Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Chakra Bhed

Babu Gopala Ram · 2011/01

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चक्क भेद
(प्रयागी गुण्डों का असम साहस)
,
बाबू गोपलाराम गहमर निवासी
सम्पादित ।
-
.
जासूम से उद्धत )
1
T
मई सं० १६२६६०
-
जार्ज मिटिग पर्स, काशी में मुद्रित ।
मिलने का पता-
मैनेजर जासूस,
गहमर (गाजीपुर)
मूल्य १)
11

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IN
चक्रभेद।
पहला क्यान
G
हाथों में हथकड़ी।
"मैंने आपको गिरफ्तार किया!"
पुलीस के मासिफ्यूटर ने बडे तपाक से प्रतापसिंह के
कन्धेपर पीछे से हाथ रख कर कहा ।
प्रताप अपने सजे सजाये बैठक में कानून की किताब
उलट रहे थे। जहा विना खवर दिये बिना नौकर गरीया की
परवानगी पाये कमरे में कोई श्रा नही सकता था यहाँ
पुलीस अहलकार के इस तरह पहुच कर गुस्ताखी करने से
प्रपल प्रतापी प्रतापसिंह वकील को जो क्रोध हुआ यह कहने
की नही स्वयम् समझने की वस्तु है। लेकिन करते पया।
लहका चूंट पीकर प्रताप ने अपने तई सम्हाला और कहा-
"गिरफ्तार ! किस फसूर में"
पुलीसवाले ने उसी तरह गम्भीरता से कहा-"मैंने खून
के कसूर म प्रतापसिह यकील को गिरफार किया।"

7 जासूस
दूसरा क्यान
प्रेमकी ककड़ी।
प्रतापसिह इलाहाबाद के सूरजकुण्ड पर रहते थे। वह
भडे घराने के सुन्दर नवजवान थे । उनके बाप और दादा
दोनों ही नामी वकील थे। उनके बाप ने बहुत बड़ी उम्र में
एक वे.अवलम्बको अबला से व्याह किया था। लेकिन प्रताप
के पैदा होने पर थोडे ही दिन बोते थे कि हैजे से उनकी मृत्यु
हो गयी । प्रतापकी मा भी पति शोक न सहकर दूसरे ही
महीने में पतिलोक सिधारी।'
प्रतापसिह जब अपने मा बाप की अपार दौलत के मालिक
हुए। मरकारी तौर से उनका अभिभावक नियत हुआ।
ताप ने अपनी मेधा शक्ति और परिश्रम से वकालत पास
करके बडा नाम पाया। प्रयाग के वकीलो में पडित अयोध्या
नाथ के बाद उन्ही की बड़ी चलती हुई।
एक दिन अपने आफिस म पेठे प्रतापसिह एक सङ्गी
मुकदमे म नजीरों को किताव उलट रहे थे कि पुलीस ने पहुंच
कर उनको हथकडी पहनायी थी।
म
गाडीवान टोले म एक धनी श्रादमी हालही एक मकान
किराये पर लेकर ठहरा था उसका नाम केशवसिह था।
उसका ठाट बाट और उसकी तैयारो देख कर,महल्ले के लोग
जाते

अचम भेद
५
केशव के एक लडकी थी। जिसका नाम केशिनी था।
फेशिनी की चमक दमक, उसके रङ्ग रूप और बाहरी सजावट
पर देखने वालों की ऑखें भुलसने लगी । जो लोग स्त्रियों की
याहरी सुन्दरता को ही नारी जाति का महत्व मानते हैं जिनकी
दृष्टि में स्त्रियों का मोहकरूप और आलङ्कारिक ठाट घाट ही उनका
सर्वस्य है उनकी नजरों में केशिनो के रूप यौवन की घडी
बडाई हुई। लेकिन जो लोग मातृत्व और सतीत्व को स्त्री
जाति का भूपण समझते हैं । उनकी आसोम ऐसी चटक
मटक की छयल चिकनियों कामिनियों नरक कुण्ड से भी
अधिक जलती हुई जान पड़ती हैं । उनी निगाह म ऐसी
स्त्रियों की रूप माधुरी ज्वलन्त अग्नि के समान दाहक होती है।
गाडीवान टोले में ठहरने के पूरे पन्चास दिन के बाद के
शव ने वहाँ के बडे लोगों को एक ठाटदार दारत दी। शहर
के बहुतेरे आदमी उसमें नेवते गये थे। प्रतापसिंह भी उसम
बुलाये गये थे
उन आये हुओ में केशिनी से प्रताप की ही अॅख मिलोअल
हुई । उसमें केशिनी के बाप केशव की भी मदद मिली । लेकिन
मर्द की जाति कैसी होती है। प्रतार एक दूसरी के फन्दे में
पड़ चुके थे तो भी केशिनी के कटाक्षों से घायल हो पड़े।
एक दिन प्रतापसिह रेलवे स्टेशन की ओर घूमने गये
ज्यौही हाते से बाहर निकले । केशिनी अपनो साइकिल पर
सवार उधर से आपडी। एक पत्थर के मम्मे से ठोकर लेकर
उसकी साइफिल गिरी। केशिनी भी मानो गिर कर घायल

६ दुई । प्रतापसिंह ने दौड़ कर उसे उठाया। केशिनी ने और अपनी देह ढील दी। प्रताप उसको पकड कर पहा करने लगे। उपकारी प्रताप ने उसकी पडी सेवा की। जब वह होश. में आ गयी तब उसको घर पहुचाने का यन्दोवस्त करके आप मकान को लौट गये। लेकिन चार ही पांच दिन पर प्रतापसिंह ने केशिनी की कला समझली । उसकी ओर से उनका मन एक दम फिर गया। जब केशिनी को प्रतापका यह भाव उनकी वात और यवहारों से जान पडा तय उसने बडा विकट रूप धारण- किया। अब प्रताप उसका सह छोडकर अलग हो गये तो भी वह रूपकी देयो लेकिन काम को दानपी फेशिनी उनके गले पड़ने का उपाय करने लगी। पीछे प्रताप को पता लगा कि केशव अपनी बेटी के साथ इसी मतलब से इलाहाबाद में आया है। और बड़े बड़े लोगों को भोज देना भी इसी का एक अध्याय है। इधर कुछ दिनों से प्रताप का मन पूना नाम की एक सुन्दरी से लगगया था।साधारण रूप देखने से पूना से केशिनी की लुनाई अधिक थी। लेकिन पूना और प्रताप के दिलों का पूरा मिलान हो गया था। पूना के पिता अभी कई कारणों से व्याह करने में विलम्ब कर रहे थे। पूना की पवित्र लुनाई, उसकी मधुर और सरलता भरी सुन्दरता, चन्द्रमा की शीतल छटा के समान निर्मल और सुस्निग्ध थी। 1 संचम भेद- केशिनो को सुन्दरता आग के समान दपदपा रही थी। उसके रूप में पड़ने से यदि होनबल हो तो वह तुरत उपल जाता था । फेशिनी फी छवि पुरुष की शक्ति पर अधिकार कर के उसको दलित करने वाली मोहमयी थी और पूना की। पवित्र शोभा प्यारी और मीठी ऑखों को तर करने वाली थी। केशिनी की कान्ति चमचमाती हुई चाह भरी आँखों को चका चौध लगाती थी । पूना की पूभा पति के साथ मिलकर घर को स्वर्ग बनाने वाली थी और कैशिनी पति को पास पाकर और की तृष्णा अपने ऊपर खींचने वाली थी। पूना पति की दासी होकर पति ही फो परमेश्वर मान उसकी पूजा करने वाली थी और फेशिनी पति के ऊपर चढ कर औरों का मान,औरोंका घखान चाहने वाली थी। पूना अपने पति की मान मर्यादा और घड़ाई से अपनी मान मर्यादा और बडाई मानने वाली थी केशिनी अपना मान अपनी पडाई और अपना अहङ्कार पति से भी ऊपर चाहने वाली थी। अपने मिजाज और अपनी बडाई के आगे सबको मिट्टी समझती थी। भगवान का विधान घडा विचित्र है । पूताप और पूना के सुन्दर निष्कलङ्क मिलान में उनके पवित्र दाम्पत्य प्रेम में शिनी ने न जाने कहा से आकर विष छिडकना शुरू कर दिया। तीसरा क्यान हस्त नेस्त। एक दिन प्रताप ने अपनी सफलता कहने के लिये पूना से भेट की । दोनों एक मोड पर खड़े बाते करने लगे। पूताप

जासूस 800
ने कहा--"अब मेरा तुम्हारा ब्याह पका हो गया। अब वह
दिन प्राता है कि हम वेसकोच तुम को धर्म पती कहने में
अपना गौरव समझेगे।
पूना ने कहा-"मेरा अहोभाग्य है। आपको मैं स्वामी
पाकर धन्य होऊगी यह मैं किस मुह से कहूँ। लेकिन मेरे।
मन में आप पर जो श्रद्धा भक्ति और अनुराग है उसको मैं
बाहर नहीं कर सकती।"
-
इसी समय घोडे की टाप सुनाई दी। थोड़ी ही दूर पर
एक घोड़ा खडा हुआ उस पर जो सवार थी उसने हाथ में
चायुफ तान कर उसी के इशारे से प्रताप को अपने पास
बुलाया । पूताप ने कहा -'आयी पिशाचिनी।"
पू०-जाते क्यो नही सुन आओ क्या कहती है ? बात कर
माने में पया हरज है?
पूना ने पूताप का चेहरा देख कर समझ लिया कि उनको
उस पर बडी घृणा हो रही है। वह इससे पहले सुन चुकी थी
फि फेशिनी उनसे मिला करती है।
यात यह कि दुनियां में कुछ ऐसे यादमी है जो पराये का
सुख देख कर भर मुह मिट्टी ले उठते हैं। और उसमें खलल
डालने के लिये मित्र बन कर या साधु के रूप में पहुच कर
तरह तरह की यातों से उसे नष्ट करने की कोशिश करते हैं।
लेकिन पूताप और पूनादेवी का प्रेम इन शैतानों की कसौटी
पर पहले ही कसा जा चुका था। पताप पता
क
।
-

चक्र भेद
६
ठहरा कर केशिनी के पास पहुचे। उसने मुसकुराफर कहा-
"श्रत तो आपका दर्शन दुर्लभ हो गया।
पू०-नही काम की भीड से नहीं आ सका । एक दिन
मिलूंगा।"
घोड़े ही पर चढ़े चढ़े केशिनी पूताप के कान के पास मुंह
करके कुछ कहने लगो। पूना ने मन ही मन कहा-"कैसी
बेहया लुगाई है मेरे सामने ही इतनो ढिठाई । पराये पुरुष
के मुह के पास मुँह लेजाकर बात करते इसको शरम
नहीं आती।"
लेकिन पना के मन में कुछ ईर्षा या दाह नहीं हुआ। इसी
समय केशिनी बडे घमण्ड से हिलतो डुलतो घोडा बढ़ाती
चलो गयो । जर पूताप लौट कर अपनी प्यारी के पास पहुचे
उसने देखा कि उनका मन दुखो और चिन्तित है।
-
-
"
पूना ने पूछा-"क्या हाल है
पृ०-हाल क्या । यह प्रेतिनी हमारे ऊपर सनीचर होकर
इस शहर में आयी है । हँस कर पूना बोली-"इस प्रतिनी
की क्या हकीकत जो हमारे सामने हमारे प्यारे का बाल बॉका
कर सके।
फिर दोनों में और पूमको यातें हुई। पूना ने कहा-"आज
सुना समाज में भजन मण्डली श्रायी है। लेकिन हारमोनियम
घजाने वाला यहुत बीमार हो गया है। मत्री जी ने मुझे हार.
मोनियम बजाने के लिये कहा है । तुम भी पाओगे न ?"

जासूस
पू०-हां मैं जानेवाला तो था लेफिन आज एक बडा सङ्गीन
काम आ गया है। इसको नियटाये बिना हमको कुछ सुहाता
नहीं है। आज उसका हरतनेस्त करना ही होगा।
यही कहकर पूताप वहां से चले गये।
चौथा क्यान
कारवाई।
चन्द्रमा की उजियाली चांदनी में जमनानिज पर खडी
फेशिनी पत्तापसिंह से बातें कर रही है। कोई दस बज गया
होगा। आस पास शान्ति है। यमुना के शीतल जल से
सुनिन होकर ठढ़ी हवा चल रही है। दोनों के चेहरे पर
उद्वेग दिखाई देता है। दोनों लोहे का मेहराब पकड़ कर
अगल बगल खडे हैं । केशिनी ने कहा-
'तो आप ठीक कहते है मुझे नहीं चाहते ?
पृ०-इसके जवाब से आप को दु.ख ही होगा नाहक
क्यौ ऐसी घात करना जिससे चित्त दुःखी हो।
गुस्से के मारे केशिनी की श्राखे लाल हो पायी । लेकिन
पूताप उसकी परवा न करके लोहे पर दाहने हाथ से ताल देने
और ठकठकाने लगे।

चक्रभेद
सोपिन की तरह फुफुग्राफर केशिनी बोली-
"अच्छा यह यात ठीक है कि आप पूनावाई को चाहते है?"
प.--यह सब पूछने का श्राप को कोई हक नही है।
अब रात बहुत हो गयी चलिये मैं आप को घर पहुचा आऊँ।
के०--जब घर चलना होगा तब आप पहुचा दीजियेगा।
पहले मेरी बातों का जवाब दीजिये। अगर नहीं देते तो मुझे
कई बातें आप से अभी पूछने की है।
पू०--अच्छी बात है आप पूछिये लेकिन इतना याद रखिये
कि जिनका आपने अभी नाम लिया उनकी यात कुछ मत
फहियेगा।
के०--क्या । पूना की यात मैं कुछ नही पूछू
पृ०- नही ! हरगिज नहीं ।
के०--यह कैसी यात प्राप कहते है ? ऐसी बेदर्दी का
व्यवहार आप को करना उचित नहीं है। मैंने दो सवाल
आप से पूछे है। आप मुझे चाहते है या नहीं ? इतना पूछने
का मुझे हक नही है ? आप ही ने तो यह हक मुझे दिया है।
पू०--मेरो समझ में आप की बात नही आयी। मैंने आप
को कब क्या पूछने का अधिकार दिया है ? साफ कहिये श्राप
का मतलब क्या है?

--
।
* जासूस
के०--साफ पया कह खाक पत्थर ? श्राप को खुद मालूम
है कि आपने क्या अधिकार मुझे दिया है। अगर सय खोल
कर कह तो और हँसी होगी।
इतना सुनते ही प्रतापसिह ठठाकर हँस पडे बोले-
"यह तो आप अच्छा स्वाह करती हो पाई । आप का
मतलब क्या है ? मेरी समझ में नहीं आता"
के०-मुझे श्राप पागल मत समझिये। इसमें हँसने की
कुछ बात नही है। श्राप मेरो संश्ची बात को हसी में उडा
देना चाहते हैं देखकर मैं भी दह हो रही हूँ।
पृ०-तो क्या श्राप के कहने का यह मतलब है कि मैंने
कभी ऐसा भाव दिखाया है कि मै श्राप को चाहता है। या
आप की चाह पाने की लालसा रखता हूँ?
के०-हां यही मेरा मतलब है?
पू० अच्छा पतलाइये कब मैंने एसा भाव दिखाया है ?
केo-श्राप ने साफ़ शन्दों में मेरे प्रेम को याचना की है।
पू.--या भगवान् । आप यह क्या पक रहो हो बाई
साहया?
.
4
के-चकती नहीं जो सभी बात है वहों में कह रही है।
आप ने जिस आग्रह और लालसा से मेरी यांचना की थी।
यह सब देखती हूँ आज उलट गया है। न वह पाते हैं न यह
भाय । आप फिसी दूसरे के फन्दे में पड गये है। और जिसके

चक्रभेद
१३
पू०-आप क्या कहती है । आप की बातों से तो मैं अवाक
हो रहा हूँ। मैने जबान से या काम से कभी ऐसा भाव नहीं
दिखाया जिससे जाहिर हो कि मैं आपको चाहता हूँ। यह तो
बिलकुल फरेव की याते आप कह रही हो ।
को०-श्रच तो आप यह कहेंगे ही। एक अवला को
फुसलाकर श्रापने पूमभाव दिखाया और दूसरी से शादी करने
जा रहे हैं। अब झूठी बातें बनाकर ऐव छिपाने के सिवाय
आपको उपाय क्या है ?
पूल-ओ हो ! अय में समझ गया। मुझ पर इस समय
बडे बड़े फन्दे रचे गये हैं जान पड़ता है। अब तो इस जगह
मेरा इस घडी रहना सतरे से खाली नहीं है।
इतना सुनते ही केशनी उपटकर बोली-"तो बेहतर है
तुम यहाँ से चल दो। लेकिन मेरा हक देकर तो जाय।"
यही कहकर मुट्ठी बांधे हुए केशिनी वही चेहल कदमी करने
लगी। उसकी लाल लाल आखें देखकर पूताप सिंह दन हो
गये। उन्होंने दातो से ओठ काटकर अपना क्रोध सम्हाला
और गम्भीरता से घोले-"यह क्या कहती हो केशिनी चाई।
आप से भेंट होने से पहले ही मेरा ध्याह पूना से ठीक हुआ
पड़ा
। इस बात को परमात्मा जानता है श्राप नाहक भ्रम
में पड़ी हो। मैंने सपने में भी आप पर ऐसा भाव नही
दिखाया जैसा श्राप कह रही हो। दो एक बार आपसे भेट
दुआ लेकिन मेरा कभी प्रापसे ऐसा भाव नही रहा न है।
एमके सिवाय आप पर मेरी दिल से बडी नफरत है । आपको
देखते ही मुझे डर लगता है। आपकी यह सब बातें ऐसी ही
-
है

न
KO जासूस Ec
है जैसे कोई बिलकुल बेजान पहचान का आदमी आकर मुझसे
कहने लगे कि हमसे उसका प्रेम है।
के यह बात है ! तो आप मुझे घिनाते है मुझे देखकर
श्राप डरते हैं ? क्यों मै चुडेल हूँ या आदमखोर डाइन हूँ?
खयरदार प्रताप ! अपना भला चाहते हो तो पूना से शादी का
इरादा इसीदम दिल से दूर कर दो। मैं कहे देती हूँ नहीं तो
तुम दोनों के लिये मै हौत्रा हो जाऊँगी।
पू०-मैं आपको साफ़ कह देता हूँ। बेहतर है कि आज
हमारा श्राप का निबटेरा हो जाय । हस्त नेस्त यही सही।
के-अच्छी बात है में भी यही चाहती है। भर बॉह
चूड़ी फि एकदम रॉड ।
इसी समय एक आदमी उन दोनों की ओर घूरता हुथा
बंगल से चला गया। प्रताप ने कहा-"अच्छा मैं एक बात
पूछता हूँ। आप क्रोध छोडकर अफल से काम लीजिये और
मेरी यात का जवाब दीजिये ।"
केशिनी चुपचाप उसकी ओर धूरती रही । अव पूताप ने
कहा-'"आप यहीं यतलाइये कि जबरदस्ती करके कोई किसी
का प्रेम पा सकता है या किसी से शादी ब्याह हो सकता है
फेशिनी गर्जकर बोली-"सुनो।
प्रताप
मैं
असल बात अपने
दिल की कहती हूँ। मैं अब तुमसे पोति करना चाहती हूँ।
अब तो मैं भी तुम्हें घिनाती है। अगर तुम इस रास्ते पर
नही गये होते तो हो सकता है कि मैं तुमको प्यार कर सकती
"

चक भेद
केसांचे में ढाल दिया है। यह बात जरूर याद रखो कि खी
की ईर्षा और डाह के समान भयङ्कर वस्तु ससार में दूसरी
नहीं होती।
पू०-दुसरी वस्तु ससार में जरूर है।
केशिनी ने कडक कर पूछा--"है तो बतलाओ क्या है ?"
पू०-यह तो यही आप को यह मुहब्बत है।
इतना सुनने पर तो केशिनी आपे से बाहर हो पड़ी और
हाथ उठाकर पूताप पर वार करने चली। पूताप ने भी उसका
हाथ पकड लिया। दोनों में हाथापाही होने लगी। लेकिन
प्रताप उसका धका सम्हाल नहीं सके। यह धरती में जा गिरे
साथ ही केशिनी पुल के नीचे पानी में जा गिरी।।
अव केशिनी को जमुना फी धार में चुमकियाँ लेते देखकर
प्रताप के चोरे तो लोहू नहो । मन में उनके आया कि यह तो
घडा अनर्थ हुश्रा । झट श्राप भो उसो जगह कूद पड़े । अब
वह तीसरा आदमी जो चगल काटकर गया था वहा आ पहुंचा
उसने योडी देर तक धार में नजर गडाकर देखा फिर तेजी से
किनारे पर दोड गया। और किनारे हो किनारे चला गया।
इस घटना के दूसरे ही दिन शहर भर में खवर उडी कि
नये आये हुए धनी सजन को लडको का पता नही चलता।
बस पुलीस में रिपोर्ट हुई। बडी सरगर्मी से तहकीकात होने
लगी। और पूताप गिरकार कर लिये गये। यह भी मालूम
हुआ कि लाश जमुना नट पर पायी गयी है।

-
जासूस
पाँचका क्यान
जुर्म से इनकार ।
आज इजलास में भीड के मारे पीठ पर पीठ छिलती है।
शहर भर में जिस खून की चर्चा थी श्राज उसी खून का
मामला अदालत में पेश है। इसके सिपाय प्रयाग के नामी
बफील प्रताप सिंह खूनी कहकर कठघरे में खड़े किये गये है।
जिसके तीन पुस्त सेविकालत चली आती है जिसने सैकड़ों
स्वनियों को अपनी बुद्धि और चाल की पाल निकालने की
धातुरी के पूसाद से फॉसी की तिकठी सें उतारा है वही आज
खूनी होकर असामी के कठघरे में खड़ा है।
इसी समय सड़क पर से कोई चिल्ला कर गाता हुश्रा
निकला:-
एक दिनों सबही पर बीती।
हम जानी हमीं पर' यीती ।।
सूरज चाँद घसै जग ऊपर,
ग्रहण लगे उनहूँ पर बीती ।
एक दिनवा सवही पर चीतो ॥
रामचन्द्र दुनियाँ के मालिक,
सीता हरी उनहूँ पर बीती।
एक दिनमा सवही पर बीती ।।
रापण नृप त्रासत त्रिभुवन को,
'.
-
.

चक्र भेद
१७
7
जगत अधीन किये जिसने सब,-
लङ्क जरै उनहें पर बीती।
एक दिनयॉ सवही पर बीती॥
सय ने बड़े ध्यान से उस गाने वाले की मम भरी बातें
सुनी। न्यायसिहासन पर बैठे हुए मैजिस्टट ने भी कलम
फान पर रखकर शान्त भाव से उसका गाना सुना। फिर
उसके आगे बढ जाने पर सबका ध्यान सामने टेवुल पर पडी
हुई लाश पर गया। एक सफेद कपडे से लाश ढकी हुई थी
श्रय उधार दी गयी। लाश पर पाच जगह चोट के निशान
देखकर लोग दांतो उगुली काटने और आपस में कहने लगे-
"जिस शैतान ने इस सुन्दरी पर हाथ चलाया है उस हत्यारे
का पत्थर कलेजा तनक नहीं पसीजा। यह बडे शैतान का
काम है ।" एक ने बहुत धीरे से कहा-"वकील ऐसेही वेदर्द
होते है सफेद को स्याह, स्याह को सफेद करते जरा भी नहीं
हिचकते।"
श्रय मैजिस्ट्रेट ने कहा-"अच्छा जी असामी।
इतना सुनतेही हजलास पर सन्नाटा छा गया। फिसी के
मुंह से अब वात नाही निकलती। प्रताप की इस दशा पर
बहुतों को तरस भी आया कितनों ने रूमाल निकाल फर
आंसू पोछे।
इसी समय केशव की पुकार हुई। वह गवाह के कठघरे
में आ खडे । उनकी उम्र ययालीस बरस की है। चेहरे के
अच्छे हैं लेकिन सूरत देखने से मालूम हुआ कि गेते रहे है।
और
पुकार होते ही सू पोंछते हुए आये हैं।
२

हे
K003-जासूस
श्रय केश फो हलफ दिया गया। और वल्दियत कौमियत
लिखा कर वह अपना धयान देने लगे। अपना ययान देते हुए
बेचारे केशव ने जरा भी इधर उधर नही किया न ांस ही
गिराया। पूर्व सावधानी से अपने तई सम्हाल कर सीधी
सीधी बातें शुरू कर दी। उन्होंने टेवुल पर रखी हुई लाश
की ओर उगली यता फर कहा-'यहो मुझ अभागे को वह
घदनसीय बेटी । तारीख रविवार को मेने बैठक में पहुंच
फर देखा तो यह चूमने जाने के लिये तैयार है । मैंने कहा-
"अय सूरज व चुका इस रात के अकेले कहाँ जानोगी बेटी।"
उसने कहा-जमुना निज पर घूमने जायगी। और यह भी
कहा कि प्रताप भी यहाँ आने का वचन दे चुके हे तब मैंने
देखा कि सयानी लडको के इस काम में रुकावट डालना ठीक
नहीं है। चुप हो गया लेकिन फिर मुझे उसको जीते जी
देखना नसीब नहीं हुआ फिर उसको मैंने मरा हुअा ही देखा
है । लाश जमुना के किनारे घायल मिली है।
मेजिस्टेट ने केशव को लाश के पास जाकर पहचान करने
का हुक्म दिया। जब वह लाश देखकर हट गये तव पूताप
भी जो चुपचाप सिर भुकाये हुए मन में कुछ सोच रहे थे
लाश के पास गये। लेकिन चेहरा देख कर मानो आस्मान से
गिरे। उनकी अखे चढ़ गयी । कुछ भी उनको समझ में नहीं
आया कि क्या हुश्रा है ? फिर उसी समय उनका चेहरा
पूसन्न हो आया मुसकुराते हुए अपने कठघरे म पहुचे।
इसीसमय केशव ने विनती की-"अदालत की परवानगी मिले
तो इस समय में एक छिपी वात निवेदन करूँ जिससे मालूम
हो जायगा कि यह कैसा भयानक चक्र मुझ पर चलाया गया हैं ।

चक्र भेद
हाकिम का हुक्म हुआ-"अगर उस बात से इस मामले
का सम्बन्ध है तो हम सुनने को तैयार हैं।"
के-हॉ हुजूर खुब सम्बन्ध है।
हा०-अच्छी बात है कहिये ।
अब केशव वह गुप्त भेद कहने लगे-“मैं जो बात कहता
हूँ वह बहुत गुप्त होने पर भी यहाँ के पुराने भेदू आदमी
जानते हैं। पूताप के बाप ने जिस ली से शादी की थी उसके
कोई नही है यह वात गप्प उडायी थी। असल में उसका एक
नशेगज भाई था। वह बड़ा पियक्कड महा गॅजेडी था । इसी
से उसकी बहन ने जाहिरा उससे नाता नही रखा। शादी
होने पर उन्होंने पताप के पिता अर्थात् अपने पति से उसकी
चात कह दी। वह गुप्त रूप से उसकी धन से मदद करते थे
लेकिन वह भी लोगों में उसको अपना साला कह कर परिचय
नही देते थे। जव प्रताप के मा पाप दोनो मर चुके तर उस
मामा ने इनके पास पहुच कर अपना परिचय दिया लेकिन
इन्होंने उसको अपना मामा कह कर जाहिर नहीं किया ।
लाचार होकर उस बेचारे ने अपना नाम बदल डाला और
अपने यल व्यवसाय से गुजारा करने लगावह इनका मामामे ही
हुँ। उन्ही प्रताप ने अपनी मोलेरो यहन का खून किया है ।
अब प्रताप से रहा नहीं गया। क्रोध के मारे जोश म
भर कर बोल उठे-"हजूर दोहाई सरकार की इस आदमी ने
जो बाते कहो है सब झूठो और गढ़ी हुई है। इसको पफ
घात भी सचो नहीं है। एक ओर मेरी पहन बनाया जाना है
दूसरी ओर दूसरा ही अपराध लगाया जाता है।"

.
जासूस
मैजिस्ट्रेट ने असामी को रोक कर कहा-'इस बात से
मुकदमे का कुछ सम्बन्ध नही अगर आगे जरूरत पडेगी तो
इस पर खयाल किया जायगा। तुमने लाश देख ली है। अब
अपना मतलब तुम जूरी को बता सकते हो।
केशव ने कहा-'हजूर चेहरा ऐसा विगड गया है कि में
हलफ लेकर नहीं कह सकता कि यह मेरी लड़की है । इसके
हाथ के निशान, वाल, दांत सब हमारी लड़की के से ही है
जांघ में पक निशान था वह भी इसमें मौजूद है। इसके हाथ
में हमारे नाम की अगुठी मिली है। इसके कपड़े मेरी लडकी
के हैं। इन्हीं सब बातों से मैं कह सकता है कि यह मेरी
लडकी है।"
फिर डार का बयान हुश्रा जिसने लाश की जांच की थी।
उसने उसके मरने का कारण बतलाया। उसके बाद एक और
आदमी की पुकार हुई । जब वह गवाह के कठघरे में आया
उसको देख कर लोग अवाक हो रहे । उसने बयान किया-
'मेरा नाम रघुपति है। में उस रात रविवार को पुल पर
से श्राया था। जिसकी लाश है उसको और असामी को चाते
करते देखा था। वह यही कपडा पहने थी जो लाश पर है।
एका जुरी ने पूछा- 'उस समय कितना बजा था ?"
ग-नव बजक्र वाईस मिनट हुए थे।
जु०-मिनट भी याद है ?
-हां पोंकि हमको गाडी पकडना था । पुल पर आकर
घडी वही मैने देखी थी फिर आगे बढ़ गया।
1
-

चक्र भेद
जु०-आपने ठीक ठीक इसो असामी को वहा बात करते
देखा था।
।
-
ग० हाँ ! हाँ ! उजेलो रात थी। मेने अच्छी तरह
पहचाना था।
मैजिस्ट ने कहा-"अच्छा कहते चलो।"
ग०- मै जर इन लोगों के पास पहुंचा नर इनको यातें
चन्द हुई । जब श्रागे बढ गया तर सुना स्त्री कहती थी-
"तुम्हारे हो विश्वासघात से मेरो मुहयत दुश्मनी से बदल
गयो है । इस मर्द ने भी वही वेदर्दी से कडक कर बात की।
मैंने समझा कि कुछ घटना न हो जाय । इसी से मेरे मन में
डर हुआ कि वहा तीसरा कोई नहीं था। में थोड़ी दूर पर
छिप रहा। वहां से मुझे उनकी बातें तो नहीं सुनाई देतो थी ।
लेकिन एक बार इस मर्द को यह कहते सुना-"वस पर मेरी
जान इसी से बचेगी कि तुम्हें इसी जमुना में डाल कर रातम
कर दू । या उठा कर यही से गिरा दू । दुसरा कुछ उपाय
नही रहा।" यह आवाज जोर से आयी इसो से मने सुन ली
और झट छिपी जगह से निकल कर इनके पास चला मुझे
मालूम हुआ दोनों में जुत्थम जुन्थी हो रही है। मर्द का हाथ
मैंने उठते कई बार देखा ओर हुमक कर मारते भी सुना । फिर
धम्म से पानी में गिरने की आवाज आयो । उसके बाद ही
फिर आवाज सुनाई दो। यह मुझे नहीं दिखाई दिया कि मर्द
के हाथ में कोई हथियार था या नहो ? लेकिन इतना मैंने
समझ लिया कि जान लेने देने का मामला हुश्रा है। यस
इतना ही जानता हूँ।

-
२०
128जासूस
उसका बयान हो चुकने पर इजलास में सन्नाटा रहा।
असामी वडी धीरता से कठघरे में पडा था। उसके चेहरे पर
घबराहट नहीं थी। एक और आदमी ने गवाही दी वह रेल
का लाइन खलासी था। उसने चयान किया मौके पर हाथा
पाही के निशान देये थे लेफिन कही पून के दाग थे या नहीं
इस पर खयाल नही किया। एक चौथे आदमी ने भी इजहार
दिया सब का ययान हो जाने पर मैजिस्ट्रेट ने असामी से
पूछा-"तुम को कुछ कहना है । मैं दौरा सुपुर्द करने से पहले
तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ।"
असामी ने कहा--' इस टेवुल पर जो लाश पडी है इसके
खून की यावत में कुछ नही जानता। मैं, इसके पून में बिलकुल
बेगुनाह हूँ। इस बात को परमात्मा जानता है । मैं इस समय
और कुछ कहना नहीं चाहता।"
इतना सुनने पर देखने वालों म बडी खुशी हुई। एक
आदमी ने तो दौट कर असामी से गले लगना चाहा लेकिन
सत्री के मना करने पर वह लौट गया।
5
छठा बयान
अंमामी दौग सुपुर्द।
इसी समय बडा शोर मचा । एक आदमी बेतहाशा दौडा
हुआ इजलास पर पहुँच गया। सिपाहियों ने बहुतेरा रोका
लेकिन उनकी कोशिश नाकाम हुई। जब वह मैजिस्ट्रेट के
सामने पहुँच गया तच दो सिपाही दौडे लेकिन हाकिम के

H
-
चक्र भेद
इसके याद मैजिस्ट्रेट को असेसरों ने कहा कि प्रताप
इस मामले में खूनी है उसी ने खून फरके लाश जमुना में
फेक दी है।
अब मैजिस्ट्रेट ने प्रताप को दौरा सुपुर्द कर दिया।
सिपाहियों ने बड़ी कठिनता से भीड हटायी। प्रताप के कुछ
परिचित भी वहाँ गये। उन लोगों ने हलफ लेकर कहा कि
उन लोगों को अच्छी तरह मालूम है कि इस मामले में तुम
वेगुनाह हो लेकिन वकील चैरिस्टर क्यों नहीं करते।"
प्रताप ने मुसकुरा कर कहा-"दौरा अदालत में मालूम
हो जायगा कि किस वास्ते वकील वैरिस्टर नहीं करते।"
अब सब लोग निराश हो कर चले गये। सत्री भी प्रताप
को हवालात में ले गये ।
सातवाँ वयान
लंगट्ट बाबा।
अथ शहर भर में प्रताप के मुकदमे की चर्चा होने लगी।
छोटे बडे संघ की जवान पर इस खून की बातें थी हाटघाट
सर्वत्र लोग इस पर बात यहस करने लगे। किसी ने कहा-
केशव महा शैतान नरपिशाच है इसने बेचारे सहायहीन प्रताप
को सिकले में डालकर चांपना शुरू कर दिया है। और अदा
लत में मामा वन कर भाजे का सत्यानाश करना चाहता है।
उसका मतलब है कि प्रताप इस अपराध में फांसी चढ जायें
-

आश्रो। तुम
३०
407जासूस
निज पर पहुँची । वहां जाकर पड़ी हुई और परमात्मा से
विनती करके चोली 'हे नाथ ! हे प्रभो! हे दीनबन्धु । मेरे
स्वामी का सकट दूर करो। हे जमुना मैया । सहाय. हो माता!
उन्होने ठीक कहा था कि यही चुडैल मेरा सर्वनाश करेगी।
वही हुआ। हे बहन केशिनी! बहन केशिनी 1.
अगर नहीं मरी हो तो आओ। मेरे प्यार को वचाशो! वह
मुझे चाहते है मुझ म उनका सम्मा प्रेम है अगर इसी लिये
तुमने उन पर आफत डाली हैं तो आयो बहन ! मैं ही ऐसी
जगह जाती हूँ जहाँ मुझे कोई नहीं देख सकता। मैं तुम्हारे
वास्ते ससार छोड देंगो। बहिन तुम आओ! मेरे प्यारे को
बचानो। हे भगवान । बचायो ! गुहार लगो नाथ ! 'त्रिया
गोहार ! गाय गोहार । इस श्रमागिनो को बिन्ती पूरी करो
प्रभो । हे नाथ हे अखिलनायक विश्वम्भर ।
ऐसा जान पडा मानो कोई देवकन्या परमात्मा से प्रताप
के लिये मङ्गलकामना कर रही है। इसी समय पीछे से आवाज
प्रायी -"चिन्ता मत करो पेटी! तुम्हारी बिनतो भगवान पूरी
करेंगे। तुम्हारे प्यारे को परमात्मा वेगुनाह सावित करेंगे।"
पूना इस आवाज से चौककर पीछे देखती है तो एक
श्रादमी थोडी दूर पर खड़ा है। उसको देखते ही डरी और
चिलाकर बोली --"कौन है । कौन मुझे प्रवोध दे रहा है।"
"मैं हूँ बेटी । मुझे लोग लॅगढ़ कहते है।"
अकचकाकर पूना ने कहा--"अरे वाना ! तुम किवर
से आ गये।"
"यया कहूँ मे इजलास पर मच्चो घात कहने गया था।

m
चक्र भेद है
उसी सच्ची यात के कहने से हमको सिपाहियों ने हवालात में
बन्द कर दिया। कहने लगे झूठो बात कहो तो छोड देंगे।"
पू०-तो हवालात से कैसे निकल आये वाया । क्या झूठ
घोल के छुट्टी पाये हो?
"तुम ऐसी बात क्यों कहती हो वेटो । मुझे तो आज पाच
घरस से तुम देखती हो। मैं गाजा भाग खाता हूँ । दम लगा
कर ही दिन विताता हूँ लेकिन मैं झूठ कभी नही बोलतान
फंभी बोलुगा । पुलीस जब किसी मामले में अपराधो को नही
पाती तव मेरे ऊपर चाप यढाता है यह बात सही है लेकिन
सारी दुनिया तो मुझे पागल कहा करती है। मेरे ऐन पागल
का पुलीस कर ही क्या सकती है। न हम उसके किती काम
के है न मुट्ठी ही गरम कर सकते हैं उमकी ।
पू०-तर छुट्टी कैसे मिली बाया तुमको?
"यह तो मेरा मन है। जब मैंने चाहा कि निकल जाऊँ
भट निकल आया।"
-अरे तव तो तुमने सब चौपट कर दिया वाचा । जर
तुम माग आये हो तव हाकिम तुमको विश्वासी नही समझगे
न तुम्हारी बात पर विश्वास करेंगे। नतीजा यही होगा कि
हमारे मालिक को फांसी हो जायगी। यह तुमने क्या कर दिया ?
"नही मैं अपने मन से भाग कर नहीं आया हूँ बेटी।
चहा तो मुझे मौज था। गाजा भाग को भी मिल जाता रहा।"
"तराये कैसे?"
ल० -आया हूँ मैं प्रताप को बचाने के वास्ते।
पू०-तो जो कुछ तुमने, धयान किया है वाया ! उसके
1
पू०-
-

जासूस सिवाय तो और कुछ नही न कर सकते? "हॉ काहे नही कर सकता। उस लोडिया को लाकर मैं फचहरी में हाजिर कर दूगा ।" पू०-अच्छा यह तो बोलो! तुमने ठीक पहचाना था। पाप बेटी को बातें करते देखा था ? भूले तो नहीं न ? नशा पानी तो नही किया था? "नहीं बेटी ! नशा पानी की बात नही जैसे तुमको पह- चानता हूँ वैसे ही केशिनी को पहचानता था उसकी बातें मैंने सुनी थी। क्या सचमुच तुम भी मुझे अव पागल समझने लगी।" पू०-लेकिन तुम उसको कहाँ ढढोगे? अगर नही मिली तब तो सब चौपट हो जायगा। तुम्हारी गवाही के सिवाय और कुछ तो सफाई हई नही है उनके वास्त । "कुछ परवा नही बेटी। मुझे गवाही देने से जेल में रखा था। मैं चला आया हूँ। फिर इजलास पर बड़ी अदालत में जाकर गवाही दे पाऊँगा बस ! इसमें क्या प्राता जाता है। । आहका क्यान पूना का विश्वास । पूना ने यडी नरमी से पूछा-"काहे चावा ! सच्च बोलो तुम कौन हो ? हम लोग जो समझते हैं वह तो तुम हो नहीं । कहो अपना भेद नहीं दोगे?" ल० -पयों बेटी। ऐसी बात क्यों कहती हो? -- ।

चक्र भेद
पू०-"असल बात ऐसी है बाबा कि तुम्हारी आज की
बातें सुनने से मेरे मन में यह आता है कि जैसा हम लोग
तुमको साधारण समझते है वैसे तुम हो नही । अव सञ्ची
बात कहो तुम कौन हो?"
इतना सुनते ही लँगह बावा ठठाकर हॅम पडे। उनके
चेहरे पर अनुपम ज्योति फूटी। बोले-"हॉ बेटी ! ठीक कहती
हो तुम्हारा अटकल दुरुस्त है। मैं उतना देहाती गॅवार नहीं
हूँ जितना सब लोग मुझे समझते हैं। मैं यूनिवर्सिटी का
एम० ए० पास हूँ।"
पू०-ओ हो ! तव तुम इस तरह क्यों रहते हो वावा ? क्यों
नहीं अपने असली रूप में श्राते ?
"ना बेटी । उसमें आने की जरूरत नही है। जैसे चक्र में
आज प्रताप पिस रहा है उससे भी विकट चक्र में पड कर मैं
इस हालत को पहुंचा हूँ।"
पू०--तो चक्र चालियों को फल देने के बदले तुमने अपनी
आदमियत ही छोददी?
"सुनो चेटो तुम जैसी दया मुझ पर करती हो प्रताप का
भी वैसा ही विश्वास है । लेकिन कुछ चिन्ता की बात नही में
ने प्रताप का उपकार करने की ठानी है । इसके वास्ते मैं अपनी
जान की भी परवा नहीं करूंगा। पहले मै प्रताप को वचाऊँगा।
पीछे अपने प्राण की रक्षा करूँगा। तुम परवा मत करो । चक्र
चालियों का सय व्यूह टूट जायगा ! दुनिया में सत्य की ज्योति
असत्य के पहाड से भी नही छिप सकती।"
पू०- इसके वास्ते तो घाना कुछ भी चिन्ता नहीं है
आज तुम्हारी बात से मुझे दूना बल हो पाया है। अब मैं घर
३
।
-

।
जासूस
जाऊँगी। तुमसे फिर कहाँ भेट होगी बाबा! देखो छिप कर
रहना नहीं तो पुलीस पकड़ ले जायगी तुमको।
ल-सो ठीक है बेटी उसकी परवा नहीं लेकिन तुमको
एक घार प्रताप से भेट करना होगा। मुझे रुपये की जरूरत है
लेकिन अपने वास्ते नही उसी प्रताप को बचाने के लिये
रुपये का काम पड़ा है।
पूछ-कुछ परवा नहीं । उनको बचाने के लिये जो कहो मैं
फरने को तैयार हूँ वाया।
"अच्छा आओ वेटो तुम हमारे साथ।" यही कह कर
लगटू याचा वडी तेजी से आगे बढ़े। पूना भी उनके साथ
चली। कुछ दूर जाकर जमना के किनारे से थोड़ी दूरी पर
एक पत्थर का टुकड़ा दिखाया। कहा-कलह इसी समय यहा
आना अगर मुझसे भेट नही हो तो इसी के नीचे एक चिट्ठी
मिलेगी उसको ले जाकर प्रताप को देना। ओर वहां जो कुछ
पीते सो लिख कर लाना । रात के अगर नहीं मिलू तो इसो
पत्थर के नीचे रप जाना। हो सकेगा इतना?"
खुशी से पूना घोली-"हाँ हा ! हो जायगा।"
अच्छा एक बात याद रखना। मेरे चले आने पर अब
वहा खोज शुरू होगी । तुम्हारे पीछे भी आदमी लगेंगे। लेकिन,
पूर्व सरदारो से रहना। यहां का तुम्हारा आना जाना था
कुछ चीज यहा से ले जाना श्रयता रख जाना किसो को किसी
सरह मालूम न होने पावे नहीं तो सब गुड गोबर हो जायगा।"
पुर-यह सब तो मैं समझ गयो । लेकिन तुम्हारी खोज
में मेरे पीछे क्यों नादमी लगेंगे याया ?

६चक भेद
३५
"इसका कारण है। लोग समझेंगे कि मैं जर वात प्रताप
से करूगा तव तुम्हारे हो जरिये करूगा।"
पू-ऐसा समझने की वजह पया ?
"वजह ऐसी कि सरकार को तो ऐसा ख्याल नही होगा
लेकिन केशन अपनी इस कारवाई से नहीं चूकेगा। और उसके
ऐसा करने का एक कारण भी है।"
पू०-वह क्या?
"वह यह कि प्रताप के तो और फोई है नहीं । जय
उसको फांसी का हुक्म होगा तय अपनो सव सम्पत्ति वह
तुम्हों को बख्श देगा। इसी से सर तुम्हारे पीछे पड़ेंगे।"
पूर-ओ हो । या भगवान । यह पया प्यारे फासी पर
चढ़ेंगे और मैं उनकी दौलत भोगूगी । इससे तो पहले ही
मुमें मरजाना अच्छा है ।
"वह बात है नहीं बेटी।न यहा तक नौवत पावेगी।
लेकिन यह तुम अच्छी तरह जान रक्सो कि प्रताप काही मव
हडपने की नीयत से केशर यहां श्रया है पहले उसने अपनी
फेशिनी का फन्दा डाला। जब उससे काम नहीं यना तब यह
पासण्ड रचकर चक्र चला रहा हे इसी से मैं कहता कि
तुम खूय खवरदारी से रहना थेटो । जग भी चूक न
होने पाये।"
पूछ-तुमने यह सब खबर कहां से पायो यावा?
"श्रय फिसी दूसरे दिन पूना ! में आज चलता है।" यही
कहकर लंगट्ट याया पदा से चलते बने। किसी के पांव की

२६
जासूस
आरट पाकर ही वह सरके थे। पूना भी वहीं छिप गयी।
जब वह चला गया त वहां से निकल कर अपने घर को
रवाना हु।
---
-
नयाँ क्यान
जुर्म की गवाही।
यडी तेजी से पूना अपने घरको जा रही थी। लेकिन
जहा अब माघ मेले का टिकट घर बनता है वही पुल के पास
पहुचते ही किसी ने रोका महा-रे कहाँ चिरई। इतनी
तेजी से क्यों उटी जाती हो?"
इतना सुनते ही पूना के तो देवता कूच कर गये । बेचारी
कांप कर वही खडी हो गयी। मुह से कुछ कहते नहीं बना।
वह आदमी उसके पास श्राया और मुह के पास मुह लेजाकर
बोला [--'श्रो हो। तुम हो पूना।"
पूना ने पहचान लिया कि वह केशव था उसने सम्हाल
कर कहा- "अच्छारारता छोड़िये में जाऊ।"
के०- हाँ। हाँ! तुमको कोई रोकता नहीं लेकिन मैं जो
पूछता सो बतलाती जान ।
इतना सुनते ही पूना का डर क्रोध से बदल गया अांखें
लाल हो पायी । कटक कर चोली-"इतनी रात के में सापकी
वात का जवाब नहीं दे सकती।"
के-कितनी रात गयी है मालूम है निशाविहारिणी ?
4
-

चमा भेद -
३७
के०-चारह बज गया है।
"वजने दीजिये । मैं जातो ट हट जाइये श्राप ।"
के-अच्छा बतला सकती हो इतनी गत के कहा किस
काम के वास्ते गयी थी।
"मे थापको नही, जानती।"
के०-1 जानत नही हो श्राप ! जिस अभागिनी फेशनी
का जमना के पुल पर सून हुमा उसोका तो में बाप ह श्राप !
श्राप मुझे भूल गई।
"मुझसे इससे क्या लगाव है ?'
के-लगाव हो चाहे नेहो लेकिन मुझे यह जानना है
कि इस पून : आप कहा तक शामिल है ।
"अवतो आप एक शवला की बेइज्जती करते हैं साहब।"
के-नहो साहा ! इस सून में जो पकड कर दौरा
सुपुर्द किया गया है उसी को प्यारी से में पूछता कि इस रात
के उस सृन को जगह पर किस नीयत से धूम रही है।
"मैं आप ले श्रम बात नहीं करना चाहती । येहतर है
कि आप रास्ता छोड़िये में चली जाऊ।' इतना सुनने पर
वह हट तो गया लेकिन कडक कर इतना कहा-"अच्छी बात हे
श्राप मेरो घातों का जवान नही देतो तो न सही लेकिन ऐसी
जगह मैं श्रापको ले जाऊगा जहाँ प्रापको जगार देनाही
पडेगा । जान पडा है त पन में कोई प्रताप का दिली
आदमी भी था।"
+-

08 जासूस &
अब पूना से नहीं सहा गया। क्रोध के मारे जोश में
नाकर बोली-'जरूर यह भी हो सम्ता है कि आपका यह
क उसी जगह पर टूट जाय जहां श्राप हमको बुला ले जाने
ले है।"
यही कह कर पूना तेजी से चल पड़ी थी। चलते चलते
उसने केशव की यह यात सुनी-'यह भी हो सकता है कि
आपको इसकी वही जवाब देही करना पड़े।"
दसका क्यानक
प्रताप के वेरिस्टर।
दूसरे ही दिन यह सवर शहर भर में बिजली की तरह
दौड गयी कि लगटू पाया हवालात से माग गये है । लेकिन
पूना का दिन कटना मोहाल हो गया। वह मन में कहने लगी
कि कव सूरज डूबेंगे। कय रात होगी। इसी इन्तिजारी में
तीसरे पहर को नोकर ने खबर दी कि एक भलेमानस भेट
करने आये है।
इतना सुनते ही पूना की आत्मा उड गयी । उसने समभ
लिया कि उसी पातकी ने प्रताप फा मुझे दिली कहकर रिपोर्ट
की है और पुलीस मुझे पकडने आयी है। पूना सरल स्वभाव
की थी लेकिन उसके भीता बल बहुत था। प्यारे के सकर
समय म उसकी बुद्धि और तेजी दिखाई देने लगी । झट स्थिर
चित्त होकर उस भले आदमी से भेट करने के लिये बैठक में

चक्रभेद - ३९ 1 खुश होकर आयी । वह श्रादमी उसको देखते ही शासन छोडकर उठ खडा हुआ और सन्मान से बोला-"शापही पूना बाई है ?" 'हो। हां! विराजिये कहिये किस काम से आप पधारे हे?" "मेरा नाम योगेन है । मैं प्रताप का बेरिस्टरह। उन्ही के कहने से मैं आपसे भेट करने आया है।" पूना बोली 'ओ हो ! तब तो बड़े भाग से आपके दर्शन हुए । कहिये उनकी क्या दशा है। तकलीफ तो उनको बहुत हो रही है। न जाने भगवान की कैसी विचित्र लीला है । लेकिन इस तरह किसी बेगुनाह आदमी को ऐसा दु.स होगा तो किसी को धर्म में कैसे प्रास्तार सकेगी। अच्छा यह तो कहिये आप उनको इस सदर से बचा सकेंगे न यो० -भरोसा तो पेसा ही होता है लेकिन उन पर सुबूत ऐसे है कि हिम्मत छूट जाती है। इसके सिवाय एक लॅगटू वाया ही फी गवाही पर दार मदार है। लेकिन यह जेल से भाग गया है। इससे अब हमारे पास कोई उपाय नहीं रहा न मुझे यही समझ में आता है कि क्या करूं? पूना ने चारों ओर ताक कर कहा-"लॅगटू पाया तो जरूर पेशीपर पाकर बयान देंगे।' अर तो खुशी से मानो वकील का चेहरा प्रसन्न हो आया। पूछने लगा--'आपको ठीक मालूम है यह यात" "हाँ । हाँ ! इसमें पया पूछना है "कैसे यह यात सापफो मालूम हुई ?" पू०-द धाया ने ही मुझ से कहा है। PM

४०
जासूस
'तो उनसे आप से भेट हुई थी ?"
पू०-हाँ। हाँ।
"कव! कव"
पू०-कल्ह रात के।"
"पहले से उनकी खबर मिली थी?"
पू०-जी नहीं । आकस्मात भेट हो गयी।
"तब तो बडी खुशी की बात है । मैं तो उनके लिये अधीर
हो रहा था। आप मुझे यह सव बातें बतला सकती है जो
उन्होंने कही है उन बातों को मुकदमे में मुझे बहुत जरूरत है।
"हाँ ! हाँ । क्यों नहीं बतलाऊँगी।" यही कह कर पूना ने
वह सब बातें कहीं जो उनसे लॅगटू धापा की हुई थी। यह
भी कह दिया कि आज रात के उनसे भेट होने की बात है।
वह मुझे एक चिट्ठी देंगे। लेकिन उन्होंने मुझे पूर्व खवरदारी
से रहने को सावधान कर दिया है । मुझे उनकी पाते ठीक भी
जान पड़ती है क्योंकि कल्ह जब मैं घर को आ रही थी तब
रास्ते में केशा ने मुझे रोका था।
वकील ने चेहरा मलीन करके कहा - "ओहो। सच तो
घडा बदमाश है वह आदी ।"
पू०-बदमाश क्या ऐसा तैसा ! वह मुझे रात के बहुत
धमकाता रहा।
"उस बदमाश के चमकाने में क्या धरा है। लेकिन आप
श्राज लॅगट्ट बाया से भेट जरूर करना।"
पूर्व-अच्छा मैं उनसे जेल में भेट करने जाऊ तो इसमें
कुछ गडबड तो नहीं है न ?

ही चक्र भेद
"हा गोलमाल हो भी सकता हे नही भी हो सकता लेकिन
बेहतर है कि इतना जल्दी आप मेट मत कीजिये जो कुछ
कहना सुनना हो आप हमारे जरिये कहिये हम जाकर सब
कह श्रावेंगे और आप तो जवाब ले श्रावेगे।"
'पूनही साहर चाहे जो हो मुझ से तो अन उनको एक
चार देरो विना नहीं रहा जायगा । उनको मेरी बात सुनना
और मानना ही पड़ेगी।
"अच्छा में दो तीन दिन म वन्दोवस्त कर दूगा । एक यात
मैं कहे देता है। मेरी मुलाकात की बात आप किसी से मत
कहियेगा । अपने मा वाप या लॅगटू बाबा से भेट हो तो उनसे
भी नहीं कहना।"
पू०-~-काहे ?
"हम लोग घझील ह। हर बात की वजह हम लोगों से
पूछना ठीक नहीं होता। जो कहता है उसके अनुसार श्राप
फाम कीजिये बस "
पूल-मे इसको पूरी पारदी नहीं कर सकती।
"थयों ? यो?"
पू० - क्यों तो पाप हो कह चुके है। हम लोग री
जाति है हर बात को धजह यतला देना में भी मुनासिर
नही समझती।
यहाँ पफोल साहर इस जपार पर झेप गये। उनसे इसको
फाढते नही बना। फिर दोहो चार ओर यात करके श्राप
पिदा हो गये।

03 जासूस . उनके जाने पर फिर पूना रात होने की राह ताकने लगी। उसके भीतर जो ज्वार भाठा हो रहा था यह शन्दों में कह सुनाने योग्य नहीं रहा । ग्यारहवां बयान लँगटू गायव । रात के ग्यारह बज गये । सब नौकर चाकर नीद में खर्राटे लेने लगे। लेकिन देचारी पूना की अखों में नौद कहां । बह- कौच से उठ कर कारे में टहलने लगी। चुप चाप वही पहले का रङ्गीन अलवान श्रोढकर बहुत धीरे धीरे घर से बाहर हुई। जय पुल के पास पहुंची तो मालूम हुआ कि कोई ऊपर से जा रहा है। जहां श्राहट मिली थी वहां उसने कुछ देर तक टक लगाकर देखा । लेकिन कोई नजर नहीं आया। कुछ दूर और आगे वही फिर उसको किसी की नाहट आयी । पूना समझा कि यही लैंगद बाधा होंगे। बहुत बीरे उसने पुकारा- 'वावा यावा! श्रोचावा" लेकिन उसने जवाब नहीं दिया। तब वह और जोर से चावा यावा करके पुकारने लगी । इस पर भी जब उसने कुछ उत्तर नहीं दिया तब उसके मन में डर हुना। लेकिन साहस से फिर वह आगे बढ़ी। जब पूना अपने मुकाम पर पहुँच गयी। उसने चारों ओर ताक पर अच्छी तरह जाँचा । कहीं किसी की आहट नहीं -

४.
।
चक्र भेद
पाकर उसने बतलाये हुए पत्थर को उठाकर देखा । श्रधेरे में
टटोलने पर उसके हाथ में एक कागज लगा। पुशी से उठाकर
उसने जेब में रखा।
जब वह वहा से उठकर दो कदम चलो मामने ही काला
आदमी सा मालूम हुआ। उसने कुछ रूखे होकर कहा-"पयों
यहां क्या हो रहा है।"
इस समय पूना से कुछ जवार नहीं मिला। तब वह और
कडककर बोला-“खबरदार अगर फिर यहा इस तरह घूमती
हुई मिलोगी तो मैं गिरफ्तार करलूंगा।"
पूना ने इस अवसर पर भी अपने तई बहुत सम्हाला ।
कुछ रुककर उसने पूछा-'तुम कौन हो?"
'मैं कौन हूँ उसकी पोज पूछ से तुमको कुछ नहीं मिलेगा।
सीवी घात यो है कि पत्थर के नीच से जो कागज उठाया है
वह मेरे हवाले करो।"
पू०-क्यों वह मेरी चीज है उसमें किसी का क्या दावा है ?
"जी नहीं वह मुझे देना ही होगा। अगर नहीं दोगी तो
यही जमुना में बोर दूगा।
"यस अपनी जवान पर लगाम लगा चुप रह ।" कह
कर पूना बगल से चलती हुई।
पूना तेजी से जा रही थी। वह आदमी भी उसके पीछे
पीछे गया । जर पुलपार होकर वह थागे वढी उस आदमी
ने चिलाकर कहा-'सरदार। अब आगे होगी तो मैं
फैर करूंगी।"

४४
+3 जासूस
श्रच पूना का साहस छूट गया। यह जानके डर से यही
चुप चाप पड़ी हो गयो । भय से उसका शरीरथर्राने लगा।
चह आदमी अब तेजी से उसके पास आने और कहने लगा-
"क्यों अब भागती पयों नही ?"
अव पूना बहे जोर से चिल्ला उद्यो-"अरे दौडा दौडो
गुहार करो! जान मारता है।'
इसी समय किसी ने बडी कडक स कहा-"कौन है रे
बदमाश ! दूर हो सामने से । स्त्री की देह पर हाथ लगाया तो
जान नहीं छोडूंगा।"
पू. ~ कौन लगटू वावा?
वह श्राहमी वावा का नाम सुनते ही खुश होकर बाला
"नाह रे हम ! पक हो तोर से दो शिकार !" साथ ही उसने
सीटी बजायो । उसका जबाव किसी दूसरे ने उसी तरह सीटी
से दे दिया।
"हो बेटा बडे नसीब घाले।" कहकर लगट्ट बावा ने पूना
को कहा-~"जाव बेटी तुम अपना रास्ता लो यहां ठहरने का
कुछ काम नहीं तुम्हारा।"
'इतना जरदी निकल भागेगो।" कह कर वह आदम तेज
दौडतो हुई पूना को ओर ज्योहो झपटा लंगट्टी बावा ने दौड
कर उसको एकही धम्के में गिरा दिया। अब पूना घेखटके
चली लेकिन उसी समय एक दूसरा श्रादमी आया उसको
उस पहरो ने डाटकर कहा-"अरे देखता क्या है। पकड उस
लोंडिया को नहीं सब किया कराया मिट्टी हो जायगा।
अब यह दूसरा पूना के पीछे दौडा । वह बडे जोर से
-

चक भेद है
भागने लगी उसके सिर की साडी नीचे खिसक गयी।सुले केश
हवा में फर फराने लगे। पूना हाफती हुई आगें चली जाती थी
वह बदमाश भी अपनी ताकत भर दौड़ रहा था एक स्त्री सो
भी भले घर की जिसको दौडने का अभ्यास नही एक बदमाश
से कहा पेश श्रा सकती थी। उसने देखा कि पाजी से पीछा
नही छूटता तब बहुत ही डर गयी । पीछे से पहुंच कर ज्येही
उस दुष्ट ने उसका
झोटा पकडा वह मूर्छित होकर गिरी थी
कि उसने झपट कर थाम्ह लिया।
जब उस घदमाश ने पूना को पम्जे में पाया । बडा प्रसन्न
हुश्रा । लेकिन उसकी प्रन्नता देर तक नहीं रही । इसी समय
एक आदमी वहा आ धमका उसको उसने अपना जोडीदार
समझ कर कहा-"अरे यार यडी मिहनत से यह काबू में आयी
है लेकिन बात करते ही कपार पर उसके वन घहराया । उसके
सिर पर वह डण्डा पडा कि बेहोश होकर, अलग गिर गया।
। वह पदमाश पूना के जेय से वह कागज नहीं लेने पाया
था कि चोट से घायल होकर गिर गया। श्रव पूना होश में
अयी और झाड पोछ कर पड़ी हुई । उसके मन में यह देखकर
खुशी हुई कि लगटू बाया से वह बदमाश अट नही सकता।
श्रय यावा उसकी ती पर चढ कर जेन टटोलने लगे।
और कुछ तो नहीं लेकिन एक जोडी उनको हथकडी मिली।
उसने अब होश में आकर कहाँ । "अरे । खवरदार ! मैं पुलीस
का आदमी है। इस सरकारी चीज से पकड जायगा।"
'अच्छी बात है बेटा । मै तो जानता ह कि यह तुम मेरे
चारते लाये हो लेकिन अभी मैं तुम्ही को यह पहनाता ह।"
--
.

,
जासूस
यही कह कर लगढ़ यावा ने उसको हथकडी भर दी और
अपनी रस्सी से उसके पांव कप्त कर बांध दिये । लंगहू वाया
हमेशा वाल के बनो हुई एक मजबूत किन्तु पतजी रस्सी
लपेटे रहते थे।
वह बदमाश अवतो वेवस हो पडा लेकिन जब हाथ
पांव चलाकर थक गया तब बोला- 'हम फेर कहते है।
पुलीस के सरकारी श्रादमी है । तुम अपनी जान आफत में
मत डालो।"
ल०-
मै भी पुलीस का देखकर डर रहा ह । अब तेरे डर
से दिल में घुसने जाता है। लेकिन तोको आराम को जगह कर
देता है । यही मजे की रात काटना ।
यही कहकर लगढ़ ने उसको वहां से घसीटा और पास
चालो झाडी म कर के पूना से बोले-"जाव बेटी । अब कुछ
डर नहीं है।'
पूना अब तक खडी यह लीला देख रही थी बोली -"अाज
तुम नही रहते बाबा तब तो मेरा सर्वनाश हो गया था।"
लं-वह बात जाने दो बेटी ! तुम पहले घर चलो ।
पू-लेकिन यह चिल्लायगा तब तो और एलीस वाले
आकर तुमको गिरफ्तार कर लेंगे बावा ?
हसकर लगटू वाया घोले-
नहीं बेटो यह पुलीस का
आदमी नहीं यह केशव का टुकडखोर गुडा है। उसी ने
तुमको पकड़ने के वास्ते इसको भेजा था। यह बदमाश अंध
चिला नहीं सकता। ऐसा कादरपन अगर केश को मालूम
हो जायगा तो इसकी रोटी मारो जायगी इसी से यह चुप

-- । चक्र भेद चाप यही पड रहेगा। कन सरेरे जो यहा आयेगा वहो इसका वन्धन खोल देगा। चलो येटी अब मकान चलो । देर मत करो। पू०–तो बावा । आपको यह पुलोस में देना चाहता था ? ल-ना बेटी यह सब शैतान हैं । पुलीस के यहां काहे को जायगे। हमको किलो सुनसान जगल में ले जाते । केशर मुझसे बहुत डरता है । यह समझता है कि मैं हो इसका भएडा फोड सकता ह । लेकिन में ऐसा नहीं चाहता। रास्ते पर रहता तर मुझे इससे कुछ काम नहीं था। पू०-लेकिन अब तो वावा बडा टेढा मामला हो गया । तुम्हारी खयर इन लोगों को मिल गयी । अब ये सब तुम्हारे पीछे आदमी जरूर लगायंगे। ल०-उसके लगाने से कुछ नही होगा। मुझे पकड़ लेना चट रोटी पट दाल नही है। लेकिन यह तो बतलायो बेटी कि इन बदमाशों को इसका पता लगा कैसे कि तुम यहाँ कोगन लेने प्रायोगी जिससे उस बदमाश ने आदमो तैनात करा दिया? पूछ-ता यावा ! इन लोगों को पता कुछ नहीं लगा। ये लोग संयोग से यहा आ गये हैं। ल०-नही येटी यह बात नहीं है। इनको पता जरूर लग गया है। और तु हारे ही पीछे ये सर आये थे। नहीं तो यह फागज कैसे मागते ? पूo-मैने तो तुम्हारी यात किसी से कही नही लेकिन-

-
जासूस
लेफिन है न ? जतर यही बात है इसी से लोग
कहते है स्त्री जाति को कोई गुप्त भेद बताकर उस पर भरोसा
फरना मूर्ख का काम है। सवाजित ने कृष्ण के मणि चोरी
करने का सन्देह करके अपनी घर चाली से कहा बस सबेरे
ही नगर भर में वात फूट गयी। इसमें तुम्हारा कुछ अपराध
नहीं है बेटी हमारी ही भूल है। अच्छा बतलाओ तुमने किस
से वह बात कही थी।
पूष-हां बाया । उन्हीं ने अाना वेरिस्टर हमारे पास
भेजा था। उसी को अपना आदमी समझ कर मैंने भीतरी बात
कही थी। उसके सिवाय और के सामने तो मैं कभी कहीं इस
भेद की वात जवान पर नहीं लायी।
ले-बस ! यस समझ गया मैं उस शैतान की करनी ।
अच्छा उसने अपना नाम क्या बतलाया था।
पू०-नाम योगेन सेन बतलाया। इस शहर में तो उसका
बड़ा नाम है।
लॅक-श्रोहो । अच्छा उसका चेहरा कैसा था ?
जब पूना ने वेरिस्टर का देहरा मोहरा बतलाया तव
लॅग याचा दांत पीस पर बोले-'ओफ! ये सब है बड़े
शैतान योगेन साहय तो बिलकुल नाटे कद का है। सिर के
याल दुश्रर होने से सब सफाचट है।
पूर-अरे बापरे! तो हम को ठग गया है। तब तो घडी
श्राफत है वाया ! श्रव किसका विश्वास किया जाय ?
'मैंने तो तुम से यह दिया था बेटी कि बड़ी खबरदारी
से रहना। लेकिन तुम उस शैतान के फरेव में पट गयी।
-
को

।
चक भेद
अच्छा अव तुम घर पहुंच गयी। देखो एक बात याद रखो
अब तुम को मुझ से भेट करने के लिये कही जाना नही
होगा।मैं खुद आकर तुम से भेट कर जाऊँगा। लेकिन जय
जैसा मौका होगा तव उसी भेष में श्राऊँगा मेरे रूप रङ्ग का
कुछ ठिकाना नही रहेगा।" यही कहकर लॅगढ़ बाबा विदा
होने लगे। पूना ने रोक्कर कहा-'कल्ह वह फिर आवेगा
वावा! उससे मैं डॉटकर पूलूंगी कि किसको यह सब
कह दिया था"
"अरे ना! ना ! उससे कोई बात नही कहना। यही तो
तुम्हारी समझ की कमी है बेटी । तुम बिलकुल इस घटना को
पो जाना। उससे ऐसी कोई बात नहीं कहना । ऐसा भाव
दिखाना जिससे मालूम हो कि तुम इस ठग पने को कुछ भी
नहीं समझती।"
पू०-अच्छा ! श्रच्छा ! अब मैं समझ गयी। अब मुझे
कोई नही उग सकेगा। एकवार ठगी गयी तो क्या अब
ऐसा नही होगा।
लग-हां येटी यही मैं चाहता हूँ कि खयरदार रहो किसी
का विश्वास मत करो। इस अवसर पर मुझे तुम्हारा ही
एक सहारा है। अच्चा अब इस चिट्ठी को तुम प्रताप के पास
पहुंचा दो लेकिन राय सबरदार उस शैतान केशर के किसी
श्रादमी के हाथ न पड जाय ।
पूनही श्रर तो यह चिट्ठी मेरी जान के पीछे है। मर
जाने पर भी इसको नही छोडूंगी।
रॉ०-हां बेटी। अगर मरना पड़े तो भी इसको नाश
करके तो मरो।
४

५०
403 जासूस
इसी समय किसी ने सीटी बजायी। पूना ने झट घर में
जाकर किवाड भीतर से बन्द कर लिये। और लगढ़ याया
यहां से तुरत गायव हुए ।
।
Y
कारहका क्या
वकील की नकल ।
दूसरे दिन ठीक समय पर वकील साहब श्रा पहुंचे।
लौड़ी से खवर पाकर पूना बैठक में गयी। वहां उन्होंने पहले
दिन की तरह उठकर श्रादर किया। पूना ने भी बहुत सम्हल
कर उन्हें बिठाया। आप भी वैठी। अपने भीतर का भाव बड़ी
तकलीफ से सहती और सम्हालती रही लेकिन उसके चेहरे
पर कोर और घृणा का जो भाव था उसको वकील धूरते हुए
पड़ी नरमी से बोले--"कल रात के जहां जाना या वहीं
होथायी न"
पू०-जी हां।
तो जिस लगटू वाया की बात पर हमारे प्यारे मवकल
प्रताप की जान अटक रही है उससे भेट हुई थी ?"
पूर-हां लेकिन न जाने कैसे दुश्मनों ने लचर पाली।
उनके श्रादमी भी वहा पहुच गये थे।
इतना फहफर पूना ने उस वकील , पर जांच की नजर
डाली लेकिन उसके चेहरे में किसी तरह का हेर फेर न देखकर
आप भी शान्त हो गयी। उसने पूछा-"अरे ! तब श्राप
यची कैसे"

चक्र भेद
पू०-एक बदमाश मुझपर वार - करने चला था लेकिन
उसी अवसर पर लॅगट्ट धावा ने पहुंच कर मेरी जान बचायी।
"अच्छा! तब तो ठीक हुआ। लॅगट्ट से भेंट हो गयी थी।
'पू०-हां!
"उन्होंने कोई चिट्ठी दी है ?"
पू०-नही वह मुझे यही पहुचा गये और कागज पत्र
न देकर जो कुछ करना है सर जबानी सममा गये ।
"लेकिन वह बात भी तो हमको मालूम हो जाना चाहिये !"
पू०–तो मैं खुद उनसे मिलकर जो कहना है। कह दूगी।
वह जो उचित समझेगे करेंगे। ऐसी हालत में उनके वकील
से कहने में कुछ लाभ नही रहा ।
अब तो नकली वकील साहब झेप गये। कपार खुजली
फर बोले-'तो आप कर प्रताप से मिलेंगी।"
पू०--अभी इसका भी कुछ ठीक नहीं है।
अय बफील देवता अपना सा मुँह लिये हुए पूना के यहा
से प्रस्थान कर गये।
.
--
तेरहमा क्यान
बुढ़िया का रूप।
मेल को फष्ट फोठरी में पड़े प्रताप पडी चिन्ता में समय
बिता रहे है। यह चाहते तो रुपया खर्च फरके उस जगह भी
सुख से रह सकते थे। एकाध श्रादमियों ने ऐसे अवाजा

પૂર
• जासूस
तवाजी भी की और ऐसी बातें उनको साफ कह भी दी गयी
कि जेल में चे लोग रुपये चालो की इन्तिजारी में पसेरी
पटकते रहते है और जय कोई रुपये वाला उस हाते में आता
है तब उनकी आशा के पौधे लहलहा उठते है लेकिन उनके
श्राने पर उनकी सव कोशिशों पर पानी फिर रहा है। तो भी
प्रताप ने इन बातों पर कुछ कान नहीं दिया ।
जिस दिन उन्होंने केशिनी का खून होना सुना और पुलिस
ने खूनी कहकर गिरफ्तार किया उसी दिन से उनके भीतर
बडी बड़ी चिन्ता की लहरें उठ रही है। कभी बिलकुल
जिन्दगी से उदासीन हो जाते है कभी संसार से उनको विराग
हो जाता है। श्राप ही आप कहने लगते हैं-"यात तो बडी
टेढी जान पड़ती है। क्या जाने यह केशव मेरा मामा ही हो
मेरी मा का नाम केशा था। लडकी का नाम केशिनी है। अगर
यह केशव ही हमारा मामा हो तो कुछ आश्चर्य नहीं लेकिन
है यह आदमी बडा फन्दीला शैतान इसमें भी कुछ सन्देह नही
है। नहीं तो इस को कैसे मालूम हुआ कि सब जायदाद कब
केसे किसके नाम लिखी गयी है। इसको मेरे घर का सब पता
है और यह मुझे मार डालने की कोशिश भी कर रहा है।
अगर मैं मरा तो सब दौलत इसी के हाथ जायगी। लेकिन
चूरहे पडे जो जिसके सीन का होगा वह उसको जरूर पावेगा
लेकिन यह केशिनी मरी कब और कैसे मरी । भोगे कपडे से
किनारे उठकर मैने खुद उसको घर जाते देखा है। अगर फिर
लौटकर दृव मरी हो तर तो यात दूसरी है। क्या सचमुच
किसी ने उसको मार डाला है ? मुझे तो जान पड़ता है वह
मरी नहीं है। लेकिन फिर वह गयो कहां?
।

T । " चक्र भेद - इसी समय किवाड सुला । प्रताप ने पूछा-"कौन ?" 'आप से एक बुढिया भेट फरने आयी है।" प्र०-पहले नाम बतलाओ।। इतना सुनते ही सिपाही लौट गया। उधर जेलर के श्राफिस में एक युढिया वैठी थी। उससे जाकर पहरे वाले ने कहा- आप का नाम जाने बिना वह भेट करना नही चाहते।" अय वह बुढिया क्या जवाव दे यही सोच रही थी कि उसी कमरे के दरवाजे पर किसी ने हाथ मारा,। जब सिपाही ने दरवाजा खोला । बुढिया को यह चिन्ता हुई कि वह कौन आदमी थाया। जब वह भीतर आया तय देखा कि केशव है तब बुढ़िया फो यडी चिन्ता हुई । 'केशव ने धीरे से कहा-"जवान स्त्री जब दुनिया बनती है तब उसके चेहरे पर यहार नहीं रहती।" उसे सुनकर जेलर ने कहा--"क्यों आप इनको पह- चानते हैं" के-मे बुढ़िया को नहीं पहचानता लेकिन जो वती धुढिया के पायी है उसको पहचानता हूँ। जे0---आप खामखाह मेरे काम में सलल देने आये है देखता है। के०-पयों साहय ! ऐसा क्यों कहते हैं ? जे०-और नही चया । आपने मुझे अन्धा ममझ रखा है या इतना ना समझा बनाया कि मैं नकली रूप नहीं पहचान सकता । या आप मुझे सिखलाने आये, हैं ? के-अच्छा साहब ! गुस्तागी माफ कीजिरे लेकिन + 1 4

१४
0033 जासूस
गैर
इतना तो आप समझते ही होंगे कि रूप बदल कर कुछ
कानूनी मतलब से श्रायी है।
जे०-यह सब फजूल याते श्राप छोडिये मुझे अपना
काम मालूम है कह तो दिया कि आप मुझे सिखलाइये नहीं।
अब यह बुढिया उठकर बोली-"आप उनको इत्तिला
कराइये कि पूना भेट करने आई है। मेरा नाम पूना वाई है।"
सिपाही ने कहा-यह आपने अच्छा किया जो अपने तई
छिपाया नही । ठहरिये। तलाशी लिये विना आप को जेलर
साहब भीतर नहीं जाने दंगे।"
'हमारे पास चिट्ठी तो है।"
सिo-हॉ चिट्ठी तो दीक है। लेकिन चिट्ठी में यह नहीं
लिखा है कि वे कायदे, विना तलाशी लिये जाने दो।
इसी समय केशव बोल उठा-"देखिये साहब यह वेष
बदल कर भीतर जाती हैं। अगर आसामी भाग, जायगा तो
आप पर जवाब देही श्रावेगी। मैं आप को जयरदार कर
देता हूँ।"
जेलर थोडी दूर पर बैठे अपना काम कर रहे थे। भाव से
उन्होंने ऐसा दिखलाया मानो वह सुनते ही नही । सिपाही
घड़ा समझदार था। जेल में रहते रहते सव यातों में पका
हो गया था। उसने धुढिया उर्फ पूना से कहा-'ययों आप
इनकी बात पर कुछ कहना चाहती है ? मैं जेलर साहब
से क्या कह ।"
पू०-मैं यही कहती हैं कि इस आदमी ने जाल फरेय की
बात की है।
-
-

चक्र भेद- ५५ ~ के-तो आप अपनी सूरत पर फरेव देकर पयों इस तरह से वायी हो पूर-तुम्ही से बचने के लिये मैने यह रूप बदला और किसी खराब नीयत से नहीं। के-आप प्रताप से भेट करने जाओगी तो मेरा इसमें क्या बिगडवा है जो मुझसे छिपाती हो आप ? जिसको ठग कर आपने प्रताप का प्रेम पाया है उसको तो खुन कराकर आप बेखटके हो गयी न?" पू०-आपकी ताने भरी यातों का जवाब में नहीं देना चाहती आपको अच्छी तरह मालूम है कि मुझे आप से कितना और पयों भय है के-ताने की बात नहीं । आप पर मुकदमा चला ही चाहता है। आप ही की खूब सूरती में फसकर प्रताप ने यह रचून किया है। इसका सुबूत में पाचुका है। तमक फर पूना बोली-"खवरदार ! जवान सम्हाल कर यात कीजिये। कोई मर्द होता तो इसी दम श्रापको हाथो हाथ बदला दे देता।" के-तो तुम स्त्री होकर हमारी बदनामी करोगी यही न । कर डालना जो तुम चाहो। इतनी देर तक रोलर सव सुनते रहे अब उनसे सहा नहीं गया। योल उठे-"क्यों जनाव आपने तो कानून हाथ में ले लिया है और पेसी बातें कर रहे है कि यहा मैं कोई होता हो नहीं। जेल के मालिक आप ही हो गये है। यह आप की हर फत किसी भले श्रादमी को पसन्द नही हो सकती। पूना

५६
-
23 जासूस
वाई अपने रूप बदलने की वजह काफो बतला देतो अमी में
उनको प्रताप से भेट करने के लिये ले जाऊँगा।"
पू० मे इस श्रादमी के सामने कुछ कहना नहीं चाहती।
जे०-अच्छी बात है। आप मेरे साथ आवे ।
इतना सुनते ही पूना उठी लेकिन केशव ने, कडक कर
कहा - "देखिये साहय ! इस स्त्री के पास प्रताप को भागने के
लिये एक नकशा है अगर आप उसको नहीं लेंगे तो वह जलर
भाग जायगा और आपको सब फजीहत सहना होगी।।
केशव की बात पर जेलर को बड़ा क्रोध आया। लेकिन
पूना का चेहरा देखते ही वह सहम गये। नकशे की बात से
पूना के भीतर जो चञ्चलता हुई उसका आभास चेहरे पर
पाकर जेलर के मन में बडा सदेह हुआ। पूछने लगे- "क्यों
जी पूनावाई ! यह क्या सच कहते है ?
मैं
इस विषय को कुछ बात नहीं कह सकती।
के०-देखिये साहय ! इनकार कर गयी न? श्राप अगर
तलाशी नहीं लेंगे तो इसका फल आप ही भोगेंगे।।
r
कौदहका बयान
जासूसिनी।
जेलर ने पूना से कहा-"देखो बेटी ! मुझे इस मामले में
सन्देह हे। और तुम्हारे वेष बदलने से मुझे और सन्देह
मजबूत हो गया है। इससे मैं तलाशी लेकर हो जाने दूंगा।"

चक्र भेद
अव पूना
घडे
सङ्कट में पडी। उसके पास कागज जरूर
था। उसके पाते हो जेलर सय भेद जान जायगा ओर पूना
पकड जायगी। यहाँ पूना पर बडी विपत्ति पडी। नया करे
कैसे तलाशी देवे इसको चिन्ता के मारे वह हवास में नहा रही।
वह येचारी सीधी सादी छोकड़ी अब यडे भारी भुईफोड से
फाम पड़ गया है। कुछ देर तक यहां सन्नाटा छा गया। सोच
विचार कर पूना ने कहा-"जाने दीजिये मैं आज उनसे भेट
ही नहीं करूंगी। इस तरह वेइज्जती सह कर मैं भेट करना
नहीं चाहती।"
फिर केशव चोल उठा-"तो जाइये लेकिन वह कागज देते
जाइये । जेलर साहब ऐसा जरूरी कागज कभी नहीं छोड़ेंगे।
नहीं तो उनकी नौकरी पर खलल पावेगा। बेहतर यहो होगा
कि श्राप कागज दे दीजिये न तलाशी ली जायगी न बेइज्जती
ही होगी।
पूना ने केशव की बात का कुछ जवाब न देकर जेलर से
कहा-"पयों साहय ! अगर मै आज भेट नही करके योहो
चली जाऊँ तो आपको कुछ इनकार है "
जे हा यह तो यनी बात है। अब में देखता है मामला
घटा सद्गीन हो गया है। एक तरह से प्राप कबूल कर चुकी
हो कि आपके पास ऐसा कोई कागज,जरूर है। ऐसी हालत
में में उसको देखे विना कैसे छोड सकता हूँ। अब मैं समझ
रहा हूँ कि असामी को छुडाने के लिये कोई चक चल रहा है।
और उस चक को तोडना हमारा कर्तव्य है।
पू --तो राजी न होने पर भी आप जररदस्ती तलाशी
ले सकते हैं?
1

03 जासूस
'हां खास खास मौके पर ले सकता है। और उन मौको
की यहां कमी नहीं नजर आती।"
अब भी पूना झूठ नहीं बोल सकी । आप ही आप मनं
में कहने लगी-दे अव भगवान् क्या करता है ?"
इसी समय केशव बोल उठा-'अब तो फन्दे में आ गयी।
बाई साह्न ! फाराज दे दोजिये क्यों नाहक फसाद बढाती हो।"
जे०- हा बेटी । यह सज्जन ठीक कह रहे हैं कागज दे दो
सब बखेडा पाक हो जाय ।
'यह मैं नहीं जानती कि आप लोगों को मुझ पर ऐसा
जुल्म करने का अधिकार है या नहीं 1 मैं काग़ज अपने पास
होने न होने की यात न मानती ही हूँ न इनकार ही करती है।
अय आप लोगों को जो अच्छा जान पडे सो कीजिये लेकिन
इतना
में
जरूर कहूंगी। कि आप लोगों को देने के वास्ते मेरे
पास कोई कागज नहीं है।" यही कह कर पूना वहीं एक
चौकी पर थप्प से दैठ गयी। लेकिन भीतर कलेजा धुकपुक
करने लगा। जेलर ने पूछा--"तो श्राप कागज नही दोगी?"
.
"अच्छा धनकुमार तुम केशवसिह के साथ बाहर जाय ।
मैं रुचित्रिसद्ध तलाशी को काम कर डालू । क्या करना
ऐसे मौके आजाते है कि ड्यूटी करने के लिये सब करना
पडता है।"
के-तो मुझे बाहर जाने की क्या जरूरत है, मैं यहां रह
तो पया हरज है।
जे-मैं
कहता आप बाहर जाइये। जरूर आपको मेरा
कहना मानना पडेगा।
,

चक्र भेद- ५४ इसपर भी केशव ने चाहा कि जाना नहीं पड़े लेकिन जब उसने जेलर का रुख देखा धन कुमार के साथ बाहर गया अव जेलर ने किवाड बन्द कर के कहा-"अच्छा अब कहो घेटी! में अब तलाशी लेने को तैयार है। अब तुम्हारे ही हाथ में यह बात है कि हमारी भीमर्यादा देखो अपनी भी इजत बचाओ।" इसका पूना ने कुछ जवाब नहीं दिया। तब फिर जेलर ने कहा- "देखो बेटी । मै तुमको नरमी से समझाता हूं ऐसा काम करो कि तुमको इस नापाक काम से रिहाई मिले।" पूना उसी तरह चुप रही। श्रर जेलर ने एक स्त्री धुलाई और उसको तलाशी करने का हुक्म दिया। उस स्त्री ने पूना के सय जेय और कपडे देख कर कहा- नहीं है।" अब जेलर ने श्राफर कहा--"देखो येटी ! यह मालूम है कि तुम्हारे पास वह कागन है लेकिन मिलता नहीं और उसको पाये विना हम कमरे से बाहर जाने नही देते मुनासिब है कि वह कागज तुम गुददे दो। पू०-मैने तो फार दिया आपको देने के लिये मेरे पास कोई कागज पत्र नहीं है। जेल-बेहतर है ये काम में जासूसिनी मूला से ही कराऊ । उसी दम जेलर ने उनको धनकुमार से धुलावाया । यहां एक मोटी थरा थलही शश्चियन लेडी श्रा पहुची। फिर जेलर ने कहा-'श्रर भी कहता हूँ बेटी। उनकी तलाशी पर यह कागज नहीं छिप सकता।" जर पूना ने अपनी बात नही पदली सप जेलर अपनी जेलरन को फागजात की बात समझा कर पाएर रोगये। घर - . जासूस उस कमरे में यही पूना और मोटी बीवी रह गयी । उनको देखते हो पूना के प्राण सूप गये । उसने समझा कि यह,बड़ीं चेदर्द स्त्री है। ऐसी सूखी इस तरह का निर्दय चेहरा उसने कभी जिन्दगी म नही देखा था तो भी विनती करके बोली- "मैं आपसे यह निवेदन करती है कि अगर आप मुझपर जुलुम नही करें तो यह लेडी रास्कोप वाच चेन सहित नापको नजर करूगी। "नही नही ! मैं जुल्म क्यो करूगी।” यही कहती हुई उसने घड़ी चेन सहित लेकर अपने जेब में रख ली। लेफिन उसका भाव देखफर पूना को तसल्ली नहीं हुई उसने मन में कहा-'इसने प्रसाद तो चढ़वा लिया लेकिन अभी काम नहीं किया करने का ढह भी नहीं दिखाई देता।" जब उस मोटी बीवी ने पूना से जोडा खोलने को कहा तब उसकी रू काप गई। लेकिन धीरज धरकर जोडा दे दिया। श्रच्छी तरह देख भालकर लौटा दिया तब उसके जी में जीशाया। मोटी बीवी ने अव किवाड खोल कर जेलर को पुकारा लेकिन फिर रक गयी। उसने पूना से उसकी चोली भागी दोहरे कपडे की चोली उतार कर पूना ने उसके हाथ मदी बीवी ने उसे फाड कर देखा और वही फेंक कर अब साहब को एकारा । किवाडा खुलने पर साहब, केशव और धनकुमार तीनों भीतर आये घूढा सिपाही भी अन्दर श्राया। जेलर ने आते ही पूछा--"क्यो कागज मिला।" धीची ने कहा-"नही कागज इस वेगरी के पास कोई नही है। यह मैं हलफ लेकर कह सकता है।" फैशव ने पूछा--"यह कोन है?" - +4

चक्र भेद
" जेलर ने कहा- "सरकारी जासूसिनी है । इनका मुझे पूरा
विश्वास है। अब मुझे तसल्ली हो गयी कि इनके पास कोई
ऐसा कागज नहीं है।
पन्दरहको क्यानक
जेल मे भेट ।
अब जेलर ने पूना से कहा-"प्रय मै तुम को असामी से
भेट करा दे सकता है बेटी।" फिर सिपाही से कहा--"कह
दो कैदी से कि पूना पाई तुम से मिलने आती है।"
थोडी देर पर, जेलर के साथ पूना अपने प्यारे प्रताप से
भेट करने चली । खुशी में अपना जोडा और चोली छोड जाती
थी। मोटो वीवी ने पुकार कर कहा-“ययों बेटी प्यारे से मिलने
की खुशी में तुम ने अपना जोडा भी विसार दिया ?"
सम्हल कर पूना लौटी और जोडा चोली पहन कर प्यारे
से मिलने चली। भीतर एक कोठरी दिखा कर जेलर ने कहा-
'जाव बेटी ! इसी में असामी प्रताप है। भेट कर आओ। आधा
घटा मुलाकात करने को दिया जाता है।"
जय पूना भीतर गयी । झट किवाड बाहर
जेलर लौट गये। चलने से पहले केशव ने रोककर हिदायत
की थी कि ऐसा काम मत कीजिये। लेकिन जेलर ने उसको
डॉट दिया था अव उसी विषय पर जेलर श्राप ही आप कहने
लगे-"है बेचारी सीधी सादी लडकी और उसी से छिपने के
7
से बम्द करके
-

* जासूस लिये इसने चेप बदला है और कोई खराव नीयत इसकी नहीं में क्यों ? भीतर जाते ही इधर पूना के आँसू बहने लगे। देह थर थर फॉपने लगी। प्यारे की हालत देख कर वडा दुःख हुआ लेकिन प्रताप से मिलने के लिये हाथ बढ़ाया । पताप ने रोका । कहा "प्यारी पहले मेरी बात का जवाय दो" अब पूना इवास में धाकर सहम गई। उसने चोली के भीतर से एक चिट्ठी निकाल कर पताप के हाथ में दी। प्रताप ने इसे रखते हुए पूछा-"तुम मुझे गुनहगार समझती हो या बेगुनाह ?" पूना जो प्रताप के रोकने पर सूप गयी थी। हवास भायी। उसने पहले समझा था कि यह क्या हुना। किसी तरह चिकट सङ्कट काट कर यहाँ आयो तो प्यारे का रुख दुसरा हुभा' लेकिन सवाल सुनकर वह बोली-"यह क्या को गुनहगार समझंगी? ऐसा तो कभी मेरे मन में कोई भाव भी नही पाया ?" प्र०-लेफिन मेरे ऊपर बडी गवाहियाँ हैं। बड़े बडे सुबूत है। तय भी तुम मुझे बेकसूर ममझती हो? पू० - में सब समझती हूँ। यह सब झूठ का चक्र में अच्छी तरह जान गयी हूँ। Fo-नही प्यारी सब भूठ नहीं है। असल बात यह है कि मैं एक बात से डरता । अगर तुमसे कोई असल बात पूछ ले तो भो मैं चक्र में पिस जाऊगा। पूर--पही यात न जो तुम केशिनी से कहकर आये रहे ? प्र०-हो तुमको याद है मैं तुम 7 ? 4. -

चक्र भेद
पू०-याद क्यों नही है। तुमने तो यही कहा था कि प्राज
इसका निवटेरा करके ही तो लौटोगे इतनेस्त करने को कहे
थेन?
प्र० - हां यही बात है लेकिन उस रात के उसका खून हो
गया। तब भी तुमको विश्वास है कि मैने ग्वून नहीं किया ।
पू.हा मै ग्यूब जानती है तुमने खून नहीं किया।
प्र०- उस रात के उसी पुल पर जरूर मुझसे उसको भेट
हुई थी और मैने ही उसको धक्का देकर जमुना में गिरा दिया ।
पू०-अरे यह तुम क्या पक रहे हो ?
म०-चक नहीं रहा हु सशी बात कहता हू । हम दोनों
हाथा पाही करते हुए पानी में गिर पडे थे। जिसने हमारे ऊपर
गवाही दी थी उस थादमी ने हम लोगों को लडकर गिरते
हुए देखा था। अब भी तुम मुझे वेगुनाह हो लमझती हो?
इतना सुनते ही पूना ने प्रतार का गला पकड लिया।
कहने लगी- हे भगवान क्या बात है। हमारा प्यारा क्या चक
रहा है। यह क्या हो गया ?"
Ho- तुम मुझे पागल मत समझो प्यारी मैं अभी पागलं
नही हुआ लेकिन तुम्हारी सी देवी मेरे लिये दु ख सह रही
है। इसी से मै पागल हो जाऊगा।
पू०-अगर पागल नही हो तब तुम पर्चा इस तरह वक
रहे हो। क्या तुम मेरी जान कर रहे हो ?
नही । नही ! मैं जाच नहीं करता प्यारी असल
बात कह रहा है। तो भो तुम मुझे बेकसूर समझतो हो ? •
पू०-हॉ! हाँ! कसूर समझती है।
।

.
है
--
६४
जासूस
प्र०-मैने जो कहा उसको तुमने अच्छी तरह समझ लिया?
पू०-हॉच्छी तरह समझ लिया।
अव प्रताप का मलीन मुख प्रसन्न हो छाया। बोले-घस
प्यारी में और कुछ नहीं कहना चाहता। मुझे खुद नहीं
मालूम है कि यह खून का मामला कैसा है। किसने खून किया
और किसका खून किया यह सब मुझे कुछ भी मालूम
नही है।"
पूल-अच्छा वह सब मैं समझ हुकी है। अब काम की
बात करो समय बीत रहा
प्र.- बस मुझे अब और काम की बात नहीं है। तुम
दुनिया में एक हो जो मुझे बेकसूर समभती हो बस इतने ही
से मुझे सन्तोप है।
लेकिन हमारे विश्वास करने से क्या होगा। दुनियां के
सामने तुमको येगुनाह बनना होगा।
प्र०--वह तो मेरे मरे बिना इस लोक में नहीं हो सकता।
तुम भी इसके लिये तैयार हो जाय। अब मुझे इस फन्दे से
रिहाई नही मिल सकती।
पू०-जरूर मिल सकती है। केशिनी जीती है। फिर
उसके खून के वास्ते तुमको फॉसी कैसे होगी ?
नहीं अय में चक्र में पड़ गया है। विना पिसे मेरा
निस्तार नही है।
पू०-नही तुम यवराव मत भगवान् सब ठीक करेगा
लगह याया सब काम पूरा कर देगा।
4

P । -- चक्र भेद ६५ प्र०-गह तो जेल से भाग गया है। वेचारे ने सच्ची बात कही थी। पूछ-तो तुम इसकी चिन्ता मत करो यह पेशी के दिन आकर सभी बात कहेगा। १०-यात पया कहेगा। चक जो तैयार है उसको तोडना अनहोनी बात है। पू०-चक्र तो टूटा ही हुआ है। वह इसी कोशिश में है कि केशिनी को जीते जी इजलास पर लाकर पेश कर दे। म०-- मुझे तो इस बात पर विश्वास नहीं होता। पू०-तो तुम लगटू बाया पर विश्वास नही करते ? Ho-वह भाग गया है इसी से मुझे उस पर अब भरोसा पू-यह तुम्हारे ही भले के लिये भागा है। कचहरी में जरूर हाजिर होगा। इसी समय जेलर ने बाहर से पुकारा। कहा-"प्रव समय हो गया। बाहर श्राओ बेटी।" "बहुत अच्छा" कहकर प्रताप से पूना विदा हुई और जेल से बाहर होकर अपने घर को चलती बनी। नहीं रहा। । . ܝ | सोलहका क्यान मुठभेड़ । पूमा को जेल से निकल कर घर आते आते सन्ध्या हो चली अभी रास्ते में थी कि पीछे से फिसी ने कन्धे पर हाथ - १६ क - । 4 रखा। लौट कर देखती है तो एक चुढिया अच्छी पोशाक में खड़ी है। वह बोली-'श्राओ बेटी पूना हमारे साथ ।" पू०~श्राप कौन हैं." "चाहे कोई हो तुम्हारा भला चाहने वाले हैं।" पू०-विना नाम पता बतलाये मै नही आऊँगी। अच्छा इस कच्ची उन में तुमने इतनो बहादुरी का काम कर डाला फिर भी इस मामूली काम के लिए कदरातो हो । श्राओ आओ ! लॅगटू वाया ने तुमको कुछ सन्देशा भेजा है। पू०-मैं समझ गयो। तुम दुश्मनों के आदमी हो । चलो जाव हटो यहा से। इसी समय एक और जवान वहां पहुंचा। उसने उस बुढ़िया से इशारे ले कुछ बातें की लेकिन पूना की आखों से वह इशारेवानी बचो नहो । उसने समझ लिया कि दोनों दुश्मन के श्रादमी हैं। लेकिन बुदिया की आवाज कभी कभी ऐसी निकल पाती थी कि पहचानो हुई जान पड़ती थी। यह धुढिया बोली-'अरे लॅगटू बाबा ने कुछ कहा शा तुम से " कहकर पूना के कान में कुछ मत्र की तरह फकने लगों। पूना ने चोक कर कहा-"देखें तुम्हारा मुंह ?" "लेकिन और फोई मेरा मुँह देख लेगा तो श्राफत में पड़ेगा।" पूपयों तुम्हारे पीछे क्या कोई आदमी लगा है ?" 'नहीं मेरे पीछे नही आदमो तुम्हारे पीछे लगा है।" पूरा यो हो । तर तो लग पाया ही हो। चलो कहा चलाना होगा? --

कृचक भेद
३७
--
भर दोनों बातें करते हुए आगे बढ़े। लगटू बार बार
पीछे ताक रहा है देखकर पूना ने पूछा-काहे बावा ! मेरे
पीछे कौन लगा है "
लग-केशव का गुण्डा है जो योगेन व कर तुम्हारे
पास गया था।
पू०-कैसे जानते हो कि वह मेरे पीछे लगा है।
ल०-मैंने उसको देखा है। आज उसी जून से मैं तुम्हारे
पीछे छाया की तरह घूम रहा हूँ। उसके साथ सुद केशव
मी श्राया था। मैं अगर वुढिया के वेश में नहीं होता तो छिप
कहा सकता था?
पू-अरे में भी बुढिया बनकर आयी और तुमने भी
बुढिया का रूप भरा है लेकिन तुम्हारा रूप तो कोई पहचान
ही महीं सकता यावा!
ल-हां मुझे घरापर ऐसा रूप भरना पड़ता है। अब
बतलाओ प्रताप से पया पया याते हुई ?
पू०-पहले मैं अपनी विपत कह लूँ तर भीतर की यात
कहूंगी। फाटक पर बडी बडी आफत आयी थी ।
लक-यह सय मुझे मालूम है तुमको कहना नही पडेगा।
पू०-ऐ । मालूम कैसे हुआ वह सब ?
ल-पही आदमी हमको सब पोल गया जो श्रमी भेट
.
।
करने आया था।
पू०-यह है कोन ?
लक-यह इसी जेल में रहता है।

1
• जासूस
पू०-वह आदमी उस घडी यहां पर था ?
ल-हां वहीं था।
पू०-
लेकिन मैंने नहीं देपा ।
ल-वही जासूसिनी मूला जिसने ने मेम बनकर
तुम्हारी तलाशी ली थी।
पू०-अरे वही इस वक्त जवान मर्द के घेप में है ?
लक-मैं ने तो तुमको खवरदार दिया था न कि ऐसे बहुत
मामले अभी होंगे तुमको तैयार रहना चाहिये इन सब के वास्ते
पू०- अरे यह सब क्या हो रहा है लॅगट्ट बाया मुझे तो यह
सब सपने की तरह मालूम होता है।
लैंग-सब देखते देखते सह जायगा । घबराना नहीं।
Jo-तो उसको मालूम था कि कागज कहाँ था ?
ले० हाँ सब मालूम था । तुम घर जाकर मिजाज ठिकाने
करके समझोगी तो जान जाओगी।
अब पूना ने वह सव चाते कही जो प्रताप ने कोठरी में
उससे हुई थी।
ले०-तो प्रताप ने चिट्ठी पढ़ी नही १
पू०-ना.।
ले-अच्छा चलो तुमको घर पहुचा श्रावे ।
पूर-पयो अब क्या डर है कुछ अभी १
ले- केशव के दूत छूटे हुए है डर तो कदम कदम पर है।
इसी समय पीछे से किसी की आहट मिली। लॅगढ़ ने
फिर कर देखा कहा-चलो यह सब आ गये।"
,
र

श्रीचक्र भेद
१६
पू०-कौन है सय
लँ-वही केशव अपने दूतों के साथ फसाद करने की
नीयत मे आया है। डरना मत तुम । इन शैतानों की बदमाशी
तो मैं चुटकी बजाकर हया कर दूगा।
अर केशर अपने साथियों सहित श्रा पहुचा । उसने आते
ही कहा-पूना पाई । मुझे आप से कुछ कहना है "
इतना सुनते ही पूना खड़ी हो गयी।
सत्तरहका बयान
20
चांद शहमात ।
केशर ने पहले यही पूछा- "यह श्राप के साथ कौन है
पू०-यह कोई हो आप से कुछ मतलब नहीं है।
फे०-हॉ कोई पेसा जरूरी मतलब तो नहीं हे योही
पूछता था।
पू०-तो अभी आप की लालसा नही पूजी हे यया ? आज
तो आप ने खूब मुझे हैरान कर लिया। अव जाइये अपना काम
देखिये में अपने काम को जाऊँ।
फे०-अभी क्या हुआ है पूना । अभी देखना आगे भागे
होता है क्या ? में अच्छी तरह समझ गया है कि श्राप हो मेरो
लडको के खून में सिद्ध साधक हो।
अच्छा प्रताप का मुकदमा हो जाने दीजिये फिर आप की
ढिठाई को भगवान श्रापको फल जरूर दे देगा।"
।

७०
।
*
008 जासूस
के०-नही उतनी देर नहीं है। मैं सुबूत जुटा कर खुद
आपके नाम नालिश दायर कर चुका है।
पूo-मेरे नाम ? किस कसूर में ?
के०---यही कि श्राप ही इस खून में प्रधान है । यह पुलीस
के आदमो आपको गिरसार करने आये है। लीजिये साहब
यही पूना बाई है । में सनाख करता है।
बस इसके बाद ही वह पुलीस का श्रादयी आगे बढा और
"पूना बाई मै श्रापको गिरफ्तार करता ह" कहकर ज्यों ही हाथ
बढ़ाया कि सामने ही बुढिया पाकर बोली ' तुम कौन है गिर
सार करने वाला?"
मै पुलीस का प्रासिक्यूटिग अफसर ह। मेरे पास इनकी
गिरफारी का चारट है।"
बुढिया-कहाँ है वारट देसू ।
"तुम कौन हो वारर देखने वाले ?"
"मैं इसकी फूला ह । घर पहुचाने जाती ह ।"
पु० क०- तो तुम किस हिम्मत से हमारे भागे होकर
सरकारी काम में खलल डाल रही हो?"
"मैं खलल नहीं डालती लेफिन चाहती है कि सामने ही
कानूनी काम न होने दू। वेकायदा श्राप गिरफ्तार नहीं
कर सकते।"
पु०~में तुमसे फजूल बातें करके अपना
नहीं पोऊगा।
"तो तुम अपने रास्ते से चुप चाप चले क्यों नहीं जाते।"
पु०~घारंट हो या न हो मैं जरुर गिरफ्तार करूंगा। हाथ

Name
.
चिक भेद
में भुजाली तानकर लगटू ने कहा-'अच्छा करो गिरफार "
"अरे यह तो स्त्री नहीं मर्द है यार"
"मर्द तो मर्द अभी शैतान पहलवान से सामना करना
न पडेगा । सय चौकडी भूल जायगी । चालाकी करके आये हो
किसी की लडकी चुराने ?”
केo-मर्द हो चाहे औरत हो । सरकारी काम म खलल
डालने का मजा मालूम हो जायगा।
हा और ढोढ भगत किसी लडकी को उडा लेजाने के
लिये आकर मौज करेंगे क्यों ?
अब तो केशव अपना नाम सुनकर आस्मान से गिरा।
चोककर योल उठा-- 'अरे याप रे । तू कौन -
"अरे मुझे पहचानता नही मैं तेरा काल हू । यही तेरे
पाप की नाव डुयो दृगा। खयरदार होजा र यया कहे देता ह ।"
के--अरे दुनिया में ऐसा कौन पैदा हुआ जो मुझे
इसी समय सवारी लिये हुए पाठ आदमी आ पहुचे।
केशव ने उछल फर कहा- हाँ ठीक मौके पर श्रा गये हो
तुम लोग।' फिर गगट्ट से कहा--'हमसे यहुत पधारो मत।"
अब लगृट से इस घड़ी बात नही निकली तय हसकर
केशव बोला-'यो अव यह सर क्या हुमा पधारना तुम्हारा
दुम दबाकर अवसरकोगे?"
"अच्छा ! अच्छा । हमारा भी मौका आयेगा।"
-अच्छा जब मौका थायेगा तब देखा जायगा। तुम
लोग अप गिरफ्तार क्यों नही परते?
पराने श्राया।

७२ 73 जासूस. EC- "किसको गिरफ्तार करें?" के०-यह जो बुढिया यनी हुई है। इसी के नाम वारट है। अब दो आदमी पूना को पकडने के वास्ते आगे बढे । वह बेचारी चिल्ला उठी बोली-"अरे लगूटः वाचा यह तो हमको पकडते है । पुकारो पुकारो श्रादमियों को।" के-अरे पकडो पकडो ! उसको भी वह भी जेल का भगा हुआ कैदी है। 'इतना जल्दी मे नही लोटूंगा।" पु० क०-इसके नाम बारट है? "चार्ट का क्या काम यह तो जेलखाने से भागा हुआ असामी है।" पुरक० -तो जवाबदेही किसके सिर पर होगी। "जवाबदेही को तो मैं खुद तैयार है।"- 'अच्छी बात है" कहकर पुलीस के अहलकार लॅगूट बाबा को यफडने चले। पहले उसने जोर लगाया लेकिन प्रत को हथकडी पड गयी । और आदमी पूना के साथ साथ चले।' अब पूना रोने लगी । लॅगढ़ ने उसको प्रबोध देकर कहा- "तुम डरती क्यों हो रोश्रो मत अभी तो इन लोगों का ढकोसला खतम हो जाता है।" सब सवारी पर बैठे। और गाडी रवाना हुई थोडी दूर आगे जाने पर सबके सब ठहाका मारकर हसने लगे। लंग ने कहा-"ले भाई खोलदे यह कवण।" अप लँगट्ट की हथकडी खुस गयी । जो पूना दुख म रोती चिलातो थी वह उन लोगों की खेल देखफर अफवका गयी। - A

.
३
चक्र भेद
७३
गट्ट ने कहा-"यच गयो पूना इसवार बदमाशों का फन्दा
चखेर दिया गया।
पू० -हम लोग तो गिरफ्तार हुए है,?
लेकिन उसी समय देखा तो गिरफ्तार करने वालों में
रक स्त्रों की आवाजी म बोलो-"नहो तुम्हारी तो गिर
तारी और रिहाई एक साथही हुई है। अच्छा चोलो के जेब म
चिट्ठी तो ठोक ठिकाने से थी न ?"
पू०-हां वह तो जोडे के साथ मैं उठातो गयो थो। कागज
मेरा जहां का तहा वैसेही रखा था लेकिन मुझे ता उलटी हो
उम्मीद थी।
'मेही वह मूला हू । मैंने हो तु हारो तलाशी ली थी।
घटीभी मौके से पहुच जायगो तुम्हारे पाल ।
पू०-मुझे तो वह सब सपने को तरह मालूम हुआ।
आपको मालूम था कि चिट्ठी कहा थी ?
ओर क्या विना मालूम हो !"
पूर-तो इसी से चोलो आपने मेरो फोड कर फेंक दी
जिससे देखने वाले को कुछ सन्देह वाको न रह जाय।
"हा इसके साथ हो मुझे भी तो हलफ लेकर कहना था
कि इसके पास कोई कागज नही है।"
पू०-ठीक है। कानून का बचाव आपने किया कि यह
चीज तो वरती में पडीथो । क्यों ?
"हा। हा।" हम कर उसने इतना कहा । पूना ने फिर
पूछा-"तो जापको केशव का वह चक्रमालूम था।
-

७४
0:3जासूस Exc
"वह सब इस घडी तुमको जानने की क्या जरूरत है ?"
पू०- तो उसफो क्या यही मालूम है कि आप लोगों ने
उसी का काम साधने के घास्ते हम लोगों को गिरफ्तार
फिया है।
"हॉ यह तो जानते ही हैं।"
पूर-अरे हो आप लोग कह लिये जाते है हमको'
अब घर पहुचाने चलते है । केशव ने सेल तो अच्छी
खली लेकिन यही वह प्यादेशह मात हो गया।"
अट्ठारहमा क्यान
शत्रु का रूप।
उधर प्रताप के मुष्टमे की पेशी पास आ गयी। दो हो
दिन घाफी रह गये। दोनों ओर से गयाहों की तैयारी जोरों
पर है। पूना जिस दिन केशव के पजे से छूट आयी उसी दिन
से ह घर के बाहर नहीं होती। लॅगट्ट बाया ने उसको याहर
निकलने और पिसी बेजान पहचान के आदमी से भेट करने
की एक दम मनाही कर दी थी। यह भी समझा दिया था
कि किसी से डरना नही न किसी ऐसे वैसे की यात पर
काम देना।
बहुत दिन हुए पूना से लॅगटू की देखा देखी नहीं हुई
इससे मन में पूना को चिन्ता थी। अपने कमरे में बैठी वह
मन ही मन कुछ सोच रही थी कि लौडी ने पहुंच पर खबर
दी- एक भले मानस भेट करने आये हैं।"
1

V
चक्र भेद
पूना-नाम गाम पूछ आनो फि क्या काम है?
नोकरानी ने लौट कर कहा-"उ मिग्न हैं नल से प्रताप
का कुछ सन्देसा लाये है।"
पूना-कह दो काम के मारे फुरसत नही है। इस घड़ी
भेट नही होगी।
लेकिन उसने नहीं माना कहा-'योल दो मेरा नाम मुला
हे जासूसिनो है।"
"अच्छाले आयो" कह कर पूना ने हुक्म दिया लेकिन
जय यह कमरे में आयी । उसका चेहरा देखते हो पूना क्रोध
के मारे जल उठो । बोली-"अरे फिर तुम यहां कपड़े बदल कर
आये। तुमको शरम नहीं आती ! योगेन । नफली योगेन।
यही कह कर पूना उठी और अपने पाप को पुकारने चली।
उस आदमी ने फडफ कर कहा- सबरदार जाना नहीं
यहाँ से 1"
पूर--अरे तेरी इतनी हिम्मत । मेरे घर में घुसकर मुभी
मकाने श्राया है?
पूना की इस बात में वही रुखाई घड़ा साहस और बड़ा
ही विकट भार था । अब उस आदमी ने भी मुरल्यो की तरह
कहा-"अरे सुन तो ले छोकडी पात तो सुन ?'
पू०-मै तुम्हारी यक यात भी नहीं सुनगी।
'अच्छा योगेन की नही तो संगहू की यात तो सुनो.
गीन?"
इतना कह कर उसने अपना नकली वेष चेहरे से उतार
डाला। श्रय पूना अकबका कर बोली-'तुम भी तो बाया
-
។
ग

७६
जासूस
कमाल करते हो। चेहरा तो चेहरा आवाज भी बदल देते हो
कितनी बोली बोलते हो। इतना जीम ऐठना कहा सीखा
तुमने "
"मेरी पढने की जिन्दगी इन्ही सब फन्द फरेवो' में तो
पूना-तो दुश्मन के रूप म तुम मुझे डराते क्यों हो?
डराता नही मै अपने रूप भरने का इमहान दे रहा
था। अव पास हो गया बेटो।"
पूना हॅसतो हॅसतो लौट गयो। बोली-"में भी प्रकचका
गयो चाया कि यह बदमाश फिर मेरे घर में किस हिम्मत से
वाया । उस दिन तो तमक कर चला गला था।"
लॅ-अच्छा वेटी अब मैं दुश्मन के बेड़े में जाता हूँ । शेर
फो माद में से लौटुं या नहीं इसो विचार से भेट भी करने
आया था।"
पू-तो उन से जेल म भेट कर आये ?
लॅ० - हाँ मैं उनके वकील से मिल चुका और हलफ लेकर
एफिडेविट भो दे पाया। मैंने कह दिया है कि जो कुछ मैने
कहा है यह सर हरफ बहरफ सच्चा है। परसों मुकदमा शुरू
होगा । मुझे पता लग चुका है कि जिस लडकों के खून
का अपराव लगाकर प्रताप को जेल में बन्द किया गया है वह
अपने बाप के घर म छिपी हुई है।
पूछ-तो उसने छिपाया भी तो घर में १ कहीं दूर देश
नहीं भेज दिया ?
करने

७७
चक्र भेद
लँ -शैताम को पूरी शेतानी करने की बुद्धि मिल जाय
सो भले आदमी दुनिया में रहने कैसे पायेंगे?
पू०-तो यह रूप भरा है उसी के कमरे में घुसने के वास्ते।
ले-हां लेफिन एक और काम के लिये भी मैं तुम्हारे
पास आया है। कर सकोगी बेटी?
पूर--कहिये कौन फाम है। जहां तक बनेगा पीछे तो
हटूगी नही ।
"अच्छा अगर मैं नही लौहूँ, और यह समझ में श्रा
जाय कि मैं मर गया हूँ तो यह चिट्ठिया जिनके जिनके
नाम है उनको पहुंचा देना।"
पू०-तो यह कौन बडा मुश्किल है। इसको तो में आनन
फानन म कर डालगी।
-अच्छा अगर में पेशी के दिन नही आ सकू तो यह
चिट्ठी प्रताप को देना । अगर आ जाऊँ तो जला देना।
पू०-अच्छी बात है।
लॅ०-अच्छा एक बात और है
। मूला
को
तुम अपना
विश्यासी समझना । वह भी हमारे ही ऐसा तुम्हारा हित
करने वाली है। अगर मैं मर जाऊँ तो उससे वैसी ही आशा
रखना। वह इस चक्र को तोडे बिना चैन कहीं लेगी। उस
दिन उसी ने जोड तोड लगाकर केशव की सब चौकटी
भुलादी और तुम्हारी रक्षा की थी।
इसी समय कियाड पर किसी ने हाथ मारा । लॅगद सहम
कर बोला-"देखो फिर कोई शैतान आया। अच्छा जाय पूना!
दरवाजा सोलो। अगर कोई मर्द हो तो उससे कुछ बातें

७८
जासूस
करना। जब लौटकर यहां श्रावोगी तब जो कुछ यहा देवना
उससे घबराना नही ।"
"अच्छा" कहकर पूना ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला !
लेकिन किलो गुण्डे बदमाश को वहां नहीं देखा। एक लडका
जोर से बोला-'कुछ खाने को दे माई।"
पूना ने उसको कुछ देकर विदा किया लेकिन जब लौटी
तब उसने कमरे में लँगटू को नहीं पाया खिडकी के पास
गयी तो छडों की हालत देखकर समझ गयी कि उसी को राह
लॅग बाहर चले गये है।
।
उनीसका क्यान
जासूमी कुत्ता।
प्रताप का मुकदमा इजलास पर हो रहा है। मुद्दई के
गवाहों का बयान भोर जिरह खतम हो चुकी है। एक तरह
से अपराव सावित हो है । केरल असामी के गवाहों की सफाई
थाफी है । जिस दिन मुद्दई के गवाहों का बयान खतम हुआ
उसी दिन प्रताप को पूना के पिता ने एक चिट्ठो-दो। प्रताप
ने उसे पढा। लिखा था--"मैं मुकदमे में हाजिर नहो हो
सका इससे निराश नहीं होना । मे श्राता तो भी मेरा ययान
नही लिया जाता। अगर तुम कसूरवार साबित हो जाव तय
मी कुछ हानि नहीं है। मैं सदा तुम्हारे साय साथ हूँ। जर
मक तुमको गुनाह नहीं सारित कर लंगा तब तक मुझे चैन

चक्र भेद
७३
नही है किसी तरह का कुछ डर या मन में दूसरी बात
नहीं लाना।"
चिट्ठी पढ़कर प्रताप ने हलते हुए अपने वकील को दे दी।
पूना कचहरी में किलो दिन नहो गयो । लेकिन बाप से रोज
रोज मुकदमे का हाल जो सुनती रही उसोसे उसको बडी
व्याकुलता बडा उग था।
मुकदमे के चोये दिन वडा पानी बरसा। बांधो और
विजलो का भा बडा जोर था। पूना उन समय अपने कमरे
में बैठी सोच रही थी। उसके भीतर जो वित्ता और विचार
को विकट आँधी चल रही थी वह इस बाहरी अन्यड झका
से कही भयानक ओर बहोढाह करने वालो था ।
' इसी समय किसी ने जगले पर ठक ठकाया। पूना ने
सममा पेड को डालो या हवा का झांका लगा है। लेकिन किए
वही भाज आयो। तत्र खोलकर देखा लेकिन कहो कोई
दिखाई नही दिया। तर समझ गयो कि केवल भ्रम हुआ है।
इसी समय फिर सिसकारी दो ओर साथही कुते का
गुरीना और भोकना पुनाई दिया। फिर किसी ने कहा-
"वन्द करो खिडकी बन्द ।"
अघ झट पूना ने उसको बन्द कर दिया।
लेकिन फिर उसी तरह पर पर करके तीन पार आवाज
आयो फिर पूना ने खोला और कहा कौन है ?'
बाहर से किसी ने कहा-"कुद खाने को दो माई"
आवाज पू ने पहचानी । यह वही लडका या जो एक
घार पहरो पा चुका था। मर चह खिडको को राह भीतर

.
।
+
SO
जासूस
आया । पूना हट गयी और पूछा-"तु कौन है क्या
चाहता है
"मेरा नाम दमडी है। बाप का नाम दोकडा । दादा का
छदामी लाल । नाना पापचकौडी है। परनाना सतकौडी।
हंसफर पूना ने कहा- "सात पुश्त म भी एक पैसा पूरा
नहीं होता। खैर क्या चाहता है। भीतर किस साहस से कूद
आया है तू?"
"मैं खबर देने आया ।"
'पू०- फिसफी स्ववर?
"खगह बाबा की।"
३०-यया खबर देगा लगटू बाया की ?
"घडी श्राफत से मैं अभी बचकर शाया हू वाहन जरा
सम्हल ले लास लेले।"
पू०-क्यों क्या हुआ था?
"ज्यों ही तुमने पहली बार जंगला खोला। एक श्रादमी
नजर आया। यह किसी फन्दे में खडा था। इसी से मे सहम
गया । अच्छा यहाँ आप के पिता के सिवाय और कोई है ?"
पू०- नही । नहीं।
"तब जरूर वह घात से था । मेरा कुत्ता मुझे जप पयर
दार कर दिया तब मैं समहुल गया।"
पू०-यह था कहा?
"एक पेड़ के पास था। श्राप के दरवाजे पर या पुलीस
का पहरा है। निगरानी बैठी है।"
-

चक्र भेद ८१ ortan nirmnind पूर-चैठी होगी। बैठने दो हाल कहो। "हाल तो यही चिट्ठी लाया हूँ।" पूना चिट्ठी उसके हाथ से खोल कर पटने लगी उसमें लिखा था:- "बेटी पूना' 'मै केशिनी को देख आया हूँ। पेशी पर नहीं था सका । लेकिन आकर भी मैं इस घडी कुछ कर नही सकता था ओर पकडा जाता तो सब कोशिशे मेरो वन्द हो जाती । मैं इसी घात म हूँ कि जीती जागती केशिनी को इजलास पर हाजिर कर देने से सब बखेडा मिट जायगा। अगर प्रताप को फांसी की सजा सुनायी जाय तो भी तुम डरना नहीं । कोई उसका वाल वॉका नहीं कर सकता। अन्त को वह बेकसूर साबित होगा मेरा कहना सच्चा जानना जरा भी डरना नही न निराश होना । प्रताप से कह देना मैं उसके अच्छे के लिये ही हाजिर नहीं हुआ हूँ। मेरे इस दूत दमडो का भरोसा फरना।" पूना सब पढकर पुश-हुई लेकिन यह बात उसकी समझ में नही आयी फि केशिनी को देख चुकने पर भी वह | उसको क्यों गिरफ्तार करके नही लाये है। उसने लडके दमडी से कुछ "घस जो कुछ है उसी में है।" पू०-तुम हो कितने यरस के? तेरह बरस तेरह महीना तेरह दिन यस श्रय में जाता हूँ" पू०-लॅगटू वाया से कितने दिन की पहचान है तुम्हारी? "डाई परस ढाई महीना ढाई दिन।" - - " पूछा--"और

*09 जासूस
पू०--तुमको मानते हैं।
"खूब मानते है उन्होंने मुझे पाना लिखना सिखलाया
है। पानी में पैरना, जमीन पे लेटे लेटे चलना, रूप बदलना,
जपान ऐठकर दूसरी बोलो बोलना सब में उन्हीं का चेला
है। सदा उनके साथ रहता है उनके हुक्म पर हाजिर रहना
ही मेरा काम है।
पू०--उस दिन जब तुम आये थे तब यह जानते रहे कि
लॅग? वावा यहां हैं?
"हा जानता था।"
पू०--तुम ने खाने को दो माई कहा था न ?
"हां यही हम लोगों का इशारा है। अब मैं जाता है लेकिन
जिधर से आया था उधर से नहीं जाऊँगा।"
-
पूछ-क्यों?
4-
"हम को पकड़ने के लिये घात लगाये बैठा है।"
पू०-तो आते वक्त काहे नहीं पकडा ?
"वह सब जानते थे कि मैं काम करने आया हूँ चिट्ठी
पत्री दूंगा इसी से जाती बेर पकडेंगे सब । लॅगटू बाबा को
पकडने के लिये वे सब घूम रहे है "
पृ०-ऐसा क्यों करते हैं वे सबै?
'चात यह कि बावा उन बदमाशों का सब फन्द फरव
जामते समझते हैं। उनसे ये सब डटते नहीं है।"
पू०-तो यह सब उनको पकड कर करेंगे क्या?
'करना पया जान से मार डालेंगे "
पू तो बाग पुलीस को खबर क्यों नही देते।
"उनकी बात सुनता कौन शहर भर में गुराडो ने उन

चक्र भेद
को पागल प्रसिद्ध कर रखा है। लेकिन अब जल्दी उन सब
की यदमाशी चूल्हे में चली जायगी। यावा छोडने वाले देवता
तो है नहीं।"
पू०-किधर से जाओगे?
"सामने के दरराजे से।"
पूर-क्यों खिड़की से नही ।
'नही उधर से जाने में पकड लेग वे सव। उनको पता
नहीं लगेगा लेकिन में मुलावाद कर इधर ल चला जाऊँगा।
दरवाजा चल कर खोल दो मैं झट भाग जाऊँगा।"
ज्यो हो पूना ने दरवाजा खोला वह लडका पकही छलाङ्ग
मे बाहर हो गया। पूना ने कर दरवाजा यन्द कर लिया । इसी
समय कई फेर सुनाई दिये। किसी के जोर से चिल्लाने की
आवाज आयो। पूना बहुत धवरायो। योली- अरे! यह पया
हुया यही आफत हुई। जान पडता है गुडो ने बेचारे
लडके को मार डाला है। यही कह कर पूना ने शान ओढ़ लो
और धीरे धीरे दरवाजा खोलकर बाहर चलती हुई ।
हासका क्यात
जाते की कारम्बाई।
पूना तेजी से जर चलने रागो पानों को वूदै प्रास्मान से
आ आ कर मानो उसको जाने से मना करने लगी । लेकिन
पूना ने उनको कुछ परवाह नहीं की उसको शिसी का कुछ

जासूस -डर भय नहीं । वह येचारे बालक दमडी को बचाने के वारते घर से निकली है। जाते जाते पूना को उस दमड़ी का कुत्ता दिखाई दिया। अब उसी के साथ साथ वह भी चलती हुई। उसने समझ लिया कि यह दमडी का विश्वासी कुत्ता है उसी के पास जायगा। इसी भरोसे पूना उसके पीछे पीछे चलती हुई । । ऑधी पानी से अंधेरा हो गया था। चलते चलते पूना ने देखा ता फिर उसी पुल पर श्रागयो है। थोड़ी दूर और आगे गयी होगी कि उसने पीछे से किसी के आने की आहट पायी फिरकर देखती - तो कोई उसके पीछे तेजी से भा रहा है । पूना सी तेजी पीछा करने वाला और झपटा और "श्रव कहाँ जाती हो । अब कदम उठाती हुई श्रागे वढी लेकिन नही निकल सकती। दौडो देखता कितना दौड सकती हो?" पूना दौती हुई नदी के किनारे जा पहुंची। अब उस पीछा करने वाले ने जोर से पकार कर कहा- बस आगे बढोगी तो पक्ष में फंसकर या नदी म य कर जान देना पड़ेगा। 'अबरार पूना ने लट्वट का सामना देखा तो भी चुपचाप खडी नहीं रह सकी। किनारे ले लौट कर जहल की ओर बढी। वह यादमीभी-"श्रय कहाँ जाती हो ल पर गोरिया। अब तो पकड गयी।" कहकर दौटता चला पूना अब डर के मारे थोडी दूर और आगे जाने पर गिर गयी वह भादमी खुश होकर उसे पफटने चला लेकिन पीछे ले पिसी ने डाँट कर कहा-"खघर- बार ' श्राग यदा फि खोपडी उगा।" अध तो ह पानी ही सफर पोला-भरे तु कौन है?"

चक्र भेद
'मैं है तेरा यम"
यम ! एक यमदूत के बच्चे को तो अभी ठीक तरह से सर
कर के आया है। अब खुद यमराज कोही ठीक करता हूँ। श्रा
निकल आ सामने "
इतना सुनते ही वह आदमी ठठाफर हसने लगा । उसने
कहा- अरे यह तो किसी लड़के की आवाज है।" फिर उसी
ओर ताफने लगा जिधर से आवाज आयी थी।
यह फिर ठहाका मार कर हंसा और बोला-"कुछ खाने
को दोगेजी?"
अब वह श्रादमी यहाँ से यह कहता मुथा हट गया-"मैं
इस लौंडे को नही देख पाता लेफिन यह मुझे अच्छी तरह
देख रहा है।" यही कहता हुशधर श्रादमी पीछे हटने लगा।
कहीं से श्रावाज आयो । "भाग माग पयों जानखोता ?'
श्रय दमडी ने पूना के पास पहुँच कर कहा-"उ !
उठो । घहन घर चलो अब कुछ डर को वात नही रहो।"
पूना-- किधर से चलूँ । रास्ता फहा
'उनको चिन्ता नही में ले चलता है। देर फरने ले
आफत होगी। चार पाँच आदमो इधर ला रहे ह।"
पृ०-ये सब है फौन?
"गुएडे है और कौन ?
"धाप रे पाप" फाह फर पूना उस सी के माय तेजी से
चल पड़ी। कुछ दूर जाने पर दमदी ने कहा-"शच्या धादी
दूर तकलीफ है। आप रमी गफ फर चलिये।"
"उछ परवाह नही" फह कर पूना दमदी के पाले उपयों
मकल फरके चलने रागो।
१"

0.3 जासूस
चलते चलते दमडी ने कहा "अब डर नहीं है। हम लोग
अप सडक पर पहुँचते है इधर सवेरा भी हो पाया है। अब
ये सप निशाचर अपनी अपनी माँद में जा विपंगे।"
चमड़ी ने पूना को घर पहुंचाया और-"कुछ खाने को दो
माई।" कह कर वहाँ से चलता बना । उधर पूना ने घर पहुच
कर देखा तो वहाँ वडी श्राफत पड़ी हुई है। बन्दूकों की आवाज
सुन कर ही उसके वाप जागे थे और जब उन्होंने पूना को
नही पाया तब चारों ओर श्रादमी दढ़ने को निकले। लेकिन
कही पता न पाकर उनको बड़ी चिन्ता हो गयी थी। वह बेटी
पूना को देखते ही पडे खुश हो गये। लेकिन हाल सुन कर
चोले - अच्छा अाज तो अतवार
है कचहरी खुलते ही मैं
केशव पर नालिश कर दूंगा। यही शैतानी करने लगा है।"
पू०-लेकिन सावित कैसे करेंगे कि यह सब उसी का
काम है?
"हॉ यह पात तो हे जरूर कि गवाही नहीं मिलेगी।"
पू०-जाने दीजिये यह सब कचहरी का बम बसेड़ा करने
की कुछ जरूरत नहीं है। भगवान इसका उसको जरूर
फल देंगे।
"लेफिन फल पाने के पहले ही अगर ये सब कुछ खून
खराबी फर डाले नय?"
राब श्रत को यही बात ठहरी कि प्रताप यकील से सलाह
लेकर तो हम मामले में जायते की काररवाई की जायगी।

चक भेद
इक्कीसका क्याने
अमामी का बयान ।
अथ असामी की और का बयान हुआ ! 'ताप ने कहा- "मैं
अपनी प्यारी पूना से यात कर रहा था जिससे मेरी शादी पको
हो चुकी है। उसी समय घोड़े पर सवार केशिनी उधर से'
निकली। उन्होंने मुझे हाथ के इशारे से पास बुलाया
जाने की इच्छा न होने पर भी जाना पड़ा। उन्होंने मुझे नव
चले
रात
को भेट करने के लिये कहा और यह भी
कहा
कि
जरूरी काम है। कोई भले घर की स्त्री हम लोगों की बातें
सुनेगी में इस बात पर राजी हो गया । मुझ में अब तक दो
बार उनकी भेट हो चुकी थी । मुझे पहली ही बार में सन्देह
हुआ था, मुझे इच्छा थी कि उसी रात के हमारे उनके सफाई
हो जाय । पुल पर जाकर देखा तो वह पहले से पहुंची है।
पूछा वह स्त्री आयी है । उन्होंने कहा-'नही में अकेली
आपसे मिलने आयी है।"
इसके बाद जो हुआ था वह हमारे पाठक पढ़ चुके हैं
प्रताप ने वह सब बातें इजलास पर कह सुनायो ओर बतला
दिया कि जब वह पानी में गिर गयी वह भी उनको बचाने के
लिये कूद पडा। लेकिन जब देख लिया कि वह परना अच्छा
जानती है और तैर कर किनारे पहुँची तप उसने समझ लिया
कि यह सब चक्र रचा गया है। इसम कुछ गृह भेद हे।
प्रताप का धयान हो चुकने पर उनके नकील ने रसँग पाया

CE
wa जासूस
का एफिडेविड पेश किया। बहुत कुछ उन माजरत के बाद,
मजूर हो गया। उसके बाद पूना के मां बाप का भी ययान
हुआ। कई सफाई के गवाहों का बयान हुआ।
अब प्रताप के वकील ने जुरियों को सम्बोधन करके
कहा-"यह एक बड़े भयदर चक्र का मामला है । फेशिनी से,
प्रताप का ध्याह सम्बन्ध भी नहीं हुआ. प्रताप की दौलत हथि
याने के लिये केश ने उसका मान कर जाल रचा है।
इसी बात को उन्होंने अपनी स्पीच में बडा जोर देकर कहा।
प्रताप को मा की एक चिट्ठी पेश को गयो जो यह साबित
करतो कि केशव उनका मामा नहीं है। लेकिन मुकदमे से
उसका कुछ सम्बन्ध नहीं कह कर वह नामजूर कर दिया
जूरी अपने मत्रणागृह में गये। और लौट आने पर एक
राय होकर बोले-"असामी अपराधी है।"
इतना धनते ही सबके चेहरों पर सूरवा वरस गया। लेकिन
प्रताप का मुख मण्डल वैसाही प्रसन्न था । उन्होंने निडर भाव
से कहा-"मुझे मूव मालूम है कि मैं इस मामले में बेगुनाह
इस कारण फासी से नही डरता न मृत्यु का भय करता हूं।
मुझे विश्वास है कि भगगन जो कुछ करता है सो भले के
लिये करता है। मैं यहां के इजलास से परमात्मा के इजलास
पर जाने म प्रसन्न है । यहां किसी चफील मुख्तार की जरूरत
नहीं पटती न किसी की सई सिफारिश चलती है। वहाँ मेरा
असर सुविचार होगा।"

चक्र भेद है
बासका क्यान
यहरा बूढ़ा
प्रताप को फांसी का जिस दिन हुक्म हुआ उसी दिन
तीसरे पहर के अपने बालाखाने में वेठी पूना बेकसूर की
फांसीढ रही थी। रास्ते में एक ने अपने साथी से कहा-
"सुनते हो यार आज तो बडा अनर्थ हो गया।"
"क्या हुआ
•"प्रताप को फांसी का हुक्म हो गया।"
इतना सुनते ही पूना कोठे पर मूञ्छित हो गयो । पहा
पानी भरने पर भी होश नही हुना। बीस दिन तक उसको
बेहोशी रही। लेकिन बडी कोशिशों के बाद उसको जान
बच गयी।
जब वह शोक से उठकर बैठो नीचे वरण्डे में कुर्सी पर
छवा ले रही थी । उसको कुछ भी ससार का सुहाता नही था।
देखा तो सामने ने एक बूढ़ा लाठी येघता हुश्रा आ रहा है।
यह धीरे धीरे पूना के सामने आफर थप्प से बैठ गया। थका
घट के मारे हॉफने लगा। उसका चेहरा देखने से पूना फो
दया आयी। पूछा--कहाँ से आते हो बूढे ।"
बूढा-आता हु तो बड़ी दूर से ।
पू०-कुछ खायोगे?
बू०-- हा वडा धरम होगा। दो कुछ खाने को।
*जासूस आफिस २) पर मिलता है।
--
+
.

"
६०
• जासूस
"श्राश्रो" कह कर पूना ने भीतर बुलाया। अपनी मा से
उसके लिये खाने को मांगा। मासको अकेले में डॉटने और
कहने लगी-'तुम अब यह सब बखेडा मत लाया करो बेटी!"
पू०--बहुत थका हुआ भूखा है देवोमा । फिर उससे पूछा
-"पयो मकान कहाँ है तुम्हारा?"
"हमारा घर द्वार कहाँ है?"
पूना की मा बोली "तो धरमशाले में काहे नहीं जाते तुम"
"मैं गया तो था। अच्छा नहीं लगा इसीसे चला आया।
श्रय पूना के कान में उसको मा समझाने लगी-"तुम ऐसी
को मत बुलाया करो वेटी। यह सब चखेडे की बात है।
श्रय यह घृढा चोला-"मैं जाऊँ?
पू -~~-धयों क्यो?
'यह माई मुझ पर सन्देह करती है।'
अब पूना की माने उसफा खाने के वास्ते ला दिया। बूढे ने
एनुश होकर खाया। जय उसकी मा चली गयी । पूना से
कहने लगा-'यह फैसी घात हुई । सन्देह भी किया। खाने
को भी दिया ?"
पू०-हॉ सीधे सादे देवता लोग तब के श्रादमी होते हैं।
इनके मन में कोई किसी बात नहीं आती। आयी भी तो झट
दूर हो जाती है।
पूना और बूढे में बातें हो रही थी कि दो सराड मुसएड
उधर से बात करते हुए निकले । दोनों घूर घूर कर पूना की
भोर ताकते जाते थे।
उनको देपते ही पूना के चेहरे पर सूखा दरस गया। ढक
पेपर चढ़े ने पूछा-"पाई धर्मी कुछ तकलीफ हुई क्या तबी.
थत फैसी है।
.

-
.
-
चक्र भेद
पू०-तबीअत अच्छी नही है। कैसा तो भीतर खराब हो
"तुम्हारे याबूजी कब आयेंगे?"
पू-यह तो आज नही श्रायेंगे।
'ओ हो। तभी न १ तब तो बडा कठिन हुश्रा"
पू-यों क्या काम है?
"काम कुछ नही, श्रव रात हो गयी। मैं चाहता था यही
दो हाथ जगह मिल जाती रात काट लेता। तुम्हारे बाबूजी
होते तो हमको जगह मिल जाती।"
पू०-हां लेफिन माताजी को यह यात पसन्द नहीं है।
तुम धर्मशाले या सराय में जाकर ठहरो।
'घडी आफत है। भला इस रात के मैं कहाँ जाऊँ ?"
पू०-जाव पास ही मुसाफिरों को ठहरने की जगह है।
खर्चा मा से में दिला सकती हैं।
'ना ना हमको रुपया पैसा नही चाहिये।"
"तो जाय में भीतर जाती हू " कह कर पूना ने किवाड
यन्द कर लिये । वह भी--"जाय आराम फरो" कह कर
चला गया।
जय यह बूढा यहाँ से थोड़ी दूर पर पचा। वे ही दोनों
मुसएड उसके पीछे पड गये। एक ने अपने साथी से कहा
- "है तो यही । देखो तो हिला इला पर कुछ फाम आवे।"
दूसरे ने पूछा-"कौन है? कहाँ जाओगे हे उसने
ताक पर कान पर हाथ रखा । तय गुण्डे ने कहा-"अरे यह तो
बहरा यार !चिरला कर पात करना होगा।"
जय थिलता फर पूदा--"कहा जाता है ?" तर भी जवाय

. . 20 •08 जासूस EX उसने नहीं दिया। लेकिन अपने पास से एक कागज पसिल निकाल कर उसको दिया। उसने लिखा-'तुम उसो घर के आदमी हो जहां बात करते थे।" बूढे ने मूडी झाँटकर इनकार किया। अब उसने लिखा "उस घर के किसी को पहचानते हो ?" इस बार भी उसो तरह उसने नाही को। फिर उसने लिखा-'इसी शहर में रहते हो?' इसके जवाव न भी उसी तरह इनकार हुआ । अब उसने पूछा - "केशन को पह चानते हो" "कुछ कुछ जानता हूँ।" "वह आदमी कैसा है सो ठीक नहीं जानता।" अब दूसरे लाथी ने कहा-'लो हो गया अब चिल्लाने का क्या काम है?" पहला बोला- 'जाने दो चलो। जिस लडकी को ले जान है वह है वही जो इससे बात करती थी। लेकिन यार काम ते ऐसा वैसा नही यहा सङ्गीन है। एक बार काफी रकम का उससे बन्दोवस्त करके तो हाथ डालना ठीक होगा।" अच्छी बात है चलो लेकिन जरा दुधुश्रा पोलो। मिजा ठिकाने श्रा जाय तय ।" अब नो होली की ओर चले। वह बूढा भी कुछ दूरी पर उनका पीछा करने लगा। जव दोन भीतर दूकान में चो गरे। बूढा बाहर ही बैठा कहने लगा- 'पालो पञ्चे। तुम लोग पूर मस्त हो लो। तुम्हारे पीछ फोई छाया की तरह लगा है यह तुमको खबर नहो । यह तुम लोगों को पूरी पवर लेगामही बूढ़ा,यहरा यूदा। तुम लोग को सिखला देगा। - ।

चक भेद
M
तेईसमा क्यान
.
t
है
गुण्डों की बैठन।
केशव अपने गुण्डों के साथ एफ सुनसान मकान में बैठा
। शगव की बारह बोतलें और तीन गिलास रते हैं। बारहो
'घोतले खाली हो चुकी हैं। मस्त होकर फेशन ने कहा- "देखा
न! कैसी चाल है। सब भात हो गये या नहीं?"
एक ने मुंह का गाज पोंछ कर कहा-'अभी मात की यात
मत कहो। तुम्हारी लडकी है कहां। अगर वह आकर हाजिर
हो जाय तो तुम मात होगे या मात फरोगे यह भी कुछ सोचते
हो ? हम दोनों ही मिट्टी में गड़ जायेंगे कि वचेंगे?"
दूसरा योला- 'उसको तो घडे फायदे में रखा है। उसका
पता कोई नही पा सकता। वह तो मर गयी। समझिये।
लेकिन ऐसी ये कही लड़की है कि क्या कहें। जव जोश में
आवेगी किसी की कुछ सुनने वाली नहीं है। मट हाजिर
होजायगी।"
पहला--लेकिन यार इस लोडे को फासी हो चाहे न हो
जन वह इसके जीते जी वह लौडिया नजर भाजायगी तब तो
सप फन्दा फट जायगा।
दू- अरे तुम कहते क्या हो। वह लौडिया क्या इसको
पचाने के लिये कम हाथ पांव पीटती है। लेकिन भरोसा इतना
ही है कि मुद्दत चीत चुफी। श्रय की हफ्ते म उसको फासी हो
जायगी।

------ - - जासूस इसी समय आवाज श्रायो-'यही लौण्डा लोडिया नही उसको बचायेगा और तुम लोग तिकी पर चढोगे।" ऐसा मालूम हुआ जैसे श्राफाश वाणी हुई हो। आवाज भी ऐसी ही भरी हुई थी कि आदमी उस तरह नहीं बोलता, सबके प्राण सूख गये। दोनों गुण्डे कृद फर खड़े हुए। केशव ने कहा- कौन बोलता है? "शैतान की आवाज है।' के०-अरे ! तब तो हम लागों को कोई देख रहा है। जान पड़ता है। यही कह कर वह उठा। खिडकी जॅगले देखते देखते एक मे से छुड निकल देख कर बोला-"देखो ! जरूर कोई इस मैं आया है वही हम लोगों की बातें सुनता या। नहीं तो शैतान कहां से आ जायगा । देखो देखो कही पास ही होगा। एक ने कहा -'हो तुम्हारे वास्ते बैठा है।' के-कौन रहा यार वही लगटुआ तो नहीं है। "उसके सिवाय और को व्या पडी जो इस तरह पीछा रेगा इसी समय एक नोकर ने पहुँच कर खबर दी-दो आदमी सरदार से भेट करने आये है के-शकल सूरत? "गुए है दोनों।" "अच्छा वुला लाश्रो।" सुन कर नोकर चला गया । जय दोनों भीतर आये केशव उन्ह देखतेही खुश हो गया। बोला-'ओहो ! ठीक मौके से पाये । कहो देख पाये मकान । लडकी को पहचान लिया !" 2" " "

1
...
चक भेद
६५
- गुण्डा बोलने लगे-"हम लोग देख तो सब कुछ आये
लेकिन काम यड़ा सहीन हैं । हम लोग तो नही कर सकेंगे।"
के. -अरे एक बार राजी होकर पर लगे पीछे हटने ?
गुरु-पहले हम लोगों ने देखा नही था । अब तो सब
देख सुनकर आये हैं। अव न सब हाल मालूम हुआ है।
के. तो समझ लिया। इनाम जियादा चाहते हो। यही
बात न?
एक उनमें बोला-"साहब दर से सरये। रुपये से ज्या
नहीं होता । रुपया मिले तो सिर काट लाऊँ या नहीं तो कटा
माऊ। हम लोग जान को डरते हैं थोडे । क्यों यार बोलते
काहे नही "
'तुम तो कहते ही हो इसमें दोनों को बोलने का कौन
-अच्छा जाव दोनो को सौ सौ अशरफी देंगे।
अव राजी होन!
"हाँ अब हम लोग पीछे नहीं हटेंगे।"
एक-तो हम लोग ठिकाने पर पहुँचा कर अलग हो जायेंगे।
दू०-हॉ आप सबारी शिकारी ठीक रखें। हमलोग पह
सब नही जानते । लल्लो चप्पो की बात नहीं साफ कहते हैं।
के -हा ह सब ठीक रहेगा। जब दोनों वहा से बिदा
होकर बाहर चते किती ने कहा 'खवरदार । खवरदार !"
इतना सुनते ही दोनों आग कर घर में घुस गये। केशव
ने घबराकर पूछा-"श्रय क्यारे ! लौटे क्यों ?"
पहला यहाँ कोई शैतान है दादा हम लोगों को काम म
प्रागे घने नहीं देता है। हम लोगों से यह सझीन काम होगा
नही देखते हैं, बडी पदी श्राफतें हैं।
काम है॥

केशव ठहाका मार कर बोला-'यो हो मालूम हुआ
घही मैना बोला है। पिंजड़ा में बैठा वह यों ही वका करता है।
तुम लोग कैसे कायर हो उसकी बात पर डर गये।"
"अरे ! तब वही रहा है।" कह कर दोनो सम्हल गये।
और हॅस कर चलने लगे। लेकिन उनके भीतर वडा खटकी
था।
केशव दोनों को बाहर पहुचा कर, लौटने पर साथियों से
बोल.-"यह तो यडी श्राफत की बात है। यह कौन पाजी इस
तरह पीछे पड़ गया। जरूर दुश्मनों का कोई आदमी चक्र के
भीतर घुस आया है। अब उसका सर उतारे विना काम ही
नहा चलेगा। यह बच्चा को नहीं मालूम है कि इस चक्र में
आकर पिस जाना पडेगा।"
चौवीसका क्यान
aire
होली में मस्ती।
दोनों गुण्डे जव हौली से मस्त होकर बाहर निकले वह
बूढा भी उनके पीछे हो लिया था। लेकिन उसको उन दोनों ने
देखा नहीं था । जय केशव के उस जङ्गल वाले घर म दोनों
घुसे यह बूढाभी पिछवाडे की ओर सेरसोई घर जा बैठा था।
घोडी देर पीछे एक लौटीने श्रापर चूढ़े के कान में
कहा-'काम तो आज ही होगा। तुम यहाँ से चले जाव
जब ओरिया उगेगी तय पुल पर श्राफर मिलूंगी।"
-

चक्रभेद --- १ यही कहकर वह झट पट चली गयी बूढा भी बाहर होने के लिये सामने के सदर दरवाजे को चला। इसी समय एक ने पहुँच कर कहा- कौन है रे। यहाँ क्या करता है " बूढा थथम कर पडा हुश्रा और कान पर हाथ रप कर अपने को बहरा बतलाया। इसी समय एक और श्रादमी वहाँ पहुँचा । वही केशव था। उसने पहले आये हुए मे पूछा--"यह कौन है लच्छन " ल०--यही तो मैं भी देखता हूँ। नहीं मालूम होता कि यह आदमी है या धन के०- -इसको पकड कर ले चलो देखें कौन है ? लच्छन केशव का दहना हाथ था। उसने कहा-"चलो बडो । भीतर चलो। तुम्हारो तलाशी लेना है कि हो कौन तुम?" यही कहकर लच्छन ने उसके कांधे पर हाथ रखा। वह बूढा उसके साथ चुपचाप चलता हुआ। मुंह से कुछ नहीं घोला। जब भीतर गया केशव ने पूछा "तू फौन है मेरे घर में श्रधेरे में आकर क्या करता रहा उसने कुछ कहा नहीं-कान दोनों दिखा कर सर हिलाया। केशव ने पूछा--"तू बहरा है बूढ़े ने फिर कान पर हाथ रखा और कागज पेंसिल दे दिया। अब लिखकर यातें होने लगी सवाल - कौन है। 'गरीय पादमी हूँ भूप लगी है। आप की रसोई में पाना मॉगने साया था।" स-कहाँ रहता " ७

t
पूछने
--
"मेरा धर द्वार नहीं है। जहां सॉझ वहीं विहान।"
इसी समय केशव की लौंडो गुलबी वहां पहुंच कर
लगी "भोजन तैयार है।"
फेश०-अभी ठहरो। अच्छा गुलवी इसको पहचानती है
गु०-हाँ पहचानती हूँ।
के-कहाँ रहता है कौन है यह?
गु०-सो तो नहीं मालूम है लेकिन कभी कभी भाकर
खाना मॉगता है। मैं वासी कुसी जो बचा रहता है दे देती हूँ।
केर-कभी कभी क्या माने ? तुम तो कई हफ्ते पर पायी
है यहाँ?
गु०-हां यह आठ दिन पर आता है हर अतवार को।
के-तुमने इसको बुलाया था ?-
गु०-हाँ कहा था खाना ले जाना ।
के०-इसका कभी नाम पूछा था ?
गु०-ना नाम मोको कौन काम है भिखमगा.का।
के०-अच्छा नाम तो पूछ ले ?
गु०-आप लिख के देवे तब जवाब देगा।
"अच्छा जाय।" कहकर केशव ने गुलवी को,विदा कर
। निया श्राप लच्छन से बातें करने लगा। कहा-"यह तो हम
गो का यह मयना नहीं मालूम देता"
पर लच्छन उसके पास जाकर जोर से बोला-"हारे यह
जात रुपये है लेगा?"
उसने कुछ जगार नहीं दिया उसकी ओर टुकुर टुकुर
तापाता रहा । तर केशव ने फहा-"जाने दो इसके पीछे मगज
1
।
L

।
चक्र भेद
मारना ठीक नही है। वह लौडा जासूस क्या करता है । कुछ
सवर लेना चाहिये।"
"नही , नही । छोडना ठीक नहीं है। यह है वज्र बाहर
इसमें सन्देह नहीं लेकिन इस लोडिया को जो रखे हो इसके
बारे में कुछ मालूम है तुमको ?"
केश--नही मेरी स्त्री जव गयो तर लौंडी को लेती गयी
थी। रसोई बनाने वालो पडाइन भो चली गयी तब मैंने चारों
ओर नौकरानी के लिये आदमी भेजे लोगों से कहा भी फिर
यही मिल गयी। इसी को रख लिया।
ल०--तो इस घडी घर में जनाना कोई नही है?
के०--ना --
ल-मुझे तो इसके ढई अच्छे नही जान पडते।
फे०-काहे । काहे ?
ल०-योंकि यह साधारण स्त्री की तरह नहीं दीखती।
शॉनों पर इसको ज्योति देखने से बढी अम्ल की जान पडत्ती
है। हाथ पैर भले घर को स्त्री के समान है। यात करते समय
चारों ओर देस सुन कर बडी सवरदारी रखती है । कोई नात
हो तुरत जवाब दे देती है।
के-बात तो ठीक कहते हो । मैने यह सर इतना ख्याल
नहीं किया।
लक-यह बूढे से इशारे म कुछ बान कर रही थी मेरी
नजर.पड गयी देखा नही साना देने के यहाने केमे बोक
मौके पर पहुँच गयी।
फे०-अरे तो क्या समझते हो कोई मेदिनी हे। जगरना
है तब तो यह जीती लोटती नहीं यहा ले ?
"

-
जासूस
अभागे को प्रबोध दें। प्रताप ने कहा-"यह मैं जानता हूँ कि
सत्य इस झूठे चक्र के छिपाये नहीं छिप सकता क्योंकि चाँद
को कोई अधेरे से श्राड नहीं कर सकता। एक न एक दिन
असल वात जाहिर हो जायगी । इसी से मैं समय मॉगता था।
मेरा कलङ्क इस चक्र के कारण भरने पर भी रह जायगा।
हाय विधाता मैं अव उसकोसुनने नहीं आऊँगा लेकिन मरती
बेर यह जगत का बोझ लेकर दूसरे लोक में जाना बडा दुःख
मय जान पडता है। इतना जरूर है कि जब इसका सञ्चा भेद
खुलेगा। जब यह चक्रभेद होगा तब मेरा कलश धुल जायगा
लेकिन मैं उसको देप सुन नही सकंगा।",
चंकी-क्या करें हम लोगों ने तो बड़ी कोशिश की लेकिन
मुहलत मिली ही नहीं । यार तुम भी तो कालत करते ही रहे।
मैंने भी कभी ऐसा चक्र नहीं सुना कि गवाहों के मारे समझ
बूझ कर एक हाकिम ने एक वेगुनाह को फॉसी का हुनम
दिया हो।
तो अब आपकी या राय है। आप क्या करना
चाहते है । आपने अपनी ओर से तो जहाँ तक बना किया।
लेकिन और क्या कहना है ? जिन लोगों ने मुझ पर विना
वजह के यह सब चक्र रचा है उन पर परमात्मा कृपा करे
बल मैं और इस समय कुछ भी नही कहना चाहता। लेकिन मैं
अपनी जायदाद के लिये वसीयत पर जाना चाहता हूँ।
५०-५यो श्राप का कोई अपना है १. ।
प्र--ना मेरा कोई नही है,
३०--तय घसीयत किसके नाम करना चाहते हैं ?
प्र०- अपनी प्रारप्यारी पूना के नाम वसीयत, करुंगा
1

चक्रभेद - - सके। ३ 7 1 जिसमें उसको मालुम हो जाय कि मेरी सब जायदाद जो व्याह के याद उसकी होती वह उससे कोई छीन नहीं -सफता। हमको- जो शैतान चक्र रच कर उससे छुडाते है उनको यह ताकत नहीं कि उसकी प्राप्य सम्पत्ति से छुडा "यह तुम कैसी बात करते हो यार वकील हो कर ऐसी लचर यात कोई कहता है। तुम्हारे बाद क्या होगा इसकी चिन्ता अगर करना चाहते हो तो यह नही समझते कि चक्र चलाने वाते जब तुम्हारी जिन्दगी सतम कर सकते है तथ तुम्हारी जायदाद को पूना से छीन लेना कौन घडी बात है। उसके धागे इसकी रिसात क्या है ?" । प्र--हॉ बिसात है! - --अच्छा एक धात तो सुनो। केश जो अपने तई तुम्हारा मामा घनता है यह गत विलकुल झूठी है ? प्र०--विलकुल झूठा चक्र रचाई मई। अभी तक तुम इतनी यात नही समझ सके? घ ---श्रच्छी बात है तो उसका एक रफ लिप दो मैं तैयार कर दूंगा। अच्छा वसीयत की जायगी किसको ?' प्र० उसी पूना को दी जायगी व०-यह तो पायी नही यहाँ आवेगो ?, "अहा ! चारे कई बार मेरे पास आने के लिये उसने 'श्राग्रह किया। लेकिन मेरे हो भाग्रह करने से यह नही आयी। नही पर मरतो यार मैं अपनी प्यारो को भर आँख जरूर देख लुगा । और दो चार पाते विदा होते समय कह दूंगा। उस देवी पा चलती येर दर्शन करके पवित्र होना उचित ही है।" , । - - । 1

१०४
20 जासूस
यही मन में कहकर प्रताप ने कहा--"नहीं। श्रावेगी! अब
उसके श्राने में रुकावट नहीं होगी।"
व०--अच्छी बात है तो हम लोग कलह बारह बजे के
बाद यहाँ आवेगे।
"अच्छी बात है।" कहकर प्रताप ने मजूर किया। बस
वकील साहव वहाँ से चले गये। सहायक जेलर वहां खडे
सब बातें सुन रहे थे। सुन चुफने पर उनका चेहरा-कुछ
प्रसन्न हुआ।
जव वकील चला गया प्रताप अपने कमरे में टहलने लगे।
मन ही मन उनके चिन्ता का ज्वार भाठा हो रहा था । आप ही
आप कहने लगे "जकर यह वसीयत कर डालना होगा। इसमें
तो कुछ पाप नहीं है। मैं इस मामले में बेगुनाह है, तो भी
चक्र चालियों के मारे मुझे फॉसी पर चढना पड़ता है। जब
मैं तिकी पर छटपटाता रहंगा तव मेरे दुश्मन खुश होकर
उछलेंगे और हजारों आदमो खडे तमाशा देखेंगे। लेकिन
जाने से पहले अपनी प्यारी का मैं आलिङ्गन करूंगा। उसका
पवित्र और उज्ज्वल मुँह चूम कर अपने हाथों वसीयत उसको
सोप कर तो ससार से विदा होऊगा।
इसी समय संत्री ने पहुँच कर प्रताप से पूछा--"एक और
आदमी पाप से मिलने आये है : भेट कीजियेगा?"
प्र-कोई पहिचाना हुआ आदमी है ?
"मैंने नो उनको पहले कभी नही देखा। फोई बूढे
आदमी है।"
मन में प्रताप ने प्रसन्न होकर कहा-"यह जार लंगढ़

- . - चक्र भेद १०५ बाबा होंगे। वही तरह तरह के रूप में घूमा करते हैं ।" फिर सत्री से वोले-'अच्छा बुला लाओ।" जब वह श्रादमी पाया। प्रताप ने अच्छी तरह देखा लेकिन पहचानाहुभ्राबादमी नहीं था। और मोके पर संत्री खडा रहना था लेकिन इस बूढे के भीतर जाते ही वह किवाड बन्द करके बाहर चला गया। प्रताप ने पूछा-"आप कोन हैं मैं पहचानता नही । "मेरा नाम सुनने से पहले जिस काम के लिये आया हूँ । वही सुन लो।" प्र०---नहीं पहले आप अपना नाम पतलाइये । "नाम लेफर क्या करोगे मेरा नाम तो भगू है।" भ-यह नाम तो मैंने कभी सुना नहीं था।" "हां कितनी बातें है जो तुमने अभी नहीं सुनी बया। लिये आया उसको सुनना चाहते हो" संसार में अभी बहुत कुछ तुम को सुनना है। मैं जिस काम के प्र0अच्छा कहिये । आपको यातो से तो मुझे बड़ा स्नेह भाव मिल रहा है। भगवान को न जाने क्या करना है। "अगर मेरी बात मानो तो मैं तुम को रिहाई दे सकता है।" Hoयह तो बड़े अचरज को यात शप कह रहे है। "मेरी यावों से कुछ सन्तोप नहीं होता सालीचरज हो?" -मैंने यह बात कभी सोची नही इससे यह नही उमझ में आता कि इसका क्या जपाय हूँ। 'मैं तुम को पचा सकता।" ०-लेफिन इस सगीन धाम के लिये कुछ शर्त भी तो प T , १०६ •008 जासूस "हाँ! हॉ जरूर है।" प्र०- -अच्छा मान लीनिये कि मैं जेल से भाग गया तो मेरा कल कहाँ जायगा । पुलीस मेरे पीछे पीछे धूमेगी। यह तो और आफत की बात होगीन ? "नहीं, नहीं यह बात नहीं होगी। तुम देखटके मौज करोगे। तुम को कोई अपराधी नहीं कहेगा ।। - प्र०- आपकी इस यात से तो मेरी बोलती बन्द हो गयी है। "हॉ मैं भी ऐसा ही समझता था।" प्र०-श्राप कैसे बया करेंगे? "तुम्हारा बेगुनाह होना सावित करेंगे। तुम को जेल से भागना नहीं पड़ेगा। Ho-तो आप मुझे बेकसूर समझते हैं ? "हाँ! हाँ" • प-तो मुझे घेकसूर साबित कर देंगे। "हॉ जरूर कर दूंगा।" पू०- तो फिर मुझे बापने कैदखाने में पयों बन्द कर रखा है। संसार में सच्ची बात पयों नही, जाहिर कर देते आप सजन आदभी हो कर एक वेगुनाह को नाहक कष्ट सहते क्यों देख रहे है ? - यह तो हमारी इच्छा पर है।" -तो मालूम हुश्रा आभादमी नहीं मादमी के पशु । श्राप से मैं कुछ भी नहीं चाहता। कृपा फीजिये आप जाइये यहां से । लेकिन रिहाई पाना चाहते हो या नही सो कहो। प्र० यह तो स्वाभाविक पात है कौन रिहाई नहीं चाहेगा?

स ४- । 4 ! चक्र मेद १०७ जन्म मरन से आदमी रिहाई चाहता है तब इस बधन से कौन रिहाई नही चाहेगा।" "देखो तुम गीता का शान तो इसघडी छांदो मत मुझे सीधी सीधी बातें बताते चलो।" प्रक-मुझे दुःख इसी बात का है कि आप इस मामले में जान इनकर भी चुप क्यों हैं ? "यह तो मै बतला चुका कि उसका कुछ मतलब है १" । -प्र-यह मतलय तो सुने ? 'मुझे रुपये का मलतव है। प०-ओफ! तो यही पहले क्यों नहीं कहा आपने ? फांसी का हुक्म होने पर क्यों आये ? "इसका भी मतलब है।", प्रo-वह मतलब क्या है ? कह तो दिया रुपया।" Fo--तो रुपया पाने से श्राप मुझे बेगुनाह सावित करके रिहाई करा देंगे? । "हां करावेंगे।" Ho-तो आजादी और इजत के सामने रुपया या चीज है ? 'हां हां यह तो मैं भी कहता है।" प्र० - कितना रुपया चाहते है। 'तुम्हारा सर्वस्व चाहते है।" म०-सर्वस्व । तो रिहाई होने पर या पहले। "पहले ही" प्र. और पुछ 'हां और-है। " . M ४ - .

म । . +7 जासूस प्र -और क्या है? 'तुम को यह लिख देना होगा कि तुम को जिन्होंने हैरान और वेइज्जत किया है उन पर कुछ दावा नहीं करोगे यह हलफ से लिखना होगा।" प्र०-श्रो हो। यह बात है ? "देयो अव दिन तुम्हारे पूरे हो आये हैं । कुछ घटे वाकी है। फिर तो तुमको तिकठी पर लटकना होगा।" to-लेकिन जिन्होंने चक्र रचकर एक बेकसूर को फांसी दिलाने में कसर नहीं की उनका विश्वास कैसे किया जायगा। "यह श्राप को मरजी पर है।" प्र०-अगर मैं विश्वास नहीं क तव। तव क्या मरना होगा तुमको ।'जान से हाथ धोनोगे।" अच्छा जाइये आप ! मैं यह सव नहीं मानता। इतनी देर तक पताप ने उनकी बातें सुनी और उसका चेहरा खूच सवरदारी से देख रहे थे । जव जवाव सुना तब उस आदमी का रूप फक्क, हो गया। दो कदम वह और पीछे हट गया। श्रा फाड फाडकर देपने लगा। छाती धुकुर पुकुर करने लगी। पूताप ने फिर पूछा-'अच्छा आप कौन हो मुझे बतलायो" "में तो नाम पतला ही चुका हूँ।" पूर--नही वह झूठा नाम है। आप वेप बदने हुए हैं। अर मुझे पहचान में आया है। "अच्छी बात है। तो कह क्यों नही देते कि मैं कौन है।" पूर-जिस स्त्री का- यात पूरी होने से पहले हो भनाके से दरवाजा खुला और T ! सचक मेद १०६ संत्री ने भीतर पहुँच कर इशारे से पूताप को चुप फिया और बूढ़े को पकड कर वाहर ले गया। जब दोनों आफिस में बैठे रक्षक ने कहा- "ओफ! आज तो मैं बहुत सस्ते पचा" "कैसे कैसे." रक्षक कैसे पूछते हो असामी के दुश्मनों को अगर खबर हो जाती कि मैं आप को भीतर लाया हूँ तब तो मै खतम हो चुका था। "उनको सवर होती कैसे?" २०-मैं तो समझता हूँ साहव यह केशव ज्योतिष जानता है नही तो कैसे उसको पता लग गया। तो मुझे भीतर ले जाने से पहले ही इस बात को सोच लेना था।" २.-हांसो तो ठीक ही है लेघिन मन में पाया कि आस पास कोई देपता नही है । थोडासा आप से पैदा यरल इसी मतलय से में ले गया था। तो फिर हुआ यया होने की बात मत पछिये एक बूढा जेल के पास पास घूमता है। पता नही साहय कि ये सब क्य पिस रूप में घम रहे हैं । इसी से मैं डर गया। "छि छि तुम ने तो सय गुरु गोयर कर दिया। मेरा काम सिद्ध हो रहा थामिगच ही तुम ने सप चौपट पर । दिया।" -पया परता साहय बाप तो पूरा आधा घटा भीतर रहे। '-

,
-
१९०
00:जासूस
"अच्छा जाने दो फांसी कय होगी।"
२०--फांसी सोमवार को है।
"क्यों मुल्तवी नहीं हुई ?"
र०-नहीं, नहीं!
"क्या बात हुई। पूताप के तो बहुत हित मित्र धनी और
घडे लोग हे मुल्तवी नहीं करा सके।" :
२०-इसी से तो मुस्तयो नही हुआ।
“वाह ! कैसी बात करते हो इसी से तो मुल्तवी हुआ
करता है।"
२०. हा लेकिन यहाँ यह बात नहीं हुई।
"अच्छा इस में सुना है कोई जासूस छूटा है।"
"वह कौन जासूस है जानते हो?"
२०-नही साहब ! मुझे खबर नहीं है इसकी। लेकिन
नहीं मालूम मौके पर कहाँ से आ पहुंचता है। ये लोग झट
मौके से आकर असामी को बेगुनाह छुडा ले जाते हैं ।
"नही ऐसा नहीं हो सकता इसमें"
र०-काहे साहव बात क्या है आप तो मालूम होता है
जानते है कुछ।
"नही इसकी वजह है न?"
र०-क्या वजहहै!
"वह मर गयी है।
₹०-मुझे तो विश्वास नहीं होता साहव । वैसे आदमी
मरते नहीं है। देखना जरूर मोके पर कही न कहाँ से आ
धमकेगी।
"अच्छा वह लँगट्ट यावा मर गया ?"
-

१
.
कचक्र भेद'
र०-पया जाने मुझे तो मालुम नहीं है।
'वही तो जासूस था इसने ?"
२०-, वही था नही नहीं ! ऐसा नहीं है।
"मैं कहता है ऐसा ही है।"
रत-श्राप है कौन साहब
"पूताप का भी यही सवाल बरावर रहा।"
२०-घतला दिया उसको?
"नही !नही "
२०-हमको बतला दीजिये!
"नही । नही"
२०-कौन जाने आप ही वह जासूस हो!
"नहीं मेरा कहना तो यह कि यह मर गया है। अच्छा
सुनो एक बात मैं परसों फिर पूताप से, भेट फरने आऊँगा।
अंगर भेट करा दोगे तो आज का दूना ! समझे !
२०-अच्छा परसो की बात परसों देखी जायगी।
"अच्छा र चलता हूँ। जय रामजी की।"
"जय रामजी की।"
जर बूढा चला गया। जेल का असिस्टेंट श्राप ही श्राप
कहने लगा-फिर तुम को हम घुसने देंगे श्रर पया फिर सियार
वार तले जायेंगे। श्रसामी भगाने की नीयत से यह बूढ़ा आता
है। पहले मालूम होता तो मैं भीतर आने ही नहीं देता एक
वो यूढा दूसरे गेममा वन इसी से जाने दिया था नहीं तो
मुझे क्या कुता फाटे थाकिने श्रादमो को ले जाता। वापरे।
बाप ! रुपये के वास्ते जान फोन देने जाय?"
और यह पूरा पूताप के कमरे से दूर हुश्रा नेभी उन्होंने

+
0.जासूस
विचार किया कि अपने वकील को सब कह दें अभी न्याय पाने
की आशा है। जब तक सांस तब तक आस ! अभी
दुनिया से सत्य और धर्म तो उठ नही गया है न!
छब्बीसकर बयान
मारतों के पीछे भागतों के आगे।
जव बूढा निराश हो कर पूना के घर से चला गया तक
चह अपनी मा से बोली-"यह बूढा आज टिक रहता तो हरज
नही था।"
मा०- इतना भोग कर भी होश नहीं पाता बेटी ! वे जाने
पहचाने का क्या ठिकाना है।
पू -नामाई । यह बूढा तो भला श्राद रहा है ।
मा-सो हो सकता है लेकिन तुम्हारे यावू जी कहते रहे
है कि जिन बदमाशों ने प्रताप की जान पर चक्र रचा है उनक
मतलघ तुम को भी मारे विना नही सिद्ध होगा।
पूना कुछ पनी विपत्ति सोच रही थी मा की चात उसके
कानों में गयी ही नहीं लेकिन प्रताप का नाम सुनते ही मानो
नीद से चौक उठी। छाती धड़पने लगी।मा से उसने पूछा---
'पया कहा मा । ताप के लिये जान पर क्या?"
फुछ नही बेटी 'श्रय पुछ होगा नहीं उनकी जान
यचाने के लिये पटी बढी तैयारिया हो रही है ।। श्राज
म्हारे घावू जी भी उसी गये है
पू०-कादे मा । इनकी फाँसीका दिन पड़ गया है
-
1

.
चक्र भेद
: - मा० . ना वेटी हम को तो मालूम नहीं है।
पू०-अच्छा लॅगह यावा की कुछ खबर मिलो हे मा?
मा०-उनके तो मरने की खबर सुनती हूँ वेटो ?
पू.-ए मर गये?
माव कहते तो लोग ऐसा हो है लेकिन तुम्हारे बाबू जी
को विश्वास नहीं है।
पू०--मैं इस पर विश्वास करती है।
मा० क्यों!
पू०- दुश्मनों को उनसे बडा डर था। मार डाला हो तो
आश्चर्य नहीं है लेकिन उनके खून की तहकीकात नही हुई
काहे!
मासुनती है पुलील चाले उनको रगेदे जाते थे यह
पानी में डूब मरे।
पूर-तो फुछ उस मामले की जाँच हुई ?
मा०--अब लावारिश लाश की जाँच क्या होगी।
पू०- काहे?
मा०-सुना है पुलोस के पीछा करने पर लँगह बावा भागा
है और जमुना में एक डोगी काही मॉड सफर
भागा। लेकिन उधर से ऑधी आयी डोंगी डूय गयी । लाश का
पता ही नही लगा।
पूछ-तो जिन्हों ने पीछा किया था चे सय पुलीस घाले
रहेपा और कोई।
माय-असल बात की किसी को सपर नहीं है। यह
मामला अब दय गया है।
पू०-यो हो । पहभी उन्ही चक्र चालियों का पार है।

29 जासूस
वेचारा लॅग वाया मार डाला गया 'बड़ा उपकारो देवता था।
अब हमारे प्यारे की कुछ आशा नहीं रही। काहे मा ।
चाहती हूँ उनसे जेल में भेट करके कुछ बात कह दूं जिनसे
उनके मित्रों को काम में सुभीता होगा।
मा०- अच्छा देखा जायगा।
पू०--देखा नही जायगा मा । मैं जरूर भेट करूँगी।
यही कहकर वह जोश के मारे अपने कमरे म गयी लेकिन
यहाँ जाते ही नोद श्रा गयी।
जब आधी रात बीत चुकी कोई एक बजने के बाद दो
आदमी उसके द्वार के सामने सडक से जा रहे थे। एक
फहा- "यह तो बड़ा दुदिन है यार जान पडता हे पानी आयेगा
अाधी के मारे तो बुरी हालत है कही पानी पाया तव तो
दुचले और दो असाढ का मामला हो जायगा।"
दूसरा बोला-"अरे इसी में तो मजा है। हम लोगों के
लिये दुर्दिन ही तो अवलम्ब होता है। तुम ने नहीं सुना। चोर
न भावे उजालो रात !"
पूना के कमरे में सन्नाटा है। टेवुल पर का लम्प टिम टिमा
रहा है सोते समय उसकी रोशनी कम कर दी गयी थी। इसी
समय ठक से आवाज आयी पूना ने खास कर करवट बदला।
आवाज रुक गयी। थोड़ी देर पर फिर आवाज वैसीहो आयी।
मालूम हुआ किसी ने झिलमिली उठायी। उसने, भीतर मुंह
डालकर मका और चारों ओर अच्छी तरह देखा। पूना ने
आहट पाकर पडे ही पड़े ताका : किन उसने झिलमिली की
मोर नहीं देखा नहीं तो सामने ही दिखाई देता कि कोई
गफली घेहग लिये भीतर ताक रहा है। उसकी सूरत देखते ही
वह तो चिशा उठती।
1.
।
।

६चम भेद
पूना फिर पार कर उठी और चारों ओर देख कर लेट
गयो । उसने वहाँ किसी को नहीं देखा।
।" यह थादमा जय नीचे उतरने लगा। साथी ने कहा-"क्या
हुआ रे?".
'अभी तो मा को लोड़ी जागती है।"
'रात भर जागतो रहो?"
"ना । ना! आहट पाकर उठ बैठो हे । मुझ से ही कुछ
भूल हो गयी।"
"अच्छा फिर सो जायगी। जाघ देखो अब सो भी गयी
होगी। कम उम्र के श्रादमो को नौद घरते कितनी देर लगती
है। तुम बाहर निकाल दो मैं लेकर चलदूंगा । यस काम फतह है।"
श्रय उसने फिर जाकर देखा तो पूना की नाक बज रही
है। यस पोरे पोरे पों के बल भीतर चला। पहले चाहर ही
से झिलमिलो में हाथ डाल कर सिटकिनो उसने खोली फिर
आइने के नीचे की सिटकिनो के पास धूसा मार कर काच
तोडा और उसको भी बहुत गोरे खोल कर मोतर घुस गया ।
सिरहाने जाकर उसने दगा भरा एक रूपाल नाक पर रखकर
पजे के चल बाहर आया। और अपने सारी से योला-
"तैयार है
?"
"ह हः। ठंढा कर दिया हे?"
"हाँ करता हू जरदी लेना।"
अय यह पलके पाल या अोर रूमाल पर मोठो शोर दगा
छिडका। फिर नाक पर देकर पिचोने को चार से कस के
चोग उसे उठा कर उसने अपने साथी के हमाले किया पद
उसे टगे हुए नीचे उतर गया

• जासूस 8.
दूसरा साथी बम्स पेटारी तोड कर जो कुछ पाया ले का
चलता हुआ । जव हवा लगने से पूना को होश होने का हा
हुआ । उसने फिर रूमाल में दवा डाल कर नाक पर रखा
फिर वह वैसी ही नेहोश हो गया । मरती बेर के समान घरना
बजने लगा।
श्रव दोनों उसे लेकर साथ चले। एक ने कहा-"जल्द
चलो रुपया ले कर हम लोग चल चले।"
"खवरदार एक पग भी हटा कि खोपडी खतम्म।" यह
कहकर सामने ही वह बहरा बूढा आ खडा हुआ। अव उन
डाकू ने पूना को पटक दिया और श्राप पडा हुआ। इध
लॅगहू ने जेब से हथकडी निकाल कर उस डाकू के कस दी
लेकिन
दूसरा रे धीरे यह कहता हुआ वहाँ से सरव
"मारतो के पीछे भागतों के आगे।"
अट्टाईका क्यान
पूना होश में।
शव घर के और सब भी जाग उठे। पूना की मा ने खिडकी
से देखा तो पूना बेहोश।
पह बूढा उत्तमो पकडे है । बस चिल्लाने और "वही बूढा"
फरने लगी नोकर लौटी भी चिल्लायो ।
जघ पूना होश में आयी। दूसरी ओर से जासूस दुतदमडीभी
या गया। अथ रॉगट्ट ने पकडे हुए श्रादमी को दमडी के हवाले

। लेकिन तुम पर बडी श्राफत है।"
"
चक्रभेद
करके पूना को उसके कमरे में पहुचाया। पूना की मा ने गुस्से
में भर कर कहा-"अरे ! तू कौन है?
ले-श्राप चिल्लाना नहीं माई नही तो गुरा पड़ेंगे।
मा०-तू करता क्या था?
लॅ०-मैंने दो गुल्डो के हाथ से पूना को उबारा है अब मैं
इसको यहाँ पहुचाये जाता है।
मा०-तू है कौन।
"मैं लॅगटू माई।'
इतने में पूना होश में आकर बोली-"अरे वाया ! तुम जीते
हो बड़े भाग्य है पावा । तुम्हारा फिर दर्शन तो मिला ।"
ल०-हां चेटी उस चाण्डाल फेशय के खप्पर में से तुमको
निकाल लायाह । जरा और देर होतोतोसर्व नाश हो चुका था।
अच्छा अब अपनी मा को समझाओ धुमाश्रो चेटी। मैं चलता
हु नही तो और गुण्डे श्रा पहुचेंगे।
पूना के समझाने मे मा कामिजाज ठिकाने आया। लॅग? ने
कहा-"श्रर मैं ठहर नही सकता रेटो । मरा मुर्दा यमराज के
यहां से लौट पाया है समझा न ? मैं उसीके पीछे लगा हू
"सो में अच्छी तरह समझती हूँ।
०-श्राप अपने पिता से कह देना । फरह मेरे हा याप
फो साथ रोकर यहा से हट जायें। क्योंकि प्रताप को जान जो
लोग लेना चाहते है उनका भार तुम पर भी वैसा ही है।
पृ० - अच्छा याचातुम पुलीस जाफर यह सय कह
फाहे नही देते हो
ल-सर समय पर होता है येटी । उकताने से गुलर

-
407 जासूस
नही पकती । केशव ने बड़ी चालाकी है। मेरे लिये वह इनाम।
योला। देशो मै भी उसफी सब तैयारी पर मानी फेर देता
है । अच्छा हां याद रखना करह जरूर यहाँ से चली जाना।
पूर-मैं उनसे जेल में भेट करूं?
ना! नाऐसा हरगिज मत करना । वह खुदं छूटने
पर तुम्हारे पास आवेगे।
पू०-फांसी का समय तो आ गया।
लं.-मैं तो बेटो तुम को बार बार कहता हूँ कि उनको
फांसी नहीं होने दूंगा । उनको बेगुनाह सावित करके विजय
का डट्का वजाकर जेल से छुड़ाऊगा और दुश्मनों के मुह में
कालिख पोतूंगा। अब मैं जाता हूँ बेटी। खवरदार । खवरदार!
पू०-अरे तुम यही ठहरो। मुझे अकेले छोडकर मत
जाव क्या जाने फिर बदमाश सब आवे इस पकडे हुए को कल्ह
पुलीस में दे देना सब पापही पकड जायगे। तुम जाते क्यों हो?
"इस घड़ी कुछ खास फरण है अभी कानून से हमारी
विजय नही होगी। सच मौके पर देखा जायगा।
पू०-तो कल सवेरे मुझे यहां से हटने को कहते हो ।
अगर सरे तक जीती बची रहगी तय न ?
"हां हां मेरा कहनासुनो देखो खूब पसरदारभूलना मत।"
वे सब अभी इतना जल्दी नहीं पायेंगे। कोई दूसरा
फन्दा तैयार करके तो पहुचेंगे।"
पृ०-लेकिन हम लोग ले जाय तो निना पता पाये तुम
आयोग से।
"उसको चिन्ना मत फरो एम हूँढ लेंगे।" कह पर लगढ़
पाया से चराते हुए।
-*-31

१०
चक्र भेद
उत्ततासका क्यान
इनाम का इश्तहार।
लगा जब पूना को अलग जाकर बातें करते थे तब दमडी
केदी को लिये दूर खडा था। वह कैदी बोता-"अवे इस तरह से
पिस्तौल मत कर लो।"
द-काहे और कान के पास कर दूं
'वयों रे जानवर मानेगा नहीं ?"
द.-पास रहेगा तभी न उसकी आवाज अच्छी तरह
सुनायी देगी वहादुर?
"अच्छा बच्चा कमी तो मेरे हाय में पडोगे तव श्राटा दाल
का भाव मालूम पडेगा।"
द.- यह बात है।
"बहुत बढो मत वच्चा हम कहे देते हैं।'
द०-अरे कह तो दिया । हवास में बैठा रह नहीं तेरी
सोपडी घोंघे की तरह फोड दूंगा समझता है कि नही ।
उस समय उस गुण्डे ने देखा कि दमडी अकेले है। झट
घात पाकर उस पर झपटा। दमडी घगल काट गया। अब
यह गुरडा धम्म से एक गहरे चयञ्चे में गिर गया। उसी में
यह चुभकिया साने लगा। दमडी ने उसका पान पकड कर
ग्दो चा। फिर सिर के बाल धरकर घसीटने शोर कहने लगा-
" जैसी करनी वैसी भरनी।"
उमसे
इसी समय लँगह यहा आ पहुंचा। दमडी ने
अय

01 जासूस :- गुण्डे की सब यहादुरी घतलायी। सुनकर लॅगटू यायाने गुएडे से कहा-"देखो यहादुर ! तुम से हम को एफ समझौता फरना है।" 'अच्छी बात है लेकिन पहले यह हाय का फगन तो लॅo-नही । नहीं ! वह यात नहीं है। मैं जो कहता हूँ पहले उसको पस द से या नापसन्द से कर लो तो पीछे घात । गुरु-हाँ अव हाथ में पड गये है तो ऐसा फहते हो एक दिन तुम भी पाले पडोगे तो हम सूद सहित चुका लेंगे। "अच्छा अब जो हम करते हैं वही तुम भी कर लेना" कहकर लॅगह ने उसके कपडे देखे उसमें से एक भुजाली निकाली और एक छोटा पिस्तौल भी मिला। दोनों चीज अपने अधिकार में करके लगढ़ ने कहा-'अब इसको छोड़ दो बच्चा। गोल माल करने का काम नहीं है।" गु.-यही तो हम भी कहते है कि गोल माल करके नाहक हमारे साथियों को बुलाना और जान श्राफत में डालना सम झदार का काम नहीं है। द०- अरे चिलायगा तो गला दवा दूंगा । समझा ? हुना ! दुश्रा ! ढेर हुया ! लॅ०-घस ! यस ! धकने का काम नहीं बेटा चले चलो चुपचाप। गुरु-चला फर क्या करना है वाया ! पुलीस में तो तुम हम को दे नही सकते । तुम्हारे पकड़ने के लिये इनाम घोला गया है। "अच्छा चल बेटा ! तेरे लिये भी हम इनाम पावेंगे। "कह कर दमडी ने गुराडे का हाथ पकड़ा। गु०-अरे । 1 1 ।

१२१
चक भेद
तीसका क्यान
घुड़सवार डाकू।
बे लोग दो घटे तक फैदी को लिये हुए चलते गये । जय
जाते जाते नदी के किनारे पहुंचे तब तक किसी से उनकी
मुलाकात नहीं हुई।
रात का अधकार दूर हो गया था। पूरब ओर से खूप
मकाश हुश्रा इसी समय गाडी की आवाज आयो । लॅगटू ने ऊँचे
चढ़ कर देखा पड़ी भारी गाडी तेजी से आ रही थी।
सायही साथ एक आदमी घोडे पर चढा आ रहा था ।
लॅगहू ने उसे पहचान लिया चर फेशव का प्रधान साथी
लच्छन था।
लॅगह ने समझ लिया कि गाडी में बदमाश लदे हैं।
जरूर उसी के पीछे वे सब भा रहे हैं। अब तो घडी आफत
हुई । ये बदमाश दो बार जान मारने पर उतारू हुए और
दोनों वार इन्हों ने मुँह की खायी । अब क्या करू । चिलाकर
आदमी बुलाऊँ और पुलीस के हवाले कर दूं या देसू कि
आगे क्या क्या होता है। इन्हीं के हथियार से इनको मार
सकता है या नहो ? अगर मैं मर गया तबतो बेचारा प्रतापचडी
श्राफत में पडेगा। मेरे मरने पर उम चेचारे प्रताप की भी
मरन हो जायगी। देख लें कि भगवान् को क्या करना है।
अव तक तो मैंने कोई पातक नहीं किया है। लेकिन देर आज
क्या करना होता है।
यही मन में लँग सोच रहे थे कि पीछे से दिमीने पहुँच
।

१२२
09 जासूस
फर उनके सर में लाठी मारी । लँग वहीं धड़ाम से गिर गये।
बँधे हुए गुण्डे ने कहा- "कहा था न कि कभी हमारा भी
पाला पडेगा। अब उलट गयी न चाजी।"
इसी समय गाडी की आहट मिली वधे हुए गुण्डे ने ऊचक
कर देखा । अपने साथी लच्छन को देस' फर खुशो के मारे
उछल गया । अब यहां हम यह यतला देना उचित समझते हैं
कि कैसे क्या हुआ और बाजी किस तरह उलट पडी!
वात यों हुई कि दमी अपने कैदी को लेकर एक मैदान में
पहुँचा और एक पेड में उसे नॉध कर लेंगटू की राह ताकता
था।क्योंकि लॅग थोडी दूर साथ चल कर पूना से कुछ कहने
जाते हैं कहकर लौट गया था।
दमडी ने उसको चाँधते समय कहा--"जरा यही ठहरो
पहलवान । साफ़ हो जाय और तुम्हारा मुँह अच्छी तरह देख
फर पहचान लूँ तव आगे कदम बढाऊ। खवरदार रहना।
अगर श्रव-भागोगे तो इस बार पकडते ही कलम कर दूंगा।"
लेकिन वह गुण्डा उस घडी यह सोच रहा था कि किस
तरह इसके पछे से भागे । इसी कारण उस बात पर कान
नही दिया । दमटी सॉप से बहुत डरता था। उसने देखा कि
एक सॉप पेड़ के एक सौढरे में गेंडर मारे बैठा है । उसको
देखते ही दमडी पेड पर से कूदा और पॅधे हुए गुण्डे पर
जा गिरा।
कैदी को इस हरकत से बड़ा क्रोध आया यह सम्हल कर
दमदी को हथफटीधे हाथो से पीरने और रहने लगा-
"पश्चा घडे बढ गये हो अभी खडफ को पहचानते नहीं। लो
पूजा अच्छी तरह ।"
--

१२३ चक्र भेद । जय-मार कर राडफ ने दमडी को, बेहोश कर दिया तव वही छोड कर लॅगढ़ की खोज में चला। रास्ते में उसने लॅगट्ट अचानक उसको भी उन्हीं हाथों मार गिराया 'फिर लच्छन को चिल्ला कर बोला--"रो । ठहरो । पल्टन पाया और रोको।" ख०- लच्छन नेअपने साथी खडक की चोली पहचानी और सवको रोक कर अपने घोडे की पाग रोकी बोला-'अरे कहाँ आया खडकू तू किधर से" -मैं यही था प्राया नहीं। ल०-सो तो देखताह लेफिन यह जेवर किसने पहनाया ? "तुम्हारे ही काम में यह इनाम मिला है यार । एसी करने से पहले इसको सोलो तय यात सब कहें । इसी समय गाडी हॉकने वाला फूद कर सउक फे हुचा चोला-"अरे । उसी वृढे की यह करनी है वह है कहाँ पा यार" १ "उसाको धागे सुला श्राया ह । उसने जैसे मेरा काम चौपट किया था उसको भी लीप पोत कर अया हाथों Pाय बदला दिया है उसको तो। ल, किसका काम लोप पोत कर पाया है पडफ पर-उसी लँगटुया को मार के मारे बेहोश परये तो लग-अरे तो उसको पाया का तुमने' -उराफी यात पग रहते हैं। उसका मन लिये माया है। हम लोगों ने उस तौशिया को न्यो हो हालियान जाने कहाँ मे आफर उसने मन मिट्टी कर दिया और मेरे हाथ भाया।

१२४
जासूस
-
में उसने हथकडी कसके पकडा था। लेकिन बच्चाजी को
अब आटा दाल का भाव मालूम हो गया होगा।
ल-अव तो हाथ में कर लिया हैन ?
ख०-थरे श्रव ? श्रय तो वह हिल भी नहीं रहा है।'
उसी के हथियार त उसको काबू किया है मैने ।
यही कहकर खडकू ने हथकडी दिखायो । अव गाडीवान
ने पूछा- "वह लौडा कहां गया इसका दूत वह भी थोडी दूर
पर आगे पडा है।"
लन्छन चोककर बोला' “ऐं। कोई और था ?"
ख० - हा साहब वह भी सांप का पोवा है।
ल०-वह कौन है?
"अरे वही रहा दमडिया।" जब खडकू से सुना तब लच्छन
घोडे से उतर कर लॅगह को देखने चला ।
2"
इकतीसा क्यान
मुर्दा गायव ।
ह
अब लच्छन ने पूछा--"तो दमड़िया कहा है
"आगे चलिये हम उसको दिखाते है" लेकिन जब
सड़फ उस पेड के पास गया तब उसे न पाकर बडा अक
चकाया । बोला "अरे यह पोवा ज्या हना पीकर भाग गया ?"
अव गाडीवान बोला "लो इसको हम लोग देखने आये
तब तक यह भी हम जानते हे झाड पोंछकर चलता वना
होगा।"

-
चक्र भेद
१२५.
अब सब के सब यहां चले जहां लँगटू मूछित पड़ा था।
यहां जाने पर कुछ दूरी पर से एक स्त्री की चिल्लाहट
सुनाई दी। यह आवाज अन और पास आने लगी । क्योंकि
जवर से श्रावाज आर ही थी उधर ही को वे सब जारहे थे।
मालूम हुआ कि किसी स्त्री पर कोई दानवी अत्याचार हो
लेकिन अब ऐसा मालूम हुआ कि वे सब जितना आगे
पढते है उतना ही वह आवाज भी आगे जा रही है। इस बात
पर किसी ने ध्यान नही दिया था अप लच्छन सब को रोककर
बोला -"यह बड़े अचरज की बात है ज्यों ज्यों हम लोग आगे
बढते है त्यो त्यो वह आधाज भी धागे जारही है।"
एक दूसराबोला-~"हां भाई । यह तो अप. मालूम हुश्रा
वह आवाज भी हवाकीतरह उडती आरही है। अब सब लोग
खड़े होकर सुनने लगे तो आयाज एकदम बन्द हो गयी।
खडक ने मानो नीद से उठकर कहा "थरे ! यह हम कहाँ
चुडैल के पीछे चले आये । तब तक वह लँगट्ट लम्बा न हो
अब सब के सब वहां को लौटे जहां लॅगह पडा था। लेकिन
फिर वह सावाज और कातर होकर सुनाई देने लगी वह
स्त्री बडे जोरसे रो रोफर कहने लगी'अरे दौडो दौडो । गाय
गुहार तिरिया गुहार जो जहां हो दौडो दौडो
अब सब मुंह तमोअल करने लगे। फिर आवाज नायी।
-"अरे बचानो पचानो तिरिया गुहार गाय गुहार
अब लन्दन ने चिल्लाकर कहा "रे कौन हो तुम कहाँ ?"
"अरे यहा यहां। इधर 'देरी मत करो। मरती हूँ। जान
गया हो?"
,
गयी-गणी"

1 २२६ जासूस ta गाडीपान बोला-"यह कोई चुडैल है भाई आदमी नहीं है। अब लच्छन बोला-"अरे आवाज में पहचान गया 1 जाव- तुम लोग लॅगढ़ को देखो मैं इसके साथ उसकी ओर जाता है। जहां से आवाज भारही है। अच्छी बात हे कहकर खडकू और गाड़ीवान लॅगटू की। थोर गये। जव उजियाला अच्छी तरह हो पाया तय खडकू ने उस गाडीवान का मुह ताक कर कहीं- 'क्यों ऐसा तुम्हारा चेहरा क्यों हो रहा हो।" "थया जानें भाई जव से मैने उस स्त्री की चिल्लाहट सुनी है तब से मेरे भीतर कैसा तो हो रहा है। ख-अरे चिल्लाने में तुम्हारा पैंया हुआ? 'हुआ कुछ नहीं। मुके तो वह आदमी' की चिल्लाहट नहीं मालूम हुई यार" ख -परे तो क्या भूत समझता है ? भूत नही चुडैल रही भाई. उतनी दूर हम लोंग गये कोई आदमी दिखाई नहीं दिया और बैह श्रीपाज भी भागती ही गयी।" -थोडाऔर जाने से भेट हो जाती। 'नहो यार तुम आगे जाते तो आवाज भी भागे जातो । यह खून का वरला ग्डून है दूसरा कुछ नही ।" -अरे तू तो पगला है। 'नाना वह अावाज में सुन चुका हूँ। पहचानता है। उस घी नादमो की अवाज थी। इस पडो फत्र में से पही घोल रही थी।" 'सानो वही हम लोग मूत चुडेल पर वहस करते है उपर लग रफूचक्कर हो जायगा। ख०-

were
'और नहीं तो वह तुम्हारे पास्ते भी पडा है क्या?"
ख. लेकिन यार अब तो श्रेला दूसरी हुई।
'हा यार है तो ऐसा हो लेकिन हम कहते हैं, अगर वह
मरा नहीं होतो बेचारे साधू सवालो को छोड़ देना बेहतर है।"
खरे यह सवभाव भगत काम की बेरा नहीं करता।
"अरे याप रे । वह चिल्लाहट तो भई मैं मही सुनता तगी
अच्छा था।'
ख. अरे वह सब कुछ नहीं खाली खयारा ही खयाल
रहा यार।
'धतेरे खयाल की नानी मेरे सब ने आवाज सुनो। मैं ने
अपने कानो सुना। तुम ने मो सुना तो भी सवाल हो खपाल
फरते हो।"
अव खडक ने ढह अच्छा नहीं देख कर गाडी पाले को
एक योतल दिया। उसको मन भर पोकर जय मस्त हुश्रा तय
बोला- चला यार श्रव ठीक बात में मैं आ गया हो तो
मालूम हुधा कोई चीन सोयो गी।
जब देना वहा पहुंचे जहाँ लॅगष्ट्र को बेहोश छोड गये ये
वहाँ देखा तो.कोई नहीं है। पर खरक वोला-"अरे ! राम
इस नोसीपरमो ठार पडायार गया कहो."
गा - देखो कहो यही भरा पड़ा होगा जायगा फहाँ मुही
भी चलता है।"
१०-अरे यारपवाडाविका प्रा:मो है। मरा नहा होश में
प्राफर फाहो लिया है लेकिन कहा पाउहो दागा। चलो ता
देखें।
गर-~-यही तो रख गये थे देवान यहो जगह है।

7
.
203'जासूस
ख-हाँ
थार लेकिन देखो खून गिरा है चलो यही दाग
देखते हुए चले जरूर मिलेगा।
कुछ दूर दाग देखते हुए जाने पर दोनों एक नाले के पास
पहुँचे । वहाँ जाने पर खडकू योला "बस अब क्या ! पछी उड
गया यार"
-क्यो । क्यों!
पड -देखते नही दाग अवनी ।
गा-तो वह मरा नही चहाने से मुर्दावना पड़ा था।
ख० नही यार सांस नही चलती थी । "मैंने हाथ की
नाडी तक देखी थी बन्द पडी थी । जरूर इसमें कुछ गोल माल
है देखो मेरेरो खडे हो रहे है।"
गा०- तो साफ क्यों नहीं कहते क्या मतलब है ?
उसा समय एक जगह से आवाज आयो--"खबरदार!
जयर । जासूस सार ।"
च खरक ने चोंक कर कहा-"वस यार वही है। देखो न
यहो उसने जून धोया है।
अरे यार वही भूत हुआ मर के।
न --फिर तुम पागल पना बकने लगे न ?
यही कहकर खडक हॅसने लगा। एक अोर से लच्छन भी
अपने साथियों सहित वही श्रा पहुँचा । यह जगह वहा गङ्गा
पार करने पर है जहा मंसी यसी है।
-

१२६ सोचक भेद बत्तीसका क्यान - , कोशिश करो। जय लच्छन अपनेसाथियों सहित श्रापाज की टोह में बहुत दूर जाने पर भी किसी को नहीं देख पाया तव घोला-"अच्छा अब मैं जाता हू फौन चिल्लानेनाना है बोलो नही नो मैं लौट पड़गा।" फिर आवाज अायी-नाना ! लौटो मत । मुझे छोडकर मत जाप मुझे काल के गाल से ज्वारो।" ल०--अच्छा तुम हो कौन ? "मैं हूं केशिनी।" लसो तो मैं श्रावाज से पहचानता हूँ लेकिन सामने आती काहे नहीं ? 'पार पाश्रो नाला पार।" अव भट लच्छन नाला पार गया। तो देखा कहीं कोई नहीं फिर बोला--"अव याती काहे नही " नावाज आयो-"कुछ खाने को दो भाई" अव यात असल लन्दन को समझ में आ गयी। मुंभ- बाफर बोला--"अरे पाजी ! तूही जा! जा! एक बार तेरा पीछा फरके देख चुफा हूं । तेरे पीछे कोन लगेजा।" यही कहकर लच्छन यहाँ को चला जहाँ लँग को छोड़ गया था वहाँ सडफू और गाडी चाले को देखकर पूछा- क्यों क्या हुआ ? यह लॅगढ़ कहाँ है ?" प

ORE जासूस
ख० -यह तो भाग गया। लेकिन जो चिल्लाती थी उ
को देख पाये?
ल०-अरे कोई खी विखी नहीं रही जी वहां तो।
ख० सय क्या चुडैल थी?
ल०-चुडैल नहीं वही तुम्हारा सांप का पोवा था।
ख०-अरे तो उस बदमाश को पक्रडा नहीं ?
ल-नाः
ख-श्रीफ । एक बेर और उस को कोई पकड कर लावे
तो उस को हम दो सौ कल्दार गिन दे ।
ल०-पास ही कहीं लगद है।
ख०---कौन जाने भाई कैसे वह भाग गया। मेरी समझ
तो कुछ नहीं पाता।
ल० उस को तुम पकडो तो हम आधा मन कलदार
तुम को देंगे।
-उस को पावें कहाँ हम ?
स०-यहीं अगल बगल में वह पडा है। फेशक ने उसको
पकड़ने के लिये दिढोरा पिटवाया है । यहाँ किसी के घर में
होता तो अब तक जरूर पकड गया होता । उस को पकडने
से खूय इनाम मिलेगा। समझे खडकू
और यह क्या करेगा?
इस को भी बडा तुम अपने साथ रसो। दोनों
श्रादमी मिल कर कोशिश करो। मैं गाडी ले जाता हूँ।"
अच्छी यात हे'कह कर सबने अपना अपना रास्ता लिया
.

कचक मेद
--
तेतीसका क्यान।
- अब खडकू
गा
पलीते में आग।
और गाडीवान दोनों एक साथ लॅगहूँ की
खोज में वहां से रवाना हुए। लेकिन थोडी ही दूर चलने पर
खडफू ने कहा "यार भूख वडो लंगो है पहले चलो कही पेट
भर ले तव और कुछ काम होगा।"
-मैं मी तो यही चाहता था। कलह रात को भी मुभो
खाना नसीय नही हुआ।
थव दोनों एक राय होकर खाने की टोह में चले लेकिन
रास्ते में एक जगह सून गिरा देख कर सडकू वहीं रुक गया।
कहा-"कहो यार शिकार तो मिल गया। श्रय पहले शिकार
मारोगे या खाओगे"
गा०-अच्छा अगर शिकार मिल जाय तो अच्छा है।
पहले सापज तो लोसाना फहॉ जायगा ?
"अच्छी बात है चलो तव पायो।' कह कर खून का दाग
देखता पउफू चलता हुआ।
कुछ दूर आगे जाने पर पून के दाग तो नही मिले लेकिन
यह घरावर अटकल पर चला गया। रेल कम्पनी की एक
गुमटी सामने मिली। उसके पास ही एक गोदाम दीरा पड़ी।
पाक को मालूम था कि रेलवे गेंग याले पुली उसमें अपना
सम्पलगता आदि औजार रसा करते हैं।
।

* जासूस:
खडकू ने अटकल किया कि उसी में या आस पास लॅगटू
कही छिपा है गाडीवान की भी राय मिल गयी। अब दोनों
उस घर की तलाशी के लिये तुरत कोशिश करने लगे। खडक
ने कहा- "देखो वह आदमी ऐसा वैसा नहीं है। जैसी ही
अकल और चालाकी उसको है वैसी ही ताकत भी है। खबर.
दारी से खूब होशियार होकर यहाँ रहना होगा। तुम यहीं
रेहो । चारों ओर नजर रखो मैं जरो अन्दर जाकरदेख आऊ ।"
"अच्छी बात हैं। यहां की चिन्ता नहीं मैं खबरदार हूँ।"
जव गाडीवान ने कहा तव सड़कू वहाँ से बहुत धीरे धीरे पञ्ज
के घल गोदाम की ओर चलता हुआ।
लेकिन रोक कर गाडीवान बोला-"तुम्ही यहाँ ठहरो। मैं
जाता है देख पाऊगा।"
इस तरह दोनों में वहस हुई । लेकिन अन्त को गाडीवान
का जाना ठीक ठहरा। वही गया। वहाँ पहुँच कर उसने फटी
दीवार में दरार से देखा तो भीतर गगट्ट सोया है। और डाइना
माइट और पलीता रया है। गाडीवान ने पहुंच कर खडकू
ने कहा-"यार मामला तो तैयार है कहो तो घरके साथही
उसको भी उडा दें यह जो चारूद खाना है इसी में वह
बैठा है।
ख०-यात तो तुमने ठीक विचारी लेकिन बडी सघरदारी
से काम करना होगा। यह बडा सङ्गीन मामला है। जव में
पहरे पर है यहाँ।
"सो तो बनी यात है।" कह कर गाडीवान गोदाम को
गया। दरवाजे पर जाकर उसने जोडा खोला। उँगली से टेलते

- । ६चक भेद १३३ ही दरवाजा सुगमता से खुल गया। श्रय गाडीवाला भीतर जाफर घात विचारने लगा। घात ठीक करते उसको देर नहीं लगी । झट उसने पलीते का घण्डल उठाया और बारूद भरे कनस्तरे से उसको मिला दिया। फिर उमे उभाडता हुआ बाहर गया । झट खडकू के पास जाफर काँपता हुआ घोला- "कोई आदमी तो नही आया न ?" ख०-आया कोई नही लेकिन इतना कांपता क्यों है। काम फतह कर आया या नहीं ? : "कांपता मैं कहाँ लेकिन यार उस गोदाम में दामी चीजें रखी है । सब उड जाने से बडी सनसनी फैलेगी । इसीसे तुम से पूछने आया। पकडते के लिये चारों ओर धमा चौकडी होने लगेगी । अब सब ठोक कर के आया हूँ। पलीते में भाग वेने की देर रह गयी है। निपटाते आनो मुझे भूख बहुत लगी है। -ख-तो उसको किसके वास्ते छोड भाये हो यार जाप "तो जाने दो रात को यह काम होना अच्छा है।" सतय तो पछी उसमें से उड जायगा। "पछी उडने का नही है। उसके डेने टूट गये हैं बडा जनम हो गया है । डाकुर के बिना यह श्राराम थोडे होगा।" • अरे यह सब कबिलांव छोड़ दे। जा आग लगाताआ। "तुम्ही क्यों नही जाते । जार" बहाँ अगर तुमसे नहीं बनेगा तय मैं जाऊगान . ख- 4 ४ करूंगा क्या? १

-
- जासूस
"जो असल काम था वह तो मैं कर आया।"
ख०--इसी से तो कहता हूँ। तुम्हारा जाना वूझा है।
आग देकर सब निबटाते आओ।
अप गाडीवान वहाँ से धीरे धीरे चला। मौके पर पहुच
कर उसने जेब से दियासलाई निकाली और चारों ओर ताक
कर उसकी बत्ती घिसने लगा। एक बार पत्ती भन से अली
फिर हवा से बुझ गयी-"श्रीफ यह काम हमारे किये न
होगा" कह कर उसने दियासलाई की बत्ती पलीते पर फेक दी
और आप दौडा हुआ साथी के पास पहुच कर बोला-"आग
तो लगा धाया यार।'
अब दोनों वहा से पार होकर स्टेशन को चलते हुए।
चौक पर पहुँच कर उन्होंने हौली देखी। उसी में घुस कर
साने पीने लगे। बेचारे परोपकारी लगट की जान लेने के
लिये यह सब जो तैयारी हुई उसकी कुछ भी खबर उसे
नही हुई।
--
कतिासका छयान
-
--
दाना पानी।
लेकिन गाडीवान ने जो बात सोची थी यह नहीं
दुई। उसकी समझ में दियासलाई की बत्ती बुझ गयी
लेक्नि लवर बुझ जाने पर भी उसकी नोक पर जो आग थी
चदी काफी हुई।

TA
चक भेद
आग अब पलौते पर चढने लगी। बेचारा लॅगटू नीद में
बेखबर पडा था। उधर पलीतालता चलता वामद भरे पीपे
के पास पहुंच गया। तो भी लॅगष्ट्र को उसकी कुछ खबर नहीं ।
-एक चूहा बिल से निकल कर बाहर चला । उसको नजर
भी उस लपकती हुई आग पर पडी । वह डर कर यहाँ से
फिर बिल में जा घुसा। वेचारे लॅगटू को दिल में घुसने की
चिन्ता नहीं न उसको इस महा विपत्ति की कुछ फिक्र है।
इसी समय वीर बालक दमडी यहाँ श्रा पहुंचा। उसने
एकही नजर में सबलीला समझ ली। देखा तो जरा देर में
महा अनर्थ होता है। झट दौड कर उसने दातों से पलीता काट
लिग ।'आगे बढ़ती हुई श्राग धुझ गयी लेकिन दमड़ी की जीम
पर जलाम हो गया।
लँगढ़ की प्राण रक्षा करने मे दमडी के मन में घडी
खुशी हुई उसने थूक कर मुह साफ कर लिया। उसकी इस
हरकत से लॅगटू की नीद खुली सामने ही दमडी को
देख कर मुसकुराने लगे। दमडी ने पूछा-चोट आपको
पहत लगी है न
ल०-हां पचा उस बदमाश सडकुत्रा ने घडी मार मारी
यो मुभो।
"मारने में तो उसने मुझे भी फसर नही की लेकिन मैं
धोखा देकर भाग गया।"
लैं-अच्छा मुझे क्यों और कैसे मारा उसने मुझे तो उम
घडी होश ही नहीं था । अव दमडी ने सय कथा लॅगढ़ से
उसकी कह सुनायी और कहां-"यह तो मैंने समझ लिया

जासूस ..
था कि आप थोड़ी ही देर पर होश में बाजायेंगे इसी पास्ते
में उनको धोखा देकर दूर ले गया था।"
इसी समय लँगह की नजर यासद के पीपे पर पडी योले
"इस पर जरा सी चिनगारी पड़े तो सब स्वाहा हो जाय
देखते हो?"
द. जी हाँ हो तो सब तैयारी थी। अभी मैं आया तो
पलीता जल रहा था।
"अरे यह क्या कैसे हुआ यह अनर्थ ?"
यही कह कर लॅगटू बड़े अकचकाये । अव दमडी ने सब
कहां और अपनी काररवाई.तथा जीभ जलने की बात
भी सुनायो।
लॅ० अरे तब तो दुश्मन यहाँ भी आये रहे मुझे मार
ही डाला था।
द०-और नही क्या । कुछ कसर थी थोडे ।
लॅ०-तू तो सयोग से भागया नहीं तो अब तक क्या
का क्या हो जाता?
द० -अब तक तो कहाँ न उड़ गये होते।
लॅ०--तप चेटा तुम ने तो आज मेरी जान बचा ली।
द-मैं कौन चीज हू चावा। भगवान ही सबकी रक्षा
फरता है। उसीने मुझे यहाँ इस अवसर पर भेजा है।
लॅ०-ओफ ! परमात्मा मुझे मरने में तो कुछ वैसा
नहीं था लेकिन बेचारे प्रताप की क्या गति होती ? वह तो
खतम हो चुकता।
३०-तो क्या समझते हैं कि प्रताप पतम नही होंगे।
a

चक्र भेद
उनको तो परसों फासी होगी न ? पर आप कैसे यचायेंगे
उनको ?
लॅ०-नहीं वेटा मेरे जीते जी प्रताप को फाँसी नहों
होने पावेगी।
अगर
उठ बैठेगा।
तष?
दु०-आप अब क्या करेंगे? खुद हो तो इस हालत में
लॅ०-नहीं वेटा ! मेरी हालत वैसी खराब नही है
भने तो थोडा पानी और कुछ खाने को ला दे तो मैं अभी
द-लेकिन मेरे जाने पर बदमाश कोई और श्राफत डालें
ल-अव मैं तैयार हू तुम जाव ।
'द०-तो मैं श्रादमी नहीं बुला लाऊँ मदद के वास्ते ।
लॅ-नही बेटा! शोर गुल करने की जरूरत नहीं है। हम
को पकड़ने केास्ते इश्तहार वटा गया है न ?
द०-सो तो मालूम है।
ल-मालुम है तो जा पहले ना पानी ले आओ
पिस्तौल हम को देते जार।
अप दमड़ी लँगटू के हाथ र पिस्तोल देकर श्राप
पतासका क्यान
चतता हुआ।
ढलोपल ।
जानसेनगज की होली में आज पियाडौ की यही धोंगा

१३८ - जासूस मस्ती हो रही है। कभी ठठाकर हसने के मारे 'छतफटी पड़ती है। वभी रोने के मारे कुहराम नजर आता है। कभी शोर गुल के मारे महल्ले वालो को कल नहीं 1 दुकानदार का लडका छयला जुरफो में बेले का तेल लगाये, लखनौत्रा दुपलिया वृटेदार टोपी डॉटे, चिकन का कुर्ता पहने पान चबाते हुए ग्राहकों का मदिरा दे रहा है दूसरे चौतरे पर गजक और चिखना का ठाट है इसी समय एक और लौडा उसके सामने दूर ही खता होकर कुछ इशारा करने लगा। उसने दाहिने हाथ की तर्जनी दोनोश्रोठो पर रखकर चुप २.ने का इशारा किया और बांये हाथ से भीतर का कमरा दिखाया जिस में बैठे दो पियक्कड़ ढलोअल कर रहे थे। दूकान वाले ने विगड कर म्हा-"अरे कौन हो तुम.! इशारे बाजी का क्या काम है। मुँह से साफ बोलते फाहे नही ?" उस ने और पास जाफर जेय से एक कागज दिया । दूकानदार का प्रोध उतर रहा था । कागज पढ़ कर बोला- "अरे यह इश्तहार तो हमने पहले से देख रखा है। यह क्या दिखाते हो हमको ?" "देखने नही । एक हजार का इश्तिहार है ? दू०-हा लेकिन जो लगटू को पकड़वा देगा यह न पावेगा एक हजार ? "पकडवाना मुश्किल नहीं । तुम जरा सम्हल कर चलो और अफल से काम लो तो मैं उस को बतला दे सक्ता ।" दू-तो तुम्ही क्यों नहीं पकडघाफर हजार मार लेते जो हमको घतलाते हो? -- . - 1 -

।
4चक भेद
, "वह इस वक्त तुम्हारे घर में है मैं कैसे पकडाऊँ।"
दू-मैं ने तो सुना था यह पुलीस में गिरफ्तार हो
कर मर गया है।
"वह सब गप्प है। मैंने अभी उस को देखा है।"
दू-कब देखा है कहाँ?
"दस मिनट पहले देखा है।"
दू-सचमुच
"विलकुल सच जैसे सुरज का उगना सच्च वैसेही उस
1
१
को मेरा देखनी सच है।
।
दू-तुम्हारा मकान?
"मकान मेरा भूसी में है।"
दूनाम
"नाम लेकर क्या करोगे मैं तो भी तुम को दिया
देता
दू-मुझे इस बात पर विश्वास ही नही होता !
में पहचान करा कर पकडा दगा। इस पर भी विश्गस
नही होता"
दू. 'तुम ने कभी उसको देपा हे।"
"हां देखा है। अच्छी तरह पहचानता हु
अय हजार के लोग में विभोर होकर दुकानदार लीडा
अधीर हो गया। बोला- तो फैसे पया करना होगा यह तो
पोलो" "अच्छा जमादार कहाँ है ?"
दूर-पालही तो है नाफे पर ।
"उसी को कहने से काम होगा।"
-

- +08 जासूस दू०-अच्छा तुम जाव मेरा नाम लेकर जमादार को बुला लाओ। "अच्छा मैं जाता हूं लेकिन एक बात याद रखो । वह बड़े घात से बोलेगा। विलकुल पीर नावालिग होकर बोलेगा। तुम उसको चालवाजी में भूलना नहीं । समझा ? वह आदमी वहां से चल पड़ा। थोड़ी देरं पर जमादार के साथ लौट आया। इनाम के लोभ में जमादार भी फूले नही समाते थे। उन्हों ने भी समझा कि हजार पर हाथ मारेंगे। दरजा भी बढ़ेगा। जब जमादार होली में पहुँचे । दूकानदार के साथ उस लोडे ने एकान्त में सलाह को । अव तीनों का गुट्ट हो गया। जमादार उस कमरे में गये जिस में पियक्कड मस्ती कर रहे थे। इसी समय सयोग से खडक दरवाजे पर आ गया। वह ज्योंही लौंडे को देखा उसे यह कहता हुआ दौडा-"अरे ! सांप का पोवा" जो लोग ध्यान से यह मामला पढ़ रहे है. उन्हों ने जरूर पहचाना होगा कि यह साप का पोवा वही दमडी था। जिसको लंगटू ने खाना लाने को भेजा था । वह जब शहर में आया । जानसेनगज में होली के सामने पहुचने पर उसने पियकडों की धमा चौकडी सुनो और कुछ देर खड़े होकर मन में सोचा-" इन बदमाशों को यडी खुशी हो रही है । मानो किला फतह करने की सुशी में दलोअल कर रहे हैं । यहाँ इन बदमाशों को इही के फन्द में फसा देने का अच्छा अवसर है। यही सोच कर यह दूकानदार के सामने इशारेबाजी करने गया था। उसके बाद को सब बातें तो ऊपर लिखी जा चुकी हैं - -

"
चक्र भेद
'अब दमड़ी को पकड़ने के लिये खडकू झपटा तभी
जमादार ने उसे गिरफ्तार करके हथकड़ी भर दी?
दमडी ने कहा-"भीतर एक और है उसके नाम भी
पारएट है उसको भी गिरफ्तार करो जमादार साहब ।" अब
जमादार खडकू को दुकानवाले के हवाले करके गाडीवान को
पकडने चला। वह घबराफर खिडकी की ओर भागा।
"अंदं कहा जायेगा बचा? धन का गीदड जायगा किधर
बस यही कहता हुआ उसे भी पकडलिया जब जमादार बाहर
आये खडकू ने कहा--"मुझे फिस कसूर में गिरफ्तार करते
हो जमादार?"
लेकिन सचमुच खडक के अपराधों की गिनती नही हे
वह कई बार जेल जा चुका है । उस दांगी के कसूर की गिनती
कौन करे तो भी डॉट के साथ उसने जमादार से कैफियत
माँगी । लेकिन धैलान कूदा फूदी गोद की मसल हुई। दुकानदार
झट योल उठा- 'यह देयो इश्तहार तुमको पकड़ने के धास्ते
एक हजार का इनाम है।
अब तो सडक जोर से पडफने लगा पोला-'पार में।
आँख तो है नहीं पकडने चले हो तुम लोग।मै लॅगह नही है
अगर चाहो तो मैं लॅगटू का पता दे सकता है।"
द०- मैंने तो कहा था न फि घामट इन्कार करेगा।
ख० ओ हो! समझ गया साप का पोवा यह सवतेरी ही
चालाकी है क्यों?
६०-हा! हां पापा तुमको कौन नहीं जानता ?
त्र-तू तो जानता है कि में लंगर नदी 'फिर पर्यो
ना भट का जहाज तयार कर रहा है ?
।

• जासूस
द०-लॅगटू नहीं तो कौन हो तुम ? अव लगे हवा, देने
हमी को
ख०-अच्छा जमादार साहव ! मैं चलता लेकिन इस
लोडे को भी थाने में ले चलो आप।
जमा०-क्यों उसफा क्या कसूर है ?
ख-वह झूठ बोलता है जमादार जी ! मैं साधू तो नहीं
हूँ मैं विलकुल बेगुनाह भी अपने को नही कहता लेकिन मैं
लगह नहीं है।
जमा०—वह जवाव और सुबूत तुम इजलास पर देना।
प०-अच्छा आप इस लौंडे को भी जरूर ले चले।
जमा०-अच्छा उसको भी ले चलेंगे।
द०-देखिये जमादारजी ! हमने पकडा रिया है इसी से
अदाश्त करके बातें बनाता है आप इसके फन्दे में मत आइये।
एक बात और है यह बडा दतकटहा है। घात पाते ही काटेगा।
देखिये दॉत पीसता है अब !
जमा०-इसमें फन्द फरेव कुछ नहीं तुमको गवाही तो
देना ही होगी कि यही लॅगह है:
'वह तो महल्ले में जाने पर सब लोग पहचान लेंगे।
पवरदारी से रहना वह काटे नही
यही कहकर दमडी
घडी,तेजी से भाग निकला। जमादार को उस पर विश्वास
हो गश था और दमडी ने अपना पीछा करने का अवसर भी
नही दिया। इस कारण अब खडकू को हो लेकर थाने को चले
उ दमडी खाना पानी लेकर अपने वाया के पास पहुंचा।
चाचा बहुत देर होने से भूप के मारे छटपटा रहे थे।
३
1

१४३
संचक भेद
छत्तीसकर बयान
k
सङ्गीन काम।
दमडी का लाया हुया आहार पाकर लंगर कुछ ठीक
हुआ। दिन भर उसने वहीं काट डाला । जब रात हुई ।लॅगट्ट
का मुंह गम्भीर हो आया । मन में सोचने लगा-"वेचारे प्रताप
की क्या हालत होगी। क्या देर स्वभाव का सच्चा चेगुनाह
प्रताप शैतानों के चक मे पडकर फांसी चढ़ेगा ' ओफ ! क्या
धर्म की दुहाई दुनियां से उठ गयो । या भगवान क्या
करोगे ? मैंने इतनी कोशिश को उस बेचारे वेगुनाह को बचाने
के वास्ते इतना किया एक दिन सूत मिलने पर भी नहीं मिला।
उसको पाते पाने में वञ्चित रहा न जाने कहां गायब हो गयी।
अब तो समय नहीं रह गया। आज की रात और फरह का
दिन इतना ही रहा है। एक दिन और दो रात के याद ही
रेचारे को फॉसी हो जायगी। अव तो बिलकुल ना किनारे
आ गयी है।"
यही कह कर लॅगटू झट उठे और येष यदल फर बाहर
हुए। देखा तो आसमान में बादल है ! जान पडता है थोडो हो
देर में बरसने लगेंगे। रह रह कर यादलों में मिली हुई बिजली
चमक उठती है। उसी रोशनी में 'लॅगह का चेहरा देखकर
चमड़ी चौक गया। लॅगट्ट ने आस्मान की ओर देखा आप हो
आप कहा-"श्रो हो थर तो पानी घरमने को पूरी नेवारी है।
मच्छी बात है। पानी यरसने को इस मौके पर बड़ी जरूरत है।

-
जासूस
इस पानी वूवी में इस दुर्दिन में काम कर सकोगे हे मन !
तुम से बनेगा?
हाँ! हाँ। जरूर
बनेगा।
यही कहता हुआ लॅगटू टहलने लगा इसी समय दमडी'
को सामने देखकर बोला' देखो बच्चा आज एक सङ्गीन काम
करना होगा।
२० उसके हारते तो मैं सदा आप के प्रसाह से तैयारहूँ।
लेफिन पलीता दाँतो काटकर जो सहीन काम किया है
अफसोस श्राप को उसकी पता नहीं लगने पाया ।
लॅ०-नही टो। मुझे उसका पता तो लगा है जरूर ।
तुमने जो वहादुरी की है उसको कहीं और किये होते तो तुम
फो सोने का तमंगा मिलता और किसी राजा महाराजा का
होने से जागीरे मिल गयी होती लेकिन तुम ने तो एक गरीय
रमता राम की जान बचाई है जो खाली आशीर्वाद के सिवाय
और कुछ भी उदा नही कर सकता हमको इस मौके पर इसी
से इस घडी सन्तोष करना होगा बेटा।
दु-नही बाबा जी श्राप ऐसी बात मत कहिये हमारे
घर वंश में तो कोई रोने वाला भी नहीं है। आपही मेरे मा
थाप है । आपने जो शावास कहके मैरी इतनी पीठ ठोकी
इतनेही से मेरा पेट भर गया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिये।
मेरे लिये तमगा जागीर सब मिट्टी है।
शाचाश! बेटा शाबाश श्राज तुमने हमको दिखा दिया कि
दूसरे के उपकार के लिये श्रादमी कैसे अपना सर्वस्व अर्पण
कर देता है। अब मैं अपने काम में वैसाही है डेंटा रहूँगा। अष
"
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W

चफ भेद
१४५
या तो प्रताप को यचाऊँगा नही तो अपनी ही भाग में अपने
तई जलाकर भस्म कर डालूंगा वस और कुछ नहीं बेटारा !
चला शा मेरे पीछे आज तोको एक सगीन काम करना है।"
द०-लेकिन पाया मेरी बात माने तो मैं एक और
निवेदन कर।
लॅ०-८हो बेटा । कहो!
द:-मैं तो एक गरीय लडका । गरीव की बात और
कही का पंकनान यासी होने पर ही मोठी लगती है । तो भी
जब आप निडर फरते हैं तब पिता के सामने यश्चेको अपने मन
की बात कह डालना अनुचित नहीं है। मेरी राय है कि आज
माप विश्राम कीजिये। अभी आप बहुत कमजोर हैं ।
लॅ०-हां घेटा में कमजोर जरूरहूँ लेकिन एक ऐसी बात मेरे
मन में भायी है जिससे मुझे बडा यल हो पाया है। अब देर
करने का समय नहीं है। जरा सी देर में एक वेगुनाह की
नान जायगी । इमी से बेटा अब आराम या विश्राम का अवसर
नहीं रहा।
द-लेफिन ऑधी पानी तो घडे जोर का आता है।
लॅ०-अच्छी बात है आने दो मुझे एक चीज चाहिये।
द०-क्या चीज?
लैं-एक गैता और एक कुदाली ।
"लीजिये गैता और कुदाली" यही कहकर दोनों दमडी ने
मुहय्या कर दिया और पूछा क्या करे गे?"
ल० का खोदू गा ।
द० मुझे कत्र में देंगे क्या ?
लं०-नाना।

.
१४६
* जासूस
द०- अपने बाम्ते?
ल०-ना
द०-तब किस के वास्ते कत्र खोदेंगे?
ल- हमको एक लाश की जरूरत है।
द०-तो कत्र में से निकालना है?
ल० हां।
द०-चोट लगने से मगज तो खराब नहीं हुआ?
ल०-नहीं ! नहीं ! मैं काम करने चलताह मगज खराब
नहीं हुआ है।
द्० हां ! हां ! समझगया इसी से तो मैंने आपको गैता ला
दिया है"
श्रय दोनों अपने काम को रवाना हुए।
सतीसको ब्यान ।
hi
बुढ़िया की लड़की ।
और दमडी दोनो कब्रिस्तान में पहुंचे। वहां
दमडी का कलेजा कांप गया। उसने कहा-"यहां आप भूतों
में आये हो घावा ?"
लॅ०-तो इस में क्या हरज है येटा ?
द०-मुझे तो घडा डर लगाता है।
ल-डर काहे का बेटा! यहां तो सब मुर्दे पड़े है जो
जहान से विदा हो चुके । जिनकी यहां मिट्टी देह' पडी है उन
JAP

३१७
की चक्र भेद
से डर काहे का। मच्छड चीटी तो तुम्हारी देह में तकलीफ
मी पहुच सकते हैं लेकिन इन मुर्दो से क्या हो सकता है।
द०-काहे ! अगर इनमें से कोई निकल कर खडा
होजाय तब?
।
लॅप-तो क्या तुम भूत प्रेत पर विश्वास करा हे वच्चा ?
द०-मुझे तो आपही पर विश्वास है वाया ! आप जो
कहें सो में करू । अरे ! कौन मेरी देह पर हाथ किसने रखा।
इस समय दमडी के रोएँ खड़े हो गये। लगट्ट ने कहा-
"ना वेटा तुम को आगे जाना नही होगा । यही खडा रह।"
लेकिन दमडी ने नही माना न उसको तसल्ली हुई । साथ
ही साथ चला थोडी ही देर में खडकूने एक कनखोदी और कुछ
हडी गुडी एक बोरे में भर कर लाया।जर कब्रिस्तान से दोनों
बाहर निकले दमडी को कुछ साहस हुआ । उसने बोरा गुरु
के
हाथ से लेकर अपने फपार पर रखा । और दोनों अपनी जगह
पर जा पहुँचे । लेटते ही उनको नोंद आ गयी।
जर ऑस्ने खुली तप दिन यहुत चढ पाया था। दोपहर
को लॅगहू ने दमडी से कहा-जेलखाने से सबर लाना होगा
-
।
"यहुत अच्छा जाता हूँ।" कह कर दमडी यहाँ से रवाना
हो गया।
जाते जाते दमडी ने देखा एक जगह एक बुढ़िया सडक की
पटरी पर जडी बूटी रखे बेच रही हे थोड़ी देर पर एक लडकी
उसके पास पहुंची। उसको देखते ही घुढिया बोली-"अरे तू
कहाँ फिरती है रे॥
,

१४८
-naजासूस
लड़की चोली - "मो से कहे रही कि यहाँ बैठी है कि
मैं सपना देखती हूँ?"
बु०-हुआ। हुश्रा ! बन्द कर अपना मुह ! हमारा मांस
खाने गयी थी मु करियहो।
ल०-ऊँ ! ऊँ ! हमसे चला नहीं जायगा। अमा । रेल से
चली चलो।
चु०- चला नही जायगा तो खा जायगा । वढियां बढ़ियां
माल गटकने को तो बडी तेज चलने की बेर नाकी देती है।
हरहेंगा को परुमा पगुरी को रथ १ अब तक की- कभी घर
पहुँचगयी होती । दूकाने ढूंढ रही हैं जानो ।
ल ना अम्मा । मैं दूकान नही जेल में गयी थी।
व वुढिया दांत पीसकर चोली- "अरे तू जेल का करने
गयी रही रे ' तोको ओही जेल में जाना होगा देखती हूँ। जेल
में का मरने गयी रही।"
लु०-कल्ह फासी होगी न?'
बु०-फांसी होगी तो तोको का?
ल-जौन फांसी पडेगा उसी को देखने गयी रहीअम्मा ।
बु.-अरे चल चल रे मु करिखही चल नही एक हाड़
एक जगह नहीं रक्खूगी। जो एही बाबू जाते हैं इनसे पूछ
गाडी क्व आवेगी।
बुढिया की बात याबू ने सुनी एक मर्द के पास आकर
पूछने लगे-"केशव यावू किस गाडी से जाने वाले है ?"
"शहर से गाडी थावेगी कया ।
मा -पाच पज के पचास मिनट पर।
।

mi । - चक्र भेद १४६ अव केशव ने लड़की से कहा-"सुन लिया न ? जाब अपनी मा से कह दो ल-अच्छा शहर जाने के वास्ते गाडी कब प्रावेगी? बुंदिया ने सुन लिया था। बोली--"चल चल पैदल चल चलें अभी बहुत देर है। ल०-देर कैसे अब तो घडीभर भी नही है। बु०-अच्छा तो गाडी ही पर चलना में भी थक गया है। चलते चलते पांव में फोडे पड गये हैं। इहां दो रुपये का सौदा भी तो नहीं विका। बुढिया की अव बरावर नजर प्लाटफार्म पर हो रही गाडी आयो और हर हराती हुई निकल गयी तव बोली-"अरे घडी भर तो बीत गयी। गाडी नहो आयो। इसी समय सीटी बजी। बुढिया चोली-"हाँ पायी है गाडी।" "क्यों मामला पया है तू चकती क्या हे दु-चकतीनही शहर से जो गाटी आने वाली है उसी पूना धायेगी। "अरे दोनों गाडी तो साथ ही प्रागी। इसो गाडी में केशव चावू शहर जायगे।" बुढिया ने देखा कि उसकी बातें वह केशर कान देकर घूरता और सुनता है लडकी को डॉट कर बोली- अच्छा चल घरे विपतलोनी तो मालिक से कह फे पूर्व हरदो गुड़ पिलाऊगी।" दोनोयोर से गाडियां श्राफर अपडाउन जाटफार्म पर पाडी हुई थी । मुसाफिर चढते उतरते थे। फेशा याद भी प्रक और ओर खड़े रहे। किमो पर सवार नहीं हुए तब । 5 ।

M
-
१५०
जासूस
लडकी दौड कर बुढिया से बोली-“काठ की तरह खड़ा है अब
बढ़ता उत्तरता कुछ नहीं।"
बुल-अच्छा जाने दे। अबकी बार काल पाया है। अब
हमारे मामले में पड़ा है तब मरे विना नही रहता चल ।
इसी समय दो भले आदमी एक पुत्र वाली स्त्री को गार्ड।
से उतारने लगे। केशर उसकी और पीठ करके कुछ सोच
रहा था बडी आफत थी अगर केशव एक बार भी पीछे, फिर
कर देखे तो पहचान लेगा : बड़े सङ्कट का समय आया।
दुढिया ने लडकी के कान में धीरे धीरे कुछ कहा। लड़की
पूना के पास जाकर बोली-"श्रागे जाइये वह जड़ी बूटी वाली
आपकी उपकारिणी है।"
पूना ने आवाज पहचान ली। उसी समय वह जडी
बूटी वाली के पास गयी। वह इशारे से और पास बुलाने
लगी-जव और पास गयी तब तक गाड़ी खुल चुकी थी।
दोनों गाडियां चलने लगी। लेकिन जो पीछे खुली उसी पर
केशव कूद फर बड़ी तेजी से चढ़ गया।
अब पूना ने अपने साथियों को आगे चलने का इशारा
फरके कहा -"श्राप लोग आगे पढ़ें मुझे इस बुढ़िया से कुछ
बाते करना है।"
घुढ़िया बोली -"अच्छा हुआ जो तुम भागयी कहो
भरोसा तोहे?"
"आशा तो मैंने नही छोडी माई जव- तक सांस तब तक
पास पर जीती हु । देव भगवान को क्या करना है।" ।
थाज रात के प्रताप की रिहाई होगी।
.
-

जाता रहा।
कवक भेद
इतना सुनते ही पूना मानो आसमान से गिरी दुनिया का
पाँव पकड कर बोली--"आप कौन है ?"
"अरे तू लंगटू को नहीं पहचानती बेटी?"
पू-ओहो ! मैंने बिलकुल नही पहचाना धावा! तुम
जो कहते हो उस पर कभी कभी मुझे बडा सन्देह होता है
गा। लेकिन कल्ह जो कुछ देखा है उससे सब सन्देह
"क्या देखा है बेटी?"
पू०-जिसके वन होने के कसूर में उनको फांसी होगी
सीको जीता जागता देखा है
'कहा देखा है"
पू०- मैंने एक गाडी में सवार होकर उसको जाते देखा है।
'हो बेटी! ठीक बात है। अब तो तुम को तसल्ली
हो गयी
पू-इस बात की तो तसल्ली हो गयी कि यह जीती है।
मच्या हम और तुम दोनो इजलास पर हलफ लेकर गवाही
दें कि केशनी जाती है तब भी फांसी नहीं रुकेगी'
पूल-काहे बाबा
"अव तो कल्ह सवेरेही फांसी हो जायगी। अव समय
इन बातों के लिये नही है। इसके सिवाय तुम्हारी बातों पर
कुछ विश्वास नहीं होगा। हां एक उपाय है। अगर हम लोग
कल सवेरे केशिनी को किसी तरह हाजिर कर देतो काम
बन सकता है। लेकिन वह यात होती नहीं दिखाई देती
तो भी प्रताप को बचाना ही होगा।चाहे जैसे हो?
।

जासूस
पू०- तो मुझे पया करने को कहते हो यावा,!
चुढ़िया ने ऐसा भाव देखाया।मानो उसके हाथमें कोई डबी
दयासे भरीदे रही है। देकर बहुत धीरे धोली-"इसीवक्त इसमें
की चिट्ठी प्रताप के पास पहुचा दो देर हरगिज न होने पावे।
और यह जाहिर होना चाहिये कि रात के वहां पहरे पर कौन
रहेगा । कै श्रादमी पहरे पर रहते हैं। और जो कुछ पता लगे
सो हमको पाकर खबर देना।
इतना ही कह कर बुढिया उठी और अपनी लड़की के
साथ एक ओर चली गयी। पूना यहां से चल कर.
साथियों से जा मिली।
।
अपने
अहतीसका क्यान।
।
लॅगटू का वारिस ।
नैनी के सेंट्रलजेल में सन्ध्या के लोगों की पडी भीड हुई।
हुक्म ले लेकर लोग भीतर जाने लगे। याहर दालमोट, सेव,
चटनी श्रादि बेचने वालों की प्राधाजे तग रही हैं। एक
बूढा लम्बी सफेद दाढी लिये टहल रहा है।
इसी समय एक अच्छी पोशाक पहने जवान ने सामने
आकर बूढ़े को बड़े आदर से प्रणाम किया । बूढ़े ने पूछा
"भेट हुई उनसे"

चक भेद
१५३
बू-कहां?
"रास्ते में।"
वू-साथ में कोई और था।
"हां वही मूला बीयी थी।"
vo-बीवी रही या साहब ?
"चीवी रही। यीवी?"
बू-तो वह औजार सच लाये हो?
जी हा।
चू०- काहे दो।
अब उस जवान ने दो पिस्तोल और एक भुजाली दी
उन्होंने अपने कपडे में अच्छी तरह छिपा लिया जवान ने
पूछा-- 'इन सब का काम पडेगा।"
यू०-काम तो नहीं पडेगा लेकिन खयरमारी तो अच्छी
.
-यह शीशी कहा है?
"यह भी तो लाया है। आप का उपदेश और कथा सुनते
सुनते अगर नोद नहीं आवे तो यह योतल उसकी अचूक
या है।
डाढी वाले की सूरत देखकर लोग उसे परमहस का रूप
समझते थे। गले में माला, लिलार पर लम्या तिलक, शरीर
में पीताम्बर और पॉच में सडाऊ देख कर सब को श्रद्धा
होती थी लेकिन लडके के हाथ से जब योनल लिया तप
पहतां के मन म सन्देह हुमा ।
परमहंस ने कहा-"देखो चेटा। आज तुम को यहाँ

१५४ * जासूस आधी रात तक रहना होगा। और जो जो मैं ने कहा है उस में चूकना नहीं खवरदार।" यही कह कर वह बूढा साधू वहाँ से चला गया। लेकिन थोड़ेही देर में लौट आकर फिर बोला-"देखो बच्चा | आज हमारी तुम्हारी छन्त की भेट है।" "पयों काल बुला लिया। मौत ने टाँग पकड़ ली।" चू-नही घेटा ! हसी नही मैं ठीक कहताइ । जो कुछ तुम को समझा दिया है। पका रहना उस में । "कुछ परवाह नहीं ! मेरा दुनियां में कोई है नहीं पाया आपही मेरे सब कुछ है। श्राप के मरने पर में जीता रहगा। ऐसा आप मत समझियेगा। श्राप की ही रथी पर मै धरना देकर न मरूं तो मेरा नाम दमडी नहीं। वू-छि.छि बेटा ! ऐसी बात नहीं करमा मैं खूप जानता है कि तुम में साहस है। तुम इस शहर का भिलारी होने पर भी तृही लॅगढ़ का उत्तराधिकारी है। तू भिखमगा आदमी होकर लामो का मालिक है। इतना सुगतेही दमड़ी हसने लगा। बूढे ने कहा-"क्यों बेटा। हसता क्यों है, मेरी बात पर विश्वास नही । होता" द०-नही मेरा श्राप की बात पर विश्वास नहीं यह बात तो इस जिन्दगी में होने की नहीं है। लेकिन दमडी को आप लखपती कहते है। इसी से मुझे हंसी आती है। भला जो दमडी सडक का भिखारी है श्राप की कृपा नहीं होने से जो रास्ते पर कुत्ते की तरह फिरा करता वह लख- पतो होगा यह हंसने की बात नही है क्या ?

चम भेद
१५५
धूल-अच्छा अगर मैं आज मरा तो देखना एमडी लस
पती होता है या नहीं?
२०-अच्छा बाया । एक बात पतलाइये आपके पास
इतना रुपया है तब आप इस तरह खाने पदोस की तरह
क्यों फिरा करते हैं?
“वट यात किसी से कहने की नहीं है बेटा।" यही कह
कर बूढ़े ने दमडी को छाती से लगाया और "खबरदार रहो।
कहकर चलता हुआ।
उनतालीसा क्यान
.
जेल से बाहर।
भव हमारे पाठक बूढे को पहचान गये होंगे, वह लॅगढ़
इसी महात्मा के चेप में चागे बढा। चलते चलते एक जगह
जाकर देखा तो जासुसिनी मला पूना से बातें कर रही है
मूला बोली-"देखना खूष सम्हाल कर घबराना नही हिम्मत
नहीं खोना । खूब छाती पोढ करके काम करना होगा तुम्हारे
ही ऊपर बसा भरोसा है।"
पूछ-लेकिन कुछ गोखमाल हो जाय तय ?
"गोल माल कुछ नहीं होगा । लैंगटू की सलाह पर चलने
से ही विजय है वह नीति में जैसा चाणक्य है । काम करने
में भी उसको धनजय समझना।"

"
आसूस
"तम मै क्यों पीछे हटूंगी?"
मू-प्रताप भी वैसाही चौर है। लेकिन तुम कदराने खमी
तब तो नाव किनारे ही बोरदेगी।
पू०-मा! मा. अब मैं कादर नहीं हूँगो । इसी समय
मूला बोली-" लो आ गये धावा ।
अब तोनों ने वहाँ बहुत देर तक अकेले में सलाह को
उधर पारह कर घटा बजा। अब जेल के दरवाजे पर पहुच
फर उन लोगों ने भीतर जाने की परवानगी मागी । जेलर.ने
अझला फर पूरा-"कौन है भाई इतनी रात को यखेड़ा करने
आये तुम लोग?"
मू-नहीं साहय हम लोग वखेडा करने नहीं आये।
यह हमारे पुरोहित है। जिन्दगी के जो कुछ घटे प्रताप के
के बाकी है । उसमें यह उनको अन्तिम उपदेश देंगे।
हुक्म लाये हो?
मू०- साह विना हुश्म के कैसे आवेंगे लीजिये लीजिये
हुपम नामा।
अब जेलर उनतीनों को लेकर आफिस में गये । लेकिन
यहाँ बूढ़े का चेहरा देखकर बडे अकचकाये वह रूप पहचाना
दृया है लेकिन कहाँ देखा है इसको याद नहीं
यायो। उनसे
घोले-"मैंने आपको कहॉ देखा है यही ख्याल नही आता ।
बूढा वेपधारी लंगटू ने कहा-"देखा होगा
अब जेलर ने उससे तो कुछ नहीं कहा। लेकिन उन दोनों
स्त्रियों को समझाया--"आप लोग अपना नकली रूप उतार
असली चेहरा दिसाइये तो मैं आगे फाररवाई करूँ।"
"
-
7

चक्र भेद
१५७
जय उन दोनों ने अपने मुह पर से नफली चेहरा उतार
दिया तय मूला को पहचान कर जेलर घोले - "ओ हो! मुझे
नहीं मालूम था कि आप असामी के मित्र हैं।"
मूक-मैं किसका किसका मिन हूँ यह तो आप को मालूम
है। क्योंकि मेरा पेशा आप जानते है।
ao-हॉ यह बात तो मुझे मालूम है ।
मूक-यह भी आप को स्वबर हो गयी होगी असामी का
भला चाहनेवालों को विश्वास हो गया है कि जिसके खूनके
अपराध में यह पकडा गया है यह मरी नहीं जीती जागती है।
जे-हा यह मै सुन तो चुका हूँ लेकिन यह उन लोगों
की भूल है।।
अभी इस बात पर बहस करना बेकार है पयोकि आप
को आगे चलकर मालुम होजागा कि इसमें भूल उनकी नहीं
श्राप ही की है। सैर मैं अपने आने का कारण पतलाना
चाहती है। प्रताप के वारिसों ने मुझो उस स्त्री को हॅट कर
निकालने के लिये तैनात किया है।
जे-यह कय से मूला पीवी ?
मू०-जिस वक्त आपने मुझे पूना की तलाशी लेने कहा
था उसी दिन से
"जी नहीं उससे पहले से नहीं।"
अब जेलर ने पूना से पूछा--"याप क्या रात भर असामी
के साथ रहेंगी?"
पू०-हाँ जब तक उनको बाहर नहीं ले जाया जायगा
.
तब तक

8 जासूस
जे०-लेकिन एक बात कह देना चाहता हूँ तीन बजे
केशव बाबू आने वाले है।
पू०-वह क्या करने श्रावेगे?
जे-यह हमको मालूम नहीं है लेकिन उस समय शायद
आप वहाँ रहना पसद नही करेंगी इसी से मैंने कह दिया है।
अव पूना विगड कर बोली "तो मैं उससे पहले ही चली
जाऊँगी।"
"अच्छी बात है । आइये ।" कह कर जेलर ने चाभियों का
गुच्छा उठाया। उनके चलने पर मूला को आफ़िस ही में बैठे
देखकर पूना ने पूछा-"आप नहीं चलोगी?"
"नहीं मुझ से तो उनकी कुछ जान पहचान भी नहीं
और आपकी उनकी तो मुलाकात होगी उस समय मैं वहाँ
रहना भी नहीं चाहती अगर जरूरत हो तो मुझे बुला
लीजियेगा।
इतना जय मूला बीवी ने कहा तब जेलर बूढ़े और
पूना को ही लेकर चले गये । मूला श्राफिस ही में रहगयी।
अब उसके चेहरे से स्त्री का भाव दूर हुआ उसकी जगह
पर सूच साहसी दृढ सङ्कल्प पुरुप का मुह दिखाई दिया उसकी
आँखों से तेज की ज्योति निकलने लगी।
उन लोगों ने कैदी की कोठरी में पहुँच कर देपा भोतर
वाहर दोनों जगह दो पहरे दार यमदूत की तरह खड़े हैं। पूना
भीतर जाने पर अधीर हो पड़ी । लॅगढ़ ने उसका भाव समझ
लिया और पानी जो रखा था वही गिलास में दाल कर उसको
पीने के वास्ते दिया।
पूना पानी पीने लगी लेकिन घडा फडश्रा लगा ताप ने
-

1
पाहुत दिनों के बाद बाहर की साफ हवा पाकर पूरी तसरली
चक्र भेद
देखा कि पूना को मूर्छा पाया चाहती हे झट प्रालिद्गन
करके थाम्ह लिया कहा-"क्यों प्यारी ! यह तुम करतो
क्या हो
अब पूना होश में आ गयो। पहरेवाला यह दशा देखकर
बाहर गया। उसने बाहर से दरवाजा बन्द कर लिया। अब
भीतर बूढे पुरोहित वेद मत्र पढने लगे। उनका सिहनाद और
उपदेश सुन कर पहरे वाले भी मुग्ध हो रहे। सब कान देकर
सुनने लगे। इसी समय खट खट की आवाज आयी ।
पुरोहित यावा ने कहा- 'ओफ बडा गरम है । क्यों सिपाही
जय किवाड तो खोलो। गरम के मारे जान निकलती है भाई।"
जर पह दार ने दरवाजा खोला बाहर जोडीदार को
बोला जोडीदार बाहर का दरवाजा खोलना । यावाजी
हवा पाने को बराडे, में जायगे बडी गर्मी है।"
यही कह कर वह पहरेदार भीतर गया । बूढा ढलता
पडता बाहरी पहरेदार पर जा गिरा उस के पास क्लोरोफार्म
भरा रुमाल था वही उस की नाक पर रख कर इसे बेहोश
कर दिया। प्रताप ने भी अपने हायों भीतरी पटेदार की
अब लंगट्ट ने दोनों बेहोश सिपाहियों का मुह कसकर
पाँध दिया और दोनों को हथकडी कसदो।
इसी समय मूला ने पाकर कहा-"अब देर मत करो
सब दरगज खुल गये हैं । निकलो जल्दी ।"
अथ चारों उसी दम जेल के बाहर होगये । प्रताप ने
वही दशा कर दी।
-
-

१६०
* जासूस
हासिल की। सब के सब बाहर निकल गये कही कुछ खटका
या किसी तरह की रुकावट नही पड़ी।
"खडे नहीं होना । चरावर पॉव उठाते चलो" कहकर
लॅगह ने प्रताप का हाथ पकड कर घसीटा प्रताप कुछ कहने
को मुह खोलते थे कि लॅगटू ने कहा-"यहाँ घात नहीं करना"
इसी समय पीछे से किसी की आहट मिली। लॅगट्ट ने
कहा-'वस घरावर सीधे चले जाव । मैदान में एक रास्ता
मिलेगा। उसी को पकडे हुए आगे बढ़ते जाना। जहाँोड
मिले वहीं खडा होना मैं वही मिलूगा ।
वस प्रताप तेजी से चलते गये लेकिन लॅगट्ट यह देखने के
लिये खडे रहे कि कौन आता है।
जय वह आदमी पास आया । लैंगटू हाथ में भुजाली
सम्हाल कर पक पेट की आड में छिप गया। वह श्रादमी
पास से निकल गया। तब लॅगढू ने देखा कि वह श्रादमी
पहचाना हुआ नहीं है । अब लॅगट्ट ने कहा-"अच्छा
टुथा । अगर इस घडी केशव प्राता तो विना खून खराबी
हुए नही रहती । श्राज मैं उसको हरगिज नहीं छोडता ।
जय वह आदमी दूर चला गया। तब लॅगट्ट प्रताप की
टोह में झटपट वहां से रवाना हुआ।
जहा पहले बतलाया था वहाँ मोड पर पहुच कर देखा
तो कोई नही है। तथ उसने मुह से सीटी बजायी। जपाव में
धारे से कुत्ते की सी आवाज आयी। तम लँगह को तसल्ली
हो गई। थोडी देर में उमड़ी सामने आगया।
लॅगट्ट ने पूछा-"यहाँ किसी को देखा है यचा?,
०-दो देना है।
-
.

.
मौका पाने पर आपको सेय बात में कहगा। अभी प्राप
| pass danrrer yet डेजर या तुम इसी म किनारे चले
जाव और सूरज उगने से पहले ही बहुत दूर पहुच जाय।
चक्र भेद
लैं-किसको देखा है ?
दु-उन्ही प्रताप को देखा है और किस को देखता ।
लँ- कहा है।
--आगे हैं
ल-बलो यही मुझे ले चलो।
"आइये" कहकर दमडी मागे पढ़ा लगद पीछे पीछे चलते
ए । चलते चलते जाकर लगट्ट याया देखते हैं तो एक जगह
पत्थर की चट्टान है उसी पर प्रताप बैठे हैं । अ बूढ़े को देख
कर प्रताप ने कहा- अच्छा आप अब मुझे रतलाइये। आप
लॅ०-क्यों । आप मुझे पहचानते नही हे ?
- मैंने नहीं पहचाना लॅगढ़ बाया ने जो काम करने
को कहा था। वहीं काम आपने किया है।
लैं-यही तो कहता है कि तुम लैंगटू को पहचानते
Ho-योफ ! पापही लॅगटू बाया है ?
लॅ०- अब इल घड़ी बातें करने का अवसर नही है।
की आफत टली नहीं है यू डिड नाट पास you did not
"बहुत अच्छा।" कहकर प्रताप तेजी से रवाना हो गये।
उधर यन्दूकों के फैर पर फैर होने लगे।
अब वह मप सुनकर लगटू ने कहा-"महॉ मालूम हो गया।
भय विगुल बजता है। खून सरायी की मुर्त भागयो ।'
नही हो।
.

जासूस
चालासका याम
कन्धे पर हाथ ।
-
उतर जेलर ने जय श्राफिस में पहुच कर देखा । मूला गाल
पर हाथ रखे कुछ सोच रही थी। पूछने लगे-'यह रोहित
है कौन?"
"मुझे मालूम नही शहर से लोग लाये है कहते है उनके
घराने के गुरु है । अयोध्या से आये हैं।"
जे-अच्छा आप से इस मामले का क्या लगाव है सो,
मेरी समझ में नहीं पाता।
"मैंने तो आपको सब कह दिया।"
जे०-- अच्छी बात है। तो षया आपको याद है कि मैं ने
आप को पूना के कपडे के भीतर कोई कागज है या नहीं
इसकी तलाशी लेने को कहा था ?
'हां! अच्छी तरह याद है।"
- लेकिन वह कागज पूना के पास था और आपने
जान बूझ कर उसे छोड़ दिया। यह कागज असामी के हाथ
में पहुंच गया था।
"अगर आप को ऐसा विश्वास हे तब तो उसे हटाने का
हमारे पास कोई उपाय नही है।
जे0--गप को सरकार से तनख्वाह मिजती है न ?
"जी हां।"
जे०-मैं समझता है । आपने अपनी ड्यूटी पूरी नहीं की
उस दिन।'
-
1
+

चक्र मेद
"आप को जो समझ में श्रावे सो कोजिये मेरी समझ
में आप का मगज़ खराब हो गया है।"
जे-सो हो सकता है लेकिन मैं इन पुरोहित का पूरा
नाम पता लिये बिना तो जाने नही दुगा। मुझे सन्देह
हो रहा है।
"आज तो आपकी एंडी से चोटी तक सन्देह ही सन्देह
भरा है।"
' जेव-हां लेकिन इसका असल भेद भी तो सनेरे तक सब
को मिल जायगा।
"अच्छा पुरोहित गुरुजी के धार में या सन्देह आप
करते है "
जे--मैं समझता हूं यह मेरे यहाँ असामी था जेल
भाग गया है।
"तो यही सन्देह होता होगा कि यह असामी को
लेकर भागेगा"
जे-ऐसा उसका करना कुछ अचरज तो नही है लेकिन
यह काम कह देनाजितनासहज है उतना करना सुगम नहीं है।
यही कह कर जेलर कुछ लिखने लगे। मूला कुछ ही चुप
रह कर वहाँ से उठ खड़ी हुई । अब जेलर अपना लिपना पन्द
करके उन पर नजर डालने लगे।
मूला वही आफिस में चेहल कदमो कर रहो था। जेलर
बैठे लिख रहे थे। इसी रेखपरी में मूला ने भापट कर उनका
गला व्याया और क्लोरोफार्म से तर रूमाल नाक पर रख कर
बेहोश कर दिया। उसके याद जो घटना हुई सो हम पहले
कह पाये है।
-

१६३
08 जासूस..
मूला और पूना जेल के हाते से बाहर जाकर कुछ दूरी पर
खडी हुई । इसी समय एक ,लोंडे ने वहां पहुच कर कहा
-- "कुछ खाने को देगी माई ?'
पहचान कर स्त्रियों ने पूछा-"क्यों ठीक है सब?".
द०-हां आगे लादेय गाडी तैयार है। अब झट पट मूला
पूना को साथ लेकर चली थोडी ही दूर जाने पर उनको गाडी
मिली उसी पर सवार हो गयी । मूला ने ही याग पकडी और
यडी सावधानी से हॉकने लगी । सबेरा हो चला गाडी चलती
चलती एक अड्डे पर जा रुकी लेकिन वहाँ सर अभी
सोये पड़े थे। एक आदमी ने आकर गाड़ी पकडी। दोनों उतर
पडी! मला ने कहा-"सूब तेजी से चलो अब आदमी चारों
ओर हम लोगों को पकड़ने के लिये छूटे होंगे।"
पू.-तो क्या हम लोगों को गिरफ्तार कर लेंगे?
म०-हाँ पा लेने पर पकड़ेंगे जरूर। जो काम हम लोगों
'ने किया है उसके वास्ते कालेपानी की सजा होती है।
पू०-- कुछ परवा नही हमारे प्यारे को तो रिहाई मिल
गयी। फिर जो होगा उसको,भोगने के वास्ते में खुशी से,
+-
.
तैयार है।
M
मू-नही इतना डरने की बात नहीं है। दूसरे की गुप्त
जगह हम लोगों ने हृढ ली तव अपने लिये जगह नहीं
मिलेगी ? अव हम लोगों को-कपडे बदल लेना होगा। इस
रास्ते से आगे इधर से यह रास्ता अभी बन्द है इसी पर से
चलें।
कुछ दूर चलने पर पूना बोली- एक आदमी हम लोगों
की निगरानी करता है।"

?
.
चक भेद
१६५
मूल-कैने मालूम हुना
पू०-वह देखो छिप कर घूर रहा है हम लोगों को।
मू०-घूरने दीजिये। आप उधर ताको मत । चुपचाप
चली आओ। चिल्लाना उल्लाना कुछ नही ।
थोडी दूर आगे दोनों स्त्रियाँ चली थीं कि किसी ने पीछे
से आकर दोनों के कधे पर दो हाथ रखे।
इकतालीसा क्यान
असामी पनछुट्टी पर ।
चन्दूक की आवाज होते ही लॅगटू वाया प्रताप का हाथ
घर फर जबरदस्ती घसीट ले चले । दमडी भी उनके पीछे पीछे
चला । जव एक सुनसान जगल में पहुचे तर लॅगढ़ ने कहा-
"अब भी हम लोग बेखटके रिहाई पा सकते हैं। हम लोग
कानून से लडाई नहीं करते दुश्मन से लड रहे हैं। इन
बदमाशों ने तुम्हारी जान लेने को चक्र रचा है। पूना को देख
कर खून करने का वार कर चुके है ये शैतान उसके कमरे में
घुस कर क्लोरोफाम से बेहोश कर के अपना चक्र चला चुके
थे। अगर में उस अवसर पर नहीं पहुंच जाता तो उसकी
जान घर तक चली गयी होती।"
प्रताप के मन में जो जेल से निकलने पर कानूनी विषय
को चिन्ता से आगा पीछा हो रहा था उसी को ताड पर लँगह
यह बात कही । उसको सुनने पर प्रताप को पडा क्रोध
आया। योले-'थरे ! यह सब याते तो मुझ से पहले नही
ने

-
जासूस
कही गयी । थच्छा वह दिन श्रावेगा जय मैं इन शैतानों
इनकी करनी का फल दूंगा।
लँ-वह तो सब हो जायगो तुम घयराव मत चेन
धीरज धरो। मेरी ही बात नहीं और आदमियों ने भी केटि
को जीता जागता देखा है।
इसी समय दमड़ी भी पीछे नाहट लेने गया था दौड
हाफता हुश्ना श्राया। बोला-"हम लोगों के पीछे तो बाद
लगा है।
लैंग-सो मैं जानता हूँ।
द-अब मैं आप लोगो को डॉगी पर पहुंचाई
सुचित्त होऊगा । उसी एक ही में बैठकर आप मौके से उन
जाइये फिर जङ्गल में पहुच कर छिपे रहियेगा।
ल-अभी डोंगी है कितने
द०-अभी कोस भर है।
अब वे सब बडी तेजी से कदम उठाकर चलते गये।
थोडी देर बाद सीटी की आवाज आयी। लगट्ट ने कह
"पीछे श्राने घाले हम लोगों को देख रहे है।"
मालूम हुश्रा?
"देखते नही सीटी बज रही हैं। देखो दमड़ी अ
तुम्हारा काम आया।"
दु:-कुछ परवा नही याच मैं तैयार हूं। आप लो
चले में झाडी में छिप कर दे। कौन हैं सर । "
अब दमडी झाडी में छिप रहा। वे दोनों चले गये। थोड
देर पीछे तीन श्रादमी आये। जव झाडी के पास से श्रा
पढ़े तब दमडी ने उनको अच्छी तरह देखा लेकिन पहचा-
?

चकमेद
1६७
नहीं सका । अरे वह धीरे धीरे उनका गुप्त रूप से पीछा
करने लगा।
"
कुछ दूर आग जाफर वे तीनों सलाह करने लगे । एक ने
कहा -"हम लोग किस रास्ते पर आये है । एक आदमी
को तो मैंने साफ देखा है।
"अभी तो इनको भागे श्राधा घंटा भी नही हुआ । मैंने
जर ग्राफिस में पहुंच कर देखा तो जेलर का हाथ पॉच कसा
हुआ था। उसको झट पट खोल कर बाहर आया । उसी
दम दो दर्जन श्रादमी छटे हैं। चारो ओर तार दौडाये गये
है । तोपों की फैर हुई है । यदमाश गया किधर ?
दमडी ने आयाज से पहचाना वह केशव था।
" नही --यहयात नहीं जिसके मगज से इतना फरेय
निकला है यह ऐसा वैसा श्रादमी नहीं है। उसने चारों ओर
तैयारी किये बिना इसमें हाथ नहीं डाला है। असल यात
तो यह है कि लेग से हम लोग अट नही सकते है
उसके पास जरूर कोई जिन पिशाच है।"
। अावाज से दमडी ने पहचाना कि यह वही लच्छन था ।
केशव ने पूछा--"तो वह आदमी है कौन ।",
लॅ--कौन जाने भाई कैसे कहा जाय कि कोन है ?
केo-लेकिन जिस दिन मैं पूना को गिरफ्तार करने
गया । उस दिन उसने मेरा असल नाम लेकर पुकारा था।
है यह कोई भेदू नादमी जरूर ।
"तो क्या ?"कहकर लच्छन ने केशव के फान में कुछ कहा।
के.-मैं भी यही समझता है। मुझे यहुत दिनों से सन्देह
है कि यह वही है।

। +9 जासूस 10-तब तो यह बदला ले रहा है जाने दो जमर यही बात है। ल०-तो उसको काबू नही कर सकते। के.-- लखपती को कौनसा लोभ देकर काबू किया जायगा। ल:- हम लोग जो भेद जानते है उसको जानने के लिये मी तो वह लाखो दे सकता है। अघ केशव और लच्छन बहुत धोरे कान में मुह लगा कर गते करने लगे। तीसरा बोल उठा-"अरे यही सडाहोने से नो असामी पकडा नहीं जायगा। हम लोग ठीक रास्ते पर मा गये हैं। अगर अभी चलते होते तो उलको पकड लेते।" के०-ठीक कहते हो लच्छन ! अच्छा चलो किस रास्ते से चलना होगा? तीसरा चोला- वह जरूर शहर की ओर गये होंगे। उसी रास्ते से चलना चाहिये । के. -हा अच्छी बात है चलो चले। घस अब तीनों 'उस रास्ते पर चलने लगे। कुछ दूर चले जाने पर उस तीसरे ने एक आदमी को सामने देख कर कहा-"अरे शिकार तो यह है देखो ! देखो!" - अब तीनों छिप कर चले। इसी समय किसी की चिल्लाहट सुनाई दी। सय चौफ उठे लेफिन लच्छन बोला-"हां ठीक है चेही सव है।" अब लॅग और प्रताप ने भी उन लोगों को देख लिया । लॅगट्ट ने धीरे से कहा-"चे सब हम लोगों को देख रहे है "कैसे मालूम हुश्रा। यह जो चिल्लाहट सुनाई दी है उसी से ?" ज - . - जरूर।"

तरकीब कर रहा है।
"कैसे मालूम हुआ ?
चक्र भेद
लॅनही यह तो दमडी की आवाज है।
"तो क्या वे सब दमडी को पकड कर तकलीफ दे रहे है ?"
लॅ:-नहीं, यह तो अब शैतानों को भुलाने के लिये यह
इसी समय एक शौर तरह का शब्द हुआ जिस को सुन
कर लॅगढ़ ने कहा- यह पुलीस वाले नही खुद फेशव बाबू हैं
लें-इशारे से मैं समझ गया है। दमडी इशारे की
ही आवाज में बतला रहा है कि केशव दो और आदमियों के
साथ है।
"यह दो श्रादमी कौन पुलीस अहलकार है ?"
लॅ.-नहीं एक उनमें लच्छन है दूसरा उसी का साथी
"यह लच्छन कौन है?"
लॅ०-लच्छन केशव का दहना हाथ उससे भी वढ चढकर
पदमाश है। तुम्हारे ऊपर जो चक्र चला है वह सब उसी की
"तो ये , सव फिस हिम्मत पर हम लोगों को पकड़ने
ले०-यह सब भी ऐसे पैसे नही विकट शैतान है। और
लच्छन तो शैतानों का दादा है।
"अच्छा देखता न कि कैसे पकडते हैं वे सब हम लोगों
को ?" यही कह कर प्रताप ने अपना पिस्तोल सम्हाल लिया।"
लग-मेरी भी यही राय है। उन सभी को भी खया है कि
जान लेने देने का मामला श्रा पडा है और इसी तेयारी से ये
एक गुण्डा है।
शैतानी है।
-
आये हैं ?"
.
।

१३० 6 सय भी श्राये हैं। तुम्हारे ही मामले की बात नहीं है इनसे हमारा बहुत पहले का पाता खुला हुश्रा है। प्र०-तो आप इनको पहले से पहचानते है ? लॅ०--में बहुत बपों से इनके पीछे हैं। मुझे ये सब जासूस कहते हैं लेकिन यह खबर नहीं है उनको कि इनका ख्याल सोरहो श्राने सधा है। प्र०- तो पया श्राप सचमुच जासुस है ? लग- -यह सब बातें छोडो। जब काम सिद्ध हो जायगा तब असल यात सुन लेना। इस घडी तो में लॅगद चावा ही हूँ। १०-अरे यह सब तो पास आ गये चाचा व खयरदार हो जाना चाहिये। श्रय आमने सामने दोनों दल पहुँच गये। केशव भबू के गुण्डे ने कहा-"यहाँ से तो निशाना बहुत ठीक लगेगा। इनको मारने में कुछ भय नही है। करो फैर अव ।' के-मै भी यही चाहता हूँ। अब लच्छन ने ताक कर पिस्तौल छोड़ा। फैर के साथ ही लँगह चिजा कर गिर गया। साथ ही प्रताप से कहा- 'भागो भागो। तुम अपनी जान बचाओ।" प्र०-आप यहाँ मर रहे हो और मैं भाD यह नहीं हो सकता। ल-मेरी बात मानी देर मत करो। लेकिन प्रताप ने नहीं माना कहा-"ऐसा शैतान मुझे मत समझिये।" और पास चैठ कर पांच पर हाथ फेरने लगा और कहने लगा--"कहाँ लगी है चोट"- । .

तैयार थी। उसी पर सवार होकर दोगों आगे बढ़े। थोडी चक्र भेद १७१ अब पूताप पर ही लच्छन का फैर हुा । लेकिन पूताप ने लैंग के पायते पेठ कर देखना शुरू किया। इस समय तीनों कोई पञ्चीस फुट के फासले पर आ गये थे। अब लँगटू झट पट उठ खडा हुआ और पिस्तौल ताने हुए कडक फर घोला-"खवरदार आगे बढा कि खोपडी खतम्म !" लेकिन इसके जवाब में फिर पिस्तौल का फैर हुश्रा। तब लँगटू ने ताक कर अपना पिस्तौल छोडा और लच्छन तडप कर वहीं 'गिर गया। उसके दोनों साथी सहम कर खड़े लँगट्ट ने कहा- "देयते क्या हो ढोंढ़ । लच्छन हमारी तरह नकल नहीं करता चलो जी अब इन बदमाशों की नानी मरेगी। सचमुच अब ये दोनों लच्छन की सेवा सुश्रूपा में लग गये। और लॅगटू प्रताप को लेकर बडी तेजी से चलने लगे। कई घटे दौडने पर गहा का किनारा मिला वहाँ डोंगी दूर जाने पर लॅगह ने कहा-"श्रय नुम चले जाव- मजिल पर - हो गये। ये लोग पहुंचा देंगे। प्र०-और श्राप कहना मत टाला करो।" "मुझे यहां भूत पकडता है। हठ मत करो प्रताप । मेरा पु०-बहुत अच्छा लेकिन पूना कहाँ रही ? पूना के लिये चिन्ता मत करना वह मेरे जिम्मे है। यस उसी दम लॅगटू डोगी से उतर पडे । अथ धार पर कसमार पड़ने लगी और पनछुही तीर की तरह तेजी से . %D आगे बढ़ी।

- जासूस
गयी। अगर दूसरा होता तो हम लोग गिरफ्तार हो चुके थे
न? अब चलो बहन जहाँ तक बने जल्दी चलो।"
चलते चलते -जब दोनों आदमी एक मकान के सामने
पहुंचे। मूला ने कहा-"यहाँ थोडा आराम कर लो बहन ।"
यही कह कर वह दरयाजा खट खटाने लगी। एक बुढ़िया
किवाड पोल कर बाहर आयो । उससे मूला ने कान में कुछ
कहा और आप पूना को लिये हुए ऊपर वाले कमरे से
चली गयी।
कमरा साफ सुथरा था श्रासन भी बैठने को मौजूद देख
फर पूना के मन में सन्देह हुआ कि यह कौन जगह है। यह
स्त्री भुला कर किसी खराब मतलब से तो नही ले आयी है।
इसी समय वह बुढिया दोनों के खाने को ले पायी'। खा
पीकर पूना ने पूछा-"यह मकान क्या आप का है ?"
"नहीं मेरा नहीं एक जालिया श्रादमी का यह मकान है।"
-अरे बाप रे! कैसे मुझे ठीक समझ में नहीं आया।
मूक-तुमको कुछ सन्देह होता है क्या वहन मुझ पर ?
पू०-ना, ना! श्राप ऐसे परोपकारी पर मुझे सन्देह
हरगिज नहीं हो सकता । लेकिन जो यात मेरी समझ में नहीं
आती उसको पूछना तो उचित है न
मू-जरूर पूछ लेना चाहिये । यात ऐसी है बहन कि
यहाँ जो श्रादमी रहता था वह नकली नोट बनाया करता था।
वेष बदल कर मैंने उसको पफडा था। अब यह जेल में है
लेफिन अपना घर द्वार मेरे ही जिम्मे फर गया है।
पूछ-तो यहा किस मतलय से प्रायों?
* उस नकली नोट घाले का मामला आगे छपेगा।
.-
-

m
चक भेद
१७५
'. यहां किसी तरह का डर नही है।
पू०-क्यों।
"क्योंकि सब लोग जानते हैं यह मकान पुलीस के जिम्मे
"है । इसने पुलीस ही के नौकर सोडी पहरेदार की तरह रहा
करती है। इस वास्ते कोई नहीं आता। और हम भी जव
तुमको और प्रताप को ये कसूर समझे हुए हैं तब न यहाँ
लाये है नहीं तो किसी अपराधी को यहाँ आने थोडे दिया
जाता है।"
तेतहालीसका क्या
-
जासूस साँवल सिंह।
उधर सवेरा होते ही शहर भर में प्रताप के जेल से भागने
की खबर विजली की तरह फैल गयी। पायनियर, मार्निग पोस्ट
और इण्डियन यूनियन आदि सय असयारों में इस घटना का
बयान छुप गया । हाट याट, घर घाट धुनसार सब में यही
वरचा होने लगी कि फॉसी से बचने के लिये जूनी प्रताप
नेल से भाग गया। जब उसने किसी तरह से कुछ उपाय
वही देखा तय इस दङ्ग से उसने अपनी जान पचायो।
किसी ने कहा-"इस तरह भाग कर कोई अहरेजी राज
ने कहा जा सकता है ? जरूर एक न एक दिन पकड जाकर
तेफली पर चढ़ा दिया जायगा।"
.

१७६
+28 जासूस
किसी ने कहा-
नहीं यार पांडेचेरी या चन्दरनगर
भाग जाय तो जान बच जायगी उसको कोई नहीं पा सकेगा।"
किसी ने कहा-"सुना है कि नेपाल में भी भाग जाने पर
अग्रेज सरकार का वहां अख्तियार नहीं है।
एफ ने समझा कर कहा -"श्रजी अलियार क्यों नहीं है।
यात यो फि जो क्सृरवार भाग फर यहां जायगा तो जैसे यहां
सीधे पकट लेते है वैसे नहीं पकड सक्ते । वहां की सरकार
को यह सरकार लिगी तब वह सरकार गिरफ्तार करके
इस सरकार के हवाले फरेगी। मतलव यह फि गिरफ्तारी में
देर होगी लेकिन वहां जान से रिहाई नहीं हो सकतो"
यही सर्वत्र चर्चा थी लोग रात का हाल सुन कर दांतों
उँगली दवा रहे थे। राजा होटल में आराम कुर्सी पर बैठे अच्छी
पोशाफ में एक अक्षर घराने के यावू अखबार पढ़ रहे थे।
उनके ललाट पर कुन्तलीन तेल की बसी हुई चौरुखी पट्टी
उनकी कमीज के गिनी सोने के चम चमाते बटन, वालों की
नोक पर जड़े हीरे की चमक, उनके दहने हाथ की अनामिका
की बढिया श्रावदार नीलम जडी अगुठी, उनकी कमर के नीचे
फरस डॉगा की ब्लू किनारी वाली भूनी धोती, उनके पांव का
डासन कम्पनी वाला सुबुक खुरी का जोडा, गले में जडाऊ
गोप देखने वालों को अच्छी तरह बतला रहा था कि यह
घायू फलफत्ते के टागोरफेमिली के होंगे या किसी राय घराने
के भूषण होंगे अथवा राजा पद्योत कुमार के नातेदारी में होंगे।
वह ऊपर से तो अखबार पढ रहे थे लेकिन पासही चैठे
चार आदमी जो रात के पूताप के भाग जाने की बात पर
बहस कर रहे थे उन पर उनकी कनखी चल रही थी।
.
+

चक्र भेद
इसी संनय उनको नजर एक दुबले पतले आदमी पर
पड़ी। अखबार पढ़ने वाले यावू ने उसे अक चफा कर देखा
और जेब से एक फोटू निकालकर मिलाया ।
मिलाने पर बाबू को बडा प्राश्चर्य हुआ। थोड़ी देर पर
वह दुबला पतला जवान उठ कर वहाँ से चलता हुआ। बाबू
भी उसके पीछे नजर बचाकर चले ।
स्टेशन के बाहर प्रोफेसर छत्रे का सर्कस पाया था । बडी
धूम धाम से तमाशा कर रहा था। उसको देख भाल कर वह
आदमी सूरज कुण्ड पहुंचा। वहाँ पुल के पास न्यू पाल फेड
नाटक कम्पनी अपना वीर अभिमन्यू नाटक खेल रही थी। वह
आदमी टिकट लेकर उसी में घुस गया
जर पावू भी टिकट लेकर भीतर जाने लगे तभी एक बूढ़े
ने पीछे से पहुच कर उन कन्धे पर हाथ रखा। उन्होंने देखा
कोई बूढा सौदागर है। लेकिन चेहरा देखते ही बूढ़े ने माफी
मांगी और "मुझसे भूल हुई।" कह कर चला गया।
थर ज्यों ही चावू भोतर गये थियेटर के एक आदमी ने
सामने से झुक कर सलाम किया । और उनसे पूताप के भागने
की चरचा छेड कर पाते फरने लगे। थियेटर वाले को चानों
से मालूम हुआ कि वह उनको सॉवल सिंह जासुस समझते हैं।
अब हम भी इन बाबू को सॉपल सिंह ही कहेंगे।
सॉवल सिंह उस दुग्ले पतले के पास ही जाकर बैठ गये।
थोड़ी देर चारा और तक कर उन्होंने उस आदमी से जिसका
पीछा करते हुए आये ये कहा- 'श्राज आदमी बहुत फ्म है ?"
उनकी तरफ ताके बिना ही उसने जवाब दिया-'हॉ यहाँ
आशिक माफ के चोचले नही न है। अगर गुलरकावली

. mmnanv १७८ OF जासूस इन्दर सभा होती लयला मजनू का रोल होता तो लोगो की पीठ पर पीठ छिलती होती।" अब वह बाबू अर्थात् सॉवल सिह भी बातों में मिस्री घोलने लगे। मुसुकरा कर उन्हों ने पूछा - "यह लम्बी आँख वाली कौन स्टेज पर श्रायी है यार । इसकी चितवन तो कमाल करती है वाप रे बाप कौन ऐसा है जो इस तीरे निगाह से घायल नही हो जायगा।" लेकिन वह पहले आया हुआ आदमी इन बातों से खुश नही हुश्रा। अब यह इनकी बातों का जवाब न जाने क्यों टाल मटोल में देने लगा। उसने कहा-"यह तो प्रोग्राम से, मालूम हो जायगा।" "यह खेल कैसा है" "हाथ कहन को आरसी क्या !" कहकर वह आदमी उठने लगा। अय सॉवल सिंह ने उसका हाथ पकड फर पहले श्रादर से रोका । कहा-ठहरिये आपसे कुछ वाते करना है।" उसने बिगड कर कहा-"मैं तोश्राप को नही पहचानता?" "नही पहचानते होंगे।" जव सांवलसिह ने इतना कहा तब उसने मुंझला कर कहा-"तब मुझ से पूछना परा है?" मा०- जी कुछ तो पूछना है नही तो नाहक श्रापको तकलीफ़ मै नही देता। यही काह कर,सॉवल सिह ने जेब से फोह निकाल कर उसके हाथ दिया। कहा-'श्राप इसको पहचानते है " ... - 1 श्राप को

चक्र भेद
१७६
उसने उसी तपाक से कहा-'जी नहः । मैं ने यह
चेहरा कभी नही देखा।" यही कह कर वह श्रादमी चलता
हुआ।
सॉवल सिह सहम फर वही तक गये । थोड़ी ही देर
पर पोछा करने के लिये बाहर आये लेकिन फिर उसका कुछ
पता नहीं चला।
चकालीसका बयान
स्त्री पुरुष के वेष में।
। उस बूढे सौदागर को शायद हमारे पाठकों ने पहचाना
होगा। वही लॅगह चावा थे । नाटक से उठ कर वह सूरजकुण्ड
को एक-गली में गये जहा जूए वालों का एक अहा था । पहा
पहुंचने पर देखा तो केशर था भी एक दॉब पर बैठे हैं।
थोडी देर पर वह दुबला जगन फेशन पावू के बगल में
जा घैटा । अब उनको पात होने लगी । लगटू भी गुप्तरूप से
सब देखने लगे। उसको आवाज से लगद का चेहरा बिलकुल
यदल गया।
-
.
उस ज्याच ने लॅगढ़ को दिपा पर केशर बाबू के कान में
कुछ कहा। अय फेशव लैंगटूक ओर ताक फर यता चक्ति
हा। और उस जवान के साथ ही पाह निकला

- जासूस लॅगटू ने भी उसका छिप कर पीछा किया। लेकिन फिर सॉपल सिह पहुँच कर लॅगट्ट के शामिल हुए। सॉवल सिह ने बहुत धीरे धीरे कहा "प्रोफ चेहरे का ऐसा मिलान हो मे ने देखा ही नही । मुझे तो वह केशिनो ही मालूम देती है।" 'उँ । हू ! मामला बडे गहरे जा रहा है। चलो अभी उसका पीछा करें।" अब केशव याबू उस दुबले पतले को साथ लिये हुए कम्पनी बाग में घुसे। पारमान में बादल छाये थे। काली घटा के मारे इतना अन्धे । था कि केशव ने टटोल कर कठिनता से वेञ्च पाया। उसी पर बैठ कर उससे पूछा-"क्यों ! कैसा हाल सवर तो कहो?" "खबर क्या पूछता है शैतान | तू बोल मे बहन का तूने घया किया ! अगर सय हाल साफ नहीं कहेगा तो मैं तुझे फासी चढ़ा देंगे। समझता है या नही ?" के०-रे इतना मिजाजरमान पर क्यों ? 'वन श्रय बहुत सी बातें मुझे मालूम हो गयी । तू श्रय मेरी मुट्ठी में है जर चाहं तव तुके तिकठी पर चढा दू के-तो यहा फमाद करना है क्या ? "जरू करना है।' फे-लेकिन मेरे पाले पड़ने पर क्या गात होगी सो तो है . ३ 1 मातम हेन । 1 "म्यून मालूम है ।'

चक्र भेद
तव किस विरते पा हम से दुश्मनो की हिम्मत
दुई हे तुमको
श्रर तुम्हारा डर नही है मुझको तिल भरभी।"
केव-पयो क्यों शाब क्या हुश्रा ?
"अब मुझे वह सब बातें मालूम हो चुग जिनके जाहिर
कर देने से तुमको फांसी हो जायगी ।"
के.--देखो चलकेसा । मुह सम्भाल कर बातें करो।
यहा इस महा अधियारी में कोई नही है। यही गला दवा दूंगा
तो कोई गोहार करने नही आवेगा।
"अभी मैं पुकारूँ तो तुम्हारे यमराज इसा दम तुम्हारे
कपार पर
"
"अच्छा तो ले एकार।" कह कर केशर उस पर टूट पडा
और इतना जोर से उसके सिर में भाग कि बेहोशी के मारे वह
धरती पर गिर गयी।
लेकिन इसी समय लॅग वाया पहा पहुच गये । उन्हों-
ने देखा तो केशर भी वहीं मरा पडा है । हाथ रखकर देखा तो
लाश घरफ मी ठही हो गया है। नाडो नहा चलतो । छाती
पर हाथ रखा तो धडकन नहीं है। लॅगटू ने समझ लिया फि
दिलकी हरकत बन्द (हाटल) हो जाने से हो यह शैतान
मर गया है।
सॉवल सिंह जय वहाँ पहुँच गये। गट्ट ने कहा- यह
पातकी तो शापही मर गया। बच्चा जल्दी एक गाडी लाओ।"
साँवा सिंह उमघारते बन्दोवस्त करने चले। लॅग ने
उस बेचारी का सिर गोरम लेकर देना ता बेहोशो । साहाल

१८२ • जासूस कर कपडा पानी में भिगो कर मुंह और सर श्रॉखों पर फेर ने लगे थोडी देर पर उसने श्रोसेसोली कहा-"वचाओ बचा-" ना डरो मत बेटी । डरो मत ।"कहकर लॅगट्ट ने प्रधोध दिया वह फिर वोली-'अरे । यह कौन चोलता है। मैं कहां है?" फिर उसकी नजर केशव की लाश पर पड़ी देखते ही उसने पूछा-"यह कौन है?" "यह हमारा और तुम्हारा दुश्मन है । उसी ढोंदू की - लाश है " " अकचकाकर उसने पूछा-"एँ । ढोद मरा है। उसने तो ही सबको मार कर बेहोश किया था ।" लॅ-हाँ लेकिन उसको पवर नही थी कि मारने वाले से बचाने वाला जबरदस्त है। "अभी उसकी मार से मैं बेहोश हो गयी थी। लेकिन मैं नहीं जानती कि इसको किसने मारा लें-इसके दिलकी हरकत बन्द हो गयो तुमको मारने के आधे ही सेकड बाद तो यह कटे रूख की तरह गिरा है । इसके पाप की नाव ऐसी लद गयी थी कि तुमको मारने के बाद एक पग भी आगे नहीं जा सका है। "श्राप कौन है" लॅ.-मे तो दलजीत सिंह ह । इतना सुनते ही वह मानो आस्मान से गिरी । बोली- मरे हुए आदमी को में कैसे देखती है । या भगवान मैं जागती ह या सपना देखती है" लॅ. नहीं तुम जागती हो । "अरे तो यह सफेद बाल तो उनके नहीं थे।" 1 1 - न

चक्र भेद
१८३
। श्रव नकली रूप हटा कर लॅगद ने अपनो असलो सूरत
दिपाई अच्छी तरह देखकर उसने उनकी गोद में अपने तई
ढोल दिया।
श्रय लॅगढू ने उसको झाड पोंछ कर चिठाया तब वह
योली-"जर मैं इस चाण्डाल के सामने आई तब देखा था
तुमने
लॅ०-लेकिन पहचाना नहीं । श्रम जर तुम्हारी बोली मैंने
साफ सुनी तय पहचाना है। मैंने तो पहले तुमको केशिनी
समझाया।
मैं केशिनी के लिये ही केशव से भगड रही थी ?
to-वह कौन है।
"वह मेरी जौवां बहन है।"
ले-तो वह है कहाँ
मुझे तो अभी मालूम नहीं है। उस पातकी शैतान से में
यही पूछ रही थी।"
ले०-ओहो । यस अव में समझ गया अच्छा पक महीने से
ऊपर हुआ तुम केशव से एक नाले के किनारे भेट करने
गयी थी?
थी"
लॅ०-तुम्हारे साथ में कोन था ।
"मेरे साथ में यही लच्छन था"
लँ०--ओहो अवमैं समझ गया तो केशव का खून सचमुच
इया है।
इसी समय सॉग्ल सिंह यहा जा पहुंचे लैंगट्ट ने उससे
पहले ही केशव की लाश का धन्दोवस्त कर दिया था। अय
-
,

-जासूस
जवान के वेप में उस युवती को साथ लिये हुए लॅगढ़ गाडी पर
सवार हुए । सांवल सिह कोच वक्स पर जा बैठे
कुछ दूर जाने पर दो सिपाहियों ने गाडी रोक ली। एक
तुरत घोडे के पास पहुँच कर राल पकडी । दूसरा जोकर
गाडी का दरवाजा खोलने लगा। लेकिन सॉवल सिंह ने उन
को डॉट दिया तव पहचान कर दोनों ने गाडी छोड दी।
अव गाडी उस जाली नोट बनाने वाले के मकान पर पहुंची।
सॉवल सिंह भर उतर पडे । उन्होंने लॅगटू से पूछा-"इनको
क्या करना होगा?"
"अभी मैं बतलाता है। पहले भीतर तो चले।"
फिर लेंगटू ने उस स्त्री के कान में कुछ कहा तव वह भी
उतर कर उनके साथ चली : सॉवल सिह आगे आगे रास्ता'
दिखाते हुए चले।
,
-
a
पैतालासका क्यान
-
शैतान का साथी।
दूसरे दिन सवेरे उसी जालसाज के मकान में एक छोटी
सी सभा घेठी। लँगटू पाया एक अलग आसन पर विराजे ।
उनकी वगल में एक सुन्दरी विराजमान हुई। यह सुन्दरी वही
है जो जघान के घेप में केशव की मार खाफर घेहोश हुई थी।
जिनको मारने जाकर केशव आप काल के गाल में जा पडा
1

चक्र भेद
१८५
जिस केशिनी के सून का 'अपराध प्रताप के कपार पर
थोपा जाकर उसको फांसी का हुम्म दिया गया था उसको
यह खी पूरो नकल है । लेकिन विशेष ध्यान से देखने पर दोनों
का अन्तर जान पडता है । इस सुन्दरी का नाम बलकेशा
वाई है।
बलकेशा के चेहरे पर जो मधुरता और सौम्यभाव है यह
केशिनी के चेहरे पर नहीं है । पूना मी वहां बैठी सव का
(चेहरा पारी बारी से देख रही है। मूला योवी और सॉवल
सिंह भी बैठे हे।
मजा हुश्रा
घलकेशा ने ही पहले सन्नाटा तोडा कहा-"मैंने समझा
था कि नकली येप में मुझे कोई जीत नहीं सकेगा लेकिन मूला
बीयो से मैं हार खागयो।"
मु०-मैं श्राज उन्नीस बरस से वेप बल पर धूमती हूँ।
इस काम में मेरा हाथ
फिर लॅगह बावा से कहने लगो-"जर मैं चपरासी बन
कर केशव की चपरासगीरी करती थी तब भी मुझे किसी ने
नही पहचाना। फिर में गाडावान बनो । जर आपको उन
चारडालों ने चोर कोठरी में बन्द फिया तव उन शैतानों
को इसका पता थोडे था कि कोई इस बूढे को वहा
है
निकाल देगा।
ल-सो तो सब मैं मानता है लेकिन उस शैतान लच्छन
का सन्देद आप पर खूब था। पडे सॅयोग से आप उस मौक
पर गयी।
पूना चुप चाप उन लोगों की बातें सुन रही थी। श्रर
-

जासूस
लॅगढ़ का मुंह लाल हो आया। लेकिन सम्हल कर बोले-
"मैंने मोले पन से आपको अपनी हैसियत नही, बतलायी।
मतलब मरा यह था कि श्राप मरे धन को नहीं मुझको प्यार
करे । लेकिन अब देखता ह तो उसी से सब अनर्थ हुए हैं ।
क्योंकि श्रापके सरपरस्त सरदार लोग अगर यह जानते कि
मुझे आपकी बपौती से कई गुनी अधिक सम्पत्ति है तो वे
लोग इतना गोल माल नहा करते न हम लोगों पर ही इतने
ग्रह आते।
बल-कुछ परवा नहीं । गत न शोचामि कृतम् नमन्ने
जो प्रारब्ध । उसको कौन तोड सकता है। किसी फयि ने ठीक
कहा है कि भाल लिखो लिपि टारि सके को। चाहे जो हो।
मैं अपना खोया हुआ धन पाकर सव दुख भूल गयी और
भगवान को श्रव धन्यवाद करती है।
"श्राप आगे का हाल कहिये सुनने को मन बद्भुत उकता
रहा है।
पल-आगे का हाल क्या कहना है। मैंने सर से छिपा
कर इन्ही अपने मन के बादशाह से व्याह करा लिया। जिस
रात के शादी हुई उसी -गत के दोंढा और लच्छन ने अपने
गुण्डों के साथ तैयार होकर व्याह मण्डप पर आक्रमण किया।
मैं भी अपने प्यारे को बचाने जाकर घायल हुई। जब चे सब
बेहोश करके ले जाने लगे तब मैंने अपने प्यारे को खून से
लेदफद पड़ा देखा था। मैं उसी रात के विषय हो गयी।
जय मे होश में आयी तव अपने तई एक भयावनी कोठरी में
यन्द पाकर अपना सङ्कट समझ गयी। एक तो घायल थी
ऊपर से कैद की आफत फिर पाने पीने या दवा दारू का

चक भेद
कुछ इन्तजाम नही । जिस चारडालिनी के घर में मैं बन्द की
गया उस राक्षसी को भी एक वर्ष पर स्वर्ग से बुलौना श्रा
गया। वह मरती बेर मुझे यह कह कर रिहाई दे गयी कि
मेरो बहन जीती है। लेकिन मेरे स्वामी की कुछ बात उसने
नही बतलायो । मुझे यह सपने में भी भरोसा नहीं था कि
उनका फिर दर्शन पाऊगी या वह जीते ह।
पूo-श्रो हो । तर तो अव पडा ही प्रानन्द का दिन है
अच्छा आगे काहिये।
३०-य मैं मर्द का वेप लेकर पातकी दोहा की खोज में
निकली। बहुत दिनों पर यहा उसको मैने पकडा और अपनी
बहन के सून होने की खबर पढ़ कर उससे पूछने लगी थी।
उसने कहा था कि केशिनी बहन मरी नहीं है लेकिन उसी के
जरिये से ताप की दौलत हथियाने का उपाय हो चुका है।
मैंने बहन से भेट करना चाहा उसने कहा यह मामला चतम
होने पर दोतों बहन को मिला देगा। मुझे उसने दूतिनी बना
कर जेल में भेट करने को भेजा मैं गयी प्रताप ने मुझे शिनी
समझा। मैंने भी अपने तई छिपा डाला लेकिन फिर ज्यों ही
अपना परिचर देने चली त्यो हो मुझे उस कमरे से झट
निकाल दिया गया। इसके बाद जर जाने प्रताप का भला
करना चाहा तब तब इन शैतानों ने मुझे गार लाचार कर
दिया। श्रय इरादा था कि फामी के दिन फलरों से सय हाल
महगी इतने में प्रताप के भाग जाने की जबर मिली। फिर फरह
रात के जासलिनी और जासूस की नजरों में पढ़ कर मैं
विस्मय का कारण हुई। थियेटर में होढा को न देप कर
सूरज कुण्ड पर जूए फे घडे में उसको पफटा। यह मे

२६०
जासूस
उसको साथ लिये हुए मैं बहन को उबारने को गरज से मौके
पर पहुंची। वहाँ उस चाण्डाल ने मुझ पर वार किश। मैं
बेहोश हो गयो । जब मैं होश में आयी तब मैंने अपने तई
स्वामी को गोद में पाया पहले सपना जान पड़ा लेकिन जब
मैंने असली रूप में इनको देखा तब सारा सपना सच्चा हो
हो गया । उस घडी मुझे उस धूर्त को लाश दीख पड़ी।" ।
सब सुन कर पूना ने बडे श्रादर म पलकेता का प्रालिङ्गन
किया। बोली-“वाह पहन । मुझे नही -मालूम था कि इन
लंगटू पावा की जटा में भी कोई डिबिया हे खरे आप लोगों
के मिलने से मुझे घड़ा आनन्द आया ।
पर -अब मैं चाहती है कि पूना से प्रताप का मिलन
होवे तय गठ के जलसा किया जाय ।
पू०-यह तो भगवान के हाय है घहन !
पल. -अय उसमें देर नहीं है ढङ्ग से जान पड़ता है कि
दुष्टों के दमन और शिष्यों के पालन का समय आ गया है।
पूर-तुम्हारे मुह पर चन्दन अक्षत पडे बहन । तुम्हारा
जोडा युग युग प्रसन्न रहे । लेकिन याया श्रय नुमको मैं सदा
यावा ही कहूंगी। भला तुम इतने बडे धनी होकर भी ऐसी
गरीयी में पयों दिन बिताते रहे सो तो कहो?
लग-अच्छा सुनो में सब कहता ह। जर इनसे मेरा
ध्याए हुआ तब भी इन्होंने नही बतलाया कि इनको कोई
जोगा बहन है। रोर में व्याह की रात गुण्डी को नानी से
येहोश हो गया। जय होश में आया तव में अस्पताल में था। दो
धानी सैया करती थी सामने एक पुलीरमैन था। मुझे पाँच
जानते देख फर उन्होंने पूदा- आप कैसे इं?" मैंने न्यारी का
।
--

चक मेद
हाल पूछा । उन्होंने कहाँ पुलीस के आने के पहले ही गुण्डे
उनको लेकर कही. भाग गये। एक ने कहा वह मर गयी
इससे लाश हटाई गयी मैं फिर वेहोश हो गया । इवीस दिन
बाद आराम होकर उठा। लेकिन दुनिया मुझे तुच्छ जंचने
लगी। जिसके साथ ससार पसाने को मन में थी उसो को
शैतानों ने ससार में विदा कर दिया तब मेरे जीने में क्या है।
लेकिन मेरे मन में कोई कहने लगा कि मेरो प्यारी मरी नही
है । फिर मिलान होगा। तब मैं श्राशा पर जीने लगा। मुझे
पता लगा कि शैतानों ने चादी के तट में मामले को छिपा
डाला। ढोंढा का भी कुछ पता नहीं लगा तब मैंने एक वसी.
यत करके अपने वकील को दी और कमर कस कर ग्यारी
को हृढने के वास्ते निकल पडा । जिनकी खोज में पाक
छानता हुआ बड़े बड़े नगरों का चक्कर काट के श्राया एक बार
काशी की कुजगली में उनको घडे ठाट बार से देप कर
दह होगया जर मेरी समझ में आया कि यह ठाट करक प्रेमी
की पोज में गलियों म क रही है तमो मुझे स्त्री मात्र से घृणा
हो गयी । और दुनिया में मैंने जब तक जिन्दगी रहे लोगों
का उपकार करना ही ठान लिया। तभी से मैं गरीब भिख.
मड़े के मेप में लंगर होकर रहने लगा। मेरे मन में पहले ही
से धा कि जासूसो करके सरकार और प्रजा को मदद दूंगा।
वही काम में करने लगा। इस से जैसे सर्व साधारण प्रसम
वेसे ही अफसर लोग भी मेरो नि स्वार्थ सेवा से आलादित
होकर मेरो मान-मर्यादा करने लगे। मैं इन्हीं से रूप बदलने
में जैसा पका हुआ जीभ घुमाकर अावाज बदलने में भी वैसे
ही मज गया । इस तरह मैं सन्यासी होकर ससार का उप

૨૨
OF जासूस
कार करने लगा। पूना का सञ्चा प्रेम और प्रताप का दिल
देख कर सदा इन को मदद पर तैयार रहा है। उसके बाद
तो जो कुछ हुआ वह आप लोगों से छिपा नही है। जब
उस रात के केशव ने जवान मर्द को स्त्री का नाम लेकर पुकारा
तब मेरा माथा ठनका पीछे तो सब बातें जाहिर हो पडी।
पूना बोल उठी-"मैं तो बाबा आपको करनी से उऋण नहीं
होऊँगी। हम दोनों आदमी जिन्दगी भर श्राप के ऋणी रहेंगे।
भगवान की दया से आप लोगों का मिलना देखकर जो मुझे
नानन्द हुआ है वह कह नहीं सकती।"
इसी समय किसी ने किवाड पर धक्का मारा । मूला
भट दरवाजा खोला तो दमडी भीतर पाया। और अफचका-
कर सब की ओर देखने लगा ।
लँ-क्यों बेटा क्या सवर लाया है ?
द-लच्छन भी विदा हुए।
ले-कैसे वेटा । कैसे?"
द०-आप ने जो गोली मारी थी उसी से उसकी जान
गयी। पहले उसने जखम मामूली समझा था लेकिन जब
साथी का मरना सुना तब स वह अय तय की हालत म है।
इसी से खबर देने आया हूँ।
ल-अच्छा किया बच्चा। चलो मैं अभी रूप बदलकर
आता है। उससे कई बातें पूछने की है । अगर मर जायगा
तो कुछ भी पता नहीं चलेगा।

चम भेद १६३ लैक-अच्छा किया यश्चा। चलो मै श्रमी रूप बदल कर आता हु। उससे कई यात पूछने की है अगर मर जायगा तो कुछ भी पता नहीं चलेगा। छियालीसा क्या । केशप के महल में डाकुर ने पहुच कर देखा कि एक सुन्द्र हवादार कमरे में लच्छन मरन सेज पर पड़ा है । उस पातकी के चेहरे पर वह तेजी बाज नही है। उसका निडर- पन भय दूर होगया। ललाट से पसीना चल रहा है। कण्ठ सुखा जाता है। देह में जैसे मैकडों विच्छू डक मार रहे हो वैसे थाह के मारे छट फटी जाती है उसकी विफलता उसका उद्वेग और उसकी छट पटाहट देखने पाले का धीर छूट जाता है। सामने ही एक ओर डाकर और दूसरी ओर पडोसी बैठे हैं। लॅगटू पाया वही पहुंच कर धीरे धीरे बगल में जा खडे हुए। लच्छन ने आह करके डाकर से पूछा-'अव कितनी देर है डायर साइव ?" कुछ देर चुप रह कर डाकुर ने कहा-"कोई डेढ़ दो घटे के तुम मेहमान हो । जो कुछ करना हो कर दालो" ल-श्रय फरना धरना क्या कहे कबीर अब का बनिहें जब चार जना मिलि काध उठाये। नकली चेहरा उतार कर लॅगटू ने सामने जा कहा- "हॉ! हॉ! करना धरना जरूर है।" उनको देखते ही लच्छन की त्योरी चढ़ गयो । योल्प

"
।
१६४
-जासूस Us
--"तुम किस हिम्मत पर यहां आये "
लॅ-खाता तो ख्यौढ़ करना होगा न ?'
"किलका खाता।"
ल--तुम सच्ची बात कहो केशिनी का किसने खून
किया है?
इतना सुनते ही लच्छन का मुंह लाल हो पडा-"चोला
वह तोमरी नही है।"
ल-कहां है तब?
"वह नैनी के पागल खाने में है।"
अब लगटू ने मुट्ठी गज से आनरेरी मेजिस्ट्रेट को बुला
कर कहा सब बाते अव मरती बेर तो कह दो।
तुम लिखो हम सही कर देंगे। अभी हम को बेहोशी नहीं
हुई है । यही लिखना सच्ची बात मैं कहता हूँ। जब केशिनी
भी कपडे पहने जगल में पहुची। वहीं हम लोग मौजूद थे।
उसको घर ले जाकर ही हम लोगों ने प्रताप को पीस
हालने से लिये चक्र रचा। तुरत ही कार्फ का हुआमुर्दा गगासे
उठा लाये और केशिनी के गहने और पडो से उसको सजा
कर जमुना के किनारे रखा। तुरत पुलीस में खबर दी लेकिन
चेहरे का मिलान नहीं होने से काट पीट कर ऐसा कर दिया
कि पहचानी नहीं जा सके। इधर केशिनी कुछ गडबड न करने
पावे इसी डर से उसको वह हथकडी भरकर पागल खाने में
भरती करा दिया उसके बाद तो जो कुछ हुआ वह बालक
बूढ़े संघको मालूम है ।
अच भानरेरी मेजिस्ट्रेट के सामने ही लॅगटू ने सब बयान
कागज पर लिखा दियालच्छन ने देखटके होश हवास में उसपर,
है

चमा भेद
१६५
।
सही की उसकी नकल करके उस पर भी सही फराली गयी
और जिला जज के पास भिजवाने का वन्दोवस्त किया। जिले
के मालिक कलेकर को भी खबर हुई। उसी दम पुलीस भेज
कर पागल खाने से केशिनी बुलाई गयी । उस की पहचान
भी हुई । मेजिस्ट्रेट ने पहुच कर लच्छन का बयान लिया।
लच्छन
ने
लगढ़ से कहा-"तुम्हारे यहाँ तो हमारा भी
कुछ हिसाव थाकी है । तुमको मैंने यहुत दानों से पहचाना
है। केशव ने भी पहचान लिया था।'
ल०-भगवान ने तो पहलेही वह हिसाब चुकता कर
दिया है।
"क्यों क्या बलकेशा तुम को मिल गयी है।"
लॅक-हाँ केशव की जान जिस भगवान ने ली उसी ने
मेरी प्यारी को मुझे उसी गत के सौंप दिया।
इतना सुनतेही लच्छन का चेहरा प्रसन्न हो आया । लगद
ने हाथ मिलाया। फिर थोडा हट कर घोले-"तुम ने तो
बड़े बड़े पातक किये हे लच्छन ? मैं चाहता तो कभी का
तुम से हिसार चुकता कर लिया होता। लेकिन सय के
सामने फासी चढ़ाने के लिये सबूत जुटाने की कोशिश
फरता रहा । मुझे नहीं मालूम था कि भगवान तुम लोगों के
समान पिशाचों को फाँसी की पवित्र तॉत में लगाना नहीं
चाहता इसी से अब इस तरह तुम्हारा अन्त होता है।
मरती घेर परमात्मा का गुणानुवाद करो। पापका वोमा हलका
हो जायगा। श्रन्त में शान्ति मिलेगी। जिराफा अन्त भला उस
फा सय भला । अगरेजा में भी करते है। All well
which end well

जासूस
,
उपसंहार।
अव सब ठीक होगया। लन्छन के थन्तिम बयान...
भरोसा किया गया। केशनी- पागल खाने से इजलास
लायी गयी । उसकी सहोदरा बहन घलकेशा ने पहचान की
जेल से लगद और प्रताप के भांग जाने का असल भेद जान
पर अधिकारियों ने उन को क्षमा कर दिया।
पूना के मा बाप पहले डरे थे लेकिन लंगट्ट ने खुद जाक
उनकी तसल्ली की थी। अब प्रताप के बेगुनाह छूटने पर ख
में खुशी हुई। पूना से प्रताप का व्याह हो गया उसमें सेश
जज, कमिश्नर और कले मृर भी नेवते गये थे।
व्याह हो जाने के बाद खुशी में प्रताप ने मूला को इतन
रुपया दिया कि उनके स्वामी कपिलदेव ने भी पुलिस के
नौकरी छोड़ दी।
प्रताप ने भी वकालत करना छोड दिया। अब प्रताप और
लगढ़ का बडा घरौधा हुआ। पास में धन बहुत था। बङ्क
जमा कर के उसीके । सूद से अपना निर्वाह करने लगे
बाकी जिन्दगी प्रताप और लगटू दोनों ने संसार का उप
कार करने में बितायी। जैसे पूना और प्रताप तर
लंगटू और घलकेशा का जीवन सुखमय हुआ वैसाही भग
वान सब का करें।
4

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Chakra Bhed

Author
Babu Gopala Ram
Title
Chakra Bhed
File name
Chakra Bhed
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2011/01
Publisher
Jharga Printing Press Kashi
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546332
Barcode
4990010024817.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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