Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Khadh
Front matter
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खाद
लेखरु-
मुखत्यारसिंह वकील
प्रकाशक
चैजनाथ केडिया
हिन्दी पुस्तक एजेन्सी
२०३, हरिसन रोड,
कलकत्ता
तृतीय पार ]
सवत १९८८
[मूल्य १)
प्रकाशक
वैजनाथ केडियो,
प्रोप्राइटर
हिन्दी पुस्तक एजेन्सी
२०३, हरिसन रोड,
किशोरीलाल केडिया
'वणिक प्रेस
१, सरकार लेन,
कलकत्ता।
प्रकाशकका निवेदन
हमें यह देखकर बडी प्रसन्नता होती है कि हिन्दीके पाठकों-
फोरचि दिनों दिन सुधर रही है। अब वे फेल तिलिस्म और
ऐयारीसे भरे उपन्यासमात्रके प्रेमी ही नहीं रह गये हैं , उन्हे
विज्ञान, शिल्प, कृषि तथा व्यापारादि सम्बन्धी पुस्तकें पढनेका
भी चाव हो रहा है चारों ओरसे अपने ज्ञानफी वृद्धि करनेकी
इच्छा हो रहो है। रुपि-सम्बन्धी पुस्तकोंकी सपतसे हमारा
यह अनुमान है कि इस पियकी ओर रोगोंका ध्यान अधिक
आकर्पित हो रहा है। भारत कृषिप्रधान देश है, इसलिये इस
विषयकी ओर सर्वसाधारणका ध्यान अधिक आकर्षित होना
सौभाग्यफी बात है।
कृषिको उन्नतिके लिये सबसे अधिक महत्वका विषय पाद
है। जिस किसानको पादका ज्ञान नही उसकी खेती कभी हरी
भरी नहीं हो सकती। कोई फसल हो, कोई चीज हो, सबके लिये
किसी न किसी प्रकारको खाद जरूर चाहिये। पिना सादके
अगर आप एक योघेमें ५ मन अन्न पैदा करते हैं तो साद डाल.
कर ५० मन कर सकते हैं। युरोपनाले थोडीसी जमीनमें
इतनी अधिक चीजें फेल खादके प्रतापसे ही पैदा कर इतने धन
वान हो रहे हैं। सेत हो, बाग हो, बगीचा हो, सबके लिये खाद
आवश्यक है। खाद अनेक प्रकारकी होती है। आज क्ल कर
तरहकी वैज्ञानिक खाद निकली हैं जिनका उपयोग कर किसान
बहुत फायदा उठा सकते हैं। इस पुस्तकमें लेखक महाशयने
[] इस यातको चेष्टा की है कि सादके सम्बन्धमें यथाशक्ति कोई चात छूटने न पावे। अब तक हिन्दी में साद सम्बन्धी जो एक- दो पुस्तकें हैं वह इतनी छोटी हैं कि उनसे खादके निषयमें पूरा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता। और जिन लेखकोंने सेती- सम्बन्धी बडी पुस्तकोंमें सादकी चर्चा की है वह भी बहुत थोडी; इसका यही कारण जान पडता है कि उन्हें, धरती, वीज, पानी, साद इत्यादि सभी विपयोंपर लिसना रहता है इसलिये इस निपय को यह जल्दी जल्दी समाप्त कर आगे बढ जाते हैं। इसीलिये उन पुस्तकोंसे पाठकोंको जैसा चाहिये वैसा लाभ नहीं होता। हमें आशा है कि इस पुस्तकको पढ़कर पाटक खादके पियमें पूरी जानकारी प्राप्त कर यथेष्ट लाभ उठायेंगे। चित्र परिचय विनमें दो खेत है, एक खाद डालकर धोया गया, दूसरा चिना सादके। चित्रकारने दोनोंका नतीजा आपके सामने दिसला दिया है। साद डाला हुआ पत कितना बढा है और खाद रहित पतके पौधे किस तरह गिरे हुए हैं, मानो निर्जीव हैं । साद डालनेवाला किसान हसुआ लिये अपना खेत फाटने जा रहा है और चिना सादके खेतका मालिक खेतमें कुछ हुभा न देख, जमींदारके लगानके डरसे कहीं दूसरे गांव भाग गया। यह चित्र प्रसिद्ध चित्रकार श्रीरामेश्वर प्रसादजी धर्माकी कृपाका फल है। हमारे चतुर चितेरे मिनकी यह हार्दिक अभिलापा है कि भविष्यमें एजेंसीको कोई भी पुस्तफ चित्रविहीन न हो। उनको इस अभिलापाकी पूर्ति के लिये हम घरापर प्रयत्न करते रहेगे। माशा है, इन चित्रोंसे पाठक आनन्द लाभ करेगे। -प्रकाशक अमिका रखती भारतवर्पकी जान है। तीन चौथाईसे अधिक मनु- प्योंका निगाह फेवल पतीपर होता है। यद्यपि दूसरे सब देशोंने खेती करना इसी देशसे सोया है, तथापि आज इस देशकी धरती- की उपज दूसरे देशोंसे बहुत ही कम हो रही है । बूढ़े किसानोंको बहुत बार कहते सुना गया है कि सेतीकी उपज दिनों दिन कम होती जा रही है। जिन पेतोंमें पहले ६ मन प्रति बीघा अन्न पैदा होता था, उनमें अय चार घडी भी नहीं होता। दूसरे देशों को उपज हमारे देशसे कई गुनी अधिक है। भारतवर्षकी उपज. के घट जानेके कई कारण हैं। पहला कारण जिसका हमे इस पुस्तकमें विचार नहीं करना है, वर्षाका ठोक समयपर न होना है। हमारे देशको सिचाईके लिये केवल मेहफा आसरा है और यही कारण है कि जिस वर्ष जहा वर्षा नहीं होती, वहा हजारों मनुष्य भूखके मारे प्राण दे देते हैं। दूसरे देशोंमें भी सर्वदा वर्पा समयपर नहीं होती, तथापि वहा इतने अकाल नहीं पडते । कारण यह है कि वहाके लोगोंने अपनी बुद्धिसे सिचाईके अनेक उपाय निकाल लिये हैं और जलको अपने वशमें कर लिया है, जय चाहते हैं, उन्हे सिवाईके लिये जल मिल जाता है। जलके सिवाय उपजके कम होनेका एक बडा कारण यह -
भी है कि हमारे देशको धरतीमें हजारों वर्षों से पेती होती चली
आयी है और इस कारण धरतो, पौधौंका मोजन फम हो गया
है। दूसरे देशोंके लोग इस बातका ध्यान रखते हैं कि किस
नाजके पोनेसे किन किन चीजोंको कमी खेतमें होती है और ये
उन्हीं चीजोंको पेतमें डाल देते हैं और इस प्रकार पेतकी ताकत
जैसीकी तैसी बनी रहती है। हमारे देशमें इस बातका कुछ
भी ध्यान नहीं रक्खा जाता कि जो फसल हमने सेतसे फाटी
है उससे खेतमें कौन कौन पदार्थ कम हो गये हैं, जिनका डालना
आवश्यक है। हा, कुछ शहरोंमें खेती करनेवालोंको यह ज्ञान
जरूर है कि पादके डालनेसे उनको पैदावार बढ सकती है और
खादके हो सहारे ये एक वर्षमें फई फई फसले पैदा करते हैं।
परन्तु फेवल इस मानसे काम नहीं चल सकता। किसानको
यह जानना अत्यावश्यक है कि कौन पेत किस जिन्सको क्यों
उत्तम पैदा कर सकता है और कोई विशेष जिन्स किसी खेतमें
फ्मा साद डालनेसे अधिक मात्रामें उपज सकती है। पादके
ज्ञानके अतिरिक्त हमारी उपजके फम होनेके और भी अनेक
कारण हैं, परन्तु हम उन सषका उल्लेख इस छोटीसी पुस्तकमें
नहीं कर सकते। इस पुस्तकमें केवल साद सम्बन्धी ही
कुछ यातें लिपी गयी हैं।
यदि किसी पौधेको जडसे उखाइ लें और तौले तो
मालूम
होगा कि छोटासा दाना जो हमने चोया था उसका भार अब
फितना अधिक हो गया है। यदि उसको धूपमें डाल दें तो
[-] उसका भार बहुत कम हो जायगा और पानीको मात्राका बहुत साभाग इस प्रकार उडकर हवामें मिल जायगा। यदि इस सूखे हुए पौधेको जला दें तो राखकी मात्रा और भी कम होगी। यह रासको मात्रा वही भाग है जो पौधेने खेतकी मिट्टीसे प्राप्त किया है। यदि इस प्रकार सव राप हम खेतमें डाल दें तो खेत को कुछ घाटा न पड़े और खेतकी मिट्टी वैसी ही बनी रहे । परन्तु लापों मन गेहू तथा और पदार्थ हर साल बाहर चले जाते हैं और उनके बदले खेतको कुछ भी नहीं मिलता। जैसे किसी धनीको आमदनी न हो और हर साल सर्च होता रहे, तो उसका फभी-न-कभी दिवाला अवश्य निक्लेगा, इसी तरह हमारे सेतोंकी दशा पदार्थों के वरावर निकलते रहनेसे बहुत ही शोच नीय हो गयी है। अन्य देशोंके लोग इस यातकी खोज फरते रहते हैं और जो-जो रासायनिक पदार्थ सेतोंसे लेते हैं उन्हें किसी न किसी रूप में अवश्य खेतोंमें वापिस पहुचा देते हैं। इन रोगोंने खादोंकी वैज्ञानिक मीमासा की है और आज दिन ये लाखों प्रकारको खादें, जिनको हम अपनी अज्ञानतासे नष्ट कर देते है, फाममें ला रहे हैं। हम अपने अज्ञानके कारण गोबरकी खादको भी ठीक तरहसे यरतना नहीं जानते और उसके सबसे उपयोगी भागको नष्ट होने देते हैं। हमने इस पुस्तकमें सादक विषयमें उन बातोंको, जिनका जानना आवश्यक है, विस्तारपूर्वक लिखा है। हमने यह भी प्रयत्ल किया है कि
--
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[-]
जहा तक हो सके पारिभाषिक शब्दोंका प्रयोग इस पुस्तकमें न
किया जाय, तथापि बहुतसे शब्द काममें लाये विना कार्यसिद्धि
न हो सकी। परन्तु हमारी समझमें यदि पाठक पुस्तकको
आद्योपान्त पढनेकी कृपा करेंगे तो कोई भाग ऐसा न होगा
जिसे घे भली भाति न समझ सके । हमें पूर्ण आशा है कि यदि
हमारे किसान उन सब नियमोंका, जिनका वर्णन इस पुस्तक
किया गया है, ध्यान रखेंगे और अपने खेतोंमें अच्छी खाद
डालनेकी प्रथा जारी करेंगे तो उनकी उपज कई गुनी अधिक
हो जायगी।
परमात्मा करें कि हम भी अन्य देशोक समान अपने खेतोंकी
उपज बढाने में समर्थ हों और भारतभूमिको फिर स्वर्णमूमि
कहलानेका सौभाग्य प्राप्त हो ।
मुलत्यारसिंह
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वाद"
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प्रथम भाग प्रथम अध्याय खादमें मूलतत्व ऐसे अनेक पदार्थ है जो प्रत्येक पौधेमें पाये जाते हैं, परन्तु ऐसे पदार्थ थोडे ही हैं, जिनको प्रत्येक पौधेको आवश्यकता होती है और जिनको पृथ्वी में डालनेसे पौधोंको उपन बढ जाती है । जितने प्रकारके पौधे ससारमें पाये जाते हैं, उन सबको कुछ मूलतत्वोंकी आवश्यकता होती है । यदि ये मूलतत्त्र पृथ्वीमें न हों तो पौधे नष्ट हो जाते हैं और उपज पिल्कुल नहीं होती। इन मूलतत्वोंमें सबसे पहला नम्वर नत्रजनका (नाईट्रोजनका) है। यह एक प्रकारकी गैस है। वायुमें-जिसमें हम प्रति दिन सास देते हैं-अधिक भाग इसी गैसका पाया जाता है । वायुमण्डलमें नजनकी मात्रा इतनी अधिक होनेसे भाप यह सोच सकते हैं कि इस गैसके मिलने में पौधो को किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होनी चाहिये, क्यो कि पौधे सुगमतासे वायुमण्डलसे आवश्यकतानुसार नत्रजन प्राप्त कर सकते हैं। जावसे माल्लम हुआ है कि पौधे पत्तोंके द्वारा वायुको अवश्य हमारी सासले अन्दर लेते हैं , परन्तु इस प्रकार ।
२ खाद नत्रजनको वे पचा नहीं सकते। वायुमण्डलका नत्रजन उनके काममें नहीं आ सकता। नत्रजनका जितना भाग पौधो के भोजनमें परिणत होता है वह प्राय सबका सब पौधे जडो द्वारा ही प्राप्त करते है। नत्रजन किसी न किसी रूपमें खेतकी मिट्टीमें मौजूद होना चाहिये। इसी कारण ऐसी सादों का पौधों में डाला जाना यावश्यक है जिनमें किसी न किसी रूपमें नत्रजन मौजूद हो । नाजनके अनेक मिश्रण हैं और इन्हीं मिश्रणो के रूपमें नत्रजन पोधेके लिये सेतकी मिट्टीमें मिलाया जा सकता है शोरेका तेजाप अर्थात नत्रिकाम्ल ऐसा मिश्रण है जिसको पौधेकी जड़ें तुरन्त ही अपनी छोटी छोटी पतली जडों द्वारा खोंचकर पचा लेती हैं। बहुतसे विज्ञान बेचामो का यह मत है कि नत्रजनका कोई मिश्रण क्यों न हो वह जबतक नत्रिकाम्लमें परिणव न हो तब तक पोधेके काममें नहीं था सकता। उनके मतमें प्रत्येफ नत्रिक मिश्रणको पहले नत्रिकाम्लमें परिणत होना पड़ता है और फिर वे पौधेका भोजन बनते हैं । शोरेका तेजाय बहुमूल्य होनेके कारण सादने काममें नहीं घरता आ सकता। दुसरे यह घडा तीक्ष्ण पदार्थ है, यदि पौधेके ऊपर डाल दिया जाय तो पौधा जल जायगा । पानीको बहुत अधिक मात्रा मिलाये बिना यह पौधेके काममें नहीं पा सकता। वर्षा होते समय बिजलोको चमकसे भी वायुमण्डलका नत्रजन नरिकाम्ल बन जाता है और फिर यह वर्षा जलमें घुलकर पृथ्वीपर गिरता है। यही कारण है कि वर्षाका जल अन्य जलो की अपेक्षा अधिक उपयोगी माना गया है। दूसरा मिश्रण अमोनिया गैस है, यह पड़ी तीन गैस है। इसको देखक ।
म्यादी मुक्तत्व सूपा पाहुत कठिन है। यदि नौसादर और यपुळे पो पूटर मिला दे और थोड़ासा पानी डाल सो एक प्रकारकी पड़ी जीव गन्य निकलनो आरम्म होगी, यदी अमोनिया गैस है। पादके टेरो में यह गैस प्राय निकला फरती है और साधारणत खादकी दुगन्ध इसी गैसका अधिकाश होता है। इसको सरूपमें पौधों में देना असम्भव है, गन्धले पाय मिलने से यह गन्धित समानिया नामो ठोस पदार्थ में परिणत हो जाती है। यह पदार्थ सादफे काममें लाया जाता है। शोरा भी नजनका मिश्रण है, यह एक प्रकारकी मिट्टोसे प्राप्त होता है जिसको सारी कहते हैं। इस पदार्थको उपयोगिताको दमारे किसान प्राय जान गये हैं। ननित सोटा नत्रजन और सोटका मिश्रण है, नविन पुटाश नत्रजन और पुगराका मिश्रग है । साधारण शोरा प्राय नत्रित पुटाश हो होता है । इनसे पौधा नमजन प्राप्त कर सस्ता है । गोयर, मन, विष्ठा मादि पदायोंमें मी नमन मिला रहता है, इससे यह साइके लिये उपयोगी होते हैं। नत्रजनको किसी खादको यदि सेठमें डाला जाय और खेतमें मन्य द्रव्यो को कमी न हो तो पौधे बहुत शोरता से यढने लगेंगे। यही कारण है कि जिन सेतो में खाद अधिक डालो जाता है ये प्रायः इतने ऊचे पढ़ जाते हैं कि पौधा अपना योमन सम्हाल फर वायुके छोटेसे मो से नीचे गिर जाता है । जिन खेतो की फसलको बहुत ही शोघ यदाना हो इनमें ननजनकी कोई नाद डालनी चाहिये। दूसरा नम्मर पुटाशका है। यह पदार्थ अपने धात्विक रूपमें कहीं नहीं मिलता । यह पढ़ा चमकदार और अल जानेवाला पदार्थ है। यह ४ खाद किसी न किसी मिश्रणके रूपमे ही ग्वेतोंकी मिट्टीमें पाया जाता है। इसके न रहनेसे पौधोंमें शक्ति उत्पन्न नहीं होती-वे निर्बल रहते हैं । पौधो को बलवान बनानेका फाम पुटाश ही करता है। परमा- त्माने यह उपयोगी पदार्थ इतनी अधिक मात्रामें खेतकी मिट्टी में रक्सा है कि बहुत कम इसकी खाद देनी पड़ती है । इसीसे पुटाशको खेतोंमें पहुचानेके लिये बहुन कम खाद काममें लायी जाती है। शोरा नत्रित पुटाश है अर्थात् इसमें दोनों पदार्थ पुटाश तथा नत्रजन मौजूद हैं । पुटाशको सेतोंमें पहुचाने के लिये प्राय गन्धित पुटाशसे काम लिया जाता है। चिकनी मिट्टी तथा डाफर खेतोंमें पुटाशकी माना स्वामाविक रूपसे रहती है. और इसलिये गैसले, मटियार और डाकर खेतों मे प्राय पुराशको खाद डालनेकी पानश्यकता नहीं होती। घोसरा उपयोगी पदार्थ जिसकी पौधेको अधिक बावश्यकता होती है, प्रस्फुरिफ (फासफोरस) है। दियासलाईके सिरेमें एक प्रकारका लाल या पीला पदार्थ लगा रहता है जिसकी रगडसे दिया- सलाई जल उठती है। यदि इस दियासलाईको अन्धेरे में किसी चिफनी वस्तुसे धीरेसे मलें तो सुन्दर चमकदार लफोर-आगको रेसासी स्विच जाती है। यही फासफोरस है। पौधों बीजमें इस पदार्थकी मात्रा बहुत अधिक होती है और यही कारण है कि यदि फिसी खेतकी मिट्टीमें प्रस्फुरिककी मात्रा न हो छो फसल चाहे कितनी दो क्यों न बढ जाय परन्तु अन्नकी मात्रा बहुत ही कम होगी। प्राय देखा जाता है कि बहुतसे खेतोंमें यद्यपि गेहूं आदि अन्न बहुत सदमें मूलतत्व । ऊचा नहीं पढता तथापि बाल बडी लम्पी आती है और कितने ही सेतोमें अन्न बहुत ऊ चा बढ जाता है पर बाल बहुत छोटी माती है। यह फेवल प्रस्फुरिक अधिक या कम होने का परिणाम है। भारतवपमें इस खाटकी ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता, इसीसे उपम दिनों दिन कम होती जा रही है। प्रस्फुरिककी साद अधिक- तर हड्डियों से प्राप्त की जाती है। हमारे यहा हड़ियों का कोई उपयोग नहीं होता, वह इकट्ठी करके विदेश भेज दी जाती है। यह हमारी पड़ी भारी भूल है। जबतक हम हड़ियों का उपयोग भारम्भ न फरेंगे तबतक हमारी उपज अधिक न हो सकेगी। गोबर तथा अन्य सादोमें कुछ मात्रा प्रस्फुरिकको होती है, लेकिन वह इतनी कम कि उससे कुछ काम नहीं चल सकता। उपयुक्त तीनों पदार्थ प्रत्येक पौधके लिये आवश्यक हैं । ऐसा कोई पौधा नहीं जो इनमेसे किसी एकको अनुपस्थिति में भी फल फूल सके, इसलिय छपकका कर्तव्य है कि वह इन तीनों पदार्थो को सेवमे मौजूद रक्खे । इन्हीं तीनों पदार्थो की कमी बेशोसे खादकी उपयो गिता जानी जाती है। तीनों पदार्थों अथवा प्रथम भोर तृतीय पदाथ- को मिलाकर डालनेपर कोई पौधा ऐसा न होगा जो न घढे। साधा रण सादमें इन्ही तीनो पदार्थोंको देख लेना चाहिये। भिन्न भिन्न भन्नोक लिये विशेष प्रकारकी खाद उनक भोजनक अनुसार बनायी जाती है। परन्तु इन तीनो को मिली हुई साद सब फसलो में डाली जा सकती है। इसके लिये कृपकको अधिक जानने की मावश्यकता नहीं।
है चौथा पदार्थ, जिसका खेतमें होना आवश्यक है, चूना है। ऐसे पौवे थोडे हैं जिनके भोजनके फाममें चूना आता है। परन्तु यह पदार्थ इस कारण अधिक उपयोगी है कि यह मिट्टीको भुरभुरा रखता है और खेतकी मिट्टोको पौधेके भोजनके योग्य बनाता है। अगले अध्यायमें हम बतलावेंगे कि पौधे किस प्रकार अपना भोजन मिट्टीसे प्राप्त करते हैं । इस अध्यायके पढनेसे , पाठकों को इस पदार्थकी उप- योगिता भली भांति समझमें आ आयगी। इन पदार्थों के अतिरिक्त पौधेको मन्न, लोहा, गन्धक आदि अनेक मूलतत्वोंकी आवश्यकता होती है । परन्तु ये सब पदार्थ इतनी अधिक मात्रामें परमात्माने मिट्टी में उपस्थित किये हैं कि इनको ऊपरसे डालनेकी आवश्यकता नहीं होती। इनके सिवाय और पदार्थोकी मात्रा पौधेके भोजनमें इतनी कम होती है कि यहा उनका विचार करना अनावश्यक है। द्वितीय अध्याय पौधे कैसे बदते हैं संसारमें सारी सृष्टिमें--एक ही रीति पायी जाती है। जैसे हम सांस लेते हैं वैसे ही पौधे भी सांस लेते हैं और वायुको खींचकर अपने भीतर लेते हैं । अन्तर केवल इतना ही है कि मनुष्य तथा अन्य प्राणिमात्र सांसमें मम्लजन लेते और कार्बनिकाल पौधे केसे पढ़ते हैं मेंस बाहर निकालते हैं। परन्तु पौधे कार्बनिकाल सौखमें भीतर लेने और अम्लजन छोडते है, अर्थात क्रिया एक ही है, पदार्थों में यदि किसी छोटे पानमें किसी चहेको इस प्रकार बन्द फर दे कि उममें वायुमा प्रवेश न हो सके तो पानको विद्यमान वायुमे जिनना अम्लजन होगा वह सब चूहा थोड़ी दरमें alस द्वारा सा जायगा और वह पान कार्यनिकाम्लो भर जायगा। इस प्रकार थोडी देग्में सम्लजन समाप्त हो जानेके कारण चूहेका दम घुटने लगेगा और कुछ देर थोर रक्से रहनेपर चूहा हाफ हॉफकर मर जायगा। इससे मालूम होगा कि अम्जन प्राणिमात्रके लिये कितना मावश्यक है। सर प्राणी वायुको सांस लेकर सदा गन्दा करते रहते हैं। यदि पर• मान्माशी मोरसे वायु शुद्धिका यह प्रबन्ध न होता तो एक प्राणी भी जीवित न रह सकता । इस प्रकार प्रकृति वायुमण्डलका कानिकाम्ल जो मनुष्यों तथा प्राणियोंने वायुमण्डलमें सास छोड़कर मिला दिया है पौ?के द्वारा समाप्त करा देती है और हमको सदा स्वच्छ साफ सांस लेने के योग्य वायु मिलती रहती है। जैसे इवाके सिवा हमारे लिये भोजन तया अलकी भी मावश्य कता होती है। वैसे हो पोधोंको भी भोजन तथा अलकी आवश्यकता होती है। हम अपना भोजन मुय द्वारा प्राप्त करते हैं और पौधे अपनी जडों द्वारा। अन्नर केवल इतना ही है कि हमारे एक मुस होता है और पौधेके प्रत्येक छोटे छोटे तन्तु जो मिट्टीम दूर तक फैले रहते हैं मुसका काम देते हैं। यदि हमारे समान पौधोंके मी एक ही है साद मुख होता और इतने अधिक तन्तु न होते तो पौधोंका जीवित रहना फठिन था। हमें परमात्माने चलने फिरनेको शक्ति दी है, एक स्थान- पर भोजन न मिले तो हम दूसरे स्थानपर जाकर भोजन प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु वेचारे पौधोंमे यह शक्ति नहीं है। यह एक स्थानसे दूसरे स्थानको नहीं जा सकते, इसीलिये उन्हे छोटे छोट सन्तु दिये गये हैं जो चारों ओर भोजनकी खोजमें दूर तक फैल जाते हैं घोर इस प्रकार पौधे जीमित रहते हैं। यदि एक रोटी हमें दे दी जाय और कहा जाय कि इसको निना टुकड़े किये एकदम सायो तो हम नहीं खा सकते, क्योंकि हमारे मुसका परिमाण परिमित है ।इसी तरह पौधेकी जड़ों के मुख जितने चौडे होंगे उतने ही गाढ़े पदार्थको वे खानेमें समर्थ हो सकते हैं। पौधो की जडो के तन्तुओ के अन्तिम सिरे बहुत ही धारीफ होते हैं और उनमे बहुतये तो हमारे घालोंसे भी अधिक पतले होते हैं। दुरबीनकी सहायतासे देसनेपर मालूम होगा कि यह तन्तु भीतरसे थोथे होते हैं, इन्हों के द्वारा पौधा अपनी खुराक मिट्टीसे प्राप्त करता है। ईश्वरने हमारे समान पौधेको हाथ नहीं दिये कि वह अपने भोजनको हायसे तोडकर टुकड़े कर सके । इस फठिनाईको दूर कर- नेके लिये एक प्रकारका तेभाय पौधो की जडो से निकलता है। जो मिट्टीको पानी में घुलने योग्य बना देता है। कोई भोजन जनतक पह इतना पारीक न हो जाय कि पानी में घुलकर पौधेको पारोक जड़ो में घुस सके, पौधेके लिये काम का नही होता। यही कारण है कि जिन खेतो को मिट्टी पारीक कर दी जाती है उनमें पौधे अधिक पढ़ने हैं।
पौधे से पहते हैं ६ । इसलिये मिट्टीका धारोक होना भोर जलका उपस्थित होना पोधेके स्वास्थ्यके लिये अत्यन्त आवश्यक है। एक बात और समझनेको है कि कई पदार्थ चाहे ये कितने ही पारीक क्यो न पर दिये जाय, पानी में नहीं घुलने । उदाहरगफे लिये यदि रेतको सूर पारीक पोस दिया जाय तो भी यह जलमें नहीं घुलती । परन्तु पौधो के लिये वही भोजन उपयोगी होगा जो जलमें घुल सके। थत यह आवश्यक है कि पौधेके लिये मिट्टी में उपस्थित भोजन ऐसे रूपमें हो कि वह जलमें घुल जाय । इस कायमें मिट्टीमें धूना कलीको उपस्थिति बडा फाम देती है। फलोमें यह गुण है कि वह सब पदार्थीको गलाकर चूर चूर कर देती है और इस प्रकार मिट्टीमें मौजूद भोजन जो पहले पौधे लिये किसी फामका नहीं था, पौधेके काममें पा सकता है। जिस प्रकार भोजनफे पचानेमे हमारे मुसमें थूफ उत्पन्न होकर यहुत काम करता है ऐसे ही पौधेकी जडो मे कई प्रकारके अम्ल (तेजाय) होते हैं जो मिट्टोमें उपस्थित सुगमको चूर्ण करने सथा पानोमें घुलने योग्य बनानेमें बहुत काम करते हैं। इसलिये चुनेका मिट्टीमें होना जरूरी है। पौधेकी अडो में प्रकृतिने यह अद्भुत गुण रक्सा है कि वह मिट्टी में से केवल उसी पदार्थको लेता है जिसकी उसफो मावश्यकता होती है। जैसे हम अनाप शनाप भोजन करते हैं और बहुतसे ऐसे पदाथ भी खा जाते हैं कि जिनको हमारा मेदा पचा नही समता, और ये सब पदार्थ हमारे मलमे ज्यो के त्यो निकल आते हैं, पौधो की दशा वैसी नहीं है। क्योकि ईश्वरने प्राणियो को बुद्धि दी है कि वे पथ्य-अपथ्यमें अन्तर करके पदाथोको खाद सावें। परन्तु पौधो में न तो बुद्धि है और न यह सम्भव है कि वे जलमें मिले किन्ही पदार्थो को साते और किन्हीं को न खा सकते । परन्तु यह स्वाभाविक गुण प्रकृतिने इनकी जड़ों के सत्वो को दे दिया है । और इसी कारण यदि कोई अभक्ष्य पदार्थ जलमें घुल भी जाय तो पौधों की जडे उसको ग्रहण नहीं करती । पौवा अपनी जड़ो से जलमें धुला हुआ भोजन चूसता है और वह भोजन रखकी दशामे परिणत हो पौधेकै सारे शरीरमें घूमता हुआ भिन्न भिन्न भागोंकी पुष्टि करता है। जैसे हमारे भोजन का रुधिर बनता है और उस रुधिरसे मजा, मांस, हड्डो, वाल, त्वचा भादि बनते हैं वैसेही इस रससे पौधेफे भिन्न भिन्न अवयव धनते हैं और पौधा पढता है। सूर्य की किरणोंसे जलका बहुतसा भाग सूख जाता है और कुछ भाग पौधेके शरीरमें मिल जाता है। पौधेका कौन भाग किस प्रकार बनता है, दूसरा भाग उसो रससे किस प्रकार बन जाता है यह ऐसे प्रश्न हैं जिनपर दृष्टि डालना इस पुस्तकका काम नहीं है। हमने केवल पाठकों के विनोदार्थ तथा सादको पूरी उपयोगिता पाठको की समझमें पा जाय इस मतलपसे पौधो के बढनेका कुछ हाल लिख दिया है। पौधेके बढनेमे अनेक सूक्ष्म रासायनिक क्रियाए होती हैं, जिनको देखकर बुद्धि चकित होती है। उपर्युक्त कथनसे हमको केवल पाठको का ध्यान कुछ सिद्धा- न्तो को ओर आकर्षित करना है। एक यह कि फिसो सेती मिट्टोमें पौधेके भोजनके योग्य आवश्यक पदार्थों का होना ही ।
पौधे कैसे बढ़ते हैं ११ उनकी वृद्धिका कारण नहीं हो सकता, जबतक कि चे पदार्थ इस योग्य न हों कि पौधा उनको सा सके अर्थात वे जलमें घुल सके। प्राय खेतोंको मिट्टीको जांच करनेसे यह पाया जाता है कि उसमें सन आवश्यक पदार्थ उपस्थित हैं परन्तु इमी सिद्धान्तको न समझकर फमल वो देनेसे उपज ठीक नहीं होती। अच्छा विश्लेषण करनेवाला वह मनुष्य है जो यह देसे कि प्रत्येक भोज्य पदार्थकी कितनी कितनी मात्रा मिट्टीमें उपस्थित है जिसको पौधा तुरन्त सा सफे। बहुतसी खार्दै भी ऐसी होती हैं कि वे शीघ्रतासे इस योग्य नहीं होतो कि जलमें भली भाति घुल सकें । अत उनसे होनेवाले लाभको कभी कभी वह फसल जिसमें डालो जाती हैं नहीं उठा सकती, प्रत्युत उससे अगली फसल लाभ उठाती है । अथवा ज्यो ज्यो यह पदार्थ पानीमें घुलने योग्य बनता जाता है त्यों त्यो पौधे उसको खाते जाते हैं। उदाहरण के लिये यदि हड्डियोंको फूटकर सेतो में डाल दिया जाय तो जिस वर्ष ये इस प्रकार लूटकर डाली जायगी उसी वर्ष उनका पूग उपयोग नही हो सकता। फई वर्ष तक धीरे धीरे गलकर वे पोधो को लाभकारी होंगो। साधारण तौरपर यह बात स्पष्ट हो सकती है कि हड्डियो को चाहे कितना ही यारीक किया जाय व पानीमें नहीं घुल सकती, मत काममें भी नहीं आ सकीं। हा, यदि हडियो को गन्धकके तेजावमें घोल लिया जाय तो वे इस योग्य हो जायगी कि पानी में घुल सके। इसी कारण जय कभी हडियो की खादसे तुरन्त ही लाभ उठाना होता है तो उनको गन्य- काम्लमे घोलकर काममें लाया जाता है।
१२ साद खादो के डालनेमें एक यातका और ध्यान रखना आव- श्यक है कि सादो का उपयोग न फेल यही है कि उनमें पौधो का भोजन उपस्थित होता है, बल्कि इसके अतिरिक्ष यह भी देसना होता है कि उसका जल और मिट्टीपर क्या प्रभाव पड़ेगा और उसका पसलपर क्या परिणाम होगा। उदाहरणके लिये यदि कोई खाद सेतोंमें डाडी जायगी तो सेतकी मिट्टी में पानीको धडनेसे रोकनेकी शक्ति पहलेसे अपेक्षा अधिक हो जायगी। जैसे यदि किसी खेतमें ऐसी साद डाली जाय जिसमें पौधों का ही सडा हुआ भाग अधिक दो तो इस रोतमें भरा हुआ पानी जितनी देरमें पहले उड़ता था भर उससे अधिक देरमें पडेगा और इस प्रकार फसलको सिचाई को कम आवश्यकता होगी। दूसरी ओर यदि उस सेतमे पहले ही बिना गली हुई साद अधिक थी तो इसके और अधिक हो जानेसे सेतमें दीमक लग जानेका भय हो जायगा । सूर्य की फिर- गोंके प्रभावमें भी साद डालनेसे अन्तर पड़ जाता है अर्थात किन्हीं खादोंके डालनेसे सूर्याकी गरमी खेत अधिक याफर्पित करता है, किन्हीके डाजनेसे कम । जिस तरह एक प्रकारका कपडा पहननेले अधिक गरमी मालूम होती है और दूसरे प्रकारका कपडा पहननेसे फम । स्याह वस्न चाहे सूती ही हों, शीघ्र गरम हो जाते हैं मोर सफेद उतनी जल्दी गरम नहीं होत । इसी प्रकार वायुमण्डलसे जलके विन्दु, जो हवामें मिले रहते हैं, सींचनेपर प्रभाव पड़ता है। कोई साद वायुमें विद्यमान जलको अधिक सोचतो है, कोई नहीं। जैसे यदि शोरको सुला हुआ छोड़ द अथवा चूना घेषुझी कलीको सुला छोड़ दे तो कूड़ा करकट ओर गोवरको साद समें शीवही नमी आ जाती है। ऐसी ही सादके डालनेसे खेतको मिट्टोम वायुके सचारपर प्रभाव पड़ता है। कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि वे वायुको भली भांति खेतकी मिट्टीमें प्रवेश करने देते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो नहीं करने देते। वायुके सवारका भी पौधो पर अभुत प्रभाव पड़ाता है। बहुतसी क्रियाएं जो पौधो को जडो में होती रहती हैं व केवल वायुको ही उपस्थिति में होनी सम्भव है। अभिप्राय यह कि फेल किसी साइको यानत यह जान लेना कि इसमें फोनसा मूलतत्व है, किस किस मात्राम पौधो का भोजन भागनेको अवस्थामें मौजूद है,काफी नहीं कहा जा सकता। उत्तम कृषक धननेके लिये मिट्टी के गुग तथा भौतिक युक्तियों का प्रभाव जानना भी आवश्यक है । इन सब बातो का पूरा पूरा हाल लिखना इस पुस्तकका विषय नहीं है। कृषि इतना महान विषय है कि उसके एक एक अनपर घडे पड़े प्रन्थ लिखे जा सकते हैं। हमने इस पुस्तकमें उपयोगी, रोज फाममें आनेवाली माते लिखी है, विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस विपयको घडी वही पुस्तक पढनी चाहिये । - --- तृतीय अध्याय कडा-करकट और गोबरकी साद कूड़ा करकट और गोवरकी साद बहुत दिनों से भारतवर्ष में प्रचलित है और हमारे देशवासी इससे काम लेना जानत हैं। पर गो. घरका बहुत बड़ा माग गोइठा (उपले) धनानेमें जाता रहता है और २४ खाद फेवल कुछ दिनो का गोबर ही खादके काममें लाया जाता है । उपर पाथवर जलानेका जो काम लिया जाता है उसमें बहुत कम भाग-जे गख बनता है-सादके काममें आ सकता है। यदि उपलोंको जलाने के काममे न लाकर यह काम लकही और कोयलों से लिया जाय तो लाखो मन साद प्राप्त हो सकती है । परन्तु यह प्रश्न रह जायग कि फोयले और लकडी सरोदकर भाग जलानेमें लाभ होगा या हानि । इस समय इस विषय के दोनों पहलू दिखलानेकी पावश्यकता नहीं है । परन्तु इतना कहना अत्यन्त भावश्यक है कि जिन स्थानों पर लकड़ी जलानेके लिये सस्ती मिल सकती है अथवा जलानेका कार्य किसी और पदार्थकोयले मादिसे लिया जा सकता है वहा गोबरका उपला बनाना छोडकर इसे सादके काममें अवश्य लाना चाहिये । जलाने से मिट्टीका पदाह्य धातु-भाग तो अवश्य प्राप्त हो जाता है परन्तु यह भाग जो डकर हवाम मिल जाता है और जिस में प्रायः सारा ही भाग नत्रजनका होता है, जाता रहता है। फूड -फरकटको खादो को यदि कई स्थानो से लेकर मुकाबला किया जाय तो उनमें अन्वर पाया जायगा, जिसके बहुतसे कारण हैं। इसी कारण यह कह सकना कि उस बार फूड को खादका परिणाम यह हुआ था इस कारण अब भो यहो होगा, गलत होगा। कूड़े को सादमें कई प्रकारके पदाथ मिले. मन्न,रेत, मिट्टो पत्ते तथा ढोरोके नीचे विद्यार.. पदार्थों में बहुत अन्तर होता . ऐसा विचित्र होता है कि गोवर, है फूड़ा करकट और गोवरकी खाद जाता है । फूडेको पाद या पta सम्म धमें विधानो को बहुतसी बातें जाननी चाहिये जिनका व्योरेवार वर्णन हम नीचे लिखते हैं। गोपा, लीद तथा मसींगन मर्यात दोरो की विष्ठा भिन्न भिन्न कारणो से भिन्न प्रकार की होती हैं। एक पशुको निष्ठामें साधारणत जो गुण पाये जाते हैं, ये दुसरे पशुफे गोयरमें नहीं पाये जाते । दोगे को जो चारा दिया जाता है उसके कारण भी उनकी विष्ठामें अन्तर होता है। दोरकी उन्न तथा स्वास्थ्यका भी उसकी विष्ठापर घड़ा प्रभाव पड़ता है, जैसे छोटी उम्रके दोरके गोमरमें ननजन, पुटाश तथा प्रस्फुरिफका अश कम पाया जायगा और युवाके गोवर- में अधिक तथा बुटे के गोयरमें उससे भी अधिक होगा। काम परनेवालेफे गोयरमे अधिक भाग इन उपयोगी पदार्थीका होगा,क्योंकि इसका शरीर मोटा नहीं हो पाता, परन्तु सडे रहनेवाले दोरके गोबरमें इन पदायों की मात्रा कम होती जायेगी। जातिके अनुसार घोडे की लीद गौके गोयरकी अपेक्षा गरम समझी जाती है, उसमें जला भाग कम होनेसे सोनों पदार्थो की मात्रा अधिक होती है और नत्रजनका भाग अधिक होने कारण ही वह शीघ्र सड़ने लगती है। अगले पृष्ठये सानेमें बतलाया जाता है कि किस ढोरके गोबरमें कितनी मात्रा किस उपयोगी पदार्थकी पायी जाती है। यह लेखा १००० सेर ताजे मलका है। इससे यह पता लगता है फि भेडकी लेंडीमें सबसे कम मात्रा पानीको हातो है। उसमें नत्रजन तथा प्रस्फुरिकाम्ल अन्य खादोंसे अधिक होता है। पुटाशकी खाद मात्रा भेडके मलमें अवश्य कम होती है, परन्तु इसका कारण यह है कि भेडकी ऊनमें पुटाश पाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता ह पानी प्रस्फुरिफाट नत्रजन १००० सेर में १००० 1% से पीछे % १००० सेर पीछे % १००० सेर पीछे ५८० घोडा ६० सेर७६ ५ सेर ५०३५ सेर, ३५, ३ सेर ३० गौ ८४० सेर ८४३ सेर ३०/२.५ सेर .२५ १ सेर १० भेड सेर ५८/७५ सेर ७५.६ सेर ६ ३ सेर ३० कि यदि समान भाग प्रत्येक ढोरका मल लिया जाय तो भेड़का मल अधिक उपयोगी पाया जायगा, परन्तु यदि प्रत्येक प्रकारके मलको सुसाकर परीक्षा करें तो उसका परिमाण यह होगा कि ननजन% प्रस्फुरिफाम्ल क्षार घोड़ा २०८ १४५ १२५ । भेड १७८ r --- १४२ ०७१ इसीके साथ यह भी याद रखना चाहिये कि प्रत्येक जातिक पशु तथा प्रत्येक पशुमें भी दिनभरके मलको मात्रा कम अधिक होती है। जैसे घोडेसे गौको दिनभरको गोवरको मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार दिनभरको एक गौकी खाद एक घोडे फी कूडा फरफट और गोबरको खाद सादके समान हो उपयोगी होती है। ढोगेंके मूत्रमें भी फर्क होता है। मनमें मलकी अपेक्षा खादका गुण अधिक होता है। दु सकी घात है कि भारतवर्षमे मृत्रकी उपयोगिताको ओर बिल. कुल ध्यान नही दिया जाता। यह अत्यन्त उपयोगी पदार्थ यो ही सखकर नष्ट हो जाता है। जहां ढोर बाँधे जाते है वहाँकी धरती ही इसको सोख लेती है और यह अत्यन्त लाभदायक पदाथ सेमके काम न आकर व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। दोरोंको बांधनेका ढङ्ग खराब होनेके कारण हो उनका मून फाममें नहीं आ सकता। यद मूनका ऐसा प्रपन्य कर दिया जाय कि समका सब भून बहकर एक ओर जाकर इहा हो जाया करे तो यह मूत्र ज्योका त्यो या पानी में मिलाकर खेलोंमे डाला जा सकता है या और किसी पदार्थ-मिट्टो, खाद, राख आदिमे मिलाकर सेतों में डाला जा सकता है। ढोरो की निडाईका कोई प्रबन्ध ही नहीं होता और कहीं हुआ भी तो बहुत ही वेढगा। किसी सिद्धातको ध्यानमें रखकर यइ काय नहीं किया जाता, वैसे ही कमी कभी एक दो हफ्तेके बाद थोडी बहुत रेत या मिट्टो ढोरो के नीचे डाल दी जाती है। उसमे इस यातका विचार बिलकुल नहीं किया जाता कि इसका दोरो पर क्या प्रभाव पड़ेगा तथा जन यह फूडा या मिट्टी ठायी जाकर सेतम ले जायो जायगी तो खेतमें इसका क्या प्रभाव होगा। इन दोनों बातों का ध्यान रखना जरूरी है। बिछाई या सुसा करने- मे यह ख्याल रहना चाहिये कि ढोर रात भर आरामसे बैठ सके और उनका सप मून विठाई सोख सके। दैलोंके नीचे रोज़ इस २ १८ खाद ६ विछाईको बदलते रहना चाहिये जिसमें उनके नीचे हमेश सखा रहे। पिछाईके लिये रेत वा पुआल आदि काममें लाया जाता जामें कभी कभी ईसकी पत्तियोंसे भी यह काम लिया नावा आड के दिनों में रेत डालनेसे कोई अधिक लाभ नहीं होता। ईखकी पत्ती अथवा पुमाल बिछा दिया जाय तो रात-मर उस गरमी के कारण ढोर सुखसे रहते हैं। पुमाल या पत्तियोंको श बदलने की जरूरत होगी लेकिन यह खेतमें डाली जा सकती हैं कोपर डालकर गलनेके बाद सेतोंमें पहुंचायी जा सकती हैं। यदि गर्मियों में बिछाई जाय तो अधिक उपयोगी होगी, परन्तु रे चिकनी मिट्टी कुछ अश अवश्य मिला रहना चाहिये। खा रेतमें मूत्रके सोख सकनेको तामत नहीं होती और इससे स. सब मूत्र नोचेकी मिट्टी में चला जायगा मोर वरवाद होगा। य कभी फाममें मत लामो। चिकनी मिट्टीक देलों में भी यह अवर होता है कि वे चिफने होनेके कारण ढोरों को मुलायम स्थान दे सकते । जमीन सख्त धनी रहती है। अच्छा तो यह है बिछौने के लिये स्खेतकी रोखली मिट्टी डाली जाय अथवा पीली भूड मिट्टी जिसमें चिकनी मिट्टोको फुछ मात्रा स्वभावसे मिली रहती काममें लायी जाय। इस मिट्टीसे ढोरो के नोचेका स्थान न भी रह सके। यद्यपि पत्तो भोर पुमालमें नत्रमन तथा प्रस्पु काम्लकी मात्रा बहुत कम होती है तथापि यहा पुआल या पर्स डालनेका मतलब इतना हो है कि वे मूत्रको भली भांति सोस तथा दोरों को माराम पहुचा सकें। पत्ती और पुमालको खाक । फूडा फरफट और गोषरकी साद ढेरमें पहुचनेपर सूर्यको गरमी कम हो जाती है और खाद देरमें सड़ती है जिससे एमोनियाके उड़नेका भय कम हो जाता है । ढोरोंकी चरनीमें बचे हुए भूसेको भी उनके नोचे निसर देते हैं और वह मिछानेका काम देता है। रेफिन इसकी मात्रा हमेशा कम मिलती है और यह किसी अन्य चीजके साथ मिडाकर डाला जा सकता है। पत्तो से भी मिछाईधा काम लिया जा सकता है। पतझड़के पत्ते इस प्रकार काममें लाये जा सकते हैं। परन्तु पत्तोंमें नत्रजन और प्रस्फुरिकाम्छकी अधिक माना नहीं पायो जाती तथा यह दोरोको पुमाल तथा पती जैसा माराम भो नहीं दे सकते। गरमीके दिनों में सेतकी पारीफ मिट्टो अथवा भूडके खेतो की रेतसे काम लेना सबसे अच्छा है। अब हम मृत्रक भेदका विशेष ब्योरा लिखते हैं। थोडी आयुर पशु अधिक मूत्र करते हैं। पशु जितना अधिक जल पीता है उतना ही मून अधिक प्राप्त होता है तथा मूत्रमे अलकी मात्रा भी बढ़ जाती है। नीचेफै खानोंसे मालूम होगा कि मूत्रमे मामूली तरहसे कितनी माना किस उपयोगी पदार्थकी पायी जाती है। यह लेखा सर्वसम्मत नहीं कहा जा सध्ना फ्योंकि भिन्न भिन्न पाता के लिहाजले मनमें इन पदार्थीको न्यूनाधिक मात्रा पायी जायगी, तथापि पाठक लेखसे हिसाब लगाकर कुछ अनुमान कर सकेंगे और उन्हें मालूम हो जायगा कि मूत्र भी मलवे कुछ कम उपयोगी पदाथ नहीं है। नीचेक लेससे मालूम होता है कि प्रस्फुरिकाम्लको मात्रा मूत्रमे बहुत ही कम होती है । मलमें प्रस्फुरिकाम्लको सासी मात्रा होती है।
२० म्वालिस पेशाय सेतों में डालने की अपेक्षा गोवरको साद जिसमें मूत्र भी मिलाकर सडाया गया हो अधिक उपयोगी होगी। साधारण जल नत्रजन प्रस्फुरिका क्षार प्रति प्रति प्रति प्रति | प्रति प्रति प्रति प्रति १०००१०००,१०००/१०००/१०००१०००/१०००/१००० भागाभाग भागाभाग भागाभाग भाग भाग पीछे पीछे पीछे पीछे पीछे पीछे पीछे पीछे भेड ८६५८६५१४ | १४ ५० ५ २०३० घोडा ८६०/८६० १२ १२ . ६२०२० १४ । १४ । पशुओंमें प्रस्फुरिकाम्नकी मात्रा नहीं होती परन्तु कुत्ते मादि मासा- हारी पशुओं के मूत्रमें प्रस्फुरिकाम्ल पाया जाता है। इस विषयमें एक बात और भी याद रसनेत्री है। मलमे मोजनका भाग जाता है जो पचकर रुधिर आदिमें परिणत नहीं होता, अर्थात् मल एक तरहसे वे पचा हुआ भोजन है। परन्तु मूत्रमें जो आता है वह पचे हुए भागका आता है। इस कारण मत्रमे नमजन, पुटाश तथा प्रस्फुरिक जिम अवस्थामें होते हैं, वह ऐमी होती है कि पोगा उसको तुरन्त हो अपने काममें ला सकना है। जितना मूत्रद्वारा बाहर निकालता है रस आधे । आता है। यद्यपि ऐसी दशामें अघाकि -- पशु म .
कूडा करकट और गोबरकी खाद २१ पचा सके, कुछ अधिक मात्रा मलमें नत्रजनको पायी जा सकती है तथापि साधारणतया यही बात देखने में आती है। घोडेके सिवाय अन्य पशुओंके मूत्रमे चूना तथा प्रस्फुरिकाम्ल बहुत ही कम पाया जाता है। प्रकृतिने कुछ ऐसा नियम स्पसा है कि पशु भोजनद्वारा जितनी मात्रा नाजन, पुटारा तथा प्रस्फुरिकाम्लकी साते हैं वह सबका सव नत्रजन, पुटाश तथा प्रस्फुरिक मल-मूत्रद्वारा बाहर आ जाता है। यच्चो तथा बूढे पशुओ में यह नियम लागू नहीं होता। यदि किसी खेतमें चारा ही चारा बोया जाय और वह केवल पशुभो के रिगलानेके फाममें लाया जाय और इन पशुओंका सवका सप मल मूत्र उस खेत मे डाल दिया जाय तो खेतकी उपजाऊ शक्ति कभी कम न हो सकेगी, चाहे कितने ही वर्ष उसमे चारा क्यो न बोते रहें। ऐसे पशु, जिनके शरीर हृष्ट पुष्ट हो रहे हैं, घे भी इस दशामे इन तीनो उपयोगी पदार्थोका बहुत कम उपयोग कर अपने शरीरका भाग बना सकते हैं। मलमै मूनकी अपेक्षा नत्रजनको मात्रा कम होती है तथा इस योग्य भी नही होती हि पौधा उसको तुरन्त ही अपने काममें ला सके। यदि मूत्र और मल मिलाकर काममें लाये जाय वो अधिक लाभ होगा। घोडेफी खाद प्राय एकसो पायो जाती है क्योंकि उसे एक हो तरहका भोजन दिया जाता है। यह अन्दाजा लगाया गया है कि दिनभरमें साधारण घोडा १४५६ सेर लोद करता है जिसमे यदि सुवा दिया जाय वो ३१८५ सेर लोद प्राप्त होगी। इसमें 8 सेर । .
२२ . नत्रजन और ४६ सेर खनिज पदार्थ होंगे। इस प्रकार एक वर्षमें एक घोडेसे ३२०८५ सेर नत्रजन प्राप्त हो सकता है, यह कितनी अधिक माना है। इससे पाठक स्वय अनुमान कर सकते हैं कि मल मून कितना आवश्यक पदार्थ है और किमानो को उसको कितनी अधिक परवाह करनी चाहिये । नत्रजनकी अधिकताके कारण घोडेको लीद शीघ्र सड़ने लगती है और इसे गरम साद कहते हैं। गौके गोवरमें जलकी मात्रा अधिक होनेसे यह ठडा गिना जाता है और देरमें सडकर कामका होता है। गौके गोचरफी खाद ३-४ वर्पतक सेतो में अपना प्रभाव दिखाती है। एक दिन में एक गौसे साधारणतया ३६.६२ सेर गोवर प्राप्त होता है जिसको यदि सुला दिया जाय वो फेल ४६६ सेर सूखा उपला (गोइठा) प्राप्त होगा। इसमे १२८ सेर नत्रजन तथा ८६२ सेर खनिज पदार्थ होगे। इस प्रकार गौसे एक वर्षमें २३ सेर नत्रजन प्राप्त होता है। गौके गोयरको यदि धैसे ही डाल दिया जाय तो इसका जल सूख जायगा और यह एक ठोस पदार्थ बन जायगा, जिसका मिट्टी में मिलना कठिन होगा। इसीसे गोबर यदि गलाकर न डाला जाय तो उसका प्रभाव बहुत दिनोंमें जाकर होगा । गोबरके गलने और चूर्ण रूप होनेमें इस फारण भी देर लगती है कि गोवरमें एक प्रकारको विपचिपाहट होती है जो गोपरपर वायु- का कोई प्रभाव नहीं होने देती । पछिया (फलोर) के गोबरमें यह चिप चिपाहट और भी अधिक होती है। शायद इसी कारणसे गोके गोनरको लीपनेके काममें लाया जाता हो । गायके गोचरके सहने में इतनी गरमी उत्पन्न नहीं होती जितनी और पशुओंकी विष्ठा सडनेसे कूडा करकट और गोबर की खाद होती है। अत गोबरसे नत्रजनके उडनेका इतना भय नहीं होता जितना अन्य खादोंके सड़ने में नाजन उड़ने का भय रहता है। भेडके लडीकी खाद-सव सादो में भड़की साद अधिक उपयोगी होती है। यह बात हमारे यहाँके किसान अच्छी तरह जावते हैं । अब भी यह रिवाज अनेक स्थानो पर पाया जाता है कि बहुतसे खेतो में तीन चार दिनतक बाहन हो जानेपर कई दिनतक भेडोंको रातमें बिठा दिया जाता है जिससे उस स्थानकी मिट्टीमें विशेष प्रकारसे उपजाऊ शक्ति बढ जाती है। मेडकी लेंडीकी साद इतनो मात्रामे मिल सकनी कठिन है कि खेतो में केवल वही डाली आ सके। सम्भव है सेतो में बैठनेका और भी कोई प्रभाव होता हो परन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि वाहन (जुते हुए खेत) में यदि तीन चार राश्रितक भेडों को किसी स्थानपर बिठावे तो वहाकी फसल सार सेतकी फसलकी अपेक्षा अधिक उत्तम होती है। दिनभर में मेडसे १८६ सैर मल प्राप्त होता है, जिसमें ४६ सेर सुखा भाग होता है। इसमें १६ सेर नत्रजन और ११२ सेर सनिज भाग होता है। इस प्रकार एक घपमें ६९३५ सेर नत्रजन प्राप्त होता है। क्यो कि इसमें नत्रजनकी मात्रा अधिक होती है और जलकी मात्रा कम होती है, इससे यह बहुत जल्द सडने लगती है और नत्रजनके उड जानेका भय अधिक होता है। यहातक यह बतलाया गया है कि किसानके लिये कूडा फरफट कितना जरूरी है। गोबर, लीद, मूत्र मादि सेतो के लिये कितने उप- योगी है और किस किस जातिके पशुओ के मल मूत्रमें क्या क्या साद गुण पाये जाते हैं। अब हम पाठकों का ध्यान दूसरे विशेष उपयोगी विषयफी मोर आफर्पित करना चाहते हैं। हमने देख लिया कि मल-मनमें वे तीनो पदार्थ, जिनकी पौधो को आवश्यकता होती है, पाये जाते हैं, परन्तु कह चुके हैं कि केवल इन तीनो पदार्थो के होनेसे ही कुछ नही हो सकता जबतक कि वे इस अवस्थामें न हो कि पौधा तुरन्त ही टनको अपने भोजनके काममें ला सके। गोयर तथा पिछाईमें जो नत्रजन, पुटाश तथा प्रस्फुरिकाम्ल मौजूद रहता है वह इस योग्य नहीं होता कि पौधे उसको भोजन काममे ला सके । इसलिये जरूरी होता है कि गोवरको इस तरहसे काममें लाया जाय कि इसमें उपस्थित तोना पदार्थ पौधोंके भोजनका वास्त- विक कार्य कर सके । दुसरी जरूरी बात यह है कि जितना भाग मलमूनमें नत्रजन आदि पदार्थोंका मौजूद होता है वह सबका सव काममें लाया जा सकता है। अब हम यह दिखाना चाहते हैं कि क्या यह सभव है कि यह सयकी सप माना हम अपने खेतोंतक पहुंचा सकते हैं अथवा नहीं ? और यदि पहुचा सकते हैं तो पौधे सनमेंसे किसनी माना तत्काल फाममें ला सकेगे और कितनी देर में । वास्तवमे यह प्रश्न पाठकोंकी समझमें आ जानेसे कूड़े करकटकी खादका वास्तविक लाभ समझमें आ सकेगा। गोवर तथा मूत्र सप्रसे पहले उस स्थानपर गिरते हैं जहा पशु उस समय मौजूद हो। यदि पशु उस समय जगलमें मौजूद है तो वह भाग किसानके काममें नहीं, सकता, यदि मल-मून त्याग करनेका, रहनेकी ही हो तो क्या होगा ? मल-मूत्र गिर -- . , फूड़ा फरफ्ट और गोयरफी साद मलमें घुड़े हुए रुपयोगी पदार्थों को लेकर मिट्टी में चला जायगा और यदि उसे जगहको मिट्टीको सोदकर अलग न किया जाय तो यह भाग मिट्टोमें मिल जानेसे नष्ट हो जायगा। पशुओंके बाँधनेका स्थान ऐसा धनाना चाहिये कि वह जलको सोस न सके। यह तभी समय है जय स्थान पकी ईटोंसे जड़ा हो या रस्य चिकनी मिट्टीको जमीन हो । ई टोंमें दाम भी अधिक लगत है और इससे पशुओंको माराम भी नहीं मिलता, इसलिये चिकन मिट्टीका फर्श होना हो अच्छा है। चिकनी मिट्टीफे फेवन डले साल देनेसे या उनको टुकडे फर पिला देनेसे यह कार्य न चलेगा, क्योंकि इस तरह करनेसे एक तो ढोगेको यह टुकडे चुभगे और फप्ट दगे पथा भूमि समतल न होनेसे मूत्रको नोचे जाने का मौका मिलेगा। इसलिये चिकनी मिट्टी और पानी डाल डालकर भली भानि फूट देना चाहिये जिसमें वह सन इफमार हो जाय, फिर चाहे कितना भी पानी उसपर क्यों न डाले वह नीचे न घेठ सकेगा। ऐसा करनेसे जमीनमे मून तथा मलका फुछ भाग जानेसे तो पच गया परन्तु अब सयका सत्र मून यह निकलेगा और इस प्रकार फ्लयर सूब जायगा । इसको दूर करने तथा ढोरोंके लिये मोर सुसमारो स्थान बनानेके लिये जैसा हम लिख चुके हैं कि कुछ बिछौनी कर देनी होगी, इससे दोनों लाभ होंगे, एक ओर तो मल मूनका सबका सर भाग इस बिछौनीमें मिल जायगा और दूसरी भोर ढोरोंको आराम मिलेगा। इस प्रकार स्थानिक हानिको हम दूर कर सकते हैं। अब यदि इस बिछौनीको मल मूत्र सहित सेवमें डाल दिया जाय तो क्या परिणाम होगा ? इसपर विषार २६ खाद । करनेशी भावश्यकता है। खेतोंमें यह पदार्थ जाकर मिट्टीमें नहीं मिल सकता। यदि इसको कुछ दिनतक छोड़ दिया जाय तो सभव है कि इसमें दीमक लग जाय और पौधोंको लामो स्थानमें हानि हो। जहांतक मूत्रमें विद्यमान नत्रजन तथा खनिज पदार्थ हैं वहातक वो पौधेके काममें ला जायगे परन्तु बिछौनी और गोयरका भाग देरमें धाममें पा सकेगा। जयतक यह पदार्थ गल सडकर खेतकी मिट्टीमें न मिल जाय कोई लाभ पौधोको नही पहुच सकता । इस प्रकार खेतमें जानेसे गलने समयतफ इसका पड़ा रहना निरर्थक हुआ तथा खेतमें मिलना भी सुगम नहीं है । अत यह आवश्यक है कि इसको किसी भोर स्थानपर डालकर गलाया और सडाया जाय और तय खेतोंमें डाला जाय । गोपर, मल, मूत्र तथा अन्य सघ पदार्थ, जिनमें नत्रजन फुछ भी उपस्थित होता है, यदि हवामें छोड दिये जाय को वे सड़ने लगते हैं और उनमें स्वाभाविक ही ऐसे परिवर्तन होते हैं कि वे चूर-चूर हो जाते हैं । अत मलमूत्रको चूर-चूर करनेके लिये किसी स्थानपर छोड देना चाहिये जहाँ वह गल सडकर ठीक हो जाय। यह स्थान फैसा हो, पहले इसका विचार आवश्यक है । इसके पश्चात् हम यह बतावे गे कि पडा-पहा मल-मून चूर-चूर होकर सादमें परिणत हो जाता है। और मल-मूत्र डालनेस स्थान ऐसा होना चाहिये कि उसमें पानी सोखनेको शक्ति बिलकुल न हो। इसके लिये ई टोका पका फश होना चाहिये या चिनी मिट्टोको सब कूटकर निछाना चाहिये । पर चिकनी मिट्टीमें एक ऐष होता है, खादमें जो चुनेका वह चिकनी कूडा करकट और गोबरकी साद २७ अश रहता है, खादके सडनेसे जो एक प्रकारका अम्ल, जिसको Humic Acid (काष्ठाम्ल) कहते हैं, उत्पन्न होता है, मिट्टोको जल्द भुरभुरा बना देता है और फिर चिकनी मिट्टोमे सोस लेनेकी नयो शक्ति नहीं रह जाती । इसलिये सथा और कई कारणोंसे नीचेका स्थान पका ही बनाना चाहिये। इसमें सर्च बहुरा नहीं, पर लाभ अधिक है। दूसरी बात खादको सई में डालना चाहिये, जिसमें बिसरने स्मादिका डर न रहे। खाद खुली हुई पडी रहनेसे सराब हो जाती है और उसमें जो नत्रजन रहता है वह उड जाता है। वर्षासे पहले काममें न आनेगाली सादोंपर छायाका प्रबन्ध होना चाहिये, जिसमें ऊपर वर्षाका पानी न पडने पावे । छप्पर डालने का प्रबन्ध न हो सके तो कमसे कम खादके खतोंको भजी भाति धन्द कर दिया जाय । बन्द करनेसे यद्यपि खादके सडने कुछ अधिक देर लगेगी, लेकिन पानो भीतर जानेसे जितनी हानि करता उससे बहुत कम हानि होगी। भागेके वर्णनसे आपको मालूम होगा कि खाद पडी रहनेपर उसमें क्या-क्या परिवतन होते हैं। गोयरकी सादमे विशेष रूपसे नर. जन बहुत ही कामकी चीज है। नत्रजन एक तरह की गैस है जो हवामें उड जाती है,लेकिन गोयर और मूत्रमे यह गैस ऐसे रूपमें मिली रहती है कि नहीं पड़ती। गरमी पाने तथा हवा पहुवनेपर जय सड़ना प्रारम्भ होता है तो इसमें एमोनिया तथा नत्रभनके अनेक मिश्रण बनकर घडने लगते हैं और खादका लाभदायक अश उडकर नष्ट हो जाता है। गोबरकी खादमें दो ताइके जन्तु काम करते हैं, एक ऊपरके २८ साद भागमें जहा हवा लगती है और दूसरे ढेरके बीच में जहा हवा नहीं लगती। गोयर तथा विठाईमें ऐसे भाग होते हैं जो पानी में घुरनेका गुण नहीं रखते और पौधों के काममें तुरन्त नहीं आ सकते । देरफे घोचमें जो जन्तु काम करते हैं, वे इन सब मिश्रणो को तोडने फोडनेका काम करते हैं और खादको सड़ाना आरम्म कर देते हैं और कपरके जन्तु इसी प्रकार सादको कारयनिक एसिड गैस तथा जलमें परिणत कर देते हैं। पहले प्रकारके अन्तु, जो वायुको अनुपस्थितिमे ही काम करते हैं, सर पदार्थीको छिन्न भिन्न फर डालते हैं और पदार्थोका रूप बदल कर नये मिश्रण कर खादमें सडाव पैदा कर देते हैं । जब सादके भीतरवाले इन जन्तुपोंके कारण सादके सव मिश्रण नष्ट-भ्रष्ट होकर साधारण रूप धारण करते हैं तो वायुका संचार सादमें आरम्भ हो जाता है और हवा लगते ही यह जन्तु मर जाते हैं, हवा लगनेपर यह नहीं जी सकते । अब ऊपरवाले जन्तु, जो वायुमें जीवित रहते हैं, अधिक मात्रामें फैल जाते हैं और जल बनाना आरम्म फरते तथा कारबनिकाम्ल उत्पन्न करके कावन. के मिश्रणों को नष्ट करना मारम्भ कर देते हैं। इससे पाठकोंको मालूम होगा कि सादके बीचवाले जन्तु केवल प्रारम्भिक कामके लिये ही पैदा होते हैं और अपना काम समाप्त करके मर जाते हैं। यदि भीतपाले जन्तु काम न करे तो वायुका सचार खादमें असम्भव हो जाय और सादमें पोलापन न मा सके। खादमें सडते समय कार्बनिकाम्ल उत्पन्न होनेफे कारण घडी गरमी उठती है और नत्रजनके मिश्रण एमोनियामें परिणत होते और फिर फार्बनिका । फूडा फरफट और गोयरकी खाद म्लसे मिलकर एमोनिया फावनिक बनते हैं। यह पदार्थ अधिक गरमी होनेसे फिर फट जाता है और एमोनिया उड़ने लगता है। इस प्रकार सादका बहुमूल्य अश नष्ट हो जाता है। यदि हवा अधिक न जाने पावे तो एमोनिया फम यनेगा, क्योंकि गरमी कम उत्पन्न होगी और उड़ने की सम्भावना कम रहेगी। सादमें कभी कभी केवल ना- जन रह जाता है। सादके गलने में देर लगती है और यदि सावधानी- से काम न लिया आय तो स्वादके बहुमूल्य माग नष्ट होनेकी समावना रहती है। साइमें एक प्रकारका काठाम्ल (Humic Acid) भी पैदा होता है जो खेतोंके लिये बडा उपयोगी है। यह किमी प्रकार खेतमें क्यों न पहुंचाया जाय भारी भोतिक प्रभाव रसता है। सादक सड़नेमे नमी तथा गरमी, इन्हींको ज्यादा जरूरत होती है । साधा रणतया प्रत्येक मनुष्य जानता है कि जो पदार्थ कुछ घण्टमे गरमीके मौसममें सडकर सराप हो जाता है वह कई दिन तक जाडे के दिनों में धरा रहता है। यदि फलोंको गरमियों में देरतक रखना पड़ तो उनमें थोड़ी ही दरमें परिवर्तन हो जायगा। परन्तु जाडोंमें देरतफ रफ्स रहनेपर मो उनमें सडार रत्पन्न नहीं हो सकता। सडानके लिये दोनों वस्तुओं- का होना आवश्यक है। सादमे नमी तो बहुत होती ही है, परन्तु सूर्यको गरमी के कारण और कुछ कायनिकाम्लक पारण खाद शीघ्र सड़ जाती है। जो साद खुली पड़ी रहती है उसमेंसे नमो भो शीघ्र उड जाती है और वह साद सूख जाती है, परन्तु उपयोगी नहीं पनती, क्यो कि यह गलती नहीं है।
३० खाद होशियार किसानका यह सबसे पहला काम है कि वह नत्रजन- को नष्ट न होने दे। नत्रजन कई प्रकारसे नष्ट हो जाता है। यदि कार्यनित एमोनिया ही बनकर रह जाय तो कोई हानि नहीं होती, परन्तु फेवल एमोनिया तथा नत्रजन दोनो सडनेवाले पदार्थ हैं, मत कृपकका यह फत्तव्य होना चाहिये कि वह इन दोनों को उत्पन्न होने दे। स्मरण रखना चाहिये कि खाद जितनी अधिक गरम होगी, उसकी जितनी अधिक उलट-पलट की जायगी और जिवनी सूसी रहेगी उतनी ही उसके अन्दरसे एमोनियाके नष्ट होनेकी अधिक सम्भावना है। अतएव अच्छो साद बनानेके लिये यह जरूरी है कि उसे एक गढेमें मरफर बन्द कर दो, वह भीतर ही भीतर गल जायगी और चूर-चूर होकर पौधेके फाममें भाने योग्य हो जायगी । ऊपर छप्पर डाल दनेसे और भी अच्छा होगा। बहुतसे रासायनिक विद्वानोंने बहुतसे ऐसे पदार्थ बतलाये हैं, जिनके डालनेखे एमोनियाफे नष्ट होने का डर नहीं रहवा । एमोनिया गधकाम्लके मिलनसे गन्धित एमोनियामें बदल जाता है। गधित एमोनिया ठोस पदार्थ है और वायुमें उडफर नष्ट नहीं होता तथा पौधों में डालनेसे उसका नत्रजन पौधोंके काममें आ जाता है। हमने नत्रजनकी सादोंमें इसका वर्णन किया है। उसके लिये भरछा यह होगा कि सादके नीचे पुरानी उत्तम सडी हुई खाद डाल दा जाय तथा घोच-बीचमें भी डालते रहे। ऐसा करनेसे पुरानी सादसे कार्य निकाल निकलसा रहेगा और वह एमोनियासे मिलकर उसको कार्यनित एमोनियामें बदल देगा।
। कूड़ा फरफट और गोयरको साद काधनित एमोनिया एक न उड़नेवाला पदार्थ है। जिन किसानों- के यहां खत्तोंमे डाला जाय और सत्ते बन्द करक सड़ाना चाहे उनको फेवल धीच बीचमें थोडी थोड़ी पुरानी खाद डाल देनी चाहिये। हमारे देशमे सादको वेसे ही खुला छोड दिया जाता है और उसका बहुतसा बहुमूल्य भाग इस प्रकार उड़ जाता है। हमार देशकी साद साधारण मिट्टोसे कुछ ही अच्छी हैसियत रखती है। गोबर तथा पेशाका साराका सारा पानो ड जानेसे खादमें सक्षा अधिक गरमी रहती है और वायुका अधिक सचार हो जानेसे ये जतु जो गोवरफे तिनके मादिको तोड़-फोड़कर ऐसे सम्मिश्रणोंमें परिणत करत है कि वे पौधोंके काममें आ सकें, फाम नहीं कर सकते और गोवरको खाद अच्छी तरहसे नहीं गलने पातो, उसक बड़े बड़े हळे बन जाते हैं, पत्ती, तिनके तया गोवरके अन्दर उपस्थित भाग, जिनको पशु पचा नहीं सका था, ज्योंफ त्यों ही बने रह जाते हैं और इसी रूपमें वह खाद सेतोंमें डाल दी जाती है। क्या इस प्रकारको खाद कुछ भविक उपयोगी हो सकती है ? कदापि नहीं। खादका कोई पदार्थ क्यों न हो जो मिट्टोमें भी मिलकर तद्प नहीं हो सकता वह किस प्रकार पौधों के काम मावेगा । किसानका फतव्य है कि वह गोबर की खाद बनाने में दो बातों का विशेष ध्यान रक्से। प्रथम यह फि नत्रजनका कोई भाग नष्ट न होने पावे और दूसरे साद अच्छी सरह गल जाय। गोवरकी खादको खेतमें डालनेसे और सादोंकी अपेक्षा क्या लाम होता है, इसपर हम कुछ थोडासा विचार करते साद हैं। कई बार यह प्रश्न उठाया गया है कि जन सव सादोंसे यह खाद सस्ती मिल सकती है तब अन्य सादोंक डालनेको क्या यावश्यकता है ? खादोंमें कौन साद बहुमूल्य है, कौन सस्ती ह, यह बड़े गम्भीर प्रश्न हैं। यहां इनकी मीमांसा करना निरर्थक है और विशेषकर भारतवर्ष जैसे देशोंमें जहापर कृपया ध्यान ही और खादोंकी ओर आकर्षित नहीं हुआ है। लोगोंने अभी इस कार्यमें अधिक दिलचस्पीसे काम लेना भारम्म नहीं किया है। वह समय हमारे लिये गर्वफा होगा जय इस प्रकारके प्रश्नों में हमारे देशवासी रोचकतासे भाग लेंगे। गोरक्षी खादमे सारे आवश्यक पदार्थ उपस्थित है और इस कारण इसे सब प्रकारके सेतोंमें चाहे हम कोई पदार्थ क्यों न मोवें, डाल सकते हैं । पान्तु इन पदार्थों की माना बहुत ही न्यन होती है। प्रत बहुत मात्रामें डालनेसे अधिक लाभ पहुंच सकता है। हमने इसी विषयमें अपर बतलाया है कि गोघरको खाद सर्वदा मिन्न मिन्न प्रकारको होगी। परन्तु जांचकर यह पता लगाया गया है कि साधारणत १ टन गोपरको खादमें केवल १५ पोड नमन, ५ पौण्ड प्रस्फुरिकाम्न और ७ पौण्ड पुटाश होता है। नत्रजनका साराका सारा काम जिस वर्ष खाद डाली जाय उसी वर्ष फाममं नहा मा जावा, क्योंकि ननजन ऐसे ऐसे सम्मि श्रणोंकी दशामें उपस्थित रहता है कि वह तुरन्त काममें नहीं आ सकता। इसलिये जो किसान गोनरकी अधिक खाद अपने खेत में डालता है वह अपने धनका फल एक ही धपमे नहीं पा सकता। - फूडा करकट और गोषरकी खाद ३३ नत्रित सोडा मादि ऐसे पदार्थ हैं जिनका प्रभार सो वर्ष हो जाता है, उनमे १०० भागों से ७८ म.7 नत्रजन उसी वर्ष काममें मा जाते हैं। यही कारण है कि सोडा आदि कृत्रिम खार्दोका प्रभाव फसळपर इसी वर्ष हो जाता है। परन्तु गोपाकी खादफा एकमात्र यही लाभ नहीं है कि इसके डालनेसे पौधेको आवश्यक भोजन मिल जाता है, बल्कि गोबर डालनेसे और कई लाभ होते हैं। जैसे यदि किसी खेतमें कृत्रिम खाद ही डाली जाय और ऐसी खाद, जिसमें ऐ द्रिक पदार्थ (ऐ द्रिक साद Organic manures ) मौजूद हों, न डाली जाय तो जताई ठीक न हो सकेगी। वर्षा न होनेपर पौधे बडी जल्दी सूख जायगे, अधिक वर्षा भी इनको हानि पहुचा- वेगो । दुसरो पात गोबरकी साद डागनेसे यह होती है कि सूर्यकी गरमी खेतको अधिक गरम कर शोघ्र नहीं सुखा सकती। तीसरे वायुका सचार सेतमें बना रहनेसे पौधे अच्छी तरह बढते हैं। चौथे गोवरकी सादमें एक पदाय होता है जिसको humio ( फाष्ठाम्ल) कहते हैं और इसमें यह गुण होता है कि पौधोंमें यह सूखा सहन कर सकनेकी शक्ति देता है तथा इस पदार्थको उपस्थिति के कारण ही जब अधिक वर्षा होती है तो खेत अधिक जज सोख लेता है और फिर धीरे धीरे पौधे उस जलको चूसते रहते हैं। भारत जैसे देशमें जहा पानीका कोई सहारा नहीं, गरमी भी और देशोंकी अपेक्षा अधिक पडती है, इस गुणके कारणही गोबरको खाद बहुत उपयोगी है। जिन पतोंमें कोई पदार्थ बहुतही अधिक मात्रामें उत्पन्न करना हो उनमें गोधरकी खाद ज़रूर डाली जाय, परन्तु साथ ही कृत्रिम ३ खाद सादास भी काम लिया जाय । इस प्रकार उस खादमें दोनो गुण हो जायगे। गोवरकी खाद ग्वेनो मे डालनेका उत्तम समय वर्पाक पूब है उस समय सेतो में स्वाद डालकर भली भाति मिला देनी चाहिये वर्षाका पानी पड़नेसे सम खाद गलकर मिल जायगी और उसके षा अगर कोई फसल बोई जायगी तो बड़ी अच्छी उपज होगी। या खेतमे कोई फसल बोई हुई हो और उसमें खाद डाली जाय तो सह अच्छी गली हुई साद डाली जानी चाहिये, नहीं तो भय होगा Eि कहीं खादके गलने समय सेतमें दोमा उत्पन्न होकर हानि पहुचावे । साद यदि रेनोली तथा रौसली जमोनमें डाली जाय तो सर्व अच्छी तरह सडी हुई डाली जाय। इसके गलनेसे मेतके अन्दर ए प्रकारकी चिपक पैदा हो जाती है । यह चिकनी मिट्टोमे किसी रूप डाल दी जाय तो लाभकारी होगी, परन्तु इसे भलीभांति मिला देन आवश्यक है, क्यो कि इसके डालनेसे सारे ऐतकी मिट्टीमे चिकना पन दूर हो भुरभुरापन आ जायगा, पौधो की जडे खूप गहरी ज सके गी और वायुका सचार ठोक हो सकेगा। ठड खेतो को गोवर खाद गरम कर देती है, क्योकि सहते समय खादसे कार्बनिकाम्न निकलनेके कारण खेतकी मिट्टीको ऐसा कर देती है कि इसमें उप स्थित भोजनका भाग पौधेके काममें आ सके और सडनेकी गरम सेतकी मिट्टोको गरम रस सके । गोवरकी सादको गलनेमें देर लाती है। साधारणत एक वर्षम .
MA फूडा फरकट और गोयरफी साद गलती है। यदि खादको जल्दी गलाकर फाममे लाना हो तो इसको सहा ताकीव यह है कि एक गड्ढा खोदो और उसक नीचे पयो इटें भलीभांति निछा दो जिसो सादका कोई भाग मिट्टो न मिल सका। गढ़में गोयर कूड़े मादिको तह भनी भाति लगा दो। जप यह तह एक फुटके परीष मोटी हो जाय तो इसपर पेशाय अथवा मोरोका पानो भली भांति छिडक दो और इसपर रासकी एक तह विश दो, फिर इसपर एक तह खादकी लगाकर इसी तरह डालने जाओ। जब देर काफी ऊँचा हो जाय ता ऊपर गसको एक तह और देकर छोड दो। एक सप्ताहके पाद एक लोहेके मोटे छड़से इस ढेरमे थोडी थोडी दूरपर सुगर फर दो जो इतने गहरे हो कि नीचेन चल.जाय । अन इन सूराखो में यही गीज़ पानी डालो। यदि देर बहुत मोटा हो और इसमें पानीफा डाल पाना असमव हो, क्यो कि सूरासका गहरा कर सकना कठिन होगा तो इसकी अच्छी तरफीव यह है कि चौडे यासके फई थोथे नल घनना को, जिनमें थाई-योडे फासलेपर सुगस हों, इन यांसों को सादके ढरमें, साद घालते समय ही थोडे थोडे फासलेपर लगा दो। पर इनमें यह पानी डालो तो चारो मोर फैल जायगा। वात्पर्य यह है कि स्वाद पानी तथा गरमीको उप- स्थितिमें शोध गलती है। पानी इस प्रकार पहुचाया जायगा और गरमी सज्ञान प्रारम्भ होनेसे स्वय पैदा हो जायगी। यदि यह कार्य और भी शीन करना हो और सरदोका मौसम हो तो थोड़ी मात्रामें पानी में चना और मिला दना चाहिये और इस देरपर रास भली भांति डाल देनी चाहिये । रास न डालनेसे सादमें उत्पन्न हुआ नत्र खाइ अन उड नायगा और गखको उपस्थिति में इसके उड़नेका भय न रहेगा । जहाँ तक हो सके चूना थोडी मात्रामें डालो, क्योंकि देखा गया है कि अधिक चूना होनेसे एमोनिया अधिक घनकर उडने लग जावा है और फिर अधिक राख भी उनको न रोक सकेगी। चतुर्थ अध्याय पत्तोंकी साद अन्य खादोंकी तरह पत्तोंको साद भी खेती के लिये उपयोगी होती है। यह बहुत सस्तेमें तैयार की जा सकती है। गावोमें तथा खेतोंके पास-पास प्राय बाग, जगल वगैरह होते हैं। पतझडके दिनोमें वहासें पत्ते इकह करके देर लगाये जा सकते हैं। गांवों में देखा गया है कि भभूजे इन पत्तों को इकट्ठा कर भाड़ जलानेके काममें लाते हैं। अगर भाडकी रास सेतोंमें सालो जाय तो वह भी कुछ लाभदायक होती है पर उसका विशेष उपयोगी अंश अलफर नष्ट हो जानेके कारण वह अधिक फायदेमन्द नहीं होती। पचोंको अगर गोवरकी खादमें मिलाते रहें तो विना परिश्रमके उनकी खाद बन जायगी भोर यह खाद विशेष उपयोगी होगी। अगर केवल पचोंको खाद बनानी हो तो उसका उपाय :- पतझड़के पत्ते, घास, पौधोंको ज इत्यादि चीजो को एक गढ़े। में भर देना चाहिये। यदि इसमे हरे पत्ते भी रहे और लाम पत्तोंकी खाद ३७ होगा क्यो कि खाइके सडनेके लिये नमीकी जरूरत होती है। ढेर बनानेका सिद्धान्त पहले लिखा जा चुका है, लेकिन यहां सक्षेपमें फिर लिख दिया जाता है। गढ़ की तहमें चिकनी मिट्टी कूटकर भली- भांति लिपाई फग देनी चाहिये, गढ के चारो ओर ऊपर नीचेसे भी लीप देना चाहिये, जिसमें खादका कोई अश मिट्टीमें न जा सके। इस गढ को पानीसे सर करके तीन-चार रोज छोड देनेके बाद फिर मिट्टीकी एक सह डाल देनी चाहिये जिसमें स्वाद सडते समय उत्पन्न होनेवाले पदाथ नष्ट न हो सके। इसके बाद इसपर पत्तो की एक तह डालकर पानीसे तर करके मिट्टी डालनी चाहिये। गदा भरने तक इसी प्रकार पत्ते और उसपर मिट्टीको तह डालते जाना चाहिये । भर जानेपर मुह बन्द कर वर्षाके पानीके बचावके लिये ऊपरसे एक छप्पर डाल देना चाहिये। यदि पत्ते अच्छी तरहसे तर किये जाय वो ६१० महीने में स्वाद हो जाती है। ऊपर पचोंको तर करने के सम्बन्धमें जो कुछ कहा गया है उसपर विशेष ध्यान देना चाहिये , क्योंकि बिना तरी और गरमीके कोई खाद नहीं सइ सकती। गरमी वो सादमें भीतर सूद हो पा हो जाती है, क्योंकि कार्बनिकाम्ल तथा कार्वतद्विम्लजिद मादि गैस सडते समय उत्पन्न होती है, लेकिन तरी अपने माप नहीं पैदा होती। तरीके लिये आर पानीके बजाय पेशाब, मोरीका पानी और किसी तरहका गन्दा पानी डाला जाय तो अधिक उपयोगी होगा। गदे पानीसे खाद जल्दी सड़ती है। गन्दा पानी न मिले तो साफ पानीको अपेक्षा तालाबका पानी डालना भविक उपयोगी होगा। रमोईका जल भी डाला जा सकता है। ।
साद - खादको तर रसनके लिये गरमीमें अधिक और सरदी के दिनों में फम पानी देना चाहिये। इतना ज्यादा पानी कभी न देना चाहिये कि वह बहुत नीचे तक चला जाय और खादका अश भी साथ लेता जाय। अधिक पानी डालनेसे एक हानि यह भी है कि सबके सब पत्ते आपसमें जुड़ जायगे और सडनेका काम सुगमतासे न हो सकेगा। अधिक पानी डालनेसे साद एक घरीखी नहीं हो सकती, नीचेकी साद अधिक गलेगी और ऊपरको ज्योंकी यों बनी रहेगी । साद विशेषकर पत्तोंकी साद जनतक गल न जाय पौधोंके किसी काम नहीं आ सकती, क्योंकि यह पानी में नहीं घुल सकी और इसलिये पौ? भोजनका काम नहीं दे सकती । यदि पत्तोंकी खादको और भी जल्दी बनाना हो और उसकी उपयोगिता बढानो हो तो अच्छा यह है कि इसमें पुगना बुा हुमा चना भी छिडरते रहे । खादमें डालनेके लिये बिना वुझा चूना कभी काममें न लाना चाहिये, क्योंकि निना घुझा चूना पेड़ोंको हानि पहुचायेगा, पत्तोंको जलायेगा और उनको गला डालेगा। जो चूना बहुत दिन पहले चुझाया जा चुका हो और पड़ा हुआ हो, वही काममें लाया जाय । यह चूना वडा सस्ता होगा, अन्दाजन 11) मनक भानसे मिल जायगा । चूना डालोसे साद भी जल्दी बनेगी। साथ हो ऐसे सेनोंमें जिनमें चूनेकी कमी है अथवा ऐसी चीज' योनी है जिसम चनेको आवश्यकता है, यह ग्वाट और भी अधिक उपयोगी मित होगी।
पञ्चम अध्याय शोरा तथा खारीकी साद खारी एक प्रकारकी मिट्टी है, जिसको लोना मिट्टी या शोरा मिट्टी भी कहते हैं । बहुतसे स्थानो में एक और मिट्टी भी, जो पानीक कारण नदी-नालो के किनारे फूल जाती है और सफेद हो जाती है, इसी नामसे पुकारी जाती है। इसका नाम रेह है। धोबी इसे फपटे धोनेक काममें लाते हैं। रेह सवदा नदी-नालो के पास पायो जाती है । सारी मिट्टीको आगपर डालनेसे एक प्रकारको रोशनीसी होगी जैसी शोरा डालनेसे होती है। स्वारो मिट्टो वास्तवमें शोरेको हो मिट्टी है । इसीसे शोरा बनाया जाता है। शोरा बनानेवाले, जिनको भागरी या नोनिया कहते हैं, इसको पानीमे घोलकर मिट्टोका अनघुल भाग अलग कर लेते हैं और धुलोबाने भागको सुखाकर शोरा पना देते हैं। सारी मिट्टी बहुन स्थानोंपर इननी अधिक होती है कि सप कयो दीवारे फूल जाती हैं और खुरच देोसे मिट्टी नीचे चूर चर होकर गिर पड़ती है। जिन स्थानोंपर मून पडना रहा हो अथवा अधिक दिनो तक खाद ही पडती रही हो, वहाकी मिट्टी भी ऐसी हो हो जाती है। सारी मकानो की दोवारो को माडर अथवा रास्तकी मिट्टीको इकट्ठा करके काममे लाते हैं। कहीं कहीं इसरे बड़े बड़े ऊचे ढेर स्वाभाविन रूपसे मिलते हैं। इनको किसान इकट्ठा ।
१ ४० साद . खारीको पाद भी भारतवर्ष पुगनी है और यहुत दिनो से लोग इसकी उपयोगिताको जानते थे। सारीकी पाद क्यो उपयोगी होती है और इसमें क्या मूल तत्व है, यह जानना आवश्यक है। सारी वास्तवमें एक प्रकारका मिट्टी मिला हमा शोरा है, मत शोरेमें जो गुण पाये जाते हैं वही इस सादमें पाये जाने चाहिये। शोरेका रामायनिक नाम ननित पुटाश है अर्थात् यह नत्रान अथवा पुटाशका एक मिश्रण है। इसके डालनेसे इसी कारण पौधों को नमन था पुटाश दोनो पदार्थ प्राप्त हो सकेंगे। नत्रभन पौधों के तुरन्त फाममें या जायगा, पर पुटाश उपयोगी न होगा। गधित पुटाश फाममें मानेवाली चीज है जिसच वर्णन किया जा चुका है। चिकनी मिट्टोमें काफी पुटाश होता है मत विनोर तथा डाकर मिट्टोफे लिये खारीकी याद अधिक उपयोगी नहीं हो सकती, प्रत्युत सभव है कि हानिकारक हो । खारीकी खाट सदा ऐसे सेतोंमें डाली जाती है जो रौसले हों। ग्वारीकी साद डालनेको साधारण रीति यह है कि जिस दिन हवा बन्द, हो, प्राम काल खेतमें बिसरफर पानीसे सींच देना चाहिये, जिममें सड़ न सके मोर सबकी सब पानीमें धुकर पौधोंके फाममें मा सके। अगर खेनमें पहिले पानी दे दिया जाय और जब उसमें ऐसी नमी याकी रहे कि पैर विपकते रहें तब बिखेरी जाय तो और अच्छा है। खारी निखरने के बाद शोध पानी देना चाहिये । साके डालनेसे पानी अधिक आवश्यक होता है। इसका कारण बिलकुल स्पष्ट है । नत्रजनके पहुंचने का परिणाम सदा यह होगा कि पौधेका , शोरा तथा खारीकी खाद ४१ बहुत बढ़ना प्रारम्भ हो। पौधोंके पढनेके लिये जल अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि पौधेका अधिक भाग जलका ही होता है। यदि खारी दिये हुए खेतको पानी ठीक समयपर न पहुंच सके तो शका है कि सबका सब सेत जलकर नष्ट हो जाय। खारी अथवा और कोई नत्रमन सम्बन्धी साद डालनेका पहला परिणाम यह हुआ करता है कि पौधे एकदम बढ जाते हैं और इसी कारण जल अत्यन्त भावश्यक होता है। जो किसान जलका फाफो प्रबन्ध करनेमे पस मर्थ हैं उनको कदापि नत्रजनवाली साद सेतोंमें न डालनी चाहिये। यही कारण है कि हमारे यहां के किसान खारीको वर्षा के दिनों में डालते हैं। खारी भधिकतर ईखमें डाली जाती है, क्योंकि प्रथम तो यही एक बहुमूल्य चीज किमान पैदा करते हैं और दूसरे इसको केवल वही लोग पाते हैं जिनको पानीका प्रबन्ध करनेमें काई दिछन नहीं होती। पानीका प्रबन्ध न हो सके तो शोरा अथवा खारी कभी काममें न लानी चाहिये । खारी, शोरा अथवा ओर कोई नत्रजन सम्बन्धी खाद डालनेका क्या लाभ है, इसको भी जाना आवश्यक है। नत्रजन सम्बन्धी खादका परिणाम यह होता है कि उससे पौधे जाते हैं। पैदावार कितनी ही कम क्यों न हो, परन्तु खारी तथा शोरे के डाले हुए पौधे बहुत ऊचे बढ़ेंगे और हर-भरे होंगे। गेह आदि अन्नोंमें यदि डालेंगे तो भूसेकी मात्रा बहुतही अधिक हो जायगी । अधिक मात्रामे डालनेसे सभव है पौधा इतना बढ़ जाय कि थोड़ीसी तेज वायुके चलनेसे नीचे गिर आय। इसी प्रकार इनके संतमें डालनेसे गन्ना बहुत पद भायगा । सभव है उसका गुण उचम न हो पूर्व बट साद h-NA MMA nama परन्तु पौधा अवश्य बहुत ऊँचा बढ जायगा। यह शोरे मयवा सारीको साद, जय पौधोको बहुत जल्दी तैयार करना हो, डालना बहुन रुपयोगी होगा। वो पडने अथवा खेतमें फीडा लग जाने अथवा और किसी कारणसे यदि यह भय हो कि खेत ठिठुरा जाता है मोर फसल नष्ट हो जायगी तो सर्वदा नत्रजन सम्बन्धी कोई साद डालनी चाहिये। कभी कभी देखने में आया है कि फसलके पोते ही किसी कारणसे फसल ठीक नहीं पजती, सार पौधे बहन छोटे-छोटे और रोगोसे पैदा होते है। यह तब होता है जबकि बोते ही वर्षा शेजाय या खेतमें काफो सील न हो, इसी प्रकार खेतोंमें उत्तम जातिका वीज न पडनेके कारण या और किन्हीं कारणोंसे भी पौधोकी रगत बडी बुरो दोस पडती है और पौधे नित्य प्रति बिगडने जाते है, पीले पड़ने जाते हैं तो सारी शोरा या कोई और नत्रजन सम्बन्धी साद डाल देनेसे फमलपर एकदम गैन मा जायगी और फिर पौथे स्त्रय घट आयगे। यहुतसे किसानों का यह मन है कि जिस ग्येनमें शोरेको साद या सारी डाली जाती है उसमे वह पसल जिसमें भोग या सागे डाली गयो हो, सूब पैदा होती है, परन्तु माली फमल उत्तम पैदा नहीं होती। इसका कारण समझमें आ जानेपर किमानों को किसी तरहका भय नही रहना । शोरा अथवा सारीके डालनेसे चीज अधिक मात्रामें पैदा होगी, और जहां व शोरेमे उपस्थित नजनको सा जायगी वहाँ सेतमें उपस्थित प्रस्फुरिकाम्ल तथा अन्य सनिज पदार्थों को भी सा आयगो । यदि ऐसे खेतोंमें शोरेके अतिरिक्त भार कोई साद विशेष - शोग तथा सारीकी पाद इस कमोको कर प्रस्फुरिफको साद न डाली जाय तो पैदावार अवश्य कम हो जायगो । हा, यदि इस बात का ध्यान रखा जाय कि शोरा डालनेके कारण फसल बहुत पैदा हुई है और इस कारण धरतीमें उपस्थित भोजनको मात्रा बहुन कम हो गई है और फरनेक लिये और पदार्थ डाल दिये जाय तो कोई कारण नहीं है कि यह शिकायत हो । यदि सारी और शोरक डालनेसे फसल अधिक पैदा होती है तो यह तो किसानका पादर्श ही है। ऐसा करनेमे सेतको मिट्टी निवेल अवश्य बनेगी। उसमेंसे जो पदाथ निकल गये है उनको वापिस डालना हो उसका इलाज होगा। गेहू आदि दानेदार अन्नोंमे, यदि शोरेको साद या सारी डाली जाय तो प्राय यह देखा गया है कि सेत तो बहुत घढ जाते हैं परन्तु अन्नकी पैदावार कुछ अधिक नहीं होती, क्योकि अन्नके भीतर नमन बहुव कम होता है और प्रस्फुरिक अधिक होता है, अत जबतक खेतों में या तो स्वाभाविक रूपसे प्रस्मुरिक मोजूद न हो या डाला न जाय, तबतक अन्न अधिक नही होगा। इसलिये यदि शोरेके साथ ही प्रस्फुरिकको कोई साद डाली जाय तो फसल बहुत मालामे पैदा होगी। मंटर धादि बहुतसो फसलें ऐसा हैं जिनको नत्रजनसम्बन्धी खादोकी कुछ भी भानश्यकता नहीं होतो, क्योंकि इनमें यह गुग पाया जाता है कि यह घायुमण्डलसे मजन खींच सकती हैं और सपने काममें ला सरती है तथा आगामो फसल के लिये एकत्रित कर सकती है, इसलिये इन फसलों में शोरा अथवा खारो डासना निरथक दोगा। पारी या शोग पानी में बात घुल्नेवाला पनार्थ है। यदि ।
४४ खाद किसी खेतमें सारी या शोरा डाला गया और फिर उसमें पानी आ गया या वर्षा हो गयी और पानीको मात्रा इतनी आयी कि कुछ पानी खेतसे बाहर निकल गया तो सपको सय साद पानी में घुल. कर चादर पली जायगी और नष्ट हो जायगी। यदि शोरा या खारीके बाद पानी पहुत गाढा दिया जाय तो पानीफे साथ ही यह भी घुलकर नीचे चला जायगा और पौधोको अधिक लाभदायक न होगा। इसलिये सारी या शोग डालनेपा खेतमें पतला पानी देना चाहिये। शोरेकी साद साधारण रूपसे २० सेर फच्चे यीघेके दिसायसे होती है, परन्तु यदि २० सेर शोरा एफ ही पार न डालकर धीरे धीरे कई पार करपे टाला जाय तो अधिक उपयोगी होगा। पहुक्से विद्वानोंको सम्मति है कि खेत योनेसे पूर्व खेतमें थोडो मात्रामें शोरा मिला दिया जाय अथवा जब पौने ४-५ पत्तोंके हों, वम डाला जाय। ऐसा करनेसे जो पौधे उत्पन्न होंगे वह अधिक बलवान और शक्तिशाली होंगे। कई बार डालनेसे पौधोंको बडा मारी लाम होगा, शोरेको साद ऐसे खेतोमें, जिनमें पुटाशकी मात्रा पहलेसे ही मौजूद हो, हानिकारक होगी, क्योंकि पुटाशका आधिक्य पौधोंको हानिकारक होता है।
पष्ठ अध्याय चूनेकी खाद बहुतसे पौधोंको चूनेको आवश्यकता होती है, परन्तु यह पदार्थ इतनी कम मात्रामे आवश्यक होता है कि किसी सेगमें इसके डालनेको बहुत ही कम जरूरत पड़ती है । यह और बात है कि भारत वर्षमे खेती होत इतने दिन बीत गये और चूना कभी सेतोंमें डाला नहीं गया, इससे सभव है किन्ही फसलों के लिये किन्हीं खेतोंमें डालना भावश्यक हो, परन्तु साधारणत इसको कोई नही डालता। यदि किसी सेसमें यह देखना हो कि उसमें चूनेको माना पर्याप्त अवस्थामें मौजूद है या नहीं, तो उसके जाननेकी यह तरकीब है कि उसकी मिट्टीको एक (Test tube ) परीक्षण नलिका में रखो और उसमें थोडासा गन्धकाम्ल या नमकका तेजाब डाल दो। इस नलिका को कानके पास ले जाफर सुनो कि कोई आवाज सोय-सायकी माती है या नही, यदि न माती हो तो समझो कि चूनेकी आवश्यकता है। जिन खेतोंमें चूना काफी होता है उनमें तेजाब डालते ही मिट्टी उबलने लगती है। जिन खेतोंमें खट्टापन आ गया हो उनमें भी चूना बड़ा काम देता है और खेतकी मिट्टीको सट्ट से मीठा कर देता है। खेतकी मिट्टीमें चूनेकी आवश्यकता देवल इसी कारणसे नहीं है कि फसल खाद । को इसका आवश्यकता होगी परन्तु इसलिये भो कि चनेको मिट्टीमें डालनेसे पोधेका उपस्थित भाजन, जो इस अवस्था नहीं होता कि पानीमें घुल सके, पानोमें घुलने योग्य पन जाता है। जिस प्रकार भोजनमें मसाला, यद्यपि यह हमारे लिये विशेष उपयोगी नहीं, परन्तु मोजनको रुचिकर बना देता है और मनुष्य अधिक भोजन कर सस्ता है, इसी प्रकार खेतों में चनेक डालनेसे अनेक पदार्थ जो पौधो. के भोजनकै रूपमें पहले मौजूद न थे पौधो के भोजनके रूपमें परि- णत हो जाते हैं, यह चूनेका सबसे बडा रासायनिक गुण है। चूना टालनेसे बहुतसे लाभ होते हैं । १-लोहा आदि पदार्थों के और भी ऐसे मिश्रण खेतोंमें पैदा हो जाते हैं कि पौधोंको हानिका होते हैं, वह चूना डालनेसे टूट फूटकर खेत में मिल जाते हैं और कोई हानि नहीं पहुचा सकते। २-सेनकी मिट्टीमें चूनेको उपस्थितिसे एमोनियाको सींचनेकी शक्ति बढ़ जाती है। ३-यदि किसी सेतमे पत्ते, जड़ें, कच्ची साद आदि पदार्थ हों तो वह चूनेके मिलनेसे शीत्र सडने आरम्भ हो जाते हैं और एमोनिया मादि सम्मेलन बनकर पौधोंके भोजनका काम देते हैं। जिन वेतोंमें ऐ द्रिक पदार्थ अधिक हो अथवा कई वर्षसे गोगरकी और पत्तोंको खाद पडती रही हो, यदि इनमें चुना डाला जाय तो बडा उपयोगी होगा। ४-सेतोमें उपस्थित नत्रजन जो इस अस्थामे नहीं होता कि पोधे उसको काममें ला सके वह उसको एमोनिया तथा नत्रिकाम्नमें परिणत करके पौधोंको कामके योग्य बना देता है। ५-चूनेके डालनेसे चिकनी मिट्टी भुग्मुरी मौर रेतीली मिट्टी लसदार हो जाती है और इस - यह उनकी साद प्रफार दोनो तरहफी स्टिोपर चना अपना प्रमाव करता है और बामदायक होता है।६-चूनवाले सेनकी फसल पहुन जल्द पढ़ती मोर पानी है, इस कारण मौसमका प्रभाव कम होता और सेन भी आगामी फसलरे लिये शव फाम याने योग्य या जाता है। चूनेशी सादको यात मी शोरकी सादक समान यह यहा जाता है कि कुछ वपीक पद सेन निवल हो जाता है ओर पैदावार फम हो जाती है। कारण स्पष्ट है क्योंकि सेतमें उपस्थित भोजन शीघ्र ही पौधोंक काममें आ जाता है, इस कारण सेनकी उपजाऊ शक्ति कुछ वपो में निवउ हो जायगी मही, परन्तु मोर साद सेतो में डाली जाती म्हे तो ऐमो शका होने की कोई सम्भावना नहीं। ऐसा ही है जैसे कोई कह कि भूसे रहना अच्छा है, क्योंकि भोजन फरते रहने से घरा हुआ अन्न कम होता चला जायगा। साधारण फडका चूना तथा पिसे हुए फच्च फकड़ भी काम दे सकते हैं, परन्तु इनमे वास्तविक चनेको मात्रा कम होती है। चूना चाहे बुझा हुआ खेतमें डाला जाय अथवा बुझाकर डाला आय, वह थोड़े दिनोक याद कार्यनित चूना बन जायगा । येवुझा चूना डालने से खेतके सन पदाथ जल उठ गे और गरमी के कारण बहुत शोत्र गलनेसे पौधो के काममे नहीं आ सके गे । पत्थरका चूना और चाक भी इस काममें आ सकता है, परन्तु वुझा हुआ चना या फली इस कारणसे काममें लायी जाती है कि यह पिसी हुई मिलती है और चाक अथवा चूनेका पत्थर यदि पीसा जाय तो बहुत लागत आती है । यदि चना फूकते समय जो रास प्राप्त होती है वह भी खाद लायी जाय तो लाभदायक होगी, क्यो कि इसमें भी कुछ चनेकी मात्रा पायी जाती है । आवश्यकता इस बातकी है कि चूने या कलीको इस अवस्थामे खेतमे डाला जाय कि वह भली भाति खेतमें मिल जाय । साधारणत खेतमें ४ मन कच्चे वीधेके हिसाबसे काफी होता है। पडे हुए खेतमें, मोनेसे पहले, चूना फैकर मिला देना चाहिये । खडे हुए खेतमें चुना डालना ठीक नहीं होता । अन्य खादो में मिलाकर डाल दिया जा सकता है। जो गुण चुना डालनेके ऊपर लिखे गये हैं वे सम कार्वनित चूनके हैं। यदि चूना किसी और अवस्थामें सेवमें मौजूद भी होगा, तो अधिक उपयोगी नहीं हो सकना और फिर भी बुनेकी बादकी आवश्यकता होगी। जैसे यदि इडियो की खाद सेतमें डाली जाय वो चूना खेतमें पहुच जाता है परन्तु जो लाभ अकेले चूनेके डालनेसे होता वह नहीं होता। हम ऊपर बता चुके हैं कि भारसवपमें चूना डालनेको बहुत भावश्यकता है और चना डालनेसे खेनो को पदावार अवश्य पढ जायगी। चना डालनेसे खेतो को अनेक रोग नहीं लगवे और यह ख्याल किया गया है कि यहुतसी स्वय उपभनेवालो घासे चना डालने- से नहीं पजतीं। -- सप्तम अध्याय पाखानेकी खाद मनुष्यफा पाखाना तथा पेशाय दोनों खादका काम देते हैं और पहुत उपयोगी होते हैं। शहरो में म्युनिसिपलिटियां पाखानेको इकट्ठा करवाती हैं और वेचकर लाभ भठाती हैं। साधारणत हिन्दुस्तानमें इसको खादसे परहेज किया जाता है और खादफे लिये कम काममें लाया जाता है । इसका कारण यह है कि इसमें स्वादका तत्व अधिक होता है और यह विश्वास किया जाता है कि इस खादके डालनेसे जो पदार्थ पैदा होते हैं उनसे तामसिक बुद्धि पैदा होती है और मनमें पुरे भाव उत्पन्न होते हैं। हिन्दु शास्त्रो में इस घातपर बड़ा विचार किया गया है कि फिन पदार्थो क खानेका मनपर क्या प्रभाव पड़ता है। परन्तु अभीतक साइन्सने इस ओर कुछ ध्यान नहीं दिया। हम नहीं कह सकते कि वास्तवमें क्या बात है, परन्तु इसमें सन्दह नहीं हो सकता कि शहरो की शाक माजियां जो अधिक खाद देकर उप- मायी जाती हैं वे गावकी शाक भाजियो को अपेक्षा कम स्वादिष्ट होती हैं। गांवके पाडे खेतो को जो गावके समीप होते हैं, दुरके ख्शो से अच्छा समझा जाता है और उनकी पैदावार अधिक होती है, क्यो कि इनमें गांव के लोग शोधार्थ जाते रहते हैं। म्युनिसिपलि- टिया मलको इक्ट्ठा फरके शहरसे बाहर गहरे-गहरे खत्चे खोदकर खाइ डाल देती है और वहां यह पड़ा पड़ा सड़ जाता है, गलनेपर बचे येच सालती हैं। पहले यह खत्ते बहुत सस्ते विकते थे और बहुत से खत्ते बिना पिके भी रह जाया करते थे, परन्तु अब इनका खासा मूल्य मिल जाता है। अब किसान भी इसकी कुछ कदर जानने लगे हैं। शहरके म्वेतों में इसी खादकी बदोलत कई-कई फसलें हो जाती हैं और पैदावार भी बहुत अच्छी होती है। इस सादमें नत्रजन, गोवरकी खादकी अपेक्षा अधिक होता है और यही कारण है कि इसमें दुर्गन्धि अधिक होती है। यदि मच्छी गली हुई खाद भी किसी खेतमें डाली जाय वो भी बडी दुर्गन्ध आती है और खेतके पाससे निकलने के लिये नाक बन्द करनी पड़ती है। इस दुर्गन्धको दूर करनेके लिये अनेक उपाय किये जाते हैं । यदि खाद डालकर खेत जोत दिया जाय सो खादकी मिट्टी मिल जानेसे वह दुर्गन्ध आती रहती है। यदि पासानेमें रास मिला दी जाय वो भी दुगन्ध कम हो जाती है। राख सदका काम देती है और दुर्गन्ध भो कम करती है। पाखानेको खाद जितनी चीन और जापानमें फाममें लायी जाती है सनी कहीं नहीं पाती। वहां के लोग इसकी बड़ी पदर करते है क्यो कि इसके अतिरिक्त बहा गोवरकी खाद बहुत ही कम होती है । राजाको ओरसे पासानेकी खाद इकट्ठी काने के लिये विशेष साक्षाएं निफालो जाती हैं। पाखानेकी सादफा गोबरकी अपेक्षा शीघ्र चूरा होता है, क्योंकि दोरोंको जो खाद्य पदार्थ-पास चारा मादि-दिया जाता है वह इतना बारीक हो कर पेटमें नहीं पहुंचता जितना पाखानेकी खाद कि मनुष्यका भोजन , मनुष्यके भोजनमें अधिक ताव होता है और ढोरोंके भोजनमें नहीं, इसी प्रकार मनुष्यके पाखाने में प्रस्फुरिफाम्ल गोवरको अपेक्षा अधिक होता है तथा और मो खनिज पदार्थ जो गोबरमें बहुत कम मात्रामें पाये जाते हैं इस खादमें अधिक मात्रा में मिलते हैं। नमक आदि अनेक पदार्थ मनुष्य खाता है, जिनका अश पाखानामें पहुंचता है। इसी प्रकार मनुष्यके पेशाबमें भी उपभ बढानेवाले पदार्थका ढोरो के मूत्रको अपेक्षा आधिक्य होता है। मनुष्यके मल मूत्रमें फोन पदार्थ किस मात्रामें होता है, यह पात नीचेके खानोंसे भलीभांति मालूम हो जायगी। मल मूत्र पौंड % वार्षिक पौंड वार्षिक % . वैदिक पदार्थ ) १६८ २४ राख १०४ नत्रजन प्रस्फुरिकाम्त १.१ पुटाश .२४ ०३ ०२ इससे पता चलता है कि ढोरोंके समान मनुष्यके मूनमें मी कितने उपजाऊ शक्तिवाले पदार्थ पाये जाते हैं। चीनमें पाखानेको खादकी इतनी कदर की जाती है कि ताजाको ताजा ही खेडोमें खाद . डाल दिया जाता है। पाखानेको खादफे काममें लाने में सबसे बड़ी दिक्त उसका इकट्ठा करना है, तथा यहाँ भी देखना है कि ऐसा करने में दुर्गन्ध न फैले और लोगों के स्वास्थ्यको हानि न हो। भारत वर्षमै अभीतक इसको इकट्ठा करने में कोई आपचि नहीं दोख पडती पान्तु तो भी बहुतसी म्युनिसिपलिटियां इसको अलाने लगी हैं। अलानेसे घायुमें दुर्गन्ध फैलती है। यद्यपि इसके दूर करनेके अनेक उपाय सोचे गये हैं तथापि यह कार्य हानिकर ही है, इसके अतिरिक्त वह पदार्थ जो खेतोकी उपज बढाने के काम आ सकता,व्यर्थ नष्ट हो जाता है । यदि इकट्ठा करनेमें इसके मूल्यकी अपेक्षा अधिक लागत न यावे वो यह बड़ी अच्छी खाद है। बहुतसे स्थानो की म्युनिसि- पलिदियो (जैसे काशीकी) पाखानेको नदियों में बहा देती हैं, इससे नदियो का पानी भी खराब हो जाता है और यह खाद नष्ट हो आती है। ग्रामों में पासाने वने हुए नहीं होते और इस कारण इसको इकट्ठा फरनेकी कोई जरूरत नहीं होती। सेतों में इसका स्वय उपयोग होता रहता है। म्युनिसिपलिटियोंके पास प्राम इस खादसे लाभ उठा सफ्ते है और खरीद कर अपने काममें ला सकते हैं। इससे म्युनिसिपल दियोंकी भाय भी यह जायगी और किसानोंकी पैदावार भी अधिक हो जायगो। पेशाबको एकत्रित करनेका कोई विशेष नियम नहीं है। यही पही ऐसा किया जाता है कि गन्दा पानी इकट्ठा कर या गाडोमें भरके गन्दी नालियां डाल दिया जाता है। यह गन्दा पानी खेतोकी सिचाईफे काम माता है और इससे उपज बहुत बढ़ आती है । यातसे ही पद ५३ स्थानापर इस गन्दे पानीसे भाई करने का बड़ा मूल्य प्राप्त किया जाता है। पेशाबका सुले हुए इस प्रकार घढ़ते रहना वायुको दुर्गन्धित करता है तथा उसमेंसे नत्रजनका बहुतसा भाग एमोनिया बनकर उड़ जाता है। यदि घन्द नालियों में गन्दा पानी बहाकर अथवा इन सो के साथ मिलाकर डाल दिया जाय तो अधिक लाभदायक होगा। बहुतसे स्थानोंमे पानीमें यहाकर सघ मैला याहर निकाल दिया जाता है और उठानेका काम पानीसे लिया जाता है। फिर इस पानोको साफ करते हैं और ठोस पदाथको दबाकर अलग करते और खादके काममें ले पाते हैं, परन्तु ऐसा करनेसे जो ठोस पदार्थ प्राप्त होता है, उसमें खोकी खाद जैसा गुण नहीं होगा। हो, यह पदार्थ भी कुछ उपयोगी अवश्य समझा जाता है । जहाँ एमोनिया बनाया जाता है वहा नत्रजनका बहुतसा भाग मैलेसे अलग कर लिया जाता है और केवल खनिज पदार्थ ही खेतोंके काममें आता है। F अष्टम अध्याय । F - हरी साद हमारे देशमें बहुत दिनोंसे यह रिवाज चला भाता है कि जिन खेतोंमें कोई खाद डालनी मुशकिल होती है अथवा काफी, मानामें खाद नहीं मिलती हो, वहां सन, सनी, मटर, गुवार, नील मादि कोई ५४ फसल बोकर उसको जैसेका तसा ही काटकर खेतोंमें मिला दिया जाता है । यह हरी खाद कहाती है। इसके बाद जो फसल बोयी जाती है उसकी पैदावार बहुत बढ़ जाती है। इस अध्यायमें हम इस घातका कुछ विचार करेंगे कि इससे पया लाम होता है। कोई पौधा जब खेतमें धोया जाता है तो को सामान ससको अपने भोजन के लिये आवश्यक होता है, खेतसे प्राप्त फरके पढ़ता और फलता-फूलता है। फल मानेसे पूर्व उसके डण्ठल मुलायम होते हैं और यदि फूल आवे ही उसको काटकर सेतमें मिला देव तो यह सबका सब भोजन आगामी फसलके योग्य धना धनाया मिल जायगा। फूलोंके समय पौधेके रसमें जोश होता है और कोंपल, पत्ते, वने, पौधेके सव अवयव मुलायम होते हैं, अत यह शीघ्र ही खादमें परि- णत हो जाता है। ऐसा करनेसे खेतमें उपस्थित भोजन इस प्रय स्था मा जाता है कि पौधा उसको अपने फाममें सुगमतासे ला सके। इस प्रकार करनेसे खेतमें गरमी, मुरमुरापन मादि अनेक गुण पैदा हो जाते हैं। भारतवर्षमें ईखके खेतोंमें प्राय सनी बोकर मिला दी जाती है। हरी खाइके लिये कौन फसल बोई जाय ? यह सवाल किसान- को मली माहि समझ लेना चाहिये। यदि वह निम्नलिखित सिद्धांतको एक पार समझ जाय तो उसे बड़ा लाभ होगा। यह सिद्धांत को हम नीचे लिखते हैं, न केवल हरी खाद बनाने के विषयमें ही काम देगा प्रत्युत वैसे भी बड़े महत्वका है। हम बता चुके हैं कि हरी खाद वायुमण्डलमें नत्रजनका माग से अधिक है परन्तु पौधोंमें यह शक्ति नहीं होती कि ये इसको वायुमण्डलसे चूस सके । यदि यह गुण भी पौधों में पाया जाता तो नत्रजन सम्बन्धी खाद डालनेफी बहुत फम मावश्यकता हुआ करती। हम यह भी पता चुके हैं कि नत्रजा पौधों की जड़ोंद्वारा ही प्राप्त होता है, पतोंद्वारा अथवा किसी और अवयवद्वारा नहीं। पदुतसे पौधे परमात्माने ऐसे बनाये हैं जो नत्रजनप्रिय हैं और जिनकी जड़ों में ऐसे छोटे छोटे अन्तु काम करते हैं कि वह वायुमण्डलसे नमजन सोच खीच कर इन पौधोंकी जडोंमें जमा करते रहते हैं। जब यह फसल काट ली जाती है सो जितनी माना नजनकी पहले जम्न थी उससे कहीं अधिक मात्रा उसको खेतमें फसलके पश्चात प्राप्त हो जाती है, जो भागामी फमनके काम आती है। इन फसलोंके ग्वेतमें योनेसे पौधे खेतमे नत्रजन कम करनेके बजाय बढाते हैं। ऐसे पौधे सब फलीदार फसलें सनी, सन, मोठ, नील, गुवार, मटर, मेथी, रिजका आदि हैं। हरी खाद इसी कारण इन फसलों की अपसे उत्तम होगी, क्योंकि इनके धोनेसे नत्रजनको मात्रा खेतोंमें पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ जायगी। यों तो कोई फसल खेतमें योकर जोत देनेसे लाभदायक होगी, परन्तु विशेष गुणकारी वही फसले होंगी जिनमें नत्रजनको वायुमण्डलसे खीचनेका गुण पाया जाता है। दुसरी बात जिसका ध्यान रखना बावश्यक है, यह है कि फसत ऐसी बोयी माय, जिसके बोनेमें लागत बहुत कम भावे, योडेसे परिश्रममें फसल पैदा हो सके और थोड़े दिनों में जोखने के - खाद - फसल बोकर उसको जैसेका तैसा ही काटकर खेतोंमें मिला दिया जाता है । यह हरी खाद कहानी है। इसके बाद जो फसल बोयी जाती है उसकी पैदावार बहुत बढ़ जाती है। इस अध्यायमें हम इस घातका कुछ विचार करे गे कि इससे क्या लाम होता है। कोई पौधा जब सेतमें घोया जाता है तो जो सामान उसको अपने भोजन के लिये मावश्यक होता है, खेतसे प्राप्त फरफे पढ़ता और फलता-फूलता है। फल मानेसे पूर्व उसके डण्ठल मुलायम होते हैं और यदि फूल माते ही उसफो काटकर ग्वेतमें मिला देव तो यह सयका सब भोजन आगामी फसलके योग्य पना बनाया मिल जायगा। फूलोंके समय पौधेके रसमें जोश होता है और कोंपल, पत्ते, वने, पौधेके सब अवयव मुलायम होते हैं, मत यह शीघ्र ही खादमें परि- गत हो जाता है। ऐसा करनेसे खेतमें उपस्थित भोजन इस अब- स्था मा जाता है कि पौधा उसको अपने काममें सुगमतासे ला सके। इस प्रकार करनेसे खेतमें गरमी, भुरभुरापन मादि अनेक गुण पैदा हो जाते हैं। भारतवर्षमें ईख के खेतोंमें प्राय सनी धोकर मिला दी जाती है। हरी खाद के लिये कौन फसल बोई जाय ? यह सवाल किसान- को भली भांति समझ लेना चाहिये। यदि वह निम्नलिखित सिद्धांतको एक बार समझ जाय तो से बड़ा लाम होगा। यह सिद्धात जो हम नीचे लिखते हैं, न केवळ हरी खाद बनानेके विषयमें ही काम देगा प्रत्युत घेसे भी पढ़े महत्वका है। हम पता चुके हैं कि हा खाद ५५ वायुमण्डलमे नत्रजनका भाग से अधिक है परन्तु पौधोंमें यह शक्ति नहीं होती कि वे इसको वायुमण्डलसे चूस सके । यदि यह गुण भी पौधोंमें पाया जाता तो नत्रजन सम्वन्धी खाद डालनेकी बहुत कम आवश्यकता हुआ करती। हम यह भी बता चुके हैं कि नत्रजन पौधोकी जड़ोंद्वारा ही प्राप्त होता है, पत्तोंद्वारा अथवा किसी और अवयवद्वारा नहीं । बहुरासे पौधे परमात्माने ऐसे बनाये हैं जो नत्रजनप्रिय हैं और जिनकी जड़ों में ऐसे छोटे छोटे जन्तु काम करते हैं कि वह वायुमण्डलसे नत्रजन खीच खींच कर इन पौधोंकी जडोंमें जमा करते रहते हैं। जब यह फसल काट ली जाती है तो जितनी माना नत्रजनकी पहले जमा थी उससे कहीं अधिक मात्रा उसकी खेतमें फसलके पश्चात, प्राप्त हो जाती है, जो भागामी फसनके काम आती है। इन फसलोंके खेतमें मोनेसे पौधे खेतमे नत्रजन कम करने के बजाय बढाते हैं। ऐसे पौधे सब फलीदार फसलं सनी, सन, मोठ, नील, गुवार, मटर, मेथी, रिजका मादि हैं। हरी खाद इसी कारण इन फसलोंकी सबसे उत्तम होगी, क्योंकि इनके धोनेसे नाजनकी मात्रा खेतोंमें पहले की अपेक्षा यहुत पढ़ जायगी। यों तो कोई फसल खेतमें योकर जोत देनेसे लाभदायक होगी, परन्तु विशेष गुणकारी यही फसले होंगी जिनमें नत्रजनको वायुमण्डलसे खींचनेका गुण पाया जाता है। दुसरी यात जिसका ध्यान रखना आवश्यक है, यह है कि फसल ऐसी बोयी जाय, जिसके बोनमें लागत बहुत कम माये, थोडेसे परिश्रममें फसल पैदा हो सके और थोडे दिनोंमें जोतने के । न खाद . फसल योफर उसफो जैसेका तैसा ही काटफर खेतोंमे मिला दिया जाता है । यह हरी साद कहानी है। इसके बाद जो फसल बोयी जाती है उसकी पैदावार बहुत घढ़ जाती है। इस अध्यायमें हम इस घातका कुछ विचार करेंगे कि इससे फ्या लाभ होता है। कोई पौधा जब खेत में बोया जाता है तो जो सामान उसको अपने भोजन के लिये आवश्यक होता है, खेतसे प्राप्त फरफ बढ़ता और फलता-फूलता है। फल पानेसे पूर्व उसके डण्ठल मुलायम होते हैं और यदि फूल पाते ही उसको काटकर सेतमें मिला देव तो यह सबका सब भोजन आगामी फसळके योग्य बना बनाया मिल जायगा। फूलोंके समय पौधेके रसमें जोश होता है और कोंपल, पत्ते, ने, पौधेके सब अवयव मुलायम होते हैं, मत यह शीघ्र ही खादमें परि- णत हो जाता है। ऐसा करनेसे खेतमें उपस्थित भोजन इस अव. स्थामें आ जाता है कि पौधा उसको अपने काममें सुगमतासे ला सके। इस प्रकार करनेसे खेतमें गरमी, भुरभुरापन प्रादि अनेक गुण पैदा हो जाते हैं। भारतवर्षमें ईखके खेतोंमें प्राय सनी बोफर मिला दी जाती है। हरी स्वाद के लिये कौन पसल बोई जाय ? यह सवाल किसान- को भली भांति समझ लेना चाहिये। यदि वह निम्नलिखित सिद्धांतको एक बार समझ जाय वो उसे बड़ा लाभ होगा। यह सिद्धास जो हम नीचे लिखते हैं, न केवळ हरी खाद बनानेके विषयमें ही काम देगा प्रत्युत्र वैसे भी पढ़े महत्त्वका है। हम पता चुके हैं कि वायुमण्डलमें नत्रजनका माग से अधिक है परन्तु पौधों में यह शक्ति नहीं होती कि ये इसको वायुमण्डलसे चूस सके । यदि यह गुण भी पोषोंमें पाया जाता तो नयजन सम्पन्धी रगद डालनेकी बहुत कम मावश्यकता हुआ करती। हम यह भी पता चके हैं कि नत्रजन पोपोंकी जड़ोंद्वारा ही प्राप्त होता है, पत्तोंद्वारा अथवा किसी और अवयवद्वारा नहीं। बहुतसे पौधे परमात्माने ऐसे पनाये हैं जो नत्रजनप्रिय है और जिनकी जड़ों में ऐसे छोटे छोटे जन्तु काम करते हैं कि वह वायुमण्डलसे नग्रजन खींच खींच कर इन पौधों की जड़ों में जमा करते रहते हैं। जय यह फसल काट ली जाती है सो जितनी माना नत्रजनकी पहले जमा थी उससे कहीं अधिक मात्रा उसकी खेतमें फसलके पश्चात प्राप्त हो जाती है, जो भागामी कमलाके काम आती है। इन फसलोंके खेतमें मोनेसे पौधे खेतमें नवजन कम करने के बजाय बहाते हैं। ऐसे पौधे सब फळीदार फसलें सनी, सन, मोठ, नील, गुवार, मटर, मेथी, रिजका मादि हैं। हरी स्वाद इसी कारण इन फसलों की सबसे उत्तम होगी, क्योंकि इनके मोनेसे नत्रजनको मात्रा खेतों में पहले की अपेक्षा घहुत पढ़ जायगी। यों तो कोई फसल खेतमें धोकर जोत देनेसे लाभदायक होगी, परन्तु विशेष गुणकारी वही फसले होंगी जिनमें नत्रजनको वायुमण्डलसे खींचनेका गुण पाया जाता है। दुसरी बात जिसका ध्यान रखना आवश्यक है, यह है कि फसम ऐसी बोयी आय, घिसके योनेमें लागत बहुत कम भावे, थोडेसे परिश्रममें फसल पैदा हो सके और थोड़े दिनोंमें जोवनेके खाद - , योग्य हो जाय । हरी साद डालनेके लिये यदि ऐसी फसल बोयी जायगी जो देरमें होती हो, तो एफ फसल माती रहेगी और उस फसलकी हानि किसानको ठानी पडेगी, हरी सादके लिये जो फसल योयी जायगी उसको अन्तमे खेतमें ही जोत डालना है, अत उसपर जितनो लागत आवेगी उसे निरर्थक हो समझना चाहिये। इसके लिये उत्तम वर्षाका मौसम है, अप सेतफो पानी देनेको भी आवश्य- पता नहीं रहती। थोड़े दिनोंमें फसल होकर यदि जोत दी जाय तो पह शीघ्र सड़फर खेतमें मिल सकगी। बहुत शीन फसल होनेवाली मोर नत्रजनको वायुमण्डलसे खीचनेका गुण रखनेवाली सन, सनी, गुवार और उड़द आदि फसलें हैं। इनमें सनसनी (सनई) सबसे जल्दी होती हैं और इनके लिये खेतको किसी तैयारीकी आवश्यकता नहीं, केवल एक बार पखेरकर हल चला देना ही पर्याप्त होगा। पानी देनेकी भी आवश्यकता नहीं, फेवल एक वर्षा हो जाय तो भी फसल पक नायगी । सन, सनीकी फसल एक मासमें सासी पड़ी हो जाती है और फिर रबीकी कोई फसल भली भांति खेतमें हो सकती है। सन, सनीके खेतको एक और कारणसे भी अच्छा समझा गया है, क्योंकि इसकी जर कुछ गहरी जाती हैं और नीचे की मिट्टी इस प्रकार पोली हो जाती है कि नीचेका उपस्थित मोजन पेडमें ऊपर आ आता है जो खेतमें मिल जानेपर पौधोंका सपना हो जाता है। इस प्रकार जिसने गहरे जानेवाले पौधे हरी खाद के लिये बोये जायगे उतनी ही दूर सफका भोजन भागामी फसल के लिये मिल सकेगा।
ही साद सन और सनीफी जद मुसलाकार होती है और इसलिये गहरो जाती है। गुवारका भी यही हाल है, परन्तु गुवारके सेतको कभी इस प्रकार नहीं जोता आता प्रत्युत पकाकर काटते हैं और खयाल करते हैं कि इसके पत्ते भी यदि खेतमें पड जाय तो आगामी फसल बहुत अच्छी होगी। गुवारके खेनमें एक विशेष गुण यह पाया जाता है कि इसकी खेतकी मिट्टी यहुत फूलती है और भुरभुरी होती है, चिकनौर या डाकर खेतोमे गुषार धोया जाय तो उनकी हैसियत बहुत बढ़ जायगी । हमारे विचारमें, जब कि फेवल गुगारको पका- कर काट लेनेका प्रभाव भागामी फसलपर इतना उचम पडता है तो कोई कारण नहीं है कि काटकर मिला देने का बहुत ही उत्तम प्रभाव न पड़े। पाठकोंको इसकी परीक्षा अवश्य करनी चाहिये। किसानोंका यह अनुभव है कि यदि सन या सनीको जोतकर खेतमें ईस योयो जाय तो ईस बहुत पढगी और माल अच्छा और अधिक बैठेगा। जिस प्रकार अधिक मात्रामें नत्रजनकी कोई खाद डालनेसे खेतों में बोयी हुई ईख बहुत बढ़ जाती है और उसमें लाट होती है, दाना बिलकुल नहीं पड़ता, यह दशा सन या सनीके जोतनेसे नहीं होती। साको अपेक्षा सनी अधिक उपयोगी मानी गयी है , क्योंकि सनका उण्ठल सनीको अपेक्षा मोटा और कडा होता है और उसके गलने में इसी कारण अधिक समय लगता है और भली भावि गळकर मिल भी नहीं सकता। सन यदि दुर दुर बोया जाय या किसी कारणसे कम उपजे तो उसमेंसे बड़े-बड़े गुद्दे निकलते हैं और उनका मिट्टीमें सुगमतासे मिलना कठिन हो जाता है, परन्तु सनीमें यह भवगुण नहीं होता। सन, सनीके अतिरिक्त नील भी इस काममें लाया जा सकता है, परन्तु देखा गया है कि जिन खेतोंमें नील घोया जाता है यदि उनमें कोई फसल बोयी जाय तो यह बहुत बढ़ती है, ईख तो बहुत ही ज्यादा बढ़ती है और यदि सय पत्ते खेत में हो रहे हों अर्थात् पकाकर खेत काटा गया हो तो ईसमें माल बड़ा ही पड़ता है और खेत देरमें पफता है। यदि नीलको बोकर जोत दिया जाय तो और भी मधिक खेतोंके बढ़ने की सभावना होगो। पस्तुत नीलके खेतमें फोई फसल क्यों न योये, उसकी पैदावार और खेतोंको अपेक्षा पहुत बढ जायगी। नीलके और गुगारके खेतमें विशेष गुण पाये जाते हैं और अनुभवी किसान फसलको देखकर यह बता सकते हैं कि इस खेतमें पहले क्या फसल बोयी गयी थी। नीळके खेतमें पानी देते समय एक प्रकारका रङ्ग पानीमें दीख पड़ता है जो नीलका सूचक होता है। मेथी भो इस काममें लायी जा सकती है और इसके लिये इसे जोत डालना सन या सनीसे भी अधिक उपयोगी माना गया है। परन्तु मेथीकी फसल पीकी फसल है, मत यदि इसके खेतको जोतकर ईख घोयी जाय तो ईख कुछ पीछे पड़ जायगी। यह अस- भव होगा कि साखसे पहले फसल योयी जा सके। बैसाखमें मोयी हुई फसल कुछ पछेती जरूर हो जाती है। हरी सादको खेनमें डालकर मिला देनेमात्रसे ही काम नहीं .
हरी खाद चलता, किन्तु किसानका यह भी कर्तव्य है कि वह यह देखें कि पाद भली भांति गळकर खेतमें मिल गयी है या नहीं, और कोई जड हरी सादकी रह सो नही गयी है। साद सर्वदा गरमी और नमीकी मौजूदगीमें गल्ती है। यदि गरमी न हो तो खाद ज्योंकी त्यो वनी रहेगी और यदि नमी न होगी तो भी यही दशा होगी। नमी तो स्वाभाविक हो हरे पौधो की होगी और मौसम वर्षाके बाद कुछ-कुछ गरम होता ही है। खेतको पानी देनेसे यपि साद शीघ्र गल जानेको सभावना है, तथापि पानी दिये हुए सेतको जोसा नहीं जा सकता, क्योंकि नम सेतके जोतनेसे डळे उपडेंगे और खेतकी मिट्टीको बारीक करना असभव होगा। फसलको यदि खुरपेसे भली भांति काटकर मिलाया जाय तो ज्यादा अच्छा होगा, क्योकि इस प्रकार काटकर मिलानेसे जडो का रहना असभव होगा। जडो के रह जानेसे सेतसे पौधे घरावर भोजन खींचते रहेगे और यह हानिफो कारण होगा। हरी खाद काटकर बिछा देने और एक बार हल चलानेमानसे ही काम न चलेगा, प्रत्युत कई बार हल जोखना होगा जिससे हरी खाद भली भांति मिट्टीमें मिल जाय । यदि ऐसा न किया गया और कुछ भाग इस फसलके ऊपर पड़े हुए रह गये तो कुछ पौधोंके अवयव सुख जायगे और सूखनेके पश्चात उनका गलना पड़ा ही कठिन होगा। वर्षाके दिनों में अलमें कुछ ऐसा प्रभाष मी हो जाता है कि प्रत्येक पदार्थ बहुत शीघ्र गलकर खेतमे मिल जाता है। इस कारण हरी खाद इस मौसममें जोव डालना बहुत ही उपयोगी सिद्ध -- हुआ है। 4 नवम अध्याय हड्डियोंकी साद जो कुछ खेतों में पैदा होता है वह सबका सय किसी न कि रूपमें जीवो के काम माता है और प्राणियों के शरीर उसीसे बनते यदि सेतकी पैदावारका फोई भी अश देशसे बाहर न जाय मरे हुए पशुफे शरीरके सारे अवयव खेतको भेंट कर दिये जाया क. वो देशकी धरतीफी उपजाऊ शक्मेिं कभी कोई कमी न भावे और किसी अन्य खादकी आवश्यकता हो पडे । हमारे देशमें यह दोनों का होते हैं। मन्न मी यावर भेजा जाता है और प्राणियों के शरीर सबसे बहुमूल्य भाग हझ्यिा मी पाहर भेज दी जाती हैं। यो हझ्यिा पाहर न भेजी जाती तो यह सब हडियो किसी न किस रूपमें मिट्टी में ही मिलती और खेतकी सपजाऊ शक्तिमें सहाय देती। हमारे यहां किसान हलियो को कदर बिलकुल नहीं जानते। सेतो की उपजाऊ शक्तिके लिये प्रस्फुरिक एक अत्यन्त मा श्यक पदार्थ है। प्रस्फुरिकका कुछ भाग सो गोपर मादिके रूप वापिस पहुंच जाता है, परन्तु पाकी जितना प्रस्फुरिक प्रतिवर्ष फस खेतकी मिट्टी में कम करती रहती है यह बेतमें वापिस नहीं पहुचता हमारे यहा खेतो में प्रस्फुरिफ बहुत ही कम हो गया है और यह कारण है कि खेतो की उपजाऊ शक्ति दिनों दिन कम होती जा रह इट्टियोंकी खाद ३। जिन सेतो में सादकी मात्रा बहुत अधिक डाली जाती है उनमें भी ऐसी चीजे , जिनको प्रस्फुरिकको आवश्यकता होती है, अधिक माना एत्पन्न नहीं हो पाती । क्या हमारे किसान भी इस उपयोगी पदार्थसे काम देना सीखेंगे? हहियो को पटुतसे आदमो धामिक विचारो से काममें नहीं आते और न छूना हो पसन्द करते हैं, यह उनकी पड़ी भूल है । हदि पोको खेतोंमें डालनेका निषेध हमको किसी शास्त्रमें नही मिलता। हाइयां केवल १५० वर्षसे बाहर आने लगी हैं, इससे पूर्व तो अवश्य सेवो में ही गलफर मिलती रही होगी। अप भी फितने ही पार्मिक हिन्दु सजन हैं जो हड्डियो के चाकू, कधी मादि अनेक पदार्थ छूते ही नहीं, बल्कि रोज काममें लाते हैं । यह हमारा दुर्भाग्य है कि संसार आगे पढा जा रहा है और हम अपने ऐसे ही-ऐसे अनेशनेक क्षत विचारों के कारण भाति भांतिके पप्ट भोग रहे हैं। इष्टिडयो में चूता और प्रस्फुरिक होता है, कुछ भाग ननभनफा होता है या एक प्रकारको चिकनाई होती है जो पौधो के किसी कामका पदार्थ नहीं होता । हरियोंकी विशेष उपयोगी तथा जल्दी सहायता देनेवाली खाद किस प्रकार अन्य देशोंमें बनायी जाती है, यह यात हम अन्यत्र लिसेंगे और वहीपर हड्डियों की पूरी मीमांसा करेंगे, यहां इम फेवल यह बताना चाहते हैं कि साधारण किसान भी किस प्रकार दहियोंसे काम ले सकता है। दहियोंको लेकर एक पात्रमें डाल, उसमें पानी भर कर उबालना घारम्म करो। कुछ देर में दखोगे कि एक प्रकारकी चिकनाई पानीपर तेर मावेगी तथा पानीमें एक पदार्थ धुळ जायगा । इडिड़यों में विक नाई सासी मायामें होती है। यह विफनाई सावुन बनाने, गेरा धनाने अथा और अनेक कार्यों में काम आती है। इस प्रकार हदियोंसे चिकनाई अलग करनेसे एक मूल्यवा पदार्थ किसानको मिल सकता है। दुसरा पदार्थ जो पानीमें मिल गया है, वह साधारणत सरेस होता है । यह पदार्थ भी विफनेवाल है। परन्तु इसमें नत्रजनकी मात्रा मौजूद रहती है। सरेस इष्टियों बहुत कम मात्रामें प्राप्त होता है और यदि इसकी कुछ परवाह न करे तो भी मधिक हानि नहीं, क्योंकि हहियोंकी खाद साधारणत: केवल प्रस्फुरिकके लिये फाममें लायी जाती है । नत्रजनके लिये चिकनाई में : नहाजन होता है और न प्रस्फुरिक । केवल कार्यन और अभिद्रवजन होता है जो दोनों पदार्थ पौधा वायुमण्डल तथा जलसे ले लेता है और यदि कोई चिकनाई सेतोंमें डाल भी दी जाय तो पौधो को लाभ नहीं पहुंच सकता, केवल पदार्पोफे भोज्यरूप धननेम कुछ बाधा पडेगी। अब जन इस प्रकार हड्डियो की चिकमाई दूर हो गयी तो हनियां सुतोड़ हो जायगी । इनको साधारण हथोडेसे छोड़कर चूर चूर किया जा सकता है। यदि ऐसे तोडकर हो माधया पाव इचके टुकड़ कर लिये जाय तो भी यह हनियां सादका काम देती हैं परन्तु इसमें यह अवगुण अवश्य होता है कि खेतमें यद छोटे छोटे टुकड़े देरमें गलकर पौधों के काम मावेगे और कई वर्षतक धीरे धीरे काम देगे। जो किसान बहुमुल्य पदार्थ डालकर हहियों को खाद नहीं यना सकते उनके लिये हमने यह सुगम रीति जिसी है । साधारणत पिना हहियोंकी साद पानी में पकाये हुए यदि इडियोंको तोड़कर छोटे छोट टुकड़े कर लिये जाय तो यह टुकड़े खेतमें डाले जा सकत है। बिना पानी में पकाये हुए इलियोंको इस प्रकार खोड़कर काममें लाना कठिन होगा और इसी कारण हमने सुगम रोति ऊपर लिखी है। हहियां पिसी पिसायो या टूटो भी बाजारों में मिल सकती है। पम्बई, कलकत्ता, कानपुर आदि शहरों में अनेक कार्यालय हैं जिनक यहांसे हड़ियोंका चूरा या टुटे हुए टुकड़े मिल सकते हैं । इहियां पीसकर इसनी बारीक फर दी जाती है कि ये आटे और मेदा जैसी पारीक हो जाती है। यदि हमारे पाठक इस परेको काममें लाना चाहे तो ला सकते है। यह घोन मील Bone meal या योन चिप्स Bone chips के नामसे मिकता है। लियोंको वैसे ही तोड़कर डालना या पानीमें पकाकर डालना एपयोगी अवश्य है परन्तु इसके डालनेका पूरा प्रभाव सी वर्षको फसलपर नहीं पड़ेगा क्योंकि गलने में और मिट्टी में मिलने में देर लगती है। एक और सुगम तरीका हम हड्डियों की खाद बनानेका नीचे लिखने हैं । इस तरीके कोई ऐसा पदार्थ नहीं है जो पाठकोंको कष्ट या अधिक व्ययसाध्य हो। किसी स्थानपर एक गड्ढा खोदो और इसके नीचे विकमी मिट्टीकी तह बहुत उत्तमत्तासे लगाओ, जिसमें पानी भर देनेपर उसके जमीनमें नीचे जानेका भय बिलकुल न रहे। अब इस स्थानपर हडियोंको सह बिठायो और इसमें पुछ बिना बुझा चूना तथा साद मिलाकर मूत्र या गन्दी नालियों का गन्दा पानी सालते रहो। कई दिनतक ऐसा करनेके बाद हहियोंकी दूसरी तह hr , खाद लगाओ और उसको भी इसी प्रकार मुन्न अथवा गन्दे पानीसे तर फरो। फिर वोसरी तह चूने, खाद और हड्डियोंकी लगाओ। ऐसा करनेके पाद भली भांति चिकनी मिट्टीसे धन्द करके छोड दो। कुछ दिनोंके बाद देखोगे कि इलियां स्वय गल गयी है और मिट्टीमें मिल गयी हैं। इस प्रकार इहियोंकी साद घनानेके लिये ६ महोने लगते हैं। गोवरकी भी खाद बनानेमें इससे फुछ कम समय नहीं लगता । यदि हड्डियों के टुकड़े करके उनको वैसे हो खादमें डाल दिया जाय और गोधरको खादके खत्तोंमें डालते रहे तो भी इडिया कुछ न कुछ अवश्य गले गी और टुकडे या बुगदेको वैसे ही डालनेकी अपेक्षा उत्तम काम देगी। ऐसा करने में किसानोंको किसी विशेष परिश्रमकी भी मावश्यकता नहीं। दूसरी तरकीय हड्डियोंकी साद यनानेको यह है कि एक गड्ढे में चिकनी मिट्टीकी सह विछाओ, उसपर हहियोंके छोटे-छोटे टुकडे या चुरादे पिछामो और इसमें चुमा हुआ फलीचूना डालो, फिर एक तह घोडे की लीदको दो, इसपर फिर हडिया डालो, चने और हड्डियों- की तह देते रहो। जब इतनी हटियां डाल चुको जितनी कि खाद पनानी हो तो इसमें मोटे थोये बास या मिट्टोके पके हुए छोटे छोटे दो तीन पानाले लगाफर ऊपरसे चिकनी मिट्टीसे अच्छी तरह बन्द पर दो। इन यांसों या मिट्टोक परनालोंके मुह चिकनी मिट्टाफ यावर निकले रहने दो। इनके द्वारा गन्दा पानी या पेशाप मालवे रहो।। दो-तीन मासके बाद अपरकी चिकनी मिट्टी एहवयावसे बला करके ट्टियां मोर लीद भलो भावि मिला दो और फिर यन्द कर दी।
हहियों की खाद फिर उसपर गन्दा पानी और मूत्र डालने रहो। कुछ दिनों में खमीर एठकर इहियां बिलकुल गल जायगी। इस प्रकार तैयार की हुई बाद खेतमे तुरन्त काम करती है और किसी फसल के लिये, जिसमें वह डाली जाय,उपयोगी होती है। किसानोंको ऐसा करने में किसी फष्टपी सम्भावना नहीं है। और यदि किसान दो चार पार भी इस खादको यनाकर फनदार फसनोंमें डालेंगे वो हमको पूर्ण विश्वास है कि वह सवदा काममें लाने लगेंगे। यह ऐसी साद नहीं है कि जिसपर अधिक लागत आती हो। विलायतमें हड़ियोंकी साद कानी दामो में खरीदकर किसान काममें लाते और लाभ उठावे है, फिर कोई कारण नहीं कि हमारे किसान ऐसे पदार्थो से लाभ न पठा सकें। बहुतसे शहोंमें अप सींगका पुराना या हड्डियों का पुरादा खाद के लिये फाममें आने लगा है। अमरोहा मादि अनेक स्थानों में जहां हड्डियां तथा सींगफे चाफूके दस्ते, फपियो मादि पदाथ पनाये जाते हैं, यहा पुरादा किसी काममें नहीं आता और अब लोगोंने उनको आलू आदि जिन्नों के खेतोंमें डालकर दसा है तो उनको इसका लाभ झाव हुआ है और अपतक जो वस्तु फेंक दी जाया करती थी वह सब काममें लायो जाने लगी है और इसको खासी कीमत भी वसूल हो जाती है। परन्तु सींग अथवा हड्डियों का बुरादा इतनी मात्रामें नहीं मिल सकता कि सब फसलोंमें डाला जा सके, मत हड्डियोंको पोसने या तोडनेका प्रवन्ध अवश्य करना होगा। सोंगके धुरादे की पायत यह भी मशहूर है कि इसका प्रभाव मालको फलपर बहुत शीघ्र पडता है। जिस प्रकार हड्डियोंका ५ 1 - साद, चूरा देश्में काम देता है उस प्रकार सींग : रेसे काम लेनेपर देर नहीं होती। हटियोंका चूरो करनेके स्थानमें बहुत से किसान हड्डियोंको रास या कोयला काममें लाते हैं। हड्डियोंके कोयलेमें ननजन- सम्बन्धी सब पदार्थ पिनकुल नष्ट हो जाते हैं और अधिकतया चनेका माग रह जाता है, और इसी कारण यह इतना उपयोगी नहीं होता जितनी कि हड्डियोंकी खाय। विलायतमे हड्डियोंकी साद- की राख के काममें आनेका कारण और है। वहां हड्डियोंका कोयला बनाकर बेचा जाता है और पड -बड़े कार्यालय स्वयं बनाते हैं। हड्डियोंके कोयळेमें एक सास बात यह है कि यदि इसमें कोई रंगीन रस डाला जाय तो कोयला उस सारे रगको सा जायगा और रस मिना रगका, बिलकुल सफेद, कोयलेसे बाहर निकलेगा | जितनी मोप- धियां तथा और अनेक पदाथ, जिनको सफेद करके बेचा जाता है, उन सबमें हड्डियोंफा कोयला ही घरता जाता है। यों को यह कोयला कार्यके लिये अनेक पदार्थों के सम्बन्ध धरतते हैं परन्तु खांडके साफ करनेमें इसका अधिक प्रयोग होता है। रस पक जानेपर हडिडयो के चूरेमें डालकर धेरंग फर देते हैं और फिर इसकी राव बनाकर खांड पनावे हैं। हड्डियो का चूरा जब एक दो बार इस कार्यके लिये काममें लाया जाता है वोग दूर करनेकी उसकी यह शक्ति वोरे धीरे नष्ट हो जाती है, क्यो कि कोयलेके सूरासों में यह रंग भर जाता है। अप इनको एक बार फिर जलाना होता है और तब यह काममें हड़ियोंकी खाद लाने योग्य होते हैं। इसी प्रकार कुछ बार काम करनेसे हड्डियों- का कोयला कामके योग्य नहो रहता और वह सेतो मे डाल दिया जाता है। किसान इस कोयलेको सरोद लेते हैं। जिन देशो में खाडके कार्यालय अधिक हैं वहासे कोयला बाहर भी भेज दिया जावा है मोर किसान उन्हें खेतो में खादके लिये काममें लाते है । हड्डिया थोडेसे ईधनसे भस्मीभूत हो जाती है, क्योंकि इनको नमो दूर हो जानेपर यह स्वय जलने लगती है । यदि देशसे बाहर भेजनेके स्थानमें लोग इनको फूफफर इनकी राख भी खेतों में डालना आरम्भ कर दे वो भी कुछ कम लाभ न हो। आजकल कौडियो के मोल यह मनमोल पदार्थ बाहर जाता है और वापिस माकर सैकडो रुपयेका पिता है। यदि प्रत्येक प्राममें किसान भगियोंसे हड्डियां इकट्ठी कराना भारम्भ करें वो वार्षिक खादको माना थोडेसे परिश्रमसे पढ़ सकती है। हड्डियोंकी खाद बनाने के और भी मनेक तरीके है जिनके प्रयोग धरनेसे हड्डिया अधिकसे अधिक लाभप्रद हो सकती है । उन सप तरीको का ब्योरा हमने इस स्थानपर देना उचित न समझ इसी पुस्तकके दुसरे भागमें विस्तारपूर्वक दिया है। प्रथम भागमे हमने कैवल बहुत कम धन लगाकर खाद बनानेके परोको का जिक्र किया है।
दशम अध्याय - - H खलाकी साद हमारे देशमें तेल उत्पन्न करनेवाले पदार्थ बहुत पैदा होते हैं। सरसों, तिल, रेंडी आदि अनेक द्रव्य भारतवर्षमें पैदा होते हैं। ऐसे लाखो ही मन पदार्थ, जिनसे तेल निकाला जा सकता है, इस देशमें पैदा होते हैं और मनेफ तो मिट्टीमें ही मिलकर नष्ट हो जाते है। जगलों में कितनेही ऐसे बीज होते है जिनमें तेलको साम्रो मात्रा पायी जाती है, पर हमारे पुरुषार्थकी कमी, तथा ज्ञानके अभाव- के कारण प्रतिवर्ष यह पदार्य लासों मन नष्ट होते हैं। हमने इसपर अपनी पुस्तक "शुद्ध सावन में विशेष रूपसे लिखा है । प्राय सारे जगतमें भारतवर्षके बीज भेजे जाते है और उनका तेल वे लोग निकालकर काममें लाते है। बहुतसे ऐसे भी धोम हैं जिनका तेलही निकाल कर हमारे देश वापिस आकर मिकता है। यदि हमारे यहाँ तेज निकालनेके कार्यालय हो तो धीजो के स्थानमें दूसरे देशो को हम तेल भेज सकेंगे। तेल बीजो की अपेक्षा कम स्थान चौगा। बाहर भेजनेमें हमारा किराया कम लगेगा और हमारे देशको तेल निकालनेकी मजदूरी और खलो बच जायगी। सली इस योग्य होती है कि दोर खा सकें। बहुतसी सलियां इस प्रकार- की हो सकती है जिनको ढोर खा नहीं सकते और वे केवळ खेजमें खलीको खाद डालनेके काम में लायी जा सकती है। खलियोंमें उपजाऊ शक्तिके दोनो पदार्य उपस्थित रहते है और इस कारण खली मपजाऊ शक्ति बढाने के लिये घडो उत्तम खाद है। नोमका तेल पर पहुच मात्रामें काममें लाया जाने लगा है। यद्यपि अब भी मोमका तेल जितना निकाला जा सकता है नही निकाला जाता, तथापि नीमका तेल अपसे सावुन पनानेमें काम आता है तपसे इसको भोर लोगो की विशेष रुवि हो चली है। नीमको तेल पेरनेसे कितनी खली प्राप्त होती है यह आप स्वयं अनुमान कर सकते है, क्यो कि नीमकी निवोली में एक तिहाईके लगमा तेल निकलता है घोर दो भाग खळी रह जाती है। इस सलीमें बडा भारी गुग उपजाऊ शक्तिके पढाने. का होता है। साधारणत जो जो तत्व जिस मात्रामे नीमको खलोमें पाये जाते है वह यह है। नमी ऐन्द्रिक भाग नत्रजन अना प्रस्फुरिक ५०७ १४० १०० भाग पीछे होता है। इससे ज्ञात होगा, कि नीमको खली खेतों में डालने के लिये कितनी उपयोगी होती है। जिन प्रान्तो में नीमका तेल निकाला जाता है वहा सब कुछ दिनो से इसको खलीसे भी काम लिया जाने लगा है। मालूके खेतोंमें कई स्थानो पर नीमकी खजो डाली गयी है और पैदा- वार बहुत ज्यादा हुई है। यदि सारी निवोलियां इकट्ठी की जाये, उनसे तेल निकलवाकर बेच दिया जाय और खलीको खेतमे डाला जाय तो किसानो का कितना उपकार हो यह पाठक स्वय अनुमान राख ८४५० ६४२ १ खाद र सकते है । इसी प्रकार रॅडीका वेल बहुत मात्रा निकाला आता है और इसकी खली भी ढोर नहीं सा सकते। यह पदार्थ पनों में डालने के काम आ सकता है। रे डोके अतिरिक सासों, नलसो, यिनोले आदिकी खली भी सेतोंमें सादका ' काम दे सकसी , यद्यपि इन सालियों को ढोरोंको खिलानेके काममे भी लाया जाता । यदि ऐसी खली जिसमें तेल बहुत कम रह गया हो और बिलकुछ सूसा हुआ चूरा हो, ढोगे को खिलाने के फाममे लायो नाय तो वह पड़ी उपयोगी हो सकती है। सलीमें नमजन, पुदाश नौर प्रस्फुरिकाम्लको इतनी मात्रा होती है कि वह यदि ढोरोको न खलाकर खेतोंमें डाली जाय तो बहुत लाभप्रद होगी। स्खलियो में पस्थित नत्रजन तथा प्रस्फुरिकाम्ज्ञ इस रूपमें होता है कि पौधे उख- तुरन्त मोजनके काममें ले आते हैं। इसी कारण जिस फसलमे लीकी साद डाली जाती है वह उसी फसलको लाभ पहुचा सक्ती और उसकी कीमत उसी वर्ष निकल पाती है। खलियोंका रिवाज मारे देशमें इस कारण अधिक नहीं देस पड़ता कि यहां सरसों, वल और अलसीके अतिरिक और तेलके बीजों का तेल कभी नहीं काला गया और सरसों आदिकी खली ढोरोंके खानेके काममें आती ही। परन्तु अन सौभाग्यसे हमारे देशमे भो भनेक शहरों में वेल कालनेके बड़े-बड़े कार्यालय स्थापित हो गये हैं और अनेक जो को खलो काममें लानेके लिये मिल सकती है। तेल निकालनेके ये साधारणत बोर्माको पोसकर या साबुत हो या ज्यो का त्यों ल्होंमें दवा दिया जाता है और दबाव पडनेके कारण यह तेल मे खलीकी खाद बाहर निकल जाता है। इसके अतिरिक्त एक और तरकीब भी अब कुछ दिनो से काममें लायो जाने लगी है। तेल अनेक पदार्थों में घुल जाता है, जिनमें बीजका और कोई भाग नहीं घुउता जैसे यदि पेट- रोल (मोटर चलानेका मिट्टोका तेल ) को लेकर उसमें बीजोंको पीस कर डाल दिया जाय तो कुछ देरमें सबका सब तेल इस पेटरोलमें घुल जायगा। पर यदि इसको भत्रकेके दारा उडाया जाय तो पेट रोल उड़कर दूसरी ओर चला जायगा और तेल एक ओर रह जायगा । इस प्रकार बहुतसा भाग पेटरोलका वापिस मिल जाता है और बीजो में जितना तेल होता है सबका सब बाहर निकल आता है। इस नियासे खलीमें तेल बिलकुल नहीं रह सकता और तेलकी मात्रा कोल्हूको अपेक्षा कहीं अधिक प्राप्त होती है। परन्तु इस दशामें जो खली प्राप्त होती है वह अन्य किसी काम की नहीं होती। क्योंकि इसमें तेल न होनेके अतिरिक्त यह भी दोष होता है कि दुर्गन्धपूर्ण होती है। पर सेतोंमें डालने के लिये यह बडा उपयोगी पदार्थ है और अनेक सलियोंकी अपेक्षा सस्तो मिल सकती है। भारतवर्ष में जहावक हमें ज्ञात है, इस प्रकारका एक कार्यालय पगालमे है। यदि उन कार्या- लयों की खली सादके काममें लायो जाने लगे तो कार्यालयोंको अधिक लाभ हो और अन्य प्रांतोंमें भी इस प्रकारके कार्यालय खोले जा सके। फिर किसानों के खेतोंकी उपज भी बढ सके। खेतों में खलीको साद बीज बोते समय कदापि न डालनी चाहिये । जय पौधे उपजकर थोडे थोडे बड़े हो जाय तो प्रत्येक पौधेकी अडमे थोडी खलो रखकर मिट्टोसे दया देना चाहिये। खली यदि यारीक पीसी ७२ स्वाद , हुई हो अथवा पानी में घोलकर डाली जाय तो और भी उपयोगी होगी । बहुससे कार्यालयों में सजीका चूरा पिसा-पिधाया मिलता है और उसको पोसनेको आवश्यकता नहीं होती। यह चरा मैशीनका पिसा हुआ होता है, अत किसानोंके लिये स्वय ऐसा बारीक पीस सकना मसम्भव होगा। इस कारण यह उत्तम होगा कि यह चूरा पिसा-पिसाया खरीद लिया जाय । खली सुगमताये ऐसे भी टूट जाती है और उसका पूरा किसान भी कर सकते हैं, परन्तु रेत जैसा बारीक करना असम्भव है । खली जितनी बारीक होगी उतनी ही वह पानीमें सुगमतासे धुल सकेगी। जितनी सुगमतासे कोई पदार्थ पानीमे घुल सकेगा उनना ही उत्तम प्रभाव उसका पोधो पर होगा। वैसे तो हर तरहको खली पौधोंको उपयोगी है तथापि नीमको सली विशेषरूपसे उपयोगी होती है। इसके डालनेसे अनेक प्रकारके कोडे खेामें नहीं लगने पाते। छोटे पौधोंको जो जानवर हानि पहुचाते थे वह भी कुछ कम हो जाते हैं। किस प्रकारको खलीमें कितनी माना कि पदार्थको उपस्थित होती है यह भी किसानको जानना चाहिये । इस तरह किसान बलीकी उपयोगिता और विशे पताको जान सकता है और इस प्रकार यह भी अन्दाजा लगा सकता है कि किस प्रकारकी खलीका प्रयोग उसके लिये उत्तम होगा। हमने कुछ खलियो का विवरण नीचे दिया है जिससे पाठको • को कुछ लाभ होगा। सही भी बहुत कारणों से एक प्रकारको नहीं हो सकती, अत इस विवरणमें जो मानाएं दी गयी हैं ये साधा- रणत ठीक है। उनमें विशेष कारणो से कोई पोज तथा तेल निका- - सजीको खाद ७३ लने ढंग अन्तर पड़ गया हो तो उसको पाठक स्वय अनुमान फरफे ठीक कर सकते हैं। तेलकी मात्रा प्रत्येक प्रकारको सलीमें जिसमें तेल दमाकर निकाला गया हो, न्यूनापिक होती है। हां, जो सली किसी रासायनिक घोल द्वारा निकाली गयी हो उसमें तेलको मात्रा सम्भव है पिज्ञकुल ही न हो । तेलकी मात्राका सलीमें रहना ढोरो के लिये उपयोगी होता है परन्तु सादके लिये तेल रहित खली काममे लायो जानी चाहिये। यदि उसमे कुछ तेक रह जाय तो खादको कुछ गुणकारी नहीं बना सकता, पतिक दल्दै ऐसी सकी खेतमें जाकर देरमें धूळ सकेगी। यह प्रविद्ध पात है कि यदि किसी पदार्थको पानी में डाल दे हो वह पदार्थ अलमें जल्दी घुल जायगा, इसकी अपेक्षा कि यह पदाथ तेलमें भिगोकर डाला जाता। तेल पानीको किसी पदार्थ के भीतर पैठने नहीं देता और यही कारण है कि तेलका भीगा हुआ पदार्थ गलनेमें दे देता है। यह विख्यात कहावत है कि चिकने घडे पर पानीको वद नहीं ठहरती । अत तेलको उपस्थितिमें खलीको गरने में देर लाती है और वह पौधेके तुरन्त काममें नहीं आ सकती। यदि शीन ही सलीसे खेतों में काम ना हो तो चूरेदार खली जिसमें तेळ विळकुळ न शे तलाश करके बरतनी चाहिये । तेल लिये सलीको गरम करते हैं, इसलिये जिस खलीमें गरमी पहुंचाकर तेल सुखा दिया गया हो वहो काममें लानी चाहिये। यदि तेल अधिक हो और सूसी सली न मिले तो ऐसी सूरतमें उसे गरम पानीमें कुछ देर पश देना चाहिये, इससे तेलकी कुछ मात्रा पानोपर आ जायगी और निवारकर अलग की जा ७४ - खाद सकेगी। परन्तु साधारगत इस झमटकी आवश्यकता नहीं है, वैसे चूग करके डाल देनी चाहिये। खलियोंके मूल तत्व जाननेकी सरणी, (१००० पौड सलीके पीले) ८८३ नाम पली सूम्बेपदार्थ की मात्रा नत्रजन प्रस्फुरिकाम्म पोटाश सफा किये हुए बिनौलेको खली ६१८ ७२० ३२५ मगफली की सकी ८९३ । ७६२ २०० तरेकी खली ९०० २०० १३ भलसीको खरी १६२ १२५ मिनोलेकी खली जिसका छिलका ३५२ २५८ १५१ न ताग गया हो उपर्युक्त कथनसे पता लगता है कि सबसे अधिक उपयोगी खली बिनोलेको है परन्तु विनोलेकी सलो सो अलग रहो, निनोलेका तेल ही निकालनेका रिवाज हमारे देशमें नहीं पाया जाता। देश भरमें ३१४ कार्यालय हैं। सारेके सारे बिनौले दूसरे देशो को भेज दिये जाते हैं और उनसे कोई उपयोग नहीं लिया जाता। हम आशा करते हैं कि पाठक इस ओर ध्यान देगे और इस प्रकारके पदार्थोंसे काम लेनेका प्रयत्न करेगे। Slove 1 एकादश अध्याय f रातकी साद भाग राख क्या पदाय है इसपर ध्यान देनेकी जरूरत है। यदि किसी पदार्थको जला दें सो उसके दो भाग हो जाते हैं। एफ तो वह भाग जो भागमें जलकर वायुमण्डलमें आ मिला और दूसरा यह भाग जो गखके रूपमें पाकी रह गया । यह वह भाग है जिसको साधा- रणत भाग नहीं जा सस्ती, यद्यपि अधिक तेज श्रोचसे गसकी माना और भी कम हो जाती है, राख प्राय लकड़ियो और अपलो के जलानेसे प्राप्त होती है जिनका वायुमण्डल्में मिल आनेवाला तो उडकर मिल जाता है और सनिज भाग पाकी रह जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राखमें पौधोंके सारे खनिज माग उप- स्थित होते हैं। रासको पेतमे डालनेसे पौधोंको सय गनिज भाग मिल जाते हैं। परन्तु रासमें पेवल इतना ही गुण नहीं है,पत्युत इसमें और भी कई यातें पायी जाती है । रासमे चनेये समान सबसे विशेप गुण यह पाया जाता है कि सतमें पौधेफे मोजनकी जितनी माता उपस्थित होती है, रास डालनेसे वह इसरूपमें आ जाती है कि पौधा ससफो काममें ला सके। चूना डालनेसे खेतमें पौधोंके जलनेका भय होता है परन्तु राससे वह भय भी नहीं रहता । चूना डालनेसे खेतमें उपस्थित नत्रजन एमोनिया पनकर निकलने लगता है और उसके ७४ खाद सकेगी। परन्तु साधारणत इस झमटको आवश्यकता नहीं है, वैसे ही चूग करके डाल देनी चाहिये। खलियोंके मूल तत्व जाननेकी सरणी, (१००० पोड खलीके पीछे) नाम सली ७२० ४४८ सूवेपदार्थ की मात्रा नत्रजन प्रस्फुरिकाम्या पोटाश सफा किये हुए बिनौलेको पली ६१८ ३२५ मगफली की सी ८६३७६२ तरेकी खली ९०० ४६६ २०० १३ अलसीको पली ८६३ मिनोलेफी खली जिसका छिलका ३५२ २५८ १५१ नउताग गया हो उपर्युक्त पथनसे पता लगता है कि सवप्ते अधिक उपयोगी खली विनोलेको है परन्तु निनौलेको खलो सो अलग रहो, बिनौलेका तेल ही निकालनेका रिवाज हमारे देशमें नहीं पाया जाता। देश भरमें ३।४ कार्यालय हैं। सारेके सारे निनौले दूसरे देशो को भेज दिये जाते हैं और उनसे कोई उपयोग नहीं लिया जाता। हम आशा करते हैं कि पाठक इस ओर ध्यान देगे और इस प्रकारके पदार्थोसे काम लेनेका प्रयत्न करेगे। ८७५ एकादश अध्याय रावकी साद रास क्या पदाय है इसपर ध्यान देनेकी जरूरत है। यदि किसी पदार्थको जला दें सो उसफ दो भाग हो जाते हैं। एक तो वह भाग जो भागमे जलकर वायुमण्डलमें जा मिला और दूसरा वह भाग जो गरफे रूपमें माफी रह गया । यह वह भाग है जिसको साधा- रणत आग नहीं जला सक्ती, यद्यपि अधिक तेज आंचसे रासकी माना और भी कम हो जाती है, रास प्राय लकड़ियों और सपलो के जलानेसे प्राप्त होती है जिनका वायुमण्डल में मिल जानवाला भाग तो धडकर मिल जाता है और सनिश भाग पाकी रह जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राखमे पौधोंके सार खनिज माग उप- स्थित होते हैं। रासको खेतमे डालनेसे पौधोंको सर म्यनिज भाग मिल जाते हैं। परन्तु रासमें पेवल इतना ही गुण नहीं है,प्रत्युन इसमें खोर भी कई याने पायी जाती है । रासमे चनेये समान सबसे विशेष गुण यह पाया जाता है कि खतमें पौधेफे मोजनकी जितनी मात्रा उपस्थित होती है, रास डालनेसे वह इस रूपमें आ जाती है कि पौधा एसको काममें ला सके । चूना डालनेसे खेतमें पौधोंके जलनेका भय होता है परन्तु रासते यह भय भी नहीं रहता। चूना डालनेसे खेतमें उपस्थित नत्रजन एमोनिया बनकर निकलने लगता है और उसके उड जानेका भय रहता है परन्तु रानमें यह विशेष गुण है कि वह एमोनियाको पढ़ने नहीं देती । इस प्रकार चूने के समान ही रास गुण- फारी पदार्थ है । चूनेमें पहुत कम प्रश ऐसा होता है जो पौधे खाते हो, क्योंकि बहुत कम पौधो को चूनेको भावश्यकता होती है, परतु रासमें कोई भी तत्व ऐसा नहीं होती जो पौधेके काम का न होता हो। राख सारीको सारी हो पौधों के भोजनका काम देती है। राख हाल्ने चिफनौट तथा डाकर सत भुरेमुरे हो जाते हैं। राख यदि पौधेके ऊपर घसेर दी जाय तो कोडे मर जाते हैं और पौधे खूप बढ़ने लगते हैं। कोई भी साद ऐसी नही है जिसका कोई समय नियत न हो। कोई साद बीजके उपजनेफे समय, कोई थोडा घढ जानेपर, कोई फलके समय, कोई बीजके साथ ही डाली जाती है परन्तु राखकी खाद ही एकमात्र ऐसी चीज है कि पाहे न डाल दो, लाभकारी होगी राखको सादमें मिला देनेसे वह बहुत जल्दो सड़ जाती है और उसका एमोनिया उड़ने नहीं पाता। गखको पेशाय पाखानेमें मिला देनेसे खादमें नम्रजन उहनेको जो सम्मानना होती है वह जाती रहती है। यही कारण ज्ञात होता है कि हमारे देशमें राख. फूडे, गोबरके साथ मिलाकर डालनेका रिवाज पाया जाता है। समात्र, गेहू मादिके खेतोंमें सो रासका यखेरना बहुत ही उपयोगी पाया गया है।
द्वादश अध्याय पुरादा, ईट-पत्थरका चूरा और नाटकी खाद लफडीफा युरादा भी खादकी भाति काम दे सकता है। परन्तु यह इतनी मात्रामें नहीं मिल सकता कि केरल ससीको अकेले खादको मांति फाममें लाया जा सके। जिन स्थानोंपर लकडी चीरनेका काम होता है वहा युरादा अधिक मात्रामे मिल सकता है। पुरादा साधारणत गोवरफी सादमें डालकर घरता जा सकता है। यदि बुरादा वैसेका पैसा हो खेतमें डालकर मिला दिया जाय धो इसके खेतमें मिलने में देर लगेगी। परन्तु ऐसी दशामें कोतमें पानीको न उडने दनेकी शक्ति उत्पन्न हो जायगी। थोड़े दिनोंमें ही पानीके मिलनेसे यह स्वय गल जायगा। जिन स्थानोंपर लकडीका बुगदा अधिक मात्रा मिलता है वहां लोग इसको जला डालते हैं, परन्तु जलाने की अपेक्षा खादकी भांति यह अधिक उपयोगी होगी । ईटों तथा पत्यरके चूरे में भी खादके वाव होते हैं । इन दोनों पदार्थों में केवल खानिज भाग होता है और ईटोंके चूरेमें तो वह खनिज भाग इस अवस्थामें होता है कि खेतोंमें डालनेपर पौधो के बहुत देर में काम आ सकता है। इसके डालनेसे साधारणत यही लाम समझा गया है कि खेतमें पानीको न उडने देनेको शक्तिमा खाड जाती है। पत्थरके चूरेमें पौधोंको थढानेको यो आश्चर्यजनक क्ति पायी गयी है, परन्तु अभीतक इसका अन्वेषण पूरे तौरपर नहीं हो पाया है। पक्षियो की वीटमें गोवरको अपेक्षा अधिक उपभाऊ शक्ति होती है। परन्तु घोटका एकत्रित करना बड़ा कठिन कार्य है। बहुतसे धागों में जहा रातमे पो बसेरा लेते हैं, घोट बढी मात्रामे इकट्ठो हो जाती है । वहाँसे यह काममें लायी जा सकती है। हमाग अपना अनुभव है कि यह खाद घडी ही उपयोगी है । भारतवर्ष में लोग प्रायः मांसाहारी नहीं है, इसलिये ऐसे अनेक स्थान हैं जहां सहस्रों पक्षी रातमें आकर विश्राम करते हैं। जिन बागोंमें पेड केवल लकडीके लिये लगाये जाते हैं उनमें पक्षियों के इकट्ठा होनेसे किसी हानिकी सम्भावना नहीं है मन ऐसे धागों में यदि यह प्रबन्ध किया जाय कि पक्षी सुखसे रह सकें और उनको कोई मनुष्य मार न सके वो बोट खासी मात्रामें मिल सकती है। यह ठीक है कि एक पक्षोसे पीट बहुत ही कम प्राप्त होती है परन्तु जहा सहस्रों पक्षी रहते हैं वहां यह माना बहुत ही अधिक हो सकती है। जिस प्रकार गोषरको पाद सडनेमे देर लेती है उस प्रकार घोट नहीं लेती । बोटमें सब वाव बहुत बारीक अवस्थामें होते हैं पर ऐसोको ऐसी ही खेतमे डालो जा सकती है। किसी रिशेप मवस्थामें कुछ दिनो के लिये किसी गड्ढेमें बन्द करके भी गलायी जा सकती है। प्रत्येक जाति के पक्षोकी घाटमें भिन्न भिन्न गुण होते हैं। परन्तु इतने गहरे अन्वेषगकी आवश्य- ।
बुरादा, ईट पत्थरका चूरा और बोटको खाद ७६ कता नहीं है। यह सवसम्मत सिद्धान्त है कि परियों की बीटमें पौधोंक सुराकके भोज्य पदार्थ मिलते हैं और कोई ऐसा भाग नहीं पाया जाता जो पौधोंको हानिकारक हो। अमेरिकामें समुद्र के समीप बीटों को बड़ी मात्रा पृथ्वीमे खोदनेसे निकलती है। इस पदार्थको गुवानो (Guano ) कहते हैं, यह सारे यूरपमें काममें लाया जाता है। भारतवर्ष में भी यह पदार्थ वहाँसे लाकर बेचा जाता है और खादके लिये परता जा सकता है । यदि हमारे देशवासी भी इससे लाभ उठाना चाहें तो उठा सकत है। ऐसी कोई खान भारतवर्ष में नहीं पायी गयी। अमेरिकासे गुवानो मगाकर काममें लाना महगा पडेगा। जब तक परीक्षा करके न देखा जाय, नहीं कहा जा सकता कि यह खाद काफी सस्ती पड़ सकती है या नहीं।
दूसरा भाग प्रथम अध्याय -- - । विशेष खाद और उनकी आवश्यकता हमने पहले भागमे भिन्न-भिन्न स्वादोंका--जो साधारणत काममें लायी जाती है वर्णन किया है। जितनी साद हमारे यहाँके किसान प्राय, परतते हैं उन सपका वृत्तांत प्रथम मागमें भा चुका है। हमने प्रथम भागमें यह भी सक्षेपमें बताया है कि पौधेको किन फिन पदार्थो की विशेष रूपसे आवश्यकता है और पौधे भोजन किस प्रकार खाते हैं । इस भागमें हम ऐसो विशेप रासायनिक खादों का वर्णन करेंगे जो विदेशमें काममें लायो जाती हैं। बहुतघी खादें जिनमें केवल रासायनिक पदार्थ है, भारतवर्ष में सासी महगी मिलती हैं और हमारे देशमें उनके बनाने का कोई प्रान्य नहीं है। हम इन सादोंके बनानेका हाल भी सूक्ष्म रूपसे देंगे, जिसमें पाठक कुछ अनुमान कर सकें और समव हो तो उनके बनाने का प्रयत्न भी कर सकें। विदेशोंमें विज्ञानको पड़ी चर्चा है और रासायनिक पदार्थ विस्तृत रूपमें बनाये जाते हैं। एक पदार्थक बनानेमें सैकड़ों पदार्थीका प्रयोग हुआ करता है और बहुतसी मात्रा ऐसे पदार्थोंकी विशेष खाद और उनकी आवश्यकता बच रहती है जिनको केवल बाहर हो फेक देना होता है। यह पद कभी कमी मच्छ दामोंपर विक जाते हैं। जिप्रकार साड पना वाले यही शोरा बड़ी मात्रामें प्राप्त होता है, परन्तु शोरा धना लिये कोई सेंची नहीं डालता। सण्ड सारी सांड बनान लिये काम करते हैं परन्तु शोरा भी सांडके साथ प्राप्त हो जाता। इसी प्रकार अनेक रासायनिक कार्यालयों में एक पदार्थ बनावे ! दूसरा पदार्थ प्राप्त हो जाता है। इस दुसरे पदार्थकी थोड़ी घा कीमत कार्यालयको यदि मिल जाय तो बहुत समझी आती है। प्रकार किसानको भनेक खाद यूरोपमें मुफ्त मिल जाती है। हम देशमे इन बातोंका बहुत कम प्रवार है अत जो कोई विशेष खाद खरीदना चाहते हैं वह हमको दूसरे देशोंसे हो म गानी पड़ती है में उसकी लागत बहुत देनी होती है। पर खाद बनानेके कार्यार हमार देशमें भी खुल गये हैं और यदि लोग इस ओर ध्यान द। बहुत ही शीन सब प्रकारको खादे सस्ने दामोंपर मिल सकेंगी। हमने बताया है कि पुटाश और नत्रजन तथा प्रस्फुरिफ वीन पदार्थ अधिक उपयोगी हैं। इन तीनों पदार्थोंके बिना पौधा नहीं ब सकता । अनुमान करो कि एक खेतमें प्रस्फुरिक कम हो गया है जो हमने ऐसी चीज बोयी है जिधमें प्रस्फुरिक की मात्रा अधिक चाहिये अब यदि गोबर की खाद अथवा पेशावकी खाद या कोई और सा डालेंगे तो इन सादोंमें प्रस्फुरिकको बहुत ही कम माना होनेके कारण यह खाद सैकडों मन प्रति एकडके हिसारसे डालनी होगी। इतन खाद कहासे मावेगी ? यदि खरीदकर डाली जाय तो उसकी लागत aur खाद अधिक होगी। फिर इतनी मात्रामें यदि खाद मिल भी गई तो ढो डालनेमें कितनी लागत मावेगी। यह हिसाब लगाया गया है साधारणतया एक टन अर्थात् २८ मन गोवरको खादमें केवल पौण्ड (६। सेर) ननजन, ५ पौण्ड (२॥ सेर) पुटाश और पौण्ड (शा सेर) प्रस्फुरिक होता है अर्थात् ये तीनों उपयोगी पद २८ मनमे २७ पौण्ड अर्थात् १॥ सेर होते हैं अर्थात् गोवर स्वादमें १ मनमें केवल एक सेर बल्कि इससे कुछ कम ही माग उ योगी पदार्थोका होता है । इसके अतिरिक्त यदि सतनी अधिक मात्रा खाद खेतो में डाली जायगी तो खेतकी मिट्टीपर उसका क्या प्रभा होगा? उनके मिट्टी में मिलते समय अनेक फोडे उत्पन्न हो जायगे यदि ऐसे खेतमे जिसमें प्रस्फुरिकको मावश्यकता हो, गोरकी सा न डालकर (क्यो कि इसमें २८ मनमें केवल ७ पौण्ड प्रस्फुरिक अर्थात् एफ मनमें केवल दो छटाक प्रस्फुरिक है) हडियो में खाद डाली जाय वो भी हडियो की बाद मधिक उपयोगी नहीं कई जा सकती। हड्डियों में यद्यपि प्रस्फुरिककी मात्रा अधिक होती। परन्तु वह उस अवस्था नहीं होती कि पौधो के काममें उसी फसलो मा सके जिस साल कि खाद डाली जाय। अस यह आवश्यक है कि खेतो में ऐसी खाद डाली जाय जिसमें बहुत मात्रा ऐसे पदार्थोकी हो जो पौधो के काममें मा सके। यही घाते अन्य सप खादो के सम्पन्धमें भी कही जा सकती हैं। विदेशियोंने कृषि-विद्या के मर्मको समझ कर ऐसी रासायनिक खादे घनायी हैं कि मिनके डालनेसे पौधोंको आवश्यक वस्तु भली मानि पहुच सके। इसमें सन्देह नहीं नत्रजन-सम्बन्धी साद ८३ कि उनका मूल्य अधिक होगा परन्तु उपयोगिताको दृष्टिसे वह अधिक नही पहा जा सकता। हम यह भली भांति बता चुके हैं कि पौधोंको साधारणत: वीन पदार्थो की मावश्यकता है। पहला नत्रजन, दूसरा प्रस्फुरिक, तीसरा पुटाश । यदि यह दोनों पदार्थ खेतोंमें डाले जाते रहें तो खेतकी पैदा- धार अधिक हो जायगी। इस कारण हम सारी रासायनिक खादोंको वीन ही भागोंमें विभाजित कर विचार कर सकते हैं। हम इस भागमें यह बतठावेंगे कि कौन कौन सो सादे ऐसी हैं जो नत्रजन, प्रस्फुरिफ अथवा पुटाशके लिये खेतमें डालनेसे उपयोगी होंगी। यह बात कि कौन फसल किस खादसे अधिक अच्छी होगी अथवा किस जिन्सको किन-किन पदार्थों की विशेष आवश्यकता होती है अत. कौन खाद किस फल डालनी और कम डालनो उपयोगी होगी, मागे वर्णन करेगे। द्वितीय अध्याय ननजन-सम्बन्धी खाद वायुमण्डलमें नत्रजनका भाग तीन-चौथाईसे भी अधिक है। लोगोंका सयाल है कि अम्लजन गमक जो दूसरी गैस वायुमें पायी जाती है उसको श्वासमें देना बहुत हो कठिन है। अत परमात्माने -- स्वाद उसकी तेजीको कम करने के लिये वायुमण्डलमें नत्रजनको अधिक सत्पन्न किया है। इसमें सन्देह नहीं कि वायुमण्डलमें नत्रजन अधिक माना पस्थित है और प्राणिमात्र जो नत्रजनका भाग अपने श्वासमें अन्दर ले जाते हैं वह ज्यों का त्यों वापिस या जाता है। यदि पौधों में यह शक्ति होती कि वह नत्रजनको वायु-मण्डलसे अपने श्वासमें पत्तों द्वारा खींच सकते तो कदापि नत्रजन-सम्बन्धी सादकी आवश्यकता न होती परन्तु ऐसा नहीं है । परमात्माने पौधों को यह शक्ति क्यों प्रदान नहीं को यह अभी तक विज्ञानको समझमें नहीं मा सका। इसमें अवश्य हो कोई बुद्धिमत्ता होगी। नत्रजन पौधोंके लिये सब पदार्थों से अधिक मावश्यक पदार्थ है। परीक्षा करनेके लिये कि पौधोंमें नत्रजन मिलकुल न पहुचनेका क्या परिणाम होता है यह देखनेके लिये छोटे-छोटे अलग-अलग धातुके गमलों में पानी डालकर बीज बोये गये। एक गमलेमें सब पदार्थ जिनकी पावश्यकता पौधोंको है जलमें घोल दिये गये, दुसरेमें नत्रभन बिलकुल नहीं डाला गया। तीसरेमें प्रस्फुरिक और चौथेमे पुटाशका प्रभाव रक्खा गया। परिणाम यह हुआ कि पहिला पौधा खूप बढा, दूसरे गमलेमें जिसमें नत्रजन नहीं था,पौधा जरासा हो नष्ट हो गया। वीसरेमें पौधा खासा घदा, परन्तु उसपर धीज नहीं माया, चौथेमें वह बड़ा लिज विजा यहा। इसी प्रकार दूसरी परीक्षा की गयी। गमलों में पानीके स्थानमें रेत प्रथा फुकी हुई मिट्टो डालकर एक गमलेमें जीनों पदार्थ, दूसरेमें नत्रजनका अभाव, तीसरेमें प्रस्फुरिफ और चौथेमें पुटाशका अभाव किया गया तो भी यही परिणाम निकला।
नमनन्सायन्धी बाद ८५ सैकष्टों पार ऐसी परीक्षाए फरक या निश्चय किया जा चुका है किनभन अत्यन्त आवश्यक पदार्थ है। इसी प्रकार यह भी कई वार परीक्षा को गयी है कि पौधे वायुमण्डलसे नमजन नही सीधते और सदा इसी परिणामपर पहुंचे कि पौधा नत्र. जन केवल अपनी अडद्वारा प्राप्त करता है और वायुमण्डलसे नप्रभा नहीं देवा सिमाय डा फलीदार पौधोंके कि जिनमें यह गुण पाया जाता है कि ये वायुमण्डलसे नत्रजनको घोचकर जमीनमें इम्हा करते रहे। पतसे जतु मटर मारिक पौधोंकी अझैपर ऐसे पाये गये हैं कि मिनका यही काम होता है कि चे वायुमण्डलसे नत्रमन इकट्ठा करते रहें। मटर मादिके खेतोंमें योनेके समय जिवनी नमनको माना होती है उससे बहुत अधिक मटरफी फसल काटनेपर पायी जाती है। परन्तु यह जन्तु मटर- की फसल काटनेपर जीवित नहीं रहते, यदि यह जोवित रह सकते तो सेवमें एक पारके पोये हुए मटरमें यह गुण होता कि उसमें ननजन- सम्बन्धी कोई खाद डालनेको आवश्यकता न होती। एक प्रकारके जतु और भी भारतवर्ष तथा अन्य देशोंकी जमीनोंमे पाये गये हैं। वे सर्वदा नत्रजनको वायुमण्डलसे इकट्ठा करते रहते हैं । इन जन्तुओं को किसी प्रकारको विशेष फसल आवश्यक नहीं है फेवल इस पेतमें इन पदार्थो का होना मावश्यक पाया गया है--एक Carbohy drate कार्योहाईड्रेट और दूसरा चूना कार्यनित । इन दोनों पदार्थो - के न होनेपर यह जन्तु स्वय मा आते हैं। यह मी प्रयत्न किया गया है कि सेतोंमें इन जन्तुओंको कृत्रिम रूपसे उत्पन्न किया जाय।
स्वाद यदि ऐसा हो सके तो खेतों में एक मुट्ठो खाद इन जन्तुओं को पर्याप्त।' हो सकेगी। इसपर पडे-बडे परीक्षण किये गये, परन्तु अभीतक अधिक सफलमा प्राप्त नहीं हुई। बहुवसे कार्यालय ऐसे पदार्थ बेचते हैं जिनके डालनेसे खेतोंमें यह जन्तु पैदा हो जाते हैं और बिना नत्रजनको खाद डाले हुए ही यह जन्तु उत्पन्न हो जाते हैं और किसी नत्रजनसम्बन्धी खादफे डालनेकी आवश्यकता नहीं रहती। कृषि विद्याफे पण्डित इस प्रकारके परीक्षण कर रहे हैं और उन अन्तुभोंको पालनेका प्रयत्न किया जा रहा है। इसमें बहुत कुछ सफलता भी हुई है, परन्तु अभीतक यह नहीं कहा जा सकता कि फेवल उन्हींके द्वारा खोंमें नत्रजन पहुचानेमे आवश्यक्तानुसार सफलता हुई हो। सभव है कि वह दिन मा सके कि जब नत्रजन- सम्बन्धी खादोंके डालनेकी भावश्यकता न रहे और फेवल इन जन्तुओंका खेतों में पालना ही किसानका काम रह जाय । पाठकोंको हम इस विषयमें अधिक पाशा न दिलाकर केवल इस आश्चर्यजनक सिद्धांतका वृत्तान्त ही लिख देना पर्याप्त समझते हैं। जो कृपक इस ओर विशेष ध्यान देना चाहें वे इस विषयकी पुस्तको को पढ तथा परीक्षणो को स्वय करके देख सकते हैं। भारतवपमें वह साद विदेशसे माकर मिकती है जिनके डालनेसे यह तत्व खेतो में पैदा हो सकते हैं। ये अनेक नामो से प्रसिद्ध है। परन्तु इनको केवल परीक्षामान ही हो सकती है। हम पाठको को इनके भरोसे खेतो को बिगाड़नेकी सलाह नहीं दे सकते। परमात्माको ओरसे मी समारमें कुछ ऐसे नियम कार्य नत्रजन-सम्बन्धी साद कर रहे हैं जिनके द्वारा नत्रजन रूपांतरमें परिणत हो धरतीम मा रहता है और पौधो के काममे मा सकता है, परतु यह बहुत ही कम मात्रामे हुमा फरता है । अत इससे यथोचित कार्य नहीं चल सकता । यह हम पता चुके हैं। वायुमण्डलमे नत्रजन तथा अम्लजन गैस मौजूद रहती है। और दोनो के सम्मेलन अनेक हैं जो मिट्टीमे मिलाये जा सकते हैं परन्तु दोनो के एक स्थानपर मिले रहते हुए भी ये सम्मेलन नहीं बन सकते। ननिकाम्ल तथा एमोनिया दोनों पदार्थ नत्रजन, ममिद्रवजन तथा अम्ल मनके सम्मेलन है और जलमें दोनों पदार्थ घुल जाने हैं। परन्तु कोई ऐसी क्रिया आजतक ज्ञात न हुई कि किस प्रक र वायुको उपस्थित सामग्रोसे यह पदार्य बनाये जा सकते । यदि वजनमें पम्जनको उपस्थितिमें निजलीको गरमी पहुचायी जाय । नत्रिकाम्न बन जाता है। वर्षाके दिनों में यह देखा गया है कि कि जलमें इसी कारण वायुमण्डलका नत्रजन नत्रिकाम्नमें परिणत हो जाता है। हिसाब लगाया गया है कि इस प्रकार प्रति एकड १. पौंड नाजन खेतोंको प्राप्त हो जाता है। वर्षाका जल दुसरे जलोंकी अपेक्षा, समव है, इसी कारण मधिक उपयोगी माना गया हो। इस प्रकार परमात्माफी मोर- से प्रतिवप खेतोंको नत्रमनकी कुछ मात्रा मिला करती है। वायु- के नत्रजनको किसी और प्रकार काममें लाने के लिये सैकड़ों यत्न किये गये हैं और किये जाते हैं। यदि वायुमण्डलमें विद्युत् द्वारा मधिक गरमी पहुंचायी जाय तो नत्रजन अन्य धातुओंमें मिलायी ५८ साद जा सकती है। फैलशियम कारबाइंड ( खाटिक कार्विद) एक सफेद पदार्थ है जो बहुत अधिक मानामें पानी टालकर भाजकल रोशनीके फाममें जाता है। अधिक तीन रोशनी देनेवाली मोटरकार तथा वाईसिकलोंके लेम्प प्राय इसीसे रोशनी पाते हैं। इसपर पानी डालनेसे एक प्रकारको अदृष्ट गैस निकलती है जिसको ऐसीटीलीन गैस कहते हैं। यदि इसमें दियासलाई जलाकर लगा दी जाय तो यह बढ़ा तीन प्रकाश देजर जलने लगती है। फेलशियम फारवाईडमें यह गुण पाया जाता है कि इसको पारीक पीसकर गरमो पहुचाफर यदि नत्रजन इसके पास लाया जाय तो यह उसको चूस लेता है और इस प्रकार अपना अंग बना लेता । वायुमें उपस्थित नत्रजन तानेके पनोंपरसे गुजारकर अलग कर लेते हैं और यह नत्रजन केलशियम फारपाईडसे मिलकर एफ और पदार्थ बन जाता है जो सीन चार प्रसिद्ध नामोंसे जाना जाता है। केलशियम सिनेमाईट नाईटोलिम अथवा फाल्कस्टिफस्टोफ आदि इसके प्रसिद्ध नाम हैं। इस पदाथमें १०० भाग पोछे २० भाग घे घुझे चूनेके होते हैं और इसी कारण यह वायुसे पानी खींचकर घुमना प्रारम्भ हो जाता है और जब इसमें पानीके मिलने अथवा वायुमण्डलकी नमो पहुचनेसे चूनेफा घुमना मारम्म होता है तो गरमी उत्प न होती है और इसमें उपस्थित नत्रजा एमोनिया घनकर उडने लगता है। इस प्रकार फैलशियम सिनेमाई यदि खुला छोड दिया जाय वो खरााहो आने का सन्देह है। अत इसको पीपणेमें भली- भाति पन्दं रख देना उचित है। यह भी बहुतसे विद्वानों तथा नत्रजन-सम्बन्धी साद । अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवळ घोरियोंमें भरकर रख देनेसे कोई अधिक हानि नहीं पहुं यतो । रासायनिक हिसाबसे कैल शियम सिनेमाईडमें सौ भाग पीछे ३५ भाग ननजनके होने चाहिये, परन्तु पामारके फेलशियम सिनेमाईसमें १०० भाग पीछे येवल २० भाग ननजनके होते हैं। गचित एमोनिया पादि नत्रजनकी और खादोको अपेक्षा यह कम लाभदायक पाया गया है। फैलशियम सिनेमाईड सबसे अधिक उन सेतोंको उपयोगी होता है जिनमें चूने की आवश्यकता हो । क्योंकि खेतमें डालनेपर जन यह पानी सिधकर घुझना आरम्भ होगा तो चूना फायनित उत्पन्न होकर सेतको लामकारी होगा। दुखरी घात इस पदार्थ- के उपयोगमें यह है कि यदि किसी संतमें बीज बोकर कैलशियम सिनेमाईड डाला जाय अथवा फैलशियम सिनेमाईड डालते ही बीज चो दिया जाय तो इसकी भमरुके कारण योज भली भाति न उपज सकेंगे । इसी कारणसे अधिक मात्रामें मिट्टी अथवा और कोई याद बिना मिलाये हुए इसे पौधो पर यखेरना भी उचित नहीं है। यदि वीज योनेके साथ ही साथ इसको काममें लाना हो तो सवदा बीभ योनेसे १५, २० दिन पून सेतमें डालकर भली भांति मिला दो और मिलाने के पश्चात् जप सेनकी भमक बिलकुल निकज आय तो खेतमें बोज चोओ। यदि सुपरफासफेट (जिसका वर्णन इस पुस्तके अध्याय ३ मे क्रिया है) ५ या १० गुना मिलाकर खेतमें डाला जाय तो और भी उत्तम खाद बनेगी। इस पदार्थमें इतना हलकापन ₹कि उड जानेका सदेह है तथा सेतमें बखेर सफना भी पडा कठिन ।
। कृपक इस १० कार्य है। इसी कारण ५ से १० गुने तक सुपरफासफेट तथा मिट्टी या कोई उचित पदार्थ लेकर इसमें भली भाति मिलाते हैं और गरमीको सात करनेके लिये थोडा पानी भी छिड़कते रहते हैं। कई बार मली- मांति मिला देने तथा कई दिन तक पडे रहनेसे इसका खेतमें मिलाना तथा पखेरना सुगम हो जाता है। बहुतसे स्थानों में रखानेकी कठिनाईको दूर करने के निमित्त इसमें कोयले का तेल मिला. कर डालते हैं अथवा पानी मिलाकर वुमा लेते हैं और फिर काममें लाते हैं । इस पदार्थका रंग भौंसला होता है । एक और पदार्थ जिस- को स्टिकस्टोफके नामसे पुकारते हैं और जिसका रंग काला होता है, बनाया जाता है। इसमें भी १०० भाग पीछे २० भाग नत्रजनके होते हैं और उसका भी गुण मिलकुल ऐसा ही है जैसा कि फैलशियम सिनेमाईडका वर्णन किया गया है । उपर्युक्त दोनों पदार्थो का बनाना बड़ा कठिन है क्योंकि इनके बनानेका कार्य केवल विद्युतको सहा. न्यतासे हो सकता है। हमारे देशमें अब कुछ स्थानों में भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये विद्यु तसे काम लिया जाने लगा है और सभव है कि कुछ दिनो में वह समय उपस्थित हो जम कि यह पदार्थ अपने देश में बनाये जा सकें और कृपक सेतो में डालकर लाभ उठा सकें। विद्युत द्वारा ही नत्रजनको एक और पदार्थमे मिलाया जाता है जो उपयुक पदार्थसे मिलती जुलती वस्तु है । इसको नत्रित साटिकर ( फैलशि- यम नाईट्रेट) कहते हैं। इसमें नत्रजन १०० भाग पीछे फेवल १३ माग होती है। यह पदार्थ भी ऐसे ही खेतो में अधिक उपयोगी होगा जिनमें चनेका प्रभाव हो गया हो । जिन सेतो में Peaty नत्रजन सम्बन्धी साद काठ मिट्टीफी घिसा हो उनके लिये फेलशियम नाईट्रेटे अधिक उपयोगी होगा तथा चिकनौट खेतों में जिनमें नत्रित सोडेके कारण नमीमा गयी हो और मिट्टीमें चिपक अधिक बढ गयी हो, नत्रित कैलशियम यड़ा उपयोगी होगा। वायुमण्डलके ननजनको काममें लानेके अतिरिक्त और भी ऐसे अनेक पदार्थ हैं जिनमें नत्रजन पाया जाता है और वह पदार्थ पतोंमें डालनेसे खेतोंको नत्रजन प्राप्त हो सकता है। ऐसे पदार्थ दो प्रकारफे हैं। एक ये जो परमेश्वरकी भोरसे बने बनाये ससारमें मिलते हैं और दुसरे वे जिनको मनुष्य अपने युद्धिपलसे मनाकर काममें लाता है। प्रथम जातिके पदार्थो मे नत्रित सोडा है, ये पदार्थ स सार के अनेक स्थानों में स्वय पाये जाते हैं। सबसे अधिक मात्रामें ये अमेरिका तथा मिश्र देशमें मिलते हैं और प्राय वहीसे सारे देशमें भेजे जाते हैं। ननित सोडेका उपयोग विलायतमें प्रत्येक कृषक भली भांति जान गया है और यह बहुत अधिक काममें लाया भी जा रहा है। हमारे देशमें घडे कामों मे इसकी परीक्षा की गयी है और उपयोगी पाया गया है। हम नहीं कह सकते कि किस भाव- तक इसका उपयोग लाभदायक होगा क्योंकि ऐसे परीक्षणोका हमारे देशमें नितांत ही मभाव है और बिना परीक्षा किये कोई सम्मति देना घड़ी जिम्मेवरीका काम है। नत्रित सोडा बहुत शोधू पानीमे घुल जाता है। यदि इसको कुछ देर के लिये खुला छोड़ दिया जाय तो यह वायुमण्डलसे स्वय जल खींचकर द्रवीभूत हो जायगा । अधिक माना सानेसे यह पदार्थ विषरूप है और घोडे तथा अन्य । ।
ढोर जब कभी इसकी योरियों को चाट लेने हैं तो मर जाते हैं। लाडी, कोयला आदि पदायों के साथ मिलनेसे जल उडने तथा धमाका होनेका भय रहता है। नरित सोडा न केवल पानी में घुल जानेवाला पदार्थ है, बलिक इम का मिट्टी में रह सफना ही असम्भव है। यह या तो पानीमें घुलकर खेतोंसे बाहर पहकर निकल जाता है या खेतोंको मिट्टोमें नीचे चला जाता है और पौधों के कामका नहीं रहता । इस कारणसे नत्रित सोडेको सर्वदा उपजे हुए खेतके पौधोंपर बखेर देना उत्तम है, जिसमें पानी उसको घोलकर जदोंके काममें ले भावे और फिर नष्ट होने की सम्भावना न रहे। इसे हरे पदार्यों पर डालनेसे यह उनको मुलस देता है। इसी प्रकार पौधोंपर छिड़क देनेसे हानिकर होता है । इस लिये घडी सावधानीसे सेतोंमें घरना चाहिये । इसे मारोश खादों के साथ मिला देनेसे हानिकी कोई मभा- बना नहीं हो सकती। परन्तु याद रखना चाहिये कि नत्रित सोडा कदापि सुपरफास्फेट तथा घुली हुई हड्डियोंको स्वादमें मिलाकर न पखेरना चाहिये , ऐसा करनेसे ननिकाम् नत्रित सोडेसे अलग हो जाता है। इसमें साधारणत १०० भाग पीछे १५७ भाग नत्रजनके होते हैं, या मौ भाग पीछे १६१ भाग एमोनिया होता है। नत्रित सोडा सदा असली सरोदना चाहिये । नमें मोर पदार्थो का मिलाना फठिन है तथापि किसानका कर्त्तव्य है कि वह असली खरीदने का प्रयत्न करे । नत्रित सोडा साधारणत नत्रजनके लिये ही खेतोंमें डाला जाता है। सी. को माना साधारणत पौधों के काममें नहीं आती, परत सोडेमें कोई लरण क्यों न हो उसमें यह गुण पाया जाता है कि वह - ननजन-सम्बन्धी खाद ६३ सेतो में उपस्थित पुटाराको पानी में घुलने योग्य यना देता है। चि. नोट तथा हलकी रेतीली जमीनोंपर भी इसका यह प्रमाव पदना है । अनुभवी लोगों का कथन है कि नमन सोडा डालनेके पाद किपी सेवमें पुदायको खाद डालनेको पारश्यकता नहीं होती। उन फपलोंक लिये मी जिनको पुगशसे अधिक प्रेम है नरित सोडा सेव- में उपस्थित पुटाशको इस योग्य बना देता है कि वह मोर किसी पुढाश-सम्पन्धी विशेष सादके मिना भली भांति फल फूल सके। परीक्षा फरके देखा गया है कि एक से धर्म २५ वर्ष तक mangold (मेनगोला) मोया गया, जो पुटाश प्रिय पोया है और ननित सोडे- की साद दो गयी, वो पैदावार माछो रही, पान्तु तके दुसरे भाग में मन्य नत्रजन सम्पन्धो सादे डाली गयी तो पैदावार कम होने लगी। उदाहरण के लिये यदि खेतमे गन्धित एमोनिया डाला जाय तो ३ वर्षके पाद अवश्य खेवमें पुटाश-पम्यन्यो साद डालनी पड़ेगी, क्योंकि गन्धित एमोनिया में यह गुण नहीं है कि वह सोतमें उपस्थित पुगशके काममें मानेका कोई प्रध कर सके। इस प्रकार त्रित सोडा अपने अन्दर उपस्थित नत्रजन द्वारा सेतोंकी सहायता करता है और खेतमें उपस्थिम पुटाशको पौधों के योग्य बनाता है। जिन खेतोंमे नत्रित सोडा डाला जाय उनमें केवल प्रस्फुरिककी पाद पोर डालनी होगी। नरिव सोडेको लगातार कई वर्ष तक अधिक माना डालनेका परिणाम मदा बुरा होता है। इसके डालनेसे डाफर जमीन नम रहने लगती है और यदि इन खेतोंको भली भाति सुखाकर न जोवा आय खाद तोडले उपडते हैं और खेत मच्छो ताह तैयार नहीं हो सकता। नत्रित सोडा जैसा ऊपर लिखा जा चुका है वायुमण्डलसे पानो सींच लेता है और इस प्रकार जल खेतोंमे पढाकर उनको नम रखता है। इन खेतों में सूखनेपर बड़ी चोडी चौडी दरारें पड़ जाती हैं और पौधे सुगमतासे नहीं उपज सकते । नत्रित सोडा कभी-कभी डाला जाय या इसमें आधा गन्धित एमोनिया तथा सुपरफास्फेट मिलाकर डालते रहे तो ऐसो सम्भावना बहुत कम हो जाती है। नत्रित सोडे में नत्रजन इस अवस्थामें उपस्थित रहता है कि पौधा उसको तुरंत काममें ला सके। यही कारण है कि वे खेत जो कोडे नगनेके कारण, पाजा पड़ने के कारण या किसी और कारणसे ठिठर जाय और पौधेका घढना बन्द हो जाय अथवा घरकारी आदिकी कोई फसल बहुत ही शीघ्र तैयार करनी हो तो नत्रित सोडा खेतमें डालना बडा लाभदायक पाया गया है। यदि नभित सोडेको सुपरफास्फेट या दुसरी वाइसे मिलाना पडे तो जितनी जितनो मात्रामें मिलाना हो उतनी मानामें लेकर एक फरशपर ढेर लगा दो और सून मिलाते रहो। यदि नत्रित सोडा पारीक न हो तो डलोंको फोड लेना उचित है । जय भली भांति मिल जाय वो खेतमें डाल दो। जब यह साद खेतम डालनी हो तभी दोनों पदार्थ मिलाने उचित हैं, अन्यथा नमी वायु-मण्डलसे सीच आनेपर इस खादफे डले बन जायगे और ननजन भी कुछ मात्राम उड़ जायगा। यदि दो तान दिन पश्चात् काममें लाना हो तो कोई अधिक हानि नहीं।
नत्रजन-सम्पन्धी साद ६५ । नत्रित सोडा चूना या गसके साथ मिलानेसे कोई हानि नही होती। जिस प्रसार गधित एमोनियामें घना अथवा रात्र मिलानेसे नत्रजनका परमाग उड जानादि, ननित सो की यह व्यवस्था नदी है।सिक स्लेग, पुटाशके टवग मी नत्रित सोडेके साथ मिलाये जा सकते हैं। यल सुपरफास्पेटको नत्रित सोडेक साय नहीं मिलना पाहिये, इसकसिया मोर किसी प्रकारको भी पार नत्रित सोडमें मिलानेसे कोई हानि नहीं होती। साधारणत गरित सोडेको अन्य सादोंके साथ मिलानेको कोई आवश्यकता नही होती, क्योंकि नरित सोहा सर्वा फसल के भारम्भमें डाला जाता है जय पौधोको सूप पढ़ाना हो। साद फसलके पढ़ चुक्नेपर डाली जाती है। क्योंकि ननित सोडा मन्समें डालनेसे सवदा फसल देरमें पसी है और देरवा री यनी रहती है। मत प्रस्फुरिफको साइ प्राय पौधेफे कुछ पद जानेपर ही डाली जाती है। इस प्रकार नत्रित सोडा डालने में कोई भय नहीं है। ननित सोडेके समान शोघ फाम देनेवाली नगजनसम्बन्धी स्वाद गन्धित ऐमोनिया मानी गयी है। पत्यरफा कोयला वनस्पतिकी मिट्टीमें, सैकड़ों वर्ष हुए, दम जानेका परिणाम माना गया है। पत्थर के फोयलेमें १०० भाग पोछे १५ से २ भागतफ नत्रजन होता है। जय कोयलेको जलाकर उससे गैस तैयार की भावी है तो इस नन जनका कुछ भाग एमोनिया होकर उडना आरम्भ होता है। एमो- निया पानी में घुलनेवाला पदार्थ है । मत बह पानीमें घोलकर निकाला जाता है और फिर भभासे उड़ाकर गंधकाम्छमें मिला दिया जाता है साद तो दानेदार गन्धित एमोनिया तैयार हो जाता है। गन्धित एमोनिया तथा एमोनिया पनानेका सविस्तर वृत्तात हमने अपनी पुस्तक विज्ञान- कल्पतरु" के तीसरे भाग लिया है। वहां इसे देख सकते हैं। गैस धनाने कार्यालयों के अतिरिक्त यह पदार्थ मट्टियों, अंगीठियों आदिमें जहां फोयला जलाया जाता है, प्राप्त करनेका प्रमन्ध किया गया है। इस लवणमें १०० भाग पोछे नत्रजनके २०५भाग उपस्थित होते हैं। एमोनियाको घेचनेके रूपमे रखनेके लिये नमकके तेजाबमे डालकर भी पहले जमाया जाता था, परन्तु पर यह प्रथा पिल्कुल जाती रही और गन्धित एमोनिया ही बनाया जार सेतामें डालनेके काम- मे आता है। गन्धित एमोनियामें यदि और कुछ मिला हुयान हो तो यह दानेदार और सफेद होता है और पानी में सुगमतासे घुल जाता है। बाजारका गघित एमोनिया धूसर होता है और उसमें पीलापन भी कमी-कभी मिला होता है। कभी-कभी यह बिलकुल नीला होता है। खालिस गन्धित एमोनियामें १०० भाग पीछे २१२ भाग नत्र- जनके होते हैं और पाजारफा गन्धित एमोनिया १०० भाग पीछे ६५ भाग असली होता है और उसमें ५ भाग अन्य द्रव्य मिले होते हैं, इस कारण इसमें १०० भाग पीछे नत्रजनके २०२ भाग या १०० भाग पीछे एमोनियाके २४५ होते हैं। गन्धित एमोनिया में लोग मिलावट कर देते हैं, परन्तु इसका पता सुगमतासे लग आता है। गन्धित एमोनिया कुलका कुल बह जानेवाला पदार्थ है । मत यदि इसकी मुट्ठी-भरकर आगपर डालें तो साराका सारा जलफरड़ नजन-सम्बन्धी साद आयगा और कोई पदार्थ आगमें घाकी नहीं रहेगा। पहले गन्धित एमोनिया में एक और पदार्थ मिला होता है जिसको एमोनिया सलकोसायनाईड कहते हैं। यह पदार्थ पौधों को हानिका- रफ होता है। यदि एमोनियाको पानी में घोलकर थोडासा हरिद लोह (फोरिक क्लोराइड ) डाले तो जलका र गहरा लाल हो जायगा। गहरा लाल हो जाना ही इस बासको पहबान है कि इसमे सलफो- सायनाईड उपस्थित है। गन्धित एमोनियाले चनेकी उपस्थितिमें, चाहे वह कार्बनितके रूपमें ही क्यों न हो, गैस निकल कर सड़ने लगती है और इस प्रकार एमोनियाके उड़ जानेसे सादका वास्तविक और उपयोगी भाग आता है। इसी कारण गन्धित ऐमोनियाको कदापि चूने के साथ अथवा किसी ऐसी सादके साथ जिसमें चना मिला हो, फाममें नहीं लाते । इसी प्रकार करीले सेतोंमें भी जिन- में प्राय घनेकी मात्रा अधिक होती है, गधित एमोनियामें उपस्थित एमोनियाको मात्रा कुछ कम हो जाती है। गन्धिा एमोनिया भी ननित सोडेके समान बहुत शीघ्र प्रभाव डालता है। गधित एमोनिया डालनेसे खेतोंमें उपस्थित चूना गधित'च ना बन जाता है और इस प्रकार खेतोंमे उपस्थित धोका प्रभाव जाता रहता है। यदि इन्हों खेतोंमें गधित एमोनिया अधिक मात्रामें डाला जाता रहे तो उसमे ऐसे पौधे जितको चूनेकी मावश्यकता होती है बिलकुल नहीं उपजते । कई खेतों की जाच करके देखा गया है कि उनमें केवल गन्धित एमोनिया लगातार साले जाने के कारण हो जब बिळ कुल नहीं उपजा, यद्यपि उसमें अन्य पदार्थ खेतमे उपजके लिये थे, ९८ खाद और फिर चूना डालनेसे यह हानि जाती रहो। यदि किसी खेतकी मिट्टीका, जिसमें गन्धित एमोनिया डाला जाता रहा हो, परीक्षण कर देखा जाय तो पता लगेगा कि उसकी मिट्टो बम्ल है, जिसकी मिट्टी- को जलमें घोल लिटमस डालनेसे लग जायगा। कई प्रकारके जतु सेतोंमें ऐसे पाये जाते हैं जो गन्धित एमोनियाके सेतमें डालनेसे नत्रजनको स्वयं खा जाते हैं और गन्धकाम्लको अलग कर देते हैं और मिट्टी खट्टी होती चली जाती है। इस प्रकार जप सब कार्यनित चूना, जो खेतमें होता है, इस तेजामके काम आ चुकता है तो काठिन मिट्टी अथवा काष्ठादिक खादके भागपर तेजावका प्रभाव आरम्म होता है और उसका काठाम्ल अलग होकर एकत्रित होने लगता है और खेतकी मिट्टी खट्टी होती चली जाती है। खेतकी मिट्टीफे खट्टी होने का प्रभाव यह होता है कि खतमें जो नत्रजन पौधे वायुसे इकट्ठा करते तथा सेतकी मिट्टी में नत्रजनका जो सञ्चार तथा अनेक उप- योगी क्रियाएं होती थीं वे सबको सब सटाईके कारण बन्द हो जाती हैं और सेतमें पौधों की पैदावार कम होती चली जाती है। गन्धित एमोनिया तथा नत्रित सोडेको खादमें एक अन्तर यह मी है कि यदि किसी खेतमें देरतफ गधित एमोनिया डालते रहें तो इस खेतमें सटाई यह जायगी। चूनेको मात्रा कम होती चली जायगी। साथ ही एक दोप यह भी होगा कि गन्धित एमोनियाके खेतों में पौधों की जड़ें नीचे नहीं जाती और नचित एमोनियामें जई नीचे जाती हैं। यह परीक्षण करके देखा गया है कि जिन सेतों में गन्धित एमोनिया डाला गया उनमें स्वय सपजाऊ पौधोंकी केवल नत्रजन-सम्बन्यो खाद ऐसी जातियां पायी गयीं जिनकी जई कम नीची जाती हैं। गधित एमोनियाके खेतोंम गेहू की उपज ननित एमोनियाके सेतोंकी अपेक्षा कम होती है क्योंकि गेहूझी जर्ड नोची जाया करती हैं। परन्तु जब जिसकी जड़ें कम नोचो जाती है उसको उपज गन्धित एमोनिया तथा नत्रित सोडा दोनों की अवस्थामें समान पायो जाती है। एक मन्तर यह भी पाया गया है कि ननित सोडेकी फसल गधित एमो. नियाको फालकी उपेक्षा उत्तम पकती हैं। जवके खेतोंमें गन्धित एमोनियाका प्रभार नत्रित सोडें का अपेक्षा अधिक उत्तम पाया गया है। नत्रित साहकी कप गन्धित एमोनियाको अपेक्षा दरमें पकती है, क्योंकि नत्रित सोडको सादवाले पौधे अधिक गहरे जाते हैं इस कारण सूर का प्रभाव भी इनपर कम होता है। ऋतुका प्रभाव भी नत्रित सोडेके सेतोपर इसी कारणसे कम होता है कि इसकी जड अधिक गहरी जाती हैं। खेतोंमें जो अनेक प्रकार के अन्तु पाये जाते है जिनका स्थान-स्थानपर विचार किया गया है, उनको ननभनको आवश्यकता भोजनके लिये रहती है। इस भोजनको कुछ जतु तो अपने शरीरके काममें लाते हैं और कुछ उसको गैस रूप बनाकर उडा देते हैं । गन्धित एमोनियाकी अपेक्षा नत्रित सोडेको यह जतु कम फाममे लाते हैं। मत इनको गधित एमोनियाको अपेक्षा नत्रित सोडा सतके पौधों के काम अधिक आता है। इसी प्रकार नम मौसममें एमोनियाकी नमीका नत्रीभवन बन्द हो जाता है और ननित सोडाफा उपस्थित रहता है, मव नम मौसमोमें ननित सोडा विशेप उपयोगी होगा।
सादः , काजलकी खाद-पत्थरके कोयलेमें एक भाग -प्रति १८० भाग पीछे नत्रजन होता है। जब कोयला जलाया जाता है तो नत्रजन एमोनिया वनफर उडने लगता है। कारयनके छोटे छोटे, अणुवोंमें यह गुण होता है कि वह गैसोंको अपने ऊपर जमाफर रोक लेते हैं। इसी कारण यह एमोनिया जो फोयला जलानेसे उत्पन्न होता है चिमनीमें जाकर फामलके साथ इकट्ठा हो जाता है। इस प्रकारके काजलमें ०५भागसे भाग तक साधारणत १०० भाग पीछे नत्र- जन पाया गया है । सय विश्लेपणो का माध्यम १०० माग काजल्में ३२ भाग नत्रजन है। नत्रजनके लिहाजसे काजल इतना उपयोगी नहीं है, परन्तु इसका प्रभाव खेतो पर पड़ा आश्चर्यजनक होता है। खेतो की मिट्टोफे रगका पौधोंपर पढा प्रभाव पड़ता है । जिन खेतो फी मिट्टी फाले र गकी होती है उनमें अधिकसे अधिक सूर्य को रश्मि- यो गरमी पहुचाया करती हैं और इन खेतो की मिट्टी अधिक गरम रहती है । सफेद मिट्टीमें गरमी फमसे कम हुमा करती है । इसलिये जिन खेतो में काजल डाला जाता है, उनमें गरमी अधिक रहती और इसी कारण पौधे अधिक पढते हैं। जिस प्रकार गङ्गाको नहरके कारण खेतों में प्राय व ढापन आ गया है, वह काजलफे डालनेसे दूर हो सकता है । विशेष कर अधिक गरमो पहुचानेका लाभ सावनीको फसल (असाढी) पर होता है और छिरे हुए त पड़ी तोग्रतासे पढते हैं। यदि फाजलवाले खेत दिनमे अधिक गर्म हो जाय तो उनकी गरमो रात्रि में भी बहुत हद तक बनी रहती है इसलिये इन खेतोंपर पालेका भी प्रभाव कम पडता है। खेतोंमें सादका गलना तथा । ।
प्रस्फुरिककी साद नत्रजनका यनना, जतुओंका बढना केवल गरमीको अधिकतामें ही अधिक होता है इसलिये कामलेका डालना घडा उपयोगी है। चिक- नौर तथा डाफर जमीनोंको गैसली बनाने में काजल सहायता करता है। कालके डालनेसे अनक प्रकारके कीड़े और जानवर,जो खेतों मे बड़ी हानि पहुचाते हैं और विशेषकर बन्नकी फसलोंको नही पहुचा सकते । पिनियोंमें काजल पडी मात्रामें इकट्ठा हो जाता है और ऐसे स्थानोंपर जहा बड़े-बड़े कार्यालय होते हैं पहुय मानामें मिल सकता है। सम्भव है गेह धादिके सेतोंमें राख डालनेका पुराना रिवाज इसी कारणसे पडा हो। तृतीय अध्याय प्रस्फुरिककी खाद प्रस्फुरिक पौधोंके लिये कितनी मावश्यक वस्तु है, यह हम भली भांति पता चुके हैं, विशेष फर चीजोम तो इस पदार्थका पहुस यडा भश पाया जाता है । प्रस्फुरिक पोधोंमें पहुनानेके लिये दो घडे तरीके काममें लाये जाते हैं। एक तरीका तो यह है कि हड्डियोंको खेतमें डालकर यह पदार्थ खेतोंमें पहुचाया जाय और इस कारणसे राहियोंमे उपस्थित प्रस्फुरिक अधिकसे अधिक काममे लाया जा सके उनको भनेक रासायनिक क्रियाओं द्वारा साद रूप बनाया जाता है। दूसरे प्रस्फुरिकको खाद सनिज पदार्थोंसे प्राप्त की जाती है । भनेक १०२ साद । प्रकारकी चट्टानों में सया मिट्टियों में प्रस्फुरिफकी अधिक मात्रा पायी जाती है और इन पदार्योो रासायनिक सम्मेलनो द्वारा अधिक उपयोगी धनाकर काममें लाया जाता है। इस प्रकार प्रस्फुरिक खादकी दो जागिया की जा सकती हैं, एक सनिज खाद और दूसरी पाशविक खाद । चाहे कोई पदार्थ किसी प्रकार खनिज अथवा हड्डि- योंसे प्राप्त क्यों न किया गया हो, पान्तु आदर्श दोनों दशाओंमें यही रहता है कि प्रस्फुरिकाम्ल जो इनमें उपस्थित होता है वह इस दशामें आ जाय कि पौधोंके काममें आ सके। हम बता चुके हैं कि यदि हड्डियोंको चूग कर खेतोंमें डाल दिया जाय तो लाभदायक होती है, परन्तु उनका गुण कुछ वर्षों के बाद प्रगट होता है और कई वर्षातक होता रहता है अर्थात् हड्डियों में उपस्थित प्रस्फुरिकाम्ल इस अवस्थामें नहीं होता कि पौधोंके तुरन्त काममें आ सके । यही चात अन्य खनिज पदार्थोंमें भी पायी जाती है जिनमें प्रस्फुरिकाम्ल पाया गया है। परीक्षण करनेसे यह पता लगा है कि गधकाम्ल में यह गुण है कि वह इस प्रस्फुरिकाम्लको इस अवस्थामें पहुचा देता है कि पौधे तुरन्त ही उसको अपने काममें ला सकें। गधकाम्सके अतिरिक्त और भी कई प्रकारके खनिज अम्ल नमकके तेजाव आदि हैं परन्तु उनका मूल्य भी अधिक है और उनसे काम लेना मी फठिन है , क्योंकि जब इनको इडियोपर डाला जाता है तो इनके भीतरसे जो गैस निकलती है वह बडी हानिकारक होती है। गधकाम्न सस्ता पदार्थ है और इसको काममें लाने में यह कठिनाई भी नहीं है। इसलिये इसे ही अधिक काममें लाया जाता है। विलायतमें अनेक पदार्थों को प्राप्त करते हुए गधकाम्ल (०२ म हो जाता है। अनेक खनिज पदार्थों में स्वाभाविक रूपसे धक मिली हुई निकलती है। जब इन पदार्थो को अलग करते हैं तो धक एड़कर गधकाम्लके रूपमें परिणत हो जाती है। इस प्रकार घकाल अनेक कार्यालयोंमें योंही प्राप्त हो जाता है। यही भरण है कि साधारण प्रकारका गधकाम्ल बहुत सस्ता मिल आता 1 भारतवर्षमें गंधकाम्ल बहुत कम मात्रामें दो तीन स्थानोंपर पनाया ता है। फलकत्ता, पम्बई तथा देहलीमें इसके कार्यालय है पापि उसे किसी और पदार्थको बनाते हुए प्राप्त नहीं किया जाता युत गघकसेही प्राय बनाना पडता है, जिसका परिणाम यह होता है इसके धनानेमें लागत बहुत अधिक भाती है। गन्धकाम्लके सस्ता होनेके कारण भारतवर्ष में अनेक पदार्थ तैयार नहीं हो सकते और न पदार्थो को लाचार हो विदेशसे मंगाना पड़ता है। गधकाम्ल बडा • उपयोगी पदार्थ है और यदि हमारे देशमै किमी प्रकार घहुत स्ता मिलने लग जाय तो बान कितने ही पदार्थ सस्ते बनाये जा के और उनको अन्य देशोंसे मगाने की आवश्यकता न रहे। गन्धकाम्लमें यदि हइियोंको डाल दिया जाय तो वह अनायास घुल जाती है। इन हड़ियों और गन्धफाम्लके सम्मेलनको जी हुई हड्डियों Dessolved bones के नामसे जाना जाता है। उमें १०० भाग पीछे ३५ से ४० भाग तक प्रस्फुरिक होता है जिसमें २ से १८ भाग तक घुलनेवाली दशामें होता है । इसमें नत्रजन भी २० भाग पीछे ३ भाग होता है। इनका रस धूसर होता है और छ चुछ नम और चिपकनेवाली होती है। इनको खेतमें घर १०४ स्वाद , । । कठिन होता है क्योंकि यह ऐसा चूर्ण नहीं होता कि सुगमतासे ग्वेसो पखेर सकें । यदि इसमें कोई और पदार्थ न मिळावें तो इसका खेतों में डाल सकना पड़ा कठिन होता है। साधारणत इसमें गच Cyosum का चूरा डाला जाता है, परन्तु इसके डालनेसे कोई लाम नहीं होता। यदि उनमें गोपरकी बारीक खाद मिला दो जाय तो अधिक उपयोगी होगी और यह साद प्रत्येक खेतमें डाली जा सकेगी क्योंकि इस अवस्थामें सारे पदार्थ उपस्थित होंगे। गन्धकाम्लमें पानी डाल कर हलफा कर लिया जाता है और फिर हरियों में मिलाते हैं । यदि हड्डियोंका चूरा पारीक हो तो अधिक उपयोगी माद धनेगी क्योंकि इस अवस्थामें गन्धकाम्लका हदियोंपर अच्छा प्रभाव पड़ सकेगा। गन्धकाम्ल ऐसे घड़ा तीक्ष्ण पदार्थ है और जब साधारण पदार्थों को जला डालता है तो पौधोंको जला डालना कोई बड़ी बात नहीं, परन्तु जो गन्धकाम्ल इस कार्यके लिये काममें लाते हैं वह हलका होता है फिर उसमें पानी मिलाते हैं। इसके अतिरिक्त हट्टियों में एक प्रकारका चूना होता है, जो गन्धकाम्लसे मिलकर उसकी सीक्ष्णताको नष्ट कर देता है और जिस प्रकार हम बता चुके हैं क्षारित चूना तथा गन्धकाम्ल मिलकर प्रस्फुरिफ चूना बन जाता है। भारतवर्षसे प्रति वर्ष कई लास मन हड़ियां दूसरे देशोंको चली जाती है और इस प्रकार लाखों रुपयेकी उपज देनेवाली खाद फोडि- यो मोल बाहर चली जाती है। १६०२ से १९०८ तकमा मोसत लगानेसे ज्ञात होता है कि प्रति वर्ष २३०१८२८ मन इडिया भारत- प्रस्फुरिककी खाद वर्षसे बाहर गयी और उनका मूल्य केवल ४८७५५३५ रु० माप्त हुआ। इसमे पाठक स्वय अनुमान कर सकते हैं कि यदि यही दशा जारी रही तो कुछ दिनोंमें हमारी खेती केसी शोषनीय दशा हो जायगी। सुपरफास्फेट :-माजकल यह खाद अधिक काममें लायी जाती है और उपयोगी समझी जाती है। सुपरफास्फेट किसी न किसी प्रकारसे गन्ध माम्ड तथा हड्डियोंके चूरे अथवा और खनिज पदार्थका जिसमें यही गुण पाये जाते हों सम्मेलन है। पहले लोग २ माग हडियोंके चूरेमे १ भाग गन्धकाम्ल और डेढ दो भाग जल मिलाकर हड्डियों मिलाते थे और फिर इसमें और पानी मिलाकर खेतों में छिडका फरते थे। आजकल सुपरफास्फेट अधिक प्रयुक्त होता है। सुपरफास्फेट तथा घुली हुई हड्डियां एक ही पदार्थ है, कुछ अधिक अन्तर नहीं है, केवल इतना अन्तर है कि सुपरफास्फेट हटि- योंके अतिरिक्त और भी अनेक पदार्थों से बनाया जाता है। हडियों के चरेको लेकर उसमें आधा भाग गन्धकाम्ल जिसका गुरु व १५२ हो डालकर भली भांति मिलाकर छोड़ दो। यह दोनों पदार्थ आपसमें मिल जायगे और अगले दिन इस योग्य हो सकेंगे कि इनको मूगरियोसे तोड सकें । इनको कुछ देर सुखाफर काममे ला सकते है। गंधश्चामलको मात्रा हड़ियों तथा अन्य पदार्थों को जिन्हें इम काममें लाया जाय विश्लेषणपर निर्भर है। कभी कभी इससे अधिक और कभी कम डालना होगा। गन्ध काम्ल सर्वदा इतना डालना चाहिये कि यह सारे उपस्थित चनेको १०६ खाद - 1 . प्रस्फुरित चूना धनाकर कुछ दच न रहे , प्रत्युन जिस हिसाबसे गलना चाहिये उससे कुछ कम डालो। यदि कुछ भाग हइयों या भन्य पदार्थों का ऐसा रह जाय जिसपर गन्य काम्लका कोई प्रभाव न हुआ हो तो उत्तम समझा जाता है, यह भाग भी धीरे धीरे खेतोंके पौधोंके काम मा जावा है । सुपरफास्फेट बनाने में यह विचार रखना चाहिये कि हहियोंके अतिरिक्त जो पदार्थ काममे लाये जाय उनमें लोह अम्लजिद और अलमोनियम अम्लजिद न हो, क्योंकि इनको उपस्थितिसे साद ऐसी बन जाती है कि वह जलमें न घुल सके । इसी कारण ऐसी खाद खेतोंमें अधिक उपयोगी नहीं होती। सुपर- फास्फेटका मूल इस बातपर निर्भर है कि विवनी मात्रा प्रस्फुरि- काम्लकी उसमें इस योग्य है कि वह पानीमें घुल जाय और खेतो में जाकर पौधो के भोजनका तुरन्त फाम दे सकूँ। इसीलिये जितने खाद घेचनेवाले हैं वे सर अपनी बादमें ऐसे भागको मात्रा पतावेंगे। सुपरफारपेट जैसा आजकल विकता है वह धूसर रगका चूर्ण है जो कई प्रकारफा बनाया जाता है । साधारणत यह चार प्रकारका होता है। १०० भाग पोछे घुलनेवाले प्रस्फुरिकको मात्रा २६, ३०, ३५ और १० होती है अथवा प्रस्फुरिकाम्लको माना १२, १४, १५, और १८ हुमा करती है । पाठकवृन्द इस योग्य तो नहीं है कि ये स्वय अपने विश्लेषण कर यह देख सके कि अमुक सादमें इतनी माना किसी पदार्थको है स्थापि वह यह भवश्य कर सकते हैं कि जिन दुकानदारों से वे खाद खरीदे उनसे यह पूछ लेवें कि उनकी सादमें किचनी मामा,प्रस्फुरिकाम्ल अथवा प्रस्फुरिक चूनेफी है जो + प्रस्फुरिककी खाद १०७ पानी में घुल सकती है और पौधो के तुरन्न काममें आ सकती है। पाठको को चाहिये कि वे इसी बातपर प्रस्फुरिकी खादो का सस्ता तथा महमा हेना निर्भर समझ । उदाहरण के लिये यदि एक दुकान दार ३० भागवाले सुपरफास्फेटको ४) रु० मन बेचता है तो दुसरा दुकानदार २६ भागवाले सुपरफास्फेटको यदि २' ==)| मनसे अधिक मूल्यपर वेचे तो कोई लाभ नहीं, प्रत्युन हानि सममनी चाहिये । सुपरफास्फेटमें केवल पानीमे घुलनेवाला पदार्थ की तो कामको चीज है । अत इसोसे खादको उपयोगिता जाननी चाहिये। दूकानदार यह भाग बनानेमें अनेक धूर्तता करते हैं, परन्तु अबतक हम स्वय इन बातो को जानने योग्य नहीं बनते, तब तक हमें यह बातें सहन करनी पड़ेंगी। जिन स्थानो पर हड्डियो का चूरा खूब सस्ता मिल सके वहां यदि कृपक स्वय बनाकर काममें लावें तो अच्छा है। गन्धकाम्ल इकट्ठा खरीदनेमें सस्ता पड सकेगा और हम स्वय यह देख सकेंगे कि जो कुछ हम फाममे लाये हैं वह वास्तवमें ठीक है। तीसरा पदार्थ जो प्रस्फुरिककी खाद है वह बेसिक स्वेगके नामसे प्रसिद्ध है। जिन स्थानोंपर लोहकी ढलाईका काम होता है वहां यह पदार्थ योंही प्राप्त हो सस्ता है। लोहेकी मिट्टी, जिसको पिघलाकर लोहेके अनेक पदार्थ बनाये जाते हैं, इस्पात तथा ढला हुआ लोहा बनता है, देगचन कहाती है और खानोंसे सोदकर निकाली जातो है। अनेक स्थलोंपर इस मिट्टी में प्रस्फुरिकाम्ल स्वाभाविक रूपमें मिला हुआ पाया जाता है। जब इस देगचूनको पिघला कर डालते ।
हैं तो यह प्रस्फुरिकाम्न भी घुल जाता है और लोहा उपयोगी नहीं चतता। उत्तम लोहा बनाने के लिये इस प्रस्फुरिकाम्जको दूर करना होता है। पहले इस प्रस्फुरिकाम्लकी सापत्ति के कारण उत्तम लोहा प्राप्त करने में बही कठिनाई उठानी पड़ती थी। बहुत दिनोंके परी. क्षणके पश्चात् इस बातमें सफलना हुई कि इसके ढालने के स्थानपर चना तथा मम लगा दिया जाय जिसमें लोहेके पिघलते ही समका सब प्रस्फुरिकाम्ल चूने तथा मनमे मिलकर एक सम्मेलन बन जाय । इस प्रकार लोहे की ढलाई की भट्ठियोंमे एक पदार्थ पैदा हो जाता है। यादमें इसको पीसकर सेतों में डाला गया तो इसकी जप- योगिता मालूम हुई और इस प्रकार वह देगचून जो प्रस्फुरिकाम्लको एपस्थिति के कारण बुरा समझा जाता था, अब अधिक उपयोगी और लाभदायक बन गया। इस प्रकारके प्राप्त हुए मलमें कमी-कमी १२ भागसे देकर १३ भागतरु १०० भाग पोछे प्रस्फुरिफाम्ल पाया जाता है। यह पदार्थ यदि बारीक पीसा हुमा न हो सो पौधेकी जड़ें अधिक लाभ नहीं उठा सकतों क्योंकि इसको भेदन करना उनकी सामर्थ्यके चाहर होता है। मत जितना पारीक पीसा हुआ हो उतना ही अधिक उपयोगी होगा। हम नहीं कह सकने कि भारतवर्ष में जो कार्यालय देगचून फाममें लाते हैं उसमें प्रस्फुरिकाम्लको मात्रा होती है या नहीं और उसको इस कार्यके लिये पात सकते हैं या नहीं। आशा है, कार्यालयके कोई प्रमाधकर्चा इस ओर विशेष ध्यान देकर इस उप- योगो पदार्शकी ओर ध्यान देंगे। अधि सस्तेपन कारपा बेसिक स्लेग बहुत काममें लाया जाता है । । 7 प्रस्फुरिकको साद १०६ हा अतिरिक्त खेतों में प्रस्फुरिकाम्ल पहुचानेको ओर भी अनेक साद है, जैसे अनेक प्रकारको चट्टानों के पत्यरो में प्रस्फुरिकाम्लकी मात्रा पायो जाती है और इन पत्यरो को पूर्ण करये अथवा और सम्मेलनोंके साथ मिलाकर बाद के फोममें लाते हैं,परन्तु घेसिक स्लेग खया मुपापरफेसे कोई पदार्थ और अधिक उपयोगी नहीं पाया जाता। इस कारण और 'शादोभ वृत्तान्त यहां लिखना उपयोगी न होगा। पेवल यह धवा देना माश्या प्रतीत होता है कि अनेक कार्यालयों में जहां हरियो से सरेस पनात हैं वहां चूना डालकर जो पानी प्रशग किया जाता है, उसमें भी कभी कभी खासी माना प्रस्पुरिफाजकी मिल जाती है और यह सादा काम आ सकती है। भारतवपमे फोई ऐसा स्थान नहीं है जहासे घडी मानामें प्रस्फु रिकके पत्थर प्राप्त हो सकें। केवल त्रिचनापीमें पैरममाठर चालुके में खोदनेपर ऐसी मिट्टी प्राप्त होती है जिधमे कही कही ५६ भाग से ५६ मागत: १०० भाग पोछे प्रस्फुरिक मिलता है। हजारीयाग- और नेलोरमे भुइवल खोदते समय प्रस्फुरिक कुछ मात्रामे प्राप्त होता है, परन्तु वह किसी काम नहीं लाया जाता । विजगापट्टमी खानाम भी कुछ माना निकलती है, परन्तु इनकी उपयोगितापर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। . -- चतुर्थ अध्याय पुटाशकी खाद पुटाशकी साद ननजन तथा प्रस्फुरिकको सादोंकी अपेक्षा बहुत कम काममें लायी जाती है। इसका घडा कारण यह है कि स्वाभाविक रूपसेही खेतोंम पुटाशकी इतनी मात्रा उपस्थित है कि इसके डालनेकी आवश्यकता नहीं होती। हां, इतना आवश्यक होता है कि खेतोमें उपस्थित पुटाशको इस योग्य बनाया जाय कि वह पौधोंके काममें पा सके। इसके लिये अधिकतर नत्रित सोडेका प्रयोग किया जाता है, अर्थात् जिन खेतोंमें नत्रजनकी सादके लिये ननित सोडा काममें लाया जाता है, उनमें सोडा जो पौधोंके काममें नहीं पाता वह पुटाशको जलमें घुलने योग्य बना देता है। यद्यपि यह भी कहा जाता है कि पौधोंमें पुटाशके न मिलनेपर सोडेको काममें लानेका गुण होता है तथापि यह बात अभी तक प्रमाणित नहीं हो सकी है कि जिन खेतोंमें चिकनी मिट्टीकी माना काफी हो उनमें पुटाशकी पादकी भावश्यकता साधारणत नहीं होती, क्योंकि चिकनी मिट्टोमें प्राय पुटाश उपस्थित होता है। हां, रेसोले संतोंमें फभी कमी पुटाश डालना मावश्यक होता है। परीक्षा करके यह प्रमाणित किया गया है कि पुटाशी साद न फेवल इसलिये यावश्यक है कि पौधोंको उसकी आवश्यकता होती है, प्रत्युन इसलिये भी कि पोधो मे जो फार्चन अभिद्रवजन (Oorbohydrate) सम्बन्यो पुटाशको साइ पदार्थ नशाला, शकर मादि होते हैं यह फेवन पुटाशको उपस्थितिम हो यन सकते हैं। यदि किसी सेवमें पुटाश इस भवस्यामें मौजूद न हो कि पौधोके फाममें आ सके तो पौधों में इन पदायों की कमी होने के कारण पैदावार महत कम हो जायगी । इसी कारण जो नत्रजन एकत्रित करनेवाले जन्तु सेतोंमें काम करते हैं वह भी मर जाते हैं, क्योंकि उनको कावन अभिनित पदार्था को आवश्यकता होती है। यह परीक्षा करके देखा गया है कि माल गाजर आदिकी फसल जिनको नशास्ते तथा माठेको आवश्यकता होती है, पुटाशको अनु. पस्थितिमें बहुत कम होती है। यह भी कहा जाता है कि पुटाशक होते हुए सेवोंमें कोडे फम लगते हैं। इन बातों का क्या कारण है, मभीतक समझमे नहीं मावा परतु यह लाम जो ऊपर लिखे गये हैं होते अवश्य हैं। पुटाशकी खाद डालनेके लिये गंधित पुटाशको खाद डाली जाती है और इस अवस्थामें पुटाश पौधोंके तुरन्त काममें आता है । पुटाश एक ऐसा पदार्थ है जो बहुध कम मात्रामें पाया आता है और मम तक फेवल पौधोंको गससे प्राप्त किया जाता रहा है परन्तु रासका अधिक मात्रामें प्राप्त होना अत्यन्त दुष्कर है। खेतों में खाद के लिये रास डालनेका रिवाज बडा पुराना है, जैसा हम इस पुस्तकके प्रथम भागमें विस्तारपूर्वक लिन चुके हैं । पहाडोंमें जहां वनस्पति अधिक माजाम होती है और कभी कभी अनेक कारणो से पेड़ों को जलाया जाता है, वहांसे राख प्राप्त की जा सकती है अथवा माडो से जहां प जलाये जाते हैं, गख प्राप्त होती है मथवा नित्य प्रति घरों में ११२ + खाद - । लफडी जलानेसे जो राख प्राप्त होती है, काममें लायी जा सकती है। परन्तु कितनी मात्राम इस प्रकार राख प्राप्त होगी यह प्रत्यक्ष । है। भनित पुटाश अर्थात् शोरेको सेतो में डालनेसे भी पुटाश पहुच जाता है जिसका विस्तारपूर्वक वृतान्त प्रथम भागमें कह चुके हैं, परन्तु खाइके लिये एक प्रकारका छवण जिसमें पटाशकी मात्रा बहुत अधिक पायो आती है, जर्मनीसे प्राप्त होता है, स्ट्रेस- फोर्ड से थह पदार्थ बहुत बड़ी मात्रामें सोदकर निकाला जाता है और सादफे लिये काममें लाया जाता है। भारतवर्षमें भी सम्भव है ऐसा कोई खनिज पदार्थ हो जिससे पुटाश प्राप्त किया जा सके, पर इस ओर कुछ परिश्रम नहीं किया गया है । अनेक प्रकारकी चट्टा- भों में भी पुटाशकी मात्रा बहुय पायी जाती है, परन्तु उनसे पुटाशको इस रूपमें प्राप्त करने में कि वह पौधो के काममें आ सके, सफलता तो प्राप्त हुई है, परन्तु वह महगी पडतो है । मन अभीव इनको 'काममें नहीं लाया गया। अधिकतर ३ पदार्थ पुटाशके लिये काममें लाये जाते हैं। (१)गंधित पुटाश-यह अधिकतर जर्मनीमें बनाया जाता है और इसमें से ५१ भागतक पुगशको मात्रा १०० भाग पीछे होतो है। यह गन्धकाम्ल तथा पुटाशका सम्मेलन है। (२) हरिद पुटाश-इसमें भागसे ५५-भागतक २०० भाग पीछे पुटाश होता है। (३) गन्धित पुटाशमग्न-यह एक हम मूल्यपाला पदार्य है। इसमें २६ मागसे,२८ भागतक पुटाश होता है। H , पञ्चम अध्याय पाधाप र खादका प्रमाव हम यह बता चुके हैं कि प्रत्येक फसलके पश्चात् अनेक पदार्थों की पहुतसी माना सेतकी मिट्टी कम हो जाती है। हम उन पदायोको, जिनको पौधे हर साल खेतमसे निकालने हैं, यदि इसमें न डालें वो किसी दिन उन खेतोंको पज बहुत ही कम हो जायगी। उत्तम उपज प्राप्त करनेके लिये यह अत्यन्त मावश्यक है कि पौधो के लिये खेतमें भोजन प्रर्याप्त मात्रामें उपस्थित हो । यदि कोई एक पदार्थ भी, जिसकी पौधो को आवश्यकता हो, खेतोंमें मौजूद न हो तो पौधे न पढ सकेंगे और उपज बहुत ही कम हो जायगी, चाहे धाकी सप पदार्थ कितनी ही मात्रा क्यो न मौजद हो । प्रत्येक जातिके पौधोंको भिन्न-भिन्न प्रकारके पदार्थीको आवश्यकता होती है और इसी कारण यह सम्भव है कि एक फसल जिस खतम उत्तम हो सके दूसरी नैसी उत्तम न हो । होशियार किसानका यह काम है कि वह यह जाने कि कौन खेत किस फसल के योग्य है और उसमे किस जातिके पौधों का भोजन उपस्थित है। जो फसल हम बोना चाहते हैं यदि उसका भोजन खेतमें नहीं है तो हमार लिये यह आवश्यक होगा कि उस खेतमें जिन्सके लिये जो हम बोना चाहते हैं जिस वस्तुको कमी है, डालें। यही पदार्थ जो उस कमीको पूरा करने के लिये डाला जाय, खाद कहाता है। ।
११४ खाद हम बता चुके हैं कि किसी खेतमै समव है सबके सम द्रव्य जिनकी पौधोंको आवश्यकता है, मौजूद हों परन्तु वे इस अवस्थाम न हों कि पौधे जडी द्वारा उनको अपने काममें ला सके। मत कृपक- फा कर्तव्य है कि वह खेतमें जो पदार्थ इस योग्य न हो कि पौध उनको अपने काममें ला सकें, उन्हें इस योग्य बना दें कि वह पौधाके काम पा सके । जो पदार्थ वह सादके तौरपर खेतमें डालें, उनमे इस यातका ध्यान रखें कि मधिसे अधिक मात्रा भोजनकी उस रूपमें हो कि पौधे तुरन्त काममें ला सके। हम बता चुके हैं कि तीन पदाओं पौधोंके लिये सबसे उपयोगी हैं, और प्राय इन्हों वीन पदार्थों की यावश्यक्ता पौधों को हुआ करतो है । (१) नत्रजन () प्रस्फुरिक (३) पुराश । हमने इस भागमें तीनों प्रकारको खादो का जो सारमें यरतो जाती हैं, विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। अब हम पाठको को। यह बताना चाहते हैं कि किस प्रकारकी खादो का पौधो पर क्या प्रभाव होता है और उन पदार्थों की कमी सेतों में क्या हानि पहुचाती है। हमें विश्वास है कि यदि पाठकवृन्द इस घातको भली भानि समझ जायगे तो उनको बड़ा भारी लाभ होगा तथा ये खेतफे घढने पर या न बढनेपर अनुमान द्वारा यह पता लगा सकेंगे कि अमुक सेतमें अमुक पदार्थोकी आवश्यकता है। हम पहले नत्रभाकी सादोंका प्रभाव वठाते हैं। ननजनका पोधोंमें क्या काम है यह जानना पाठकोंको अत्यन्त आवश्यक है पत्ते, वने और जड़ें, यह सत्र माग नत्रजनसे ही पनते हैं, अव जिस सेवमें नत्रजनकी कमी होती है इस रोतके पौधोंक पचे कम ।
पौधो पर खादका प्रभाव होते हैं, पौधे कम बढ़ते हैं और वे सिकुडेसे दीख पड़ते हैं। नत्रजन- के अभावमें पौधेकी वाढ जाती रहती है। पुटाश अथवा प्रस्फुरिक तो तभी पौधेकै भोजनका काम दे सकता है अब पोधा बढता रहे। बहुतसे पौधोंमें तो प्रस्फुरिक बीज बनने के समय ही काममें आता है और इससे पहले बहुत थोडी मात्रा काममें आया करती है। जिन खेतोंमें नत्रगन की अधिकता होती है उनमें पौधे यहुत घढते हैं, पत्ते खूब लगते हैं, रंग हरा बना रहता है और खव भरा हुआ दोखता है। भूसेको माना बहुत होती है। बीजोंमे तथा गाजर मादिको जड़ोंमें नत्रजनका प्रभाव कम होता है, परन्तु पौधा पोजके योग्य हो सके उस अवस्या तक पहुचाने के लिये यह आवश्यक है कि पौधोंको नत्रजन पहुचाया जाय। नत्रजनक बहुत अधिक होनेका परिणाम यह भी हुआ करता है कि पौधे पकनेमें बहुत देर लेते हैं भोर देरतक हरे बने रहते हैं। पाठकोंने देखा होगा कि सेतोंमें, जिनमें खाद अधिक डाली जाती है, फसल दस्तक हरी बनी रहती है और ईख तो बहुत देरमें पकार इन योग्य होता है कि इससे गुड बनाया जा सका रस पडा पतला होता है, परन्तु सेत पहुत शीघ्र पहा पाता है। इस कारण मारम्भमें यह मावश्यक है कि तमें कुछ हो क्यों न पोया जाय, त्रजन सम्बन्धी साद डालो जाय । इसके डालनेसे पौध बहुत बढने लगेंगे और खेत पिना खादवाले खेतों की अपेक्षा एकदम आगे निकल जायगा। नत्र मनको खादके सातोंमें किसानको इसी कारण बडा धोखा हो जाया करता है कि वेसे खेतोंमें फसल सब रोताको अपेक्षा उत्तम दोस पड़ती है, परन्तु यदि इस सेतमें खाद अन्य पदार्थ न हों तो अन्नकी प्राप्ति और सोतोको अपेक्षा कम निक- लती है। किसी खेतमें भन्नकी अधिकता के लिये फेवल नत्रजन डालनेसे काम नहीं चलेगा, परन्तु जो पौधा अधिक नहीं बढा जिसकी जड़ें अधिक गहरो नहीं गयी, जिसके पत्ते चारों ओर वायुमें नहीं फैले, उसमें यह शक्ति नहीं हो सकती कि वह अधिक मात्रामें घोज घनानेवाले पदार्थीको खेतसे खींच सके। अत अधिक पोज होनेके लिये यह आवश्यक है कि पौधा खूब बडा हो चाहे बहुत बडे पौधेपर अधिक योजन पावें। इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि पौधोंके प्रारम्भमे नत्रजन काफी मात्रामें खेतमें पहुचायी जाय। खेतों में नजनको मात्रा इतनो अधिक नहीं होती कि फसल खुन हो सके। इन तीनों उपयोगी पदार्थों में नत्रजनकी मात्रा सेतोंमें सरसे कम पायी जाती है, और इसी कारण पौधोको अधिक मात्रामें पिना नत्रजन सम्बन्धी कोई साद डाले नहीं उपजाया जा सकता। प्रस्फुरिक और पुटाशफी मात्रा नत्रजनकी अपेक्षा अधिक होती है। अत्त यह देखा गया है कि केवल नत्र जन-सम्वन्धी खादोंके डालनेसे ग्सेतोंकी पैदावार बढ गयी है । विशेप कर पुटाशकी तो बहुत ही कम खेतोंमें आवश्यकता होती है । प्रस्फुरिक और नत्रजन सम्बन्धी खाद खेतो में डालनेसे प्राय सभी खेतो की पदावार पहुत बढ जाया करती है। नत्रजनसम्बन्धी सादके डारनेका यह परिणाम वो तुरन्त होता है कि फसल एकदम बढ़ने लग जाती है, खेतपर रौनक आती है और खेतकी फसलमें पासवाले खेतसे जिसमे कोई साद न डाली गयी हो, रिशेपना दीस पडती है। 3.
जिन सेतोंमें नत्रजन सम्बन्धी खाद बहुत अधिक मात्रामें डाली जाती है उनकी फसल बडी खराब होती है। उनके भूसेकी मात्रा अन्नकी अपेक्षा बहुत बढ़ जाता है और अन्न भी उत्तम कोटिका प्राप्त नहीं होता। यदि गेहूंके किसी खेतमें नजन-सम्बन्धों खाद बहुत अधिक डाल दी जाय तो जो अन्न उत्पन्न होगा उसकी रोटीमें लोच बहुत कम होगा, पाटा फुसफुसा होगा, बोममे गेहू और गेहुओ की अपेक्षा कम होगा। पाठकका शायद यह सयाल हो कि सेतसे अधिकसे अधिक अन्न साद डालकर निकाला जा सकता है अर्थात् यह मनुष्यके अधीन है कि वह संतमें चाहे जितना अन्न उत्पन्न कर सके। परन्तु यह पात गलत है। यह ठीक है कि खाद डालनेसे उपजकी मात्रा बहुत बढ जाती है, परन्तु यदि साद डालते ही चले जाय तो एक अवस्था ऐसी माती है कि अधिक खाद डालने से अन्नको मात्रा सादकी लागतकी अपेक्षा बहुत ही कम बैठनी है और सादके दाम भी भली भांति प्राप्त नहीं होते। केवल मान सम्बन्धो खादोंके विषयमें ठीक है। चाहे फिसो जातिकी साद क्यो न हो वह कुछ मात्रातक खेतकी उपज बहुत चढाती है, फिर एक अवस्था ऐसी आ जाती है कि अधिक साद डालनेसे उपजको मात्रामे बहुत हो न्यून अन्तर पड़ता है और सादके दाम भी ठोक तौरपर याप्त नही होते। कृपकका कर्तव्य है कि खेतो में खाद डालने समय इस बातका भी भली भांति ध्यान रपरो। यह बात कि खेतमे कौन खाद कितनी डाली जाय, बड़ा कठिन प्रश्न है, क्योंकि प्रत्येक जातिके सेतको सामर्थ्य तथा प्रत्येक यह सिद्धान्त ११८ पौधेकी आवश्यकता ऋतु, देश, काळ प्रादिपर निर्भर है। ये सब बातें केवल अनुभव द्वारा हो जानी जाती हैं और कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं बताया जा सकता। यदि किसी खेतमें नत्रजनकी खाद बिलकुल न दी जाय और उस स्तमें नत्रजन न हो तो उस स्खेतके पौधो के पत्ते शीघ्र ही पीले होकर गिरने लगते हैं। नत्रजनवाले खेत के पत्ते देरतक हरे. भरे बने रहते हैं। परन्तु जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं अधिक ननजनकी साद डालनेसे अन्नमें भेद पड़ता है तथा माय भी कम होती जाती है, परन्तु इसके तिक्त सबसे बड़ी हानि अधिक नमजाकी साद ढालनेसे यह होती है किस खेतमें कीड मधिक लगते हैं। परीक्षा फाके देखा गया है कि जिन खेतो में नगगनकी साद अधिक मात्रामे डाला गयो, उन खेतों में कोड़े अधिक लगे, जिनमे खाद साधारण मात्रामे डाली गयी, उनमें कीडा मिलकुल ही नहीं लगा। मत. नत्रजनकी अधिकतासे घडी हानि होती है। नत्रजनकी खादोंमें यह अवगुण क्यों है इसकी बहुन विवेचना की गयी है, परन्तु अनसक जो परिणाम निकला है वह यह है कि ननजनकी सादको अधिक मात्रामे डालनेक कारण पत्ते लम्बे और चौडे होते हैं। पौधेकी टहनियोंके जोड घहुन दूरपर होते हैं, पत्ते तथा विनफेमे रिना खादवाले खेतकी अपेक्षा शक्ति कम पायी जाती है। इसका स्पष्ट प्रमाण यह भी है कि यदि गोभी आदि भाजियों को अधिक साद देकर पैदा किया जाय जो षड़ी सुन्दर दीख पड़ेंगी, परन्तु यदि उनको फाटकर रख छोडे सो वह शीघ्र ही बिगह जायंगी। गांवमें जहाँ पाद तथा - ।
भामा बहुत कम मानामें डाली जाती है भाजियां देरतक रखी जा सकती हैं, परन्तु शहरको मामिया जिनमे साद बहुत अधिक पडती है, देर. तक नहीं रह सकती। अस पौधेको इस निर्मलता के कारण कोडोंका प्रभाव अधिक पड़ता है। यह भी कहा जाता है कि सेतों में नाजनके अधिक डारनेसे पत्तोंको बनावट कुछ ऐसी हो जाती है कि फोड़े उसपर अधिक जीवित रहते हैं। कौन साद फिस खेतमें अधिक उपयोगी होगी, यह बड़ा अटिल प्रश्न है। इसका सत्तर हम स्थान स्थानपर देंगे और हमने अनेक स्थोंपर इस यातकी व्याख्या की भी है। पहतसे लोगोंका यह विचार है कि यहुतसे पौधोंको एक प्रकारफी सादकी, बहुतसे पोधोंको दूसरे प्रकारको सादोंकी आवश्यकता हुआ करती है। पदाहरणके लिये गेहूको नाजनकी सादको अधिक आवश्यम्ता होती है और यदि पुटाश तथा प्रस्फुरिक सम्बन्धी साद न भी डाली जाय तो पौधे इन दोनों पदार्थोंको सेतसे स्वय प्राप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार जोफे लिये प्रस्फुरिककी सादी अधिक आवश्यकता होती है, इसका पड़ा कारण यह भी दीख पड़ता है कि जौको जहें गेहू के समान गहरी नहीं जाती और जिस प्रकार गेहू दूर दूरसे अपने लिये भोजन ढूंढ लेना है, जो नहीं दूर सकता। इसी प्रकार यह बात बहुतसी खादोंके प्रभावपर भी निर्भर है। गन्धित एमोनिया उन खेतोंमे अधिक उपयोगी होगा जिन खेतोंमें चूना पहलेसे मौजूद है, नहीं तो वह सेको सट्टा कर देगा। गेहूं के लिये नत्रित सोडा गन्धित एमोनियाकी अपेक्षा १२० खाद अधिक उपयोगी पाया गया है। सम्भव है इसका यह कारण हो फि नत्रित सोडेके डालनेसे प्रस्फुरिक तथा पुटाश जो खेतमें उप स्थित होता है वह इस अवस्था में हो जाता है कि पोधों के काम आ सके। गन्धित एमोनियामें १०० भाग पीछे २० भाग नवजन होता है, परन्तु नत्रित सोडेमें केवल १०० भाग पीछे १८ भाग नत्रजन होना है। इसलिये नत्रजनकी अपेक्षा ननित सोडे और गन्धित एमोनियामें ३ ४ का सम्बन्ध है। यदि किस खेतमें चूनेकी मात्रा काफी हो जिनमे गन्धित एमोनियाका तेजाब हानिकारक हो सके तो नत्रित सोडेको उसी समय प्रयोग परो कि वह ३४ दामोंमें मिल सके। यदि नत्रित सोडा ६) मन मिलना हो तो गन्धित एमोनियाके दाम 5) मन तक दिये जानेमें कोई हानि नहीं है । जौके खेतोंमें गन्धित ऐमोनियाके डालनेसे उत्तम कोटिका जो उत्पन्न होता है। हलके रोसले खेतोंमें भी गन्धित एमोनियाका डालना सबसे अच्छा माल्लम होता है, यदि इनमें कार्बनित चूनेफी.मात्रा कापी मौजूद हो। उत्तमता प्रतीत होती है कि दोनों प्रकारफी सादोंको मिलाफर डाला जाय, क्योंकि नत्रित सोडेके डालनेका परिणाम यह होगा कि पौधोंको तुरन्त नत्रजन मिल सकेगा तथा गन्धित एमोनिया पीछे देरतफ नत्रजन देता रह सकेगा। नत्रित सोडेमें जो अवगुण खेतोंमें अधिक क्षार उत्पन्न करनेका है यह गन्धित एमोनिया फे टाल्नेसे जाता रहेगा और गन्धित एमोनियामें जो अम्लके पहुचाने- का अवणुण है वह ननित सोडा दूर कर देगा। नत्रित सोडा तथा गन्धित एमोनियाको इस कारण काममे लाया पधिर्धापर सादका प्रभाव १२ जाता है कि इनके डालनेका फसलपर तुरन्त प्रभाव पड़ता है और पौधे वढने आरम्भ हो जाते हैं। और जितनी सादे है उनके डालनेका प्रभाव देरमें होता है और कभी-कभी तो पूरा प्रभाव पड़नेमे कई पं लग जाते हैं। अत अन्य खादोपर जितनी लागत आती है वह देरमें वसूल होती है और इस कारण यह खाद अन्य खादोको अपेक्षा सस्तो पडती है। एक और अवगुण इन कृतिम अथवा वैज्ञानिक सादोंमे यह है, जिसका विचार कृपकोंको करना चाहिये किं वैज्ञानिक खादोंके लगातार डालनेसे यदि गोबर आदिको खाद बिलकुल न डाली जाय तो खेतोंकी अवस्था बिगडती चली जाती है, उनमें ऐन्द्रिक भागको कमी होने लगती है और खेतो में मुलायमियत आनी फठिन होती है। विशेषकर ऐसे देशो में जहा जलके लिये फेवल वर्षाको बाट जोहनी पडे । वैज्ञानिक खाद अधिक उपयोगी नहीं होती। देश गया है कि जिन खेतोंमें वैज्ञानिक साद ही डाली जाती रही हो उनमे सूखेको गेकनेका गुण जाता रहता है, इन खेनोंमे यदि भल ठीक समयपर न पहुचे तो वह जल जाते हैं। इसी प्रकार ऋतुक हेर फेरका बड़ा भारी प्रभाव इन सेतोपर हुआ करता है। सम्भव है, इसी कारण हमारे देशमे फेवल गोवरकी खाद डालने का ही रिवाज हो और अन्य खादोंकी ओर विशेष परिश्रम न किया गया हो। विशेषकर उस समय जप कि भारत- वपसे अन्न, इलियां आदि बहुत कम बाहर जाती थीं। और जमीन अधिक और मनुष्यसख्या कम थी। दोनों पातोके लिहाज- से अर्थात नत्रजन भा सेतोंको मिल सके और ऐन्द्रिक पदार्थ भी । 1 १२२ - स्वाद प्राप्त हो, खलीकी खाद बडी उपयोगी है। क्योंकि इसमें जितना नाजन होता है उसका ७१ भाग १०० माग पीछे उसी वर्षकी फसलके काम मा जाता है। और खेतोंम ऐन्द्रिक भाग भी बना। रहता है। किसानो को सचित है कि सलीकी खादकी ओर विशेष रुचि करें। खासकर रेडी और नीमकी सलीको मोर विशेष ध्यान देनेकी मारश्यकता है, क्योंकि ये सलियां सस्ती मिल सकती और ढोरों के सानेके काम में भी नहीं पाती। प्रस्फुरिककी साद नत्रजनकी सादो के विरुद्ध खेतो को शीघ्र पकानेमें सहायता देती है अर्थात् यदि किसी सेतमें नजनकी साद डालें तो फसळ देरमें पकेगी, परन्तु यदि प्रस्फुरिफली खाद डालें तो यह शीघ्र पफ जायगो। जिस प्रकार नत्रजनको खादों का प्रभाव पौधोंके पत्ते और तनेपर पड़ता है प्रस्फुरिकका प्रभाव पौधोंक यीजों पर पड़ता है। कभी २ वो प्रस्फुरिफकी खादोकी फसल एक सप्ताहसे पहले भी पककर तैयार हो जाता है और पत्तोंकी मात्रा भी अधिक प्राप्त होती है। यदि किसी सेतमें स्त्रमनको खाद डाली जाय तो पौधोंमें पाल, फूल और फल देरमें भावेंगे और यदि प्रस्फुरिककी खाद डाली जाय तो फल, फूल और घाल शीघ्रतासे पाती है। नत्र- जनको सादोंके डालनेसे योजों की मात्रा भूसकी मात्रासे बहुत कम हो जाती है। परन्तु प्रस्फुरिकको खाद डालनेसे पीजोंकी मात्रा भूसेकी अपेक्षा वढ जाती है। पर्यात् नत्रजन भूसा बढ़ाता है और प्रस्फुरिक अन्नको बढ़ाता है । कृषकका फतव्य है कि अन्न अधिक करनेके लिये वह प्रस्फुरिककी साद अधिक डाले। यह भी देखा गया ।
पाषा पर सादका प्रमाव १२३ है कि ईखके जिन खेतोंमें प्रस्फुरिकको खाद डाली गयी है उनमें माल अधिक बैठना है अर्थात् एक कूडी रसमें गुड़की मात्रा बिना प्रस्फुरिकको खादवाले खेतको अपेक्षा फहीं अधिक होती है । गन्ना प्रस्फुरिककी सादसे अधिक मीठा हो जाता है और रस गाढा हो जाता है । इसके विरुद्ध नत्रजनको खादसे ग्वेतोंमे ईख बहुम बढती है, परन्तु उसका रस फोका और पतला होता है यद्यपि रसकी मात्रा भविक होती है। यदि नत्रजनकी सादकी ईससे राब बनाकर खांड बनायी जाय तो उसमें दानेको माना बहुत कम होगी। जिन खेतोंमे प्रस्फुरिकको साद डाली जाती है उनमें पौधों की जडें अधिक फैलती और गहरी जाती हैं, इसलिये फमलपर अनावृष्टि का प्रभाव कम पड़ता है और सूग्वे के दिनोंमें भी खेती जैसी की-तैसी ही बनी रहती है। देखा गया है कि जिन देशों में अधिक गरमी पडती है वहां प्रस्फुरिक- की साद अधिक उपयोगी पायी गयी है। जौके खेतोंमें साधा- रणत जडें कम और थोडी दूर तक गहरी जाती हैं। परन्तु जन प्रस्फुरिफकी खाद डाली जाती है तो अडें अधिक फैलती और गहरी जाती हैं । सेा सुपरफास्फेटके डालनेका परिणाम यह होता है कि वह ग्वेतमें उपस्थित कावनित चूनके साथ जा मिलता है और उसका प्रस्फुरिकाम्ल अलग होकर पोधो के काम आ जाता है। यदि किसी सेतमें कर्वनित चूना उपस्थित न हो, खेतमें तेजोरकी अधिकता हो अथवा किसी खेतमें गन्धित एमोनियाके डालनेक कारण बट्टापन घट गया हो, तो सुपरफास्फेट खेतको मिट्टी में उपस्थित लोहे या चिकनी मिट्टीमें उपस्थित एमोनियाके साथ मिल जाता है। उस अवस्थामें १२४ खाद , प्रस्फुरिकाम्ल खेतोंके काममें नहीं आ सकता । ऐसे खेतों में जिनमें कार्यनित चूना मौजूद न हो सुपरफास्फेटका डालना अधिक उपयोगी नहीं हो सकता । यदि सुपरफास्फेटको किसी खेतमें डाला जाय तो नत्रित मोडेके समान यह पानीमें घुलकर नीचे नहीं जा रहता, प्रत्युत पोधेके फाममें आने योग्य बना रहता है। अत. यदि इसको बीजोंके बोनेके साथ ही खेतमें डाल दिया जाय तो कोई हानि नहीं है। बहुत से किसानों का ख्याल है कि प्रस्फरिकाम्ल साद पानी में घुलकर नीचे चली जाती है और पौधोंकी जडोंसे इतनी दूर जा रहती है कि पोधे उसको अपनी जड़ों द्वारा सींचनेमें असमर्थ हो जाते हैं और कुछ उपयोग नहीं उठा सकते, परन्तु यह यात ठीक नहीं प्रतीत होतो । खेतोंमें सुपरफास्फेटकी खाद यदि फसल घोते ही डाल दी जाय तो भो कोई हानि नहीं, प्रत्युत प्रारम्भमें जो पौधे प्रस्फुरि- फाम्ल चाहते हैं उनको बड़ा लाभ होगा। सुपरफास्फेटका अधिक उपयोगी होना इस वातपर भी निर्भर है कि वह खूप पारीक पिसा हुआ हो, क्योकि यारोक होने की अवस्थामें ही खाद खेतोंके लिये अधिक उपयोगी हो सकेगी। पौधोंके छोटेपनकी अवस्थामें ही खाद- का डालना अधिक उपयोगी पाया गया है। हम ऊपर बता चुके हैं कि सुपरफास्फेटकी खाद उन खेतों के लिये अधिक उपयोगी नहीं हो सकती जिनमें कार्यनित चूनेको मात्रा उपस्थित न हो, परन्तु ऐसे सेतोंमें Basic slage खाद बडी उप- योगी पायी गयी है क्योंकि उसमें चनेको मात्रा उपस्थित होती है और सुपरफास्फेट डाजनेसे जो प्रस्फुरिक लोई अथवा एलोमी- पौधो पर खादका प्रभाव १२५ नियमसे मिलकर ऐसे रूपमें परिणत हो जानेका जो मय होता है कि पोधेकी जडे उसको घोल न सके, वह जाता रहता है। बेसिक स्लेग सुपरफास्फेटको अपेक्षा सस्ता भी होता है। अत मारी खेतोंमे सर्वा सिक स्लेग ही फाममें लाना उचित है। चेसिक स्लेगके पेतोंमें डालनेसे पुटाश भी, जो ऐसी अवस्था में होता है कि रोतोंमें पौधोंके काम न मा सक, चूनेसे मिल पौधोंके योग्य हो जाता है। इसलिये किसानों को याद रखना चाहिये कि जिन सेतोंमें फफरीली मिट्टी हो और चूनेकी मात्रा भधिक हो उनमें सर्वदा सुपरफास्फेट काममे लावें जिनमे धुनेको कमो हो, उनमें सदा येसिष्ठ स्लेग यरते । ख? सेतों में भी सुपरफास्फेटका प्रयोग न कर बेसिक स्लेग हा बरतना चाहिये । जिन स्तोंमें कायनित चूनेकी मात्रा कम हो उनमें यदि सुपरफास्फेट हो डालना पड़े तो सबदा नीचे लिखा प्रयोग फाममें लाना उचित है । २ भाग सुपरफास्फेट लेकर उसमें एक भाग हाड़ियोंका धारीक पीसा हुमा चरा चाहे यह दहियोंको गरमी देकर चिकनाई दूर की हुई हो या न हो, एक भाग पैसिक स्लेग मिलाकर एक जगह ढेर लगा दो। इस प्रकार पडे रहनेसे और सुपरफास्फेटफा प्रभाव पड़नेसे दोनों पदार्थीका एक सम्मेलन धन आयगा और एक प्रकारके डलेसे प्राप्त होंगे, इनको मु गरियोंसे तोड़कर बारीक कर लो और खेतोंमें डाल दो। यह दोनों मिले हुए पदार्थ सब प्रकारके खेतोंमें विकिसी भयके डाले जा सकते हैं। इड़ियों के चूरेको यदि साधारण रूपसे विश्लेषण करके देखें वो पता लगेगा कि उसमें प्रस्फुरिकाम्ल बड़ी मात्रामें उपस्थित है परन्तु 1 खाद ॥ खेतमे डालें तो इतना उपयोगी नहीं प्रतीत होता । इसका कारण हम प्रथम भागमें लिस चुके हैं। यहां हम फिर घताना चाहते हैं कि हाट- योंमें प्रस्फुरिककी मात्रा इस अवस्थामें नहीं होती कि पोधा उसका अपने काममें ला सके। पौधेकी जडो में जो पदार्थीको अलमें घुलने योग्य घना दनेका गुण है उसका प्रभार हड्डियोपर बहुत ही कम पड़ता है और इस कारण हडियो में उपस्थित प्रस्फुरिक वर्षीक बाद पौषो के काम आता है। हाल्यो का विश्लेषण करनेसे प्रस्फुरिककी सब मात्रा मालूम हो जाती है, परन्तु बहुत कम भाग इसका पौधों के फाममे आ सकता है, इसलिये विश्लेपणसे धोखा नहीं साना चाहिये। हम पता चुके हैं कि जिन हडियो को गरमी देकर उनको चिकनाई अलग कर लो गयो है उनका पीसना सुगम होता है और वारीफ की जा सकती है। हड्डियोंका चूरा जितना पारीक होगा उतना ही पौधोंकी जडे अधिक प्रभाव डाल सकेंगी। किसानोंका यह विचार है कि यदि हड़ियोंको गरमो देकर पोसा जायगा तो उनमें नत्रजनको माना कम हो जायगी । यह विलकुल ठीक है और इसमें सन्देह नहीं दोसस्ता कि इस प्रकार ननजनको माना कम हो जायगी, परन्तु हदियों में प्रथम तो नत्रजन की मात्रा होतो ही बहुत है, द्वितीय मह इस अवस्थामें होती है कि पौधे उससे अधिक लाभ नहीं उठा सकते। मत यदि हड्डियों को बिना गरम किये भी खेत में डाल दिया जाय तो नत्रजनसे पौधे अधिक लाभ न सठा सकेंगे। हां, चिकनाईके उपस्थित रहनेसे चूरा पारीक न हो सकेगा और इस कारण पौधे चुरेसे प्रस्फु- रिफ भी कम प्राप्त कर सकेंगे। किसानोंको जितना हड़ियों का चूरा । - पोधो पर खादा प्रभाव १२७ अधिक पारीफ मिलेगा यह सतोंमें उतना ही शीघ्र प्रभाव दिखा सगा। इसके अतिरिक्त सनिज स्वार, जिनमें स्वाभाविक रूपसे प्रस्फुरिकको मात्रा पायी जाती है, सेतोंमें बड़ी उपयोगी होती है और यदि सस्तो मिल सके और बहुत पारीक पीसकर काममें लायो जाय सो पड़ा काम होगा। पुटाशका सेतो में क्या उपयोग होता है यह हम भली भांति पुटाश-सम्बन्धी सादो के अन्तर्गत लिख चुके हैं, उन सपका यहां दोहराना निरर्थक है । पेवल एक यात फिर लिख देना पयाप्त होगा कि पौधों में पुटाशकी उपस्थितिम दो नशास्ता और चीनी होती है और इसकी अनुपस्थिति में यह पदार्थ नहीं पढ़ते । खेतमें तीनो पदा योकी उपस्थिति में हो पौधोंश जीवन सभव है। यह ठोक है कि किसोयो एक पदाथकी, किसी पौधेको दो पदार्थोकी और किसीको चीनों की अधिक आवश्यकता क्षेती है। योग्य किसानफा यार्सष्य है कि बद आते कि अमुफ फसलके बोनके लिये अमुक पदार्थकी, अमुक मानामें, समुफ समयमे डालना चाहिये। यह पात परीक्षा और अनुभवपर ही निर्भर है। इसके लिये विशेष रूपसे कोई निश्चित नियम नहीं बताया जा सकता।
- तीसरा भाग किस फसल में क्या खाद डालनी चाहिये । हमने प्रथम भागमें उन सादोंका जो साधारण तरहसे कृपकों- फो प्राप्य हैं, दूसरे भागमें उन वैज्ञानिक खादोंका, जिनका प्राय हमारे देश में प्रभाव है, हाल लिखा है। पाठकोको दोनो माग पढने के पाद बहुतसे सिद्धान्त जिनके आधारपर खाद बनायो जाती है, मालम हो जायगे तथा वह स्वय भी विचार कर सकेंगे कि फोन साद किस खसमें डाली जाय । हम बतला चके हैं कि फौन खाद किस खेतमें किस फसल के लिये डाली जानी चाहिये । यह यडा जटिल प्रश्न है और कृपकको इस बात के निश्चयमें बड़ी योग्यताको आवश्यकता है । तथापि हम एक और चातकी ओर पाठको का ध्यान दिलाना चाहते है। कौनसी खाद किस खेतमे किस फसलके लिये डालनेपर अधिक उपज देगी केवल यही बात कृपकको जाननो आवश्यक नहीं है, वल्कि उसको यह भी जानना चाहिये कि कौन खाद उसको अपने खेतमें डालनेके लिये किस भाव मिल सकेगी और उसके डालनेसे कितनी अधिक उपज होनेकी समावना है। उदाहरणके लिये यदि किसी खेतमें १०) की स्वाद डालनेसे ए) को उपज बढ जायगी तो वह कृपक यह वो अवश्य कह सकेगा कि उसने दुसरे कृषको.
4 किस फसल में क्या खाद डालनी चाहिये १२६ की अपेक्षा अधिक उपज करके दिखला दो, परन्तु हिसाब लगानेसे उसे १) का घाटा रहा । यदि उस खादके डालने का प्रभाव भागामी वपमे भो हो तब तो वह भी लाभ हिसायमें लगाना होगा । मर्यात कृषकका यह कर्तव्य है कि वह देखे कि अमुक खाद रे डालनेमें क्या लागत आवेगी, उस खादका प्रमान खेतकी दशापर भागामो फसलों की अपेक्षा कैसा होगा ? जो फसल अधिक पैदा होगी उससे कितनी लागत वसूल हो सकेगी? वस्तुत बहुतसी बातों को ध्यानमें लाकर ही कृषकको कोई साद काममें लानी चाहिये, अन्यथा यह सम्भन है कि वह कृषक अधिक वस्तु पैदा करे मोर फिर भी उसको हानि ठानी पड़े। यह सर लेखा इस पुस्तक के लिहाजसे बड़ा गूढ है और केवल अनुभर ही इसको अधिक सिखा सकता है। हमने फेवल पाठकोके विनोदार्थ उनका ध्यान इस ओर लगानेका प्रयत्ल किया है कि ये केवल यह पढकर कि अमुक साद अमुक फसलमें अमुक स्थानपर डाली गयी और उसने इतनी अधिक उपज कर दी, इस प्रकारकी बातोंसे धोसेमें ना जाय,बल्कि उस स्थानकी सारी बातोंको विचार फर अपने प्रान्त, खेत, भाव आदिका विचार कर उन खादोंको काममें लाने यान लाने का विचार करे । हम इस भागमें भिन्न भिन्न फसलोंके लिये फिन किन खादोंको काममें लाया जाय, इसका विचार करेगे। आशा है कि पाठक उससे लाभ उठावेंगे। हमने जो कुछ इस भागमें लिखा है वह कोई पेटेण्ट नुसखे न समझने चाहिये किमास यन्दकर इन खादोंको खेतमें डाल दिया जाय और यह परवाह न की जाय कि हमारे खेतके लिहाजसे ६ खाद " वह कदतिक उपयोगी होगी। हमारे पताये हुए नुसखो अथवा विशेष बाद इस भागमें केवल पथदर्शकका काम दे सकेंगी। पाठक स्वयं अपने खेतों माविका विचार करके उनमें न्यूनाधिकता कर सकते हैं । जो कुछ हमने इस पुस्तकमे लिखा है वह बड़े बड़े अनु- भत्री पुरुषों की प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुस्तकों तथा लोगों के मनुभवके अधार- पर लिखा है, परन्तु तो भी प्रत्येक मनुष्य को अपने लिहाजसे उनका उपयोग करना चाहिये । हमने अनेक फल जो अनेक स्थलोंपर अनेक खादोंके डालनेसे प्राप्त किये गये हैं जान घूमकर नहीं लिसे हैं । यदि हमारे कृपक भी इसने योग्य हो जाय कि सदा फलको निकालकर अपने लिये कोई सिद्धान्त निश्चित कर सकें तो हम ऐसा करते । यदि हम, इस समय पाठको का अनेक सादो का जो परिणाम अमुक स्थलों- पर हुमा है लिप देते तो हमें पूर्ण विश्वास है कि पाठकवृन्द मात्र बन्दकर पराक्षा आरम्भ कर देते और सम्भन है कि वे देश, काल और अवस्थाके भिन्न होनेसे ठीक न निकलते वो कितना भपकार होता? मत पाठकगण हमें ऐसा न करने के लिये क्षमा करेंगे। यदि पाठकोने इस पुस्तकको लाभकारी समझा तो हमारा विचार है किसी अन्य पुस्समें इनका पूरा-पूरा हाल लिखेंगे। इस समय हम अपने दायित्वको समझकर पाठकों को एक बार फिर यह याद कराना चाहते हैं कि व वल किसी स्थानविशेषकी खादक परिणामको जानकर माखे बन्द कर उसक प्रयोग करने का प्रयत्न न करें,बल्कि यह इसे कि वह परीक्षण जिसपर लटू होकर वह अनुकरण करने लगे हैं किस स्थानपर किया गया है, वहांको भावहवा फैसी है, ऋतुझा प्रभाव क्या है, जिस न - - सेपरकिया गया है ससको रासायनिक नया मोविक स्थिति फेसी है, इत्यादि पातोंका ध्यान कर अपनी दशा, देश, काल, खेतकी दशा तथा खादयो मुल्य मादिपर विचार करफे परीक्षण करना चाहिये। यदि ऐसा न किया गया वो सम्भव है कि हमको लाभफे स्थानमें हानि उठानी पटे। पाठको का कर्तव्य है कि यह इस पुस्तकमें जो सिद्धान्त यताये गये हैं माद्योपांत उनको चित्तमें रखकर काम , तमी पूर्ण लाभ एठा सकेंगे। हमने जो खाद विशेष विशेष फसलोंके लिये पवनायी है, उनके अधिक उपयोगी होनेके कारण भी लिग्ये हैं, पाठ- को को चाहिये कि वे अपने खेतो के लिहाजसे उसपर विचार करके काममें लावें। नीचे इस भागके अन्तर्गत हमने थोडीसी फसलोंका हाल लिया है क्योंकि अबका हाल लिखना इस छोटीसी पुस्तकों असम्भव था। तयापि जितनी फसलं सघारणत हमार देशमे कृषक मोते हैं उन सभीका विचार किया गया है। अन्य फसलोंके लिये पाठक इसी प्रकार स्वय निश्चय कर सकेंगे। गेहू गेह पड़ी मावश्यक फसल है। भारतवर्ष में बहुध दिनो से यह मन्त बोया जाता है। हमको केवल इसकी खाइके विषयसे इस पुस्तफ- में प्रयोजन है।हम यहां इस फसल अथवा किसी अन्य फसल के निपय- मे यह नहीं बतायेंगे कि वह किस प्रकार वोयी जाय, क्योंकि यह विषयान्तरमें जाना होगा। हम यहां केवल इतना पताधंगे कि इसको कोन खाद अधिक उपयोगी होगी। यदि १०० सेर गेहू लेकर उसको जलावे तो २ सेर राख प्राप्त २३२ खाद होती है, इसी प्रकार १०० सेर भूसा जलानेसे ३ सेर ओर अन्नका छिलका फेवल १०० सेर जलानेले ७ सेर राख्न प्राप्त होती है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मन्नके छिमें सबसे अधिक मात्रा खनिज पदार्थोकी होती है । यदि १०० सेर गखका विश्लेषण किया जाय तो निम्नलिखित प्रकारसे भिन्न भिन्न तत्वों की मात्रा पायी जायगी। मनके छिल- खानिज पदार्थोके नाम भूसेकी रास अन्नकी राख केिको राख सिलीका प्रस्फुरिकाम्ल ८१.२२ ४.३१ ४३६८ ५२४ ४४५ गन्धकाम्ल . ६२४ चूना मत १.२७ लोहा २६ २६ पुटाश १९७८ ३४५१ सोडा ऊपरकी सारणीके देखनेसे पता लगता है कि खनिज पदायोंमें सिलीका तथा पुटाश पौधो को अत्यन्त आवश्यक होता है और मन्न बनते समय प्रस्फुरिफाम्लकी यही मावश्यकता होती है, मत यह तीनों पदार्थ खेसमें प्रर्याप्त मात्रामें होने योग्य हैं। हम पता चुके हैं कि पुटाश काफी मात्रामें खेतोंमें साधारणत पाया जाता है। यदि किसी खेसमें न हो तो राख,गन्धित पुटाश मादि + । गेहू कोई खाद डालनी चाहिये । सिलीका यह पदार्थ है जिसको साधारण परिभाषामें रेत कह सकते हैं। जिन सेतो में रेतकी मात्रा कम होती है जेसे डाकर या चिफनौट सेव,उनमें गेहूं कम पैदा होगा। रोसली जमीन इस कार्य के लिये अधिक उत्तम होगी, क्यो कि साधारणतः चिकनोट मिट्टोमें पुटाश अधिक पाया जायगा,परन्तु सिलोका बहुत कम होगी और रेतीले खेतों में सिनीका अधिक और पुटाश कम होगा। परन्तु रोसळे खेतो में दोनों पदार्थो को आवश्यकता होगी। क्योंकि गेहूंके निये चूना भी आवश्यक है मत जिन खेतो मे चूनेको माना काफी होगी उनमें पुटाश और सिलीका इस रूपमें हो जायगा कि वह पौधे के काम आ सके । अन खेतो में चूना फेवल इस कारणले कि गेहको उसकी आवश्यकता होगी न रहना पाहिये, यहिक इसलिये भी खेतो में डालनेसे अन्य पदार्थ पुटाश सिलीका आदि पानीमें घुलने- की अवस्या आ जाते हैं, होना मावश्यक है। इसलिये गेहू के खेतो में कभी कभी चूना डालते रहना चाहिये। ऊपरको धारणीसे खनिज पदार्थो का पता चलता है, परन्तु नत्रजनकी मात्राका पता नहीं चलता। हम नीचे सब पदार्थोकी एक एकडको माना जो एक फसल से प्रतिवर्ष गेहू पोनेसे निकल जाती है, लिखते हैं । इस मात्रामें देश- कालके अनुसार कुछ परिवतन होना सम्भव है। अनुमानके लिये पाठको को यह प्रर्याप्त होगा ! फसलकी न्यूनाधिपता- के लिहाजसे इन मायामो में अन्तर पड़ सकता है, जो पाठक स्वय हिसाब करके निकाल सकते हैं। एक एकडमें १८०० पौंड अर्थात् २२॥ मन अन्नकी पदवारके लगभग मानकर यह हिसाप लगाया गया तथापि साधारण १३४ साद । . है। यदि उपन न्यूनाधिक हो तो उस हिसाबसे सम पदार्थोंमें न्यूना- धिता करनी होगी। इच प्रकार नत्रजन भी ५० पौड एक फसलमें गेहू के सेतको भावश्यक होता है, जिसके लिये नत्रजन-सम्बन्धी कोई खाद भी डालनी होगी। नत्रजन-सम्मन्धी खाद डालनेका अथवा अन्य साद डालनेका अधिक लाभ उन्हीं खेतोंको हो सकता है जिनमें पानी दिया जा सके। नत्रजन सम्बन्धी अथवा अन्य खाद डालनेका कोई भी परिणाम न होगा यदि खेतमें जल न दिया जा सके। हमारे देशमें सिचाईका बहुत कम प्रबन्ध है और प्राय. अन्नकी फसलों को बहुत ही कम पानी दिया जाता है। यही कारण है कि गेहू को कोई साद देनेका रिवाज नहीं पाया आमा । साधारणत ईखके खेतमें गेहू बहुत उपज देता है। जिसका विशेष कारण यह प्रतीत होता है कि इस खेतमें ईसकी बची हुई साद मौजूद रहती है तथा छोटी-छोटी घालें कम उत्पन्न हो सकती हैं। विदेशीय पुस्तकोंमें हमको यह वृत्तान्त कहीं नहीं मिल सका कि ईखके खेतमे गेहू अधिक क्यों पैदा होता है-परन्तु हमारे देशके कृपोंका यह अनुमय है कि ऐसा होता है, पर इसका कारण वे भी नहीं बता सके। शोरकी खाद, खारी अथवा राखगेहूके सेतो मे डालनेका रिवाज कहीं कही हमारे देशमें पाया जाता है। शोरेकी खादकोश। मन मति एकड़के हिसायले सालना प्रर्याप्त है। और यह भी परीक्षण करके देखा गया है कि अधिक मात्राम डालना कुछ लामकारी नहीं होता तथा प्रतिवर्ष डालना भी निरर्थक है। बार पांच वर्ष के पश्चात् + -- . 4 r . ० . गर १३५ डालना उचित है। शोरको साद गसमें मिलाकर अयया गोयरकी पारीक सादमें मिलाकर पोधो पर अब वे छोटे छोट ही हो डालना सचिट है। शोरेको साद उस समय डालतीचाहिये जब खेतको पानी दिया गया हो और उसको कुछ नमी भी बाकी हो। वेवल शोरे EMA की खाद डालनेसे खेतमें नत्र. जन अधिक पहुचेगा पान्तु यदि उसमें प्रस्फुरिकफी मात्रा न डाली सायगी तो भूसेफी मामा भले ही पढ़ जाय अन्न मधिक न होगा, बत सुपरफास्फेट अथवा हद्दीकी 2. खाद भी डालनी चाहिये। विशेष फर उन खेतोंमे जिनमें ननजन सम्बन्धी कोई पाद साली जाय उनमें सुपरफास्टेट अवश्य डालना सपित है। क्योंकि ननजनकी भधिकताके कारण पौधे अधिक पढ़ जायगे और इस कारण धनपर लम्पी बाल या सफनेको गग्व नगजा गयफ पुटाश सोडा चना मान पसल के समय सखाकर पौड पोड पोड पोड पीड पोड पौंड फसका मार ४१८३ १७२५०७८/२८८.२.६/६२/७१.२१ १ २५/३६६ 2128 अन्न १८०० भसा ३१५८ सम्भावना हो सकेगी खाद " अच्छी मिट्टीमें साधारण गेहू के लिये खादको भावश्यकता नहीं होती परन्तु यदि पौधे अच्छे न रुपले मथवा उखड्ने प्रारम्भ हो जाय तो १ से १५ हड्रडवेट तक नत्रित सोडा अथवा गधित एमोनियाकी खाद सेनमें मसेर देना उचित है, नमित सोडा गधित एमोनियाकी अपेक्षा अधिक उपयोगी कहा जाता है । अथवा १५ मन प्रति एकड़के हिसायसे फाजल सेतो में डाला जाता है क्योकि इसके डालनेसे कीडा सेसों में कम लगता है मोर कुछ मानामें नत्रजन भी पहुचाता है। ऐसी खाद जिसमें गेहू के लिये सारे आवश्यक पदार्थ उपस्थित हो यह है कि वीज पोते समय ३ हंड्रेडवेट सुपरफास्फेट अथवा २ हडू डबेट बैधिक स्लेग सेतो मे पखेर कर मिला दिया जाय। दोनो पदार्थों में जैसा हम पहले लिख चुफ हैं खेतमें धूनेकी १५- स्थितिका ख्याल रखकर खाद डालनी ठीक होगी और फिर जव पौध कुछ बडे हो तो २ हड्रेडवेट ननित सोडा अथवा गन्धित एमो- निया डालना चाहिये । हलके सेतो में प्राय पुटाशकी कमी होती है, ऐसी अवस्था ३ हंड्रेडवेट कैनिट ( Kaint ) जो सनिज पदार्थ जर्मनीमें सोदकर निकाला जाता है डाल दिया जाय भयवा गधित पुटाश ३ एड्रेडवेटके हिसापसे डाल दिया जाय । गेहमें बहुत स्थानो पर नमक डालना भी बड़ा उपयोगी पाया गया है। नमक यद्यपि कोई पदार्थ सिनाय हरिनके उस योग्य नहीं प्रतीत होता कि वह गेहू के पौधेके काम या सके परन्तु सोडके कारण धरतीमे जो पदार्थ पुटाश प्रस्फुरिक आदि इस अवस्थामें होते हैं कि पौधा उनको अपने काममें न ला सके, वह इस योग्य बन जाते हैं जो, यव । कि पानीमे घुलकर पोया अपने लिये उपयोगी कर सके। यदि किसी वतमें चूना कम हो तो उन सेतो में गन्धित एमोनिया डालनेसे अम्लकी मात्रा बढ़ जाने की सम्भावना होगी। खेतमें चूनेफा मौजूद होना आवश्यक है। मत यह मावश्यक है कि कृपक यह देखें कि चूना उसके सेवमे पर्याप्त मात्रामें उपस्थित है या नहीं। इसके जाननेफी साधारण किया यह है कि सेनकी मिट्टीको लेकर शोशेको एक नळीमें डालकर थोडासा गन्धकाम्ल अथवा नमकका तेजाब डाल दो। यदि इसमें साय सायकी मावाज निकले और मिट्टी उपळने लगे तो जानना चाहिये कि चूना काफी मौजूद है और यदि तेजाय डालनेका कोई भी प्रभाव न हो तो मानो कि चूनेक डालनेको आवश्यकता है। सर्वदा याद रक्सो कि चूनेका डालना रोतको जोतते समय होना पाहिये, स्खेतमे पौधे उपजनेपर अथवा वीज पोते समय चूना फरापि 'नडालना चाहिये। गेहूं के सम्बन्धमे एक वृद्ध मनुष्यका कथन है कि यदि पीपलके पत्नी की खाद डाली जाय तो सपा अधिक होगी तथा पीज रिशेप रूपसे मोटा हो जायगा। हमने इसका अनुभव नहीं पिया, पाठक अनुभर कर स्वय देख सकते हैं। विशेषन वे लोग जो केवल चीज उत्पन्न करके घेचनेका व्यवहार करते हैं, उनके लिये तो यह विया यहुव ही उत्तम प्रतीत होती है। जौ, यय जो भी भारतवर्षका पुराना अन्न है। यद्यपि आजकल खानेके काममे बहुत कम लाया जाता है, तथापि शराब पनानेके कारण यह १३८ 4 w M पौ। हरिन सिलीका पांड - . O प ० अधिक मात्रामें धोया जाता है। भारतवर्नमें यह बाम ख्याल है कि जोफी फसल जिस वर्ण वर्षा कम होती है। गेहू की अपेक्षा अधिक उपजती है तथा इसपर वर्षाके कम होनेका प्रभाव भी कम पडता है। यद्यपि विदेशीय पुस्तकों के देसनेसे इसके विपरीत मालम 2310 होता है क्योंकि यह यताया जाता है कि जोकी जडें मविक गहरी नहीं जा सकती, इस कारण दूर तकफी नमोको खींचनेमें असमर्थ होनी चाहिये । परन्तु अनुभव इसके विपरीत घालासा है। संभव है इसका कोई और फारण हो जो हमको अभीतक ज्ञात नहीं हुआ है। - - V - है जो फोन पदार्थ फितनो मात्रा फसलका भार पोद 0508 २४४७ में उपस्थित होता है इसके लिये हमने एक सारणी दी है उसमें एक एकड घरतीका लेखा दिया गया है जिसमें १४४७ पौण्ड भन्न तथा २४४७ पौण्ड भूसा पैदा हो। मन्ना मोड़ जौ, यव १३९ यदि इससे न्यूनाधिक उपज होघे सो उसीके हिसाबसे उस फसलको न्यूनाधिक पदार्थों की अावश्यकता होगी। इसके देसनेसे पता लगता है कि प्राय वे ही सब पदार्थ जौको आवश्यक हैं जो गेट को । सनिज पदार्थमें सिलीका तथा पुढाश और प्रस्फुरिफाम्लको जरूरत होती है और नत्रजनकी भी मावश्यकता गेह के ही बराबर होती है। साधारणत जोमें यक्षा खाद नहीं दी जाती और बिना पादके हो फसल सासी मात्रा उत्पन्न होती है। यदि अधिक फसल पैदा करनी हो तो गेहू के समान ही उसमें भी साद डालनी उचित है। उत्तम शराब बनानेवाले जौमें यह आवश्यक है कि नत्रजनकी मात्रा न्यन हो । पत यह उन खेतोमें जिनमें नत्रजनसम्बन्धी अधिक खाद डालो गयी हो, उत्तम जातिका उत्पन्न नहीं हो सकता। वास्तवमें हमारे पूर्वजोंका तो यह विचार है कि कोई भी पदार्थ जिसमें अधिक रगद डाली गयो हो, सात्विक बुद्धि उत्पन्न करनेवाले पदार्थ उत्पन्न नहीं कर सकता । शायद यही कारण हो कि हमारे देशमें सादोंको मोर कम परिश्रम किया गया है और केवल खेतको कुछ दिनतक छोड देना अथवा गोषरफी खाद डालना ही पर्याप्त समझो गया। परन्तु अय समयके परिवर्तनसे हमको यह आवश्यकता आ पड़ी है कि अधिकसे अधिक भन्न थोडेसे थोडे स्थानमें प्राप्त किया जाय और इसी कारण अनेक पदार्थों के डालनेकी आवश्यकता पड़ती जा रही है। सम्भव है कि किसी समय विज्ञानवैचा इस मोर भी ध्यान देकर ऐसा सिद्धान्त निश्षय कर सके कि किस खादसे एल्पन्न १४० हुए भन्नका बुद्धिपर क्या प्रभाव पड़ता है, परन्तु आजकल इस मोर ध्यान नहीं है। जौको नवजनकी बादकी इसनी मानश्यकता नहीं होती जितनी कि उसको प्रस्फुरिकाम्लको खादकी आवश्यकता होती है। यह ख्याल किया गया है कि जोफी फसल प्रस्फुरिफकी अनुपस्थितिमें बिलकुल मच्छी नहीं हो सकती । ३ ईड्रडवेट सुपरफास्फेट अथवा उतना हो घड़ियों का चूरा यदि कप्तक साथ कोत में पोर दिया जाय तो पडा उपयोगी होगा और उपज बहुत अधिक हो सकेगी। पुटाश सम्बन्धी खाद डालनेसे दाना अधिक बढ़ जाता है, भूसा कुछ अधिक कडा होता है और मन्नका रंग कुछ कुछ स्याह हो जाता है। पुटाशको खाद फेवल करीली तथा रेतीली जमीनों में डालनी चाहिये । पुटाश- की खाद डालनेसे खेत कुछ अधिक देरमें पकता है। इस कारण फेवल माधा हडूडबेट गन्धित पुटाश केवल ऐसे सेतोंमे डालना चाहिये जिनमें रेतकी माना यहुत ही अधिक हो। अन्यथा पुटाशकी किसी खादफी जरूरत नहीं । गन्धित एमोनिया, हड्रेडरेटप्से १६ हडवेट तक काममें ला सकते हैं मवथा तरेकी सलो ३-५ हरेडवेटतक प्रति एकड़ डालनी चाहिये। यदि सुपरफास्फेट या एमोनिया अथवा तरेकी सली डाली जाय तो उसको भली भांति बोर कर मिला देना चाहिये । यदि खेतमें कोई जडदार फळ अथवा गुबार आदि कोई ऐसी फसल योयी गयो हो जो नत्रजनको स्वय वायुमण्डलसे सोचने- की समर्थ्य रखती हो तो ऐसी अवस्थामें केवल सुपरफास्फेटकी खाद मलनी उचित है, और किसी सादके डालनेकी आवश्यकता नहीं।
जई । जई मईको कमल भी जोसे बहुन मिलती जुलती है। परन्तु उसमें यडा अन्तर यह है कि जहाजोमा दाना अधिक काममें आता है यहां जई अधिकतर पारेके काम घाती है, बैलों, घोडा सादिको चरानेके रिये ही अधिकतर बोयो जाती है। यद्यपि जइका दाना भी दलकर घोडोंको सिलाया जाता है तथापि अधिकतर जई पाटकर खिलायी जाती है। इससे चारफा हो धाम लिया जाता है, इसलिये जिस रोतमें जई पोयी जाय उसमें नत्रजन अधिक होना चाहिये, जिसमें पोधे खूप घटकर पारा ज्यादा दे सके। नत्रजन सम्बन्धी खाद जोको अधिक यढाकर दानों को बिगाड देती है, इस कारण अधिक मानामें नामनझी स्वादोंका डालना मना किया है, परन्तु जहमें यह खाद खूप डाली जा सकती है। यदि जईके खेतमे अधिक खाद नत्रानकी डाली जायगी तो दो पार भी काटी जा सकेगी। जईके भीतर जो जो पदार्थ पाये जाते हैं उनकी सारणी नीचे दो गयी है। इसमें भी एक एकरको साधारण पनका हिसाब दिया गया है । इसके अनुसार न्यूनाधिकता की जा सकती है। साधारणत जईके खेतों तथा अन्य स्खेतोंमें गोयरकी साद तो डाल दी जा सकती है परन्तु विशेष रूपसे अईके प्रत १ से २ हरेडवेटतक ननित सोडेकी खाद डालनी चाहिये या गन्धित एमो- निया डालना चाहिये या २ हड्रेडवेट सुपरफास्फेट डालना उचित है। पुटाशकी खाद डालनेको कोई आवश्यकता नहीं होगी, न अईक खेसमें कोई ऐन्द्रिक खाद डालनेकी ही भावश्यकता है। यदि जईक १४२ 20 4r ० 30 रोतको कुछ बढ़ जानेपर फाट लिया जाय और फिर एक पार गधित एमोनिया अथवा नप्रित सोडेकी साद डाल दी जाय तो दूसरी फसल फिर वैसी ही होगी। पजाम में जहाँ ममी बहुतसे स्थानोंकी जमीन खोतीके काममें लायी जानी E भारम्भ हुई है, खोतोंमें इतनी E मात्रा भोजनको मौजूद है कि प्राय सभी खेत एक बार काटने पडते हैं अथवा थोडे बढ जानेपर उनमें बकरियां पराली जाती हैं। गोवरको सादमें भी नत्रजन की खासी माना होती है, परन्तु - उसका प्रभाव कुछ देरमें होता है तथा मधिक मात्रामें भी अलनी पड़ती है । यह भी पहा जाता है कि सुपरफास्फेट तथा और कोई प्रस्फुरिक सम्बन्धी सादक डाउने से जई सुस्वादु हो जाती है और ढोर अधिक रुचिसे साते हैं। इस कारण उत्तम यह है कि खेतोंमें घोनेके पहले सुपरफास्पट अथवा १३०/०५/१६.६ प्रस्फरि रास नत्रजनीगंधक पुटीश सोडा चूना | मग्न काम्ल हरिन सिलीका पौंड | पौंड पोड पौंड पोड योड पौंड पो० पौंड ो. १६२५/ ५१ | ३४ | ३२/६.१/ ०.८ | १.८ |३ २३३५ १४० १८४८३७०४६ १८|५.१६४६१६५४ ३६७८१६१/ ५२ फसलका भार फसलके समया सुखाकर पो० पन्न जोद MO 30 मई अन्य कोई खाद खेतोंमें खूब डाल दो जाय जिसमें खेतमें प्रस्फुरिफ पर्याप्त मानामें पहुच सके। ऐसा करनेसे फसलभरक लिये वह काम देती रहेगी । हम दो हड्रेसवेट बैसिक स्लेग अथवा सुपरफास्फेट एफ एण्ड में डाल देंगे सो खेतमें प्रस्फुरिफकी पर्याप्त मात्रा पहुच जायगी। हडियोंका चरा भी डाल सकते हैं, परन्तु यह १४ हदू सवेट तक डालना होगा, क्योंकि उसमें बहुत कम मात्रा काममें मानेके योग्य होगी। नत्रजनके लिये यदि खलियोंका चूरा परता जाय तो भी खूब काम देगा। नीमकी खलीमें १२ भाग सक १०० भाग पीछे प्रस्फुरिकाम्ल होता है। नत्रजन भी ५ भागसे अधिक होता है, अत यह तथा अन्य सजी इस काममें बरत सकते हैं। मकई मईका पौधा भारतवर्ष किसी विशेष उद्योगस-सिवाय बड़े बड़े शहरों के जहा यह यहुत पहले बेचनेक लिये वो दी जाती है- नहीं बोया जाता । पापमें मकईकी दो फचले किसी किसी स्थान पर हो जाती है और विशेष रूपसे भी इसक बोने का प्रयत्न होता है। परन्तु सयुक्त प्रान्तमें अधिकतर मई मुफ्तका प्रत्ल समझो जाता है, वर्षा होनेपर वैसे ही एक बार हल जीतकर मकई पखेरकर बो दी जाती है और जो हो जाय वही काफी समझो जाती है। मकई. के खेतोंमें कहीं कोई खाद नहीं डाली जाती। मकई की खेती अधिकतर अमरिकामें की जाती है और वहाँकी पैदावार भी हमारे देशसे कई गुना अधिक होती है। हमने अपन देशमें भी कई खुखड़ियां पेडोंपर आते हुए देखी हैं। नैनोवालक २४४ साद . ०२ ० ०. mm ०५ . प्रस्फार गख नत्रजन गधक पुटाश सोडा चना मग्न काल हरिन सिलीका ० . एक बगीचेमें एक पेडपर १२ खुड़ियां देसी गयीं, इससे पाठक स्वय अनुमान कर सकते हैं कि . कितनी अधिक माना माईकी हमारे देशमे उत्पन्न की जा सकती है। यदि पिशप रूपसे मईको अधिक मात्रामें उत्पन्न करना हो तो सपसे सुगम रीति यह है कि उस खेतमें जिसमें मकई वोना हो . दो-तीन गाडी साद मच्छी गली हुई डालकर मिला दी जाय, फिर गूले पनाफर सुपरफास्फेटकी खाद अथवा हड़ियोंका चरा २ " से ३ हड्डवेटतक मिलाकर खेत में डाल दिया जाय । इसके डालनेसे मकई मधिक होगी। यदि यह इच्छा हो कि स्वाद कम काममें लावें को प्रत्येक पेडके पारों मोर ही थोडी थोड़ी खाद डालनी काफी होगी जब खेतको नलाया जाय तो उसके साथ ही साथ खाद डालकर मलीभांति ३३७७ । १२१/ ४३ | १८३६३/०२/ ०५] ३४ १८०..२ . १८७७ ६१५१०२६८० फसलका भार फमलक साय मुसाकर १६८० २२०० ३८८० 222 १४५ मकई मिला दी जाय, ऐसा करनेसे खाद बहुत कम मात्रामें डालनी पड़ेगी। मई साधारणत सयुक्तपात तथा अन्य प्रान्तोंमें भी वर्षाके दिनोंमें घोयी जाती है। यदि इसमें कोई खाद नत्रित सोडा अथवा गन्धित एमोनियाकी डाली जाय तो यह भी सभव है कि वह समकी सब वर्षाके पानीसे बहकर बाहर जाती रहे। भारतीय किसा- नोंमें यह विख्यात पात है कि मकई आधा काल चाहती है, अर्थात् जय मच्छी वर्षा होती है तो मई मर जाती है। अत्र यदि उसे पानी नहीं निकाला आयगा वो मई जाती रहेगी और पानी निकाला जायगा तो खोनमें से सारीकी सारी साद पानीमें घुलकर वह जाय। अथवा सम्भव है कि सादके अतिरिक्त जो और भोजन प्रेतमें इस योग्य उपस्थित हो कि पौधोके काममें पा सके और पानी में सकता हो, बहकर निकल जाय। इस कारण यह अधिक उपयोगी होगा कि जिस सातमें मई बोयी जाय उसमें में. बनाकर बोयी जाय जिसमें सेतमें पानी भरा रहनेपर भी मकई के पौधोंको अधिक हानि न पहुचा सके। साधारण रूपसे तो खेतोंमें सब पदार्थ मौजूद होते है और कोई खाद नहीं डाली जाती, तथापि जिन खेतोंमें पानीके निकलनेको सम्भावना हो तथा डौल बनाकर मकई पोयी गयी हो उसमें खाद अवश्य डालनी चाहिये और विशेषकर प्रस्फुरिककी खाद ही उपयोगी है, क्योंकि वर्षाके दिनोंमें वर्षासे पर्याप्त नत्रजनके मिल जाने की सम्भावना है। भौर पुगशकी सार्दोकी प्राय भाव श्यक्ता ही नहीं पड़ती। १० खाद . चावल मकई के समान चावल के सेतों में भी कोई साद नहीं डाली जाती, इसका बड़ा कारण यह है कि चावल सर्वदा झीलके खेतोंमें ही बोया जाता है और मोलके सेतोंमें आस पासकी धरतीका पानी बहकर माता है, इसमें पौधोंका उपयोगी भोजन पानी में मिलकर आ जाता है। यङ्गाल प्रान्तमें चावल अधिकतर बोया जाता है। चीनमें जहाँ चावल बहुव अधिक मात्रामें बोया जाता है, बालोंकी खाद डाली जाती है। चावलके खेतमेंसे पानी निकालना भी पडता है, इसलिये किसी खादका डालना उपयोगी नहीं कहा जा सकता। हां, ऐसे खेतोंमें, जहां साधारणत पानीको निकालनेकी आवश्यकता न पड़े, खादका डालना अवश्य उपयोगी होगा। चावल अथवा धानको पनीरी लगाकर लगाया जाता है। पनीरी के खेत ऐसे होते हैं कि उनमे पानी ले जाया जा सकता है तथा हर प्रकार उन खेतोंका प्रबन्ध किया जा सकता है, इसलिये उन खेतों में पनीरोके लिये गोवरकी खाद तथा अन्य खाद डाली जाती है । चावलके दानेमें फेवल : भाग १०० भाग पीछे राप होती है और गसमें निम्नलिखित पदार्थ पाये जाते हैं। सिलीका २ भाग, पुटाश २३७० भाग, चूना ३०१६ भाग, सोडा ४ भाग, मान १२१० भाग, प्रस्फुरिकाम्ल ५५ भाग तथा गन्धकाम्ल १०५ भांग।' इस प्रकार मालूम होता है कि इसको भी प्रस्फरिकाम्लकी अधिक आवश्यकता है। चावल के खेतोंमें हाइयोंका बुरादा डालकर परीक्षण .
चावल RAM किया गया है। वासा प्राय फजीभूत हुए हैं। इस कारण सुपरफा सेटकी खाद अधिक उपयोगी पायी जायगी, क्योंकि मईफे समान चावल भी माय वकि दिनों में पोया जाता है इसलिये उसको नमन सम्बन्धी खादोंको मावश्यकता होगो घोर पुटाराको खादको वैसे ही कोई मावश्यकता नहीं, क्योंकि रेतीले संसोंमें जिनमें पुटाशकी कमी होती है, पावळ पोया हो ही जा सकता। इसलिये फेवल प्रस्फुरिक सम्बन्धी साद हो अधिक उपयोगी है और यदि ठीक तरह- से डाली जाय तो कोई कारण नहीं है कि यथोचित लामानो। গলা भारतवर्ष में गन्नेकी खेती सारे स सारसे पहले होती चली मायी है और यद्यपि हमारे निरुत्साह तथा निरुद्यमके कारण जहाँ कुछ वर्ष पूर्व भारतकी मोह अन्य देशोंको जातो थी यहां मय अन्य देशोंसे खांड पनकर हमारे देशमें पेपो जावो है । इस सिके पवसे कारण है, परन्तु हा सका विचार करता इस स्थानपर उचित नहीं प्रतीत दोता । हम दूसरो'बाह' नामक पुस्तकमें इसका पूरा-पूरा विचार करेगे। यद्यपि पुकन्दरको साहय कारण भी हमारी खोडको पड़ी हानि पहुंचती है तथापि गन्नेका पौड मो अन्य देशोंसे हमारे दशमें कुछ कम मानामें नहीं आतो मोर हमारो पांडको अपेक्षा बहुत सस्ती विकती है। गन्ने की फपस किसानका बडो आमदनी है, माजमर- को कमाईके पश्चात किसान गन्ने की फपल तैयार कर पाता है। इस लिये वह इसपर भविक खाद डालनका तैयार हो जा सकता है, यदि उसकी ममम यह मा जाय कि अमुक फरको खाद अवश्य गुण १४८ खाद 1 कारी होगी। माज भी, यद्यपि हमारे देशमें मोर देशोंकी अपेक्षा रुपनकम होने लगी है परन्तु इसके सेतोंमें सब किसान खाद डालते हैं। वर्षाके पूर्व खाद डालनेका प्राय रिवाज पाया जाग है, जिसमें सब खाद वर्षाफे पानीमें घुलकर पौधेके काम आ सके। इसके खेत सर्वधा ऐसे स्थानोंपर होते हैं कि उनमेंसे पानी नहीं निकल सकता तया ईरसका सोत वर्षाके पानीको सूध चूसफर मढता है मोर कमी ऐसा नहीं देसनेमे पाया कि अधिक वर्षाके कारण ईसकी मेजी जाती रही हो । खेत उपजने के समय अथवा इससे पूर्व खेतोंमें साद डालने का रिवाज विष्टकुल नही है, यद्यपि ऐसा होना अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है। जो पौधे उत्तम नहीं उपजते, जिनमें यह शक्ति नहीं होती कि वे शकिशाली होने के कारण भली भांति जीवित रह सके, उनके लिये साद अत्यन्त आवश्यक है। सादझे डालनेसे पौधा अच्छी तरह बडा हो जानेसे बहुतेर रोगोंसे बच जाता है । भारम्भमें साद न देने का रिवाज भारतवर्ष में इस कारण मी न होता सम्भव है कि साद यदि किसी खेतमें डाली जाय तो उसका कोई लाभ नहीं हो सकता जबतक कि उसमें पानी काफी न दिया जाय । भारतवर्ष में प्राय कुवों से सिंचाईका काम लिया जाता है, कुवोंका पानी न ने अधिक मात्रा में दिया जा सकता है और न जल्दी-जल्दी दे सकते हैं इस कारण इन खेतों में अधिक खाद डालनेसे सम्भव है, इवनी गरमी उत्पन हो कि पौधेको काफी पानी न मिल सके और वह जलकर भस्मीभूत हो जाय । जहा नहरका पानी मावा है वहाँको दशा और मो शोचनीय है, क्योंकि प्राय. यह देखने में माता है कि नहरों के - गन्ना माले पन्द हो जाते हैं और पानी समयपर न मिलने कारण रोस नष्ट हो जाते हैं। कई वर्षो ऐसा देखा गया है कि सारे पर्प की फमाई केवळ नहरोंके दो सप्ताह मन हो आनेसे नष्ट हो गयी है। परन्तु वह सारेके सारे भय गोपरको साद अपवा हड़ियों का पूरा भोर गस डालनेको अवस्थामे नहीं हो सकते, क्योंकि इनमें नजन- की मात्रा इवनी नहीं होती कि वह फसलको एकदम पहत अविष्फ पढ़ा सके । इससे खेतमे अडझे कणों को देरमै उड़ने देनेकी शकि उत्पन्न हो जाती है। मिट्टी मुरमुरो रहनेसे पानी कम पडता है, पौधेकी जह अधिक गहरी जानेसे रोतमें दूर दूर तक भोजन पोधो के काममा सकना है। हमारे विचारमें सेनों को तैयार करते समय यदि उनमे गोयाबी पालो पालो साद मसेरकर मिला दी जाय को बड़ी गुणकाो होगी भोर यदि इसमे थोडी माना हशियोंका घाभी मिला दिया जाय को सोने सुगन्धका काम देगा। इसमें केवल एक मापत्ति मालूम होती है कि साधारणत ईखको फसल मायसे वैशाग्य सफ हमारे प्रान्नमें योयी जाती है। इन दिनो गोवरको केवल यही माना प्राप्त हो सकती है जो वर्षाके पश्चात् इकट्ठी की गयी हो। क्यो कि वर्षा के पूर्व सारीकी सारी साद खेतो मे डाल देते है और वक दिनो मे किसी कामके योग्य इकट्ठी नहीं की जाती । जाड़े फे दिनो मे खाद घरमे पड़ी रहनेसे भली भाति गळ नहीं सकती और इस कारण खेतो मे डालनेसे सम्भव है कि वह सेतो मे मधिक दीमक लगनेका कारण पने । विशेष फर ऐसे स्थानो पर जहां दीमक अधिक लगती है,हम कभी यह सम्मति पाठकों को नहीं दे सकते कि वह १५० खाद फची साद खेतो में डालें। यदि अच्छी गली हुई साद प्राप्त न हो सके तोपची खाद डालनेसे यह उत्तम होगा कि कोई खाद न डोली जाय । सम्भव है, इन्ही विचारों के कारण ऐसी प्रथा भारतवर्ष में पायी जाती हो । यदि पाठक इसमें कोई परिवर्तन करे तो सम्मव है, हानि उठानी पड़े। पाठकवृन्द यदि सावधानीसे कार्य करे और खाद- फो, जेसा हम पहले लिख चुके हैं, सत्तो में ऊपरसे छान डालकर रसनेका रिवाज डाला जाय तो हर समय खाद गनी हुई मिल सकेगी। केवल पहले वर्ष कुछ मापचि होगी फिर यह दोर लग आयगा कि कभी एक सत्ता और कभी दूसरा तैयार मिल सकेगा और इस प्रकार फठिनाई दूर हो जायगी। यदि गनी हुई साद प्राप्त न हो तो हम वैज्ञानिक खाद डाल सकते हैं, जो हर समय प्राप्य है। इसी प्रकार यदि खेतों में खलीका चूरा मिला दिया जाय तो वह भापत्ति दूर हो सकेगी। खलीका चरा ४-५ मन प्रति बीघेके हिसाबसे अथवा इससे अधिक भी मिला सकते हैं। इसके डाउनेसे पौधो को जिन- जिन पदार्थोकी आवश्यकता हुआ फरतो है वह सब मिल सकेंगे। गन्ना किन किन पदार्थों को चाहता है मौर इसकी रासायनिक बनावट क्या है, अब हम इसपर विचार करना चाहते हैं। इसके पोधोंमें ७२ भाग १०० भाग पीछे पानी होता है, १० भाग ततु भौर १८ भाग चीनी होती है। इससे मालूम होगा कि इस पौधेके लिये पानी कितना आवश्यक है। यदि १०० भाग ईखका जलाया जाय तो उसमें फेवल { भाग गस प्राप्त होगी अर्थात् खनिन पदार्थों- की मात्रा फपलके बोझकी अपेक्षाः' बहुत ही कम होती है।
गन्ना गन्नेको पुटाशकी अत्यन्त आवश्यकता होती है, इसी कारण रेतीले खेतोंमें जिनमे पुटाशको मात्रा बहुत कम पायी जाती है, ईख. की फमल उतम नहीं हो सकती। ऐसे खतों में जिनमें चिकनी मिट्टी अधिक हो उनमें ईखकी फसल खूब होगी, क्योंकि इनमें पुटाशकी मात्रा अधिक हुमा करती है। डाकर सेतोंमे भी ईख खूब होती है परन्तु अधिक चिकनी मिट्टीके खेतों में जब पानी दिया जाता है तो यह खेत के नीचेतक नहीं जा सकता और ज. उससे पूरा उपयोग नहीं ले समतों और जब पानी सूखने लगता है तो खेतमें घडी लपी लम्बी दरारें पड़ जाती हैं जो फसजको हानिकर होती है। इसलिये यदि चिकनौट या डाफर जमीनमें ईख बोयो जाय तो गोबरकी खाद या घनेकी खाद डालनी अधिक उपयोगी होगी । फसलके बोनेसे कुछ दिन पूर्व डालकर खेतमें भलीभांति मिला दी जाय जिसमे वह खेत भुरभुग हो जाय अथवा खेतको जला दिया जाय तो भी उसमें कुछ भुरमुरापन मा जायगा। खेतमें एक टन (२८ मन) गन्नेको उत्पन्न करनेके लिये ३०६८ पौंड ननमन तथा २६६६८ पौंड खनिज पदार्थों की आष- श्यकता होती है । यदे साधारण फसल ४० टन गन्नेको प्रति एफडके हिसावसे रक्खी जाय तो नत्रजन १२२७२ पौंड आवश्यक होगा मोर प्रस्फुरिकाम्ल ६६८० पौंड, पुटाश ३६६ ४० पौड, चूना ८७२० पौंड, मग्न ६६४० पौंडकी जरूरत होगी। यद्यपि मौसम पैदावार मत्य देशों को इससे कहीं अधिक है क्योंकि हमारे देश में २८०० मन तक गन्ना पैदा हो जाता है। इस प्रकार साधारण चालीस खाद टन गन्ना उत्पन्न करनेके लिये ४०० पौंड नत्रित सोडा, २०० पौड गन्धित पुटाश तथा ३०० पौंड सुपरफास्फेट खेतमें डालना होगा, यदि सब पची, अगोला (फुनगी) धादि सेतमें ही छोड दी जाय । यदि ऐसा न किया जाय तो जैसा हमारे देशमें भगोला चारेके काम भाता है, पत्ती जला दी जाती है तो इससे बहुत अधिक मात्रामें यह पदार्थ आवश्यक होंगे। उपरोक्त मात्रामे ऋतु, जमीन इत्यादि वातों- के अनुसार न्यूनाधिकमा करनी होगी। पुटाशकी अधिक साद खेतों- में डालनेकी आवश्यकता नही होती परन्तु किसी खेतमें लगातार ईख बोनी पड़े तो इसकी अवश्य मावश्यकता होगी। पुटाशकी खादके लिये सर्वदा गन्धित पुटाशते ही काम लेना उचित हैं। म्यूरि- थेट आफ पुटाश (Muriate of Putash) से भी पुटाशका काम चल जाता है परन्तु परीक्षण करके देखा गया है कि जिन खेतोंमें यह खाद डाली जाती है उनमें पैदा हुए गन्नोंमें शीरेकी मात्रा यद जादी है और दाना कम हो जाता है। कैनिटके डालनेमें भी यही डर है सुपरफास्फेटके डालनेसे गन्नोंका रस मधिक मोठा पैदा होता है और इसी कारण स्वाड की मात्रा अधिक पैदा होती है। नजनके अधिक साद पानेका परिणाम यह होता है कि पौधे बहुत बढ जाते है और उनका रस फीका पैदा होता है। दाना कम पडवा है और कमी कभी तो गुड़ भी नहीं हो सकता । हमारे देशमें पुरानी प्रथा यह है कि ईखर्के खेतमें कमी देख नहीं होते। जिन स्वामें ऐसा करना पडे उनमें खाद खूब डालनी चाहिये. - । - गन्ना जिसमें मिनी मात्रा मनेक पदार्थों को तसे निकलती है उतनी ही साद द्वारा खेतमें पहुंच जाय। यदि उपरोक्त मात्रामें या इससे न्यूनाधिक स्वाद देशका अनुसार डाली जायगी तो प्रत्येक वर्ष एक ही संतमें ईस पैदा हो सकेगी। हमारे देशमें ईख प्राय ऐसी फसलों. के पश्चात् मोयी जाती है जिनमें पायुमण्डलसे ननमन सी घनेका गुण होता है जैसे गुार, मटर, उड़द आदि। इस प्रकार ननजन प्राप्त हो जाता है और फुल पुटाश तथा प्रस्फुरिक गोपरको सादसे प्राप्त हो जाता है। यह भी देखा गया है कि यदि नीलके खेत में ईरा बोयी जाय तो पैदावार बहुत होती है, यद्यपि गुड पढिया जातिका नहीं होता । ईख यहुत ऊपी बढतो है। बहुतसे स्थानोपर साको पयवा सनीको योकर खेत में ही जोत देते हैं और इस प्रकार सेतको नत्रजनकी खाद काफी प्राप्त हो जाती है तथा पुटाश घोर प्रस्फुरिक पोधेकै काममें भा सके इस रूपमें हो जाता है। सनकी पेक्षा सनीको इस प्रकार जोतना अधिक उपयोगी पाया गया। । सीके जोतने खेतमें इस पहुँत बढ़नी है, और गुड अच्छा होता है और दाना सूप पडता है। यदि गुगार तथा उड़दको पकाकर रोतमे काटा जाय तो भी नत्रजनकी खादकी मापश्यना नहीं होती। यदि कृपकको यह शान हो कि कोन पदाथ उसके सेतमें कितनी मानामें इस अवस्थामें मौजूद है कि पौधा अपने काममें ला सके तो वह स्वय इस बातका फैसडरा कर सकेगा कि खेतमे कौन खाद किस मात्रामें डाली जाय। सोडेकी खाद भी ईखके खेतमे बड़ी उपयोगी है। इसकी भी * खाद 1 खेतमें वर्षासे पहले पखेरना ठीक होगा। नत्रजनको वैज्ञानिक साद चाहे नत्रित सोडा हो, चाहे सोडा, दोनों को ही एकयार डालनेको अपेक्षा यह उत्तम होगा कि दो तीन बार करके थोड़े-थोड़े डाले जाय। कई पार करके थोडा थोडा डालना एक बार डालनेको अपेक्षा उत्तम पाया गया है। जब कभी पौधोंका घढना बन्द हो जाय अथवा किसी कीड़े लग जानेसे फसल बढनी बन्द हो गई तो नत्रजनकी साद देनेसे फसल फिर बढनी भारम्भ हो जायगी। ईखकी खादमें अनुभवसे देखा गया है कि अधिक फसल पैदा करनेकी यह क्रिया हो सकती है कि घाडीके खेतमें मेथी वो दी जाय और इस मेयोको खेतमें जोत भली भाति मिला बैसाखमें ईख घो दी जाय । ऐसा कर. नेसे किसानको कोई हानि न होगी मोर फसल बडी उचम होगी। यह भी देखा गया है कि महुएकी खली जो बडी सस्ती मिल सकती है, ५० मन प्रति एकड़के हिसायसे डाल दी जाय या २५ मनके करीव प्रति एकड नीमकी खली डाली आय तो बड़ा नाम हो। सलीको सर्वदा चूरा करके प्रत्येक पौधेपर डालना अधिक उपयोगी होगा। तमाखू किसान के लिये तमाखू घडी लामको फसल है, क्योंकि यह योटे दिनों में ही तैयार हो जाती है और महंगी बिकती है । तमाख भधिक मात्रामें पैदा करना ही किसानफी तारीफकी बात नहीं है, बल्कि किसानकी योग्यता इसमें है कि उसके खेवकी तमाखू लोग पीनेमें अधिक पसन्द करें। ऐसी तमासू जो पीनेमें उत्तम समझो जाय पैदा करना साधारण पात नहीं है, उसके लिये घडे अनुभव और परिश्रमकी आवश्यकता है। साधारणत यह बता देनेसे कि अमुक सादके डालनेसे उत्तम जातिको तमासू पैदा होगी, काम नहीं चल समता। तमापू हलकी, छेददार भौर पोली धरतीमें, जिसमें (Humus) (काटित धरती ) की मात्रा अधिक हो, परन्तु सट्टापन न हो, अधिक उत्तम होती है । सख्त और ठढी धरतीमें जिनमें चिकनी मिट्टीको मात्रा अधिक हो और ऐन्द्रिक पदार्थ कम हों, उत्तम जातिको नहीं होती। जिन खेतोंमें उत्तम जातिको तमासू पैदा होती है उनका भौतिकीय विश्लेपण इस प्रकार पाया गया है। यदि इन खातोंकी मिट्टीको गरमीकी कक्षा ११० पर सुखाया जाय तो १०० भाग में ६३ भाग रह जायंगे और इन ६३ भागोंमें निम्नलिखित पदाथ पाये आयगे। चिकनी मिट्टी ३८०१ रेत, ८६ ७६, चूना १६० ऐन्द्रिक पदार्थ ०५४ इसी प्रकार रासायनिक विश्लेषणसे २३ भाग सूखी मिट्टीमें निम्नलिखित पदार्थ मिलेंगे। नत्रजन ००६२ प्रस्फुरिकाम्ल फुल ००११ प्रस्फुरिकाम्ल जिसको पौधा तुरन्त काममें ला सके ० ००३ कुल पुटाशकी मात्रा ००७५ भोजनके योग्य पुटाश. तमाख के खेतके लिये पानीका खडा रहना अथवा सेतमें खटाई.
का उपस्थित होना विष काम देता है। जिन खेतोंके नीचे की जमीन सख्त होतो है उनमें पानी का करता है और इसलिये वह खेत ठ.. पड जानेसे तमाखू धोनेके काम के नहीं होते। यद्यपि तमाखू की रासमें चनेको वड़ी मात्रा पायी जाती है तथापि वह उन सेतोंमें अच्छी उपज नही देतो मिन खेतों में फार मधिक हो । सिद्धान्त यह है कि तमास एन खेतोंमें उत्तम जातिको होती है जिनमें कमसे कम ०५ भाग १०० भाग पीछे चनेको हो और अधिकसे अधिक २ भाग पाया जाता हो । उत्तम छोटिकी जमीनोंमे १मागसे भी अधिक मात्रा ऐसे पुटाशकी पायी जाती है जो पौधे तुरन्त काममें ला सकें । यदि यह मात्रा कम होते होते ०५ भाग १०० भाग पीछे रह जाय दो गन्धित पुटाशका डालना आवश्यक होगा। समासू उत्तम होने के लिये यह आवश्यक है कि पौधे एकसे पढते रहे और उनकी वाढ कमने न पावे। ठिठर जानेसे पौधे उत्तम समापू पैदा नहीं करते । नत्रित सोडा सथा गन्धित पुटाशका प्रयोग जैसा हमने आगे लिखा है किया जायगा तो पौ?में सूबनेकी रुचि न होगी, क्योंकि ये दोनों पदार्थ पृथ्वी में नमी बनाये रखनेका भी गुण रखते है। तमाखूमें १०० भाग पोछे १६ से लेकर २८ भागतेक राख होती है और रीसमें निम्नलिखित पदार्थों की मात्रा पायी जाती है। पुडाश १२ १६ भाग जिस सेतमें १००० डे पत्ते सुखे हुएं उत्पन्न हो उसमेसे चूना ४५६. माग नत्रजन ५५ पौंड प्रस्फुरिकाम्ल मन ०६ भाग
समाख
१५७
हरिद पुटाश
निकल जायगा।
मन
१३ ०६ भाग ८ पौड तथा पुटाश ६० पौंड
३६८ भाग
दरिद सोडा
३७७ माग
ਬਿਲੀ
८०१ माग
प्रस्फुरिफ लोहा ५४८ भाग
सूखे हुए पत्तों में कार्वनित पुटाशका होना आवश्यक है। इसके
विना तमाख भली भांति नहीं जल सकती। तमाग्यके लिये पुटाश
सबसे अधिक मावश्यक होता है। तमाखका खेत एक एकडसे १३०
पौंड पुगश निकाल देता है। यह पदार्थ यदि खेतमें पर्याप्त मात्रामें
पौधेके भोजन के रूपमें उपस्थित न हो तो गन्धित पुगशके रूपमें
डालना चाहिये । पुटाशके लिये तथा अन्य पदार्थों के लिये खेतों में
गोषरको साद डाली जाती है। यदि एक एकडमे २० टन गोबरकी
साद डाल दी जाय तो फाफी होगी चौर सारे आवश्यक पदार्थ
पौधेको खेतमे मिल सकेगे। हमारे देशमे भी यह बात लोग भली
भांति जानते हैं कि यदि किसी कुपे का पानी खारा हो वो वह पानी
खेतमें उत्तमकोटिको तमास पैदा करेगा। सोडेको खादफे डालनेसे
भी तमाखू उत्तम पैदा होती है। चाहे जो खाद तमाखके खेत में
डाली जाय परन्तु मधिक नत्रजनको खाद न डालनी चाहिये, क्यों-
कि नत्रजनकी खाद मधिक डालनेसे पौधों के पत्ते पतले पड जाते
हैं और ये सूखनेपर बडी शीघ्र पुरेसे हो जाते हैं। २ मनके लगभग
सोडा एक एकडमें डालना पर्याप्त होगा। एक बात इस सन्मन्धमें
यह मो याद रखनी चाहिये किएमोनिया-सम्बन्धी खाद जैसे :
१५८ खाद . एमोनिया भादि खेतों में न डालनी चाहिये। इसके ढालनेसे पौधों के पत्तोंमें छेद हो जाते हैं और वे जलसे दीख पडते हैं। सुपरफास्फेट अथवा प्रस्फुरिफकी कोई खाद धमाके सेतमें डालनी भावश्यक नहीं है, क्योंकि प्रस्फुरिफ बहुत ही कम मात्रामें खेतको आवश्यक होता है। यदि तमाखू लगानेसे पूर्व २, ३ मन रेडीको खली अथवा यिनोलेको खलो खेतमें डालकर मिला दी जाय तथा इतना हो सुपरफास्फेट और शा मन गधित पुटाश डाला जाय तो यह तमासके लिये सबसे उचम स्वाद है। जब पौधा कुछ बढ जाय तो १ मन नत्रित सोडा डाल दिया जाय । साधारणत ये दोनों बाते किसानको याद रखनी चाहिये कि पुटाशको बाद पौधेको अत्यन्त मावश्यफ है, तथा हरिनके बाद जैसे हरिद सोडा, हरिद पुटाश (Kaanit muraite of potash) तमासूके खेतमें कभी भी न डालने पाहिये । इनके डालनेसे तमाखू पीनेमें बडी निकृष्ट कोटिको हो जाती है। पाखानेको खाद तमासूके लिये निम्नलिखित स्वादसे विशेष उपयोगी बतायी जाती है। निम्नलिखित खादसे विशेष उपयोगी बतायी जाती है। निम्नलिखित मात्रा एक एकडके लिये है। १५मन मामूली चौरसे १५० पौंड, सुपरफास्फट २०० पौंड, ननित' सोडा तथा २०० पौड गधित गायफा गोषर पुटाश एक एकड़के लिये पर्याप्त भेड़ बकरीकी लेंडी १० मन होता है। यदि कभी पौधों को शीघ्र बढाने के लिये नत्रित सोडा - ईटको सुरखी ककरका पुरादा हड्डीका बुरादा ८मन २० मन
कपास
१५६
पानीमे घोल कर दे दिया जाय
तो बडा उपयोगी होता है।
१०० घडे पानी के लिये २ सेर
शा सेर पर्याप्त होगा। जिन
खेतोंमें चूना कम हो उनमें
सुपरफास्फेटके स्थानमें बेसिक
स्टेग डालना उचित है।
कपास
फपास हमारे देशमें अधिकतर वर्षा ऋतुके भारम्भमें बायी
जाती है और जैसे अन्य सारनीको फसलको खादको यावश्यकता
नही होती वैसे ही इसको भी नहीं होती। कपासकी फसल किसानके
लिये मुफ्तकी फसन मानी जाती है। क्योंकि थोडी भी अधिक वर्षा
हो जानेसे इसके जाते रहने की सम्भावना रहती है। कपासमे कोई
विशेष परिश्रम करनेकी मोर किसानोंने ध्यान नहीं दिया है। कपा-
सकी फसल पड़ी उपयोगी है। कपास बड़ी महगी विकती है। यदि
अधिक ध्यानसे इसकी खेती की जाय तो बहुत धन देनेवाली बनायी
जा सकती है। भारतवर्ष में कपासक लिये कोई खाद काममे नहीं
लायी जाती, कहीं कही यह रिवाज पाया जाता है कि पौधोंके कुछ
पद जानेपर उनकी जाडोंमें ताजा गोवा या राख डाल देते हैं। इसक
डालनेसे उपज बढ़ जाती है। गायर या गोवरकी खाद अथवा नत्र.
जनकी और कोई खाद पौधोंके पैदा होत समय कदापि सेतमे नहीं
7
। १६० साद डालनी चाहिये। नत्रजनको अधिक साद बहुत ही हानिकारक है। क्योंकि इससे पौधे पहुत पढवे तो हैं परन्तु उनपर गूलर कम माखों है और इस कारण रुई कम प्राप्त होती है । नत्रजनकी खाद डालनेसे खेतमें पौधे शीघ्रतासे पटते हैं और सूम बढते हैं। यदि फपासका पौधा रंग बदलना भारम्भ फरे और उसका रंग पीला पड़ने लगे तो जानना चाहिये कि नत्रजनकी आव- श्यकता । उस दशामें ननित सोडा आदि नत्रजन सम्बन्धी कोई खाद डालनी उचित है । प्रस्फुरिकशी साद डालनेसे रूई अधिक प- जवी है तथा फूल जल्दी पाता है। नत्रजनको खाद डालनेसे फसल देरमें फपास देने योग्य होती है । अब कई वर्षसे यह देखनेमें आता है कि जो खेव देरतफ सडे रहते हैं उनकी जडोंके कारण फूल नहीं सिळ सकते । इस प्रकार पहुत उत्तम खेतकी पैदावार भी बहुत कम होती है। यदि खेतमें हड़ियोंका चूग अथवा प्रस्फुरिकाम्छकी साद सुपरफास्फेट मादि डाले जाय तो खेतकी उपज बहुत बढ़ जाय और देखक खेतके खड़े रहने के कारण जो हानि खेतोंको पहुचती है उसकी बहुत कम समावना रह जाय । यदि किसी खेतके परे हरे रहे और गुलर न मावा हो तो जानना चाहिये कि इसको प्रस्फुरिफकी खादकी भावश्यमचा है। पुटाशके गलनेसे पौधोंमें सल्ती पाधी है और इस पर कीड़े बहुत कम लगते हैं। इन सब विचारोंसे निम्नलिखित खादमें कपासके, पोधको जिन पदार्थोको आवश्यकता होती है वह सम पदार्थ मौजूद हैं। यह माना एक एकरके लिये है। . क कपास १६१ नमित सोहा २ मन, सुपरफास्फेट ३५ मन, हरिद पुटाश २५ से। और जन इस उपर्युकरणादका दो तिहाई भाग पौधों के लगात समय और एक तिहाई भाग १मासके पश्चात् सालना उचित है। यदि ४ हड्रेडोट सुपरफास्फेट भार २ ईडबेट विनोलॉफी घलीका पीज बोनेप्से पूर्व खेतमे मनी भाति मिला दिया जाय पौधे पुछ यडे हो जाये तो । हड डवेट गन्धित एमोनिया अयश ननित सोडा डाला जाय तो यड़ा उपयोगी होगा । साधारणत सपासके लिये पुटाराधी किसी सादकी मावश्यकता नहीं होती। मालूकी खाद मालू योनेका रिवान प्राय शहरों में हो पाया जाता है। कहीं फही गांवों में मो भए मालू योया जाने लगा है । मालूके योनेमें और अन्नोको अपेक्षा अधिक होशियारीको आवश्यकता है। यही कारण है कि इसका रिवाज इतना अधिक नहीं हुआ है। दूसरा कारण अधिक न घोनेफा यह भी है कि उत्तम आल उत्पन्न करनेके लिये अधिक खादफी आवश्यश्ता होती है और पानी भी बहुत पाहिये। प्रामों में न तो पानी ही अधिक मिल सकता है और न इतनी खाद ही प्राप्त हो सकती है। प्रामों में और भी अनेक फसलें घोनी होती है और सन सपको भी मानी तथा खाद देनी पड़ती है। मालू धोनेके बाद किसानको घही काम रह जाता है, दूसरे लोतोंकी ओर वह अधिक ध्यान नहीं दे सकता। साद पहुत अधिक मात्रा में डाल दी जाय तो अन्य खेतों में डालने के लिये किसान साद कहांसे लावे ?
१६४ वाद । वैज्ञानिक खाद तथा गोवरफी खाद मिलाकर डाली जाय। - गोबर- की खाद डालनेसे एक लाभ यह भी है कि यदिगोवरकी साद खेतमें डालकर मिला देवें और फिर हल चला मली मावि स्वादको मिलाकर माल लगाये जायं तो साद गलकर कुछ स्थान खाली करेगी और यह स्थान साली होनेसे पौधोंके आसपासको जमीन मुरभुरी होगी और इसमें बालुओंको फैलनेपा एय मौका मिलेगा। साधारण आलूकी फसल पैदा करनेके लिये प्रति एफडके हिसारसे ४ हड्रेटवेट सुपर- फास्फेट, एक हडू डवेट गन्धित पुटारा और एक हडवेट गन्धित' एमोनिया वरतना चाहिये । यदि और अधिक फसल पैदा करनी हो तो इसमें दो हडे डयेट गुवानों और एक एडवेट गन्धित एमोनिया और मिलाओ तथा पोषोंपर डाले। यदि नवजनकी सादोंके साथ साथ प्रस्फुरिक तथा पुटाशकी खाद भी डाली जायगी तो वह नत्रजन काममें मा जानेसे उपयुक्त हानि न होगी। लूसन या रिज़का रिजका योनेका रिवाज अप किसानों में बहुत बढता जाता है। कारण यह है कि अब किसान भलीभांति जान गये हैं कि रिजका यदि सेतमें भली भांति लगा दिया जाय तो चारा इतना अधिक प्राप्त होता है कि दो तीन बीघेका रिजका ही पई पीके चारेका काम दे सकता है। गर्मी के दिनों में तथा जाडेमें अब कोई हरी चीज नहीं मिल सकती, रिजका हग बना रहता है और ढोर से बडी रुचिसे खाते हैं। रिजके- को यदि अच्छी तरह सेत तैयार करके धो दिया जाय तो यह ४६ वर्पतक काम देता है, यद्यपि वर्षाके दिनों में घासके प्राधिक्यके कारण कुछ कमी हो जाती है। परन्तु वर्षाऋतुके बीत जानेपर यदि घासको भली भांति छोलकर छोद दिया जाय और पानी देते रहें तो खूब पैदा होता है । रिजरेमे वायुमण्डलसे नत्रजन सींचनेका गुण है और यही कारण है कि इसकी फसल कई कई वपतक काम देती रहती है। रिज़रे. के खेतमे जब और कोई फसल बोयी जाती है तो वह भी खूप उपज देती है, क्योंकि इसके बोनेसे खेतमें नजनको मात्रा अधिक हो जाती है। इस प्रकार रिजकेको ननजनको आवश्यकता नहीं होती। केवल पुटाश और प्रस्फुरिकको आवश्यकता रह जाती है, सो यदि खेतमें योते समय ५ हर्डवेट पैसिक स्लेग और ४ हड्रेडवेट गन्धित पुटाश डाल दिया जाय तो रिजका सूर पैदा होगा। बोते समय यदि थोड़ी मात्रामें ननजनको कोई साद जैसे गन्धित एमोनिया भादि डाल दी जाय तो पौधे शीघ्र बढ आते हैं और चारा देने के योग्य हो जाते हैं। फभी कभी गोधरकी खाद भी डालते रहना उपयोगी होता है। यदि प्रस्फुरिककी सादके लिये हड्डियों का चूरा भी काममें लाया जाय तो बड़ा उपयोगी होगा, क्योंकि वह धीरे धीरे पौधोंके काम आता रहेगा। मूंगफलीकी खोद मूगफलीको केवल चूनेकी साद दी जाती है और जिन खेतोंमें गोबरकी साद दी जाती है वह बहुत दिन पूर्व डाली जाती है, जिसमे वह खेतमे भली भाति मूगफलोके घोनेसे पूर्व गल्फर मिल जाय । नहरकी रेत तथा तालाबकी मिट्टी भी सेतों में डालनेसे पैदावार अधिक होती है । कहा जाता है कि मेड तथा बकरियों को संतमें बैठानेसे भी मूगफलीकी पैदावार बढ जाती है।
भारतवर्ष
में वैज्ञानिक खादों के
मिलनेके पते
हमने इस पुस्तकमे अनेक प्रकारको सादें लिसी हैं और उनमें से
पहुतसो ऐसी हैं जिनका बाजारमे मिलना कठिन है। अतएव यह
उचित जान पडता है कि उनके मिलने का पूग पूरा पता लिखें। सलि-
योंका भारतवर्ष में बहुत कम रिवाज है और साधारण सलियां
प्रत्येक ग्रामके तेलियोंसे प्राप्य हे वया बाजारमे भी मिल सकती है।
तथापि तेल पेरनेके पर बड़े कार्यालय जहाँसे अधिक मात्रामें खली
प्राप्त हो सकती है, यह हैं-
(१) झोप प्रादर्स प्रीमियर आयल मिल्स, कानपुर (सलो)
(२) तेल मिल्स, देहली
(३) इडियन प्रोडक्टस कम्पनी, कलकत्ता
वैज्ञानिक तथा अन्य प्रकारकी साद बेचनेवालोंके
पते यह है
(१) मेसर्स डी० घाल्डई एण्ड फम्पनी, कानपुर
(२) मेसर्स डी० घाल्डई एण्ड फम्पनी, कोनगर, फलकत्ता
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लखा- हिन्दी-पुस्तक एजेन्सी माला। १-सप्तसरोज लेखक--उपन्यास सम्राट् अयुिक्त "प्रेमच द" इसमें सात अति मनोहर उपदेशपद फहानिया है, जिनका भारतको प्राय समो भाषाओंमें अनुवाद निकल चुका है। यह हिन्दी साहित्य सम्मेलनको प्रथमा परीक्षा तया फई राष्ट्रीय पाठ- शालाओंकी पाठ्यपुस्तकोंमें और सरकारी युनिरर्सिटियोंको प्राइज लिस्ट में है । इसके अनेकों सस्करण हो चुके हैं। मूल्य ।। २-महात्मा शेखसादी -उपन्यास-मम्राट् श्रीयुक्त "प्रेमचन्द" फारसी भाषाके प्रसिद्ध और शिक्षाप्रद गुलिला पोस्ताके लेखक महात्मा शेषतादीका यडा मनोरंजक और उपदेशमद जीननचरिन तथा नीतिकथाए, गजलें, कसीदे इत्यादिका मोर- अक सग्रह किया गया है । मूल्य । ३-विवेक-वचनावली लेखक-स्वामी विवेकानन्द स्वामी विवेकानन्दजीके बहुमूल्य विचारों और अमूल्य उप देशोंका बडा मनोरक्षक सत्रह । यडी सीधी सादी और सरल भाषामें प्रत्येक चालक, स्रो, वृद्धके पढ़ने तथा मनन करने योग्य है। ४८ पृष्ठोंका मूल्य ४-जमसेदजी नसरवानजी ताता लेखक-स्वर्गीय ५० मन्नन द्विवेदी गजपुरी वी० ए० श्रीमान् धातुर ताताको जोपनी बडी ओजस्विनो भाषामें लिपी गयी है। इस पुस्तकको यू० पी० ओर विहारके शिक्षा विभागने अपने पारितोषिक वितरणमें रखा है। सचित्र पुस्तकका प्रय फेल) -
1 +
१२-चित्रमय श्रीकृष्ण
इस पुस्तकमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी लोलायोंका वर्णन
चित्रोंमें किया गया है। पुस्तकमें एक तरफ कथाका सार और
दूसरी तरफ उसीका चित्र दिया गया है, जिससे चित्रोंको देखकर
ही सर कथा मालूम हो जाती है। पुस्तको ४२ वित्र है। सब
चित्र तिनरगे हैं। पुस्तक कई घार छप चुकी है। सुन्दर मनोहर
सजिल्दका मूल्य हिन्दी ४) बगला ४)
१३-भाव चित्रावली
चित्रकार-श्रीधीरेन्द्रनाथ गगोपाध्याय
इस पुस्तकमें एक ही सजनके विविध मानोंके १०० रंगीन -
और सादे चित्र दिसलाये गये हैं। आप देखेंगे और आश्चर्य
फरेंगे। गगोपाध्याय महाशयने अपनी इस फलासे समाज और
देशकी बहुतसी कुरीतियोंपर घडा जबरदस्त फटाक्ष किया है।
कितायके देखनेसे मनोरञ्जनके साथ साथ आपको शिक्षा भी
मिलेगी। सजिल्द पुस्तकका मूल्य ४)
१४-राम बादशाहके छः हुक्मनामे
स्वामी रामतीर्थजीके छ व्याख्यानोंका सग्रह है। स्वामीजीके
ओजस्वी और शिक्षाप्रद भाषणोंके बारेमें फ्मा फहना है जिसने
अमरीका, जापान और यूरोपमें हलचल मचा दी थी। व्याख्यानों
को पढकर प्रत्येक भारतवासीको शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
स्वामीजीकी भिन्न भिन्न अवस्थाओंके तीन चित्र भी हैं। मूल्य १)
१५-मै नीरोग हूं या रोगी
लेखक-प्रसिद्ध जलचिकित्सक डाक्टर लुईकूने
यदि आप स्वस्थ रहकर आनन्दसे जीवन विताना, डाकृरों,
वैद्यों और हकीमोंके फन्देसे छुटकारा पाना, प्राकृतिक नियमा
नुसार रहकर सुख तथा शान्तिका उपभोग करना चाहते हैं तो
इस पुस्तकको अवश्य पढिये । मूल्य 1)
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