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Naishhadhakaavya

Kheimaraaja Shriikrxshhnd-adaasane · 2005/09/10

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श्रीः।
नैषधकाव्य।
कविवर वरिष्ठ राजकवि गुमान
मिश्र विरचित ।
जिसमें
राजरानी महारानी दमयंतीके स्वयंवरकी कथा
अत्यन्त रोचक मनभावन परमसुहावनकवित्त
दोहा, चौपाई, कवित्तादिकोंमें वर्णित है।
वही
विद्याविलासियोंके आनन्दार्थ
खेमराज श्रीकृष्णदासने
बंबई
स्वकीय “श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयमें
छापकर प्रगट किया।
श्रावण संवत् १९५२, शके १८१७.
इस पुस्तकके सर्व हक यंत्रालयाधिपनें स्वाधीन रवखहैं ।

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नैषधकाव्यकी अनुक्रमणिका ।
२०
३०
संख्या
विषय
दोहा-
१ प्रथम सर्गमें वर्णिवी, नरपति नल अवतार ॥
सकलसुमति जनयहकथा, सुनियोचित्तसँभार ॥
२ सर्ग दूसरे में कथा, वर्णन नल अनुराग ॥
मिलिबो हेम मरालको लीलासों बिचबाग ॥
३ सर्ग तीसरे में कथा, हेम हंसको गवनु ॥
वर्णनदेश विदर्भको, कुंडिनपुर नृप भवनु ।
४ चौथे सर्ग मराल औ, दमयंती संवाद ॥
आगमढिग निषधेशके, मेट्यो विरह विवाद ॥
५ सर्ग पाँचयें में विरह, दमयंती संताप ॥
राजनको बोलै पिता; ब्याह उछाह प्रताप ॥
६ छठे सर्ग नारद मिलन, वासव सदन समाज ॥
नल मारग छलसाज सुर, दूतकाज सुरराज ॥
७ सर्ग सातये में कथा, कुंडिनपुर नृपगौन ॥
रति पति विविध विलासमें, दर्शन रावर भौन ॥
८ सर्ग आठयेमें कथा, नख शिखरूप विचारि ॥
वर्णन राजकुमारिको, नल दर्शन निरधारि ॥
नवम सर्गमें वर्णिवो, दूतकाज सुरराज ॥
कहिवो सुर संदेशको, रचना चारु समाज ॥
१० पंच दूगुने सर्ग में, बहु वर्णन उर आनि ॥
उत्तर प्रति उत्तर वचन, है है नल पहिचानिः ॥
११ कथा ग्यारहें सर्ग में, राज स्वयंवरठाट ॥
राजनको आगमन पुनि, नगर ग्राम वनवाट ॥
५८
८९

२ नैषधकाव्य । । पथ ॥ उदय अचल' रवितेज सुयश शशि सोहत सागर ॥ चातुरता मणि खानि रूप गुण आगर नागर॥ सुरतरु सुर सुमित्रनि निरखि दुवन भीम भीषम चली। जहँ राजत नगर नरेश बर खाँ साहेब अकबरअली॥४॥ दोहा ॥ देखतही जाको बदन, सदन शिरी आधिकाइ॥ देह न रूपकि राशि यह, मदनकान्ति यहि भाइ ५॥ कवित्त मनहरण ॥ दुर्जनकी हानि विरधापनोई करै पर गुण लोप होत यक मोतिनके हारही ॥ टूटे मणिमालै निरगुण गायताल लिखै पोथि नहीं अंक मन कलह विचारही। शंकर वरण पशु पक्षिनमें पाइयत अलकही पारैअरु भंग निरधारही॥चिरुचिरु राजौराज अलीअकबर सुरराजके समाज जाके राजपर वारही ॥ ६ ॥ धर धर हालै धर धर धुंधुकारनिसों धीर नर तजेंगे धरैया बलबाहके ॥ फूटत पताल ताल सागर सुखात खात जात है उडात ब्योम विहंग बला- हके ॥ झालरि झुकत झलकत झपे फीलनिपै अली फीलनिपै अली अकबर खाँके सुभट सराहके ॥ अरि उर रोर सोर परत सँसार घोर बाजत नगारे नरवर नस्नाहके ॥ ७ दिग्गज दबत दबकत दिगपाल भूरि धूरिकी धुंधेरीसौं अँधेरी आमा भानकी ॥ धाम औ धराको माल बाल अबलाको अरि तजत परान राह चहत परानकी॥ सैयद समर्थ भूप अली अकबर दल चलत बजाइ मारूदुंदुभीधुकान्हकी ॥ फिरि फिरि फणनि फणीश उलटतु ऐसे चोली खोलि टोली ज्यों तमोली पाके पानकी ॥ ८ ॥ विकट मतंग साजि सुभट चलत दल अली अकबरखा मुबारिक बखतसों। दलत मलत खुरथारनि.पहार हय धुंधुरिसों भयो भानु नभमें नखतसों॥ कबहूँ बराह- कौहूं कच्छप सुरभि कौहूं कबहूं गहत शेष वासुकि सखतसों ॥ छूटत गहत ज्यों कहार बार त्यौही धन्योभूमि खंड खंड पातिशाहाकि तखतसों९ दोहा॥ कौनु भयो ऐसो नृपति, को बैंहै यहि भाइ॥ जाके डर गजये शकस, दिग्गज देत पठाइ ॥१०॥ कवित्त मनहरण ॥ साँचे अवतार करतार शुभ घरी रच्यो भूपर अनूपरूप देखि जीजियतु है। नीति रीति प्रीति अरु नेक न अनीति लागै तेजसों तपतु शीलसुधा पीजियतु है ॥ खान् बलि अली अकबर अद्भुत राज रावरा है अचल सुयश भीजिय तु है ॥ आडे आसमान भासमान गजराज दै दै गाडे वै बननि बीच काव्य । सिंह बाँधि लीजियतु है ॥ ११ ॥ दंडालय छंद ॥ जे बल प्रचंड उदंड शुंड गहि मार्तड मंडल खंदै ॥ नभ कहलि परत पुरंहूत हहलि मजबूत फूत कारै छडै ॥ मननात भोर भूषण अमोल झननात झवा झूलनि सरसे ।। रणतेज वारि दिग्गज उदार अकबर नरेश दरबार लसै ॥ १२॥ आ- शीर्वाद ॥ छप्पय ॥ गुणं क्षीर निधि ममलय सो बीची परिपूरं ॥ धीर- धर्म रुचि रु मुदित तर तेज ससूरं ॥ दान लवूकृत कर्णमुक्ति वर्णित बहु गाथं ॥ अली अकबर खाँ कामतरू शुतिनाम सनाथं ॥ उदंड चंड भुज दंड युग खंडित पर नृप मंडलं ॥ त्वंरक्षरक्ष भगवति शिवे प्रभुता हसिता खंडलं ॥ १३ ॥ अन्यच ॥ वीर समर मागत्य शत्रु कदन बहु कृतवति ॥ भवति भवस्य भवति मुंडि मालाभुबिकति कति ॥ शिरास विभर्ति शिवोपि कर्म युगलेपि गले पिच ॥ करमूलपि करेपिं धारपति शूल फले पिच॥राजाधिराज जगदीश तासु सुरगुरु रपिशंभुस्वयं ॥ अभिलखति शिसो रिव सर्वदा तव सुमिरे सततंजयं ॥१४॥अन्यच॥ सुंदर शूर उदार बर विक्रम साजत ॥ अटल समरभट विकट कोटि गंजन छबि छाजत ॥ शील सत्य सन्मान दान विद्या विनोदमति ॥ मनौ रचे करतार कामतरु मोहन मूरति ॥ आजानबाहुपरकी जरत स्वामिभक्त रसरंगनव ॥ तह आति उज्ज्वल मजलिसलसै सोमवंश सरदार सब ॥ १५ ॥ दोहा ॥ 'पण्डित कबि मंडित लसैं, सभामंडली चारु ॥ गणक चिकित्सक चतुर चित, धर्म धुरंधर सारु ॥१६॥ खाँसाहेबके हुकुमते, मिश्र गुमान विचारि वरणी नैषधकी कथा, संस्कृतकी अनुहारि ॥ १७ ॥ मिश्र सर्व सुख सुक बिबर, श्रीगुरु चरण मनाइ॥वराण कथा हौं कहतिहौं, ( हैं वई सहाइ १८॥ संयुत प्रकृत पुराणसे, संवतसर निरदंभ ॥ सुरगुरु सह सित सप्तमी, क- ह्यौ ग्रंथ प्रारंभ ॥ १९ ॥ प्रथम सर्गमें वरणिबो, निषध देश परकार ॥ नगर राज मंदिरन पुनि, नल भूपति अवतार ॥ २० ॥ सोरठा । सोमवंश भूपाल, सकल पुहुमिमें तेजधर ॥ बीरसेनि गुणमाल, निषधदेशपर प्रीतिकर ॥२१॥ हरिगीत|सब देश मनि गुणखानि गनि धनि धनि सरा- हत हैं सबै. ॥ सुखबास सीयनिवास संयुत शोभि ज्यौं रवि छबिफवै ।। कछुकरी यों करतूति विधि निज ज्योति सुरपुरको हँसै ॥ जगमगत जाहिर नैषधकाव्य । जगतपर बर निषध देश सदा बसै ॥ २२ ॥ तारक ॥ उत्पत्ति थली जनु चातुरताकी ॥ विषम मही जनु है तपसाकी ॥ सित सागर ते छवि उज्ज्वल जाकी ॥ जनु बैठक सोहतहै कमलाकी॥२३॥अन्यच॥तहँ सोहत है सरिता कारी ॥ जनु क्षीर पयोनिधि भेदिनि कारी ॥ युत पद्म सु- नील कुबेर थलीसी ॥ द्विज गावत हैं महिमा शिवकीसी ॥ २४ ॥ दोहा ॥ मीन मिथुन करकट मकर, चलत सुग्रह सुखपाइ ॥ राशि मा- लसी देखिये, उदित शोभ सरसाइ ॥ २५ ॥ तारक ॥ लहरी अति च- ञ्चल लेत लसी है ॥ तनु शीतल मानहु साँपडसी है ॥ विपुप्याइ जिया- वति है सबहीको ॥ रस बैदिनिसी विलसै जगतीको ॥ २६ ॥ अन्य ॥ तहँ सोहत है यकु शैल सोहायो ॥ जनु मैरु मही द्युति देखन आयो । बहु बंशबड़े सुरगावतं जामें ॥ बिलसै हरि हेम मई परभामै ॥ २७ ॥ तोटक ॥ क्षिति केशरिके उपमा बिलसै ॥ अति सुन्दर कानन फूल लसै॥ बहु रीक्षनकी सबही अवली ॥ शशिलोक विराजत भाँति भली २८ अन्यच ॥ बहु राजत हैं गजराज बड़े ॥ नभ आडत बिंध मनौ उमडे ॥ चहुँधा चमरी चम चौर करें । बट बंजुल मंजुल छत्र धरै ॥ २९ ॥ अन्यच ॥ सब ओर पराग विभूति लसै ॥ बहु कोश निमें अलि आनि बसै ॥ क्षिति नायककी उपमा उपजी ॥ धनकी धुनि दुंदुभि दीह बजी ॥ ३० ॥ गवय ॥ सुरभीकेसरि बसै नील बन माँह ॥ मनौ नगर सुग्रीवको सोहत सुन्दर छाँह ॥ ३१ ॥ छप्पय ॥ त्रिभुवन भूषण भूमि भूरि बर नगर शिरोमणि ॥ झल- झलात छवि अच्छ अच्छ लखि भाषति धनि धनि ॥ सोहत विकट कपाट जटित पुरद्वार फटिकमय ॥ मनौ रच्यो कैलास शंभु निज बास भक्त दय ॥ जनु सजत सुमेरु प्रदक्षिणा चहुँ सुवरण प्राकार पर ॥ सरिवरि जहानको करिसकै सब नर बर नव नगरकर ॥ ३२ ॥ कवित्त मनहरण ॥ तीनौ लोक रचना रचत हैं विरंचि यासौ अचल खजानौ जानौ राख्यौ गुण गचिकै ॥ रूपकी उपज सुखसु कृतको विस्तार पारावार जाको कौन पावै पारु सचिकै ॥ याहीते कहायो अद्भत करतार विधि भूतल नगर नरपर ऐसो रचिकै !! लखत षधकाव्य । बनतु है सहस नयननहीं सों कछु 'वर्णत न बनै सहसाननसों ॥ ३३ ॥ हरिगीतिका छंद ॥ दशकोश ते जहँ देखियत अवली पताकनकी भली ॥ सबसौंधसीसनियै लसै बिच बीच मोति- नकी कली ॥ सुर आपु गहि हित मानिकै पै बिंदुगण फबिसों फली ॥ जनु क्षीरसागरते कड़ी दिवि ओर जललहरी चली ॥ ३४ ॥ कलि कालको भय मानि जहँ युग सत्य आनि सदा बसै ॥ अति पुण्य पावन जानि शील सनेह साँचु सुधालसै ॥ जनु भूमिमें सुरबास उत्तम बासु बासवको रच्यो ॥ बहु रत्न राजत श्री विराजत क्षीरसागरसों सच्यो । ३५ ॥ अन्यच ॥ मणिं हेमके कलशानकी युतिरातिहू दिन होति है ॥ शिर ओक ओकनिमें रह्योराम सूरलोक उदोतु है ॥ अति स्वक्ष सुंदर हेमफाटिक की शिला गसि कै गली ॥ शशिको समाज ल- ग्यो मनौ तल चंद्रिका चहुँधा चली ॥ ३६ ॥ पद्धटिका छंद ॥ बहुभाव संघ सोहत बजार ॥ नवद्वीप चित्र चीजै हजार ॥ जनुहै कुबेर नगरी उदार ॥ मणि हेम चीर हय गज मुठार ॥ ३७ ॥ सुनि सोर परत नहिं बैनकान ॥ जनु भूपति बैठो करि दिवान ॥ छुटि चलतु कौन ल- हिये न छोर ॥ जनु मायाके बंधन अतोर ॥ ३८ ॥ दोहा । अचल अंग जोई जहाँ, लखतु तहाँ तेहि भेव ॥ मानौ साधि समाधि सब, ध्या- वत पूरण देव ॥ ३९ ॥ भुजंगप्रयात ॥ तहाँ राजको धाम यों शोभ साजै ॥ तिहूँ लोकमें रूप वैकुंठ राजै ॥ बने वेषरूरे घने तेज पूरे ॥ सजीसंजमीलोग संग्रामसूरे ॥ ४० ॥ तोमर ॥ मुक्तानकी नव पाँति ॥ रचिद्वारपै बहुभाँति ॥ सब सिद्धिको मुख येहु ।। मुसुक्यात सुन्दर गेहु ॥ ॥ ४१ ॥ दोहा ॥ सुघर नीलमणिसों रचे, जालरंध्र रुचि ऐन ॥ निरखतु निज शोभा मनौ, राजशिरीके नयन ॥ ४२ ॥. सवैया ॥ खिरकीनके आनन सुंदर सोहत नयन गवाक्षनके अति नीके ॥ रोसन- दान मकान लसैं शुभ नासिका कोष सुरंग मनीके ॥ लालपनारेनकी रसना चहुँ ओर त्वचा रचि पुंज हँसीके ॥ सुन्दर देहनिगेहवने सुधने परिवारैहैं राजशिरीके ॥४३॥ दोहा ॥ चहूँ ओर नौबति बजति, स्वर्ण शिखर बरजोर ॥ मेघ घने गरजत मनौ, कनकाचल चहुँ ओर ।। ४४ ॥

॥ हालिक ॥ लालमणीन रची भुड़वारी । राजशिरी जावक अनु- हारी ॥ फैलिरही किरणे अतितामू ।। केसरि फूलिरही सबिलास ॥४५॥ चौपाई ॥ बँगला गजदंतनिके रचे । श्याम लाल मणिबेलिन खचे ॥ मनौ हाँस रसके घर आजू । न्योति बोलायो रति रतिराजू ॥ ४६ ॥ दोधक ॥ आँगन हीरन साजि संवारो ॥ छज्जनि में करिदंत सिधारो॥ ऊरधहू अधते उनई है। श्वेत प्रभा पुनिरुक्ति भई है ॥ ४७ ॥ अन्यच॥ दोउनको प्रतिबिंब दु₹में ॥ होत नहीं गहिरी छबिमै ॥ साध मनौ उपकार सयाने । आपुसमाह करै हित माने ॥४८॥ तारक ॥ बहु बेलिन बूटन संयुत सोहैं ॥ परदा सिदरीनलगे मन मोहैं ॥ हे नव धूप सुगंधितनीके ॥ जनुबाग विराजत राजशिरीके ॥४९॥ नाराच ॥ चबूतराजराइके जहाँ तहाँ बने घने ॥ रचे विचित्र चारु रंग अंग संग सोसने ॥ लसै प्रभात रंगसौं न नीठि दीठिकै परै ॥ अपार भूमिदार सूर आरसी मनौहरै ॥ ५० ॥ अन्यच ॥ रचे विचित्र चारु रूप व्योम भूप तारके ॥ अनेक चित्रसारिका अगार हैं विहारके ॥ निहारिकै प्रभात रंग मोहि मोहि कैरहै ॥ मनौ त्रिलोक जीवहै विनीत बास संग्रहै ॥५१॥ दोहा ॥ होत रंग संगीत गृह, प्रति ध्वनि उड़त अपार ॥ अरज करत निकरत हुकुम, मनी काम दरबार ॥ ५२ ॥ कामतंत्रकी देवता, मोहन मंत्र स्वरूप ॥ नारीमय त्रैलोक जनु, राज तुरावर भूप ॥५३॥ रोला॥ ताने विशद वितान लाल झालरि झुकि झूमै ॥ मनौ सुधाधर बिंब प्रात रविकी छवि चूमै|बँगला बने अनेक लालसित श्याम सोहावन ॥ गृह द्युति- सागरमाहँ मनौ फूले सरोज बन ॥ ५४ ॥ दंडालय ॥ गाहै गज गाहें पगनहि ठाहैं गढ़ गिरि दुग्गन दाबिदरें ॥ डारै गहि डारें ऐंचि उखारें तरुन तरुन संहार करें ॥ सब द्वारन ठाढे संगर गाढे कद बल बाढे विंद मनौ ।। चौकी निज साजत दिग्गज लाजत गज राजत लखि लखत घनौ ॥ ५५ ॥ दोहा ॥ तिनहीकी अनुसार रथ, हय ढलै तकी भीर ॥ सजे सबैलनयुद्ध थिर, रहत धुरंधर धीर ॥५६॥ छप्पय ॥ कहूँ लरत गजराज बाघहरना कहुँ जूझत ॥ मल्ल युद्ध कहुँ होत मेष वृष महिष अरूझत ॥ कहूँ नटत नट कोटि भाट बरलावत गुण मनि ॥

नैषधकाव्य । कहूँ यज्ञके ठाट वेदगावत मुख मुनि भनि ॥ कहुँ गनक गनत योगी जपत यन्त्र मन्त्र मत विरत नित ॥ कहुँ करत चारु चरचा भली कबित चित्रकी चतुर्चित ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ चहूँ ओर सब नगरके लसत दिवालय चारु ॥ आसमान तजि जनु रह्यो, गीरवानु परिवार ॥ ५८ ॥ मनौ रची निज बासको, और भूमि भगवंत ॥ खाई मिस चहुँ ओर जनु, सोहत सिंधु अनन्त ॥ ५९ ॥ प्लवंगम् छंद ॥ होमन जहँ धूम कुटिल मति देखिये ॥ जहँ मणि मालनि माहँ भेद अवरे खिये ॥ कोकनके द्विजराज विरोध बखानिये ॥ मूलहानि तिथि पत्र प्रगट पहिचानिये ॥ ६० ॥ गोपल ॥ दया बोलिकी ललित निकुंज ॥ गुंजत सुख पक्षिनके पुंज ॥ गुरुकी हानि मिठाई माह ॥ पाप रचित भोजनकी चाह ॥ ६१ ॥ तोटक ॥ सिगरी क्षिति हीरन . जोरिगसी ॥ तिनमें शशिकी प्रतिमा बिलसी ॥ चलनयननके मुख देखि डरयो ॥ नभते जनु भूतल टूटि पन्यो ॥ ६२ ॥ अन्यच ॥ सुर लोकनकी उपमा छहरी ॥ उठती सब ओर सुधालहरी ॥ परनारि मनौ छबि भार छई ॥ बहु भीतर है अनुराग मई ॥ ६३ ॥ कबित्त घनाक्षरी ॥ नीलमणि भवननिमें तम गहि राख मनौ मोतीके महल मिली तारेन बनाइकै ॥ फटिक भीतिनमें जोन्हाईसों जटित मिली धुज पट क्षीर धिति रंगनि समाइकै ॥ सुंदर वदन युवतीनके मिलत लयो प्रफुलित पंकज पराग सुख पाइकै ॥ लाल कलशानिमें लहत निजरससे सुसूरकी किरण प्रात परती लखाइकै ॥ ६४॥ दोहा ॥ सदा नीलमणि भवनमें, बसत निडर तमराज॥ प्रगटत रसना गतनिको, अभै- दानके साज ॥ ६५॥ छप्पय ॥ तिनो भुवन विख्यात नामबर कीरति मूरति ॥ दया क्षमा शुचि शील दान धीरज सुधर्मरति ॥ सकल देव व्योहार विदित बोलत मुखहँसि हँसि॥ निडर समरडरलोक लाज साजत मुख गसि गसि ॥ रामानुराग लक्ष्मण मनौ मित्र मुदित सब दिवस सब ॥ जहँ बसत मुनेश्वरसे सकल आनंदमय संयम नियम ॥ ६६ ॥ अन्यच॥ धर्म धुरंधर वीर धीर कलिकाल.विहंडन ॥ तपत तेज बरवंड साधु गन मंडल मंडन ॥ पुण्य सलोक पवित्र चित्रमति मित्र मोहतम ॥

नषधकाव्य । रूप मनोहर राशि वैदपरकाशित हरिसम ॥ नृप वीरसेनि नंदन नवल सोमवंश सब गुण सच्यो ॥ क्षिति भाग्य प्रजाके पुण्यफलनि नलराजा करता रच्यो॥ ६७ ॥ . इति श्रीमत्प्रचंड दोर्दडप्रतापमार्तडभूमंडलाखंडल श्रीखाँ साहब अली अकबरखाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचि- तेकाब्यकलानिधौनलावतारो नाम प्रथमस्सर्गः॥१॥ दोहा-सर्ग दूसरेमें कथा, वर्णन नल अनुराग ॥ मिलिबे हेम मरालको, लीलासों बिचबाग ॥ १ ॥ सोरठा ॥ जासु कथा करि पान, विबुध मुधानहिं आदारिहि ॥ सेजराशि बलवान, श्वेतछत्र मंडल मुयश ॥ २ ॥ वंशतिलक ॥ जाकी कथा रसभरी निदरै सुधाको ॥ सोई नरेश नल- राजत सम्पदाको ॥ साजे सुवर्ण नवदंड सितातपत्री ॥ पूरेप्रतापागनसों धरित्री ॥ ३ ॥ हरिगीतिका ॥ जगमाह जे छिन चिंतिये कलिका- लकी महिमा घटी ॥ अघ ओघ धोवत ज्यों कथा जिमि दिव्यसाधुनकी बटी ॥ निज सेवनी पहिचानिकै वहई अनुग्रह आनिहै ॥ करिहें पवित्र चरित्र मेरी जीभ अवगुण बानि है ॥ ४॥ तारक ॥ करि अंशदिगीश- निके इक ठौरे ॥ विरची नलमूरति रूप न थोरे ॥ तिसरी ऋषि आशिष वेद मई है ॥ सब लोक देखावन काज भई है ॥५॥ दोहा ॥ घालतु है कुल मदनमद, वहै आँखि सुखपाइ ॥ मन लै तिलोचन अवतरचौ यही बतावत आइ ॥ ६॥ चंद्रमाला ॥ चारो चरणा समेत सुखी कर धर्म धरामें थाप्यो ॥ चारौ वर्ण सुखी जहँ विकसैं पाप पुंज तह काँप्यो ॥ एकपाँइ छिगुनीसे क्षिति, निराधार होइ गाव्यो ॥ तनु अनूप दुर्बलसों दीसत मनौ तपोबल बाब्यो ॥ ७ ॥ घनाक्षरी ॥ बिकट कटक सजि नलके चलत दल धुन्धुरि प्रताप शिषी धूम मलिनाई है वहै परिपूरणपयोनिधि सुपंक भई अंक द्वै शशीमो दरशतु बहु धाई है ॥ दिपत धनुष घन आसुगबरषि अरि तेज तेप्रचंडचंड अनल बुझाई है। लगत अमैनक अशुभ अति शत्रुनको कोइ लासो कुयश लुल तुव बहु नैषधकाव्य धाई है ॥ ८॥ दोहा ॥ इति भीति राखी भ नल, जग न लहै कहुँ अयन ॥ अतिवां छोडति न छिन, अरि रमनिनके नयन ॥ ९ ॥ मनहरण ॥ संगर धरामे जाके रंगलों सुभट निज निज चातुरीसों यश पटनि बुनत हैं ॥ करि करबाल व्योम कोरि कोरि जोरि जोरि चन्द्रते विशद जाके गुणन गनत हैं ॥ अमल अमोल ओसु डोल झल झल होत कबहुँ घट न जन देखत सुनत हैं ॥ आठौ दिशि- रानी राजधानीके शृंगारिबेको आठौ दिगराज जानि चीरन चुनत हैं ॥ १० ॥ तारक ॥ जिमि वैरिन छोंड विरोध दयो है ॥ तिमि धर्म विरोध नहीं उनयो है ॥ जित मित्र अमित्र प्रताप प्रहारी ॥ दृगचारि विचारि गै निरवारी ॥ ११ ॥ तोटक ॥ नलके यश तेज विराजत हैं । शशि भानु वृथा छबिछाजत हैं । जबहीं जबयों विधि चित्त धरै । तब छेकनको परिवेष करै ॥ १२ ॥ अन्यच ॥ विधि भाल दरिद्र लिख्यो जेहिके ॥ नहिं कीजत अंक वृथा तेहिके ॥ नल येतिकु ताहि तुरंतदयो ।। जिमि टारि दरिद्रको दूरि कियो ॥१३ ॥ अन्यच ॥ कवितान सुमेरुन बाँटि दियो । जलदानन सिंधुन सोंकि लियो । दुहुँ ओर बँधी जुलफे सुभली ॥ नृप मानतुओ यशकी अवली ॥ १४ ॥ अन्यच ॥ कवि औ बुध जासु समीर रहें। सब वंदनकै जयदेव कहैं । दिनही दिन ओज उदय बिलसै ॥ रविकी सिगरी छबि आनि बसै ॥ १५ ॥ स्वागता ॥ अंबुजात युति मूगन दूखै ॥ राज शीशमणि ऊपर मूखै ॥ हेतु जानि वि- धि मंगल वेषा ॥ साजि भूपपद ऊरधेरेषा ॥ १६ ॥ दोधक ॥ जी- तिलिये. जग शत्रु घनेरे ॥ सातौद्वीपनके नृप चेरे ॥ गाइनमें मिलि बाघ बसै जू ॥ चोरनमें मिलि साह हँसै जू ॥ १७ ॥ हरिगीत ॥ नवरंग संगर माह दिग्गज अंधकार समेटिकै ॥ छतधार दुरदिन धोरमें भटकौंच दुर्गम भेटिकै ॥ करवाल निर्मल दूतिका वश जोर योबन सों भरी ॥ अभिसारिका सम आइकै जगजीयकेसिय पाँपरी ॥ १८ ॥ दोहा ।। लसत सुमित्रो पेत नृप, दशरथके . परभाइ ॥ क्षमा भार गुरुसे सज्यो, मधु सुगंध सरसाइ ॥ १९ ॥ घनाक्षरी ॥ पूरुव पुनीत उदयाचल अवधिबासी उत्तरहू सेतुबंध पारनि परत हैं ॥ पश्चिम नैषधकाव्य । अमंद मंदराचल चलत नीके दक्षिणजे अंत गंधमादन तरत हैं ॥ जोरि जोरि कोरि कोरि शीशन छुवत क्षिति भूपति अनेक झुंड मंडल भरत हैं। कहि कहि देत दुरिहीते चोपदार निज गहि गहि नामनि प्रणामनि करत हैं ॥२०॥ तोमर ॥ तेहि राजको यहु राज ॥ वरणे सुसाधु समाज ॥ मुकुरै सकै समुहाइ ॥ गिरि है विपच्छ बनाइ ॥ २१ ॥ अन्यच ॥ दुर्गानिको सतसंग ॥ इक ईश राखति अंग ॥ इक मेघ धारत चापु ॥ ध्वज वीर उन्मत आपु ॥२२॥ अं० ॥ जहं पाग बॉधन योग ॥ दुख दीहका तन लोग ॥ आसिधार तीक्षण जानु ॥ मधुपान भौरन मानु ॥२३॥ दोहा॥ हस्त श्रवणको नाश यह, पत्राही में होत॥ दानहानि यक करिनमें, रवि शशि ग्रसत उदोत ॥२४ ॥ बढन न पावत हैं जहां, फेस करज मलदीन ॥ वरषके बासर धरतही, अंबर अधिक मलीन ॥ २५॥तारक॥ इमि राज्य लयो सबुलै सबही में ॥ जय रूप थप्यो सिगरी धरणी में ॥ ऋतुराज मनौ वनमें उदयो है ॥ तनुयो बनको परबेमु भयो है ॥ २६ ॥ दोहा ॥ पद छबि लव पल्लवनहीं कमल मलीन बनाइ॥ लाके मुखको दासु है, शारदशशी न लखाइ॥२७॥ प्रद्धाटिका॥ मिसि रोम राज रेषा सुवेष ॥ विधि गनत मनो गुण गण अशेष ॥ थल रोम कूप लखिकै प्रभाव ॥ जनु दिये विंदु दूषण अभाव ॥ २८ ॥ अरि दुर्गलूटि अरगल अखंड ॥ जनु धरी बडाई बाहु दंड गोपुर कपाट विस्तार झारि ॥ गहि धरयो बच्छ थल में सँवारि ॥ २९ ॥ घनाक्षरी ॥ लीला विहँसनि सो हरायो हिमिकर ज्योंहीं कोलनिकी कांति हरी नयन रतनारेसों ॥ अमल कपोल गोल आरसी अमोल ओप उपरे रहति श्रुति भूषण सितारेसों ॥ ताकी समताकी कहूँ उकुति युगति होति उपमा बनति कैसे सुकवि विचारेसों। दूसरो न कमल मुकुर शशिजेतबारु वदनसों वदन बखामतु निहारेसों ॥ ३० ॥ लक्ष्मीधर ॥ भूपको देखिकै बामकी काँतिसों ॥ आपने अंगके रूपकी भाँतिसों ॥ ती- नहु लोकनकी सुन्दरी सबै ॥ मोहिकै आपुते प्रीतिको संभवै । ॥ ३१ ॥ चौपाई ॥ मोही इमि देवनकी नारी । इकटक देखत तन- मन वारी ॥ वही टेव अजहूं लाग धारै ॥ निशि दिन अनिमिष नयन नैषधकाव्य । ११ निहारै ॥ ३२ ॥ अ०॥ नलको सुनत जन्म फल लेखै ॥ रूप लखे बिन अफल विशेषै ॥ उरगीनेहरगी इमि धेरै ॥ स्तुति निन्दा नयनाकि करें ॥ ३३ ॥ अ० ॥ मनुजबधू नयनन सुख गहैं । धीरज धारि विलोकत रहैं ॥ मोहि मोहि तनमय है जाहीं । पलक विघ्न पारत कछु नाहीं ॥ ३४ ॥ अ० ॥ जवनि नारि सपने कछु देखै ॥ तब नल भूप रूपरस पेखै ।। जब जब भूलि कछू मुख कहै । तबै नाम नलही को गहै ॥ ३५ ॥ दोहा । निजनायक सँग सुरतिमें, ध्याइ ध्याइ नलरूप ॥ नयन नूदि बनिता सबै, करती केलि अनूप ॥ ३६ ॥ तोटक ॥ निज बदन द्युति समता लखति ॥ नल देखि दर्पणमें तकति ॥ लजि रहहिं तिय निज रूप बिन ॥ इक भीमकी तनयाहि बिन ॥३७॥ दोहा ॥ देश विदर्भ नरेश वर, भीम भीम अनुहारि ॥ दमयंती कमनीय तन, ताकी राजकु- मारि ॥ ३८ ॥ सुनि सुनि नलके शील गुण, दान स्वरूप पवित्र ॥ दमयंती मनु मिलिगयो, क्षीर सुक्षीर विचित्र ॥ ३९ ॥ चौबोला ॥ तात सदन जब जाइ सयानी, वंदि पढ़ति नल गुणनिघने ॥ सुनि सुनि मदन पीर सरसानी, तनु कदम्बके तूल बने ॥४०॥ दोहा ।। नरहू के परसंगमें, कहै सखी नल कोइ ।। सुनि शरीर पीरी परै, पलमें पीरी होइ ॥४१॥ सवैया। रंगकोभौन फुहारेनके दिग नेक खड़ी तहँ आनि भई ॥ काहूसों काहू सहेली कहो नल देइ मिलाइ तबै चितई ॥ सब अंगमरोरि मुरी मनमें झार पूरि रही रस मैन भई ॥ दृगछाइ रहे मुक्ताजलके नलके सुनतै कुम्हिलाइ गई ॥ ४२॥ तारक ॥ सर्व चित्र चितेरेनसों रचवावै ॥ तिनमें जुव सुंदररूप बनावै ।। लखि कामको चित्र कहै यह कैसो ॥ नहिं भावत और लिखै किन कैसो ।। ४३ ॥ दोहा-ऐसे छलबलकै लखत,नल मूरति लिखवाइ॥दुसह प्रथम अनुरागहै क्यों हूं कह्यो न जाइ ॥ ४४ ॥ चौपाई ॥ चरचा निषध देशकी करै । नरवरकी वाणी मुख धरै।।बीरि सदा नरवर की खाइ॥४५॥नलको नामुलेत मुसुकाइ।कवि पण्डित याचक जे आत निज नरवर नगर बतावै॥तिन्है देइ अनगन धनभारा॥सुनत सुयश नलकेर सुखारा॥४६॥सारावती॥

- १२ नैषधकाव्य । चित्र लिये नलको करमें ॥ भवन अकेली व्है भरमें ॥ संग सखीनहुसों चकिकै ॥ यों समता मिलवै तकिकै ॥ ४७ ॥ सवैया ॥रतिको सुख स्वादु नयो उनयो पति सोवति नयनन आनि अरै ॥ करु झारि झुकै नरहै हँसिहेरि हरे करुले छतिया पधरै ॥ बरजोरी करै जब और कळू करमीजि पसीजि चलै थहरै ।। अनुमानती है सखि आवतही तजिसेज जही अकुलाइ परै ॥ ४८ ॥ प्यारे बढे पहिले अनुरागके कांति हजार गुणी सरसानी ॥ याहू कि ऐसी चली चरचा परवीननलै तिहुँलोक बखानी ॥ कौनु न राझि गयो सुनिकै पुनि रूप चितै न भयो अभिमानी साँसन सांट मनोभवकी नवला नलके हिय माहँ समानी ॥ ४९ ॥ दोहा॥ निज छबिकी रतिकी विमल, मुक्तावलिके योग। दमयन्तीके गुणसुने, नल वर्णत बुधलोग।॥५०॥तोमरातब पाइ औसर काम॥ नलसों रह्यो कछु बाम ॥ करि ताहि मूरात आपु ॥ किय जीतको परतापु ॥ ५१ ॥ दोहा ॥ दमयन्तीके गुण जबै, कानधरे नृप आनि ॥ काम आपने चापको, कान धरयो गुणतानि ॥ ५२ ॥ मनहरण ॥ ऐसे धीर साहसीके जीतिबेको ठाडो भयो संकित मदन मन धीर न धरतु है ॥ तीनि लोक जीतके सुयशडभरे हैं दई सोहे द्वै सकतु नाही लाजन मरतु है ॥ जाको योग जासों करयो चहतु करतु तासों विधिको वि- लास कछू कह्यो न परतु है ॥ धीरजको कौच याको फूलनिके बातनि सों टूक टूक डारयो करि कौतुक करतु है ॥ ५३ ॥ सवैया ॥ सोइ रहै उठि जाइ अटापर मीतनसों न मिलै छलकै .॥ चौपरिकै सतरंज रचै कबहूं रस रंग लखै बलकै ॥ थल एक लगै न कहूँ चितयों हितकी सरिता उमडी ललकै ॥ खरकै छबि आनि गडी उरमें नृपरावरमैन रमै कलकै ॥ ५४ ॥ मोदक ॥ लोगनसों विरहागिनि गोवत ॥ धी- रजको सजि कानन जोवत ॥ जानत जागतके गुण साथिनि ॥ सेज शशीकर सुन्दर यामिनि ॥ ५५ ॥ सधैया । मैनके बान लगे तनमें न बच्यो तिल अंग अभेद बनाइ कै ॥ पै नृप भीमसों आपनी ओरते ब्याहकी बात कहै न चलाइ कै । भूपति माननकी यह रीति है याँचतही किन जाहि पराइकै॥आपनी ओरते माँगत नाहिन माँगतही सबु देत लु- नैषधकाव्य । १३ टाइ कै॥५६॥ मोदक.॥ छूटत हैं मुख साँसनके गन ॥ भूप बतावत आ- लसहै तन ॥ पीत भई छवि है सब अंगन ॥डारत टेर कपूर बिलेपन ॥ २७॥ दोधक ॥ बोलि उठ्यो दमयंति कहाँ है ॥ कोऊ न वैन सुन्यो न तहाँ है। पंचम राग कलाँवत गायो॥राज समाज सबै समुझायो ॥ ५८ ॥ तुंगाछंद ॥ परिजन सब ठाढे ॥ लखत विपति बाढ़े ॥ कछु न मन विचारै ॥ नयननि जलढारै ॥५९ ॥ प्रद्धटिका॥ज्यों खु- लत जात मन्मथ विकार॥ त्यों लहत भूप लज्याअपार ॥ सब धर्म धाम धीरज निधान॥ जेहि शिवसमान गावत जहान ॥ ६० ॥ गुण निफलभये सब वेद वैन ॥ अनुराग रह्यो भरिपूरि ऐन॥रति संग पाइ मन्मथ अराल अनिरुद्ध तहाँ उपजतु विसाल ॥ ६१ ॥ अन्यच ॥ विन मैन चिह्न बैव्यो न जाइ ॥ करि यत्र भूप मनमें लजाइ ॥ जब लगन लगी मजलिस उदास ॥ तब चित विहारकी करी आश ।। ६२ ॥ प्रद्ध- टिका ॥ सब कामरूप मित्रान समेत ॥ मनु करौ बगीचाके नि- केत ॥ परिजनन ओर देख्यो कनेखि ॥ साजौ तुरंग यहु हुकुमलोख ॥ ६३॥अं० ॥ करि करि प्रणाम दौरे अपार ॥ तुरतै तुरंग साज्यो शृंगार। छबिश्वेत जासु जिमि तरुनिहाँस॥जबमान अधिक पौरुष प्रकाश॥६४अ० अतिचपल पुष्ट पुटटाय टोर ॥ जो खूदत मंदर सकल छोर॥ थिररहत न छिन जिमि तरुणि नयन॥ठहरत नडीठि जिमि मुकुर नयन ६५॥ सोरठा केसरिरूप अनूप, झल झलात द्युति वदनतल ॥ लसतहिये शुभरूप मनौ देवमणिकी किरनि॥६६॥ मरहट्टा छंद॥ चंचल खुरखूदै गिरिंगण गूंदै लसत रेणुकणजाल ॥ सीखति गति वेगनि लगे अनेगनि जनु जनि चित्त रसाल ॥ मुख ओंठ चलांकी निजगति बांकी नृपसों कहत सुनाइ। यह जानत हयके सब गुण रयके यासों रहत चुपाइ॥ ६७॥ रसिक॥ परम पुरुष नल चहत ॥ जनु रवि रथ हय सहत ॥ यहि सुयशहि जग हत ॥ दशनि किराण मुख लहत ॥ ६८ ॥ तोटक ॥ सित केसर चंचल पूंछ लसै ॥ मुक्तागण गुंदनि सो सरसै ॥ नीको हय राजु बतावतु है ॥ जनु चौर दुहूँकरवावंतु है ॥ ६९ ॥ घनाक्षरी ॥ महाराज नलको विदित वरबाजी सुख गीरदान पति अभिमानिन गिरावई ॥ गरुड नैषधकाव्य । समान गर्व कहा कहौं मन गति दौरतमे तेज गवन पौनही सिखावई ॥ मेरी जानि गहनु नहोइ जो ये वारवार भानु महताब माँगि रथन ल- गावई ॥ अंबरके खेतय उद्देत नेक बाग लेत राहु केत नाहि कहूं छांह छुइ पावई ॥ ७० ॥ दोहा ॥ आत्रय ऊंची थल विना, छुवत न जाकी पीठि ॥ बाजिसाजि ठाढो कियो, मुख सन्मुख नृप दीठि ॥ ७१ ॥ दौरि चले परिजन सकल, कंदि सोरु संभार ॥ बाजि उठे इकवार ही, दुंदुभि दीह हजार ॥७२॥ तारक ॥ सँगसाजि चले बहु भूपति भारे॥ रवि किंकर ज्यों रवि संग निहारे ॥ तुरकी हय साजि चले नृप आगे ॥ सब दूरिहि देखति पाँयनि लागे ॥७३॥ दल संयुत भूपति बाहेर आयो ।। सम भूमि विहार बिनोद बनायो । असवारं तुरंगन दाबि घ- नेरे ॥ छलसों परिहास करें बहुतेरे ॥ ७४ ॥ दोहा॥ दौरावत चहुँ ओर इय, देखत बात लजात ॥ छूटत मानौ फुलझरी, जरी जीन सरसा- त ॥ ७५ ॥ दौर हमारीको धरा, अल्प आधिक यह जानि ॥ मनौ करत अंभोधि थल, खुरन खूदि रजसानि ॥७६॥ दौरत शत्रु दिगंत लौं,लंघत सिंधु सुज़ासु ॥ ता नृपके हय जानि यह, करत मंडली लासु ।। ५७ ।। प्रटिका ॥ यह लखत ललित लीला विलासु ॥ नृप गयो बाग जहँ सुख निवासु ।। वनपास पहुँचि सब नगर लोग | फिरि चले मुदित मन योग योग ।। ७८ ॥ सँगके नरेश उतरे समीप ॥ तेद्वार खड़े राखे म- हीप।। गहि एक एक मित्रनि अनूप॥ माध बाग गयो अनुराग भूप ७९॥ तोटक ॥ वनपाल प्रधान प्रणाम करै ॥ करजोर विलोकत प्रेमधरे ॥ फल फूलनकी महिमा विनई ॥ वनकी सब शोभ दिखाइ दई ॥ ८० ॥ तोमर ॥ फल फूल पत्र प्रकासु ॥ जनु है वसंत निवासु ।। चहुँधासु जासु हजार ॥ जनु है सुगंध बजार ॥ ८१ ।। बहु भाँति फूलत फूल ॥ अलि संचरै रसमूल ॥ सजिकै धरे ऋतुराज ॥ मनमत्थ आयुध साज ॥ ८२ ॥ चौपाई॥ कहुँ तरुवर पण्डितसे राजै ॥ फैले पत्र पुराण विराजै ॥ कहूँ महीपति शोभा धरै ।। नवदलसे सबको मन हरै ॥ ८३ ॥ उडत पराग धुधि चहुँ ओरी॥ ऋतुराजा खेलत जनु होरी ॥ कल गाननि कोकिल कुल गा|भवन बीन परवीन बजा।।८४॥

१५ दूत विलंबित ॥ छूटत हैं जलंयन्त्र तहाँ बन ॥ गरजि के जल चादरि सों सने || परम मोरनिको जहँ लासु है ॥ मानहु सावन भादौं मासु है ॥ ८५ ॥ लसत केतकिके कुल फूलसों ॥ रमतु भँवर भरे रसमूलसों ॥ शिव सुपूजन माँह मने करे ॥ मनहु सी अपकीरति सों भरे ॥ ८६ ॥ मौक्तिक दाम ॥ दुरव्यो हिय केतकि देखत भूप ॥ करयो तब तापर रोष अनूप ॥ वियोगिनिके उरभेदतु रोजु ॥ करै तुमको निजबाण मनोजु ॥ ८७ ॥ सकंटक रूप न काटन योग ॥ गिरै विरही तिहि लागत लोग ॥ महेश यही तुमको निदह्योजू ॥ आरासम पत्रनिदै विदरयोजू ॥ ८८ ॥ दोहा || मधुसों गीले हाथ है, ऐंचो ध- नुष न जाइ ॥ ते पराग माले कुसुम शर, बेधत मोहिं बनाइ ॥ ८९ ॥ सुखदायक ॥ देखे फल सँभारि सुहाये दाडिमनि ॥ धूपे तललै धूपनवाय आनननि ॥ चहै समता होन दमयंतीके कुचनि ॥ छूटै घटै धूम मानौ हू काननि ॥ ९० ॥ दोहा ॥ लखी वियोगिनि दाडिमनि, कंटक अंग निदान ॥ फुलत नविन दरको । लग्यो, शुकमुख किंशुकबान ॥ ९१॥ मनहंस ॥ विरहनिके पल खातही यहि नामसों ॥ यहिते पलाश प्रसिद्ध हौ गति वामसों ॥ कछु फूल लागत लाल हैं तेहि हेतसों॥इमि दूखिकै पुहुमी पुरंदर चेतसों॥९२॥ नील ॥ नव लता पुनि सुंदर नृप दीठि परी॥ चुंबित मंद समीर सुसी- कर सों भरी ॥ कंपित अंग अनूप कलीमुख हांसु लसै ॥ कूजत कंठक- पोत विलोकत जीव सै ॥९३ ॥ चंपपकी कलिंका लविलोकत जानि परी ॥ भँवरनकी अवली उमहीं सिगरी ॥ पूजत काम बसंत सुदीपक वारि धरी ॥ चित्त वियोगिनके मुपतंगम तूलकरी ॥ ९४ ॥ कबित्त । बांचति कोकिल हैं विरहीनकी दुःखदशा अलि देत हुकारै ॥ फूलि रह्यौ करुणारसबाग वियोग संयोग विहार विहारै ॥ या जगमें कछु नाहिन है कहती सबसौं कर फूल पसारै ॥ देखत है टरि भूप तहां भरि नयनन आंब गुलाबकी डारै ॥ ९५ ॥ भुजंगप्रयात ॥ विलोके तहां आंबके शाखि मौरे ॥ चहूंधा भ्रमै हुंकरैं भौंर बौरे ॥ लगै पवनके झूक डारै झुकावै ॥ विचारे वियोगीनको ज्यों डेरा॥१६॥शशिवदन॥पिक नैषधकाव्य द्विज देखे ॥ कुपित विशेषे ॥ नयननिराते ॥ वचननिताते ॥ ९७ ॥ दोहा ॥ दिन दिन तनु तनुतागहा, लहौ मूरछा तापु ॥ पिक द्विज ये बोलत न जनु, विरहिनि देत शराषु ॥ ९८ ॥ सोरठा ॥ लसत धूम अलिशीश, चम्पकके गुच्छा दिपत ॥ धूमकेतु विसवीस, उयो वियोगि- निको अहित ॥९९॥दोहा॥ चहुँ दिशि मिटत पराग कन, शीश लगी आलिपाँति ॥ लखी नागकेसरि चलित, मदन सानकी भाँति ॥ १० ॥ तोमर ॥ चहुँओरते अलिधाइ ॥ नलके सुगन्ध लोभाइ ॥ तजिदेत फूल बनाइ ॥ सब ओर गुंजत आइ ॥ १०१ ॥ दोहा ॥ बारनारिके कुचन संम, तके पके फलवेल ॥ पवन चलित कंटक दलित, चन्दन सुरभि समेल ॥ १०२॥ सवैया ॥ गदि रहे गन गुच्छनिके नवरंगित रंग सुरंग बखान्यो ॥ मोहन बान बसी करके औ उच्चाटनको बहु ठीक ठिकान्यो ॥ नृप मयनको अक्षय बाण निषंग बन्यो निहिच पचिमै पहिचान्यो | विरहीनके हीय हुलास विडारन पाँडर डारन देखि डरान्यो । १०३ ॥ दोहा ॥ कोरक सहित अगस्तिया, लख्यो राहु अवतार ॥ कला कलाधरकी गिली, जनु उगिलत यहि बार ॥१०४॥ चं- द्रमाला॥ सित तुषार दलबसन दूरि करि हठसों अंग उघारै ॥ कंपतु तनु लै नवल लतासों सुघर समीर विहारै ॥ झरिझरि परत कुसुम श्रम सीकर सुखसनेहसों सो हैं। लोचन {दि रह्यो पुहुमी पर निरखतही मनमो हैं १०५ संवैया ॥ शीतल डोलत मंद समीर भयो तेहिते अति शीतल नीको॥ फूलनके रससों मिलिके प्रगट्यो सबु स्वादु सुधाधरहीको ॥ केतकीके नव पीत परागसों पीत भयो रँगु सोहनोजीको ॥ द्यौस में विरहाकुल भूप लह्यो सुख तोहूँ सजी रजनीको ॥१०६ ॥ दोहा ॥ विरहबिथाहू में लख्यो, भूपति आनन चन्द ॥ कुहू कुहू टेरन सरिस, कोकिलदै दुख द्वंद ॥ १०५ ॥ प्रमाणिका ॥ अशोकनाम जानिकै ॥ लख्यो सुसाखि आनिकै ॥ लसै सुरंग फूलसों ॥ मनौ जवान तूलसों ॥ १०८ ॥ सवैया ॥ बावली विभ्रम वीचिनसों तटलागि चढी मिरदंग बजावै ॥ गावतु हैं पिक पञ्चमताननि मोर मिले वनितान चलावै ॥ रंग बन्यो वनमें सब अंगनि चोपसों भूपहि मोरि रिझावै ॥ भागके भाजन जात नैषधकाव्य । १७ जहाँ चहुँ कोदनि माह विनोदनि पाकै ॥ १०९ ॥ तारक ॥ फहरै नवपात निसान बनेरे । नृप आवतु हैं जनु मयन अहेरे॥ गुलक्यारि- नमें अलि बोलत मानौ ॥ वह काम नफीरिनिकी ध्वनि जानौ ॥११॥ दोहा ॥ शिवपूजन हित कनकके, कुसुमरसत अलिजाल ॥ मयन नृपति जगजीतकी, बजी मनौ करनाल ॥ १११ ॥ दोधक ॥ जो गुलकेसके फूल सराहैं ॥ मयन तुरीनके जीन झवा हैं ॥ सोहतु रौ- सनिमें गुल्लाला ॥ मानहुँ कामके आशव प्याला ॥ ११२ ॥ सवैया॥ अलि कोकिल बीन बजे बजने बन देलिन केलिसों नाच रचायो॥ संगम मंत्र मनोज महा ऋतुराज लस्यो गुललालन मायो ॥ तजि मान मिलै मनभावन को तिय याँ लिखि आइ सुवागानि आयो ॥ आमिल हू छिन पौन प्रवीनलै ना फरमा फरमानु पठायो ॥ ११३ ॥ संयुत ॥ शुक सारिका गुण उच्चरै ॥ तृपकी सुकीरति सुंदरें ॥ सुनि होत ही न हुलासु है । दमयंति प्रीति प्रकाशु है ॥ ११४ ॥ विरहागि है दुगुनी जगै॥ मन बाग देखत नालगै ॥ पग ने आगुहिको दयो। इक ताल देखत मोहियो ॥ ११५ ॥ दोहा ॥ लैकै सब संचित रतन मंथनको भयमानि ॥ मनौ बगीचा बीच गृह, वस्यो क्षीरनिधि आनि ॥ ॥११६ ॥ जलतल विषधर दंड बहु, झलक श्वेत सरसात । मनौ बसत वासव दुरद, रदनावलि संघात ॥ ११७॥ चंचल तरल तरंग तट, प्रति- बिंबित जल होत ॥ लगत वीचि ता जन मनौ, सुर वाजिनके गोत ॥ ११८ ॥ पुंडरीक विकसत लसत, बसत कलंक मलिंद ॥ मनौ उदित यामें मुदित, दिपति अनेकानिचंद ॥ ११९ ॥ चलत चक्र करकमल बल, मधुकर द्युति दरशाइ ॥ विषधर पै राजत सदा, सवरण हरिके भाइ ॥ १२० ॥ लपझी अंग तरंग बहु, सरिता रंग अनूप ॥ नव पंकज अं- कुर जहाँ, धरत प्रवाल स्वरूप ॥ १२१ ॥ सित सरोज फूले उतै, इत इंद्रिय बरनोर॥ शशि मंडल उहि ओर जनु, विष मंडल यहि ओर १२२ चलती लता सिवारकी, चलत रंगके संग ॥ बडवानलको जनु धरयो, धूमधूमरे रंग ॥१२३॥ मित्रसंग कंटकित तन, सीग्रहपै परवीन॥ जासु कमलनी अप्सरा, शुचि सुगंधसों लीन ॥ १२४ ॥ जाके जलमें ३

१८
धकाव्य
प्रति फलत, सब तट तरु इक आंक ॥ पर्वत परयो सपच्छ है, मनौ
लसत मैनाक ॥ १२५ ॥ गीत ॥ मणि दीह दर्पण है मनौ जलदेवता
रमणीनको ॥ मुकुतानि हीरनिसों रच्यो घरु धौ जलेश प्रवीनको ॥ जनु
सात सिंधुनको यहै उत्पत्तिको थलु मानिये ॥ जलराशि रूपधन्यो मनौ
शशि जोन संयुत जानिये ॥ १२६ ॥ चौपाई ॥ मुनि जन मन सज्जन
गुण जेते॥सुकृतपुण्य शुचि सत्व समेते॥ सुधासार चंदन घनसार॥इनसों
मनौ कन्यो श्रृंगार ॥ १२७ ॥ चक्र कमल कर चिह्वनि धेरै ॥ महापुरु-
षकी शोभा भरै ॥ नीलकंठ पीवत विष याको ॥ सागर मंथन समय
सुताको ॥ १२८ ॥ सोरठा ॥ तेहि तडाग तट ओर, अद्भुत देख्यो
स्वर्ण तन ॥ कलहंसन शिरमौर, मोहि गयो भूपाल तव ॥ १२५ ॥ चों
च चरण युग लाल, अंकुर दल द्वौ रागके।। नवल प्रगलभावाल ॥ तिन
तिनके अनुरूप जनु ॥ १३० ॥ लक्ष्मीधर ॥ देखि ता रूपको भूप
मोह्यो महा। देहमें मैनकी पीर रोकी हहा॥ आजुलों में न ऐसो विलोके
उँकहूं॥देवके लोक कोहै यहै सांचहूं॥१३१॥दोहा॥ चलत देव इच्छा ग्र
बल, जितै तितै समुहाइ॥ दौरत सुर नर नाग मुनि, ज्योति नगन बसवाइ
॥ १३२ ॥ निशिपाल ॥ एकु धरि पाइँ इकु पॉइ उरमें लयो॥ बीच
फिरितोकि शिर टाकि छदसों दयो ॥ तीर सर आइ अरसाइ खगुसो
दयो ॥ दूरि टुकलाइ नल भूमिपति जोइयो ॥ १३३ ॥ दोहा ॥
निज मुख छबि जीत्यो नयो, मनौ स्वर्ण जलजात । किधी वरुण जलराज
को, हाटक छत्र सोहात ॥ १३४ ॥ प्रद्धटिका । उतरचो तुरंत हयते
नृपाल ॥ पग दिपति जरी जूता रसाल ॥ वनके प्रबाल सह अंबुजात ॥
जनु युद्धकाज सन्नद्ध गात ॥ १३५ ।। छलसों स्वरूप बावन बनाइ ॥
दुरि चलत हरे नहिं बजति पाँइ ॥ पहुँच्यो समीप जब भूमिपाल ॥
करपि झपटि पकरयो मराल ॥ १३६ ॥ तब तरफराइ फरकै अतूल॥
उठि चल्यो चहतु नहिं चलतु मूल ॥ तब कंठ फारि बोल्यो अराल ।
कर काटत चोचनि सों मराल ॥ १३७ ॥ भ्रमरावली ॥ तवहीं भह-
राइ भजे खग सरसों॥ बहु सोरनि साजत हैं मिलिके डरसोंलगिमारुत
चंचल पंकज सुंदर सों ॥ सर मानहु भूपतिको बरजै करसॉ ॥१३८॥

१९ दोहा ॥ जाको पति निरद्वैतही, वास योग नहिं भूमि ॥ कोसि मानहु चले, गगन विहंगम घूमि ॥ १३९ ॥ चौपाई॥ निरखि भूप बोल्यो हँसि यही ॥ हाटक हंस अनूपमसही ॥ तब बोल्यो धरि धीर मराल ॥ उक्ति अनूपम वैन कराल ॥ १४० ॥ अ०॥ कौन चाल भूपाल तिहारी ॥ निरखि गह्यो हाटक छदधारी ॥ कनक रत्न धनभार तिहारे ॥ सागर सीक रहोत सुखारे ॥ १४१ ॥ मेरे वधे एकु वध पापु ॥ पुनि विश्वासघातको तापु ॥ तोहि देखि सज्जन ह्याँ आयो ॥ हौसोयो संताप सतायो ॥ १४२ ॥ जो कछु करयो पराक्रम बूझ्यो ॥ तो किनजाइ सु समर अरूझ्यो ॥ हमसे अबल वधेको नामु ॥ सब संसार हँसै कहि बामु ॥ १४३ ॥ फलदल वृत्ति मूल वन फरै ॥ स्तुति निंदा सम चित धरै ॥ मुनि समान खग तिनहि सतावत ॥ पति कहाइ पुहुमीह लजावत ॥ १४४ ॥ दोहा ॥ कहि कहि ऐसे वचन तब, चकित किये भूपाल ॥ करुणारस में सरस वर, बोल्यो हेममराल ॥ १४५ ॥ सवैया ।। होही भयो वि- रधापनमें इक बालक सों जननी अति जीरन ॥ हैं अबही चिकुला जनमे वरटा तनमें छिनु धारत धीरन ॥ हौं प्रतिपालक हौं तिनको नहिं आजु अहार मिल्यो अरु नीरन ॥ मेरी भई यह आनि दशा निघरे विधि तोहि अरे यह पीरन ॥ १४६ ॥ चौपाई ॥ पुनि पुनि निजतरुणी सुधिकरै ॥ कहै वयन करुणारस भरै ॥ चिकुलनको कैकै पछितायो ॥ नयन {दि परवाह वहायो॥१४७ ॥ नायकाप्रति-सवै- या।मैं फरमायसिकीने मृणाल सुलावतु है मगमें अरि हैगी ।। बूझहिंगी पुनि साथिनसों निज नयनननीर नदी भरि हैगी।उत्तरही कि अचान कमेस सवाइके धीर नहीं धरिहैगी ॥वे जब देइँगे रोय महा तो इहा मृगनयनी कहा करिहैगी ॥ १४८ ॥ कबित्त ॥ यहि शोकसों प्राण तजैगी बरंगनि तौ निहचै पतिको व्रतुपारै ॥ नहिं नयननते कबहूं छिन ओट भई मिलि जोट विहार विहारै ।। आजु लग्यो इकवारही आनि बड़ो दुखदानि सुभाग्य हमारे ॥ तौ मारेहूं पर मारे उदै मरिहैं चिकुला लफिकै सब बारे ॥ १४९ ॥ दोहा ॥ बड़े मनोरथसों लहे, पूजि पूजि ब्रजनाथ ॥

नैषधकाव्य ।
ते चिकुला हैहैं दई, कैसे आज अनाथ ॥ १५० ॥ चम्पकमाला ॥
ज्यों करुणाको वैन सुनायो । भूपतिके जीमें दुखछायो ॥ छोडि दियो
ताको कहि ऐसो ॥ देखिलियो तेरो तनु जैसो ॥ १५१ ॥ दोहा ॥
जाइ मिल्यो निज गोतमें, आनंदरव सरसाइ ॥ घेरि लियो चहुँ ओरते
सब हसन मिलि आइ ॥ १५२ ॥
इति श्री मत्प्रचंडदोर्दड प्रतापमार्तड भूमंडलाखंडल
श्रीखाँसाहब अलीअकबरखांप्रोत्साहित गुमान मिश्रवि-
रचिते काव्यकलानिधौ हंसग्रहणोनाम द्वितीयस्सर्गः ॥२॥
दोहा ॥ सर्ग तीसरेमें कथा, हेमहंसको गवनु ॥ वर्णन देश विद-
भको, कुंडिनपुर नृप भवनु ॥ १ ॥ सोरठा ॥ पाइ मुक्ति द्विजराज, प्रभु
पुरुषोत्तमसों सुगति॥ लह्यो ब्रह्म सुखसाज, बनत न वर्णत वचनसों ॥२॥
दोहा ॥ पांख हलाइ फुलाइ तन, चोंचुनिचुनि सुख ज्वाइ ॥ गयो दौरि
उगड़े नीडको, मिल्यो सबनि सुखपाइ ॥ ३ ॥ परयो पाँइ तब माइके
करवायउ आहार ॥ पुनि निज तरुणीसों मिल्यो, बाटेउ विविध
विहार ॥ ४ ॥ चिकुलनिकी सब खबरि लै, समाधान करि माइ ॥
डि आयो पुनि ताल तट, मिल्यो हंस समुदाइ ॥५॥ प्रद्धटिका॥ बहु
सै बल क्षमताको निधान ॥ युत रुद्र अक्ष मधुकर निधान || जनु कमल
जानि उड़िक मराल ॥ बैठ्यो भुवालके कर रसाल ॥ ६ ॥ विश्वास पाइ
पहिलो निदान ॥ मनमुदित हंस बैव्यौ सुजान ॥ बोल्यो पियूष समचारु
वैन ॥ मनुकान लग्यो नृपको सुऐन ॥ ७॥ हंसदोधक ॥ राजन
काज शिकार बनायो । खेलनि में नहिं दोष बतायो । भूपति जो तुममो
कहँ छाँडेउ ॥ तौ निज धर्म दया पर माड़ेउ ॥ ८॥ जे अपने कुल-
दीन निहारें ॥ ते निजकाज अहार विचारें ।। मीननकी यह रीति बखानी
मारत होत न दोष निसानी ॥९॥ जापर जे निज बासु सँवारै । तात
रुपै मल मूत पखारै ।। ते खग खेल अखेटक मारै ।। राजनिको नहिं
दोष विचारै ॥ १० ॥ जे तिनुकान च विन दोसे ॥ आपुर, तिन
संग भरोसे ॥ वेझत, नृपते मृग ऐसे ॥ लागत पाप तिन्हें न अनैसे॥११॥

नैषधकाव्य । २१ में तुमसों कटु बोलान बोल्यो । सो अपराध चहाँ अब छोल्यो। चाहत हौं कछु काज सँवारयो । जो हिय आपने होइ विचारचो॥ १२ ॥ आ- पनते शुभ आवत जाने ॥ तौ न अनादर देत. सयाने ॥ जो विधि देत कछू फल जीसो ॥ तौ जगजीवहिके करही सो ॥ १३ ॥ हो प्रभु हौं बलहीन पखेरू ॥ हौ तुम राजन माँह सुमेरू ॥ अंतर आपुसमें अवगाहौ।। पै उपकार करयो कछु चाहौ ॥ १४ ॥ जो उपकार करै जग माँही ॥ तौ बदलो सजिये निज याही ॥ आपुनके बलके अनु- सारै ।। नाहिन घाटि न बाढ़ि विचारै ॥ १५ ॥ भप सुना विनती ब- हुतेरी ॥ यद्यपि मूरुख है मति मेरी ॥ ज्यों शुकवैन स्वहावन जानौ ॥ त्यौं यह बात करौ परमानौ ॥ १६ ॥ देश विदर्भ सुवेद बखान्यो । सुन्दरता मणि आकर मान्यो ॥ है रमणीय रमा परभासों ॥ सुन्दर सौध सुधा वसुधासों ॥ १७ ॥ मयन मनौ निज लोक बसायो । भूप शृंगारको देश सुहायो ॥ पद्मिनि जाति जहाँ सब नारी ॥ मानहु बैठि विरंचि सँवारी ॥ १८ ॥ दोहा॥ जहँ दुर्वासा तप करयो, कंटक लाग्यो पाँइ ॥ शापदियो ता देशते, डारयो दर्भ नशाइ ॥ १९ ॥ सुखसों विहरत वननमें, विद्याधर सुर सिद्ध ॥ तबते त्रिभुवनमें भयो, देश विदर्भ प्रसिद्ध ॥ २० ॥ तोटक ॥ जगतीपति भीम तबै तेहिको ॥ अरि काँपतनाम सुने जेहिको ॥ जिन षोडशदान अनेक दिये ॥ बार महा हयमेध किये ॥ २१ ॥ रणजीति शिरी बहु वार वरी ॥ सँगकी- रति नौल सखी सुथरी ॥ भुजदंडनसों जिन दैत्यहने ॥ पठये उपहार शची सघने ॥ २२ ॥ कुल भोज सरोजनको रविहै ॥ लखतै तमजात महादवि है॥ सत मारगसों विचलावत है।। द्विज चक्रनि चैन बढावतुहै२३ दोहा॥ वीति गयो बहुकाल कछु,भयो न ताके बाल। जऊ सुचित सब दुखनिसों, दुचित भयो भूपाल ॥ २४ ॥ पटरानीसों कैमतो, लैपरिजन कछुसाथ, आश्रम गयो नरेश तब, जहाँ दमन मुनिनाथ ||२५ ॥ प्रमि- ताक्षरा ॥ जहँ वेद घोष नितपाप हरैं। शुक सारिकानि मुख ब्रह्मर ॥ बक हंस सारसनि वाद परै ॥ मत द्वैत भेद निर्वेद करें ॥ २६ ॥ सवैया ॥ बाघ बछानिको गाइ जियावत बाघिनिपै सुरभी सुत चोषै ।।

नैषधकाव्य । न्योरनिको सहरावत सांप अहारानि दै वेडहै प्रतिपोखे ॥ व्याधिकथा नहिं मैं सुनिये अपलोक सबै जल कुंडनि बोग्वै ॥ नयननिराग भई पिकके अरु विग्रह वैन शरीरके घोखै ॥ २७ ॥ बंधन है मनहीको जहीं अरु संयममें यमको यमुना है ॥ दैत्यकथा अघकी सुनिये जहां सीग्रह- सों अलि राखतु कामुहै।। ढेर विभूतिनके चहुँ और रजोगुणयो अभिराम विराम है। आश्रम देखि मुनेश्वरको अति पावन पुण्य कन्यो परणामु है२८ चौपाई ।। कहूं बिछे सोहत मृगछाला ॥ कहुं गूंदति मुनि अच्छनि माला ॥ कहूं मूल फल दल मिलि कूटत ॥ कहुँ कहुँ पके निवारनि जूट- त ॥ २९ ॥ सुकुमारी तन मुनि जन नारी ॥ घट भरि भरि सींचततरु वारी ॥ थकी जानि मारुत गतिमंद ॥ परसि परसि तनु करत अनंद ॥ ३० ॥ वल्कल चीर चुनै दिन मदे ॥ कोउ फूलनिले अलकनि गूदे ॥ भूषण तन फूलनिके करै।। देखतही मुनिजन मनहरै ॥३१॥ श्रुति नाघत तिनहीके नयन ।। चिकुरै वक्रगतिनके ऐन । खेलत मुनि कुमार छविछाया ॥ मानहुससत्यलोकते आया ।। ३२ ॥ मुनिजन निज संयम जप साधै ॥ धरि धरि ध्यान ब्रह्म आराधै ॥ चम चमात रुचिके तनजाल ॥ बनत न देखत रूप विसाल ॥३३।। घनाक्षरी ॥ बलकली धरै तबरत अनेक भरै जनपद गहत लहत मंत्र मतहें ॥ येसे बलतपै परलोकनते अरियाते कोसनि अचलतैते केबरो लगत हैं । सुवसनभामै साधैपौन नय तन आनि अदभुत मुकुतौ करनको सजतहैं।। दंड विगहत हैं सबन एक मंडललै राजशी रहित राजै तापसी जगत हैं ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ एक एकते सरस सब, तप पवित्र अवतार । तिनमें राजत दमनमुनि, जनु जगको करतार ॥ ३५॥ हरिगीतिका । शिरते छुटी छिटकी जटा मृदुवेलि ज्यों शुचि शीलकी ।। जनु शृंगशैल सुमेरुते बहु धार गंगसलीलकी || तिरपुंड राजत भालपै शुभभस्मको रचिकै कियो । जनु हेमकी नव पट्टिका तिहुँ देवका आसन दियो ॥ ३६ ॥ चहुँ ओरते लपटी छटा छवितेज पुंज समानसों ॥ जनु सूर मण्डल में लसै तडितानके शुभ साजसों ॥ असरापकी रसनावली समरेष भूयुग पाँति है । गुणतीनि तीनिहु देव तिहु मनु काललोचन काँति है ॥३७॥ वि- षधकाव्य । ज्जूहा ॥ पुण्यके पालहैं ॥ दीनके घालहैं ॥सीयके हेतहैं ॥ नयन- सों भेतहैं ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ पुण्यनिके जल घोरिघने धनसार मिले मृगमेह दहावत ॥ कंजनिके किधौं पुंजलिसों नखते शिख अंगसबै सियरावत ॥ बोरत स्वादु सुधारसमें बसुधा महँ सो द्विज धन्य कहावत । जापर नेक दया ग आवत तातनके त्रयताय नशावत।। ३९॥ सुलक्षण ॥ अति ललित लंबित कानहैं ।। जहँ सुनत मन्त्र विधान हैं। चहुँ श्रुतिन जनु युग तनुधरे । मुनि मुखहि सेवतु हैं खरे॥४०॥ शुभ वंश उन्नत नासिका ॥ तपकी ध्वजा द्युति हाँसिका। जहँ छुटत पवन सुहा सुहै ॥ तिल फूल के तन त्रामु है ॥४१॥दोहा॥ इडा पिंगला सुषुमणा नारिनको रंग भौनु । पूरक कुंभक रेचकनि, मिलि रमती रसरौनु।। ४२॥ लीलाछंद ॥ कमल सों मुसुक्यात आनन पूरि दंत मयूष ।। स्वच्छता हियकी मनौ प्रगटी पवित्र मयूष ।। स्वर्णको उपवीत राजित कंध लंधित बाम है । सकल इंद्रिय जनु सुचंचल रोकिबेकी दाम है ॥४३॥ दृढ़पद। बाहु बंध कर मूलमें आछावलिराजै ॥ लपटे फणि श्रीखंडकी लतिका जनि राजै ॥ कुंड जुरच्यौ सुहोमको जनु नाभि सोहाई ॥ रोमावली मिसि धूमकी रेखा चलि आई॥ ४४ ॥ धोती सोहत श्वेत है जनु जोन्ह सोहाई ॥ मनहु जरा दुगुनी करी तनुकी छबि छाई ॥ कधौं कटि लो- न्हात हैं गंगाजल ठाढ़े ॥ किधों चरण नख अंसुके पटसों द्युति ठाढे ॥४५॥ दोहा ॥ सकल भूप शिर मुकुट मणि, मिलत ओप सर सात ।। चरण कमल मुकुतावली, लसत नखनकी पाँत ॥ ४६ ॥ घनाक्षरी ॥ विकसत सुंदर अशोकतर वेदिकापै मृदुल सु दर्भ नयो आसनु सँवारयो है ।। तापर विराजत दमन ऋषिराज आस पास ऋषि- राजनको मंडल सुधारयो है ॥ सनक सनंदनसे विदित परम तत्त्व नरम कठोर वैनयाके विववारयो है ॥ देखतही मुनिनको जन्म फल लह्यो भूप उमझो उदधि उर आनंद में पारयो है ॥ ४७ ॥ दोहा ॥ फटिक माल कोपीन पट, दंड कमंडलु चारु ॥ आनि सत्वगुणको बस्यो, सुख- पावत परिवारु ॥ ४८ ॥ अति दुर्बलतनहूँ बढ्यो, झलक पुंज परकाश ॥ सेवन हित जनु ब्रतिनि मिलि, करचो शरीर निवास ॥४९॥ त्रिभंगी॥

नैषधकाव्य । न्मुख तब आयो क्षिति शिरनायो टेरिसुनायो करजोरे मुनि भूपति जान्यो उठि सनमान्यो गुणनि बखान्यो मनु भोरे ॥ सादर उरलायो आ- सन लायो बैठायो सुखमानि सही॥ हँसि पुनि बूझी प्रेम अरूझी तपबल लूझी कुशल सही ॥ ५० ॥ दोहा ॥ न्हान उपासन के सकल, वंदि यज्ञ थलबास ॥ कंद मूल फल सरसदै, भोजनके सविलास ॥ ५१ ॥ आगम कारण भूप तब, मुनिसों कह्यो सुनाइ ॥ मुनिवर दई उपासना, परम दयालु दयाइ ॥५२॥ प्रद्धटिका ॥ तब विष्णुभक्ति दीन्ही दयाल ॥ तुम नारिसंग लेवौ भुआल ॥ सब होत तुरत अभिलाष सिद्ध ॥ यह विष्णुभक्ति देवन प्रसिद्ध ॥५३ ॥ गहि पाँइ चल्यो घरको नरेश ॥ ह्यां आइ कन्यो व्रतको विशेष ॥ तब प्रगट भये भय भूरिहारि ॥ वरदयो दुईको मन विचारि ॥ ५४ ॥ नृप धन्यो पुत्र मनमें सुधारि ॥ रानी सुलई कन्या विचारि ॥ ता गर्भ युगल जन म्योस्वरूप ॥ यक तनय चारु तनया अनूप ॥ ५५ ॥ दम कन्यो नाम दमघोष आनु ॥ सुंदरु वोदारु बलको निधानु ॥ दल मल्यो रूप तिहुं लोक वाम ॥ दमयंति कन्यो तनया सुनाम ।। ५६ ॥ तेहि सरि न और तिय तीनिलोक ।। मैंदोख फियो सब ओक ओक । अब है कुमारि वयमननवीन ॥ कछु वर्णत ताकी छवि प्रवीन ॥ ५७ ॥ तारक ॥ वह सांचेहु रूपवती लक्ष्मी है ।। गुणसिंधु धराधिपते न नमी है । सब लोगन चारु कथा चरचाकी ॥ जिमि मेघ छपी छवि चन्द्रकलाकी ॥५८||अ०॥ तिन केशनिकी समता कत पावै ॥ केतिकौ किन चामर चित्त चलावै ॥ शिर राखत दंछ सनेह भरे हैं ॥ पशु जीवनि पीठिन दै निदरेहे ॥५९॥ दोहा ॥ नयन मृगनको बागुरा, मन मीननको जाल ॥ काम अहेरी केलसै, चाबुक नील बिसाल ॥ ६० ॥ हारे हरिनीके नयन, लगे पलक मुरझाइ ॥ समाधान तिनको करत, मनौ खुरन खुज्वाइ ॥६१॥ पड़ता। ताके दोनों कुल गनिये ॥ औ दोनो लोचन मनिये ॥ जोते नारी गुण गनियौ ॥ सो हैं लागे श्रुति सुनियौ ॥ ६२ ॥ सोरठा ॥ नलिन मलिन है जात, हरिन होत छबिहीन तब ॥ खंजन गंजन गात, अञ्जन रञ्जन मंजुछबि ॥ ६३ ॥ बिंब ॥ फल अधर बिंबजासो ॥

कहि अधर नामतासों ॥ लहत शुति कौन मूंगा ।। वर्णि जग होत गूंगा ॥ ६४ ॥ रोला । दमयंतीके बदन काज शशिसों हरि लीन्हो । सुधा- सार नहँ चाहि विविधविधि परम प्रबीन्हो बहो भयो विल बीच झलकन- भ सॉवलताई ॥ हरिन कहत कोउ ताहि शशा कोउ भामे सोहाई ॥ ३५ ॥ मुख ॥ तामे कहा तिरछी हग कोर अंभोंह मिरोरनिकी चतुराई ।। गूद चुनीन कनी रमनीनसिमैन कहा अलकै छहराई ॥ ओढनिको सुक हा रसुमै जुकडयुत एक सुधाकी बडाई॥ वा मुखकी सर चाहत चंद्रमा क्योंन कलंक पलै बहुधाई ॥ ६६ ॥ कमल ॥ भ्रुकुटी कुटिल धनुष मानौ रति मनमथहित बनौ ॥ सकति सहित जगलसो सरधि तिलकसो शुभकसो ॥ ६७ ॥ नीलस्वरूपक ॥ रावरेके समहै बाह बालौ ॥ जीतति है युतिवंत जहाँलौ ॥ जो गिरि दुर्गनि माहँ बसैजू ॥ जाभुज चंदन डार त्रसैजू ॥ ६८ ॥ सवैया ॥ कंचुकी सूही कसे मोहरा अति फैलि चली तिगुनी परभासी ॥ माणिकके भुजबंद चुरी मणि कंचन कंकन वोप प्रकाशी॥ रावरे कंठकी माल मनौ निचुस्यो जनु रंगमिली मृदुतासी ॥ बाल अबाल मयंकमुखी की लसै भुजबाल प्रबाल लता- सी॥ ६९ ॥ दोधक ॥ कमल वसै जल कोटिन माही ॥ लेतशिरी करसों चितचाही ॥ मित्र प्रताप सहाइनि आनै ॥ पय तिहिसा सब होत डिरानै ॥ ७० ॥ दोहा ॥ रोम रेखदै बीचमें, बाँटिलयो निज अंग ॥ तऊ दबावत तरुणई, लरिकॉईको रंग ।। ७१ ॥ सुपथ ॥ जासु देह द्युति सागर माही॥ खेलिकोलि सजिके बहु धाहीं ॥ काम जीव नु दुऔ नृप आय || कुंभ स्वर्ण कुच गोल बनाय ॥ ७२ ॥ दोहा ॥ झरतप्रभा चहुँओर झर, झमझमात छविजाल ॥ रचत चक्र धरि कनक घट, मानौ काम कुलाल ॥ ७३ ॥ लालकंचुकी में लसत, कुच कंदुक नारंग ॥ फैली प्रभा तरंग जनु, अंग अनूप सुरंग ॥ ७४ ॥ सुमुख ॥ उदर मनोहर सुक्षमकै ॥ झलझलात सुखमा झलकै ॥ विधिकरि मूति सुमायनिको ॥ त्रिबलीप्रवली उपजीतनको ॥७५॥ कटि ॥ झीनीसिता ननि काननि में रसनावतसी रसना झननातै ॥ नाचत सी लहकै चलते मृदु सीखति सी विपरीतिकी वातै ॥ देखतही कटि लोचन जात गई नैषधकाव्य घटिकै कटि आडत यातै ॥ छाइरही छवि घाँघरो छानि पिछानि लही उलही छतियाते ॥ ७६ ॥ सोरठा ।। बिंब नितंब सडोर, छहरत छबि पट ऊपरहु॥रचे चक्र रथ जोर, जनु जगजीतन कामके॥७७॥ सुसमा रंभा तरुको जंघा निदरै ॥ रंभातरु नीकेही विदरै ॥ लज्जा करि हस्ती के ललना ॥ शुंडागहि धारहि कुंडलना ॥ ७८ ॥ सोरठा। गुंजन मणि मंजीर, चरण लसत मेंदूररंगाबोलत हंस अधीर, शरदभोर अंभोज जनु ॥ ७९ ॥ सरिता सरनि अन्हाइ, एक पांइ रविको विनय ॥ लही सुगात तब आइ, दमयंती पगढ कमल ॥ ८० ॥ सवैया ॥ छूटत वार न भारसहै लचके कटि औ भ्रुकुटी चढि आमै ॥ छूटी अ- भूषणकी किरणें जनु राजत दाभिनिके पिंजरामै ॥ लोचन कोरनसों तिरछे लखि टोननकी करवृत्ति बता ॥ सोकुशची रति रंभ हजारन खालन लच्छि लखी नहि भामै ॥ ८१ ॥ अमृतग- ति ॥ सरवर गाहत नितही ॥ चतुर रहो बहु तितही | तब देखी हग भरिकै ।। सफल सजीवन करिकै ॥ ८२ ॥ इन्द्रवज ॥ देखी जब वह राजरानी ॥ भूली सबै शुद्धि चलै न बानी ॥ येहो विधाता यह जो बनाई ॥ है है कहाँ या पति सुंदराई ॥ ८३ ॥ अन्य० ॥ देख्यो तुम्हें अद्भुत रूप शाली ॥ आई हमें शुद्धि वाहौ भुआली ॥ ता रूपके लायकु एकु तोही ॥ छोड़ेउ सबै संशय आजु मोही।।८४ ॥ दोहा ॥ दमयंतीको रोष रस. हँसी मान तुम योग ॥ नवल वधूतन पैदिपति लालमाल मणि भोग ॥८५।। गंगाधर ॥ भूपरूप नव सुन्दरतेरो॥ ता विहीन नहिं रोचतुहेरो ॥ यामिनिहींमिलि चंद्र विराजै ।। विज्जु संग घनकी छबि छाजै ॥ ८६ ॥ अ०॥ चित्तचारि सुरराज सराहै ॥ और देवगण वात कहाहै ॥ तो सँग योग जु सहज नहानो॥ मेघवोट शशिरेख प्रमानो ॥ ८७ ॥ प्रमाणिका ॥ समीप जाइ तासुके ।। कही सो यों प्रकाशिके ॥ तुम्हें धरै सुचित्तमें ॥ टरै न बात नित्तमें।। ८८ ॥ अ०॥ जो इंद्रमेटिहूचहै । नतौ मिटै सही रहै ।। यहै सुकाज में गन्यो । जो होइ आपहू मन्यो ।। ८९ ॥ दोहा॥ तुमसों बूझतुहौं वृथा, निजपौरुष परिमान || काजहि सों कहि देतहैं, जैहैं जगत सुजान ।। ९०॥ अमृत नैषधकाव्य २७ वचन द्विजराजके, पीवत भूप अघाइ॥ लई मनौ उदगार तिहि, मृदु वि- हँसनि मिसि आइ ॥ ९१ ॥ बना ॥ करकमलनपोंछो पच्छ अंगौछो बार बार मनुहारि करी। पीयूष निसानी यों मृदुवानी बोल्यो अंतर धीर धरी ।। ९२ ॥ नल ॥ कुंडलिया॥ तेरी आकृति की नहीं, उपमा या जगहंस ॥ वर्णत नहिं बाचा बनत, तेरो शील प्रशंस || तेरो शील प्रशंस अवतरची आइ आनिहरि ॥ किधों इसके नाम रहे रवितेज पुंजभरि ॥ जहँ जहँ शुभ आकार तहाँ शुभगुणकी ढेरी ॥ सामुद्रिकको उदाहरण पायो तनु तेरी ॥ ९३ ॥ सुलक्षण।। तनु है न इक सुवरण मई ॥ तुअ वचनाति तैसी भई ॥ नहिं पच्छपात शरीरसों। तू करति है परपीरसाँ ॥ ९४ ॥ मदलेखा ॥ में संतापित देही ॥ तैं पायो नव- नेही ॥ जैसे मारुत लागे || अंभो बिंदुनि पागे ॥ ९५ ॥ अ० ॥ द्रव्यै और बखानै ॥ ताहीको निधि जानै ॥ साधूको सतसंगा ॥ साधूको नि- धिरंगा ॥ ९६ ॥ सवैया।। बार हजार सुनी हम हूँ वह मोहनी मूरति जीवन ऐसी ॥ पै अब तेरे कहे निजकै पुनि देखतिहौं निज नयनन जैसी ॥ मित्रनिकी निज हीयकी आँखिन देखति दूरि भली याँ अनैसी ॥ तीरह सूक्षमको नलखै इन आँखिनते मुख माहँ लसैसी ॥ ९७ ।। दोहा॥ चर्चा ताके रूपकी, निपटि परी मम कानु ॥ अनि ऋचा जनु प्रज्वलित, जासो काम कृशानु ॥ ९८॥ यम युवती दिशिते चल्यो अहि फुकार विषघोरि॥ लगै पवन विरहागि जाग, तन ईंधन गन जोरि॥ ९९ ॥ कमल ॥ दरश मिलत रबिसाँ॥ तपति गहत छविसाँ॥ पर- सि परसि हमको ॥ शशि बढ़वत तमको ॥ १००॥ तोटक ॥ रति नायक केसर फूल बजे ॥ विषकी लतिका नित नव उपजे ॥ उर लागत मोहत है मनको ॥ अति तापित आनि करै तनको ॥ १०१ ॥ चामर ।। हौं वियोग सिंधुमें अथाह बूड़िकै रह्यो । भाग्यसों लह्यो तुही जहाजबाँ- हसों गह्यो।तोहिं प्रेरणा करौं जो पिष्टको सुपीसनो। आपुही सुजानि जाहि ज्ञान जोथुरौ घनो ॥ १०२॥दोहा॥तो मगमें सब सुभग सुख, तुरित मि लन पुनि सोहि ॥ सिद्धि करौ अभिमत लहौ, समय सुमिरियो मोहि ॥१०३॥ विदा कियो नृप हंस तब, नृपकीरति ध्वज वंश ॥ वचि नैषधकाव्य । बगीचाके महल, दाखिल भयो प्रशंस ॥ १०४ ॥ सोरठा ॥ सुफल करों दिन आज, लखि दमयंतीको वदन ॥ उड़यो हंस शिरताज, महि मंडल कुंडिननगर ॥ १७५ ॥ सवैया ॥ हाटक हंस चल्यो उडिके नभमें दुगुनी तनु ज्योति भई ॥ लीकसों ऐंचि गयो छिनमें छहराइरही छवि सोनमई ॥ नयननसों निरख्यो न बनाइ कै कै उपमा मन माह लई । साँवल चीर मनौ पसरयो तेहि पै कल कंचन वेलि नई ॥१०६॥ मोदक ॥ दीठि परयो प्रथमै मग सोहन ॥ नीर भरचा कलला मन मोहन ॥ ता कहँ कारज सिद्धि बतावत ॥ भागनसों समुंहे लखि पावत ॥ १०७ ॥ दोहा॥भयो पक्ष झंकार स्व, झमाके चल्यो खगराज ॥ लसिलसि नीचे खग लखत, ऊपर जान्यो बाज ॥१०८॥ मगमे लखि वन बाग नग,खग विलंब नहिं कीन ॥ जाको मन जासों लग्यो, तासों रुकत प्रवीन ॥ १०९ ॥ पहुँचो देश विदर्भमें, हेमहंस समुहाइ ॥ रजधानी नृप भीमकी, नगिचानी तब आइ ॥ ११० मोहि रह्यो द्युति देखिकै, कुंडिनपुर पुर राज ॥ वचन रचनखों चतुर वर, वर्णत शोभ समाज ॥ १११ ॥ उल्लल ॥ गृह फटिक रचे शशिखण्ड सम फैलि रही छबि शित सरस ॥ निज कंत संग क्षिति युवति जनु करत मुदित चितहाँसरस ॥ ११२ ॥ तारक ॥ मणि लालनसों रंग भान बनायो विच वीचहि नीलम गेह सोहायो॥ रविके चित नेह मनो अधिकायो॥ निज लोकहिमें सुत लोक वसायो । ११३ ॥ लँगडी ॥ सांज आले अबजमें, तेहि प्रकाश चहुँ ओर ॥ सब तिथि निशिमें, अतिथि सी राकी कन्यो प्रकाश ॥ ११४ ॥ वसंततिलक ॥ न्हाती जहाँ सुनयना नित बावलीमें ॥ छूटे उरोज तल कुंकुमनीरहीमें ॥ श्रीखंड चित्त दृग अंजन संग साजै ॥ मानौ त्रिवेनी घरही वि- राजै ॥ १.१५ ॥ तोमर ॥ चहुँ ओर कंचन कोत ॥ रचि योग पट्ट अंगोत ॥ छिन एक नीर बहोत || लखि भौन जागत जोत ॥ १६॥ अ० ॥ सब ओर खांइ तेहि मांह ॥ प्रतिबिंबकी छवि छांह ॥ जनु आइ लोकं अकासु ॥ सुखु जानि मानि सुपासु ॥ ११७ ॥ दोहा॥ तुंग पताका पटल गत, चाबुक चलत सुगाम ॥ रवि रथके बाजी जहाँ, नैषधकाव्य । अरुण लहत विश्राम ॥ ११८ ॥ लक्ष्मीधर ॥ तीनिहू लोकके वास वासी जिते ॥ दीठि आमैं भले काज साजै तिते ॥ देहधारी मनौ विश्व- रूपी यहै ॥ वेदगाई बड़ाई बडी जो लहै ॥ १-१९ ॥ चौपाई ॥ मुड- वारी रवि मणिन सँवारी ॥ अनल झार छूटी छविवारी ॥ दिनमें अति अद्भुत गति रहै ॥ बाणासुर पुर शोभागहै ॥ १२० ॥ अ० ॥ शंख शुक्ति मुक्तामणिभरे ॥ अम्बुज रंग चीर बहु धरे ॥ सागरसों जहँ लसत बजार ॥ मुनि सोख्यो सब सलिल अपार ॥ १२१ ॥ सवैया ॥ शशिकी मणि उच्च अगार पगारनि चन्द्राहि छू श्रवती जल धारै ॥ पूर प्रवाहनसों सुरसिंधु बड़ी उमड़ी तरुतोरि किनारै ॥ सागर इंदु उदोत बढे यह मानि मनौ पतिके अनुसारै ॥ धन्यतिहूँपुर वे रमणी तजि जे ऋतु आन पतिव्रत पारै ॥ १२२ ॥ चुलिआल ॥ अस्तसमय सूरय तजत निजरुचि पुंज सुरंग सुहावन ॥ केसरिके बाजारमे रहत इक अंग रुचिर तन ॥१२३॥ सरसी ॥ गुंजत भौंर मिल्यों केसरिमें तोलत सहज सुभाई॥ जहँ बजार जनसोर संग गाहक है शुद्धि भुलाई ॥ दिनमणि मणि गसि गली सँवारी तपत दिवस सरसाई ॥ ता मारग सब शिशिर शीतमें चलत भले सुख पाई ॥ १२४ ॥ अहीर ॥ मुख लोचन करि पाइ । कमलन रचे बनाइ ॥ चम्पकके दल अंग ॥ दमयंती तनरंग ॥ १२५ ॥ अ० ॥ स्मर अरचाकी हित माल ॥ ताको कहत विसाल ॥ तेरे कंठ सुयोग | देत सकल रस भोग ॥ १२६॥ दोहा ॥ शिखर नील मणि कीर्तिमिलि, श्यामध्वजा पट ज्योति ॥ दिन- करकी गोदी चपल, जहँ यमुनासी होति ॥ १२७|| मनहरण ॥ आपने महल रंग अटासों विलोकि वाम तडित छटासी करयो चहै अभिसारको नीचे नीचे चलत विपुल जलधर देखि तापे चढ़ि चलिगहे पीतमके प्यारको॥ गतिकी तरलतासों नयन न लगत पल झल मल होत रूप विमल विहारको || सोहत शचीसी बैठी जलद विमान आसमान ते उतरि आई नगर उदारको ॥ १२८ ॥ अ० ॥ केलिके महल दमयंतीके शिखर वर मर्कत किरण छूटी ऊपरको छरीसी॥ लागी ब्रह्मांड खण्ड खण्ड कैन डारयो याते नीचेकै वदन फिरी मानौ लाज भरीसी ॥ ऊ- ३० नैषधकाव्य । रध मुखी वै चरतहै सुर सुर भाँति सुनिके बदन परी झावै धुति हरी- सी ॥ पुण्यको वगर धन्य कुंडिननगर जग जगर मगर कीर्ति जाकी सोन जरीसी ॥ १२९ ॥ दोहा ॥ विधु रतननि कर हॉरचे, रजनि नीर भरि होत ॥ विफल सीचनो लखि रच्यो, भैमी बाग उदोत॥१३०॥ मालिनी ॥ उपवन विच देखी राजपुत्री विराजै ॥ सरिस वय सहेली वै चहूँ ओर छाजै ॥ दिपत नखत माला मध्य ज्यों चन्द्ररेषा॥ ललित सुर मृगाक्षी लक्षिज्यों चारु वेषा १३१॥दोहा।। इंद्रा नी निज सखिन सँग, नंदनबनमें आइ ॥ क्रीडति हें ऐसही, ऐस यही दरशाइ ॥ १३२ ॥ बैठक हित थल लखनको, कनक पंख फहराइ ॥ प्रभाचक्र भूपर लसत, ऊपरही मड़राइ ॥ १३३ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड पंडित भूमंडला खंडल श्री खाँसाहब अली अकबर प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचित्ते काव्यकलानिधौ हंस गमनं नाम तृतीयस्सर्गः ॥ ३ ॥ दोहा-चौथे सर्ग मराल औ, दमयंती संवाद ॥ आगमढिग निषधेशके, मेव्यो विरह विषाद ॥१॥ सोरठा || बाजू दुऔ समेटि, नभते उतरयो जूठसो ॥ दमयंती ढिग भेटि, बैव्यो पाँख हलाइ क्षिति ॥ २ ॥ भयो अचानक सोर, लगत जोरसों पंखक्षिति, फिरि चितई ओहि ओर, कहा कहा यह कहतही ॥३॥ दोहा।। दमयंतीकी सहचरी, छोडि विषय रस ओर ॥ देखिरही तारूपको, मुनि ज्यों हरि सब ठौर ॥ ४॥ चंचला।। हंस देखिकै अनूप आपके शरीरतीर ॥ लेनकाज तासुके यहौ भई अकं- पधीर ॥ ज्यों मुनीश चित्त चारु लै समाधि साधि आनि॥ हंसके मिला- पको हलै चलै न ध्यान मानि ॥ ५ ॥ पृथ्वीछंद ॥ विलोकि दमयं- तीको गहन घात आकारसों ॥ उड्यो न नभको तबै कनकहंस संचारसों हरेहरष हेत साँ कर चलाइलायो चहै।। तबै फरकि फूलसो तनिक जाइ आगे रहै ॥ ६॥ त्रिभंगी ॥ ज्यों ज्यों सँगधावै गहन न पावे झपटि नैषधकाव्य । चलावै हाथ जही।। आली दै ताले कुहँकि रसालै सरस उताले हँस तही॥ ॥ दम०॥ चहती उचटायो सोरु मचायो सब मिलि यासों बीच हरै ॥ पीछे जनि आयो तेज न गायो कहा खिझावो जाहु घरै।। ७ || दोहा ॥ कपट कोपसों सखिनको, विदाकरी सुकुमारि ॥ छायासी पाछे लगी हाटक हंस निहारि ॥ ८॥ स्वागत ॥ एक एक पगपै यह जान ।। हंस हाथगत होत सुजाने ॥ दूरि दूरि छलसों यहु धायो ॥ अंधकार कुंजनलै आयो ॥ ९ ॥ संग आइ पहुँची न सहेली ॥ देखि राजतनयाहि अकेली ॥ अंगमाह जलबिंदु विराजै ॥ फूल लोल लतिका जनु छाजै ॥१०॥ अ०॥ वैन चारु नर लौ तब बोल्यो । ज्यों पियूषरसको मग खोल्यो | राजपुत्रि जनि दौरो ऐसो ॥ पाइ कमलपखुरी नवजैसो ॥ ११ ॥ अ०॥ येसरोज मुखि यौवन देखे ॥ क्यों न डरै हिये कौन विशेषे ॥ पात कंप करसों तरु जेते । तोहिं बार राखत जनु तेते ॥ १२ ॥ दूतविलंबित ॥ चलति तू गजगामिनि भूमिमै ॥ धरणि औ नभ आवत धूमिमै ॥ गहन चहति मोहिं कहा करमें फसै ।। अहहबालपनो अजहूं लसै ॥ १३ ॥ कमल आसन वाहन हंस है। स्वर्गलोक निवास प्रशंस है ॥ चरत हाटक कंज मृणालहै ॥ धरतदे ह सुवरण विशाल है ॥ १४ ॥ प्लवंग ॥ विधिको आयसुपाइ मराल विहारको ॥ नभतजि आये भूमि सरोवर चारको ॥ नल नृपलीला ताल न्हाइगे ओकमै ॥ कौतुकसो हो एक भ्रमतु भूलोकमै ॥ १५॥ दोहा॥ बाग तडागरु जगत, सों, देत देव फल भोग ॥ ज्यों तरुवर दोहद दिये, विना समय फल भोग ॥१६॥ प्रद्धाटिका ॥ हम देवलोकवासी मराल ॥ नहिं पकरत हमको फांसजाल ॥ नल एक मोहिं पकन्यो अनूप ॥ सुरलोक भोगके भाग रूप ॥ १७ ॥ जब करत केलि लीला विहार।। जिमि चलत चौर चहुंधा अपारा।तिमि करत जाइ हम पक्षवात।। सुरसिंधु सलिलसों शीतगात॥१८॥दोहा॥साधु विभक्ति विचारमें, प्रथमा व्यक्ति सुजासु ॥ सुऔ यसै मिलि शुभ समै, साधन क्षमा प्रकासु॥१९॥ उपद्रेबज॥दरिद्रदिवान बोरिडारै।।अमोघ वरषै सुनीर धारै । तासनको याचक हाथ ओड़े। कहूं पपीहा धन संग छोडै ॥२०॥ अन्यच॥ सुनी नैषधकाव्य । जु मोसों नलरूप वानी।। भई सुरंभा रसरंग सानी ।। सुन्यो जो ताको नल नाम जैहीं ॥ मिली सु येती नलकू बरैहीं ।। २१॥ मनहंस ।। हम भूमिते सुरलोकको पगु देतहैं ॥ नलकेलिके कलगानी सुनि लेत हैं । जब इंद्र किन्नर गीत गावत चोभके ।। हमको न भावत नकहू सुर ओजके ॥ २२ ॥ दोहा ॥ हाहाकरि निदरचो तबै, हम हरि गा- यन हेरि ॥ तबते ताको नाम जग, हाहा भाषत टेरि ॥ २३ ॥ घननंद ॥ नलके गुण अभिराम सुनत सकाम होत शची कंटकिततन।। लखत न बासव तास पुण्य प्रकाश प्रेमसलिल पूरित नयन ॥ २४ ॥ चितदै सुनत महेश वर्णत शेष नल के गुणगण मन हरन ॥ करि कंडू मिसि आन मूदत कान तब गिरिजापति व्रत धरन ॥ २५ ॥ विधि सजि धरम विधान सब परिमान रोकतवीमिहि मौन मिल || मिलि कंठ लगि तासु जग परकाशु जानतु ता जड़ वेदतिस ॥ २६ ॥ अ०॥ लक्ष्मी मिलि मुभाइ हिय अकुलाइ नृपति व्रतकी विरति ॥ समय करत नियाल निज परकाश गति अद्भुत अति तासु पति॥ २७ ॥ संवैया ॥ सो विधिको कर कूर कहावत पूरण चंद्र रच्यो द्युति हीनो ॥ जा नल को मुख देखि तज्यो शिवशीशपै आधिकसो परवीनो ॥ निज जीतन हार मुन्यो हमसो तबते अति इंदुरहे भय भीनो ॥ चलि सूरयसागर मोहिं छपै कतहूं धन पुंज परै नहिं चीनो ॥ २८ ॥ आपने वाहनको हरि आयसु देत यहै रसरंग मचावत ॥ आपने भीतनसों नलको मुखकीरति के गुणक्यों नर चावत।। ज्यों वरणो हम चोजु कछू मुदि नाभिसरोजगयो सकुचावत बूडि विरंचि गये उतआधु गहे उर माह रमा लल चावत२९॥ अ० ॥ नलको मुख कोलमें केसरिसे शुभवति सदा तनुके छवि छाजै ॥ रचि मानौ करी गुणकी गणना करतार सुकंचनरेष विराजै ॥ हीरनकी कल तलपै यहि भाँति न काँतिकी ज्योति समाजै॥ चौदह और अठारह भेदसों विघननकी पदवी सुखप्ताजै ॥ ३० ॥ सो० निरखि शिरीदै तास, काम पुरंदर तनकसे ॥ द्वै विधि क्षमा निवास, जिय न लगत अहि शेष जिन ॥३१॥ चंचरी ॥ पाँखसों इक हीन है बिनतातनूज प्रमान है । रूप देत नयनसों परिय समीर समान है ॥

नैषधकाव्य । देह दीप्ति दीपे महामणि मानिये गति रूपके॥ कौन दिशि जो न जातहैंजू अश्व नैषध देश के ॥ ३२ ॥ शत्रुके रमणीनकी हग अश्रुकी सरिता चली ॥ युद्ध भूमिनमें भई उत्पत्ति अननकी• भली ॥ बाण पत्रग जासुके फहरातहें जहँ दोसुसो ॥ वैरि प्राणन पौनसों छकि जात हैं निरजोसुसो ॥ ३३ ॥ शार्दूलविक्रीत ॥ तीनौलोकनिवासी जे जन घने ते जोगमै ज्ञातसो ॥ आयुर्दाय घटै नहीं सुनिनको जो बु. द्धिके मानसो ॥ बाडै आनि परईसों जुगननी क्यों हूँ वनै आइ कै ॥ तौ ताके गनकी चलौ सुगनना संसारमें गाइकै ॥ ३४ ॥ तारक ॥ तहँ पक्षिनको . नहिं रोवत द्वारे ॥ हम हम मंदिर भीतर जात सुवारे ॥ तिनकी रमणी गणको सिखरामै ॥ गतिके कछु मंजुल भेद बतामै ।। ३५ ।। तिन संग शृंगार कथा हम भा ॥ रतिरंभ शची मुखमा अभिलारे ॥ नवकाम अभिला. ॥ नवकाम प्रतीति धरोहरि धारी॥ यह जानि खरीदतहैं नवनारी ॥ ३६ ॥ दोधक ॥ देखतुहौं नलको मुख जौलौं । जीवनको फल जानतु तौलौं ॥ मोहि रही युवती रसभीनी ।। नयनन लाज विदाकरिदीनी ॥ ३७ ॥ सवैया ॥ कौलसे नयननसों विहँसै झमकै तनु भूषणकी परभासी ॥ विद्रुम रंग तरंगलसै अधरान मिली मुसक्यान सुधासी ॥ वैननिमें निज मोहनीके कछु आखरसे पढि आवतहासी ।। प्राणनवारि निहारि रहे सब मोहि रहे सब नागरिवासी ॥३८॥ तेरे लसै शिररांगित ओढनी ऐसिय वाकी लखी हम पागै ॥ जैसी बुटी तुव कंचुकी पै इमि पैंधतु है उरमें मृदुबाग ॥ ऐसि य रीझ सुभाव सबै रुचि ऐसोई वाहूको सोहतु बागै ॥ है समता अतिही उनते तुम क्यों न तिन्हैं सुनते अनुरागै ॥ ३९ ॥ तेहि राज्ञके योग रची हि तुही विधि ऐसी न और तिलोक सँवारी । कै रबिनी बिन को- न लसै शशिइंद्रलहै यह मैं निरधारी ॥ जो कबहूं नलसों न मिलौ फल- हीनतौ रूपकी राशि तिहारी ॥ भौंरनको मुख संगन तौ लगि नूतन तान वसंत श्रृंगारी ॥ ४० ॥ अ०॥ व्याह किधी नलही सों रच्यो विधिको चित पैठिके कौने निहारो ॥ व्याहके योग्य भई अबही अरु भूपर रूप अनूप तिहारो ॥ श्रीहरिको गिरिजा इरको रतिकाम कोयों ५ नैषधकाव्य । जिन योग सँवारी । योगसों योग मिलावनको · मति संचित हो तु वि- रोच विचारो ।। ४१ ॥ दोहा ॥ पंकज मुखे नलराज विन, और न योग लखाइ ॥ को गूंदत गुणदर्भसो, माल मालती पाइ ॥ ४२ ॥ जो जडता वश विधि तुम्हैं, नहिं मिलवै नलराज ॥ जग कलंक सागर तरन पावै कहा जहाज ॥४३॥ सर्वया ॥ नाहकही वकवाद बढ्यो सुकहा र- समों कह या चरचामें॥ राजकुमारि थकायो तुम्हें में सरोजसे पांइ कठोर धरामें।।सो अपराध अगाध गन्यो अब ताकहँ कैसेहु मेट न यामें॥जो कछ आपुनके मनमें अभिलाष कहौ तुरतै करि आमै ॥ ४४ ॥ सोरठा ॥ हेम हंस नरनाह, गह्यो मवन ये वचन कहि ॥ दमयंती मनमाह, अभि- प्राय जान्यो चहत ॥ ४५ ॥ सवैया ॥ लोचन ऐच लजाइ गई ति- रछी मुरिकै मुसक्याति छबीली ॥ राजकुमारि विचारि कछू मनबोलि उठी मृदुबात रसीली ॥ आपुनको धृगमानति हौ खगचापलता वश गरबीली ॥ तोहि उड़ाइ दियो तटते जिभि बात लगे लहरी झुकिझीली।। ४६ ॥ चर्चरी ॥ स्वच्छराजत रावरी तनु आरसी परभाइकै ॥ है लग्यो अपराध मोतन माँह यो सरसाइकै ॥ रावरे समुहे भई जब हों नहीं चि- तलाइकै ॥ सोपरयो प्रतिबिंब ता महँ पाप है नसुभाइकै ॥ ४७ ॥ मल्लिका ॥ पाप मैं करयो विचारि ॥ जानहीनहौ कुमारि ॥ सो क्षमा करौ मराल ॥ देव रूपसी विसाल ॥ ४८ ॥ सवैया ॥ तेरे स्वरूप सुधारस पानते प्रीति न ओर बड़ी जिय मेरे ॥ ज्योजगके सिय रावत लोचन चंद्र पियूष मयूषन हेरे ॥ जो जियते निकसै न मनोरथ सो न क ह्यो परबैन घनेरे ॥ कौन कुमारि कहै द्विजराज सों ब्याहकी बात नि- लाजके घेरे ॥ ४९ ॥ मालाधर ॥ वचन सुनिकै तहों कनक हंस मो- ह्योमहा ॥ सरस नहिं दाखयो पिक नवीन वाणी कहा ॥ बदनलचिला. जसों नृप कुमारि जानी जहीं ॥ मुदित मन द्वै तहीं चतुर चारु वाणी कही ॥ ५० ॥ हंस ॥ सोरठा ॥ अति दुर्लभ जगजानि, धरयो मनो- रथ तैं जो मन ॥ परत नमोश्रुति आनि, श्रुति अक्षर अंतिमवरण॥५१॥ जहँ चित पहुँचत आनि, होत लाभ ताको सुचित ॥ जहँ न चित्त पहि- चान, वही ब्रह्मयोगी लहत ॥ ५२ ॥ सवैया ॥ सुंदर सोन स-

नैषधकाव्य ।
रोजमुखी तिरजंच सों लाज सजै · विनकाजै ॥ ब्रह्मपुरी महँ
वास करैं शुचि सत्य विलासिनिके रस राजै ॥ प्रेम महा पर कै
उपकारमें नेमवहै छलकै बल भाजै ॥ जो चरचा चित माहँ धरै किन
प्राणटरै मुखसों नहिं साजै ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ मृगलोचनि तजि
सोच चित, औ सकोचु कछु नाहिं ॥ कहहु मनोरथ करि कृपा, त्रास
त्यागि मन माहि ॥ ५४॥ सोरठा ॥ यह कहि हेम मराल, मौन-
गयो गुण भौन तब ॥ बोली वैन विसाल, हरष लाज लीला ललि-
त ॥ ५५ ॥ दमयंती॥ दोहा ॥ सखि जे मनसों मिलि रहीं,
लखि न रहै मोजीय। सो तोसों कैसे कहौं, और न चाही हीय ॥५६॥
सवैया ॥ कुल शील सुशैलते छूटि चली उत लाज नदी उमडी अति
भारी ॥ जहँ मज्जतु नाग अनंग बली लहरी जहँ सोच सँकोच सँवारी॥
बूडि गये नखते शिखतामें रही चपिकै चुपि भूपकुमारी ॥ हाट-
कहंस हरै हँसिक निज चोंचसों चोज कथा विस्तारी ॥ ५७ ॥ हंस ॥
सवैया ॥ हौ चतुरे चितकी कविता असलेष विशेषनकी रचनामै ॥
जानि गयो हौं मनोरथ रावरो उत्तरकी गति व्यंग्य दशामै ॥ राजसों
ब्याहकी बात भली नल हैं जियमें यह भेद बतामै ॥ तो हियकी थि-
रता निहचै बिन क्यों तिनसों हम जाइ जतामै ॥ ५८ ॥ यौवनकी यह
वानि वनी छिनहीं छिन ज्यों बदलै बहुधाई ॥ चाहत हैं तुमको सुर
पन्नग राजकुमार चितै चतुराई ॥ औरसों व्याह करै तुअतातु
जो कै बलिकै तुमही ललचाई ॥ ठीक करे विन क्यों कहि
ये सरदारसों बूझि गवाँरकी नाई ॥ ५९ ॥ दोहा ॥ और न या संसा
रमें, लाज हँसीके योग ॥ ठीक करत निज बदनसों, फेरि टरत जे
लोग ॥ ६० ॥ जो जाकोकीवे कहत, काज न कीजै सोइ ॥ जीतबभरि
ताके कहौ, कौनु सामुहे होइ ॥ ६१ ॥ तैं अधीन निज बापके, आप
तरुण वै बाल॥ महाराज नलराजके, हमहैं मीत मराल ॥ ६२ ।। सब-
विधि है असमंजस, हिय संशय नहिं जाइ ॥ और काज जो कछु सुमुखि
मोहि देहि फरमाइ ॥ ६३ ॥ शिर कँपाइ कुंहकी कपी, कोमल
राजकुमारि ॥ मनौ परे श्रुति कटु वचन, तिन्हें निकारत झारि॥ ६४ ॥

नैषधकाव्य । दमयंती ॥ हरिप्रियाछंद ।। वीर हेम हंसराज धीरबुद्धिके समाज मोहि और राजयोग कल्पना जुतेरो ॥ याहि जानि वेद थांभ रविसों निशि संग आनि संशय पहिचानि ताहि प्रणव पाठ पेरौ।। ज्यॉ सरोजिनी विहाइ रविको शशिसों मिलाइ गिरिजा तजि गिरीश जाइ तो यहै बनि- आवै ॥ मेरे जिय है अंदेश तोसों चातुर सुदेश ऐसो बलि विरस वैन कैसे कहि आवै ॥ ६५ ॥ सवैया । साँच विचार करी तुमहूँ खग झूठ न तेरो कहो करिहौंगी। जो न मिलैं नल मोहिं अबै तजिदेह तबै अनलै बहिहोंगी॥ गातको पालकहै इकतात जो और सों व्याहै न तौडरि होंगी आनको पीतमहै वह राज हिये धरि जीतब क्याँ करिहौंगी ॥ ६६ ॥ सोरठा ॥ यहै मनोरथ सार, दासी हौं नलराजकी ॥ चित चिंतामणि छार, वहै सकल निधि पदुम मुख ॥ ६७ ॥ सवैया॥ भूपको रूप अ. नूप मनोहर श्रीन सुधारस पान करयो॥ चित्रमैं बारहजारलख्यो अब तौ रहतै चहुँ ओर खरयो ॥ तब हौंहूँ भई तनमै धनमै छनमै मनमै अर- परयो। अब ताको सँयोग औ प्राण वियोग तिहारे दुहूँकर माहँ धरचो ॥ ६८ ॥ दीपक ॥ हैं दीनमो प्रान॥ देमोहिं जीदान। सो छोड़ेि जं- जाल ॥ संदेशकी चाल ६९ जो काज आवश्य ॥ तामें न आलस्य॥ हेहंसभू- पाल ।। आधीन हौं बाल ॥७०॥ ककुभ ॥ जानति हो यहि भूमि लोक बर्सि मोह बुद्धि सरसाईहै ॥ पर उपकार रीति तौ जानी जहँ ऐसी चतु- राईहै ॥ प्राणदान दीबेको पन में कहा सुमद्वै बैठ्यो है ॥ वचन अधीन एक तेरेहौं कौन दोष कै पैव्यो है ॥ ७१॥ सोरठा॥ देत आपने जीव- सब सज्जन आरतन हित॥ कहाहोत गुण सीव, मोज्यो मोको देत तुम।। ७२ ॥ सारंग ॥ जो जीवके दानको देत संसार ॥ तो आपनो जीव देहों तु उद्धार॥ तू देतु है मोहिको जीवते बादिहौं देउँका तोहिं दारिद्रसों डादि ॥ ७३ ॥ सवैया॥ मोललै जीव तैं मेरो मराल जु और न लाभ तौ पुण्यमहा है॥पीतम प्राणको दानि तुहीं यश गान करौंगी सुजान सरा है ॥ एकहू कौड़ीके मोल सुने नहिं अज्ञ कृतज्ञनको चित चाहै । प्राण दै मोल खरीदत साधु तिन्है सहते तबहूं निरबाहै ॥७४॥ कटुक ॥ वहे भूपहै आठ लोकेशको अंश ॥ धरयो बुद्धिसों ध्यान मैं चित्तमें हंस ॥

नैषधकाव्य । ३७ करीयों कृपा मिल्यो मोहिं आचान।। भयो आनि मध्यस्थ मो ज्यों स- माधान ।। ७५ ॥ सोरठा ॥ करौ न और विचार, बासर नाहिं बिलंब को ॥ कहा समय निरधार, जे आरत आसकत हित॥ ७६ ॥ मनह- रण। निज रमणीनलों करतुहै बिलास जब तब ये वचन खग भूलहूं न भाषने।। जलसों अघात ताहि अमृत सोहात नाहिं दूजे कोई कलह करन लागै ताखने ।जब काहूं दोष रोष करै नलराज तब हूं ये रसराज बैन चित्त रोकि राखने। मोहित गरज ऐसे भूपसे अरज बड़ी बरजत याते हंसमौस- मकुराखने ॥७७॥प्रमिताक्षरा॥ बहुविज्ञ आपु तिहिलोक गैन।। शुभकाल पाइ करिये सुवैन ॥ कहुँदै बिलम्बकरि सिद्धि जहां ॥ बरहै असिद्धिसन जानि तहां ॥ ७८ ॥ दोहा ॥ कहे वचन ये लाज तजि, नहिं अचरज जिय जानि ॥ काम साखि उन्मत्त करि, जो कहवावत आनि ॥ ७९ ॥ सोरठा ॥ लहत जबै उन्मत्त, गहत चैन तब ढर समर ॥ प्रथम पुहुप अनुरुत्त ॥ विरह विथा युत दूसरो॥८॥ सुनि ये बैन विसाल, दमयंती के प्रेम दृढ ॥ फांसी नल गुण जाल, तब बोल्यो सुर हंस हँसि ॥४१॥ हंसमोदक ॥ जो यह सांचिय बात बखानति ॥ तौ वह संदेश व्रथा उर आनति ॥ जो तुमको नलको तनु तापतु ॥ काम यहै सुसंयोगु बतावतु ॥ ८२॥ तो संग बांधिदई गति ओमति ॥ भोजन भूषणकी नरही रति ॥ ध्यावत तोहिं कहै उपहासनि ॥ ओठ सुधारस आस हुला- सनि ॥ ८३ ॥ दोधक ॥ सुंदरतासम मूरति मेरी ॥ जारि सुछार करी हरटेरी ॥ क्यों नल मूरति यों सुख पावै ॥ तो सह पाइ अनंग सता- वै ॥ ८४॥ दोधक ॥ तेरिये मूरति एक लिखावै ।। सो कुचि तेरेनको सिखरावै ॥ देखत आंसुनकी झरिलावै ॥ सो छवि देखतही बनिआ- वै ।। ८५ ॥ सवैया ॥ तेरे वियोग भयो कछु ऐसो उदासी नलै न परै नहिं चीनो ॥ तेरोइ चित्र लिये निशि वासर बैठो रहै रंग भौन प्रवीनो। चानक भूमि झुक्यो तकिया लगि घूमि गिरयोत्यों खवासिसि लीनो।।पाटि लयो घनसारनित्यों यकवारही नाइ गुलाबनिदीनो ॥८६॥ दोहा ॥ लसत कमल हग अधखुले, अचल अंग टकलाइ ॥ तरी चिंतासों रह्यो चिंताहरण भुलाइ ।। ८७ ॥ सवैया ॥ राहै विचारनकी चलि दौरत ३८ नैषधकाव्य । साजि मनोरथ तैं सरसाइकै ॥ स्वासनिको वरषै बहु भूपति ध्यानसों तेरो स्वरूप मिलाइकै ॥ जागतही सब वीतत रैनि रचै किन सुंदर सेज बनाइकै ॥ तेरे वियोगते नयनन लागत नवल बहू जि- मिनीद न आकि कै ॥ ८८ ॥ दोहा ॥ ज्यों ज्यों अति कृशता बढति, त्यों त्यों द्युति सरसात ॥ दग दगात त्योंही कनक, ज्योंही दाहत जात ॥ ८९ ॥ मनहरण ॥ तरे पाइबेकी सोय यतन करतु तामें पाप न गनत कळू ऐसो आसक्त है ॥ व्याह चरचामें तेरो नाम कहि कहि उठत ऐसो महाराज कहूँ ऐसो मसकतुं है॥ मयनके लगत पैने बान सुल- गत विरहागिनि जगत जरी लाज ससकतु है ॥ भौन भौन याहीके करत अफसोस सब कौन कौन देखत करेजो कसकतु है ९० ॥ सवैया ॥ बोलत जानि कहै कछु उत्तर डोलत मोहिं लखै तित धावै ॥ आवत जानिकै आगे चलै उठि गावत तोहि गनै मिलि गावै ॥ रूसती हौ विनकाज कहा बलि या कहि वारहि वार मनावै ॥ वीरसों तोहि न पीर अरी सुनि तीरखरी हँसिकै पहरावै ॥९१॥ ॥सोरठा॥ तेरो विरह अपार, जनु यम अनुजाकी लहरि ॥ पंक मूरछा सार, हायपरयो कुंजर नृपति॥ ९२ ॥ दोहा ॥ दुहुँकर छोड्यों पंचशर, भई दशा दश ताश ।। सदा जाइ दशई दशा, वैरी सदन निवास ॥ ९३ ॥ प्रद्धटिका ॥ जब भयो काम तापित महीप ॥ तब मोहिं पठायो तो समीप ॥ किय सफल काज गजगौनि तेंजु ॥ मुख उदित भयो नल संग मैजु ॥१४॥ धनि धन्य देवि गुरतन रवानि ॥ जेहि करयो भूप नल वश सुजानि ॥ यह बडो बडाई चन्द्रिकाहि ॥ अति तरल होत लखि सिंधु जाहि ॥ ९५ ॥ सवैया ॥ नलसों विलसों मिलि चन्द्र ज्यों यामिनि त्यों तुमसों मिलि सो सुखपै है ॥ बलिये रचना कुच कंचुकीपै सब वेलि- नईकर कौल क्नै है ॥ निज लोचन चारु चकोरनिसों जब वा मुख चन्द्र सुधाहि अचै है ॥ तब और सबै सुधि भूलि हैगी परि नेसुक मे रोकह्यो सुधिपै है ॥ ९६ ॥ अ० ॥ नलके तपको तुम कामलता नव अंकुर सों नखराजतु हैं ॥ दैदलनीलनई भृकुटी नव पल्लव आँठ समा- जत हैं ॥ हाँसलसै कलिका मुख भूषण फूलनकी छबि छाजत हैं ।

नैषधकाव्य । सोहि रहे कुच कंचनके फल पेखसीके फल लाजत हैं ॥ ९७ ॥ दो- हा ॥ स्वेद सलिल मधुसोंसने, नल कर कमलनि भेटि॥ तो कुच रचना जितरची, ले हैं क्ये समेटि ॥ ९८ ॥ चौपाई॥नलको मन तेरे मन माही ॥ हिलिमिलिके सेवत बहुधाही ॥ मनौ मदन तन फिरि विधि साजे ॥ द्वैपरमान जोरिकै राजै ॥ ९९ ॥ सवैया ॥ फूलनके धनु साँ नलको जब जीति सक्यो नहिं मयनमवासी ॥ चापलता तुमको नवकै शुभवंश भये गुणराारी विलासी ।। फूल हराके झवा झुकि झूमति पीठि सुरंगित रेख प्रकासी ॥ ईगुर रंगरंगी विलसै कढ़ि ठि दिये तनु- तोल क्षमासी ॥ १०० ॥ मनहरण ॥ तेरी कंठशिरीके नवल मुकुता फले तिनके गिलोला काम करतु बनाइकै ॥ तेरी तनु सुलगि लतासी लहलही मंजु लसतु धनुष बेलि वाके करलाइकै ॥ रोम रेख बलित पन- चहै ललित नाभि सोहत गिलोला थल गहिरे सुभाइकै ॥ नलराज हंस- को अहेरो करि करि रोज हनति मनोज निज ओज सरसाइकै ॥१०॥ रूपके समर नल राजसों समर जब सरवरि करिकै सक्यो न समुहाइकै ।। तेरे चिकुरनिके शरनिकरे वान धरचो भालमें धनुषटूकदै करि बनाइकै॥ हरके नयन कुंड अनल बरततामें आपनो शरीर धीर होम्यो हरषाइकै ॥ सुवर- ण शैल कुच रावरे मकर पत्र ताही की परणशाला रही ठहराइकै ॥ १०२ ॥ पद्मावती॥ बातन रस भीनो हंस प्रबीनो सरस भेद निज भाषि कहै । त्यों- ही सब आली अतिचल चाली आइ गई पग खोजगहे ॥ हंस ॥ मैं वार लगाई देह विदाई निषधराज टिग जान चहौं ।। सबसुखनि विलासौ प्रेमप्रकाशौ राजकुँअर तो चरण गहै। ॥ १०३ ॥ सवैया ॥ मोहन मयनके बाननके मधुसों मिलये अतिही सरसाइकै ॥ माखनसे कहे वैन मराल वे काननि बाल पिये न अघाइकै ॥ स्वादही स्वाद विषाद बढ्यो बहु वाद पन्यो पियकी रुचि पाइकै ॥ तापर रंग चढ़ी तनमाह रही मनमें छन मूरछा छाइकै ॥ १०४ ॥ सोरठा ॥ गयो गगन मग खूदि, छिन मो हाटक हंस तब || ऊरध मुख हग मंदि, रही सबै छबिकी चमक||१०५।। मोदक ॥ पांखनि अग्र उठावति आवति || कारजकी जनु सिद्धि बता- वति ॥ यों नल पास बतावनको खगु ॥ नैषधदेश चल्यो गहिकै नषधकाव्य मगु ॥१०६॥ ॥ सोरठा॥ घेरि सखी सब साथ, दमयंतीको लै चलीं।। गहे हाथसों हाथ, दुर्गमलखि झखती खिझी ॥१०॥ अन्यच ॥ लख्यो हंस नृप आनि, वही बगीचा बीच गृह।। नेकु न परत पिछानि, नव कि. सलय दल तलपपर ॥ १०८ ॥ मालिनी ॥ जलजनयान मोंको देहि संभोग नीको ॥ तुम विन सब लागै राजके साज फीको ॥ बकतु विरह मातो आउरे हंस भाई ॥ तवहीं प्रणति करिके हंस वाणी सुनाई ॥१०९॥ नृप उठि उर लायो चूमिकै चोंच पोछ्यो । निज कमर दुपट्टा छोर लेके अंगाच्या ॥ बचन सब प्रियेके बार बार कहाये ॥ सुनि सुनि अपनेहूं कंठसों राज गाये ॥ ११० ॥ सोरठा ॥ गई सखी लै गेह, दमयंतीको विकल है ॥ परवश करी विदेह, नेह सिंधु बूड़ी बड़ी ॥ १११ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकालानिधौ हंस समागमो नाम चतुर्थस्सर्गः॥४॥ " दोहा॥ सर्ग पाँचयेंमें विरह, दमयंती संताप॥ राजनको बोले पिता- ब्याह उछाह प्रताप ॥ १ ॥ सोरठा ॥ विलखि सखी मुरझाहि, दमयं- तीको विरह लखि ॥ तनु सँभार कछु नाहि, कहहिं परस्पर दुखवचन ॥२॥ नलको गुण गण आनि, सुयश कुसुम धनु रूप शर॥ श्रुतिसँयोग साँ तानि, मारेउ याहि अनंग हठि ॥ ३ ॥ दूत विलंबित ॥ अतनु तापतई ततमें रहै ॥ प्रिय कथा रस मज्जनको चहै ॥ अहहदाह परै तैहिरंगमें ॥ विषम आनि चढ़े सब अंगमें ॥ ४ ॥ मुख न शुद्धि करै कहुँ हाँसकी ॥ चितरही नहिं हाँस हुलासकी ॥ करत दारुण दुःख अनंगुहै ॥ नयन खंजनकी गति पंगु है ॥ ५ ॥ तोमर ॥ छिनही छिन काम सँतापतयो ॥ मुख पंकज सों कुम्हिलाइ गयो ॥ नहिं देखत हू पहिचानि परै ॥ दिनके शशिकी समता निदरै ॥६॥ अहीर ॥ तरनि तरुन बयकीन ॥ घट उरोज दृढ़पीन ॥ अनल संग करि हाल ॥ तपवत कामकुलाल ॥ ५॥ दोधक ॥ उरूदुऔ विरहानल दूखी.॥

नैषधकाव्य । ऊषरकी कदली जनु सूखी ॥ हाथनकी उपमा परकाशे । ओज तुषार सरोजपतासे ॥ ८॥ तोटक ॥ जब काम सँताप भरयो उरमाही ॥ नहिं होत जु टूक हियो बहुधाही ।। जनु गाढ़ उरोजनि दाविदयो है ॥ मुखलागि रह्यो अपराध नयो है ॥ ९॥ सोरठा ॥ गड़त पाँइ जब आइ, बड़ी विथा सीकुरकरत॥ क्यों न पीर सरसाइ, याके हिय भूपति चुभ्यो ॥ १० गीतिका ॥ तनु माँह पीतमके विलोकन काजको अकुलाइकै ॥ जनु जातहैं उलटे विलोचन चित्त अंतर पाइकै ॥ समुहे खरी सखिया रहैं निशि दिवस यों सरसाइकै॥ नहिंनेक जानि पिछानि मानत यों रहैं लटकाइकै ॥ ११ ॥ करकमल राखि कपोल सुन्दर सोचुसों आनननयो दृगनीर पूर परचो तहाँ प्रतिबिम्बसों छतिया छयो।। हियमा हँराजतराज है प्रियप्राण इहि आनंद भयो । निकस्यो मनौ तेहि भोटकै हुलस्यो मनौ चुम्बन कियो ॥ १२ ॥ तारक । विरहानलसों मन मान मिताई ॥ नित पवन बढावत आनि सहाई ।। हियजात न रूप कछू दिखरावै ॥ जब आवत संसनि वेगिबढ़ावै ॥ १३ ॥ चन्द्रमाला ॥ ज्यों ज्यों वि- रह ब्यथा तनु कोमल बाढ़त ताप समाजै ॥ छिनहींछिन रँग पीत श्याम सित हरित लाल छबिछाजै ॥ चहूँ ओर किरण सरसाती दीपतिपुंज उजेरे॥मनौ लिखी चहुँदिशि में है पियमूरति चित्र चितेरे.॥१४॥ दोहा कुच अञ्चल काँपत रहत, मयन दशा उरदेखि ॥ कौन दुखी जग होत है निजआश्रय दुखपेखि ॥ १५॥ शोभन ॥॥ आनन लोचन कर पग मोचन सजे कमलमें सरस बने। ताप बढ़ामैं ज्यों अंकुलामैं रविसंयोगसों धामसने ॥ बाणनिमारै हियो बिदारै निरदै मन्मथ बैरपरयो । अंगनि डादै त्यों त्यों वाढै यहि अनीतिसों फूलि फरयो ॥१६॥ भुजंगप्रया- त ॥ बिसानाथ पून्यो लखे भानुजाने ।। करै दीह संताप सों अंग माने । नहीं टूकदै होतुहैं क्यों कछूतै ॥ वियोगीनको ज्यों खरोवज्र हूतै ॥१७॥ विमलासखी ।। सोरठा ॥ अहो अहो रतिनाथ, तीनि भुवन तुमसों तपै।। अति अद्भुत गुणगाथ, जिन छिनमें ऐसी करी॥१८॥ सवैया।। हाइ दई न विछोहकरै छिन जीवत क्यों न रहै हरषान्यो। कौनसहै सखिया- की दशा यह आवतहै लखि जीवकुलान्यो । चन्दनसों छतियाँलगि बोरि ६ नैषधकाव्य । उरोजनि मांद सरोजनि आन्यो । लागि रही पिरहागि चहूँ दिशि सेजपै सोवत्ति है रति मान्यो ॥ १९ ॥ विरहागिनिकी महिमा अजहूँ लगि जानति है न हियो अनुसगी ॥ निज आननिको तिन तूल तहाँ करि ताहि बुझावनके रसपागी ॥ जहँ फूलकी साँट नहीं है लगी चित कोमल राजकुमारि सभागी ॥ तहँ कामके शूल सहै समुहे उर गाट उरोज स रोजनि आगी ॥ २० ॥ [दि दरीचिनदै परदा सिदरीन झरोखन रोंकि छपायो ॥ नेकु परै न कहूँ लसिकै शशिकी किरणे परवेशुन पायो ॥ भौनके भीतर आवनको विषहारनिके मिस रूप बनायो । लावत ही तनमें जुरझार विकार हजार गुणी सरसायो ॥२१॥ तोटक निशि योसरहैं यह ग्रीवनये ॥ अरि तुंग उरोजनि अश्रु छये ॥ प्रतिबिंबित लोचनि ओट भये ॥ जनु काम सुरंगित बान हये ॥ २२.॥ अन्यच्च।।असुआ ग उज्ज्वल जात ढरे। अति लाल कपोलनि आनि परे प्रतिबिंबित होततहाँ शशि है। अपनो सम जानि रहो वसि है ॥२३ ॥ नाराच ॥ कपूर चूर छानिकै मलैजपंक सानिकै ॥ करयो सुअंग राग खेत शीत हेत मानिकै ॥ छुटे रहैं महाधने भुजंग. केश साँवरे ॥ मनो मनोजसों डरे महेश स्वाँगको करें ॥ २४ ॥ गल्यो सरीज हाथसों चल्यो उरोजपैधरै ॥ लहीं उसाँस सों जरचो सुछार है गिरो परै ॥ नरेश प्राणनाथके सु हाथलागि हैं जहीं ॥ प्रलेपुसे कुसोहिये सँतापु जाइ गो तहीं ॥ २५ ॥ मोदक ॥ हौं हियहू नहि चाहति ॥ एक मलै मनराखि उमाहति ॥ सौंह करै विरहागिनि में तपि ॥ शुद्ध शरीर सचौटी करी कपि ॥ २६ ॥ दोहा ॥ विरह ताप तनुमें लगत, कमल कली है बात ॥ मानौ भरि मूठिन विथा, गहि डारत सर- सात॥२७॥रूपमंजरीसखी॥सोरठा॥ अरौ कहौ कित जाहिं, कहा करें कैसरहैं। जिय आशा कछु नाहिं, देखतही याकी दशा॥२८॥ लगि अनंग अहि बान, विष फैलो तनुमें बिवस ॥ देखत रहत न प्रान, करुणासिंधु बूडतनको ॥ २९ ॥ सवैया ॥ पिक बोलत काँपत है हियरा तहँ लोल सिवार लता लपिटाई ॥ हिय कामके केत धन्यो तनु मानहु कै तेहि ता- पर धूम मचाई ॥ मुख साँचु शशीमणिसों वरणो यह भूपतिकी तनया नैषधकाव्य । ४३ छबिछाई ॥ लखि होत · उदोत सखी जबही तब नयननसों जलधार बहाई ॥ ३० ॥ आजुलौं आशरही हुतीजो अबतौ कछु सांस चलै हँग और ॥ नेकु परै न रह्यो घरमें यह देखि दशा भरमै मति बौरै ॥ ऐसी भई नित आन महा चलि हेरि हहा कछु मोहिय और ॥ ठाढ़ी करै परि चारिकतौ घरि चारिक लौं पियरो रँगुदौरै ॥ ३१ ॥ मान मंजरी दोहा ॥ ज्यौं रति पतिको बान, त्यों मोहन यह नृपसुता ॥ चाहत कन्यो निदान, यहू याहुकी पंचता ॥ ३२ ॥ सोरठा। कीजै दौरि गोहारि, समर करन आयो समर ॥ लीजै याहि उबारि, याके जीवत जीवनो ॥ ३३ ॥ सवैया ॥ पावक बाण कन्यो शशिको पहिले करि ओज मनोज चलायो । त्यों जलधारनिको अँशुआ इन अंबुद बाणनि बोरि बहायो ॥ वारुन बाण चल्यो नवनीरद ज्यों उतते इतको झुरि आयो॥ दीरघ सांसनिसों इनहूं तजि तीर समीरनि मारि भगायो॥३४॥ दोधक ॥ दक्षिण पवन चली तरवारै ॥ टूकहि टूक हियो करि डारै ॥ ताकहँ सांप मृणाल धरे हैं ॥ पौननके जिन कौर करे हैं ॥ ३५ ॥ चौपाई॥ द्वैदुख दुस्सह दै विधि याको ॥ विरह एक औ जीतवताको। ऊपर दाबि दये. कुच ठाढे ॥ वेनट सांस गडे उरगाढे ॥ ३६ ॥ दोहा ॥ दीन्हे तीर चलाइ सब, समर समर धरि धीर ॥ गहि मारे द्वैताल फल, तब छाती पर वीर ॥ ३७ ॥ नेहमंजरी सखी। सोरठा ॥ सुनि सुनि सखिकलाप, विकल सखी जन जे करहिं । बरी विरह संताप, पल उठाइ चितई कुँअरि ॥३८॥ बार बार शशिहेरि, करन लगी ताको कुयश ॥ राहु बड़ाई देरि, बोली उभौहें नयन ॥ ३९ ॥ दमयंती ॥ तोमर ॥ साख नेह मंज़री लेह ॥ शशिखों तपीसबदेह ॥ नहिं रैनि अंतु लखाइ । युग चारिसों छिनु जाइ ॥ ४० ॥ नरगीरबान विरंचि ॥ युग होतु है जिमि संचि ॥ रमियुक्तको छिनु जौनु ॥ युगहै वियुक्तनि तौनु ॥४१॥ हिमवान मो जनु लीन ॥ गिरिजा तहाँ तप की. न ॥ उर कामको डेरुमानि ॥ नहिं सैलकी शुचि जानि ॥ ४२ ॥ शिव भालपै नहिं आँखि ॥ जैहैं तहाँ सबु साखि ॥ विरहागि जागत जोर ॥ विछुरी प्रिया तेहि ठौर ॥ ४३ ।। नेहमंजरी॥ दूतविलंवि- .

नैषधकाव्य । त ॥ अग्निकी लपटें इमिहैं नहीं । विरहकी झार विषमें ज्याँ कहीं। विरहसों युवती अतिही डरै । मृतक लैहँसि पावकमें जरें ॥ १४ ॥ दमयंती ॥ सोरठा ॥ राखी हिय घरघेरि, कलाकलुष विरहिनित- पन ॥ दई निकारि नवेरि,जे जग उज्ज्वल पाप शशि ॥४५॥ लक्ष्मी- धर ॥ दौरिकै चंद्र सों बूझि आली हहा ॥ दाहके दानकी शक्ति पाई कहा ॥ सिंधुमें कालकूटै मिली है जही । चाडवाअग्रिसोंकै शिखी तैयही ॥४६॥ दोहा ॥ दै मारयो विधि चंद्र को,श्याम शिलान मझो- र ॥ फैलि रही किरणैमनौ, तारागण चहुँ ओर ॥४०॥ दमयंती ॥ दोहा॥ अरी जरी सब अंगमें, घरी वरष ज्यों जाइ ॥ चहूँ ओर दौरी फिरें, जोन्ह पिशाची धाइ ॥४८॥ शंगार वेलि सखी ॥ सवैया॥ चंदन चारु चवारेन माँह तुषार मिलै धनसार निसानो ॥ मेह महा बड़िसे वर्षे चहुँ ओरनि नीर गुलाब निसानो ॥ कैगच गीरिनके नियरे सियरेनव कमल पतान वितानो ॥ लैचलि राखहु याहि इहाँ राचि माहकीरै निनयोनसखानो ॥ ४९ ॥ लक्ष्मीधर । जाइकै बासको साज साज्यो जहाँ ॥ याहिले हाथही हाथराख्यो तहाँ ॥ मैनके बानको ल्यो निसान्यो भयो ॥ सूरज्यों घाइ पैघाइ सामूलयो ॥ ५० ॥ दमयंती ॥ सोरठा दौरि सखी समुझाइ, चंदहि मेरी ओरते॥येरे कूर सुभाइ, कहा करत ऐसे. करम॥५२॥सवैया॥ सागरमें गिरि मंदर सों दबिक्यों न कलंकित चूर भयो ॥ कुंभज क्यों न तुरंतहि तै जलघोरि गेंदौरासों लीलिलयो ॥. मन मेरेको चाहति है अपनायो मैं प्राणपयान विचारि ठयो । नलके मुख चन्दहि जाइ मिलौं यह पंडित काम बताइ दयो ॥ ५२ ॥तारक। जगमें यशको बजवाइ नगारो ॥ करि सागरके कुलको उजियारो ॥ बध पौरुष लेगहि प्राण हमारो ॥ शशिलक्षणदै अबकै निरवारो ॥५३॥ यौबन बलि सखी। सुलक्षण ।। जब चंड अंसु अथोत हैं ॥ तब आनि ये रबि होत हैं ॥ अतिताप अंगनि करत हैं । दिन होत रविछवि हरत हैं ॥ ५४॥ दमयंती ॥ दोहा ॥ करान भरत तमाल दल शशिकुरंग मुख देह॥ ताहि चरण लागत थकै, तनक सम्हारो नेह॥५५॥ यौवनबेलिसखी ॥ सोरठा ॥ समय चूकि मति होइ, आइहाथ नैषधकाव्य । ४५ कोगहसखे ॥ गहिराखौ अव सोइ, शशिको मुख नहिं देखिये॥ ५६ ।। दमयंती तोमर ॥ कर एकमें धनु लेह ॥ इक आइ आरसि मेह प्रतिबिंबमें विधु देखि ॥ गहि मारु ताहि विशेषि ॥५७ ॥ मधुमालती सखी ॥ दूतविलंबित ॥. करत पूरणचंद्र बड़े परतापको ॥ शुभ गभाषत ज्योतिष पापको ॥ उहतु नाहिन छीन सुधा करौ ॥ गनत पाप कुबुद्धि न आदरौ ॥ ५८ ॥ दमयंती सोरठा ॥ लियो राहु जब लीलि छोरयो निज रुचिसों न यहु ॥ पहियासों टुरि ठीलि गिरयो गरेके छिद्र द्वै ॥ ५९ ॥ रूपमालती सखी ॥ झूलना ॥ चक्र कर आयुधरि चक्र कर आयुधरि राहुशिरकाटि हरि पायु यह आनि विरहीनदीन्हो ॥ जउर विनसतासुके पंचतनहि जासुकै त- वहीं यह आनि इत दै उदै लीन्हो ॥ ६० ॥ दमयंती ॥ गगनं- ग ॥ सहचरि बूझौ जरासो विनति वचन मम सुनिये ॥ जैसे जरा- सिंध तनु तमसिर सिखि युत गुनिये ॥ ६१ ॥ दमयंती ॥ सोरठा । कहि तमसों शांश टेरि, ब्राह्मण गणि वैरिहि तजतु ॥ पतितु शशिहि निरवेरि, नितप्रति सेवत वारुणी ॥ ६२ ॥ दोहा ॥ द्विजपति ग्रसि कोढ़ी भयो, श्वेत राहु यहु ऐनि ॥ विरहिनि मुख शशि असनको, भ्रमतु न शशि भ्रम मैनि ॥ ६३ ॥ काममालती सखी॥ सोरठा ॥ उवतु इंदु अति दूरि, उपालंभ ताको कहा ॥ निकट काम हिय भूरि, ताहीको कहिवो उचित ॥ ६४ ॥ दमयंती ॥ नाराच ॥ भले मनोज कौन चालि रावरी कही बनै ॥ रहौं हिये जहाँ तहाँ सुदाह देत हौ घने ॥ सुजात वेदज्यों मुआनि आसरो करै जहाँ ॥ रजाइ देत ताहि नाशु आपहूं गहे तहाँ ॥ ६५ ॥ तोटक ॥ रतिके सह- चारि सदा तुमहौ ॥ परि मोतन मै रति क्यों न लहौ ॥ विरही तनको अति तापितरौ ॥ तियहूँ यह जानि सराहित हौ ॥ ६६ ॥ झूलना ॥ हर नयनसों छुटि ज्वालसों जुटि जरत जब तन देखि ॥ तब दौरिकै विरहीनके हिय पैठि जात विशेषि ॥ मिलि. ताहि दाहत हो तहाँ तुम ये मनोज कठोर ॥ पल एकहूँ न परै कहूँ कल पीर जागत जोर ॥ ६७ ॥ चित्रतीसखी ॥ सरसी ॥ फूलनिके करि बानि लरे नैषधकाव्य । तुम शिवसों सो फलु लीन ॥ फूलहूंको समर मने है नीति प्रकाशित कीन ॥ पियो पियूष सकल देवनमें अमर भये क्यों नाहिं ॥ रतिके अधर स्वादुरसमात्यो पियो नतें चित चाहि ॥ ६८ ॥ दोहा ॥ देत न मीचु अंनंग शठ, गिरत धनुष नहिं पानि ॥ मृतक मूंठि ज्यों द्रढ गही, मुंठि रह्यो गुण तानि ॥ ६९ ॥ दमयंती ॥ सरसी ॥ ज्योति हेतु दृगमीचु बचै तनु रूप प्रकाशित होइ ॥ काहू सुर सेवाके कीन्हे तुरत यहै फल सोइ ॥ धनि धनिदेव तिहारी सेवा फूटिजात . चषचारु ॥ अतिविरूप द्युति देहमें अरु चलत मीच परिवार ||७०|| चित्रकलासखी। तोमर। विधि जानि तोहिं नृसस ॥ किय फूल आयुध अंस ॥ दृढ़चापसों शरहोत ॥ तब तीनि लोक निसोत ।। ७१ ॥ दोहा ।। हर ज्यों हारे तीन पुर, तीनों लोक मनोज ।। जानिपरै विधि जानिशर, मधुसों सींचतु रोज ॥७२॥ सवैया॥ रावरे बाणनके विषमेषु विरंचि रच्यो लजि कै सुनिसान्यो ॥ ज्यों विरही ज- नको परमानु दयो अति चंचलता सरसान्यो । ताकाहि टूक हजार कन्यो छिन एकहि में करि क्रोधरिसान्यो। केसरिसी मृदुमेरी सखीरी भई छतिया छतिया उपमान्यो ॥ ७३ ॥ मधुनार ॥ विधि पुहुप आन ॥ दिये पंचबान । तेहि जरत जोइ ॥ सब जगतरीइ ॥ ७७ ॥ दमयंती॥ सोरठा ॥ तेरे देखि सुभाइ, छीनि लयो धनुं दै विधिहि ॥ कुटिल भ्र- कुटि नल पाइ, फेरि धनुर्द्धर तैभयो ॥७५॥ दूतविलंबित ॥ छ ऋतुसों तुम मांगतु जाइकै ।। पुहुपलै यकु यकु बनाइकै ॥ करतु बान तिन्हैं तुम पंचसों ॥ धनुष एकु कन्यो परपंचसों ॥ ७६ ॥ अतनुहौ जो तुम हरके किये ॥ परम आनंदसाँ सबके हिये ॥ सतनु जो धनु धरते कहूं ॥ शरनितौ को सकतो कहूं ॥ ७७ ॥ गिरीश पै रिसकै शर जो तजौ ॥ तुम समेत सुभस्मदशाभजौ ।। करतु मोहनमंत्र विधानु है | अपिक स्वर पंचमबानु है ॥ ७८ ॥ विमुख होत शशी लखिकै उयो । विरहिनी जन जे हियरातुयो । लगतु दक्षिण मारुत वाम है ॥ पनच ऐचति जो भु- जकामु है ॥ ७९ ॥ मदन अंध वियोगिनि मीचु है ॥ वज्रसाँहियो निरदै नीचु है ॥ तुमै एकै जीति शिवै लयो ॥ मदन अंधक मृतु + नैषधकाव्य । जैमी भयो। ८०॥ मोहनमाला सखी। सवैया ॥ एकतौ अति को- मल हुती विरहागिनिसाँ अतिछीन भई हो ॥ पुनि बारहि बारके बाद किये अधरामृदु सूखि गये कुँभिलाइ गई हो ॥ चौर करौ उत बीजनटो रोरी घोरौ तुषार कहा सुठईहौ ॥ बोलौ न आपु कहौ कर जोरिकै देख- ति हौ कछु मैनमई हो ॥ ८१ ॥ पाँइ परौं बलिजाउ हहा तुम ऊपरलै इन प्राणन वारौ ॥ क्यों न कठोर फटै छतिया यह तेरी दशा निज नयन निहारौ ॥ ज्यों अकुलाइ उठै अतियों उठिकै नभ नैषधदेश सिधारौं ॥ सौ छलके बलसों नलको गहि चांदनी सों तुअपायन पारौं ॥ ८२ ॥ बैठी कहा चहुँ ओर सबै उठि मंजुल कंजनसेज विछावौ ॥ चन्दनसों लिपिरावटी दै परदा चहुँ ओरन चंद दुरावौ ॥ वीजनकी इतडोरींगही उत बोरि गुलाब सिसी ढरकावौ ॥ फूलन काज पठै उनको तुम बैठि इ- तै तरवा सहरावौ ॥ ८३ ॥ एक अली नल वेष करी रंग केसरिसों सब अंगन वोरी ॥ एक दमयंती स्वरूप बनी चुनि रंगित चीर संजी चहुँ ओरी ॥ लै पिचकारी चले इतते उतते लै गुलांव मुठी वह दौरी ॥ हेरि हहा सखि तो मनभावतो भावतीके संग खेलत होरी ॥ ८४ ॥ सवैः या ॥ छिनही छिन सेज हजार सजै छिनही छिन सेज करै चरचाको॥ छिनही छिन वीजन वै हरिकै छिनही छिन स्वांगनकी चरताको ॥ छिनही सखियां सिगरी सिगरी गहि पायन लौटि पलौटतीवाको ॥ उपचारनको न सरै कछु काजु कहूँ न परै कल नेकहूँ वाको॥८५॥ ढूँढ़त सेजपै जानि परै पहिचानि परै नहिं आंखिन आगे ॥दौरि उपाउ करें सखि याँ सब भाइ खरी निशि वासर जागे ॥ पानी उतारि उतारि पियें उर धाइ बलाइ लै लै यह मागे ॥ जीवनमूरि तू मेरी जिये यह तेरीदशा लखि मोहिय लागे ।।८६॥ अनंगमाला सखी॥दोहा॥ राजकुँआर सुनि हित वचन, यतनन जीवो राखि ॥ दमयंती॥जीतवु मे रो शत्रुहै ताकी कुशल न भाखि ॥ ८७ ॥ कंचन लता सखी ॥ दोहा ॥ अमृत किराणि सखि है उयो, यासों कहा डिराइ दमयंती॥ होइ कहूं जो मृत किरण, तौ न ताप नियराइ ॥ ८८ ॥ रंग विरं- गिनी सखी ॥ दोहा ॥ विधि विरोध तिथिको रटै, पिकसों दिक नैषधकाव्य । वनि लेह ॥ दमयंती ॥ कहा अर्थ टूटे यहै, बोलि जरावत देह ॥ ८९ ॥ रंगिनी सखी ॥ दोहा ॥ तेरो मन भावन अहै, है तेरे उर माँह । दमयंती.॥ यहै बड़ो सन्ताप नहिं, मिलति गरे गहि बाँह ॥ ९० ॥ सोरठा ॥ लागे देह उसास, मन मन्मथ पावक बन्यो ।। बड़ी मूरछा तास, कहत कहत आधे वचन ॥ ९१ ॥ सवैया ॥ आनन श्वेत हरो पियरो रँग नयनन रूप रहै विलखानी ॥ अंगन तोरि मरोरि मरी अलकै खुलि फैलि रही सरसानी ॥ ज्यों त- किया ते झुकी उतको इत हाथही हाथ लये ठकुरानी ॥ सेजपै पारि कुमारि सबै तब टेरि उठी अति आरत वानी ॥ ९२ ॥ प्रद्धटिका ॥ कोउ दौरि सलिल मुख सींचिदेइ ॥ कोऊ सरोज दल झाँकि देइ ॥ कोउ गहे विजन कर करत पौन ॥ कोउ सहरावत कर चरण तौन ॥ ९३ ॥ अ०॥ बहु किये सरिस उपचार शीत ॥ सखियाँ विलाप अति करैं भीत ॥ कछु कर्म कर्म के देव योम ॥ तनु भयो चेत निज भाग भोग ॥ ९४ ॥ सखी ॥ सवैया ॥ देखि कले कछु साँस चलै मुख नयन हने सु चले पहिचानौ ॥ काँपत ओठ तके तुम मेनके बोलति कोमलते सुनि कानौ॥ चारुमती तनु अंचर झाँपहि कोसिनिकेसनिको गहि आनौ ॥ पोंछि तरंगिनि नयननिसों जल धार बहै सरिता शरतानौ ॥ ९५ ॥ सोरठा कली सरसात, आली जन आरत करत ॥ सुनत विकल भोगात, भीम भूप भीतर चल्यो ॥ ९६ ॥ मनहरण ॥ द्वारिका महल द्वार ड्यो- टीपै अचल हैं भूरि दोष दूरि दोष करतु बनाइकै ॥ एकुरहै नाजिर औ दूसरो सुअंगकरु भूपतिपै एकै बात कही शिरनाइकै ॥ सु- श्रुत चरकताकी उकुति युगुति जोर जानत हैं हम सबभेदनि सचाइकै ॥ नलद साँ याकी विथा जाइगी छिनकमाहिँ सुनि चितुलाइ राजुरह्यो अकुला- इकै ॥९॥ आवत हैं तात यों कहत दौरि पौरि जन सुनत ही तौहीं राज- कुँअरि सकाइकै ॥ दूरिहि सों धरणि छुअत तसलीमकरि सीम कुलकानि विरहागिनि छपाइकै ॥ चितकी चलनि चरचतु हैं चतुर तिन जानी- न्याह योग यों उछाह सरसाइकै ॥ आशिषयाँ दीन्ही नख शिखते सुखि कमल नैषधकाव्य । तरही लहौ अभिमत रौ सुमन सुहाइकै ॥ ९८ ॥ दोहा ॥ सुनि आशिष नृप जो दई, व्याह उछाह उमाह॥ आनंद अंबुधिमें में भई, मगन सखी चितचाह ॥ ९९ ॥ बाहर आयो भूप पुनि, बूझि मंत्र वरवेगि ॥ राज बोलावन काजको भेजे चारन नेगि ॥ १०० ॥ नव द्वीपन पति पुरिन पति, सकल देशपति जौन ॥ अमर पच्छ अहिराज सब, बोलि पठाये तौन ॥ १०१ ॥ इति श्रीप्रचंड दोर्दण्ड मंडित भू मंडलाखंड श्रीखाँ साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधी दमयंती विरंहवर्णनं नाम पंचमस्सर्गः ॥५॥ - दोहा-छठे सर्ग नारद मिलन, बासव सदन समाज ॥ नल मारग छलसाज सुर, दूत काज सुरराज ॥ १ ॥ सोरठा ॥ जौलौं राज समाज, जुरै आइ कुंडिननगर ॥ तबही श्री ऋषिराज, नारद सुरपति गृह गये ॥ २ ॥ पर्वत चल्यो सपक्ष, तेहि पछार अचरज नहीं ॥.नारद गुरु जग अक्ष, अति - अद्भुतं नभ जो चव्यो ॥ ३ ॥ प्रद्धटिका । मुनि चल्यो गगन बिनही विमान ।। बहु भयो भानु ज्यों भासमान ॥ जन और चहत साधन बनाइ ॥ तपसीन होत तप सिद्धिं आइ ॥४॥ मुनि चल्यो नघत सुरपर.विमान ॥ तिनकरी प्रणति बहुधासमान ॥ किय अतिथि हेत आदर अपार ॥ नाहं करयो अंगिकार ॥ ५॥ लिय ऐंचि तेज जितनो दिनेश ॥ मुनिदेह लगत नाहिँ घामलेश ॥ रवि हरीसोभ मुनिराजलेखि॥ द्विजराज हरी रवि सोभ लेखि ॥ ६॥ तारक ॥.सुरसिंधु तही बहु आदर कीन्हो ॥ तट दूबनि दर्भनि आसन दीन्हो ॥ जलसों चरणोदक दै सुखपायो ॥ सरसीरुहको मधुपर्क बनायो ॥ ७ ॥ सुनतै सुरनायक जू उठि धाये ॥ बहु दूरिहि सोय गये शिरनाये ॥ मुनि सादरही हँसिकै उस्लाये ॥ महि पाणि दुऔ प्रभु आसन आये ॥ ८॥ मौक्तिकदाम ॥ सिंहासन उच्च तहाँ मुनिनाथ ॥ करें थिति पूजन की विधि साथ ॥ तहाँ कछु ५० वैषधकाव्य । आसन और सुरेश ॥ करी विनती कर जोरि सुदेश ॥ ९ ॥ मिलैं जब मित्र समाज अनूप ॥ चलै तब चारु कथा बहु रूप ।। न आवत क्यों इत सूर महीश ॥ चहै यह बूझनको सुरईश ॥ १० ॥ इंद्र॥दोहा॥ अब नृप वंशन में नहीं, उपजति बीर करीर ॥ जे. परहारिनि सों समर छोडति धीर शरीर ॥ १९॥ माटी में गुर देह सो, ऊरध गति नहिं होइ। तजि आवत मेरे निकट, आदर गारव जोइ ॥ १२ ॥ तोटक ॥ अब वे इतको नहिं आवत हैं ॥ रण क्यों नहिं तेज उपावत हैं ॥ नहिं भावत इंद्रपती मनिकै ॥ अपने इक कारज की गनिकै ॥ १३ ॥ बहु संपदते विपदा नितही ॥ निज पूरब पुण्य मिली कितही ॥ जब पानि सुपातरके दिजिये ॥ तबही लक्ष्मी सुखको लिजिये ॥ १४ ॥ दोधक ॥ संशय दूर करौ प्रभु मेरो ॥ हों नित सेवकहों प्रभु तेरो ॥ वैन मनोहर रावरे ऐसे ॥ पाप हरै अघमर्षन जैसे ॥ १५ ॥ तोमर ॥ यह भाषि वासव आपु ॥ तब द्वै रह्यो चुप चापु ॥ दशस सरूह नयन ॥ मुनि ओर हेरत ऐन ॥ १६ ॥ लखि इंद्रकी मति धीर ॥ मुनि बैन ज्यों गिरिकीर ॥ तवहीं भये मुनिराव ॥ परसन्न शुद्ध सुंभाव ॥ १७ ॥ मुनि ॥ तोटक ॥ शत यज्ञनसों तुम इंद्र भये ॥ तिनके श्रम तौ तुम जानि लये ॥ तेहि पै तुम दानैको उमहौ ॥ धनि धन्य सदा वासव तुमहौ ॥१८॥ तारक ॥ नहिं बैन न आवत ऋद्धि तिहारी ॥ अति आदरकी पदवी निरधारी॥ सब देखिपरी निज नयनन जैसी ॥ अभिलाषन राजशिरी पर ऐसी ॥ १९ ॥ हंसी ॥ श्रीको चाहौ और दीनो अतिथिन पर अति करुण करी है ॥ इच्छाही सों भोगै सागौ नयन सहस सब सिधि सिधरी है ॥ तेरी बातें मीठी मीठी सुनि सुनि तरल सुचित गति तेरी॥तीनो लोकै पालौनीकै धनि धनि धनि हरि मति तेरी ॥ २० ॥ सोरठा ॥ समर शस्त्र तनु त्यागि, इत आवत नहिं राज ज्यों ॥ सो सुनिये चित लागि, कारण मैं वर्णन करौं ॥ २१ ॥ चर्चरी ॥ भूमिमें तुमसों लसै यक भीम भूपति भागसों ॥ ऋद्धि सिद्धि विदर्भ देशनि जोग जाग विराग सों ॥ कन्यका तेहिके भई इक ताहि रूप अमोलहै।।नाम है दमयंति यौवन बैस

नैषधकाव्य ।
राजति सोलहै ॥ २२॥ लीलागति ॥ मन माह चाहतिहै युवा
वह जानिये नहिं कौनहै । परमाणसे नहिं मान राखति पँदिक गुण
भौनु है ॥ अब है भई वह व्याह लायक चारु- बेलि श्रृंगारकी ॥ तासु
तात चाहत स्वयंवर करयो ठीक विचारकी॥२३॥पृथ्वी॥ मनोज नृप फेरि
कै हुकुमराज जीते सबै ॥ भये वश दमयंतिके समर वात चलै कवै।। सुनै जुरु-
चिता तासुकी जित गुनै रुआ भूषनै ॥ करे तित अभ्यास यों सकल सिद्धि
ताही गनै ॥ २४ ॥ दोहा ॥ जे आभूषण दान गुन, वह तिय करै
पसंद ॥ तिनमें तनिको जो चतुर, सो सबमें सुखकंद ॥ २५ ॥
तोटक ॥ जवते वह योवन बैस भई ॥ रणकी सुधि राजन भूलि गई ॥
तिनमें मनमत्थ सिकार करै ॥ तिनके मृग नयनन बाँधि हरै ॥२६ ॥
तिनके घर दूतिनकी अरचा ॥ नितही नित ता गुणकी चरचा ॥ यहि ते
इहँ भूप न आवतहैं। तुमसों नहिं आदर पावत हैं ॥ २७ ॥ चर्चरी ॥
भीम भूप सुर दूरिसों अति दूर अंतर जानिकै ॥ हौं चल्यो इतको इहाँ
रण रंग आनंद मानिके॥कोन जानति है तुम्हें बहु युद्ध करत सुभाइसों॥
है रहे चुप चाप बोलि मुनीश यों सुरराइसों ॥ २८ ॥ सोरठा ॥
सुनि ये वचन विशाल, महा मुदित मघवा भयो ॥ होत सुभग रस वास
वचन रचनमें प्रभुनकी ॥ २९ ॥ इंद्र ॥ दोहा ॥ मुनि ह्याँ राजत हैं
सदा, ममसु अनुज दनुजारि ॥ संगरकी चरचानहै, सोवत पाँइ पसारि
॥ ३० ॥ चौपाई ॥ विश्व रूपता ताकी ऐसी ॥ रीति रची जैमुनि
मुनि जैसी ॥ सुर विग्रह जो सहत न नेको ॥ व्यर्थ करौ मम वचन वि-
वेकौ ॥ ३१ ॥ विनय समुद्र सुधा रस सानी ॥ चुप कि रह्यो हरि कहि
मृदुवानी ॥ तजि उसास मुनि भयो उदासी ॥ तब बोल्यो रण रंग
बिलासी ॥ ३२ ॥ मुनि ॥ संवैया ॥ सुरलोक रसातल युद्धकी
आशते भूमि निवासन चैन गहौं ॥ अरु भूमि पतालके संगरसों नभमें
नहिं हौं निहचिंत रहौं । तुमको लखि मोद लह्यो सुरनायक भूत-
लको अब जायो चहौं ॥ करिये किरपा करि औप सुमोहि
बहोरि इहाँ सुख आनि लहौं ॥ ३३ ॥ दोहा ॥ दमयंतीके व्याह
को, है है राज समाज ॥ ते करि हैं संग्रामको, भूतलमें मम काज॥३४॥

५२ नैषधकाव्य । प्रद्धटिका।यह भाषि चले तुरतै मुनीशापगरोंकि रह्यो बहुधा सचीश ॥ गंधर्व कन्यो पर्वत प्रणाम ॥ ऋषि विदा कियो तब शक्र धाम।।३५||अ. घर आई कियो इंद्र साँच, येह ॥ केहि भाँति होइ दमयंति नेह॥ करगह्यो वज्र अति कठिन जानि ॥ मृदु गह्यो चहत दमयंति पानि ॥ ३६ ॥ नरनाह कामको हुकुम मांनि ॥ सुरनाह चल्यो क्षिति ओर आनि ॥ शिरनायशची विलखी अपार ॥ जनु चहै चल्यो अवहूं पतार ॥ ३७॥ स्वागत ॥ इंद्र देखि क्षितिको अनुरागे॥ रंभ श्याम युति आननलागे । श्याम जीभ गति ऊपर भाष.॥ आपुहानि मनमें अभिलारे ॥ ३८ ॥ दीह साँस मुख छोडि घृताची ॥ प्राण मुक्ति के मारगराची ॥ मैनका मुख नवावत रूखी ॥ शीत बेलि जनु पंकज सूखी ॥ ३९ ॥ कह्यो तिलोतमहूँ तब ऐसे ॥ गिरेहाथ ते चामर जैसे ॥ सुरपुर बास न योग हमारे॥ सुरपति आपु भूमि पगुधारे॥४०॥अ०॥ काहूसेां कोऊ याँ कहै।। बैठी कहा विचारति-रहै ॥ कश्यपको सुत इन्द्र कहावे ॥ कश्यपसुता और को धावै ॥४१॥ दोहा ॥ आने वरुण यम. जो चलें, तीनौ संग दिगीश। चलत एक आगे चले, पाछे सब विसवीस || ४२ ।। शिख- रिनी ॥ पीछे भेजी दूती सबान दमयंतीके निकटको ॥ बड़ी भेजी भेटै विदरभनाथ सुभटको॥ करें ऐसे सेवा सकल सुर देवाधिप मिले॥ चलं चारौ भूको हरषि हियह को मिलि हिले ॥ ४३ ॥ जबै आये भू- मै तरलछन हूमै सुगतिसो ॥ करी ऊँची ग्रीवा रथ धुनि सुनि एक म- तिसो॥ चलै पारावारै चपल लहरी मेघ गरजे॥तले आगे देखो नरपति लसै स्यंदन सजे॥४४॥सोरठां। दयो सारथी टारि, रथहाँकत कौतुक सन्यो। लीन्हो ताहि निहारि, नयन जन्मको फल लह्यो॥४५॥ दोहा ॥ देखि तरुण वय तासुकी, वरुण भयो जल रूप ॥ जलपतिको यह उचित है सीसम सरस अनूप ॥ ४६॥ हाकली ॥ सूरयको सुत ताहि निहारी॥ श्यामल रंग भयो निरधारी ॥ आजहुलौ तेहिको जग जालू ॥ भाषत ताहि सबै कहि कालू ॥ ४७ ।। पावक ताप गह्यो तेहि देखी ॥ तासमता अभिलाष विशेषी ।। रूप निरूपितकै गुणगेह ॥ आजु लगे तेहि तापित देह ।। ४८ ॥ कौशिक देखतही तेहि रूप ॥ जासन नैषधकाव्य । ५३ हारत काम अनूप ॥ कौशिक रूप भयो मन माह ॥ नयन सहस्र न सूझत नाह ॥ ४९ ॥ मोदक ॥ मूरतिवंत श्रृंगार सोहावन ।। सुन्दरता तेहिको मनभावन ॥ विस्मित देखि दिगीश भये सब ॥ सोचि रहे मन माह सबै तब ॥ ५० ॥ रूप विशेषणकी परभा जब ॥ भूषण वेश बने सुखमा सब ॥ स्यंदन साजि चब्यो इत आवत ॥ देश विदर्भको समुहावत ।। ५१ ॥ ॥ दोहा ॥ आते उदार सुकुमार वय तरुन नयेसो ओर ॥ कुंडनपुरको जात है, साज स्वयंवर जोर ॥ ५२ ॥ चौपाई॥ धर्मराज सलिलेश हुतासन ॥ भये हर्ष चल ताप प्रकाशन || प्राण रूप जलको नल देखे ॥ आय महा बोले सविशेषे ॥ ५३ ॥ दुता॥ झूलना॥ लाभ नाहिं दमयतिको हमको परी यह जानि ॥ छोडि सुन्दर राज भू यहि वरैगी सुर आनि॥ जो वरै तजि याहि हमको तौन वह हम योग ॥ रूप और कुरूपको नहिं भेद जानत भोग ॥५४॥ वरुण॥ कुमार लहरी ॥ हमै तब वरै यह ॥ प्रभुत्व जब तौ लहे ॥ न दीठि यहुधों परै ॥ सुकौन चरचाकरै ॥ ५५ ॥ यमराज ॥ संयुत ॥ हमहूँ दुहूँ दिशिते गये ॥ घरके न बाहेरके भये ॥ दम- यति याहि विवाहि है ॥ यहिके स्वरूप सराहि है ॥ ५६॥ दोहा॥ बा- हिर पंचनमें हँसी, द्वैहै आठौ अंग ॥ घरमें नयन न सामुहे, हैं रमणी संग ।। ५७ ॥ सवैया ॥ यहि भांति रहे झुकिकै सुरतीनौ कहा करिये कछु और न आवै। तब शोचि कछु मनमें मघवा मति सञ्चितों परपंच बनावै ।। बोलि उठ्यो छलसों नलसों यह रावरी मूरति मोदबढ़ावै । सो सुखसों तुम क्षेमसोंही तुमै देखतही चित इच्छितपावै ॥ ५८॥ दोहा॥ अर्धासन मैं जेहिदियो, करि आदर संभार ॥ वीरसेनि नरनाहसम, रेखा लसत लिलार ॥ ५९ ॥तोमर ॥ तुमही सुपूत सुजान ॥ तेहिराजके कुल भान ॥ कितको करयो श्रमआनि ॥ वहु देशहैं गुणखानि ॥ ६०॥ हमहूं चले शुभ काल ॥ जेहिको मिल्यो फल हाल । यहि राह आधेक आनि ॥ तुमसों भई पहिचानि ॥ ६१ ॥ नल ॥ तोमर ॥ यहतौ परस्पर बात ॥ गुरुरूप आपु लखात ॥ हम अज्ञहैं . बहु भाइ ।। तुम आपु देहु बताइ ।। ६२ ॥ चम्पकमाला ॥ दण्ड धरे याको यम जा-

नैषधकाव्य ।
नौ ॥ ज्वालबरै याको शिषि मानौ ॥ फांस डरै याको जलनाथौ ।।
शेष रह्यो सो इंद्रसनाथौ ॥ ६३ ॥ याचक द्वै तेरे हम आये ॥ देखतही
चारौ फल पाये ॥ ॥ मारगको आयासु वितामैं ॥ कारज को तो
आपु
बतामैं ॥ ६४ ॥ सवैया ॥ याचक नाम सुने हों तनु फूलि
उठे भुजदंड सोहाये ॥ फूल कदम्बके तूल भयो तिन पाँयन धाइलसो
शिरनाये । जो अति दुर्लभ देवनको वहु मेरे अधीन कहाँ केहि भाये ॥
जानि विरोधपरै यहिमें तबसंशय यों नलके उर आये॥६५॥नल॥नील
सरूपकजीवितलौं अब अर्थिनदीजै। तामहँ नेकु न नाह करीजै॥ जो सुर
नायक मांगनआवै । तौ कहदेइ हियो सुखपावै ।।६६ ॥ जानिपर कह चाहत
येहैं ॥ तौ विन याँचतही हम दें ॥ जानत हूँ रुचि अर्थिन केरी ।।
देत न जे तिनको धिग टेरी ॥ ६७ ॥ अ० ॥ जे अति आप खुशा-
मदि चाहें ॥ माँगत वार न नेह निबाहैं ॥ निष्ठुर बोलनमें उतसाहै ॥
दातनमें तिन कौन सराहै ॥ ६८ ॥ दोहा ॥ तिन समान लै दीजिये
जीवन अर्थिन हाथ ॥ दर्भ युक्ति जलदान विधि, वहै बतावत
गाथ ॥ ६९ ॥ सारव ॥ पंक कलंकित कौल गनै ॥ लच्छि निवास
तहाँ न बने । जावक पाणि सरोज नयो ॥ आसन ता कहँ आनि
दयो ॥ ७० ॥ याचकके मनको भरिकै ॥ देत न जे करणा करिकै ॥
भूतल भार भयो तिनको ॥ पर्वत सिंधु नरूखनको ॥ ७१ ॥ भुजंग
प्रयात ॥ सबै दान संसारके छोडि दीन्हे ॥ हमै आइकै एक यों याँचि
लीन्हे ॥ बडी कीर्ति दीन्ही हमैं वेद चारचो ॥ कहा होइगो काजमो
सों सँवारयो ॥ ७२ ॥ सोरठा ॥ छोडि जात यहि लोक, दाता धनदै
आपनो ॥ अरथि बधू विन टोंक, पहुँचावत परलोक हूँ ॥ ७३ ॥
गोपाल ॥ एक गुणो धन दै संसार ॥ देत स्वर्ग पर गुणो हजार ॥
अर्थी सौ अधमन उद्धार ॥ साध करत तासों वैपार ॥ ७४ ॥ प्रद्ध
टिका ॥ यहि भाँति भूप सोचत अपार ॥ बोल्यो विचारि मन वच
उदार ॥ परसन्न बदन लखिकै दिगीश ॥ अति हर्ष भयो चित विसे
वीस ॥ ७५ ॥ ॥ राजा ॥ जैसों जाको अन्न तनु, तैसी ताकी होत ॥
आपनकी देखत नयन, सुधा स्वादु उद्दोत ॥ ७६ ॥

चौपाई ॥ मेरो अल्प सुकृत वरु केतो ॥ कहा होत ताको फल येतो ॥ अतिदुर्लभ दर्शन तुम देखो ॥ पुरिखनके ये तप फल लेखो ॥ ७७ ॥ सरवसहन व्रत जो क्षिति राख्यो ॥ताको आज सफल अभि- लाप्यो । जो तुम चरण सरोजनिपूजी ॥ याते धन्य और नहिं दूजी७८मा. गंधाना।। जीतबहूँते अधिक आप चित जो कछुचाहौ।।मोकोसेवक जानि कृपा करि मुखहि सराहौ।। हौं कह कीवे योग आप समझत सब नीके।।पूजौ चर्णन अबहिं होहिं अभिलाष जुहीके ॥७९॥ चित्रप॥ भूपतिकी सुनि- वानी ॥ सत्य सुधारससानी ॥ वासवतौ छल कीनो ॥ कारजमें चितदी नो॥ ८० ॥ इंद्र ॥ तारक ॥ दमयंति विवाहनको हम आये ॥ सब अंगन माँह अनंग सताये ॥ अब आपुन दूतपनो यह कीजै ॥ सिद्धि- कार्यकरि 'जगमें दीजै ॥८१॥ दोधक ॥ भूतलमें नल भूपति भारे ॥ सिंधु तुहीं सब कूप निहारे ॥ जागत नभमें ग्रह जोऊ ॥ भान समान प्रकाशत कोऊ ।। ८२ ॥ तीनिहु लोकनको हम देखे ॥ तो गुणसिंधु अगाध विशेषे ॥ कारजमैं तुमको परचायो । तो हमहूँ चितमाँ सुख पायो । ८३ ॥सोरठा॥ शुद्ध वंश गुण थान, सायक साँ राजाकरयो। चहै चलायो आन, शक्र वक्र धनुसो भयो ॥ ८४ ॥ सुनि ये छल बल दैन, जानि भेद भूपति गयो ॥ किये रूखौहैं नयन, कुटिलनमें मृदुता न हित ॥ ८५ ॥ राजा ॥ छप्पय ॥ जगमें जेते जीव चित्त तिनके तुम जानत ॥ निजमति दर्पण माहँ तत्त्व सन्मुख पहिचानत ॥ मुख न मौनु हौं सजो काजनाशै जेहि कीन्हे ॥ जो कहिके नहिं करै लाज ताको मनहीन्हे ॥ जो करन योग नहिं जासुके ताकी फरमायसि करत ॥ तुमही वि- चारि समुझौ सकल कहा लाभ या धरत।।८६मनहंस।। हम जात हैं तेहि ब्याहको उत्साहसों। तेहिसंग दूतपनो करै केहि राहसों।।तुमहूं बड़े सुरनाहजू सरसातहौ । हमको छलौ बिनलाभ क्यों न घिनातहो ॥ ८७ ॥ तो- टक ॥ मनमोहत नाम सुने जेहिको ॥ चहुँ ओर न रूप लुखै तेहिको । तेहिसंग करौं किमि दूतकथा | केहिभाँति बनैं यह योग यथा ॥ ८८ ॥ सवैया ॥राजे मनोरथमाहँ चढी निशि घोसरहै तेहिकी छबि देखे ॥ श्वास छुटै मुखपीरीपरै विरहागिबरै खरकै सु विशेखे ॥ सो परंतीति नि- नैषधकाव्य । हारत ताहि न ज्यों रहिहै उर एक निमेखे ॥ कौन समर्थ विरस जी- तत रीतियहै जगकी अनुलेखे ।। ८९॥ ब्योदिनमें छरिया बरजै जिनके डर जान न पैयत नेरे ॥ जैहों तिन्हें हनि भीतर तौ नहिं सो मिलिहै भयकै घरघेरे ॥ प्राणनलौं प्रणदान कोहै कहिदेत दधीचिहि आदि घनेरे।। प्रा- णनहूं ते हजार गुणी दमयंति दिये न चहौं यशहरे ॥ ९० ॥ यांचतहीं तुमसों करिपूजन मोहिं मिलै दमयंति सयानी ॥ लाज न आवतहै तुम- को अब सो विपरीति करौ ममवानी ॥ मोकहँ तो पहिलेहि बरचो तिन जो तुम राजकुमारि बखानी ॥ देखतही हमको लजिहै भजिहै न तुम्हें यह मैं पहिचानी ॥९१ ॥ दोहा॥ ताते खेद न कीजिये, कृपाकरौ सुर नाथ ॥हँसी होइगी काजनहिं, बिन उपाइ जनसाथ।।९।। सोरठा। सुनि नलके ये बोल, द्वै अडोल गति देवपति।। कपट हरयो अतिलोलं, रौरंके मुख देखिकै ॥ ९३ ।। इंद्र ॥ दोहा ॥ कहा कहउ ऐसे वचन, चंद्र वंश तुम भूप ।। अंगीकृत करिकै फिरत, कौन धर्म कोहि रूप ॥ ९४ ॥ मनोहरण ॥ यह जो विलोकतु है जगतु ॥ निजकाल नाशहिको भगतु तहँ धर्म यशको को तजत ॥ यहि भाँति तू हमको भजत ॥ ९५ ।। प्रद्धटिका ॥ जे वंशभये तेरे महीप। तिन दान दिये बहु कुल प्रदीप॥ यक इंदु आदि उपज्यो कलंकु ॥ तुम हूँ न गहौ तेहिरीति अंक।। ९६ ॥ जोकै कुदीठि मुख मुंदिलेहु । लखि अर्थिन सों मानहु न नेहु ॥ तुमसे महीपको सो कलंकु| जि मिशीत भानुमें शशक अंकु ॥९७ ॥ प्रद्ध- टिका ॥ तैं. पढ्यो वर्णन मैनवन ॥ कै भूल्यो पढ़िकै भूप कर्न ॥ यहि भाँति अर्थ जन चित्त चार ॥ सो करत आनि दोला विहार ॥ ९८ ।। इंद्रवज्र पायो धनो याँ यश शुभ्र तेंही॥ छोडौ न ताको सिखवो जो मेंही कौने लह्यो।। याँचक और ऐसो ॥ सो देवराजा सुरवृक्ष जैसो ॥ ९९ ॥ उपेन्द्रवज्रा॥ मिटै न क्यों हूँ अभिलाष दैवी॥ करै सदानंद सदा बनै वी ॥ तहू गल्यो है तेहि भाँतिको कै॥ चहै तहाँ जाइ कोऊ नरोकै।। १०० ॥ नामराज ॥दोहा ॥ वीरसेनि कुलदीप तुम, तहाँ लग्यो तम आनि ॥ सोम वंश उत्पत्ति समतहाँ करत पहिचानि ॥ ११ ॥ कामधेनु पशु कल्पतरु, कठिन महा तेहि पाश ॥ याचक विमुख

नैषधकाव्य
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न होतहैं, कहा विचारत आस ॥ १०२ ॥ अन्यच्च ॥ मांगतदीजै
तुरतही, जीतबमें संदेह॥ खुलत मुदत फल व्यंग्यमें, यहै कहत गुणगेह॥
१०३ ॥ वरुण ॥ सवैया ॥ दाननिके जलधारनिसों मुक्तागण भूषण
संयुत जोहैं ।। पूरण सादर चन्द्रमुखी बहु कीरति नौल बहू तुमसोहैं।।
कँवच अभेद तुं चामयही अरु वज्रके स्थिन जो अवरोहै ॥ तेउरहे नहिं
कर्ण दधीचि कहा तुम धर्महिं त्यागिदियो है ।। १०४ ॥ दोहा ॥ सत्य
पाश गुणसों बँधे, अजहूं चलत न नेक। विंध्याचल बलिराजये, धरे धर्म
की टेक ॥ १०५ हम मांगत और बर, ते हम मांगत तोहिं।। पूरिमनो-
रथ एकुनहि, सुयश सकल दिशि सोहि ॥ १०६ ॥ दूतविलम्बित ॥
चलतबार सुमिरै तुम्हें कहूं ॥ मिलत मंगल ताहि अनेकहूं । अफल
गौनु जोहोइ तुम्हें सुनौ ॥ निखिलमंगल तौ अफलै गुनौ ॥ १०७ ।।
मनहरण ॥ इष्टपै हमारी तै जु प्रतिक्रत श्रुतिकरी यह श्रुतिके समान
ताहि जानिये बनाइकै।।धर्म अर्थ ताहि साजि अब महाराज अमितस-
कत अभिधान पाद पाइकै ॥ कीरति तिहारी तीनौलोकन पुनीतकरै एक
सेतताइको हुकुम सरसाइकै।। वस्तुनमें नील पीत हरित सुरुखरंग तिनमांह
रही अवतदात छबिछाइकै॥ १०८ ॥ छप्पय ॥ सहसचरण जे भानुपूत
तिनको शनि सोहै। भयो पंक केहिहेत तासु छबि सुत अवरोहै।।याको उत्तर
आजलख्यो हमतोकह देखे ॥ नाघत तेरे तेज भयो रवि पंगु विशेषे ॥ यहि
भाँति चाट वचना वचन मोहि लयो भूपाल मनु॥ वरजोर बिगारी पकरि
कै, पेटि धरी शिर पोट जनु ॥१०९॥दोहा॥ अंगीकार कर यो जबै, दूत
भार नरनाह ॥ तंब बोल्यो सुरनाह हँति, मुदित भयो मन
माह ॥ ११० जहाँ तहाँ नृप रावरी, इच्छा ऐसी होइ॥ तहाँ तहाँ सब
लोकमें, तुम्हें न देखे कोइ ॥ १११ ॥ .
इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला
खण्डल श्री खाँ साहब अली अकबर खाँप्रोत्साहित गुमान
मिश्र विरचित्ते काव्यकलानिधौ सुर संगमो
नाम षष्टस्सर्गः ॥६॥

नैषधकाव्य । दोहा॥ सर्ग सातयेंमें कथा, कुंडिनपुर नृप गौन ॥ रतिपति विविध विलास में, दर्शन रावर भौन ॥ १॥ सोरठा ॥ नैषधपत्ति सुर मित्त, रथ हँकवायो वेगिसों ॥ दूतकाज धरि चित्त । कुंडिनपुर सन्मुख चल्यो ॥ २ ॥ वसंत तिलक ॥ रोंके वियोग चल पावक ज्वालही में ॥ आन्यो दिगीश गण कारज साँचजीमें ॥ जैसे अगस्त्य जल सागर पानकीनो ॥ डर्बार दीह वडवानलको न चीनो ॥ ३ ॥ सवैया ॥ नलकी परनालि मिल्यो तियको रस पूर सवाद पियूषहि चाहैं ॥ अति प्यास भरे तेहिके सुर चारौ तहाँ नलको बहुबार सराहैं । लाइ रहे टकसी अनिमेष मनोरथ कैकै करें उतताहै ॥ भूषण आप भये तेहि देशके आगमकी पुनि हेरत राहैं ॥ ४॥ सोरठा ॥ कुण्डिनपुर मिस आइ, भूमि इंद्र अमरावती॥रथ पहुँच्यो नगिचाइ, साधु मनोरथ सीधि ज्यों ॥५॥ हरिगीतादमयंतीके पगनि सो हैं कृतारथ गली यहि ग्रामकी ॥ मुख श्वास छोडि उदास द्वै सुधि आइकै सुर कामकी॥चषबाम अश्रु प्रमोद कंटक पक्ष्मनू तनु भोगसाँ । हग दाहिनो फरक्यो तहाँ पुरदेखि नेहसँयोगसाँ ॥ ६ ॥ रथसाँ तहीं उतरयो महीपति वेगि कुंडिनपुर गयो । जिमि सूर- मंडलते कढ्यो चपतेज चंदहिमें रयो ॥ नलको स्वरूम अदृश्य द्वै तब नेक नहिं लखिकै परै ॥ तन माहँ आवत सकल छवि निधि ज्यों अनंग कला धरै ॥ ७ ॥ चौपाई ॥ देखि देखि कुंडिनपुरवासी ॥ चातुर सुंदर विविधि विलासी ॥ भाँति भाँतिके भवन निहारे ॥ आश्चर्य नलके उरभारे ॥ ८ ॥ गहित सुघर नगरकी शोधा ॥ छूटे मणि किरणनिके गोभा ॥ महामुदित मनमें तब भयो । राजा राजद्वार जब गयो ॥ ९॥ लीला ॥ चोरसाँ छिपिहौं चल्यो यह जानि चित्तलजाइ ॥ देखि द्वार ढलैतगण तब रहे मोह चढ़ाइ ॥. लालसा दमयंति संगम मानि होत हुलास ॥ दूतकाज विचारिकै करिलेत चित्त उदास ॥ २० ॥ मृदुगति नृपचल्यो सब नाघिद्वार ॥ निरखो न केहूँ तेहिबार । चहुँ ओर देखत जात ॥ मनमें न नेकुसकात । १५ ॥ सोरठा !। कौन जात यह ले- खि, काहूँ सों काहू कह्यो।। ग्रीव फेरि तेहि देखि, राजसिंधु विस्मित भयो। १२ ॥ कवित्त॥ रावरमै उबटावतही इक अंग उघारि कछू मृग नयनी।

नैषधकाव्य । देखतही चष {दि लिये, नृपत्यों इक आइ गयो पिकबैनी ॥ तासों अ- चानक भेट भई छुटि और गयो थलुकै मति पैनी ॥ लालच सों परस्यो चहेत्ताहि तहाँ बहु बार कडै मृगनयनी ॥ १३ ॥ तारका ॥ सब ओर खरी दमयंतिहि देखे ॥ यह कामप्रपंचनको फल लेखे ॥ तेहिते मन और लगै न कुमारी छवि तासु रही भरि नयनन भारी ॥ ॥ १४ ॥ अ० ॥ तिन ओर निराशकरचो हियराहै. ॥ सुरकाजहिको निह चौ चितचोहै। विरहागिनसों तनु छीन भयोहै ॥ तेहिं देखत स्वाद विषाद लयोहै ॥ १५ ॥ सवैया॥ भ्रमकी दमयंति लखै जवहीं तब देव संदे- शनको मृदुभाषै । सुनि वचन अद्रश्य तबै युवती मनमें डंरि सोरु सबै करिराखै ॥ लगि मारुत मन्द उडै अचरा झमकै कुचकिंकर नैसलखै ॥ मुख फेरिरहै नृप धीर धुरन्धर चोपचित न चहूँ चष चाखै ॥१६॥ बाल नकी अवली गुणसों पुर अन्तरजाल मनोज पसारचो॥ पै नृप नयन दुऔ करसायल फांसिसक्यो न कितीकहि हारयो॥ बांधिके केश हुती तेहिको भुजमूल अतूल खुल्यो झमकारयो। लेपति केसीर नाभिलिखी तब मंदि रह्यो गदूऔ विचारचो॥ १७ ॥ अ० ॥ इतते इक जातिहुती उतते इक आवतही तिन बीचगह्यो । कुचकंचन डोल अडोल गड़े सुखसिंधु सुवारि समाइरह्यो। कछु चेततही अलगाइगयो निज अंगनको परितापल- ह्यो । पुलकी उत दोऊ मयंकमुखी सब देह प्रस्वेद प्रवाह बह्यो ॥१८॥ तारक ॥ जितही जित भूपति होत खरयोहै । जितही अद्भूत प्रकाश भरचोहै ॥ तहई तहई युवती जुरिआवै ॥ चकि मोहितद्वै कछु भेद न पावै ॥ १९ अ० ॥ युवती ॥ अलि लागत है गृह आजु सोहायो ॥ जितही तित आनंदसों छबिछायो ॥ नहिं जानिपरै दुरि कै सुर कोऊ ॥ विरै इत यों कहुँ उत्सव होऊ ॥२०॥ दोहा ॥ मूंद- ति बनै न खोलतै, नयन रह्यो अकुलाइ ॥ लखि बिलास यह आपनो, आपुहि माँह-लजाइ ॥ २१ ॥ तोटक ॥तिय और जहींग कोर करै। तवहीं शर मारत मार औरै ॥ फलहीन न फूल भयो तेहिके ॥ करि धी- रज पूजनको यहिके ॥ २९ ॥.प्रद्धटिका ॥ यहि नारि संग नहिं भे- ट होइ ॥ तहँ चल्यो आप थल देखि कोइ ॥ चौपथह मध्य ठान्यो ६० नैषधकाव्य । महीप||सब साध दरश परसन्न दीप ॥ २३ ॥ सोरठा ॥ तरुणी मुख- की ओर, हेर नयन मूंदे दुऔ ॥ प्रगट करी तेहि ठौर, सो शशि आप सरोज जहँ ॥ २४ ॥ हरि गीतिका ॥ चहुँ ओरते तरुणी चलें नल कोग, न बनाइकै ॥ लगि अंग लौटि झुकत झहरत भाजती डरुपाइक॥ बहु बार कंदुक सोहन्यो नख रोटलै तिनहूँ तन्यो ॥ तिनहूँ घस्यो कुच चित्र कुंकुम सुरति जनु तेहि संग सज्यो ॥ २५ ॥ दोहा॥ लखो हार हीरा ललित, प्रतिबिंबित नृप रूप ॥ हेरि रही हियरामनौ, करयों प्रवेश अनूप ॥ २६ ॥ तारक ॥ नृपके प्रतिविम्ब न देखत मोहै ॥ रमनी रतिसी सब सुंदर साहै ॥ उमग्यो तनु आइ अनंग बिलासी ॥ अलसाइ रही थकि नयननहाँसी ॥ २७ ॥ अब तौ तिनको डर छूटि गयोहै ॥ बिन देखतहूँ सब जीव भयो है। चहुँ ओरन दौरत ताहि निहारै ॥ निज प्राणनको तेहि ऊपर वारै ॥ २८ ॥ दोहा । जहाँ लखै पद चिह्न सब दौरि जाइ तेहि ठौर ॥ चूमि चूमि आगे कहै, द दर्शन शिरमौर२९।सोरठा॥ भ्रमत भ्रमत गृह माह, थक्यो भूप क्रश विरह वश ॥ शोधनिपै नंर जाह,उच्च शिखर बैठक करी ॥ ३० ॥ सवैया ॥ हेम मराल तबे तसबीर दई हि नलै पहले लिखि जैसी। आपु अटा पर ही नखसों दमयंति लिखी अति सुन्दर तैसी ॥ लालकी माल उतारि हरे तेहिको पहिराइ दई उर वैसी॥ देखत झुंड जुरे युवती करमीजि पसीजि कहैं यह कैसी ॥ ३१ ॥ दोहा॥ खेलत बालक पूर रज, राजत तहाँ सुवेष ॥ परत चित्र चित दोख ते, चक्र वराति पट रेष ॥ ३२ ॥ सवैया ॥ द्वै तरणी नव आप समें अवलोकि सराहती हैं सुघराई ॥ चानक बीच कट्यो तेहिके छिन एक भई आति ओट सोहाई ॥ दोख परयो न कछू तिनको उमडी यक कौतुककी सरसाई ॥ हेरि हँसै हरर्षे ससवाहि डेराहि भनँ इमि धूम मचाई ॥ ३३ ॥ अ० ॥ एक खरी उत ओर करी तेहिको इतते यक गेंद चलाई ॥ आनि परयो तेहि बीच महीप गिरी लगि अंगनसों उल- टाई ॥ लागि अकास गिरी यह गेंद रंगी रंगकेसरिसों छवि छाई ॥ हाहा अचम्भो बडो सजनी जन लागत पूर पियूष नहाई ॥ ३४ ॥ दोहा ।।दै अदृश्य पुर पुर फिरत, मणि प्रतिबिंब अनेक ॥ योगीसों नैषधकाव्य । राजत तहाँ, बडो वियोगी एक ॥ ३५ ॥ युवती ॥. सवैया ॥ मैं तौ छुयो सखि कोऊ युवा हम छाँह लखी इत मानुष कैसी ॥ बोलतसो परख्यो हमहूँ मणिमें प्रतिबिंबत मरति तैसी ॥ऑपुस माह करैं चरचा चित अद्भुत भाँति भई यह ऐसी ॥ बेगि बराइ चल्यो तितही जितही जितको रुचि सों मतिपेषी ॥ ३६ ॥ दोहा ॥ राजसदन सो नृपसुता, आव- तही तेहिवार ॥ हेमछरी कर सहचरी, सोहत संगहजार ॥ ३७ ।। सवैया ॥ कोऊ गुलाबलै लै छिरकाउ करै समुहे मणि मारग झारै ॥ कोऊ करै चहुँ ओर निचोरनि भौरनकी कोउ भीर निवारै ॥ चोसरिचीरु सुगंधि लिये सखियाँ सँगराज सुता सरदारै ॥ आंवें अनूप गलीमें चली तेहि प्राणपियारी अली परवारै ॥ ३८॥ देखि समाज छक्यो नृपछैल रहो तेहि गैल लोभाइ अकेलो ॥ देखत है भ्रमको यौ ठाट उचाट करै चितमो अलवेलो ।। भ्रमको नलदेखि (दमयंति) जहीं निजहारं उतारि नयो गहिकै गल मेलो ॥ बहु आइ छयो नृपके हियमें परि यों तिनमें अति कौतुक फैलो ॥ ३९ ॥ सोरठा ॥ साँचमाल हियलागि, सुख अद्भुत भूपति छक्यो । जागि उठी विरहागि, मनौ कुंड आहुति परी ॥ ॥ ४० ॥ लसत एकही. ठाम, लसत दुऔ तिसरतसे। ॥ करतं अचंभो काम, दइय काम कैसो भयो । ४१ ॥ सवैया ॥ दमयंति यही नृपको परस्यो सरस्यो उत अंतरसेकुसोहान्यो ॥ थहरी नवबाल ज्यों ताल मृगी चितई चहुँधा न कहूँ ठहरान्यो ॥ सुखसिंधु अथाह परयो पुहुमी "पिउछाह भरयो छिन एक वितान्यो । लखिचेत लग्यो झखकेत जग्यो तब स्वादुभरे उनमादु बखान्यो ॥ ४२ ॥ दोहा ॥ साँच मिलहि झूठो गनहि, साँची भाँति लोभाहिं । दोऊ लै ता बाट रत । टरत तहाते नाहि।। ४३ ॥ प्रदटिका॥ इमि करतकला अभिराम काम।। धरि धीर गई वह बाम धाम ॥ नृप भ्रमत लह्यो ताको अबास ॥ मणि लसत कँगूरा लगिअकाश ॥ ४५ ॥ दोहा ॥ जरी चंदवाके तरे, मखमल गदी विशाल ॥ आस पास झालर लगी, हीरा मोती लाल ॥ ४५ ॥ उच्चसिं- हासन पै शची, सोहत राजकुमारि ॥ खरी खवासैं रसभरी, जनु उतरी सुरनारि ॥ ४६॥ तोटक ॥ सखियां सतलाख तहाँ थितहैं ॥ रसरंग .

Re नैषधकाव्य । विलासनम चतह ॥ नृप मोहिरह्यो लखिकै परभा ॥ रतिकी सरसै रनि- वास सभा ॥ ४७ ॥ सवैया ॥ बाजंत तार पखाउज वीन नवीन प्र- बीन सबै मदमाती॥ गावंती गीत सनेहसने करिनाच कला अतिहीं इत- राती ॥ भौंहनिमें दृगकोरनिमें मुसक्यानिमें भायनिको सरसाती ॥ डो- लत बांह चुरीखनकै चमकैं अचरा झमकै खुलीछाती ॥ ४८ ॥ तोमर॥ पिकवेणु वीन निहारि ॥ यहि कंठसों गहिहारि ॥ धरि तीन रेख अनूप ॥ वरणी तबै यह भूप ॥ ४९॥अ०॥ दमयंति ले नल राज ॥ तुमको मि- वह आज ॥ सुनि सारिका मुख येह । नलको कॅप्यो सब देह॥ ५० हमको लयो इन जानि ॥ नहिहै मृषा सुरवानि ॥ तहँ बैठिकै नृपवीर ॥ तब यों धरयो हियधीर ॥ ५१ ॥ दोहा ॥ आलीजन ये सीखये, मेरो नाम सुनाय || समाधान यों करतहैं, वेई बैन पढ़ाय ॥ ५२॥ भानमती मालिनितवै, आइ बेलि शृंगार।। दूरिहिते क्षिति शीशछै, किये हार उप- हार ॥ ५३ ।। सवैया ॥ स्वांग स्वयंवरको सखियां करि एकहि लै नल वेष वनाई ॥ एक करी दमयंति खरी सुथरी किनहूं नलकीरतिगाई ।। मो हितद्वै उमड़ी उतको वह ह्यां यह राजकुमारि लजाई ॥ बूंघटही मुख फेरि हरें झिझिकातही माल पियै पहिराई ॥ ५४ ॥ दोहा ॥ शशि बदनी अभरक तिलक, कह्यो शशी त्तिय एक ॥ लखत सखी मुख चन्दु. जहँ, राजत चंद्र अनेक ॥ ५५ ॥ मालिनी ॥ अति चतुर चितेरी चित्रनी नारि राजै । सब मिलि दमयंती रूपको चित्र साजै ॥ कर, लिखत न आवै कोलको लेखि डारै ॥ कुबलै लिखि पारै नयन के ला खंहारै ॥ ५६ ॥ नित नित परबीनै किन्नरी साजि आवै ॥ मिलिमिलि दमयंती संग वीणा बजावै ॥ रचि रचि मिखरामै नाचकी चाल चोखी ॥ कुहँकि कुहँकि गावै रागिनी लै अनोखी ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ अरध चंद नखचुंबिकुच, लखी सखी यकतासु ॥ बन्यो नेवारा काम जमु, छति-- या सब रसबासु ॥ ५८॥ लक्ष्मीधर ॥ कामके चापको योगु पामें जहीं ॥ आनिकै आलिको यो विदाएँ तहीं ॥ हारके ब्याजसों फूल आ- ने जिते.॥ सूचिसों भेदि.डारै सहेली तिते ॥ ५९ ॥ तोटक ॥ दमयं- ति उरोजनपै रचनां ॥ यक आलिकरै मतिकी सचना ॥ नलके करकी नैषधकाव्य । तसबीर नई ॥ लखि पंकजकी उन बैंचि दई ॥६० ॥ चर्चरी ॥ खेल चौपरिमें कह्यो हनि सारिका यहि चाइसों ॥ सारिका विनती करी सुनिकै हँसी सब आइसों ॥ पान दान सुवर्णको दमयंतिके अति पासहै ॥ हेमहंसरह्यों इहाँ करि दूतका जु निवासहै ॥ ६१ ॥ दोहा॥ ललित लुनाई की लहरि, राजत सभा अनूप ॥ दमयंतिहि प्रगटित करै वई अलौकिक रूप ॥ ६२ ॥ तारक ॥ नलकी तसवीर लिखी सब ठाई । तिनमें प्रतिबिम्ब परै बहुधाई ॥ तिनते कछु सुंदर आजुहि सोहै ॥ कहती यह देखि तिया मन मोहै ॥ ६३ ॥ दोहा ॥ दहन शमन सलिलेशकी, दूती दई निकारि ।। वचन रचनसों तिन जऊ करी बडी मनुहारि ॥ ६४ ॥ देखि अनादर आपनो, दूती भई निराश ॥ नल दमयंती व्याहकी, फेरि धरी चित आस । ६१ ॥ पद्धटिका ॥ दमयंति लखी जब सुचित धाम ॥ उठि इंद्र दूतिका किय प्रणाम ॥ कर जोरि करी विनती अपार ॥ मन मुदित भई सखियाँ हजार ॥ ६६ ॥ दूती ॥ अ० ॥ लिपि देवलोककी भूमि थान ॥ पढि सकत कौन ऐसा सुजान॥ यहिते मोहिं पठयो है सुरेश ॥ तेरे समीप कहिकै स देश ॥ ६७ ॥ करिकै कृपा. दृग कोरहरि ॥ धरि काननेकु यह विनति मेरि ॥ कहि कंठ अंग मिलिकै . सुरेश ॥ तुअ कुशल क्षेम बूझी सुदेश ॥ ६८ ॥ तन जग तेरे अनुराग तोम ॥ संदेश कह्यो इक रोम रोम । तुव विरह शचीपति भयो दीन ॥ निाश द्यौसरहै तन मन मलीन ॥ ६९ ॥ सवैया ॥ ज्यों अकुलाइ उठै जबहीं तबहीं लगि आइ कहै यह जासो ॥ भीम महीपतिको चलिकै नहिं माँगत क्यों दमयंतिहि तासो ॥ ह्याँ लगि आइ सकै नहिं लाजसों है न परै कल बागतमासो ॥ साइ गरी पुरहूतको प्रेमिनि बंधि स्वयंवर फूल हरासो ॥ ७० ॥ दोहा ॥ क्षीरधि मधि सुरसी कढी, या अनुराग निमित्त ॥ फेरि मथन जन वै करें, याके व्याह सुचित्त ॥७१॥ चंचरी ॥ तीनिं .लोकनमें बड्यो दिवहै तहाँ. सुर जानिये ॥ है बडो तिन माह बासव वेद बात बखानिये ॥ दास होन चहै चहौ तुव रीतसों अनुरागकी ॥ धन्य राजकुमारित् उकुरायनी अनु- .

नैषधकाव्य । रागकी ॥ ७२ ॥ सोरठा ॥ शत मखको पदपाइ, करत खुशामदि रावरी ॥ मानिलेहु करिभाइ, भौंहलास लीलाललित ॥ ७३॥ कवित्त॥ देवनदीतट नंदनवागमें जाइ सोहाग विहाग विहारौ । धौर जेठानी मिलो लक्ष्मी तुम पैन्हिके फूलनके बलिहारौ ॥ चातुर सुन्दर चोपभरचो तहां देवरु कान्ह हँसोरु तिहारो ॥ मान मरोरि शचीको अहै तुम ये मुखराज- कुमारि निहारौ ॥ ७४ ॥ मायाछंद ॥ लीलाहीसों बासबजीमें अनु- रागौ ॥ तीनौ लोक पालत नीके सुखपागौ ॥ जो जो चाहो तुम वासों लोजौ ॥ कीजै मेरीओर कृपासो सरभीजौ ॥ ७५ ॥ प्रमिताक्षरा॥ नित पूजि चित्त परणामकरौ ॥ जिनको सुध्यान जियमाह धरौ ॥ करिहैं प्रणाम तुमको सुरवै ॥ विधि इंद्रसंग जबतौ जुरिवै ॥ ७६॥ दोहा ।। करीविनति करजोरिकै, रचि रचि बैन विशाल ॥ गुदरानी तेहिदूरिते, पारिजातकी माल ॥ ७७ ॥ अतिआदरसों नृपसुता, पासै धरी उठाइ ॥ पूरी सब आशासुरभि, नल आशा बहिराइ ॥ ७८ ॥ ॥दमयंतीकी सखी ॥ सवैया ॥ और विचार करौ न कळू अब आपुबड़ी तुमहौ सुखदायनि ॥ काहूं कह्यो यहुतौ समयोगहै मानु सखींहों गहों तुवपायनि काहूकयो यह उत्तरहै हँसिकै अबहीं कहिये ठकुरायनि ।। कोऊ कहै यह मंगलकाज कहा मनमौन गह्योहै गोसायनि ॥ ७९ ॥ दमयंती ॥ इंद्रमाला ॥ हौंतो वचन अधीन तिहारे मोहिं कहा कहिआवै ।। सुनिकै मुदित भई सब सखियाँ दूती मोद बढ़ावै ।। देखत खड्यो तमासा भूपति रूप अनूप लोभान्यो ॥ मिली न प्राणप्रियामोंको सुरदूत काज नहिं आन्यो८०सोरठा॥दमयंती मुसुक्याइ, अधरकोर उज्वल करी।। ऊतरको 'समुहाइ, मालाको परिणाम करि ॥ ८१ ॥ दमयंती पद्धटिका ॥ तुअवर्णे बासव गुण उदार ॥ यह कह्यो परम साहस अपार ॥ को इन्द्र बड़ाई करन योग ॥ कछु देव बखानत वह प्रयोग ॥ ८२ ॥ जोर्जतु जालके चित्त होइ ॥ सब जानि जात सर्वज्ञ सोइ ।। तेहि उत्तरदीमे कौन भाँति ॥ जेहि होइ आनि मम चित्त शांति ॥८३॥ दोहा ॥ जो आई सुरनाहको, नाहिं करै जग कौन ॥ मै अज्ञान अपमानवच, कहत समै सुर तौनु ॥ ८४ ॥ सवैया॥ दिगपालनके सब अंशमिलैं बहु भू- पति देव स्वरूप सोहायो । तेहिको मिलिहों करि व्याह उछाह भयो यह वासवको मनभायो ॥ कहि चाटु उचाटु करै कत नै चित शैल सतीनको कानै चलायो। नरको बरिहों डरिहौं न तऊ नलको बरिहौं यह मैं ठहरायो ॥ ८५॥ रथोद्धता ॥ मैं विचारि पहिलोह जासुको।। चित्त माहँ पति मानि तासुको ॥ इन्द्रव्याह हमको न भावतो।। धीरज सुख जग ज्याँ न लावतो ॥ ८६ ॥ चौपाई॥ भरतखंड नव खंडन माही॥ पर पावन वर्णत बहुधाही ॥ मैं गृहस्थ आश्रम निरबाहौं । पति सेवाको धर्म सराहौं ॥ ८७ ॥ स्वर्ग लोक केवल सुखसाजै ॥ धर्म कर्मकी रीति नराजै॥ घरनि माँह पावत वै दोऊ ॥ तजै जानि तिनको नहिं कोऊ ॥ ८८ ॥ दोहा ॥ दान दया मष सत्य शुचि, शील साधु संतोष ॥ इन हूँ ते सुर मुदित है, उदित करत नहिं रोष ॥ ८९ ॥ संयुत ॥ सुरलोकते क्षितिको गिरे ॥ निज छीन पुण्यनिसों घिरे ॥ नर भूमिते उतको चले ॥ निज वारु कर मणि सों फले ।। ९० ॥दोहा॥ गिरत चढत यहि भाँतिसों, सुर नर सब संसार ॥ परत दुओ कर सरकरा, हानि लाभ अनुसार ॥ ९१ ॥ पद्धटिका ॥ कहि दूति संग इमि अर्ध वयन ॥ सहचरिन ओर लखि कोर नयन ॥ तब बोलि उठ्यो बातें उदार ॥ जनु वाजि उठी वीणा सितार ॥ ९२ ॥ यह है अनादि संसार सिद्ध । तिय पुरुष योग यामै प्रसिद्ध ॥ तुम सबै बडी ही हौ अधीन ॥ यासों विचारि चित कहा कीन ॥ ९३ ॥ तारक ॥ सब जीव अदृष्ट अधीन बखानी ॥ केहिकूमहि काहि उराहन आनौ ॥ जड रूप अदृष्ट झुकै तेहि कोऊ ॥ मुख के समको फल पावत सोऊ ॥ ९४ ॥ मोदक ॥ कोमल ईष न ऊँटहि चाहति ॥ ऊँटन कामेल ईष सराहति। आपनकी रुचि जामहँ पावत ॥ प्रीति तहाँ हठिकै उपजावत ॥ ९५ ॥ मनहंस ॥ गुण इंद्रके हियेको हरै बहु भाइसो ॥ नलको सनेह बढे तऊ चित चाइसो ॥ जिमि ब्रह्मको सुखपाइ पूरण मानिकै ॥ नहिं चित्त लागत लोगके सुख आनिकै ॥ ९६ ॥ दोहा ॥ कीट आदि कैटभ मथन, लगु जगमें यह रीति ॥ निज रुचिके अनुसार सब, करति सबनसों प्रीति ।। ९७ ॥

प्रद्धटिका॥यहि भाँति करयो सबको प्रबोध।। तजि दयो सब न मनको विरोध ।। उठि इंद्र दूति शिर धुनि अपार ।। फिारे चली विलखि अनमें हजार।।९८||सुनि छिपे रूप ये वचन चारुाउर फिरिकि रह्यो नृपको श्रृंगारु मम मुदित भयो सुखसिंधु न्हाइ॥ दमयंति नेह गुण सों लोभाइ ९९॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड पंडित भूमंडला खंडल श्री खाँ साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचित्ते काव्यकलानिधौ दमयंती दर्शन नाम सप्तमस्सर्गः ॥७॥ दोहा-सर्ग आठमें कथा, नख शिखरूप विचारिं ॥ वर्णन राज कुमारिको, नल दर्शन निरधारि।।१।। सोरठा॥ दर्शन मिलन विचारि, प्रथम मनोरथ बल्लवित ॥ देखत राजकुमारि, सो नृप हिय फूल्यो फल्यो ॥ २॥ तोटक ॥ पहिले तिय अंगनमें मिलई ॥ पुनि आनंद सिंधु समाइ गई ॥ फिरिकै सुखके अँसुआनि छई ॥ यहि भाँति भई नृप दीठि नई ॥ ३ ॥ मनहरण ॥ भावतीको आनन मुधाधर निहा- रतही उमड्यो उदधि उर भारि अनुरागको ॥ उंचे कनकाचल कुचन चढि गई दीठि पायो अवलंब थलु फलु भाले भागको ॥ मगन भई धौं रूप पानिप पियूष महा उरजद बीच दवी देखि मगु लागको ॥ गिरति गिरति चढि तटते गई लिपटि लखत लखत रंगरूपरस रागको ॥४॥तोटक कुचके चहुँ ओरन दीठि फिरै ॥ परभा झर चक्रन आनि फिरै ॥ सब ओर लिप्यो मृगमेदमहा ॥ तम हेत भयो दिग भेद कहा ॥ ५ ॥ भ्रमचक्र नितंबिनिसों टरकी ॥ नलकी तब दीठि हिये उरकी ॥ युग जंघनि रंभ सु थंव बने । थिर द्वै गहिकै अवलंब घने ॥ ६॥ भुजंग प्रयात ॥ धरयोको नाम है नित्र जैसो ॥ कहै मेरहूँ नामयो नेत्र तैसो । मिलै अंगमोसों न क्यों भाति वाकी ॥ लगी पाँइ याते मनौ- दीठि ताकी॥७॥ दोहा॥ नयननसों पीवत छक्यो, आसव रूप अनूप।। आनंद अद्भुतसों भरयो, तब वर्णन मन भूप॥ ८ ॥ चुलिया ॥ होइ विरंचि मनोज जो कैधौ मेरो चित्त मनोरथ।। बनै न तौ या मांतिको रूप नैषधकाव्य । ६७ अनूपमनो हांस पथ ॥ ९ ॥ गीत ॥ उपजी धराधरसों तरंगिान है पियूष श्रृंगारकी । यह पूर योवनको लसै कुच कोकलोक विहारकी ॥ यहि मांहराजत कामहै निज काय व्यूह बनाइकै ।। अति अंग मूरति दे- खिये बहु रंगकी छबि छाइकै ॥ १० ॥ सवैया ॥ कनकाचलकी स- रिता सर कंचन कमलके साँचेनसो भरि काढ़ी ॥ सब राकासे अंग अनूप लसें छह छवि एक घटीनहिं बाढ़ी । विधि और स्वरूप तिया जे रची यहि ते लम सौदनिकी मति गाढ़ी।। तरुणी सुधरै अब जे रचिहै तिन जी- तनको यह ऐंठति ठाढ़ी ॥ ११ ॥ सुंदर जे उपमान नये इन अंगनतों सब हारिंगये ॥ ये न मलीन भये मनमें तनिकौ अतिही परसन्न ठये ॥ याको बखान करें कविता द्युतिके रस अद्भुत भाव छये ।। देहैं बड़ाई बड़ी हमही ते यही ते महा सुख मानिलये !! १२॥ दोधक ॥ देखत मोह करैं बहुतेरे ।। या उर अवगुण जातन नेरे। देखनके भय ठौर नपामै आनि बसै सिगरे गुणयाप्पै ॥ १३ ॥ तोमर ॥ करहाटक काँति कठो- र ॥ घिनसी लगै तेहि ओर ॥ केतकी की युतिमूल ॥ मुखमेलि छार समूल ॥ १४ ॥ तारक ॥ शिखिपक्षनि सोहत चंद्र घनेरे ॥ याके कच जीतत ताकहँ हेरे । मुख जीतत है शशि एक सोहायो । तहिते निज ऊपर बांस बनायो ॥ १५ ॥ दोहा ॥ याके मुख शशिशो- भज्यों, अन्धकार चहुँओर ॥ राख्यो पीछे बांधिजनु, केशपात छलजोर॥ १६ ॥ मनहरण। सघन तिमिर घन तार मरकतहार सोहत श्रृंगारधार सरससमाजके ॥ छहरतछविछूटि छूटत छुक्तक्षिति मोहकैसे मारग विमल सुखसाजके। बेलिकी सुवास फैलिरही आसपास दौरि भौंरि गुंजरत पुंज लोभ चोज चाजके ॥ मोलिनसों गूंधे प्राणप्यारीके चिकुरचारु चाबुक लसत तुरि मयन महाराजके ॥ १७ ॥सवैया ॥ कामको चाप कछूक जरचो लखि ईश कह्यो युग टूक नवीने ॥ वेगहि आप विरंचि रची भ्रुकुटी कुटिले अतिही चितदीने॥ कामके चापको कामकरै तिसहूँ पर ये तेहिको मत लीने। देखतही हियको हठिवेझहि झूमतिघूमि गिरें परबीने।॥१८॥ दोहा॥ या मुखद्वै कर शशितजी, सांवल रेख सुभाइ॥ काम चाप गहि विधु दुऔ, भौहैं दई बनाइ ॥१९॥ चर्चरी ॥ तीनिबाणनसों तिहूंपुर नैषधकाव्य । जीतिकै बहुभाइसों ॥ सरोजनसों रचे दमयंतिके हग चाइसों।। भौंहको धनुपाइ कांड कटाक्षकोरनिसों कट्टै॥ भेदिकै तन त्रान धीरज चित्तमोह महाब? ॥ २० ॥ दोहा ॥ पूरिरहत मोतेमनौ, राते कोर सोहात ॥ याकेसे याके लसत, नयन सांवरे गात ।। २१ ॥ हरिगीत ॥ जेहिमां- ति बचत रंभकेदल लेत सार सुहाइकै । तेहिभांति कमलनसों लयो गहि रूपसार बनाइकै ॥ तेहिसों रचे यहिके विलोचन लोकनाथ लोभाइकै ॥ २२ ॥ दृग भोर देखतही रहैं छकि मोह सों सरसायकै ॥ सवैया ॥ या दिगते जनु नयनशिरी हरिनीन उधार लई सविलासै ॥ मांगिलई तिनको डरपाइ करी कछु चंचल भौंह प्रकासै ॥ ब्याजसों बाढ़ि अनेक बढ़ी तब जाइ चढी लगिदीठि अकासै ॥ कोरनसों विहँसै बतराइ लजाइ करै जुरि जोर त- मासै ॥ २३॥ दोहा॥ याके दृग मृग अति चपल, दोरन मिलत स- प्रीति ॥ करण कूपकी भीति इत, उतनासीकी भीति।। २४॥ सवैया ॥ सिमुक फूल न तूललगै शुभ उन्नत वंश जगे गुण भारे॥ छूटि सुगंध रहे चहुँ ओरन भौंरनके गण होत सुखारे ॥ मोरत कोरत चैनथुनी मुक्तागण भूषण संग सितारे ॥ मानिकी वानिसजै अबही यह नासिका देखतही हम वारे ॥ २५ ॥ दोहा॥ संध्या जनु मुख चंद ढिग, राजत अधर सुवेष ॥ फूलेपंकजमें मनौ, युग ईंगुरकी रेष ॥ २६ ॥ दोधक ॥ ओंठनकी समता नहिं पा३ ॥ विम्बके तीरन चित्त चलावै ॥ बिंबसदा ट्ठम देश विराजै ॥ विद्रुम ओंठनिकी छविछाजै ॥ २७ ॥ सवैया ।। लालजरी पट ओढ़नी सों सब ओरन बेनी झमी मुथरी है।। मानहु सूरयकी परभातम पै यक बारहिं आनि परी है।। मालती माल मिलै मुकुताबि चबीच लरी [दिनेह भरी है। शीशसुमेर समीप मनौ रस हास शृंगारकी धार अरी है ॥ २८ ॥ शीशते वेनी छुटी यक वारजुसाँवरी नागिनिसी लहकारी ॥ फैलि गयो अंग अंगनमें विष ज्यों .मिसुकै हमनेकुनिहारी लालनकी गुँदि मालनसों मन लागत साँचहु हेम निहारी ॥ ज्यों मुख चंद्रसुधा चुहकी कुहकी बतियाँ त्यों भगी भय भारी ॥ २९ ॥ छुटि लिलाट रही अलकै झलकै विच वीचकली मुकतानकी॥ रैनि अं नैषधकाव्य । ६९ ध्यारी मनौ मिाल तारेन चंदपै वारत है सुखदानकी ॥ वेस रिसों उरझी लट एक चलाचल चौर समीर निधानकी ॥ मोर मनौ बरजोर जुरयो गहि ऐचत नागिनि बैरनिधानकी ॥३०॥ बोरे तँबो- ललसें अधरा मनमोहतहै दुगुनी परभाडै । आननओप सुधारससागर विद्रुमरंग तरंगचलावै ॥ लालनकी किरणें सब सूधि सुहावनीरेख सुवेषरही ॥ याकी गुणी चतुराई विरंचि विचारिरची अनुरागमईदै ॥ ३१॥ ऊपर हाँस लसै झलकै छबि ओंठन भीतर म्यान तहीसी। हीरनकीद्युति जीरणहोति निहारत सुन्दर रूपवतीसी ॥ माणिकरंग रँगीरसना सुख मानिकै आनि सुवानि वतीसी ॥ दौरति श्वास सुगंधिनसों सब ठौरनि भौंरनि भीर भरीसी ॥३२॥ दोहा॥ सिरस कुसुम कोमल अमल, याके अंग सँवारि ॥ मृदुताकी रचनाकरी, पूरी वचन विचारि ॥ ३३ ॥ सवैया ॥ कंठमें बैठि वजावत वीन प्रवीन सुधारस गावतिवानी। वेईक, मुख अखरा सुवशीकर मोहन मंत्र निसानी ॥ कोकिल मोर मलिंद मराल लजावनकी जुगुतै पहिचानी । मूरछना उघ उतवे इतमोहिय मूरछना सरसानी ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ मुखदेख्यो विधु चिबुक गहि, याकोरच्यो बनाइ ॥ अंगुलिगाड़ गडीमनौ, साँवलविंदु सुहाइ ॥ ३५ ॥ सवैया ॥ फूल्यो मनौ परभातको पंकज अजनबिंदु लग्यो तलताके ॥ रेखकलंक समेटि मनौ शशि बैठिरह्यो हँसि ऊपर वाके ॥ मोहन मंत्र लिख्यो किधौं मैन मुवीच विराजत रूपरसाके ॥ नीलमकी किरचीसम साँवल ठोढ़ीम विंदु लसै नवलाके ॥ ३६ ॥ दोहा ॥ मोमन मत्तगयंदको, गह्यो चहत चितचाड़॥रूपखेतमें हेतसों, मयन लगाई गाड़ ॥ ३७ ॥ सवैया ॥ श्रवण झुकै झुमका अतिलोल अमोल जराइ जरे जरबीले ॥ गोलकपोलनपै झमकै सम कै न सके करहाट कुचीले ॥ मोहि गयो मन देखतही उपमा अवरेखत चित्तरसीले ॥ पूरणद्वै शशिसाँ मिलिकै उदये जनु द्वै रविरंग रँगीले ॥३८॥ मनहरण ॥ हेरे सुरति हरत मन मोहितकै मोहनीकै आयरसे बोलत सुभाइकै ॥ हाँसीकी झ- लक लखियतु है सुभग छवि भरयो अभिमान रह्यो हारन सोहाइकै ।। श्रुति सुखदेनी गीत गमक प्रवेनी तेरी कंठकी सहज हित ध्वनि सुनि नैषधकाव्य । पाइकै॥ बाणीबीन तोरै तार नरद मिरीरै नहिं बोलै करि सोरै कहुँ कोकि ल बनाइकै ॥ ३९ ॥ सवैया ॥ तैसी न. भ्रुकुटी लट छूटत सॉटचलै मिलि मैन गुनीकी॥ रंगभरी विहँसै अँखियाँ निरखें दुरि औ झलकै वरु- नीकी ॥ नेक मिरोरतही थहरै गतिलै छहरै छबिलाल चनीकी ॥ वैनन मैनको बैनबजै यह नाप्तिका रासथली नथुनीकी ॥४०॥ कैसे विरंचि रचे कुचये नहिं दीठिसकै तकि पुंज प्रभासों ॥ लालजरी अँगिया पहिरी बरनी न परै गहिरी छविवाखाँ। बाहुलतानमें आनिकसे मोहरान लसै भु. जबंद झबासों ॥ साँझ समय शशिभोरके भान समान छुटें किरनै छति- यासाँ ॥४१॥ बंदन विंदु लिलार लसै रसको बरषै सरसै रंगदून्यो|भाग सु हागकी लालगदी जगदी विचकुंकुमकी चित चून्यो॥औरन ऐसी लखीन सुनी रतिसी तरुनी हियमानति ऊन्यो ॥ केशनसाँ उतहोत कुहू इत आन- नसों मन लागत पून्यो ॥ ४२ ॥ फूलि रहे दल पंकजपै जनु इंद्र वधूनकी पाँति घनेरी ॥ चुनरि चारु मनौ रतिकी रँगि रंग कुसुम बुटी बहु तेरी ॥ बैठक लाल गदी मनौ कामकी जोरि गुनीन चुनीन चितेरी ॥ बुंदनसों मेहँदी बिलसै मनहाथ रहै नहिं हेरि हँथेरी ॥ ४३ ॥ माणिकसे नख कोरनकी किरणें सम हीरनके परमानो ॥ विद्रुम अंकुर अंगुरि पानि चुरै रँग सुन्दरता सरसानो ॥ छाप छला मुंदरी झमके दमकै पहुँची गजरा मिलि मानो । जाहिर या कर माँह करयो रतिको सब जीति जवाहिर खानो ॥ ४४ ॥ गोरे उड़ान रही खुभिकै चुभिकै चित माह बडी चटकीली ॥ नीलम तार मिही सुकुमार रँगी रचि कंचन बेलि रँगीली ॥ चञ्चल कै मिलि कंकन संग कहै रति पावति यानि रसीली ॥ मूरति सी रसराजकी राजत नवलबहू कि चुरी नवनीली ॥४५॥ काम विरंचि विचारि रचे सिगरे रँग चम्पक अंग संवारे ।। विद्रुम विम्ब बधूकनसों अधरा नख औ तरवा छविवारे ॥ कोमल पाँइ मनोहर हाथ औ आनन सुंदर लोचन भारे ॥ फूलेइ फूले सरोजन सों सजि कै कुचमैं कलिका करि डारे ॥ ४६ ॥ फूली रसाल लता तनुता पर पाँति मिलिंदनिकी छबि छाई ॥ कुंदनकी पटुली मृदु ऊपर मानहु अंजन रेख सुहाई ॥ बीस बिशेविषफैलि गयो हग रोम लता उरमी दरशाई ॥ पीछे परी छुटि वेणी मनौ उर आरसी में प्रति विम्बित पाई ॥४७॥चंचल अंचल होत जहीं सजनी जन वीजन पौन डोलाई। केस- रि रंग तरंग बढ़ी दुहुँ ओर कढ़ी कुचकोर सौहाई ॥ कंचुकी ऊपर जाहिर होति जवाहिरसी छतियाँ छबिछाई ॥ द्वै शशिखण्ड मिले रविमण्डल मानहु फैलिरही अरुनाई ॥ ४८ ॥ चौसरि हीरनकी उरराजत राछनि- सों मुकताविचसाजै । कण्ठसों हांसी परी छन मानहु फैलिरहे सब बिंदु बिराजै ॥ छविक्षीरधिते निकसीयह सीतन क्षीरके छीटनकी छबिछाजै ॥ पढ़िमंत्र वशीकरसों छिरके किधौं सीकरमयन स्वरूप समाजै ॥ ४९ ॥ ईश विलोचन पावकसों लपट्यो अंगअंग अनंग परान्यो । नाभि सुधा- रसकी सरसीलखि झंपिपरयो यहिमांह बुझान्यो ॥ ताते कढ़ी यह धूम. लता अति सूक्षम सुंदर रूप बखान्यो। सोइ वरंगिनिके बरनी नवरोमबली मन हेठ हेरान्यो ॥ ५० ॥ बावलीएक अकाश राजत कञ्चनतीनि सिढोन सँवारी ॥ नीलमणीनकी राइलसै अतिसूक्षम मानहु नागिनिकारी ॥ कं- चन कंज कलीयुग तापर है परभा रबिकी छविवारी॥ शारद इंदु समीपर हैं निशि वासर फैलिरहै उजियारी ॥ ५१ ॥ हंसक नाम कहावतही तुमपै मधुरीध्वनि बोलि न ऐहै ॥ काननजाइ लगौ विछुआ किति किंकिणियों रसवादु मचैहै ॥ द्वैरहिहै चपवेरनिकै यहतौ विपरीति कला सरसैहै ॥ श्रवणनिमांह सुधारसनैहै जिती रसना रसना ठहरैहै ॥ ५२ ॥ घांघरे में मखतूल झवाझुकि झूमति डोरि अतुल सुहाये॥ नीबीकी गांठि गुलाबक- लीसम सौरभ छूटतेहैं सरसाये ॥ छोरनकोर किनारिनकी किरणे चहुँऔर छुट्टै छबिछाये ॥ घूमतघेर घनो गहि फेरत काम मनौ चित चाक चढा- ये ॥ ५३ ॥ वैशशिबिम्ब नितंब बने सु झैपे झमके लहँगा लहकारे। जं- धनकी युति संघनको लखि कंचनकी कदली गनवारे ॥ चारुकुसुम पिडीपिडुरी घन पूँघुर नेवर हैं झनकारे ॥ ईगुर गोल बड़ी गुलफैं दुरि दीठिपरे जब नीठि निहारे ॥ ५४ ॥ मोकर कौलनि लाइक जावक बेलि लसै गहिरी परभासों ॥ नूपुरकी ध्वनिको सजिकै सुर गावत गीत संगीत कलासों ॥ मंदउठाइकै जौलों छुवै क्षिति छावति तौलौं प्रबाल लतासो॥ राजकुमारिके राजतहैं पद इंदुकला नख बिंदु सुधासों ॥ ५५ ॥ अं- ७२ नैषधकाव्य । बुजचिह्न लिखेविधिसुन्दर सेवत पांयनको हरषाने ॥ बासरहै सियको निशि बासर है सरमें सब कमल डेराने ॥ याकहँ तो पगुकै न गनौं गति के अतिमंजुल भेदवखाने ॥ मत्त गयंद गनौ यहिको यह अंकुश अंकु कहैं सरसाने ॥ ५६ ॥ कमलनके दल सारलिये पुनि रंग कुसुंब घने बहुबोरे ॥ आरसी से उजरे छविवार विरञ्चिरचे तरवा अतिकोरे ॥ बांधत बाँक न सांकरहै मनौ वाके हिये बहुवार निहोरे ॥ या गजगौनिकै पाइँलसैं धुनिपायलकी कहती कछुओरे ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ शिखते नखलौं वरणि इमि, धरणि अधीश लुभाइ ॥ निज प्रत्यक्षता होनकी, इच्छा करी बनाइ॥ ५८॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मण्डित भूमंडला खण्डित खंडल श्रीखांसाहब अलीअकबरखां प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्य कलानिधौ दमयंती वर्णनंनाम अष्टमस्सर्गः ॥ ८॥ दोहा ॥ नवम सर्गमो वर्णिवो, दूतकाज सुरराज॥ कहिवो सुर संदे- शको, रचना चारु समाज ॥ १॥ सोरठा ॥ दमयंती टकलाइ, सखी सहित अद्भुत भई ॥ आनंदसिंधु समाइ, देखतही वा तरुणिको ॥२॥ दोहा ॥ देवकाजकोलौ रहै, छिप्यो विरहसंताप ॥ ज्याँ पलालके जा. लमें, अनल झारगति आप ॥ ३ ॥ जौलौभैमी नयनशर, नल उर लगैं बनाइ ॥ तौलौं तामें काम शर, शिरलौ गयो समाइ॥४॥ तोमर॥तेहि देखिके दमयंति ॥ नलकी भई मतिवति ॥ वह ह्याँ कहाँ यह जानि ॥ चुप ढ रही पहिचानि ॥ ५ ॥ दोधक ॥ देखतही केतिको सकुचानी । मोहिगई बहुतै मृदुवानी ॥ छाइरह्यो रस अद्भुत ऐसो॥ दीठिपरयो न जुवा यहु जैसो ॥ ६ ॥ तोटक ॥ तुम कौन कहाँ कित आवत हौ ॥ नहिं बूझिसकीभय मानियहौ ॥ लखिकै न रह्यो मनहाथ मुठी ॥ सखियाँ सिगरी भहराइ उठी ॥७॥ दोहा।। बैठी राजकुमारि तहँ, साहस शील सुभाइ ॥ देखि कृतारथ होति नृप, दूत विचारि लजाइ॥ ८॥ तारक॥

नैषधकाव्य भरि दीठि लख्यो जहँ प्राणपियाही । लगि दीठिरहै तेहि अंगन माही॥ जब और निहारनको अँगपावै ॥ पहिले नियों तब अंगलोभावै ॥ ९॥ दोधक ॥ छाँडिसकै न लखै अँग जेई ॥ और निहारनको उमड़ेई ।। देखतही नल होत तमासे । चंचल नयन चलें नटवासे ॥ १०॥दोहा नयननिसाँ पीवत छकी, आशव सुधास्वरूप ॥ आनंदकी लहरी ललित, अवलोकत नल रूप ॥ ११ ॥ तारक ॥ नलकी सुथरी अति सूक्षम भौंहैं ॥ गुणजाल. मनौ भवके समसोहैं ॥ तिन माह फंसे दृग खंजन वाके ॥ तनकौ न डरै न टरै रस छोके ।। १२ ।। प्लवंगम ॥ ऑनन लोचन पाँइ हाथ जल जोतहैं ॥ नयन मिले अकुलाइ देखि निज गोतहैं ॥ छाइ रह्यो मन मोह महा सुखसों भरयो ॥ जीवत मुक्त अमुक्त स्वाद चितमें धरयो॥ १३॥ सोरठा॥ आवतही उत कोंड, सिंह चालि चातुर नृपति ॥ अद्भुत भरी विनोद, आदरको उद्दित भई ॥ १४ ॥ दोधक ॥ जानत आदरकी परिपाटी । रीतियहै तिन उत्तम ठाटी ॥ जो परणाम करै पग धोवै ।। सुंदर बैनन ताप बिगोवै ॥ १५॥ तोटक॥ निज नयननको तिनुका करिये ॥ तहँ आसन भूमि हिये धरिये ॥ बुझिये सुख बैन भले कहिये । इमि पूजन आगतको लहिये ॥ १६ ॥ दमयंती ॥ संयुत ।। इत आइ आसन लीजिये ॥ तुम और देखत जीजिये । छिन एक ह्याँ पगु धारिये॥ श्रमको अयासु निवारिये ॥१७॥ नव कमल कोमल पाँइहैं ॥ कहिये कहाँ लगु जाइहैं ॥ बहु देश पूरण भाग है ।। जहँ रावरो अनुराग है ॥ १८ ॥ पतिझारसों वनमें भयो । बहुदेश जो तजिकै दयो ॥ तुमको कहे गुणधामहैं ॥ बहु कौन धन्य सुनाम हैं ॥ १९ ॥ हरि गीतिका ॥ निजबाहुके बलसों तरयो तुम सात सागर चाइसो ॥ सब भाँति भट रक्षित इहाँ पहुँचे तहाँ परभाइसो ॥ यह करचो है अति विमल साहस शूरसार अपारकै॥ वह कौन इच्छित काजहै हमहूं सुनै निरधारिकै ॥ २० ॥ भुजंगप्रयात ॥ फले भाग्यसों पुण्यते नयन तेरे ॥ सुधास्वादुलै रावरी ओर हेरे॥ लख्यो है न यों मयन में देह धारी ॥ भई हीन ऐसी भई ज्यों सुखारी ॥ २१ ॥ लख्यो रावरी चारु है रूप जैसो ॥ अदृश्य

नैषधकाव्य
फिरो है पराकर्म तैसौ ॥ चहूं और छायो तपै तेजनीको ॥ करयो वास
है देवके लोकहीको ॥ २२ ॥ सुपथ ॥ दस्र दोइ नहिं एक बखाने ॥
कामदेह नहिं धारण आने । चिह्न चारु तिनते छवि छाये ॥ रूपरा-
शि सविशेष बताये ॥ २३ ॥ तोमर ॥ जेहि वंशमें जनु लीन्ह ॥
तेहिको कृतारथ कीन्ह ॥ वहु सिंधुखों अधिकातु ॥ जेहिको भयो शशि
तातु ॥ २४ ॥ दोहा ॥ अक्षबन्ध विद्या निरखि, जान्यो देश स्वरूप॥
आदरके कछु वचन कहि, वर्णन करयो अनूप ॥ २५ ॥ आपुहि उठि
आसनदयो, करगहिक बैठारि ॥ अरघादिक पूजन करयो, उदयाचल
रविवारि ॥ २६ ॥ दमयंती ॥ गीत ॥ हर नयन कुंड हुतासमै
निज देह होमि बनाइ कै ॥ अव मयन है तुम अवतरे तेहि पुण्यके
फल पाइकै ॥ विधिको मनौ द्युति कोष अक्षय येकठो करि-
कै धरयो । सियरात देखत रोम रोम विनोद यों उरमें धयो ॥ २७॥
दोधक ।। नयन दुऔ कर सायल तेरे ॥ कोटि करें गतिके अति फेरे॥
राखतहैं शशि आनननेरे ॥ वाहनके हित चाहत नेर ॥ २८ ॥सोरठा॥
राशि करी यक ठौर, तुम सब जग परभानकी ॥ भ्रमत भ्रमत चहुँ ओर-
शिलाबीन विधुकर सजै ।। २९॥चौपाई॥ मही सफल नरवर तुम जोहौ।।
स्वर्ग भाग अति जो सुरखोहौ ॥ उर्गवंश भूषण तुम जो तौ ॥ सब ऊपर
पाताल ग़नौ तौ॥३०॥या संसार सिंधुमें दूजोनल प्रतिबिम्ब रावरी पूजो
दोई एक रूप अति रूरे ॥ विधिके शिल्प अचिंतित पूरे ॥ ३१ ॥
उपेंद्रवच ॥ बडे भये संसारव चित्त मेरे॥ तुम्हें प्रभा पाटल रूप हेरे
पीयूष संवाद कछूक बातें ॥ सुन्यो चहैं कान तृषालु यातें ॥ ३२ ॥
दोहा । दमयंतीके अधर नव, जपा कुसुम धनुतानि ॥ वचन काम
शर ये हने, विध्यो भूप मनआनि ॥ ३३ ॥ सरसी ॥ निज अनुराग
सुधा श्रवणनसों पीवत रह्यो अघाइ || दुर्जन मुख जो वेणु भावतो हित
सुख क्यों न सुहाइ । विरह भार संताप दावि हिय धरम धुरंधर
धीर ॥ खोल्यो सोतु पियूष सरसरस बोल्यो नल गंभीर ॥३४॥ नल ॥
नीलस्वरूप ॥ देव समाज हते हम आये ॥ चारि दिगीशन ठेलि
पठाये ॥ आपुन कोजु संदेश कहे हैं। ते हिय माँह बनाइ लहे हैं।॥३५॥

नैषधकाव्य । ७५ जोकिरपा करिके सुनियेजू ॥ मोहिं कृतारथ कै गुनियेजू ।। आदर एक यहै बहु तेरो ॥ वैन प्रमाण करै जब मेरो ॥ ३६ तोटक ।। जबते तुम बस कुमारि भई । सुकुमारि महारराति रूप छई ॥ तबते सुर चारिन चैन गहें ।। तुव सेवकता चित माँह चहैं ॥ ३७ ॥ सुरनायक औ सलि- लेशसही ॥ यमराज हुताशन प्रीति कही ॥ शर पंच प्रपंचनमें परि- कै ॥ अब तौ शरणागति है डरिकै ॥ ३८ ॥ तारक ॥ नवयौवनसे सबये नृप दोऊ। अबतो तन राज करें बलि ओऊ। अवलोकि दुराजु भयो मनभायो॥तिनको चित धीरज मैन चुरायो।। ३९।। अब रावरीय तिनके मन आसा॥ नहिं पालत हैं अपनी तिय आप्ता ॥ तुव योवनके संघहीन उयोहै ।। अनुराग बढ्यो अति वासवको है ॥ ४०॥सवैया॥ इकबार महानिशिमें अकुलाइ गयो दिशि पूरबकी रजधानी॥पूरणचंद उदोतकरयो चहुँ ओर छुटी किरणें सरसानी ॥ देखतही विरहागिबही उरसूखत सूरयकी मतिआनी।। कैकै हजार विलोचनलाल कराल चितौनि तकै अभिपानी ॥ ४१ ॥ दोहा ॥ तीनि नयनके वैरसों, काम भयो यहि भाइ ॥ सहसनयनके वैरसों, कौनदशा लैजाइ ॥ ४२ ॥ स्वागता ।। इंद्र रीझ नहिं नंदन माहीं । शूल तूल पिकबोल सुनाहीं ॥ भाल इंदु अपराध विचारे । ज्योंडेरात शिक्ओर निहारे ॥ ४३ ॥ अन्धकार चहुंओरन छायो ॥ काम बाण रजसों उपजायो । हूरही सुरैनि उजेरी ॥ सांचुकीन पिकवानि घनेरी ॥ ४४ ॥ लक्ष्मीधर ॥ शक्रको हाथही हाथराखै जहीं ॥ और ते औरलै सेजसाजैतहीं ॥ औरके दारिदै जेहरै वातसों॥ तेभये दारिदी रूखहे पातसों ॥ ४५ ॥ भुजंगप्रयात ॥ जबै कामके चाप टंकार छूटें । तबै आइकै इंद्र के कानफू ॥ प्रबोधै भलीभांतिसों जीव जैसे ॥ सुनै कौन निर्वाण संवाद ऐसे ॥ ४६॥ मालिनी ।। मदन अनलपीड़ा क्षेमको तोरिलीजै ॥ कमल नवकलीले सेजको साजकीजै ॥ सरस मधुर मैंहूँ स्वर्णदीमें प्रकाशी ॥ शिशिरऋतु सरीखी छाय रीषी उदासी॥४७॥ भुजंगप्रयात ॥ सुनासीर यों भांतिहै देहछामें ॥ रहै रोजसंतापसों मूरुछामें॥ न जानै मुखौ दुःख औ शीत घामे ॥ रहै प्राण जोरावरी रीझ यामे ॥ १८ ॥ दोधक ॥ याचक जा तनुको निजपूजे ॥ मूरति जो ७६ नैषधकाव्य । शिवकी कहि दूजे || सोउ दिगीश'तुम्है चितचाहै ॥ जाजग पावक नाम सराहै ॥ ४९ ॥ तोकहपाइ मनोभव ऐसो ॥ ताप करचो तियको तनु तैसो ॥ आपुन तापहिको 'दुख पावै ॥ वा उर औरन को नसतावै ॥५०॥ दूती ॥ झूलना ॥ हर नयनमें वसि आगिही इन देहह्यो जब मार ॥ तेहि कोपसों तिन शुद्ध है तब कह्यो वैर विचार | अबरावरे तिरछे- विलोचन में वस्यो मुखसार ॥ तनु जारि छार करचो हुतासन यों भयो उद्धार ।। ५१ मोदक ॥ काम खस्यो शर फूलन मारत ॥ भेदिहि पोसत टूक न पारत॥ होमहुमै कोउ फूल चढ़ावत ॥ दीखिशिषी हिय मोड- रुपावत ॥ ५२ ।। सवैया ॥ ईधन कामकरयो हियरा तेहि माहं मृणाल लता लपिटाई ॥ आगि अनंग मनो सुलगी निकसी नवधूम शिखा छबि- छाई ॥ ऐसे जंजाल परयो विरहावश वेहद व्याकुलता सरसाई ॥ बार हजार करी विनती पर रावरी मैन कछू रुचिपाई ॥ ५३॥ नीलस्वरू- पक ॥ चंदनकी दिशिको मन भौतौ॥ जासह सूरय है युतराती ॥ वा यमराज धरयो चित तोमै ॥ धीरजकामसिखी हम होम ॥५४॥ सेवत हैं मलयाचल ताको । नौल प्रवालनकै रचनाको ॥ जे दुखह नहिं छांडत सेवा ॥ जानत प्राण तिन्हें नरदेवा ॥ ५५ ॥ अंग सबै तेहिके हित लागे॥ मानहु काम सुकीरति जागे ॥ कैतहि बाहु प्रतापनिछार्य ।। तो विरहानल जोर सताये ॥ ५६ ॥ तोमर॥ इमि है भयो यमदीन।। निाश द्यौस चैन नलीन । अब रावरी मति पाइ॥ तेहि सों कहे हम जाइ ॥५॥ सवैया ॥ केसरसी जहँ फूलत साँझको वा दिशिको पति सुंदरु जो है। चेतु प्रचेतहुको तुमहीमें लग्यो निशि वासरही मनमोहै। यों बड़वानल तापक रैन सदा बिच सागरके बसिबोहै । ज्यों परताप करै जल पालक पंक भयो सब सूखत सोहै ।। ५८ ॥प्रमाणिका॥ मृणाल दंड जो धरचो।। हिये विचारसो करयो।। मनोज बाण जे भरे ॥ हजार छिद्र ये करे ।५९। हरिगीत ॥ यहि भाँति देव त्रिलोकके पति शरनि आवत रावरी ॥ निज चरण सेवकताचहें तुव रूप सोभ सुधाभरी।।तुव नयन बंक हथ्या- रलै अति दर्प दर्प कुयों करें ॥ सुरलोक माँह अलोकलागत कौन को न हियो जरै ॥ ६० ॥ चर्चरी ॥ भोर रावरहै स्वयंवर लोकमें नैषधकाव्य । चर्चाचली ॥ सारधार सुधापरी चहुँ 'देवका नभिमै भली ॥ रावरे ओठके रस स्वाद लोभहिसों भरे ॥ देवलोक विमान मारग त्यागिकै क्षिति अवतरे ॥ ६१ ॥ है नजीक वहौ जहाँ क्षितिमे विभाषेत हैं खरे ॥ मोहि भेजि दयो इहाँ ढिगरावरे निहचे धरे ॥ हैं संदेश कहे कळू तिनको कहों अब चाइसों ॥ आपहू सुनि लीजिये करि प्रेम पूरण भाइसों ॥६२। संवेया॥पीन उरोजनिसों मिलिक इक एक करी विनताहै जुतरी ॥ मैनकी मूर्छा आनि जगै जब एक तू जीवनमरि घनेरी ॥ केतक दिवसनि लौं त- रसै गप्यास स्वरूप रहे भरि तेरी ॥ लै परसन्न भुजागल मेलि सजौ परिवेषकी रेष सुफेरी ॥ ६३ ॥ चर्चरी ॥ काम ताप तुषारसे दृगको रसों हँसि हेरिले ॥ दूरिकै तन तापको उर मैन पीरनिबेरिले ॥ देविरा- जति है वृथा हम कामबाणनिसों जरे। और ठौर नहै हमै अब रावरेतकिपाँ- परे६४ासवैया॥ यांचतहें तुमको नृपक्कार हजारनको विनती अनुरागे ॥पै हमको यह आशरो एक जु आइ तिहारे हैं पाँयनलागे ॥ जो चलचूक ग- नौ कछु यामहँ तो यह न्याउ अनंगके आगे॥ ज्योंजियमाह रही मिाले त्यों अब आइ मिलो छतियारसपागे ॥६५॥ गीतिका ॥ जियमाँह तो कछु हैदया दिवलोकको सुखलीजिये ॥ क्षितिमाहे जो रुचि रावरी सुखवासतौ क्षिति कीजिये ॥ उपहार फूलनके करो तुमपै न भावति है हमैं ॥ पग कमल सुन्दर रावरे हम शीश छावनको क्षमैं ॥ ६६ ॥ सोरठा ॥ सुधासरनि कलनाहि, सुख कैसो अपसरनिमें ॥ रीझ न चन्दनमाहि, रुचि वन्दन तुव भालपै ॥ ६७ ॥ मदन अचानकमीच, वचि न सकत पीयूषहू ॥ अहे अधर रस सींच, स्वादु सुधासों सौ गुण्यो । ६८ ॥ घनाक्षरी ॥ केतुसो सहित धरे धनुषमकरजरयोहरके प्रबल नयनानलमें परिकै।। अब अवतार तेरे मनहींसों पायो पुनि काम तब वेई षटठाढ़े धीर धरिकै॥भौहनिको चाप गान ताननीके बान तेरे नयनानि सों मीन ध्वजाराखति फहरिकै ॥ कंचन अडोल गोल कुचन गादोईभयो भेदतु तिलोकजोर जीरन जजरिकै ॥ ६९ ॥ सवैया ॥ शोचतमे निर- खी तनुकी युति मोहिरही अँखियां अतियेसी॥ गानमें कानि अलिंगनमें तनु नाक सुबासु छुटै मुख जैसी ॥ तुव ओठसुधारसमें रसना गुण नैषधकाव्य | रावरमें मनकी मंति येसी ॥ तुम जालकरी करसायल अक्षान मार शिकारकी रीति अनैसी ॥ ७० ॥ तोटक ॥ यहिभाँति सँदेशनकी अवली । रसना तलमे लिखि मै सवली ॥ फल मोहिं कृपाकरिकै करिये ।। इनमें सुर एक हिये धरिये ॥ ७१ ॥ दोहा ॥ सुरपति पति है उचित अति, शमन संग समभोग | अनल अमंगल सों सुमिल, वरुण तरुण तुअ योग ।। ७२ ।। इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबर खां प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ सुर संदेश कथनो नाम नवमस्सर्गः ॥ ९॥ दोहा-पंच गुने सर्ग में, यह वर्णन उरआनि ॥ उत्तर प्रति- उत्तर वचन, ढहै नल पहिचानि ॥ १ ॥ सोरठा ॥ सुनै भौहके भाइ, प्रगट उदासीको कहत ॥ सुनत तऊ चितलाइ, पिय मुख निकरत सुर गिरा ॥ २ ॥ सुनी अनसुनी कीन, वाणी प्रगट अनाकनी ॥ भैमी परम प्रवीन, नृप सन्मुख नयननिहँसी ॥ ३ ॥ दमयंती ॥ तारक ॥ हमतौ तुमसों कुल नामहि बूझे ॥ तुम औरहि और कथान अरूझे ॥ कहिये यह कौन बडी चतुराई ॥ छलकी रचना रचि आपु चलाई ॥४॥ दोहा ॥ कहूँ प्रगट अप्रगट कहुँ, उत्तर दयो बनाइ ॥ चतुर सरस्वति रावरी, नदी सरस्वति माइ ॥ ५ ॥ तोमर ॥ इमि रावरे सुनि वैन ॥ निहचै भयो चित चैन ॥ अब आपनाम पियूष ॥ तेहिकी रही भरि भूष ॥ ६॥ लीला ॥ रत्ननायक हो भये यह कौन है वह वंशु ॥ दूरि भागत है तमोगुण देखि ज्यों रवि अंशु॥ छाँडिक छल स्यान ये कहिये कृपा करि हेरि ॥ द्वै रही चुपचाप आपन नई नयनान फेरि ॥ ७ ॥ नल ॥ नंद ॥ कुल अभिधान हमारे बूझहि जौन ॥ कहि यतु है नहिं जानि प्रयोजन कौन ॥८॥ फल न होइ वह वैन कहे वकवादु॥ अल्पवचन फल.अधिक सुवाणि सवादु ॥ ९ ॥ नाम जानिकै करियतु ७२ नैषधकाव्य जग व्यवहार ॥ हम तुम यह साधारण सनसार ॥१०॥ मेरो जो कुल समल सुन्यो कोहि काज ॥ कुल उज्वल हम दूत बड़ी यह लाज॥११॥ मनहंस ॥ यह जानिक नाह मैं कही कुलनाम है ।। तुम हूँ हठौ न तुम्हें कहा यह कामहै ॥ रुचिरावरी बहुतै बड़ी निरधारिये ॥ शशि वं- शके हम हैं करीर विचारिये ॥ १२ ॥ इंद्रवंज ॥ आचारकी बात बड़े बत्तामें ॥ लीजै न क्यों हूँ मुख आप नामें॥राजारह्यो यों हितापकारी ॥ मानौ शिखी शारद मौनधारी ॥१३॥ दनयंती॥ सवैया ॥ जो तम हो शशिवंश विभूषण संशय तौ नटरै चितमेरे ॥ बोलागी हौं हूँ नती लौं सुनौ नहिं जौ लगि नामके आखर तेरे॥ साधनकी पदवी तुम दोरत ओरत बैन कहे हम टेरे॥ जासन है न पिछानि कळू मिाले ता सँग कौन करै हित हेरे ॥१४॥ तोमर॥ सुनि बैन ये नलराज। मनमें लहे सुख साज ॥ दृग सामुहे करिलेतु ॥ मुसुकाइ उत्तरदैतु ॥ १५ ॥ नल ॥ प्रद्धटिका ॥ सुनि जलजनयनि मृदुसुधानि ॥ अजुरागराशि मनवच नयेनि ॥ करिदेवि सफल मेरो अयासु ॥ सजिये दिगीश सँग रम नि- वासु ॥ १६ ॥ कहिये संदेश चितमें विचारि॥ जहि होहिं मुदित मन दानवारि ॥ चहुँ देवनके मन शाँति होइ ॥ कहिये विचारि अब वचन सोइ१७ सोरठा॥ज्यों ज्यों लागत ढील, करत खुशामदिरावरी ॥ त्यों त्यों होत कुचील, चारौसुर चिंताविकल ॥१८॥ वासव नयन हजार, हेरत कै हैं मम डगर॥ धिकमोको संसार, परकारज में शिथिलता ॥१९ ॥ तोटक ॥ पुहुमीपति मौन गह्यो रहि कै ॥ सब देव संदेशनिको कहिकै ॥ दमयंति रही सुनते रसिकै ॥ चहुँ देवनकी मतिको हँसिकै ॥ २० ॥ दमयंती॥ चौपाई ॥ जलपतिमो ढिग तोहिं पठायो ॥ औ परेत राजा पहुँचायो । अरु कौशिकके कारज काजे ॥ ऊरध मुख सिखके हित साजे ॥ २१ ॥ दोहा ॥ देव कुमति अति व्यंग्यमै, प्रगट करी सुकुमारि ॥ अब प्रकाश बोली वचन, रचना चारु विचारि ॥ २२ ॥ दमयंती ॥ संयुत ॥ यह कौन सों शुभ योग है ॥ जगमें हँसी अरु सोगहै । जहँ ताल हंसनसों सने ॥ बगुलीनको तहँको गने ॥ २३ ॥ झमकैं जहाँ तिय ईसुरी॥ तहँ मानुषी कत वा पुरी॥नहिं स्वर्णतो जेहिको - नैषधकाव्य जुरै ॥ तहँ पीतयो गहनो फुरै ॥ २४ ॥ तारक ॥ सुरभाषतही अपनी मन भाई ॥ उपजी मम काननमें वधिराई ॥ समही सम योग संसार स- राहै ॥ हरनी कहुँ मत्त गयंदहि चाहै ॥ २५ ॥ सोरठा ॥ कहि कछु ऐसे वैन, कह्यो सखीसों कानलगि ॥ दूत ओर करि नयन, कहि सखि मेरी ओरते ॥ २६ ॥ दोहा ॥ देवदूत तुम अति चतुर, पतिव्रतकी गति जोइ ॥ लाजभरी मेरी सखी, कहति सुनै अब सोइ ॥ २७ ॥ तोटक ॥ मैं तौ विचारि चितमें नल राज राख्यो ॥ चाहों न और विबुधै यह साँच भाष्यो ॥ येही सतीन महँ रीति चली सुवेषा ॥ जैसी चलै नधन पाथर पुंज रेषा ॥ २८ ॥ मेरो हियो जो कबहूं नल छाँडि औरै ॥ चाहै अयान पनमें जब नींद दौरे ॥ तो जानिकै वरन काज हमै अरूझै ॥ चारौ दिगीश अपनी मति क्यों न बूझै ।।२९॥ दूतवि- लम्बित ॥ करहिं देव अनुग्रह आपनो॥ मनुजदेह करें हम जापनी ॥ सहिभीख हमाह यह आशही ॥ नलमिलें हमको सबिलासही ॥ ३० ॥ प्रटिका ॥ सुनि और प्रतिज्ञा ममकठोर ॥ दृढ़ करी चित्तमे जानि जोर ॥ जो होइ न ब्याह नलसंग माह ॥ तनु त्यागकरों तौ अनल 'माहँ ॥ ३१ ॥ गल बांधि फांसिकै अन्त लेउँ ॥ कै जलअगाधमें जीव देउँ ॥ जब होत जंतु आपदा बृद्धि ।। नहिं दोष होत कारज निषिद्धि ॥ ३२ ।। जब वर्षामें होतहै, मारग जल संयोग ।। बाटछांडि ऊबट चलत सकल सयाने लोगृ ॥ ३३ ॥ सारवती ॥ मैं तियजानि न ज्ञानलहो। का विधि उत्तर देनकहो ॥ हौ तुमही सबभाँतिभले ॥ सो कहिये जेहि माँह फले ॥ ३४ ॥ चम्पकमाला ॥ दूतभयो यासों मनहीनो ॥ बोलिकहो तो बैननबीनो ॥ प्रीतिसमैं तें रीतिप्रकाशी ॥ आनि कळू तामें रिस भासी ॥ ३५ ॥ नल ॥ सोरठा ॥ अहो नारि सुकुमारि, तुम चतुरै सब जगतपर ।। मैंहूं लई विचारि, जैसी मति कछु रावरी॥ ३६॥ चर्चरी ।। देवता तुमको चहैं निज प्राणसों सरसाइकै ॥ आपही उनते उदासिल कौनसों गुण पाइकै॥ दारि दीरघमैं कहूँ निधिजातिहै न बिचा- रिकै ॥ {दिकौन कपाटतामहँ रोकिलेत निवारिकै ॥ ३७ ॥ सवैया ।। मानुषजाति न देवहि चाहति आप नवीन कही यह वानी ॥ दूरिक- नैषधकाध्य । री गुरुहू हितते नहिं तो हियते ग्रहदोष निशानी ॥ देवनकीगति पावत मानुष देवकृपा सबहीते बखानी।। पारसके परसेविन लोह न हाटक कां- तिगहे मनमानी ॥ ३८ ॥ सर्भ ॥ सुरपति लजि तुम नलकाचइती ॥ पुनि निजमति तुम अतुरसरहती।। कदलि तजत मुख धरि बद बदरी ।। करम सरतु अकुमति निरदरी ॥ ३९ ॥ मनहंस । तप आगिमें तनु होमिकै सबतंतहै । सुरलोकके फल लेनको विलसन्त है ॥ सुरलोकसों तुम ओर आवत चाइलों।। तुम ताहि क्यों न चहौ कहो केहि भाइसों ४०॥ सवैया ॥ जो तुम बंधनकै तनुतजिहौ तौ तुम बासबके घर जहाँ ॥. जा जरिहौ किरिआ करिहौ सब अंग हुतासनके सियरैहौ ॥ जो परिहौ जलमांझ अगाध तबै हियरा वरुणै हुलसैहौ ॥ और उपाय कैकैमरिही तबतो यमराजहीले सुखलैहौ ॥४१॥ दोहा । हैं निषेधके विधिवचन, यह नहिं जानीजात।। व्यंग्य वचन सुनि रावरे, चित चिंता सरसात४२॥ तौ सरस्वति रसभौंरपरि, भ्रमतु महा ममचेतु ॥ कहिदीजै अब लाज तजि, केहि दिगीश सन हेतु ॥ ४३ ॥ चौपाई ॥ ऐरावत करि कुंभ सयोगी ।। जो पूरब दिशिको रसभोगी ॥ सहस नयनसों देखन लायक ॥ तो समान सुन्दर सुरनायक सोरठा ॥ तेरो संगम पाइ, सजै सकंटक अंगहरि ॥ रहे शची विल- खाई, मनौ नयन कंटक लगे ॥ ४५ ॥ तोटक ॥ हमतौ अपने जिय जानि लही।। तुम पावकसों अनुरागि रही । कुल क्षत्रिय तेजवती तुमहौ ॥ तेहिके अति ओजहिसों उमहौ ॥ ४६॥ प्रद्धटिका ॥ तनु ताप जानि तासों उदास ॥ जनि होहु सती तुमहो प्रकाश। जब लेत प- रिक्षा वारवार ॥ शिषि होतु सखी करमें तुषार ॥ ४७ ॥ तुम धर्मशील गुण ज्ञान गेहु।। किय धर्मराजसों अधिक नेह।। मैं कह्यो देखि मनमें विचार यह भयो योग संयोग खार ॥ ४०॥ तारक ॥ मलयाचलमें निज जाइ बसौजू ।। मृदु चंदनके वनमें बिलसौजू ॥ ऋषिराज अगस्त्य अ- शीशन पावो ।। कल या विधिलौ मिलि मीचनशावो ॥४९॥ सोरठा॥ सिरस कुसुम सुकुमारि, पति जलपति तोको उचित ।। ज्यों रजनी विर धारि, मिली शीतकरसों हरषि ॥ ५० ॥ चंद्रमाला ॥ तजि वैकुंठ नैषधकाव्य धामै हरिमिलि कमला सँगसोपै ।। सुर नर नाग सिद्ध किन्नर मुनेि हाथ बाँधि पग जोमै । तारत्नाकर माहँ नि दिन होइहै बास तिहारो॥ लहरी ललित केलि जल साजो मिलिक प्राणपियारी ॥ ५१ ॥ भुजंगप्रया- त॥ कहीं दूतवाणी महानेहकारी । दमयंली भई नाहि नेकौ मुखारी ॥ धरै हाथपै आरसी से कपोलै ।। सुनीक सुनी नाहिं यो चित्त डोले ।। ॥ ५२ ॥ सोरठा ॥ दमयंती अति दीन, भई सुनत ये वचन कटु ॥ दीह सांस दुख लीन, करुणाकी तसबीर जनु ॥ १३ ॥ दमयंती ॥छप्पय॥ भेदत हो ममकान बोल बोलत कटु जैसे। काहे क. हि सुर संदेश सुई मन लागत यैसे॥ अर्धजीवी हुती करी ताहूते छीनी॥ साँचे तुम यमदूत दूतता साँची कीनी॥तु वदन कड़त अखराविरसप्रगट रुप और धरै ॥ परकान कीट ज्यों काटि अति प्रचंड पीडा करे। ५४ ॥ सोरठा॥ अली और करि नयन, ता मुखलों उत्तरदयो । फेरि रुखौहैं नयन, ऐंचिकरी भृकुटी कुटिल ॥ ५५॥दमयंतीकी सखी। तोटक ॥ यहिके जिय लाज करी कसना॥ निहचै यहिकी हमहीं रहना सुनिये सुरदूत बनाइ कहैं | हमही यहु उत्तर देनचंहें ॥ ५६ ॥ दंडालय ॥ निहचै चित जानौ ठीक रखानौ भोर स्वयंवरसाजिभले ॥ चहुँ ओर सभागे उत सब लागे ऐहैं राजकुमार चले ॥ भूपति नलप्यारो निरखतिन्यारो वरन माल तेहि गेरिगरे॥ युगसों दिन बीतत चित चितु- चीततु आपुकरत उपहासखरे ॥ ५७ ॥ चर्चरी ॥ आपु आजु बसौ इहाँ तुम ओर देखत जीजिये || जाइगो दिनबीतिकै भिस प्रीतिको रस लीजिये ॥ ही लिखी तसबीर ज्यों खगराज जो नलराजकी । सो मिले छबिरावरी सम एक शीलसुभाइकी ॥ ५८॥ नीलस्वरूपक॥ साँचुठगे विधि लोचन तेरे ॥ जो तुव आनन और न हेरे ॥ भोर विलोकि नलै फल लेहौ ॥ भूतल चंद्र सुधाहि अचैहौ ॥ ५९ ॥ हंसगति ॥ अब देव संदेश न भाषौ ॥ यह दंतकथा धरिराखौ ॥ हम माँगत अंजलि जोर ॥ यह बोलिरही मुख मोरे ॥ ६० ॥ सोरठा ॥ ज्ञान दया अरु धर्म, तीनि रत्न जिनहूँ कहे ॥ कहाँ कवन यह कर्म, ताहि तजे पावे नरक ॥ ६१ सुनत सुधा से वैन, मदन अनल आहुति परी॥ करि सकु- A का पै नैषधकाव्य । ८३ चौहें नयन, गनत आपुको अदय अति ॥ ६२ ॥ दोहा ॥ बिध्यो मर्म आरत वचन, दूत धर्म थिरनेहु ॥ दीह साँस मुख छोडि नृप, कं- पुकंटकित देहु ॥ ६३ ॥ देवदूत ॥ प्रद्धाविका ॥ सुर रूख रहत सब इंद्रधाम ॥ वे देत सदा अभिलषत काम ॥ तुमको सुरेश माँगे पुकारि ॥ गहि दें तुम्हें तौही विचारि ॥ ६४ ॥ हिय तो विवाह अभि- लाप आनि ॥ रचि अग्नि यज्ञ विधि साँचु जानि ॥ निज माह होमि निज अंश भाग ॥ माह लेइ तुम्हें निहवे सभाग ।। ६५ ।। तोमर ॥ यमराजकी दिशि ईश ॥ नित हैं अगस्त्य मुनीश वरदानको संभाव ॥ जगमें प्रसिद्ध प्रभाव ॥६६॥ दोहा ।। तुमको याँचत जाइ यम, जो ति नसों कर जोर ॥ तातोको ऋषिराज गाह, देहि तुम्हें बरजोर ॥ ६ ॥ तारक ॥ जलपालक सुरभी बहुतेरी ॥ तुमको तह याँचत जो कर जोरी ॥ तबतौ वहिके घरही तुम जै हो । सुर शोक करे नलको नहिं ६८ ॥ जब इंद्र मन कारे हैं निजनारी ॥ करिहैं न शची मखकी रखवारी ।। तब जूझ स्वयंवर में भरि है जू ॥ नहिं माल गरे नलके परिहैजू ॥ ६९ ॥ गनि है न अचारजकी बहु फुकै ॥ कहिये अपनी नहिं आगि भभूकै ॥ विनहीं शिषि साखि न ब्याह बनगो ॥ जलसों मिलनो केहि भाँति सनेगो ॥ ७० ॥ जलनायक जो यहि भांति रुठे हैं ॥क्षिात ते सिगरे जल ऐंचि उठे हैं । केहि भाँत संकल्प पिता करिहैगो !! करतौ बलके करपै धरिहेगो ॥ ७१ ॥ इन बातनहीं यम- राज ठहै ॥ अपनो इक किंकर मीच पठेहै ॥ तुमही कहकै नलको हरिलेहै । सबही दुखसागरको भरिदेहै ॥ ७२ ॥ दोहा ॥ ताते मो हितकी कही, चित धरि राजकुमारि ॥ करिये आप दिगीश यक, चारौ माहँ विचारि ॥ ७३ ॥ जहांहोत सुर विघ्नकर, करत चित्तमें रोष ॥ करमें धरो न पाइये, है करमेको दोष ॥ ७४ ॥ नल मिलापकी हानि गनि, सुनत दूतके वैन ॥ वर्षावन लागी कुँअरि, सावन भादौ नयन ॥ ७५ ॥ सवैया ॥ कालनसों अलिनी अलि ज्यों दुहुँनयननसों अँसुआ युग टूटै ॥ काजर नीर मिले झमके परिपीन उरोजनपै छबिलूटै ॥ नील भणीन से चंचल चारु लसै छिन आछिनसों नहिं छूटै॥ दै रवि बिम्बधरे नैषधकाव्य । उठी लपट जनु भालपै बालशनीचरसे चितचूटै ॥ ७६ ॥ त्रटिका ॥ चहुँओर भ्रमत जोवतु अपार ॥ अतिधुनत शीश बगराइबार ॥ तनु बर मदनझार ॥ पियराइगई तजिकै सम्हार ॥ ७७ ॥ दृग बोठगई सू- झत न आन ॥ मतिभई मूढ़ जिमि विगतप्रान ॥ नहिहोत जानि नल- को मिलाप || तब करनलगी बहुतै विलाप ॥ ७८ ॥ दमयंती ॥ दूतविलम्बित ॥ अनलमैन करी अभिलाषम ॥ सजहि बोग हमै किन राखमै ।। निषधदेश चलो उड़ि वायुसों। समैपाइ मिलों नलपाइसों॥७९॥ ऐविरंचि बडे तुम धीरहौ । परमनोरथ भंजन वीरहौ ॥ जियहु कोटि बरीषन जाइकै । पियहु मोतन प्राण अघाइकै ॥ ८० ॥ तारक ॥ क- हि हिय जो तुमलौ हम येहौ ॥ विरहागिनसों कुंभिलाइ गये हौ ।। शर फूलन भेद तुमै न अनैसो।। अब आपन वज्र केहो तुम कैसो ॥८॥ भतिता यह मान भयो हिय राहै।। अजहूँ जिय ताहि न छोड़न चाहै ।। यह कौन विचार सजोषसनोहै ॥ युग चारि सती ब्रतमै हसनोहै ।८२॥ मनहरण।। नयन हमारे पूरे पातक अयनसाँचे जिनके मनोरथ विफल भये आईकै।। अँसुआ प्रवाहनसों धोवत रहत नित तऊ जरत हजार वार वार अकुलाइकै । चारिहूं दिगीशनके दयाको समुद्र सूख्यो जासों मि- टि जात ताप तीनहु बनाइकै । जिनके कटाक्ष एक मोहूं ते सरस कोटि तरुणी तुरंग तिन्हें मिले सरसाइकै ॥ ८३ ॥ सवैया ॥ ये युगसे छिन बीततहैं दिन मीच मनाहि कहा सहिहौगी ॥ प्राणपियारो छुटै मन ते न छुट्टै मन मोरयहै चहि होगी ॥ अँसुअनके झरसों निशि द्योस बड़ी वर्षाऋतुकै रहि होगी ॥ हेरि यहै सुर सोइ गये बिन काज विलाप कहा करिहौगी ॥ ८४ ॥ ये नलराज तुम्हें चितमें धरि दासी भई निहचे- हम तेरी ॥ देखतु हौ निज नयननसों अब होति है ये कछु जात न मेरी ॥ बागके ताल तलायनमें नित हूँढि फिरी बहुतै करि फेरी ॥ सोऊ विरंचिलये हरिकै खग डारि दई जिन पाँयन बेरी ॥८५ ॥ तेरे वियोग गई तजिकै तनु एक तिया दमयंती बखानी ॥ रावरे काननमें परिहै नल यों चरचा चलिकै सरसानी ॥ आप दया तब तो करिहौ सुनिकै करुणारसकी यह वानी ॥ अंजलि जोरि कहौं तुमसों सुधिकै सजियो भरि अंजलिपानी ॥ ८६ ॥ अम्बुज नयनि वि. योग भरी विरहाकुल बैन कहे दुखभीने ॥ सो मुनिकै उरलागि उड़ी विरहागिनिकी लपटें अतिपीने ॥ वासवकाज सबै बिसरयो नल राजभये सुमहामनदीने ॥ बैठिरह्यो तेहि ठौर ठग्यो जनु बावरो सों पियरोर- गकीने ॥ ८७ ॥ नल ॥ सवैया ॥ कारज कौन विलाप करै मृग लोचनि सोचनि को तजिदीजै। पंकज सों मुख छाइ रह्यो मुक्तागण ऑ- सुन विदुन भीजै || आगे खड्यो नल है यह तौ तसलीम करै किरपाकार दीजै॥करि तिरछी दृगकोर निहारि मुधारसप्यास बुझै तब जीजै८८दोहा विंदुमतीकी चातुरी, तें जुकरी निरधार ॥ तोहीते संसार यह, निहचैभयो संसार ॥ ८९ ॥ जलजपातपै इंदु ज्यों, करपर धरे कपोल ॥ अँसुअ. निके मुक्तानि सों, लसत हार हियलोल ॥ ९० ॥ नयनन जल कन्जल मिलित, हाँपोछाँ निजहाथ ।। पग पराग रजभूरि हौ, नयननसाँ घसि- माथ ॥ ९१ ॥ त्रिपदी ॥ मानकरौ तुम जोपै ॥ दोष कछू लखि- मोपै ॥ तो बहुतै अनुरागौं॥ तुअपायन लागौं ॥ ९२ मनहरण ॥ रूप अभिमान भरी बोली धाँ न बोली बैन नयन साँ निहारे होत कौन सुअयासुहै ॥ कलपलता है तैहीं पावक सपा है सब मोको दीठिदान मैं कृप- णता निवासु है।।मधुर अधरकोर कीजिये विहँति सित भौंहकी ललित लोल लीलागति लासुहै ॥ कीजियै हुकुम मोहिं अरज महेशजूकी चरचाको करौ- नेह चरचा प्रकाशुहै ॥ ९३ ॥ सवैया ॥ आसनकी वर्षाऋतुको तजि सादरकै मुसक्यानि जुन्हाई ॥ लोचन खंजन खेलकरैं मुखपंकज कांति चढे सरसाई॥ सारसुधारस काले कथा कहिये ममकाननि मानि मिताई। चम्पकसे तनु अंक अभूषण कैमिलि कण्ठकी मालसुहाई ॥ ९४ ॥ काम नराचनिको ठगिबो सबु तैं मृगनयनि सिख्यो सरखान्यो || ज्योंमिलती हियभीतर त्यों तनु बाहिर भेंटनको अकुलान्यो ॥ तेरोइ रूप अनूपछयो मन नयननको बहुकोचु बखान्यो॥ मार न मार लगै किन बाणनि प्राण- नि मैं नकहूं डर आन्यो॥ ९५ ॥ हंसगति॥ तुअ ओंठनको रस चाहौं। मधु सीध सुधाहि सराहौं ॥ गिरिशंग उरोज बिलासौं ॥ नय इंदुकला परकाशौं ॥ ९६ ॥ मनहरण ॥ मनमथ मानको निरतु ते करति नित

नैषधकाव्य
रोमावलि नवल ललित सूतधारीहै।। तेरे अंग हारमें सरसरुचि नायककी
शीशफूल द्विजैराजहूंको हासकारीहै ॥ नवरसभाव अनुभावके भवननीके
लोचन अनतगति चतुर सचारीहै ॥ अभरनतार सुकुमार ये बजतवीन
मोहत प्रबीन ते नवीन बैस खारीहै॥९७॥ शोभनसुरेष अठबरगुसुवेष लि-
ख्यो मृदुलअधरपर तेरेविधिचाइसो॥ लगनभलीमै लयो तोतनमनोजराज
भयो मनभायो काज सरल सुभाइसो॥ लगत दशनछत रोचना तिलक
ताहि करोंमें बनाइ सब अंगनि बनाइ सो ॥ जीतिकै सुरतरौने
प्रीति कै मुदित मन गहि गहि पांइ जाइ मिलौ रखराइसो ॥ ९८ ॥
मृदुगति ॥ बलि हँसि मृदु वैनि ॥ हम पै करुन कारे ऐनि ॥ रस
अधर चाखि अभेव॥हम करें उरसिजसेव ॥ ९९ ॥ दोहा ॥ ज्यों
गिरिजा गिरि शयनकी, शीत करिनकी नि।। हों नल हौं ताकी तुही
प्राणसजोवनिऐनि ॥ १०० ॥ तारक ॥ विरहाकुल बोलि चुक्यो
यह वानी ।। पुनि चेत भयो मनमें मति आनी ॥ मुनि ज्यों लगि चित्त
विकारही जाने ॥ तब रोकि रहे मनमें पछिताने ॥ १०१॥ नल ॥प्रद्ध-
टिका | मैं करयो कहा ऐसो अकाजु ॥ यह जानि जाइगोदेव
राजु । मैं दयो हाइ आपुन बताइ ॥ बहुभाँति रह्यो अवलोकि
पाँइ ॥ १०२ ॥ सुरकाज गयो सिगरो नशाइ ॥ सकिहीं न तिन्हैं
आनन देखाइ ॥ हनुमान आदि जस सेत दूत ॥ उपहास सेत हमहें
अभूत ॥ १०३ ॥ झूलना ॥ नहिं आपनी मतिसों कहे हम बोलि वैन
असाध । निज जानि हैं यह देवता निज बुद्धि बूझि अगाध ॥ अब
देखिये कहिये कहा जगलोग ये यहि काम ॥ सब कहत पालक सों
जनदन हरति शिव नाम ॥ १०४ ॥ सोरठा ॥ फट
तु हियो भरि लाज, सुरसँचोटि याकीलमें ॥है न ओरसों काज, जन मुख
पेकोकर धरे ॥ १०५ ॥ होत ज्ञानसों काम, सोई विधि पहिले हरयो
देव होत जब बाम, तब सुरहूँ सो होत नहि॥१०६॥तोमर॥ यहि भाँति
सोचि नरेश ॥ करि चित्तमाह कलेश ॥ तिनको प्रबोधन काज || तब
आइयो खगराज ॥ १०७ ॥ दोहा ॥ भयो पक्ष झंकार तब, ऊपर
लख्यो महीश ॥ आयो हाटक हंस यह, सोई है विसवीश ॥ १०८ ॥

नैषधकाव्य हंस ॥ भुजंगप्रयातः ॥ महिपाल तोमें न नेकौदया है ॥ निराश करचो याहि ऐसो कहा है । सहै कामके शूल यों अंक ओड़े। तिहारे विना साँचेहू प्राण छोड़े ॥ १०९ ॥ सारांगिका ॥ यतन करीही रचिकै ।। सुरपति काजे सचिकै ॥ तेहि पर यों सोचति हौ ॥ तुमन मृषासों रोचति हौ ॥ ११० ॥ मल्लिका ॥ बोलियो मरालराज ॥ सा- जिकै दुहूँ सुकाज ॥ माँगिकै विदा विनोद ॥ जातिभो विरांचे कोद ॥ १११ ॥ करहंस छंद ॥ नल सुरनि जानि ॥ किय हृदय मानि ।। करि करि प्रणाम । लखि मुदित बाम ॥ ११२ ॥ नल ॥ नाराच ।। दिगीशकाज लागिकै कुबोलमैं महाकहे ॥ सुधन्य धन्य देवित विनीत कै सबैस हे॥वियोगकीजु आगिसों वच्योहिये बनाइकै॥भलो भयो प्रमादु मोहिं भागसों सुहाइकै ॥ ११३ ॥ सोरठा ॥ दोष होत गुण आइ, काहू मिलि काहूसमै ।। जो लंघनु सरसाइ, बड़ी बड़ाई, व्रतनमें ॥ ११४ ॥ सवैया॥याँचतु हैं तुमको सुर चारौ बड़ी करिकै मनमैं अनुहारयो ।। मोहुँकसेवकपाँयनको अब चाहत है करयो चित्त तिहारयो ॥ हौ चतुरै परवीननिमें तुमलों करिये निरधार विचारयो । शूल अतूल बदै पछितात जबै सहसा कछुकाज सँवारयो ॥११५ ॥ बिंब ।।सुनत नल वैन ऐसे॥ सरस पिकराज जैसे ॥नृप मुकुटभीमजाके॥ सुकृत तरु फूलपाके ॥११६ दोहा॥ उमडि मोद हों हियो, मधुर बोल सुनि कान ॥ ज्यों मधुऋतु शोभा बढ़े,कूकत पंचमतान॥११७॥सवैया॥ छूटतही नलके छलको दम- यति तजी चितकी दुचिताई।जाति भयो भय भूल्यो विराग भई अनुरागहिकी सरसाई। ता सँग बैठिहि आननखोलि औ बोलि करी बतियाँनि ढिठाई नारिनबेली कि नारिनई नखते शिख लाजके सिंधु समाई॥ ११८ ।। दोहा ॥ आनंदके अँसुआनिसों, उमहे रोम अतूल || वर्षाऋतु विकसत भयो, ज्यों कदम्बके फूल ॥ ११९ ॥ दोधक ॥ उच्च उरोजनिपै शिर- नाये ॥ कन्धर कन्धन नेक उठाये ॥ जानिगई मनकी मति आली ॥ आपनते चरचा हँसि चाली ॥ १२०॥ दोहा ॥ सकल भूप शिरमुकुट मणि, महाराज गुणभौन ॥ सत्यसिंधु सुखतिधुशशि, तुम समान जगको- न ॥ १२१ चौपाई॥ सुनी आप मुखते निजबानी॥ पूरीलाज रावरी नैषधकाव्य । आनी ॥ हौं याकी अब को बखानी।। सो सुनि सुखद साँच मन मा- नो ॥ १२२ ॥ मूरति लिखी रावरी जहां ॥ खड़ीरहै निशि बासर तहां॥ बार बार पांयन शिरना ॥ नयननराखि प्रबाह बहावै ॥ १२३ ॥ पृथ्वी ॥ तुम्है सुरमरालही वरणिबात मेरी कही।। वियोग दुःखकीदशा दुसहदीह जैसी रही ॥ सुधानिधि सुवशमै जन्मरावरो है सही ॥ मली मसनृसंसता कहौआप कासों लही ॥ १२४ ॥ छप्पय ॥ तुमसों हारयो काम सरसतनु काँति प्रकाशौ ॥ मुखसों हारचो चन्द्र चारु चन्द्रिका बिलासौ ॥ यह ताकी है तिया मोहिं जानत वै दोऊ॥ देतमीचु नियराइ तापतन पाप समोऊ।। यहि भाँति भयो मेरो भलो, मोहि तिहारी कै गन्यो. सब अमर सत्य संकल्पहै तो बनाव मेरो बन्यो ॥ १२५ ॥ सवैया ॥ मोहिं रजाइ सुधाधर अंशनि राखलै चाहत कालिका मेव्यो ॥ यों अकलंकित द्वै मिलि है मुख रावरो मै सुवृथ सुख मेट्यो ॥ हों भरी सुवधू वध पातक तो मुख माह कलंक लपेट्यो ॥ जो करै पातकसे बढती उतपातनिसों नित होत ससेट्यो ॥ १२६ ॥ मनहंस ॥ निज बानदे परसन्न झै रतिराइसों ॥ बहु आनि मोहिं हनै तहीं अति चाइ सों ॥ तुम माँह प्राण मिलाइ कै तजि देहको ॥ तब जीतिहौ तुम रूप पाइ विदेह को ॥ १२७ ॥ सवैया ॥ देवनके गुण वेद बखानत भेदिनसों शुचिकी चरचामैं ॥ ये तुमसों अनुरागि रह्यो जनु ताहि कहातनिकौ मन भामै ॥ प्रातबढाइ करे करजोरि सबै तपसी रविकी महिमामै ॥ चन्दहि देखि अनन्दित होत कुमुदिनीके कछ कामन आमै ॥ १२८ ॥ वंशस्थ ॥ हथ्यार धारी व्रत ये सदा धेरै ॥ डरै सुनासीरहुसों तिलै भएँ । प्रसून नाराचन काम जो हने ॥ न मोहिको राखत हो कहा गनै ॥ १२९ ॥ मनहरण ॥ हमतौ तिहारे चर्णनकी शरनि गहि ताहि मारयो चहत मदन निर्दई है ॥ ताहि कहा छोडत हौ देवता स्वरूप जानि देवतानि जानै वा चंडार गतिलई है ॥ ताहीके बनावत विषम ये विशिष मधु कुटिल कठेरो मतितासां मिलि गई है ॥ दोषी औ अदोषीसों भलाई ओ खोटाई करे होत अनरथ बात वेद निरमई है ॥ १३० ॥ छप्पय ॥ स्वयंवरकी राति आप रुचिसों नैषधकाव्य । अनुरागै ॥ करयो साँच तुम दूत पाप तनिको नहि लागै ॥ तुम मोसों मिलि यज्ञ सानि देवन सुख देहौ ॥ पूजन दान विधान गान गुण वेद बनै हौ । यहि भाँति हरषि हिय सकल सुर सुरपुरसहि त समाजसों ॥ नहि दे तोहिं उराहनो वदन मौनधरि जालसो॥१३१॥ शार्दूल विक्रीड़ित ॥ आवें क्यों न इहां स्वयंवर बने चारा देवता।। हो तोको बरिहौं बनाइ उनकी कैके बडीलेवता ॥ आगे करुणानिधान उनको मोको दुखीजानिक। वेनाही तुमही काम तिनहो येती करो खानि- कै ॥ १३२ ॥ पद्धटिका॥ यहि भाँति देखि तेरी सबीह ॥ इमि करति विलापनि दीह दीह ॥ बिच बीच मोन मर्याद ओलि ॥ दियं सुधासार भूषणहिखोलि ॥ १३३ ॥दोहा ॥ मन्मथ अनु वर राबरो, साँचो चोर चंडार || वनबासी मधु मित्रकरि, चित्त चुरावन हार ॥ १३४ ॥ भैन उपनिषदमें दयो, याको तुम्हें सुनाइ ॥ आने इच्छा रावरी, सोई बनै बनाइ ॥ १३५ ॥ दोधक ॥ दमयंति यकंत कही यह बानी॥ विश्वास सुधारससों लपिटानी ॥ तुम देवनसंग स्वयंबर आयो ।। तिनको नि- हुचै करि वैन सुनावो ।। १३६ ॥ प्रद्धटिका ॥ तब करयो नृपति यह अंगिकार ।। शिरनाइ सकुचि यह बार बार ॥ पुनि विदाभयो करिकै विनोद ॥ रथसाजि चल्यो सुरपथ निकोद ।। १३७ ॥ युग चारभये सब रैनियाम || अति दुसह विथा तनु करीकाम ॥ यहिते दयाइ मानौ विरं- चि ॥ सब रैनि त्रिजामा कीन संचि ॥ १३८ ॥ सोरठा ॥ भयो जो कछ व्यवहार, आइ नृपति बिनयो सकल ॥ जानिगये तब सार; भये उदास दिगीश सब ।। १३९ ॥ इति श्रीप्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खण्डल श्री खाँ साहब अली अकबर खाँप्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचित्ते काव्यकलानिधौ नलपरिचयो नाम दशमस्सर्गः ॥६॥ दोहा ॥ कथा ग्यारहें सर्गमें, राजस्वयंबर ठाट ।। राजनको आगमन पुनि, नगर ग्राम वन बाट ॥ १॥ सोरठा ॥ स्यंदन साजि कुमार ९० नैषधकाव्य । सब कुलीन आयधनें । सुन्दर शूर उदार, चतुरस्वयंबरको सरुचि ॥२॥ सवैया ॥ कौन न मैनके बान बिध्यो अरु कौन कुमार चल्यो अकुला- इकै ॥ कौन न मारग पूरि रह्यो हय मत्त गयंदन सों सरसाइकै ॥ कौन पहारन चूर भयो दलिकै न गयो वन कौन बनाइकै॥कौन न सागर सूखि गयो अरु कौन दिगीश उठ्यो हहलाइकै ।। ३ ॥ तारक ॥ तेहि लायक व्याहनको मतिचाली । हठसों हरिलेन चले अपचाली ॥ जन औरतमा- सेहिकी रुचि दूनी । पहिचानि परे दशहूँ दिशि सूनी।। ४ ॥ गीत ॥ यहि भाँतिसों सबही भरी नृपसैनभीरन सों भली।छुट शीशते तिल नाल है तल यों रही गसिके गली।। तेहि माहँ जो तनिको चल्यो कोउ आगेही सरसाइकै ॥ दमयंति व्याहिलई मनौ वहु यो रह्यो सुख पाइकै ॥ ५ ॥ दोहा ॥ नगर बडयो कौतुक भयो, उठी नारि भहराइ॥ लखै दरीचिन में दुरी, तब वणे सब भाइ ॥६॥दोधक।। रोंकि रहे मग लोग अगारी ॥ देतधका बहुतै पिछवारी ॥ अंगन अंगगये मिलि ऐसे ॥ यंत्रन दीच चपे जन जैसे॥७॥ मनहरण। दिशि दिशि हूँ ते दिनकरसे दिपात दीह राजनिके दल चले कुंडिननगरको ॥ धुंधुरिके पटल सघन परि पूरिरही समुद्र सुखाने सोच बढ़त सगरको। तजिकै दिगीशन दुहागिलक दीनीदिशि मेले कै वदन सहैं शोककी रगरको ॥ डगर डगर पुरवासिनसों मिलि रहे जाने न परत गये बगर बगरको ॥ ८ ॥ सवैया ॥ भीर भरी चहुँ ओर खरी थकि राजनकी सब फौज घनेरी ॥ उच्च पताकनसों नगरी करु फेरि बलावत है बहु तेरी। हाथिनके हलका गण मंडि भई नभ ज्यों वसुधा घन घेरी ॥ चञ्चल वाजि खुरीन किरे न भयो बसुधातल ज्यों नभ येरी ॥ ९॥दोहा॥ आखंडल ओ दंडधर, शिषी वरुण दिगपाल गये चारि येई तहाँ, गये न और उताल ॥ १० ॥ सखीसों सखी ॥ सोरठा || कहो सखी केहि हेत, आये और दिगीश नहिं ॥ तीनौ लोक समेत, कौन रह्यो उत्सव सुने ॥ ११ ॥ सखीको उत्तर स- खीसों। मारक ॥ नृप भीम पुरोहित जे ऋषि आये ॥ दिग बन्धन के सब मन्त्र सुनाये ॥ बहुतैरनि जो दिग्पाल कहाँपै ॥ तब क्यों करि ता महँ वे पहँ आवे॥१२॥ दमयति विलोचन देत हरे।समुहें नसके नैषधकाव्य । ९१ चलि ये विचरे ॥ मृगवाहन पौन जु हे दिगराजै॥ यहि हेत तहाँ यह आवत लाजै ॥ १३ ॥ सोरठा ॥ स्वच्छ शैल माणे देखि, आति कुभाँति तन आपनी ॥ पुण्य जने सुविशेषि, नहि आयो दिगपाल तह ॥ १४ ॥ दृढपद ॥ राजत आधे अंगमें बनिता छवि छाई ॥ ताके आगे होति है काहे भाँति ढिठाई ॥ ऐसी भाँति विचारके नहिं देखन आये ॥ महादेव परसन्न व तहँ आशिष गाये ॥ १५ ॥ धरें कहाँ क्षिति भारको अहि शेष सयानो ॥ नागी दिशि दिगपाल ज्यों सब देव बखानो॥ खोलि विलोचन वीससै उत्सुक अतिभारी ॥ हेतु बनै नाता- सुको पुर कुंडिनचारी॥ १६ ॥ सोरठा । लोक वेद मत जानि, आये तहां विरञ्चि नहि।। काहू कह्यो बखानि, ब्याह पितामह संग करु॥१७॥ नालस्वरूपक आलिनके मुखकी मुनि बातें ॥ आप अनादरकी चरचातें ॥ दूखत चित्त गये मुख मैले॥ चारि दिगोश चलेतेहिगैले१८॥ सवैया ॥ नलके भ्रमसों दमयंति कहूँ बरिहै हमको इन आसन यागे।। सब चातुर चारि दिगीश तबै नलके सम रूप बनावनलागे।। कोटि उपाय करें श्रमकै क्रमकै न शिरी तनिको तहँ जागे ।। झूठनकी छबितौ लगिहै नहिं जौलगि आवत साँचकेआगे ॥ १९ ॥ तोटक ॥ पहिले मुख पूरण चन्द्रकरयो ॥ परफुल्लित पंकजक निदरचो ॥ तब दर्पणमें लाखकै न बन्यो ।। सुर चारहुके उर शोचघन्यो ।॥ २० ॥ सोरठा ॥ करि करि थाके गोहि, लही न तामुखकी प्रभा ॥ नलमुख कैसे होहि कहेवेद सुर अनल मुख ॥ २१ ॥ दोहा ॥ देवनकी छविसों बड़ी, नलतन छवि नित नूत ॥ यहै जनावन काजविधि, मनौ करे यकसूत ॥ २२ ॥ चारौ भये अलीक नल, पहुँचे राज समाज ॥ सबै आपनेकाजको, लजत न छोडतलाज ॥ २३ ॥ तारक ॥ पहुँचे सुर वे नलके कछु आगे॥ नहिं नैसिक देखत सुन्दरलागे ॥ परिजात जबै हरिजू हरिलाये ॥ नहिंचारि सुरद्रुम होत सुहाये ॥ २४॥ सोरठा॥ महादेव हियहार, आये बासुकि सेत छवि।करत शोर संभार, सेना अनुचर रंग सब॥२५॥मनहरणमिदन अनल झुक झुकन झुलाये तूला येतूलतुलनआये आनंदके मूल हैं। सातौद्वी- प द्वीप दीह दीपीत अवनीदिपति अवनीपति समूह राजभौननके कूलहैं।

नषधकाव्य सुन्दर सदन सौंध गला विचित्रबाग आसन सकारे उपबन फूल फूलहैं। आदरसों आगह है लै लैराज भागलोग भागन सयोग राखे मन अनु- कूलहैं ॥ २६ ॥ बंधूक|कुडिन बासव आपुहि आये॥ राज समाजनको शिरनाये ॥ आदरकै विनती बहुकीनी ॥ इच्छित वस्तु सबै भरिदीनी ॥ २७ ॥ सोरठा ॥ कीरति तिया सलील, भूप सदन नृप भावती ॥ दान दया शुचि शील ये रखवारे कंचुकी ।। २८ ॥ तोटक ॥ जिनसों पहिचानि हुती पहिली ॥ तिन संगरही मतिहीन मिली ॥ नृपभीमकरी इकसी अरचा ॥ सब भाषतु वा गुणकी चरचा ॥ २९ ॥ दोहा ॥ कहा राउ कह रंक सब, सन्माने नृपभीम ॥ यथायोग सब कै मुदित, गहे आपनी सीम ॥३०॥ नीलस्वरूपक ॥ राजसमाज सबै नृप मंदिर माँ- हगये ॥ विस्तृत भौन सुपासन संकटलेश लये ॥ ज्यों मुनिको करसंगत सागर आनि लसै ॥ ज्यों हरिके प्रतिरोम अनेक त्रिलोक बसै ॥ ३१ ॥ दोहा ॥ द्वार द्वार उत्सव लगै, चित्रित करे अपार ॥ नभौ भयो भूषित मनौ, नृप भूषण संभार ॥३२|| सवैया॥ बोल विशाल विभूषण सुन्दर हैं जिनक सब चाकर ठाढ़े ॥ जानतहैं अबला जन बालक मा- नहु ये नृप हैं द्युति बाढ़े॥ चामर पौन प्रस्वेद चलै नहिं देखि समाज रहे लिखि काढ़े॥ छत्रनिसों कुम्हिलात न फूल यों देव नदेव गये मिलि गाढ़े ॥ ३३ ॥ संयुत ॥ निशि माँह सोचति देखिकै ॥ दमयंतिको अवरेखिकै सब होत पूरण काम हैं ॥ अभिलाषसों अभिराम हैं ॥ ३४ ॥सोरठा। भोर भये नृप भीम, पठये राज बोलाइ सब ॥ गहें स्वयंवर सीम, नर भूषण भूषित भये ॥ ३५॥ दोहा ॥ बैठतही नल राजके, भये राज छबि छीन ॥ सकल कलानिधिके उदै, ज्यों तारा झुति दीन ॥ ३६ ।। सवैया ॥ राज समाज किदीठि परी नलके पहिलेइ उछाह भरी ॥ बानके देखि अचानकही पुनि भ्यानक भोंह मरोरि करी ॥ इन्दु उयो प- हिले पुहुमी महँ मूरति दूसरी काम धरी ॥ दस्र भयो तिसरो निहचै छ- लकी महिमा बहु भाँति भरी ॥ ३७॥ दोधक ॥ बोलि उठे उर बुद्धि कुचाली ॥ राजति ह्याँ कतिको शुति शाली ॥ रोष भरे हँसि बाँह उठाई।। आस अलीक नली दिखराई ॥ ३८ ॥ सोरठा ॥ गुणको दोष बखान नैषधकाव्य । करत औरकी और नित् ॥ खेलत सहज सुजान, निज गुण दोष विचार नहि ॥३९॥ तारक॥ नित गावत है जेहिको यश वानी ॥ तडितायुत अम्बुज ज्यों सिय रानी ॥ नभ देखत ठाढ स्वयंवर साजे ॥ हरि जू चढि के खगराज विराजे ॥ ४० ॥ सेनिका ॥ आठ ओर आठदीठि दै रह्यो।लोकनाथ आश्चर्य वै रह्यो॥भूलि विश्वकर्म हूँ सुचातुरी ॥ राजथान दोखे चित्त आतुरी ॥४१॥ चौपाई ॥ मूरति एक करी हरि लोचन ॥ दूजी उदयाचल मन रोचन ॥ द्वादश तनु विदश तनु धारी ॥ दशहूं दिशि नृप भीर निहारी ॥ ४२ ॥ सोरठा ॥ सुर गिरिकी रजनीश, नितप्रति करति प्रदक्षिणा ॥ तह लख्यो विस वीश, हरके बॉये नयन ॥४३॥ दोहा॥ सबनभते टंटी परै, छूटो वेणी छोर॥ अमर वधूटीरि सभरी, निरखि राज चहुँओर ॥ ४४ ॥ चर्चरी ॥ यक्ष लक्षनि सों लसें सतलक्ष सिद्धनसों भरी ॥ भीर किन्नर कोटि कोटि महर्ष हर्षन विस्तरी ।। वाल्मीकि बखानहीं निज आदिही कविताकरी ॥ गीरवान- निसाँचरेस गुरुनिहूं महिमा धरी ॥ ४५॥ पद्धटिका ॥ ये जुरेआइजे हैं भुआल॥ नहिं भीम बुलाये भूमिपाल॥ निज देखत कौतुक विधिअ- पार ॥ रचना सुचारु त्रैलोक सार ॥ ४६ ॥ विधि धरतुआनि प्रतिमास जोरि ॥ जेघटत सुधाधर तोरि तोरि ॥ तिन मेल रचतु इनके शरीर ॥ ज्यों झलझलात तन हेम हीर ॥ ४७ ॥ सोरठा ॥ इन भूपनमें आनि, मिलै दीजिये दस्रजो॥ पर न वै पहिचानि, आपसमें किन पचिमरै ४८॥ दोहा ॥ ये जे राजतहैं युवा, परम रूपकी खानि ॥ एक मयनके जरिगये, कहा होत जगहानि ॥ ४९ ॥ उच्चमंच शिखरन सुथित, किये भीम करजोरि ॥ मेरुशंग बैठे लसत, मनौ देवशत केरि ॥ ५० ॥ चौ- पाई ॥ देखीराज भीर वहु धाहीं॥ भीम भप सोच्यो मनमाहीं॥ ये सब भूपति देवसरीखे ॥ कौनकहै इनके गुणसीखे ॥ ५१ ॥ दोहा ॥ कौन सुतहि समुझाइहै, गुण कीरति कुल गोत ॥ कीजैकहा उपाइ अब, भयो विषाद उदोत ॥ ५२ ॥ तोटक ॥ तिन ध्यानधरयो हरिको जवहीं॥ हरिजू परसन्न भये तवहीं ॥ कमलैक्षनि वाणिहि बोलिकह्यो । उनहूं मनमें अति मोद लह्यो ॥ ५३॥ हरिजू ॥ तो० ॥ यह राजसमाज सुहावत नैषधकाव्य । है ॥ गुणगोत तुम्हें कहिआवतहै ॥ इनके तुम जाइ चरित्र कहौ ॥ जगती कवि कौतुक मोदलहौ॥५४॥प्रद्धाटका॥ तब चली वारण कारकै प्रणा- म ॥ अवतरीसभा विच बेमबाम ॥ शुभ उदरलसत बलि त्रयोरूप ॥ साहित्य लखत लोचन अनूप ॥ ५५ ॥ मुख धरत सोम सिद्धांत चारु ॥ अरु उदर शून्यता बाद सारु॥ है वर्ण मात्रा दोइ भाँति ॥ सब छह मनी भुज युगलकांति ॥५६॥ सोरठा ॥ जाके चरितं अपार, सब शिक्षाके ग्रंथ हैं।।रचना सहज शृंगार, कल्प ग्रंथ आकलप विधि ॥ ५७ ॥ गुण दीरघके भाव, मधुर नदत शब्दावली ॥ सुवरणरूप बनाव, रसना र. चि व्याकर्णसों ॥ ५८ ॥ दोहा ॥ ज्योतिर्मय तारा रसाम, भई दंत द्युति मूल ॥ पूरब उत्तर पंथमत, द्वरद छद अनुकूल ॥५९॥सोरठा॥ ब्रह्म कर्मके भेद, दै विधि श्रुति विद्याकरी॥ उत्तर जानि अखंद, पर सन उत्तर चरण द्वै ॥ ६० ॥ प्रटिका ॥ करलसत विपचासतबेश ॥ निरंदे नरची गहिकै गणेश ॥ उरराजत मुक्तामाल लोल || जनु वेद- नके आखर अमोल ॥ ६१ ॥ तेहि कह्यो भीम नृपसों पुकारि ॥ मन माँह मोद करिये विचारि ॥ कुल शील दान साहस चरित्र॥ हों काहे हों राजनके पवित्र ॥६२! सुनि मुदित भयो मन भोमनाथ ॥ उठि दौरि लग्यो पगनाइ माथ ॥ करि पूजन वाको उचितरूप ॥ अति उच्च दयो आसन अनूप।।६३॥गीत। तब भीम भूप बुलाइकै हमलीनसों तुरंत कह्यो। इत लाइये दमयंतिको उन शीशप आयसु गह्यो।सब देश देशनते मही- पन ऐचिबे कहँ जाल है।। गुणराशि रूप रसाल मंजुल काम चंपक माल है ॥ ६४ ॥ सब भाँति भाँति शृगार अंबर साजिकै सखिकै चलीं ॥ सुखपालकी असवारकै चहुँ ओरते किरण रलीं। बाजे ताल बीन मृदंग मंगल गीत गावहिं किन्नरी ॥ जयजीव विप्रबधू पढ़ें बरविर्द वंदिन उच्चरी ॥ ६५ ॥ दोहा॥ लागे मग आगे चले, बनिदासिनके यूह ॥ करसुंदर हाटक छरी, टारत लोग समूह॥ ६६ ॥ तारक! पहिले सत लाख लखी जब दासी॥ उमड़ी सब राजनके दृगहाँसी। सखियाँ रतिसी जब फेरि निहारी॥ तब तो तनुकी सब शुद्धि विसारी ॥६॥ दमयंतिहि देखिरहे टकलायो ॥ जनु आनंद सिंधु सुधाहि संमायो ॥ चमके अच नैषधकाव्य । अंचलगात घनेरे ॥ रचि चित्रनिमें जनु काम चितरे ॥ ६८ ॥ तोटक सब ओर सुगंधनकी लहरी ॥ अवली अति भौरनकी छहरी ॥ जिनसों छिपि नेकु न देखि परै ॥ परभा झर चक्रनि चित्तहरै ॥६९ ॥तारक॥ सब ओर गुलाबनको छिरकायो ॥ हँसिकै सखियान अबीर उडायो । करकंदुक फूलनकी नवलासी ॥ परिहास करैं सुधरै गहाँसी ॥७॥ दोहा।। निज लोचनको फल लह्यो, सब भूपन तेहि देखि॥ आसव रस- श्रृंगार छवि, कछु वर्णत सविशेषि ॥ ७१ ॥ देखति टेढी भौंहकै, जहाँ जहाँ नरनाह ॥ सखी ओर कर्पूरयों, कस्तूरी परवाह ।। ७२ ॥ गीत ॥ मुस्क्यानिकी द्युतिसों दबावति जोन्ह पूरण धारकी ॥ यह आनि औनि सुऔतरी निजबामसी हरिद्वार की ॥ सब अंग अंगनमें अभूषण रत्नकांति अपार ॥ जनुलोक लोचन ये लगे जहई तहां सुखसार हैं ॥ ७३ ॥ मनहरण ॥ रदनकी युति निदरत द्युति तारनकी बदन की कांति रुचि चंदकी करकरी। केशनसों कुहू के अँध्यारे निरध्यारे ध्यारे शीशफूल परभा प्रभाकरकी लैधरी|अभिरत गिरत अलिक श्रम सीकर अलकनि गूंदी मुक्तानकी महालरी ॥ दोऊ ओर चलत चमर अवदात मानौ आस पास नाचेहंस बनिता उजागरी ॥ ७४ ॥ गरब सरब वह्यो नाकलोगवासिनके देखि अपसरा अयसी और गैर नाहिने ॥ याके अवतरे अवतरे भयो नाकलोक भूरिभाग भूमि जामें ऐसी निधि चाहने॥ याको जैसो जैसो सुनि सुनिरूप दूरिनते आये हम सब याके गुण अवगाहने वाहूते सहस लाख कोटिगुन्यो रूपयाके लखत बनतं पै न बनत सरा- हने ॥ ७५ ॥ सोरठा ॥ रस शृंगार जलराश, कहूँ लसत पीयूष मय ॥ ताते भई प्रकाश, यह लक्ष्मी लावण्य निधि ॥ ७६ ॥ मुख शशि मुख्य सुयेहु, शशिनभ मैला, छनिक पुनि ॥ भौंह चाप गुणगेहु, फूलनको नहि कामधनु ॥ ७७ ॥ सवैया ॥ टारनकी युग कुंडलीकै निहचै विरच्यो निज काम निशानो ॥ ओर दुहूँसो कटाक्षछुटै विचकै निकसे सुथरे सरमानो।। धूरि भरचो धन भोर धरयो तजि फूल दयो धनु कामपुरानो ॥ याहाकी भौंहनसों वशकै जग जीति लयो पचिकै पहि- चानो ॥ ७८॥ तोमर ॥ विधिकौललै हिमिमाख॥ गहि खंजरीटप्रकाश ॥

नैषधकाव्य ।
तु आनि पावस जोइ ॥ यह दीटिऋपोषतु सोइ ॥ ७९ ॥ कवित्त ॥
दमयंतीके नयन अरु, कमलन सों कछु होत विशेषसो भौरन बूझै ॥
जनु जानि यहै विधि आनि लिखी पुतरी मिस भोरन की युति सूझै ।।
रति कामके सौंध रचै कुचपै छबि पुंज छुटै नहिं दीठि अरूझै ॥ जिनकी
द्युति देखतही चकिकै चकई चकवा झरि आपुस जूझै ॥८॥ चौपाई
मानुष लोक न ऐसी और॥ लखी नकाहू काहूठौर॥ स्वर्ग उरगके लोग
निहारे ॥ तहाँ न ऐसे रूप सँचारे ।। ८१ ॥ सोरठा ।। यह ऐसी सु-
कुमारि, मनहीं सों विधिना रची ॥ हाथ छुये निरधारि, होतो ऐसो रूप
क्यों ॥ ८२ ॥ तोटक || नव फूलनसों सब अंग सची॥ यह काम
विरंचि बनाइ रची।।सुर पंचम कंठ निवास करचो ॥ मुख माह कपूर
सुबास भरयो ॥ ८३ ॥ दोहा ॥ सब ऐसे वर्णन करत, वासव सुरन
समेत ॥ अचल चषनि सखि लखिरहे, लहे सरस सुख चेत ॥ ८४ ॥
सोरठा ॥ कारज हेतु बनाव, निज नलको आदेश करि॥ दुष्ट थानिवर
भाव, धरयो इन्द्र व्याकरण कर ॥ ८५॥ सवैया ॥ भूमिकी मैनका
आइ गई यह मंजु मनोहर भूषण साजे ॥ राज स्वयंवरको अवलोकत
मंगल के सब बाजन बाजे ॥ आनंदके अँसुआनि छये नलके दृग देख
तही अतिराजे॥जेजे बखान करें नरनाहते आपनी ओर निहारत लाजे८६
॥दोहा।। सचढ़ी आगे चली, श्रीभगवती अनूप॥दौरि लगे चर्णन चतुर
तिहुँ लोकनके भूप ॥ ८७ ॥
इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मण्डित भूमंडला
खण्डित खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबरखाँ
प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्य
कलानिधी स्वयंबर वर्णनंनाम
एकादशमस्सर्गः ॥ ११ ॥
'दोहा-संग बारहेंमें कथा, वर्णतहैं अतिचारु ॥ द्वीप पुरी नरनाह
सब, वर्णन करि निरधारु ॥ १॥ सोरठा ॥ सभा देवता रूप, लखति
'नयन अनमिष विमल ॥ लाभ काज बर भूप, दमयंती ताको भज॥२॥

नैषधकाव्य सवैया । तेहि अंग अभूषणमें प्रतिबिंब पर सबराजनके बहुतेरे । मा- नौ अमाइ गये बहुअंगनि भोहितद्वै निहचै चितवेरे ॥ गाधिकोनन्द मुनीश्वर और कहूँ रचते सुरओक धनेरे ॥ देखत देव विमानचढ़े चहुँओर लसे नभ यों हठिहेरे ॥ ३ ॥ धूपनके परवाह सुगंध हजारन छूटिरहे सबधाई । रोकिरही रव रंगभरी शुभ भौंरनकी अवली सवाई। मंगल तुंग मृदंगनके प्रति शब्द उठे ध्वज वीर सोहाई ॥ सौधनकी अवली जिमि पातुर चातुर नाचकरैं सुंदराई ॥ ४ ॥ सोरठा ।। तब भगवती सुजान, वाणि वाणि बोली विहसि ॥ चढ़ी मराल विमान, दमयंतीके दाहिने ॥५॥ सरस्वती॥सोरठा। आये लखि यहिठौर, कोटि कोटि ये देवता ॥ जित चितकी तुव दौर, मनविचारि करि वाहि पति ॥६॥ल- गत कल्प शतकोटि, एक एकके गुण गनत ॥ मनमें लेह अगोटि, जो सुंदर नीको लगै॥ ७॥दोहा॥ तुअ दरशनकी टकटकी, सहज टकटकीसंग।।अ- मृतपान तुव बदन रस, त्यों इनको इक रंग ॥ ८॥ तोटक ॥ इनके गिरि आदिहि भूमि दुही ॥ सुर साखिनकी अवलीन पुही ॥ मुक्ताफल भूरि फले बिलसैं | जनु क्षीर पयोनिधि बिंदु लसैं ॥ ९ ॥ दमयंती ।। कर जोरि दमयंति प्रणाम ठये ॥ जनु कमल मुंदे लखि चंदनये ॥ जिय जानति यों अपराध भयो । डरि चाहति औरहि ठौर गयो ॥१०॥ ॥सोरठा। मैले मुख सुर देखि,जान्यो चरित कहार गण । मृदुल चले सविशेषि, दमयंतीके हुकुम विन ॥११॥ चौपाई ॥ असुर भयंकरतासों पागे॥विद्याधरती अधरस भागे ॥ सिद्ध प्रसिद्ध विरागं विचारे ।। मुनिगणके पग ओरनिहारे ॥१२॥ दोहा ॥ एक गंधरवमैं नहीं, नेक गंधरव तास॥ त्यागि सबनि न्यारे चले, करि कहार भव लास ॥१३॥ भुजंगप्रयात ॥ लख्यो बासुकी नागराजा सुहायो । लसै छत्र सिंहासनै साजि आयो ।। बने वेष रूरे करें सेव ठाढ़ेफणीफुकरें चारु शृंगार बाढ़े॥१४॥सोरठा॥ जाको जग विस्तार, लोक वेद वाणी विमल ।। बोली करि निरधार, चंद्र- मुखी दमयंति प्रति ॥ १५ ॥ है हरको उपवीत, गिरिजा कुंकुम मिलि अरुण ॥ पाट सूत्र परतीत, वासुकि सेवक सार यह ॥१६ ॥ सवैया॥ कंकन याहि करैं कबहूँ मणि सुंदर शीश हजार वखानौ॥याहीसों बाँधै जटा- नैषधकाव्य । निके जूटनि औ कबहूँ गुणिकै धनुतानौ ॥ आसन बाँधे समाधि समय शिव साधत योग महा मन मानौ ॥ प्राण समान प्रधान भयो हरके घर बासुकि एक खजानौ ॥१७॥छप्पय॥ एक जीभ हरशीश इंद्र रसको अनुरागै । और जीभ सौस्वाद अधररस तेरो पाग !! जानै यहै विशेष जीभ द्वै जाके सोहै ॥ सुन्दर शूर उदार देखि तरुणी मन मोहै ।। जियजा- नि विषम विष भीतिसों,जनि डराहिं चुंबन समै ॥ विधना विचारि पहिले रचे, अधर रावरे अमृतमै।।१८॥सोरठा।।सुनिकै वचन अपार, और ओर हेरन लगी ॥ फन सकुचात हजार, नील कमल मुद्रितमनौ ॥ १९ ॥ गये कहार तुरंत, जहँ बैठे भूपाल गण || मधुकर निकट बसन्त, बनशोभा ज्यों लैगये ॥ २० ॥ प्रद्धटिका ॥ लोकेश नारि बोली वि. चारि ॥ सखि चन्द्रवदनि थिर रहि सम्हारि ॥ लखि तोहिं चोपसों नृप समाज || निज नयन जन्मफल लहहिं आज |॥ २१ ॥ हरि हर विरं- चि जिन किये लीन ॥ शृंगार सार रसके अधीन । शर पंच पंच इंद्रि- यन छोभि ॥ वह कामकरै आनंदसोभि ॥ २२ ॥ दमयंति देखि ये द्वीप नाथ ॥ नवद्वीपनते आये सुगाथ ॥ इनमें विचारि निज ब्याहयोग ॥ में वर्णतहों करि भोग भोग ॥२३॥ यह सघन नाम भूपति सुठारु ॥ संग्राम- शूर सुन्दरउदारु ॥ जल मधुरसमुद याके सुदेश । पुष्करसुद्वीपको है नरेश ॥२४॥ करिजाइ तहां जलकेलि चारु ।। वन बाग वीच लीला विहारु ॥सुर- लोक सांच याको सुदेशातू शची इन्द्र यहहै नरेश ॥२५॥ दूतबिलंबित।। लसति मूरति चारु विरंचिकी ॥ वट सुमंडलके तल संचिकी ॥ लखत तोहिं अनंदित होइ रहैं ॥ सकल शिल्पिनमें पदवीगहैं ॥ २६ ॥ चौपाई ॥ राज हंस यह कीरति याकी । सेत हंसिनी त्रिभुवनताकी । आश्चर्य एकै चित चाहि ॥ नीर क्षीर विलगावति नाहि ॥२७॥दोहा।। सुंदर शूर सराहनो, सकल कलाकी खानि॥लग्यो न मन दमयंतिको, नाम अना पहिचानि ॥ २८ ॥ सोरठा ॥ चित सों चतुरकहार, और राज ढिग लै चले ॥ लखि मैलो निरधार, वा भूपतिको वदन शशि।।२९॥ चौपाई॥ वाणी बिहँसि कही जब बानी॥ अति विचित्र पीयूष निशानी॥ याहि देखि सखि पंकजनयनी ॥ हव्यनाम राजा मतिपैनी ॥ पढ़त नैषधकाव्य । वंदियाके यशभारे ॥ सकल शब्द जूठे करि डारे॥ मेरे चरण चरणकित धरै ॥ अर्थ आनि पुनरुक्ति न परै ॥ ३० ॥ दोधक ॥ साकल द्वीप सुदेश बखान्यो ॥ जामह शाक महातरु मान्यो | पल्लव जूह दिगं- तनराजै ॥ जासु हरी हरिता छबिछाजै ॥ ३१ ॥ मोदक। जामहँ क्षीर पयोनिधि सोहत ॥ वक्र तरंगनि सों मनमोहत ॥ भौंहनकी समता मनमें करि ॥ जाइ तहाँ करिलेह बराबरि ॥ ३२ ॥ सोरठा ॥ क्षीर पान करि थूल, भुजगराज शय्या मरस ॥ ह्याँ सोवत सुखमूल, सिया सहित पंकजनयन ॥ ३३ ॥ तोहिं तहाँ लखिापइ, सीयडरै तो रूप सों ॥ राखै अधिक सोवाइ, चरण चापि हरिको चतुर॥३४॥ सवैया॥ उदयाचल शीश विहार सजौ यहि भूपतिके सँग कै सुघराई। तहँ गैरिक राग करौ दुगुनै पग जावककी मिलिकै अरुनाई ॥ दिनहूँमहँ साँझसि जानि परै लखि भाल पै कुंकुमकी अरुनाई ॥ चहुँ ओर चकोरनि भीर भरै शशि पूरण आनन देत दिखाई ॥३५॥ सोरठा ॥ तेरो विरह कृ- शानु, तहँ आहुति भूपति भयो ॥ करयो साँच अविधानु, हव्य आपनो जानिकै ॥ ३६ ॥ प्रमाणिका। सुने सुबैन वाणिके ॥ परे न चित्त आ- निके ।। तही सुदोषु या दियो । नइंद्र याचनो कियो ॥ ३७ ॥ अधी शक्रौंचद्वीपको ॥ मुरेशहै वनीपको ।। कुमारु बैस मारु है। विरंचि सृष्टि- सारु है ॥ ३८ ॥ दोहा ॥ दधिको उदधि सोहावनो, मधिजन पदके जामु ।। जानौ याको यश जम्यो, तीनौ लोक प्रकाशु ॥३९॥ प्लवंगम- छंद ॥ क्रौंच महीधर महा विचारि विहारको ॥रम्यबगीचनि विनोद अगारको॥४०॥ षटमुखके रस छिद्रनि बोलत हंसहै।।मानहु तव गुण गान प्रकाश प्रशंस है ॥ ४१ ॥ नीलस्वरूपक ॥ पूजत जाहि मिलैं फल चारौ । सागर संसृति होत उधारो ॥ सो भगवान सदा शिव सोहै ॥ ताकहँ सेवतदेशसजोहै ॥ ४२ ॥ सवैया॥ तेहि शैल में काम कलोलक ला कुलकेलिकरौ पतिके चित चाही ॥ दधिपूर पयोनिधिके तट माह महीपतिके सँघनीषकी छाही ॥ तुव भाल कपोल उरोजनि पैन रहे श्रम सीकर ये बहु धाँही ॥ दधिके कन जाल मिल्यो लगि मारुतद्वै है सुवासु खवास की नाही ॥४३॥ तोमर ॥ करि भाँति भाँति न भोग।

१०० नषधकाव्य । तुव वाम ब्याहनयोग ॥ यहि नामहै द्युतिमन्त, बुधिवंत गावत सन्त॥४४॥ तोटक ॥ यहिको यश इस समान चरै ।। परि सागर छोरिनिमाँहतरै ॥ परताप दिवाकरको निदरै ॥ परताप करै अरु पापहरै ॥ ४५ ॥ प्रद्ध- टिका ।। सुनि सुनि बखान ताके सभाग ॥ भनभयो नेक नहिं सानु राग ॥ ले चले और टिगको कहार ॥ तब बोली देवी वचओदार ॥ ४६ दोहा ॥ दर्भद्वीप अवनीप यह, नयन कुशेसय आपु ॥ मोहूको उत्तम लग्यो, योगा योग मिलापु ॥ ४७ ॥ तोमर ॥ यहि नाम ज्योतिष मान ॥ महि वैरहै जिनि भान ॥ घृतको पयोनिधिचारु ॥ यहि देशमें विस्तारु ॥४८॥ बसंततिलक। स्वच्छंद मंदर महीधर कंदरा है। यासों मथ्यो युद्ध सागर यों सराहै ॥ श्री शेषनागरजु ऐचनकी नसेनी ॥ तामें विहार सजिये चालकै प्रबीनी ॥ ४९ ॥ सवैया ॥ रावरे देखि उरोजनको सुमिरै सुर बानर कुंभ सोहाये ॥ हाथनको लखिकै कलपद्रुम पल्लव चित्तलगे छविछाये ॥ आननको लखि पूरणचन्द पियूष मयूष मनौ मनभाये ॥ मंदर देखि तुम्हें दविहै पुनि सागर मंथनकी सुधि आये ॥ ५० ॥ सोरठा ॥ ताखों भई उदास, ज्यों हरिजूसों गिरि सुता ॥ तहों कहार प्रकाश, और राज सन्मुख चले ॥ ५१ ॥ मालिनी ॥ तबहीं वचन बोली दाहिने श्री भवानी ॥ अभिमुख भुज कै कै चारु शृंगार सानी ॥ अय सखि दमयंती शाल्मलि द्वीप वारो ॥ यह नरपति रूरी तोहिके योग प्यारो ॥ ५२ ॥ चौपाई वपुष्मानयाको है नीम ॥ सुरासिंधुयाके अभिराम ॥ विपति सिंधु मुनि सागर डरे ॥ निडर एकु यहहै छबि धरे ॥ ५३॥ दोहा ॥ तामें निज परिजन सहित, प्राण पियारे संग ॥ करौ केलि मधुपानकी, कला रासरस रंग ।। ५४ ॥ भुजंगप्रयात ॥ तहाँ द्रोण नामा लसै शैलनीको ॥ मनौ द्वीपको द्वीप प्यारो महीको ॥ महा औषधी काँति वाली प्रकाशै ॥ लगे कज्जलै मेव मानौ प्रकाशै ॥ ५५ ॥ पृथ्वी छंद ॥ तहाँ शल्मली तरु लसत आकाशसों ॥ झरै मृदुल तूल यों परमसेतस्यौ पारुसों ॥ मनौ गिलम ए बिछी सुभग भाँति देखी परै ॥ विहार जब तू करै चरण कमलिनीके धरै ॥ ५६ ॥ तारक ॥ यहिके गुणको सुनतै अकुलानी ।

नैषधकाव्य । १०१ शिविका चरबाहन हूँ यह जानी ॥ तब और नरेश समीप सिधारे ॥ परमेश्वरि हूँ हँसि बैन उचारे ॥ ५७ ॥ सोरठा ॥ मेधा तिथि है नाम प्लच्छ द्वीप शासक यहै ॥ याके उरलगि बाम, ज्यों हरिके कमला लगी। ५८ ।। चौपाई ।। बड़ो दीह पाकरि तरु हेरे ॥ जीह माहँ होइ है मति तेरे ।। झूल डारि शाखा अति ऊंची ॥ खेलकेलिकी अवधि पहूँची ॥५८॥ संवैया । इक्षुर सोदय यों निधि राजत या जगतीपतिके अतिनेरे ॥ वासो उदास होइ जाइगो भूप्रति स्वादकरे अधरामृत तेरे ॥ देशमें भोजन पान करै नहिं कोऊ सुधाकरके बिन हेरे ॥ रावरे आनन औनष है लखि मावस हे महँ चंद घनेरे ॥ ६० ॥ उपेंद्रवज्र । नदी विषासा जहँ चारुलीला । महोज्वलासार पियूष शीला ॥ सरो- जराजी विकसी तहांहैं ॥ मनौ करौ आरति आपु चाहें ॥६॥सोरठा।। और ओर मनजानि, हारे चले कहारगण ॥ बोली वाणि सुवानि, ता ऊपर तृणतोरिकै ॥ ६२ ॥ वाणी ॥ प्रद्धटिका || जेहि शीश रत्न उपजी अंमोल ॥ सोइ जम्बुद्वीपको नृप अडोल ॥ यहि द्वीपमाहँ युव- राज भूरि ॥ सबरहे सुयशभरि पूरि पूरि ॥ ६३ ॥ नवद्वीपनको यह आपु भूप ॥ धरि आतपत्र सुर गिरि अनूप ॥ कैलाश छटा चामर चलंत ॥ अयओर संत सेवत अनंत ॥ ६४ ॥ दोहा ॥ जामुनि जम्बू मेलगी, सिद्धबधू तेहि देखि ॥ ये हाथी कैसे चढ़े, बुझै तब सविशेषि ६५ तोटक ॥ तेहिके फलकी द्रवरूपभई ।। यमुना सरिता रवि आपु ठई ।। जेहिकेतल मृत्तिक स्वर्णमई ॥ उपमा तुव अंगन संघलई ॥ ६६ ॥ सोरठा ॥ या कोटि हजार, नरपति संग सुहावने ।। मैं वर्णों निरधार, आपयोग तू समुझिले ॥ ६७ ॥ सरस्वती ॥ दोहा ॥ अरि युवती शृंगार बर, इन्दीवर तम भान ॥ नृप अवन्तिपुरको अहै, है तेरे मन मान ॥६८॥ सुलक्षण ॥ तहँ लसति अति सिमानदी ॥ जनु वरुण बैठ ककी गदी।भुज लहरि तोहिं मिलैबसी ॥ नववदन पंकजमें हँसी ॥६९ ॥ सवैया ॥ याकी पवित्र उज्जैनि पुरीमहँ आपु विराजति गौरि गो- साँइनि ॥ बामशरीर विभूषण शंभुकी तीनिहुँ लोकनकी ठकुराइनि ॥ सेवक दीनदयालु सदा तेहिसों सिखिलीजी पतिव्रत भाइनि ॥ चा- १०२ नैषधकाव्य । इनि सो निहचै धरिहो बरदायनिके परिहौ नित पाइनि ॥ ७० ॥ सोरठा॥ करै क्यों न खुटचाल, पतिसों पछै न कटुक तिय ॥ चन्द्रकला हर माल, सदा एक परिवार है ॥ ७१ ॥ ॥ दोहा ॥ भूप ओर हेन्योकुँ अरि, करि रूखे दृग कोर || बिरस देखिबेते भल्यो, नहीं देखनो जोर ॥ ॥ ७२ ॥ पद्धटिका ।। नृप भूषण की मति शोम माँह ॥ प्रतिबंब परी दमयंति छाँह ॥ तहँ देखि उदासिल चित कहार ॥ लैचले और नृप ढिग उदार ॥ ७३ ॥ तब वाणि बिहँसि करको उठाइ ॥ दिय गौड़ देश राजा दिखाइ ॥ यहि ओर नेक दमयंति हेरि ॥ मन तोपर दीन्हो वारि फेरि ॥ ७४ ॥ मनहरण ॥ भारे भारे कदअनि दुर दावेदारे याके प्रबल कृपाण मुक्ता झलर मरतहै ॥ दीरघ परिघ याके भुजके प्रताप तपी मानौ राजसीकसेद बिंद पसरत है ॥ जोरिकै सपत तंतु यशके बसन बनबोई सबलोकनिको छाँह बितरत है ॥ चक्रको धरे तु याते कोऊ सरबहकहैं कोऊ नरवरनरहरिकै तरत है ॥ ७५ ॥ सोरठा ॥ दमयंती की जानि, चिंता कछु महिपालपर॥गही और टिग आनि, जानत भाव सुजान सब ॥ ७६ ॥ तोमर ॥ तब वाणि बोलि सुजान ॥ सखिवाणि मोक रि कान ॥ पृथुराजहै गुणगेह ॥ मथुरा महीपति येह ॥ ७७ ॥ किन अं- कराजतु जोर ॥ कर मूल में सब और ॥ शर चाप धारण योग । यहिको कहैं बुधलोग ॥ ७८ ॥ छप्पय ॥ गोबर्द्धन गिरि माँह मोर बहु सोर मचावें ॥ ताते भयको पाइ साँप कहुँ दीठि न आवै ॥ वृंदावन में निडर केलिकीजै चित चाही ॥ कुंज कुंज प्रति कुसुमलता पुंजनकी छाही । स्रमश्वेत सलिल सीकर सुरत मुक्ता भूषण अंगके ॥ ते हरत चोरलौ चलत थकि धीर समीर सुरंगके ॥ ७९ ॥ तोटक ॥ दमयंति उदासिल भाँति भली । तेहि ते टरि औरै ओर चली ॥ तब वैन गिरासु खपाइ कहै ॥ सब राज सुनै चितलाइ रहै ॥ ८० ॥ सोरठा ।। राजत मानसुरेश,काशिराज काशीपुरी ॥ याको उत्तमदेश, रजधानी है मुक्तिकर ॥ ८१ ॥ सवैया ॥ पातक पुंज लखे कलिके करुणामयके करुणामय आई ॥ क्यों तरि जगजीव बड़े जडकोटि करै किन दैव सहाई ॥ काशी प्रकाशी करी पुहुमी परदेह तजे सुरलोक बड़ाई ॥ योग विराग विना नैषधकाव्य । जप याग सु जामहँ मुक्ति परी जनु पाई ॥ ८२ ॥ सोरठा ॥ भवसा- गर जल जंतु, काशी मरि हर रूपको ॥ लहत तोरि जगतंतु, अस्तिधातु भूभाव ज्यों ॥ ८३ ॥ दोहा ॥ गंगा गौरि गिरीश गुरु, गोविंदके गुण गान ॥ गीरवानसे गुणिगने, गावत हैं गुणमान ॥ ८४ ॥ सवैया ॥ रतिसी तुम या नृप के उरमें कुसुमायुध सों यहु तो मिलि सोहै ॥ जनु आनि लयो अवतार वहोरिकै जोरी बनी रति कामकी जोहै ॥ नख अंक उरोजन केसरि बंक अनूपम रूप बराबरिको है ॥ शिव शीशकी चन्द्रकला लजिहै निहचैभजिहै लखिकै मनमोहै ॥ ८५ ॥ मनहरण ॥ याके दल चलत पहलसी हलतभूमि शेषरुहलत कोल क- च्छप हलतहै ॥ धुंधुरिकी धारासों धमकि विधि बिंधिजात शूरके तुरंग तुंग पंगुढे चलतहै ॥ बिंधिसे झरतमद दुरद विहद कद निनद मचावै नभ शुंडनि बलत है । भारे भार भारेसो सहसफन वारे फूटे रुधिर ,छारे वे पनारेसे लगतहै ॥ ८६ ॥ सोरठा ॥ नेक दीठि नहिं कीन, दमयंती वा ओरको ॥ वाको वदन मलीन, भयो अनादर सो नयो ॥ ८७ ॥ एक एक ढिग जाइ, छोड़ि छोड़ि औरै गहै ॥ परमपुरुष चितलाइ, मनो उपनिषदकी ऋचा ॥ ८८ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्री खाँ साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधी द्वीपपति वर्णनं नाम सप्तमस्सर्गः ॥७॥ दोहा-सर्ग तेरहें में कथा, देशपती नरनाथ ॥ तिनके गुणगण वर्णिबो, शुभ वाणी शुभ गाथ ॥ १॥ सोरठा ॥ निज तरुणीकी लाज, करि बिलम्ब अकुलात नृप । आये सहित समाज, समुद.वारहू पारके ॥ २॥ ठाड़े भये कहार, कंध वंश सुखपाललै ॥ दासी सखीह- जार, देखि भूप विस्मित भये ॥३॥उपेंद्रवज ॥ सरस्वतीवैन तबै सु- १०४ नैषधकाव्य । नायो ॥ महीपनीको निकटै दिखायो ॥ सुवर्णकी केतकिपर्ण जैसी ॥ सु- वर्णराजा ऋतुपर्ण तैसो ॥ ४॥दोहा॥मिलन तिहारेकी अवधि, मगनभयो नरनाह ॥ निज रजधानी अंबधी की, करत न नेकौ चाह ॥ ५ ॥ ॥ तोटक ॥ यहिके उरमें रसरंग रचौ ॥ जलकलि विहारन जाइ सचौ ॥ सरयू जल बिंदु निहार लसै ॥ तुव उच्च उरोजनि आनि बस॥६॥ ॥ मनहरण ॥ याके कुल भूपति बनायो पारावार एक दूजे नरनाह भरचो गंगाजल धारसौं ॥ बाँधोहैगो अर्णवके कुलको कमल राम जोरि वनचर कोरि सघन पहारसा ॥ झल झल होत याके सुयश हजार भारे उलयत पारे पार अगम अगारसौं ॥ मार्तड वंशको उदंड परभा उहोत एक ते सरस एक चंड अवतारसौं ॥ ७॥ मोदक ॥ यहि भूपति को यशं क्षीर पयोनिधि ॥ नहिं पावत पार कवीश्वर की बुधि ॥ यहिके गुणके गण जो गनि आवतु ॥ अरि कीरति की विरती विनशावतु ॥८॥ सवैया ॥ यहि भूपके तेज दिवाकर सो विधि दीह.ते दीह बड़ो दिन कीन्हो ॥ वडवानल याहीको है प्रतिबिंब पयोनिधि जारि प्रकाशहि लीन्हो ॥ अरिराजनिको यश तारनिलो कहुँ नैतिक दीठि परै नहिं चीन्हो॥तम भीतर बाहेरहू नरहै नरहै सुख मारग में मन दीन्हो ॥ ९॥ मनहरण ॥ याके अरिनतौ अप कीरति अधिक बढ़ी यमुना नदी सी फैलि चली चहुँ ओरसा ॥ याके भुजदंडनिसों भई सुरसरि रूप कीरति सुहाई मिलि तासों अति जोरसों ॥ संगरके संगम में हात जे सुभट कोटि कोटि उद्भट तार तू रज के सोरसों ॥ रंभाके सघन बननंदन सदंर्भ मिले रंभा परिरंभन करत साँझ भोरसो ॥ १० ॥ ॥ पद्धटिका ॥ यहि भाँति परे गुण तासु कान ॥ रहि शिर कैंपाय कछु सावधान ॥ तब और नृपति दीन्हो दिखाइ ॥ भगवती व- चन बोली बनाइ॥ ११ ॥ यह पाँडु वंश है भूमिपाल ॥है कीरति रमणी भाललाल ॥ यहि और नेक हगकोरहेरि ॥ जनमैन पीर बाधा निबेरि ॥ १२ ॥ सोरठा ।। क्षितिमें फिरी बनाइ, चड़ेि अकाश नाच्योचहै ।। बड़ो वंश यहु पाइ, नाचति कीरति नर्तकी ॥ १३ ॥ दोहा ॥ याके डर अरिवर फिरें, वनन वनन करिदौर ।। निज नगरी बनसीबनी, बनी न एको नैषधकाव्य और । १४ ॥ मनहरण ।। संगर सों भाजे अपकीरति सों लाजे अरि सघन वन तहाँ विकसतु है ॥ अनल प्रताप लागे अनिलनराच झुक ताते चिनगारेनको यूह निकसतु है ॥ जैखो जैसो ईवन जरत त्यों बढ़त तैसो कबहूँ घटे न ऐसी अवधिकसतु है ।। मार्तड मंडल ओ पावक तपत भव भालपै नयन वज्र इंद्र इकतु है ॥ १५॥तारक॥ यहिके दलदंति चलें जब झूमै । कुलपर्वतसे लखिये रणभूने ॥ सँग देवनके पृथु देखन आयो ॥ फिरि चाहत है क्षिति शैल उठायो॥ १६ ॥ सोरठा ॥ बोली दाली टेरि, दमयंतीकी और लखि ॥ धरयो पहत सखिहेरि, काकपताकापै चरण ।। १७ ॥ हँसे समा सब कोइ, भूप बदन मैलो भयो । जहाँ श्वेतता होइ, टकटकात तह श्यामरँग ॥ १८ ॥ मालिनी। तबहिं वचन बाली भारती मावलीन्हे ॥ चल न यानि दम- यंती ओरको दीठि दीन्हे ॥ यह नरपति नीको इंद्र के शैलको हे ।। कर गहि सखि याको रूपसी तोहिसोहै ॥ १९ ॥ अरि सकल पराने नाम याको सुनेते ॥ विपिन कल न पावं कीरवाणी गुनेते ॥ गुणगण गनियाके बेपढे सीखि लीन्हे ॥ सुत भजत आगे भीति माड़े मलीने ॥ २० ॥ दोधक ॥ या डर भपति वांगे पराहीं।। छोडिदे तरुणी मगमाहीं ॥ बूझतही निज देश वता।। शांतल चंदन चंदगना- 4॥ २१ ॥सोरठा ॥ धनुष बाण गुणपाइ, यह भूपति जग वश करत केवल गुण परभाइ, तू वशकर यांते सर॥२२|| मनहरण|| यात जे भजतअरि तिनकी रमनि गिरि बिलनिमें वापर व्यतीत करिबोकरें । चंद्रके उदोत निकरति शिखरनपर खेलकी बदकजानि बाल अरिबो करें। रोवन लगा जंगी विषम उसासिनसों छतियांप चन्द्र प्रतिबिंब करिबो करें। तिनको गहत हर्षित ह्वे रहत सुत अद्भुत दुख सुख भाव भरिबोकर२३॥ विजय बजाइ मारू जहाँ है करत सोइ धरणि सराह निजभाग सरसाइक। यह मेरोपति मेरो याहीमें सुरति याते कांपति थर थर सातुकबनाइका याके सन्मखते समरमें शरीर छोडि जेहै सुरलोक अरिंगण समदाइक ॥ सूरयमें विल अवलोकत प्रबलखल मानो यम साजो दरवाजो चितला- इकै ॥ २४ ॥ संयुत ॥ गुणराशिको सुनि तासुकी ॥ रद दापि अंगुलि नैषधकाव्य हांसुकी ॥ चुप ढेरही तब ईश्वरी ।। नृप औरके दिगको टरी ॥ २५ ॥ दोहा ॥ पुरी कांचीको लसै, भूप पुरन्दर येहु । सुन्दर मन्दर सों अ. चल, बल गौरव गुणगेहु ॥ २६ ॥ मनहरण।। सुभट अटूट कोटि कोटि रण जूझवारे याको जूझ देखि मति कौनकी न भरम।। तीर ज्यों कठोर जो लचै न सों दिगन्तजात चाप ज्यों मुठीमें थाना पाव आनिनरम।। जंगवीर धीर परपीरको करतभंग रंगसों करत कछू आइकै समरमै ॥ बाजत निशान गान जीतको वखानहोत नाचती बजारन में वैरिनकी हरमै॥२७॥ छप्पय॥भरेभाल सिंदूर उच्चअति शूर सुहायो।औररंग सब श्याम तमो- गुण ज्यों छबिछायो ।। नभमें उदित उदार नखत मुक्तागणराजै ॥ शोर करत सब ओर भैपर भीरलतों छाजै ॥ जब हूलकरत गजराजरण मनी आइ संध्या गई ॥ सब शूर तेज अथवनलगे जोरिपाणि अंजलिठई॥२८॥ सवैया ॥ हरिको उर छोडिदयो लक्ष्मी मकरी मणिके छल पूरयोजराहै। तजि कौलदयो तबते छतिया छिदि छेदि हजारन कौन सराहै ।। आपने लायक वास विचारत ढूंढिफिरी तिलोक धराहै ॥ तेजपुंज प्रकाशि तदेखि बसीतिय या भुजके पिंजराहै ॥ २९ ॥ मनहरण ।। आखिन में मोदको सलिल न धरत याके वैन उनहींसों नित सुनत सुहाइकै ॥ तनमें न रोम याते मन्में मुदितहोकै रचत न पल पुलकावलि बनाइकै ॥ याहीते अहीश नेक शीश न कँपावें कहूँ क्षिति गिरिबेके डर हियेमें डरा- इकै॥ कहा धौ करत शेष सुनिकै सुयश याको कौनभांति धावनखों प्रीति प्रगटाइकै ॥३०॥ समरमें अरि गज कुंभिनमें हनौतीर फोकलों समात वीर ऐसो तेजधारीहै ॥ रावरे कुचनिकी बराबरि चहत याते शालतहै तिन्नै सेवा करत तिहारीहै ॥ परतहै पांइ तेरे करिके उपाइ तैहीं ऐसो पति पाइ अहे कहा वैस बारीहै ॥ मोहूँसो दुराइलेह वातन भुराइ तेंतो आषु चतुराइ भरी विधना सँवारी है ॥ ३१ ॥ प्रद्धटिका ॥ दमयंति लख्यो मुसुक्याइ नेक ॥ तब और बतायो भूप एक ॥ सखि लखिनै पाल महिपाल आप ॥ दिनकर समान जाको प्रताप ॥ ३२ ॥छप्पय॥ तरकस मेते लेत धनुष जोरत नहिं जान्यो। ऐचत परयो न जानि का नलौं धौं कब तान्यो।। छुटत परयो नहिं जानि चलत लागत नहिं देख्यो नैषधकाव्य । १०७ याको आसुग अवान माँह अदभुत कार लेख्यो ॥ रणरंग घोर अंगनि विजय गावतु हे गुण गानसों । भिदि भिदि अनेक महिमें गिरे जानत याअनुमानमों ॥ ३३ ॥ सोरठा ॥ हंसी सखी यक देखि, दमयंतीकी भोहचल ॥ यामें गुणगण लेखि, संकटनों कैसे कहै ॥ ३४ ॥ सुलक्षण। नृप और लिंग करुणा मई ॥ सुखपालकी संग ले गई ॥ मिथिला पुरं- दरको कह्यो । मनमाह मोद वहूँ लह्यो ॥ ३५ ॥ चौपाई॥ पाहि पाहि यासों नहिं करो ॥ तो ताको एसो फल लह्यो । समर माह जाके अरिराज ॥ याते काइत ओठ समाज ॥ ३६॥ यासों जग याँचत जेते ॥ मन भाये पावत फल तेते ॥ कल्पवृक्ष फल भारनि भरयो । ट्राटे टूटि डारनिसों परयो ॥ ३७ ॥ दोहा ॥ नयनसैन दमयंतिकी देखि गिरा गुण भरि ॥ कामरूप राजा तबै, दयो दिखाई रि॥ ३८॥चर्चरी सखी रतिरूप तू यह काम रूप महीपहै ॥ व्याह लायक रावरे कुल कोल दीपति दीपु है ॥ रंग संगरमाहँ वैरिनकी बधू शिरको धुनै ॥ जीतिकी लिपिज्यों लिखै निज नाथ को संकटु सनै ॥ ३९ ॥ सोरठा ॥ यहि सन्मुख रिपु हारि, बूड़े आसुग धारसा ॥ तनि टूक कै डारि, तऊ तरे सागर जगत ॥४०॥ दोहा । खासदान साँले दई, बिरी खवासिन चारु॥ परिहरियै यासों जननि, मुखपरिश्रमको सारु ॥ ४१ ॥ चौपाई ॥ उत्कल भूप और करि हाथ ॥ वाणी वर्णत भयो सनाथ ॥ नयन कोर सो नेक कनेखि॥ गुण अनुराग रूप याहे देखि ॥ ४२ ॥ गीतिका॥ जग माहँ याचक यूह जोरि समूह दाननितों भरे ॥ सुररूख औ सुर धेनु की ढिग जात हैं न कोऊपरे ॥ निज दूध सीचत धेनु वाहि सुदेतु भोग पतान के । यहि भाँति आपत में करें उपकार को नित दानके ॥ ४३ ॥ सोरठा ॥ या प्रताप उर भान, भ्रमत अग्नि वन में छिप्यो धिक बड़वानल मान, निज आरि जल शरणनि बच्यो॥ ४४ ॥ तोमर॥ दमयंति की रुचि जानि॥ हँजिकै कयो तब वानि॥सखि देशकीटकराज॥ गुण धीर धर्म समाज ॥ ४५ ॥ दोहा ॥ मुख लौ रच्यो विरांचे यह रह्यो न दीपति कोस॥अंधकार पुंजनि सज्यो, चिकुरनि कै निर्जीस ४६॥

१०८ नैषधकाव्य । मनहरण ॥ याकी आसे सॉपिान कढ़तः म्यान सुखिर साँ लहलही श्याम महा चपल निहारी है ॥ नेकु न अघात घट घटत पियत नित वैरिन की प्राणवात ऐसी भूख भारी है।विष की लहरि बढ़े तिसकी अ- धिक चढे तिन्है नसताव जिन मुगति विचारीहै ।बसन गरे में डारि अँगुरीदशन दाबि भागनिसों एसी नाग दवाने सुधारीहै ॥४७॥छप्पय ॥ पीठदेत जो समर शत्रुकी और अनसो।। जहारहै तहँ होइ वक्र ताहीसों तैसो ॥ अंग- नि आपु कठोर शोर ज्यों वज्र करेरो ॥ महादोषको धरै मूठिको बंध घ. नेरो ॥ यहिभाँति दीहको दंडको गहत एक गुण चाइसों।। यहि सरि न और विधि निर्मयो गुणग्राही परभाइसों ॥४८॥ याक शर औ शत्रु एकसे दो सौहवै ॥ रणसन्मुख द्वै गिरें कंप मुखशब्द न जौवें।। भये दुओ जब मुक्त बहुरि आवत नहिं नीके।।बड़े बडे गुण योग जिन्हें गावत सब- होके ॥ इमि कछु विशेषनहिं लखिपरै आश्चर्य एकै तक॥तहँ एक आमि- त्रनिको हनै एक भेदि मित्रहिसकै ॥ ४९ ॥ सवैया || फूलत मंजुल काके पुञ्जनि गुञ्जत भौर महा सुखपायो।। हीरनकोडग नीर गही रस तीरवनीरतमालनि छायो |मारगको श्रम पारगहो गुणनागर सागर सों बनिआयो ॥ जागत जाग कर अनुराग यही बडभाग तडाग खना- यो॥ ५० ॥ दोहा ॥ याकी कीरतिसों विमल, श्वेत भये जगजाल ॥ अरि अपकीरति द्वीफ्की, छायासी तिहुँकाल ॥ ५१ ॥ दमयंतीकी सह- चरी, कविता निपुण अपार ॥ याकी अपकीरति वरणि, हो करिहौं निरधार ॥ ५२ ॥ चौपाई ॥ या भूपतिके अयश निहारे ॥ गने परारधते अतिभारे ॥ गावत हैं गूंगागण खरे । जिनके वचन समझि नहिं परे ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ गावत लै सुर आठयों, बहु बांझनके पूत ॥कूर मरम नीके गहत, सारतंटइकसूत ॥५४||सोरठा|इसी सभा महराइ, सु निके अद्भुत वचन ये ॥ भैमी चली लुभाइ, दयुति सागर लखि निकटही ॥ ५५ ॥ दोधक ॥ पाँच लखे इक रूप सुहाये ॥ भूषण वेष समान बनाये ॥ चारि अलीक न ता मन भाये॥ एकहि देखत नैषधकाव्य । १०९ नयन जुड़ाये ॥ ५६ ॥सोरठा || नल लखि राजकुमारि, सर्वस अपने चित्तको ॥ सुधाप्तिधुमधि वारि, बूड़ि रह्यो तन मदन मय ॥ ५७॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबर खाँ प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्यकलानिधी देश पतिवर्णनं नाम त्रयो दशस्सर्गः॥ १३ ॥ दोहा ॥ सर्ग चौदहें में कथा, पंचनलीको संग ॥ वर्णनश्लेष- विलास मय, भैमी संशय रंग ॥ १ ॥ सोरठा ॥ ज्यो सुगंध अलि माल, नंदन सो ढिग कल्पतरु ।। त्यों भैमी सुखपाल, चलि कहार जहँ पंचनल ॥२॥ कह्यो भगवती टेरि, कछु गाथा अश्लेषको ।। वासवनल त्यो हेरि, लख्यो न काहू भावसो ॥ ३ ॥ दोहा । वीरसेनिउद्भव असुर, बलजित पौरुषसार। सेनाचर गज मुख सहित, दानवारि विस्तार ॥ ४ ॥ सवैया ॥ भूभ्रत शत्रुनके हठि काटत कोटिक यक्ष अगोटि अठाये ।। देवनि माहँ अधीश यहै गुण रंजित जीव सबै चितलाये ॥ पाइँनमें अनुरागित है शुभ सेवत लेखनिके गण आये ॥ याके सँयोग शची सुखलै विधि एक रची सब अंग सुहाये ॥ ५॥ पद्धटिका ॥ सुनि गिरा वैन नल हरि समान ॥ निरधार भयो नहिं परत कान | नहि नयननसाँ पायो विशेसु ॥ ज्यों वासव त्यो नैषध नरेशु ॥ ६ ॥ पुनि गिरा गूढ़ बोली विचारि ॥ नल राज आग्नि सों एक सारि ॥ सखि यह प्रताप निधि शुचि स्वरूप ॥ शिर दिपत ज्योति ताके अ- नूप ॥ ७ ॥ मुख विबुध सभाको यहै देव !! सुब याग करत याकी सु- सेव ॥ अति तरल हेति परथिव तूल ॥ याकी विभूति फैली अतूल॥८॥ ॥ सोरठा ॥ सुनि वाणीकी वानि, मिलि समान नल अनल सों ॥ परी न कछु पहिचानि, राजकुँअरि विस्मित भई ॥ ९॥ मनहंस ॥ तबहीं हँसी परमेश्वरी सुखपाइकै ॥ दमयंति ओर अनूप भौंह चलाइकै ॥ रविनंदके गुण गान तौ वरण लगी । नलराजके छलसों प्रकाशनमें ११० नैषधकाव्य । पगी ॥ १० ॥ सोरठा। धरत दंड सब ठौर, याकी रुचिसों अमरकी॥ धर्मराज शिरमौर, मित्र परमप्रिय चित्रगति ॥ ११ ॥ सकल भूतगण बास, सब याके वश में रहत॥नेकु न होत उदास, तीनिलोकके भोगसों। १२ ॥ दोहा।।गिरा बोलि ऐसे वचन, नेक डोले पगमंद।। नलके छल वरण लगी, जलनायक मुख चंद ॥ १३ ॥ रहत सर्वतो मुख बनी अनी ग्राह भटजोर ।। लसति भूरि तरवारि निधि, जासु बाहिनी घोर ॥ १४ ॥ चौपाई॥ रतनाकर याके बहुतेरे॥ समुदै निशिवासर हित हेरे॥ काम धान महिमान खदाव ॥ सदा पूरियन रस वर्षावै ॥ १५॥दोहा॥ वचन अनेकारथ सलिल, सींचति ज्यों ज्यों वानि ॥ त्यों संशय लतिका बढ़ी, दमयंती उर आनि ॥ १६ ॥ तोटक ॥ नलके गुण गौरवकी रचना॥ मति देबिकरी मतिकी सचना। यह राजत है सुररंग सभा॥छबि अक्ष हजारनको परभा॥१७॥ वहजारत दारुणको सवहीं ॥झलकै परिताप लगै जवहीं ॥ घन फूलन भूषितसी तनु है ।। भुवनेश्वरनाम सोहावनुहैं॥१८॥ पति दक्षिण और न या सरिको ॥ परमारत चोप बचै टरिको ॥ सुनिकै यह अद्भुत वात नई ॥ पचहूँ नल ओर चकी चितई ॥ १९ ॥ नहिं पावतहै निरधारकियो ॥ धरको हियरा अति तापलियो ।। हरिनी जनु चानक जालपरी ॥ जनु सोनचिरी अवहीं पकरी ॥ २० ॥ दोहा ।।इन्द्र अनल यम वरुणसों, नलवर्णन मिलिजात ॥ चारिपक्ष गणिदोष मन, पंचमही ठहरांत ॥ २१ ॥ एक एक नल लखिछकी, पंचमपै मनमोज ॥ गनती बाणनी सफल, मानौ करी मनोज ॥ २२॥ चारिओर हेरै नहीं, लखि पंचम बडभाग ॥ मनअन्तर उपज्यो मनौ, जन्मांतर अनुराग॥ २३ ॥ लीलाछन्द ॥ द्वैगई अति विकलतनमें छुटिजात संभार ॥ सुमिरिकै मनमाहँ आनति हेमहंस विचार ॥ देवलोक मरालको इत पाइये किन आज ॥ आइ देइ बताइ तुरतै कौनहै नलराज ॥ २४ ॥ अन्यच्च ॥ लखत चन्द्र अनेक जगजन आंखिमें जबरोग॥ है भयोभ्रम मोहिं अद्भुत कौनरोग सँयोग ॥ कायव्यूह बनाइकै नल धो करै परिहास ॥ सकल विद्यनिको कलानिधि खानिहै सविलास ॥ २५॥ तोमर ॥ इनमाँह है नल एक ॥ पुनि एकराज विवेक ।। अरु तीसरो तहँ काम ॥ युग नैषधकाव्य । दस्रको अभिराम ॥ २६ ॥ दोहा ॥ पहिले पेखे विरह में नल अनेक भ्रमलागि ॥ लखति पांच, आई मनौ, वहै दशाजियं जागि॥ २७ ॥ तारक। इनमें नल क्योंकरि जानि परैगो॥ नहिं मानुष लक्षणसों उभरैगो । इनमें सुरचिह्न परें लखि नाहीं॥ अकुलाइ गई कल- पै मन माहीं॥ २८ ॥ दोहा॥ मैं कैसे पाऊँ नलै, जड़ मानुष अज्ञान॥ कहि गाथा अश्लेषसों, श्री भगवती सुजान ॥२९॥ मालिनी ॥ अमरस दैहूजै याचिहौं रावरे सों॥ नल नरपति मोको दीजिये पावरे सों ॥ मदन अनल लागो सूखि केधौं तिहारो॥ करुन जलधिजीको दोषलाग्यो हमारो ॥ ३० ॥ चंद्रमाला || भटकायो नलरूप आपुरि पेखो पुण्य तिहारो॥ मूरख हाथ परी पोथी ज्यों पर उपकार बिसारो॥जाके करम लिखो ईश्वर जो सोई हो तु सवारे ॥ सूरय तापलगे फूलत हिमिलागत कमल पजारे ॥ ३१ ॥ देवीके कर वरन मालदै जो नलको पहिराऊ । तौ दि- गीश देवी दुख माने कैसे तिन्हैं लराऊँ। जो इनमें साँचो नल सोई वरन माल यह धारै ॥ तो समाज पंचनमें कोऊ कैसे लाज विसारै ॥ ३२ ॥ चारि नलनको एक शेष है पंचम अचल बखान्यो । सुधा सलिल सी- चति नयननको मैन रूप मन मान्यो । यासों रसवश मेरो चित है सरबसु यहै सुहायो । होत कवितके छोर छबीली अनुप्रास छविछायो । ३३ ॥ प्रद्धटिका ।। इमि करि विकल्प संदेह चित्त ॥ पायो न चिह्न- नेको निमित्त ।। अति मुदित होत लखि नलरसाल || विनलाभ अधिक अकुलात वाल॥ ३४॥ इति श्रीप्रचंड दोर्दण्ड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडलाखंडल श्रीखाँ साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधी पंचनली वर्णने नाम चतुर्दशस्सर्गः ॥ १४ ॥ दोहा ॥ सर्ग पंद्रहें वर्णिबो, वर्णमालको ठाटदै अशीश सब देवता, लौटे सहित उचाट ॥ १ ॥ सोरठा ॥ नल मिलिंबेके हेत, सेवन देवनको लगी ॥ सुरभी देवनिकेत, सुर सेवा

नैषधकाव्य
११२
नरसुरभि ॥ २ ॥ धूपत सलिल चढ़ाइ, आल बाल परदक्षिणा ॥ इष्ट
भिष्ट फलपाइ, देत देव सब देवतरु ॥ ३ ॥ सवैया ॥ देवनकी मन
भावनाकै सुमिरे एक एकके नामसुहाये ॥ आठ सिद्धि नवोनिधिपावत
गावत जे इन में चितलाये।। साधि समाधि धरयो हिध्यान करचो कछु
स्थानभये मनभाये ॥ भाजन भाग सभाजनराग भरेरस देखि रहे टक
लाये ॥ ४ दोहा ।। गीतसहित षट पद जुकुत, कुसुम लताके संग ॥
पूजनलागी विनय वहु, सब छंदनके रंग ॥ ५॥ वंशस्थ ॥ करीवडी
भक्ति दमयंति दीनद्वै ॥ रहे सु चारो सुर आफु लान ।। हरचो महामोह
दया निकेत ॥ करें कृपाताहि सुबद्धि देतहैं ॥ ६॥ चौपाई॥ जो
जो गाथा गिरा प्रकाश्यो । ताको अर्थ हियेमें भास्यो । सबमें नल नल
में सब जोरे ॥ नलकी अधिकाई चित भोरे ॥ ७ सोरठा ॥ व्यंग्य
वचनकी खानि, जापर यह किरपा करै ॥ सो मरति धरिआनि, खरी
भारती आपुहै ॥ ८ ॥ संयुत ॥ नहिं पांई भतल में लगे ॥ सरचारि
आनंद सों पगे । नल केलगे पगमेदिनी ॥ लखिजाति जानि नितीव-
नी ॥ ९ सुरके शरीरनमें कहीं ॥ कणरेणुके लखिये नहीं ॥ नलदेह
शुति पाइकै ॥ जनुभूमि भेटत चाइके ॥ १० ताटक ॥ नलके
पललोइन मॉह लगें ॥ सुर नयननमें न निमेष लग ॥ सुर शीश
न फूल मलीन भये । नलके शिरके कुम्हिलाइ गये ॥ ११ ॥ तारक॥
इन भेदनसों नलको पहिचान्यो ॥ चित अन्तरसिंधु सुधाहि समा-
न्यो । तब काम उतायलकै अकुलावै ॥ जयमाल न लाजनते पहि.
रावै ॥ १२ ॥ अन्यच्च ॥ जवही पहिरावन को उमहरी ॥ तबसा
तुक तंभु उठे तनवैरी ।। हग लाज मनोज हिये डरपावै ॥ दुहुँ ओर बंधी
फिरकी सम धावै ॥ १३ ॥ सवैया ॥ नसिकु हाथ वरयो पिय त्यों
पुनि ऐचिलयो छतिया घरकानी ॥ चंचल दीठि चली उतको हसि
कोरनि हालसि बीच बिलानी ॥ आवत जात कटाक्षर हैं नल हैं नल है
जितको अभिमानी ॥ कामकला कुल आकुलकै अबला अबलाजहि पै
ठहरानी ॥ १४ ॥ दोहा॥ अर्ध नयन फेरयो हरे, गिरा वदन की
ओर ।। नल मुख कमल लखे दुरे, अरध नयन की ओर ॥ १५ ॥

नैषधकाव्य
"
देवी ॥ दोहा।। लाज लहरि लीला मई, नई तुहीने आपु ॥ तोही
तलगति लै मिलै, के शीतल के तापु ॥ १६ ॥ तब देवीके कान लगि
दमयंती परवीन॥ अर्धनाम नलको लियो, हॅसि मृदु उत्तर दीन ॥१७॥
लै उतारि सुखपालकी, गहे हाथ सों हाथ ॥ जरी बिछौनानिपै चली
गिरा लिये ही साथ ॥ १८ ॥ कवित्त ॥ वाहुलता गलमेलिगिरा
दमयंति करी मघवा मगसौहै ।। नैगइ अंग भई दुगुनी ससवाइ करी
कुटिलै पलभौंहै ॥ हाथसों होथ गह्यो हसिकै मति साथ चली पग
द्वैमनमोहै ॥ लाजलता हिय में उलही झहराइ भजी दुलही सरिसौहै
।। १९ ।। चित्रय ।। आवत देखि दमयंती ॥ रीझत इंद्र इकंती ।।
भाजति पेखि डिरानी ।। वासव दीठि लजानी ॥ २० ॥ दौरि गही पुनि
वाही ॥ त्यो झहराइ झुकाही ॥ वासवके ढिग आनी ।। गूढ
गिरा मुमुक्यानी ॥ २१ ॥ गीतिका ॥ यह रावरी अरचा
करै करजोरिकै चितलाइ कै ॥ नहिं माल मेलिसकै गरे नल-
राजसों समुहाइकै ।। तुम माह एक वरै तवै जब तीनिको अपकारकै ॥
यह जानिकै सुर अंशमें नलमें चहै सुखसारकै ॥ २२ ॥ निज हाथन
सों गहि कंध ग्रीव मिलाइ पाँयन पैदई। करिये कृपा सुरनाह यापर रा-
वरी शरण गई। मुसुक्याइ नेसुकही सुरेश्वर भौंह सैननिसों कह्यो।। हरषीं
सखी सिगरी गिरा नल ओरको मारग गह्यो ।॥ २३॥ दोहा । नलमौं
हे जब लै चली, वदन हँसौहें वानि || झुके रिसौंहे नयनके, लीन्ही भौंहैं
तानि।। २४ ॥ कवित्त। बाजत नेवर नेकु चलै झिझिकै पुनि पीछेहिको
फिरि आवै ॥ नेकु लखे तिरछेहग कोरन जोरिकथा लजि नारि नवावै।।
कबहूँ मुरि पीठि दै ठाढ़ी रहै कर ओटदै मालपियै देखरावै ॥ यह पूरि
मनोज रह्यो नलके वह दुरिहिते छलकै ललचावै ॥ २५ ॥ मालकं ।।
चली गज चालि ॥ लगी ढिग आलि !! गई नलपास । भरी सु विलास
॥ २६ ॥ सवैया ॥ चोर पँखा चहुँ ओर सुगंध सजै तिन दासिन त्यों
चित लावै ॥ त्यों त्यों भजे कर ठेलि रिसाइ ज्यों ज्यों मति लै नलसों
नियरावै ॥ पाँइप सखियाँ सिगरी कर जोरि निहोरत बाँह उठावै ॥
ग्रीवनये विहँसै क्षितिपाल खरी नहिं माल पियै पहिरावै ॥ २७ ॥

नैषधकाव्य देखतही उमढ्यो परै चापर तोरति अंगन लेत जम्हाई ॥ लाइरहै टकसी थिरद्वै जनु लेत पिये तियकी सुघराई । वा ढिग घेरि चलें सखियां पग चारिकलौकर ऐचत आई।अंचल ओट दियेही दिये कर चंचल माल नलै पहिराई॥२८॥दोहा॥ जनु निज प्रीति प्रतीतिकी, बरनावली विशाल ॥ पहिराई नलके गरे, नव मधूककी माल ॥ २९॥सोरठा॥ पुही बदल श्याम, जन शृंगार रस बेलि यह॥फाँस चलाई काम, भूपतिके गरमें परी३० नल उर संगम पाइ, अंकुरसों पुलकित भई। देखति भौंह चढ़ाइ, दमयंती वा मालको ॥ ३१ ॥ सवैया । नौबति बाजिउठी इकवारही मंगल वीन मृदंग सुहाये ॥ गाइ उठी सखियां सुखगीत निछावरि भूषण चीर लुटाये ॥ वन्दिप विरदावलि नन्दित आशिष विप्रबधूनि सुनाये ।। नाचतीहैं चहुंओरनि किंनरी भीमके धाम असीम वधाये ॥ ३२ ॥ तोटक ॥ नलके उर निर्मल माल नई ॥ सब फूलनिसों प्रतिविवभई ॥ कछु नाहिं कछूक समाइगई ॥ सरधार मनोज मनौ हतई ॥ ३३ ॥ तोमर ॥ नलमाल सों उरलागि ॥ परसे दुआवत जागि || जनुअर्ध्य साजत काम ॥ तेहि ब्याहको अभिराम ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ तूल तूल दमयंतिके, कँपतअंग सतिभाइ ॥ आश्चर्य भूभ्रतु कँप्यो, कामबाण वस वाइ ॥ ३५ ॥ भुजंगप्रयात ॥ जहीं मालकी ओर राजा निहारो॥ गरो पूरिआयो महामोद भारो ॥ भयो रंग पीरो धरो हीय धीरो ॥ कद म्बै कली ज्यों सजोहै शरीरो ॥ ३६ ॥ लखे भाव ऐसे तबै देव चारौ ॥ उदासी भये आपको मानमारौ ॥ धरे आपने रूप शोभा प्रकासी ॥ हँसे जे जुरे आइ राजा विलासी॥ ३७ ॥ तोमर ॥ प्रगटे सुनयनहजार ॥ कर वज्र तीक्ष्णधार ॥ सबराज हेरत नीठि ॥ इमि इन्द्र आवत दीठि ॥३८ ॥ चहुँ ओर छूटत ज्वाल ॥ तहँ वैरही छबि- लाल ॥ इमि देखि पावकरूप ॥ विस्मय भये सब भूप ॥ ३९ ॥ कर दण्ड लोवनलाल ॥ सब देह राजतकाल ॥ यमराजरूप निहारि भजिकै चलीं सब नारि ॥ दोहा ॥ चित्रगुप्त कायस्थगुण, दीठि परयो तेहि ठौर॥ मसी लिखै इक पत्रपै, मसी छिपावत और ॥ ४१ ॥ तारक ॥ करपास धरे जल ॥

नैषधकाव्य । ११५ नायक नीको ।। तहँ देखिपरो उजरो. जगतीको ।। परमेश्वरिहू निजरूप प्रकाश्यो ।। अति अद्भुत तेज तहाँ तब भास्यो ॥४२॥ दोहा ॥ नल दमयंती की लखी, जोरी परम रसाल ॥ .तब बोल्यो सुरपाल हँसि सुन्दर वैन विशाल ॥४३॥ प्रद्धटिका॥ नल कटा हमारो दूत भाउ। दमयति लह्यो ताको प्रभाउ॥ अब मिल्यो तोहिं सरवसु सुचेतु।। श्रृंगार सार सुखको निकेतु ॥ ४४ ॥ अग्नि ॥ प्र० ॥ नल करे होम हय मेध याग ।। बहु दिये लोकपति देव भाग ।। हम भये मुदित मन पाइभोगु ।। दमयंति भयो तेरो सँयोग ॥ ४५ ॥ नलराज तोहिं वरदान देतु ॥ तू सरसरसोई स्वादलेतु ॥ करि सिद्ध शुद्ध परकार भूरि । हम कराह पाक जिमि अमियमूरि ॥ ४६ ॥ धर्मराज ॥ प्रदटिका ॥ इम धर्मराज भाषत पुकारि ॥ नलराज नेकु इतको निहारि ॥ नहिं कष्टदशा तुमको लखाइ ॥ नहिं चित्त धर्मते अंत जाइ ॥४७॥ वरुण॥ छप्पय॥ जहाँ जहाँ तुम चहौ तहाँ निर्जल महसागर ॥ सकल बाहिनी संगर हैं तेरे गुण आगर || करत ताप नहिं तेज भानु पावक डरि जाही ॥ देश देशके गौनरहौ जस मेघन छाही ।। कुलि फूलत फूल सोहावने ते सुगंध अतिही धरै ॥ दमयंति संग जलकेलिमें महामोद तुमको करै ।। ४८॥ दोहा ॥ मेरी सखि तेरी प्रिया, है प्यारी अति मोहि ॥ मोहि रही हों तोहि लखि, देति तहीं बरुतोहि ॥४९॥बिन माँगे जो पाइये, ताहि न दीजै छोडि ॥ दैव देइ जो करि कृपा, लीजै ओली ओडि ॥५० ॥छप्पय ।। नारि पुरुष आकार भेद द्वै भाँति बखान्यो । पारब्रह्मके रूप तेजको पुंज प्रमान्यो || आदि अन्तमें प्रणव वीच हरि बीज विराजै ॥ अनल संग शुभ रंग लता लक्ष्मी छवि छाजै ॥ शिर मुकुट सुधाकरकी कला अमल लसै परकाश सौं ॥ चित सुमिरि भूप मम मन्त्रको होइ सिद्धि- सविलासों ॥ ५१ ॥ जपतु याहि चित लाइ होत सुरगुरुकी वानी ॥ मोहत सुर नर नारि कामकी कान्ति लजानी ॥ जो जो मन अभिलाष तीनि लोकनमा आवै ॥ सुरहू दुर्लभ होई वस्तु तुरतै सो पावै ॥ यहि भाँति भोग संसारके बाढत ज्ञान सुतंत्रहै ॥ नल भूप सुनै मम रूपमय यह चिन्ता मणि मन्त्रहै ॥ ५२ ॥ धूप दीप युत पुहुप भोग नैषधकाव्य । पूजा जो साजै ॥ हंसवाहिनी मोहिं ध्यान धरि ज्ञान समाजै ॥ वर्ष एक जो जपै मन्त्र चिंतामणि मेरो ॥ पावै मेरो रूप भानु सम परै न हेरो ॥ जेहि ओर कृपा कारकै लखै धेरै हाथ जेहि शीशपै ॥ सो रचन लगै कविता तुरत जैसो बनति अहीशपै ॥ ५३ ॥ सवैया ॥ पुण्य श्लोक करै कविता तुम पुण्यश्लोक भये जग जाने ॥ कीरति कीरति तीनहु लोक विलोकि तुम्हें जन लेत खजाने ॥ सुन्दरता मणि आकर तेज दिवाकर ते झमकें सरसाने ॥ पाप हरें सुमिरे कलिके तुम श्रीहरिके सरिके मन माने ॥ ५४ ॥ दोहा ॥ बोली देवी देव सब,कहा देह तुहि धीर॥जे तो तिय पतिव्रत हरै, होइ भस्म सो वीर५५॥ मनहंस ॥ तब देवता नभको चले सुखपाइकै॥धनघोर दुंदुभि दीह दीह बजाइकै उठिकै चले नृप झुंडसों अकुलाइकै गयेयक्षकिन्नर दानवादि लजायकै ५६ ॥ चर्चरी ॥ और राजनिसों सखीगणव्याहको ठहरा॥भीम भूपति सों कह्योइकै दमयंति यों चित चाइकै।।ते सखी सब रूप सुंदरि शील भूषणसों भरी ॥हेरि हेरि निहाल होत महीप ओरनिको खरी॥५७॥चौपाई॥ इंद्र संग सुर तीनि सिधारे ॥ हंस चढ़ी देवी पग धारे ॥ औसरजानि तबै अति भल्यो ॥ नल डेरनिको चाहत चल्यो ॥ ५८ ॥ ॥ दोहा॥ वरषे फूल अकाशते, शरसे छोड़त मारु ॥ पुंजनि गुंजत ओर चहुँ, भौर- निको परिवार ॥ ५९ ॥ मालिनी ॥ जहँ जहँ निज डेरा हते तहाँ भूप आये ॥ नल मिलि दमयंती संग बैठे सुहाये ॥ मुदित चितमहाँ-त व्याहके साजसाजै ॥ सब सजत बधाई भेटदै भीमराजै ॥ ६० ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मण्डित भूमंडला खण्डित खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबरखाँ प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ देवगमनं नाम पंचदशस्सर्गः ॥ १५ ॥ दोहा॥ सर्ग सोरहेंमें कथा, नल विवाहको रंग ॥ दमयंती श्रृंगा- रिवो, अंग अंग परसंग ॥ १॥ सोरठा ॥ निषधदेश नरनाह, डेरनको इर्षित चले ॥ वरन माल उर माह, लागे दूजी दमयंतिसी॥२॥दोहा॥

नैषधकाव्य । मारगमें वर्षत चल्यो, अरथिनको धनभार॥करिराख बहु ढेर उन, ढोवतर- हि न सम्हार ॥३॥ भीमराज भीतर गयो, रानी सों बतराइ॥ जनी सहे- लिनसों सहित, लीन्ही सुता बोलाइ ॥ ४ ॥ राजा रानीसा कह्यो, बड़ो तिहारो भाग ॥ नल सों पायो पाहुनो, जामें जग अनुराग ॥ ५ ॥ सजें साज सब सुंदरी, कुरि ब्याहके योग ॥ बाहेर आइ बुलाइ लिय, सकल ज्योतिषी लोग ॥ ६ ॥ प्रद्धटिका ॥ तब ब्याह लगन सोधी बनाइ । नहिं सप्तम अष्टम ग्रह लखाइ ॥ गुनराति रहै छत्तिस अमोल ॥ दशदोष दूरि भजि गये लोल ॥ ७ ॥ तब दूत वेगि भेजे महीश ॥ नल निकट जाइ कहियो अशीश ॥ करिये पवित्र हम कोश धाम ॥ तुव चोंदक सों सफल काम ॥ ८ ॥ शशि वदन ॥ कहि चारण वानी ॥ नरपति मानी ॥ हँसि नल बोले ॥ वचन अमोले ॥ ९ ॥ दोहा ॥ मेरो कहौ प्रणाम चलि, हों आवत यहि बेर ॥ बिदा कियो नृप दूतको, दिये दान वसुदेर ॥ १० ॥ तोमर ॥ सुनि भीम दूत सुवानि ॥ मनमा आन दमानि ॥ रथ वाजि वारण आनि ॥ पठई तहाँ अगवानि ॥ ११ ॥ दोधक ॥ जे लिखनो करि चित्र प्रबीने ॥ ते अति गर्व करें रंगभीने ॥ जे पकवान घने करि जान ॥ ते अपनीसरि और न मानै ॥ १२ ॥ दोहा ॥ करत खुशामाद सबनकी, राजरानि गुणग्रेह। पान दान सन- मान कै, मानति सबन अछेह ॥ १३ ॥ तोटक ॥ सवही मुक्ता मणि- माल लगी ॥ पुरद्वारन द्वारन रंगरंगी ॥ भरि आनँददीह बिलासतु है ॥ मुख मंजुल हास प्रकाशतु है ॥ १४ ॥ प्रद्धटिका ॥ कुलिक तरीजीके बसन चारु ॥ ते सजे पुहुप कीन्हो शृंगारु॥ निज दै सुगंध रँग रंग गीन ॥ झालरि वितान झौ झलक लीन ॥ १५ ॥ तनसजे नग अमोल पुर फिरें भरि ललक लोल ॥ मणि बँधे खरंजा धाम धाम ॥ प्रतिबिम्ब होत तिन माहँ बाम ॥ १६ ॥ नील ॥ बाजत हैं धन बाजनये चहुँ ओर घने ॥ साजतहैं तत्काल तहाँ तत्मोदसने ॥ द्वै सुखिरै मुख उच्च सुधा धनि टीप पढ़े॥आनंदकी ध्वनि धीर सुने मन मोद बडै १७॥ सवैया॥ वाणनकी ध्वनि ये न छपावत बैननकी ध्वनि गीत छपावै ॥ गीतनकी छवि लोपत जराऊ प्रजा ११८ नपधकाव्य झरझर दुंदुभि झर झरको सकुचावै ॥ दुंदुभिके. रव दूरि करै जठ कूक निको हनि दीह बजावै ॥ वेऊ न नैसिक जानि परें जब मर्दल ताल बजावत गावै ॥ १८ ॥ दोहा । ये कोटिन बाजन बजे, मुखर सोर संभार ॥ चीहकरन दिग्गज लगैं, फूटत करन अपार ॥ १९ ॥ चौपाई ॥ सात कुंभके कुंभ सुहाये ॥ ते सुगंध जलसों भरि लाये ॥ उबटि कुरि चौकी बैठारि ॥ मंगल न्हान सवारै नारि ॥ २० ॥ चर्चरी ॥ एक रावरिको चहै दमयंतिके कुचकी सही ॥ कोपसों हित सखीही घट ग्रीवसौं गहिकै रही ॥ बोरि नवल रसाल पल्लव ओषधी अधिक परी ॥ न्हान साजै मीत सुंदरि गीत गावै किन्नरी ॥ २१ ॥ दोहा॥ न्हाइ वसन पहिरे विशद, रही विहद छवि छाइ ।। शरद चाँदनी खीलसी, निकसी धन विलगाइ ॥ २२ ॥ झहरि झहरि जलकन गिरें छहरि छबीलीबार ॥ मनौ गिले मुकुता नखत, ते उगिलत तम धार ॥ २३ ॥ बार धने वर्षत सलिल, वसन श्वेत परकाश ॥ मनौ मिली वर्षा शरद, अद्भुत बढत विलास ॥२४॥ अंग अंगौछत बडि चले, सब दीपतिके जाल ॥ सान धरी गुणमान जनु, हेम काम करबाल ॥ २५ ॥ सोरठा ॥ दौरि सखी समुदाइ, साज्यो रत्न चऊतरा ॥ तहँ बैठारी जाइ, करन लगी शृंगार सब ॥ २६ ॥ मोदक ॥ अंग अभूषितसे सब लागत ॥ भूषण भार कहाँ रस पागत ॥ या तनु में करिये जब मंडित ॥ भूषण पावत ज्योति अखंडित ॥२७॥ सवैया ॥ कुंद कली मिलि केश गुँदे बिच बीच भली मुक्तालरसो है। आनिबसे शशिके शिर रसहास शृंगार मनौ मनमोहै ॥ धूपित धूप सुगंधनिसा मद अंध मधुव्रतके अवरोहै ॥ ऐचिलई हलके बलसों यमुना जलकी लहरी कहि टोहै ॥ २८ ॥ पद्धटिका । पुनि तिलक भाल में रचि अनूप । तिहिरूप भूप मुद्रा सरूप ॥ रचि करणफूल काननि सुढार ॥ मिलिक रन दिवाकर करत प्यार ॥ २९ ॥ तारक ॥ छहरी अलकै मुख मोतिन गूंदी ।। जनु भाँदौके घन धारत बूंदी ॥ गनि चंद विरोध गहे जनु तारा ॥ दुहुँ ओर फिरै शशिके तम धारा ॥ ३० ॥ सोरठा ॥ अंजन रेत सुढार कोर, काढ़ि नयनन रची।। पुतरी नीलम सार, तिनकी पै

नैषधकाव्य ।
११९
साँवल राह जनु ॥ ३१॥ कबित्त। पीछे खरी इक केश गुँदै अलबेस
भरतिकिया लगि सोहैं ।। सौहे खरी इक आरसी लै तेहि ओर तकै वि
हँसै मनमोहै । और दुहू सखि चौर करें तिन्है बोल सुनाइ सुधारस
लोहै ॥ नंदित होइ उमगै कविता रुचि वंदि वधूनि सो बूझति
दोहै ॥ ३२ ।। सवैया ॥ नयनन अंजन एक सजै इकतौ मुक्ता
नथ लै पहिरावै ।। एक सँवारत हार हिये इक लाल जरी ऑगया
कसि आवै । सूरयकी किरणे जनु ओढ़नी घाँघरे में रसना झनकावै ॥
एक करै पगपायल नेवर एक तिया विछियानि बनावै ॥ ३३ ॥ कोऊ
रुमालले पोंछि कपोल फुलेल तिलौंछति बार प्रबीनी ॥ केऊ कसें भुज
बंदझवा मणिकंकन चारु चुरी मृगनयनी ॥ अँगुरीनमें छापछला मुदरीन
खकोर रचीमेंहदी सुख देनी।। कर मोरति कोऊ बलाइलैलै तिनु तोरति
कोर फिरै चितचैनी ॥ ३४ ॥ मनहरण ॥ साँवल कमलको गहतु
धनुषकाम पनच करत तहाँ अवली अलीनकी ॥ तीक्षण तरल तामें
सायक धरतु करि यतन युगुति कोकनँदकी कलीनकी ।। याके ये नयन
यई करत कटाक्ष नई इनही सों जीती मयन जगती बलीनकी ॥ कम-
लको न धनुष भंवरकी न पनच कलीनके न बाण कहैं सुमति नलीनकी ।
३५॥ सवैया ॥ पाँयनमें ठकुरायनिके रचिके शुभजावक बेलि घनेरी॥
चाइनिसों करै कौलनिजोरि गोसाइनि सों कह्यो नाइनि चेरी ॥ पीत-
मकी पगरी लगिकै सिगरी रचना विगरी यह मेरी ॥ कौंलकी ऐंचिदई
सखिया हँसिनौल बहू तिरछे हग हेरी ॥ ३६ ॥ केसरि केसरि अंगनि
मैं कत लेपनके मिस मैल मिलाई ॥ दीपति दीपककी कलिका दिनरै-
नि न एकसी देत दिखाई।कामिनिके गुणही न तपै तनदामिनिमें अतिही
तरलाई ॥ दूसरी और रची न गई विधिपै यहसी यहई बनिआई ॥३७॥
दोहा॥पंकज केसरसों मिली, ज्यों मिलिंदकी पाँति।।सुंदर दशननिपै दिपै
रेखमिसीकी कांति ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ नयन बड़े बड़े मोती बड़े नथ
बार बड़े छहरे सटकारे ।। पंकज पाँखरीसी अँगुरी कुच कुंदन कंचुकीकी
अनुहारे । ये रतिसी दुलही उत वे दुलहारति नाहसे सुंदर प्यारे ॥
भौनके भाइनहीं गये मिलि प्राण दु₹के दुहूँ परवारे ॥ ३९ ॥

१२० नैषधकाव्य । दोहा॥ पैंधी लंबित सतलरी, पुडी प्रेम रंगताग ॥ मनौ विपंची कामकी, रागति पंचमराग ॥ ४० ॥ लगेमेन अधरा मृदुल, भये महा सुकुमार ॥ तापर रँगबीरीन को, नीको लगत अपार ॥ ४१ ॥ सोरठा ॥ दुपहरियाको फूल, इंगुरके रँगसों रँग्यो ॥ रतिकोकिधौ दुकूल, रॅगिकुसुम सोहोकरचो ॥ ४२ ॥ दोहा ॥ भूषणकी किरण छुटैं, बासव धनु अनुहारि ॥ मनौ सिलीमुख धनुषलै, करतु मैन रखवारि ॥ ४३ ॥ दोधक ॥ अंगनमें सव भॉति शृंगारी ॥ देहिं अशीश पति- व्रतनारी ॥ जीवहु जागत वर्ष करोरी ॥ गौरि गिरीश बनी जिमि जोरी ॥ ४४ दोहा || जलके सरल विलासमय, चातुर खरेखवास ॥ बहु बाजन बाजन लंगे, साजत भूषण वास ॥ ४५ ॥ दोधक ॥ पीरीरची शिरपाग विराजै ॥ शीश सुमेर मनौ रवि छाजै ॥ हीरम मोतिन लाल मनीको ॥ मौर दिपै शिरपै अतिनीको ॥ ४६॥ तोटक ॥ झमकै पुहुप राजनकी कलँगी ॥ जनु राजशिरी शिर ज्योति जगी ॥ कल हीरनको सर– चुली ॥ शशि सादर पूरण ज्योति बसै ॥. ४७ ॥ दोहा ॥ जरतारेको झलमल्यो, तुरी द्युति दरशाइ ॥ मुख शशि जीती सूरकी, दई किराणि छिटकाइ ॥१८॥ पाग मिली झूमै विमल, मुक्तावली विशाल ॥ फूल्यो मानौ अमरतरु नवमंजरी रसाल ॥ ४९ ॥ प्रद्धटिका ॥ लखि खौरि लगै नीकी लि- लार ॥ शशिखंड चारु जनु एक सार ॥ परिवेष मनौ विधुको विसाल । गल राजत मुक्ता नखेत माल ॥ ५० ॥ मकराकृत कुण्डल मंडिकान ।। जहँ कढत तरल सुकटाक्ष बान ॥ दिय अंजन नयनन माह मोरि ॥ जनु बांधे खंजन श्याम डोरि ॥ ५१ ॥ दोहा ॥ जग जासों लक्ष्मी कढी, परवारनको हेतु ॥ साँचो भयो समुद्रकर, चक्र रत्न संकेतु ॥ ॥ ५२. ॥ दृढपद ॥ बाहनिमें नरनाहके नवरत्न विराजै ॥ छूटी किरण तासुकी सित लाल समाजै ॥ गंगाधों नदसोंन सों मिलिकै उमही है। केधौं सुयश प्रतापकी तहँ ज्योति जगी है ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ सुधा भरे अधरन मिली, रँग तमोल रस रेख ॥ मनौ लाल तोसक विछी रतिकी सेज सुवेष ॥ ५४ ॥ मनहरण ॥ व्याहके बरन वर बागो झल नैषधकाव्य । झल होत सूरको उदोत ज्यों लखत दीठि हहरै ॥ पनरत अंक अंक पाति अनुराग कैली ऐसी भाँति रतिकी अनूप रूप लहरै ॥ वाम अंग भूषित तरल करबाल सोहै अन्य दमयंतीजी छवीली छबि छहरै।। दूलहु बनो है प्यारो आनंदको मूल बार देखती अतूल झुंड झुंडनि है थहरै ॥ ५५ ॥ गीत ॥ तब दीह दीह बजे बने सब साज नौबति जोर हैं। नव चंग संग मृदंग मंगल दुंदुभी ध्वनि घोर हैं।। बनि नाचती सुर अच्छरी जिन भाव मोहत सिद्धहैं।द्विजराज गावत वेद देत अशीश देव प्रसिद्ध ५६ तब ज्योतिषी सँग पुरोहित और जे द्विजराज हैं। गुरु ज्ञान वृद्ध प्रसिद्ध सिद्ध विधान जानत काज हैं ।। सब सूत भागध बंदि चारण नोगे यह अनंत, ॥ रचि चारुमोतिन चौकमंडल फूलपत्र वसंत हैं ।। ५७ ॥ जल पूरि हाटक कुंभको धरि थापि गौरि गणेशको॥दल दूर्वा दधि मेलि कुंकुम बारिदीप सुदेवको ॥ तहँ लाल आसनकी गदी मणिलाल मोतिनसोलदी। चहुँ ओरते उमड़ी परै अनुराग आनँदकी नदी ॥ ५८॥ निज अर्घ्य देत महर्षि हर्षित दूलहै तहँ लाइकै ॥ करवाइ पूजन बाँधि कंकनरीति वा कुलपाइकै ॥ बनिकै बरात गयंद स्यंदन बाजि बाहन साजिकै ॥ फिरि छत्र चौंर पताक सों चढ़िक चले अति गाजिकै ॥ ५९॥ सुनि सोरको सिगरी पुरी नवनागरी अकुलाइकै॥गृहकाज छोड़ि तुरंत दौरि लगी गवा- छनि आइकै ॥ रवपूरि भूषणको रह्यो अरु भूरि फूंकत मोर हैं ॥ अलकै गुदी मुक्ता गिरै नभकी घटा जनु जोर हैं ॥ ६० ॥ दोहा ॥ अंजन आँजतते भई, नल दर्शन को लोल ॥ गई भूलि करकंपिकै, साँवल करे कपोल ॥ ६१ ॥ सवैया ॥ पाँयनमें उरझी रसना करदाबि निबी इक दौरति ढीली ॥ घेरिलई तहँ हंसनिके अवतंसनि आनिकै जीलरसीली ॥ ठाढीहँसै सखियाँ सब दूरि भरीरिस भूरि झकै गरबीली ॥ भाज्यो चहै बँधुवाजिमि छूटि गह्यो रखवारेनदै पगकीली ॥ ६२ ॥ दोहा ॥ मुख सरोज नख आरसी, हँसनिबैनिपीयूष ॥ नयननकी देखत हरै तलफ प्यास अरु भूख ॥ ६३ ॥ माला Dदतते चली, विथुरत मुक्ताजाल ॥ मनौ लाज मोचन करै, याके गौन रसाल ॥ ६४ ॥ उचकै लाये टकटकी, छुवै धराणि नहिं पाँइ ॥ देवनकी रमणी मनौ १२२ नैषधकाव्य । जुरित भई सतिभाइ ॥ ६५ ॥ भूषण गिरत न, जानही, देहिं सखी पहिराइ ॥ चकी विलोकै रसछकी, रही टकटकी लाइ ॥ ६६ ॥ कवित्त ॥ काननके पर्यंत, लौं नैन पठारि विलोकती चाउभरी है ॥ आवत है सखि सोइ जु वा जेहि ऊपर मोहि रही सिगरी है ॥ बासवको न बरयो दमयंति करयो पन चातुरै चोपधरी है ॥ वासवैको वरणै कविता सब गावत या छबिकी लहरी है ॥ ६७ ॥ दोहा ॥ नखते शिख भूषित भयो, झमकत भूषण भार ॥ चल नयननके उडि लगे मानौ नैन हजार ॥ ६८ ॥ दमयंती तब अवतरयो, पुहुप बाण अवतार॥ सुन्दरताके देशको, भयो भूप सरदार॥६९॥ देवनको परसन्नकै, निज चतुराई भाइ ॥ लह्यो स्वाद पीयूष खसु, सोरठा ॥कहि कहि ऐसी भाँति, रीझि रही रस भीजि सब ॥ भीर न नगर समाति, नारी मय संसार जन ॥७१॥ छूटत बाण कटाक्ष, कुटिल भृकुटि धनुसों विकट ॥ राते रतन गवाक्ष, काम भूप तरकस भये॥७२॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्री खाँ साहब खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ वरयात्रा वर्णनं नाम षोडसस्सर्गः ॥ १६ ॥ नल संगम को पाइ॥७०॥ अली अकबर दोहा-सर्ग सत्रहें वार्ण बो, नल विवाह आचार ॥ दीवो दैजो दानको, भोजनं सहित बढार ॥ १ ॥ सोरठा। रथ वृन्दनिके ठाट, सं- गभूप चढ़ि चढ़ि चले ॥ गई रोंकि सब वाट, सुंदर मंदिर भीमके ॥२॥ नीलसरूपक ॥ गौतम नाम पुरोहितकरे ॥ मंगल साज लिये परि- पूरे ॥ लैऋषि वृंद चले चढ़ि आगे ॥ दौरत भूपति पाँयन लागे ॥ ३ ॥ दोहा ॥ लागे पीरे लाल सब, बागे सजे बरात ॥ केसरि मनौ कुसुम बन, फूलिरह्यो दरशात ॥ ४ ॥ सवैया । हाथिनके हलकानिके ऊपर गुंजत धूह समूह नगारे ॥ कोटि निशान ध्वजा फहरै नभ ओटि न जा- निये भानु निहारे ॥ चातुर चित्त कवित्त प. यश चारण वारण पावत

नैषधकाव्य ।
भारे ॥ भार भरी लचकी अचला पचंकी परै शेषकी चाँदि दरारे ॥ ५॥
सारावती ॥ भूषण में प्रतिबिंब परै॥ श्वेत छटा तिनमें पसरै ॥ ओर
दुहूँरमणी चतुरै ॥ चामरचंद्र समान टुरै ॥ ६ ॥ दोहा । सब रँग रे-
सम कतरिके, तख्ता फूल बनाइ॥ तेहीतेही भाँतिकी दई सुगंध मिलाइ७
तखतन बनि पै नाचती, चातुर पातुर पुंज ॥ टूरिपरी बनते मनो, परी
करै रस गुंज ॥ ८ ॥ छप्पय ॥ छूटत कर सम सोम भोम रंग श्वेत
सुहाये ॥ गुँदे फूल मखतूल तुंग तरुवर छबिछाये ॥ हरित लाल
अरु पीत परम पल्लव लहराहीं ॥ रचे बगीचा चारु हरे छहरें घन
छाहीं ॥ जिमि जोरि कोटि तैंतीस सुर चलतु उषाको कंतु है ॥ इमि
सोहत नल दूलहु बन्यो चहुँधा लसत वसंतु है ॥ ९ ॥
दोहा ॥ दमयंती सों कछु बड़यो, दमन नाम जो भाइ ॥
अगवानी सँगलै मिल्यो, दूरि धरणि शिरनाइ ॥१०॥ द्वितीयझूलना
गति मंद मंद बरात जात विनोद बात बखानि ॥ हथ फूल छूटि अनार
चंपक चारखी द्युति खानि॥छुटिकै सितारेनसों हवाइनसों बरयो नभ पूरि।।
भयमानि पावकको भजे सब देवतागणदूरि ॥ ११ ॥ लीला ॥ राज-
पैरि समीपलौं पहुँची बरात बजाइ ।। हाथचीर पताक चंचल लेति ताहि
बुलाइ ॥ बांधि वंदनवार पंकज रंभके दलथंभ ॥ रत्नहाटकके भरे घट
हैं विवाह अरंभ ॥ १२ ॥ चौपाई ॥ भीमधाम भूपति जे आये ॥
कोटि कोटि जे न्योति बुलाये ॥ उमही भीर न नेकु समात॥ जब द्वारे
परगई बरात ॥ १३ ॥दोहा॥ हाँथै हाथ खवास तब, लै उतारिनरनाथ
चौकमाहँ ठाढो कियो, देखत लोग सनाथ ॥१.४ ॥ उठि उठि सब ढाढ़े
भये, भीम भूपके संग ॥ चलि आगे लखि दूलहै, मनमें बढ़त उमंग॥
१५ ॥ मिल्यो भीम भूपति बरै, घरी भाग शुभ शोधि ॥ ज्यों हरको हि-
मवान औ, हरिको क्षीरपयोधि ॥ १६ ॥ तारक ॥ तब प्रोहित गौरि
गणेश पुजाये ॥ द्विज वंदिनको बहुदान दिवाये । मणि माणिक लोल
अमोल लगाये ॥ नृप भीम नलै कपरा पहिराये ॥ १७ ॥ जहँ खंभ
हजार कहैं कदलीके ॥ बहु वंश प्रशंस लगे अतिनीके ॥ मुक्ता मणि
झालरि लेत झुकायो | अहिकी लतिका दलसों सबछायो ॥ १८॥

লঙ্কা दोहा ॥ रची सर्वतो भद्र तहँ, मणि कपुर रजचौक ॥ मंडित आँगन मांडयो, जनु रबिछबि अवलोक ॥१९॥सृग्धरा॥ ता पीछे भी- मराजा विनय युत बरै माँड़ये मध्य आन्यो। गा रानी सुवानी सबमि लि हिलिक आरती के बखान्यो। बैठारयो चारु चौकी कहत नहिं बनै देखि वाकी निकाई । बैठारीले दमयंती निकटले नृपतिके आई लगाई वधाई ॥ २० ॥ राम || गठिजोरो साखियां करें, नल पटुकासों साठि॥ छुटत गाँठि हियकी. अरी, परी वखनमें गॉठि ॥२१॥तोमानल जेंइयो मधुपर्क ॥ मन देखि आवत तर्क ॥ दमयंति औठ समान ॥ पहिरे भयो रसपान ॥ २२ ॥ सरसी। नलके कर सरोजके ऊफा दमयंती कर राखि ॥ पावक चंद्र सूर निशि वासर सुर गुरु द्विज दे साखि ॥ गावें गीत सखी सब सुन्दरि बजत बाजने यूह ॥ कन्यादान भीम नृप दीन्हो दीन्ही दासि समूह ॥ २३ ॥ दोहा ॥ नलको कर नीचे परयो तियकर ऊपर हेरि ॥ सुधि करि करि विपरीतकी, हँसें सखी मुख फेरि ॥ २४ ॥ शिव जो दीन्ही भीमको, एक नाम हित पाइ ॥ चिं- तामणिकी माल सो, दई नलै पहिराइ ॥ २५॥ जासों महिषासुर हत्यो तीक्षण धार कराल | गिरिजासों लहि भीमसो, नलै दई करवाल॥२६॥ शत्रुनके रक्तै पियै, यम जिह्वाके रूप ॥ म्यान जराऊ में दुरी, दई छुरीसो भूप ॥ २७॥ अग्नि करयो उपहार रथ, दमयंती हितलागि । भीमदयो नलको वहै, जल थल गति अनुरागि ॥ २८ ॥ उच्चश्रवादि इंद्रको, जलधि छायो जोइ ॥ वरुणदया हय भीमको, नले दयो नृप सोइ॥२९॥सोरठा॥ इंद्रु ओरते आइ, विश्वकर्मा भीमै दयो॥ पीकदान सुख पाइ, नलको दीन्हो लालमय ॥३०॥ निज मयूष समुदाइ, पूरि रह्यो सब ओरसों॥ धोवत दास बनाइ, मानौ भरयो तमोल रँग ॥३१॥ मयदा- नवरचि कादि, दई भीमको नाम हित ॥ रही हरित द्युति बाढ़ि, थारी पन्ननकी दई ॥ ३२ ॥ जामें जेवत भोग, होत न मय विष विषमको ॥ निकट न आवत रोग, सरस अन्न कंठे पचै ॥ ३३ ॥ दुर्वासाके शाप ऐरावत क्षितिमें गिरयो। भीमराज परताप, सोसिंदुर नलको दयो॥३४॥ भजि दिगंतको जात, मेरे सन्मुख होत जे || हाथिनको यह बात, करन नंषधकाव्य १२५ चलाचल सो कहै ॥ ३५ ॥ निज नृपकीरति दंड, वरत दशन दै श्वेत अति ॥ अरि अपकीरतिखंड, दमकी धारनिसों धरै ॥ ३६ ॥ गीत ॥ जितनी दयो जेहि भाँति दायज भीम भूपति हेतसों ॥ गणिको सकै रथ बाजि वारण रत्नभाजनचेतसों। बहु दान दासि सुगंध वासन भोग भाग समानसों ॥ सुरभी अनेकन ग्रामके गण धाम दे शुभका जसों ॥ ३७॥ दोहा । बाम हुतो लल ब्याह में, पावक चित लल- चाइ ॥ ताकी करी प्रदक्षिणा, दक्षिण करी बनाइ ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ पाथरकी थिर रेख रहै जिमि त्यों तुम या पतिके संग हूजो ॥ यांकहि प्रोहित राजधरया शिलपै पगुलै दमयंतिको दूजो ॥ पाथर तूलके तूल उड़े करु लाइ छुवै हरिको नहिं जूजी ।। याकी मनौगति पै न चली हरि हारि गयो करिकै पग पूजो ॥ ३९ ॥ तारक ॥ ध्रुवको अवलोकत भोह चढ़ाई ॥ अति सूक्षमरूप न देत देखाई ॥ध्रुव है अनुराग सुहाग तिहारो ॥ सखियाँ हाँस बैन कयो अति प्यारो॥ ४० ॥ तोटक ॥ दमयंति जबै करसों परसे ॥ तब फूलनकी समता सरसे ॥ करते छुटि लाज जबै विथुरे ॥ मुकुतागणस सुख देत दुरे ॥४१॥ मुख पावकके पुनि होमि दिये ॥ तब तो द्युतिदंत समान किये ॥ नलके सँग भामरि लेत लसै ॥ दृगकोरनिही अलि ओर हँसै ॥ ४२ ॥ घृत आहुति धूम लतानि करै ॥ लगि भाल मनौ अलकै छहरै ॥ छतिया मृगनाभि सुगंधि रली ॥ हग अंजन कान सरोज कली ॥ ४३ ॥ लखिकै सब दायजु भीम दयो । जनकौन रुमंचित जोन भयो। दुलहा दुलही पुलके मिलिके ॥ नहिं जानि परै सबकेरलिके ॥ ४४ ॥ मृदुगति ॥ यहि भाँति करि विधिब्याह ॥ हरषे पुरोछ उछाह ॥ सब पढ़त विप्र बनाइ॥ श्रुति विविधि मंगल गाइ॥ ॥ ४५ ॥ दोहा ॥ लै नारी भीतर गईं, अद्भुत साजि समाज ॥ दै अ- शीष बाहेर गये, सब ऋषीश द्विजराज ॥ ४६ ॥ हरिगीत ॥ सब साजिकै कुलरीति विधि विधि दूलहै मुख चाहिकै । रनिवास सिगरी ना- गरी बहुरूप राशि सराहिकै ॥ तन मन विसारहि प्राण वारहि करहिं न्यो छावरि धनी॥मुख नवल दुलहिनिको विलोकहि कमलकी जहँ छबि घ.

नषधकाव्य । नी॥४७॥ परिहास करहिं अनेक हँसि हँसि दुहुनि मुख दै दै विरी ॥ चलि झमाक दामिनिसी दिपति चहुँ ओरते कामिनि घिरी ॥ पुनि तीन रजनि बधाव संयुत सेज रुचि मिलये तहाँ ॥ नहि मिलन मँख घटी छुटी नहि लाज जनजागत तहां ॥ ४८ ॥ सोरठा ॥ दमयंती संयोग, सपनहूँ नृप लहि छकै । सो साँचो करि भोग। मगन भयो सुख सिंधु में ॥ ४९ ॥ प्रद्धटिका ॥ इत भीम भूप जेउनारसांजे ॥ जेहि देखि जाति पीयूष लाजि ॥ बनेगि पठै बोली बरात ॥ बनि च- ले हर्ष हिय नहिं समात ॥ ५० ॥ प्रद्धटिका ॥ सब छत्र धारि नरपति कुमार ॥ सजि वसन रत्न भूषण हथ्यार ॥ सँगले खवास बाजन बजंत ॥ नव मंडफ तर पहुँचे तुरंत ।। सन्मानि भीम नृप पग पखारि ॥ दिय यथा योग आसन विंचारि ॥ ५१ ॥ परसें विलासमय सुघर नारि ॥ परिहास करें अरु देइँ गारि ॥ कोउ माँगत होइ सुनै न ठारि ।। तेहि दयो ऊकको हँसतडारि ॥५२॥ मम लोचनको तव दरश प्यास ।। इहि ओर नेक लखिकै विलास ॥ इक कह्यो वराती सुनि सुनारि ॥ भजि गई नैन जल छीट मारि ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ इनमेमेसेल्यो हियो, कह्यो वराती चेति ॥ कहत तुच्छ गल मेलि, गल माल ऐचि तिय लेति ।। ५४ ॥ दोधक । एक परूसतिही कमलासी जेवनहार करी तहँ हाँसी ॥ के छलको विछुवापग छायो । डारि भजी पटसोरु मचायो ॥ ५५ ॥ आसन जे ऋषिकाज बनाये ॥ पूँछ दुरे तिन माह लगाये ॥ गोंद समेत रंगे तहँ बैठे ॥ ब्राह्मण वृंद पटें श्रुति जेठे ॥ ५६ ॥ दोहा ॥ और ठौर उठि बैठिये, महाराज द्विजराज ॥ उठे विप्र चपटे पटा, पीछे पूँछ समाज ॥ ५७॥चर्चरी ॥ भाँति भाँति अनेक सुंदरि मोदसों परसें खरी||कामकी करतूत्ति मूरति ज्योतिकी विलसैं बनी।।जेवते तब मंद मंद छतीस व्यंजन षट् सनी ।। शंख भेरि मृदंग संग तँबूर भीरनिसोंधनी।।५८॥सोरठाबार बार नृप भीम, सबनि ओर करजोरि कै विनती करी असीम, जेवत भूप सराहि कै॥ ५९ ।। रही थकित होइ मोहि सरस परूसन हार तियारहे वराती सोहि, मनौ दास नृप कामके ॥ ६०॥ हँसी मोरि मुख आन, नईलाज गद गद वचन ॥ सोई भयो जमान, वाके नैषधकाव्य । १२७ नेह मिलायको ॥ ६१ ॥ सवैया ॥ चंचल नयननिकी गति रोंकति और कह्यो चहै साजति औरै ॥ जे मृगनैनिके भाव लखे मुसक्यात जुवा- चित वा ढिग दौरै ॥ तोय परोसतही मुखनै इकु.चुंबनको ललचै बर जोरै॥ ज्यों झपट्यो पगु त्यों रपट्यो चपट्यो तन भात परयो तेहि ठौरै ॥६२॥ तोटक ।। यक बीजनु ढोरतिही अबला ॥ कुचकोर कड़े जिमि चन्द्र- कला ॥ तेहिको लखि एक युवाथरकै ॥पिंजरा खगडोरि बॅध्यो परकै ॥६३॥ नवभाजन पाननके करिकै ॥ छहरी सुहरी किरणै भरिकै॥जनु भाजनसों भरिराखत है ॥ करडारत सागन चाखत है ।। ६४ ।। सवैया ॥ चावर खंडित नेक भये नहिं मंडित शुद्ध सुगंध समाते ॥ एकते एक छुटै छहरै छबिमोतिनकी लहरै सरसाते ॥ कोमलस्वाद सुधाहि मनौ निजदीपति खेत हँसै सरमाते ।। बातनही छवि जात अघात हैं जेंवत भूपति भात बफाते ॥ ६५ ॥दोहा ॥ सुरभि दूधनों निर्मये, क्यों न सुरभि घृत लेहि ।। पायस परास थरानमें, पूरि समुदसे देहि ।। ६६ ॥ सुधास्वादते सौ गुन्यो, खीरखांड रसजानि । होमकरत अभिरत तजत, भजत याहि सुर आनि ।। ६७ ॥ लक्ष्मीधर ॥ राइतो स्वादकै मूदि आँखें हसै ॥ खातकै कैसि- सी यों खटाई रसै ॥ इंदुके बिंबसे हैं पसूसे वरा ॥ तोरिते टूटिआवें रसी- ले गरा॥ ६८ ॥ सोरठा॥ पहिले शीतल होत, पुनि हीतल गरमी करे। साँचे चंद उदोत, बरासरा हैं विरहिजन ॥ ६९॥ सवैया॥ एक परूसतही पकवान भये कछु शीतलही कछु ताते । केलिको औसर बूझत ताहि जु वाइ कुले न किये मुसक्याते ।। शीतल ताते बिथोरि दिये इमि दूरि करी दिन रातिकी बाते ॥ साँझ बताइ दई है यही सुधरी अंगुरी अधरा रंग राते ॥ ७० ॥ तारक ॥ रचि आमिषके परकार नबीने ।। नव रंगि- तकै अधरां सम कीने ॥ रस सों मुख चूमति ताहि बराती ॥ अवलोकि परोसति नारि लजाती ॥ ७१ ॥ यहि भांति नये परकार सवारे ॥ जेहि देखतभूतल जेवन हारे । बिन आमिष आमिषसे पहिचाने।। जहु आमिष तेन परै कछु जाने ॥७२॥ बहु भांति अकालिक वस्तु वनाई ॥ तिनही तिन रंग सुगंधनिछाई ॥ षट हू रसकी रुचिको उपजावै ॥ चकिकै जेन जेवत जानि न पावै ॥ ७३ ॥ मनहंस ॥ यहि भाँतिते जे मन सजे परवीन है ॥

नैषधकाव्य १२८ अतिसै सवाद सुगंध सा रस लीन है ॥ तिनको कहाँ लग को सके सब जेइँ कै ॥ गनती गने नहिं पार पावत सेइ कै ।। ७४ ॥ दोहा ॥ सोधि फिरायो बरफ मैं, शुचि सुबासुकी खानि । झरिन सो नारि न बहुरि, आनि परूले पनि ! ७५ ॥ संयुता ॥ यहि भाँति जावत भूप हैं ॥ छबि कंठलौं सुख रूप हैं । वह बार बार सराहि के परिवेषि- का मुख चाहि कै ॥ ७६ ॥ दोहा ॥ भै शिवके नीके रचे, नीके पय दधिचारु । जम्यों मनौ पीयूषको, चन्द्रबिंब समसारु॥७॥ चर्चरी ॥ दूधमें प्रतिबिंबसों परिबेषिका मुख देखि कै। ताहि चूमत है युवा तेहि और उच्चकनषि कै।। थारमें प्रतिबिंब लागरि हेरि एक जुवारस्यो ॥ दाबि दै तेहि गोद मोदक दोइ त्यों उनहूँ हस्यो ॥ ७८ ॥ चौपाई ॥ नाही नाहिं बराती कहें ॥ ओट हाथ थारनि दैरहैं । सब व्यंजनते मन परकारा ॥ नारि परोसिदेइ निरधारा ॥ ७९ ॥ गोपाल छंद ॥ लेखि विलास अघाने भूरि ॥ भोजन भार रहे जब दूरि ॥ हाटकके घट भरे हजार ॥ कर पर छालनको तेहि बार ॥ ८० ॥ धोवत कर नख कर सरसात ॥ चन्द्रकला जनु अम्बुज पात॥ सजि सजि सबै वराती लोग ॥ खरे भये तब योगा योग ॥ ८१ ॥ दोहा ॥ भोजन छरस प्रसिद्ध हैं, यह अद्भुत संचार ॥ भोगत भूपति सात रस, भीम भवन शृंगार ॥ ८२ ॥ भीम भूप वीरादये, लौंग कपूर मिलाइ ॥ क्रमुक खंड एला विमल, मुक्ता चून बनाइ ।। ८३ ॥ हरिगीतिका ॥ तिनके खवासनिकोदये युग रत्न जाति मँगाइ कै ॥ इकु झूदुतामहँ सकल द्युति निधि साँचु छबि छुटि लाइ कै ॥ तिन गहो झूठो नग छबीलो कि रणि गण परभाइसों ॥ सब हँसन लागे लोग तब नृप सकल दीन्हे चाइसों ॥ ८४ ॥ इमि करत भोग अनेक विधि विधि रैनि औ दिन होत सो ॥ पुनि चलत मृदु जनवास आमहि भीम भूप निकेतसो ॥ भरि रजनि देखत निरतरंग तरंग सुखसागर भरी ॥ परि पूरि ब्याह उछाह निज गृह चलनकी चित मति करी ॥ ८५ ॥ शुभ समय जानि विदा भये पुनि वाजि वारण साजिकै ॥ मिलि मात करहिं विलाप रहि दमयंति नत मुखलाजिकै । मुख चूमि लखि लखि लाइ उर ग नैषधकाव्य । नीरकी सरिता बढी ॥ मन मोदसों गहि गोद सखि सुखपालकी परलै चली ॥ ८६ ॥ सोरठा ॥ वह शोभा अभिराम, लखि न परै कितहूँ कहूँ ॥ भयो भीमको धाम, ज्यों लक्ष्मी बिन. क्षीरनिधि ॥ ८७ ॥ दोहा ॥ पहुँचावनको भीम नृप, संग चले अति दूरि ॥ नल फेरे पर णाम कै, वर्णत वा गुण भूरि ॥८८ ॥तोटक ॥ दमयंति मनै नल मोहि लियो ॥ दुख माइकको सब दूरि कियो ॥ मृदु बातन में मन मोहि गई ॥ तनहूँ मनहूँ पति प्रेम मई ॥ ८९ ॥ पहुँची रस रंग वरात भरी ॥ अभिराम जहाँ नलकी नगरी॥ ध्वज चीरन तोरन यों छलकै॥ जनु छूटि रहीं अलकै झलकै ॥ ९० ॥ मालिनी ॥ सब सचिव सभागे दूरिही दौरि आये ॥ लचि लचि क्षिति छै छै हाथ माथे बनाये ॥ सजहिं तुरत भै लै खजाने लुटावै ॥ घर घर सब नारी व्याहके गीत गावै ॥ ९१ ॥ सब नगर शृंगारो इंद्रकैसो अखारो ॥ नल सँग दम- यंती मंगलै लै सिधारो | कछु सचिव न बूझै देशकी बात रूरी ॥ नि- ज चरित बखानै स्वै कथा पाइ पूरी ॥ ९२ ॥ उठि उठि सब धाई देखिवेको सुनारी ॥ लखि नल दमयंती लोक लाजै विसारी ॥ मगन मगधि थोरै लाज कै सो नदीसै ॥ जियहु विधि बरीसौ देहि नीकी अशीशै ॥ ९३ ॥ नरपति गृह आयो मोद सो दान दीन्हे ॥ सकल सुर विलोकै पुष्पकी वृष्टि कीन्हे ॥ जननि मन अनंदै आरतीले उतारी॥ नत वदन दमयंती मोदसों गोद पारी ॥ ९४ ॥ दोहा ॥ पाँइ परी दमयांत तब, सासु अशीशै हेरि॥ मणिगण न्योछावरि करहि, तेहि परचारि घनरि ९५॥सोरठा ॥ देखत चढे विमान, चारौ सुर सरस्वति सहित ॥ भये मुदित गुण मान, तब चड़ेि सुरपुरको चले ॥ ९६ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबर खाँ प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ नल पुर प्रवेसो नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥ १७ नैषधकाव्य । १३० दोहा-सर्ग अठारहमें कथा, देव गमन सुरलोक ॥ मारगमें कलिकालसों, है भेट अटोक ॥ १॥ सोरठा ॥ अमर चारि गत लोल, करि निष्फल परिश्रम धराणि ॥ ज्यों धारिधि कल्लोल, ज्यों आये त्योहींगये ॥ २॥ प्रमाणिका ॥ दमयं- तिपै कृपाधनी ॥ न आपनी विथागनी ॥ नलैहृदै सुचाइकै ॥ सुभक्ति मोद पाइकै ॥ ३॥ रहे विमान सोहिकै ॥ दिनेश ज्योति मोहिकै।। चहूँ चलें ध्वजा धरी ॥ नचैं सुगान अच्छरी ॥ ४ ॥ स्वागता ॥ धात वेग साजे रथ जाही ॥ मेघ ओघ धारे तहँ छाही॥ दीठि नेकु नहिं- आवत जो है। सिद्धि एक अति भाजनुसो है ॥५॥ होत मेघ जब बासव संगी ॥ इंद्र चाप विलसै बहुरंगी ॥ धर्मराजकरदंड विराजै ॥ छत्ररूप रवि लागत छाजै ॥ ६ ॥ तोटक ॥ चहुँ ओरन छूटि रही लपटें ॥ लागि वायु बबूलनिसों झपटैं ॥ लखि आवत पावक नाचनचै ॥ दमयंति बरी इनहीनिहचै॥ ७॥ भ्रमहोत हिये सुर लोगनके ॥ मुसक्यात सुने भव भोगनके ॥ यहि भाँति दिगीश चले मगमें ॥ इकसोरसुन्यो अतिही- लगमें ॥ ८॥ सुनि घोर अघोरिनके रुतकौ॥चकिकै दृग फेरि करे उत- कौ॥ यक साँवल फौज तहाँ झलकी ॥ जनु आवत धार चढ़ी मलकी ॥ ॥९॥ जनु पातक की नगरी उमही॥ तमराशि मनौ इक ठौर सही ॥ नभ धुंधुर मूरति आवति है ॥ चहुँ देवनको समुहावतु है ॥ १० ॥ ॥ तोमर ॥ मनमथ्थको भागोलु ॥ कलि कीन्ह जाहि हरोलु॥ पहिले परयो बहु दीठि॥तंब दैरहे सुरपीठि॥ १६॥दोहा।। शूर अगम्या गमनमें, भय न लाज परसंगादाता दूतिनके बड़े, राजाके भटसंग॥१२॥सोरठा।। धरत लोक जित भाउ मनौ बुद्ध अवतार यहु, ईश्वर तूल बनाउ, साजत सृष्टि- शरीर विन॥चौपाई॥ आवत और लख्यो सरदार ॥ सबको डाटतु कँपत • अपार ॥ १३ ॥ ॥ अरुण बदन बहुगारीदेत ॥ क्रोध नाम ताको कहि लेत ॥ १४ ॥ जाके संग सिपाही धोर ॥ पीसत दंत करत मुख सोर ।। भुकुटी कुटिल नयन करिराते ॥ काटत ओठ भूरि रिसमाते ॥ १५ ॥ सोरठा ॥ जासों काम डेराइ, ताहि क्रोध वशमें करै ॥ हर दुर्वासा पाइ, देखि लेहु इनकीदशा ॥ १६ ॥ करत विराग बनाइ, लाल नैषधकाव्य । देहको ॥ तमको देत बढ़ाइ, जऊ जुलित हियमें रहै ॥ १७ ॥ गोपाल ॥ बाये बदन अर्ध मुख गाथ ॥ धनिकनि ओर पसारे हाथ ॥ दीन चेष्टा करे डिरान । लख्यो लोभ.देवनि नियरान ॥१८॥ याचक ठग दंभी अरु सूम॥ धूत उपाधि मचाये धूम ॥ निर्धनलै धनि कनके पास ॥ बेंचत है ज्यों अपने दास ॥ १९ ॥ सोरठा ॥ रहत सकल तनमाहि, ये रसनापर प्रीति अति ॥ नाहि गनत है नाहि, तृष्णा रमणीको रमण॥२०॥ मिलि मिलि रोवत दीन, सुनै न गुरु उपदेशको। सुत दारनसों लीन, मोह लखत सुर छोहसों ॥ २१ ॥ जानत है नित- मीच, तऊ न हरिमें चित धरै॥ कुटिल आसनी नीच, ये चाकर चहुँ ओर हैं ॥ २२ ॥ चंद्रमाला ॥ ब्रह्मचारि बनबास यती जिमि गृही आशरो आनै ॥ त्यों मनोज अरु क्रोध लोभ ये मोह अधीन बखान॥ जागतकी जो नीद अंधता देखत में जो गाई॥ सुनत में जो कही बधिरइव उजि यारे मेंलाई ॥ २३ ॥ पहिचाने लखि चिह्न पाछिले कामादिक निरवारे ॥ बदन श्याम नखते शिखलौं कुलि कलुष कंचुकनिधारे ॥ देखत भये देव दूखित हिय सूखित बदन मलीने ॥ करकस शब्द सुने काननिसों कहत पाप परबीने ॥ २४ ॥ कामा- दिकनके वचन ॥ छप्पय ॥ वेद धूत संवाद ताहि साँचो जो जानै ॥ बाजीगरक बाग तोरि फलते गहि आनै ॥ अग्नि सत्र तिर्वेद भखम धारन आछाली ॥ एक दंड तिर्दड चर्म मृग जटा कपाली ॥ यह ठाँटु टॉठि आजीविका करत धूत जन जगत में।यहि बुधि न पौरुष होत कछु पंथ चलावत भगत में ॥ २५ ॥ सोरठा ॥ द्वैकुलकी लहि शुद्धि, हर्षि करत संबंध सब ।। जानत नाहिं कुबुद्धि, पछिले कुलके दोष गुण ॥२६॥ तारक ॥ जेहि भाँति करै तियकी रखवारी ॥ नरकी नहिं ओट करै नहिं सारी ॥ उघरै नहिं बात कलंक मई है ॥ जगदंभिनकी यह रीति नई है ॥ २७ ॥ परदाररमे सम पाप न दूजो ॥ तुम क्यों करि वासव पाप न पूजो ॥ गुरुदारनके कलुषै तजि देहू ॥ द्विजराज कह्यो गुरु दार सनेहू ॥ २८ ॥ पुनि व्यास वरावरि और न मान्यो ॥ सुनिये तिनहूँ यह वैन वखान्यो । जब कामिनिके तनु कामसतावै ॥ नहि पा- षधकाव्य । तक होत जुवाहि रमावै ॥ २९ ॥ दोहा ॥ जैसी श्रद्धा सुकृत पर, क्यों न सुरन पर सोइ ॥ वेद कहत सो काम करि, जहाँ अंत सुख होइ॥ ॥ ३० ॥ द्वितीय झूलना ॥ बलसों करौ सब पाप तुमको वे न ला- गत फेरि ॥ बलसों करे सब काम निर्फल कहत मनु मुनि टेरि ॥ श्रुति अर्थ सों अरु सुमृति सों बहु भेद अर्थ न होत ॥ बल बुद्धि विवरण करत ता महँ सो भल्यो सुख सोत ॥ ३१ ॥ जेहि देहमें हम बुद्धिही वह देह डारत दाहि ।। परसाखि जीव जुदो नहीं यह पाप लागत काहि ॥ यहि देहके कृत कर्म लागत और देह न पाइ ॥ जब और जेंवत अन्न है तब और क्यों न अघाइ ॥ ३२ ॥ दोहा॥ एक आत्मा सबनिमें, लहत पाप सब ठौर ।। एकपाप तेरो मिले, कौन भारु तह और ॥ ३३ ॥ एक आत्मा सबनिमें कह्यो पुण्य तें एक ॥ क्यों करि सबके पुण्य बिन, ताकी पुण्य विवेक ॥ ३४ ॥ एक आत्मा सबनिमें जो साँची यह बात । पुण्य पाप एकै करै, फल सब में वै जात ॥३५॥ भुजंगप्रयात ॥ करौरे करौ काम केसा सनेही । सबै देव मानै बनेगो करेही ॥ कहैं लोग यों वेद हैं देव वानी ॥ यही विष्णुको पुत्र वेद प्रमानी ॥ ३६॥ प्रद्धटिका ॥ नहिं जानि परत परलोकनेक ॥ नहिं आवत वासों पत्र एक ॥ मनु कहे धर्म अपने पुरान ॥ ते सकत कौन करिके निदान ॥ ३७ ॥ कुरुराज सभा कवि व्यास देव ॥ गुणि बर्णेउ उनके उन अभेव ॥ उनकी पसंद अनुसार पाइ ॥ भाषे पुराण बसु दश बनाइ ॥ ३८ ॥ निजबंधु बधू सँग सुरति कीन | पुनि दासी संगति सों मलीन ॥ तिनको प्रमाण केहि भाँति योग । जेहि भूले वैदिक सकल लोग ।। ३९ दोहा ॥ विप्रन कीन्हे ग्रंथ सब निज जीविका विनोद ॥ बैलनके पाचँन परत, बड़ी बुद्धि आमोद ॥४०॥ जाजक छोड़त सुरत सुख, तिन्है सराहत लोग ।। चाहत हैं वे स्वर्गमें सुरनायका संयोग ॥ ४१ ॥ स्वागता ॥ पाप पाइ खग औ मृग होंही ॥ वेद बोल सब सांच कहोंही । लेहिं आप जब भोगनितेऊ । भपरूप निजको कहिबेऊ ॥ ४२ ॥ चौपाई ॥ मुक्ति शिला गौतम भाषी ॥ वेद ऋचा दे दे सब साखी ॥ पाथर नैषधकाव्य । कहा बहु जानै ॥ सुरति मुक्तिके सुखै न मानै ॥ ४३ ॥ सोरठा ॥ इंद्रादिककी नारि, निज निज पतिव्रतको धरै । मुक्त नहीं हिं विचारि, रहैं कामकी कैदमें ॥४४॥ नीलसरूपक ॥ कर्म करे फलहोत शुभाशुभ वेद कहै ॥ ईश्वर को व्यवहार अकारण कौन गहै । आपुसमाहँ विवादिनकी मति एक नहीं ।। दूषणदै अनुमान प्रमाणन व्यासकही ॥ ४५ ॥ औरनके उपदेश न नेकु न कोपगही ॥ आपकरै आतिरोष तिन्हैं तुम सिद्ध कहौ ।। दान दिये दुख होत सियानहि प्रीति करै ॥ दान दिये वलि मूढ़ गयो बँधि भूमि तरै ॥ ४६॥ दौलति को ललचाइ सबै युगभाव करै । एक खुशामद होत कोऊ जगदण्डधरै ॥ जो जनु होत सुबुद्धि सोई सुरसों नडरै ॥ जोजिय जानत शुद्ध वाहि मग- पाँउ धरै ॥ ४७ ॥ तिर्भगी ॥ सुनि यह दुर्वानी पाप निशानी वासव मानी रोष कियो ॥ बोल्यो तिनसोहैं वदन रिसाहैं टेढ़ी भी हैं बरतहियो ॥ श्रुतिके रखवारे त्रिभुवन प्यारे वज्र अधारे हम ठाढ़े। तहँ को मतिभंगी वकतु कुढंगी यमपुर रंगी डर डाढ़े ॥ ४८ ॥ दोहा ॥ जाति लोप चारी किये, जबै परीक्षालेत ॥ देखिलेह खल श्रुति बचन साधु शुद्ध करदेत॥४९॥सबको अनल समान है लेत परीक्षाकाल|साँचे को जलरूपढे, नेक न करत वेहाल ॥५०॥ ईश्वर की इच्छा विना, कर्म करे फल होत ॥ ऋतु पति नारी योग सों, सदा न गर्भ उदोत ॥५१ ।। प्रेतदेह लहि पितर निज, चरित बतावत आइ ॥ गया करावत आपनी, और लोकको पाइ ॥ ५२ ॥ भ्रम सों लै यमदूत इत, फेरि पठावत तासु ॥ सुने कथा परलोककी, क्यों न होत विश्वासु ॥ ५३ ॥ जब तू जान विदेशकोउ, तो हि मिलत तेहि रीतिआइ चरित तेरो कहै, कौन करै परतीति ॥५४॥ प्रद्धटिका॥ पर ज्वलित भयो पुनि जुलन देव॥ छुटि रही ज्वाल चहुँधा अभेव ।।अग्नि॥ शठ कहा बकतु हेरे नृसंश ॥ छिन माहँ भस्म है है सवंश ॥ ५५ ॥ जे करत पुत्र मष पुत्र हेत ॥ तत्काल ईशफल पुत्र देत ॥ जे देत सकल बलिदेव भाग ॥ अभिलाष भोग पावत सभाग ॥ ५६ ॥ यम- राज उठ्यो कर दंडतानि॥ हठि कहत कौन शठ दुष्ट वानि।। तुवकंठ.ओ- नैषधकाव्य | ठको कुंठ जानि ॥ हो काटत तेरो मंद मानि ॥ ५७ ॥ जब करयो च- हत कंन्या विवाह ।। तब बूझत हैं सबसों सलाह ॥ परलोक जानको कौन मूढ़ ॥ नहिं बूझै गुरुसा ज्ञान गूढ़ ॥ ५८ ॥ जे करत बहुत मत- सों सनेह ॥ ते सब विरोधके भरे गेह ॥ तेहिते विचारि अविरुद्ध थानु। मत वेद प्रकाशित सार मानु ॥ ५९ ॥ तब वरुण अरुण मुख उठ्यो बोलि ॥ करुणा विहीन सुनिकान खोलि ॥ परचंड पाप पाखंड मूल ।। मम पास देख नहिं होति शूल ॥ ६० ॥ मोदक ॥ ईश्वरको तुम जो नहिं मानत ॥ शालग्राम शिला पहिचानत ॥ तामहँ कूरम चक्र विराजत ॥ को नर जाइ तहाँ तेहि साजत ॥ ६१ ॥ जो शत यज्ञनको परि पावत ।। सो सुर सहित सु इंदु कहावत ॥ क्यों तुमसों पदवी नहिं पावहु ॥ वेदहि छाँडि वृथा मग धावहु ॥ ६२॥ सोरठा॥ चारव कों तिन माह, करि प्रणाम आयो निकरि ॥ द्वै सन्मुख सुरनाह, बोल्यो अंजाल जोरिकै ॥ ६३ ॥ दोहा ॥ हम चाकर कलिराजके, वृथा करत हो दोष ॥ ताकी मरजीको तके, करत रंग औ रोष ॥ ६४ ॥ तौलौ चारौ देवता, देखत भौंह उठाइ ॥ आयो द्वपारसो सहित, रथ ऊपर कलि राइ ॥ ६५ ॥ ज्यों चँडालसों द्विज भजै, विमुख भये दिगपाल । तब बोल्यो कलिकाल हसि, ऊंचे घोष कराल ॥ ६६ ॥ कलिकाल ॥ तोमर ॥ सुखसों रहे सुरपाल | लाह . अग्नि आनंद माल ॥ यमराज चित्त विनोद ॥ कहि पासि भाषित मोद ॥ ६७ ॥ दमयं- तिको सुनि व्याह ॥ हमको बड़ी चित चाह ॥ हम जात हैं तेहि हेत ॥ सुनिये विनोद निकेत ॥ ६८॥ सुनि तासु बैन दिगीश। दृग ऐंवि झारत शीश ॥ मुख आप माह विलोकि ॥ क्रमसों उठे सब टोकि ॥ ६९ ॥ विधि तोहिं जानत मार ॥ करि द्रोह औ अपकार ॥ विधिको कुरयो श्रुति सेतु ॥ तुम एक नाव न हेतु ॥ ७० ॥ दोहा॥ वह तो बीती. बात हम, हुते स्वयंवर ठौर ॥ दमयंती नलको बरयो, जानि राज शिरमौर ॥ ७१ ॥ चौपाई ॥ सानुराग नागनिको छोड्यो ॥ देवन ओर न लोचन ओड्यो ॥ दमयंती गुण रूप विशाला ॥ नल उर डारि कई जयमाला ॥ ७२ ॥ सुनतै ऐसे बैन तुरंत ॥ कह्यो कोप अति नैषधकाव्य । १३५ ही युग अंत ॥ जो निश्चय कलि नाउँ कहाऊँ ॥ देवनको कारज करि आऊं ॥ ७३ ॥ राज स्वयंवर में दमयंति ॥ नल पाई ज्यों सिय विल संति ॥ बड्यो अनादर भयो तुम्हारो ॥ येही ते जिउ जरयो हमारो ॥७४॥ हमै देखि तुम रहे बराइ ॥ हम आये तुमसों नियराइ॥असमर्थनके पाइहि भाइ ॥ राजहि देखत रहहि पराइ ॥ ७५ ॥ बड़े वंश तुम देव सभागे॥ सुंदर शूर महा अनुरागे ॥ तिनको छोड़ि अनादर कीन्हो ॥ नलै ब्याहि गुण गौरव दीन्हो ॥ ७६ ॥ दोहा ॥ तुम चारौ बैठे रहे, ब्याहो नल निरशंक ॥ शीत भानु में ज्यों लगी, तुम में क्षमा कलंक ॥ ७७॥ तास चल्यो न बल कछू, हमपै कहा रिसात ॥ सुने अनादर आपने मनमें क्यों न लजात ॥ ७८ दोधक ॥ ये कलिके सुनि बैन उदासी। बोलि गिरा तबही गुणरासी ॥ गिरा ॥ कीरति जाइ नलै इन दीनी ॥ औ दमयंति दई परवीनी ॥ ७९ ॥ वाणिहि नसिकु ज्वाब नदीनो ॥ देवन ओर चल्यो मतिहीनो ॥ बोलि कही बहुरौ कटु बानी ॥ गर्ब भरी अरु पाप निशानी ॥ ८०॥ कलि ॥ अन्यच्च ॥ हौं न चहौं निजकै दमयंती ॥ आवति मोमन में केहि गंती ॥ है नलपै करुणा नहि मेरी ॥ इंद्र सुनौ निश्चय चित मेरी ॥ ८१ ॥ दोहा ॥ जी हौं जीवत हौं बली, छली छिद्र कछु पाई ॥ दमयंती औ भूमिको, नलते देउँ छोड़ाइ ॥ ८२ ॥ द्वापरहूं हुंकारसों, करी बड़ाई सोइ ॥ कान मूदितामें दिये, बासव बैन समोइ ॥ ८३ ॥ इंद्र ॥ दोहा ॥ हम चारौ लज्जित बदन, साँच लख्यो कलिराज ॥ थोरो दीजतु बड़ेनको होति बड़ी हियलाज ॥८४ चारौफलके दानि हम, तिनको मनु सकुचात॥ नलकी भक्ति समानकै, हमपै दियो न जात ॥ ८५ ॥ सोरठा ॥ कलि तोको नहिं योग करतकोप नलपै अतुला|लोकपाल शुभ भोग, निषध सिंधुको सुधाधर ॥८६॥क्षमावान नलराज, तेरो कलि अवकाशनहि।। निश्चित धर्म समाज, द्वापरहूको उदय कित ॥ ८७ ॥संयुत ॥ दमयंति रानि विनी तहै ॥ पति प्रेमकी चित चीतहै ॥ तुम सारिखे तकि क्योंसकै ॥ निज चित्तमें बलकै बकै ॥ ८८ ॥ युग शेष आपु विचारिये ॥ नल ओर को न निहारिये ॥ नहिं जाइयो तेहि की सभा ॥ घटि जाइगी यह तौ प्र- नैषधकाव्य । भा ॥ ८९॥ दोहा॥ देवकहैं कलिपै कहै, कलि देवनपै सोइ ॥ वचन वरावर हीबढ़ी, बडी लराई होइ ॥ ९० ॥ निज निज पक्ष प्रमाणकै- सम पौरुष सरसात ॥स्वर्ग गये चढि देवता, कलि नलपुर नियरात॥९१॥ दोधक ॥ वैदिक विप्रप श्रुतिरागे॥ त्योंकलिके श्रुति फूटन लागे॥घोष सुने क्रमकी चरचाको ॥ छूटि गयो पग को क्रमुवाके ॥९२॥ दोहा ॥ नगर सहीतै नहिं सकै, सुनत सहीतै दीन।होम सुगंध नसी नसा, आहुति धूममलीन॥९३॥ तारक। परसे जहाँ विप्रनके पगपानी।। रपट्यो नसकै चलिकै अभिमानी ॥ तिलतर्पनमें तिल देखि विथोरे । लाख काँपतु भाजि चल्यो मुखमोरे ॥९४॥ द्विज भालन में तिलकावलि छाई।। दरकी छतियाँ त वारि अराई । जनु झूठ वखानत देखत रीझो।। रमणी प्रति वैन सुने तब खीझो ॥ ९५ ॥ स्वागता ॥ यज्ञरूप बनसे कार लेखे ॥ धर्म साध जनव्याध विशेषे ।। ढूंढि ट्रॅढि तिथ हीसै चाहै ।। बार बार झुरिकै उर दाहै ९६दोहा॥ जोपराकव्रत करतु तेहिदेखत जरतुबराकु।।मूरखके मुखहू- सुनहि, कलिको एको आँकु ॥९७॥ गायत्री रविधामते,विप्रनलई बुलाइ। देखत नहिं दुरतै बन्यो, तुरतै गयो बिलाइ ॥ ९८ ॥ चौपाई ॥ ब्रह्म चारि बैषानस सने ॥ जेंवत यती धेरै घर घने ॥ तिन्है देखि हिय में रिस गहै ॥ चरन धरन को थानु नलहै ।। ९९ ॥ सोम याग सुरभी वृष होम।। हिंसा देखि चल्यो जिय जोम ॥ सुनत ऋचा श्रुति भाज्यो दूरि॥ खरकुबुद्धि भरिकै रिस भूरि ॥ १०० ॥ कवित्त ॥ मौन व्रतीनको मो जिय जानतु मोहिं शरापत देत हैं गारी ॥ वंदत देवनको जन जे जनु लातनलै शिरकै हनि मारी ॥ अंजलि देत ऋषीश्वर जे चहुँ ओर छुटी छिटकी निरधारी ॥ तातेइ तेलनकै कै मनौ छिरकै जेहिगात जरै इक सारी ॥ १०१ ॥ प्रद्धटिका ॥ कटि मुंज रंजु कर दंड देखि ॥ इमि ब्रह्मचारि द्विज छल अलेखि ॥ जनु बाँधत जोरीसौं बनाइ । अरु चाहत मारन दंड घाइ ॥ १०२ ॥ दोहा ॥ स्नान कथा तकसे गनै, पातकसे सब वेद ॥ प्यासो पावै अनल ज्यों,लहै न छल औ भेद ॥ १०३ ॥ मं- डल को छोड़योचहै, पंडिलसाइ निहारि ॥ देखि पवित्री करनि में प: वित्रास निरधारि ॥ १०४ ॥ दुर्जनको ढूंढ़त फिरै, लहै ऋषिन मुनिवा- नैषधकाव्य १३७ स ॥ छपनक चाहै अक्षमन, दीछित परनि विलास॥ १०५॥ सोरठा॥ अच्छ बीजकी माल, सब फेरत जन रैनि दिन ॥ फटत जीव वेहाल मानौ मरि अवहीं गयो ॥ १०६ ॥ तोटक ॥ सुनिवे कह देख नको नलके ॥ चहुँ ओर फिरें न कहूँ झलके ॥ शुचि वैरिनसों न कहूँ ठहरै ॥ श्रुतिकी ध्वनि अंबरहू थहरै ॥ १०७ ॥ दोहा ॥ जहां वीर हंता सबै, कोऊ विरहत नाहिं ॥ रोष युक्त नहिं जीव जह, जीवन मुक्त बसाहिं ॥ १०८ ॥ दोधक ।। जेंवत विप्रनको हँसि देखै ॥ आपुस माहँ मिलै सविशेषै ॥ जानत सोम महाऋतु भोग ॥ {दत आँखिनको गनिरोगै ॥ १०९ ॥ कामुकु विप्र लख्यो सबहीको ॥ मोद भयो मनमें अतिनीको || बामसुदेव उपासक जान्यो त्यों रिसकै बहुतै दुखमान्यों ॥ ११० ॥ ॥ दोहा ॥ गो हिंसा देखत हँस्यो, जगी कामकी आगि ॥ देखि याग गोमेधको, हाल चल्यो खलु भागि ॥ १११ ॥ कवित्त ॥ विप्रहि देखतही हो जेहि नित्त निमित्तक कर्मनि त्यागे ॥ जानि गयो यजमान जबै तब दोषदै दै करयो रोष अभागे ॥ जज्वनिकी रमणी अरु ऋत्विज आप में गारिनसों अनुरागे ॥ हेरतही हहराइ हँस्यो कहें वेद विदूषक गावन लागे ॥ ११२ ॥ प्रदटिका ॥ कलि लख्यो तबै चलि राज भौन ॥ डरि ससकतु नहिं करि सकतु गौन ॥ नलराज लखे दमयंति संग ॥ जनु इंदु शची हरि रमा रंग ॥ ११३ ॥ तिनको अछेह हेरयो सनेह ॥ उर उड़यो शालि अरु बरी देह ॥ तिनके बिलास रस वैन चारु॥सुनि भयो मरनको भेदु सारु ॥११॥कलि जानतु अपने दोष भूरि ॥ गुण रहे दुहूँके देह पूरि ॥ नहिं सक्यो नेकु तिन ओर हेरि ॥ हरवाइ तहाँ ते चल्यो फेरि ॥ ११५ ॥ तहँ एक बगीचाहो नगीच ॥ तेहि माँह गयो कलि बुद्धिनीच ॥ तहँ रहत तपोधनकेन वृंद ॥ कीन्हो अनंदसों तेहि पसन्द ॥ ११६ ॥ दोहा ॥ फल दल फूलनसहित तरु, जे पूजत निज देव ॥ तिनकी ओर न लखि सक्यो, सक्यो जानि जिय भेव ॥ ११७ ॥ दोधक ॥ एक महातरु हेरि बहेरो ॥ सौंध समीप रहै नल केरो ॥ तापरतौ निज वास विचारो ॥ आपन लायक रूप १८ १३८ नैषधकाव्य । निहारो ॥ ११८ ॥ दोहा ॥ निज शिरपै कलिको दयो, जबै विभा- तक ठाम ॥ कल्पद्रुम छबिहू भयो, तौते कलिद्रुम नाम ॥ ११९ ॥ बैठि विभीतकपै रह्यो, डरत लखै नल राज ॥ ज्यों कौआ कारो बदन दहे संक गहि बाज ॥ १२० ॥ सवैया ॥ छलसों नलको अपलो- कहि चाहत काल व्यतीत गयो अधिकायो ॥ पुनि द्वापर दौरौ फिर मीपर वाहीके कारज में चितलायो॥ वाही समै विस्मय रसमें करि काम शरासन कोपि चटायो ॥ संग वसंत लिये हुलस्यो नलराजके सौंध समीप सिधायो॥ १२१ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मण्डित भूमंडला खण्डित खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबरखाँ प्रोत्साहित गुमानमिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ कलिसमागमनो नाम अष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥ दोहा-सर्ग उनसेमें कथा, काम विहार विलास ॥ केलि अंग अंगनि सहित, दीपति पुंज प्रकाश ॥ १ ॥ सोरठा ॥ दार सार नल पाइ, कामसिंधु तारन तरी ॥ भरी वि. लास बनाइ, रमत रहैं रस आमिय मय ॥ २ ॥ रमत रहे दिन रैनि दमयंती सँग सर्व वित ॥ विषै न लागत ऐनि, जो ज्ञानी परब्रह्ममय ॥३॥ लीला ॥ राज्य मंत्रिनको दयो सब देश कोष समेत ॥ आपलै दमयंतिको उर हेम सोधनिकेत ॥ भाँति भाँतिनसों रची सब सेव पूजितकाम ॥ वै रहैं मणिकी प्रभा झर मेरुसों अभिराम ॥ ४ ॥ धूप शुद्ध सुगंध साधित काम सर परकार ॥ दीपिका झमक हजार न दूरि हो अंध्यार ॥ मणिसों बँधी सब भूमिमे करपूरको छिरकाव ॥ मृगनाभि केसरिसों लिपी सब रत्न माल बनाव ॥ ५ ॥ कहुँ तीनि लोकनके विचित्रित चित्र राजत जोर ॥ कहुँ रत्न जाल गवाछ गुंजत भौंर ठौरहि और ॥ नल अंग संगमसों सुगंधित सेज फूल सुरंग ॥ तेहि भूमिको सम तिलक सुन्दर है शृंगार प्रसंग ॥ ६ ॥ तट निकट निह कुटसों कठै लहरी भरी सुख वास ॥ मिलि जातहैं रति रंगमें नैषधकाव्य । १३९ दमयंतिके सुखवास ॥ गीत ॥ जहि में लिखे विन जीव जीव सजीवसे लखिकै परें ॥ सब भाँति भाँतिनकी लगी माण रूप रंगनिसों भर ॥ जेहि देखि ग्रीवकँपाइ मोहत लोकको करतारहै ॥ जनु रोग वाढत वातको तहिते भयो विनसारहै ॥ ७ दोधक ॥ भौतिन वीच वने ग्रह रूरे ॥ गावत गीत तहाँ जन पूरे ॥ देखतही विस्मय उपजावै॥ तारबंधी पुतरीन नचावै ॥ ८ ॥ आवतहू जहँ रैनि अँ- ध्यारी ॥ फैलि रहै चहुँ ओर उज्यारी ॥ भीतिनमें मणिकोटिन जेटी॥ छूटि रहैं किरण द्युति भेटी॥९॥ छूटत हैं जल यंत्र फुहारे॥नाचत मोर महा छवि वारे ॥ लोकत चीर ध्वजा रतनारे ॥ साँवन भादोंके घन वारे ॥ १० ॥ दूत विलंबित ॥ मदन तंत्रनकी कुलि कारिका ॥ पढ़ें पंजरमें शुक सारिका ॥शुरतमें नल ओ दमयंतिके ॥ रहहिं ये सखि- या जिमि अंतिके ॥ ११ ॥ मनहरण || मंत्रानसों प्रतिमा सजीवरति कामजूकी लखिकै विलास वेऊ सुरत करत हैं। तिनके मणितरैनि छूटत कपट ओट कोटि जाल रंध्रनि में है पसरत हैं ॥ उपवन बोलें पिक डोलैं मृतवारे अलि नीचे परवीन वीन गान सतरतहैं ॥ मुख मुख सुख पागे करें बैन अनुरागेरसमें विवस तरै कानन परत हैं ॥१२॥छप्पय हाटक अंक विटंकर लखि कबि चाटु सुहाये ॥ वात्स्यायन मुनि कहे कोक ऋषि जे कछु गाये ॥ गौतम तिय सुरराज इन्दु गुरु रमनी लीला ॥ मत्स्योदरी चरित्र लिखे चित्रित शुभ शीला ॥ यहि भाँति भौन मणि भीतिमें सब मन्मथ पौरुष लिखे ॥ विहरत विनोद दोऊ क- रत सुरत रंग संगम सिखे ॥ १३ ॥ सोरठा ॥ जग उज्ज्वलके हेत बैजयंतु नीचो कियो!! जाकी कीरति श्वेत, कातिक पून्योकी सुमा ॥१४॥ दोहा ॥ पार पहुंचि भवसिंधुके, भये युवति आधीन ॥ रचे चितेरे चित्र में, ऐसे मुनि परवीन ॥९५ ॥ दोधक ॥ माति करै वर्षाऋतु- लाम् ॥ आवति मोरनिके हग आँसू ॥ मोरनिकी वनिता गहि लेही ॥ केलि बिना उपजै सुततेही ॥ १६ ॥ दोहा ॥ याते नाचत मोर जहँ मेही जीत्यो मार || हम जाके बाहन यहौ, ब्रह्मचारि सरदार ॥ १७ ॥ तारक । नल ओ दमयंति जहाँ छबि छाये ॥ रति मन्मथ औरतिसे नैषधकाव्य । बनि आये ।। इनको अवलोकतही यह जोरी।।मन लागति है अतिही रुचि थोरी ॥ १८ ॥ हरिगीत ॥ तेहि सौंध भूधर हेमके गृहमाह रंगनि सोरमै ॥ नहिं नागरी तिम करि सकै नहिं बसन वर्णत कबितमै ॥ बहु परम पूरुष योषिता यह स्वामि बहु यह वश परी ॥ बहु युवा यह सुकुमारवय सुख सुरतसों अतिही डरी ॥ १९ ॥ जब दूत कारजको गयो नल हो तबै बतियां कहीं ॥ सुधि करतसो निज ढीठ ईश सवाइने अँखियाँरही ॥ जहँ लाख लोगनिको समागम हठि तहाँ नलको बरयो । तब सुमिरि मन निज चपलता कुल लाजसों जियराजरयो ॥ २० ॥ सवैया ॥ सेजप जाइ जहाँ नल बैठत ताढिग हेरि सके न लजानी ॥ बूड़ि रही सरिता कुल कानिकी श्रवण सुनै पियकी मृदुवानी ॥ केलिके मंदिर आवति नाहि बड़ी विनती करि भीतर आनी ॥ पाँइ परे हून पौढ़ति है परिकै गहि पाटी रहै सुरिसानी ॥ २१ ॥ चौपाई ॥ गौरी गुणवारी सुकुमारी ॥ जे जे भाव करें पिय प्यारी ॥ तिन भावनिकोप्यो जब चाहै ॥ सौ विनतीहू फेरि न गाहै ॥ २२ ॥ ज्यों ज्यों करै रुखाई नारि ॥ झुकै हाथ डारै झिझकारि ॥ पिय हियमें त्यों त्यों नहिं हानि ॥ दूत समै निहचै पहिचानि ॥ २३ ॥ तारक ॥ पहिले बहु आलिन संग बुलाई ॥ इक दोइ प्रतीति भयेपर आई ॥ तेहिको छलसों नल अंत पठायो ॥ निज प्यारिहि पाइ भयो मन भायो ॥ २४ ।। नव सौरभ फूलनकी रचनापे ॥ सिसकी भरि पौढ़तही कुचकापे ॥ गलबाहुलता पिय ऐचिलतासी ॥ उरहार श्रृंगार करी नवलासी ॥ २५ ॥ सवैया ॥ नै गई नारि गही पहिले पिय चुंबति चोप लिलार रसीले ॥ नेकु उचीत्यो कपोलनिको रस लेति पिये न अघात अमीले ॥ सोहे प्रती ति हसौहे भई पुनि पान करै अधरान रँगीले ॥ मानौ सुधा उदगार लई विहँसै हग कोरनि छैल छबीले ॥ २६ ॥ स्वागता । लाज जाहि नियराज भजावै ॥ नयननिमें डर यों डरपावै ॥ बाल भाव जिमि मैन डरावै ॥ दौरि दौरि वाके ढिग आवै ॥ २७ ॥ सवैया ॥ हार विलोकनके मिसकै रस सार भरयो छतियाँ न निहारै ॥ ग्रीवके ऊपर नैषधकाव्य । १४१ छै फुदना त्यों दुरी अँजुरी कुचकोर किनारै ॥ ज्यों तुम मोहि दई प- हिराइ वहौ रचिहौ तिमि कंठ तिहारै ॥ द्वै हरुये कुचको सहरावत चाव- नसों पहिरावत हारै ॥ २८ ॥ सोवत पेखि पिया कर कंपत डोरी नि- वीकी गही खरकौं हे ॥ जानि जगी रिख रंग रंगी भय भूरि पगी सुलगी थरकौंहे ॥ घाँघरे झीन झपी झलकै लखि जंघन मै ललकै लर कोहे ॥ जानि लई दुगुने पट झांपि बढी भ्रुकुटी अधरा फरकौंहे ॥२९ ॥ तोटक ॥ तिनही तिन भाँतिन प्रेम करै ।। जेहिते तियके तन भीति टरे ॥ निज चापलता तिय चापलता करि मैन लचाइ दई समता ॥ ३० ॥ मनहरण ॥ सखिनसों कासे कसि नीवी बंधाव ज्यों ज्यों त्यों त्यों मुसक्याते आप आप मुख चाहिकै ॥ उरज उतंग श्रृंगमें रुपै उदित चन्द्र बंक नख अंक लाल मालनि सराहि कै ॥ कबहुँ पलक ढारि नयन मुकलित करै कौहूँ विक सित सुखसिंधु अवगाहिकै ॥ कोऊ कमल खिले अधखिले विलसत कोऊ पद्मिांन जीती पदुमिनि यों उमाहि कै ॥ ३१ ॥ नल विनु देखे काम बैठन न देत वाहि देखन न देत लाज ऐसे साँकरे परी ॥ पीतम पियारो लख्यो रूप उजियारो नैन भरि न निहारो अद्भुत रचना करी ॥ रतन भीतिनमें परत प्रतिबिब त्योही छतिया मणीनमें रंगीन प्रतिमा अरी ॥ तिन तिन ओर तृणतोरति करति दीठि नीठि बिहरत पीठि दैरहै खरी खरी ॥३२॥दोहा॥ ब्याकुल बासर विरहसों, रै निरही चित छाइ ॥ रैनि माहँ बासरचहै, लीला सुरत लजाडू ।। ३३ ।। नल ॥ तोमर ॥ मृगनयनि दे तजि भीतिकार प्रीति लेह प्रतीति ।। हमको सखी समजानु ।। नल यों करै सनमानु ॥ ३४ ॥ सोरठा ॥ तिय हिय मन्मथ आगि, लाज महोषधिसों दबी ॥ दुगुन उठी अब जागि, पियसनेह रस मंत्रवच ॥ ३५ ॥ पृथ्वी ॥ छुटाइ नलके करै कुच छिपाइ लीन्हेतही ॥ समेटि छतिया लता सरस बाहु दोऊ गहीं ॥ मनौ डरति है लाजसों निकट लालको त्यागिकै ॥ बसैजु हियमें सदा मिलति ताहिसों पागिकै ॥ ३६॥ चौपाई ॥ चन्द्रवदनि तेरे पग लागौं ॥ तोसों एक दान मैं मागौं । तेरो अधर एकही बार ॥ पान नैषधकाव्य । १४२ करौं पाऊँ सुख सार ॥ ३७ ॥ एसो पोटे ओंठ रस लेत ॥ हठसों पर समरद नख देत ॥ बार बार वाके गुण गावें ॥ बार बार तरवा स हरावें ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ रावरे आनन इंदु सुधारस आसवसों छकि- मत्त भयो है ॥ संवकहीं जेहि लायकको वह काम करो मनमोमलयो है ॥ कोमल पल्लवसे मृदुहाथान चापतु जंघानेको उनयो है ॥ झारतु पाइनिनैननिसों लांच नाइनिके राच रंग रयो है।॥३९॥चर्चरी।चुंबनादिकमें तजी तुम लाज तौ बिगरयो कहा।।त्यों तजौ अबहूँ विलासिनि पॉइ लागत हों हहा||चाटु बैन बनाइ सुंदर कैलिकी रचनारची। वाम कौतुक केप में अभिलाष मदनकी सची ॥ ४० ॥ लाज तोहिं भली लग पहिले समा- गम पाइक॥ स्वप्न संगम सों बिलज्जित होहु जातुलजाइकै ॥ दत जात उराहने नरनाहयों रससों छकै ॥ लाज टि गई नई दमयंतिकी नल केतकै ॥ ४१ ॥ प्रद्धटिका ॥ नाग पाश अरु बाहु बंध ॥ पुनि हंस चरण स्वस्तिक सुगंध ॥ वृक्षाधि रूड़ जानौ सभाग फिरिलता वेष्टित सा- नुराग ॥ ४२ ॥ इन आदि बंध कीन्हे अपार॥ पुनि सुरति रंग कीनति विचार ॥ अभिलषित सखी लोचन सरोज ॥ दिन देखि तोहि हमलहैं चोज ॥ ४३ ॥ सोरठा ॥ करि ऐसे संकेत, भूपरमें दमयंति सँग ॥ मैन विहार निकेत, लसे दोउ रति मयनसे ॥ ४४ ॥ हरिगीत॥ रसरंग आलससों भरी परभात जानत चोंकिकै ॥ उठि चलत सुरत निकेत सों- गहि वसनु राखति रोकि कै ॥ भरि ललक चाखत अधर रस मुख सुरत सुखललचाइकै ॥ क्षितिकी शची सम लसति पद्मिनि भूपसुरपति लाइकै ॥ ४५ ॥ सोरठा ॥ हँसी सखी अनुमानि, लहि विलंब आग- मनको॥गई कोकमत जानि, भोरे रस पद्मिनि सुरत ॥ ४६॥दोहा॥ निज निज निधु वन चिह्न युत, लखी सखी परभात।। आप आपनी चितै गति नलिन नयन नैजात ॥४७॥सवैया। दमयंति इकंत सखीनके संग पगी रति रंग कथा जहँ भाषै। तहँ देवनके बरसों छिपिकै नल काननिबैन पियूष निचाखै ॥ पास खड़यो सबिलास हँसै वरपैरसरूप जबै धरि राखै ॥ राजहि देखिदबी सखियां सब लाजनि नवल बहू शिर नाखै ॥ ४८ ॥ दोहा । अवलोकी कोकी डरी, साँझ विरहभै पाइ ।। विरह जनायो आगि लो, पि नैषधकाव्य । १४३ य हँसिलई बनाई ॥ ४९ ॥ मनहरण ॥ चुंबन • करत मुख मोरत न मृगनैनी नारि न नवावै गलबाँही बितरतही ॥ त्यों त्यों पिप हियमें पियूष वर्षत रस रंग सरसतरहे पाँयन परतही ॥ भुज लतिकानिसों छिपावै कुच कलिकानि विनती करेते लेति ऐंचि इतरतही ॥ केसरि कपटकी बनीही पट कंचुकीसमिटि गई अंक पंकहके धरतही ॥ ५० ॥ चंद्रमाला ॥ परि परि पाँइ प्राणपति माँगत नख छत देति ननीके ॥ बातन मिस करु ऐचि पियाको नख छतदे निजहीके ॥ अंचल हिय भूषण बाहेरको पीतम सकत छुटायो । लाज बसन भूषण भीतरको सोन रिकै आयो ॥ ५१ ॥ तोमर ॥ बलवान मन्मथ राज ॥ हठिकै छुटावत लाज ॥ बिन चीर सोहत भूरि ॥ महताबसी द्युति पूरि ॥ ५२ ॥ सरसी ॥ हौं मागत रतिदान दीन द्वै नाहिं करत तू नाहि ॥ मैं जानी तेरी रुचि मीठी सुरत रंग रसमाहि ॥ चाहत सुन्यो वचन वनिताके ऐसे करत उपाइ ॥ नैसिकुरुकं पाइ सकुचानी उत्तर- कयो बताइ॥ ५३॥ तारक ॥ पहिले पियक कर ओरन हेरे ॥ बहुरोहरुये झिझकारति फेरे ॥ परिपूर्ण प्रतीति भई हियमाही ॥ तबने कु करै हँसि वैननु नाही ॥५४॥ सवैया ॥ रूप अभूषण वेष सुगंध नयेई नये करि रोज सिधारे।।रोज कवित्त न येई नये पटें रोजनई बतिया विस्तारै एकसी जानि परै पियको नहिं देवनकी वनिता अनुहारै ॥ वैसनई अरु हौसनई नित नेहनई छबि रोज सँवारें ॥ ५५ ॥ भावनसों प्रगटै पियपै निजनहके सागरकी सरसाई ॥ वातनकी मधुरी महिमा करि देत गहे गुणकी गरुआई ॥ पाँइ पलोटति वै हरिके हरिलेत हियो शुचि सेवक ताई ॥ मोल लये जनदास इते वश है प्रियमाण करी मन भाई ॥ ५६ ॥ मान मनावतिमें नहिं मानति बातनि जानत लाल रिसाने ॥ नयन चलाइ हरे मुसक्याइकै लीन्हे मनाइ बनाइ लुभाने ॥ कीन्हे हरे हठसों परिरंभन चोपसों चुंबन लेत अघाने ॥ ऐसे छके छबिसों ललके नलंके चष फेरि नयों ललचाने ॥ ५७ ॥ सोरठा ॥ लपटि गई अरधंग, ज्यों गिरिजा मिली गिरीशसों ॥ कोक कला परसंग, अं- गरीति ज्यों तरुलता ॥ ५८ ॥ कवित्त ॥ कोनथली न जलाशयको नैषधकाव्य । नहिं काननको नहिं शैल सुहायो ।। लोकनको अरु देशनको नहिं काम कलाको प्रकार बनायो । रागनको अरु बागनको अनुरागनको सुजहाँ जुरि आयो ॥ पूजि अनंग पिया गहि संग जहाँ रस रंगन भूप मचायो ॥ ५९ ॥ ऐचत चीर लची दुगुणी झुकि पूँकि हरे दुति दीप बतायो । भूपतिके रस पेंच प्रभाझर छूटि रही सब देत देखायो ॥ श्रवण तरचोननिते गहिके तहँ अंबुज नील मिलाइ दुरायो । मानि मनोभवकी अरचारीत राणि मनौ शिरफूल चढायो॥६०॥चर्वरी॥फूलठांकि दुराइ दीप प्रसन्नज्यों मनमें भई।दीपद्वै दुहुँ ओर और प्रकाशद्वै दीपति छई। एक अंचल- सोंदुरावतहूँ हरै विस्मय करै॥शुद्ध आवति अग्निको बरु रोषकै पतिसों अरै६१ सोरठा ॥ वह्नि बड़ो सुख पाइ, वर दीन्हो नलराजको । चाह रावरी पाइ, प्रगटौं वेगि बुझाउँ पुनि ॥ ६२ ॥ पगव्यो तम चहुँ ओर, नल इच्छाको पाइकै ॥ गहि लीन्ही भरि कोर, मुदित भई अकारि भरी।।६३॥ दमयंती॥ मनहरण।। चूमत कपोलहौं तिहारे ललकन भरि अलकन- हीके भारोहे अलसातहौ।।करज कलित दुर उरसो ललित लाल मिलत तिहारे हार ओझिल रिसातही ॥ सेवकिनि जानौ हौं तो कोई क रौंगी नेकु अब छोड़ि दीजै गहे अंक अकुलातही ।। करौंगी सुरत चित चाहसौं तिहारी फेरि मैनकीस्यों तुरत मिलौंगी काल्हि रातिही ॥ ६४ ॥ दोहा ॥ दीपक छिन छिन बरि उठे, छिन छिन जाहि बुझाहि ॥ तम धन दामिनि रंगमें, करत केलि चित चाहि ॥६५॥सोरठा॥ भौहै लई चढ़ाइ, काम चढायो चाव त्यों ॥ नयन माँद अलसाइ, छूटन लगे हुँकार सर ॥ ६६ ॥ दोहा ॥ अधर दक्षत वीसी करै, कर झारै झुकि जाइ ॥ रतिको मानौ आपु गुरु, निरत सिखावत गाइ ॥ ६७ ॥ हाटक गेंद स- मान कुच, दये नख छत भूप ॥ सौंध सिवर रति कामके, सेज सुरंग सुखरूप ॥ ६८॥ झलकत जंबन पैलगी, यों नख छतकी माल | हाटक खंभनपै बँधी, मयन ध्वजा जनु लाल॥६९॥तोटक॥ नलके कर कमल गहै जवहीं ॥ दमयंति उरोजनको तवहीं ॥ सब ओरन श्वेत छंटा छह- रै मिलि हार प्रभा निज जानि परै।।७०॥अँगमेद सुकुंकुमबेलि मची ॥ छलकंचुकिया सखियानरची ॥ नलके उरलागत शोभसने ॥ जनु नैषधकाव्य । किंशुक बाणन कामहनै ॥७॥ दुलहा मुखसों मुखलाइ रहै॥ कवि कौन तहाँ उपमानकहै ॥ विधु सागरते कछु ये निकस्यो ॥ अपने प्रतिबिंब समेत लस्यो । ७२ ॥दोहा ।। चुंबन करन उरोज पिय, मुख सोहत यहि भाइ ॥ अमृत भरनको कनकपट, शशिसों धरयो मिलाइ ॥ ७३ ॥ देखि देखि देखन लगै, मिलि मिलिकै लपिटात ॥ चूमि चूमि चुम्बन करै, हिये न नेकु अघात ॥ ७४ ॥ सुरत केलि टूटोहरा, छिटकत मुक्ता जाल ॥ परे न कछु पहिचानि मिलि, श्रम सीकरकी माल ॥ ७५ ॥ सोरठा ॥ आप रूपकी खानि, लखत रहै रमणी वदन ॥ अंग अंगमें सानि, पार भई सुखसिंधुके ॥ ७६ ॥ कवित्त ॥ अंगनिमें पुलकाव- लिको बहु योजन अन्तर मानत है ॥ नयनन माह निमेष लगे विधिकी वरषै सम जानत है ॥ बाहुलता गलमें सिथिलात तहीं विरहै उंर आनत है ॥ दोऊ दुहूँन समोवतसे मिलि सोवतमें सुख सानत है ॥ ७७ ॥ मनहरण ॥ सुस्त सलिल कन जानत प्रियाके पीउ थंभन करत परिरंभन उपाइकै ॥ मणिकी भितीनमें दिखायो प्रतिबिम्ब कह्यो कौन इत आयो रही प्यारी भय भाइकै ॥ आपनो सुरत रस मुकुत न होन देत सूर चन्दनादिन कबन्धन बनाइ कै ॥ योगकी युगति औ सँयोगकी भुगति रीति कौनकी प्रतीति दूजो नायकुन लाइकै ॥ ७८ ॥ दोहा ॥ एकहि संग दुहूँनके, उपज्यो स्वाद सुगंध ॥ विषम बाण मय विषम रत, गुंजत अलिमद अन्ध ॥ ७९ ॥ हरि गीत ॥ पुनि करत समरत सुरत सुखरस छाकि चुम्बन लेत हैं। भुज मूल औ कचनाभि सुंदर रहसि आनँद देत हैं ॥ सब सिथिल तनु मुकुलित विलोचन पुलकं मुख शशिमें सिसी ॥ इमि निखिल निधुव- नकी कला पियको हँसी तियको खिसी ॥ ८० ॥ सोरठा || सुरत मोद रसपाइ, सोहत कर रुह दशन छत ॥ ज्यों सर्वत करवाइ, लौंग मिर्च नीकी लगै ॥ ८१ ॥ सवैया । मंदही मंद बयार करै नल झीन जरी दुपटा मृदु छोरसीं ॥ स्वेदके · बुंद विराजि रहे मुख इंदु न छत्रनके गन जोरसों ॥ भौंह चला चल नाक सकोरि भरै सिसकी चितवै हग कोरसों । मोतिनके हरवा निरु- नषधकाव्य वारतु प्योतरवा सहरवितु ओरसों ।। ८२॥ दोहा॥ प्यारीके तन स्वे- दकन, पियत पीयके नैन । नसिक प्यास बुझाति नहि, महिमा मानत मैन ॥ ८३ ॥ जया पुहुप अलिपाति पति, अधरन कज्जललीक ।। सकु- चीली छिपयो चहै, चाहत हँसी अलीक ॥ ८४ ॥सोरठा ॥ आपु हँसी मुख मोरि, त्यों त्यों बूझत भूप हठि ॥ मुकुरुदयो करजोरि, यहै दयो उत्तर तिन्है ॥ ८५ ॥ रथोझता ॥ भाल माहँ पतिक निहा- रिकै ॥ रेख.जावक लगी विचारिकै ।। मोरिकै बदन कमलस खिल्यो। चंद्र सूर परभातसों मिल्यो । ८६ ॥ दूतबिलंबित ॥ हुकुमको गहि मयन महीपको ॥ दशनके छत ओठ समीपको ॥ दुखत वेदन जाति है कही, अजहूँलौं यह भाति नही सही ॥ ८७ ॥ लखि उरोजनकी नखरेखको । मदन किंशुक बाण विशेषको ॥ हसि उठ्यो नरनायक चाइकै ॥ रिस भरी बिझुकै सरसाइकै ॥ ८८ ॥ पहिरिये उरमोतिन हारको ॥ अमृतसीकर विंदु.विहारको ॥ करजके छत वेदनको हेरै ॥ हम यही सुखको विनती करै ।। ८९ ॥ कबित्त ॥ शीतल पौन करै छिनमें छिनमें तरवा सहरावन लागै ॥ पीन पयोधर पै परबीन सजै छलकी अँगिया रस पागै ॥ स्वेदके विंदु रुमाललै पोंछति गूंदतु केश खुले मुख आगे ॥ दीन्ही खवाइ तंबोल विरी मुख बेस बनाइ दये सब बागे ॥ ९० ॥ दोहा ॥ अपराधी सरपंच यहु, तममें करत प्रकाश ॥ अब तेरे पाँयन परत, कृपा करनकी आश ॥ ९१ ।। ऐसे कोमल वचन कहि, सजनलग्यो सब साज ॥ प्यारीको पाँउनलग्यो, द्वै सबको शिर- ताज॥९२॥सवैया॥ मानिनि मानु मरूकै तज्यो मनभावन पावनपै शिर नायो ॥ कै नसकै अँखियां समुहे रिस पाछिलीसों चितकै सरमायो । त्यों उमग्यो अतिनेहनयो फरकी भुज औ हियरा ललचायो ॥ लोकिकै आइ गई उरमें लगि मानहु प्यो परदेशते आयो ॥ ९३ ॥ दोहा ॥ बढ़त मनोरथ जाति अति, घटति जाति त्यों रेनि॥ हँसि बोल्यो तब बैन नल, सकुचि सुनै मृगनेनि ॥ ९४ ॥ नल || छप्पय॥ देव दृतके रूप- तोहिं निरदै दुख दीन्हे ॥ तीछन वचन बिझाइ तेइ मै पातक कीन्हे ।। तिनसों चित्तलजात बात कहतै नहिं आवै ॥ तेरे चर्णन माह चातुरी नैषधकाव्य । चाह बतावै ॥ अब तपको बदलो देत हौं जब लगि प्राणशरीरमें ॥ बिन, मोलदास तेरो भयों माफ भयो तकसीरमें ॥ ९५ ॥ सवैया ॥ सो छनु जामहँ तोहिं लखौं अरु राज गनौ अनुराग तिहारो॥ सोइ सुधारस पान हमै चख चुंबन जो परिरंभनवारो ॥ ईश्वरकी किरपा वहई जबतें तिरछे हँसि नेक निहारो॥ सागरसों सरिता परिरंभन चाहत हौ यहि भाँति विहारो ॥ ९६ ॥ दोहा॥ कौन भाँति वर्णे पैरें, तेरे धीर सुभाइ॥ तिन समान सुरपति तजो, मोको बरो बचाइ ॥९७ ॥ चौपाई ॥ एक योस चर्चा में सुनी ॥ तोसों सखी चतुर दूगुनी ॥ जिन 'जिनसों जेजे ज्यों डरें। निजभय हेतु बड़ाई करें ।। ९८ ॥ कोऊ सखी ॥ छुये जात जो सिमिटि विशेषि ॥ मै मन डरौं लजाऊँ देखि ॥ और सखी ॥ कच्छपपल चापलता हेरि ॥ मोको लेत तहीं भय घेरि ॥ ९९ ॥ अपर सखी ॥ बहुरंगी सरठा शिर मैं ॥ मोहिं देखि लागै डरुझूमै ॥ निज निज भीति सबै कहि देत। तू ठकुरायनि डरत केहि हेत ॥ १०० ॥ दमयंती ॥ गोपाल ॥ तीनि लोकमें जो भय होइ।। मोहिं सकै लखि नाहिन सोइ॥ नलको विरह एक छिन रहै। मरन तूल मोको डरुवहै ।। ॥ १०१ ॥ दोहा ॥ ताते सेवकके वचन, पर करिये परतीति ॥ जीतब भरि तेरे निकट, रहौं अचल वहि रीति ॥ १०२ ॥ छप्पय ॥ विरह विपतिमें गरल हुते तब मोहिं जिवाये ॥ रैनि स्वप्नमें दुहनि अंकले दुहनि मिलाये ॥ करत रहे रसरंग अंगकी तपति बझावै ॥ जिय मोही अवलंबि रोज मेरे गुण गावे ॥ भरि रजनि नाम मेरो नहीं लेत दोऊ द्वै मैन में ॥ इहि रोष पाइ मृगनयनि सुनि नीद न आवति नैनमें ॥ १०३ ॥ सोरठा ॥ वचन रसीले जागि, कहति जाति भूपति रसिक॥ सोइ गई उरलागि,रानी रति आलस भरी॥१०॥ सवैया ॥ ओठन ओठ मिलाइ लिये छतियाँ छतियाँ लगि एक करी है ॥ ऊरुनि ऊनि सो रसिकै छबि पुंज प्रभा सब कुंज भरी है ॥ भेंटन जानि परै तिल तूल अतूल लई सुख लूटि खरी है ॥ कामही की रति हीकि मनौ सुखसेजपै एक लिखी पुतरी है ।। १०५॥दोहा॥

१४८ नैषधकाव्य । मिलि मिलि चलत दुहूनिके, शुभ नासिका सुवास ॥ एक प्राण दुहूंनको कहे देत परकाश ॥ १०६ ॥ इति श्री प्रचंड . दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्री खाँ.साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यक लानिधौ नल दमयंती संभोग वर्णनं नाम एकोन विंशतितमः सर्गः ॥ १९ ॥ दोहा-सर्ग वीसमें कथा, सूर उदैको रंग ॥ चैतालक मुख वर्णि बो, नल जागन परसंग ॥ १ ॥ सोरठा ॥ भूप जागिवे काज, बोले वन्दी वैन मृदु ॥ वील्यो रैनि समाज, सोवत प्यारी अंकलै ॥ २ ॥ वन्दीजन ॥ प्रद्धटिका ॥ जै जै जनेश जै महाराज ॥ लखिये प्रभात शोभा समाज ॥ लहि प्रथम शकुन दमयंति रूप ॥ मंगल पुनीत प्रिय तनु अनूप ॥ ३ ॥ गीत ॥ यहु जाति पास नितंबिनी दिशको चल्यो सित भानु है ॥ छवि लाज ऐंचि भयो निरंकुश छैल ज्यों हिमवानु है ॥ नव मित्र संगम आशसों सबिलास कोकिल जीलसों। मुसक्यात नैन सरोज गावतिबासबीदिशि शीलसों॥ ४ ॥हरिगीत॥ मुँदिजात खुलि खुलि स- कल तारे दीठि झिलिमिलि होतही ॥ चहुँ ओर केसरिसी खिली दिननाहँ किरंणि उदोतही ॥ भरिरजानि जीतिलयो तमोगुण भोर दारिदयोंलख्यो॥. नहिं अमृत दीधितिमें रही इक छबिछटा चखसों चख्यो ॥ ५ ॥ जगमाह तिमिर तरंग तुंग प्रपंच पंक समान है ॥ अतिश्याम छवि मधुकर निकर जनु करत रबिरुचिपान है ॥ तिन अंकुरनि निर ओस बिंदुनिकी विरा- जति माल है ॥ जनु सुघर सूचि न मिदति मुकतनिको अनूपम जाल है ॥ ६॥ पद्धटिका ॥ रवि किरणिऋचाचै प्रणवरूप || विधिनखतलोपि विंदुनि अनूप ॥ तहँ रचत आनि सुरसाधि लेतु ॥ गहि इंदु बिंबसो अंशु देतु ॥ ७॥ मनहरण ॥ दुरि चरमाचल में चंदु छिपि छिपि जातु मू- दती है नैन कुमुदिनि मुरझाइका कागनकी काकली कलित बन बाग रही छाया समतमकी पटल छटा छाइकै ॥ मायामय जाया रघुपतिकी इरीही नैषधकाव्य । १४९ जिमि तिमिरचिकुर ऐंचि रावन उपाइकै।। अरुणं बदंन सूर करन पसारे देखौ हरतु सरबरी विहीन पति पाइकै ॥८॥ प्रद्धटिका ॥ सुर मिथुन केलि शय्या अकास ॥ उडु गलितहार मुकुता विलास ॥ भरि रह्यो श्वेत करतूल तूल ॥ गलसोइ रूप विधुभयो कूल ॥ ९॥ रविकिरणि कही दशशत प्रमान ॥ तेइ चारि वेदशाखा बखान ॥ तेहि उदैपाइ महिदेव भूरि ॥ परभात देवध्वान करत पूरि ॥ १० ॥ आयो शिकार दिननाहु भूप ॥ धरि छूटत सरगज किरणि रूप ॥ ते हनत काग सम .अंधकार || मिलि करत काग ताते पुकार ॥ ११ ॥ ससमार नडर शशि भजत जातु ॥ उड़ि तारा पारावत विभातु ॥ सुर सुरत हार टूटे अपार ॥ ते दुरके मुक्ता नखत सार । रवि किणि बुहारीसों बुहारि ॥ करि पुहुप महीमें दिये डारि ॥ १२ ॥ दोहा ॥ प्रथम अतिथि रबि जानि नभ, तिमिर दूरवासंग ॥ ओस सलिल आखत नखत, देत अर्थ सरबंग ॥ १३ ।। क्यों न जिवावै असुर गुरु, तम असुरै परभात ॥ संध्या- वृत भ्रत जीविनी, विद्या कही न जात ॥ १४ चेंचु चूँमि चटुके लिपटु पक्ष हलाइ फुलाइ ॥ मिलत कोकरमणी रमन, लीलाकोक उपाइ॥१५॥ सोरठा ॥ प. कोक जो और, लहै सुरति परवीनता॥ आपु कोक शिर मौर, केलि कलाके सारनिधि ॥ १६ ॥ सवैया॥ तारा सभा अरु रैनि बहू इनको नहिं योग हती यह ऐसी ॥ देखतही अपने पतिकी यहि भांति विपत्ति कहूँ छिपि वैसी ॥ चंद्रहूकी छतियाँ अति साँवल पाहनते धनपीन अनैसी ॥ क्यों नवटूक भई छिनमें बिछुरी वह प्राणप्रिया जब ऐसी ॥ १७ ॥ सरसी ॥ नवत लाज होमति अनुरागी अरुण किरण शिषिमाह ॥ ब्याहि लई संध्या सरोज हग विगसतही दिननाह ।। गावत गीत मिलिंद सुघर ध्वनि झरत पुहुप चहुँ ओर ॥ श्रुति सुख पढ़त बैठि शाखा द्विज अरु नाचत हैं मोर ॥ १८ ॥ हरिगीत ॥ सुनिये तपोमयराज ऋषि महाराज, श्रीनलराजजू ॥ करि वेद विधि संध्या प्रणति अरु राजके शुभ साजजू ॥ इत इंद्रकी दिशि गर्भ संयुत चहतु जन्म्यो बालु है ॥ उत छुटत कंठ कपोतह कृत वदनराजतुलालु है॥१९॥ महाराज रानि दमयंति नै नलराजको हियराहरयो । नहिं मनतु दूषण बेद १५. नैषधकाव्य । विधिके लोपकोयों वसु परयो॥तू परम पण्डित आपु है नहिं दुरित हेतु कर सही!|अपवाद लोगनमें चलै जहँ कामकी चरचानहीं ॥२०॥मालिनी ॥ तट तरु खग जागे, रावके रंग पागे ॥ जगत अधखुलेसे कमलिनी नयन लागे ॥ पियत मधुप माते ओठकी सीधु मानौ ॥ पुहुपरस अमीसे गाइ शृंगार गानौ ॥ २१ ॥ मनहरण ॥ केसरि कुसुम सम फूलि फैलि रही छवि रविकी तरुण झबि झमकत अरुनाई है। बीच बीच दौरत जलजमधुपान पुंज गुंजत मधुप मानौ गुंजा द्युति पाई है ॥ साँवल अहार जो करत पीत मात तो ही सुलकेसरीनमै होत श्यामताई है॥ तम् को पियत सूरुताखों उतपति पाइ यमुना समनमै सरस मलिनाई है ॥ २२ ॥ प्रद्धटिका ॥ पति अस्त समय अनुराग कीन्ह ॥ जेहिं अमर लोकपति बरत लीन्ह ॥ तजि अधर भुवन चलि गई साँझ ॥ सोइ दीपति आई अनल माझ ॥ २३ ॥ अ० ॥ करि कमल मूरछा तिमिर दूरि ॥ सुर वेद सुरकर अमिय मूरि ॥ कल्हार [दि अप मिरत देत ॥ तह समन पिता यह जानि हेत ॥ २४ ॥ दोहा ॥ झमझमात रविमणि विमल, रवि किरणनिको पाइ ॥ निजपतिकी सम्पति लखे, कोन काँति सरसाइ ॥ २५ ॥ चंदु कमलिनीको रहै, रविके विरह सताइ ॥ हँसी कमलिनी देखि दिन, वितिनी वरिह बलाइ ॥ २६ ॥ मालति कालतिका • झरत पुहुपकल हाँस। कोक लोककी देखिकै, दिनको केलि विला- स ॥ २७ ॥ छप्पय ।। मलै सानसों खस्यो चलत अतिमंद मुहायो । शीतल भयो शरीर सजन अलि सोर मचायो । सरसी जात पराग धूरि धूरालै धूरयो । मान सरोवर सलिल बिंदु कनलै मुख पूरयो । याह.भाँति पौन परभातको आवत सकै वखानिको। परसेदु केलिको हरत हठि जैसे पौनु पखानिको ॥ २८ ॥ चंद्रमाला। वासर भयो दिवाकर कीरति झो सूरयकर छुरधारै ॥ मुंडतु तिमिर यातिकवरी निशि चोरनिको जुनि कारै ।। डारिदये वै केश सँवारे अवनी तलमें नैसे ॥ छायामिस तरु त- रुके तरहरि प्रगट देखिये वैसे ॥ २९ ॥ दोहा॥ सुयशरावरो शंख सम,जाको द्विजपति भाइ।।जो याको करछे दुलखि, धरयो कलंकु बनाइ ॥ ३०॥ सोरठा ॥ सूरय करसों भेदि,भयो अरासों अरध विधु॥ डारै नैषधकाव्य १५१ कमलनि छेदि, अरकोकनिके विरहको ॥ ३१॥ दोहा ॥ कमला करको पाहरू, कुमुद सदल दृग खोलिजिगि निशि सोयो दिन उदै, अ. लिकल रवगल बोलि ॥ ३२ ॥ प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष, देत प्रशीज सिहाइ ॥ तुहीं तुहीं परगट करै, पर प्रत्ययको पाइ ।। ३३ ॥ द्वितीय त्रिभंगी ॥ अमल कमल दल विमल सकल थल विलतित नल मारग लागे खग आगेही उठि जागे ॥ मधुर मधुर ध्वनि निगम गुनत मुनि मिलि तियकोक सभागे सुखपागेही अनुरागे ।। अरुणकरनिकर कनक सुरजहर गगनजु अंगनझारे भुअडारे फूल सितारे ॥ जय जय तमहर जयाति धरलखि उदयाचल वारे निशि न्यारे पापपधारे ॥ ३४ ॥ मोदक ॥ वंदिबने परभात वखानत ॥ जागि दोउ उर आनंद आनत।। दानदये नल जू कुल पूषण ॥ रानि उतारि दये निज भूषण ।।३५ ॥ नंदित पैंधत वंदिनके गन । जात सराहत चोपमहामन ॥ माणिक ला- ल किये जनु लोचन.॥ चाहत याचक दारिद मोचन ।। ३६ ॥ गीत ॥ सुरवाहिनी अभिषेकको विधिवेद संध्यहि ध्याइकै ॥ करिकै कृतारथ वंदि न यननि सैन वंदन भाइकै॥स्थवात वेगवनाव सुन्दर दाइजे महँ जो लह्यो। चढि सोधते निकरयो सुधाधर मेरुको मारग कह्यो ॥ ३७ ॥ इति श्रीप्रचंड दोर्दण्ड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडलाखंडल श्रीखाँसाहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ सूर्योदय वर्णन नाम विंशतितमःस्सर्गः ॥ २० ॥ दोहा-सर्ग इकीस में कथा, दमयंतीको मान ॥ उत्तर प्रति उत्तर वचन, नल करिहैं सनमान ॥ १ ॥ सोरठा ॥ शोधि शिखर मणि धाम, आयो राजा न्हाइ कै ॥ रथ ऊपर विशराम, बात वेगि नभते उतरि ॥२॥ दमयंती भहराइ, उठी देखि आयो नृपति ॥ उदवत शशि नियराइ, सिंधु प्रतीची बीचि ज्यों ॥ ३ ॥ चौपाई ॥ दमयंती अति आदर करयो। भूपति देखि मोद मन भरयो ॥ मंदाकिनि पंकज छबिजानी ॥ हाथ पाँइ दृग बदन निशानी ॥ ४ ॥ सवैया ॥ आनि नेषधकाव्य ७२ दयो पिय हाटक पंकज प्राणप्रिया करसों गहि लन्हिी ॥ पंकज नयनि प्रकाशि रही कमला समलै करकमलन बीनो।।थोरो दयो बहुतै करि मानत पीतमके हितको चितचीनो ॥ चाटकलों अभिलाष भरी सतलाखनिमो लबराटक कीनो ॥ ५॥ दोहा ॥ लखि प्रसन्न ठकुरायनी, विहरनिसों अनुमानि ॥ प्राणपियारो चाइसों, तब बोल्यो मृदुवानि॥ ६ ॥ नल ॥ दोधक ॥ मज्जित देव नदी हम कीन्ही ॥ संध्यहि अंजलि तामह दीन्ही ॥ शेष रही करिवे विधि प्यारी ॥ जो नबहै रिसकी उर व्यारी ॥ ७ ॥ लोचन ऐंचि रही अरिसौ है ।। तानि करी भ्रुकुटी सरिसोहैं ॥ नैसिकुपीय वियोग न भावै ॥ जानियहै नहिं बोलु सुनावै ॥८॥ दोहा भूपति ढिगते नेकटरि, गई सखीके पास ॥ कुमुदिनि तजि कमलनिमिली, ज्यों कमला सबिलास॥९॥करि किरिया परभातकी,सखी रोंकि निज पानि पाछेसों दमयंतिके, ऍदि लिये ग आनि॥१०॥हँसन लगीं सहचरि सबै देखिहि नयन दुराइ।मानौ मापति लोयननि, कर परसनि फैलाइ।।११॥ तोटक ॥ जिय जानति हैं यह तो सखिया ॥कर ऐचि छुड़ावत अँखिया ॥ परसे सुख सो नल जानि लई ॥ रहि नारि नवावति मौन मई ॥ १२ ॥ नल ॥ तारक ॥ मृगलोचनि योग नहीं तुमको है ॥ निज दासहि ओर लखौ सरिसौ है ॥ जेहिकी किरपा तुमको हम पायो ॥ तपसो तुमको नहिं क्यों मन भायो ॥ १३ ॥ भाररैनि करी हम सेवकताई ॥ नहिं हाइ करी विनती मनभाई ॥ यहिते अपराध भई रिस तेरे ॥ अब वंदति हैं पद पंकज तेरे ॥ १४ ॥ पियके कर पायन ओर निहारे ॥ दमयंतिसो दूरिहिते झिझकारे ॥ शर छोड़ि कटाक्षनके पैने ॥ उर पांइ दयो करि नयन तनेने ॥ १५ ॥ हिय भेदि कटाक्षनसों वश कैकै ॥ नल बोलि उठ्यो तियके पगछैकै ॥ नल ॥ तुअ दौरति है अँखिया हरिनीती ॥ श्रुति कूपनके भयसों उलटीसी१६॥ रिसह मिसहौ तुममो उर प्यारी ॥ सियरावति कमलन सूर्य उज्यारी ॥ नवमोतिनकी समता द्युतिवारे ॥ सुखदायक आखर बैन तिहारे॥१७|| सोरठा ॥ तेरी वाणि पियूष, कढ़ी क्षीरनिधिते मिलित ॥ हरति आव रस भूष, दुग्ध बिंदु मुसुक्यात नित ॥ १८ ॥ दोहा ॥ उदया चल पूरण शशी, उदित चंद्रिका साथ ॥ बैव्यो नल पथकपै, गहे प्रियाको हाथ ॥ १९ ॥ लक्ष्मीधर ॥ अंगमें अंग वाके समोवै हँसै ॥ दूरिकै वियोगै बढ़ावै रसै ॥ गोदलै बारही बार चूमै मुखै ॥ भानु ज्यों कमल त्यों चित्त पावै सुखै ॥ २० ॥ बोलि लीन्ही कलानाम प्यारी सखी ॥ आप सोहें खरीकै कृपासों लखी ॥ रूपओ बैसमें अप्तरी यक्षनी ॥ नर्मकी केलिलीला करी साक्षिनी ॥ २१ ॥ नल |सोरठा ।। सुनहिकले मृगनयनि, रोष भरी तेरी सखी ।। रँगी खेल रँगऐनि, नाह करुणा हमपै करै ॥ २२ ॥ तोटक ॥ रसके परिरंभनदै रजनी ॥ पति मोल लयो हमतौ सजनी ॥ नितहौं तुमसों यह बातक- है ॥ सब झूठ भई न सदा निवहै ॥ २३ ॥ नल छोड़ि न और बसै मनमें।। रुचि पूरि रही तेहि की तनमें॥ यहिके हियकी परतीतिनई ॥ नव योवनसों विपरीति भई ॥ २४ ॥ मौक्तिक दाम ॥ नयो मुख कमल विलोचन लाल॥ लखै इतको करि दीठि कराल॥ लख्यो तब मोहिं करयो जब दूत ॥ यही सुधि भूलि गई इक सूत ॥ २५ ॥ अलीन सु- नावति वैन पुनीत ॥ मैं लखि ठानति मौन विनीत ॥ सखीन बुला- वति नाम पुकारि ॥ नलेति न लेति हमैं निरधारि ॥२६॥ उरोज रहें उर मंडित पीन ॥ कठोर भई छतियाँ दैहीन ॥ गयो रुकिचित्त रह्यो नहिं ठौर ॥ धरै हमको कितलै शिरमौर ॥ २७ ॥ सोरठा ॥ देत उराहन भूप, नरम केलि लीला नरम ।। बोली बैन अनूप, कला कला धरकी कला ॥ २८ ॥ कला सखी सवैया ॥ साँच विचारति हो पुहुमीपति ऐसी दुहुनकी प्रीति नई है ॥ पाछिली प्रीति बड़ी हमलों यहि ते हमही महँ रंगरई है ॥ मयनके तंत्रनि मंत्रनिके मत जानत मति मोद मई है । नवल वहू रतिको पति तीक्षन ज्यों तरवारि कि धार भई है ॥ २९ ॥ प्रीटिका॥ ना सत्य वचन तुम सुर समान । तेहि भाँति चतुर रानी सुजान ॥ धरि मन्मथके सो रूप लेत ॥ तुम पूरि रहे हियके निकेत ॥ ३० ॥ तुम माहँ चित्त चिहुट्यो निदान ॥ नहिं ऐंचत आवै कढ़त प्रान। यह राज धूरि ताते रिसाति॥ दृग मोरि छोरसों लख- ति जाति ॥ ३१॥ मनहंस । जब ते लखे तुम मैन चंचल कोरसों।

१५४ नैषधकाव्य पुतरीनमों मिलिकै बसै तुम ओरसों ॥ मम बैनपै परतीति जो नहिं हो ति है ॥ लखिये विलोचन आइ आपुन ज्योति है ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ निज कुच कुंकुम रावरे, हिय में देति लगाइ॥ कहे देत अनुराग निज है तोमें यहि भाइ ॥ ३३ ॥ तोटक ॥ जब ते तुम आनि वसे मनमो ॥ परिपूरि रहे सब ही तनमो ॥ कुच दो हिय मोन समाइ सकै ॥ छतियाँ मग बाहेर को ललकै ॥ ३४ ॥ यहि भाँति कला कल बैन कहे ॥ हग भूपतिके मुसुक्याइ रहे ॥ रमणी परबृझनु है नि- जुकै॥चिबुकै गहि आनन उन्नतु कै॥३५॥ पियके करसों मुख मोहत है। युत पंकजसों शशि सोहत है ॥ बहुरौ नरनाह कह्यो हँसिकै ॥ सखियाँ हरषीं सुनतै रसिकै ॥ ३६॥ नल ॥ यहिके मुखको शशि मित्रभयो । अरि बासर ताहि निकारिदयो ॥ लखि कमलनमें समता सिगरी ॥ ति- नमें कमला कुल आनि भरी ॥ ३७ ॥ दोहा ॥ अधर दशत रसरंगमें मोपै योग नरोष ॥ कीर बिवफल छत करत, ताहि देत कहुँ दोष ॥३८॥ पद अंकुश कुच कुंभकी, लक्ष्मीलई चुराइ ॥ तिन्है पीडिकै भूपहों,साजी क्यों न सजाइ ॥ ३९ ॥ संयुत ॥ मृदुकंद ओठनिको दसै ॥ अपरा- धमों मुखमों बसै ॥ शिरको कहा बलि पापु ॥ पग? सके नततापुहे ॥ ४० ॥ यह बूझि तैं करुणा भरी ॥ तकसीरको हमसों परी ॥ जेहि ते न बोलति चाइसों ।। बरभौंह ऐंठति भाइसों ॥ ४१ ॥ सोरठा ॥ कान आपनो लाइ, दमयंतीके बदन ढिग ॥ छलसों सुमुख लगाइ, दमयंतीके कानसों ॥ ४२ ॥ तब बोली मुस्क्याइ, कला मनोज कलावती ॥ तिरछे नयन चलाइ, दमयंतीसों सरिस होइ ॥ ४३ ॥ लीला ॥ मैन मंत्रनकी कला हमहीं पढ़ाई सोधि ॥ भाँति भाँतिनसों सिखाइदई तबै बुधि बोधि ।। ते सबै दमयंतितै हियते दई विसराइ ॥ तें करयो विपरीति दंपति भाव यों उलटाइ ॥ ४४ ॥ बैन ये सुनिकै कलाके मौन देति हुँकार ॥ ऐंचि कौंलु दयो तहीं सखि सोझकी बहुवार ॥ ४५ ॥ कलासखी ।। सोरठा ॥ महाराज नलराज, मैं विनती बहुतै करी ॥ भई अधिक इतराज, दईकोलकी ऐंचिकै ॥ ४६॥ लीला ॥ मोहिं बूझति तैं ग- न्यो नलको न चिह्न न पाइ॥ रूपकै नलको चल्यो छल गेहु है सुर- नैषधकाव्य १५५ राइ ॥ स्वर नदी जल जातले सुरलोकते इत आइ ॥ मोहि चाहतु है छल्यो करि नेहके सब भाइ ॥ ४७ ॥ होगयो जब काम मोहित कै अहल्या तीर ॥ स्वाँगु कुरकुटको करयो तब धुद्धि बंचक वीर ॥ यों भयो दमयंतिके भ्रम इंद्र तुमको जानि ॥ साँच हौ नल देहु तौ परछन्न चिह्न बखानि ॥ ४८ ॥ शशिबदना ॥ यह कहि बानी ॥ चुपकि सयानी ॥ नरपतिबोल्यो । आमरतु खोल्यो । ४९॥ नल।सोरठा॥ प्रेम पियारी रानि, निज मनमे किन सुधि करै ।। में वर्गों पहिचानि अपनी तेरी आगिली ॥ ५० ॥ सवैया ॥ लाज भरी डरसों थहरी जब वा निशि केलि कला विस्तारी ॥ आधिकही रसरंग समय हम तोहिं दयो तजिकै मनुहारी ॥नेकु वियोग लयोन परै जब मानु करै कबहूँ रुचिवारी । सो सुधि भूलि गई निजकै वह देखतही तमबीर हमारी ॥५१॥ दोहा ॥ सदनख छत तो कुचनिके, उपटे मो उर आइ ॥ सुधि करिमैं हँसिके कह्यो, दीन्हे सखिन बनाइ ॥ ५२ ॥ सवैया ॥ खेलमही सखियानके संग तहाँ हम ये कछुरोषु कह्यो । याँचत है सबके ढिग हौरपटयो मिसुकै तुअपाँइ परयो ॥ वादिनहीं जब आइ गयो रति लालचसों ललचातु खरयो । तैं परिहास सज्यो सजनी मुख चामि भुजागहि अंक भरयो ॥ ५३ ॥ दोहा ॥ अधरनिमें अधरनि मिलै दीन्ही विरी खवाइ ॥ मति भूलै मानिनिजु हो, जाती हो परिपाइ।।५४॥ सवैया ॥ लोचन फेरि करचो बदलो निशि लेत करोट रहे मिलिसौं हैं ॥ नेकु वियोग सह्यो न गयो गुरु लोग रिसाइ चढ़ावत भौहें ॥ मांगत मोहिं बिरी करसों कर लागत भाजि गई अलगौहें। सोइक बार सबै बिसरी जब सों इक बार करी हमसौंहें ॥ ५५ ॥ चौपाई ॥ प्रथम सुरत मेही कुम्हिलाइ ॥ वार वार रति सही न जाइ ॥ मैं तब तोहिं उराहनुदयो । सो बलि भूलि भलोपन लयो॥५६॥ झूठ वचनमें रस- सों रूसी। चली सखी न संग कोऊसी॥ मोहिं देखि आगे रस पगी। सुमिर वहै तृण तोरन लगी ॥ ५७ ॥ सोरठा ॥ चिबुक साँवरो बिंदु प्रतिबिंबित मुख हारमै ॥ मनौ नखत में इंदु, सुधि करि प्यारी सुरति श्रम ॥ ५८ ॥ सरसी ॥ सुधि करि शरद कोकनदलोचनि विलसित १५६ नैषधकाव्य। विपिन विहार ॥ चल दलको दलु टूटि परयो महि लागत पवन झुका- . र ॥ ५९ ॥ सोरठा ॥ ऐसी भाँति वखानि, सकल भेद भूपति कहै ॥ दमयंती सकुचानि, ऍदि रही सखिके श्रवण ॥ ६० ॥ दोहा ॥ नयन कमलकी गति हतै, जानि कानकी बानि ॥ ॥ राजरानि मीड़ति तिन्है गहे कोकनद पानि ॥ ६१ ॥ हरिगीत ॥ यह लखत केलि विलास तियके हाँससों पिय मुखलसै ॥ जनु सरग नवल प्रवालके दल दुग्धकी लहरी रसै ॥ नहिं रहसि भेदनिसों विदित सखियाँ सबै विहसें खरी ॥ जनु पुहुप वर्षे हर्ष हिय महि अवतरी नभसों परी ॥ ६२॥ सोरठा ॥ नल मुख हाँस उदोत, अली हँसी सोहन लगी ॥ प्रगट सुधाधर होत कुमुद पाँति जैसे खुलै ॥ ६३ ॥ पहिचान्यो सुरहाँस, सखी पक्ष निज पाइकै ॥ अबलालै बलपास, कला विज्ञ बोली कला ॥६४॥कला सखी॥ सोरठा ॥ अहेरानि गुण खानि, नेक आइ इत हंस गति ॥ पिय मुख मधुरस सानि, सुनि सुंदरि सुंदर वचन ॥ ६५ ॥ सवैया ॥ पीछे खरी बहराइ सुनै पियकी बतियाँ छतियां सुख देनी ॥ भूपतिके शिरपेंच मणीन भई प्रतिबिंब सरोरुह नयनी ॥ जानि गई जिय भावक- लाचित चावभरी चितवै करि सैनी ॥ आँखिनके बिन साखिन हू लहिहेत करै अनुमामति पैनी ॥ ६६॥ कलासखी ॥ प्रद्धटिका ॥ मम श्रवण अभूषण मणि कठोर ॥ तुअ हाथनमें सखि गड़तकोर ॥ निज पट्टरानि कर ऐचिलेह ॥ मैं करत आपसों अर्ज येह ॥ ६७ ॥ नलराज कह्यो सुनि रानि रानि ॥ निर्फल अयासतजि श्रवणपानि ॥ तप तुरत कला करदिये झारि ॥ दमयंति गई तजि सोरुपारि ॥ ६८ ॥ तब कलासखी चलिगई डोलि ॥ दुरिनेह मंजरी लई बोलि ॥ कला ॥ सुनि दोउनके सखि रहसबैन ॥ जेहि भाँति भये भरिरैनिसैन ॥ ६९ ॥ दोहा ॥ मैं तोसों वर्णन करयो, अपनी जानी बात ॥ तेंहूँ कहि जो कछुलही, सही रही अलसात ॥ ७० ॥ मौक्तिकदाम ॥ कही उनहू अनजानत बात ॥ भये तब दंपति कंपित गात ॥ कह्यो तब भूपति वोलि कलाहि ॥ पुनि भूपति नेहलताहि सराहि ॥ ७१ ॥ नल ॥ कहौ तुम झूठ सिख्यो कहि ठाम ॥ दुहुन सिखी मति मोहन काम ॥

नैषधकाव्य । १५७ नेहमंजरी ॥ कहा बिनहीं ठिकदेत कलंक ॥ सखी नहिं झूठ कहैं यक अंक ॥ ७२ ॥ पिय मिलि आपु ठगौ सब आलि ॥ नयोग हमै तुमसों अँठ चालि ॥ कहै लगि कानन काननबैन ॥ हँसै करि अद्भुतसों चित चैन ।। ७३ ।। कलासखी । दमयंति हमै जनिलावहि दोष ।। करै बिनकाज कहा बलिरोष ॥ कहैं हम बात छिपाइ निदान ॥सुनै जेहि माह द्वितीय न कान ॥ ७४ ॥ नल ॥ लखी मृगलोचनि आलि तुम्हारि ॥ सबै छल साहसकी अनुहारि ॥ करै इनको जनि चित्त विलास ॥ सुनै सखियां कुहकैं कलहाँस ॥ ७५ ॥ दोहा ॥ हंस गवान निज भवनमें, आवन इहै नदेह ॥ दुर विनीत कतमीत है, चरचि चित्त चितलेह ॥ ७६ ॥ चुलिआला ॥ दमयंती शिरनाइकै सैनक री सकुचाइ सुलक्षण | जानि गयो भूपाल सब भेद रह्यो मुस्काइ ततक्षण ॥ ७७ ॥ मालाधर ॥ वरुण बरसोंतहीं कर समेटि छोटै दई ॥ बसन सबभीजिकै लखत आश्चर्य भई॥विधनु नमि दीठिको दयुति उरोज देखी परै ॥ दीपति जनु दामिनि युगल तोयसों अंबरै ॥ ७८ ॥ नंदा ॥ जानतु जग तुवसनको अंबरु नामु ॥ नखत सलिल कन सुंदर नित विशरामु ॥ ७९ ॥ श्लोक छंद ॥ देखि देह दशादोऊ लाजसों बहुतै भरी ॥ आइ भीतरते तौही दौरि बाहेर को टरी ॥ ८० ॥ देखिके निकसे दोऊ ओरजे सखियां हुती ॥ ते सबै तुरतै दौरी बाहरी इक सुती ॥ ८१ ॥ प्रद्धटिका ॥ दमयंति करी करसैन आइ ॥ तब लई दुवो सखियां बोलाइ ॥ वै बोली बाहेरते पुकारि ॥ किनि देहु इन्, अजहूँ निकारि ॥ ८२ ॥ दोहा ॥ भूपदरीची बीचह्न, बोल्यो आनन खोलि ॥ बाहेरही सब सहचरी, करी दीठि हगडोलि ॥८३ ॥ नल त्रिभंगी ॥ जे जे हम बातें रस रस सातै करी सुहानैं रजीनजगे ॥ ते इन सुनि लीन्ही अब सुधि कीन्ही कहि दीन्ही हिय प्रेमपगे ॥ इनकी रति पतिकी और सुरतिकी गति निज नयननि हम देखी ॥ तेहि पै वै ढी भई बसी छलई यह मति लेखी ॥ ८४ ॥ सोरठा ॥ जिन के चरित पुनीत, कीरतिसों उज्ज्वल दिपै ॥ दूषण देत अमीत, मृषामषी करत ॥ ८५ ॥ सखी दोऊ ॥ हम न करैं कछु दोष, * -

१५८
नैषधकाव्य ।
चर्चारावरी ॥ जालांग आनत रोष, ये हम जाती बाहरी ॥ ८६ ॥
तोमर ॥ लजिकै रही दमयंति ॥ पिय पोष ताहि इकति ॥ मुख चूमिलै
उरलाइ ॥ नव नेहसों समुझाइ ॥ ८७ ॥ गहि पीन उच्च उरोज ॥
करनीवि ऐचत चोज ॥ नख अंक सोहतलाल ॥ शिवशीश किंशुक माल
॥ ८८॥ नल दोहा ॥ कुच नितंब ऊरू विमल, मिलततिहारो बास ॥
उज्ज्वल गुनमैं शुभदशा, ताको लहत प्रकाश ॥ ८९ ॥ सहि नसकै
मन्मथव्यथा,तनु कोमल चल नयनि । हहा पाँइ तेरे परौं, तन मन वारौं
ऐनि ॥ ९० ॥ सोरठा ॥ पतिकी हठ गति जानि, झमकि उठी पर्यक
ते ॥ नेवर झनक सुहानि, चली अलीकी ओरको ॥ ९१ ॥ कुच नितंबके
भार, पग आगे नहिं परि सकें ॥ पाछे विथुरत बार, टूटी कटि लचकी
परे ॥ ९२ ॥ तोटक ॥ नलपै चलि ताहि गह्यो न गयो । लहिसात्वि
कितंभ समान भयो ॥ दमयंति लजाइ सखी गनमें ॥ नहिं जाइ रहै
नससै मनमें ॥ ९३ ॥ गीत ।। तब वंदि सुंदर द्वारपै नलराजसों
विनती करी ॥ दिनमध्य आवत जानिक गुनमान भावनसों भरी ॥
वंदिवधू ॥ जै जीव श्रीनल भूमि वासव मध्य वासर है भयोः ॥ जल
न्हानके क्षितियान चाहत गऊ पूजनको ठयो ॥ ९४ ॥ जलश्वेत शुद्ध
सुगंधि सुंदर केश पुंजनि रावरे ।। छहरात होत मनौ मिले यमुनातरंगाने
सॉमरे ॥ जगशीश पै दिननाहतापतु आपको परतापुजू ॥ शिवपूजि दान
विधान संयुत आनिये उरजापुजू ।। ९५ ॥ सुनि बैन वंदिनके तहीं नल
भूमिनायक चाइसों ॥ जेहि ओर प्राणप्रिया गई तेहि ओर हेरत भाइसों
गिरिराज जापति जापको हित मानि आनंदसों भरयो । निजराज भौन
गयोचहै पर्यंकते उठिकै खस्यो ॥ ९६ ॥
इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला
खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबर खाँ प्रोत्साहित
गुमानमिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ नल
विलासो नाम एकविंशतितमःसर्गः ॥ २१ ॥

१५९ दोहा-सर्ग बीस द्वैमें कथा; वर्णन वासर कृत्य ॥ पूजन हरि हर देवको, वंदन परिजन भ्रत्य ॥ १॥ सोरठा ॥ उदयत नल महि इंद, खंड सातये सोधपै ॥ जोरत करनि नरिंद, साँचे कर दाता भये ॥२॥सवैया ॥ चीनके चीर नबीननिसों गिलमै गुलजार हजार बिछाई ॥ पैनलके तरवातलके समढे न सकै कलि कोमल ताई । झुंडजुरे सिगरे नरनायक मंडिप नाम करैं बहुधाई ॥ शीश अभूषण माल मिली सुगली जनु कमल कलीनसों छाई ॥ ३ ॥ मनहरण ॥ निज निज देशनिके रतन विशेष वेश करत नरेश भेंट दूरि शिरनाइक ॥ बोलत पुकार चोबदार हेमछरीवार वारन तुरंग स्थराजत बनाइके ।। काहू और सनै कहूँ विहँसत नयन काहू सों कहत वन मृदुल सुहाइकै ॥ दौरि दौरि सजत अशीश तसलीम तेई धन्यवै धरामे पावें भोग भाग भाइके ॥ ४॥ दोहा ॥ निज निज लायक थान थित, नृप चितवत तेहि आर ॥ पूजन शारद चंद ज्यों, ऊरध नयन चकोर ॥ ५॥ करि करि लोचन भौंहकी सैनभेट धरणीश ॥ लेत एकसों औरको, वहै करत बकसीस ॥ ६ ॥ चौपाई ॥तिनसों भूप कुशल हेसि बझी ।। देश रीति पुनि प्रेम अरूझी ।। रागरंग रण चरचाखरी ।। भेंमीपति तिनसों ते करी ॥ ७॥ ते अति मुदित भये नरनाह || थिति आपनी गनी जगमाह ॥वार वार चर्णन शिरधारें ॥ करैं अरज निज भवन सिधारें ॥ ८ ॥ नल तिनके पूजे अ- भिलाष ।। झलकति दई खिलति सतलाख ॥ हरषि गये ते भूप अवास ॥ नृप मन्जनको सज्यो विलास ॥ ९॥ तोमर ।। चहुँ ओरते नवनारि ॥ घट पूरि हाटक वारि ।। छुटि फैल जात सुवास ॥ अलिपुंज गुंज वि. लास ॥ १० ॥ मृग मेद केसरि सानि ॥ उवटै नृपै मृदुपानि ॥ दधि और तेल सुगंध ॥ शिरमीजि केश निबंध ॥ ११ ॥ सोरठा । भूभृत धन तप कीन्द, ताहि न्हवावत सरसशुचि ॥ जलधरघट भरिलीन्ह, तीरथ जल लहरी विमल ॥ १२ ॥ प्रद्धटिका । रचिस्वर्ण रतन चौकी अनूप ॥ ता ऊपर राजत न्हात भूप ॥ बहु पढ़त गंग वि. नती बनाइ ॥ कर जोरि चित्त थिर माथनाइ ॥ १३ ॥ सवैया ॥ हे सुरवाहिनि दाहिनि दीननितो पगलीन जो दास कहावै ॥ द्वारदेवे तिहिके १६६ नैषधकाव्य । शिवके सब बासव तौँ नित जान न पावै ॥ जात पुरी पुरुषोत्तमकी विल सात तहाँ सुकहा कहि आवै ॥ गूंदै शची प्तियके हरवा तरवा यमलोक- नको दिखरावै ॥ १४ कवित्त ॥ औरको कपूत कूर कायर कलंक युत जाकी प्रीति रीति पर दोष चरचाकीसों ॥ कालदंड दानको गुमान जू बुलायो ताहि ताके किंकरनि आनि गह्यो शिरताकीसों ॥ गंगकी तरं- गसों कहूँते कोऊ अंग मिल्यो देव अंगननिसों उठायोलै चलाकीसों ॥ सुरपुर जाइ वैव्यो बोलै सतराइ देखौ पाँयन दवावै दुलहिनि मघवा कीसों ॥ १५ ॥ प्रद्धटिका ॥ कर नरम तऊ विधि करम जानि ।। तब हरित पवित्रा धरत पानि ॥ जनु प्रिया विरह तन अनल झार ॥ तेहिकी अपार ये धूम धार ॥ १६ ॥ हरिगीत ॥ आचमनीयको जल गंगको . करसों लयो । तहँ चुलक निर्मलमें झलक नभ लोक प्रति बिंबित भयो । जनु सकल भूतलके पदारथ दान में नल हैं दयो ॥ १७॥ सोरठा ॥ दमयंतिहि अलगाइ, निजपति पायी भूमि तिय ॥ अंग अंग लपिटाइ, गई भस्म मिस यज्ञकी।।१८॥साधत प्राणायाम,कटिलो ठाढे सलिलमें ।। मनौ वरुणके धाम, कमल मुँदे द्वै शशि खुल्यो ॥ १९ अभ्र विशद द्युति तार धोती पहिरी मारछवि ॥ दश दिशि वसन उदार, हरकी करि जनु ईर- षा ॥ २० ॥ संयुत ॥ दमयंतिके दिगको चलै ॥ चितकी लही गति चंचलै ॥ उर ऊतरी परिधानसों ॥ नृप ताहि रोकत ज्ञानसों ॥ २१ ॥ घट बारिके कुच पीन हैं ॥ शिर दर्भ केशनबीन हैं ॥ सब अंग शीत करै तिया ॥ नलको भजै जलकी सिया ॥ २२ ॥ उपेन्द्रवज्र ॥ करे उपस्थान दिनेशजूके ॥ अखंड धारा जल अर्धहूके ॥ जपै महा- मंत्रन देव गाये ॥ सरोज श्री खंड मिले चढ़ाये ॥ २३ ॥ दोहा ॥ फटिक माल करमें लसै, झल झलात छवि जास ॥ बीज बरन वश भगति रस, जनु कर करत निवास ॥ २४ ॥ लीला ॥ पाणि पंकज पौरमें जब देव तर्पण युक्ति ॥ पितर तर्पण तिल मिलति तिल हाथमें पुनरुक्ति ॥ धाममें निज त्यों लसै प्रभु अंभुपति सुखधाम ॥ क्षीर सागरमें रमै जनु देव वासव नाम ॥ २५ ॥ दोहा ॥ न्हाइ बिमल धोती पहिरि, छहरि चाँदनी चंदु ॥ पूजा मंदिरमें गयो, आसन लयो नैषधकाव्य अमंदु ॥ २६ ॥ द्वितीय झूलना' ॥ दंडी व्रती ऋषिराज राजत चारु आसन साजि ॥ जहँ दिव्य धूप सुगंध बंधित भौंर गुंजत राजि ॥ चहुँ ओर फूलनसों भरीं फल झूमि वंदनवारि ॥ नाश अंधकार गयो हजारन दीप राखत वारि ॥ २७ ॥ मुकुतानके बिछुरे मनौ निज देह पावक दाहि ॥ धरि घोरि केसरिसों सिसी भरि रूप रूप सराहि ॥ मणि साँवरे चकरेक चोरनि माँह चन्दनपंक ॥ जनु राहुके मुखमें परयो धुरिकै ससंक ससंक ॥ २८ ॥ कस्तूरिका चयसों भरे मय रजत सुंदर थार ॥ क्षिति इंदु मंडल अवतरे उर कृष्ण सार अपार ॥ नव मालती कुलमाल पर्वत फूल राजत ढेर ॥ गिरि देव देव निवासको तेहि तूल है बहु फेर ॥ २९ ॥ चौपाई ॥ भाँति भाँति नैवेद्य बनाये ॥ उज्ज्वल शुचि चीरनसों छाये ॥ भरी भूमि तिल परै न हेरि ॥ उत्तम कामिनि लाज धनेरि ॥ ३० ॥ प्रथम भूमिपति पूजत भानु ॥ जाको वेद करै गुण गानु ॥ भक्ति भाव देखत संपन्न॥सावक्तर रवि भये प्रसन्न ॥ ३१ ॥माल करी राचि चंदनलाल।।सासों जपत भानु मनुजाल ||मानौ चहत अधिक अरुणाई। करै तासुकर सेवक ताई ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ कनक. कुसुमसों पूजि शिव, सोहत अति अभिराम ॥ सायक दयो चढ़ाइ जनु, मानि हारि हिय काम ॥ ३३ ॥ मनहंस ॥ नव नागकेसरि फूल देव चढाइ कै ॥ भव भाल होत कपाल भूषण भाइकै ॥ पुनि नील नीलज कंठ माल मिलाइकै॥तब द्वै गये शिवनील कंठ बनाइकै ॥ ३४ ॥ दोहा॥ कलु- षहरण करिहैं कृपा, मर्दन मयन अनूप ॥ शुभ सौरभ आगे रची, भूप- काम सरधूप.॥ ३५ ॥ सवैया ॥ दमयति तियै बिछरोन परै न पियेक- लनेक परै छतियामै ॥ शिव शीश कलानिधिसों सकुचै निहचै न रहै गति औमतियाम॥मिसुकै उर ध्यान धरोहरको धरको हियरा फरको अतियाम।। तब मांदि रह्यो अँखिया पुहुमीपति पूरि रह्यो बतिया बतियामै ॥ ३६ ॥ सोरठा ॥ परयो दंडवत पाँइ, मनौ मदन आयो शरण ॥ दीने बाण चढ़ाइ, कमल कोरि शिव चरणपै ॥ ३७ ॥ प्रद्धटिका ॥ नृप जपन लग्यो शत रुद्रजाप ॥ जेहि हीन होत जगतीनिताप ॥ कर लसत अच्छ अवली विशाल ।। नव पल्लवमे जनु भौंर माल ।। ३८ ॥ तारक ॥ पुरुषो- १६२ नैषधकाव्य तमको पुनि पूजन कीन्हो ॥ पढ़ि धूरुष सूकत संयम लीन्हो जपि द्वादश अक्षर मंत्र नवीनो ॥ हरि द्वादशमूरतिको चित चीनो ॥ ३९ ॥ लक्ष्मीधर ।। मल्लिका फूलकी दीह माला गुडी ॥ आखन स्थानमें छापि दीन्ही जुदी ॥ भक्तिके भावसों विष्णु जूतों रस्त्रो॥नाग राजा मनौ आइ ह्याँई वस्यो॥४०॥प्रमाणिका ॥ सरोज निल जोरिकै ॥ हरा गरे निहोरिक॥चढाइ भूप जो इयोसिया कटाक्ष सो भयो॥४१॥गीतासब दिव्य शुद्ध सुगंध लेपित बारि दीप कपूरसों ॥ नव स्वर्ण केतक पुंडरीक चढाइ देत अदूरसों ॥ करि अन्न पक्क पियूष पोपित स्वाद देत निवेद है ॥ बहु भाँति धूपति धूपसों जेहि देखि नाशत खेद है ॥ ४२ ॥ मौक्तिकदाम ॥ अमोल मणीन रचे बहु दाम ॥ सबै अंग अंग किये अभिराम ॥ लसें हरिजू थिर आसनश्वेत ॥ मनी पयसागर माह निकेत ॥ ४३ ॥ कस्यो परणाम गयो लचिमाथ ॥ मही पुष्पांजलि श्री नृप हाथ ॥ धरी शिरपै सुख शोभ उमंग ॥ महेश्वर मौलि विराजत गंग ॥ ४४ ॥ मनमोहन ॥ जलनिधिसुता हियमें बप्तति ॥ हरिकी सुरति तेहिमें लसति ॥ तेहि उच्च थल सरस्वति रहति॥अनुराग कंठहिमें बहति ॥ ४५ ॥ तोटक ॥ तेहिते धन पूजन योग नहीं ॥ समुझाइ दियो बुध लोगनही ॥ मुकुत्तावलि शीश वदावलिकै ॥ हरिकी विनती विनयी चलिकै ॥ ४६॥ नल ॥ लीला ॥ रावरी महिमा न आवति वैन औ मनमाहि ॥ जो कछू कहिनासुटेरतु योग जानतु नाहि ॥ हौं करौं परलाप या परि पाँय पंकज नयन ॥ सो क्षमा करिये कृपानिधि जानिये जड़ वैन ॥ ४७ ॥ सोरठा ॥ हौं जड़ जीव अज्ञान, चहत बड़ाई रावरी ॥ जैसे भासत भान, तम ताको प्रगटन चहै ॥ ४८ ॥ चर्चरी ॥ जो न आवत वैनमें मनमें न लागत ध्यानसों ॥ तो हमें सुख लाभ होत विचारि देखत ज्ञानसों॥मेघ ज्यों नियरात है नहिं कोटि चातक टेरसों ॥ देखि जात जुड़ात लोचन प्यास नास सबेरसों ॥४९॥ सवैया ॥ मीन स्वरूप धरयो छलको छलको लगि सागर पूछतरारे ॥ क्षीरतरंगनि सों मिलिकै सुरगंग भई अवदात निहारे ॥ मंडित कै क्षिति मंडलको निज निज पीठि अखंड धरी ॥ जिन नैषधकाव्य । निरधारे ॥ मंदरके किन चक्र विराजत साजत "कच्छपरूप विचारे ॥ ॥ ५० ॥ मनहरण ॥ चारौ खुर दि खूदि खनिकै अवनि तल जलधि बनाये चारि अतुल अपार हैं ॥ एक डाढ आई दै उठाई महिकॉल रूप शशिकी कलापे शशि समता विचारहै ॥ दानव गहन सिंह अरध मनुजतनु विकट कुटिल सा निपट करार है ॥ अंकुश नखन ऐंचि हरिणकशिपु अने डोरि ऐति छोरि तोरि लीन्ही निरधार है ॥ ५१ ॥ सवैया ॥ आवतही पुरके धुरते मिले बहु बालक घेरि लि- यो । बावन जानि महा मन कौतुक चेरिन भीतर टेरि लयो ॥ बाल राज वधू हुलसी कन दानको चून जबै कर फेरि लयो ॥ पावतही पगती निके भूमिहि तीनहु लोकहि नापि लियो ॥ बाहनसों उपजे जग क्षत्रिय लोकनकी रचना जब कीनी ॥ तिनहीं सबते तिन तूल हने निर्मूल उखारि सबै क्षिति छीनी ॥ पंसुल भामिनि भूरि- नकी नवखंड करी द्विज देव अधीनी ॥ अर्जुनके भुज दंडनि खंडित की रति राम ऋषीश्वर लीनी ॥ ५३ ॥ मनहरण ॥ लीनो अवतार अज तनुजते महाराज दुखन तुम्हें न खर दूषणके अरि हौ ॥ ज्ञान हो न चहौं मोहु याऊ कहै यासों लखौं रावण चमू ज्यों सब ओर रहे भरि हौ। सुयशकी राशि तीनौ भवन प्रकाशिये निकासि दीनी सीता लोक बाद- निसों डरिहौ ॥ विश्रवासों भई शूपनेखाकरी ताहि रूप पितर समान ताके काननिकतरिहौ ॥ ५४ ॥ दारिद हरति मेरे वारिदसे बसुदानि चारौ भुजदंड मार्तंड तेज चटके ॥ अलप कलप तरु जरसों उखारयो निज ईर्षासों पागे अनुरागे दान रटके ॥ जीतके निधान उपधान सियरानी जूके वाणी जूके विमल विहारक निकटके || जय अभिराम तन छबि कोटि काम वारौं भादौंकरे श्याम धन यादव कपटके ॥ ५५ ॥ कर न सकत रण विफल करन काज अर्जुनरथ साजि सारथी सुहाये हौ।। पारथ कृतारथकै भारथ जिताये जोर शूर सुत शूरको हराये वेद गाये हौ ॥ वाम विहँसत नयन दाहिनो दुखित ऐन ऐसो अद्भुत गति सुमति बताये हो ॥ करत हो शेष बास जगत अशेष वास दैत्यनको त्रास देत देवनको भाये हौ ॥ ५६ ॥ धरत हौ धरणि धर्म हेत धनि धनि धी- १६४ नैषधकाव्य । रज धुरंधर सहसफन वारे हौ ॥ माधुरी पियत मधु साधुरीति साधितकै वाधित करत भव वाधनि उधारे हौ ॥ मुशलसों कुशल सजत तीनौ लोकनकी सहल सहल यमुनाके मद गारे हो ॥ प्रबल प्रचारे दैत्य अबल उबारे देत रोहिणी के प्यारे नीके नन्दके दुलारे हौ ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ एक रूपदै भेद विन, तीनिकाल थिरचारि || गावत पंच अधीश षट,हंता सात सवारि॥५८॥ छप्पय ॥ सुयशरूप तुम विष्णु जन्म जानतसों लीन्हो॥ विष्णु जसा द्विजदेव जगतमें गौरव दीन्हो ॥ सकल मलेक्षन काल हेतु करवाल भयंकर ॥ रुधिर कुंडगहि मुंड झुंड हरष हिय शंकर ॥ इमि दुःख दशा हरि धरणिकी हरिदश विधि अवतार धरि ॥ कलिकी सुरूप सुर भूप प्रभु, चित मलकी गति पार करि ।। ५९ ॥ स्वागता ॥ राम भानुसुतसों हित मान्यो ॥ इंद्र पूत तुरतै हति आन्यो ॥ कृष्ण इन्द्र सुतके रखवारे ॥ भान सुवनके खंडनवारे ॥ ६० ॥ ज्यों त्रिविक्रम भये तुम रूरे ॥ तीनि लोक पद पंकज पूरे ॥ तीनि वार ताक्यो चित चीन्हो ॥ जाम्बवंत परदक्षिण कीन्हो ॥ ६१ ॥ छप्पय ॥ लसत एक कर शंख शंख निधिको नित दायक ॥ जलज सहस दल कहत बास जल जाके लायक ॥ चक्र सराहत शक्र वक्र शिशुपाल विहंडन ॥ गदा अगद संसार दरत गद दैयत खंडन ॥ उर दिपत ललित वन माल छबि मनौ बालित रुक्मिणि भई ॥ नव नील जलदतनु सदा रहौ हिय ओनई ॥ ६२ ॥ बसत चरणतल गंग जलज कर हिय चिंतामनि॥ सागर सोवत तुम्हें मिले मानौ परिचय गनि ॥ धर्म बीज कर सलिल सरित लक्ष्मी उर राजै ॥ कामदेव फल फल्यो देत तुम मुक्ति समाजै ॥ पुनि तीनि लोक तुव उदरमें लखत मारकंडेयमुनि ॥ निजरूप और एकु हेरिकै अति अद्भुत गति चित्त चुनि ॥ ६३ ॥ सोरठा || नाम रावरो लेत, लीलाहूमे नरकहू ॥ नरक भीति नहिं देत, वे इनके भवसों भजे ॥ ६४ ॥ नाम तिहारो राम, परम पतित पावन विमल ॥ वहे एक अभिराम, लयो तीनि अवतार धरि ॥ ६५ ॥ दोहा । भानु नयनसों तम इरौ, देखि दासकी प्रीति ॥ विधु लोचनसों लीजिये, तीनि ताप तन जीति ॥ ६६ ॥ हरिगीत ॥ मम चित्त नैषधकाव्य । अति अल्प तो गुणराशि क्यों गहिकै सकै ॥ जिमि कनक मेरुहि पाइ निर्धन पोट हाटककी तकै ॥ नहिं करत हौ विधि वेद कछु सब भाँति खेदन सोभसों ॥ मन चहत हो करि कृपा तिहारी निलजलै अब पापसों ॥ ६७ ॥ सोरठा ॥ प्रगट भये हरि आय, भक्ति भाव पूजा लई ॥ दै अशीष सुखपाइ, तुरत गये निजधामको ॥ ६८ ॥ दोहा॥ पितरके काजसजि, वंदि व्रती ऋषिराज ॥ द्विजन अनेकन दान दै, चल्यो निकेत समाज ॥ ६९ ॥ स्रोजन परिजन साथलै भान ओज आकार ॥ भोजन मंदिरमें गयो, योजनको विस्तार ॥ ७० ॥ मनहरण ॥ एक ओर किन्नर भरत मतहित गान पंचम भरत तान करत तरेपिकै ॥ ठोर ठौर जगर मगर मणि दीपनिसों अगर सुवास है अगर धूप पेषिकै ॥ केसरि कपूर चूर चन्दन मिलाय चारु चोवालै चतुर चौका चाँदनीसों लेपिकै ॥ भोजन मलूल भारे भाजन जराऊ तहाँ राजत थरा हैं छपाकर छवि छेपिकै ॥ ७१ ॥ सवैया ॥ कोऊ सलोने कोऊ मधुरे तुरसाइनके सुरसाइनराचे ॥ लेत सुवास छकैं सुर किनर रंगभरे रसना बसनाचे ।। कंचन थारनमें परसे सरसे रुचिसों पकवान अजाचे॥ शीतल नीर समेवत जेंवत भूप अमीर अमीरससाँचे ॥७२॥ स्वागता ॥ भूरि भूप मिलि भोजन कीन्हे ॥ पाणि धोइ शुचि पानन दीन्हे ॥ सेज भौन आयो रँग भीनो ॥ रास रंगको कौतुक कीन्हो ॥ ७३ ॥ वसंत तिलक ॥ न्हाइ सु पूजि सुर भीमसुता सयानी ॥ पाछेहि भोजन किये नल राज रानी ॥ आइ समीप पतिके अति लाजकीनी ॥ गामैं नचैं अ- मर अप्सरिया नवीनी ॥ ७४ ॥ चंचु प्रभादलित बिंब फलानुरागी ॥ पन्नामई हरित पच्छन ज्योत जागी॥लीन्हे सरोज शुक पंजर एक आली॥ आई तहाँ ललित चालि मनौ मराली ॥ ७५ ॥ सोरठा ॥ साँवल तनपर भाइ, कुहूँ शब्द साँचे कहत ॥ पिक करकोलसुहाइ, और अली आई चली ॥५६॥ प्रटिका.।तब निरत कला संगीत चार ॥ गंधर्वतिया उघ अपार ॥ सुर मधुर बीन ध्वनि बजत जात ॥ दमयंति गानसों जनु लजात ॥७७॥सोरठा ॥ दमयंतीके गान, मधुर मनोहर जे सुनत।करि परिवाद प्रमान, वीन भई परिवादिनी ॥ ७८ ॥ दोधक ॥ दम्पति कीरति की- १ नैषधकाव्य रति हेरी । शक शची समता निरवरी ॥ कीरु पग्यो म्रतुपे मणि पाग्यो भूप सराहत बोलन लाग्यो ॥ ७९ ॥ कीर ॥ त्रिभंगी ॥ तुम या तिय लायक गुण निधि नायक मन भायक मिलि रजनि जगे चित- प्रेमपगे ॥ भव मैन सुहायो तुम द्वै आयो रतिपति पायो भागलगे अ- नुराग रंगे ॥ सुरसरि तुअरानी स्वच्छ सयानी पावन मानी सरस लसै तुअ अंक बसै ॥ मुख शशि हुलसावत तुम सुखपावत हरप मँगावत सुमतजसै दशदिशि निकसै ॥८० ॥ पद्धटिका॥ दमयंति कपट कंचुकि तिहारि ॥ रतिराज राजधानी विचारि ॥ तुव नयन मीन ध्वजदै सुधा- रि ॥ तहँ भौहैं बाँधी बंदनवारि ॥ ८१ ॥ गीत ॥ रावरी पर प्रीति को लखि कौलरागनिसों रँग्यो ॥ मिलि वारुणी दिशि बामसों सबरीन चाहत है जग्यो । सखियां सबै टरि जाहिं बाहेर चोज जाहिर चातुरी॥ नख दंतसों रण रंग जीतत भैनके डर आतुरी ॥ ८२ ॥ यहि भाँतिके- लि बिलासको सकुचोजसों तिरिया पडी।मुतक्याइ नैननही अली इक एक है बाहिर कढी ॥ पिक कूँकिकि तुहीं तुहीं करि आपु उक्ति विलासकै॥ नृप ओर औ शुक ओर हेरति कमल लोचन लालकै ॥ ८३ ॥ चर्चरी॥ बावली इककेलि सौंध समीप दीपतिसों रची ॥ रत्न हाटक बेलि बूट निसों सिठी सबही सची ॥ नये गये न अकास हेरत त्रास बासरके मुदे॥ कोक शोक समै भये बरजोर जोरनसों जुदे ॥८४॥दोहा॥विछुरि रहत नहि सहत सकि, तकि तिनकी यह रीति ॥ रानी कुम्हिलानी बदन, पियसों कह्यो सप्रीति ॥ ८५ ॥ रानीमोदक ॥ पंकजलोचनि आव यहाँ लग ॥ देखहु ये अबहीं बिछुरे खग ॥ भेदत हैं दुखसों जन मोदर ॥ कौन इन्हैं लखि होतु न आतुर ॥ ८६ ॥ दोहा ॥ काल सहावै जो दशा, सोई सहै निदान ॥ युगल विहंगम जगतके, उदाहरण अनुमान ॥ ८७ ॥ कबित्त ।। स्नानके समान भानु मंडल बनायो कर चिनगी झरत सवहींसो भयो लालु है ॥ ऐचत अरुणदाम भामरि परत जात तेजको तरल दंड मंडित बिलासु है ॥ भेदन बहुत रथ चरण युगल खग करत अविधि विधि कुपित करालु है ॥ विरह कृशानु धूम मलिन महा सुधरयोबाढ़ि धरिबेको साँझ काल करवालुहै॥८॥दोहा॥

नैषधकाव्य १६७ शशिवदनी मुख सो कड़े, आसव वचन पियूष ॥ छैलु पियतु श्रवणनि छक्यो, रसकी रही न ॲष ॥ ८९ ॥ राजा ॥ सोरठा ॥ यह इनकी सतिभाइ, तैं जैसी देखी दशा ॥ क्यों न सुमुखि बिलखाइ ॥ करुणाकी तस्वीर तू ॥ ९० ॥ सवैया ॥ कै बिछुरे रमणी मनभावन चावनखों चित चाहति जीत्यो ॥ चापलता चुकुटी कुटिलै करि रावरी ये सहसों बलचीत्यो ॥ नावककी नलिका सम नासिका श्वासनिको शुभ सोर- भसीत्यो ॥ पौनके अच्छय बाणनिसों रणरंग अनंगरहै नहिरीत्यो॥११॥ दोहा ॥ तेरे सुबरणों रह्यो, नहिं सुवरणको नाम ॥ रूपराज राजत भयो, लाजत तनु अभिराम ॥ ९२॥ छप्पय ॥ मधुराईकी लता खाँड़के खेत लगावै॥वर्षे धन पीयूष अल्प पल्लव सरसावै॥दाख घोरिकै दूध सीचि कै अधिक बढ़ावै ॥ चंदकलाके फूल फूलि बहुतै मन भावे ॥ तहँ फलै कहूँ जब परम फल, मुक्ति मुक्ति जासों कहत ॥ तब अधर मधुर ये रावरे छबि वारी उपमालहत ॥ ९३ ॥ सवैया ॥ भारती आइ बसी मुखमें अरविंद मई रसना तव कीनी ॥ ताहीकी बीन बजावनकी उपजी यह रावरी वाणि प्रवीनी ॥ ताहीको रंग विहार कि बैठक ओंठनकी रुचि है रँग भीनी ॥ ताहियकी मुक्तावलि है बलि तो रसना वलिमै उतिदीनी ॥ ॥ ९४ ॥ मनहरण ॥ मन्मथ तीरथ तिहारी सुरसरि वाणि ताहीको पुलिन खाँड़ मिसिरी बखानीहै ॥ सलिल पियूप पूर पूरण रहत चोज चातुरी छिपत जलचर सरखानीहै ॥ सोहत कनारे रतनारे रद छद दोऊ भारतिसों कमल सुवासलकै सानी है ॥ याहीते समूह सजि सेवत सकल द्विज जपकी परममंत्र तपकी निशानी है ॥ ९५ ॥ ऊरध अधर जपा पुहुपकी माल ताहि करत शरासन असमसर रावरो ॥ साँवल चिबुक विंदु गुठोकै पनचकैकै रदन शरण आयो शरण उतावरो ॥ वचन तिहारो साँचे निहचै धनुष धरै वेद चातुरीनसाजि सीखै चित चावरो ॥ कोकिल मराल मोर सारिका कपोत भौर विदित विघार थीव उदित उछावरो॥ ॥ ९६ ॥ छप्पय ॥ सो गँवारु सो चतुर पाति नहि बैठन पावै ॥ काम वाणकी धार नेक तेहि ओर न धावै ॥अधर कहै मधुनाहि कहै तनु स्वरनु न मानै ॥ बदनकहै नहिं इंदु नाम कहि सुधा न जानै ॥ गजगौनिकोक नैषधकाव्य युग सौकसौं मति उदास मनको करै ॥ हो जातु जोहि अंजलि विनै राखौं रोंकि दिवाकर ॥ ८७ ॥ दोहा ॥ सरसीरुह लोचनि तुहूँ सखियनके दिगजाहि । हौं बाहरको जातु हो, संध्या विधि निरबाहि ॥ ९८॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मण्डित भूमंडला खंडल श्रीखाँसाहब अलीअकबरखाँ प्रोत्साहितगुमान मिश्र विरचिते काव्यकलानिधौ वासर कृत्य वर्णनं नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥ दोहा-कथा सर्ग तेईस में, शशिको उदै बखान ॥ वर्णन भूपति तिय करति, परिपूरण परमान ॥ १॥ सोरठा ॥ नृप संध्या विधि वंदि, राग वारुणी अधर रुचि ॥ मंदिर गयो अनदि, खंड साँतयें सौंध पर ॥२॥ चौपाई । सेज चाँदनी सी छविछाई || बैठि तहाँ नल प्रिया बोलाई ॥ बैठारी तापै सनमानी ॥ संध्या दई विशेष बखानी ॥ ३ ॥राजा ॥ लीला ॥ नयनसों करिये कृतारथ पासिकी दिशि- रानि ॥ धोइ यावक रंगसों सब अंग कुंकुमसानि ॥ तुंगशैल अकासते रवि शृंगसों दुरकात ॥ चूर गौरिक सांझदै परिपूर धूर उडात ॥ ४ ॥ द्रुतविलंबित ॥ चरम भूधर भीलनिसों पल्यो ॥ अरुण चूड दिवा- करहै भल्यो ॥ शिर उठाइ करै रवसांझको ॥ अरुण सजत पश्चिम माझको ॥ ५ ॥ भुजंगप्रयात ॥ प्रतिहारिनीसी करै सांझ बासा ॥ गहे शूर शोभा मई हाथ आसा ॥ निकारे दिनै देति है रोष कीन्हे ॥ प्रवेसै भली भाँतिसों राति चीन्हे ॥ ६॥ मनहरण ॥ महानट नचत निरखिकै सभानु राग साँझ कुनटीसी पार्वती रूप चाहिकै ॥ लसत अकाशतन विमल नखत गण रंग भरि अंगहार सजत सराहिकै ॥ हनत किरात कालु कलित कराल वेष दिवस दुरद पदुमक अवगा हिकै ॥ ताहीकी रुधिर धार करत पसारा सॉझ तारागण रहे कुंभ मुक्तानिवाहिकै ॥ ७ ॥ सोरठा ॥ रहे साँझ सों फूल दशहू दिशिनि विभाग सब ॥ मानौ लाल दुकूल, गहे ब्याहको दिग नैषधकाव्य । बसन ॥ ८॥ सवैया ॥ साँझ सराफ अकास भयो रबि हाटकको गुटिका छवि छायो॥पश्चिम शैल कसौटी करयो तेहिमाह भली विधिसों कसिलायो ॥ बंचनको निहचै करि ताकहँ तोलन काज अमोल उठायो ॥ तैहीं दये छिटकाइ बटा जनु तारेनको गण देत दिखायो सोरठा ॥ पाक दाडिम रबि बिंब, हरी साँझ याकी तुचा ॥ काल चावि विधि निंब, उगिलत तारा अस्थिगण ॥ १० ॥ दोहा ॥ साँझ समय तंडव करत चंडीपति गतिलोल ॥ नभ अखंड मंडित लसै फटिक चटानि अमोल ॥ ११ ॥ पद्धटिका ॥ निज वर्णनके सुनतै लजाइ ॥ जनु सांझ गई तुरतै बराइ ॥ नभ नखत दंत तमरह्यो छाइ ॥ तब कह्यो प्रियासों निषधराइ ॥ १२ ॥ नल ॥ पद्धटि- का ॥ जब राम बाण संधान कीन ॥ उछरयो उदन्व भयसों अधीन ॥ तब फैलि शंख मुक्ता अपार ॥ सो नाकलोक में चमत्कार ॥ १३ ॥ दोहा ॥ सुरसरि कूल कुलाय कुल, कोक बिरह अकुलाइ ॥ आंसुनकी धारातजी, नभतारा समुदाइ ॥ १४ ॥ मंदाकिनके जंतु जल, झलकत नभतलपाइ ॥ झख कुलीर गोधा मकर, मिथुन मोद सरसाइ ॥ १५ ॥ रानी ॥ कबित्त ॥ फूल्यो अकाश दिखावति है यह योगिनिसी जिय यामिनिजागी ॥ मार मेरेहु जिवावति है अरु कमलनके हगबंधन पागी ॥ मोहन अंजनि दै कुहकै कुहकै पिक मंत्रनितों अनुरा- गी॥ शंखन छत्रनि छत्र धरे पल नील सरोरुह नयननलागी ॥ १६ ॥ राजा ॥ सोरठा ॥ तम मिससी इत चेतु, शची सौ- ति दिशिते बढ़ी ॥ टूटत वास रसेतु, ऐरावतकी मदनकी ॥ १७ ॥ दोहा ॥ राम सेतु रोमावली, दिशिपति वाहन रूप ॥ धावत तम देखत भजे, रविके वाजि अनूप ॥ १८ ॥ चन्द्रमाला ॥ कर सहस्त्र सोंलै उठाइ रवि ऊरध नभकरि राख्यो ॥ याहियते नियराइ गयो तम रवि अथवत मन माख्यो ॥ उलट्यो गगन कराहु करयो विधि इन दीपक अध बारयो ॥ अंधकार छलसों क्षिति ऊपर फैल्यो कज्जल भारचो ॥ १९ ॥ रानी ॥ मनमोहन छंद ॥ मृग मेद तम तनमें दिपति ॥ दुरि नील अंबरमें छिपति ॥ अभिसारिका गतिसों चलति ॥ २२ नैषधकाव्य । १७० यह रैनि त्यों तुमको छलति ॥ २० ॥ चौपाई ॥ जग लोचन गो नामकहा ।। सूर किरणि पुनि गोष दुपायै ॥ मिले लई हरिकै रवि साँझ ॥ अंधकार छायो जग माँझ ॥ २१ ॥ राजा ॥ दोहा ॥ तमकै तत्त्व विचारमें, वैशिषिक मत सार ॥ तेहि उलूक दर्शन कहत, लहत साँचु अधिकार ॥ २२ ॥ चलत चोर चाकर चतुर, बोलत विरद उलूक ॥ आवत लखि तमराजको, भाजि भये द्विज मूक ॥ २३ ॥ वासर दोष विचारको, पठई तम नरनाथ ॥ दूतीसी लागी फिरे, छाया सबके साथ ॥ २४ ॥ आभीर॥भूपतिमा गुण गान ॥ रोष करयो सित भान ॥ आइ उदय तह कीन । त्यों नल वर्णन लीन ॥ २५ ॥ नल॥ सवैया ॥ मेरु शिखानि कमातनिसों छिपि चन्द्रनयो छलकै छवि छायो ॥ चंचुं चकोरनिके चुलकानि. भरै निज रूप शुधानि समायो । नील निचोल उतारि चली सजि भाँति गली लियकै मन भायो । चाँदनिसे तन चीर अभूषण हीरनि चित्रपटी रल गायो । ॥ चर्चरी ॥ रावरे मुख सामुहें शशि आरसी परमान है ॥ नीलकंज विशाल लोचन संग गुणवान है ॥ आपने लघुभाइ वासव वाहनै मिलिकै रह्यो । शीश पूरण पूरि सिंदुर रूप सिंधु- रको गयो ॥ २७ ॥ सोरठा॥ मढ़ी किरणि सब ओर, विधि साँचो वि- धना कह्यो । ताइरूप अति गौर, भरि भरि कादत्त बदन शुभ ॥ २८ ॥ राजा ॥ तोमर ॥ सुरराजकी दिशिरानि ॥ तनुलाल अंबर तानि ॥ मुखचंद चारु उदोत ।। जन सज्ज वास कहोत ॥ २९ ॥ राजा ॥ हरिगीत ॥ अभिराम सीतै लखत लाजत लखति हिय मति बंकसो ।। तब कान नाक विहीन लक्ष्मण कीन श्याम ससंकसों ॥ शुपनखा मुखकी लही सुखमा शशी यह अब जानिये ॥ सब श्रवत रुधिरसो लाल अंबर बलित गति मनु मानिये ॥ ३० ॥ रानी॥ सरसी ॥ चन्दरजतको हेम कूटकै साँझ छली छलकीन ॥ दयो रैनिके कर बदलो करि आपुन देनमणि लीन ॥ वासव सुत चकई गहि फेंकी टूटि अरुण छबिडोरि ॥ गरत जात मुखसों वह चंचल छुटत छपाकर छोरि ॥ ३१ ॥ राजा॥ सालूरा ॥ जे अछिर नखतनि लिखत तिमिरतति सुयश सरस नि-

नैषधकाव्य
१७१
सि कलम धरे ॥ कै व्योम असित सिल मसित कुसिक गन लसित सिलि
पिवर समय परे ॥ तेलोपि जरद रँग विबुध सिसिर कर पढ़त असम
सर मत पसरे ॥ दैमेटि रमनि मन पिय जन-दितिरिस भुक्ति मुक्ति करि
युगात तरे ॥ ३२ ॥ रानी ॥ सवैया ॥ पूर पयोधि बढ़ावनको श-
शि है अपनी मणिसों जलमेलै । कोकनकी वनिता विलक् हग आँसुनके
परवाह सकेलै ॥ रैनि कलिंदसुता लहरी तम सूखतही छहरी
छबि लैलै ॥ ताहीकी रेतनकी लिकता सन देत अनंदनि चांदनि
फैलै ॥ ३३ ॥ सोरठा ॥ एक कुमुद कुल हाँस, करत साँच सबसों
तुजगु॥दिन थे होत उदास, इतो न शशि उज्ज्वल करै ॥३४॥लीला॥
ईश शीश जटानिमें बसिकै शशी तपकीन ॥ एक सो सु उदोत होत न
नीच सीच अधीनपान पाइ पियूष जीवत, राहकी शिरमाल ॥ देखिकै
भव भालपै भयसों बड़े म बिसाल ॥ ३५ ॥ तारक ॥ निजकांति
चकोरनको अँचवाई ॥ अपनी कलिका शिव शीश चढ़ाई ॥ सब देवन
दिव्य सुधा भुगुताई ॥ शशि सोच सुरद्रुमको लघु भाई ॥ ३६ ॥
छप्पय ॥ मृगमद अंकित इंदु गरल गत अंकित शंकर ॥ सुधा धवल
तनु इंदु भसम युत शंभु भयंकर।निखत अभूषण इंदु अस्ति भूषण शिव
सोहै॥गायो द्विजपति इंदु उग्र पशुपति मनमोहै॥निज भाल मल्लि कलिका
करयो जटा बल्लिमै मिलित शशि ॥ महि लहत कला हरसों रही रहत
तही संसार हँसि ॥ ३७ ॥ दोहा ॥ काम अस्तिलै अधजरे, श्वेत
श्याम शशिकीन ॥ वहै जानि भूषित करयो, शिरपै शंभु प्रवीन ॥३८॥
चौपाई ॥ मृग आमिष रुधितों शशि तोरै ॥ दौरि सिंहिका सुअनस
जोरै ॥ साधनको पाछो जे गहैं । निज त्यों दै ताको निरबहैं ॥ ३९ ॥
राजा॥तोमर ॥ सुरकै सुधारस पान ॥ किय चन्दु तुच्छ निदान ।
पुरिखानकी परसस्ति ॥ लिय सिंधु शोकि अगस्ति ॥ ४०॥ दोधक ।।
जोन्ह कलानिविकी पटरानी ॥ सागरकी बढ़ती सनमानी ॥
मीत चकोरनकी मन भाई ॥ पै कुमुदै हित कौमदि गाई ॥ ४१ ॥
स्वागता॥ हानि वृद्धि अपने पितु तुलै॥क्यों न चंद्र सरसै अनुकूलै॥
शीतल आप पिये शशिमें परहीतलकी तब ताप बुझानी ॥ ५४ ॥

१७२
नैषधकाव्य।
सोरठा॥ है आदर शशरूप, दर्शन देत न दरशको ॥ अत्रिनेत्र अनुरूप
शशि त्रिनेत्र शिरपै चढ्यो ॥ ४३ ॥ करत सकल सुरभोग, सुधा किर-
णि मखरूप लखि ॥ वामै हिंसा योग, यामें मलिन कलंकु है ॥ ४४ ॥
मनहंस ॥ रथते छुट्यो मृग प्याससों ललचाइकै ॥ जलहीन अंबरमे
रह्यो अकुलाइकै ॥ तब दौरिके निशिनाहके उरमें लग्यो ॥ रस पान
पोषि पियूष पंकिलमें पग्यो ॥ ४५ ॥ रानी ॥ मोदक ॥ बालक
चंद न रंक विराजत ॥ होत युवा छतियां छबि छाजत ॥मानहु भामिनि
ओषधिको गन ॥ है पठयो कहि नेह सँदेशन ॥ ४६ ॥ नाराच ॥
महेश बाणसों डिरात ऐनतार जानिकै ॥ रह्यो निशीश आसरो महेश
प्यार मानिकै ॥ संसार है जहाँ तहाँ शशी कहै सबै भले ॥ मृगीकहै
नताहि क्यों पद प्रयोग बावले ॥ ४७ ॥ हरिगीत ॥ पूरि पूर
पियूषके रस सारसों थकिकै रह्यो । चन्द बिम्ब रसाल फल जिमि काल
चाखनको गयो ॥ राहके मुख यंत्रमें धरि पैरिकै रसले लियो ॥ नभ
छुटत पीन छता भयो जनु देखते मन मसि लियो॥४८॥प्रमाणिका ॥
शशी सखा अनंगको ॥ नयोगुजानि अंगको ॥ कपूर काम मित्तु है ॥
जरे बढ़ातु वित्तु है ॥ ४९ ॥ तारक ॥ अथवा यहि भाँति सुहाति
मिताई ॥ शिवके दृगमें तनु मैन जराई ॥ विधुहू हियमावसनेह
विचारयो॥ हरिके हग सूरयमें तनु जारयो ॥५०॥ राजा॥ मोदक ।
चन्द भयो पर पूरुष लोचन ॥ अंबुज जाहि कहें दुखमोचन ॥
साँवल अंक मिलिंद मनोहर ॥ द्वै पुतरी सुथरी अति सुन्दर ॥ ५१ ॥
सोरठा ॥ विधु औ गरुड़ उदार, द्विजपति दोऊ पक्षधर ॥ हरि
नायक आधार, नयन क्रिया इनसोंउचित ॥ ५२ ॥ दूत विलंबित ॥
शिशिर में लखि पंकज छारको ॥ गनत पावक रूप तुषारको ॥ उठत
धूम तहाँ अति साँवख्यो ॥ ससक अंक कहै शशिमें भल्यो ॥ ५३ ॥
रानी ॥ सवैया ॥ देश प्रबाहनकी सरिता सब ओर बहैं बहुतै
सरसानी ॥ कानन कोठि अकोठि कुलाचल भार भरी धरणी. अकु-
लानी ॥ सूच्छम छाँह स्वरूप भई चितचाह नई निहचै बियरानी ॥
शीतल आप पिये शशिमें परहीतलकी तब ताप बुझानी ॥ ५४ ॥

नैषधकाव्य । १७३ समानिका ॥ अंक में ससा बसै •॥ कौन चन्दको हँसै ॥ बापके शरीरमें ॥ बाजि औ करीरमें ॥ ५५॥ रानी ॥ कमला ॥ असितरु सित रजनी ॥ शशि ग्रह युग रमनी ॥ तिनहि मिलतु मनुकै ॥ असित सुकुल तनुकै ॥ ५६ ॥ मनहरण ॥ दिनको अथोत समै बूड़त तरणि रहि तमकी विपति नदी नैननिलौं आइकै।।पूरवके पुण्य परसादते उडूप पायो भयो मन सुमन सुगंध पार पाइकै ॥ ओषधिनपतिको सुरसकै निरुज करै क्षय होत द्विजन बचामै मंत्र भाइकै ॥ समुदन सुतकोसमुदु करै रत्नननि सुधा जतननि क्यों न सींचत बनाइकै॥ ५७ ॥ बिंबा ॥ शशिकर पीयूषनाही ॥ हरि मिरतु नोजराही ॥ निशि निशि चकोर पीवै ॥ युग युग हु क्याँ न जीवै ॥ ५८ ॥ मालिनी ॥ सरस वचन भैमी पीवसों बोलिनीके ॥ नयन विकसि आये मोद सों प्राण पीके ॥ धनि धनि पिकबैनी चोजकी उक्ति तेरी ॥ चिबुक गहि उठाई चाम लीन्ही घनेरी ॥ ५९ ॥ दमयंती ॥ मालिनी॥ निज मुख नहिं सोहै आप नी जो बडाई ॥ बदन शशि तिहारो मै तही काँति गाई ॥ नल ॥ शशि वदनि न जानै आपने दिव्य रूपै ॥ वर्णतु अब हों हौं तो मुखै दिव्य भूपै ॥ ६० ॥ संयुत ॥ तुअगीत सों वश होइ रह्यो । मुख रावरो निहचै गह्यो ॥ यहि लोभते मृग नेकहूं ॥ महि चंद्र छोड़ि टरै कहूँ ॥ ६१ ॥ सवैया ॥ चंद्र सुधारस पान करै तम पाननकी धन छांह छयो है ॥ बासरको न चल्यो परै तापर तापर है तन धाम छयो है ॥ बेठा कठै अधरा मगसों पगसों परसै न सनेह नयी है ॥ बोलु चलाकु उलारतसों तेहिते निशिमें चलि दूरि गयो है ॥ ६२ ॥ नालस्व- रूपक ॥ देखि परै न बनाइ छुटाइ ॥ अंबर माह चढ़ी मलिनाइ ॥ धोवत ताहि सुधा जल लैलै ॥ यों रजनी रजकी हति मैलै ॥ ६३ ॥ चित्रपद ॥ मेघनकी मलिनाइ ॥ शारद मास छुड़ाइ ॥ शारदहूं शशि भेट्यो ॥ जात कलंक न मेव्यो ॥ ६४ ॥ सरसी ॥ एकादश रुद्रनके शिर इक इक कलाबांटि शशिदीन ॥ कलापांच सौपंच बाण शर पैनी गासी कीन ॥ कूटि कूटि तारागण लाखन और चन्द जब होइ ॥ अकलंकित तब वदन रावरे करै बराबरि सोइ ॥ ६५ ॥ वदन शरद १७४ नैषधकाव्य अंकम सस धरता अधर पियूष समान॥चाहि रोई वासव सब छल करि बल करि रह्यो न पान || गगन भयो यह उदित शीतकर मुदित भयो चित चाहि ॥ सुधादेव जूठनि गनि घिनसों पियतन ताहि सराहि ॥ ६६ ॥ सोरठा ॥ औषधीशको पाइ, निरुज भयो विहरत गिरिस ॥ कालकूटको खाइ, अंग लगावै गरल धर ॥ ६७ ॥ मनहरण ॥ द्विज पति देव गुरुदारसों सनेह करयो नयननकी तारासम लारा रूप रानी है ॥ अद्भुत गति देखि याकी गजराज गति पतितन भयो यह साँची वेद वानी है ॥ आतम प्रकाशकी युगीत ज्योति जानति जे तिनमें लगति नाहिं मुकुति निसानी है ॥ जैसे प्रतिबिम्ब सब ठौरनिमें परत है मैले ऊजरेकी कछू भाँति ना विचारी है ॥ ६८ ॥ चौपाई ॥ सुधा बोलि तिल जल सुत देहीं ॥ हर्षित होत पितर ते लेही ॥ सुधा रूप तिल साँवल अंक ।। शशिमें देखि परै निरसंक ॥ ६९ ॥ केलि सौंध कुल्पा जल माहीं ॥ शशि मण्डलकी छलकत छाँही ॥ हंस जानि हंसिनि नियराति ॥ पाँख झारि झपटत नियराति ॥७० ॥ दूतविलंबित ॥ कुमुदिनी हरिणी वनमें रहै ॥ पुहुप लोचन खोलि उसाल है ॥ लखति ऊपरको रसरीति सों ॥ हरिणको विधुमे पति प्रीतिसों ॥७१॥अलप पुंषपि यूषनिसों रली ॥ मदनकी सरसी विधु मंडली ॥ अमर मीन सुधा जल पानसों।करत ताहि ध्वजा सन्मानसों ॥ ७२ ॥ चर्चरी ॥ यह जो जनु जोन्ह राजत तार अस्तिनसों लसै ॥ लीक जो नभ मध्य सो फणिहारकी छबिसों बसै ॥ अष्ट मूरति शंभुकी इक साँच देखि अकाशहै ॥ अंक फूलि उमारहौ शशिमें वहै परकाश है ॥ ७३॥ स्वागता ॥ श्वेत गोल रवि चंद्र बनायो ॥ कामराज शिर छत्र सुहायो ॥ जो कहुँ रजनीमें छबि छीनी ॥ छत्रभंग निश्चय तम दीनो ॥ ७४ ॥ सवैया ॥ तीनिहु लोकन जीति दशानन नेकहु जाहि न जीतन पायो ॥ रावरे आनन एक वहौ निशिनायक नेसुक हेरि हरायो । सोई लगी शशिके मुख कारिख औ तेहि सारिख कौन बतायो । कोऊ कहौ क्षिति छाँह छई मृग अंक सशंक कहूँ ठहरायो ॥ ७५ ॥ बंधु ॥ राम करे सब क्षत्रिय छीने ॥ क्षत्रिय रामकरे मदहीने ॥ त्यों शशि पंकजको निशि जारै ॥ तो मुख .

व्य । १७५ पंकजसों निति हारै ॥ १६ ॥ दोहा॥ सागरते अनि नयनते, उद्भव द्विज यहि नाम ॥ विधु साँचो अब अवतरयो, सब शोभा विशराम।।७७॥ चंद्रमाला ॥तार विहार भूमि मय हिम अय. चंद्र मंडली कीनी॥लसत जहाँ मृगनाभि वाससो है सब शुति भरि दीनी॥स्वर्ग लोक तिलक भयो विधि इन सुकृत न सरलाई ॥ जिन जिन सुनी गुणी साँची तिन जिन अतहू पनि आई ॥ ७८ ॥ मनहरण ॥ हर पतनीसों भयो सिं- हके स्वरूप शशि सस औ हरिणको उदर माह आन्यो है ॥ तेरे मुख पाहूंसों मनमें डरत कहूँ एकसों जगतमें न काहू भय मान्यो है ॥ गगन विपिनमें विहार निशि निशि करै तम गज घंटानि घटावत बखान्योहै ॥ केसर करनि झहरावत निपट याको सिंहिका तनूज दूजो प्रति भट जा- न्यो है ॥ ७९ ॥ छप्पय ॥ लोचन कमल चढ़ाइ कमल आसन नित पूजै ॥ तो मुख कमल बनाइ वास कमलाको दूजे ॥ वचन न वर्णी जाति जासु रुचि राशि सुहाई ॥ लसत कला चौगुनी कौन गाव सुघ- राई॥तहँ कहत कौन समता महत चहत. चन्द चित चावरी ॥ शिव शीश जटा तटिनी निकट वनवासी बक बावरो ॥ ८० ॥ नेहमंजरीसखी॥ सोरठा ॥ यह सखि सोई चन्द, विरह पाइ जेहि हौं दही ॥ मनमो- हत मतिमन्द, तौहीं लह्यो कलंक जग॥८॥दमयंती ॥ मनहरण ॥ साँझहौं अटा पै अन जानत गईही मोहि देखतही दौरि चारो ओर उमडतसी ॥ हौं तौ डरपाइ भाजि भौनमें लुकाई सोऊ पीछे लागी आइ घरहाई हुमडतसी॥ जगर मगर घर बाहेर विवर करि सोरनि चकोरनिकी झुंड झुमडतसी ॥ कैति नकसैरी विरहिनि वैरी बोरिबको चाँदनी वहैरी येरी घेरे घुमड़तसी॥८२॥ लीला ॥ वासवः दिशिमें भयो शशि पुंडरीक प्रमान ॥ लैकला अव दात निर्मल आरसी अभिराम ॥ इंदु सिंधुर दान संगत चंचरी कर- साल ॥ हैं लगे उरमाँहबे उड़ि अंक अंकतमाल ॥ ८३ ॥ राजा ॥ छप्पय ॥ शशिको षोड़श अंश कलाकहि वेद बखानै ॥ घटत बढ़तते नित्त असित सित पक्ष प्रमानै ॥ परिवासों इक एक कला पंद्रह तिथि तेई ॥ पूरणमासी होति पूरि आवै सब तेई ॥ वह एक कला जो सोर- ही लै उखारि हर शीश धरि ॥. बहु दुखतरहो बहु घोसलौं गयो और १७६ नैषधकाव्य । वह श्याम परि ॥ ८४ ॥ मनहरण ॥ रावरे बदन छवि सदनकी समतासों चाहै करचो शशि निज नयन अनिआरे हैं ॥ मानिकै मिताई करी भाई पचिकोरनसों जोन्ह अचवाई जाको देव पचिहारे हैं ॥ "अंकसों मयंक कहूँ रंकको न जान देत नील कमलनि धर करै उजियारे हैं ॥ भ्रमि भ्रमि हारयो होत भोर तनु गारयो क्षीर सागरमें पारयो मनही में मान मारे हैं ॥ ८५ ॥ सकल लोनाईकी लहरिसों छहरि छवि बदन तिहारयो विधि रच्यो चितलाइकै ॥ वासवको पोंछि मैल मिलत अगौंछनिसों चिकिनो छपाकरु छपा पटरानी पाइकै ॥ दोउनि सँवारि सुरसरि वारि धोवै हाथ तिनमें लगत काँति कनक बनाइकै ॥ कमलाके वास कमलागै और कीरी युति उपजतवेई कुल कमल चलाइकै ॥ ८६ ॥ सवैया ॥ आसवसार सुधाधर मंडल है मद कोमल वा छबिछायो ॥ देववधू तेहि पीवत छीव छकै सब जीव करै चितलायो ॥ छूटत सौरभ शोभ सने तेहि लोपत तारेनबीच बसायो॥ प्यालो लगो माण नीलमको उर अंक कलंक नरंक वतायो । ८७ ॥ सोरठा ॥ शशिके गुण गहिलीन तिन सों मुख तेरो रच्यो । दोषाकरु विधि कीन, विधि चातुर चित विविध विधि ॥ ८८ ॥ मदन माला ॥ गगन लगत रबिरथहै खुरचय ॥ तहँ बिल परतभरत जल अमिय मय ॥ मिलत सिसिर करसरस सबुद बुद ॥ जलजनयनि नभ नरवत करत मुद ॥ ८९ ॥ सोरठा ॥ विधु पापरके रूप, तिल कलंक उड पुहुपयुत ॥ दै नैवेद्य अनूप, करिये काम उपासना ॥ ९० ॥ छप्पय ॥ लगत दशन सुर भानु झीन झांझरि समसोंहैं। झरत अमृत सब ओर झलक झालरि मन मोहैं ॥ मुक्तानखत अपार हार उपकंठ विराजै ॥ सुरत हुनीकर नवल लाल पल्लव छबिछाजै ॥ रति मयन भूपके व्याहमें रूप राशि अभिषेक रस ॥ विधुभर त भांवरी शीश जनु सहसधार मंगल कलस ॥ ९१ ॥ अथ श्रीहर्ष कविराज राजको वर्णन ॥ छप्पय ॥ कवि कुल मुकुटनिमाह हीर समकीरति राजै ॥ पिता हीर परसिद्ध जासु मति सुरगुरु लाजै ॥ मामल देवी माय पुण्य पति व्रत गिरिजासी ॥ सकल मुक्ति की दानि नैषधकाव्य १७७ साधु सेवक को कासी ॥ तेहि तनय भयो श्री हर्षकवि हरष भारती तंत्र को ॥ भव भाजन परम प्रसाद मय जो चिंतामणि मंत्रको ॥ ९२ ॥ जपि चिंतामणि मंत्र ब्रह्म सन्मुख जिन कीन्हो ॥ निर्जन साधि समाधि तेज निर्गुण चित दीन्हो ॥ कविता करी अनेक ग्रंथ नवरस रससाने ॥ बहुरि करयो दिग्विजय जीति पण्डित सन्माने ॥ जेहि भवन अवतरी ईश्वरी कला रूप तनया सुछवि ॥ जिन गौड़ पाठ दुर्गा रची ज्ञान वर्ष श्रीहर्ष कवि ॥ ९३ ॥ कनवजपति नरनाह जाहि उठि आसन साजै ॥ सभा माहँ सन्मानि पानदै सुयश समाजै ॥ चर्चा मम्मट भट्ट संघ षट मास सोहाई ॥ जिन बुरिकै बहु भाँति वागदेवी लडवाई ॥ शुचि पुण्य पियूष विचित्र रस व्यासदेव वरणी भली ॥ नलराज कथा नैषध वहै तिहूँ लोक कीरति चली ॥ ९४ ॥ रचे संगै बाईस जाहि कविईश सराहै ॥ अति पद व्याक मंजुरीति गुण गण उतसाहै ॥ पूरुव अर्ध अनूप गणत द्वै सहस सलोने ॥ ईश लोक सैंतीस अधिक पावें जन टोने ॥दै सहस चारि श्लोकसों उत्तर अरध सँवारिकै ॥ सब सहस चारि इसलोक औ इक तालीस विचारि कै ॥ ९५ ॥ दोहा ॥ खाँ साहेबके सुयश वर, श्रीगुरु चरण सहाइ ॥ सो विचार अनुसार मति भाषा रच्यो बनाइ ॥ ९६ ॥ रचे अर्थके भँवर बहु, कठिन जोर सब ठौर ॥ खलको जलके भौंर सत, जनन कमलके भौर ॥ ९७ ॥ सरल देखि हर्षत सुजन, निंदत कुजन अपार ॥ दाख मधुर जुर बावरो, कहत कटुक निरधार ॥ ९८ ॥ साधु सरलसों कटुकको, करत बड़ा सन्मान ॥ शंभु धरयो गलमें गरल, तजो सुधाको पान ॥ ९९ ॥ ताते मैं कर जोरि कै, कहत सबनि शिरनाइ ॥ सुकवि चतुर तिहुँ लोकमें, विनती तिन्हैं सुनाइ ॥ १०० ॥ मेरी तो सब चूक है, वाको ढक तुम आप ॥ सो सवारि करिये कृपा, परगट परम प्रताप ॥ १०१ ॥ गौरिनन्द गिरिजा गिरिश, गुरु गोविंद गुमान ॥ युग १७८ नैषधकाव्य । तौ लगि अविचल · रहौ, अकबर अली सुनान ॥ १०२ ॥ इति श्री प्रचंड दोर्दड प्रताप मार्तड मंडित भूमंडला खंडल श्री खाँ साहब अली अकबर खाँ प्रोत्साहित गुमान मिश्र विरचिते काव्यक लानिधौ चन्द्रोदय वर्णनं नाम त्रयोविंश स्सर्गः समाप्तम् ॥ २३ ॥ माघमासे कृष्णपक्षे तिथौ पञ्चम्यां भौमवासरे सम्बत् १९४५ शुभम् भूयात् ॥ सोरठा॥ संवत् शर अरु वेद, ग्रह शशि तपसा पंचिमी ॥ यामें नहिं कछु भेद, कृष्णपक्ष कुज बार है ॥ १ ॥ श्लोक ॥ शरवेदाङ्कचन्द्रे द्वे नक्रमासाऽसिते दले ॥ अहि तिथ्याम् भौमसंयोगे ग्रंथोयम् पूर्णतामगात् ॥ १ ॥ इति नैषधकाव्य समाप्त ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, " श्रीवेङ्कटेश्वर " छापाखाना (मुंबई.)

जाहिरात। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण। संस्कृत मूल और भाषाटीकासहित खुलापत्रा । कविकुलतिलक आदिकवि महर्षिवाल्मीकिकृत रामायण समग्र ग्रंथ माहात्म्य और अनुक्रमणिका टिप्पणी शंकासमाधानसहित परमपुष्ट मोटे और चिकने कागजपर सुवाच्य मनोहर अक्षरोंमें छपकर विक्रयार्थ प्रस्तुत है-हिन्दुस्थानमें आजपर्यंत इसका ऐसा भाषानुवाद नहीं हुआथा. इसकी टीका अत्युत्तम बहुत सुगम और ललित मनरंजन शब्दोंमें विद्वद्वरशिरोमणि श्रीयुत पं० ज्वालाप्रसादमिश्रजीने अत्यन्त ही उत्तम की है. पदपदका अर्थ दर्पणवत् झलकायाहै. सकल गुणआगरी नागरीकी पूरी लालित्यता सर्वांगरूपसे दरशायाहै. यह बालसे वृद्धत- कको परमोपयोगी है. कथा बांचनेवाले विद्वानोंको इससे बहुत ही लाभ प्राप्त होवेगा. केवल अक्षर मात्रका बोध होनसेही सज्जनजन इस रामायणका पारायण सहजमें कर सकेंगे और कथा बाँचकर धन यश लक्ष्मीके भागी होंगे. ऐसा सुंदर मनोहर रमणीयग्रंथ होनेपरभी सबके सुगमार्थ समग्र ग्रंथ उनके मकानपर २१ रु० भेजनेपर पहुँचजायगा. ग्रन्थकी अद्भुत छवि और आन्तरिक विद्वत्ता देखकर ग्राहकगण परम- प्रसन्न होजायँगे ॥ ग्रंथसंख्या अं. ९०००० होगी. मनुस्मृति । पं०केशवप्रसाद प्रोफेसर आगरा काळे कृत भाषाटीकासहित । इस उत्तम प्रथका सान्वय भाषा अत्युत्तम हुआहे, यह पुस्तक प्राणि- मात्रको परमोपयोगीहै, राजा महाराजा भी इसीके अनुसार धर्मपूर्वक शासन करतेहैं यह ग्रंथ देखनेहाके योग्यहै, भाषा अत्यन्त सुगम रसीली है. कीमत २॥ रु० रफका २ रु०॥

जाहिरात। सामुद्रिक शास्त्र बड़ा। यह पुस्तक प्राणियों के शरीरावयव तथा हस्तरे- खाओं के फलाफल कथन में परमोपयोगी है। इसके द्वारा आयुज्ञान, संतानादि, धनी, निर्धनी, पंडित, मूर्ख, कामी, चोर, साधु और असाधुका ज्ञान केवल पठन- मात्र से सर्वसाधारण मनुष्य जिसको कुछभी समझ होगी कहने में समर्थ होसक्ता है. इसकी भाषा परम मनोहर और सरल है; विशेष रोचकता इस में यह है कि प्रत्येक मूलके इलोकोंका सान्वय सरल हिन्दी- भाषा में टीका कियागया है, जिससे भारीसे भारी पं- डित और छोटेसे छोटे अल्पज्ञ अपने नेत्रोंसे अवलो- कन कर इसका स्वाद पासकते हैं, विलायती कप- ड्रेकी जिल्द बँधी है. मूल्य केवल । रु. है। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-खेतवाड़ी-मुंबई.

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Naishhadhakaavya

Author
Kheimaraaja Shriikrxshhnd-adaasane
Title
Naishhadhakaavya
File name
Naishhadhakaavya
Text
OCR done
Citation
1817
Published
2005/09/10
Publisher
Shriivenkat'eshvaraa Mudraalaye
Language
Sanskrit
Pages
184
Library
Donar
Classification
Literature
Keywords
Mumbai
DLI number
495885
Barcode
2990100072963.00
Scanning centre
S.V. Digital Library, Tirupati
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
h2lf3iVdauQ
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