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Shrinityaismarn-pathmala
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विषयानुक्रमणिका । विषय। पृष्ठ १ .... १ २ १० ५ १६ ચર नवकारमंत्र :: :: .. . .. संप्तं स्मरणानि। बृहदजितशान्तिस्मरणम् । लघुअजितशान्तिस्मरणम् । ३ नमिऊण-स्मरणम् । ... ४, गणधरदेवस्तुतिस्मरणम् । : गुरुपारतन्त्रयस्मरणम्। सिग्घमवहरउ-स्मरणम् । उवसग्गहरस्मरणम् । स्तोत्राणि । भक्तामरस्तोत्रम्। वृद्धशान्तिः। जिनपक्षरस्तोत्रम् । ऋषिमण्डलस्तोत्रम्:: श्री गौडीपार्श्व जिन वृद्धस्तवनम् । ६. श्रीगौतमस्वामिजी-रास। २४ २५ '३३ २ .. ३ ४ ४३ •.५६.
. प्रस्तावना: : हर कोई आस्तिक-समाजके लिए प्रभु-भक्ति से बढ़कर और कोई विशेष उपादेय चीज संसारमें नहीं। ईश्वर- भक्ति के अनेक उपायोमें, उनके विविध गुणोंका स्तुति- स्तोत्रों द्वारा स्मरण करना एक मुख्य ओर भवंध्य उपाय है। यही कारण हैं कि हमारे परम-आस्तिकं जैन संप्रदाय के अनेक धुरंधर आचार्योंने विविध भाषाओं में असंख्य स्तुति-स्तोत्रोंकी रचना कर स्वयं भगवद्-भक्तिका अपूर्व लाभ प्राप्त कर अग्य जोवोंके लिए भी उसंका रास्ता सरल कर दिया है। अब आवश्यकता है केवलं उन उत्तम २ स्तुति-स्तोत्रों को और उसे ठीक २ समझनेके लिए अन्यान्य साहित्यके ग्रन्थों को भी प्रकाशित करनेकी, जिससे सर्व कोई सुंगमतासे उसको लाभ ऊंठा सकें। : बड़े आनंद की बात है कि हमारे परम पूज्य, प्रातः- स्मरणीय, बृहत्खरतर-गच्छाचार्य; - व्याख्यान-वाचस्पति, ( २ ) जंगम युगप्रधान भट्टारक श्री १००८ श्री जिन-चारित्र सूरी-. श्वरजी महाराज ने अन्य व्यर्थ आडंबरों में जोरशोरसे बहते हुए जैन-समाज के समय और धन-व्यय के प्रवाह को रोक- कर, उसे साहित्यप्रकाशन के एकांत-पुण्यानुबंधि कार्य में लगानेका निश्चय ही नहीं, बल्कि तदनुसार प्रयत्न भी शुरु कर दिया है, जिसके फल-स्वरूप "श्री अभयदेवसूरि-ग्रन्थ- माला" नामक एक ग्रन्थसीरीज़ भी गत-वर्ष में प्रारंभ कर दी गई है, जिसमें अब तक विविध-विषयकी चार पुस्तकें भी निकल चुकी हैं और कई एक प्रेसमें छप भी रही हैं। यहां पर मैं श्रीयुक्त कोठारी रावतमलजी भेरूदानजी हाकिमको जो कि धनीश होनेपर.भी नम्र, साहित्य-प्रेमी, उदार-प्रकृति, सरल एवं गुढ़ धर्म-रुचि होनेसे जैन-संप्रदाय, के एक भूषण-रूप हैं, अनेकानेक हार्दिक धन्यवाद.देता हूँ कि जिन्होंने उक्त श्रीजी महाराजके इस शुभ प्रयत्न में सर्व प्रथम योग-दान किया है। आपने उक्त ग्रन्थमाला के प्रथम गुच्छकका सर्व-व्यय देकर उसको अमूल्य वितरण किया (३) है; इतना ही नहीं, उस प्रन्यकी प्रथमावृत्ति अल्प-समय में ही वितीर्ण हो जानेसे इस दूसरी आवृत्तिका की सर्व-व्यय उसी उत्साह से देकर अपनीस्वाभाविक उदारता और धर्म- प्रेमका खासा परिचय दिया है। मैं समझता हू, हमारे और भी धनी जैन-भाई यदि ऐसे ही उत्साह से जैन. साहित्योद्धारमें रस लेते हुए अपनी, उदारताका प्रवाह इस दिशा में यहावें, तो जैन-साहित्यकी बहुत कुछ उन्नति होनेमें विशेष समय न लगेगा। आशा है अन्य जैनी भाई भी ऐसे कार्यों में यथाशक्ति सहायता कर पुण्य और यश के भागी होंगे, ताकि इस ग्रन्थमाला के व्यवस्थापक-गण और भी विशेष रूपसे जैन-साहित्य को प्रकाशित करने में समर्थ होंगे। मुझे यह कहते बड़ी खुशी होती है कि हमारे जैन- समाज में भी अव साहित्यकी तरफ विशेष रुचि होने लगी है। थोड़े ही समयमें यह नित्यस्मरण पाठमाला' के प्रथम संस्करण की कापियां खतम होना हो इस बात का ज्वलंत ( ४ ) दृष्टान्त है। इस दूसरे संस्करण में शुद्धता की और विशेष ध्यान दिया गया है और संस्कृत-प्राकृत भापाके अनभिज्ञ पाठकोंको भी शुद्ध उच्चारण करने में सुगमता हो इस हेतुसे पद-च्छेदादि भी यथास्थान किया गया है। इस आवृत्तिमें "श्रीगौतमस्वामिजीका रास" भी जोड़ दिया गया है, जो कि प्रथमावृत्ति में नहीं था। संशोधन-कार्य में विशेष ध्यान देने पर भी मेरे दृष्टि- दोष से या प्रेस के भूतोंके कारण संभव है कोई भूलें रह गई हों, पाठक-गण से नन प्रार्थना है कि वे उसे सुधार कर पढ़नेका अनुग्रह करें। विःत- संशोधक।
हाकम कोठारौ श्रीयुक्त भेरुदान जौ
बीकानेर निवासी
वर्तमान कलकत्ता
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॥श्री नित्यस्मरण-पाठमाला॥ ॥ अथ नवकार-मन्त्र । णमो अरिहंताणं॥१॥ णमो सिद्धाणं ॥२॥ णमो आयरियाणं ॥३॥ णमो उवझायाणं ॥४॥ णमो लोए सव्व-साहूणं ॥५॥ एसो पंच-णमुक्कारो ॥६॥ सव्व- पाव-प्पणासणो ॥ ७॥ मंगलाणं च सव्वेसिंदा पढौ हवइ मंगलं॥६॥ इति ॥ ॥ अथ सप्त स्मरणानि प्रारभ्यन्ते ॥ ( १ ) .॥ प्रथम श्रीबृहदजितशान्तिस्मरणम् ।। ॥ अजिअं जिअ-सव्व-भयं, संतिं च पसंत-सव्व-गय- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। पावं। जय-गुरु-संति-गुणकरे, दोवि जिणवरे पणिवयामि ॥१॥ (गाहा) ॥ ववगय-मंगुल-भावे, ते हं विउल-तव- निम्मल-सहावे। निरुवम-मह-प्पभावे, थोसामि सुदिट्ठ- समावे॥२॥ (गाहा)॥ सव्व-दुक्ख-पसंतीणं, सव्व- पाव-प्पसंतिणं । सया अजिय-संतीणं, नमो अजिअ- संतिणं ॥३॥ (सिलोगो) ॥ अजिय! जिण! सुह- प्पवत्तणं, तव पुरिसुत्तम! नाम-कित्तणं। तह य धिइ- मइ-प्पवत्तणं, तव य जिणुत्तम ! संति! कित्तणं ॥४॥ (मागहिया)॥ किरिआ-विहि-संविअ-कम्म-किलेस-विमु- क्खयर, अजिअं निचिअंच गुणेहिं महामुणि-सिद्धि-गयं । अजिअस्स य संति-महा-मुणिणोवि अ संतिकर, सययं मम निव्वुइ-कारणयं च नमसणयं ॥ ५॥ (आलिंगणयं)। पुरिसा! जइ दुक्ख-वारणं, जइ अ विमग्गह सुक्ख-कारणं। अजिअं संतिं च भावओ, अभयकरे सरणं पवजह ॥६॥ (मागहिआ)॥ अरइ-रइ-तिमिर-विरहिअमुवरय-जर-मरणं, सुर-असुर गरुल-भुअगवइ-पयय-पणिवइ । अजिअमह- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। मवि अ सुनय-नय-निउणमभयकर, सरणमुवसरिअ भुवि-दिविज-महि सययमुवणमे ॥७॥ (संगययं )। तंच जिणुत्तममुत्तम-नित्तम-सत्तधर, अजव-मद्दव-खंति-विमु- त्ति-समाहि-निहिं । संतिकरं पणमामि दमुत्तम-तित्थयरं, संति-मुणी मम संति-समाहि-वरं दिसउ ॥८॥ (सोवाणयं) सावत्थि-पुत्र-पत्थिवंच वर-हत्थि-मत्थय-पसत्य-वित्यिन- संथि, थिर-सरिच्छ-वच्छं मयगल-लीलायमाण-वर- गंध-हत्थि-पत्थाण-पत्थियं संथवारिहं। हस्थि-हत्य-वाहु- धंत-कणग-रुअग-निरुवहय-पिंजरं, पवर-लक्षणोवचित्र- सोम-चारु-रूवं, सुइ-सुह-मणाभिराम-परम-रमणिज-वर- देव-दुन्दुहि-निनाय-महुरयर-सुह-गिरं ॥६॥ (वेढओं)॥ अजिअं जिआरि-गणं, जिअ-सव्व-भयं भवोह-रिडं। पण- मामि अहं पयओ, पावं पसमेड मे भयवं. ॥ १० ॥ (रासालुद्धओ) ॥ कुरु-जणवय-हत्यिणाउर-नरीसरो पढम तओ महा-चक्रवटि-भोए मह-प्पभावो,जो बावत्तरिस्पुर-वर- सहस्स-वर-णगर-णिगम-जणवय-वई, वत्तीसा-रायवर-सह- ४ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। स्साणुयाय-मग्गो, चउदस-वर-रयण-नव-महानिहि-चउस- हि-सहस्स-पवर-जुवईण सुन्दर-वई, चुलसी-हय-गय-रह- सय-सहस्स-सामी, छन्नवइ-गाम-कोडि-सामी आसिजो भारहम्मि भयवं ॥ ११॥ (वेढओ) |तं संतिं संतिकरं, संतिण्णं सव्व-भया। संति थुणामि जिणं, संति विहेउ मे ॥ १२॥ (रासानंदिययं) ॥ इक्खागु-विदेह-नरीसर! नर-वसहा ! मुणि-वसहा !,नव-सारय-ससि-सकलाणण! विगय-तमा! विहुअ-रया!। अजिउत्तम-तेअ-गुणेहि महा- मुणि-अमिय-बला! विउल-कुला!, पणमामि ते भव-भय- मूरण ! जग-सरणा! मम सरण॥ १३ ॥ (चित्तलेहा) ॥ देव-दाणविन्द-चन्द-सूर-वन्द!हह-तुट्ठ-जिट्ठ-परम, लट्ठ-रुव! धंत-रुप्प-पट्ट-सेअ-सुद्ध-निद्ध-धवल, दंति-पंति! संति! सत्ति-कित्ति-मुत्ति-जुत्ति-गुत्ति-पवर !, दित्त-तेअ-वंद-धेअ! सव्व-लोअ-भाविअ-प्पभाव-णेय! पइस मे समाहिं ॥१४॥ (नारायओ)॥विमल-ससि-कलाइरेअ-सोम, वितिमिर-सूर- कराइरेअ-ते । तियसवइ-गणाइरेअ-रूवं, धरणिधर- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । पवराइरेअ-सारं ॥ १५॥ (कुसुमलया)॥ सत्ते य सया अजिअं सारीरे अ चले अजि। तव-संजमे य अजिरं, एस थुणामि जिणमजिअं ॥१६॥ (भुअगपरिरंगियं)॥ सोम- गुणहि पावइ नतं नव-सरय-ससी, तेअ-गुणेहि पावइ न तं नव-सरय-रवी । स्व-गुणेहि पावइन तं तिअस-गण-वई, सार-गुणेहिं पावइ न तंधरणि-धर-बई ॥१७॥ (खिजिअयं)। तित्थ-वर-पवत्तयं तम-रय-रहिअं, धीर-जण-शुभच्चिअंचुअ- कलि-कलुसं । संति-सुह-प्पवत्तयं ति-गरण-पयओ, संतिमहं महामुणि सरणमुवणमे ॥ १८ ॥ (ललिअयं)॥ विणओ- णय-सिरि-रइअंजलि-रिसि-गण-संथुरं थिमिश्र, विधु- हाहिव-धणवइ-नरवइ-थुअ-महिअच्चियं बहुसो । अइरु- ग्गय-सरय-दिवायर-समहिअ-सप्पमं तवसा, गयणंगण- विअरण-समुइय-चारण-वंदिरं सिरसा ॥ १६ ॥ (किस- लयमाला)।। असुर-रुल-परिवन्दिअं, किन्नरोरग-णमंसि। देव-कोडि-सय-संथुरं, समण-संघ-परिवंदिरं ॥ २० ॥ (सुमुहं ) ।। अभयं अणह, अरयं अरुयं । अजिअं अजि, ६ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। पयओ पणमे ॥ २१॥ (विजु विलसिओं)॥ आगया वर- विमाण-दिव्व-कणग-रह-तुरय-पहकर-सएहिं हुलिअं। ससंभमोअरण-खुमिअ-लुलिय-चल-कुण्डलंगय-तिरीड-सो- हन्त-मउलि-माला ॥२२॥ (वेढओ) ॥ जं सुर-संघा सासुर-संघा वेर-विउत्ता भत्ति-सुजुत्ता, आयर-भूसिम- संभम-पिडिअ-सुट्ट-सुविम्हिय-सव्व-बलोघा । उत्तम-के- चण-रयण-परूविअ-भासुर-भूसण-भासुरिअंगा, गाय-समो-. णय-भत्ति-वसागय-पंजलि-पेसिअ-सीस-पणामा ॥२३॥ (रयणमाला)॥ वंदिऊण थोऊण तो जिण', तिगुणमेव य पुणो पयाहिण। पणमिऊण य जिणं सुरासुरा, पमुइआ स-भवणाई तो गया ॥ २४ ॥ (खित्तयं)॥ तं महामुणि- महंपि पंजली, राग-दोष-भय-मोह-वजि। देव-दाणव- नरिंद-बंदिसं, संति-मुत्तम-महातवं नमे ॥ २५ ॥ (खित्तयं)॥ अंवरंतर-वियारणिआहिं, ललिअ-हंस-बहू- गामिणिआहिं। पीण-सोणि-थण-सालिणिहि, सकल- कमल-दल-लोअणिमाहि ॥ २६ ॥ (दीवयं)॥ पोण-निरं- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। तर-थण-भर-विणमिअ-गाय-लयाहि', मणि-कञ्चण-पसि- दिल-मेहल-सोहिअ-सोणि-तडाहिं। वर-खिंखिणि-नेउर- सतिलय-वलय-विभूसणियाहि', एकर-चउर-मणोहर- सुन्दर-दंसणियाहिं ॥ २७॥ ॥ (चित्तखरा) ॥ देव-सुन्दरी हिं पाय-धन्दिआहि, वन्दिा य जस्स ते सुविकमा कमा, अप्पणो निडालएहिं मंडणोडुण-पगारएहि केहि केहि वि अवंग-तिलय-पत्त-लेह-नामपहि चिल्लएहिं संगयं- गयाहिं, भत्ति-सन्निविट्ठ-बंदणागयाहिं हुन्ति ते वंदिया पुणो पुणो ॥२८॥ (नारायओ) ॥ तमहं जिणचंद, अजिथं जिभ-मोहं । धुअ-सव्व-किलेसं, 'पयमो पण- मामि ॥ २६ ॥ (नंदिभयं) ॥ थुअ-चंदिअस्सा रिसि-गण- देव-गणेहिं, तो देव-वहूहिं पयओ पणमिअस्सा। जस्स: जगुत्तम-सासणअस्सा, भत्ति-वसांगय-पिडिअाहिं । देव-वरच्छरसा-बहुआहिं, सुर-वर-रुइ-गुण-पंडिअआहि ॥ ३० ॥ (भासुरयं) । वंस-सह-तंति-ताल-मेलिए,..तिउ- क्खराभिराम-सह-मीसए कए अ, सुइ-समाणणे अ' सुद्ध- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। सज-गीअ-पाय-जाल-घंटिआहि, वलय-मेहला-कलाव-नेउरा-- भिराम-सह-मीसए कए य देव-नटिआहि, हाव-भाव-विभम- प्पगारएहिं, नञ्चिऊण अंग-हारएहिं वन्दिआ य जस्स ते सुविकमा कमा, तयं तिलोय-सव्व-सत्त-सन्ति-कारयं, पसंत-सव्व-पांव-दोसमेस हं नमामि संतिमुत्तमं जिणं ॥ ३१ ॥ (नारायओ)॥ छत्त-चामर-पडाग-जूअ-जव-मंडि- आ, भय-वर-मगर-तुरग-सिरिवच्छ-सुलंछणा । दीव- समुद्द-मंदर-दिसागय-सोहिआ, सत्थिय-वसह-सीह-रह- चक्क-वरंकिया ॥ ३२ ॥ ( ललिअयं )॥ सहाव-लट्ठा सम-प्पइट्ठा, अदोस-दुट्ठा गुणेहि जिहा पसाय-सिट्ठा तवेण पुट्ठा, सिरीहिं इट्ठा रितीहिं जुट्टा ॥ ३३ ॥ (वाणवासिआ) ॥ ते सवेण धुअ-सव्व-पावया, सव्व-लोअ-हिअ-मूल-पावया। संथुआ अजिय-सन्ति-पायया, होतु मे सिव-सुहाण दायया ॥ ३४॥(अपरान्तिका)॥ एवं-तव-बल-विउलं,थुअं मए अजिअ-संति-जिण--जुअलं । ववगय-कम्म-रय-मलं, गई गयं सासयं विउलं ॥३५॥ (गाहां ) ॥ तं बहु-गुण-प्प- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । ह सायं, मुक्ख-सुहेण परमेण अविसायं। नासेउ मे विसायं, कुगड अ परिसावि अ पसायं ॥३६॥ (गाहा)॥ तं मोएर अनंदि, पावेउ अ नंदिसेणमभिनंदि। परिसाइवि सुहनंदि, मम य दिसउ संजमे नंदि ॥ ३७॥ ( गाहा )। पक्खिा चाउम्मासे, *संवच्छरिए अ अवस्स-भणिअन्यो। सोअन्चो सम्बेहिवि, उवसग्ग-निवारणो एसो॥ ३८ ॥ जो पढइ जो अनिसुणइ, उभओ-कालंपि अजिय-सन्ति-थयं । न हु हुन्ति तस्स रोगा, पुन्बुप्पन्ना विनासन्ति ॥ ३९ ॥ जइ इच्छह परम-पयं, अहवा कित्तिं सुवित्थडं भुवणे । ता तेलु- कुद्धरणे, जिण-वयणे आयरं कुणह ॥ ४० ॥ इति श्रीवृहदजितशान्तिस्तवनं प्रथम स्मरणम् ॥१॥ * "संवच्छर राईए अदिअहे अ" इति पाठान्तरम् ।
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। (२) ॥ अथ द्वितीयं लघु-अजितशान्तिस्मरणम् ॥ . उल्लासि-कम-नक्ख-निग्गय-पहा-दण्ड-च्छलेणंगिणं, वंदारूण दिसंतइव्व पयर्ड निव्वाणमग्गावलिं। कुन्दिन्दुजल- दन्त-कन्ति-मिसओ नीहन्त-नाणंकुरु करे दावि दुइज- सोलस-जिणेथोसामिखेमङ्करें।शाचरम-जलहि-नीरंजो मि- णिजअलोहि, खय-समय-समोरं जो जिणिजागईए । सयल- नहयलं वा लवए जो पएहिं, अजियमहव सन्ति सो समत्थो थुणेउं ॥२॥ तहवि हु बहु-माणूल्लास-भत्ति-ब्भरण, गुण- कणमिव कित्तेहामि चिन्तामणि व्व । अलमहव अचिन्ता- णन्त-सामत्थओसिं फलिहइ लहु सव्वं वंछिअंणिच्छिों मे ॥३॥ सयल-जय-हिआणं नाम-मित्तेण जाणं, विहडइ लहु दुट्ठानिट्ठ-दोघट्ट-थटुं । नमिर-सुर-किरीडुग्घिट्ट-पायारविन्दे, सययमजिअ-सन्ती ते जिणन्देभिवन्दे ॥४॥ पसरइ वर-कित्ती वड्ढए देह-दित्ती, विलसइ भुवि मित्ती जायए श्री नित्यस्मरणा-पाठमाला। ११ सुप्पवित्ती। फुरइ परम-तित्ती होइ संसार-छित्ती, जिण- जुअ-पय-भत्ती हीअ-चिंतोर-सत्ती ॥५॥ ललिअ-पय-पयार भूरि-दिव्यंग-हार, फुड-घण-रस-भावोदार-सिंगार-सारं। अणिमिस-रमणिज दंसण-च्छेअ-भीया, इव पुण मणि- बंधाकास-नहोवयारं ॥६॥ थुणह अजिभ-संती ते कया- सेस-संती, कणय-रय-पसंगा उजए जाणि मुत्ती । सरभस- परिरंभारंभि-निव्वाण-लच्छी, घण-थण-घुसिणिक्कुप्पंक- पिंगीकयच ॥७॥ यहुविह-नय-भंगं वत्थु णिच्चं अणिय', सदसदभिलप्पालप्पमेगं अणेगं । इय कुनय-विरुद्ध सुप्प- सिद्धच जेसिं, वयणमवयणिज ते जिणे संभरामि ॥८॥ पसरइ तिय-लोए ताव मोहंधयार, भमइ जयमसण्णं ताव मिच्छत्त-छपणं । फुरइ फुड-फलंताणंत-णाणंसु-पूरो, पयड- मजिय-संति-भाण-सूरोन जावा अरि-करि-हरि-तिण्हु- ण्हवु-चोराहि-वाही,समर-डमर-मारीरुद्द-खुद्दोवसग्गा। पल- यमजिभ-संती-कित्तणे झत्तिजंती, निविडतर-तमोहाभक्ख- रालुंखिअन्व ॥ १०॥ निचिअ-दुरिंभ-दारु-दित्त-झाणग्गि- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। जाला-परिगयमिव गोरं, चिंतिअंजाण एवं । कणय-निहस- रेहा-कति-चोर करिजा, चिर-थिरमिहलच्छिं गाढ-संथंभि- अन्च ॥११॥ अडवि-निवडियाणं पत्थिवुत्तासिआणं, जलहि- लहरि-हीरताण . गुत्ति-ट्ठियाणं । जलिअ-जलण-जाला- लिंगिआणच माण', जणयइ लहु संतिं संतिनाहाजिआण ॥१२॥ हरि-करि-परिकिण्ण पक्क-पाइक-पुन्नं, सयल-पुहवि- रज'छडिआण-सज । तणमिव पडिलग्गंजे जिणा मुत्ति- मग्गं, चरणमणुपवना हुतु ते मे पसन्ना ॥ १३ ॥ छण-सलि- वयणाहिं फुल्लु-नित्तुप्पलाहिं, थण-भर-नमिरीहिं मुट्ठि- गिज्मोदरीहिं । ललिअ-भुअ-लयाहिं पीण-सोणि-स्थलाहिं, सम-सुर-रमणीहिं वंदिआ जेसि पाया ॥ १४ ॥ अरिस- किडिभ-कुट्ठ-गंठि-कासाइसारा, खय-जर-वण-लूआ-सास- सोसोदराणि । नह-मुह-दसणच्छी-कुच्छि-कन्नाइ-रोगे, मह जिण-जुअ-पाया सुप्पसाया हरंतु ॥ १५॥ इअ गुरु-दुह- तासे पक्खिए चाउमासे, जिणवर-दुग-थुत्तं वच्छरे वा पवित्तं। पढह सुणह सिझाएह झाएह चित्ते, कुणह . श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। १३ मुणह विग्धं जेण घाएह सिग्धं ॥ १६ ॥ इय विजयाऽजिअ- सत्तु-पुत्त! सिरि-अजिअ-जिणेसर!, तह अइरा-विस- सेण-तणय! पंचम-चक्कीसर! । तित्थंकर! सोलसम! संति! जिण-बल्लह-संथुअ!, कुरु मंगलमवहरसु दुरियम- खिलपि धुणंतह ॥ १७ ॥ इति श्रीलघु-अजितशान्तिस्तवनं द्वितीयं स्मरणम् ॥२॥ ॥ अथ नमिऊणनामकं तृतीयं स्मरणम् ॥ नमिऊण पणय-सुर-गण, चूडामणि-किरण-रजिअं मुणिणो। चलण-जुअलं महाभय, पणासणं संथवं वुच्छं ॥१॥ सडिय-कर-चरण-नह-मुह,-निवुड-नासा विवन- लायण्णा । कुछ-महा-रोगानल,-फुलिंग-निद्दड्ढ-सव्वंगा॥२॥ ते तुह चलणा-राहण,-सलिलंजलि-सेभ-वुड्ढिअ-च्छाया। वण-दव-दड्ढा.गिरि-पाययन्व पत्ता पुणो लच्छिं ॥३॥ दुव्वाय-खुभिय-जलंनिहि,-उभड-कल्लोल-भीसणारावे । सं- १४ 'श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। - भंत-भय-विसंठुल,-निजामयं-मुक्क-वावारे ॥४॥ अविदलिय- जाणवत्ता, खणेण पावंति इच्छिअंकूल। पास-जिण-चलण- जुअलं, निच्चं चिजे नमति नरा ॥५॥ खर-पवणुद्धय-वण- दव,-जालावलि-मिलिय-सयल-दुम-गहणे। डझत-मुद्ध- मिय-वहु,-भीसण-रव-भीमणम्मि वणे ॥ ६॥ जग-गुरुणो कम-जुअलं, निग्वाविय-सयल-तिहुअणाभो। जे संभरंति मणुअा, न कुणइ जलणो भयं तेसिं ॥ ७॥ विलसंत-भोग- भीसण,-फुरिआरुण-नयण-तरलं-जीहालं.। उग्ग-भुअंग नव-जलय,सच्छहं भीसणायारं ॥८॥ मन्नति कीड- सरिसं, दूर-परिच्छूढ-विसम-विस-वेगा। तुह · नाम- 'क्खर-फुड-सिद्ध, मंत-गुरुआ नरा लोए ॥६॥. अडवीसु मिल्ल-तकर,-पुलिंद-सद्दूल-सह-भीमासु । भय-विहुर- बुन्न-कायर, उल्लरिअ-पहिअ-सत्थासु ॥ १० ॥ · अविलुत्त- विहव-सारा, तुह नाह ! पणाम-मत्त-वावारा । ववगय- विग्घा सिग्धं, पत्ता हिय इच्छियं ठाणं.॥ ११॥ पजलिआ- नल-नयणं, दूर-विआरिय-मुहं महाकायं । नह-कुलिस-घाय- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। १५. विअलिअ-गईद-कुभ-स्थलाभो॥ १२॥ पणय-ससंभम- पत्थिव,-नह-मणि-माणिक-पडिअ-पडिमस्स। तुह-वयण- पहरणधरा, सीहं कुद्धपि न गणति ॥ १३ ॥ ससि-धवल- दंत-मुसलं, दीह-कल्लाल-वड्ढिउच्छाहं । महु-पिंग- नयण-जुअलं, ससलिल-नव-जलहरारावं ॥१४॥ भीम महा-गई'दं, अध्यासन्नंपि ते नवि गणंति। जे तुम्ह चलण- जुअल मुणिवइ ! तुंगं समल्लीणा ॥ १५॥ समरम्मि तिक्ख- खग्गा,-भिग्घाय-पविद्ध-उधुय-कबंधे । कुत-विणिभिन्न- करि-कलह-मुक्क सिक्कार-पउरम्भि।।१६ ॥ निजिय-दप्पुद्धर- रिउ, नरिंद-निवहा भडा जसं धवलं । पावंति पाव- पसमिण! पास-जिण! तुह प्पभावेण ॥ १७ ॥ रोग-जल- जलण-विसहर-चोरारि-मईद-गय-रण-भयाई। पास-जिण- नाम-संकित्तणेण पसमंति सव्वाई' ॥१८॥ एवं 'महा- भयहरं, पास-जिणिंदस्स संथवमुआरं । णंदयर, कल्लाण-परंपर-निहाणं ॥१६॥ राय-भय-जक्ख- रक्खस, कुसुमिण-दुस्सउण-रिक्ख-पीडासु। संझासु भविय-जणा- १६ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। दोसु 'थे, उवसग्गे तह य रयणीसु ॥ २० ॥ जो पढइ जो अनिसुणइ, ताणं कइणो य माणतुंगस्स । पासो पा पसमेट; सयल-भुंवणञ्चिम-चलणो॥२१॥ इति श्रीपार्श्वजिनस्तवनं तृतीयं स्मरणम् ॥ ( ४ ) अथ गणधरदेव-स्तुतिरूपं चतुर्थ स्मरणम् ।। तं जयउ जए तित्थ', जमित्य तित्थाहिवेण वीरेण । सम्मंपवत्तियं भव्व-सत्त-संताण-सुह-जणयं ॥ १॥ नासिय- सयल-किलेसा, निहय-कुलेसा पसत्य-सुह-लेसा। सिरि- वद्धमाण-तित्थस्ल मङ्गलं दिन्तु ते अरिहा ॥ ३ ॥ निद्दड्ढ- कम्म-बीआ, बीआ परमेट्ठिणो गुण-समिद्धा सिद्धा ति-जयः पसिद्धा, हणन्तु दुत्थाणि तित्यस्ल ॥३॥ आयारमायरता, पंच-पयारं सया पयासन्ता । आयरिआ तह तित्थ, निहयः कुतित्थं पयासन्तु ॥४॥ सम्म-सुअ-वायगा वायगाय सि- अवाय-वायगावाए। पवयण-पडणीय-कएऽवणिंतु सव्वस्स।
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। सङ्घस्स ॥ ५॥ निव्वाण-साहणुज्जुय-साहूणं जणिय-सव्व- साहजा। तित्थ-प्पभावगा ते हवंतु परमेट्ठिणो जइणो ॥६॥ जेणाणुगयं णाणं निव्वाण-फलं च चरणमवि हवइ । तित्थ- स्स दसणं तं मंगुलमवणेउ सिद्धियरं ॥७॥ निच्छउमो सुअ- धम्मो, समग्ग-भवंगि-घग्ग-कय-सम्मो । गुण-सुटिअस्स संघस्स. मंगलं सम्ममिह दिसउ ॥८॥ रम्मो चरित्त- धम्मो,संपाविअ-भव-सत्त-सिव-सम्मो।नीसेस-किलेसहरो, हवउ सया सयल-संघस्स ॥ ६ ॥ गुण-गण-गुरुणो गुरुणो, सिव-सुह-मइणो कुणंतु तित्यस्स । सिरि-वद्धमाण-पहु- पयडिअस्स कुसलं समग्गस्स ॥ १० ॥ जिय-पडिवक्ता जक्खा, गोमुह-मायङ्ग-गयमुह-पमुक्खा। सिरि-बम्भसन्ति- सहिआ,.कय-नय-रक्खा सिवं दिंतु ॥ ११॥ अंबा पडिहय- डिम्बा; सिद्धा सिद्धाइया पवयणस्स। चक्केसरि-वइरुट्टा, सन्ति-सुरा दिसड़ सुक्खाणि ॥१२॥ सोलस विजा-देवीउ, दिन्तु सङ्घस्स मङ्गलं विउलं । अच्छुत्ता-सहिमाओ, विस्सुअ-सुयदेवयाइ समं ॥१३॥ ज़िण-सासण-कय-रक्खा, १८ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। जक्खा चउवीस-सासण-सुरावि । सुहभावा: संतावं, तित्थस्ससया पणासन्तु ॥ १४॥ जिण-पवयणम्मि निरया, विरया कुपहाउ सव्वहा सव्वे । वेयावच्चकरावि अ, तित्थ- स्सं हवन्तु सन्तिकरा ॥ १५॥ जिण-समय-सिद्ध-सुमग्ग- वहिय-भव्वाण जणिय-साहजो। गीयरई गीअजसो, सप- रिवारो सिवं दिसउ ॥१६॥ गिह-गुत्त-खित्त-जल-थल-वण- पव्वयवासी देव-देवीओ । जिण-सासंण-द्विआणं, दुहाणि सव्वाणि निहणंतु ॥१७॥ दस-दिसिपाला स-क्खित्तपाल- या नव ग्गहा स-नक्खत्ता । जोइणि-राहु-ग्गह-काल-पास- कुंलिंअद्ध-पहरेहिं ॥ १८ ॥' संहकाल-कंटएहिं सविटि- वच्छेहि कालवेलाहिं।. सव्वे सव्वत्थ सुह, दिसन्तु सव्व- स्स सङ्घस्स ॥१६॥ भवणवई वाणमन्तर,-जोइस-वेमा- णि यजे देवा । धरणिन्द-सक्क-सहिआ, दलन्तु दुरियाई तित्थस्स ॥ २०॥ चक्कं जस्सं जलंत, गच्छई पुरओ पणा- सिंय-तमोह। तित्थस्स भगवओ, नमो नमो वद्धमाणस्स ॥ २१ ॥ सो जयउ जिणो वीरो, जस्सज वि सासणं जए .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। १६ . जयइ । सिद्धि-पह-सासणं कुपह-नासणं सव्व-भय-महणं ॥ २२॥ सिरि-उसमसेण-पमुहा, हय-भय-निवहा दिसन्तु तित्थस्स । सव्व-जिणांण गणहारिणोऽणहं वछियसव्व ॥ २३ ॥ सिरि-वद्धमाण तित्थाहिवेण तित्थं समप्पिय जस्स। सम्मं सुहम्म-सामी, दिसउ सुहंस यल-संघस्स ॥२४॥पयईए भहिया जे, भद्दाणि दिसन्तुसयल-संघस्स। इयर-सुरा वि हु सम्मं जिण-गणहर-कहिय-कारिस्स ॥२५॥ इय जो पढ़इ तिसंझ, दुस्सझ तस्स नत्थि किंपि जए। जिणदत्ताणाए ठिओ, सनिटिअट्ठो सुही होई ॥ २६ ॥ इति श्रीगणधरदेवस्तुतिनामकं चतुर्थं स्मरणम् ॥ ४॥ (५). ।। अथ गुरुपारतन्त्र्यनामकं पञ्चमं. स्मरणम् ॥ मय-रहिय गुण-गण-रयण, सायरं सायर पणमिऊण । सुगुरु-जण-पारतंतं, उवहिव्व थुणामि तं चेव ॥ १.॥ निम्म- हिय-मोह-जोहा, निहय-विरोहा पण?-संदेहा। पणय गि-वग्ग- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । दाविअ-सुह-संदोहा सुगुण-गेहा ॥ २॥ पत्त-सुजइत्त-सोहा, समत्त-पर-तित्थ-जणिय-संखोहा । पडिभग्ग-मोह-जोहा, दं- सिम-सुमहत्थ-सत्योहा॥शापरिहरिअ-सत्थ-वाहा, हय-दुह- दाहा सिवंच-तरु-साहा । संपाविअ-सुह-लाहा, खीरोदहिणु- व्व अग्गाहा ॥४॥ सुगुण-जण-जणिय-चुजा सजो निरवज- गहिय-पव्वजा। सिव-सुह-साहण-सजा, भव-गिरि-गुरु-चूरणे वजा ॥ ५॥ अज-सुहम्म-पमुहा, गुण-गण-निवहा सुरिंद-वि- हिअ-महा। ताण तिसंझनाम, नामनपणासइ जियाणं ॥६॥ पडिवजिअ-जिण-देवो, देवायरिओ दुरंत-भवहारी। सिरि. नेमिचन्द-सूरी उज्जोअण-सूरिणो सुगुरू ॥७॥ सिरि-वद्धमाण- सूरी, पयडोकय-सूरि-मंत-माहप्पो । पडिहय-कसाय-पसरो, सरय-ससङ्कुच्च सुह-जणओ ॥ ८॥ सुह-सील-चोर-चप्परण- पञ्चलो निश्चलो.जिण-मयस्मि । जुगपवर-सुद्ध-सिद्धन्त-जाण- ओ पणय-सुगुण-जणो ॥६॥ पुरओ दुल्लह-महिव,-लहस्स अणहिल्लवाडए पयर्ड।मुक्काविआ रिऊणं, सीहेणवदव्वलिंगि- गया ॥ १०॥ दसमच्छेरय-निसि-विष्फुरन्त-सच्छन्द-सूरि- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। २१ मय-तिमिरं । सूरेणव सूरि-जिणे, सरेण हय-महिम-दोसेणं ॥११॥ सुकइत्त-पत्त-कित्ती, पयडिअ-गुत्ती पसन्त-सुह-मुत्ती पहय-परबाइ-दित्ती, जिणचंद-जईसरो मंती ॥ १२ ॥ पयडिअ-नवंग-सुत्तत्य, रयणुक्कोसो पणासिअ-पओसी। भव-भीय-भविअ-जण-मण, कय-संतोसोविगय-दोसो॥३॥ जुग-पवरागम-सार,-प्परूवणा-करण-वन्धुरो प्रणि । सिरि-अभयदेव-सूरी, मुणि-पवरो परम-पसम-धरो ॥ १४ ॥ कय-सावय-संतोसो, हरिव सारंग-भग्ग-संदेहो। गय- समय-दप्प-दलणो, आसाइय-पवर-कव्व-रसो॥१५॥ भीम- भव-काणणम्मि अ, दंसिअ-गुरु-चयण-रयण-सन्दोहो । नीसेस-सत्त-गुरुओ, सूरी जिणवल्लहो जयइ. ॥ १६ ।। उवरिडिअ-सञ्चरणो, चउरणुओग-प्पहाण-सच्चरणो। असम- मयराय-महणो, उड्ढ-मुहो सहइ जस्स करो ॥१७॥ दंसिस- निम्मल-निश्चल,-दन्त-गणोगणिअ-सावओत्य-भओ । गुरु- गिरि-रुओ सरहुव्व, सूरी जिणवल्लहो होत्या ॥ १८ ॥ जुग-पवरागम-पीऊस-पाण-पीणिय-मणा कया भव्वा २२ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला जेण जिणवल्लहेणं, गुरुणा तं सव्वहा चंदे ॥ १६ ॥ विप्फु- रिय-पवर-पवयण, सिरोमणी बूढ-दुव्वह-खमो य। जो सेसाणं सेसुव्व, सहइ सत्ताण ताणकरो॥२०॥ सञ्चरिआण- महीणं, सुगुरूणं पारतन्तमुव्वहइ । जयइ जिणदत्त-सूरी, सिरि-निलओ पणय-मुणि-तिलओ ॥ २१ ॥ इति श्रीगुरूपारतन्त्रयनामकं पञ्चमं स्मरणम् ॥५॥ (६) ॥ अथ षष्ठं स्मरणम् ॥ सिग्घमवहरउ विग्धं, जिण-वीराणाणुगामि-संघस्स । सिरि-पास-जिणो थंभण-पुर-डिओ निद्विआनिहो ॥ १ ॥ गोयम-सुहम्म-पमुहा, गणवइणो विहिअ-भव्व-सत्त-सुहा । सिरि-वद्धमाण-जिण-तित्य-सुत्थयं ते कुणन्तु सया ॥२॥ सकाइणो सुरा जे, जिण-घेयावञ्च-कारिणो संति। अवह- रिय-विग्ध-संघा, हवन्तु ते संघ-सन्तिकरा ॥३॥ सिरि- थंभणय-ट्ठिय-पास-सामि-पय-पउम-पणय-पाणोण। नि-
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला ।
-
इलिय-दुरिय-विंदो,धरणिदो हरउ दुरियाई-10. गोमुह-
पमुक्ख जक्खा, पडिहय-पडिवक्ख-पक्ख-लक्खा ते ।
कय-सगुण-सांघ-रक्खा, हवन्तु संपत्त-सिव-सुक्खा ॥५॥
अप्पडिचक्का-पमुहा, जिण-सामण देवया वि जिण-पणया।
सिद्धाइया-समेया, हवन्तु संघस्स विग्घहरा ॥६॥ सकाए-
सा सचउर-पुरडिओ वद्धमाण-निण-भत्तो । सिरि-वम्भ-
सन्ति-जक्नो, रक्खउ संघं पयत्तेण ॥ ७ ॥ खित्त-गिह-गुत्त-
सन्ताण-देस-देवाहिदेवया ताओ । निव्वुइ-पुर-पहिआणं,
भव्याण कुणंतु सुक्खाणि ॥ ८॥ चकसरि-चकघरा, विहि-
पहरिउच्छिण्ण-कन्धराधणियं । सिव-सरण-लग्ग-सङ्घस्स,
सव्वहा.हरउ विग्याणि ॥ ६॥ तित्यवइ-वद्धमाणो, जिणेसरो
सङ्गओसुसंघेण । जिणचन्दोऽभयदेवो, रक्खउ जिणवल्लह-
पह मं ।। १०.॥ सो जयउ वद्धमाणो, जिणेसरो दिणेसरो
व्व हय-तिमिरो। जिणचंदा-ऽभयदेवा, पहुणो जिणवल्लहा जे
अ॥१॥ गुरु-जिणवल्लह-पाए,-ऽभयेदेव-पहुत्त-दायगे वंदे।
जिणचन्द-जिणेसर-वद्धमाण-तित्यस बुड्ढि-कए ॥ १२ ॥
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। जिणदत्ताणं सम्म, मन्नन्ति कुणन्ति जे य कारति । मणसा वयसा उसा, जयंतु साहम्मिआ ते वि॥ १३ ॥ जिणदत्त- गुणे नाणाइपो सया जे धरन्ति धारन्ति । दंसिभ- सिवाय-पए, नमामि साहम्मिआते वि ॥१४॥ इति षष्ठं स्मरणम् ॥ ६॥ ( ७ ) ॥ अथ उवसग्गहरनामकं सप्तमं स्मरणम् ॥ उवसग्गहरं पास, पासंबंदामि कम्म-घण-मुकं । विसहर- विस-निन्नास, मंगल-कल्लाण-आवासं ॥ १॥ विसहर- फुलिंग-मंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गह-रोग- मारी, दुह-जरा जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामी वि बहु-फलो होइ। नर-तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख-दोगचं ॥ ३॥ तुह सम्मत्ते लद्ध, चिन्तामणि-क्रप्प-पायवभहिए। पावंति अविग्येणं, जीवा अयरामरं ठाणं ॥ ४ इअ संथुओ महायस !, मत्ति-भर- श्री.नित्यस्मरण-पाठमाला। २५ निभरण हिभएण । ता देव! दिज बोहि, भवे भवे पास! जिण-चंद!॥५॥ इति श्रीपार्श्वजिनस्तवनं सप्तमं स्मरणम् ॥७॥ समाप्तानि सप्त स्मरणानि । ( १ ) अथ श्रीभक्तामर स्तोत्रम् । भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा,-मुद्द्योतकं दलित- पाप-तमो-वितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिन ! पाद-युगं युगादा, वालम्वनं भव-जले पततां जनानाम् ॥१॥ यःसंस्तुतः सकल-वाङ्मय-तत्त्व-योधा,-दुद्भूत-धुद्धि-पटुभिः सुरलोक-नाथैः । स्तोत्रैर्जगत्रितय-चित्तहरैरुदारैः, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥ २॥ युग्मम् ॥ वुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पादपीठ ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत- ३
२६
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला
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त्रपोऽहम् । बालं विहाय , जल-संस्थितमिन्दु-विम्ब,
--मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ॥३॥ वक्त
गुणान् गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान्, कस्ते क्षमः सुरगुरु-
प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ?
। कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्र,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ? ॥४॥ सोऽहं
तथापि तव भक्ति-वशान्मुनोश!, कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि
प्रवृत्तः । 'प्रीत्यात्म-वीर्य्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्र, नाभ्येति
किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्? ॥ ५॥ अल्पश्रुतं
श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् ।
यत् कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चारु-चूत-कलिका-
निकरैक-हेतु ॥ ६ ॥ त्वत्संस्तवेन भव-संतति-संनिवद्ध',
पापं क्षणात् क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रान्त-
लोकमलि-नीलमशेषमाशु, सूर्यांशु-भिन्नमिव शावरमन्ध-
कारम् ॥.७॥ मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,--मारभ्यते
तनु-धियापि , तव .प्रभावात् । चेतो हरिष्यति सतां
नलिनी-दलेषु, मुक्ताफल-द्युतिमुपैति ननद-विन्दुः ॥ ८ ॥
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। आस्तां तव स्तवनमस्त-दोषं, त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्र-किरणः कुरुते प्रभव, पद्माकरेषु जलजानि विकाशभाजि ॥ ६ ॥ नात्यद्भुतं भुवन- भूषण ! भूतनाथ !, भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किंवा, भूत्याश्रितं य इह नात्म-समं करोति ? ॥१०॥ दृष्ट्वा भवन्तमनिमेष- विलोकनीयं, नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षुः । पीत्वा पयः शशि-कर-द्युति दुग्ध-सिन्धोः, क्षारं जलं जलनिधेरशितुं क इच्छेत् ? ॥ ११॥ यः शान्तराग-रुचिभिः परमाणुभिस्त्वं, निर्मापितस्त्रिभुवनैक-ललाम-भूत !। तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां, यत्तेसमानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२ ॥ वक्त्र व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि, निःशेष- निर्जित-जगत्-त्रितयोपमानम् । बिम्बं कलङ्कमलिनं क्व निशाकरस्य, यद् वासरे भवति पाण्डु पलाश-कल्पम् ॥१३॥ सम्पूर्ण-मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप,-शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तवलयन्ति । ये संश्रितास्त्रि-जगदीश्वर-नाथमेकं, कस्तान श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । निवारयति संचरतो यथेष्टम् ? ॥१४॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशोनाभिनीतं मनागपि मनो न विकार- मार्गम् । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन, किं मन्दरादि-शिखरं चलितं कदाचित् ? ॥ १५ ॥ निर्धूम- वर्तिरपवर्जित-तैलपूरः, कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाशः ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः, स्पष्टीकरोषि सहसा. युगपजगन्ति । नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः, सूर्यातिशायि-महिमा- ऽखि मुनीन्द्र ! लोके ॥ १७ ॥ नित्योदयं दलिन-मोह- महान्धकार, गम्यं न राहु-बदनस्य न वारिदानाम् । विभ्राजते तव मुखाजमनल्प-कान्ति, विद्योतयजगदपूर्व- शशाङ्क-विम्बम् ॥ १८ ॥ किं शर्वरीष शशिनाऽह्नि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषुतमस्सुनाथ!। निष्पन्न-शालि-वन- शालिनि जीव-लोके, कार्य कियजलधरैर्जल-भार-नम्रः॥१६॥ ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं, नैवं तथा हरि- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । ૨૬ हरादिषु नायकेपु. । . तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥ मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा, दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि सोपमेति । किं चीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः, कश्चिन्मना हरति माथ! भवान्तरेऽपि ॥ २१ ॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रस्ता। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मि, प्राच्येव दिग् जनयतिस्फुरदंशु-जालम् ॥ २२ ॥ त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस,-मादित्य-वर्णममलं तमसः परस्तात् । त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु, नान्यः शिवः शिव-पदस्य मुनीन्द्र! पन्याः ॥२३॥ त्वामव्यय विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं, ब्रह्याणमीश्वरमनन्तमनङ्गकेतुम् । योगीश्वरं विदित- योगमनेकमेकं, शान-स्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥ २४ ॥ वुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, त्वं शंकरोऽसिभुवन- त्रय-शंकरत्वात्।धाताऽसि धीर! शिव-मार्ग-विधेर्विधानाद्, व्यक्तं त्वमेव भगवन ! पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ तुभ्यं श्री नित्यस्मरणा-पाटमाला। ३० नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ!, तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल- भूषणाय । तुभ्य नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन ! भोदधि-शोषणाय ॥ २६ ॥ को विस्मयोत्र यदि नाम गुणैरशेष,-स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!। दो- रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वैः, स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिद- पीक्षितोऽसि ॥ २७॥ उच्चैरशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख, -माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् । स्पष्टोल्लसत्किरण- मस्त-तमो-वितान, विम्ब रवेरिव पयोधर-पार्श्व-वर्त्ति ॥२८॥ सिंहासने मणि-मयूख -शिखा-विचित्र, विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् । विम्बं वियद्विलसदंशु-लता-वितानं, तुङ्गो- दयाद्रि-शिरसीव सहस्ररश्मेः ॥ २६ ॥ कुन्दावदात-चल- चामर-चारु-शोभ, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम् । उद्यच्छशाङ्क-शुचि-निर्भर-वारिधार, मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥ छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्ककान्त, -मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु--कर-प्रतापम् । मुक्ताफल- प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभ,प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । ३१ ॥ ३९ ॥ उनिद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ति,-पर्युल्लसन्नख- मयूख- -शिखाभिरामौ। पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः, पद्मानि तत्र विवुधाः परिकल्पयन्ति ॥ ३२॥ इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेन्द्र!, धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य । याक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा, ताक् कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोऽपि ॥ ३३ ॥ श्च्योतन्मदाचिल- विलोल-कपोल-मूल, मत्त-म्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम् । ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं, दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदा- धितानाम् ॥३४॥ भिन्नेभ-कुम्भ-गलदुज्ज्वल-शोणितात, -मुक्ताफल-प्रकर भूपित-भुमि-भागः। बद्ध-क्रमः क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि, नाकामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते ॥३५॥ कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वहि-कल्पं, दावानलं ज्वलित- मुज्ज्वलमुत्स्फुलिङ्गम् । विश्वं जिघत्सुमिव संमुखमापतन्तं, त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम् ।। ३६ ॥ रक्तक्षणं समद- कोकिल-कण्ठ-नीलं, क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् । आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्क-स्त्वनाम-नाग-दमनी ३२ श्री नित्यस्मरण-पाटमाला। हृदि यस्य पुंसः ॥३७॥ वलगत्तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीम-नाद,- माजौ वलं वलवतामपि भूपतीनाम् । उद्यहिवाकर-मयूख- शिखापविद्ध,त्वत्कीर्तनात् तम इवाशुभिदामुपैति ॥३८॥ कु. न्तान-भिन्न-गज-शोणित-चारिवाह,-वेगावतार-तरणातुर- योध-भीमे । युद्ध जयं विजित-दुर्जय जय-पक्षा, स्त्वत्पाद- पङ्कज-वनायिणो लभन्ते ॥ ३६॥ अम्भोनिधौ क्षुभित- भीषण-नक्र-चक्र,-पाठोन-पीठ-भ-दोल्वण-वाडवाग्नौ. । रङ्गत्तरङ्ग--शिखर-स्थित-यानपात्रा,-स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति ॥४०॥ उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार- भुग्नाः, शोच्यां दशामुपगताश्च्युत-जीविताशाः । त्वत्पाद- पङ्कज-रजोऽमृत-दिग्ध-देहा, मा भवन्ति मकरध्वज- तुल्य-रूपाः ॥४ा आपाद-कण्ठमुरुशृङ्खल-वेष्टिताङ्गा, गाढं वृहनिगड-कोटि-निघृष्टजङ्घाः । त्वन्नाममन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः, सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति ॥ ४२ ॥ मत्त--द्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलांहि,-संग्राम-वारिधि-महो- दर-बन्धनोत्थम् । तस्याशु नाशमुपयाति भय मियेव, श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ३३ यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥४३॥ स्तोत्र-स्त्रज तव जिनेन्द्र!गुणैर्निबद्धां, भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र- पुष्पाम् । धत्ते जनोय इह कण्ठगतामजलं, तं मानतुङ्गमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४४॥. इति श्रीभक्तामरस्तोत्र सम्पूर्णम् ॥ ( २ ) ॥ अथ वृद्धशान्तिः॥ भो भो भव्याः! . शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्वमेतत्, ये यात्रायां त्रिभुवनगुरोराहताभक्तिभाजः। तेषां शान्तिर्भवतु भवतामहदादि-प्रभावा,-दारोग्य-श्री-धृति-मतिकरी क्लेश-वि- ध्वंस-हेतुः॥१॥ भो भो भव्यलोका इह हि भरतैरावत-वि- देह-सम्भवानां, समस्त-तीर्थकृतां जन्मन्यासन-प्रकम्पानन्तर- मवधिना विज्ञाय सौधर्माधिपतिः सुघोषा-घण्टा-चालना- नन्तरं सकल-सुरासुरेन्द्र सह समागत्य सविनयमईट्टारक गृहीत्वा गत्वा कनकाद्रिश्यङ्गे विहित-जन्माभिषेकः शान्ति- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। मुद्घोषयति, ततोऽहं कृतानुकारमिति कृत्वा; 'महाजनो येन गतः स पन्थाः ' इति भव्य-जनैः सह समागत्य, स्नात्र- पीठे स्नात्र विधाय शान्तिमुद्घोषयामि । तत्पूजा-यात्रा- स्नानादि-महोत्सवानन्तरम् , इति कृत्वा कणं दत्त्वा निश- म्यतां वाहा ॥ ॐ पुण्याहं २, प्रीयन्तां २, भगवन्तोऽहन्तः सर्वज्ञाः, सर्वदर्शिनः । त्रैलोक्य-नाथाः, त्रैलोक्य-महिताः, त्रैलोक्य-पूज्याः, त्रैलोक्यश्वराः, त्रैलोक्योद्योतकराः ॥ ॐ श्रीकेवलज्ञानि १, निर्वाणि २, सागर ३, महायशः ४, विमल ५, सर्वानुभूति ६, श्रीधर ७, दत्त ८, दामोदर ६, सुतेजः १० स्वामि ११मुनिसुव्रत १२ सुमति १३ शिवगति, १४, अस्ताग १५, नमीश्वर १., अनिल १७, यशोधर १८, कृतार्घ १६ जिनेश्वर २० शुद्धमति २१ शिवकर २२ स्यन्दन २३ संप्रति २४ एते अतीत-चतुर्विंशति-तीर्थंकराः ॥ ॐ श्रीऋषभ १, अजित २, सम्भव ३, अभिनन्दन ४सुमति ५, पद्मप्रभ ६, सुपार्श्व ७, चन्द्रप्रभ ८,सुविधि, शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२, विमल १३, अनन्त १४,धर्म १५, श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ३५ शान्ति १६, कुन्थु १७, अर १८, मल्लि १६, मुनिसुव्रत २० नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्द्धमान २४ एते वर्तमान-जिनाः ।। ॐ श्रीपद्मनाम १, शूरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयंप्रभ ४, सर्वानुभूति ५, देवश्रुत ६, उदय ७, पेढाल ८, पोटिल , शतकीर्ति १० सुत्त ११, अमम १२, निष्कषाय १३, निष्पु- लाक १४ निर्मम १५, चित्रगुप्त १६ समाधि १७, संवर १८, यशोधर १६, विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३, भद्रंकर' २४, एते. भावि-तीर्थंकरा: जिनाः शान्ताः शान्तिकराभवन्तु। ॐ मुनयो मुनि-प्रवरा रिपु-विजय-दुर्भि- क्ष-कान्तारेषु दुर्ग-मार्गेषुरक्षन्तु वो नित्यम् ॥ ॐ श्री नाभि१, जितशत्रु २, जितारि ३, संवर ४, मेघ ५, धर ६, प्रतिष्ठ ७, महसेन ८, सुग्रीव ६, दूढ़रथ १०, विष्णु ११, वासुपूज्य १२, कृतवर्म १३, सिंहसेन १४, भानु १५, विश्वसेन१६, सर १७, सुदर्शन १८, कुम्भ १६, सुमित्र २०, विजय २१, समुद्रवि- जय २२, अश्वसेन २३, सिद्धार्थ २४ इति वर्तमानचतुर्वि- शति-जिन-जनकाः।
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला
ॐ श्री मरुदेवी १, विजया २, सेना ३, सिद्धार्था ४,
सुमंगला ५, सुसीमा ६ पृथिवीमाता ७, लक्ष्मणा ८, रामा
६, नन्दा १०, विष्णु ११, जया १२,श्यामा १३, सुयशा १४,
सुव्रता १५, अचिरा १६, श्री १७, देवी १८, प्रभावती १६,
पदा २०, वप्रा २१, शिवा २२, वामा २३, त्रिशला २४, इति
वर्तमान-जिन, जनन्यः॥
ॐ श्रीगोमुख १, महायक्ष २, त्रिमुख ३, यक्षनायक ४,
तुम्बुरु ५, कुसुम ६, मातङ्ग ७, विजय ८, अजित ६, ब्रह्मा
१०, यक्षराज ११, कुमार १२, षण्मुख १३, पाताल १४,
किन्नर १५, गरुह १६, गन्धर्व १७, यक्षराज १८, कुबेर १६.
वरुण २० , भृकुटि २१, गोमेध २२, पार्श्व २३, ब्रह्मशान्ति
२४ इति वर्तमान-जिन-यक्षाः ।।
ॐ चक्रेश्वरी १.अजितवला २ दुरितारि ३.काली ४
महाकाली ५ श्यामा ६, शान्ता ७ भृकुटि ८ सुतारका
अशोका १० मानवी ११ चण्डा १२ विदिता १३ अङ्कुशा १४
कन्दर्पा १५ निर्वाणी १६ बला १७ धारिणी १८ धरणप्रिया
श्रो.नित्यस्मरण-पाठमाला। २५ निब्भरण हिअएण । ता देव! दिज बोहिं, भवे भवे पास! 'जिण-चंद!॥५॥ इति श्रीपार्श्वजिनस्तवनं सप्तमं स्मरणम् ॥७॥ समाप्तानि सप्त स्मरणानि । . ( १ ) अथ श्रीभक्तामर स्तोत्रम् । भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा, मुद्द्योतकं दलित- पाप-तमो-वितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिन ! पाद-युगं युगादा, वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥१॥ यःसंस्तुतः सकल-वाङ्मय-तत्त्व-बोधा,-दुद्भूत-घुद्धि-पटुमिः सुरलोक-नाथैः। स्तोत्रैर्जगत्रितय-चित्तहरैरुदारः, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथम जिनेन्द्रम् ॥२॥युग्मम् ॥ वुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पादपीठ ! स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। त्रपोऽहम् । चालं विहाय .जल-संस्थितमिन्दु-विश्व, --मन्यः क ' इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ॥३॥ वक्तु गुणान् गुण-समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्, कस्ते क्षमः सुरगुरु- प्रतिमोऽपि वुद्ध्या ? । कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्र, को वा तरीतुमलमम्बुनिधि. भुजाभ्याम् ? ॥४॥ सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनोश!, कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः। प्रीत्यात्म-वीर्य्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्र, नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम् ? ॥ ५॥ अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वंशक्तिरेव मुखरीकुरुते बलामाम् । यत् कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चारु-चूत -कलिका- निकरैक-हेतु ॥ ६॥ त्वत्संस्तवेन भव-संतति-संनिबद्ध', पापं क्षणात् क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । लोकमलि-नीलमशेषमाशु, सूर्यांशु-भिन्नमिव शार्वरमन्ध- कारम् ॥ ७॥ मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,--मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात् । चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु, मुक्ताफल-द्युतिमुपैति ननद-विन्दुः ॥ ८॥ -आकान्त- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। २७ आस्तां तव स्तवनमस्त-दोष, त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्त्र-किरणः कुरुते प्रभव, पद्माकरेषु जलजानि विकाशभाञ्जि ॥ ६॥ नात्यद्भुतं भुवन- भूषण ! भूतनाथ !, भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किंवा, भूत्याश्रितं. य इह नात्म-समं करोति ? ॥ १० ॥ दृष्ट्वा भवन्समनिमेष- विलोकनीयं, नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षुः पीत्वा पयः शशि-कर-द्युति दुग्ध-सिन्धोः, क्षारं जलं जलनिधेशितुं क इच्छेत् ? ॥ ११॥ यः शान्तराग-रुचिभिः परमाणुभिस्त्वं, निर्मापितस्त्रिभुवनैक-ललाम-भूत ! । तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां, यत्तेसमानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२ ॥ वक्त्र व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि, निःशेष- निर्जित-जगत्-त्रितयोपमानम् । बिम्बं कलङ्कमलिनं क्व निशाकरस्य, यद् वासरे भवति पाण्डु पलाश-कल्पम् ॥१३॥ सम्पूर्ण-मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप, शुभ्रा गुणात्रिभुवन तवलड्डयन्ति । ये संश्रितास्त्रि-जगदीश्वर-नाथमेकं, कस्तान ?
२८ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । निवारयति संचरतो यथेष्टम् ? ॥१४॥ चित्र किमत्र यदि ते त्रिदशोङ्गनाभिनीतं मनागपि मनो. न विकार- मार्गम्. । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन, किं मन्दरादि-शिखरं चलितं कदाचित् ? ॥ १५ ॥ निधूम- वर्त्तिरपवर्जित-तैलपूरः, कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोपि। गम्यो.न जातु मरुतां चलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाशः ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः, स्पष्टीकरोषि सहसा. युगपजगन्ति । नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभारः, सूर्यातिशायि-महिमा- ऽसि मुनीन्द्र ! लोके ॥ १७ ॥ नित्योदयं दलिन-मोह- महान्धकार, गम्यं न राहु-वदनस्य . न .वारिदानाम् । विभ्राजते तव मुखाजमनल्प-कान्ति, विद्योतयजगदपूर्व- शशाङ्क-विम्बम् ॥ १८॥ किं शर्वरीष शशिनाऽह्नि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेन्दु-दलितेपुतमस्सुनाथ!। निष्पन्न-शालि-वन- शालिनि जीव-लोके, कार्य कियजलधरैर्जल-भार-नम्रः॥१॥ ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं, नैवं तथा हरि- श्रो नित्यस्मरण-पाठमाला। २६ हरादिषु नायकेषु । तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काच-शकले 'किरणाकुलेऽपि ॥२०॥ मन्ये वरं हरि-हरादयं एव दृष्टा, दृष्टषु येषु हृदयं त्वयि सोषमेति । किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः, कश्चिन्मनो हरति माथ! भवान्तरेऽपि ॥ २१॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं, प्राच्येच दिग् जनयति स्फुरदंशु-जालम् ।। २२ ॥ त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस,-मादित्य-वर्णममलं तमसः परस्तात् । त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु, नान्यः शिवः शिव-पवस्य मुनीन्द्र ! पन्थाः ॥२शा त्वामव्यय विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं, ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनङ्गकेतुम् । योगीश्वरं विदित- योगमनेकमेकं, ज्ञान-स्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥ २४ ॥ बुद्धस्त्वमेव विवुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, त्वं शंकरोऽसि भुवन- त्रय-शंकरत्वाताधाताऽसि धीर! शिव-मार्ग-विधेर्विधानाद्, व्यक्तं त्वमेव भगवन ! पुरुषोत्तमोऽसि ॥ २५ ॥ तुम्यं .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ !, तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल- भूषणाय । तुभ्य नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन ! भोदधि-शोषणाय ॥ २६ ॥ को विस्मयोत्र यदि नाम गुणैरशेषै,-स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया सुनीश!। दोषै- -विविधाश्रय-जात-गर्वैः, स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिद- पीक्षितोऽसि ॥ २७॥ उच्चैरशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख, -माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् । स्पष्टोलसत्किरण- मस्त-तमो-वितानं, विम्ब रवेरिव पयोधर-पार्श्व-वर्त्ति ॥२८॥ सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे, विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् । विम्वं वियद्विलसदंशु-लता-वितानं, तुङ्गो- दयाद्रि-शिरसीव सहस्त्ररश्मेः ॥ २६ ॥ कुन्दावदात-चल- चामर-चारु-शोभं, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम् । उद्यच्छशाङ्क-शुचि-निर्भर-बारिधार, मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥ छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्ककान्त, -मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु--कर-प्रतापम् । मुक्ताफल- प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभ,प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। . ॥ ३९ ॥ उनिद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ति,--पर्युलसन्नख- मयूख-शिखाभिरामौ। पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः, पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥ ३२ ॥ इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेन्द्र!, धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य । याक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा, तादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोऽपि ॥ ३३॥ श्च्योतन्मदाचिल- विलोल-कपोल-मूल, मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम् । ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं, दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदा- श्रितानाम् ॥३४॥ भिन्नेभ-कुम्भ-गलदुज्ज्वल-शोणितात, -मुक्ताफल-प्रकर भूषित-भुमि-भागः। बद्ध-क्रमः क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि, नाकामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते ॥३५|| कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-चह्नि-कल्पं, दावानलं ज्वलित- मुज्ज्वलमुत्स्फुलिङ्गम् । विश्वं जिधत्सुमिव संमुखमापतन्तं, त्वन्नाम-कोर्तन-जलं शमयत्यशेषम् ॥ २६ ॥ रक्तक्षणं समद- कोकिल-कण्ठ-नीलं, क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् । आकामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्क-स्त्वन्नाम-नाग-दमनी श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । हृदि यस्य पुंसः ॥३७॥. वलगत्तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीम-नाद,- माजौ वलं बलवतामपि भूपतीनाम् । . उद्यदिवाकर-मयूख- शिखापविद्ध, त्वत्कीर्तनात् तम इवाशु भिदामुपैति ॥३८॥ कु. न्ताप्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,-वेगावतार-तरणातुर- योध-भीमे. युद्ध जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षा,-स्त्वत्पाद- पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते ॥ ३६॥ अम्भोनिधौ क्षुभित- भीषण-नक्र-चक्र,-पाठोन-पीठ-भ-दोल्वण-वाडवाग्नौ । रङ्गत्तरङ्ग--शिखर-स्थित-यानपात्रा, स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति ॥ ४० ॥. उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार- भुग्नाः, शोच्यां दशामुपगताश्च्युत-जीविताशाः । त्वत्पाद- पङ्कज-रजोऽमृत-दिग्ध-देहा, मा भवन्ति मकरध्वज- तुल्य-रूपाः ।।४।।आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा, गाढं वृहन्निगड-कोटि-निघृष्टजवाः । त्वन्नाममन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः, सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति ॥ ४२ ॥ मत्त-द्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि,-संग्राम-वारिधि-महो- दर-बन्धनोत्थम् । तस्याशु नाशमुपयाति भय भियेव, श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। AY यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥४३॥ स्तोत्र-स्त्रज तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धा, भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र- पुष्पाम् । धत्ते जनोय इह कण्ठगतामजलं, तं मानतुङ्गमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४४॥ इति श्रीभकामरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ . ( २ ) ॥ अथ वृद्धशान्तिः॥ भो भो भव्याः! शृणुत पचनं प्रस्तुतं सर्वमेतत्, ये यात्रायां त्रिभुवनगुरोराहताभक्तिभाजः । तेषां शान्तिर्भवतु भवतामहदादि-प्रभावा, दारोग्य-श्री-धृति-मतिकरी कश-वि- ध्वंस-हेतुः॥१॥भो भो भव्यलोका इह हि भरतैरावत-वि- देह-सम्भवानां, समस्त-तीर्थकृतां जन्मन्यासन-प्रकम्पानन्तर- मवधिना विज्ञाय सौधर्माधिपतिः सुघोषा-घण्टा-चालना- नन्तरं सकल-सुरासुरेन्द्रः सह समागत्य सविनयमहदहारक गृहीत्वा गत्वा कनकाद्रिशृङ्गे विहित-जन्माभिषेकः शान्ति- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। मुद्घोषयति, ततोऽहं कृतानुकारमिति कृत्वा, 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' इति भव्य-जनैः सह समागत्य, स्नात्र- पीठे स्नात्र विधाय शान्तिमुद्घोषयामि । तत्पूजा-यात्रा- स्नात्रादि-महोत्सवानन्तरम् , इति कृत्वा कर्णं दत्त्वा निश- म्यतां वाहा ।। ॐ पुण्याहं २, प्रीयन्तां २, भगवन्तोऽर्हन्तः सर्वज्ञाः, सर्वदर्शिनः । त्रैलोक्य-नाथा:, त्रैलोक्य-महिताः, त्रैलोक्य-पूज्याः, त्रैलोक्यश्वराः, त्रैलोक्योद्योतकराः ॥ ॐ श्रीकेवलज्ञानि १, निर्वाणि २, सागर ३, महायशः ४, विमल ५, सर्वानुभूति ६, श्रीधर ७, दत्त ८, दामोदर ६, सुतेजः १० स्वामि ११ मुनिसुव्रत १२ सुमति १३ शिवगति, १४, अस्ताग १५, नमीश्वर १६, अनिल १७, यशोधर १८, कृतार्घ १६ जिनेश्वर २० शुद्धमति २१ शिवकर २२ स्यन्दन २३ संप्रति २४ एते अतीत-चतुर्विंशति-तीर्थंकराः ॐ श्रीऋषभ १; अजित २, सम्भव ३, अभिनन्दन४सुमति ५, पद्मप्रभ ६, सुपार्श्व ७, चन्द्रप्रभ ८,सुविधि , शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२, विमल १३, अनन्त १४,धर्म १५, श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। शान्ति १६, कुन्थु १७, अर १८, मल्लि १६, मुनिसुव्रत २० नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्द्धमान २४ एते वर्तमान-जिनाः ।। ॐ श्रीपद्मनाभ.१, शूरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयंप्रभ , सर्वानुभूति-५, देवश्रुत.६, उदय ७, पेढाल ८, पोटिल ६, शतकीर्ति १० सुत्त ११, अमम १२, तिष्कषाय १३, निष्पु- लाक १४ निर्मम १५, चित्रगुप्त १६ समाधि १७, संवर १८, यशोधर १६, विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३, भद्रंकर' २४, एते भावि-तीर्थकराः जिनाः शान्ताः शान्तिकराभवन्तु। ॐ मुनयो मुनि-प्रवरा रिपु-विजय-दुर्भि- क्ष-कान्तारेषु दुर्ग-मार्गेषुरक्षन्तु वो नित्यम् ॥ ॐ श्री नाभि १, जितशत्रु २, जितारि ३, संवर ४, मेघ ५, धर ६, प्रतिष्ठ ७, महसेन ८, सुग्रीव , हृढ़रथ १०, विष्णु ११, वासुपूज्य १२, कृतवर्म १३, सिंहसेन १४, भानु १५, विश्वसेन १६, सर १७, सुदर्शन १८, कुम्भ १६, सुमित्र २०, विजय २१,. समुद्रवि- जय २२, अश्वसेन २३, सिद्धार्थ २४ इति वर्तमानचतुर्वि- शति-जिन-जनकाः ॥ ।
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला।
।
ॐ श्री मरुदेवी १, विजया २, सेना ३, सिद्धार्था ४,
सुमंगला ५, सुसीमा ६ पृथिवीमाता ७, लक्ष्मणा ८,. रामा
६, नन्दा १०, विष्णु ११, जया १२,श्यामा १३, सुयशा १४,
सुव्रता १५, अचिरा १६, श्री १७, देवी १८, प्रभावती १६,
पमा २०, वप्रा २१, शिवा.२२, वामा २३, त्रिशला.२४, इति
वर्तमान-जित, जनन्यः॥
ॐ श्रीगोमुख. १, महायक्ष २, त्रिमुख ३, यक्षनायक ४,
तुम्बुरु ५, कुसुम ६, मातङ्ग, विजय ८, अजित , ब्रह्मा
१०, यक्षराज ११, कुमार १२, षण्मुख १३, पाताल १४,
किन्नर १५, गरुड.१६, गन्धर्व १७, यक्षराज १८, कुबेर १६
वरुण २०, भृकुटि २१, गोमेध २२, पार्श्व २३, ब्रह्मशान्ति
२४ इति वर्तमान-जिन-यक्षाः ।।
ॐ चक्र श्वरी १ अजितबला २ दुरितारि.३ काली.४
महाकाली५ श्यामा ६, शान्ता ७.भृकुटि ८ सुतारका :
अशोका १० मानवी ११. चण्डा १२ विदिता १३ अङ्कुशा.१४
कन्दर्पा १५ निर्वाणी १६ वला १७ धारिणी १८ धरणप्रिया
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। १६, नरदत्ता २०, गान्धारी २१, अम्बिका २२, पद्मावती २३, सिद्धायिका २४ इति वर्तमान-चतुर्विंशति-तीर्थकर- शासनदेव्यः। ॐ ह्रीं श्रीं धृति-कीर्ति-कान्ति-बुद्धि-लक्ष्मी-मेधा-विद्या-सा- धन-प्रवेश-निवेशनेषु सुगृहीत-नामानोजयन्ति ते जिनेन्द्राः। ॐ रोहिणी १ प्रज्ञप्ति २ वजङ्खला ३ वज्राङ्कुशा ४ चक्रेश्व- री ५ पुरुषदत्ता ६ काली ७ महाकाली ८ गौरी ६ गान्धारी १० सर्वास्लमहाज्वाला ११ मानवी १२ वैरोट्या १३अच्छुप्ता १४ मानसी १५ महामानसी १६ एताः षोडश विद्या-देख्यो रक्षन्तु मेस्वाहा ॥ॐ आचार्योपाध्याय-प्रभृति-चातुर्वण्य॑स्य श्रीश्रमण-सङ्घस्य शान्तिर्भवतु। ॐ प्रहाश्चन्द्र-सूर्याऽङ्गारक- बुध-बृहस्पति-शुक-शनैश्चर-राहु-केतु-सहिताःसलोकपाला: सोम-यम-वरुण-कुबेर-वासवादित्य-स्कन्द-विनायका ये चान्येऽपि प्राम-नगर-क्षेत्रदेवतादयस्ते सर्व प्रीयन्तां अक्षी- ण-कोश-कोष्ठागारा नरपतयश्च भवन्तु स्वाहा ॥ ॐ पुत्र- मित्र-भ्रातृ-कलत्र-सुहत्-संबन्धि-बन्धु-वर्ग-सहिता नित्यं श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। चामोद-प्रमोद-कारिणो भवन्तु। अस्मिंश्च भूमण्डले आय. तन-निवासिनांसाधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाणां रोगोपस. र्ग-व्याधि-दुःख-दौर्मनस्योपशमनाय शान्तिर्भवतु ॥ॐ तुष्टि- पुष्टि-ऋद्धि-वृद्धि-माङ्गल्योत्सवा भवन्तु । सदाप्रादुर्भूतानि दुरितानि पापानि शाम्यन्तु, शत्रवः पराङ्मुखा भवन्तुस्वाहा। श्रीमते शान्तिनाथाय, नमः शान्तिविधायिने । त्रैलोक्स- स्यामराधीश,-मुकुटाभ्यर्चितांहये ॥१॥ शान्तिः शान्तिकरः 'श्रीमान्, शान्तिं दिशतु मे गुरुः । शान्तिरेव सदा तेषां, येषां शान्ति हे गृहे ॥२॥ ॐ उन्मृष्ट-रिट-दुष्ट-ग्रह-गति -दुःस्व- म-दुनिमित्तादि । संपादित-हित-संपद्, नाम-ग्रहणं जयति शान्तः॥शा श्रीसंघ-पौर-जन-पद,-राजाधिर-राज-संनिवे- शामाम् । गोष्ठिक-पुरमुख्याणां, व्याहरणेाहरेच्छान्तिम् ॥ ४॥ श्रीश्रमणसंघस्य शान्तिर्भवतु, श्रीपौर-लोकस्य शा- न्तिर्भवतु, श्रीजनपदानां शान्तिर्भवतु, श्रीराजाधिपानां शान्तिर्भवतु, श्रीराज-संनिवेशानां शान्तिर्भवतु, श्रीगोष्ठि- कानां शान्तिर्भवतु । ॐ स्वाहा २ ॐ हाँ श्री पार्श्वनाथाय ॥
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ३६ स्वाहा।एषाशान्तिःप्रतिष्ठा-यात्रा-स्नात्रावसानेषु शान्तिकल- शं.गृहीत्वा कुङ्कुम-चन्दन-कपूरागुरु-धूप-वास-कुसुमाञ्जलि- समेतः मात्रपीठेश्रीसंघसमेतः शुचिः शुचिवपुःपुष्प-वस्त्र-च- न्दनाभरणालंकृतः, चन्दनतिलकं विधाय कण्ठे कृत्वाशान्तिमु- द्घोषयित्वाशान्ति-पानीयं मस्तके दातव्यमिति। नृत्यन्ति नृत्य मणि-पुष्प-वर्ष, सृजन्ति गायन्ति च मङ्गलानि । स्तोत्राणि गोत्राणि पठन्ति मन्त्रान्, कल्याणभाजो हि जिनाभिषेके ॥१॥ अहं तित्थयर-माया, सिवादेवी तुम्ह-नयर-निवासिनी । अम्ह सिवं तुम्ह सिवं, असुहोवसमं सिवं भवतु स्वाहा ॥२॥ शिवमस्तु सर्व-जगतः, पर हित-निरता भवन्तु भूत-गणाः । दोपाः प्रयान्तु नाशं, सर्वत्र सुखीभवतु लोकः ॥२॥ उपस- र्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विनवल्लयः। मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥३॥ इति वृद्धशान्तिः समाप्ता ।।
४० श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ( ३ ) अथ जिनपञ्जर-स्तोत्रम् । ॥ ॐ ही श्री अहं अईद्भ्यो नमोनमः। ॐ हाँ श्री भई सिद्धभ्यो नमोनमः ॥ॐही श्री अहं आचार्गेभ्यो नमोनमः । ॐ ह्रीं श्री अर्ह उपाध्यायेभ्यो नमोनमः । ॐ ह्रीं श्री अहं श्रीगौतमस्वामिप्रमुखसर्वसाधुभ्यो नमोनमः ॥१॥ एष पञ्च-नमस्कारः, सर्व-पाप-क्षयंकरः। मङ्गलानां च सर्वेषां, प्रथमं भवति मङ्गलम् ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीं जये विजये, अहं परमात्मने नमः । कमलप्रभ-सूरीन्दो, भाषते जिनप- अरम् ॥३॥ एकभक्तोपवासेन, त्रिकालं यः पठेदिदम् । मनोऽभिलषितं सर्व, स लभते ध्रुवम् ॥ ४ ॥ भूशय्याब्रह्मचर्येण, क्रोध-लोभ-विवर्जितः । देवताने पवित्रात्मा, षण्मासैर्लभते फलम् ॥ ५॥ अर्हन्तं स्थापयेद् मूर्ध्नि, सिद्ध चक्षुर्ललाटके । आचार्य श्रोत्रयोर्मध्ये, उपाध्यायं तु प्राणके ॥ ६ ॥ साधुवृन्द श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । ४१ मुखस्याने, मनः शुद्ध विधाय च। सूर्य-चन्द्र-निरोधेन, सुधीः सर्वार्थ-सिद्धये ॥७॥ दक्षिणे मदन-द्वषी, वाम- पावें स्थितो जिनः। अङ्ग-संधिषु सर्वशः, परमेष्ठी शियङ्करः ॥८॥ पूर्वाशांश्रीजिनो रक्षे,-दाग्ने यी विजितेन्द्रियः। दक्षिणाशां परं ब्रह्म, नैती च त्रिकालवित् ॥ ६ ॥ पश्चिमाशां जगन्नाथो, यायवों परमेश्वरः। उत्तरां तीर्थकृत् सर्वामीशानी च निरञ्जनः ॥ १० ॥ पाताल भगवानहन्नाकाशं पुरषोत्तमः । रोहिणी-प्रमुखा देख्यो, रक्षन्तु सकलं कुलम् ॥ ११ ॥ ऋषभो मस्तकं रक्ष- दजितोऽपि विलोचने । संभवः कर्ण-युगलं, नासिकां चाभिनन्दनः ॥ १२ ॥ ओष्ठौ श्रीमती रक्षद्, दन्तान् पद्मप्रभो विभुः। जिह्वां सुपार्श्वदेवोऽयं, तालु चन्द्रप्रभो विभुः ॥१३॥ कण्ठं श्रीसुविधी रक्षद्, हृदयं च श्रीशीतलः । श्रेयांसो वाहु-युगलं, वासुपूज्यः कर-द्वयम् ॥ १४ ॥ अङ्गुलीविमलो रक्षेद्, अनन्तोसौ स्तनावपि । सुधर्मोऽप्युदरा- स्थीनि, श्रीशान्ति भि-मण्डलम् ॥ १५ ॥ श्रीकुन्थुर्गुह्यक ४२ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला । रक्ष,-दरो रोम-कटी-तटम् । मल्लिहरू पृष्ठ-बंशं, अङ्केच मुनिसुव्रतः ॥ १६ ॥ पादाङ्गुलीनमी रक्षेत्, श्रीनेमिश्चरण- द्वयम्। श्रीपार्श्वनाथः सर्वाङ्ग,वर्धमानश्चिदात्मकम् ॥१७॥ पृथिवी-जल-तेजस्क,-बाय्वाकाशमय जगत् । रक्षेदशे- प-पापेभ्यो, वीतरागो निरञ्जनः ॥ १८ ॥ राजद्वारे श्मशाने वा, संग्रामे शत्रु-संकटे । व्याघ्र-चौराग्नि-सर्यादि- भूत-प्रेत-भयाश्रिते ॥ १६ ॥ अकाल-मरण-प्राप्ते, दारिद्रया- पत्समाश्रिते। अपुत्रत्वे महादोपे, मूर्खत्वे रोग-पोडिने ॥ २०॥ डाकिनी-शाकिनी-अस्ते, महा-ग्रह-गणार्दिते। नद्युत्तारेऽध्व-वैषम्ये, व्यसने चापदि स्मरेत् ॥ २१ ॥ प्रातरेव समुत्थाय, यः स्मरेज्जिनपक्षरम् । तल्य किञ्चित्यं नास्ति, लभते सुख-सम्पदम् ॥ २२ ॥ जिनपक्षरनामेदं, यः स्मरत्यनुवासरम् । कमलप्रमराजेन्द्र,--थ्रियंस लभते नरः ॥२३॥ प्रातः समुत्थाय पठेत् कृतज्ञो, यःस्तोत्रमेतज्जिनपञ्जराख्यम् । आसादयेत्स कमलप्रभाख्य, लक्ष्मी मनो-वाच्छित-पूरणाय ।। २४ ॥ श्रीरुद्र पल्लोय-वरेण्य-गच्छे, देवप्रभाचार्य-पदाज- श्रो नियस्तरमा-पाठनाला । ४३ हंसः। यादीन्द्र-चूडामणिरेप जेनो, जोयाद् गुरुः श्रीकमल- प्रभाख्यः ॥२५॥ इति श्रीजिनपक्षरस्तोत्रं संपूर्णम् ।। ४ ) अथ श्रीऋषिमगडल-स्तोत्रम् । आद्यन्ताक्षर-संलय,--मक्षरं व्याप्य यत् स्थितम् । अग्नि- ज्वाला-समं नाद-विन्दु-रेखा-समन्वितम् ॥१॥ अग्नि- ज्वाला-समाकान्तं, मनो-मल-विशोधकम् । देदीप्यमानं हत्पना, तत्पदं नोमि निर्मलम् ॥२॥ अहमित्यक्षरं ब्रह्म- वाचकं परमेप्टिनः। सिद्धचक्रस्य सद्बीजं, सर्वतःप्रणिदध्महे ॥३॥ ॐ नमोऽर्हद्भ्य ईशेभ्य ॐ सिद्धभ्यो नमोनमः ॐ नमः सर्वसूरिभ्य उपाध्यायेश्य ॐ नमः ॥४॥ ॐ नमः सर्वसाधुभ्य ॐ ज्ञानेभ्यो नमोनमः । ॐनमस्तरा निभ्य. श्चारित्रेभ्यस्तु ॐ नमः ॥२॥ जयसेस्तु रितदह ाद्य- टकं शुभम् । स्थानेष्टसु विन्यस्तं, पृथग्योजसमन्त्रि .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ॥६॥ आद्यं पदं शिखां रक्षत्, परं रक्षतु मस्तकम् । तृतीय रक्षत्रे द्वे, तुर्य रक्षेचनासिकाम् ॥ ७॥ पञ्चमं तु मुखं रक्षत्, पष्ठ रक्षश्च घण्टिकाम् । नाभ्यन्त सप्तमं रक्षेद, रक्षेत् पादान्तमष्टमम् ॥ ८॥ पूर्व-प्रणवतः सान्तः, सरफो द्वयन्धिपञ्चषान् । सप्ताप्टदशसूर्याङ्कान्, श्रितो विन्दु- स्वरान् पृथक् ॥६॥ पूज्यनामाक्षरा आद्याः, पञ्चातो ज्ञान- दर्शन-चारित्रेभ्यो नमो मध्ये, ह्रींसान्तसमलंकृतः ॥१०॥ हाँ हौँ । हुँ । हूँ। हैं। हैं । हौं । हः । असिआउसाशान- दर्शनचारित्रभ्यो नमः । जम्बूवृक्षधरो द्वीपः, क्षारोदधि- समावृतः । अहंदाद्यष्टकैरष्ट-काष्ठाधिष्ठरलंकृतः ॥११॥ तन्मध्यसंगतो मेरुः, कूटलक्षेलंकृतः । उच्च रुच्च स्तर- स्तारस्तारामण्डल-मण्डितः ॥ १२॥ तस्योपरि सकारान्तं, वीजमध्यास्य सर्वगम् । नमामि विम्बमार्हन्त्यं, ललाटस्थं निरञ्जनम् ॥ १३ ॥ अक्षय निर्मलं शान्त', बहुल जाड्य- तोज्झितम् । निरीहं निरहङ्कार, सारं सारतरं धनम् ॥१४॥ अनुद्धतं शुभं स्फोतं, सात्त्विकं राजसं मतम् । तामसं चिर- श्री नित्यस्मरण-पाठमाल। ४५ .संधुद्ध, तेजसं शर्वरीसमम् ॥ १५॥ साकारं च निराकार, सरसं विरसं परम् । परापरं परातीतं, परंपरपरापरम्॥१६॥ एकवर्ण द्विवणं च, त्रिवर्ण तुर्यवर्णकम् । पञ्चवर्ण महावर्ण, सपरं च परापरम् ॥ १७ ॥ सकलं निष्कलंतुष्ट, निर्वृतं भ्रान्तिवर्जितम्। निरञ्जनं निराकार, निर्लेप वीतसंश्रयम् ॥ १८ ॥ ईश्वरंब्रह्म-संबुद्ध', वुद्ध सिद्ध मतं गुरु । ज्योतीरूप महादेवं, लोकालोक-प्रकाशकम् ॥ १६ ॥ अहंदाख्यस्तु वर्णान्तः, सरफोविन्दुमण्डितः। तुर्य-स्वर-समायुक्तो, बहुधा नाद-मालितः ॥ २०॥ अस्मिन् चीजे स्थिताः सर्वे, वृषभाद्या जिनोत्तमाः । घणे निजैनिजयुक्ता, ध्यातव्यास्तत्र संगताः ॥२१॥ नादश्चन्द्र-समाकारो, विन्दुर्नील-सम-प्रभः । फलारुण-समासान्तः, स्वर्णाभः सर्वतोमुखः ॥२२॥ शिरः- संलीन ईकारो, चिनीलो वर्णतः स्मृतः । वर्णानुसार-संलीनं, तीर्थकृन्मण्डलं स्तुमः ॥२३॥ चन्द्रप्रभ-पुष्पदन्तौ,नाद-स्थिति- समाधितौ। विन्दुमध्यगतौ नेमि,-सुव्रतौ जिनसत्तमौ ॥२४॥ पभप्रभ-पासुपूज्यौ, कलापदमधिष्ठितौ। शिर-ई-स्थिति- ४६ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला संलीनौ, पार्श्व-मल्ली जिनेश्वरी ॥२५॥ शेषास्तीर्थकृतः सर्वे, हरस्थाने नियोजिताः । माया-बीजाक्षर-प्राप्ता,-श्चतुर्वि- शतिरर्हताम् ।। २६ ॥ गत-राग-द्वष-मोहाः, सर्व-पाप-विव- र्जिताः । सर्वदाः सर्वकालेषु, ते भवन्तु जिनोत्तमाः ॥२७॥ देवदेवस्य यच्चक्र', तस्य चक्रस्य या विभा। तयांच्छादित- सर्वाङ्ग, मा मां हिनस्तु डाकिनी ॥ २८ ॥ देवदेवस्य० मा मां हिनन्तु राकिनी॥२६॥ देवदे० मा मां हिनस्तु लाकिनी ॥ ३० ॥ देव० मा मां हिनस्तु काकिनी ॥३१॥ देवदे० मा मां हिनस्तु शाकिनी ॥३२॥ देव० मा मां हिनस्तु हाकिनी ॥ ३३॥ देव० मा मां हिनस्तु याकिनी ॥३४॥ देव० मा मां हिंसन्तु पनगाः ॥३५॥ देव० मा मां हिंसन्तु हस्तिनः ॥३६॥ देव० मा मां हिंसन्तु राक्षसाः ॥ ३७॥ देव० मा मां हिंसन्तु वह्नयः ॥३८॥ देव० मा मां हिंसन्तु सिंहकाः ॥ ३६॥ देव. मा मां हिंसन्तु दुर्जनाः ॥४॥मा मां हिंसन्तु भूमिपाः ॥४१॥ श्रीगौतमस्य या मुद्रा, तस्य या भुवि लब्धयः । ताभिरभ्युद्यत-ज्योतिरह सर्व-निधीश्वरः ॥ ४२ ॥ पातालं- श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ४७ वासिनो देवा, देवा भूपीठवासिनः। स्वर्वासिनोऽपि ये देवाः, सर्वे रक्षन्तु मामितः ॥४३॥ येऽवधिलब्धयो ये तु, परमावधि-लन्धयः। ते सर्वे मुनयो देवा, मां संरक्षन्तु सर्वदा ॥४४॥ दुर्जना भूत-वेतालाः, पिशाचा मुद्गलास्त- था। ते सर्वेऽप्युपशाम्यन्तु, देवदेव-प्रभावतः ॥४५॥ ॐ ह्रीं श्रीश्च धृतिर्लक्ष्मी, गौरी चण्डी सरस्वती । जयाम्या विजया नित्याक्लिन्ना जिता मद-द्रवा ॥ ४६॥ कामाङ्गा कामवाणा च, सानन्दा नन्दमालिनी। माया मायाविनी रौद्री, कला काली कलिप्रिया ॥४७॥ एताः सर्वा महादेव्यो, वर्तन्ते या जगत्रये । मह्य सर्वाः प्रयच्छन्तु, कान्तिं कोर्ति धृति मतिम् ॥ ४८ ॥ दिव्यो गोप्यः सुदुः- प्राप्यः, श्रीऋषिमण्डलस्तवः ।भाषितस्तोर्यनाथेन, जगताण- कृतेऽनघः ॥ ४६॥ रणे राजकुले वही, जले दुर्गे गजे हरौ। श्मशाने विपिने घोरे, स्मृतो रक्षति मानवम् ॥५०॥ राज्य- भ्रष्टा निजं राज्य, पदभ्रटा निज पदम्। लक्ष्मी-भ्रष्टा निजां लक्ष्मी, प्राप्नुवन्ति न संशयः॥ ५१ ॥ भार्यार्थी लभते ४८ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। भायाँ, पुत्रार्थी लभते सुतम्। वित्तार्थी लभते वित्तं, नरः स्मरण-मात्रतः ॥५२॥ स्वर्ण रूप्ये पटे कांस्ये, लिखित्वा यस्तु पूजयेत्। तस्यैवाष्टमहासिद्धिाहे वसति शाश्वती ॥ ५३॥ भूर्जपत्र लिखित्वेदं, गलके मूर्ध्नि वा भुजे। धारितं सर्वदा दिव्यं, सर्व-भीति-विनाशकम् ॥ ५४॥ भूतैः प्रेत हैर्यक्षः, पिशाचैर्मुद्गलैनलैः। वात-पित्त-कफोद्रेकैः- मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५५ ॥ भूर्भुवःस्वस्त्रयीपीठ-वर्तिन शाश्वता जिनाः। तैः स्तुतैर्वन्दितैष्टियत् फल तत्फल श्रुतौ ॥५६॥ एतद् गोप्य महास्तोत्र, न देय यस्य कस्य- चित्। मिथ्यात्ववासिने दत्ते, बाल-हत्या पदे पदे ॥ ५७ ।। आचामादि तपः कृत्वा, पूजयित्वा जिनावलीम् । अष्टसाह- निको जापः, कार्यस्तत्सिद्धिहेतवे ॥५८॥ शतमष्टोत्तर प्रातर्ये पठन्ति दिने दिने। तेषां न व्याधयो देहे, प्रभवन्ति न चापदः ।।५६ ॥ अष्टमासावधि यावत्, प्रातः प्रातस्तु यः पठेत् । स्तोत्रमेतद् महातेजो, जिनविम्ब स पश्यति ॥६॥ दृष्ट सत्यस्तो विम्बे, भवे सप्तमके ध्रुवम्। पद प्राप्नोति .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला ।
४६
शुद्धात्मा, परमानन्दनन्दितः ॥६॥ विश्ववन्यो भवेद् ध्याता,
कल्याणानि च सोऽश्नुते। गत्वा स्थान पर सोऽपि,
भूयस्तु न निवर्त्तते ॥ ६२॥ इदं स्तोत्र महास्तोत्र, स्तुती-
नामुत्तम परम्। पठनात्स्मरणाजापालभ्यते पदमुत्तमम्
॥६३ ॥ (इति श्रीनपिमण्डलस्तोत्रंक्षेपकश्लोकाभिराकृत्य
मूलमन्त्रकल्पानुसारेण लिखित गणिभिः श्रीक्षमाकल्याणो.
पाध्यायः, तदेवात्रास्माभिर्मुद्रितम्)
( ५ )
॥ अथ श्रीगौडीपार्श्वजिन-वृद्धस्तवनम् ॥
॥ (दूहा) वाणी ब्रह्मावादिनी,जागै जगविख्यात । पास
तणा गुण गावतां, मुज मुख वसज्यो मात ॥१॥ नारंगै
अणहलपुरै, अहमदाबादैपास । गौडीनो धणीजागतो, सहुनी
पूरे आसा॥२॥ सुभ वेला सुभ दिन घडी, मुहुरत एक मंडा-
ण प्रतिमा ते इह पासनी,थई प्रतिष्ठा जाण ॥३॥ (ढाल)
गुणहि विशाला मंगलीक माला, वामानो सुत साचोजी।
५
श्री नित्यम्मरण-पाठमाला। धण कण कंचण मणि माणक दे, गौडीनो धणी जावाजा (गु०).॥४॥ अणहिलपुर पाटण माहे प्रतिमा, तुरक तणे घर हुती जी। अश्वनी भूमि अश्वनी पीडा, अश्वनी वालि विगूती जी (गु०) ॥५॥ जागंतो जक्ष जेहनै कहिये, सुहणो तुरक आपै जी। पास जिनेसर केरी प्रतिमा, सेवक तुझो संताप जी (गु०)॥६॥ प्रह ऊठीने परगट करजे, मेघा गोठीने देजे जी। अधिक म लेजे ओछो म लेजे, टका पांचसै लेजे जी (गु०) ॥७॥ नहि आपिस तो मारीस मुरडीस, मोर बंध बंधास्ये जी। पुत्र कलत्र धन हय हाथी तुझ, लाछि धणी घर जास्यै जी (गु०) ॥ ८॥मारग पहिलो. तुझने मिलस्यै, सारथवाह जे गोठीजी। निलवट टीलो चोखा चेढ्या, वस्तु वहै तसु पोठी जी (गु०) ॥ ६ ॥ (दूहा) ॥ मनसु बीहनो तुरकडो, माने वचन प्रमाण । वीबी में सुहणा तणो, संभलावै सहिनाण ॥ १०॥ बीबी बोले तुरकने, बडा देव है कोय । अवसताव परगट करो, नहींतर मारै सोय ॥११॥ पाछली रात परोडीयै, पहली बांधै पाज ।
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ५१ सुहणा माहें सेठने, संभलावै जक्ष-राज॥ १२॥ (ढाल) एम कहीं जक्ष आयो राते, सारथवाहने सुहणे जी। पास तणी प्रतिमा तु लेजे, लेतो सिर मत धूणे जो (एम०) ॥ १३ ॥ पांचसै टका तेहने आपे, अधिको म आपिस वारू जी। जतन करी पहुचाडे थानिक, प्रतिमा गुण संभारंजी (एम०) ॥ १४ ॥ तुझने होसी बहु फल दायक, भाई गोठीने सुणजे जी। पूजीस प्रणमीश तेहना पाया, प्रह उठीने थुणजे जी (ए०) ॥१५॥ सुहणो देईने सुर चाल्यो,आपणे थानक पहु'तो जी। पाटण मांहें सारथवाहु, हीडै तुरकने जोतो जी (ए०) ॥१६॥ तुरकैजाता दीठो गोठी, चोखा तिलक लिलाडे जी। संकेत पहुतो साचो जाणि, चौलावै बहु लाडै जो (ए०) ॥ १७ ॥ मुझ घरि प्रतिमा तुझनें आपु', पास जिणेसर केरी जी। पांचसै टक्का जो मुझ आप, मोल न मांगु फेरीजी (ए०) ॥१८॥ नाणो देई प्रतिमा लेई, थानक पहुंती रंगै जी। केसर चंदन मृगमद घोली, विधसु पूजा रंगे जी (ए०) १६ ॥ गादी रुडी रूनी कीधी, ते मांहि प्रतिमा राखै जी।
-
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला।
अनुक्रम आव्या परिकर माहें, श्रीसंघ ने सुर साखै जो (ए०)
॥२०॥ उच्छव दिन २ अधिका थाये, सत्तर भेद सनात्रो
जी । ठाम २ ना दरसण करवा, आवै लोक प्रभातो जी (ए०)
॥२२॥ (दूहा) ॥ इक दिन देखै अवधसु, परिकर पुरनो भङ्ग ।
जतन करू' प्रतिमा तणो, तीरथ अछै अभङ्ग ॥२२॥ सुहणो
आपै सेठने, थल अटवी उजाड। महिमा थाल्यै अति घणी,
प्रतिमा तिहां पहुंचाड ॥२शा कुशल खेम तिहां अछे. तुझ्ने
मुझने जाणि। संका छोडी काम करि, करतो मकरि
सकाणि ॥२४॥ (ढाल)। पास मनोरथ पूरा करे. वाहण
एक वृषभ जोतरै। परिकरथी परियाणों करै, एक थल
चढ़ि बीजो उतरै ॥२५॥ वारै कोस आव्या जेतले, प्रतिमा
नवि चाले तेतलै । गोठी मनह विमासण थई, पास भुवन
मंडावू सही ॥ २६ ॥ आ अटवी किम करू प्रयाण, कटको
कोइ न दीसै पाहाण । देवल पास जिनेसर तणो, मंडावं
किम गरर्थे विणो ॥ २७ ॥ जल विन श्रीसंघ रहस्यै किहाँ,
सिलावटो किम आवे इहां। चिन्तातुर थयो निद्रा लहै,
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ५३ यक्षराज आवीने कहैं ॥ २८ ॥ गुहली ऊपर नाणो जिहां, गरथ घणो जाणीजे तिहां। स्वस्तिक सोपारीने ठाणि, पाहण तणी उल्लटस्यै खाणि ॥ २६ ॥ श्रीफल सजल तिहां किल जूओ, अमृत जलनी सरसी कूओ । खारा कुवा तणो इह सैनाण, भूमि पड्यो छै नीलो छाण ॥ ३०॥ सिलावटो सीरोही वसे, कोढ पराभवियो किसमिसे। तिहां थकी तुं इहां आणजे, सत्य वचन माहरो मानजे ॥३१॥ गोठीनो मन थिर थापियो, सिलावटने सुहणो दियो। रोग गमीने पूर्व आस, पास तणो मंडे आवास ॥ ३२॥ सुपन माहे मान्यो ते वैण, हम वरण देखाड्यो नैण । गोठी मनह मनोरथ हुवा, सिलावटने गया तेडवा ॥ ३३ ॥ सिलावटो आवै सूरमो, जिमें खीर खांड घृत चूरमो । घ. घाट करै कोरणो, लगन भलै पाया रोपणी ॥ ३४ ॥ थंभ २ कीधी पूतली, नाटक कौतुक करतीरलो। रङ्गमंडपरलियामणों रौ, जोतां मान- वनो मन वसे ॥३५॥ नीपायो पूरो प्रासाद, स्वर्ग समो मांडे आवास । दिवस विचारी इंडो घड्यो, ततखिण देवल ऊपर .
. श्री नित्यस्मरण-पाटमाला। . चढ्यो ॥३६॥ शुभ लगन शुभ वेला वास, पन्चासण वेठा श्रीपास। महिमा मोटी मेरु समान, एकलमिल वगडे रहै. वान ॥३७॥ वात पुराणी मैं सांभली, तवन मांहि सूधी सां- कली। गोठी तणा गोतरिया अछ, यात्रा करीने परने पछे . ॥ ३८ ॥ (दोहा ) ॥ विधन विडारन यक्ष जगि, तेहनो अकल सरूप । प्रीत करे श्री सङ्घने, देखाडै निज रूप ॥३६ गरुओ गौडी पास जिन, आपे अरथ भंडार। सांनिध करै श्री सङ्घने, आसा पूरणहार ॥४०॥ नील पलाणे नील हय, नोलो थई असवार । मारग चूका मानवी, वाट दिखावण हार ॥४१॥ (ढाल ) ॥ वरण अढार तणो लहै भोग, विघन निवारे टालै रोग। पवित्र थई समरै जे जाप, टाले सगला पाप संताप ॥४२॥ निरधननो घरि धन नो सुत, आप अपु- त्रीयाने पुत्र । कायरने सूरापण धरै, पार उतारै लच्छी वरै॥४३॥ दोभागीने दे सोभाग; पग विहणाने आपै पग। ठाम नहीं तेहने चैं ठाम, मनवंछितं पूरें अभिराम ॥ ४४ ॥ निराधार ने ये आधार, भवसायर उतारे पार। आरतियानी श्री नित्यस्मरणा-पाठमाला । आरत भंग, धेरै ध्यान ते लहै सुरंग ॥ ४५ ॥ समसां सहाय दीये यक्ष राज, तेहना मोटा अछे दिवाज । बुद्धि हीण ने बुद्धि प्रकाश. गूंगाने वचन विलास ॥४६॥ दुखियाने सुखनो दातार, भय भंजण रंजण अवतार । बंधन तूटे वेडी तणा, श्री पार्श्व नाम अक्षर स्मरणा ॥४७॥ (दृहा ) श्री पार्श्वनाम अक्षर जपे, विश्वानर विकराल । हस्त जूथ दूरे टले, दुद्धर सिह सियाल ॥४८॥ चोर तणा भय चूकवे, विष अमृत उडकार । विपधरनो विष ऊतरे, संग्रामें जय जय कार ॥४६॥ रोग सोग दालिद्र दुख, दोहग दूर पलाय । परमेसर श्री पासनो, महिमा मन्त्र जपाय ॥ ५० ॥ (कडखानो चाल) ॥ उजितु २ उंज उपसम धरी, ॐ ह्रीं श्री श्री पार्श्व अक्षर जपते। भूत ने प्रेत झोटिंग व्यन्तरसुरा, उपसमे वार इकबीस गुणते (5) ॥५१॥ दुद्धरा रोग सोगा जरा जंतने, ताव एकान्तरा दुत्तपते । गर्भवन्धन व्रणं सर्प विच्छू विषं, चालिका चालमेवा झवते (उ०)॥५२॥ साइणी डाइणी रोहिणी रंकणी, फोटका मोटका दोप हुते। दाढ ५६ श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। उंदरतणी कोल नोलातणी, स्वान सीयाल विकरालं दंते॥५३॥ . (उ०) धरणेंद्र पद्मावती समर शोभावती, वाट आघाट अटवी अटते । लखमी लोढुं मिलैं सुजस वेला उलै, सयल आस्या फलै मन हसं (उ) ॥ ५४ ॥ अष्ट महाभय हरें कानपीड़ा टलै, ऊतरै सूल सीसग भणते। वदत वर प्रीतसुप्रीति- विमल प्रभू, श्री पास जिण नाम अभिराम मन्तै ( उंजितु) ॥ ५५ ॥ ॥ इति श्रीगोडी पार्श्वनाथजी वृद्ध स्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ श्री गौतम स्वामिजी का रास ॥ - ॥ वीर जिणेसर चरण कमल, कमला कय चासो; पणमिवि पणिसु सामीसाल, गोयम गुरु रासो। मण तणु वयण एकंत करिवि, निसुणहु भो भविया, जिम निवसे
श्री नित्यस्मरणं-पाठमाली ।
५७
तुम देह गेह गुण गण गहगहिया ॥१॥ जंवूदीव सिरि भरह
खित्त, खोणी तल मंडण, मगह देस सेणिय नरेस, रिऊ
दल बल खंडण। धणवर गुव्वर गाम नाम, जिहां गुण
गण सज्जा; विप्प बसे वसुभूइ तत्थ, तसु पुहवो भजा
॥२॥ ताण पुत्त सिरि इन्दभूइ, भूवलय पसिद्धो; चाउदह
विजा विविह रूब, नारी रस लुद्धो। विनय विवेक
विचार सार, गुण गणह मनोहर; सात हाथ सुप्रमाण देह,
रूवहि रंभावर ॥३॥ नयण वयण कर चरण जणवि,
पंकज जल पाडिय; तेजहि तारा चन्द सूरि, आकास
भमाडिय। रूवहि मयण अनंग करवि, मेल्यो निरधाडिय,
धीरम मेरु गंभीर सिंधु, चंगम चय चाडिय ॥४॥ पेक्खवि
निरुवम रूव जास, जण जपे किंचिय; एकाकी किल भीत्त
इत्थ, गुण मेल्या सिंजिय। अहवा निश्चय पुव्व जम्म, जिणवर
इण अंचिय; रंभा पउमा गउरी गङ्ग, तिहां विधि वंचिय
॥५॥ नय वुध नय गुरु कविण कोय, जसु आगल रहियो;
पंच सयां गुण पात्र छात्र, हीडे परवरियो। करय निरंतर
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श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। यज्ञ करम, मिथ्यामति मोहिय; अणचल होसे चरम नाण, दसणह विसोहिय ॥६॥ वस्तु ॥ जंबूदीव जंबूदीव भरह वासंमि, खोणीतल मंडण, मगह देस सेणिय नरेसर, वर गुव्वर गाम तिहां, विप्प बसे वसुभूइ सुन्दर, तसु पुहवि भज्जा, सयल गुण गण रूव निहाण, ताण पुत्त विज्जानि- लो, गोयम अतिहि सुजाण ॥ ७ ॥ भास ॥ चरम जिणेसर केवलनाणी, चोविह संघ पइट्ठा जाणी। पावापुर सामी संपत्तो, चउविह देव निकायहि जुत्तो ॥ ८॥ देवहि समवसरण तिहां कीजें, जिण दीठे मिथ्यामत छीजे। त्रिभुवन गुरु सिंहासन बेठा, ततखिण मोह दिगंत पट्टा ॥६॥ क्रोध मान माया मद पूरा, जाये नाठा जिम दिन चोरा। देव दुंदुभि आगासें वाजी, धरम नरेसर आन्यो गाजी ॥१०॥ कुसुम वृष्टि अरचे तिहां देवा, चउसठ इंद्रज मागे सेवा। चामर छत्र सिरोवरि सोहे, रूवहि जिनवर जग सहु मोहे ॥ ११ ॥ उपसम रसभर वर वरसंता; जो- जन वाणि वखाण करता। जाणिवि वर्द्धमान जिण श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। पाया, सुर नर किन्नर आवइ राया ॥ १२ ॥ कंत समोहिय जलहलकता,गयण विमाणहि रणरणकंता। पेक्खवि इन्दभूइ मन चिंते, सुर आवे अम यज्ञ हुवंते ॥१॥ तीर तरंडक जिम ते वहिता, समवसरण पुहता गहगहिता। तो अभिमानें गोयम जपे, इण अवसर को तणु कंपे ॥ १४ ॥ मूढा लोक अजाण्युबोले, सुरजाणंता इम कांइ डोले । मो आगल कोइ जाण भणीजें, मेरु अवर किम उपमा दीजें ॥१५॥ वस्तु ।। वीर जिणवर वीर जिणवर नाण संपन्न पावापुर सुरम- हिय, पत्त नाह संसारतारण, तिहि देवइ निम्महिय, समवसरण बहु सुक्ख कारण, जिणवर जग उज्जोय करे, तेजहि कर दिनकार सिंहासण सामी ठव्यो, हुओ तो जय जयकार ॥६६॥ भाल ॥ तो चढियो घणमाण गजे, इन्दभूइ भूयदेव तो; हुंकारो कर संबरिय, कवणसु जिणवर देव तो।. जोजन भूमि समोसरण, पेवखवि प्रथमारंभ तो; दह दिस देखे विवुध वधू, आवंती सुररंभ तो ॥१७॥ मणिमय तोरण दंभ ध्वज, कोसीसे नवघाट तो; वहर ६० श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। विवर्जित जतुगण, प्रातीहारिज आठ तो। सुर नर किनर असुरवर, इंद्र इंद्राणो राय तो, चित्त चमकिय चिंतवए, लेवंता प्रभु पाय तो ॥ १८ ॥ सहसकिरण सामी वीरजिण, पेखिम रूप विसाल तो; एह असंभव संभव ए, साचो ए इ'द्रजाल तो। तो वोलावइ त्रिजग गुरु, इद्रभूइ नामेण तो; श्रीमुख ससय सामी सवे, फैडे वेद पएण तो ॥१६॥ मान मेल मद ठेल करे, भगतिहिं नाम्यो सीस तो, पंच सयांसु व्रत लियो ए, गोयम पहिलो सीस तो। बंधव सजम सुणिवि करे, अगनिभूइ आवेय तो; नाम लेई आभास करे, ते पण प्रतिबोधेय तो ॥२०॥ इण अनुक्रम गणहर रयण, थाप्या वीर इग्यार तो, तो उपदेसे भुवन गुरु, संयमशुं व्रत बार तो। विहु उपवासें पारणो ए, आपण विहरंत तो गोयम संयम जग लयल, जय जयकार करत तो ॥ २१॥॥ तु ॥ इंद्रभूइ इंद्रभूइ चढियो बहुमान, हुकारो करि पितो, समवसरण पहुतो तुरंतो, जे संसा सामि सवे, चरमनाह फेडे फुरत तो;
श्री.नित्यस्मरण पाठमाला ।
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चोधिवीज संजाय मने, गोयम भवहि विरत्त, दिक्खा लेई
सिक्खा सही, गणहर पय संपत्त ।। २२ ॥ भास.॥: आज
हुओ सुविहाण, आज पचेलिमा पुण्य भरो; दीठा. गोयम
सामि, जो निय नयणे अमिय सरो। समवसरण मझार,
जे जे संसय ऊपजे ए; ते ते पर उपगार, कारण पूछे-मुनि
पबरो॥ २३ ॥ जीहां २ दीजें दीख, तीहां केवल ऊपजे ए;
आप कनें अगहुँत, गोयम दीजें दान इम। गुरु ऊपर गुरु
भक्ति, सामी गोयम ऊपनिय; एणिछलं केवल नाण, रागज
.राने रंग भरे ॥२४ ॥ जो अष्टापद सेल, वंदे चढ चउवीस
जिण; आतम लब्धि वसेण, चरम सरीरी सो ज मुनि। इय
देसणा निसुणेह, गोयम गणहर संचरिय; तापस पनर
सएण, तो मुनि दीरें आवतो ए ॥२५॥ तप सोसिय निय
अंग, अम्हां संगति न., पजे ए, किम चढसे दृढ काय,
गज जिम दीसे गाजतो .ए । गिरुओए अभिमान, तापस.जो
मन चिंतवे ए; तो मुनि वढियो वेग, आलंबवि दिनकर
किरण ॥ २६ ॥ कंचण मणि निप्फन, दंडकलस ध्वजबड
६
६२ श्री नित्यस्मरण-पाठमाली । सहिय; पेखवि परमाणन्द, जिणहर भरतेसर महिय। निय निय काय प्रमाण, चिहु दिसि संठिय जिणह बिंव; पणमवि मन उल्लास, गोयम गणहर तिहां वसिय ॥ २७ ॥ वयर-सामीनो जोव, तिर्यक् जृभक देव तिहां, प्रतिबोध्यो पुंडरीक, कंडरिक अध्ययन भणी । वलता गोयम सामि, सवितापस प्रतिबोध करे, लेई आपण साथ, चाले जिमजूथा- धिपति ॥२७॥ खीर खांड घृत आण, अमिय वूठ अंगूठ ठवे; गोयम एकण पात्र, करावे पारणो सवे। पंच सयां शुभ भाव, उज्जल भरियो खीर मिसे; साचा गुरु संयोग, कपल ते केवल रूप हुआ ॥ २६ ॥ पञ्च सयां जिणनाह, समवसरण प्राकारत्रय; पेखवि केवल नाण, उप्पन्नो उज्जोय करे। जाणे जणबि पीयूष, गाजंती घन मेघ जिम; जिनवा- णी निसुणेवि, नाणी हुआ पंचसया ॥३०॥ वस्तु ॥ इण अनुक्रम इण अनुक्रम नाण पन्नरेसें, उप्पन्न परिवरिय, हरिदुरिय जिणनाह वदह, जाणेवि जगगुरु वयण, तिहि नाण अप्पाण निंदह । चरम जिनेसर इम भणे, गोयम म .
श्री नित्यस्मरण-पांठमाला। करिस खेव,छेह जाय आपण सही, होस्यां तुल्ला चेव ॥३॥ भास ॥ सामियो ए वीर जिणन्द, पूनमचन्द जिम उल्लसिय; विहरियो एभरहवासम्मि, वरस बहुत्तर संवसिय । उवतो ए कणय पउमेण, पाय कमल संधैं सहिय; आवियो ए नय- णानंद, नयर पावापुर सुरमहिय ॥ ३२ ॥ पेसियो ए गोयम सामि, देवसमा प्रतिबोध करे, आपणो ए तिसला देवि, नंदन पुहतो परमपए। वलतो ए देव' आकाश, पेखवि जाण्यो जिण समो ए; तो मुनि ए मन विखवाद, नाद भेद जिम ऊपनो ए॥ ३३ ॥ इण समे ए सामिय देखि, आप कनासुटालियो ए; जाणतो ए तिहुअण नाह, लोक विवहार न.पालियो ए| अतिभलों ए कीधलो सामि, जाण्यो केवल मागसे ए, चिन्तव्यो एबालक जेम, अहवा केडे लागले ए॥३४॥ हूं किम ए वीर जिणंद, भर्गातहि भोले भोलव्यो ए; आपणो ए उचलो नेह, नाह न संपे साचव्यो ए। साचो ए वीतराग, नेह न हेजेंलालियोए, तिणसमे ए गोयमचित्त, राग वैरागे वालियो ए ॥ ३५ ॥आवतो ए जो उल्ल, रहितो .
१६४ श्री नित्यस्मरंण-पाठमाला। ... 'रागे साहियो ए, केवल ए. नाण उत्पन्न, गोयमसहिज ऊमा- हियो ए।. तिहुअण ए जय जयकार, केवल महिमा सुर करे ए, गणधरु ए करय वखाण, भविया भव जिम निस्तरे ए -:॥ ३६ ॥ वस्तु ॥ पढम गणहर पढम गणहर बरस पञ्चास, गिहवासे संवसिय, तीस वरस संजम विभूसिय, सिरि "केवल नाण पुण, बार बरस. तिहुअण नमंसिय, राजगृही 'नयरी उठ्यो, वाणवइ वरसाउ, सामी गोयम गुणनिलो, होसे सिवपुर ठाउ ॥ ३७॥ भास ॥ जिम सहकारे कोयल टहुके, जिम कुसुमावन परिमल महके, जिम चन्दन सोगंध निधि। जिम गंगाजल लहिसा लहके, जिम कणयाचल तेजे झलके, तिमःगोयम सोभाग निधि ॥३८॥ जिम मान सरोवर निवसे हिंसा, जिम सुरतरू वर कणय वतंसा, जिम महुयर राजीव चने । जिमरयणायर रयणें विलसे, जिम अंबर तारागण वि- कले, तिम गोयम, गुरु केवल धनें ॥३६॥.पूनम निसि जिम ,ससियर सोहे; सुर तरु महिमा जिम जग मोहे, पूरव दिसि जिम सहसकरो। पञ्चानने जिम गिरिवर राजे, नरवइ घर- .
श्री नित्यस्मरण-पाठमाला। ६५ जिम मयगल गाजे, तिम जिन सासनमुनि पवरी ॥४०॥ जिम गुरु तरुघर सोहे साखा, जिम उत्तम सुख मधुरी भापा, जिम वन केतकि महमहे ए। जिम भूमीपति भुषवल चमके, जिम जिन मन्दिर घण्टा रणके, गोयम लन्धे गहगह्यो ए ॥ ११ ॥ चिन्तामणि कर चढीयो आज, सुरतरु सारे बछिय काज, कामकुम्भ सहु वशि हुआ प । कामगवी पूरे मन कामी, अष्ट महासिद्धि आवे धामी, सामी गोयम अणुसरिए ॥४२॥ पणवक्खर पहिलो पभणीजें, माया चीजो श्रवण सुणीजे, श्रीमिति सोभासंभवाय। देवां धुर अरिहंत नमीजे, विनय पतु उवझाय थुणीजे, इण मन्त्र गोयम नमो प॥४३॥ पर- घर वसता काय करीजे, देस देसांतर काय भमीजे, कवण काजधायास करो। प्रह ऊठी गोयम समरीजे, काज समग्गल ततविण सीजे; नव निधि विलसे तिहां परे ए॥ ४४ ॥ * यह श्री विनयप्रभ उपाध्याय जी, श्री जिन कुशल सूरिजी के, जिनका स्वर्गवास वि० सं० १३८६ में हुआ था, शिष्य थे।
श्री नित्मर. गठमालां। चवदय सय बारोत्तर वरसे, गोयम गणहर केवल दिवसे, कियो कवित्त उपगार परो।आदहिं मंगल ए पभणीजे, परव महोच्छव पहिलो दीजे, रिद्धि वृद्धि कल्याण करो ॥४५॥ धन माता जिण उयरे धरियो, धन्य पिता जिण कुल अवत- रियो, धन्य सुगुरु जिण दीखियो ए। विनयवंत विद्या भ- एडार, तमु गुण पुहवी न लभइ पार, वड जिम साखा वि. स्तरोए। गोयम सामी रास भणीजे, चउविह संघरलिया- यत कीजें, रिद्धि वृद्धि कल्याण करो॥४६॥ कुकुम चंदन छडा दिवरावो, माणक मोतीना चौक पुरावो, रयण सिंहा- सण येसणी.ए। तिहां वेसी गुरु देसना देसी,भविकजीवना काज सरेसी, नित नित मङ्गल उदय करो॥४७॥ इति श्री गौतमस्वामि रास सम्पूर्ण ।
श्री अभयदेवसूरि-ग्रंथमाला।
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तैय्यार पुस्तकें-
नंबर
पुस्तकका नाम।
१ . नित्यस्मरण-पाठमाला (द्वितीयावृत्ति) अमूल्य
२ शुद्ध देव अनुभव विचार (हिन्दी)
३ द्रव्यानुभवरलाकर
२॥
४ जिन दर्शन-पूजन-सामायिक विधि प्रकाश 1)
छपती हैं-
।
१ राइय-देवसिय-प्रतिक्रमण सूत्र
२ अध्यात्म-अनुभव-योग-प्रकाश (हिन्दी)।
३, आगम सार का हिन्दी भाषान्तर ।
४ सांवत्सरिक-प्रतिक्रमण-सत्र।
छपेगी-
१ परतरगच्छ पंच प्रतिक्रमण सूत्र ( अर्थ सहित )
२ प्राचीन-स्तोत्र-रसमाली (इसमें प्राचीन निण्यात
आचायाँके धनाये हुए कार अति स्तोत्ररक्षों
समावेश है)
अन्य पुस्तकें-
१. स्थावादानुभव-रक्षाकर।
१॥
२ पर्युषणा-निर्णय।
समूल्य
मिलनेका पता
१-श्रीमनु-अभयवसूरि-प्रन्धमाला,
बड़ा उपाश्रय, सीकानेर (राजपूताना)
२-बाबू भैरुदानजी अमीचन्दनी.
नं. ३, मल्लिक रशीट, कलकत्ता
३-~-आत्मानन्द जैन पुस्तक प्रचारक मंडल
शौशन मोहोल्ला, आगरा
यह पुस्तक सहायक महाशय के न. २, हमाम
गली; कलकत्ता" इस पलेले भी मिल सकती है
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