिव्यत्यये स्यात् ।।२।। 40 ३०-(च) तथा (विमति व्यत्यये) अन्य विभक्ति के बोलने पर जैले प्रतिपादकरूप एक देश की समानता ले अर्थ बोधक होते हैं उसी मांति (एकदेशवाह) गो भदप शक शब्द का प्रयोग एक देशीय होने से गौणी, गावी आदि अशुद्ध और अपभ्रंश शब्दों द्वारा गो रूप अर्थ व बोध स्यात होता है सं०-गौ शब्द की शक्ति गो धर्म आदि अर्थ में हो सकती है न कि व्यक्ति में अतः इसे सिद्ध करते हैं प्रयोगचोदनाभावादकत्वमविभागात् ॥३०॥ ५० - [अविभागात् ] गो शब्द लोक और वेद में एक सा है [अर्थकत्वम् ] उसका व्यक्तित्व रूप से एक ही अर्थ मी है क्योंकि [प्रयोग चोदना भावात् ] वाक्य की प्रेरणा होने से माo- 'ब्रीहीन्वहन्ति' धान कूटो, 'अश्व नय' घोड़ा ले जा 'गामानय गौ लाओ इन प्रेरक वाक्यों में धान का कूटना, घोड़ा ले जाना और गौ लाना आदि मात्र का अर्थ बोधक है न कि जाति का । जाति लाई या ले जाई गई अथवा कूटी नहीं जा सकती। अतः गौ शब्द गौ व्यक्ति का बोधक है न कि जाति का। सं०--जाति के शब्दार्थ न होने में हेतु देते हैं।

M पYRIDAUNTY Tarun प०अल्या रावस्था मदि शब्द का अर्थ जाति खान लिया जाये तो वह व्याशित बातों का बाचक नहीं आना जावेगा। मा और कोई कहे कि छः दो, बीमा दो, तो इन बाचयों जो छ. अथवा बील आदिका देना है वह जाति पक्ष में नहीं किन्तु व्यक्ति का ही है। क्योंकि जाति एक होने से छः आदि संख्या का आधार नहीं हो सकती। 0--और युक्ति देते हैं। अन्यदर्शनाञ्च ॥३२॥ प० ऋ०- अन्यदर्शनात् ] प्रहा--क्रिया के साथ अन्य बस्तुका अन्व्य देश जाने से [च] शब्द का अर्थ जाति नहीं। -जैसे कोई कहे कि यदि युद्ध में एक अश्व भर जाने तो तुरन्त दूसरा ले लेवे । यहां अश्व का मरना और अन्य का ग्रहण जाति पक्ष में नहीं बट सकता क्योंकि जाति में मरण और ग्रहण दोनों असम्भव है इसलिये व्यक्ति ही शब्द का अर्थ है जाति नहीं। सं0--पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। प्राकृतिस्तु क्रियार्थत्वात् ॥३३॥ प० ऋ०-[तु] पूर्व पक्ष को हटाने के निमित प्रयोग किया है [प्राकृतिः] शब्दका अर्थ जाति है न कि व्यक्ति क्योंकि [क्रिया- थत्वात् ] शिष्ट गुरुजनों के व्यवहार में आने से जाति रूप अर्थ में ही शब्द की शक्ति का ग्रहण है - पारतं मांव वेमा FORY হYes-cয় সুখী এই লীলায় দুঙ্গা কাকে চীনা সুলকার : প্রী प्रकार वह शब्द की शक्ति को प्राण हरता है यह जाति में ही होता है जैले जिलने जिस व्यास्तु के नाम के शब्द शक्ति को प्रहण किया वह उस वही कहेगा और उससेलिन्न व्यक्ति को देखकर सन्देह होगा ही नहीं। सं-पुनः सन्देह किया जाता है। न क्रिया स्यादिति चेदान्तहे विधान न द्रव्य... मिति चेव ॥३४॥ प० ०--(क्रिया) जाति पक्ष में जैले यह कहा जाने कि "नीहीन वहन्ति धान कूटने की क्रिया (न स्यात् ) नहीं होगी और (अर्थान्तरे) अन्य के स्थान में (विधानं ) अन्य ग्रहण का विधान तथा (द्रव्या, षड्देया, द्वादश देया इत्यादि द्रव्याश्रय काल (न) नहीं होगा (चेत् ) यदि (इति) ऐसा कहो तो ठीक नहीं। -तेतीसर्व के माध्य में बताया जा चुका है कि यदि व्यक्ति में शक्ति ग्रह मानी जाये तो जिस व्यक्ति में उसको शक्ति ग्रह हुआ है उससे अन्य में शक्ति ग्रह न होने से अवश्य- मेव सन्देह होता क्योंकि शक्तियें अनन्त हैं और एक व्यक्ति हूसरे से मिन्न है अतः जाति ही शब्दार्थ है व्यक्ति नहीं। सं०-इन शंकाओं का समाधान करते हैं। तदर्थत्वात्प्रयागस्याविभागः ॥३५॥ -(तदर्थत्वात् ) ब्रीह ( जो) आदि पदों को लक्षणवृत्ति से कहे हुये अर्थ होने से (प्रयोगस्य) प्रयोग के अर्थ का (अवि- मागः ) बाधक नहीं। मा०-शब्द का अर्थ यह है कि जिसका अन्य किसी प्रकार से TO New sa 2009 प०क्र०- Datma नाम न हो। व्यक्ति ऐसा पदार्थो नहीं कि जो अन्य किसी भांति न मिल सके। जाति प्रहण से वह स्वयं ब्रहण में भाजावेगी ফাঁকি অ জানি স্কা স্ব স্ত্রী লি গাঙ্গ সানি ঘা अहण नहीं हो सकता। अतः उसमें शक्ति का मानना व्यों है और अर्थापत्ति से लाभ करने में बड़े दोष हैं अतएव शब्द का मुख्यार्थ जाति और व्यक्ति बिना आक्षेप के मिलते हैं। इति श्री मीमांसा दर्शने प्रथमाध्याये तृतीयः पादः । अथ प्रथमाध्यायस्य चतुर्थपादः प्रारभ्यते। वेद स्वतः प्रमाण हैं, , ब्राह्मण, कल्प सूत्र, स्मृति और शिष्टाचार वेदानुकूल होने से प्रमाण और प्रतिकूल होने से अत्र- माण कहे। अब ऐतरेय ब्राह्मण में निरूपित्त कर्म की संज्ञा का कथन करते हैं उक्तं समाम्नायैदमयं तस्मात्सर्वं तदर्थ स्यात् । ( समास्नायै तदर्थ । वेद को विवेयार्थ में प्रामाण्य ( उक्तं) कहा गया है (तस्मात् ) अतः (सर्व) सब ब्राह्मणों में कहा हुआ उद्भिदादिपद (तदर्थ) विधेयार्थ के लिये (स्यात् ) है। मा०-ज्योतिष्टोम यज्ञ में ऐसा पाठ आता है कि "उद्भिदायजेत् इत्यादि इसमें पूर्व पक्षी ने यह कहा है कि प्रथम वेद करो विधेय अर्थ में प्रामाण्य कहा क्योंकि विधि वाक्य पूर्व विधान किये गये ज्योतिष्टोम यज्ञ में उद्भिदादि रूपगुण विशेष का विधान करते हैं किसी अपूर्व योग का नहीं क्योंकि ऐसा मानने से वाक्य भेद हो जाता है कि एक ही वाक्य प्रथम याग का और फिर उसके नाम का विधान करे यह समीचीन नहीं अतः ऐसे यागों में गुण विशेष का ही विधान मानना ठीक है नाम का नहीं। सं०-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। प०क्र०-- amarSIR अपि वा वाम संसाधलवावपूर्वमविधा- यकवार पा० ऋ०-अपि का) सदा पूर्ण पक्ष निवारण के लिये है (उत्पती) सुनने पर ( या ) जो पद (अपूर्ण) या किसी अन्य अर्थ में प्रयोग में पाया हो मन) साग का नाम (स्यात् । है [विधायकवाना मिली मुख विशेष का बदलाने वाल! नहीं। भा-उभिदादि पद किसी अन्य प्रार्थ के पर्याय में पहले प्रसिद्ध नहीं हुए। अतः उस्म भाग्य में किसी गुण भूत द्रव्य विशेष का नहीं करते किन्तु वेद विहित कमी की संज्ञा ही बतलाते हैं। सं0-चित्रादि शब्दों ले पागका निरूपण करते हैं। यस्मिन् गुणपदेशः प्रधानतोऽभिसम्बन्ध ॥३॥ ५० ऋ०-यस्मिन् ] जिस पद में [गुणोपदेशः रुद्र होने पर भी गुणोपदेश मिले उस का प्रधानतः ] धातु रूप प्रकृति के साथ [अभि सम्बन्धः ] याग का नाम हाकर सम्बन्ध होना योग्य है। मा० - इस वाक्य में कि "चित्र या यजेत पश कामः' इस नाम विधि से कि, पश कामना बाला पुरुष चित्रा नामक याग करे अथवा इस में गुणविधि है कि चित्र रूप वाले किसी द्रव्य विशेष से याग करे ! इसका उत्तर यह है कि यद्यपि चित्रा शब्द उद्भित शब्द के समान यौगिक है परन्तु किसी निमिन्न रूप वाले किसी एक पदार्थ से रूढ़ है तब भी वह उद्भित के समान याग है। चित्रा याग दही, मधु, घी और जल, अक्षत अनेक पदार्थ युक्त होता है परन्तु गुणविधि मानने से 'अग्निषो मीयं पशमा लमते” अर्थात् प्रकाश और सरल गुणमय परमात्मा [५] के उद्देश्य से पशु का उत्सर्ग त्याग] करे। सं-- अग्निहोत्रादि शब्दों को इसका नाम होना निरूपण तत्पश्यञ्चाल्यशास्त्रम् ॥४॥ १० च और तत्प्रख्य] जिल बाबय में सुने हुए गुण का मिलने वाला [ अन्यशास्त्रम् ] अन्य वाक्य विद्यमान हैं उस में नाम विधि होती है। मा०--ब्राह्मण अन्थों में "अग्निहोत्रं जुहोति यहाँ यह जानना হঅ ই কি চন্দ্র স্থায় স্কা বিলাল লাল টু আর অন্য হী। इसका यह उत्तर है कि "अग्नि ज्योति” इत्यादि से सायं जुहोति और सूर्योज्योति से प्रातः जुहोति । इन वाक्यों में अग्नि रूप गुण पाया जाता है परन्तु प्राप्त विधि नहीं है अतः यह नाम विधि ही कहे जावेंगे और यदि यह कहो कि जिस कर्म में अग्नि में होमता है वह अग्निहोत्र है इससे भी नाम ही उपलब्ध होता है गुण नहीं। अतः वहां नाम की विधि है न कि गुण का विधान। वैसे ही 'आधार" याग कर्म में भी नाम जानना। सं०-श्येन शब्द भी याग का नाम है उसे कहते हैं। तत्व्यपदेशं च ॥५॥ प० क्र --(च) तथा । तद् व्यपदेशं) जिन वाक्यों में प्रसिद्ध पदार्थ से कर्म का उपमेय तथा उपमान भाव से निरूपण पाया जावे उसे भी नाम विधि कहते हैं भा-जिन स्थलों पर श्येन, सन्देश तथा गो याग के नाम आये है वहां गुण विध न है अथवा नाम इसका उत्तर यह दिया गया है कि यद्यपि जाति वाची श्येन आदि शब्दों से याग का निरूपण किया गया है परन्तु उस याग में श्येन आदि रूप गुण विधान HER সান क्रमांव विमा के प्रयोजन से नहीं किन्तु उपमा के प्रयोजन से है जैसे श्येनः याज अपने शत्रु को पकड़ लेता है अथवा सन्देश संडाली बट- लोई आदि को पकड़ती है और गौने दूध से यजमान का श्येन सहश (क्षण करती है) वाला भाव है अतः नाम विधिही मानना चाहिये न कि गुण विधि। सं० वाजपेय शब्द मी याग नाम धेयक ही है। नामधेये गुणश्रुतेः स्याद्विधानमिति चेत् ॥६॥ प० ऋ०--(नाम धेये) नाम ही में (गुणश्रुतेः) गुण के सुने जाने से (विधान) वाजपेय शब्द से गुण विधान ( स्यात् ) है । (चेत्) यदि ( इति ) कहा जाये तो समीचीन नहीं। मा० -ऐसे अनेक स्थलों में बाजपेय याग का नाम है अथवा गुण विधान है कि जहां पाता है कि "वाजपेयेन स्वराज्य कामो यजेत् ” इसका यह भाव है कि पान करने योग्य अन्न रस को बाजपेय कहते हैं। इससे सिद्ध है कि वाजपेय संज्ञा में ही द्रव्य रूप गुण पाया जाता है अतः वहां गुण विधान है न कि नाम विधि है। सं-अब इसका समाधान करते है। तुल्यत्वात् क्रिययोर्न ॥७॥ प० ऋ०-(न ) यह गुण विधि नहीं क्योंकि गुणविधि स्वीकार करने से (क्रिय योः) वाजपेय यज्ञ और दर्श पूर्णमास यह दोनों यज्ञ क्रियायें (तुल्यत्वात् ) परस्पर समान होती हैं। भा०-वाजपेय याग में गुण मानने से दर्श पूर्णमास की विधि में अन्तर नहीं रहता । दर्श पूर्णमास याग में भी तो वही गुण वाजपेय कैसे अन्न भय द्रव्य के गुण विधि युक्त ही होते हैं अत:

गुण की सदृशता से दर्श पूर्ण मास प्रकृति याग और वाजपेय विकृति याग हो जावेगा और अति देश स्वीकार करना होगा परन्तु वह माना नहीं जा सकता क्योंकि वाजपेय याग सत्रह "दीक्षा और सत्रह ही "उपसत' वाला होता है परन्तु दर्श पूर्ण मास में यह नहीं होते अतः ज्योतिष्टोम याग का विकृति रूप वाजपेय याग है। सं-इसमें हेतु देते हैं। ऐकशब्य परार्थवत् ॥८॥ १० - (ऐक शब्द) एक ही वाक्य में ( यदि एक ही वाक्य से गुण विधान पदार्थ वत्) गुणस्वरूप दूसरे अर्थ का गुण विधान मानने से वाक्य रूप दोष आता है तथा याग का अभि- धान कर लिया जावे तो एक ही यज धातु के अर्थ याग और वाजपेय के साथ वाजपेयेन यजेत् और स्वाराज्य कामों यजेत् ' इसमें कर्मत्व और कर्णत्व रूप सम्बन्ध मानना पड़ेगा जो ठीक नहीं क्योंकि एक ही पद का अलग अलग अर्थ से दोनों के साथ सम्बन्ध मानने में वाक्य दोष होता है अतः 'वाजपेयेन' इसे नाम विधि ही मानना चाहिये गुण विधि नहीं। सं०- अग्नेय आदि शब्दों को विशिष्ट याग का विधान कर्ता बतलाते हैं। तद्गुणास्तु विधीयेरन्नविभागाद्विधानार्थे न चेदन्येन शिष्टाः ॥६॥ प० ऋ०- (तु) शब्द नाम विधि की के लिये प्रयोग हुआ । (तद्गुणा) 'आग्नेय' युक्त गुणों है शब्द कर्म भारत कमांव विभाः । का (विधियेरन) विधान करते हैं। कारण कि (विधिनार्थे) कर्म विधायक धाग्य शब्दों में (अविभागात् ) कर्म और अग्नि आदि गुणों में अन्तर नहीं और यह गुण किसी दूसरे वाक्य से (शिष्टाः) उपलब्ध (न चेत् ) नहीं है। माo-जैसे दर्श पूर्ण मास अधिकरण में कहा जाता है कि 'यदाऽग्नेयोष्टाकपालो ऽमावस्यायां पौर्णमास्या यावाच्युतो भवति' इसमें आग्नेय शब्द अग्निहोत्र शब्द के समान कर्म का संज्ञक है अथवा गुण सहित कर्म का विधान है। यदि केवल नाम विधि मानी जावे तो लाघवता है तो सीन मानना ही ठीक है जैसे जहां कोई अन्य वाक्य गुण का विधान करता है वहां ही वह माना जाता है यह नियम है। जैसे अग्नि ज्योतिः इत्यादि में न कि सर्वन और भाग्नेयोऽटाकपालः' में अग्नि गुण का दिखलाने वाला अन्य वाक्य न होने से वहां गुण सहित कर्म के विधान करने वाले ही आग्नेय आदि शब्द है ऐसा मानना ठीक है। सं०--वहिः शब्द जाति वाचक है उसको कहते हैं। बर्हिराज्ययोरसंस्कारे शब्दलाभादतच्छब्दः।। बर्हि राज्ययोः ) बर्हि और प्राज्य का ( असंस्कारे) संस्कार हीन (शब्द लामात् ) शब्द प्रयोग से (अतच्छदः) वह शुद्ध नहीं क्योंकि बर्हिः कुश तथा शुद्ध घी के वाचक नहीं, बर्हि और आज्य मात्र के वाची हैं। सं०-प्रोक्षणी शब्द यौगिक है उसे बतलाते हैं। प्रोक्षणोष्वर्थसंयोगात् ॥११॥ ५० ऋ०-(प्रोक्षणीषु) जहां प्रोक्षण हो उन जलों में प्रोक्षणी शब्द TIME का प्रयोग मानना चाहिये। क्योंकि (अर्थ संयोगात्) अवय-- वार्थ के सम्बन्ध से प्रोक्षिणी शब्द का अर्थ जल ही है। मा०-दर्श पूर्णमास याग में "प्रोक्षिणी रासादय'- इस वाक्य में प्रोक्षिणी जल वाची है अथवा जाति वाची अर्थात् जल मात्र का ज्ञापक है अथवा यौगिक प्रोक्षण के साधन मात्र का वानी है। सं0-निर्मन्थ्य शब्द भी यौगिक ही है। तथा निर्मन्थ्ये ॥१२॥ १० ---( तथा) जिस प्रकार प्रोक्षिणी शब्द "प्रोक्षिणी रासादय वाक्य में यौगिक है उसी प्रकार (निर्मन्थ्ये ) यह वाक्य "निर्म- न्थ्येनेष्टब्दाः पचन्ति वाक्य में यौगिक है। मा०-अग्नि चयन प्रकरण में "निर्मन्थ्ये शब्द संस्कारवाची है अथवा जाति वाची अथवा यौगिक इसका यह उत्तर है कि अग्नि चयन कर्म प्रकरण में पढ़े जाने से वह शुद्ध अग्नि और उससे उत्पन्न अग्नि मात्र का वाचक हो सकता है परन्तु यहां यौगिक ही है। संस्कार वाची मानने से 'चिर मथति अथवा" अचिर निर्मथित' का निश्चय नहीं हो सकता और जाति वाचक मानने से यथोपपन्न अग्नि का ग्रहण अग्नि चयन में ठीक नहीं। अतः लोकिक मथन से अग्नि का ही ग्रहण करना चाहिये जो कि निर्मन्थ्य शब्द का अर्थ भी है। सं०-वैश्वदेव आदि शब्द मी याग वाची हैं उसे: कहते हैं। वैश्वदेवे विकल्प इति चेत् ॥१३॥ प० ऋ०-(वैश्वदेवे) अर्थात् “वैश्वदेवेन यजेत् " इस वाक्य में सुने गये देवता तथा द्रव्य रूप गुण का (विकल्प ): जैसे मांव भा ७ बाग्नेशमा कपाल नियति इस वाक्य में आये देवता तथा हव्य रूप गुण के साथ विकल्प है (चेत् ) यदि ( इति) ऐसा कहा जाये तो ठीक नहीं। चातुर्मास यज्ञ के चार पर्व अर्थात् वैश्वदेव, बरूण, अचास, साकमेध सुनासीरीय ! इनमें प्रथम पर्व में आठ प्रकार के याग कहे है। इसमें 6 वैश्वदेवेनयजेत् ५ गुणविधि है . अथवा नाम विधि इसका निरूपण करना है। यहां यजेत् पद बाठों याग का अनुवाद करके उसमें देवता तथा द्रव्य रूप गुण की विधि बतलाता है। प्रकरण में ऐलाही पाठ है उसके विहित देवता तथा द्रव्य रूप गुणों का आग्नेय' आदि वाक्या विधान किये अग्नि आदि देवता तथा पुरोडाशादि द्रव्य रूप गुणों के साथ विकल्प के स्थान में संग्रह है। सं०-इसका समाधान करते हैं। नवा प्रकरणात्मत्यक्षविधानाच्च नहि प्रकरण द्रव्यस्य ॥१४॥ ५० ऋ०-(न वा ) गुण विधि मान कर अग्नि आदि देवता रूप गुणों का विश्वे देव रूप गुण के साथ विकल्प ठीक नही (प्रकरणात ) प्रकरण से अग्नि आदि हाना और (प्रत्यक्ष विधा- नात्) साक्षात् तद्धित श्रुति से विहित एवं (द्रव्यस्य) उत्पन्न वाक्य से पुरोडाश आदि द्रव्य गुणों की प्राप्ति का भी (प्रक- रणं) प्रकरणानुकूल द्रव्य गुण के योग से (न, हि) विकल्प नहीं बनता। मा०-अग्नि देवता और पुरोडाश आदि प्रकार गुण पहले विद्य- मान होने से अन्तरङ्ग है और वैश्व देव वाक्य में विधान किये १ (६१) देवता एवं द्रव्य रूप गुण पश्चात् होने से वहि रङ्ग है यतः अन्तरङ्ग से वह रङ्ग निर्बल होता है अतः बहिरङ्ग द्वारा अन्त- का पाक्षिक बाध मानकर विकल्प' ठीक नहीं क्योंकि निर्बला प्रबल का बाधक नहीं हो सकता। अतः “वैश्व देवेन यजेत् ११ में गुण विधि नहीं कि तु नाम विधि है अर्थात् पूर्वनिर्दिष्ट बाट यागों में “यजेत् । पद से वैश्व देव नाम से अनुवाद कर लिया गया है। सं०-गुण विधि मानने में और भी दोष है। मिथश्चानर्थसम्बन्धः ॥१५॥ पा (घ) और (मिशः) दोनों का (अन सम्बन्धः) सम्बन्ध नहीं बनता। भा-उत्पत्ति वाक्य द्वारा उपलब्ध होने से अग्नि आदि गुण पूर्व ही विद्यमान है अतः उनका याग-योग होने पर प्रकरण द्वारा जाने हुए वैश्वदेव रूप गुण का सम्बन्ध नहीं माना जा सकता कारण कि अग्नि आदि गुणों का सम्बन्ध होने से याग आकांक्षा रहित हो जाता है और आकांक्षा रहित होने से सम्बन्ध नहीं होता एवं सम्बन्ध न होने से विधि मानना निष्प्रयोजन के समान है इसलिये वैश्वदेवेन यजेत् यह गुण विधि नहीं किन्तु पूर्वोक्त आठों याग की समुच्चय रूप नाम विधि है। सं०-याग की आवृत्ति से सम्बन्ध तो बन जाता है। फिर असम्बन्ध कैसा परार्थत्वाद्गुणानाम् ॥१६॥ ५० ऋ०-(गुग्णानां ) गुणों के (परार्थ त्वात) अप्रधान होने से कर्म की आवृत्ति नहीं हो सकती।

मांव भा प० आo-गुणों की आवृत्ति प्रधान के अनुसार होती है न कि गुणों के अनुकूल प्रधान का इस नियम से याग प्रधान है और अग्नि आदि विश्वेदेव याग का अंग होने से प्रधान और इसी लिये यह गुण कहे जाते हैं क्योंकि गौण प्रधान नहीं हो सकता अतः तदनुसार ही याग की आवृत्ति भी नहीं बन सकती इस कारण नाम विधि ठीक है गुण विधि नहीं। सं० वैश्वानर यज्ञ में (अष्टा कपाल) आदि शब्दों का अर्थवाद होना कहते हैं। पूर्ववन्तोऽविधानास्तित्सामर्थ्य समाम्नाये ॥१७॥ का पूर्ववन्तः] अग्नि आदि गुणपूर्व होने से [अविधा- नार्थाः] "वैश्व देवेन यजेत" में उसकी विधि की सामथ्र्य नहीं, परन्तु [ समान्माये] अष्टा कपाल, नब कपाल आदि बाक्यों में [तरसामर्थ्य ] आठ आदि गुणों की विधि बल से है क्योंकि पहले वह न थे। मा० -यहां यह सिद्ध किया है कि "अष्टा कपाल" में विधि है या वैश्वामरेष्टि निरूपक वाक्यों में सुनते हुये द्वादश कपाल के प्रशंसक अर्थवाद हैं। इसमें पूर्व पक्षी कहता है कि "द्वादश सुकपाले संस्कृतः” जो बारह कपालों में पकाया जाय उस पुरोडाश रूप द्रव्य विशेष को द्वादश कपाल कहते हैं और सिद्धान्ती यह कहता है कि इस कथन से कि द्वादश कपाल पुरोडाश रूप द्रव्य विशेष का वाची है उसी प्रकार अष्टाकपाल नव कपाल आदि भी पुरोडाश रूप द्रव्य विशेष वाची हैं द्वादश कपाल के समान उन के पवित्रतादि फल भी कहे गये हैं अतः अतः यह गुण विधि है न कि अर्थवाद । सं०-इसका समाधान करते हैं।

गुणस्य तु विधानार्थे तद्गुणाः प्रयोगे स्युरन- र्थका नहितं प्रत्यर्थवत्ताऽस्ति ॥१८॥ ५० ऋ० -[तु] शब्द पूर्व पक्ष निवृत्ति के लिये प्रयोग किया गया है [ गुणस्य ] बारह कपाल रूप गुण के विधाला] विधान करने वाले वैश्वान इस वचन के होते हुये भी[अतद्गुणः] आठ कपाल आदि रूप गुणों का विधान नहीं हो सकता और [प्रयोग याग की अन्तर विधि में अयोग्य होने से [अनर्थकाः] वह निष्फल हो जाते हैं और [तं प्रति] विना अथवाद माने हुये उनका प्राकृत याग से सम्बन्ध एवं (अर्थवत्ता) प्रयोजनीय (नहि ) नहीं हो सकते। -यद्यपि द्वादश कपाल की भांति अष्टा कपाल भी पुरोडाश रूप द्रव्य के ही याची हैं परन्तु द्वादश कपाल रूप द्रव्य गुण का इस याग के साथ योग नहीं क्योंकि वह पूर्व ही द्वादश कपाल रूप गण से रुका हुआ था और अनेक गणों की विधि मानने से वाक्य भेद रूप दोष पाता है वह ठीक नहीं और बिना अर्थ- बाद माने हुये इस याग से योग भी ठीक नहीं बैठता। इसलिये अष्टा कपाल द्वादश कपाल की स्तुति कर्ता होने से अर्थ वाद है गुण विधि नहीं। सं--पुन. अाशंका करते हैं। तच्छेषी नोपपद्यते ॥१॥ प० -- (तच्छेषः) अष्टा कपाल और द्वादश कमाल के शेष अर्थात् स्तुति कर्ता हैं यह (न) नहीं ( उपपद्यते) सिद्ध हो सकता है। भा०-अष्ट संख्या द्वादश के सामने छोटी है इस कारण अष्टा "भा Januman IPASHA कपाल को द्वादश कपाल का स्तुति का कहना असंगत है सं०-इसका समाधान थह है। अविभागाद्विधानार्थे स्तुत्यर्थेनोपपद्यरन् ॥२०॥ प० ऋ०--(विधानार्थ) कथित द्वादश संख्या में (अविभागात ) अष्ट आदि संख्या का अन्तर्भाव होने से ( स्तुत्यर्थेन) स्तवन रूप अर्थ से ( उपपद्यरन) अष्टा कपाल आदि कथन ठीक है। भा०-बाठ की संख्या १२ के भीतर होने से उसका अश है और अंश द्वारा अंशों की स्तुति होना असम्भव नहीं अतः अष्टा कपाल आदि वाक्य अर्थ बाद ही हैं गुण विधि नहीं। संक-उक्त अर्थ की आशंका। कारण स्यादिति चेत् ॥२१॥ -(कारण) अष्टा कपाल आदि सुने हुये पवित्रादि फल के कारण ( स्यात् ) हैं (चेत) यदि (इति) ऐसा कहें तो ठीक नहीं। भा-अष्टा कपाल और द्वादश के स्तुति का अर्थ वाद नहीं हो सकते किन्तु कठिन पवित्रता आदि रूप फल के कारण हैं और कारणता क्रिया का शेष अर्थात् गुण हुए बिना सम्भव नहीं अतः वह गुण विधि ही है अर्थ वाद नहीं कही जा सकती। सं०-इसका समाधान यह है । प्रानर्थक्यादकारणं कहि कारणानि गुणार्थो हि विधीयते ॥२२॥ प. 0-(अकारण) अष्टा कपाल आदि कथित पवित्रता आदि यूकom नाग RRACHANA काल के मूल नहीं। क्योंकि (बानर्थ्यक्यात् ) उनका उस फल में प्रयोजन नहीं (कर्तुः हि ) यज्ञ का यजमान को ही (कारणानि) पवित्रादि फल मिलने से वह कत्तों को अनुपलब्ध होने के स्थान में जात पुत्र को होते हैं अतः (गुणार्थ: हि) स्तुति वाची का (विधीयेत् ) अष्टा कपाल आदि विधि बतलाई है गणार्थ नहीं। मात-यदि अष्टाकपाल का भिन्न अर्थ मान कर उन में गुण विधि मानी जावे तो अनेक इष्टियां माननी होगी और ऐसा मानना प्रारम्भ और अन्त की एक वाक्यता नष्ट होती है। और इससे एक ही इष्टि का विधान मिलता है कारण कि वैश्वानरं द्वादश कपाल निर्ववेल पुने जाते "यहां से प्रारम्भ करके यस्मिन् जाते एतामिष्टिं निर्वपति पूत एकः संभवति " दृष्टि के अन्त वाक्य तक एक ही इष्टि का उपसंहार किया है। यदि बीच में पढ़े गये अष्ट कपाल आदि भी गुण विधि होती तो उस प्रकार का उपसंहार ही क्यों किया जाता । अतः यह गुण विधि नहीं किन्तु अर्थवाद है। सं-यजमान शब्द को प्रस्तर (कुशमुष्टि ) आदि में स्तुति कता का विस्तार करते हैं। तत्सिद्धिः ॥२३॥ ५० ऋ०-(तत्सिद्धि.) कुशमुष्टि आदि से यजमान का कार्य पाया जाता है। मा0-जैसे यजमानः प्रस्तरः। यजमान एक कपाल इन अधिकरण वाक्यों में गुण विधि है अथबा अर्थवाद । इसका यह समाधान किया गया है जैसे द्वादश कपाल का अष्ट कपाल एक अवयव ( भाग) है उसी प्रकार कुश मुष्टि (प्रस्तर ) आदि एत ब का यजमान अवयन नहीं किन्तु स्तुति का है। -अग्नि आदि शब्द बाहानादि स्तुति बाची है। K23 ATTO 2221 ६ Cinaya AEEEEN प0 नागादि वर्गों को जो अग्नि प्रादि संक्षा से कहा है उसका कारण (जातिः , उत्पन्न गुण विशेष ही है। 9- अग्निबाणः इन्द्रो राजन्यः वैश्योविश्वेदेवाः' इन बाक्ष्यों में अग्नि प्रादि शब्द गुण के बतलाने वाले हैं अथवा अर्थवाद ब्राह्मण क्षत्रिय श्रादि के स्तुति वाची हैं। यहां अर्थ- बाह मानने से या वाक्य व्यर्थ हो जाता है फिर भी गण विधि मानला संगत नहीं। कारण कि अग्नि आदि स्वतन्त्र पदार्थ होने से ब्राह्मण आदि के मण नहीं अत्तः (सिंहोऽयं देवदन्तः) यह देवदत्त सिंह है सिंह के क्रूरतादि गुण विशेषों की सादर- यता ले देवदत्त को सिंह कहा है। उसी प्रकार उद्भूत प्रकाश आदि गण विशेष की समानता से ब्राह्मण आदि को अग्नि कहा है अतः ब्राह्मण अग्नि, क्षत्रिय, इन्द्र और वैश्य को विश्वदेव- कहा । यहां भी अर्थवाद है गुणविधि नहीं । सं०--यजमान आदि शब्दों को यूप का स्तुति कन्तो निरूपण करते हैं। सारूप्यात् ॥२५॥ प० क्र-(सारूष्यात् ) यूप को आदित्य और यजमान कहा है, यह तेज तथा ऊचाई की योग्यता से सादृश्य कहा है । भा०- जैसे यजमानों यूप" आदित्यो यूपः यहां यजमान और 'यूप ' में लम्बाई तथा घृत से चुपड़े यूप और सूर्य में तेज की समानता कही है। इसी सादृश्य से यूप को यजमान और आदि- न ।

कहा गया है अतः दोनों के स्तुति का अर्थ वाद हैं। -अब अपशु श्रादि गौ आदि के सावक होने से प्रयोग किये गये हैं। प० ऋ० -(प्रशंसा) गौ और घोड़ा को छोड़कर छाग आदि सब पशु हैं यहां गौ और अश्व की स्तुति है। भा० -- यहां भी इन वाक्यों में कि 'पशवो वा अन्य गो ऽश्वे- ध्यः पशवो गो अश्वाः" अयज्ञो वा एष यो ऽस्तमा प्रसन्न वा सतत् यद्न्छन्दोमम् ” आदि निधि वाक्य है अथवा अर्थवाद है। चापि विधि मानने से यह सब बाक्या सार्थक हो जाते है तथापि ऐला करना ठीक नहीं क्योंकि विधि होने से गो, अश्व ही पशु सज्ञाक होते हैं। बकरी चादि नहीं इसी प्रकार सामवाला और छन्दोम वाला यश ही सूत्र कहलाता है अन्य नहीं यह ठीक नहीं क्योंकि अजादि भी पशु है और साम और छन्दो रहित भी यज्ञ होते हैं अतः यह अर्थ वाद कि गो अश्व अजादि उत्तम पशु है और इसी प्रकार साम और छन्दोम रहित भी यज्ञा और सूत्र होते हैं जो उत्तम है अतः यहां केवल स्तुति की गई है विधि वाक्य नहीं कहे जा सकते। सं० - जिन मन्त्रों में सृष्टि शब्द नहीं और असृष्टि शब्द भी नहीं उन मन्त्रों का स्वृष्टि शब्द से ग्रहण होता है ! भूमा ॥२७॥ ५० क्र--(भूमा ) सृष्टिलिंग वाले मन्त्रों का भूयस्त्व होने से। भाo---सृष्टि रूप दधाति बाक्य में सृष्टि शब्द सृष्टि तथा असृष्टि दोनो के लिये प्रयुक्त हुआ है और वहां अग्नि व unevi PAGeen HEA aur संचयन कर का प्रकरण बाल रहा हैइनमें स्वृष्टि शब्द बाहे मन्त्रों का इष्टिका (ई) के उपधान में गुण रूप से विधान হয় তলা টু কা শুলা গলুল ঈ মুড়ি মা কালী शब्द बाले मन्त्रों से इष्टकर के उपधान का विधान है यहाँ शुद्यापि दृष्टि के साथ 'उपद्धाति क्रिया के साथ योग होने से स्वृष्टि शब्द वाले मन्त्रों का उपधान में गुरण रूप से विधान होना योग्य है परन्तु यह असंगत है क्योंकि अग्निचमन कर्म के प्रक- रशा में पढ़े जाने से वह मन्त्र स्वयं भाया है परन्तु उसका विधान नहीं किया जा सकता। 60 प्राणभृत' शब्द को लक्षणा से प्राण वाले तथा बिना সাহ আল ‘মসলাজুল” এ প্র ফ া লুচ্ছ বিষয় करते हैं। लिङ्ग समवायात् ॥२८॥ पक्र--(लिङ्ग समवायात् ) नरम पाये जाने से प्राणभृत मन्त्र की सब मन्त्रों से संगति है। मा० -जैसे “प्राणभृत उप दधाति" में प्राणभृत शब्द प्राण एवं अप्राणभृत दोनों प्रकार के मन्त्रों का अनुवादक है। तो शंका होती है प्राण शब्द वाले मन्त्रों के उपधान में गुण रूप विधान है अथवा लक्षणावृत्ति से प्राण तथा अप्राणभृत दोनों प्रकार के मन्त्रों का अनुवाद करके इष्टका के उपाधान की विधि है ! कहते हैं कि यद्यपि प्राणभृत क्रिया का उपद्धाति क्रिया से योग होने से प्राण शब्द वाले मन्त्रों का उपधान में गुण रूप से विधि माननी चाहिये और अनुवाद नहीं क्योंकि यदि अनुवाद माने तो लक्षणा माननी पड़ेगी। फिर भी गुण रूप से विधान मानना असंगत है क्योंकि ऐसा करने से मन्त्र अनर्यक होते हैं। M !

MOHABAR SOME सं0- संदिग्ध अर्थ का वाक्य शेष ले निर्णय निरुपण करते हैं। सन्दिग्धेषु वाक्यशेषात् ॥२९॥ प० क्र0-'सन्दिग्धेष) विहित अर्थों में भ्रम होने पर (वायया शेषात) बाक्य शेष से निर्णय होता है। भा-जैसे कहा कि अग्नि कुण्ड में उपधान के लिये शक्कर को घी से चुपड़ना (मिलाना) ऋथवा तेल से। यद्यपि इस वाक्य में शक्कर का केवल चुपड़ना मात्र कहा है तो भी तैल से चुपड़ी शक्कर का वहाँ अग्रहण है क्योंकि वहां निर्णायक मान्य नहीं है परन्तु धृत कर उसकी तेजस्विता रूप प्रशंसात्मक 'तेजो वै धृतम्' वाच्य शेष विद्यमान है अतः लैला-शर्करा अज्जन निरर्थक ना हो जाता है अतः उस बाक्य में घी से भीगी हुई शक्कर ही ली गई है तैल युक्त नहीं । 60 --पदार्थ योग्यतानुसार अर्थ निर्णय करते हैं। अर्थाद्वा कल्पनेकदेशत्वात् ॥३०॥ प० ऋ०-(अर्थात् ) अन्य निश्चय करने वाले चिन्हों के न होने पर पदार्थ की क्षमता से (बा) ही अर्थ के निश्चय की (कल्पना) ऊहा होती है क्योंकि ( एक देशस्वात् ) कल्पना से भी अर्थ निर्णय हो सकता है। भाग--यज्ञ में प्रयोजनीय घी आदि पदार्थों को उनकी योग्यता- नुसार स्त्र वा आदि से भाग विशेष का मिन्न करना इस भाव से इन वाक्यों में 'नु वा आदि ग्रहण है। अथवा कमी शुवा से, कभी स्वधिति से, कभी हस्त से अवदान करना इस भाव से ग्रहण है वो कहते हैं कि भाग में घी आदि विभिन्न पदार्थों का उपयोग होता है जो शीत में अत्यन्त कठिन होने से खु वा स्था व म ना LEARN ७०) हाथ से चवदान होना कठिन है अतः विकल्प प्रयोजन से उनके ग्रहण की कल्पना असंगत है किन्तु वा से अवदान योग्य पदार्थों का चबा ले स्वधिति के सोचा स्वधिति से और हाथ के योग्य पदार्थ का हाथ से अवदान श्रेष्ठ है और पदार्थ योग्यता से कल्पना भी ठीक होती है अतः पदार्थ योग्यता ने यहां न्नु बादि ग्रहण है न कि विकल्प अभिप्राय में। यहां बने पदार्थ योग्यता से उनके बावदान का निरूपण है उसी प्रकार सर्वत्र योग्यतानुसार अर्थ का भी निर्णय जानना चाहिये। इति श्री मीमांसा दर्शने प्रथमाध्यायस्य चतुर्थ पादः समाप्त । प्रथा द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः भारभ्यते। सं०-- प्रथम अध्याय में वेदानुकूल बों को धर्म पतला या अब उसके भेदों को बतलाते हैं। भावार्थाः कर्मशब्दास्तेभ्यः क्रिया प्रतीयेतेष ह्यर्थों विधीयते ॥१॥ प० ऋ०(भावार्थः ) याग, होम, दान तथा प्रत्ययांश से धात्वंश से भावना वाची ( कर्म शब्दाः) बजेति, जुहोति ददाति आदि क्रिया पद ( तेभ्यः ) उनसे ( क्रिया) याग होम दान रूप कर्तव्य काम का (प्रतीयेत ) ज्ञान होता है और ( एवहि) यही (अर्थ) क्रिया रूप का आव (विधीयते) धर्म कहा गया है। मा०-जैसे कहा गया है कि 'सोमने यजेत् स्वर्ग कामः' 'दर्श पूर्ण मासाभ्यां स्वर्ग कामो यजेत् ' अग्निहोत्रं 'जुहोति हिरण्य मात्रेया' पदाति यह सब ज्योतिष्टोम यज्ञ के कामना मन्त्र हैं इनमें नाम और आख्यातान्त समस्त पद धर्म को कहते हैं अथवा Paa Siasana 27 - (७१) , १ यजेत् , जुहोति , आदि श्राख्यातान्त पद स्वयं ही धर्म के कथन करने वाले हैं। इसका समाधान यह है कि धर्म द्रव्य गण रूप किसी वस्तु विशेष की संज्ञा नहीं परन्तु लोस पी आदि नाना वस्तुओं का और पुरुष के उद्योग से सिद्ध वेदानुकूल याग, होम, दान आदि रूप कतव्या विशेष का नाम धर्म है और उनका ज्ञान यजेत् जुहोति आदि आख्यातान्त पदों से होता है अतः सर्वत्र विधि वाक्यों में विद्यमान नाम और पाख्यातान्त पदों के बीच केवल प्राख्यातान्त पद ही धर्म के निरूपक है। संद -इसा सार्थ में प्राशंका करते हैं। सर्वेषा भावोऽर्थ इति चेत् ॥२॥ प० ० ---(सपा) सोम, घी इत्यादि पदार्थो का (अर्थः) साधन करने योग्य अर्थ (भाव) यज्ञादि क्रिया ये हैं अतः नाम पद भी धर्म के निरूपक है (चेत् )यदि ( इति) इस प्रकार, कहा तो ठीक नहीं। मां-जैसे थाली आदि उपकरणों के बिना पाक क्रिया नहीं होती और न उसका भात (चावल) पकाने का सिद्धफल ही उपलब्ध हो सकता है। उसी प्रकार सोम घी आदि पदार्थों के बिना याग आदि क्रिया भी नहीं हो सकती और न उससे होने वाले फल की प्राप्ति हो सकती है इसलिये विधि वाक्य में विद्यमान क्रिया पद समान नाम पद भी फल के साधन धर्म के कहने वाले है न कि केवल आख्यालान्त पद ही। सं०-आगे के दो सूत्रों में नाम और आख्यातान्त पदों के लक्षण द्वारा शंका निवारण करते हैं। येषामुत्पत्तौ स्वे प्रयोगे रूपोपलब्धिस्तानि L नामानि तस्मातेभ्यः पराकांक्षाभूतल्यात्स्वे प्रयोगे ॥३॥ म Zooice प० ०-(स्वे) अपने अर्थ (अयोगे) प्रयोग होने पर (षां) जिन पदों का ( उत्पत्ती ) बोलने के समय में (रूपोपलब्धिः) अपने अर्थ की प्राप्ति होती है (तानि) उनको ( नमामि ) नाम कहते हैं और (तस्मात् ) बोलने के समय अर्थोपलब्धि होने से (तेभ्यः) वह (पराकांक्षा) स्वार्थ सिद्धि के निमित अन्य की इच्छा रहित है क्योंकि (स्वे, प्रयोगे) उनके बोलने काल में (भूतत्वात ) अर्थ रहता है। मा0--अर्थ दो प्रकार के होते हैं सिद्ध और साध्या। जो अर्थ अपने बाचक पदों के बोलने की अवधि में विद्यमान हैं और अपनी सिद्धि के निमित्त अन्य साधन की आवश्यकता नहीं रखते वहां सिद्ध और उनके वाचक पदों की 'नाम' संज्ञा है सोमादि द्रव्य गुण वाची शब्द का उदाहरण है जो अर्थ अपने वाचक पदों के बोलने काल में न हो किन्तु बोलने काल के पश्- चात् द्रव्य आदि विभिन्न साधनों तथा पुरुष के उद्याग से उत्पन्न हो वह साध्य और उनके वाचक 'याख्यात' कहे जाते है। जैसा कि यजति, जुहोति और ददाति के बोलने के समय याग होम दानादि अविद्यमान थे परन्तु पुरुषार्थ के पश्चात् होते हैं। सं०-इनके ज्ञान की क्या आवश्यकता है। येषां तूत्पत्चावर्थे स्वे प्रयोगे न विद्यते तान्या- ख्यातानि तस्मात्तेभ्यः प्रतीयेताऽऽश्रितत्वात्प्र- MAHARASHARMA ७३ ) योगस्य ॥४॥ प० ऋ0-(तु) फिर ( ऐषां) जिन पदों के (उत्पत्तौ) उत्पन्न अर्थात् उच्चारण समय में (अर्थ, स्वे) निज अर्थ में (प्रयोगः) उसच्चारण (न विद्यते) न हो (तानि) उनको (आख्यातानि) आख्यात कहते हैं और (तस्मात) इसी कारण ( तेभ्यः) उनसे ( प्रतीयेत् ) धर्म जाना जाता है कारण कि (प्रयोगस्य) उनका प्रयोजन (आश्रितत्वात् ) पुरुष प्रयत्न पर आश्रित है। मा०-जिन पदों के अर्थ बोलने के समय न हों किन्तु द्रव्य आदि विभिन्न साधनों और पुरुष के उद्योग के अनन्तर सिद्ध हो उन्हें माख्यात् कहते हैं। खं0-बागादि कसौ से भविष्यत् का फलारंभ क्यों पाया जाता है चोदना पुनरारम्भः ॥५॥ प० ऋ० (पुनः) जिल लिये (चोदना) उक्त कर्मों की प्रेरणा अर्थात् विधि वेद में मिलती है और उनसे (भारम्भः) भविष्यत् फल का प्रारम्भ होता है। मा0-जैसे लौकिक मनुष्यों के किये हुये कर्मों का कर्म फल होता है उसी प्रकार याग, होम दानादि कर्म जो परमात्मा की आज्ञा से किये जाते हैं उनसे भावी फल का प्रारम्भ होता है। सं०-विधि वाक्यों में विद्यमान आख्यात निरुपण कर अब उनके विभाग कहते है। तानि वध गुणप्रधानभूतानि ॥६॥ ५००-[तानि] वह क्रियापद [] दो भांति के है a - (७४ [गुणाधान भूतानि ] एका सौदा कर के निरूपक और दूसरे प्रश्चान कर्म के बतलाने वाले हैं। ঘডিe=কি ছ থ হয়ে কী লাখ ট মুক্ত হয়- भूत और दूसरा अधानभूत । जो गौण कमों के निरूपक है उन्हें অন্য স্থী, যক্ষ্মা জুম ইঃ মনি মাজনূর কাছ । सं-प्रधानभूत का यह लक्षण है। যত্র ল দ্বিী পানি খালানি দু- स्यगुणमतत्वात् ॥७॥ प० ऋ०-[:] जो कर्म [ चिकीय ] संस्कार के निमित्त [द्रव्य] द्रव्य की अपेक्षा न नहीं करते जानि] वे [प्रधान भूतानि ] प्रधान कर्म हैं। कारण कि[ द्रव्यमय] द्रव्य का[गुण मूतत्वाना उनके प्रति गाया। मा०---जो कर्म द्रव्य के न संस्कार करने वाले हैं न उत्पन्न करने वाले ही हैं किन्तु स्वयं ही द्रव्य साधक हैं वह प्रधान कर्म कहलाते हैं जैसे याग, होम दान इत्यादि । सं०-अब गौण कर्म का लक्षण करते हैं। यैस्तु द्रव्यं चिकीर्घ्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत तस्य द्रव्यप्रधानत्वात् ॥८॥ १०० - [तु] तथा [यै] जो कर्म [चिकीयते ] संस्कारादि के निमित्त [द्रव्यं] द्रव्य की अपेक्षा बाले हैं [तत्र ] वहां उन कर्मों में [गुणः] गौणता [प्रतीयेत् ] समझनी चाहिये क्यों- कि [तस्य] उन कर्मों के लिये [ द्रव्य प्रधानत्वात् ] द्रव्य प्रधान M accuriHRMSASKAL a 470-जो कर्म हव्य के संस्कारक और उत्पन्न करने वाले है और स्वयं हव्य साध्य नहीं उन्हें गौण कर्म कहते हैं "जैसे ब्रीहीन महन्ति धानो को कूटो। तण्डुलानि, चिनधि, चावलों को पीसो। वह कर्म द्रव्य के संस्कार कहलाते हैं और 'यूर लक्षति पत्रको को बनावे आहवनीय माद्धाति अग्न्याध्यन करे कडे गौण कहे जाते हैं क्योंकि यह कर्म संस्कार एवं उत्पत्ति के निमित्त द्रव्य पर अवलम्बित है अर्थात हम किस का संस्कार और किस की সুদি কই? কুক প্রায় দুনী ধনী । স্বল্প जिन कर्मों का फल अदृष्ट हो वह प्रधानकर्म और जिनका दृष्ट है वह गौण कर्म होते हैं। सं०-सम्मान को गौण कर्म बतलाते हैं। धर्ममात्रे तु कर्म स्यादनिवृत्तेः प्रयाजवत॥९॥ प (तु) शब्द का पूर्व पक्ष सोडत निमित्त हैं (अयाजवत्) লিংক সজ্জা সস্তা চ = Sী গাঙ্কা ( লাল ) के धर्म मान सम्मान भी (कम। प्रधान कृत्य (स्यात् ) कारण कि उनसे (अनिष्टतेः) किसी दृष्ट की दृष्टि नहीं पाई जाती। भाo-"स्तु वः सम्माष्टि, “अग्नि सम्माष्टिं परिधि सम्माटि पुरोडाशं पय्येग्नि करोति इत्यादि वाक्य दर्श पूर्णमास याग प्रकरण में पढ़े गये हैं। सवः अग्नि और परिधि का सम्मान एवं पुरोडाशं का पय॑ग्नि करण प्रधान कर्म है अथवा गौण । क्योंकि जैसे 'अवहनन' कूटना आदि कर्म का तुष विमोकादि भूली प्रथक्करण आदि प्रत्यक्ष फल हैं उसी प्रकार सम्मा- जादि कर्म भी अंदृष्ट फल रहित है अतः 'प्रयाज' कर्म के सदृश सम्मार्जन भी प्रधान कसे है और वह प्रधान कर्म होने से स কাজী হায় सं०-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। तुल्यश्रुतिवाढ तरैः सधर्मः स्यात् ॥१०॥ १० ऋ०---(वा) पूर्व पक्ष परिहारार्थ प्रयोग है (इतरैः ) कूटने आदि कर्म के (सधर्मः) सदृश ( स्यात् ) हैं क्योंकि (तुल्य श्रुति स्वात्) दोनों का एक प्रकार से उपदेश मिलता है। मा०-जिस प्रकार कूटना पीसना दृष्टि फल द्योतक नहीं उसी प्रकार सम्माजनादि भी नहीं है परन्तु वह उनके समान गौण कर्म मानना चाहिये । इसलिये कि द्रव्य प्रधानता की बतलाने वाली द्वितीया विमक्ति का उपदेश दोनों स्थानों में एक सा है और कत्तों के ईदिसततम की कर्म संज्ञा वाला माना है और जो ईप्सिततम होगा वही प्रधान होगा अतः याग के लिये उप-- योगी बनाने योग्य क्रिया तुप रहित धान कर्ता को ईप्सिततम है इसी भांति नु वा के सम्मान आदि भी कर्ता को ईप्सि- ततम है। सं०-इसका समाधान करते हैं। द्रव्योपदेश इति चेत् ॥११॥ प० क्र0 -(द्रव्योपदेशः) सुचः सम्मष्टिः में जो द्वितीयान्न चः पद से खुवः द्रव्य का उपदेश है वह गौण रूप से है न कि प्रधानता से (चेत् ) यदि (इति) इस प्रकार का कहो तो असमी- चीन है। -जहां ऐसा आता है कि 'सक्तू न जुहोति' 'एक कपालं जुहोति' अर्थात् सत्तुओं से होम करे अथवा एक कटोरे में पड़े पुरोडाश से हवन करे इन वाक्यों में सक्तु आदि गौण द्रव्य Sand मा०- (७७) शाद्वितीया विभक्ति से बतलाया है उसी प्रकार सचः सम्माटि आदि में भी न वादि द्वितीया विभक्ति से बतलाया है नुवादि के प्रधान से। सं०-अक इसका समाधान करते हैं। न तदर्थत्वाल्लोकवत्तस्य च शेषभूतत्वात् ॥१२॥ प० ऋ० (न ) ननु चः सम्मष्टि 'आदि में गुण रूप से स्वाः आदि द्रव्यों का उपदेश नहीं, कारण कि (लोकवत् ) जैसे लोक में कहते हैं कि 'प्रासं गच्छति' इसी प्रयोग की भांति (तदर्थ त्वात् ) उसमें उपदिष्ट द्वितीया विभक्ति को कमर्थित्व है (च) फिर (तस्य ) वह न वादि सब द्रब्य (शेष भूत त्वात् ) घी आदि के रखने आदि से उनके शेष हैं। मा०-सत्तु आदि द्रव्य केवल होम के साधन हैं न कि किसी अन्य कार्य में आने वाले हैं क्योंकि उनका हवन करने से वह भस्मीभूत हो जाते हैं इसी कारण 'सक्क न जुहोति' में लक्षण वृत्ति से करणर्थिक द्वितीया विभक्ति की कल्पना द्वारा सक्तु आदि का गुणरूपेण आदेश मानना ही ठीक है परन्तु स्नु चः सम्माटि में उपदिष्ट द्वितीया विभक्ति को करणर्थकता नहीं मान सकते क्योंकि सम्मान से मिन्न यज्ञ के उपयोगी घी आदि रखने में सम्मार्जित सवा आदि का विनियोग है जो बिना कर्म में द्वितीया माने हो ही नहीं सकता। विशेषकर जब कर्म इप्सिततम होने से प्रधान माना गया है। अतः यह उदाहरण समीचीन नहीं। सं०-अब स्तोत्र तथा शस्त्र को प्रधान कर्म सिद्ध करते हैं। स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो याज्यावद्द वताभिधा- ७ to "तु' शब्द पूर्व पक्ष का द्योतक है (स्तुत शस्त्रयोः) स्तोन नौर शश्न (संस्कार:) संस्कार कर्म है। मह (यायावत ) थाज्या ऋचा की सहश (देवता विधान स्वाला गुराण कथन से परमात्मा के स्वरूप को कहते हैं। मा०-याज्या' द्वारा याग के प्रारम्भ में अध्वर्य खड़ा हो कर ईश वन्दना करता है और जिन मन्त्रों में स्तुति की जाती है। यह स्तोत्र और बिना गाये स्तुति करने का नाम शस्त्र है। अब ज्योतिष्टोम में स्तोत्र शस्त्र गुण कर्म है अथवा प्रधान कर्म । जैसे याज्या ऋचा गुण निरुपगत से ईश्वर का स्वरूप बतलाती है उसी प्रकार स्तोत्र शस्त्र भी गुण कीर्तन करते हैं। इस प्रकार का अनुस्मरण भूसीदूर करने की मांति परमात्मा संस्कार-विशेष है। जहां संस्कार्य संस्कारक भाव हो बहाँ संस्कार्य प्रधान और संस्कार गौण होता है। अतः यह गौरण कर्म है न कि प्रधान । वेदों में एक सच्चिदानन्द ही देवता माना हैं अन्य नहीं। अतः उसे "अग्नि मित्रं वरुणमग्नि माहुरथो दिव्यस्य सुपरणोंगरुत्मान एक सद्विग्राबहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वान- माहुः आदि परमात्मा के ही प्रकाश गुण प्रधानता से कथन किया जाता है। इसी प्रकार नामों की प्रवृत्ति का भी उसके अनुसार प्रधानता दी जाती है क्योंकि एक प्रभु अनन्त गुण, अनन्त वीर्य, अनन्त पराक्रमादि गुण हैं जिस ऋचा में जिस नाम से स्तुति है वही उसका देवता माना जाता है ऐसी ऋचा आग्नेयी, ऐन्द्री, वारुणी आदि नाम से हैं अन्तः इन्द्र, अग्नि, वरुण महेन्द्र कोई मिन्न देवता नहीं। सं0- स्तोत्र तथा शस्त्र कर्म सम्बन्धी आक्षेप का समाधान (७६ . नापन अर्थेन त्वपकृष्येत देवतानामचोदनार्थस्य गुण भूतत्वात् ॥१४॥ -~-(तु) शब्द पूर्व पक्ष का परिहार करता है ( देवता नाम चोदना ) यदि स्तोत्र शस्त्र को गुण कर्म माना जाता है तो उन मन्त्रों का जिन में इन्द्रादि देवता के नाम से स्तुति वाले मन्त्र का (अर्थन ) अर्थानुकूल (अपकृष्येस) अपकर्ष होना चाहिये। क्योंकि (अर्थस्य । देवता रूप अर्थ के लिये (गुण सूत स्वात् ) मन्त्र गुण भूत हैं। -स्तोतव्य पदार्थ भय गुणों के कथन को स्तुति अथवा प्रशंसा करते हैं। गुणों के कथन से बस्तु - स्वरूप को बतलाने का नाम स्तुति नहीं है जैसे यज्ञदन्तश्चतुर्वेदा भिज्ञः यज्ञदन्त चारों वेदों का ज्ञाता है इस वाक्य में स्तुति योग्य देवदन्त में चारों वेदों का ज्ञान गुण सम्बन्ध कहने से स्तुति पाई गई। यदि इसी को चतुर्वेदी है उसे लाओं परन्तु इसमें कोई नहीं पाई जाती इसी प्रकार स्तोत्र शस्त्र को भी गुण कथन से देवता में प्रशंसात्मक गुणों के सम्बन्ध का साथी मानना चाहिये। अतः 'आज्यैस्तवते. अथवा 'भाग्यैर्देव प्रकाशते यह वाक्य स्पष्ट हो जाते हैं। और दोनों का भेद भी जाना जाता है। देवता मन्त्र गुण भूत और मन्त्र प्रधान होते हैं। जहां जिसके पास पढ़ा गया होगा वही रह कर वह स्तुति कता हो सकता है और इसी से मुख्यार्थ लाभ होने पर 'स्तौति तथा 'शंसति धातु की अर्थ में लक्षणा भी न करनी पड़ेगी अतः यही समीचीन है कि स्तोत्रश स्त्र प्रधान कसे हैं न कि गौण कर्म है माने जावे।

७ सं-पुनः अाशंका करते है। वशावता गुणाथै स्यात् ॥१५॥ प० ऋ०-'वा' शब्द शब्दार्थ है (वशावत् ) जैसे वशा सम्बन्धी 'गुण वाली अजा' के स्मरण के लिये उसका विशेष्य वाचक 'छाग पद घटता है और “एष छाग' यह मन्त्र पढ़ा जाता है उसी प्रकार (गुणार्थः) बड़े गुण वाले इन्द्र के स्मरण में 'अमित्वा' शूर जो नुमः यह मन्त्र (स्यात् ) माहेन्द्रग्रह याग की समीपता में पढ़ा गया है। मा०---स्तोत्र शस्त्र को गुण कर्म भाव कर ऐन्द्र अगाध मन्त्र "अमित्का शूरनोनुम:' का अपकर्ष (जिस प्रकरण में जो पाठ है वहां से उठा कर जहां देवता हो ले जाना) रूप दोष बतलाना ठीक नहीं क्योंकि मन्त्र का महत्व गुण विशेष इन्द्र' उसके ही स्मरण में माहेन्द्र ग्रह याग की समीपता में पढ़े गये हैं । सगुण का अभिधान निर्गुण शब्द से होता है जैसे "वशा' अजा (बकरी) जैसे कहा कि "सावा एषा सर्व देवत्या पदजावशा वायव्या मालमते" अर्थात् अपने सौम्या गुणों से सबके आधीन रहने वाली यह 'अजा' सर्व गुण सम्पन्न परमात्मा के उद्देश्य से प्रदत्त महान पुण्य-जनक होती है। अतः प्रजा-रक्षक 'वायु' परमात्मा के उद्देश्य से इसका उत्सर्ग विशिष्ट गुण करे । सं०--उस शंका का निराकरण करते हैं । न श्रुतिसमवायित्वात् ॥१६॥ प० ऋ०-(न) वह मन्त्र महेन्द्र के अमिधायक नहीं क्योंकि उनमें ( श्रुति ) समवायत्वात् इन्द्र पद से सम्बन्ध है।

(१) मा०माहेन्द्र प्रह' याग की सन्निधि में जो मन्त्र पढ़े हैं वह माहेन्द्र शब्द कि जिस देवता अर्थ में तद्धित प्रत्यय करने से ऐसा बनता है कि "महेन्द्रो देवता अस्य ग्रहस्य अर्थात् महेन्द्र है देवता जिसका पान वह माहेन्द्र कहा जाता है। प्रत्यय का स्वभाव है कि जिस प्रकृति के आगे होगा उसके साथ मिलकर ही अपने अर्थ का बोधक होता है न कि प्रकृति के एक देश का। सं०--इन्द्र' और महेन्द्र के भिन्न होने में हेतु देते हैं। व्यपदेशभेदाच्च ॥१७॥ १० 0-(च) और (व्यपदेशभेदात् ) नाम मात्र भेद से इन्द्र और महेन्द्र भिन्न २ हैं। भाइन्द्र और महेन्द्र की प्रवृत्ति का निमित्त साधारण और महान् ऐश्वर्य है । निमित्त भेद से नैमित्तिक भेद का होना स्वाभाविक है अतः परमात्मा का इन्द्र और महेन्द्र रूप से भेद मानना चाहिये अतएव दर्श पूर्ण मास यज्ञ में ' बहु दुग्धीन्द्राय' बहु बुधि महेन्द्राय हविः इसका भेद भी विस्पष्ट कहा जाता है अतः दोनों का भेद है। सं०..और भी युक्ति देते हैं। गुणश्चानर्थकः स्यात् ॥१८॥ प० 20-(च) इन्द्र और महेन्द्र को एक ही स्वीकार करने से (गुणः) महान् विशेषण (अनर्थकः) वृथा (स्यात् ) हो जाते हैं। मा- जिस विशेषण ने अपने विशेष्य को अन्य से न संयुक्त किया वह विशेषण व्यर्थ होता है. 'महान्' विशेषण और 'इन्द्र' विशेष्य यदि अपने विशेष्य को अन्य से न युक्त करे तो वृथा (घर) होता है अतः इन्द्र तथा महेन्द्र को एक मानना ठीक नहीं। सं-दोनों में मिलता होने में और भी नुक्ति देते हैं। तथा याज्यापुरोरुवोः ॥१॥ प० ० -( याज्या पुरोरुचोः) यदि दोनों एक ही सान जावें तो ' याज्या' तथा 'पुरोऽनुवाक्या' ऋचाओं में दोनों का भेद पूर्वक कथन ( तथा ) अर्थहीन हो जावेगा! मा०-बारा के प्रारम्भ में इन दो मन्त्रों को अध्वर्य रबड़ा हो कर पढ़ता है कि 'इन्द्रस्य नु बीर्याणि प्रबोचं यानि याज्या तथा पुरोऽनुवाक्या मन्त्र कहलाते हैं। इनमें इन्द्र के पर्याय पर- मात्मा की स्तुति है अतः यह ऐन्द्र याज्या पुरोऽनुवाक्या कहते है। महा इन्द्रो य ओजसा इन दो मन्त्रों का नाम माहेन्द्र याज्या और पुरोऽनुवाक्या' है इन महेन्द्र नाम से परमात्मा की स्तुति है यदि इन्द्र महेन्द्र दोनों एक माने जावेंगे तो याज्या पुरोऽनु- वाक्या का विकल्प मानना पड़ेगा। वशावत् ' इस दृष्टान्त का समाधान करते हैं। वशायामर्थसमवायात् ॥२०॥ प० ऋ०-(वशाया ) यशा अजा (बकरी) में (अर्थसमवात्वात ) छाग रूप अर्थ का योग पाये जाने से दिया हुआ दृष्टान्त ठीक नहीं। :-जैसे वशा गण विशेष वाली अजा का निरूपण करके 'एष छागः' इस मन्त्र में केवल अजा वाचक 'छाग' शब्द से विधान किया गया है उसी प्रकार महत्व विशिष्ट इन्द्र का निरूपण करके 'अभित्वा शूर नो नुमः' इस मन्त्र में केवल इन्द्र शब्द से विधान किया है यह पूर्व कथित दृष्टान्त ठीक नही। क्योंकि 'छाग' ७ 11723 220 PER सं० शब्द नशा-बाली अजा विशेष का ही अनुगामी है न कि अजा मात्र का। परन्तु इन्द्र शब्द महत्व शिष्ट 'इन्द्र' का अनुगामी नहीं ক্ষি হলে ক্লাস ফাই গ': দ্যা লিমিঃ ঋলা ক্ষা নিল কং দু হাত লম্বা গান্ধি ল' বা স্ত্রী হয়। एक ऐसा धर्म है जो अजा व्यक्ति को छोड़ नहीं सकता और महल से विरुद्ध है। अतः छाग शब्द बशा विशेष अजा का अभिभावक है यह सम्भव है परन्तु इन्द्र शब्द महत्व विशेष इन्द्र का नहीं। इसी भाव से दृष्टान्त और दाष्टान्त मेविष- অল ইন দু হাই ল া আমি অঙ্ক লী স্মী अपकर्ष से दोष होने से स्तोत्र शस्त्र के गुण कसे मानले में दोष अतः वह प्रधान कर्म है। सं० अपकर्ष में इष्टापत्ति से सन्देह दिखाते हैं। एच्चेति वाऽअर्थवत्व.त् स्यात् ॥२१॥ 40 -'वा' शब्द आशंका की सूचनार्थ आया है ( यत्र ) जिर खाग में इन्द्र देवता हो उस में ( इति) पूर्व पठित 'अमित्या शूरनो नुमः' श्रादि ऐन्द्र प्रगाय मन्त्रों का अपकर्ष ( स्यात् ) हो । कारण कि (वार्थवत्वात् ) वह अर्थवाद हो जाते हैं। यदि 'श्रभित्वा शूरनो नुमः' इस ऐन्द्र प्रगाथ मन्त्र में महेन्द्र वा अभिधान, महेन्द्र याग की समीपता में पढ़े जाने से नहीं किया जा सकता। और इन्द्र का अभिधान करने से अर्थ देते हैं तो जिस याग का इन्द्र देवता है वहां उनका अपकर्षे होने में कोई हानि नहीं। सं0---इस शंका का उत्तर देते हैं न त्वाम्नातेषु ॥२२॥ भाOmpan ७

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५००--(आम्लातेषु) एन्द्र प्रगाय मन्त्रों के सिवाय 'याम्याहि'
मन्त्रों में (नतु) नहीं तो अर्थ वाला घट नहीं सकता।
स्तोत्र शस्त्र को गुण कर्म स्वीकार करने से इस अमित्वा
शूरनो नुमः आदि मन्त्रों को अपकर्ष होने से अर्थ वाला हो
सकता है परन्तु जिन मन्त्रों में यम नामक परमात्मा का स्तुति-
वाची मन्त्रों से प्रशंसा करें अर्थात विशिष्ट शब्द वाली ऋचाओं
से परमात्मा का स्तवन करे और प्रजापालन तथा प्रकाश
गुण विशेष परमात्मा की अग्नि मारुत शब्द युक्त मन्त्रों से
स्तवन करे तो वहां मन्त्रों को अपकर्ष होने से अर्थवाला नहीं
हो सकता और अपकर्ष अवश्य करना पड़ेगा क्योंकि जिस स्थान
तथा जिसकी समीपता में उसका पाठ है वहां ले वह अन्य के
अनुगामी नहीं हो सकते अतः अपकर्ष मानना समीचीन नहीं ।
सं०-पुनः आशंका करते हैं।
दृश्यते ॥२३॥
प० ऋ०-(दृश्यते) याम्यादि मन्त्रों को भी अन्यत्र अर्थ वाला
पाते हैं।
मा०-जिस प्रकार एन्द्र प्रगाथ मन्त्रों का इन्द्र देवता सम्बन्धी
याग में अपकर्ष सप्रयोजन है उसी प्रकार उस उस देवता के
यागों में याम्यादि मन्त्रों का अपकर्ष भी अर्थ वाला है निरर्थक
नहीं। अतः स्तोत्र शस्त्र को गुण कर्म मानना ही उचित है ।
सं:-इस आशंका का निवारण करते हैं।
22420
अपि वा श्रुतिसंयोगात्प्रकरणे स्तौतिशंसती
क्रियोत्पत्ति विद्ध्याताम् ॥२४॥

पा० ऋ०---"अपि वा” आशंका दूर करने को पद का प्रयोग है (स्तौति शंसती) स्तोत्र और शास्त्र (प्रकरणे) प्रकरण में ही (क्रियोत्पत्ति) स्तुति रूप क्रिया का (विदध्याताम् ) विधान करते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनको (श्रुति संयोगात् ) मुख्याथं का योग होता है। भा-स्तोत्र शस्त्र का मुख्य अर्थ 'स्तुति' और देवता के स्वरूप का अभिधान गौण अर्थ है । गौण की अपेक्षा मुख्य उत्तम होता है। यदि मुख्य अर्थ का लाम हो सके तो गौण अर्थ क्यों ग्रहण करे। गौण अर्थ मानने से प्रकरण विच्छेद है और अन्य मन्त्रों का अपकर्ष भी स्वीकार करना पड़ता है। स्तुति रूप मुख्य अर्थ के मानने में दोनों दोष नहीं आते। सं०-स्तोत्र शस्त्र के प्रधान कर्म होने में हेतु भी है। शब्दपृथकत्वाच्च ॥२५॥ (च) तथा (शब्द पृथकत्वात् ) स्तोत्र अथा शस्त्र शब्द का अन्तर पाये जाने से भी वह प्रधान कर्म है। भा--स्तोत्र तथा शस्त्र का भेद पाये जाने से भी एक मुख्य तथा दूसरा गौण है। और यदि स्तोत्र शस्त्र को प्रधान कर्म मानेंगे तो स्तोत्र जन्य तथा शस्त्र जन्य दो फल होने से उनकी भेद पूर्वक विधि भी सफल हो जाती है और गुण मानने से देवता स्वरूप का अनुस्मरण रूप एक ही फल दिखलाई देता है । और भेद उत्पन्न नहीं होता क्योंकि देवता स्मरण लक्षण फल एक से ही हो सकता था दोनों के विधान की आवश्यकता न थी। परन्तु भेद होने से वह किसी विजातीय फल के उद्देश्य से हैं न कि देवता स्मरण लक्षण दृष्ट फल निमित्त । अतः स्तोत्र शस्त्र प्रधान कर्म है न कि गौण । प०क ॥

। ( to स्तोत्र शस्त्र का देवता मरा लक्षण एकही दृष्ट फल तो हानि ही क्या है। अनर्थक व तदननम् ॥२६॥ १० ...(च) तथा स्तोत्र शस्त्र उममा का एक फल स्वीकार करने से (तद्वचन) दोनों की विधि निरूपया (अनर्थक) असफल हो जायगी। मायदि एक ही विधि-विधान से उभयफल मिल सके तो दोनों का विधान वृथा हा जायगा । सं०-प्रधान कर्म मानने में दोष का परिहार दर्शन अन्यश्चार्थः प्रतीयते ॥२७॥ प० ऋ०--(च) तथा प्रधान कर्म मानने से अन्यः) स्तोत्र जन्य कर्मों के अतिरिक्त (अर्थ) शस्त्र से उद्भूत फल (प्रतीयते) उपलब्ध होता है। भाo-प्रधान कर्म मानने से स्तोन्न उद्भूत एवं शस्त्र उद्भूत पृथक-पृथक् अदृष्ट फलों की उपलब्धी होती है जिनसे उभय का विधि विधान प्रयोजनीय होता है और गुण कर्म मानने से विरुद्ध फल होता है। अतः गुण कर्म के समान प्रधान को स्वीकार करने में वह दोष नहीं रहता। सं०--स्तोन तथा शस्त्र के प्रधान कर्म मानने में और भी हेतु है अभिधानं च कर्मवत् ॥२८॥ १००-(च) तथा एवं (कर्मवत् ) प्रधान कार्य सघश (अमिधान) स्तोत्र शस्त्र का विधान है। भाo-दर्श पूर्ण मासाभ्यां यजेत् । और 'अग्नि होत्रं जुहोति' (७) কালী ন গলিখান্দি সাল, অলা ফা ই গনিমা দুআ जाता है। सं०-और मी हेतु देते है। फलनिवृतिय ॥२९॥ (च) तथा स्तोत्र एवं शस्त्र दोनों के (फल निवृत्तिः) फल सिद्धि सुनी गई है। भा-इन वाक्यों में कि जहां यह बाता है कि 'एष वै स्तोत्र शस्त्रयोदोहः' अर्थात् यह स्तोत्र शस्त्र कर्म का फल है। इस मांति दोनों के भिन्न फल हैं और दोनों प्रधान कर्म है यदि गौण होते तो फल भी न सुनने में बाता क्योंकि प्रधान कर्म के फल से ही गौए कर्मों के फल होते हैं वह स्वतन्त्र फलदायक नहीं होते। अतः प्रधान कर्म का ही फल होता है न कि गौण का। न उस देवता के कि जिसके वह गुणभूत हैं। सं0-विधान करने तथा न करने भेद से वेद दो प्रकार का है अब यह निरूपण करते हैं। विधिमन्त्रयोरे कर्थ्य मैकशब्दात् ॥३०॥ ५० ऋ०-(विधिमन्त्रयोः) विधि (विधान वाले ) तथा मन्त्र (अविधान वाले) मन्त्रों का (एकार्थाम) विधि रूप से एक ही अर्थ होता है क्योंकि (एक शब्दयात) वह दोनों एक ही वेद वचन हैं। भा--विधि और मन्त्र दो प्रकार का वेद है विधि उसे कहते हैं कि जहां वेद के वाक्य कर्म विशेष के विधान कर्ता अग्नि होत्रादि कर्मों का वर्णन करते हैं। मन्त्र वह है कि जो किसी कर्म विशिष्ट के विधि विधान को नहीं करते किन्तु अभ्युदय भारती कमांक विभाग पक्र0 निःश्रेयस के साधन ईश्वर स्तुति, प्रार्थना, ज्ञान आदि सृष्टि के विभिन्न अनेक पदार्थों का प्रतिपादन करते हैं। अतः वेद सर्व कल्याणार्थ दृष्टि के आदि में हुये वह कल्याण कर्तव्य कर्म के अनुष्ठान से मनुष्य मात्र को उपलब्ध हैं न कि सिद्ध पदार्थ के ज्ञान द्वारा और वेदों का प्रयोजन भी मनुष्य को कल्याण प्रदान करना है अतः वेद के मन्त्र और ब्राह्मणा दोनों प्रकार के वाक्य के प्रतिपादक हैं। सं०-इसका समाधान करने हैं। अपि वा प्रयोगसामान्मन्त्रोऽभिधानवाची स्यात् ॥३॥ -(अपि वा) पूर्व पक्ष के परिहार के लिये प्रयोग है (मन्त्रः) मंत्र (अभिधान वाची) प्रति पादक (स्यात् ) हैं क्योंकि (प्रयोग सामर्थ्यांत) शब्द प्रयोग शक्ति से उक्तार्थ उपलब्ध होता है। मा०-विधि और मन्त्र एक ही वेद शब्द के वाचक हैं तथापि दोनों के अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। शब्द सामर्थ्य से विधि का अर्थ विधान कहाता है और मन्त्र का अर्थ अभिधान है। जो शब्दार्थ सामर्थ्य से मिलता है उसके विरुद्ध कल्पना करनी ठीक नहीं। इसके अतिरिक्त अभ्युदय और निःश्रेयष्ट फल तक की आकांक्षा वाले पुरुष को अनेक पदार्थों का ज्ञान चाहिये उन्हीं के यथावत् ज्ञान से ऐहिक और पारलौकिक उत्थान के उपाय जुटा सकता है। यदि वेद उनका वर्णन न करते तो वह ममुष्य के लिये कल्याण कर न होता। अतः वेदों में वेदवाक्य कर्मों के विधान समान ही सिद्ध पदार्थों के गुण कर्म और स्वमावादि का भी विधान है जो विधि पाले हैं वह विधि और अभिधान वाली मन्त्र संज्ञक ऋचायें है अतः अर्थ भेद से ही यह सब है। सं-अब विधि शब्द से मन्त्रों के अतिरिक्त किसी अन्य ब्राह्मण वाक्य कामहरा न हो सके उस विधि वाक्य का भी निरूपण तब्बोदकेषु मन्त्राख्या ॥३२॥ प० ऋ०-- (तच्चोदकेषु) अग्नि होत्रादि के विधान करने वाले तथा सिद्धार्थ के प्रति वादक वेद वाक्यों की ( मन्त्राख्या) मंत्र का माननी चाहिये। मा0देदों के बाक्यों में कमी का विधान तथा सिद्धार्थ का अभिधान है। इन दोनों को ही मन्त्र कहते हैं। पहले भी विधि और मन्त्र दोनों मन्त्र के ही प्रकार बतलाते थे। अतः जो ब्राह्मणों को मन्त्र बतलाते हैं उनका पक्ष इससे कट जाता है। सं-अग्निहोत्र के प्रतिपादक तथा सिद्धार्थ अमिधायक वेद बाक्यों की मन्त्र संज्ञा कह कर अब उनके व्याख्यानादि रूप ऐतरेयादि ग्रन्थों की ब्राह्मण संज्ञा पर विचार करते हैं शेषे ब्राह्मपशब्दः ॥३३॥ प० क्र.--(शेषे) मन्त्रों की व्याख्या रूप ऐतरेयादि ब्राह्मणों के अन्य भी (ब्राह्मण शब्दः) ब्राह्मण संज्ञा वाले हैं। जो अन्य के उपकारार्थ ही पदार्थ अथवा शेष कहलाता से स्वामी के लिये सेवक आदि हैं। व्याख्यान भी व्या- का शेष होता है अतः ऐतरेयादि व्याख्यान होने से वेदों के हैं, अर्थात् मन्त्रों के शेष ऐतरेयादि ग्रन्थ ही ब्राह्मण सं वेद की मंत्र संज्ञा और उनके ब्राह्मणों की व्याख्या संज्ञा भारती क्रमांक विभार कह कर बब ब्राहारण यों को ऐसा (वेद नहीं) सिद्ध करके वेदों के विभाग की स्थापना करते हैं। अनामनातेष्वमन्त्रत्वमाग्नातेषु विभागः ॥३४॥ 40 30---(अनास्नातेषु) ऋषि प्रोक्त होने से ऐतरेयादि ब्राह्मण को ( अमंन्त्रत्वं ) वेदत्व नहीं। (हि) अत: उन्हें छोड़ कर (बास्नातेषु) ईश्वर प्रदत्त मंत्रों का (विभागः) विभाग करते मा०-अह, प्रवर तथा नामधेय यह तीनों मंत्र नहीं इसलिये इन्हें छोड़ कर जो मंत्र हैं उनका विभाग किया गया है। सं०-यह विभाग इस प्रकार है। तेषामृग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था ॥३५॥ प० ऋ०-(पत्र) जहां जिन मन्त्रों में (अर्थवशेन ) छन्द शास्त्रानुकूल (पाद व्यवस्था) पादों का प्रबन्ध है (तेषां) उन मन्त्रों की (ऋक) ऋग्वेद संज्ञा है। भा०-छन्दः शास्त्र में पिंगलाचार्य वैदिक तथा लौकिक भेद से दो प्रकार के छन्द बतलाते हैं । गायत्री आदि वैदिक तथा आर्या आदि लौकिक छन्द संज्ञक निरुपण किये हैं। एक एक छन्द तीन तथा चार पद तक होता है जो छन्दोबद्ध अर्थात् पाद व्यवस्था युक्त है वह ऋग्वेद के मन्त्र हैं अर्थात् मन्त्रों के याग आदि विभाग उपाय छन्द शास्त्र ने छन्दोबद्ध मन्त्रों की ऋग्वेद मन्त्र संज्ञा ही है। सं०-पाद व्यवस्था के पश्चात् गान व्यवस्थानुकूल वेद के विमाग को कहते हैं। CERMINE RIES (१) गीतिषु सामाख्या ॥३६॥ ५० ऋ०-(गीतिपु) जो मन्त्र गान किये जा सकें उन्हें ( सामा- ख्या) साम संज्ञक कहा गया है। -अगवान की उपासना के लिये जिन मन्त्रों का ज्ञान हमें दिया गया वह गान करने योग्य होने से सामवेद कहलाये। सं0--शेष मन्त्र क्या कहलाये। शेषे यजुःशब्दः ॥३७॥ पर क्र० ---(शेषे) जो पाद वद्ध नहीं न गान किये जा सकें वह सब मन्त्र ( यजुर्वेद शब्द) यजुर्वेद हैं। -अवशिष्ट मन्त्र यजुर्वेद कहलाते हैं अर्थात् पादवद्ध ऋग्वेद, गीतवद्ध, साम और अवशिष्ट काम्य कर्मवद्ध मन्त्र यजुर्वेद हुए यही वेदत्रयी कहलाती है। सं०- चौथा अथर्ववेद का यजुर्वेद में अन्तर्भाव किये जाने से पूर्व पक्ष करते हैं। निगदो वा चतुर्थ स्याद्धर्मचिशेषात् ॥३८॥ प० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष बोधक है (निगदः) जो छन्दोबद्ध और गीति युक्त मन्त्रों के सिवाय स्पष्ट अर्थ वाले हैं उनकी यजुर्वेद संज्ञा नहीं किन्तु (चतुर्थ) अथर्ववेद संज्ञा ( स्यात् ) है क्योंकि (धर्म विशेषात् ) यजुः के धर्म से उसका मिन्न भा0mm धर्म है। मा०-जिन मन्त्रों को निगद कहते हैं। इनकी ही 'यजु' संज्ञा है अथवा यजु संज्ञा ही भिन्न है। इसका निरुपण यह है कि यद्यपि छन्दोबद्ध (पाद) तथा गीति युक्त मन्त्रों से निगद भारती क्रमांक विभाग है यह निगद मिन्न ही है तब भी वह यजु नहीं कहे जा सकते क्योंकि राहों में स्वर, पाठ, क्रम मिन्न २ हैं जो उलचे' चा क्रियते उच्चैः साना, उपांशु यजुपा, उच्चै निर्गन' जैसे ऋग्वेद तथा सामवेद उच्दोच्चारण यजुका उपांशु और फिर निगद का उच्च पाठ बोला जाता है अतः यजु से निगद भिन्न है। यदि उसके अन्तर्गत माना जावेगा तो बजु का उपाशत्व और निगद का उच्च सात्व धर्म पर पर विलक्षण होने से अनुमान होता है कि यजु में निगद का अन्तर्भाव नहीं किन्तु अतिरिक्त होने से 'अथर्व' संज्ञा है। सं०-और भी हेतु है। व्यपदेशाच्च ॥३॥ ५० --(च) और ( व्यपदेशातू) यह गजु है इस प्रकार व्यवहार भेद से भी निगद यजु नहीं। भा०-शब्दात्मक व्यवहार से भी यही सिद्ध होता है कि ऋग तथा साम मन्त्रों के सिवाय मन्त्रों में भी यजु है यह बिना भेद कल्पना किये कैसे जाने जा सकते थे। सं०-अब इसका समाधान करते हैं। यजूषि वा तद्रूपत्वात् ॥४०॥ प० ०-(वा) पूर्व पक्ष परिहारार्थ है ( यजूषि) निगदयजुः हैं क्योंकि (तद्र पत्वात् ) उस में यजु का लक्षण मिलता है। मा०-जिन की पाद व्यवस्था नहीं और जो न गान किये जा सके, छन्द शास्त्र के अनुसार वह यजु संज्ञक मन्त्र हैं। और उसका लक्षण ऋग तथा साम मन्त्रों को छोड़ कर निगद और अनिगद जितने मन्त्र हैं समान हैं और समान होने से वह PARAMERICANAY मिन्न नहीं। अतः निगद यजु से भिन्न नहीं किन्तु यजु के भीतर होने से वह भी यजुः ही है। सं०-धर्म भेद होने का समाधान करते हैं। वचनाद्धर्मविशेषः ॥४१॥ ---(धर्मविशेषः ) जो भेद अर्थात् उनका उपांशत्व और उच्चैस्वरूप है वह ( वचनात् ) पूर्व कथित वाक्य के अनुसार मा० amera प०क me- -एक होते हुए भी बीच के भेद से धर्मभेद सम्भव है अतः पूर्व कथित वचन से जो उपांशुत्व तथा उच्चैस्त्वरूप धर्म भेद से यजुः मन्त्र निगद से अलग नहीं किये जा सकते। सं०-निगद के उचैव धर्म का प्रयोजन कहते हैं। अर्थाच्च ॥४२॥ च) निगद के यजुः होने पर भी जो धर्म विशेष कहा गया है वह ( अर्थात् ) प्रयोजन के कारण है। भा०-दूसरे के बोध के लिये निगद का अंचे स्वर में पाठ होता है यदि उस का उपांशु पाठ किया जावे तो अन्य को बोध नहीं हो सकता। सं०-इसे और इसे निगद कहते हैं इस व्यवहार भेद का यह समाधान किया जाता है। गुणार्थो व्यपदेश ॥४३॥ प० ऋ०-(व्यपदेशः) यह यजुः है और यह है निगद जो यह व्यवहार है वह वह (गुणार्थः) गौण है।

भारती
क्रमांक
विभार
मा0-धीच के भेद को लेकर यह व्यवहार होता है इसलिये
वह निगद और यजुः के पारस्परिक भेद का समर्थक नहीं।
सर्वेषामिति चेत् ॥४४॥
प० ऋ०-(सर्वेषाम् ) ऋग् के बीच के मन्त्र भेद को निगद
बतलाया है (चेत् इति ) ऐसा कथन किया जाये तो समी-
चीन नहीं।
मा-निगद मन्त्रों का यजुः में अन्तर्भाव नहीं किन्तु वह
अन्तर्मान ऋग्वेद में है क्योंकि ऋग्वेद मन्त्र और निगद उच्च-
स्वर से पढ़ें जाते हैं। इनका समान धर्म है।
10---अब आशंका की जाती है कि-
न ऋग्व्यपदेशात् ॥४५॥
प० क्र0- (न ऋग) उच्चैस्त्व धर्म के समान होते हुये भी ऋग
मन्त्रों में निगद का अन्तर्माव नहीं, क्योंकि उनमें (व्यपदेशात्)
ऋग से मिन्न का उपदेश मिलता है।
भा-जैसे कहा गया कि 'अयाज्यावै निगदः ऋचैव यजन्ति ।
अर्थात् निगद याग के योग्य नहीं कि तु ऋचा से यज्ञ करे।
श्रतः ऋग और निगद भिन्न हैं और इसी लिये उच्च स्वर
पाठ की समानता होते हुये भी ऋग्वेद में निगद का अतर्भाव
नहीं हो सकता प्रत्युत लक्षण के समान होने से निगद यजुः
ही अंतर्गत है।
सं-अब एक वाक्य का लक्षण करते हैं।
अर्थकत्वादेकं वाक्यं साकांक्ष
साकांक्षं चेद्विभागे
स्यात् ॥४६॥

प० ०-(अर्थकत्वात् ) जिन क्रिया और कारक पदों के मेल से एक अर्थ मिलता है (चेत् ) यदि (विभागे) उनमें से किसी भी एक पद को अलग करदें तो (साकांक्षं) अन्य अपेक्षा वाले होते हैं। (एक वाक्य) ऐसे पद समूह एक वाक्य कहे जाते हैं। -जब एक पद दूसरे के बिना वाक्यार्थ बोध न करा सके 'आकांक्षा कहते हैं जैसे विष्णु दन्तः पद्भ्यां प्रामं गच्छति' इस वाक्य में विष्णु दत्त को 'गच्छति' क्रिया के बिना और गच्छति को विष्णदत्त के बिना उसका पांव से गांव जाना असम्भव है और इसे ही वाक्यार्थ बोध की असम्भवता मानते हैं। अब साकांक्ष है अर्थात् क्रिया, कर्ता, कर्म और करणादि कारक पद समूह क्रिया अथवा कर्मादि किसी एक पद से अतिरिक्त हो जाने पर बाक्यार्थ बोधक नहीं रहते प्रत्युत बोध के लिये विमत पद की अकांक्षा होने से साकांक्ष (इक्षा वाले रहते हैं) और उसकी उपलब्धि पर निराकांक्ष वाक्यार्थ बोध होता है। वह क्रिया कारक पद समूह “एक वाक्य" कहलाता है। सं०-अब अनेक वाक्य का लक्षण करते हैं । समेषु वाक्यभेदः स्यात् ॥४७॥ ५० ऋ०-( समेषु) जो निराकांक्ष पद समुदाय है उनमें (वाक्य भेदः) प्रति समूह वाक्य भेद (स्यात् ) है। मा०-अनेक वाक्य लक्षण इसलिये करना पड़ा कि यजुर्वेद के 'चित्पतिर्मा पुनातु वाक् पतिर्मा पुनातु' आदि मन्त्र में पद समूह वाक्य सम्पूर्ण एक हैं किन्तु नाना वाक्य हैं इसलिये यह समाधान है कि जो पद समूह दूसरे पद समूह की इच्छा नहीं रखता ऐसे वाक्य मिन्न मानने चाहिये न कि एक । 'चित्पतिमा आदि मन्त्रों में अपना अर्थ ज्ञान कराने में परस्पर निराकांक्षत्य (६) होने ले समानता है। अतः प्रथम समूह एक वाक्य और दूसरे समूह का दूसरा वाक्य समुदाय इसी क्रम से उत्तरोत्तर है और इसी क्रम से यजु मन्त्रों में सर्वन एक वाक्य तथा जाना वाक्य कल्पना कर लेना उचित है। सं०-अध्याहार कर लेने के लिये भी कहते हैं। अनुषंग' वाक्यसमाप्तिः सर्वेषु तुल्ययोगित्वात् ॥ प० %0-(वाय समाप्तिः) वाक्य अन्त का प्रयोजक, (अनुषंग) पदान्तर का योग (सर्वेषु) जिन वाक्यों में प्रापेक्षित हो अध्याहार कर लेना चाहिये क्योंकि (तुल्य योगित्वात् ) उसका सबसे सम्बन्ध है। मा-पहिले बतलाया जा चुका है "चित्पतिमापुनातु” मन्त्र में "अछिद्रेन पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः" इस अन्तवाक्य का शेष है इसका 'चित्पतिर्मा पुनातु में अनुषंग है अथवा नहीं इस सन्देह को दूर करने के लिये कहते हैं, कि 'देवो वा सविता पुनातु' वाक्य में जिस प्रकार पुनातु क्रिया को करण आपेक्षित है उसी प्रकार पूर्व के उभय वाक्यों में आया हुआ 'पुनातु' क्रिया पद भी 'करण' की इच्छा रखता है अतः यह सिद्ध हुआ कि अन्तिमा बाक्य के समान पूर्व के दोनों वाक्यों में भी उक्त वाक्य शेष का अनुषङ्ग कर लेना ठीक है अध्याहार न करे। सं०-अनुषङ्ग के अपवाद का निरूपण करते हैं। व्यवायान्नानुषज्येत ॥४९॥ ५० ऋ०-(व्यवायात्) मध्य में व्यवधान अन्तर से (न अनुष- ज्येत) अनुषङ्ग नहीं होता। मा०-इस मन्त्र में कि “सन्ते वायुर्वातेन गच्छता समङ्गानि थजजैः सं "यज्ञपति राशिषा" इसमें "गच्छता क्रिया का अनुषन से यज्ञपति राशि में है या नहीं इस की संगति के लिये कहा जाता है कि अनषङ्गन बतलाये गये वाक्यों में ही होता है बतलाये हुओं में नहीं। “सन्ते' तथा 'संयज्ञ' के बीच में सम- गानि वाक्य का अन्तर है इसलिये उक्त क्रिया का अन्तिम वाक्य में अनुषङ्ग नहीं हो सकता अब यह कि 'समङ्गानि में गच्छतां का अनषङ्ग क्यों नहीं तो "गच्छंता इस प्रकार के वचन का परिणाम करने से श्रुत पद के योग का नाम अनुषङ्ग माने जाने परिणत का सम्बन्ध नहीं अतः समङ्गानि वाक्य में सम्बन्ध न होने से अन्तिम वाक्य में भी अनपङ्ग नहीं हो सकता। इति मीमांसा दर्शने द्वितीयाध्याये प्रथमः पादः समाप्तः । अथ द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः प्रारभ्यते शब्दान्तरे कर्मभेदः कृतानुबन्डत्वात् ॥१॥ सं०-माख्यात पद का वाच्य, एवं गौण तथा प्रधान दो भांति से धर्म का स्पष्टीकरण पिछले पाम में किया। अब याग होम, दान इत्यादि रूप से वह कथित कर्म रूप धर्म के अनेक भेद निरूपण करने के निमित्त आख्यात भेद से भेद का स्पष्टीकरण करते हैं। प० ---(शब्दान्तरे) आख्यात भेद होने से ( कर्म भेदः) कर्म का भेद है इसलिये कि ( कृतानुबन्धत्वात् ) आख्यात भेद से कर्म द का सम्बन्ध नियत है। मा०-यजेत् से जुहोति ददाति आदि तथा जुहोति से यजेत् ददाति इत्यादि एवं ददाति से यजेति जुहोति आदि शब्दान्तर (८) हैं। तथा शब्दान्तर का कर्म भेद के साथ नियत सम्बन्ध है। यथा 'कट करोति' पुरोडाशं पचति प्रामं गच्छति इत्यादि में करोति का कर्ता, पचति का पाक, तथा गच्छेति का जाने के साथ योग है अब यदि इन प्रख्यात पदों का एक ही कर्म अर्थ करे तो शब्दान्तर प्रयोग सर्वथा भ्रष्ट हो जाता है अतः उन्हें एक ही कर्म वाचक कहना ठीक नहीं किन्तु यथा क्रम याग, होम, दान धन इत्यादि लक्षण भिन्न २ कर्म वाचक हैं सं अभ्यास से किए कर्म को स्पष्ट करते हैं एकस्येवं पुनः श्रुतिरविशेषादनर्थकं हि स्यात् ॥२॥ ५००-(एकस्य) एक प्रख्यात पद का (पुनः श्रुतः) फिर सुनना ( एवं) भी आख्यात भेद समान कर्म का भेदक है (हि) निश्चय पूर्वक ( अवि शेषात ) कर्म मेद न मानने से ( अनर्थकम् ) वह व्यर्थ ( स्यात् ) होता है । भा०--'समिधो यजति' तनून वातं यजति, इदोयजति, वहियजति, स्वाहाकारं यजति इन वाक्यों में पांच वार 'यजति' शब्द सुने जाने से यह शब्द एक ही कर्म का प्रतिपादक है अथवा प्रति श्राव 'सुनने से) विभिन्न कर्मों का विधान करने वाला है। यद्यपि इन में पिछले अधिकरणों के समान आख्यात भेद नहीं केवल एक ही 'यजति' शब्द का फिर श्रुति लक्षण के श्रवण प्रयोगवश किया गया है तब भी यहां एक ही कर्म नहीं बतलाया क्योंकि ऐसा मानने से 'यजति' शब्द का वार २ सुनना वृथा और जो श्रवण अथवा अभ्यास की सिद्धि के लिए इस 'संमि- तयण में जहां पांच बार 'यजति' कहा है वह आख्यात क्रिया ॥ का रूपवचनात भेद न होने से भी लक्षण की यथा अनुपपत्ति से समिधो यजति आदि वाक्य भिन्न भिन्न कर्म के विधायक है न कि एक ही सं-विद्वद्वाक्य को 'आग्नेय आदि याग का अनुवादक निरूपण प्रकरण तु पौर्णमास्यां रूपबचनात् ॥३॥ ५० क्र.-'तु' शब्द कर्मान्तर विधान शंका का परिहारक है (पौर्णमास्यां) इसमें पौर्णमासी शब्द सहित य एवं विद्वान् शब्द युक्त विद्वद्वाक्य प्राप्त प्रकरण में आग्नेय' आदि याग अनुवादक है न कि विधायक, क्योंकि उससे याग के रूप का भान नहीं होता। मा०-(१) जो प्रकाशमय परमात्मा देव के उद्देश्य से अमा- वस्या तथा पौर्णमासी में प्रदत्त "अष्टकपाल' है वह अच्युत होता है। (२) प्रकाश तथा सौम्य स्वभाव परमात्मदेव के उद्देश्य से पौर्ण नासी में घृत से 'उपांशु' करे। (३) दधि तथा घृत से, अमावस्या में सर्वेश्वर्थ युक्त परमात्मा के अर्थ याग करे इत्यादि में आग्नेय , ऐन्द्र, यह तीन तो दर्श नाम वाली और आग्नेय, उपांशु, याज, अग्निषोमीय यह तीन पूर्णमास संज्ञक अर्थात् दर्श और पूर्णमास संज्ञा वाली 'आग्नेय आदि षट्-याग को विधान करके य एवं विद्वान् पौर्णमासी यजते एवं विद्वान् अमावस्यां "यजेते” वह ऐहिक और पारलौकिक सुख को प्राप्त होता है। यहां विद्वद्वाक्य पड़ा है यह पौर्णमासी संज्ञा वाले 'आग्नेये' षट्-याग का अनुवादक हैं अथवा पौर्णमास और अमावस्या संज्ञक कर्मान्तर का प्रतिपादक है। सं०-यदि विद्वद्वाक्य अनुवादक है तो प्रयाज का भी अनुवादक ( १०० ) क्यों नहीं क्योंकि आग्नेय आदि के सहश वह भी तो प्रकृत विशेष दर्शनाच्च सर्वेषां समेषु प्रवृत्तिः स्यात् ॥४॥ ५० ऋ०-( समेषु ) समान भाव से प्रकृन होते हुये भी--(सर्वेषां) 'आग्नेय' तथा 'प्रयाज' सब के अनुपाद को ( अप्रवृत्तिःस्यात्) विद्वद्वाक्य की प्रवृत्ति नहीं हो सकती (हि) निश्चय पूर्वक (बिशेष दर्शनात् ) आग्नेय आदि में काल सम्बन्ध रूप अधिक पाया जाता है (च) और प्रयाजादि में नहीं मिलता। भा-विद्वद्वाक्य में आया पौर्णमासी तथा अमावस्या पद, पौर्ण- मासी तथा अमावस्या काल में होने वाले कर्म विशेष वाची हैं न कि काल मात्र अथवा कर्म मात्र का। सं०-इसमें पूर्व पक्ष उठाते है।। गुणस्तु श्रुतिसंयोगात् ॥५॥ प० क्र०-'तु' शब्द पूर्व पक्ष को लक्षित करता है ( गुणः) उस विद्वद्वाक्य में बतलाये कर्म में द्रव्य देवता रून गुण ( श्रुति) संयोगात ) श्रुति संयोग से प्राप्ति है। भाo-यादाग्नेयोऽष्ट कपालः 'श्रादि वाक्य दर्श पौर्णदास नामक आग्नेय, आदि यज्ञ का विधान नहीं करते किन्तु वाक्य में बतलाये कर्म में द्रव्य देवता रूप गुण का विधान करते हैं। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। चोदना वा गुणानां युगपच्छास्त्राच्चोदिते (१०१) हि तदर्थत्वातस्य तस्योपदिश्येत् ॥६॥ प० ऋ०-'वा' पूर्व पक्ष के परिहार के लिये आया है (चोदना) कर्म विधि वाक्य जैसे “यदाग्नेयोऽष्ट कपालः गुण विधि नहीं क्योंकि (गुणानां ) द्रव्य देवता गुणों का (युगपत् शासनात्) एक काल में ही उनका शासन होने से उनको ( चोदिते) वाक्या- न्तर विधान कृत कर्म में गुण का विधान कर्ता माना जाये तो ( तस्य उपदिश्यते ) प्रथक् प्रथक उपदेश होने से (हि ) निश्चय पूर्षक है क्योंकि (तदर्थत्पात् ) वह बतलाये हुए कर्म के निमित्त है। मा०-यदि विद्वद्वाक्य को अपूर्व कर्म का विधान करने वाला मान कर उसमें आपेक्षित द्रव्य देवता रूप गुणों के निमित्त "यदाग्नेयोऽष्टा कपालः” आदि को गुण का विधान करने वाला भान लें तो जिस प्रकार 'आधारमाधारयति' बाक्य में बतलाये 'आधार' नाम वाले कर्म को आवश्यक 'ऋतुत्व' और 'सन्तत' रूप गुणों का ऋजु माधारयति सन्तत माघारयति के के द्वारा प्रथक प्रथक् बतलाया गया है उसी वकार 'यदाग्नेय' आदि से भी उक्त गुणों का प्रथक विधान होता परन्तु उन वाक्यों द्रव्य देवता रूप गुणों का एक विधान मिलने से यह अनुमान होता है कि उस वाक्य में द्रव्य देवता रूप गुण विशेष अपूर्व कर्म के विधान करने वाले हैं न कि गुण विधायक हैं। सं०-वाक्यों के गुण विधि होने में और भी हेतु हैं। व्यपदेशश्वतद्वत् ॥७॥ ५० क्र0--'च' और 'तद्वत' उसी प्रकार द्रव्य देवता रूप गुणों का एक साथ शासन गुण विधि का समर्थक नहीं उसी प्रकार भारती (१०२) (व्यपदेशः) समुच्चय व्यपदेश भी असमर्थक है। मा०-अमावस्या में यह प्राहुतियां जैले उग्राणि हवा एतानि हतीषि अमावास्यायां सम्श्रियन्ते अाग्नेयं प्रथमम् ऐन्द्र उत्तरे प्रधान' हवि है इनमें पूर्व अग्नि परमात्मा और शेष दोनों इन्द्र परमात्मा के निमित्त दी जाती है यहां अमावस्या में जो तीन समुदाय रूप हावि का उपदेश है वह यदाग्नेय आदि वाक्कों के गुण विवि में नहीं आता क्योंकि उस से "अमावास्या' याग में अग्नि और इन्द्र नाम वाले अनेक देवताओं का विधान मिलता है परन्तु विद्वद्वाक्य में कहे गये 'अमावस्या याग एक हैं और एक याग में अनेक देवताओं का एक साथ होना असम्भव है। अतः विद्वद्वाक्य अनुवादक ही माना गया है ! सं०-इस अर्थ में और हेतु देते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥८॥ प0 क्र०-(च) तथा (लिंग दर्शनाच्च ) इस प्रकार संकेत पाये जाने से कि " चतुर्दश पौर्णमास्याम् ॥ यदाज्नेयः' आदि वाक्य गुण विधि नहीं कर्म विधि ही है। भाo-चौदह पौर्णमास कर्म में, और तेरह आहुति अमावस्या में दी जाती है। इस वाक्य में तेरह और चौदह पाहुतियों का कथन है । "यदाग्नेय आदि वाक्यों में कर्म विधि उसका लिंग है। क्योंकि विद्वद् वाक्य को विधि कती मानंगे तो उस पूर्वोक्त संख्या की अपूर्णता रहती है अर्थात् पांज 'प्रयाज' तीन 'अनुयाज' "दो चतुः' जिसमें आज्य भाग और "स्विष्ट कृत' नामक हविदर्दान, यह १० अथवा ११ हवि अङ्ग है इन तीन प्रधान हवियों के मिलाने से वह संख्या पूर्व हो जाती है उस तीन हवि का विधान ' यदाग्नेय' वाक्यों से ही मिलता है न कि विद्वद् (१०३) बाध्य से अतः वह वाक्य गुण विधायक नहीं किन्तु विधान कत का डर है इसी संख्या से उसमें बतलाये पौर्णमाल तथा अमावस्या नामक तीन २ प्रधान बाहुति रूप कर्म का विवाद अनुवादक हैं। ---अब पूर्व पक्ष करते हैं कि:- पौर्णमासीवदुपांशुयाजःस्यात् ॥ प० ऋ०-(पौर्णमासीवत्) जैसे पौर्णमासी पद जिस प्रकार विद्वद्वाक्क का अनुवादक है उसी प्रकार (उपाशुयाजः) उपां- मुयाजः पद भी उपांशुयाज मन्तरा यजति वाक्य का होने से अनुवादक है। भा० - "उपांशु याज मन्तरा यजति" इस वाक्य से द्रव्य देवता रूप याग नहीं होता और विधि प्रत्यान्त न होने से 'यजति पद से शाग का विधान भी नहीं मिलता प्रतएव वह वाक्य अपूर्व कर्म विधान कर्ता नहीं किन्तु विद्वद्वाक्य के समान 'विष्ठा- बादि' वाक्य में बतलाये यागत्रय का अनुवादक है। सं-अब पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। चोदना वाऽप्रकृतत्वात् ॥१०॥ -'वा' शब्द पूर्व पक्ष के खण्डन के लिये आया है। (चोदना) यह कर्म विधि है अनुवादक नहीं क्योंकि 'उपांशु याज मन्तरा यजति' में ऐसा ही मिलता है (अप्रकृतत्वात् ) प्रकृत याग का अभाव होने से। भा०-'उपांशु याज मन्तरा' में उपाशु याज नामक अपूर्व कर्म का विधान कर्ता है और विष्णु रूपांशु यष्टव्य, आदि वाक्य उसे स्तुति करने वाले अर्थवाद है। प०क्र0 ( १०४ ) SiO इसे उपांशु याज' क्यों कहते हैं। गुणोपबन्धात् ॥११॥ प० ऋ०-(गुणोपवन्धात्) उपांशुत्व गुण सम्बन्ध ने उस कर्म की संज्ञा 'उपांशु' है। मा०-इस समस्त कर्भ में 'उपांश मन्त्रोच्चारण है। अतः इसको 'उपाशु याज कहते हैं। सं-कर्म के प्रधान होने में हेतु देते हैं। प्राये वचनाच ॥१२॥ प® -(च) तथा वह (प्राये) प्रधान कमाँ के भीतर (वचनात) पाठ पाये जाने से प्रधान है। मा०-पौर्णमासी कर्म का आग्नेययाग मस्तक है उपांशयाज हृदय तथा अग्नीषोमीय चरण है ऐसा पाठ मिलता है यदि वह प्रधान न होता तो प्रधान यागों में उसका पाठ न पाया जाता परन्तु उस पाठ से यह अनुवादक होता है कि वह भी प्रधान याग ही है क्योंकि प्रधान याग में प्रधान का ही पाठ हो सकता है किसी और का नहीं। अतएव 'उपांशु याज मन्तरा यजति' वाक्य, उपांशु याजु; नामक प्रधान भूत याग का विधान कर्ता है न कि अनुवादक। सं०-'आधार वाक्य और 'अग्निहोत्र' वाक्य को अपूर्व कर्म विधान कर्ता होने का निरुपण करते हैं। आधाराग्निहोत्रमरूपत्वात् ॥१३॥ प००-(आघाराग्नि होत्रम्) आधार और अग्नि होत्र वाक्य अनुवादक हैं इसलिये कि (अरूपत्वात् ) उन से याग स्वरूप (१५) की प्राप्ति नहीं होती। मा०-'आधार संज्ञक कर्म करे' ऊंची तथा सीधी धारा से आदि वाक्य में अग्निहोत्र वाक्य दधि आदि बतलाये हुये कर्म का अाधार बाक्य अंचे आदि विधान किये वाक्य का अनु:- चादक है अथवा अग्निहोत्र वाक्य तथा आधार वाक्य का अपूर्व कर्म एवं दधि आदि और ॐचे वाक्य उसके अपेक्षित गुणों का विधान कता है अतः यह अग्निहोत्र बाक्य तथा आवार वाक्य से याग के स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती अत दोनों वाक्य अपूर्व के विधान कर्ता नहीं किन्तु अनुवादक संज्ञापबन्धनात् ॥१४॥ १० ऋ०-(संज्ञोप बन्धनात् ) वाकयों से संज्ञा का सम्बन्ध मिलता है अतः वह विधायक नहीं कहे जा सकते। "अग्निहोत्रं जुहोति" "आधार माघार येति" में जो द्वितियान्त शब्द से अग्निहोत्र और आधार की ओर संकेत किया है वह कम प्रतीत होते हैं। परन्तु नाम निर्देशक पूर्वक ही सिद्ध कहा जाता है न कि असिद्ध का । इस नियम से प्रतीत होता है कि 'अग्निहोत्र तज्ञा आधार नामक कर्म सिद्ध है और अग्निहोत्र वाक्य एवं आधार वाक्य उसके अनुवादक हैं न कि विधायक । सं०-उस अर्थ में हेतु देते हैं। अप्रकृतत्वाच्च ॥१५॥ प० क्र--(च) तथा (अप्रकृतत्वात् ) प्रकरण में आये वाक्य से भी द्रव्य देवता की उपलब्धि नहीं होती।

भा9 अग्लि हान्न बाल्य और प्राधार वाक्य द्रव्य देवता के द्योतक नहीं उसी प्रकार बाल्यान्तर से भी कुछ प्रतीत नहीं होता और अपूर्व कर्म का स्वरूप द्रव्य तथा देवता माना गया है, वह यदि प्रतीत न हो तो ऐसे वाकयों को अपूर्व कर्मों का विधायक नहीं कह सकते अतः वह विधायक के स्थान अनुवादक ही भाने जावंगे। सं--अब पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। चोदना वा शब्दार्थस्य प्रयोगभूतत्वात्तत्सन्नि- धेगुणार्थेन पुनः श्रुतिः ॥१६॥ -'वा' शब्द पूर्व पक्ष के परिहार के लिये आया है। (चोदना ) अग्निहोत्र तथा आधार वाक्यों के कर्म विधान कर्ता होने से अनुवादक नहीं क्योंकि (शब्दार्थस्य) उनका अग्निहोत्र तथा प्राधार रूप जो (तत्सन्निधेः) उनके समीप श्रुति दधि आदि वाक्य हैं (वह गुणार्थन) गुण सं०-अब वाक्यों को अपूर्व कर्म का विधान कर्ता कहते हैं। द्रव्यसंयोगाच्चोदना पशुसोमयोः प्रकरणे ह्यनर्थको द्रव्यसंयोगो न हि तस्य गुणार्थेन ।। प० क्र०-(पशु सोमयोः) दो वाक्य सोमने यजेत, तथा अग्नी षोमीयं ( चोदना ) अपूर्व कर्म के विधान कर्ता हैं उनमें (द्रव्य-- संयोगात ) द्रव्य का योग पाया जाता है (हि) यदि (प्रकरणे) प्रकरण में पढ़ा हृदयादि "और ऐन्द्र वायवादि वाक्यों का विधान कर्ता माने तब ( द्रव्यसंयोगः) सुने हुये द्रव्य का योग (अनर्थकः ) व्यर्थ हो जाता है। अतः (तस्य) उसका श्रवण विधि है।

५० क्र०-
( १०७ )
(गुणार्थन) गुणरूप से भी (नहि ) नहीं हो सकता है।
सं०-अब बांति अादि को संस्कार कर्म का विधान कत्ती होने
का निरूपण करते हैं।
अचोदकाश्वसंस्काराः ॥१८॥
(च) तथा ( अचोद काः) अपूर्व कर्म के विधान कर्ता
नहीं किन्तु (संस्काराः) पशु तथा सोम रूप द्रव्य का संस्कार
बतलाते हैं।
सं० सोमेन यजेत' से एक ही सोम याग की विधि पाई जाती
है अतः एक याः और दश ए.कों का ग्रहण कैसा ।
तद्धदाकर्मणाऽभ्यासो द्रव्यपृथक्त्वादनर्थक
हि स्यादभेदो द्रव्यगुणीभावात् ॥१९॥
प० क्र0-(तभेदात् ) पात्र भेद से (कर्मणः) सोमयाग की
(अभ्यास) आवृत्ति समझनी क्योंकि (द्रव्य पृथक स्वात्) पात्र
भेद से, तत्स्थ सोम द्रव्य का भी भेद मिलता है (हि ) यदि
कर्मावृति न हो तो (भेदः) वह भेद ( अनर्थक) वृथा ( स्यात् )
हो जाता है और (द्रव्य गुणी भावात् ) सोम रूप द्रव्य का अङ्ग
से ही ग्रहण की आवृत्ति है।
मा-जिस कर्म को बारम्बार किया जाता है उसे अनुष्ठान
कहते हैं अभ्यास और आवृति पर्यायवाची है अतः आवृति
के कारण दश पात्रों का ग्रहण प्रयोजन के अनुकूल हो जाता है।
संस्कारस्तु न भिद्यते परार्थत्वाव्यस्य
गुणभूतत्वात् ॥२०॥

भारती क्रमांक विभाग (१०८) 'तु' शब्द आशंका दूरी करण के लिये है (संस्कारः) पशु बन्ध रूप संस्कार की (न भियते) यूप भेद होने से भी आवृत्ति नहीं क्योंकि ( परार्थत्वात यूप पशु बांधने के निमित्त होने से (गुणभूतत्वात् ) गौण है। सं०--अब संख्या कृन कर्म भेद को कहते हैं। पृथक्त्वनिवेशात्संख्यया कर्मभेदःस्यात् ॥२१॥ प० क्र0---(संख्यया) भेदेन ( कर्म भेदः) कर्म का भेद (स्यात्) है क्योंकि उसका (पृथकत्व निवेशात् ) संख्येय भेद से नियत सम्बन्ध है। सं0---संज्ञा कृत कर्म भेद को बतलाते हैं। संज्ञा चोत्पत्तिसंयोगात् ॥२२॥ ५० ऋ०-(च) और [ संज्ञा नाम भी कर्म में भेद करने वाला है क्योंकि उस का [ उत्पत्ति संयोगात् ] कर्म के विधान कर्ता वाक्य के साथ योग है। सं०-गण भेद से कर्म भेद कहते हैं। गुणश्चाऽपूर्वसंयोगे वाक्ययोः समत्वात् ॥ पक्र०-[च] तथा [अपूर्व संयोगे] प्रकृत देवता के साथ नः याग होने से (गुण) गुण एवं कर्म का भेद करने वाला है [वा क्ययोः] पूर्व और उत्तर उभय वाक्य [ समत्वात् ] एक से हो जाते हैं। अगुणे तु कर्मशब्दे गुणस्तत्र प्रतीयेत ॥२४॥ प० ०-(तु) शब्द शंका परिहारार्थ है (कर्मशब्दे ) अपूर्व कर्म का विधायक वाक्य ( अगुणे) गुण रहित कर्म का विधायक है प०क्र (१०६) (तत्र ) उस वाक्य से बतलाये कर्म में (गुणः) वाक्यान्तर से कर्म का (प्रतीयेत ) विधान होता है। सं०-अब दधि आदि गुण का फल कहते हैं। फलश्रुतेस्तु कर्म स्यात् फलस्य कर्मयोगी- त्वात् ॥२५॥ 'तु' शब्द पूर्व पक्षार्थ है (कर्म) दधि वाक्य अपूर्व कर्म का ( स्यात् ) विधान कर्ता है क्योंकि (फलश्रुतेः) उसका एकल सुना गया है एवं (फलस्य) फल से (कर्म योगि त्वात्) कर्म से नियत सम्बन्ध है। भा० दध्ना इन्द्रिय कामस्य जुहुयात' अर्थात् चक्षुः आदि इन्द्रिय की कामना वाला दही से होम करे इस में इन्द्रिय फल रूप उपदेश फल पाये पाने से यह कर्म के बिना केवल एक दधि रूप द्रव्य से नहीं मिल सकता क्योंकि फल कर्मजन्य होता है अतः इन्द्रिय फल के लिये दधि आदि रूप गुण मान का विधा- यक नहीं किन्तु 'अग्निहोत्र' वाक्य के तुल्य गुण साक्ष्य अपूर्व कर्म का विधान करता है। सं -अब इसका समाधान किया जाता है। अतुल्यत्वात्तु वाक्ययोगणे तस्य प्रतीयेत ॥२६॥ प० ऋ०-'तु' शब्द पूर्व पक्ष के परिहारार्थ है (वाक्य यो:) 'अग्नि- होत्र तथा 'दध्नेन्द्रिय इन दोनों वाक्य में (अतुल्य त्वात ) एक नहीं अतः ( तस्य ) अग्निहोत्र कर्म में (गुणः ) फल विशेष के लिये गुण का (प्रतीयेत ) विधान है। भा०-'अग्नि होनं जुहुयात स्वर्ग कामः' लोक और परलोक की आरती क्रमांक विभाग इच्छा वाला पुरुष नित्य दोनों समय अग्नि होत्र करे यहां इस লায় প ফ্লা অস্ত্র লক কাজ ই संसब कर्मान्तर को कहते है। समेषु कर्म युक्तं स्यात् ॥२७॥ १० क्र--( समेष ) सदृश वाक्यों में ( कर्म युक्त) अपूर्व कर्म के साथ फल सम्बन्ध ( स्यात) है मा०-जिस प्रकार प्रकृत याग के विधान को वाक्य से याग एवं फल का जन्य जनक मान सम्बन्ध है उसी प्रकार उस वाक्य में गुण विशिष्ठ याग के साथ पशु रूप फल का जन्य जनक भाव नहीं। सं०-सौभर और निधन का समान फल निरूपण करते हैं। सौभरे पुरुषश्रुतेनिधनं कामसंयोगः ॥२८॥ प० ऋ०-( सौमरे) सौभर सम्बन्धी निधन में (पुरुषश्रुतेः) पुरुष प्रयत्न का उपदेश है अतः (निधनं) वह निधन ( काम- संयोग) फल वाला है। मा०-जिस पुरुष को वर्षा, अन्न, तथा सुख विशेष की इच्छा हो वह सौमर नामक साम विशेष से परमात्मा की स्तुति करे क्योंकि इससे समस्त फल प्राप्त होते हैं यह विधि बतलाकर साम के पांच अथवा सात माग होते हैं और अन्तिम को निधन कहते हैं यहां पर वृष्टि कामना वाला 'हीष' अन्न कामना वाला 'ऊर्ग' सुख विशेष कामना वाला 'ऊ' इसका निधन करे इन वाक्यों में 'कुर्यात' पद से पुरुष प्रयत्न का उपदेश मिलता है। सं०-अब इसका समाधान किया जाता है।

( १११ ) सर्वष्य वोक्तकामत्वात्तस्मिन्कामश्रुतिः स्या- निधनार्थापुनः श्रुतिः ॥२॥ प० ० ---- (घा) पूर्व पक्षपरिहारार्थ है (सर्वस्य) सब साम को उक्त कामत्वाल) वृष्टि आदि फल का हेतुक है अतः (तस्मिन्) सौभर में (काम श्रुतिः) फल श्रवण ( स्यात) है (पुनः) तथा (श्रुतिः) निधन वाक्य में फल श्रवण (विधनार्थी ) व्यवस्था हेतुक है। मा०-सम्पूर्ण साम से फल सिद्धि होती है अथवा उसके किसी अंश से भी होती है क्योंकि निधन सौभर साम का एक भाग है । सं-ज्योतिष्टोम यज्ञ का आग्रह ग्रहण उसके गुण निरुपण करते हैं। इति मीमांसा दर्शने द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः समाप्तः ।। अथ द्वितीयाध्याय तृतीयः पादः प्रारभ्यते ॥ गुणस्तु ऋतुसंयोगात्कर्मान्तरं प्रयोजयेत्संयोग- स्याशेषभूतत्वात् ॥१॥ ५० ऋ०--'तु' शब्द पूर्व पक्ष का द्योतक है [गुणः ] स्थन्तरादि सामरूप गुण के श्रवण से [कर्मान्तर] दूसरे कर्म का प्रयोजयेत प्रेरक है क्योंकि [ऋतुसंयोगात् ] उसका अन्य क्रम से योग है और [ संयोगस्य ] वह सम्बन्ध [ अशेषभूतत्वात् ] मुख्य कर्म से प्रथक है। सं०-अब पूर्व पक्ष का समाधान किया जाता है।

भारती
क्रमांक
विभाग
एकस्य तु लिंगभेदात् प्रयोजनार्थ मुच्येते-
कत्वं गुणवाक्यलात् ॥२॥
प० क्र0-'तु' पूर्व पक्ष निराकरणार्थ है ( एकस्य ) एक ही
ज्योतिष्टोम याग का (लिंगभेदात् ) विशेषण भेट से ( प्रयोज-
नार्थम् ) ग्रह ग्रहण रूप अर्थ के निमित ( उच्येत ) वाक्य कहे
जाते हैं अतः ( गुणवाक्यात् ) उन्हें बह ग्रहण रूप गुण विशिष्ट
का विधानकर्ता होने से ( एकरवं ) कर्म की एकतावश भेद
नहीं ।
सं०--ब्राह्मणादि कृत्य के कर्मान्तर होने का निरूपण करते हैं।
अवेष्टौ यज्ञसंयोगाकतुप्रधानमुच्यते ॥३॥
५० ऋ०-( अवेष्टौ) अवेष्टि नामक याग सन्निधि में पठित
(ऋतु प्रधानम् ) अपूर्व कर्म विधायक ( उच्यते ) है क्योंकि
( यज्ञ संयोगात् ) क्षत्रिय संबन्ध होने से।
सं०-अग्न्याधान तथा उपनयन को कर्मान्तर निरूपण करते हैं।
श्राधाने सर्वशेषत्वात् ॥४॥
प० ऋ० [आधाने ] अग्न्याधान, और यज्ञोपवीत में विधि है
क्योंकि वह [ असर्व शेषत्वात् ] सब मनुष्यों को पूर्व प्राप्त
नहीं होता।
मा०--वैदिक कर्मानुष्ठान अग्न्याधान और विद्या प्राप्ति के
बिना नहीं हो सकता और विद्या प्राप्ति उपनयन के बिना नहीं।
सं०--'दाक्षायण आदि को गुण कथन के लिये कहते हैं।
अयनेषु चोदनान्तरं संज्ञोपबन्धात् ॥५॥

प० क्र- 40 --[अयनेषु ] दाक्षायणादि वाक्य में [चोदनान्तरं] कर्मान्तर विधि होने से उनमें [संज्ञोप बन्धात् ] कर्म संज्ञा का सम्बन्ध हैं। सं०-इसमें हेतु देते है। अगुणाच्च कर्मचोदना ॥६॥ प० क्र0-[च] तथा [अगुणात् ] अन्य गुण योग न होने से वह [कर्मचोदना] कर्म मात्र का विधान है। सं०-अन्य हेतु और भी है। समाप्तं च फले वाक्यम् -[च ] और [वाक्यं] वह वाक्य ( फले ) मोक्षादि फले (समाप्त) कर्म मात्र का उद्भुत-उत्पादक है। सं.-इसका समाधान करते हैं। विकरो वा प्रकरणात् ॥८॥ 'वा' शब्द पूर्व पक्ष के परिहारार्थ आया है (विकार) दर्श पूर्ण मास में गुण विशेष का विधान करने वाला होने से वह वाक्य [प्रकरणात् ] उसके प्रकरण में पढ़े जाने से भी। सं०-और मी हेतु है। लिंगदर्शनाच्च ॥९॥ 400-(च) तथा (लिंगदर्शनात) चिन्ह प्रतीत होने से वह वाक्य गुण विधायक है न कि उसे कर्मान्तर विधायक कह सकते हैं। सं0--अब 'संज्ञोपबन्धात्' उस पक्ष में कठिन का समाधान प०क्र0 #বী क्रमांक विभाग भा० गुएाजोपबन्धः ॥१०॥ प० (गुणात् ) बारम्बार रूप गुण कथन से (संज्ञोपबन्ध) याग की दाक्षायण संज्ञा कही गई है। -दाक्षायण शब्द बारम्बार रूप गुण का वाचक है उसी गुण योग में प्रकृत याग को दाक्षायण याग कहा है। अब सात सूत्र के पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। समाप्तिविशिष्टा ॥११॥ प० ऋ०-( समाप्तिः) उस वाक्य का आकांक्षा रहित होना। (अवशिष्टा) कर्म फल सम्बन्ध कथन के समान गुण फल सम्बन्ध कथन में समानता है। सं0-'वायव्यं श्वेतम् । ऐसे वाक्यों में अपूर्व कर्म का विधान पाये जाने से पूर्व पक्ष करते हैं। संस्कारश्चाप्रकरणेऽकर्मशब्दत्वात् ॥१२॥ ५० 0-यहां 'च' शब्द पूर्व पक्ष की सूचना निमित्त है (अप्र-- ककणे) प्रकरण में न होने पर भी पढ़ा हुआ 'वायव्य श्वेतम' आदि वाक्य (संस्कारः) स्पर्श रूप संस्कार गुण के विधान कर्ता हैं न कि अपूर्व कर्म विधान कर्ता हैं, उनमें (अक्रम शब्दात् ) उसका वाचक कोई शब्द नहीं। खं०-द्वितीय पक्ष को कहते हैं। यावदुक्तं वा कर्मणः श्रुतिमूलत्वात् ॥१३॥ 40 0-'वा' शब्द पूर्व पक्ष के निमित्त आया है (यावदुक्त उस वाक्य में स्पर्श तथा निर्वाण मात्र कर्म के विधान कर्ता है इसलिये कि (कर्मणः ) कर्म का (श्रुति मूलत्वात्) जैसा सुना बैसा ही विधान मानना ठीक है। सं०-इस पूर्व पक्ष का समाधान किया जाता है। यजतिस्तु द्रव्यफलभोक्तृसंयोगादेतेषां कर्म- सम्बन्धात् ॥१४॥ प० क्र0 am 'तु' शब्द पूर्व पक्ष परिहारार्थ है। ( यजतिः) यह वाक्य प्रधान कर्म के करने वाले हैं। उनसे (द्रव्य फल मोक्त संयोगात्) द्रव्य, फल तथा देवता तीनों का का याग मिलता है और (ऐतेषां) तीनों का ( कर्म सम्बन्धात् ) प्रधान कर्म के साथ अनियत सम्बन्ध है। सं०-इसमें हेतु देते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥१५॥ प० ऋ०-(च) और (लिंगदर्शनात ) के पाये जाने से उस कार्य की सिद्धि है। सं०-'वत्सया लभते में संस्कार कर्म का विधान है इसका निरूपण करते हैं। विशये प्रायदर्शनात् ॥१६॥ प०क-(विशये) याग विधि है अथवा संस्कार विधि है इस संशय के उपस्थित होने पर (प्राय दर्शनात्) प्रकरण वलादेश से निश्चय करे। सं०-इस अर्थ में अब हेतु देते हैं।

भारती क्रमांक विभाग NEW (११६) अर्थवादोपपत्तेश्व ॥१७॥ प००-(च) वथा (अर्थवादोपपत्तेः) अर्थवाद से मी उस अर्थ की सिद्धि है। संयुक्त स्त्वर्थशब्देन तदर्थः श्रुतिसंयोगात् ॥१८॥ ५० ऋ०---( अर्थ शब्देन) उपधान रूप कर्मवाची उपदधाति क्रिया के साथ ( संयुक्त ) नियोजित जो चरु वह ( तदर्थ) उप- धान के निमित्त है (तु) न कि याग के लिये क्योकि ( श्रुति संयोगात् ) इससे सुने हुए अर्थ का लाम है। सं०-पर्याग्निकृत वाक्य भी संस्कार का विधान का है। पानीवते तु पूर्ववादवच्छेदः ॥१९॥ -- पात्नीवते ) वाक्य विशेष में (अविच्छेदः) सामान्य याग में अमिलाषित द्रव्य संस्कार का विधान है न कि अपूर्व याग का, क्योंकि ( पूर्वत्वात् ) याग पद पूर्व ही आ चुका है। सं०-'अदाभ्य' पात्र विशेष का निरूपण करते हैं। अद्रव्यत्वात्केवले कर्मशेषः स्यात् ॥२०॥ 40 क्र०-(अद्रव्यत्वात् ) द्रव्य और बिना देवता के (केवले) केवल 'अदाभ्य' और 'अंशु' ग्रहण सुने जाने से याग विधान की कल्पता नहीं क्योंकि ( कमशेषः) ज्योतिष्टोम कर्म का अङ्ग स्यात् है न कि प्रधान कर्म का। सं०--अब अग्नि चयन संस्कार कर्म का निरूपण किया जाता है। अग्निस्तु लिंगदर्शनाक्रतुशब्दःप्रतीयते ॥२१॥ प० क्र0 ( ११७ ) प० ३० --'तु' शब्द पूर्व पक्ष परिहार करता है। (अग्निः) अग्नि बाक्य (क्रतुशब्दः) याग का नाम (प्रतीयेत) प्रतीत होता है क्योंकि (लिङ्गदर्शनात् ) उसके बतलाने वाले स्तोत्र तथा शस्त्र रूप चिन्ह मिलते हैं। सं० -- इसका समाधान यह है। द्रव्यं वा स्याच्चोदनायास्तदर्थत्वात् ॥२२॥ 40 -'वा' पूर्व पक्ष परिहारार्थ है ( द्रव्यं ) अग्नि के (चोद- नायाः प्रेरणा से (तदर्थत्वात् ) उसके स्थापन अर्थ से है । तत्संयोगात्क्रतुस्तदाख्यः स्यात्तेन धर्मविद्या- नानि ॥२३॥ प० क्र0-(क्रतु संयोगात् ) यज्ञ के साथ अग्नि का अङ्गाङ्गि भाष रूप सम्बन्ध है [तदाख्यं] लिङ्ग वाक्य में अग्नि पद [क्रतुः ज्योतिष्टोम यज्ञ का वाचक [ स्यात् ] है अतः तिन] वह वाक्य [धर्म विधानानि ] याग में स्तोत्र एवं शस्त्र रूप गुण का विधान करता है न कि संज्ञा का बोधक है। प्रकरणान्तरे प्रयोजनान्यत्वम् ॥२४॥ प००-[प्रयोजनान्यत्वं ] नित्य अग्निहोत्र कर्म से 'मासाग्नि होत्र कर्म मिन्न है क्योंकि (प्रकरणान्तरे। वह अन्य प्रकरण से विदित है। फलं चाकर्मसन्निधौ ॥२५॥ प० 0-(च) तथा (अकर्म सन्निधौ) अनारभ्याधीत आदि बाक्य में ( फलं) सुने हुए फल प्रकरणान्तर से कर्म भेद करने भारती क्रमांक विभाग (११८ ) धाले है। सन्निधो लविभागारफलार्थेन पुनः श्रुतिः ॥२६॥ 40 ---(सन्निधौ) अवेष्टि यत्र की समीपता में पढ़ा हुआ 'एतया' वाक्य (फलार्थन) फल सम्बन्ध के लिये (पुनः श्रतिः) अवेष्टि याग का फिर फिर करने का विधायक है (तु)न कि कमान्तर का (अविभागात्) अविभाग होने से। आग्नेयसूक्तहेतुत्वादभ्यासेन प्रतीयेत ॥२७॥ -'तु' पद पूर्व पक्ष का द्योतक है। (आग्नेयः) भाग्ने आदि वाक्य में बारम्बार आग्नेय याग सुने जाने से (अभ्यासेन) मिन्न अनुष्ठान के निमित्त है क्योंकि ( उत्त हेतु त्वात् ) बार- म्बार श्रुति कर्म भेद का साधक है। अविभागत्तु कर्मणां द्विरुक्तेन विधीयते॥२८॥ ५० ऋ०-'तु' पूर्व पक्ष का निराकरण करता है। (द्विरुक्त) पुनः पुनः कथन होने से भी (न विधीयते) कर्मान्तर का उक्त वाक्य में विधान ही क्योंकि ( कर्मण) पूर्व वाक्य विहित कर्म में (अविभागात् ) इस वाक्य विधान कर्म का सामजस्य अर्थात् एकता है। अन्यार्था वा पुनः श्रुतिः ॥२॥ १० ऋ०-वा' पूर्व पक्ष का परिहार करता है और एक देशी के समाधान को "समाधाना मास' मात्र बतलाता है। (पुनः श्रुतिः ) आग्नेय याग का बारम्बार श्रवण (अन्यार्थी ) ऐन्द्र याग स्तावक होने से है। इति श्री मीमांसा दर्शने द्वितीयाध्याये तृतीयः पादः समाप्तः। BHOOTRAI प०क्रompan * यो३म् 8 अथ द्वितीयाध्याये चतुर्थः पादः प्रारभ्यते । सं०-"जब तक जिये अग्निहोत्र करे। इसमें पूर्व पक्ष करते हैं। यावज्जीविकोअभ्यासः कर्मधर्मः प्रकरणात्।। -( यावज्जीविकः) जीवन पर्यन्त होने वाला (अभ्यासः) फिर फिर अनुष्ठान । (कर्म धर्मः) अग्निहोत्र कर्म का कर्म है कारण कि (प्रकरणात् ) कर्म का प्रकरण होने से। सं०-इस पक्ष का समाधान किया जाता है। कतुर्वा श्रुतिसंयोगात् ॥२॥ प० क्र०-'वा' पूर्व पक्ष परिहार के निमित्त प्रयोग है ( कर्तु:) चावज्जीव पुरुष का धर्म है क्योंकि (श्रुति संयोगात्) मुख्यार्थ लाम होने से। सं-इसमें हेतु देते हैं। लगदर्शनाच्च कर्मधर्मे हि प्रक्रमेण नियम्येत तत्रानर्थकमन्यत्स्यात् ॥३॥ ५० क्र० -(च) तथा (लिङ्गदर्शनात् ) चिन्ह मिलने से कि जब तक जिये तब तक कर्म करे यह पुरुष धर्म है न कि कर्म का (हि) इसलिये कि (कर्म धर्म ) कर्म का धर्म होने से (प्रक्रमेण) प्रारब्ध कर्म का (नियम्येत) मरण पर्यन्त समाप्ति का नियम हो तो ( तत्र) ऐसा नहीं ( अन्यत् ) फल क्षय श्रवण से ( अन- र्थक) वृथा ( स्यात् ) है। सं०-इसमें यह हेतु भी है। व्यपवर्ग च दर्शयति कालश्चेत्कर्मभेदः स्यात् ।

বী क्रमांक विभार (१२० ) १० se..( व्यपवर्ग) दर्श आदि कर्म की समाप्ति (च) तथा कर्मान्तर विधि ( दर्शयति) वाक्यान्तर में मिलती है (चेत) यदि ( कालः) दर्शकर्म की समाप्ति के पश्चात् काल का शेष है तो ( कर्मभेदः) तब ही कर्म विशेष का विधान ( स्यात् ) है। सं०-इसमें हेतु देते हैं कि:-- अनित्यत्वात्तु नैव स्यात् ॥५॥ प0 क्र०(तु) तथा सामान्य अग्निहोत्रादि का कर्म (एव) इसी प्रकार जरा, मृत्यु अवधि वाला (नस्यात) नहीं होता (अनित्यत्वात् ) क्योंकि वह अनित्य है। सं०-इसमें हेतु देते हैं। विरोधश्चापि पूर्ववत् ॥६॥ 40 - [च तथा [ पूर्वावत् ] पूर्व कहे दोषों के समान [विरोधः अपि ] अनुष्ठान न करने से रूप लक्षण दोष भी आता है। सं-इसका उपसंहार करते हैं। कतु स्तु धर्मनियमात् कालशास्त्र निमित्तं स्यात् ॥७॥ प० ऋ०-~[काल शास्त्र] समय शास्त्र के समान वाक्य । (निमित्ते) जीवन रूप निमित्त । [ कर्तु धर्म नियमात ] जब तक जिये कर्त्ता का धर्म नियम है। तु न कि कर्म के धर्म का । सं०-सब शाखाओं में वैदिक कर्मों को समन्व्य करते हैं। नामरूपधर्मविशेषपुनरुक्तिनिन्दा शक्तिसमाप्ति ( १२१ ) व जनप्रायश्चित्ताऽन्यार्थदर्शनाच्छाखान्तरेषु कर्म. भेदः स्यात् ॥८॥ -( शाखान्तरेषु ) शाखाओं में। (कर्मभेदः) कर्मों का परस्पर भेद' । (स्यात) है कारण । (नाम रूप धर्म विशेष पुनरुक्ति निन्दा शक्ति समाप्ति वचन प्रायश्चित्तान्यार्थ दर्शनात् ) नाम भेद, स्वरूप भेद, धर्म भेद और पुनरुक्ति आदि पाई जाती है। सं0- इसका समाधान किया जाता है। एवं वा संयोगरूपचोदनाख्याविशेषात् ॥९॥ प० क्र.-(वा) पूर्व पक्ष परिहारार्थ प्रयोग है। (एवं) प्रति बाहरण तथा शाखा में अग्निहोत्र एक ही है भेद नहीं। कारण कि (संयोग रूपचोदना ऽऽख्याऽविशेषात् ) फला, स्वरूप, प्रेरणा और नाम का सर्वत्र समन्वय है। सं-नाम भेद हेतु का निराकरण करते हैं न नाम्ना स्यादचोदनाविधानत्वात् ॥१०॥ -(नाम्ना नाम भेद से। ( नस्यात् ) अग्निहोत्र कमों का भेद नहीं क्योंकि (अचोदनाविधानत्वात् ) उनकी विधि वाक्यों में प्ररणा नहीं है। सं०-इसमें युक्ति देते हैं। सर्वेषां चैककम्यं स्यात् ॥११॥ 40 0-(च) और (सर्वेषां) अग्निहोत्र दर्शपूर्णमास ज्योति- ष्टोम आदि सब यज्ञ । (एक कयं) एक ही कर्म ( स्यात् ) हैं। सं०--इसमें युक्ति यह भी है। प०० भारती क्रमांक विमान ( १२२) कृतकंचाभिधानम् ॥१२॥ (च) तथा (अभिधानम्) काठक, कालापक, नाम (भेद कृतक) नरहने वाले है। सं0-रूप भेद का निराकरण किया जाता है। एकवेऽपि परम् ॥१३॥ ब० ऋ० ( एकत्वे अपि) प्रति ब्राह्मण तथा प्रति शाखा कर्म के एक होने पर भी (पर) एकादश कपाल और द्वादश कपाल और द्वादश कपाल का प्रवचन विकल्प के आधार पर हो सकता है। सं०-धर्म भेद के हेतु देते हैं। विद्यायां धर्मशास्त्रं ॥१४॥ प० ३०-(विद्यायां) कारीगरी श्रादि अध्ययन वाक्य (धर्म- शास्त्रे) शास्त्र में बतलाये भूमि भोजन अङ्ग हैं न कि कर्म में । सं0-पुनरुक्ति हेतुक समाधान करते हैं। आग्नेय पुनर्वचनम् ॥१५॥ प००-(भाग्नेयवत् ) आग्नेय यज्ञ के समान (पुनवर्चनम् ) पुनरुक्ति अनुवाद है। सं०-इसी को पुनः पुष्ट करते हैं। अद्विवचनं वा श्रुतिसंयोगाविशेषात् ॥१६॥ १० -(वा) सूचनार्थ है (वा) अथग (अद्विवचनं) ब्राह्मण तथा शाखा में पुनर्वचन नहीं (अति संयोगाविशेषात् ) वेद सम्ब- न्ध सर्वत्र समान है ( १२३) सं-पुनः युक्ति देते हैं। अर्थासन्निधेश्च ॥१७॥ -(च) पुनः (अर्थासन्निधेः) एक शाखायें उस अग्नि-- होन रूप अर्थ का शाखान्तर में कहे हुए सम्बन्ध से वह पुनरुक्ति नहीं मानी जाती। सं०-इसमें हेतु और भी है। न चैकं प्रति शिष्यते ॥१८॥ प० ऋ०-(च) पुन: (एक प्रति ) ब्राह्मण तथा शाखा में विषयक पुरुष के प्रति अग्निहोत्र करणोपदेश है (न शिष्यते) न होने से। सं०-समाप्ति वचन रूप का हेतु का समाधान करते हैं। समाप्तिवच्च संप्रेक्षा ॥१९॥ -(च) तथा (सम प्तिवत्) कर्म समाप्ति का बतलाने वाला वचन होने से उससे (सम्प्रेक्षा) प्रति ब्राह्मण तथा प्रति शाखा कर्म का भेद ही है। सं०-निन्दा, अशक्ति तथा समाप्ति बचन तीनों को कर्म भेद में अहेतुक कथन करते हैं। एकत्वेऽपिपराणि निन्दा शक्तिसमातिवचनानि । प० क्र0 o-(एकत्वेऽपि) प्रति ब्राह्मण तथा शाखा में एक ही अग्नि- होत्र का प्रवचन होने से (निन्दा शक्ति समाप्ति वचनानि) निन्दा अशक्ति तथा समाप्ति बचन (पराणि) तीनों होते हैं। सं०-पुनः श्राशंका करते हैं। प्रायश्चित्तं निमित्तेन ॥२२॥ प००-- , मारती क्रमांक वभाग ( १२४ ) १० ऋ०-(निमिन्तेन) होम की उदित अथवा अनुदित वेला पर (प्रायश्चित्त) प्रायश्चिन्त विधान किया हुआ कर्म पक्ष का साधक नहीं। सं०--इन शब्दों का परिहार किया जाता है प्रक्रमाद्वा नियोगेन ॥२२॥ ५० ऋ०-(बा) शब्द उस शंका के परिहारार्थ है। (नियोगेन) उदित होम अथवा अनुदित होम की प्रतिज्ञा का नियम करके (प्रक्रमात्) प्रारम्भ करदे अथवा विपरीत होने पर प्रायश्चित्त कहा गया है। Rane सं०--समाप्ति वचन से बीच के कर्म की क्यों पाई जाती है। समाप्तिः पूर्ववत्त्वाद्यथाज्ञाते प्रतीयते ॥२३॥ प० ऋ०-[समाप्तिः] समाप्ति [ यथा ज्ञाने] प्रतिज्ञानुकूल [प्रती- यते ] समझनी चाहिये। [पूर्ववत्त्वात्] वह निश्चयपूर्वक श्रारंभ की गई है। सं0--अन्यार्थ दर्शन के हेतुक प्रथम हेतु को कहते हैं। लिंगविशिष्ठ सर्वशेषत्वान्न हि तन्त कर्म- चोदना तस्माद्वादशाहस्याहारव्यपदेश स्यात् । प० 0--(लिंगं ) चिन्ह (अवशिष्ठं] प्रति ब्राह्मण और प्राप्ति शाखा कर्म भेद का अर्थ वाला नहीं ( सर्वशेषत्वात् ) उससे तो ज्योतिष्टोम सर्व प्रथम माना गया है (तत्रं ) तब (कर्म चोदना) कर्म प्रेरणा-विधि (नहि) नहीं मानी जा सकती (तस्मात् ) अतएज ( द्वादशाहस्य) वृहत्सामा के (आहार व्यपदेशः) दिदीक्षाणाः ( १२५ ) तथा अदिदीक्षाणाः शंकानुष्ठान कथन ( स्यात् ) है वह कर्म भेद का नहीं। सं०--अन्यार्थ का दूसरा हेतु देते हैं। द्रव्ये वाचोदितत्वाद्विधीनामव्यवस्था स्यान्नि- देशाधरतिष्ठेत् तस्मान्नित्यानुवादःस्यात् ।२५॥ ५० क्र०-(च) और (द्रव्ये) अग्नि रूप द्रव्य के चयन करने में ( अर्चा दित्वात् ) एकादशिनी याग का उपदेश (प्रेरणा) न होने से (विधिनां) पक्ष तुल्य निन्दा और वेद सहश यज्ञ भूमि और यूपों के बीच रथाश्व परिमित अन्तराल के विधि वाक्य की (अव्यवस्था) व्यत्तिकम (स्यात्) अवश्य है तथापि (निर्देशात] 'वाचःस्तोम' याग में एकादश यूप की विधि होने से (व्यवति- ष्ठत्) उक्त विधियों की व्यवस्था हो सकने से ( तस्मात्) अतः वह अग्नि चयन विभाग (नित्यानुवादः) पूर्वोक्त विधि वाक्यों का विधान ( स्यात् ) है न कि विधान । सं०-अन्यार्थ दर्शन में तृतीय हेतु दिया जाता है। विहितप्रतिषेधात् पक्षेतिरेकः स्यात् ॥२६॥ ५० क्र०-(विहितप्रतिषेधात् ) अतिरात्र याग में 'षोडशी' पात्र के ग्रहण तथा निषेध की विधि के (पक्षे) विधान तथा निषेध पक्ष (अतिरेकः ) दो और तीन का अनुपात् (स्यात्) हो सकता है। सं०-अन्यार्थ दर्शन में चौथा हेतु देते हैं। सारस्वते विप्रतिषेधाद्यदेति स्यात् ॥२७॥ प० ०-(सारस्वते ) सारस्वत सत्र में। (विप्रतिषेधात् ) पुरो- भारती क्रमांक वभाग (१२६ ) डाशी और सान्नायीका अधिकार कहने से जो शाखान्तर में "एषवान प्रथमो यज्ञ:) आदि वाक्य से विरोध पाने पर उसका परिहार ( यदा, इति) "यदा' इस पद के अध्याहार से ( स्यात् ) होता है। सं-अन्याथै दर्शन में पांचवा हेतु देते हैं। उपहव्येऽप्रतिप्रसवः ॥२८॥ प० ०-( उपहव्ये) उपहव्य याग में वृहत तथा रथन्तर साम विधान वृथा है क्योंकि (अप्रति प्रसवः) वह स्वभाव से विदित है। सं०-इन पूर्व पक्षों का समाधान किया जाता है गुणार्था वा पुनः श्रुतः ॥२९॥ ५० ऋ०--(वा) पूर्व पक्ष निराकरणार्थ प्रयोग किया गया है (पुनः ति) प्रकृति याग से प्राप्त होने पर वृहत्साम और रथन्तर साम का पुनः विधान (गुणार्था) दक्षिणा रूप गुण विशेष के नियम के निमित्त है। सं०-प्रति ब्राह्मण और प्रति शाखा कर्म भेद से साधक लिंगों के निराकरण किये जाने पर अब कर्म अभेद का साधक लिंगों को कहते हैं। प्रत्ययंचापि प० ३०-(च) तथा (प्रत्ययं) एक शाखा में याग का और दूसरी शाखा में उसके गुणों का विधान मिलने से। (अपि) भी। प्रति ब्राह्मण और प्रति शाखा अग्निहोत्र कर्म का अभेद Maase दर्शयति ॥३०॥ बादाम (१२७ ) बतलाता है। सं०-पुनः आशंका करते हैं। अपि वा क्रमसंयोगाद्विधिपृथक्त्वमेकस्यां व्यवतिष्ठेत ॥३१॥ 40 क्र०-[अपि बा] शब्द शंका द्योतनार्थ है। ( एकस्या) प्रत्येक शाखा में। (विधिपृथकत्व) अङ्गों के अनुष्ठान भेद से। (व्य- बतिष्ठेत् ) ही होने चाहिये कारण कि [क्रम संयोगात् ] अनु- ष्ठान के पाठक्रम से सम्बन्ध है और वह प्रति शाखा अलग- अलग है। सं०-इस आशंका का परिहार करते हैं। विरोधिना त्वसंयोगादेकाकर्ये तत्संयोगाद्वि- धीनां सर्वकर्मप्रत्ययः स्यात् ॥३२॥ ५० -'तु' शंका के परिहारार्थ प्रयोग है [विरोधिना] अनुष्ठान क्रम से विरोध करने वाले पाठ के साथ [असंयोगात् ] अङ्गा- नुष्ठान का सम्बन्ध नहीं क्योंकि [एक कर्ये ] पूर्ण कथित युक्ति- वाला देश से प्रति ब्राह्मण और प्रति शाखा सिद्ध होने पर [विधिनां] सम्पूर्ण अंश विधानों का [तत्संयो- गात् ] सब शाखाओं में प्रत्येक बतलाये क्रम के अनुसार अंगों का अनुष्ठान [स्यात् ] होता है। इति श्री मीमांसादर्शने द्वितीयोध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥ कर्म की एकता হিনী कमांक ओ३म् अथ तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः प्रारभ्यते। विभाग सं0-दूसरे भाग में यज्ञादि कर्मों के भेद उनके बीच में कौन शेष और शेषी कर्म हैं निरूपण करके अब प्रथम शेष के लक्षण बतलाते है। अथातः शेष लक्षणम् ॥१॥ प0 ऋ0-अथ] भेदादि कथन के पश्चात् ( शेष लक्षणं) शेष का लक्षण निरूपण करते हैं अतः इसलिये कि वह लाभप्रद है। सं०-शेष के क्या लक्षण हैं। शेषः परार्थत्वात् ॥२॥ प० -[परार्थत्वात् ] दूसरे के लिये होने वाला [शेषः ] शेष कहलाता है। सं०-'शेष क्या है निरूपण करते हैं। द्रव्यगुणसंस्कारेषु बादरिः ॥३॥ प0 0-[ द्रव्य गुण संस्कारेषु] द्रव्य गुण तथा संस्कार में शेष शब्द की प्रवृति होती है यह बादरि आचार्य मानते हैं। सं-इसमें जो कमी है उसे कहते हैं। कर्माण्यपि जैमिनिः फलार्थत्वात् ॥४॥ ५००-[कर्माणि, अपि] यज्ञ दान होम शेष के ही लक्षण हैं [फलार्थत्वात] क्योंकि उनके फल हैं ऐसा [जैमिनः] मिनि आचार्य मानते हैं। ब Samma *शेष का और लक्ष्य कथन करते हैं। फलं च पुरुषार्थत्वात् ॥५॥ प० - [चा पुनः फलं द्रव्यगुण और संस्कार एवं कर्म के समान फल भी शेष है क्योंकि [पुरुषार्थत्वात] वह पुरुषार्थ निमित्त है। सं0-शेष का क्या लक्ष्य है निरूपण करते हैं। पुरुषश्च कर्मार्थत्वात् ॥६॥ प० ऋ० - [च] तथा [ पुरुषः ] द्रव्य की भांति पुरुष भी। शेष है कारण कि । (कर्मार्थत्वात् ) वह कर्म दिमित्त है। सं०--अवहननादि धर्मों को आदि का शेष कहते हैं। तेषामर्थन सम्बन्धः ॥७॥ प० क्र0-( तेषां) अवहननादि धर्मों का। (अर्थेन ) वितुथी श्रावादि इष्ट फल के अनुसार । ( सम्बन्धः ) ब्रीहि आदि के साथ शेष शेषी भाव सम्बन्ध है। सं०---उक्त पक्ष का पूर्व पक्ष करते हैं विहितस्तु सर्वधर्मः स्यात् संयोगतोऽविशेषा- प्रकरणाविशेषाच्च ॥८॥ -(तु) पूर्व पक्ष का द्योतक है। (विहितः ) शास्त्र में बतलाये अवहनन । कूटना) आदि । (सर्वधर्मः) सब के धर्म । स्यात् ) हैं क्योंकि । संयोगतः अविशेषात् ] उनका द्रव्य से प्रधान कर्म के साथ योग है। [च] तथा [प्रकरण विशेषात् ] प्रकरण भी है। स--पूर्व पक्ष स्थापित करते हैं। अर्थलोपादकर्म स्यात् ॥९॥ ५० ऋ०--( अर्थलापात ) फल दृष्टिगत न होने से। [अकर्मस्यात् ] RA - -- - भारती कमांक विभाग सब कर्म सब द्रव्यों में नहीं किये जा सकते अत वह प्रति द्रव्य के लिये हैं। फलं तु सह चेष्टया शब्दार्थोऽभावाद्विप्रयोगे- स्यात् ॥१०॥ ५० क्र0---'तु' आशंका को दूर करने के लिये प्रयोग में लाया गया है (चेष्टया) क्रिया (अवहनन) के (सह) युक्त (फलं) तुष विमोकादि प्रयोजन (शब्दार्थः) शब्द का भाव अर्थ (स्यात्) है (विप्रयोगे. फल न होने पर (अभावात्) अवहन्नादि 'अव- हन्ति' आदिक अर्थ नहीं माने जा सकते। सं०-दाय आदि यज्ञों के साधनों की व्यवस्था कहते हैं। द्रव्यं चोत्पचि संयोगात्तदुर्थमेवचोद्यत ॥११॥ ० क्र0--(च) और (द्रव्यं) 'स्फूय' इत्यादि द्रव्य का (उत्पत्ति संयोगात् ) उत्पत्ति वाक्य से जिस जिस क्रिया के योग्य से (तदर्थम् एद ) वह उसी क्रिया निमित्त (चोद्यते) विधान किये जाते हैं। सं०-अरणि आदि गुणों या नियम करते हैं। अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरैककानियमः स्यात् ॥ ५००-(अर्थकत्वे) एक वाक्यार्थ में (द्रव्य गुणोः) द्रव्य और गुण के ( नियमः) परस्पर योग-नियम ( स्यात् ) हैं इस- लिये कि (एक काति) दोनों का किया सिद्ध कार्य समान है। सं०--'सम्मान' आदि को 'ग्रह' आदि द्रव्य मात्र का धर्म निरूपण करने के लिये पूर्वपक्ष करते हैं।

(१३१ ) एकत्वयुक्तमेकस्य श्रुतिसंयोगात् ॥१३॥ १० क्र०-(एकत्व युक्त) ग्रह आदि सम्मान होने का (एकस्य) एक बार ही (श्रुति संयोगात् ) एक वचन श्रुति से 'सम्मार्जन' सम्बन्ध मिलता है। सं0-इसका समाधान करते हैं। सर्वेषां वा लक्षणत्वादविशिष्ट हि लक्षणम्॥ 40 क्र--(वा) पूर्व पक्ष के परिहारार्थ आया है (सर्वेषां) सब अह आदि द्रव्यों का सम्मार्जन (लक्षणत्वात्) एक बचन के लक्षण का उपन्यास जैसे "ग्रहं सम्म, इत्यादि में महत्व जाति के अभिप्राय से। (हि) निश्चय और (लक्षण) उस जाति (अवि- शिष्ट) सबा ग्रह आदि में तुल्य हैं। सं०--'पशुमालभेत' यह उदाहरण क्यों है। चोदिते तु परार्थत्वाद्यश्रुति प्रतोयेत ॥१५॥ तु) विषय दृष्टान्त का द्योतक है (चोदिते) याग में विधान के अनुसार दिये पशु में (यथाश्रुति) जिस संख्या का श्रवण है उसका (प्रतीयेत) ग्रहण होना ठीक है, कारण कि (परार्थत्वात् ) वह पशु आलम्म हेतु से गौण है। सं०-- सम्मान ग्रहों का ही धर्म है चमसों का नहीं इसे कहते हैं। संस्काराद्वा गुणानामव्यवस्था स्यात् ॥१६॥ प० ऋ०--(षा) शब्द पूर्व पक्ष को बतलाता है (गुणानां ) गुण भूत सम्मान आदि का (अव्यवस्था, स्यात् ) ग्रह धर्म ही है प०० भारती कमांक विभाग पक्र0 शा न कि चालों का क्योंकि ( संस्कारात्) वह संस्कार कर्म है। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान यह है। व्यवस्था वाऽर्थस्यश्रुतिसंयोगात् तस्य शब्द- प्रमाणत्वात् ॥१७॥ (वा) पूर्व पक्ष के निराश के लिये है (व्यवस्था) प्रहमार्जन ही धर्म है न कि चमस का क्योंकि (अर्थस्य ) ग्रहों का ( श्रुतिसंयोगात् ) ग्रहं इस द्वितीयान्त पद श्रुति से सम्मार्जन के साथ धर्म धय भाव योग है तथा (तस्य ) उसका (शब्द- (प्रमाणत्वात् ) शब्द प्रमाण से वर्जनीय नहीं। सं0- सप्तदशा रत्निता' को 'वाजपेय' यज्ञ में यशु याग सम्बन्धी यूप को निरूपण करते हैं। आनर्थक्याचदंगेषु ॥१८॥ प० क्र०- तदङ्गष) 'सप्तदशा रत्नि' यह वाक्य वाजपेय यज्ञ के अंग भूत पशु याग सम्बन्धी पयू में होने से (आनर्थक्कात् ) वाजपेय याग में यूप के न होने से कारण धर्मी का लाभ न होने से निरर्थक होती है। संo अब अभिक्रमण' आदि 'प्रयाज मात्र का धर्म कहते हैं अतः यह पूर्व पक्ष है कि :- कत गुणे तु कर्मासमवायाद्वाक्यभेदः स्याच ॥ प० 0-[तु] पद पूर्व पक्ष द्योतक है [ वाक्य भेदः ] इस वाक्य में कि 'अमिक्रामं जुहोति' वाक्य भेद [स्यात् ] होना ठीक है क्योंकि [कर्तृ गुणे] कर्ता के गुण अमिक्रमण का [कर्मा- ESTAN क ( १३३ ) समवायात् ] 'जुहोति' क्रिया से सम्बन्ध नहीं। सं०-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। साकांत्वेकवाक्यं स्यादसमाप्तं हि पूर्वेण ॥२०॥ प० क्र0-[तु] शब्द पूर्व पक्ष के निराकरणार्थ आया है ( एक- वाक्यं] अभिक्राम गुहोति यह एक पद वाक्य है [हि] निश्चय पूर्वक [साकांक्षं] विभाग करने से दोनों पद साकांक्ष बन जाते हैं और [पूर्वण] केवल [अभिक्राम] पद से [ असमाप्त ] वाक्य पूरा नहीं होता। सं-'उपवीत' को 'प्राकरणिक सर्व कर्म का अंग बतलाते है। सन्दिग्धे तु व्यवायाद्वाक्यभेदः स्यात् ॥२१॥ ५० क्र०-'तु' शब्द 'लामधेनी' की अंगता के खण्डनार्थ पाया है। [सन्दिग्धे] उपबीत सामधेनी का अङ्ग है अथवा सब यर्मों का [वाक्यभेदः] इस सन्देह को हटाने के लिये उपवीत वाक्य सामधेनी प्रकरण भेद से [ स्यात् ) जाना जाता है कारण कि ( व्यवायात) बीच में निवित' नामक मन्त्रों का अन्तर है। सं०-अब निवित नामक मन्त्र सामधेनी का अङ्ग होने के भीतर प्रकरण के विच्छेदक नहीं इसका समाधान करते है। गुणानां च परार्थत्वादसम्बन्धः समत्वात्स्यात् ।। प० क्र०-(च) तथा। (गुणानां) एवं निविद् मंत्र। (परार्थ- त्वात् ) यज्ञ अग्नि तथा ईश्वर स्तुति पदक हैं। (समत्वात् ) क्योंकि वे सममाव हैं। (असम्बन्धः स्यात् ) उनका अङ्गागी भाव नहीं है। सं०-वानी तथा वृधन्वती नामक चार मन्त्रों को आज्य भाग ७ भारती क्रमांक वभाग का अङ्ग होना कहते है। मिथश्चानर्थसम्बन्धात् ॥२३॥ ५० क्र0-(च) और । (मिथः) वात्रधनी' और 'वृधन्वती का दर्शपूर्णमास नामक यज्ञ से सम्बन्ध नहीं, क्योंकि (अनर्थ (सम्बन्धात् ) वह व्यर्थ है। सं०-हस्त अवनेजन' अर्थात् हाथ धोने आदि को प्रकरण में होने वाले समस्त कर्म का अङ्ग कहते हैं। अानन्तर्यमचोदना ॥२४॥ १० ऋ०-(धानन्तर्यम) विना उपदेश पाठ। अचोदना) अङ्गागी भाव सम्बन्ध का समर्थक नहीं। सं०-उक्त सूत्र से निश्चित अर्थ में युक्त देते हैं। वाक्यानांच समाप्तत्त्वात् ॥२५॥ प० क्र--(च) और ( वाक्यानां ) उद्धरित गक्यों का सम्बन्ध नहीं क्योंकि ( समाप्तत्वात् ) अपने-अपने पद समूह से अर्थ को बतलाने से ही आकांक्षा हीन है। सं0- "चतुर्धाकरण' अर्थात् चार याग करने को ' आग्नेय" पुरोडाश मात्र का धर्म है। शेषस्तु गुणसंयुक्तः साधारणः प्रतीयेत मिथ- स्तेषामसम्बन्धात् ॥२६॥ ५० ऋ०-(तु) शब्द पूर्व पक्ष का बोधक है । (गुण संयुक्तः) आनेय सम्बन्धी । (शेषः) चार भाग करण । (सर्वसाधारणः) m ( १३४ ) ल्लक्षणार्था सर्व पुरोडाशं धर्म में। (शेषः) अङ्ग । (प्रतीयते) है क्योंकि (तेषां) अग्नि और चार भाग का । (मिथः) पारस्परिक । (असम्बन्धात्) सम्बन्धी नहीं (प्रत्युत) उसका पुरोडाश और चार भाग करण का सम्बन्ध है। सं०-इसका समाधान करते हैं। व्यवस्था वाऽर्थसंयोगाल्लिङ्गस्यार्थेन सम्बन्धा- गुणश्रुतिः ॥२७॥ प० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष निवृत्यर्थ प्रयोग किया गया है। (व्य- वस्था) चतुर्भाग करण आग्नेय पुरोडाश धर्म ही है क्योंकि । (लिंङ्गस्य ) अग्निदेव का । (अर्थेन) पुरोडाश से। (सम्बन्धात्) सम्बन्ध होने से। ( अर्थसंयोगात् ) चतुर्माग करण का आनेय पुरोडाश से योग पाया जाता है और (गुण श्रुतिः) पुरोडाश के माथ अग्निदेव का वह सम्बन्ध । (लक्षणार्थी) पुरोडाशान्तर से से भिन्न करणार्थ है। इति श्री भीमांसा दर्शने तृतीयोध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः। अथ तृतीयाध्याये द्वितीयः पादः प्रारभ्यते । अर्थाभिधानसामर्थ्यान्मन्तं पुशेषभावः स्यात्त- स्मादुत्पत्तिसम्बन्धोऽर्थेन नित्यसंयोगात् ॥१॥ ५० क्र०-(अर्थाभिधान सामर्थ्यात् ) जिस अर्थ के प्रकट करने का बल मन्त्र में है उसके प्रति ( मत्रेषु ) मन्त्रों में (शेष भावः) शेषता ( स्यात् ) होती है। [तस्मात् ] परन्तु [अर्थन] अर्थ মানী। विभाग MAMATA Anity के साथ। उत्पत्तिः सम्बन्धः ] शक्ति वृत्ति रूप मन्त्रस्थ पद साथ पदों का नित्य सम्बन्ध है सं0- अब अविहित कर्म में मन्त्रों के विनियोग का निषेध निरू- पए करते हैं। संस्कारकत्वादचोदितेन स्यात् ॥२॥ 40 क-(अचोदित) अविहित कर्म में (न स्यात् ) मन्त्र विनि- योग नहीं होना चाहिये क्योकि [ संस्कारकत्वात् ] वह विहित कर्म के ही संस्कार करने वाले हैं। सं० 'गार्हपत्य अग्नि के उपस्थान में इन्द्र रूप प्रकाशक मन्त्रों का निरूपण करते हैं। वचनात्त्वयाथार्थमैन्द्री स्थात् ॥३॥ प० ऋ०-तु' लिंग सम्बन्धी विनियोग की व्यावृत्ति के निमिन्त' प्रयोग है [ ऐन्द्री] इन्द्ररूप ईश्वर के वसलाने वाले मन्त्र का [अयथार्थ ] लिंग से विनियोग नहीं हो सकता किन्तु (वचनात् । बाक्य विशेष से ( स्यात् ) होता है। सं०-इन्द्र पद से तो ईश्वर का श्रभिधान पाया जाता है न कि गार्हपत्य अग्नि का अतः उस मन्त्र का गाहपत्य अग्नि के उप- स्थान में विनियोग नहीं हो सकता इसका उत्तर देते है। गुणाद्वाऽप्यभिधानं स्यात्सम्बन्धस्याशास्त्रहेतु- a त्वात् ॥४॥ ५० --(का अपि) शंका को दूर करने के लिये प्रयोग है। (गुणात् ) गुण सम्बन्ध से ( अभिधान ) इन्द्र शब्द से गार्ह- (१३) पत्य अग्नि का अभिधान ( स्यात् ) हो सकता है क्योंकि (सम्ब- न्धस्य ) पद पदार्थ के सम्बन्ध का ( अशास्त्र) हेतुत्वात् वह वाक्य रुकावट उत्पन्न करनेवाला नहीं। सं-आह्वान् विनियोग कथन में पूर्व पक्ष करते हैं। तथाहानमपि चेत् ॥॥ प० ०-(तथा) 'निवेशनः संगमनो वसूनाम् मन्त्र गार्हपत्यर्थ है तथैव (आह्वान ) हविष्कृत ! ऐहि इति विरवध्नान्नाकृयति' मन्त्र ( अपि ) मी अवहननादि के लिये है (चेत्) यदि (इति) ऐसा कहो तो ठीक नहीं। सं0-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। न कालविधिश्चोदितत्वात् ॥६॥ प० ० -( काल विधिः) अवघ्नन' पद अवहनन क्रिया का बतलाने वाला काल का विधान करने वाला है न कि अवहनन क्रिया का क्योंकि (चोदित्वात् ) वह ब्रीहीन वहन्ति' वाक्य से पूर्व ही विहित है अतः ( न ) उस वचन वल से 'ऐहि' मन्त्र का 'अविहित' अवहनन क्रिया में विनियोग मानना समीचीन सं... ऐहि' मन्त्र आह्वान बोधक नहीं किन्तु गुण वृत्ति से अघ- हनन का द्योतक है अतः वह उसी में विनियोग होना समीचीन है न कि आह्वान क्रिया में। गुणाभावात् ॥७॥ १० ऋ०-( गुणा मावात् ) गुण सम्बन्ध न पाये जाने से 'ऐहि' मन्त्र अवहनन का प्रकाशक नहीं हो सकता। प भारती कमांक বলা संहिषि पद का अर्थ "यजमान पत्नी है न कि अवहनन इसकी यह पहचान है। लिङ्गाच्च ॥८॥ 40 o-(च) और (लिङ्गात ) चिन्ह पाये जाने से अवहनन 'हविष्कृत' पद का अर्थ भी नहीं है। सं०-'अवन्नन पद को अवहनन रूप कर्म का विधानकर्ता मान लेने में दोष दिखलाते हैं। विधिकोपश्चोपदेशे स्यात् ॥९॥ प० क्र--(च) तथा । (उपदेशे) अवधनन पद से उस कर्म की विधि माने तब । (विधिकोपः) लक्षण अर्थ में विधान किया हुआ 'शत' प्रत्यय अनुपपन्न ( स्यात् ) होता है। सं0- अग्नि विहरण' आदि के द्योतक मन्त्रों का अग्नि विहरण आदि में विनियोग निरूपण करते हैं। तथोत्थान विसर्जने ॥१०॥ ५० ऋ०-(तथा ) जिस भांति अवघ्नन पद अवहनन काल का ज्ञापक है उसी प्रकार (उत्थान विसर्जन) "उत्तिष्ठन्नन्वाह" में उत्तिष्ठन् तथा निसृजति ‘पद भी उत्थान काल तथा विस- जन काल के बोधक हैं। सं०-अब 'सूक्त वाक' का प्रस्तर प्रहरण में विनियोग किये जाने का पूर्व पक्ष करते हैं। सूक्तवाके च कालविधिः परार्थत्वात् ॥११॥ प० -(च) और (सूक्त वाके ) सूतस्थ वाक्य में भी (काल (१३९) ܒ विधिः) काल विधान ही मानना चाहिये कारण कि (परार्थ-- स्वात् ) परार्थ होने से सूक्त वाक्य का प्रस्तर के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। सं०--अब पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। उपदेशो वा याज्याशब्दो हि नाकस्मात् ।१२। प० क्र0--(वा) शब्द पूर्व पक्ष के हटाने को प्रयोग किया गया है । (उपदेशः) उपदेश होने से (हि) निश्चय (याज्याशब्दः) वह थाग सम्बन्धी देवता का द्योतक होने से (अकस्मात् ) निमित्त रहित (न) प्रहरण का अङ्ग नहीं। सं०- परार्थ' होने को सूक्तवाक का जो सम्बन्ध नहीं बतलाया उसका यह समाधान है। स देवतार्थस्तत्संयोगात् ॥१३॥ ५० क्र--(स) सूक्तवाक ( देवतार्थ ) देवता निमित्त होने पर भी प्रस्तर का अङ्ग है क्योंकि (तत्संयोगात् ) उसका देवत्ता से प्रस्तर का सम्बन्ध होता है। सं०-"प्रस्तर प्रहरण' में प्रत्तिप्रति ' नामक संस्कार कर्म की आशंका से उस पूर्व अर्थ को संपुष्ट करते हैं। प्रतिपचिरति चेस्विष्टकृद्धदुभयसंस्कारःस्यात् ॥ प० 0-(प्रतिपत्तिः) प्रस्तर प्रहरण प्रतिपत्ति रूप संस्कार कर्म है (चेत् ) यदि (इति) कहो तो असमीचीन है क्योंकि (स्विष्ट- कृद्वतः) स्विष्टकृत कर्म के समान (उभय संस्कार ) दोनों प्रकार के कर्म (स्यातू) हैं सं0--'सूक्त वाक नामक मन्त्रों का अर्थ के अनुकूल विनियोग भारती कमांक वभाग कह कर अब पूर्व पक्षा करते हैं। कृत्स्नोपदेशानुभयत्र सर्ववचनम् ॥१५॥ प० ०( उभयन्न ) दर्श तथा पूर्ण मास यज्ञ में ( सर्व प्रवचन) सूक्त वाक नामक सब मन्त्रों का पाठ करना बतलाया है क्योंकि ( कृत्योपदेशात् ) 'सूक्त गक' नाम के ग्रहण से सब मन्त्रों का प्रहरण के साथ अङ्ग होने से उपदेश मिलता है। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। यथार्थ वा शेषभूतसंस्कारात् ॥१६॥ ५० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष की निवृत्ति के निमित्त है ( यथार्थ) 'सूक्तवाक' नामक मन्त्रों के अर्थ अनुकूल प्रत्येक यज्ञ में प्रस्तर प्रहरण में विभाग के साथ विनियोग होने से (शेष भूत संस्का- रात्) वह यज्ञ के शेष भूत अर्थात् यज्ञ सम्बन्धी देवता का स्मरण दिलाने रूप संस्कार का रूप है। सं०-इस प्रार्थ में शंका करते हैं। वचनादिति चेत् ॥१७॥ प००-(वचनात् ) 'सूक्त वाके न प्रस्तर प्रहरति' इस वाक्य सूक्त वाक नामक सब मन्त्र का प्रत्येक यज्ञ में प्रस्तर प्रहरण में विनियोग होगा ठीक है (चेत्) यदि (इति) ऐसा कहा जाय तो ठीक नहीं। सं०-उक्त शंका का समाधान किया जाता है। प्ररकणाविभागादुभे प्रति कृत्स्नशब्दः ॥१८॥ १० ऋ०-( कृत्स्न शब्दः) सब मन्त्रों के वाचक सूक्त वाक शब्द का ग्रहण ( उभे प्रति ) दर्श तथा पूर्णमास दोनों के अभिप्राय से POONAL ७ Rihindian है क्योंकि (प्रकरण विभागात् ) दोनों एक ही प्रकरण के हैं। काम्य याज्वानु वाक्या नामक मन्त्रों का काम्येष्टि मात्र में विनियोग होना चाहिये उसका निरूपण करते हैं । लिंगक्रमसमाख्यानाकाम्ययुक्तं समाम्रानम् ॥ 40 ---(समाम्नानं) काम्य याज्वानु वाक्य द्वार का (काम्य- युक्तं ) काम्येष्टियों में ही विनियोग होता है न कि शष्टि मात्र में क्योंकि (लिंग क्रम समाख्यानात्) क्रम एवं समाख्या सहित लिंग से ऐसा ही पाया गया है। सं0 आग्नीघ्र आदि मण्डों के उपस्थान में प्रकृत मन्त्रों का विनियोग निरूपण करने को पूर्व पक्ष स्थापित करते हैं। अधिकारे च मन्त्रविधिस्तदाख्येष शिष्टत्वात्।। प० ०-(तु) पूर्व पक्ष का सूचक है । ( अधिकारे) ज्योति-- ष्टोम याग के प्रकरण में । ( मन्त्रविधिः) जो "आग्नीध्र आदि मण्डपों के उपस्थान निमित्त 'आग्नेयी' आदि मन्त्रोपदेश है वह । ( अतदाख्येषु ) अप्रकृत मन्त्रों में क्योंकि । (शिष्टत्वात्) साधारण रूप से किया गया है । सं०-इस पूर्व पक्ष का समाधान यह है । तदाख्योवा प्रकरणोपपत्तिभ्याम् ॥२१॥ १० क्र०-(वा) पूर्व पक्ष के हटाने को पाया है। (लदाख्यः) जिस स्तोत्र अथवा शस्त्र साधन आग्नेय आदि मन्त्र को प्रकरण में पढ़ा गया है उन्हीं का मण्डपोस्थान में विनियोग है न कि अप्रकृत का अतः (प्रकरणोपपत्तिभ्यां) प्रकरण तथा युक्ति ।

বাস कमांक वभार इसमें यह युक्ति है। अनर्थकश्चोपदेशः स्यादसम्बन्धात्फलवता (न पस्थान फलवत्) ॥२२॥ ५० ---(च)और यदि भाग्नीध्र' आदि मण्डप के उपस्थान में अप्रकृत मन्त्रों का विनियोग माना जावे। (उपदेशः) उपदेश विधि । (अनर्थकः) निष्फल ( स्यात् ) हो जाती है क्योंकि । ( फलवता) फलित ज्योतिष्टोम के साथ। ( असम्बन्धात्) असम्बन्ध होने से। ( उपस्थाने) जिस उपस्थान से सम्बन्ध है. वह (फलवत् ) फलदायक (नहि ) नहीं है। सं०-'आग्नेय ऐन्द्र' तथा वैष्णव मन्त्र पढ़े जाने से उनका स्तोत्र और शस्त्र आदि क्रिया में पूर्व ही कि वियोग होने से फिर उप- स्थान विधान करके कर्मान्तर विनियोग नहीं मानना चाहिये क्यों कि एक वार विनियोग हुए का पुनः विनियोग नहीं हो सकता। इसका समाधान करते हैं। सर्वेषां चोपदिष्टत्वात् ॥२३॥ -(सर्वेर्षा) सब मन्त्रों का ( उपदिष्ट त्वात् ) वाचः स्तोम याग में विनियोग का उपदेश है (च) अतः विनियोग किये का पुनः विनियोग करना दोष नहीं। सं०-'सोम मक्षण से बतलाने वाले मन्त्रों को 'ग्रहण' आदि विनियोग निरूपण करने को पूर्व पक्ष करते हैं। लिंगसमाख्यानाभ्यां भक्षर्थताऽनुवाकस्य ॥२४॥ ५० ऋ०-( अनुवाकस्य ) अनुवाक का ( मक्षार्थता) भक्षण में हो प्रयोग होने में विनियोग है क्योंकि (लिंग समाख्यताभ्यां) प०क्र .

He
पक्र
(१४३)
लिंग तथा समाख्या से ऐसा ही मिलता है।
सं०--इसका समाधान करते हैं।
तस्य रूपोपदेशाभ्यामयकर्षोऽर्थस्यचोदित-
स्वात् ॥२५॥
तस्य) भन्नानुवाक सम्बन्धी (अपकर्षः) भक्षण
वाक्य से भिन्न ग्रहण आदि में विनियोग क्योंकि ( रूपोप देशा-
भ्यां ) उनसे रूप ग्रहण आदि विधान होने से ( अर्थस्य ) ग्रहण
आदि का (चोदित्वात् ) वह यह लक्षण विधि से ही प्रेरित
अथवा अर्थ वाला है।
सं --उक्त बाक्य में तृप्ति और भक्षण के द्योतक में "द आदि
मन्त्रों का मक्षण मान में विनियोग होना चाहिये।
गुणाभिधानान्मन्द्रादिरेकमन्त्रः स्यानयोरेकार्थ.
संयागात् ॥२६॥
५० 0-(मन्द्रादि ) 'यन्द्र' मन्त्र ( एक मन्त्रः) सम्पूर्ण मन्त्र
( स्यात् ) भक्षण के लिङ्ग हैं न कि तृप्ति के मी (गुणा मिधा-
नात् ) तृप्ति का गुण रूप कथन (तयोः) मन्त्र में तृप्ति और
अक्षण दोनों के द्योतक मागों का ( एकार्थ संयोगात् ) भक्षण रूप
अर्थ में ही मुख्य योग्य है।
संग-शेष सोम रस के भक्षण में विनियुक्त मन्त्र का शेष सब
सोमों के भक्षण में विनियोग करते हैं।
लिङ्ग विशेषनिर्देशात्समानविधानेष्वरेन्द्रा-
पाममन्त्रत्वम् ॥२७॥

घ0 -( समान नियानुष) शेष सोम रस युक्त ग्रहों के भक्षण का समान विधान (अनेन्द्राणां) जो 'ऐन्द्रा ईश्वर निमित्त प्रदन्त उसका भक्षण (अमन्त्रत्व) मन्त्र का विनियोग नहीं क्योंकि (लिङ्ग विशेष निर्देशात् ) उसमें इन्द्र पीत शेषत्व, अभि- धापक सामर्थ्य रूप लिङ्ग विशेष का कथन मिलता है। सं0-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। यथादेवतं वा तत्प्रकृतित्वं हि वर्शयति ॥२८॥ ५० ऋ०-(वा) अथवा (यथा देवतं ) जिस गुण रूप देवता की प्रधान स्वीकार कर ईश्वरोद्देश्य से ग्रहों द्वारा सोमरस हवन किया जाता है उस-उस देवता अनुसार 'श्रहा' से अनैन्द्र ग्रहों के भक्षण में भी वही मन्त्र विनियोग होना चाहिये (हि) निश्चय क्योकि (तत्प्रकृतित्वं) इन्द्र तथा अनेन्द्र प्रदानों का परस्पर प्रकृकि तथा विकृति भाव ( दर्शयति) शास्त्र से पाया जाता है। -अब पुनरभ्युन्नीत सोम शेष के भक्षण विषय में निरूपण सं०- पुनरभ्युन्नीतेषु सर्वेषामुपलक्षणं द्विशेषत्वात् ॥ ५००-(पुनरभ्युन्नीतेष) ग्रहों में फिर से डाला हुश्रा सोमरस उसके भक्षण काल में। (सर्वेषां ) इन्द्र तथा मैत्रा वरुण सब। ( उपलक्षणं ) अहा करनी होगी क्योंकि । (द्विशेषत्वात् ) बह सोम रस का भक्षण करने योग्य शेष है। सं०-पूर्वपक्ष का निरूपण करते हैं। अपनयाद्वा पूर्वस्याऽनुपलक्षणम् ॥३०॥ ५० ऋ०-(वा). पूर्व पक्ष द्योतक है । (पूर्वस्य ) जिसके लिये (१४५ ) पहिले हवन किया गया। (अनुपलक्षणे) मक्ष मन्त्र में अहा नहीं होनी चाहिये। क्योंकि ( अपनयात् ) भक्षण करने योग्य शेष के साथ उसका सम्बन्ध नहीं रहता। संo.--पूर्वपक्ष का समाधान किया जाता है । ग्रहणाद्वाऽपनयः स्यात् ॥३॥ १० ऋ०-(वा) पूर्वपक्ष के हटाने को प्रयोग किया गया है। (अनपनयः) इन्द्र-सम्बन्ध-विच्छेन न होने से ( स्यात) हो सकता है क्योंकि (अहसात् ) ग्रहण पाया जाता है। सं०. पारनीवत' पात्रस्थ होमविशेष के भक्ष में पानीवान श्राग्निरूप ईश्वर देवता के साथ इन्द्र वायु आदि की अहा न करना निरूपण करते हैं। पालीवते तु पूर्ववत् ॥३२॥ 40 0-(तु) पूर्व भक्ष का द्योतक है (पानीवते) पानीवत ग्रह में बचा होम शेष खाने के समय भक्ष मन्त्र में [पूर्ववत् ] पूर्व की भांति अहा कर लेनी चाहिये। सं0- पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। ग्रहणाद्वाऽपनीतं स्यात् ॥३३॥ प००--(बा) पूर्वपक्ष द्योतक है (उपानीतः) पानीवत् पात्र के शेष में इन्द्र वायु आदि के सम्बन्ध विच्छेद (स्यात् ) होता है (ग्रहणात् ) उसमें आग्रयण स्थाली से सम्बन्ध हीन लाने का प्रहण हुआ। सं०-पानी बान शेष के मक्ष मन्त्र में त्वष्टा' रूप ईश्वर की "अनूहा करने को पूर्व पक्ष करते हैं। , भारत कमांक वेभार भा CALE त्वष्ठार तूपलक्षयेत्पानात ॥३४॥ पा० ऋ०----(तू) पूर्व पक्ष द्योतक है ( त्वष्ठारं ) त्वष्टानामक पर- मात्मा की ( उपलक्षयेत् ) पानीवत शेष--भक्षण की अहा होनी ठीक हैं क्योंकि (पानात् ) सोम ग्रहण करना सुना जाता है। सं०---पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। अतुल्यत्वात्तु नैवं स्यात् ॥३५॥ पक्र०-(तु) पूर्व पक्ष के हटाने को प्रयोग है (एवं ) इसी प्रकार पत्नी के साथ त्वष्ठा की अहा (न) नहीं ( स्यात) हो सकती क्योंकि सोम के स्वीकार में दोनों का सम्बन्ध एक सा नहीं होता। त्रिंशच परार्थत्वात् ॥३६॥ १००- --(च) तथा (त्रिशत) ये तीस देवताओं की अहा नहीं हो सकती क्योंकि ( परार्थत्वात् ) वह गौण होने से। वषट्कारश्च कतृवत् ॥३७॥ प० ऋ०-(च) और ( कर्तृवत ) होता, अध्वर्यु आदि की यश मन्त्र में प्राप्त नहीं होती उसी प्रकार (वष्टाकार ) अनुवष्टाकार के देवता अग्नि की मी प्राप्ति नहीं हो सकती। सं०-सत्ताइसवें सूत्र में पूर्व पक्ष का निराकरण करते हैं। छन्दः प्रतिषेधस्तु सर्वगामीत्वात् ॥३८॥ ५० क्र.-(तु) पूर्व पक्ष के लिये आया है। (छन्दः प्रतिषेधः) जगती छन्द के निषेध पूर्वक अनुष्ठव छन्द की अहा का विधान 'ऐन्द्र' तथा 'अनन्द्र' प्रदानों के प्रकृति तथा विकृति भाव में CRETARY PAN HEL PALI प्रमाण नहीं क्योंकि। (सर्वगामीत्वात् ) ज्योतिष्टोम याग एक होने से सोम और सोम के अन्य धर्म का सातथा सब दानों में एकसा है। संक-ऐन्द्राग्न शेष भक्षण को अमन्त्रक कथन करते हैं। ऐन्द्राग्ने तु लिंगभावात्स्यात् ॥३९॥ 40 -(तु) शब्द पूर्वपक्ष के लिए आया है। (एन्द्राग्ने) ऐन्द्राग्न' नामक ग्रह-शेष के भक्षण में। (स्यात् ) भक्ष मन्त्र विनियोग है कारण कि (लिङ्गभावात् ) उनका विनियोजक लिङ्ग विद्यमान है। सं -इस पक्ष का समाधान करते हैं। एकस्मिन्वा देवतान्तराद्विभागवत् ॥४॥ ५० ऋ०-(वा) पूर्वपक्ष परिहार के लिये आया है। (विभाग- वत् ) चार भाग करने। ( एकस्मिन् ) एक सोम मक्षण में ही होता है । ( देवतान्तरात् ) इन्द्र से 'इन्द्राग्नी' देवता भिन्न हैं। सं०-अनेक छन्द वाले ऐन्द्र शेष' के भक्षण में उस भक्ष मन्त्र का विनियोग निरूपण करते हैं। छन्दश्च देवतावत् ॥४१॥ प० ऋ०-(च) शब्द । (तु शब्द के अर्थ में पूर्वपक्ष का द्योतक है। ( देवतावत् ) इन्द्र देवता के निमित्त प्रदत्त सोम भक्षण करने योग्य शेष में यक्ष मन्त्र का प्रयोग है उसी प्रकार । (छन्दः) एक गायत्री छन्द वाले सोम भक्ष्य शेष में उसो मन्त्र का विनि- योग होना ठीक है। सं० -इसका समाधान करते हैं वेभार (१४८) सर्वेषु वाऽभावादेकच्छन्दसः ॥४२॥ 4e pa-(वा) पूर्व पक्ष के परिहार के लिये है (सर्वेषु) अनेक छन्द वाले एक ऐन्द्र भक्षण में विनियोग नहीं होते क्योंकि (अमावात् एक छन्द सः) कोई ऐन्द्र सोम एक छन्द वाला होता ही नहीं। ---इसका समाधान यह है। सर्वेषां वैकमंत्र्यमैतिशायनस्य भक्तिपानत्वा- सवनाधिकारो हि ॥४॥ ५००-'तु' पूर्व पक्ष परिहारार्थ है ( सर्वेषां) इन्द्र, अनेन्द्र सब शेष भक्षण में ( एक मन्त्र्यं) एक ही भक्ष मन्त्र का विनियोग है (हि.) कारण कि ( भक्ति पान स्वात् ) 'दा' धातु के अर्थ में 'या' धातु प्रयोग करके बहुव्रीहि समास द्वारा लक्षणावृत्ति के आश्रय से ( सत्वनाधिकारः) 'सवन' अर्थ किया है यह (ऐति- शायनस्य ) महर्षि ऐतिशायन मानते हैं। इति मीमांसा भाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ।। अथ तृतीयाध्याये तृतीयः पादः प्रारभ्यते । -अब ऋग्वेदादिका धर्म निरूपण करते हैं। श्रुतेर्जाताधिकारः स्यात् ॥१॥ ५० ऋ०- जानाधिकारः] धर्म विशेष काले मन्त्रों का 'ऊचैस्तव आदि धर्म [स्यात् है क्योंकि [श्रुतेः] उनके विधान करने वाले -उच्चैऋचा' आदि वाक्यों में मन्त्र पाचक 'ऋचा' आदि SpeatICE MERIES ( १४६) शब्दों का उपदेश पाया जाता है सं०-इसका समाधान करते हैं। वेदो वा प्रायदर्शनात् ॥२॥ प० - [बा] पूर्व पक्ष परिहारार्थ है [ वेदः] ऋग्वेद के बाचक हैं क्योंकि [प्रायदर्शनात् ] वेदों के उपक्रम से पदों का प्रयोग हुआ है। सं०-उतार्थ साधक लिङ्ग निरूपण करते हैं लिङ्गाच्च ॥३॥ प००-[च तथा [लिङ्गात् ] उसका चिन्ह मिलने से भी उस अर्थ की प्रामाणिकता है। सं०-इसमें हेतु देते हैं। धर्मोपदेशाच्च न हि द्रव्येण सम्बन्धः॥४॥ १० ऋ०-[च] और (धर्मोपदेशात् ] साम का उच्चस्त्व कथन से सिद्धि है [हि ] क्योंकि [द्रव्येण ] साम के साथ [सम्बन्धः] उच्चैस्त्व धर्म सम्बन्ध [न] ऋगादि पदों का वेदार्थ माने बिना नहीं हो सकता। सं०--इसमें हेतु देते हैं। त्रयीविद्याख्या च तद्विदि ॥५॥ प0 0-[च] और [तद्विदिः] तीनों वेद के जानने वालों में [त्रयी विद्याख्या ] त्रयी विद्या नाम प्रवृत्ति से भी यही सिद्ध ख-इस में अाशंका करते हैं।

पारतं कमांक वमा पकoniseos TION HA (१५०) व्यतिक्रमे यथाश्रुतीति चेत् ॥६॥ [व्यतिक्रमे ] ऋचा का यजुर्वेद में तथा यजु का ऋग्वेद में पाठ होने पर [ यथा श्रुति ] श्रुन्त उच्चैरत्व आदि धर्म लाम से भी उन शब्दों को वेद वाची मानना ठीक नहीं [चेत् ] यदि [ इति] ऐसा कहो ठीक नहीं सं०-इस आशंका का यह समाधान है। न सस्मिन्निवेशात् ॥७॥ प० ऋ०-न] ऋचा पाठ के व्यति क्रम से उसके धर्म का व्यति क्रम हो जाने में दोष नहीं क्योंकि वह [ सर्वस्मिन ] दोनों ऋग और यजुर्वेद में [निवेशात् ] मिले रहने से माना गया है। सं०-उतार्थ को सम्पुष्ट करते हैं। वेदसंयोगान्न प्रकरणेनबाध्येत ॥७॥ [ वेद संयोगात् ] वेद सम्बन्ध से 'उच्चस्त्व' श्रादि कार्यों का नियम है उसका [प्रकरणेन] प्रकरण से भी [न बाध्यते] हानि नही होती। सं०--- अग्न्याधान' कर्म के साम का उपांशु गान निरूपण करते हैं। गुण मुख्यव्यतिक्रमे तदर्थत्त्वान्मुख्येन वेद- संयोगः ॥९॥ १० - [गुण मुख्य प्रतिक्रमे ] गुण एवं मुख्य में वेद के धर्म उच्चैस्त्व आदि सम्बन्ध की आशंका पर (मुख्येन) गुण पूर्व मुख्य में ही ( वेद संयोगः) वेद धर्म का सम्बन्ध होता है PASSEM प० क्र0

क्योंकि (तदर्थत्वात् ) गुण एवं धर्म सब मुख्य के हेतुक हैं न
कि गुण के।
सं-ज्योतिष्टोम याग याजुर्वेदिक है उसका उपांशु अनुष्ठान
कथन करते हैं।
भूयस्तवेनोभयश्रुति ॥१०॥
५० 0-(उभय श्रुति ) दो वेदों में सुने हुए कर्म का प्रधान रूप
से विधान । (भूयस्त्वेन ) अङ्गों की अधिकता से निर्णय किया
जाता है।
सं०-यत् , श्रुति, लिङ्ग, और बाक्य तीनों विनियोजक बतलाये थे
अत. प्रकरण की विनियोजकता कथन करते हैं।
असंयुक्त प्रकरणादिकत व्यताथित्वात् ॥११॥
५० क्र --( असंयुक्तं ) श्रुति, लिंग, तथा वाक्य का जिस का
विनियोग नहीं हो उसका । ( प्रकरणात् ) प्रकरण से विनियोग
समझना चाहिये क्योंकि । ( इति कर्त्तव्यतार्थित्वात् ) प्रधान में
अङ्ग के विनियोग की आकांक्षा होती है।
सं०-क्रम योग से विनियोग निरूपण करते हैं।
क्रमश्च देशसामान्यात् ॥१२॥
५० क्र0--(च) और (क्रमः) अनुमन्त्रण मन्त्र तथा उपांशु याग
के अङ्गागी भाव का बोधक स्थल है क्योंकि (देश-सामान्यात्)
दोनों का एक ही स्थान है।
सं०-अब समाख्या का विनियोग निरूपण करते हैं।
आख्या चैवं तदर्थत्वात् ॥१३॥

Pain १० ---() तथा एवं क्रमानुसार ( आख्या ) समाख्या मी विनियोजक समझनी चाहिये क्योंकि (तदर्थत्वात् ) उसके कता कियां का योग मिलता है। सं०-श्रुति प्रमाण एक स्थान पर एकत्रित होने पर किसके अनु- सार विनियोग होना ठीक है इसके बलाबल का विचार करते हैं। श्रुति-लिंग-वाक्य-प्रकरण स्थान-समाख्यानां समवाये पारदोर्वल्यमविप्रकर्षात् ॥१४॥ ५० ---( श्रुति लिङ्ग वाक्य प्रकरण स्थानादि ) अति लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या इन छः ( समवाये ) श्रुति, लिंगे लिंग वाक्या प्रकरण, प्रकरण, क्रम और समाख्या इन दो २ मांति के प्रमाणों के एक स्थान में न जाने से ( पारदौर्बल्य) पूर्व प्रबल और उत्तर निर्बल होता है कारण कि । अर्थ विप्र कर्षाम ) पूर्व की अपेक्षा उत्तर से ठहर कर विनियोग होता है। सं०-वारह उपसद् संज्ञक होम का निरूपण करते हैं। अहीनो वा प्रकरणाद्गौणः ॥१५॥ -(वा) पूर्व पक्ष के लिये प्रयोग है। (अहीनः) श्रहीन- याग। ( गौणः) ज्योतिष्टोम याग की गौण संज्ञा है कारण कि ( प्रकरणात् ) प्रकरण में उसका पाठ है। सं-इस पक्ष का समाधान करते हैं। असंयोगात्त मुख्यस्य तस्मादपकृष्येत ॥१६॥ ५० ऋ०-तुर संबद्ध पूर्व पत्र के निराश करने को आया है ( तस्मात् ) ज्योतिष्टोम यारा से कई दिन में पूर्ण होने बाला अहीन' संज्ञक यागान्तर मैं (अपकृष्येत) द्वादश 'उपसद' दोनों प०क्र० ७ . पक्र0 का अपकर्ष सम्बन्ध होना ठीक है क्योंकि (मुख्यस्था) मुख्य वृत्ति द्वारा नहीच' शब्द (संयोगात् ) उसका बाच्छा बाचक भाव ज्योतिष्टोम के साथ नहीं होता। सं0---अब 'कुलाय' आदि स झक यागों में प्रतिपत् । संज्ञक मन्त्रों का उत्कर्ष निरूपण करते हैं। द्वित्वबहुत्वयुक्त वा चोदनातस्य ॥१७॥ ---(बा) पूर्वपक्ष का द्योतक है। द्वित्वबहुत्व युक्त) दो अथवा अधिक यजमान वाचक द्विवचन और बहुवचनान्तपद मन्त्रों का ज्योतिष्टोम से पृथक कर 'कुलाय आदि यज्ञ में नियो- जित करना ठीक है क्योंकि (तस्य ) ज्योतिष्टोम में दो अथवा बहुत यजमान की ( अचोदनात् ) प्रेरणा अथवा विधि नहीं बत- लाई गई है। संक-इसमें पूर्व पक्ष करते है। पक्षणार्थकृतस्येति चेत् ॥१८॥ प०0--(पक्षण ) यजमान की असमर्थता से ज्योतिष्टोम में भी (अर्थ कृतस्य ) अर्थ से एक अथवा दो यजमान होना सम्भव है ( चेत् ) यदि (इति) कथन ठीक नहीं। सं0-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। नप्रकृतेरेकसंयोगात् ॥१॥ प० ऋ०-(न) यह कथन ठीक नहीं क्योंकि । (प्रकृतेः) ज्योति- ष्टोम यज्ञ में । ( एक संयोगात्) एक ही यजमान का विधान है। सं-अव 'जाधनी' पशुयाग में 'उत्कर्ष निरूपण करते हैं। जावनी चैकदेशत्वात् ॥२०॥ ।

मांव visnage HARI PS MARRRRE ५०-(च) तथा (जाघनी) जावनी का पशुयज्ञ में उत्कर्ष होने से मी (एकदेशत्वात् ) उक पशु (एकदेश) अङ्ग है। सं०-पत्नी संयाज में पूर्व पक्ष करते हैं। चोदना वा अपूर्ववाद ॥२१॥ एकदेश इति चेत् ॥२२॥ ५० क्र0-(वा) पूर्वपक्ष का द्योतक है। (चोदना) उस वाक्य में "पत्नी संयाज' के अङ्ग रूप से 'जावनी' का विधान है क्यों कि (अपूर्वत्वात् ) ऐसा करने से अपूर्व अर्थ लाभ होता है और ( एकदेशः) पशु हिंसा करने से उसके अङ्ग जाधनी की प्राप्ति । (चेत्) यदि ( इति ) ऐसा कहा जावे तो असम्भव है। सं0-इस हिंसा करने का समाधान करते हैं कि क्या है ! नप्रकृतेरशास्त्रनिष्पत्तः ॥२३॥ ५० क्र0---(न) यह कथन ठीक नहीं क्योंकि । (प्रकृतेः) प्रकृत याग में जाघनी का पाना मानने से । ( अशास्त्र निष्पत्तेः) सर्व शास्त्र में निसिद्ध बतलाई हिंसा करनी पड़ती है। सं०-'सन्तर्दन' का ज्योतिष्टोम याग की संस्था भूत “ उकथ्य" आदि यागों में उत्कर्ष निरूपण करने को पूर्व पक्ष करता हूँ। सन्तर्दनं प्रकृती क्रयणवदनर्थलोपात्स्यात्।२४॥ प० क्र0-- ( सन्तर्दनं ) सन्तर्दन का (प्रकृती) अग्निष्टोम में (स्यात् ) मिला हुआ (पैठ ) है क्योंकि ( अनर्थलोपात् ) ऐसा मानने से वाक्यार्थ का लोप नहीं होता और (क्रयणवत्) सोम मोल लेने के साधन स्वर्ण तथा गौ आदि के समान उसका विधान सम्भव है। SH ।

सं०-इस पूर्वपक्ष का समाधान यह है उत्कर्षो वा ग्रहणाद्विशेषस्य ॥२५॥ 40 O---(वा) पूर्वपक्ष का खण्डन करता है ( उत्कर्षः ) 'अग्नि- ष्टोम प्रकृति में सन्तर्दन का उत्कर्ष माना है क्योंकि (विशेषस्य) उम वाक्य में ज्योतिष्टोम का दीर्घ सोम रूप विशेषण (ग्रहणात् ) लिया गया है। सं-पुनः पूर्व पक्ष किया जाता है। कर्तृतो वा विशेषस्य तन्निमित्तत्वात् ॥२६॥ प० ऋ०-(वा) पूर्वपक्ष द्योतक है ( कर्तृतः) यजमान सम्बन्ध से ही ज्योतिष्टोम याग का 'दीर्घ सोम' विशेषण है क्योंकि (विशेषस्य ) उसका विशेषण ( तन्निभितत्वात् ) गजमान निमि- त्तक है। सं०--इस पूर्वपक्ष का यह समाधान है। ऋतुतो वाऽर्थवादानुपपत्तेः स्यात् ॥२७॥ प० क्र--(वा) पूर्वपक्ष के परिहार के निमित्त आया है (क्रतुतः) याग सम्बधेन दीर्घ सोम विशेषण मानना ठीक ( स्यात) है ऐसा मानने से (अर्थ वादानुपपत्तेः)'धृत्येः 'शब्द से 'सन्तर्दन' का सोम धारण रूप जो कथित फल वह नहीं बनता। संग-इस अर्थ में सन्देह करते हैं। संस्थाश्च कर्तृवदारणार्थाविशेषात् ॥२८॥ प० ऋ०-(च) शब्द 'तु' शब्द के स्थान में शंका का द्योतक है (कवत् )जैसे ज्योतिष्टोम के कत्तों का सब संस्थाओं में निवेश

हैं उसी प्रकार (संस्थाः) सन्तर्दन का भी सब संस्थानों में
निवेश होना ठीक है क्योकि (भारणार्थाविशेशात ) सोम धारण
सब में एक सा ही है।
सं०-इसका समाधान यह है।
उक्थ्यादिषु वाऽथस्य विद्यमानत्वात् ॥२॥
५० ऋ०---(वा) शंका समाधानार्थ प्रयोग है ( उक्थ्यादिषु)
उकथ्य में ही सन्तर्दन का मिला हुआ मानना ठीक है क्योंकि
(अर्थस्य ) उसमें 'सन्तर्दन' का फल ( विद्यमानत्वात् ) विद्यमान
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सं०--फिर आशंका उठाते हैं कि:-
अविशेषात्स्तुतियर्थेति चेत् ॥३०॥
५० क्र--(स्तुतिः ) उकथ्यादि की दीर्घ सोम रूप से प्रशंसा
(व्यर्थ है क्योंकि ( अविशेषात् ) अग्निष्टोम की सब संस्थाओं
में सोम एक सा है (चेत्) यदि (इति) ऐसा कहो तो ठीक नहीं।
सं०-उस शंका का समाधान करते हैं।
स्यादनित्यत्वात् ॥३१॥
प० ०-( स्यात् ) "उकथ्य' आदि में सोम अधिक होता है
क्योंकि (अनित्यत्वात् ) दश मुट्ठी परिमाण का विधान करने
वाला शास्त्र अनित्य है।
संo-'प्रवर्य' संज्ञक कर्म का प्रथम प्रयोग में निषेध पूर्वक निवेश
में निरूपण करते है
संख्यायुक्त क्रतोः प्रकरणात्स्यात् ॥३२॥

(१५७ ) ५० ऋ०-(संख्यायुक्त) संख्या बाची प्रथम पद वाला वाक्य (ऋतो:) ज्योतिष्टोम याग सम्बन्धी प्रवर्य संज्ञक कर्म का निषेध करने वाला- (स्मात् ) है क्योंकि (प्रकरणात् ) उस प्रकरण में उसका पाठ है। संइस पूर्व पक्ष का यह समाधान है। नैमित्तिकं वा कतृ संयोगाल्लिगस्य तन्निमित्त- वात् ॥३३॥ ५० ऋ०--(वा) पूर्व पक्ष की निवृत्ति के लिये आया संयोगात्) कता की प्रथम प्रवृत्ति के लिये (नैमिन्तिक) ज्योति- ष्टोम का प्रथम यज्ञ नाम कहा गया है क्योंकि । (लिङ्गस्य) प्रथम द्वितीय आदि लोक व्यवहार होने से। [तन्निमित्तत्वात् ] कत्तों की प्रथम प्रकृति आदि के लिये देखा जाता है। सं०-पोषण पेषण' का विकृति यज्ञ में विनियोग प्रयोग निरूपण करते हैं। पोष्ण पेषणं विकृतौ प्रतीयेताऽचोदनात्मकृतौ ॥ प० ऋ०-[पौणं] सब पदार्थों को पुष्टिकारक परपात्मा निमि- तक प्रदेयपदार्थ । [पेषणं ] पीस कर प्रदान विधान उसका। [विकृतो] पूसा देवता के विकृति याग में विनियोग । [प्रतीयते] मानना चाहिये क्योंकि [प्रकृतौ] दर्शपूर्णमास याग में [अचोद- नात ] पूसा देवता की विधि नहीं पाई जाती। सं०-पेषण केवल चर में घुसा हुआ है बतलाते हैं। तत्सर्वार्थमविशेषात् ॥३॥ 400-[वत्] वह [ पेषण ] का[सर्वार्थ ] परमात्मा निमित्त

भा
Duraman
Ssweet
Here
Rana
प्रदेय पदार्थों में मिला होना चाहिये क्योकि [अविशेषास् ]
उसका विधान समान रूप से है।
बं0- इसका समाधान करते हैं।
चरौ वाऽर्थोक्तं पुरोडाशेऽर्थविप्रतिषेधात् पशो
न स्यात् ॥३६॥
५० ऋ०-[वा] पूर्व पक्ष के लिये आया है [चरी ] केवल चरू
में उस पेषण का मिलाय है सर्वत्र नहीं [पुरोडाशे] पुरोडाश
में [अर्थोक्त ] वह पूर्व अर्थ से मिलता है और [ अर्थ विप्रति-
षेधात् ] पीसने रूप अर्थ का असम्भव होने से [पशौ] पशु
में[ न स्यात्] वह स्वयं नहीं होता।
सं०-इस अर्थ में शंका कहते हैं
वरावपीति चेत् ॥३७॥
प० ऋ०-(चरौ, अपि) चरु में भी पीसना असम्भव है चेत्)
यदि (इति) ऐसा कहा जाये तो ठीक नहीं।
सं०--इस आशंका का समाधान करते हैं।
न पक्तिनामसात् ॥३॥
400-(न) कथन ठीक नहीं क्योंकि (पक्ति नामत्वात् केप)
मात को चरु कहते हैं।
सं०-पौष्ण चरु में एक देवताक पेहण का निवेश है द्विदेवतक
(सौमा पौष्णा) और ऐन्द्रा पौष्णा यरु में नहीं यह निरूपण
करते हैं।
एकस्मिन्नैकसंयोगात् ॥३९॥

( १५६ ) पक्र०--(एकस्मिन् ) एक देवता परक पेषण का निवेश है द्विदेवता परक चरु में नहीं (एकसंयोगात् ) पेषण विधान करने वाले वाक्य से चरु के साथ ही उनका योग मिलता है। सं०-- हेतु देते है। धर्माविप्रतिषेधाच्च ॥४०॥ ५० क्र-(च) और (धर्म विप्रतिषेधात् ) दोनों धर्मों का विरोध होने से भी द्वि देवता परक चरु में पेषण का निवेश नहीं हो प०क्र0 सं०--इसमें पूर्व पक्ष करते हैं। अपि वा सद्वितीये स्याहवतानिमित्तत्वाद।४१॥ -(अपि) 'वा' दोनों शब्द पूर्व पक्ष के द्योतक हैं (स द्वितीये) द्वि देवता परक चरु में भी ( स्यात् ) पेषण को मिलाव होना चाहिये क्योंकि (देवता निमित्चत्वात् ) उसके निवेश का निमित्त देवता उसमें है सं0--उस अर्थ में लक्षण निरुपण करते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥४२॥ ५० 0-(च) और (लिंगदर्शनाच्च) लक्षण देखने से भी उस अर्थ की सिद्धि होती है। सं--"सामा पौष्णं चरु निर्वपेन्नेम पिष्टं पशुकाम" यह अर्ध पिष्ट का विधायक है लक्षण नहीं अतः इसमें अर्थ सिद्धि नहीं पाई जाती। वचनात्सर्वपेषणं तं प्रति शास्त्रवत्त्वादर्थाभावा

Fol
द्विचरावपेषणं भवति ॥४३॥
पक्रवचनात् ) उक्त वाक्य नेमपिष्ट का विधायक होने से
(सर्व पेषणं) पशु पुरोडाश, और चरु सब में पेषा माने जाने
(तं प्रति) उसके मानने से (शास्त्र वाक्तत्वात् ) वह वाक्य
अर्थ वाला हो सकता है और अर्थाभावात् ) और असम्भव तथा
फल के अभाव के कारण पशु पुरोडास में यदि न माने तो ( द्वि-
चरौ)सोमा पोष्ण चरू में भी ( अपेषणं भवति) बह पेषरण न
बन सकेगा।
सं०-इसमें पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं ।
एकस्मिन्वाऽर्थधर्मत्वादैन्द्राग्नवद्भयोन स्माद-
चोदितत्वात् ॥४४॥
प० ऋ०-(वा) शब्द पूर्वपक्ष की निवृत्ति का द्योतक है (ऐन्द्रा-
ग्नवत् ) चार भाग करने का एक देवता परक आग्नेय पुरोडाश
में ही घटता है और दो देवता परक एन्द्राग्न पुरोडाश में नहीं
उसी प्रकार ( एकस्मिन् ) एक देवता परक पोषण चरु में (स्यात्)
पेषण का निवेश है (उभयोः) दो देवता परक ' सौमा पेयां'
और 'ऐन्द्रा घोषण चरु में (न) नहीं क्योंकि ( अर्थ धर्मत्वात् )
पिष्ट माग याग का धर्म अभिप्रेत है उसका (अचोदित्वात)
सौमा पोषण आदि में विधान नहीं।
सं०-- तस्मात्पूषा' वाक्यान्त में 'अदन्त को हि स०' यह शेष
बाक्य कहा गया है इसमें पूषा को ( दन्तहीन) कहा है अतः
वह प्रपिष्ट भाग उसका धर्मविदित होता है।
हेतुमात्रमदन्तत्वम् ॥४॥

( १६१) 40 ---(अइन्तल) उस वाक्य शेत्र में जो 'अहन्तत्व कथन है वह (हेतु मात्र) देवता मात्र के शरीर हीन होने में कारण जानना चाहिये। सं --जो पुत्रोंक लिंग से निवेश सिद्धि है को वह अनुचित कैसे कहा जा सकता है। वचनं परम् ॥४६॥ प० क्र . ( वचन) विधि वाक्य है लक्षण नहीं। , इति श्री मीमांसादर्शने तृतीशध्याये तृतीय पादः समाप्तः। अथ तृतीयाध्याये चतुर्थः पादः प्रारभ्यते।। सं०--'निवीतं मनुष्याणां' को अर्थ वाद प्रतिपादन करने के निमित्त पूर्वपक्ष किया जाता है। निवीतमिति मनुष्यधर्मः शब्दस्य तत्प्रधान- खात्॥१॥ प० ०--( निवीतमिति मनुष्य धर्मः) निवीत यह मनुष्य कर्माङ्ग बताया गया है ( शब्दस्य ) उक्त शब्द से (तत्प्रधानत्वात् ) मनुष्य कर्म की प्रधानता है। सं०-इसमें आशंका करते हैं। अपदेशो वाऽर्थस्य विद्यमानत्वात् ॥२॥ ५० ऋ०-वा] शंका का द्योतक है [ उपदेशः ] उक्त वाक्य का अनुवाद है न कि विधि क्योंकि [अर्थस्य ] निवीत [विद्यामन- स्वात् ) पूर्व से लोक सिद्ध है। पहुं०... इस शंका का यह समाधान है। विधिस्त्वपूर्वत्वात्स्यात् ॥३॥ पO 90--'तुशंका परिहार के लिये है (विधिः) बह विधि वाक्य ( स्यात् ) है क्योंकि (अपूर्वत्वात् ) निपीत रूप अर्थ 35 प०क संक-इसी पूर्वपक्ष में और पूर्वपत करते हैं। स प्रायात्कमधर्मः स्यात् ॥४॥ (स) निवीत (कर्म धर्म:) प्रकृत कर्म का अंग (स्थान) है क्योंकि (प्रायात् ) उसका उस प्रकरण में पास है। to-उस पूर्व पक्ष में विशेषता यह है कि- वाक्यस्य शेषवत्वात् ॥५॥ १० ऋ०-(वाक्यस्य) उस वाक्य (शेषव त्वात्) शेष में पढ़े समाख्या बल से अध्वर्यु कर्तृक प्रकृत कर्म के अग निवी का विधान करता है सर्वत्र नहीं। 6-अब दूसरे पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं। तत्प्रकरणे यत्तत्संयुक्तमविप्रतिषेधात् ॥६॥ (तत् ) वह वाक्य ( प्रकरणे) दर्श पूर्णमास कर्म के प्रकरण में ( यत् ) जो मनुष्य कर्म है ( तत्संयुक्त) उसका अंग निवीत का विधान होने से (अप्रतिषेधात्) उस पूर्वोक्त 'षष्ठयन्त' की संगति बैठ जाती है। सं०-पुनः पूर्व पक्ष का समर्थन करते हैं। प० क्र०- पOOrana तप्रधाने वा तुल्यवत्मसंख्यानादितरस्य तदर्थ- स्वात् ॥७॥ (67) एक देशी समाधान के निराकरण के लिये पाया है ( तत्प्रधाने) यह वाक्य मानुष प्रधान सब कर्मों में निवीत रूप अङ्गका विधान करने वाला है क्योंकि ( तुल्यवत्प्र- संख्यानात वीत वाक्य समान उससे उस कर्म मात्र का. बोधक होने से ( इतरस्य ) षष्ठी पद मनुष्याणां' (तदर्थत्वात् ) उस अर्थ में घटता है। संक-अब पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। अर्थवादो वा प्रकरणात् ॥८॥ प० क्र--(वा) सिद्धांत सूचनार्थ आया है (अर्थवादः) वह वाक्य उपवीत विधि का स्नातक अर्थवाद है क्योंकि (प्रकरणान) प्रकरण से ऐमाही पाया जाता है। सं०-उक्त अर्थ में युक्ति देते हैं। विधिना चैकवाक्यत्वात् ॥४॥ (च) तथा (विधिना) उपवीत विधिवाक्य के साथ एक ( वाक्यत्वात् ) वाक्य की एक वाक्यता प्राप्त होने से बह अर्थ नहीं मिलता। संक-दिगविभाग' को अर्थवाद निरूपण करते हैं। दिबिभागश्च तद्वत्सम्बन्धास्थार्थ हेतुत्वात्।१०॥ ५० ऋ०-(च) तथा ( तद्वत ) निवीत के समान दिग विभाग मी अर्थवाद है क्योंकि ( सम्बन्धस्य ) वह दिग सम्बन्ध (अर्थ గారి Team हेतुत्वातु) अर्थ हेतु प्रसिद्ध है। सं०--परुष दित आदिको अर्थवाद कहते हैं। परुपि दितपूर्णधृतविदग्धं च तद्वत् ॥११॥ ५० क्र0--(च) और ( तद्वत्त) निवीत समान (परुपिदितपूर्ण- धृतविदग्धं ) परुषि दित, पूर्ण, धृत और विदग्ध यह चारों अर्थ- , sai बाद हैं। सं0- अमृत day an Email THA निषेध की विधि निरुपण करते हैं। अकर्म ऋतुसंयुक्त संयोगान्नित्यानुवादः स्यात् ॥१२॥ ५० 90-- (क्रतु संयुक्त ) दर्श पूर्ण में कथित ( अकर्म) अनृत निषेध (नित्यानुवादः) नित्य प्राप्त का अनुवाद ( स्यात् ) क्योंकि (संयोगात् ) निषेध का वाक्यान्तर से विधान है। सं०-पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं। विधिर्वा संयोगान्तरात् ॥१३॥ ५० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष के परिहार के लिये आया है (विधिः) निषेध वाक्य विधि है अनुवाद नहीं क्योंकि (संयोगान्तरात) उद्देश्य भेद से दोनों वाक्यों का भेद है। -अब जमाई हेतुक मन्त्रोच्चारण को प्रकृत याग में पुरुष धर्म निरूपण किया जाता है। अहीनवत्पुरुषस्तदर्थत्वात् ॥१४॥ प० - महीनवत) जिस प्रकार 'उपसद संज्ञक यज्ञा 'अहीन' पक्र0 का धर्म है उसी प्रकार (पुरुष धर्मः) जमाई निमित्त मन्त्र का उच्चारण भी यह पुरुष मात्र का धर्म है क्योंकि (तदर्थात्वात् ) उसके उद्देश्य से विधान पाया जाता है। सं०-इस पूर्ण पक्ष का यह समाधान है। प्रकरणविशेषाद्वा तद्य क्तस्य संस्कारो द्रव्य- वत् ॥१५॥ -'वा' पूर्व पक्ष की व्यावृत्ति के लिये पाया वत् ) ब्रीहि रूप द्रव्य का प्रोक्षण (ता क्लस्य ) याग सम्बन्धी पुरुष का (संस्कारः) मन्त्रोच्चारण संस्कार है (प्रकरण विशेषात् ) प्रकरण की विशेषता से। सं०-'अहीनवत् दृष्टान्त का समाधान करते है। व्यपदेशादपकृष्येत ॥१६॥ पo ao-(व्यपदेशात् । अधिक कथन से [ अपकृष्येत ] उपसद् होम का अपकर्ष होता है। सं०-अब गोरण आदि निषेध को ब्राह्मण मान के लिये होना कहते हैं। शंयो च सर्वपरिदानात् ॥१७॥ प० ऋ०-[च और [शयो] महाराज 'शम्भु के उपदेश में जो ब्राह्मण के 'अवगोरण आदि का निषेध है वह ब्राह्मण मात्र के लिये जानना चाहिये क्योंकि [ सर्वपरिदानात् ] उससे उसका अहण है। खं०-'रजस्वला से सम्भाषण निषेध निरूपण करते हैं।

म
नां
भ
Paaton
प्राग परोधान्मलबद्धाससः॥१८॥
प० ऋ०-( मलबद्वाससः) रजस्वला से सर्व प्रकार के सम्मा-
पण का निषेध (प्राग) यज्ञारम्भ में ही (अपरोधान ) उसे सहा
भूमि से बाहर करके याग का विधान करे ।
सं०-इसमें युक्ति देते हैं।
अन्नप्रतिषेधाच्च ॥१९॥
१० ऋ(च) तथा (अन्नप्रतिषेधात) रजस्वला संभोग के
निषेध से भी यह कथन ठीक है।
*०--सुवर्ण धारण मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है।
अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात् ॥२०॥
५० ०-'तु' सिद्धान्त सूचक है ( अप्रकरणे ) किसी यज्ञ
विशेष में अपठित सुवर्ण धारण आदि ( तद्धर्मः ) मनुष्य मात्र
का धर्म है क्योंकि (ततः) प्रकरण से (विशेषात् ) वह अद्-
THA
सं०-इसमें पूर्व पक्ष करते हैं।
अद्रव्यत्वात् शेषः स्यात् ॥२१॥
40 क्र0-(तु) पूर्वपक्ष सूचक है (शेषः) सुवर्ण श्रादि का
घारण याग शेष ( स्यात् ) है क्योंकि (अद्रव्यत्वात् ) वह एक
क्रिया है।
सं०-इसमें युक्ति यह है कि:-
वेदसंयोगात् ॥२२॥

( १६७ .) 400-( वेदसंयोगात् ) उक्त वाक्या का यजुर्वेद से सम्बन्ध है अतः उहतार्थ की सिद्धि है। स०--पुन: इसमें युति देते हैं। 4 -(च) तथा (द्रव्यपरत्वात् ) उस वाक्य में आये 'हिण्य पद को याग सम्बन्धी सुवर्ण का स्मारक होने से भी ठीक है। सं०-इस पक्ष का समाधान करते हैं। स्याद्वाऽस्यसंयोगदत्फलेन सम्बन्धस्तस्मात्कमैं- तिशायनः ॥२४॥ ५० ऋ०-- का) पूर्वपक्ष का निरास करता है ( संयोगवत् ) फला सम्बन्ध से उसी प्रकार (फलेन सम्बन्धः) फल के साथ सम्बन्ध से (स्यात् ) होता है ( तस्मात् ) अतएव (कर्म) वह प्रधान कर्म है (ऐतिशायलः) ऐसा ऐतिशायन ऋषि मानते हैं। शेशेऽप्रकरणेविशेषात्सर्वकर्मणाम् ॥२५॥ ----'जप' नामक यज्ञों को 'वैदिक कर्म का अंग निरूपण करते हैं। ५०0-(अप्रकरणे ) अप्रकरण पठित 'जप' आदि होम (सर्व कर्मणा) लौकिक वैदिक' सम्पूर्ण कर्म का (शेषः) अङ्ग है क्योंकि ( अविशेषात् ) समान रूप से उसका पाठ है। ----उक्त पूर्व पक्ष का समाधान किया जाता है। होमास्तु व्यवतिष्ठेरन्नाइवनीयसंयोगात्॥२६॥ १ s सं0 P संत CMS BE Lond ५० FO--(तु) शब्द पूर्व पक्ष के हटाने को आया है । (हामाः) याग ( व्यवतिष्ठेरन) वेदिक कमों में ही कर्तव्य है क्योंकि (आहवनीय संयोगात् ) वैदिक कर्म तथा होम उमय था ( आह- वनीय) अग्नि सम्वन्धी होते हैं। संo इसमें हेतु देते हैं। शेषश्च समाख्यानात् ॥२७॥ प० ०---(च) और (शेषः) वैदिक कर्माङ्ग होने से क्योंकि (समाख्यानात् ) 'आध्वर्यव' काण्ड में पढ़ा गया है। सं०-अश्व प्रतियह हेतुक वारुणी दृष्टि की अङ्गरूपता से कर्त- व्यता निरूपण करते हैं। दोषाविष्टिलौकिके स्थाच्छास्त्रद्धि वैदिके न दोषः स्यात् ॥२८॥ (तु) शब्द पूर्व पक्ष सूचक है (दृष्टिः) अश्व प्रति अह हेतुक इष्टि विधान ( लौकिके ) सांसारिक अश्व प्रति ग्रह में भी (स्यात् ) होती है क्योंकि ( दोषात् ) प्रतिग्रह में दोष बतलाया गया है (हि) और (वैदिके) वैदिक अश्व प्रतिग्रह में (शास्त्रात्) शास्त्र सिद्ध होने के कारण (न दोष स्यात् ) दोष नहीं है। सं0-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। अर्थवादो वाऽनुपपातातस्माद्यज्ञ प्रतीयेन २४ 40 0-(वा) पूर्वपक्ष निवृत्यार्थ आया है (अर्थवादः) अश्व प्रति ग्रह से जलोदर रोग होने की निवृति के लिये उक्त इष्टि है पक्र०

(१६६)
यह अर्थवाद है कारण कि (अनुपपातात् ) अश्व प्रति ग्रह में
कोई पाप नहीं अतः ( यज्ञे) जिस यज्ञ में अश्व दक्षिणा की
विधि है उसमें (प्रतीयेत) अङ्गरूप से उस इष्टि की कर्तव्यता
जाननी चाहिये।
संoअश्व दाता को उक्त इष्टि को करने का निरूपण करते हैं।
अचौदितं च कर्मभेदात् ॥३०॥
(च) और (अचोदित) विधान की गई न कि
हामार्थ और (कर्मभेदात् ) दान और प्रतिग्रह दोनों के भेद से।
सं0-इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं।
सा लिंगादाविजे स्यात् ॥३१॥
प० क्र--(सा) उक्त इष्टि ( अविजे) यजमान को (स्यात्)
करना चाहिये क्योंकि (लिंगात् ) प्रमाणों से ऐसा ही मिलता
है
सं०-वैदिक सोमपान में 'वमन' होने पर सोमेन्द्री इष्टि करना
चाहिये
पानव्यापञ्च तद्वत् ॥३२॥
(च) तथा ( तद्वत् ) अश्वदान इष्टि निमित्त है
उसी प्रकार ( पानव्यापत् ) सोमपान वमन भी इष्टि का
प० क्र-
निमित्त है।
सं०--इसका समाधान करते हैं।
दोषात्तु वैदिके स्यादर्थाद्धि लौकिके न दोषः
स्यात् ॥३३॥

ION 12.2 (१७०) ५० ऋतु' शब्द उस पक्षकी निवृत्ति के लिये आया है (बैदिके) वैदिक सोमपाल-बाल होने पर (स्यात्) इष्टि कर्तव्य है क्योंकि (दोषात् ) उसके वमन का प्रारम्भ वाक्य में दोष नहीं बतलाया है और (लौकिके ) लौकिक सोमपान में (दोषः ) वमन होना दोष ( न स्यात् ) नहीं हो सकता (हि) कारण कि (अर्थात) वह वमन निमित्त ही होता है। संभ-यजमान उक्त इष्टि करे अतः पूर्वपक्ष लेता है। तत्सर्वत्राविशेषात् ॥३४॥ प० क्र--(तत्) वह सोम वमन (सर्वत्र ) ऋत्विक और यज- मान दोनों को इष्टि करने में कारण है क्योंकि (अविशेषात्) वह समान रूप सुना जाता है सं०-इसका समाधान किया जाता है। स्वामिनो वा तदर्थत्वात् ॥३५॥ ५००-(वा) पूर्वपक्ष के हटाने को प्रयोग किया गया है (स्वा- मिनः) यजमान को वह इष्टि करनी चाहिये क्योंकि (तदर्थत्वात) वह कर्म फल का भोगने वाला है। खं०-उतार्थ में लक्षण दिखाते हैं। लिंग दर्शनाच्च ॥३६॥ १० क्र0-(च) और (लिंगदर्शनात् ) लिंग के मिलने से वह अर्थ सिद्ध होता है। संo-श्रव अगुल चौड़ी दो खंडों की अग्नि में होम करने का निरूपण करते हैं।

सर्वपदान हविगस्तदर्थत्वात् ॥३७॥ ५० --( हविषः) हवि का (सर्व प्रदान) अग्नि में सर्व प्रदान झोना । तदर्थत्वात् ) वह उसके निमित्त है। स०-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। निरवदानातु शेषः स्यात् ॥३॥ ५० ऋ०--(तु) पूर्व पक्ष निरास हेतुक पद है (शेषः) कृत्स्न पुरोडाश के स्थान में स्विष्ट कृद् और कार्यों के लिये होम होना ( स्यात् ) हैं (निरवदानातू) कृत्स्न पुरोडाश रूप हवि से अनुष्ठ पर्व परिमाण दो टुकड़ों को काट कर याग का विधान है। सं0- इसमें आशंका करते हैं। उपायो वा नदर्थत्वात् ॥३॥ ५० ऋ०-(वा) आशंका सूचनार्थ आया है ( उपायः) द्विह- विषः शब्द से हवन का नियम कहा गया है 'द्विरवदान' से हवन नहीं करना चाहिये कारण कि ( तदर्थत्वात् ) सब पुरोडाश हबनाये है। सं०-शंका का समाधान करते हैं। कृतत्वात्तु कर्मणः सकृत्स्याद्रव्यस्य गुणभूत- त्वात् ॥४०॥ ५० क्र0-(तु) शब्द आशंका निवारार्थ आया हैं (सकृत) एक बार (कर्मणः) हवन के ( कृतत्वात् ) कर देने से ( स्यात् ) हवन विधि वाक्य [ द्रव्यस्य ] शेष पुरोडाश क्योंकि [गुणभूत- स्वात] उक्त क्रिया के लिये गौण है।

सं ( १७२ ) सं०-इस अर्थ में हेतु देते हैं। शेषदर्शनाच्च ॥४१॥ ५७ - [च] और [शेषदर्शनात ] शेष पुरोडाश से कार्यों का विधान मिलता है। सं०-आग्नेयादि तीनों हवियों से 'स्विष्टकृत' आदि शेष कर्मों की कर्तव्यता कहते हैं। अप्रयोजकत्वादेकस्माक्रियेरञ्छेषस्य गुणभूत- खात् ॥४२॥ ५० ऋ०-[एकस्यात् ] एक हवि द्वारा [क्रियेरन] स्विष्टकृत' शेष कर्म कर्त्तव्य है तीनों हवियों में से नहीं शेषस्य] शेष कर्मों केलिये [ गुणभूतत्वात् ] गुण भूत होने से [अप्रयोजकत्वात] वह उनकी बार बार कर्त्तव्यता का प्रयोजक नहीं । सं०-अब' उक्तार्थ में हेतु देते हैं। संस्कृत वाच्च ॥४३॥ ५००-[च तथा [ संस्कृतत्वाच्च] एक बार उस कर्म के होने से भी प्रधान हवि संस्कृत हो जाती है। सं0--उस पूर्ण पक्ष का समाधान किया जाता है। सर्वेभ्यो वा कारणविशेषात्संस्कारस्य तदर्थ- त्वात् ॥४४॥ ५००-[षा] पूर्व पक्ष की निवृत्ति के लिये आया सर्वस्मात] शेष पाहुतियों से यह करने योग्य कर्म है [कारणविशेषात ।

( १७३ ) उनके होने में कारण समान है एवं संस्कारस्य ] संस्कार तदर्थ- स्वात् ] हवि मात्र के निमित्त होने से वह प्रति हविः हो सकता सं०-अर्थ साधक लिंग को निरूपण करते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥४५॥ प० ऋ०-च] तथा लिङ्गदर्शनात् ] लिङ्ग के पाये जाने से वह सं०-उन तीनों हवियों में एक हवि कौनसी है। एकस्माच्चेद्याथाकाम्यमविशेषात् ॥४६॥ 40 ऋचेत ) यदि [एकस्मात् ] एक हविः पक्ष है तो [ यथा कामी ] स्वेच्छा से किसी एक हवि से उक्त कर्म का अवदान करे क्योंकि [अविशेषात् ] वह तीनों हवियां समान हैं। सं०-- पूर्व पक्ष का समाधान यह है। मुख्याद्वापूर्वकालत्वात् ॥४७॥ ५० ऋ०-[वा] पूर्व पक्ष का निराकरण करता है (मुख्यात्) इस हवि का परमात्मा निमित्त अवदान किया जाता है उसी से उसका अवदान होना क्योंकि (पूर्वकालत्वात् ) वह सबसे त्यागने योग्य है। सं०-चार प्रकार से आग्नेय पुरोडाश का भक्षण ऋत्विजों को दिया जाये इसका निरूपण करते हैं। भक्षाश्रवणादानशब्दः परिक्रये ॥४॥ ५० ऋ०-दान शब्दः) चार विभाग करके ऋत्विजों को देना प्रथम (१७४) [परिक्रये] वह उनके परिक्रय निमित्त है न कि भक्षण के लिये क्योंकि [भक्षा श्रवणात] दान विधायक वाक्य में भक्षण का नाम नहीं सुना। संक-इस अर्थ में हेतु देते हैं। तत्संस्तवाच्च ॥४९॥ प०-(च और सित्तस्तवात् ] पुरोडाश दान दक्षिणा के नाम से स्तुति करने के निमित्त वह कर्म सिद्ध होता है। jo- इसमें समाधान पक्ष उठाते है। भक्षर्थों वा द्रव्यो समत्वात् ॥५०॥ --(वा) पूर्व पक्ष के निरूपण करने को आया है (मक्षार्थः) पुरोडाश भक्षणार्थ ही है न कि परिक्रमानिमित्त क्योंकि (द्रव्ये) उस पुरोडाश द्रव्य में (समत्वात) यजमान और ऋत्विजों का समान अधिकार है। सं0---पुरोडशि दान रूप दक्षिणा के नाम से की गई स्तुति का समाधान है। व्यादेशादानसंस्तुतिः ॥५१॥ पक्र०--(दान संस्तुति ) पुरोडाश दान की दक्षिणा रूप स्तुति की गई है (व्यादेशात् ) वह दान पात्र की समानता है। इति मीमांसा दर्शने तृतीयाध्याये चतुर्थः पादः। पक्र0 Mu ओ३म् अथ तृतीयाध्याये पञ्चमः पादः प्रारभ्यते। खं0-उपांशु यज्ञ में ध्रुवा पात्र में बच प्राज्य द्वारा स्विष्ट कृत कर्मों की अकर्तव्यता कथन में पूर्व पक्ष करते है। आज्याश्च सर्व संयोगात् ॥१॥ प० ऋO--- (आज्यात् ] ध्रुवा पान में शेष आज्य से [च] और स्विष्टकृत करना चाहिये क्योंकि [ सर्वसंयोगात् ] उक कर्म निमित्त सब हवियों के अवदान का विधान मिलता है। सं०--इसमें हेतु देते हैं। कारणाच्च॥२॥ प० --च] तथा [कारणात् ] स्विष्टकृत आदि कर्म सब शेष हवियों के संस्कार का कारण होने से भी उस कर्थ की सिद्धि होती है। सं०--उक्त अर्थ में हेतु देते हैं। एकस्मिन्त्समवत्त शब्दात् ॥३॥ ५० 0-[एकस्मिन् ] 'आदित्य चरु रूप एक हविः [सम वत्त शब्दात् ] 'समवद्यति' शब्द का प्रयोग मिलने से भी उस अर्थ की सिद्धि होती है। संड-उक्त अर्थ सिद्धि में अन्य हेतु देते हैं। धान्ये च दर्शनात् स्विष्टकृदर्थवादस्य ॥४॥ प० ऋ०-च) और (आज्ये) नौव वृत से भी (स्विष्टकर) विष्टकृत, आदि कर्म करने चाहिये क्योंकि [अर्धवादस्य]

७
HAN
221
STENCE
( १७६ )
उसका समर्थक अर्थवाद वाक्य ( दर्शनात् ) मिलता है।
सं०--पूर्वपक्ष का समर्थन करते हैं।
अशेषत्वानु नैवंस्यात्सर्वादानादशेषता ॥५॥
40 ऋO-तु' पूर्वपक्ष के हटाने को आया है (न, एवं, स्यात् )
स्विष्ट कृत आदि कमों में प्रौन घृत से अवदान नही हो सकता
कारण कि ( अशेषत्वात् ) वह उपांशु याज शेष नहीं (सर्वा-
दानात् ) उपांशु याज से ध्रुवा पात्र से जितना धृत ग्रहण करने
योग्य था उस सब का हवन हो चुकने पर ( अशेषता) उपांशु
याज के घी का शेष न रहना सिद्ध है।
सं०-उपांशु याज के पश्चात् जो ध्रुवा पात्र में घृत है उसे
ही उपांशु याज शेष क्यों न मान लें।
साधारण्यान्न ध्र वायां स्यात् ॥६॥
प० ऋ०-(ध्रुवायां) उपांशु याज के पश्चात् धौव धृत है वह
(नस्यात् ) उपांशु याज शेष नहीं क्योंकि वह (साधारायात्)
सब कर्म निमित्त है।
सं०--अब उपांशु यज्ञ के निमित्त ध्रुवा पात्र से जुहु में श्राज्य
लिया गया है उसके शेष से वह कर्म क्यों न कर लिये जावें।
अक्कत्वाच्च जुहां तस्य च होमसंयोगात् ॥७॥
५० ऋ०--( जुहां) जुहु में जितना भी है (अवतत्वात् ) वह सब
हवन निमित्त अवदान किया गया है (च) और ( तस्य) उसस
(होम संयोगात् ) प्रधान हवन के साथ सम्बन्ध होने पर है।
सं0--उतार्थ में आशंका होती है।
चमसवदिति चेत् ॥८॥

(१७७ .) प० FO-( चमसवत्) ऐन्द्र वायव चमस में ग्रहण किये गये सोम का अग्नि के उद्देश्य से हवन जिस प्रकार होता है उसी भांति विष्णु के उद्देश्य से जुहु निमित्त प्रहीत घृत से भी स्विष्ट- कृत आदि कर्म होने चाहिये (चेत् ) यदि (इति) ऐसा कहा जावे तो ठीक नहीं। सं०---- आशंका का समाधान करते हैं। न चोदनाविरोधाद्धविःप्रकल्पनाच्च ॥९॥ प० ऋ०-(न) यह कथन ठीक नहीं क्योंकि (चोदना विरोधात्) ऐसा मानने से उसका विधि वाक्य से विरोध होने से (च) और (हविः प्रकल्पनात्) ऐन्द्र वायवं गृहणाति बाक्य से केवल हषि कल्पना मिलती है। हवन संयोग नहीं । सं०-स्विष्ट कृत कर्म निमित्तक सब हवियों से अवदान की कथित विधि का समाधान करते हैं। उत्पन्नाधिकारात्सति सर्ववचनम् ॥१०॥ प० ऋ०-(सति) शेष रहने पर ( सर्ववचनं ) वाक्य प्रवृत्ति से ( उत्पन्नाधिकारात ) अधिकार में पाठ होने से। Mo--अब तृतीय सूत्र में निरूपित हेतु का निराकरण करते हैं। जातिविशेषात्परम् ॥११॥ प० ऋ०--(परं) प्रायणीय नामक इष्टि में आदित्य चरु के पास 'समवध्वति' शब्द का प्रयोग पाया जाता है वह (जाति विशेषात्) भात और घी सम्बन्धी जाति विशेष के अभिप्राय वश है। सं०-चतुर्थ सूत्र के हेतु का समाधान करते हैं।

(१७) Hand पक्र0 अन्त्यमरेकार्थे ॥१२॥ ए --(अन्त्य) धौव वृत से स्विष्टकृत आदि कर्मों की कर्तव्यता का साधक प्रत्यभि धारण बतलाया गया वह 'अरे-- कार्थे ) ध्रुवा पात्र के रिक्त न होने से है। सं-साकरस्थानीय संज्ञक याग में स्विष्टकृत' आदि कर्मों की श्रकर्त्तव्यता निरूपण करते हैं। सांकम्प्रस्थाय्ये स्विष्टकृदिडञ्च तद्व ॥१३॥ --(च) तथा (तद्वत् ) उपांशु याज सदृश (साकं प्रस्था- थीये) साकं प्रस्थायीय संज्ञक यज्ञ में (स्विष्टकृदिड) स्विष्ट कृत और इडा अवादान कर्म नहीं होता। सं०-सौत्रा मणी यत्र में भी वह कर्म अकर्चव्य ही है। सौत्रामण्यां च अहे षु ॥१४॥ ५० क्र--(च) तथा (सौत्रा मण्यां) सौत्रा मणि यज्ञ में (ग्रहेष) ग्रहों से भी हवन कहे जाने से उस कर्म की अकर्तव्यता है सं०-इसका लक्षण निरूपण करते हैं। तद्वच्च शेषवचनम् ॥१५॥ प० ३०-(च) तथा और (शेष वचनांत् ) "ग्रहों" से होम के विधान करने वाले वाक्य जो शेष हैं वह (तद्वत) साकं प्रस्थायीय के समान उक्त यज्ञ में 'स्विष्टकृत' आदि कर्मों की अकर्तव्यता का घोतक है। सं०-अब 'सर्वपृष्ठ' संज्ञक इष्टि में स्विष्टकृत आदि कर्मों का एक बार अनुष्ठान करने को निरूपण करते हैं। Kan . ( १७१) द्रव्येकत्वे कर्मभेदात्पुतिकर्म क्रियेरन् ॥१६॥ 40 0-(द्रव्येकत्वे) द्रव्य के एक होने पर भी (कर्मभेदात् ) प्रधान कर्म का भेद होने से (प्रतिकर्म) प्रत्येक प्रधान कर्म (क्रियेरन) स्ष्टिकृतादि कर्म करने चाहिये। सं०-उक्त पक्ष का समाधान करते हैं। अविभागाच्च शेषस्य सर्वान्प्रत्यवशिष्ट-- त्वात् ॥१७॥ प० ऋO-(तु) पूर्व पक्ष के हटाने को प्रयोग किया गया है (शेषस्य ) हविः त्यागानन्तर बचा शेष भाग वह (अति भागात) परस्पर कुछ भेद नहीं क्योंकि (सर्वान् प्रति) सब प्रधान को में। (अवशिष्टत्वात् ) पुरोडाश रूप हवि समान है। सं0-.-.ऐन्द्रवायव' ग्रह में आहुति देने के पश्चात् शेष सोम का अनेकवार भक्षण को कहते हैं। ऐन्द्रवायवे तु वचनाप्रतिकर्म भक्षस्यात् ॥१८॥ प० क्र--(तु) विलक्षण अर्थ सूचक है ( ऐन्द्रवायवे) ऐन्द्र-- वायव संज्ञक पात्र में (प्रति कर्म) प्रति आहुवि रूप कर्म (अक्षः) भक्षण ( स्यात् ) होना ठीक है क्योंकि (वचनात् ) वाक्य विशेष से होता ही है। सं०-पुरोडाश के समान सम्पूर्ण शेष सोम-भक्षण निरूपण के लिये पूर्व पक्ष करते हैं। सोमेऽवचनाद्धभक्षो न विद्यते ॥१॥ प० ऋ०-(सोमे) ज्योतिष्ठोम में (मक्षः) शेष सोम भक्षण मदान CON ( १८० ) (नविधते) नहीं पाया जाता क्योंकि (अवचनात् ) उसकी विधि का कोई बाक्य नहीं। सं उक्त पक्ष का समाधान किया जाता है। स्याद्वाऽन्यार्थ दर्शनात् ॥२०॥ ५० ऋ०--(वा) पूर्व पक्ष के परिहार के निमित्त प्रयोग है (स्यात् ) सोमों का शेष भक्षण होना (अन्याथैदर्शनात्) तत्स- म्बन्धी भ्रमण का विधान होने से। संक-'सर्वतः परिहारं वाक्य में केवल भ्रमण का ही विधान है न कि सोम भक्षण का भी। वचनानि त्वपूर्वत्वात्तस्माद्यथोपदेशंस्युः॥२१॥ ५० ऋ०-'तु' आशंका के दूर करने को प्रयोग किया है (बच- नानि) 'सर्वतः परिहारं बचन भ्रमण आदि विशिष्ट भक्षण विधायक होने पर ( अपूर्वत्वात् ) अपूर्व अर्थ है। सं०-चमस संज्ञक सोम पात्रों में होता आदि ऋत्विक द्वारा किया शेष सोम का भक्षण निरूपण करते हैं। चमसेषु समाख्यानात्संयोगस्य तन्निमित्त- त्वात् ॥२२॥ ५० 30-(चमसेषु ) चामस नामक सोम पात्रों में (समाख्या- नात् ) व्याख्या के आधार पर शेष सोम को भक्ष्य कहा गया है (संयोगस्य) उस समाख्या सम्बन्ध का (तन्निमित्तत्वात् ) मक्षण के हेतु है। संo-होत चमस' आदि दश पात्रों में उद्गात चमस नामक पान विशेष में सुब्रह्मण्य' सहित उद्गाता आदि चार ऋत्विज कर्तृक शेष सोम का भक्षण कथन करते हैं। उद्गातृचमसमेकः श्रुतिसंयोगात् ॥२३॥ प० ऋ० ---(उद्गात चमस) उद्गातृ चमस नामक पात्र में बचा सोम का ( एकः) उद्धाता ही भक्षण करे क्योंकि (श्रुतिसंयोगात्) उस चमस के साथ उद्गात शब्द का सम्बन्ध है। 10-प्रथम पक्ष का खण्डन करते हैं। सर्वे वा सर्वसंयोगात् ॥२४॥ प०७-(वा) पूर्व पक्ष के दूर करने को पढ़ा गया (सर्वे) पात्र में सब ऋत्विजों को शेष सोम भक्षण करना ठीक है (सर्व संयोगात् ) सब के वाचक बहु वचन का उस पात्र से सम्बन्ध सं-दूसरे पूर्व पक्ष के खण्डन कर तीसरे पक्ष को कहते हैं। स्तोत्रकारिणां वा तत्संयोगाद्वहुश्रुतेः ॥२५॥ ५० क्र0---(वा) दूसरे पक्ष के खण्डन में है (स्तोत्रकारिणः ) उस पात्र में उद्गाता, 'प्रस्तोता और प्रति हा दीनों को भी भक्षण करना चाहिये इस लिये कि (तत्संयोगात) उनके सम्बन्ध (बहुत्व श्रुतेः) बहु वचन का प्रयोग है। सं०--पूर्वपक्ष करते हैं। सर्वे तु वेदसंयोगात्कारणादेकदेशे स्यात् ॥२६॥ ५० क्र0--(तु) तृतीय पक्ष के खण्डन के लिये है। और सिद्धान्त सूचक मी है (सर्वे) यज्ञ में साम छेनियों और (सुब्रह्मा- एय) इन चारों को खाना चाहिये (वेद संयोगात ) चारीका सामवेद मान से सम्बन्ध है एवं (एक देशे) उद्गाता संज्ञक ऋत्विक में जो उद्गात शब्द है बह' (कारणात) उद्गीथ' संज्ञक सामवेद विशेष के गान के लिये (स्यात् ) है। सं0- परि योजना' नायक पान में प्रावस्तुत संज्ञक ऋत्विक का किया हुआ शेष सोम अक्षण के लिये पूर्व पक्ष स्थापित करते हैं। , ग्रावस्तुतो भक्षो न निद्यतेऽनाम्नानात् ॥२७॥ प० क्र--(प्रावास्तुतः) 'ग्रावस्तुत ' संज्ञक ऋत्विक का किया (मक्ष ) हारियोजन' संज्ञक पान में अवशिष्ट सोम का भक्षण (न विद्यते) नहीं होता क्योंकि (अनास्नानात् ) उस पात्र में उसके भक्षण का विधान नहीं मिलता। सं0---इस पूर्वपक्ष का समाधान किया जाता है। हारियोजने वा सर्व संयोगात् ॥२८॥ प० ---(पा) पूर्वपक्ष निराकरणार्थ है ( हारियोजने ) 'हारियोजन' नामक पात्र में 'प्रावस्तुत' को भी शेष सोम का मक्षण करना चाहिये क्योंकि (सर्वसंयोगात् ) उक्त पान मक्षण में उसका सम्बन्ध मिलता है। सं०--इसमें आशंका करते हैं। चमसिना वा सन्निधानात् ॥२॥ प० क्र0-(वा) आशंकारार्थ प्रयोग है ( चमसिना ) वाक्य में सर्व शब्द से चमसियों का प्रहण है क्योंकि (सन्निधानात्) उसकी सन्निधि में शब्द का प्रयोग मिलता है।

सं०-इस आशंका का समाधान करते हैं। सर्वेषां तु विधित्वाचदर्था चमलिश्रुतिः ॥३०॥ --'तु' शब्द आशंका निवारण के लिये है (सर्वेषां ) चमसी, अचमसी, सब ऋत्विजों का सर्व शब्द 'सर्व' से ग्रहण है (निधित्वात् ) हारियोजन पात्र में सर्वभक्षण का विधान है (चमसि श्रुतिः) पूर्व वाक्य में चमसियों का ग्रहण है [तदर्था] उस पात्र की प्रशंसा के लिये है। सं०-'वषट्कार' को भक्षण का निमित्त कहते हैं। वषटकारच्च भनयेत ॥३१॥ प० ऋ०-(च) तथा [ वषटकारात्] वषटकार करने से मन- येत होता शेष सोम का पूर्व भक्षण करे। सं०-वषट कार समान हवन एवं सोमाभिषद दोनों को सोम- भक्षरण का निमित्त कथन किया जाता है। होमाऽभिषवाभ्यां च ॥३२॥ 40०-च] और (होमामिषवाभ्यां) होम और अभिषव यह दोनों भी भक्षण निमित्त है। सं० वषट कचों का वषट्कार के लिये चमसों में स्तेय भक्षण के लिये पूर्व पक्ष करते हैं। प्रत्यक्षोपदेशाच्चमसानामव्यक्तः शेषे ॥३३॥ ५० - चमसानां] चमसों के भक्षण में अनिमित्त है क्यों- कि[प्रत्यक्षोप देशात] उनके मक्षण में चमसिया निमित्त कही गई हैं और [अव्यक्तः] वषट्कर्चा प्रथम मक्ष यह वाक्य शेषे] LY -- चाल से अलग ग्रहों के भक्षण में है। रक-पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं। स्याद्वाकारण भावादनिर्देशश्चमसानां कतु स्त. द्वचनत्वात् ॥३४॥ ५० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष के खण्डन के लिये प्राया है (स्यात् ) बष्टकारादि मी चमतों के अक्षण में निमित्त है क्योंकि (कारण भावात्) बह कारखा रूप कहे गये हैं और (चमसानी) चमस मन में (कर्तुः ) चमसियों का ( अनिर्देशः) निमित रूप से कथन न मिलने से (तद्वचनत्वात्) 'यथाचमसं वाक्या सब चमसियों के भागा का विधान करता है और अन्य का निबन्लेक मी नहीं है। सं०--उतार्थ में लक्षण करते हैं। चमसे चान्यदर्शनात् ॥३५॥ प० 0-(च) और (अन्य दर्शनात्) चमसाध्वर्यु द्वारा वष्ट- कत्तों के प्रति चासों का दान मिलने से (चमसे ) बबट्रकों आदि का वषट् कार आदि निमित्तक चमस में सोम मरण एकपात्रे क्रमादध्वयुः पूर्वो भक्षयेत् ॥३६॥ सं-अब अधिक भक्षण के अधिकारी होने से प्रथम होता के मक्षण को कहते हैं। प० ०-(एक पात्रे) एकही पात्र में होता और ऋत्विजों के भक्षण की विधि होने से (अध्वर्गः ) अध्वयु नामक ऋत्विक (पूर्वः) प्रथम ( भक्षयेत्) खावे क्योंकि (कमात्) क्रम पाये जाने से सं०. इसका समाधान करते हैं। होता वा मन्त्रवर्णात् ॥३७॥ १० ऋ०-(वा) पूर्व पक्ष के हटाने को आया है (होता) होता को पूर्व भक्षण कर्तव्य है कारण कि ( मन्त्र वर्णात ) वेदों में ऐसा ही है। संग--इसमें हेतु देते हैं। वचनाच्च॥३०॥ १० ऋ०--(च) और (वचनात् ) वाक्य विशेष से भी कथित अर्थ की पुष्टि होती है। संo इस अर्थ में हेतु यह है कि कारणानु पूर्याच्च ॥३९॥ प० ऋ०-- च ) तथा [ कारणानु पूर्व्यात् ) कारण कर्म से भी उस अर्थ की सिद्धि है सं0-अनुज्ञा पूर्वक सोम भक्षण निरूपण करते हैं। वचनादनुज्ञातभक्षणम् ॥४०॥ प० - [अनुज्ञात भक्षणं] अनुज्ञा प्राप्त सोम का भक्षण करना (वचनात् ) वाक्य द्वारा भी मिलता है। सं०-वेद मन्त्र द्वारा अनुज्ञा का निरूपण करते हैं। तदुपहूत उपह्णयस्वेत्यनेनानुज्ञापयेल्लिङ्गात ॥

घ) -(तत्) सोम भक्षण का (उमहत उपयस्वेत्यनुज्ञा- पयेत् ) उपहत उपलयस्व' मन्त्र से अनुज्ञापन करे क्योंकि (लिंगात्) मन्त्र में अनुज्ञापन की शक्ति है। सं०- अनुज्ञा के समान प्रति वचन का भी वैदिक वाक्य से होना निरूपण करते है। तत्रार्थात्प्रतिवचनम् ॥४२॥ १० O-[तत्र] बेद मन्त्र से प्रति वचनं। उसका उत्तर [अर्थात) अर्थ से वेद मन्त्र द्वारा होना पाया जाता है। सं०-एक पात्र में अनेक ऋत्विक कतक भक्षण अनुज्ञा कहते हैं। तदेकपात्राणां समवायात् ॥४३॥ qe po-(तत्) सोम भक्षण अनुज्ञापन [एक पानाणां] एक में भक्षणीय (समवायात्) इसमें एक चित हो भक्षण कर्त- सं0-स्वयं यज्ञ कत्ता होने से यजमान का सोम भक्षण निरूपण करते हैं। याज्यापनयेनापनीतो भक्षः प्रवरवत् ॥४४॥ प० क्र0--(प्रवरवत् ) वरण समान [ याज्यापनये] याज्या अपनयन होने से [भक्षः] अक्षण का [न, अपनीतः] अपनयन नहीं होता। सं०-पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं यष्टुर्वा, कारणगमात ॥४५॥ ५० --[वा] पूर्वपक्ष के निराकरण के लिये आया है [यष्टु:]

(१७) भाग कत्ता यजमान को अक्षणीय कारण गमात् ] याज्या पागम से भक्षण निमित्त 'वषट कार का भी प्रागम है। -प्रवरवत् में दृष्टान्त देते हैं। प्रवृत्तत्वात्प्रवरस्थानपायः॥४६॥ 40 --[प्रवरस्य ] होता के वरणी होने का [अनपनयः] अपनय नहीं होता क्योंकि [ प्रवृत्तत्वात् ] वह प्रवृत्त हो चुकता है। सं0-फलचमस' को पागार्थ निरूपण करते है। फलचमसो नैमित्तिको भचाविकारः श्रुतिसंयो- गाद॥४७॥ ५० ऋ०-[ नैमित्तिकः ] क्षत्रिय और वैश्य के लिये बनाया फल- चमसः] फलचमस [मक्षविकारः] भक्षणीय है कारण कि [श्रुति संयोगात् ] वाक्य शेष से यही प्रमाणित होता है सं०-अब उक्त पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। इज्याविकारो वा संस्कारस्य तदर्थत्वात् ॥४८॥ ५० क्र०-[पा] पूर्वपक्ष के दूर करने को प्रयोग किया गया है। [इज्याविकारः] फलचमस बाग निमित्त है क्योंकि संस्कारस्य उसका भक्षण [तदर्थत्वात् ] याग के लिये होने से ही बन सकता है। सं-- इसमें हेतु देते हैं। होमात् ॥४९॥ ।

पए ( होमात ) होम का अनुवाद पाने से वह सिद्धार्थ भ TEL सं०-इसमें हेतु देते हैं। चमसैश्च तुल्यकालत्वात् ॥५०॥ १० ऋ० (च तथा (चमसैः) चमसौ द्वारा ( तुल्य काल- स्वात् ) फल चमस के उठाने का एक ही समय होने से भी वह प्रमाणित होता है। सं0-उतार्थ में लक्षण कथन करते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥५१॥ प० क्र0-(च) तथा (लिङ्गदर्शनात् ) लिङ्ग के पाये जाने से भी वह अर्थ सिद्ध होता है। सं०-'दशपेय' संज्ञक यज्ञ में सोम भक्षणार्थ यजमान चमस के प्रति लिये “दश ब्राह्मणों का चलकर जाना" कहते हैं। अनुप्रसर्पिषु सामान्यात् ॥५२॥ प० क्र0-(अनुप्रसषु ) यजमान चमस प्रति मक्षण के लिये दश क्षत्रिय होने चाहिये (सामान्यात) ऐसा होने से यजमान के से साथ एक जातित्व की प्राप्ति है। सं-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। ब्राह्मणा वा तुल्यशब्दत्वात् ॥५३॥ ५० क्र0--(वा) पूर्वपक्ष के निराकरण के लिये पाया है (प्रा. हाणा ) यजमान चमस के लिये अनुमसर्पणा कर्ता ब्राह्मण हो न कि क्षत्रिय क्योंकि (तुल्य शब्द त्वात् ) उसका एक ब्राह्मण शब्द

से उपन्यास किये जाने से
इति मीमांसा दर्शने तृतीयाध्याये पञ्चमः पादः समाप्तः ।।
अथ तृतीयाध्याये षष्ठः पादः प्रारभ्यते ।
सं0-सुतादि पदार्थ खैर इत्यादि लकड़ी के होने योग्य हैं अतः
पूर्वपक्ष करते हैं।
सर्वार्थमप्रकरणात् ॥१॥
प० 0-(सर्वार्थम) प्रकृति तथा विकृती दोनों यागों में खैर
की लकड़ी के न वादि पदार्थ बनाने का विधान है ( अप्रकर-
रणात् ) यह
किसी पाठ में नहीं पढ़ा गया है।
सं0-इसका समाधान करते हैं।
प्रकृतौ वाद्विरुक्तत्वात् ॥२॥
40 ---(वा) पूर्वपक्ष निराकरणार्थ आया है ( प्रकृती) दर्श
पूर्ण मास यागों में (द्विरुक्तत्वात् ) द्विरुक्ति प्राप्ति होने से
सं०-पुनः पूर्वपक्ष करते हैं।
तजं तु वचनप्राप्ते ॥३॥
१० ऋ०--(तु ) पूर्वपक्ष को सूचित करता है (तद्वर्ज) अप्रकरण
पठित को छोड़ कर (वचन प्राप्ते ) जो विधि पूर्वक प्रकृति याग
में होता है उसमें प्रेरक वाक्य की प्रवृत्ति से भी।
सं०-उक्त पूर्वपक्ष में सिद्धान्ती की आशंका यह है ।
दर्शनादिति चेत् ॥४॥

(१०) 40 0-(दर्शनात ) प्रकृति में विकृति के धर्म योग से सर्वत्र प्रेरक वाक्य में प्रवृत्ति प्रमाणित होती है (वेत् ) यदि (इति) कहा जावे तो असमीचीन है। सं०-- सिद्धान्त बादी की आशंका का पूर्व पक्षी समाधान करता TO 5 day न चौदनैकार्थ्यात् ॥५॥ (न) यह काम ठीक नहीं है ( चोदनै कार्यात ) प्रकृति और विकृति दोनों यागों में एक सी ही विधि होने से। सं०-सिद्धान्ती की पुनः अाशंका। उत्पचिरिति चेत् ॥६॥ प० ३0--(उत्पत्तिः) विधि वाक्य पूर्वक सम्पूर्ण धर्मों का प्रकृति याग से साक्षात् स्वामाविक सम्बन्ध होने से (चेत् ) यदि (इति) माना जावे तो असमीवीन है। सं०-इस पूर्व पक्ष का यह समाधान है। न तुल्यत्वात् ॥७॥ ५० ऋ०-(न) यह कथन ठीक नहीं (तुल्यवत् ) वह धर्म प्रकृति और विकृति दोनों में समान रूप से विहित है। सं०-इस पक्ष का सिद्धान्ती द्वारा समाधान । चोदनार्थकात्स्याच मुख्यविप्रतिषेधात्मक- त्यर्थः ॥८॥ ५० ऋ०-(तु) पूर्व पक्ष की हानि के निमित्त है ( प्रकृत्यर्थः)

(१६१)
प्रकृति योग के लिये विधान न कि विकृति के निमित्त होने से
( चोदना कात्स्नात) प्रेरक वाक्य से सर्व धर्म मिलने से
( मुख्य विषति षेधात् ) दोनों के विधायक हैं इसमें दोष
आता है।
सं०- विकृति याम में सामधेन्यिों की सप्तदश संख्या का
निरूपण।
प्रकरणविशेषात्तु विकृतौ विरोधि स्यात् ॥९॥
REAM
(तु) शब्द सिद्धान्त सूचना के लिये है (विरोधि)
सामोनियों की पञ्चदश संख्या की प्रतिद्वन्दी सप्तदश संख्या
(विकृतौ ) विकृत यज्ञ में (स्यात् ) विहित है न कि प्रकृति याग
में ( प्रकरण विशेषात् ) उस में पञ्च दश संख्या पाती है।
सं०-सामधेनियों के सप्तदश नैमित्तिक सप्तदश नैमित्तक
प्रकृति विधान निरूपण करते हैं।
नैमित्तिक तु प्रकृतौ तद्विकारः संयोगाविशे-
षात् ॥१०॥
५० ऋ०-(तु) सिद्धान्त सूचनार्थ प्रयोग हुआ है । (नैमित्तिक)
वैश्य निमित्तक विहित सप्तदश सामधेनियों का (प्रकृतौ) प्रकृति
याग में होने से वह सप्तदश सामधेनियें (संयोग विशेषात् )
वाक्य विशेष से विहित होने के कारण [तद्विकारः] पूर्व विहित
पंच दश सामधेनियों का बाधक है।
सं०-अब अग्न्या धान को 'पवमान आदि इष्टियों का अंगन
होना प्रमाणित करते हैं।
इष्टयर्थमग्न्याधेयं प्रकरणात् ॥११॥

400-(अग्नाधेय) अग्नाधान ( इयर्थ) पवमान आदि इष्टियों का श्रङ्ग है क्योंकि (प्रकरणात) उनके प्रकरण से उसका विधान होने से। सं०-अब पूर्वपक्ष करते हैं न वा तास तदर्थत्वात् ॥१२॥ प००-वा) पूर्वपक्ष के खण्डनार्थ प्रयोग है (न) कहना ठीक नहीं क्योंकि ( तासां) वे इष्टियां (तदर्थत्वात ) आहव-- नीय आदि अग्नियों के संस्कार के लिये विधान की गई हैं। सं०-अब इसमें लक्षण प्रमाणित करते हैं। लिंगदर्शनाच्च ॥१३॥ ५० ऋ०-(च) तथा (लिङ्गदर्शनात् ) उसके लक्षण मिलने से मी अर्थ की प्रामाणिकता है। सं०- अग्न्याधान को विकृति तथा प्रकृति सब पैदिक कर्मों का पूर्वपक्ष करते हैं। तत्प्रकृत्यर्थं यथान्येऽनारभ्यमादाः ॥१४॥ १० क्र0-(यथा) जिस प्रकार (अनारभ्यवादाः ) अप्रकरण पठित आदि वाक्य विहित बताये गये हैं (अन्ये) खादिरत्वादि धर्म प्रकृति याग के लिये हैं उसी प्रकार (तत्) अग्न्याधान भी ( प्रकृप्यर्थ ) प्रकृति याग निमित्त है। सं०-पूर्वपक्ष का समाधान किया जाता है। सर्मार्थ वाऽऽधानस्य स्वकालत्वात् ॥१५॥ प० ऋ०-(वा) शब्द पूर्वपक्ष के खण्डन के लिये आया है

( सर्वार्थ ) अन्याधान प्रकृति विकृति दोनों कर्मो के निमित है
(प्राधानस्य स्वकालत्वात्) क्योंकि उसका आधान समय नियत है ।
सं०-पावमान इष्टि प्रसिद्ध अग्नि में कत व्यता निरूपण
करते हैं।
तासामग्निः प्रकृतितः प्रयाजवत्स्यात् ।।१६।।
५० क०-(प्रयाजवत् ) जिस प्रकार प्रयाज नामक होम
( प्रकृतितः ) 'दर्शपूर्णमास' यज्ञ से होने वाले 'पाहवनीय' प्रादि
सिद्ध अग्नि में होते हैं उसी भांति ( तासां ) 'पवमान', इष्टियां भी
(अग्निः ) उस सिद्धाग्नि में ही ( स्यात् ) होनी समीचीन हैं।
सं०-पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं।
न वा तासां तदर्थत्वात् ।।१७।।
५० का-(वा) शब्द पूर्वपक्ष के दूर करने को प्रयोग किया
गया है ( न ) वह वक्तव्य ठीक नहीं क्योंकि ( तासां ) 'पवमान'
इथियां ( तदर्णत्वान् ) अग्नि संस्कारार्थ विहित बतलाई हैं।
सं०-उपाकरणा' आदि को अग्नीषोमीय पशु का धर्म प्रमा-
गित करने के लिये पूर्वपक्ष करते हैं ।
तुल्यः सर्वेषां पशुविधिः प्रकरणाविशेषात् ॥१८॥
-(पशुविधिः) पशु-उमेश्य से विहित उपाकरण प्रादि
विधियां अथवा धर्म ( सर्वेषां) सब अग्निषोमीय पशुओं के (तुल्यः)
सदृश हैं क्योंकि ( प्रकरणाविशेषात् ) प्रकरण से सब पशुओं से
समान सम्बन्ध मिलता है।
सं०-पुन: पूर्व पक्ष करते हैं।
स्थानाच्च पूर्वस्य ॥१६॥

i R प० ०-(क) एच 'तु' शब्दार्थ में आने से पूर्व पक्ष का द्योतन करता है ( पूर्वस्य ) वे धर्म अग्नीषोमीय के हैं क्योंकि (स्थानात् ) उनकी सन्निधि में पाठ होने से । सं०---तृतीय पूर्व पक्ष किया जाता है । श्वस्त्वेकेषां तत्र प्राश तिगुणार्था ॥२०॥ पू० क०-'तु' पूर्व पक्ष की सूचना दी है (श्वः) वह धर्भ सननीय पशु के हैं ( एकेषां ) शाखान्तर में उनका सम्बन्ध होने से ( तत्र) उन धर्मों का ( प्राक् श्रुलिः ) जो सौत्य दिवस से पूर्व प्रथम प्रोप- वस्थ्य दिवस में श्रवण है ( गुरणार्थी ) वह गौरण है। सं0-इस अर्थ में आशंका करते हैं। तेनोत्कृष्टश्य बालविधिरिति चेत् ॥२१॥ प० ऋ०--(तेन ) आश्विन वाक्य में (उत्कृष्टस्य ) उत्तर कृत्य सवनीय पशु का ( कालविधिः ) अनुष्ठान विहित है ( चेत् ) यदि ( इति) ऐसा कथन समीचीन नहीं । सं०-आशंका का परिहार करते हैं। नैकदेशत्वात् ॥२२॥ -(न) पूर्वोक्त कथन ठीक नहीं कारण कि (एकदेश- त्वात् ) एकदेशीय विधान से समुदाय को विहित बतलाया है। सं०-पुनः आशंका करते हैं। अर्थेनेति चेत । २३॥ ५० ऋ० – ( प्रर्थन ) सब का अर्थ से ग्रहण होने से न कि साक्षात् ( चेत् ) यदि ( इति ) ऐसा कहो तो ठीक नहीं । सं०-अाशंका का परिहार करते हैं।

(१६५) न अतिविप्रतिषेधात् ॥२४॥ प० -(न) वह कथन समीचीन नहीं कारण कि (अति- विप्रतिषेधात् ) ऐसा मानना साक्षात् अति का विरोधक है। सं--पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। स्थानात्तु पूर्वस्य संस्कारस्य तदर्थत्वात् ॥२५॥ ५००० --'तु पूर्व पक्ष का निराकरण करता है। ( पूर्वस्य । बे धर्म अग्निषोत्रीय पशु के विधान किये हैं क्योंकि ( स्थानात ) सन्निधि प्रमाण ऐसा हो है और (सस्कारस्य) सस्कार मात्र को (तदर्थत्वात् ) अग्निषोभीय पशु के लिये होने से उक्त अर्थ की सिद्धि होती है। सं० --उनार्थ में लिङ्ग कहते हैं । लिंगदर्शनाच्च ॥२६॥ प० ०-(च) तथा लिङ्गदर्शनात्) प्रमाण चिन्ह से भी उक्त अर्थ की सिद्धि है। सं-'अश्विन' और 'पुरोडाशेन" उभय वाक्य अर्थवाद हैं काल विधायक के नहीं इसका उत्तर- अचोदना गुणार्थेन ॥२७॥ ५० ---( गुरणार्थेन) दोनों वाक्य को (अर्थवादत्य) होने से (अचोदना ) काल लाभ नहीं कहा जा सकता। स -'शाखा-हरण' को सायं प्रातः दोनों 'दोहों का धर्म बतलाते हैं। दोहयोः कालभेदादसंयुक्त श्रुतं स्यात् ॥२८॥ ५० ऋ० -( श्रुतं) दर्शपौरणंमास याग में सुने गये 'शाखा- (१९६) हरण' मादि (दोहयोः ) सायं प्रातः दोनों समय दूध दुहने के (असंयुक्तं ) धर्म नहीं हैं क्योंकि (कालभेदात्) उनके काल का ७ उक्त पक्ष का समाधान यह है। प्रकारणाविभागाद्वा तत्संयुक्तस्य कालशास्त्रम् ! २६॥ ५००-(वा) पूर्वपक्ष के निराकरण के लिये आया है (कालशास्त्र) दूध दुहने का विधान मारने वाला शास्त्र (तत्संयुक्तस्य) सायं प्रातः दोनों समय का विधायक है कि सायं काल दोहन का क्योंकि (प्रकरणाविभागात) प्रकार कोनों का सम्बन्ध है। तद्वत्सबनान्तरे अहाम्जनम् ॥३०॥ 4390 ---( तद्वत् । दूध दुहने के धमे समान ही (अहाम्नानम्) ग्रह धर्मानुष्ठान ( सवनान्तरे ) प्रातः सवन के पश्चात् मध्यन्दिन तथा सायं सवन में होता है। स० -- रशनावेष्टन' ( रस्सी लपेटना ) श्रादि धमों का अग्नी- षोमीय प्रादि तीनों पशुओं में अनुष्ठान कहते हैं। रानाच लिंगदर्शनात ॥३०॥ प० ---(-) और (रशना) नावेष्टनादि श्री अग्नी- षोमोय प्रादि तोनों शाम के धर्म है कि (लिमकान त् लक्षणों से ऐसा ही प्रतीत होता है। स० -244 का शु' तथा 'दा' नामक ग्रहों का धर्म बतलाने के लिन करते हैं। प्रासचिव अभयुक मितरैः अन्तिम ॥३॥ ५०० ---(या। प्रकरण , मट) नोभान होने से ( १९७ ) 'अ' और 'अदा' उभय पात्रों का (इतर:) ऐन्द्रवायवादि ग्रह धर्मों के साथ ( असंयुक्तं ) सम्बन्ध नहीं क्योंकि ( असन्निधानात ) ग्रह धर्मों का उसके समोप में विधान नहीं मिलता। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। संयुक्त वा तदर्थत्वाच्छेषस्य तन्निमित्तल्वात् ॥३३ प०क-(बा) पूर्व पक्ष के हटाने को है। (संयुक्त) संमार्जन प्रादि धर्मों का दोनों ग्रहों के साथ सम्बन्ध है क्योंकि (तदर्थत्वात् ) वह ग्रह मात्र के लिये विहित है और ( शेषस्य ) ग्रह धर्मों का ( तन्निमित्तत्वात् ) ग्रह मात्रोद्देश्य से विधान योग्य है। सं०---उक्तार्थ में हेतु देते हैं। निर्देशाद् व्यवतिष्ठेत ॥३४॥ -(निर्देशात्) उक्त विहित वाक्यों द्वारा भी (व्यच- तिष्ठेत् ) उक्त धर्मों का ग्रहमात्र से सम्बन्ध मिलता है। सं०-अखण्डत्वादि' वाक्य को अप्रकरण पठित चित्रिणी' मादि इष्टिकाओं ( ईटों) का धर्म बतलाते हैं। अग्न्यंगमप्रकरणे तद्वत् ॥३५॥ प० ऋ०-( तद्वत् ) प्रप्रकरण पठित 'पशु' और 'प्रदाभ्य' के सम्माजन धर्म होते हैं उसी प्रकार (अप्रकरणे) अप्रकरण पठित चित्रिणी आदि ईटों के भी (अन्यङ्ग) अग्निचयन प्रकरण में पढ़े गये अखण्डत्वादि धर्म समझने चाहिये। सं०-'अभिषव' आदि को सोमपात्र का धर्म कहते हैं। नैमित्तिकमतुल्यत्वादसमानविधानं स्यात् ॥३६॥ प० -(नैमित्तिकं) फलचमस (असमानविधान) प०क- (१९८६) सोम समान अभिषक आदि श्री का विधान नहीं (स्यात् ) हो सकता क्योंकि ( अतुल्यत्वात् ) वह सोन के समान नहीं है। सलीबार' आदि प्रतिनिधियों में जो आदि मुख्य द्रव्यों का भवान' आदि धर्मों का अनुष्ठान बतलाते हैं। চায়নি বইও प००-() शब्द 'तु' स्थानीय होने से पूर्व पक्ष का द्योतक है ( तद्वत् ) नैमित्तिक फल चमस' अभिषा भादि धर्मवान् नहीं অলী চাক্ষাৎ ( মলিলি:ি লীনাং া িরিলিজ = শ্রী মঞ্চায় आदि धर्मवान् नहीं। सं०-इस पूर्वपक्ष का समाधान किया जाला है। तहत् प्रयोजनकत्वाद ॥३॥ प० ---(तद्वत् 'बीहि' प्रादि के समान नीवादि के भी अवधान धर्म होते हैं क्योंकि (प्रयोजनकत्वात्) दोनों का याग सिद्धि तात्पर्य समान ही है। सं०-इस अर्थ में हेतु देते हैं। अर्थलक्षणत्वाच्च ॥३६॥ ५० ऋ०-(च) और ( अर्थलक्षणत्वात् ) अर्थापत्ति प्रमाण से भी उक्त अथं की प्रामाणिकता है। सं०--प्रतिनिधि बतलाने वाली शातियों का नियम बतलाते हैं। नियमार्था गुणश्र तिः ॥४०॥ ५० ऋ०--(गुणश्रुतिः ) प्रतिनिधि को विधान बाली श्रुतियां (नियमा) उक्त नियम के निमित्त हैं। सं०-अब 'दीक्षणीय' आदि को अग्निष्टोम याग का अंग बतलाते हैं।

( १९९)
संस्थास्तु समान विधानाः प्रबरबाविशेषात् ॥४१||
प० क्र०'तु पूर्वपक्ष का सूचक है। (संस्थाः) सात यज्ञों की
(समानविक्षामा) दीक्षणीय आदि इष्टियां अग हैं श्योंकि (प्रकरणा-
विशेषात) सब का एक ही प्रकरण है।
----उक्त अर्थ में युक्ति देते हैं।
व्यपदेशश्च तुल्यवत् । ४३॥
५००-(ब) और ( तुल्यबत् ) समान रूप से (व्यपदेशः)
सब संस्थानों का उन्त यज्ञ के प्रकरण में कया है।
सं०----इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं।
विकारास्तु कामसंयोगे नित्यस्थ समत्वात् ।।४।।
'तु' पूर्वपक्ष के दूर करने को पाया है। (विकारा:)
उपशा माहितीनों संस्थायें अग्निष्टोम का विकार हैं क्योंकि (काम
संयोगे) पशु आदि फल की कामना के सम्बन्ध से विधान मिलता है
अतः (नित्यस्य) नित्य अनिष्टोम संस्था के (समत्वात्) एक बराबर
होने पर भी उनमें दीक्षणीय प्रादि काग रूप से विधान नहीं
किया गया ऐसा समझना चाहिये।
सं०-अब "व्यपदेशश्च तुल्यवत्" सूत्र में कथित युक्ति का
समाधान किया जाता है।
अपि वा द्विरुक्तत्वात्प्रकृतेर्भविष्यन्तीति॥४४॥
प० -(अपि वा ) अथवा ( द्विरुक्तत्वात् ) द्विरुक्त होने से
उक्त इष्टियां (प्रकृतेः) प्रकृति ज्योतिष्टोम की ही ग (भविष्यन्ति
इति) होंगी।
बचानात्तु समुच्चयः ॥४॥

१०-'तु' व्यावृति निमित्त प्रयोग है। (बचनात) "अचम्निष्टोम" आदि वचनों से ( समुच्चयः ) अग्निष्टोम एवं কাজ চাৰি । এই গুলি ফাহ মালু ফুল সকল বই मिलता है उनका समान विधान नहीं पाया जाता। संखडक्लार्थ में युक्ति देते हैं। प्रतिषेधारुच पूर्वलिंगानाम् ॥४६॥ ५० (च) और (पूलिंगानाम ) पूर्व करणीय हवनों का ( प्रतिशेधात् ) 'उनथ्य' आदि में निषेध मिलने से भी वह अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। सं०-ज्योतिष्टोम याग एक है उसको सात संस्था किस प्रकार हो सकती हैं। गुणविशेषादेकस्य व्यपदेशः ॥४७॥ प -(गुणविशेषात् ) स्तोत्रादि रूप गुण विशेष के भेद से ( एकस्य ) एक ही ज्योतिष्टोम का ( व्यपदेशः) सात संस्थानों द्वारा वर्णन है। इति मीमांसादर्शने तृतीयाध्याये षष्ठः पादः समाप्तः ।

अथ तृतीयाध्याये सप्तमः पादः प्रारभ्यते। सं०-वेदि और 'बहि' इत्यादि एव उनके धर्मों को प्रग सहित दर्शपर्णमास यज्ञ के धर्म बतलाने के लिये पूर्व पक्ष करते हैं । प्रकरण विशेषादसंयुक्त प्रधानस्य ॥१॥ ५० क्र.---(प्रधानस्य) 'वेदि' आदि प्रधान यज्ञ के धर्म हैं न कि अंगों के, कारण कि ( प्रकरणविशेषात् ) प्रकरण की विशेषता से (असंयुक्तम् ) उनका अंगों के साथ सम्बन्ध नहीं है। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं । सर्वेषां वा शेषस्थातल्पयूक्तवाद ॥२॥ प० क्र० - (वा) पूर्व पक्ष के निराकरण के लिये आया है (सर्वेषां) वेदि आदिक प्रधान तथा अंग सब के धर्म हैं कारण कि (शेषस्य) धर्म-धर्मि भाव का (प्रतत्प्रयुक्तत्वात् ) नियम बांधने वाला वाक्य है प्रकरण नहीं। सं०-अब इस अर्थ में शंका करते हैं। श्रारादपीति चेत् ॥३॥ प० क्र --(पारात् अपि) प्रधान यज्ञके साथ पढ़े जाने से 'पिण्ड पितृ यज्ञ' के भी 'वेदि' आदि धर्म होंगे ( चेत् ) यदि ( इति ) ऐसा २०२) पत्र--- महा जा सके तो यह कथन उपयुक्त नहीं । सं--- 2----उक्त माशंका का निराकरण करते हैं। न तद्वाक्यं हि तदर्थत्वात् ॥४॥ ५० ---(न) ऐसा कथन ठीक नहीं (हि) कयोंकि (तद्वाक्यो) वह वाक्य (तदर्थत्वात्) प्रधान एवं दोनों के लिये 'वेदि आदि का विधान करता है। सं०-उक्तार्थ में लक्षण कहते हैं। लिगदर्शनाच्च ।। (च) तथा ( लिंगदर्शनात् । चिन्ह मिलने से भी उक्तार्थ प्रमाणित होता है। सं०--यजमान द्वारा 'वपन प्रादि संस्कारों को प्रधान यज्ञ का अंग कहते हैं। फला संयोगातु स्वाभियुक्त प्रधानस्थ ॥६॥ प० क-(तु) पूर्वाधिकरण से विभिन्नता सूचका है (स्वामि- युक्त) यजमान सम्बन्धी संस्कार कर्म (प्रधानस्य) प्रधान यज्ञ का नंग है क्योंकि (कलसंयोगात्) उनका फल के साथ सम्बन्ध हैं। सं० -'सौमिकी' नामक वेदि को प्रधान एवं गौरण दोनों कर्मों का अंग कहते हैं। चिकीर्षया च संयोगात ॥७॥ ५० --(च) तथा सौमिकी संज्ञक बेदि प्रधान कर्माग है कारण कि ( चिकीर्षया) कम की इच्छा द्वारा (संयोगात् ) उसका उसी से सम्बन्ध है।

(२०३ ) 3- सं.---'अभिमर्शन' प्रधान एवं अंग दोनों प्रकरण के कामों का अंग है अतः पूर्वपक्ष करते हैं। तथाऽभिधानेना (तथा) जिस ऑति सौमिकी' प्रधान कांग है उसी भांति 'अभिमर्शन' भी प्रधान आहुति का अंग है क्योंकि (अभिधानेन ) उसका कथन मिलता है। -इस पूर्वपक्ष का समाधान किया जाता है। ताकते तु हलविस्तस्मात्सर्वचिकीर्षा स्यात् ।।६।। ५० ऋ०--(तु ) पूर्व पक्ष का हटाने वाला है । (फलश्रुतिः) फल साधना के सुने जाने से (लघुते ) अग युक्त प्रधान में पाये जाने ले (तस्मात्) भतएव (सर्वाचिकीर्षा) 'इति शक्ष्यामहे' चादि अंग एवं प्रधान सबा की इच्छा (स्यात) है न कि प्रधान की ही। सं-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। হাখা গজালাক্সিমাজু ? प० ० ---(अभिवानम्) 'चतुर्होत्रा' प्राद शाक्य में जो अभिः मर्शन का विधान पाया जाता है वह । सर्वार्थ) प्रग-प्रधान दोनों के निमित्त है क्योंकि (गुणाभिधानात् ) उनमें पौर्णमासी अमावस्या पद से काल का प्रवचन मिलता है न कि बाहुति का। सं०---दीक्षा तथा दक्षिणा को प्रधान कर्म का अंग कहा है। दीक्षादक्षिणं तु वचनाप्रधानस्य ॥११॥ प. क्र.---'तु' पूर्वाधिकरण से विभिन्नता सूचक प्रयोग है। (दीक्षादक्षिणं) दीक्षा तथा दक्षिणा (प्रधानस्य) प्रधान कर्म का अंग है कारण कि (वचनात्) वाक्य से इसी प्रकार प्रतीत होता है ।

व maas ---- इसमें युक्ति यह है। निवृत्तिदर्शनाच्च ॥१२॥ प० ऋ०-(च) और (निवृत्तिदर्शनात) निरूढ़ पशु बन्ध संज्ञक यज्ञ में दीक्षा की निवृत्ति से बह अर्थ सिद्ध होता है। सं0-... वेदि' तथा यूप की गाता प्रमाणित करने को पूर्व- पक्ष करते हैं। तथा यूपस्य वेदिः ॥१३॥ प० ०-(तथा) वाक्य विशेष से दीक्षा और दक्षिणा प्रधान कर्म का अंग है उसी प्रकार (बेदिः) वेदि भी यूप का अंग है। सं०-इसका समाधान करते हैं। देशमात्र वा शिष्टेनैकवाक्यत्वात् ।।१४।। -(बा) पूर्व पक्ष के हटाने को पाया है (देशमात्र) अर्धमन्तर्वेदि शब्द देश मात्र का उपलक्षण है कारण कि (अशिष्टेन) उसकी अद्ध बहिर्वेदि के साथ (एकवाक्यत्वात) एक- वाक्यता है। सं० हविर्धान संज्ञक छकड़े (शकट) को सामधेनियों की अनङ्गता के लिये पूर्वपक्ष करते हैं। सामिधेनीस्वदन्याहुरिति हविर्भानयोर्वचना- त्सामिधेनीनाम् ॥१५॥ प० ०---(हविर्धानयोः) हविर्भान शकट के भीतर जहां सोम कूटा जाता है वह (सामिधेनीनां) सामिधेनियों का अंग है क्योंकि ( सामिधेनीस्तदन्वाहुरिति ) इस ( वचनात् ) वाक्य से विदित होता है। प००-- ( २०५) सं०-पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं देशमात्र वा प्रत्यक्षं गर्थकर्म सोमस्य ॥१६॥ प० ऋ०--(बा) शब्द पूर्वपक्ष के दूर करने को पाया है (देश मात्र) यह शकट अपने से सम्बन्धि देश विशेष का उपलक्षण है (हि) क्योंकि वह (सोमस्य) ज्योतिष्टोम याग का (अर्थकम) अंग (प्रत्यक्ष)स्पष्ट है। सं०--इस अर्थ में समर्थक हेतु देते हैं। समाख्यानं च तद्धत् ॥१७॥ प० ऋ०-(च) और (तत्) से शकटसंज्ञक पद देश विशेष का उपलक्षण हैं । उमओ भांति (माख्यान) हविर्धान का अग कथन करना भी उस अर्थ का साधक है। सं0----ऋत्विाओं द्वारा अंग कर्मों का अनुष्ठान बतलाने के लिये प्रधान कर्म अनुष्ठान की यजमान-शर्तव्यता के लिये कहते हैं। शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लाहलात् तस्मात् स्वयं प्रयोगे स्यात् ॥१८॥ -(शास्त्रकल) शास्त्र विहित अग्निहोत्रादि कर्मों के फल (प्रयोक्तरि) अनुष्ठान कर्ता में होता है, क्योंकि (तल्लक्षणत्वात्) उसका फल उसी को मिलता है (तस्मात्) अत: (प्रयोगे) उनके करने में (स्वयं) पार ही (स्थात्) अनुष्ठान करना चाहिये। -अन्य भी मांग कर्मों का अनुमान होता है कहते हुए पूर्व पक्ष करते हैं। उत्सर्ग तु प्रधानत्वाच्छेष हारी प्रधानस्य तस्मादन्यः स्वयं वा स्यात् ॥१६॥ सं० Om- २०६) ना @mare ५० %--(तु) पूर्व पक्ष सूचनार्थ पाया है (उत्सर्गे) दक्षिणा में (प्रधानस्य) यजमान का (प्रधानत्व त्) मुख्यत्व अपेक्षित है सर्वत्र नहीं अतः (शेष कारी) दक्षिणा के सिवाय यावत् अंगों का अनुष्ठान करने बाला (लपात्) यजमान से (अन्य:) भिन्न ऋत्विज (ar) अथवा (स्वयं) प्रापही (स्थानी होता है। पूर्व पक्ष का समाधान किया जाता है। ফাংশ্ববিদ্যালসালঘস্থা अत्यगात्मनि ॥२०॥ ५०० --'वा' पूर्व पक्ष के हटाने को प्रयोग किया है (अन्यः) यजमान के सिवाय ऋत्विज भी (स्मात्) शेषाङ्ग कर्मों के अनु- ष्ठान करने वाले होने चाहिये क्योंकि (परिक्यान्नानात्) उन कर्मों के अनुष्ठान के लिये ही ऋत्विजों का परिक्रय कहा गया है वह (प्रत्यगात्मनि) अपने आप में विप्रतिषेधात्) विरोध होने से नहीं हो सकता था। सं०----यज्ञ में कितने ऋत्वित् होने चाहिये यह कहते हैं । सत्रात्त परिमाणं स्यादनियमोऽविशेषात् ॥२१॥ ५० ऋ-(अनियमः ऋत्विकसंख्या का नियम नहीं क्योंकि (अविशेषात्) उनका विधान करने वाला वाश्य नहीं है अतएव (तत्र) अंग कर्मों के अनुष्ठान में (कत परिमारणं) उनकी संख्या (अर्थात्) कर्मानुसार (स्यात्) होनी चाहिये। सं०-पूर्व पक्ष का समाधान यह है। अपिवा अतिभेदात्पतिनामधेयं स्युः ॥२१|| -(अपिवा) यह शब्द पूर्व पक्ष का खण्डन करता है।

(२०७ ) प- (स्यु:) ज्योतिष्टोम यज्ञ में १७ ऋत्विर होते हैं क्योंकि (प्रतिनाम- यो प्रत्येक कर्तव्य कार्यानुसार हैं। (तिभेदात) उनके भिन्न २. नाम हैं। सं०-उतार्थ शंका करते हैं। एकस्य धर्मभेदादिति चेत् ॥२३॥ ५०० ---(कर्मभेदात् ) निया भेद द्वारा ( एकस्य ) एक ही ऋत्विक के अध्वयु प्रानि नाम हैं ( चेत् ) यदि ( इति ) ऐसा हैं तो ठीक नहीं। सं0-इल शंका का समाधान करते हैं। नोल्पत्ती दि ॥२४॥ -(न) उन बार ठीक नहीं (हि) निश्चयपूर्वक (उत्पत्तौ । वरण विधायक बादशा में अध्ययु' मादि १७ ऋत्विजों का वरा किया जाता है। सं-भेद से चमसाउनयु नामक सहकारी ऋत्विजों के भेद बतलाते हैं। चमसाजयवश्च तैयपदेशात् ॥२५॥ ५० ऋ०-(च) तया (चमसाध्वर्यवः ) चमसाध्वयु आदि १७ ऋत्विज भिन्न २ है (तैः ) उन १७ के साथ (व्यपदेशात् ) इल के वरण का पृथक कथन मिलता है। सं.----अब 'चभसाध्वयु'-संख्या नियत करने को पूर्व पक्ष करते हैं। उत्पत्तौ तु बहुश्रु ते। ॥२६॥ प. क्र.---'तु' पर्व पक्ष का सूचक है। चमसाध्वयु अनेक होते (१०८) e Sad DE हैं ( उत्पत्ती ) वरहा बालय से सिद्ध है (बहुश्रुतेः) क्योंकि बहुवचन से कहे गये हैं। -इस पूर्व पक्ष का समाधान यह है। दशव लिंगदर्शनात् ॥२७॥ पक०-( दशल) चमसाध्वयु दश हैं क्योंकि (लिंग- दर्शनात ) चिन्ह उनके ऐसे हैं कि दश ही होने चाहिये। 0 --- "शभिता' संज्ञक ऋत्विक का अध्वाभादि ऋत्विजों से भिन्न न होना कथन करते हैं। शमिता च शब्दभेदात् ॥२८॥ पृ० ---(च) शब्द 'तु' माद के स्थानीय प्रयोग होने से पर्व पक्ष को बतलाता है। (शमिता) शमितासंज्ञक ऋत्विक अध्वयु आदि १७ ऋत्विजों से भिन्न है क्योंकि (शब्दभेदत् ) उनसे नाम का भेद है। सं०--पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं । प्रकरणाद्वोहाच्यसंयोगात् । २३॥ ५० क्र.--'वा' शब्द पूर्व पक्ष परिहारार्थ प्रयोग हुआ है ( प्रकरणात प्रकरण में पढ़े हुए अध्वयु के प्रस्थाता आदि सहकारी पुरुषों से शमिता पृथक नहीं क्योंकि ( उत्पत्त्यसंयोगात् ) उसका भिन्न बरण वाक्य नहीं मिलता। सं०--अब उपगाता प्रध्वयु आदि ऋत्विजों से भिन्न नहीं, इसको कहते हैं। उपगाश्च लिंगदर्शनात् ॥३०॥ Paani ( २०६) प०० ---(च) तथा (उपगा:) उपगाता भी अध्वयु के भीतर हो है क्योंकि (लिगदर्शनात) उसके एक होने का चिन्ह मिलता है। सं-सोमा बेचने वाले को उन ऋत्विजों से भिन्न बतलाते हैं। बाकशी वन्यः कर्मणोऽचोदितत्वात् ॥३१॥ 'तु' शब्द पूर्व से विलक्षणता सूचक है (विक्रयो ) सोम बेचने वाला (अन्यः) अध्वयु आदि ऋत्विजों से पृथक् है कारण कि (कर्मणः | उसके कर्म सोम बेचना प्राधिका (अलोदि- तत्वात् ) विधान नहीं मिलता सं०--यज्ञ में कर्म करने वाले पुरुषों में ऋत्विक किसे कहते हैं इसको बतलाते हैं। कर्मकार्यात्सर्वेषामृत्विक्त्वमविशेषात् ॥३२॥ प० ---(सपा) मन में जितने कर्मकर्ता हैं सब ( ऋत्वि- करन) ऋत्विक कहे जाते हैं क्योंकि (अविशेषात् ) एक रूप से (कर्मकार्यात् ) विशालकृत कर्मों के करने वाले हैं ... इस पक्ष का समाधान करते हैं। नवा परिसंख्यानात् ।३३।। ५० ---(वा) पर्व पक्ष के निवृत्यर्या प्राया है (न) ऐसा बहना ठोक नहीं क्योंकि (परिसंख्यामात् । ऋत्विजों की सत्रह संख्या सुनी जाती है। सं०--इस अर्थ पर शक करते हैं। पक्षेणेति चेत् ॥३४॥ १० ऋ०---(पक्षेणं) सौम्यस्थाध्वरस्थ यज्ञकतोः सप्तदशत्विजः' इस वामय में १७ का ग्रहण एक देश के प्रयोजन के लिये हुआ है ( चेत् ) यदि ( इति ) ऐसा कहा जावे तो ठीक नहीं। सं०-पाशंका का समाधान करते हैं। - (२१०) Poontinue 1. न सर्वेषामनधिकारः॥५॥ --(ल) यह कहना समीची नहीं बोंकि (सर्वेषां) सब का (सनधिकार:) हा नहीं तलाया। अब पूर्वोक्त बामन में सप्तदबा ऋत्विज अध्ययुगादि हो को मानना चाहिये इसका निक्षम करते हैं नियमस्तु दक्षिणाभिः अतिसंयोगात् ॥३६॥ प० क-तु' शब्द नियम न होने के लिये प्रयोग किया गया है। (नियम:) सनह ऋत्विज प्रध्वयु मादि ही हैं या नहीं यह (दक्षिणाभिः) दक्षिणा वाक्य से सिद्ध है क्योंकि (अतिसंभोगात) दक्षिणाना में उनकी संज्ञा का लम्बन्ध मिलता है। सं०-इसमें हेतु देते हैं। उक्त्वा च यजमानत्वं तेषां दीक्षाविधानात् ॥३७॥ (च) एवं (यजमानत्व) सम में ल ऋत्विजों को यजमान (उक्त्वा) कहा जाकर (तेषां) तदुपरान्त ध्वयु मादि की (दोक्षाविधानात्) दीक्षा का विधान उसमर्थ से पाया जाता है। -----उन सत्रह अवयु आदि ऋत्विजों में सनहा यजमाना पक- स्वाभिसप्तदशाः कर्मसामान्यात् ॥३८॥ प० ० -- (स्वामिसप्तदशा:) उन संत्रह में सत्रहवां यजमान ऋत्विज् कहा जाता है क्योंकि (कर्मसामान्यात्) विहित कर्म का करने वाला होने से बराबर है। -यज्ञ में प्रध्वयु आदिक ऋत्विजों का नियत कर्म कथन करते हैं। ते सर्वार्थाः प्रयुक्तवादग्नयश्च स्वकालत्वात् ।।३।। प० क्र--(ते) अध्वयंप्रादि ऋत्विज् ( सर्वार्थाः) यज्ञ के अन्तर्गत सड़कों के निमित्त हैं क्योंकि प्रसुतस्बात उसके लिये ही वे नियत किये जाते हैं। इसी प्रकार (स्कालत्वात् नम: न) अधिनयों ने विषय में मो यथासमय बित होने से यह समभाना चाहिये। सं० ---पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं। পিঁয়াজু জল থইথ ক্যা হয় থাকায় খণা ! ০ --कर्मणः) काका व्यवस्था) प्ररणे . ऋत्विज के लिए नियम (स्यात) है क्योंकित (तत्सयोगात्) उसके साथ बाध्नयन प्रादि समास्या का सम्बन्ध मिलता है और संयोगस्या वह समय (अर्थवतात) निरर्थक नहीं होता। सं-सपासमा द्वारा नियम का साया तलाते हैं। तस्योपदेशसमाख्याने निर्देश ४१ प० ऋ० ---(उपदेशसमाख्यालेन) कहीं बावविशेष द्वारा (तस्य) उस कर्म का निर्देश:) लिया मिलता है। सं०. इस का लक्षणा यह है । ताहच्च लिंगदर्शनम् ॥४२॥ १० ऋ(च) तथा (तत्) पूर्वोक्त कहे अनुसार उसी भांति (लिंगदर्शनम्) लक्षण भी मिलते हैं। स-सब प्रषानुवचन को मैंत्रावरुण का कर्तव्य बतलाने के लिए पूर्व पक्ष करते हैं। प्रधाऽनुवचनं मैत्रावरुणस्योपदेशात् ॥४॥ ----(प्रषानुवचन) समरत एवं व्यस्त सब 4ष एवं अनु- वचन (मैत्रावरुणस्य) मंत्रावरुण को कर्तव्य हैं कारण कि ( उप- देशात्) बाक्यविशेष से ऐसा ही है। 10--इस पक्ष का समाधान करते हैं। पक्र० (२१२ ) न DARA Prad पुशोऽनुवाश्याधिकारी वा अपयन्निधानात् ॥४४॥ ५० ----'चा' का पूर्व पक्ष के निराकारार्थ है। (पुरोऽनु. यावयाधिकार: ) प्रेष सहित अनुवचन में मनावरण का अधिकार है सब में नहीं क्योंकि (प्रषसन्निधानात) वहां प्रेष के साथ ही अनुबन्धन का भी विधान है। स०---इस अर्थ में युक्ति देते हैं। प्रासरनुवाके चमोतृदर्शनात् । ४॥ ----(च) और (प्रात नुवा) मानुन जल रूप प्रातः पठित्त अनुवाक में (होतृवर्शनात) होता का सम्बन्ध मिलने से बह अर्थ लिद्ध होता है। सं०- अध्वयु चल-होमों का कर्ता है इसका पूर्व पक्ष उठाते हैं। चमसाँश्चमसाध्वर्यवः समाख्यानात् ।।४६ --(चमसान्) चमस होनों को ( चमसाध्वर्यवः) चमसाध्वयु करें क्योंकि (समास्यानात्) चमसाध्वयु समाख्या से ऐसा ही मिलता है। सं०----पूर्व पक्ष का समाधान किया जाता है। श्रध्वयुवा न्यायत्वात् ॥४७॥ --('वा') शब्द पूर्व पक्ष निराम लिये आया है। (अध्वयुः) चपसहोमका कर्ता मध्व है क्योंकि (तन्न्यायत्वात्) वह न्याय प्राप्त है। सं०--इस कथन के लिए युक्ति देते हैं। चमसे चान्यदर्शनात् । ४८॥ प० ऋ०--(च) और ( चमसे ) चमस-होम में ( अन्यदर्श- नात्) अन्य का सम्बन्ध मिलने से भी इस अर्थ की प्रामाणिकता है। * P प००- प०क (२१३) सं०.यदि शमसाध्वयु चमस-होम का कर्ता नहीं तो उनकी समाख्या क्यों की गई इसका समाधान करते हैं। अशनी ते प्रतीघेरन् ॥४६॥ --(अशक्ती) अश्वयु के होम करने में अशक्त होने पर (ते) चमसाध्वयु (प्रतोयेरन् । हवन करते हैं। सं०-अनेक विधि कर्मों का, जो वेदानुसार अनुष्ठेय हैं उनका वर्णन करते हैं। वेदोपदेशात्पूर्वबह दायले यथोपदेश स्युः ॥५०॥ प० --(पूर्ववत् ) पूर्ण अधिकरण के अनुसार (बेदोप- देशात् ) वैदिक समात्यानुसार वमन-होम कर्ता अध्वर्यु ही कहा जावेगा उसी प्रकार (वेदान्यत्वे) नाना वेदोक्त कमों में भी (यथो- पदेश) वैदिक विधि अनुसार (स्यु:) अनुष्य है। सं० -- साङ्ग वेदाध्ययन को शिक्षा उक्त प्रार्थ की दृढ़ता के लिये आवश्यक है, अतः उसे कहते हैं। গাট্টা स्यादधिकारसामथर्यात सहागैरव्यक्तः शेषे ॥५॥ वा)पूर्व पक्ष से विलक्षणता के द्योतक होने के लिये है (अधिकारसामर्थ्यात्) अपनी शक्ति अनुकूल है (मङ्गौः) व्याकरण प्रादि अङ्गों के (सह) सहित (तद्ग्रहणात् वेद का ग्रहण होने से ही (स्वधम :) अपने धर्म का (स्यात्) निश्चय होता है न कि किसी दूसरे प्रकार, व्याकरणादि (शेषे) अंगों को छोड़ कर वेद से (अव्यक्तः) स्पष्ट नहीं होता। इति कृते मीमांसा दर्शने तृतीयाध्याय सप्तमः पादः स्वधर्मः पक्र० (२६४) म अथ तृतीयाध्याये अष्टमः पादः प्रारभ्यते। Apps SHAS सं०-यजमान ऋत्विजों का वरण करे इसको स्पष्ट करते हैं। स्वामिहर्म परिमायाः कर्मशास्तदर्थत्वात् ॥१॥ --(परिकरः) ऋत्विों का वरण (स्वामिन) बज. লাল সূচই ফ্লাহ কি ( ফাঁহ: ) বা লবগুলাল। শুক্মী ক पक्रon an নিলিংক । A सं०-यजमान की आज्ञा से बारा कृत अवयु का कर्तव्या बतलाते हैं। जनादितरेकी स्यात् ॥३॥ प०००-(बचनात्) अजमान की याज्ञा से इतरेषां) अध्वयु नादि ऋविनों का भी (स्यात्) वह वरण होना चाहिये। सं०-वपन आदि संस्कार याजमानता के कथन के लिये हैं। संस्कारास्तु पुरुषसामथः यथावेदं कर्मचद् व्यवतिष्ठेरन् ।।३।। ५०३०.-'तुपूर्वपक्ष सूचक है (पुरुषसामर्थ्य ) अतुष्ठान योग्यता के साधन निमित्त (सस्काराः) विहित 'वन' आदि संस्कार (कम वित्) मानव प्रादि कम के समान (यथावेद) वेदानुकूल (व्यवतिष्ठेरन्) व्यवस्था होनी चाहिए। सं०-इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हैं। याजमानास्तु तत्प्रधानत्वात्कर्मवत् ॥४॥ ५० ऋ०-'तु' शब्द पूर्वपक्ष के परिहार के लिये पाया है। (कर्मवत्) प्रधान कर्म यजमान का होने से उसे याजमान कहा जाता है उसी भांति (याजमानः) केश वपन आदि संस्कार कर्म भी यजमान ही हैं कारण कि (तत्प्रधानत्वात्) वह फल भोक्ता होने से प्रधान है। सं० ---इसमें हेतु देते हैं। व्यपदेशाव ।। (च) तथा (व्यपदेशात्) क्षौर कर्म सम्बन्धी अभ्यङ्ग से इसकी सिद्धि है। संo----पूर्वार्थ के साधक का कथना करते हैं। गुपये तस्य निर्देशः ॥६॥ १०-(गुगत्वे) यजमान का धर्म होते हुए ही (तस्य) वपन भादि का (निर्देश:) विधान बनता है। सं०. में साधकान्तर बतलाते हैं। चोहना प्रति भावाच ॥७॥ प० ऋ०--(च) तथा (बोदनां प्रति) जिसके लिये विधान मिलता है उसके प्रति (भावात्) संस्कार कर्म का सद्भाव होने से भी अर्थ सिद्धि होती है। स -जैसे यजमान का कर्तव्य है उसी प्रकार समाख्यावा अध्च्यु का भी कर्तव्य क्यों न मान। अतन्यवादसमान विधानाः स्युः ॥८॥ (असमानविधाना: स्युः) वह संस्कार (वपनादि) कम अध्वयु और यजमान दोनों को समान रूप कर्तव्य नहीं हो सकते क्योंकि (अतुल्यत्वात्) दोनों एक नहीं हैं। सं०----तप याजमान कर्म हैं। तपश्च फलालिद्धित्वाल्लोकवत् ।।६ ---(च) और (तपः) वपन आदि के समान तप (व्रत) भी यजमान का कम है क्योंकि (लोकवत) लोक प्रसिद्ध परिश्रम (२१६) वर समान वह भी (फललिखित्वात) पाल सिद्धि का हेतु है। बाक्य शेष से उस नर्थ की सिद्धि पाई जाती है। वाक्यशेषश्च तद्वत् ॥१०॥ (a) और (तद्वत्) संसार के समान (वाक्यशेष:) वाक्य शेष भी उत्तार्थ का समर्थक है। सं--तको वाच्य विशेष के बल से कहीं विजों का भी पORO म वचनादितरेषाम् ॥११॥ -(बचनात्) वाक्या विशेष खल से (इतरेषां) कहीं कहीं ऋत्विजों का भी कम कहा गया तप (स्यात्) होता है। सं०-इसे ही पुनः दृढ़ करते हैं। गुणत्वाच्च वेदेन न व्यवस्था स्यात् ॥१५॥ प० ऋ०-(द) और (वेदेन) वेद सम्बन्धी प्राध्वयंच' आदि समाख्या द्वारा (व्यवस्था ) तप कर्मादि की व्यवस्था ) नहीं (ख्यात्) होती क्योंकि (गुणत्वात्) यह गौरण कम है सब का नहीं। सं-फल कामना यजमान का कर्तव्य है। तथा कामोऽर्थसंयोगात् ॥१३॥ (तथा) जिस प्रकार तप' यजमान का कम है उसी प्रकार (कामः) फलेच्छा भी यजमान को ही करनी चाहिये क्योंकि (अर्थसंयोगात्। वह उस फल का भोक्ता है । संद-इसका कुछ अपवाद कथन करते हैं। व्यपदेशादितरेषां स्यात् ।।१४।। ५० ऋ०---(व्यपदेशात्) वाक्यशेष के बल से (इतरेषां) ऋत्विज् मी (स्यात्) उक्त कामना के कर्ता होते हैं। प०कom (२१७) सं०-'तेजोऽसि तेजो मयि धेहि' मन्त्र पाठ यजमान को करना चाहिये या ऋत्विजों को। मन्त्राश्चाऽकर्मकरणास्तद्वत् ॥१५॥ प.० ऋ०-(च) और (अकर्मकरणाः ) जिन मन्त्रों में माहुति डालना आदि का विनियोग क्रियात्मक नहीं ( मन्त्राः) उन मन्त्रों का पाठ ( तहत ) कामना फल की प्राप्ति के निमित्त यजमान करे। सं० -इसमें यह युक्ति देते हैं। विप्रयोगे च दर्शनात्॥१६॥ ५००-(च) तथा (विषयोगे) प्रवास में ( दर्शनात् ) प्रार्थना-विधान मिलने से भी यह अर्थ सिद्ध होता है। सं----"वाजस्य मा प्रसव" यजुर्वेद १७१६३ का मन्त्र यजमान और अध्वयु दोनों पढ़े या क्या। याम्नाते भौ यानानस्यार्थवन्यात् ॥१७॥ प० क्र.-(द्वचारनातेषु) दो बार लिन मन्त्रों का पाठ किया जावे उनको पढ़ना ( उभी ) यजमान और अध्नयु दोनों का कर्तव्य है कि ( द्वयाम्नानस्य ) इसका दो बार आम्नान पाठ (अर्थवत्वात् ) अर्थयुक्त हो जाता है। सं0---मन्त्रार्थ वेत्ता यजमान मन्त्र पाठ करे इसे कहते हैं। ज्ञाते चबाचनं न ह्यविद्वान् विहितोऽस्ति ॥१८॥ --(ज्ञाते) मन्त्रार्थ ज्ञानी यजमान से (च) ही (वाचनं) यज्ञ में पठनीय मन्त्र पढ़वावे ( हि) क्योंकि ( विद्वान् ) मन्त्रार्थ न जानने वाला (विहितः न अस्ति) अविहित यजमान माना गया है। सं०---बारह द्वन्द्व कर्मों को करने वाला अध्वयु हो, इसे कहते हैं। go 50 - Oimam याजमाने समाख्यानात् कर्माधि याजमानं स्युः ॥१६॥ १० क..(कर्माहिए ) द्वादश संजक कम (याजमानं स्युः) यजमान को करने चाहिए (याजमाने ) बाजमान काण्ड ( খালা সঞ্জয় গুল লিলনা सं० इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं। अध्वयुवा तदर्थोहि स्याहपूर्व समाख्यानम् ॥२०॥ 402 --'ar' पूर्वापक्ष के निराकरण के लिए भाया है (अध्ययुः ) अनयुको उक्त द्वादश कर्म करने चाहिये ( हि) कारण कि (तदर्थः ) का उनके लिए हो परिय किया जाता है और ( समाख्यानम.) जो भाजपाल काण्ड में कथन है वह (न्यायपूर्व ) भी युलियुक्त है। सं०-अध्वयु के किये कर्म का अनुष्काल होता को कर्तव्य है, इसे कहते हैं। विप्रतिषेधे करणः समवायविशेषादितरमन्यस्तेषां यतो विशेष: स्यात् ।.२१॥ -(विप्रतिषेधे) अध्वर्यु तया होता से अनुष्ठान किये कर्म को "कुण्डपाविनामयनम्" संज्ञक यज्ञ में विधि वामयों से होता को करना कहा है ( करणः) अध्वर्यु से अनुष्ठान किया कर्म ही होता को करना चाहिये क्योंकि (समवायविशेषात् ) उसका उसी से सम्बन्ध है ( इतरं ) दूसरे कर्म (तेषां) होता सम्बन्धी ऋत्विजों के बीच ( अन्यः ) होता से भिन्न मैत्रावरुण' संज्ञक ऋत्विक को करना चाहिये ( यतः ) क्योंकि ( विशेषः) उसमें होता का सामीप्य रूप विशेष सम्बन्ध ( स्यात् ) है । सं०-प्रेषकर्ता से प्रषार्थकर्ता का भेद बतलाते हैं। प००--

मधु च पाधिकारात् ॥२२॥
4000 ---(च) और (प्रषेषु) का कर्ता औष' कर्म से
पृथक् है क्योंकि (पराधिकारात् ) उसका अन्य के ही लिये
सं0- अब अग्नीध्र को प्रार्थ का करने वाला बतलाते हैं।
अध्वस्तु दर्शनान् ॥२३॥
१० ----'तु' शब्द पूर्वपक्ष का सूचक है (अ) उसस
দুই কন মুলা দুমু ই না (হলার) শুদ্ধ। ৫ জুলা
सom
प००-
-इस पूर्वपक्ष का यह समाधान है।
गौठो वा धर्म सामान्यान् । २४॥
-'वा' शब्द पूर्वपक्ष का निराकरण करता है।
(गौणः) उस वाक्य में जो (अध्वर्यु: ) शब्द है वह गुण वृत्ति
से अग्नीध्र संज्ञक है कारण कि ( कर्मसामान्यात् ) उसमें कर्म करने
का धर्म पाया जाता है।
सं०-'करण' मन्त्रों में यजमान के फल की प्रार्थना करने पर
पूर्वपक्ष करते हैं।
ऋत्विककलं करोवर्थवत्वात् ॥२५॥
प000--(करणेषु) करण वाचक मन्त्रों में (ऋत्विक्फलं)
अध्वयु ऋत्विक के लिए फल की प्रार्थना समीचीन है क्योंकि
(अर्थवत्त्वात ) ऐसा होने से सार्थक होता है।
सं०----पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं।
स्वामिनो वा तदर्थत्वात् ॥२६॥

(२२) 'चा' पूर्वपक्ष के लाडना को आया है। (स्वामिनः ) यजमान के लिये काल की नार्थना है क्योंकि (तदर्थत्वात् । वही सज्ञ फल का भोगने वाला है। सं० ---इस अर्थ का यह लिङ्ग है लिगदर्शनाच्च ॥२७॥ १० ---(च) तथा (लिङ्गदर्शनात् ) लिंग माने जाने से भी उस अर्थ की सिद्धि है। सं0-इस अर्थ में एक अपवाद है उसे बतलाते हैं। काय तु फलं तेषां स्वामिनं प्रत्यर्थवत्वात् ॥२८॥ १० -तुपूर्वाधिकरण से विलक्षण मार्थ का द्योतक है (तेषां ) कहीं 'करण' मन्न में ऋत्विजों ने निज के लिए (फल) स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रार्थना की है। है वह ( काशं ) यजमान कर्म की वृद्धि के लिए है क्योंकि (स्वामिन प्रति ) अजमान के लिए (अर्थ- वत्त्वात् ) लढ़ा हुआ कर्म ही फल होता है। सं० -अब अध्वयु और यजमान दोनों के द्वारा समान प्रार्थना करने पर विचार करते हैं। व्यपदेशाच्च ॥२६॥ ५० ऋ०-(च) और ( व्यपदेशात् ) कहीं २ वाक्य विशेष से भी फल प्रार्थना का होना अध्वर्यु एवं यजमान दोनों में समान पाया जाता है। सं.-तनु द्रव्य संस्कार को प्रकृति एवं विकृति सब कर्मों के लिए है। द्रव्यसंस्कारः प्रकरणाऽविशेषात् सर्वकर्मणाम् ।।३० ।

(२२१) १० - द्रव्य संस्कार) यज्ञ उपयोगी बहि' आदि द्रव्यों के मास्तरण आदि संस्कार रूप ध ( सर्व कर्मणा ) सब कर्मों के लिए अर्थात् प्रकृति एवं विकृति दोनों को ( प्रकरणाऽविशेषात् ) সহ ই তলা না। ঐ সাহা জানা । सं-कहीं २ प्रकृति में अत्तलाये धर्मों का विकृति में असम्बन्ध Emaidos निर्देशात् विकृताचपूर्वस्याऽनाधिकारः ॥३१॥ 'तु' विलक्षणता सूचक है । (विकृती) अग्नीषोमीय पशुसंज्ञक विकृति यज्ञ में (अपूर्व ) बहि आदि के लवनादि धर्मों का ( अनधिकारः ) सम्बन्ध नहीं होता क्योंकि । निर्देशात् ) उनके कार्य प्रादि का उस विकृति में ही विधान है, दर्शपूर्णमास रूप प्रकृति में नहीं पाया जाता। सं.- विकृति और पवित्र दोनों के एक परिभोजली संजन अहिं से बनाये जाने को बतलाते हैं। विरोधच अतिविशेषादव्यक्तः शेषे ॥३२॥ ---(च.) और ( शेषे) विधृति तथा पवित्र दोनों में ( अव्यक्तः ) 'असंस्कृत बहि' का विनियोग है संस्कृत का नहीं क्योंकि ( अतिविशेषात् ) उसका दोनों में विनियोग होने से वाक्य विशेष के साथ विरोधे) निरोध हो जाता है। सं०-प्रकृति पुरोडाश के शकल का ऐन्द्रवायव-पात्र में रखा जाना बतलाते हैं। अपनयस्त्वेकदेशस्य विद्यमानसंयोगात् । ३३॥ ---(एकदेशस्य) प्राकृत पुरोडाश के एक देश का (तु) प०क निश्चय ही (मापनयः) ऐवदायन नामक पान में अपना होना योग के कारण कि दिनानसंयो) ऐसा होने से विद्यमान प्रवाल कोष्टि के उमासुधा का अनुष्ठा तलाते हैं। विकृती सर्वार्थः शोशः अतिवम् ॥३४॥ १० कर--(प्रकृतिवत् ) हर्शपूर्णमास या विधान किये शाए का (विकृती) कायोटि विकृति मा ( शेषः ) विधान किया उपांशुत्व रूप गुण भी (सार्थः) मा एवं प्रधान दोनों e -इस पक्ष का समाधान करते हैं। मुख्यायो वाऽस्थानोदितत्वात् ॥३५॥ प. oar पूर्णपक्ष के निराकरण को बाया है (मुख्यार्थः ) जांशु धर्म का विधान प्रधान के निमित्त है योंकि ( अङ्गस्या ) अङ्ग का ( प्रचोदितत्वात् ) वह धर्म विधान नहीं किया गया। सं०-नवनीत प्राज्य को 'इयेल' नामक यज्ञ के गभूत दोक्षणीस श्रादि इष्टियों का धर्म बतलाते हैं। सन्निधानविशेषादसम्भवे तदङ्गानाम् ॥३६। प० ०-(असंभवे ) श्येन' याग में प्राज्य द्रव्य का प्रस- म्भव होने से (तत्) विधान किया मक्खन घी (अङ्गानां ) उस याग का अङ्गभूत दीक्षणीय आदि इधियों का धर्म है क्योंकि ( सन्निधानविशेषात् ) उनका धर्म होने से भी उसका याग के साथ विशेष सम्बन्ध हो सकता है। इस अर्थ में साशंका करते हैं।

(२२३ ) सं Pram- श्राधानेऽपि तथेति चेत् ॥३७॥ पक-( तथा ) जैसे नवनीताज्य श्येन याग के अड़ों का धर्म है इसी प्रकार ( आधाने ) समाधान का (पि) भी धर्म है ( चेत् ) यदि ( इति) ऐसा कहो तो ठीक नहीं। स०-इस माशंका का समाधान करते है नाडाझरहत्वादंगल्याऽतनिमित्तस्यात् ॥३८॥ प० क्र--(न) कथन ठीक नहीं बयोंकि (माकरणलाद) अन्याधाल का प्रकरण नहीं और (अङ्गस्य सबनीताय का प्रिलक्षिा भत्तत्वात् ) उसने उद्देश्य से विधान नहीं किया जाता। --माज्य को श्येनया की अङ्गभूत इष्टियों का धर्म कहते हैं। तत्काले बा लिंगदर्शनात् ॥३६! 'a'पन पक्ष का सूचक है। (तत्काले ) वह आज्य सुत्यादिन में होने वाला इटियों का मत है क्योंकि (लिगदर्शनात् ) चिन्हों में पाया जाता है -उक्त पक्ष का समाधान करते हैं। सर्वेषां वाऽविशेषात् ॥४॥ ५० *-'वा' शब्द पूर्व पक्ष का निराकरण करता है ( सर्वेषां) वह आज्य श्येन' याग के सब अङ्गों का धर्म है क्योंकि (अविशेषात् ) उसका सामान्य रूप से विधान है। पूर्व पक्ष में पाए लिंग का समाधान किया जाता है। न्यायोक्ते लिंगदर्शनम् ॥ ४॥ । Human । Swap प० ( न्यायोक्ते ) प्रकरण में नवनीत वाक्य सम्पूर्ण की अंगता का द्योतक है (लियर्शनात् ) प्रमाण-वाक्य मिलने से। सं-सवनोय पुरोडाशों के प्रतिभूत द्रव्यों को कहते हैं। मांसं तु सुवनीयानां चोदनाविशेषात् ॥४२॥ प० ऋ०---तु' सिद्धान्त सूचक शब्द है (सबनीयानां) सनीय पुरोडामों का ( मांस ) 'नीहि' आदि के न मिलने पर मांसल प्रकृति द्रव्या है क्योंकि ( चोदनाविशेषात् ) उन द्वय विधायक वाममों ऐसा ही विधान है। सं० ---मांस शब्द के जो मांसल गौशी वृत्ति से अर्थ लिये गये हैं उसको ठीक न मानकर आशंका करते हैं। वितरसानिधावस्यायेति चेत् ॥४३॥ प० ----(अत्रिी) अन्य पद के सुपीक न होने से (भक्तिः) मांस पद का मांसल अर्थ माना है (अन्याय्या) सो ठीक नहीं ( चेत् ) यदि { इति) ऐसा ही मानो तो ठीक नहीं है। सं०---इस आशंका को उठा कर समाधान करते है। स्यात्ाकृतिलिंगाह राजयत् ॥४४॥ प००--(वराजवत्) जिस प्रकार वाज' प्रकृति भूत मन्त्र को बतलाने वाले साम शब्द सन्निद्धि से बराज पृष्ठ नामक स्तोत्र के वाचक होते हैं उसी प्रकार ( सवनीयाना) सवनीय आदि शब्द की समीपता से मांस शब्द भी मांसल वाचक ( स्यात् ) हो सकता है अतः कथन समीचीन है। इति मीमांसादर्शने तृतीयाध्याये अष्टमः पादः समाप्तः । 24/64 हमा Amma भाधुनिक एलोपैथिक गाइड (नया संस्करण) एलोपेथिवीटमेंट लेखक संशोधक डा हरनारायण कोकचा" (Gold Medalist) पुस्तक की कुछ विशेषताये हमारे शरीर की रचना और कार्य का वैनानिक वर्णन, हमारा भोजन और इसके सम्बन्ध में नई नई जानकारी, इंजैकान लगाने की विधियों और प्रत्येक रोग की इंजैक्शनों द्वारा चिकित्सा, एलोपैथी में अब तक के हुए नये-से-नये गाविष्कारों का वर्णन, संक्रामक रोगों पर कैसे विजय प्राप्त करें? सभी संक्रामक रोगों की प्रारम्भिक चिकित्सा तथा कम्पाउण्डरी शिक्षा का खुलासा विवरण, एलोपैथिक के सुप्रसिद्ध मिक्सचरों और पेटेन्ट औषधियों के असली नुस्खे, नई दवाइयाँ, कई चार्ट, तालिकाएँ और कोप । आजकल की नई चिकित्सा-विधियों का खुलासा सचित्र वर्णन ! पृष्ठ संख्या ८०० से ऊपर मूल्य केवल १२) । बारह रुपये। वैज्ञानिक ढंग से मुगियों की देखभाल करने की रिसर्चपूर्ण पुस्तक ও এসে এক বিছানা হল यह पोल्ट्री फार्म खोलने वालों के लिए एक विशेष लाभप्रद व पावश्यक पुस्तक है । देहातों व शहरों में साइन्टिफिक तरीकों पर पोल्ट्री फार्म खोलकर और मुगियों और अण्डों की तिजारत करके यूरोप व अमरीका की भाँति लाखों रुपये कमाये जा सकते । मूल्य १२) बारह रुपये, डाक व्यय २) अधिक सन्तान होने से माता-पिता का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है वर्थ कण्ट्रोल जान-बूझकर आँखों पर पट्टी बांधकर चलना सबसे बड़ी मूर्खता है । इस वैज्ञानिक युग में सन्तान बन्द होना मामूली सी बात है। आप भी इस नवीन युग से फायदा उठायें । डाक्टरों ने ऐसी-ऐसी विधियाँ खोजकर निकाली हैं जिनले सन्तान का बन्द होना बिल्कुल मासान है। गृहस्थी जो अधिक सन्तान से परेशान हैं तथा वह सज्जन जो कि ज्यादा औलाद होने के विरुद्ध हैं इस पुस्तक को अवश्य मंगायें । नवविवाहित दम्पत्ति भी इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करें, ताकि अधिक संतान उत्पत्ति से उनका स्वास्थ्य नष्ट न हो । मूल्य ५।) सवा पाँच हाया, डाक खर्च ॥) पृथक् । हर प्रकार की पुस्तक मिलने तथा बी. पी. द्वारा मंगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भण्डार (V. 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Book) चावड़ी, दिल्ली-६ हरियाणा के लोकप्रिय गीतों का संगठन हरियाणा लोक गीत संग्रह- 'नादान' हरियाणवी हरियाणा, रोहतक जिला, कनाल, झुन्झुनू, सूबा दिल्ली के हर प्रकार के जैसे राम विवाह, सावन महिमा, सांझी, कृष्ण और विविध प्रकार के विभिन्न गीतों का समावेश । इस पुस्तक में हरियाणा प्रान्त का नामकरण, महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले मधुर गीतों का बहुत ही मधुर ढंग से उल्लेख किया गया हैं । मूल्य ३m) पौने चार रुपये, डाक व्यय १.२५ अलग। टेलर मास्टरों तथा रेडीमेड कपड़े बेचने वालों के लिए अंगिया चोली गाइड-शीलारानी माजकल ये तैयार चोली का व्यापार बहुत उन्नति कर गया है। चार-छः गिरह कपड़ा जिसका मूल्य दो रुपये होता है नये फैशन चोली की शक्ल बदल कर पन्द्रह-बीस रुपये में बिकता है। हमारी पुस्तक में आधुनिक ढंग की चोलियाँ काटना तथा सिलाई करना और उनकी सही-सही फिटिंग यादि समस्त बातें चित्रों द्वारा समझाई गई हैं तथा उनके आधुनिक डिजायन फोटो भी दिये गए हैं। मूल्य ३१) साढ़े तीन रुपये । डाक व्यय मालगा देवी देवताओं की भारतियाँ संग्रहकर्ता ज्योतिषाचार्य श्री जगन्नाथ शर्मा इस पुस्तक में सब देवी-देवताओं की तमाम प्रारतियां, स्तोत्र, कार्य-काल और पूजा-पाठ की शास्त्रीय विधि ज्ञान, वैराग्य, देश प्रेम, समाज-सुधार, ईश्वर भक्ति के सैकड़ों भावपूर्ण भजनों आदि का संग्रह है। प्रत्येक देवता के उपासक व्यक्ति के लिए यह बड़े काम की पुस्तक है। मूल्य ३॥) साई तीन रुपये, डाक व्यय अलग। भोज और कालीदास की रचनाओं का अनुपम संग्रह राजा भोज और कालिदास सम्पादक सत्यकाम सिद्धान्त शास्त्री यह सर्वविदित है कि राजा भोज विद्या प्रेमी था। उसके दरबार में अनेकों विद्वान थे जिनमें कालिदास, जिनकी कीति सारे संसार में फैली हुई है, दरबार का मुख्य रत्न था । सभी दूसरे विद्वान् उससे दोध करते थे और उसको दरबार से निकालने के षड्यन्त्र रचते रहते थे । परन्तु कालिदास की अपनी विद्वता से सभी को मुंह की खानी पड़ी । इसी प्रकार की राजा भोज और कालिदास की रचनाओं का अपूर्व संग्रह पुस्तक में सरल भाषा में दिया गया है । बाल वृद्ध, युवा तथा सभी के लिए उपयोगी है । पृष्ठ लगभग २०० पक्की जिल्द भूल्य ३॥) साढ़े तीन रुपये डाक खर्च अला। हर प्रकार की पुस्तके मिलने तथा वी. पी. द्वारा मंगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भंडार (V. V. Book) चावड़ी, दिल्ली-६ 1 प्रेमी भक्तों के लिये भगवान भक्ति सम्बन्धी वेदान्त पुस्तके स्वामी महात्मा जीवनराम जी धर्माचार्य द्वारा लिखित----(१) जीवनराम (२) जीवाराम (३) जीवादास (४) जीवानन्द आदि चार उपनामों से लिखित १. अनुभव प्रकाश-इसमें मनुष्य बोध भजनमाला, ज्ञाल वैराग्य प्रकाश भजनमाला और ब्रह्मज्ञान भक्ति प्रकाश तीन पुस्तकें शामिल हैं, मूल्य ७॥)। . চাল জহা সাহা মূলকা -भवसागर से तरने के लिए नियमबद्ध पढ़ने योग्य पुस्तक जिसमें निर्गुण-सगुण भजनमाला व गद्य-पद्य प्रश्नोत्तर का संग्रह है। मूल्य ३) तीन रुपया । ३. मनुष्य बोध भजनमाला -इस पुस्तक में ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, गृहस्थ और सन्यास चारों आश्रमों को भजन, दोहा, श्लोकों में अर्थ सहित समझाया गया है । मूल्य २॥) ढाई रुपया। ४. ब्रह्मज्ञान भक्ति प्रकाश-जिसको लेखक ने रामजन (भगवान प्रेमियों) को बोध कराने के लिये लिखा है । मूल्य २॥) ढाई रुपया। ५. रामदेव जी कीमवतार लीला-इसमें रामदेव जी के जन्म से लेकर समाधि तक का विस्तृत वर्णन "खंभा खंभा खंभारे" तर्ज में किया गया है। मूल्य १॥) डेढ़ रुपया। ६. भक्ति उपदेश भजन माला---यह पुस्तक ब्रह्मज्ञान भक्ति रहस्य लथा वेदान्त के प्रश्नोत्तर सहित लिखी गयी है। भजन दोहे अर्थ सहित वेद मंत्र सभी रोजक ढंग से लिखे गये हैं जो प्रत्येक मनुष्य मात्र के लिये बहुत ही उपयोगी । मूल्य २॥) ढाई रुपया। ७. भक्ति प्रकाश प्रभाकर--मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए इस अनुपम ग्रन्थ को प्रकाशित किया गया है । मूल्य केवल २॥) ढाई रुपया । ६. आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति अर्थात् सरल देहाती घरेलू इलाज- (श्री जीवन राम गुसाईवाल) उच्च विभूतियों एवं उच्च महात्माओं द्वारा भाज- माइका किये हुए नुस्खे एवं इलाज जो सहज ही उपलब्ध हो सकें। मूल्य २॥) ९. रामजन गुटका -(श्री जीवनदास जी के शिष्य बुन्दूराम मात्रंगी कृत ब्रह्मज्ञान और आत्मा अनुभव तथा वेद सिद्धान्त अनुकूल लिखा गया है । मूल्य केवल २) ढाई रुपया । १०. ब्रह्मज्ञान प्रकाश--श्री बुन्दूराम मात्रंगी जी ने ब्रह्मज्ञान और आत्म- ज्ञान भजन, पद्य, छन्द द्वारा बहुत ही सुन्दर ढंग से लिखा है। मूल्य ११॥) ११. सोट मत मुक्तसागर-श्री साधू--मोट राम जी द्वारा लिखा ज्ञान का यह अमूल्य भण्डार अवश्य मंगाइये । मूल्य शा) डेढ़ रुपया । हर प्रकार की पुस्तके मिलने तथा वी० पी० द्वारा भंगाने का एक मात्र स्थाय देहाती पुस्तक भण्डार (V. V. Book) चाबड़ी दिल्ली-६ हैं , क १२. कल्याण भारती शब्द, चौपाई मिलान द्वारा बुद्धि को ठीक भग- वान के हित में लगाने वाली पुस्तक, मूल्य २॥) ढाई रुपया। १३. शंकरदास बहलान--सनातन धर्मी भजनों में बम्बई टाइप के मोटे अक्षर में इस पुस्तक को छापा गया है। वह पुस्तक लिगुण की खान है मूल्य २) ढाई रुपया। १४. मस्तनाथ चरित (ले० स्वामी यातनाम जी)---इस पुस्तक में अनेक प्रकार के अद्भुन, मनोहर, विचित्र रूप ब निर्माण, कवित्त, शिक्षा, उपदेश दोहा आदि संयुक्त अति उत्तम शिक्षा से सचित्र दिया गया है, मल्य २१ रुपया दुग्ध उद्योग के लिए अमूल्य भेंट डेरी कार्य-कालीचरण गुप्ता नई वैज्ञानिक रोवानी एवं प्रगति को देखते हुए डेरीफार्म के लाभदायक कार्य को चलाने वाली प्राभ्यासिक जानकारी के लिए यह पुस्तक लोने में सुहागा का काम करती है। इस में डेरी का इतिहास. दूध का भोजन में महत्त्व, कीटा- गुमों की जानकारी, दुध रखने की विद्या एवं तरीके, दूध के भाग', जानवरों का प्रबन्ध एवं रोग रोकथाम और दूध का व्यापार आदि विभिन्न विद्याओं को सविस्तार सरल भाषा में समझाया गया है। विषय को देखते हुए कीमत सिर्फ ३) साढ़े तीन रुपये, डाक व्यय १२) अलग । कथावाचकों, उपदेशकों, ज्ञानी, विद्वानों तथा हर गहस्थी के लिए वृहत् दृष्टान्त सागर सम्पूर्ण पाँचों भाग লক্ষ ০ দল মলা মাল (বঙ্গ হল শাহ বা হাডিং) इस ग्रन्थ में वैदिक, लौकिक, सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, भक्ति और ज्ञान-वैराग्य आदि सभी विषयों में अच्छे से अच्छे दृष्टान्तों का संकलन किया गया है। संसार के अनेक महापुरुषों, राजाओं विद्वानों एवं सिद्धों के अनुभूत तत्त्वों का इसमें अनोखा समावेश है। महिलायें उपदेशक दृष्टान्त सुना कर अपने नाम का सिक्का जमाने के साथ-साथ बच्चों को उत्तम शिक्षा भी दे सकती हैं। पृष्ठ ६६८, सजिल्द पुस्तक का मूल्य १०॥) साढ़े दस रुपया, डाक व्यय २) । शर्बत और लोडावाटर का व्यापार करो शर्बतों का कारोबार हुकमचन्द गुप्ता शर्बत और सोडावाटर का व्यापार इस समय बड़ा लाभदायक है। देशी, अंग्रेजी, बाजारू, वैद्यक, यूनानी, डाक्टरी के तरह-तरह के शर्वत घर में ही तैयार कर सकते हो । जनसाधारण के लिए पुस्तक अत्यन्त लाभदायक है। मु० २) ढाई रुपये डाक खर्च ११) अलग। हर प्रकार की पुस्तके मिलने तथा वी० पी० द्वारा संगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भण्डार (V. V. Book) चाबड़ी, दिल्ली-६ , O शिवपूजा पर १००० पृष्ठों का महान् ग्रन्थ श्री शिव महापुराण-६० रतीराम शास्त्री इसमें शिव चालीसा, शिव ताण्डव, शिव सहस्र नाम तथा शिवार्चन की भारतियाँ व श्लोक दिए हैं। विश्वेश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शत रुद्र संहिता कोटि रुद्र संहिता, उमा संहिता और वायवीय संहिता का सरल व रोचक वर्णन है। मोटा टाइम व शिव जी के अनेकों रंगीन चित्रों सहित सम्पूर्ण सातों खण्डों का मूल्य १४) चौदह रुपया । डाक व्यय पृथक् । मोटर मैकेनिक बन कर सैकड़ों रुपये मासिक कमायो मोटर निकटीचर-कृष्णानन्द शर्मा, (M.M., M.E.S.) क्या हडसन, क्या फोर्ड, क्या शेवरलेट सभी आधुनिक मोटर कारों के इन्जनों के पूरे वर्णन व बिजली की वायरिंग इस पुस्तक में है। बड़े-से-बड़े इन्जीनियर, वर्कशापों में काम सीखने वाले ड्राइवर तथा केनिकों को इसे हो खरीदने की सलाह देते हैं। पृष्ठ ४४०, चित्र २५०, सातवाँ संशोधित संस्करण मूल्य ६) छ: रुपया, डाक व्यय १॥) रुपया पृथक् । इलैक्ट्रिक सुपरवाइजरी की परीक्षा निःसंदेह पास कराने वाली पुस्तक इली मिटकमाइड-प्रोफेसर नरेन्द्रनाथ केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों द्वारा स्वीकृत इलैक्टिक सुपरवाइजरी परीक्षा के सिलेबस के अनुसार लिखी गई इस पुस्तक में इलेक्ट्रिका मोटर्स, मीटर्स, इलैक्टिक सकिट्स, ए० सी० ब० डी० सी० मशीन, बैटरीज, स्विच बोर्ड, पार्मेचर बाइंडिंग का सचित्र वर्णन, साथ ही इलैक्टिक सुपरवाइजरी परीक्षा पंजाब के प्रश्नपत्र उत्तर सहित, प्रणाली, परीक्षा इण्डियन इलैक्ट्रिसिटी रूल्ज १६५६ तथा बहुत सी उपयोगी बातें लिखी हैं। पृष्ठ संख्या ७५२ । चित्र संख्या १८५, (सातवाँ संस्करण), मूल्य १०) दस रुपया, डाक व्यय ११) । पुराने छापेका कोका ५० का बनाया हुत्रा হসী মূল কী হাল হলি जिसमें स्त्री पुरुषों के गुप्तांग, चुम्बन, आलिंगन तथा चौरासी वासनों के भेद खोल कर लिखे हैं। पुरुषों व स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा करने के सरल उपाय बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त बर्थ कन्ट्रोल के वैज्ञानिक और ठीक उपाय बताये गये हैं । मूल्य ४) चार रुपया, डाक व्यय पृथक् । विसिम ट्राजिस्टर रेडियो-भार सी० विजय इस पुस्तक में ट्राजिस्टरों के सिद्धान्त, कार्य तथा प्रयोग में आने वाले सर- किटों के वर्णन के साथ-साथ ट्रांजिस्टर रेडियो में होने वाली प्रत्येक खराबी को जानना उस खराबी को दूर करना और शावश्यक यन्त्रों का उपयोग समझाया गया है । मूल्य 1) साढ़े सात रुपये । डाक व्यय पृथक् । हर प्रकार की पुस्तके मिलने तथा बी० पी० द्वारा मंगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भण्डार (V.V.Book) धाबड़ी, दिल्ली-६ के आध्यात्मिक संसार का अनुपमेय वेदान्त ग्रन्थ লাল মাথাৎ কাৰুত্ব – ১ লীহা इस ग्रन्थ के अनुशीलन से न जाने कितनों का इस संसार से उद्धार हो पाया । रामचन्द्र के कुल-गुरु महर्षि वशिष्ठ जी ने जिस दुर्लभ यात्म-शास्त्र का उपदेव श्री रामचन्द्र जी को दिया था, उसका वर्णन इस ग्रन्थ में बड़ी मुबोध भाषा में किया गया है। ग्रन्थ को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए उसे मोटा टाइप और दो वण्डों में पाँच प्रकरणों (वैराग्य, मुमुक्ष, उत्पत्ति, स्थिति और उपशम) और दूसरे खण्ड में सम्पूर्ण निर्वाण प्रकरण (पूर्वाद्ध और उत्तरार्द्ध) का समावेश किया गया है। ब्रह्मा, माया, जीव आदि का विवेचन और भक्ति, वैराग्य और वेदान्त का यह अन्थ है । विरक्ति तथा मोक्ष चाहने वाले सज्जनों का तो मानो प्राण ही है । छपाई बहुत ही सुन्दर है। दो जिल्दों में बड़ा साइज पृष्ट १२८८, मूल्य २२) बाईस रुपया, डाक बमय ३।।) अलग । पुस्तक मोटे टाइप में छपी है। जिसको बूढ़े तथा अधिक उम्र के लोग भी पढ़ सकते हैं। कुण्डलियों द्वारा फलादेश तथा विचार बताने वाला ग्रन्थ মুত্ত্বজ্ঞ লিন্দাজা ভগীনি (জামাদি চায় ) लेखक सगवान दास मित्तल भृगु संहिता के आधार पर अत्यन्त फलप्रद और नवीन ग्रन्थ जिसमें पंचाग ग्रह गोचर प्रणाली, नौ ग्रहों का राशि परिवर्तन तथा गोचर प्रणाली, बारह लग्नों के अन्तर्गत ग्रहों की स्थिति, सभी राशियों के अनुकूल व प्रतिकूल ग्रहों का पूर्ण विवेचन किया गया है जिससे प्रत्येक व्यक्ति ग्रह राशि, नक्षत्र, लग्न व फल का हिसाब सही-सही जान सकता है । मूल्य ४१) साढ़े चार रुपया, डाक व्यय ११) पृथक् । पेन्ट तथा वार्निश की इण्डस्ट्री लगायें बानिश तथा पेन्ट इण्डस्ट्री जिसमें सभी प्रकार की वानिशे, घटिया व आधुनिक ढंग से पेन्ट बनाने के बहुत सरल तरीके लिखे हैं। कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक की सहायता से थोड़ी थोड़ी पूजी लगाकर वानिश व पेन्ट बनाने का काम कर सकता है। पृष्ठ संख्या २३७, मूल्य ७॥) साढ़े सात रुपए डाक व्यय अलग। श्वपटुडेट टेलरिंग कैशन बुक-इस पुस्तक में लड़कों, लड़कियों, स्त्रियों व पुत्षों के नए-नए फैशन के कपड़ों के डिजायन दिये गए हैं । दर्जी लोग ये डिजायन दिखाकर ग्राहनों से ज्यादा आर्डर ले सकते हैं और आप इनमें से सुन्दर डिजायन पसन्द करके मन्शा माफिक नई क्वालिटी के कपड़े सिलवा सकते हैं । मुल्य ६) छ: रुपये, डाक व्यय १।। अलग ।। हर प्रकार की पुस्तकें मिलने तथा वो. पी द्वारा मँगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भण्डार (V. V. Book) चाबड़ो, दिल्ली-६ । घड़ी साज बन कर तीन सौ रुपये प्रति मास कमाइये प्रैक्टिकल घड़ी साजी -रामअवतार 'बीर इस पुस्तक में हर प्रकार के नये व पुराने मॉडल की घड़ियों को खोलना, सफाई करना, उनमें काम आने वाले समस्त पुजों की जानकारी, उनकी फिटिंग, उनके दोष तथा दोषों को ठीक करने की विधि बताई गई है। इस पूस्तक की सहायता से एक साधारण मनुष्य भी आसानी से काम सीख कर अपने खाली समय में ही १००-१५० रुपया माहवार कमा सकता है । पृष्ठ संख्या ११२, चित्र संख्या ७३ है । मूल्य ४॥) साढ़े चार रुपया, डाक व्यय ११) अलग! छत्तीस प्रकार के भोजन बिना अच्छे शाक बने बेकार होते हैं शशाक रत्नाकर-सुशीला प्रत्येक घर में बनने वाली शाक-सब्जियों को बनाने के तरीके व उनमें पड़ने वाले मसालों आदि का वर्णन बड़ी सरल भाषा में सविस्तार किया गया है। इससे श्राप स्वादिष्ट शाक-सब्जियाँ बना सकती हैं। मू० २१॥) ढाई रुपए, डाक व्यय १०-) अलग । साबुन के बड़े-बड़े कारखानेदारों में हलचल मचा देने वाली पुस्तक साबुन इण्डस्ट्री-सुरेश चन्द्र सहगल यदि आप साबुन का कारखाना खोलना चाहते हैं तो पहले इस पुस्तक को खरीदें। इसमें हर प्रकार की खुशबू का हाल, देशी तथा अंग्रेजी साबुन बनाने के सुगम और नवीन योग लिखे गये हैं जिनसे श्राप कुछ घन्टों में हर प्रकार का अति उत्तम, चिकना, सस्ता और चमकदार साबुन बना सकते हैं, जैसे लाइफब्वाय, डन्डा साबुन, सनलाइट, हमाम सोप, नीम सोप, महारानी सोप, बाल-सफा, शेविंग स्टिक, लीक्विड सोप, पारदशिक सोप बनाने, साबुनों में मिलने वाली सुगंधि तथा साबुन फैक्ट्री की मशीनरी अादि की सम्पूर्ण जान- कारी है । पृष्ठ संख्या २७२, चित्र संख्या ३१, मूल्य ६) छ: रुपया डाक व्यय १) अलग। लकड़ी के व्यापारियों तथा जंगल के ठेकेदारों के लिए मीट्रिक सिस्टम में गोल लकड़ी जन्त्री पनायश चोब---राजेन्द्र कुमार B.Sc. जिसमें बगैर चिरी हुई गोल लकड़ी की पैमायश का पूरा हिसाब मीट्रिक सिस्टम में लिखा गया है। जंगल के ठेकेदारों, लकड़ी बेचने वालों और लकड़ी के बड़े-बड़े खरीदारों तथा पाराकों के लिए बहुत उपयोगी पुस्तक है । मूल्य ३) तीन रु०, डाक व्यय ११) अलग। हर प्रकार की पुस्तकें मिलने तथा बी० पी० द्वारा मंगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भंडार (V.V. Book), चाबड़ी, दिल्ली-६ - -

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तिल की नोट पहाड़ होता है । जिसे हम जादू समझते हैं वह गाँसों का धोखा है A के जादू-शिवानन्द शर्मा माजकल बाजारों में जादूगर लोग बच्चों को ताग के विषय में नये-नये खेल दिखा कर बहुत से पैसे टग लेते हैं । भोले-भाले गौर ताश के अजीब खेल सीखने वाले उनके धोखे में ब में ये हमारी पुस्तक 'ताश के जादू मंगाकर हुन प्रकार के लेल सीख सकते हैं। पुस्तक में हर खेल को समझने के लिए अनेक चित्र दिये गये हैं। मूल्य केवल ३) तीन रुपया । मुह देखने के शीशे बनाना झालीचरण शीशे की सफाई, शीशे पर कलई नहाना, काँच में छेद करना, टूटे हुए शीशे को जोड़ना, शीशा गलाना, शीशे के प्लेट, लास तैयार करना, बोतल बनाना, कृत्रिम रंगबिरंगे जवाहरात बनाना, शीशे के खिलौने बनाना, སྤྱོད पर कलई करने का तरीका आदि । मूल्य २।।) लाई रु० डाक खर्न १) । स्वचाकू का कारोबार-चन्द्रमा सहगल चदि माप हर प्रकार के खाने और पीने बाले तम्बाकू का कारोबार करना चाहते हैं तो यह पुस्तक मापको बहुत सहायता देगी, इस पुस्तक के द्वारा श्राप लजीज तम्बाकू तैयार कर सकते हैं। मूल्य २॥) ढाई रु० डाक खर्च ) । देकरी बहार---कालीचरण इसमें हर प्रकार के विस्कुट, डबल रोटी, मेस्टरी आदि बहुत सरल ढंग से बनानी मताई गई हैं। तमाम तरीके सुने-सुनाए नहीं बल्कि किटकल है। डबल रोटी, बिस्कुट आदि की मांग दिन पर दिन तरक्की पर है। बिस्कुट विद्रो रनोल कर हजारों रुपया कमाएं । मूल्य २।१) ढाई १० डाक खर्च १३) अलग। सालकोवाशनको अथवा कारखाना जो मिठाई. सी. बास जिसमें हर प्रकार की अंग्रेजी मिठाइयाँ, लासजर ड्राप्स, चाकलेट, टॉफी, पीपरमेंट, लाली पप, लच्छे, खिलौने, फल आदि बनाने के सरल तरीके प्रैक्टिकल रूप से लिखे गये हैं। आज ही काम शुरू करके फायदा उठाना प्रारम्भ कर दें। मूल्य २।।) ढाई रु०, डाक खर्च १।-) अलग । इलैक्टिक तथा गैस बल्डिग----जयनारायण जिनमें पाक्सी-एसिटिलीन वैलिंडा तथा इलैक्ट्रिक वैल्डिग का सम्पूर्ण विवरण दिया गया है । लेखक श्री जयनारायण शर्मा ब नरेन्द्रनाथ । पृष्ठ संख्या ४९६, चित्र संख्या १५० मूल्य १२) बारह रुपया, डाक खर्च २) अलग । हर प्रकार की पुस्तके मिलने तथा वी० पी० से मंगाने का एक मात्र स्थान देहाती पुस्तक भंण्डार (V.V. Book) चावड़ी, दिल्ली-६

Mimansa Darshanam

Author
Nnull
Title
Mimansa Darshanam
File name
Mimansa Darshanam
Text
OCR done
Publisher
Dehati Pustak Bhandar Delhi
Language
Sanskrit
Pages
236
Library
Bharti Bhawan Library Allahabad
DLI number
272902
Barcode
5990010894235.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
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