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Amarakosah Dwithiya Khandah

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'काशीस्थ राजकीय प्रथम तथा मध्यम परीक्षा पाठ्य निर्धारित- 'मणिप्रभा' हिन्दी टीका तथा 'अमरकौमुदी' टिप्पणी के सहित १ अमरकोष ( सम्पूर्ण)। (टोकाकार---याकरण-साहित्याचार्य साहित्यरत्न श्रीहरगोविन्द मिश्रजी,काशी 'मंणिप्रभा नामंक हिन्दी व्याख्यामें मूल श्लोकोंके पर्याय (नाम) सन्दिग्ध शब्दोंके शुद्ध प्रतिपदिकावस्थाका) स्वरूप ( जैसे-राजा=राजन, विद्वान् = विद्वस, .....), लिङ्ग, पाठान्तर और मतान्तरके पर्याय, अन्य ग्रन्थो या कोषों में मिलनेवाले आंशिक समानाकार बाहरी शाब्द, तथा हिन्दीमें से दिये गये हैं और कठिन विषय उदाहरणादिसे विशद किये गये हैं। क्षेपक श्लोकों . की व्याख्या भी मूलके समान ही विशद रूपसे की गई है। 'अमरकौमुदी' नामक संस्कृत टिप्पणीमें-वेद, वेदान, स्मृति, पुराण और साहित्यादि अनेक प्रन्थोंसे प्रमाण-वचन, पाठान्तर आदि, तथा अक्षौहिणी सेना, मन्वन्तर काल, द्रोण खारी आदि प्रमाण (वोल) इत्यादिके अनेक चत्र मी दिये हैं जिनसे अनेक श्लोकोंके आशय अनायास ही समझ में आ जाते हैं । परिशिष्टमें विशेष आवश्यकीय विषय तथा अन्तमें मूल, क्षेपक और समानाकार या पाठान्तर आदि बाहरी शब्दोंकी अकारादि क्रमसे सूची और ग्रन्थारम्भमें गवेषणापूर्ण विस्तृत भूमिका देकर ग्रन्थको परमोपयोगी बनाया गया है। कागज छपाई आदि सब छ अत्युत्तम रहनेपर भी मूल्य लागतमात्र सजिल्द पुस्तक का केवल २ २ अमरकोश-"मणिप्रभा" " और "अमरकौमुदी" नामक परीक्षोपयोगी भाषाटीका तथा टिप्पणी सहित प्रथमकाण्ड मूल्य ।) ३ अमरकोश-"मणिप्रभा" और "अमरकौमुदी" नामक परीक्षोपयोगी भाषाटीका तथा टिप्पणी सहित द्वितीयकाण्ड मू०१८) ४ अमरकोष-मूल (गुटका) अनेकार्थध्वनिमञ्जरी-द्विरुपकोश-एकाक्षरकोश सहित । ४||४५ इंच का जेबी गुटका मूल्य बहुत अल्प ।) ५ अमरकोष -मूल । केवल प्रथम काण्ड मात्र। मूल्य )॥ ६ अमरकोष-मूल । केवल द्वितीय काण्ड मात्र । मूल्य प्राधिस्थानम्-चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय, बनारस ।

॥ श्रीः॥ हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमात्मा ३० अमरकोषः व्याकरण-साहित्याचार्या पण्डित श्रीहरगोविन्दमिश्रेण 'मजिप्रमा- ख्यहिन्दीटीकया 'अप्परकौमुद्याख्य संस्कृतटिप्पण्या चालकृतः । (द्वितीयकाण्डस्य वर्गाः १-६) सालेतिक चिह्न और शब्द के विचरण । मूल के सङ्केत- ' इस चिहके बीचवाले अंश क्षेपक हैं, उनके अन्तमें ( ) इस कोष्ठ के मध्यमें क्रमानुसार पहिसख्या लिखी गई है। श्लोकोंके पहले या मध्यभागके अङ्क हिन्दी टोकाके प्रतीक टीका और टिप्पणी के सङ्कत- -सन्दिग्ध (सुविभक्ति प्रातिपदिकसे भिन्नरूपवाले) शब्दों के प्राति- पदिकावस्थाका शुद्ध रूप । + -पाठभेद या मतभेदसे उपलब्ध पर्याय और ग्रन्थान्तरमें उपलब्ध आंशिक समानाकार ( प्रायः मिलते जुलते हुए ) या प्रसिद्धतम पर्याय । []-क्षेपक श्लोकोंकी हिन्दी टीका का ऐसे बिल है । उन २ ग्रन्थों के काण्ड, वर्ग, लोक, परिच्छेद, अध्यायादि जानने के लिये अ. दिये गये हैं। -- पुया पुल-पुल्लिा महेo-महेश्वर म-अभिधानचिन्तामणि स्त्री या स्त्री-स्त्रीलिङ्ग भा. दी०-मानुजीदीक्षित भा० दी०-मानुजीदीक्षित या स्मृल्या याज्ञस्मृ०- न या ना-नपुंसकलिङ्ग मु०-मुकुट याज्ञवल्क्यस्मृति त्रि या नि:-विलिङ्ग भा०-भागुरि मनु या मनुस्मृ:-मनुस्मृति निक-नित्य साद०-साहित्यदर्पण प्रा०-प्राच्य गी-श्रीमद्भगवद्गीता ए०व०-एकवचन रा० ऋ० दी-रामकृष्णदी. द्विव०-द्विवचन क्षित वि० पु०-विष्णुपुराण वै. सिम वैयाकरणसि. ब०व० या बहुव० बहुवचन बु० म०-बुधमनोहरा द्धान्तलघुमजपा शे०- शेष अ०वि०-अमरविवेक सुश्रु क० स्था:-सुश्रुतकmo-मत या मतभेद व्या० सु०-व्याख्यासुधा ल्पस्थान उदा०-उदाहरण (रामाश्रमी) मा०नि०-माधवनिदान स्वा०-स्वामी पा० सू०-पाणिनीयसूत्र *.इत्यादि चिह्न टि- क्षी स्वा०-क्षीरस्वामी अभि.चिन्ता या अ०चि० प्पणीके प्रतीक हैं। देखने का नियम-१ जिस शब्दके बाद जो संकेत है उसीके साथ उस संकेत का सम्बन्ध है। २ संख्यासहित संकेतका पहलेवाले उतने शब्दों के साथ सम्बन्ध । ३ कहीं २ एक ही शब्दमें एकाधिक भी संकेत हैं। ४ नामके अन्तमें लिखी संख्यामें पाठान्तर, कोषान्तर आदिके कोमध्यागत पर्यायोंकी गणना नहीं है । उदाहरण-भुः (=भू। x भूः, - भूर् , अ०) भूमिः ( x भूमी), अचला, अनन्ता, रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा, धरा, धरित्री, धरणिः ( x धरणी), क्षोणिः ( x क्षोणी, क्षौणिः, क्षोणी ) ज्या ( x इज्या ), काश्यपी, क्षितिः, सर्वसहा, वसुमती, वसुधा, उर्वी, वसुन्धरा, गोत्रा, कुः, पृथिवी ( x पृथवी), पृथ्वी, क्षमा, अवनिः, (x अवनो), मेदिनी, मही ( ४ महिः २७ स्त्री ), 'पृथ्वी' के २७ नाम हैं। यहाँ पर पहले भूः के प्रातिपदिकावस्था का शुद्धरूप 'भू' और दूसरे के प्राति. पदिकावस्थाका शुद्ध रूप भूर है और यह अव्यय है। भूमिः का मतान्तर से भूमी भी पर्याय है एवं धरणिः का धरणी, क्षोणि: का क्षोणी, क्षौणिः और क्षौणी, ज्या का इज्या, पृथिवी का पृथवी अवनिः का अवनी, मही का महिः पर्याय है । भूः आदि २७ शब्द स्त्रीलिङ्ग है और ये सब २७ नाम पृथ्वीके हैं, इसमे भूमी धरणी, क्षोणी, क्षौणिः, क्षोणी, इज्या, पृथवी, अवनी, आर महिः की गमना नहीं है। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये। अथ अमरकोषस्य द्वितीयकाण्डस्थ (३-६ वर्गस्य) विषयानुक्रमणिका विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्टाङ्काः विषयाः पृष्टाङ्काः विषयाः पृष्ठाङ्काः वर्गभेदः (श्लोक१) १ पूरवर्गः ११३ वनौषधिवर्ग:१२४ मनुष्यवर्गः १८७ भूमिवर्गः १२. सिंहादिवर्गः १७३ - १ शैलवर्ग:

अथ द्वितीयकाण्डम् । वर्गभेदान् कथयति- १ वर्गाः पृथ्वीपुरक्षमाभृद्वनौषधिमृगादिभिः । नृब्रह्मक्षत्रविशुद्रः साङ्गोपाङ्गैरिहोदिताः॥१॥ ये १० १. अथ भूमिवर्गः। २ भूर्भूमिरचलानन्ता रसा विश्वम्भरा स्थिरा । धरा धरित्रो धरणिः क्षोणिया काश्यपी तितिः ॥ २॥ १ इस द्वितीय काण्डमें अङ्गों और उपाङ्गोंके सहित 'पृथ्वी, पुर, पर्वत, वनौ- षधि, मृगादि ("आदि शब्दसे 'पक्षी, कीट' आदिका संग्रह है अथवा 'भृगादि शब्द *सिंहवाचक है ), मनुष्य, ब्रह्म, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रः वर्ग अर्थात "भूमिवर्ग १, पुरवर्ग २, शैलवर्ग ३, वनौषधिवर्ग ४,.........." कहे गये हैं। ("भूमिके अङ्गा-'मृत् , शाखा और नगर' आदि तथा उपाङ्ग 'मृत्सा आदि, पुरके अङ्गा-'आपण' आदि तथा उपाङ्ग 'विपणी' आदि, पर्वतके अङ्ग-शिला' आदि तथा उपाङ्ग 'मनसिल, गेरु आदि धातु ; वनौषधिके अङ्ग--'वृक्षा आदि तथा उपाङ्ग 'फूल, फल आदि ; मृगके अङ्ग-'रुरु' आदि । तथा उपाङ्ग 'लोमा आदि एवं 'मृगादि के आदि पदसे संगृहीत पक्षीके अङ्ग---'कीट, फतीङ्गा आदि तथा उपाङ्ग 'चञ्चु, पङ्ख आदि हैं; इसी तरह अन्यान्य वगांका भी अङ्गोपाङ्ग समझना चाहिये। १. अथ भूमिवर्गः। २ भूः (= भू | + भूः, भूर्, अ०), भूमिः (+ भूमी), अचला, अनन्ता रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा, धरा, धरित्री, धरणिः (+धरणी), क्षोणिः (+क्षोणी, * 'मृगादि' शब्दस्यायमेवार्थः समुचितः, मृगान् पशूनचीति मृगादिरिति व्युत्पस्या 'भू- गादिः शब्दस्य सिंहपर्यायलाभसामन्जस्यात्। अत एवाग्रे सिंहादिवर्ग'कथनं संगच्छतेऽन्यथा मृगादिवर्गकथनस्यौचिस्यात् ।। .

१०६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- सर्वसहा वसुमती वसुधोर्वी वसुन्धरा । गोत्रा कुः पृथिवी पृथ्वी क्ष्मावनिर्मेदिनी मही ॥३॥ १ 'विपुला गह्वरी धात्री गौरिला कुम्भिनी क्षमा (१) भूतधात्री रत्नगर्भा जगती सागराम्बरा (२) २ मृन्मृत्तिका ३ प्रशस्ता तु मृत्ला मृत्स्ना च मृत्तिका । ४ उर्वरा सर्वसस्थाढया ५ स्यादृषः क्षारमृत्तिका ॥४॥ ६ ऊषवानूषरो द्वावप्यन्यलिङ्गौ ७ स्थलं स्थली। हैं । क्षौणिः, क्षौणी ), ज्या ( + इज्या * ), काश्यपी, क्षितिः, सर्वसहा, वसुमती, वसुधा, उर्वी, वसुन्धरा, गोत्रा, कुः, पृथिवी ( + पृथवी), पृथ्वी, क्षमा, अवनिः ( + अवनी), मेदिनी, मही ( + महिः । २७ स्त्री), 'पृथ्वीके २७ नाम हैं। १ [ विपुला, गह्वरी, धात्री, गौः ( = गो), इला, कुम्भिनी, क्षमा, भूत- धात्री, रत्नगर्भा ( + रत्नवती ), जगती, सागराम्बरा ( ११ स्त्री), 'पृथ्वी के ११ नाम है ] ॥ २ मृत ( =मृदू ), मृत्तिका ( २ स्त्री) 'मिट्टी के २ नाम ३ मृत्सा, मृत्स्ना ( २ स्त्रो), 'अच्छो मिट्टी के २ नाम हैं । ४ उर्वरा ( + उर्वरा । स्त्री, 'उपजाऊ मिट्टी का १ नाम है ॥ ५ उषः (पु), क्षारमृत्तिका (स्त्री), 'खारी मिट्टा' अर्थात् 'सादी मिट्टी या रेहा के २ नाम हैं। ६ ऊषवान् ( = ऊषवत् ), ऊपरः (२ त्रि), 'खारी मिट्टीवाले स्थान' अर्थात् ऊसर या रेहचट जमीन के २ नाम हैं । ७ स्थलम् (न), स्थली (स्त्री), 'स्थल' के २ नाम है। ("अकृत्रिम भूमिका स्थली' (स्त्री) यह १ नाम है, 'कृत्रिम भूमि' का 'स्थला' (स्त्री) यह १ नाम है और 'भूमिसामान्य अर्थात् 'भूमिमात्र' का 'स्थलम्' (न) यह १ नाम है")। * "इज्या इति मूर्खव्याख्या, 'ज्या मौवी ज्या वसुन्धरा' इति शाश्वतविरोधात्" इति क्षी० "वीचिः पश्चिमहिः केलिरित्याचा हस्वदोर्षयोः" इति वाचस्पत्युक्तः ।। ०स्वा०॥ ..

भूमिवर्ग:१] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १०७ १ समानौ मरुधन्वानौ २ द्वे खिलाग्रहते समे ॥ ५ ॥ त्रिवथो जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् । ४ लोकोऽयं भारतं वर्ष- हैं १ मरुः, ध्वन्वा (धन्वन् । २ पु), 'मरुस्थल' अर्थात् मारवाड़ देश या राजपूतानेको ज़मीन' के २ नाम २ खिलम् , अप्रहतम् (२ त्रि), 'विना जुती हुई जमीन के २ नाम हैं । ३ जगती (स्त्री), लोकः (पु), विष्टपम् (+पु, विष्टपम् ), भुवनम् , *जगत् ( ३ न), 'भूतल' के ५ नाम हैं । ४ भारतम् (+भारतवर्षम् , भारतवर्षः, पु न । न ), हिन्दुस्तान' का १ नाम है । ( "यह 'हिन्दुस्तान' जम्बुद्वीपका नवमांश है। वर्ष ९ हैं-भारत १, किंपुरुष २, हरिवर्ष ३, रम्य ४, हिरण्मय ५, कुरु ६, भद्राश्च ७, केतुमाल ८, और इलावृत्त ९ । इनमें क्रमशः ३ हिमालयके दक्षिण तरफ, ३ उत्तर तरफ, १-१ पूर्व तथा पश्चिम तरफ और १ मध्य में है")॥ ७ . - - * एक महाभूतं "पृथ्वी, पञ्चमहाभूतविषयेन्द्रियात्मक 'जगत् इति पृथ्वीजगत्यो'मदः ।। | "उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्ष तद्धारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥१॥ इति । वर्षे स्थान विदुःप्राशा इमं लोकं च भारतम् ।। इति भारविश्च । तदुक्तम् । जम्बुद्वीपस्थाना नववर्षाणां नामानि- "स्याद्भारतं किम्पुरुष इरिवर्षे च दक्षिणाः । रम्यं हिरण्मयकुरू हिमाद्ररुत्तरास्नयः ॥ १ ॥ भद्राश्वकेतुमालो तु द्वौ वर्षों पूर्वपश्चिमी । इलावृत्तं तु मध्यस्थं सुमेरुयंत्र तिष्ठति ॥ २॥ इति वाचस्पतिः ।। एषां सोमा ब्रुवन् क्षी० स्वा० स्वष्टावेव वर्णाण्याह । तद्यथा- "हिमवाम् हमकूरश्च निषेधो मेरुरन्तरे। नोल: श्वेतश्च शृङ्गोवान् गन्धमादनमष्टमम् ॥ १ ॥ इति सीमाविच्छिन्नान्यष्टौ वर्षाणि"॥ इति ।।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे १ शरावत्यास्तु योऽवधेः॥६॥ देशः प्राग्दक्षिणः प्राच्य २ उदीच्यः पश्चिमोत्तरः। ३ प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात् ४ मध्यदेशस्तु मध्यमः॥७॥ ५ आर्यावर्तः पुण्यभूमिमध्यं *विन्ध्यहिमालयोः । १ प्राच्यः (पु), 'शरावती नदीके पूर्व और दक्षिण तरफ वाले देश' का १ नाम है ॥ २ उदीच्यः (पु), 'शरावती नदी के पश्चिम और उत्तर तरफ- वाले देश का १ नाम है ॥ ३ प्रत्यन्तः, म्लेच्छदेशः (२ पु), 'म्लेच्छ देश' अर्थात् 'कामरूप आदि के २ नाम हैं। ४ मध्यदेशः, मध्यमः (पु), 'मध्यदेश' के २ नाम हैं। ५ आर्यावर्तः (पु), पुण्यभूमिः (स्त्री), 'विन्ध्याचल और हिमालय के पहाड़ बीचवाले देश के २ नाम हैं । - * विन्ध्यहिमागया:' इति पाठान्तरम् । 11 उत्तन काशिकायाम्- "प्रागुदञ्चौ विभजते हंसः क्षीरोदके यथा ( विदुषां शब्दसिद्धयर्थं सा नः पातु शरावती ॥१॥इति ॥ RE- चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते । तं म्लेच्छविषयं प्राहुराविर्तमतः परम् ॥ इति ॥ विषयो देशः। ॥ तदुक्कं मनुना- "हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यस्मारिवन शनादपि । प्रस्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः"॥१॥ इति मनुः २।२९ ॥ अत्र विनशन तीर्थविशेषः परे प्रसिद्धाः॥ पातदुक्तं मनुना- "आसमुद्राच वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् । तयोरेबान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुबु धाः॥१॥ इति मनुः ।। २।२२ ।। तयोहिमवदिन्यपर्वतयोरित्यर्थः ॥

भूमिवर्ग: १] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ नोवृजनपदो २ देशविषयौ तूपवर्तनम् ॥ ८ ॥ ३ विधागोष्ठान्नडप्राये नड्वान्नवल इत्यपि । ५ कुमुद्वान्कुमुदप्राये वेतस्वान्बहुवेतसे ॥६॥ ७ शाद्वलः शादहरिते सजम्बाले तु पङ्किलः । है जलप्रायमनूपं स्यात् १०पुंसि कच्छस्तथाविधः ॥१०॥ १ नीवृत् , जनपदः (+जानपदः । २ पु), 'मनुष्योंके ठहरनेकी जगह, ग्राम, नगर के २ नाम हैं । २ देशः, विषयः (२ पु), उपवर्तनम् ( न ), 'देश' अर्थात् 'ग्रामके समु. दाय के ३ नाम हैं। ३ यहांसे लेकर 'गोष्ठं गोस्थानक.... (२१११२) के पहले तक त्रिषु' का अधिकार होनेसे सब शब्द त्रिलिङ्ग हैं। ४ नड्वान् (= नड्वत् ), नड्वलः (२ त्रि), 'नरसल या नरकट जिस देशमै अधिक होता हो उस देश के २ नाम हैं । ६ कुमुद्वान् ( = कुमुद्वत् , त्रि), 'जिस देशमें कुमुद अधिक हो उस देश' का १ नाम है ॥ ६ वेतस्वान् ( = वेतस्वत् , त्रि), जिस देशमें बेत अधिक हो उस देश' का १ नाम है ॥ ७ शाद्वलः ( + शाड्वलः । त्रि), 'नई घासोंसे हरा भरा स्थान या देश का १ नाम है। पङ्किलः (त्रि ), 'कीचड़वाले देश या स्थान' का १ नाम है ॥ ९ जलप्रायम् , *अनूपम् (२ त्रि), 'बहुत जलवाले स्थान या अनेक प्रकार के पेड़ लता और झरनेवाले जङ्गलसे युक्त सब तरहके अन्न पैदा होनेवाले देश के २ नाम हैं ॥ १० कच्छः (पु। + न ), 'बहुत पानीवाले स्थानके समान नदी आदिके पासवाले बगीचा इत्यादि का १ नाम है । ("भा० दी० मतसे 'जलप्रायम्' आदि ३ नाम उक्तार्थक हैं")। तदुक्तम्- "नानाद्रमलतावीरूनिसरप्रान्तशीतलैः। वनैप्तिमनूपं स्यात्सस्यैत्रीहियवादिभिः॥ १॥ इति ॥ अ०६ भमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- - १ स्त्री शर्करा शर्करिलः २ शार्करः शर्करावति । देश एवादिमा ३वेवमुन्नेयाः सिकतावति ॥ ११ ॥ ४ देशो नद्यम्बुवृष्ट्यम्बुसम्पन्नव्रीहिपालितः । स्यान्नदीमातृको देवमातृकश्च यथाक्रमम् ॥ १२ ॥ ५ सुराशि देशे राजन्वान्स्यात्ततोऽन्यत्र राजवान् । ७ गोष्ठं गोस्थानकं स्तत्तु गौष्ठीनं भूतपूर्वकम् ॥ १३ ॥ 8 पर्यन्तभूः परिसर:-- १ शर्करा (नि० स्वी), शर्करिलः (त्रि), 'अधिक बालूवाला या छोटा २ कङ्कड़वाला या रेतीला देश के २ नाम हैं । २ शार्करः, शर्करावान् ( = शर्करावत् । २ त्रि), 'बालुवाले देश इत्यादि ("आदि शब्दसे बालूवाले पदार्थ आदिका संग्रह है" ) के २ नाम हैं । ३ इसी तरह 'सिकता आदि शब्दसे मी तर्ककर समझना चाहिये। ("सिकताः (नि० स्वी। + नि० ब० व० ),सैकतिलः (त्रि ), 'बालूबाले देश' के २ नाम हैं। सैकतः, सिकतावान् ( सिकतावत् । २ त्रि), 'बालूवाले देश आदि के २ नाम हैं.)। ४ नदीमातृकः, देवमातृकः (२ त्रि), 'नदो और नहर आदिके पानीसे खेत सींचनेपर अन्न पैदा होनेवाले देश' का तथा 'वर्षाके पानीसे खेत सींचनेपर अन्न पैदा होनेवाले देश' का १-१ नाम है ॥ ६ राजन्वान् ( =राजन्वत् , त्रि), 'धर्मात्मा शीलवान् और सदा- चारी राजासे पालित देश' का १ नाम है ॥ ६ राजवान् ( राजवत् , त्रि), 'सामान्य राजासे पालित देश' का १ नाम है। ७ गोष्ठम् , गोस्थानकम् (२ न ), गौओंके रहनेका स्थान गोशाला आदि के २ नाम हैं ॥ ८ गौष्टीनम् (न), 'जहां पहले गौ रहती हों उस स्थान' का नाम है ॥ ९ पर्यन्तभूः (स्त्री), परिसरः (पु), नदी और पहाड़ आदिके पासको भूमि' के २ नाम हैं। % 3D क्रमशः , भूमिवर्गः १] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १ सेतुरालौ स्त्रियां पुमान् । २ वामलूरश्च नाकुश्च वल्मीकं पुन्नपुंसकम् ॥ १४ ॥ ३ मयनं वर्म मार्गावपन्थानः पदवी सृतिः । सरणिः पद्धतिः पद्या वर्तन्येकपदीति च ॥१५॥ ४ मतिपन्थाः सुपन्थाश्च सत्पथश्वाचितेऽध्वनि । ५ व्यध्वो दुरध्वो विपथः कदध्याकापथः समाः ॥१६॥ ६ अपन्यास्त्वपथं तुल्ये शृङ्गाटकचतुष्पथे। ८ प्रान्तरं दूरशून्योऽध्या कान्तारं वम दुर्गमम् ॥१७॥ १ सेतुः (पु), आलि: ( + आली । स्त्री ), 'पुल' के २ नाम हैं । २ वामनरः, नाकु: (२ पु), वल्मीकम् (+बाल्मीकम् । पुन), बम्बोट, दिमकाण' अर्थात् 'दीमक या कीड़ोंद्वारा इकट्ठा किये हुए मिट्टीके. देर के ३ नाम हैं। ३ अयनम् , वर्त्म ( = वर्मन । २ न), मार्गः, अध्वा ( =अध्वन् ), पन्थाः ( = पथिन् । + पथः । ३ पु), पदवी ( + पदविः ), सृतिः, सरणिः (+शरणिः), पद्धतिः ( + पद्धती), पद्या, वर्तनी, (+वर्तनिः, वर्त्मनिः).. एकपदी ( + एकपात = एकपाद् । ७ स्वी), 'मार्ग, रास्ते के १२ नाम हैं ||~- ४ अतिपन्थाः (= अतिपथिन ), सुपन्था (= सुपथिन् ), सत्पथः (३ पु), 'अच्छे मार्ग के ३ नाम हैं । ६ व्यध्वः, दुरध्वः, विपथः, कदध्वा ( = कदध्वन् ), कापथः (+कुपथः । ५ पु* ), 'खराब मार्ग के ६ नाम हैं। ६ अपन्थाः ( = अपथिन् , पु), अपथम् (न), 'कुमार्ग, खराब रास्ते' के २ नाम हैं। ७ शृङ्गाटकम् , चतुष्पथम् (२ न), 'चौरस्ता या चौक के २ नाम ८ प्रान्तरम् ( न ), 'जिसमें बहुत दूर तक छाया और पानी नहीं मिले उस रास्ते' का १ नाम है ।। ९ कान्तारम् (पु न ), 'चीर कण्टक और झाड़ी इत्यादि से दुर्गम रास्ते का १ नाम है। "विपथं-कापथं" च क्लीबमाहुः, यद्वामनः-('पथः संख्याव्ययादेः') "सचथाव्ययपू- कस्य पथः क्लीबता" इति क्षी० स्वा० 'विपथकापथ' शब्दयोनपुंसकत्वमप्युक्तवान् ।। - अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ गव्यूतिःस्त्री कोशयुगं रनल्यः *कि कुचतुःशतम् । ३ घण्टापथः संसरणं ४ तत्पुरस्योपनिष्करम् ॥१८॥ ५ द्यावापृथिव्यौ रोदस्यौ द्यावाभूमी च रोदसी (३) दिवस्पृथिव्यौ गजा तु रुमा स्याल्लवणाकरः' (४) इति भूमिवर्गः॥१॥ १६गम्युतिः ( स्त्री + पुन । गोरुतम्, गोमतम् २ न), 'दो कोश लम्बे रास्ते या स्थान' का १ नाम है ॥ २ नल्वः (पु। + न), चार हजार हाथका लम्बा रास्ता या रस्सी आदि' का १ नाम है । ३ घण्टापथः (पु), संसरणम् ( न ), 'राजमार्गः के २ नाम ४ । उपनिष्करम् (न), गांवके राजमार्ग' का १ नाम है ॥ ६ [द्यावापृथिव्यौ, रोदस्यौ, द्यावाभूमी, रोदसी, दिवस्पृथिव्यौ (५ स्त्री नि. द्विव० ), 'आकाश और पृथ्वीके समुदाय के ५ नाम हैं ] ॥ ६ [ गञ्जा, रुमा ( २ स्त्री ), लवणोकरः (पु), 'खारा समुद्र के ३ नाम है ॥ इति भूमिवर्गः ॥ १॥ st - * "किष्कु चतुःशतो” इति काचित्कः पाठः। अयं क्षेपकः क्षी०स्वा० व्याख्यायामुपलभ्यते,तत्र 'दिवस्पृथिव्यौ गजा तु' इत्यस्य स्थाने - दिवस्पृथिव्याः संज्ञेयम्' इति पाठभेदश्चोक्त इति ज्ञेयम् ।। * 'अङ्गोपाझापेक्षया भूमेः प्राधान्यादाह-"इति भूमिवर्ग" इतीत्यवधेयम् ।। तथा च बृहस्पतिः "धन्वन्तरसहस्रं तु क्रोशं, क्रोशद्वयं पुनः। गव्यूतं स्त्री तु गव्यूतिर्गोरुतं गोमतं च तत्” ॥ १ ॥ इति । धनुहस्तचतुष्टयम्" इति। द्वाभ्यां धनुःसहस्राभ्यां गव्यूतिः पुंसि भाषितः" ॥ इति शब्दार्णवः” इति ॥ एवञ्च-४ हस्ताः= १ धनुः । १००० धनूंषि = १ क्रोशः। २ क्रोशौ वा २००० धनूं षि: १ गब्यूतिः। || "नल्वं' हस्तशतम्" इति मा० दी० । 'किकुर्हस्तस्तेषां चतुःशती 'नल्वम्' इति माला । कात्यस्तु-"नल्वं ( विंश) हस्तशतम्" इति क्षी० स्वा०।, "नल्वं विशं हस्तशतम्" इति मुकुटः॥ "दशधन्वन्तरो राजमागों घण्टापथः स्मृतः" इति चाणक्य" इति ॥ बुधैः संसरणं वर्म गजादीनामसंकुलम् । पुरोपनिष्कर चोक्तम्" इति क्षी० स्वा०॥

पुरवर्गः २ ] मणिप्रभाव्याख्यासाहतः । . २. अथ पुरवर्गः। १ पूः स्त्री पुरीनगौं वा पत्तनं पुटभेदनम् । स्थानीयं निगमो२ऽन्यत्तु यन्मूलनगरात्पुरम् ॥ १ ॥ तच्छाखानगरं ३ वेशो वेश्याजनसमाश्रयः। ४ आपणस्तु निषद्यायां ५ विपणिः पण्यवीथिका ॥ ५ ॥ ६ रथ्या प्रतोली विशिखा ७ स्याञ्चयो वप्रमस्त्रियाम् । २. अथ पुरवर्गः। १ पू: ( =पुर् , स्त्री), पुरी, नगरी ( २ स्त्री न), पत्तनम् (+ पट्टनम् ), पुटभेदनम् , स्थानीयम् , (३ न ), निगमः (पु), 'नगर के ७ नाम हैं । (जहां अनेक तरहके कारीगर व्यापारी आदि वसते हैं उसके 'पू:, पुरी, नगरी' ये ३ नाम हैं, 'जहां राजाके नौकर आदि वसते हैं उसके पत्तनम् , पुटभेदनम्' ये २ नाम हैं और खाई या चाहरदिवारी आदिसे घिरे हुए नगरके स्थानीयम् , निगमः ये २ नाम हैं। यह भी किसी २ का मत है")॥ २ शाखानगरम् (न), 'छावनी' अर्थात् 'राजधानीसे अतिरिक्त छोटे २ नगर' का १ नाम है। ३ वेशः, वेश्याजनसमाश्रयः (भा० दी०। २ पु), 'वेश्याओंके वास- स्थान के २ नाम हैं। ४ आपणः (पु), निषद्या (स्त्री), 'बाज़ार, हाट या ग्राहकोंके ख- रीदने योग्य वस्तु (सौदा) के रखनेका स्थान' अर्थात् 'गोदाम के २ नाम हैं। ६ विपणिः (+ विपणी), पण्यवीथिका (+पण्यवीथी । २ स्त्री ), 'दूका- नोंकी पति या बाज़ारका रास्ता या बाज़ारसे भिन्न सौदा बेचनेके किसी भी स्थान' के २ नाम हैं। ("आपणः” आदि ४ नाम 'बाजार' के हैं यह भी मत है।")॥ ६ रथ्या, प्रतोली, विशिखा ( ३ स्त्री ), 'गली के ३ नाम हैं । ("विपणिः आदि ६ नाम एकार्थक हैं यह भी मत है")॥ ७ चयः (पु), वप्रम् ( न पु), 'धूस' अर्थात् 'किले के चारो तरफ उँचा किया हुआ मिट्टीके ढेर के २ नाम हैं ।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्हे- हैं १ प्राकारो वरणः *सालः२ प्राचीनं प्रान्ततोवृतिः ॥ ३ ॥ ३ भित्तिः स्त्री कुड्यटमेडूकं यदन्तय॑स्तकीकसम् । ५ गृहं गेहोदवसितं वेश्म सद्म निकेतनम् ॥ ४ ॥ निशान्तपस्त्यसदनं भवनागारमन्दिरम् । गृहाः पुंसि च भूमन्येव निकाय्यनिलयालयाः ॥ ५॥ ६ वासः कुटीद्वयोःशाला सभा ७ सजवनं त्विदम् । चतुःशालं = मुनीनां तु पर्णशालोटजोऽस्त्रियाम् ॥ ६ ॥ १ प्राकारः, वरणः, सालः ( +शालः । ३ पु), 'बांस या काँटा आदि- के घेरा के ३ नाम हैं। २ प्राचीनम् ( + प्राचीरम् । न ), 'कांटा मादिसे घिरे हुर नगरके समीपवाले स्थान का १ नाम है । ३ भित्तिः (स्त्री), कुड्यम् (न), 'दिवाल' के २ नाम ४ एडूकम् ( + एडुकम् , एडोकम् । न ), 'मजबूतीके लिये भीतर- में हड्डी लोहा लकड़ो या टीन आदि देकर बनाई हुई दिवाल' का १ नाम है। ५ गृहम् , गेहम् , उदवसितम् , वेश्म (= वेश्मन ), सझ (=सझन् ), निकेतनम् , निशान्तम् , वस्त्यम् (+ पस्त्यम् , बस्त्यम् ), सदनम् (-सादनम्), भवनम् , अगारम् , मन्दिरम् (१२ न ), गृहाः (पु नि० ब० व० ), निकाय्यः (+निकाय:), निलयः, आलयः (३ पु), 'मकान' के १६ नाम हैं । ६ वासः (पु), कुटी (+कुटिः । पु स्त्री ), शाला, सभा (२ स्त्री), 'सभाभवन या बैठकखाना के ४ नाम हैं। ("गृहम् ,....", २० नाम मकाना ही के हैं यह भी मत है।) ७ सञ्जवनम् , चतुःशालम् (+ चतुःशाला, स्वीः २ न ), 'चौतरफा घर- वाले स्थान के २ नाम हैं । ८ पर्णशाला (स्त्री। +न ), उटजः (पु न), 'पत्तोंसे बनाई हुई साधुओं. की कुटी' के २ नाम हैं। *"साल: प्राचीरं" इति पाठान्तरम् ।। + "कुलोदवसितं पस्त्यम्' इति वाचस्पत्यनुरोधात्-"निशान्तपस्त्यसदनम्" इत्यपीति क्षी०स्वा० श्राह॥ - पुरवर्ग: २] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । ११५ . १ १ चैत्यमायतनं तुल्ये २ वाजिशाला तु मन्दुरा । ३ आवेशनं शिल्पिशाला ४ प्रपा पानीयशालिका ॥ ७॥ ५ मठश्छात्रादिनिलयो ६ गञ्जा तु मदिरागृहम् । ७ गर्भागारं वासगृहम्मरिष्टं सूतिकागृहम् ॥ ८ ॥ 8 कुट्टिमोऽस्त्रीनिबद्धा भू १०श्चन्द्रशाला शिरोगृहम् (५) ११ वातायनं गवाक्षो१२ऽथ मण्डपोऽस्त्री जनाश्रयः । १ चैत्यम् , आयतनम् (२ न ), "यज्ञस्थान-विशेष के २ नाम हैं। २ वाजिशाला, मन्दुरा ( २ स्त्री ), 'अस्तवल' के २ नाम हैं । ३ आवेशनम् (न), शिल्पिशाला (+शिल्पशाला । स्त्री ।+न ), 'कारी गरोंके घर के २ नाम हैं। ४ प्रपा पानीयशालिका (३ स्त्री), पौसरा या पानी रखने की जगह के २ नाम हैं। ५ मठः (पु) 'मठ' अर्थात् 'विद्याथियों या सन्यासियों के रहनेकी जगह के २ नाम हैं। ६ गञ्जा (स्त्री), मदिरागृहम् (न), 'कलवरिया या मदिराके 'घर' के २ नाम हैं। ® गर्भागारम् , वासगृहम् ( २ न ), 'घरके बोचके हिस्से' के २ नाम हैं। ८ अरिष्टम् , सूतिकागृहम् ( + सूतकागृहम् । २ न ), 'सौरीके घर' अर्थात् 'जिसमें लड़का पैदा हुआ हो उस घर' के २ नाम हैं। ( "किसीके मतसे धार्भागारम् , ..." ४ शब्द एकार्थक हैं")॥ ९ [ कुटिमः ( पु न ), 'पत्थर या सिंगमर्मर मादिके बने 'फर्श का १ नाम है ] ॥ १० [चन्द्रशाला (स्त्री), शिगेगृहम् (न), 'अटारी, या घरके ऊपरी छत' के २ नाम है ॥ ११ वातायनम् ( न ), गवाक्षः (पु), 'झरोखे २ नाम है । १२ मण्डपः ( पु न), जनाश्रयः (पु), 'मण्डप' के २ नाम हैं। * "शिल्पिशालम्” इति पाठान्तरम् । “शिल्पशाला" इति सभ्यः पाठ' इति क्षी० स्वा०॥ अयं क्षो स्वा० व्याख्यायां समुपलभ्यते ॥

ममरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- १ * हादि धनिनां वासः २ प्रासादो देवभूभुजाम् ॥ ४ ॥ ३ सौधोऽस्त्री राजसदन ४मुपकार्योपकारिका । ५ स्वस्तिकः सर्वतोभद्रो नन्द्यावर्तादयोऽपि च ॥१०॥ विच्छन्दकः प्रभेदा हि भवन्तीश्वरसझनाम् । ६ स्यगारं भूभुजामन्तःपुरं स्यादवरोधनम् ॥ ११ ॥ शुद्धान्तश्चावरोधश्च ७ स्यादः क्षोममस्त्रियाम् । = प्रधाणप्रघणालिन्दा बहिरप्रकोष्ठ के ॥ १२ ॥ १ हर्म्यम् (न), आदि ("आदि शब्दसे 'स्वस्तिकम् , अट्टालिकम् वासगृहम् (३ न ),..........., 'धनियोंके रहने के स्थान का नाम है ॥ २ प्रासादः (पु), 'देवतामों और राजाओंके निवासस्थान या कोठा' का १ नाम है ॥ ॥ ३ सौधः (पु न ), राजसदनम् ( न ), 'राजाके घर के २ नाम है । ४ उपकार्या, उपकारिका ( २ स्त्री), 'तम्बू , कनात, सामियाना' के २ नाम है । ( "सौधम्, .........., ४ शब्द राजगृह' के नाम है" ) ॥ ९ स्वस्तिका, सर्वतोभद्रः, नान्द्यावर्तः, आदि ("आदि' शब्दसे 'रूपकः, वर्द्धमानः......... ), विच्छन्दकः (+विच्छर्दकः । ४ पु), धनियोंके गृहों के १-१ नाम है। ("चारो तरफसे दरवाज़ा और तोरणवाले घरको 'स्वस्तिका, अनेक मंजिले घरको 'सर्वतोभद्र', गोलाकार घरको 'नन्द्यावर्त, और बड़े तथा सुन्दर घरको 'विच्छन्दक' कहते है" ) ॥ ६ अन्तःपुरम् , अवरोधनम् ( २ न), शुद्धान्तः, अवरोधः ( २ पु), 'रनि- वाँस' के ४ नाम है ॥ ७ अटः (पु), क्षोमम् (+क्षौमम् । न पु), 'मटारो के २ नाम है। ८ प्रघाणः, प्रधणः, अलिन्दः (+आलिन्दः । ३ पु), 'पटडेहर' अर्थात् 'चौकठके बाहरी जगह के ३ नाम है । एतत्पूर्व "मत्तालम्बोपाश्रयः स्यात्प्रग्रीवो मत्तवारणः” इति क्षेपकः क्षी० स्वा० व्याख्याने उपलभ्यते ।। "विच्छर्दकप्रभेदा हि" इति पाठान्तरम् ॥

पुरवर्ग: २ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १ गृहावग्रहणी *देहल्यङ्गणं चत्वराजिरे। ३ अधस्तादारुणि शिला ४नासा दारूपरि स्थितम् ॥१३॥ ५ प्रच्छन्नमन्तारं स्यात् ६पक्षद्वारं तु पक्षकम् । ७ वलीकनीधे पटलप्रान्तेऽथ पटलं छदिः ॥ १४ ॥ १ गृहावग्रहणी, देहली ( २ स्त्री), 'डेहर या दरवाज़े के नीचेवाले भाग' के २ नाम हैं। २ अङ्गणम् ( महे० । + अङ्गनम् , भा० दी० क्षी० स्वा०; I + प्राङ्गणम् , प्राङ्गनम् ), चत्वरम् , अजिरम् ( ३ न), 'प्राङ्गन,चबूतरा' के ३ नाम है ॥ ३ शिला ( + शिली । स्त्री), 'दरवाजेके दोनों खम्भों के ऊपर- वाले काठ, लोहा या पत्थर' का १ नाम है । ४ नासा (स्त्री), 'दरवाजेके दोनों खम्भोंके ऊपरवाले काष्ठ, लोहे या पत्थर का १ नाम है । ६ प्रच्छन्नम् , अन्तरिम् (२ न ), 'खिड़की' के २ नाम है ॥ ६ ६ पक्षद्वारम् , पक्षकम् ( + पु, क्षी० स्वा० भा० दी० । २ न ), 'मुख्य द्वारके बगलवाले द्वार के २ नाम है। ७ वलीकम् (+पु), नीध्रम् , पटलप्रान्तम् ( ३ न ), 'छान्ह, ओरी, या घोड़मुहा' के ३ नाम हैं। ८ पटलम् (न), = छदिस, स्त्री || क्षी० स्वा०, नपुं० भा० दी०, महे० ), 'छावना, छाजन' के २ नाम है । * "देहत्यानम्" इति पाठान्तरम् ॥ + पक्षकः" इति पाठान्तरम् ॥ + णान्तस्याङ्गणशब्दस्य पृषोदरादित्वात्सिद्धिः । “अङ्गनं प्राङ्गणे याने कामिन्यामजनामता" इति विश्वमेदिन्युक्तेः, "अङ्गनं प्राङ्गणे यानेऽप्यङ्गना तु नितम्बिनी” इति अनेकार्थसंग्रह हेमच- न्द्राचार्योक्तेश्च नान्तोऽपि 'अङ्गन' शब्द इत्यवधेयम् । अधिकं व्याख्यासुधाटिप्पणे द्रष्टव्यम् । "प्रच्छन्नमन्तारं स्यात्पक्षद्वारं तदुच्यते” इति कात्यात् 'पक्षद्वार' शब्दः पूर्वान्वयीत्यन्ये' इति भा० दी। तन्न शोभनम् , 'त्वन्ताथादि न पूर्वभा' (१।१।४) इति ग्रन्थकारप्रतिज्ञा- विरोधात् । अथवा 'तो'स्थाने 'च' पाठमाश्रित्याविरोधोऽपीत्यवधेयम् ।। ॥ "छदिः स्त्रियामेव (लि० सू० १३५ ) इत्यत्र 'इयं छदिः' इत्यादिना 'छदिः शम्दसा- धुत्वमुक्त्वा पटलं छदिः' इत्यमरकोषे 'पटल' साहचर्यात् 'छदिषः क्लीबतां वदन्तोऽमरव्याख्या- छदिः ( %3- ममरकोषः। [द्वितोयकाण्डे- १ गोपानसी तु वलभी छादने वक्रदारुणि । २ कपोतपालिकायां तु विटङ्क पुनपुंसकम् ॥ १५ ॥ ३ स्त्री द्वारिं प्रतीहारः ४स्याद्वितर्दिस्तु वेदिका। १ गोपानसी, *वलभी (+वलभिः, f वडभी । २ श्री ), 'धरन कैंची या छानेके लिये दिये हुए टेढ़े काष्ठ' के २ नाम है ॥ २ कपोतपालिका (स्त्री), विटङ्गम् (न पु), 'कबूतर आदि पक्षियों- के लिये लकड़ी आदिके बनाए हुए घर' के २ नाम है। ३ द्वाः (=द्वार स्त्री), द्वारम् (न), प्रतीहारः (+प्रतिहारः । पु), 'दरवाजा' के ३ नाम है। ४ वितर्दिः ( + वितर्दी ), वेदिका ( २ स्त्री.), 'वेदी, चौतरा के २ नाम हैं। तार उपेक्ष्या" इति भट्टोजीदीक्षितः। “छदिः स्त्रियामेव' (लि० सू० १३५) इत्यत्र एवपदम- न्तराऽपि सूत्रोक्त्या छदिषः स्त्रीत्वे लब्धे 'पटलं छदिः ( अमर २।२।१४ ) इत्यत्र पटलसाहचर्या- क्लीबत्वसन्देह' इति तन्निवारणाय सूत्रे 'एव'कारस्तदुच्यते 'अमरव्याख्यातार उपेक्ष्या' इति" इति सुबोधिनीकारः । 'पटलच्छदिषी समे' (अभि० चिन्तामणौ ४।७६) इत्यस्य “पटयति स्थग- यति पटलं त्रिलिङ्गः, 'मदिकन्दि- ( उणा० सू० ४६५) इत्यलः, पटं लातीति वा ॥१॥ छाद्य- तेऽनेनच्छदिः क्लीबलिङ्गः' "रुच्यचि-" ( उ० सू० ९८९) इति इस्' 'छदेरिस्मन्- (पा० सू० ४।२।३३) इति ह्रस्वः" इति व्याख्यानं कुतम् । वाचस्पत्याभिधाने च'छदि"स्त्री,छद-कि, 'छदिषि पटले' (चाल), अमरः, "छदिः स्त्रियाम्' (लि० सू० १३५ ) पा० उक्तेरिदन्तताऽस्य" इति, "छदिष, न०,छद् इसि 'पटले सान्तं क्लीब' रायमुकुट इन्द्रस्य छदिरसि'यजु०४।२८२ गृहे निघण्टुः" इति चोक्तत्वात् इकारान्तः 'छदि' शब्दः स्त्रीलिङ्गः, सकारान्तश्च 'छदिस्' शब्दः क्लीबलिङ्गः, इत्यायातम् । क्षी० स्वा० मु० क्लोबत्वम् महे० मा० दी. स्त्रीत्वमामन्तति, तथा व्याख्यासुधाटिप्पणीकाराः पं० शिवदत्ता अपि "स्त्रीत्वे ग्रन्थकारप्रतिज्ञाभङ्गापत्त्या लिङ्गस्य लोका- श्रयत्वाङ्गीकारात् 'छदिः स्त्रियाम्' (लि० सू० १३५) इत्यस्याकिञ्चित्करत्वेन तस्य क्लीबत्वमे. बाङ्गीकृतवन्तः। वस्तुतस्तु वाचस्पत्युक्त्या इकारान्त'च्छदि' शब्दस्य स्त्रीत्वाङ्गीकारे सकारान्त 'च्छदिः' शब्दस्य क्लीबस्वाङ्गीकारे च दीक्षितादिविरोधेऽपि नैव ग्रन्थकार प्रतिशाभङ्गः, नापि क्षी० स्वा० मुकुटयोविरोध इत्यवधेयम् ॥ मुकुटेनास्य पर्यायता नाङ्गीकृता ।। +"ओको गृहं पिटं चालो वडभी चन्द्रशालिका' इति त्रिकाण्डशेषात्" 'शुद्धान्ते वडभी चन्द्रशाले सौधोववेश्मनि' इति रभसाच्च ।। .

धुरवर्ग: २] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १ तोरणोऽस्त्रो बहिरं २ पुरद्वारं तु गोपुरम् ॥ १६ ॥ ३ कूदं पूर्धारि यद्धस्तिनखस्तस्मिन्नध्य त्रिषु । कपाटमररं तुल्ये ५ *तद्विष्कम्भोऽर्गलं न ना ॥ १७ ॥ ६ श्राराहणं स्यात्सोपानं निश्श्रेणिस्त्वधिरोहिणी । - संमार्जनी शोधनी स्याहसंकरोऽवकरस्तथा ॥१८॥ क्षिप्ते १० मुखं निःसरणं ११ संनिवेशो निकर्षणम् । १ तोरणः (पु न ), बहिरम् (न), 'तोरण, बाहरी फाटक' के २ नाम हैं। २ पुरद्वारम् , गोपुरम् ( २ न ), 'नगर बड़े फाटक' के २ नाम है। ३ हस्तिनखः (पु), 'सुखपूर्वक चढ़नेके लिये राजद्वार या नग- रद्वारपर बनाई हुई ढालू जमीन" का १ नाम है । ४ कपाटम् (+कवाटम् ), अररम् ( अररि, अररिः । २ त्रि), "किवाड़ के २ नाम हैं । ५ अर्गलम् (न स्त्री), 'किल्ला' के २ नाम है। ६ आरोहणम् , सोपानम् ( २ न ), 'सीढ़ के २ नाम है । ७ निश्रेषणः ( +निश्रेणा), अधिरोहिणी ( २ स्त्री ), 'काठकी सीढ़ी' के २ नाम है। ८ संमार्जनी, शोधनी ( २ स्त्री), 'झाड़ के २ नाम है ॥ १ संकरः ( +संकारः), अवकरः (२ पु), 'कतवार बहारन' के २ नाम है। १० मुखम् , निःसरणम् ( न ), 'घर आदिके प्रधान द्वार के २ - ॥ ११ सन्निवेशः (पु), निकर्षणम् (न), "ठहरने योग्य सुन्दर स्थान' के २ नाम हैं। * "तद्विष्कम्भ्यर्गलम्" इति पाठान्तरम् ।। "निश्रेणिस्त्वचिरोहणी" इति पाठान्तरम् ।। "संकारोऽवकारः" इत्यपि पाठान्तरम् ।।

१२० अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे... १ समौ संवसथग्रामौ २ वेश्मास्तुरस्त्रियाम् ॥ १६ ॥ ३ *ग्रामान्तमुपशल्यं स्यात् ४ सीमसीमे स्त्रियामुभे । ५ घोष भाभीरपल्ली स्यात् ६ पक्कणः शबरालयः ॥ २०॥ इति पुरवर्गः ॥२॥ ३. अथ शैलवर्गः। ७ महीधे शिखरिदमाभृदहार्यधरपर्वताः । अद्रिगोत्रगिरिग्रावाचलशैलशिलोच्चयाः ॥ १॥ १ संवसथः, ग्रामः ( २ पु), 'ग्राम' के २ नाम है ॥ १ वेश्मभूः (स्त्री), वास्तुः (पु न ), 'घरकी जमीन' के २ नाम है। ३ ग्रामान्तम् । (+पु), उपशल्यम् (२ न), 'गांवके पासवाली जमीन के २ नाम है ॥ ४ सीमा ( =सीमन् ), सीमा ( २ स्त्री), 'सिवान सीमा के २ नाम है। ६ घोषः (पु), आभीरपल्ली ( + आभीरपल्लिः । स्त्री), 'अहीराके झोपड़े या गांव के २ नाम है ॥ ६ पक्वणः, शवरालयः ( २ पु), 'कोल, भील किरात मादि म्लेच्छ जातियों के घर के २ नाम है ॥ इति पुरवर्गः ॥ २॥ . ३. अथ शैलवर्गः। ७ महीध्रः, शिखरी ( =शिखरिन् ), माभृत् (+भूभृत् ), अहार्यः धरः, पर्वतः, अद्रिः, गोत्रः, गिरिः, ग्रावा ( =ग्रावन् ), अचलः, शैलः, शिलोचयः (१३ पु) 'पहाड़ के १३ नाम है ॥ "ग्रामान्त उपशल्यं स्यात्' इति पाठान्तरम् ॥

शालवर्ग: ३] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १२१ 1 -- १ लोकालोकश्चक्रवालस्त्रिकूटस्त्रिककुत्समौ । ३ श्रस्तस्तु चरमदमामृदुदयः पूर्वपर्वतः ॥२॥ ५ हिमवान्निषधा विन्ध्यो *माल्यवान्पारियात्रकः । गन्धमादनमन्ये च हेमकूटायो नगाः ॥ ३ ॥ ६ पाषाणप्रस्तरमावोपलाश्मानः शिला द्वषत् । ७ कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गं प्रपातस्त्वतटो भृगुः ॥४॥ कटकोऽस्त्री नितम्बोऽद्रः१०स्नुः प्रस्थः सानुरलियाम् । १ लोकालोकः, चक्रवाल: (+चक्रवाडः । २ पु), 'सात द्वीपवाली पृथ्वीको घेरे हुए पहाड़ के १ नाम हैं। २ त्रिकूटः, त्रिककुत् (=त्रिककुद् । २ पु ), 'त्रिकूट पहाड़ के २ नाम हैं । ३ अस्तः, चरमक्ष्माभृत् ( २ पु), 'अस्ताचल के २ नाम है ।। ४ उदयः, पूर्वपर्वतः (२ पु ), 'उदयाचल' के २ नाम है ॥ ९ हिमवान् (=हिमवत् ), निषधः, विन्ध्यः, माल्यवान् (=माल्यवत् ), परियात्रका (परियात्रिका), गन्धमादनम् (न। +पु), हेमकूटः (शेष पु), हिमालय निषध आदि पहाड़ों का क्रमशः १-१ नाम है । ( "अन्य शब्दसे "मन्दरः, मलयः, सह्यः, चित्रकूटः, मैनाकः ( ५ पु),.........." का संग्रह है।)॥ ६ पाषाणः प्रस्तरः, ग्रावा (ग्रावन ), उपलः, अश्मा ( अश्मन् । ९ पु), शिला, हषत् ( = दृषद् । २ स्त्री), 'पत्थर' के ७ नाम है। ७ कूटः ( पु न ), शिखरम् , शृङ्गम् ( २ न । + ३ पु न ), 'पहाड़की चोटी के ३ नाम है। ८ प्रपातः, अतटः ( + तटः ), भृगुः ( ३ पु ), 'पहाड़से गिरने योग्य स्थान के ३ नाम है। ९ कटकः ( पु न ), 'पहाडके मध्यभाग' का १ नाम है । १० स्नुः, प्रस्थः, सानुः (६३ पु न ), 'पहाड़से समतल भूमिके * "माल्यवान् पारियात्रिक" इति पाठान्तरम् ॥ | "प्रपातस्तु तटो भृगुः" इति पाठान्तरम् । तत्र "प्रपत्यते यस्मात्तटात्स भृगुरिति विग्रहो ज्ञेयः । मूलपाठे च "प्रपतत्यस्मादिति प्रपातः, न तटमत्रेत्यतट इत्येवं विग्रहो ज्ञेयः ।। * "सानुरस्त्रियौ" इति पाठान्तरम् ।। क्षीरस्वामिभानुजिदीक्षितौ तु "स्तुः प्रस्थः सानुरस्त्रियौ" इति पठित्वा 'द्वित्वात्प्रस्थोs- . .

१२२ [द्वितीयकाण्डे- अमरकोषः। १ उत्सः प्रस्रवणं २ वारिप्रवाहो निर्झरो झरः ॥५॥ ३ दरी तु कन्दगे वा स्त्री ४ देवखातविले गुहा । गहरं गण्डशैलास्तु व्युताः स्थूलोपला गिरः ॥६॥ ६ *दन्तकास्तु बहिस्तिर्यकप्रदेशानिर्गता गिरेः। (६) ७ खनिः स्त्रियामाकरः स्यात् पादाः प्रत्यन्तपर्वताः । किसी एक भाग के ३ नाम है ॥ १ उत्सः (पु), प्रस्त्रवणम् (न), 'पहाड़से गिरे हुए अधिक जलके इकट्ठा होनेवाले स्थान' के २ नाम है । २ वारिवाहः ( अन्य मतसे ), निर्झरः, झरः ( ३ पु ), 'झरना के ३ नाम हैं। (“ अन्य आचार्यो के मतसे 'उत्सः,....६ नाम 'झरना ३ दरी (स्त्री), कन्दरः ( पु स्त्री ), 'पहाड़के कन्दरा' के २ नाम है ।। ४ देवखातबिलम् (भा० दी० । देवखातम् , बिलम्। महे०), गुहा (स्त्री), गह्वरम् ( शेष न ), 'स्वभावहीसे बने हुए बिल या गुफाके ३ नाम है ॥ ("किसी २ के मतसे 'गुहा, गह्वरम्' ये दो ही नाम है" ) ॥ ६ गण्डशैलः ( ), 'पहाड़से गिरे हुए बड़े २ चट्टान' का १ नाम है ।। ६ [ दन्तकः (पु), पहाड़के टेढ़े स्थानसे बाहर निकले हुए बड़े चहान' का १ नाम है ] ॥ ७ खनिः ( +खानिः, खानी । स्त्री), आकरः (पु। +गजा स्त्री), 'खान' अर्थात् 'रत्न, धातु और कोयला आदिके निकलनेके स्थान के २ नाम है। ८ पादः, प्रत्यन्तपर्वतः ( २ पु ), 'आसपासकी छोटी पहाड़ी' के २ नाम है ॥ प्यस्त्री' इत्याहतुः। महेश्वरस्तु त्रयाणामपि स्त्रीत्वाभावमुक्त्वा "स्नुः पुंलिङ्ग इति सर्वधर" इत्याह । * अयं क्षेपकः क्षो० स्वा० व्याख्याने समुपलभ्यते। श्रभिधानचिन्तामणी (४११००) चेत्यवधेयम् ॥ । यस्कात्य:--'देवखाते बिले गुहा' इति, शाश्वतोऽप्यार -गह्वरं विलदम्भयोः' इति, अभि० धानचिन्तामणौ-दरी स्यात्कन्दरोऽखातबिले तु गहरे गुहा' ( अभि० चिन्ता० ४१९९) इतिः प्रामाण्यादिति विभावनीयम् ॥ *- स्यादाकरः खनिः खानिर्गना-" इति (अभि० चिन्ता ४११०२) उक्तेः ।।

शैलवर्ग: ३] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १२३ १ उपत्यकानेरासन्ना भूमिररूमधित्यका ॥ ७॥ ३ धातुर्मनःशिलाद्यद्रे गैरिक ५ निकुञ्जकुऔ वालीबे लतादिपिहितोदरे ॥ ८ ॥ इति शैलवर्गः ॥३॥ तु विशेषतः । १ उपत्यका (स्त्रो), 'पहाड़के पालवाली जमीनके नीचेवाले हिस्सं' का १ नाम है। २ अधित्यका (स्त्री), 'पहाड़के ऊपरवाले स्थान' का १ नाम है । ३ धातुः (पु), 'धातु' अर्थात् 'पहाड़से निकले हुए धातु' का १ नाम है । ( "सोना, चांदी, तांबा, हरिताल, मैनसिल, गेरु, अञ्जन, कसोस, सीसा, लोहा. हिङ्गुल (सिंगरिफ), गन्धक और अभ्रक, आदि धातु पहाड़से निकलते हैं)॥ ४ गैरिकम् (न), गेरु' अर्थात् पहाड़से निकले हुए एक धातु-विशेष का १ नाम है॥ ५ निकुञ्जः, कुञ्जः ( २ पु न ), 'कुल' अर्थात् 'लता या झाड़ी आदिले आच्छादित स्थान-विशेष के २ नाम है ॥ इति शैलवर्गः ॥ ३॥ . , तदुक्तम्- सुवर्णरूप्यताम्राणि हरितालं मनःशिला। गैरिकाञ्जनकासीसलोहसीसाः सहिङ्गुलाः॥१॥ गन्धकाऽभ्रकतानाचा धावतो गिरिसम्भवा:"॥ इति ॥ कचित्तु- 'स्वर्ण रूप्यं च तानं च रङ्गय सदमेव च । सीसं लोहं च सप्तैते धातवो गिरिसम्भवाः॥१॥ इति सप्त धातव उक्ताः । तत्रैव- "सप्तोपधातवः स्वर्णमाक्षिकं तारमाक्षिकम् । तुत्थं कांस्यं च रीतिश्च सिन्दुरश्च शिला जतु" ॥१॥ इति सप्तोपधातवश्च उक्ताः । सविस्तरमेतद्विवरणं चरकादिग्रन्थेषु द्रष्टव्यम् ।। - १२३ ममरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- ४. अथ वनौषधिवर्गः। १ अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं वनम्। २ महारण्यमरण्यानी ३ गृहारामास्तु निष्कुटाः ॥ १ ॥ ४ आरामः स्यादुपवनं कृत्रिमं वनमेव यत् । ५ अमात्यगणिकागेहोपवने वृक्षवाटिका ॥ २ ॥ ६ पुमानाक्रीड उद्यानं राज्ञः साधारणं वनम् । ७ स्यादेतदेव प्रमदवनमन्तः पुरोचितम् ॥ ३॥ - वीथ्यालिरावलिः पड्डिः श्रेणी : लेखास्तु राजयः। ४. अथ वनौषधिवर्गः। १ अटवी (+ अटविः । स्त्री), अरण्यम्, विपिनम् , गहनम्, काननम्, वनम् (+वनो, स्त्री। ५ न), 'वन जङ्गल' के ६ नाम हैं । २ महारण्यम् (न), अरण्यानी (स्त्री), 'बड़े जलङ्ग' के नाम है। ३ गृहारामः, निष्कुटः (२ पु), 'घरके पासमें लगाये हुए जङ्गल' के २ नाम है ॥ ४ आरामः ( पु ), उपवनम् (न), 'किसीके लगाये हुए वन या बागीचे के २ नाम हैं। ६ वृक्षवाटिका (स्त्री), 'मन्त्रियों का वेश्याभोंके उपवन' का १ नाम है ॥ ६ आक्रीडः (I+न), उद्यानम् (न), 'प्रमदाओं या मित्रोंके साथ क्रीडा करने के लिये लगाये हुए साधारण वन या बागीचे के २ नाम है। ७ प्रमदवनम् (न), 'रानियों के क्रीड़ाके लिये लगाये हुए वन या फुलवारी' का १ नाम है। ८ वीथी (+वीथिः ), आलि: (+अलि ) आवलिः (+आवली), पङ्क्तिः ( + पङ्क्ती ), श्रेणी ( + श्रेणिः । ५), 'कतार' के ६ नाम है । ९ *लेखा (+रेखा), राजिः (२ स्त्री), रेखा लकीर' के ३ नाम है। * या सान्तरा सा 'पङ्किः' या च निरन्तरा सा रेखा' कथ्यते । यथा-क्षत्रियपतिः, ब्राह्म- पतिः., मसीभस्मादिखचिता रेखा । यथा-भस्मरेखा.... "|| बनौषधिवर्गः . ४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १२ . .. ७ १ वन्या वनसमूहे स्यादरङ्कुरोऽभिनवोद्भिदि ॥ ४ ॥ ३ वृक्षो महीरुहः शाखी विटपी पादपस्तरुः । * मनोकहः कुटः शालः पलाशी द्रद्रुमागमाः ॥ ५ ॥ ४ वानस्पत्यः फलैः पुष्पात्रपुष्पावनस्पतिः । ६ । मोषध्यः फलपोकान्ताः स्युरवन्ध्यः फलेग्रहिः ॥ ६ ॥ = वन्ध्योऽफलोऽवकेशीच १ चन्या ( स्त्रो), 'वनके समूह का १ नाम है । २ अङ्कुरः ( + अङ्करः । पु), अभिनवोद्भिव (=अभिनवोनिज स्त्री, मा० दो० । + प्ररोहः ) 'अङ्कुर' के २ नाम हैं । ३ वृक्षः, महीरुहः, शाखी (=शाखिन् ), विटपी ( =विटपिन् ), पादपः (+अधिपः, चरणपः, ) तरुः, अनोकहः, कुटः, साल: (+शाला), पला- शी (= पलाशिन् ), छः, द्रुमः, अगमः, ( + अगच्छः,...." । १३ पु ), 'पेड़ के १३ नाम हैं। ४ वानस्पत्यः (पु), 'फूलकर फलनेवाले पेड़' का १ नाम है । "जैसे-आम, लीची, अमड़ा, )॥ ५ वनस्पतिः, (पु), 'विना फूले फलनेवाले पेड़ का १ नाम जैसे-गूलर, कटहल, पीपल, बड़, "। किसीके मतसे उक्त दोनो शब्द 'वृक्षमात्र' के वाचक हैं । ६ ओषधी (+ औषधिः । स्त्री), 'फलकर पक जाने पर नष्ट हो जानेवाले उद्भिद्' का १ नाम है । ("जैसे-'धान, चना, जौ, गेहूं.....१) ॥ ७ अबन्ध्यः (+अवन्ध्यः), फलेग्रहिः (२ त्रि), 'अपने २ समय- में फलनेवाले पेड़ आदि के २ नाम हैं । ८ बन्ध्यः (+वन्ध्यः ), अफलः, अवकेशी ( =अवकेशिन । ३ त्रि), *"श्रनोकहः कुटः शाल" इति पाठान्तरम् ।। "ओषधिः फलपाकान्ता स्यादबन्ध्यः" इति पाठान्तरम् ॥ * "अङ्क्रश्चाङ्कुरः प्रोक्तः' इति हलायुधः" इति अमरविवेकपुस्तके, अङकुरश्चाङ्कुरः प्रोक्तः' इति हलायुध" इति व्याख्यासुधापुस्तके लिखितम् ॥ 'वनस्पतिः' इत्येकं नाम 'आम्रादिवृक्षस्येति भा० दो० चिन्त्यः । पाम्रादिवृक्षस्य पुष्पा- जातफलोपलक्षितवृक्षत्वात् 'तैरपुष्पावनस्पतिः' इति मूलोक्तिविरोधादित्यवधेयम् । अ०१० ममरकोषः । [द्वितीयकाण्डे- १ फलवान्फलिनः फली २ * प्रफुल्लोत्फुल्लसंफुल्लव्याशविकचम्फुटाः ॥ ७ ॥ फुल्लश्चैते विकसिते ३ स्युरवन्ध्यादयस्त्रिषु । ४ । स्थाणुर्वा ना ध्रुवः शङ्कुपर्हस्वशाख शिफः क्षुपः ॥ ८ ॥ ६ अप्रकाण्डे स्तम्बगुल्मौ ७वल्ली तु व्रतिलता । - लता प्रतानिनी वीरुद्गुल्मिन्युलप इत्यपि ॥ ६॥ नगाधारोह उच्छाय उत्सेधश्चोच्छ्रयश्च सः। 'नहीं फलनेवाले पेड़ आदि के ३ नाम हैं ॥ १ फलवान् ( = फलबत् ), फलिनः, फली (= फलिन् । ३ त्रि), 'फले हुए पेड़ श्रादि' के ३ नाम हैं । २ प्रफुल्लः ( + प्रफुल्तः ), उत्फुल्ला, संफुल्लः, व्याकोशः ( +व्याकोषः ), विकचः, स्फुटः, फुल्लः, विकसितः ( ८ त्रि), 'फूले हुए पेड़, लता मादि' के ८ नाम हैं॥ ३ 'अबन्ध्या से विकसितः' शब्द तक सब शब्द त्रिलिङ्ग हैं । ४ स्थाणुः (पुन ), ध्रुवः, शङ्खः (२ पु ), 'खुत्थ, ठूठा पेड़ के ३ नाम हैं। ६ क्षुपः (पु), 'गांछी, या जिसके डाल आदि छोटे हों उस पेड़ आदि का १ नाम है। ६ स्तम्बः, गुल्मः ( २ पु ), 'विना डालवाले पेड़ भादि' के २ नाम हैं। ७ वल्ली (+बल्लि: वेलिः), व्रततिः (+व्रतती, प्रततिः ), लता ( ३ स्त्री), 'लता, लत्तर के ३ नाम हैं । ("जैसे-'अंगूर, मालती, खीरा,""")। ८ वीरुत् (वीरुध ), गुल्मिनी ( २ स्त्री), उलपः (पु), 'बहुत डाला से युक्त लता' के ३ नाम हैं । ९ उच्छ्रायः, उत्सेधः, उच्छ्रयः ( ३ पु), 'पेड़ भादिकी उंचाई के ३ नाम हैं। , * प्रफुल्तोत्फुल.' इति पाठान्तरम् ।। "स्थाणुरस्त्री" इति पाठान्तरम् ।।

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १२७ १ अस्त्री प्रकाण्डःस्कन्धः स्यान्मूलाच्छाखावधिस्तरोः॥ १० ॥ २ समे शाखालते ३ स्कन्धशाखाशाले ४ शिफाजटे। ५ शाखाशिफावरोहः स्यान्मूलाच्चानं गता लता ॥ ११ ॥ ६ शिरोऽग्रं शिखरंवाना ७ मूलं बुध्नोऽनिनामकः । - सारोमजानरि त्वक्स्त्रीवल्कं वल्कलमस्त्रियाम् ॥ १२ ॥ . १ प्रकाण्डः (पु न ), स्कन्धः (पु), 'कन्धा, पड़ आदि के शाखाकी जड़ के २ नाम हैं। २ शाखा (+शिखा), लता ( २ स्त्री), 'डाल' के २ नाम हैं। ३ स्कन्धशाखा, शाला ( २ स्त्री), सबसे पहले फूटनेवाली डाल के २ नाम हैं। ४ शिफा, जटा ( २ स्त्री), 'सोर' अर्थात् 'जमीनके भीतर फैली हुई पेड़ को जड़ के नाम हैं। ५ अवरोहः (पु), पेड़की जड़, या पेड़ आदि पर चढ़ी हुई गु. डुचि आदि लता' का १ नाम है। ('यह महे० और मुकुट का मत है। भा० की० मतसे 'अवरोहः' (पु), 'डालकी जड़ का १ नाम है, तथा 'लता' (खा) वृक्षके ऊपर चढ़नेवाली लता' का १ नाम है" ) ॥ ६ शिरः ( =शिरम् ), अग्रम् (२ नाम क्षी० स्वा० महे० मतसे ), शि- खरम् ( ३ न), 'फुनगी' अर्थात् 'पेड़ आदिके सबसे ऊपरके हिस्से के .. नाम हैं। ७ मूलम् (न), बुनः ( +बध्नः ), अज्रिनामकः ( "पैरके वाचक सर, शब्द । २ पु), 'पेड़ आदिकी जड़ के ३ नाम हैं । ८ सारः, मज्जा ( = मज्जन् । + मज्जा = मज्जा, स्त्री । +२ पु ), 'लकड़ी. के बीचका हीर' अर्थात 'सारिल लकड़ी' के २ नाम हैं । १त्वक (= त्वच, स्त्री), वल्कम् , वल्कलम् (२ पुन), पेड़ आदि के के ३ नाम हैं। * "स्यान्मूलाच्छाखावधेस्तरोः" इति पाठान्तरम् ।। + "सारो मज्जा समौ" इति पाठान्तरम् ॥

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- . , १ काष्ठं दारविन्धनं त्वेध इध्ममेधः समस्त्रियाम् । ३ निष्कुहः कोटरं वा ना ४वल्लरिमारिः स्त्रियौ ॥१३॥ ५ पत्रं पलाशं छदनं दलं पर्ण छदः पुमान् । ६ पल्लवोऽस्त्री किसलयं विस्ताविपटोऽस्त्रियाम् ॥ १४ ॥ = * वृक्षादीनां फलं सस्यं वृन्तं प्रसवबन्धनम् । १ काष्ठम् , दारु (+दारुः, पु । २ न), 'लकड़ि' के २ नाम हैं । २ इन्धनम् , एधः (= एधस् ), इमम् ( ३ न), एधः (पु), समित् (= समिधू । स्त्री), 'जलावन इंधन' के ५ नाम हैं। ("भा० दी० मतसे इन्धनम्, ....., ३ नाम 'जलावन' के और 'एधः, समित्ये २ नाम 'हवनकी लकड़ी के हैं" ॥ ३ निष्कुहः ( +निष्कुटः । पु), कोटरम् (पु न ), 'पेड़के खोंढरा' के २ नाम हैं। ४ वल्लरिः (+वल्लरी), मञ्जरिः (+मञ्जरी। २ स्त्री) 'मञ्जरी, बौर, मोजर के २ नाम हैं। ६ पत्रम् , पलाशम् , छदनम् , दलम् , पर्णम् (५ न), छदः (पु), प- ता के ६ नाम हैं ६ पल्लवः (+पु), किसलयम् ( २ पु न ), 'नये पल्लव' के २ नाम हैं। ७ विस्तारः (पु, भा० दी०), विटपः (पुन, महे. क्षी० स्वा०), 'पेड़के फैलाव' के २ नाम हैं । ("पल्लवः,......, ४ नाम एकार्थक हैं यह भी किसी ३ का मत है")॥ ८ फलम् (भा० दो०), सस्यम् (+शस्यम् । २ न), 'फल' के २ नाम हैं। ९ वृन्तम् , प्रसवबन्धनम् (भा० दीः । २ न), "भेटी' अर्थात् पेड़ आदिके फल या फूलकी जड़ के २ नाम हैं । * वृक्षादीनां फलं शस्यम्' इति पाठान्तरम् ॥ "विटपो न स्त्रियां साम्ये शाखाविस्तारपल्लवे' इति (मेदि०पृ० १०९ श्लो० २२)पान्तवग मेदिनीवचनात् , 'शाखायां पल्लव सास्ये विस्तारो विटपेऽस्त्रियाम्' इति रभसात् , 'स्कन्धादूर्व तरोः शाखा कटप्रो (पों) विटपो मतः' इति कात्याच्चेत्यवधेयम् ॥ .

वनौषधिवर्गः ४ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। ५ ஷம் १ श्रामे फले शलाटुः स्यारच्छुम्के वानमुभे त्रिषु ॥ १५ ॥ ३ क्षारको जालकं क्लीबे ४ कलिका कोरकापुमान् । * स्याद्गुच्छकस्तु स्तबका६ कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम् ॥ १६ ॥ ७ स्त्रियः सुमनलः पुष्पं प्रसूनं । कुसुमं सुमम् । ८ मकरन्दः पुष्परसः- परागः सुमनोरजः ॥ १७ ॥ १० द्विहीनं प्रसवे सर्व- १ शलाटुः (त्रि), 'कच्चे फल का १ नाम है । २ वानम् (त्रि), 'सूखे फल' का १ नाम २ क्षारकः (पु), जालकम् (न), नई कली, या कलियोंके समूह के २ नाम हैं। ४ कलिका (स्त्री), कोरकः (पु), 'कांदी' अर्थात् 'विना खिले हुए फुल के २ नाम हैं॥ ६ गुच्छक: (+गुच्छः, गुत्सकः, गुत्सः ), स्तबकः ( २ पु), महे० मतले कलियोंसे छिपी हुई गांठ' के और भा० दी० मतसे 'शीघ्र खिलनेवालो कली' के और अन्यमतसे 'फूल या फल आदिके गुच्छे के २ नाम हैं । ६ कुड्मलः (+कुट्मलः) मुकुलः (२ पुन ), 'अधखिली कली के २ नाम हैं। ७ सुमनसः (=सुमनस्, नि० स्त्री ब० व० । + ए० ३०), पुष्पम् , प्रसूनम् , कुसुमम् , सुमम् (४ न ), 'फूल' के ६ नाम हैं । ८ मकरन्दः, पुष्परसः (२ पु), 'फूल के रस' के २ नाम हैं । ९ परागः (पु), सुमनोरजः (= सुमनोरजस् , न ) 'फूलके पराग' के २ नाम हैं। १० पहले कहे हुए शब्दोंका सामान्यतः लिङ्गनिर्देश करने के उपरान्त द्वि- "स्याद्गुत्सकस्तु स्तबकः कुटमलो" इति पाठान्तरम् ।। "कुसुम समम्" इति पाठान्तरम् ॥ + 'सुमनाः पुष्पमालत्योः ( मेदि० पृ० १९० श्लो० ६७) इति सान्तवग मेदिन्युक्तेः 'पुष्पं सुमनाः कुसुमम्' इति नाममालोक्तेः, ""सुमनाः प्राज्ञ दैवयोः । जात्याः पुष्पे...... (अने० सं० ३१७६०) इति हैमोक्तेश्चेत्यवधेयम् ।। , * अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ हरीतक्यादयः स्त्रियाम् । २ श्राश्वत्थवैणवप्लाझनैयग्रोधैगुदं फले ॥ १८ ॥ बाहतं च ३ फले जम्ब्बा जम्बूः स्त्री जम्बु जाम्बवम् । ४ पुष्पे जातीप्रभृतयः स्वलिङ्गा ५ ब्रोहयः फले ॥ १४ ॥ हीन' इस शब्दसे अब विशेषतया लिङ्गनिर्देश करते हैं। आगे कहे जानेवाले पेड़, लता और औषधके वाचक शब्द यदि फूल, फल, जड़ और पत्तेके वाचक हों तो वे नपुंसकलिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं। ( "जैसे-'चम्पकम् , आम्रम् , सूरणम्' ये तीन शब्द क्रमशः 'चम्पाके फूल, आमके फल और सूरनकी जड़' इन अर्थों में प्रयुक्त होनेसे नपुंसकलिङ्ग हुए हैं")॥ १ ( "हरीतक्यादयः" इस शब्दसे उक्त लिङ्गका बाधक वचन कह रहें हैं" ) फल आदि अर्थमें प्रयुक्त होनेपर भी 'हरीतकी, कर्कटी" आदि शब्द स्त्रीलिङ्ग ही रह जाते हैं अर्थात् नपुंसकलिङ्ग नहीं होते हैं । (जैसे-'हरीतकी, कर्वटी, द्राक्षा, बदरी' आदि शब्द क्रमशः 'हरे, ककड़ी, दाख, और बैरके फल' इस अर्थ में प्रयुक्त होनेपर भी पूर्ववत् स्त्रीलिङ्ग ही हैं नपुंसकलिङ्ग नहीं हुए हैं")॥ २ आश्वत्थम् , वैणवम् , प्लाक्षम् , नैयग्रोधम् , ऐङ्गुदम् , बार्हतम् (६ न), पीपल, बांस, पाकड़, वट, इङ्गुदी और भटकटैयाके फल' के क्रमशः १-१ नाम हैं। ३ जम्बः (स्त्री), जम्बु, जाम्बवम् (२ न ), 'जामुनके फल' के ३ नाम हैं। ४ जाती (स्त्री) प्रभृति ("प्रभृति' शब्दसे 'यूथिका, मल्लिका, , शब्दके पुष्प अर्थमें प्रयुक्त होने पर पूर्ववत् लिङ्ग रहते हैं अर्थात् न सकलिङ्ग नहीं होता । "जैसे-'जाती, यूथिका, मल्लिका,..."( ३ स्त्री), शब्द पहले लतार्थक रहने पर स्त्रीलिङ्ग होनेसे पुष्पार्थक होनेपर भी. स्त्रीलिङ्ग ही हैं")॥ ५ श्रीहिः (पु), आदि ("आदि' शब्दसे 'यवः मुद्गः, माषः, प्रियङ्गुः, गोधूमः, चणका,......) शब्द फल अर्थमें प्रयुक्त होनेपर पूर्ववत् लिङ्ग रह- ता है अर्थात् नपुंसकलिङ्ग नहीं होता। ("जैसे-'नोहिः, यवः मुद्गः, माषः, प्रियङ्गुः..."(५ पु), शब्द पहले ओषध्यर्थक रहने पर पुल्लिङ्ग होनेसे अब फलार्यक होने पर भी पुल्लिङ्ग ही रह गये हैं नपुंसकलिङ्ग नहीं हुए हैं")॥ - वनौषधिवर्ग:४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १ विदार्याद्यास्तु मूलेऽपि २ पुष्पे क्लीबेऽपि पाटला। ३ बोधिद्रमश्चलदलः पिप्पलः कुञ्जराशनः ॥ २० ॥ भश्वत्थेऽथ कपित्थे स्युर्दधित्थग्राहिमन्मथाः। तस्मिन्दद्धिफलः पुष्पफलदन्तशठावपि ॥ २१ ॥ ५ उदुम्बरो जन्तुफलो यज्ञाङ्गो हेमदुग्धकः । ६ कोविदारे चमरिकः कुहालो युगपत्रकः ॥२२॥ ७ सप्तपर्णो * विशालत्वक्शारदो विषमच्छदः । १ विदारी (स्त्री), आदि ( "आदि' शब्दसे "शालपर्णी, अंशुमती, गम्भारी, ......." ) शब्दके 'मूल फल और फूल' अर्थ में प्रपुक्त होनेपर भी पूर्ववत् लिङ्ग रहता है अर्थात् नपुंसकलिङ्ग नहीं होता। ("जैसे-विदारी, शालपर्णी, अंशुनती, गम्भारी ( ४ स्त्री),....." ) 'मूल, फल और फूल' अर्थमें प्रयुक्त होनेपर भी पहलेवाला स्त्रीलिङ्ग ही रह गया है नपुंसकलिङ्ग नहीं हुआ है"t) ॥ २ पाटला (स्त्री न ), पाटलाके फूल' का १ नाम है । ३ बोधिद्रुमः (+बोधिः), चलइलः, पिप्पला, कुञ्जराशनः (+गजाशनः), अश्वत्थः ( ५ पु), 'पीपलक पेड़' के ९ नाम हैं ॥ ४ कपित्थः (+कबित्थः, कवित्था), दधित्था, ग्राही ( =पाहिन् ), म. न्मथः, दधिफलः, पुष्पफला, दन्तशठः ( ७ पु ), 'कैंत' के ७ नाम हैं ॥ ५ उदुम्बरः ( + उदुम्बरः), जन्तुफलः, यज्ञाङ्गः, हेमदुग्धकः (४ पु), "गूलर' के ४ नाम हैं। ६ कोविदास, चमरिका, कुद्दालः, युगपत्त्रका (४ पु), 'कचनार के ४ नाम हैं। ७ सप्तपर्णः, विशालत्वा ( =विशालत्वच ), शारदः ( +शारदी), विष- * “विशालत्वक् शारदी" इति पाठान्तरम् ॥ । 'विहीने प्रसवं सर्वम्। (२।४।१८ ) इति स्त्रीत्वबाधनायेमानीत्यवधेयम् ।। #. यत्तु भा० दी० पाटलः कुसुमे वर्णेऽप्याशुव्रीहिश्च पाटला' इति शाश्वतोक्ल्या 'पाटला' शब्दस्य पुंस्त्वमप्युक्तम् , तत्तु 'पाटला पाटलौ स्त्री स्यादस्य पुष्पे पुनर्न ना' ( मेदि० पृ० १६६ इलो० १०९) इति मेदिन्यां पुंस्त्वनिषेधाद्-'पाटलन्तु कुङ्कुमश्वेतरक्तयोः । पाटलः स्यादाशु- श्रीहिपाटला पाटलिद्रुमे' ( अने० सं० ३१६६४) इति हैमोक्तेश्च चिन्त्यमेवेति विभावनीयम् ॥

अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्डे- ..... . १ आरग्वधे * राजवृक्षशम्पाकचतुरङ्गलाः ॥ २३ ॥ मारेवतव्याधिघातकृतमालसुवर्णकाः । २ स्युर्जम्बीरे इन्तशटजम्भजम्भीरजम्भलाः ॥ २४ ॥ ३ वरुणो वरणः सेतुस्तिक्तशाकः कुमारकः । ४ पुन्नागे पुरुषस्तुङ्गः केसरो देववल्लभः ॥ २५ ॥ ५ पारिभद्रे निम्वतर्मन्दारस्पारिजातकः । ६ तिनिशे स्यन्दनो नेमी रथद्रुरतिमुक्तकः ॥ २६ ॥ वञ्जलश्चित्रकृच्चाथ द्वौ पीतनकपीतनौ। अाम्रातके ८ मधूके तु गुडपुष्पमधुद्रुमौ ॥ २७ ॥ मच्छदः ( ४ पु), 'सतवना, छितवन' अर्थात् 'सात पत्तेवाले वृक्ष विशेष, सप्त. पर्ण के ४ नाम हैं। १ आरग्वधः (+ आग्र्वधः, अरग्वधः ), राजवृक्षः, शम्पाकः (+शम्याकः, संपाकः), चतुरङ्गुलः, आरेवतः, व्याधिधातः, कृतमालः, सुवर्णकः ( + सुपर्णकः सुवर्णः, सुपर्णः । ८ पु ), 'अमलतास' के ८ नाम हैं । २ जम्बीरः, दन्तशठः, जम्भः, जम्भीरः, जम्भलः ( +जंम्भरः। ५ पु), 'जंबीरी नींबू' के ५ नाम हैं । ३ वरुणः, वरणः, सेतुः, तिक्तशाकः, कुमारकः (५ पु), वारुण' के. ५ नाम है। ४ पुन्नागः, पुरुषः, तुङ्गः, केसरः (+ केशरः), देववल्लभः ( ५ पु), 'नाग- केसर के नाम है। ६ पारिभद्रः, निम्बतरुः, मन्दारः, पारिजातकः (४ पु), 'नीम' के और भा०वी० मतसे 'बकायन' के नाम है। ६ तिनिशः, स्यन्दनः, नेमिः ( + नेमी = नेमिन् ), स्थगुः, अतिमुक्तकः, बञ्जुलः, चित्रकृत ( ७ पु), 'वंजुल, तिनिश' के ७ नाम है । . पीतनः, कपीतनः, आम्रातकः ( + अम्रातकः । ३ पु), 'अमड़ा' के ३ नाम हैं। ८ मधूकः (+मधुकः, मधूल:, मधुला), गुडपुष्पः, मधुद्रुमः, वानप्रस्था, * "रा जवृक्षशम्याकचतुरङ्गुला" इति पाठान्तरमिति सुभूत्यादय इति भा० दी०॥ १ - वनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। वानप्रस्थमधुष्टीलौ १ * जलजेऽत्र मधूलकः । २ पीलौ गुडफलः स्त्रंसी तम्मिम्तु गिरिसम्भवे ॥ २८ ॥ | अक्षोटकन्दरालौ द्वाध्वङ्कोटे तु निकोचकः । ५ पलाशे किशुकः पर्णो वातपोतोऽथ वेतस ॥ २६ ॥ स्थान पुष्पविदुलशीतवानीग्वजुलाः । ७ द्वौ परिव्याधविदुला नादेयी चाम्बुवेतसे ॥३०॥ - शोमाञ्जने शिग्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवमोचकाः । मधुष्ठीलः (+ मध्वष्ठालः । ६ पु), 'महुआ' के ५ नाम हैं ॥ १ मधूलकः ( + मधूल:, । पु ), 'पानीमें या पहाइपर होनेवाले महुए' का एक नाम है । ( "इसके पत्ते बहुत बड़े २ होते हैं" ) ॥ २ पीलुः, गुडफल:, संसी (= बसिन् । ३ पु), पीलुनामक वृक्षविशेष' के ३ नाम हैं ॥ ३ अक्षोटः, कन्दरालः ( + कर्परालः । २ पु ), 'पहाड़ी पीलु' के नाम हैं। ४ अङ्कोटः ( + असोटः, अकोलः ), निकोचकः ( + निकोटकः । २ पु), 'ढलानामक वृक्ष-विशेष' के २ नाम हैं ।। ६ पलाशः, किंशुकः, पर्णः, वातप्राथः (४ पु) "पलाश' के ४ नाम है ।। ६ बेतसः, स्था, अभ्रपुष्पः (+रथाभ्रपुष्पः ), विदुरः, शात: (+न), वानीरः, वक्षुलः (७ पु), 'वत' के ७ नाम ७ पारव्याधः, विदुला, नादेयी (स्त्री), अम्बुवेनसः ( + जलयतमः । अंग पु), 'जलवे के ४ नाम हैं ॥ ८ शोभाञ्जनः ( +शोभाञ्जनः, सोभाञ्जनः, सौभाजनः ), शिक्षा, ना. गन्धकः, अक्षीव, (+ आक्षीवः, आक्षारः मु.), माचकः (+मोवः । ६५), 'सहिजन' के नाम है ॥ . o * मधूलकः” "गिरिजेऽत्र :" इलि पाठान्तरम् ।। + "अक्षोटकपरालौ” इति पाठान्तरम् ॥ "शिग्रुतीक्ष्णगन्ध कादीरमोचकः” इति पाठान्तरम् ॥

ममरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- . १ रक्तोऽसौ मधुशिग्रुः स्यान्दरिष्टः फेनिला समौ ॥३१॥ ३ बिल्वे शाण्डिल्यशलूषो मालाश्रीफलावपि । ४ प्लसो जटी पर्कटी स्यान्यग्रोधो बहुपोद्वटः ॥ ३२॥ ६ गालवः शाबरो लोध्रस्तिरीटस्तित्वमार्जनौ । ७ आम्रचूतो रसालोऽसौ : सहकारोऽतिसौरभः ॥ ३३ ॥ 8 * 'कामाडो मधुदूत माकन्दः पिकवल्लभः' (७) १० । कुम्भोलूखलकं क्लीवे कौशिकौ गुग्गुलुः पुरः । १ मधुशिग्रुः (पु), 'लाल फूलवाल सहिजन' का १ नाम है । २ अरिष्टः (+रिष्टः), फेनिलः (२ पु ), 'रीठा के २ नास है ॥ ३ बिल्वः, शाण्डिल्यः, शैलुषः, मालरः, श्रीफलः (५ पु), 'बेल' के ६ नाम है ॥ ४ प्लक्षः, जटी (=जटिन । + जटिः । जटी, स्त्री। २ पु), पर्वटी (स्त्री), 'पाकड़ के ३ नाम है। ६ न्यग्रोधः, बहुपात् ( + बहुपादू ), वटः ( ३ पु ), 'वट, बरगद' के नाम है। ६ गालवः, शाबरः ( + साबरः ), लोध्रः ( + रोध्रः ), तिरीटः ( +त. २), तिल्वः, मार्जनः ( ६ पु ), 'लोध' के ६ नाम है। ("गालवः, आदि २ नाम 'सफेद लोधा के और लोध्रः' आदि ४ नाम 'लोध के है यह क्षी० स्वा० का मत है।) ७ आम्रः, चूतः, रसालः ( ३ पु), 'आम' के ३ नाम है ॥ ८ सहकारः (पु), 'सुगन्धियुक्त प्राम' का १ नाम है ॥ ९ [ कामाङ्गः, मधुदूतः, माकन्दः, पिकवल्लभः (४ पु), 'आम' के ४ नाम है ]॥ १० कुम्भम् , उलूखलकम् ( + उदूखलकम् , कुम्भोलूखलकम् । २ न), कौशिकः, गुग्गुलुः, पुरः ( ३ पु ), 'गुग्गुलु' के ५ नाम है । * “कामाङ्ग""वल्लभः" अयमंशः क्षी० स्वा० पुस्तके मूल एवेयवधेयम् ॥ | "कुम्भं चोलूखलक" इति पाठान्तरम् । तत्र नामद्वयस्वीकारे मूलपाठ एव समीचीन इति ३ । बोध्यम् ॥

वनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १३५ १ शेलुः श्लेष्मातकः शीत उद्दालो बहुवारकः ॥ ३४ ॥ २ राजादनं प्रियालः स्यात्सन्न कद्रुर्धनुः पटः । ३ गम्भारी सर्वतोभद्रा काश्मरी मधुपर्णिका ॥ ३५ ॥ श्रीपर्णी भद्रपर्णी च काश्मयश्वाप्यथ द्वयोः । *कर्कन्धूबंदरी कोलिः ५ कोलं कुवलफेनिले ॥३६॥ १ शेलुः (+सेलुः ), श्लेष्मातकः, शोतः (+न), उहालः, बहुः चारकः ( ५ पु), 'लसोड़ा' के ९ नाम हैं । २ राजादनम् (+राजातनम् । +पु । न), प्रियालः (+पियाला), सन्नकदुः ( सन्नः, कद्रुः, यह सोमनन्दी मतसे ), धनुःपटः (+धनुष्परः धनुः- धनुष , पटः । ३ पु ), 'चीरौंजी, या पियार' के ४ नाम हैं । गम्भारी (+कम्मारी), सर्वतोभद्रा, काश्मरी (+कार्मरी), मधुप- णिका, श्रीपर्णी, भद्दपर्णी ( ६ स्त्री), काश्मयः (पु), 'गंभार' के ७ नाम हैं। ४ कर्कन्धूः (+कर्कन्धुः । पु स्त्री), बदरी ( +२ पु स्त्री मुकु०), कोलि: (+कोली, कोला । २ स्त्री), 'वैर के ३ नाम हैं। ५ कोलम्, कुवलम् , फेनिलम् , सौवीरम् ( + सौवीर्यम् ), बदरम् (६ D ३ * 'कर्कन्धु (न्धू ) बदरी कोलिघण्टि कुवलफैनिले । सौवीरं बदरं कोलमथ....." इति क्षी० स्वा० पाठः॥ + सङ्ख्थागणनायामुक्तोऽप्ययं शब्दो भा० दो० अव्याख्यातस्तत्संशोधकप्रमादात्रुटितो व्या- ख्यातृत्यक्तो बेति बुधैर्मृग्यम् ॥ + "कर्क कण्टकं दधातीति विगृह्य “अन्दूदृम्भूजम्बूकफेलूकर्कन्धूदि धिपूः" (उ० सू० श९३) इति कूप्रत्ययेऽस्य सिद्धिरिति भा० दी ।क्षी० स्वा० तु 'कर्को लोहितोऽन्धुः कर्कन्धुः शकन्ध्वादित्वात्पररूपमित्याह । तच्चिन्त्यम् , सिद्धान्तकौमुद्यां 'शकन्धवादिषु पररूपं वाच्यम्' ( वार्ति० ३६३२ ) इति वार्तिकोदाहरणत्वेनोक्तस्य 'कर्कन्धु' शब्दस्य 'कर्काणां राजविशेषाणा- मन्धुः कूपः कर्कन्धुः' इति तत्रैव तत्त्वबोधिन्यां दण्ड्युक्तेः 'अन्दूदृम्भू-" ( उ० सू० १९३) इति पाणिनिसूत्रस्य च विरोधात् हस्व कर्कन्धु शब्दस्यान्यार्थकत्वादित्यवधेयम् ।। $ 'अथ द्वयोः' इत्युक्त्या ग्रन्थकारप्रतिज्ञाविरोधात् 'कर्कन्धूबदरी' शब्दौ स्त्रीपुंलिङ्गाविति मुकुटोक्तिश्चिन्त्या। तथा सति 'बदरी कोलाकार्पास्योबंदरन्तुफले तयोः (अने०संग्र०३।५८३) इति हेमचन्द्राचार्योक्तेः 'बदरी कोले क्लीबं तु तत्फले' (मेदि० पृ० १४९ श्लो. २७) इति मेदिन्यु. तेश्च विरोधस्य दुर्वारत्वादित्यवधेयम् ॥

श्रमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे--- - - -- १ १ सौवीरं बरं घोण्टाप्यथ स्योत्स्वादुकण्टकः । विकतः स्त्रुवावृक्षो ग्रन्थिलो व्याघ्रपादपि ॥ ३७ ॥ २ पेरावतो नागरङ्गो नादेयी भूमिजम्बुका । ३ तिन्दुकः स्फूर्जकः कालस्कन्धश्च शितिसारके ॥ ३८ ॥ ४ काकेन्दुः कुलकः काकतिन्दुकः काकपीलुके । ५ *गोली ढो भाटलो घण्टापाटलिनॊतमुष्कको ॥३६॥ ६ तिलकः क्षुरकः श्रीमान्- न), घोण्टा (+ धुण्टा । स्त्री ), 'बैरके फल या वनवैर के ६ नाम है। १ स्वादुकण्टकः ( + गोपकण्टः ) विकङ्कतः ( + वैवङ्कतः ), सुवावृक्षः, ग्र. न्थिलः, व्याघ्रपात(= व्याघ्रपाद् ।+व्याघ्रपादः, व्याघ्रपादपः । ५५), कटाय" के ६ नाम हैं। २ ऐरावतः, नागरङ्गः ( २ पु), नादेयी, भूमिजम्बुका ( + भूमिजम्बूः । २ स्त्री), 'नारङ्गी वृक्ष' के ४ नाम । ("प्रथम २ नाम 'नारङ्गो वृक्ष के और अन्तवाले २ नाम 'भूमिजम्बू' अर्थात् 'एक प्रकारके कन्द' के हैं, यह भी अन्याचार्यों (गौड़) का मत है" ) ॥ ३ तिन्दुकः (+तिन्दुकी), स्फूर्जकः, कालस्कन्धः, शितिसारकः (+नील- सारः । ४ पु), 'तेन्दुश्रानामक वृक्ष के ४ नाम हैं ॥ ४ काकेन्दुः, कुलकः, काकतिन्दुकः, काकपीलुकः ( ४ पु ), 'कुचिला' के नाम हैं॥ ५ गोलीढः (+गोलिहः ), झाटलः, घण्टापाटलिः ( + घण्टा, पाटलिः, क्षी० स्वा०), मोक्षः, मुष्ककः ( + मूषकः । ६ पु), 'काला पादर या लोध-विशेष के ५ नाम हैं । ६ तिलकः, क्षुरकः, श्रीमान् (श्रीमत। ३ पु) 'तालमखाना के नाम है ॥ * "गोलीहो झाटलो" इति पाठान्तरम् ॥ + "बदरी सदृशाकारो वृक्षः सूक्ष्मफलो भवेत् । अटव्यामेव सा घोण्टा गोपधोण्टेति चोच्यते" ॥१॥ इत्युक्तेर्बदरीशक्षाकारस्य वन्यफलस्येति केचिन्मतेनेदम् ।। + कर्कन्ध्वा दित्रयं वृक्षार्थकम् , अन्ये फलार्थकाः, घोण्टा इत्युभयस्घृक्-अर्थादुभयसम्बन्धी" इति क्षी० स्वा०॥ .

जनौषधिवर्ग:४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । - १ समौ पिचुलझाबुको । २ श्रीपर्णिका कुमुदिका कुम्भी * कैडर्य कटफलौ ॥ ४० ॥ ३ क्रमुकः पट्टिकाख्यः स्यात्पट्टी लाक्षाप्रसादनः । ४ । तूदस्तु यूपः क्रमुको ब्रह्मण्यो ब्रह्मदारु च ॥ ४१ ॥ तूलं च ५ नीपप्रियककदम्बास्तु हलिप्रियः । ६ वीरवृक्षोऽरुष्करोऽग्निमुखी भल्लातकी त्रिषु ॥ ४२ ॥ ७ गर्दभाण्डे कन्दालकपीतनसुपार्श्वकाः । पलक्षश्च तिन्तिडी चिञ्चाम्ब्लिकाहथो पीतसारके ॥ ४३ ॥ सर्जकासनबन्धूकपुष्पप्रियकजीवकाः । १ पिचुलः, झावुकः ( २ पु ), 'झाऊ वृक्ष' के २ नाम हैं । २ श्रीपर्णिका ( +श्रीपर्णी ), कुमुदिका, कुम्भी ( ३ स्त्री), कैडर्यः (+कैदर्यः, कैटर्यः ), कटफल: (२ पु), 'कायफर के ५ नाम है ॥ ३ क्रमुकः, पट्टिकाख्यः, पट्टी (=पट्टिन् । + पट्टी = पट्टी,स्त्री), लाक्षाप्रसा दनः ( ४ पु), 'पठानीलोधः के ४ नाम है ॥ ४ तूदः (+नूदः), यूपू: (+यूषः, मुकु०), क्रमुका, ब्रह्मण्यः (४३), ब. सदार ( + ब्रह्मकाष्ठम् ), ठूलम् ( + तूली, गौड मतसे । २ न ) 'सहतूंत या तूंत' के ६ नाम है ॥ ६ नीपः, प्रियकः, कदम्बः, हलिप्रियः (+ हरिप्रियः । ४ पु), 'कदम्ब वृ. क्षा के ४ नाम है ॥ ६ वीरवृक्षः, अरुष्करः (२ पु ), अग्निमुखी (स्त्री), भल्लातकी (त्रि), 'भेलाबा' के ४ नाम है ॥ ७ गर्दभाण्डः, कन्दरालः, कपीतनः, सुपार्चकः, प्लक्षः (६ पु), लाहो पीपल' के ६ नाम है। ८ सिन्तिडी ( + तिन्तिली), चिञ्चा, अम्लिका (+ आम्लिका, आ- म्लीका, अम्लीका । ३ स्त्री) 'इमली के ३ नाम है । ९ पीतसारकः (+पोतसालकः ), सर्जका, असनः ( + आसनः ), बन्धूकपुष्पः, प्रियका, जीवकः ( ६ पु ), विजयसार के ६ नाम है ॥ * "कैटर्यकट फलौ" इति पाठान्तरम् ।। 1 "नूदस्तु यूपः” इति पाठान्तरम् ॥ * "पीतसालके" इति पाठान्तरम् ।। . क .

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- . १ * साले तु सर्जकार्याश्वकणकाः सस्यसंवरः ॥ ४४ ॥ २ नदीसजों वीरतरुरिन्द्रद्रुः ककुभोऽजुनः । ३ राजादनः फलाध्यक्षः क्षीरिकायाठमथ द्वयोः ॥ ४५ ॥ इङ्गुदी तापसतरुपले चर्मिमृदुत्वचौ। ६ पिच्छिला पुरणी मोचा स्थिरायुःशाल्मलिद्धयोः॥ ४६॥ ७ पिच्छा तु शाल्मलीवेष्टे रोचनः कूटशाल्मलिः । चिरबिल्वो नक्तमालः करजश्च करके ॥ ४७ ॥ १ सालः ( +शाला, श्यालः ) सर्जः ( + सर्जकः ), कार्य: (+का. यः), अश्वकर्णकः, सस्यसंवरः (+शस्यशंबरः । ५ पु), 'शाल या सखुआ' के ५ नाम है। • नदीसर्जः, वीरतरुः, इन्द्रद्रः, ककुभः, अर्जुनः ( ५ पु), 'अर्जुन वृक्षाके ५ नाम हैं। ३ राजादनः (+न), फलाध्यक्षः ( २ पु ), क्षीरिका (स्त्री) 'खिरितीके पेड़ के ३ नाम है । ४ इङ्गुदी (स्त्री पु), तापसतरुः (१), 'इङ्गदी, इशाके पेड़ के २ नाम है । ५ भूजः ( + भृजः ), चर्मी ( = चर्मिमन् ), मृदुत्वक् ( = मृदुत्वच् । + मृदुच्छदः । ३ पु), 'भोजपत्रके पेड़ के ३ नाम है ॥ ६ पिच्छिला, पूरणी, मोचा (+मोचनी। ३ स्त्री), + स्थिरायुः (=स्थिरायुष, पु), शाल्मलिः ( + शाल्मलि, शाल्मलः । स्त्री पु), 'सेमर के पेड़ के ५ नाम है ॥ • पिच्छा (स्त्री), शाल्मलीवेष्टः (भा० दी० पु), 'मोचरस के २नाम है । ८ रोचनः, कूटशाल्मलिः (+कुशाल्मलिः । २ पु), 'काला सेमर' के २ नाम है। ९ चिरबिल्वः ( + चिरिबिल्वः ), नक्तमालः ( + रक्तमालः क्षी० स्वा० ) करजा, करञ्जका (४ पु), 'करज' के ४ नाम है । * "शाले तु सर्जकाश्विकर्णकाः संस्यशंबरः" इति पाठान्तरम् ।। +"चिरिविल्वो रक्तमालः" इति पाठान्तरम् ।। * "ष्टिवर्षसहस्राणि वने जीवति शाल्मलिः" इत्युक्तेरस्य स्थिरायुस्त्वमित्यन्वर्थ नामेत्य- वधेयम्॥ .

वनौषधिवर्ग: ४ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १३६ १ प्रकीर्य: पूतिकरजः *पूतिकः कलिमारकः । करक्षभेदाः २ षड्ग्रन्थो मर्कट्यङ्गारवल्लरी ॥ ४ ॥ ३ रोही रोहितकः प्लीहशत्रुर्दाडिमपुष्पकः । ४ गायत्री बालतनयः खदिरो दन्तधावनः ॥ ४६॥ ५ मरिमेदो विट्खदिरे ६ कदरः खदिरे सिते । सोमवल्कोऽप्य थ व्याघ्रपुच्छगन्धर्वहस्तकौ ॥ ५० ॥ एरण्ड उरुबूकश्च रुचकश्चित्रकश्च सः। १ प्रकीर्यः, पूतिकरजः (+ पूतीकरजः, पूतीकरञ्जः), पूतिकः ( + पूती- कः), कलिमारकः (+कलिकारकः । ४ पु), 'काँटेदार करके पेड़ के ४ नाम हैं। २ षड्मन्थः (पु), मर्कटी, अङ्गारवल्लरी ( १ स्त्री), 'कसञ्जके भेद' का १-१ नाम है। ३ रोहो ( =रोहिन् ), रोहितकः ( +रोहितः), प्लीहशत्रुः, दाडिमपु. पकः (+ रक्तपुष्पकः । ४ पु), 'गुलनार, या लाल करक्ष' के ४ नाम हैं । ४ गायत्री (स्त्री। +गायत्री =गायत्रिन् , पु), बालतनयः (+बा- लपत्रः ), खदिरः, दन्तधावनः (४ पु ), 'कत्या, खैर के ४ नाम हैं। ५ अरिमेदः ( + परिमेदः, अहिमेदः, अहिमारः ), विट्खदिरः (२ पु), बदबू करनेवाले कत्थे के २ नाम हैं । ६ कदर, सोमवल्कः ( २ पु), 'सफेद कत्था' के २ नाम हैं। ७ व्याघ्रपुच्छः (+व्याघ्रदलः), गन्धर्वहस्तकः, एरण्डा, उरुबूकः (+रुवुः, स्युः, रूबूका, रुवुकः, उरूवकः, उरुवुकः,), रुचकः, चित्रका, चञ्चः, पञ्चा. , - * "पूति (ती) कः कलिकारकः" इति पाठान्तरम् ।। "खदिरो रक्तसारश्च गायत्री दन्तधावनः। कण्टकी बालपत्रश्च जिह्मशल्यः क्षितिक्षमः" ॥१॥ इत्युक्त्या 'बालपत्त्र' शब्दस्य खदिरयवासेत्यर्थयोरभिमतत्वेन 'बालपुत्र'भ्रान्त्या ग्रन्थकारो- ऽत्र 'बालतनयशब्दमुक्तवान् । तस्मादत्र "बालपत्रश्च खदिरो” इति पाठः समीचीन इत्यव. धेयम् ।।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- - चञ्चुः पश्चाङ्गुलो * मण्डवर्धमानव्यडम्बकाः ॥ ११ ॥ १ अल्पाशमी शमीरःस्यारच्छमी सक्तुफला शिवा। ३ + पिण्डीतको मरुबकः श्वसनः करहाटकः ॥५२॥ शल्यश्च मदने ४ शक्रपादपः पारिभद्रकः । भद्दारु द्रुकिलिमं पीतदारु च दारु च ॥ ५३ ॥ पृतिकाष्ठं च सप्त स्युर्देवदारुण्यपथ द्वयोः । पाटलि पाटला मोधा काचस्थाली फलेल्हा ॥ ५४॥ कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी ६ श्यामा तु महिलाह्वया । लता गोवन्दनी गुन्द्रा प्रियङ्गुः फलिनी फली ॥ ५५ ॥ विश्वक्सेना गन्धफली कारम्भो प्रियकश्च सा । डुलः, मण्डः ( + आमण्डः, अमण्डः, आदण्डः ), वर्द्धमानः, व्यडम्बकः (+व्य- डम्बरः। +व्यडम्बनः स्वा० । ११ पु), 'एरण्ड रेंड' के ११ नाम हैं। १ शमीरः (पु), 'छोटी शमी' का १ नाम हैं । २ शमी, शक्तुफला (+ शत्तु फली), शिवा (३ स्त्री), 'शमी के ३ नाम हैं। ३ पिण्डीतका, मरुबकः (+मरुवकः ), श्वसना, करहाटक: (+करहाटः), शल्यः, मदनः (६ पु), 'मयनफल के ६ नाम हैं ॥ ४ शक्रपादपः, पारिभद्कः (+पारिभद्रः । २ पु), भद्दारु (+पु), गुकिलिमम् , पीतदारु, दारु (+२ पु), पूतिकाष्ठम् , देवदारु (६ न ), 'देवदारु' के ८ नाम है ॥ ६ पाटलिः (+पाटली। स्त्री पु), पाटला, मोघा ( +अमोघा ), काचस्थाली ( +काकस्थाली, +काला, स्थाली, २ क्षी० स्वा० ), फलेकहा, कूष्णवृन्ता, कुबेराक्षी ( ६ स्त्री), 'पाढ़रिए के ७ नाम हैं । ६ श्यामा, महिलाह्वया, लता, गोवन्दनी (+गौः गो, वन्दनी), गुन्द्रा, प्रियङ्गुः, फलिनी, फली, विष्वक्सेना, गन्धफली, कारम्भा ( ११ स्त्री), प्रिंयका (पु) 'ककुनी, टांगुन के १२ नाम हैं । *"मण्डवर्धमानध्यडम्बराः" इति पाठान्तरम् ।। । "पिण्डीतकी मरुवकः" इति पाठान्तरम् । "काला स्थाली फलेरुहा" इति पाठान्तरम् ॥ "वन्दनी पुष्पशोभना । गन्धप्रियङ्गुः कारम्भा लता गौर्वर्णभेदिनी" इतीन्दूक्तेः ॥ .

बनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । . . - १ * मण्डूकपर्णपत्रोणनटकट्वङ्गटुण्टुकाः ॥ ५६ ॥ । स्योनाकशुकनासक्षदीर्घवृन्तकुटन्नटाः। । शोणकश्चारलौ २ तिष्यफला त्वामलकी त्रिषु ॥ ५७ ॥ अमृता च वयवस्था च ३ त्रिलिङ्गस्तु विभीतकः । नाक्षस्तुषः कर्षफलो भूतावासः कलिद्रुमः॥ ५ ॥ 8 अभया स्वव्यथा पथ्या कायस्था पूतनाऽमृता। हरीतकी हैवमती चेतकी श्रेयसी शिवा ॥ ५ ॥ ५ पीतद्रुः सरलः पूतिकाष्ठं चाथि द्रमोत्पलः । कर्णिकारः परिव्याधो लकुचो लिकुचो डहुः ॥ ६ ॥ १ मण्डूकपर्णः, पत्त्रोर्णः, नटः, कट्वङ्गः, टुण्टुकः (+दुन्दुका), स्थोनाक: (+श्योनाकः ), शुकनाशः, ऋक्षः, दीर्घवृन्तः, कुटन्नटा, शोणक: (+शोनका क्षी० स्वा० ), अरलुः ( + अरटुः । १२ पु ), 'सोनापाठा' के १२ नाम हैं। २६ तिष्यफला, आमलकी (+ आमला । त्रि), अमृता, वयस्था (+कायस्था क्षी० स्वा० । शेष स्त्री), 'श्राँवला के ४ नाम हैं । ३ बिभीलकः (त्रि), अक्षः ( + बिभीतकाक्षः ), तुषः, कर्षफल:, भूता- वासः (+भूतवासः ), कलिद्रुमः ( ५ पु), 'बहेरा' के ६ नाम हैं । ४ अभया, अव्यथा, पथ्या, कायस्था (+वयस्था), पूतना, अमृता, हरीतकी, हैमवती, चेतकी, श्रेयसी, शिवा ( ११ स्त्री), 'हरें के ११ नाम हैं। ५ पीतदुः, सरलः (२ पु), पूतिकाष्ठम् (न), 'सरलनामक काष्ठ (वृक्ष) विशेष के ३ नाम हैं । ६ द्रुमोत्पला, कर्णिकारः, परिख्याधः ( ३ पु), 'कठचम्पा' के ३ नाम हैं । ७ लकुचः, लिकुचः, डहुः ( + डहूः । ३ पु), 'वडहर के ३ नाम हैं । "मण्डूकपर्णपत्रोर्णनटकट्वङ्गदुन्दुकाः" इति पाठान्तरम् । "श्योनाकशुकनास ......” इति पाठान्तरम् ॥ "शोनकश्चारली" इति पाठान्तरम् ॥ तिभ्यं मङ्गल्यं फलं यस्याः सा तिष्यफला । तस्वञ्चास्या:- "नित्यमामल के लक्ष्मीनित्यं हरितगोमये। नित्यं शङ्खच पद्मे च नित्यं शुक्ले च वाससि" ॥१॥ इस्युक्तरित्यवधेयम् ॥ . N अ०१२ ર अमकोषः। [द्वितीयकाण्डे- हैं १ पनसः कण्टकिफलो २ निचुलो हिज्जलोऽम्बुजः । ३ काकोदुम्बरिका फिल्गुमलयूजघनेफला ॥ ६१ ।। ४ मरिष्टा सर्वतोभद्राहिङ्गनिर्यासमालकाः। + पिचुमन्दश्च निम्बेऽथ पिच्छिलाऽगुरुशिशपा ॥ १२ ॥ ६ कपिला भस्मगर्भा सा- १ पनसः ( + पणसः, दुर्ग मतसे; फलसः ), कण्टकिफलः ( + कण्टक. फलः । २ पु), 'कटहल' के २ नाम २ निचुलः ( +निचोलः ), हिज्जल: (+इजलः ), अम्बुजः ( ३ पु ), मा० दी० मतसे 'स्थलबेता के क्षी० स्वा० तथा० महे० मतसे 'जलबेत के और अन्य मतसे 'समुद्रफल' के ३ नाम हैं ॥ ३ काकोदुम्बरिका, फल्गुः, मलयूः ( + मलपूः, मलापू: ), जवनेफला (४ वी ), 'कठूमर, कालागूलर' के ४ नाम हैं । ४ अरिष्टः, सर्वतोभद्रः, हिङ्गुनिर्यासः, मालकः, पिचुमन्दः ( + पिचुमदः क्षी० स्वा० ), निम्बः ( ६ पु ), 'नीम' के ६ नाम हैं । ५ पिच्छला, अगरशिंशपा ( + अगरु न, शिंशपा स्त्री भा० दी० मतसे २ शब्द शीशम' के २ नाम हैं । "पिच्छिला, अगरु (न), शिंशपा ( +अग. रुशिशपा । महे० और क्षी० स्वा० शेष स्त्री), 'शीशम के २ नाम हैं")॥ ६ कपिला, भस्मगर्भा ( महे । २ स्त्री), 'कपिल वर्णवाले शीशम के २ नाम हैं। ("महेश्वरने "पिच्छिला, अगरुशिशपा, कपिला, भस्मगर्भा । ४ स्त्री), इन चारों को पर्यायवाचक कहा है")। *"पणसः कण्टकिफल: निचुल इज्जलोऽम्बुजः" इति पाठान्तरम् ॥ + "फल्गुमलपूर्जधनेफला" इति पाठान्तरम् ॥ "पिचुमदश्च" इति पाठान्तरम् ।। 'मगर, शिशपा' इति नामद्वयम् "अगर क्लीवे शिंशपायां जोड़के लघुनि त्रिषु॥ इति रुद्रः। अगसारा शिशपा इत्येकमेव नामेति क्षी० स्वा० महे० च । अत्र रुद्र भा० दी० "अगरु कीब जोङ्गकशिशपयोांच्यवल्लधुनि" (मेदि० पृ० १४१ श्लो० १४१) इति रान्त. वर्ग मेदिन्युक्ते: “- अगुरुत्वगुरौ धौ शिशपायां-"(अने० सं० ३१५२०) इति हमचन्द्रा. पार्योक्तेश्च विरोधेऽपि स्त्रीलिङ्गयोः 'पिच्छलाशिंशपा' शब्दयोमध्ये कोबस्य 'अगुरु' शब्दस्य भा.दी० मतेऽङ्गीकारेण 'भेदाख्यानाय- (२०१४) इति ग्रन्थकारप्रतिशाविरोध इत्यवधेयम् ॥ ।

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। HD १ शिरीषस्तु कपीतनः । भण्डिलोऽप्यरथ चाम्पेयश्चम्पको हेमपुष्पकः ॥६३॥ ३ एतस्य कलिका गन्धफली स्यादथ केसरे। * बकुलो ५ वजुलोऽशोके ६ समौ करकदाडिमौ ॥ ६४ ॥ ७ चाम्पेयः केसरो नागकेसरः काञ्चनाह्वयः । - जया जयन्ती तर्कारी नादेयी वैजयन्तिका ॥ ५ ॥ है श्रीपर्णमग्निमन्थः स्यात्कणिका गणिकारिका । जयो १ शिरीषः, कपीतनः, भण्डिल: (+भण्डिस भण्डील:, भण्डी। ३ पु), 'सिरिस के ३ नाम हैं। २ चाम्पेयः, चम्पका, हेमपुष्पकः ( ३ पु)'चम्पा' के ३ नाम हैं । ३ गन्धफली (स्त्री), 'चम्पाकी कली' का १ नाम है ॥ ४ केसरः (+केशरः), बकुल: (+ वकुलः । २ पु), 'मौलेसरी के २ नाम हैं। ६ वजुलः, अशोकः ( २ पु), 'अशोक' के २ नाम हैं। ६ करकः, दाडिमः ( + दाडिम्बः, दालिमः, डालिमः । २ पु ), 'अनार के २ नाम हैं। • चाम्पेयः, केसरः, नागकेसरः, काञ्चनाह्वयः (+"सोनाके सब नाम: ४ पु), 'नागकेसर के ४ नाम हैं। ८ जया, जयन्ती, तोरी, नादेयो, वैजयन्तिका (५ स्त्री), 'जाही, अरणी या गनियार के नाम हैं। ९ श्रीपर्णम् (न), अग्निमन्थः, कणिका, गणिकारिका (२ स्त्री), जयः (शेष पु), भा० दी. 'जयपर्ण के ५ नाम है। ("जया....."१० नाम 'भरणी' के हैं यह क्षी० स्वा० का मत है।")॥ * "वकुलो वजुलोऽशोके" इति पाठान्तरम् ।। एतन्मते 'जयादि वैजयन्तिकावधि स्त्रीलिङ्गशम्दानुक्त्वा मध्ये कोब 'श्रीपर्ण शब्दस्य पुंलिङ्ग 'अग्निमन्याशब्दस्य च कथनान्तरं स्त्रीलिङ्गस्य कणिकादिशब्दद्वयस्य ततश्च भूयोऽपि पुंलिङ्ग'जयशब्दस्यात्तत्वेन लिङ्गसार्यात "भेदाख्यानाय-(११२१४)" इत्यादिग्रन्थकार. प्रतिशमलापरिवारमाय भानुजीदीक्षतः पञ्च नामानि पृथक्चकार। क्षीरस्वामी तु वनौषधिवगे अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ऽथ कुटनः शक्रो वत्सको गिरिमल्लिका ॥ ६६ ॥ २ एतस्यैव कलिन्द्रयवभद्रयवं फले । ३ कृष्णपाकफलाविग्नसुषेणाः करमर्दके ॥ ६७ ॥ ४ कालस्कन्धस्तमालः स्यात्तापिच्छोऽप्यपृथ सिन्दुके । * सिन्दुवारेन्द्रसुरलो निर्गुण्डीन्द्राणिकेत्यपि ॥ ६८॥ १ कुटजः, शक्रः, वत्सकः (३ पु), गिरिमल्लिका (स्त्री), 'कोरैया के ४ नाम है ॥ २ कलिङ्गम् (+पु, स्त्री) इन्द्रयवम् । (+पु), भद्रयवम् ++पु । ३ न ), 'इन्द्रयव' के ३ नाम है । ३ कृष्गपाकफल:, अविनः ( + आविनः ), सुषेणः, करमर्दकः (४ पु), करौंदा, करवन के ४ नाम है। ४ कालस्कन्धः, तमालः, तापिच्छः ( +तापिञ्जा, तापिन्छः। ३ पु ), 'सूर्ती' के ३ नाम है ॥ ६ सिन्दुकः ( + सिन्धुकः ), सिन्दुवारः, इन्द्रसुरसः ( + इन्द्रसुरिसः । ३ पु ), निर्गुण्डी ( + निर्गुण्ठो ), इन्द्राणिका ( २ स्त्री ), 'सिंधुमार' के ५ नाम हैं। -- -- लिङ्गमार्यदोषस्थानावृतत्वेन दशानामपि नाम्नामेकपर्यायतामाह तत्र प्रमापकवचनानि चोपन्य- स्तानि । तपथा- यदिन्दुः-"अग्निमन्योऽग्निमथनस्तावरणिको जयः। अरणिः कणिका सैव तपनो वैजयन्तिकः॥१॥ इति ॥ चन्द्रनन्दनवाह- अग्निमन्थोऽग्निमथनस्तकारी वैजयन्तिका। घहिमन्थोऽरणिः केतुर्नयः पावकमन्थनः ॥१॥ तर्कायों वैजयन्ती च वह्निनिर्मन्थनी जया" इतिचा अत एव-अग्निमन्यो जयः स स्याच्छीपणी गणिकारिका । जया जयन्ती तर्कारी नादयी वैजयन्तिका" ॥१॥ इति वचनसङ्गतिः" इत्यवधेयम् ।। * "सिन्दुवारेन्द्रसुरिसौ" इति पाठान्तरम् ।। इन्द्रयवं कुटजफलम् , भद्रयवं कुटजबीजम् । यदाह- फलानि तत्येन्द्रयवं बीजं भयवास्तथा" इतीति क्षी० स्वा० ॥

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाव्याख्यासहित । --- वृक्ष ५ नाम हैं ॥ १ वेणी * खरा गरी देवताडो जीमृत इत्यपि । २ श्रीहस्तिनी तु भूरुण्डी ३ तृणशून्यं तु मल्लिका ॥ ६ ॥ * भूपदी शीतभीरुश्च ४ सैवास्फोटो वनोद्भवा । ५ शेफालिका तु सुवहा निर्गुण्डी नीलिका च सा ॥ ७० ॥ ६ सितासौ श्वेतोसु रसा भूतवेश्यऽथ मागधी । गणिका यूथिकाम्बष्ठा ८ सा पीता हेमपुष्पिका ॥ ७१ ॥ 8 अतिमुक्तः पुण्डकः स्याद्वासन्तीमाधवी लता। १ वेणी, खरा, गरी ( + खरागरी, गरा, अगरी, गरागरी । ३ स्त्री), देवताडः ( + देवताला ), जीमूतः (२ पु.), 'देवताल' अर्थात् 'बन्दाली, एक तरह के गुजराजी के २ श्रीहस्तिनी, भूरुण्डी (• छी), 'एक तरह के शाक-विशेष के २ नाम हैं । ( "उसके पत्ते हाथी के कान जैसे बड़े २ होते हैं")। ३ तृणशून्यम् (+तृणशूल्यम् । न ), मल्लिका, भूपदी, शीतभीः ( x श.. तभीः । ३ स्त्री), 'छोटी बेला' के ४ नाम हैं। ४ आस्फोटा ( + आस्फोता । स्त्री), 'जङ्गली वेला' का १ नाम है ॥ ५ शेफालिका (+ शीफालिका ), सुवहा, निर्गुण्डी ( ३ स्त्री, 'कालो नेवारी के ३ नाम हैं। ६ श्वेतसुरसा, भूतवेशी ( २ वा ), 'सपेद फूलवाली नेवारी के २ नाम हैं। ७ मागधी, गणिका, यूथिका, अम्बष्टा ( ४ वी ), 'जूही' के ४ नाम हैं । ८ हेमपुष्पिका ( स्त्री ), 'पीले फूलवाली जूही' का १ नाम है ॥ ९ अतिमुक्तः, पुण्डूकः (+मण्डकः ! २ पु), वासन्ती, माधवी, लता ( + माधवीलता । २ स्त्री), 'वसन्त ऋतु में फूलनेवाले कुन्द-विशेषा, या माधवी' के ४ नाम हैं । ("अतिमुक्तः, पुण्ड्रकः, ये दो 'मल्लिका के भेद हैं। यह भी किसी २ का मत है" ) ॥ “खरागरी, गरागरी" इति पाठान्तरे । + "तृणशूल्यम्" इति पाठान्तरम् ।। * "भूपदी शतभीरुश्च सैवास्फोता वनोद्भवा” इति पाठान्तरम् ॥

१४६
अमरकोषः।
[द्वितीयकाण्डे-
१ सुमना मालती जातिः २ सप्तला नवमालिका ॥ ७२ ॥
३ माध्यं कुन्दं ४ रक्तकस्तु बन्धूको बन्धुजीवकः ।
५ सहा कुमारी तरणिदरम्लानस्तु महासहा ॥ ७३ ॥
७ तत्र शोणे कुरबकम्स्तत्र पीते कुरण्टकः ।
. * नीली झिण्टी द्वयोर्बाणादासी चार्तगलश्च सा ॥ ४ ॥
१० । सैरेयकस्तु झिण्टी स्यात्--
१ सुमनाः (=सुमनस् । + सुमना-सुमना), मालती, जाति; (३ स्त्रो),
'चमेली' के ३ नाम हैं ॥
२ सप्तला, नवमालिका (+नवमल्लिका । २ स्त्री), 'वसन्ती नेवारा
वृक्ष के ३ नाम हैं।
३ माध्यम् , कुन्दम् (२ पु ।२ पु न ), 'कुन्द' के २ नाम हैं ।
४ रक्तकः, बन्धूकः ( + बन्धुकः ), बन्धुजीवकः (३ पु), दुपहरिया-
जामक पुष्पवृक्ष
के
३ नाम हैं।
५ सहा, कुमारी, तरणिः, ( ३ स्त्री) 'घिकुमार' के ३ नाम हैं।
६ म्लानः (पु) महासहा (स्त्री), 'सेवती गुलाब' के २ नाम हैं।
("यह कांटादार होता है")॥
५ कुरबकः ( + कुरवकः कुरुवकः, कुरुबकः । पु), लाल फूलवाले
सेवतो गुलाब' का १ नाम हैं।
८ कुरण्टकः ( + कुरण्डवः, कुरुण्डकः । पु), 'पीले फूलवाले सेवती
गुलाब' का १ नाम है।
९ बाणा (+वाणा । पु स्त्री), दासी (स्त्री), आर्तगलः (+अन्तर्गलः।),
"काली कटसरया के ३ नाम हैं ॥
१० सैरेयक (+सैरीयकः । पु ), झिण्टी (स्त्री) 'कटसरया'के २ नाम हैं।
* "नीला झिण्टीद्वयोवाण" इति पाठान्तरम् । अत्र सामान्याया झिण्ट्या विवरणम.
नुकस्वा विशेषनील्यादेर्भेदकथनस्य सकलसरगिविरुद्धस्वापूर्व "सैरेयकस्तु...""रुणे" त्यस्य
ततश्च "नीली झिण्टी..... सा" इत्यस्य पाठस्यौचित्यं प्रतिभावोत्यवधेयम् ।।
+"सैरेयकस्तु" इति पाठान्तरम् ।
सैरीयकः सहचरः सैरेयश्च सदाचरः।
पीतो रजोऽथ नोलश्च कुसुमैस्तं विभावयेत् ॥१॥

अनौषधिवर्ग:४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १४७ . १ तस्मिन्कुरबकोऽरुणे । २ पीताकुरण्टको झिण्टी तस्मिन्सहचरी द्वयोः ॥ ७५ ॥ ३ श्रोड़पुष्पं * जपापुष्पं ४ वज्रपुष्पं तिलस्य यत् । ५ प्रतिहासशतप्रासचण्डातहयमारकाः ॥ ७६॥ करवीरे ६ करीरे तु ऋकरग्रन्थिलावुभौ । ७ उन्मत्तः कितवो धूर्तो धत्तूरः कनकाह्वयः ॥ ७७ ॥ मातुलो मदनचोम्स्य फले मोतुलपुत्रकः । फलपूरो बीजपूरो रुचको मातुलुङ्गके ॥ ७८ ॥ १० समीरणो मरुबकः प्रस्थपुष्पः फणिज्जकः । १ कुरवकः ( +कुरबकः । पु), लाल कटसरैया' का १ नाम है। २ कुरण्टकः (+ कुरुण्डकः । पु), सहचरी (स्त्री पु), पीली कटसरैया के २ नाम हैं ॥ ३ ओड्रपुष्पम् , जपापुष्पम् ( +जवापुष्पम् । २ न ), 'ओढउला के २ नाम हैं । ४ वज्रपुष्पम् (न), 'तिलके फूल' का १ नाम है ।। ६ प्रतिहासः (+प्रतीहासः), शतप्राशः, चण्डातः, हृयमारकः, करवीर: (५५), 'कनइल पुष्प-वृक्ष' के ५ नाम हैं ।। ६ करीरः, करः, ग्रन्थिलः (३ पु) 'करील' के ३ नाम हैं । - उन्मत्तः, कितवः, धूर्तः, धत्तूर: ( +धुस्तूरः, धुस्तुरः, धूस्तरः, धुतूरः ), कनकाह्वयः ( स्वर्णके वाचक सब शब्द ), मातुलः, मदनः (७ पु) धतूर' के ८ मातुलपुत्रकः (पु), धतूरके फल' का १ नाम है ॥ ९ फलपूरः, बीजपूरः, रुचकः, मातुलुङ्गकः ( ४ पु ), 'बीजौरा नींबू के ४ नाम हैं। ('फलपूरः, बीजपूर: ये दो नाम उक्तार्थक तथा 'रुचकः, मातुलझेका ये दो नाम 'मातुलुङ्गका के हैं यह भा० दी० का मत है")॥ १० समीरणः, मरुबकः ( +मरुवकः ), प्रस्थपुष्पः, फणिजक: जम्बीरः पीत: कुरण्टका शेयो रक्तः कुरवकः स्मृतः। नील आर्तगलो दासी बाण ओदनपाक्यापि" ॥२॥स्युक्तरित्यवधेयम् ।। "जवापुष्पम्" इति पाठान्तरम् ।। चित्तूरः काञ्चनाह्वयः" इति पाठान्तरम् ॥ * "मरुवकः" इति पाठान्तरम् ॥ . ७ नाम अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- जम्बीरोऽप्यस्थ पर्णासे कठिअरकुठेरकौ ॥ ७ ॥ २ सितेऽर्जकोऽत्र ३ पाठी तु चित्रको वह्निसंज्ञकः । ४ * अाह्ववसुकाऽऽस्फोटगणरूपविकीरणाः ॥ ८० ॥ मन्दारश्चार्कपर्णोऽत्र शुक्लेऽलर्कप्रतापलौ । ६ शिवमल्ली पाशुपत एकाष्ठीलो । बुको वसुः ॥ १ ॥ ७ वन्दा वृक्षादनी वृक्षरहा जीवन्तिकेत्यपि । - वत्सादनी छिन्नरहा गुडूची तन्त्रिकोमृता ॥ २ ॥ जीवन्तिका सोमवल्ली विशल्या मधुपएण्यपि । (+जम्भीरः । ६ पु), 'भरुवा' के ५ नाम है । १ पर्णासः, कठिारः, कुठेरकः, (३ पु), 'पर्णास, या बबई के ३ नाम हैं। २ अर्जकः (पु) 'शपेद बवई' का १ नाम है । ३ पाठी ( = पाठिन् ), चित्रकः, वह्निसंज्ञकः ( अग्निके वाचक सब नाम । ३ पु), 'चीत के ३ नाम है ॥ ४ अर्काहः ( सूर्यके वाचक सब नाम ), वसुकः ( + वसूकः ), आ- स्फोटः (+आस्फोतः ), गणरूपः, विकीरणः (+विकिरणः (, मन्दारः, अर्क. प: (७ पु), एकवन, आक, मन्दरा' के ७ नाम है ॥ २ अलकः, प्रतापसः ( २ पु ), 'सपेद फूलवाले एकवन' के २ नाम है। ६ शिवमल्ली (=शिवमल्लिन् ), पाशुपतः, एकाष्टीलः, वुक्रः (+ बुकः), वसुः (५ पु)'गुम्मा' के ५ नाम है ॥ • वन्दा, वृक्षादनी, वृक्षरहा ( + वृक्षरोहा ), जोवन्तिका (+जीवन्ति । ४ स्त्री), 'आकाशबल, बांदा के ४ नाम है ॥ ८ वत्सादनी, छिन्नरहा, गुडूची ( + गुडुची) तन्त्रिका, अमृता, जीवन्ति- का ( + जीवन्ती), सोमवल्लो, विशल्या, मधुपर्णी (९ स्त्री), 'गिलोय गुड़च' के N - SENA * . अकोह सुका स्फोतगणरूपविकारणाः" इति पाठान्तरम् ।। + "बको वसुः" इति पाठान्तरम् ॥ . 1 बुक बिल्वं सत्तरं सुमना पाटला तथा। पद्ममुस्पलगोसूय्यमष्टौ पुष्पाणि शहरे" ॥१॥ इत्युचस्वाच्छिवप्रिया.मली 'शिवमल्ली' इति नामेत्यवधेयम् ।।

वनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ मूर्वा देवी मधुरसा मोरटा तेजनी नुवा ॥ ३ ॥ मधूलिका मधुश्रेणी गोकर्णो पोलुपण्यपि । २ पाठाम्बष्टा विद्धकर्णी स्थापनी श्रेयसो रसा ॥3॥ एकाष्ठीला पापचेली प्राचीना वनतिक्तिका । * कटम्भराशोकरोहिणी कटुरोहिणी ॥ ५ ॥ मत्स्यपित्ता कृष्णभेदी चक्राङ्गी शकुलादनी । ४ । भात्मगुप्ताजहाव्यण्डा कण्डरा प्रावृषायणी ॥ ६ ॥ ऋष्यप्रोक्ता शूकशिम्बिः कपिकच्छुश्च मर्कटी। ५ चित्रोपचित्रा न्यग्रोधी द्रवन्ती शम्बरी वृषा ॥ ७ ॥ प्रत्यक्श्रेणी सुतश्रेणी ६ रण्डा मूर्षिकपर्ण्यपि । १ मुर्वा ( + मूर्वी), देवी, मधुरसा, मोरटा, तेजनी, युवा (+नवा), मधूलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी, पीलुपर्णी (१० स्त्री), 'मृ' अर्थात् 'चिनार, चुरनहार, धनुषके उपयोगी लताविशेष' के १० नाम हैं॥ २ पाठा, अम्बष्टा, विद्धकर्णी ( + अविद्धकर्णी), स्थापनी, श्रेयसी, रसा, एकाष्टीला, पापचेली, प्राचीना, वनतिक्तिका (१० स्त्री ), 'पाठा या पाढर के १० नाम हैं। ३ कटुः, कटम्भरा ( + कटंवरा, कटम्बरा) अशोकरोहिणी (+अशोका, रोहिणी ), कटुरोहिणी, मत्स्यपित्ता, कृष्णभेदी ( + कृष्णभेदा ), चक्राङ्गों, शकु- लादनी ( ८ वी), 'कुटकी' के ८ नाम हैं। ४ आत्मगुप्ता ( + स्वरंगुप्ता), अजहा (क्षी० स्वा० महे । + जडा, भा० दी०), अव्यण्डा, कण्डुरा (+कण्डूरा), प्रावृषायणी, अध्यप्रोक्ता, शूकशि, म्बिः, कपिकच्छुः (+ कपिकच्छु:), मर्कटी (९ स्त्री), 'कवाछ' के ९ नाम है ॥ ९ चित्रा, उपचित्रा, न्यग्रोधी, द्रवन्ती, शंवरी ( + शम्बरी), वृषा, प्रत्य. श्रेणी, सुतश्रेणी, रण्डा (+चण्डा ), मूषिकपर्णी (+मूषिकाह्वया । १० स्त्री) 'मूसाकर्णी' के १० नाम हैं । * "कटम्ब (टव )राशोकरोहिणी" इति पाठान्तरम् ।। +"पाश्मगुप्ताजडाध्यण्डा" इति पाठान्तरम् ।। "चित्रोपचित्रा...'शम्बरी घृषा" इति पाठान्तरम्। पत्र दन्त्यां द्रवन्तीभ्रामान. यकार: "उपचित्रा" माह इति क्षो० स्वा०॥ S"चण्डा" इति पाठान्तरम् ॥ - १५० अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ अपामार्गः शैखरिको धामार्गवमयूरको ॥ ८ ॥ प्रत्यक्पर्णी * केशपर्णी किणिही खरमरी। २ । इजिका ब्राह्मणो पद्मा भार्गी ब्राह्मणयष्टिका ॥18॥ मङ्गारवल्ली बालेयशाकबर्बरवर्धकाः । ३ मजिष्ठा विकसा जिङ्गी समझा। कालमेषिका॥०॥ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्लयपि । ४ यासो यवासो दुःस्पर्शो धन्वयासः कुनाशकः॥ १ ॥ रोदनी कच्छुरानन्ता समुद्रान्तो दुरालभा । ५ पृश्निपर्णी पृथक्पर्णी || चित्रपय॑द्भिवल्लिका ॥ १२ ॥ , १ अपामार्गः, शैखरिकः (+शिखरी), धामार्गवः (+अधामार्गवः), मयूरकः ( ४ पु), प्रत्यकपर्णी ( +प्रत्यक्पुष्पी), केशपर्णो (+कीशपर्णी ), किणिही, खरमञ्जरी ( ४ स्त्री), चिचिढ़ा' के ८ नाम हैं ॥ २ हञ्जिका (+फञ्चिका ), ब्राह्मणी, पमा, भार्गी (भृगुजा) ब्राह्मणयष्टिका, अङ्गारवल्ली (६ स्त्री), बालेयशाका, वर्वरः, वर्धकः (३ पु), 'ब्रह्मनेटी, भारङ्गी के ९ नाम हैं ।। ३ मञ्जिष्ठा, विकसा ( + विकषा ), जिङ्गो, समङ्गा, कालमेषिका ( + कालमेशिका ), मण्डूकपर्णी, भण्डीरी (+मण्डीरी), भण्डा, योजनबल्ली (+योजनपर्णी । ९ स्त्री), 'मीठ' के ९ नाम ४ यासः, यवासा,दुःस्पर्शः, धन्वयासः (+धनुर्यासः), कुनाशकः (५ पु), रोदनी (+चोदनी), कच्छुरा, अनन्ता, समुद्रान्ता, दुरालभा (+ दुरालम्भा । ५ स्त्री), 'जवासा' के १० नाम हैं । ५ पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, चित्रपर्णी, अधिवल्लिका (+अधिपर्णिका,मुकु०) हैं * "कौशपणी" इति पाठान्तरम् ॥ "फजिका" इति मुकुटसमतं पाठान्तरम् ।। 1 "कालमेशिका" इति पाठान्तरम् ।। "मण्डीरी भण्डी योजनपये पि" इति पाठान्तरम् ॥ | "चित्रपर्ण्यधिपर्णिका" इति पाठान्तरम् ।।

बनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाच्याख्यासहितः । १५१ कोष्टुविन्ना सिंहपुच्छो * कलशिर्धावनिर्गुहा । १ । निदिग्धिकास्पृशी व्याघ्री बृहती कण्टकारिका ॥ १३ ॥ प्रचोदनी कुली क्षुद्रा दुःस्पर्शा राष्ट्रिकेत्यपि । २ नीलो काला क्लीतकिका ग्रामीणा मधुपर्णिका ॥ ४ ॥ रञ्जली श्रीफली तुत्था द्रोणी दोला चनीलिनी । ३ अवल्गुजः सोमराजी सुवल्लिःसोमवल्लिका ॥५॥ कालमेषी कृष्णफला बाकुची पूतिफल्यपि । ४ कृष्णोपकुल्या वैदेही मागधी चपला कणा ॥ ६ ॥ उषणा पिप्पली शौण्डी कालोपूथ करिपिप्पली। कपिवल्ली कोलवल्लो श्रेयसी वशिरः पुमान् ॥ ७ ॥ क्रोष्टुविन्ना, सिंहपुच्छी (+सिंहपुच्छकः पु), कलशिः ( + कलशी), धावलिः (+धावनी), गुहा (९ स्त्री), 'पिठिवन' के ९ नाम हैं। १ निदिग्धिका, स्पृशी, व्याघ्रो, बृहती, कण्टकारिका (+कण्टकारी), प्रचोदनी, कुली, क्षुद्रा, दुःस्पर्शा, राष्ट्रिका (१० स्त्री) 'भकटैया', रेंगनी के १० नाम हैं। २ नीली, काला, क्लीतकिका, ग्रामीणा, मधुपर्णीका (+मधुपर्णी), रज्ज- नी (+रजनी ), श्रीफली, तुत्था, द्रोणी ( +तणी), दोला ( +मेला ), नीलिनी (११ स्त्री), 'नील' के ११ नाम हैं ॥ ३ अवलगुजः (पु), सोमराजी, सुबल्लिः, सोमवल्लिका (+ सोमवल्ली), कालमेषी (+कालमेशी), कृष्णफला, बाकुची (+बागुची मुकु०), पूतिफली (६ स्त्री), 'बाकुचा या बकुची' के ८ नाम ह ॥ ४ कृष्ग, उपकुल्या, वैदेही, मागधी, चपला, कणा, उषणा (+ ऊपणा ), पिप्पली (+ पिप्पाल:), शौण्डो, कोला (१० स्त्री), 'पीपरि के १० नाम हैं । ५ करिपिप्पली ( + करिपिप्पलिः ), कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी (४ स्त्री), वशिरः (+बसिरः । पु), 'गजपीपरि के ५ नाम है ॥ * "कलशी धावनी गुहा" इति पाठान्तरम् ।। | "बृहवो तु निदिम्धिका" इति भागरिवाक्यावत्र अन्यद्धान्तः, यतोऽनयोर्महान् अद" इति क्षी० स्वा० ॥ 1"षणा पिप्पलो" इति पाठान्तरम् ॥ * "वासरः पुमान्" इति पाठान्तरम् ।। . .

अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्डे-- १५२ १ * चव्यं तु चविका २ काकविञ्चीगुजे तु कृष्णला। ३ पलङ्घषा विक्षुगन्धा श्वदंष्ट्रा स्वादुकण्टकः ॥ ८॥ गोकण्टको गोक्षुरको वनशृङ्गाट इत्यपि । ४ विश्वा विषा प्रतिविषातिविषोपविषारुणा 1880 शृङ्गी । महौषधं चापूथ क्षीरावी दुग्धिका समे। ६ शतमूली बहुसुताऽभीरुरिन्दीवरी वरी ॥ १०० ॥ ऋण्यप्रोक्ताऽभीरुपत्रीनारायण्यः शतावरी । अहेरु- १ चव्यम् (न । + स्त्री), चविका ( स्त्री।+न, पु, ) 'चाभ चव्य के २ नाम है। ("ये दो नाम भी पूर्वार्थक हैं, यह भी किसी २ का मत - . . २ काकचिचिः, (+ काकचिञ्चि:, काकचिञ्चा), गुना, कृष्णला (+र. त्तिका । ३ स्त्री) गुंजा, लाल धुंघची, या करेजनी' के ३ नाम है ॥ ३ पलकृषा, इक्षुगन्धा, श्वद्रष्टा ( ३ स्त्री), स्वादुकण्टकः, गोकण्टकः, गो. क्षुरकः, वनशृङ्गाटः ( ४ पु), 'गोखरू, के ७ नाम है । ४ विश्वा, विषा, प्रतिविघा, अतिविषा, उपविपा, अरुणा, शृङ्गी (७ स्त्री), महौषधम् (न), 'श्रतीस' के ८ नाम है ॥ ५ क्षीरावी, दुग्धिका ( २ स्त्री ), 'दुधिया घास' के २ नाम है ॥ ६ शतमूली, बहुसुता, अभीरुः, इन्दीवरी, वरी ( + वरा ), ऋष्यप्रोक्ता, अभीपत्त्री, नारायणी, शतावरी, अहेरुः (१० स्त्री),'शतावर' के १० नाम हैं। * "चव्यं तु चविकं काकचिश्चागुज्जे तु कृष्णला" इति पाठभेदः । चन्द्रनन्दनस्तु सा. मान्येनाह, करिपिपल्या एव पर्यायतामाहत्यर्थस्तथाहि- "चव्या कोलाथ चविका श्रेयसी गजपिप्पली। च्यवना कोलवल्लो तु चयं कुन्जरपिप्पली"॥१॥ इति ऐतन्मते स्वन्तस्य पूर्वानन्वयित्वप्रसक्त्या 'चव्यं च' इति पाठः समीचीन इत्यवधेयम् ॥ "महौषधं तु विषं नातिविषा । म्यथ तु हि महौषधं ( विसं) शुण्ठी लशुन चेति विषा(१)शब्दमबुद्ध्वा भ्रान्तोऽयम्" इति क्षी० स्वा०॥ + "वरा" इति पाठान्तरम् । चन्यं च" इति पाठवा मतेनेदमित्यवधेयम् ।। - बनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १५३ १ रथ *पोतद्रुकालीयकहरिद्रवः ॥ १०१ ॥ दार्वी पचम्पचा दारुहरिद्रा पर्जनीत्यपि । २ वचोयगन्धा षडग्रन्था गोलोमो शतपर्विका ॥ १०२ ।। ३ शुक्ला हैमवती ४ वैद्यमातृसिंह्यौ तु वाशिका । वृषोऽटरूषःसिंहास्यो वासको वाजिदन्तकः ॥ १०३ ।। ५ + आस्फोटा गिरिको स्याद्विष्णुकान्ताऽपराजिता । ६ इक्षुगन्धा तु काण्डेक्षुकोकिलाक्षेक्षुरक्षुराः ॥ १०४ ॥ ७ शालेयः स्याच्छोतशिवश्छन्ना मधुरिका मिसिः। मिश्रेयाष्यम्थ सीहुण्डो वज्रानुक्स्त्री स्नुही गुडा ॥ १०५ ।। १ पोतद्रूः, कालीयकः ( + कालेयकः ), हरिद्रुः ( ३ पु), दावी पचंपचा (+पचंबचा ), दारुहरिद्रा, पर्जनी (४ स्त्री), 'दारुहल्दी के ७ नाम है । २ वचा, उपगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमो, शतपर्विका (६ स्त्री), 'घुड़बच या बच के ६ नाम है। ३ हैमवती (स्त्री), 'खुरासानी बव' का १ नाम है ॥ ४ वैद्यमाता (=वैद्यमातृ), सिंहो, वाशिका (+वासिका । ३ स्त्री) वृषः, अटरूषः (+अटरुषः ), सिंहास्यः, वासकः, वाजिदन्तकः (५५) अडूसा, बाकस के ८ नाम हैं। ५ आस्फोटा ( +आस्फोता ), गिरिक विष्णुकान्ता, अपराजिता (: स्त्री), 'अपराजिता के ४ नाम ६ इक्षुगन्धा (स्त्री), काण्डेक्षुः, कोकिलाक्षः, इक्षुरः, क्षुरः (४ पु), 'तालमखाना' के ५ नाम है ॥ ७ शालेय:, शीतशिवः ( २ पु), छत्त्रा, मधुरिका, मितिः (+मिसी, मिशिः, मिशी, ), मिश्रेया (+मिश्रेयः, पु। ४ स्त्री), सोभा या वनसौंफर के ६ नाम है। ८ लीहुण्डः (+ सिहुण्डः, शीहुण्डः ), बजः (+वज्दुः । २ पु), स्नुक =स्नुह् ), स्नुही (+स्नुहा ), गुडा, समन्तदुग्धा ( ४ स्त्री), 'सहुड़' के "पीतद्रु कालेयकहरिद्रः” इति पाठान्तरम् ।। आस्फोता" इति पाठान्तरम् ।। + "मिश्रेयोऽप्यथ सीहुण्डो वजp : स्नुक् स्नुही गुडा" इति पाठान्तरम् ॥ ॥ १ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- ૫૪ २ समन्तदुग्धारथो वेल्लममोघा चित्रतण्डुला। तण्डुलश्च कृमिघ्नश्च विडङ्गं पुनपुंसकम् ॥ १०६ ॥ बला वाट्यालका ३ घण्टारवा तु शणपुष्पिका । ४ मृद्रीका गोस्तनी द्राक्षा स्वाद्वी मधुरसेति च ॥ १०७ ॥ ५ सर्वानुभूतिः । सरला त्रिपुटा त्रिवृता त्रिवृत् । त्रिभण्डी रोचनी ६ श्यामापालिन्छौ तु सुषेणिका ॥ १०८ ॥ काला मसूरविदलार्धचन्द्रा कालमेषिका । ७ मधुक क्लीतकं यष्टिमधुकं मधुयष्टिको ॥ १० ॥ . ६ नाम है। १ वेल्लम् (न), अमोधा (+मोधा ), चित्रतण्डुला ( २ स्त्री), तण्डलः +तन्तूलः, मुकु०), कृमिघ्नः (+ कृमिघ्नी, स्त्री । २ पु), विडङ्गम् (पु न ) 'बायबिडङ्ग के ६ नाम है। २ बला (+वला ), वाट्यालका ( वाट्यालकः, पु । २ स्त्री), 'बरि- भार" ( औषधविशेष ) के २ नाम हैं । ३ घण्टारवा, शणपुष्पिका ( २ स्त्री), 'सन सनई के २ नाम है। ४ मृद्वीका, गोस्तनी (+गोस्तना), द्राक्षा, स्वाद्वी, मधुरसा (६ स्त्री), 'दाख मुनक्का' के ६ नाम है ॥ ५ सर्वानुभूतिः, सरला ( + सरणा, सरडा ), निपुटा (+त्रि पुटी, असा ), निवृता, निवृत, त्रिभण्डी, रोचनी (+रेचनी । ७ स्त्री), 'सपेद निशोथ के ७ नाम है। ६ श्यामा, पालिन्दी (+पालिन्धी), सुषेणिका, काला, मसूरविदला, अर्द्धचन्द्रा, कालमेषिका ( ७ स्त्री), 'काला निशोथ' के ७ नाम है ॥ ७ मधुकम् , क्लीतकम् , यष्टिमधुकम् (+ यष्टीमधुकम् । ३न), मधुष्टिका (स्त्री), 'मुलहठी जेठीमधु' के ४ नाम है। Antaram *"बला वाट्यालको घण्टारवा" इति पाठान्तरम् ।। +"सरणा" पति पाठान्तरम् ॥ "चनी" इति पाठान्तरम् ॥

वनौषधिवर्गः ४] मणिप्रभाब्याख्यासिहतः। १५५ . १ विदारी क्षीरशुक्लेक्षुगन्धा * क्रोष्ट्री च या सिता । २ मन्या क्षीरविदारी । स्यान्महाश्वेतगन्धिका ॥ ११० ॥ ३ लाङ्गली शारदी तोयपिप्पली शकुलादनी । ४ खरवा कारवी दीप्यो मयूरो लोचमस्तकः ॥ १११ ॥ १ विदारी, क्षारशुक्ला, इक्षुगन्धा, क्रोष्ट्री ( ४ स्त्री), भा. दी० मतसे 'कृष्ण भूमिकूष्माण्ड' के और महे० मतसे 'शुक्ल भूमिकूष्माण्ड' के ४ नाम है। २ क्षीरविदारी, महाश्वेता, ऋक्षगन्धिका (+ऋष्यगन्धिका । ३ स्त्री), भा० दी० मतसे 'शुक्ल भूमिकूष्माण्ड' के और महे० मतसे 'कृष्ण भूमि. कूष्माण्ड के ३ नाम है ॥ ३ लाङ्गली, शारदी, तोयपिप्पली, शकुलादनी (४ स्त्री ), 'जलपीपरि' के ४ नाम है। ४ खराश्वा, कारवी ( २ स्त्री), दीप्यः, मयूरः, लोचमस्तकः ( + लोच मटः। ३ पु), 'मजमोदा के नाम है ॥ "कोष्टी तु या सिता" इति "यासिता" इति च पाठान्तरे। "स्यान्महाश्वेतष्यंगन्धिका" इति पाठान्तरम । या असिता= कृष्णा इतिश्छेदं कृत्वा विदारी,.." ४ 'कृष्णभूकूष्माण्डस्य, अन्या सि. ता- शुक्ला 'क्षरिविदारो,...' ३ शुक्लभूकृष्माण्डस्य' इत्युक्त्वा-"यासिता-शुक्ला 'विदा. री,... ४ शुक्लभूकूष्माण्डस्य तथा 'अन्या या असिता= कृष्णा क्षौरविदारी,१३ 'कृष्ण . भूकृष्माण्डस्या इति मुकुटोकं चिन्त्यमिति मा० दो। क्षी. स्वा० तु 'विदारी....३ 'कृष्णभूकूष्माण्डं प्रान्देशेषु विख्यातम्', ततः 'क्रोष्टी तु या सिता' इति पाठमुररीकृस्या 'या सिता शुक्लासा 'क्रोष्ट्रा' इत्युक्त्वा अन्याया असिता = कृष्णा क्षीरविदारी,..' ३'कृष्ण. भूकूष्माण्डस्य इत्येवं विभागत्रयं कृतम्। तत्रेदमवधेयम्-क्षीरमिव शुक्लेति स्वयं प्रद. शितस्य क्षीरशुक्ला शब्दविग्रहस्य, 'क्रोष्ट्री भृगालिकाक्षीरविदारीलागलीषु च' (मेदि० पृ० १३४ श्लो. २०) इति मेदिन्युक्तः, 'क्रोष्ट्र क्षीरविदारिका' (अने० संग्र० २।४०६ ) इति हेमचन्द्राचार्योत्तेश्च विरोधात् मुकुटोक्तिरेव समीचीना। पत्र च क्षी० स्वा० सम्मतः 'क्रोष्ट्री तु यासिता' इति पाठः भा० दी० सम्मत: 'या सिता' इति च्छेदश्च समोचनः प्रतिभाति । एवं सात 'विदारी..." ३ 'शुक्लभूकूष्माण्डस्य, 'क्रोष्ट्री... ४ 'कृष्णभूकूष्माण्डस्य' इरयाया तम् । अषिकन्वन्यत्र द्रष्टव्यम्। - १५६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- . १ गोपी श्यामा शारिवा स्यादनन्तोत्पलशारिवा । २ योग्यमृद्धिः सिद्धिलक्ष्म्यौ ३ वृद्धेरप्याह्वया इमे ॥ ११२ ।। ४ कदली वारणबुसा रम्भा मोचांशुमत्फला। काष्ठीला ५ मुद्गपर्णी तु काकमुद्गा सत्यपि ॥ ११३ ॥ ६ वार्ताको हिङ्गुली सिंही भण्टाको दुष्प्रधर्षिणी । ७ नाकुली * सुरसा रास्ना सुगन्धा गन्धनाकुली ॥ ११४॥ नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी छत्राकी सुवहा च सा । १ गोपी (+गोपा), श्यामा, शारिवा (+सारिवा), अनन्ता (x चन्दना ), उत्पलशारिवा ( ६ स्त्री), 'शारिवा, ग्वार के ६ नाम है । २ योग्यम् (न), ऋद्धिः सिद्धिः, लक्ष्मीः ( ३ स्त्री), 'सिदिनामक औषध-विशेष के ४ नाम हैं ॥ ३ वृद्धिः (स्त्री), पूर्वोक्त ( योग्यम् , ऋद्धिः, सिद्धि, लक्ष्मीः ) चार शब्द 'वृद्धिनामक औषध-विशेष' के ५ नाम है । ("किसीके मतमें 'यो- ग्यम् ,"...""वृद्धिः, पाचों शब्द एकही पर्याय है")॥ ४ कदली (+कदला स्त्री, कदलः पु), वारणबुसा (+वारणवुसा), रम्भा, मोचा, अंशुमत्फला),(+भानुफला) काष्ठोला(६ स्त्री), 'केला' के ६ नाम हैं। ५ मुद्पर्णी, काकमुद्रा, सहा ( ३ स्त्री ), 'भूगपर्णी, मुंगौनी वनमंग के ३ नाम है। ६ वार्ताकी ( + वार्ताकुः, वार्ता, वार्ताकः ), हिङ्गुली, सिंही, भण्टाकी, दुष्प्रधर्षिणी । ( +दुष्प्रधर्पणी । ६ स्त्री ), 'वनभटा के ५ नाम है । ७ नाकुली, सुरसा, रास्ना, सुगन्धा (+ नागसुगन्धा), गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, छत्त्राको, सुवहा ( ९ स्त्री), 'रास्ना, रासना' के ९ नाम हैं। . . A-PHemama- "सुरसा नागसुगन्धा" इति पाठान्तरम् ॥ । वैद्यास्तु "नाकुलीगन्धनाकुल्यो' दमुररीकुर्वन्ति । तद्यथा- नाकुली सर्पगन्धा च सुगन्धा भोगगन्धिका । सैव सर्पसुगन्धेति..." इति । "अन्या मयासुगन्धा च सुवहा गन्धनाकुली। साक्षी नकुलेष्टा च छत्वाकी विषमर्दिनी" ॥॥ इति चेति ।।

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १५७ साला १ विदारिगन्धांशुमती पर्णी स्थिरा ध्रुवा ॥ ११५ ॥ २ तुण्डिकेरी समुद्रान्ता | कार्पासी वदरेति च । ३ भारद्वाजी तु सा वन्या ४ शृङ्गी तु ऋषभो वृषः ॥ ११६ ॥ ५ गाङगेरुकी नागबला झषा हस्वगवेधुका । ६ धामार्गवो घोषकः स्यात् ७ महाजाली स पीतकः ॥ ११७ ॥ ज्योत्स्नी पटोलिका जाली नादेयी भूमिजम्बुका। १० स्याल्लाङ्गलिक्यग्निशिखा- १ विदारिंगन्धा ( + विदारीगन्धा), अंशुमती, सालपर्णी (+-शालपर्णी स्थिरा, ध्रुवा ( ५ स्त्री), 'सरिवन के ६ नाम हैं । २ तुण्डिकेरी, समुद्रान्ता, कार्पासी (+कर्पासी), बदरा (+वदरा । ४ स्त्री), 'कपाल' के ४ नाम हैं ॥ ३ भारद्वाजी (+भद्रा । स्त्री), 'बनकपास या नर्मा' का १ नाम है । ४ शृङ्गी (स्त्री), ऋषभः (+ वृषभः ), वृषः ( २ पु), 'करकरासिंगी' के ३ नाम हैं। ६ गारुकी, नागबला, झपा, हस्वगवेधुका (४ स्त्री), 'गंगेरन के ! जाम हैं। ६ धामार्गवः घोषकः ( २ पु), 'सपेद फूल वाली तरोई के २ नाम हैं ।। ७ महाजाली (स्त्री), पीले फूलवाली तरोई' का १ नाम हैं । ८ ज्योत्स्नी ( +ज्योत्स्नी, जोत्स्नी), पटोलिका, जाली ( ३ स्त्री ), चचिढ़ानामक तरकारी' के ३ नाम हैं । ९ नादेयी, भूमिजम्बुका ( २ स्त्री ), 'भुंई जामुन' के २ नाम हैं । १० लाङ्गलिकी, अग्निशिखा (+ अग्निमुखा, अग्निज्वाला । २ स्त्री), 'करिहारी' के २ नाम हैं । . . * "शालपणी" इति पाठान्तरम् ॥ "कसी वदरेति च" इति पाठान्तरम् ।। "वृषभो वृषः" इति पाठान्तरम् ॥ "ज्योत्स्नी पटोलिका जाली नादेयी भूमिजम्बुका" इति पाठान्तरम् । अत्र “नादेयी भूमि- जम्बुके" त्युक्त्वाऽपि भ्रान्त्या पुनरत्रोक्तेति क्षी. स्वा० ॥

१५८ भमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- १ काकाङ्गीकाकनासिका॥ ११८ २ गोधापदी तु सुवहा ३ मुसली तालमूलिका । * अजशृङ्गी विषाणी स्यात् ५ * गाजिह्वादाविके समे ॥ ११ ॥ ६ ताम्बूलवल्ली ताम्बूली नागवल्ल्यप्यख्य द्विजा । हरेणू रेणुका कौन्ती कपिला भस्मगन्धिनी ॥ १२० ॥ + एलावालुकमैलेयं सुगन्धि हरिवालुकम्। वालुकं चाऽथ पालङ्कयां मुकुन्दः कुन्दकुन्दरू: १२१ ॥ २० बालं ह्रीबेरबर्हिष्टोदीच्यं केशाम्बुनाम च । १ काकानी ( + काकजङ्घा ), काकनासिका (२ स्त्री), 'कौवाठोठी: के २ नाम हैं ।। २ गोधापदी ( + हंसपदी), सुवहा ( २ स्त्री, ) 'लजालु' के २ नाम हैं । ३ मुसली, तालमूलिका ( २ स्त्री ), 'मुसलीकन्द' के २ नाम हैं । ४ अजशृङ्गी, विषाणी ( २ स्त्री, 'मेढ़ासीङ्गी' के २ नाम हैं । ५ गोजिह्वा, ( + दर्विका । २ स्त्री, 'गोभी के २ नाम हैं। ६ ताम्बुलवल्ली, ताम्बूली, नागवल्ली ( ३ स्त्री), 'नागबेल, पान' के ३ नाम हैं। ७ द्विजा, हरेणुः, रेणुका, कौन्ती, कपिला, भस्मगन्धिनी ( + भस्मगन्धा, भस्मगर्भा । ६ स्त्री ), 'रेणुकावीज' के ६ नाम हैं । ८ एलावालुकम् ( + एलवालुकम् ), ऐलेयम् , सुगन्धि ( =सुगन्धिन् ) हरिवालुकम् , वालुकम् (५ न ), 'पलुमा' के ५ नाम हैं। ( यह सीतलचीनी की तरह होता है और इसमें कूठसा गन्ध होता है )॥ ९ पालकी (स्त्री), मुकुन्दः, कुन्दः (+कुन्दुः), कुन्दुरुः (कुन्दरः । ३ पु), 'पालक' के ४ नाम हैं। १० बालम् (+वालम् । +न पु), होवेरम् (हीवेरम् ), बहिष्टम् , उदीच्यम् , केशाम्बुनाम ( =केशाम्बुनामन् । 'केश और जलके पर्यायवाचक सब शब्द' । ६ न ), 'नेत्रबाला' के ६ नाम है। * "गोजिहादविके समे" इति पाठान्तरम् ॥f "एलवा(बा)लुकमैलयम्" इति पाठान्तरम् ।। "वालं हीवेरवहिष्ठोदीच्यम्" इति पाठान्तरम् ।। , . .

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १ कालानुसायवृद्धाश्मपुष्पशोतशिवानि तु ॥ १२२ ॥ लेयं २ तालपर्णी तु दैत्या गन्धकुटी मुरा। गन्धिनी ३ गजभक्ष्या तु सुवहा सुरभी रसा ॥ १२३ ॥ महेरणा कुन्दुरुकी सल्लकी *लादिनोति च । ४ अग्निज्वालामुभिक्षे तु धातको धातुपुषिका ॥ १२४ ॥ ५ पृथ्वीका चन्द्रावालेला निष्कुटिबहुलाथ सा। सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी त्रिपुटा त्रुटिः ॥ १२५ ॥ • ब्याधिः कुष्टं पारिभाच्यं वाप्यं पाकलमुत्पलम् । १ कालानुसार्यस् , वृद्धम् , अश्मपुष्पम् , शीतशिवम् , शैलेयम् (६ न), 'शिलाजीत के ६ नाम हैं । २ तालपर्णी, दैत्या, गन्धकुटी, मुरा, गन्धिनी ( ६ स्त्री ), 'मुरा, ममो- रफली, तालिसपत्र' के नाम हैं । ३ गजमक्ष्या (+ मजभक्षा), सुवहा (+ सुनवा), सुरभी (+ सुरमिः), रसा ( +सुरभीरला ), महेरणा (+महेरुणा), कुन्कुरुकी, सल्लकी (+शल्ल. की, सिल्लकी ), लादनि (+हादा। ८ स्त्री), 'सलई' के ८ नाम ४ अग्निज्वाला, सुभिक्षा, धातकी(+धातुको), धातृपुष्पिका (+धातुपुष्पि- का। ४ स्त्रा), 'धव के ४ नाम हैं। ६ पृथ्वीका, चन्द्रबाला ( + चन्द्रवाला), एला, निष्कुटिः (+निष्कु- डी), बहुला ( ५ स्त्री), 'बड़ो इलायची के ५ नाम हैं । ६ उपकुञ्जिका, तुत्था, कोरङ्गी, निपुटा, त्रुटिः (+ त्रुटी । ५ वी), "छोटी इलायची के ६ नाम हैं । ७ व्याधिः (पु), कुष्टम् , पारिभाव्यम् ( + पारिभव्यम् ), वाप्यम् ( + व्याप्यम् , आप्यम् ), पाकलम् , उत्पलम् ( ६ न ), 'कू' ( औषधि- विशेष) के ६ नाम हैं। * "हादिनीति च" इति पाठान्तरम् ।। धातुकी "धातुपुष्षिका” इति पाठान्तरम् ।। "चन्द्रवालला" इत्यसमीचीनः पाठः। क्षो. स्वा० भा० दी. व्याख्यानोक्तस्य चन्द्र- बालेवेति विग्रहस्य वौचित्यात् ।। S"पारिभव्यं व्याप्यं पाकलमुत्पलम्" इति पाठान्तरम् ।। हैं , अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- १ शङ्खिनी चोरपुष्पी स्यात्केशिन्यश्थ वितुन्नकः ॥ १२६ ॥ झटामलामटा ताली शिवा तामलकीति च। ३ प्रपौण्डरीकं पौण्डयमथ तुन्नः कुबेरकः ॥ १२७ ॥ कुणि कच्छः कान्तलको नन्दिवृक्षोऽथ राक्षसी । चण्डा बनहरी । क्षेमदुपत्रगणहालकाः ॥ १२८ ।। ६ व्याडायुधं व्याननखं करजं चक्रकारम् । सुषिरा विद्रुमलता कपोताधिर्नटी नली ॥ १२ ॥ ८ धमन्यजनकेशी हनुहट्टविलासिनी! १ शङ्खिनी, चोरपुष्पी, केशिनी ( ३ स्त्री, ), 'शंखाहुलीनामक लतावि- शेष के ३ नाम हैं। २ वितुन्नकः (पु), झटामला ( + झटा, अमला ) अज्झटा ( + अ. मलाज्झटा ), ताली, शिवा, तामलकी (६ स्त्री), 'भूई आँवरा, छोटा माँवरा के ६ नाम हैं ॥ ३ प्रपौण्डरीकम् , पौण्डर्यम् ( + पुण्डर्यम् । २ न ), 'पुण्डरीय वृक्ष' के २ नाम हैं। ४ तुन्नः, कुस्का, कुणिः (+तुणिः ), कच्छः, कान्तलकः, नन्दिवृक्षः ( + नान्दिवृक्षः । ६ पु), 'तून' तूणी' के ६ नाम हैं । ५ राक्षसी, चण्डा, धनहरी (३ स्त्री), क्षेमः, दुष्पत्त्रः (+दुष्पुत्रः ), गणहासकः ( + गणः ! ३ पु ), 'चोरानामक गन्धद्रव्य के ६ नाम हैं। ६ व्याडायुधम् (+व्यालायुधम् ) व्वाघनखम् , करजम् , (४ न), 'व्याघ्रनखनामक गन्धद्रव्य' के ४ नाम हैं । ७ सुषिरा ( +शुषिरा ), विद्रुमलता, कपोतानिः, नटी, नली ( ५ स्त्री), मी० दी० मतसे 'मालकाँगनी' के ५ नाम हैं । ८ धमनी, अञ्जनकेशी, हनुः, हट्टविलासिनी ( ४ स्त्री), भा. दी० मतसे 'अञ्जनकेशी के ४ नाम हैं । वक्रकारकम् . * "तृणिः कच्छः" इति पाठान्तरम् ॥ "व्यालायुधम्" इति पाठान्तरम् ।। + "क्षेमदुष्पुत्रगणहासकाः" इति पाठान्तरम् ।। S"शुषिरा" इति पाठान्तरम् ॥

वनौषधिवर्गः ४ ] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १६१ १ शुक्तिः शङ्खः खुरः कोलदलं नखरमथाढको ॥ १३०॥ काक्षी मृत्स्ना तुवरिका मृत्तालकसुराष्ट्र जे । ३ कुटन्नट * दाशपुरं वानेयं परिपेलवम् ॥ १३१ ॥ प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्तीमुस्तकानि च । ४ ग्रन्थिपणे । शुकं बह पुष्पं स्थौणेयकुक्कुरे ॥१३२॥ ५ मरुन्माला तु पिशुना स्पृका देवी लता लघुः। १ शुक्तिः (स्त्री), शङ्कः, खुरः (३ पु), कोलदलम् , नखम् (+न. खी। २ न), भा० दी० मतसे 'नखनामक गन्धद्रव्य' के ५ नाम हैं । महे० मतसे 'सुषिरा,.......) ७ नाम 'मालकाङ्गिनी के और 'हनुः........११७ नाम 'नखनामक गन्धद्रव्य के हैं । २ आढकी, काक्षी, मृत्स्ना ( + मृत्सा ), तुवरिका (+तूचरिका । ४ स्त्री), मृत्तालकम् (+मृतालकम् ), सुराष्ट्रजम् (३ न), 'रहर, अर. इर के ६ नाम हैं। ३ कुटन्नटम् ( +पु न), दाशपुरम् ( + दशपुरम् , दशपूरम् ), वानेयर (+बन्यम् ), परिपेलवम् , प्लवम् , गोपुरम् , गोनईन् , कैवर्तीमुस्तका (+कैवर्तिमुस्तकम् , कैवर्तमुस्तकम् । ८ न ), 'छोटा नागरमोथा, कैवर्तीनु- स्तक, जलमोथा' के ७ नाम हैं। ४ ग्रन्थिपर्णम् , शुकम् , बहम् (+बर्हिः । +शुकबहम् ; क्षी० स्वा० )- पुष्पम् ( + बर्हपुष्पम् ), स्थौणेयम् , कुक्कुरम् ( ६ न ), "कुकुरौन्हा, गठि वन के ६ नाम हैं। ५ मरुन्माला, पिशुना, स्पृक्का ( + पृक्का ), देवी, लता, लघुः समुद्रा. "दशपुरम्" इति “दाशपूरम्" इति च पाठान्तरें ।। + "शुकं वहपुष्पम् , शुकबह पुष्पम् , शुकं बहिपुष्पम्' इति पाठान्तराणि ।। ये तु-"स्पृक्का तु ब्राह्मणी देवी मसन्माला लता लघुः । समुद्रान्तावधूः कोटिवर्षा लङ्कोपिका मरुत् ।। १ ।। मुनिर्माल्यवती माला मोहना कुटिला मता"। इति वाचस्पत्युक्त्याऽत्रापि 'मरुत्, माला' इति पृथङ् नामनी'त्याहुस्तचित्यम् । तथा सति त्वन्तत्वेन मरुच्छब्दस्यासंग्रहापत्तेरित्यवधेयम् ॥ 3 , अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- - ॥ समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोपिकेत्यपि ॥ १३३ ॥ १ तपस्विनी जटामांसी जटिला* लोमशा मिसी । २ त्वकपत्रमुत्कट भृङ्गं त्वचं चोचं वराङ्गकम् ॥ १३४ ॥ ३ कञ्जुरको द्राविडकः । काल्पको वेधमुख्यकः । ४ ओषध्या जातिमाने स्युपरजातौ सर्वमौषधम् ॥ १३५ ॥ ६ शाकाख्यं पत्त्रपुष्पादि ७ तण्डुलीयोऽल्पमारिषः । न्ता, वधूः (+बधुः ), काटिवर्षा, लङ्कोपिका (१० स्त्री), 'असवरग, स्पृका, अस्थरक एक तरहका शाक-विशेष के १० नाम हैं। १ तपस्विनी, जटामांसी, जटिला, लोमशा, मिसी (+मिसिः, मिषिः, मिपी, मसिः, मषिः, मषी, मसी, आमिषी। ५ स्त्री), 'जटामासी के ६ नाम हैं । २ त्वक्पत्त्रम् (+त्वक त्वच , पत्त्रम् ), उत्कटम् , भृङ्गम् , त्वचम् , चोचम् , , वराङ्गकम् (६ न ), 'दालचीनि' के ६ नाम ३ करकः ( +करकः ), द्राविडकः, काल्पकः (+काल्यकः ), वेध- मुख्यकः ( ४ पु ), 'कचूर' के ४ नाम हैं । ४ ओषधिः (स्त्री), 'जातिमात्र' अर्थात् 'बीहि (धान्य ), यव, चना आदि में प्रयुक्त होता है । ६ औषधम् ( न ), 'जातिले भिन्न' अर्थात् 'दवा आदिकों में प्रयुक्त होता है। ६ शाकम् (न), "साग' अर्थात् 'जिससे फल, फूल आदि ('जड़, शाखा, कन्द,..." ) का बोध हो, उसका १ नाम है । जड़ १, पत्ता २, अङ्कुर ३, अग्रभाग ४, फल ६, शाखा, ६ विरूढ ७, छाल ८, फूल, ९ और कवक १० ये दस प्रकारके 'शाक होते हैं । ७ तण्डुलीयः, अल्पमारिषः ( २ पु ), 'चौराईके साक के २ नाम है * "लोमशामिषी, लोमशा मिशी" इति पाठान्तरं॥ 1 "काल्यको वेधमुख्यकः" इति पाठान्तरम् ।। * “पत्त्रमूलादि" इति पाठान्तरम् ।। तदुक्तम्- "मूलपत्त्रकरीराग्रफलकाण्डाविरूढकम् । त्वरपुष्पं कवकं चैव शाकं दशविधं स्मृतम् ॥१॥ इति ॥

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । १ विशल्याग्निशिखानन्ता फलिनी शक्रपुष्पिका ॥ १३६ ॥ २ स्यावृक्षगन्धा छगलान्यावेगी वृद्धदारकः । जुङ्गो३ ब्राह्मी तु मत्स्याक्षी वयस्था सोमवल्लरी ॥ १३७ ॥ ४ पटुपर्णी हैमवती स्वर्णक्षीरी हिमावती। ५ हयपुच्छी तु काम्बोजी भाषपर्णी महासहा ॥ १३ ॥ ६। तुण्डिकेरी रक्तफला बिम्बिका पीलुपयेपि । १ विशल्या, अग्निशिखा, अनन्ता, फलिनी, शक्रपुष्पिका (५ स्त्री), 'अग्निशिखा, इन्द्रपुष्पी' के ५ नाम है। २ ऋक्षगन्धा ( + वृक्षगन्धा, ऋष्यगन्धा ), छगलान्त्री (+छगलागी, छगलाण्डी, छगलाजी, छगला, अन्त्री, ), आवेगी ( ३ स्त्री), वृद्धदारकः, जुङ्गः (२ पु), 'विधारा के ५ नाम है । ३ ब्राह्मी, मत्स्याक्षी, वयस्था, सोमवल्लरी (+सोमवल्लरिः । ४ स्त्री) 'ब्राह्मी के ४ नाम है। ४ पटुपर्णी, हैमवती, स्वर्णक्षीरी ( + स्वर्णवती), हिमावती ( ४ स्त्री), मकोय के ४ नाम है। ५ हयपुच्छी, काम्बोजी, माषपर्णी, महासहा (४ स्त्री , 'माषपर्णी, वनडरद् के ४ नाम है। ६ तुण्डिकेरी (+तुण्डकेरी, तुण्डिकेशी), रक्तफला, बिम्बिका, पोलुपर्णी ८ ४ स्त्री), 'कुनरुन' के ४ नाम हैं । तत्र १ मूलम्-मूलकविशादेः, २ पत्त्रम्-वास्तूकनिम्बादेः, ३ करीरम्-वंशाङकुरादः, ४ अनम्-वेत्रादेः, ५ फलम्-कूष्माण्डवार्ताक्यादेः, ६ काण्डम्-कमलादे लम् , ७ विरूढ- कम्- 'तालास्थिमज्जेति' गौड: क्षेत्रोग(धृ) तस्य फलमूलादेः सेकानवोद्भिन्नाकुरा विरुढा' इति क्षी० स्वा०; ८ त्वक्-मातुलुङ्गादेः, ९ पुष्पम्-तिन्तिडीकोविदारादेः, १० कवकम्- छत्वाकम् इति । केचित्त- "पत्त्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं संस्वेदजं तथा । शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरु विद्याद्यथोत्तरम्” ॥ १ ॥ इत्युक्तेः षड्विधं शकमामनन्ति । तत्र सस्वेदजं भूमिच्छत्रम् , अन्ये प्रागुक्ता बोध्याः ।। * "स्याद् वृक्षगन्धा, स्यादृष्यगन्धा' इति तत्रैव "छगलाण्ड्यावेगी" इति च पाठान्तराणि ॥ t "तुण्डकेरी" इति "तुण्डकेशी" इति च पाठान्तरे ।। ७ m अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- * १ बर्वरा कबरी तुङ्गी खरपुष्पाजगन्धिका ॥ १३ ॥ २ एलापर्णी तु लुवहा रास्ना युक्तरसा च सा । ३ चाङ्गेरी चुक्रिका दन्तशठाऽम्बष्ठाम्ललोणिका ॥ १४० ॥ ४ सहस्रवेधी चुकोऽम्ब्लवेतसः शतवेध्यपि । ६ नमस्कारो गण्डकारी समझा खदिरेत्यपि ॥ १४१ ॥ ६ जीवन्ती जीवनी जीवा जीवनीया || मधुस्त्रवा। ७ कूर्चशीर्षों मधुरकः शृङ्गह्रस्वाङ्गजीवकाः ॥ १४२ ॥ १ वर्वरा (+बर्बरा, वर्वरा), कवरी (+कबरी), तुङ्गी, खरपुष्पा, अजगन्धिका ( ५ स्त्री), 'पवई, बवईनामक शाकविशेष के ६ नाम है ॥ २ एलापर्णी, सुवहा, रास्ना, युक्तरसा ( ४ स्त्री), 'एलापर्णी के ४ नाम है। ३ चाङ्गेरी, चुक्रिका, दन्तशठा, अम्बष्ठा, अम्ब्ललोणिका ( अम्ललो. गिका, अम्ललोलिका । वी ), 'नोनी, चूक' (शाकविशेष ) के ५ नाम है। ४ सहस्रवेधी ( =सहस्त्रवेधिन् ), चुक्रः, अम्ब्लवेतसः ( + अम्लवेतसः ) शतवेधी ( =शतवेधिन् । ४ पु), 'ममलबेत? के ४ नाम है। ('चाङ्गेरी, आदि ९ शब्द एक पर्याय है यह भी किसी २ का मत है)। ६ नमस्कारी, गण्डकारी (+गण्डकाली), समङ्गा, खदिरा (+खदिरी। ४ स्त्री), 'लजालू, छुईमुई के ४ नाम है ॥ ६ जीवन्ती, जीवनी, जीवा, जीवनीया, मधुस्ववा (मधुः, स्त्रवा । ६ स्त्री), 'जीवन्ति' के ५ नाम है ॥ ७ कूर्चशीर्षः, मधुस्कः, शृङ्गः, हस्वाङ्गः, जीवकः ( ४ पु), 'जीवक' के ५ नाम है। (“जीवन्ती आदि १० शब्द एक पर्यायवाचक है, यह भी किसी २ का मत है।) * "बर्बरा कबरी इति पाठान्तरम् ।। "दन्तशठाम्बष्ठाम्ललोणिका" इति पाठान्तरम् ।। + "चुक्रोऽम्लवेतसः" इति पाठान्तरम् ।। "गण्डकाली समङ्गा खदिरीत्यपि" इति पाठान्तरम् ।। || "मधुः सवा" इति पाठान्तरम् ।।

वनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाण्याख्यासहितः। १ किराततिक्तो भूनिम्बोऽनार्यतितोऽथ सप्तला । * विमला सातला भूरिफेना चर्मकरेत्यपि ॥ १४३ ॥ ३ वायसाली स्वादुरसा वयस्था४थ मकूलकः । निकुम्भो दन्तिका प्रत्यक्श्रेण्युदुम्बरपर्ण्यपि ॥ १४४ ॥ ५ अजमोदा तूनगन्धा ब्रह्मदर्भा यवानिका । ६ मूले पुष्करकाश्मीरपदपत्राणि पौष्करे ॥ १४५ ॥ ७ अन्यथाऽतिचश पद्मा चारट पद्मवारिणी। १ किराततिक्तः (+चिरात्तिक्तः चिरतिक्तः चिरातिक्तः, किरातः, कैरातः), भूनिम्बः, अनार्यतिक्तः ( ३ पु), 'चिरायता के ३ नाम है ॥ २ सप्तला, विमला, सातला (+शातला ), भूरिफेना, चर्मकषा (६ स्त्री) 'सेहुंड' के ६ नाम है ॥ ३ वायसोलो, स्वादुरसा, वयस्था ( ३ स्त्री ), 'काकोली' के ३ नाम है । ४ मकूलकः (+मुकूलकः ), निकुम्भः (२ पु), दन्तिका (+दन्तिजा), प्रत्यक्श्रेणी, उदुम्बस्वर्णी (+ऊदुम्बरपर्णी, ऊडम्बवरपर्णी । ३ स्त्री), 'दन्तीनाम- क औषध' के ६ नाम है ।। ५ अजमोदा, उग्रगन्धा, ब्रह्मदर्भा; यवानिका ( + यमानिका । ४ स्त्री), 'मजमोदा इजवाईन' के ४ नाम है। ( "यद्यपि 'यवानिका' को पहले कह चुके हैं, तथापि शाकभेद में यहां पुनः कहते है" ) ॥ ६ पुष्करम् , काश्मीरम् , पद्मत्त्रम् ( + पद्मवर्णम् । ३ न ), 'पुष्कर मूल' के ३ नाम है। ७ अव्यथा, अतिचरा, पद्मा, चारटी, पद्मचारिणी (६ स्त्री), 'पद्मचारिणी' 'स्थलकमलिनी के ५ नाम है ॥ . "विमला शातला" इति पाठान्तरम् ।। | "मुकूलकः" इति पाठान्तरम् ॥ + “यमानिका" इति पाठान्तरम् , अत्र “यवानिका" पुनरुक्ताऽपि शाकभेदात्पुनरुक्ता, य- वानीति मत्वा ग्रन्थकृद्धान्तो वा" इति क्षी. स्वा० ।। पुष्करकाश्मीरपझपत्त्राणि' अत्र 'पद्मवणे त्यत्र 'पद्मपर्णति लिपिम्रान्त्या ग्रन्थकारः पनपत्रे त्याह" इति क्षी०स्वा०॥ १२॥० अमरकोषः। द्वितीयकाण्डे N ง १ * काम्पिल्यः कर्कशश्चन्द्रोरक्ताङ्गोरोचनीत्यपि । १४६॥ २ प्रपुन्नाडस्त्वेडगजो दद्रुनश्च उनश्चक्रमर्दकः । घमाट । उरणाख्यश्च ३ पलाण्डुस्तु नुकन्दकः ॥ १४७॥ ४ लतार्कदुद्रुमौ तत्र हरितेऽथ महौषधम् । लशुनं जनारिष्टमहाकन्द्रलोनकाः ॥ १४ ॥ १ पुनर्नवा तु शोथनी वितुन्नं सुनिषण्णकम् । १ काम्पिल्यः ( + काम्पिल्लः ), कर्कशः, चन्द्रः, रक्ताङ्गः ( ४ ) रोचनी (+रेचनी । स्त्री), 'कबीला' के ५ नाम है ॥ २ प्रपुन्नाडः (+प्रपुन्नालः, प्रपुनाला, प्रानाडः, प्रपुन्नडः ), एडगज: ( + एलगजः), दद्रुघ्नः ( + दद्रूटनः, दुद्रुहरः ), चक्रमर्दकः, पद्माटः उरणाख्यः ('उरण' अर्थात् मेषके वाचक सब नाम । + उरणाक्षः ।६ पु), 'चकवढ' के ६ नाम है ॥ ३ पलाण्डः, सुकन्दकः ( २ पु), 'प्याज के २ नाम है ॥ ४ लतार्कः, दुद्रुमः ( २ पु ), 'हरे प्याज के २ नाम हैं। (धन्वन्तरी ने इन दोनोंको पलाण्डु (प्याज ) से अभिन्न माना है") ॥ ५ महौषधम् , , लशुनम् (+लशूनम् । + पु। २ न), गृञ्जनः, अरिष्टः, महाकन्दः, सोनकः ( ४ पु), 'लहसुन के ६ नाम है। ("सुश्रुतकारने इन्हें भी पलाण्डु (प्याज ) को जाति मानी है ॥ ६ पुनर्नवा शोथध्नी ( २ स्त्री), 'गदहपुर्ना' के २ नाम है ॥ ७ वितुन्नम् , सुविषण्णकम (२ न ). 'खपरिया' के २ नाम है। * काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रेचनीत्यपि" इति पाठान्तरम् ॥ "उरणाक्षश्च' इति पाठान्तरम् ॥ तथा चोक्तं धन्वन्तरिणा- "पलाण्डुम(योवनेष्टश्च मुकुन्दो मुखदूषकः । हरिणोऽन्यपलाण्डुस्तु लताको दुद्रुमश्च सः१॥ इति क्षी० स्वा० ॥ S तदाह सुश्रुते- "लशुनो दर्धपत्त्रश्च प्रिच्छगन्धो महौषधम् । फरणश्च पलाण्डुश्च लवतर्कोऽपराजितः॥१॥ गृञ्जनं यवनेष्टश्च पलाण्डोदेश जातयः" । इति क्षी० स्वा० ॥ 6 . अनौषधिवर्ग: ४] मणिप्रभाव्याख्यालाहतः। १ स्याद्वातकः * शीतलेोऽपराजिता शणपर्ण्यपि ॥ १४६॥ २ परावताधिः कटभी पण्या ज्योतिष्मती लता। ३ वार्षिक त्रायमाणा स्यात्त्रायन्तो बलभद्रिका ॥ १५० ॥ ४ विष्वक्लेनप्रिया । गृष्टिाराही दरेत्यपि । ५ मार्कवो भृङ्गराजःस्थात् ६ काकमाची तु वायली ॥ १५१ ॥ ७ शतपुष्पा सितच्छनातिच्छुत्रा मधुरा सिलिः। अवाक्पुष्पी कोरवी च = सरणा तु प्रसारिणी ॥ १५२॥ तस्यां कटम्भरा राजबला भद्रबलेत्यादि । १ वातकः, शीतलः (+शीतलवातकः, धन्व० । २ पु), अपराजिता, शण- पर्णी ( + सनपर्णी, असनपर्णी, आसनपर्णी । २ स्त्री), ‘पटुमा, “पटसन' के ४ नाम हैं। २ पारावताघ्रिः ( + पारावताज़ो), कटनी, पण्या, ज्योतिष्मती (+ज्योतिष्का ), लता ( ५ स्त्री), 'मालकांगनी' के ६ नाम हैं । ३ वार्षिकम् (न), श्रायमाणा, त्रायन्ती, बलभद्रिका ( ३ स्त्री)'त्रायः माणा के ४ नाम हैं॥ ४ विष्वक्लेनप्रिया, गृष्टिः (+घृष्टिः), वाराही, बदरा (४ स्त्री), "बिलाई कन्द के ४ नाम हैं । ९ मार्कवा, भृङ्गाराजः (+भृङ्गरजाः,= सूरजस्, भृङ्गरजः=भृङ्गरज । २ पु), ओंगराज' के २ नाम हैं । ६ काकमाची (+काचमाची), वायसी ( २ स्त्री), 'मकोय, काक- प्रिया के २ नाम है ॥ ७ शतपुष्पा, शितच्छत्त्रा, अतिच्छत्ता, मधुरा, मिसिः (+मिसी), अवाक्पुष्पी, कारवी ( ७ स्त्री), 'सौंफ के ७ नाम है । ( "अन्तवाले २ नाम ॐधावलि के हैं, यह भी किसीका मत हैं" ) । ८ सरणा ( +सरणी), प्रसारिणी, कटम्भरा ( + कटम्बरा), राजबला, भद्रबला ( ९ स्त्री), 'आकाशाबेल (बंवर ) के ६ नाम है। "शीतलोऽपराजिताऽशनपण्यपि" इति पाठान्तरम् ॥ + “घृष्टिबाराही बदरेत्यपि” इति पाठान्तरन् । "सरणी" इति तु यक्तः पाठः" इति क्षी० स्वा०॥ * .

१६८ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे--- or चतुकृञ्चक्रवर्तिनी - जनी जतूका रजनी ॥ १५३॥ संस्पर्शास्थ शटी गन्धमूली षड्ग्रन्थिकेत्यपि । करोऽपि पलाशोऽथ कारवेल्लः | कठिल्लकः ॥ १५३ ।। सुषवी चाथ ४ कुलकं पटोलस्तिक्तकः पटुः ५ कूष्माण्डकस्तु कारुरुर्वारुः कर्कटी स्त्रियौ ॥ १५५ ॥ ७ इक्ष्वाकुः कटुतुम्बी स्यात् तुम्ब्यलाबूरुभे समे । १ जनी (+जनिः ), जतूका (+जतुका), रजनी (+जननी), जतुकृत् , चक्रवतिनी, संस्पर्शा ( ६ स्त्री), 'चकवत' के ६ नाम हैं ॥ २ शटी, गन्धमूली (+गन्धमूला ), षड्ग्रन्थिका (३ स्त्री), कचूरः (+कबुरः, क—रः), पलाशः ( २ पु ), 'आमाहल्दी के ५ नाम है ॥ ३ काखेल्ला, कठिल्लकः ( + कटिल्लकः । २ पु), सुषवी ( + सुसवी, सुशवी । स्त्री), 'करला के ३ नाम है ॥ ४ कुलकम् (न), पटोलः, तिक्तकः, पटुः (३ पु), 'परवल' के ४ नाम है। ५ कूष्माण्डकः (+कुष्माण्डकः ), कर्कारः (२ पु), 'तरकारी वला कोहड़ा' के २ नाम है ॥ ६ उर्वारुः ( + ईवारुः, इर्वारु:, ईवालुः, एर्वारुः ), कर्कटी ( + कर्कटिः । २ स्त्री) 'ककड़ी कांकर' के २ नाम है ॥ * इक्ष्वाकुः, कटुतुम्बी (२ स्त्री), 'तितलौकी, तीता कद ३ नाम है ॥ ८ तुम्बी ( + तुम्बिः, तुम्बा, तुम्बः), अलाबूः, ( + आलाबूः, आलाबुः, अलाम्बुः, लाबुः, लाबू:, लाबुका । २ स्त्री ), 'कद्दू लोको' के २ नाम हैं । , . .. * "जननी" इति पाठान्तरम् ॥ + "कटिल्लकः" इति पाठान्तरम् ।। "कारुरेर्वारुः" इति "कर्कारुरीरुः" इति च पाठान्तरे। 'एारुः कटुचिर्भटी, 'उर्वा. रुकमिव बन्धनात्' इति श्रुतेः 'उर्वारुक स्वादुचिर्भटोमाहुः" इति क्षी० स्वा० ॥ तद्भेदानाह बृहस्पतिः- "अलाबूः स्त्री पिण्डफला तुम्बिस्तुम्बी महाफला। तुम्बा तु वर्तुलाऽलाबूनिम्बे तुम्बी तु लाबुका" ॥१॥ इति ॥

वनौषधिवर्गः ४ ] मणिप्रभाच्याख्यासहितः। १६६ سع १ चित्रा गवाक्षी गोडुम्बार विशाला विन्द्रवारुणो ॥ १५६ ॥ ३ अर्शोधनः * सूरणः कन्दो ४ गण्डीरस्तु समष्ठिला । ५ कलम्ब्युपोदिकाऽस्त्री तु मूलकं हिलमोचिका ॥ १५७ ।। वास्तुकं शाकभेदाः स्युर्दूर्वा तु शतपर्विका । सहस्रवीर्याभार्गव्यौ रुहाऽनन्ताऽथ सा सिता ॥ १५ ॥ गोलोमी शतवीर्या च गण्डालो शकुलाक्षका । १ चित्रा, गवाक्षी, गोडुम्बा ( ३ स्त्री ), 'जेठुई काँकर' के ३ नाम हैं । २ विशाला, इन्द्रवारुणी ( २ स्त्री), 'इनारुन' के २ नाम हैं । अशोघ्नः, सूरणः ( + शूरणः ), कन्दः (३ पु), 'मोल, सूरन के ३ नाम है। ४ गण्डीरः (पु), समष्ठिला (स्त्री), 'गांडरनामक शाक-विशेष' के २ नाम है। ५ कलम्बी, उपोदिका ( + उपोदका, अपोदका ), मूलकम् , ( न पु), हि. लमोचिका, वास्तुकम् (+ वास्तूकम् । न । शेष स्त्री ), 'करमी या करमुमाँ, पोई, मूला या मुरई, हिलसा और बथुआके साग' का क्रमशः १-१ नाम है । ( "यहां तक शाकम्भेदका वर्णन है" ) ॥ ६ दूर्वा, शतपर्विका, सहस्त्र वीर्या, भार्गवी, रुहा, अनन्ता (६ स्त्रो), 'दूब' के ६ नाम है। ७ गोलोमी, शतवीर्या गण्डाली, शशुलाक्षका ( + पु। ४ स्त्री, ), 'सपेद दूब' के ४ नाम है यह भा० दी० का मत है। (प्रथम दो नाम उक्कार्थक और अन्तवाले दो नाम 'दुबके भेद-विशेष' के हैं यह क्षी० स्वी० का मत है" ) ॥ "शूरणः" इति पाठान्तरम् ।। "कलम्ब्युपोदका' इति भा० दी० पाठः, "कलम्व्यपोदका” इति क्षी० स्वा० पाठः, मूल- स्थस्तु महे० सम्मत इत्यवधेयम् ॥ * "वास्तूकन्” इति पाठान्तरम् अत्र निर्णयसागरीय व्या० सु० पुस्तक 'वास्तुकम्' इति मूलपाठश्चिन्त्यस्तत्र "उलू कादयश्च" ( उ० सू० ४।४१) इति 'वास्तूक शब्दस्य सिद्ध्युक्तेः, पुनह्रस्वमध्यस्य 'वास्तुक' शब्दस्य प्रकारान्तरेण सिद्ध्युक्तेश्च स्वोक्तिविरोधात् ॥ "शकुलाक्षकः" इति पाठान्तरम् ।। । . .

१७० अमरकोषः। द्वितीयकाण्डे- १ कुरुविन्दो मेघलामा मुस्ता मुस्तकमस्त्रियाम् ॥ १५९ ॥ २ स्याद्भद्रमुस्तको गुन्द्रा ३ चूडाला चक्रलोच्चटा। ४ वंशे त्वत्सारकर्मारत्वचिसारतृणध्वजाः ॥ १६॥ शतपर्वा यवफलो वेणुमस्करतेजनाः। ५ वेणवः कीचकास्ते स्युये स्वनन्त्यनिलोद्धताः॥१६१ ।। ६ ग्रन्थिनी पर्व परुषी ७ गुन्द्रस्तेजनकः शरः। = नडस्तु धमनः पोटगलोहऽथो काशमस्त्रियाम् ॥ १६२ ॥ इक्षुगन्धा पोटगला- १ कुरुविन्दः मेघनामा (= मेघनामन् । + मेघके वाचक सब नाम । २ पु), मुस्ता (स्त्री), मुस्तकम् (न पु), 'मोथा' के ४ नाम है । २ भद्मुस्तकः (पु। + भद्रम् , मुस्तकम् , ३ न ), गुन्द्रा (स्त्री) नागरमोथा के ३ नाम है । ("धन्वन्तरिने गुन्द्रा और भद्रमुस्तक' में अभेद* माना है") ३ चूडाला, चक्रला, उच्चटा ( ३ स्त्री), 'चुडाला, एक प्रकारके मोथा घास के ३ नाम है। ४ वंशः, त्वक्लारः कर्माः, त्वचिसारः, तृष्णध्वजा, शतपर्वा (= शतपर्वन् ) यवफलः, वेणुः, मरू करः, तेजनः (१० पु ), 'बांस के १० नाम है ॥ ६ कीचकः (पु), छिद्र में हवाके प्रवेश करने पर बजनेवाले बांस' का १ नाम है । ६ ग्रन्थिः (पु), पर्व ( पर्वन् ), परुः (=परुष । + परु= परुः । २ स्त्री न ), बांस आदिके गांठ या पोर' के ३ नाम हैं । ७ गुन्द्रः, तेजनकः, शरः (+सरः। ३ पु), 'सरकण्डा,सरई के ३ नाम हैं। ८ नडः ( + नलः), धमनः, पोटगलः (३ पु ), 'नरसल, नरकट, नरई के ३ नाम हैं। ९ काशः (+कासः । पुन ), क्षुगन्धा (स्त्री), पोटगल: (पु), 'काशनामक तृण-विशेष के 3 नान हैं । धन्वन्तरिरभेदमाह-"मुस्तमम्बुधरो मेघो धनो राजकशेरुकः भद्रमुस्तो वराहोऽब्दो गाङ्गेयः कुरुविन्दकः" ॥१॥ इति क्षी० स्वा०॥

शैलवर्ग: ३] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ पुंसि भूम्नि तु बल्बजाः । २ रलाल इक्षु३स्तभेदाः पुण्डूकान्तारकादयः॥ १६३ ।। ४ स्याद्वीरणं वीरतरं ५ मुलेऽस्योशीरमस्त्रियाम् । अभयं नलदं सेव्यममृणाल जलाशयम् ॥ १६४ ।। लामज्जकं * लघुलयमबदाहेष्टकापथे। ६ नडादयस्तृणं गर्नुच्छयासाकप्रमुखा अपि ॥ १५ ॥ १ बल्बजाः (पु नित्य ब० ३० । +६० व० *) 'बगई' का १ नाम है। (काश:,..." ४ नाम एकार्थक है यह भी किसीका मत है" ) ॥ २ रसालः, इक्षुः ( २ पु ), 'ईख, गन्ना, ऊख' के २ नाम है । ३ पुण्ड्रः, ( + पौण्ड्रः ), कान्तारकः ( २ पु ), आदि ( "आदि शब्दले 'एमाला, कर्कटकः ( २ पु ). "का संग्रह है" ) ये 'ऊरके भेद-विशेष हैं। ४ वीरणम् , वीरतरम् ( २ न ), 'गाँडर घास के २ नाम है ("इसीके जड़को 'खश' कहते हैं। ९ उशीरम् (न पु), अभयम् , नलदम् , सेव्यम् , अमृणालम् ( + मृणा- लम्), जलाशयम् , लामज्जकम् , लघुलयन् (+लघु, लयम), अवदाहर इष्टकापयाम् (+अवदाहेष्टम् , कापथन् । १ न ) लश' के १० नाम हैं। ६ नड' आदि और मसुत् , ज्यामकः ( + श्यामकः । २ पु), अर्थात् क्रमशः 'एक तृण-विशेष और सांवा' और 'प्रमुख शब्द से नीवारः, कोद्रवः ( २ पु), अर्थात क्रमशः 'तेनी या तीन और कोदो ये तृणधान्या हैं । "लधु लयमवदाहेष्टकापथे” इति । इष्टकापथेत्यत्र ''ग्रन्थकृत्तु सेव्यामृणालयोनलदोशीरैका- थत्वाद्धान्ताः” इति क्षी० स्वा०॥ । "एको वल्वज" इति पातञ्जलमहाभाष्योक्तेरित्यवधेयन् । + इक्षुमेदा यथा-'इत्तुः कर्कटको वंशः कान्तारो वेणुनिः सृतः । इतुरन्यः पौण्डकश्च रसालः सुकुमारकः ॥ १ ॥ अन्यः करङ्कशालिः स्यादिक्षुयोनीचबालिका । तथान्य इक्षुगन्धा स्यादिक्षुलः कोकिला नकः ॥ २ ॥ इति । निघण्टौ त्वन्य एवेक्षुभेदा उक्तास्ते यथा- "पौण्डूको भीरुकश्चापि वंशकः शतपोरकः । कान्तारस्तापसेतुश्च काण्डेतुः सूचिपत्रकः ॥ १॥ नैपालो दीर्घपत्रश्च नोलपोरोऽथ कोशकः । इत्येता जातयस्तेषां कथयामि गुणानपि ॥२॥ इति ।। - , - अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्ड- १ अस्त्री कुशं कुथो दर्भः पवित्ररमथ कत्तृणम् । पौरसौगन्धिकध्यामदेवजम्धकरौहिषम् ॥ १६६ ॥ ३ छत्रातिच्छन्नपालनौ ४ मालातृणकभूस्तृणे । ५ शष्पं चालतृणं घाला यवसं तृणमर्जुनम् ॥ १६७ ॥ ७ तृणानां संहतिस्तृण्या ८ नड्या तु नडसंहतिः। 8 तृणराजाह्वयस्ताला १० नालिकेरस्तु लागली ॥ १६८ ॥ ११ घण्टा तु पूगः क्रमुको गुवाकः स्वपुरो१२ऽस्य तु । फलमुद्वेगम्- १ कुशम् (पुन), कुथः, दर्भः (२ पु), पवित्रम् (न), 'कुशा के ४ नाम हैं । २ कत्तणम् , पौरम् , सौगन्धिकम् , ध्यामम् , देवजग्धकम् , रौहिपम् (६ न ), 'रोहिषनामक सुगन्धित घास' के ६ नाम है । ३ छत्त्रा (स्त्री). अतिच्छत्त्रः, पालनः (२ पु), 'पानीमें होनेवाले तृणु-विशेष के ३ नाम हैं। ४ मालातृणकम् , भूस्तृणम् (२), 'बचके समान रूप तथा पानी में होनेवाले तृण-विशेष के २ नाम हैं। (यह भा० दी० का मत है । महे० और क्षी० स्वा०के मतसे 'छत्रा""भूस्तृण' ६ शब्द एकार्थफ हैं")॥ ५ शष्पम् ( + शस्यम् ), बालतृणम् (२ न ), 'नई और कोमल घास के २ नाम है ॥ ६ घासः ( ), यवसम् (न), 'गवत' अर्थात् 'बैल, घोड़ा, आदि पशुओंके खाने योग्य भूसा घास' के २ नाम है । ७ तृणम् , अर्जुनम् ( २ न), 'तृणमात्र' के २ नाम हैं। ८ तण्या (स्त्री) 'घासकी ढेरी' का १ नाम है ।। ९ तृणराजः, तालः ( + तलः । २ पु ), 'ताड़ के २ नाम हैं । १० नालिकेरः ( +नारिकरः, नारिकेलः, नाडिकेरः, नारोकेलः, ४ पु०, नारिकेलिः, नारीकेली, २ स्त्री), लाङ्गालो ( = लागलिन् । +लाङ्गली लागली, स्त्री। २ पु), 'नारियल के २ नाम हैं। ११ घोण्टा (स्त्री), पूगः, क्रमुकः, गुवाकः (+गूवाकः ), खपुरः (४ पु), 'सुपारी, कसैलीके पेड़ के ५ नाम हैं । १२ उद्वेगम् (न), 'सुपारीके फल' का १ नाम है ।

सिंहादिवर्गः ५] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । २ एते च हिन्तालसहितात्रयः ॥ १६६ ।। खजूरः केतकी ताली खजुरी च तृणद्रुमाः। इति वनौषधिवर्गः ॥४॥ ५. अथ सिंहादिवर्गः। २ सिंहो मृगेन्द्रः पञ्चास्यो हर्यक्षः केसरी हरिः । ३ 'कण्ठीरवो मृगरिपुर्मुगदृष्टिमंगाशनः' (८) पुण्डरीकः पञ्चनखचित्रकायमृगद्विषः' (8) ४ शार्दूलद्वीपिनौ व्याने ५ तरक्षुस्तु मृगादनः ॥ १॥ ६ वराहः सूकरोघृष्टिः कोलः पोत्री *किरिः किटिः । १ हिन्ताल: (पु) के साहत पूर्वाक्त तीन शब्द (नारिकेल आदि), और खजूरः (१), केतकी, ताली, खजूरी (३ स्त्री) को तृणद्रुमः (पु), सर्थात् 'तृणद्रम' कहते हैं । इति चनौपधिवर्गः ॥ ४ ॥ . ५. अथ सिंहादिवर्गः। २ सिंहः, मृगेन्द्रः, पञ्चास्यः, हर्यक्षः, केसरी ( = केसरिन् । + केशरी केशरिन् ), हरिः ( ६ पु), 'सिंह' के ६ नाम हैं ॥ ३ [कण्ठीरवः, मृगरिपुः, मृगदृष्टिः, मृगाशनः, पुण्डरीकः, चित्रकाय:, मृगहिट ( = मृगद्विप । ७ पु) 'सिंह' क " नाम हैं ] ॥ ४ शार्दूलः, द्वीपी ( = द्वीपिन् ), व्याघ्रः (३ पु ), 'बाघ' के ३ नाम हैं। ५ तरक्षुः ( + तरक्षः ), मृगादनः ( २ पु ), 'चिता या तेंदुआ बाघ' के २ नाम हैं ( "मुकु० मतसे 'वृक' अर्थात् 'हूंडार' के ये २ नाम हैं")॥ ६ वराहः, सूकरः ( + शूकरः ), घृष्टिः (+गृष्टिः), कोलः, पोत्री (=पो- त्रिन् ), किरिः ( + किरः ), किटिः, दंष्ट्री ( = दंष्ट्रिन ), घोणी (=घोणिन् ) * "किरः क्रिटिः" इति पाठान्तरम् ।

अमरकोषः [द्वितीयकाह.. . क वनौकाः ( ७ , दंष्ट्री घोणी स्तब्धरोमा कोडो भूदार इत्यपि ॥ २६] ३ कपिलवगशाखामुगवलीनुखाः । मर्कटो धानरः झीशा बलौका अथ २ मल्लुके ॥ ३ ॥ ऋक्षाच्छमलमलूका ३ गण्ड के खगखङ्गिनौ । लुलायो महिषो बाहवियत्कालरलैरिभाः ॥ ४॥ स्त्रियां शिवा भूरिमायगोलायुमृगधूर्तकाः । शृगालवञ्चककोच्नुफेरुफेरबजम्बुकाः ॥५॥ ६ श्रोतुर्बिडालो मार्जारो वृषदंशक आरनुभुक् । त्रयो गौधारगौधेरगौधेया गोधिहात्मजे ॥६॥ स्तब्धरोमा (=स्तब्धरोमन् ), काड़ा, भूदारः (१० पु), 'सूभर' के १२ नाम है'। १ कपिः, प्लवङ्गः (+ प्लवङ्गमः), पलवगः, शाखामृगः, वलीमुखः (+बली. मुखः, बलिमुखः ), मर्कटः, वानरः, कीशः, = वनौकरम् । ९ पु) 'बन्द' के ९ नाम हैं। २ भल्लुकः, ऋक्षः, अच्छमल्लः (+अच्छः, भल्लः), मल्टकः (+भाल्लुकः, भालुकः, भालूकः । ४ पु), मालू' के ४ नाम ३ गण्डकः, खड्ग, खड्गी ( = खगिन् । ३ पु ), गेंडा' के ३ नाम हैं । ४ लुलायः (+लुलापः ), महिषः, वाहद्विपत ( + वाहविट् = वाहद्विप ), कासारः, सैरिभः (५ पु), 'भंसा' के ६ नाम हैं । ६ शिवा (नि० स्त्री), मुरिमायः , गोमायुः , मृगधूतकः , गालः (+सुगालः), बञ्चक: (+वञ्चकः ), क्रोष्टा ( = क्रोष्टु ), फेरः, फेरवः (+फेरण्डः ), जम्बुकः (+जम्बूकः । ९ पु), स्यार, सृगाल' के १० नाम हैं। ६ आतुः, विडालः ( + बिडालः, विलालः), मार्जारः, वृपदंशकः, आ. भुक् ( + आखुभुज । ५ पु), 'बिलार के ५ नाम हैं । ७ गौधारः, गौधेरः, गौधेयः ( ३ पु ), 'गोहरा, चन्दनगोह' अर्थात् 'काले सांपसे गोहमें पैदा होनेवाला जीवविशेपश्या 'विसखपगा के ३ नामहे ।। "ऋक्षाच्छभल्लभालूका" " इति पाठान्तरम् ॥ | "लुलापो मा५:" इति पाठान्तरम् ।। + "सृगालो वञ्चकः क्रोष्टफेरुफेरवजम्बुकाः" इति पाठान्तरम् ॥

सिंहादिवर्ग:६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १७५ १ श्वाविचु शल्य रस्तल्लोनि शलली शललं शलम् । ३ वातप्रमीतिमृगः ४ * कोकस्त्वीहायगो वृकः ॥ ७॥ ५ मृगे कुरङ्गवातायुहरिणाजिनयोनयः । ६ ऐगय मेण्याश्चर्माद्यमेणस्लैणमुभे त्रिषु ॥ ८ ॥ = कदली कन्दली चीनश्चमुरुप्रियकावपि । समुरुश्चेति हरिणा अमी अजिनयोलयः॥६॥ १ श्वावित् ( बाविध ), शल्यः (२ पु), 'साही' के २ नाम हैं । २ शलली (स्त्री), 'साहीके कांटे' का १ नाम है ।। ३ वातप्रमीः ( + स्त्री), वातमृगः ( २ पु ), 'बहुत तेज दौड़नेवाले मृग-विशेष' के २ नाम हैं। ४ कोकः, ईहामृगः, वृकः ( ३ पु ), भैडिया हुंडार' के ३ नाम हैं । ६ मृगः, कुरङ्गः, वातायुः (+वानायुः, क्षी० हवा, बनायुः), हरिणः, अजिनयोनिः ( ५ पु ), 'मृग, हरिण' के ५ नाम हैं ६ ऐणेयम् (त्रि), 'मृगके चाम, सींग आदि' का १ नाम ७ एणम् (त्रि ), 'मृगके चमड़े, सींग, हड्डो श्रादि' का १ नाम है ॥ ८ कदली, कन्दली ( ४ स्त्री। क्षी० स्वा० मतसे कदली+कदलिन् , कन्दलीकन्दलिन ; २ पु), चीनः, चमूह, प्रियकः समूहः (४ पु), 'मृग-विशेष के ६ नाम हैं । ९ 'कदली आदि ६ शब्द और आगे कहेजानेवाले 'कृष्णसार' आदिको अजिनयोनिः (पु) अजिनयोनि' कहते हैं। ("इनके चमड़ेका उपयोग होता है)। * "कोक ईहामृगो वृकः” इति पाठान्तरम् ॥ i"--कदलो हरिणान्तरे। रम्भायां वैजयन्त्यां च ( अने० सं० २६३३-६६४) इति "शिरोऽस्थनि कन्दलन्तु नवाङ्कुरे करध्वनौ । उपरागे मृगभेदे कलापे कन्दली द्रुमे ॥१॥ (अने० सं० २६३१) इति च त्रिस्वरलान्तवर्गे हेमचन्द्रोक्तेः, "कन्दलं त्रिषु कालेऽप्युपरागे नवाङ्कुरे । कलध्वनी कन्दली तु मृगगुल्मप्रभेदयोः ॥ १॥ कदला कदलौ पृश्न्यां कदली कदलौ पुनः।

अमरकोषः । १७६ [द्वितीयकाण्डे- १ * कृष्णसाररुरुन्यकुरङ्कुशम्बररौहिषाः । गोकर्ण पृषतैयरोहिताश्चमरो मृगाः ॥ १० ॥ २ गन्धर्वः शरभो रामः समरो गवयः शशः । ३ इत्यादयो मृगेन्द्राद्याः गवाद्याः पशुजातयः ॥ ११ ॥ ४ 'अधोगन्ता तु खनको वृकः पुंध्वज उन्दुर' (१०) ५ उन्दरुषकोऽप्याखुगिरिका बालमूषिका । ७। 'छुछुन्दरी गन्धमुखी दीर्घतुण्डी दिवाधिका' (११) १ कृष्णसारः (+कृष्णशारः), रुरुः, न्यः, रकुः, शम्बरः ( + संवरः, शंवरः), रौहिषः ( + रोहिपः ), गोकर्णः, पृषतः, एणः ऋश्यः, ( +ऋष्यः ), रोहितः ( + लोहितः ), चमरः (१२ पु ), ये १२ 'मृगके भेद' हैं । २ गन्धर्वः (+गन्धर्बः , शरमः, रामः, समरः, गवयः शशः (६), क्रमशः 'गन्धयुक्त मृगविशेष, लड़ीसरा या एक प्रकार का बन्दर विशेष, सुन्दरजातीय मृग-विशेष, बहुत भागनेवाला मृग-विशेष, नीलगाय और खरहा' का १-१ नाम है ॥ ३ ये छ (पूर्वोक्त 'मृगेन्द्र' आदि) और वक्ष्यमाण ( आगे कहे जानेवाले ) गो, महिष' आदि पशुजातिः (स्त्री), 'पशुजाति: है अर्थात् इनकी पशुजातिमें गणना होती है । ४ [ अधोगन्ता (= अधोगन्तृ ), खनका, वृकः, पुंध्वजः, उन्दुरः (६ पु) 'चूहा, मूसा' के ६ नाम हैं। ६ उन्दुरुः, भूषकः (मुपकः ), आखुः (३ पु ), 'चूहा, मूला' के ३ नाम हैं। ६ गिरिका, बालमूपिका (२ स्त्री), 'मुसली, छोटी चुहिया' के २ नाम हैं। ७ [ छुछुन्दरी, गन्धमुखी, दीर्घतुण्डी, दिवान्धिका (४ स्त्री), 'छुछुन्दर' के ४ नाम हैं ॥ रम्भावृक्षोऽथ कदली पताकामृगमेदयोः ॥२॥(में० पृ० १७२ श्लो०६९-७१) इति लान्तवर्गे मेदिन्युक्तेश्च विरुद्धमेतत् ॥ * "कृष्णशाररुरुन्यकुरङ्कुसंवररौहिषाः" इति पाठान्तरम् ॥ 1"छुछुन्दरी "दिवान्धिका" इत्यंश क्षी० स्वा० व्याख्यायां समुपलभ्यते ॥ . Maniawanslation animwearianiserterwitte सिंहादिवर्ग:५] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १७७ - १ सरटः कृकलासः स्यात् २ मुसली * गृहगोधिका ॥ १२ ॥ ३ लूता स्त्री तन्तुवायोर्णनाभमर्कटकाः समाः । ४ नीलगुस्तु कृमिः ५ कर्णजलौकाः शतपद्युभे॥ १३ ॥ ६ वृश्चिकः शूककोटः स्याऽदलिद्रणौ तु वृश्चिके । ८६ पारावतः कलरवः कपोतोऽथ शशादनः ॥ १४ ॥ पत्त्री श्येन:- १ सस्टः, कलास: (+कृकलाशः, कृकुलासः । २ पु), 'गिगिट के २ नाम २ मुसली ( + मुशली), गृहगोधिका (+-गृहगोलिका । २ स्त्री), 'बिछुतिआ, छिपकली' के २ नाम हैं ॥ ३ लूता (स्त्री), तन्तुवायः ( + तन्त्रवायः ), ऊर्णनाभा, मर्कटकः ( ३ पु), 'मकड़ा' के ४ नाम है ॥ ४ नीलगुः (+नीलामुः ), कृमिः ( + क्रिमिः । २ पु ), 'छोटे २ कीड़ों के २ नाम हैं। ५ कर्णजलौकाः ( = कर्णजलौकस् । कर्णजलौका = कर्णजलौका ), शतपदी ( २ स्त्री), 'गोजर, कनखजुरा' के २ नाम है। ( "यह वृश्चिकका भेद है") ॥ ६ वृश्चिकः, शूककीटः (२ पु), 'ऊनी वस्त्रको काटने वाले कीड़े। , के २ नाम हैं ७ अलि: (+आलिः, आली ), गुणः (+ द्रोणः ), वृश्किः ( ३ पु); 'बिच्छू के ३ नाम हैं। ८ पारावतः ( + पारापतः ), कलरवः, कपोत: ( ३ पु), 'कबूतर' के ३ नाम हैं । ( "क्षी० स्वा० मतसे 'प्रथम नामा 'घरेलू कबूतर' के और अन्य २ नाम 'जङ्गली कबूतर' के हैं" ) ॥ ९ शशादनः, पत्त्री (=पत्निन् ), श्येनः (३ पु), 'बाज' के ३ नाम है। "गृहगोलिका" इति सभ्यः पाठ' इति क्षी० स्वा०॥ तन्त्रवायोर्णनाभमर्कटकाः" इति पाठान्तरम् । * "नीलामुस्तु क्रिमिः कर्णजलौका शतपद्युभे” इति पाठान्तरम् ।। 8 "पारापतः" इति पाठान्तरम् ।।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ १ उलूकस्तु वायसारातिषेचकौ । २ 'दिवान्धः कौशिको घूको दिवाभीतो निशाटन (१२ ) ३ व्याघ्राटः स्याद्भरद्वाजः४ खञ्जरीटस्तु खञ्जनः॥१५॥ ५ लहपृष्टस्तु कङ्कः स्यादथ चापः किकीदिविः । ७ कलिङ्गभृङ्गधूल्यादा ८ अथ स्थाच्छतपत्रकः ॥ १६ ॥ दार्चाघाटोहऽथ * सारङ्गस्तोककश्चातकः समाः । १० ककवाकुस्ताम्रचूड कुक्कुटश्चरणायुधः॥ १७ ॥ ११ चटका कलविङ्क: स्यात् १२ तस्य स्त्री चटका १३ तयोः । पुमपत्ये चाटकैर:- १ उलूका, वायसारातिः, पेचकः ( ३ पु), 'उल्लू' के ३ नाम हैं। २ [ दिवान्धः, कौशिकः, धूकः, दिवाभीतः, निशाटनः (५ पु ), 'उल्लू के ६ नाम हैं ]॥ ३ व्याघ्राटः भरद्वाजः (२ पु), 'शार्दूल, भारद्वाज पक्षी' के २ नाम ४ खरीटः, खञ्जनः (२ पु), 'खंडरिच पक्षी' के २ नाम हैं । ५ लोइपृष्टः, कङ्कः ( २ पु) 'सपेद चील' अर्थात् 'कङ्कहड़ा पक्षी, जिसके पंखको बाणमें लगाते हैं उसके २ नाम हैं । ६ चापः (+ चासः), किकीदिविः ( + किकीदिविः किकिदिविः किकिदि- वा, किकीदिवी:, किकोदिवः, किकिः दिवः । २ पु), 'चास पक्षो के २ नाम हैं। ७ कलिङ्गः, भृङ्गः, धूम्याटः (३ पु), 'भुचेङ्गा पक्षी' के ३ नाम हैं । ८ शतपन्नकः, दार्वाधाटः ( २ पु), 'कठखोलवा, कठफोरवा पक्षी के २ नाम हैं। ९ सारङ्गः (+ शारङ्गः),तोककः, चातकः (३पु), 'चातक पक्षी के. ३ नाम हैं। १० कृकवाकु:, ताम्रचूडः, कुक्कुटः, चरणायुधः (४ पु), 'मुर्गा' के ४ नाम हैं। ११ चटकः, कलविङ्कः (२ पु), 'गवरा चटक पक्षी के २ नाम हैं। ("यह नर होता है।) १२ चटका (स्त्री), गवरैया, चटका पक्षी का १ नाम है । ( यह मादा होती है।) १३ चाटकैरः (पु), 'गवरा और गवरैयाके पुत्र' का १ नाम है । *"शारजस्तोककश्चातकः" इति पाठान्तरम् ।। , , सिंहादिवर्गः ५ मणिप्रभाव्याख्यानहितः । १ च्यात्ये चटकैव ला ! २ करेटुः करेटुः स्यात् ३ वकणकरी समौ । ४ बनप्रियः परभृतः कोकिला विक इत्यपि ।। १४ ५ काके तु करटारिवलिपुष्ट समजाः । धवासात्मघोषपरद्वाल ग्यारस पि ॥ २० ॥ * स एव च चिरजीवी चैकष्टिश्च नौकुलिः (१३) ७ द्रोण काकस्तु काकोला ८ झाल्यूहः कालकराडकः । मातायिचिल्लो ३० दाक्षाय्यो ११ कोर शुको भलो ! २१ ॥ १ चटका (स्त्री), गवरा और नरैथाका पुत्री' का १ नाम है !! २ कर्करटुः (+कर्कराटुः ), करेटुः (+कटुः । २ पु), 'अशुभ बोल्. लेवाले पक्षि-विशेष, या टिटिहिरी' के २ नाम हैं । ३ कृकणः, क्रकरः ( २ पु), ये २ 'अशुभ बोलनेवाली पक्षीके भेद- विशेष हैं ॥ ४ वनप्रियः, परभृतः, कोकिला, विकः (४), 'कोरल' के ४ नाम हैं ।। ६ काकः, करटः, अरिष्टः, बलिपुष्टः, सत्यजः, ध्वाङ्कः, आत्मघोषः, पर- भृत् , बलिभुक् ( =बलिभुज् ), दासः (१० यु), 'सोआर के १० नाम हैं । ६ [ चिरञ्जीवी ( =चिरजीविन् ), एकष्टिः, मौकुलिः (३ पु), 'कोमा' के ३ नाम हैं ] ॥ ७ द्रोणकाकः (+दग्धकाकः, वृद्धकाका ), काकोल, (२ पु), 'डोम- कौमा' के २ नाम हैं। ८ दात्यूहः ( + दात्यौहः ), कालकण्ठकः ( २ पु), "जलकौमा, धंए. सा रंगवाला कौश्रा' के २ नाम हैं। ९. आतायी ( =आतायिन् । +आतापी =आतापिन ), चिल्लः (२ पु.) 'चील' के २ नाम हैं । १० दाक्षाय्यः, गृध्रः (+गृद्धः । २ पु), 'गीध के २ नाम ११ कीरः, शुकः ( २ पु ). 'तोता. सुग्गार के २ नाम हैं । "स एव"मौकुलिः" इत्यंशः क्षी०स्वा० व्याख्यायां वर्तते ।। आतापिचिल्लौ" इति पाठान्तरम् ।। . . हैं How अमरकोषः। १८० [ द्वितीयकाण्डे- ANTRUST . * क्रौञ्चोऽथ बकः कः ३ पुष्कराह्वस्तु सारसः ।. ४ कोकश्चक्रश्चक्रवाको रथाङ्गाह्वयनामकः ॥ २२ ॥ ५ कादम्बः कलहंसः स्यादुत्त्रोशकुरौ समौ । ७ हंसास्तु श्वेतगरुतश्चक्राङ्गा मानसौकसः ॥ २३ ॥ - राजहंसास्तु ते चञ्चचरणैर्लोहितः सिताः। ६ मलिनैर्मल्लिकाक्षास्ते १० धार्तराष्ट्राः सितेतरैः ॥ २४ ॥ ११ + शरारिराटिराडिश्च- १ क्रुङ् ( = क्रुञ्च), क्रोञ्चः (क्रुञ्चः । २ पु), पु), 'क्रौञ्च, कराकुल पक्षी के २ नाम हैं। २ बकः, कह्न (+कङ्कः । २ ), 'बगुला' के २ नाम हैं। ३ पुष्कराह्वः ('कमलके पर्यायवाचक सब शब्द'), सारसः (२ पु), 'सारस के २ नाम हैं। ४ कोकः ( + कुकर ), चक्रः, चक्रवाकः, स्थाङ्गः ("रथाङ्ग अर्थात् पहिये के वाचक सब शब्द।४ पु), 'चकवा' के ४ नाम हैं। ५ कादम्बा, कलहंसः (२ पु ), 'बत्तख पक्षी के २ नाम हैं। ६ उत्क्रोशः, कुरः ( २ पु) 'कुरर पक्षी' के २ नाम हैं । हंसा, श्वेतगरुत् , चक्राङ्गः, मानसौकाः ( = मनसौकस्म् । 'हंस' के ४ नाम हैं। ८ राजहंसः (पु), 'सपेद शरीर और लाल रंगके चोंच-पैरवाले. हंस' का १ नाम है। ९ मल्लिकाक्षः (+मल्लिकाख्यः । पु ), 'सपेद शरीर और धूपके समान धूमिल रंगके चोंच-पैरवाले हंस' का १ नाम है ॥ १० धार्तराष्ट्रः (पु), 'सपेद शरीर और काले रंगके चोंच-पैरवाले इंस' का १ नाम है ॥ ११ शरारिस (+शरातिः, शरालिः, शराली, शराटिः, शराडिः ), आदिः (+आतिः, आटी,), आडिः (+आडी । ३ स्त्री), 'आडी पक्षी' के ३ नाम हैं। * "ऋचोऽथ वकः" इति पाठान्तरम् ॥ +"मलिनलिकाख्यास्ते" इति पाठान्तरम् ।। "शरारिरातिरादिश्च" इति पाठान्तरम् ॥ . . .

सिंहादिवर्ग:२] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । हैं १ बलाका बिसकण्ठिका । २ हंसस्य योषिद्वरटा : सारसस्य तु लक्ष्मणा ॥ २५ ॥ ४ जतुकाऽजिनपत्रा स्यात् ५ परोष्णो तैलपायिका । ६ वर्षणा मक्षिका नीला ७ सरघा मधुपक्षिका ॥ २६ ॥ ८ पतङ्गिका पुत्तिका स्याहदंशस्तु वनमक्षिका। १० दंशी तजातिरल्पा स्याद् १ गन्धोली वरटा द्वयोः ॥ २७ ॥ १ बलाका, बिसकण्ठिका (+बिसकण्टिका, क्षो० स्वा० । २ स्त्री), 'बगुला-विशेष के २ नाम २ वरटा (+वरला। स्त्री), 'हंसकी स्त्री' अर्थात् 'हंसिनी' का १ नाम है। ३ लक्ष्मणा (+लक्षणा । स्त्री), 'सारसो' अर्थात् 'सारसको स्त्री का १ नाम है। ४ जतुका (+जतूका ), अजिनपत्त्रा ( २ स्त्री), 'चमगादड़ बादुर' के २ नाम हैं ॥ ९ परोष्णी ( + परोष्टी ), तैलपायिका (२ स्त्री), चपड़ानामक कीटविशेष' के २ नाम हैं ॥ ६ वर्वणा (+बर्बणा ), मक्षिका (+मशीका), नीला (३ स्त्री ), 'नीले रंगकी मक्खी के ३ नाम हैं। (भा० दी० के मतसे प्रथम शब्द उक्तार्थक है और अन्तवाले दो शब्द विशेषण हैं" ) ॥ ७ सरघा, मधुमक्षिका ( २ स्त्री ), 'मधुमक्खी' के २ नाम हैं ॥ ८ पतङ्गिका, पुत्तिका ( २ स्त्री), 'एक तरहको मधुमक्खी' * के २ नाम हैं। ९ दंशः (पु), वनमक्षिका (स्त्री), 'दंश, डॅस, बड़े मच्छड़ के २ नाम हैं ॥ १० दंशी (स्त्री), 'मस, छोटे मच्छड़ का १ नाम है ॥ ११ गन्धोली (स्त्री), वरटा ( +वरटी । पु स्त्री ) 'व, भिर, बिहिनी गन्धयुक्त मक्खी-विशेष' के २ नाम हैं। * यथैतेषां नामभेदपूर्वकं मधुवर्णमाह निमिः- "माक्षिक तैलवर्ण स्याद्धृतवर्ण तु पैत्तिकम् । भ्रामरन्तु भवेच्छुक्लं क्षौद्रं तु कपिलं भवेत् ॥ १॥ इति . १३ अ० अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे - १ भृङ्गारी * झीरुका चीरी झिल्लिका च समा इमाः। २ समो पतङ्गशलभौ ३ खद्योतो ज्योतिरिङ्गणः ॥ २८ ॥ ४ मधुव्रतो मधुकरो मधुलिण्मधुपालिनः । द्विरेफपुष्पालड्भृङ्गषट्पदभ्रमरालयः ॥ २६ ॥ ५ मयूरो बहिणे। बहीं नीलकण्ठो भुजङ्गभुक् । शिखावलः शिखी केकी मेघनादानुलास्यपि ॥ ३० ॥ ६ केका वाणी मयूरस्य७ समो चन्द्रकमेचको। ८ शिखा चूडा शिखण्डस्तु पिच्छवहें नपुंपके ॥ ३१ ॥ १ भृङ्गारी, झीरका ( + झीरिका, झिरुका, झिरिका, झिरीका, चीरका ), चोरी, झिल्लिका ( + झिल्लीका, झिल्लका, चिलिका, चिल्लका । ४ स्त्री), 'झोंगुरए के ४ नाम हैं। २ पतङ्गः, शलभः (२ पु), 'फतिंगा, पतंग' के २ नाम हैं। ३ खद्योतः, ज्योतिरिङ्गणः (२ पु), 'जुगनू' के २ नाम हैं । ४ मधुव्रतः, मधुकरः, मधुलिट् ( = मधुलि ), मधुपः, अली (= अलिन), द्विरेफः, पुष्पलिट ( = दुष्पलि ), भृङ्गः, षट्पदः, भ्रमः, अलिः (११ पु) 'भौरा भ्रमर' के ११ नाम हैं ।। ५ मयूरः ( + मयुरः + ), बर्हिण:, बहीं ( = बहिन् ), नीलकण्ठः, भुजङ्ग- भुक् ( = भुजङ्गभुज् ), शिखावलः, शिखी ( = शिखिन् ), केकी (=केकिन्) मेघनादानुलासी ( = मेघनादानुलासिन् । ९ पु ), 'मोर' के ९ नाम हैं। ६ केका (स्त्री), 'मोरकी बोली' का १ नाम हैं । ७ चन्द्रकः, मेचकः । (२ पु ), 'मोरके पूंछवाले नेत्राकार चिह्न के २ नाम हैं । ८ शिखा, चूडा ( २ स्त्री, ), 'मोरके शिरकी कलंगी या मुकुट' के २ नाम हैं ॥ ९ शिखण्डः (पु), पिच्छम् , वहम् ( २ न), मोरके पंख के ३ नाम * "चीरुका' इति पाठान्तरम् ।। "-मयूरो मयुरो मतः" इति ( श्लो० ५) शब्दभेदप्रकाशोक्तेः॥ + "बहिकण्डसमं वर्ण मेचकं अवते बुधाः" इति कात्यः ।। हैं सिंहादिवर्गः ५] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १८३ १ खगे विहङ्गविहगविहङ्गमविहायसः। शकुन्तिपक्षिशकुनिशकुन्तशकुन द्वजाः ॥३२॥ *पत्रिपत्रिपतगपतत्पनरयाण्डजाः। नगौकोवाजिविकिरविविष्किरपतत्रयः ॥ ३३ ॥ नोडेाद्भवा गरुत्मन्तः पित्सन्तो नमसङ्गमाः। २ तेषां विशेषा हारीतो मद्गुः कारण्डवः प्लवः ॥ ३४ ॥ तितिरिः कुक्कभो लावो जीवंजीवश्चकारकः । १ खगः, विहङ्गः, विहगः, विहङ्गमः, विहायाः ( =विहायस् ), शकुन्ति:, पक्षी ( =पक्षिन् ), शकुनिः, शकुन्तः, शकुनः, द्विजः, पतत्त्री ( = पतत्त्रिन् । +पतत्त्रिः), पत्त्री ( =पत्रिन ), पतगः, पतन ( = पतत ), पत्त्ररथः, अण्डजः, नगौकाः ( =नगौकस् ), वाजिः, विकिरः, विः, विष्किरः, पतत्त्रिः, नीडोद्भवः, गरुत्मान् ( = गरुत्मत् ), पित्सन् ( = पित्सत् ), निमसङ्गमः (२७ पु), 'पक्षी, चिड़िया के २७ नाम हैं । २ हारीतः ( + हरितः ), मद्गुः, कारण्डवः, प्लवः, तित्तिरिः ( +ति- त्तिरः), कुक्कुभः, लावा, जीवजीवः (=जीवजीवः, जीवाजीवः ), चकोरका, कोयष्टिकः ( + कोयष्टिः, क्षी० स्वा० पाठ ), टिटिभकः ( + टिटिभकः, टिटिभः। +ट्ठिभः, कोकः । क्षी० स्वा० पाठ ), वर्तकः ( + ऋकरः, क्षी० स्वा० पाठ) वत्तिकः (+ वर्तकः; क्षी० स्वा० पाठ । १३ पु), आदि ('आदि शब्दसे शारिकाः कपिलला....."), ये 'पक्षि-विशेष है। उनमें क्रमशः 'हारिल, जलमुर्गा; करडुआ ( कौवेके समान काले रङ्गाके बड़े • पैरवाला बत्तखविशेष जलकौवा, * "पतत्रिपत्रिपतगपतत्पत्त्ररथाण्डजाः' इति पाठान्तरम् । अत्र 'पतेरत्रिः' (उ० सू०) इति , भ्रान्त्या ग्रन्थकृदिदन्त मिमं मन्यत इति क्षा० स्वा०॥ निभसमाकाशं गच्छतीति विग्रहे "गमश्च" (पा० सू० ३।४।४७ ) इति उप्रत्यये 'नभ- सङ्गम' शब्दस्य सिद्धिः । 'नभस खं मेघवत्म विहायसम्" इति निगमात् "अत्यविचमिनमिर. भिलभिनभितपिपतिपनिपणिमहिभ्योऽसच" ( उ० सू० ३९७), इत्यनेन सिद्धोऽदन्तोऽपि 'नमस' शब्दोऽस्तीत्यवधेयम् । सान्त नभः शब्दपक्षे तु नभसा गच्छतीति विग्रहे 'गमे: सुपि वाच्यः बार्तिक २०११) इति खचि "वाचंयमपुरन्दरौ च' (पा० सू०६।३।६९) इति चकाराद- मागमे 'नमसङ्गम' शब्दसिद्धिबोध्या।

१८४ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे-- *कोयष्टिकष्टिट्टिाको वर्तको वर्तिकादयः ॥ ३५ ॥ १ गरुत्पक्षच्छदाः पत्रं पतनं च तनूरुहम् । २ स्त्री पक्षतिः पक्षमूलं ३ चञ्चस्रोटिरुभे स्त्रियौ ॥ ३६॥ ४ प्रडीनोड्डोनसंडीनान्येताः खगगतिक्रियाः। ५ पेशो कोषाद्विहिनेऽण्डं ६ कुलाया नीडमस्त्रियाम् ॥ ३७ ॥ पोतः पाकोऽर्भको डिम्भः पृथुकःशावकःशिशुः । तीतर, वनमूर्गा, लावा या लवा, मोरके तुल्य पंखवाला पक्षि-विशेष, चकोर, पक्षी-विशेष, टिटहरी और वत्तख' का १-१ नाम तथा 'बटेर 'वटेर के २ नाम हैं। प्राचीनों मत से 'वर्तकः (), वार्तिका (स्त्री मानकर बटेर और बटेरकी स्त्री का क्रमशः १-१ नाम है")॥ १ गरुत् , पक्षः छदः (+न । पु), पत्त्रम् , पतत्त्रम् , तनूरुहम् (३ न ), 'पंख' के ६ नाम है। २ पक्षतिः (=पक्षती। स्त्री), पक्षमूलम् (न), 'पंख की जड़ के २ नाम हैं। ३ चञ्चुः ("चञ्चूः ), नोटिः ( = तुण्डम् । २ स्त्री) 'चेच, ठोर' के २ नाम है ॥ ४ प्रडीनम् , उड्डोनम् , संडोनम् (३ न), पे ये ३ 'पक्षियों के चाल है। इनमें ' तिर्छा या अत्यन्त उड़नेका, ऊपर उड़नेका, मिलकर उड़ने का क्रमशः १-१ नाम है ।। ९ पेशो (पेशिन् , .."पु: पेशी-पेशी स्त्री), कोशः ( = कोषः पु न । = पेशीकोषः; क्षी० स्वा० ), अण्डम् (न); 'अण्डा' के ३ नाम है । ६ कुलायः (पु), नोडम् ( न पु), खोता घोसला' के २ नाम है । ७ पोतः, पाकः, अर्भकः, डिम्भः, पृथुकः, शावकः, शिशुः ( ७ पु), 'बच्चे के नाम है ॥ * "कोयष्टिष्टिट्टिमः कोकः करो वर्तकादयः" इति क्षी०स्वा०सम्मतः पाठः । अत्र मूलोक्तपाठं मत्वा 'उदीचां तु स्त्रियामित्वम् , प्राचां न ( वा० ७।३।४५) इति स्त्रियां रूपदयप्रदशनाय 'वर्तिका' ग्रहणम्' इति प्राञ्चः । वस्तुतस्तु घृतेस्तिकन्'( उ० सू० ३।१४६ ) इति तिकन्नन्तस्य भूषिकवत्पुंस्यपि वर्तिकः' इति रूपकथनमिदम्" इति भा० दो० । पूर्वोक्त क्षो० स्वा० सम्मते पाठे तु नैव रूपयप्रदर्शनमित्यवधेयम् ॥ पेशीकोशो' इति कोषो' इति च पाठान्तरम् ॥ , १ सिंहादिवर्ग:५] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ १ , . १ स्त्रीपुंसौ मिथुनं द्वन्द्धं २ युग्मं तु युगलं युगम् ॥ ३८ ॥ ३ समूहो निवहव्यूहसन्दोहविसरबजाः । स्तोमौघनिकरवातवारसवातसञ्चयाः ॥ ३६॥ समुदायः समुदयः समवायश्चयो गणः । स्त्रियां तु संहतिवृन्दं निकुरम्वं कदम्बकम् ॥ ४० ॥ ४ वृन्दभेदाः ५ समैवर्गः ६ सङ्घसार्थों तु जन्तुभिः । ७ सजातीयैः कुलं - यूथं तिरश्चां पुन्नपुंसकम् ॥ ४१॥ १ स्त्रीपुंसौ ( भा०दी० मतसे । नित्यद्विव० पु), मिथुनम् , द्वन्द्वम् (२ न) 'स्त्री और पुरुषकी जोड़ी' के ३ नाम है ॥ २ युग्मम् , युगलम् , युगम् ( ३ न ), 'जोड़ा, सम' के ३ नाम है। ( "मुकुटने 'द्वन्द्व' शब्दको भी इसीका पर्याय मानकर ४ नाम * कहाँ है" )। ३ समूहः, निवहः, यूहः, संदोहः, विसरः, ब्रजः, स्तोमः, ओघः, निकरः, जातः, वारा, संघातः, सञ्चयः, समुदायः, समुदयः, समवायः, चयः, गण: ( १८ पु ), संहतिः ( स्त्री), वृन्दम् , निकुरम्बम् , कदम्बकम् ( ३ न ), 'समूह' के २२ नाम है। ४ अब समूहों के भेद-विशेष कहते हैं । पु, 'एक जातीय प्राणियों या अप्राणियों के समूह का १ नाम है । ( "जैसे- मनुष्यवर्गः, ब्राह्मणवर्गः शैलबर्गः, )॥ ६ । संघः, सार्थः ( २ पु), 'एक जातीय या भिन्न जातीय प्राणि- मात्र के समूह के २ नाम है । ( जैसे-'पशुसङ्घः, पक्षिसङ्घः, वणिक्सङ्घः") ७ कुलन् [ न ], 'एक जातीय केवल प्राणियोंके समूहका १ नाम है। (जैसे-ब्राह्मणकुलम् , ऋषिकुलम् , गोकुलम् , ......" )। ८६ यूथम् [न पु] एक जातिके तिर्यग्जातीय (पशुपक्षीआदिके) समू- * 'द्वन्द्व' शब्दस्य 'युग्म' पर्यायत्वमनुचितम् । तथा सति "-द्वन्द्वमाहवे । रहस्ये मिथुने युग्मे-'" (अने० सं० ३.५२३-५२४) इति हैमात् "द्वन्द्वं रहस्ये कलहे तथा मिथुनयुग्मयोः' ( मेदिनी पृ० १७२ श्लो० १० ) इति मेदिन्याश्चाविरोधेऽपि 'स्वन्ताथादि न...' (१।१।४) इत्या दिग्रन्थकारप्रतिज्ञाविरोधात्। 'द्वन्द्वयुग्मे तु" इति पाठे तु ग्रन्थकारप्रतिज्ञाऽविरोधान्मुकुटमतस्य सामन्जस्यमपीत्यवधेयम् ॥ +18 “सङ्घसङ्घातपुौघसार्थयूथकदम्बकाः" इति । ६ वर्ग:

१६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ पशूनां समजोऽन्येषां समाजो३ऽथ सर्मिणाम् । स्थानिकायः४ पुञ्जराशीतूत्करः कूटमस्त्रियाम् ॥ ४२ ॥ ५ कापातशोकमायरतैत्तिरादीनि तद्गणे । ६ गृहासक्ताः पक्षिमृगाश्छेकास्ते गृह्यकाश्च ते ॥ १३ ॥ इति सिंहादिवर्गः ॥ ५ ॥ . gtie . ह' का १ नाम है । ("जैसे-'मृगयूथम् , गजयूथम् ,बहियूथम् ,........:) | १ समजः (पु), 'केवल पशुओंके समूह' का १ नाम है । (जैसे- गोसमज:......")॥ २ समाजः (पु), 'पशुसे भिन्न जातिवालों के समूह' का १ नाम है। ("जैसे- श्रोत्रियसमाजः, ब्राह्मणसमाजः,..." ) ॥ ३ निकायः (पु), 'एक जातिवालोंके समूह' का १ नाम (जैसे-ब्राह्मणनिकायः, गोनिकायः, श्रमणनिकाय:,......")॥ ४ पुजः ( +पिक्षः), राशिः, उत्करः (३ पु), कुटम् ( न पु), 'अन्न इत्यादि के ढेरी' के ४ नाम हैं । ( 'जैसे--धान्यराशिः, तृणराशिः,......) ६ कापोतम् , शौकम् , मायूगम् , तैत्तिरम् ( ४ न ), आदि ("आदिसे- “कौक्कुटम् , काकम् ,..." ) 'कबूतर, सुग्गा, मोर और तीतर' आदि ("आदिसे---सूर्गा और कौआ, ...,') के समूह' का क्रमशः १-१ नाम है ॥ ६ छेकः, गृह्यकः ( २ पु), पालतू पशु-पक्षी' अर्थात् 'घरमें पाले हुए तोता, मोर, मैना आदि पक्षी और मृग आदि पशुओं के २ नाम हैं । इति सिंहादिवर्गः ॥ ६ ॥ -- . . निकर निकायविसरबजपुञ्चसमूहसञ्चयाः समुदयमार्थयूथनिकुरम्बकदम्बकपूगराशयः । चयसमवायवृन्दसन्दोहसमाजवितानसं हतिप्रकरघनौघसंघसंघातवातकुलोत्कराः स्मृताः" ॥ ( अभि० रत्न० ४।१ ) इति चोक्त्वा भागुरिइलायुधौ ‘सङ्घसार्थयूथपुञ्जानां पर्यायतामाइ- तुः' इत्यवधेयम् ॥

हैं मनुष्यावर्गः ६ ] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १८७ ६. अथ मनुष्यवर्गः। १ मनुष्या मानुषा मा मनुजा मानवा नराः। २ स्युः पुमालः पञ्चजनाः पुरुषा पूरुषा नरः ॥१॥ ३ *स्त्री याषिदबला योषा नारी सीमन्तिनी वधूः । प्रतीपदशिनी वामा वनिता महिला तथा ॥२॥ ४ विशेषास्त्वङ्गना भीरुः कामिनी वामलोचना । प्रमदा मानिनी कान्ता ललना च नितम्बिनी॥३॥ सुन्दरी रमणी रामा ५ कोपना सैव भामिनी । १ वरारोहा मत्त काशिन्युत्तमा वरवर्णिनी ॥४॥ ६. अथ मनुष्यवर्गः। १ मनुष्यः, मानुषः, मर्त्यः, मनुजः, मानवः, नरः (६ पु), भा० दी० मतले 'मनुष्यमात्र' के ६ नाम २ पुमान् (पुंस), पञ्चजना, पुरुषः, पूरुषः, ना (नृ । ६ पु), भा० दी० मतसे 'पुरुष' अर्थात् 'मर्द' के ५ नाम हैं । ( "महे० मतसे 'मनुष्या,"ना' ये ११ नाम 'मनुष्य के हैं")" ॥ ३ स्त्री, योषित ( +जोषित्, योषिता, जोषिता), अबला ( + अवला), योपा (+जोषा ), नारी, सीमन्तिनो, वधूः, प्रतापदर्शिनी, वामा, वनिता, महिला (+महेला, महला । ११ स्त्री), 'ओरत, जनाना' के ११ नाम है । ४ अङ्गना, भीरुः, (भीरू, भीलुः, भोलूः,), कामिनी, वामलोचना, प्रमदा, मानिनी, कान्ता, ललना, नितम्बिनी, सुन्दरी ( + सुन्दरा ), रमणी ( + रम- णा), रामा ( २२ स्त्री), 'ये १२ 'स्त्रियों के भेद-विशेष' हैं । ५ कोपना, भामिनी (२ स्त्री), 'क्रोध करनेवाली स्त्रा' के २ नाम हैं । ६ वरारोहा, मत्तकाशिनो (+मत्तकासिनो), उत्तमा । वरवर्णिनी (४ स्त्री, ) 'गुणवती स्त्री के ४ नाम है ॥ 'स्त्रा याषिदवला जोषा' इति पाठान्तरम् ।। + वरवर्णिनीलक्षणं यथा- "शीते सुखोष्णसर्वाङ्गी ग्रीष्म या सुखशीतला। भर्तृभक्ता च या नारी विज्ञेया वरवर्णिनी" ॥१॥ इति ॥

E अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्डे- १ कृताभिषेका महिषी २ भागिन्योऽन्या नृपस्त्रियः । ३ पत्नी पाणिगृहीती च द्वितीया सहधर्मिणी ॥ ५ ॥ भार्या जायाय 'भूनिदाराः ४ स्यात्तु कुटुम्बिनी । पुरन्ध्री ५ सुचरित्रा तु सती साध्वी पतिव्रता ॥६॥ ६ * कृतसापत्निकाध्यूढाधिविनाऽथ स्वयंवरा । पतिवरा च वर्यास्थ कुलस्त्री कुलपालिका ॥ ७ ॥ 8 कन्या कुमारी- १ महिषी (स्त्री), प राना' का १ नाम है । (जैसे-वासवदत्ता,....")। २ भोगिनी (स्त्री), 'पटरानीसे भिन्न रानियों का १ नाम है। ("जैसे-पद्मावती,......." ) ॥ ३ पत्री, पाणिगृहीती, द्वितीया, सहधर्मिणी ( + सधर्मिणी, सहचरी), भार्या, + जाया (६ स्त्री), दाराः (= दार, पु नि० ब०व० । +1 दारा=दारा, स्त्री), 'च्याही हुई स्त्री' के ७ नाम हैं । ४ कुटुम्बिनी, पुरन्ध्री ( + पुरन्ध्रिः, मु०), 'पति-पुत्रवाली स्त्री के २ नाम हैं॥ ६ सुचरित्रा, सती, साध्वी, पतिव्रता ( ४ स्त्री), 'पतिव्रता स्त्री के नाम हैं। ६ कृतसापलिका ( +कृतसापत्नका ), अध्यूढा, अधिविन्ना (३ स्त्री), भनेक विवाह किये हुए पुरुषकी पहली स्त्री' के ३ नाम हैं । * स्वयंवरा, पर्तिवरा, वर्या ( ३ स्त्री), "जिसके लिये स्वयंवर किया गया हो उस कन्या के ३ नाम है। ८ कुलस्त्रो, कुलपालिका [ २ स्त्री ], 'कुलीन स्त्री के २ नाम है। ९ कन्या, कुमारी (२ स्त्री), 'प्रथम अवस्थावाली या क्वाँरी लड़की के २ नाम है। ७ . . 'कृतसापत्नकाऽध्यूढा-' इति पाठान्तरम् ॥ 'जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः" इति मनुः ।। t"क्रोडा हारा तथा दारा त्रय एते यथाक्रमम् । क्रोडे हारे च दारेषु शब्दा: प्रोक्ता मनीषिभिः ॥१॥ इत्युक्तेः ।

मनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ गौरी तु नग्निकानागतार्तवा । २ स्यान्मध्यमा दृष्टरजा३स्तरुणी युवतिः समे ॥ ८॥ ४ *समाः स्नुषाजनीवध्वश्चिरिण्टीतुस्ववासिनी। १। गौरी, नग्निका ( +लग्निका ), अनागतातवा ( ३ स्त्री) 'जिसे रजोधर्म नहीं हुआ हो उस स्त्री' के ३ नाम २ मध्यमा, दृष्टरजाः (=दृष्टरजस् । २ स्त्रो), "जिसे पहली बार रजोधर्म हुश्रा हो उस स्त्री के २ नाम हैं । ३ ६ तरुणी (+ तलुनी ), युवतिः (+युवती। २ स्त्री), 'जवान स्त्री' के २ नाम हैं। ४ स्नुषा, जनी ( + जनिः), वधूः ( ३ स्त्री), 'पतोहू' अर्थात् 'पुत्र, भतीजा या शिष्य आदिकी स्त्री के ३ नाम हैं । ५ चिरिण्टी ( + चिरण्टी, चरण्टी, चरिण्टी), स्ववासिनी ( + सुवासिनी । २ स्त्री), 'जिसे जवानीके चिह्न कुछ २ मालूम पड़ रहे हों ऐसी विवाहित स्त्री' के २ नाम हैं । * "समाः स्नुषाजनीवध्वश्चिरण्टी तु सुवासिनी" इति पाठान्तरम् ॥ ttथ प्रसङ्गास्त्रीणां संशाविशेषा उच्यन्ते- 'बालेति गीयते नारी यावर्षाणि षोडश। गौरी स्वसब्जातरजाः श्यामा पाडशवार्षिकी ॥१॥ इति ॥ 'अष्टवर्षा भवेदगौरी नववर्षा च रोहिणी। दशवर्षा भवेत्कन्या अत अध्वं रजस्वला ॥१॥ इति संवर्तस्मृतिः १।६६॥ अत्र कष्टवर्धा भवेद् गौरी नवमे नग्निका भवेत्" इति स्माते विशषा नादृत इति क्षी० स्वा० ॥ अवस्थाभेदेन स्त्रीणां संज्ञा आह- "यावस्खोडशसयमन्दमुदिता बाला ततस्त्रिंशत तावरस्यात्तरुणीति बाणविशिौः संख्या तुतावद्भवेत् । सा प्रौढत्पमिधीयते कविवरैवृद्धा तवं स्मृता निन्या कामकलाकलापविधिषु स्याज्या सदा कामिभिः" ॥१॥इति ।। - अमरकोषः। १६० [द्वितीयकाण्डे- १ इच्छावती कामुका स्याद् २ वृषस्यन्ती तु कामुकी ॥8॥ ३ कान्तार्थिनी तु या याति संकेतंसाभिसारिका । ४ पुंश्चली *धर्षिणी बन्धक्यसती कुलटेत्वरी ॥ १० ॥ स्वैरिणी पांशुला च स्या५दशिश्वी शिशुना विना । ६ वीरा निष्पतिसुता ७ विश्वस्ताविधवे समे ॥ ११ ॥ = आलिः सखी वयस्याथ पतिवत्नी सभर्तृका । १ इच्छावता, कासुका ( २ स्त्रा), किसा पदार्थको चाहनेवाली स्त्री के २ नाम हैं ॥ २ वृषस्यन्ती, कामुकी ( २ स्त्री ), 'बैल-घोड़ेकी तरह मैथुनकी इच्छा करनेवाली स्त्री के २ नाम हैं ॥ ३ । अभिसारिका (स्त्री), 'रतिके लिये अपने पति या जारके संकेत किये हुए स्थानपर जानेवाली, या जार वा पति को संकेत-स्थानपर बुलानेवाली स्त्री' का १ नाम है ॥ ४ पुंश्चली, धर्षिणी ( +चर्षणी, धर्षणीः, कर्पणिः ), बन्धकी, असती, कुलटा, इत्वरी, स्वैरिणी, पांशुला ( + व्यभिचारिणी। ८ स्त्री), 'व्यभिचा- रिणी स्त्री के ८ नाम हैं। ६ अशिश्वी (स्त्री), 'वंशहीन स्त्री' का १ नाम है ॥ ६ अवीरा (स्त्री), पति और पुत्रसे हीन स्त्री' का १ नाम है ॥ ७ विश्वस्ता, विधवा ( २ स्त्री), 'विधवा स्त्री के २ नाम हैं। ८ आलिः, सखी, वयस्या ( ३ स्त्री ), 'सहेली' के ३ नाम हैं | ९ पतिवत्नी, सभर्तृका ( २ स्त्री), 'मधवा स्त्री' के २ नाम हैं । * 'चर्षणी' इति धिषणा' इ.त च पाठान्तरे ।। + अभिसारिकाया लक्षणान्याहुः । तद्यथा- "हित्वा लज्जाभये शिलष्टा मदनेन मदेन च । अभिसारयते कातं सा भवेदभिसारिका"॥१॥ति भारतः ।। "कामार्ताऽभिसरेत्कान्तं सारयेद्वामिसारिका" ॥ दशरूपक २।३७ इति । अभिसारयते कान्तं मा मन्मथवशंवदा। स्वयं वाऽमिसरत्याषा धीरैरुक्ताऽभिसारिका" ॥१॥ सा.द.३३११८ इति ॥

जनुष्यवर्ग: ६ ] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १६२ २ वृद्धा पलिक्की २ प्राज्ञो तु प्रज्ञा ३ प्राज्ञा तु धीमती ॥ १२ ॥ ४ शुद्री शुदस्य भार्या स्यापूच्छूद्रा तजातिरेव च । ६ आभीरी तु महाशूद्री जातिपुंयोगयाः समा ॥ १३ ॥ ७ अर्याणी स्वयमा स्याटक्षत्रिया क्षत्रियाण्यपि । ६ उपाध्यायाप्युपाध्यायी १० स्यादाबार्यापि च स्वतः ॥ १४ ॥ ११ आचार्यानी तु पुंयोगे १२स्याद-- १ वृद्धा, पलिक्नी ( २ स्म्रो ), 'वृद्ध या पके हुए बालवाली स्त्री' के २ नाम हैं। २ प्राज्ञी, प्रज्ञा (२ स्त्री), 'किसी विषयको अच्छी तरह स्वयं जाननेवाली स्त्री' का २ नाम हैं । ३ प्राज्ञा, धीमती ( +बुद्धिमती । २ स्त्री), 'चतुर स्त्री' के २ नाम हैं। ४ शूद्री (स्त्री), 'किसी भी वर्णमें उत्पन्न हुई शुद्रकी स्त्री' का १ नाम है ॥ ६ शूद्रा (स्त्री), 'शूद्र वर्णमें उत्पन्न हुई शुद्रकी या अन्य किसी जातिकी स्त्री' का १ नाम है ॥ ६ आभीरी, महाशूद्री ( २ स्त्री ), 'ग्वालिन या गोपकी स्त्री, महा. शुद्रकुलमें उत्पन्न किसी भी जातिकी स्त्री, अन्य वर्णमें उत्पन्न महाशू- द्रकी स्त्री के २ नाम हैं । ७ अर्याणी, अर्या ( २ स्त्री), 'वैश्य कुलमें उत्पन्न सो के २ नाम हैं । क्षत्रिया, क्षत्त्रियाणी ( २ स्त्री), 'क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न स्त्री' के २ नाम हैं। ९ उपाध्याया, उपाध्यायी ( २ स्त्री), 'स्वयं पढ़ानेवाली स्त्री' के २ नाम हैं। १० आचार्या (स्त्री), "मन्त्रों की स्वयं व्याख्या करनेवाली स्त्री' का १ नाम है ॥ ११ आचार्यानी (+आचार्याणी । स्त्री), 'आचार्यकी स्त्री' का १ नाम है । १२ अर्थी (स्त्री), 'किसी भी जातिमें पैदा हुई वैश्यकी स्त्री का १ नाम है ॥

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- . १ क्षत्रियी तथा। २ उपाध्यायान्युपाध्यायी ३ पोटा स्त्री(सलक्षणा ॥ १५ ॥ ४ वीरपत्नी वीरभार्या ५ वीरमाता तु वीरसूः । ६ जातापत्या प्रजाता च प्रसूता च प्रसूतिका ॥ १६ ॥ ७ स्त्री नग्निका* कोटवी स्याद्दूतीसंचारिके समे। कात्यायन्यर्धवृद्धा या काषायवसनाऽधवा ॥ १७ ॥ १० सैरन्ध्री परवेश्मस्था स्ववशा शिल्पकारिका । १ क्षत्रियी (स्त्री), 'किसी भी जातिमें उत्पन्न हुई क्षत्रियकी स्त्री का नाम है ॥ २ उपाध्यायानी, उपाध्याया (२ स्त्री), 'पढ़नेवालेकी स्त्री के २ नाम हैं। ३ पोटा ( स्त्री ), 'स्तन और दाढ़ी, स्त्री-पुरुषके इन दो लक्षणोंसे युक्त स्त्री या नपुंसक स्त्री' का १ नाम है ॥ ४ वीरपत्नी, वीरभार्या ( २ स्त्री), 'शूरवीरकी स्त्री' के २ नाम हैं । ६ वीरमाता ( =वीरमातृ ), वीरसूः (२ स्त्री), 'शूरवीरकी माता' के २ नाम हैं॥ ६ जातापत्या, प्रजाता, प्रसूता, प्रसूतिका ( ४ स्त्री ), 'प्रसूति' अर्थात् 'जिसे सन्तान पैदा किये थोड़े दिन बीते हों उस स्त्री के ४ नाम हैं । ७ नग्निका ( भा० दी० ), कोटवी ( + कोट्टवी, कौटवी । २ स्त्री), 'नङ्गी स्त्री के २ नाम हैं। ८ दूती, सञ्चारिका ( २ स्त्री), 'दूती' के २ नाम हैं । ९ कात्यायनी (स्त्री), 'अधबूढ़, गेरुआ कपड़ा पहनी हुई विधवा स्त्री' का १ नाम है ॥ २० ६ सैरन्ध्री ( + सैरिन्ध्री । स्त्री ), 'जो दूसरेके घर रहे, स्वतन्त्र 'कोट्टवी' इति पाठान्तरम् ।। + 'कषायवसनाऽधवा' इति पाठान्तरम् ॥ * 'सैरिन्ध्री' इति पाठान्तरम् ।। सैरन्ध्रीलक्षणं यथा- चतुःषष्टिकलाऽभिज्ञा शोलरूपादिसेविनो। प्रसाधनोपचारशा सैरन्ध्री परिकीर्तिता' ॥१॥न कात्यः । क्षी. स्वातु 'परिकीर्तिता' इत्यत्र 'स्वव शेति च' इति पाठमाइ॥ on मनुष्यवर्गः ६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। १ मसिनो स्यादवृद्धा या प्रेष्यान्तःपुरचारिणी ॥ १८ ॥ २ वारस्त्री गणिका* वेश्या रूपाजोवाइथ ला जनैः । सत्कृता वारमुख्या स्यात् ४ कुट्टनी शम्भली समे ॥ १६ ॥ ५ विप्रशिका त्वोक्षणिका दैवज्ञाथ रजस्वला। स्त्रीधर्मिण्यविरात्रेयो मलिनी पुष्पवत्यपि ॥ २०॥ ऋतुमत्यप्युदक्यापि ७ स्याद्रजः पुष्पमातवम् । हो और केश झाड़ना शूथना आदि शिल्पकार्य करती हो उस स्त्री' का १ नाम है ॥ १ अलिक्नी (स्त्री), 'जो वृद्धा नहीं हो, आज्ञा पाकर कहों माया जाया करे और रनिवास में रहे उस स्त्री का १ नाम है ॥ २ वारस्रो, गणिका, वेश्या ( + धेष्या), रुपाजीवा ( + पण्यत्रो, पणत्रा । ४ स्त्रो) 'वेश्या के ४ नाम हैं। ३ वारमुख्या (स्त्री), 'सौन्दर्य और गान आदि अद्गुणोंसे बड़े लोगों के द्वारा प्रतिष्ठा पानेवाली वेश्या' का १ नाम है ॥ ४ कुट्टनी, शम्भली (+सम्भली । २ स्त्री), 'कुटिनी के २ नाम हैं । ५ विप्रश्निका ईक्षणिका, दैवज्ञा ( ३स्त्रो), 'हाथ-पर आदिकी रेखाम को देखकर शुभाशुभ लक्षणोंको जानने या कहनेवाली स्त्री'के ३ नाम हैं। ६ रजस्वला, स्त्रीधर्मिणी, अविः ( + अवी), आत्रेयी, मालनी, पुष्पवती (x पुष्पिता ), ऋतुमती, उदक्या ( ८ स्त्री ), 'रजस्वला स्त्री के ८ नाम हैं। ७ रजः ( = रजस् ), पुष्पम् , आर्तवम् (३ न ), 'स्त्रियोंके रज के ३ नाम हैं . % 3D * वेष्या' इति पाठान्तरम् ॥ स्रोधर्मिण्यपि चात्रेयी मलिनो पुष्पवयाप' इति स्वा० पाठः । 'अवितृस्तृतन्त्रिभ्य ई:(उ० सू०३ । १५८ ) इति ईप्रत्ययेन सिद्धयुक्तस्तदने च 'भवि स्रोधर्मिणी विद्यात्' इति कात्यात् 'सार्वधातुभ्य इन्' ( उ० सू० ४ । ११८) इति इन् प्रत्यये हस्वान्ताऽपि पविः इति भानु जिदोक्षितेन स्वयमुक्तस्वान्मूले स्त्रीधर्मिण्यविरात्रेयी' इति इस्वान्त 'अविः शब्दपाठः संशोधकप्र. मादज एव । व्याख्यातुदोर्षान्त 'अविः शब्दस्यैव प्रथम माषितस्वेन तत्रैव स्वास्थाप्रदर्शनात ॥ "असिक्नी स्यादवृद्धा या प्रेष्याऽन्तःपुरयोषिता" इति मुनिः ।।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ श्रद्धालुर्दोहदवती २ निष्कला विगतार्तवा ॥ २१ ॥ ३ मापन्नसत्त्वा स्याद्गुविण्यन्तवत्नी च गर्भिणी। ४ गणिकादेस्तु गाणिक्यं गाभिणं यौवतं गणे ॥ २२ ॥ ५ पुनभूदिधिषूरूढा द्विस्तिस्या * दिधिषुः पतिः । ७ स तु द्विजोऽनदिधिषः सैव यस्य कुटुम्बिनो ॥ २३ ॥ १ श्रद्धालुः, दोहदवती ( २ स्त्री ), 'गर्भ रहनेपर किसी वस्तु या कार्य चाहनेवाली स्त्री के २ नाम हैं। २ निष्कला (+निष्कलो), विगतार्तवा ( २ स्त्री), 'रजोधर्मसे होन स्त्री' के २ नाम हैं ३ आपन्नसत्वा, गुर्विणी ( +गुर्वी ), अन्तर्वत्नी, गर्भिणी (+गर्भवती। ४ स्त्री ), 'गर्भवती स्त्री के ४ नाम हैं ॥ ४ गाणिक्यम् , गाभिणम् , यौवतम् ( ३ न ). 'वेश्याओं युवतिओं और गर्भिणियों के समूह' का क्रमशः १-१ नाम है ।। ६ पुनर्भूः, दीधिपूः ( + दिधीपूः, दोधिपुः, अग्रेदिधिषुः । २ स्त्री), 'दो बार व्याही हुई स्त्री के २ नाम हैं । ६ दिधिषुः (+दिधिपूः, स्वा० म० । पु०), 'दो बार व्याही हुई स्त्रीके पति का १ नाम ७ अग्रेदिधिषूः ( + अग्रेदिधिषुः । पु ). 'दो बार व्याही हुई स्त्रीके द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) वर्गाबाले पति' का १ नाम है ॥ * दविषः पतिः' इति पाठान्तरम् ॥ । तदुक्तं याज्ञवल्क्ये- अक्षता च क्षता चैव पुनभूदिधिष : पुनः' इति याश० १।६७ ॥ "ज्येष्ठायां यद्यनूढायां कन्यायामुह्यतेऽनुजा ! सा चादिधिषुर्शया पूर्वा तु दिधिघुमंता" ॥ १ ॥ इति ।। "दिधिपूस्तत्पुनभूविरूदा स्यादिधिषुः पतिः, स तु द्विजोऽयेदिधिपूर्यस्य स्यास्सैव गेहिना" ॥ १ ॥ अमि० चिन्ता० ३११८९ इति ।

मनुष्यवर्गः६] मणिप्रभाव्याख्यासिहतः । १९५ -- १ कानीनः कन्यकाजातः सुतोऽथ सुभगासुतः । सौभागिनेयः स्यात् ३ पारस्त्रयस्तु परस्त्रियाः ॥ २४ ॥ ४ पैतृण्वसेयः स्यात्पैतृवस्नीयश्च पितृष्वसुः । सुतो ५ मातृवसुश्चैवं ६ वैमात्रेयो विमातृजः ॥ २५ ॥ ७ अथ बान्धकिनेयः स्याद्वन्धुलश्चासतीसुतः। कौल टेरः कोलटेयो - भिक्षुकी तु सती यदि ॥ २६ ॥ तदा कोलटिनेयोऽस्याः कोलटेयोऽपि चात्मजः । ६ आत्मजस्तनयः सूनुः सुतः पुत्रः १० स्त्रियांत्वमो ॥ २७ ॥ आहुईडितरं सर्वे-- १ कानीनः (पु), 'क्यारी स्त्रीके पुत्र' का १ नाम है । 'जैसे-'व्यास, कर्ण,.........) २ सुभगासुतः, सौभागिनेयः ( २ पु ), 'सौभाग्यवती स्त्रीके पुत्र' के २ नाम हैं। ३ पारस्त्रेणेयः (पु), 'पर स्त्री के ४ पैतृष्वसेयः, पैतृष्वस्त्रीयः ( २ पु) 'फूआका पुत्र, फुफेरा भाई के २ नाम हैं। ५ मातृष्वसेयः, मातृष्वस्त्रीयः ( २ पु), 'मौलीका लड़का, मौसेरा भाई के २ नाम हैं ॥ ६ वैसात्रेयः ( +वैमात्रः), विमातृजः (• पु), 'सौतेली मांका लड़का' अर्थात् 'मैभावत भाई, के २ नाम है। बान्धकिनेयः, बन्धुलः, असतीसुतः, कौलटेरः, कौलटेयः ( ६ पु), 'व्यभिचारिणी स्त्रीके पुत्र' के ६ नाम हैं ८ कौलटिनेयः, कौलटेयः ( २ पु), 'भीख मांगनेके लिये घर २ घूमने वालो सदाचारिणी स्त्रीके पुत्र' के १ नाम हैं !! ९ आत्मजः, तनयः, सूनुः, सुतः, पुत्रः (९ पु), 'पुत्र' के ६ नाम हैं १० दुहिता (=दुहित । स्त्री), और 'आत्मज' आदि ५ शब्द स्त्रीलिङ्ग होने पर ( आत्मजा, तनया, सूनुः सुता, पुत्री । ५ स्त्री ), 'लड़की पुत्री' के ६ नाम हैं। पुत्र' को १ नाम है अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- , २ १ऽपत्यं तोकं तयोः समे। २ स्वजाते त्वौरसोरस्थौ ३ तातस्तु जनकः पिता ॥ २८ ॥ ४ जनयित्री प्रसूर्माता जननी ५ भगिनी स्वला । ६ ननान्दा तु स्वसा पत्युनत्री पौत्री सुतात्मजा ॥ २६॥ = भार्यास्तु भ्रातृवर्गस्य यातरः स्युः परस्परम् । । प्रजावती भ्रातृजाया १० मातुलानी तु मातुली ॥ ३० ॥ १ अपत्यम् , तोकम् (२ न), 'सन्तान' अर्थात् 'लड़के या लड़की के २ नाम हैं। * औरसः, उरस्यः (+ औरत्यः । २ पु), 'अपने खास लड़के के २ नाम हैं। ३ तातः, जनकः, पिता (=पितृ । ३ पु), 'पिता' के ३ नाम है ॥ ४ जनयित्री (+जनित्री), प्रसूः, माता (=मातृ), जननी (+ जननिः । ४ स्त्री), 'माता' के ४ नाम है ॥ ५ भगिनी, स्वसा ( =स्वस् । २ स्त्री), 'बहन' के २ नाम है ॥ ६ ननान्दा (= ननान्ह । + ननन्दा = ननन्ह, नन्दिनी ), 'ननद' अर्थात् पति की बहन का १ नाम है ॥ ७ नप्त्री, पौत्री, सुतात्मजा ( भा० दी। ३ स्त्री ), 'नातिन' अर्थात् 'पुत्र या पुत्री की लड़की के ३ नाम है ॥ ८ याता ( =यातृ, स्त्री 'गोतिनी' अर्थात् 'पति के भाइयों की स्त्री का १ नाम है ॥ ९ प्रजावती भातृजाया (२स्त्री), 'भाई की स्त्रो, भौजाई' के २ नाम है। १० मातुलानी, मातुली (+मातुला । २ स्त्री), 'मामी' अर्थात 'मामा ( पिता का शाला ) की स्त्री के २ नाम है ॥ * "स्वक्षेत्रे संस्कृतायां तु स्वयमुत्पादयेद्धियम्। तमौरसंविधानोयारपुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥१॥ मनुः९। १६६ इति वचनास्परमार्यायामपि स्वस्माजाते पुत्रे नातिव्याप्तिः शङ्क था । "औरस १ क्षेत्रज २ दत्तक ३ कृत्रिम ४ गूढोत्पन्न ५ अपविद्ध ६ कानीन ७ सहोढ ८ क्रोत ९ पौनर्भव १० स्वयंदत्त ११ शौद्र (पाराशर) १२" इति दायादादायादवान्धवरूपदावविध पुत्रलक्षणं मनुस्मृती (९।१६६-१७८) द्रष्टव्यम् ।।

ननुष्यवर्ग: ६ मणिप्रभाब्याख्यासहितः । M १ पतिपत्न्याः प्रसूः श्वश्रूः २ श्वशुरस्तु पिता तयोः । ३ तुभ्राता पितृव्यः स्यात् ४ मातुओता तु मातुलः ॥ ३१ ॥ ५ श्यालाःत्युतिरः पल्याः ६ स्वामिना देवृदेवरौ । ७ स्वस्त्रीयो भागिनेयः स्यात् ८ जामाता दुहितुः पति ॥ ३२ ॥ पितामहः पितृपिता १० तत्पिता प्रपितामहः। ११ मातुर्मातामहावं १२ सपिण्डास्तु सनामयः ॥ ३३ ॥ १ श्वधूः (स्त्री), 'सास' अर्थात् पति या स्त्रीको माता' का १ नाम २ श्वशुरः (पु), 'ससुर' अर्थात् पति या स्त्रीके पिता का १ नाम है ।। ३ पितृव्यः (पु), 'चाचा' अर्थात् 'पिता के भाई का १ नाम है । ४ मातुलः (पु), 'मामा' अर्थात् 'माताके भाई का १ नाम है ६ श्यालः (+स्यालः। पु), 'शाला' अर्थात् स्त्रीके भाई का १ नाम है । ६ देवा (=देव), देवरः ( २ पु ), 'देवर' अर्थात् 'पतिके *छोटे भाई के २ नाम हैं। ७ स्वस्त्रीयः ( + स्वस्त्रियः, स्वस्त्रेयः), भागिनेयः (२ पु), भगिना' अर्थात् 'बहन के लड़के के २ नाम हैं । ८ जामाता (=जामातृ, पु), 'दामाद' का १ नाम ९ पितामहः, पितृपिता ( =पितृपितृ । २ पु), 'पिताके पिता के २ नाम हैं। १० प्रपितामहः (पु), परदादा' अर्थात् पितामह के पिता' का १ नाम है ॥ ११ मातामहः (पु), 'नाना' अर्थात् 'माताके पिता' का १ नाम है । ("इसी तरह 'प्रमातामहः (पु): 'परनाना' अर्थात् 'नानाके पिता' का १ नाम है" )॥ १२ सपिण्डः, सनाभिः ( २ पु ), सात पुस्तके भीतरवाले परिवार के २ नाम हैं ॥ * युक्तमिदं क्षो० स्वा० महे० मतम् । ग्रन्थकारमते तु 'पत्युतमात्रस्य मे नामनी (ए. स्युय॑छो भ्राता श्वशुर एवेति सुभूत्यादयः' इति भा० दी. आह ।। तिदुक्तं मनुना- "सपिण्डता तु पुरुषे सतमे विनिवर्तते।' इति मनु, ५॥३०॥ - - १६८ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ समानोदर्यसोदर्यसगय॑सहजाः समाः। २ सगाभवान्धवज्ञातिबन्धुस्वस्वजनाः समाः ॥ ३४ ॥ ३ शातेयं ४ बन्धुता तेषां क्रमाद्भावसमूहयाः । ५ धवः प्रियः पतिर्भर्ता ६ जारस्तूपपतिः समौ ॥ ३५ ॥ ७ अमृते जारजः कुण्डो ८ मृते भतरि गोलकः । । भ्रात्रीयो भ्रातृजो १० भ्रातृभगिन्यौ भ्रातुरावुभौ ॥ ३६ ॥ १ समानोदर्यः, सोदर्यः (+सोदरः, सहोदरः ), सगर्व्यः, सहजः (४ पु), 'सहोदर भाई' अर्थात् एक मातासे उत्पन्न भाई के ४ नाम हैं । २ सगोत्र., बान्धवः, ज्ञाति:, बन्धुः, स्वः ( यह सर्वनाम-संज्ञक है ), स्वजनः (६ पु), 'सगोत्र, अपने खास खान्दान' के ६ नाम हैं। ३ ज्ञातेयम् (न), 'जातियों धर्म या भाव' का १ नाम है । ४ बन्धुता (स्त्री)'बन्धुश्रोके समूह का १ नाम है ॥ ५ धवा, प्रिया, पतिः, भर्ता ( = भर्तृ । ४ पु), 'पतिः के ४ नाम हैं। ६ जारः, उपपतिः (२ पु), 'जार अर्थात 'अप्रधान पति' के २ नाम हैं। ७* कुण्डः (पु), 'पतिके जीते रहने पर जारसे पदा हुए लड़के का १ नाम है ॥ ch गोलकः (पु), 'पतिके मरने पर जारसे पदा हुए लडके' का १ नाम है। ९ भ्रात्रीयः (+भ्रातृव्यः), भातृजः (२ पु), 'भतीजा' अर्थात् 'माईके लड़के का १ नाम है। १० भ्रातृभगिन्यौ (भा० दी० मत से ), भ्रातरौ ( =भातृ। २ पु द्विव०), 'भाई-बहन के २ नाम हैं। ( "जब भाई नाम हैं। ("जब भाई और बहनको एक साथ कहना हो तब इसका प्रयोग होता है। इसी सरह "भार्यापती च तौ” (२॥ ६१३८) तक जानना चाहिये।) २ पु नि. - * तदुक्तम्- "परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलको । परयौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः" ॥१॥इति मनुः ३६१७४ मनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १६ % 3D १ मातापितरौ पितरौ मातरपितरौ प्रसूजनयितारौ। २ श्वश्रूश्वशुरौ श्वशुरौ ३ पुत्रौ पुत्रश्च दुहिता च ॥ ३७ ।। ४ दम्पती जम्पती जायापती भार्यापतोच तो। ५ गर्भाशयो जरायुः स्यादुल्वं च ६ कललेोऽखियाम् ॥ ३८ ॥ ७ सूतिमासो वैजननो ८ गर्भो भ्रूण इमो समौ । तृतीया प्रकृतिः शराढः क्लीबः पराडो नपुंसके ॥ ३ ॥ १ मातापितारी ( मातापितृ), पितरौ (=पितृ ), मातरपितरौ (=मातरपित), प्रसूजनयितारौ (=प्रसूजनयित ! ( ४ पु, नि० द्विव० ), 'माता और पिताके समुदाय' के ४ नाम है ॥ २ श्वश्रूश्वशुरौ, श्वशुरौ ( २ पु, नि० द्विव० ), 'सास और ससुर के समुदाय के २ नाम है। ३ पुत्री ( पु० नि० द्विव०), 'लड़का और लड़कीके समुदाय का १ नाम है। ४ दम्पती, जम्पती) (+२ स्त्री), जायापती, भार्यापती (४ पु, नि. दिव० ), 'पति और पत्नी के समुदाय के ४ नाम है ॥ ५ गर्भाशयः, जरायुः ( २ पु), उल्बम् ( + उल्वम् । न), 'गर्भाशय अर्थात् जिसमें गर्भ लिपटा रहता है उस चर्म के ३ नाम है ।। ६ कलल: (पुन ), 'वीर्य और शोणितके समुदाय का १ नाम है। ("किसीके मतसे 'गर्भाशय' आदि २-२ नाम उन अर्थोमें है, और, किसीके मतसे ४ नाम एकार्थक है")॥ ७ सूतिमासः, वैजननः ( २ पु), 'सन्तान पैदा होनेवाले ( नवे या दशवें) महीने के २ नाम है ॥ ८ गर्भ, भ्रूणः ( २ पु ), 'गर्भ यो गर्भस्थ जीव के २ नाम है। ९ तृतीया प्रकृतिः (+ तृतीयप्रकृतिः । स्त्री), शण्ढः ( + षण्डः, शण्डः, "नपुंसकम्" " इति पाठान्तरम् ॥ "शाल्मली मथिली मैत्री दम्पती जम्पती च सा" इत्युक्तेरिति बोध्यम् ॥ । तदुक्तं महर्षिणा याज्ञवल्क्येन- "नवमे दशमे वापि प्रबलैः सूतिमारुतः। निःसार्यते बाण इव यन्त्रच्छिद्रण सज्वरः" ॥१॥याश. स्मृ० ३८३ इति । भा० दी० तु अस्य तुरीयपादं 'जन्तुश्छिद्रेण सत्वरः' इत्येत्रमाह ।।

श्रदरकोषः। द्वितीयकाण्डे- - . १ . १ शिशुत्वं शैशवं बाल्यं २ तारुण्यं यौवनं समे ! ३ स्यात्स्थाविरं तु वृद्धत्वं ४ वृद्धसंघेऽपि वार्धकम् ॥ ४० ॥ पलितं जरसा शौकल्यं केशादौ ६ चिनला जरा। ७ स्थादुन्तानशया *डिम्भा स्तनपा च स्तनन्धयी ॥ ४२ ॥ बालस्तु क्यान्माणवको- पण्डः 1 ),क्लीबः, पण्डः (३ ),न पुंसकम् (न । ), न पुंसकम् (न । + पु), नपुंसक, हिजड़ा' के ५ नाम है ॥ १ शिशुत्वम् , शैशवम् , बाल्यम् ( ३ न ), 'लड़कपन, बाल्यावस्था के ३ नाम है। २ तारुण्यम् , यौवनम् ( ३ न ), 'जबानो, युवावस्था' के २ नाम हैं। ३ स्थाविरम् , वृद्धत्वम् (+वार्द्धकम् , वार्द्धक्यम् । २ न), 'बुढ़ापा' के २ नाम है। ४ वृद्धसंघः (भा० दी० मतसे । पु) वार्द्धकम् (+वाक्यम् । न ), 'वृद्धसमूह' के २ नाम है ॥ ६ पलितम् (न), 'वुढापा मादिसे बाल दाड़ो मूछ आदिके सफेद होने का १ नाम है ॥ ६ वित्रसा, जरा ( २ स्त्री), 'बुढीति के २ नाम है । ७ उत्तानशया, डिम्भा, स्तनपा, स्तनन्धयी ( ४ त्रि), 'दूध पीने वाली लड़की के ४ नाम हैं। ("स्त्रीलिङ्ग में रूपप्रदर्शनके लिये स्त्रीत्वको कहा गया है , स्त्रीत्व विवक्षित नहीं है। पुलिङ्ग में-उत्तानशयः, डिम्भः, स्तनपः, स्तनन्धयः (४ पु), 'दूध पीनेवाले लडके' के ४ नाम हैं, नपुंसकलिङ्गमें 'उत्तानश. यम्......., होता है । इसी तरह आगे जानना चाहिये" ) ॥ ८ बालः, माणक्कः, (माणवः।२ त्रि ), 'छोटे बच्चे के. २ नाम है, * "डिम्म' शब्द: प्राक् ( २।५।३८) पक्षिक्रमेणोक्तोऽप्यत्र मानुषक्रमेण पुनरुक्तः ।। पिण्ड: शण्डे-"(अने०सं० २।१२२ )इति, 'षण्डः कानन इडवरे' (अने० सं० २।१२९) ति घण्ढौ तु सौविदो। वन्ध्यपुंसीड्वरे क्लोबे-" (अने० सं २।१३०-२३१ ) इति च हेमचन्द्राचार्योन्तेरिस्यवधेवम् ॥ "अपत्ये कुत्सिते मूढे मनोरौत्सर्गिकः स्मृतः । नकारस्य च मूर्धन्यस्तेन सिद्ध्यति माणवः ॥१॥ एवमुकरीत्या निष्पन्नान्माणवशब्दात्स्वार्थे कनि 'माणत्रक शब्दसिद्धिर्शया ॥ .

मनुष्यवर्ग: ६] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। २०६ १ वयस्थस्तरुण युवा । २ प्रवयाः स्थविरो वृद्धो जीना जीणों जरन्नपि ॥ ४२ ॥ ३ वर्षीयान्दशमी ज्यायान् ४ * पूर्वजस्त्वनियोऽग्रजः । ५ जघन्यजे कनिष्ठयवीयोऽवरजा वरजानुजाः ॥४३॥ ६ अमांसो दुर्बलश्छाता ७ बलवान्मांसलोंऽसलः। * तुन्दिलस्तुन्दिभस्तुन्दीबृहत्कुक्षिः पिचण्डिलः ॥ ४४ ॥ १ वयस्थः, तरुणः, युवा (-युवन । + युवकः । ३ त्रि), 'जवान युवा के ३ नाम हैं। २ प्रवयाः ( = प्रवयस् ), स्थविरः, वृद्धः, जीनः, जीर्णः, जरन् ( =जरन् । ६ नि ), 'बूढ़े' के ६ नाम हैं । ३ वर्षीयान् ( = वर्षीयस् ), दशमी (= दशमिन् ), ज्यायान् ( =ज्या- यस् । ३ नि ), 'बहुत बूढ़े के ३ नाम है ॥ ४ पूर्वजः, अग्रियः (+अग्रीयः, अग्रयः, अग्रीमः, अग्रिमः ), अग्रजः (३ त्रि), 'बड़े भाई या अपनेसे पहले जन्मे हुए' के ३ नाम हैं। ६ जघन्यजः, कनिष्ठः (+ कनीयान् = कनीयस् ), यवीयान् ( = यवी- यस् । + यविष्ठः ), अवरजः, अनुजः ( ५ त्रि ), 'छोटे भाई या अपनेसे पीछे जन्मे हुए' के ६ नाम है॥ ६ अमांसः, दुईलः, छातः ( +शातः । ३ नि ), 'दुर्बल कमजोर' के ३ नाम है। १ ७ बलवान् ( = बलवत् ), मांसलः, अंललः (३ त्रि), 'बलवान् । मजबूत' के ८ तुन्दिल: (+तुण्डिला, तुन्दितः, तुण्डितः, तुन्दिकः, उदरिलः), तुन्दिभः (+तुण्डिमः ), तुन्दी ( =तुन्दिन । + तुण्डी = तुण्डिन् ), बृहत्कुक्षिः, पित्र. ण्डिल: (+पिचिण्डिलः । ६ त्रि), 'तोंदवाले, बड़े पेट वाले के ६ नाम हैं ।। * 'पूर्वजस्त्वग्रीयोऽयजः' इति पाठभेदः । किन्वत्रच्छन्दोभंगोऽपि वर्तते ।। । 'दुर्बलश्शातः' इति पाठान्तरम् ॥ + 'तुन्दिलस्तुन्दि कस्तुन्दी बृहत्कुक्षिः पिचिण्डिल:' इति पाठान्तरम् ।।

२०२ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ अवटीटोऽवनाटश्चावभ्रटो नतनासिके । २ केशवः केशिका केशी ३ बलिनो बलिभः समौ ॥ ४५ ॥ ४ * विकलाङ्गस्त्वपोगण्डः ५ खो हस्वश्च वामनः । ६ खरणा: स्यात्खरणलो ७ विग्रस्तु गतनासिकः ॥ ४६ ॥ खुरणाः स्यात्खुरणसः प्रक्षुःप्रगतजानुकः । १ अवटीटः, अवनाटा, अवचटः, नतनालिका (४ त्रि), महे० मयसे नकचिपटा' अर्थात् 'चिपटी नाकवाले के ४ नाम है। भा० दी० मतसे 'नतनासिक' शब्द के पर्याय नहीं होने से ३ ही नाम है " )॥ २ केशवः ( + केशवान् = केशवत् ), केशिकः, केशी ( = केशिन् । ३ त्रि), 'सुन्दर केशवाले के ३ नाम है ॥ ३ बलिनः, बलिभः ( २ त्रि) 'जिसका चमड़ा सिकुड़ गया हो उस' के २ नाम हैं। ४ विकलाङ्कः, अपोगण्डः (+पोगण्डः । २ त्रि), 'कम या अधिक अङ्गवाले के २ नाम है ॥ ६ खवः (+खर्वः, निखर्वः), हस्वः, वामनः (३ त्रि), 'बौना मन' के १ नाम है। ६ खरणाः (= खरगस् ), खरणसः (२ त्रि), 'नुकीली नाकवाले के २ नाम हैं। ७ विग्रः ( + विखुः, विखः, विख्या, विखः, विख्रुः ), गतनासिक: (+विनासिकः । २ त्रि), 'नकटा' के २ नाम है ॥ ८ खुरणाः ( = खुरणस् ), खुरणसः ( २ त्रि), 'पशुके खुरके समान ताकवाले के २ नाम है। ९ प्रजुः (+प्रज्ञः 1 ), प्रगत जानुकः (२ त्रि), 'रोगसे या स्वभा. वतः विरल जबावाले' के २ नाम है। वा. . .. . .. * विकलांगस्तु पोगण्डः खवों' इति पाठान्तरम् । तदुक्तं भानुजिदीक्षितेन- प्रक्षुः संहतजानु: स्यात्प्रज्ञोऽन्यत्रैव दृश्यते ॥” इति साइसाङ्कः, इति ।

मनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। २०३ १ ऊर्चक्षुरूर्वजानुः स्यात् २ लक्षुः संहत जानुकः ॥ ४७ ॥ ३ स्यादेडे बधिरः ४ कुब्जे गडुलः ५ कुकरे कुणिः । ६ पृश्निरल्पतनौ ७ श्रोणः पङ्गो = मण्डस्तु मुण्डिते ॥ ४ ॥ है बलिरः केकरे १० खोडे खा ११ स्त्रिषु जरावराः। १२ जडुलः कालकः पिप्लु:-- १ अर्ध्वजुः ( +ऊर्ध्वज्ञः * ), ऊर्ध्वजानुः ( २ त्रि), बैठने पर जिसकी जङ्घा ऊपरको उठी रहती है। उस' के २ नाम है ॥ २ संजुः ( + संज्ञः 1 ), संहतजानुकः ( २ नि ), 'सटे हुए जङ्घावाले' के २ नाम है। ३ एडः, बधिरः ( २ त्रि), 'बहिरा के २ नाम हैं। ४ कुब्जः ( + न्युनः), गडुलः (+गडुः । २ त्रि) 'कूबड़ा' के २ नाम है। ६ कुकरः, कुणिः (कृणिः । २ त्रि), 'टेढ़े हाथवाले के २ नाम है । ६ पृश्निः (+पृष्णिः ), अल्पतनुः (२ त्रि), 'छोटे शरीरवाले के २ नाम है ॥ ७ श्रोणः, पङ्गुः (२ त्रि), 'पङ्गु' के २ नाम है ॥ ८ मुण्डः, मुण्डितः ( २ त्रि), 'मुण्डन कराये हुए' के २ नाम हैं । ९ बलिरः (+ बलिरः), केकर (+ काचरः, कावरः । २ त्रि), ऐंच देखनेवाले' अर्थात् 'एक भौंको ऊचा और एक भौंको नीचाकर देखने वाले के २ नाम है ॥ १० खोडः (+खोलः, खोरः), खञ्जः (२ त्रि ), 'लँगड़ा' के २ नाम हैं। ११ 'जरा' (२।६।४१ ) शब्दके बादसे यहां तक सब शब्द त्रिलिङ्ग है। ("उनमें ग्रन्थकारके कथनानुसार सब शब्दों को प्रायः पुंल्लिङ्गमें देकर लिङ्गनिर्देश त्रिीलङ्ग लिखा गया है, अतः स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गाके रूपको स्वयं समझ लेना चाहिये")॥ १२ जडुलः ( +जटुलः ), कालक, पिप्लुः (पु), 'लहसन' अर्थात 'जन्म-कालसे ही उत्पन्न शरीरके चित-विशेष के ३ नाम है। भित्र मा. दी०- "संज्ञः संहतजानौ च भवेत्संशोऽपि तत्र हि । ऊर्ध्वजरूर्वजानुः स्यादृध्वज्ञोऽप्यूर्ध्वजान के" ॥ १॥ इति साहसाङ्कः, इति ।।

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- ३ तिलकस्तिलकालकः ॥ ४६ २ अनामयं स्यादारोग्यं ३ चिकित्सा रुकप्रतिक्रिया । ४ भेषजौषधभैषज्यान्यगदो जायुरित्यपि ॥ ५० ॥ ५ स्त्री रुग्रुजा चोपतापरोगव्याधिगदामयाः। ६ क्षयः शोषश्च यक्ष्मा च ७ प्रतिश्यायस्तु पीनसः ॥ ५१ ॥ = स्त्री क्षुक्षुतं क्षवः पुंसि : * कासस्तु क्षवथुः पुमान् । १० शोफस्तु श्वयथुः शोथः११ पादस्फोटो विपादिका । ५२ ॥ १२ किलोलसिध्मे-- १ तिलकः, तिलकालकः ( २ पु), 'तिल' अर्थात् 'काली तिलके समान देह के चिह्न-विशेष के २ नाम है ॥ २ अनामयम् , आरोग्यम् ( २ न ), 'नीरोग' के २ नाम है ॥ चिकित्सा, रुकप्रतिक्रिया (२ स्त्री), 'चिकित्सा' अर्थात् 'रोगको करने के लिये दवा आदिके सेवन करने के २ नाम है ॥ ४ भेषजम् , औषधम् , भषज्यम् ( ३ न ), अगदः, जायुः ( २ पु), 'दवा के ६ नाम है। ९ रुक् (= रुज् ), रुजा ( २ स्त्री), उपतापः, रोगः, व्याधिः, गदः, आमयः ( + आमः । ६ पु), 'रोग' के ७ नाम है । ६ क्षयः, शोषः, यक्ष्मा ( = यक्ष्मन् । + राजयक्ष्मा=राजयक्ष्मन् । ३पु), 'राजयक्ष्मा रोग के ३ नाम है ॥ ७ प्रतिश्यायः ( + प्रतिश्या ), पीनसः ( + आपीनसः । २ पु) 'पी नस रोग के २ नाम है। ८ क्षुत् (स्त्री), क्षुतम् (न), क्षवः (पु), 'छौंक' के ३ नाम है। ९ कासः (+काशः ), क्षवथुः ( २ पु ), 'खाँसी' के २ नाम है ॥ १० शोफः, श्वयथुः, शोथः (३ पु), शोथ, सूजन' के ३ नाम हैं ११ पादस्फोटः (पु), विपादिका (स्त्री), 'बिवाय' अर्थात् 'पैरके तलवे में फटनेवाले रोग-विशेष के २ नाम है। १२ किलासम् , सिध्मम् ( + सिध्मली । २ न), 'सेहुँआ, सिहुला' के.२ नाम है। * 'काशस्तु क्षवथुः पुमान् इति पाठान्तरम् ॥

मनुष्यवर्गः ६] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । २०५ ७ . १ कच्छ्वां तु पाम पामा विचिका । २ कण्डूः खर्जुश्च कण्डूया ३ विस्फोटा*पिटकः स्त्रियाम् ॥ ५३ ॥ ४ व्रणोऽस्त्रियामीर्ममरुः क्लीबे ५ नाडीव्रणः पुमान् । ६ कोठो मण्डलकं ७ कुष्ठश्वित्रे - दुर्नामकार्शली ॥ ५४ ॥ ६ मानाहस्तु निबन्धः स्याद् १० ग्रहणी रुक्प्रवाहिका। ११ प्रच्छर्दिका वमिश्च स्त्री पमांस्तु वमथुः समाः॥ ५५ ॥ १ कच्छ, पामा (=पामन् , + न ), पामा, विचिका (४ स्त्री), गीली खुजली या खसरा के ४ नाम हैं । २ कण्डूः ( + कण्डुः ), खजूः, कण्डूया ( ३ स्त्री), खाज या खुज- लाहट के ३ नाम हैं। ३ विस्फोटः, पिटकः (२ पु स्त्री। स्त्री में विस्फोटा, पिटिका । +विटि- का 1+ २ त्रि), 'फोड़ा के ३ नाम हैं ॥ ४ व्रणः (पु न), ईर्मम् , अरुः (= अरुन २न), 'घाव,त्रण के ३ नाम हैं। ९ नाडीव्रणः (पु), 'सइन' अर्थात् 'सर्वदा पीब बहानेवाले व्रण-विशेष का १ नाम है। ६ कोठः (पु), मण्डलकम् (न), भा० दी० मतसे 'गजकर्ण रोग अर्थात् 'जिससे शरीरमें गोले २ चकत्ते पड़ जाय उस रोग के २ नाम हैं। ७ कुष्ठम् , श्वित्रम् (न), भा० दी. मतसे 'सफेद कोढ़' अर्थात् 'चरक फूटने के २ नाम हैं। ("महे० मतसे 'कोठा, ..., ४ नाम 'सफेद कोढ़ ही के हैं")॥ ८ दुर्नामकम् , अर्शः ( = अर्शस् । + अर्शम् = अर्श । २ न), 'बवा- सीर के २ नाम हैं॥ ९ आनाहः, निबन्धः ( + निवन्धः । २ पु), 'जिसमें मल और मूत्र रुक जायं उस रोग के २. नाम हैं । १० ग्रहणी (+ ग्रहणिः), प्रवाहिका (२ स्त्री), 'संग्रहणी' के २ नाम हैं। ११ प्रच्छर्दिका, वमिः (+वमी, स्त्री वमः, पु । २ स्त्री), वमथुः (पु), 'वमन, कया के ३ नाम * "पिटकस्त्रिषु" इति भा० दी० क्षी० स्वा० सम्मतं पाठान्तरम् ।। उल्टी, ॥

२०६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्हे- १ १ व्याधिभेदा विद्रधिः स्त्री ज्वरमेहभगन्दराः। २ श्लोपदं पादवल्मीकं ३ केशघ्नस्त्विन्द्रलुप्तका' (१४) ४ अश्मरी मूत्रकृच्छु स्यात् ५ पूर्व शुक्रावधेस्त्रिषु ॥ ५६ ॥ ६ रोगहार्यगदङ्कारो भिषग्वैद्यौ चिकित्सके । वातों निरामयः कल्य = उल्लाघो निर्गतो गदात् ॥ ५ ॥ विद्रधिः ( स्त्री), ज्वरः, मेहः ( + प्रमेहः ), भगन्दरः ( ३ पु ), 'पेट आदि कोमल स्थानमें होनेवाला फोड़ा, ज्वर, प्रमेह और भगन्दर (गुदाके बगल में होनेवाला व्रण-विशेष ) का क्रमशः १-१ नाम है। ये सब 'व्याधिके भेद हैं । २ [श्लीपदम् , पादवल्मीकम् ( २ न), 'पीलपांव' अर्थात् 'जिसमें पैरके घुटने के नीचेका हिस्सा फूलकर बहुत मोटा हो जाय उस रोग के २ नाम हैं ] ॥ ३ [ केशघ्नः, इन्द्रलुप्तकः (२ न), 'टुनकी लगना' अर्थात् 'जिससे शिर आदि के बाल झड़ने लगें उस रोग' के २ नाम हैं ] ॥ ४ अश्मरी (स्त्री), मूत्रकृच्छ्रम् (न), 'मूत्रकृच्छ' अर्थात् 'जिससे पेशाब करने में अत्यन्त कष्ट हो उस रोग' के २ नाम हैं। ५ यहांसे आगे 'शुक्रम् (२।६।६२ ) के पहलेवाले सब शब्द ब्रिलिङ्ग हैं। ६ रोगहारी ( =रोगहारिन् ), अगदङ्कारः, भिषक् ( =भिषज् ), वैद्यः, चिकित्सकः (५), 'वैद्य, डाक्टर, कविराज, हकीम आदि दवा करने वाले के ५ नाम हैं। ("क्षी० स्वा० मतसे 'रोगहारी, अगदवार' ये २ नाम 'भौषधा के भी हैं")॥ ७ वार्तः (+वान्तः ), निरामयः, कल्यः (+नीरोगः । ३ त्रि), महे० मतसे 'नीरोग के ३ नाम हैं । ८ उल्लाघः (त्रि), महे० मतसे 'रोगसे शीघ्र हो छुटे हुए। नाम है। ("भा० दी० मतसे 'वातः,........, ४ नाम 'नीरोग के ही हैं")। का १ * अयं क्षेपकांशः क्षी० स्वा० व्याख्यायामुपलभ्यत इत्यवधेयम् ॥ + 'वान्तो निरामयः' इति पाठान्तरम् । अत्र मूलपाठ एव युक्तः, अग्रे ( नानार्थवर्ग ) "वात फल्गुन्यरोगे च त्रिषु' (२२७६) इति स्वयं वक्ष्यमाणत्वात् , -वार्तं त्वारोग्यारोग- फल्गुषु' (अने० संग्र० २११९४ ) इति हैमोक्तश्चेत्यवधेयम् ॥

Home मनुष्यवर्गः ६ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । २०७ १ ग्लानग्लास्नू २ श्रामयावी विकृतो व्याधितोऽपटुः । आतुरोऽभ्यमितोऽभ्यान्तः ३ समौ पामनकच्छुरौ ॥ ५ ॥ ४ दद्रुणो दगुरोगी स्या ५ दर्शोरोगयुतोऽशंसः। ६ वातकी वातरोगी स्यात् ७ सातिसारोऽतिसारकी ॥ ५४॥ = स्युः क्लिन्नाक्षे * चुल्लचिल्लपिल्लाः क्लिन्नेऽदिण चाप्यमी। है उन्मत्त उन्मादवति १० श्लेष्मलः श्लेष्मणः कफी ॥६० ॥ १ ग्लानः, ग्लास्नुः (२ त्रि), 'रोगसे खिन्न' के २ नाम हैं । २ आमयावी (=आमयाविन ), विकृतः, व्याधितः, अपटुः, आतुरः, अभ्यमितः, अभ्यान्तः ( + रोगी=रोगिन् । ७ त्रि), 'रोगी के ७ नाम हैं !! ३ पामनः (पामरः ), कच्छुः ( २ त्रि), 'मोदी खुजलीवाले या खसरा रोगवाले के २ नाम हैं । द१रोगी=दर्दुरोगिन् । २ त्रि), 'दाद नोगवाले के २ नाम हैं । ५ अर्शोरोगयुतः (भा० दी०), अर्शसः (२ त्रि), 'बवासीर रोग- वाले के २ नाम हैं। ६ वातकी ( =वातकिन् ), वातरोगी ( = वातरोगिन् । २ नि ), वात- रोगवाले के २ नाम हैं । • सातिसारः, अतिसारकी ( =अतिसारकिन् । + अतीसारकी =अती- सारकिन् । २ त्रि), 'अतीसार रोगवाले के २ नाम हैं । ८ क्लिन्नाक्षः ( महे०), चुल्ला, चिल्ला, पिल्लः (४ त्रि), कीचर से युक्त आँखवाले' के ४ नाम हैं। प्रथम 'क्लिन्नाक्ष' शब्दको छोड़कर शेष ३ नाम (चुल्लम् , चिल्लम् , पिल्लम् ; ३ न), कीचरसे युक्त आँख के हैं। ("चुल्लः, चिल्लः, पिल्लः; ३ नि ), 'आँखसे कीचर निकलनेवाले रोग-विशेष के भी ३ नाम हैं")॥ ९ उन्मत्तः, उन्मादवान् ( =उन्मादवत् । + उन्मादी= उन्मादिन् । २ त्रि), 'पागल, उन्माद के रोगी के २ नाम हैं । १० श्लेष्मला, श्लेष्मणः, कफो ( = कफिन् । ३ नि ), 'कफवाले रोगी के ३ नाम हैं । *"चुल्लः चक्षुरोगविशेषः, तद्योगाच्चुल्लं चक्षुः । चुल्लचक्षुश्वाच्चुलः परुषोऽपीत्यवधेयम् ।।

२०४ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ न्युजो भुग्ने रुजा २ वृद्धनाभौ * तुण्डिलतुण्डिभौ। ३ किलासी सिमलोऽन्धोऽदङ ५ मूलि वर्तमूच्छिता ॥ ६ ॥ ६ शुक्रं तेजोरेतसी च बीजवीयन्द्रियाणि च । ७ मायुः पित्तं ८ ककः श्लेष्मा स्त्रियां तु त्वगसृग्धरा ॥ २ ॥ १० पिशितं तरसं मांसं पललं क्रव्यमामिषम् । ११ उत्तप्तं शुष्कमांसं स्यत्तद्वल्लूरं त्रिलिङ्गकम् ॥ ६३ ॥ १ न्युजः (त्रि), 'रोगसे कुबड़ा' का १ नाम है ॥ २ वृद्धनाभिः, तुण्डिल: (+तुन्दिलः ), तुण्डिभः (+तुन्दिभः । ३ त्रि), 'ढोंढए अर्थात् 'कब्ज आदिके कारण बढ़े हुए नाभिवाले' के ३ नाम हैं। ३ किलासी ( = किलासिन् ), सिधमलः ( २ त्रि), "सिहुला, सहुमा या पपड़ीवाले रोगी के २ नाम हैं । ४ अन्धः, अहक् ( = अदृश् । २ त्रि), 'अन्धा, सूर' के २ नाम है ॥ ५ मूर्छालः, मूर्तः, मूच्छितः (३ त्रि), मूळ या मृगी रोगवाले' के ३ नाम है ॥ ६ शुक्रम् , तेजः ( = तेजस् ), रेतः ( = रेतम् ), बीजम् ( + वीजम् ), वीर्यम् , इन्द्रियम् (६ न,) 'वीर्य अर्थात् 'मनुष्यके शरीरस्थ धातुके ६ नाम है । ७ मायुः (पु), पित्तम् (न), 'पित्त' के २ नाम है ॥ ८ कफः, श्लेष्मा ( = श्लेष्मन् । २ पु ), 'कफ' के २ नाम है ॥ ९ त्वक् ( = त्वच् ।+ त्वचः, पु; + त्वचा, स्त्री), असग्धरा ( + अस ग्धारा । २ खी), 'चमड़ा के २ नाम हैं । १० पिशितम् , तरसम् , मांसम् , पललम् , ऋव्यम् , आमिपम् ( ६ न), 'मांस' के ६ नाम है। ११ उत्तप्तम् , शुष्कमांसम् (२ न), वल्लूरम् (+ वल्लुरम् । त्रि), 'सूखे मांला के ३ नाम है ॥ "तुन्दिलतुन्दिभौ" इति पाठान्तरम् । अत्र मूलपाठ एव समीचीनः,यतः 'तुण्डिरुन्नतना- भिस्तुन्दिस्तु जठरः' इति क्षी० स्वा० उक्त्या वृद्धनामियुक्तस्यैव पर्यायतौचित्यप्रतीतेः ।। अत्र नैरुक्ताः-"मांसभक्षयितामुत्र यस्य मांसमिदाभयहम् एतन्मांसस्य मांसत्वे निरुक्तं मुनिरब्रवीत् ॥ १॥ इति क्षी० स्वा० ॥ भ ननुप्यवर्गः ६] मणिप्रभाध्याख्यासहितः । , १ धिरेऽसृग्लोहितास्त्ररक्तक्षतजशोणितम् । २ जुकामांसं ३ हृदयं हन् ४ मेदस्तुपा वला ॥ ६४ ॥ ५ पश्चाद्ग्रीवाशिरा मन्या ६ नाडो तु धमनिः * शिरा । तिलक लोम मस्तिष्कं गोद किट्ट मलोऽस्त्रियाम् ॥ ५ ॥ १ रुधिरम् , असृक् ( = असृज ), लोहितन् , अस्त्रम् , रक्तम् , क्षतजम् , शोणितम् ( ७ न ), 'खून के ७ नाम हैं । २ बुक्का (स्त्री+बुक्का = बुक्कन् , पु I + बुक्का,वृक्का; २ स्त्री), अयमांसम् (न। + बुक्कामालम् , न) 'कलेजा' अर्थात् 'हृदयके भीतरवाले कमलके समानाकार मांस-पिण्ड-विशेष के २ नाम है। ३ । हृदयम् , हृत् ( = हृदू । २ न), 'हृदय' के २ नाम है। { बुक्का,......, ४ नाम 'हृदय' के हैं किसीका यह भी मत है")|| ४ सेदः ( = मेदस् । + मेवः ! न ) वपा, वसा ( २ स्त्री ), 'चर्बोके ३ नाम है। ६ मन्या (स्त्री), गर्दनके पीछेवाले नस' का १ नाम है ॥ ६ नाडी, धमनिः ( +धमनी), शिरा ( +सिरा । ३ स्त्री), 'नल' के ३ नाम है॥ ७ तिलकम् , क्लोम ( =कलोमन् । ३ न ), 'पेट में जल रहने के स्थान' के २ नाम है। ८ मस्तिष्कम् (+मस्तिकम् ), गोर्दम् ( + गोदः, पु । २ न ), 'दि. माग, मस्तिष्क, माइण्ड' के २ नाम है ।। ९ किष्टम , (न) मलम् (पुन ), 'नाक, कान आदिके बारह मल' के २ नाम है ।। * "सिरा" इति पाठान्तरम् ।। तदुक्तन्- "एमकोशप्रतीकाशं रुचिरं चाप्यधोमुखम् । हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत् ॥ १॥ इति ।। * 'पद्मकोशप्रतीकाशम...' इत्यनुरोधादिदमेव समीचीनं प्रतिभाति ।। तदुक्तं मनुना- "वसाशुक्रमसूङ्मज्जा मूत्रविट वाणकर्णविट् । श्लेष्माश्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृणां मला:" ॥ १ ॥ इति मनुः ५:१३५ - २१० अमरकोषः। - [द्वितीयकाण्डे- १ अन्त्रं पुरीतद् २ गुल्मस्तु प्लीहा पुंस्य३थ वस्नसा । स्नायुः स्त्रियां ४ कालखण्डयकृती तु समे इमे ॥ ६६ ॥ ५ सृणिका स्यन्दिनी लाला ६ दूषिका नेत्रयोर्मलम् । ७ 'नासामलं तु सिङ्घाणं - पिञ्जूषः कर्णयोर्मलम्' (१५) मूत्र प्रस्ताव १० उच्चारावस्करौ शमलं शकृत् ।। ६७ ॥ * पुरीषं गूथवर्चस्कमस्त्री विष्ठाविशौ स्त्रियौ। १ अन्त्रम् ( + आन्त्रम् ), पुरीतत् ( २ न ), 'अँतड़ी के २ नाम हैं। २ गुल्मः, प्लीहा (=प्लोहन् । + प्लीहा=प्लीहा, स्त्री । २ पु), 'गुल्म रोग' अर्थात् 'हृदयके वांये कोखमें होनेवाले मांस-पिण्ड-विशेष' के २ नामह॥ ३ वस्नसा, स्नायुः ( २ स्त्री), 'प्रत्येक अङ्ग उपाङ्गके जोड़के नस' के २ नाम हैं। ४ कालखण्डम् (+कालखञ्जम् ), यकृत् (२ न), 'यकृत्' अर्थात् 'हृदयके दाहिने कोखमें होनेवाले मांस-पिण्ड-विशेष' के २ नाम हैं । ६ सृणिका (+सृणीका ), स्यन्दिनी, लाला (३ स्त्री), 'लाए के ३ नाम हैं। ६ दूषिका (+दूषीका । स्त्री), 'कचर' का १ नाम है ॥ ७ [ नासामलम् , सिङ्घाणम् ( २ न ), 'नकटी, नेटा' अर्थात् 'नाकके मैल के २ नाम है ] ॥ ८ [ पिञ्जूषम् (न), 'खोंट' अर्थात् 'कानके मैल' का १ नाम है ॥ ९ मूत्रम् (न), प्रस्तावः (पु), 'पेशाब' के २ नाम है ॥ १० उच्चारः, अवस्करः (२ पु), शमलम् . शकृत , पुरीषम् ( ३ न), १ - अत्र भा० दी० तु 'कर्णविण्मूत्रविण्नखाः' इत्येवं तद्भिन्नमेव द्वितीयचरणमाहेत्यवधेयम् ॥ प्रसङ्गादेतेषां निर्गमस्थानानि गरुडपुराणोक्तानि लिख्यन्ते- "द्वारद्वादशभिभिन्नं किटं देहाद्वहिः स्त्रवेत् । कर्णाक्षिनासिका जिह्वा दन्ता नाभिर्नखा गुह्यं शिरा वपुलॊम मलस्थानानिाचक्षते ॥ इति ग० पु. १५।६०-६१ ॥ * "पुरीषं गूथं वर्चस्कमस्त्री विष्ठाविषौ स्त्रियो” इति "गूथं पुरीषं वर्चस्कमस्त्री विष्ठाविषी स्त्रियौ इति च क्रमशः क्षी० स्वा० भा० दी० सम्मते पाठान्तरे ।। गुदम् ॥

मनुष्यवर्गः ६ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ स्यात्कपरः कपालोऽस्त्री २ कोकसं कुल्यमस्थि च ॥ ६८ ॥ ३ स्याच्छरीरास्थिन कङ्कालः ४ पृष्ठास्थिन तु कशेरुका। ५ शिरोऽस्थनि करोटिः स्त्री ६ पास्थिनि तु पर्युका ॥ ६ ॥ ७ अङ्गं प्रतीकाऽवयवोऽपघनोऽथ कलेवरम् । गात्रं वपुः संहननं शरीरं वर्म विग्रहः ॥ ७० ॥ कायो देहः क्लीवपुंसोः स्त्रियां मूत्तिस्तनुस्तनूः । 8 पादागं प्रपदं १० पादः * पदनिश्चरणोऽस्त्रियाम् ॥ ७१ ॥ गूथम् , वर्चस्कम् ( २ पु न ), विष्ठा, विट् ( =विश् । + विट् = विष् । २ स्त्री), 'विष्ठा, पाखाना' के नाम है ॥ १ कपरः (पु), कपालः (पुन ), 'कपाल' के २ नाम है ॥ २ कीकसम् , कुल्यम् , अस्थि (३ न ), 'हड्डो के ३ नाम है ॥ ३ + शरीरास्थि (न), कङ्कालः (+करङ्कः । पु), 'कङ्काल, उटरी का१नाम ४ + पृष्ठास्थि (न), कशेरुका (+कशारुका । स्त्री), रीढ़ अर्थात 'पीठके बीचकी हड्डी' का १ नाम है । ६ + शिरोऽस्थि (न), करोटिः ( + करोटी। स्त्री), 'खोपड़ी का १ नाम है। ६ + पाश्र्वास्थि (न), पशुका (+ पशुः । स्त्री ), 'पँजड़ी' का १ नाम ७ अङ्गम् (न), प्रतीकः, अवयवः, अपधनः ( ३ पु), 'शरीरके अङ्गा के ४ नाम हैं। ( "जैसे-हाथ, पैर, शिर, मुख,.......) ८ कलेवरम् , गात्रम् , वपुः (=वपुष् ), संहननम् , शरीरम् , वर्म =वर्मन् । ६ न), विग्रहः, कायः (२ पु), देहः (पुन), मूर्तिः, तनुः (+ तनुः = तनुस् ), तनूः ( ३ स्त्री), 'शरीर, देह' के १२ नाम है । ९ पादानम् , प्रपदम् (न), 'पैरका चौवा' अर्थात् 'परके आगे. वाले हिस्से के २ नाम हैं। १० पादः ( + पदः), पत् (प), अधिः (३ पु), चरणः (पुन), 'पैरए के ४ नाम है ॥ है . * "पदोऽङ घ्रिश्चरणोऽस्त्रियाम्" इति क्षी० स्वा० व्याख्यानुसारि पाठान्तरम् ॥

अमरकोषः। (द्वितीयकाण्हे- १ तद्ग्रन्थी धुटिके गुल्फो २ पुमान्पाणिस्तयोरधः । ३ जङ्घा तु प्रस्ता ४ जानूरुपर्वाष्ठीवदस्त्रियाम् ॥ ७२ ॥ ५ सक्थि कलीबे पुमानूरुदस्तत्सन्धिः पुंसि वसणः । ७ गुदं स्वानं पायुर्ना - बस्ति भेरधो द्वयो ।। ७३ ॥ कटो ना श्रोणिफलकं १० कटिः श्रोणिः ककुझती। ११ पश्चानितम्बः स्त्रोकटयाः १९ क्लीबे तु जघनं पुरः ॥ ४ ॥ १३ कूपको तु नितम्बस्थौ द्वयहीने कुकुन्दरे । . १ धुटिका (स्त्री), गुल्फः (पु), 'पैरकी घुट्ठी' के २ नाम है । २ पाणिः (पु), 'परकी घुट्ठीके नीचेवाले हिस्से' का १ नाम है । ३ जङ्घा, प्रस्ता (२ स्त्री) 'जंघाके २ नाम हैं। ४ जानु, ऊरुपर्वा ( = ऊरुपर्वन् । २ न), अष्ठीवत् (पु न । मा. दी. मतसे ३ पु न ), 'घटना, ठेहुन के ३ नाम है ॥ ५ सक्थि ( = सक्थिन् न), ऊरुः (पु), 'घुटनेके ऊपरवाले हिस्से के २ नाम हैं । ६ वसणः (पु), घुटना तथा उसके ऊपरके जोड़ का १ नाम है ॥ ७ गुदम् , अपानम् ( २ न), पायुः (पु), 'पाखानाके रास्ता' के २ नाम है। ८ बस्तिः (पु स्त्री ), 'मूत्राशय का १ नाम है ॥ ९ कटः (पु), श्रोणिफलकम् (न, भा०दी०), 'कमरके दोनों बंगल' के २ नाम है। १० कटिः (+ कटी ), श्रोणि: (+श्रोणी), ककुद्मती ( ३ स्त्री ) 'कमर' के ३ नाम है । ("अन्याचार्यों के मतसे 'कटः,........१६ नाम 'कमर के है")॥ ११ नितम्बः (पु) 'स्त्रियोंके चूतड़' का १ नाम है ॥ १२ जघनम् (न), 'स्त्रियोंके जंघा' का १ नाम है । १३ + कूपकः (पु), कुकुन्दरम् (+कैकुन्दरम् । न), चूतड़ पर पृष्ट-वंशके नीचेवाले गढ़े के २ नाम हैं ।

हैं मनुष्यवर्गः ६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । १ स्त्रियां स्फिचौ * कटिमोथाखुपस्थो वदयमाणयोः ॥ ७५ ॥ ३ भगं योनिद्धयोः ४ शिश्नो मेढ़ो । मेहनशेफसी। ५ नुकोऽण्डकोशा दृषणः ६ पृष्ठवंशाधरे त्रिकम् ॥ ७६ ॥ पिचण्डकुक्षी जठरोदरं तुन्दं स्तनौ कुचौ। 8 चूदुकं तु कुचागं स्यात् १० न ना कोडं भुजान्तरम् ॥ ७ ॥ १ स्फिक् ( = स्फिछ, स्त्री), कटिप्रोथः ( + कीमोथा, कटिः, प्रोथा, प्रोहः । पु), 'कुल्हा' अर्थात् 'कमर में होने वाले मांस-पिण्ड' के २ नाम २ उपस्थः (पु न ), 'भग मौर लिङ्ग अर्थात् 'स्त्री या पुरुषके पेशाब करनेके रास्ता' का १ नाम है ॥ ३ भगम् (न), योनिः (पु स्त्री), 'स्त्रीक पेशाब करनेके रास्ता' के २ नाम हैं। ४ शिश्नः, मेद्रः (२ पु), मेहनम् , शेफः (= शेफस् । + शेपः =शेपस् , शेफ: = शेफ; शेषः =शेप || । २ न ), 'पुरुषके पेशाब करनेके रास्ता के ४ नाम हैं। ६ मुष्कः, अण्डकोशः ( +अण्डकोषः), वृषगः (३ पु), 'अण्डकोश, फोता के ३ नाम है ॥ ६ विकम् (न), 'पीठको रीढ़के माधारपर तीन हड्डियों के जोड़ वाले स्थान-विशेष' का १ नाम हैं ॥ ७ पिचण्डः (+पिचिण्डः), कुक्षिः (२ पु), जठरम् (+पु), उदरम् , तुन्दम् (३ न ), 'पेट' के नाम हैं। ८ स्तनः, कुचः ( + पयोधरः, वक्षोजः । २ पु ), 'स्तन' के २ नाम हैं। ९ चूचुकम् (+चुचुकम् । +पु), कुचाग्रम् ( २ न ), 'स्तनके ऊपर वाले काला भाग' के २ नाम हैं। १० क्रोडम् ( न स्त्री ), भुजान्तरम् (+ अङ्कम् । न), 'गोदी के २ नामहैं । कटीपोथावुपस्थो" इति पाठान्तरम् । पृथङ् नामद्वयमिति मते तु "कटी प्रोथावुपस्थो" इति पाठान्तरम् ॥ "मेहनशेपशी" इति पाठान्तरम् ।। "पिचिण्डिकुक्षी" इति पाठान्तरम् ॥ "चुचुकं तु" इति पाठान्तरम् । || 'शेफशेप' शब्दयोरदन्तत्वादेव 'शेपपुच्छलाङगूलेषु शुनः' (वा० ३१०१) इति वार्ति. कसङ्गतिरन्यथा सान्तत्वे मध्ये विसर्गस्यापि वक्तुमौंचित्यम् ॥ १५ ० .

अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्डे १ उरो वसंच वक्षश्च २ पृष्ठं तु चरमं तनाः । ३ स्कन्धो भुजशिरोऽसोऽस्त्री ४ सन्धी तस्यैव जत्रुणी ॥ ७ ॥ ५ बाहुमूले उभे कक्षौ ६ पार्श्वमस्त्री तयोरधः । ७ मध्यमं चावलग्नं च मध्योऽस्त्री- द्वौ परौ द्वयोः ॥ ७ ॥ भुजवाहू प्रवेष्टो दोः * स्यात् । कफोणिस्तु कूर्परः। - १ उरः (= उरल ), वत्सम् , वक्षः (= वक्षस् । ३ न), 'छाती के ३ नाम हैं। ('कोडम्, ........, ६ नाम 'छाती' के हैं, यह अन्य आचार्यों का मत है"). २ पृष्ठम (न), 'पीठ' का १ नाम है ॥ ३ स्कन्धः (पु), भुजशिरः ( = भुजशिरस् , न), अंसः (पुन) 'कन्धे के ३ नाम हैं। ४ जत्रु (न), 'कन्धेके जोड़' का १ नाम है ॥ ५ बाहुमूलम् (न), कक्षः ( + कक्ष्यः । पु), 'काँख' के २ नाम हैं ६ पार्श्वम् (न पु), 'कोख, अर्थात् 'आँखके नीचेवाले भाग' का १ नाम है। ७ मध्यमम् , अवलग्नम् ( + चिलमम् । २ न), मध्यः (पुन । +३ पुन 1 ), 'शरीरके मध्य भाग' के ३ नाम हैं । ८ भुजा, बाहुः (+बाहः । २ पु स्त्री), प्रवेष्टः, दोः (+दोष । + दोषा, स्त्री भागु० । २ पु), 'बाँह के ४ नाम हैं । ९ कफोणिः (+ कफणिः, कपोणिः । पु स्त्री) कूपरः ( + करापु) 'केहुनी के २ नाम हैं। . * 'स्यात्कपोणिस्तु" इति पाठान्तरम् ।। 1-मध्यमो मध्यजेऽन्यवत् । पुमान् स्वरे मध्यदेशेऽप्यवलग्ने तु न स्त्रियाम्" ( मेदि. पृ० ११८ इलो० ४९---५०) इति, 'अवलमोऽस्त्रियां मध्ये त्रिषु स्याल्ल ममात्रके ( मेदि० पृ. १०० श्लो० ५९ ) द्वेति मेदिन्युक्ते: ' स्त्री' इत्यस्य त्रिभिः सम्बाधः समीचीनः प्रतिभातीत्य- वधेयम् ॥ 'कफोणिः कफणियोः' इति शब्दार्णवात् 'कफाणिः कूर्परः स्मृतः' (अभि० रत्न० २।३७८) इति हलायुधाच्चेत्यवधेयम् ।।

मनुष्यवर्गः ६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । २३५ १ अस्योपरि प्रगण्डः स्यात् २ प्रकोष्ठस्तस्य चाप्यधः॥ ८० ॥ ३ मणिबन्धादाकनिष्ठं करस्य करभो वहिः। ४ पञ्चशाखः * शयः पाणिस्तर्जनी स्यात्प्रदेशिनी ॥ १ ॥ ६ अङ्गुल्यः करशाखाः स्युः ७ पुंस्यङ्गुष्ठः प्रदेशिनी । मध्यमाऽनामिका चापि कनिष्ठा चेति ताः क्रमात् ॥ २ ॥ = पुनर्भवः कररुहो नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम् । प्रादेश- १ प्रगण्डः (पु), 'केहुनीके उपरवाले भाग' का १ नाम है ॥ ३ प्रकोष्ठः (पु। + न ), केहुनीके नीचेवाले भाग' का १ नाम है । ३ करभः (पु), 'हाथकी कलाईसे कनिष्ठा तकवाले बाहरी मांसल भाग का १ नाम है ।। ४ पञ्चशाखः, शयः (+ शमः, शवः), पाणिः (३५), 'हाथ' के ३ नाम हैं । ६ तर्जनी, प्रदेशिनी ( + प्रदेशनी । २ स्त्री), 'तर्जनी अर्थात् 'अँगूठेके पासवाली अंगुली के २ नाम है ॥ ६ अङ्गुली ( + अङ्गुलिः, अङ्गुरिः, २ स्त्री; अङ्गुला, पु), कारशाखा ( २ स्त्री ), 'अङ्गुली' के २ नाम हैं ॥ अङ्गुष्ठः (पु), प्रदेशिनी ( + प्रदेशनी ), मध्यमा, + अनामिका,. कनिष्ठा ( ४ स्त्री ), 'अंगूठेसे लेकर कनिष्ठा तकवाली प्रत्येक अङ्गुली' का क्रमशः १-१ नाम है। ८ पुनर्भवः ( + पुनर्नवः ), कररुहः ( २ पु), नखः, नखरः (+त्रि । २ पु न ) 'नाखून नह' के ४ नाम हैं । ९ प्रादेशः (पु), 'फलाये हुए तर्जनी और अगूठेके प्रमाण-विशेष का १ नाम है। . * "शमः पाणिस्तर्जनी" रयात्प्रदेशनो" इति पाठान्तरम् । नाममाला तु 'पाणिः शयः शमी हस्तः" इत्युभयं पपाठ' इति क्षी० स्वा०॥ + "पुनर्नवः" इति पाठान्तरम् ॥ * अनया ब्रह्मणशिशरश्छेदनादपवित्रत्वेन नामग्रहणायोग्यतया 'अनामिका' इति नाग्नः प्रसिद्धिः । अत एव धज्ञाघवसरेऽस्यां दर्भमयं पवित्रं धार्यत इत्यवधेयम् ।।

२१६ २ भमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ तोलगोकर्णास्तर्जन्यादियुते तते ॥ ३ ॥ ३ अङ्गष्ठे सकनिष्ठे स्थाद्वितस्तिदिशाङ्गुलः । ४ पाणौ चपेटप्रतलप्रहस्ता विस्तृताङ्गुलौ ॥ ४ ॥ ५ * द्वौ संहतो सिंहतलप्रतलौ वामदक्षिणों। ६ । पाणिनिकुन्जः प्रसृतिस्तौ युतावजलिः पुमान् ॥ ८ ॥ = प्रकोष्ठे विस्तृतकरे हस्तो मुटया तु बद्धया। स रत्निः स्या१०दत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिना ॥ ६ ॥ १ तालः (पु), 'फलाये हुए मध्यमा और अंगूठे के प्रमाण-विशेष का १ नाम है। २ गोकर्णः (पु), 'फैलाये हुए अनामिका मौर अँगूठेके प्रमाण- विशेष का १ नाम है ॥ ३ वितस्तिः (पु स्त्री), द्वादशाङ्गुलः (भ० दो०, पु) 'वित्ता' अर्थात् फैलाये हुए कनिष्ठा और अँगूठेके प्रमाण-विशेष' के २ नाम हैं । ४ चपेटः (+ चर्पट:, पु+चपेटा, चपेटिका; २ स्त्री), प्रतलः (+तला, तालः), प्रहस्तः ( ३ पु), 'थप्पड़, चटकन के ३ नाम हैं। ६.सिंहतलः (+संहतलः, सिंहताल: ), प्रतलः (२), फैलाये हुए दोनों हाथोंको सटाने के २ नाम हैं । ६ प्रसूतिः (स्त्री। + प्रस्तः, पु), 'टेढ़े किये ( समेटे ) हुए हाथ' का १ नाम है ॥ ७ अञ्जलिः (पु), 'अञ्जलि' का १ नाम है । ८ हस्तः (१), 'एक हाथ' अर्थात् 'दो बित्ता या चौबीस अङ्गुल के प्रमाण-विशेष' का १ नाम है ॥ ९ रनिः ( + सरनिः । पु स्त्रो), 'निमूठ (मुट्ठीको बाँध कर) हाथसे नापे हुए प्रमाण-विशेष' का १ नाम है ॥ १० अरनिः ( स्त्री पु ), 'कनिष्ठा अङ्गुलोको फैलाये हुए मुट्ठी बांध कर हाथले नापे हुए प्रमाण-विशेष' का १ नाम है ॥ * "द्वौ संहतौं सिंहतलः प्रतलौ” इति मुकु० सम्मतं पाठान्तरम् । "द्वौ संहतौ संहतलप्र. सुलो" इति च पाठान्तरम् ॥ | "पाणिनिकुञ्जः इत्यपपाठः' इति क्षी० स्वा० ॥ 'मङ्गुल मनुष्यवर्ग: ६ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ व्यामो बाह्वोः सकरयोस्ततयोस्तिर्यगन्तरम् । २ अर्जविस्तृतदोष्पाणि नृमाने पौरुषं त्रिषु ॥ ७ ॥ ३ कण्ठो गलाष्टऽथ ग्रीवायां शिरोधिः कन्धरेत्यपि । ५ कम्युग्रीवा बिरेखा साऽवटु_टा काटिका ॥ ८ ॥ ७ वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम् । ॐ क्लीबे घ्राणं गन्धवहा घोणा नाला व नालिका ॥ ८ ॥ है श्रोष्ठाधारौ तु रदनच्छदौ दशनवाससी। १ व्यामः (पु), दोनों तरफ दोनों हाथोंको फैलाकर नापे हुए प्रमाण-विशेष' का १ नाम है २ पौरुषम् (त्रि), पोरसासे नापे हुए प्रमाण-विशेष' का १ नाम है। ( "खड़े होकर हाथको ऊपर उठानेपर जो प्रमाण होता है उसे 'पारला कहते हैं, यह ४३ हाथका होता है" ) | ३ कण्ठः, गलः (२ पु), 'कराट' के २ नाम ४ ग्रीवा, शिरोधिः, कन्धरा ( ३ स्त्री), 'गर्दन के ३ नाम ५ कम्बुग्रीवा (स्त्री) 'शङ्खके समान तीन रेखावाली गर्दन' का १ नाम है । ६ अवटुः, घाटा, कृकाटिका ( ३ स्त्रो), 'घाँटी' के ३ नाम हैं। (भा दी० मतसे 'गर्दनके ऊपरवाले भाग के और स्वा० मु० मतसे 'गर्दनके पिछेवाले भाग के ये ३ नाम है" ) ॥ ७ वक्त्रम् , आख्यम् , वदनम् , तुण्डम् , आननम् , लपनम् , मुखम् ( ७ न ), 'मुखके बिल' के और उपचारसे 'मुखमात्र' के ७ नाम है ॥ ८ ब्राणम् (न), गन्धवहा, घोणा' नाला ( + नसा, नस्या), नासिका (+ कुल्या, सिवाणी । ४ स्त्री), 'नाक' के ५ नाम है । ९ ओष्ठः, अधरः, रदनच्छदः (३ ), दशनवासः ( =दशनवासस् , न ), 'ओठ के ४ नाम है ॥ मुखशब्दस्य साधुत्वप्रकारो निरुक्तं प्रोक्तस्तथा हि- "प्राक्खनो मुडुदात्तश्च ततोऽच्च प्रत्ययो भवेत् ।। प्रजासृजा यतः खातं तस्मादाहुर्मुखं बुधाः ॥ १॥ इति ।। हैं . १ २१८ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- - - १ मधस्ताञ्चिबुकं २ गण्डौ कपोलौ ३ तत्परा हनुः ॥ १० ॥ ४ रदना दशना दन्ता रदापूस्तालु तुकाकुदम् । ६ रसज्ञा रशना जिह्वाउप्रान्तावोष्टस्य * सृक्विणी ॥ ११ ॥ = ललाटमलिकं गोधिारूर्व दुग्भ्यां ध्रुवौ स्त्रियो । १० कूर्चमस्त्री भ्रुवोर्मध्यं ११ तारकाक्षणः कनीनिका ॥ १२॥ १२ लोचनं नयनं नेत्रमीक्षणं चक्षुरक्षिणी । दूरदृष्टी- १ चिबुकम् (न), माठ और ठुढीके नीचेवाले भाग' का १ नाम है २ गण्डः, कपोल: ( +कटः । २ पु) 'गाल के २ नाम है ॥ ३ हनुः (स्त्री), 'दाढ़ी, ठुढ्ढी' का १ नाम है ।। ४ रदनः, दशनः, दन्तः ( + दंष्ट्रा स्त्री), रदः ( ४ पु), 'दाँत' के ४ नाम है। ५ तालु, काकुदम् ( २ न ), 'तालु' के २ नाम है ॥ ६ रसज्ञा, रसना ( + रशना । +न), जिह्वा ( + लोला । ३ स्त्री), 'जीभ के नाम है। ७ सक्किगी ( - सृक्विगी स्त्री । + सृक्किगी= सृक्किणी स्त्री; सूक्ति सक्छिन् , सक्कि; सूक्क सक्छन् , सूक्तम् सृक्क सृक्कि-सृक्किन् ,-स- क्कि सुक्क =सक्कन् ; सूक्कम् = सक्का ८ न), ओठके दोनों किनारों। का १ नाम है ॥ ८ ललाटम् , अलिकम् ( + अलोकम् , भालम् । २ न), गोधिः (पु), "ललाट के ३ नाम हैं। ९ भ्रूः (स्त्री) 'भाह' का १ नाम है ॥ १० कूर्चम् (न पु ), 'दोनों भौंहके बीचवाले भोग' का १ नाम है । ११ तारका, कनीनिका ( भा. दी० क्षी० स्वा० । २ स्त्री) आँख की पुतली' के ३ नाम है ॥ १२ लोचनम् (+विलाचनम्), नयनम् , नेत्रम् , ईक्षणम् , चक्षुः (-चक्षुष), अक्षि (६ न), दृक् ( = दृश् ), दृष्टिः (२ स्त्री), 'आँख' के ८ नाम है ॥ * मुक्किणी" इति पाठान्तरम् ।। .

मनुष्यवर्ग:६ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । २१६ . १ चास्नु नेत्राम्बु रोदनं चास्त्रमश्रु च ॥ ३ ॥ २ अपाङ्गौ नेत्रयोरन्तौ ३ कटाक्षोऽपाङ्गदर्शने । ४ कर्णशब्दग्रहौ श्रोत्रं श्रुतिः स्त्री श्रवणं श्रवः ॥ १४ ॥ ५ उत्तमाझं शिरः शीर्ष मूर्धा ना मस्तकोऽस्त्रियाम् । ६ चिकुरः कुन्तलो वालः कचः केशः शिरोरुहः ॥ १५ ॥ ७ तद्वन्दे कैशिकं कैश्यम्मलकाचूर्णकुन्तलाः । ते ललाटे भ्रमरकाः १० काकपक्षः शिखण्डकः ॥ १६ ॥ १ अस्तु, नेत्राम्बु, रोदनम् , अस्त्रम् , अक्षु ( + वाष्पम् । ५ न ), 'माँसू के ६ नाम हैं । २ अपाङ्गः (पु), 'माँखों के किनारे वाले भाग' का १ नाम है ॥ ३ कटाक्षः (पु), अपाङ्गदर्शनम् (न), 'कटाक्ष' के २ नाम हैं । ४ कर्णः, शब्दग्रहः ( २ पु), श्रोत्रम् , श्रुतिः (स्त्री), श्रवणम् , श्रवः (=श्रवस् । शेष ३ न), 'कान' के ६ नाम हैं ॥ ६ उत्तमाङ्गम् (+वराङ्गम् ), शिरः ( = शिरस् । +शिरः =शिर, * पु), शीर्षम् (३ न), मूर्धा ( = मूर्धन् पु), मस्तकः (पुन), 'सिर मस्तक के ५ नाम हैं। ६ चिकुरः (+चिकूरः, चिहुरः 1 ), कुन्तलः, वाल: (+बालः ), का, केशः, शिरोरुहः (+शिरलिजः, मूर्धजः । ६ ), 'केश, बाल के ६ नाम हैं • कैशिकम् , कैश्यम् ( २ न ), 'केशके समूह का १ नाम है । ८ अलकः, चूर्णकुन्तलः ( २ पु), अंगूठिया बाल के २ नाम हैं । ९ भ्रमरकः (पु), 'काकुल' अर्थात् बुलबुली यानी कलाटपर लटके हुए बाल' का १ नाम है ॥ १० काकपक्षः, शिखण्डकः (+ शिखाण्ड डकः । २ पु), 'काकपक्ष' अर्थात् 'लड़कोंकी जूड़ा जुलुफी, शिखा-सामान्या के १ नाम हैं * "शिरोवाची शिरोऽदन्तो रजोवाची रजस्तथा" इत्युक्तेरिति बोध्यम् ॥ + 'कुन्तला मूर्धजाः शस्ताश्चिकुराश्चिहुरास्तथा' इति दुर्गोक्तेः। किन्तु 'विदुर' शब्दस्य प्राकृत एव बाहुल्येन प्रयोग उलभ्यते न तु संस्कृत इत्य वधेयम् ॥ + "क्षत्रियाणां' चुडा 'काकपक्षः' इति गौडः" इति क्षी० स्वा०॥

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्हे- mein -- १ *कबरी केशवेशारऽथ धम्मिल्लः संयता कचाः। ३ शिखा चूडा केशपाशी वितिनस्तु जटा सटा ॥ ६७ प्रवेणिः प्रवेणी ६ शीर्षण्यशिरस्यौ विशदे कचे। ७ पाश: पक्षश्च हस्तश्च कलापाः कचात्परे , gE !! - तनूरुहं रोम लाम : तद्वृद्धौ । श्मश्रु पुंमुखे। १० माकल्पवेषौ नेपथ्यं- १ कबरी (+कवरी । स्त्री), केशवेशः (+केशवेषः । पु), 'बालके रचना-विशेष के २ नाम हैं। २ धम्मिलः (पु), 'पटिया जूरा' अर्थात् 'बांधे हुए स्त्रियों के बालके रचना-विशेष' का १ नाम है ॥ ३ शिखा, चूडा, केशपाशी (३स्त्री), शिखा,चुटिया,चुन्नी' के नाम हैं। ४ जटा, सटा (२ स्त्री), 'जटा' अर्थात् 'आपसमें सटे हुए बाल या ऋषियोंकी जटा या जटामात्र के २ नाम हैं । ५ वेणिः ( + वेणी), प्रवेणी ( + प्रवेणिः । २ स्त्री), 'बालकी गुथी हुई चोटी के २ नाम हैं ॥ ६ शीर्षण्यः, शिरल्यः ( २ पु) 'निर्मल वाल' के २ नाम हैं। ७ पाशः, पक्षः, हस्तः (३ पु), ये तीन शब्द 'कच' शब्दसे परे रहने पर अर्थात 'कचपाशः, कचपक्षः, कचहस्तः (३ पु), या कच ( केश) के पर्याय. वाचक शब्दसे परे रहने पर अर्थात् 'केशपाशः, केशपक्षा, केशहस्तः, वाल. पाशः, वालपक्षा, वालहस्तः ( ६ पु ), इत्यादि नाम 'केश-समूह के हैं ॥ ८ तनूरहम् , रोम ( = रोमन ), लोम ( = लोमन् । ३ न ), 'रोंएं, के ३ नाम हैं। ९ श्मश्रु ( +स्मभु । न ), 'दाढ़ीके बढ़े हुए बाल' का १ नाम है । १० आकल्पः, वेषः ( +वेशः । २ पु), नेपथ्यम् ( न ।+पु), 'आभू- षण आदिसे उत्पन्न शोभा' के ३ नाम हैं । *कवरी केशवेषोऽथ" इति पाठान्तरम् ।। | "तिनः ता जटा सटा" पाठान्तरम् । अत्र -सा' शब्द केशार्थकः । * "मश्र पुंमुखे” इति पाठान्तरम् ॥ ७ मनुष्य वर्ग:६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। २२१ १ प्रतिकर्म प्रसाधनम् ॥EE !! २ दशैते त्रिवश्लङ्कर्ताऽलङ्करिष्णुश्च ४ मण्डितः । प्रसाधितोऽलङ्कृतश्च भूषितश्च परिष्कृतः ॥ १०० ॥ ५ विभ्राड् भ्राजिष्णुरोचिष्णू ६ भूषणं स्यादलङक्रिया। ७ अलङ्कारस्त्वाभरणं परिष्कारो विभूषणम् ॥ १०१ ॥ मण्डनं चास्थ * मुकुट किरीटं पुन्नपुंसकम् । 8 चूडामणिः शिरोरत्नं- १ प्रतिकर्म (=प्रतिकर्मन् ), प्रसाधनम् (२२), 'तिलक, फूल आदिले सवारने के २ नाम हैं । "आकल्पः, ६ नाम एकार्थक हैं, यह भी एक आचार्यों का मत है)। २ यहांसे लेकर आगेवाले दश शब्द त्रिलिङ्ग हैं। ३ अलङ्कर्ता (= अलङ्क), अलङ्करिष्णुः (+मण्डलः । २ नि), 'अलङ्कृत ( सुशोभित ) करनेवाले के २ नाम हैं। ४ मण्डिता, प्रसाधितः, अलङ्कृतः, सूषितः, परिष्कृतः (+परिस्कृतः । ६ त्रि) 'आभूषण इत्यादिसे सुशोभित के ६ नाम हैं। ६ विभ्राट ( = विभ्राज् ). भ्राजिष्णुः, रोविष्णुः ( ३ त्रि ), 'श्राभूषण इत्यादिसे अधिक शोभनेवाले' के ३ नाम हैं। ६ भूषणम् (न । +भूषा स्त्री), अलक्रिया (स्त्री), 'आभूषण इत्यादिसे सुशोभित करने के २ नाम हैं। ७ अलङ्कारः, आभरणम् , परिष्कारः (+परिस्कारः । १ ला और ३ रा. पु), विभूषणम् (+भूषणम् ), मण्डनम् (शेष ३ न ), माभूषण, गहना' के ६ नाम हैं। ८ मुकुटम् (+ मकुटम् । न), किरीटम् (पुन), 'मुकुट के २ नाम हैं । ९ चूडामणिः ( शिरोमणिः । पु), शिरोरत्नम् (न), 'शिरोमणि के २ नाम हैं। "मकुटं किरीटं" इति पाठान्तरम् ।। | इदमसत्-वेषो हि वस्त्रालङ्करणप्रसाधनैरङ्गशोभा। प्रसाधनं तु समालम्भनं तिलकपत्र. भङ्गादिना ( अङ्गशोभा) इति क्षी० स्वा० । % 3D २२२ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ तरलो हारमध्यगः ॥ १०२॥ २ वालपाश्या पारितथ्या३ पत्नपाश्या ललाटिका । ४ कर्णिका तालपत्नं स्यात् ५ कुण्डलं कर्णवेष्टनम् ॥१०३ ॥ ६ अवेयकं कण्ठभूषा ७ लम्बनं स्याललन्तिका । - स्वणः मालम्बिकाऽथोरस्सूत्रिका मौक्तिकः कृता ॥ १०४ ॥ १० हारो मुक्तावली ११ देवच्छन्दोऽसौ शतयष्टिका । १ तरल: (+ नायकः । पु), 'हारका सुमेरु' अर्थात् 'हार या माला के बीचवाले बड़े दाना' का १ नाम है ॥ २ वालपाश्या ( + बालपाश्या ), पारितथ्या (२ स्त्री ), 'स्त्रियों की चोटी या जूड़ामें लगाने के लिये सोने आदिकी पट्टी (भूपण-विशेष) के नाम हैं। ३ पत्नपाश्या, ललाटिका ( २ स्त्री), 'बन्दो, बेना आदि ललाटके भूषण' के ३ नाम हैं॥ ४ कर्णिका (स्त्री), तालपत्त्रम् (+ताडपत्त्रम् । न), 'कनफूल, ऐरन, तरकी, झूमक आदि कानके भूषण' के २ नाम हैं । ५ कुण्डलम् , कर्णवेष्टनम् (२२), 'कुण्डल' के २ नाम हैं ॥ ( ॥ ("कु- एडल' और कर्णिका में यह भेद है कि 'कुण्डल' को स्त्री-पुरुष दोनों पहनते हैं और 'कर्णिका' को केवल स्त्रियां ही पहनती हैं") ॥ अषेयकम् ( + ग्रैवेयम् , गौवम् । न ), कुण्ठभूपा (स्त्री), 'हँसुलो, कण्ठा, टीक आदि गलेके भाभूषण' के २ नाम हैं। ७ लम्बनम् (न), ललन्तिका (स्त्री), 'गलेसे कुछ २ नीचे लटकनेवाले भूषण' के २ नाम हैं । ८ प्रालम्बिका (स्त्री), 'गलेसे थोड़ा २ नीचे खटकनेवाले सुवर्णके भूषण' ( सोनेका हलका सिकड़ी आदि) का १ नाम है ॥ ९ उरसूत्रिका (स्त्री) 'मोतीके हाए का १ नाम है ॥ १० हारः ( ), मुक्तावली (स्त्री), 'हार के २ नाम हैं । ११ देवच्छन्दः (१), शतयष्टिका (स्त्री । भा० वी० ) 'सौ लड़ीवाले हार के २ नाम हैं। ६ - अनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। २२३ । १ हारभेदा * यष्टिभेदाद्गुच्छगुच्छार्द्धगोस्तनाः ॥ १०५ ॥ अर्द्धहारो माणवक एकावल्येकष्टिका । २ सैव नक्षत्रमाला स्यात्सप्तविंशतिमौक्तिकैः ॥ १०६ ॥ ३ आचापका पारिहार्यः कटको वलयोऽस्त्रियाम् । १ गुच्छः (+गुत्सः, गुत्स्यः ), गुच्छार्द्धः (+गुत्साः गुल्ल्याई), गोस्तनः, अर्दहारः, माणवकः (६ पु), एकावली (स्त्री), ये ७ 'हारोंक भेद. विशेष हैं। ("इनमें बचीस लड़ीके हारका गुच्छ, चौबीस लड़ीके हारका गुच्छार्द्ध, चार लड़ीके हारका गोस्तन, बारह लड़ीके हारका अर्द्धहार, बीस लड़ीके हारका माणवक और एक लड़ीके हारका एकावली नाम है।)॥ २ नक्षन्नमाला (स्त्री), 'सत्ताइस मोतियोंक हार का १ नाम है । ३ आवापकः, पारिहार्यः ( २ पु ), कटकः, वलयः ( २ पु न ), 'पहुँची, कड़ा आदि हाथके भूषण के ४ नाम हैं । "यष्टिभेदाद् गुत्सगुत्साद्धगोस्तनाः' इति पाठान्तरम् ।। अत्र क्षी० स्वा०-"प्रन्ये स्वाख्यन्–'द्वात्रिंशल्लतो गुच्छो गुह्याच्छादकत्वात्। चत्वा. रिंशल्लता गोस्तनो लम्बमानत्वात् , गोपुच्छोऽपि । चतुःपञ्चाशल्लतोऽर्द्धहारो देवच्छन्दाई. स्वात् । विशल्लतो माणवकाऽल्पकत्वात् इति" इत्याह । अभिधानचिन्तामणी हेमचन्द्राचार्यपादै- रुक्त हारभेदा प्रसादुच्यन्ते- देवच्छन्दः शतं साष्टं विन्द्रच्छन्दः सहस्रकम् । तदई विजयच्छन्दो हारस्त्वष्टोत्तरं शतम् ॥१॥ अर्द्ध रश्मिः कलापोऽस्य द्वादश वर्द्धमाणवः । द्विादशार्द्धगुच्छः स्यात्पञ्च हारफलं लताः ॥२॥ अर्द्धहारश्चतुःषष्टिगुच्छमाणवमन्दसः। अपि गोस्तनगोपुच्छावर्द्धमर्दू यथोत्तरम् ॥ ३ ॥ इति हारयष्टिर्भदादेकावल्येकयष्टिका । कण्ठिकाऽस्यथ नक्षत्रमाला तत्संख्यमौक्तिकैः" ॥४॥ इति अभिः चिन्ता०२३२२-३२६ अन्ये वेवमाहुः-चतुःषष्टिलतो हारोऽथाष्टहोना यथोत्तरम् । रश्मिः कलापो माणवकोऽर्द्धहारार्द्धगुच्छकः ॥१॥ कलापच्छन्दा मन्दरः स्याद्गुच्छः सप्ततियष्टिकः" । इति । अत्र केचित् 'रश्मिकलापो' इति वा पठित्वैकं नामेत्याहुः। सुल भतयाऽवगमाय चक्र द्रष्टव्यम् ।। - २२४ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे - विविधमतेन हाराणा संज्ञाया यष्टिसंख्यायाश्च बोधकचक्रम् ।। पERatatuRNDRA क्रमागतसंख्या: देवच्छन्दः १०८ * " विजयच्छन्दः ** ३४ * रहिमकपाल: ५४ :14 अद्धमाण: १२ ७ श्रद्धगुच्छ २४ २४ हारफलम् अर्द्धहारः १२ my ३ ३२ ३ माणव: १६ ४० . गोस्तनः x . ४ गोपुच्छः २ * ४० ५ एकावली नक्षत्रमाला २७ मौ. २७ मौ. २७ मौ० २७ मौ. wman रश्मिः -- कलापः * कलापच्छन्दः १६ लनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । २२५ १ केयूरमजदं तुल्ये २ अगुड्लीयकमूर्मिका ॥ १०७ ॥ ३ लाक्षराऽङ्गुलिमुद्रा स्यात् ४ कङ्कणं करभूषणम् । ५ स्त्रीकठ्यां मेखला काञ्ची सप्तमी रशना तथा ॥ १८ ॥ क्लीबे सारसनं चाथ पुंस्कटयां हतं त्रिषु । ७ पादागर्द तुलाकोटिमजीरो नूपुरोऽस्त्रियाम् ॥ १० ॥ हंसका पादकटकः = *किङ्किणी क्षुद्रघण्टिका। । त्वक्फलकृमिरोमाणि वस्त्रयोनिः १ केयूरम् , अङ्गदम् (न), 'विजायठ, बाजूबन्द, बहरबूटा के २ नाम हैं। २ अङ्गुलीयकम् ( + अङ्गुरीयकम् । न+पु), ऊर्मिका (स्त्रो), 'अँगूठी के २ नाम हैं। ३ अङ्गुलिमुद्रा (स्त्री), 'नाम खुदी हुई अंगूठी का १ नाम है ।। ४ कङ्कणम् , करभूषणम् ( २ न, 'कङ्कण, ककनार के २ नाम हैं । ९ मेखला, काञ्ची, सप्तकी, रशना (+ रसना, सिजनी । ४ स्त्री), सारसनम् (न), स्त्रियों को करधनी' के ६ नाम हैं। ६ शृङ्खलम् (नि), 'पुरुषांकी करधनी' का १ नाम है ॥ ७ पादाङ्गदम् (न), तुलाको टिः (+तुलाकोटी। स्त्री), मीर: (+मजीला), नूपुरः ( २ पुन), हंसका, पादकटकः ( २ पु), 'पावजेब के ६ नाम हैं। ८ किङ्किणी ( + किङ्किणिः, कङ्किणी ), क्षुद्रघण्टिका ( २ स्त्री ), घूघूर के २ नाम हैं। ९ वस्त्रयोनिः (स्त्री), 'जिनके कपड़े बनते हों उन छाल, फल, कृमि और रोंएं: का १ नाम है। ("तिसी केला आदिके छालसे, कपास * "कङ्किणी" इति पाठान्तरम् ।। | "अयं मैथिल्यभिज्ञानं राघवस्याङ्गुरीयकः' ( भट्टी ८।११८ ) इत्युक्तेरिति मुकुटः॥ 1 "एकयष्टिभवेत्काञ्ची मेखला त्वष्टयष्टिका । रशना षोडश ज्ञेया कलापः पञ्चविंशकः" ॥१॥ इत्युक्ता भेदास्त्विह नाश्रिता इत्यवधेयम् ॥

२२६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ दश त्रिषु ॥ ११०॥ २ वाल्कं क्षौमादि ३ फालं तु कार्पासं बादरं च तत् । ४ कौशेयं कृमिकोशोत्थं ५ राङ्कवं मृगरोमजम् ॥ १११ ॥ आदिके फलसे, रेशमवाले कृमि ( कीड़े) के कोएसे और भेंड़, दुम्मा भेंडा मृग आदिके रोंएंसे कपड़े बनते हैं; अतः 'उन छाल, फल, कृमि और रोएं का 'वस्त्रयोनिः (स्त्री), यह १ नाम है")। १ यहांसे दश शब्द त्रिलिङ्ग है । (“वाल्कम् , क्षौमम् , फालम् , कार्पासम् बादरम् , कौशेयम् , राङ्कवम् , अनाहतम् , निष्प्रवाणि, तन्त्रकम्' क्षी० स्वा० भा० दी० मतसे ये १० शब्द त्रिलिङ्ग हैं। वाल्कम् , क्षौमम् (न* ), फालम् , कार्पासम् , वादरम् , कौशेयम् , कृमिकोशोत्थम् , राङ्कवम् , मृगरोमजम् , अना. हृतम्, निष्प्रवाणि, तन्त्रकम् ('च' शब्दसे इसका संग्रह हुआ है ), सुभूति और महेश्वरके मतसे शेष ११ शब्द त्रिलिङ्ग हैं") ॥ २ वाल्कम् , क्षौमम् ( +न । २ त्रि), तिसीवट या केले आदि के छालसे बने हुए कपड़े के २ नाम हैं ॥ ३ फालम् , कार्पासम् , वादरम् ( + बादरम् । ३ त्रि, 'कपास इत्यादि फलसे बने हुए कपड़े' अर्थात् 'सूती कपड़े के ३ नाम है ॥ ४ कौशेयम् , कृमिकोशोत्थम् (भा० दी०, क्षी० स्वा+कृमिकोपोत्यम् । २ श्री), पीताम्बर आदि रेशमी कपड़ा? अर्थात् 'रेशमवाले कोदोंके कोएके बने सूतसे बुने हुए कपड़े के २ नाम है ॥ ५ राङ्कवम् , मृगरोमजम् ( भा० दी०, क्षी० स्वा० । २ त्रि), 'दुशाला, शाल, अलवान, कम्बल आदि ऊनी कपड़ा' अर्थात् 'मृग (भेडा आदि पशु ) के रोंएके बने सूतसे बुने हुए कपड़े के या 'रङ्कुनामक मृग-विशेषके रोएंके बने सूतसे बुने हुए कपड़े के २ नाम है ॥ * "क्षौमं दुकूलं स्याद् द्वे तु” ( २।६।११३ ) इत्यत्र 'दुकूल' शब्दसाहचर्यात् 'क्षौम क्लीवमेवेत्याशयः। अत एव 'कृमिकोशोत्थ-मृगरोमज शब्दयोरपि पर्यायता, 'तत्रोक्त' शब्द, स्यैकादशसङ्घयता च सिद्धयकता । स्वा० भा० दी० मते तु 'कृमिकोशोत्थ-मृगरोमज' शब्द- योर्न पर्यायता, 'क्षौम' शब्दश्च त्रि लिङ्ग एव, अत एव 'दश त्रिषु' इति ग्रन्थकारोक्तिः संगच्छते इति बोध्यम् ॥ . ७ .

मनुष्यवर्ग: ६ ] मणिप्रभाव्याख्यासहितः। २२७ १ अनाहतं निष्प्रवाणि तन्त्रकं च नवाम्बरम् । २ तत्स्यादुद्गमनीयं यद्धौतयोर्वस्त्रयोयुगम् ॥ ११२ ॥ ३ पत्त्रोणे धौतकौशेयं ४ बहुमूल्यं महाधनम् । ५ क्षौमं दुकूल स्याद् ६ द्वे तु निवीतं प्रावृतं त्रिषु ॥ ११३ ॥ ७ स्त्रियां बहुत्वे वस्त्रस्य * दशाः स्युर्वस्तयो द्वयोः । = दैय॑मायाम । श्रारोह:- १ अनाहतम् (+ अहतम् ), निष्प्रवाणि, तन्त्रकम् ( भा० दी, क्षी स्वा० । ३ त्रि), नवाम्बरम् (न), भा० दी० क्षी० स्वा० के मतसे जो पहना, धुलाया या फटा हुआ नहीं हो उस कपड़े के और महेश्वरके मतसे कोरे कपड़े के ४ नाम है ॥ २ उद्गमनायम् (न), 'धुलाये हुए कपड़े का नाम है । ( 'धौत. योर्वस्त्रयोर्युगम्' यहाँ पर 'युग शब्द अविवक्षित है") ॥ ३ पत्त्रोर्णम् (न), धौतकौशेयम् (भा० दी० । २ न) 'धुलाये हुए रेशमी कपड़े के २ नाम हैं। ४ बहुमूल्यम् , महाधनम् ( भा० दी०। २ न), 'वेशकोमती चीज़ के २ नाम है ॥ ५ क्षौमम् (त्रि । + न), दुकूलम् (न); 'पीताम्बर के २ नाम है । ६ निवीतम् ( + निवृत्तम् ), प्रावृतम् (२न), 'ढके हुए वस्त्र' के २ नाम है ॥ ७ दशाः (स्त्री नि० ब० ० ), वस्तयः (भा० दी० । स्त्री पु नि०० व० । +वर्तयः; २ एक व० भा है ), 'कपडेकी किनारी, धारी, दस्सी, के २ नाम है। ८ देयम् (न), आयामः, आरोहः (+ अनाहः । २ पु), 'कपड़े आदि * 'दशः स्युवस्तयोयो इति पाठान्तरम् ॥ Kानाहः" इति पाठान्तरम् ।। + युगशब्दस्याविवक्षायां लक्ष्यं यथा- "गृहीत पत्युद्गमनीयवस्त्रा" । कुमारसम्भव ७११ इति ।। "धौतमुद्गमनीयं च-" इति हलायुधश्च (अभि० रत्न० २।३९६)॥ 'वर्तिवास्ति' शब्दयोरेकवचनत्वञ्चापि । तथा हि हलायुधः-"वतिर्वस्तिर्दशाः सिच:" (अभि० रत्न० २।३९६) इति ।। - २२८ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- om १ परिणाहो विशालता ॥ ११४ ॥ २ पटच्चरं जीर्णवस्त्रं ३ समौ *नक्तककटौ। ४ वस्नमाच्छादनं वासश्चैलं वसनमंशुकम् ॥ ११५ ।। ५ सुचेलकः । पटोऽस्त्री स्याद् ६ वराशिः स्थूलशाटकः । की लम्बाई के ३ नाम है ॥ १ परिणाहः (पु), विशालता (स्त्री), 'कपड़े आदिकी चौड़ाई' के २ नाम हैं। २ पटच्चरम् , जीर्णवस्त्रम् ( २ न ), 'पुराने कपड़े के २ नाम हैं । ३ नक्तकः (+ लक्तकः), कर्पटः ( २ पु),मुकु० महे० मतसे 'पुराने कपड़े के टुकड़े के, भा० दी० मतसे 'रुमाल' अर्थात् पसीना आदिको पोंछनेवाले छोटे वस्त्र के और क्षी० स्वा० मतसे 'दूध पानी आदिको छाननेवाले कपड़े के २ नाम है॥ ४ वस्त्रम् , आच्छादनम् , वासः (= वासस् ), चैलम् (+चेलम् ), बसनम् , अंशुकम् (+चीरम् , प्रोतः । ६ न), 'कपड़ामात्र' के ६ नाम हैं। ६ सुचेलकः (पु), पटः (पु न। + पु स्त्री क्षी० स्वा०), 'अच्छे कपड़े के २ नाम हैं। ६ वराशिः ( +वरासिः । + पु), स्थूलशाटकः (२ त्रि ), 'मोटे कपड़े के २ नाम हैं । ( "सुचेलका,... । ( "सुचेलका,......" ४ शब्द एकार्थक हैं, यह एक आचार्यों का मत है")॥ * "लक्तककर्पटौ इति पाठान्तरम् ।। पटोली ना वराशिः' इति 'पटोऽस्त्री ना वरासिः' इति च काचित्कं पाठान्तरम् ॥ पटोऽस्त्री कर्पटः शाटः सिचयप्रोतलक्तकाः' इति रभसोक्तेः, “पटश्चित्र पटे वस्त्रेऽस्त्री, प्रियालदुमे पुमान्' ( मेदि० पृ० ३६ श्लो० १९) इति मेदिन्युक्तेश्च 'अस्त्रीति चिन्त्यम् , द्वयो. रदर्शनात्' इति क्षी० स्वा० वचसश्चिन्त्यत्वमुक्तम् भा० दी। क्षी० स्वा० तु 'अस्त्रीति चिन्त्यम् योदर्शनात्' इत्येवोक्तत्वात् 'अपटीक्षेपेण' इति लक्ष्याच्च भा० दी. उक्तेसेंच. चिन्त्यत्वम् । “अ- म्बरमंशुकमुक्तं वस्त्रं सिचयः परः पोट:' (अभि० रत्न० २।३९३) इति हलायुधोक्तया तु 'पट' शब्दस्य पुंस्त्वमात्रमेवायातीत्यवधेयम् ॥

मनुष्यवर्गः६] मणिप्रभाव्याख्यासहितः । २२१ - १ निचोला प्रच्छदपटः २ समौ रलककम्बलौ ॥ ११६ ॥ ३ अन्तरीयोपसंव्यानपरिधानान्वधोंऽशुके । ४ द्वौ प्रावारोत्तरासङ्गौ समौ बृहतिका तथा ॥ ११७ ॥ संब्यानमुत्तरीयं च ५ चोलः कूर्पासकोऽस्त्रियाम् । ६ नीशारः स्यात्प्रावरणे हिमानिलनिवारणे ॥ ११ ॥ ७ अोरुकं वरस्त्रीणां स्याश्चण्डातकमस्त्रियाम् । स्वास्त्रिप्वाप्रपदीनं तत्प्राप्नोत्याप्रपदं हि यत् ॥ ११ ॥ । अस्त्री वितानमुत्तोचो- १ निचोला ( + निचुलः । त्रि), प्रच्छ इफ्टः (२ पु), महे० मा० दो. मतसे 'पालकी आदिके मोहार या सारङ्गी, सितार आदिके गिलाफ' (खोली) के, क्षी०स्वा० मतसे 'रजाई, तोलक तकिया आदिको खोलो' के और अन्याचार्यों के मतसे 'बुर्का' अर्थात् 'यवन आदिकी स्त्रियां पदेंके वास्ते जिसको ओढ़कर पूरे शरीरको छिपा कर बाहर निकलती है उस वस्त्र-विशेष' के नाम है ॥ २ रल्लकः कम्बलः (२ पु), 'कम्बल' के २ नाम है। ३ अन्तरीयम् , उपसंव्यानम् , परिधानम् , अधोंऽशुकम् (४ न), 'कमर से नीचे पहने जानेवाले धोतो, पायजामा, साड़ी आदि कपड़ों के ४ नाम है। ४ प्रावार: (+प्रावरः) उत्तरासगः (२ पु), बृहतिका (स्त्री), संव्यानम् , उत्तरीयम् (२ न ), 'कारसे ऊपर धारण करने योग्य दुपट्टा, पगड़ी आदि कपड़ों के ६ नाम ५ चोल: (+चोली स्त्री । पु), कूर्गसकः (पु न ), 'स्त्रियोंको चोली, कुर्ती श्रादि के २ नाम हैं । ६ नीशारः (पु), 'रजाई, दुलाई या शीतले बचनेके लिये ओढे जानेवाले वस्त्रमात्र' का १ नाम है ॥ ७ अोरुकम् (न), चण्डातकम् (न पु), 'लहंगा' के २ नाम हैं । ८ आप्रपदीनम् (त्रि ), 'औरतक लटकनेवाले कपड़े का १ नाम है ॥ ९ वितानम् (न पु), उल्लोचः (पु), 'चॅदवा के २ नाम हैं १६ अ० २३० अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे.... . १ दूध्याधं वनवेश्मनि । २ प्रतिसीरा * जवनिका स्यात्तिरस्करिणी च सा॥ १२० ॥ ३ । परिकर्माइसंस्कारः स्याटमाष्टिमार्जना मृजा । उद्धर्तनोत्सादने द्वे समे ६ श्राप्लाव आप्लवः ॥ १२१ ॥ स्नानं ७ चर्चा तु चाचिवयं स्थालकोऽथ प्रबोधनम् । अनुबोधः पत्त्रलेखा । पत्त्राङ्गुतिरिमे स मे ॥ १२२ ॥ १ दूष्यम् ( + दूश्यम् । न ), आदि ( "आदि" शब्दसे 'पटकुटी (स्त्री), एटवासः ( = पटवासस् ), पटगृहम् , पटकुड्यम् ( ३ न ), इत्यादिका संग्रह है।) 'कपड़ेके घर, डेरा, रावटी, तम्बू धादि' का नाम है । २ प्रतिसीरा, जवनिका ( + यमनिका ), तिरस्करिणी ( + तिरस्कारिणी, तिरस्करणी । ३ स्त्री), 'कनात, पर्दा के ३ नाम है । ३ परिवर्म ( =परिकर्मन् । + प्रतिकर्म = प्रतिकर्मन् । न ), अङ्गसंस्कार (), 'कुङ्कुम आदिसे शरीर के संस्कार करने के २ नाम हैं ॥ ४ माष्टिः, मार्जना, सृजा ( ३ स्त्री), 'झाड़ पोंछकर शरीरको साफ करने के ३ नाम हैं। ५ उद्वर्तनम् , उत्सादनम् (+उच्छादनम् । २ न), 'उबटन, वेशन, साबुन आदिसे शरीरको मलने के २ नाम हैं ॥ ६ आप्लानः, आप्लवः (२३), स्नानम् (न), 'स्नान करने के ३ नाम हैं। ७ चर्चा (स्त्री), चाचिक्यम् (न), स्थासकः (पु), 'शरीरमें चन्दन मादि लगाने के ३ नाम है । ८ प्रबोधनम् (न), अनुबोधः (पु), 'निकले हुए गन्धकको फिरसे लाने के २ नाम हैं । ( "जैसे-'कस्तरीके गन्धको निकल जाने पर मदिरा छोड़नेसे उसका गन्ध फिर आ जाता है")॥ ९ पत्त्रलेखा, पत्त्राङ्गुलिः (२ स्त्री), 'कम्तरी, केसर, मेंहदी या चन्दन आदिसे गाल या स्तनादिपर पत्ते फूल मादिकी चित्रकारी करने के २ नाम हैं। १ , * "यमनिका" इति पाठान्तरम् ।। + प्रतिकाङ्गसंस्कारः" इति पाठान्तरम् ॥ + "पत्त्राङ्गुलिरिम स्त्रियो" इति पाठान्तरम् ।।

जनुष्यवर्ग: ६ ] मणिप्रभाब्याख्यासहितः । ७ १ १ तमालपत्नतिलकचित्रकागि विशेषकम् । द्वितीयं च तुरीयं च न त्रियारपथ कुङ्कुमम् ॥ १२३ ।। काश्मीरजन्मानिशिखं वरं बाह्रीकपोतने । रक्तसंकोचपिशुनं * धोरं लोहितचन्दनम् ॥ १२४ ॥ ३ लाक्षा राक्षा जतु लोवे यावोऽलतो द्रुमामयः । ४ लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञमथ जायकम् ॥ १२५ ॥ + कालीयकं च कालानुलार्य बाथ लमार्थकम् । * वंशिकागुरुराजाहलोहकमिजजोऽङ्गकम् ॥ १२६ ॥ १ तमालपत्नम् , तिलकम् , चित्रकम् , विशेषकम् ( २ रा ४ था पुन शेष न ), 'कस्तुरी चन्दन भस्म आदिले टीका (तिलक) लगाने के ४ नान हैं । २ कुकुमम् , काश्मीरजन्म ( = काश्मीरजन्मन् ), अग्निशिखम् , वरम् , बालोकम् (+बालिहकम् , बलीकम् , बह्निकम् ), पीतनम् , रकम् (+अल- संज्ञम् ; खूनके पर्यायवाचक नाम ), संकोचम् , पिशुनम् , धीरन् (+वीरम् ) लोहितचन्दनम् ( ११ न ) 'केसर कुङ्कुम' के ११ नाम हैं । ३ लाक्षा, राक्षा ( + रक्ता। १ स्त्री), जतु (न), यावः, अलक्तः, दुमा- मयः $ ( ३ पु), 'लाही, लाक्षा, लाख, महावर के ६ नाम हैं । ४ लवङ्गम् , देवकुसुमम् , श्रीसंज्ञम् (श्री अर्थात् लक्ष्मीके पर्यायवाले सब नाम । ३ न), लौंग' के ३ नाम हैं । ५ जायकम् , कालीयकम् ( + कालेयकम् ), कालानुसार्यम् (३ न), पोला चन्दन, जायकनामक गन्धद्रव्य' के ३ नाम हैं । ६ वैशिकम् (+वंशकम् ), अगुरु (+ राजाहम् , लोहम् , ( + पु), कृमिजम् (६ न), भा० दी मतसे 'भगर' के ६ नाम हैं ॥ * 'वी (धी) रलोहित चन्दनम्' इति पाठान्तरम् ॥ + "कालयकं च" इति पाठान्तरन् । * "वंशकागरुराजाहलोहकृमिजजोऽङ्गकम्” इति पाठान्तरम् ॥ धन्वन्तरिस्त्वेवमाह- "लाक्षा पलषा राक्षा दीप्तिश्च कृमिजं जतु । कृतघ्नानङ्गमनाता च द्रुमव्याधिरलक्तकः" ॥१॥ इति ॥ अगर) - २३२ अमरकोषः। [ द्वितीयकाण्डे- - । १ * कालगर्वगुरु २ स्यात्तु मङ्गल्या मल्लिगन्धि यत् । ३ यक्षधृपः सर्जरसो रालसर्वरसावपि ॥ १२७ ॥ बहुरूपोऽप्यस्थ वृकधूपकृत्रिमधूपको । ५ तुरुष्कः पिण्डकः । सिहो यावनोऽप्यऽथ पायसः ॥ १२ ॥ श्रीवासो वृकधूपोऽपि श्रीवेष्टसरलद्वौ । ७ मृगनाभिगमदः कस्तुरीच- १ कालागुरु, अगरु ( + अगुरु । २ न ), भा० दी० मतसे 'काला अगर के २ नाम हैं। ("महे० मतसे 'वंशिकम् , ..., ७ नाम 'अगर के हैं। २ मङ्गल्या (स्त्री), 'बेलाके फूलके समान सुगन्ध देनेवाले मगर का १ नाम है। ३ यक्षधूपः ( +धूपः ), सर्जरसः, रालः (+राला स्त्री, अरालः ), सर्वरसः, बहुरूपः ( ५ पु ), 'गल धूप के ५ नाम हैं । ४ वृकधूपः, कृत्रिमधूपः (२ पु), 'अनेक सुगन्धित पदार्थों को मिलाकर बनाये हुए धूप' के २ नाम हैं । ५ तुरुष्कः, पिण्डकः, सिलः (+सिल्हः), यावनः (४पु),लोहबान'के४नाम हैं। ६ पायसः, श्रीवासः ( + श्रीः), वृकधूपः (वृकः ), श्रीवेष्टः (+श्री. पिष्टः ), सरलद्रवः (६ पु), 'सरल देवदारुके लासासे बने हुए सुगन्धित द्रव्य-विशेष' के ५ नाम है ॥ ७ मृगनाभिः (+नाभिः $), मृगमदः ( + मृगः ||, मदः ।। २ पु), कस्तूरी (स्त्री), 'कस्तूरी' के ३ नाम है ॥ * "कालागुवेगुरु स्यात्तमङ्गल्या इति पाठान्तरम् । अत्र पक्षे यन्मल्लगन्धि अगुरु तत्तु मङ्गल्या स्यादित्येनं सम्बन्धो ज्ञेयः, तत्र मूलपाठ एव समीचीन इत्यवधेयम् ।। + "सिल्हो यावनोऽप्यथ" इति पाठान्तरम् + "श्रीपिष्टसरल द्रवो" इति पाठान्तरम् ॥ "मुख्यराट्क्षत्रिये नाभिः पुंसि प्राण्यङ्गके द्वयोः । चक्रमध्ये प्रधाने च स्त्रियां कस्तूरिकामदे" ॥१॥ इति रभसोक्तेः नाभिशब्दस्यापि पर्यायत्वमित्यवधेयम् ।। || "मृगनाभिमृगमदः मृगः करतूरिकापि च" इत्युक्तेमंगशब्दस्यापि पर्यायत्वमित्यवधेयम्।। T"मदो रेतसि कस्तुर्यां गर्व हर्षेभदानयोः” (मेदिनी पृ० ७९ श्लो० १२) इत्युक्तेः मद- शब्दस्यापि पर्यायतेत्यवधेयम् ॥ , मनुष्यवर्गः ६] मणिप्रभाब्याख्यासहितः। १ अथ कोलकम् ॥ १२ ॥ कक्कोलकं कोशफलरमथ कर्पूरमस्त्रियाम् । घनसारश्चन्द्रसंज्ञः *सिताभ्रो हिमवालुका ॥ १३० ॥ ३ गन्धसारो मलयजो भद्रश्रीश्चन्दनोऽस्त्रियाम् । ४ तैलपर्णिकगोशीर्षे हरिचन्दनमस्त्रियाम् ॥ १३१॥ ५ तिलपर्णी तु पत्राङ्गं रजनं रक्तचन्दनम् । कुचन्दनं चाथि जातीकोषजातीफले समे ॥ १३२ ॥ १ कोलकम् (+कोरकम् ), कक्कोलकम् , काशफलम् (+कोषफलम् । ३ न ) 'कङ्कोल' के ३ नाम हैं । २ कपूरम् (पुन), घनसास, चन्द्रसंज्ञः (चन्द्रमाके पर्यायवाचक सब शब्द ), सिताभः (+सिताभः । ३ पु), हिमावालुका (स्त्री), 'कपूर' के ९ नाम हैं। ३ गन्धसारः, मलयजः (२३), भद्रश्रीः (स्त्री), चन्दनः (पुन ), 'मलयागिरि चन्दन' के ४ नाम हैं । ४ तैलपर्णिकम् , गोशीर्षम् ( २ न), हरिचन्दनम् (पु न ), 'सपेद ठण्डा चन्दन, कमलके समान गन्धवाले चन्दन और कपिल या पीले वर्ण- वाले चन्दन का क्रमशः १-१ नाम है ॥ ५ तिलपर्णी (स्त्री), पत्त्राङ्गम् , रञ्जनम् , रक्तचन्दमम् , कुचन्दनम् (४ न), 'लाल चन्दन के ५ नाम हैं । ६ जातीकोषम् ( + जातिकोशम् ' जातीकोषः, जातिः, कोषः 1 ), जाती. फलम् (+फलम् ।। २ न), "जायफर के २ नाम हैं ।। *"सिताभो हिमवालुका" इति पाठान्तरम् ॥ + "कोशः कोषः इवाण्डजे । कुडमले चषके दिव्येऽर्थचये योनिशिम्बयोः । जाती- कोशेऽसिपिधाने-" ( अने० संग्र० २१५४६-५४७), इति, -अथ जनिषु जातिः सा- मान्यगात्रयोः ।। मालत्यामामलक्यां च चुल्ल्यां कस्पिल्लजन्मनोः। जातीफले छन्दसि च" (अ. ने० संग्र० २।१६८-१६९) इति हेमचन्द्राचार्योक्तेः जाति-कोष-कोशशब्दानां पर्यायतेत्य. वधेयम् ॥ + "फलां हेतुफले जातीफले फलकसस्ययोः' (अभि० चिन्ता० २१४९९) इति हेमचन्द्रा- चार्योक्त्या 'फल' शब्दस्यापि पर्यायत्वमित्यवधेयम् ।। . .

अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे १ कर्पूरागुरुकस्तुरीककौलेर्यक्षकर्दमः । २ गात्रानुलेपनी वर्णिकं स्याद्विलेपनम् ॥ १३३ ॥ ३ चूर्णानि वालयोगाः स्युर्भावितं धासितं त्रिषु । ५ संस्कारो गन्धमाल्याधैर्यः स्यात्तदधिवासनम् ॥ १.४ ॥ ६ माल्यं मालास्रजो मूनि- १ * रक्षकर्दमः (पु), 'कपूर, अगर, कस्तूरी भोर कङ्कोल ; इन चारोंको वरावर २ देकर बनाये हुए लेप-विशेष' का १ नाम है । २ गात्रानुलेपनी, वत्तिः ( २ स्वी), वर्णकम् , विलेपनम् (२ न), 'लेप . करनेके लिये पीले या घिसे हुए गन्धद्रव्य-विशेष' के ४ नाम हैं। ("क्षी. स्वा० मतसे दो दो शब्द एकार्थक हैं ")॥ ३ चूर्णम् (न), वासयोगः (पु), 'कपड़े आदिको वासनेके योग्य चूर्ण किये हुए गन्धद्रव्य-विशेष' के २ नाम हैं ॥ ४ भावितम् , वासितम् ( २ त्रि), 'सुवासित कपड़ा आदि' के २ नाम हैं। ("क्षी० स्वा० मतसे गन्धद्रव्य अर्थात् इतर आदि से सुगन्धित किये हुए कपड़े आदिको 'भावित और केतकी, केवडा या गुलाब आदिसे सुगन्धित किये हुए कपड़े आदिको 'वासिता कहते हैं")॥ ६ अधिवासनम् ( न ) गुलाबजल सुगन्धित फूल श्रादिसे पान तिल मादिको सुवासित करने का १ नाम है ॥ ६ माल्यम् (न), माला, खक ( = स्त्रज् । २ स्त्री), 'शिरसे धारणा की हुई माला' के ३ नाम हैं । ( "यहां 'मुनिः शब्दके अविवक्षित होनेसे तदुक्तं ब्याडिना-- "कर्पूरागरुकस्तूरीकझोलघुसणानि च । एकीकृतमिदं सर्वं यक्षकर्दम इष्यते॥१॥ इति ॥ धन्वन्तरिस्तु भिन्नमेवाह । तद्यथा- "कुङ्कमागरुकस्तरीक परं चन्दनं तथा। महासुगन्धमित्युक्तं नामतो यक्षकर्दमः ॥१॥ इति ॥ | गात्रानुलेपनी वर्ति विगन्ध्यथ विलेपनम् । वर्णकञ्चाथ विच्छित्तिःस्त्री कषायोऽङ्करोगके" ॥१॥ इति रभसोक्तिमनुसृत्वेदमित्यवधेयम् ॥ , - मनुष्यवर्ग:६] मणिप्रभाब्याख्यासिहतः। १ OM केशमध्ये तु गर्भकः। २ प्रभ्रष्टकं शिखालम्बि ३ पुरोन्यस्तं ललामकम् ॥ १३५ ॥ ४ प्रालम्बमुजुलम्बि स्यात् ५ कण्ठाद्वैकक्षिकं तु तत् । यत्तिर्यविक्षप्तमुरलि ६ शिखास्वापीडशेखरौ ॥ १३६ ॥ ७ रचना * स्यात्परिस्यन्द - आभोगः परिपूर्णता । है उपधानं तूपबहः १० शय्यायां शयनीयवत् ॥ १३७ ॥ शयनं ११ मञ्चपर्यङपल्यङ्काः खट्वया समाः। मालामात्र' के भी ये ३ नाम हैं")॥ गर्भकः (पु), 'केशके बीच में लगाई हुई माला' का १ नाम है । २ प्रभ्रष्टकम् (न), 'शिखा या चोटी से लटकती हुई माला का १ नाम है। ३ ललामकम् (न), 'ललाट पर धारण को हुई माला, मुण्डमाल' का १ नाम है। ४ प्रालम्बम् (न), 'गलेमें सीधे लटकती हुई माला' का १ नाम है ॥ ९ वैकक्षिकम् (न), 'जनेऊको तरह तिर्छा पहनी हुई माला का १ नाम है। ६ आपीडः, शेखरः (२ पु), शिखामें रखी हुई माला' के २ नाम हैं । ७ रचना (स्त्री), परिस्यन्दः (+परिस्पन्दः । पु), 'माला आदिको वनाने ( गूथने )। के २ नाम हैं । ८ आभोगः (पु), परिपूर्णता (स्त्री), 'सेवा सुश्रूषा भादि सब प्रकारके उपचारोंसे परिपूर्ण होने के २ नाम हैं । ९ उपधानम् (न), उपबहः (पु), 'तकिया के २ नाम हैं । १० शय्या (स्त्री), शयनीयम् , शयनम् ( २ न ), 'शय्या, बिछौना' के ३ नाम हैं। (भा० दी० मतसे 'तोलक शादि' के ये ३ नाम हैं" ) ॥ ११ मञ्चः, पर्यतः, पल्यङ्कः (३ पु), खट्वा ( स्त्री), 'पलँग खटिया आदि' के ४ नाम हैं। ("किसी २ के मतसे 'मञ्चः' यह १ नाम मचान या Romala * स्यात्परिस्पन्द" इति पाठान्तरम् ।।

२३६ अमरकोषः। [द्वितीयकाण्डे- १ गेन्दुकः कन्दुको २ दीपः प्रदीपः ३ पीठमासनम् ॥ १३८ ॥ ४ समुद्कः सम्पुटकः ५ प्रतिग्राहः पतद्ग्रहः । ६ प्रसाधनी कङ्कतिका ७ पिष्टातः पटवासकः ॥ १३ ॥ = दर्पणे * मुकुरादर्शी : व्यजनं तालवृन्तकम् । इति मनुष्यवर्गः ॥ ६॥ ऊंचे सिंहासन आदि' का और ‘पर्यङ्कः, पल्यङ्कः ये २ नाम पलँग मसहरी मादि' के तथा 'खट्वा' यह १ नाम 'खटिया के हैं)। १गेन्दुकः ( + गिन्दुकः, गेण्डुकः, गण्डूकः ), कन्दुकः (२ पु), 'गेंद' के २ नाम हैं। २ दीपः, प्रदीपः ( +स्नेहाशः, कजलध्वजः, दशेन्धनः, गृहमणिः, दोषातिलकः, शिखातरुः, दीपवृक्षा, ज्योत्स्नावृक्षः; पु । २ पु), 'चिराग के २ नाम है। ३ पीठम् , आसनम् (२ न), 'आसन के २ नाम है ॥ ४ समुद्रकः, सम्पुटकः ( २ पु), 'डब्बा, सम्पुट' के २ नाम हैं ॥ ५ प्रतिमाहः (बै० प्रतिग्रहः ), पतद्ग्रहः (२ ), 'उगलदान' पिक' दान के २ नाम है ॥ ६ प्रसादनी, कङ्कतिका ( २ स्त्री), 'कधी के २ नाम हैं ॥ ७ पिष्टातः, पटवासकः ( २ पु ), 'बुक्का' के २ नाम हैं ॥ ८ दर्पणः, मुकुरः ( + मकुरः, मङ्कुरः ), आदर्शः ( + आत्मदर्शः । ३ पु), 'शीशा, आइना' के ३ नाम हैं । ९ व्यजनम् , तालवृन्तकम् (+तालवृन्तम् । २ न), 'पंखा के नाम हैं। इति मनुष्यवर्गः ॥ ६ ॥ * "मकुरादशौं” इति पाठान्तरम् ।। तिदुक्तं त्रिकाण्डशेषे----..-दीपस्तु स्नेहाशः कज्जलध्वजः। दशेन्धनो गृहमणिः दोषातिलक इत्यपि ॥१॥ शिखातरुदीपवृक्षो ज्योत्स्नावृक्षोऽथ-" इति ॥

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Amarakosah Dwithiya Khandah

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Amarakosah Dwithiya Khandah
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Amarakosah Dwithiya Khandah
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Citation
1939
Publisher
Chowkamba Samskruth Pusthakalay
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Scl
DLI number
326139
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