Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Dravyaguna
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. भूमिका। मनुष्योंकी आरोग्यताये निमित्त वैद्यकशासपी बहुतही भावन्यक्ता होती है, कारण कि,द्रव्याफे गुण दोष जानकर उनका व्यवहार करनेसे शरीरम सहसा रोगा सञ्चार नहा होता है, सानपानके यावत्सदार्य है सभीने गुण दोष विद्यमान है, इस कारण जो उनको जानकर भोजनादिम प्रवृत्त होता है, वह सुखपाता है, वैद्यकशास्त्र तीन भागाम विभक्त है, निघण्ट, निदान और विविधता निघण्टम दुब्योंके गुणदोष, निदानम रोगी एक्षण और चिकित्सा रोगारा निवारण भोपधिया द्वारा वर्णन रियाद, यद्यपि सीना भाग बडेही उपयारी है परन्तु इनम पहरा "द्रव्पगुण 'सबके उपयोगी और वैद्यकशास्त्रम प्रवेश होलेका दारद । प्रथम औषधी भादिके गुण दोष मानकर किर निदानसे राग निश्चपर उसकी दूर | परनेवाली भोपधी मदान की जातीदे इसकारण सबसे प्रथम निघण्टका अनुशीलन वरना उचितहै और केवल वैद्याहीयो नहीं गृहस्थमात्रको निपण्टया जानना उचितहै, जिसे जानकर अहिवकारक वस्तुओषा सेवन न करखे रोगसे पचवर पूर्णभायु भीगसकता। प्रथमही जब वैद्यकशास्त्री प्रवृत्तिहुईथी, तब इस भारतवर्पम महात्मा नपिपाने बेदानुसार भनर अन्य निर्माण पर इसदेशवो उन्नतिय शिखरपर पहुँचादियाथा, यारकमसे जर अनयतस्पर यवनाने इसदेशयो माफमण पिया तप सही नथ सत्सरापे भग्निम जरादिपेगये, तब इग्लेण्डीयपुरषाने उनको पराजितपर यह भारतभूमि पुछ स्पस्यकी और बहुत सौजवर प्राचीन ग्रन्याया उद्धार रिपा और पश्चात इस देशनिवासियानभी अनापत्र स्थापितयर प्राचीन ग्रन्योको सोनपर पुनरुद्धारवरना निश्चयकिपाहै भौर महुत खोजकर विविध विषयवनय प्रकाशित वियजातहैं। परन्तु सदना घेद्यकशा प्रथाम अभावक सैक्डा प्रयभी प्रयाशित नहीं | हुपंहे, इसवारण देशभाषविसहित सर्वसाधारणले उपका निमित्त यो ग्रन्थ प्रकाशित होनेकी बहुतही भावग्यवता धारण कि, सर्व साधारणको सस्कृत घा ज्ञान न होनेसे शाखाका मर्म समझम नहींभाता, इसबारण भाषातरयर | टनको शाववाभाशय समाना बदुतरचितहै, जिससे ये अपने पर्यशापे परिप्रमयो देखपर लाभ उठाये । यही विचार कर हमने वैद्यवर महामहोपाध्याय श्रीमचक्रपाणिदत्तविरचित "दृष्य गुण 'काभाषाटीवावर बेग्यवशावतसगुणमादव श्रीयंकटेश्वरायाधिपति श्रीपुत | खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयी सप मकारये स्वारसहित समरंगारदिवार पचापि यह टीश सर्वसाधारण उपवारवे निमितही प्रवाशितरियाद पन्तु | भाषादेषी भोधि भाषागे"भूर्वमनोरजनी पहबरभी भपने यावत्या भाषामही निर्याह करते है महाशय पदाचित् इससे स.तुष्ट न हांगे, धारण वि ऐसे ही महात्माभावे पसनोम धीरसाकृती भनेक पुस्तक पनिहाभागामाहारहार्गद शेषम पाटर महाशयासे प्रार्थना है कि भाप यदि इसम पोई भूरपुर पाये तो अपनी सदारतासे क्षमायर हसबै समान गुणग्राहीही यहप्रय भापी उपचारक |निमिनदी प्रयाशित विपा गया है। आपका-पण्डित बालाप्रसादमिश्न, मोइयादीनगरपुरा-मुरादाबाद भूमिका। मनुष्योंकी आरोग्यताके निमित्त पैद्यकशास्त्रकी बहुतही आवश्यकता होती है, कारण फि, द्रव्योके गुण दोष जानकर उनका व्यवहार करनेसे शरीरम सहसा रोगीका सम्भार नहीं होता है, खानपानके यावत्पदार्थ है सभी गुण दोप विद्यमान है, इस कारण जो उनको जानकर भोजनादिम प्रवृस होता है, वह मुखपाता है, वैद्यकशास्त्र तीन मागामे विभक्त है, निघण्ट, निदान और चिकित्सा निघण्टम द्रव्योंके गुणदोष, निदानमे रोगोके लक्षण और चिकित्सामे रोगोंवा निवारण औषधियों द्वारा वर्णन किया है, यद्यपि तीनो भाग बडेही उपयारी है परन्तु इनमें पहला "द्रव्यगुण" सबके उपयोगी और वैद्यकशास्त्रमे प्रवेश होनेका द्वारहै । प्रथम औषधी भादिके गुण दोष जानकर किर निदानले रोग निश्चयकर उसकी दूर करनेवाली औषधी प्रदान की जाती है इसकारण सबसे प्रथम निघण्टका अनुशीलन करना उचितहै और केवल वैद्योंहीको नहीं गृहस्थमात्रको निघण्टका जानना उचितहै, जिसे जानकर अहितकारक वस्तुओंका सेवन न करके रोगसे बचकर पूर्णआयु भोगसकता। प्रथमही जब वैद्यकशास्त्रकी प्रवृत्तिहुईथी, तब इस भारतवर्षमे महात्मा ऋषियोंने वेदानुसार अनेक ग्रन्थ निर्माण कर इसदेशको उन्नति के शिखरपर पहुँचादियाथा, कालकमसे जब अनयतापर यवनाने इसदेशको भाक्रमण किया तब सहनौ अथ सस्कृतके अग्निम जलादियेगये, तब इग्लैण्डीयपुरुषाने उनको पराजितकर यह.भारतभूमि कुछ स्वस्थकी भोर बहुत खोजकर प्राचीन ग्रन्थीका उद्धार किया और पश्चात इस देशनिवासियानभी अनेकयन्त्र स्थापितकर प्राचीन ग्रन्योको खोजकर पुनरुद्धारकरना निश्चयकियाहै और बहुत खोजकर विविधविषयकनथ प्रकाशित कियेजातहै। परन्तु सहस्रो वैद्यकशास्त्रोके ग्रन्योमे अभीतक सैकडो ग्रन्थभी प्रकाशित नहीं हुपद, इसवारण देशभाषकिसहित सर्वसाधारणके उपकारके निमित्त वैद्यकके अन्य प्रकाशित होने की बहुत ही आवश्यकताहै कारण कि, सर्व साधारणको सस्कृत का ज्ञान न होनेसे शास्त्रोका मर्म समझमे नहींाता, इसकारण भापान्तरकर उनको शास्त्रोंकाभाशय समझना बहुत उचितहै, जिससे वे अपने पूर्वजकि परिश्रमको देखकर लाभ उठावै । यही विचारकर हमने वैधवर महामहोपाध्याय श्रीमचक्रपानिदत्तविरचित "द्रय गुण"का भाषाटीकाकर वैश्यवशावतसगुणग्राहक "श्रीवेंकटेश्वर यन्त्राधिपति श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयको सब प्रकारके स्वत्वसहित समर्पणकरदियाहै. यद्यपि यह टीका सर्वसाधारणके उपकारके निमित्तही प्रकाशितकिया परन्तु भाषादेषी जोकि भाषाको "मूर्खमनोरजनी" कहकरभी अपने यावत्कार्य भाषामेही निर्याह करते है वे महाशय कदाचित इससे सन्तुष्ट न होगे, कारण कि ऐसेही महात्माभोके वसनोंमें पँधीहुई संस्कृतकी अनेकपुस्तफेटपजिवाओंका आहारहोगई। शेषमे पाठक महाशयोले प्रार्थना है कि, आप यदि इसमें कोई भूलचूक पावे तो अपनी उदारताले क्षमाकर हसके समान गुणग्राहीही यगन्ध आपरे उपकारक निमिनही प्रकाशित किया गया है । आपका-पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्र, मोहल्लादीनदारपुरा-मुरादाबाद.
द्रव्यगुणानुक्रमणिका। पृष्टाक .... .... ... .... ... " 1." " .. .... " .IN .... .... .... .... " .... .... " .... ... .... .... " .... .... ... " .... ... .... १. " .... .... .... .... .... " ... " " .... .... .... २० । .... .... .... .... .... " ... .... .... .... १५ " " .... " " .... .... .... १ " .... .... .. .... .... .... .... .... .... " .... ૨૨ विषय. टाक. विषय. मौरकामांस पाठीनमास्स कबूतरकामांस वर्मिमत्स्य... जंगलीकबूतरकामांस कुलिसमत्स्य | जंगलीवितकबूतरकामांस कुजकमत्स्य घनकेमुरगेकामांस मुद्रमत्स्य... ग्राम्यमुरगेकामांस गुत्थमत्स्य.... वनपुलिंगकामांस चलदमास्य ग्रामफुलिंगकामांस शुद्रमत्स्य.... तोतका मांस मत्स्यकरछपादिकेअण्डे.... इसकामांस देशभेदसजीवांकअवयवगुण शरारि,पककलहंस बलाका मांस " निषिद्धमांस कूर्मादिकेगुण यर्जितमांस कालेकेंकडेकामांस श्रेष्ठमांस गोयकामांस लघुमच्छियोंकेअण्डे सेदीकामांस मत्स्यकअण्डे मूपककामांस ईसकेअण्डे मांसभेद सूमिछली जांगलअनूपमांस भेद शाकवर्गः। जंघालजीवकामांस विकिरजीवोंका शाकगुणभेद जीवन्तीगुण प्रतुदीबोंका गुहाशायीजीवोंका प्रसहजीवोंका वथुआ पर्णमृगोंकामांस चिल्लीशाक १७ चिलमेशयनकरनेवालोंका मूलकपोतिका ग्राम्पजीवोंका पकीमूली | नदीके किनारेफिरनेवालेजीवांका सूखीमूली तथा फल मेलेवालेजीवोंका कोशस्थ औरचरणवालोंका पोई.... मुनसुनियां मत्स्यगुण.... १८ मरसा रोहमरस्यगुण पालक शकुलमत्स्य शिलिन्दमत्स्य कसौंदी माडीमत्स्प काठशाक... पहिसमास्य मटर भौर उसकेपने एलङ्गमत्स्य सतीरिक पर्वतमत्स्य भाफुटमरस्य १९ । पुनर्नया " .." .... " .... ... .... .... " " .... .... " .... .... " ... " ... .... .." " का .... .... ११ .... .... .... ... " .... ... " .... " " .... .... "" १ .... .... .... " .... .... .... .... " U .... ..." ... .... .... " .... .... ..." " ... .... .... .... ... .... .... .... .... " " .... .... ... ... .... " ... .... .... " .... .... . ... ... .... .... " .... .... चना .... .... ... .... 7 .... ... .... ..
(८) द्रव्यगुणानुक्रमणिका। पृष्ठांक. 7 .. .... 1 .... .... .... 11 " M .... ... .... विषय. वनकद यांसकाकाला ऐन्दुक उन्दीमान, नदीमाप वनकन्द जिमीकन्द.... " " ... .... . ... ... ... " .... .. ... ... ग . .... .IN .... " । .... .... .... .... .... .... ” " .." ... . " " 1.0 4... " .... .... ... " 11 4.. .... " ॥ H कैलकीजड पकी.... फची वाराहीकन्द ३० वालनारियलखजूरक फल सुपारी सनकोविदारसफेदकचनार सेमल ॥ असा अगस्यके फूल रामवृक्ष मोखाकाकांशिनफफूल " कमलमूल... .... .... ... .. .... .... " nan ... . ... .... " । .... ... ..." " " .... .... ... .... .... ... " " .... ... .... .... .... .... विषय, पृष्ठांक, कंचट अम्किलोना चूका कलाम्बिका सरसोंकाशाक तुन्दरीशाक नाडीशाक.... पटोलपात.... नीम पर्पट वेतन वरकमान्बी कया वत्सादनी सरसों २६ करत घट गूलर पीपल पाकरकेपत्ते .... सोमराजी.... बैंगन कररीवेफर कारवेलकाकोडी पेठा पकापेठा पठेकीनाडी बसीककदी करु नवीनककटी खीरा शीर्णवृन्त (तरजभेद) अदाकद तूम्पीकीनाडी पाइपीतूम्पी कुमुदउत्पलकीनालफूल फट हस्तिमा आलुक विदारीकन्द शतावरी तरुट (सीलकामकाजा) २९ भंसीडाघोलकसेफ पिण्दालू " .." ... ... ... 17 .... " ... .... ॥ n ... A." .... " .... ... " .... .... " .... .... " ... .... " .... " .... .... 11 .... " .... ... .... " सिम्हालनिर्गुपडी कापोली छत्रकाप्याल, निपिद्धपदार्थ शाकधगमेश्रेष्ठ शाकक्षवगुण अथलवणादिवर्ग:। ३२ सैंधा समुद्रलपण विरियासाँचरनीन कालानोन .... सौवर्चल पृथ्वीभीतरसेनिकलालवण ... पेमकनदीकालवण गुडिकावण पारगुण अवाखारसजीखार टंकणक्षार..... भद्रख सांड पीपलीगीली सूखी .. .... " .. .... " " .... ... ... 17 ... .... ... " ... " .... .. . .. ... " HI 44. " ... .... ... " .... .... " .... 14.4 11 .." ..11 .... ... "" द्रव्यगुणानुक्रमणिका। (९) पृष्ठाक " ३५ 1 " " " 1 " 1 " 1 विषय पृष्ठाक बडगारपीपरपाक्दादिये फल । मौरसिरीफल ४१ कच्चाफालसा पकाकारसा कच्चावेल पकावेल दाख भूरीदास कभारीफल खजूरफल ४२ महुएकापवाफर नारियल पहातारपल रेलेकीफली कटहर 11 २६ " 1" " " " " " " - विषय सूखी कारीमिरच गीलीमिर्च श्वेतकालीमिर्च हींग जीरा अजवायन (वालाजीरा धनियाँ एहसुन प्याजगुण फलवर्गः। दाडिमी (दोमकारकी) पुरानापानीमामला घर (सूखागीला वसाआम पकाआम अम्रोटी अम्बाडा घडहर करौदा चमरख कच्चाअम्लवेत इम्ली पाशीइम्ली हरफारेवदी जम्बीरीफर नारगी (फल) विजोरानीयू विजारेकीछाल विजारेषागूदा नागवेशर चकोत्तर कैथकानमा जामन " " श्रामले रहेडा हरडकीगुठली " ३८ " . ४४ . " " " " " " ३९ " " " 9 1 चिरोजीकीमींग वृक्षानुसारफलगुण भिरायचीगुठीकामसूदा वरजुभाटेसूनीमकाफट वायविडङ्ग बच्चेवेष्कागुण वारिवर्गः। जरभेद धाराजर गगाजल समुद्रज गगाजलकीपरीक्षा आवाशपतितजल भोलेकाजल हिमकाजल नदीयाजर शौणभद्रभादिकाजल स्थयहुएसरोवरचाजल . " " " 1 १1 ४६ " राजादन तोदन अनुया द्रव्यगुणानुक्रमणिका। " .... .... .... " IN ... " ... H " .... .... .... ... ... ... " .... " ... .... " .... .... .... " ... .... .... .... " .... .... " " ..." an षिय. पृछांक. ताहारकाजल बावडीकाजल कुऍकाजल नयेवनेकुकाजल करनेकाजल सोतेकाजल ४७ वालुकाविछाकरनिकालाजल केदारऔरतृणादिसेअच्छाअल्प सरोवरकाजल समुद्रकाखारीजल अनूपदेशकाजल साधारणजला पश्चिमवाहिनीनदीकाजल पत्थरोमेंगिराखेदितजल .... हिमालयसह्याद्रिकीगुहाकाजल चन्द्रकान्त और चन्द्रकिरणसंयुक्त " .... .ra " .... " .... " ... " .... .... .... " .... . . ... .. " .... .... " " " .... .... .... " .... ४८ .... " .... " .... .... .... .... .... .... " " .... नारियलकानीनजल .... .... 11 जीर्णजल .... 1 विषय. पृष्ठांक. ऊंटनीफादूध एकसुरपालेचौपापोंकादूध स्त्रियांकाध ५३ दूधकोविकृति बिनाऔटायादूध..... दुहतमंदूधपीना बहुतोटा आदूध यर्जितदुग्ध दहीगुण गौकादही.... ५४ बकरीकादही महिपीकादही भेडकादही घोडीकादही स्त्रीकेदूधकादही.... हथिनीकादद्दी दहीसंयोगीपदार्थ भौटेहुएदूधकादही घीनिकाला आदही दहीकामलाई महा दहीकापानी मलाईपुस्तमट्ठा पोलतकउदश्वितमथित.... वातादितकऔषधीडालकरपीना क्षतादितकसेवननिषेध तक्रकूचिका मण्ड किलाट पीयूष और मोटर.... ताजामक्सन दूधसमथकरनिकालामदन गौकेदहोकामक्खन घृतके गुण गोकात भैसकाघुत यफ कात .... " " .... .... " .... .... .... ४९ ... .... .... " .... .... .... " १ .... .... .... .... .... .... " सुगंधवालाआदियुक्तजल तालकाजल शीतलजल शीतलजजित उष्णजल के गुण औटायामाजल. गुणागुण भाकाशादिकेजलकानातुभोंके अनुसारग्रहण इटसिधारकीचादिकाजल क्षीरवर्गः। 17 .... .... ... " .... .... .... " .... " .... ५७ .... " .... ... 1 .... .... .... .... " 4... .... " .... 1 .... .... .... .... 11 7 .... .... क्षारकेगुण... गोकादूप... जागीकादूध पकारीकादूध भपीकाद्ध मेपकादूध इयिनीकादूध " .... 4.1 .... ... ... " ५२ .... .... " " .... ... ... " " .... ...
द्रव्यगुणानुक्रमणिका। (११) पृष्टांक 2 " " " " विषय भयादिवर्गः। मद्यगुणा सुरागुणा श्वेवासुरा प्रसन्ना यवकीसुरा घल्वलीमद्य कोहलमय चकसमद्य शीथुमधईसपवायेराची विनापकाये रसरी शीधू गुडकी शीधू शर्वराकीसी महुएकैफूलकीशीधू जामन और गुड मिलीशी " " ६० विषय भेडकायुत पुरानात दूधसेनिकारात घृतमण्ड तैलवर्गः। तेलगुण सरसौवातल अण्डकातल अरसीकातेल | परज और नीमचातेल सिलवालसर्वश्रेष्ठ दूसरपदायोकेवेल घसा और मीगीगुण ऐश्वादिवर्गः। | ईखकारस कोलू मेपेलारस गन्नेकेतीनभागकारस पकारस रसफाफाट महुएके फूलरसकाफाट " " " " 11 " ॥ " " 11 भोपधी सुरा मेरेय मद्य ६७ " " " " ६८ " " ६२ " " " कन्दमूलादिका भासव अरिष्ट अरिष्टादिकाप्रयोग स्याध्यमद्य प्रसन्नामद्य शुक्तगुण शुक्तमें अन्य व्यका सयोग गुडमधुयुक्तशुक्त काजीगुणा तुषगुणा गौवकरीमादिफेमूनाकेगुण गोमूत्रगुणा भैसेकरमूत्र छागकामूब भेडकामूत्र घोडकाभूत्र हाथीवामृत्र गधेवामूत्र उठकमूत्र ६९ . " ग ७० पुरानागुड खाद शकर तमराज (शवराभेद) नेदयुक्त गुट मधुसे उत्पन्नशर्वरा मस्पपिण्डिका मधुगुण मधुवेभेद माक्षिकवीश्रेहता भ्रामरक्षौद्रादिकीपरीक्षा नवीनमधु पुरानामधु पचमधु मधुकायोग उष्णमधु " ६३ " 11 " " 11 " " कृतान्नवर्गः। M " कृतानगुण (१२) द्रव्यगुणानुक्रमणिका। " " .... .... ... .... " .... .... .... ७८ .... ... ... " .... 17 .... " " ... .... .... .. .. विषय. पृष्टांक, दादिमीआदिअम्लपदायाँकापूष धान्य और अन्लद्रव्योंकापूप दही आम्लपदार्थाकापूप तक्रअम्लयूप गोरसादिद्रव्योंका यूप तिलकी सलसिण्डाकीकेगुण रागषादवविधि रसाला (सिखरन) गुडकेसाथदही दाखखजूरकालीमिर्चझायूष दूध आमभक्षणगुण मन्थगुण .... अम्लस्नेहयुक्तमन्य शक्तपिण्डी भक्षवर्गः। ... ... " ... .... " .... .... .... " 17 ... .... " " .... .... " .... " .... . .... ..." " .... .... " .... .... ८० " .... ... 14 " .... .... .... .... .... " .... .... विषय धोये चावलोंका भात ७१ भुने चावलोंका भात ... " मण्ड खीलोंका मण्ड "" पेयाविलपी आदि ७२ क्षीरगुणा..... खिचडी | मांसादि संयुक्तअन ७३ रसोदन (रसा) घोरभक्त.... तत्कालजलसेधोयाभन्न पचानेजलपकामात .... दाल जोशझियाशाफ जोशफियामांस घृतादियुक्त खालिप्यगुणाः .... घृतादियुक्त शुष्कमांस.... ७४ भुनासूखामांस उसकेयनानकोविधि" खुप्तपिष्ट शूलपरभूनामांस- तेलमें सिद्ध कियामांस.... वेसवारमें छिद्र कियासोहा मांसरस रसके ऊपरका स्वच्छभाग रसरदितमांस जलामत्स्य भुनामत्स्य.... मूंगकापूप.... दाडिमीयुक्तयूष मसूरमूंगादिकायूष दादिमीयुनकाकसहितयूप पटोलनीमकायूप.. मूलीकायूष मंगआमलेनापूप | जौकोलकल्यांकायूष धानोंफायूप पभेद .... .... .... 1 .... .... " " . .... .... घृतपूर घेवर .... " .... ... ... .... .... " .... .... १ .... " .... .... .... " .... .... " .... दूध डाले चौले धानोंकहोने सतू.... दूधलप्सी.. ८१ गौडिका रसभरी 'गुझिया' पहक गेहूंकाकसार गोधूमचूर्ण.... फेणक धेसवारफेलाप गादिकापम्य.... " मांसयुक्तचेसवार.... तिलकल्ककेपल्लाल ८३ पूरी. शालीधान्यके मोजपदार्थ मूंग उरद आदिकोदाल.... मूंगादिकभक्ष्य तेलपकपदार्थ टीकरे और अंगापरसेकेपदार्थ " फुलमाष " .... ... " .... . ... " ... .... " ... .... " .... " .." .... . .... " " .11. " .. .... .... ... 11 .... " .... ... " .... ... .... .... " १ ..." ....
द्रव्यगुणानुक्रमणिका। (१३) पृष्ठार " " , " " " ९४ ' " ८५ ९५ " " विषय पृष्ठांक द्रव्यानुसार भक्ष्यगुण भुनेजीकापदार्थ वैद्यवाक्यसेप्रमाणकियेपदार्थ आहारविधिः। ८४ रसोईघर कैसाहोनाचाहिये सूपकारकी श्रेष्ठता घी भोर भोजनपसनेवेपदार्थ विनपात्रोमे क्याधरै भोजनपरोसनेकीविधि कैसंस्थान में भोजन कर भोजनका परिमाण ८६ भोमनपर सोफदमचले घामवर वटसेलेट भोजनकरकेदौडनकानिषेध ताम्बूलभक्षण अन्नपाकविधि सुगन्धित अनसे इद्रियाकी तृप्ति । अग्निसेपाक होना सातधातुभाभद रसंसरुधिरादिधीउत्पत्ति उपधातुआकापूर्णवर्णन टपधातुआवेमल जाठराग्निकीउत्कृष्टता अन्नकी उत्कृष्टता अतुपानविधिः। भनुपा- केपदाथ चातादिकीनधिकताममनुपान स्नेहपरअनुपान तेलपर पिसेअनपर मासेआतएपर पिष्टपदार्थापर चापलमूगपर मासपर क्षीणानिघालाको मद्यपाननकरनवालाको भ० वती, मार्गरेभायहुएआदिको विषय रोगरहिताको दहीमादिभम्लपदाधापर बहुतभोजनपर अनुपानवैगुण आदिमध्यभन्तमजलपीनके गुण अनुपानकानिषेध अनुपानकरवर्जितकृत्य व्याधीमे अनुपान प्रमाण गुणकर्मविधि । शीतलपदार्थ स्निग्धपदार्थ रूखापदार्थ पिच्छिरपदार्थ विशदपदार्थ तीक्ष्ण और मूदुपदार्थ अग्निसेक द्रवपदार्थ सूक्ष्मपदार्य दुर्गन्धपदार्थ सरपदार्थ ज्यवायी पिकासीपदार्थ आशुकारीपदार्थ सूक्ष्मपदार्थ करजादिकीदैतान देवगुरुमादिकापूजन चरणधोने के गुण नेत्राका आजन क्सरत करनेकेगुण तेलकामारिस चूणकामालिस गरमलकास्नान चन्दनादिभालेपनपेोगुण नदानवख्धारण रनवेगहनेपहरने पगडीधारणगुण छवीधारणके गुण " ८८ " ॥ " " " " ९७ " " " " " " " . " अनुमानविय M om MA 444 दस्टकारमा བཙས། दारत- PM AN .... H सW RWA . Man .. .. ... :: :: :: :: :: :: . .. . ....... ha .. ON AN. . .... ne N . ... ... ... .. " " .... .... .... ... .. .. " .... 1. " ... .... .... " " .... .... निद्रानाकारको रजिनल दिना कहानीपन साहिनियों तिकीपनगुन বন मोर और चेतन रुगंधा मुखदायकपवन शतावरी अत्यन्तरमनन हस्तिशर्मपलास... पूर्वकोपन पभिनकी पवन मारपणी उतरदक्षिणको पवन विशाला सयभोरकोवायुकेगुण १०० सारिषा धूमक्युण. भनन्तमूल जुखाम प्रियंगु সন্নি लोध आम पठानीलोप धूप और झापाके गुण चंदनी अंधकार फुहरे गुण प्रपोपटरीफ.... मरदेशके गुण जीयन्सी भनूपदेशका गुण अष्टधः। सामान्य देशका गुण हेमन्त तके गुण मुलैली शिशिर अर्जुन वृक्ष.... बसन्त सरदमोबा ... ग्राम भांगरा यां भंगार दण्दोरपल प्राणहारका छापस्तु रदन्ती माणदायक छ.यस्तु तालाली द्रांगापुष्पी... द्रव्य गुणकी समाति १०२ पिणुशान्ता दूसरेपन्यासमहणकीऔषधी। मृमिकाली सुदर्शगा " ... मजीड, पूर... " ... " " M .... ... ... ... घपाक गुण " .... .... ... " .... .... .... .. .. .... 1 .... । 1. ... ... ... " .... .. " " १५ ... .... ... ... ... .. .... .... .... 1 " ... .. .... .... ... " " . .... ..." ... ... " " ... .... .... .... . " " .... 10 ... .... ... .... " ... ... ..." .." ... .... " आयुगर विधान .... ... .... .... ... " .... .... .... " .." . .... येही जद " " .. ... . ....
द्रव्यगुणानुक्रमणिका विषय पृष्टाक विषय भारगी चोरी पृष्ठोक १०५ " " " 1 . " , 7 " १०६ झिपटी पाक्लिाक्ष हरतारमखाना करिहारी कनर कापातकी খননী बझी वच " " " , शखपुष्पी . 7 १०७ दर दी दारहल्दी सामराजी १ 1 " " " सजना दुरारमा कुटकी रास्ना जायन्ती चकना और उसके फूल देवदार भहसा गिरोप अजवायन पीपलामूल चण्य, मजपापर ११० चीता दन्ती दृषी सहुडबरा दूध भाकवृक्ष आकका दूध जमारगाटा धतूरा भिलावेके फर इसका इलीय धन गूगल नया गूगल पुराना और सूखा गूगल लालनिशोप फुटवी निसोथ राजवृक्ष उसका फल रोइडा वृद्धदार ११२ निर्गुण्डी नरसीदल निरोरफडी शरोचन तवीर इति वनौषधिवर्गः सम्पूर्णः। 1 १ " , , वरज नीमफल वायविडड रेणुका भाजपत्र सारिया तिरिच्छ धायक असन श्वतखेर नीम महनिम्ब चिरायता पिनपापड़ा पाठा इदजी इस बीम रुगधवाला माधा अतीत वाकहाशगी वायफल , १०८ " प " " " द्रव्यगुणानुक्रमणिका। मण्ड शुद्ध चावलीको चौदह गुने सूखेमलको पतलाकर गुदाक द्वापः पानी में डालकर औटावे जब चावल निकालती वह भेदन है । सीजजाय तष मांड निकाल ले यह रेचन-जो पेटके मन्नादिका उत्तम शुद्ध मण्डह। पाकहोने अथवा कच्चे होनेपर अन्ना फांट-एक पल औषधी लेकर अच्छी रीतिसे कूटकर सोलह गोले जलपात्रमें दि तथा वातादिमलोंको पतला करके अधोभागमें प्राप्तकर गुदाद्वारा रेचन | भरकर धरै जब गरम होजाय तय कुटी कर वहरेचकह था निशोतु । औषधी डालकर खूब औटावे फिर संशोधन-जो स्वस्थानमें संचित उसपानीको कपड़ेसे छानसे यह फांटह। मलाको ऊपर भागमैलाकर मुख ना मंथ-पांटका भेदह । सिवाद्वारा निकाल और भाभाग जौकामथ-सायितजाको भुनाय चूत लेगाकर गुदालिंग द्वारा बाहर निकाले पिसयाटे उसे शीतल जलमें इसमकार यह शोधकहै यथा धंदाला सिलावे जिससेन पहुसपतलाहोन बहुत छेदन-जो परस्पर मिलेकफादि दोषों गाढा फिर उसमें पीमिलाकर पिये जो को अपनी शक्तिसे तोड़ पृथक करदे वाद घेद्यकमें ऐसेभाय कि उनका वह छेदन यथा काली मचं शिलां पर्याप नहीं लिखा है उनको लिखते हैं। जीत। अभिप्यन्दुि-जोद्रव्य अपने पिच्छक घमन-जो पछदशाको न भासहुए पित्त गुणोंके भारीपनेसे रस ऐजानेवाफी कपको बलसे मुखके मार्गको निकाले नाड़ियोंको रोकर शरीरको भारी यह यमनकारक हे यथा मैत्रफल। फरताह पह भभिष्पन्दि (स्रोतनापी) दीपनपाचन-जो भामको न पचाकर पधा-दही। अतिको प्रदीपफर पद दीपन दे या प्रभाषी-जो भगनासिका आदि सौफ और जो भामको पचाकर फिर छिद्रोंसे कफादिदोप संचयको निकाले अनिको प्रदीप्तकर यह पाचनदै यथा वह प्रमाथीहे (घ) नागकेशर भारजी दोनों कार्य कर यह पाजीकरण वीर्यकी प्रवृत्तवारनेया दीपन पाचन हे यथा चीता। लोभीपी पटी, शतापर, व्यवापी वसन-जो पछि पाकहोने योग्य वाता अपमही सबहमें फैलनेयाली । दिदीप पोष्टमें आश्रित हुभोंको पिता रसापन-जो देहकी वृद्धावस्था और ही पाकको बीच भागमें लाकर ज्वरादिरोगको नाशयर ययालय गुदाफ दारा निकालै यह संसन यमा दन्ती। भमस तासकर गदा। स्तम्भन-सी औषधी कदागुणकरके अनुलोमन जो थासादिदोषकि कोर शीतवीर्यकरके भीर यसले रसयुक्तही कोशान्तकर परस्पर यद्ध पाभयदांका नेसे पाक दलकी दो यादीको उत्पन्न भिन्न ३ कर जांच गिग अषया यात परपद भौषधीम्तंभनी पपा फुदा और मपुरीपादिस यद्ध पोष्ठको स्वर स्पोनाय. मादीको भनिीतकर और फरक महादिको गुदद्वारा प्राप्तकर भामादिया पागनकर और उम्ण होने शहर निवाळे यह भनुलोमनः पया से समस्यरूप पफादिधातुगकि दोप भीर मलको झोपण पर पद मादी यथा संशमन-जो मोषधी प्राणीक भोजन गमपीपक सावजीरा पिय पदार्थको न वमन द्वारानिशाले न दस्तफरय किन्तु दोषमि मिटकर हैपन-जोरसादि धान और याता उन्हें यही शान्तपरदे पाशमक। दिलापको गुशाशरददर सहर निषा पटरी प्रसन पदसहपया पर शत। पया गिहाय॥ भेदन-भो भोपर्षि पासादि दो पारे उम्पणंम् । J है. MIYA SHminum श्रीगणेशाय नमः। द्रव्यगुण-सटीक UBRARL. मंगलाचरणम् । शंकरशंकरदेवगिरीशंगिरिजापतिम् ॥ गणेशविनहरिवन्देहंकामदम्प्रतम् ॥ १ ॥ रचितश्चकदत्तेनयोद्रव्यगुणसंग्रहः ॥ मयाज्वालाप्रसादेनतस्यव्याख्याभिधीयते ॥२॥ प्रायः पृच्छन्ति यत्रेशास्तद्रव्यगुणसंग्रहः । धारणस्मरणोन्मुखो यथास्याल्लिख्यते तथा ॥१॥ वैद्यराज श्रीचक्रदत्तजी सर्व साधारणके ऊपर कृपा दृष्टि कर द्रव्य गुण वर्णन करनेकी इच्छासे कहते हैं कि, मधुरादि रस और यावत्पदार्थ हैं वे सब द्रव्य कहलाते हैं उन सब द्रव्योंमें गुण दोष रहते हैं वे गुण दोप जानकर प्राणी उनका धारण स्मरण करे तो परम सुखपाता है आरोग्यता होतीहै इसीकारण में यथा योग्य उनको लिखता हूं तात्पर्य यह है कि जब द्रव्य गुणके पूछनेपर उसे जानकर अनुकूल आहार विहार करनेसे मनुप्य चिरकालतक आरोग्य रह सकता है इस कारण उसकी जिज्ञासा करना सबको उचित है उन सबके उपकारके निमित्त न बहुत विस्तार और न बहुत संक्षेपसे में द्रव्यगुण लिखताहूं ॥१॥ अथ मधुररसगुणाः। मधुरो धातुविवईन आयुर्वलवर्णतृप्तिकृत्कण्ठ्यः । सन्धानकृन्मुसादिहादकरः स्निग्धगुरुशीतः ॥ २॥ सम्पूर्ण रसोंमें आयुप्यादिके गुण योगसे मधुररस प्रथम उञ्चारण कियाई, इस कारण पहले उसीके गुण कहे जातेहैं।
(२) द्रव्यगुणः। | मधुररस धातुका बढानेवाला, आयुर्वल वर्णका करनेवाला कण्ठ का हित करनेवाला, घ्राण जिह्वा कंठ ओष्ठका, तथा उरक्षत मुखका सन्धान करनेवाला, चिकना, भारी और ठंडाहै, इस कारण वात पित्तकाभी जीतनेवालाहै, शीतलपन इसमें स्वाभा- विकहै, कहीं उष्णभी होजाताहै, सो संयोगसे होताहै, जैसा | वरकमें लिखाहै 'मधुरंकिभिदुष्णस्याद्यथाचानूपमामिषम्' मधुर रस अनूप देशके मांसको समान कुछ गरम है. यद्यपि निर्माण होनेसे रसोंमें शुण नहीं, परन्तु उपचारसे द्रव्यगुणही रसोंमें | निर्देश किये जाते हैं ॥२॥ अम्लोरुचिदीप्तिकरो मन इन्द्रियबोधनो हृदयत्तपो । वातार्जवकृदल्यः कण्ठदहः स्निग्धलघुरुष्णः ॥३॥ अम्लरस रुचिकरनेवाला, दीप्तिकारक, मन इंद्रियको योधन करनेवाला, हृदयको तृप्तिकारक, पवनका अनुलोम करनेवाला, बलकारक,कण्ठमें दाह करनेवाला, स्निग्ध लघु और उष्णहे ॥३॥ लवणः केदन पाचनो दीपनो विच्छेदनः सरस्तीक्ष्णः । कफविष्यन्दीरुचिकृत स्निग्धगुरूप्णो मुसविशोधी un लवण रस केदकारक, पाचक, दीपन, भग्नकारक, सारक, तीक्ष्ण, कफ सावक, रुचिकारक, स्निग्ध, गुरु, उष्ण, मुखका शोधन करनेवाला है, सँधेमें शीतलता जलकी अधिकतासे है और ' काम्ललवणा आग्नेया इति सुश्रुतोक्तः ॥ ४ ॥ कदरास्वंशोधयतिघ्राणाक्षिविरेचन क्रिमीनहन्ति । रसनोदेगकृदुष्णोलघुरूक्षःकुटहारीच ॥ ५ ॥ कटु रस मुख शोधक नासिका नेत्र का विरेचक, कि- मिहारी, जिद्दाको उद्वेग करने वाला, उप्ण, लघु, ससा, रुष्ट हरनेवाला है ॥५॥ तिक्तोनरोचते स्वयमरोचकनो विपनश्च । दीपनपाचन शोधन रूतः शीतोलघुश्चापि ॥ ६॥ N भाषाटीकासमेतः। (३) तिक्त रस स्वयं नहीं रुचताहै, परन्तु अरुचि आर वि- पको दूर करताहै, दीपन, पाचन, शोधन. करने वाला, शीतल और हलका है ॥ ६ ॥ तुवरोहिमगुरुरुक्षः स्तम्भीशमनश्च पीतनोग्राही। व्रणपाकार्तिकेदान्निहन्ति कण्ठञ्चवनाति ॥७॥ कपाय रस ठंडा भारी रूखा स्तम्भन करनेवाला, शमन कारक, प्राही, प्रणपाक, दुःख, केद, को दूर करनेवाला और कण्ठ को बांधनेवालाद और 'सक्षः शीतो लघु श्चेति । ऐसा जो चरक में लिखाहै और यह गुरु लिखाहै सो विरोध नहीं आसक्ता अकारका प्रश्लेष करने से अलघु होकर भारी काही अर्थ होताहै, वाग्भट्टमें भी लिखा है " कषायाकफपित्तनो गुरु बस्ति विशोधनः ॥ हरीतकी को जो टप्ण लिखाहे और भेदक लिखाहै वह अपवादतासे जाना उत्सर्गतासे नहीं ॥ ७ ॥ शीत कफमारुतकृद्धीय गुरुपित्तनाशनं वल्यम् । उष्णंकफवातहरं पित्तकरं लघुवृष्यञ्च ॥ ८॥ रसके गुणोंक अनन्तर वीर्य कथन करते हैं वीर्य मृदु, ती. क्ष्ण, गुरु, स्निग्ध, लघु, रूक्ष, उप्ण और शीतल इन भेदोंसे आठ प्रकारकाहै, किसी किसीके मतमें शीत और उप्ण इन भेदोसे दो प्रकारका है, शीतरस कफ और पवन का करने वालाहै, गुरु, पित्त नाशक तथा बलकारीहै, उष्ण रस कफ घातका हरने वाला, पित्तकारी, लघु और बल करताहै ॥८॥ शीतं वीर्येणयद्व्यं मधुरं रसपाकयोः। तयोरम्लं यदुष्णञ्च यच्चोक्तं कटुकं तयोः॥ ९॥ जो द्रव्य धीर्यमें शीतल है, वह रस पाफमें मधुर है और उन रस और पाकमें जो अम्ल है, वह वीर्यमें उष्ण जानना और जो द्रव्य रस पाकमें कटु है, वह वीर्यमें उष्ण जानना ॥९॥ कटुर्विपाकः शुक्रनोवद्धविडूवातलोलघुः ।
द्रव्यगुणः।
स्वादुर्गुरुः सृष्टगलोविपाकः कफशुक्रलः।
पाकोऽम्लः सृष्टविण्मूत्रः पित्तकृत् शुक्रनुल्लघुः॥१०॥
अब विपाकका स्वरूप निरूपण करते हैं, जठराग्निके
| योगसे जो रसका परिणाम होता है, उसे विपाक कहते हैं कटु
रसका विपाक वीर्यका नाशक, विष्टाका बांधनेवाला, पवन
का करनेवाला तथा लघु होताहै, स्वादिष्ट पदार्थाका पाक
गुरु, मल निस्सारक, कफ और शुक्र कारक होता है, अम्ल प-
दार्थोंका पाक विष्टाका निकालने वाला मूत्र सारक पित्तकरने
| पाला शुक्र का नाशक और लघु होता है ॥ १० ॥
शालयोमधुराः शीता लघुपाकावलप्रदाः।
पित्तनाल्पानिलकफाः स्निग्धवद्धाल्पवर्चसः ॥ ११ ॥
हेमन्त ऋतुके उत्पन्न हुए धान्य लघु और परिपाक में
पल देने वाले हैं, पित्त नाशक थोडासा वात और कफ करनेवाले
स्निग्ध मल वंधक और अल्पमल बढ़ानेवाले हैं ॥ ११ ॥
रक्तशालिस्त्रिदोपनश्चक्षुष्यः शुक्रमूत्रलः ।
तृष्णानोबलकृतस्वयॊ हद्यस्तदनुचापरे ॥ १२॥
रक्त शालि त्रिदोष दूर करने वाले चक्षुको हितकारक
| मूत्र तथा वीर्यके करने वाले, तृष्णा नाशक बलकारी रवरकारी
| हृदय को हितकारी हैं, दूसरे धान्य गुणोंमें इन से हीन वीर्य
वाले हैं ॥१२॥
पष्टिकोमधुरः शीतो लघुवृप्य त्रिदोपहा ॥ १३॥
सांठीके चावल ठंडे मधुर हलके वीर्यकारी और बि-
दोप नाशक है ॥ १३ ॥
मधुरश्चाम्लपाकश्चत्रीहिः पित्तकरोगुरुः।
बहुमूत्रपुरीपोप्मा विदोपस्त्वेवपाटलः ॥१४॥
ग्रीहि (जो) मधुर अम्लपाकी पित्तकारी और गुरुहें,
बहुत मूत्रपुरीषके करने वाले विदोपकारी उष्ण वीर्य करनेवाले
पाटल धान्य ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेतः।
धान्यं शरद् ग्रीष्म भवं पाकेऽम्लं पित्तकद्रु ॥ १५ ॥
जो शरद और ग्रीष्म में होने वाले धान्य हैं वे पाक
में अम्ल पित्तकारी और गुरु
धान्यं सर्व समातीतं पथ्यं लध्वन्यथानवम् ।
ततःपरं लघुतरं रुक्ष वातप्रकोपणम् ॥ १६ ॥
और एक वर्ष के पुराने होकर सब धान्य पथ्य और लघु
हो जाते हैं और इसके उपरान्त और भी लघु रूक्ष और वात
के कोपकरने वाले हो जाते हैं ।। १६ ॥
दग्धायामवनौजाताः शालयोलघुपाकिनः ।
कपायावद्धविण्मूत्रा रूक्षा श्लेष्मापकार्पणः ॥ १७ ॥
दग्ध पृथ्वी में उत्पन्न हुए धान्य शीन पाकी होते हैं कसेले
विभूत्र के बांधने वाले रूखे, श्लेष्माको दूर करते हैं। १७ ।।
स्थलजाः कफपित्तन्नाः कपायाः कटुकानुगाः ।
किञ्चित् सतिक्तमधुराः पवनानलपईनाः ॥ १८॥
जागल भूमिमें उत्पन्न हुए कफपिनको दूर करते हैं
पचने में चरपरे किश्चित् कडवे मधुर वात तथा अग्निके बढाने
वाले हैं ॥ १८॥
रोप्यातिरोप्यालयवः शीघ्रपाकागुणोत्तराः।
अदाहिनोदोपहरा वल्यामूत्रविवर्द्धनाः ॥ १९ ॥
जो एकवार लगाकर फिर दूसरी जगह लगाये जातेहैं वे
लघु शीघ्र पाक होनेवाले गुणोंमें श्रेष्ठ दाह नहीं करते बलका-
रक और मूबके बढानेवाले हैं ॥ १९॥
शालयश्छिनरूढायहक्षास्ते बद्धवर्चसः ।
तिक्ताकपायाः पित्तनालघुपाका कफापहाः ॥२०॥
जो धान्य एकवार छिन्न करके फिर बढाये गये हैं वे सखे
और मलवर्द्धक हैं तथा तीखे कसेले पित्तनाशक लघुपाकी कफ
नाशक हैं ॥ २०॥
द्रव्यगुणः।
गोधूमःस्थैर्यकृढप्यः स्निग्धःशीतः सरोगुरुः।
सन्धाता बृंहणोचल्यो जीवनोवातपित्तहा ।। २१ ॥
गेहूं स्थिरता करनेवाले, बलकारक, स्निग्ध, शीतल,
सारक और गुरुहँ सन्धान करने वाले बृंहण बलदायक जीवन
दायक वात पित्तके हरनेवाले हैं ॥ २१ ॥
यवः स्वादुः कषायश्च कफपित्त हरोहिमः ।
व्रणेपु सर्वदापथ्यस्तिलपत् पाकतः कटुः ।।
बहुवातपुरीपश्च मेदोवात तृपापहः ।
वृष्योवल्योवद्धमूत्रस्थैर्याग्निस्वरवर्णकृत् ॥ २२ ॥
यव स्वादु कसेला कफपित्त हरनेवाला ठंडाहै ॥ वणोंमें
| तिलकी समान सदा पथ्य है जैसे व्रण के ऊपर तिलका तेल
वात पित्त कफमें हितकारी है इसी प्रकार यवभी सब अवस्था-
| ओंमें व्रणमें हितकारी है जैसा कहा है “तिलवत् यव कल्कंतु
केचिदाहुर्मनीषिणः । अविदग्धंतु शमयद्विदग्धं पाचयत्यपि ॥
पक्कं भिनत्ति मन्यश्च शोधये द्रोपयेदपि" यव काकल्क तिलकी
समान है ऐसा किन्ही माहात्माओंका मत है यह अविदग्ध
व्रणको शान्त करता और विदग्धको पचा देताहे पक्केको फोड
कर शोधन रोपण करदेता है कोई व्रणपर यवका मण्ड सदैव
| अच्छा समझते हैं इसी कारण शुश्रुतमें हित आहित व्रणहित
| वर्ग में यवका पाठ किया है. कोई इसको पाकमें कटु कहते हैं
| कटु पाकित्व होनेसे लटुत्व कहाहै कुक्षिमें बहुत वात और
पुरीषका करनेवाला मेदकी वात निवारणमें समर्थ, तृषानाशक,
वीर्यवर्द्धक बलकारक, मूत्रका बांधनेवाला स्थिरता अग्नि और
स्वरवर्णका करनेवालाहै ।। २२ ।।
श्यामकः शोपणोरूमो वातलः श्लेष्मपित्तहा।
तद्वच्चकडनीवारकोरदूपाः प्रकीर्तिताः॥२३॥
श्यामक ( समा ) सोखनेवाला, रूखा वातकारी श्लेम
पित्तका हरनेवाला है और इसीके समान गुणकारी कंगनी मि-
वार कोदी भी हैं ॥ २३ ॥
भाषाटीकासमेतः।
मुद्गःकपायोमधुरः कफपित्तास्रजिल्लघुः।
ग्राहीशीतः कटुः पाके चक्षुप्योनातिवातलः ।
प्रधानाहरितास्तापल्या मुद्द्वरसाः स्मृताः ॥२४॥
मूंग कसैली मधुर कफपित्त रक्तकी नाशनेवाली लघु
मलरोधक शीतल पचने में कटु नेत्रोंको हितकारी किश्चित वात
वर्धक है उसमें हरी मूंग प्रधान हैं और गकारस बलकारकहै२४
मसूरोमधुरः शीतः संग्राही कफपित्तहा ॥ २५ ॥
मसूर मधुरशीत संनाही और कफपित्त हरनेवालोहे ॥२५॥
मापोबहुमलोवृष्यः स्निग्धोष्णमधुरोगुरुः।
वातमुटुंहणोवल्यो मेदोमांसकफप्रदः ॥२६॥
उडद बहुत मलके करनेवाले बलदायक स्निग्ध उष्ण मधुर
गुरु हैं वातको दूरकरने वाले वीर्य करने वाले बलदायक
| मेदास और कफके बहाने वाले हैं ॥ २६ ॥
राजमापः सरोरुच्यः कफशुक्राम्लपित्तनुत् ।
तत्स्वादुर्वातलोरूशकपायोविपदोगुरुः ॥२७॥
राजमाप सारक रुचिकारक कफीर्य्य तथा अम्लपित्तके
दूरकरनेवाले हैं उनका स्वादवातकारीमरखा कसैला. विपदायक
गुरु है ।। २७ ।।
चणकोवातलः शीतः कफामृक् पित्तपुंस्त्वनुत् ॥२८॥
चना पातकरने वाला ठंडादै कफ रुधिर पित्त और
पुरुपता नाशक है ॥२८॥
सतीलावातलारक्तपित्तना ववर्चसः ॥२९॥
मटर वादी रक्तपित्तका नाश करने वाली, तथा मलको
बांधनेवाली है ॥ २९॥
तुवरी कफपित्तनो कलायश्चातिवातलः ॥३०॥
अरहर कफ पित्त नाशक मलबांधती और अधिक वात
करनेवाली है ॥ ३०॥
मकुष्टः शीतलोग्राही कफ पित्त ज्वरापहः ॥ ३१॥
द्रव्यगुणः।
मोठ शीतल पाही कफ पित्त और ज्वरको हरने वाली है ३१
कुलत्थः कफवातनोग्राहृष्णस्तुवर कटुः ।
शुक्राइमरीगुल्मकासश्वासानाहान् सपीनसान् ।
हन्त्यशोमेदसीहिका रक्तपित्तकरश्चसः ॥ ३२ ॥
कुलथी कफ वात नाशक आही गरम कपाय कटु है वीर्य
पथरी, गुल्म, कास, श्वास, अनाह, पीनस,अर्श, मेदरोग,हिचकी
हरती तथा रक्तपित्तके करनेवाली है ॥ ३२ ॥
वन्यः कुलत्थस्तवच विशेपान्नेत्र रोगनुत् ॥३३॥
इसी प्रकार वनकी कुलथी है वह विशेष कर नेत्ररोग
को दूर करती है ॥ ३३ ॥
काकाण्डोमात्मगुप्ताना मापवत् फलमादिशेत् ॥ ३४ ॥
शुकशिम्बी कोलशिम्बीकामी फल उडदकी समान है ऐसा
जानना ॥ ३४॥
ईपत्कपायोमधुर सतिक्तः संग्राहकःपित्तकरस्तथोष्णः।
तिलोविपाके मधुरोवलिप्ट स्निग्धोत्रणालेपनएव पथ्यः ।
दन्त्योग्निमेधाजननोऽल्पमूत्रस्त्वच्योतिकेश्योऽ
निलहायुरुश्च ॥ ३५॥
कुछ कसेला मधुर तीखा संग्राही पित्तकारक उष्ण और
विपाकमें मधुर ऐसे तिल होते हैं, यह बलकारक, सिग्ध, व्रण
लेपन, पथ्य, दांतोंको हितकारक अग्नि यढानेवाला बुद्धि बढा-
नेवाला थोडा मूत्र लानेवाला त्वचामें हितकारी केशीको
बढानेवाला बात हर और गुरुहे ।। ३५
तिलेपु सव्वेष्वसित प्रधान मध्यासितोहीनतरास्तथान्य।।३६॥
सय तिला में काले तिल प्रधान हैं, श्वेतमध्यम, ॥ और
पीत हरित रंगके गुणों में इससे होनहें ॥ ३६॥
शिम्बास्तुविविधाहक्षावठघ्नाः स्वादुशीतलाः।
विदाहिनौग्निशमनाविज्ञेयाः कफनाशनाः।
शुक्रदुष्टिक्षयकराः कटुपाका प्रमाथिनः ॥ ३७॥
भाषाटीकासमेतः। (९) सब प्रकारके शिम्बीधान्य रूखे वलनाशक स्वादु शीतल होते हैं, यह विदाही अग्निके शान्तकरनेवाले और कफ नाशक जानने, वीर्यकी दुष्टता क्षय करनेवाले पाकमें कटु और मलको बांधनेवाले हैं ॥ ३७ ।। सितासिताःपीतकरक्तवर्णाभवन्तियेऽनेकविधास्तुशिम्बाः । यथोदितस्तेगुणतः प्रधानाज्ञेयास्तथोष्णा रसपाकयोश्च३८ श्वेत काले पीले लाल वर्णके अनेक प्रकारके शिम्बी धान्य होतेहैं, वे यथोक्त कहे हुए गुणसे प्रधानहें वे रसवार्य विपाकके | गुणोंसे एक दूसरेसे श्रेष्ठहैं अर्थात, कालेसे श्वेत पीलेसे काले, और कालेसे पीले गुणमें श्रेष्ठ हैं, और रसपाकमें उणहैं॥ ३८॥ सहाव्यं मूलकजाश्चशिम्बाः कुशिम्बवल्लीप्रभवाश्चशिम्वाः। ज्ञेयाविपाके मधुरारसेच बलप्रदाः पित्तनिवईणश्च ॥३९॥ मुद्गपर्णी माषपर्णी मूलकशिम्बी कुशुमवल्लीसे उत्पन्न | हुए शिव यह विपाकमें मधुर रसवाले जानने, बल देनेवाले, तथा पित्तके दूर करनेवालेहै ॥ ३९ ॥ विदाहवन्तश्च भृशं विरुक्षा विष्टभ्य जीय॑न्त्यनिलप्रदाश्च । रुचिप्रदाश्चैव सुदुर्जराश्च सर्वैस्मृता वैदलिकाश्च शिम्बाः४० यह विदाही अत्यन्त रूखे देरसे जीर्ण होनेवाले, वात वर्द्धक रुचि देनेवाले देरमें जीर्ण होनेवाले, वैदलिक अर्थात् | गीले शिम्बी धान्य इतने गुणयुक्तहैं ॥ ४० ॥ पष्टिकायवगोधूमा लोहितायेच शालयः । मुद्दाढ़कीमसूराश्च धान्येपु प्रवराः स्मृताः॥११॥ सांठी जो गेहूँ लाल चावल मंग आढकी मसूर यह धान्यों में श्रेष्ठ कहे है ॥४१॥ कफवातहरस्तीक्ष्णः सिद्धार्थोरक्तपित्तकृत् । लिगूधोष्णाक्रिमिकुष्टनाकटुकोरसपाकतः ॥ १२ ॥ कफ वातको हरनेवाला तीक्ष्ण रक्त पित्तको करनेवाला
(१०)
द्रव्यगुणः।
.
श्वेत सरसों होताहै, यह स्निग्ध उष्ण कृमि और कुष्ठको दूर
करनेवाला, रसपाकमें कटुहै ॥ ४२ ॥
तद्गुणाराजिकावाच्यात्तद्गणोऽन्योपिसर्पपः ।
रसेपाकेच कटुकाकुसुम्भः कफनाशनः ॥ १३ ॥
वही गुणराईमहें यही गुण दूसरे प्रकारके सरसोमें होतेहैं
कुसुम्भ रस पाकमें कटु और कफ नाशी ॥ ४३ ॥
अनावं व्याधिहतमपागतमेवच ।
अभूमिज नवञ्चापिनधान्यं गुणवत् स्मृतम् ॥ १४॥
वे ऋतु में उत्पन्न हुए व्याधिसे मारे हुए कच्चे ऊपर अपत्य-
कादि विपली भूमिमें उत्पन्न हुए और नये धान्य गुणवाले नहीं
होतेहैं ॥ ४४ ॥
यवगोधूममापाश्च तिलाश्चाभिनवाहिताः।
पुराणानीरसारूक्षानतथार्थकरामताः।
विदाहिगुरुविष्टम्भिविरूढं द्वाददूपणम् ॥१५॥
इति धान्यवर्गः।
जो गेहूं उड़द तिल यह नये अच्छे होतेहैं यह पुराने पड़-
कर नीरस-सूखे होकर उतने गुण युक्त नहीं रहतेहैं, और अंकु-
रित हुए धान्य विदाहि भारी मलरोधक, विरूद्र तथा दृष्टिको
दुषण करनेवाले हैं ॥४॥
इति धान्यवर्गः।
अथमांसवर्गः।
सव्वं वातहरं मांस वृष्यं वल्यं स्मृतंगुरु ।
प्रीणनं बृहण हृद्यं मधुरं रसपाकयोः ॥१॥
संपूर्णमांस वात हारक, वीर्य वर्द्धक, बलवर्द्धक तृप्ति कारक
मारी हृदयको हितकारी रस तथा पाकमें मधुरहें ॥३॥
हरिणः शीतलोवद्धविण्मूत्रोदोपनोलघुः।
मधुरोमधुरः पाके सुगन्धिोपनाशनः ॥२॥
भाषाटीकासमेतः।
(११)
हरिणका मांस शीतल मलबन्धक मूत्ररोधक दीपन लघुहै,मधुरहे
पाकमें भी मधुर सुगन्धिका करनेवाला त्रिदोष कानाशकहे ॥२॥
कपायोमधुरोधः पित्तामृक् कफवातहा ।
संग्राहीरोचनोवल्यस्तेपामणोवरापहः ॥ ३॥
काले हिरणका मांस कसेला मधुर रक्तपित्त निवारक कफ
निवारक, हृदयको हितकारी संग्राही रुचिकारक बलदायक
ज्वरका हरनेवालाहै ॥ ३ ॥
शशःस्वादुःकपायश्चलघुःपित्तकफापहः ।
नातिशीतलवीर्य्यत्वाद्वातसाधारणोमतः॥४॥
खरगोशका मांसस्वादिष्ट, कसैला, लघुपित्त, और कफका
| हरनेवाला है, वीर्य करनेले अति शीतल नहीं है, वातमें
साधारणहै ॥ ४ ॥
नातिशीतगुरुस्निग्धं मांसमाजमदोपलम् ।
शरीरधातुसामान्यादनभिष्यन्दिवृंहणम् ॥६॥
परेका मांस अधिक शीतल नहीं है, भारी स्निग्ध और
दोष रहितहै, अभिप्यदि, किंचित् उष्ण और धातु साम्य-
| कारकहै ॥ ५ ॥
मेषस्य मधुरं मांस पित्तश्लेस्महरं गुरु ॥६॥
मेषकामांस मधुर पित्त और लेप्माकाजीतनेवालाहै भारी है।
मेदः पुच्छोद्भवं वृष्यमौरभ्रसदृशं गुणैः ॥ ७॥
मेद पुच्छनाम मेषका मांस अर्थात् पुच्छ देशमें लम्बा यमानं
मांसपिण्ड पुरुषत्वका बढानेवाला,गुणों में बकरेकीसमान है ॥२॥
माहिपं तर्पण वृष्यं स्निग्घोष्णं मधुरं गुरु ।
निद्रापुंस्त्ववलस्तन्यवर्धनमांसदाढर्यकृत् ॥८॥
महिपका मांस तृप्तिकारक, बलकारक, स्निग्ध उष्ण और
| मधुर तथा भारी है, निद्राकारक पुरुषता बल और स्तनों में
दूध बढानेवालाहै, तथा शरीरके मांसको दृढ़ करनेषालाहै ॥८॥
(१२)
द्रव्यगुणः।
शुष्ककासश्रमात्यग्नि विषमज्वरपीनसान् ।
काश्य केवलवातांश्च गोमांसं सन्नियच्छति ॥९॥
सूखी खांसी श्रम अग्नि विषम ज्वर पीनस कृशता और
केवलबात रोगोंको गोमांस दूर करताहै ॥९॥
हयमांसं वलकरमुष्णं मारुतनाशनम् ॥१०॥
घोडेका मांस, बलकारक, उप्ण बातका नाशकरनेवाला है १०
गवयस्यापिमांसन्तु स्निग्धंकासनिवर्हणम् ।
रसेपाकेच मधुरं व्यवायस्यतुवर्द्धनम् ॥ ११ ॥
गवयका मांस स्निग्ध और कास रोगको दूर करने वालाहै ॥
रस और पाकमें मधुर तथा वीर्यको बढानेवालाहै ॥ ११ ॥
खनिमांस कफघ्नन्तु कपायमनिलापहम् ।
पैत्र्यपवित्रमायुष्यं वद्धमूत्रविलक्षणम् ॥ १२ ॥
गैंडेका मांस कफ नाशक कसैला अनिल रोगका दूर
करनेवालाहै, पितरोंका हित कारक अवस्था स्थापक, मूत्र
रोधक और रूखाहै ।। १२ ॥
वराहपिशितंवल्यंरोचनवेदनंगुरु ।
स्नेहनं बृंहणवृष्यं श्रमन्नमनिलापहम् ॥ १३ ॥
वराहका मांस बलकारक, रोचक, स्वेद कारक, भारी है
स्नेहन, पुरुषत्व कारक,यलकारक,श्रम और वात नाशक ।।१३॥
लावोलघुःकटुाहीस्वादुःशीतस्त्रिदोपनुत् ॥ १४ ॥
लवापक्षीकामांस लघु कटु ग्राही स्वादु शीतल और
त्रिदोषका दूर करनेवालाहै ॥ १४ ॥
तित्तिरिः सर्वदोपघ्नोग्राहीवर्णप्रसादनः।
ईपद्रूष्णमधुरोवृष्योमेधाग्निवर्द्धनः ॥ १५ ॥
तीतरका मांस सब दोषका दूर करनेवाला माही और
वर्णका प्रसन्न करनेवालाहे कुछ गरम मधुर बल वर्द्धक बुद्धि और
अग्निका बढ़ाने वालाहै ॥ १५ ॥
भाषाटीकासमेतः।
(१३)
.
पित्तश्लेष्मविकारे सरक्तेषु कपिञ्जलाः।
मन्दवातेयु शस्यन्ते शैत्यमाधुर्यलायचात् ॥ १६॥
कपिञ्चल (गोरातीतर) का मांस ॥ पित्तकफके विका
रमें रक्त तथा मन्दवातमें शीत मधुर और लघु होनेसे हित
कारीहै ॥ १६॥
ईपदुष्णागुरुस्निग्धाहणावर्त्तकाःस्मृताः ॥ १७॥
कुछ गरम स्निग्ध और बृहण वर्तकका मांस होताहै ।। १७ ॥
ककरालघवोहयास्तथाचैवोपचक्रकाः ।
वातपित्तहरावल्या मेधाग्निवलवर्द्धनाः ॥१८॥
ककर लवाकी समान कपिजल (तीतर ) से कुछ स्थूल
| कामांस लघु,हृदयको हितकारक होताहै, चकवा और उपचक्रके
मांसभी इसी प्रकार वात पित्तके हरनेवाले बुद्धि अग्निके बढा-
नेवाले हैं ॥ १८ ॥
वहींदृक्श्रोत्रमेधानिवयोवर्णस्वरायुपाम् ।
हितोचल्योगुरुश्चोष्णीवातघ्नोमांसशुक्रलः ॥ १९ ॥
मोरकामांस दृष्टि श्रोत्र बुद्धि अग्नि क्यवर्ण स्वर आयुका
| बढानेवाला हितकारी बल दायक भारी उष्ण वात नाशक मांस
| और वीर्य वर्द्धकहै ॥ १९ ॥
पारावतोगुरुः शीतोरक्तपित्तहर स्मृतः।
रसेपाकेच मधुरःकपायोविपदोपिच ॥२०॥
कबूतरका मांस भारी शीतल रक्तपिक्त हरनेवाला है,
रसपाकमें मधुर कसेला तथा विषदाताहै ॥ २० ॥
तेभ्योलघुतरा किञ्चित् कपोतावनवासिनः।
शीता संग्राहिणश्चैव सल्लमूत्रकराश्यते ॥ २१ ॥
जंगली कबूतरके मांसके गुण कुछ उनसे न्यूनहैं, वे ठंडे
|संग्राही और स्वल्प मूत्र कारक हैं ॥ २१॥
जंगली पाण्डु वर्णका कपोत (गयदासकामत ) कसला
स्वादु और नूनखराहे ॥ २१॥
द्रव्यगुणः।
कपायः स्वादुलवणा गुरुकाणकपोतकः ॥२२॥
वनके मुरगे का मांस स्वेद स्वर और बल कारक है ।। २२ ।।
कुकुटोहणो वन्यः स्वेदस्वरवलापहः ।
स्निग्धोष्णोनिलहावृष्योग्राम्यस्तद्वद्गुरुस्तुप्तः ॥ २३॥
और माम्य मुरगेका मांस स्निग्ध उप्ण वात नाशक वृप्य
| और भारीहै ॥ २३ ॥
कुलिङ्गोमधुरः स्निग्धः कफशुक्रविवर्द्धनः ।
सन्निपातहविश्मकुलिंगस्त्वतिशुक्रलः ॥ २४ ॥
कुलिंग चिडियाकामांस मधुर स्निग्ध कफ और वीर्यका
बढाने वाला सन्निपातका हरने वालाहै और घर का कुलिंग
अधिक वीर्य करताहै ॥ २४ ॥
शुकमांसं कपायाम्लं विपाकेरूक्षशीत्तलम् ।
शोपकासक्षयहितसंग्राहिलघुदीपनम् ॥२५॥
तोते का मांस कसैला अम्ल विपाकमें सखा और शीतल
है सोप रोग, खांसी, क्षयमें हितकारक संमाहि लघु और
दीपनहे ॥२९॥
गुरूष्णस्निग्धमधुराः स्वरवर्णवलप्रदाः ।
बृंहणाः शुक्रलाश्वोक्ता हंसाः पवननाशनाः ॥२६॥
इंसोंकेमांस भारी स्निग्ध मधुर स्वर वर्णवलके देनेवाले,
| बृंहण वीर्यवर्द्धक वातके हरनेवालेहैं ॥ २६ ॥
शराविककादम्बचनाकाः पवनापहाः ।
स्निग्धाःसृष्टमलावृप्या रक्तपित्तहराहिमाः ॥२७॥
शरारी और बक कलहंस नलाका का मांस वात जित
स्निग्ध मल सारक बल कारक रक्त पित्त हरनेवाला और
शीतलहै ।। २७॥
कूर्मादयः स्वादुपाकरसावल्यानिलापहाः।
शीता स्निग्धाहिताः पित्तेवर्चस्याः श्लेष्मवर्द्धनाः ॥२८॥
भाषाटीकासमेतः। कूर्मादिक स्वादुपाक रसवाले बलकारक वातजित शीतल, स्निग्ध, हितकारी, पित्तमें हितकारी मल कारक श्लेप्मवर्द्धकहैं२८ कृष्णः कर्कटकस्तेषां वल्यः कोष्णोऽनिलापहः । शुक्रसन्धानकृत् सृष्टविण्मूत्रोऽनिलपित्तहा ॥२९॥ काला कैंकडा बलकारक कुछ उष्ण, वातजित् वीर्यका सन्धान करने वाला विष्टामूत्रका उत्पन्न करता वात पित्त हरनेवालाहे ॥२९॥ गोधाविपाकेमधरा कपायकटुकारसे । वातपित्तप्रशमनीबृंहणी वलवद्धिनी॥१॥ गोधा ( गोय) का मांस पाकमें मधुर कसेलाहै रसमें कटुहै वातपित्तका शान्त करनेवाला बृंहण और बलको बढानेवाला है शल्यकः स्वादुपित्तनोलघुशीतोविपापहः॥२॥ शल्यक (सेही) कामांस स्वादु पित्त का नाश करनेवा ला लघु शीतल और विषका नाशकहै ॥ २ ॥ मूपिकोमधुर-स्निग्धोव्यवायीशुक्रवर्द्धनः ॥३॥ मूषक का मांस मधुर स्निग्ध सब शरीर में व्याप्त होक- र पकनेवाला तथा वीर्यका बहाने वालाहै ॥ ३ ॥ दुर्नामानिलदोपनाः क्रिमिदूपीविपापहाः । चक्षुष्यामधुरा पाके सपा मेधानिवर्द्धनाः॥४॥ दुर्नाम ( बवासीर ) वात दोषका हरनेवाला, कृमि दूर करनेवाला, विष का नाशक है, नेत्रोंको हितकारी पाकमें मधुर | बुद्धि और अग्निका बढ़ाने वाला सर्पका मांस होता है ॥ ४ ॥ जंघालावातपित्तना स्तीक्ष्णापस्तिविशोधनाः। कपायमधुराश्चैव लघनोबलवर्दनाः ॥६॥ मांस दो प्रकारके होते हैं, जागल और अनूप, जागल वर्ग आठ प्रकारकाहै, जहाल (शीघ्रगामी हिरण आदि ) विष्किर (चोंच चरणसे वखेरकर खानेवाले, वतक मोर मुरगा आदि) प्रतुद (यहुत प्रकार प्रहार करनेवाले मैना भृगराजतो.
(१६)
द्रव्यगुणः।
ते आदि, (गृहावासी सिंहव्याघ्रादि) प्रसह्य (हठसे बैंचकर
खानेवाले काक कुररकङ्क गृध्रादि) पर्णमृग ( पत्तेवाले वृक्षोमें
विचरनेवाले वानर वनमानस आदि वृक्ष मूषिक आदि (विले-
शय शल्यक गोयमूसा आदि) ग्रामचराः (गांवमें रहनेवाले
छागमेपादि) और अनूप पांच प्रकारकाहै कूलचर (पानीके
समीपमें फिरनेवाले, हाथी गवय महिष आदि) (प्लव जल में तैर-
नेवाले हंस सारस क्रौञ्च चकवाचकवी आदि ) कोपस्थ ( कोषमें
स्थित होनेवाले शंखशुक्ति शम्बूक आदि) पादवन्ताः (चर-
णवाले कूर्म कुंभीर कर्कट आदि) और मत्स्य प्रसिद्ध हैं जाङ्गाल
जीवोंका मांस वात पित्तका दूर करनेवाला तीक्षण तथा वस्तीका
शुद्ध करनेवालाहै,कसेला मधुर लघु और बलका बढाने वालाहै५
विष्किरामधुराः शीता कपाया लघुपाकिनः ॥६॥
विकिर जीवोंका मांस मधुर शीतल कसेला लघुपाकीहै॥६॥
प्रतुदाः कपायमधुराः श्लेष्मपित्तहराहिमाः।
वद्धमूत्रमलारुक्षाः फलाहारानिलावहाः ॥७॥
प्रतुदजीवोंका मांस कसेला मधुर कफ पित्तका हरनेवाला
| ठंडाहे, मूत्रमलका बांधने वाला रूखाहै फलका आहार पवनका
करनेवालाहै ॥७॥
गुहाशयावातहरा नेत्रगुह्यविकारिणाम्॥
हितागुरूष्णमधुराः स्निग्धामांसाशिनोधिकम् ॥ ८ ॥
गुहामें शयन करनेवाले जीवोंका मांस वात हारक नेत्र
तथा गुह्य स्थानमें विकार करनेवालाहै हितकारी गुरु गरम
मधुर स्निग्धता यह अधिक करताहै ॥८॥
प्रसहाः स्वादुवीर्योष्णास्तेपां मांसाशिनस्तुये।
तेशोपभस्मकोन्मादे हिताः क्षीणेविशेषतः ॥९॥
मसह जीवोंका मांस स्वादुवीर्यमें उप्प जो इनका मांस
| खातेहैं उनका शोप भस्मक उन्माद और क्षीण रोग विशेष
करके दूर होताहे ॥९॥
भाषाटीकासमेतः।
(१७)
हुकशुकास्त्रहितः पर्णमृगः स्वादुर्गुरुस्तथा।
सृष्टमूत्रपुरीपश्च कासार्शः श्वासनाशनः ॥ १० ॥
पर्ण मृगवाले जीवोंका मांस स्वादु और भारीहै मूत्र पुरी-
पका बनानेवालाहे खांसी बवासीर और श्वास रोगका दूर फर-
| नेवालाहै ॥ १० ॥
विलेशयावातहरा वृहणारसपाकयोः ।
मधुरावद्धविण्मुत्रा वीय्योष्णाश्च प्रकीर्तिताः ॥११॥
विलमें शयन करनेवाले जीवोंका मांस वात हारकहै।
रस पाकमें वीर्यकी वृद्धि करताहै तथा यह मांस मधुर विष्टा
मूत्रके बांधनेवाले उष्ण वीर्य कहे हैं ॥ ११ ॥
ग्राम्यावातहराः सर्वे वृहणाः कफपित्तलाः।
मधुरारसपाकाभ्यां दीपनावलवर्द्धनाः ॥ १२॥
ग्राम्य जीवोंका मांस वातका हरनेवाला वीर्य वर्द्धक
कफपित्त का करनेवाला रस पाकमें मधुर दीपन और बलका
बढानेवालाहै ॥ १२ ॥
कूलचरामरुत्पित्तहरावृष्या बलावहाः ॥
मधुरस्निग्धशीताश्च मूत्रलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ १३ ॥
किनारेपर फिरनेवाले जीवोंका मांस वात पित्त हारक
वीर्य वर्द्धक बलकारक, मधुर स्निग्ध शीतल मूत्र सारक तथा
कफ कारकहै ॥ १३ ॥
पूवावृष्याहिमाः स्निग्धारक्तपित्तानिलापहाः।
मृष्टमूत्रपुरीपाश्च मधुरा रसपाकयोः ॥ १४॥
तरनेवाले जीवोंका मांस वृष्य ठंडा स्निग्ध रक्त पित्त और
वात हरताहै मूत्र पुरीषका निर्माता रस पाकमें मधुरहै ॥ १४
कोपस्थाः पादिनश्चैव स्निग्धाः शीतानिलापदाः ।
वर्चस्याः मधुरावृष्णाः पित्तनाः कफकारकाः ॥१५॥
कोशस्थ और चरणवालोंका मांस स्निग्ध शीतल तथा
आग्निका बढानेवालाह, मलकारक मधुर शुक्रकारक पित्तनाशी
और कफकारकहै ॥ १५ ॥
(१८) द्रव्यगुणः। 1 मत्स्याः स्निग्धोष्णमधुरा वातजिन्मललोमनाः । पित्तमांसवलश्लेष्मशुक्राभिष्यन्दकारकाः ॥ १६॥ मत्स्य स्निग्ध उष्ण मधुर वातजित मलके करनेवाला) पित्त मांस बलश्लेष्मा शुक्र और स्वेदका करनेवाला है ॥ १६ ॥ रोहितः सर्वमत्स्यानां वरोवृष्योऽदितात्तिजित् । कपायानुरसः स्वादुतिनोनातिपित्तकृत् ॥ १७॥ सब मछलियोंमें रोहू मछली श्रेष्ठहै यह बलकारक | अदित और दुःखको जीतनेवालोहै. यह रस में कसेली स्वाद | वात नाशक बहुत करके पित्तको नहीं करतीहै ॥ १७ ॥ शकुलोमधुरोरुच्यः कषायोविपंदोलघुः॥१८॥ शकुल (एकप्रकारकी) मछली मधुर रुचिकारक कसेली विषदायक.मधुरहै ॥ १८ ॥ शिलिन्दः श्लेष्मलोवल्योविपाके मधुरोगुरुः। वातपित्तहरोवृष्य आमवातंकरोमतः ॥ १९॥ शिलिन्द मत्स्य श्लेष्मा कारक बलदायक विपाकमें मधुर और गुरुहे, वात पित्तहारक बलकारक तथा आम वातका करनेवालाहे ॥ १९ ॥ आडिमत्स्यो गुरु स्निग्धः स्वादुर्वृष्योवलप्रदः ॥२०॥ आंडी मत्स्य गुरु स्निग्ध स्वादुवीर्य और बलका करनेवालाहै२० इल्लिसोमधुरः स्निग्धः पित्तशेष्मप्रकोपणः। नृणां व्यवायनित्यानां हितोवह्निविवर्द्धनः॥२१॥ इलिस मत्स्य मधुर स्निग्ध पित्त और श्लेष्माका क्रोध करने वाला मनुष्योंके शरीरमें फैलनेवाला हितकारी अनिका बढाने वालाहे ॥ २१ ॥ एलंगः स्निग्धः मधुरोगुरुविष्टम्भिशीतलः ॥२२॥ एलङ्ग मत्स्य स्निग्ध मधुर गुरु विष्टम्भी और शीतलहै।।२२।। पर्वतोमधुरः स्निग्धः कपायानुरसोगुरुः ॥ २३ ॥ पर्वत मत्स्य मधुर स्निग्ध कसेला रसकारक और गुरुहे ।।२३ " भाषाटीकासमेतः। (१९) भाकुटोमधुरोवृष्यः कपायानुरसोगुरुः ॥२४॥ भाकुट मत्स्यका मांस मधुर पुरुषार्थ कारककसैलारसमें गुरुहे२४ पाठीनः श्रेष्मलोवृष्या निद्रालः पिशिताशनः ॥ दूपयेद्रक्तपित्तञ्च कुष्ठरोगं करोत्यसौ ॥२५॥ पाठीन मस्त्य श्लेष्मा कारक पुरुषार्थकारक निद्राकारकहे इसका मांस रक्त पित्तको दूषितकर कुष्ठ रोग करताहे ॥ २५ ॥ वर्मिमत्स्यस्तथावृष्यो मधुरोरसपाकतः ॥२६॥ वमि मत्स्य बलकारक रसपाकमै मधुरहै ॥२६॥ कुलिशः कपायमधुरः कुन्जकः कफपित्तहा ।। २७ ॥ कुलिश मत्स्य कसैला मधुरहै कुब्जक कफ पित्त दूर करताहै२७॥ शृङ्गीतु पातशमनी स्निग्धाश्चष्म प्रकोपणी ॥ २८ ॥ | गृङ्गीवात शान्त करनेवाला, स्निग्ध श्लेष्माका करनेवालाहे२८॥ मद्गुरोमधुरोवृष्योविपाक मधुरोगुरुः ॥ २९ ॥ मद्गुर मत्स्य मधुर प्य विपाकमें मधुर और गुरुहे ।। २९ ।। गुत्थमत्स्योगुरुःस्निग्ध श्वेष्मलोवातनाशनः ॥३०॥ गुत्थ मत्स्य भारी स्निग्ध कफकारी वात नाशक है ॥३०॥ कवय्यःस्निग्धमधुराः चलदङ्गोगडोयथा ॥३१॥ कवय्य मृगका मांस मधुरहै और चलदंग मत्स्य रूखा है३१॥ क्षुद्रमत्स्यास्तुलघवो ग्राहिणोग्रहणीहिताः ॥३२॥ क्षुद्र मत्स्य लघु माही महणी रोगमें हितकारक है ॥३२॥ मत्स्य कूर्मखगाण्डानि स्यादुवाजीकराणिच ॥ ३३ ॥ मत्स्य कछुए और पक्षियोंके अण्डे स्वादु और वाजी कर १३३ चरः शरीरावयवः स्वभावोधातवः क्रियाः। लिंगं प्रमाण संस्कारोमात्राचास्मिन् परीक्ष्यते ॥३॥ मांस भक्षणमें चरजीवोंके शरीरके अवयव स्वभाव धातु क्रिया लिंग प्रमाण संस्कार, मात्राकी परीक्षा कही है, अर्थात देश विशेषसे भक्ष्य विशेपस मृगादिका गुरु लघु पना (२०) द्रव्यगुणः। वर्णन किया है, इस कारण जल चरादि जीवोंकी परीक्षा अवश्य करनी, शरीर अवयवकी परीक्षा करनी जैसा लिखा है कि विहंगोंकी उरु और ग्रीवा विशेषकर गुरु है, साथ मांस सभी भारी, कोड स्कंध शिर स्थान और भी भारी हैं, स्वभाव सबमें जातीय धर्म है, जैसे मूंग लावक कपिजल स्वभावसेही | हलके हैं, धातु शोणित आदि उत्तरोत्तर एक दूसरे से भारीहै, चेष्टा, बहुत चेष्टावाले प्राणी, आलसियों से विशेष हैं, अर्थात | लघुह, लिंगमें पुरुष गुरु और स्त्री लघुहै, हारीतने कहा है, चौपायों में श्री लघुहैं, पक्षियों में पुरुष लघु हैं, जातू कर्णने भी कहाहे वन्ध्याछागी श्रेष्ठहै वहन मिले तो वकरी लेनी, पाराशरकह ते हैं चौपायोंमें स्त्री और विहंगोंमें पुरुष लेना, प्रमाणमें जैसे महा शरीरवाले अपनी जातिमें भारी हैं संस्कार जैसे मांस रसके निदेशमें सुझंतने कहा है स्नेह गोरस धान्य अम्ल फल और जो वस्तु अम्ल युक्त हैं वह यथोत्तर गुरुहैं, ऐसाही चरकमें लिखाहै "गुरूणां लाघवं विद्यात संस्कारात् सविपर्ययम् बीहे लाजा | यथा चस्युः शक्तूनांसिद्ध पिण्डिका" इति संस्कारसे लघु भारी | हो जाते हैं, जैसे भारी धानोंकी खीलें हलकी होतीहैं, लघु सत्तु- ऑकी सिद्ध पिण्डिका भारी होती ( अग्निमें पकाये पिण्ड) मात्राके वशसे हलका भारी और भारी हलका हो जाताहै, | थोडी देनेसे भारी की मात्रा हलकी, और हलकी की भारी होजातीहै, चकारसे अग्निबलसे लघु भारी जानना ॥ ३४ ॥ कृशात्स्वयंमृतान्मांसविपव्याडइतादपि । वालतोयाग्निविछिन्नंरोगिशुष्क नपूजितम् ।। अगोचरभृतंयञ्चमेध्यंवृद्धतथैवच । सिद्धपर्युपितंतद्वदुर्गन्धिग्रथितञ्चयत् ॥ क्रिमिजग्धश्चयन्मांसमायुःकामोविवर्जयेत् ॥ ३५॥ कृशजीवका, स्वयं मृतक हुएका, विषखायेका व्याघ्रादिसे हत हुएका बाल अवस्थाका जल अग्निसे व्याकुलका रोगी तथा शुष्कजीवका मांस अच्छा नहीं होता जो अनूप धन्व देशमे पुष्ट हुआ हो जिसका भेद वह गया हो बनाकर बासी 1 भाषाटीकासमेतः। (२१) हो गया हो जिसमें दुर्गन्धि और गांठ पड़गई हो, जो मांस कीडौं काखाया हो, आयुकी इच्छावाला उसे न स्वाय ॥ ३५ ॥ एभ्योऽन्येषामुपादेयं मांसं दोपविवर्जितम् । लावतित्तिरि सारङ्ग कुरङ्गैःणकपिअलाः॥ मयूर वर्मिकूर्माश्च श्रेष्ठामासगणेयिह ॥३६॥ इससे अन्यदोष रहित मांसको लेना चाहिये, लावा, तीतर सारंग, कुरंग, एणमृग, कपिंजल, मयूर, रोहित. मत्स्य, और कूर्म इनका मांस अच्छा होता है ॥ ३६॥ पोताधानास्तुसर्वेषां सुस्निग्धा लघुदीपनाः। महाप्रमाणागुरवः क्रियावन्तोऽल्पचेटिनः॥३७॥ छोटी मछलियोंके समूह के अण्डे सबके लघु और दीपन होते ह, तथा स्निग्ध होतेहैं महा प्रमाण वाले भारी क्रियावाले और अल्पचेष्टा वाले होतेहैं ॥ ३७ ॥ मत्स्याण्डानि विशेपेण वातपित्तहराणिच । यानिहयरुच्यानि कटुपाकीनिचैवहि ॥ ३८॥ मत्स्यके अण्डे विशेषकर पात पित्त को हरते हैं, यह हृदयको रुचिकारक और कटु पाकीहैं ॥ ३८ ॥ हंसनीजं परं वल्यं बृंहणं वातनाशनम् । पाकेलघुतरं प्रोक्तं सर्वामयविवर्जितम् ॥ ३९ ॥ हंसका अंडा परम बलकारक पुरुषार्थ कारक वात नाशकहै |पाकमें अत्यन्त लघु सर्व रोग वर्जित है ॥ ३९॥ विष्टम्भिनः शुष्कमत्स्या अमल्यादुर्जरामताः। सिदलामहणीदोपशमनी पवनापहा ॥ १० ॥ इति मांसादिवर्गः। सूखी मच्छी मलरोकने वाली, बल रहित देरमें पचतीहै, वि प्टम्भी ग्रहणी दोषको शान्त करने वाली तथा वात नाशकहे ४० इति मांसवर्गः।
(२२)
द्रव्यगुणः।
शाकानिप्रायशस्तानिविष्टम्भीनि गुरूणिच ।
रूक्षाणिवहुवासि सृष्टविणमारुतानिच ॥ १॥
प्रायःसम्पूर्ण श्रेष्ठ शाक विष्टम्भी और मल रोकनेवाले तथा
भारी होतेहैं, रूखे अधिक मल प्रवृत्त करनेवाले वात युक्त होतेहैं ?
पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्द संस्वेदजं तथा ।
शाकं पडूविधमुद्दिष्टं गुरुविद्याद्यथोत्तरम् ॥२॥
पत्र, पुष्प, फल, नाल, कन्द, संस्वेदजके भेदसे शाक छः प्रका-
|रकाहै, यह उत्तरोत्तर गुरु जानना ॥२॥
जीवन्ती सर्व दोषनी चक्षुष्या मधुराहिमा ॥ ३ ॥
जीवन्ती (डोडी) सब दोषोंको दूर करनेवाली चक्षुओंको
हितकारक मधुर है ॥ ३ ॥
तण्डलीयमसृपित्तविपनुत्स्वादुपाकतः ॥ ४॥
चौलाईका शाक रुधिर पित्त विकार विष दूर करनेवाला
पाकमें स्वादु ॥४॥
वास्तूकस्तुसरोहयो दोपनुत्पाकतोलघुः।
सक्षारः क्रिमिहामेध्यो रुच्योऽग्निवलवर्द्धनः ॥५॥
वास्तूक (वथुआ) सारक हृदयको हितकारी दोष नाशक
पाकमें लघुहै, उसका क्षार क्रिमि नाशक, बुद्धि बढानेवाला,
रुचिकारक अग्नि और बलका बढानेवालाहै ॥५॥
लघुपत्रीतुयाचिल्ली सावास्तूकसमामता ॥ ६॥
और लघुपत्रवाला चिल्ली शांक वास्तूककी समान कहाहे ॥
मूलकपोतिका कण्ठ्या सर्व दोपहरीलघुः ।
कटु तिक्तरसाहया रोचनीवह्निदीपनी ॥ ७ ॥
मूलकपोतिका(छोडी मुली)कंठको हितकारक सब दोष नाशक
और लघुहै, रसमें कट और तिक्त हृदयको हितकारक सर्व दोष
हरनेवाली रुचिकारक अग्नि प्रदीप करनेवाली है ॥७॥
महत्तद्रुविष्टम्भितीक्ष्णमामंत्रिदोपकृत् ॥८॥
और पकी हुई मूलीविष्टम्भी तीक्ष्ण आम और त्रिदोषकी
करनेवालीहे ॥८॥
भाषाटीकासमेतः।
(२३)
तदेवस्निग्धसिद्धन्तु वातनुत्कफपित्तकृत् ॥९॥
और ग्रही स्निग्ध सिद्धकी हुई वात नाशक कफ और
पित्तकी करनेवालीहै ॥९॥
शुष्कन्तु शोथशमनंगरदोपहरलघु ॥१०॥
सूखी शोथ रोगकी शान्त करनेवाली विष दोष नाशक
लघु है ॥ १० ॥
तत्फलंकफवातनं तत्पुष्पं कफ पित्तजित् ॥ ११॥
इसका फल कफ वातका नाश करनेवाला और इसका
पुष्प कफ पित्तका जीतनेवालाहे ॥ ११ ॥
हिलमोचीतु कुठनीभेदनीकफपित्तनुत् ॥ १२ ॥
हिलमोच ( हुलहुल) कुष्ठ दूर करनेवालाहे भेदन और कफ
पित्तनाशकहे ।। १२ ॥
उपोदिकासरास्निग्धा वल्याशेष्मकरीहिमा।
स्वादुपाकरसावृष्या वातपित्तमदापहा ॥१३॥
उपोदिका (पोई)सारकहै स्निग्ध वल और श्लेप्माकी करने
वाली है पाकमें स्वादु रस युक्त वलकारक वातपित्त मदकी दूर
करनेवाली है ॥ १३ ॥
सुनिपण्णन्तु संग्राहि अविदाहि विदोपनुत् ॥१४॥
सुनिषष्ण (मुनमुनिया ) संग्राही अदाहक और विदोप
दूर करनेवालीहै ॥ १४ ॥
मारिपोमधुर शीतोविष्टम्भीगुरुपित्तनुत् ॥१५॥
मारिप (मरसा ) मधुर ठंडा विष्टम्भी मारी और पित्तका
दूर करनेवालाहै ॥ १५ ॥
पाठङ्ख्यापद्धविण्मूत्राकफभी तण्डलीयवत् ॥ १६॥
पाल (पालक ) विष्टामूत्रको बांधने घाला कफ नाशक
गुणमें चौलाई की समानहै ॥ १६॥
कासमहानिदाकण्ठ्यास्वादुस्तिक्तविदोपनुव ॥ १७॥
कासमर्द ( कसोंदी ) अग्निदाता कण्ठको हितकारक स्वाह
तीखा निदोष दूर करनेवालाहै ॥१७॥
(२४) द्रव्यगुणः। कालशाक गरश्शेष्म शोथनं दीपनं कटु ॥ १८॥ काल शाक विष श्लेष्म शोथका हरने वाला, दीपन और कटुहे ॥ १८॥ कलायपत्रं मधुरं रूक्षं भेदिचवातलम् ॥ १९॥ कलायपत्र(मटरके पत्त)मधुर रूखा भेदी और वात करताहै १९ सतीलकं त्रिदोषघ्नं कटुपाकं सतिक्तकम् ॥ २० ॥ सतीलक शाक त्रिदोष नाशक पाकमें कटु और तीखाहे २० चाणक दुर्जरं स्वादुकौसुम्भन्तु कफापहम् ॥२१॥ चना कठिनतासे पचनेवाला स्वादिष्ठहै कुसुम्भका शाक कफकानाशकारकहै ।। २१ ॥ पुनर्नवायुग्म मुष्णवीर्य रसायनं सरम् । कफानिलामदुर्नामवनशोथोदरापहम् ॥ २२॥ दोनो पुनर्नवा गरम और वीर्यमें रसायन है तथा सारक है कफ वात आम पिडिका अर्श ब्रन शोथ उदर रोगको दूर करता है।॥ २२॥ कञ्चटं तितकं माहिरक्तपित्तापहं स्मृतम् ॥२३॥ कंचट शाकतीखा माही और रक्तपित्त नाशक है ॥ २३ ॥ चाङ्गेरीतु कपायोष्णा मधुरा वन्दिदीपनी। साम्लावातकफौहन्ति ग्रहण्यशोविकारनुत् ॥२४॥ चांगेरीशाक (अम्लिलोना) कसेला उष्ण मधुर अग्निदीपक है अम्ल सहित वात कफ नाशक ग्रहणी और अर्श विकारको दूर करता है ।। २४॥ चुक्रकंदुर्जर भेदि अम्लं पित्तकरंगुरु ॥२५॥ चूका शाक कठिनतासे जीर्णहोनेवाला भेदी अम्लपित्तका | करनेवाला भारीहै ॥२५॥ कलम्बिका गुरुव॒ष्या कपाया स्तन्यवृद्धिदा ॥२६॥ कलम्बिका शाक भारी वाजी कर कसेला स्तनकी वृद्धि करता है ॥२६॥ .
भाषाटीकासमेतः।
(२५)
सार्पपं गुरुशाकञ्च बद्धमूत्रं त्रिदोपकृत् ॥ २७॥
सरसोंका शाक गुरु मूबवृद्ध कारक तथा त्रिदोष कारकहै २७
ग्रीष्म सुन्दरकस्तितोरोचनः कफपित्तनुत् ॥२८॥
श्रीप्म सुन्दरक (सुन्दरीशाक) तीखा रुचिकारक कफपित्त
नाशक है ।। २८॥
नाडीचः पिच्छिलः शीतो विष्टम्भी वातकोपनः ।
रक्तपित्तहरःस्वादुमण्डूक्याद्याश्च तद्गुणाः ॥२९॥
नाडीच ( नाडी शाक)चिकना शीतल विष्टम्भी वातका
करनेवाला रक्तपित्तका हरनेवाला स्वाइ माण्डूक्यादि उसके
गुण हैं ॥ २९ ॥
पटोलपत्रं पित्तनं नालं तस्य कफापहम् ।
फलं तस्य त्रिदोपघ्नं मूलं तस्य विरेचनम् ॥३०॥
पटोल पत्र पित्तका नाश करने वालाई नाडी उसकी कफ
करने वाली है फल त्रिदोष नाशक और मूल विरेचन करने
वाली है ॥३०॥
निम्बः पित्तकफच्छदिवणहल्लासकुपनुत् ॥३१॥
नीम पित्त, कफ, छर्दि व्रण हल्लास और कुष्ठका नाश करने
वाला है ॥३१॥
पर्पटस्तुं सवेत्राग्रस्तितः पित्तकफापहः ॥ ३२॥
पर्पट वेग अन तीखा कफऔर पित्तका हरनेवाला है ॥३२॥
विदोपशमनीवृष्या काफमाचीरसायनी ।
नात्युष्णा शीतवीर्याच भेदनी कुष्ठनाशिनी ॥ ३३ ॥
काकमाची ( केवया) निदोष शान्त करनेवाली यलकारक
| रसायन है बहुत गरम नहीं शीत वीर्यवाली भेदन करनेवाली
| कुष्ठ नाशक है ॥ ३३॥
वायंवत्सादनीहन्यात्पित्तनी सुवर्चला ॥ ३४॥
वत्सादनी वातकी दूर करनेवाली पित्त नाशक कान्ति
कारक है ॥ ३४॥
(२६) द्रव्यगुणः। राजक्षवकशाकन्तुत्रिदोपशमनलघु । ग्राहिशस्तं विशेपेण ग्रहण्यशोविकारिणाम् ॥ ३५॥ राजक्षवक (सरसोंका)शाक त्रिदोष शान्त करनेवाला पच नेमें हलका है, प्राहीहै विशेष कर ग्रहणी और अर्श विकारको | शान्त करताहै ॥ ३५॥ दीपनाः कफवातनाश्चिरविल्वांकुराः सराः॥३६॥ चिर विल्व (करन) के अंकुर दीपन कफ वात नाशक तथा | सारक हैं ।। ३६ ॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्ष पद्मादिपल्लवाः । कपायस्तम्भनाशीताहिताः पित्तातिसारिणाम् ॥३७॥ न्यमोध (वट) गूलर पीपल पाकर पद्म आदि इनके पत्ते कसैले स्तम्भीशीत पित्त और अतीसार वालौंको हितकारी, ३७ अवल्गुजाकट-पाकेतितापित्तकफापहः ॥ ३८॥ अवल्गज (सोमराजी) पाकमैं कटु तीखा पित्त कफका दूर करनेवालाहे ।। ३८॥ पातीक कटुतीक्ष्णोष्णं मधुरं कफवातजित । रोचनंवद्विजननं जीर्णन्तु पित्तलं मतम् ॥ ३९ ॥ वार्ताक (बैंगन) कटुतीक्ष्ण उप्णा मधुर कफ और वातका जीत- नेवाला रोचक अग्निवलकारकहै जीर्ण होने पर पित्तकारकहे॥३९॥ कण्डूकुष्ठक्रिमिघ्नानि कफवातहराणिच । फलानि बृहतीनान्तु कटुतिकलघूनिच॥१०॥ कटेरीके फल तुजली कुष्ठ कृमिके नष्टकरनेवाले कफ वातके हरनेवाले कटु तिक्त और लघु होते हैं ॥ ४० ॥ कारवेल्वः सकर्कोटो रोचनः कफपित्तनुत् ।। ४१॥ कारवेल कर्कोटी ( काकोड़ी) रोचन कफ तथा पित्तकी दूर करने वाली है॥४१॥ कूष्माण्डकं पित्तहरं वालं मध्य कफापहम् ।
भाषाटीकासमेतः।
(२७)
पक्कं लघूष्णं सक्षारंदीपनं वस्तिशोधनम् ॥
सर्वदोपहरं हृद्यं पथ्यञ्चेतोषिकारिणाम् ।।१२।।
पेठा पित्तहरनेवालाहै छोटा और मध्यका कफ नाशकहै पक्का
लघु उण क्षार युक्त दीपक तथा वस्ति शोधक है सर्व दोष हरने-
| वाला हृदयको हितकारी चित्तके विकार वालोंको पथ्य है ॥४२॥
सक्षारा मधुराहक्षारुच्या वातकफापहा ॥
अश्मरीभेदनी गुबीनाडी कूष्मांडसम्भवा ॥ १३ ॥
क्षार सहित मधुरे रूखे रुचिकारक वात कफ के हर्ता अश्मरी
भेदक गुरु इसप्रकार पेठेकी नाही होती है ॥४३॥
एवोरुक सककोरु सुपके कफवातकृत् ॥
सक्षारं मधुरं रुच्यं दीपनं नातिपित्तलम् ।। १४ ॥
एवा रुक (वडीककडी) कर्कारु (पेठा) यह पकेहुए कफ
और वातके करने वाले क्षार सहित मधुर रुचिकारक दीपन
और बहुत पित्तके करनेवालेनहीं है ॥ १४ ॥
पालं सनील त्रिपुपं तेषां पित्तहरं स्मृतम् ।
तत्पाण्डकपकृजीर्णमम्लं वातकफापइम् ॥ ४५ ॥
नवीन ककही नीलो खोरके समान पित्त हरनेवाली कहींहै,
यह श्वेत वर्णका कफका करनेवाला जीर्ण अम्लवात और कफ
का हरनेवालाहै ॥ ४५ ॥
शीर्णवृतं कमहरं सक्षारं मधुरं हि तत् ।
भेदनं दीपनं हृद्यमानाहाप्ठीलनुल्लघु ॥ १६॥
शीर्ण वृन्त एक प्रकार कातरबूज. कफ कारकक्षार युक्त मधुर
और हलकाहे, भेदन दीपन हृदयको हितकारक आनाह रोग
| टीवन रोग दूर करता है ॥ ४६॥
अलाबुः शीतलारूक्षा गुर्वी वर्च-प्रभेदिनी ॥ ४ ॥
अलावू कटुतुम्बी ठंडी है रूखी है भारीहे मलको भेदनेवालीहर७
अलाचुनाडिकागुनी मधुरा पित्तनाशिनी।
वातश्लेष्मकरीक्षा शीतलामलभेदिनी ॥ १८॥
द्रव्यगुणः।
| तुम्बीकी नाडी भारी मधुर और पित्तको नाश करनेवाली है
तथा वात श्लेष्मको करनेवाली रुखी शीतल अम्ल भेदने-
वाली है ॥४८॥
तिक्तालावुरद्यातु वामनी वातपित्तजित् ॥ १९ ॥
कड़वी तुम्बी हृदयको हितकारक नहीं है, वमनकारक बात
पित्तको जीतनेवालीहे ॥ १९ ॥
कुमुदोत्पलनालास्तु सपुष्पाः सफलाः स्मृताः।
शीताः स्वादुकपायाश्च कफमारुत कोपनाः॥५०॥
कुमुद उत्पलके नाल फूल फल शीतल स्वादु कसेले कफ
और वातके कोप करानेवालेहैं ॥ ५० ॥
हस्तिमध्वालुकादीनि रक्तपित्तहराणिच ।
गुरूणि स्वादुशीतानि स्तन्यशुक्रकराणिच ॥१॥
हरितमधु आलुक आदि रक्त पित्तके हरने वाले हैं भारी
स्वादु शीतल स्तनों में दुग्ध तथा वीर्यके करने वाले हैं ॥१॥
विदारीकन्दो वल्यश्च वातपित्तहरश्च सः।
मधुरोहणोवृष्यः शीतः स्वयोतिमूत्रलः ॥२॥
विदारीकन्द वलकारी धात पित्तको हरने वाला है, मधुर
बलकारक और पित्तहरनेवालाहै, मधुर बृंहण बलकारक शीतल
स्वर और अधिक मूत्रका करने वालाहै ॥ २ ॥
वातपिचहरीवृष्या स्वादुतिक्ताशतावरी ।
महतोसव हयाच मेधानिवलवादिनी ।
ग्रहण्यशोविकारनी वृष्याशीता रसायनी।
कफपित्तहरास्तिता स्तस्याएवाइकुराःस्मृताः ॥३॥
शतावरी वात पित्तकी हरनेवाली, वीर्य वर्द्धक, स्वादु और
तिक्त है, वही अधिक हृदयको हितकारक मेधा अग्नि और
| यलको बढानेवालीहै, ग्रहणी अर्श (बवासीर) के विकारको
दूर करनेवाली, बलकारक ठंडी और रसायनीहै, कफपित्तके
हरनेवाली तथा तीखा उसका अंकुर होताहै ॥३॥
भाषाटीकासमेतः। (२९) तरूट विस शालूक क्रौञ्चादनकशेरुकम् । शृङ्गाटकाडलोट्यञ्चगुरुविष्टम्भि शीतलम् ॥ १॥ तरूट (नीले कमलकी जड़) विस शालूक भैंसीड़ा कोश्चा- दन (घंघोल ) कसेरु सिंघाड़ा और अंकलोट्य भारीहै विष्टम्भ- कारी और शीतलहै ॥४॥ पिण्डालुकं कफहरं गुरु वातप्रकोपणम् ॥६॥ पिंजलू कफका हरनेवाला भारी वातकाकोपकरने वालाहै ५॥ वज्राख्यकन्दः श्लेष्मनः कटुपाकश्च पित्तकृत् ॥६॥ बजाख्यकन्द श्लेष्माका हरनेवाला पाकमें कटु तथा पित्तका करनेवालाई ॥६॥ वेणोः करीराः कफला मधुरारसपाकतः। विदाहिनोनातिवलासकपायाविरूक्षणाः ॥७॥ घाँस काकल्ला कफ कारक रसपाकमें मधुरहै तथा दाह कारक | अति वलकारक नहींह कसेला और रूखाहै ॥ ७ ॥ ऐन्दुकञ्च नदीमापं विपदं गुरुशीतलम् ।। ८ ।। ऐन्दुक वन्दीमान नदीमाप विपदायी भारी और शीतलहर शूरणोदीपनोरुच्यः कफनोविपदोलघुः । विशेपादर्शसां पथ्यो भूकन्दस्त्वतिदोपलः ॥ ९॥ पनकन्द दीपन रुचिकारक कफ नाशक विषय दायक लघु विशेष करके अर्श रोगमें पप्यहै, और जिमीकन्द बहुत दोप करताहै ॥९॥ माणकं स्वादुशीतञ्च गुरुचापि प्रकीर्तितम् ॥ १०॥ मानकन्द स्वादशीतल और गुरुदै ॥ १०॥ कदल्यावलकृन्मूलं वातपित्तापहं गुरु ॥ ११ ॥ केलेकी जड़ बलकारक यात पिन हरनेवाली गुरुहे ॥ ११ ॥ आमवातकरी कच्ची कफकद्वरुपिच्छला ॥ १२ ॥ कची आमघातकी करनेवाली फलकारक गुरु और पिच्छलह १२ द्रव्यगुणः। वाराहकन्दः श्लेष्मनः कटुकोरसपाकतः। मेहकुप्ठकिमिहरो बल्यो वृष्योरसायनः ॥ १३ ॥ बाराहीकन्द श्लेष्माका दूर करनेवाला रसपाकमें कटुहै प्रमेह कुष्ठ कृमिका हरनेवाला बलदायक वीर्य वर्द्धक रसायनहे ॥१३॥ तालस्य नारिकेलम्य खजूरस्य शिरांसिच । कपायस्निग्धमधुरहणानि गुरूणिच ॥ १४॥ ताल नारियल और खजूर के फल कसेले स्निग्ध मधुर वीर्य- कारक भारीहें ॥ १४॥ गुवाकस्य शिरस्तइदिनं मदकारकम् ॥ १५॥ मुवाकका (सुपारी) फल भेदन और मदका करनेवालाई १५ वालं हनावे जीर्ण व्याधितं किमिभक्षितम् । कन्दं विवर्जयेत् सर्व योवासम्यडूनरोहति ॥ १६॥ जो छोटाही ऋतु सम्बन्धी नहो, जीर्ण व्याधियुक्त कीडोंका खायाकंदहो अथवाजो अच्छी प्रकार नउगाहो उसे भक्षणन करें। शणस्यकोविदारस्य कबूंदारस्य शाल्मले। पुष्पं संग्राहिशस्तञ्च रक्तपित्ते विशेषतः॥१७॥ सन कोविदार कर्बुदार (सफेद कचनार ) सेमल इनके फूल खानेमें अच्छेहै, विशेष कर रक्तपित्तमे हितकारीहै ॥ १७ ॥ वृपागस्त्यस्य पुष्पाणि क्षयकासापहानिच ॥१८॥ पृष (अडूसा) और अगस्त्यके फूल क्षय और कासरोगके दूर करनेवालेहे ॥ १८॥ आगस्त्यं नातिशीतोष्णं नक्तान्धानाञ्च शस्यते॥१९॥ अगस्त्यका फूल न ठंडाहे न गरम विशेषकर रतौधे वालको | उपकारीहै ॥ १९ ॥ राजवृक्षस्य निम्नस्य मुष्ककाकांशनस्यच । कफपित्तहरं पुष्पं कुष्पघ्नं कुटजस्पच ॥२०॥ राजवृक्ष नीम मुप्क (मोखावृक्ष ) कार्काशन (वृक्ष) इनके पुस्प कफ पित्तके हरनेवालेहै और कुटजके फूल कुष्ट दूर करतेदे२० भाषाटीकासमेतः। (३१) सतिक्त मधुरं शीतं पा पित्तकफापहम् ॥२१॥ कमल तीखा मधुर शीतल पित्त और कफका हरनेवालाह२१ मधुरं पिच्छिलं खिग्धं कुमुदं ल्हादिशीतलम् ॥२२॥ कुई मधुर पिच्छल चिकनी प्रसन्न कारक तथा शीतल है॥२२॥ सिन्दुवारं जीवनीयंहिमं पित्तविनाशनम् । यथावृक्षं विजानीयात कुसुभस्य गुणागुणान् ॥२३॥ सिन्धुवार (सिम्हालू) निर्गुण्डी जीवनी (काफोडी) ठंडी और पित्तनाशक है जैसा वृक्ष होताहे वैसेही उसके गुण होतेहैं ॥२३॥ उनकास्तु पलालेाकरीपक्षितिरेणुजाः ॥२४॥ सवैसंस्वेदजाः शीताः कपायाः स्वादुपिच्छिलाः ॥ गुरवश्छद्यतीसार ज्वरश्लेष्माभयप्रदाः ॥२५॥ छत्रका पलाल अर्थात् अन्न रहित अन्नकी नाल ईख सूखा- | गोवर और रेणुमें उत्पन्न होनेवाला संस्वेदजशाक शीत वीर्य कषैला स्वादिष्ठ पिच्छल भारी छर्दि अतीसार ज्वर और श्लेप्मा | रोगके करनेवालेहैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ कर्कशंपरिजीर्णञ्च क्रिमिजुष्टमदेशजम् । विवर्जयेत् पत्रशाकं यदकाल विरोहिच ॥ २६॥ कर्कश अत्यन्त जीर्णकोडोंसे युक्त अदेशमें उत्पन्न हुआ शाक पत्र भोजन करना उचित नहीं है अथवा जो अकालमें उत्पन्न हुआ है वह त्यागने योग्य ।। २६ ॥ सतीलो वास्तूकरचुच्छ चिल्लीमूलकपोतिका। मण्डूकपर्णीजीवन्ती शाकवर्ग प्रशस्यते ॥२७॥ सतीला वास्तुरू (कलाय, व धुआ) शिरिआरी (चिड) चिल्ली मूल मण्डूकपर्णी और जीवन्ती यह शाक में अच्छी कही है।॥ २७॥ धान्येषु मांसेप फलेपु चेव शाकेषु चानुक्तमिहाप्रमेयात् ।। भास्वादतो भूतगुणे गृहीत्वा तदादिशेट्रव्य मनल्पबुद्धिा२८ (३२) द्रव्यगुणः। धान्य मांस फल शाक आदिका जो प्रयोग इसमें नहीं कहाहै उसको स्वाद औरभूतगण अर्थात रस और शीतोष्णादिगुणोंको जानकर बुद्धिमान् उसको प्रयोग करें ॥२८॥ शाकं हिनस्तिवपुरस्थि निहतिनेत्रम् । वर्ण विनाशयति शुक्रमथासृजञ्च । ओजः क्षयं प्रकुरुते पलितन्त्वकाले । हन्तिस्मृति गतिमिति प्रवदन्तितज्ज्ञाः॥२९॥ शाक शरीरको नष्ट करताहै हड्डीको जीर्ण करतानेत्रोंको नष्ट करताहै वर्णका नाश करता तथा वीर्यको रुधिरको नष्ट करता है वलका क्षय करता अकालमें वाल पकाता स्मृतिगतिको नष्ट | करताहै ऐसा उस वार्ताके जानेवाले कहते हैं ।। २९॥ शाकेषु सर्वेनिवसन्तिरोगा रोगोहि देहस्यविनाशहेतुः । तस्माद्धैः शाकविवर्जनहि कार्य तथाम्लेषु सएवदोपः ३० इति शाकवर्गः। शाकमें सम्पूर्ण रोग निवास करतेहैं और रोगही देहके नाश करनेका कारण है इसकारण बुद्धि मानोको शाकका सेवन नहीं करना चाहिये और यही दोष खटाईमें भीहोतेहैं ॥३०॥ इति शाकवर्गः । सैन्धवं दीपनं हृद्यं चक्षुष्यं रोचनं लघु । स्निग्धं वृष्यञ्च मधुरं शीतं दोपनमुत्तमम्॥१॥ सेंधादीपन है हृदयको हितकारी चक्षुको हितकारी रुचि- कारक और लघु है स्निग्ध वीर्यकारक मधुर शीतल और दोष का दूर करनेवाला है ॥१॥ सामुदमधुरं पाकेनात्युष्णमविदाहिच । भेदनं स्निग्धमीपञ्च शूलघ्नं नातिपित्तलम् ॥ २॥ समुद्रलवण पाकमें मधुर न बहुत गरम और न विदाहिहै भेदन कुछेक स्निग्ध शूल नाशक और बहुत पित्त कारक नहींह २ भाषाटीकासमेता। (३३) विडं सक्षारतीक्ष्णोष्णं सूक्ष्म दीपनरोचनम् ॥ शूलहदोगशमनं रूक्षं वातानुलोमनम् ॥३॥ विरिया सोंचरलोन क्षार सहित तीक्ष्ण सूक्ष्म दीपन और रुचिकारक है शूल हरनेवाला रोगका शान्त करनेवाला स्खा और वातका अनुलोम करनेवाला है ।। ३ ।। सौवर्चलन्तु वीयाँष्णं विपद कटुकं लघु । गुल्मशूलविबंधनंहृद्यं सुरभिदीपनम् ॥ ४ ॥ सौवर्चल कालानोनवीर्यमें उष्ण विषदायक कटु और लघु होता गुल्म और शूल को चाश करने वाला है हृदयको हित- | कारी सुरभि और दीप्तिका करनेवालाहै ॥ ४॥ सौवर्चलगुणाः कृष्णालवणे गन्धवर्जिताः ॥६॥ सौवर्चलके गुणमें इतना अन्तर है कि कालेनमकमें गंधि नहीं होती है ॥ ५॥ सतितं कटुसक्षारं तीक्ष्णमुत्छेदिचौद्भिदम् ॥६॥ औद्भिद लवण तीक्ष्ण उत्कदि क्षारयुक्त कटु और कड़वा है ६ रोमकं तीक्ष्णमुष्णञ्च व्यवायि कटुपाकिच । वातघ्नं लघुविष्यन्दि सूक्ष्मां विभेदि मूत्रलम् ॥७॥ रोमक नदीमें होनेवाला नमक तीक्ष्ण उष्ण व्यवायि तथा कटु पाकी होता है वात नाशक लघुविप्यन्दि सूक्ष्म मल भेदी और अत्यन्त मूत्रका लानेवाला है ॥ ७ दीपनं पाचनं भेदि लवणं गुडिकायम् । कफवातकृमिघ्नंच लेखनं पित्तकोपनम् ॥ ८ ॥ गुडिका लवण दीपन पाचन और भेदी होताहै कफ बात कृ- मिका नाश करनेवाला लेखन और पित्तका कोप करने वाला है। क्षारास्तुदीपनासर्वे रक्तपित्तकराः सराः। गुल्माग्रिहणीदोपशर्करामविनाशनाः॥९॥--- सम्पूर्णक्षारदीपन रक्तपित्त करनेवाले सारकहें गुल्म अर्श महणी दोष शर्करा और पथरी शर्करारोगके नाश करनेवाले ३ (३४) द्रव्यगुणः। शेयौ वह्निसमौ क्षारौ सर्जिकायवशकजौ । शुक्रश्लेष्म विवन्धाशों गुल्मलीहविनाशनौ ॥ ३० ॥ जवाखार और सज्जीखार अतिके समान जान्ने यह वीर्य और श्लेप्मका बंधन करनेवाले अर्श गुल्म और प्लीह रोगके नाशक हैं ॥१०॥ अग्निदीप्तिकरस्तीक्ष्णप्टकणक्षार उच्यते ॥११॥ टेकण क्षार अग्निका दीप्त करनेवाला है ॥ ११ ॥ आईकं रोचनंहृद्यं कटूष्णं वृष्यमेवच । कफानिलहरं स्वयं विवन्धानाह शूलनुत् ॥ १२ ॥ अदरख रुचिकारक हृदयको हितकारी कटु उष्ण वीर्यवर्द्धक कफवातका हरनेवाला स्वर फरने वाला विबन्ध अनाह और शूल रोगका दूर करने वाला है ॥ १२ ॥ शुण्ठीतु कफवातनी सस्नेहा लघुदीपनी। वृष्योष्णा रोचनीया विपाके मधुराकटुः ॥ १३ ॥ सोंठ कफ और वातकी हरनेवाली स्नेहयुक्त लघु और दीप्ति करने वाली है वीर्यकारक गरम रुचिकारक हृदयको हितकारक पाकमें मधुर और कटु है ॥ १३॥ पिप्पल्यास्वादुशीतागुवी नेप्मप्रकोपणी ॥ १४ ॥ पिप्पली गीली स्वादु शीतल भारी श्लेप्माको कोप करतीहे १४ साशुप्का मधुरापाके वृप्या पित्तप्रसादनी। स्निग्धोष्णादीपनीवातश्लेप्मनुच्छासनाशिनी ॥ १५ ॥ और सूखी हुई पाकमें मधुर बलकारक पित्तकी करनेवाली निग्ध उपण दीप्तिकारक वात श्लेम और अनुच्छसकी नाश कानेवालीहे ॥ १५॥ मरिचं लघुतीक्ष्णोष्णं रुक्षरोचनदीपनम् । रसेपाफेच कटुकं कफ पित्तकोपनम् ॥ १६ ॥ एखी काली मिर्च लघु तीक्ष्ण उप्ण मखी रुचि और दीप्ति- फारफहै, रसपाकमें कटु, कफनाशक पिसका कोप करनेवाली १६ भाषाटीकासमेतः। स्वादुपाक्यामरिचं गुरु श्लेष्ममकोपिच ॥ १७॥ नात्युष्णं नातिशीतञ्च वीर्य्यतोमरिचं सितम् ॥ गीली मिर्च पाकमें स्वादु, भारी कफका कोप करतीहै ॥ १७ ॥ गुणवन्मरिचेभ्यश्च चक्षुष्यञ्च विशेपतः ॥ १८॥ श्वेत मिर्च वीर्यसे न गरमहै न ठंढी यह गुणयुक्त विशेष करके घृतादिके साथ नैत्रोंको हितकारकहैं ॥ १८ ॥ हिंगुतीक्ष्णं कट्टरसं शूलाजीर्णविपन्धनुत् । लघूष्णं पाचनं स्निग्धं दीपनं कफवातजित् ॥ १९॥ हींग तीक्ष्णहै, रसमें कटु, शूल अजीर्ण विवन्ध रोगको दूर करतीहै, लघु उष्ण पाचन स्निग्ध दीपन कफ और वातकी | जीतनेवाली है ॥ १९॥ जीरकं रुचिकृत्सर्वं गन्धाय कफवातजित् । तीक्ष्णोष्ण कटुकं पाके कटुपित्ताग्निवर्द्धनम् ॥२०॥ जीरा रुचिकारक, सुगन्धिवान वात कफका जीतनेवालाहै, तीक्ष्ण उष्ण पाकमें कटु पित्त अग्निका बढानेवालाहै ॥२०॥ यमानी कृष्णजीरश्च ज्ञेयाजीरकपद्गुणैः ॥२१॥ अजवायन और कालाजीरा यह भी जीरे के समान गुणमेंहें २१ धन्याकं कासतृदछर्दिशमनं चक्षुपोहितम् । कपायतिक्तं मधुरं हृद्यं रोचनदीपनम् ॥ २२ ॥ धनियां खांसी प्यास छर्दिका शान्त करनेवाली नेत्रोंको हित- कारकहे कसेली तीखी मधुर हृदयको हितकारक रुचिकारक दीपनहे ॥ २२ ॥ लशुनः क्षारमधुरः पत्रे मधुरपिच्छलः। मध्येकन्देतु तीक्ष्णोष्ण कटुपाकरसः सरः । हृद्यः केश्योगुरुवृष्यः स्निग्धो दीपनपाचनः । भन्मसन्धानकृद्धल्यो रक्तपित्तप्रकोपणः ॥
(३६)
द्रव्यगुणा।
किलासकुष्टगुल्मार्शो मेहकृमिकफानिलान् ।
सहिकापीनसश्वासकासान्हन्ति रसायनः॥२३॥
लहसुन क्षारयुक्त मधुर है, पत्ते मधुर और पिच्छलहैं, मध्यमें
उसका कन्द तीक्ष्ण और उष्ण पाकमें कटु रस और सारक है,
हृदय और केशको हितकारी, बलदायक स्निग्ध दीपन पाचनहे
टूटे अवयवको जोड़नेवाला, बलकारक, रक्तपित्तका कोप करने
| वाला, किलास कुष्ठ गुल्म अर्श प्रमेह कृमि कफ वात रोगहिचकी
पीनस श्वास कास सबका दूर करनेवाला रसायनहै ॥ २३ ॥
पलाण्डुमधुरोवृष्यः कटुः स्निग्धोनिलापहः ।
वल्यापित्ताविरोधीच कफकृद्रोचनोगुरुः ॥२४॥
पलाण्टु (याज नपुर बलकारक कटु स्निग्ध वात नाशक
बलकारक पित्तका अविरोधी कफ करनेवालारुचिकारक गुरुहे२४
ग्राहीगृचनकस्तीक्ष्णो ग्रहण्यशोविकारतुत् ॥२६॥
इति लवणादिवर्गः।
गृञ्जन (गाजर) प्राही तीक्ष्ण महणी और अर्शका विकार
दूर करता है ।। २५॥
इति लवणादिवर्गः।
कपायानुरसंयातिपित्तलंदाडिमंस्मृतम् ।
दीपनीयरुचिकरं हृद्यं वचौविवन्धनम् ॥ १॥
दाडिमी कसेली है बहुत पित्त कारक नहीं है दीपन रुचिका-
रक हदपको हितकारक विटाफी बांधने वाली है ॥१॥
द्विविधतत्तुविज्ञेयं मधुरश्चामलमेवच ।
विदोपनन्तुमधुरमम्लं वातकफापहम् ॥२॥
यह अम्ल और मधुर दो प्रकारफी है मधुर त्रिदोषकी दूर
करने वाली अम्ल (स्वट्टी) वात और कफकी दूर करनेवाली है॥२॥
प्राचीनामलकञ्चैवदोपघ्नं गरहारिच ॥३॥
पुराना पानी आमला दोषनाशक तथा विपदरनवाला है॥३॥
भाशाटीकासमेतः।
कर्कन्धुकोलबदरमामं पित्तकफावहम् ।
पक्कं पित्ता निलहरं स्निापं समधुरंसरम् ॥४॥
कर्कन्धु (वेरी) कोल (वेर ) बदर (घेर) यह फच्चा कफ और
पित्तका करनेवालाहे पका हुआ पित्त वातका हरने वाला स्निग्ध
मधुर सारक है ॥४॥
तच्छुक कफवातघ्नं नचपित्ते विरुध्यते ।
पुराणनृप्रशमनं श्रमनलघुदीपनम् ॥६॥
सूखाहुआ कफ वातका हरने वाला पित्तका विरोधी नहीं है
(पुराने प्यासको शान्त करनेवाले श्रम नाशक लघु और दीपनहें
सौवीरं बदर स्निग्धं मधुरं वातपित्तजित् ॥६॥
सौवीर देशका वेर बहुत स्निग्ध मधुर वात और पित्तका
जीतने वाला है॥६॥
आनं वालं रक्तपित्तकरं मध्यन्तुपित्तलम् ।
पक्कं वर्णकरं रुच्यं मांसशुकवलप्रदम् ॥
पित्ताविरोधिवातघ्नं हृद्यं गुर्खनुलोमनम् ॥ ७ ॥
कच्चा आम रक्तपित्त करने वाला है मध्यम पित्त करने वाला
पक्कावर्ण करने वाला रुचिकारक मांस शुक्र और पलका करने
घाला है पित्तका अविरोधी वात नाशक हृदयको हितकारी
भारी अनुलोमकारक है ॥ ७॥
आम्रपेपी कपायाम्लाभेदनी कफवात्तजित् ॥८॥
आमकी पेषी अमोटी कसैली पातफारक भेदिनी कफवातकी
जीतनेवालोहे ॥ ८॥
आम्रातकं तर्पणञ्च वल्यं मधुरबृंहणम् ।
स्नेहनं श्लेष्मलं शीतं वृष्यं विष्टभ्यजीयति ।। ९ ।।
अंयाहा तप्तिकारक पलवर्द्धक मधुर और बृहण है स्नेहका-
रक श्लेष्माकारक ठंढा बलकारक और देरमै जीर्ण होने
घाला है ॥९॥
(४०) द्रव्यगुणः। कपित्थमांस कंण्ठनं दुशघ्नं ग्राहि वातलम् । मधुरामलकपायत्वात्सौगन्ध्याचरुचिप्रदम् । तदेवसिद्धं दोपघ्नं विपघ्नं पाहिगुवपि ॥२६॥ कैथाकायदा कंठनाशक विषनाशक ग्राही और वातका करनेवालाहे कसेला होनेसे मधुर और अम्लहै और सुगन्धि होनेसे रुचिकारकहै और वही सिद्ध हुआ दोषनाशक विष नाशक आहि और गुरुहे ॥ २६ ॥ जाम्बवं वातलं ग्राहि रूक्षं पित्तकफापहम् ॥२७॥ जम्बू वात कर्ता आही रूखा पित्त तथा कफको दूर कर है२७ तिन्दुकं तुवरं स्वादु गुरुपित्तकफापहम् ॥२८॥ तिन्दुक (तेंदू) कपेला स्वादु भारी पित्त और कफको दूर करनेवालाहे ॥२८॥ स्निग्धं स्वादुकपायञ्च राजादनफलंगुरु ॥२९॥ खजुरकी समान फल (राजादन ) निग्ध स्वादु कसेला और भारी है।॥ २९॥ कपायमधुरं रुक्ष तोदनं कफवातजित् । अम्लोणं लघुसंग्राहि स्निग्धं पित्ताग्निवर्द्धनम् ॥३०॥ तोदन * (वामप्रियफल) मधुर रूखा कफ और घातका जीतने वाला, खट्टा उष्ण हलफा संपादी, चिकना पित्त और | अमिका बढानेवालाहै॥३०॥ अनुपाकिफलं स्वादु वातपित्त विनाशनम् ॥ ३१॥ भनुपाकि (अनुपा ) फल स्वादु पात और पित्तका नाश करनेवालाहे ॥ ३१ ॥ सीरिवृक्षफलं विद्याद्गुरुविष्टम्भि शीतलम् । कपायमधुरं साम्लं नातिमारुतफोपनम् ॥ ३२ ॥ दूधवाले गृक्ष यह गूलर पीपल पाफर आदिके फल भारी विष्टम्भकारक और शीतलहैं, कसैले मधुर अम्ल तथा घातका कोप फरनेवाले नहीं ॥ ३२॥ दक्षिणमें यह नारणाम्टिका नामले पमिद है।
भाषाटीकासमेतः।
(४१)
वाकुलं मधुरं स्निग्धं कपायं विपदञ्चतत् ।
स्थिरीकरचदन्तानां संग्राहि फलमिप्यते ॥ ३३ ॥
वाकुल (मौलसिरी मीठा चिकना कसैला विष्टम्भी शीतलक
|सैला विषदायक और शीतल, दांतोंका स्थिर करनेवाला और
फल इसका माहि है ॥३३॥
परूपकं समधुरं कपायानुरसंलघु |
वातनं पित्तजननमत्यम्लं तदुदाहृतम् ॥ ३४॥
कच्चा फालसा मधुर कसैला रसयुक्त और हलकाहे वातहारक
(पित्तका उत्पन्न करनेवाला और अधिक खट्टाहै । ३४॥
'समधुरं तच्च वातपित्तनिवर्हणम् ॥ ३५॥
और पक्का फालसा मधुर वात और पित्तका दूर करने वाला है ३५
कफानिलहर तीक्ष्णं निग्ध संग्राहिदीपनम् ।
कटुतिक्तकपायोष्णं चालविल्वमुदाहृतम् ॥
तदेवविद्यात्संपर्क मधुरानुरसं गुरुः।
विदाहिविष्टम्भकर दोपकृत् पूतिमारुतम्॥३६॥
कच्चावल कटु तीखा कसेला कफ और वातका हरनेवाला
तीक्ष्ण चिकना संग्राही दीपन कहाहै और यही पका हुआ मधुर
| रस युक्त गुरु है विदाही विष्टम्भ फा करनेवाला दोषका करने-
वाला वात शोधकहै ॥ ३६॥
द्राक्षातु मधुरास्निग्धाशीतावृष्यानुलोमनी ॥
रक्तपितज्वरवासवृष्णादाहक्षयापहा ॥३७॥
दाख मधुर स्निग्ध शीतल बलदायक अनुलोम करनेवाली
है रक्त पिन ज्वर वास तप्णा दाह क्षयकी हरनेवाली है।। ३७ ॥
गोस्तनी या गुरुर्वृष्या द्राक्षासा वातपित्तनुत् ॥३८॥
गोस्तनी (भूरी) दाख भारी बलदायक वातपित्तको दुर
करनेवाली है ॥ ३८ ॥
केश्य रसायनं मेध्यं काश्मयोः फलमुच्यते ॥३९॥
(४२)
द्रव्यगुणः।
वालोंको हितकारक रसायन बुद्धि को बढ़ाने वाला (कम्भारी)
का फल कहा है ॥ ३९ ॥
खरं मधुरं वृष्यं स्निग्धं शोणितपित्तजित् ।
क्षतक्षयापहं हा शीतलं तर्पणं गुरु ॥४०॥
खजूर मधुर वीर्यवर्द्धक स्निग्ध रुचिर और पित्तको जीतने
वाला है क्षत क्षयरोग को दूर करने वाला हृदयको हितकारक
शीतल तृप्ति कारक और भारीहै ॥ ४०॥
मधूकस्यफलं पके वातपित्तप्रणाशनम् ।
तस्य पुष्पं बृहणीयमचं गुरुशीतलम् ॥४१॥
महुपका पका फल वात रक्त विकारका दूर करनेवाला है
उसका पुष्प मद कारक हृदयको अहितकारक भारी और
शीतलहै ।। ४१ ॥
नारिकेलं गुरुस्निग्धं पित्तनं स्वादशीतलम् ।।
बलमांसकरहा बृहणं पस्तिशोधनम् ॥ १२॥
मारियल गुरु चिकना पित्तनाशक स्वादशीतल बलमांस
करनेवाला हृदयको हितकारी वाजीकर वस्ति शोधकहे ॥ ४२ ॥
तालं स्वादुरसं पकं गुरु पित्तविनाशनम् ।
तद्वीजं स्वादुपाकन्तु मूत्रलं वातपित्तजित् ॥ १३ ॥
पका ताल फल स्वादु रसयुक्त भारी पित्त नाशकहे उसका
बील पाको स्यादु मृत्रका अधिक करनेवाला वात पित्तका
जीतनेवालाहे ॥ ५३॥
कदलं मधुरं हृद्यंकपायं नातिशीतलम् ।
वातपित्तहरं रुच्यं वृष्यं श्लेप्मकरं गुरु ॥ १४ ॥
कलेकी फल्ली मधुर दयको हितकारक कसेलोहे यदुत ठंडी
नदाह वात पित्तफी हरनेवाली रुनिकारक धीर्य बर्द्धक कफ
कारक और मारोहै ।। ५८ ॥
श्लेष्मलं मधुरं शीतं मातफफट गुरु ।
पनसं सकपायन्तु निग्धं स्वादुरसं गुरु ॥ १२ ॥
भाषाटीकासमेतः।
(४३)
ल्हेसवेका फल कफकारक मधुर शीतल और भारी है पनस
(कटहल) कसेला चिकनारसमें स्वादु और भारीहै ।। ४५ ॥
पथ्या पञ्चरसांयुष्या चक्षुष्याऽलवणा सरा।
मेध्योष्णादीपनी दोपशोथकुष्ठज्वरापहा ॥४६॥
हरड़ पांचों रसोंसे युक्त चक्षुको हितकारी आयुकी देनेवाली
लवण रससे रहित सारकहै बुद्धिको बढानेवाली गरम दीपन
| दोष शोथ कुष्ठ और ज्वरकी हरनेवालीहै ॥४६॥
धात्रीतद्रिशेपेण वृष्याशीतव वीय॑तः ।
हन्तिवातं तदम्लत्वात पित्तं माधुर्य्यशैत्यतः।
कर्फ कटुकपायत्वात् फलेभ्योप्यधिकञ्च तत् ॥१७॥
इसीप्रकार आमले विशेष करके वीर्यकारक और शीतलहैं।
अम्ल होनेसे वातको हरणकरतेहैं मधुर होनेसे शीत पित्तको
हरतेहैं कहु और कसेला होनेसे कफको हरताहै इसके फलमें
अधिक गुणहैं ॥ ४७ ॥
अक्षभेदनरूक्षोष्णवैश्वर्य क्रिमिनुत्कटु ।
चक्षुष्यं स्वादुपाकञ्च कपायं कफपित्तनुत् ॥ ४८॥
अक्ष (बहेडा) भेदन है सुखा गरम वैश्वर्य कृमिनाशक कटुहै
नेत्रोंको हितकारक पाकमें स्वादु कसैला कफ और पित्तका
नाशकहै ॥४८॥
पथ्यामनातु चक्षुष्यो वातपित्तहरो गुरुः ॥ ४९ ॥
हरड़की गुठली नेत्रोंको हितकारक वात पित्त हरने वाली
भारी है ॥ ४९ ॥
वैभीतकोमदकरः कफमारुतनाशनः ॥५०॥
बहेड़ा मद कारक कफ और वातका नाश करने वाला है ५०
कोलमज्जातु मधुरः कपायः पित्तनाशनः ।
तृष्णायंनिलनश्च धात्रीमजापि तद्गुणः ॥५॥
बहेडेकी मींगी मधुर कसेली पित्त नाशक तृष्णा छदि वात
नाशक है यही गुण आमले की गुठली में हैं ॥५१॥
पियालमज्जामधुरोवृष्यः पित्तानिलापहः ॥५२॥
(५४) द्रव्यगुणः। पियाल (चिरोंजी की गुठली) मींग मधुर बलकारक पित्त वात हरनेवाली है।। ५२॥ यस्ययस्यफलस्येह वीर्य भवति यादृशम् । तस्यतस्यैववीर्येण मज्जानमपिनिर्दिशेत् ॥५३॥ जिस जिस वृक्षका फल जैसा होता है उसी उसी फलकी मींगमें भी वैसा ही गुण होता है ।। ५३ भल्लातकास्थ्यग्निसमं त्वङ्मांसं स्वादुशीतलम् ॥५४॥ भिलावेकी गुठली अग्निकी समान छाल और गूदा स्वादु और शीतल है ॥५४॥ करकिंशुकारिष्ट फलं जन्तुप्रमेहनुत् । रूक्षोष्णं कटुकंपाके लघुवातकफापहम् ॥ ५५॥ करंजुआ टेसू नीमका फल जन्तुओंका प्रमेह दूर करते हैं | रूखे टप्णपाकमें कटु लघुवात और कफको दूर करनेवाले हैं ॥५५॥ तितमीपद्विपहितं विडङ्गं क्रिमिनाशनम् ॥५६॥ वायविडङ्ग तीखी कुछविषमै हितकारी कृमिका नाश | करतीहै ॥ ५६ ॥ फलेषुपरिपकं यद्गुणवत्तदुदाहृतम् । बिल्वादन्यत्र तज्ज्ञेयमामं तदि गुणोत्तरम् ॥२७॥ जो पक्के फलई वेही गुणदायकहें वेलको छोड़कर ऐसा जाना वेल अपक (जो पकाहु आनही ) वही श्रेष्टहै ।। ५७ ॥ व्याधितंक्रिमिजुष्टश्च पाकातीतमकालजम् । वजनीयं फलंसमपर्यागतमेवच ।।५८॥ इति फलवर्गः। व्याधि युक्त कीडे पड़ा हुआ जिसका पाक होचुकाहे जो अकालमें उत्पन्न हुआहै जो पका नहीं है इसप्रकारका फल खाना न चाहिये ।। ५८॥ इति फलवर्गः।
भाषाटीकासमेतः। (४५) धार कारन्तु तोषारं हेमं खाम्बु चतुर्विधम् ॥ १ ॥ धाराका करका * शिशिरमें होनेवाला हिमका होनेवाला (संहतिमान) आकाशका जलचार प्रकारका ॥१॥ धारन्त्वनद्विधाप्रोक्तं गाङ्गं सामुद्रमेवच ॥२॥ उसमें धाराका जल दो प्रकारका गंगाका जल और समुद्रका जलहै और चरकमें जो लिखा कि (जलमेक विधं सर्व पतत्य- न्,नमस्तला ) कि सव जल एकही प्रकारका होताहे यह सत्यहै, तथापि अन्तरिक्षका जल धूली मल विप लूतादि सम्बन्ध से दूषितहो जाताहै, तो सदोष और निर्दोष दो प्रकारका गंगाका निर्दोष और सागरका स दोषहै, गंगाशब्दसे अन्य नदी भी जाना और सागर शब्दसे जलाशयादिभीजाना, सो आश्वि- नमासके विना समुद्रका जलपान करना नहीं चाहिये ॥ २ ॥ येनाभिवृष्टममलं शाल्यन्नं राजतस्थितम् । अक्किन्न मविवर्ण वा तत्पेयं गाङ्गमन्यथा। सामुद्रं तन्न पातव्यं मासादाश्वयुजादिना ॥३॥ कारण कि अगस्त्यके उदय से लूतादि दोष दूर हो जाताहै जिस जल से सींचे हुए शाली धान्य रजतपात्र में स्थित केद रहित निर्मल वर्णके रहें वह जल पान करना चाहिये वही गंगा- | का जल जाना, वही पानके योग्य है और स्नान अवगाहनके योग्य है, इससे विपरीत समुद्र का जल जाना, वह पानके योग्य नहीं है ॥३॥ खाम्बुगङ्गाभव हयं हादिबुद्धिप्रबोधनम् । तन्वव्यक्तरसं सृष्टं शीतं लध्वमृतोपमम् ॥ जीवनं तर्पणञ्चैव तद्वन्नामसभूमिगम् ॥ ४॥ आकाश से गिरा हुआ गंगा जल हृदयको हितकारक आनं- ददायक वृद्धिका प्रबोध करने वाला है, आस्वाद सुखका देने वाला, शीतल हलका अमृतकी समान है, जीवन और तृप्तिका *दिव्य पवन बिजली के योगरे ताडित हो जो जल आकाश से ओले वनफर गिरता है उसे फरफा कहते है.
(४६)
द्रव्यगुणः।
देने वाला है, इसी प्रकार अन्तरिक्ष से भूमिमें आया हुआ
अर्थात् आकाश गुण सम्बन्ध वाली भूमिका जल है ॥४॥
कारक तोयममृतं नेहारं सर्वदोपकृत् ।
अवश्यायभवं रूक्षं चातलं लघुशीतलम् ।।
दाहासृक् पित्ततृट्छदि सक्थिस्तम्भादिपूजितम् ॥५॥
करका ऑले सम्बन्धी जल अमृत रूप है, निहारका जल
सब दोष का दूर करने वाला है और संहती भूत हुए हिमका
| जल रूखा वातकारक शीतल है दाह रुधिर पित्त तृष्णा छर्दि
सक्थि स्तम्भादि में हितकारकहै ॥ ५॥
नादेयं वातलं रूक्ष दीपनं लघुलेखनम् ॥६॥
नदीका जल वात कारक रूखा दीपन हलका और लेखनहै ६
नदेऽभिष्यन्दि मधुरं सान्द्रं गुरुकफावहम् ॥ ७॥
नद शोणभद्र आदिका जल अभिप्यन्दि मधुर घना भारी
| कफका करनेवालाहै ॥७॥
सारसं तुवरं वल्यं तृष्णानं मधुरं लघु ॥८॥
स्वयं निर्मित सरोवरका जल कसेला बलकारक तृष्णा नाशक
मधुर और लघुहै ॥ ८॥
ताडागं पातलं स्वादुकपायं कटुपाकिच ॥९॥
तालावका जल वातकारक स्वादु कसेला कटुपाकीहै ॥ ९ ॥
वाप्यं सक्षारकटुकं पित्तल कफवातनुत् ॥ १०॥
बावड़ीका जल क्षार युक्त कटु पित्तकारक कफ और वातका
दूर करनेवालाहे ॥१०॥
कोपं कफघ्नं सक्षारं पित्तल लघुदीपनम् ॥११॥
कुएंका जल कफ नाशक खारी पित्तकारक लघु और दीपनहे ११
चौडमग्निकरं रूक्ष मधुरं कफकारि च ॥ १२॥
नवीन कुएंका जल अग्निकारक रूखा मधुरऔर कफ करनेवालाहै
नैरं लघुपथ्यञ्चदीपनं कफनाशनम् ॥ १३॥
झरनेका जल हलकाहै पथ्यहै दीपनहै कफनाशकहै ॥ १३ ॥
भाषाटीकासमेतः। (४७) औद्भिदं पित्तशमनं मधुरं न विदाहि च ॥१४॥ नीचे स्थानसे ऊपरको उपलकर निकलता हुआ जल पित्तका शान्त करनेवाला मधुरहै विदाही नहीं है ॥ १४ ॥ वैकिरं लघुसक्षारं श्लेष्मलं वह्निदीपनम् ॥ १५ ॥ वालुकादि विछाकर जलके स्थानसे ग्रहण किया जल हलका क्षार युक्त श्लेष्माकारक अग्नि प्रदीप्त करनेवालाहै ।। १५ ।। केदारं पालवल स्वादुविपाकेगुरुदोपलम् ।। १६॥ केदार और तृणादि से आच्छादित अल्प सरोवरका जल स्वादु पाकमें भारी दोषकरनेवालाहै ॥ १६ ॥ सामुद्रं लवणं विस्त्रं सर्वदोपप्रकोपणम् ।। १७॥ समुद्र का खारी जल आमगधी और सब दोषका कोप करने वाला है ।। १७ ॥ आनूपं वार्षभिष्यन्दि मधुरं पिच्छिलं गुरु । स्निग्धं पतिहरं सान्द्रं जाङ्गलं वार्य्यतोन्यथा ॥१८॥ अनूप देशका जल अभिष्यन्दि मधुर चिकना और भारी है स्निग्ध अग्निका हरने वाला सघन जांगल जल होता है ॥ १८ ॥ साधारणं वारिशीतं दीपनं मधुरं लघु ॥ १९॥ साधारण जल शीतल दीपन मधुर और लघु होता है ॥१९॥ पश्चिमोदधिगाः शीघ्रबहायाश्चामलोदकाः। पथ्याः समस्तास्तानयो विपरीतास्ततोन्यथा ॥ २०॥ जो नदी पश्चिमकी ओर बहती हैं पश्चिम सागरमें जाती हैं, | जिनका जल निर्मल है और शीघ्र वहती हैं उन सब नदियोंका जल पथ्य है, इससे विपरीत अपथ्य है ॥२०॥ उपलास्फासनाक्षेप विच्छेदैः खेदितोदकाः। हिमवन्मलयोद्धताः पथ्यास्ताएवचस्थिराः॥ किमिश्नीपदहृत् कण्ठशिरोरोगान् प्रकुर्वते ॥२१॥ जो जल पत्थरों के आस्फालन आक्षेप विक्षेप से खेदित होता है, जो हिमालय और मलया चलके स्थान गुफासे प्राप्त हुआ
(४८)
द्रव्यगुणः।
है, वे स्थिर जलभी पथ्य हैं कृमि रोग श्लीपद हृदय कण्ठ और
शिरके रोगोंको करताहै ।। २१ ।।
पारियात्रभवायाश्च विन्ध्यसह्यभवाश्चयाः॥
शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ताहेतुः स्लीपदस्य च ॥२२॥
जो गुहाआदि स्थानमें होनेवाले जलहैं जो जल विन्ध्य पर्वत
और सह्य पर्वतमें गुफादिमें स्थितहैं वेशिरो रोग हृदय रोग कुष्ठ
| रोग और श्लीपद रोगके करनेवाले हैं ॥ २२ ॥
रक्षोनं शीतलं ल्हादि ज्वरदाहविपापहम् ।
चन्द्रकान्तोद्भवं वारिपित्तनं विमलं स्मृतम् ॥ २३ ॥
चन्द्रकान्त मणिके प्रभावसे युक्तजल तथा आकाशमें चन्द्र
| किरणले प्राप्त हुआ जल राक्षसकी पीडा निवारण करनेवाला
शीतल आनंद करनेवाला ज्वर दाह विषका दूर करनेवाला
पित्तका नाशक और निर्मलहै॥ २३ ॥
दिवाककिरणैर्जुएं जुटमिन्दुकरैनिशि ।
अरुक्षमनभिष्यन्दि तत्तुल्यं गगनाम्बुना ॥२४॥
जो दिनमें सूर्यकी किरणोंसे युक्तहे और रात्रिमें जिसमें
चंद्रमाकी किरणें पड़तीहैं वह जल रूखा नहीं है अभिष्यन्दता
रहित आकाश जलकी बराबर है ॥२४॥
नारिकेलोदकं वृष्यं स्वादुनिग्धं हिमं गुरु ।
हृद्यं पित्तपिपासानं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ २५ ॥
नारियलका जल वीर्य कारक स्वादु चिकना ठंडा भारीहे
हृदयको हितकारक पित्त और पिपासाका नाश करनेवाला दीपन
| और वस्ति शोधक है ॥२५॥
नारिकेलजलं जीर्ण गुरुविष्टम्भिपित्तकृत् ॥२६॥
नारियलका जल जीर्णहुआ भारी विष्टम्भि और पित्तका करने
वाला है ।। २६ ॥
पालकमुकतोयन्तु तृष्णापित्तास्रजिद्गुरु ॥ २७ ॥
सुगंधवाला भद्रमोथेका जल तृष्णा पित्त रक्तको जीतनेवाला
और भारीहे ॥ २७॥
भाषाटीकासमेतः।
(४९)
तालाम्बु पित्तजिच्छुक्रस्तन्यवृद्धिकरं गुरु ॥२८॥
तालकाजल पित्तका जीतनेवाला शुक्र और दूधकी वृद्धि
करनेवाला भारी है ॥ २८ ॥
मूपित्तोष्णदाहे विरक्तेमदात्यये ।
श्रमलमपरीतेषु तमकेवमयौतथा ॥
ऊर्द्धगे रक्तपित्तेतु शीतमम्भः प्रशस्यते ॥ २९ ॥
शीतल जल मूर्छा पित्तकोप उप्ण दाह विपरक्त मदात्यय अम
| खेद तमक (दुःख) वमन रक्तपित्तके ऊर्द्धगति होने में गुण कारक
कहा है ।। २९ ।।
पार्श्वशूले प्रतिश्यायेवातरोगेगलग्रहे।
आध्मानस्तिमितकोठे शयःशुढे नवज्वरे ॥
हिकायां स्नेहपीतेच शीताम्बुपरिवर्जयेत् ॥३०॥
पसलीका दर्द पीनस वातरोग गलग्रह रोग अफरा कोष्ठ
| स्तम्भ तत्काल शुद्धि नवीन ज्वर हिचकी स्नेहपान इनमें शीतल
जलका पीना वर्जित है ॥ ३० ॥.
उष्णोदकं सदापथ्यं कासश्वास ज्वरापहम् ।
कफवातामदोपघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ ३३ ॥
गरम जल सदा पथ्य है कास श्वास ज्वरका हरनेवाला कफवात
आम दोषका हरनेवाला दीपन यस्ति शोधन करनेवालाहै॥३॥
शृतशीतं विदोपघ्नं यदन्तर्वाप्पशीतलम् ।
शीतीकृतन्तु विष्टम्भि दुर्जरं पवनाहतम् ॥ ३२॥
औटाकर ठंडा किया हुआ जल विदोप नाशक है जो भीतर
वाफसेही शीतल किया गया है वह कोष्ट है और जो पवन
लगनेसे शीतल हुआ है वह दुर्जर और विष्टम्भिहै ॥३२॥
नतत्पय्युपितं देयं कदाचिदपि जानता।
व्यम्लीमवेत् पर्युपितं कफक्लेदि पिपासवे ॥३३॥
(५०)
द्रव्यगुणः।
औटाया जल बासी किसी प्रकार सेवन करना नहीं चाहिये
|बासी जल विरस होजाता है वह कफ क्लेवाले और प्यासको
अहित कारीहै ।। ३३ ॥
शृतंतोयं दिवारात्री गुरु रात्रिशृतं दिया ।। ३ ।।
दिनका पकाया जल रात्रिमें भारी होजाता है और रातका
औटाया दिनमें भारी होजाता है ॥ ३४ ॥
भौमानामम्भसांप्रातः सवेंपां ग्रहणं मतम् ।
तदाहि शैत्यं नैर्मल्यं तीचापा परमोगुणौ ॥ ३५॥
पृथ्वीके जल सब प्रकारके प्रातःकालमें ग्रहण करने श्रेष्ठहैं उस
समय वे शीतल निर्मल गुणों में परम श्रेष्ठ होते हैं ॥ ३५॥
आन्तरीक्षन्तु वसु कौपमौद्भिदमेवच ।
अगस्त्योदयनैर्मल्यात् सर्व शरदिशस्यते ॥
सरस्तडागसम्भूतं हेमन्ते जलमिप्यते ।
कौपचौण्डे वसन्ते तु ग्रीष्मेप्रास्त्रवोद्भिदे ॥
कोपं प्रापि सर्व वा संस्कृतं वारिचेष्यते ॥३६॥
हठ (सिवारभेद ) सिवार कीचड़ आदिसे युक्त जल दोषका-
रक है जो अत्यन्त वायुसे वर्षामें आकाशका जल ग्रहण करना
चाहिये जो गंगाका हो तथा कूप और उद्विदजल ग्रहण करना
अगस्त्य के उदयमें कुवारमें सब जल निर्मल होजाते हैं सरोवर
और तड़ागका जल हेमन्तमें निर्मल होकर पीनके योग्य होता
है कुएं और चौण्डका जल वसन्तमें और ग्रीष्ममें हितकारक
और सोतका जल निर्मल पीनेके योग्यहै कुएंका वा और
कहींका जल चौमासेमें शुद्ध करिके पान करना चाहिये ॥३६॥
हठशैवलपंकादिसंछनं दोपलञ्चतत् ॥
बायर्ककिरणास्पृष्टं नपेयं साधनाहते ॥ ३७॥
आर सूर्यकी किरणोंसे तापित है वह पीना न चाहिये जब
तक उसे सिद्ध न कर ले ॥३७॥
भाषाटीकासमेतः। (५१) अरोचके प्रतिश्याये प्रसेकेश्वयथौ क्षये। मन्दानायुदरेकुष्ठे ज्वरेनेवामयेतथा ॥ वणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दमाचरेत् ॥३८॥ इति पानीयवर्गः। अरुचि पीनस जुकाम प्रसेक सूजन क्षय मन्दाग्नि उदर कुष्ठ ज्वरमें नेत्ररोग व्रण मधुप्रमेह इन रोगों में बहुत जल कमती पीना चाहिये ॥ ३८॥ इति पानीयवर्गः। अथ क्षीरवर्गः। क्षीरमष्टविधं गव्य माजमौरभ्रमाहिपे। कारेणवमथौष्ट्रञ्च वाडवं मानुपं तथा ॥१॥ आठप्रकारका दूध होता है गौका बकरीका मेषीका भैसका हथनीका ऊंटनीका घोडीका और स्त्री (मानुषी का) यद्यपि और जन्तुओं केभी दूध होता है परन्तु उपयोगी होनेसे यही वर्णन कियागया है ॥ १॥ क्षीरं स्वादुरसं स्निग्ध मोजस्य धातुवर्द्धनम् । वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरुशीतलम् ॥२॥ क्षीर स्वादु रसयुक्त स्निग्ध वल और धातुका वढानेवालावात पित्तहरनेवाला वीर्यवर्द्धक श्लेष्मकारक भारी और शीतलहे ॥२॥ गोक्षीर मनभिष्यन्दि स्निग्धं स्वादु रसायनम् । रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥ जीवनीयं तथा वातपित्तघ्नं परमं मतम् ॥ ३ ॥ गौका दुध अनभिप्यन्दि (अनावक) स्निग्ध स्वादु और रसायन है रक्तपित्तका हरनेवाला ठंडा रसपाक. मधुर जीवन का देने वाला और वात पित्तका हरने वाला है ॥ ३॥ छागं कपायमधुरं शीतं पाहिपियोलघु ।
(५२)
द्रव्यगुणः।
रक्तपित्तातिसारघ्नं क्षयकासगरापहम् ॥
अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तनिपेषणात् ।
नात्यम्बुपानाव्यायामात् सर्वव्याधिहरं पयः॥४॥
छागका दूध कसेला 'मधुर शीतल माही प्रिय और ला है,
रक्तपित्त अतिसारका दूरकरने वाला, क्षय और कास रोगका
दूर करने वाला है जो कि बकरी अल्प शरीर वाली हैं नित्यकटु
| और तिक्त द्रव्यका सेवन करती हैं न बहुत जल पीती हैं और
| परिश्रमके करनेसे उनका दूध सब दोषोंका हरने वला है ।। ४ ॥
मेपीक्षीरं गुरुस्वादु स्निग्धोष्णं कफपित्तकृत् ।
शुद्धेऽनिलेभवेत्पथ्यं सेकेचानिलशोणिते ॥५॥
मेपीका दूध भारी स्वादु स्निग्ध गरम कफ और पित्तका करने
वाला अग्निमें शुद्ध करनेसे पथ्य है और वातरक्तमें सैकमें हित
कारक है ॥६॥
महिपीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः।
रेहादूनमनिद्राणामत्यनीनां हितञ्चतत् ॥ ६॥
भैंसका दूध गोके दूधसे अधिक भारी है और अधिकतर
शीतल है वृतमें अधिक हैं जिनको निद्रा न आतीहो वा आधिक
अग्निहो उनको हित कारक है ॥६॥
हस्तिनीनांपयोवल्यं गुरु स्थैर्यकरं वरम् ।
ईपक्षोष्णलवणमौष्ट्रकं दीपनं लघु ॥
शस्तवातकफानाइकृमिशोफोदरार्शसाम् ॥ ७॥
हथिनीका दूध बलकारक भारी स्थिरता करने वाला श्रेष्ठहै,
कुछ रूखा नोनखरा दीपन और लघु ऊंटनीका दूध होताहै
| यह वात कफ आनाह कृमि शोफ उदर अर्श रोगमें हित
कारक है ॥७॥
उष्णमेकशफंवल्यं शाखावातहरंपयः ।
ईपदम्लं स्वादुरूक्षं लवणानुरसं लघु ॥ ८॥
भाषाटीकासमतः।- (५३) एक खुरवाले चौपायोंका दूध बलकारक बाहु सक्थि आदि | शरीरके अवयवोंकी वातका हरनेवालाई कुछ अम्ल स्वादु रूखा लवणरस युक्त और लघु होता है ॥ ८॥ नास्तुि मधुरंस्तन्यंकपायानुरसंहिमम् । नस्याश्चोतनयोः पथ्यं जीवनं लघुदीपनम् ॥ ९॥ त्रियोंका दूध मधुर कसैला रस युक्त शीतलहै नस्य और नेत्रोंके तर्पणमैं पथ्य जीवन दायक लघु और दीपन है ॥ ९॥ क्षीरसन्तालिका वृष्या निग्धा पित्तानिलापहा ॥१०॥ दूधका षिकार वीर्य बलकारक स्निध पित्त और वातका हरनेवालाहै ॥ १०॥ पयोभिष्यन्दिगुर्वामं प्रायशः परिकीर्तितम् । तदेवोक्तलघुतरमनभिष्यंदिवेवृतम् ॥११॥ बिना औटाया दूध भारी अभिप्यन्दि होताहै और औटाया हुआ अत्यन्त लघु और अनमिप्यन्दि होता है ॥ ११ ॥ वर्जयित्वा स्त्रियास्तन्य माममेवहितद्धितम् ॥ १२॥ परन्तु स्त्रीका दूध औटाना नहीं चाहिये वह कचाही हित | कारकहै ॥ १२ ॥ धारोष्णं गुणवत् क्षीरं विपरीत मतोन्यथा ।। १३ ।। दुहतेमें दूधकी धार पान करना गुणकारकहै उष्ण है अन्यथा इससे विपरीतगुणहैं ॥१३॥ तदेवातिशृतं सर्व गुरु बृंहण मुच्यते ॥१४॥ अनिष्टगन्धमम्लञ्च विवर्ण विरसञ्चयत् । वज्य सलवणं क्षीरं यचविग्रथितं भवेत् ॥ १५॥ बहुत औटाहुआ दूध भारी और वीर्य जनक है ॥ १४ ॥ जिसमें दुर्गन्ध आती हो खट्टा विवर्ण और विरस हो गपाहो वह और नमकपड़ा दूध तथा फटाहुआ दूध खाना | वर्जित है ।। १५॥ दध्यम्लं मधुरं ग्रादि गुरूष्णं वातनाशनम् ।
(५४)
द्रव्यगुणः।
मेदःशुक्रवल श्लेष्म पित्तरक्तानि शोफकृत् ॥
रोचिष्णशस्तमरुचीशीतके विषमज्वरे॥
पीनसेमूत्रकृच्छे चरूक्षन्तु ग्रहणीगदे ॥ १६॥
दही खट्टा है मधुर है ग्राही भारी वात का नाशक है, मेद
शुक्र बल श्लेष्मा पितरक्त अग्नि शोफका करनेवाला है रुचि
कारक है अरुचि शीत विषमज्वर पीनस मूत्रकृच्छ्रमें हितकारक
है, और अहणी रोगमें रूखा हितकारक है ॥ १६ ॥
गन्यं दधिचमंगल्यं वातघ्नं सुचिरोचकम् ।
स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनं बलवर्द्धनम् ॥ १७॥
गौका दधि मंगलदायक वात नाशक पवित्र और रोचक है
स्निग्ध पाकमें मधुर दीपन और बलवर्द्धक है ॥ १७॥
दध्याज कफपित्तनं लघु वातक्षयापहम् ।
दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम् ।।
विपाकेमधुरं वृष्यं रक्तपित्तप्रसादनम् ।
बलाशवर्द्धनं स्निग्धं विशेषादधि माहिपम् ॥ १८ ॥
अजा बकरीका दही कफ पित्तका नाशक हलका वात और
क्षय रोगका नाशक है, बवासीर स्वास कास रोग और अग्नि
दीपनमें हित कारक है विधाकमें मधुरवीर्य वर्द्धकरक्तपित्तका प्रसन्न
| करने वाला,यल वर्द्धक,स्निग्ध विशेष करके महिषका दधि है१८॥
कोपनं कफवातानां दुर्नानाञ्चाविकं दधि ॥ १९॥
भेड कादही कफ वातका कोप करने वाला तथा अर्श
| रोगका नाशक है, ॥ १९ ।।
दीपनीयमचक्षुष्यं वातलं वाडवं दधि ।
रुक्षमुष्णकपायञ्च कफमूत्रापहञ्चतत् ।। २० ॥
घोडीका दही दीपनहे चक्षुको अहित कारकहै, तथा वात
कारकहै रूखा गरम कसैला कफ और मूत्रका हरनेवाला है २०
स्निग्धं विपाके मधुरं वल्यं सन्तर्पणं गुरु ।
चक्षुष्यमयदोपघ्नं दधिनार्या गुणोत्तरम् ॥ २१ ॥
भापाटीकासमेतः। (५५) स्त्रोके दूधका दहीविपाकमें मधुर बल कारक तृप्तिकारकभारी नेत्रोंको हितकारीहै और गुणोंमे श्रेष्ठहै ।। २१ ।। लघुपाके वलाशनं वीय्योष्णं पंक्तिनाशनम् । कपायानुरनाम्यादधिवच्चोंविवन्धनम् ॥ २२॥ पाकमें लघु जलनाशक वीर्य में उप्ण पाक नाशक कसैलारसमें मलबन्धक हथिनीका दही होताहै ॥ २२ ।। पीन्युक्तानियानीह गव्यादीनि पृथक् पृथक् ॥ विज्ञेयमेवसर्वेषु गव्यमेवगुणोत्तरम् ॥ २३॥ जो कि गौके दही पृथक पृथक् कहेहैं इस प्रकार सबके दहीमें उत्तरोत्तर गुणजानना ॥ २३ ॥ वातनंकफकृत्निग्धं व्रहणं नातिपित्तकृत् । कुर्याद्रक्ताभिलासञ्चदधियव सुपरिनुतम् ॥ २४॥ पाकादि कर दहीमें अच्छी तरह मिलानेसे भोजनमें इच्छा करताहै वात नाशक कफ कारक स्निग्ध वीर्य कारक और अत्यन्त पित्त कारक नहीं है ।। २४ ।। शृतशीरातुयजातं गुणवदधितत् स्मृतम् । वातपित्तहर रुच्यं धात्वग्निवलवर्द्धनम् ॥ २५ ॥ जो औटे हुये दूधसे उत्पन्न दहीहै वह गुण कारक होताहै वह वात पित्तका हरनेवाला रुचिकारक धातु और अग्निका चल बढाने वालाहै ॥ २५ ॥ दधित्वसारं रूक्षश्चग्राहिविष्टम्भिवातलम् । दीपनीयं लघुतरंसकपायरुचिप्रदम् ॥ २६ ॥ घी रहित दही रूखा माही विष्टम्भकारक वात वर्द्धकहै दीपन अत्यन्त लघु कसैला और रुचिका करनेवालाहै ॥ २६ ।। दनः सरोगुरुर्वृप्योविज्ञेयोऽनिलनाशनः । वन्हेर्विधमनश्चापिकफशुक्रविवर्द्धनः ॥२७॥ दहीको मलाई भारी स्निध वीर्य वर्द्धक वात नाशक अनि मन्द करनेवाली कफ और वीर्यकी वढानेवालीहै ।। २७ !!
(५६) द्रव्यगुणः। तकं लघुकपायाम्ळं दीपनं कफवातजित् । शोथोदराशॉग्रहणीदोपमूत्रग्रहारुचि प्लीहगुल्मघृतव्यापगरपानामयान् जयेत् ॥२८॥ मट्ठा लघु कसेला खट्टा दीपन कफ और वातका जीतने वाला | सूजन उदर रोग बवासीर संग्रहणी मूत्रग्रह अरुचि प्लीहागुल्म स्नेह व्यापत विप पाण्डुरोग इनको दूर करता है ॥ २८ ॥ मस्तुतद्वत् सरस्रोतः शोधिविष्टम्भजिल्लघु ॥२९॥ इसी प्रकार दधिमस्तु (दहीका पानी) सारक स्रोतोंको शोधने वाला विष्टम्भ जित् लघु है ।। २९ ।। ससरं निर्जलं पोलं तक पादजलान्वितम् । मोदकमुदश्वित्स्यान्मथितं सरवर्जितम् ॥३०॥ सर ( मलाई ) युक्त निर्जल मट्ठा घोल कहाता है, चौथाई | जलमिला तक कहाता है आधा जल जिसमें मिलाहो वह उद श्वित और मथा हुआ जल रहित उन्मथित कहाता है ॥ ३० ॥ चोलं पित्तानिलहरं तक दोपत्रयापहम् । उदविच्छेष्मलञ्चनमथितं कफपित्तनुत् ॥ ३३ ॥ घोल पित्त वातका हरने वाला है, तक्र त्रिदोषका हरने वाला है उदृश्चित् कफ करनेवाला और मथित कफ पित्तका दूर करने वाला है ॥ ३१॥ वातम्लं सैन्धवोपेतं पित्तेस्वादुसशर्करम् । पिवेत्त कफेचापिव्योपक्षारसमायुतम् ॥ ३२॥ वातकी अधिकता में अम्लतकको सेंधाडालकरपिये पित्त में बूरा डालकर स्वादु पिये और कफकी अधिकतामें सोंठमिरच पीपल और जवाखारके साथ पिये ॥ ३२ ॥ नैवतकं शतेदद्यात् नोष्णकाले न दुईले । नमूभ्रिमदाहेषु नरोगेरक्तपित्तके ॥ ३३॥ क्षतमें तक्रकासेवन करें, न उष्ण कालमें न दुर्वलतामें सेवन
भापाटीकासमेतः।
(५७)
करे, तथा मूर्छा भ्रम दाह रक्तपित्त रोगमें, तक्रका सेवन करना
नहीं चाहिये ॥ ३३ ॥
ग्राहिणीपातलारूक्षाविज्ञेयातक्रकूचिका ॥ ३४ ॥
ग्राही वातकारक रूखी तक्र कूर्चिका (आमिक्षा) जाननी३४॥
तक्राल्लघुतरोमण्डः कूचिकादधितकजः ॥ ३९ ॥
मण्ड (रस) तकसे अत्यन्त हलका होताहै दहीकी कूचि-
कासे मण्ड होताहै दहीके साथ दूध पकानेसे कर्चिका होतीहै
कोई तकसे दधि कूचिका का होना कहतेहे विशेष कर दहीकी
होतीहै ॥ ३५ ॥
किलाटोऽनिलहावृष्यः कफनिद्राकरोगुरुः॥३६॥
किलाट ( नष्ट क्षीर पिंड) अग्निनाशक वीर्य कारक कफ
निद्राकरनेवाला भारी होताहै ॥ ३६ ॥
मधुरोहणस्तगत पीयूपोपिसमोरटः ॥३७॥
मधुर पुष्टिकारक पीयूष और मोरट होताहै तुरत प्रसव हुए
| पशुका दूध पीयूप कहाताहै और सातरातके पीछे उसकी मोरट
संज्ञा होतीहै ॥ ३७॥
नवनीतं नवं वृष्यं शीतं वर्णवलाग्निकृत् ।
संग्राहिवातपित्तामुक्क्षपाऽशॉर्दिवकासजित् ॥ ३८ ॥
ताजामक्खन वीर्य कारक शीतल वर्णवल अग्निका करने
| वाला नाही वात पित्त रुधिर क्षय अर्शत्व ( बवासीर) अदित
और खांसीका दूर करनेवालाहै ॥ ३८॥
क्षीरोद्भवन्तु संग्राहिरक्तपित्ताक्षिरोगनुत् ॥ ३९ ॥
दूधसे मथकर निकला मक्खन संग्राही रक्तपित्त नेनरोगका
दूर करनेवालाहै ३९॥
विकल्प एपदध्यादिश्रेष्ठोगव्योऽभिवर्णितः।
विकल्पानवशिष्टास्तु क्षीरवीर्य समादिशेत् ॥४०॥
यह दहीसे निकाला हुआ गऊका मक्खन बहुत अच्छाहै
दूसरे जीवोंके दूधके अनुसार उनके मक्खनके गुण जानने ॥४॥
(५८) द्रव्यगुणः। घृतं बुद्धयग्नि शुकोजोमेदःस्मृतिकफावहम् । वातपित्तविपोन्मादशोपालक्ष्मीजरापहम् । स्नेहोत्तमं योगवाहिसर्वथा मधुरं हिमम् ॥४१॥ घृतबुद्धि आग्नि वीर्य मेद स्मृति कफका बढानेवाला है और वातपित्त विप उन्माद शोष, अलक्ष्मी जराका दूर करनेवालाहै संस्कार वशसे कफकोभी दूर करता है स्नेहोंमें उत्तम योग वाही (जिस द्रव्यके संग संयुक्तकरो वैसाही होजाय ) सर्वथा मधुर और शीतल है ॥ ४ ॥ गव्यं धृतं घृतश्रेष्टं चक्षुष्यं मलवर्द्धनम् । विपाके मधुरं श्रेष्ठं वातपित्तविपापहम् ।। १२॥ गऊका घृत श्रेष्ठ है नेत्रोंको हितकारी बलका बढ़ाने वाला- पाकमें मधुर श्रेष्ठ वात पित्त और विषका दूर करनेवाला है ४२॥ माहिषन्तु घृतं स्वादु पित्तास्रानिलनुद्धिमम् ॥ १३॥ भैसका घृत स्वादु पित्तरक्त वात नाशक और ठंडाहे ॥४३॥ छागं घृतंतु चक्षुष्य लध्वग्निबलवर्द्धनम् ॥ १४॥ बकरीका घृत नेनोंको हितकारक लघु आग्नि और बलका | बढाने घालाहै ।। ४४॥ आविकादीनि सीपियुद्धास्वक्षीरवद्वदेत् ॥ ४५ ॥ भेड आदिके घी उनके घृतकी समान गुणवाले हैं ॥४५॥ सर्पिः पुराणं विमलप्रतिश्यातिमिरापहम् । मूर्छाकुष्ठविपोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ।। १६ ॥ पुराना घी त्रिदोष पीनस तिमिर रोगका हरनेवाला मूर्छा कुष्ट विष उन्माद अह अपस्मारका नाश करताहै उन गन्धवाला पुराना घृत दशवर्षमें होताहे जितना जितना पुरानाहो उतना उतना गुणोंमें अधिक होताहै ॥ ४६॥ क्षीरघृतंतु संग्राहितर्पण नेत्ररोगनुत् ॥ १७॥ दूधसे निकाला धृत प्राही दृप्तिकारक नेत्ररोग दूर करताहे४७ - भाषाटीकासमेतः। (५९) सर्पिर्मण्डः सरः स्वादुयोनिश्रोत्रशिरोक्षिजान् । गदान् जयति शोधनो रूक्षस्तीक्ष्णस्तनुश्चसः ॥४८॥ इति क्षीरवर्गः। वृतमण्ड सारकहे योनि श्रोत्र शिर नेत्रोंके रोगोंको दूर करता तथा शोथ दूर करताहै रूखा और तीक्ष्णहै ॥ ४ ॥ इति क्षीरवर्गः। तैलं संयोगसंस्कारात सर्वरोगहरं स्मृतम् । कपायानुरसं स्वादु मूक्ष्ममुष्णं व्यवायिच ।। पित्तलं बविण्मूत्रं नच श्लेष्माभिवर्द्धनम् । वातनमुत्तमं बल्यंत्वच्यं मेधाग्निवर्द्धनम् ॥ ३॥ संयोग संस्कारसे तेल सब रोगोंका हरनेवालाहै कसैला | रसीला स्वादु सूक्ष्म गरम और व्यवायीहै पित्तकारक विष्ट मूत्रका बांधनेवाला कफका न करनेवाला वात हारक वलकारक त्वचाको हितकारक मेधा और अग्नि का बढानेवाला है ॥ १॥ सार्प कटुतीक्ष्णोष्णं कफशुकानिलापहम् । लघुपित्ताम्रकृत्कोठकुष्टार्शवणजन्तुनित् ॥२॥ सरसोंका तेल कटु तीक्ष्ण गरम कफ वीर्य वातका हरनेवाला, | हलका पित्त रुधिरका करनेवाला, कोठ कुष्ठ बवासीर व्रण कृमिका दूर करनेवालाहै ॥२॥ सेकाभ्यंगावगाहेपु तिलतेलं प्रशस्यते । तदस्तिषुच पानेषु नस्येकांक्षिपूरणे ।। अन्नपानविधौ चापि प्रयुज्यं वातशान्तये ॥३॥ सेक मालिश स्नानमें तिलका तेल उत्तमहै, तथा बस्तिशोधन पान नस्य कर्म आंख नाकके पूर्ण करने में अन्नपान विधिमें वात शान्तिमें इसका प्रयोगकरना चाहिये ॥३॥ तैलमेरण्ड तिक्तं कटुस्वादुरसंगुरु ।
(६०) द्रव्यगुणः । वनगुल्मानिलकफानुदरान विषमज्वरम् ।। रुक्शोफो च कटीग्राकोष्टपृष्ठाश्रयोजयेत् ॥४॥ अरंडका तेल तीखा स्वादु कटु रसयुक्त और भारीहै बन गुल्म बात कफ उदर रोग विषमज्वर दर्द सूजन कमर गुह्य, कोष्ठ, पीठकै दर्दको दूरकर्ता है ॥ ४ ॥ तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं विस्रं रक्तरण्डोद्भवं त्वति ॥५॥ तथा तीक्ष्ण उप्ण चिकना सारक लाल अरण्डका तेल होताहे५ उमाकुसुम्भज तूष्णं त्वग्दोपकफपित्तकृत् ॥६॥ अलसीकातेल गरम त्वचाके दोष और कफ पित्तका जीतने वालाहै ॥ ६॥ करचनिम्बतैलन्तु नात्युष्ण कफपित्तजित् । तिक्तं क्रिमिहरं तैलं शेपं योनिवदादिशेत् ॥ ७॥ करंज और नीमकातेल बहुत उप्ण नहीं, कफ और पित्तका जीतने वालाहै तीखा कृमि हरने वालाहै, शेष जो वस्तु जैसी हो वैसा उसका तेलजाने ॥ ७ ॥ सर्वेभ्यस्त्विहतेलेभ्य स्तिलतैलं विशिष्यते ॥८॥ सब तेलासे तिलका तेल अधिक उत्तम है।॥ ८॥ वसामज्जा च वातघ्नी वलपित्तकफप्रदो। मासानुरूपगन्धौ च विद्यान्मेदोऽपिताविव ॥ ९॥ दूसरे पदार्थोंका निकालातेलमें गुणोंमें उन पदार्थोके समान है |वर्षी और मांग वातनाशकवलपित्त और कफकी देनेवाली | और मांसके अनुसार उनमें गन्ध और मेद जानना जिस जीव. का जैसा मांस सी उसकी चर्वी जाननी इति तैलवर्गः। इक्षोरसो हिमोवृष्यस्तपंणो जीवनः सरः। वात्तामृतापित्तजित्स्वादुः स्निग्धः प्रीणनबृंहणः। रसोदन्तकृतः श्लेष्मकारणं न विदाइवान् ।।१।।
भाषाटीकासमेतः।
(६१)
ईखकारस ठंडा बलकारक तृप्तकारक जीवन दायक सारक
वात रक्त पित्तका जीतनेवाला स्वादु स्निग्ध प्रीति कारक वीर्य
बलकर्ता रस दन्त पीडाकारक श्लेष्माका करनेवाला तथा विदाही
नहींहै ॥ १ ॥
यान्त्रिकस्तु विदाहीस्याद्दरुस्त्वग्ग्रन्थियोगतः ॥२॥
कोल्हूमें पेला हुआ रस भारी ग्रन्थिके योगसे होताहै ॥२॥
अतीवमधुरो मूले मध्ये मधुर एवच ।
अग्रे चाक्षिषु विज्ञेय इथूणां लवणो रसः ॥ ३॥
मूलमें अतीव मधुर मध्यमें मधुर और गन्नेकी फुलची पर नन-
खरा रस होताहै ॥ ३॥
पकोरसो गुरुः स्निग्धः सतीक्ष्णः कफवातजित् ॥ ४॥
पकारस भारी स्निग्ध तीक्ष्ण कफ और वातका जीतनेवालाहै।
फाणितं गुर्वीभष्यन्दिहणं कफशुक्ररम् ॥५॥
इसका फांट भारी अभिप्यान्दि वीर्यकारक कफ और वीर्यका
करनेवालाहै ॥५॥
रूक्ष मधूकपुष्पोत्थं फाणितं त्वधवातहत् ।
कफदं मधुरं पाके कपायं वस्तिदूपणम् ॥६॥
महुएके फूलके रसका फांट वातका हरनेवालाहे कफ कारक
पाकमे मधुर कलेला वस्तिका दूषण करनेवालाहै ।। ६ ।।
गुडोवृष्यो गुरुः स्निग्धः सक्षारो मूत्रशोधनः ।
नातिपित्तहरोमेदः कफक्रिमिवलप्रदः ॥७॥
गुड वीर्यकारक,गुरु चिकना क्षारयुक्त मूत्रका शोधन करनेवा.
ला पित्तका बहुत न हरनेवाला मेद कफ कृमि और बलकारकहे
पित्तघ्नो मधुरः शुद्धो वातघ्नोऽसृक्प्रसादनः ॥ ८॥
मधुर और शुद्ध पित्तका हरनेवाला वात नाशक रुधिरका
स्वच्छ करनेवालाहै ॥ ८॥
सपुराणोऽधिकगुणो गुडः पथ्यतमः स्मृतः॥ ९॥
पुराना गुड अधिकतर गुणदायक और पथ्यह ॥ ९॥
(६२) द्रव्यगुणः। खण्डं वृष्यतमं वल्यं चक्षुप्यं बूंदणं तथा। वातपित्तहरं नातिस्निग्ध हृद्यं सुखप्रदम् ॥१०॥ खांड वीर्यकारक बलदायक नेत्रोंको हितकारक वीर्यवर्द्धक वात पित्तको हरनेवाली कुछेक स्निग्ध हदयको हितकारक सुखदायकहे ॥ १०॥ शर्करावातपित्तामुछिदिविपापहा ॥११॥ शकर वात पित्त रुधिर विकार मूर्छा छदि विपकी हरने- वाली है ॥ ११ ॥ तमराजस्तुतृष्णानोज्वरदाहालपित्तजित् ॥ १२ ॥ तमराज (शर्कराभेद ) तृष्णा नाशक ज्वर दाह रुधिर और पित्तको जीतनेवाली है ॥ १२ ॥ वृष्याक्षीणक्षतहिता सस्नेहा गुडशर्करा ॥ १३॥ स्नेह युक्त गुड और शकर वीर्यवर्द्धक क्षीण और क्षत (घाव) में हितकारकहै ॥ १३ ॥ मधुजा शर्करा रुक्षा तृष्णाउद्यतिसारनुत् । तद्गुणा तिक्तमधुरा सस्नेहा यासशर्करा ॥१४॥ मधुसे उत्पन्न हुई शर्करा रूखी तृष्णा छर्दैि अतिसारको दूर करनेवालीहै जो स्नेहयुक्त शर्कराहे उसके गुणतीखे और | मधुरहें ॥ १४ ॥ गुडमत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराविमलाः परम् ॥ १५॥ गुड़की अपेक्षा मत्स्याण्डिका निर्मल है (गुड़की निखार | कर बनाई टिकिया ) गुडकी मत्स्यण्डिकासे खांड और बूरा निर्मल है ॥ १५॥ यथा यथेषां वैमल्यं मधुरत्वं तथा तथा। स्नेहगौरवशैत्यानि सरत्वञ्च तथा तथा ॥ १६॥ जितनी जितनी इनमें निर्मलता हो उतनी ही उतनी मधुर ता अधिक होती है और उतना उतना ही स्नेह गुरुता और शीतलता अधिक होती जाती है तथा सारक होते जाते हैं१६॥
भाषाटीकासमेत मधुस्वादुरसं शीतं व्रणशोधनरोपणम् । कपायानुरसं रूक्ष वल्यं दीपनलेखनम् ।। सन्धान लघुचक्षुष्यं स्वयं हृयंत्रिदोपनुत् । श्वासहिकाविपहरमुष्णं खाम्बुविरोधि च ॥ १७ ॥ सहत स्वादु रससे युक्त शीतल व्रणका शोधन और रोपण करने वाला है कसेला रसयुक्त रूखा बलकारक दीपन और लेखन है दूटे जोडको मिलानेवाला हलका नेत्रोको हितकारक स्थर और हृदयको हितकारक त्रिदोषहारक श्वास हिचकी विषका हरने वाला गरम आकाश जलका विरोधी है ॥ १७ ॥ माक्षिक भ्रामरं क्षौदं पौत्तिकं मधुजातयः । माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेपाभ्रामरं गुरु ।। १८॥ माक्षिक भ्रामर क्षौद्र पौत्तिक यह चार मधुकी जाति हैं यद्यपि सुश्रुत में आठ प्रकारका कहा है परन्तु चार प्रकारका सर्वत्र प्रसिद्ध है उन सबमें माक्षिक सहत श्रेष्ठ है और भ्रामर | गुरु है ।। १८ ॥ माक्षिक तैलवर्णस्याघृतवर्णन्तु पैत्तिकम् । शौदन्तुकपिलंविधाच्चेत भामरमुच्यते ॥ १९ ॥ माक्षिक मधु तेलके रंगका पौत्तिक घृत वर्णका क्षौद्र कपिल वर्णका भ्रामर श्वेत वर्णका होता है ॥ १९ ॥ बृंहणीयं मधुनवं नातिश्लेष्महरं सरम् । मेदःस्थौल्यापहंग्राहि पुराण मतिलेखनम् ॥ दोपत्रयहरं पक माममम्लं त्रिदोपकृत् ॥ २० ॥ नवीन मधु वाजीकरण है तथा अधिकतर श्वेप्मको हरण नहीं करता है सारक है । मेदकी स्थूलताको हरने वाला माही लेखन पुराना मधु होता है पक्का मधु त्रिदोष हरने वाला है कचा अम्ल और त्रिदीप का करने वाला है ॥२०॥ तयुक्त विविधैोगनिहन्यादामयान्वहून् ॥ २१ ॥ और अनेक योगोंके साथमें अनेक रोगोंको दूर करता है २१
(६४)
द्रव्यगुणः।
उप्णेन मधुसंयुक्तं वमनेष्ववचारितम् ।
अपाकादनवस्थानानविरुध्येत पूर्ववत् ॥ २२ ॥
इत्यक्षवादिवर्गः।
उष्ण मधुके साथ वमनमें औषधी देनी अपाक और अनव-
स्थामें पूर्ववत् बिरोध नहीं होता ॥ २२ ॥
इत्यक्षवादिवर्गः।
सर्व पित्तकरं मद्यमम्लं दीपनपाचनम् ।
भेदनं कफवातघ्नं हृद्यं पस्तिविशोधनम् ।।
पाके लघुविदाछुष्णं तीक्ष्णमिन्द्रियवोधनम् ।
विकासिमृष्टविण्मूत्रं निद्राभावप्रसक्तिनुत् ॥ १॥
सब प्रकारके मद्य पित्त करने वाले अम्ल दीपन पाचन भेदन
कफ वातके दूर करते, हृदयको हितकारी और वस्ति के शुद्ध
करने वाले हैं पाकमे लघु विदाही गरम वीर्य वर्द्धक इन्द्रिय
शोधक चित्त खिलाने वाले, विष्ठा मूबके निर्माण करने वाले,
निद्रा का अभाव और उसमें अत्यन्त प्रसक्तिको दूर करने
वाले हैं ।। १ ॥
स्तन्यरक्तक्षयहिता सुरादीपन बृंहणी।
कार्याोंग्रहणीदोपसूत्राघातानिलापहा ॥२॥
सुरा स्तनोंको हितकारक, रक्त क्षयमे हितकारक, दीपन
और बाजी करण है, कृशता बवासीर ग्रहणी दोष मूत्रधात
और धातफी दूर करने वाली है ॥२॥
कासाशीग्रहणीदोपप्रतिश्यायविनाशिनी।
श्वेता मूत्रकफस्तन्यरक्तमांसकरीसुरा ॥३॥
तथा खांसी बवासीर संग्रहणी पीनसको दूर करती है श्वेता
सुरा मूत्र कफ स्तन्य रक्तमांसकी करने वाली है ॥३॥
उद्यरोचकहतकुक्षितोदशलप्रमर्दिनी ।
प्रसन्नागुल्मवाताशविबन्धानाहनाशिनी ॥४॥
भाषाटीकासमेतः। छर्दि अरुचि नाशक, कुक्षिका शूल दूर करती है प्रसन्न सुरा गुल्मधात अर्श विवन्ध अनाह रोगको दूर करती है ॥४॥ पित्तलाल्पकफारूक्षा यवैर्वातप्रकोपनी। विष्टम्भिनी सुरागुर्वी श्लेष्मलातु मधूलिका ॥५॥ यवकी सुरा पित्तकारक थोडा कफकरती है रूखी और धात की कोपकरनेवाली है विष्टम्भकारक सुरा भारी है गोधूमकी | सुराश्लेग्मकारक है ॥ ५॥ रूक्षा नातिकफावृष्या पाचनी वल्कलीसुरा ॥६॥ वल्कली (दालचिनीकी) सुरा रूखी कुछ कफकारक वाजी कर और पाचक है ॥ ६॥ कोहोलोभेद्यवृष्यश्च त्रिदोपोवदनप्रियः॥७॥ कोहेल नाम मद्य भेदक वाजीकर निदोषकारक और मुख- प्रिय है ॥ ७ ॥ प्रायुष्णोजगलः प्रोक्तोरूक्षस्तृकफशोथनुत् ॥८॥ जगल मदिरा प्राही गरम रूपी तृषा और शोफ रोगको दूर करती है ॥८॥ हृद्या प्रवाहिकाटोपदुर्नामानिलशोधनुन् । वक्कसोतसारत्वादिष्टम्भी वातकोपनः ॥९॥ चक्कस मद्य हृदयको हितकारक प्रवादिका आदोप दुर्नामवात और शीथकी दूरकरने वालीहै और सार रहित होनेसे विष्टम्भी तथा वातका कोप करनेवाली है ॥ ९॥ शीधुः पित्तानिलहरः श्लेष्मस्नेहविकारहा। मेदाशोथोदराशोनो वल्यः पक्करसोमतः ॥ १० ॥ पकाकर ईखके रससे बनाया हुआ शीधु मद्य पित्तवातका हरनेवाला श्लेष्मा और स्नेहके विकारका हरनेवाला मेद सूजन उदररोग वयासीरका दूर करनेवाला बलकारक रसके पाकमें | होता है ।। १०॥ ५
(६४)
द्रव्यगुणः।
उष्णेन मधुसंयुक्तं वमनेष्ववचारितम् ।
अपाकादनवस्थानानविरुध्येत पूर्ववत् ।। २२ ॥
इत्यक्षवादिवर्गः।
उप्ण मधुके साथ वमनमें औषधी देनी अपाक और अनव-
स्थामें पूर्ववत विरोध नहीं होता ॥ २२ ॥
इत्यक्षवादिवर्गः।
सर्व पित्तकरं मद्यमम्लं दीपनपाचनम् ।
भेदन कफवातनं हृद्यं बस्तिविशोधनम् ॥
पाके लघुविदाझुणं तीक्ष्णमिन्द्रियबोधनम् ।
विकासिमृष्टविण्मूत्रं निद्राभावप्रसक्तिनुत् ॥१॥
सब प्रकारके मद्य पित्त करने वाले अम्ल दीपन पाचन भेदन
कफ वातक दूर करते, हृदयको हितकारी और वस्ति के शुद्ध
| करने वाले हैं पाकमे लघु विदाही गरम वीर्य वर्द्धक इन्द्रिय
| शोधक चित्त खिलाने वाले, विष्ठा मूत्रके निर्माण करने वाले,
निद्रा का अभाव और उसमें अत्यन्त प्रसक्तिको दूर करने
वाले हैं ॥१॥
स्तन्यरक्तक्षयहिता सुरादीपन बृंहणी।
कार्याशीग्रहणीदोपमूत्रापातानिलापहा ॥२॥
सुरा स्तनोंको हितकारक, रक्त क्षयमे हितकारक, दीपन
और वाजी करण है, कृशता बवासीर ग्रहणी दोप मूत्रधात
| और धातकी दूर करने वाली है ॥२॥
कासाझेग्रहणीदोपप्रतिश्यायविनाशिनी।
श्वेता मूत्रकफस्तन्यरक्तमांसकरीसुरा ॥३॥
तथा खांसी बवासीर संग्रहणी पीनसको दूर करती है श्वेता
सुरा मून कफ स्तन्य रक्तमांसकी करने वाली है ॥३॥
उधरोचकहवकक्षितोदशलप्रमर्दिनी।
प्रसन्नागुल्मपाताशीविषन्धानाहनाशिनी ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेतः।
छदि अरुचि नाशक, कुक्षिका शूल दूर करती है प्रसन्न मुरा
गुल्मधात अर्श विबन्ध अनाह रोगको दूर करती है ॥४॥
पित्तलाल्पकफारक्षा यवैर्वातप्रकोपनी।
विष्टम्भिनी सुरागुवी श्लेष्मलातु मधूलिका ॥५॥
यवकी सुरा पित्तकारक थोडा कफकरती है रूखी और वात
की कोपकरनेवाली है विष्टम्भकारक सुरा भारी है गोधमकी
सुरा श्लेष्मकारक है ॥५॥
रक्षा नातिकफावृष्या पाचनी वल्कलीसुरा ॥६॥
वल्कली (दालचिनीकी ) सुरा रूखी कुछ कफकारक वाजी
कर और पाचक है ॥ ६ ॥
कोहोलोभेद्यवृष्यश्च त्रिदोपोवदनप्रियः ॥७॥
कोहेल नाम मद्य भेदक वाजीकर त्रिदोषकारक और मुख-
प्रिय है ॥ ७ ॥
ग्राझुष्णोजगलः प्रोक्तोरूक्षस्तृट्कफशोथनुत् ॥८॥
जगल मदिरा ग्राही गरम रूखी तृषा और शोफ रोगको दूर
| करती है ॥८॥
हृद्यः प्रवाहिकाटोपदुर्नामानिलशोथनुत् ।
वक्कसोहतसारत्वादिष्टम्भी वातकोपनः ॥९॥
वकस मद्य हृदयको हितकारक प्रवाहिका आटोप दुर्नामवात
| और शोथकी दूरकरने वाली है और सार रहित होनेसे विष्टम्भी
तथा वातका कोप करनेवाली है ॥ ९॥
शीधुः पित्तानिलहरः श्रेष्मस्नेहविकारहा।
मैदाशोथोदराशैनो वल्यः पक्कग्सोमतः॥ १० ॥
पकाकर ईखके रससे बनाया हुआ शीधु मद्य पित्तवातका
हरनेवाला श्लेष्मा और स्नेहके विकारका हरनेवाला मेद सूजन
उदररोग बवासीरका दूर करनेवाला बलकारक रसके पाकमें
होता है ॥१॥
द्रव्यगुणः। जरणीयोविवन्धनः स्वरावर्णविशोधनः । लेखनः शीतरसिकोहितः शोफोदरार्शसाम् ॥ ११ ॥ ईखके रसको विनापकाये बनी हुई शीघ्र शीधू जीर्ण होती है विवन्ध दूर करती स्वरवर्णका शोधन करती लेखन शोक | उदर और अर्श रोगम हितकारकहै ॥ ११ ॥ गौडः शीधुः कपायः स्यात् स्वादुःपाचनदीपनः॥ १२ गुडकी बनी हुई शीधूकसेली स्वादु पाचन और दीपनहे १२॥ शार्करो मधुरोहृयोदीपनोवस्तिशोधनः ।। वातम्रो मधुररपाके रुच्यइन्द्रियवोधनः॥१३॥ शर्कराकी बनाई शीध मधुर हृदयको हितकारक, दीपन पस्तिके शोधनेवालीहै वात नाशक पाकमें मधुर रुचिकारक इन्द्रियोंको योधन करनेवालीहै ॥ १३ ॥ शीधुर्मधूकपुष्पोत्थो विदाह्यग्निवलप्रदः। रुक्षः कपायः कफहा वातपित्तप्रकोपनः ॥ १४ ॥ महुपके फूलसे यनी हुई शोध विदाही अग्मिकी यदानेवाली तथा वलकारकह, सखी कसेली कफनाशक वात पित्तकी कोप करनेवालीहे ॥ १४ ॥ जाम्बवो बद्धनिप्यन्दस्तुवरोवातकोपनः ॥ १५ ॥ जाम्बू फलके रससे गुड़ मिलाकर बनाई हुई शीध मन बंध कारक कसेली वातका कोप करनेवाली है ॥ १५ ॥ तीक्ष्णः सुरासवो हृयो मूत्रलः कफवातनुत् । मुखप्रियः स्थिरमदो विज्ञेयोऽनिलनाशनः ॥१६॥ औषधी मिलाकर बनाया हुआ सुरा सय हृदयको हिस फारक मूत्रकारक कफ वातका नाश करनेवालाहे मुखप्रिय स्थिर मदयाला धात नाशक जानना ॥ १६ ॥ तीक्ष्णः कपायोमदकृटुर्नामकफगुल्मनुत् । क्रिमिमेदोऽनिलहरोमरेयो मधुरो गुरुः॥१७॥ मरय मद्य तीक्ष्ण कसला मदकारक यवासीर कफ मोर गुल्म भाषाटीकासमेतः। का दूर करने वाला है कृमि मेद वात हरनेवाला मधुर और भारी है ॥ १७॥ निर्दिशेद्रव्यतश्चान्यान्कन्दमूलफलासवान् ॥ ३८॥ इसी प्रकार दूसरे द्रव्य कन्दमूलादिसे बने आसवोंके गुण जानने ॥१८॥ नवं मद्यमभिष्यन्दि दोपकृजीर्णमन्यथा ॥ १९ ॥ नई मद्य अभिप्यन्दी दोष कारक है। पुरानी इसके विपरीत पुरानी सुरा श्रेष्ठ है ।। १९ ।। अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिकोगुणैः ॥२०॥ अरिष्ट ईख विकार अभया (हरड) चीता दन्ती पपिली आदि बहुतसी औषधियोंके योगसे क्वाथ बना हुआ) गुणों में अधिक होता है ।॥ २०॥ बहुदोपहरश्चैव रोगाणां शमनश्वसः। दीपनः कफवातघ्नः सरः पित्ताविरोधनः ॥ शूलाध्मानीदरप्लीहज्वराजीसाहितः ॥ २१ ॥ यह बहुत दोपोंका हरनेवाला रोगीका शान्त करने वाला दीपन कफ वातका नाशक सारक और पित्त विरोधीहै, शूल अफारा उदर रोग प्लीहा ज्वर अजीर्ण बवासीरको दूर करताहे२१ अरिष्टासवशीधूनां गुणान् कर्माणिचादिशेत् । बुद्धायथास्वं संस्कारमवेक्ष्य कुशलोभिपक् ॥ २२ ॥ चतुर वैद्यको उचित है कि अरिष्ट आसव और शीधूओंके गुण कर्माको जानकर बुद्धिसे उनका संस्कार विचार प्रयोग करें २२॥ सान्द्रं निदाहि दुर्गंधिविरसंक्रिमिलं गुरु । अहृद्यं तरुणं तीक्ष्णमुष्णं दुर्भाजनस्थितम् ।। अल्पौषधं पर्युपित मत्यच्छं पिछिलञ्चयत् । तद्वज्य सर्वथा मद्यं किञ्चिच्छेपञ्च यद्भवेत् ॥२३ ॥ जो मधु सघन विदाही दुर्गधिकारक विरस कृमियुक्त, भारी, हृदयको अहित कारकमन्दउत्पन्न तीक्ष्ण उष्ण बुरे पात्रमें स्थित
(६८)
द्रव्यगुणः।
थोड़ी औषधी वाला बासी अति स्वच्छ पिच्छल पीछेका पात्रमें
बचा हुआ यह मद्य सर्वथा त्यागने योग्य है ॥ २३ ॥ .
.चिरस्थितं जातरसं दीपनं कफवातजित् ।
रुच्यं प्रसन्नं सुरभि मद्यं सेव्यं मदावहम् ।। २४॥
जो बहुत दिनका रक्खा हुआ रसहीनहै वह कफ और
वातका जीतनेवालाई प्रसन्ना मद्य रुचिकारकहै सुगन्धि युक्त
मदकारक, मद्य सेवन करना चाहिये ॥ २४ ॥
शुक्तं वलाशपित्तामुक्क्लेदि वातानुलोमनम् ।
भृशोष्णतीक्ष्णरूक्षाम्लं हृद्यं रुचिकरं सरम् ।
दीपनं शिशिरं स्पर्श पाण्डुतृक्रिमिनाशनम् ॥ २६ ॥
जो मस्तु आदि पदार्थ पवित्र वर्तनमें गुड़कांजी मधु तीन
दिनतक बंदकर धान्य राशिमें धर दिये जाते हैं वह शुक्त कह-
| लाताहै, यह बलकारक पित्त रुधिरक्लेदका करनेवाला, वातका
| अनुलोम करनेवाला अत्यन्त ऊष्ण तीक्ष्ण रूखा अम्ल हृदयको
हितकारक रुचिकर और सारकहै, दीपन स्पर्शमें ठंडा पाण्दु
रोग तृष्णा और कृमिका दूर करनेवालाहै ॥ २५ ॥
तद्वत्तदासुतं सबै रोचनन्तु विशेषतः ॥ २६ ॥
इसी प्रकारके गुणवाले शुक्तमें आई करीरादि जलनेसे होते हैं,
| वे विशेष कर रुचि कारक होते हैं ॥२६॥
गौडानि रसशुक्तानि मधुशुक्तानियानि च ।
यथा पूर्व गुरुतराण्यभिष्यन्दकराणि च २७५
जो गुड़से बने हुए शुक्तहैं और जो मधुके योगसे यहें यह
यथा पूर्व एक दूसरेसे भारी और अभिप्यन्द कारकहें ॥ २७ ॥
काक्षिकं भेदितीक्ष्णोष्णपित्तकृत्स्पर्शशीतलम् ।
भ्रमकमहरं रुच्यं दीपनवस्तिशूलनुत् ॥
शस्तमास्थापनेहालघुवातकफापहम् ।
गण्डपधारणादनमलदोर्गन्ध्यशोपजित ॥२८॥
भाषाटीकासमेतः।
.
कांजी भेदनहे तीक्ष्णगरमहै पित्तकारक स्पर्शमें, शीतलहै,
भ्रमक्कमकी हरनेवाली रुचिकारक दीपन वस्तीके शुलको दूर
करने वाली है, स्थापनमें श्रेष्ठ हृदयको हितकारक लघुवात और
कफकी हरने वालीहै, और मुखमें कुल्ला धारण करनेवाला
मुखका मैल दुर्गन्धि और शोप रोगका जीतनेवालाहै ॥ २८ ॥
पुभिरेवगुणैर्युक्ते सौवीरकतुपोदके।
किमिदोगगुल्मार्श पाण्डुरोगनिवईणे ॥२९॥
इसी प्रकारके गुणोंसे युक्त कांजी और तुप (धान्यभूसी)
काजलहै, यह कृमि हृद्रोग गुल्म अर्श पाण्डुरोग दूर करताहै २९
मूत्रंगोजाविमहिष गजाश्चोष्ट खरोद्भवम् ।
पित्तलं रूक्षतीक्ष्णोष्णलवणानुरसंकटु ॥
क्रिमिशोफोदरानाह शूलपाण्डुकफानिलान् ।
गुल्मारुचिविपश्चित्रकुष्ठाशीसिजयेल्लघु ।।
दीपनं पाचनं भेदितेषु गोमूत्र मुत्तमम् ॥ ३० ॥
गोषकरी भेड़ भैंसा हाथी घोडा ऊंट गधा इन जन्तु ओंका
मूत्र पित्तकारक रूखा तीक्ष्ण गरम रसमें खारी कटु है कृमि
रोग सूजन उदर रोग अफारा अनाह शूल पाण्डुरोग कफ
तथा वात रोग अफारा अनाह शूल पाण्डु रोग कफ तथा
घात रोग जीतनेवाले और लघु हैं, दीपन पाचन और भेदनमें
गोमूत्र श्रेष्ठ है ॥ ३०॥
गोमूत्रं कटुतीक्ष्णोष्णं सक्षारत्वानवातलम् ।
लघुग्निदीपनमेध्यं पित्तलं कफवातनुत् ।।
गुल्मशूलोदरानाह विरेकास्थ पनादिषु ।
मूत्रप्रयोगसाध्येषु गव्यं मूत्रं प्रयोजयेत् ॥३३॥
गोमूत्र कटु तीक्ष्ण गरम है, क्षार युक्त होनेसे वात कारक
नहीं है, लघु अग्निका दीपन करने वाला बुद्धिको बढ़ाने वाला
पित्त कारक कफवात नाशक है, गुल्म शूल उदर अनाह
विरेचनके स्थापनादिमें तथा मूत्र प्रयोग साध्यादिमें गौका मूत्र
हित कारी है ॥ ३१ ॥
(७०) द्रव्यगुणः। दुर्नामोदरशूलेषु कुष्ठमेहाविशुद्धिपु। आनाइशोफगुल्मषु पाण्डु, रोगे च माहिपम् ॥ ३२॥ दुर्नाम ( ववासीर) उदर रोग शूल कुष्ठ प्रमेहके दूर करनेमें तथा अनाह शोफ रोग गुल्म और पाण्डु रोगमै भैसेका मूत्र हित कारक है ॥ ३२ ॥ कटुतिक्तान्वितं छाग मीपन्मारुतकोपनम् ॥ ३३ ॥ छागका मंत्र कटु तीखा और कुछ बातका कोप करने वाला है ॥ ३३ ॥ सक्षारतिक्तकटुकमुष्णं वातनमाविकम् ॥ ३४॥ भेडका मूत्र तीखा कटु गरम और वात नाशक है ॥ ३४ ॥ आश्वं कफहरं मूत्रं वातचेतोविकारनुत् ॥ ३५ ॥ घोडेका मृत्र कफ हरने वाला वात चित्तके विकार उन्माद अपस्मारको दूर करता है ॥ ३५ ॥ तीक्ष्णं क्षारे किलासेच नागमूत्र प्रयोजयेत् ॥ ३६॥ तीक्ष्ण क्षार और किलासमें हाथीका मूत्र प्रयोग करे ॥३६॥ दीपनं गार्दभं मूत्रं गरचेतोविकारनुत् ॥ ३७॥ गधेका मूत्र तीक्ष्ण है विष और चित्तके विकारको दूर करता है ॥ ३७॥ अर्शीघ्नं कारभं मूत्र मानुपंतु विषापहम् ॥ ३८॥ इति मद्यादिवर्गः। ऊंटका मूत्र यवासीर नाशक है और मनुष्यका मन्त्र विष हारकहै ॥ ३८॥ इति मद्यादिवर्गः। विधिनाकृतभाहारःप्रीणनोधातुपोपकः । स्मृत्यायुः पुष्टिवर्गोंजःसत्वोत्साहविवर्द्धनः॥१॥ अय भोजन पोग धान्पादिका संस्कार वशसे गुण कथन करने हैं अर्यात कृतान्य वर्गका गुण कथन करते विधि पूर्वक H भाषाटीकासमेतः। (७१) बनाया हुआ भोजन प्राणियोंकी धातुओंका पुष्ट करनेवाला स्मृति आयु पुष्टि वर्णवल सत्व और उत्साहका बढानेवालाहै । ओदनः क्षालितः स्विन्न प्रस्तुतोविपदोलघुः । भृष्टतण्डुलजोत्यर्थ मन्यथास्याद्गुरुग्धसः ॥२॥ धोये हुए चावलोंका भात मृदु हुआ पसाया विष दायक और लघुहै और भुने चावलोंका उससेभी अधिक लघु है, और विना धोये हुओंका भारी है ॥ २॥ मण्डस्तु भूरिदोपन्नोदीपनोऽनिलनाशनः । ज्वरहापरमोवल्यास्वेदनोमार्गशोधनः॥३॥ मण्ड (चावलोंका मण्ड चौदह गुणे जलमें होताहै ) बहुत दोषोंका नाश करनेवाला, दीपन तथा वात नाशकहै ज्वर नाशक परम बल दायक स्वेदन और इन्द्रियोंके मार्गका शोधन करनेवालाहे ॥३॥ लाजमण्डोविशुद्धानांपथ्यः पाचनदीपनः । वातानुलोमनोद्यापिप्पलीनागरान्विताः ॥४॥ खीलोंका मण्ड विशुद्ध पथ्य पाचन और दीपनहै, वातका अनु लोम करने वाला हृदयको हित कारक पीपल और सोंठ डालनेसे होता है ॥४॥ पेया स्वेदानिजननी वातवर्धोऽनुलोमनी। क्षुत् तृष्णा ग्लानिदौर्बल्य कुक्षिरोगज्वरापहा ॥५॥ पेया और विलेपी दो प्रकार कीयवागू होती है, पेया स्वेद, और अग्निको उत्पन्न करने वाली, वात और मलको अनु | लोम करने वाली, क्षुधा तृपाग्लानि दुर्वलता कुक्षिरोग और ज्वरकी नाशकरने वाली है ॥ ५ ॥ विलेपीग्राहिणीहद्यातृष्णानीदीपनीहिता। व्रणाक्षिरोगसंशुद्ध दुर्वलस्नेहपायिनाम् ॥ ६॥ विलेपी (चौगुने जलमेसिद्ध अन्न ) ग्राही हृदयको हित कारक
(७२)
द्रव्यगुणः।
तृष्णा नाशक दीपनी हित कारक है, व्रण अक्षिरोग नाशक है,
शुद्ध दुर्बल नेह पानवालों को हित कारक है ॥ ६ ॥
यतागूवरतृष्णानीलध्वीवस्तिविशोधनी ॥ ७ ॥
यवागू ज्वर तृष्णाकी नाशकरने वाली लघुवस्ति
| शोधक है ॥ ७ ॥
शिक्थकैरहितोमण्डः पेयाशिस्थसमन्विता ।
यवागर्वहुशिक्थस्याद्विलेपीविरलद्रवा ।। ८॥
सिक्थ से रहित मण्ड और पेया, सिक्थके सहित होती है,
यवागू अधिक सिक्थ वाली और विलेपी किंचित द्रवयुक्त
होती है अर्थात् द्रव्यसे चौगुना पानी डालकर औटावै जवल
| पसीके समान गाढी और लिपटने वाली हो जाय उसे विलेपी
कहते है ! द्रव्यसे चौगुने पानीमें डालकर पतलीपेजके समान
कुछल्हस दारपर्यन्त औटी हुई कोपेया कहते है पेयाकी अपेक्षा
कुछगादे कोयूष कहते है। चारपल औषधीले कुछ थोडीसी
कूटकर उसमें ६४ पलपानी डालकर औटावे आधार है तब उतार
ले उसे छान चावल आदि द्रव्यडाल औटावे गाढी होनेपर
| उत्तार लेइसे यवागू कहते हैं ॥ ८ ॥
मण्डपेयाविलेपीनामोदनस्य च लाघवम् ।
यथापूर्वशिरस्तत्र मण्डो वातानु लोमनः ॥९॥
मोदनकी अपेक्षा विलेपी विलपीकी अपेक्षा पेया पेयाकी
अपेक्षा मण्ड अधिक लघुहे उसमें मण्ड वातका अनुलोमन कर-
नेवालाहे ॥९॥
पायसः कफकृद्धल्योविष्टम्भी मेदुरोगुरुः ॥ १० ॥
पायस खीर कफका करनेवाला बलकारक अतिस्निग्ध और
भारी है तथा विष्टम्भीहै ॥ १० ॥
कृशरापित्तकफदावल्या मारुतनाशिनी ॥ ११ ॥
कृशरा (सिचढी) पित्त कफकी करनेवाली बलकारक वात
नाशकई ॥ ११ ॥
भाषाटीकासमेतः।
अन्नं मांसादिभिः साई सिद्धं स्याद्गुरुव्रहणम् ॥१२॥
जो अन्न मांसादिके संगसिद्ध कियाहै वह भारी और बाजी
कर होताहै ॥ १२॥
रसौदनोज्वरहरोवल्यो ग्राह्यनिलापहः ॥ १३ ॥
रस ओदन ज्वरहारक बलकारक प्राही और वात नाशकहै१३
घोलभक्तं श्रमाशोघ्नं रुच्यं तर्पणदीपनम् ॥१४॥
घोल भक्त (मठेमे मिला अन्न) श्रम बवासीर नाशक रुचि-
कारक तृप्ति कारक दीपनहे ॥ १४ ॥
सद्योऽन्नं वारिणाधीतं शीघ्रपाकं बलप्रदम् ।
शीतलं मधुरं रूक्षं श्रमन्नं तर्पणं परम् ॥ १५ ॥
तत्कालजलसे धोया हुआ अन्न शीघ्र पकनेवालाहै बल देने
वालाहै,वह शीतल मधुर रूखा श्रमनाशक परम तृप्ति कारकहै १५
पानीयभक्तं व्युपितं मेदःस्वेदकफप्रदम् ।
त्रिदोपकोपनं रूक्षं मलकृन्मूत्रलंपरम ॥ १६॥
पांच गुने पानीमे पकाया भात मेदस्वेद और कफका करने-
वालाहै, त्रिदोषका कोप करनेवाला, सखामल कारक, और
परम मूत्र कारकहै ॥ १६ ॥
सुस्विनोनिस्तुपो भृष्टईपत् सूपोलघुर्हितः॥१७॥
अच्छी प्रकार भिजोकरा छुलके उतारी हुई कुछ भूनीहुई पक्क
हुई सूप (दाल) हलकी और हितकारक है ॥ १७ ॥
स्विनं निष्पीडितं शाकं स्नेहसंस्कारितं हितम।
अस्विनं स्नेहरहितमपीडितमतो न्यथा ॥ १८॥
इसी प्रकार जोश दिया हुआ पीडित किया शाक धृतादिके
| संस्कारसे हितकारक होताहै और जो जाशन दिया गयाह स्नेह
| रहित तथा पीडित नहीं किया गया वह इसके विपरीत गुण
वाला है ।। १८ ॥
स्विनं मांस कटुस्नेहगोरसाम्लफलै सह ।
बृंहणं रोचनं बल्यं खालिष्कस्तु सदागुरुः ॥ १९ ॥
द्रव्यगुणः।
जोश किया मांस कटु स्नेह युक्त गोरस (घृतादि) तथा
आम्ल फलके साथ सेवन किया हुआ वाजीकर रुचि कारक
बलकारक है और खालिप्क (सूखे मांसका भेद) सदा भारीहे १९
तदेवगोरसादानं सुरभिद्यसंस्कृतम् ।
विद्यात्पित्तकफोत्केदि वलमांसानिवर्द्धनम् ॥ २० ॥
वही गोरसादिसे युक्त सुगंधिके द्रव्योंसे संस्कार किया हुआ
पित्त और कफका उत्क्लेद करने वाला वल मांस और अग्निका
| बढ़ाने वाला है ॥२०॥
परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं हर्पणं प्रीणनं गुरु ।
रोचनं चलमेधाग्निमांसोजःशुक्रवर्द्धनम ॥२१॥
और सूखा मांस (बहुतसे घृतमें भूनकर वारंवार उस पर
गरम जल छिडककर जीरा आदि मसाला मिले मांसको शुष्क
कहते हैं) यह गुणोंमें स्थिर स्निग्ध हर्षण और प्रसन्न करने
| वाला रुचिकारक वल बुद्धि अग्नि मांस ओज वीर्यका बढ़ाने
घाला है ॥२१॥
तदेवोलुप्तपिष्टत्वादुल्लु तमिति भापितम् ।
परिशुष्कगुणैर्युक्तं ज्ञेयं पथ्यतमं गुरु ॥२२॥
घही लुप्तपिष्ट होनेसे लुप्त पिष्ट नाम वाला कहाताहे वह
सूखा गुणोंसे युक्त अधिकतर पथ्य कारक और भारी है ॥ २२ ॥
तदेवशूलिकाप्रोतमारे परिपाचितम् ।
ज्ञेयं गुरुतरं किञ्चित् प्रदिग्धं गुरुपाकतः॥२३॥
वही शूलिकामै पोहकर अंगारके ऊपर पकानेसे कुछ दग्ध
होकर भारी और पाकर्म गुरु होताहै ॥ २३ ॥
मांसंयत्तैलसिद्धं तदीयोष्णं पित्तकृद् गुरु ।
घृतसिद्धन्तुरुच्यग्निदृष्टिदंपित्तनुल्लघु ॥२४ ॥
जो मांस तेलमें सिद्ध किया, वह वीर्यमें ठण पित्तकारक
और भारीह और पृतमें सिद्ध किया रुचि अग्निकारक दृष्टि देने
वाला पिननाशक लघु है ॥२४॥
भाषादीकासमेतः। (७५) वेशवारोगुरुः स्निग्धोवलोपचयवर्द्धनः ॥ २५ ॥ वेसवार (मांसरस ) भारी चिकना बलकारक है मांसको हड्डीसे अलगकर भली प्रकार पीसकर गुड़ और घीद्वारा स्निग्ध करिकै पीपलकाली मिरच मिलाले इसको वेशवार कहतेहैं २५ रसोज्वरक्षयहरः स्मृत्योजः स्वरवद्धनः । बूंदणः प्राणानोवृष्यश्चक्षुष्योवणिनां हितः॥२६॥ मांसरस ज्वर क्षयका हरनेवाला स्मृति ओज स्वरका बढ़ाने वाला वाजीकर प्रसन्नता कारक वीर्यकारक नेत्रोंको हितकारी व्रणों में हितकारक है ॥ २६ ॥ सदाडिमयुतोवृष्यः संस्कृतोदोपनाशनः॥२७॥ और दाडिमी से युक्त वही बलकारक है और संस्कार करने से दोषनाशक है ॥ २७॥ प्रीणनः सर्वधातूनां विशेषान्मुखशोषिणाम् । क्षुत्तृष्णापहर श्रेष्ठः सोरावः स्वादुशीतलः ॥२८॥ रसके ऊपर का स्वच्छ भाग सब धातु ओंका प्रसन्न करने वाला विशेषकर मुख शोषमें हितकारक है, क्षुधा तृष्णाका हरने वाला स्वादु शीतल है ॥२८॥ मांसंयदुद्धृतरसं न तत्पुष्टिवलावहम् । विटम्भिदुर्जरं रूक्ष नीरसं मारुतावहम् ॥ २९ ॥ जिस मांससे रस निकल गया है वह पुष्ट और बलकारक नहीं होता है वह विष्टम्भि देरमें पचनेवाला रूखा निरस वात | का करनेवाला है ॥ २९॥ दग्धमत्स्योगुरुर्वृष्यो बृंहणः प्राणवर्द्धनः । क्षीणशुक्राश्चयेकेचित् ममजज्जरिताश्रये ।। नित्यं स्त्रीसेविनश्चैव क्षीणरेतसएव च । दग्धमत्स्योहितस्तेपां स तैललवणान्वित्तः ॥ ३० ॥ जला हुआ मत्स्य भारी वीर्य वर्द्धक है मद जनक और प्राणका बढ़ाने वाला है जो कोई क्षीण वीर्य भग्न और जर्जरित
(७६)
द्रव्यगुणः।
है वा नित्य स्त्री प्रसंग करने वाले क्षीण वीर्य हैं उनके निमित्त
तेल लवण युक्त दग्ध मत्स्य हितकारक है ॥ ३०॥
तस्माद्धीनगुणः किञ्चिद् भृष्टमत्स्य उदाहृतः ॥ ३१॥
भुना हुआ मत्स्य कुछ उससे हीनं गुणवाला है ॥ ३१ ॥
यथाप्रकृतिनिदेश्यो व्यञ्जनेषु गुणान्वयः ॥ ३२ ॥
और भी व्यननो में प्रकृतिके अनुसार गुण जानना ॥ ३२ ॥
कफनोदीपनोहयः शुद्धानां ब्रणिनामपि ।
ज्ञेयःपथ्यतमश्चापि मुद्गयूपः कृताकृतः ॥ ३३ ॥
मूंगका यूष कफ नाशक दीपन हृदयको हितकारक शुद्ध हुए
व्रण वालोंको हितकारक है लवणसे युक्त होवा नहीं ॥ ३३ ॥
सतुदाडिममृद्धीकायुक्तः स्यादागपाडवः ।
रुचिष्णुर्लघुपाकश्च दोपाणाञ्चाविरोधकृत् ॥ ३४॥
वही दाडमी दाखसे युक्त होकर राग पाडव कहलाताहै यह
रुचिकारक पाकमें लघु दोषोंका अविरोधी है ।। ३४ ॥
मसूरमुद्गगोधूम कुलत्थलवणैःकृतः।
कफवित्ताविरोधीस्यात् वातव्याधौ च शस्यते॥ ३५ ॥
मसूर मूंग गेहूं कुलथी लवणसे सिद्ध किया कफपित्तका विरोधी
होताहे और वात व्याधिमें अच्छा कहाहै ॥ ३५ ॥
मृद्वीकादाडिमयुक्तसचाप्युक्तोऽनिलादिते ।
रोचनोदीपनोहयो लघुपाक्युपदिश्यते ॥ ३६॥
दाडिमीके संग मुनक्का वातव्याधिमें हितकारकहें यह रुचि.
कारक दीपन हृदयको हितकारक और पाकमें लहै ॥ ३६॥
पटोलनिम्बयूपौतु कफमेदोविशोपिणौ ।
पित्तनोदीपनौद्यो किमिकुष्टज्वरापही ॥ ३७॥
पटोल और नीमका यूप कफ और मेदका शोषनेवाला
पित्तनाशक दीपन हृदयको हितकारक कृमि और कुष्ठका
नाशकई ॥ ३७॥
भाषाटीकासमेतः।
(७७)
हन्तिमूलकयूपस्तु कफमेदोगलामयान् ।
श्वासकासप्रसिश्याय प्रसकारोचकञ्चरान् ॥ ३८॥
मूलीका यूष कफ मेद गलेके रोग स्वासकास पीनस प्रसेक
अरुचि ज्वरको दूर करताहै ॥ ३८॥
मुद्दामलकयूपस्तु माहीपित्तकफेहितः।
यवकोलकुलत्थानां यूपः कण्ठ्योऽनिलापहः ॥ ३९॥-
मूंग और आमलेका यूष ग्राही पित्त और कफमें हितका-
रकहै, जो कोल (कंकोलक) कुलथीका यूष कंठमें हितकारक
और वात नाशकहे ॥ ३९ ॥
सबंधान्यकृतस्तद्वद बृंहणः प्राणवर्द्धनः ॥१०॥
सम्पूर्ण धानोका किया यूष इसीप्रकार बलकारक बाजीकर
और प्राणवर्द्धनहै ॥ ४०॥
खडकाम्बलिकोहयो छर्दिवातकफेहितौ ॥४१॥
खड दो प्रकारका होताहै एकता और समीधान्यके सहित,
दूसरा मट्ठा और शाक मिलाया हुआ, पहला रूप धान्य स्नेह
अम्ली पदार्थ युक्त होताहै, दूसरा कैप चांगेरी (अम्बिलोना)
| काली मिर्च जीरा चीता डालकर पक्क किया जाताहे और दही
अम्ल लवण स्नेह तिल उरद संयुक्त होताहै यह खडक अंव लिक
नामवाले दोनो यूष हृदयको हितकारक छर्दिवात और कफमैं
हितकारक. ।। ४१॥
वल्यःकफानिलौहन्तिदाडिमाम्लोऽनिदीपनः ॥४२॥
दादिमी और अम्ल पदार्थोके साथ किया यूष बलकारफ,
| कफ वातका हरने वाला, अग्नि दीपन करता है ॥ ४२ ॥
धान्याम्लोदीपनोयः पित्तकद्वातनाशनः ॥ १३ ॥
धान्य और अम्ल द्रव्यका यूप दीपन हृदयको हित कारक
पित्तकारक वात नाशकहै ।। ४३ ।।
दध्यम्लालेष्मलोबल्यः स्निग्धोवातहरोगुरुः॥४४॥
दही अम्ल पदार्थका यूप श्लेष्मा बलकारक चिकना वात हर
और भारीहै ॥ ४४ ॥
(७८) द्रव्यगुणः। .. तकाम्लः पित्तकृद्धल्योविपरक्तपदपणः॥ ४५ ॥ तक अम्ल यूष पित्त करनेवाला. बलकारक पित्त और रक्तका दूषित करने वालाहै ॥४५॥ अथगोरसधान्याम्लफलाम्लैरन्वितञ्चयत् । यथोत्तरं लघुहितंसंस्कृतासंस्कृतरसम् ॥ ४६॥ जो यूष गोरस धान्य अम्ल फल अम्ल द्रव्योंसे युक्तहे वह उत्त रोत्तर संस्कार किया हुआ लघु और हितकारक होताहे गोरस अम्लकी अपेक्षा धान्य अम्ल युक्त रस लघु होताहे, इत्यादि यह | संस्कार युक्त और संस्कार रहित जानना ॥ ४६॥ तिलपिण्याकविकृतिः शुष्कशाकं विरूढ़कम् । सिण्डाकी च गुरूणिस्युः कफपित्तहराणिच ॥४७॥ तिलकी पीसी खल सूखाशाक विरूढक ( अंकुरित शाक) सिण्डेकी यह सब भारी और कफ पित्तके हरने वाले हैं ॥ ४७ ॥ रागपाडवयोगास्तुच्छदिमृच्छतिपापहाः। लघवोवृंदणावृष्या हृद्यारोचनदीपनाः॥१८॥ सिता रुचक (काला नोन सैंधानोन अम्ल फालसा जम्बू फलके रसीसे युक्त राजसरसों मिलाया हुआ राग होताहै और पाडय मधुर अम्ल लवण सुगन्धि द्रव्योंसे उत्पन्न हुए अनेक | | प्रकारके कोई कहते हैं कि गुडके सहित आमकारस पकाकर | उसमें स्नेह और सौंठ डालनेसे राग पाहव होताहे कोई मंगके | रसमें दाख और अनारकारस मिलानेको राग पादव कहते हैं। यह दिमूच्छा तृष्णाका हरनेवालाहे ॥ ४ ॥ रसाला हणीवृष्या स्निग्धावल्यारुचिप्रदा॥ १९॥ रसाला (दधि संयोग पदार्थ) दालचीनी इलायची तेजपात नागकेशर जीरा गुड अदरक सोंठ पीसकर मिलानेसे रसाला लवण पृत तेल मिरचादिसे रहित असंस्कन वा अकृत होताहे और इन पदायाँसे पुनकृत वासंस्कृत होताद । १ तीर भूतिमें प्रसिद्ध है।
भाषाटीकासमेतः।
(७९)
होताहै ) यह बाजीकर वीर्य वर्द्धक स्निग्ध वलकारक तथा रुचि
देनेवालाहै ॥४९॥
दधिस्याद् डसंयुक्तं स्नेहनश्चानिलापहम् ॥ ५० ॥
गुडके साथ दही नेहन और वात हर होताहै ॥ ५० ॥
द्राक्षाखर्जूरकोलानां गुरुविष्टम्भिपालकम् ।
परूपकाणां क्षौद्रस्य यच्चेक्षविकृतिप्रति ॥२१॥
दाख खजूर कोल ( काली मिर्च ) का यूष भारी विष्टम्भिहै,
फालसे और शहतकी, तथा जो ईखके रसकी विकृतिहै, यह
पालक पर्यन्त जो द्रव्यहै ।। ५१ ।।
तेषां कचम्लसंयोगात पालकानां पृथक् पृथक् ।
द्रव्यमानञ्चविज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् ॥ ५२ ॥
इनका कटु अम्लके संयोगसे द्रव्यमान पृथक पृथक् जानकर
| गुणकर्मकहै ॥ ५२ ।। ।
दुग्धानं शीतलं स्वादु वृष्यं वर्णकरं गुरु ।
वातपित्तहरं रुच्यं बृंहणंबलवर्द्धनम् ॥५३॥
दुध और आम शीतल स्वादु बल वीर्य करने वालाहै, वर्ण
| कारक और गुरुहे वात पित्तहर रुचिकारक वाजीफर बल
| वर्द्धक है ॥ ५३॥
सक्तवः सर्पिपाभ्यक्ताः शीतोदकपरिणताः।
नातिद्भवा नातिसान्द्रामन्थ इत्यभिधीयते ॥ ५४॥
शीतल जलसे युक्त घृत सहित सत्तू न बहुत पतले न बहुत
घने मन्थ कहलाते हैं ॥५४ ।।
मन्या सद्यो वलकरः पिपासावरनाशनः॥५६॥
मन्य तत्काल बल करनेवाला,प्यास और ज्वरका नाशकहे५५
साम्लस्नेहगुडोमूत्रकृच्छ्रोदावर्तनाशनः ।
शर्करेक्षुरसद्राक्षायुक्तः पित्तविकारनुत् ॥
द्राक्षामधुकसंयुक्तः कफरोगनिवईणः।
वर्गवयेणोपहितो मलदोपानुलोमनः ॥५६॥
द्रव्यगुणः। 'और यही मन्थ अम्ल स्नेहके सहित मूत्र कृच्छ और उदा वर्तका नाशकहै, तथा शर्करा इक्षुका रस और दाखसे युक्त पित्त विकार नाशकहै, तथा दाख और मधुके संग कफरोग नाशकहे इस प्रकार अम्ल शर्करा द्राक्षा तीन वर्गोंके साथ मल और दोषका अनु लोमन करनेवालाहै ॥ ५६ ॥ गुबीपिण्डी खेरात्यथै लध्वीसैवविपर्ययात् । सक्तनामाशुजीयेतमृदुत्वादवलेहिका-॥२७॥ इति कृतान्नवर्गः। सत्तुकी पिण्डी भारी है और पतले सक्तुं हलके हैं संतुओंकी अफ्लेहिका (चाटने योग्य) मृदु होनेसे शीघ्रजीर्ण होजातीह ५७ इति कृतन्नवर्ग: वक्ष्याम्यतःपरं भक्ष्यारसवीर्यविपाकतः॥१॥ अब रस वीर्यके विपाकसे भक्ष्य पदार्थोंको कहत्ताहूं ॥ १॥ पृथुकागुरवः स्निग्धाः कफविष्टंम्भकारकाः। वल्याः सक्षीरभावात्तु वातनाभिन्नवर्चसः ॥२ ।। पृथुक (चौले ) भारी स्निग्ध कफ और विष्टम्भ कारक बल कारकहें और वही क्षीरके भावसे वात नाशक हैं ॥ २ ॥ लाजाश्छद्यतिसारघ्नाः नेहमेदकफच्छिदः॥३॥ खील छर्दि अतिसारको दूर करनेवाली स्नेह मेद और कफकी नाश करने वाली हैं ॥३॥ धानोल्लम्बास्तु लघवः कफमेदोविशोषणः॥४॥ धानोंक होले लघु कफ मेदके सोखने वाले हैं ॥४॥ सक्तवो वातलारूक्षा वद्धवर्चस एवच ॥५॥ सत्तूवातकारक सखे मलको बांधनेवालेहें॥५॥ भक्ष्याः क्षीरकृतावल्या वृप्पोद्याः सुगन्धिनः । अदाहिनः पुष्टिकरा दीपनाः पित्तनाशनाः॥६॥ दूध लपसी बलकारक वाजी कर हृदयको, हितकारक .
भाषाटीकासमेतः। सुगन्धि करने वालीह अदाहि पुष्टि कारक दीपन और पित्त | कारकहै ॥६॥ घृतपूराः प्राणकरा हयाः श्रेष्मविवर्द्धनाः । वातपित्तहरा वृष्या गुरवो मांसशुक्रलाः॥७॥ घृत पूर प्राणोंको बल देनेवाले हृदयको हितकारक कफके वढानेवाले हैं वात पित्त हर वाजीकर भारी मांस और वीर्यके बढानेवालेहे (घेवर )॥७॥ गौड़िकाव्हणा वृष्या गुरखश्चानिलापहाः। अदाहिनः पित्तसहाः शुक्रलाः कफाईनाः॥८॥ गोडिका (गुइको आटेमें मिलाकर पकाई हुई बृंहणहै वीर्य करनेवाली है भारी तथा वात नाशक है अदाही पित्तसहने | वाली वीर्यकारक कफ वर्द्धक है ॥ ८ ॥ मधुशीर्पकसंयावाः पूपायेते विशेषतः। गुरवोबृहणाश्चैव मोदकास्तु सुदुर्जराः॥९॥ मधु शीर्षक ( रसभरी) संयाव * (गुझिया) पुए यह विशेष करके भारी और वाजी कर है और मोदक ( लड्डू ) दुर्जर है॥९॥ पट्टका प्राणरुचिकृद्रुः स्वोऽनिलापहः ॥ १० ॥ पट्टक (लौंग सोंठ मिरच पीपल यह वस्तु दहीमें मथकर डाले और चूर्णकर दाडिमके बीज डालनेसे बनता है) यह माणोंको रुचि करनेवाला भारी स्वरमें हितकारकवातका हरनेवालाहै १० विष्यन्दः स्तिग्धमधुरो वल्योवातापहो गुरुः ॥११॥ गेहूंका कसार (घी पूरा मिलाहुआ) स्निग्धमधुर वात नाशक और भारी है ॥ १२ बृंहणावातपित्तना वल्या भक्ष्यास्तु सामिताः ॥ १२ ॥ बलकारक वात पित्तनाशक वाजी कर द्रव्य गोधूम चूर्णका बना हुआ होता है॥ १२ ॥ * संयाव गेहूके आटेको पानी और दूधके साथ माडके उसके खण्डकर घृतमें उतारे इसमें दालचीनी इलायची वडी काली मिर्च और अद्रख का पूर्ण डाले। +
(८५)
द्रव्यगुणः।
यथाकारणमासाद्यभोकृणां छन्दतोपिया।
अनेकद्रव्ययोनित्वाच्छास्वतस्तानविनिर्दिशेत ॥२७॥
इति भक्ष्यवर्गः।
पड षडयवागू तथा राग षाडव सहक विचित्र पालक और
भी अनेक प्रकारके यूप कटु अम्ल लवण युक्त स्वादु लेह्य पदार्थ
तथा फलके उत्पन्न हुए पदार्थ वैद्योंके वाक्यसे बनाये जाते हैं
वह भोजन करनेवाले यथा कारणसे वा स्वच्छन्दतासे बनातेहैं
अनेक द्रव्योंको उनकी योनिके अनुसार कथन करै ॥ २७ ॥
इति भक्ष्यवर्गः।
अथाहारविधिं वक्ष्ये विस्तरेणानुपूर्वशः॥१॥
अब विस्तार पूर्वक आहार विधि कहताहूं ॥१॥
आहास्थितमसङ्कीर्ण शुचिकार्य महानसम् ॥ २ ॥
रसोई घर श्रेष्ठ पुरुषोंसे स्थित और पवित्र होना चाहिये
| और बहुत संकीर्णता नहो ॥२॥
तबाप्तैः साधितं रम्यमविरुद्धमुपस्कृतम् ।
विपनरगमन्वैभिपगन्नेनिवेदयेत् ॥३॥
वहाँ श्रेष्ट रसोइये श्रेष्ट भोजन बनावें जो संयोगसे विरुद्ध
नही विषनाशक औषधी आर मंत्रोस युक्तकर उस अन्नको
निवेदन कर ॥३॥
घृतं कार्णायसेदेयं पेयादेयातु राजते।
फलानि सर्व भक्ष्यांश्च प्रदद्याद्वेदलेपुतु ॥ १॥
घी कृष्ण लोहके पात्रमें देना चाहिये पेया चांदीके पारमें
फल और सब प्रकारके भोजन पत्तल पर देने चाहिये कोई
दलका अर्थ यांसका पात्र करते ॥४॥
परिशुष्कप्रदिग्धानि सोवणेपूपकल्पयेत् ॥५॥
सो और प्रदिग्ध पदार्थ वर्णक पात्रोंमें घरे ॥५॥
प्रवाणि रसांश्चैव राजतेपूपहारयेत् ॥६॥
भाषाटीकासमेतः।
और द्रध ( पतले ) रस चांदीके पात्रों में काल्पत कर ॥ ६॥
कटाणि खड़ांश्चैव सर्वान शैलेषु दापयेत् ॥७॥
मट्टे दहीके हे पदार्थ पत्थरके वर्तनों में धरै ॥ ७ ॥
दद्यानाम्रमये पात्रे सुशीतं सुशतं पयः।
पानीयं पालक मद्यं मृन्मयेषु प्रदापयेत् ॥८॥
औटाकर शीतल किया दूध ताम्बेके पात्रमें रखना चाहिये
| पानी पालक और मद्य मट्टीके पात्रमें रक्खै ॥८॥
पनवेयपत्रिपुरागपाडवपट्टकाम् ॥९॥
वज ( हीरे ) संयुक्त पानों में रागपाडव और पट्टकोंको रक्खै९
पुरस्तादिमले पात्रे सूपं दद्यात्तुपाचकः ।
फलानि सर्व भक्ष्यांश्च परिशुष्काणि यानि च ॥
तानि दक्षिणपातु भुनानस्योपकल्पयेत् ।
प्रद्रवान रसयूपादीन सव्ये पार्थे प्रदापयेत् ॥
सर्वान् गुडविकारांश्च रागपाडवपट्टकान् ।
पुरस्तात् स्थापयेत्तानो द्वयोरपि च मध्यतः॥ १० ॥
और उनके आगे उज्वल पानमें दाल भात परोसना चाहिये
तथा फल और सब भक्ष्य पदार्थ शुष्क द्रव्य यह भोजन करने
बालके दक्षिण और स्थापन करे और गोलेरसयपादिको वाई।
और स्थापन करे सम्पूर्ण गुटके विकार राग पाउन सदृश पन
दोनों ओरके रवये पदार्थोके आगे स्थापन करे ॥ १०॥
एवं विज्ञायमतिमान् भोजनस्यीपकल्पनाम् ।
भोक्तारं विजने रम्ये निःसम्पातेतु भोजयेत् ॥ ११ ॥
बुद्धिमान इस प्रकार भोजनकी फल्पनाको जानकर भोजन
करने वालेको वात रहित निर्जनमें भोजन करावे ।। ११ ॥
पूर्व मधुरमनीयात् मध्येऽल्मलवणो रसी।
अन्ते शेपान रसान वैद्योभोजनेषवचारयेत ॥ १२ ॥
प्रथम मीठा पदार्थखाप मध्यमें अम्ल और एक पदार्थ
खाय और अन्तमें दूसरे रमोंको भोजन कर ॥ ११ ॥
(८६)
द्रव्यगुणः।
अन्नेन कुक्षेविंशो पाने के प्रपूरयेत् ।
आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेपयेत् ॥ १३॥
कोखके दो भाग अन्नसे और एक भाग पानसे पूराकरे चौथा
भाग पवनके आने जानेको खाली रक्खे ॥ १३ ॥
भुक्कापादशतं गत्वा वामपार्श्वन संविशेत् ।
शब्दान रूपरसात् गन्धानपश्चिमनसप्रियान् ।
भुक्तवानुपसेवेत तेनानं साधुतिष्ठति ।
भुक्तोपविशतस्तुन्दं शयानस्य वपुर्भवेत् ।।
आयुश्चक्रममाणस्य मृत्युर्धावतिधावतः ।
ताम्बूलमुपसेवेत कर्पूरायधिवासितम् ।। १४॥
भोजन करके सो कदम चले और वाम कर्वटसे लेटे शब्द
रूप रसगंध मनके प्रिय पदार्थ पहिले भोजन करने पर सेवन
करे इस्से अन्न भली प्रकार स्थित होता है भोजन करके बैठनेसे
पेट बढ़ता है लेटनेसे शरीर पुष्टहोता है टहलनेसे आयु बहती
है और भोजन कर दौड़नेसे संग मृत्यु दौडती है भोजन करने
पर कपरादिसे अधिवासित करताम्बूलका सेवन करे ॥ १४ ॥
ताम्बूलं क्षतपित्तासरूक्षोत्कुपितचक्षुपाम् ।
विपमू मदातीनामपथ्यं शोपिणामपि ॥ १५ ॥
ताम्यूल क्षत पित्त रुधिर विकार वाले नेत्र रोगी विष मासे
व्याप्त मदसे आर्त हुए पुरुषोंको अपथ्य है ॥ १५॥
अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्पति ।
तवभिन्नसंघात स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥
समानेनावधूतोऽनिरुदीर्यः पवनेन तु ।
काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ १६॥
अन्न ग्रहण कर्मका करने वालाप्राण अन्नको कोष्ठ में खेंचता है
वह पानी आदि द्रव पदायासे मृदुहोकर समान पवनसे निर्धत
होकर शिथिल होता हुआ अग्निद्वारा युभुक्षाके समय आयु
पृद्धिक निमित्त पचता है ॥ १६ ॥
भाषाटीकासमेतः। एवं रसमलायान माशयस्थ मधस्थितः। पचत्यग्निर्यथा स्थाल्या मोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥१७॥ इस प्रकार रस और मलके निमित्त आशय में स्थितहुआ अन्न जठराग्निसे इस प्रकार पचता है जैसा पटलोई में चावल पकते हैं ॥१७॥ अन्नमिएं झुपहितमिर्गन्धादिभिः पृथक् । देहेप्रीणातिगन्धादीन् प्राणादीनीन्द्रियाणिच ॥ १८ ॥ इष्ट अन्न जोगन्धादि युक्त सेवन किया है वह गंधादिके सहित देहमें माप्त होकर गन्धादि ग्रहण करने वाली नासिकादि इन्द्रि- योंको ग्रहण करता है आहारका पार्थिव भागदेहको पुष्टकर घ्राणमें प्राप्त हो उसकी गन्ध और देहकी गन्धको पुष्टकरता है उसी प्रकार जलादि पदार्थ जाने ।। १८ ।। भौमाध्यामेयवायव्याः पञ्चोषमाणः सनाभसाः । पञ्चाहारगुणान् स्वान् स्वान् पार्थिवादीन पचन्तिहि॥१९ पृथ्वी जल तेज वायु आकाश इनके भाग सूक्ष्म रूपसे सब द्रव्योंमें रहते हैं सो पार्थिव द्रव्योंका पाक अग्निके बिना नहीं होता इसकारण पांचो द्रव्योंके पदार्थों में सूक्ष्म रूपसे आग्नि रहती है इसकारण वे जठराग्निकी प्रबलतासे बलको प्राप्त हो | अपने अपने पार्थिवादि पांच आहारके गुणोंको पचातेहैं द्रव्य व्यापारके वशसे गंधादि होते हैं उस्से गुणोंका पाक कहा है यदि कहोकि तेजतो स्वयं हि अग्नि है पाचकहै उसके निमित्त दूसरी अनिकी अपेक्षा क्यों है तो उत्तर यह है कि, हम तेजमें पाचक | अग्निको स्वीकार नहीं करते हैं किन्तु जैसे तेजका सुवर्णादि द्रब्य होनेपर भी उसके पाकमें अग्निकी अपेक्षा है इसी प्रकार | अग्निका तेज द्रव्यमें है इसीप्रकार और भी जानना ॥ १९ ॥ सप्तभिर्देहघातारो धातवो द्विविधं पुनः। यथास्वमग्निभिः पाकं यान्ति किहप्रसादवत् ॥ २० ॥ देहके धारण करने वाली सात धातु दो प्रकारकी हैं वे किट प्रसाद (मल और सार) के समान यथायोग्य अपने में स्थित (८८) द्रव्यगुणः। - आग्नि द्वारा पाक प्राप्त होती हैं, धातुओंमें जो भूताग्नि है वही उनमें सहाय है ॥ २० ॥ रसाद्रक्तं ततो मांस मांसान्मेदस्ततोऽस्थि च । अस्भोमजा ततः शुक्र शुक्रागर्भः प्रसादजः ॥२१॥ इनके पाकसे क्रमसे जो होता है सो कहते हैं, रससे रक्त, रुधिर से मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मजा, मज्जासे वीर्य, और वीर्यके प्रसादसे गर्म होता है, प्रसादका योग सबके साथ है, प्रसाद नाम सार भागका है, कोई गर्भ प्रसाद सम्पूर्ण पदका अर्थ मोजका करते हैं, इस अर्थमें प्रसाद शब्दका अर्थ सर्वत्र नहीं लगता है,यद्यपि रसरक्त आदिके वननेमें विद्वा- नोंके कई पक्ष हैं जैसाकी दूधका दही दहीका मक्खन होता ह इसी प्रकार रसका रुधिर और उसका क्रमानुसार वीर्य होता है कोई कहते हैं रस पहले रक्तकोलावित करता है उसे | मांस स्वरूपमें लाकर उसेप्लावितकर मेद करता है जैसा | हारीतने कहा है रस सात दिनमे परि वर्तन करता हुआ श्वेत हरित पीत होकर फिर रक्त हो जाताहै वह यथा क्रमदिवसोंमें पित्तके कारण रक्त होजाताहे यही शुश्रुतमें लिखा है रस अपने समीपकी धातुको शीय पुष्ट करताहै दूरको देर में, इस मतमें विष्ठा मूत्र आहार मलादिका सार भाग रस कहाहै, वह व्यानद्वारा सब धातुओंको पुष्ट करताहै परन्तु "खले कपोत न्याय से जैसे दूर स्थित वीर्यभी प्रभावसे शीघ्र आजाताहे | इसी प्रकार बलकारक रस रक्तादि धातुओंको शीघ्र प्लावितकर मेदादि कर देताहै यही पक्षसाधुहे ॥२१॥ रसाद स्तन्यं तथा रक्तमसृजः कण्डराः शिराः । मांसाद्वसास्त्वचः पट्च मेदसःस्नायुसन्धयः ॥२२॥ अब उपधातुओंका वर्णन करतेहैं रससे दूध तथा नियोंका आर्तक, रुधिरसे स्थूलनसे, शिरा (छोटीनस) होतीहै मांससे नसा और त्वचा छ, और मेदसे म्नायु सन्धियें होती सुभुतमें लिखाहे रस एक महीने में वीर्य होताई और रज जो है वह रससे रतकी समान शीघ्र होताहै, मासमें नहीं, हां यह वार्ताह कि भाषारीकासमेत। उसकी गर्भाशयमें प्राप्ति एक महीनेमें होतीहै विश्वामित्र ने कहा है कि केशके समान वीजरक्तके वहानेवाली नाडी गर्भाशयको पूर्णकरतीहै, वह एकमासमें बीज रूप होजाता है, वह पीज भूत रक्तही आर्तवहै ७ भेदसे सूक्ष्म स्नायुका पोपण होताहै, चरकमें कण्डराशब्दस्थूल शिरावाची है, यही स्तन्य आदि सात उपधातु शरीरकी धारण करनेवाली हैं इनमें धातुओंके पुष्ट करनेकी सामर्थ्य नहींहै ॥ २२ ॥ किट्टमन्नस्यविण्मूत्रं रसस्य तु कफोमृजः। पित्तं मांसस्य खमलामलः स्वेदस्तु मेदसः ॥२३॥ स्याकिटं केशलोमास्न्थो मजः स्नेहोऽस्थि विट्त्वचाम् अपनी अग्निसे पाक होकर जो रसका मल भाग है वह | कफहै, वह प्रसादज होकर कफ होताहै रसोत्पति मासेही कफ नहीं होताहे, इसी प्रकार रक्तादि मलमें जानना, मासके मल | कर्ण नासा स्वेद प्रजनादि स्थानसे निकलते हैं, केशलोम | अस्थिका किट्ट होताहे सुश्रुतमें अस्थिका मल नख लिखा है, मजा स्नेह अस्थित्वचा इनका मल विदूर पिकाहै, कोइ इसका तीन प्रकारसे परिणाम कहतेहैं रसका अग्नि पाकसे मल कफ स्थूल भाग रस सूक्ष्म भाग रक्त है तैसेही रक्तका अनि, पाकसे मल पित्त, स्थूल भाग शोणित सूक्ष्म भाग मांस होता है, इसी प्रकार और भीजाना ।। २३ ॥ प्रसादकिट्टधातूनां पाकादेवं द्विधर्चुतः ॥२४॥ इस क्रमसे धातुओंके पाक होनेसे प्रसाद किट्ट दो प्रकारका है एक सार भाग एक मल होताहै ॥ २४ ॥ परस्परोपसंस्तम्भा धातुस्नेहपरस्परा ॥ २० ॥ इसप्रकार धातुओंके स्नेहफी परम्परा (तृप्तकरना) परस्पर सापेक्षहे यह परस्पर उपकारकहैं, यदि अत्यन्त व्ययसे शुक्रक्ष । यहो जाय तो धातुभी क्षय हो जाती है ॥ २५॥ अन्नस्य पक्का सर्वेषां पतृणामधिको मतः । *आंखफी मेल कीचड।
(९०)
द्रव्यगुणः।
तन्मूलास्ते हि तवृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकः ॥२६॥
भौतिक पांच प्रकारकी अग्नि सात अन्नकी एक पचानेवाली
इन सबमें जठराग्नि प्रधानहै उन सबकी क्षय वृद्धि इसीके
आधीनहै ॥ २६॥
तस्मात्तं विधिवद्युक्तैरन्नपानेन्धनहितैः।
पालयेत् प्रयतस्तस्य स्थितीह्यायुर्वलस्थितिः॥ २७॥
इसकारण जाठराग्निको अनेक प्रकार के युक्त इन्धन रूपी अन्न
पानोसे निरन्तर पालना करतारहै, इसकी स्थितिमें आयु बलकी
स्थिति होतीहै ।। २७॥
योहि भुङ्क्ते विधि मुक्ताग्रहीदोपजान्गदान् ।
सलोल्यालभते शीघ्रं तस्मान्नोलवयेदिधिम् ॥२८॥
जो विधिको त्यागकर भोजन करताहे उसकी चंचलतासे
उसको ग्रहणी आदि दोष शीघ्र प्राप्त होतेहैं, इससे विधिको
। उल्लंघन नकरे ॥ २८॥
प्राणा-प्राणभृतामन्त्रमन्नलोकोऽभिधावति ।
वर्णप्रसादसोस्वयं जीवितं प्रतिष्टितम् ॥
तुष्टिःपुष्पिवलमेधासर्वमन्नेप्रतिष्टितम् ।
लौकिककर्मथद्वत्तौ स्वर्गतोयच वैदिकम् ।।
कर्मापवर्गयञ्चोक्तंतचाप्यन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ २९॥
इत्याहारविधिः।
प्राणधारियोंके प्राणअन्न हैं,अन्नकी ओर लोक भावमान होते हैं।
वर्ण प्रसाद स्वर जीवित बुद्धि सुख तुष्टि पुष्टि बल मेधा यह सब
अन्नमेंही प्रतिष्ठित है वृत्तिम जो लौकिक कर्म है, स्वर्ग जानेमें
जो वैदिक कर्म है मोक्षके कर्म यज्ञादि जो कहे हैं, वहमी सब
अन्नमें प्रतिष्ठित हैं इसकारण विधिसे अन्नका सेवनकरै ।। २९ ।।
दयाहारविषिः।
शीतोष्णतोयासवमद्ययूपफलाम्लधान्याम्लपयोरसानाम् ।
यस्यानुपानन्तु हितं भवेद्यत्तस्मैप्रदेयं त्विह मात्रयातत्॥१॥
भाषाटीकासमेतः।
(९१)
आहारके उपरान्त सुखसे अनपाक होजाय इस कारण अनु
पानका सेवन करना बहुत उचित है सो संक्षेपसे कहतेहैं शीत
उष्ण जल आसव मद्य यूष फलाम्ल वीजोरानींबू आदि
धान्याम्ल कांजी आदि, पयमस्तु तत्रादि, इक्षुरस जिसे जो
अनुपान हितकारक है वह मात्राके अनुसार उतनाही उसकोदे।
व्याधिञ्च कालच विभाव्यधीरे-
द्रव्याणि भोज्यानि च तानि तानि ॥२॥
व्याधि और समयकी भावना करके वह बहु भोज्य पदार्थ
खाने चाहिये ॥२॥
स्निग्धोष्णं मारुतेशस्तपित्तेमधुरशीतलम् ।
कफेऽनुपानं रूक्षोष्णं क्षये मांसरसं पयः॥३॥
वातकी अधिकतामें स्निग्ध उष्ण पदार्थ हितहुँ पितमें मधुर
शीतलपदार्थ हितकफमें रूखे और उष्णपदार्थका अनुपान
हितकारकहें क्षयमें मांस रस पानकरना उचितेहै ॥३॥
उष्णोदकानुपानन्तु स्नेहानामथ शस्यते ।
ऋते भल्लातकस्नेहात्तवतोयंसुशीतलम् ॥ ४॥
स्नेहके ऊपर उष्णोदकका अनुपान श्रेष्ठ कहाहै केवल भिलावे
और स्नेहके ऊपर शीतल जलपान करना उचित है ॥ ४॥
अनुपानं बदन्त्येकेतैले यूपाम्लकाधिकम् ॥५॥
कोई तेलके ऊपर यूप अम्ल और कांजीका पान करना कहतेहैं।
शीतोदकं माक्षिकस्य पियानस्य च सर्वशः।
दधिपायसमद्यात्तें विपदुऐ तथैव च ॥६॥
पिसे अन्नपर शीतल जलका पान करना उचित है मद्यसे
आर्त हुए तथा विपके क्रमसे दही और घृत देना उचित है ॥६॥
केचित पिष्टमयस्याहुरनुपानं सुखोदकम् ।। ७ ॥
कोई पिष्ट पदार्थीपर कुछ एक गरम जलका अनुपान कहतेहै
पयोमासरसो वापि शालिमुद्रादिभोजिनाम् ।
युद्धाध्वातपसन्तापविषमद्यरुजासुच ॥८॥
(९२) द्रव्यगुणः। चावल मंगादि भोजन न करने वालोंको दूध तथा मांसका रस अनुपान कहा है युद्ध आतप सन्ताप विपरोगोंमें भी मांसरस तथा दूधका अनुपान हित है ॥ ८॥ मांसादेरनुपानन्तु धान्याम्लं दधिमस्तुवा ॥ ९ ॥ मांसादिके ऊपर दही और मस्तुका अनुपान हित है ॥९॥ अल्पाग्नीनामनिद्राणां तन्वाशोकभयकमैः । मद्यमांसोचितानान्तु मद्यमेवानिशस्यते ॥ अमद्यपानामुदकं फलाम्लं वा प्रयोजयेत् ॥१०॥ क्षीणाग्नि निद्रा रहित तन्द्रा शोकभय कमसे युक्त तथा मद्य मांस देनेके योग्य मनुष्योंको मद्यही श्रेष्ठ है जो मद्यपान नहीं करते हैं उनको जल जंभीरी नीबू आदिका अनुपान हितकर है १०॥ उपवासाध्वभाष्यस्त्रीमारुतातपकर्मभिः। क्लान्तानामनुपानार्थ पयः पथ्यं यथामृतम् ॥ सुराकृशानां स्थूलानामनुशस्तं मधूदकम् ॥ १३ ॥ वती मार्गसे आये हुए स्त्री बात धूपसे व्याकुल हुए तथा थकेहुओंको दूधका पान अमृतकी समान है, कृशीको मद्य हितकारक है और स्थूलोंको मधु मिला हुआ जल हितकारीहै ११ निरामयानां चित्रन्तु भक्तमध्ये प्रीतितम् ॥१२॥ और रोग रहिताको नाना प्रकारका भोजनके मध्य में कहा है १२ क्षीर मिक्षुरसचेति हितं शोणितपित्तिनः ॥ १३ ॥ रक्त पित्त वालोंको दूध और गन्नका रस हितकारीहै ॥ १३ ॥ अर्कशेलुशिरीपाणामासवास्तु विपार्तिपु ॥ १४॥ विपसे व्याकुल हुएको अर्क शेलु ल्हसोडा शिरीप और आसवका अनुपान हितकर है॥ १४ ॥ यदाहारगुणेः पानं विपरीतं तदिष्यते तबानुपानं धातूनां दृष्टं यत्नविरोधि च ॥ १६ ॥ जो आहारके गुणोंसे पान विपरीत है और धातुओंका विरोधी नहीं है वही अनुपान कहाहे जैसे दही अम्लका मधुर
भाषाटीकासमेतः।
(९३)
क्षीर पायसके साथ कांजी आदिका अनुपान है इसप्रकार दही
आदि अम्ल पदाथाके साथ क्षीरआदिका पान धातुओंका विरोध
करताह इससे वह अनुपान नहींह इसमकार औरभी जानना१५
दोपवद्द्वरुवा भुक्तमतिमात्रमथापि वा।
यथोक्तेनानुपानेन सुखमन्नं प्रजीयेति ।। १६॥
जो दोषवत् भारी अथवा यहुत खाया हुआहे वह यथोक्त अनु
पानसे मुख पूर्वक जीर्ण होजाता है ॥ १६ ॥
रोचनं वृंहणं वृप्यं दोपन्नं वातभेदनम् ।
तर्पण मार्दवकरं श्रमकृमहरं सुखम् ॥
दीपनं दोपशमनं पिपासाच्छेदनं परम् ।
पल्यं बलकरं सम्यगनुपानं सदोच्यते ॥ १७॥
रुचिकारक,वाजीकर बलकारक, दोपनाशक और वातक
भेदक नृप्तकारक मृदुताकारक श्रमकम हरनेवाले सुखदायक हैं
| दीपन दोष शमन कारक पिपासाके छेदनकरने वाले हैं बलयुक्त
बल कारक यह गुण सम्यकू अनुपानके हैं ॥ १७ ॥
तदादोकर्पयेत्पीतं स्थापयेन्मध्यसेवितम् ।
पश्चात्पीतं हयति तस्माद्वीक्ष्य प्रयोजयेत् ॥ १८॥
आदिमें जल पीनेसे अधोगत वायुसे रूखा होकर देहको कृश
करता है मध्यमें सेवित किया स्थापन करता है पीछे पिया
हुआ बलकारक है इसकारण देखकर प्रयोग करै ॥ १८ ॥
स्थिरतां गतिमक्किन्नमन्नमद्रवपायिनाम् ।
भवत्यावाधजननमनुपानमतः पिवेत् ॥ १९ ॥
जोगीले पदार्थ पान नहीं कर्ता वह अन्न स्थिरता गति और
केद रहितताको प्राप्त होताहै, और अवाथा जनकहे इस कारण
अनुपानको पानकर ॥ १९ ॥
न पिवेत् श्वासकासात्तों रोगे चाप्यूर्द्धजन्चुगे ।
क्षतोरस्कः प्रसेकी च यस्य चोपहत्तः स्वरः ॥२०॥
द्रव्यगुणः।
श्वास काससे आर्तहुवा ऊर्ध्वजत्रुके रोगसे युक्त क्षत हृदय
प्रसेकसे युक्त वा जिसका स्वर उपहत होगया है वह अनुपान
पानन करे ।। २० ॥
पीत्वाथ्वभाष्याध्ययनस्वप्नगेयानशीलयेत् ।
प्रदूष्यामाशयं तद्धि तस्य कण्ठोरसिस्थितम् ॥
स्यन्दाग्निसादच्छादीन् जनयेदामयान्वहून् ॥२१॥
अनुपान पान करके मार्गका चलना बहुत बोलना पढना सोना
| गाना नकर ऐसा करनेसे यह आमाशयको दूषित करके उसके
कण्ठ हृदय और उसमें स्थित हुए स्यन्दता अग्निसाद छर्दि
| आदि बहुतसे रोगोंको उत्पन्न करतेहैं ॥ २१ ॥
अनुपानं प्रयोक्तव्यं व्याधी शेषमभवेपलम् ।
पलद्वयन्त्वनिलने पित्तने तु पलनयम् ॥२२॥
इत्यनुपानविधिः।
लेप्मासे उत्पन्न हुई व्याधीम अनुपान प्रयोग करना चाहिये
जो पल मानहो बात व्याधीमें दोपल और पित्तमें तीन पल
प्रयोग करना चाहिये ॥ २२ ॥ (१ पल चार तोले)
इत्यनुपानविधिः।
अत उर्व प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मविस्तरम् ।
कर्मभिस्त्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रयागुणाः॥१॥
अब इसके उपरान्त गुणोंका कर्म विस्तार पूर्वक कहताई
नाना द्रव्योंके आश्रयी भूत गुण उनके कमांसे जाने जातेहैं ॥१॥
सादनः स्तम्भनः शीतोमू केददाहजित् ।
उष्णस्तद्विपरीतः स्यात्पाचनश्च विशेषतः॥२॥
शीतल पदार्थ हृदयको आनद करने वाला स्तम्भन कारक
यीतमा तृष्णा छेद और दाहका जीतने वाला है उष्ण इसके
विपरीत पदार्थहे वह इसके विपरीत गुण वाला है परन्तु पाचन
विशेप है॥२॥
भाषाटीकासमेतः। (९५) स्नेहमाईवकृत् स्निग्धो बलवर्णकरस्तथा। रुक्षस्तद्विपरीतः स्यात् लेखनास्तम्भनाखरः ॥३॥ स्निग्ध पदार्थ स्नेह और मृदुता कारक वलवर्ण करने वाला है रूखा पदार्थ इसके विपरीत गुण वाला लेखन और स्तम्भ न करने वाला है, तथा खर है अर्थात कर्कश है ॥ ३ ॥ पिच्छिलः पीडनोवल्यः सन्धानः श्लेष्मलोगुरुः ॥४॥ पिच्छिल पदार्थ पीडा कारक बलदायक सन्धान कारक कफ कारक और गुरु है ॥ ४॥ विशदोविपरीतः स्यात्लेदावृषणरोपणः॥५॥ विशद पदार्थ इसके विपरीत क्वेद हारक और व्रणोंका रोपण करने वाला है ।। ५॥ दाहपाककरस्तीक्ष्णः स्रावणोमृदुरन्यथा ॥ ६॥ दाह और पाकका करनेवाला, तीक्ष्ण वणस्राव करनेवालाहै, मृदु इसके विपरीतहै ॥६॥ सादोपलेपवलकृत गुरुस्तर्पणबृंहणः॥७॥ अग्निकासेक बलकारक भारी तृप्तिकारक वाजीकरहै ॥ ७ ॥ लघुस्तद्विपरीतः स्याल्लेखनोरोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्ता स्तेपां कर्मविशेपणैः॥ दशैवान्यान् प्रवक्ष्यामि वादीस्तन्निवोधमे ॥ ८॥ लघु इसके विपरीत लेखन और रोपण करनेवालाहै, कर्मोंकी विशेषतासे दश आदि कर्म कहेहैं उनमें दशको मै कहताहूं उन द्रवादिके कर्माको आप मुझसे सुनिये ॥ ८ ॥ द्रवः प्रक्लेदनः सान्द्रः स्थूलः स्याहन्द्रकारकः ॥९॥ द्रव पदार्थ प्रक्तदन, सान्द्र पदार्थ स्थूल, और द्वन्दकारकहैं ९॥ श्लक्ष्णः पिच्छिलवज्ज्ञेयः कफलोविपदोयथा ॥१०॥ श्लक्ष्ण पिच्छल पदार्थकी समान जानना, जैसे कफ और विष- दायक पदार्थहैं ॥ १०॥ सुखानुवन्धीसूक्ष्मश्च सुगन्धोरोचनोमृदुः ।। ११ ॥
द्रव्यगुणः। . सूक्ष्मपदार्थ सुखका अनुबन्धीहै, सुगन्धिवाला पदार्थ रोचन और मृदुहै ।। ११॥ दुर्गन्धोविपरीतोऽस्मात् हल्लासारुचिकारकः ॥ १२ ॥ दुर्गन्ध पदार्थ दुर्गन्धि करनेवाला,हल्लास और अरुचिकारकहै १२ सरोऽनुलोमनः प्रोक्तो मन्दो यात्राकर स्मृतः ॥ १३ ॥ सर पदार्थ विगुणवायु मलादिका प्रवृत करनेवालाहै मन्द पदार्थ देहकी स्थिति करनेवालाहै ।। १३ ।। व्यवायी चाखिलं देह व्याप्यपाकायकल्प्यते ॥ १४॥ भांग पचनेसे पहले व्यवायी सम्पूर्ण देहमें व्याप्त होकर पाक करताहै ॥ १४ ॥ विकासीविकसन्नेवं धातुबन्धान विमोक्षयत् ॥ १५॥ विकासी जो शरीरकी संधियोंके बंधन और धातुओके ओज को शिथिलकरे (सुपारी) ॥ १५ ॥ आशुकारी तथाशुत्वांघावत्यम्भसितैलवत् ॥ १६ ॥ आशुकारी पदार्थ शीघ्रगति होनेसे शरीरमें ऐसे फैलता है जैसे जलमें तेल ॥ १६ ॥ सूक्ष्मस्तु सौक्ष्मात्सूक्ष्म स्रोतःस्वनुसर स्मृतः। गुणाविंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तिताः ॥१७॥ सूक्ष्म पदार्थ रोम कूपोंके द्वारा शरीरमें प्रवेश करता है, यथा तेल यह वीसगुण यथायोग्य वर्णन किये ॥ १५ ॥ दन्तकाष्ठं करनादि रुचिदं दन्तशोधनम् ॥ १८॥ करंजादिकी दतोन रुचिकारक और दांतोंकी शोधन करने बाली है ॥ १८॥ जिह्वानिलेखनं वजिह्वारस्यजात्यजित् । देवगोविप्रवृद्धानां गुरूणामपि पूजनम् ॥ आयुष्यं वृद्धिदं पुण्यमलक्ष्मीकविनाशनम् । मङ्गल्योपासनं शस्तं वृद्धिदं व्यसनापहम् ॥ पादप्रक्षालनं पादमलरोगश्रमापहम् ।
भाषाटीकासमेतः। (९७) M हरिप्रसादनं वृष्यं रक्षोघ्नं प्रीतिवर्द्धनम् ॥ नेत्रमचनसंयोगात् भवेच्चामलतारकम् । लापर्व कर्मसामर्थ्य स्थैर्य क्वेश सहिष्णुता ॥ दोपक्षयोऽनिवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते । वातपित्तामयीवालो वृद्धोऽजीर्णीतु तं त्यजेत् ॥ मेदोहरः स्थैर्यकरो गौरवव्यापिनाशनः। अभ्यङ्गो मार्दवको वातोप्मविनाशनः॥ उद्वर्तनं स्थिरकर कफमेदोविनाशनम् । सानं दीपनमायुप्यं वृष्यं स्वयं बलप्रदम् ॥ कण्डूमलकफस्वेदतन्द्रातृड्दाहपाप्मजित् । उष्णाम्बुनाधःकायस्य परिपेको वलावहः ॥ तेनैव तूत्तमाङ्गस्य बलकृत्केशचक्षुपोः। भालेपनं वृष्यतरं बल्यं दुर्गन्धपापूमजित् ।। वासोनवं निर्मलञ्च श्रीमत्पारिपदं शुभम् । हर्पणं काम्यमौजस्यं रत्नाभरणधारणम् ॥ रजोवश्याय मुय्याशु हिमानिलनिवारणम् । प्रतिश्यायशिरःशूलहरञ्चोप्णीपधारणम् ।। ईतेर्विधमनं वल्यं गुप्त्यावरणशंकरम् । धर्मानिलरजाम्बुम्नं छत्रधारणमुच्यते ॥ १९॥ जिहाका लेखन करनेवाली मुख और जिह्वाकी विरसताको जीतनेवालीहै, देव गो ब्राह्मण वृद्धाका पूजन गुरुभूजन आयुरद्धि और पुण्यका देनेवाला अलक्ष्मीका नाशकहै, मंगलकी उपासना श्रेष्ठ, वृद्धि देनेवाली, व्यसनकी दूर करनेवाली है, चरणधोना चरणोंके रोग मल और श्रमका नाश करनेवालाहै, दृष्टिका प्रसन्न करनेवाला बलकारक राक्षस नाशक प्रीति वर्द्धकद, नेत्रोंका जना पुतलीको निर्मल करताहै लघुता कर्ममें सामर्थ्य स्थिरता .(१८) द्रव्यगुणः। क्लेशके सहुनकरनेकी सामर्थ्य दोष क्षय अग्नि वृद्धि कसरत कर- नेसे होतीहै, वात पित्तके रोगवाला युद्ध अजीर्णवाला कसरत न करे। तेलका मलना मृदुताकारक वात कफ नाशकहै चूर्णका मालिश स्थिरता करनेवाला कफ और मेदका नाशकह स्नान दीसिकारक आयुवर्द्धक बलकारक स्वर और वलका करने- वालाहै खुजली मलं कफ स्वेद तन्द्रा (आलस्य ) तृषा दाह और पापका जीतनेवालाई गरम जलसे शिरको छोड़ नीचेकी देहका धोना बलकारकहै और उसीसे शिरपर परिपेक करना केश और नेत्रोंको बलकारक आलेपन (चन्दनादि ) बाजीकर बलकारक दुर्गन्ध और पापका जीतनेवालाहे नवीन वस्त्र धारण करना निर्मल शोभा सभ्यताका देनेवालाहै, रत्नके गहने पह- रनेसे प्रसन्नता काम और बलके देनेवालेह और रज शरदी सूर्य किरण हिम वातकी निवारण करनेवाली तथा पीनस शिरशूल की हरनेवाली पगडी है, इसका शिरपर धारण करना उपरोक्त गुण करता है. पिशाचादिसे रक्षा आगामि दुर्दैवकी विघातकहे छत्रीके धारण करनेसे धूप वात रज जलसे रक्षा होती है ॥१९॥ स्खलतः संप्रतिष्ठान शत्रुणाञ्च निवारणम् । अवयम्मनमायुप्यं भयानं दण्डधारणम् ॥ पादाभ्यनस्तु चक्षुष्यो निद्राकृत्पाण्डुरोगहा। सम्बाहनं मांसरक्तत्वक् प्रसादकरं परम् ॥ प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवातश्रमापहम् । . निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः काश्य बलाबलम् ॥ वृपताकीवताज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ २०॥ दण्डका धारण करना गिरनसे बचाना शत्रुका निवारण करना अवष्टम्भन आयुका देनेवाला और भयका नाशफ है चरणोंका मालिश नेत्रोंको हितकारक निद्रा फारक चरण रोग | नाशक है सम्बाहुन (चरण दवाना आदि) मांसरत त्वचाका | प्रसन्न करनेवाला है प्रीति और निद्रा कारक बलकारक कफ यात मोर नमका निवारण करनेवाला है सुख दुःख पुष्टि कृशता भाषाटीकासमेतः। (९९) बल अवल वृषता नपुंसकता ज्ञान अज्ञान मृत्यु यह सब निद्राके आधीन है ॥२०॥ अकालेऽतिप्रसङ्गाच नच निद्रा निपेविता सुखायुपीपराकुर्यात्कालरात्रिरिवा परा ॥ रात्री जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरूक्षमनभिष्यन्दित्वासीनं प्रचलायित्तम् ॥ २१ ॥ जो समयपर अति प्रसंगसे निद्रासेवन नहीं करताहे उसकी मुख आयुनष्ट होती और यह कालरात्रिकी समान है रात्रिमें जागरण करना रूखापन करता है दिनमें सोना स्निग्धता करता है बैठे २ ऊंघना अरूखापन और अनभिप्यन्दि है ॥ २१॥ आस्थावर्णवलश्लेष्मसौकुमार्यकरीसुखा । तालवृन्तोद्भवं वातं विदोपशमनं विदुः ॥ वंशव्यजनजः सोष्णीवातपित्तप्रकोपनः । चामरी वस्त्रवातश्च मायुरोवेनजस्तथा।। एते दोपनितावाताः स्निग्धायाः सुपूजिताः । निवातमारोग्यकरं सुखवातं श्रमापहम् ॥ प्रवातं रोक्ष्यवेवर्ण्यस्तम्भकृद्दाहपित्तनुत् । प्राग्वायुरुष्णोऽभिप्यन्दीत्वग्दोपार्शविपक्रिमीन् । सन्निपातज्वरं श्वासमामवातञ्च कोपयेत् । पश्चिमः शिशिरोहन्ति मूर्छा दाई तृपां विपम् ॥ प्राग्गुणो दक्षिणः प्रोक्त उत्तर पश्चिमानुगः ॥२२॥ तालके पत्तेकी पवन मुखका वर्ण पल श्लेष्मासुकुमारता करने याली है और यही ताड़के पंखेकी हुवा विदोपके शान्त करने पालीहे यांसके पंखेकी पवन उष्ण और वात पित्तकी फोप करने यालोहे चंपर और वस्त्रकी पवन तथा मोरऔर पतके पनेकी पवन वातके दोपोंको जीतनेवाली स्निग्ध हृदयको हितकारक और श्रेष्ठ है। निवात आरोग्य कारक सुपपवन श्रमहरनेवाली है (१००) द्रव्यगुणः। अत्यन्त पवन रूखापन विवर्ण स्तम्भकारक दाह और पित्तको जीतनेवालीहै, पूर्वकी 'पवन गरम' अभिप्यन्दी त्वचाके दोष बवासीर विष कृमि सन्निपात ज्वर श्वास और आमवातकी कोप करनेवाली है पश्चिमकी शिशिर है मूर्छा दाह नृपा विषकी नाशक है पूर्वकी समान दक्षिणकी और पश्चिमकी समान उत्त- रकी पचन होती है ॥ २२ ॥ विश्वग्वायुरनायुष्यः प्राणिनां नैकरोगकृत् । धूमः पित्तानिलौ कुर्यादवश्यायःकफानिली। अग्निातकफस्तम्भशीतवेपथुनाशनः। आमाभिष्यंदशमनो रक्तपित्तप्रकोपनः ।। आतपः कटुको रूक्षश्छायामधुरशीतला । ज्योत्स्नाकपायमधुरादाहामृपित्तनाशिनी ॥ तमोभयावह तिक्तं कुज्झटि कफपित्तला ॥२३॥ सव ओरकी वायु आयुकी हरनेवाली प्राणियोंकी अनेक रोग करती है धूम पित्त और वातका करनेवाला है जुकाम कफ और वातका करनेवाला है अग्नि वात | और कपकपीका नाशकरने वाला है आम अभिप्यन्दका शान्त करने वाला तथा रक्त पित्तका कोप करनेवाला है धूप कटु मखीदै छाया मधुर और शीतलहै ज्योत्स्ना (चांदनी) | कसेली मधुर दाह रुधिर और पित्तका नाश करने वाली है अंधकार भयदायक तिक्त और कुहरा कफ और पित्तका करनेवाला है ॥ २३ ॥ शीताभिष्यन्दिनीवृष्टिस्तन्द्रानिद्रावलप्रदा। देशोधन्यामरुत्पित्तकरोरुक्षोष्ण एव च ॥ आनूपस्तुहिमः स्निग्धोवातश्लेष्मकरो गुरुः । साधारणः समगुणः सनरोगापहः स्मृतः ॥ हेमन्तः शीतलः स्निग्धः स्वादरमेश्च वृद्धिकत। ., शिशिरः शीतलः किञ्चिवक्षस्तीक्ष्णोनिलाऽग्निकृत् ।। कफ स्तम्भ IS. - प्रभाते मैथुनं निद्रा सा भाषाटीकासमेतः। वसन्तस्तुवरः सोष्णकफव्याधिसमीरणः।" ग्रीष्म उष्णोऽतिरूक्षश्च कटुको बलहानिकृत् ॥ वः शीताविदाहिन्यो वन्हिमांद्यानिलार्तिदाः । शरत्पित्तकफप्रायास्निग्धोष्णाशस्य वृद्धिकृत् ॥ पूतिमासं स्त्रियोवृद्धा बालार्कस्तरुणं दधि । सोमांस नवान्नञ्च वालास्त्री क्षीरभोजनम्। वृतमुष्णोदकञ्चैव सद्यः प्राणकराणि पक्षीय सन्तताध्ययनं वादः परतन्त्रावलोकनम् । तद्विद्याचार्यसेवा च बुद्धिमेधाकरोगण | RAPTRY. आयुष्यं भोजनं जीर्णवेगानामविधारणम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च साहसानाञ्च वर्जनम् ॥२४॥ वृष्टि शीतकी प्रकट करनेवाली तन्द्रा निद्रा और वलकी करनेवाली है मरुदेश वात पित्त करनेवाला रूखा और उप्ण है अनूपदेश शीतल चिकना वातकारक श्लेष्माकारके तथा गुरु है। साधारण देश समान गुणवाला सर्व रोगका हरनेवाला कहा है हेमन्तऋतु शीतल स्निग्ध स्वाद और अग्निकी वृद्धि करनेवाली है । शिशिरकतु शीतल किश्चित रूखी तीक्ष्ण वात और अग्निकी करनेवाली है वसन्त ऋतु | सर्व श्रेष्ठ उष्ण कफ व्याधि और वातकारकहै । ग्रीष्मऋतु | गरम बहुत रूखी कटु बलहानि करनेवाली है। वर्षा ऋतु शीत | विदाही अग्निमन्दता वातका कष्ट देने वाली है। शरद् ऋतु पित्त कफ युक्त है स्निग्ध उष्ण और खेतीकी पृद्धिकरनेवाली है | दुर्गधि वाला मांस युद्धस्त्री प्रातःकाल की धूप तत्कालका दही प्रभात कालमें मैथुन और सोना यह छह वस्तु तत्काल प्राणोंकी हरने वाली है। ताजा मांस नवीनअन्न बालस्त्री क्षीरभोजन यूत (गुरूपूजा) गरम जल, यह तत्काल प्राणकी देनेवाली वस्तु हैं! निरन्तर पढना विवाद पुराने ग्रंथोंका अवलोकन करना उस | उस विद्याके आचार्यकी सेवा करनी मेधा और युद्धिकी करने
(१०२)
द्रव्यगुणः।
वाली है । जीर्ण होनेपर भोजन करना आयुका करनेवाला है
तथा वेगोंका न रोकना ब्रह्मचर्ययुक्त अहिंसा और साहसका न
| करना यह आयुका करनेवाला है ॥ २४ ॥
तन्त्राणां सारमाकृष्यद्रव्याणां गुणसंग्रहः ।
भिपजामुपकाराय रचितश्चक्रपाणिना ॥ २५ ॥
अनेक तन्त्रोंका सार लेकर वैद्योंके उपकारके निमित्त द्रव्यों
के गुण संग्रहकर यह द्रव्य गुण चक्रपाणिने किया है ॥२५॥
श्रीपेंद्यमहीमहोपाध्यायनीमच्चकपाणिदत्तकृतदव्यगुणसंग्रहः पण्डित ज्वाला.
प्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकासहितः समाप्तः ॥ १॥
अथ ग्रन्थान्तरोक्तनानौषधपरिच्छेदः ।
विल्वमूलं मरुच्छेष्म छदिनं रक्तपित्तजित् ।
पाटला कफवातघ्नी श्योनाको ग्राहि दीपकः॥१॥
बेलकी जड वात श्लेष्मा छर्दिकी नाशक रक्त और पित्तकी
जीतने वालाहै पाढल कफ बात नाशक सोनागाछ माही और
। दीपन है ॥१॥
गम्भारीमूलप्रत्यूष्णमहित मानसेषुतत् ।
गणिकारीतु शोथनी हितावातविकारिणाम् ॥२॥
गंभारी (कुम्भेर ) कीजड़ बहुत गरम मनको अहित कारकहै
(मदन मादनी) शोथनाशक, वातविकार वालोंको हितकरहे।
एरण्डमूलं शूलनं वृष्यं वातकफापहम् ।
गोक्षुरो मूलकृच्छ्नो बल्यो वृष्योऽनिलापहः॥
एरण्डकीजड़ शूलनाशक बलकारक वात और कफ
नाशकहै, गोखरू मूत्रकृच्छू नाशक बलकारक वाजीकर
वात नाशकहै ॥३॥
उष्णायातकफश्वासकासनी कण्टकारिका ।
वृहती पाचनी सोष्णा ग्राहिणी वातनाशिनी ॥४॥
कटेरी गरम है बात कफ वासको नाश करनेवाली है, बडी
कटेरी गरम पाहिणी बात नाशिनी ॥४॥
भाषाटीकासमेतः। (१०३) शालपर्णी पृश्निपी ग्राहिणी कफपित्तजित् । स्निग्धारुच्या बला वृष्या ग्राहिणी वातपित्तजित् ॥६॥ शालपर्णी पृश्निपणी ग्राहिणी कफ और बातकी जीतने वालीहै खरैटी स्निग्ध रुचिकारक बलकारक वाजीकर ग्राही वात पित्तकी जीतने वालीहै ॥ ५॥ तद्वन्नागवलात्यर्थ कृच्छे क्षीणे क्षते हिता। अश्वगन्धा तु वातनी वल्या वृष्या रसायनी ॥६॥ इसीप्रकार नागवला कृच्छ्र क्षीण और क्षतमें अत्यन्त हित कारकहै, असगंध वातनाशक बलकारक बाजीकर और रसायन है ॥६॥ शतावरीवातपित्तमेहकुष्ठहरासरा। हस्तिकर्णः परं वृष्यो मेधायुर्वलवर्धनः ॥ ७ ॥ शतावरी बात पित्त प्रमेह कुष्ठ हरनेवाली सारकहै हस्तिकर्ण (पलाश) परम वाजीकर मेघा आयु पलका बढाने वालाहे॥७॥ वातपित्तहरा सोष्णावल्यावृष्या प्रसारणी। मापपर्णी महावृष्या चक्षुष्या मुद्गपणिका ॥८॥ प्रसारिणी (पसरन ) वात पित्तकी हरनेवाली, गरम, पल- कारक वाजीकर है,मापपर्णी महाबलकारक है मुद्गपर्णी नेत्रोंको | हितकारकहै ॥ ८॥ विशाला कफवातमी चक्षुष्या मूत्रकृच्छजित् । शारिवावातपित्तामृक्तृट्छर्दिज्वरनाशिनी ॥९॥ विशाला (इन्द्रायन ) कफ वात नाशक नेत्रोंको हितकारक भूस्कृटकी जीतनेवाली सारिका वात पित रुधिर तुषा हार्दि ज्वरकी नाशकरनेवालीहै ॥ ९ ॥ अनन्ताग्राहिणी रक्तपित्तप्रशमनीहिमा । गुन्द्रापित्तास्रदाहनी चक्षुप्या मूत्रकृच्छजिद ॥१०॥ अनन्तमूल माही रक्त पित्त प्रशान्त करनेवाली शीतल है (१०४) . द्रव्यगुण। प्रियंगु पित्त रुधिर दाह नाशक, नेत्रोंको हितकारक मूत्रकृच्छ्र जीतनेवालीहै ॥ १० ॥ लोधोमुक्कफपित्तनश्चक्षुष्य शोथजित्सरः । तद्वच्छवरलोभोपि चक्षुष्यो मृदुरेचनः ॥ ११ ॥ लोध रुधिर कफ और पित्तका नाशक नेत्रोंको हितकारक शोथका जीतनेवाला सारकहै, इसीप्रकार पठानीलोध नेत्रोंको हितकारक मृदु रेचकहै ॥ ११ ॥ मनिष्ठाकुष्ठवैस्वयंशोथनी वर्णदीपनी । लाक्षाभमविसर्पनी वल्या त्वग्दोपनाशिनी ॥ १२॥ मजीठ कुष्ठ विस्वर शोथनाशक वर्ण दीप्तिकारकहै, लाख भग्न और विसर्परोगनाशक बलकारक त्वग्दोष नाशकहै ।। १२ ॥ प्रपौण्डरीकं चक्षुष्यं शिशिरं व्रणरोपणम् । जीवन्ती श्वासकासनी स्वर्या च क्षयनाशिनी ॥१३॥ प्रपौण्डरीक शालपर्णीकी बराबर पत्तेवाली ( पुण्डरिया) नेत्रोंको हितकारक ठंढी व्रणरोपण करनेवालीह जीवन्ती श्वास कास नाशकरनेवाली स्वरकारक क्षयनाशक है ॥ १३ ॥ अष्टवोऽसपित्तनो व्रणहा वातपित्तनुत् । मधुकं रक्तपित्तनं व्रणशोधनरोपणम् ॥१४॥ अष्टवर्ग ( जीरा ऋषभक मेदा महामेदा ऋद्धि वृद्धि काकोली क्षीरकाकोली) रक्त पित्त नाशक तणनाशक वात पित्त नाशक है मुलेठी रक्त पित्त नाशक वृणके शोधन रोपण करने वालीहै ॥१४॥ पार्थः पथ्यः क्षते भने रक्तस्तम्भनकृच्छ्योः । अस्थिभनेस्थिसंहारो हितो चल्योऽनिलापहः ॥१५॥ अर्जनवृक्ष क्षतमेपथ्य भग्नमेपथ्य रक्तकृच्छमें हितकारक स्तम्भन करनेवालाहै हाडभांगा अस्थिभग्नमें हितकारकहै बलदायक बात नाशक है ॥ १५ ॥ .
भाषाटीकासमेतः।
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भृङ्गराजस्तु चक्षुष्यः केश्यः पाण्डुकफापहः।
तद्गुणः केशराजोऽपिवहिकृञ्च रसायनः ॥१६॥
मांगरा नेत्रोंको हितकारीकेशोंको हितकारी पाण्डु कफ
रोगका दूर करने वालाहै उसीप्रकारका केशराज (भंगर)
| अग्नि कारक और रसायन है ॥ १६ ॥
दण्डोत्पलद्वयं श्वासकासजिद्रह्निदीपनम् ।
रुदन्ती बज्ञिकृद्धष्या पित्तनी च रसायनी ॥ १७॥
दंडोत्पल (शुप) दोनो श्वासकास नाशक तथा अग्निके
दीपन करने वाले हैं रुदन्ती ( चनेकेसे पत्तेवाली) क्षुप अग्नि
करने वाली बाजीकर पित्त नाशक रसायनीहै ॥ १७ ॥
तालमूली हिता वाले ग्राहिणी च रसायनी ।
द्रोणपुष्पी कफाशनी कामलाकृमिशोथजित् ॥ १८॥
ताल मूली बातमें हित पाहणी और रसायनी है द्रोणपुप्पी
कफ और अर्श रोगकी नाश करनेवाली कामला कृमि और
शोध रोगकी जीतने वाली है।॥ १८॥
शोथनी कासहा कण्ठ्या विपनी गिरिकार्णिका।
वृश्चिकालीविपनी तु कासमारुतनाशिनी ॥ १९॥
गिरिकर्णिका (विष्णु क्रान्ता) शोथ कास नाशक कठको
हितकारक और विष नाशक है वृश्चिकाली (क्षुप विच्छाटी) विष
नाशक खांसी और यात नाशक है ॥ १९॥
अहिंस्राविपशोथनी तद्गुणेव सुदर्शना ।
भार्गातुश्वासकासन्नी गुन्नाकुष्ठवणापहा ॥२०॥
सुदर्शना (वृक्ष नाम) अहिंना विप और शोथका नाश
करनेवालाहे भारंगी श्वास खांसीकी नाश करनेवाली है चौटली
| कुष्ठ और व्रण दूर करतीहै ॥ २० ॥
सूवित्तौविबंधनः सैरीयः कफवातजित् ।
आमवातानिलासनी कोकिलाशकुलाहको ॥२१॥
द्रव्यगुणः।
हुर हुर विबन्ध नाशकहै, झिण्टी कफ और बातकी जीतने
वाली है कोकिलाक्ष कुलाहक( लाल तालमखाना ) आमवात
और रक्तविकारको दूर करनेवालेहें ॥ २१ ॥
हलिनीकरवीरश्च कुठदुष्टत्रणापही।
कोपातकी कफाशांनी पक्कामाशयशोधनी ॥ २२ ॥
हलिनी करवीर( कलिहारी, कनेर ) कुछ और दुष्ट व्रणको दूर
करते हैं,कोषातकी कफ और अर्श रोगकी हरनेवाली पक आमा
शय शोधनी है ॥ २२ ॥
मेध्याज्योतिष्मतीतीक्ष्णव्रणविस्फोटनाशिनी ।
घयासंस्थापमी ब्राह्मी मेघायुर्वलवदिनी ॥२३॥
ज्योतिष्मती बुद्धि कारक तीक्ष्ण व्रण और विस्फोटक नाशने
वाली है, ब्राह्मी षयकी स्थापन करनेवाली, मेधा आयु और
वलकी बढानेवाली है ॥ २३ ॥
वचायुष्या वातकफतृष्णानी स्मृतिदिनी ।
शक्राशनन्तु तीक्ष्णोष्णं मोहकृत्कुष्ठनाशनम् ॥२४॥
बच आयुकी बढानेवाली वात कफ तृष्णानाशक स्मृति
बढानेवालीहै, और शकाशन (भाग) तीक्ष्ण, गरम, मोह करने
वाली तथा कुष्ठ नाशकहै ॥ २४ ॥
वलमेधानिकृत श्लेष्मदोपहारिरसायनम् ।
शंखपुप्पी तु तीक्ष्णोष्णा मेध्याक्रिमिविपापहा ॥२६॥
बल बुद्धि और अग्निकी करनेवाली, श्लेष्म दोष हरनेवाली
रसायन है शङ्खपुप्पी तीक्ष्ण उष्ण पवित्र बुद्धि करनेवाली कृमि
और विष हरनेवालीह ॥ २५॥
शिरीपो निपवीसर्पस्वेदत्वग्दोपशोथजित् ।
दूर्वा तु रक्तपित्तनी कण्डत्वग्दोपनाशिनी ॥२६ ।।
सिरस विष विसर्प त्वचा दोष तथा शोथ रोगका जीतने
वालाहै, दूर्वा रक्त पित्त नाशक खुजली और त्वचाका दोष
नाश करतीहै ॥ २६॥
भाषाटीकासमेतः। (१०७) हरिद्रा कफपित्तनी कण्डू त्वग्दोषनाशिनी । तहहार्वी विशेषेण कफाभिष्यन्दनाशिनी ॥२७॥ हलदी कफ और पित्त नाशकहै, खुजली और त्वचाके दोषको दूर करतीहै, इसी प्रकार विशेषकर दारुहलदी कफ आभष्यन्द को दूर करती है ।। २७॥ अवल्गुजो वातकफपित्तत्वग्दोपनाशनः । तद्धदेडगजो गुल्मोदरार्शः कुष्ठजित्कटुः ॥२८॥ सोमराजी वात कफ पित्त और त्वचाके दोषको नष्ट करती है | इसीप्रकार चकवड़ गुल्म उदर अर्श कुष्ठजित और कदुहे ॥२८॥ करननिम्बजफलं क्रिमिकुष्ठप्रमेहजित् । विडङ्गमीपत्तिक्तन्तु क्रिमिनं विपनाशनम् ॥ २९ ॥ करन और नीमके फल कृमि कुष्ठ और प्रमेहरोगको जीतते हैं, वायविडङ्ग कुछ तिक्त कृमि और विषकी नाश करने वाली ॥ २९॥ रेणुकाकफवातघ्नी दीपनी पित्तकृल्लघुः। भों वल्यः कफास्रनः शिशपा वातनाशिनी ॥३०॥ रेणुका (विख्यात है) कफ वात नाशक दीपनी पित्त करने | वाली तथा लघुहै, भूर्जपत्र बल कारककफ रुधिर विकार नाशक है, शीशम वात नाशक है ॥ ३० ॥ आस्फोता विपकुष्ठनी तिनिशो दाहपित्तनुत् । धातकीकुसुमं शीतं रक्तपित्तातिसारनुत् ।। ३१ ।। आस्फोता(हापरमाली)विपकुष्ठ नाशक है,तिनिश (तिरिच्छ) | दाह पित्तका दूरकरनेवालाहै धायके फूल ठंडे पित्त और अति सारके दूर करनेवालेहैं ॥ ३१ ॥ असनः कफपित्तनः कदरो दन्तदाढऱ्या कृत् । निम्बः पित्त कफच्छदिवणहृत् वातकुटनुत् ॥ ३२ ॥ असन कफ पित नाशक हैं, तखैर दांतोंको दृढ करने
(१०८)
द्रव्यगुणः।
वालाहै नीम कफ पित्तछर्दि व्रणका हरनेवाला वातकुष्ठको दूर
करता है ।। ३२॥
महानिम्बः परं ग्राही कपायोऽम्लश्च शीतलः।
भूनिम्बो वातलो रूक्षः कफपित्तज्वरापहः॥३३॥
महा निम्ब अत्यन्तग्राही कपेला अम्ल शीतल है, भूनिम्ब
(चिरायता) वात कारक सूखा कफ पित्त और स्वरका हरने
वाला है ॥ ३३ ॥
पर्पटः पित्तद्दाहचरजित् कफशोपणः ।
पाठातिसारशमनी लवादोपत्रयापहा ॥३४॥
पित्तपापड़ा वातका हरने वाला दाह ज्वरका जीतनेवाला
तथा कफका शोपनेवालाह, पाठ अतिसार शान्त करने वाला
लघु त्रिदोष दूर करनेवालाहै, ॥३४॥
कुटजः कफपित्तासत्वग्दोपाशतिसारजित् ।
तबीज ज्वरनित्तिक्तं रक्तपित्तातिसारजित ॥ ३५॥
कुटज (इन्द्रजा ) कफ पित्त रुधिर त्वचादीप अर्श और
| अतीसारका जीतने वाला है, उसकावीज ज्वरका जीतनेवाला
तिक्तहै रक्त पित्त तथा भतीसारका जीतने वाला है ।।३५॥
होवेर छदि हल्लासतृष्णातीसारनाशनम् ।
मुस्तकं तिक्तकटुकं वातघ्नं पाहिदीपनम् ॥ ३६॥
हीवेर (सुगंधवाला) छर्दि हल्लास तृष्णां अतीसारका नाश
करनेवाला मोथा तीखा कटुवातनाशक ग्राही और दीपनहे३६
पाचन्यतिविपातिक्ता ग्राहिणी दोपनाशिनी।
शृङ्गी कफानिलश्वासकासहिका ज्वरापहा ॥३७॥
अतीस पाचन तीखा तथा प्रहणीके दोष नाश करनेवालाहै,
| काकडासींगी फफ वात श्वास कास हिचंकी ज्वरके दूर करने-
वाली ॥ ३७॥
कइफले कफरोगघ्नं श्वासकासवरापहम् ।
कुष्ठं वातकफश्वासकासहिकापरापहम् ॥ ३८॥
भाषाटीकासमेतः।
(२०९)
कायफल कफरोग नाशकवास कास और ज्वरका नाशकहै,
कूठ वात कफ श्वास कास हिचकी और ज्वरका हरनेवालाहै३८॥
शोभाञ्जनः कटुस्तिक्तशोथविद्रधिगुल्मनुत् ।
यापः सरोज्वरच्छर्दिश्चष्मपित्तविसर्पजित् ॥ ३९ ॥
शोभाजन (सैंजना) कटु तीखा शोथ विद्रधि और गुल्मका
|दूर करनेवालाहै, दुरालभा सारक ज्वर छदि श्लेप्मा पित्त विसर्प
रोगोंको जीतनेवालाहै ॥ ३९ ॥
कटुकी तु सराहक्षाकफपित्तज्वरापहा ।
राना शोथामवातनी बायन्ती कफवातनुत् ॥ ४० ॥
कुटकी रूखी कफ पित्त तथा ज्वरकी हरनेवाली है रास्ना शोथ
आमवातकी नाश करनेवाली है, चायन्ती वायमाण बला
लता) कफ और धात नाशकहै ॥ ४० ॥
वरुणोनिलझूलनो भेदी चोष्णोश्मरीहरः।
पुष्पं वरुणज पाहिपित्तनमामवातजित् ॥ ४ ॥
वरुणा वात शूलनाशक भेदी गरम पथरीरोग नाशक है
वरनेकाफूल माही पित्तनाशक आमवातका जीतनेवाला है॥४१॥
पारिभद्रोऽनिल श्लेष्मशोथमेहकिमीजयेत् ॥४२॥
पारिभद्र ( देव दारु ) वात कफ सूजन प्रमेह और कृमिका
जीतनेवालाहै ॥ ४२ ॥
वासकः कासवेस्वर्य्यरक्तपित्तकफापहः।
गुडूची ग्राहिणी वल्या विदोपनी रसायनी ॥४३॥
वासक ( अदूसा ) खांसी विस्वरता रक्त पित्त और कफ
नाशक है गिलोय माहिणी बलकारक त्रिदोषनाशक और
रसायना है ॥४३॥
दीपनी ज्वरतछर्दिकामलारक्तपित्तनुत् ।
भेदनं पिप्पलीमूलं दीपनं कफनाशनम् ॥ १४ ॥
दीपनी ( अजवायन ) ज्वर तृष्णा छदि कामला और रक्त
पित्तकी दूर करनेवाली है पीपलामूल भेदन दीपन और कफका
नाश करनेवाला है॥४४॥
(११०) द्रव्यगुणः। चविकागजपिप्पल्यो पिप्पलीमूलवत् स्मृते । चित्रकोऽग्निसमः पाके शोथार्शः क्रिमिकुष्ठहा ॥ ३५ ॥ चन्य, गजपीपल, यह पीपलामूलकी समान जानना चीता पाकमें अग्निकी समान सूजन बवासीर कृमि और कुष्ठ रोगको दूर करता है ॥४५॥ दन्तीसाष्ठीलिकाध्वानगुल्मोदरहरासरा । दूपीविपोदरप्लीहगुलाकुष्टप्रमेहजित् ॥ ४६॥ दन्ती अष्ठीलिका अफारा गुल्म उदररोगहरने वाली सारक है. दूपी विष उदररोग प्लीहा गुल्म कुष्ठ और प्रमेह रोगका जीतने वाला है ॥ ४६॥ बहुदोपे प्रयोक्तव्यं वह्नितुल्यं सुधापयः । अर्क-क्रिमिहरस्तीक्ष्णः सरोर्शः कफदोपजित् ॥१७॥ सुधापय (सेंहुडका दूध ) बहुत दोपमेंभी देना चाहिये यह अग्नि तुल्य है अर्क ( आकवृक्ष ) कृमि हरनेवाला तीक्ष्ण सारक | और यघासीर कफके दोषोंका जीतनेवाला है ।। ४७ ॥ तत्पयः क्रिमिदोषघ्नं हितं कुष्ठोदरासि । काणकं फल मुत्क्लेदितीक्ष्णमुष्णं विरेचनम् ॥ १८॥ उसका दूध कृमि दोपका दूर कर ने वाला कुष्ठ उदर और अर्श रोग; हित कारक है काणक फल (जमाल गोटा) उल्केदि तीक्ष्ण गरम और विरेचन है ॥४८॥ धुस्तुरो मदमूर्छाकृत्कफनो वह्निपित्तकृत् । भल्लातकफलं स्निग्धं किमिदु मनाशनम् ॥ १९ ॥ धुस्तूर (धतूरा) मद मूळ का करने वाला है। कफ नाशक | अग्नि और पित्तका करनेवाला, भिलावेका फल निग्ध कृमि और दुर्नाम (ववासीर) दूर करनेवालाहे ॥४९॥ दन्तस्यैर्य करादिकपायं मधुरञ्चतत् । भल्लातवृन्तं मधुरं पक्कजम्बूफलोपमम् ॥२०॥ दांतोंका स्थिर करनेवाला, ग्राहीक कसेला और मधुरहे और भाषाटीकासमेतः। इसका (कलीकावन्धन) मधुर पक्की जामनके फलके समान होताहे ॥५०॥ गुग्गुलुर्दीपनस्तितः सकपायो रसायनः । कटुमैंदोनिलश्लेष्मकुष्ठनः संसनोलघुः ॥ ६॥ गूगल दीपन है तीखाहै कसेला और रसायनहै कटु मेद वात लेमा कुष्ठ नाशक, खंसन और लघुहे ।। ५१ ॥ स्निग्धकाञ्चनसङ्काशः पक्वजम्बूफलोपमः । नूतनो गुग्गुलः प्रोक्तः सुगन्धीयश्च पिच्छलः ॥१२॥ नया गूगल चिकना सुवर्णकी समान पक्के जामनके फलसरीखा होताहै और सुगन्धिमान तथा पिच्छल होताहै ॥ ५२ ।। पुराणः शुष्कोदुर्गन्धोमलानां नापकर्षकः । अरुणानिवृतास्वादुः कपाया मृदुरेचनी ॥५३॥ पुराना और सूखा गूगल दुर्गन्ध और मलोंको नहीं खेंचताहै । अरुण विश्रुता (लाल निसोथ) स्वादुकसेली और मृदु रेचकहे ५३ रुक्षा च कटुका चैव पाके तिक्ता कफापहा । तस्याश्वाल्पान्तरगुणा विज्ञेया विवृतासिता ॥५४॥ कटुका (कुटकी) रूखी पाकर्म तीखी तथा कफ नाशकहै विवृता (निसोतमे ) इससे बहुत थोड़े गुणहैं ॥ ५४॥ ज्वरद्रोगवातासगुदावत दिरोगनुत् । राजवृक्षोऽधिकः पथ्यो मृदुमधुरशीतलः ॥५५॥ राजवृक्ष ज्वर हद्भोग घात रुधिर उदावर्त आदि रोगका दूर करने वालाहै अधिकपथ्य मृदु मधुर और शीतल है ।। ५५॥ तत्फलं मधुरं वृष्यं वातपित्तहरं सरम् । रोहीतकोयकृत पोहगुल्मोदरहरः सरः॥५६॥ उसकाफल मधुर बलकारक वात पित्त हरनेवाला सारकहे रोहित (रोहेडा) यकृत प्लीहा गुल्म उदर रोग हरनेवाला। सारक है।॥ १६॥ 1 द्रव्यगुणः। रसायनोवृद्धदारः शोथामवातरोगजित् ॥ अपामार्गोऽग्निवत्तीक्ष्णः क्वेदनः प्रेसनःसरः ॥ १७ ॥ वृद्धदार रसायन है शोथ तथा आम वातरोगको दूर करताहै अपामार्ग (चिराचिरा) अग्निकी समान तीक्ष्ण केदी संसन और सारक है ॥२७॥ सिन्धुवराो विपश्लेष्मकुष्ठवणविपापहः । तुलसीपित्तकृद्रातक्रिमिदोर्गन्ध्यनाशिनी ॥२८॥ सिन्धुवार (निर्गुडी) विषश्लेप्मा कुष्ठ व्रण और विषका हरने वाला है तुलसीदल पित्तकारी कृमि और दुर्गन्धका नाशक है । पार्श्वशूलारतिश्वासकास हिकाविकारजित् । मूळ तु बृहणीवल्या कफवातामयान् जयेत् ॥२९॥ पार्श्व शूल अरति श्वास कास हिचकीके विकारका जीतने वाला है मूर्वा (मरोस्फली ) बलवीर्यकारक है कफ और वातके रोगोंको जीतने वालीहै ।। ५९॥ कपायामधुरारूक्षा वातघ्नी वंशलोचना । तुगाक्षीरी क्षयश्वासकासनी मधुरा हिमा। दिङ्मानं दर्शितं ह्येतत् गृह्यतां पण्डितः परम् ॥६॥ वंशलोचन कसेला मधुर रूखा और वात नाशक तवावीर क्षय धास कास नाशक मधुर और शीतलहै, यह औषधी वर्ग दिङ्मान दिखादिया विशेष पंडित लोग महणकर सकतेहैं ॥ ६॥ इति श्रीमिअमुसानंद मनु पंस्ति ज्यालामसाद मिश्रकृत भापाटीका वनौषपिवर्ग:समासः । पुस्तकगिलनेका,ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास * श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-खेतवाड़ी-(मुंबई.) "