Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Prakrat Vyakaran

Acharya Hemchand · 2011/01

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'समताका
आगम सस्थान ग्रन्थमाला
15
सम्पादक
प्रो सागरमल जैन
प्राकृत व्याकरण
(आचार्य हेमचन्द्र विरचित)
डॉ. उदयचन्द्र जैन
विभागाध्यक्ष
जैनविद्या एव प्राकृत विभाग
मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय
उदयपुर-313 001
प्रभारी एव
डॉ. सुरेश सिसोदिया
शोध अधिकारी
आगम, अहिसा-समता एव प्राकृत सस्थान
उदयपुर-313 001
अभिया
धम्म
what
आगम
उदयपुर
www
संस्थान
आगम, अहिंसा-समता एवं प्राकूत संस्थान
उदयपुर (राज.)

पुस्तक
..
प्राकृत व्याकरण
सम्पादक
प्रो. सागरमल जैन
प्रस्तोता
डॉ. उदयचन्द्र जैन
डॉ. सुरेश सिसोदिया
..
प्रकाशक
आगम, अहिंसा-समता एवं प्राकृत संस्थान
पद्मिनी मार्ग, उदयपुर-३१३००१
संस्करण
प्रथम,
१९९७
मूल्य
रुपये ७०.००
मुद्रक
पारदर्शी प्रिंटर्स
२६१, ताम्वावती मार्ग, उदयपुर-३१३ ००?
अक्षरांकन
श्रीराजेन्द्र कम्प्यूटर्स, उदयपुर
४११०२९

gথচাকাঙ্গীয় प्राकृत भाषा एव आगम साहित्य के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थो का प्रकाशन एव उन्हे जनोपयोगी बनाने का प्रयास आगम, अहिसा - समता एव प्राकृत सस्थान का मुख्य उद्देश्य रहा है । इसी उद्देश्य से सस्थान द्वारा अब तक दस प्रकीर्णक ग्रन्थ अनुवाद एव सुविस्तृत भूमिका सहित प्रकाशित हो चुके है । विविध विश्वविद्यालयो मे जैनविद्या एव प्राकृत भाषा मे अध्ययनरत छात्रो के पाठ्यक्रम को दृष्टिगत रखते हुए प्राकृत साहित्य के प्राय सभी प्रतिनिधि ग्रन्थो के गद्य एव पद्य के पाट सकलित कर प्राकृत भारती ग्रन्थ का प्रकाशन भी संस्थान द्वारा किया गया है । साथ ही जैन धर्म एव दर्शन से सम्बन्धित दो शोध प्रबन्धो- जैन धर्म के सम्प्रदाय तथा उपासकदशाग और उसका श्रावकाचार का प्रकाशन भी सस्थान द्वारा हो चुका है । प्राकृत व्याकरण की समृद्ध परम्परा से परिचित कराने की दृष्टि से प्रस्तुत प्राकृत व्याकरण पुस्तक का प्रकाशन सस्थान द्वारा किया जा रहा है । जैनविद्या एव प्राकृत विभाग, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर के विभागाध्यक्ष डॉ. उदयचन्द्र जैन तथा आगम, अहिसा - समता एव प्राकृत सस्थान, उदयपुर के प्रभारी एव शोधाधिकारी डॉ. सुरेश सिसोदिया ने सयुक्त रूप से इस पुस्तक को प्रस्तुत करने का कार्य किया है । विद्वान लेखको ने प्राकृत व्याकरण को.सरल रूप से सिखाने के लिए इस पुस्तक मे आधुनिक पद्धति का . प्रयोग किया है। इससे प्राकृत सीखने वालो को व्याकरणिक ज्ञान सरलता पूर्वक हो सकेगा। प्राकृत के सूत्रो को प्राय. रटकर सीखने की पद्धति अपनाई जाती है किन्तु यह पद्धति बोझिल ही समझी जाती है, इसी बात को ध्यान मे रखते हुए विद्वत्द्वय ने प्राकृत व्याकरण के सूत्रो का विश्लेषण इस प्रकार किया है कि सूत्रो को रटे बिना ही प्राकृत व्याकरण का ज्ञान हो सकेगा। सस्थान के मानद् निदेशक प्रो. सागरमलजी जैन के हम अत्यन्त आभारी है जिनके दिशा-निर्देशन मे सस्थान प्राकृत भापा एवं आगम साहित्य का सतत् प्रकाशन कार्य कर रहा है । सस्थान की मानद् सह निदेशिका डॉ सुषमाजी सिघवी एव मन्त्री श्री वीरेन्द्रसिंहजी लोढा के भी हम आभारी है, जो सस्थान के विकास मे हर सम्भव सहयोग एव मार्गदर्शन - दे रहे है। प्रस्तुत पुस्तक के प्रकाशन हेतु स्व. श्रीमती मीनादेवीजी चोरडिया की पुण्य स्मृति मे उनके परिजनो ने पन्द्रह हजार रुपये का अर्थ सहयोग प्रदान किया है, एतदर्थ हम उनके प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करते है । ग्रन्थ के सुन्दर एव सत्वर मुद्रण के लिए पारदर्शी प्रिन्टर्स, उदयपुर को धन्यवाद ज्ञापित करते है । गुमानमल चोरडिया सरदारमल कांकरिया अध्यक्ष महामन्त्री प्रस्तुत प्रकाशन के अर्थ सहयोगी स्व. श्रीमती मीनादेवीजी चोरड़िया संक्षिप्त जीवन परिचय जयपुर की धर्मनिष्ठ उदारचेता, महिलारल श्रीमती मीनादेवीजी चोरडिया का 4 अगस्त 1983 को 73 वर्ष की आयु मे संथारापूर्वक समाधिमरण हो गया। आपके पिता श्री मगनमलजी सा बोथरा समाज के सुप्रतिष्ठित, धर्मनिष्ठ सुश्रावक थे । आपका विवाह समाज के अग्रणी श्रावक श्री केशरीमलजी सा चोरडिया के सुपुत्र जौहरी श्री स्वरूपचदजी सा चोरडिया के साथ हुआ । पितृपक्ष एव ससुराल पक्ष दोनो परिवारो के धार्मिक संस्कारो और आदर्श वातावरण से श्रीमती मीनादेवीजी के जीवन मे तप, त्याग, सहिष्णुता और निष्काम सेवा भावना की उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और वे आदर्श महिला-जीवन का प्रतीक बन गई । सेवा, स्वधर्मी वात्सल्य तथा गुप्तदान प्रारभ से ही आपके जीवन के अग रहे । वैभव सम्पन्न परिवार में जन्म लेकर तथा चारो ओर भौतिक सुरा सुविधाओं की सामग्री होते हुए भी आपने 'सादा जीवन उच्च विचार' को ही अपना आदर्श जीवन सूत्र बनाया | आपके व्यवहार में शालीनता, वाणी में माधुर्यता, हृदय मे अजस्र करुणा और पग-पग पर आत्मीयतापूर्ण स्नेह सागर लहराता रहता था । समाज की अनेक महिलाओ को अपने स्नेह, सेवा और सहयोग का सम्बल देकर आपने उन्हें स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनाया । आप प्रत्येक को सुख-दुख मे पथ प्रदर्शिका वनकर उन्हें अपना वात्सल्य और प्रेम वॉटती थी। संत महापुरुषों, महासतियॉजी म सा के प्रति आपकी अनन्य श्रद्धा और अटूट भक्ति थी । सामायिक और स्वाध्याय के प्रति आपकी विशेष रूचि थी। आपने अपने जीवन मे कई प्रकार के त्याग और प्रत्याख्यान ले रखे थे । आप आदर्श तपस्विनी थी। आपने कई अठाईयाँ, ग्यारह, पन्द्रह तथा मासखमण तपस्याएँ की। आपके धर्मपरायण व्यक्तित्व और सेवाभावी जीवन का प्रभाव आपके पूरे परिवार में परिलक्षित होता है । आपके तीनों पुत्र सर्वश्री गुमानमलजी चोरडिया, उमरावमलजी चोरडिया एवं राजमलजी चोरडिया तथा सुपुत्री स्व श्रीगी प्रेमलताजी नवलखा सामाजिक, धार्मिक, शेक्षणिक एव चिकित्सा सवधी बहुवित सेवा कार्यो एव लोक कल्याणकारी विविध प्रवृत्तियों में अग्रणी है । आप ती पुत्रों का भरा-पूरा परिवार सेवा और वात्सल्य भावना का जीवत प्रतीक है।

पुरोवाक प्राकृत भाषा और व्याकरण को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए भाषा एव व्याकरण के स्वरूप को भी जानना होगा । भाषा विचारो और भावो की प्रेषणीयता का साधन है । भाषा मनुष्य का ऐच्छिक व्यवहार एव अभ्यासो का एक समूह है । भापा समाज के वातावरण से सीखी जाती है । अत भाषा के प्रयोग मे क्रमश एक व्याख्या या पद्धति होती है, यही भाषा के व्याकरण को निर्धारित करती है । मूल शब्दो के अर्थो की व्याख्या व्याकरण से होती है । शब्दो के विश्लेषण कार्य को व्याकरण कहा गया है। आचार्य राजशेखर ने भी शब्दो की सिद्धि तथा व्याख्या करने वाले शास्त्र को व्याकरण कहा है । अत भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ सम्बन्ध है । असाधु (अशुद्ध) शब्दो से साधु (शुद्ध) शब्दो को जिसके द्वारा पृथक् किया जाता है, व्याकरण कहा जाता है। भाषा के क्षेत्र मे कार्य करने वाले शोधार्थी के लिए भाषा और व्याकरण की जानकारी मार्गदर्शन का कार्य करती है । आचार्य जिनसेन ने व्याकरणशास्त्र, छन्दशास्त्र और अलकारशास्त्र इन तीनो के समूह को 'वाड्मय' कहा है । इस वाड्मय की शिक्षा भगवान ऋषभदेव ने अपनी पुत्रियो को दी थी । ध्वनिप्रक्रिया एव व्याकरणिक विश्लेषण द्वारा ही किसी भाषा के स्वरूप की सही जानकारी हो सकती है । प्राकृत को भी इसी माध्यम से जानने का प्रयत्न करना जरूरी है । प्राकृत भाषा का सम्बन्ध भारतीय आर्यभाषा के सभी कालो से रहा है । वैदिक युग के साथ प्राकृत जनवोली एव कथ्य भाषा के रूप मे रही । मध्ययुग मे प्राकृत दर्शन-चिन्तन एव साहित्य की भाषा बनी तथा आधुनिक युग मे प्राकृत अपभ्रश के माध्यम से विभिन्न प्रान्तीय भाषाओ के साथ जुडी हुई है। प्राकृत भाषा के व्याकरण सम्बन्धी नियम स्वतत्र आधार को लिये है तथा जनभाषा मे प्रयोगो की बहुलता को भी प्राकृत ने सुरक्षित रखा है। प्राकृत ने अपने इन्हीं तत्त्वो के अनुरूप कुछ ऐसे नियम निश्चित कर लिये जिनसे वह किसी भी भाषा के शब्दो को प्राकृत रूप देकर अपने मे सम्मिलित कर सकती है । यह प्राकृत भाषा की सजीवता और सर्वग्राह्यता कही जा सकती है । इसी प्रवृत्ति का प्रयोग करते हुए प्राकृत कवियो ने अपने काव्य साहित्य को विभिन्न शब्द-भडारो से समृद्ध किया है । प्राचीन विद्वान् नमिसाधु के अनुसार प्राकृत शब्द का अर्थ है - व्याकरण आदि सस्कारो से रहित लोगो का स्वाभाविक वचन-व्यापार । उससे उत्पन्न अथवा वही वचन-व्यापार प्राकृत है। प्राक्+कृत पद से प्राकृत शब्द बना है, जिसका अर्थ है पहिले किया गया । जैनधर्म के द्वादशाग ग्रन्थो मे ग्यारह अग ग्रन्थ पहिले किये गये है। अत ।

। - उनकी भाषा प्राकृत है, जो वालक, महिला आदि सभी को सुवोध है । इसी प्राकृत के देश-भेद एवं सस्कारित होने से अवान्तर विभेद हुए है । अत. प्राकृत शब्द की व्युत्पति करते समय 'प्रकृत्या स्वभावेन सिद्ध' अथवा 'प्रकृतीना साधारणजनानामिद प्राकृतम्' अर्थ को स्वीकार करना चाहिये । जनसामान्य की स्वाभाविक भाषा प्राकृत है। भारतीय भाषाओ के आदिकाल की जनभाषा से विकसित होकर प्राकृत स्वतन्त्र रूप से विकास को प्राप्त हुई है । वोलचाल और साहित्य के पद पर वह समान रूप से प्रतिष्ठित रही है। उसने देश की चिन्तनधारा, सदाचार और काव्य-जगत् को अनुप्राणित किया है । अतः प्राकृत भारतीय संस्कृति की संवाहक भाषा है । प्राकृत व्याकरणशास्त्र को पूर्णता आचार्य हेमचन्द्र के सिद्धहैमशब्दानुशासन से प्राप्त हुई है । प्राकृत वैयाकरणो की पूर्वी और पश्चिमी दो शाखाएँ विकसित हुई है। पश्चिमी शाखा के प्रतिनिधि प्राकृत वैयाकरण हेमचन्द्र है (सन् १०८८ से ११७२) । इन्होंने विभिन्न विपयो पर अनेक ग्रन्थ लिखे है । इनकी विद्वता की छाप इनके इस व्याकरण ग्रन्थ पर भी है । इस व्याकरण का अनेक स्थानो से प्रकाशन हुआ है, किन्तु इन दिनो हिन्दी अनुवाद के साथ प्राकृत व्याकरण की जो कमी अनुभव की जा रही थी उसकी पूर्ति आगम सस्थान, उदयपुर के इस प्रकाशन से हो जाती है । आगम संस्थान के प्रकाशनो ने प्राकृत अध्ययन का एक नया क्षेत्र खोला है । प्रकीर्णको के हिन्दी अनुवाद सहित सम्पादन-प्रकाशन ने आगम संस्थान की/यहाँ के विद्वानो की एक अलग पहिचान बनायी है । इस कार्य में जैनविद्या मनीषी प्रोफेसर कमलचंद सोगाणी एव प्रोफेसर सागरमल जैन का निर्देशन/सहयोग स्मरणीय रहेगा । संस्थान के कर्मट एव विद्यानुरागी महामन्त्री श्री सरदारमलजी कांकरिया एव उनकी टीम का सवल संस्थान की गतिविधियो की आधारशिला है । सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के जैनविद्या एवं प्राकृत विभाग के प्राध्यापको तथा सस्थान के कार्यो मे संलग्न युवा विद्वानो के पारस्परिक सारस्वत सहयोग से सार्थक परिणाम अपेक्षित है । सस्थान से पूर्व मे प्रकाशित 'प्राकृत भारती' की तरह डॉ. उदयचंद्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया द्वारा प्रस्तुत यह 'प्राकृत व्याकरण' पुस्तक भी प्राकृत के विद्यार्थियो एवं अध्येताओ द्वारा अवश्य समादृत होगी। यह पुस्तक संक्षेप मे सूत्रशैली से प्राकृत व्याकरण सीखने के लिए उपयोगी प्रतीत होती है। ८ मार्च, १९९७ A प्रोफेसर प्रेम सुमन जैन अधिष्ठाता-कला महाविद्यालय, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर प्रारम्भिकी प्राकृत-भाषा जन साधारण की भाषा के रूप मे प्राचीन समय से ही विकास को प्राप्त होती रही है । वैदिक-युग तक यह भाषा जन-सामान्य की लोक-प्रचलित भाषा रही है । महावीर ने इसी जन-भाषा 'प्राकृत' को अपने उपदेशो का माध्यम बनाया । जन-सामान्य की यही भाषा कुछ समय पश्चात् साहित्यिक भाषा के रूप मे हमारे सामने आई । आगम ग्रन्थो, शिलालेखो एव नाटको आदि मे इसका प्रयोग होने लगा । इसके पीछे जन-सामान्य का प्राकृत-भाषा के प्रति सम्मान ही कहा जा सकता है । वेदो की रचना जिस भाषा मे हुई, उस भाषा मे भी प्राकृत-भाषा के अनेक उदाहरण देखे जा सकते है | इससे यह तो स्पष्ट है कि प्राकृत-भाषा का विकास वैदिक युग से ही होने लगा था । अत उस मूल लोक-भाषा मे जो विशेषताएँ थी, वे बाद मे वैदिक-भाषा एव प्राकृत-भाषा मे समान रूप से आती रही है । वैदिक-भाषा और प्राकृत-भाषा की कुछ समान प्रवृत्तियो के कारण भाषा-वैज्ञानिको ने इस भाषा के विषय मे यह मत व्यक्त किया है कि 'प्राकृतो का अस्तित्व निश्चित रूप से वैदिक बोलियो के साथ-साथ विद्यमान था । 2 वेदो मे भी ऋग्वेद की भाषा मे प्राकृतीकरण की प्रवृत्ति मिलती है । क्योकि इस समय वेदो मे जन-भाषा के तत्त्व मिले-जुले रूप मे उपस्थित थे । महावीर युग के वाद जैसे ही साहित्यिक रचनाओ के निर्माण का युग प्रारभ हुआ, वैसे ही व्याकरण तत्त्व विविध रूप मे समाविष्ट होने प्रारभ हो गये। डॉ पिशेल ने भी कहा है - 'सब प्राकृत भाषाओ का वैदिक व्याकरण और शब्दो का नाना स्थलो मे साम्य है ।'3 इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वैदिक-भाषा और प्राकृत-भाषा का पारस्परिक सम्बन्ध है । प्राकृत-भाषा के विविध प्रयोगो और इसके विकसित साहित्य के कारण व्याकरण-सम्बन्धी नियमो का वैयाकरणो ने स्वतन्त्र रूप से विधान किया तथा जनभाषा के प्रयोगो को सुरक्षित रखकर इसे जनसामान्य मे अधिक से अधिक लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। 1 दृष्टव्य है- 'वैदिक भाषा में प्राकृत के तत्त्व'-डॉ प्रमसुमन जैन एव डॉ उदयचद्र जैन का लेख (प्राकृत एव जैनागम विभाग, सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा आयोजित 1981 के यू जी मी समीनार में पठित) 2 तुलनात्मक भापा विज्ञान-डॉ पी डी गुणे, ए 153 3 प्राकृत भापाओं का व्याकरण-डॉ पिशेल, पृ 8 4 विस्तार हेतु दृष्टव्य है- (क) प्राकृत मार्गापदेशिका-प वेचरदास दोशी (ख) प्राकृत स्वयं शिक्षक (द्वितीय सस्करण) खण्ड-1 - डॉ प्रमसुमन जैन 8 है प्राकृत-व्याकरण -शास्त्र का कोई व्याकरण प्राचीन युग मे रहा हो, ऐसे उल्लेख तो मिलते है, किन्तु लगभग दूसरी शताब्दी के पूर्व का कोई प्राकृत-व्याकरण उपलब्ध नहीं है, किन्तु प्राकृत-व्याकरण के सिद्धान्त प्राकृत के आगम ग्रन्थो मे प्राप्त होते है । उन्ही के आधार पर और उपलब्ध प्राकृत ग्रन्थो को ध्यान में रखते हुए आगे चलकर प्राकृत के व्याकरण ग्रथ लिखे गये है | उन सबकी समीक्षा नही करके यहाँ सक्षेप मे प्राकृत-व्याकरण के कुछ प्रमुख ग्रन्थो का परिचय प्रस्तुत ताकि उससे आचार्य हेमचद्र के प्राकृत-व्याकरण की परपरा को समझा जा सके । आचार्य भरत के नियम प्राकृत-भाषा के नियमो का विधान भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' मे किया है। उन्होने 18वे अध्ययन मे विभिन्न प्राकृत-भाषाओ का उल्लेख करते हुए प्राकृत की प्रमुख विशेषताओ को गिनाया है । 'ऐ', 'औ' एव विसर्ग का निषेध, ख-घ-थ-ध-भाण हआरो अर्थात् ख, घ, थ, ध, भ का 'ह' होता है । इन्ही विशेषताओ के साथ भरतमुनि ने प्राकृत बोलने वाले पात्रो का उल्लेख करते हुए यह भी कथन कर दिया है कि धीरोदात्त, धीरललित, धीरोद्धत नायक विशेष अवसर पर प्राकृत का प्रयोग कर सकते है ! नाट्यशास्त्र के इसी क्रम के 32वे अध्ययन मे नाद युक्त प्राकृत-गाथाओ को प्रस्तुत किया है, जिनमे प्राकृत-भाषा के विशेष नियम देखे जा सकते है । यथा- गज्जंते जलआ णच्वंत सिहिणो, गाअंतो भमरा रम्मे पाउसए । (अध्ययन 32, गाथा 85) चण्ड का प्राकृत-लक्षण प्राकृत-व्याकरण का सर्वप्राचीन ग्रथ चण्डकृत 'प्राकृत-लक्षण' को माना गया है । इसकी रचना द्वितीय शताब्दी मे की गई थी । यह अति लघुकाय ग्रथ है। इसमे तीन विधान है, जिनमे क्रमश. 31, 29 एव 39 सूत्र है । प्रथम विधान शब्द रूपो की विभक्तियो का है और द्वितीय एवं तृतीया विधान प्राकृतीकरण से सम्बन्धित है । सूत्रकार ने 'सिद्ध प्राकृत त्रेधा' इस प्रथम सूत्र से अपने ग्रथ का प्रारभ किया है । विभक्ति-विधान नामक प्रथम-अध्याय मे सज्ञा-शब्दो के 17 सूत्र है, जिनमे पुर्लिंग, स्त्रीलिग एव नपुसकलिग मे लगने वाले महत्त्वपूर्ण प्रत्ययो का ही निर्देश है। इन सभी के लिए एक ही सूत्र पर्याप्त होगा - ‘सागमस्याप्यामो णो हो वा' (5) सूत्र सभी लिगो के षष्ठी विभक्ति के वहुवचनो मे ण एव ह प्रत्यय होने का निर्देश करता 1 विस्तार हतु दृष्टव्य है- 'प्राकृत व्याकरण शास्त्र का उद्भव एवं विकाम' नामक डॉ प्रेममुमन जैन का निवन्ध - संस्कृत प्राकृत जैन व्याकरण और काप की परपरा, छापर 1977 2. भरतमुनि-नाट्यशास्त्र, अ 18, श्लोक 6-23, हिन्दी व्याख्या, पृ 335 प्रका चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणमी 3 वहीं, 18/32-33, 337 9 है । सर्वनाम-शब्दो से सम्बन्धित सूत्र 14 है, जो 'अम्ह' एव 'तुम्ह' सर्वनाम शब्दो के नियमो का विधान करने वाले है तथा इसका 'तु त्ता च्या दृ तु तूण ओ प्पि पूर्वकालार्थे (2/19) सूत्र पूर्वकालिक क्रिया का है एव 'भावे त्तण (2/29) सूत्र तद्धित का है। ग्रन्थ के अत मे अपभ्रश, पैशाची, मागधी एव शौरसेनी के एक-एक सूत्र है। बलदेव उपाध्याय ने इस ग्रथ की व्याकरण के विषय मे लिखा है- 'इसमे उस सामान्य प्राकृत का निरूपण किया गया है जो अशोक की धर्मलिपियो की भाषा से उत्तरवर्ती और वररूचि द्वारा व्याख्यात प्राकृत से पूर्ववर्ती है । यह अश्वघोष और भास के द्वारा अपने नाटको मे प्रयुक्त भाषा से समता रखती है । वररूचि का प्राकृत-प्रकाश 'प्राकृत प्रकाश' ईसा की तृतीय-चतुर्थ शताब्दी मे रचित प्राकृत-व्याकरण का महत्त्वपूर्ण ग्रथ है । यह 12 परिच्छेदो मे विभक्त विशदता एव व्यापकता को लिए हुए है । इसकी सूत्र सख्या 509 है । इसके प्रारभिक चार परिच्छेद प्राकृतीकरण से सम्बन्धित है । पचम-परिच्छेद शब्द-सिद्धि-विधान का है, षष्ठम परिच्छेद क्रिया-रूपो का है, सप्तम-परिच्छेद प्राकृत धातुओ का है, अष्ठम-परिच्छेद निपात-विधि का है, नवम-परिच्छेद अव्यय-विधान का है । इसके अतिरिक्त तीन परिच्छेद विभिन्न प्राकृतो (पैशाची, मागधी, शौरसेनी) से सम्बन्धित है । प्रस्तुत व्याकरण की रचनाशैली चण्डकृत प्राकृत-लक्षण की तरह ही है । वृहद एव प्राकृत के विविध नियमो का विवेचन होने के कारण इस ग्रथ का विद्वत जगत् मे काफी प्रचार एव प्रसार हुआ । इसी प्राकृत-प्रकाश की निम्न चार टीकाएँ है, जो सभी दृष्टियो से महत्वपूर्ण है :- 1. मनोरमा-टीका- यह प्राकृत-प्रकाश पर लिखी गई प्राचीन टीका है। इसमे टीकाकार भामह ने अल्प शब्दो मे ही वररूचि के सूत्रो के रहस्य को उद्घाटित किया है । साथ ही विभिन्न उदाहरणो द्वारा सूत्र की प्रकृति को भी स्पष्ट किया है । यथा- 'न नपुसके 5/25', प्रथमैकवचने नपुसके न दीर्घत्व भवति । दहि, महु आदि । 2. प्राकृत- -मंजरी-टीका- कात्यायन द्वारा रचित यह टीका मनोरमा टीका का ही अनुसरण करती है । यह पद्यवद्ध सरल-शैली से युक्त है । इसमे दृष्टातो के साथ शब्द रचना भी है । यथा- अमोऽकारस्य लोप: स्यादत उत्तरवर्तिनः । वच्छं पेच्छेह वदेह सूरं चंदं णिअच्छह ॥ यह टीका 'अतोऽम 5/3' सूत्र की है। इसमे द्वितीया विभक्ति के एकवचन के वच्छ, सूर और चद शब्द है । इसी तरह 'जसो वा 5/20' की टीका को देखा 1 प्राकृत प्रकाश, वाराणसेय सस्कृत विश्वविद्यालय प्रकाशन, भूमिका-पृ 15 10 जा सकता है, जिसमे स्त्रीलिग शब्दो के विविध निर्देश है । यथा- उत्त्वमोत्त्वं च जायेते द्वावादेशौ जस स्त्रियाम् । सर्वेषामपि शब्दानामथवा स्याददन्तता ॥ होन्ति मालाउ मालाओ पक्षे माला णईउ च । णईओ च णई वा स्याद् वधूशब्दोऽपि तद्विधः ॥ इस प्रकार काव्यात्मक-शैली मे निबद्ध यह टीका नवम-परिच्छेद मे समाप्त होती है। 3. प्राकृत-संजीवनी-टीका:- 14वीं शताब्दी में वसतराज ने प्राकृत-प्रकाश पर विस्तृत सजीवनी टीका लिखी, जो न केवल इसलिए अनुपम है कि यह वृहद्-टीका है, अपितु यह टीका इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि टीकाकार ने इसमे शब्द-सिद्धि एवं विभिन्न उदाहरणो को भी प्रस्तुत किया है । कहीं-कही पद्यो का प्रयोग भी इसमे है । पद्यो मे पूर्ण प्राकृत और कुछ पद्यो मे मात्र प्राकृत के शब्द देकर उसे सस्कृत मे निवद्ध किया गया है । पूर्ण प्राकृत का एक उदाहरण दृष्टव्य है:- कुसुमाउहपियदूअओ मउलाविअघणचूअओ । सिढिलिअमाणग्गहणओ वाहअइ दाहिणपवणओ ||4/26 || 4. प्राकृत-सुबोधिनी-टीका:- 17वीं शताब्दी मे सदानद ने प्राकृत-प्रकाश पर लधु शब्दो से युक्त सुबोधिनी टीका लिखी है । इस टीका के साथ कही-कहीं पर पद्य भी दिये गये है । इस टीका को प्राकृत-सजीवनी सक्षिप्तीकरण कहा जा सकता है। 5. प्राकृत-वाद:- नारायण विद्याविनोद की यह टीका प्राकृत-प्रकाश के छह परिच्छेदो की टीका मानी गयी है। प्राकृत-शब्दानुशासन पुरुषोत्तम देव ने 12वीं शताब्दी मे 'प्राकृत-शब्दानुशासन' नामक प्राकृत-व्याकरण की रचना की । यह ग्रथ वीस-अध्यायो मे विभक्त है । जिसके दो अध्याय अभी तक उपलब्ध नहीं हो सके है । इसका तीसरा-अध्याय भी पूर्ण नहीं है। इसके चतुर्थ अध्याय मे सन्धि के नियमो का निर्देश है । पचम अध्याय विभक्ति विधान, षष्ठम अध्याय क्रियाविधान, सप्तम अध्याय धातु रूपो एव अष्ठम अध्याय निपात-विधान का है। शौरसेनी विधान के लिए नवम अध्याय है, जिसमे 93 सूत्र है । यह विवेचन प्राकृत-प्रकाश की अपेक्षा अधिक पूर्ण तथा पुष्ट है ।" प्राच्या (10वे मे), अवती (11वे मे), मागधी (12वे एवं 13वे मे), चाण्डाली (14वे मे), शावरी (14वे मे), ढक्की (16वे मे) है (इसके 17-18 अध्याय अपभ्रश भाषा से संवन्धित हैं, जिनमे १0+233113 सूत्र है ।) इस पर टिप्पण लिखते हुए वलदेव 1. बलदेव उपाध्याय- प्राकृत-प्रकाश, भूमिका, पृ. 23 11 उपाध्याय ने लिखा है- 'पुरुषोत्तमदेव ने अपभ्रश का प्रामाणिक प्रतिपादन एकत्र कर भाषाविदो का बडा उपकार किया है। इसी के अन्तिम दो अध्यायो मे पैशाची-प्राकृत की विशेषताओ का उल्लेख भी है। सिद्ध-हेम-शब्दानुशासन 12वी शताब्दी मे रचित 'सिद्ध-हेम-शब्दानुशासन' ने सस्कृत एव प्राकृत- -वैयाकरणो मे काफी प्रसिद्धि प्राप्त की । आचार्य हेमचन्द्र का यह व्याकरण 'पाणनीय' की अष्टाध्यायी की प्रतिस्पर्धा करने वाला ग्रथ है । इसमे कुल आठ अध्याय है । प्रथम सात-अध्याय सस्कृत भाषा की विस्तृत व्याकरण की जानकारी देने वाले है । अन्तिम आठवा-अध्याय 'प्राकृत-व्याकरण' का है। जिसमे प्राकृत के पूर्ण-नियमो को विधिवत् प्रस्तुत किया गया है | आठवे-अध्याय मे चार-पाद है । जिसके प्रथम-पाद (271) एव द्वितीय-पाद (218) मे प्राकृतीकरण, सधि-विधान, निपात एव कृदत-विधान किया है । इसका तृतीय-पाद (182) सज्ञा-सर्वनाम, क्रिया-कृदतो के विवेचन से युक्त है । आचार्य हेमचद्र ने इन विधानो के साथ 'स्वोपज्ञवृत्ति' द्वारा सूत्रो का विश्लेषण भी किया है । चतुर्थ-पाद (448) के प्रारभ मे विविध प्राकृत-क्रियाओ का सकेत भी है तथा इसी मे शौरसेनी, मागधी, पैशाची तथा चूलिका-पैशाची के नियमो का विधान है । इसका अन्तिम पाद अपभ्रश-भाषा से सबन्धित है | प्रस्तुत प्राकृत-व्याकरण भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है । इसके महत्त्व के विषय मे डॉ पिशेल ने लिखा है- 'सभी प्राकृत-व्याकरणो मे सर्वोत्तम और महत्त्वपूर्ण ग्रथ हेमचद्र का प्राकृत-भाषा का व्याकरण है । 2 आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इसकी प्रशसा करते हुए लिखा है- 'प्राकृत के ज्ञान के लिये हेमचद्र का यह ग्रथ सम्पूर्ण, प्रामाणिक तथा विश्वसनीय है । अपभ्रश को तो उन्होने प्रथम वार साहित्यिक भाषा के उन्नत आसन पर आसीन कराया है। साहित्यिक गौरव से मडित करने का श्रेय आचार्य प्रवर को निसदेह प्राप्त है ।' कत्रे ने भी लिखा है 'गुजरात के प्रसिद्ध बहुश्रुत विद्वान हेमचद्र का प्राकृत-व्याकरण अत्यत सुविख्यात एव सर्वथा पूर्ण है। प्राकृत शब्दानुशासन 13वी शताब्दी के त्रिविक्रम द्वारा विरचित प्राकृत-व्याकरण का यह ग्रथ . 1 बलदेव उपाध्याय-प्राकृत-प्रकाश, भूमिका, पृ 23 2 प्राकृत भापाओं का व्याकरण, पृ 76 3 प्राकृत प्रकाश, भूमिका, पृ 32 4 प्राकृत भाषाएँ और भारतीय सस्कृति में उनका अवदान, पृ 26 विस्तार हेतु दृष्टव्य है- आचार्य हेमचन्द्र और उनका शब्दानुशासन-एक अध्ययन -डॉ नेमीचद्र शास्त्री 'प्राकृत-शब्दानुशासन' हेमचद्र की तरह विषय को प्रतिपादन करने वाला है। इसकी स्वोपज्ञवृत्ति ग्रथकार की स्वय की है । इस ग्रथ के प्रारभ मे सूत्रकार ने हेमचद्र का भी स्मरण किया है। प्रस्तुत ग्रथ तीन अध्यायो मे विभक्त है । त्रिविक्रम ने प्रत्येक अध्याय को चार-चार पादो से अलकृत किया है । इसके कुल वारह पादो मे 1036 सूत्र है। इन वारह पादो के प्रारभिक कुछ पादो मे प्राकृतीकरण, सधि-विधान, तद्धित एव अव्ययविधान को प्रस्तुत किया गया है। द्वितीय-अध्याय के द्वितीय-पाद मे सज्ञा-शब्दो का विधान किया है । इसके तृतीय-पाद मे 'तुम्ह', 'अम्ह' एव सख्यावाची सर्वनामो का विधान किया है । द्वितीय अध्याय का चतुर्थ-पाद एव तृतीय-अध्याय का प्रथम-पाद क्रिया-कृदतो के विधान का है । इसी अध्याय के द्वितीय-पाद मे शौरसेनी, मागधी, पैशाची और चूलिका का विधान है | इसी अध्याय के तृतीय-चतुर्थ-पाद मे अपभ्रश-भाषा का विवेचन किया है । त्रिविक्रम ने प्रत्येक अध्याय मे अनेकार्थक शब्द भी दिये है | जिनसे तत्कालीन भाषा की प्रवृत्तियो का ज्ञान तो होता ही है, साथ ही इससे अनेक सास्कृतिक वातो पर भी प्रकाश पडता है । इस व्याकरण मे सूत्रो को सक्षिप्त रूप मे प्रस्तुत किया गया है । किन्तु वे सभी सूत्र हेमचद्र के सूत्रो की तरह ही है । फिर भी त्रिविक्रम के इस व्याकरण के अन्तिम पृष्ठ पर जो 'झाडगास्तु देश्या सिद्धा 3-4-72 के सूत्र मे झाड (लता) दद्दसिरि (चदन) भावई (गृहिणी) आदि 846 देशी शब्द है, वे एक नई दिशा का परिचय देते है तथा वे विविध भाषाओ के सकेत को भी स्पष्ट करते है । यही नहीं, अपितु त्रिविक्रम का अपभ्रश-भाषा का विवेचन भी बहुत कुछ अपभ्रश के नवीनीकरण पर प्रकाश डालता है। प्राकृत-कामधेनुका लकेश्वर रावण द्वारा रचित अति लघुकाय व्याकरण का यह ग्रथ 'प्राकृत-कामधेनुका' 10वी शताब्दी के वाद लिखा गया है । इसमे कुल 34 सूत्र है । ग्रथ के प्रारम्भ मे ही सूत्रकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यह व्याकरण वालको के वोध के लिए लिखा गया है । इसमे सूत्रकार ने सामान्य-प्राकृत की विशेषताओ के साथ अपभ्रश को उकारवहुला (उपादान्ते अकारस्य 11वा सूत्र) कहा है । प्राकृत-कल्पतरू 'प्राकृत-कल्पतरू' रामशर्म तर्कवागीश भट्टाचार्य कृत 15वी शताब्दी की पद्यवद्ध रचना है । इसके अध्यायो का विभाजन तीन शाखाओ मे हुआ है । प्रथम-शाखा मे 9 स्तवक है, जिनमे कुल 192 कुसुम (सूत्र) है । इस शाखा के स्तवको मे सूत्रकार ने प्राकृतीकरण, सधि-विधान, सज्ञा, सर्वनाम, शब्द विधान, 1 डॉ. नमिचन्द्र शास्त्री-अभिनव-प्राकृत-व्याकरण-पृ 20 13 क्रिया-कृदन्त विधान आदि को प्रस्तुत किया है । द्वितीय-शाखा के तीन स्तवक है, जिनमे 101 कुसुम है । इन स्तबको मे शौरसेनी, प्राच्या, अवन्ती, बालीकी, माग पी, अर्धमागधी, दाक्षिणात्या-भाषाओ का विधान तथा विभाषा-विधान के नियमो का निरूपण किया है । तृतीय-शाखा पूर्ण अपभ्रश से सम्बन्धित है, जिसमे अपभ्रश के नागर, ब्राचड एव पैशाचिक-विधान को प्रस्तुत किया गया है । सूत्रकार ने एक ही पद्य मे प्रथमा एकवचन - बहुवचन, द्वितीया बहुवचन, पचमी एकवचन-बहुवचन एव सप्तमी एकवचन के प्रत्ययो के निर्देश के साथ उनसे बनने वाले रूपो को भी प्रस्तुत किया है । ऐसे अनेक उदाहरण इस व्याकरण मे देखे जा सकते है । उदाहरणो के साथ वाक्य रचना भी पद्य मे है । यथा- 'अग्गी वणे लग्गइ तत्थ वाऊ । जलति अग्गी विउणति वाऊ || आदि षड्भाषाचन्द्रिका 16वी शताब्दी मे रची गई 'षड्भाषाचन्द्रिका' नामक यह रचना लक्ष्मीधर की है । इस प्राकृत-व्याकरण मे त्रिविक्रम के सूत्रो का सकलन किया है तथा सूत्रकार ने स्वय इस पर वृत्ति लिखकर सेतुबध, गउडवहो, गाहासत्तसई, कप्पूरमजरी आदि ग्रथो के उदाहरण दिये है । डॉ नेमिचन्द्र शास्त्री ने इस व्याकरण की विशेषता का गुणगान करते हुए लिखा है- 'प्राकृत-भाषा की जानकारी प्राप्त करने के लिए ‘षड्भाषाचन्द्रिका' अधिक उपयोगी है | इसकी तुलना हम भट्टोजिदीक्षित की सिद्धातकौमुदी से कर सकते है । 2 प्राकृतचन्द्रिका 16वी शताब्दी मे शेष श्रीकृष्ण ने 'प्राकृत-चन्द्रिका' नामक प्राकृत-व्याकरण की रचना की । यह पद्यवद्ध रचना है । इसके पद्यो की सख्या 441 । ये 441 पद्य आठ प्रकाशो मे विभक्त है । इस ग्रथ मे प्राचीन उदाहरणो के साथ नवीन उदाहरण भी है । इसका अतिम प्रकाश विभिन्न प्राकृत-भाषाओ से सम्बन्धित है । इस व्याकरण के सम्पूर्ण पक्षो मे पाण्डित्य भी दिखाई देता है। । प्राकृत-मणि-दीप 16वी शताब्दी के प्रसिद्ध विद्वान अप्पयदीक्षित ने 'प्राकृत-मणि-दीप' ग्रथ की रचना की है । यह लघुवृत्ति से युक्त वालोपयोगी रचना है । प्राकृत-रूपावतार सिहराज कृत 'प्राकृत-रूपावतार' त्रिविक्रम के प्राकृत-शब्दानुशासन का 1 प्राकृत कल्पतरु, अ 6/2, प्रका एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता-1954 2 अभिनव प्राकृत-व्याकरण, प्रस्तावना पृ 21 14 सकलित रूप ही है । इसमे सधि-समास, शब्दरूप, क्रियारूप आदि का विधान सक्षेप रूप मे है । यह प्राकृत-व्याकरण व्यावहारिक-दृष्टि से आशुबोध कराने के लिए उपयोगी है । इसके लेखन की तुलना वरदाचार्य से की जा सकती है । प्राकृत-सर्वस्व । 17वी शताब्दी मे मार्कण्डेय ने विभिन्न प्राकृतो की विशेषताओ को गिनाने के लिए ही 'प्राकृत-सर्वस्व' ग्रथ की रचना की थी । इसमे कुल 20 पाद है । प्रारभिक आठ पाद प्राकृतीकरण, सधि-विधान, सज्ञा-सर्वनाम, क्रिया-कृदतो आदि से सम्बन्धित है | शेष सभी पाद विभिन्न भाषाओ के नियमो के विधान का नियमन करने वाले है । इस प्राकृत-व्याकरण का अपभ्रश-अश हेमचद्र एव वररूचि की तरह ही महत्त्वपूर्ण है । इसमे दिये गये नियम पद्यवद्ध है । इसके उदाहरण भी काव्यादर्श, भट्टिकाव्य, सेतुबंध, कर्पूरमजरी, गउडवहो, मृच्छकटिक, शाकुन्तल, प्राकृत-पैगलम आदि ग्रथो के है। प्रस्तुत व्याकरण के विषय मे यह कहा जा सकता है कि मार्कण्डेय ने इस प्राकृत-व्याकरण को रचने से पूर्व विविध ग्रथो का गभीर अध्ययन किया होगा, तव कही इस पर शास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन प्रस्तुत किया होगा । आज इसे भाषा-शास्त्रीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है । डॉ जगदीशचद्र जैन ने लिखा है- 'महाराष्ट्री, शौरसेनी और मागधी के सिवाय प्राकृत की अन्य वोलियो का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह व्याकरण अत्यत उपयोगी है 12 मार्कण्डेय ने इस ग्रथ मे अपभ्रश की 27 और पैशाची की 11 विधाओ पर भी नवीनतम रूप से विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत किया है। जैन-सिद्धात-कौमुदी 19वी शताब्दी के प्रकाण्ड विद्वान एवं साहित्यकार मुनिरत्नचदजी ने "जैन-सिद्धांत-कौमुदी' नामक व्याकरण की रचना की । यह अभी तक लिखे गये प्राकृत-व्याकरण से भिन्न एवं अर्धमागधी-भाषा का स्वतंत्र ग्रथ है । यह पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध इन दो भागो मे विभक्त है । सूत्रो पर मुनिश्री ने स्वोपज्ञवृत्ति भी लिखी है, जिससे सूत्र मे प्रतिपादित विषय का सुवोध-शैली मे ज्ञान हो जाता है । यह जैनागम की व्याकरण का आधुनिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ कहा जा सकता है । प्राकृत-व्याकरण-शास्त्र की उपर्युक्त परपरा से स्पष्ट है कि प्राकृत व्याकरण विद्वानो के अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय एव विदेशी विद्वानो ने भी आधुनिक युग मे स्वतत्र रूप से आगम ग्रथो का सम्पादन करते समय प्राकृत-व्याकरण-शास्त्र पर विशद प्रकाश डाला है । वर्तमान में भी प्राकृत-व्याकरण के अध्ययन के लिए 1 प्राकृत-साहित्य का इतिहास, पृ 642 2. वही, पृ 642 15 आधुनिक-शैली मे प्राचीन परपरा का सनिवेष करते हुए विद्वानो ने इस दिशा मे कुछ अध्ययन प्रस्तुत किये है ।* प्राकृत व्याकरण की दृष्टि से पण्डितरत्न श्री प्यारचदजी म सा की हेम-प्राकृत-व्याकरण जो दो भागो मे प्रकाशित है, महत्त्वपूर्ण कृति कही जा सकती है, किन्तु यह कृति वर्तमान मे तो प्राय अनुपलब्ध ही है । अत विश्वविद्यालयो मे अध्ययनरत छात्रो, साधु-साध्वियो एव प्राकृत भाषा तथा व्याकरण के जिज्ञासुजनो को प्राकृत-व्याकरण के समस्त सूत्रो की एक लघु पुस्तक सहज उपलब्ध हो सके, इसी दृष्टि को ध्यान मे रखकर हमने प्राकृत व्याकरण कृति को इस रूप मे प्रस्तुत किया है। हमारे लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि प्राकृत व्याकरण के समस्त सूत्रो को प्रस्तुत कृति के रूप मे प्रकाशित कर हम पाठको को अर्पित कर रहे है । प्रस्तुत कृति के मूल्य और महत्त्व का मूल्याकन करना तो पाठको का ही कार्य है, किन्तु यदि इस कृति के माध्यम से प्राकृत भाषा एव आगम साहित्य के अध्ययन और स्वाद याय की प्रवृत्ति विकसित होती है तो हम अपना प्रयास सार्थक समझेगे । उदयपुर 2. उदयचन्द्र जैन 7 मार्च, 1997 Eसुरेश सिसोदिया 'प्राकृत मार्गापदेशिका (पं वचरदास दोशी), अभिनव प्राकृत व्याकरण (डॉ नमिचन्द्र शास्त्री), प्राकृत वाक्य रचना वोध (युवाचार्य महाप्रज्ञ), प्राकृत रचना सौरभ (डॉ कमलचंद सोगानी), परंपरागत प्राकृत व्याकरण की समीक्षा और अर्द्धमागधी (डॉ के आर चन्द्र), प्राकृत स्वयं शिक्षक (डॉ प्रेमसुमन जैन), प्राकृत दीपिका (डॉ सुदर्शनलाल जैन), हेम प्राकृत व्याकरण शिक्षक (डॉ उदयचन्द्र जैन), शौरसनी प्राकृत व्याकरण (डॉ उदयचन्द्र जैन) ।

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प्रथम-पाद अथ प्राकृतम् ॥१॥ इसके अनन्तर प्राकृत का वर्णन करते हैं । बहुलम् ॥२॥ में बहुलता .. प्राकृत आर्षम् ॥३॥ ऋषियों की वाणी को आर्ष कहा जाता है । दीर्घ- ह्रस्वौ मिथो वृत्तौ ॥४॥ समासपद में दीर्घ का इस्व हो जाता है तथा इस्व का दीर्घ, दीर्घ का दीर्घ एव ह्रस्व रहता है । यथा- अन्ता-वेइ :-अन्तर्वेदिः, सत्तावीसा :-सत्तवीसा :-सप्तविशति, जुवईजणा :-जुवइ-जणो ·-युवतिजन, वारी-मई :-वारिमई :-वारिमतिः, भुआयत .-भुअ-यत :-भुजा यन्त्रम्, पईहर :-पइहर :-पतिगृहम् । जउण णई :-जउणाणई :-यमुना नदी, णइ-सोय :-णई सोय :-नदी स्रोतः । गोरिहर :-गोरीहर :-गौरीगृहम्, बहुमुह :-बहूमुह :-बधूमुख । सन्धि- पदयोः सधिर्वा ॥५॥ पद में संधि विकल्प से होती है । यथा- वासेसी :-वास- इसी, विसमायवो :-विसम-आयवो । दहि ईसरो :-दहीसरो, साऊ अय ·-साउ-उअय । न युवर्णस्यास्वे ॥६॥ इ और उ वर्ण के आगे 'अ' स्वर होने पर सन्धि नहीं होती है। यथा- न वेरिवग्गे वि अवयासो । वदामि अज्जवइर । सझा बहु अवऊढो । एदोतोः स्वरे ॥७॥ . :

प्राकृत व्याकरण
ए और ओ स्वर होने पर सन्धि नहीं होती है।
यथा- संजमे आरतो, अहो अच्छरिअं, णिहणे आवंध, देवो इह ।
स्वरस्योवृत्ते ॥८॥
स्वर के उद्वृत्त (शेष) रहने पर सन्धि नहीं होती है ।
यथा- णिसिअरो, णिसाअरो, रयणीअरो
'कहीं-कहीं पर सन्धि हो जाती है ।-
यथा- कुम्भ आरो :-कुम्भारो। सु-उरिसो सूरिसो, राअ-उल :- राउल ।
त्यादेः ॥९॥
ति आदि के स्वर होने पर सन्धि नहीं होती है ।
यथा- होइ इह, भणामि इदं, भणसि ईसर ।
लुक् ॥१०॥
स्वर के आगे स्वर होने पर शब्द के स्वर का लोप हो जाता
dic
यथा- भाणुदयो, चक्किंदो, णरिंदो, जणोसही ।
-
व्यञ्जन लोप-
अन्त्यव्यञ्जनस्य ॥११॥
शब्द के अन्त्य व्यंजन का लोप हो जाता है ।
यथा- जाव :-यावत्, ताव :-तावत्, मण :-मणस्, राअ :-राजन् ।
न श्रदुदोः ॥१२॥
श्रद् और उत् के अन्त्य व्यंजन का लोप नहीं होता है ।
यथा- सद्दहिअं, सद्धा, उग्गयं ।
निर्दुरोर्वा ||१३॥
निर् और दुर् के अन्त्य व्यंजन का विकल्प से लोप होता
है।
यथा- णिस्सह, दुस्सहं । पक्ष में- नीसहं, दृसहं ।
स्वरेन्तरश्च ॥१४॥

३ डॉ. उदयचन्द्र जेन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया निर् के पश्चात् अन्तर् के 'अ' स्वर होने पर अन्त्य व्यंजन का लोप नहीं होता है । यथा-णिरतर, णिरवसेस, णिरवगाह । स्त्रियामादविद्युत. ॥१५॥ विद्युत् शब्द को छोडकर अन्त्य व्यंजनांत शब्दों के स्त्रीलिंग मे 'आ' हो जाता है । यथा- सरिआ, पाडिवआ, सपआ । रो रा ॥१६॥ रेफांत का 'रा' आदेश हो जाता है । यथा-गिरा, धुरा, पुरा । क्षुधो हा ॥१७॥ क्षुध् शब्द के अन्त्य व्यंजन का 'हा' हो जाता है । यथा- छुहा । शरदादेरत् ||१८॥ शरद् आदि के अन्त्य व्यंजन का 'अ' हो जाता है । यथा- सरअ, भिसअ। दिक्-प्रावृषो सः ॥१९॥ दिक् और प्रावृष् शब्द के अन्त्य व्यजन का 'स' हो जाता है। यथा- दिसा, पाउसो। आयुरप्सरसोर्वा ॥२०॥ आयुष् और अप्सरस् शब्द के अन्त्य व्यजन का विकल्प से 'स' हो जाता है । यथा- दीहाउसो, अच्छरसा । पक्ष में- दीहाऊ, अच्छरा । ककुभो हः ॥२१॥ ककुभ् के अन्त्य व्यंजन का 'हा' हो जाता है । । यथा- कउहा।

प्राकृत व्याकरण ४ धनुषो वा ॥२२॥ धनुष के अन्त्य व्यंजन का विकल्प से 'ह' हो जाता है । यथा- धणुहं । पक्ष में- धणू । अनुस्वार- मोनुस्वारः ॥२३॥ 'म्' का अनुस्वार हो जाता है । यथा- जल, फल, सबंध । वा स्वरे मश्च ॥२४॥ अन्त्य 'म्' के आगे स्वर होने पर 'म्' का अनुस्वार विकल्प से होता है । यथा- जीवमजीवं, उसहमजियं । जीव अजीव, उसह अजियं । * कहीं-कहीं पर त् और क् अन्त्य व्यजन का अनुस्वार हो जाता है । यथा- जं, तं, सक्खं (साक्षात्), वीसु (विष्वक्), सम्म (सम्यक्), पिह (पृथक्) ङ-ज-ण-नोऽव्यंजने ॥२५॥ इ, ज्, ण् और न् व्यंजन होने पर भी अनुस्वार हो जाता है। यथा- पंती :-पक्तिः, परमुहो :-पराङ्मुखः, कंचुओ :-कचुकः, लंछणं :-लाछनम्, छमुहो :-षण्मुखः, उक्कठा :-उत्कण्ठा, सझा :-सन्ध्या, विंझो :-विन्ध्यः । वक्रादावन्तः ॥२६॥ वक्र आदि शब्दों के प्रारम्भ में अनुस्वार का आगम हो जाता है । यथा- वक :-वक्र, तंस :-व्यस्र, असु :-अश्रु, मंसू :-श्मश्रु., पुछ :-पुच्छं, गुठं :-गुच्छं, मुंढाः-मूर्द्धन्, बुध :-बुध्न, कंकोडो :-कर्कोटः, कुंपल :-कुड्मल, दंसणं :-दर्शनम्, विछिओ :-वृश्चिकः, गिंठी :-गृष्टि, मजारो :-मार्जार । *कहीं कहीं पर मध्य में भी अनुस्वार हो जाता है। यथा- वयसो :-वयस्य, मणसी, मणसिणी :-मनस्विन्, मनस्विनी, मणसिला :-मनःशिला, पडंसुआ :-प्रतिश्रुत् । .

. डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरश सिसोदिया क्त्वा-स्यादेर्ण-स्वोर्वा ॥२७॥ क्त्वा -ऊण, ण (तृ .ए , च /ष बहु) के होने पर विकल्प से अनुस्वार () हो जाता है । यथा-- भणिऊण, जिणेण, जिणाण । पक्ष में- भणिऊण, जिणेण, जिणाण । विशत्यादेर्लुक् ॥२८॥ विशंत्, त्रिशत् आदि के अनुस्वार का लोप हो जाता है । यथा- वीस :-विशत्, तीस :-त्रिशत्, सक्कय .-सस्कृतम्, सक्कारो :-सस्कारः । मासादेर्वा ॥२९॥ मास आदि के अनुस्वार का विकल्प से लोप होता है । यथा- मास :-मस, मासल :-मसल, कास :-कस, पासू :-पसू, कह :-कह, एव :-एव, नूण :-नूण, इणाणि :-इणाणि, दाणि :-दाणि, कि :-कि, समुहं .-समुह, केसुअ :-किसुअ, सीहो :-सिहो । वर्गेन्त्यो वा ॥३०॥ वर्ग के अन्त्य अक्षर (ड्, ञ्, ण, न् और म्) का विकल्प से अनुस्वार हो जाता है । यथा- सख :-सङ्घ, अगण :-अङ्गण, लघण :-लङ्गन, कचुओ :-कञ्चुओ, लछण :-लञ्छण, अजिअ :-अजिअ, सझा :-सज्झा, कटओ :-कण्टओ, उक्कंठा .-उक्कण्ठा, कड :-कण्ड, सढो :-सण्ढो, अतर :-अन्तर, पथो :-पन्थो, चदो :-चन्दो, बधवो :-बन्धवो, ममह ·-मन्मह, कपइ :-कम्पइ, बफइ :-बम्फइ, कलबो :-कलम्बो, आरभो :-आरम्भो, सबधो :-सम्बन्धो, कुडुबो :-कुटुम्बो, रभो :-रम्भो। .. व्यञ्जनान्त शब्द का प्रयोग- प्रावृट-शरत्तरणय पुसि ॥३१॥ प्रावृष्, शरद् और तरणि शब्द पुलिंग में होते हैं । यथा- पाउसो, सरओ, तरणी । स्नमदाम-शिरो-नभः ॥३२॥ दामन्, शिरस् और नभस् शब्द को छोडकर अन्य व्यंजनांत

६
प्राकृत व्याकरण
शब्द पुलिंग में प्रयुक्त होते हैं ।
यथा- धम्मो :-धर्मन्, कम्मो :-कर्मन्, तेओ :-तेजस्, तमो :-तमस्, पओ
:-पयस् ।
दामं, सिरं, णह - ये नपुसकलिग में ही होंगे।
शब्द प्रयोग-
वाक्ष्यर्थ-वचनाद्याः ॥३३॥
अक्षि-पर्याय एवं वचन आदि शब्दों का पुर्लिग में विकल्प से
प्रयोग होता है ।
यथा- अच्छी-एसा अच्छी (स्त्री.), एसो अच्छी (पु.), चक्खू (पु), चक्खूइ
(नपुं.), लोयणा (पु.), लोअणाइ (नपु), नयणा (पुं.), नयणाई (नपु.), वयणा (पु),
वयणाई (नपु.), विज्जुणा (पु.), विज्जूए (नपु ), कुलो (पु.), कुल (नपुं.), छदो
(पु.), छन्दं (नपुं.), माहप्पो (पु.), माहप्पं (नपुं), दुक्खा (पु), दुक्खाइ (नपु)
भायणा (पु.), भायणाई (नपुं.)।
गुणाद्याः क्लीबे वा ॥३४॥
गुण आदि का क्लीब (नपुंसकलिंग) में विकल्प से प्रयोग होता
है ।
यथा- गुणा गुणाइ । विंदू विदु । सग्गो सग्गं । मडलग्गो मडलग्ग ।
कररुहो कररुहं, रुक्खा रुक्खाइ ।
वेमाञ्जल्याद्याः स्त्रियाम् ॥३५॥
इमा प्रत्ययांत और अंजली आदि का प्रयोग स्त्रीलिंग मे
विकल्प से होता है ।
यथा- गरिमा एस एसा । महिमा एस एसा । निलज्जिमा एस एसा । द्युत्तिमा एस
एसा । अंजली एस एसा । पिट्ठी पिट्ठ । अच्छी अच्छिं । पण्हा पण्हो । चोरिआ
चोरिअ । कुच्छी एस एसा । बली एस एसा । विही एस एसा । रस्सी एस एसा ।
गण्डी एस एसा ।
बाहोरात् ॥३६॥
बाहु में 'आ' हो जाता है ।
।
यथा-बाहा एसा ।
अतो डो विसर्गस्य ॥३७॥

। डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया अकारान्त मे विसर्ग का डो ओ हो जाता है । यथा- कओ :-कुत· । सव्वओ :-सर्वतः । पुरओ :-पुरतः । अग्गओ ·-अग्रतः। मग्गओ :-मार्गतः । पुणो :-पुनः । अओ -अतः । निष्प्रती ओत्परी माल्य स्थोर्वा ॥३८॥ प्रति मल्ल शब्द होने पर तथा स्था धातु के होने पर विकल्प से निर् को 'ओ' और प्रति को 'परि' आदेश हो जाता है। यथा- ओमल्ल-:-ओमाल पक्ष में- निम्मल्ल । परिट्ठा :- पइट्ठा । निर् और से आगे माल्य -. आदेः ॥३९॥ यहॉ आदि का अधिकार प्रारम्भ होता है । त्यदायव्ययात् तत्स्वरस्य लुक् ॥४०॥ अव्यय से पूर्व ति इ होने पर लोप हो जाता है । यथा- अम्हेत्थ :- अम्हे एत्थ । जइमा :- जइ इमा । जइह :- जइ अह । पदादपेर्वा ॥४१॥ पद से आगे अपि अव्यय होने पर विकल्प से लोप होता है । यथा- त पि •-तमपि । देवो वि •- देवो अवि । इते. स्वरात् तश्च द्विः ॥४२।। ' पद से आगे इति के 'इ' का लोप एवं वर से आगे 'त' का द्वित्व हो जाता है । यथा- जिणो त्ति । पुरिसो त्ति । धम्मो ति । कि ति । जंति । लुप्त- य-र-व-श-ष-सा श-ष-सा दीर्घः ॥४३॥ य, र, व, श, ष और स के लोप होने पर यदि श, ष, स हो तो दीर्घ स्वर हो जाता जाता है । यथा- पास:-पश्य । कासव •-कश्यप । आवासय :-आवश्यक । वीसाम :-विश्राम । मीस :-मिश्र । सफास :-संस्पर्श । आसो :-अश्वः । वीसास :-विश्वास । दूसासण :-दुश्शासन । मणासिला :-मनःशिला । सीस :-शिष्य । पूस :-पुष्य । मणूस :-मनुष्य । वीसाण :-विश्वाण ।

प्राकृत व्याकरण ८ वीसु :-विष्णक् । वास :-वर्ष । वासा :-वर्षा । सास :-सस्य । विकासर :-विकस्वर । नीस :-निः स्व । नीसह :-निस्सह । अतःसमृद्ध्यादौ वा ॥४४॥ समृद्धि आदि शब्दों के आदि 'अ' का विकल्प से दीर्घ होता है। यथा- सामिद्धि :-समिद्धी । पासिद्धी :-पसिद्धी । पायड :-पयड । पाडिवआ :-पडिवआ । पासुत्तो :-पसुत्तो । पाडिसिद्धी :-पडिसिद्धी । सारिच्छो :-सरिच्छो । माणंसी •-मणसी । माणंसिणी :-मणसिणी। दक्षिणे हे ॥४५॥ दक्षिण के आदि 'अ' को दीर्घ होने पर 'क्ष' का 'ह' हो जाता है। 1 यथा- दाहिणो । इ- इः स्वप्नादौ ॥४६॥ स्वप्न आदि के आदि 'अ' का 'इ' स्वर हो जाता है । यथा- सिविणो :- सिमिणो । वेडिस :-वेतस । विलिअ :-व्यलीक । विजण :-व्यञ्जन । किविण :-कृपण । किवा :-कृपा । उत्तिम :-उत्तम । मज्झिम :-मज्झम । मुइंदो :-मृदंग । मिरिअ :-मरिच । दिण्ण :-दत्त । पक्वागार-ललाटे वा ॥४७॥ पक्च, अजार और ललाट शब्द मे विकल्प से 'इ' होता है । यथा- पिक्क । इंगाल । णिडाल । पक्ष मे- पक्क। अंगार । णडाल । मध्यम-कतमे द्वितीयस्य ॥४८॥ मध्यम और कतम शब्द के द्वितीय 'अ' को 'इ' हो जाता है। यथा- मज्झिम, कइमो । सप्तपणे वा ॥४९॥ सप्तपर्ण मे द्वितीय 'अ' को 'इ' विकल्प से होता है । यथा- छत्तिवण्ण पक्ष में- छत्तवण्ण ।

९ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया मयट्यइर्वा ||५० ॥ मयट् प्रत्यय के आदि 'अ' को 'अइ' विकल्प से होता है । यथा- विसमइओ । पक्ष में-विसमओ :-विषमयः । ई- ईहरे वा ॥५१॥ हर शब्द के आदि 'अ' को 'ई' विकल्प से होता है । यथा- हीर/हर । उ- ध्वनि-विष्वचोरु: ॥५२॥ ध्वनि और विष्वक् के आदि 'अ' को 'उ' हो जाता है । यथा- झुणी । वीसु । वन्द्र-खण्डिते णा वा ||५३॥ सहित आदि 'अ' का 'उ' विकल्प से होता है । यथा- वुद •-वन्द्र । खुडिअ :-खण्डिअ । गवये वः ॥५४॥ गवय के 'व' का 'उ' हो जाता है । यथा- गउओ। प्रथमे प-थोर्वा ||५५॥ प्रथम के 'प' और 'थ' मे विकल्प से 'उ' होता है । यथा- पुदुम, पुढम । पक्ष में- पढम । ज्ञो णत्वेभिज्ञादौ ॥५६॥ अभिज्ञ आदि के 'ज्ञ' का 'ण' होने पर 'अ' का 'उ' हो जाता है । यथा- अहिण्णू, सव्वण्णू, कयण्णू, आगमण्णू ।

प्राकृत व्याकरण
१०
ए.
एच्छय्यादौ ॥५७॥
शय्या के आदि 'अ' का 'ए' हो जाता है ।
यथा- सेज्जा, सुदेर, गेदुअ ।
वल्ल्युत्कर-पर्यन्ताश्चर्ये वा ॥५८॥
वल्ली, उत्कर, पर्यन्त और आश्चर्य के आदि 'अ' का 'ए'
विकल्प से होता है ।
यथा- वल्ली :-वेल्ली, उक्करो :-उक्करो, पेरंत :-पज्जत, अच्छेर :-अच्छरिअ ।
ब्रह्मचर्ये चः ॥५९॥
ब्रह्मचर्य के 'च' के 'अ' का 'ए' हो जाता है ।
यथा- वम्हचेर ।
तोन्तरि ||६० ॥
अन्तर के 'ल' के 'अ' का 'ए' हो जाता है ।
यथा- अंतेउरे।
ओ-
ओत्पद्मे ||६१॥
पद्म के आदि 'अ' का 'ओ' हो जाता है ।
यथा- पोम्म ।
नमस्कार-परस्परे द्वितीयस्य ||६२॥
नमस्कार और परस्पर के द्वितीय 'अ' का 'ओ' हो जाता है।
यथा- नमोक्कारो, परोप्परो ।
वाौ ||६३॥
अर्प के आदि 'अ' का 'ओ' विकल्प से होता है ।
यथा- ओप्पेइ/अप्पइ ।
स्वपावुच्च ॥६४॥

११ डॉ. उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया स्वप् के आदि 'अ' का 'ओ' और 'उ' हो जाता है । यथा- सोवइ/सुवइ । नात्पुनर्यादाई वा ॥६५॥ 'न' के बाद पुनर् के आदि 'अ' का 'आ' और 'आइ' आदेश विकल्प से होता है । यथा- न उणा, न उणाइ । पक्ष में- न उण, न उणो । वालाब्बरण्ये लुक् ॥६६॥ अलाबु और अरण्य के आदि 'अ' का विकल्प से लोप होता है। यथा- लाउ, रण्ण । पक्ष में- अलाउ । अरण्ण । आका अ- वाव्ययोत्खातादावदातः ॥६७॥ उत्खात आदि शब्दो और अव्ययो मे आदि 'आ' का 'अ' हो जाता है। यथा- जह/जहा, तह/तहा, अहव/अहवा, व/वा/, ह/हा, उक्खय/उक्खाय, चमर/चामर, कल/कालअ, ठविअ/ठाविअ, परिट्ठविअ/परिट्ठाविअ, सठविअ/सठाविअ, पयय/पायय, तलवेण्ट/तालवेण्ट, तल/ताल, हलि/हालिअ, नराअ/नाराअ, बलया/बलाया (बलाका), कुमर/कुमार, खइर/खाइर । घम् वृद्धेर्वा ||६८॥ घञ् वृद्धि प्राप्त आदि 'आ' का 'अ' विकल्प से होता है । यथा- पवह/पवाह, पहर/पहार, पयर/पयार, पत्थव/पत्थाव । महाराष्ट्रे ॥६९॥ महाराष्ट्र के आदि 'आ' का 'अ' हो जाता है । यथा- मरहट्ठ। मासादिष्वनुस्वारे ७0॥ मास आदि के अनुस्वार युक्त शब्द के 'आ' का 'अ' हो जाता Ac प्राकृत व्याकरण यथा- मंस :-मांस, पसु :-पांशु, पसण :-पासन, कंस :-कास्य, कसिम :-कासिक, वसिअ :-वाशिक, पंडव :-पाण्डव, ससिद्धिअ:-सासिद्धिक, सजत्तिअ :-सायात्रिका . श्यामाके मः ||७१॥ श्यामाक के आदि 'आ' का 'अ' हो जाता है । यथा- सामअ:-श्यामाक । आका इ- इः सदादौ वा ॥७२॥ सदा आदि के 'आ' का 'इ' विकल्प से होता है । यथा- सइ/सया, निसिअर/निसाअर, कुप्पिस/कुप्पास । आचार्ये चोच्च ॥७३॥ आचार्य के 'चा' के 'आ' का 'इ' और 'अ' होता है । यथा- आइरिअ/आयरिअ । आ का ई- ई: स्त्यान-खल्वाटे ||७४॥ स्त्यान और खल्वाट के आदि 'आ' का 'ई' हो जाता है । यथा- ठीण, थीण, थिण्ण, खल्लीड । आकाउ- उ: सास्ना-स्तावके ||७५॥ सास्ना और स्तावक के आदि आदि 'आ' है । का 'उ' हो जाता यथा-सुण्हा, थुवअ । आ का ऊ- ऊद्वासारे ७६ ॥ आसार के आदि 'आ' का 'ऊ' विकल्प से होता है । यथा- ऊसार/आसार ।

१३ डॉ. उदयचन्द्र जेन एप डॉ. सुरेश सिसोदिया आर्याया र्यः श्वश्र्वाम् ||७७॥ आर्या का अर्थ सासु होने पर या' के 'आ' का 'ऊ' हो जाता है । यथा- अज्जू । आकाए- एद् ग्राह्ये ७८॥ ग्राह्य शब्द के 'आ' का 'ए' हो जाता है । यथा- गेज्झ । द्वारे वा ॥७९॥ द्वार के आदि 'आ' का 'ए' विकल्प से होता है । पथा- देर/दुआर/दार। पारापते रो वा ||८०॥ पारापत के 'रा' के 'आ' का विकल्प से 'ए' होता है । यथा- पारेवअ/पारावअ । मात्रटि वा ||८१॥ मात्रट के 'मा' के 'आ' का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- एत्तिअमेत्त/मत्त । आ का ओ- उदोद्वा ||८२॥ आर्द्र के 'आ' का 'उ' और 'ओ' विकल्प से होता है । यथा- उल्ल/ओल्ल । पक्ष में- अल्लं । ओदाल्या पक्तौ ||८३॥ आली का पक्ति अर्थ होने पर 'आ' का 'ओ' हो जाता है । यथा- ओली । हृस्वः सयोगे ||८४॥

प्राकृत व्याकरण संयोग होने पर दीर्घ का हृस्व हो जाता है । यथा- अम्ब :-आम्र, तम्ब :-ताम्र, विरहग्गी :-विरहाग्नि, अस्स :-आस्य, मुणिंद :-मुणीन्द्र, तित्थ :-तीर्थ, णरिंद :-नरेन्द्र । इका ए- . इत एद्वा ||८५॥ 'इ' का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- पेण्ड/पिण्ड, धम्मेल्ल/धम्मिल्ल, सेंदूर/सिंदूर, वेण्हु/विण्हु, पेट्ठ/पिट्ठ, वेल्ल/विल्ल । किंशुके वा ॥८६॥ किंशुक के 'इ' का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- केसुअ/किंसुअ। मिरायाम् ||८७॥ मिरा के 'इ' का 'ए' हो जाता है । यथा- मेरा। इका अ- पथि-पृथिवी प्रतिश्रुन्मूषिक हरिद्रा विभीतकेष्वत् ॥८८ ॥ पथि, पृथिवी, प्रतिश्रुत्, मूषिक, हरिद्रा और विभीतक के आदि 'इ' का 'अ' हो जाता है । यथा- पह :-पथि, पुहवी :-पृथिवी, पडिसुअ :-प्रतिश्रुत, मूसअ :-मूपिक, हलद्दी :-हरिद्रा, बहेडअ :-विभितक । शिथिलेडगुदे वा ॥८९॥ शिथिल और इगुद के आदि 'इ' का 'अ' विकल्प से होता है। यथा- सढिल/सिढिल, अंगुअ/इंगुअ । तित्तिरौरः ॥९॥ तित्तिरि के 'रि' के 'इ' का 'अ' होता है । यथा- तित्तिर।

१५ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया इतौतो वाक्यादौ ॥९१॥ वाक्य के आदि में इति होने पर 'ति' के 'इ' का 'अ' हो जाता है। यथा- इअ जम्पिआवसणे । इअ विअसिअ-कुसुमसरो। इ का ई- ईर्जिह्वा-सिंह-त्रिशद्विशतीत्या ||९२॥ जिह्वा, सिंह, त्रिंशत् और विशत् मे स्थित 'इ' का 'ई' हो जाता है। यथा- जीहा, सीह, तीस, वीस । लुकि निरः ॥१३॥ निर् के 'र' का लोप होने पर 'इ' का 'ई' हो जाता है यथा- नीसरइ, नीसास। इका उ- द्विन्योरुत् ॥९४॥ द्वि और नि के 'ई' का 'उ' हो जाता है । यथा- दुविह, दुमत्त, णुमन्न । प्रवासीक्षौ ||९५॥ प्रवासी और इक्षु के 'इ' ज '' हो जाता है । यथा- पावासुअ, उच्छु । युधिष्ठिरे वा ॥१६॥ युधिष्ठिर के आदि 'इ' का 'उ' विकल्प से होता है । यथा- जहुट्ठिल । पक्ष में- जहिट्ठिल । इ का ओ, उ- ओच्च द्विधाकृगः ॥९७॥ द्विधा+कृ धातु मे 'इ' का 'ओ' और 'हो जाता है । i प्राकृत व्याकरण १ यथा- दोहा किज्जइ, दुहा किज्जइ । वा निर्झरे ना ॥९८॥ निर्झर के नि के 'इ' सहित 'ओ' विकल्प से होता है । यथा- ओज्झर/निज्झर । ई का अ- हरीतक्यामीतोत् ॥९९॥ हरीतकी के आदि 'ई' का 'अ' हो जाता है । यथा- हरडई। आत्कश्मीरे ||१00॥ कश्मीर के 'ई' का 'आ' हो जाता है । यथा- कम्हार । - ई का इ- पानीयादिष्वित् ||१०१॥ पानीय आदि शब्दों के 'ई' का 'इ' हो जाता है । यथा- पाणिअ, अलिअ :-अलीक, जिअइ :-जीवति, विलिअ :-व्रीडीत, करिस :-करीष, सिरिस :-शिरीष, गहिअ :-गृहीत, दुइअ :-द्वितीय, तइअ :-तृतीय, गहिर :-गभीर, उवणिअ :-उपनीत, आणिअ :-आनीत, पलिविअ :-प्रदीपित, ओसिअंत :-अवसीदत्, परिसअ :-प्रसीद, वम्मिअ :-वाल्मीक, ई का 3- उज्जीर्णे ||१०२॥ जीर्ण के 'इ' का 'उ' हो जाता है । यथा- जुण्ण । ईका ऊ- ऊहीन-विहीने वा ||१०३॥

डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरश सिसोदिया हीन और विहीन के 'ई' का 'ऊ' विकल्प से होता है । यथा- हूण । विहूण । पक्ष में-- हीण । विहीण । तीर्थे हे ||१०४॥ तीर्थ के र्थ' का 'ह' होने पर 'ई' का 'ऊ' हो जाता है । यथा- तूह । ई का ए- एत् पीयूषापीड-विभीतक-कीदृशेदृशे ||१०५॥ पीयूष, आपीड, विभीतक, कीदृश और ईदृश के 'ई' का 'ए' हो जाता है। यथा- पेऊस, आमेल, बहेडअ, केरिस, एरिस । नीड-पीठे वा ||१०६॥ नीड और पीठ के 'ई' का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- नेड/नीड, पेढ/पीढ । उका अ- उतो मुकुलादिष्वत् ||१०७॥ मुकुल आदि के आदि 'उ' का 'अ' हो जाता है । यथा- मउल, मउर :-मुकुल, मउड :-मुकुट, अगरु :-अगुरु, गुरुइ :-गुर्वी । वोपरौ ||१०८॥ उपरि के '3' का 'अ' विकल्प से होता है । यथा- उवरि -:अवरि । गुरौ के वा ||१०९॥ गुरु के 'क' होने पर 'उ' का 'अ' विकल्प से होता है । यथा- गरुअ/गुरुअ। उका ई- इर्धकुटौ ||११०॥

प्राकृत व्याकरण १८ भ्रकुटी के आदि '3' का 'इ' हो जाता है । यथा-भिउडी। पुरुषे रोः ||१११॥ पुरुष के 'रु' के 'उ' का 'इ' हो जाता है । यथा- पुरिस । उ का ई- ईः क्षुते ||११२॥ क्षुत के 'उ' का 'ई' हो जाता है । यथा- छी। उकाऊ- ऊत्सुभग-मुसले वा ||११३ ॥ सुभग और मुसल के 'उ' का 'ऊ' विकल्प से होता है । यथा- सूहव/सुहअ, मूसल/मुसल । अनुत्साहोत्सन्नेत्सच्छे ॥११४॥ उत्साह और उत्सन्न को छोडकर 'त्स' और 'च्छ' में रहने वाले 'उ' का 'ऊ' हो जाता है । यथा- ऊसुअ :-उत्सुक, ऊसव :-उत्सव, ऊसर :-उत्सर, ऊसुअ :-उच्छुक, ऊसस :-उच्छवस । लुकि दुरो वा ||११५॥ दुर के 'र' का लोप होने पर विकल्प से 'उ' का 'ऊ' होता है। यथा- दूसह/दुसह, दूहव/दुहव । उका ओ- ओत्संयोगे ||११६॥ संयोग होने पर आदि 'उ' का 'ओ' हो जाता है ।

१९ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया यथा- तोण्ड •-तुण्ड, मोण्ड :-मुण्ड, पोक्खर :-पुष्कर, कोट्टिम :-कुट्टिम, पोत्थअ :-पुस्तक, लोद्धअ :-लुद्धक, मोत्था :-मुस्ता । कुतूहले वा हृस्वश्च ||११७॥ कुतूहल के 'उ' का 'ओ' विकल्प से होता है । यथा- कोऊहल/कुऊहल/कोउहल्ल । ऊ का अ- अदूतः सूक्ष्मे वा ||११८॥ सूक्ष्म के 'ऊ' का 'अ' विकल्प से होता है । यथा- सण्ह । पक्ष में- सुण्ह । दुकूले वा लश्च द्विः ||११९॥ दुकूल के 'ऊ' का 'अ' और 'अ' होने पर 'ल' का 'ल्ल' विकल्प से होता है । यथा- दुअल्ल । पक्ष में- दुऊल । ऊ का ई- ईर्वोद्वयूढे ||१२० ॥ उद्वयूढ के 'ऊ' का 'ई' विकल्प से होता है । यथा- उव्वीढ । पक्ष में- उव्वूढ । ऊ का उ- उर्भू-हनूमत्-कण्डूय-वातूले ॥१२१॥ भू, हनुमत्, कण्डूय, और वातूल जाता है। के 'ऊ' का 'उ' हो यथा- भुमया :-भूमया, हणुमत :-हनूमत्, कण्डुअ :-कण्डूय, वाउल :-वातूल । मधूके वा ||१२२॥ मधूक के 'ऊ' का 'उ' विकल्प से होता है । यथा- महुअ । पक्ष में- महूअ ।

प्रा व्याकरण ऊ का इ.ए- इदेतौ नूपुरे वा ||१२३॥ नूपुर के 'ऊ' का 'इ' और 'ए' विकल्प से होता है । यथा- नेउर/निउर/नूउर । ऊ का ओ- ओत्कूष्माण्डी-तूणीर-कूपर-स्थूल-ताम्बूल-गुडुची-मूल्ये ||१२४॥ कूष्माण्डी, तूणीर, कूर्पर, स्थूल, ताम्बूल, गुडुची और मूल्य में स्थित 'ऊ' का 'ओ' हो जाता है । यथा- कोहण्डी, तोणीर, कोप्पर, थोर, तम्बोल, गलोई, मोल्ल । स्थूणा-तूणे वा ||१२५॥ स्थूणा और तूण मे स्थित 'ऊ' का 'ओ' विकल्प से होता है। यथा- थोणा । तोण । पक्ष में- थूणा । तूण । ऋका अ- ऋतोत् ||१२६॥ आदि 'ऋ' का 'अ' हो जाता है । - यथा- घय :-घृत, कय :-कृत, तण :-तृण, वसह :-वृषभ, मअ :-मृग । का आ- 'आ' विकल्प से आत्कृशा-मृदुक-मृदुत्वे वा ||१२७॥ कृशा, मृदुक और मृदुत्व के 'ऋ' का होता है । यथा- किसा/कासा, माउक/माउअ, माउक/मउत्त । का इ- इत्कृपादौ ||१२८॥ कृपा आदि के आदि 'ऋ' का 'इ' हो जाता है ।

. २१/ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसादिया यथा- किवा :-कृपा, हियय :-हृदय, मिट्ठ :-मृष्ठ, दिट्ठ .-दृष्ट, दिष्टि:-दृष्टि, सिट्ठ :-सृष्ट, सिट्ठि :-सृष्टि, गिण्ठि ·-गृष्टि, पिच्छी :-पृथ्वी, भिऊ :-भृगु, भिङ्ग :-भृङ्ग, भिगार :-भृगार, सिगार :-शृङ्गार, सिआल :-शृगाल, घिणा :-घृणा, घुसिण :-घुसृण, विद्ध ·-वृद्ध, समिद्धि :-समृद्धि, इद्धि :-ऋद्धि, गिद्धि :-गृद्धि, किस :-कृश, किसाणु :-कृशानु, किसरा :-कृसरा, किच्छ :-कृच्छ, तिप्प :-तृप्त, किसिअ :-कृषित, निव :-नृप, किच्चा :-कृत्वा, किई-कृति, धिइ :-धृति, किव ·-कृप, किविण :-कृपण, किवाण :-कृपाण, विच्चुअ :-वृश्चिक, वित्त :-वृत्त, वित्ति :-वृत्ति, हिअ :-हत, वाहित्त :-व्याहत, विहिअ :-वृहित, विसी :-वृसी, इसी :-ऋषि, विइण्ण :-वितृष्ण, छिहा :-स्पृहा, सइ :-सकृत्, उक्किट्ठ :-उत्कृष्ट, निसस •-नृशस । पृष्ठे वानुत्तरपदे ||१२९॥ पृष्ठ शब्द स्वतन्त्र होने पर 'ऋ' का 'इ' विकल्प से होता है। यथा- पिट्ठ/पट्ठ । मसृण-मृगाङ्क-मृत्यु-शृग-धृष्टे वा ||१३० ॥ मसृण, मृगाङ्क, मृत्यु, शृंग और धृष्ट मे स्थित 'ऋ' का 'इ' विकल्प से होता है । यथा- मसिण/मसण, मिअक/मयक, मिच्चु/मच्चु, सिंग/सग, धिट्ठ/धट्ठ । ऋकाउ- उदृत्वादौ ॥१३१॥ ऋतु आदि के 'ऋ' का 'उ' हो जाता है । यथा- उउ :-ऋतु, परामुट्ठ :-परामृष्ट, पुट्ठ :-स्पृष्ट, पउ? :-प्रवृष्ट, पुहई-पृथिवी, पउत्ति :-प्रवृत्ति, पाउस :-प्रावृष्, निहुअ :-निभृत, निउअ :-निवृत, विउभ ·-विवृत, सवुअ :-सवृत, वुत्तत :-वृतात, निव्वुअ :-निर्वृत, निव्वुइ :-निवृत्ति, वुद :-वृंद, वुदावण :-वृदावन, वुड्ड:-वृद्ध, वुटि :-वृद्धि, उसह :-ऋषभ, मुणाल :-मृणाल, उज्जु :-ऋजु, जामाउअ :-जामातृक, माउअ :-मातृक, भाउअ :-भ्रातृक, पिउअ :-पितृक, पुहुवी :-पृथ्वी । निवृत्त-वृदारके वा ||१३२॥ वृन्दारक के 'ऋ' का 'उ' विकल्प से होता है । यथा- निअत्त/निवुत्त, वुदारय/वदारय । . निवृत्त और प्राकृत व्याकरण २२ वृषभे वा वा ॥१३३॥ वृषभ के 'व' सहित 'ऋ' का विकल्प से 'उ' होता है । यथा- उसहो/वसहो। गौणान्त्यस्य ||१३४॥ गौण रूप से संयुक्त शब्दों के 'ऋ' का 'उ' हो जाता है । यथा- माउमंडल, माउहर । ऋका इ- M मातुरिद्वा ||१३५॥ मातृ शब्द के 'ऋ' का 'इ' विकल्प से होता है । यथा- माइहर । पक्ष में -माउहर । उदूदोन्मृषि ||१३६॥ मृषा के 'ऋ' का 'उ', 'ऊ' और 'ओ' हो जाता है । यथा- मुसा,मूसा,मोसावाअ । इदुतौवृष्ट-वृष्टि-पृथङ्-मृदंग-नप्तृके ||१३७॥ वृष्ट, वृष्टि, पृथक्, मृदंग और नप्तृक के 'ऋ' का 'इ' और 'उ' हो जाता है । यथा- विट्ठ/वुट्ठ, विट्ठि/वुट्ठि, पिह/पुह, मियग/मुयंग, नत्तिअ/नत्तुअ । वा बृहस्पतौ ॥१३८॥ बृहस्पति में स्थित 'ऋ' का 'इ' और 'उ' विकल्प से होता है। यथा- विहप्फई/बुहप्फई । पक्ष में- बहप्फई । इदेदोवृन्ते ||१३९॥ वृन्त के 'ऋ' का 'इ', 'ए' और 'ओ' हो जाता है । यथा- विण्ट, वेण्ट, वोण्ट । रिः केवलस्य ||१४०॥ स्वतन्त्र 'ऋ' का 'रि' हो जाता है ।

- २३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया यथा- रिद्धि :-ऋद्धि, रिसि :-ऋषि । . ऋणर्वृषभत्वृषौ वा ||१४१॥ ऋण, ऋजु, ऋषभ, ऋतु और ऋषि के 'ऋ' का विकल्प से 'रि' होता है । यथा- रिण/अण, रिजु/उजु, रिसह/उसह, रिउ/उउ, रिसि/इसि । दृशः क्विप-टक्-सकः ||१४२॥ दृश् के विचप, टक् और सक् कृदंतों में 'ऋ' का 'रि' होता है। यथा- सरि :-सदृक, सरिस :-सदृश, सरिच्छ :-सदृश । आदृते ढिः ||१४३॥ आदृत के 'ऋ' का 'ढि' हो जाता है । यथा- आदि। अरिदृप्ते ॥१४४॥ दृप्त के 'ऋ' का 'अरि' हो जाता है । यथा- दरिअ। तृत इलिः क्लृप्त-क्लुन्ने ॥१४५॥ क्लृप्त और क्लृन्न मे स्थित 'लु' का 'इलि' आदेश हो जाता है। यथा- किलित्त, किलिन । - ए का इ-- एतइद्वा वेदना-चपेटा-देवर-केसरे ||१४६॥ और केसर के 'ए' का 'इ' विकल्प से होता है। यथा- विअणा/वेअणा, चविडा/चवेडा, दिवर/देवर, किसर/केसर । वेदना, चपेटा, देवर, एकाऊ- ऊः स्तेने वा ||१४७॥

प्राकृत व्याकरण स्तेन के 'ए' का विकल्प से 'ऊ' होता है । यथा- थूण/थेण । ऐ का ए- ऐत एत् ||१४८॥ 'ऐ' का 'ए' हो जाता है । यथा- सेला :-शैला, तेलोक :-त्रैलोक्य, केलास :-कैलाश । ऐ का इ- इत्सैन्धव-शनैश्चरे ||१४९॥ सैन्धव और शनैश्चर के 'ऐ' का 'इ' हो जाता है । यथा- सिंधव, सणिच्छर । 44 -- सैन्ये वा ||१५०॥ सैन्य के 'ऐ' का 'इ' विकल्प से होता है । 1 " यथा- सिन/सेन्न । ऐ का अइ,ए- अइ दैत्यादौ च ||१५१॥ दैत्य आदि मे स्थित 'ऐ' का 'अइ' और 'ए' हो जाता है । यथा- सइन्न/सैन :-सैन्य, दइच्च/देच्च, दइन्न/दैन, अइसरिअ/इसरिअ, भइरव/भैरव, वइजवण/वेजवन, दइवअ/देवअ :-दैवत, वइआलीअ/वेआलिअ :-वंतालीय, वइएस/वेएस :-वैदेश, चइत्त/चेत्त । वैरादौ वा ||१५२॥ वैर आदि में विकल्प से 'ऐ' का 'अइ' आदेश हो जाता है । यथा- वइर/वेर, कइलास/केलास, कइरव/करव, वइसवण/वैसवण, वइसपायण/वेसम्पायण, वइआलिअ/आलिअ, वइसिअ/वसिअ, चइन/चंत्त । एच्च दैवे ||१५३॥ दैव के 'ऐ' का 'अइ' और 'ए' हो जाता है ।

२५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया यथा- दइव/देव/देव्व । उच्चैर्नीचस्यैअ. ||१५४॥ उच्चैः और नीचे के 'ऐ' का 'अअ आदेश हो जाता है । यथा- उच्चअ, नीचअ । ऐ का इ- ईद्धैर्ये ||१५५॥ धैर्य के 'ऐ' का 'ई' हो जाता है । यथा- धीर हरइ विसाओ । ओ का अ- ओतोद्वान्योन्य-प्रकोष्ठातोद्य-शिरोवेदना-मनोहर-सरोरुहेत्कोश्च वः ||१५६॥ अन्योन्य, प्रकोष्ठ, आतोद्य, शिरोवेदना, मनोहर और सरोरुह के 'ओ' का 'अ' तथा 'कृ' या 'त्' अक्षर हो तो 'क्' या 'त्' का 'व' हो जाता है । यथा- अन्नुन्न :-अन्नन्न, पवट्ठो :-पउट्ठो, आवज्ज :-आउज्ज, सिर-वअणा :-सिरोविअणा, मणहर :-मणोहर, सररुह :-सरोरुह । ओ का ऊ- ऊत् सोच्छवासे ||१५७॥ सोच्छवास मे स्थित 'ओ' का 'ऊ' हो जाता है । यथा- सूसास । ओ का अउ, आअ- गव्यउ-आअ ||१५८॥ 'गो' के 'ओ' का 'अउ' और 'आअ' आदेश हो जाता है । यथा- गउअ, गाअ ।

प्राकृत व्याकरण. २६ औ का ओ- औत ओत् ||१५९॥ 'औ' का 'ओ' होता है । यथा- कोमुई :-कौमुदी, जोव्वण :-यौवन । औ का उ- उत्सौन्दर्यादौ ॥१६०॥ सौन्दर्य आदि के 'औ' का 'उ' हो जाता है । यथा- सुंदर :-सुंदरिअ :-सौन्दर्य, मुञ्जायण :-मौञ्जायन, सुण्ड :-शौण्ड, सुद्धोअणी :-शौद्धोदनि, दुवारिअ :-दौवारिक, सुगंधत्तण :-सौगन्ध्यम्, पुलोमी :-पौलौमी, सुवण्णिअ :-सौवर्णिक । कौक्षेयके वा ॥१६१॥ कौक्षेयक में स्थित 'औ' का 'उ' विकल्प से होता है । यथा- कुच्छेअअ/कोच्छेअअ 1 औ का अउ अउ : पौरादौ च ॥१६२॥ पौर आदि मे स्थित 'औ' का 'अउ' और 'ओ' हो जाता है । यथा- पउर/पोर, कउरव/कोरव, कउसल/कोसल, परिस/पोरिस, सउह/सोह, गउड/गोड, मउलि/मोलि, मउण/मोण, सउरा/सोरा, कउला/कोला । औ का आ- - आच्च गौरवे ||१६३॥ गौरव में स्थित 'औ' का 'आ' और 'अउ' हो जाता है । यथा- गारव/गउरव । नाव्यावः ||१६४॥ नौ मे स्थित 'औ' का 'आव' आदेश हो जाता है । यथा- नावा।

२७ डॉ. उदयचन्द्र जन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया एत् त्रयोदशादौ स्वरस्य सस्वर-व्यजनेन ||१६५ ॥ स्वर सहित आदि स्वर का त्रयोदश आदि शब्दों में 'ए' हो जाता है। यथा- तेरस :-त्रयोदश, तेवीस :-त्रयोविशत्, तेतीस :-त्रयस्त्रिशत् । स्थविर-विचकिलायस्कारे ॥१६६ ॥ स्थविर, विचकिल और अयस्कार मे स्थित व्यजन सहित आदि स्वर का 'ए' हो जाता है । यथा- थेर, वइल्ल, एक्कार । वा कदले ||१६७॥ कदल मे स्थित आदि स्वर सहित व्यंजन का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- केला/कयल । वेत. कर्णिकारे ||१६८॥ कर्णिकार मे स्थित आदि स्वर सहित व्यंजन का 'ए' विकल्प से होता है । यथा- कण्णेर/कण्णियार । अयौवैत् ||१६९॥ अयि के स्थान पर 'ऐ' विकल्प से होता है । यथा- ऐ बीहेमि, अइ उम्मत्तिए । ओत्-पूतर-बदर-नवमालिका-नवफलिका-पूगफले ||१७० ॥ पूतर, बदर, नवमालिका, नवफलिका और पूगफल मे स्थित आदि स्वर और परवर्ती व्यंजन का 'ओ' हो जाता है । यथा- पोर, बोर, नोमालिआ, नोहलिआ, पोप्फल, पोप्फली । न वा मयूख-लवण-चतुर्गुण-चतुर्थ-चतुर्दश-चतुर्वार-सुकुमार- कुतूहलोदूखलोलूखले ||१७१॥ मयूख, लवण चतुर्गुण, चतुर्थ, चतुर्दश, चतुर्वार, सुकुमार, २८ MPA प्राd कुतूहल, उदूखल, उलूखल मे स्थित स्वर सहित परवर्ती स्वर एवं व्यंजन का विकल्प से 'ओ' होता है । यथा- मोह/मऊह, लोण/लवण, चोग्गुण/चउग्गुण, चोत्थ/चउत्थ, चोदर/ चमर, चोव्वार/चउव्वार, सोमाल/सकुमाल, कोहल/कोउहल्ल. ओहल/उऊहल, ओक्खल/उलूहल। अवापोते ||१७२॥ 'अव', 'अप' और 'उत्' के स्थान पर विकल्प से 'ओ' होता है। यथा- ओअर/अवतर, ओआस/अवयास, ओसर/अवसर, आंवण/उअवण । ऊच्चोपे ||१७३॥ 'ऊ' का 'ओ' आदेश तथा 'उप' के 'उ' का विकल्प से 'ओ' होता है। यथा- ऊहसिअ/उवहसिअ/ओहसिअ, ऊज्झाय/ओज्झाय/उवझाय, ऊआस/ओआस/उववास । उमो निषण्णे ||१७४॥ निषण्ण में स्थित नि+ष् सहित उम आदेश विकल्प से होता है। यथा- णुमण्ण/णिसण्ण । प्रावरणे अग्रवाऊ ||१७५॥ प्रावरण में स्थित आ+व सहित अङ्ग और आउ आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- पड्गुरण/पाउरण/पावरण । स्वरादसंयुक्तस्यानादेः ॥१७६।। स्वर की तरह असंयुक्त और अनादि का अधिकार यहाँ से प्रारम्भ होता है । व्यञ्जन-परिवर्तन- क-ग-च-ज-त-द-प-य-वा प्रायोलुक् ||१७७॥

२९ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया
मध्य और अन्त्य क, ग, च, ज, त, द, प, य और 'व'
व्यंजनों का प्राय लोप हो जाता है ।
यथा- क- लोअ :-लोक, णरअ :-नरक, ग- नअ :-नग, णअर :-नगर,
च- रयणा :-रचना, सई :-शची, ज- रयय :-रजत, ग :-गज,
त- पहाअ :-प्रभात, विआण :-वितान, द- मयण :-मदन, मअ :-मद, जइ •-यदि,
प-रिऊ :-रिपु, सउरिस :-सुपुरुष, य- माआ :-माया, समवाअ -समवाय,
व- लाअण्ण :-लावण्ण, कइ :-कवि, रइ :-रवि ।
यमुना-चामुण्डा-कामुकातिमुक्तके मोनुनासिकश्च ||१७८ ॥
यमुना, चामुण्डा, कामुक, अतिमुक्तक, के 'म्' का लोप और
'म्' के लोप होने पर अनुनासिक की प्राप्ति हो जाती है ।
यथा- जउँणा, चाउँण्डा, काउँअ अणिउत्तय ।
नावर्णात् पः ॥१७९॥
'अ', 'आ' स्वर के पश्चात् 'प' का लोप नहीं होता है ।
यथा- सवह:-शपथ, पाप :-पाप ।
अवर्णो य श्रुतिः ||१८० ॥
अवर्ण के रहने पर 'य' श्रुति अर्थात् 'अ' को 'य' सुना जाता
-
यथा- णयर, रयय, पायाल, गयण, मयण ।
कुब्ज-कर्पर-कीले कः खोऽपुष्पे ||१८१॥
कुब्ज, कर्पर, कीलक के 'क' का 'ख' हो जाता है । पुष्प
अर्थ के योग मे
कुब्ज
के 'क' का 'ख' नहीं
होता है ।
यथा- खुज्ज, खप्पर, खीलअ ।
मरकत-मदकले गः कदुके त्वादेः ॥१८२॥
मरकत और मदकल के 'क' का 'ग' होता है तथा कदुक के
आदि 'क' का भी 'ग' हो जाता है ।
यथा- मरगय, मयगल, गेदुअ ।
किराते च ॥१८३॥

प्राकृत व्याक किरात के 'क' का 'च' हो जाता है । यथा- चिला। शीकरे भ-हौ वा ||१८४॥ शीकर के 'क' का 'भ' तथा 'भ' का 'ह' विकल्प से होता है। यथा- सीअर/सीहर। चंद्रिकायां मः ||१८५॥ चंद्रिका के 'क' का 'म' हो जाता है । यथा- चदिमा । निकष-स्फटिक-चिकुरेहः ||१८६ ॥ निकष, स्फटिक और चिकुर के 'क' का 'ह' हो जाता है । यथा- निसह, फलिह, चिहुर । namam ख-घ-थ-ध-भाम् ||१८७॥ ख, ध, थ, ध और 'भ' का 'ह' हो जाता है । यथा- साहा, मुह, महला, लिह, मेह, जहण, माह, लाह, नाह, मिहुण, अह, साहु । पृथकि धो वा ||१८८॥ पृथक् के 'थ' का 'ध' विकल्प से होता है । यथा- पिध/पिह/, पुह/पुध । शृंखले खः कः ॥१८९॥ शृङ्खल के 'ख' का 'क' हो जाता है । यथा- सङ्कल। पुन्नाग-भागिन्योर्गो मः ||१९० ॥ पुन्नाग और भागिनी के 'ग' का 'म' हो जाता है । यथा- पुनाम, भामिणी । छागे लः ||१९१॥ छाग के 'ग' का 'ल' हो जाता है । यथा- छाल/छाली।

३१ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया ऊत्वे दुर्भग-सुभगे वः ॥१९२॥ दुर्भग और सुभग में स्थित 'ग' का 'व' हो जाता है । यथा- दूहव, सूहव। खचित-पिशाचयोश्च स-ल्लौ वा ॥१९३॥ खचित के 'च' का 'स' और पिशाच के 'च' का 'ल्ल' विकल्प से होता है। यथा- खसिअ/खइअ, पिसल्ल/पिआस । जडिले जो झो वा ||१९४॥ जटिल के 'ज' का 'झ' विकल्प से होता है । यथा- झटिल/जटिल । टका ड- टो डः ॥१९५॥ 'ट' का 'ड' हो जाता है । यथा- नड, भड, घड, पड़ । सटा-शकट-कैटभे ढः ||१९६।। सटा, शकट और कैटभ के 'ट' का 'ढ' हो जाता है । यथा- सढा, सयढ, केढव । स्फटिके लः ||१९७॥ स्फटिक के 'ट' का 'ल' हो जाता है । यथा- फलिह । चपेटा-पाटौ वा ॥१९८॥ चपेटा और पाट में स्थित 'ट' का 'ल' विकल्प से होता है । यथा- चविला/चविडा, फालेइ/फाडेइ । ठका ढ- - ठो ढः ||१९९॥

प्राकृत व्याकरण 'ठ' का 'ढ' हो जाता है । यथा- मढ, सढ, कमढ, कुढार, पढ । अकोठेल्लः ॥२00॥ अनोठ के 'ठ' का 'ल्ल' हो जाता है । यथा- अकोल्ल । पिठरे हो वा रश्च डः ॥२०१॥ पिठर के 'ठ' का 'ह' और 'र' का 'ड' विकल्प से होता है । यथा- पिहङ/पिढर । डकाल- . डो लः ॥२०२॥ 'ड' का 'ल' हो जाता है । यथा- गरुल (गरुड), तलाय :-तडाग, कील :-क्रीड, वहवामुह :-वउवामुख, दालिम :-दाडिम, णल :-नड, आमेल :-आमेड । वेणौ णो वा ॥२०३॥ वेणु के 'ण' का 'ल' विकल्प से होता है । यथा- वेलु/वेणु । तुच्छे तश्च-छौ वा ॥२०४॥ तुच्छ के 'त' का 'च' या 'छ' विकल्प से होता है । यथा- चुच्छ/छुच्छ :-तुच्छ । तगर-त्रसर-तूवरे टः ॥२०५॥ तगर, त्रसर और तूवर में स्थित 'त' का 'ट' हो जाता है । यथा- टगर, टसर, टूवर । त का ड- प्रत्यादौ डः ॥२०६॥ प्रति आदि के 'त' का 'ड' हो जाता है ।

३३ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया यथा- पडिवत्र :-प्रतिपन्न, पडिसार :-प्रतिसार, पडिमा :-प्रतिमा, पडिवया :-प्रतिपदा, पडंसुआ :-प्रतिश्रुत्, पडिकर :-प्रतिकर, पहुडि :-प्रभृति । इत्वे वेतसे ॥२०७॥ वेतस के 'त' का 'ड' और 'त' के 'अ' का 'इ' हो जाता है। यथा- वेडिस । गर्भितातिमुक्तके णः ॥२०८॥ गर्भित और अतिमुक्तक के 'त' का 'ण' हो जाता है । यथा- गम्भिण, अणिउँतय । रूदिते दिनाण्णः ||२०९॥ रुदित के 'दित' का 'ण' हो जाता है । यथा- रुण्ण । - सप्ततौ र' ||२१०॥ सप्तति के 'त्' का 'र' हो जाता है । यथा- सत्तरी। । । -- - - अतसी-सातवाहने लः ||२११॥ अतसी और सातवाहन मे स्थित 'त' का 'ल' हो जाता है । यथा- अलसी, सालवाहण । पलिते वा ॥२१२॥ पलित में स्थित 'त' का विकल्प से 'ल' होता है । यथा- पलिल/पलिअ । पीते वोले वा ॥२१३॥ पीत मे 'ल' प्रत्यय होने पर विकल्प से 'व' हो जाता है। यथा- पीवल/पीअल । वितस्ति-वसति-भरत-कातर-मातुलिगे हः ॥२१४॥ वितस्ति, वसति, भरत, कातर और मातुलिग में स्थित 'त' का 'ह' हो जाता है ।

- प्राकृत व्याकर यथा- विहत्थि, वसइ, भरह, काहल, माहुलिग । मेथि-शिथिर-शिथिल-प्रथमे थस्य ढः ॥२१५॥ मेथि, शिथिर, शिथिल, और प्रथम में स्थित 'थ' का 'ढ' हो जाता है। यथा- मेढि, सिढिल, पढम । निशीथ-पृथिव्यो र्वा ॥२१६॥ निशीथ और पृथिवी में स्थित 'थ' का 'ढ' विकल्प से होता है। यथा- निसीढ/निसीह, पुढवी/पुहवी । दशन-दष्ट-दग्ध-दोला-दण्ड-दर-दाह-दम्भ-दर्भ-कदन-दोहदे दो वा डः ॥२१७॥ दशन, दष्ट, दग्ध, दोला, दण्ड, दर, दाह, दम्भ, दर्भ, कदन और दोहद में स्थित 'द' का 'ड' विकल्प से होता है । यथा- डसण/दसण, डट्ठ/द?, डड्ड/दट्ट, डोला/दोला, डण्ड/दण्ड, डर/दर, डाह/दाह, डब्भ/दन्भ, डम्भ/दम्भ, कडण/कयण, डोहल/दोहल । दंश-दहोः ॥२१८॥ दंश और दह के 'द' का 'ड' होता है । er- यथा- डसइ, डहइ। सख्या-गद्गदे रः ॥२१९॥ संख्यावाची शब्दों और गद्गद के 'द' का 'र' हो जाता है । यथा- एआरह, बारह, तेरह, गग्गर । कदल्यामद्रुमे ॥२२०॥ कदली शब्द दुम-वृक्ष वाची न होने पर 'द' का 'र' हो जाता है। यथा- करली (मृग)। प्रदीपि-दोहदे लः ॥२२१॥ प्रदीप और दोहद मे स्थित 'द' का 'ल' हो जाता है । ।

३५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया यथा- पलीव, दोहल। कदम्बे वा ॥२२२॥ कदम्ब में स्थित 'द' का 'ल' विकल्प से होता है । यथा-कलम्ब/कयम्ब । दीपौ धो वा ॥२२३॥ दीप मे स्थित 'द' का 'ध' विकल्प से होता है । यथा- धिप्पइ/दिप्पइ । कदर्थिते वः ॥२२४॥ कर्थित में स्थित 'द' का 'व' हो जाता है । यथा- कवट्टिअ । ककुदे हः ॥२२५॥ ककुद मे स्थित 'द' का 'ह' हो जाता है । - यथा- कउह । निषधे धोढः ॥२२६॥ निषध मे स्थित 'ध' का 'ढ' हो जाता है । यथा- निसढ । वौषधे ||२२७॥ औषध के 'ध' का 'ढ' विकल्प से होता है । यथा- ओसढ । पक्ष में- ओसह । ন চl U- नो णः ॥२२८॥ 'न' का 'ण' हो जाता है । यथा- कणय :-कनक, मयण :-मदन, वयण :-वचन । वादौ ॥२२९॥ आदि मे विकल्प से 'न' का 'ण' हो जाता है ।

प्राकृत व्याकरण यथा- णरो । पक्ष में- नरो । निम्ब-नापिते ल-हं वा ॥२३०॥ निम्ब और नापित में स्थित 'न' का 'ल' और 'ह' क्रमश विकल्प से होता है । यथा- लिम्ब, पहाविअ । पक्ष में- निम्ब, नाविअ । पो वः ॥२३१॥ 'प' का 'व' हो जाता है । यथा- पाव :-पाप, सवह :-शपथ, पईव :-प्रदीप, साव :-श्राप, उवसग्ग :-उपसर्ग, तव :-तप, कलाव :-कलाप, पलाव :-प्रताप, उवमा :-उपमा, कविल :-कपिल, उववास :-उपवास, अवमाण:-अपमाण । . पाटि-परुष-परिघ-परिखा-पनस-पारिभद्रे फः ॥२३२॥ पाटि, परुष, परिघ, परिखा, पवस और पारिभद्र में स्थित 'प' का 'फ' हो जाता है । यथा- फालेइ, फरुस, फलिह, फलिहा, फणस, फालिहद्द । प्रभूते वः ||२३३॥ प्रभूत के 'प' का 'व' हो जाता है । यथा- वहुत्त । नीपापीडे मो वा ॥२३४॥ नीप और आपीड में स्थित 'प' का 'म' विकल्प से होता है। यथा- नीम/नीव, आमेल/आवेड । पापी र: ॥२३५॥ पापर्द्धि मे स्थित 'प' का 'र' हो जाता है । यथा- पारद्धि। फो भ-हौ ॥२३६॥ 'फ' का 'भ' और कहीं 'ह' भी होता है । यथा- रेभ :-रेफ, सभल/सहल, सिभा :-शिफा, मुत्ताहल :-मुन्दाफा, सेभालिया/सेहालिया :-सेफालिग, सभरी/सहरी :-शफरी । ..

३७ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरश सिसोदिया बो वः ॥२३७॥ 'ब' का 'व' हो जाता है । यथा- अलाबु -:अलावु, सबल -:सवल । विसिन्या भः ॥२३८॥ विसिनी के 'व' का 'भ' हो जाता है । यथा- भिसणी :-विसनी । कबन्धे म-यौ ॥२३९॥ कबन्ध के 'ब' का 'म' और कभी 'य' हो जाता है । यथा- कमंध-कयध । कैटभे भो वः ||२४०॥ कैटभ मे स्थित 'भ' का 'व' हो जाता है । यथा- केढव। विषमे मो ढो वा ||२४१॥ विषम के 'म' का 'ढ' विकल्प से होता है । यथा-विसढ/विसम । मन्मथे व. ||२४२॥ मन्मथ मे स्थित 'म' का 'व' हो जाता है । यथा-वम्मह । वाभिमन्यौ ॥२४३॥ अभिमन्यु में स्थित 'म' का 'व' विकल्प से होता है । यथा- अहिवन्नु, अहिमन्नु । भ्रमरे सो वा ॥२४४॥ भ्रमर में स्थित 'म' का 'स' विकल्प से होता है । यथा- भसल/भमर । आदेर्यो जः ||२४५॥

प्राकृत व्याकरण आदि 'य' का 'ज' होता है । यथा- जस :-यश, जम :-यम, जइ :-यति । युष्मद्यर्थपरे तः ॥२४६॥ युष्मद् के तुम अर्थ में 'य' का 'त' हो जाता है । यथा- तुम्हारिस । यष्ट्यां लः ॥२४७॥ यष्टि के 'य' का 'ल' हो जाता है । यथा- लट्ठि। वोत्तरीयानीय-तीय-कृये ज्जः ||२४८॥ उत्तरीय मे आनीय, तीय, य प्रत्यय होने पर ‘ज्ज' हो जाता है । यथा- करणिज्ज/करणीय, विइज्ज/वीअ, पेज्जा/पेआ। छायायां हो कान्तौ वा ॥२४९॥ परछाई अर्थ में छाया के 'य' का 'ह' विकल्प से होता है। -- यथा- छाहा/छाया । डाह-वौ कतिपये ॥२५० ॥ कतिपय में स्थित 'य' का डाह -'आह एवं 'व' हो जाता --- यथा- कइवाह, कइअव । किरि-भेरे रोडः ॥२५१।। किरि और भेर के 'र' का 'ड' हो जाता है । यथा- किडि, भेड। पर्याणे डा वा ॥२५२॥ पर्याण में स्थित 'र' का 'डा' हो विकल्प से होता है । ८ यथा- पडायाण/पल्लाण । . करवीरे णः ॥२५३॥ करवीर के 'र' का 'ण' हो जाता है ।

३९ डॉ उदयचन्द्र जन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया यथा-कणवीर । हरिद्रादौ लः ॥२५४॥ हरिद्रा आदि मे स्थित 'र' का 'ल' हो जाता है । यथा- हलिद्दा, जहुट्ठिल, सिढिल, मुहल, चलण, वलुण, कलुण, इंगाल, सक्काल, सोमाल, चिलाअ, फलिह, भसल, जढल, वढल, निठुल । स्थूले लो रः ॥२५५॥ स्थूल मे स्थित 'ल' का 'र' हो जाता है । यथा- थोर । लाहल-लागल-लागुले वादेर्णः ॥२५६ ॥ लाहल, लांगल, लांगुल में स्थित आदि 'ल' का 'ण' विकल्प से होता है । यथा- णाहल/लाहल, णगल/लगल, णगूल/लगूल । ललाटे च ||२५७॥ ललाट में स्थित 'ल' का 'ण' हो जाता है । यथा-णिडाल/णडाल । शबरे बो मः ॥२५८॥ शबर में स्थित 'ब' का 'म' हो जाता है । यथा-समर । स्वप्न-नीव्यो र्वा ॥२५९॥ स्वप्न और नीवी मे स्थित 'व' का 'म' विकल्प से होता है । यथा- सिमिण/सिविण, नीमी/नीवी । श-षोः स. ॥२६०॥ 'श' और 'ष' का 'स' हो जाता है । यथा- ससि •-शशि, सुह :-शुभ, कसाअ :-कषाय, घोस :-घोष । स्नुषाया ण्हो न वा ॥२६१ ॥ स्नुषा में स्थित 'ष' का विकल्प से ‘ण्ह' हो जाता है । :

प्राdaal.
यथा- सुण्हा । पक्ष में- सुसा ।
दश-पाषाणे हः ॥२६२॥
दशन् व पाषाण में स्थित 'श', 'ष' का 'ह' विकल्प से होता है।
यथा- दहमुह/दसमुह, पाहाण/पासाण ।
दिवसे सः ॥२६३॥
दिवस मे स्थित 'स' का 'ह' विकल्प से होता है ।
।
यथा- दिवह/दिवस ।
हो घोनुस्वारात् ||२६४॥
अनुस्वार से परे 'ह' का 'घ' विकल्प से होता है।
यथा- सिंघो/सीहो, संघार/संहार ।
शट्-शमी-शाव-सुधा-सप्तपर्णेष्वादेश्छः ॥२६५॥
षट्, शमी, शाव, सुधा और सप्तपर्ण में स्थित आदि अक्षर का
'छ' हो जाता है ।
यथा- छ?, छमी, छाव, छुहा, छत्तिवण्ण ।
शिरायां वा ॥२६६॥
शिरा में स्थित आदि अक्षर का 'छ' विकल्प से होता है ।
यथा- छिरा/सिरा।
लुग, भाजन-दनुज-राजकुले जः सस्वरस्य न वा ॥२६७ ॥
भाजन, दनुज और राजकुल में स्थित स्वर सहित 'ज' का
लोप विकल्प से होता है ।
यथा- भाण/भाअण, दणु/दणुअ, राउल/राअउल ।
व्याकरण-प्राकारागते कगोः ॥२६८॥
व्याकरण, प्राकार और आगत स्वर सहित 'क' और 'ग' का
लोप विकल्प से होता है ।
यथा- वारण/वायरण, पार/पायार, आअ/आअय ।
किसलय-कालायस-हृदये यः ॥२६९ ॥

४१ डॉ उदयचन्द्र जन एव डॉ. सुरेश सिसादिया किसलय, कालायस और हृदय मे स्थित 'य' का विकल्प से लोप होता है । यथा- किसल/किसलय, कालास/कालासय, हिय/हियय । दुर्गादेव्युदुम्बर-पादपतन-पाद पीठन्तर्दः ॥२७० ॥ दुर्गादेवी, उदुम्बर, पादपतन, पादपीठ मे स्थित मध्य स्वर सहित व्यजन का विकल्प से लोप होता है । यथा- दुग्गा-वी/-दुग्गा एवी, उम्बरो/उउम्बर, पा-वडण/पाय-वडण, पा-वीढ/पाय-वीढ। यावत्तावज्जीविता वर्तमानावट-प्रावरक-देवकुलैवमेवे व. ॥२७१।। यावत्, तावत् जीवित, आवर्तमान, अवट, प्रावरक, देवकुल और एवमेव के स्वर सहित व्यंजन का विकल्प से लोप होता है । यथा- जा/जाव, ता/ताव, जीय/जीविय, अट्टमाण/आवट्टमाण, अड/अवड, पारय/पावरय, देउल/देवउल, एमेव/एवमेव ।

द्वितीय-पाद
:
.
सयुक्तस्य ||२/१॥
यह संयुक्त का अधिकार है ।
शक्त-मुक्त-दष्ट-रुग्ण-मृदुत्वे को वा ॥२/२॥
शक्त, मुक्त, दष्ट, रुग्ण और मृदुत्व के संयुक्त व्यंजन का
विकल्प से 'क' हो जाता है ।
यथा- सक्क/सत्त, मुक्क/मुत्त, डक्क/दट्ठ, लुक्क लुग्ग, माउक/माउत्तण ।
क्षः खः क्वचित्तु छ-झौ ॥२/३॥
आदि 'क्ष' का 'ख', कहीं-कहीं पर छ, झ एवं मध्य तथा
अन्त्य 'क्ष' का 'क्ख' हो जाता है ।
यथा- खअ :-क्षय, खीण :-छीण, झीण :-क्षीण, लक्खण :-लक्षण ।
क-स्कयो म्नि {१२/४॥
ष्क और स्क नाम होने पर 'ख' का 'क्ख' हो जाता है ।
यथा- पोक्खर :-पुष्कर, निक्ख :-निष्क, खंध :-स्कध, खंधावार :-स्कधावार,
' अवक्खंद :-अवस्कंद ।
शुष्क-स्कन्दे वा ||२/५॥
शुष्क और स्कन्द में स्थित 'क', 'स्क' का विकल्प से
'ख' - क्ख' हो जाता है।
यथा- सुक्ख/सुक्क, खद/कंद ।
क्ष्वेटकादौ ॥२/६॥
क्ष्वेटक आदि में स्थित संयुक्त व्यंजन का 'ख' हो जाता है ।
यथा- खेड :-क्ष्वेटक, खोडम :-क्ष्वोटक, खोडअ : स्फोटक, संडअ :-स्फंटर।
स्थाणावहरे ||२/७॥
स्थाणु का हरि अर्थ नहीं होने पर 'स्थ' का 'ख' हो जाता है।
यथा-खाणु।

४३ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया
स्तम्भे स्तो वा ॥२/८॥
स्तम्भ मे स्थित 'स्त' का विकल्प से 'ख' हो जाता है ।
यथा-खभ/थभ ।
थ-ठावस्पन्दे ॥२/९॥
अस्पन्द अर्थ में 'स्त' का 'थ' या 'ठ' हो जाता है ।
यथा- थभ/ठभ ।
रक्ते गो वा ||२/१० ॥
रक्त के 'क्त' का 'ग'- 'ग्ग' विकल्प से होता है ।
यथा- रग्ग/रत्त ।
शुल्के भो वा ||२/११॥
शुल्क में स्थित 'ल्क' का 'ग' विकल्प से होता है ।
यथा- सुङ्ग/सुक्क ।
कृत्ति-चत्वरे चः ||२/१२॥
कृत्ति और चत्वर में स्थित सयुक्त व्यजन का ‘च्च' हो जाता
है।
यथा- किच्चि, चच्चर ।
त्योऽचैत्ये ||२/१३॥
चैत्य के 'त्य' को छोडकर 'त्य' का 'च्च' हो जाता है ।
यथा- सच्च, पच्चअ।
।
प्रत्यूषे षश्च हो वा ॥२/१४ ॥
प्रत्यूष के 'त्य' का 'च' तथा 'ष' का 'ह' विकल्प से होता
यथा- पच्चूह । पक्ष में- पच्चूस ।
त्व-थ्व-द-ध्वा च-छ-ज-झा. क्वचित् ||२/१५॥
कहीं पर 'त्व' का 'च' - च्च, थ्व का छ
और ध्व का ज्झ हो जाता है ।
च्छ, द्व का ज्ज

-
प्रादा,
यथा- भोच्चा, सोच्चा, णच्चा, पिच्छी (पृथ्वी), विज्ज (विद्वान), वृक्ष
वृश्चिके श्चेञ्चुर्वा ||२/१६॥
वृश्चिक के 'श्च' का 'ञ्चु' विकल्प से होता है ।
यथा- विञ्चुअ/विञ्छि ।
छोऽक्ष्यादौ ॥२/१७॥
अक्ष आदि के 'क्ष' का छ -'छ हो जाता है ।
यथा- अच्छि :-अक्षि, उच्छु :-इक्षु, लच्छी :-लक्ष्मी, कच्छ :-कक्ष, छो
छीर :-क्षीर, कुच्छि :-कुक्षि, वच्छ :-वक्ष, छुण्ण :-क्षुण्ण, कच्छा :-कक्षा,
छार :-क्षार, छुहा :-क्षुधा, दच्छ -दक्ष, वच्छ :-वक्ष ।
क्षमायां कौ ॥२/१८॥
क्षमा का अर्थ पृथिवी होने पर 'क्ष' का 'छ' हो जाता है ।
..
यथा- छमा ।
ऋक्षे वा ॥२/१९॥
ऋक्ष के 'क्ष' का विकल्प से 'छ' – 'च्छ' हो जाता है ।
m
यथा- रिच्छ/रिक्ख ।
क्षण उत्सवे ॥२/२०॥
क्षण का अर्थ उत्सव होने पर 'क्ष' का 'छ' हो जाता है ।
यथा- छण ।
हस्वात् थ्य-श्च-त्स-प्सामनिश्चले ॥२/२१॥
निश्चल के 'श्च' को छोडकर हस्व होने पर थ्य, श्च, त्स,
प्स का छ -: च्छ हो जाता है ।
मिच्छा, पच्छिम, पच्छा, उच्छाह, मच्छर, लिच्छ, जुगुच्छ ।
सामोत्सुकोत्सवे वा ॥२/२२॥
सामर्थ्य, उत्सुक और उत्सव में स्थित संयुक्त व्यजन का
विकल्प से छ-च्छ होता है ।
यथा- सामच्छ/सामस्थ, उच्छुअ/ऊसुअ, उच्छव/ऊसव ।

८५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डा सुरेश सिसोदिया
स्पृहायाम् ||२/२३॥
स्पृहा मे स्थित सयुक्त व्यजन का 'छ' हो जाता है ।
यथा- छिहा।
.
-
द्य-य्या ज· ||२/२४॥
द्य, य्य और र्य का ज - ज्ज हो जाता है ।
यथा- मज्ज :-मद्य, विज्जा :-विद्या, वेज्ज :-वैद्य, जज्ज •-जय्य, सेज्जा :-सय्या,
भज्जा :-भार्या, अज्जा :-आर्या, कज्ज •-कार्य, पज्जय :-पर्याय ।
अभिमन्यौ जजौ वा ॥२/२५ ॥
अभिमन्यु में स्थित न्य का 'ज' या 'ज' विकल्प से होता है।
यथा- अहिमज्जु/अहिमञ्जु अहिमन्नु ।
साध्वस-ध्य-ह्या झः ॥२/२६॥
साध्वस के ध्व, का तथा ध्य एव ह्य का 'झ' हो जाता है ।
यथा- सज्झस, वज्झ :-वध्य, झाण :-ध्यान, उवज्झाअ :-उपाध्याय, सज्झ ·-साध्य,
विञ्झ ·-विन्ध्य, सज्झ :-सह्य, मज्झ ·-मह्य, गुज्झ :-गुह्य ।
ध्वजे वा ||२/२७॥
ध्वज मे स्थित 'ध्व' का 'झ' विकल्प से होता है ।
यथा- झअ/धअ।
.
इन्धौ झा ॥२/२८॥
इन्ध के 'न्ध' का 'झ' हो जाता है ।
यथा- समिज्झ :-समिध, विज्झ :-विध्य ।
वृत्त-प्रवृत्त-मृत्तिका-पत्तन-कदर्थिते टः ||२/२९॥
वृत्त, प्रवृत्त, मृत्तिका, पत्तन और कदर्थित मे स्थित सयुक्त
व्यजन का ट -ट्ट हो जाता है ।
यथा- वट्ट, पवट्ट, मिट्टिआ, पट्टण, कवट्टिअ ।
तस्याधूर्तादौ ||२/३०॥
धूर्त शब्द को छोडकर र्त का ट -ट्ट हो जाता है ।

प्राddin यथा- केवट्ट :-केवर्त, वट्टि :-वर्ति, जट्ट :-जर्त, पयट्ट :-प्रवर्त, बटुल गर्नु नट्ट :-नर्त ।- - . पक्ष में- धुत्त, कित्ति, मुत्त, वत्तिआ, कत्तिआ, मुत्ति, मुहत्त, वत्ता. कत्ता ! वृन्ते ण्टः ॥२/३१॥ वृन्त में स्थित 'न्त' का 'एट' हो जाता है । यथा- वेण्ट । ठो-स्थि-विसंस्थुले ||२/३२॥ अस्थि और विसंस्थुल में स्थित संयुक्त व्यंजन का 'ठ' हो जाता है । यथा- अट्ठि, विसठुल । स्त्यान-चतुर्थार्थे वा ||२/३३॥ स्त्यान, चतुर्थ और अर्थ में स्थित संयुक्त व्यंजन का विकल्प से ठ -ट्ट हो जाता है । यथा- ठीण/थीण, चउट्ठ/चउत्थ, अट्ठ/अत्थ । ष्ठस्यानुष्ट्रेष्टासंदष्टे ||२/३४॥ उष्ट्र, इष्टा और संदष्ट के अतिरिक्त 'ष्ट' का ठ -ट्ट हो जाता है । यथा- लट्ठि :-लष्टि, मुट्ठि :-मुष्टि, दिट्ठि :-दृष्टि, सिट्ठि :-सृष्टि, पुष्ट :-पृष्ट, कट्ठ :-कष्ट, सुर? :-सुराष्ट्र । अन्य- उट्ट :-उष्ट्र, इट्टा :-इप्टा, सदट्ठ :-संदृष्ट । गर्ते डः ||२/३५॥ गर्त में स्थित 'त' का ड -:ड हो जाता है । - .. यथा- गड्ड। समर्द-वितर्दि-विच्छर्द-च्छर्दि-कपर्द-मर्दिते-दस्य ॥२/३६॥ संमर्द, वितर्दि, विच्छर्द, च्छर्दि, कपर्द और मर्दित के 'ई' का ड -ड्ड हो जाता है । यथा-समड्ड, विअड्डि, विच्छड्डु, छडि, कवर, मजिअ । -

४७ डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया
गर्दभे वा ॥२/३७॥
गर्दभ मे स्थित 'द' का ड - ड्ड विकल्प से होता है ।
यथा- गड्डह/गद्दह ।
कन्दरिका-भिन्दिपाले ण्डः ॥२/३८ ॥
कन्दरिका और भिन्दिपाल में स्थित सयुक्त व्यजन का ‘ण्ड' हो
जाता है ।
यथा- कण्डलिआ, भिण्डिवाल ।
ho
स्तब्धे ठ-ढौ ||२/३९॥
स्तब्ध मे स्थित 'स्त' का 'ठ' और 'ब्ध' का 'ढ' हो जाता है।
यथा- ठड्डो ।
दग्ध-विदग्ध-वृद्धि-वृद्धे ढः ॥२/४० ॥
दग्ध, विदग्ध, वृद्धि और वृद्ध में स्थित संयुक्त व्यजन का
- ड्ड हो जाता है ।
यथा- दड्ड, विदड्ड, विड्डि, वुड्ड ।
श्रद्धर्द्धि-मूर्धार्थेन्ते वा ॥२/४१॥
श्रद्धा, ऋद्धि, मूर्धा और अर्ध मे स्थित संयुक्त व्यंजन का
विकल्प से ढ -ड होता है ।
यथा- सड्ढा, इड्डि/रिड्डि, मुण्डा/मुद्धा, अड्ड/अद्ध ।
म्नज्ञो र्णः ॥२/४२॥
'म्न' और 'ज्ञ' का 'ण' हो जाता है ।
यथा- निण्ण :-निम्न, णाण :-ज्ञान ।
पञ्चाशत्-पञ्चदश-दत्ते ॥२/४३ ॥
पंचाशत्, पंचदश और दत्त मे स्थित संयुक्त व्यंजन का 'ण' हो
जाता है ।
यथा- पण्णासा, पण्णरह, दिण्ण ।
मन्यौ न्तो वा ॥२/४४॥

प्रातम ५.
कश्मीर के 'श्म' का विकल्प से 'म्भ होता है ।
यथा-कम्भार/कम्हार।
न्मो मः ॥२/६१॥
'न्म' का 'म' हो जाता है ।
यथा- जम्म :-जन्म, वम्मह :-मन्मथ, मम्मण :-मन्मन ।
ग्मो वा ॥२/६२॥
ग्म का विकल्प से म -:म्म होता है ।
यथा- जुम्म/जुग्ग, तिम्म/तिग्ग ।
ब्रह्मचर्य-सूर्य-सौन्दर्य-शौण्डीर्ये र्यो रः ॥२/६३॥
ब्रह्मचर्य, तूर्य, सौन्दर्य और शौण्डीर्य के 'र्य' का 'र' हो जाता
है ।
यथा- बम्हचेर, तूर, सुंदर, सोण्डीर ।
धैर्ये वा ॥२/६४ ॥
धैर्य के र्य' का विकल्प से 'र' होता है ।
यथा- धीर । पक्ष में- धिज्ज !
एतः पर्यन्ते ॥२/६५॥
'ए' होने पर पर्यन्त के 'र्य' का 'र' हो जाता है ।
यथा- परन्त । पक्ष में- पज्जत ।
आश्चर्ये ॥२/६६॥
आश्चर्य के र्य' का 'र' और 'अ' का 'ए' हो जाता है ।
यथा- अच्छेर । पक्ष में- अच्छरिअ।
अतो रिआर-रिज्ज-रीअं ॥२/६७॥
'अ' रहने पर 'Z' के रिअ, अर, रिज्ज और री आदेश हो
जाते हैं ।
यथा-अच्छरिअ, अच्छअर, अच्छरिज्ज, अच्छरो।
पर्यस्त-पर्याण-सौकुमार्ये ल्लः ॥२/६८ ॥

डॉ उदयन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसादया
पर्यस्त, पर्याण और सौकुमार्य के 'र्य' का 'ल्ल' हो जाता है।
यथा- पल्लत्थ, पल्लाण, सोअमल्ल ।
बृहस्पति-वनस्पत्योः सो वा ॥२/६९॥
बृहस्पति और वनस्पति के 'स्प' का 'स्स' विकल्प से होता है।
यथा- बहस्सइ/बहप्फइ, भयस्सइ/भयप्फइ, वणस्सइ/वणप्फइ ।
वाष्पे होऽश्रुणि ||२/७0 ॥
वाष्प में स्थित 'ष्प' का 'ह' हो जाता है, आंसु को छोडकर ।
यथा-बाह ।
कार्षापणे ||२/७१॥
कार्षापण मे स्थित 'र्ष' का 'ह' हो जाता है ।
यथा- काहावण ।
दुःख-दक्षिण तीर्थे वा ॥२/७२॥
दुख, दक्षिण और तीर्थ में स्थित संयुक्त व्यंजन का 'ह'
विकल्प से होता है ।
यथा- दुह/दुक्ख, दाहिण/दक्खिण, तूह/तित्थ ।
कूष्माण्ड्या ष्मो लस्तु ण्डो वा ॥२/७३ ॥
कूष्माण्डी के 'म' का 'ह' और
और 'ण्ड' 'ल'
विकल्प से होता है।
यथा- कोहली/कोहण्डी ।
का
पक्ष्म-श्म-ष्म-स्म-ह्या म्ह. ||२/७४॥
पक्ष्म सम्बन्धित श्म, ष्म, स्म, ह्म का 'म्ह' हो जाता है ।
यथा- पम्ह :-पक्ष्म, कुम्हाण .-कुश्मान, कम्हार ·-कश्मीर, गीम्ह ·-ग्रीष्म,
उम्ह :-ऊष्म, अम्हारिस :- अस्मादृश, विम्हअ :-विस्मय, बम्हा :-ब्रह्म ।
सूक्ष्म-श्न-ष्ण-स्न-ह्र-ह्ण-क्षणां ण्हः ||२/७५॥
सूक्ष्म से सम्बन्धित क्ष्म, श्न, ष्ण, स्न, हू, हण और क्ष्ण
का 'ह' हो जाता है ।
.

" यथा- सह :-सूक्ष्म, पण्ह :-प्रश्न, सिण्ह :-शिश्न, विण्हु :-विष्णु. जोण्हा :-ज्योत्स्ना, हाअ :-स्नात, पण्हुअ :-प्रस्तुत, बहि :-बति, जण्हु :-जहनु, पुव्वण्ह :-पूर्वाहा, अवरह :-अपराह्ण, सल्ह :-श्लप, तिण्ह :-तीक्ष्ण । .. हलो ल्हः ॥२/७६ ॥ हल का 'ल्ह' हो जाता है । यथा- कल्हार :-कहलार, पल्हाअ :-प्रहलाद । क-ग-ट-ड-त-द-प-श-ष-सकापामूर्ध्व लुक ||२/७७ ॥ क, ग, ट, ड, त, द, प, श, ष, सक, के संयुक्त होने पर इनका लोप हो जाता है । यथा- भुत्त :-भुक्त, दुग्ध :-दुद्ध, मुद्ध :-मुग्ध, छप्पअ :-पट्पद, काफल -रका खग्ग :-खड्ग, उप्पल :-उत्पल, उप्पाअ :-उत्पात, मुग्ग :-मुद्ग, मांगर :-गुगर, सुत्त :-सुप्त, गुत्त :-गुप्त, लण्ह :-श्लक्ष्ण, णिच्चल :-निश्चल, गोटी • गोलि, छट्ठ :-षष्टु, गिट्ठर :-निष्ठुर, खलिअ :-स्खलित, णेह :-स्नेह । अधो मनयाम् ||२/७८॥ म, न, य, के होने होने पर आगे के व्यंजन का लोप हो जाता है। यथा- जुग्ग :-युग्म, रस्सी :-रश्मि, सर :-स्मर, सेर :-स्मर, नग्ग • नग्न, लग्ग :-लग्न, सामा :-श्यामा, कुड्ड :-कुड्य, वाह :-व्याध । सर्वत्र ल-ब-रामवन्द्रे ॥२/७९ ॥ वन्द्र को छोडकर ल, ब, और र संयुक्त होने पर सर्वत्र लोप हो जाता है । यथा- उक्का :-उल्का, वक्कल :-वल्कल, सद्द :-शब्द, लोद्धअ :-लुब्धक, अक्क :-अर्क, वग्ग :-वर्ग। नेरो न वा ॥२/८०॥ 'द्र' के 'र' का लोप विकल्प से होता है । यथा- चंद/चण्ड, रु/रुद्र, भ/भद्र, समु/समुद्र । धावायाम् ||२/८१॥

५३ डॉ उदयर जन एव डॉ सुरश सिसोदिया
धात्री के 'र' का लोप विकल्प से होता है ।
यथा- धत्ती । पक्ष में- धारी ।
तीक्ष्णे णः ॥२/८२॥
तीक्ष्ण मे स्थित 'ण' का लोप विकल्प से होता है ।
यथा- तिक्ख/तिण्ह ।
ज्ञोञः ॥२/८३॥
'ज्ञ' के 'ञ' का लोप विकल्प से होता है ।
यथा- जाण/णाण, सव्वज्ज/सव्वणु, अप्पज्ज/अप्पण्णु, दइवज्ज/दइवण्णु,
इगिअज्ज/इगिअण्ण, मणोज्ज/मणोण्ण, अहिज्ज/अहिण्णु, पज्जा/पण्णा,
अज्जा/आणा, सजा/सण्णा ।
मध्याह्ने ह. ||२/८४॥
मध्याह्न में स्थित ह' के 'ह' का लोप विकल्प से होता है ।
यथा- मज्झन्न/मज्झण्ह ।
दंशाहे ॥२/८५॥
दशाह के 'ह' का लोप हो जाता है ।
यथा- दसार ।
आदेः श्मश्रु-श्मशाने ||२/८६॥
श्मश्रु
और श्मशान के आदि 'श्म' के 'श' का लोप हो जाता
यथा- मासु/मसु, मसाण ।
श्चो हरिश्चन्द्रे ||२/८७॥
हरिश्चन्द्र के 'श्च' का लोप हो जाता है ।
यथा- हरिअद।
रात्रौ वा ||२/८८॥
रात्रि मे स्थित 'त्र' का लोप विकल्प से होता है ।
यथा- राइ/रत्ति ।

प्राtailM.५४
अनादौ शेषादेशयोर्द्वित्वम् ॥२/८९॥
पद के अन्त्य एवं मध्य में स्थित संयुक्त व्यंजन के लोप होने
पर अवशिष्ट का द्वित्व हो जाता है ।
यथा- कप्पतरु, भुत्त, दुद्ध, नग्ग, उक, अक ।
द्वितीय-तुर्ययोरुपरि पूर्वः ॥२/९० ॥
द्वितीय और चतुर्थ अक्षर के द्वित्व होने पर द्वितीय का प्रथम
तथा चतुर्थ का तृतीय अक्षर हो जाता है ।
यथा- वक्खाण :-व्याख्यान, वग्घ :-व्याघ्र, मुच्छा :-मूर्छा, निझर :-निझर, या
:-कष्ट, तित्थ :-तीर्थ ।
दीर्घ वा ॥२/९१॥
दीर्घ शब्द में विकल्प होता है ।
यथा- दिग्घ । पक्ष में- दीह ।
न दीर्घानुस्वारात् ॥२/९२॥
दीर्घ या अनुस्वार होने पर द्वित्व नहीं होता है ।
यथा- फास :-स्पर्श, पास :-पार्व, सीस :-शीर्ष, ईसर :-ईश्वर, दोस · टेप,
लास :-लस्य, आस :-आस्य, पेस :-प्रेष्य, ओमाल :-अवमाल्य ।
र-हो ॥२/९३॥
'र' या 'ह' होने पर द्वित्व नहीं होता है ।
यथा- सुंदर, वम्हचेर, विहल ।
धृष्टद्युम्ने णः ॥२/९४॥
धृष्टद्युम्न के 'म्न' का 'ण' होने पर 'ण' का द्वित्व नहीं होता
.
यथा- धट्ठज्जुण ।
कर्णिकारे वा ॥२/९५॥
कर्णिकार में स्थित 'ण' का द्वित्व विकल्प से नहीं होता है ।
यथा- कणिआर/कण्णिआर ।

५५ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
दृप्ते ॥२/९६॥
दृप्त
में स्थित 'त' का द्वित्व नहीं होता है ।
यथा- दरिअ ।
समासे वा ॥२/९७॥
समास में विकल्प से द्वित्व होता है ।
यथा- नइग्गाम/नइगाम, देवत्थुई/देवथुई ।
तैलादौ ||२/९८॥
तैल आदि में द्वित्व हो जाता है ।
यथा- तेल्ल :-तैल, मण्डुक्क :-मण्डूक, वेइल्ल ·-विचकिल, उज्जु :-ऋजु,
विड्डा :-व्रीडा ।
सेवादौ वा ||२/९९॥
सेवा आदि में विकल्प से द्वित्व होता है ।
यथा- सेव्वा/सेवा, नेड्ड/नीड, नक्खा/नहा, निहित्त/निहिअ,
वाहित्त/वाहिअ, माउक्क/माउअ, कोउहल्ल/कोउहल, वाउल्ल/वाउल ।
शा. डातपूर्वोत् ||२/१00 ।।
शार्ड्स के 'ग' पूर्व 'र' में 'अ' का आगम होता है ।
यथा-सारग।
क्ष्मा-श्लाघा-रत्नेन्त्यव्यञ्जनात् ॥२/१०१॥
क्ष्मा, श्लाघा और रत्न मे 'अ' की प्राप्ति हो जाती है ।
यथा- छमा, सलाहा, रयण ।
स्नेहाग्न्योर्वा ||२/१०२॥
स्नेह और अग्नि में विकल्प से 'अ' का आगम होता है ।
यथा- सणेह । अगणी । पक्ष में- णेह । अग्गि ।
प्लक्षे लात् ||२/१0३॥
प्लक्ष के 'प्' में 'अ' का आगम हो जाता है ।
यथा- पलक्ख ।

प्रति व्याकरण. ५६
है-श्री-ही-कृत्स्न-क्रिया-दिष्टयास्वित् ॥२/१०४ ॥
ह, श्री, ही, कृत्स्न, क्रिया और दृष्ट में 'इ' का
आगम हो जाता है।
यथा- अरिह, सिरी, हिरी, कसिण, किरिया, दिट्ठिअ ।
र्श, र्ष, तप्त-वज्जे वा ॥२/१०५॥
श, र्ष, तप्त और वज्र में 'इ' का आगम विकल्प से होता है।
यथा- आरिस, दरिस, वरिस, वइर । पक्ष में- आयस, दसण, वास, वज्ज ।
,
।
लात् ||२/१०६॥
'ल' में 'इ' आगम हो जाता है ।
यथा-किलिन्न :-क्लिन्न, किलिट्ठ :-क्लिष्ट, सिलिट्ठ :-श्लिष्ट, पिलुट्ठ :-प्लुष्ट,
पिलोस :-प्लोस, किलेस :-क्लेष, अम्बिल :-आम्ल, गिल :-ग्ला ।
स्याद्-भव्य-चैत्य-चौर्यसमेसु यात् ॥२/१०७॥
स्यात्, भव्य और चैत्य में 'य' से पूर्व चौर्य की तरह 'इ' का
आगम हो जाता है।
यथा-सिया, भविय, चइत्त, चोरिअ ।
स्वप्ने नात् ||२/१०८॥
स्वप्न में 'न' से पूर्व 'इ' का आगम हो जाता है ।
', यथा- सिविण ।
स्निग्धे वादितौ ॥२/१०९॥
स्निग्ध में 'स' में 'अ' और 'न' में 'इ' का आगम विकल्प
से होता है ।
यथा- सणिद्ध, सिणिद्ध । पक्ष में- निद्ध ।
कृष्णे वर्णे वा ||२/११० ॥
कृष्ण वर्ण में 'ण' एवं 'ए' से पूर्व 'अ' विकल्प से होता है ।
यथा- कसण/कसिण/कण्ह ।
उच्चाहति ॥२/१११॥
स

डॉ. उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुरेश सिसोदिया अर्हत् मे 'ह' से पूर्व 'र' मे 'उ' और 'अ' विकल्प से होता है। यथा- अरुह/अरिह/अरह । पद्म-छद्म-मूर्ख-द्वारे वा ||२/११२॥ पद्म, छद्म, मूर्ख और द्वार में विकल्प से 'उ' हो जाता है । यथा- परम :-पोम्म, छउम :-छम्म, मुरुक्ख :-मुक्ख, दुवार :-वार :-देर :-दार । तन्वीतुल्येषु ॥२/११३॥ तन्वी के समान शब्दो मे 'उ' का आगम हो जाता है । यथा- तणुवी, लहुवी :-लध्वी, गरुवी :-गुर्वी, बहुवी :-बही, पुहुवी ·-पृथ्वी, मउवी :-मृद्धी। एक स्वरे श्वः स्वे ॥२/११४॥ एक स्वर मे वस् और स्व में '3' का आगम हो जाता है । यथा- सुवे। ज्यायामीत् ||२/११५॥ ज्या में 'ई' का आगम हो जाता है । यथा-जीआ। करेणु-वाराणस्योरणोर्व्यत्ययः ॥२/११६॥ करेणु और वाराणसी में 'र' के स्थान पर व्यत्यय हो जाता है । यथा- कणेरु, वाणारसी । 'ण' आलाने लनोः ॥२/११७॥ आलान में 'ल' के स्थान पर 'न' व्यत्यय हो जाता है । यथा- आणाल । अचलपुरे च-लोः ||२/११८ ॥ अचलपुर मे 'च' और 'ल' का व्यत्यय हो जाता है । यथा- अलचपुर।

पात व्रण ५८
महाराष्ट्र ह-रोः ॥२/११९॥
महाराष्ट्र में 'ह' और 'र' का परस्पर व्यत्यय हो जाता है ।
यथा- मरहट्ठ।
हृदे ह-दोः ॥२/१२०॥
हृद
में 'ह' और 'द' का व्यत्यय हो जाता है ।
यथा- दह ।
हरिताले र-लोर्नवा ||२/१२१॥
हरिताल में 'र' और 'ल' का व्यत्यय विकल्प से होता है।
यथा- हलिआर/हरिआल ।
लघुके ल-होः ॥२/१२२॥
लघुक में 'ल' और 'ह' का व्यत्यय विकल्प से होता है ।
यथा-हलुअ/लहुअ।
ललाटे ल-डोः ॥२/१२३॥
ललाट में 'ल' और 'ड' का व्यत्यय हो जाता है ।
यथा- णडाल, णलाड ।
-
ह्ये ह्योः ॥२/१२४॥
ह्य
में 'ह' और 'य' का व्यत्यय हो जाता है ।
यथा-- गुज्झ :-गुव्ह, सज्झ :-सव्ह ।
स्तोक्स्य थोक-थोव-थेवाः ॥२/१२५।।
स्तोक के थोक्क, थोव और थेव आदेश हो जाते हैं ।
दुहितृ-भगिन्यो—आ-बहिण्यौ ॥२/१२६ ।।
दुहित का धूआ और भगिनी का बहिणी विकल्प से होता है ।
यथा- दुहिआ, भइणी ।
वृक्ष-क्षिप्तयो रुक्ख-छूढौ ॥२/१२७ ।।
वृक्ष का रुख और क्षिप्त का छूढ विकल्प से होता है ।

५९ डॉ. उदयचन्द्र जेन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
यथा- वच्छ, खित्त ।
वनिताया विलया ||२/१२८॥
वनिता का विलया विकल्प से होता है ।
यथा- वणिया/विलया ।
गौणस्येषतकूरः ॥२/१२९॥
गौण रूप से स्थित ईषत् का 'कूर' विकल्प से होता है ।
यथा- कूरपिक्का/ईसि ।
स्त्रिया इत्थी ||२/१३० ॥
स्त्री का इत्थी विकल्प से होता है ।
यथा- इत्थी/थी।
धृतेर्दिहिः ॥२/१३१॥
धृति का दिहि विकल्प से होता है ।
यथा- दिहि/धिइ।
मार्जारस्य मजर-वजरौ ||२/१३२॥
मार्जार का मञ्जर और वञ्जर विकल्प से होता है ।
यथा- मज्जार/मञ्जर/वजर ।
वैडूर्यस्य वेरुलिअं ||२/१३३ ।।
वैडूर्य का वेरुलिअ विकल्प से होता है ।
यथा- वेरुलिअ/वेडुज्ज ।
एण्हि एत्ताहे इदानीमः ॥२/१३४॥
इदानीम् का एण्हि और एताहे विकल्प से होता है ।
पक्ष में- इआणि ।
पूर्वस्य पुरिमः ॥२/१३५॥
पूर्व का पुरिम विकल्प से होता है ।
यथा- पुरिम । पक्ष में- पुव्व ।

प्राकृत व्याकरण
त्रस्तस्य हित्थ-तट्ठौ ॥२/१३६॥
त्रस्त का हित्य और तट्ट आदेश विकल्प से होता है ।
पक्ष में- तत्थ ।
बृहस्पती बहोभयः ॥२/१३७ ।।
बृहस्पति के बह का भय विकल्प से होता है ।
यथा- भयप्फई/वहप्फइ ।
मलिनोभय-शुक्ति-छुप्तारब्ध-पदातेर्मइलावह-सिप्पि-छिक्काढत-पाइक्क
॥२/१३८॥
मलिन का मलिण - मइल, उभय का अवह,
सुक्ति का सुत्ति -:सिप्पि, छुप्त का छिक्क -.छुत्त,
आरब्ध का आढत्त -.आरद्ध, पदाति का पाइक्क - पयाई आदेश
होता है ।
दंष्ट्राया दाढा ||२/१३९॥
दंष्ट्रा का दाढा विकल्प से होता है ।
बहिसो बहि-बाहिरौ ||२/१४०॥
बहि का बाहिं और बाहिर आदेश हो जाता है ।
अधसो हेटुं ||२/१४१॥
अधस् का हेट्ट आदेश होता है ।
मातृ-पितुःस्वसुः सिआ-छौ ॥२/१४२ ॥
मातृ या पितृ में स्वस जुडा होने पर स्वस का सिआ और छा
आदेश हो जाता है ।
यथा- माउसिआ, पिउसिआ, माउच्छा, पिउच्छा ।
तिर्यचस्तिरिच्छिः ||२/१४३ ॥
तिर्यच का तिरिच्छि आदेश हो जाता है ।
गृहस्य घरौपतौ ॥२/१४४॥
गृह का घर पति शब्द के न होने पर हो जाता है ।

,
डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
यथा- घर, घरसामी, दायहर ।
शीलाद्यर्थस्येरः ॥२/१४५॥
शील अर्थ मे इर आदेश हो जाता है ।
यथा- हसिर, लज्जिर, जंपिर ।
क्त्वस्तुमत्तूण-तुआणाः ॥२/१४६ ॥
क्त्व का उं, अ, ऊण, तुआण आदेश हो जाते हैं ।
यथा- दट्टुं, भमिअ, घेत्तूण, भेत्तुआण ।
इदमर्थस्य केरः ॥२/१४७॥
इदम् अर्थ के लिए केर आदेश हो जाता है ।
यथा-तुम्हकेर, अम्हकेर ।
पर-राजभ्या क-डिक्कौ च ||२/१४८||
पर+राज में इदम् का क्क, डिक्क - इक्क और केर आदेश हो
जाता है ।
यथा- परक्क •-परकीय, पारकेर :-पारक, राइक्कः-राजकीय ।
युष्मदस्मदोञ-एच्चयः ॥२/१४९॥
युष्मद् और अस्मद् में अञ् का एच्चय आदेश हो जाता है ।
यथा- तुम्हेच्चय, अम्हेच्चय ।
वतेवः ||२/१५० ॥
वत् का 'व्व' हो जाता है ।
यथा- महुरव्व ।
सर्वागादीनस्येकः ॥२/१५१॥
सर्वाङ्ग मे ईन का इक आदेश हो जाता है ।
यथा- सव्वगिअ।
पथो णस्येकट् ॥२/१५२॥
पथ+ण में इक आदेश हो जाता है ।
यथा- पहिअ ।

प्राd व्याकरण ६२
ईयस्यात्मनो णयः ॥२/१५३॥
आत्मन्+ईय का णय आदेश हो जाता है ।
यथा-अप्पणय :-आत्मीय ।
त्वस्य डिमा तणौ वा ||२/१५४॥
त्व के डिमा-इमा और तण आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- पीडिमा/पीणत्तणं, पुप्फिमा/पुप्फत्तण । पक्ष में- पीणतं, पुप्फत्त ।
अनकोठात्तैलस्य डेल्लः ॥२/१५५॥
अकोठ को छोड़कर तैल प्रत्यय युक्त शब्द का डेल्ल - एल्ल
आदेश हो जाता है ।
यथा- सुरहि जलेण कडुएल्लं :-सुरभि जलेन कटुतैलम् ।
यत्तदेतदोतोरित्तिअ एतल्लुक च ||२/१५६ ॥
यत्, तत् और एतत् में इत्तिअ आदेश होता है और एतत् का
लोप हो जाता है ।
यथा- जित्तिअ, तित्तिअ, इत्तिअ ।
इदं किमश्च डेत्तिअ-डेत्तिल-डेदहाः ॥२/१५७॥
इदम्, यत्, तत्, एतत् और किं में एत्तिअ, एत्तिल, एग्रह
आदेश हो जाते हैं ।
यथा- एत्तिअ, जेत्तिअ, केत्तिअ, केत्तिल, केदह ।
कृत्वसो हुत्तं ॥२/१५८॥
कृत्व का हुत्त आदेश हो जाता है ।
यथा- सहस्सहुत्त, सयहत्त, पियहुत्त ।
आल्विल्लोल्लाल-वंत-मन्नेत्तर-मणामतोः ||२/१५९ ॥
मत् के स्थान पर आलु, इल्ल, उल्ल, आल, वंत, मन्त, इत्त,
इर और पण आदेश होते हैं ।
यथा- गेहालु, दयालु, लज्लालुआ, सोहिल्ल, छाइल्ल, जामडल्ल, विआरुलला,
मसुल्ल, सद्दाल, जडाल, फडाल, धणवत, हणुमत, पुण्णमत, कव्वइना, माणना,
गब्बिर, रेहिर, धणमणो ।
.
.

डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
तो दो तसो वा ॥२/१६० ॥
तः का तो और दो विकल्प से होता है ।
यथा- सव्वत्तो, सव्वदो । पक्ष में- सव्वओ ॥ एकत्तो, एकदो । पक्ष में- एगओ ॥
अन्नत्तो, अन्नदो । पक्ष में-- अन्नओ ॥ कत्तो, कदो । पक्ष में- कओ ॥
त्रपो हि-ह-त्थाः ॥२/१६१॥
त्रप के हि, ह और त्थ आदेश होते हैं ।
यथा- जहि, जह, जत्थ, तहि, तह, तत्थ ।
वैकादः सि सिअ इआ ||२/१६२॥
एकदा के दा का सि, सिअं और इआ आदेश विकल्प से होते
AO
यथा- एक्कसि, एक्कसिअ, एक्किआ । पक्ष में- एगया ।
डिल्ल-डुल्लौ भवे ॥२/१६३ ॥
भव अर्थ में डिल्ल - इल्ल, डुल्ल -:उल्ल प्रत्यय होते हैं ।
यथा- गाम्मिल्लिआ, पुरिल्ल, अप्पुल्ल ।
स्वार्थे कश्च वा ॥२/१६४ ॥
स्वार्थ में क
अ, इल्ल और उल्ल प्रत्यय विकल्प से होते
हैं।
यथा- चदअ, उवरिल्ल, मुहुल्ल । पक्ष में- चद, उवरि, मुह ।
ल्लौ नवैकाद्वा ||२/१६५॥
नव और एक मे ल्ल प्रत्यय विकल्प से होता है ।
यथा- नवल्ल/नव, एकल्ल/एक ।
उपरेः सव्याने ॥२/१६६॥
ऊपर का कपडा इस अर्थ में उपरि मे 'ल्ल' प्रत्यय होता है ।
यथा- अवरिल्ल ।
भ्रूवो मया डमया ||२/१६७ ॥
भू
में मया और डमया - अमया आदेश हो जाते हैं ।

प्राकृत व्याकरण ३४
यथा- भुमया, भमया ।
शनै सो डिअम् ॥२/१६८॥
शनै में स्थित 'ऐ' का डिअं - इअं आदेश हो जाता है ।
यथा- सणिअ।
मनाको न वा डयं च ॥२/१६९ ॥
मनाक में विकल्प से डयं -:अयं, इयं आदेश हो जाते है ।
यथा- मणयं, मणियं/मणा ।
मिश्राड्डालिअः ॥२/१७०॥
मिश्र में डालिअ -:आलिअ प्रत्यय विकल्प से होता है ।
यथा- मीसालि/मीसं।
रो दीर्घात् ॥२/१७१॥
दीर्घ मे 'र' प्रत्यय विकल्प से हो जाता है ।
यथा-दीहइ/दीह 1.
त्वादेः सः ॥२/१७२॥
त्व तथा तल आदि का प्रयोग 'स्व' अर्थ में होता है ।
अथा- मउत्त, मउत्तल ।
विद्युतपत्र-पीतान्धाल्लः ॥२/१७३ ॥
विद्युत्, पत्र, पीत और अन्ध में 'ल' प्रत्यय विकल्प से होता
है ।
यथा-विज्जुला, पत्तल, पीवल, अंधल ।
पक्ष में- विज्जु, पत्त, पीव, अंध ।
गोणादयः ॥२/१७४॥
गोण आदि में प्रकृति, प्रत्यय, आगम आदि हो जाते हैं ।
यथा- गो, गोण, गावी, गावीओ।
।
अव्ययम् ॥२/१७५॥

६५
ड. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश लसोदिया
यह अव्यय का अधिकार है ।
तं वाक्योपन्यासे ||२/१७६ ॥
'तं' अव्यय का प्रयोग वाक्य की शोभा के लिए होता है ।
यथा- त वदिद-वीर ।
आम अभ्युपगमे ||२/१७७॥
आम (हॉ) अभ्युगम (स्वीकारार्थ) मे होता है ।
यथा- आम बहला वणोली ।
णवि वैपरीत्ये ||२/१७८॥
विपरीतार्थ मे णवि का प्रयोग होता है ।
यथा- णवि हा वणे ।
पुणरुत्त कृतकरणे ॥२/१७९ ॥
कृतकरण (बार बार करने अर्थ) मे पुणरुत्त का प्रयोग होता
यथा- अइ सप्पइ, पसुलि णीसहेहि अगेहि पुणरुत्तं ।
हन्दि विषाद-विकल्प-पश्चात्ताप-निश्चय-सत्ये ||२/१८० ॥
विषाद, विकल्प, पश्चात्ताप, निश्चय और सत्य अर्थ मे 'हन्दि'
का प्रयोग होता है ।
यथा- हन्दि हुज्ज एत्ताहे । हन्दि चलणे णओ सो ण भाणिओ ।
हन्द च गृहणार्थे ||२/१८१॥
गृहणार्थ मे हद और हदि का प्रयोग होता है ।
यथा- हद/हदि पलोएसु इम ।
मिव पिव विव व्व व विअ इवार्थे वा ॥२/१८२॥
इव (तरह) अर्थ में मिव, पिव, विव, ब्व, व, विअ आदेश होते
है
जेण तेण लक्षणे ॥२/१८३ ॥

Yadव्याकरण
लक्षण अर्थ में जेण एवं तेण आदेश होते हैं ।
यथा- जेण सुज्जो तेण कमलवण ।
णइ चेअ चिअ च्च अवधारणे ||२/१८४॥
अवधारणार्थ (प्रकट होने अर्थ) में णइ, चेअ, चिअ, च्च प्रत्यय
होते हैं ।
बले निर्धारण-निश्चययोः ॥२/१८५॥
निर्धारण और निश्चय अर्थ में बले का प्रयोग होता है ।
यथा- बले सीहो।
किरेर हिर किलार्थे वा ॥२/१८६ ॥
किल (सम्भावना अर्थ) में किर, इर और हिर प्रत्यय विकल्प
से होते हैं ।
यथा- कल्लं किर । तस्स इर । पिअ-वयं सो हिर।
पक्ष में- किल तेण सिविणए भणिआ ।
णवर केवले ॥२/१८७॥
केवल अर्थ में णवर प्रत्यय होता है ।
यथा- णवर पिआई चिअ णिव्वति ।
आनन्तर्ये णवरि ॥२/१८८ ॥
अनन्तर के लिए णवरि का प्रयोग होता है ।
यथा- णवरि अ से रहु-वइणा ।
अलाहि निवारणे ||२/१८९॥
निवारणार्थ में अलाहि का प्रयोग होता है ।
यथा-अलाहि किं वाइएण लेहेण ।
अण णाई नार्थे ॥२/१९०॥
न (नहीं) अर्थ में अण और णाई का प्रयोग होता है ।
यथा- णाई करेमि कोहं।
माई मार्थे ॥२/१९१॥

६७ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश मिसादिया
मा अर्थ में माइं का प्रयोग होता है ।
यथा- माइ कासी माय ।
हद्धी निर्वेदे ||२/१९२॥
निर्वेद अर्थ में हद्धि का प्रयोग होता है ।
वेबे भय-वारण-विषादे ||२/१९३॥
भय, वारण और विषाद में वेव्वे का प्रयोग होता है ।
वेव्व च आमन्त्रणे ॥२/१९४॥
आमन्त्रण में वेव्व और वेव्वे का प्रयोग होता है ।
यथा- वेव्व गोले । वेव्वे गोले ।
मामि हला हले सख्या वा ||२/१९५॥
सखि के आमन्त्रण में मामि, हला और हले का प्रयोग विकल्प
से होता है ।
यथा- मामि सरिसक्खराण वि/हला, हले हयासस्स ।
पक्ष में- सहि एरिसच्वेअ गई।
दे समुखीकरणे च ||२/१९६ ॥
संमुख (उपस्थित) करने अर्थ में 'दे' का प्रयोग होता है ।
यथा- दे पसिअ ताव सुदरि ।
हु दान-पृच्छा निवारणे ॥२/१९७॥
दान, पृच्छा और निवारण अर्थ में 'हुँ' प्रत्यय होता है ।
यथा- हु साहसु । हु निल्लज्ज समोसर ।
हु खु निश्चय-वितर्क-संभावन-विस्मये ||२/१९८॥
निश्चय, वितर्क, संभावना और विस्मय अर्थ में हु, खु का
प्रयोग होता है ।
ऊ गरेक्षेप-विस्मय-सूचने ||२/१९९ ॥
गर्दा, आक्षेप, विस्मय और सूचना अर्थ में 'ऊ' का प्रयोग
होता है ।

प्राri व्याकरण : यथा- ऊ किंमए भणिअं। । थू कुत्सायाम् ॥२/२००॥ कुत्सा (निन्दा) में 'थू' का प्रयोग होता है । यथा- थू निल्लज्जो लोओ। रे अरे संभाषण-रतिकलहे ॥२/२०१॥ संभाषण और रतिकलह में रे, अरे का प्रयोग होता है । यथा- रे ! हिअय मडह-सरिआ । अरे ! रतिकलहे । हरे क्षेपे च ॥२/२०२॥ क्षेप (तिरस्कार) अर्थ में और रतिकलह में 'हरे' का प्रयोग होता है। यथा- हरे णिल्लज्ज । ओ सूचना-पश्चात्तापे ॥२/२०३।। सूचना और पश्चाताप में 'ओ' अव्यय का प्रयोग होता है । यथा- ओ अविणय तत्तिल्ले। अव्वो सूचना-दुःख-सभाषणापराध-विस्मयानन्दादर-भय-खेद-विपाद- पश्चात्तापे ॥२/२०४॥ सूचना, दुःख, संभाषण, अपराध, विस्मय, आनंद, आदर, भय, खेद, विषाद और पश्चाताप अर्थ में 'अव्वो' अव्यय का प्रयोग होता है । यथा- अव्वो दलति हिययं । अइ सभावने ||२/२०५॥ संभावना अर्थ में 'अइ' अव्यय का प्रयोग होता है । यथा- अइ दिअर किं न पच्छसि । वणे निश्चय-विकल्पानुकम्प्ये च ||२/२०६॥ निश्चय, विकल्प, अनुकम्प्य और संभावन अर्थ में 'वणे' अव्यय का प्रयोग होता है ।

६९
डॉ उदयचन्द्र जेन एव डॉ सुश सिसोदिया
यथा- वणे देमि । होइ वणे न होइ । दासो वणे न मुच्चइ ।
मणे विमर्श ॥२/२०७॥
विमर्श अर्थ मे 'मणे' अव्यय का प्रयोग होता है ।
यथा- मणे सूरो।
अम्मो आश्चर्ये ||२/२०८॥
आश्चर्य अर्थ में 'अम्मो' अव्यय का प्रयोग होता है ।
यथा- अम्मो कह पारिज्जइ ।
स्वयमोर्थे अप्पणो न वा ||२/२०९॥
स्वयं अर्थ में 'अप्पणो' विकल्प से होता है ।
यथा- अप्पणो कमल सरा । पक्ष में- सय चेअ मुणसि ।
प्रत्येकमः पाडिक्क पाडिएक्क ॥२/२१० ॥
प्रत्येक का पाडिक्क और पाडिएक्क आदेश हो जाता है ।
उअ पश्य ||२/२११॥
पश्य का 'उअ' होता है ।
यथा- उअ निच्चल-निप्फदा ।
इहरा इतरथा ||२/२१२॥
इतरथा के लिए 'इहरा' का प्रयोग होता है ।
यथा- इहरा नीसामनेहिं ।
एक्कसरिअ झगिति संप्रति ॥२/२१३ ॥
झगिति, संप्रति के लिए 'एक्कसरिअं का प्रयोग होता है ।
मोरउल्ला मुधा ||२/२१४॥
मुधा (व्यर्थ) अर्थ मे 'मोरउल्ला' का प्रयोग होता है ।
दरार्धाल्पे ||२/२१५॥
अर्ध (आधा) तथा ईषत् (अल्प) अर्थ मे 'दर' का प्रयोग होता
है।
यथा-दर-विअसिअ ।

प्राकृत व्याकरण
किणो प्रश्ने ॥२/२१६॥
प्रश्न में 'किणो' अव्यय का प्रयोग होता है ।
यथा- किणो धुवसि?
इजेराः पादपूरणे ॥२/२१७॥
इ, जे और र पादपूरण अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ।
यथा- न उणा इ अच्छीई । अणुकूलं वात्तुं जे । गेण्हइ र कलम-गोवी ।
प्यादयः ॥२/२१८॥
'पि' 'वि' आदि अव्ययों का भी प्रयोग होता है ।

तृतीय पाद
वीप्स्यात् स्यादेर्वीप्स्ये स्वरे मो वा ॥३/१॥
वीप्साअर्थक पद में 'सि' आदि प्रत्यय के स्थान पर विकल्प
से म् () हो जाता है ।
यथा- एकमेक्क, एकमेकेण, अङ्गे अङ्गे, अङ्गमङ्गम्मि । पक्ष में-- एक्ककं ।
अतः से ?ः ॥३/२॥
अकारान्त शब्दो से परे 'सि' (प्रथमा एकवचन के प्रत्यय) का
डो - ओ हो जाता है ।
यथा- जिण+ओ (लुक् १/१०- स्वर से परे स्वर होने पर) जिणो ।
वैतत्तदः ॥३/३॥
एतत् और तत् का विकल्प से 'ओ' हो जाता है ।
यथा- एत्-एस (त का स - तदश्च तः सोऽक्लीबे ३/८६ ) एसो, सो, स ।
जस-शसोलुंक् ॥३/४॥
जस् (प्रथमा बहुवचन के प्रत्यय) एवं शस् (द्वितीया बहुवचन
के प्रत्यय) का लोप हो जाता है । (मूल शब्द जिण, हरि
आदि शब्दों को दीर्घ होने पर जिणा, हरी (पु) माला,
मई
(स्त्री.) रूप बनेंगे।)
अमोऽस्य ॥३/५॥
'अम्' (द्वितीया एकवचन के प्रत्यय) के 'अ' का लोप हो
जाता है।
यथा- जिण+ 'म्' का अनुस्वार होने पर निम्न रूप बनेगे - जिणं, हरि ।
दीर्घान्त शब्दों में ( ) अनुस्वार होने पर (हस्वो मि) दीर्घ का ह्रस्व हो जाता है ।
यथा- माला+= माल, केवली+ = केवलि ।
टा-आमोर्णः ॥३/६॥
टा (तृतीया एकवचन के प्रत्यय), आम् (षष्ठी बहुवचन के
प्रत्यय) का 'ण' हो जाता है ।

आकृत व्याकरण ०२
यथा- जिण+ण ।
* 'ण' होने पर तृतीया एकवचन में शब्द के अन्त्य 'अ' का 'ए' और पष्ठी यवनत
मे शब्द के अन्त्य स्वर का दीर्घ हो जाता है।
यथा- जिणेण (तृ.ए.), हरीण, मालाण (प.बहु.)।
* 'ण' भी हो जाता है । यथा- जिणेणं, जिणाणं, हरीण, मालाण ।
भिसो हि हिं हि ||३/७॥
भिस् (तृतीया बहुवचन के प्रत्यय) के हि, हिं और हि प्रत्यय
हो जाते है ।
यथा- जिण+हि, हिं, हिं।
* हि, हिं, हि प्रत्यय होने पर अकारान्त शब्दों के अन्त्य 'अ' का 'ए' ओर इकारान्त
आदि शब्दो मे दीर्घ हो जाता है ।
यथा- जिण+हि, हिं, हि = जिणेहि, जिणेहिं, जिणेहि ।
हरि+हि, हिँ, हिं = हरीहि, हरीहि, हरीहि ।
माला+हि, हिं, हि = मालाहि, मालाहिँ, मालाहि ।
डसेस्-त्तो-दो-दु-हि-हितो-लुकः ॥३/८॥
डसि (पंचमी एकवचन के प्रत्यय) के तो, दो - ओ, दु - 3,
हि, हितो प्रत्यय होते हैं और इन प्रत्ययों का लोप भी हो
जाता है।
यथा- जिणत्तो, जिणाओ, जिणाउ, जिणाहि, जिणाहितो, जिणा । केवलीओ,
केवलीउ, केवलीहितो । मालत्तो, मालाओ, मालाउ, मालाहितो ।
भ्यसस् त्तो-दो-दु-हि-हितो-सुतो ॥३/९॥
भ्यस् (पंचमी बहुवचन के प्रत्यय) के त्तो, दो - ओ, दु - 3,
हि, हिंतो और सुंतो प्रत्यय होते हैं ।
यथा- जिण+त्तो, ओ, उ, हि, हितो, सुंतो ।
* त्तो आदि के होने पर दीर्घ तथा हि, हितो सुतो प्रत्यय होने पर विकल्प 'ए' भी
हो जाता है।
यथा- जिणत्तो, जिणाओ, जिणाउ, जिणाहि, जिणाहितो, जिणासुनो, जिहि,
जिणेहितो, जिणेसुतो ।

७३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
और शस्
ङसः स्सः ॥३/१०॥
डस् (षष्ठी एकवचन के प्रत्यय) का 'स्स' हो जाता है ।
यथा- जिणस्स, हरिस्स, कैवलिस्स ।
डे म्मि डे: ||३/११॥
ङि (सप्तमी एकवचन के प्रत्यय) के 'ए' और 'म्मि' आदेश हो
जाते है ।
यथा- जिण+ए - जिणे, जिण+म्मि = जिणम्मि ।
जस्-शस्-डसि-त्तो-दो-द्वामि दीर्घः ॥३/१२॥
जस्
के लोप होने पर डसि के प्रत्यय त्तो,
दो ओ, दु -:उ पचमी बहुवचन के प्रत्यय तो, ओ, और
आम् के 'ण' होने पर दीर्घ हो जाता है ।
यथा- जिणत्तो, जिणाओ, जिणाउ, जिणाहि, जिणाहितो, जिणा (पं.ए), जिणत्तो,
जिणाओ, जिणाउ (प. बहु.) जिणाण (प. बहु)
भ्यसि वा ॥३/१३॥
भ्यस् के हि, हितो और सुंतो प्रत्यय होने पर विकल्प से दीर्घ
हो जाता है ।
यथा- जिणाहि, जिणाहितो, जिणासुतो ।
टाण-शस्येत् ||३/१४॥
टा के ण और शस् के लोप होने पर शब्द के अन्य 'अ' का
'ए' हो जाता है ।
यथा- जिणेण (तृ. ए), जिणे (द्वि.बहु.)
भिस्-भ्यस्-सुपि ॥३/१५॥
भिस् के स्थान पर हि, हिं, हि भ्यस् के हि, हितो, सुंतो और
सु (सप्तमी बहुवचन के प्रत्यय) होने पर शब्द के अन्त्य 'अ'
का 'ए' हो जाता है ।
यथा- जिणेहि, जिणेहिँ, जिणेहि (तृ.ए.) जिणेहि, जिणेहितो, जिणेसुतो (पं.बहु.) ।
जिणेसु (स बहु )।

-
प्राकृत व्याकरण
इदुतो दीर्घः ॥३/१६॥
इकारान्त और उकारान्त शब्दों के तृतीया, पंचमी और सप्तमी
में 'हि' आदि प्रत्यय होने पर दीर्घ हो जाता है ।
यथा- हरीहि, हरीहिं, हरीहिं (तृ. बहु.), हरोहि, हरीहितो, हरीसुंता (प बर),
हरीसु (स.बहु.)।
चतुरो वा ||३/१७॥
चतुर - चउ शब्द में विकल्प से दीर्घ होता है ।
यथा- चउहि/चऊहि, चउहितो/चऊहिंतो, चउसु/चऊसु ।
लुप्ते शसि ॥३/१८॥
शस् के लोप होने पर इकारान्त एवं उकारांत शब्दों में दीर्घ हो
जाता है।
यथा- हरी, भाणू।
अक्लीबे सौ ॥३/१९॥
अक्लीब में (पुर्लिग एवं स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा एकवचन में
'सि' प्रत्यय के लोप होने पर) इकारान्त एवं उकारान्त शब्द
दीर्घ हो जाते हैं ।
यथा- हरी (पु.) मई (स्त्री.)
पुंसि जसो डउ डओ वा ॥३/२० ॥
पुर्लिग इकारान्त एवं उकारान्त शब्दों के 'जस्' का डउ - 13
और डओ -अओ प्रत्यय विकल्प से होते हैं ।
यथा- हरउ, हरओ । पक्ष में- हरिणो, हरी । भाणउ, भाणओ । पदा में- भागुण,
भाणू।।
वोतो डवो ||३/२१॥
प्रथमा बहुवचन उकारान्त शब्दों में विकल्प से डवो :-अवो
प्रत्यय हो जाता है ।
यथा- भाणवो । पक्ष में- भाणू ।
जस्-शसोर्णो वा ॥३/२२॥

और शस् का 'णो' ७५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरश सिसोदिया इकारान्त एवं उकारान्त शब्दों में जस् विकल्प से होता है । यथा- हरिणो, भाणुणो, केवलिणो, सव्वण्हुणो । उसि-ङसोः पु-क्लीवे वा ||३/२३॥ इकारान्त एव उकारान्त शब्दों में डसि और डस् का पुर्लिग और नपुंसकलिंग में विकल्प से ‘णो' प्रत्यय होता है । यथा- हरिणो, भाणुणो, केवलिणो, सव्वण्हुणो । पक्ष में- हरिस्स, हरीओ । टो णा ||३/२४॥ टा का 'णा' होता है । यथा- हरिणा, भाणुणा, केवलिणा, सव्वण्हुणा । क्लीबे स्वरान्म् सेः ॥३/२५॥ क्लीब में सि का म् -. (अनुस्वार) हो जाता है । यथा- वणं, दहि, महुँ । जस्-शस्-इ-इं-णयः सप्राग्दीर्घाः ॥३/२६॥ नपुंसकलिंग में जस् एवं शस् का इँ, इं और णि प्रत्यय होते हैं और इन प्रत्ययों के होने पर दीर्घ भी हो जाता है । यथा- वण+ई, इ, णि = वणारे, वणाई, वणाणि । दहि+ई, ई, णि = दही, दहीइ, दहीणि । महुई, इ, णि = महू', महूइ, महूणि । स्त्रियामुदोतौ वा ॥३/२७॥ स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति के बहुवचन में विकल्प से 'उ' और 'ओ' प्रत्यय होते हैं । यथा- मालाउ, मालाओ, धेणूड, धेणूओ, मईड, मईओ, लच्छीउ, लच्छीओ, बहूउ, बहूओ। ईतः से श्चा वा ||३/२८॥ ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा विभक्ति एकवचन में विकल्प से 'आ' आदेश की प्राप्ति होती है । यथा- गौरी -:गोरीआ/गोरीओ। -

कृत व्यापार
-
-
टा-ङस्-डेरदादिदेवा तु उसेः ॥३/२९॥
टा, ङस्, ङि के स्थान पर अ, आ, इ, ए प्रत्यय होते है तथा
डसि मे अ, आ, इ, ए प्रत्यय विकल्प से होते हैं ।
यथा- मालाअ, मालाइ, मालाए । मईअ, मईआ, मईई, मईए । लच्छीअ, लोग,
लच्छीइ, लच्छीए । धेणूअ, घेणूआ, धेणूइ, घेणूए । बहूअ, बहूआ, वहइ, बहूए
(तृतीया से सप्तमी एकवचन तक) । मालत्तो, मालाओ, मालाड, मालाहि, मालाहिता
(पं. ए)।
नात आत् ॥३/३०॥
आकारान्त मे 'आ' नहीं होता है ।
प्रत्यये डीन वा ||३/३१॥
स्त्रीलिंग में डी -ई प्रत्यय विकल्प से होता है ।
यथा- साहणी, कुरुचरी । पक्ष में- साहणा, कुरुचरा ।
अजातेः पुसः ॥३/३२॥
पुर्लिंग से स्त्रीलिंग में परिवर्तन करने के लिए भी जातिवाचक
के अभाव में 'ई' प्रत्यय होता है ।
यथा- भणमाणा -:भणमाणी, कहता - कहती, काला - काली, णीला -:पीली ।
कि-यत्तदोस्यमामि ||३/३३॥
सि, अम्, आम् से रहित क, ज, त में भी 'ई' प्रत्यय
विकल्प से होता है ।
यथा-कीओ, काओ । कीए, काए । कीसु, कासु । जोसु, जासु ।
छाया-हरिद्रयोः ॥३/३४॥
छाया और हरिद्रा में विकल्प से 'ई' प्रत्यय होता है ।
यथा- छाया/छाही, हलद्दी/हलहा ।
स्वस्त्रादेर्डा ||३/३५॥
स्वसृ आदि में डा -:आ प्रत्यय हो जाता है ।
यथा- ससा, णणदा, दुहिआ।
इस्वो मि ॥३/३६॥

ওও
डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुश सिसोदिया
दीर्घान्त शब्दों में 'म्' - () अनुस्वार होने पर इस्व हो
जाता है ।
यथा- णइ, मालं, बहु, लच्छि, केवलि, सव्वण्हु ।
नामन्त्र्यात्सौ मः ॥३/३७॥
आमन्त्रण में सि होने पर म् - () अनुस्वार नहीं होता है।
यथा- हे वण |, हे दहि ।, हे महु
डो दी| वा ||३/३८॥
आमन्त्रण मे विकल्प से डो -:ओ और शब्द के अन्त्य स्वर
का दीर्घ भी हो जाता है ।
यथा- हे देवो !, हे देवा ।, हे देव ।।
ऋतोद्वा ||३/३९॥
ऋकारान्त में 'अ' विकल्प से होता है ।
यथा- पिअ, माअ । पक्ष में- हे पिअर ।, हे माअर ।।
नाम्न्यर वा ॥३/४०॥
नामवाचक शब्दों मे विकल्प से 'अ' का 'अर' हो जाता है ।
यथा- हे पिअर ।, हे माअर । । पक्ष में- हे पिअ !, हे माअ ।।
वाप ए ॥३/४१॥
आकारान्त शब्दो में विकल्प से 'ए' होता है ।
यथा- हे माले ।। पक्ष में- हे माला ।।
ईदूतोईस्वः ||३/४२॥
ईकारान्त और उकारान्त शब्दों के सम्बोधन मे दीर्घ स्वर का
हस्व हो जाता है ।
यथा- हे लच्छि ।, हे बहू ।, हे गामणि ।, हे केवलि 1, हे सव्वण्हु ! ।
क्विपः ॥३/४३॥
क्विप् प्रत्ययान्त गामणी और खलपू शब्द हैं । इनमें ‘णो'
'णा' प्रत्यय होने पर दीर्घ का ह्रस्व हो जाता है ।

भाकृत व्याकरण,
यथा- गामणी+णो, णा 3 गामणिणो, गामणिणा । खलपूणो, णा = खलगो.
खलपुणा ।
:
ऋतामुदस्यमौसु वा ॥३/४४॥
सि, अम् और सु को छोड़कर 'ऋ' के स्थान पर 'उ' विकल्प
से होता है ।
यथा- भत्तू (प्र. द्वि. बहु.)। पक्ष में- भत्तुणो ।
आरः स्यादौ ॥३/४५॥
सि आदि विभक्तियों के होने पर 'ऋ' का 'आर' आदेश हो
जाता है।
यथा- भत्तारो (प्र.ए.) भत्तारा (प्र.बहु.), भत्तार (द्वि. ए) भत्तारे (द्वि. बहु ) । जिण
शब्द की तरह रूप बनेंगे।
आ अरा मातुः ॥३/४६॥
मातृ के 'ऋ' का 'आ' और 'अरा' आदेश हो जाते हैं ।
।
यथा- माआ, माअरा।
नाम्न्यरः ॥३/४७॥
नामवाचक शब्दों में 'ऋ' का 'अर' आदेश हो जाता है ।
यथा- पिअरो (प्र.ए.), पिअरा (प्र. बहु.), पिअर (द्वि.ए) पिअरे (हि बहु.)।
आ सौ न वा ॥३/४८॥
सि में 'ऋ' का 'आ' विकल्प से होता है ।
यथा- पिआ, माआ । पक्ष में-पिअरो, माअरो।
राज्ञः ॥३/४९॥
राजन् के प्रथमा एकवचन में अन्य व्यंजन के लोप होने पर
'आ' हो जाता है ।
यथा- राजन् -:राआ।
जस्-शस्-उसि-सां णो १३/५० ॥
जस्, शस्, डसि और डस् में ‘णो' प्रत्यय विकल्प से होता
है।

- ७९ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया 'णो' प्रत्यय होने से पूर्व राज के 'ज' का 'इ' भी हो जाता है । यथा- राइ+णो = राइणो । पक्ष में- रायाणो । टा णा ॥३/५१॥ टा का 'णा' विकल्प से होता है । यथा- राइणा । पक्ष में- राएण । इर्जस्य णो-णा-डौ ॥३/५२॥ 'णो' (प्र द्वि. बहु , च. ष, पं एकवचन) 'णा' (तृ. ए.) और डि (स.ए) के स्थान पर 'म्मि' होने पर विकल्प से 'ज' का 'इ' हो जाता है । यथा- राइणो । पक्ष में- रायाणो (प्र द्वि बहु., प. ए.), राइणो । पक्ष में- रण्णो, राअस्स (प. ए.), राइणा । पक्ष में- रण्णा, राएण (तृ. ए.), राइम्मि । पक्ष में- राअम्मि (स ए.) । इणममामा ॥३/५३॥ अम् और आम् सहित राज के 'ज' का विकल्प से 'इण' आदेश हो जाता है । यथा- राइणं (द्वि ए), राईण (च. प बहु.) । पक्ष में- राअ (द्वि. ए.), रायाणं (च प. बहु)। ईद्भिस्-भ्यसाम्-सुपि ॥३/५४ ॥ भिस्, भ्यस्, आम् और सु होने पर राज के 'ज' का 'ई' विकल्प से होता है । यथा- राईहि । पक्ष में- रायाणेहि ॥ राईहिंतो । पक्ष में- रायाणेहिंतो ॥ राईसु । पक्ष में- रायाणेसु ॥ आजस्य टा-डसि-उस्सु सणाणोष्यण् ॥३/५५॥ टा के स्थान पर ‘णा' और डसि, डस् के स्थान पर ‘णो' होने से विकल्प से राज के 'आज' का 'अण्' होता है । यथा- राइणा । पक्ष में- रण्णा (तृ.ए.) ॥ रण्णो । पक्ष में- रायस्स (च प. ए )॥ रण्णो । पक्ष में- रायाणाहितो (पं. ए) ॥ पुस्यन आणो राजवच्च ॥३/५६॥

प्राकृत व्याकरण ८० पुर्लिग 'अन्' प्रत्ययांत शब्दों के 'अन्' का 'आण' आदेश राजन् शब्द की तरह विकल्प से होता है । यथा- अप्पाण । पक्ष में- अप्पा । आत्मनष्टो णिआ णइआ ॥३/५७ ॥ आत्मन् शब्द के टा के स्थान पर विकल्प से 'णिआ' और 'णइआ' आदेश हो जाते हैं । यथा- अप्पणिआ, अप्पणइआ । पक्ष में- अप्पाणेण, अप्पाणेण । सर्वनाम शब्द- अतः सर्वादेर्डेजसः ॥३/५८॥ अकारान्त सर्वनाम सर्व आदि शब्दों के जस् का 'ए' हो जाता है । यथा- सव्वे, जे, के, ते । डे: रिसं-म्मि-त्थाः ॥३/५९ ॥ कि का स्सिं, म्मि और त्थ हो जाते हैं । यथा- सव्वस्सिं, सव्वम्मि, सव्वत्थ, । जस्सिं, जम्मि, जत्थ । कस्सिं, कम्मि, कत्थ । तस्सिं, तम्मि, तत्थ । * 'ए' होने पर निम्न रूप भी बनेंगे- सव्वे, जे, के, ते । न वानिदमेतदो हि ॥३/६० ॥ इदम् और एतत् सर्वनाम शब्दों को छोडकर सप्तमी एकवचन में विकल्प से 'हि' प्रत्यय होता है । यथा- सव्वहिं, जहि, कहि, तहिं । पक्ष में- इमस्सिं, इमम्मि, इमत्थ । एअस्सि, एअम्मि, एत्थ । आमो डेसि ॥३/६१॥ आम् का डेसिं - एसिं आदेश विकल्प से होता है । यथा- सव्वेसिं, जेसि, केसिं, तेसि । पक्ष में- सव्वाण, जाण, काण, ताण । कि तद्भ्यां डासः ॥३/६२॥

से परे डस् . ८१ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरा सिसोदिया किं और तत् के स्थान पर डास -.आस आदेश विकल्प से होता है । यथा- कास, तास । पक्ष में- केसि, काण, तेसि, ताण । कि यत्तद्भ्यो उसः ॥३/६३ ॥ किं, यत्, तत् के स्थान पर विकल्प से 'आस' होता है । यथा- कास, जास, तास । पक्ष में- कस्स, जस्स, तस्स । ईद्भ्यः स्सा से ||३/६४॥ क, ज, और त के ईकारात होने पर षष्ठी एकवचन में 'स्सा' और 'से' प्रत्यय विकल्प से होते हैं । यथा- किस्सा/कोसे । जिस्सा/जीसे । तिस्सा/तीसे । पक्ष में- कस्स, जस्स, तस्स। डे [हे डाला इआ काले ॥३/६५॥ कालवाचक शब्दो से परे डि के स्थान पर विकल्प से डाहे - आहे, डाला - आला और इआ आदेश क, ज, त सर्वनाम शब्दों मे हो जाते है । यथा- काहे, काला, कइआ । जाहे, जाला, जइआ । ताहे, ताला, तइआ । पक्ष में- कस्सि, जस्सिं, तस्सि । डसेम्ही ॥३/६६॥ क, ज, त सर्वनाम से परे डसि के स्थान पर 'म्हा' आदेश विकल्प से होता है । यथा- कम्हा, जम्हा, तम्हा । पक्ष में- कत्तो, जत्तो, तत्तो । तदो डोः ॥३/६७॥ त सर्वनाम से परे डसि के स्थान पर डो -:ओ विकल्प से होता है । यथा- तो । पक्ष में- तम्हा, तत्तो । किमो डिणो-डिसौ ॥३/६८॥

प्राकृत व्याकरण ८२
किम् का पंचमी एकवचन में डिणो - इणो और डीस -.ईस
आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- किणो, कीस । पक्ष में - कम्हा ।
इदमेतत्कि-यत्तट्यष्टो डिणा ||३/६९ ॥
इदम्, एतत्, किं, यत्, तत् के तृतीया एकवचन में
डिणा - इणा आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- इमिणा, एइणा, किणा, जिणा, तिणा। पक्ष में- इमेण, एएण, केण, जेण,
तेण ।
2
तदो ण : स्यादौ क्वचित् ॥३/७0 }}
सि आदि के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'त' का 'ण'
होता है ।
यथा- ण (द्वि ए.), णेण (तृ.ए), णेहि (तृ.बहु.)
किमः कस्त्र-तसोश्च ॥३/७१ ॥
त्र और तस् प्रत्ययान्त शब्दों मे किम् का 'क' हो जाता है ।
यथा- को, के, कत्थ । कओ, कत्तो ।
इदमः इमः {{३/७२॥
इदम् का इम आदेश हो जाता है ।
यथा- इमो, इमे, इम, इमे । इमेण, इमेहि, इमस्स, इमाण ।
पुं-स्त्रियोर्नवायमिमिआ सौ ॥३/७३ ।।
पुलिंग और स्त्रीलिंग शब्दों में सि परे होने पर इदम इम
का 'अयं' और 'इमिआ' आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- अय, इमिआ । पक्ष में- इमो (पु), इमा (स्त्री.)
स्सिं-स्सयोरत् ॥३/७४॥
स्सिं और स्स प्रत्यय होने पर इदम --इम का 'अ'
विकल्प से होता है ।
यथा- अस्सिं (स. ए.), अस्स (प.ए.) । पक्ष में- इमम्सि, इमम्म ।

. ८३ डा उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश ससोदिया डेर्मेन हः ||३/७५॥ डि सहित इम के 'म' का 'ह' विकल्प से होता है । यथा- इह । पक्ष में- इमस्सि ! न त्थः ||३/७६॥ सप्तमी एकवचन में इम के 'त्थ' प्रत्यय नहीं होता है । यथा- इमस्सि, इमम्मि, अस्सि । णोम्-शस् टा-भिसि ||३/७७ ॥ अम्, शस्, टा और भिस् होने पर इम का 'ण' विकल्प से होता है । यथा- ण, णे। णेण, णेहि । अमेणम् ||३/७८॥ अम् सहित इम का इण आदेश विकल्प से होता है । यथा- इण । पक्ष में- इम । क्लीबे स्यमेदमिणमो च ॥३/७९ ॥ सि और अम् के स्थान पर नपुंसकलिग मे इणं और इणमो आदेश विकल्प से होते है । यथा- इणं, इणमो । पक्ष में- इम । किमः कि ||३/८०॥ सि और अम् के स्थान पर किम् का किं नपुंसकलिंग में हो जाता है । . यथा- कि कुल तुह । वेद तदेतदो डसाम्भ्याम् से-सिमौ ॥३/८१॥ इम, त, एत, सहित डस्, आम् के स्थान पर क्रमश. से और सि विकल्प से हो जाता है। यथा- से सील । सि गुणा । पक्ष में- इमस्स, तस्स, एअस्स, इमेसिं, तेसिं, एएसि । वैतदो ङसेस्तो-त्ताहे ||३/८२॥

प्रात व्याकरण
८४
डसि के स्थान पर एत के विकल्प से तो और ताहे आदेश हो
जाते है ।
यथा- एत्तो, एताहे । पक्ष में- एआहितो ।
त्थे च तस्य लुक् ॥३/८३॥
त्य (सप्तमी एकवचन का प्रत्यय) त्तो, त्ताहे (पं. ए. का
प्रत्यय) होने पर एत के त का लोप हो जाता है ।
यथा- एत्थ (स.ए.) एतो, एताहे (पं.ए )
एरदीतौ म्मौ वा ॥३/८४ ॥
एत के त का 'म्मि' होने पर विकल्प से 'अय' और 'ईय'
आदेश होते हैं ।
यथा- अयम्मि, ईयम्मि । पक्ष में- एत्थ, एअम्मि ।
वैसेणमिणमो सिना ॥३/८५॥
सि सहित ‘एत' का विकल्प से 'इणं' और 'इणमो' आदेश
होते है ।
यथा- इणं, इणमा । पक्ष में- एस, एमो ।
तदश्च तः सोऽक्लीवे ||३/८६ ॥
पुर्लिंग एव स्त्रीलिंग में 'त' और 'एत' के 'त' का 'स' हो
जाता है ।
यथा- स, एस।
वादसा दस्य होनोर्दाम् ||३/८७ ॥
अदस् :-अद के 'द' का 'ह' विकल्प से होता है, 'म' नहीं
होता है।
यथा- अह वण । पक्ष में- अमू ।
मुः
स्यादौ ॥३/८८॥
सि आदि नाम होने पर 'अद' के 'द' का 'मु' आदेश हो
जाता है ।

८५ डा. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश मोदिया यथा- अमू । म्मावयेऔ वा ॥३/८९॥ 'म्मि' होने पर 'अद' का 'अय' और 'इम' आदेश विकल्प से होता है । यथा- अयम्मि, इअम्मि । पक्ष में- अमुम्मि । तुम्ह सर्वनाम शब्द- युष्मदस्त तु तुव तुह तुम सिना ||३/९० ॥ युम्मद् के सि सहित तं, तुं, तुव, तुह और तुम आदेश होते है। भे तुम्भे तुज्झ, तुम्ह, तुम्हे उरहे जसा ||३/९१॥ युष्मद् के जस् सहित भे, तुब्भे, तुज्झ, तुम्ह, तुम्ह, उयह आदेश होते है । त तु तुम तुव तुह तुमे तुए अमा ||३/९२॥ अम् सहित युष्मद् के त, तुं, तुम, तुव, तुह, तुमे और तुए आदेश होते है । वो तुज्झ तुल्भे तुम्हे उरहे भे शसा ||३/९३ ॥ शस् सहित युष्मद् के वो, तुज्झ, तुन्भे, तुम्हे, उरहे और भे आदेश होते है । भे दि दे ते तइ तए तुम तुमइ तुमए तुमे तुमाइ टा ||३/९४ ॥ टा सहित युष्मद् के भे, दि, दे, ते, तइ, तए, तुम, तुमइ, तुमए, तुमे और तुमाइ आदेश होते है । भे तुब्भेहि उज्झेहि उम्हेहि तुम्हेहि उय्येहि भिसा ||३/९५॥ भिस् सहित युष्मद् के भे, तुब्भेहिं, उज्झेहि, उम्हेहि, तुम्हेहि और उय्येहि आदेश होते है । 'तुझेहि, तुम्भेहि, तुम्हेहि रूप भी बनते हैं। . तइ-तुव-तुम-तुह-तुब्भा ङसौ ॥३/९६॥

प्रा(व्याकरण ८६ ङसि के तो, ओ, उ, हि, हिंतो प्रत्यय होने पर युष्मद् का तइ, तुव, तुम, तुह, तुब्भ आदेश हो जाते हैं । यथा- तइत्तो, तईओ, तईउ, तईहि, तइहितो । तुवत्तो, तुवाओ, तुवाउ, तुवाहि, तुवाहिती । तुमत्तो, तुमाओ, तुमाउ, तुमाहि, तुमाहितो । तुहत्तो, तुहाओ, तुहाउ, तुहाहि, तुहाहितो । तुभत्तो, तुब्भाओ, तुन्भाउ, तुम्भाहि, तुम्भाहिंतो । * तुम्हत्तो, तुज्झत्तो एवं तइ, तुम, तुव, तुह, तुभ रूप भी बनेंगे। तुम्ह तुभ तहितो उसिना ॥३/९७ ॥ ङसि सहित युष्मद् के तुम्ह, तुब्भ और तहिंतो आदेश होते है। तुभ-तुम्होरहोम्हा भ्यसि ॥३/९८ ॥ भ्यस् के होने पर युष्मद् के तुल्भ, तुम्ह, उयह और उम्ह आदेश हो जाते है। यथा- तुब्भत्तो, तुब्भाओ, तुम्भाहि, तुभाउ, तुम्भेहितो, तुर्भसुंतो । तुम्हत्तो, उव्हत्तो, उम्हत्तो के अतिरिक्त तुज्झत्तो रूप भी होंगे। तइ-तु-ते-तुम्ह-तुह-तुह-तुव-तुम-तुमे-तुमो-तुमाइ-दि-दे-इ-ए तुड्भोडभोरहा ङसा ॥३/९९॥ डस् सहित युष्मद् के तइ, तु, ते, तुम्हं, तुह, तुहं, तुव, तुम, तुमे, तुमो, तुमाइ, दि, दे, इ, ए, तुब्भ, उब्भ और उय्ह आदेश होते हैं । * तुज्झ और तुम्ह आदेश भी होते है । तु वो भे तुम्भ तुब्भ तुब्माण तुवाण तुहाण उम्हाण आमा ॥३/१00॥ आम् सहित युष्मद् के तु, वो, भे, तुब्भ, तुभं, तुब्भाण, तुवाण, तुहाण और उम्हाण आदेश होते हैं । अन्य रूप- तुज्झ, तुझं, तुम्ह, तुम्हें, तुभाण, तुज्झाण, तुम्हाण तुवाणं, तुहाण, उम्हाणं । तुमे तुमए तुमाइ तइ तए डिना ||३/१०१॥ ङि सहित युष्मद् के तुमे, तुमए, तुमाइ, तइ, तए आदेश होते तु-तुव-तुम-तुह-तुल्भा डौ ॥३/१०२॥

८७ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया डि - म्मि होने पर युष्मद् के तु, तुव, तुम, तुह और तुब्भ आदेश हो जाते हैं । यथा- तुम्मि, तुवम्मि, तुमम्मि, तुहम्हि, तुभम्मि । अन्य रूप- तुज्झम्मि, तुम्हम्मि । सुपि ॥३/१०३ ॥ सु होने पर युष्मद् के तु, तुव, तुम, तुह, तुब्भ, तुज्झ और तुम्ह आदेश होते हैं । यथा- तुसु, तुसु । तुवसु, तुवसु । तुमसु, तुमसु । तुहसु, तुहसु । तुभसु, तुम्भसु । तुज्झसु, तुज्झसु । तुम्हसु, तुम्हसु । टभो म्ह-ज्झौ वा ||३/१०४॥ 'भ' का 'म्ह' और 'ज्झ' विकल्प से होता है । यथा- तुभ -:तुम्ह/तुज्झ । अम्ह सर्वनाम शब्द- अस्मदो म्मि अम्मि अम्हि ह अहं अहय सिना ||३/१०५॥ सि सहित अस्मद् के म्मि, अम्मि, अम्हि, हं, अह और अहयं आदेश हो जाते है । अम्ह अम्हे अम्हो मो वय भे जसा ||३/१०६॥ जस् सहित अस्मद् के अम्ह, अम्हे, अम्हो, मो, वयं और भे आदेश हो जाते हैं । णे ण मि अम्मि अम्ह मम्ह म मम मिम अह अमा ||३/१०७॥ अम् सहित अस्मद् के णे, णं, मि, अम्मि, अम्ह, मम्ह, ममं, मिम और अहं आदेश हो जाते है । अम्हे अम्हो अम्ह णे शसा ॥३/१०८॥ शस् सहित अस्मद् के अम्हे, अम्हो, अम्ह और णे आदेश हो जाते है । मि मे मम ममए ममाइ मइ मए मयाइ णे टा ||३/१०९॥

. प्राप्त व्याकरण . ८८ टा सहित अस्मद् के मि, मे, ममं, ममए, ममाइ, मइ, मए, मयाइ और णे आदेश हो जाते हैं । अम्हेहि अम्हाहि अम्ह अम्हे णे भिसा ||३/११० ॥ भिस् सहित अस्मद् के अम्हेहि, अम्हाहि, अम्ह, अम्हे और णे आदेश होते है । यथा- अम्हेहिं, अम्हाहिं, अम्ह, अम्हे, णे । मइ-मम-मह-मज्झा ङसौ ॥३/१११॥ डसि के (तो, ओ, उ, हि, हिंतो) प्रत्यय होने पर अस्मद् के मइ, मम, मह, और मज्झ आदेश हो जाते हैं । यथा- मइत्तो, मईओ, मईउ, मईहि, मईहितो । ममत्तो, ममाओ, ममाउ, ममाहि, ममाहितो । महत्तो, महाओ, महाउ, महाहि, महाहितो । मज्झत्तो, मज्झाओ, मज्झाउ, मज्झाहि, मज्झाहिंतो। ममाम्हौ भ्यसि ॥३/११२॥ भ्यस् के (तो, ओ, उ, हि, हितो, सुंतो) प्रत्यय होने पर अस्मद् के मम और अम्ह आदेश हो जाते हैं । यथा- ममत्तो, ममाओ, ममाउ, ममाहि, ममाहितो, ममासुतो । अम्हत्तो, अम्हाओ, अम्हाउ, अम्हाहि, अम्हाहितो, अम्हासुतो। मे मइ मम मह मह मज्झ मज्झ अम्ह अम्हं ङसा ||३/११३॥ ङस् सहित अस्मद् के मे, मइ, मम, मह, महं, मज्झ, मज्झं, अम्ह और अम्हं आदेश हो जाते है । णे णो मज्झ अम्ह अम्ह अम्हे अम्हो अम्हाण ममाण महाण मज्झाण आमा ॥३/११४॥ आम् सहित अस्मद् के णे, णो, मज्झ, अम्ह, अम्हं, अम्हे, अम्हो, अम्हाण, ममाण, महाण और मज्झाण आदेश होते है । अन्य प्रयोग- मज्झं, अम्हाण, ममाणं, महाणं, मज्झाण । मि मइ ममाइ मए मे डिना ||३/११५॥ ङि सहित अस्मद् के मि, मइ, ममाइ, मए और मे आदेश हो जाते है । .

८९ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरश ससोदिया अम्ह-मम-मह-मज्झा डौ ॥३/११६॥ डि के (म्मि) प्रत्यय होने पर अस्मद् के अम्ह, मम, मह और मज्झ आदेश हो जाते है । यथा- अम्हम्मि, ममम्मि, महम्मि, मज्झम्मि । सुपि ॥३/११७॥ सु होने पर अस्मद् के अम्ह, मम, मह और मज्झ आदेश हो जाते हैं । यथा- अम्हसु/अम्हेसु, ममसु/ममेसु, महसु/महेसु, मज्झसु/मज्झेसु । संख्यावाची शब्द- त्रेस्ती तृतीयादौ ॥३/११८॥ तृतीयादि बहुवचन की विभक्तियाँ होने पर 'त्रि' का 'ती' आदेश हो जाता है । यथा- तीहि, तीहि (तृ बहु.) । तीहितो (प.बहु ) तिण्ह (च/प. बहु.) तीसु, तीसु (स.बहु.)। द्वेर्दो वे ॥३/११९॥ द्वि का 'दो' और 'वे' आदेश हो जाते है । यथा- दोहि, वेहि । दोहितो, वेहितो । दोण्ह, वेण्ह । दोसु, वेसु । दुवे दोण्णि वेण्णि च जस्-शसा ||३/१२० ॥ जस् और शस् सहित द्वि के दुवे, दोण्णि, वेण्णि, दो और वे आदेश हो जाते है । त्रेस्तिण्णिः ॥३/१२१॥ 'त्रि' का 'तिण्णि' आदेश (प्रथमा एवं द्वितीया बहुवचन में) हो जाता है। चतुरश्चत्तारो चउरो चत्तारि ||३/१२२॥ जस् एवं शस् सहित चतुर के चत्तारो, चउरो और चत्तारि आदेश हो जाते हैं । ।

.
प्राकृत व्याकरण . ९०
संख्याया आमो ग्रह ण्हं ||३/१२३ ॥
संख्यावाची शब्दो के आम् का एह, ण्हं आदेश हो जाता है ।
यथा- दोण्ह, दोण्हं । तिण्ह, तिण्ह । चउण्ह, चउण्हं । पंचण्ह, पचण्हं । छण्ह,
छह। सत्तह, सत्तण्हं ।
शेषेऽदन्तवत् ॥३/१२४ ॥
शेष सभी शब्दो के रूप अकारान्त के प्रत्यय लगाकर बनाएँ
जा सकते है ।
यथा- गिरिं, गामणिं, खल (प्र.द्वि.ए.), माल (द्वि.ए.), गिरीहि गामणीहि, मालाहि
(तृ.ए.) आदि ।
न दीर्घो णो ||३/१२५॥
'णो' होने पर दीर्घ नहीं होता है और दीर्घ का ह्रस्व हो जाता
है तथा ह्रस्व का इस्व ही रहता है ।
यथा- हरिणो, भाणुणो, गामणिणो, खलपुणो ।
णाणिणो, केवलिणो, सव्वण्हुणो ।
ङसेलृक् ||३/१२६॥
आकारान्त, इकारान्त आदि शब्दों में सि के स्थान पर प्रत्यय
लोप नहीं होता है ।
यथा- हरित्तो, हरीओ, हरीउ, हरीहितो। मालत्तो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो ।
भ्यसश्च हिः ॥३/१२७॥
आकारान्त आदि शब्दों के भ्यस् के स्थान पर होने वाले तो,
ओ, उ, हि, हिन्तो, सुन्तो में से 'हि' प्रत्यय नहीं होगा ।
यथा- मालत्तो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो, मालासुंतो । हरित्तो हरीओ, हरीउ,
हरीहितो, हरीसुतो।
डे डै: ॥३/१२८॥
आकारान्त, इकारान्त आदि में सप्तमी एकवचन में 'ए'
प्रत्यय नहीं होता है ।
यथा- हरिम्मि, गामणिम्मि, भाणुम्मि ।
.

ड. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश ससोदिया एत् ॥३/१२९॥ तृतीया, चतुर्थी, पचमी, षष्ठी एव सप्तमी मे होने वाले आकारान्त शब्दों की तरह 'ए' प्रत्यय नहीं होता है । अपितु इकारान्त आदि मे ह्रस्व स्वर का दीर्घ हो जाता है । यथा-हरीहि (तृ ए), हरीहितो (प बहु ) हरीण (च ,प. बहु.) हरीसु (स.बहु ) । विभक्ति परिवर्तन- द्विवचनस्य बहुवचनम् ||३/१३० ॥ द्विवचन का बहुवचन अर्थात् प्राकृत मे एकवचन और बहुवचन ये दो वचन ही होते है । चतुर्थ्याः षष्ठी ||३/१३१॥ चतुर्थी के स्थान पर षष्ठी विभक्ति होती है । अर्थात् चतुर्थी और षष्ठी के शब्द रुपों में समानता है । यथा- रामस्स फल देइ । जिणस्स उवएसो अस्थि । णमो अरिहताण । तादर्थ्य डे र्वा ||३/१३२॥ तादर्थ्य के योग मे डे-: ए के स्थान पर विकल्प से आय होता है । यथा- देवाय णमो। पक्ष में- देवस्स णमो । वधाड्डाइश्च वा ||३/१३३ ।। वह के स्थान पर डाइ -.आइ, आय प्रत्यय विकल्प से होते हैं । यथा- वहाइ, वहाय । पक्ष में- वहस्स । क्वचिद् द्वितीयादेः ॥३/१३४॥ द्वितीया, तृतीया, पचमी और सप्तमी के स्थान पर कहीं-कहीं पर षष्ठी का प्रयोग हो जाता है । यथा- सीमाधरस्स वंदे :-सीमाधर वदे । धणस्स लद्धो :-धणेण लद्धो । चिरस्स मुत्तो :-चिरेण मुत्तो । चोरस्स बीहइ :-चोरत्तो बोहइ । वध - :

प्रति व्याकरण ९२ द्वितीया-तृतीययोः सप्तमी ||३/१३५।। द्वितीया और तृतीया के स्थान पर कहीं-कहीं पर सप्तमी का प्रयोग भी हो जाता है । यथा- गामे वसामि :-गाम वसामि । णयरे ण जामि :-णयरं ण जामि । तिसु तंसु अलकिआ पुहवी :-तीहि अलकिया पुहवी । पचम्यास्तृतीया च ||३/१३६ ॥ पचमी के स्थान पर तृतीया और सप्तमी का प्रयोग भी होता है। यथा- गामेण आगच्छइ :-गामत्तो/गामाओ आगच्छइ । लहइ अचिरेण अप्पाणं :-लहइ अचिराओ अप्पाणं । अंतेउरे आगच्छइ :- अंतेउराओ आगच्छइ । सप्तम्या द्वितीया ॥३/१३७॥ सप्तमी के स्थान पर द्वितीया विभक्ति भी होती है । यथा- विज्जुज्जोय भरइ रत्ति :-विज्जुज्जोयम्मि भरइ रत्ति । आर्ष में- सप्तमी के स्थान पर तृतीया का प्रयोग होता है । यथा- तेणं कालेण भगवया महावीरेणं पण्णत्तो :- तम्मि कालम्मि भगवया महावीरेण पण्णत्तो। * प्रथमा के स्थान पर भी कहीं-कहीं द्वितीया विभक्ति होती है । यथा- चउवीसं पि जिणवरा । क्यडोर्य लुक् ||३/१३८॥ क्यङ् के 'य' का लोप विकल्प से होता है । यथा- गरुआइ :-गरुआअइ । जो झायइ अप्पाणं :-जो झादि अप्पाणं । क्रिया प्रयोग- त्यादिनामाद्यत्रयस्याद्यस्येचेचौ ॥३/१३९॥ 'ति' आदि आद्य (प्रथम) त्रय के आद्य (प्रथम) वचन के 'इ' और 'ए' प्रत्यय होते हैं । यथा- भणइ, भणए । हसइ, हसए ।

है ९३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरश ल्लादिया द्वितीयस्य सि से ||३/१४० ॥ द्वितीय (मध्यम पुरुष) के एकवचन में 'सि' और 'से' प्रत्यय होते हैं । यथा- भणसि, भणसे । तृतीयस्य मिः ॥३/१४१॥ तृतीय (उत्तम पुरुष) के एकवचन में 'मि' प्रत्यय होता है । यथा- भणमि । (अ का ए होने पर - भणेमि, दीर्घ होने पर - भणामि) बहुष्वाद्यस्य न्ति न्ते इरे ||३/१४२॥ प्रथम पुरुष के बहुवचन में न्ति, न्ते और इरे प्रत्यय होते है। यथा- भणति, भणंते, भणिरे । (अ का ए होने पर भणेति भी होता है ।) मध्यमस्येत्या-हचौ ॥३/१४३॥ मध्यम पुरुष के बहुवचन में इत्था और ह प्रत्यय होते है । यथा- भणित्था, भणह । (अ का ए होने पर भणेत्था, भणेह भी बनेगे ।) तृतीयस्य मो-मु-मा. ॥३/१४४॥ तृतीय (उत्तम पुरुष के बहुवचन) में मो, मु और म प्रत्यय होते है । यथा- भणमो, भणमु, भणम । अ का ए, इ और दीर्घ होने पर- भणेमो, भणेमु, भणेम । भणिमो, भणिमु, भणिम । भणामो, भणामु, भणाम । अत एवैच् से ॥३/१४५॥ अकारान्त क्रियाओ मे (प्रथम पुरुष एकवचन) तथा (मध्यम पुरुष एकवचन) में ही 'ए' 'से' प्रत्यय होते हैं । यथा- भणए । भणसे। दीर्घान्त क्रियाओं में नहीं होता है । यथा-होइ, होसि, णेइ, णेसि । देइ, देसि । 'है' अर्थक क्रिया- - सिनास्तेः सिः ॥३/१४६॥

प्रा व्याकरण ९४ सि (मध्यम पुरुष एकवचन के प्रत्यय) सहित 'अस्ति' का 'सि' आदेश हो जाता है । यथा- तुमं सि = तू है। मि-मो-मै-हि-म्हो-म्हा वा ॥३/१४७ ॥ मि (उ.पु.ए.) मो, म (उ.पु.बहु.) के प्रत्यय सहित 'अस्ति' का म्हि, म्हो और म्ह आदेश विकल्प से हो जाते है । यथा- अह म्हि = मै हूँ। अम्हे म्हो = हम/हम दोनो/हम सब हैं । अम्हे म्ह = हम/हम दोनों/हम सब हैं । पक्ष में- अस्थि । अहं अत्थि = मै हूँ । अम्हे अत्थि = हम/हम दोनो/हम सब हैं । अस्थिस्त्यादिना ॥३/१४८ ॥ 'ति' आदि प्रत्यय सहित अस्ति का अस्थि आदेश हो जाता है। एकवचन बहुवचन - यथा- प्रथम पुरुष अस्थि अत्थि मध्यम पुरुष अत्थि, सि अस्थि उत्तम पुरुष अत्थि, म्हि अस्थि, म्हो, म्ह। प्रेरणार्थक क्रिया- णेरदेदावावे ॥३/१४९॥ णि-प्रेरणार्थक क्रियाओं में अ, ए, आव और आवे आदेश होते हैं । है यथा- सो करइ/कारइ/करावइ/करावेइ । वह करवाता है/वह कराता है । सो भाणइ/भाणेइ/भणावइ/भणावेइ । वह कहलाता है/वह कहलवाता गुर्वादेरविर्वा ||३/१५० ॥ आदि गुरु/दीर्घान्त धातुओ में विकल्प से 'अवि' प्रत्यय होता है। यथा- सो णेयविइ - वह ले जाता है । सो जाणविइ = वह जाना जाता है । सो तोसविइ = वह संतुष्ट कराया जाता है । पक्ष में- जाणेइ, तोसेइ ।

-
९५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश स्मिोदिया
भ्रमेराडो वा ॥३/१५१॥
भ्रम भम में 'आड' आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- सो भमाडइ/भमाडेइ = वह भ्रमण कराया जाता है ।
पक्ष में- भामेइ, भमावइ, भमावेइ ।
लुगावी-क्त-भाव-कर्मसु ||३/१५२॥
प्रेरणार्थक अ, ए, आव और आवे का लोप होने पर आवि
प्रत्यय क्त-अ (भूतकालिक) भाव और कर्मवाच्य में हो जाता
यथा- सो करइ = वह करता है।
कर्मवाच्य- तेण कराविइ = उसके द्वारा कराया जाता है ।
भाववाच्य- सो हसइ (सा वा.) तेण हसाविइ = उससे हँसा जाता है।
अदेल्लुक्यादेरत आः ॥३/१५३ ॥
प्रेरणार्थक में अ और ए की प्राप्ति होने पर आदि अ का आ
हो जाता है ।
यथा- भाणइ, भाणेइ।
मौ वा ॥३/१५४॥
मि (उत्तम पुरुष एकवचन के प्रत्यय) होने पर विकल्प से अ
का आ हो जाता है ।
यथा- भणामि । पक्ष में- भणमि ।
इच्च मो-मु-मे वा ॥३/१५५॥
मो, मु और म (उ पु.बहु) होने पर विकल्प से इ और दीर्घ
आ हो जाता है ।
यथा- भणिमो, भणामो । भणिमु, भणामु । भणिम, भणाम ।
पक्ष में- भणमो । भणमु । भणम ।
क्ते ॥३/१५६॥
क्त-भूतकालिक कृदन्त होने पर अ का इ हो जाता है ।

प्राकृत व्याकरण :९६ यथा- भणिओ । हसिओ । . एच्च क्त्वा-तुम्-तव्य-भविष्यत्सु ॥३/१५७ ॥ क्त्वा का ऊण, तुम् -:उं, तव्य - यव्व और भविष्यत काल में क्रिया के अन्त्य अ का ए और इ हो जाता है । यथा- भणेऊण, भणिऊण । भणिउं, भणेउं । भणियव्वं, भणेयव्व । भणिहिइ, भणेहिइ । वर्तमाना-पञ्चमी-शतृषु वा ॥३/१५८॥ वर्तमानकाल, पंचमी (आज्ञार्थक) शतृ-न्त होने पर विकल्प से अ का ए हो जाता है । यथा- भणेइ, भणेउ, भणेतो। - भणइ, भणउ, भणंतो। । उससे हँसा ज्जा-ज्जे ॥३/१५९॥ ज्जा, ज्ज होने पर अ का ए हो जाता है । यथा- भणेज्जा, भणेज्ज । ईअ-इज्जौ क्यस्स ॥३/१६० ।। क्यड् का ईअ और इज्ज हो जाता है । ईअ और इज्ज ये दोनों प्रत्यय भाववाच्य और कर्मवाच्य बनाने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। यथा- भाववाच्य-सो हसइ (सा.वा.) तेण हसीअइ/हसिज्जइ जाता है। कर्मवाच्य- सो पढइ = वह पढ़ता है । (सा.वा.) तेण पढीअइ/पढिज्जइ = उसके द्वारा पढ़ा जाता है । दृशि-वचेमस-डुच्चं ॥३/१६१ ॥ दृश् में डीस -ईस और वच् में डुच्च - उच्च आदेश कर्मवाच्य और भाववाच्य में हो जाता है । यथा- दीसइ (सा. वा.) तेण दीसइ = उससे देखा जाता है । तेण वुच्चइ = उसके द्वारा कहा जाता है।

ड: उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरश ससोदिया . भूतकाल- सी ही हीअ भूतार्थस्य ||३/१६२।। भूतार्थ के सी, ही और हीअ प्रत्यय हैं । *ये तीनों प्रत्यय दीर्घान्त क्रियाओं में ही लगते है। यथा- कासी, काही, काहीअ । ठासी, ठाही, ठाहीअ । णेसी, णेही, णेहीअ । झासी, झाही, झाहीअ। *तीनो पुरुष के दोनो वचनो में समान रूप चलते हैं । व्यञ्जनादीअः ॥३/१६३ ॥ व्यंजनान्त मे ईअ प्रत्यय होता है । यथा- भणी *तीनों पुरुष, दोनो वचनो मे समान रूप चलते हैं। तेनास्तेरास्यहेसी ॥३/१६४ ॥ अस्ति सहित भूतार्थ मे आसि और अहेसि आदेश हो जाते हैं। यथा सो आसि/अहेसि ते आसि/अहेसि तुम आसि/अर्हसि तुम्हे आसि/अहेसि अह आसि/अहेसि अम्हे आसि/अहेसि ज्जात्सप्तम्या इर्वा ॥३/१६५॥ सप्तमी-विधि अर्थ में ज्ज होने पर ज्ज से आगे विकल्प से इ प्रत्यय हो जाता है । यथा- भणेज्जइ । पक्ष में- भणेज्ज । भविष्यतकाल- भविष्यति हिरादि. ॥३/१६६ ।। भविष्यत्काल में प्रत्यय से पूर्व 'हि' हो जाता है । यथा- भणिहिइ, भणेहिइ, भणिहिए, भणेहिए। भणिहिंति, भणेहिति, भणिहिते, भणेहिते । भणिहिसि, भणेहिसि, भणिहिसे, भणेहिसे । भणिहित्था भणेविस्था,

प्राएत व्याकरण : ९८
भणिहिह, भणेहिह । भणिहिमि, भणेहिमि, भणिहिमो, भणेहिमो, भणिहामि,
भणेहामि । भणिहामो, भणेहामो, भणिस्सं, भणेस्सं । भणिहिमु, भणेहिमु ।
भणिस्सामि, भणेस्सामि । भणिहिम, भणेहिम । भणिहिस्सा, भणिस्सामो,
भणेस्सामो।
मि-मो-मु-मे स्सा हा न वा ॥३/१६७ ।।
मि, मो, मु और म होने पर विकल्प से इन प्रत्ययों से पूर्व
'स्सा' और 'हा' प्रत्यय हो जाते हैं ।
यथा- भणिस्सामि, भणिहामि । भणिस्सामो, भणिहामो । भणिस्सामु, भणिहामु ।
भणिस्साम, भणिहाम ।
मो-मु-माना हिस्सा हित्था ॥३/१६८ ॥
मो, मु, और म के हिस्सा और हित्था आदेश विकल्प से होते
--
यथा- भणिहिस्सा, भणिहित्था । पक्ष में- भणिहिमो ।
मेः स्स ॥३/१६९॥
मि का स्सं विकल्प से होता है ।
यथा- भणिस्सं, भणेस्सं । पक्ष में- भणिहिमि ।
कृ-दो-ह ||३/१७०॥
कृ और दा धातु में मि का विकल्प से 'हं' प्रत्यय होता है ।
यथा- काहं, दाह । पक्ष में- काहिमि, दाहिमि ।
श्रु-गमि-रुदि-विदि-दृशि-मुचि-वचि-छिदि-भिदि-भुजां सोच्छं गच्छं
रोच्छ वेच्छं दच्छं मोच्छ वोच्छं छेच्छं भेच्छ भोच्छ ॥३/१७१॥
श्रु का सोच्छं, गमि का गच्छं, रुदि का रोच्छं, विदि का वेच्छं,
दृशि का दच्छं, मुचि का मोच्छं, वचि का चोच्छं, छिदि का छेच्छं,
भिदि का भेच्छं और भुज का भोच्छं आदि भविष्यत्काल के
उत्तम पुरुष एकवचन में हो जाते हैं ।
सोच्छाइय इजादिषु हि लुक् च वा ॥३/१७२॥
सोच्छ आदि में इ, हि और इन प्रत्ययों का लोप विकल्प से
होता है ।

ड. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश ससोदिया यथा- सोच्छिइ, सोच्छेइ, सोच्छिहिइ, सोच्छेहिइ । पक्ष में- सोच्छ । विधि/आज्ञार्थक- दु सु मु विध्यादिष्वेकस्मिस्त्रयाणाम् ||३/१७३ ॥ विधि अर्थ के प्रथम पुरुषादि के एकवचन में दु - उ, सु और मु प्रत्यय होते है । यथा- भणउ, भणसु, भणमु । अ का ए होने पर- भणेउ, भणेसु, भणेमु । सोर्हिर्वा ॥३/१७४॥ सु का हि प्रत्यय विकल्प से होता है । यथा- भणहि, भणेहि । पक्ष में- भणसु । अत इज्जस्विज्जहीज्जे लुको वा ॥३/१७५॥ अकारान्त क्रियाओ के विधि/आज्ञार्थक के मध्यम पुरुष में इज्जसु, इज्जहि और इज्जे होता है तथा इन प्रत्ययों का विकल्प से लोप होता है । यथा- भणिज्जसु, भणिज्जहि, भणिज्जे, भण । पक्ष में- भणसु । बहुषु न्तु ह मो ||३/१७६॥ विधि/आज्ञार्थक के बहुवचन में न्तु, ह, और मो प्रत्यय होते हैं। यथा- भणतु, भणह, भणमो । अ का ए होने पर- भणेतु, भणेह, भणेमो । वर्तमाना भविष्यन्त्योश्च ज्ज ज्जा वा ॥३/१७७॥ वर्तमान, भविष्यत् और विधि अर्थ में ज्ज, ज्जा प्रत्यय विकल्प से होते हैं । यथा- भणिज्ज, भणिज्जा । भणेज्ज, भणेज्जा । पक्ष में- भणइ (वर्त.) भणिहिइ (भवि), भणउ (विधि.) । * वर्तमान, भविष्यत् और विधि अर्थ के तीनो पुरुषों और दोनों वचनों में भणिज्ज, भणेज्ज, भणिज्जा, भणेज्जा रूप बनेंगे। मध्ये च स्वरान्ताद्वा ||३/१७८॥

प्रति व्याकरण . १००
स्वरान्त धातुओं के मध्य में विकल्प से 'ज्ज' और 'ज्जा'
प्रत्यय होते हैं ।
यथा- होज्जइ, होज्जाइ, होज्ज, होज्जा । पक्ष में- होइ ।
क्रियातिपत्तेः ॥३/१७९॥
क्रियातिपत्ति के स्थान पर विकल्प से 'ज्ज' और 'ज्जा' प्रत्यय
होते हैं ।
यथा- होज्ज, होज्जा । जइ रयणत्तय होज्ज तह मोक्खमग्गो होज्जा ।
पक्ष में- जइ रयणत्तय होइ तह मोक्खमग्गो होइ ।
न्त-माणौ ॥३/१८० ॥
क्रियातिपत्ति में न्त और माण आदेश होते हैं ।
यथा- हसन्त, हसमाण ।
शत्रानशः ॥३/१८१॥
शतृ और आनश् के न्त और माण प्रत्यय होते हैं ।
यथा- वेवन्त, वेवमाण ।
ई च स्त्रियाम् ||३/१८२॥
न्त और माण के स्त्रीलिंग में ई और आ हो जाते है ।
यथा- हसंती, हसमाणी । हसता, हसमाणा ।

चतुर्थ पाद इदितो वा ||४/१॥ यहाँ से धातुओं/क्रियाओं के विकल्प प्रारम्भ होते हैं । कथैर्वज्जर-पज्जरोप्पाल-पिसुण-संघ-बोल्ल-चव-जम्प-सीस- साहाः ||४/२॥ कथ् (कहना) के वज्जर, पज्जर, उप्पाल, पिसुण, सघ, बोल्ल, चव, जम्प, सीस और साह आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- सो वज्जरइ = वह कहता है । दुःखे णिव्वरः ॥४/३॥ दुख कहने अर्थ में णिव्वर आदेश विकल्प से होता है । यथा- सो णिव्वरइ = वह दुःख कहता है । जुगुप्से झुण-दुगुच्छ-दुगुञ्छाः ||४/४॥ जुगुप्सा (घृणा/निंदा करना) के झुण, दुगुच्छ और दुगुञ्छ आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- झुणइ/दुगुच्छइ/ दुगुञ्छइ । बुभुक्षि-वीज्योरिव-वोज्जौ ||४/५॥ बुभुक्ष् (भूख का अनुभव करना) का णीरव और वीज्य (पंखा करना) का वोज्ज आदेश विकल्प से होता है । यथा- णीरवइ, वोज्जइ । पक्ष में- बुहुक्खइ, वीजइ । ध्या-गो-झा-गौ ॥४/६॥ ध्या (ध्यान करना) और गा (गाना) के झा और गा आदेश होते हैं । यथा- सो झाइ = वह ध्यान करना है । सो गाइ = वह गाता है। ज्ञो जाण-मुणौ ॥४/७॥ ज्ञा (जानना) का जाण और मुण आदेश हो जाते हैं ।

प्राकृत व्याकरण.१०२
यथा- जाणइ य बंधमोक्खं । एवं जाणइ गाणी अण्णाणी मुणइ रायमेवादं ।
उदो ध्मो धुमा ||४/८॥
उद् उपसर्ग ध्मा धातु/क्रिया के स्थान पर उद्धम आदेश हो
जाता है ।
यथा- सो उखुमाइ = वह प्रदीप्त करता है, तपाता है।
श्रदो धो दहः ॥४/९॥
श्रत्+धा (श्रद्धान्) का दह आदेश हो जाता है ।
यथा- जीवाइ सद्दहणं।
पिबेः पिज्ज-डल्ल-पट्ट-घोट्टाः ॥४/१० ॥
पिब् (पीना) के पिज्ज, डल्ल, पट्ट और घोट्ट आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- पिज्जइ/डल्लइ/पट्टइ/घोट्टइ । पक्ष में- पिअइ ।
उद्वातेरोरुम्मा वसुआ ॥४/११॥
उत्+वा के स्थान पर विकल्प से ओरुम्मा और वसुआ आदेश
हो जाते हैं ।
यथा- ओरुम्माइ, वसुआइ । पक्ष में- उव्वाइ = हवा करता है।
निद्रातेरोहीरोधौ ॥४/१२॥
निन्द्रा (निद्रा लेना) के स्थान पर विकल्प से ओहीर, उड्य
आदेश होते हैं ।
यथा- ओहीरइ, उड्यइ । पक्ष में- निदाइ-नींद लेता है।
आधेराइग्घः ॥४/१३॥
आनि के स्थान पर विकल्प से आइग्घ आदेश होता है ।
यथा- आइग्घइ । पक्ष में- अग्धाइ = सूंघता है ।
स्नातेरभुत्तः ॥४/१४॥
स्ना के स्थान पर विकल्प से अब्भुत्त आदेश हो जाता है ।
यथा- अभुत्तइ । पक्ष में- हाइ = स्नान करता है।

१०३ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश ल्सोदिया
समः स्त्यः खाः ||४/१५॥
सम्+स्त्य का 'खा' आदेश होता है ।
यथा- सखाइ = घेरता/फैलता है।
स्थष्ठा-थक्क-चिट्ठ-निरप्पाः ॥४/१६ ॥
स्था+तिष्ठ (ठहरना) का ठा, थक्क, चिट्ट और निरप्प आदेश
होते हैं।
यथा- ठाइ, थक्कइ, चिट्ठइ, निरप्पइ ।
उदष्ठ-कुक्कुरौ ॥४/१७ ॥
उत्+स्था के स्थान पर ठ, कुक्कुर आदेश होते हैं ।
यथा- उट्ठइ, उक्कुक्कुरइ = वह उठता है ।
म्लेर्वा-पव्वायौ ॥४/१८॥
म्ल के स्थान पर वा और पव्वाय आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- वाइ, पव्वायइ । पक्ष में- मिलाइ = कुम्हलाता/मुरझाता
निर्मो निम्माण-निम्मवौ ||४/१९॥
निर्+मा (निर्माण करना) के स्थान पर निम्माण और निम्मव
आदेश होते है ।
यथा- निम्माणइ,-निम्मवइ ।
क्षेर्णिज्झरो वा ॥४/२० ॥
क्षि के स्थान पर णिज्झर आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- णिज्झरइ । पक्ष में- झिज्जइ = क्षीण होता है।
छदेणे-dम-नूम-सन्नुम-ढक्कौम्वाल-पव्वालाः ||४/२१ ।।
णिच् पूर्वक छद् के स्थान पर विकल्प से णुम, नूम, सन्नुम,
ढक्क, ओम्वाल, पव्वाल आदेश होते है ।
यथा- गुमइ, नूमइ, सन्नुमइ, ढक्कइ, ओम्वालइ, पव्वालइ ।
पक्ष में- छायइ = आच्छादित करता है।
निविपत्योर्णि होडः ॥४/२२॥
है

ung प्याकरण १०४
नि+पत् के स्थान पर प्रेरणार्थक में णिहोड आदेश विकल्प से
होता है ।
यथा- णिहोडइ । पक्ष में- णिवारेइ, पाडेइ = वह रूकवाता/गिराता है ।
दूडो दूमः ॥४/२३॥
दूङ् के स्थान पर दूम आदेश होता है ।
यथा- दूमेइ = पीडा पहुंचाता है ।
धवले र्दुमः ॥४/२४॥
धवल के स्थान पर विकल्प से दुम आदेश होता है ।
यथा- दुमइ । पक्ष में- धवलइ = सफेद कराता है/प्रकाशमान कराता है ।
तुलेरोहामः ॥४/२५॥
तुल के स्थान पर विकल्प से ओहाम आदेश होता है ।
यथा- ओहामइ । पक्ष में- तुलइ = तोल कराता है।
विरिचेरोलुण्डोल्लुण्ड-पल्हत्याः ॥४/२६॥
विरेच् के स्थान पर ओलुण्ड, उल्लुण्ड और पल्हत्य आदेश
विकल्प से होते है ।
यथा- ओलुण्डइ, उल्लुण्डइ, पल्हत्थइ । पक्ष में- विरेअइ - विरेचन कराता है।
झराता है/टपकाता है।
तडेराहोड-विहोडौ ॥४/२७॥
तड् के स्थान पर आहोड और विहोड आदेश विकल्प से होते
यथा- आहोडइ, विहोडइ । पक्ष में- ताडेइ = मार-पीट कराता/ताडना कराता है ।
मिश्रेर्वीसाल-मेलवौ ॥४/२८॥
मिथ् के स्थान पर वीसाल और मेलव आदेश विकल्प से होते
हैं ।
यथा- वीसालइ, मेलवइ । पक्ष में- मिस्सइ - मिलाप/मेल कराता है ।
उर्दूलेर्गुण्ठः ॥४/२९॥
-
,

१०५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
उत्+धूल के स्थान पर गुण्ठ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- गुण्ठइ । पक्ष में- उद्धलेइ = व्याप्त/आच्छादित कराता है।
भ्रमेस्तालिअण्ट-तमाडौ ॥४/३० ॥
भ्रम् के तालिअण्ट और तमाड आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- तालिअण्टइ, तमाडइ । पक्ष में- भामेइ, भमाडेइ, भमावेइ = घुमाता/चक्कर
कटवाता है।
नशेर्विउड-नासव-हारव-विप्पगाल-पलावाः ॥४/३१॥
नश् का विउड, नासव, हारव, विप्पगाल और पलाव आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- विउडइ, नासवइ, हारवइ, विप्पगालइ, पलावइ । पक्ष में- नासइ = नाश
कराता है।
दृशेर्दाव-दस-दक्खवाः ॥४/३२॥
दृश् के दाव, दंस और दक्खव आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- दावइ, दसइ, दक्खवइ । पक्ष में- दरिसइ = दिखलाता/प्रदर्शित कराता है।
उद्घटेरुग्गः ॥४/३३॥
उत्+घट का उग्ग आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- उग्गइ । पक्ष में उग्घाडइ = प्रारम्भ/खुला कराता है ।
स्पृहःसिहः ॥४/३४॥
स्पृह का सिह आदेश होता है ।
यथा- सिहइ = इच्छा/चाह कराता
सभावेरासंघः ॥४/३५॥
संभाव के स्थान पर आसंघ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- आसघइ । पक्ष में- संभावइ = सभावना कराता है ।
उन्नमेरुत्थंघोल्लाल-गुलुगु छोप्पेलाः ॥४/३६॥
उत्+नम् के उत्थंघ, उल्लाल, गुलुगुञ्छ और उप्पेल आदेश
विकल्प से होते है ।
।

पाकृत व्याकरण.१०६
यथा-उत्थंघइ, उल्लालइ, गुलुगुञ्छइ, उप्पेलइ ।
पक्ष में- उन्नामइ = ऊपर उठाता है।
प्रस्थापेः पट्टव-पैण्डवौ ॥४/३७॥
प्रस्थाप् के पट्टव और पेण्डव आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- पट्ठवइ, पेण्डवइ । पक्ष में- पट्ठावइ = स्थापित करवाता है ।
विज्ञपेर्वोक्काबुक्की ॥४/३८॥
विज्ञप् के वोक्क और अवुक्क आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- वोक्कइ, अवुक्कइ । पक्ष में- विण्णवइ = ज्ञान/विनति करवाता है ।
अर्परल्लिव-चच्चुप्प-पणामाः ॥४/३९॥
अर्प के अल्लिव, चच्चुप्प, पणाम आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- अल्लिवइ, चच्चुप्पइ, पणामइ । पक्ष में- अप्पेइ = वह अर्पण करवाता है।
यापेर्जवः ॥४/४०॥
याप् का जव विकल्प से होता है ।
यथा- जवइ । पक्ष में- जावेइ = गमन करवाता है ।
प्लावरोम्वाल-पव्वालौ ॥४/४१॥
प्लाव के ओम्वाल और पव्वाल आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- ओम्वालइ, पव्वालइ । पक्ष में- पावे - तरवाता/भिगवाता है ।
विकोशेः पक्खोड: ॥४/४२।।
विकोश का पक्खोड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- पक्खोडइ । पक्ष में- विकोसइ ।
रोमन्थेरोग्गाल-वग्गोलौ ॥४/४३ ॥
रोमन्थ के ओग्गाल और वग्गोल आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- ओग्गालइ, वग्गोलइ । पक्ष में- रोमन्थइ-पगुराता है ।
कमेर्णिहुवः ॥४/४४॥
कम् का णिहुव विकल्प से होता है ।

१०७ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश नसोदिया
यथा- णिहुवइ । पक्ष में- कामेइ = इच्छा कराता है ।
प्रकाशेणुव्वः ॥४/४५॥
प्रकाश का णुव्व विकल्प से होता है ।
यथा- णुव्वइ । पक्ष में- पयासेइ = प्रकाश करवाता है ।
कम्पेर्विच्छोलः ||४/४६॥
कम्प् का विच्छोल विकल्प से होता है ।
यथा-विच्छोलइ/कम्पेइ % कंपाता है ।
आरोपेर्वलः ॥४/४७॥
आरोप का वल विकल्प से होता है ।
यथा- वलइ/आरोवइ = चढवाता है ।
दोलेरखोलः ॥४/४८॥
दुल् का रखोल विकल्प से होता है ।
यथा- रखोलइ/दोलइ = झुलाता है ।
रम्जेरावः ॥४/४९॥
रज का राव विकल्प से होता है ।
यथा- रावेइ/रजेइ = रंग लगाता है ।
घटेः परिवाडः ।।४/५०॥
घट का परिवाड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- परिवाडेइ । पक्ष में- घडेइ = निर्माण करवाता/रचवाता है ।
वेष्टे: परिआलः ॥४/५१॥
वेष्ट् का परिआल विकल्प से होता है ।
यथा- परिआलेइ/वेढेइ = लपेटता है।
क्रियः किणो वेस्तुक्के च ॥४/५२ ।।
क्री का किण, वि+की का विक्के हो जाता है ।
यथा- किणइ, विक्केइ, विक्किणइ = खरीदता है ।

प्राप्त व्याकरण १०८
भियो भा-बीहौ ॥४/५३॥
भी का भा और बीह होता है ।
यथा- भाइ/बीहइ = डरता है।
आलीडोल्ली ||४/५४॥
आ+ली का अल्ली हो जाता है ।
यथा-अल्लीयइ-प्रवेश करता है/आता है/आलिंगन करता है।
निलीडोर्णिलीअ-णिलुक्क-णिरिग्घ-लुक्क-लिक्क-ल्हिक्काः ॥४/५५ ।।
नि+ली का णिलीअ, णिलुक्क, णिरिग्घ, लुक्क, लिक्क और
ल्हिक्क आदेश विकल्प से होते है ।
यथा- णिलिअइ, णिलुक्कइ, णिरिग्घइ, लुक्कइ, लिक्कइ, ल्हिक्कइ ।
पक्ष में- णिलिज्जइ = मिलाप करता है ।
विलीडेर्विरा ||४/५६॥
वि+ली का विरा विकल्प से होता है ।
यथा-विराइ/विलिज्जइ = नष्ट होता है
रुतेरुज-रुण्टौ ॥४/५७॥
रु के रुञ्ज और रुण्ट विकल्प से होते हैं ।
यथा- रुञ्जइ, रुण्टइ/रवइ = शब्द करता है।
श्रुटेर्हण: ॥४/५८॥
श्रु का हण विकल्प से होता है ।
यथा- हण/सुणइ = सुनता है ।
धूगेर्भुवः ॥४/५९॥
धू का धुव विकल्प से होता है ।
यथा- धुवइ/धुणइ = हिलाता है।
भुवेझै-हुव-हवाः ॥४/६० ॥
भू के हो, हुव, हव विकल्प से होते हैं ।
यथा- होइ, हुवइ, हवइ/भवइ = होता है ।

१०९ डा उदयचन्द्र जैन. एव डॉ. सुरेश समांदिया
अविति हुः ॥४/६१॥
वि के अभाव में भू का हु विकल्प से होता है ।
यथा- हुति । पक्ष में- होइ ।
पृथक्-स्पष्टे णिव्वडः ॥४/६२॥
पृथक् और स्पष्ट अर्थ में भू का णिव्वड आदेश होता है ।
यथा- णिव्वडइ।
प्रभौ हुप्पो वा ||४/६३ ॥
प्र+भू का हुप्प आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- पहुप्पइ/पभवेइ = शक्ति सम्पन्न होता है।
क्ते हूः ॥४/६४॥
क्त+भू का हू होता है ।
यथा- हूअ हुआ ।
कृगेः कुणः ॥४/६५॥
कृ का कुण आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- कुणइ/ करइ = करता है ।
काणेक्षिते णिआरः ||४/६६॥
कानी नजर से देखने में कृ का णिआर आदेश विकल्प से
होता है ।
यथा- णिआरइ । पक्ष में- काणिक्खअ करइ = कानी दृष्टि से देखता है ।
निष्टम्भावष्टम्भे णिठुह-संदाण ॥४/६७॥
निश्चेष्ट करने अर्थ में कृ+निष्टम्भ के णिटुह, संदाण आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- णिठुहइ, सदाणइ/णिट्ठभेइ ।
श्रमे वावम्फः ॥४/६८॥
श्रम+कृ का वावम्फ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- वावम्फइ । पक्ष में- सम कुणेइ = परिश्रम/उद्योग करता है ।

प्राकृत व्याकरण ११०
मन्युनौष्ठमालिन्ये णिव्वोलः ॥४/६९॥
क्रोध के कारण ओठ मलिन करने अर्थ में कृ का णिव्योल
आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- णिव्वोलइ/ मण्णुणा ओहं मलिणेइ ।
शैथिल्ये लम्बने पयल्लः ||४/७० ॥
शैथिल्य = लम्बन (लटकने) अर्थ में कृ का पयल्ल आदेश
विकल्प से होता है ।
यथा- पयल्लइ, लम्बेइ/सिढिलइ ।
निष्पाताच्छोटे णीलुञ्छः ॥४/७१ ॥
निष्पतन (गिरने), आच्छोटन (कूदने) अर्थ में णीलुञ्छ आदेश
विकल्प से होता है ।
यथा- णोलुञ्छइ-= गिरता/कूदता है । पक्ष में- णिप्पडइ = गिरता है ।
ओच्छोडइ = कूदता है।
क्षुरे कम्मः ||४/७२ ॥
क्षुर (हजामद करने) अर्थ में विकल्प से कम्म आदेश होता
है।
यथा- कम्मइ खुर कुणइ = हजामत बनाता है ।
चाटौ गुललः ॥४/७३ ॥
चाटु का गुलल आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- गुललइ/चाडू करइ ।
स्मरे-झर-झूल-भर-भल-लढ-विम्हर-सुमर-पयर-पम्हुहाः ॥४/७४॥
स्मर (स्मरण करना) के झर, झूर, भर, भल, लढ, विम्हर,
सुमर, पयर और पम्हुह आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- झरइ, झूरइ, भरइ, भलइ, लढइ, विम्हरइ, सुमरइ, पयरइ, पम्हुहड ।
पक्ष में- सरइ ।
विस्मुः पम्हुस-विम्हर-वीसराः ॥४/७५ ॥
विस्मर् (भूल जाना) के पम्हुस, विम्हर और वीसर आदेश होते
..

१११ डा. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश ससोदिया
हैं ।
यथा- पम्हुसइ, विम्हरइ, वीसरइ । पक्ष में- सो समय/अप्पं पन्हुसइ ।
व्याहृगेः कोक्क-पोक्कौ ॥४/७६ ॥
व्याह के कोक्क और पोक्क आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- कोक्कइ/कुक्कइ, पोक्कइ = वह बुलाता है/आह्वान करता है ।
पक्ष में- वाहरइ ।
प्रसरेः पयल्लोवेल्लौ ||४/७७॥
प्रसर-प्र+सृ (पसरना/फैलना) के पयल्ल और उवेल्ल आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- पयल्लइ, उवेल्लइ । पक्ष में- पसरइ ।
महमहो गन्धे ||४/७८॥
गन्ध अर्थ मे महमह आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- महमहइ।
णिस्सरेणीहर-नील-धाड-वरहाडा ||४/७९॥
निस्+स-निस्सर् के णीहर, नील, धाड और वरहाड आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- णीहरइ, नीलइ, धाडइ, वरहाडइ । पक्ष में- णिस्सरइ/णीसरइ = बाहिर
निकलता है।
जाग्रेजग्ग. ||४/८०॥
जागृ का जग्ग आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- जग्गइ/जागरइ ।
व्याप्रेराअड्ड ||४/८१॥
व्या+पृ का आअड्ड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- आअड्डइ/वावरेइ ।
सवृगेः साहर-साहट्टौ ॥४/८२॥
स+वृ के साहर और साहट्ट आदेश विकल्प से होते हैं ।
:

प्राप्त व्याकरण:११२
यथा- साहरइ, साहट्टइ । पक्ष में- संवरइ = संवरण करता/समेटता है।
आदृडेः सन्नामः ||४/८३॥
आ+दृ का सन्नाम आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- सन्नामइ/आदरई ।
प्रहगेः सारः ॥४/८४॥
प्र+ह का सार आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- सारइ/पहरइ = प्रहार करता है।
अवतरे रोह-ओरसौ ॥४/८५॥
अव+तृ-अवतर् का ओह और ओरस आदेश विकल्प से होता
है।
यथा- ओहइ, ओरसइ । पक्ष में- ओअरइ = उतरता है।
शकेश्चय-तर-तीर-पाराः ॥४/८६ ।।
शक् (समर्थ होना) के चय, तर, तीर और पार आदेश विकल्प
से होते हैं ।
यथा- चयइ, तरइ, तीरइ, पारइ । पक्ष में- सक्कई = समर्थ होता है।
फक्कस्थक्कः ॥४/८७॥
फक्क का थक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- थक्कइ/फक्कई = नीचे जाता है।
श्लाघः सलहः ||४/८८॥
श्लाघ् का सलह आदेश होता है ।
यथा- सलहइ = प्रशंसा करता है।
खचेर्वेअडः ॥४/८९॥
खच् (जड़ता/जमाता) का वेअड आदेश विकल्प से होता है।
यथा- वेअडइ । पक्ष में- खचइ = वह जड़ता/जमाता है ।
पचेः सोल्ल-पउलौ ॥४/९० ॥
पच् के सोल्ल और पउल आदेश विकल्प से होते है ।

११३ • डा. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
यथा- सोल्लइ, पउलइ । पक्ष में- पचइ = वह पकाता है।
मुचेश्छड्डावहेड-मेल्लोस्सिक्क-रेअवणिल्लुञ्छ-धंसाडाः ॥४/९१॥
मुच के छड्ड, अवहेड, मेल्ल, उस्सिक्क, रेअव, णिल्लुञ्छ और
धंसाड आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- छड्डइ, अवहेडइ, मेल्लइ, उस्सिक्कइ, रेअवइ, णिल्लुन्छइ, धंसाडइ ।
पक्ष में- मुअइ = छोड़ता है ।
दुःखे णिव्वलः ॥४/९२॥
दुःख अर्थ में मुच् का णिव्वल आदेश विकल्प से होता है।
यथा- णिव्वलेइ । पक्ष में- दुहं मुंचइ = दुःख को छोडता है ।
वञ्चेर्वेहव-वेलव-जूरवोमच्छाः ॥४/९३ ॥
वञ्च् के वेहव, वेलव, जूव और उमच्छ आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- वेहवइ, वेलवइ, जूरवइ, उमच्छइ/वञ्चइ = ठगता है ।
रचेरुग्गावह-विडविड्डाः -॥४/९४॥
रच् के उग्गह, अवह, विडविड्ड आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- उग्गहइ, अवहइ, विडविड्डइ ।
पक्ष में- रयइ = निर्माण करता/बनाता है।
समारचेरुवहत्य-सारव-समार-केलायाः ||४/९५॥
समारच्
के
उवहत्थ, सारव, समार और केलाय आदेश विकल्प
से होते हैं ।
यथा- उवहत्थइ, सारवइ, समारइ, केलायइ ।
पक्ष में- समायरइ = रचता/वनाता है।
सिचेः सिञ्च-सिम्पौ ॥४/९६॥
सिच् के सिञ्च और सिम्प आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- सिञ्चइ, सिम्पइ । पक्ष में--सेअइ = सींचता है ।
प्रच्छः पुच्छः ॥४/९७॥
--

प्रा व्याकरण ११४
प्रच्छ् का पुच्छ आदेश हो जाता है ।
यथा- पुच्छइ = पूंछता है।
गर्जेवुक्कः ॥४/९८॥
गर्छ का वुक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- वुक्कइ/गज्जइ = गरजता है।
वृषे ढिक्कः ||४/९९॥
वृष (गरजते) अर्थ में ढिक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- ढिक्कइ । पक्ष में- उसहो गज्जइ/ढिक्कइ = बैल गर्जता है ।
राजेरग्घ-छज्ज-सह-रीर-रेहाः ॥४/१00 ।।
राज् अग्घ, छज्ज, सह, रीर और रेह आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- अग्घइ, छज्जइ, सहइ, रीरइ, रेहइ । पक्ष में- रायइ = चमकता है
मस्जेराउड्डु-णिउडु-वुड्ड-खुप्पाः ॥४/१०१॥
मस्ज् के आउड्ड, णिउड्ड, वुड्ड और खुप्प आदेश विकल्प से होते
हैं
यथा- आउड्डइ, णिउड्डइ, वुइ, खुप्पइ ।
पक्ष में- मज्जइ = मञ्जन करता/डूवता/स्नान करता है ।
पुजेरारोल-वमालौ ॥४/१०२॥
पुञ्ज के आरोल और वमाल आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- आरोलइ, वमालइ । पक्ष में- पुञ्जइ = एकत्र करता/इकट्ठा करता है ।
लरजेर्जीहः ॥४/१०३॥
लस्ज् का जीह आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- जीहइ/लज्जइ = लज्जा करता है।
तिजेरोसुक्कः ॥४/१०४॥
तिज् का ओसुक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- ओसुकइ । पक्ष में- तंअइ = तीक्ष्ण करता/तेज करता है।

.. . ११५ ड. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरश् सिसोदिया मृजेरुग्घुस-लुञ्छ-पुंछ-पुंस-फुस-पुस-लुह-हुल-रोसाणाः ॥४/१०५॥ मृज् के उग्घुस, लुञ्छ, पुंछ, पुस, फुस, पुस, लुह, हुल और रोसाण आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- उग्घुसइ, लुञ्छइ, पुंछइ, पुसइ, फुसइ, पुसइ, लुहइ, हुलइ, रोसाणइ । पक्ष में- मज्जइ = मार्जन करता/शुद्ध करता/प्रक्षाल करता है । भजेर्वेमय-मुसुमूर-मूर-सूर-सूड-विर-पविरज-करञ्ज-नीरजाः ||४/१०६॥ भञ्ज् के वेमय, मुसुमूर, मूर, सूर, सूड, विर, पविरञ्ज, करञ्ज और नीरज आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- वेमयइ, मुसुमूरइ, मूरइ, सूरइ, सूडइ, विरइ, पविरञ्जइ, करजइ, नीरजइ । पक्ष में- भञ्जइ = तोडता है। अणुव्रजेः पडिअग्गः ॥४/१०७॥ अनुव्रज का पडिअग्ग आदेश विकल्प से होता है । यथा- पडिअग्गइ । पक्ष में- अणुवञ्चइ = वह अनुसरण करता है/पीछे जाता है । अर्जेविंढवः ॥४/१०८॥ अर्ज का विढव आदेश विकल्प से होता है । यथा- विढवइ/अज्जइ = कमाता है । युजो जुञ्ज-जुज्ज-जुप्पाः ॥४/१०९॥ युज् के जुञ्ज, जुज्ज और जुप्प आदेश विकल्प से होते है । यथा- जुञ्जइ, जुज्जइ, जुप्पइ । पक्ष में- जुजइ = जोड़ता/युक्त करता है । भुजो भुज-जिम-जेम-कम्माण्ह-चमढ-समाण-चड्डाः ॥४/११० ॥ भुज् के भुञ्ज, जिम, जेम, कम्म, अण्ह, चमढ, समाण और चड्ड आदेश हो जाते हैं । यथा- भुञ्जइ, जिमइ, जेमइ, कम्मेइ, अण्हइ, चमढइ, समाणइ, चड्डइ = भोजन करता है। वोपेन कम्मवः ॥४/१११॥ उप+भुज् का कम्मव आदेश विकल्प से होता है ।

५. पृत व्याकरण. १६९
यथा- कम्मवइ । पक्ष में- उवहुज्जइ = वह उपभोग करता है।
घटे गढः ॥४/११२॥
घट का गढ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- गढइ/घडइ = बनाता है।
समो गलः ॥४/११३॥
सं+घट का गल आदेश विकल्प से होता है ।
- यथा- संगलइ/संघडइ = मिलाता है।
हासेन स्फुटेर्मुरः ॥४/११४॥
हास के कारण स्फुट का मुर विकल्प से होता है ।
यथा- मुरइ/हासेण फुट्टइ।
मण्डोश्चिञ्च-चिञ्चअ-चिञ्चिल्ल-रीड-टिविडिक्काः ॥४/११५॥
मण्डय के चिञ्च, चिञ्चअ, चिञ्चिल्ल, रीड और टिविडिक्क
आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- चिञ्चइ, चिञ्चअइ, चिञ्चिल्लइ, रीडइ, टिविडिक्कइ ।
पक्ष में- मण्डइ = मंडित/शोभा युक्त करता है।
तुडस्तोड-तुट्ट-खुट्ट-खुडोक्खुडोल्लुक्क-णिलुक्क-लुक्कोल्लूराः
||४/११६॥
तुड् के तोड, तुट्ट, खुट्ट, खुड, उक्खुड, उल्लुक्क, णिलुक्क,
लुक्क, उल्लूर आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- तोडइ, तुट्टइ, खुट्टइ, खुडइ, उक्खुडइ, उल्लुक्कइ, णिलुक्कइ, लुक्कइ,
उल्लूरइ । पक्ष में- तुडइ = तोड़ता है।
घूर्णो घुल-घोल-घुम्म-पहल्लाः ॥४/११७॥
घूर्ण के घुल, घोल, घुम्म और पहल्ल आदेश होते हैं ।
यथा- घुलइ, घोलइ, घुम्मइ, पहल्लइ : घूलता/घोलता/घुमता/हिलता है ।
विवृतेदसः ॥४/११८॥
विवृत् का ढंस आदेश विकल्प से होता है ।

११७ ड. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरस सिसोदिया यथा- ढंसई विवट्टइ = धसता है । क्वथेरट्टः ॥४/११९॥ क्वय् का अट्ट आदेश विकल्प से होता है । यथा- अट्ट/कढइ = उवालता है। -- ग्रन्थेगण्ठः ॥४/१२० ॥ ग्रन्थ का गण्ठ विकल्प से होता है । यथा- गण्ठइ/गंथइ = रचता/गूंथता है । मन्थेघुसल-विरोलौ ॥४/१२१॥ मंथ का घुसल और विरोल आदेश विकल्प- से होते हैं । यथा- घुसलइ, विरोलइ । पक्ष में- मंथइ :- मथता/विलोलता है। हलादेरवअच्छः ॥४/१२२॥ हलाद् का अवअच्छ आदेश हो जाता है । यथा- अवअच्छइ = खुश होता है । नेः सदोमज्जः ॥४/१२३॥ नि+सद् का णुमज्ज आदेश हो जाता है. यथा- णुमज्जइ = बैठता है। छिदेर्दुहाव-णिच्छल्ल-णिज्झोड-णिव्वर-णिल्लूर-लूराः ॥४/१२४ ॥ छिद् के दुहाव, णिच्छल्ल, णिज्झोड, णिवर, पिल्लूर और लूर आदेश विकल्प से होते हैं | यथा- दुहावइ, णिच्छल्लइ, णिज्झोडइ, णिव्वरइ, णिल्लूरइ, लूरइ । पक्ष में- छिंदइ% छेदता है । आङा ओ अन्दोद्दालौ ॥४/१२५॥ आ+छिद् के ओअंद और उद्दाल आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- ओअदइ, उद्दालइ । पक्ष में- अच्छिंद - खींच/छीन लेता है। मृदो मल-मढ-परिहट्ट-खड्ड-चडु-मड-पन्नाडाः ॥४/१२६॥ --- .. '

पाहत व्याकरण १२८
मृद्
के
मल, मढ, परिहट्ट, खड्ड, चड्ड, मड्ड और पन्नाड आदेश
हो जाते हैं ।
यथा- मलइ, मढइ, परिहट्टइ, खड्डइ, चड्डइ, मडइ, पन्नाडइ = मर्दन करता है ।
स्पन्देश्चुलुचुलः ॥४/१२७॥
स्पन्द् का चुलुचुल आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- चुलुचुलइ/फंदइ = हिलता है ।
निर:पदेवलः ॥४/१२८॥
निर्+पद् का वल आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- निव्वलइ/निप्पज्जइ = निष्पन्न होता है।
विसंवदेर्विअट्ट-विलोट्ट-फंसाः ॥४/१२९ ।।
वि+सं+वद् के विअट्ट, विलोट्ट और फंस आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- विअट्टइ, विलोट्टइ, फंसइ । पक्ष में- विसंवयइ = असत्य करता है।
शदो झड-पक्खोडौ ॥४/१३० ॥
शद् के झड, पक्खोड आदेश होते हैं ।
यथा- झडइ, पक्खोडइ = टपकता है ।
आक्रन्देीहरः ॥४/१३१॥
आ+क्रन्द् का णीहर आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- णीहरइ । पक्ष में- आकंदइ = आक्रन्दन करता/चिल्लाता है ।
खिदेर्जूर-विसूरौ ॥४/१३२।।
खिद् के जूर और विसूर आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- जूरइ, विसूरइ । पक्ष में- खिज्जइ = खेद करता/अफसोस करता है ।
रुधेरुत्थडघः ॥४/१३३॥
रुध् का उत्थंघ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- उत्थंघइ । पक्ष में- रुन्धइ = रोकता है।
णिषेधेर्हक्कः ॥४/१३४॥
ज

११९ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरश सिसोदिया
नि+षिध् का हक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- हक्कइ/निसेहई।
क्रुधेर्जूरः ॥४/१३५॥
क्रुध् का जूर आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- जूरइ/कुज्झइ ।
जनो जा-जम्मौ ॥४/१३६॥
जन् का जा और जम्म आदेश होता है ।
यथा- जाअइ/जम्मइ ।
ततेस्तड-तडु-तड्डव-विरल्लाः ॥४/१३७॥
तन् के तड, तड्ड, तड्डव और विरल्ल आदेश विकल्प से होते
है।
यथा- तडइ, तड्डइ, तहवइ, विरल्लइ । पक्ष में- तणइ = विस्तार करता है।
तृपस्थिप्पः ॥४/१३८॥
तृप का थिप्प आदेश होता है ।
यथा- थिप्पइ = संतुष्ट होता है ।
उपसरल्लिअः ॥४/१३९॥
उप+सृप का अल्लिअ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- अल्लिअइ । पक्ष में- उवसप्पइ = समीप जाता है ।
सतपेझंडः ॥४/१४०॥
सं+तप् का झस आदेश विकल्प से होता है ।
यथा-झग/मतप्पइ ।
व्यापेरोअग्गः ॥४/१४१॥
वि+आप का ओअग्ग आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- ओअग्गइ/वावेइ।
समापेः समाणः ॥४/१४२॥

प्राकृत व्याकरण.१२०
सम्+आप का समाण आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- समाणइ 1 पक्ष में- समावेइ - समाप्त करता है ।
क्षिपेर्गलस्थाडुक्ख-सोल्ल-पेल्ल-णोल्ल-छुह-हुल-परी-घत्ताः
11४/१४३॥
क्षिप के गलत्थ, अड्डक्ख, सोल्ल, पेल्ल,, णोल्ल, छुह, हुल,
परी और घत्त आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- गलत्थइ, अड्डक्खइ, सोल्लइ, पेल्लइ, णोल्लइ, छुहइ, हुलइ, परीइ, घत्तइ ।
पक्ष में- खिवइ = फैकता/डालता है।
उत्क्षिपेर्गुलगुञ्छोत्थंघाल्लत्योभत्तोस्सिक्क-हक्खुवाः ॥४/१४४ ॥
उत्+क्षिप् के गुलगुञ्छ, उत्थंघ, अल्ल्ल्थ, उब्भुत्त, उस्सिक और
हक्खुव- आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- गुलगुञ्छइ, उत्थंघइ, अल्लत्थइ, उन्भुत्तइ, उस्सिक्कइ, हक्खुवइ।
पक्ष में- उक्खिवइ = ऊँचा फेंकता है । -
आक्षिपेीरवः ॥४/१४५॥
आ+क्षिप् का णीरव आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- णीरवइ/अक्खिवइ ।
स्वपेः कमवस-लिस-लोट्टाः ॥४/१४६ ॥
स्वप के कमवस, लिस और. लोट्ट आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- कमवसइ, लिसइ, लोट्टइ ।-पक्ष में- सुअइ-= सोता है।
वेपेरायम्बायज्झौ ॥४/१४७]
वेप के आयम्ब और आयज्झ आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- आयम्बइ, आयज्झइ । पक्ष में-वेव - कोपता/हिलता है।
विलपेझंड-वडवडी ॥४/१४८॥
वि+लप के झड और वडवड आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- झंखइ, वडवडइ । पक्ष में-विलवइ - विलाप करता है।
लिपो लिम्पः ॥४/१४९॥
:

1.
1
।
१२१ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुन्ग सिसोदिया
लिप का लिम्प आदेश होता है ।
यथा-लिम्पइ - लेप करता/लीपता है।
गुप्येविर-णडौ ॥४/१५० ॥
गुप्य
के विर और णड आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- विरइ, णडइ । पक्ष में- गुप्पइ = व्याकुल होता/घबड़ाता है ।
क्रपोवहो णिः ॥४/१५१॥ ..
क्रप् का अवह आदेश प्रेरणार्थक में हो जाता है ।
यथा- अवह आवे+इ = अवहावेइ = कृपा करता है ।
प्रदीपेस्तेअव-सन्दुम-सन्धुक्काब्भुत्ताः ॥४/१५२ ॥
प्रदीप के तेअव, संदुम, संधुक्क और अब्भुत्त आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- तेअवइ, संदुमइ, संधुक्कइ, अब्भुत्तइ । पक्ष में- पलीवइ = जलाता है।
सुलगाता है/प्रकाशित होता है।
लुभैः संभावः ॥४/१५३॥
लुभ् का संभाव आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- संभावइ/लुब्भइ = लोभ करता है।
क्षुभेः खउर-पडुहौ ॥४/१५४॥
क्षुभ् के खउर और पड्डह आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- खउरइ, पड्डुहइ । पक्ष में- खुब्भइ = क्षुब्ध होता है ।
आओरभेऽरम्भाढवौ ॥४/१५५॥ ..
आ+रभ के आरम्भ और आढव. आदेश विकल्प से होते हैं।
यथा- आरम्भइ, आढवइ । पक्ष में- आरभइ = प्रारम्भ करता है ।
उपालम्भेझख-पच्चार-वेलवाः ॥४/१५६॥
उपा+लभ के झंख, -पच्चार और वेलव आदेश विकल्प से होते
यथा- झंखइ, पच्चारइ, वेलवइ । पक्ष में- उवालम्भइ= उलाहना देता है।

प्राकृत व्याकरण .१२ अवेजृम्भे जम्भा ॥४/१५७॥ वि+जृम्भ का जम्मा आदेश हो जाता है । यथा- जम्भाइ = अँभाई लेता है भाराक्रान्तेनमेर्णिसुढः ॥४/१५८ ॥ भाराक्रान्त के अर्थ में नम् का णिसुढ आदेश हो जाता है । यथा- णिसुढइ = झुकता है । सो भाराओ णिसुदइ । विश्रमेर्णिव्वा ॥४/१५९॥ वि+श्रम् का णिव्वा आदेश विकल्प से होता है । यथा- णिव्वाइ । पक्ष में- वीसमइ = विश्राम करता है। आक्रमेरोहावोत्थारच्छन्दाः ॥४/१६० ॥ आ+क्रम् के ओहाव, उत्थार और छुन्द आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- आंहावइ, उत्थारइ, छुन्दइ । पक्ष में- अक्कमइ = हमला करता है । भ्रमेष्टिरिटिल्ल-दुंदुल्ल-ढंढल्ल-चक्कम्म-भम्मड-भमड-भमाड-तलअंट- झंट-झंप-भुम-गुम-फुम-फुस-दुम-दुस-परी-पराः ॥४/१६१॥ भम् के टिरिटिल्ल, दुंदुल्ल, ढंढल्ल, चक्करम, भम्मड, भमड, भमाड, तलअंट, झंट, झम्प, भुम, गुम, फुम, फुस, दुम, दुस, परी और पर आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- टिरिटिल्लइ । पक्ष में- भमइ = घूमता है । गमेरई-अइच्छाणुवज्जावज्जसोक्कुसाक्कुस-पच्चड्डु-पच्छंद-णिम्मह- णी-णीण-णीलुक्क-पदअ-रम्भ-परिअल्ल-वोल-परिअल-णिरिणास- णिवहावसेहावहराः ॥४/१६२॥ गम् गच्छ् के अई, अइच्छ, अणुवज्ज, अवज्जस, उक्कुस, अक्कुस, पच्चड्ड, पच्छंद, णिम्मह, णी, णीण, णीलुक्क, पदअ, रम्भ, परिअल्ल, वोल, परिअल, णिरिणास, णिवह, अवसेह और अवहर आदेश विकल्प से होते हैं ।

१२३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरा सिसोदिया
यथा- अईइ, अइच्छइ, अणुवज्जइ । पक्ष में- गच्छइ = गमन करता है ।
आडा अहिपच्चुअः ॥४/१६३ ।।
आ+गम् का अहिपच्चुअ आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- अहिपच्चुअइ । पक्ष में- आगच्छइ = आता है ।
समा अभिड: ॥४/१६४॥
सम्+गम् का अभिड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- अभिडइ । पक्ष में- सगच्छइ - सगति करता/मिलता है ।
अभ्याडोम्मत्थः ॥४/१६५॥
अभि+गम्, अभि+आ+गम् का उम्मत्य आदेश हो जाता है ।
यथा- उम्मत्थइ । पक्ष में- अब्भागच्छइ = अभिमुख आता/सामने आता है ।
प्रत्याङ पलोट्टः ।।४/१६६ ॥
प्रति+आ+गम् का पलोट्ट आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- पलोट्टइ । पक्ष में- पच्चागच्छइ = लौटता/वापस आता
शमेः पडिसा-परिसामौ ||४/१६७॥
शम् के पडिसा और परिसाम आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- पडिसाइ, परिसामइ । पक्ष में- समइ = शान्त होता है ।
रमेः संखुड्डू-खेड्डोल्भाव-किलिकिञ्च-कोटुम-मोट्टाय-णीसर-वेल्लाः
॥४/१६८॥
रम् के संखुड्ड, खेड्ड, उब्भाव, किलिकिञ्च, कोटुम, मोट्टाय,
णीसर और वेल्ल आदेश विकल्प से होते है ।
यथा- संखुड्डइ, खेड्इ, उम्भावइ, किलिकिञ्चइ, कोट्टमइ, मोट्टायइ, णीसरइ, वेल्ल्इ ।
पक्ष में- रमइ = खेलता/क्रीडा करता/रमण करता है ।
पूरेरग्घाडाग्घवोध्दुमाड् गुमाहिरेमाः ॥४/१६९ ॥
पूर के अग्घाड, अग्घव, उद्धमा, अंगुम, अहिरेम आदेश विकल्प
से होते हैं ।
यथा- अग्घाडइ । पक्ष में- पूरइ = पूरा करता है ।

एत व्याकरण.१२४
,
त्वरस्तुवर-जअडौ ॥४/१७० ॥
त्वर
के तुवर और जअड आदेश होते हैं ।
यथा- तुवरइ, जअडइ% शीघ्रता करता है।
त्यादिशत्रोस्तूरः ॥४/१७१॥
ति-:इ आदि होने पर तथा शतृ -न्त/माण होने पर त्वर का
तूर हो जाता है । .
यथा- तूरंतो, तूरमाणो ।-
तुरो त्यादौ ॥४/१७२॥
ति- इ आदि होने पर त्वर् का तुर आदेश हो जाता है ।
यथा- तुरिओ 1..
क्षरः खिर-झर-पज्झर-पच्चड-णिच्चल-णिटुआः ||४/१७३ ॥
क्षर के खिर, झर, पज्झर, पच्चड, णिच्चलइ, णिटुअ आदेश हो
जाते हैं ।
यथा- खिरइ, झरइ, पज्झरइ, पच्चडइ, णिच्चल, णिटुअइ-गिर पड़ता है/टपकता
है/झरता है।
उच्छल उत्थल्लः ॥४/१७४॥
उत्+शल-उच्छल का उत्थल्ल आदेश होता है ।
यथा- उत्थल्लइ % उछलता है।
विगलेस्थिप्प-णिटुहौ ॥४/१७५ ।।
वि+गल के थिप्प, णिटुह आदेश होते हैं।
यथा- थिप्पइ, णिठुहइ। पक्ष में- विगलइ = जीर्ण शीर्ण हो जाता है/गल जाता है।
दलि-वल्योर्विसट्ट-वम्फो ॥४/१७६ ।।
दलि (टूटना, फूटना) अर्थ में दल के विसट्ट और वम्फ आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा-विसट्टइ, वम्फइ । पक्ष में- दलइ = फटता है ।
भ्रंशेः फिड-फिट्ट-फुड-फुट-चुक्क-भुल्लाः ॥४/१७७ ॥

१२५ डॉ. उदयचन्द्र बेन एव डा. नुरेश सिसोदिया भंश के फिड, फिट्ट, फुड, फुट्ट, चुक्क और भुल्ल आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- फिडइ, फिट्टइ, फुडइ, फुट्टइ, चुक्कइ, भुल्लइ । पक्ष में- भंसइ - फूटता/टूटता/फटता/नष्ट होता है । . नशेर्णिरणास-णिवहावसेह-पडिसा-सेहावहराः ॥४/१७८॥ नश् के णिरणास, णिवह, अवसेह, पडिसा, सेह और अवहर आदेश विकल्प से होते हैं । यथा-णिरणासइ, णिवहइ, अवसेहइ, पडिसाइ, सेहइ, अवहरइ । पक्ष में नस्सइ% भागता/पलायन करता है। आवात्काशोवासः ॥४/१७९॥ अव+काश् का ओवास आदेश हो जाता है । यथा- ओवासइ = शोभित/विराजित होता है । सदिशेरप्पाहः ॥४/१८० ॥ सं+दिश् का अप्पाह विकल्प से होता है । यथा- अप्पाहइ/संदिसइ । दृशो निअच्छ-पेच्छावयच्छावयज्झ-वज्ज-सव्वव-देक्खौअ- क्खावक्खावअक्ख-पुलोअ-पुलअ-णिआवआस-पासाः ॥४/१८१॥ दृश् के निअच्छ, पेच्छ, अवयच्छ, अवयज्झ, वज्ज, सव्वव, देक्ख, ओअक्ख, अवक्ख, अवअक्ख, पुलोअ, पुलअ, णिअ, अवआस और पास आदेश हो जाते हैं । यथा-निअच्छइ = देखता है। स्पृशः फास-फंस-फरिस-छिव-छिहालुंखालिहाः ॥४/१८२॥ स्पर्श के फास, फंस, फरिस, छिव, छिह, आलुंख और आलिह आदेश हो जाते हैं । यथा- फासइ, फंसइ, फरिसइ, छिवइ, छिहइ, आलुखइ, आलिहइ = स्पर्श करता/छूता है। प्रविशेरिअः ॥४/१८३॥

प्राकृत व्याकरण १२६
प्र+विश् का रिअ विकल्प से होता है ।
यथा- रिअई/पविसइ।
प्रान्मृश-मुषो सः ॥४/१८४॥
प्र+मृश् का पम्हुस, प्र+मृष् का पम्हुस आदेश हो जाता है ।
यथा- पम्हुसइ = चोरी कराता है ।
पिषेर्णिवह-णिरिणास-णिरिणज्ज-रोञ्च-चड्डाः ॥४/१८५॥
पिष् के णिवह, णिरिणास, णिरिणज्ज, रोञ्च और चड्ड आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- णिवहइ, णिरिणासइ, णिरिणज्जइ, रोञ्चइ, चड्डइ ।
पक्ष में- पीसइ = पीसता है ।
भषेर्भुक्कः ॥४/१८६॥
भष् का भुक्क आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- भुक्कई/भसइ = भौंकता है।
कृषः कड्ड-साअड्डाञ्चाणच्छायञ्छाइञ्छाः ॥४/१८७ ॥
कृष् के कड्ड, साअड, अञ्च, अणच्छ, अयञ्छ, आइञ्छ आदेश
विकल्प से होते हैं ।
यथा- कट्टइ, साअड्डइ, अञ्चइ, अणच्छइ, अयञ्छइ, आइञ्छई।
पक्ष में- करिसइ = खीचता है। खेत जोतता है।
असावक्खोडः ॥४/१८८॥
असि (खीचने) अर्थ में अक्खोड आदेश हो जाता है ।
यथा- अक्खोडइ।
गवेषेर्दुदुल्ल-ढण्ढोल-गमेस-घत्ताः ॥४/१८९॥
गवेष् के दुंदुल, ढण्ढोल, गमेस और घत्त आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- दुंदुल्लइ, ढण्ढोलइ,गर्मसइ, घत्तइ । पक्ष में- गर्वसइ = खोजता है ।
शिलपेः सामग्गावयास-परिअंताः ॥४/१९० ॥

१२७ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
श्लिष् के सामग्ग, अवयास और परिअंत आदेश विकल्प से
होते हैं ।
यथा- सामग्गइ, अवयासइ, परिअंतइ । पक्ष में- सिलेसइ = आलिगन करता है।
म्रक्षेश्चोप्पडः ॥४/१९१॥
प्रक्ष का चोप्पड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- चोप्पडइ/मक्खइ ।
कांक्षेराहाहिलघाहिलंख-वच्च-वम्फ-मह-सिह-विलुम्पाः ॥४/१९२॥
कांक्ष के आह, अहिलंघ, अहिलंख, वच्च, वम्फ, मह, सिह
और विलुम्प आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- आहइ, अहिलंघइ, अहिलंखइ, वच्चइ, वम्फइ, महइ, सिहइ, विलुम्पइ ।
पक्ष में- कंखइ = इच्छा करता/अभिलाषा करता है।
प्रतीक्षेः सामय-विहीर-विरमालाः ||४/१९३॥
प्रतीक्ष के सामय, विहीर और विरमाल आदेश विकल्प से होते
हैं ।
यथा- सामयइ, विहीरइ, विरमालइ । पक्ष में- पडिक्खइ = प्रतीक्षा करता है ।
तक्षेस्तच्छ-चच्छ-रम्प-रम्फाः ||४/१९४॥
तक्ष के तच्छ, चच्छ, रम्प और रम्फ आदेश विकल्प से होते
हैं।
यथा- तच्छइ, चच्छइ, रम्पइ, रम्फइ । पक्ष में- तक्खइ = छीलता/काटता है।
विकसेः कोआस-वोसट्टौ ॥४/१९५॥
वि+कस् के कोआस और वोसट्ट आदेश विकल्प से होते हैं ।
यथा- कोआसइ, वोसइ । पक्ष में- विअसइ = विकसित होता/खिलता है।
हसेर्गुञ्जः ॥४/१९६॥
हस् का गुञ्ज आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- गुञ्जइ/हसइ ।
स्रसेर्व्हस-डिम्भौ ॥४/१९७॥

• । %3D है प्राकृत व्याकरण.१२८ संस के ल्हस और डिम्भ आदेश विकल्प से होते हैं. । यथा- ल्हसइ, डिम्भइ । पक्ष में- संसइ - खिसकता/सरकता/गिरता है। त्रसेर्डरबोज्ज-वज्जाः ॥४/१९८॥ त्रस् के डर, बोज्ज और वज्ज आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- डरइ, बोज्जइ, वज्जइ । पक्ष में- तसइ = डरता है। न्यसोणिम-णुमौ ॥४/१९९॥ व्यस् के णिम और णुम आदेश होते हैं । यथा-णिमइ, णुमइ = रखता है। पर्यसः पलोट्ट-पल्लट्ट-पल्हत्याः ॥४/२०० ॥ परि+अस्-पर्यस् के पलोट्ट, पल्लट्ट और पल्हत्थ आदेश होते हैं। यथा- पलोट्टइ, पल्लट्टइ, पल्हत्थइ = फेंकता/गिराता/पलटता निःश्वसेसँखः ॥४/२०१॥ निर्+श्वस् का झंख आदेश विकल्प से होता है । यथा- झंखइ/नीससइ = सांस लेता है। उल्लसेरूसलोसुम्भ-णिल्लस-पुलआअ-गुजोल्लारोआः ॥४/२०२।। उत्+लस् के ऊसल, ऊसुम्भ, णिल्लस, पुलआअ, गुञ्जोल और आरोअ आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- ऊसलइ, ऊसुम्भइ, पिल्लसइ, पुलआअइ, गुजोल्लइ, आरोअइ । पक्ष में- उल्लसइ । भासेर्भिसः ॥४/२०३॥ भास् का भिस विकल्प से होता है । यथा- भासइ/भिसइ = चमकता है। ग्रसेर्घिसः ॥४/२०४॥ ग्रस् का घिस विकल्प से होता है । यथा-घिसइ/गसइ = निगलता है। - अव+गाह - १२९ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ मुरश सिमादिया अवाद्गाहेर्वाह ॥४/२०५॥ ओगाह का ओवाह विकल्प से होता है । यथा- ओवाहइ । पक्ष में- ओगाहइ = ग्रहण करता है। आरुहेश्चड-वलग्गौ ॥४/२०६॥ आ+रुह के चड और वलग्ग आदेश विकल्प से होते है । यथा- चडइ, वलग्गइ । पक्ष में- आरुहइ = आरोहण करता/चढता है । मुहे गुम्म-गुम्मडौ ॥४/२०७॥ मुह के गुम्मड आदेश विकल्प से होते है । यथा- गुम्मइ, गुम्मडइ । पक्ष में- मुज्झइ = मुग्ध/मोहित होता है । दहेरहिऊलालुखौ ||४/२०८॥ दह के अहिऊल और आलुख आदेश विकल्प से होते है । यथा- अहिऊलइ, आलुखइ । पक्ष में- डहइ = जलाता/दहन करता है ग्रहो वल-गेण्ह-हर-पग-निरुवाराहिपच्चुआः ||४/२०९॥ ग्रह, के वल, गेह, हर, पग, निरुवार, अहिपच्चुअ आदेश हो गुम्म और जाते हैं । यथा- वलइ, गेण्हइ, हरइ, पगइ, निरुवारइ, अहिपच्चुअइ = ग्रहण करता है । क्त्वा-तुम्-तव्येषु घेत् ॥४/२१० ॥ क्त्वा-ऊण, तुम्-उ, तव्य- अव्व मे ग्रह का घेत् आदेश हो जाता है । यथा- घेत्तूण, घेत्तु, घेत्तव्व = ग्रहण करने के लिए, ग्रहण करना चाहिए । वचो वोत् ||४/२११॥ वच् का वोत् आदेश हो जाता है । यथा- वोत्तॄण = बोलकर, वोत्तु = बोलने/कहने के लिए, वात्तव्व = कहना चाहिए। रुद-भुज-मुचां तोन्त्यस्य ॥४/२१२॥ रुद्, भुज, मुच् के अन्त्य व्यञ्जन का त हो जाता है । यथा- रोत्तूण = रोकर, भोत्तूण = खाकर; मोतूण = छोडकर । रोत्तु, रोत्तव्यं ।

प्राकृत व्याकरणः १३० भोत्तुं, भोत्तव्वं । मोत्तुं, मोत्तव्वं । दृशस्तेन ट्ठः ॥४/२१३॥ त सहित दृश् के अन्त्य व्यञ्जन का हु हो जाता है । यथा- दठूण, दटुं, ददुव्वं । आ कृगो भूत-भविष्यतोश्च ||४/२१४॥ कृ के सू का भूत, भविष्यत्, हेत्वर्थ, सम्बन्ध, विधि कृदन्त में आ हो जाता है । यथा- काही (भूत.), काहिइ (भवि.), काऊणं (सं.कृ.), काठ (हे.कृ.), कायव्वं (वि. कृ.)। गमिष्यमासां छः ॥४/२१५॥ गम्, इष्, यम् और आस् के अन्त्य व्यञ्जन का छ होता है । बथा- गच्छ-गच्छइ = जाता है । इच्छ-इच्छइ - इच्छा करता है । गन्छ- जच्छइ - विराम करता है। अच्छ-अच्छइ = ठहरता/रहता/उपस्थित होता है। छिदि-भिदोन्दः ॥४/२१६॥ छिद् और भिद् के अन्य व्यञ्जन का ब्द हो जाता है । यथा-छिन्द-हिन्दह % छेदता/काटता है । भिन्द-भिन्दइ-भेदता/छेदता है। युध-बुध-गृध-क्रुध-सिध-मुहां ज्झः ॥४/२१७॥ युध, बुध, गृध्, क्रुध्, सिध् और मुह के अन्य व्यञ्जन का ज्झ हो जाता है । यबा- जुज्झइ - युद्ध करता है । वुज्झइ = बोध करता है । गिज्झइ = आसक्त होता है। कुज्झइ = क्रोध करता है । मुज्झइ - मुग्ध होता है । सिझइ = सिद्ध होता है। रुधोध-म्भौ च ॥४/२१८॥ रुध् के अन्त्य व्यञ्जन के न्ध, म्भ और ज्झ आदेश हो जाते यथा- रुन्धइ, रुम्भइ,रुज्झइ % रोकता है। सद्-पतो र्डः ॥४/२१९।। सद् और पत् के अन्त्य व्यञ्जन का ड हो जाता है

१३१ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिमादिया
क्या- सडइ = गलता है । पदइ = गिरता/भ्रष्ट हो जाता है।
वक्थ-वर्धा ठः ॥४/२२०॥
क्वथ और वर्ध के अन्य व्यञ्जन का ढ हो जाता है ।
बा- कढइ = उबालता है । वडइ = बढ़ता है।
वेष्टः ॥४/२२१॥
वेष्ट के ष्ट का ढ हो जाता है ।
पना- वेढइ % लपेटता है।
समोल्लः ॥४/२२२॥
सं+वेष्ट का संवेल्ल आदेश हो जाता है ।
यथा- संवेल्लइ = लपेटता है।
वोदः ॥४/२२३॥
उत्+वेष्ट का उव्वेल्ल विकल्प से होता है ।
यथा- उव्वेल्लइ/उल्वेढइ = बंधन मुक्त करता है ।
स्विदां ज्जः ॥४/२२४॥
स्विद् के अन्य व्यञ्जन का ज्ज हो जाता है ।
यमा- सेज्जइ%D पसीना होता है। संपज्जइ = खेद करता
व्रज-नृत-मदां च्चः ॥४/२२५॥
व्रज्, नृत्, मद् के अन्त्य व्यञ्जन का च्च हो जाता है ।
यथा- वच्चइ % जाता है। नच्चइ = नाचता है। मच्चइ % गर्व करता है।
रुद-नमो वः ॥४/२२६॥
रुद् और नम् के अन्य व्यञ्जन का व हो जाता है ।
यथा- रोवइ = रोता है । नवइ = नमन करता है।
उद्विजः ॥४/२२७॥
उद्+विज् के अन्त्य व्यञ्जन का व हो जाता है ।
यथा- उव्विवइ = शोक करता/रंज करता है।

प्राकृत व्याकरण.१३२ खाद-धावो लुक् ॥४/२२८॥ खाद् और धाव् के अन्त्य व्यञजन का लोप हो जाता है । यथा- खाइ, धाइ । सृजो रः ॥४/२२९॥ सृज् के अन्त्य व्यञ्जन का र हो जाता है । यथा- निसिरइ = निकलता है। शकादीनां द्वित्वम् ||४/२३० ॥ शक् आदि के अन्त्य व्यञ्जन का द्वित्व हो जाता है । यथा- सक्कई = समर्थ होता है । जिम्मइ = खाता है । लग्गइ = मिलाप करता है । मग्गइ = चलता है । कुप्पइ = क्रोध करता है । नस्सइ = नष्ट होता है । परिअट्टइ = भ्रमण करता है । पलोट्टइ = लौटता है । तुट्टइ = झगडता/दुःख देता है । णट्टइ = नाचता है । सिव्वइ = सिलाई करता है । स्फुटि-चलेः ॥४/२३१॥ स्फुट् और चल् के अन्त्य व्यञ्जन का द्वित्व विकल्प से होता । यथा- फुट्टइ/फुडइ = खिलाता/टूटता/फूटता है । चल्लइ/चलइ = चलता है । प्रादेर्मीलेः ॥४/२३२॥ प्र आदि उपसर्ग मील से पूर्व होने पर विकल्प से द्वित्व होता है । यथा- पमिल्लइ/पमीलइ = संकोच करता है । निमिल्लइ/निमीलइ = आँख मूंदता है । संमिल्लइ/समीलइ = सकुचाता है । उम्मिल्लइ/उम्मीलइ = विकसित होता है । उवर्णस्यावः ॥४/२३३॥ उ वर्ण का अव आदेश हो जाता है । यथा- चवइ = मरता है । विण्हवड = निदा करता है । निहवइ है । रवइ = वोलता है । सवइ = जन्म देता है । ऋवर्णस्यारः ॥४/२३४॥ ऋ वर्ण का अर हो जाता है । - अपलाप करता

१३३ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डा सुरेश सिसोदिया
यथा- करइ = करता है । धरइ = धारण करता है । मरई = मरता है।
वरइ = पसद करता है । सरइ = जाता/सरकता है । हरइ = चुराता है ।
वृषादीनामरिः ॥४/२३५॥
वृष आदि के सृ का अरि हो जाता है ।
यथा- वरिस, करिस, मरिस, हरिस ।
रुषादीना दीर्घः ॥४/२३६॥
रुष आदि के आदि स्वर का दीर्घ हो जाता है ।
यथा- रुसइ = खुश होता है । सूसइ = सूखता है । दूसइ = दोष देता है ।
पूसइ = पुष्ट होता है । सीसइ
शेष रखता है।
॥४/२३७॥
इ, उ वर्ण का गुण हो जाता है ।
यथा- जेइ, वेइ, उड्डेइ, मोत्तूण ।
स्वराणां स्वराः ॥४/२३८॥
स्वरों के स्थान पर स्वर होते हैं ।
यथा- हवइ/हिवइ, चिणइ/चुणइ, रुवइ/रोवइ, धावई/धुवइ, सद्दहणं/सद्दहाण ।
व्यञ्जनाददन्ते ॥४/२३९॥
व्यञ्जनान्त धातुओं में अ का आगम हो जाता है ।
युवर्णस्य गुणः
यथा- भमइ, हसइ ।
स्वरादनतो वा ॥४/२४० ॥
स्वरान्त/दीर्घान्त धातुओं में अ का आगम विकल्प से होता है।
यथा- पाइ/पाअइ । धाइ/धाअइ । जाइ/जाअइ । झाइ/झाअइ । जम्भाइ/जम्भाअइ।
उव्वाइ/उव्वाअइ । मिलाइ/मिलाअइ । विक्के/विक्केअइ ।
चि-जि-श्रु-हु-स्तु-लू-पू-धूगा णो हृस्वश्च ॥४/२४१॥
चि, जि, श्रु, हु, स्तु, लू, पू, धू, में ण का आगम और दीर्घ
स्वर का हस्व हो जाता है ।
यथा- चिणइ = इकट्ठा करता है । जिणइ = जीतता है । सुणइ - सुनता है ।

प्राकृत व्याकरण:१३४
हुणइ - हवन करता है । धुणइ - स्तुति करता है । लुणइ = लूटता/काटता है।
पुणइ-पवित्र करता है । धुणइ-धुनता/कॉपता है ।
न वा कर्म-भावे व्व क्यस्य च लुक् ॥४/२४२।।
चि आदि के कर्म और भाव में विकल्प से ब्व, य और लोप
भी होता है ।
यथा- चिव्व चिणिज्जइ । जिव्वइ जिणिज्जइ । सुव्वइ/सुणिज्जइ ।
धुव्वइ/धुणिज्जइ । हुव्व/हुणिज्जइ । लुव्वर/लुणिज्जइ । पुबई/पुणिज्जइ ।
म्मश्चेः ॥४/२४३॥
कर्म और भाव में म्म भी होता है ।
यथा- चिव्वई/चिम्मइ । जिव्वइ/जिम्मइ ।
हनखनोन्त्यस्य ॥४/२४४॥
हन् और खन के कर्म और भाव में भी म्म हो जाता है ।
यथा- हम्मइ/हणिज्जइ । खम्मइ/खमिज्जा ।
भो दुह-लिह-वह-रुधामुच्चतः ॥४/२४५॥
दुह, लिह, वह और रुध के कर्म और भाव में विकल्प से ब्भ
हो जाता है ।
यथा- दुभइ/दुहिज्जइ । लिभ/लिहिज्जइ । वभइ/वहिज्जइ। रुभइ/रुन्धिज्जइ।
दहो ज्झः ॥४/२४६॥
दह का ज्झ कर्म और भाव में हो जाता है ।
यथा- डज्झइ/डहिज्जइ।
वन्धो न्धः ॥४/२४७॥
बन्ध के व्ध का ज्झ विकल्प से होता है ।
यथा- वज्झइ/वधिज्जइ ।
समनूपाद्र्धेः ॥४/२४८॥
सम्+अनु, उप+ठन्ध के ज्झ विकल्प से होता है ।
यथा- संरुज्झइ/संधिज्जइ । अणुरुज्झइ/अणुरुन्धिज्जइ । उवरुज्झई/उवरुन्धिग्जइ ।

१२५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया गमादीनां द्वित्वम् ॥४/२४९ ॥ गम् आदि का कर्म और भाव में द्वित्व हो जाता है । यथा- गम्मइ/गमिज्जइ । हस्सइ/हसिज्जइ । भण्णइ/भणिज्जड । छुप्पइ/छुविज्जइ । ह-कृ-तृ-जामीरः ॥४/२५० ॥ ह, कृ, त और ज़ के सृ का ईर विकल्प से होता है । यथा- हीरइ/हरिज्जइ । कीरइ/करिज्जइ । तीरइ/तरिज्जइ । जीरइ/जरिज्जइ । अर्जेविढप्पः ॥४/२५१॥ अर्ज का विढप्प आदेश विकल्प से होता है । यथा- विढप्पइ । पक्ष में- अज्जइ = उपार्जित किया जाता है । ज्ञो णव्व-णज्जौ ॥४/२५२॥ ज्ञो के णव और णज्ज आदेश विकल्प से होते हैं । यथा- णव्वइ/णज्जइ = जाना जाता है । व्याहृगेर्वाहिप्पः ॥४/२५३॥ व्या+ह का वाहिप्प आदेश विकल्प से होता है । यथा- वाहिप्पइ । पक्ष में- वाहिरज्जइ = बोला जाता है । आरभेराढप्पः ॥४/२५४॥ आ+रभ का आढप्प आदेश विकल्प से होता है । यथा- आढप्पइ । पक्ष में- आढवीअइ/आरंभिज्जइ = शुरू किया जाता है । स्निह-सिचोः सिप्पः ॥४/२५५॥ स्निह और सिच् का सिप्प आदेश विकल्प से होता है । यथा- सिप्पइ । पक्ष में- सिणेहिज्जइ = स्नेह किया जाता है । सिच्चेज्जइ = सींचा जाता है । ग्रहेर्पप्पः ॥४/२५६॥ ग्रह का घेप्प आदेश विकल्प से होता है । यथा-घेप्पइ । पक्ष में- गिहिज्जइ % ग्रहण किया जाता है । स्पृशेशिछप्पः ॥४/२५७॥

प्राप्त व्याप..
स्पृश् का छिप्प आदेश विकल्प से होता है ।
यथा-छिप्पइ/लिविज्जइ ।
क्तेनाप्फुण्णादयः ॥४/२५८ ॥
त होने पर अप्फुण्णादि का अनियमित भूत रूप बन जाता है।
यथा- अस्फुण्णो, उक्कोस, फुड, वालीणो, वोलट्ठो, णिसुट्ठी, गट्ठो, पण्णत्तो.
अज्जिओ, खित्तो, मुत्तो आदि ।
धातवोर्थान्तरेपि ॥४/२५९ ॥
उक्त धातुओ के भी अतिरिक्त धातुएँ है ।
यथा- वलइ, कलइ, रिगइ, थक्कइ. रक्खइ. णीहरइ आदि ।
शौरसेनी-
तो दोनादौ शौरसेन्यामयुक्तस्य ॥४/२६० ॥
शौरसेनी मे असंयुक्त एवं अनादि (आदि से रहित) त का द
हो जाता है ।
यथा- जादो सयं स चेदा ।
अधः क्वचित् ॥४/२६१॥
कहीं-कहीं पर संयुक्त त का द हो जाता है ।
यथा- महंदी :-महंत, णिच्चिदो :-निश्चित, अदेउरे :-अन्त पुरः ।
वादेस्तावति ॥४/२६२॥
तावत् ताव के आदि त का द विकल्प से होता है ।
यथा-दाव:-ताव ।
आ आमन्त्रये सौ वेनो नः ॥४/२६३ ॥
आमन्त्र्य में नकारान्त् शब्दों में सु होने पर आ विकल्प से
होता है ।
यथा- कञ्चुइआ
में- कुञ्चुई !
भो वा ॥४/२६४॥
आमन्त्र्य में म् भी विकल्प से होता है ।
| पक्ष

१३७ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरश सिम्सादया यथा- राय । पक्ष में- राय । भवद् भगवतोः ॥४/२६५॥ भवद् और भगवत् मे म् हो जाता है । यथा- भव/भगव । न वा र्यो य्य. ॥४/२६६ ॥ र्य का य्य विकल्प से होता है । यथा- सुय्य । पक्ष में- सुज्ज (सूर्य) । थो धः ॥४/२६७॥ थ का ध विकल्प से होता है । यथा- अध । पक्ष में- अह (अथ) । इह-हचोर्हस्य ||४/२६८॥ इह के ह का ध विकल्प से होता है । यथा- इध । पक्ष में- इह । भुवो भ• ||४/२६९॥ भुव के भ का ह विकल्प से होता है । यथा- हवदि/भवदि । पूर्वस्य पुरवः ॥४/२७० ॥ पूर्व का पुरव विकल्प से होता है । यथा- पुरव/पुव्व । क्त्व इय-दूणौ ॥४/२७१॥ क्त्वा का इय और दूण आदेश विकल्प से होते है । यथा- भणिय, भणिदूण, पक्ष में- भणित्ता, भणिऊण । कृ-गमो डडुअः ||४/२७२॥ कृ और गम् मे डडुअ- अडुअ आदेश विकल्प से होता है । यथा- कडुअ = करके, गडुअ = जाकर । पक्ष में-करिदृण, गच्छिदृण ।

प्राकृत व्याकरण.१३८
दिरिचेचोः ॥४/२७३॥
दि, के, इ, ए प्रत्यय भी होते हैं ।
यथा- भणइ, भणए ।
अतो देश्च ॥४/२७४॥
अकारान्त क्रियाओं में दे, इ, ए, भी होता है ।
यथा- रायाई वंधदे चेदा । जइ ण वि कुणइच्छेदं ण मुच्चए ।
भविष्यति रिसः ॥४/२७५॥
भविष्यत् में स्सि प्रत्यय होता है ।
यथा- जीवस्सदि जो दु जीविदो ।
अतो उसे दो डादू ॥४/२७६ ॥
अकारान्त पु., नपुं. शब्दों के डसि के डादो -:आदो और
डादु -:आदु प्रत्यय होते हैं ।
यथा- जीवादी, जीवादु ।
इदानीमो दाणिं ॥४/२७७॥
इदानीम् का दाणिं आदेश होता है ।
तस्मात्ताः ॥४/२७८॥
तस्मात् का ता आदेश होता है ।
यथा-ता जाव पविसामि ।
मोन्त्याण्णोवेदे तोः ॥४/२७९ ।।
म के आगे इ और ए होने पर विकल्प से ण होता है ।
यथा- सरिसंणिमं । सरिसमिण । किणंद किमदं ।
एवार्थे य्येव ||४/२८० ॥
एव अर्थ में य्येव हो जाता है ।
यथा- मम य्येव वम्भणस्स ।
हजे चेट्याह्वाने ॥४/२८१॥
चेटी को बुलाने पर हजे आदेश होता है ।

१३९ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरश सिनादया
यथा-हजे चदुरिके !
हीमाणहे विस्मय-निर्वेदे ॥४/२८२॥
विस्मय और निर्वेद अर्थ में हीमाणहे आदेश हो जाता है ।
यथा-हीमाणहे जीवंत-वच्छा में जणणी ।
णं नन्वर्थे ॥४/२८३॥
ननु अर्थ में णं होता है ।
यथा- णं अफलोदया ।
अम्महे हर्षे ॥४/२८४॥
हर्ष अर्थ में अम्महे होता है ।
यथा- अम्महे एआए सुपरिगहियाए ।
ही ही विदूषकः ॥४/२८५॥
विदूषक के हर्ष में ही ही होता है ।
यथा- ही ही भो सपन्ना मणोरधा पियवयस्सस्स ।
शेष प्राकृतवत् ॥४/२८६॥
शेष नियम प्राकृत की तरह जानने चाहिए ।
मागधी-
अत एत् सौ पुंसि मागध्याम् ॥४/२८७॥
मागधी प्राकृत में अकारान्त पुर्लिग में सु का ए प्रत्यय होता
यथा- एशे पुलिशे । जिणे, णरेसे, महेसे ।
र-सोर्ल-शौ ॥४/२८८॥
र का ल और स का श होता है ।
यथा- पुलिशे (पुरुष), णल :-नर । शालश :-सारंस । शिल :-शिर
स-षोः संयोगे सोऽग्रीष्मे ॥४/२८९ ।।
:

।
-
प्रयाकरण १४०
ग्रीष्म शब्द को छोडकर संयुक्त स, ष का स हो जाता हैं ।
यथा- हस्ती, बुहस्पदी, मस्कली (मस्कदी), विस्मय :-विस्मय, कस्ट :-कप्ट,
उस्म :-ऊष्म, निस्फल :-निष्फल ।
ट्ट-ष्ठयोस्टः ॥४/२९०॥
ट्ट और ष्ठ का स्ट हो जाता है ।
यथा- भस्ट :-भट्ट, पस्ट :-पट्ट, कोस्ट :-कोष्ठ, सोस्टव :-सौष्ठव, सुस्ट :-सुप्ठ ।
स्थ-र्थयोस्तः ॥४/२९१॥
स्थ और र्थ का स्त हो जाता है ।
यथा- उवस्तिद :-उपस्थित, शुस्तिद :-सुस्थित, अस्त :-अर्थ, समस्त :-समर्थ ।
ज-द्य-यां यः ॥४/२९२॥
ज, घ और य का य हो जाता है ।
यथा- याण :-जान, यण :-जन, मय्य :-मद्य, विय्या :-विद्या, यादि :-याति,
यदि :-यति ।
न्य-ण्य-ज्ञ-जां ञः ॥४/२९३ ।।
व्य, ण्य, ज्ञ और ज का ञ हो जाता है ।
यथा- अञ :-अन्य, का :-कन्या, पुज्ञ:-पुण्य, अञ :-अज्ञ,
:-प्रज्ञा, अञ्जली :-अञ्जलि, धणजय :-धनञ्जय, पञल :-पञ्जर ।
व्रजो जः ||४/२९४॥
व्रज के ज का ञ होता है ।
यथा-वजदि :-व्रजति ।
छस्य श्चोनादौ ॥४/२९५।।
च्छ का श्च अनादि (मध्य, अन्त) में होता है ।
यथा- गश्च :-गच्छ, उपचलदि :-उच्छलदि, पिश्चिल :-पिच्छिल ।
क्षस्य कः ॥४/२९६॥
क्ष का क हो जाता है ।
यथा- यकालकश ।

१४१ डॉ. उदयचन्द्र जैन एन डॉ सुरेश सिसादिया
स्क. प्रेक्षाचक्षोः ॥४/२९७॥
प्रेक्ष और आचक्ष के क्ष का स्क हो जाता है ।
यथा- पेस्क :-प्रेक्ष, आचस्क :-आचक्ष ।
तिष्ठश्चिष्ठ. ॥४/२९८॥
तिष्ठ का चिष्ट हो जाता है ।
यथा- चिष्ठदि ।
अवर्णाद्वा ङसो डाहः ॥४/२९९॥
अकारान्त पुर्लिग मे डस का डाह -आह विकल्प से होता है।
यथा- देवाह । पक्ष में- देवस्स ।
आमो डाह वा ||४/३00 ॥
आम् (षष्ठी बहुवचन के प्रत्यय) का डाह -आह विकल्प से
होता है ।
यथा- देवा] । पक्ष में- देवाण ।
अह वयमोहंगे ||४/३०१॥
अहं और वयम् का हगे हो जाता है ।
यथा- हगे शपत्ता।
शेष शौरसेनीवत् ॥४/३०२॥
शेष नियम शौरसेनी की तरह जानने चाहिए ।
पैशाची-
ज्ञो ञः पैशाच्याम् ॥४/३०३॥
पैशाची में ज्ञ का च हो जाता है ।
यथा- पञा •-प्रज्ञा, सज्ञा -सज्ञा ।
राज्ञो वा चिञ् ॥४/३०४॥
राज्ञ के ज्ञ का चिञ् विकल्प से होता है ।
यथा- राचिो/रज्ञा ।

प्राकृत व्याकरण १
न्य-ण्यो उर्जः ॥४/३०५॥
न्य और ण्य का न हो जाता है ।
यथा- अज्ञ :-अन्य । पुन:-पुण्य ।
णो नः ॥४/३०६॥
ण का न हो जाता है ।
यथा- गुन गुन गन :- गुण गुण गुण ।
तदोस्तः ॥४/३०७॥
त और द का त हो जाता है ।
यथा- सत:-सत मतन :-मदन, वतन :-वदन।
लो लः ॥४/३०८॥
ल का ल होता है ।
यथा- कुल :-कुल, जल :-जल, सलिल :-सलिल ।
श-पोः सः ॥४/३०९॥
श और ष का स हो जाता है ।
यथा-ससी :-शशिः । विसय:-विषय।
हृदये यस्य पः ॥४/३१०॥
हृदये के य का प हो जाता है ।
यथा-हितप:-हृदय ।
टोस्तुर्वा ॥४/३११॥
टु का त विकल्प से होता है ।
यथा- कुतुम्बकं :-कुटुम्क्कम् ।
क्त्व स्तूनः ॥४/३१२॥
क्त्व का तून आदेश हो जाता है ।
यथा-भणितून, गंतून ।
धून त्यूनौष्ट्वः ।।४/३१३॥

१४३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एवं डॉ. सुरेश सिसोदिया
क्त्व+ष्टवा का धून, त्थून आदेश हो जाते हैं ।
यथा- नदून, नत्थून :-नष्ट्वा । पळून, पत्थून :-पृष्ट्वा ।
र्य-स्न-स्टां रिय-सिन-सटाः क्यचित् ॥४/३१४॥
र्य, स्न, स्ट के क्रमशः रिय, सिन और सट आदेश कहीं कहीं
हो जाते हैं ।
यथा- भारिया :-भार्या, सिनात :-स्नात, कसट :-कष्ट ।
क्यस्येय्यः ॥४/३१५॥
क्य-:य का इय्य आदेश हो जाता है ।
यथा- गिय्यते :-गीयते, दिय्यते :-दीयते ।
कृगो डीरः ॥४/३१६॥
कृ में क्य के स्थान पर डीर - ईर आदेश हो जाता है ।
यथा-कीरते।
या दृशादेर्दुस्तिः ॥४/३१७॥ .
यादृश, तादृश आदि के दृ का ति आदेश हो जाता है ।
यथा- यातिसो = जैसा । तातिसो = वैसा । केतिसो =-कैसा । एतिसो =-ऐसा ।
इचेचः ॥४/३१८॥
इ और ए का ति आदेश हो जाता है ।
यथा- भवइ -:भवति । णेई -:णेति ।
।
आतेश्च, ॥४/३१९॥
अकारान्त में इ और ए के ते और ति आदेश होते हैं ।
यथा- भणइ -:भणते, भणति । भणए :-भणते, भणति ।
भविष्यत्येय्य एव ॥४/३२०॥
भविष्यत् में एय्य ही होता है ।
यथा- भणेय्य, गच्छेय्य ।
अतो उसे तोडातू ॥४/३२१॥

प्राकृत व्याकरण. १४४
अकारान्त में डसि के डातो -:आतो और डातु - आतु प्रत्यय
हो जाते हैं ।
यथा- देवातो, देवातु । तुमातो, तुमातु ।
तदिदमोष्टानेन स्त्रियां तु नाए ॥४/३२२॥
तत् और इदम् के टा सहित पुर्लिग में नेन और स्त्रीलिंग में
नाए हो जाता है ।
यथा- नेन (पुलिंग), नाए (स्त्रीलिग)।
शेषं शौरसेनीवत् ||४/३२३ ॥
शेष नियम शौरसेनी की तरह जानने चाहिए।
न क-ग-च-जादि षट्-शम्यन्त सूत्रोक्तम् ।
पैशाच्या क-ग-च-ज-त-द-प-य-वा ||४/३२४ ॥
प्रथम पाद के सूत्र १७७ से सूत्र २६५ तक जो लोप की प्रवृत्ति
प्राकृत में है, वह पैशाची में नहीं होती है । अर्थात् पैशाची
में क, ग, च, ज, त, द, प, य और व यथावत् बने रहते
हैं।
यथा- एक, सगर, वचन, विजय, पातक, पादव, पाप, सयम, आयुध, तंवर आदि ।
चूलिका पैशाची-
चूलिका-पैशाचिके तृतीये-तुर्ययोराद्य-द्वितीयौ ॥४/३२५ ।।
चूलिका-पैशाची में तृतीय का प्रथम और चतुर्थ का द्वितीय
अक्षर हो जाता है ।
यथा- नकर : नगर, साकर :-सागर, मेख :-मेघ, खम्म :-धर्म, राचा :-राजा,
चच्चर :-जर्जर, छच्छर :-झर्झर, निच्छर :-निर्झर, तटाक :-तडाग, मंटल :-मडल,
टर:-डर,काठ:-गाढ, सण्ठ :-पण्ट, ठक्का :-ढक्का, मतन:-मदन,
कंतप्प :-कंदर्प, तामांतर :-दामोदर, मथुर :-मधुर, पन्थव :-बान्धव, थूली :-धृली,
पालक :-बालक, रफस :-रभस, रम्बा :-रम्भा, फकवती ·-भगवती ।
रस्य लो वा ॥४/३२६॥
र का ल विकल्प से होता है ।
-

१४५ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया यथा- चलन :-चरण, अलि :-अरि । नादि-युज्योरन्येषाम् ॥४/३२७॥ वर्ग का प्रथम (आदि) अक्षर ज्यो का त्यों रहता है । युज धातु के अक्षर का भी परिवर्तन नहीं होगा । यथा- गति :-गति, कवि :-कवि, टकार :-तंकार । नियोजित :-नियोजित । शेष प्राग्वत् ॥४/३२८॥ शेष नियम पूर्व पैशाची एवं शौरसेनी प्राकृत की तरह होते है। अपभ्रंश- स्वराणा स्वराः प्रायोऽपभ्रशे ॥४/३२९॥ अपभ्रश में स्वरों का प्रायः स्वर हो जाता है । यथा- कच्चु कच्च। वेण/वीण। बाह/वाहु/वाहा। पट्ठि/पिट्ठि/ पुट्टि, तणु/तिण/तिणु। स्यादौ दीर्घ-हृस्वौ ॥४/३३० ॥ सि आदि प्रत्यय होने पर दीर्घ का हस्व हो जाता है । यथा- गामिणि, केवलि । *हस्व का दीर्घ भी हो जाता है । यथा- ढोल्ला, सामला, हरी, भाणू । स्यमोरस्योत् ||४/३३१॥ सि और अम् का उत्-उ हो जाता है । यथा- रामु गच्छइ । रामु देमि । सौ पुस्योद्वा ॥४/३३२॥ . पुर्लिग अकारान्त शब्दो में विकल्प से ओ प्रत्यय होता है। यथा- देवो । पक्ष में- देवु, देव । एट्टि ॥४/३३३॥ टा का ए विकल्प से होता है । यथा- देवे । पक्ष में- देवेण, देवेण, देवे, देवए ।

प्राकृत व्याकरण १४६
डिनेच्च ॥४/३३४॥
ङि के इ और ए प्रत्यय विकल्प से होते है ।
यथा- देवि, देवे । पक्ष में- देवम्मि ।
भिस्येद्वा ||४/३३५॥
भिस् (हि हिं हिं) के ए विकल्प से होता है ।
यथा- देवेहि, देवेहि, देवहिं । पक्ष में- देवहि, देवहि, देवहिं ।
ङसे हे-हू ||४/३३६॥
डसि के हे और हु प्रत्यय होते हैं ।
यथा- देवहे, देवहु ।
पक्ष में- देवत्तो, देवाओ, देवाउ, देवाहि, देवाहितो, देवा ।
भ्यसो हुँ ||४/३३७॥
भ्यस् का हुं प्रत्यय होता है ।
यथा- देवहुं ।
पक्ष में- देवत्तो, दवाओ, देवाहि, देवेहि, देवाहितो, देवेहितो, देवासुंती, देवसुता।
ङसः सु-हो-स्सवः ॥४/३३८॥
डस्
के सु, हो, स्सु प्रत्यय होते हैं ।
यथा- देवसु, देवहीं, देवस्सु । पक्ष में-- देवगन ।
आमो हं ||४/३३९॥
आम् का हं होता है ।
यथा- देवह, देवाहं । पक्ष में--देवाण, देवाण ।
हु चेदुद्भयाम् ॥४/३४०॥
इकारान्त व उकारान्त के षष्टी वहुवचन में हुं प्रत्यय होता है।
यथा- हरिहु, हरीहुँ, भाणुहं । पक्ष में- हरीण, हरीण, भागृण, भागृण ।
डसि-भ्यस्-डीनां हे-हुं-हयः ॥४/३४१॥
डसि का हे, भ्यस् का हु और डि का हि प्रत्यय होता है ।
.
.

१४७ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसादिया
यथा- हरिहे, भाणुहे (प.ए ) हरिहु, भाणुहं (प.बहु.) हरिहि, भाणुहि (स.ए) ।
आट्टो णानुस्वारौ ॥४/३४२॥
टा के स्थान पर अकारान्त मे ए प्रत्यय होने पर अनुस्वार
भी हो जाता है ।
यथा- देवे, देवए । पक्ष में-- देवे, देवेण, देवेणं, देवेण ।
ए चेदुतः ||४/३४३॥
इ, उ में ए हो जाता है ।
यथा- हरिए, भाणुए । पक्ष में- हरिणा, भाणुणा ।
स्यम्-जस्-शसा लुक् ||४/३४४॥
सि, अम्, जस् और शस् का लोप हो जाता है ।
यथा- देव, देवु, देवो (प्र.ए) देव, देव (द्वि ए) देव, देवे, देवा (प्र. द्वि.बहु.)।
षष्ठ्याः ॥४/३४५॥
षष्ठी के प्रत्यय का लोप भी होता है ।
यथा- देव णमामि । देवस्स णमो ।
आमन्त्र्ये जसो होः ॥४/३४६॥
आमन्त्रण में जस् का हो प्रत्यय होता है ।
यथा- जणा । देवहो णमति ।
भिस्-सुपोर्हि ॥४/३४७॥
भिस् और सुप् का हिं होता है ।
यथा- देवहि । पक्ष में- देवेहि । देवेसु ।
स्त्रियां जस्-शसोरुदोत् ॥४/३४८॥
स्त्रीलिंग में
जस्
और शस् का ओ और उ प्रत्यय होते हैं ।
यथा- मालाओ, मालाउ । पक्ष में- माला ।
ट ए ||४/३४९॥
टा का ए स्त्रीलिग मे होता है ।
यथा- मालाए । हस्व होने पर- मालए ।

प्रापकरण?
ङस्-ङस्योः ॥४/३५० ॥
डस् और डसि का स्त्रीलिंग में हे प्रत्यय हो जाता है ।
यथा- मालहे । पक्ष में- मालए, मालाए, मालाइ।
भ्यसामो हुः ||४/३५१॥
भ्यस् और आम् का हु प्रत्यय होता है ।
यथा- मालहु, मालाहु । पक्ष में- मालाओं, मालाहि (पं.बहु.) मालाण (प. बहु)
डेहि ||४/३५२॥
डि का हि होता है ।
यथा- मालहि (स.ए.) । पक्ष में - मालाए, मालइ ।
क्लीबे जस्-शसोरिं ॥४/३५३ ॥
क्लीब में जस्, शस् का इं होता है ।
यथा- वणई, वण', वणारे, वणाणि, वणाणिं, वणाणि ।
कान्तस्यात उं स्यमोः ॥४/३५४ ॥
सि और अम् के क अन्त वाले अक्षरों में उं प्रत्यय होता है।
यथा- भग्गउं:-भानक । तुच्छउं:-तुच्छक ।
सर्वादे डसेरे ||४/३५५ ॥
सर्व आदि के इस् िका हां प्रत्यय होता है ।
यथा- सव्वहां, कहां, जहा । पक्ष में- मवाओं, काओ, ताओ।
किमो डिहे वा ||४/३५६॥
किम् का पञ्चमी में डिहे- इहे विकल्प से होता है ।
यथा- किह । पक्ष में- काहे, कम्हा, काओं, काहि ।
डे हि ॥४/३५७॥
डि का हिं होता है ।
यथा- सव्वहिं, जटि, कहि, तहिं । पक्ष में मम्पि, मम्मि, गव्वल, मा।
यत्तत्किंभ्यो डसा डासुर्नवा ॥४/३५८ ॥
:

१४९ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसादिया
यत् - ज, तत् - त, कि - क के डस् का डासु - आसु प्रत्यय
विकल्प से होता है ।
यथा- जासु, कासु, तासु । पक्ष में- जस्स, कस्स, तस्स ।
स्त्रियां डहे ||४/३५९॥
स्त्रीलिंग मे डहे - अहे हो जाता है ।
यथा- जहे, तहे, कहे । पक्ष में- जाए, काए, ताए ।
यत्तदः स्यमोधूत्रं ||४/३६० ॥
यत् - ज, तत् - त, का सि और अम् के स्थान पर विकल्प
से धंत्रं आदेश हो जाता है ।
यथा- ध्रुत्र गच्छइ = वह जाता है । पक्ष में- ज बोल्लियइ । त निव्वहइ ।
इदम इमुः क्लीबे ||४/३६१॥
क्लीब में इदम् का इमु
आदेश हो जाता है ।
यथा- इमु फलं।
एतदः स्त्री-पु-क्लीवे एह-एहो-एहु ||४/३६२ ।।
स्त्रीलिग, पुर्लिग और नपुंसकलिंग में एतद् - एत का एह,
एहो और
एहु
आदेश हो जाते है ।
यथा- एह माला, एहो रामु, एहु फल ।
एइर्जस्-शसोः ||४/३६३॥
जस् और शस् होने पर एत का एइ आदेश हो जाता है ।
यथा- एइ घोडा।
अदस ओइ ॥४/३६४॥
अदस् का ओइ आदेश हो जाता है ।
यथा- ओइ गिह = ये घर है।
इदम आयः ।।४/३६५॥
इदम् का आय आदेश हो जाता है ।
यथा- आयइ पोत्थइ ।

प्राकृत व्याकरण १५०
सर्वस्य साहो वा ॥४/३६६ ।।
सर्व का साह आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- साह/सव्व/सव्वु ।
किमः काइं-कवणौ वा ||४/३६७॥
किम् का काइं और कवण आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- काई घर = घर को क्यों ? कवण माला = माला कैसी है ?
युष्मदः सो तुहं ॥४/३६८॥
सि होने पर युष्मद् का तुहुं आदेश हो जाता है ।
यथा- तुहुं गच्छसि ।
जस्-शसोस्तुम्हे तुम्हइ ॥४/३६९ ॥
जस् और शस् का तुम्हे और तुम्हइं आदेश हो जाता है ।
यथा- तुम्हे गच्छंति । तुम्हइं गच्छति ।
टा-डयमा पइं तइं ॥४/३७० ।।
टा, डि और अम् सहित युष्मद् के पइं, तइं आदेश हो
जाते हैं ।
भिसा तुम्हेहि ||४/३७१॥
भिस् का तुम्हेहिं आदेश हो जाता है ।
उसि-ङस्भ्या तउ तुज्झ तुध्र ||४/३७२।।
डसि और डस् सहित युष्मद् के तउ, तुज्झ और तुधं आदेश
हो जाते है ।
भ्यसाम्भ्यां तुम्हहं ॥४/३७३ ॥
भ्सस् और आम् सहित युष्मद् का तुम्हहं आदेश हो जाता है।
तुम्हासु सुपा ॥४/३७४॥
सुप् -सु सहित युष्मद् का तुम्हासु आदेश होता है ।
सावस्मदो हउं ||४/३७५ ॥
सि सहित अस्मद् का 'हउ' आदेश हो जाता है ।

१५१ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
जस्-शसेरम्हे अम्हइ ||४/३७६ ॥
जस् और शस् के अम्हे और अम्हइ आदेश हो जाते हैं ।
टा-उयमा मइ ॥४/३७७॥
टा, डि और अम् सहित अस्मद् का मई आदेश हो जाता है
अम्हेहि भिसा ||४/३७८॥
भिस् सहित अस्मद् का अम्हेहिं आदेश हो जाता है ।
महू मज्झु डसि-डस्भ्याम् ||४/३७९॥
डसि और डस् सहित अस्मद् के महु ओर मज्झु आदेश हो
जाते है ।
अम्हहं भ्यसाम्-भ्याम् ||४/३८० ॥
भ्यस् और आम सहित अस्मद् का अम्हहं आदेश हो जाता है।
सुपा अम्हासु ॥४/३८१॥
सुप् -सु सहित अस्मद् का अम्हासु आदेश हो जाता है ।
अपभ्रंश क्रियाएँ-
त्यारदेराद्य-त्रयस्य सबन्धिनो हि न वा ॥४/३८२॥
ति आदि के अन्य पुरुष के बहुवचन मे विकल्प से हि प्रत्यय
हो जाता है ।
यथा- भणहि । पक्ष में- भणति, भणते, भणिदे ।
मध्य-त्रयस्याद्यस्य हिः ||४/३८३ ।।
मध्यम पुरुष के एकवचन मे विकल्प से 'हि' प्रत्यय होता है।
यथा- भणहि । पक्ष में- भणिसि ।
बहुत्वे हुः ॥४/३८४॥
वर्तमान काल के मध्यम पुरुष बहुवचन मे हु
से होता है ।
यथा- भणहु । पक्ष में- भणह ।
.

प्राकृत व्याकरण १५२
अन्त्य-त्रयस्याद्यस्य उ ॥४/३८५॥
वर्तमान काल के अन्त्य (उत्तम पुरुष) के एकवचन में उं
प्रत्यय विकल्प से होता है ।
यथा- भणउं । पक्ष में- भणामि, भणेमि ।
बहुत्वे हुं ॥४/३८६॥
बहुवचन (उ.पु.बहु.) में हुं प्रत्यय विकल्प से होता है ।
यथा- भणहुं/भणमो।
हि-स्वयोरिदुदेत् ॥४/३८७ ॥
हि, सु (मध्यम पुरुष विधि/आज्ञा) के इ, उ और ए प्रत्यय
विकल्प से होते है ।
यथा- भणि, भणु, भणे । पक्ष में- भणहि, भणसु ।
वय॑ति-स्यस्य सः ॥४/३८८॥
भविष्यत् में ति - इ आदि से पूर्व स प्रत्यय विकल्प से होता
है।
।
यथा- भणिसइ । पक्ष में- भणिहिइ ।
क्रियेः कीसु ||४/३८९॥
क्रियापद मे कीसु आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- वसु कन्तहो वलि कोसु ।
भुवः पर्याप्तौ हुच्चः ॥४/३९० ॥
पर्याप्त (समर्थ) अर्थ में भुव का हुच्च आदेश हो जाता है ।
यथा- अहरि पहुच्वइ, नाहु ।
ब्रूगो ब्रूवो वा ॥४/३९१॥
ब्रू का ब्रूव आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- वह/वूइ ।
व्रजे वुजः ॥४/३९२॥
व्रज का वुञ आदेश से हो जाता है ।

१५३ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिमोदिया यथा- दुबई। दृशेः प्रस्सः ||४/३९३॥ दृश् का प्रस्स आदेश हो जाता है । यथा-प्रस्सदि। ग्रहे गुण्हः ॥४/३९४॥ ग्रह का गृण्ह आदेश होता है । यथा- गृण्हई। तक्ष्यादीनां छोल्लादयः ॥४/३९५॥ तक्ष् आदि धातुओं के छोल्ल आदि आदेश हो जाते है । यथा- ससि छोल्लिज्जतु । चूडुल्लउ, झलक्किअउ, खुड्डुक्कइ, घुडुक्कइ । ध्वनि परिवर्तन- अनादौ स्वरादसंयुक्तानां क-ख-त-थ-प-फां-ग-घ-द-ध-ब-भाः ||४/३९६॥ अनादि (मध्य और अन्त्य) स्वर से आगे असंयुक्त क, ख, त, थ, प, और फ का क्रमशः ग, घ, द, ध, ब और भ होता है। यथा- सुद्धिगरो :-सुद्धिकर, सुघ :-सुख, दुध :-दुःख, जीविद :-जीवित, कध :-कथ, मध :-मथ, गुरुवय :-गुरुपद, सभल :-सफल । मोनुनासिको वो वा ॥४/३९७ ॥ म का अनुनासिक सहित वॅ विकल्प से होता है । यथा- जिवं, जेवं, ति, तेवें । पक्ष में- जिम, जेम, तिम, तेम । वाधो रो लुक् ॥४/३९८॥ अध रेफ का लोप विकल्प से होता है । . यथा- पिय% प्रिय । अभूतोपि क्वचित् ॥४/३९९॥

प्राकृत व्याकरण.१५४
रेफ न होने पर भी रेफ का आगम कही-कही पर हो जाता
die
यथा- वासु :-व्यास ।
--
आपद्विपत्-संपदां द इः ||४/४०० ।।
आपद्, विपद् और संपद् के द का इ हो जाता है ।
यथा- आवइ % आपत्ति, विवइ = विपनि सपइ = संपद ।
कथं-यथा-तथां थादेरेमेमेहेधा डितः ॥४/४०१।।
कथं, यथा और तथा के थ, था का एम, इम, इह और इध
आदेश डित - इत - इ पूर्वक हो जाते हैं ।
यथा- केम, किम, किह, किध (कथ), जेम, जिम, जिह, जिध (यथा), तेम, तिम,
तिह, तिध (तथा)।
यादृक्तादृक्कीदृगीदृशां दादेहः ||४/४०२॥
यादृक्, तादृक्, कीदृक् और ईदृक् के दृक् का डित् - इत् -.इ
पूर्वक एह आदेश हो जाता है ।
यथा- जेह, तेह, केह, एह ।
अतां डइसः ||४/४०३॥
अत् -:अ की प्राप्ति होने पर यादृक् आदि के दृक् का
डइस - अइस आदेश हो जाता है ।
यथा- जइसो, तइसो, कइसो, अइसो ।
यत्र-तत्रयोस्त्रयस्य डिदेत्य्वत्तु ॥४/४०४॥
यत्र और तत्र के त्र का डित् -'इत् - इ पूर्वक एत्थु और अत्तु
आदेश हो जाते है ।
यथा- एत्थु, अत्तु ।
एत्थु कुत्रात्रे ||४/४०५॥
कुत्र और अत्र के त्र का इ पूर्वक एत्यु आदेश हो जाता है ।
यावत्तावतोर्वादेर्मउंमहि ||४/४०६॥

१५५ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसादिया
यावत् -:जाव, तावत् -'ताव के वकार आदि अवयव के
विकल्प से म, उ और महिं आदेश होते है ।
यथा- जाम, जाउ, जामहिं । ताम, ताउ, तामहि ।
वा यत्तदोतोवडः ॥४/४०७॥
यत् और तत् का इ पूर्वक एवड आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- तेवडु, जेवडु । पक्ष में- जेत्तुलो, तेत्तुलो ।
वेद किमोर्यादेः ||४/४०८॥
इदम् और किम् तथा यकार आदि अवयव के इ पूर्वक एवड
आदेश विकल्प से हो जाता है ।
यथा- एवडु, केवडु । पक्ष में- एत्तुलो, केत्तुलो ।
परस्परस्यादिरः ॥४/४०९॥
परस्पर के प का अ हो जाता है ।
यथा- अवरोप्पर •-परोप्पर ।
कादि-स्थैदोतोरुच्चार-लाघवम् ॥४/४१० ॥
क, ख, ग आदि व्यञ्जनो मे स्थित ए और ओ को हृस्व एँ
और ओं हो जाता है ।
यथा- सुघेण, दुहे, जणहीं ।
पदान्ते उ-हु-हि-हंकाराणाम् ||४/४११॥
पद के अन्त मे उं, हुं, हि और हं का हृस्व उच्चारण होता है
यथा- भणउं, भणहु, जणहि, जणहं ।
म्हो म्भो वा ||४/४१२॥
म्ह का म्भ विकल्प से होता है ।
यथा- गिम्भो:-गिम्ह, उम्भो :-उम्ह, वम्भ :-ब्रह्म ।
अन्यादृशोन्नाइसावराइसौ ॥४/४१३॥
अन्यादृश का अन्नाइस और अवराइस आदेश होते हैं ।
प्रायस्ः प्राउ-प्राइव-प्राइम्ब-पग्गिम्बाः ॥४/४१४ ॥

प्रा व्याकरण
प्रायस् के प्राउ, प्राइव, प्राइम्ब और पग्गिम्व आदेश हो जाते
वान्यथोनुः ॥४/४१५॥
अन्यथा का अनु आदेश विकल्प से होता है ।
यथा- अनु/अन्नह ।
कुतसः कउ कहन्तिहु ॥४/४१६ ॥
कुतस् के कउ और कहन्तिहु आदेश होते है ।
ततस्तदोस्तोः ॥४/४१७॥
ततः और तदा का तो आदेश हो जाता है ।
एवं परं समं ध्रुवं मा मनाक एम्ब पर समाणु ध्रुव मं मणाउं ||४/४१८
एवं का एम्ब, परं का पर, समं का समाणु, ध्रुव का ध्रुवु,
मा का मं और मनाक का मणाउं आदेश हो जाता है ।
किलाथवा-दिवा-सह-नहे: किराहवइ दिवेसहुं नाहिं ॥४/४१९॥
किल का किर, अथवा का अहवइ/अहव, किवा का किवे,
सह का सहुं, नहि का नाहिं आदेश हो जाता है ।
पश्चादेवमेवैवेदानी-प्रत्युतेतसः पच्छइ एम्बइ जि एम्बहि पच्चलिउ
एत्तहे ||४/४२०॥
पच्छात् का पच्छा, एवमेव का एम्बइ, एव का जि,
इदानीम् का एम्वहिं, प्रत्यत का पच्चलिउ, इतः का एत्तहे
आदेश होता है ।
विषण्णोक्त-वमनो-बुन्न-वुत्त-विच्चं ॥४/४२१।।
विषण्ण का वुन्न, उक्त का वुत्त, वमन् का विच्च आदेश होत
है ।
शीघ्रादीनां वहिल्लादयः ||४/४२२॥
शीघ्र आदि के वहिल्ल आदि आदेश होते हैं ।
यथा- वहिल्ल (शीघ्र), धंधल (झझट-कलह), विहाल (अस्पृश्य), द्रवक्क (भय),
ट्रेहि (दृष्टि), निच्चट्ट (गाढ), सट्टल (साधारण), कोड (कौतुक), खेड्ड (क्रीड़ा)।
--

१५७ डॉ. उदयचन्द्र जैन एव डॉ सुरेश सिसोदिया
हुहुरु-घुग्घादय शब्द-चेष्टानुकरणयोः ॥४/४२३ ॥
शब्द एव चेष्टा के अनुकरण के लिए हुहुरु और घुग्घ आदि
आदेश हो जाते है ।
यथा- हुहुरु, घुग्घु, कसरक्क (घुट घुट)
घइमादयोऽनर्थकाः ॥४/४२४॥
घइ और खाइ आदि अव्यय अनर्थक हैं ।
तादर्से केहि-तेहि-रेसि-रेसिं तणेणाः ॥४/४२५॥
तादर्थ में, केहि, तेहि, रेसि, रेसि और तणेण आदेश हो जाते
है।
पुनर्विनः स्वार्थे डुः ॥४/४२६ ।।
पुन और विना में स्वार्थिक डु -:3 प्रत्यय हो जाता है ।
यथा- पुणु, विनु ।
अवश्यमो डे-डौ ॥४/४२७॥
अवश्यम् में डे-एं और ड
-अ प्रत्यय स्वार्थिक हैं ।
यथा- अवसे, अवस।
एकशसो डि ||४/४२८॥
एकशः में डि - इ हो जाता है ।
यथा- एक्कसि-:इक्कसि ।
अ-डड-डुल्लाः स्वार्थिक-क-लुक् च ॥४/४२९ ॥
अपभ्रंश में अ, डड -.अड, डुल्ल -.उल्ल, आदेश स्वार्थिक हैं ।
योगजाश्चैषाम् ॥४/४३०॥
कहीं-कहीं पर अ, अड, उल्ल संयुक्त रूप में पाए जाते हैं ।
यथा- हियअ, हियड, हियउल्ला ।
स्त्रिया तदन्ताड्डीः ॥४/४३१॥
स्त्रीलिंग में शब्द के अन्त में डी - ई प्रत्यय हो जाता है ।
यथा- गोरडी .-गौरी।
-

प्राकृत व्याकरण.१५८
:
आन्तान्ताड्डाः ॥४/४३२॥
अ का आ और इ भी हो जाता है ।
यथा- वत्तडिआ, धूलडिआ ।
अस्येदे ||४/४३३॥
अ का आ और इ भी हो जाता है ।
यथा- धूलड -:धूलडिआ ।
युष्मदादेरीयस्य डारः ॥४/४३४॥
युष्मद् आदि के ईय का आर होता है ।
यथा- तुहार, अम्हार, महार ।
अतो.त्तुलः ॥४/४३५॥
अत् आदि में एत्तुल आदेश होता है ।
पथा- केत्तुल, जेत्तुल, तेत्तुल, एत्तुल ।
त्रयस्य डेतहे ||४/४३६॥
व अन्त वाले शब्दों में एत्तहे होता है ।
स्था- एत्तहे, तेत्तहे, जेत्तहे ।
च-तलो:प्पणः ॥४/४३७॥
च और तल का प्पण आदेश होता है ।
था- वट्टत्तण -: वालप्पण ।
व्यस्य इएव्वउं एव्वउं एवा ॥४/४३८॥
व्य इएव्वउं, एव्वउं और एवा आदेश होते हैं ।
था- भणेएव्वउं, भणेव्वळ, भणेवा ।
त्वि इ-इउ-इवि-अवयः ॥४/४३९॥
त्व के इ, इउ, इवि, अवि आदेश होते हैं ।
था- भणि, भणिउ, भणिवि, भणवि ।
एप्प्येप्पिण्वेव्येविणवः ॥४/४४० ॥

१५९ डॉ उदयचन्द्र जैन एव डॉ. सुरेश सिसोदिया
क्त्वा के एप्पि, एप्पिणु, एवि, एविणु आदेश होते हैं ।
यथा- भणेप्पि, भणेप्पिणु, भणेवि, भणेविणु ।
तुम एवमणाणहमणहिं च ||४/४४१॥
तु -उं के एव, अण, अणहं और अणहि तथा एप्पि एप्पिणु,
एवि, एविणु आदेश होते हैं ।
यथा- भणेवं, भणण, भणणह, भणणहि ।
गमेरेप्पिण्वेप्पयोरेलुंग् वा ॥४/४४२॥
गम् धातु मे एप्पि और एप्पिणु होने पर विकल्प से ए का
लोप हो जाता है ।
यथा- गमेप्पि, गमेप्पिणु/गम्पि, गमेप्पिणु ।
तृनोणअः ||४/४४३॥
तृन् -तृ का अणअ आदेश होता है ।
यथा- अजाणअ, भणअ ।
इवार्थे न-नउ-नाइ-नावइ-जणि-जणवः ॥४/४४४॥
इव अर्थ में नं, नउ, नाइ, नावइ, जणि और जणु आदेश होते
हैं ।
लिगमतन्त्रम् ॥४/४४५॥
लिंग अतन्त्र (भेद) हैं अर्थात् लिग भी बदल जाते हैं ।
शौरसेनीवत् ॥४/४४६॥
शेष नियम शौरसेनी की तरह हैं ।
व्यत्यययश्च ॥४/४४७॥
प्राकृत में व्यत्यय भी होते है।
काल बोधक प्रत्यय में व्यत्यय होता है ।
शेष सस्कृतवत् सिद्ध ॥४/४४८॥
प्राकृत के शेष नियम संस्कृत की तरह सिद्ध होते हैं ।

संकेत सूची कारक प्रतीक एक वचन सि (प्रथमा एकवचन का प्रत्यय) अम् (द्वितीया एकवचन का प्रत्यय) टा (तृतीया एकवचन का प्रत्यय) उ (चतुर्थी एकवचन का प्रत्यय) ङसि (पंचमी एकवचन का प्रत्यय) ङस् (षष्ठी एकवचन का प्रत्यय) ङि (सप्तमी एकवचन का प्रत्यय) बहुवचन जस् (प्रथमा वहुवचन का प्रत्यय) शस् (द्वितीया बहुवचन का प्रत्यय) भिस् (तृतीया बहुवचन का प्रत्यय) भ्यस् (चतुर्थी बहुवचन का प्रत्यय) भ्यस् (पंचमी बहुवचन का प्रत्यय) आम् (पाठी बहुवचन का प्रत्यय) सुप् - सु (सप्तमी बहुवचन का प्रत्यय) व्याकरण के प्रतीक शब्द अत् (अकारान्त) इत् (इकारान्त) उत् (उकारान्त) ऊत् (ऊकारान्त) एत् (एकारान्त) आत् (आकारान्त) डी (ई) डा (आ) डाम (आस) डेसि (एसि) •डार (आहे) डाला (आला) डिणी (इणो) डीम (ईस) डिणा (इणा) डो (ओ) दो (ओ) दु (उ) डे (ए) लुक् (लोप) पु. (पुलिंग) सुप् (सु) म्त्री (स्त्रीलिग) वा (विकल्प) डउ (अउ) डवा (अवो) नपु (नपुमकलिग) म् (१) (अनुम्वार)

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Prakrat Vyakaran

Author
Acharya Hemchand
Title
Prakrat Vyakaran
File name
Prakrat Vyakaran
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2011/01
Publisher
Aagum,ahinsa Samta Aur Prakrat Sansthan Udaipur
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548933
Barcode
99999990029013.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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