Hindustani Academy, Allahabad
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-6
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nagari-Pracharini Grantbmala Seriesn.4-6. THE PRITHVIRAJ RAŠO OF CHAND BARDAI, EDITED Hindustani Academ BY Riegt. Das Mohanlal Visnulal Pandia, Radha Krisna Syam Sundar Das, B. A AND FILE NO. CANTOS XVII, TO XXIV. महाकवि चंद बरदाई कृत पृथ्वीराजरासो मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, राधाकृष्णदास जिसका । और श्यामसुन्दरदास बो. ए. ने सम्पादित किया। । पर्व-१७ से २४ तक। PRINTED AT THE MEDICAL HALL PRESS, AND PUBLISHED BY THE MAGARI PRACHARINI SABLA, BENARES. m 1906. 16066666666666 Issued 16th March 1906. [Price Re. 1.
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सूचीपत्र।
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पृष्ठ ५७७ से ५८ तक
५८६, ६०१
६०३ ,, ६३०
६३१ ६४१
६००
(१७) भूमि सुपन प्रस्ताव
(१८) दिल्लीदान प्रस्ताव
(१६) माधो भाट कथा
(२०) पदावती समय
(२२) प्रिथाब्याह वर्णन
(२२) होलीकथा ...
(३३) दीपमालिका कथा
(२४) धनकथा (अपूर्ण)
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६७१"
ॐ
६०४ ,, ६७६
६०१ "
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अथ भूमि सुपन प्रस्ताव लिष्यते ॥ (सत्रहवां समय।) पृथ्वीराज का कुंअरपन में शिकार खेलना। कवित्त । कुंअरप्पन प्रथिराज । राज आषेटक षिसहि जोव्वने मझ रवन । मूल पच्छिम दिमि मिल्लधि ॥ भानि बीर वाराह । चक्क बज्जी चावहिसि ॥ मुक्ति थान पंचांन । मिले सूर संह धसि ॥ लोहान बीर आजान भुभ । लोहा लंगर धाइया । वह थान चुक्कि अपथांन मुकि । पंचां नन रव छाइया || ई० ॥ १ ॥ हाथी घोड़े आदि का इतना कोलाहल होना कि शब्द सुनाई नहीं पड़ता। दशा ॥ पंष सबद गुंजत सुगज । है हीसन सद स्वानं । गिर गुंजत परसह बहु । सद्द न सुनिये कान ॥ ई० ॥ २ ॥ सिंह का क्रोधित होना। कवित्त । सहपति संभरिय । न मंडे रव संभल ॥ ज्यों बल बयन असंत । विन पोजै निगम मिलि ॥ गुन अवगुन कुल बध । मती पति सता मानि मन ॥ नाग अंग चंपयो । किमार अग्गै फुल्यौ मन ।। विभयो एम पंचाननछ । बाय बास सुमन फुलिय ॥ द्रिग घालि द्रिष्ट नगया सकल । तेज अंग कायर इलिय ॥ ई० ॥ ३ ॥ दूदा ॥ कानन सहन संभरत । कूछ कलह भाषेट । थह सूतो बर जग्गयो । सिसु दंपति घटि पेट ॥ ई० ॥ ४ ॥ कवित्त ॥ दिष्ट राज अंमरिय । सरित संभरिय संपत्ते । - ५०६ पृथ्वीराजरासो। [संचहवां समय २ के हके इक्काह । केक चावहिसि धत्ते । के पाइल बर बान । मूल धारी उठि नछ । के असवार करार । हीन काइर वैत? के गए मुक्ति पाइल म्रगय । पीर छटि लक्कर परत ॥ दिष्षया लंग लंगावली । बियो न को धीरज धरत ॥ छं ॥ ५ ॥ सिंह का महा क्रुद्ध होना। सुनिब सूर बर हक्क । धक्क बज्जी चावहिसि नरन सह कानन प्रसद्द । सिंघ किन्नो सु क्रोध प्रसि ॥ बीरा रसु बिड्डरिय । पुंकि सिर झारि झपहिय । दीप नयन प्रज्जरिय । लंग दिसि लगे लपहिय ॥ बल अतुल तोल तालत पय । बुल्यौ मन सहह गुहिर ॥ फटिय धरकि. मानहु गगन । सिस सनेह संगन बहन ॥ छं० ॥ ४ ॥ दूदा ॥ पाषेटक दरसे सकल । सिसु सिंघनी बिच सिंघ ॥ खान देषि मुहु रव करत । ओलंषे नरसिंघ ॥ ई० ॥ ७ ॥ सिंह पर तीर का निशाना चूकना, एथ्वीराज का तलवार से सिंह का मारना। कवित्त ॥ सबै सेन अवसान । मुक्कि लण्या बर तामस ॥ तब पंचानन हक्किं । धक्कि चहुश्रानां पामिस ॥ लै कमान बिय बांन । पंचि नंष्वौ विय चुक्यौ । समर सिंघ सब सथ्थ । तस्थ चावविसि हंका॥ उमरिय डहकि विज्जल वहकि । षग को सेमिसजा । चंप्यौ नरिंद अवसान तकि । षंडो अग्यि हथ्थता ॥ छं० ॥८॥ चंपि स्वामि विडरिय । लोह संजुरि नग मुक्यौ । लोहा लंगर राइ । बीर अवसान न चुक्यौ । खांमि सध्थ परिपथ्यं । रुड घर वर उष्पारे । रुहिर अंग भंभारिय। सिंघ पारिय अध्यारे॥ बन राय बीर बन हित्त रुप । सूर स्वामि भ्रंमं सुरसि । ।
सत्रहवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ५४ ॥ चर नंग बीर सल बज्जय । सबर जोर जम दढकसि ॥ छ ॥ ९ ॥ टूहा ॥ लंगे लोह उचार करि । अरु चावहिसि चाहि ॥ इथ्य आइ कर तान द्रढ । बर कमान कर साहि ॥ ई० ॥ १० ॥ कवित्त ॥ द्रढ कमान मुठिय प्रमान । गयौ तकि तोन जोर कर ॥ बरकि बरकि बंगाल । चित्तत चंचल सु बोलि गुर । गुंजि गरज भूभांन । जंग देवत्त रत्त जुत्र । नचि निवेस तजि बाल । सिंघ सम बीर पक्क हुअ॥ आषेट तजिय चल्लिय सुभर । बिबिध सिंघ दिष्पन दिसा ॥ सम बीर बीर एकत भए । तहां दिष्या सोमेस जा ॥ ई० ॥ ११ ॥ षेध खरिंग कुटि बीर । सुबर दिषि बीर अष्ट क्रम । सोमेसर सुअ सूर । लया पर नाजिम रवितम ॥ मुष्टि दिष्टि मरदां मरद । मिले पंचानन सूरं । पिता जात बेबंध । द्रव्य अधो अध पूरं । चय भाग तकिय सिंघद सुक्ष्य । सुला मुल लंगी चढ्यौ । उष्णमा चंद सुनि सुपन ज्यौं । सुचर बीर देही दनौ ॥ छ ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज के शिकार की धूम धाम का वर्णन, पृथ्वीराज का एक पेड़ की छाया में अपने सरदारों के साथ बैठना। छंद पहरी ॥ आषेट रमत प्रथिराज रंग । गिरवर उतंग उद्यान दंग ॥ उत्तंम तरुन छाया प्रकास । अनेक पंषि क्रीडहिं हुलास । सुब्बा सरास छुहे सुगंध । वहां भ्रमत भार बहु बास अंध फल फूल भार नमि लंगी साष। नासा सुगंध रस जित चाष ॥ ॥ १३ ॥ पनग प्रचंड फूंकर फिरंत । देषेत नरहने करत अंत || अंनेक जीव तह करत केलि । बट बिटपि छोह अवलंबि बेलि । एक घाट विकट जंगल दुअर । नहा बीर मूल पिथ्यल कुंभार ॥ वामंग अंग चामंड राय। चकै नम्बंठि सौ काल घाइ ॥ ई० ॥ १४ ॥ दाहिनि दिसा कन्हा सुजोध । सम ब्रह्म सस्त्र सम नाहि क्रोध ॥ लोहन पिठ्ठ बैठो प्रचंड । जनार जोर जम देन दंड ॥ FIR ५८० पृथ्योराजरासो। [सत्रहवां समय ४ . ढिग कन्ह बैठि पुंडीर धीर । अाजान बार बच्ची सरीर । चामंड अंग कैमास काल । जीवार जोष पसु घरनि घाल ॥ तिन अग्ग आइ पज्जन रा । सब खेल निपुन पसुदाइ घाइ ॥ छः ॥ १५ ॥ दुम ओर और सामंत जूह । दानि जोर करि करी कर जारि सेन सात सहस. सथ्थ । उडुत पंषि गहि लें। थ्थ ॥ जुर वाज कुही तुर मती धारि । उडु। जीव ने लैहि पार ॥ सच लैंहि स्वांन ने रौझ झुम्मिा पिष्षियै जुकरंक घिन मंस भूम्मि ॥ ई० ॥१६॥ सकल अनेक उठे वराछ । बट. बंटि मंसनह मुहि थाच ॥ सा मरन सूर परि बथ्य लेहि । ते बंटि बंटि सब सथ्थ देहिं । परगोस स्वान नइ लत बाटि । फिरि चढ़े जीव ते ओठ चांटि । मगमाल पवन उठि चले भागि। तिन परसु नीर सरबसि आगि ॥ ई० ॥ १७ ॥ अनजीव जीव वष्षांन कोंन । सिकार लग्गि बन हाल होन। सब मथ्थ तथ्थ हु एक जुहि । गज्यौ सु सिंघ जनु गगन फुडि ॥ धपि चल्यौ बीर प्रथिराज धीर । लंगरिय लोह तह इक नीर । दिष्यौ सुजाइ सिंघनिय बाल । अवतार धरिय जनु पुरमि काल ॥ छं० ॥१८॥ गरु राइ गुंग गज्यौ गरूर । उच्चार पुछ मनु पुरमि चूर । इथवान इथ्य हाकत ष्याल । दडुरनि दौरि मनोद बटि ब्याल ॥ आकास सीस हदै प्रचंड । जम रूप जीव ताडन तुंड ॥ इक्या सुराइ संजम कुंभार । कुव्या सु तेज जनु तीर तार ॥ छ० ॥ १८ ॥ भए लथ्थ बश्श्च नर जीव जोध । वप अग्ग केलि जनु मल्ल क्रोध ॥ गल बांच घल्लि दव्यौ सुसूर । फाचौ सु उदर जम दळू पूर ॥ इथवार एक केहरिय कीन । पय इथि अंधि करि कंन हीन ॥ आये सु दौरि सब सथ्य जामा लंगा सन्नि इम कहिय खाम ॥ ई० ॥२०॥ संजम राय के बेटे का वीरता दिखलाना । दूहा ॥ संजम राइ कुमार बल । करि संजम प धंम ॥ इक्क मिक एकत भए । अप्प चर्म पसु चर्म । ई० ॥ २१ गनि कुंभ जिसि हथ्थ इनि । फारि चीर धर डार ॥
सत्रहवां समय ५] पृथ्वीराजरासो ५८१ ॥ । संजम राव कुमार सौ । बथ्थन मारि पछारि ॥ ई० ॥ २२ ॥ रीछ रोझ बाराह इनि । दळुन बढे कोरि ॥ तिते जीव उर मभभत । कढि जम दले फोरि । ई० ॥ २३ ॥ गिरि परबत नद साह सर । लंबत लगीन बार ॥ लंगा पक्कन लंघयो । अनी धार धर धार | ई. ॥ २४ ॥ पृथ्वीराज का प्रसन्न होना और उसकी पीठ ठोंकना। कवित्त ॥ भी प्रसन्न प्रथिराज । बोल बुल्ल्यौ सुलंगरिय ॥ इत्ती देऊ प्रचंड । पंच जो मचि मोधि जिय । अहा राज सु अड्ड । पाट असा तंबूलं ॥ अड्डा बेस सुदेस । करो आदर संमूलं ॥ बोलत बैन प्रथिराज सुनि । जीव लज्जि नीची नजरि । लगाइ कंठ बुकि पिठ्ठ कर । भली भन्ना सब सथ्थ करि । ई० ॥ २५ ॥ दूचा ॥ जब दैवत्त दिवाइहै । सब सच्चा मुझ बैन मिग तिना ज्यों देषियै । प्यास न बुभझे नैन । ई० ॥ २६ ॥ सुपनंतर की प्यास ज्यों । भजै मही किहि भति । जब दैहों तब पूजिहै। जो मन मशह पंति ॥ ई० ॥ २७ ॥ सब लोगों का आगे बढ़ना, एक शकुन मिलना । पूह कहि करि अग्गें चले । मिले सूर सब संग ॥ तब दियो एक सगुन बन । भए सबन मन पंग । ई० ॥ २८ ॥ शकुन को देख कर सब को आश्चर्य होना। बत्त कहत प्रथिराज ने । पिष्यौ सगुन नृपत्ति ॥ सकल साथ अचरिज भयो । देषन है चरिक्त ॥ ई० ॥ २८ ॥ एक सर्प को नाचते हुए देखना। कवित्त ॥ अहि सुरंग मनि दुत्ति । देवि मंडै तंडव गति ॥ बालमीक विल अग्र। इक फनि कुटिल क्रोध मति ॥ एक हथ्थ बिच विध्याथांन उंची रवि संहा ॥ । -
५८२
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पृथ्वीराजरासे।।
[ सपहवां समय ६
बर संमल उर चंपि । तेज जाज्जलि सचिन्हौ ।
प्राचिज देषि प्रथिगज त्व । हक्कास्त्रौ पामर सहर ।
धावर सु कन्द बछुआन का । बोलि बीर चचिग महर ॥ छं० ॥ ३० ॥
महर कहर करिवार । भार जिन जुल कन्ह बर ॥
नरनाहां बर ग ढ । गाइ गिर दीह दुमन घर ॥
मति जातिग सहदेव । सगुन आगम गम जान ।
प्रबल मैवासन मारि। उद्यपि थप्प थिर थान।
बिर दैत दमित आजांन भुत्र । उर किंवार वर बज जुत्र ।
छुट न किमह जै वेध तजि । दुअ महिष निवारै भुजनि दुध ॥ ई० ॥ ३१ ॥
पृथ्वीराज का इस सर्प की देबी के शकुन का फल पूछना ।
छंदपहरी ॥ आया सुमहर महरन नरेस । जिछि सुनत चढि भगि जान देस ॥
उन्निद अंग उत्तंग कंध ! बर बाहु वज्ज अरि धर असंध ॥
बेहथ कलाइय इथ्य जाहि । पग दौरि बियन बर रयो गाहि॥
महिषी सु उभय पय टांसि जाइ । कलईत क्रोध दिष्षय बलाइ ॥ ई०॥३२॥
रष्यत सु निजरि सब अग्ग पच्छ । चुक्कवै चोट हनि तुच्छ तच्छ ।
छल छेद भेद नम करन राव । पर भूमि श्रप्प डस धरै दाव ।
दुअ सहस महर जिन संग जोध । कमनैत काल अनमी अबोध ॥
बहु ब्रषभ गाय महिषीन तुंग । छली छयल्ल गडरन्न पुंग ॥ ई० ॥ ३३ ॥
धुमन
मत मथांन जिन घरन घोर । आगम अषाढ जनु घटा सार ॥
बेपार दुग्ध जिन घरन पर्च । अनभंग बुद्धि जिन समर चर्च ।
विरदैत एक वांने न धार । चमरैन एक इक नबल तार ॥
सिर क्ई बिदर पग पच्छ देना ट्रिग समर देषि सिर लगत गैन ॥ छ०॥ ३४ ॥
गुज्जर अहीर असि जाति दोडू । तिन लीह लोपि सके न कोई ॥
चाचिग हजूर कुम्मार आइ । करियै हुकम सिर ल्यों चढाइ
बुल्ले सुबैन चहुन राउ । कहि सगुन सर्प देवी प्रभाउ ॥ ई० ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणों का फल बतलाना कि बिना युद्ध पृथ्वी से
आपको बहुत धन मिलेगा।
दूला ॥ महर कहर गति बैन कहि । ज्यों बुल्लै टुजबैन ।
घरी एक सन्हौ रहै । तो लभे नृप चैन । ई० ॥ ३६ ॥
सत्रहवां समय ०]
पृथ्वीराजरासो।
कंडलिया ॥ मंने संभरि बार सुनि । इह अपुब्ब गति इच्छ ।
ममम छदन घरि इक्क मैं । श्रावै भूमि रु लच्छि ।
आवै भूमि रू लच्छि । पंषि माता इह सारी ॥
दल जित्ते पुरसांन । कित्ति जग ज्यों विसतारी ॥
इन सगुननि चहुबांन । तुच्छ दुष अतिहि अभन्नौ
बिन जुद्ध इह लग्न । द्रव्य निकसै आभन्नौ ॥ छं० ॥ ३७ ॥
दूहा ॥ कुटिल दिष्ट तिन चिन्त करि । कही महर इक बात ॥
सो ब्रह्मा नन जानई । बास भविष्षत घात || ई० ॥ ३८ ॥
पृथ्वीराज का देखना कि सर्प आधा बिल में है और आधा
बाहर, उसके फन पर मणि के ऐसी देवी चारो ओर
नाचती है और राजा पर प्रसन्नता दिखलाती है।
कवित्त ॥ संभलि पिथ्थ कुमार । व्योम दिष्या स्वप सारिय ॥
अहो बाबी मध्य । अव उँचौ अधिकारिय ॥
ता फनि ऊपर मनि प्रमांन । देवि चावहिसि नंचै ॥
दिथ्यो इछ मन मंडि । राज दिसि सगुनह संचै ॥
आवै न पच्छ तथ्थह निजरि । पति हिय अयंत सुष ॥
जंपया महर धावर धनू । सगुन बीर जानै सरुष । ई० ॥ ३९ ॥
देवी का इतने में उड़कर आम की डार पर बैठना और साग
गिराना, पथ्वीराज का बड़ा शकुन मानना ।
दूहा ॥ इतें देवि उडि बैठि अब । चंच गिराय माग ॥
दौरि महिर सब इथ्य किय । लै नरिंद तुअ भाग ॥ छं० ॥ ४० ॥
सर्प सर्पिनी का मिलना और वहां से दूसरी जगह उड़ जाना
सर्प ांनि सर्पिनि मिलिय । भषु दीनौ तिन पाइ ॥
निय श्रासन थल इंडि कै। अब स्थल उडि जाई ॥ ई० ॥ ४१ ॥
इह अचिज्ज पिष्षिय सकल । चाचिग पुछि फिरि बत्त ॥
तुम जानो सब फल सगुन । महर कहर मत तत्त ॥ ई० ॥ ४२ ॥
पृथ्वीराजरासो। [सत्रहवां समय ८ ५८४ इस शुभ शकुन का फल वर्णन छंद पद्धरी ॥ तत बत्त महर तिन कही बत्त । या सगुन लाभ वरन्यौ न जत्त ॥ दिन तुच्छ मड्डि धन लाभ होइ । ता पच्छ कंक दुअराह जोडू ॥ छं०॥४३॥ तुम जैत होइ भग्गो पलांन । धन जुद्ध लाभ लम्भे बलांन ॥ इह लग्न महरत इसेो देव । पल भूमि अप्पि तो करै सेव ॥०॥४४॥ संसार कित्ति चहु चक्क होइ । बंदै सुवाइ बल दीन दोइ ॥ सागुन्य सगुन फल कहे जब्ब । प्रमुदित्त मन चहुशांन तब्ब ॥ छं०॥ ४५ ॥ जिम मेह मोर अानंद होइ । राका रयान आनंद तोई ॥ रिति राइ पाइ तरु फलत फूल । जिम सिद्ध सेव हिय हरत सून्त ॥ छं०॥४६॥ जिम मंच सक्ति साधक लहंत । रस धात रसाइन लहि चहंत ॥ जिम दृष्ट लाभ आराध वंत। प्रमदा मुहित जिम आइ कति ॥ ० ॥ ४७ ॥ तिम भया सुष्प प्रथिराज अंग । बजि पंच सब्द बाजै सुरंग ॥ ४८ ॥ शिकार बंद कर के बन में पृथ्वीराज का डेरा डालना। टूहा ॥ पंच सबद बाजिव बजि । तजि म्रगया चहुनि ।। कानन मध्य सु उत्तरिय । किन्नौ कुअर मिलान ॥ ई० ॥ ४६ ॥ डेरों की शोभा, बिछौने पलंग आदि की तयारी वर्णन, पृथ्वी- राज का शिकार की बातें करना, सरदारों का सत्कार करना, सब का ठंढा होना, भोजन की तयारी । छंद नाराचा ॥ कचौ मिलान राजयं । बरंनि कब्बि राजयं ॥ फिरंग सू फनक्कसी । जरदु जंज रक्कसी ॥ ई० ॥ ५० ॥ सुवंन वंस राज्जतं । उभे सुममम ममझतं ॥ फिरंन सूर लग्गतं । अजब्ब जेव जग्गतं ॥ छं० ॥ ५१ ॥ गिरिह डोरि रेसमं । सुपंच रंगयं भ्रमं । तने तानव तंबुझं । करे सुपवरं भुजं ॥ ई० ५२ ॥ विकाइ कैदुली चयं ।धरे प्रजंक वीचयं ॥ सवारि सेज पथ्थरं । सुगंध फूल विथ्यरं ॥ छ० ॥ ५३ ॥ गरम्म रूम तोसयं । ढके पलंग पोसयं ॥ कनक मै सिंघासनं । अछादितं सुवासनं ॥ ई० ॥ ५४ ॥ -
सचहवां समय ]
पृथ्वीराजरासा ।
५८५
।
।
धरे सुपिठ तक्किए । अतल्ल संत ढक्किए ।
अगें अबन्नि अंगनं । सिका करै छिरकनं ॥ ० ॥ ५५ ॥
कुंमकुमा गुलाबयं । सुनेक इंटि बाबयं ॥
तहां स वैठि पिथ्थयं । करै अषेट कथ्ययं ॥ छ० ॥ ५६ ॥
अनेक भंति चंदयं । पढे विरद्द छंदयं ।
सामंत खम्ब नम्मियं । मिलांन अप्प क्रमिमयं ॥ छं० ॥ ५७ ॥
से हथ्थ चाहुअानयं । दए कपूर पानयं ॥
षवास पास वानयं । हजूर उम्भ आनयं ॥ ई० ॥ ५८ ॥
विरष्य बह जंबुझं । पिरन जह अंबुजं ॥
गयंद बंधि अंदु । भरंत मह बिंदुअं ॥ छं० ॥ ५ ॥
करत केलि सारसी । मलप्प ते महारसी ॥
बिरह नेक बोलते। पलक्क चष्य षोखतें ॥ ई० ॥ ६ ॥
महावतं पुकारतें। हठं न लै अहारतें ॥
पियंत नीर षों गरें । गरज नभ ज्यों गरें॥ई० ॥११॥
कपोल लाल हल्लते । चबेल सुंड मल्लते ॥
गिलोल चोट लग्गते। विरष्ष ओट भग्गते ॥ ० ॥ १२ ॥
दिपंत दंत उज्जलं । पहार पंति कज्जलं ॥
दुरद्द हद्द बेसके। दिये गनेस भेस के । ई०
६३ ॥
सुपीलवान उम्मयं ! चरधि गड्ड षुभ्भयं ॥
करे तुरंग काजं । भरें श्रमंन बाइजं ॥ ई० ॥ ६४ ॥
मिटै डरं पसीनयं । पलान दूरि कीनयं ॥
न्हवाइ नष्प सिष्षयं । अछादि कंध रष्षयं ॥ कुं० ।। ६५ ॥
रतब्ब दै ब्रहासयं । करे वपत्त घासयं ।।
ता पच्छ जाइ साहनी । अरांम पंड वाभनी । ई० ॥ ६ ॥
कह कर भलारयं । भरी रषत्त भारयं ।
अनूचरं उतारयं । संभारि ढार ढारयं ॥ ई० ॥ ६७ ॥
हुलास सेन उप्पजै । भोज्जन भष्य निप्पजै ॥ ई० ॥ ८ ॥
सत्रहवां समय ]
पृथ्वीराजरासा ।
५८५
धरे सुपिठ्ठ तक्किए । अतल्ल संत ढक्किए ।
अगें अबन्नि अंगनं । सिका करै किरकनं ॥ ई० ॥ ५५ ॥
कुंमकुमा गुलाबयं । सुनेक इंटि बाबयं ॥
तहां स वैठि पिथ्थय । करै अषेट कथ्ययं ॥ ई० ॥ ५६ ॥
अनेक भंति चंदयं । पढे विरद्द छंदयं ॥
सामंत सब नम्मियं । मिलांन अप्प क्रमिमयं ॥ छं० ॥ ५७ ॥
में हथ्य चाहुअानयं । दए कपूर पानयं ॥
षवास पास वानयं । हजूर उम्भ आनयं ॥ ई० ॥ ५८ ॥
विरष्ष बह जंबुझं । पिरन्न जह अंबुझं ॥
गयंद बंधि अंदु। झरंत मह बिंदुअं ॥ छ० ॥ ५८ ॥
करंत केलि सारसी। मलप्प ते महारसी ॥
बिरह नेक बोलते । पलक चष्प पोलतें ॥ ० ॥ ६ ॥
महावतं पुकारतें। इठं न लै अहारतें ॥
पियंत नीर षों गरें । गरज नम्भ ज्यों गरें ॥ ई० ॥ ६१ ॥
कपोल लाल हल्लते । चबेल सुंड झल्लते ॥
गिलोल चोट लग्गते । विरष्ष ओट भग्गत ॥ ई० ॥ १२ ॥
दिपंत दंत उज्जलं । पहार पंति कज्जलं
दुरद्द हद्द बेसके । दिये गनेस भेस के ॥ ई० ॥ ६३ ॥
सुपीलवान उभभयं । चरष्पि गड्ड षुभ्भयं ॥
करे तुरंग काजं । भरें अमंन बाजं ॥ ई० ॥ ६४ ॥
मिटै डरं पसीनयं । पलान दूरि कीनयं ॥
न्हवाइ नष्ष सिष्षयं । अछादि कंध रष्षयं ॥ छं० ॥ ५ ॥
रतब्ब दै ब्रहासयं । करे चपत्त घासयं ।
ता पच्छ जाइ साहनी । अरांम पंड वाभनीं ॥ ॥१६॥
कह कर भलारयं । भरी रषत्त भारयं ॥
अनुचरं उतारयं । संभारि ढार ढारयं ॥ ई० ॥६७ ॥
हुलास सेन उप्पजै । भोज्जन भष्ष निप्पजै ॥ ई० ॥ ८ ॥
५८४ पृथ्वीराजरासो। [सत्रहवां समय ८ इस शुभ शकुन का फल वर्णन । छंद पद्धरी ॥ तत बत्त महर तिन कही बत्त । या सगुन लाभ वरन्यौ न जत्त ॥ दिन तुच्छ मद्धि धन लाभ होई। ता पच्छ कंक दुअराह जोर ॥ ई० ॥४३॥ तुम जैत होइ भग्गो षलांन । धन जुद्ध लाभ लभ बलांन ॥ इह लग्न महरत इस देव । षल भूमि अप्पि तो करै सेव ॥ ई० ॥४४॥ संसार कित्ति चहु चक्क होइ । बंदै सुवाह बल दीन दोइ ॥ सागुन्य सगुन फल कहे जब्ब । प्रमुदित्त मन चहुन तब्ब ॥ छं०॥ ४५ ॥ जिम मेह मोर आनंद होई । राका रनि आनंद ताई ॥ रिति राइ पाइ तरु फलन फूल । जिम सिद्ध सेव हिय हरत मूल ॥ छं० ॥ ४६॥ जिम मंच सक्ति साधक लहंत । रस धात रसाइन लहि चहंत ॥. जिम दृष्ट लाभ श्राराध वंत। प्रमदा मुहित जिम आइ कति ॥ ई० ॥ ४७॥ तिम भया सुष्प प्रथिराज अंग । बजि पंच सब्द बाजै सुरंग ॥ ४८ ॥ शिकार बंद कर के बन में पृथ्वीराज का डेरा डालना । दूहा ॥ पंच सबद बाजिव बजि । तजि सगया चहुनि ।। कानन मध्य सु उत्तरिय । किन्नौ कुअर मिलान ॥ छ• ॥ ४६ ॥ डेरों की शोभा, बिछौने पलंग आदि की तयारी वर्णन, पृथ्वी- राज का शिकार की बातें करना, सरदारों का सत्कार करना, सब का ठंढा होना, भोजन की तयारी । वंद नाराचा ॥ कचौ मिलान राजयं । बरंनि कब्बि राजयं । फिरंग सू फनक्कसी। जरद्दु जंज रक्कसी ॥ ई० ॥ ५० ॥ सुवंन वंस राज्जतं । उभे सुममम मममतं ॥ फिरंन सूर लग्गतं । अजब्ब जेव जग्गतं ॥ ई० ॥ ५१ ॥ गिरिह डोरि रेसमं । सुपंच रंगयं भ्रमं । तने नानव तंबुझं । करे सुपवरं भु ॥ ई० ५२ ॥ विछाइ कैदुली चयं ।धरे प्रजंक वीचयं ॥ सवारि सेज पथ्थरं । सुगंध फूल विथ्यरं ॥ छं० ॥ ५३ ॥ गरम्म रूम तोसयं । ढके पलंग पोसयं । कनक मै सिंघासनं । अछादितं सुवासनं ॥ ई० ॥ ५४ ॥ ॥ ।
५८६ पृथ्वीराजरासो । [सचहवां समय १० सब लोगों के साथ एथ्वीराज का भोजन करना । दूहा ॥ करि मिलांन मध्यांन छु। विपति भोज छह भेति ॥ एका मिलि आहार हुश्र । रही न मन का षंति ॥ छ० ॥ ८ ॥ संध्या होने पर सब लोग घर लौटे। मादक में नउ दीप किय । बढि सुगंधन तार ॥ निसि आगम बहुरे ग्रहन । जित तित भूपन भार ॥ ई० ॥ ७० ॥ पृथ्वीराज का घर पहुंच कर भूमि देवी (एवी) को स्वप्न में देखना। चढि करि संभरि वार चलि । ग्रेह सपन्नौ जाइ || अंधारी दारुन निसा । भू सुपनंतर आइ ॥ छं० ॥ ७१ ॥ भूमि देवी के रूप सौन्दर्य का वर्णन । कवित्त । पीत वसन आरुहिय । रत्त तिलकावलि मंडिय॥ कूटिय चंचल चाल । अलक गुथिय सिर इंडिय ॥ सीस फूल मनिबंध । पास नग सेत रत्त बिच ॥ मनों कनक साषा प्रचंड । गहै काली उप्पंम रुच ॥ मनो सोम सहायक राह होई । कोटि भान सोभा गही । अदभूत द्रव्य ससि अहि गल्यौ । साष सुरंग भनावही ॥ छं० ॥ ७२ ॥ पृथ्वीराज का पूछना कि तुम कौन हो और इस समय यहां क्यों आई हो। दूहा ॥ सुरंग चिया सेामो नृपति । वचन सुपन कहि लाल ॥ का तूं सुंदरि किन बरन । क्यों जभी इहि काख ॥ ई० ॥ ७३ ॥ भूमि देवी का कहना कि मैं वीरभोग्या हूं, मेरे लिये सुर असुर सब शंकित रहते हैं पर जो सच्चा वीर मिले तो मैं बहुत रस अवती हूं। कपित्त । बीर भोग वसुमती । बीर भोगी वर चाह । हाई भाइ कटाच्छ । बीर बीरा तन साड़ी । ॥
सत्रहवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। ५८० ज वीरां थी पद्धरी । विना वीरां वर बंकिय ॥ हुं दिव्य नारी एच । सुरां असुरांनइ संकिय ॥ मिष्टांन पनि बडु भोग रस । रस सुगंध वीरन द्रौं । अनभंग वीर जोहित वरि। रस अनेक निहचै श्रओं ॥ ई० ॥ ७४ ॥ गाथा ॥ पंक जनय नीवामं । सुपनंतर राज दिछायं ॥ जानिज्जै रति अंगं । कामं उछाह दीपयं मालं ॥ ई० ॥ ७५ ॥ राजा का विचार में मग्न होना। कवित्त ॥ मन लगौ बिसमित विचार । राज चिंता उप्पंनिय । भोमि बयन मन मभन । सु कर वर गहि कर लिनिय ॥ सुभ लच्छिन उत्तंग । अंग अंग गुन पिन्निय ॥ ता समान छवि वांम । न करतार न किन्निय ॥ मानीक वस दानव कुलह । भोमि चरन्न निवास करि ॥ जै जया सबद सुरपुर भयो । करै केलि कलि इंद्र सर ॥ ई० ॥ ७६ ॥ पथ्वीराज से भूमि का कहना कि षटू बन में अगनित धन है। दूहा० ॥ कई भूमि प्रथिराज से । स्तुति दै करि मन सुधि । बसै द्रव्य अगनित सगुन । षहू पुर बन मद्धि ॥ छं० ॥ ७७ ॥ अजयपाल चक्रवर्ती राजा द्वापर में था, उसने वहां असंख्य धन रक्खा है। कत्तित ।। अजैपाल चक्कवै । दुग्ग अजमेर हापरह ॥ तिहि बानिक पुर सिद्ध । लिषिय संजीत अपारह । हेम कोटि हा हुन । इन देवर धर मंझह ॥ घरी आइ इक पहर । देव देवी तत सुभमह ॥ अनांन काल पूजादि वह । तहं पत्तौ दुज राज बर ॥ अप्पी असीस मंगी लक्ष्यि । काम कयौ दुजराज नर ॥ ई० ॥ ७८ ॥ इक्क सहस अपि द्रव्य । फेरि विग्रह अप्रमानं ॥ सुनी सलछि बर विष्प । दई सुमहा बर थांनं । फिरि पत्तौ तहां राज । दिया तब श्राप दुजबर ॥
५८८ पृथ्योराजरासो। [सत्रहवां समय १२ श्रष्प भयो सुइ राज । रहै धन रष्षि गद्यौ घर ॥ मो मति द्रव्य तिहि थान रहि । तास मोह राजन करै । पायौ न कोइ बैहै न को। यो अरत्त अर्जुन फिरै ॥ ई० ॥ ७ ॥ टूहा ॥ को गड्डै पायौनि को। को विलसै करि भेव ॥ माया छाया मध्य दिन । ज्यों विषया बल देव ॥ ई० ॥८॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथीराज रासके भूमिस्वपन नाम सप्तदशो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १७ ॥ ..
अथ दिल्ली दान प्रस्ताव लिष्यते ॥ दूत का (अट्ठारहवां समय।) अनंगपाल के कैमास के हाथ में पत्र देना। दूहा ॥ दिय पत्री कैमास कर । अनँगगल कहि दून ॥ बर बंची सामंत सत । विंमत अष्षर नूत || ई० ॥ १ ॥ पत्र में अनंगपाल का अपनी बेटी के बेटे पृथ्वीराज को लिखना कि मैं बूढा हुआ, बद्रिकाश्रम जाता हूं, मेरा जो कुछ है सब तुम्हें समर्पण करता हूं। साटक ॥ स्वस्ति श्री अजमेर द्रोन दुरगे। राजाधिपो राजनं ॥ पुत्री पुत्र पवित्र पथ्थ अधना । षिची सर्व तावनं ॥ मा दृड्डा इह विद तप्प सरनं । वद्री निवत तनं ॥ आभूमं पुर ग्राम हय गय समं । संकल्पितं त्वार्थयं ॥ छं० ॥२॥ पत्र पढ़कर सब का बिचार करना कि क्या करना चाहिए। दूहा ॥ बंचि पत्र कैमास कर । नृप सामंत समंत । आइ दूत दिल्ली पुरह । सुबर बिचारहु मंत ॥ ई० ॥ ३ ॥ कोई कहता है कि दिल्ली चलना चाहिए, कोई कहता है पहिले प्रथा कुंआरि का व्याह रावल समरसिंह के साथ करना चाहिए। चौपाई ॥ दूक कई दिलिय चलि राज । मातुल बोलि तुमं प्रथिराजं ॥ इक्क कहै भगिनी परनाइय । समर सिंघ चिचंग सुराइय ॥ ई० ॥ ४ ॥ कवित्त ॥ समर सिंघ रावर नरिंद । चित्र चित्रंग देव दुति ॥ तिन सगपन संमुहौ । राज जानंत राज गति ॥ कै दिल्ली दिसि चलहि । बाल सेंवर अधिकारिय। सोमेसर पितु सतें। करिय जिन बोल सुभारिय ।
५६० पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठारहवां समय २ आवै न मंत विय बंध त । अनॅगपाल संमुह चलिय ॥ ता पच्छ प्रथा आगम सु प्रथ । देवमत्त व्याहं पुलिय ॥ छं० ॥ ५ ॥ राजा सोमेश्वर सब सामंतो को एकत्र कर परामर्श करता कि क्या कर्तव्य है, पुंडीर राय ने सलाह दी कि पाता हुआ राज्य न छोड़ना चाहिए। सित सामंत रुप्प । बैठि सब सथ्थय मंतर ॥ कैमासह चामंड । राय रामह बड गुज्जर ॥ हाहुलि राय हमीर । सलष पांमार जैन सम ।। कयौ राज हम मात । तात अप्पी दिल्ली तम ॥ पुंडीर राह इम उच्चरै । करौ सकल आदर सुधर ॥ उप्पाडू अनत महि लिज्जियै । आदि भ्रंम अंमर असुर ॥ ई० ॥ ६ ॥ चंद बरदाई का मत पूछना। चौपाई ॥ सब भट पछि पछि कवि चंदह । तुम बरदाइ लहौ बुधि कंदह ॥ किम अप्पै पितमात धरंनिय । सब बिरतंत कही मन करनिय॥ई०॥७॥ चंद ने ध्यान कर के देवी का आह्वान किया और देवी की आज्ञा से कहा। नब बरदाह सुद्ध मन कीनी । सुमरिय सकति ध्यान मन लीनैन ॥ देवी आइ कछौ बर तंतं । सो अङ्ग प्रथिराज सुमंतं ॥ ई० ॥ ८ ॥ व्यास ने जो भविष्यत बानी कही थी वह सुनाकर चंद का कहना कि आप का राज्य खूब तपैगा कवित्त ॥ पुब कथा वरतंत । कहो व्यासह ज्यों चंदह ॥ सही भविष्षित बात । सुनी मा होइ नरिंदह ॥ लोअर बद्री जाइ । पथ समप्पै चडुनं ॥ पें तेज रवि जेम। कहां सरमें परवानं ।। इह मत्त सत्त मन्त्री मनह । अरु पुबह मंत्री सपुन ॥ सामंत सित्त धर भ्रंम रत । सो पुबहु सच्चछु अपुन || ई० ॥ 21 ।
अट्ठारहवां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ५६१ । से एथ्वीराज का पूछना कि नाना (?) को वैराग्य क्यों हुआ। टूहा ॥ दूत हजूर बुलाइ करि । पुछत पिथ्थ कुंभार ॥ क्यों मातुल हुअ धर अरत । सेो कहा सत्त विचार ॥ ॐ ॥ १० ॥ दूत का अनंगपाल की प्रशंसा । गाथा ॥ दिल्ली अनंग नरिंदं । दंदं दहन दुनं दलनायं ॥ विगुन तेज सुअंगं । पुदमी इंदं पडुमी सरनायं ॥ ई० ॥ ११ ॥ अनंगपाल का प्रताप कथन । टूहा ॥ बंक टपति इक अंक लौ । मिटत करम्भर पान ।। दूम इच्छै अवनी अटल । सत्रु न सुनियै कान ॥ ई० ॥ १२ ॥ कवित्त ॥ गज गज्जत दरवार । घुरत दसम बद्द धुत्र बज्जत हय षुर तार । गाल गुज्जत सु डंट मव ॥ संत तान झंझार । भमर गुंजार बास रस ॥ मुकट बंध राजान । लीन सेवंत हुकम बस ॥ यों अवनि इंद्र तंअर तपै । कॅपै रोर मैजिन मनछ । चव बरन सरन सुष्षह रसहि । दुष्ष न किहिं दिष्षिय तनह ॥ ई०॥ १३ ॥ अनंगपाल के राज्य में दिल्ली की शोभा वर्णन । जगपाल तेअर सुढाल । सेोज वासंत दिल्लीय बर ॥ धर सुढार कालिंद पार । अठार व्रन थर ॥ वर विहार प्रकार । विपन वाटिका बिराजिय।। ग्रिह उतांन वतांन । गोष जाली उच साजिय ॥ सब लोक असेोक अनंद में । अप्प अप्प रह उड्वरिय ॥ जाजन जाप अट्वा परषि । होम धोम ध विथ्थुरिय ॥ छं० ॥ १४ ॥ अनंगपाल का वृद्धावस्था में सपना देखना कि सब तांबर लोग दक्षिण दिशा को जा रहे हैं। अति तोपर परिवार । वृव बहु रिड अनूपं ॥ भ्रंम क्रम बहु रीति । चलै सब लोक सु कूपं ॥ (१)-मो-दुवन । ૧૨ ५६२ पृथ्वीराजरासो [ अट्ठारहवां समय ४ । बीर सेन सुत बीर । पाल बहु काल धरंनिय ॥ मन लग्गा वैराग। करन क्रत ऊंच करन्निय ॥ निसि मध्य सुपन पिष्षियै दुरय। सब तूअर दक्षिन चलै ॥ आरत्त माल कंठह कुसुम । दूरि मग्ग पानी मिलै ॥ ई० ॥ १५ ॥ स्वप्न से जागकर अनंगपाल का हरि स्मरण करना। नंगपाल पड सुपन । देषि अप्पन चल चित्तह ॥ हरि हरि हरि हरि चवै । इष्ट फुनि भून वित्तह ॥ निसा जांम इक सेष । अप्प सुपनी फुनि पिष्षिय ॥ अप्प तरुनि सम उड्डि । तिथ्थ थानक तप दिष्षिय ॥ इह लष्षि चित्त चमकि पति । पानी पाय अदोलि अप॥ नरसिंघ नाम जंपिय पृथुक । सुत पुन नहीं पवित्त व ॥ छं० ॥ १६ ॥ दो घड़ी रात रहे स्वप्न देखा कि एक सिंह जमुनाजी के किनारे आया है, दूसरा उस पार से तैरकर पाया, दोनों सिंह आमने सामने बैठ गए और प्रेमालाप करने लगे, इतने में नींद खुल गई, सबेरा हो गया । घटिय उभै निसि सेष । ताम सुपनौ फुनि पिष्षहि ॥ तट कालिंदी तीर । सिंघ क्रीडन दिव दिदि । ताम समै दूक सिंघ । पार उत्तरि जल आयो । उभै स्यंघ सो मिल्या । नेह क्रीड़ा दरसाया ।। बैठी सुसिंघ इथ मंडि करि । बैठि सनंमुष सिंघ दु॥ जग्गाया बीर सिंघह सुनन । नाम सुपिष्यौ प्रात हुअ ॥ ई० ॥ १७ ॥ अनंगपाल का व्यास जगजाति का बुला कर स्वप्न का प्रष्ण करना। तब तूअर चित चक्रत । उछि एकंत मंन हुअ ॥ हरि जोति जग जोनि । बोलि दैवग्य तथ्य दुअ ॥ दिय आसन तमोर । बचन आभासि भाव दिय ।। को सुपन विरतंत । आदि अंत कारंन तिय । संभलें सुपन मन दुज दुमन । देषि राज बुल्यौ न हसि ॥ - - अट्ठारहवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ५६३ किन कही सब छंडौ दुमय । सब विम्मान सुकाल बसि ॥ छ० ॥ १८ ॥ व्यास ने ध्यान करके कहा कि दिल्ली में चौहान का राज्य होगा जैसे सिंह आया था, सो तुम भला चाहो तो अब तप करके स्वर्ग का रास्ता लो। सब दैवग्य विचारि । एक एकन मुष लोकिय ॥ सब गंठी विम्मान । एक कारन चित दो किय। कई सुनौ सुत बीर । दिल्लि चहुन निवासं || ज्यो दिष्यौ तुम सिंघ । मिलै तूंअर सम सासं ॥ तप सद्धि तुमह सद्दौ सरग । जो दृष्या उड्डुन अपन ॥ तंअर बिनास अग्गह अतुन । सब भविस्य कारन सुपन ॥ छ० ॥ १९ ॥ इस भविष्यबानी का सोचकर विचार करना कि दिल्ली का राज्य अपने दोहित्र चौहान को देना चाहिए। दूहा ॥ सबै भविस्य विचार मन । पुचि पुच चहुन । तिहि अप्पां दिल्लिय सुदत । पसरै कित्ति प्रमान ॥ ई० ॥ २० ॥ अनंगपाल का मन में यही निश्चय करलेना कि एथ्वीराज का राज्य देकर बनबास करना चाहिए कवित्त ॥ बालप्पन पन ज्वांन । गतह विद्धप्पन आयो । एक समे एकंन । चित्त परब्रह्म लगाया ।। पुत्र हाइ संसार । भूमि रष्यै पं. बढे वंस विस्तार । कित्ति दसई दिसि इंडै अब करो जोग जंगम जुगति । भुगति मुगनि मंगा हरिय ॥ पुत्तीय पुत्त अप्पो पुहमि । इम चिंतन मन में धरिय ॥ ई० ॥ २१ ॥ अनंगपाल का मंत्रियों को बुलाकर मत पूछना। थं० पद्धरी ॥ बोलेति मंत मंती प्रमांन । स्वामित ध्रम जे अंग जांनि ।। चिंते सदाय। धुर भ्रंम्म रूप बांनी बदाइ ॥ छं० ॥ २२ ॥ एकंत महल राजन बयछ । गुदरा बोलि दरवांन तछ । । रामह सुराज ५६४ पृथ्वीराजरासा । [ अट्ठारहवां समय ६ ट संसार विरत मन दिष्षि राज । चीकह कुंभ जल बूंद भ्राज ॥ छं० ॥ २३ ॥ अग्यांन चित्त ज्यों दि ग्यांन । लोभीय चित्त ज्यों हरि न ध्यान ॥ कुलटा सुनेन नहिं लज्ज जेम । कपटीय मनह नहि प्रेम नेम । ॐ ॥ २४ ॥ बांनिक बनिज नहि प्रीति अंग । दिथ्यौ सराज इन परि बिरंग ॥ बुल्ले सु बिनय करि बैन एव । कक्कु दुचित अज्ज मन लगत देव ॥ ई०॥२५॥ प्रति वात कहिय अब हमहिं ईस । बिन पुत्र सत्र संसार दीस ॥ नृप वंस अंस जो पुत्र होइ । अवनीय अप्प रष्येति सोइ ॥ छ० ।। २६ ॥ पुची सपुत्र चहुआन पिथ्य । तिन देंउं गज मा सरन तिथ्य ॥ मंचीन मंत तब कहिय राज । चव जुगनि जुगति जे भूमि काज ॥०॥२७॥ जिहि जियत जीय धर रमै ओर। तिहि नप नहीं कहि लोक ठौर ।। जनमत पुब्ब जिन तप्प होय । करि कष्ट कष्ट तप भूमि जोइ ॥ ॥२८॥ धर पाइ राइ धर धंम बढि । धर भ्रंम क्रम सुरलोक चढ़ि || जो गंग 'जुगंति कल कठिन काम । कहु षंगधार बिश्रांम ठांम ॥२८॥ इम सीष मांनि अनंगेस राइ । भूमिय सु तजै सुष कित्त जाइ ॥ मंचीन राज तब कहीय बत्त । मानों कि वैर गहि गुंग गत्त ॥ ई० ॥३०॥ मंत्रियों का मत देना कि राज्य बड़ी कठिनता से होता है इसे न छोड़ना चाहिए। अरिल ते मंची जंपिय नृर बत्ते । किहि गुन राज भूमि अनुरत्ते । गत्ति अगत्ति जिन धर पर अष्षी। तिहि धरपति धर कबहु न रयी। छ॥३१॥ कवित्त ॥ जो धरपति धर इंडि । भ्रम्यौ नल राय हेत त्रिय ।। जो धरपति धर छडि । तो राम रध्वी न सीयनिय ॥ जो धरपति छडि । भ्रमिय सुत पंड पंड बन ॥ धर कारन विक्रम । किया कग्गामिष भष्पन । धर मंडि न छडि अनंग नप। तिश्थ भ्रमन राजिंद नन ।। धर काज राज धर षंडियै ।। चिंत न दिहि राज मन ॥ ई० ॥ ३२ ॥ मंत्रियों की बात न मानकर अनंगपाल का अजमेर पत्र भेजना अरिल्ल || कहिय मंत्र नह मनिय राय । लिषि कागद अजमेर पठाय । ।
अट्ठारहवां समय ]
पृथ्वीराजरासा ।
५६५
॥
ना॥
सुनि बत्ती नप भर किल कानं । राका चंद उदधि परमानं ॥ छ० ॥३३॥
कवि चंद का मत सुनकर एथ्वीराज का दिल्ली
जाना निश्चय करना ।
दूहा ॥ सुनिय गज कवि चंद कथ । उर आनंद अपार ॥
पित मातुल मिहन मृपति । कियो सुगवन विचार ॥ ई० ॥ ३४ ॥
कैमास का भी यही मत हेना ।
थपिय मत्त कैमास मोड । धरनि धरत्तिय तथ्य ॥
चढ़ि चहुआन सुसंचरिग । पुर दिल्लीय संपत्त ॥ ई० ॥ ३५ ॥
कवित्त ॥ सुनहि राज तूअर नरेस । एक बर बुद्धि विचारिय ॥
एक बनिक पाहार । सु बय अंगह तिह सारिय ।।
ताहि बाल वय नन्ह । सील कृत
दुल्लभ
लीना
कंस काल मन हुल्यौ । चित्त मति संत उपन्नौ
अंगगेस राज तोअर प्रगट । उह सुमत्ति जिन लेइ उर ॥
मम भूमि मुक्कि राज्यद सुनि । भ्रंम धुरा रष्यै न धर ॥ ई० ॥ ३६ ॥
दूत ने आकर समाचार दिया, एथ्वीराज का धूम धाम से
दिल्ली की ओर यात्रा करना।
दूहा ॥ कही दूत सारो विवरि । आदि अन्त जो बत्त ॥
चढि चहुांन सु संचरिय । जुग्गिान पुर लै बत्त ॥ ० ॥ ३७ ॥
चौपाई ॥ लै सम सूर चढ्यौ चहुओनं । जगत सूर देव प्रति मांनं ।।
सगुन सकल समुह बनि आए । गयौ गज दिल्ली समचाए ॥ ई० ॥ ३८ ॥
गया राज दिल्ली परिमानं । मिले सूर उमंगेस निधानं ॥
देषि भूमि दिसि थान प्रामानं । राजा मुष बन्यौ चहुनिं ॥ ई० ॥ ३८ ॥
अनंगपाल ने दोहित्र से मिलकर बड़ा उत्सव किया और अच्छा
दिन दिखला कर दिल्ली का राज्य लिख दिया।
दूचा ॥ मातुल पित भिंट्यो सु पह । मिलि अति उच्छव कीन ॥
बासुर सुर रवि इंद बल । लिषि दिल्ली पुर दन ॥ ई० ॥ ४० ॥
५६६ पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठारहवां समय ८ पृथ्वीराज के राज्याभिषेक का वर्णन । छंद उधार ॥ पयो घर पाइ पाइह अंत । दह जुग मत्त रत्त गुरंत ॥ भाषत चंद छंद उधार । प्रति षग कही पन्नम जोर ॥ कुं० ॥ ४१ ।। लिषि वर धटी महरत मत्त । दुज घन वेद विद्यव सत्त । आसन हेम पह सुढार । मानिक मुत्ति दुत्ति उजार | ई. ॥ ४२ ॥ मंडित कलस विप्र विनोद । राजन अतिहि मानि यःमोद ।। धुनि वर विन मंडल वेउ । माननी सकत साजन तेउ ॥ छ० ॥ ४३ ॥ बज्जहि बहुल बज्जन भार । गांनहि मान ग्रांम सुतार ॥ नचि चिय पाच भरच सुभाव । गांनहि सिंघ विक्रम साव ॥ छं० ॥ ४४ ॥ सज्जित सघन सिंदुर दंति । छच सु पुछप सेभित पंति ॥ धवलें चढिय निरषति नारि । गोषन रंध्र सुराज पारि ॥ ई० ॥ ४५ ॥ दमकत दसन हंस विराज । मानहु तडिन अभ्भ अग्राज ॥ वसनह रसमि रज्जित कोर । सजि सित सघन वासव जोर । ई०॥४६॥ राजत श्रवन रवनि ताटंक । राका मनहु सेभ मयंक ॥ सेभित लाल कुंडल कंनि । मनु बध इंद इंद मिलत ॥ ई० ॥ ४७ ॥ चढि सु पछु सहित दंति । मनों इंद्र ऐरापंति ।। मांडल विप्र वेद सुवेद । अग्यहि जपति भेदहि भेद ॥ छ ।॥४८॥ पहि पुति पुत्त अरोधि । विंजत नृप चामर साह ।। मांडत मुकुट उत्त सुमंग । रचि बहु धात मोल सुरंग ॥ कं० ॥ ४६॥ दुति कलस करिय तास । मारिच कोटि इंद उहास ।। धुन सम मंडि छत्र अजेर । मनों हरि बाल बिंब सुमेर ॥ छं० ॥५०॥ तिलकह अरित रंजित भान्न । भल इन करहि दीप उजाल ॥ चरचहि मुत्ति कुंदन थाल । पूरति सुपडु पूजति बाल ॥ छं० ॥५१॥ चरचति सुकर अनंगपाल । मोहति कंठ मोतिन माल ॥ दुज वर चवै असिष बेद । माननि गान सन सु अषेद ॥ ई० ॥ ५२॥ (१) मो.-मानत । (२) मा.-भाल।
अट्ठारहवां समय ] पृथ्वीराजरासो। ५६७ इय गय इथ दिल्लिय देस । समप्पहि पुत्ती पुत नरेम ॥ षोडस दांन पूरन मांन । अप्पे विप्र धेन सुश्रीन ॥ ई० ॥५३॥ थप्प विप्र गेव सुम्यांन । ग्रहन सुतप्प तप्पिय थान ॥ बद्रिय नाथ धरिय सु ध्यान। ॥ छं० ॥ ५४॥ तजि ग्रह मोह माया जाल । सज्जिय जोग बंचिय काल । रचिय बांन प्रस्थह रूप । क्रमि रह तप्प तप्पित भूप । ई० ॥ ५५ ॥ हय गय तरुनि द्रव्य सुदेस । तिन वर तजिय गन नरेस ॥ संवत ईस तीस रू अठ्ठ । चलि नृप हेम गहि कर कठ्ठ ॥ छं० ॥ ५६ ॥ कवित्त ॥ एकादस संबतह । अठ अग्ग इति तीस भनि । प्रथि सुरति तहां हेम । सुद्ध मगसिर सुमास गनि ।। सेत पष्ण पंचमीय । सकल वासर गुर पूरन । सुदि मगसिर सम इंद । जोग सहहि सिध चूरन । पहु अन गपाल अप्पिय पडुमि । पुत्तिय पुत्त पवित्त मन ॥ छंद्यौ सुमोह सुष तन तरुनि । पति बद्री सज्जे सरन ॥ ई० ॥ ५७ ॥ शुभ लग्न दिखा कर बड़ी तयारी और विधि के साथ अनंगपाल का एथ्वीराज को पाट बैठाकर अपने हाथ से राज्य तिलक करना । छंद पड़री ॥ सुभ लगन दीन दिलिय नरिंद । तुम करहु राज जनु पहुमि इंद ॥ सुनि श्रवन सद्द आनंद अंग। राका रयन जनु दधि तरंग ॥छ०॥५८॥ बुल्लाइ फेरि दुज बर प्रमांन । थपि लगन मगन अमृत समान ॥ जिन वचन व्यास मिहै न कोइ। स इजह कहत मुष सिद्ध होइ॥॥८॥ मंडप्प मंडि सुतधार बांनि । रचि व्याह कृश्न रूकमनि मानि ॥ उच्छव अनंत बाजन बाज । जिन घुमर घोर रव गयन लाज ॥छ। ०॥६॥ नत्यंत नत्य पातर प्रवीन । तिन रष्ष अंग मुनि मन अधीन ॥ सब नगर उड्डि गुड्डी अनंत । कैलास विपन बांनिक बसंत ॥ई०॥६॥ भारास सुबन बनिकाच छोच । देषंत नेन मुनि मगन मोह ॥ बहुरंग व्रन चित्रित अवास । साला सुरंग गोषन उजास ॥ ई०॥६॥ (१) मो-कंद। ।
५६८ पृथ्वीराजरासो। { अट्ठारहवां समय १० । । अंगन अनंग दिषि रहत भूलि । त्रिगुन निवास सुरवास फूलि ॥ जाजिम पह जरकस जराव । अवनीस दिष्षि जकि धरत पाव ॥ ई० ॥६३॥ कुटुत तार सहजच सुरंग । भंगीन भंग भय भ्रमत अंध ॥ नव ग्रही वास सुर वास साज । तहां बैठि नि अनगेस राज ॥ छः ॥ ६४ ॥ बुल्लाय सब्ब अप भर समान । दिगपाल जोर तन तेज भान ॥ लघु बेस तरुन के वृद्ध वीर । कक वाच साच जंग श्रीर ॥ ० ॥ ६५ ॥ इंद्रोन मोह जिन अंग भंग । संग्राम रंग जनु कप्पि पंग ॥ मच्छर हुलास जिन अंग सोह। चिन जरत उठ्ठि सिर समय कोह ॥ ० ॥ ६६ ॥ नव रस विलास निय नार रंग। अनिवरत रंग भीषम प्रसंग ।। षग दान मान परिमान जोइ । कवि कहै व्रन जो नि होइ ॥ ई० ॥ ६७ ॥ कुल रीति नोति हिंदून राह । दारुन्न दुसह दुभर दुवाइ ॥ अस बैठि भूप सब समा आंनि । सुर इंद्र कोटि लेतीस जांनि ॥ छं० ॥ ६८ ॥ तहां धरिय सिंघासन कनक कति । जिन हीर लाल पीरोज पंति ॥ मानिक चूनि मनिमुत्ति भति । चकचेधि दिष्ट बुधि भूलि जति ॥ ई० ॥ ६ ॥ नुमान मान लषित पुष्पह उपाइ । तहां बैठि भूप कुल सुद्ध आइ ॥ आसन्न अस्म तहां धोरय ांन । सुरजंपि तस्य जै जया बांन ॥ छं० ॥ ७० ॥ प्रथिराज बोलि बैठाय पाठ । धुनि करत बेद तहां विप्र ठाठ ॥ विय कंध पच्छ बिय चमर ढार । रजि रूप जांनि अश्विनि कुमार ॥ ई० ॥ ७१ ॥ धरि कनक दंड सिर छच सोस । सिर चंद कंति कैलास ईस ॥ गायंत गांन कामिनि उतुंग । कलयंठ कंठ सुर करन भंग ॥ छं० ॥ ७२ ॥ मुसकत इसंत अँडन अलोल । सहजन कटाच्छ झंडन सलोल ॥ रस भरिय एक आलस्य भंग । मुनि देषि अंग मति होत पंग ॥ ई० ॥ ७३ ॥ इक अलसि फेरि उति अजोल । ठंडन असित सित श्रवन कोर ॥ अंगन अवास सालानि चूरि । जालोन गौष भरि रही परि ॥ ई० ॥ ७४ ॥ बंदीन ठाठ बिरदह बुलंत । नव रस विलास रसना तुलं ॥ सधि खान मुहरन दुज प्रवीन । अनगेस गज तब तिलक कीन ॥ छं० ॥ ७ ॥ बजि सबद पंच बाजे बजंत । तिन सार घोर दरिया बजंत ॥ जित वित्त अत्ति उच्छव रजंत । बरषाह पाइ जनु जग गर्जन ॥ ई०॥ ७६ ॥ - ।
अट्ठारहवां समय ११] पृथ्वीराजरासा। ५६६ दिल्ली के सब सदारों का पाकर एथ्वीराज को जुहार करना। छं० भुजंगी ॥ तहां बैठयं राज दिलो प्रमानं । मिरं प्रातपत्र सु दीनो निधानं । बजै टुंदुभी भीत' आकास थानं । ॥ई० ॥ ७७॥ मिले आइ सब लोइ ते सूर बीरं । जिनै आदरं राइ दीनी सरीरं । झनक्केति ताजी किनक्कै करीन। महामत्त दीसै सुमत्ती सुभीनं। ई० ॥ ७८ ॥ दूहा ॥ करि जुहार भट सुभट थट । प्रजा महाजन पार ॥ सब काहू मन यो भयो । ज्यों जलचर जल पाइ ॥ ई० ॥ ७ ॥ बड़ी तयारी के साथ सजकर पृथ्वीराज की सवारी निकलना। सत इथ्थी दस सित हुअस । मानक मुत्तिय लाख ॥ सवा लष्प सोवन महुर । गने और को माल । ई० ॥८॥ चढन जोग हथ्थी तबैं । मंगवाया मदमंत ॥ जनु घन बद्दल पवन बसि । बग पंकति मा दंत ॥ ई० ॥ ८१ ॥ जो रावर जंजीर बसि । पवन न पावै जान ॥ भान मंडि डारै प्रबल । सायर अजा समांन । छ। छंद पहरी॥ आरूढ इंद्र सम गज गरूर । ज्वालाति जोति जनु किरन सर । जरकम जराव औकार मंडि । सुरराज विपन मेोभात पंडि ॥ छ॥८॥ रेसम रास नारी बनाइ । घुघ्घर घमंक कंचन जराइ ॥ आरूढ राज आसन अनंद । सुर पुफफ विष्टि दुश्र दीन बंदि॥ ई०॥८४॥ लंगरी राव पच्छे अरोह । कर कनक दंड सिर छच सोछ । बिय बांच चमर दरगाह धारि। रविचंद किरनि जनु सिर पसारि॥छा ८५॥ तिन पच्छ पंति देतीन साजि । सामंत सूर सब चढ़े गाजि ॥ तिन पच्छ तुरी तत्ते निवानि । बर पवन रूढ मन भए जानि ॥ई॥८६॥ छत्तीस बज्ज बज्जे बाज । विरदैत बिरदै चंद राज ॥ अवधारि मध्य बाजार बीच । केसरि कपर तह अगर कीच ॥छ॥८७॥ जित तित गिरंत जारीन फूल । कृषि छलै छैल नवला अभून ॥ मन मगन मुक्त अष्षित उछार । जलजान मनों बसि ओस मार ॥छ॥८॥ १) मो.-घोस। (२). का. ए.-भर सुभट सब । सु ६०० पृथ्वीराजरासे।। [ अट्ठारहवां समय १२ सब परज अरज प्रभु करत रह । इक भूमि ग्रेह थिर राज देव ॥ नर नारि निरषि मनु मुदित मोह । लगि चंद सूर चिरचीव होह छं०८८॥ षट दरस दरसि आसिष्ष देत । प्रथिराज बंदि सिर झेलि लेत ॥ फिरि राज आइ अंदर प्रवास । जहं रहत मुग्ध मध्या सुवास ॥ईचा ॥ सनमान कीन रनिवास राई । जस मन्त्रि सत्त सत सिद्ध पाइ॥ ०॥११॥ पृथ्वीराज का रनिवास में आना, रानियों का मंगलाचार करना। दूहा ॥अन्य पनि गन सुंदरिन । मधि अंगन रनिवास ।। दिष्यत छबि छक्की सकल । मिल त्यंजन दिन तास ॥ छं० ॥ १३ ॥ कनक किउ कुंदेरनह । भरत कि भरिता अंग नैन मुष कर चरन । जनु धरि अंग अनंग ॥ ई० ॥ ३ ॥ मधुर कंति मुष मधु मुदित । उदित अर्क आकार ॥ तोरि चंन तरुनिय कहत । धरनि सहो तुम भार ॥ ई० ॥ ८४ ॥ गाथा ॥ बनिता बिनय सुकरियं । धरियं भ्रंम केन अंगायं ॥ के छवि छकित छलीयं । भइयं वसि पिष्षि पिण्यायं ॥ ० ॥ ५ ॥ दिल्ली चौहान को देकर अनंगपाल का तीर्थवास के लिये जाना। दूदा ॥ जुम्गिनिपुर चहुबान दिय । पुचीपुच नरेस ॥ अनँगाल पर तिनिय । किय तीरथ परवेस ॥ छ०॥ राई॥ यह सब समाचार सुनकर सोमेश्वर का प्रसन्न होना। कवित्त । मुनि सामेसर सूर । हियै बढिय आनंद सुघ । अति अनंद चिमलय । धनि मो पुच दीह रुष ॥ बर बाने बंधियै । मिले सामंत सूर सब ॥ सरित समुह प्रमान । मिलिय आवृत्त वीर सब ॥ गोधर लग्न चढ्न पनि । बाल चंद कल नृपति हुआ। माननिय मान जानै सकल । नर परतीत समत्त धुप ॥ छ ॥ १७ ॥ (१) कृ-सुम सभ्यंजन । ट अट्ठारहवां समय १३] पृथ्वोराजरासो । ६०१ छंद पड़री ॥ बंदहि विवेक अविवेक पाइ । विझहि मुकुट में मुकट वा ॥ नग नगन जरहि किरनी जराह । जाने कि अगनि अनहित वाइ ॥ ० ॥८॥ एथ्वीराज का प्रताप वर्णन । छंद चोटक ॥ भयभीत सुनंन चढंन कला । जनियै गुरदेव सुमंग मला ॥ बरबजि निसान दिमान धुश्रानृप राजसुकाज ज्या अंम सुअं ॥ई० ॥ ८ ॥ प्रगरी जनु कामय कोटि कला । करि उज्जल गज्ज सुमंत मला ॥ घिसरे द्रगपाल दस दिसयं । प्रगटी जनु काम कला ससियं ॥ ई० ॥१०॥ रन नंकिय पाइ कमल्ल भुअं । किनि मित्त छिपाधिप चित्त धुआं ॥ प्रगटे प्रथुपालक पंच कल । तिनमें प्रथुराज प्रथून बल । ई० ॥ १०१ ॥ परधानति भीम कुंआर तिनं नृप सेवत जास सुपाडू गनं। ई० ॥ १०२ ॥ दूहा ॥ मत त्तिय नृपराज नपि । ढिल्ली द्वै घन साज ॥ जानिज जंगल नृपनि । मन उदवि गुन पाज ॥ छ० ॥ १०३ ॥ आशीर्वाद । सित छ अग्ग सामंत सजि । बजि विघोष सुनंद ।। मोमेसर नंदन अटल । ढिल्ली सुबास नरिंद ॥ छं० ॥ १०४ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके अनंगपाल दिल्ली दान नाम अष्टदशमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १८ ॥ a (१) मो-चाइ।
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अथ माधो भाट कथा लिष्यते ॥ (उन्नीसवां समय।) पृथ्वीराज का दिल्ली आकर रहना। कवित्त ॥ विय निवास प्रथिराज । आइ चछुन वीर बर ॥ पुज्ज धाम जुगिनी समान । बलि दीय थान थिर ॥ दस दिसांन दस महिष । किन्न सहु नयर दीन बलि ॥ अवर देव पुज्जै सु सेवर । नैवेद धूप मिलि ॥ पुज्ज सु दीय दानानि अथ । अथ पंषि दीय चंडरस ।। कंपै सुसीम वहां राषि भट । जस जुप्रग्गयौ दिसि विदिस ॥ ई० ॥१॥ शहाबुद्दीन के कवि माधोभाट का गुण वर्णन । छंद भुजंगी ॥ कबी कबिचंदं सुमाधौ नरिंदं । सुरंनान भहं मध माद इंदं ॥ कवी एक भंडी भिडिभी प्रमानं । किते तार भंकार विद्या सुजानं ॥ई॥२॥ विध मंत्र पची पदें वेद बानी । सिनं भह कोनं जु पजै गियानी ॥ पढे तर्क वितर्क चौसठि विद्या । तिनं रूप के भेद चौरास सद्या ॥ ॥३॥ सतं मद्धि घटियं सुषोडस प्रमानं । इते छंद विच्छंद छंदे कलानं । महा रूप रंगति गंगा प्रकारं । तिनं बाइक भह बालन सारं । ई०॥ ४ माधो भाट का दिल्ली आना और यहां की शोभा पर मोहना। छंद चोटक । दिषि भह सुथानक दिल्लि धरं । अमना जल राजत पापहरं । तिहभ्रंम सुतं विप धित्त दई । सोइ दिल्लिय राजस राज भई ॥छ॥५॥ इंद पथ्य सु पूरब नाम धरं । इन काज सु पंडव जुद्ध जुरं ॥ चव पंथ पती पति पाप हरै । रवि की तनया तन तेज दुरै ॥ ई० ॥६॥ (१) मो-किल। (२) मो-पुज्नेति सेव। (३) मो-दिखतई। (४) मो-गई। HINDE .
६०४ पृथ्योराजरासो। [उन्नीसवां समय २ । । । चूतनी विधि देषन थान गया। श्रग लोक समान सु तेज नया ॥ ई० ॥ ७॥ दूहा ॥ इहि विधि दिष्षिय सकल द्रिग । पुर ढिल्ली उनमांन । थांन बीर चहुआंन को । प्रति कैलास समान ॥ छं० ॥८॥ पृथ्वीराज के इन्द्र के समान राज्य करने का वर्णन इंद रूप ढिल्लिय नृपति । इंद्रासन पुरि ढिल्ल ॥ सच्चीया इंछिनि सुव्रत । सुरत वृत्त गुन किल्ल ॥ ॥ सुरपति सम सामंतपति । अति अनूप मति सार ॥ कनिष्ट ांन हिंदुवान सब । दुइ गरु अत्तें भार ॥ छ० ॥ १० ॥ दूह चरित्त दिष्पित नयन । गयो भह नप थांन । मय मनु सुमन सुरष्षि कै । रच्यो प्रथी पर आंन । ई० ॥ ११ ॥ माधो भाट का एथ्वीराज के दर्बार में भेद लेने को पाना और अपने गुणों से लोगों को रिझाना कवित्त । दिषि भेट माधा नरिंद । राजधानी चहुबानी ॥ दूत भेद अनुमरै । दूत लग्यौ परिमानी । हिंदु भाष षट रस । मेछ पारसी उच्चारै। जहां अकिर को कहै । वान तैही विधि मारे । भाषा कवित्त नाटिक सकल । गीत छंद गुन उच्चरै । जानन नर्क वितर्क सब । राग बिरागह अनुसरै ॥ छं० ॥ १२ ॥ गाथा ॥ हिंदू हिंदू अवचने । रचने मेछायं मेछया बयनं । जं जं जेम समुभम । तं तं समुझायं माधवं भहं ॥ ई० ॥ १३ ॥ ध्रमाइन कायस्थ का माधो भाट का सब भेद देना। कवित्त । भ्रंमाडून कायथ सुरंग । मिल्यौ बर भह प्रमानं ॥ जू कछु भेद चहुन । दियौ निह सुरतानं । विधम सुधम विसाल । कहो निधम परिमानं कग्गद मंत चलाइ । मंत मग्गी चहुबानं ॥ दै लेह दान संभरि धनी । रोर सतम करभान बर ॥ मय मंत मंस चिंतान करि । दयौ दान इत्तोति नर । ई० ॥ १४ ॥ (१) मो-बह। ।
उन्नीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ६०५ पृथ्वीराज का माधो भाट को बहुत कुछ इनाम देना। दूहा । दस इथ्थी मै मत्त करि । भर मंडन मुष अग्ग । अरि षंडन मंडन फवज । लेड बीर बहु बग्ग ॥ ई० ॥ १५ ॥ कवित्त ॥ दस हथ्थी सन एक । एक कंजी कंमानं ॥ कंजी तौनति पंच । वान सोहै परिमानं ।। दियौ साह सुरतांन । भह दीने परधानिय ॥ छह मोती बर माल । कनक एक तोल सुजानिय ॥ दिय प्रथिराज सुराज बलि । द्रव्य सुबर चतुरंग विधि ।। माधव सुभह रंजे नृपति । चंद कही असतुति समधि ॥ ई० ॥ १६ ॥ दूचा ॥ हेमरु है गै अंबरछ । सरसे बुद्धि गंभीर । सत्त सुमनि आमित्त गति । माधौ भह सबीर ॥ ई० ॥ १७ ॥ बहुत कुछ दान देकर एक महीना तक माधो भाट को दिल्ली में रखना। कवित्त ॥ दियौ दान बर भह । मास रष्य दिल्लीधर ॥ बहु भोजन प्रति स्वाद । बूंद इंद्रास देव गुर ।। मन तीनो नृप हथ्थ । भह वप इंद प्रमान्यौ ।। गए दरिद जनमत । चिंत्य चिंता घट भान्यौ ॥ अप्पै सु दांन सामंत सब । सुस्त मत्त वृत्तह सुधरि ॥ भै पर पूर पूरन को । जा चाया भागी सुउरि ॥ छ ॥ १८ ॥ दूहा ॥ जात जान जे जान है। गए गबन किन कीन्ह ॥ इत्तय बन पूरन नहीं । मत्ति गरुअतन चोन्ह ॥ ई० ॥ १६ ॥ बहुत सा दान (जितना कभी नहीं पाया था) लेकर माधो भाट का ग़ज़नी लोट पाना । अरिल्ल ॥ लै सुदान गज्जन पुर आया । इतौ दांन जनमत न पायो । महादान विद्या परकारं । दियौ राज चौहान विचारं ॥ छ० ॥ २० ॥ । ॥ (१) मो-बरभट्ट । (३) मो-जान्यो। (२) मो-त्रप बर। (४) मो-दान ।
६०६ ঘৃঙ্খীৰাৰা [उन्नीसवां समय ४ माधो भाट का शहाबुद्दीन के दौर में पृथ्वीराज के दिल्ली पाने श्रादि का वर्णन करना। छंद पड़री ॥ गरु अत्त मत्त कविराज राज । शृंगार हास्य अदभुत विराज ॥ तिहिजाब कीन पकिति वैन। तिम तिमसुहाय सुरतान चैन। छंगा२१॥ संभरिय वत्त उम्भरि उरत्त । सुरतान बेन गोरी विरत ॥ मातुला वंस चहुनि राज । दैगया सकल दिल्लीस काज ॥छ॥२२॥ है गै भंडार बिन कित्ति भूमि । ली बाज मार आवृति कूमि ॥ दैवत्त करै दृह मनुछ लोइ । क्ली बाज जनम आत सोइ ॥०॥२३॥ अनगेस राज नजि तिथ्य जाइ । सामंत सूर वर मिले आई ॥ अजहंनि सेन इक मनी नथ्य । गोरी सदाब इद घात तथ्य ॥ छं०॥२४॥ दूहा ॥ फुहिय बत्त प्रवास सब । वसि दिल्लिय चहुन । बंदिन माधौ आय कहि । सम गोरी सुरतांन ॥ छं० ॥ २५ ॥ है गै दिल्लिय देस सब । अरु जु अबर द्रब अप्प ॥ सो सब दै चहुआन को । अन गपाल गय तप्प ॥ छं० ॥ २६ ॥ अनंगपाल के बनबास का वर्णन । ले चल्यो संग निज नरूनि । दै दिल्लिय अनगेस। मन वच क्रम बद्री चल्यो । साधन जोग जोगेस ॥ ई० ॥२७॥ यह समाचार सुनकर शहाबुद्दीन को बड़ी डाह होना। सुनत सटप्पट लम्गि मन । उर गोरी बर बीर ॥ पल पल पिन जुग जान जिय । बढिय विषम पल पीर ॥ छं० ॥२८॥ शहाबुद्दीन का क्रोध करके घोड़े पर चढ़कर लड़ने के लिये चलना, फौज़ की शोभा वर्णन छंद भुजंगी ॥ चनौ मंगि सुरतांन साहाब ताजी। जरंजीन अंमोल साकत्ति साजी ॥ बरं बासनं रत्त हेमं हमेल। मनो मुत्तिमाला बनी लष्ष जेलं ॥॥२९॥ (१) मो-सथ्य । (३) मो-सेलं। (२) -सौ समपय प्रिथरान कुं ।
उन्नीसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो। ६०० जरं हेम छचं सुभ सोम सीसं । उवं लाल थंभं सिरं सूर दीसं ॥ अगेलक्करी लाल दोसहस मोह। जिनं आह जक्की सहं कोई कोई॥ई॥३०॥ अगें साहि गोरी निमूरत्ति पान । लग्यौ बंदि माधौ पढे ब्रिद्दवान । दिसा दाहिनी षांन तत्तार गोरी। दिसंषां षुरासान रजिवांमजोरी॥ई ॥३१॥ उभै पुछि ममरेज मुलतान षांन । सुतं साहि महमंद सोहित षांन । मुषं अग्ग बेतं डसे रन्न साहं । सितं चार बांने सितं गन्ज गाहं ॥०॥ ३२ कही बत्त गोरी तिन से सबांही। कई जेब जब्बाब पुछत सांही ॥ अपं सेन सथ्यं सह सूर सध्थें । तिन जाति बांने कहै कोन कथ्थे ॥ई०३३॥ चले आहू सो मेषची मन्त्र थान। इयं इंडि दरबार साझाव तानं ॥ दरं रष्षि दरवन अप मभिम आर्य। सबै बोलि उमराति सब अप्प भायं ॥ छं० ॥ ३४॥ टूहा ॥ ओर रोकि अप मभझ गय । नमि पय सेष चिमन । अप्प प्रसंसिय विवह परि । बैठि पयंधरि पंन ॥ ई० ॥ ३५ ॥ सीष सु पुच्छिय सेस पहुं । बोलि पंचदस षांन । आसन ईडिय अप्प तिन । दिय आदर सनमान ॥ छं० ॥ ३६ ॥ शहाबुद्दीन का तातारखां आदि सरदारों को इकट्ठा करके सलाह पूछना । छंद पड़रो ॥ गोरी ततार गुरलज्ज भार । पुरसांन षांन मति सिंधुसार ॥ निसुरत्ति षांन जेहांन मीर । ममरेज षांन बल लान नीर ॥ ई० ॥ ३० ॥ प्राजोन षांन मेरन बितंड । मुलतान षांन मुहबत्ति बंड ॥ मारुत्त मीर जमुनह सुमीर । साहाब षांन गरुत गंभीर । ई० ॥३८॥ रुस्तम षान पल संक जास । गज्जनी षांन रिन साहि आस ॥ गजनीय लज्ज गुर तेज गंज । महमुंद मोर अरि तेज भंज ॥ ई० ॥ ३८ ॥ गोरीय वन काली बलाइ । मृगराज जेम मृग अरि पलाइ ॥ साइब सलाम सब करी आइ । चीमंन सेष नमि परिस पाइ ॥०॥ ४०॥ बढे सु सब कर कर समुठ्ठि । पिन एक बैठि साहाब उठि ॥ गयौ सेष वाग तह चंप नृप । बैठक्क तथ्य चौरा अनूप ॥ छं० ॥ ४१ ॥ ।
६०८ पृथ्वीराजरासो। [ उन्नीसवां समय ६ अासन मं.ड बैठो सु साहि । बैठक्क दई उमराव ताहि ॥ उच्चस्चौ वीर गोरी सु संच । पुच्छिय जु सब मंच प्रपंच ॥ छ० ॥ ४२॥ शहाबुद्दीन का पृथ्वीराज के दिल्ली पाने का समाचार कहकर उसके जोर तोड़ने का मत पूछना । कवित्त ॥ कहिय साहि साहाब । षांन तत्तार सुनौ सब ॥ बसि दिल्लिय चहुन । कही माधौ जु चंड कब ॥ अनगपाल गय नप्प । देस है गै सु द्रव्य सह ॥ सो समप्पि चहुन । अप्प सज्या मुबंन रह ॥ अरि मत्त अम्ग बर जोर हुअ । अरु लंभी चतुरंग श्रिया ॥ सधियै बैगरन घेत पल । जौ लै जोर न बंधिया ॥ छं०॥ १३ ॥ तातारखां का सलाह देना कि दिल्ली पर चढ़ाई करना चाहिए तब कहै षांन तत्तार । साइ साहाब चित्त धरि ॥ अरि अनंत बर जोर । यादि सधियै सनद करि ॥ तब दिष्यौ दल जोर । सूर सामत स्मथ्यं ।। अन्त तेज मत अत । बेग रन बहे सुहथ्थं ॥ दल जोर जोर भंडार घन । करि सचित्त भर एक मन ॥ भरहथ्थ जीव दिल्लिय सहर । मम करि अरि सहन सयन ॥ छ । ४४ ॥ तातारखां की बात का सब लोगों का सकारना, रुस्तमखां का मंत्र देना कि जब तक सेना तयार हो तब तक एक दूत दिल्ली जाय सब समाचार हिंदुओं के ले आवै । छंद पद्दरो ॥ पुरसान पान कहि सुनि ततार । संची दन मेलि वेग सहौ सुमंत । बंधीय बंधान अरि करिय अंत ॥ छ० ॥ ४५ ॥ जेहांन बोर जंपे तमंकि । तुम उरौ मीच छुट्टी न अंक ॥ सद्धियै दोरि करि सब सथ्थ । नन होइ काम दथ्यौ सुपथ्थ ॥ॐ॥४६॥ जंगी सु षांन निसु रत्ति तब्ब । बिन बंध वत्त डिभ रु गब्ब ।। चच्चरन देषि चहुआंन तुम्ह । जंपी सबत्त मंतह गुरंम्म ॥ छ08 ॥ ॥ सु बत्त जपा सुढार॥ ___
उन्नीसवां समय ]
पृथ्वीराजरासो ।
६०
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उच्चरिय षांन साहाब सक । बै वृह भएं भय बुद्ध जक्क ।
भंपियै जुद्ध पावक पाइ । बंध्यौ विराम ना निजरि आइ ॥ छं ॥ ४८ ॥
बल तुच्छ अरिय सौ सु साहि । पल दुष्ट जोर बंध्या न जाइ ।
मुलतांन षांन हसि कहिय बत्त । मम रेज षांन दाषा विगत्त । छ॥४८॥
एंजाब गरुव छंद्यो गुमान । धन मह मंत वयची प्रमान ॥
कालिंग पुलै जिम जुध पुलाइ । गरु अत्त साहि साहाब जाइ ॥छ० ॥५०॥
उक्कसें षांन सेरन वितंड । विकसे कहिय कर षग्ग मंड ॥
गोरिय अवनि तुम गनौ गति । भय भीत मृत्य दीसहि सुमत्ति ॥०॥५१॥
बिनसंत काज क्यों पातिसाह । पूछ सुमंत अच्छे सुभाइ ॥
जंपया बत्त काली बलाह । मो विना सेन गोरी पलाइ ॥ छं० ॥ ५२ ॥
काल ग्रहंत मन आइ मुभझ । मंडयौ जुन मो बिन अबुझ ।
तमस्से मीर तब फते जंग । पुज्जेन सेन पंषी कुलंग ॥ छ० ॥ ५३ ॥
सम वरन साज सज्जै न संग । हरि तेज तेज दध्ये अभंग ॥
अरि सार जैत जांनी न भेव । उच्चरौ मंत गुन सुबर गेब ॥ ई० ॥ ५४ ॥
तब मीर जमन गज्जनी षांन । महमुद्द मीर मारुत्त षांन ॥
उठे सुच्चार तम तेग झारि । बुल्ले बिसि मत्ते विचारि ॥ ई० ॥ ५५ ॥
थिर जुद्ध मंत रचौ सु सब्ब । बैठनह सूर नहि धंम अब्ब ॥
कीयौ हुकम साहाब जब्ब । अहि तेग इनै प्रथिराज तब्ब ॥ ई० ॥५६ ॥
रुस्तम कही साहाब अज्ज । मुक्कली दूत जुध करौ कज्ज ||
लषि आवै चर सु हिंदू चरित्त । तब लग्गि सेन सज्जौ सुइत्त ॥०॥५७॥
मंन्यौ सुमंत सब चित्त सार । मंद्यौ सुमंत बर चरन चार ॥
रुस्तम वाह धरि चक्त दीठ । बुल्लाइ सिंघ बर चर गरीठ ॥ ई० ॥ ५८ ॥
छंद भुजंगी । स्वयं भेद प्रकार भेदं प्रमानं । सुनौ षांन तत्तार षांन सुमान ।
स्वयं साहि साहाब साहाब सूरं । मनो भेद बंभान छुव्या करूरं॥ई०॥५॥
घानं तेज तेज प्रकारंत न्यारे। कही कब्बि चंदं उपम्मा उचारे । ई० ॥ ६ ॥
टूदा ॥ कहत चंद बर भट्ट फुनि । सकन्न कथा परिमांन ।
जुककू भट माधौ कही। सम गोरी सुरतांन ॥ ० ॥ ६१ ॥
६१० पृथ्वीराजरासो। [उन्नीसवां समय ८ छंद पद्धरी । उच्चचौ चंद बरदाइ मंडि । सुरतांन षांन आरज्ज छडि ॥ बर बीर धीर तत्तार पंडि । काली बला सेरन वितंडि ॥ छं० ॥ १२ ॥ हबसी हुजाब पुरसान बंध । पीरोज षांन निज बंध सिंघ ॥ पर दार पारि दस दस प्रमांन । राजन अनेक भर सुभि थान ॥ ॥१३॥ तिन व्यटि सभा दिष्षी नरिंद । मनों जामिनी तेज रवि सबर इंद ॥ बंदै न चंद तत्तार षांन । पीरोज बंध हबसी समान ॥ ई०॥ ६४ ॥ पुरसांन षांन जल्लाल बीर । मेरन वितंड माधी सरीर ॥ हुस्मेन सूर भट्टी प्रकार । साइ जु साहि ज्या चंद सार ॥ ई० ॥ १५ ॥ बैरंम षांन जमनेस जोर । जमजोर बर तिन बल सुथोर । पीरोज षांन माही मरद्द । सोभंत तेज ससि बर सरह | ०॥६६॥ उन्नेग षांन गाभरू मीर । बेधंत सत्त धातह सुनीर ॥ तुम तेज षांन ममरेज मीर । पुरसांन लज्ज निज मुष्प नीर ॥छ० ॥६॥ फतच मीर तुंगी तुरांन । पुज्जे न तास तम तेग पान । नव नेह धान मैदान मीर । रुम्मी रुहिल नम तेग धीर । ई० ॥ १८ ॥ ढिल्ली बढाल ढाइन प्रकार । संभरे मुष्ष भए रत्त भार ॥ पारपि रष्य पाबंग जांन । जानहि जुखामि भ्रम प्रमांन । ई० ॥ ६ ॥ फिरि पूछि जाइ दूत मनि कह । उच्चरै बत्त चहुबान थह ॥ भय भीत रीत माधव सुभह । हो देषि आइ इह तथ्य घह ॥ ई० ॥ ७० ॥ सोमेस सूर तम पुत्तमान । मारन हमीर जाने गियान । दातार ओर पोहचे न दान । दै गयौ अनंग दिल्ली निघांन ॥ ई० ॥७॥ बर राज अनँग तिथच जु जाइ । है गै सु लच्छि दोहित पाइ ॥ छ०॥७२॥ माधव भाट की बात पर विश्वास न करके शाह का दूत भेजना दूहा ॥ सार बदी सुरतांन तब । माधौ को न मान ॥ भट्ट जाति जीहं गुनौ । दूत सु पठय प्रमान ॥ ई० ॥ ७३ ॥ दूतों के लक्षण का वर्णन कवित्त ॥ कंजांनी कंम्मांन । अंक रेसम प्रति भासै॥ दस भैराक निय तोन । साहि गोरी मुकि जासै ॥ ।
उन्नीसवां समय पृथ्वीराजरासो। ६१० बत्त सांची दूत भेद अनुसरै । लपि हिंदवांन चरितं ॥ मो मत्तह सुरतांन-। थान मो कलि दस रस्तं ॥ दूत के वन मंत्रह सुपन । सब सु चरित अंषिन लषै ॥ उच्च सुक्त । सुविधि विधि अमृत भषै ॥ ० ॥ ७४ ॥ दूहा ॥ इन मुक्कलि उन सथ्थ बर । दिसि ढिल्ली परिमांन । माधी भह सु तथ्य कहि । दूत पठय सुरनांन ॥ छ । ७५ ॥ चाहुन सुरतांन बर । करन जुद्ध परिमांन । मिलन पुब्ब पछिम हुतें । बीरा रस उत्तान ॥ ई० ॥ ७६ ॥ कवित्त ॥ में बुझै सुरतांन । अप्प गज्जन बलवानं ॥ आषेटक हम कहिं । दून मुक्के अगिवानं ॥ जु कळू भेद अनुसरै। तत्तग्यांनं परिजानिय । भय भयंक भ्रम फंड । काल कलई गुन ठानिय ॥ जं कही जाइ महमंद षां । सेरन पनि वितंड बर ॥ हबसी हुजाब मुक्कलि नृपति । सुबर बीर मत्ते गहर । ई० ॥ ७७ ॥ भेद दुग्ग भजियै । भेद दुरजन धरि छिज्जै । भेद भूमि अनुसार । भेद दिल्ली धरि विज्जै भेद पष्ष मत नश्थ । भेद विन कंक न होई। भेद गुरु गुरु ग्यांन । भेद बिन तात न जाई । अत्त भेद वर रजिये। गुन सज्जन सज्जन बरन ॥ सुरतांन दीन साहाब दी । भेद साहि कीजै गवन ॥ ई० ॥ ७८ ॥ गाथा ॥ षुरसानं प्रति षांनं । पीलं नथ नथियं पानं ॥ पुंगी नथ्य प्रमानं । वरचं नथ्य सस्त्रयो बलयं । ई० ॥ ७ ॥ गजनो नरिंदं । बुल्ल्यौ बीराष्ट्र बीर साहसं ॥ विन जगत जग्गायं । तो जित निश्चयं पलयं ॥ ८॥ दूहा ॥ विन जग्गत जो जग्गियै । घग्ग साह विन हाथ ॥ मेछ पिच्छ किर सान गुर । विवरि गुरज्जन साथ ॥ ई० ॥ ८१ ॥ पातसाहि षिची सुछिति । मति रष्पन परिमांन ॥ जौ भंज चौहान तूं । कई दून सोइ ठान ॥ ॥२॥ । ।
६१२ पृथ्वीराजरासो। [ उन्नीसशं समय १० अरिल्ल ॥ माधौ बत्त सुमत्त प्रमानिय । तज दून मुक्कलि गुन ठानिय ॥ नव नव नव घन मध्य प्रमानं । कहो मंत गोरी सुविहानं ॥ ई० ॥ ८३ ॥ दूत भेजकर अपनी सेना की तयारी करना । छंद पद्धरी ॥ करि मंत साह गोरी अचंभ । आरंभ चक्क भुज दंड अंभ ॥ जल थल तिथ्यलत करि प्रमांन । उनम्यो' मेछ जनु मध्य भांन ॥ ० ॥ ८४ ॥ गगन मगन षुर षेह छाय । सुसन भांन मिटि पंथ वाय ॥ अरुझे सुकमल संकुचि सकोर । रुठी सु बदन अलि किसल थोर ॥०॥८॥ चक्कवी चक्क चक चक्री भूमि । रस ताल वितन तल कठ्ठि तमि ॥ तिन बननि तुहि छर छरत नीर । प्रज्जरै पंथ साइर गंभीर ॥ छ० ॥ २६ ॥ तन करै पवन गवनं प्रकार । उरभंत धजा गज इलत लार ॥ बाजन टमंक तबलं कठोर । नाचत ईस जनु गंग मोर ॥ ई० ॥ ८७ ॥ सुझे न नैन दिसि विदिसि थांन । मन क्रम सुद्दि नछी प्रमान ॥ ई०॥८८ ॥ टूहा ॥ चाहुनि चतुरंग दिसि । सजि सुमंत साधब्ब ॥ जुककु मंत गुन उच्चरिय । बर कोविद माधब्ब ।। ई० ॥८॥ मति माधव कोविद सुबर । कही बत्त गुन जुत्त ॥ तऊ साहि गोरी नृपति । फेरि मुक्कले दुत्त ॥ छ० ८० ॥ बोलि दूत चव अग्ग लिय । दिय कग्गर धृमांन || सुद्धि सिंध अरु साब बर। दिय इनाम श्रब्बांन ॥ छं० ८१ ॥ शाह का फर्मान लेकर दूत का दिल्ली की ओर जाना। चल्यो दूत दिल्ली दिसा । लिए साह फुरमान ॥ भेष सुसोफिय नन्न सजि । चित्त अचिंतिय मान ॥ ई० ॥ १२ ॥ (१) को-उभस्यो। (३) मो-बनह । (५) मो-मुर्काहय । (७) मो-सब। (८) मो. में यह तुक नहीं है। (२) मो-ततकमल। (४)-नन । (६) मो-बचन।
उन्नीसवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो। ६१३ आदि का दूत दूत को दिल्ली पहुंचकर अनंगपाल के बनबास और पृथ्वीराज के न्यायराज का समाचार विदित होना। गाथा ॥ दिल्ली दूत सपत्तं । फिरि फिरि देषंत न्याव नृप नैरं थह ,मान सुहं । दिन्नं वर पत्र इथ धूमानं ॥ छ० ॥ २३ ॥ बरि अब धृमानं । दिन्नं नृप आदि सूर सामंतं ॥ अनंगपाल तप सरनं । दिल्लीय दीन राज प्रथिराजं ॥ ई० ॥ ४ ॥ ध्रमान कायस्थ का सब समाचार सामंतों के रहने का बतलाना। कवित्त ॥ विवरि परि धमांन । कही चछुआंन सेन वर ॥ पष्य सत्त राजांन । सुवास कीन पिथ्यपुर ॥ पष्ण पंच कैमास । राव चावंड पथ्य चव ॥ बसि वित्ते दिन अठ्ठ । पष्य लोहन रमे सब ॥ चहुन कन्ह पष एक हुअ । बसिय बास दिन पंच हुअ ॥ सामंत अवर आगम छ । सबन वास चहुन रय ॥ ई० ॥ ५ ॥ ध्रमान का सब समाचार लिखकर भेजना। लषि करि इह बंधी विवरि । राज धम्म चहुआंन । दिय कम्मर तमु दूत कर । बर कागर धम्मान ॥ ई० ५६ ॥ सब समाचार लेकर दूत का लौटना। पवरि सबै लीनी न पति । चलिय दून निज मांग ॥ आतुर पनि गज्जन नमिय । सौफी वे सह जग्ग ॥ छं० ॥ ८७ ॥ अरिल्ल ॥ दूत आइ दिल्ली परिमानिय । राजधान जुग्गिनि पहिचानिय ॥ निगम बोध दिष्पा चक्षुत्रांनं । रहे षट दीह फिरे तिन थानं ॥ छ० ८८ ॥ दूत ने छ महीने रहकर जो बातें देखी थीं सब शाह का जा सुनाई। दहा ॥ रहे दूत षट दीह बर । लषि चरित्त षट मास ॥ जु कक्कु चरित षट मास के। कई विवरि सुदभास ॥ छं० ॥ ८ ॥ (१) मो-गेहं। (२) मो.-परक। (३) मो-भय। (४) मो-रसन। (५) मो-सुधि । ।
६१४ पृथ्वीराजरासो। [ उन्नीसवां समय १२ क्रम ढिल्ली दिल्ली बयर । दिल्ली नप चहु ांन । गौ तीरथ बन सज्जिकै । प्रगटि दिसांन दसनां ॥ छं० ॥ १० ॥ प्रथीराज चहुत्रांन बर । लै ढिल्लीपनि मूंद । जानत सकल जिहनां बर । बजि नि?ष सुदंद ॥ ई० ॥ १०१ ॥ शहाबुद्दीन का लड़ाई के लिये प्रस्तुत होना, उमरावों की तयारी का वर्णन । कवित्त ॥ माह बदी सुरतनां । आइ गज जुद्ध निरष्षिय ॥ अगड मध्य चौगांन । वीस गजमत्त 'सज्जकिय ॥ सहस एक गज झुंड । मंडि मंडल अविधानिय ॥ तहां गोरी बर बीर । दंति इक्कै दिन मांनिय ॥ गज एक सेत निज रोहि बर । चढिय पिठ्ठ तत्तार षां ॥ सुरतांन षांन निसुरत्ति षां । चढि सुगन्ज बाई रूषां ॥ ई० ॥ १०२ ॥ दिसि दष्पिन साहाब । साहिजादा चढि दंतिय ॥ अपर सब्ब उमराव । चढे गज बंधि सुपंतिय ॥ लाल भंड सम सिंघ । हेम रज्जत साहिसिर । हैदल पैदल अबर । गनिक को गनै गहब्बर ॥ महमंदचंद महावत्त सौं । बोलि साह पुर मांन दिय । गज भूत सिंघ गज मुष्य है । आंनि सुअगडह अड्ड किय ॥ छ० ॥१३॥ दूहा ॥ इहा कहत तिन चर चवन । दिर दुवाह सुगतान ॥ निरषि साह उची निजरि । बे बुल्ले पुरसान ॥ ई० ॥ १०४ ॥ बारुन बर बानै विविधि। असु अनप अालोन ॥ ठाढा कोतूहल कवल । करत दोन नव लोल ॥ कं० ॥ १५ ॥ छंद उधौर ॥ मंडित उतंग उत्तिम चंद । भूरध सोभा सेामह नंद ॥ छच विसाल बर दुति सीस । बाल विसाल उडगन ईस ॥छः ॥ १०६ ॥ आसन सिंघ मंद्यौ राज । सामंत सूर भर करि साज ॥ राज चहुआन प्रथी नरेस । मंडिय चंद देव सुरेस ॥ ई० ॥ १०७ ॥ (१) को-ए-गमंत । (२) मो-करवानन ।
उन्नीसवां समय १३] पृथ्वीराजरासो । ६१५ ॥ मास बित्तिय मंडी रेर । नह निसांन थांनह भेर ।। है गैगुंजि नाना भंति । छच विराज छचनि मंति ॥ ई० ॥ १०८ ॥ मिलिभर जहां तहां भरि भीर । सूर समथ्थ जुद्ध सधीर ॥ जित तित दिष्षि रंग सरंत । आगम जांनि फूलि बसंत ॥ई०॥१०॥ बसन विराजि दसन कुवारि । लोन कलोल सुंदर नारि ॥ गावति इसति अलि अलि रासि । दृग दुति कमुद किरनि प्रकासि ॥०॥११०॥ जब लगि बटै वीर जराइ । तब लगि गहिन साहि बधाइ ॥ जब लगि बढत बर जर जांम । तब लगि करन मत्तन काम ॥०॥ १११ ।। सुनि उर लग्गि अग्गि उदार । परति न धिनक चैन दुवार ।। बरु चर चवत चारु विचार । सिर दह वार नंमि उदार ॥०॥ ११२॥ दूत का ब्योरेवार दिल्ली का समाचार कहना। दूहा ॥ सुनत बत्त पुरसांनबर । बोले दूत हजूर ।। पुबै साहि सुचित्त करि । बिवरि षबरि संमूर ॥ ई० ॥ ११३ ॥ बचनिका ॥ सुरतांन सु विहान सुलतान साहाब दीन ॥ करि करतार कि जोर । जासु कित्त जै अरु दल की जोरि जोरि ।। जनु दरियाव की हिलार । मिलते से मुह अन मिलन से पल पंचि कढारै । सुरतांन सुचिर द्वतांन । आंनि कही कायय धृमांन । दिल्ली की षबरि विवरि निषि दीनी ॥ अनंगपाल तूंअर बन बाम लीनी ॥ देस है गै कोस पुत्री पुत्र प्रिथीराज का दीनी ॥ पष्ष सत हुए वास कीनें । तरुनि पुत्र परिवार सुष चेंन । पष्ष पञ्च कैमास को भए आएं। मास दून दिन अठभए चावंड बसाएं ॥ तीन मास लोहांन बीते । बीस रोज कंन्द चहुआंन हतें । और सब सामंतकी बसही आंनी। कितेको आननै मांनी ॥ चौहान वास की आग्या दीनी । सब सामंत सीस नामि लीनी ॥ रोज बाईस तिस पर हमको राह लगे। पडि पतंग जग्गि सानंगे । जोरै ॥ प (१) मा.-सुरतांन । (२) मो.-चि कैतो।
६१६ पृथ्वीराजरासा । [उन्नीसवां समय १४ ॥ जबलगि न बैरी जराह। तब लगि साह मारि करि आई ॥ ० ॥११४ ॥ छंद पदरी ॥ उच्चस्चौ दूत प्रति गज्जनेस । चहुबान तेज दिष्यो असेस ।। अनगेस राज तजि तिथ्य जाइ । सामंत सूर सब मिले आइ ॥ई० ॥११५॥ संकुरे सकल भुम्मिया भयांन । सेवंत आन दरबांन थांन ॥ इक भजन भोमि तजि गहत ग्रेह । निय नार रं म्म सके न नेह ॥ई०॥११६॥ दूक मिलत आंनि तजि एंड अंग । षल पम्ग पडि से ज जंग ॥ अजहूं सुसेन इक मनी नथ्य । गोरी सहाब इह घत्त तथ्य ॥ई० ॥११७ ॥ संबत् ११३८ में पृथ्वीराज का दिल्ली पाना ॥ दूहा ॥ ग्यारह से अडनीस भनि । म ढिल्ली प्रथिराज ॥ सुन्यौ साहि सुरतान बर । बज्जे बज्जि मु बाज ॥ ई० ॥ ११८ ।। अरिल्ल ॥ ग्यारह से अडतीसा मानं । भो ढिल्ली चपरा चहुबानं ॥ विक्रम बिन सक बंधी सूरं । तपे राज प्रथिराज करूरं ॥ छ ॥ ११९ ॥ कलिजुग अरु दापर की संधी । साको भ्रंम्म सुतह बल बंधी ॥ ता पच्छे विक्रम वर राजा । ता पच्छे दिल्ली नृप साजा ॥ छं० ॥ १२० ॥ कहि चरित्त दिल्ली परिमानिय । सब गुन साह बिबेकत जानिय ॥ सबै चरित्त कहे प्रति भह । सोइ दूत अध्यै प्रति घहं ॥ छं० ॥ १२१ दूत का पृथ्वीराज का चरित्र कहना, शाह का खुरासान ख़ां आदि से मत पूछना । छंद दैअध्यरी ॥ दूतं आइ दिल्ली प्रतिथानं । हेम सु है गै मुद्रित मानं ॥ राज दिल्ली चहुबानं । नाकरध नागेंद्र प्रमानं ॥ छ० ॥ १२२ ॥ एक बराह थिरं बेराहं । सकल कृत्य सुरराज समाहं ॥ को अग्या भंजै न विराज । अप्प लज्ज सम सामत लाजं ॥ ई० ॥ १२३ मुष छुट्टै जो बैन प्रमानं । तो घल्लै अगि जुलित नथानं ॥ सुनौ साहि गोरी सुरतानं । एक अंग एकं मन ठानं ॥ ई० ॥ १२४ ॥ पुब्ब लाइ दालिद्री नासं । सबै सुक तब टंक विलास ॥ दंड हथ्य जोगिंद सुदिष्यौ । नहि सुदंड प्रज्जा सिर पिष्यौ ॥ छं० ॥ १२५॥ (१) मो-अगें। (२) मो-नह राजं ।
उन्नीसवां समय १५] पृथ्वीराजरासा । ६१० दुज उचिष्ट नह उष्टं अल्ली । छीन लंक कोई छीन न भल्ली ॥ करिन ककच चिया प्रकारं । कोई न कठिन टुअन अधिकारं ॥ॐ ॥ १२६ ।। कसै हेम सोनार सुबीरं । कोई न कसी दरिद्र सरीरं ॥ भै निरभै संसार सुजानं । सुनि सुनि राज वृत्त सुरतानं ॥ छ० ॥ १२ ॥ मोरत अकृत सुटत गुन जानी । कहै दून विधि विधि परिमांनी ॥ सोहै मझ अवृत्त अभिलाषं । मोज प्रवाह सुभंत बैसाथ ॥ २० ॥ १२ ॥ यों आवै बढे कवि मन्नं । इतौ राज अप्पे प्रति दिन्न । सेत सुमंत सुमंतह सारी । भो मुष मंद मंद अभिसारो ॥ ई० ॥ १२८ ॥ यों जंपिय चक्षुआंग सुमंतं । त्यो अभिलाष गई मति तंतं ॥ बोलि षांन तत्तार प्रकारं । कही मंत सो किज्ज सारं ॥ छ० ॥ १३० ॥ अनंगपाल गौ तिथ्य सुनिज्जै । चाधुआंन दिल्ली प्रति रज्जै ॥ ॐ ॥ १३१ तातार ख़ां का दिल्ली पर चढ़ाई करने की सलाह देना। दूहा ॥ कहै षांन तत्तार वर । अत चरित्त सुनंत ॥ जे चरित्र दिल्लिय नृपति । कहि गोरी गुनमंत ॥ ई० ॥ १३२ ॥ कवित्त ॥ कदै षांन तत्तार । सुनहि गोरी सुरतांन । मोहि मत्त जो किजियो । सजियै सेन परमानं ।। कही बत्त माधौ सुभदृ । सोइ लिषि कायथ कग्गर ॥ सोह टूत सुत बोलें धरमांन नाम काइथ सुघर । तेनु चरित लिष्षे सबै अप्पे सुइथ्य बंदीन ते । सुकृत बीर बीरह तबै ॥ ॐ ॥ १३३ ॥ तातारखां का मत मान कर सुलतान का सेना सजने के लिये आज्ञा देना। टूहा ॥ मानि मंत तत्तार बर । मति गोरी सुरतान ॥ लिषि धरमानह कम्गरह । सुविधि विधि परिमान ॥ ० ॥ १३४ ॥ गाथा ॥ माधवं कोविदं भé । गीतं काव्यं रसं गुनं ॥ नर्से चिचं महा विद्या । पिंगलं भरहं तथं ॥ छ० ॥ १३५ ॥ छंद मोतीदाम ॥ निरंजन भह सुमाधव वीर । कही तिन बत्त सुसत्ति सधीर ॥ इदै कहि मत्त सुमत्त प्रमांन । सजी चतुरंगिनि सेन निधांना ई०॥ १३६॥ कहि बत्त। नभह बर॥
पृथ्वी राजरासो। [ उन्नीसवां समय १६ कवित्त ॥ सेन साजि चतुरंग । लिषे कग्गर परिमानं ॥ थांन थांन प्रति जांन । साहि कढे फुरमानं ॥ आई सेन सजि थह । सक सबै उमरावं ।। चढिदै कंधै भपटि । जांनि उन्नव्यौ दरियावं ।। विधि रूप दैव गोरी नृपति । गरु मक्ति भजन स्यन ॥ तत्तार षांन षुरसान षां । करे मत्त सच्चे बयन ॥ छ० ॥ १३७ ।। गाथा ॥ सुनि श्रवनं चर बत्तं । बज्जान घाव बीसानं । निज है वर आरोहं । चढियं सजि गज्जनी साहं ॥ ई० ॥१३८ ॥ कहि ततार गहि बग्गं । बसो छरोज अजर हो ग्रेहं ॥ रोज पंच मिलि सयनं । करि सुबसि सिंघ चहुअांनं ॥ छ० ॥ १३८ ॥ कहिष साहि बर बत्तं । सुनि सत्तार सह तुम साजं ॥ अरि आघात समथ्यं । सहि सुसिद्धि निद कज्जायं ॥ ई० ॥ १४ ॥ शाह की सेना का धूम धाम से कूच करना। छंद पडरी ॥ चढि तमकि चन्यो गोरी सहाव । उल्लट्यो जांनि सायरन भाव ॥ पुठि प्रबाह मिलि चलिग सेन। विधि विधि प्रवाह सर भरि जलेन ॥ई० ॥ १४१॥ हादसह कोस किन्नौ मुकाम । डेरा सुदीन नारौल गांम ॥ मिलि पुठ्ठि आइ सब सेन भार । है लष्प मीर गरुअत्त गार ॥ ई० ॥ १४२ ॥ बाजिब बीर बज्जत बिसाल । नारद नाचि तिन भृकटि ताल । वित्ती चियाम उग्गयौ सूर । दल चल्यौ सत्त जनु सिंधु पूर ॥छ॥१४३ ॥ संक्रमन सेन हा हुलास । चलि विषम सुषम देराह भास ॥ धुर धरि परि धंधरिय भांन । गहबर सुबत्त सुनियै न कांन॥ छं॥ १४४ ॥ दर कूच कूच उत्तरिय सिंध । दल विषम वृत्त उर साहि विद्ध । किन्नौ मुकाम आवार पार । डेरा सुदीन दल उंच ठार । ई० ॥ १४५ ॥ भंडे अनंत गडि विविध रंग । फुल्ल्यौ बसंत बनराइ चंग ॥ चर चले धरनि दिल्ली सुथांन । दल कई चरित षुरसान षांन॥ छ० ॥ १४६ ॥ दूहा ॥ कदै चरित सुरतांन सैौ । जे देषे तिन दून ॥ घुरि निसान भद्रव भरिय । इम दिष्षिय अदभूत ॥ छ ॥ १४७ ॥ (१) मा-सारं। ।
६१८ । घही॥ उन्नीसवां समय १०] पृथ्वीराजरासो । छंद भुजंगी ॥ घुरै नह नीसांन उग्गंत सूरं । बरं बीर बाजिच बजे कारं ॥ घनं पध्रे बाज दंनी सरन्न । दल सज्जि सन्नाइयं अब्बर नं ॥ई॥१४॥ रहियं पोज मरं हो साहं । नहां दौर मैारं गुरं गज्ज गाहं ॥ कहां बिहियं दंति जमत्त मत्तं । तहां छत्र रंग चियंगे टरंतं ॥ई॥१४॥ नहां बीर माही उमाही सुरानी। तहां ढाल बहु रंग अंगी दुरानी ॥ दिसा बाम तत्तार गोरी सु अन्नी । दिसा दाहिनी षांन पुरसान रन्नी ॥०॥१५० मुषं अग्ग बेतंड सेरंन षांनं । रतं बैरषं रत्त गज गाइ ठानं ॥ तिनै रत्त उच्छारि कारत्त ढारं । रज रत्त झंडं तरं तान्नु हाल ॥5॥११॥ अनी साहि पुठे विचे साहि साजं । अगें अग्ग बानी इथं नारि साजं ॥ अगें बांन गीरं सजे जुड़ सारं । मुषै मारमारं ॥२॥१५२॥ सुरं दीन दीनं कलिं कूक फुटी । भरं आह कालं भरी जुध उडी डंबरं अंबरं रेनु पूरं । बरं बाज आघात बजे करूरं ॥ ई० ॥ १५३ ॥ शाह की दो लाख सेना का सिंधु के पार उतरना। टूहा ॥ गजनेस सब सेन जुरि । आयौ सिंधु उलंघि । कूच कूच आतुर परिग । दोह लष्ष दल संघि ॥ ॥ १५४ ॥ एथ्वीराज का यह समाचार सुनकर अपने सरदारों से परामर्श करना कवित्त ॥ सुनिय बत्त पृथिराज । बोलि कैमास मंच बर ।। कंन्ह का चहुन । विरदि बज्जैति' नाइ नर ॥ रा पज्जून पवित्त । सलष पमार जैत सम । जाम देव जहों जुबान । पर संग राव प्रम ॥ पुंडीर सेन चंदह सुमति । लोहानी आजान भुत्र ॥ मिलि सकल मंत पूछिय प्रथुक । सनमानिय सेमेस सुअ॥ ई० ॥ १५॥ कैमास का मत देना कि हम लोग आगे से बढ़कर रोकें। कहिय मंत कयमास । सुनौ सामंत सब्ब भर ॥ गज्जनेस श्रायो स सज्जि । सब सेन अप्प पर । कूच कूच उभार । सुन्यौ उत्तार सिंधु नद ।। सिंध मंत्र सुभ रच्यौ । फौज चंपी न होई हद ॥ (१) मो-कक (२) मो-छज्जेति। १ ६२० पृथ्वीराजरासो [ उन्नीसवां समय १८ आयौ सुराव चावंड तब । कहा विरम रच्यो सयल ॥ इह मंत सिन्नइ सज्जे सहलि । चढि रन चंपहु दुष्ट बल ॥ ई० ॥ १५६ ॥ इस मत को सब का मानना । दूहा ॥ मांनि मंत सामंत सब । हरषि राज प्रथिराज ॥ बत्त परठ्ठिय ग्रेह गय । अप्प अप्प जुस साज ॥ ई० ॥ १७ ॥ एथ्वीराज का सबेरे उठ कर कूच करना। अरुनोदै बैरां विहसि । बज्जि निसांन निहाई ॥ चढ्यौ राज चहुआंन तब । चिंति अप्प जुध चाई ॥ कुं० ॥ १५८ ॥ कवित्त ॥ तपत सुरंग सुरंग । सुरन धंमांन इष्टय लिधि ॥ सांम दांन अरू भेद । दंड मिरनै बिसेष सिषि इहत काल इह घरिय । साहि सज्जे चतुरंगिय ॥ सुनि अवाज मुस्तान । हिंदू करिहै रन जंगिय ॥ प्रति कूच कूचनि करि प्रसति । चाहुन न करै विषम ॥ मो मत्ति मांनि माधव सुकथ । सुबर वीर बज्जे सुषम ॥ ई० ॥ १५९ ॥ चौ राज प्रथिराज । करन मुक्क्यौ प्रति साजिय ॥ बाई गंठि बंधईय । सुबर मानक सु ताजिय ।। मंच बंधि कैमास । कन्ह बछुआंन सु निडर ॥ अमृत बत्त सज्जए । सूर सामंत तत्त गुर ॥ विधि रूप भूप जानन सकल । तत्त मंत बत्तइ सुबर ॥ संग्राम सूर साधै सकल । षग झिल्ल बजी सुकर ॥ ई० ॥ १६ ॥ दूहा ॥ चढ्यौ राज प्रथिराज बर । सजि सुभह अप्पांन । विकसे अंबुज बीर बर । काइर कंपत प्रान ॥ ई० ॥ १६१ ॥ कवित्त ॥ चन्यौ राज प्रथिराज । मंगि गज रूप सुताजिय ॥ षित्रिय जाति सुभाति । हेम नग साकति साजिय ।। बंधि सत्त से तोन । बान तीषे सुभाल जल ॥ बोलि कन्ह चछुआंन । मंत्र कैमास बुट्वि बल ॥ बोले सु सब्ब सामंत भर । अरु जु सूर सथ्यं मयन । आए सुराज अग्या सुसजि । चले जुड़ सिर सजि गयन ॥ छ० ॥ ११२ ॥ . । ।
उन्नीसवां समय १६] पृथ्योराजरासो । દેરી । पृथ्वीराज की सेना का वर्णन । छद चोटक ॥ चढि राज चल्यौ सब सेन सजं । उडि घेह र रुकि अंब रजं ॥ सुर चंबक रोर तहच हयं । सहनास्य सिंधु बसन हियं ॥ छं० ॥ १६३ ॥ विकसे असबिंद जुबीर उरं । किन नंकिय कातर नारि नरं । दल संग जु ग्रिड पयांन सजं । हरयै नचि जुग्गिनि जुद्द रज ॥ ई० १६४॥ दह सत्त सहं सदलं मिलियं । नव कोस सुनन्त मिलान दियं ॥ अति कूचच कूच दलं परियं । जल पंथइ जाइ सु उत्तरियं ॥ ॥१६॥ युद्धारंभ होना। द्वहा ॥ कूच कूच गोरी सयन । जकि आयौ जल पंथ ॥ सुदि वैसाष मृग भृगु दसै । सज्ज्यौ जुद्ध समंथ ॥ छ० ॥ १६६ ॥ दिष्पि रेन डंबर डहर । चढिय चाइ चहुन ॥ सुर आनंद अनंद किय । काइर कंपि पुलीन ॥ ई० ॥ १६७ ॥ युद्ध वर्णन । छंद मुकुंद डामर ॥ ढलकंतिय ढाल निसान नहि सिय चंचल सूर चढे कसियं ॥ चक टोप सहप रँगा दह हथ्थल जोप सनाह विधि जरियं । रुस मंस उक्रसत मुंछ तिरछिय दान समानत न्हान कियं ॥ नचि नारद तुंमर अंबर आनंद ईस सु सिंगिय नद्द दियं ॥ ई० ॥१६॥ चढि अच्छरि ईसय सीस निरष्यन बोर जु जुद्द बिनोद नचं ॥ सुर रच्चिय रथ्थ अयास सुबासिय गोद चवछिय मांनि सचं ॥ नृप रच्चिय फौज सुपंच प्रपंचिय गज्जिय गेंन सिरं धरियं ॥ भरमंनिय अप्प सु जैत प्रकासिय बंदि बिरह प्रती परियं ॥ ई० ॥ १६८ ।। बर साइय सुभार जीव कलप्पिय मंनि अनंत पल वारि पनहर श्रोन सकत्तिय डिंभु अगिडिय चित्त धुकं ॥ सुष नेंन मुरत्तिय श्रोन सुरत्तह मुंछह भेहि उभं धुकजं ॥ नृप दिष्षिय सुम्भर सूर अनंदिय के कसि बोरति फौज सजं ॥॥१०॥ कवित्त ॥ दूत रचिग सेन सामंत । जुद्ध मारू रा भष्पन ।। मोर ब्यूह श्राकार । श्रप दुर्जन दल दग्गन ॥ सु सोस भु॥
६२२
पृथ्वीराजरासो ।
[उन्नीसवां समय २०
एक पंष निडर नरिंद । साथ कैमास रांम भर ॥
दुतिय पंष अत ताइ । बलिय बलिभद्र सार भर ।।
पिंड पाइ नष गज हुअ। रचर पुंछ पज्जन भर ॥
पुंडीर चंच कीती नृपति । महन रंभ मच्यौ सुथर ॥ ई० ॥ १७१ ॥
दध्धिन दिसि कैमास । बांम दिसि कन्हति सज्जिय ॥
च्यार सहस सेना सर्जत । नील फर हर ढल रज्निय ।।
सकट व्यह सजि सुभर । कग्ग चामंड अग्ग करि ।
मंच राज ढंढरिय। ठंठ मारू महंन धरि ॥
चंदैन माल भौहा सुभर । उभय चक्र सज्जे उभय ।।
प्रथिराज अनी दयिन दिसा । विषम बीर सज्ज्यौ सुरय ॥ छं० ॥ १७२ ॥
अवर अनी सामंत । षरे नव वीय महाभर ॥
सोलंकी रन बीर । सुतन विंझह सुराज बर ॥
षीची राव प्रसंग । हीर पम्मार सहथ्थं ।
सुवर बीर अवसांन । करन प्राक्रम अकथ्थं ॥
पंम्मार दोद सिंघह सुअन । सुअ प्रसंग सागर बरन ॥
बध्धेल भीम लष्पन सुअन । राम वांम हय इभमारन ॥ छं० ॥ १७३ ॥
बांई दिसि चहुन । कन्ह सज्ज्यौ दल बद्दल ॥
सहस तीस सजि सेन । मध्य सामंत अठबन्न ।
हर सिंघह बर सिंघ । हम हमीर गंभीरह॥
मंडली कमल नाल । भान भही बर नीरह ॥
उदिग पगार बिरदैत बर । सोलंकी सारंग उर ॥
सिर कन्ह छत्र सज्यो नृपति । भार सयंनइ जुद्ध भर ॥ छं० ॥ १७४ ॥
मुष अग्गों पम्मार । सलष सम जैत सु सज्जिय ॥
लोहांना आजान । तिन मद्धि विरज्जिय ॥
सहस पंच सेना समथ्य । पंम्मार सिंघस।
मध्य सूर सामला
सामला । भीम
चालुक्क पर जम ॥
ठंठरी टांक चाटा चपल । धवल जसह लाहांन सुअ॥
लौहान बंध केसरि समथ । अग्र भाग सब सूर छुअ॥ छं० ॥ १५ ॥
उन्नीसवां समय २१] पृथ्वीराजरासो। मध्य भाग प्रथिराज । सहस सेना सु च्यारि सजि ॥ चंद्र सेन पुंडोर । राइ पर सिंघ सिंघ गजि ॥ बिंझ राज लष्पन बघेल । राइ रामह कनक सम ॥ कूरंभह पज्जन । भीम चहुआन भीम क्रम ॥ भाषरह दास मंधे समथ । चाहुन नृप कन्ह सुत्र ॥ गोइंद राव भुज इथ्य नृप । जुद्द पथ्थ जै वज भुअ ॥ छं० ॥ १७६ ॥ जाम देव जहां जुवांन । हप पुठ्ठि मु रज्जिय ॥ स्थाम चमर पवरह । स्यांम गज ढाल सु सज्जिय ॥ लंगी लंगर राव । अल्ह परिहार सर बर ।। अचन्तु अटल चहुन । सिंह बारड अभंग भर ॥ जंघाल राइ भीमह सुबर । सागर गुर रिन भूरि बल ।। सामंत सकल सज्जे समय । कज्ज राज प्रथिराज दल ॥ छं ॥ १७७ ।। उत गोरी सुरतांन । सज्यों सेन अध चंद्रं ॥ अर्द्धचंद्र तत्तार । षांन षुरसान सु इंदं ॥ अर्द्धचंद्र बर सार । पान पीरोज स इंदं । मधि कलंक जल्लाल । बीर रस बीर समंदं ।। उज्जल निसंक दोउ कोर बर । तेज ताप सुरतांन डर ।। चहुबांन राह लग्गन फिचौ । पूरन पुनिमासी सगुर ॥ ई० ॥ १७८ ॥ छंद भुजंगी। इसी लीन जो गिंद जो गिंद भासे। उड़ी गिद्ध पच्छै मनों मोन भासै ।। कहै नह नंदी सुनारद वीरं। मनों जोग जोगाधि को अंत नीरं ॥॥१७८॥ करकेत बानं धरति बेन । गए लज्ज पांबी फटे पक्क पेन ॥ मयं मत्त दंतीन की पंति सेभि । तिनं देखते इंद के चित्त लाभ ॥ई॥१८०॥ झटकंत दंती सुपंती प्रकारं । बलाकंति पंती बगं मेघ सारं ॥ झरं डमरं रेन रुकि भूर नभ्भं । कलापंत पतीन की सत्त सम्भं ॥॥१८१॥ टूहा ॥ दिषिय रेन डंमर डहर । चढ्यो चाय चहुनि ॥ सूर अनंद अनंद किय । कायर कंपि परान ॥ छं० ॥ १८२ ॥ सज्यौ सेन जंगल सु पहु । जिम बद्दल आकास ॥ ढनकि ढाल दिल्ली मिली। बिषम बीर रस रास ॥ छं० ॥ १८३ ॥ ३ ६२४ पृथ्वीराजरासे।। { उन्नीसवां समय २२ घोर युद्ध होना, सुलतान की सेना का भागना ॥ छंद भुजंगी ॥ ढलक्की मिली ढाल ढालं दुसेनं। चढे देव देषै रचै रथ्थ गेनं ॥ हकै हक्क बज्जी गजै नार नारं । महा जुन लग्गौ उद्यौ धोम धारं ।। छं० ॥ १८४॥ कुटै बान इन्चारअप्पार भारं । जगी दामिनी इंद्र भादों सुढारं ॥ मिली कन्ह अन्नी षुरासान अन्नी । महा घेत मत्तौ गज गाह रन्नी ॥ कं० ॥ १८५ ॥ कुटै बान कम्मान रुक्या सुगेनं । उवं जुड़ दिठं न प्राचार नेनं ।। ਮੈਂ जुद्ध मंड्यौ महा भार भारं । भरं दून भग्गे धरं धार धारं ॥ छं० ॥ १८६॥ गिरें उत्तमंगं धरं सूर नंचै । भरं सीस कमालियं माल संचै ॥ करै जोगिनी जोग उच्चार बीरं । पिये श्रोन धारं अपारं सुधीरं ॥ इं० ॥ १८७ ॥ मिले घेत षुरसांन षां कन्ह धायौ । उरं झारि सींगी अपुठं गिराया ॥ पस्यौ भूमि षुरसान धानं सुघाए । अनी भग्गि गय और सुरतांन ठाए । छं० ॥ १८८॥ परे सहस दो षांन कढि षेत साजं । बजी जैत देषी प्रथीराज राजं ॥ भगी फौज सुलतान देषी विहाल । कुप्यो सादि षुरसान किय नेन लालं ॥ कं० ॥ १८ ॥ फ़ौज को भागते देखकर सुलतान का क्रोध करना। दूचा ॥ भगी फौज सुरतांन दिषि । कोप्यौ साहि सहाव । बहुरि मिलत जनु मेघ घुरि । सावन बद्दल आब ॥ छं० ॥ १८० ॥ सेना का ललकार शाह का फिर जोर बांधना। कवित्त ॥ इक्कि सूर सुरतान । साहि बंध्यौ बल भारी अग्गैई चौरंग । राज रष्यन अधिकारी ॥ t ॥ (१) मो.-नारि । (२) मो-हवाय ।
उन्नीसवां समय २३ ]
पृथ्वीराजरासो ।
६२५
।
दहा
सुनै सादि सुरतान । साहि जीवन सुरतानं ।।
सुबर वीर हिंदवान | कलह चंपै हिंदवानं ॥
दीजै न दान दुर्जन घरह । दइ दुवाह अभी पति ॥
मुरि भग्या साहि सुरतांन को । साल रहै जीवत सुपति ॥ ई० ॥ १८१॥
तातारखां का मारा जाना, सुलतान का हिम्मत हारना,
पृथ्वीराज की विजय।
तब कही षांन तत्तार । साह मंनी परिमानं ।।
रुप्यौ साहि नरिंद । साहि पुरसान सबानं ।।
घरी एक श्राबद्ध । बीर बीरह रस सध्या ॥
घेत परे तत्तार । साह गोरी गई सत्या ॥
मुह मेल साह चहुांत हुअ । हैथप्परि दौरे असुर ॥
चामंड राइ दाहर तनय । जै सबद्द उचरंत उर ॥ ई० ॥ १८२ ॥
हा ॥ दंतिपत्ति हल्लिय विहर । जलद कि पब्बय पाई ॥
बाद सहाई कै अनल । कै ग्रीषम नगि लाइ ॥ ई० ॥ १८३ ॥
छंद माधुर्य ॥ दव दवरि दवरित सेन उंमरित गज्ज गहरित सहयं ।
बिरहंत भद्दव जलद हद्दव कीच मच्चित भयं ॥ ई० ॥ १८४ ॥
गिरि पंषि उल्लसि उडय दस दिसि बाय बेग छरि करें।
देषत मन गति होत पंगुर दांन बरषत गिरि झरें। ई० ॥ १५ ॥
गज पंति दंतिन कति उज्जल बग्ग पंति कि राजए ।
रवि किरन बद्दल मध्य मानहु अन्य सेभ सु साजर ॥ छं० ॥ १८६ ॥
बर करत अनतह बग्ग षुल्लत उडत किरच सुषंडि के।
इल चंद मानहु कोपि उडगन अद्ध रयनीय छंडि कै ॥ ई० ॥ १८७ ॥
इल मलिय है दल दलित पैदल सैल सिषरह फहियं ।
गोपीय कन्हं जनु अगन्हें सार मार उहडियं ॥ छं० ॥ १९८ ॥
दूहा ॥ गज्जन समवर रोस रस । बज्जिग मार अपार ॥
घोलि षग्ग सैंभरि बलिय। जनुपाइक पुंतार ॥ छं ॥ १८ ॥
छंद रसावला । करी मत्त भारो बहै सार धारी । दुइथ्यं करारी । तुटै दंत जारी ॥
छ० ॥ २०० ॥
पृथ्वीराजरासो। [ उन्नीसवां समय २४ रदं क्रिञ्च झारो । मोने मच्छ वारी ॥ लगें बांन भारी। गिरं टिड्डि चारी॥ - छं० ॥ २०१॥ लगे संग भारी । मनों ब्रज तारी ॥ उठे छंद धारो । मनों धम । झारी ० ॥ २०२॥ लगें केक टारी । धनु चंद्र धारी ॥ लगी दंति अंती। बिनाती सुहती ई०॥२०॥ भरके उछारें। बकें मार मारें ॥ ढहै गज्ज जारी। गिरं अंग सारी ॥॥२०॥ दूहा ॥ गज्जन गज गजै सुभट । रहै रोकि रन रंग ॥ छिति छज्जै छित्री इसे। जिसे भीम अनभंग ॥ छं० ॥ २० ॥ छंद पड़री ॥ अति उड़ जुद्ध अनबद्ध सूर । बलवंत मंत दीसै करूर ॥ झलमलहि संग फुटि परहि तुच्छ । उप्पमा चंद जंपै सुअच्छ॥छ०॥२०६॥ दल स्यांम हृदय सोभै प्रमांन । मानों कि पंचमी भाग भांन ॥ बर संग फुहि सिप्पर प्रमांन । छर स्वाम राइ सुम्मै समान ॥छ॥२०॥ मानों कि राह अहि ससिय आइ । कुही कि किरन बद्दल नचाइ ॥ किरवान बंक बढी विसाल । ससि बनिय डोरि करि चक्र चाल ॥छ॥२०॥ सिप्पर सुस्थांम हेमह सुहंत । मानो कि चक्र हरि धरिय संत ॥ लै संगि अंग है हनि उठाइ । उप्यमा चंद जंपै सुभाइ || ई० ॥ २० ॥ मानो कि इथ्य हथिनापुरेस । पंचै सु बलिय बलिभद्र भेस ॥ प्रथिराज करिय करि संग सुद्ध । लांगत भेस दीसंत उइ ॥ ई० ॥२१॥ मानों कि राम कामह प्रमान । चैति द्रोन हनमंत जांन । ढहि पस्यो गज्ज वर घेत भूमि। मांनो सुत्र सुरनिय अंत भूमि ॥॥२११॥ दूहा ॥ चक्र रूप दोइ दीन दल । बल अभून बलवंत ।। जांनि जुगंतह जम ल । करन प्रथीपुर अंत ॥ छ० ॥ २१२ ॥ छंद विअष्परी ॥ पूरन ससि सुरतांन नरिंदं । भारथ राह भिरै भर दंदं । चींटू सेन चढे रिन घेतं । जित्तन दल पुरसान सुहेत ॥ छं० ॥ २१३ ॥ डोरु हथ्थ डबै कर डावै । सींध राग श्रबै सुर नंचै बर बेतान विघाइ । नारद नद्द करै किलकाई || ई० ॥ २१४ ॥ सुर रत्तं सुर बीर प्रमान । उडै उछंग अरिन निद्धान ॥ दाहिंम्मौ दाहिर अधिकारी । गहन साह गोरी षग रारी॥ छं० ॥ २१५ ॥ गावै॥
उन्नीसवां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो । కోమని । जंपै मेछ कुसाद कुसादे । पारसीय मीरं रसवादै ॥ षां ततार पुरसांन पषानं । गहें सूर संमुह रन वानं ॥ ई० ।। २१६ ॥ पंच बांन वह ते अधकोसं । सो नाह नरिंद सरोसं ॥ रुौ दिष्षि साहि सब षानं । गहिय तेग अनमित्त जुवान ॥"॥ २१७॥ दूहा ॥ मिले खेत रन रंग रस । षां ततार कैमास ॥ विषम रुद्र रत्तो बिहसि । मनों तेग रस रास ॥ ई० ॥ २१८ ॥ छंद मोतीदाम || मनों रस रासय गय तार । करकर बज्जिय रीठ करार ॥ चलंतह बांन सुभान छवान । निरष्यत अच्छरि व्योम विमान ॥छा२१८॥ कुटै गज बाज अनंदिय जात । मनों लगि गोम उदोत उदात ॥ भिरें भय धोम सु धुंधय भार । लबै न को सूरति एक दुरार ॥०॥२०॥ फिरै धर वज्जिय झार करार। ठिलें नठिलाइ न मन्निय हार ॥ नटं भति जोगिनि नचिय बीर । मिटी सिर मालह संकर पीर । ई०॥२२१ मिले कयमास ततार सुअंग। इन्यो कयमासह जानुय संग ॥ फुटो जुग जंग तुरंग समेत । पस्यौ हय मुच्छ ततार सुषेत ॥ छ० ॥ २२२ ॥ बिना सिर नंचिय सठि कमंध । चले असि टेकि सु तुहिय रंध्र ॥ क्लैि विक मंध कमंध सुबीर । सहस्सह पंच परे रन मीर ॥ई० ॥ २२३ ॥ भगी रन फौज सु चंडह साहि । जिते रन हिंदु ठठ्ठ सुठाहि॥ ई०।२२४|| एथ्वीराज का सुलतान की सेना का पीछा करना। दूहा ॥ भगी अनी तत्तार लषि । दल परमारह चंप ॥ धप्यौ राज प्रथिराज तब । लेहु लेहु मुष जंप ॥ छ ॥ ३२ ॥ छंद पवरी ॥ धप्यौ सुराज प्रथिराज हक्कि । उर रोहि सेन उप्परें धक्ति । मिलि फौज किय एक ठांम। आघात रीठ मत्ती उरांम ॥०॥२२६॥ किलकार इक बज्जी करार । आवद्ध तुह मुष धार धार । चंप्यौ पराटि चामुंड राव । हल हल्ल हूक मते हलाव ॥ ई० ॥ २२७॥ बीभच्छ मंत बिय भर अरूर । आबद्द जाम मच्यौ करूर ॥ संगें सुसंग असि असी घाइ । पहा सुपट्ट बज्जे निहाइ ॥ छं॥ २२८॥ जम दढ़ दढ़ जुटें विरांम । कुलिका सुधाव जुहे सुजांम ॥
पृथ्वीराजरासो। [ उन्नीसवां समय २६ पाटू सुढींक परहार पार। मिले लथ्य बथ्थ झुझे झुझार । ई० ॥ २२८ ॥ कर केस केस एकह अनुभझ । कुरिका सनि बाहें सुलभा । तुझुत अंत चंपंत पाई । तुडंत सोस जनु विषम वाइ ॥ ई० ॥ १३० ॥ किन नतं परत दंती सभार । परें विहँड पंडै सधार ॥ है गै परंत धर परि पारि । घन श्रीन अंब पूस्चौ सवारि ॥छ०॥२३१॥ लग्गे ससंग नेजा सुढाल । सेहंत पाल तरवर सुहाल ॥ कच्छपह सीस गजराज नूप । धर परे हय गय मगर रूप ॥ छं०॥ २३२॥ तुढे सुबांह मनु मीन पान । सोहंत मोन वर विविध जांन । मोहंत सीस अंबुजह सूर । से वाल चिकुर रज्जे बिरूर ॥ छं०॥२३३॥ विगसंत नेन सुरंगी न दिट्ट । अंबुज निसांनि मधुकर बयट्ट ॥ पप्पर सुभरै कालिका वारि । विन हंस सूर उडै उझारि ॥छ०॥ १३४॥ पहाटि पस्यौ चामंड धाद । विचरंत विषम बज्यो सुघाइ। दिष्यौ सुघाइ साहाब दिछ । आवद्ध मंत मत्ती सुरिठ्ठ ॥ ई० ॥२३५॥ मिल्ल्यौ सुघाइ चामंड राइ । हय हये उन उन्नं उनाडू ॥ ह्य परै बश्य लग्गेव सूर । थल घाव रिट मत्ती करूर ॥ ई०॥ २३६॥ चंपे सुमीर उप्परह धक्कि । सामंत सर लागे बिहक्कि । धर परे घेत तहां दस्स मीर । सामंत पंच परि षेत तीर ॥०॥२३७॥ धरि लियो साहि चामंड राइ । नव सहस मीर तुहे सुघार ॥ चामंड राव हय दिय षवास । साटूल नाम पावार तास ॥ छ०॥२३८॥ भग्गौ सुषेत सुरतान सेन । जै जया सह सुर सद्द गेंन । जे परे मीर सामंत घेत । वरदाय चंद ते गनिव हेत ॥ कुं० ॥ २३८ ॥ कवित्त ॥ पस्यौ भीम चहुन । बंध भाषरह महाभर ।। सांमदास चय बंध । सुतन चडुन नाह नर ॥ पस्यौ घेत जस धवल । सुन लोहान ममथ्यं । केसर केहरि रुप । बंध लौहान सुतश्थं ॥ रन परे पंच सामंत बर । षेत रीठ मत्ती भरन॥ चामड राइ दाहर तनय । गहत साहि पष्षल सुरन ॥ छं० ॥ २४० ॥ ।
उन्नीसवां समय २७] पृथ्वीराजरासो। ६२६ Bartamanning पस्यो षांन सेरन्न । वितंड मुलतान षांन धर ॥ मारू मीर सुभीर । मीर जेहन महाभर ॥ मीर जमुन गजनीय । षांन महमुंद मीर वर ॥ फतेजंग मीरह सुभीर । हासन र अंनर ॥ काली बलाडू विरदैत बर । मीर अवन्न सुजुझ मन ॥ दस परें षेत वानेत तब । गहत साहि पष्पल सुरन ॥ ई० ॥ २४१ ॥ अवर अनी सांमत । परे रन मीर महाभर । सोलंकी रन बीर । सुतन वीमह सुराज बर ॥ पीची राव प्रसंग । सुतन सागरह समथ्थ ॥ मडंन बंध षसंग । हीर पामार सु हथ्थ ॥ पामार नीरध्वज सिंधु सुत्र । सुत प्रसंग सागर सुअन । बध्धेल भीम लप्पन सुबन । राम वाम दद्धय डरन ॥ छं० ॥ २४२ ॥ दूहा ॥ सहस एक हिंदू अवर । परे घाइ रिन षेत । सहस आठरह असुर दल । परे सुबंधन नेत ॥ ई० ॥ २४३ ॥ सहस सात इय षेत रहि । परे पंच से दंति ॥ लुथ्थि कोस पंचह प्रचर । परे सुपाइल अंति ॥ ई० ॥ २४४ ॥ षेचर भूचर हंसचर । पलचर रुधिचर चार ।। नप आनंदिय राजकहुं । चलि जै जंपि उचार ॥ ई० ॥ २४५ ॥ सूरन सीस जु ईस जुरि। सुर रज्जे बर रथ्य ॥ रजि अच्छरि असिष्य दिय । बर लद्धे बर हथ्थ ॥ छ० ॥ २४६ ॥ चामंडराय का सुलतान का पकड़कर एथ्वीराज के हाथ समर्पण करना। कवित्त । बंधि साह चामंड । दिया प्रथिराज सुहश्यह ॥ राज मांनि पतिसाह । आनि मुष्यासन तथ्थह ॥ किया दंड पतिसाह । सहस अछह हय सुब्बर सोह अइ प्रथिराज । दिया चामंड महाभर ॥
६३०
पृथ्वीराजरासो।
[ उन्नीसवां समय २८
मुक्यौ सुराज सुरतांन गहि । रोहि सुवासन पठय घर ॥
जित्यौ
सुराज
प्रथिराज रिन । जय जै सद्दय सुर अमर ॥ ई०॥२४७ ॥
सुलतान को एक महीना दिल्ली में रखकर छोड़ देना ॥
बंधि साह सुरतांन । राज ढिल्लीपुर पत्ती
दंड मंडि सुविहान । राज जस जस गुन
रत्तौ
चामर छत्र रषत्त । सकल लुढे सुरतानं ॥
मास एक बर बीर । रष्पि मुक्यौ सुविहानं ॥
जय जय सुमत्त कित्तिय कवित । डोला राज नरिंद बर ॥
सामंत सूर प्रथिराज सम । भयौ न को रवि चक्र तर ॥ ० ॥२४८॥
दूहा ॥ माधौ भह सुमंत कथ । सुमत चित्त परमांन ।
सुवर साहि गोरी पति । बंधि छडि उनमांन ॥ छं० ॥ २४८ ॥
इस विजय पर दिल्ली में आनंद मनाया जाना,
बहुत कुछ दान दिया जाना।
बँटि बधाय दिल्ली सहर । जीते आवत राज ||
द्रव्य पटंबर विविध दिय । बज्जा जीत सु बाज ॥ ई० ॥ २५० ॥
दुजिय सुबद्दिय प्रति दुजह । प्रिथ्था व्याह विगत्ति ।
किमि फिर बंध्यौ माह रिन । किम धन ल सुमत्ति ॥ ई० ॥ २५१ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके माधी भाट कथा
पातिसाह ग्रहन राजाविजय नाम उनविंसमो
प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १६ ॥
Re अथ पद्मावती समय लिख्यते । बीसवां समय।) । पूर्वदिशा में समुद्रशिषर गढ़ के यादवराजा विजय- पाल का वर्णन । दूहा ॥ पूरब दिस गढ गढमपति । समुद सिषर अति द्रुग्ग नह सु विजय सुर राज पति । जादू कुलह अभग्ग ॥ ई० ॥ १ ॥ इसम हयग्गय देस अति । पति सायर म्रज्जाद । प्रबल भूप सेवहिँ सकल । धुनि निसान बहु साद ॥ ई० ॥ २ ॥ विजयपाल की सेना, कोष, दस बेटे, बेटी का वर्णन । कवित्त ॥ धुनि निसान बहु साद । नाद सुरपंच बजत दिन ॥ दस हजार च्य चढ़त । हेम नग जटित साज तिन गज असंष गजपतिय । मुहर सेना तिय संषछ । इक नायक कर धरी। पिनाक घरभर रज रष्षह ॥ दस पुत्र पुत्रिय एक सम । रथ सुरङ्ग उमर डमर ॥ भंडार लछिय अगनित पदम । सो पदम सेन कुँवर सुघर॥ छः ॥ ३ ॥ कुँअर पद्नसेन की बेटी पद्मावती के रूप गुण आदि का वर्णन । दूहा ॥ पदम सेन कुंवर सुघर । ता घर नारि सुजांन ॥ ता उर इक पुत्री प्रगट । मनहुँ कला ससिभांन ॥ ई० ॥ ४ ॥ कवित्त ॥ मनहुँ कला ससिभांन । कला सोलह सो बन्निय ॥ बाल बेस ससिता समीप । अम्रित रस पिन्निय ॥ बिगसि कमल म्रिग भमर । बैन पंजन मग लुट्टिय ।। हीर कीर अरु बिंध । मोति नष सिष अहि घुटिय ।। छत्रपति गयंद हरि हंस गति । विह बनाय संचै सचिय॥ पदमिनिय रूप पदमावतिय । मनहु काम कामिनि रचिय।।०॥ ५ ॥ (१) कृ-घन। (२) को-झमर।
६३२ पृथ्वीराजरासो। [ वीसवां समय २ दहा ॥ मनछु काम कामिनि रचिय । रचिय रूप की रास ॥ पसु पंछी सब मोहनी । सुर नर मुनियर पास ॥ ० ॥ ६ ॥ सामुद्रिक लच्छन सकल । चौसठि कला सुजान ॥ जानि चतुर दस अंग षट । रति वसंत परमान ॥ ई० ॥ ७ ॥ पद्मावती एक दिन खेलते समय एक सुग्गे को देख कर मोहित हो गई और उसने उसे पकड़ लिया और महल में पिंजरे में रक्खा । सषियन सँग खेलत फिरत । महलनि बाग निवास ॥ कीर इक दियि नयन । तब मन भयो हुलास ॥ छं० ॥ ८॥ कवित्त ॥ मन अति भया हुलास । विगसि जनु कोक किरन रवि ॥ अरुन अधर तिय सधर । बिंब फल जानि कीर छवि। यह चाहत चष चक्रित । उहजु तक्किय भरपि भर ॥ चंच चहुहिय लोभ । लिया तब गहित अप्प कर ॥ हरषत अनंद मन महि कुलस । लै जु महल भीतर गई । पंजर अनूप नग मनि जटित । सो तिहि मँह रष्षत भई ॥ छं० ॥ ९ ॥ पद्मावती कीर के प्रेम में खेल कूद भूल कर सदा उसी को पढ़ाया करती। टूहा ॥ तिही महल रष्षत भइय । गइय खेल सब भुल्ल ॥ चित्त चहुद्दयौ कीर सौं । रॉम पढ़ावत फुल्ल ॥ ई० ॥ १० ॥ पद्मावती के रूप को देख कर सुग्गे का मन में विचार करना कि इसको पृथ्वीराज पति मिले तो ठीक है। कीर कुंवरि तन निरषि दिषि । नष सिष ला यह रूप ॥ करता करी बनाय कै। यह पदमिनी सरूप ॥ ई० ॥ ११ ॥ कवित्त । कुहिल केस सुदेस । पौह परचियत पिक्क सद ॥ कमल गंध वय संध । हंस गति चलत मंद मद । सेत वस्त्र सोहै सरीर । नष स्वाति बंद जस । - (३)क-मृग।
बीसवां समय३] पृथ्वीराजरासा । ६३३ भमर भवहि भुहि सुभाव । मकरंद वास रस । नैन निरषि सुष पाय सुक । यह सदिन भूरति रचिय ।। उमा प्रसाद हर हेरियत । मिलहि राज प्रथिराज जिय ॥ ई० ॥ १२ ॥ पद्मावती का सुग्गे से पूछना कि तुम्हारा देश कौन है। दूहा ॥ सुक समीप मन कुँवरि को । लग्यो बचन के हेत ॥ अति विचित्र पंडित सुश्रा । कथत जु कथा अमेत ॥ ई० ॥ १३ ॥ गाथा ॥ पुच्छत बयन सुबाले । उच्चरिय कीर सच्च सच्चाये । कवन नाम तुम देस । कवन यंद करै परवेस ॥ ई० ॥ १४ ॥ सुग्गे का उत्तर देना कि मैं दिल्ली का हूं वहां का राजा पृथ्वीराज मानो इंद्र का अवतार है। उच्चरिय कीर सुनि बयनं । हिंदवान दिल्ली गढ अयनं ॥ तहा इंद अवतार चहुवांनं । तहं प्रथिराजद सूर सुभारं ॥ ई० ॥ १५ ॥ एथ्वीराज के रूप, गुण और चरित्र का विस्तार से वर्णन करना। छंद पदरी॥ पदमावतिहि कुँवरी सँघत्त । दुज कथा कहत सुनि सुनि सुवत्त । हिंदवांन थान उत्तम सुदेस । तह उदत द्रुग्ग दिल्ली सुदेस ॥ ॥१६॥ संभरि नरेस चहुन थांन । प्रथिराज तहां राजंत भांन । बैसह बरीस घोडस नरिंद । आजानबाहु भुत्र लोक यंद ॥१७॥ *संभरि नरेस सोमेस पूत । देवंत रूप अवतार धूत ॥ सामंत सूर सब्बै अपार । भूजान भीम जिम सार भार ॥ ई० ॥१८॥ जिहि पकरि साह साहाब लीन । तिहुं बेर करिय पानीप हीन ॥ सिंगिनि सुसद्द गुन चढ़ि जंजीर । चुक्कै न सबद बेधंत तीर छ॥१८॥ बल बैन करन जिम दान पान । सत सहस सील हरिचंद समान ॥ साहस सुक्रम विक्रम जुवीर । दानव सुमत्त अवतार धीर । ई०॥२०॥ दिस च्यार जांनि सब कला भूप । कंद्रप्प जांनि अवतार रूप ॥॥२१॥ टूहा ॥ कामदेव अवतार हुअ । सुअ सामेसर नंद ॥ सहस किरन झल हल कमल । रिति समीप वर विंद ॥ ई० ॥ २२ ॥ * को कृ-में यह तुक नहीं है। (१) को-चिंदं।
६३४
पृथ्वीराजरासो।
[ बीसवां समय ४
।
पृथ्वीराज का रूप, गुण सुन कर पदमावती का मोहित हो जाना।
सुनत श्रवन प्रथिराज जस । उमग बाल विधि अंग ॥
तन मन चित चहुबान पर । बस्यौ सु रत्तह रंग । ई० ॥ २३ ॥
कुँवरी के स्यानी होने पर विवाह करने के लिये मा
बाप का चिंतित होना।
वेस बिती ससिता सकल । आगम किया बसंत ॥
मात पिता चिंता भई । सोधि जुगति की कंत ॥ ई० ॥ २४ ॥
राजा का बर ढूँढने के लिये पुरोहित को देश देशांतर भेजना।
कवित्त ॥ सोधि जुगति की कंत । किया तब चित्त च दिस ॥
लया विन गुर बोल । कही समझाय बात तस ॥
नर नरिंद नर पती। बड़े गढ़ द्रुम्ग असेसह ॥
सीलवंत कुल सुद्ध । देहु कन्या सुनरेसह ॥
तब चलन देख दुज्जह लगन । सगुन बंद दिय अप्प तन ॥
आनंद उछाह समुदह सिषर । बजत नद्द नीसान घन ॥ छं० ॥ २५ ॥
पुरोहित का कमाऊँ के राजा कुमोदमनि के यहाँ पहुँचना।
दूहा ॥ सवालष्य उत्तर सयल । काऊँ गढ दूरंग ॥
राजत राज कुमोदमनि । हय गय ट्रिब्ब अभंग ॥ छं० ॥ २६ ॥
पुरोहित ने कन्या के योग्य समझ कर कमोदमनि
का लग्न चढ़ा दिया।
नारिकेल फल परठि दुज । चौक परि मनि मुत्ति ।
दई जु कन्या बचन बर । अति अनँद करि जुत्ति ॥ ई० ॥ २७ ॥
कुमोदमनि का बड़ी धूम
से
व्याह
के लिये बारात लाना,
पद्मावती का दुखित हो कर सुग्गे को पृथ्वीराज के
पास भेजना।
छंद भुजंगी॥ विहिसितवरं लगन लिन्नौ नरिंदं । बजी हार हारं सु आनंद ढुंदं ।
गर्दैनं गढं पत्ति सब बोलि नुत्ते। आइयं भूप सब कटु बंस जुत्ते॥ई०॥२८॥
बीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। 5x चले दस सहस्सं असव्वार जानं.। पूरियं पैदल लेतीसु थानं ।। मंत मद गलित मैं पंच दंती। मना साँ म पाहार बुग पंति पंती ॥छ॥२८॥ चलै अग्गि तेजी जु तत्ते तुषारं । चौवरं चैरासी जु साकत्ति भारं ।। कंठ नग नूपं अनोपं सु लाल । रॅगं पंच रंगं ढलकंत ढाले ॥ ई० ॥ ३० ॥ पंच सुर साबद्द वाजिब वाजं । सहस सहनाय म्रिग मोहि राजं ॥ समुद सिर सिषर उच्छाह छाई। रचित मंडपंतारनं श्रीयगाहं ॥ ई० ॥ ३१ ॥ पदमावती विलषि बर बाल बेली। कही कीर माँ बात तब होड केली ॥ झटं जाहु तुम्ह कीर दिल्ली सुदेस। बरं चाहुवानं जु नौ नरेसं ॥ ई० ॥ ३२ ॥ सुग्गे से संदेसा कहलाना णीऔर चिट्ठी देना कि रुक्नि की तरह मेरा उद्धार कीजिए । दूहा ॥ आनो तुम्ह चहुवान बर । अरु कहि इहै सँदेस ॥ सांस सरीरहि जो रहै। प्रिय प्रथिराज नरेस ॥ छ० ॥ ३३ ॥ कवित्त । प्रिय प्रिथिराज नरेस । जोग लिषि कग्गर दिन्नौ ॥ चगु नव रग रचि सरब । दिन हादस ससि लिन्नौ।। मैं अरूग्यारह तीस । साष संक्त परमानह । जोविची कुल सुव । वरनि वर रष्षहु प्रानह ॥ दिष्यंत दिष्ट उच्चरिया वर । इक पलक बिलंब न करिय ॥ अलगार रयन दिन पंच महि। ज्यों रुकमनि कन्हर वरिय॥ ॥ ३४ ॥ शिव पूजन के समय हरन करने का संकेत लिखना। ज्यों रुकमनि कन्हर वरी। ज्यों वरि संभरि कांत ॥ शिव मंडप पछिछम दिसा । पूजि समय स प्राँत ॥ ० ॥ ३५ ॥ सुग्गे का चिट्ठी लेकर आठ पहर में दिल्ली पहुंचना । लै पची सुक याँ चल्यो । उद्यौ गगनि गहि वाव ॥ जह दिल्ली प्रथिराज नर । अट जाम में जाव ॥ छं० ॥ ३६ ॥ (१) को-अनुतीस। (२) को-वह घरिय। दू पृथ्वीराजरासो। [ बीसवां समय ६ सुग्गे का पत्र एथ्वीराज को देना और पृथ्वीराज का चलने के लिये प्रस्तुत होना। दिय कग्गर टप राज कर । षुनि बंचिय प्रथिराज ॥ सुक देखत मन में इसे । किया चलन का साज ॥ ई० ॥ ३७ ॥ चामंड राय को दिल्ली में रख कर और सरदारों को साथ लेकर उसी समय एथ्वीराज का यात्रा करना । कवित्त ॥ उदै घरी उहि पलनि । उ दिन बेर उदै सजि ॥ सकल सर सामंत । लिये सब बोलि बंब बजि ॥ अरु कविचंद अनूप । रूप सरसै बर कह बहु ॥ और सेन सब पच्छ । सहस सेना लिय सष्षहु ॥ चामंड राय दिल्ली धरह । गढपति करि गढ़ भार दिय ॥ अलगार राज प्रथिराज तब । पूरब दिस तब गमन किय ॥ ई० ॥ ३८ ॥ जिस दिन समुद्र शिषर गढ में बारात पहुंची उसी दिन पृथ्वीराज भी पहुँच गया और उसी दिन गज़नी में शहाबुद्दीन को भी समाचार मिला। जा दिन सिषर बरात गय । ता दिन गय प्रथिराज ॥ नाही दिन पनिसाह को । भदू गज्जनै अवाज ॥ छ० ॥ ३९ ॥ यह समाचार पाते ही अपने उमरावों के साथ शहाबुद्दीन ने पृथ्वीराज का रास्ता आगे बढ़ कर रोका और इधर इसकी सूचना चंद ने पृथ्वीराज को दी। कवित्त ॥ सुनि गजनै अवाज । चढ्यौ माहाब दीन बर ॥ पुरासा न सुलतान । कास काविलिय मीर धुर । जंग जुरन जालिम जुझार । भुज सार भार भुत्र ॥ धर धमकि भजि सेस । गगन रवि लुप्पि रैन हुअ ॥ उलटि प्रवाह मनौं सिंधु सर । रुक्कि राह अड्डौ रहिय ॥ तिहि घरिय राज प्रथिराज सै। चंद वचन इहि विधि कहिय ॥॥४०॥ ।
बीसवां समय ७] पृथ्वीराजरासो। बारात का निकलना, नगर की स्त्रियों का गौष आदि से बारात देखना, पदावती का पृथ्वीराज के लिये व्याकुल होना। निकट नगर जब जांनि । जाय वर विंद उभय भय ॥ समुद सिषर घन नद्द । इंद दुहुँ ओर घोर गय ॥ अगिवानिय अगिवान । कुँअर बनि बनि हय सज्जति ॥ दिष्पन को त्रिय सबनि । चढ़ि गौष छाजन रज्जति ॥ विलषि प्रवास कूवरि वदन । मनौं राह छाया सुरत ॥ भंषति गवष्षि पल पल पलकि । दिषत पंथ दिल्ली सुपति ॥ छं० ॥ ११ ॥ सुग्गे का आकर पद्मावती को समाचार देना, उसका प्रसन्न हो- कर शृङ्गार करना, और सखियों के साथ शिव जी की पूजा का जाना वहां पृथ्वीराज का उसे उठाकर अपने पीछे घोड़े पर बैठाकर दिल्ली की ओर रवाना होना, नगर में यह समाचार पहुँचना, राजा की सेना का पीछा करना, एथ्वीरान के साथ घोर युद्ध होना। ८० पचरी दिषत पंथ दिल्ली दिसान । सूष भयो सुक जब मिल्यो अनि ॥ संदेस सुनत आनंद नैन । उमगिय बाल मन मथ्थ सैन ॥ ई०॥ ४२ ॥ तन चिकट चीर डायो उतारि । मज्जन मयंक नव सत सिंगार || भूषन मँगाय नष सिष अनूप । सजि सेन मनौं मनमथ्य भूप ॥ई०॥४३॥ सावन्न थार मोतिन भगय । झल हल करंत दीपक जराय ॥ संगह सषिय लिय सहस बाल । रुकमनिय जेम मज्जत मराल ॥ई॥४४॥ पूजिय गवरि शंकर मनाय । दछिनै अंग कर लगिय पाय ॥ फिर देषि देषि प्रथिराज राज । इस मुद्ध मुद्द चर पह लाज ॥ ० ॥ ४५ ॥ कर पकार पीठ हय परि चढ़ाय । है चल्यो नृपति दिल्ली सुराय ॥ भइ षबरि नगर बाहिर सुनाय । पदमावनीय हरि लीय जाय ॥ ई० ॥ ४६॥ (१) ए. क-मंडान । (२) को-कल । (३) को-यव रस बाल । (४) क-दुरि।
पृथ्वीराजरासो। [ बीसवां समय ८ बाजी सुबंब च्य गय पलांन । दौरे सुसज्जि दिस्सह दिसांन । तुम्ह लेहु लेहु मुष जपि जोध । हन्नाह. सूर सब पहरि क्रोध ॥ ई० ॥४७॥ अम्ग जु राज प्रिथिराज भूप । पछ? वछ सु भयो सब सेन रूप॥ पहुंचे सुजाय तत्ते तुरंग । भुत्र भिरन भूप जुरि जोध जंग ॥ ई० ॥ ४८ ॥ उलटी जु राज प्रथिराज वाग । थकि सूर गगन धर धसत नाग ॥ सामंत सूर सब काल रूप । गहि लोह छोह वा सु भूप ॥ ई० ॥ ४६ ॥ कम्मांन बाँन कुहि अपार । लागंत लोह इम सारि धार । घमसान घान सब बीर षेत । घन श्रोन बहत अरु रुकत रेत ॥ ई० ॥५०॥ मारे बरात के जोध जोह । परि रुंड मुंड अरि षेत सोइ ॥ ई० ॥ ५१ ॥ पृथ्वीराज का जय करके दिल्ली की ओर बढ़ना। टूहा ॥ परे रहत रिन घेत अरि । करि दिल्लिय मुष रुष्य ॥ जीति चल्यौ प्रथिराज रिन । सकल सूर भय सुष्ष ॥ छ०५२ ॥ पद्मावती के साथ आगे बढ़ने पर शहाबुद्दीन का समाचार मिलना। पदमावति इम लै चल्यो । हरषि राज प्रिथिराज ॥ एते परि पतिसाह की । भडू जुआनि अवाज । ई० ॥ ५३ ॥ अवसर जान कर शहाबुद्दीन का एथ्वीराज को पकड़ने के विचार से सेना सजना। कवित्त ॥ भई जुआनि अवाज । आय सहावदीन सुर । आज गर्दै प्रथिराज । बोल बुल्लंत गजत धुर । क्रोध जोध जोधा अनंत । करिय पंती अनि गज्जिय ॥ बांन नालि इथनालि । तुपक तीरह अब सज्जिय। पवै पहार मनों सार के । भिरि भुजांन गजनेस बल ॥ आये हकारि हंकार करि । षुरासान सुलतान दल ॥ ई० ॥ ५४ ॥ ।
बीसवां समय] पृथ्वीराजरासो। तीरं॥ शहाबुद्दीन की सेना का वर्णन, एथ्वीराज को चारों ओर से घेर लेना। ई० पहरी॥ षुरासान मुलतान धंधार मीरं । बखक सो बलं तेग सहंगी फिरंगी इलंबी समानी। ठटी ठह बलोच ढाल निसानी ॥ ई०॥५५॥ मॅजारी चषी मुष्ष जंबक लारी। हजारी इजारी इके जोध भारी । तिनं परं पीठ यजीन सालं। फिरंगी कती पास सुकलात लालं ॥ई०५६॥ तहा बाघ बाघ महरी रिकोरी । घनं सारसंमूह अरु चौर झोरी॥ एराकी अरब्बी पटी तेज ताजी। तुरकी महाबांन कम्मांन बाजी ॥ ई० ॥५७॥ ऐसे असिव असवार अग्गेल गोलं । भिरे जून जेते सुतत्ते अमोलं ॥ तिनं मवि सुलतान साहाब आप। इसे रुप से फौज वरनाय जापं ॥ ई० ॥५८॥ तिनं घेरियं राज प्रथिराज राजा चिहौ और घनघोरनीसांन बाजाई ॥५॥ पृथ्वीराज का तेग सँभाल शत्रुओं पर टूटना। कवित्त ॥ बज्जिय घोर निसान । रॉन चौहान चिहौ दिस ॥ सकल सूर सामंत । समरि बल जंच मंच तस । उटि राज प्रथिराज । वाग मनों लग वीर नट ॥ कढ़त लेग माँ बेग । लगत मनों वीज भह घट । थकि रहे सूर कातिग गिगन । रगन मगन भडू श्रोन धर ॥ हर हरषि वीर जग्गे हुलस । हुरव रंगि नव रक्त पर ॥ ई० ॥ १० ॥ दिन रात घोर युद्ध हुआ, पर किसी की हार जीत न हुई । दूहा ॥ हुरव रंग नव रंत वर । भया जुद्द अति चित्त । निस वासुर समुझि न परत । न को हार नह जित्त ॥ ई० ॥ ११ ॥ युद्ध का वर्णन्। कवित्त ॥ न को हार नह जित्त । रहेइ न रहहि सूरवर ॥ धर उप्पर भर परत । करत अति जुद्ध महाभर ॥ कहैं कमध कहाँ मध्य । कहो कर चरन अंत हरि । कहाँ कंध वहि तेग । कहाँ सिर जुहि फुहि उर ॥ (१)क-दुरि।
६४० पृथ्वीराजरासो। [ बीसवां समय १० कहाँ दंन मंत च्य षुर षुपरि । कुंभ भ्रसुंडह रुंड सब ॥ हिंदवान रान भयभान मुष । गहिय तेग चहुवांन जब ॥ छं० ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज की बीरता का वर्णन, शहाबुद्दीन को कमान डाल पृथ्वीराज का पकड़ लेना और अपने साथ लेकर चलना । छंद भुजंगी॥गही तेन चहुवान हिंदवान रानं । गजं जूथ परि कोप केहरि समानं ॥ करे रुंड मुंडं करी कुंभ पारे । बरं सूर सामंत हुकि गर्ज भारे ॥३॥ करी ची चिक्कार करि कलप भग्गे। मदं तजियं लाज उमंग मग्गे।। दौरि गज अंध चहुान केरो। घेरियं गिरदं चिहौ चक्क फेरोई॥४॥ गिरदं उडी मैंन अंधार रैनं । गई सूधि सुभ नहीं मभिझ नैनं ॥ सिरं नाय कम्मान प्रथिराज राजं । पकरियै साहि जिम कुलिंगवाजं ॥ ० ॥ ६५॥ लै चल्यो सितावी करी फारि फौजा परें मीर सै पंच तह षेत चाजं ॥ रजपुत्त पंचास मुभमे अमोरं । बजै जीत के नह नीसांन घोरं ॥ छ०॥६६॥ पृथ्वीराज का जीत कर गंगा पार कर दिल्ली आना। दहा ॥ जीति भई प्रथिराज की। पकरि साह लै संग ॥ दिल्ली दिसि मारगि लगौ । उतरि घाट गिर गंग । छ० ॥ ६७ ॥ पद्मावती का वर कर गोरी शाह को पकड़ कर दिल्ली के निकट चत्रभुजा के स्थान में पृथ्वीराज का पहुँचना । वर गोरी पद्मावती । गहि गोरी सुरतान ॥ निकट नगर दिल्ली गये। बभुजा चहुबान ॥ छं० ॥ ८ ॥ लग्न साध कर धूम धाम से विवाह करना। कवित्त ॥ बोलि विप्र सोधे लगन्न । सुध घरी परट्रिय ॥ घर बांसह मंडप बनाय । करि भांवरि गठिय॥ ब्रह्म वेद उच्चरहि। होम चौरी ज प्रत्ति वर ॥ पद्मावति दुलहिन अनूप । दुलह प्रथिराज राज नर । (२) .-करीय। (8) को.-में "ले चल्यो निकसि सब फार फौज, लिखा है। (१).-जाल। (३)का--तब। Please बीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो । ६४१ मंडया' साह साझाबदी। अट्ट सहस है वर सुवर ॥ दै दान मान पट भेष को। चढ़े राज द्रुग्गा छुजर ॥ ई० ॥ ६ ॥ पृथ्वीराज का शहाबुद्दीन को छोड़ देना और दुलहिन के साथ अपने महल में आना। कवित्त ॥ चढ़िय राज प्रथिराज । छाडि साहाबदीन सुर । विपत सूर सामंत । बजत नीसान गजत धुर ॥ चंद्र वदनि मृग नयनि । कल ले सिर सनमुष्प जुष । कनक थार अति बनाय । मोतिन बंधाय सुष । मंडल मयंक वर नार सब । आनंद कंठ गाइयव ॥ ढारंत चवर किक्कर करहि । मुकट सीस लिक जु दियव ॥ छ. ॥ ७० ॥ महल में पहुंचने पर आनंद मनाया जाना। दूला ॥ चढ़े राज द्रुग्गा विपनि । सुमत राज प्रथिराज । अति अनंद पानंद सैं। हिंदवान सिर ताज ॥ ई० ॥ ७१ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथीराज रासके श्री प्रिथीराज समुद सिषर गढ़ पद्मावती पॉणि ग्रहणं जुद्ध पश्चात पाति- साह प्रिथीराज जुद्धं श्री प्रिथीराज जुद्ध विजय पाति- साह ग्रहनं मोषनं नाम विंशति प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ 260 (१) अ-डंडयो।
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अथ प्रिथा व्याह वर्णनं लिष्यते ॥ (एक्कीसवां समय ।) चित्तौर के रावल समर के साथ सोमेश्वर की बेटी के बिबाह की सूचना। कवित्त ॥ चित्र कोट रावर नरिंद । सा सिंघ तुल्य बल । सोमेसर संभरिय। राव मानिक सुभग्ग कुल ॥ मुष मंची कैमास । पान अवलंबन मंडिय ॥ माम जेठ तेरसि सुमधि । ऐन उत्तर दिसि हिंडिय ।। सुक्रवार सुकल तेरसि घरह । धर लिनो तिन बर घरह ॥ सुकलंक लगन मेवार धर । समर सिंघ रावर बरह ॥ ई० ॥ १ ॥ सोमेश्वर का अपनी कन्या समर सिंह को देने का विचार करके पत्र भेजना। दूहा । उत्तर दिसि आठ की । दे कग्गद खिषि बत्त ॥ मोमेसर कीनौ मतौ । भगिनि दिये प्रथु पुत्त ॥ छ ॥२ समरसिंह के गुणों का वर्णन । चौपाई । प्रवत्त पहुमी बल राज । अरु जोगिंद सबन सिरताज ।। समर सिंघ रावर चिंत्तिज्जै। पुचि प्रिथा चिचंग सुदिज्जै ॥ छ. ॥ ३ ॥ कवित्त । बर प्रब्बत बैराज । नरन उत्तिम चिचंगी। बर आठ नरेस । समर साहस अनभंगी। बर मालव गुज्जर नरिंद । सार बंधी बर अड्डौ । उंच सग्गपन कियै । पुत्त श्रावै घन अड्डौ। बर बीर धीर जाजुलति न । शिवप्रसाद अविचल घरछ । मिथकज अन्ज मन संभरौ । सुनि संमर कीजै बरह । ई० ॥ ४ ॥ दूसा । मोमेसर नंदन मतौ। पुच्छि कन्द चहुआन ॥ आदि अंम पर पंथ ए। हिंदवान कुल भान ॥ ई०॥ ५ ॥ (१) मो.-पब्बयपति। (२) को.-.-पत। ॥ । ।
६४४ पृथ्वीराजरासा। [ पक्कीसवां समय २ ॥ ॥ कवित्त ॥ हिंदवान कुल भान । अंम रष्षन सुबेद बर । लै मुंजांनी ढाल । शुभम संग्राम सार गुर ॥ सो चिचंग नरिंद । प्रिथा दीनी प्रथिराज ॥ हेम इयं गय अथ्यि । देन दिल्लीय सब साजे । गह अत्त बत्त हिलौत गुर । सिंगी नाद निसांन बर ॥ काखक राइ कुप्पन बिरद । मदन रंभ चाहंत पर || ई० ॥ ६ ॥ दूचा ॥ सो भगिनी दीनी प्रिथा । सकल रूप गुन लच्छि ॥ चिचंगी रावर समर । अंगन अस्त सु अच्छि ॥ छं० ॥ ७ ॥ पत्र लेकर गुरूराम पुरोहित और कन्ह चौहान का जाना। कंडलिया ॥ बाल वेस भगिनी प्रिथा । अरु समर केलि चिचंग ॥ राज गुरू गुरराम सम । ताजी तेरह तुंग । साजी तेरह तुंग । मुत्ति नग माल सुरंगी ॥ बर दाहिम कैमास । बीर बंधव मुकि रंगी ॥ प कम्गद गहि हथ्य । कन्द अग्या बर एस ॥ नर उत्तिम चिचंग । दई बर बाल सुवेसं ॥ ई० ॥८॥ एथा कुँअरि के रूप का वर्णन । दूहा ॥ बर बरनत भगिनी प्रिथा । कहि न परै कवि चंद ॥ मानौ रति का रूप ले । परि आई मुष इंद ॥ ई० ॥ ८॥ चौपाई ॥ सुफल दिया फल लढा नाहि । इंद्र सुबल बलि नवला वांहि ॥ सीस सूर मुष अगनि कुबेर । इन समानह सुंदर हेर ॥ ई० ॥ १० ॥ एथा कुंभरि और समरसिंह के उपयुक्त दम्पति होने का वर्णन। कवित्त । स्वाशा ज्यों ग्रह अगनि । सीय ग्रह राम काम रति । नस दमयंत संयोग । द्रुपद कन्या अरजुनपनि ॥ इंद्र सची वा जोग । जोग गरिय अरु शंकर । भानर नास्तिनि कन्द । साम रोहिनी नारि घर ॥ । PHOTOnewsnnuyinagdya एक्कीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ६४५ सुतन ॥ । फल अप्प हथ्य सा दीन नृप । लच्छि सहज लच्छी दुज राज राम ग्रह लगन लिपि । संवि महरत चिंति मन ॥ ई० ॥११॥ इंद्र जोग पंचमी । सुबर पंचमि अधिकारी । भोम बीय नृप थान । सूर ग्रह केत उच्चारी ॥ इम सुमंत ग्रह लगन । व्याह दंपति दंपति गन । और सबै सुभ जोग । हाइ सुष जात धान धन ॥ इक मास लगन बर थप्पि कै। दिल्ली वै दिल्ली गया ।। सुरतांन दंड लीनो सुकर । सुकर भ्रंम कारज ठया ॥ छं० ॥ १२ ॥ लग्न का शोधा जाना। दूहा ॥ थप्पि सु लगनह राज ग्रह । सोधि पुरान उरान ॥ बाजपेय मुष उदरे । प्रिथा व्याह उनमान ॥ ई० ॥ १३ ॥ कवि चंद कहता है कि मैं पूरा वर्णन तो कर नहीं सकता पर जहां तक बनेगा उठा न रक्खूगा । बहुत मोहि कहत न बनै । बरनत कविन कठोर ।। गुन मैं पारिन अप्पि हैं। कक्कु परनिहीं सुथोर ॥ ई० ॥ १४ ॥ स्त्रियों के शरीर की उपमाओं का वर्णन । कवित्त विधानजाति । अहि ससि सन उतंग । पिक उर केहरि करिवर । अलक बयन चष चंच । जीह कटि जघन बराबर । किस्न सकल चल अचल । अदिठ अलसंत चलंतह ॥ चंदन नभवन भवन । अंब गिरि व्यंभ बसंतह ॥ सुमनि सरद भय भीत निसि । रति पति लंघत मंदगति ॥ अबला सुअंग ओपम इतिय । कही चंद इन परि विगति । ० ॥ १५॥ दूहा ॥ को कबि ओपम बाल की। कहिबे को समरथ्य ॥ सब संयोग बनाइ कै । काम । काम चन्यौ मनुरथ्य । ई० ॥ १६ ॥ एथा कुँअरि के रूप तथा नव यौवनावस्था का वर्णन । मोतीदाम ॥ बरनों ससि जुब्बन की क्य संधि । तिनं उपमा बरनो बल बंधि ॥ मिन्नी सिसरं रिति राजह जोर। चंप्यौ न मनं विपनं नह कोर॥०॥१७॥ ॥ - - ६४६ पृथ्वीराजरासो। [ एक्कीसवां समय ४ कवै चलि चंचलता चलि जाइ। धरै कबहुं धन धीरज पाइ ॥ तिनं उपमा बरनी कबिचाई । पढ़ावत काम नई गत ताई ॥ ॥१८॥ करं सिर ठंकि संवारत बार । सिषावत काम मनों चट सार ॥ दुनी उपमा बरनै कवि चंद । चलै घट रूप दिषाक्त इंद ॥ई० ॥१८॥ चती उपमा बरनी कबि चाह । लरे दुअ कोर मनों ससि राह ॥ उठे थन थोर विराजत वाम । धरें मनु हाटक सालिगराम ॥ ई० ॥२०॥ किंधों फल तिंदु कंचन जान। धरे मनु अंग सुधा रस पान ॥ तुझं रूम राजिय राजत बाम । पपीलकि सेविन पंभ विश्राम ॥ छ० ॥२१॥ जु बंकिय भेहि न तुच्छ गरूर । उठे मनु मच्छ धनंक अकूर ॥ सुबालय उष्टत मोर सुदीस। मिले जनु मंगल है ससि रीस ॥ई ॥२२॥ कह उठि लागित मार सुसीर । उठे मनु अंकुर काम सरीर ॥ तुझं द्रग सेभित कज्जल ताम। चढ़े जनु बाहन बल्लिय काम ॥ ई० ॥ २३ ॥ दुई कुच बीच सरोमय तह । लगी म्ग मद्दय छीन सुघह ॥ तिनं उपमा बरनी कवि रंग। पिये जनु कालिय के सुतभंग ॥ छ० ॥२४॥ कबै मिलि श्रीन ट्रिगस्सुतु लेहि। मनों सिस जुब्बन नारिय देहि। स विभ्रम हाइ उभारित चक्र । इमं द्रिग इष्प कटाच्छ सुवक । छ॥२५॥ इते गुन लच्छिन तच्छिन बाल । करी मनों काम सिरी रति माल ॥ भई जब बाल चढंनय बेस । दई तब पिथ्य नरिंद गिरेस॥ई ॥ २६ ॥ रावल समर सिंह का गुण वर्णन । नर नरिंद जोगिंद पति । मुंजी ढाल विरह । उडगन निकट नरिंद विय । सेवत रहन गिरद्द ॥ ० ॥ २७ ॥* कवित्त ॥ सिंगी रा अबधत । वीर चिचंग नरिंदं ॥ कमल पानि सारथ्य । अरुन तेज कहि चंदं । बर कप्पन कालकं । विरद साहन सुरतानं । बर प्रब्बत वैराज । भोग जोगह बड़ा दानं । सो महन रंभ आरंभवै । एक रंग रत्तौ रहे। कलिकान घाम विष्प नहीं । झलहलंत दुज्जन दहै ॥ ७० ॥ ३८॥ • यह दोहा मो. में नहीं है।
६४० एक्कीसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो। श्रीफल देकर पुरोहित को तिलक चढ़ाने को भेजना और इस संबन्ध से अपने को बड़ भागी मानना । दूछा ॥ फल श्रीफल दुज इष्टथ कै । जाइ संपतौ देव ॥ आज हनंदे पाप हम । मिलि चित्रंगी सेव ॥ ई० ॥ ३९ ॥ भोजन भाव अनंत किय । दिसि उत्तर ग्रह रष्षि ।। पाप जन्म चछुआन का । गय दुज राज सु दृष्ष् ि॥ई० ॥ ३० ॥ पुरोहित का चित्तौर में पहुंचकर बसंत पंचमी को तिलक देना कवित्त ।। आज हनंदे पाप । समर समुह ग्रह भग्गे॥ चय अक्रम मन नट्टए । क्रम सुकृतर फल जग्गे ।। पंच दिवस रहि थांन । जंपि दुज राज सु आइय ॥ बर बसंत बैसाष । लगन पंचमि थिर पारय॥ चतुरंग लच्छि चिचंग दिय । कुयन राम विप्र सुतह ।। जाने कि अग्गि समसान की। देषि सुतन लग्गे सु जंह ॥ ई० ॥३१॥ पृथ्वीराज के विवाह की तयारी करने का वर्णन । बाजपेय राज सू । हाइ कलजुग्ग धम्म गुर ॥ और जगनि ना होइ । व्याह मंद्यो सुधम धुर ॥ रथ चौसठ प्रमान । रथ बर जोग प्रमानं ॥ बार बार पर बाज । बीर सज्जे उनमानं ॥ सा इक्क इक्क कर ना किरनि । सत्त सत्त से बेद विधि । चित्रंग राव गवर सुध्रम । करन मती प्रिथिराज सिधि ॥ ई० ॥ ३२ ॥ हेम इयं गय जुति । सचे मिष्टान पान बर ।। घर कुबेर लम्भेन । पार प्रथिराज राज नर ॥ चाव दिसि बर गांन । दांन चाव दिसि अप्पै ॥ ब्रह्म बेद क्रम छेद । सूर नहि सोरथ थप्पै ॥ जे जोग भोग जोगिंद नव । सेो उम्गत महि भुल्लई ॥ प्रथिराज राज राजन बली । बलिन जग्ग सम तुल्लई ॥ छं० ।। ३३ ।। (१) . मो.-अक्रम नट्ठए । (२) को. कृ. ए.-अशत । (३) मो.-देव।
६४८ पृथ्वीराजरासो। [ एक्कीसवां समय ६ दूचा ॥ धरम सुथिर राजन बली । देव दैव दुति चार ॥ चाव दिसि मा देषियै । लच्छि मोल लषि भाव ॥ छ ॥ ३४ ॥ छंद मोतीदाम ।। जयं जय छंद जयं गुन रूप। कटावत हेम सु बारह भूप ॥ दिसं दिसि पूरि पंप थानामनो विधि जग्ग किदेवन थान॥॥३५॥ रस रस तोरन बंधन बार । मनो नट वत्त कला गुन चार ।। सुभै अति सेभि सुभद्रह हेम । मनों पर मेर बिराजत नेम ॥छ॥३६॥ सबै. बर बीर फिरै जिहि पास । मनो वर भांन कलान प्रकास ॥ कदै गर सुंदरि नान प्रकार । मनों ससि भान उगे इक बार ॥ ॥३७॥ बिराजन मुत्तिन बंदरवार । मनों भुत्र श्रीन मयूष प्रचार ॥ ग्रहं ग्रह उंच सु पंति विसाल। मनों कयलासय सोभति हाल ॥5॥३८॥ कथा कविचंद सु उप्पम थोर । विराजत पंतिय कंतिय चौर ॥ धरै धर अंमत पंच प्रकार । जचे तिन देत संतोष अहार ॥॥३८॥ टगं टग लग्गिय दिष्ट प्रकार । दिषे चहुआंन कलाधर सार ॥ भली विधि रूप प्रकार प्रकार । सुभै जनु इंद्र सु जातिच हार छ॥४०॥ कवित्त । नहिन हेम पर भास । लच्छि कुबेर लच्छि गुन । थान थान नवनिद । देव जप सुदेव मन ॥ अनिम महिम गरिमास । लभि देवात मविधिय ॥ अष्ट सिड्वि नव निद्धि । राज हारह बर बंधिय । जीनिय जितीक सुरतांन निधि । प्रिथा व्याह विंमत करै धनि धनि धन नव षंड हुन । लंक पंक गड्डिय उरै ॥ छ० ॥ ४१ ॥ एथ्वीराज ने ऐसी तयारी की मानो इन्द्रपूरी है। साटक । हेम हेमय हार दारुन गनं । दीसंत लच्छी बरं ॥ एंच हून सु च्यारि रन्न गुन ए । सिद्धांत सारं गुरं ॥ संभया वारुन तारु नैव तनयं । धन पौर संध गुनं । जानिज्जै सुर लोक इंद्र उदितं । धामं सचीवं बरं ॥ ई० ॥ ४२ ॥ । (१) इ.मा.-नग। न ६४६ एक्कीसवां समय ०] पृथ्वीराजरासा। एथ्वीराज का चारा दिशा में निमन्त्रण भेजना, घर घर में तयारी होना। वंद इनूफाल॥ धनि |म धनि प्रथिराज । गुन दछि लच्छि विराज ।। मधि जमुन में यों धाम । सुर नाक सुर विश्राम ॥ ई० ॥ ४३ ॥ धज इंच फरहर रूप । सुरसान पठ्य भूप ॥ त्रैलोक न्यांत काज । मनो देव व्याह विराज ॥ छं० ॥ ४४ ॥ विधि वरन वरन सु धाम । कुब्बेर बरषिय काम ॥ बर |म जग्गि प्रकार । सम दांन विनयह सार ॥ छ० ॥ ४५ ॥ फिरि राज राजन चाल । लछि देव एवति पाल । षट पाल कै प्रथु पाल। ..................॥ छ० ॥४९॥ मति भंम भूपति साज । आनंद उछव विराज ॥ जगि जोग जुग्गनि नैर । उच्छाह घर धर कैर ॥ई० ॥ ४७ ॥ विधि भान सुरपति भांन । चहुनि तिन सम मान ॥ नव नेह ग्रह ग्रह दान । कवि करै कान बषान ॥ ० ॥ ४ ॥ पर जीह फनपति होइ । चहुआन व्यापक जोइ ॥ छं० ॥ ४ ॥ हाथी घोड़े सेना आदि की तयारी का वर्णन । छंद वनाराच ॥ परछि सेन सज्जि बीर बज्जए निसानयं । नाराच छंद चंद जंपि पिंगलं प्रमानयं । गजं गज हिलं मलं चला चलं गरिठ्यं । कसंमसं उकस्सि सेस कच्छ पिठ्ठ उठ्यं ॥ छं० ॥ ५० ॥ पस्यौ सुभाम भार सो वराह कंध उन्नयं ॥ चले सयन्न वंधि भूप चंद जपि बोलयं ॥ मनों दसंति काज सेन मेलि इंद्र तोलयं । टुरंत चौर गज्ज सीसता सिंदूर राजयं ॥ ई० ॥ ५१ ॥ मनों विजाम कंठ सूर चंद बंधि लाजयं ॥ .. फिरंत डोरि कुंडली सुबाज राज दिष्पहीं ॥
६५० पृथ्वीराजरासा । [ एक्कीसवां समय कै छथ्य भार चंद कब्बि ता भ्रमंत पिष्षहीं ॥ छं० ॥ ५२ ॥ मु नष्षई सुरंग धाप बाज नाज उठहीं ॥ मनों कि डोरि चक्करी सुपथ्थ इथ्यि नष्पहों । सुबीयता सुरंग चंद उप्पमा सु रद्दई ॥ मनोकि तार नम्भतेय काल तेज तुट्टई ॥ ई० ॥ ५३ ॥ लजै भजै मनं गतीय पुब्बता कबो कहै सु अंषिका कुरंग गत्ति भान देषिता रहै रजं रजं जराष्ट्र रार छित्तयं किरावलं ॥ उपम्म चंद कबिता कही तहां उतावलं ॥ कं० ॥ ५४॥ पृथ्वीराज के सामंतों की तयारी का वर्णन । कवित्त ॥ पंच राहू पंचाल । लिन्न वैराट बद्ध वर ॥ जैत सींह भेडा भुषाल । का कन्द नाइ नर ॥ रा पज्जन नरिंद। पान ठंठरिय सिंघनग ॥ दह रावत भाजांन । बाह बंधव सुवन्न अग। बंधन सुमौर मेवार पति । अति उछाल आनंद धरि ॥ संजुरिय जान छचन सहस । सहस अड्व बज्जन सुरि । ई० ॥ ५५ ॥ दूहा ॥ जस बेली वर हथ्थ नै । फल पुच्छै चित रंग । बर सोमेसर इथ्य दै । ग्रह सज्जै रस जंग ॥ ई. ॥ ५६ रावल समर सिंह का ब्याह के लिये पहुंचना, रावल की शोभा वर्णन । आयो बर रावर समर । तोरन संभरि वार । बाल देस बनिता बनी। मनों संग रति मार ॥ ई० ॥ ५७ ॥ सूर रूप रावर समर । बेस बाल मत पच । प्रीत चंद कमनिय कुमुद । परस सरस सिन रत्त । छ० ॥ ५८ ॥ (१) रु. मो.-पुरुबका। (२) छ. ए.-रा पजून परंन । (३) मो.-संमिलिय। (४) मो.-हिततत्र । ॥ ॥
एक्कीसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। - नगर में स्त्रियों की शोभा देखने की शोभा का वर्णन । छंद मोतीदाम ॥ चढ़ी घर जाहिन बाल बिसाल । रही बघुबेस लगी चित्रसाल ॥ सनं सुध बालय अंचल लेहिं । चषं चपला कुलटा गति केहिं ॥छापूर इलावत चंचल अंचल नारि । मनों विधि देंहि कटाच्छन गारि ॥ बंधे सुर नारि कयं सुर रंग। रिं निरखें धन विद्युत अंग॥०॥ ६०॥ झम झम होइ सुहेम किरन्न । ससी पर होड़ मयूष अरुन्न । मची बर बीरन पीकह कीच । बरष्य कि मंगल सूर सु बीच ॥ छं०॥६॥ झम झम होत करं नष पान । परी छवि होड़ रवी ससि जानि ॥ तिनं मुष या नष में झलकार। नदिष्षहि उंच रहै ललचाय॥ ई० ॥१२॥ दिपै नग चीरचिराकन वांम। रचै जनु दीपक कामय स्थांम ॥ सु उज्जल भनि चिराकनि जोति। फिरै महां बाल जराइन कोनि ॥ई॥१३॥ उदै जनु लिच्छमी कंति "ब्रिगास । किधौं तप नेज किराज विलास ॥ कहै कवि चंद उधम्म प्रकास। बन्यौ जनु प्रप्पन तेज विलास ॥ई० ॥ १४ ॥ समरसिंह के पहुंचने पर मंगलाचार होना। कवित्त ॥ बर कलस्स बर बंदि । बंदि तरुनिय सर लिन्नौ । ग्रह सुरंग कवि चंद। तहां उप्पम बर दिन्नौ । घन चंदन बर पर्छ । सिढ़िय सभा सुफटिक मनि ॥ घन प्रवाल धूभिय बिलास । सिर सेभ सुरंग फुनि ॥ उत्तरिय बीर रावर समर । बर जोगिंद नरिंद गति ॥ शृंगार बाल भूषन कहौ । जु कक्कु चंद बरदाइ मति ॥ ई० ॥ १५ ॥ दूहा ॥ स्याम बेस नन बालभय । घटि न कब किसोर । दोष बाल बरनत कविय । भयो भेर घर चौर ॥ ई० ॥६॥ बर सुवस्त्र तजि बाल में । सैसब मिस सुंडारि ॥ अब भूषन जब ग्रह करहि। जोवन चढत सवारि ॥ 5 ॥६७ ॥ ॥ (१) मो.-बाम । (३) मो.-अरंग। (५) ए.-वियास। (७) मो.-विसाल। (२) ए. कृ. को.-दुरि देखत मेघ तड़ित सु अंग। (४) मो.-बीरह पीकन । (६) मो.-दर्पन । (८) मो.-शोशव - पृथ्वीराजरासा । [एक्कीस समय १० श्रृंगार का वर्णन । छंद त्रोटक ॥ तजि मज्जन सजि सिंगार अली । प्रगटी जनु कंद्रप जोति कली जुसवारिय केस सुरंग सुगंध । तिनं बर गुंथि प्रसून सु बंधि ॥ ८ ॥ तिनं उपमा म कदै कवि सुद्ध । लग्या ससि राह अधमय' जुद्ध ॥ चलें अलके अलि चंचल घट । लमी जुनु कालिय नागिनि पह ॥ई०॥६॥ जस्वौ ससि फूल धयो मनिबद्ध । उज्या गुर देव किधी निसि अव॥ बियं उपमा कबरी सु अलप्प । चढे मनु मेर ससी लय श्रप्प ॥ छं॥७० ॥ सी मंति सुमुत्तिय बंधि संवारि । तिनं उपमा बरनी सुविचारि ॥ परी रवि हाड मयूषन तार । भए जनु सिद्ध उधातम धार । ई० ॥७१ ॥ बनी कबरी बर पुत्तरि बाम । अध्यातम पाठि पढावत काम । धस्वौ बर भाल तिलक मिलाइ। मन मसि रोहिनि आनि मिलाइ । इं० ॥ ७२ ॥ मनों ससि बीयक तीय समान । तिनं सिरसा लिलाट सुजांन । दुती दुतियं बरनो कवि चंद। दुयो छबि देखि सरह का इंद ॥ छं० ॥ ७३ ॥ बनी बर भेहि सु बंकिय एह । मनों बंकिय एछ । मनों धनु काम धरं विन जेछ । कहाँ वर नासिक ओपम एह। सु काम भवन्न कि दीपकतेच ॥ ई० ॥ ७४ ॥ द्रगं उपमा दुति य दमकै । सु मनों सुत पंजन के चमकै ॥ जुदिषैवर भाइ दुलोचन कोर। मुचावत काम कमान के जोर ॥ ई० ॥ ७५॥ चाटंकन की उपमा इतनी । जु कही कवि चंद सुरंग घनी ॥ जुसुन्यौ रबि राह ग्रह्यो ससि है। सु फिरै दुहु बीच सहायक है।०७६॥ उपमा सु कपालन की चिलकै । जुमनों ससि वै रवि में झलकै ॥ जुटि गंठिग मुत्तिय पंतिन की। तिनकी उपमा कवि नै मनकी । छ। ७७ ॥ टुअ पास कपोलन तेज कुब्यौ । मनों तारक लै ससि उम्गि उद्यौ । जु चिबुक्कन की उपमा हिलज्यौं । मनों भंग सुता सिनपच तज्यों । छ० ॥ ७८॥ Sries (१) मो.-धर्मय। (२) मो.-मनों। (३) ए० कृ.-सुजानि ।
६५३ सु एक्कीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। कल ग्रीव चिवल्लिय रेष वनं । ग्रहो मनु कन्हर पंच जनं॥ विय बाल सुमालन साल सजै। सुधसी जनु भारति नम्भ नजै॥॥७॥ गुंथी पट स्याम सु मत्तिय माल । भयौ जनु तीरथ राज विसाल ॥ उठी पट कुहिय कंचुकि काम । कि जीयन को त्रिपुरं चलि काम॥ छ० ॥१०॥ कळू छबि छत्तिय की बरनं । सु रहो मनों काम तिनं सरनं ॥ बर लंकिय लंकय सिंघकिती।वर मुष्टिय मांहि समाइ तितौ॥ छ॥ ८॥ * पसरे नन द्रष्टि न ठौर रुकै । * मृगतिनह देषि मनों सु चुकै। कटि मेषल उप्पम एह धरं। मनों नौग्रह सिंघ सहादू बरं ॥ ई०॥२॥ सुभंत समुपित अंगुरि तच । मिले गुरु मंगल हस्तनि षच ॥ बनी कर पैचिय पत्य स्यांम। तिनं उपमा बरनी बर तामः ॥ छ०॥ ८३ ॥ लटकै बर अंग सु फूदन लाष । झुलै मर्नु नागिनि चंदन साष ॥ बरनों मनि बडि बढ्न नितंब । सुभै जनु उज्जल है रबि विंब ॥ ई० ॥८४ ॥ सकोमल जंघ सु रंग सुढार । भ्रमी मन चित परादिय मार ॥ सजे बहु वार सिंगार सुरत्ति। चली तब हंस उथप्पन गत्ति ॥ ० ॥ ५॥ सु एडिय उप्पमता कवि एह । रची जनु कोरिय कुंद नरेह ॥ बरने नख की उपमा कविता। सुजरे मनु कुदंन मुत्तियता ॥ ई० ॥८६॥ जिल बूंद पुहप्प कि द्रप्पन दुत्ति। कि तारकि तेज कि होर प्रभत्ति ॥ बर गोप्प सुगंध सुजानियनं । प्रगटै बर बास सदेव घनं ॥ ई० ॥ ८७ ॥ षट दून चवग्गुन में बरनं । सिनगार अभूषन ए कहनं ॥ तब सज्जिय बालत मोर मुषं । उपमा कविचंद कही सुरुषं ॥ ० ॥८॥ इन भाइ सुमुत्तिय गुंज बहाइ । द्रिगं अधरं प्रतिबिंब सजाइ ।। करें रंगरत्त दुकूल सु ओर । झुबै मुष जरध पाइ झकार ॥ ई० ॥८॥ बन्यो मनवंछ मनोरथ जम। करे जह चंद जुधरिक क्रम्म ॥ मिले कि कंह अधरा रस पान। कहै कविचंद सुजीरन जांनि गा०॥ (१) को.-प्रयाग। * ये दो पंक्तियां मो•मति में नहीं हैं। (२) मो.-बिलांम। + ये दो पंक्तियां मो• प्रति में नहीं हैं। (३) मो.-गज ।
पृथ्वीराजरासो । [पक्कीसवां समय १२ सु देषि कयौ कविरूप अभ्यास । मनों उठई मकरंद सुबास ॥ सजे षट दून अभूषन बाल । मनों करि काम करी रति माल ॥ ॥९॥ सुसज्ज सु संकर से मन अंध । मनों अरनांमद श्रग्ग सुबंध ॥ धस्यो तन कौरव वस्त्र कुवारि । मंडी जनु संभ मनमथ रारि ॥छा२॥ पांच सौ वैदिक पंडित, दो सहस्र कोविद, एक सहस्र मागध आदि गुण गाते ऐसी धूमधाम से रावल समरसिंह का मंडप में प्रामा। कवित्त ॥ सय सुपंच वर विप्र । बेद मंचं अधिकारिय ॥ उभय सहस कोविद । छंद तका अनुसारिय ।। सहस एक मागध सु । सित्त पौरांन पविचियः । सहस अठ्ठ डाहालगत । गारन सुर जित्तिय ।। उडिरेन धेन गोधल कह । सहस दोष कहन घरिय । संभरिय ग्रेह आठ पति । मिलि विधान मंडप भरिय ॥ ई० ॥ २३ ॥ विवाह मंडप की शोभा का वर्णन । छंद नाराच ॥ विधांन धान मंडपं। जवान जग्गः पन्त्रयं । विपष्ष चारि कित्तनं । समर्ध दैव रत्तनं ॥ ८४ धुनद्द धुंम्म सालियं । अषंड लन वालियं ॥ प्रजान पुन्य पानयं । सु पंच कोटि दानयं ।। सभूत भेम लच्छिनं । अभून दान दच्छिनं ॥ छ० ॥ ५ ॥ दमित्त काम लंबरं । कलंक कित्ति रावरं ॥ ई० ॥ ६ ॥ भ्रमेंन भूमि भारियं । ग्रहंत पानि धारियं ॥ कुसंभ चीर गंठियं । प्रथा प्रसंग पठियं ॥ छ । १७ ॥ सु सदियं जयं जयं । सु सद्द विप्रयं लयं ॥ (१) ए. को. कृ.-तक। (२) मो.-पवित्तिय। (३) मो.-एड। (४) ए.-विधान। (५) मो.-जग। (६) यह तुक मो. में नहीं है। ॥
एकीस समय १३] पृथ्योराजरासो। ६५५ अरुनया सु उदयं । सिकार सइयं सयं ॥ ई० ॥ ८ ॥ अचिज सिद्ध चारनं । विचार बार बारनं ॥ छं० ॥ ८ ॥ दूचा ॥ परनि बीर रावर समर । बहुत कई रस जोइ ॥ कवि वर बरनत ना बनत | और सुभष बछु होइ ॥ ई० ॥ १० ॥ करे चंद बरदार दुई । बार बार मनुचार ॥ राज राज ढिग ढिग फिरै । मनों समछु रवितार || ई० ॥ ११ ॥ कवि कहता है कि पृथ्वीराज के यहां बिवाह मंडप में इन्द्रादिक देवता जय जय कर रहे हैं और लग्न का समय ज्यों ज्यों पास पाता है अानन्द बढ़ता है। कवित्त । चाहानन के ग्रेछ । इंद्र जचि होय अग्नि बर ॥ श्रष्ट देव सत सील । नाम संतोष मंच बर । सहम गयन बर राज। धीर दिल्ली अधिकारिय॥ अच्छ देव गंध्रब्बा जयति जै जै उचारिय॥ दिव देव लगन आवै घरी । तिमतिम बाटै पेम रस ॥ ज्यों चढे समुद चिल्लोर बर । तिम सु बीर बठ्ठति जस ॥ ई० ॥ १०२ ॥ दान सकल सामंत । न्यांत अग्गै अधिकारिय॥ इंद्र साज कुब्बेर । वंद्र वासम न विचारियः ॥ बचन रचन सचि काहि । देव सचि कदै ग्यान सधि । अष्ट जोग भुलै सभोग । निरर्षत सकल सिधि ॥ जे जे नरिंद संभरि धनी । संभरि विधि संभरि चरित ।। भूपाल बीर दरबार बर । तिहित देव लागे सुगत । ई० ॥ १०३ ॥ सांमतों और राजाओं ने जो जो दहेज दिया उसका वर्णन ! छंद भुजंगी॥ प्रथमं सुकन्दं निवत्यौ सु राज। कही उप्पमा चंद कब्बीति साज शत एक बाजी करी पंच दूनं । दिया राज कन्हं निवता स ऊनई०१० (1) मो.-जब। (३) मो.-प्रति में 'दान घरबस जलधारिय (१) को. क. ए.-सितं । (२) ए.-नांस। पाठ है ६५६ पृथ्योराजरासो। [एक्कीसवां समय १४ लकी वस्त्र हेमं नगं पारि पारं । तिनं देषते देव गत्ती विचारं । दियं निडर राइ रहौर राज । भुजंगादि भुल्लै कहै सब्ब साजं ॥ छ॥१०५॥ दियं बंध राजं सलष्यं पवारं । धनं राइ कुब्बेर लौ न पारं ॥ महा दंत दंतीन की पंति बंधी । दरब्बार मानों नगंजोति संधी ॥ई॥१०॥ दिया जाम जहां सुनहो जुवानं। सहस्त्रं दसं हेम गज एक पानं ॥ दियौ राजबीची प्रसंगति बीरं । उभै दून हथ्यी हयं सत्त सूरी। छ. ॥१०॥ रजकी सु बस्त्र अनेक प्रकारं । दिपै बीर बीरं महा बीर सारं ॥ दियौ राज गौइंद आह राजा दियं तीस हथ्थी मचातेज साजं ॥ई०१०८॥ इक माल मुत्ती उतंगं सरूपं । तिनं देखते भान क्रनं न भूपं ॥ अतत्ताइ दीयो लियौ नाहि राज। हुतौ ईस भक्तं उदै देव साज आई।१०८ ॥ चिया रूप आगें महा पाप लच्छी। तिनंराज गज निरष्षी अनछी। दियौ राम राज रघुबंस बीरं। तिने पार कुब्बेर लम्भ न तीरं। ई०॥११०॥ उभै सत्त बाजी उभै सत्त हथ्थी । तिनं सथ्य एक किरन्नी बिरथ्थी । उऐ एक राजं दिया एक भान। दसं तेज राकी पराकी प्रमानं ॥ छं० ॥१११॥ दियं सत्त बंधं कनक बिराजं । उभै सहस हेमं इक बाज राज ॥ किया राज न्यौतै अजम्मेर बोरं। सदा सागरं गौरयं लाज नीरं॥छ॥११२॥ दिए पंच बाजी सुरंगंतुरकी । जिने धावतें वाद की गत्ति थक्की । दिया राज चंदं पुंडीरं सु बीरं। महा हेम सहसं उभै बाज ती॥छ०॥११३॥ दिया राज कैमास न्यौता नरिंदं । घरं पंचमी भाग लच्छी स व्यंदं । जितौ राज राज दरब्बार हेमं। तितो पंचमौभाग अप्यौ सुतेमा०।११४॥ दिया चाइ चामंड लच्छि प्रकारं। नवं निद्धि सिहं सुलभ न पारं ॥ रह्यो एक वस्त्रं उभै पंच बाजी। दिया राजराजिंदराजिंद साजी॥5॥११५॥ दिया अल्हनं अंग इत्तौ प्रकारं । तिए तात के नग्ग लिन्ने सुधारं । यं हेम रूपं गयदं सु लच्छी। जिनं देषतें इंद्र का ग्रञ्च गच्छी।ळ०११६ दिया दान सूछम्म सादल्ल मोरी । इक बाज बीरं रज पंच कोरी॥ दिया राज चंदेल भेांचा विचार। तिनं न्यौत का कोइ लभेन पारा।छ०११॥ । । - । (१) को.-चीरं। (२) ए. ओ. कृ.-में “तिनं अंग अंग विरण्यं सुलच्छी" पाठ है। (३) ए. कोल-मूछत्त।
एक्कीसवां समय १५] पृथ्वीराजरासो। नगं पंच मुत्ती इसी अह माला । जिने द्रब्ब को छह श्रावै न पाला ॥ बधे साहि गोरी लही तसबीरं। दई राज चौहानन्यांत सरीरं छ॥११८॥ सतं पंच बाजी सतं अब इथ्यी । तिनं देखतें तेज कुब्बेर नथ्थी । दियौ राज जंघाल जहोंनरिंदं । तिने नाम भीमं महातेज कंदं ॥११८॥ दसं बाज पंचं दुकं मुत्ति माल । तिनं तेज आवृत्त रवि किरन झाल॥ चसं मीति च्यारं सयं समरकंदी । गुरं राम दीया मनों राज इंदी ॥ छ० ॥ १२० ॥ लियौ ना सुराज कळू नाहिं रष्यौ । पछै धर्म राजं सु राजं बिसष्यौ । दियौ बीर चालुक्क बागर बीरं। सिरं काज राजं सुभारथ्य भीरं ॥ छ० ॥ १२१॥ नृपं हथ्थ देत सु सेवक मंडै। महा छत्र छत्री न छचीन पंडै इस्यौ राज प्रथिराज दैहथ्य तारी। तिनं भारती कौन आवै प्रकारी । छं० ॥ १२२ ॥ दिया टांक चाटा चपल्ल प्रकारं । एक बाज तेज मनों अग्नि सारं । दिया वग्गरी देव देवाधि दानं । सहस्संत बाजी दियं बाइ पानं ई०॥१२३॥ दियं अंबरं छाव से पंव दूनं । तिनं तेज आरन देषंत भूनं ॥ डुल्यौ सर्व सामंत का गर्भ भारी । पछे दोन सीसं दियं इथ्यतारी ॥ छ० ॥ १२४ ॥ दिया राज हम्मीर हाहुल्लि इंदं । तहां कब्बि चंदं उपम्मा सु छंदं ॥ मगं नाभि कप्परयं गुंट वाजी । दिया मुद्द मुष्टं तनं तेज साजी । ई० ॥ १२५ ॥ इकं कास मीरं पची संती भं । इकं भद्र जातो सु इथ्थी अचंभं ॥ सबं सहि हज्जारभारंप्रमानं। दियो चारके कष्ट साभिनंदाना॥१२६॥ दइ एक मालं सुमुत्ती सुरंगं । दिनं एक की मौल आवै सुभंगं ॥ दियौ नीति रायं मुषित्रीय दान। विझयौ राज चहुबान घल्यौ न पानं ॥ ई० ॥ १२७॥ (१) मो.-नगं । (२) को.-जालं। (३) ए.क्ष.-बीनं (४) ए.-पनं । (५) मो.-धमीव।
६५८ पृथ्वीराजरासो। [ एक्कीसवां समय १६ दई भान भट्टी निधी ताप कारं । उभे एक बाजी तुई द्रव्य धारं । दिया बीर पाचार न्यौती प्रमानं । तिनं दान कैमास को पार थानं । ई० ॥ १२८॥ 1 मुरं दो बाजी सु तत्तं प्रकारं । दई लष्प दूनं अधं तानि तारं ॥ दियं अल्हनं दानयं मक्ति घटी। एकं बाजरूपं अधं सच्चस पही॥ ॥१२॥ तो अब सामंत दीनौ प्रमानं। सगा रथ्यदानं करै को बषानं॥ई०॥१३० ॥ कवित्त ॥ जालंधर बर बापू । बीर थहा मुलतानी ॥ बंग तिलंगी सुच्छ । कारनही निदानी । बर गोतम दिसि गंग पार । परबत दिसि राज मारू माखव राज । बीर बीरगति राज। कुंकुन सकुंच कालिंग दिसि । कंदलेस कछ अच्छु गति । पराज राज राजन बली। सुबर बीर जा बीर मति ॥ ई० ॥ १२१ ॥ पृथ्वीराज और चित्तौर के रावल का सम्बन्ध बराबरी का है दोनों की प्रशंसा। कवित्त ॥ वलिय राज पथिराज । सुचत सगपन सु द्रष्ट' गति ॥ बब्बत को बल राछ । सबर बीरर सुधीर मति ॥ सुत्त मत्त रजपत । फिरे चाव हिसि पारं। अंग अंग तनु कुनै । क्रम्म सा क्रममय सारं ॥ मति गहव राज राजन बली । धरै अंभ सम्म सुधर ॥ विचंग राव रावर बसी । उंच सग्गपन तत्त बर ॥ ई० ॥ ११९ ॥ कषित । अति उदार पडु पंग । सुनिय जग बत्त श्रवकं । बलिय भाव पादरन । पर्व सम पवित समन्वं । बहुरि गरुष नोभर चिनेत । मानव मातुल गुरु । तिधित राज चितंयो । भ्रंम भूरति विवार धुर ॥ इक मात पुष आनंग वर । है भगनी है पुच जनि । संसार संभरिय राज गुर । भए सबष या परि सुभनि ॥ ई० ॥ १३३ ॥ । ।
पक्कीसषां समय १०] पृथ्वीराजरासो । ६५६ एथ्वीराज और एथाबाई के नाना अनंगपाल का वर्णन । अनग पाल पर सु । धम्म धाग्न उद्दारन ॥ बंस बीय मासुलह । भए है बीर सुभारन । कखि सारन अरि देह । जुगनि कित्ती विस्तारन । चाहुनि कमवज्ज । बंस मातुख गुर पारन । प्रथीराज दिल्ली पति । चिचंगी बर चिंतया ।। पंचमि विषाह पंचमि घरिय । भलै मुहरत में भया । ई० ॥ १३४ ॥ कवित। व्याह मद्धि करनेस । अग्य मधे चित डोले। इतो पाप कविबंध । देव देवासुर बोले ॥ ज्यों चारन घर निंद । आइ भुक्त अनुधारी । सा सुरिंद संग्रहै। दोष लग्गै जुग भारी । ग्यार में अंन भषह सुकृत । महा दोष अति ही सुबर ॥ बबंध हार निग्रह घरन । लघु बंधष हुअ नरक पर ॥ छ०॥ १३५ ॥ विवाह का देव विधि से होना, बहुत सा दाम दहेज देना। ईद पहरी ।। तिन मध्य विराजत राज राज। निर्मलिय कला रवितेज साज । ज्यूं जुगति जूबवर करन भोग। आए सु राज राजन सभाग॥ ई० ॥१३॥ भए सुराज तिस्सुत नरिंद । शडाल कंन कह सुभ्यंद ॥ पंचाख देस मोमेस सूर । मलकंत मुष्य वमल सनूर ॥ छं० ॥ १३७ ॥ आए सु बीर क्रिबाट कर्न। ,मह सुदेव धृम्मच सुपंन । एलची देस भांडेर वीर । भार सु कोटि मुष तिन नीर ॥ ई० ॥ १३८ ॥ देवत्य व्याह चहुनि कीन । दंथ्यं सु व्याह सम बरह चीन्ह ॥ अप्पी सु पुषिसिवरह सु ग्रेछ। कस बढी कला जिन लीन देह।। ई०॥१२॥ अप्पे सु एक सिख ग्रह प्रमान । श्रावन्न व्याच द्रुग्गर निधान । मै मत्त मत्ति मंतपस कीन । सिंगार सार सत सहस दीन॥ ई० ॥१४॥ हुन व्याह जनक सीमा प्रकार । मिलि जम्य राज राजन सुभार ॥ संभरि नरेस सेोमेस पुत्तारस मांनि बीर अब धत धुत्त ॥ ई० ॥ १४१॥ (१) मो.-धर।
॥ पृथ्वीराजरासो। [ एक्कीसवां समय १८ साटक ॥ ऐ सोमेस सुर्वन्न संभरि जयं । तारंग सूरं बरं ॥ सा दुजं दुज धंम्म देवति धरा । ग्राई ग्रहंजं पलं ॥ नामध्यं वप अंस सोम नृपयं । नाम नरिंदं धुरं ॥ प्रिथ्य नाथ सनाथ जग्य करनं । राज्यंद राजं गुरं ॥ ई० ॥ १४२ ॥ व्याह के पीछे दौर में पाना । कवित्त ॥ दलन मंत्र सब राज । आइ दरबार सु इंदं । ज्यों नछिच विंटयो । सरद साहै अति इंदं ॥ कनक पंति नग व्यंट । भान विव्यौ सुमेर बर । जस विंयौ बल लोई । ईस विव्यौ सु जटवर ॥ यों बिंयौ राइ सेमेस सुत्र । सबल राज राजन गरु । आरत्ति बीर देषति नृपति । भान चंद लग्गै हरू ॥ ॥ ई० ॥ १४३ ॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा। दूहा ॥ हरु सु लग्ग सुअर गिरि । गरुअलगै प्रथिराज ॥ चावहिसि लच्छी सु जन । काजन मुक्किय काज ॥ छ० ॥ १४४ ॥ दूहा ॥ लया जनम या कज्ज नृप। धर धर धरपति काम ॥ चाव हिसि भूपति सुभे । जु कछु भूमि पर हम ॥ ई० ॥ १४५ ॥ छन्द पहरी ॥जो ककू राज राजन नरिंद । सो भये काम प्रथमीस इंद ॥ नर वर नृपत्ति दीसै प्रमांन । उज्जले गंग ज्यों धंन ध्यान ॥०॥ १४६ ॥ बर सुबर बीर पग मुक्कि धीर । बहु द्रव्य इंद्र राजन सरीर ॥ नव लच्छि अंग ग्रह ग्रह प्रमांन । उच्छास लाइ मंडै निधान ।। ॥१४७॥ कनबज्ज बीर मुक्की सु लच्छि । तिहि देषि इंद्र की अब्ब गच्छि ॥ कुब्बेर कोपि अंतह निरष्षिा से बन धार ग्रह ग्रह बरष्पि ॥ छं०॥ १४८॥ बहु बंधि संधि मनु देव काज । मंगल सु जोर नीसांन बाज ॥ छ०॥ १४८॥ राबल का रनिवास में जाना। दूहा । बर बंदे सुंदरि सकल । चावदिसि फिरि पंति ॥ मनुं अंग अंग अन्नंगनह । रति बर राजति कति । ई० ॥ १५० ॥ (१) मो.-बलं। - एक्कीवांस समय १६] पृथ्वीराजरासो ६६१ कवित्त ॥ वरति चारु उप्पर । उतंड अच्छित मुत्ताहन्त ।। ससि उप्पर ससि किरनि । धीर सुषे गुन चाहल ॥ चावहिसि अंगनां । अंगनं मित गुन मंडहि ॥ एक एक को मिलत । एक लज्या तन पंडहि। प्रिथा दिष्षि झषि चिचंगपति । अच्छित मंच विक्रति ॥ ओडं ओर ओटन किय । अंनयं नारि नंबै सुस्त ॥ छ ॥ १५१ ॥ तिलक होना, और भांवरी फिरना। छंद भुजंगी॥ वियं अंग अंगति अंगं तिरंगं । बुले बेद बेदं सुजं मचं भंगं ॥ कला की अनेक प्रकारंत व्याह। टरै लग्न साहं महं मंत राहं ॥॥१५२॥ दियं हस्त थालं तिलकति राजं । तहां चंद कब्बी उपम्माति साजं ॥ मनों क कमोदंत ज्यों इंद साज । मिल्यौ जाइ चंदं सु मुत्तीनि पाजं॥ छ०॥ १५३॥ दिसा देव मंचं अमंचंति धारें। नपं|म सोधै विधी देव टारें। बुले बिन अंगं सु विधी सुवेदं । मनों देवता अग्गभूले सषेदं ॥ ० ॥ १५४ ॥ नृपं राह दिडं करूरंति टारे। फिरै भावरी भान सुम्मेर सारै ॥ छ० ॥ १५५ ॥ ऋषीकेश वैद्य और चन्द के बेटे जल्ह आदि को दिया तब रावल फेरा फिरे। कवित्त ॥ श्री पति साह सुजांन । देस थंभव सँग दिन्नो ॥ अरू प्रोहित गुर राम । ताहि अग्या नृप किन्नो । रिषिकेस दिय ब्रह्म । ताहि धनंतर पद सोहै । चंद सुतन कवि जल्ह । असुर सुर नर मन मोहै । कवि चंद कहै बर दाय बर । फिरि सुराज अग्या करिय । करि जोरि कह्यो पीथल नृपति।रावर सन भावरि फिरिय ॥ छ । १५६ ॥ दोहा ॥ निगम बोध गोतम रिष । थिरि जेहि दिल्ली थांन ।। दास भगवती नाम दे । प्रिथीराज चहुवांन ॥ ई० ॥ १५७ ॥ रिषीकेस अरु राम रिष । बहुविध देकर मांन । प्रिथा कुंवरि परनाय कै । संगि चलायै जान ॥ छं० ॥ १५८ ॥ (१) मो.-छाजं। - पृथ्वीराजरासो । [ एकीसवां समय प्रत्येक भांवरी में बहुत कुछ दान देना । कवित ॥ एक फिरत भांवरी । साठि मेवात गांम दिय ॥ दुतीय फिरत भावरी । दुरद दस एक अग्गरिय ॥ चिलिय फिरत भांवरी । दया संभरि उदक्क कर ॥ बाथी भांवर फिरत । द्रव्य दीनी अनंत बर ॥ च हुवान चतुठ चावहिसां । हिंदवान बर भान विधि । गुन रूप सज लच्छी सुबर । सहज बीर बंधी जु सिधि । ई० ॥ १५ ॥ रावल समरसिंह के पुरुषों को चित्तौर मिलने का इतिहास वर्णन छंद भुजंगी ॥ अनेक अनेक प्रकारंत सब्बी । करै राज धम्मं स्तं धम्म कब्बी। मिजे सर्व छिची इते व्याह राज। तिलम्भे नहीं नेक राजं सुसाजा ॥१६० महं भाजनं रंग रामं प्रकारं । कला अड्ड मानों सु इश्थं पसारं ॥ रतं नील रेनं कि स्याम सेतं तहां ओपमा चंद बरनै सहेत ॥ ॥१६१ गुरं भान चंदं परी राइ राजै। मने एक नषिच सज्जे विसाजै उडतं अबीरं घनं सार रंग। तिनं देवता बास भूलंत श्रृंगं । छ० ॥ १३२ किने भेद भेदंत मिष्टां न रूपं । तिनं वास देवं वगै सोम भूपं ॥ विधं कुंड मंडप्प मंडे उतंग। तिनं वास भौरं असी भूलि संग॥ छ । १६३ जिती विड चिचंग गावै अपारं । दियै विन गारी सबं भक्ति सारं । तुम महि छिची न जानन तत्त। तिनं बंस कोन सु पुछदै अभीतं ॥ ई०॥१६॥ रसं रच्चि छच्छी बडी पग्ग डट्ठी। तिनं दुंढि ढंढात नीके लिपही ॥ बडे राज देवक्त बीसल्ल नारी। सराधार भारं बली सवारी ॥ ई० ॥ १६५ तुमें चित्त चिचंग चित्तं विचारं । तुमं ब्रह्म बंसं हरे सजु भारं ॥ दियो राज हारीत रिषं प्रमानं। कयो तप्प एक गए कंग पानं॥ई ॥१६६ सिवं लिंग बिझे तुम्यो मा अघाटं। तिनं ठाम नामं धयो मेद पाट रमै विन साथं सु शरीत रिष्यं। करै सेव बाल सादत्त सिष्यं॥ ई० ॥ १६ किने छेद भेदं किते गान गावै। किते देवता सेव पुष्यं चढ़ावै ॥ करै रष्पि तप्पंदिन गंग न्हावै। तहां उज्जलं गंगषं नीर धावै॥ई० ॥१६८ करै अंग कष्टं सधै पंच अग्गी । महा तेज छीनं तनं पंच नग्गी ॥ कियं पूरनं तप्प तश्यं स अग्गं । बियं लष्प हारी अहारीसु मग्गं ॥॥१६ ६६३ पक्कीसवां समय २१] पृथ्वीराजरसो । जिती काल बेसं व बाल पत्या। तिनं देषिकै सद जाजुल्य गत्या ॥ रिषं उंच तेनं षिनं मोल चायं। नहीं मुष्य मंद्यौ लियो झोलि पायं ॥ई॥१७॥ चल्यौ अब सीसं किये उच पायं । महा तेज दुःष्पं दिष्यौ रिष्य रायं ॥ नमो मंत्र मंत्री नमो घौसपाला दियौ राज बंसं जमं की बिसालाई॥१७१॥ रयं मंच प्रम्मान दिष्या सुरिष्यं । दई भूमि जुग्गं जुगंतं विसष्पं ॥ तिनं बंम चिचंग चिचं सु राज। परं नीतिबीरं प्रिथा बाल काज॥०॥१७॥ छंद गीता मालची। ढलकत बेंनिय बाच सेंनिय नग्ग नेनिय गावई। मधुरं सबइं रहसि बई हद इदं भावई ॥ बै स्यांम सारं गुनति गोरं चिच सारं सेहई। गुञ्जत थारं उठे कोरं बेस भारं मोह ॥ छं० ॥ १७३ ॥ बिवाह की शोभा का वर्णन। कवित्त॥ विधि श्रृंगार रस बीर । हास करुना तन चारिय। रुद्र भयानक मंत । करी करुना ता वारिय ॥ करना तजि रस अठ्ठ। भयो नृप राज बिवाई॥ सुष सनेह धन ग्रेह । राज जोगिंदति साहं ॥ सुष व्याह सजन सम त रवन । गई नठ्ठि चय जांम निशि ॥ सहदेव देव देषन चलह । भुगति मुगति धन राज बशि ॥ छं०॥ १७४ ॥ दूहा ॥ सा सुंदरि सुंदरि सुकथ । रस दरसन परिमांन । मनों देव देवाल बजि । बर दुंदभी निसांन ॥ छं० ॥ १७५ ॥ छंद भुजंगी । बजे दुंदभी भेरि देवाल थानं । करे युत्ति रुपं अनेक प्रमानं ॥ विपंभीर जैसी दरब्बार थान। मिले षंड षंडं सुराजान जानं । ई०॥१७६ ॥ प्रिथा रूप भाग प्रथी कौन सी । जनक्कं सुदारं सिया रूप कैसी ॥ भुगत्ती मुगत्ती हितं ताइ कारं । सबै दिष्षियं गज राजं दुआरं॥छ० ॥ १७७ ॥ महा भोजनं ते प्रकारं विलासं । तिनं खाद तें देव इंडे न पास ॥ रचै अग्नि स्वाहा सुदेपत्ति होज । महा जग्य जापं अस्तंत सेोज ॥ छं० ॥ १७८॥ (१).-उजत । (२) को. कृ.-सर।
६६४ पृथ्वीराजरासो। [एक्कीसवां समय २२ छिन छिन्न लंका सपत्ती विराजै। दिनं अष्ट ग्रेहं रहै हार साजै ॥ सुई राज लच्छी न पूजै सुकंती। जये देवता जग्य में जीमवंती । ई० ॥१७६ ॥ कवित्त ॥ बहुत मंसधन सार। असन बलमीन समंकृत ॥ अनंग जोग फल अनत । पान मिष्टान असंकृत ।। छिति छिची विधि सजहि । देव लही लछि रूपं ।। रंक रंक गति छति । होइ राजिंद सुभूपं ॥ नवनीत सुनीत पुनीत प्रभु । चाहुआन रंजे सुभर ॥ जानिये राज राजन कै । सुरा थान माया सुधर ॥ छं० ॥ १८ ॥ अग्र दीप धनसार । बंटि मृगमद पान रस ।। बहुत सरस रस राज । दिष्पि प्रतिव्यंब अप्प जस । अरति व्यंद अरबिंद । कमल कैरव ससि सागर ।। भुगति मुगति संग्रहै । मुकति भंजै अति आगर । मय मंस कूत्र अष्षा अषम । लषिन बतीस सुर्वधि गुन तिहि काज भोज राजन करत । उछाहं प्रथिराज मन ॥ ई० ॥ १८१॥ दूचा ॥ माया मोष सु देषि कैं। गति भूले चालाहि ॥ मानों मंच सुमंति: गति । बर ब्रह्मा वस भांहि ॥ छं० ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज के दान दहेज देने का वर्णन । कवित्त । एक एक रन जोग । गरुन हरुअत्त चित्त बिधि ॥ साम दान लघुमंति कंति मग्गीति संति सिधि । अबलि बाज गज एक । उभै अप्पै नर वस्त्रं ॥ हेम हीर रजकीय पार पावै ना मंतं ॥ गरुअत्त गरुन भय भ्रत्त हों। सत हथ्थिय करनिय जुगति ॥ प्रथिराज राज राजन वलिय । देव दांन राजन भुगति ॥ छं० ॥ १८३ ॥ कवित्त । राज दांन विधि देत । लग्गि आचिज्ज थान चिय ॥ नाग लोक सुर लोक। रवी मंडल नर नर यि ॥ (२) मो.-सभि । को.-सोख । (१) मो.-कुना। (३) मो. कृ. को.-चलाहिः । (४) ए.-को.-.-मंत । (५) मो.-मनं पक्कीसवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो। ६६५ । यति कति कतियति। हथ्थ पंतिय रवि राजै ।। सु कवि चंद बर दाइ । देषि देवाधि सु लाजै ।। बदि राजधान संभरि धनी । किहि बिधि लछी लके गुनौ । ३रू सुगंग उड़गनति नभ । पत्त तरोवर गिर घनों ॥ छ० ॥ १८४ ॥ द्वहा ॥ दान मांन निरमान गुन । भगति रत्ति नप जोर ॥ कहा दिष्षि कोई लेइ निधि । भयौ भरें घर चार ॥ छं० ।। १८५ ॥ दूहा ।। तन अग्गै मन चलन है। मन अग्गे तन जाइ ॥ जिहि बिधि दांन सु उच्च । तिहि विधि पाप सु जाइ || ई० ॥ १८६ ॥ टूहा ॥ क्रम्मसु अति विधिनां रची। अंग रोर सिर पान ॥ तिन भंजन सेोमेस सुत्र । धनि संभरि चहुआन ॥ छ० ॥ १८७ ॥ चौपाई ॥ दिसि दिसि पूरिय च्य गय राज । प्रिथीराज सुरपुर सम साज ॥ बाजै पंच सबद बनि रंग । रहवनि हादस सूर अभंग || ई० ॥ १८८ ॥ कविक्त ॥ एक दीइ निडरह । राज रष्षो चित्रंगी ॥ दुतिय दीइ सामंत । गरु गोविन्द अभंगी ॥ चितिय दीह पज्जन । बल्लि कूरंभ सुधारी ॥ चतुर दीह नर नाइ । कन्ह कीनी किति भारी ॥ पंचमै दिवस कैमास बलि । बलि सुराइ सम जग्य किय ॥ छ, सु दीह पुंडीर धनि । धीर रष्यि कीरति लिय ॥ ई० ॥ १८ ॥ कवित्त ॥ सत्तम दिन रघुवंस । राम करनी कर मेरं ॥ जिहि नंदी पुर भंजि । समर मनुहारि सुबेरं । अहम दिन अचलेस । अचल कीरति जिन रवी । नवम दिवस पाझर । जगत दारिद्द सु नंषी ॥ दसमें पंवार धाराधि पति । सलष सु लषि परन्न विधि ॥ दिन एक एक रष्ये सवन । पंच च्यार लुहाय निधि ॥ ई०॥ १९ ॥ M (१) ए. कृ. को.-उड़ति । (२) मो.-भस्यो। ए• कोक. प्रति में "दुतिय गोविन्द सुदीह । गरुण सामंत अभंगी" पाठ The पृथ्वीराजरासो। [एक्कीसवां समय २४ रावल का बारह दिन तक बारह सामतों ने अपने अपने यहां नेवता किया। कुंडलिया ॥ रषि उभय षट' बीर बर । बर जंघारो भीम ॥ जिहि ओलें प्रथिराज की। को अरि चंपे सीम ॥ को अरि चंप्य सीम । देव दुज्जन अधिकारिय ।। तिहि रव्या चिचंग। समर रावर ग्रह चारिय ॥ विधि विधान विम्मान । द्रव्य अर्चन करि चष्यौ । रावर समर नरिंद । न्योति हादस दिन रष्यौ ॥ ई० ॥ १८१ ॥ बारह दिन तक रहकर रावल का कूच की तयारी करना । दहा ॥ षट बीय द्यौस रषौ सु नप । भर सु भाति बहु राज ॥ दिन बारह चिचंग पति । बजे बज्जन बाज ॥ छं० ॥ १८३ ॥ कवित्त । बजि बाजन अनुराग । सबर उच्छव बर धारिय । नूर धप ते अक्छ । पंड इथिनापुर सारिय ॥ हुअ उछाह दिल्लीस । बंधि गुड्डिय ग्रह धारं । मनी मोम कल कोट । करिय कब बल्ल बिस्तारं ॥ धन ग्रहति ग्रेह उच्छाद हुअ । चाहान रवि वया ॥ वेनिय सुजस्स पुरषातनह । बल अनंत घट चढ़या ॥ ई० ॥ १८४ ॥ बरात लौटने की शोभा का वर्णन । छ० मोतीदाम ॥ इति छंद सुछंद सुचंद प्रकार । सु मुत्तियदाम पयं पय चार ॥ परे गजनां जिहि कंकन हार। इसो गुन पिंगल नाम उचार ॥ छं० ॥१८५ ॥ दस दिहि परि वपत्तिय सेन । बिराजय राज अनंद सु अन सुधिं सुधि बीर प्रकार प्रकार। चलें संग दंपति ज्यों रति मार॥ ई० ॥१८६ ठनंकिय घंटनि हथ्थिय पूर । किनं किय बाजिय साजिय सर । इकं इक हथ्थिय दासिय पंच। इसी सरसं गुन रचिय संच॥ छं०॥ १८७॥ । (१) ए.-.-घर। (३) मो.-कोटि । (२) मो.-घर द्वारं । (४) ए ..-विलिय।
पक्कीसवां समय २५] पृथ्वीराजरासो। विधिं विधि पूरन पत्तिय साम । तिनं किय उज्जल सज्जल व्योम ॥ रह रह राजन साजत सेना मनों दिव देव दिवाधिय तेन ॥ छं० ॥ १८८ ॥ तुरंगनि तुंगनि की प्रति हींस। लगै तिन मंद सुनंदा ईस ॥ छ० ॥ १८ ॥ दूहा ।। ईस मंद संकर उदिन । ब्रह्म ध्यान सिव पान । संभरि घर चिचंगपति । को सन मानन जान ॥ छ० ॥ २०० ॥ कवित्त । बर सु बुद्धि साधन सरीर । जोगह अधिकारी ॥ कर अदग्ग जग दग्ग । सरन रष्पन जुगचारी ॥ माया से नहिं लिपत । नीर नीरज समान बर ॥ यों चिचंग नरिंद । चतुर विद्या कोबिद नर । गोरी सु बंध सुरतान रन । जस लेयन जै जैति बर । सा लच्छि रूप भगनी प्रिथा । परनि राज पत्तौ सुघर ॥ ई० ॥२०१॥ दूहा ॥ जहां परनि चिचंगपति । करी उलटि बिपरीति ॥ सिर अप्पो जुम्गिनि नृपत । देव लोक दिवजीति ॥ छ० ॥ २०२ ॥ अनंगपाल का बहुत कुछ दान देना। कवित्त ॥ बाजे बीर स बाजि । राज बज्जा से बज्जा। जस बजा बजासु । एम्म क्रमं चित रज्जा ॥ सम न कोई चिचंग । गहश्र गहिलात गरु मनि ॥ धनि सुध्रम्म अरु दान । दिया दिल्लीस बहु भैति भर मंडि बीर बुट दिपन । सत्त अट्ट अापंच भति ॥ अग्गरें बांम बर काम छत्त । इक्क बार घट्टइ सुगति ॥ छ ॥ २०३ ॥ रोखा ॥ जो दिन रही ढिल्ली प्रति मांनिय देव गति ॥ रति संपति सुख ग्रेप भार आर अति दुहुँ तन सुमन निरध्विय लाइ बर । मानों सची संजोग सुरपति आपु धर ॥ छं० ॥ २०४ ॥ दूहा ॥ कनक क्रीड सुष्ये जयति । रतिन कदै कवि चंद ॥ बर जानै कै दंपती । कै दीपक कै चंद ॥ छं० ॥ २०५ ।। (१) ए.-.-को.-चौपाई। (२) ए.को.-को।
६६८ पृथ्वीराजरासा। [ एक्कीसवां समय २६ कवित्त । मति मध्या भय बाल । बिना प्रौढा अधिकारी ॥ लच्छी सोज सहज्ज । रूप रति बरन सु सारी ॥ धीरं तन सिय सार । विरह मंदोदरि नारी ॥ पति सु सता रुकमनी । गिनी रुधिर्धान अधिकारी ॥ सा प्रथीराज भगनी प्रिथा । देव जग्य सम जग्य किय ॥ अानंद रूप आनंद कथ । सोम नंद जस बंद लिय ॥ छं० ॥ २०६ ॥ कवित्त ॥ अरुन तरुन उदयंत । सिद्ध सिक्कर फिक्कारिय॥ दिसि उत्तर ईसान । दिसा दस दसन उछारिय ॥ बिमल नाग वल्लिय विनोद । केलिय अविलंबिय ।। वागवान दरिमीय । रवन राजन कर संमिय ।। संचार सुमन सौरभ्भ बर । भ्रमर रोरि रंगिय करिय ॥ आगम अरंभ बर बरष फल । जगति जोति व्यासह धरिय ॥ ई० ॥ २०७॥ व्यास जगजाति की भविष्यद्वाणी। कहत व्यास जगजाति । नयर नागोर वसंतह ॥ जोह नंदै सोडू नंद । हसै सो रही इसंतछ । इंद्रपथ्य पुर आदि । राज राजन चहुअानह ॥ अमर बेलि कीरति । अछेह साधन सुरतानह ।। आचिज्ज बत्त हिंदुअ तुरक । हमल हेल हल्लै भुअन ॥ प्रथमंग पुब्ब पच्छिम पथिर । होत बत्त गंध्रव सुअन ॥ ० ॥ २०८ ॥ कवित्त ॥ रुधिर अकन्नित न्हान । छत्र पुबह पच्छिम पर ॥ कोलाहल कमिनिय । कज्ज हारम्य देव हरि ॥ समर सून्य मँडलीय । अमर विचार बार किय ॥ द्रुपद राय पंचाल । दुसह द्रोपदिय चीर लिय ॥ * साइ समय वरष दकईस मय । हरषवंत जुग्गनि कहिय ॥ बंचे विचार हिंदू तुरक । इक्क अचल कीरति रहिय ॥ छ० ॥ २० ॥ (१) ए.-का-.-गिनि । (२) ए.-सुन्य। (३) मो.-सार। मो. प्रति में "साई समय समय पठ विय वरब" पाठ है। ॥ ।
एक्कीसवां समय २०] पृथ्वीराजरासो ६६६ । । सभेां का अपने अपने घर लौटना। कवित्त । * "अप अप ग्रेह गुरंम्य" । राज राजन संपत्ते ॥ भोरा राव भिमंग। बत्त पुच्छै जग जित्ते ॥ पामारिय प्रारंभ । सोर संभरि' आदानह ॥ सा र सोमेस । पुत्त बंधन सुरतानह ॥ हेला हमीर हम्मीर से। विजय राज कमधज्ज किय ॥ अच्छर अचम्भ गल्हां गात्र । धरनि पंच चहुआन लिय ॥ छ० ॥ २१० ॥ कवित्त ॥ धरनि पंच चछुआनि । आनि फेरिय कर जित्तौ ॥ ता पछ हिंदू तुरक । सबै बीतक ज्यों वित्यो । धीर मीर संग्रगि । भीर भंजिय भिरि राजन ॥ जै जै तन चहुवान । देव दुंदुभि धन बाजन ॥ जिहि ग्रहन पानि रावर समर । दूअ आगम जोगि कहै । अप अप्प क्रम केलिय कहल । लिष लिलाट तित्तौ लहै ॥ ई० ॥ १११ ॥ दूहा ॥ सत्तरि सत तिय अग्ग करि । रज रज अप्प ब्रहास ॥ लीन सगोरी दंड धपि । ष सित्त पंचास ॥ ० ॥ २१२ शाह गोरी का रावल को दहेज देना । कवित्त ॥ सत्तरि सत तिय अग्ग। बीर गज राज सु अप्पिय ।। ते लीनों सुरतान । साहि गेरी गोरी किय ।। पंच सित्त पंचास । एक सौ तुंग तुरंगम ॥ सौ दासी चतुरंग । सत्त ढोलिय अचंभम ॥ चतुरंग लछि चिचंग दे । बर मोमेसर थप्पियै । बुल्लाइ सजन रावर समर । पंच कोस मिलि जंपियै ॥ ई० ॥ २१३ ॥ * मो. प्रति में यह पंक्ति नहीं है। (१) ए. को..-संभि । (२) ए.-प्रबंध। (३) ए. का. कृ. प्रति में नहीं है। (४) ए.को..-रावन । (५) कृ.-वालाई।
६००
पृथ्वीराजरासो ।
[एक्कीसवां समय २८
।
एथा ब्याह की फल स्तुति ।
सुनै ग्रहै उग्रहै । बत्त बिय सम उच्चारै
लि दिपै अरु सुनै । सुद्ध मंत्री सुद्धा ॥
प्रथा व्याह संभरै । पंच भी अंचन लग्गै
सेस फनंभित सुभट । काल पंसी नन लग्गै ॥
साधवी सीय भगनी प्रिथा । प्रथा बरन चिचंग पर ।।
इन सम न कोई भुवनह भयौ । नन है है रवि चक्क तर ॥ ई० ॥ २१४ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके प्रिथा विवाह
वर्णनं नाम एकविंसमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ २१ ॥
अथ होली कथा' लिष्यते ॥ [बाइसवां समय ।] पृथ्वीराज का चन्द से पूछना कि होली में लोग लज्जा और छोटे बड़े का विचार छोड़कर अबोल बकते हैं इसका वृत्तान्त कहो। दूहा ॥ इक दिन प्रिथु नुप पुच्छयो । कहि कविचंद विचारि ॥ नर नारी लज्या गई । फागुन मास मझार ॥ छं० ॥ १ ॥ बाल वृद्ध जुव्वन पुरुष । बुल्लैं बोल बोल ॥ मात पिता गुर ना गिर्ने । निकसे टोला टोल ॥ई० ॥ ३ ॥ च्यार वरन इक्कत्त मिल । कलह रूप कलहंत ॥ पाधि अषाधि न जानहीं । ज्यों मन नहिं विलसंत ॥ छ० ॥ ३ ॥ या पुच्छी कविचंद की । हिय हरष्य सुषदाय ॥ जु कक्कु भयो सु कहो तुम । तुम वानी बरदाय ॥ छ० ॥ ४ ॥ चन्द का कहना कि चौहान वंश का ढुंढा नामक एक राक्षस था उसकी छोटी बहिन ढुंढिका थी। ढुंढा नाम राषस हुनौ । चहुवाना कुल मभिः । तस लघु भगिनी ढुंढिका । जीवन रै सुष संझि ॥ ५ ॥ ढुंढा ने काशी में जाकर सौ वर्ष तप किया, यह सुन ढुंढिका भी भाई के पास गई, ढुंढा भस्म हो गया तो भी ढंढिका बैठी रही, उसे सो वर्ष यही सेवा करते बीता। ढुंढि गया वानारसी । सत्त वरस तप किन्न । नब ढुंढो सुनकै गई । रही भ्रात सुष चिन्ह || छ॥ ६ ॥ (१) मो. और को प्रति में यह (होली) समय नहीं है। (२) ए.-माहि। २६ ६०२ पृथ्वीराजरासा । [बाइसवां समय २ ढुंढे तन मन जन्य मैं । बाल किया भसमंत ॥ प्रिथीराज चहुवान भय । भए सूर सामंत ॥ ई० ॥ ७ ॥ तब ढुंढी बैठी रही । सत्त वरष जग जान ।। पवन खाय सेवा करै । ताको सुनौ बषान ॥ छ० ॥ ८ ॥ तब गिरिजा ने प्रसन्न होकर ढुंढिका से कहा कि में प्रसन्न हूं वर मांग। तब गिरिजा सु प्रसन्न भय । मगि ढुंढी बरदान ॥ हम सदै तब सह करनि । भष्षि करै नर जान ॥ ई० ॥ ६ ॥ ढुंढिका ने कहा कि यह वर दो कि बाल वृद्ध सब को मैं भक्षण कर सकू। बाल वृद्ध भष्यन करौं । हम को दै महमाय ।। यह बानी सुनि सामुही । रष्या करनी राय ॥ ई० ॥ १० ॥ गिरिजा ने शिव जी से कहा कि ऐसा उपाय कीजिए कि ढुंढिका की बात रहै और वह नर भक्षण न कर सके। तब गिरिजा पति सैों कयौ । ढुंढी रष्ष सु वत्त ॥ टुंढी नर भष्षन करै । साय विचारो मत्त ॥ छ० ॥ ११ ॥ गिरिजा सिव मिलि यों कहै । एक अपरब वत्त । जोगी जंगम बाहुरै । मे गषे निन नित्त ॥ छ ॥ १२ ॥ शिवजी ने आज्ञा दी कि फागुन में तीन दिन जो लोग गाली बके, गदहे पर चढ़े, तरह तरह के स्वांग बनावें उनका छोड़ और जिसको पावै वह भक्षण करें । विहल विकल वानी असुर । बोलहिं बोल अनन्त ॥ एता नर मारीत जवि । अवरनि का करि अंत ॥ छं० ॥ १३ ॥ सिव अग्या पवनह दई । प्रिथमी घर सहु अंग ॥ फागुन मातह तीन दिन । करौ अनेरी रंग ॥ ई० ॥ १४ ॥ रासभ परि चढ़ि चढ़ि इसहिं । सूप सीस धर लेहु । गोसा बंधै गलि फिरै। हो हो सबद करेहु ॥ छ ॥ १५ ॥ - । SANRMISHRAVANEnerealyars बाइसवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासा । ६७३ से . ढुंढिका ने जब आकर देखा तो सभी को गाली बकते, पागल बने, गाते, बजाते, आग जलाते, धूल राख उड़ाते पाया। ढुंढी आइ जहां तहां । दिष्ये लोग अजान ।। हो हो करि रासभ चढे । ए कवि कहै बषान ॥ ई० ॥ १६ ॥ चटक चटक दिन प्रति भएं । मद मादक अप्रमान ॥ नर नारी सब मति गई । ए पन मन अनुमान ॥ छं० ॥ १७ ॥ सिंध राग बजावहीं । गावहिं नवला गीत ॥ हो हो करि हा हा करें । ए मंडी विपरीत ॥ छ० ॥ १८ ॥ घरि घरि अगनि प्रजारहीं । उभिक धर अरु राष ॥ नाचे गावे परस्पर । त्रिया दिषावत काष ॥ ई० ॥ १८ ॥ इहि बिधि बाउ जवाविउ । फगुन मास से भाव ॥ लज्ज भज्ज विघ्घन गई । भावै षाव सुषाव ॥ छ ॥ २० ॥ इस प्रकार से लोगों ने इस आपत्ति को टाला, चैत का महीना पाया घर घर आनन्द हो गया। इहि विधि दुरित निवारियौ । मिव्यौ सबी उर दंद ॥ आये। चैत सुहामनौ । गृह गृह भयौ अनंद ॥ ई० ॥ २१ ॥ जाड़ा बीतने और बसंत के आगमन पर लोग होलिका की पूजा करते और ढुंढिका की स्तुति करते हैं। श्लोक ॥ गनेनु पार समये । वसंते च समागमे ।। होलिका प्रब्ब पूज्यंते । ढुंढा देवी नमोस्तु ते ॥ ई० ॥ २२ ॥ इति श्री कबि चंद बिरचिते प्रिथीराज रासके होली कथा समय नाम बावीसमा प्रस्ताव सम्पूर्णम् ।
में अथ दीपमालिका कथा लिष्यते । (तेइसवां समय।) पृथ्वीराज ने फिर चन्द से पूछा कि कार्तिक में दीपमालिका पर्व होता है उसका वृत्तान्त कहो। दूहा ॥ फिर पूछी पृथिराज नृप । कहो चंद कवि सब्ब ॥ होतु सुकातिक मास महिं । दीप मालिका प्रब्ब ॥ ई० ॥ १ ॥ चन्द का दीपमालिका की उत्पत्ति कहना। कहि कविचंद नरिंद सुनि । जो पुच्छौ कथ मोहि ॥ दीपमालिका उतिपत्ति सब । कहै सुनाऊं तोहि ॥ छ० ॥ २ ॥ सत्ययुग सत्यव्रत राजा का बेटा सोमेश्वर बड़ा प्रतापी था, सुर नर उसकी सेवा करते थे, वह प्रजा पालन में दक्ष था, सब लोग उससे प्रसन्न थे। सतयुग सतरत राजसय । प्रत्य दिषायौ देव ॥ तासुत सोमेसर कहिय । सुर नर करत सुसेव ॥ छं० ॥ ३ ॥ बहुत पुष्प पालै प्रजा । रिच दिव मंडान । च्यार धर्न चंहु आश्रमहि । दान मान परिथान ॥ ई० ॥ ४ ॥ उस नगरी में समुद्र तट पर बहुत अच्छे बाग लगे थे वहां एक बैदिक ब्राह्मण रहता था, उसकी स्त्री छल रहित थी। ता नगरी सत्यावती । सरित समुद्रह तहि ॥ बारी वाग विचित्र नर । ग्यान ध्यान घटि घहि ॥ ६ ॥ ५ ॥ नहां वसे सतश्रम हिज । वेदवंत वल बुड्डि ताकी नारी नागरी । तार नाही रिद्धि ॥ ॥ ६॥ स्त्री ने पति से कहा कि धनहीन दशा में जीना और दुःख भोगने से मरना अच्छा है, सो इसका कुछ उपाय करो। अवर न कोई नर दुषी । सुष भोगवा अनंत ॥ ॥
तेइस समय २] पृथ्वीराजगसो । ६०६ ने नारी कहि जिसु रष्ण सम । विथा जीव तुम कंत ॥ ई० ॥ ७ ॥ विथ्या जीवन मनुष का । जो धन नाही पास ॥ तातं को उपचार कर । करै रहै बन वास ॥ ई० ॥ ८ ॥ सत्यश्रम ब्राह्मण ज्ञान ध्यान की ओर चित्त दिया। तब सतिश्रम आदर करिय । ग्यान ध्यान चित देषि ॥ जीवन जनम विथा गयो । पार उदय तन देखि ॥ छ ॥ ८ ॥ गाथा ॥ सपनो अथ्य विहनौ । सेवेरने न भाषया दीनी ॥ मंगह मरन मह गोन । बीकि नेम न मानि कित ॥ ई० ॥ १० ॥ सत्याश्रम ने सौ वर्ष तक विष्णु का ध्यान किया, विष्णु ब्रह्मा को बताया, ब्रह्मा ने रुद्र को कहा, रुद्र ने कहा कि माया को प्रसन्न करा हमारा सब काम वही करती है। दोहा ॥ सत्ति सरम सत वरष लो । सेये विष्णु नरंत विष्णु वताया ब्रह्म कां। ताको पार न अंत ॥ छ० ॥ ११ ॥ तब ब्रह्मा सु प्रसन्न भय । रुद्र बताया ताम ॥ रुद्र कयौ माया बरहु । करै हमारो काम ॥ छ० ॥ १२ ॥ तीन वर्ष तीन महीना तीन घड़ी में वह प्रसन्न हुई और उसने चौदह रन दिए । चियन बरस चिय मास दिन । चीय घटी पल उन्न । सु प्रसन भडू सा कामिनी । दिय चौदहा रतन्न ॥ ई० ॥ १३ ॥ सत्यम ने विचार किया कि राजा की सेवा करनी चाहिए, ऋद्धि सिद्धि से क्या होता है। तब सतिश्रम ऐसी कही। कहा रिद्ध अरु सिद्धि । सेवा नरपति नाह को । एह बातएछु तिह ॥ छ ॥ १४ ॥ दिन पहर बुधि उप्पजी। दिन विहल्लि वुधि जार । (१) .-का।
अथ दीपमालिका कथा लिष्यते । (तेइसवां समय।) पृथ्वीराज ने फिर चन्द से पूछा कि कार्तिक में दीपमालिका पर्व होता है उसका वृत्तान्त कहो । दूहा ॥ फिर पूछी पृथिराज नृप । कहो चंद कवि सब्ब ॥ होतु सुकातिक मास महिं । दीप मालिका प्रब्ब ॥ छं० ॥ १ ॥ चन्द का दीपमालिका की उत्पत्ति कहना। कहि कविचंद नरिंद सुनि । जो पुच्छौ कथ मोहि ॥ दीपमालिका उतिपत्ति सब । कहै सुनाऊं तोहि ॥ छ० ॥ २ ॥ सत्यव्रत राजा का बेटा सोमेश्वर बड़ा प्रतापी था, सुर नर उसकी सेवा करते थे, वह प्रजा पालन में दक्ष था, सब लोग उससे प्रसन्न थे। सतयुग सतरत राजसय । प्रलय दिषाया देव ।। तासुत सामेसर कहिय । सुर नर करत सुसेव ॥ छं० ॥ ३ ॥ बहुत पुष्प पालै प्रजा । रिच दिड मंडान । च्यार धर्न चंहु आश्रमहि । दान मान परिथान ॥ छं० ॥ ४ ॥ उस नगरी में समुद्र तट पर बहुत अच्छे बाग़ लगे थे वहां एक बैदिक ब्राह्मण रहता था, उसकी स्त्री छल रहित थी। ता नगरी सत्यावती। सरित समुद्रह तहि ॥ बारी वाग विचित्र नर । ग्यान ध्यान घटि घहि ॥ ई० ॥ ५ ॥ वहां से सतश्रम हिज । वेदवंन वल बुड्वि ॥ ताकी नारी नागरी। ताछर नाही रिवि ॥ ० ॥ ६ ॥ स्त्री ने पति से कहा कि धनहीन दशा में जीना और दुःख भोगने से मरना अच्छा है, सो इसका कुछ उपाय करो। अवर न कोई नर दुषी । सुष भोगवा अनंत ॥
तेइस समय २] पृथ्वीराजरासो। ६५६ रुद्र को का कहा, ने नारी कहि जिसु रष्ष सम । विथा जीव तुम कंत ॥ ई० ॥ ७ ॥ विथ्था जीवन मनुष की । जो धन नाहों पास ॥ ताते को? उपचार कर । करै रहै बन बास ॥ छं० ॥ ८ ॥ सत्यश्रम ब्राह्मण ने ज्ञान ध्यान की ओर चित्त दिया। तब सतिश्रम आदर करिय । ग्यान ध्यान चित देषि ॥ जीवन जनम विथा गयो । पाप उदय तन देखि ॥ छ० ॥८॥ गाथा ॥ सपनो अथ्य विहनौ । सेवेरने न भाषया दीनौ ॥ मंगह मरन मह गोन । बीकि नेम न मानि कित ॥ छं० ॥ १० ॥ सत्याश्रम ने सौ वर्ष तक विष्णु का ध्यान किया, विष्णु ने ब्रह्मा को बताया, ब्रह्मा ने कहा, रुद्र कहा कि माया को प्रसन्न करा हमारा सब काम वही करती है। दोहा । सत्ति सरम सत वरष लो । सेये विष्णु नरंत । विष्णु वतायै ब्रह्म कौं। ताको पार न अंत ॥ छ० ॥ ११ ॥ तब ब्रह्मा सु प्रसन्न भय । रुद्र बताया ताम ॥ रुद्र कयौ माया बरहु । करै हमारी काम ॥ छ० ॥ १२ ॥ तीन वर्ष तीन महीना तीन घड़ी में वह प्रसन्न हुई और उसने चौदह रत्न दिए । चियन बरस चिय मास दिन । बीय घटी पल उन्न ॥ सु प्रसन भद सा कामिनी । दिय दहौ रतन्न ॥ ॐ ॥ १३ सत्यश्रम ने विचार किया कि राजा की सेवा करनी चाहिए, ऋद्धि सिद्धि से क्या होता है। तब सतिश्रम ऐसी कही। कहा रिद्ध अरु सिद्धि । सेवा नरपति नाह को । एह बातएहु ति ॥ ॥ १४ ॥ दिन पद्धर बुधि उप्पजी । दिन विहल्लि वुधि जार ॥ ॥ (१) कृ.-का।
६०० पृथ्वीराजरासा । [ तेइस समय ३ दीप दिषाया बुद्धि वर । बभ दीप लछि जादू ॥ ई० ॥ १५ ॥ गाहा । को कौन पथीयो । को कैान जची ।। कह कहन नामियं सीस । दुभर' गअर चक्क झै किन्नयं किन कायवं ॥ छं० ॥ १६ ॥ ब्राह्मण की बुद्धि में प्रकाश हुआ कि कार्तिक की अमावस सोमवार को लक्ष्मी उसके पास आती है। दोहा ॥ बंभन बुद्धि विलास हुइ । नई दिष्पै लछिवास ॥ कार्तिक मावस सोम दिन । लछि श्रावहि तिहि पास ॥ ई० ॥ १० ॥ लच्छी जल निधि ही वसी । निकसि निह दिन दिन्न ॥ अगर कपूर सुदीप दर । जहां पान उर बिन्न ॥ कुं० ॥ १८॥ ब्राह्मण को चार वर्ष राजा की सेवा करते बीता तब राजा ने कहा कि वर मांग। बंभन राजा सेवनौ । बरस भये दुअ च्यार ॥ तब राजा वरदान दिय । मंगौ मन्त्रि विचार ॥ छ ॥ १८ ॥ ब्राह्मण ने दीपदान बर माँगा अर्थात् कार्तिक की अमावस को उसके अतिरिक्त संसार में दीपक न जलै । तब बंभन ऐसी मॅगी। दीपहु दान विचारि ॥ कार्तिक मास समुद्घ दिन । दीपं नव संसारि ।। ई० ॥ २० ॥ अच्छे लोयन अछि तहां । अच्छे लायन निपान || नर नारी उद्दिम रहै । पीक परी तिहिपान ॥ ई० ॥ २१ ॥ राजा ने कहा कि तुमने क्या माँगा ब्राह्मणों की पिछली बुद्धि होती है, अन्न धन गाँव मांगना था, अस्तु अब घर जाओ। कहा मैंगी तुम देवता । पश्चिम बुद्धी विप्र ॥ अन धन गांव गंमार मगि । घर जाओ तुम विप्र ॥ छं० ॥ २२ ॥ ब्राह्मण ने घर आकर एक मन तेल और सवा सेर रुई मंगाई। (१) ए.-उभर।
तेइसवां समय ४] पृथ्वीराजरासे।। ६०८ ॥ अपने घर तब आय करि । तेख लिया मन एक ॥ रूई सेर सवा लई । इह तन की जु विवेक । छं० ॥ २३ ॥ कार्तिक आया, ब्राह्मण ने उत्साह के साथ राजा से कहा कि जो मांगा था सो दीजिए। कार्तिक आयौ कलपतरू । विग्रह भयो उछाह ॥ मंग्या हतौ सु देउ प्रभु । पड़ह बाज बहु नाय ॥ छं ॥ २४ ॥ राजा ने आज्ञा प्रचार कर दी कि उस दिन काई दीपक न बाले। तब आयस नरपत किया। कोय न बाले दीप ॥ आज्ञा भंग जो को करै । ताहि बँधाऊ चीप ॥ ई० ॥ २५ ॥ लक्ष्मी समुद्र से निकली तो उसने सारे नगर में अँधेरा पाया केवल ब्राह्मण के घर दीपक देखकर वहीं आई और विचार किया कि यहीं सदा रहना चाहिए । लच्छि समंदं निस्सरी । आई नगरहु तथ्य ।। अंधारौ अहि परजे । सु दीपक दिछौ जथ्य ॥ ई० ॥ २६ ॥ बंभन के घरि दिष्पि करि । आइ सही दरबार । अह निसि वासै इम वसै । लच्छी कहै विचार ॥ ० २७ ॥ लच्छी बच्छी क्या करै । दारिद दहि मुहि मत्त ॥ तू पाला घर थान रहि । सदा दुचित्तै चित्त ॥ छ० ॥ २८ ॥ मो संगि सध्थि ज निरबहै। । नदी पनि गिर दंद ॥ रात दिछ वासा वसे । सं छंद्यौ मति दंद ॥ ई० २८ ॥ लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उसका दारिद्र काट कर वर दिया कि सात जन्म मैं तेरे घर बसूंगी। तब बच्छी सु प्रसन्न हुइ । कहे रोर करंक ॥ सात जनम तुरि घर वौं । एक वसत अकलंक ॥ ई० ॥ ३० ॥ तब दरिद्र भागा ब्राह्मण ने उसे पकड़ा कि मैं तुझे न जाने दूंगा। तब दारिद्र जु भजि चल्यो । बंभन पकस्यौ धाय । ।
६५६ पृथ्वीराजरासे।। [ तेइसवां समय ५ इक छोरी तुम पुब्ब से । लच्छिक देव न जाय ॥ ई० ॥ ३१ ॥ दरिद्र ने वाक्य दिया कि मुझे जाने दो में कभी इस नगर में न आऊंगा। तब दरिद्द वाचा दई । मो कू तूं दे जान । बहुरि न जाऊँ वह पुरी । असे को बधान ॥ ई० ॥ ३२ ॥ उसी घड़ी से उसके यहाँ आनन्द हो गया हाथी घोड़े झूमने लगे। उसी दिन से यह दीपमालिका चली। घरि लच्छी आनंद मन । हय गय मान महंत ॥ दीपमालिका तदिन तैं। एह चली महि वैत ॥ छ० ॥ ३३ ॥ चारा दिशा में दीप मालिका का मान्य है। यह कथा कवि चन्द ने कह सुनाई। पुब्ब पछिम उत्तर दछिन । दीपमालिका मान । षान पान परिमान मन । काम मनोरथ थान ॥ छं० ॥ ३४ ॥ कही चंद आनंद सैौ । पुच्छी नृप प्रिथीराज ॥ दीपमालिका प्रगट हुइ । घरि घरि मंगल साज ॥ छं० ॥ ३५ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रिथीराज रासके दीपमालिका पर्व कथा समय नाम तेवीसमों प्रस्ताव संपूरणम् ॥
अथ धन कथा लिष्यते । ॥ (चौबीसवां समय ।) खद बन में शिकार खेलने और नागौर में शाह गोरी के कैद करने की सूचना । दूहा ॥ षटू भाषेटक रमै । महिम मुरस्थल यांन । नागौरै गोरी ग्रहन । सथ विमल परधान ॥ ई० ॥ १ ॥ पृथ्वीराज का कैमास की वीरता, बुद्धिमत्ता आदि की प्रशंसा करके प्रश्न करना ॥ कवित्त ॥ मंत्र जोग कयमास । मंच प्रथिराज सु पुच्छन । तूं मंत्री मंचंग । मंत्र जानहि सुभ लच्छन । सांम दांन अरु भेद । डंड निरनै करि लष्ये ।। बडु मंत्रह उप्पाइ । राज मंत्रह करि रध्यै ।। मंचह सुमंत्र मन अनुसरै । अरु मंच भेद जानै सकल ॥ अदभुत चरित्त पाषांन लिषि । बंचिन किन आवै अकल ॥ छ२ ॥ तू मंत्री कयमास । मंत्र पय पय उप्पावहि ॥ तू मंत्री मंचंग। मंत्र मंत्रीन दिषावहि ॥ मंत्री सामंत । * स्वांम धम्मं विचारै। धर समूह संग्रहै । मंच करि अरिन विडारे तुम जोग मंत्र मंत्री न कोइ । सह बत्तन उच्चार के ॥ संसार सार मंत्रह प्रवल । कहा मंत्र विच्चारि के ॥ छ० ॥ ३ ॥ एथ्वीराज का प्रश्न करना कि तालाब के ऊपर एक विचित्र पुतली है जिसके सिर पर एक वाक्य खुदा है, इसके अर्थ करने में सब भटकते हैं सो तुम इसका अर्थ करो। (१) मो.-मरुस्थल कृ-मुरस्थल । * मा प्रति में “सांमि धृम्मं सुविचारे" पाठ है। त पृथ्वीराजरासा । चौबीसवां समय २ कवित्त ॥ सलिल सुबर पाषांन । मध्य पूतली अभं ।। सलिल मत्त तन जा विसाल । उप्पम रिस रंभ। ता उप्पर बिय नाम । प्रगट प्राकार उचारै भूलि भूलि भ्रमि लाइ । मुख मनसा करि डारै ॥ वा सु वीर कैमास वीर कैमास तुम । बिया बंच नाही बनिय ।। भूतह भविष्य अरु उत्तमन । इह अपुब्ब में कथ सुनिय ॥ ई० ॥ ४ ॥ पुतली के सिर का लेख "सिर कटने से धन मिले सिर रहने से धन जाय" टूहा ॥ सिर कट्टै धन संग्रहै। सिर सज्जै धन जाइ । को मंत्री कैमास तूं। मंत्राहि करै उपाइ ॥ छ० ॥ ५ ॥ पृथ्वीराज का मंत्री के कर्तव्यों का वर्णन करके कैमास से परामर्श करना । कवित्त ॥ श्रबन राज हग रत | श्रवन जानहि परिमानना ।। बेद दिष्ट देबै सु । भेद अभेद सु ग्यानन ॥ पसुत्र नयन आचरहि । धनह परिमान सु लष्प ॥ विपति लाइ संसार | सार द्रिग इक्कय दिष्यद ।। मंघीन दिष्ट मंत्रं तनी । मंत्र भेद अनुसर सरति ॥ बमान बीर जाने सक्कल । बूढ ग्यांन प्रौढ़ह सुमति ॥ छं० ६ ॥ कवित्त ॥ निष्ण तरंगन बचौ । मंत्र तारक हरि सुवरि ॥ बदरि अंध कलार । राज दंडह लिय उद्दरि ॥ सारष जक जीव । नयन विधात धात जुरि ॥ अषिद्ध अषेटक भूल्लि । डुल्लि जब चित्त मित्त परि ॥ भुल्लहि सुदान विम्मान गति । मरन मंन्न नहि लिष्पवै ।। मंत्री न मंत्र भुल्लै त । विधि विचार विधि दिष्यवै ॥ ई० ॥ ७ ॥ (१) मो.-रस। (२) मो.-को प्रति में "श्रव जानन परि मानन" पाठहै (३) मो.-लहि। (४) ए.-वमान। (५)-मो-पन्यो। (६) मा. कृ.-वंदक्षि। (७) मो.-मनं।
चौबीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासा । ६८३ तू पृथ्वीराज का कहना कि सुना है कि बीर बाहन कोई राजा था वह बड़ा प्रजा पीड़क था और धन बटोरता था सब प्रजा ने उसे शाप दिया कि निश मरेगा और राक्षस होगा सो यह उसी का धन है छंद पद्धरी॥ अब कहीं मंच तुम पुच्छ लाइ । मनि ग्रहों नैम जिन करी सोइ ॥ पाषान अंक में लिखे राइ । वृत्तंत सोइ सब कछु सुनाइ ॥ ई॥८॥ बाहन सुबीर कोइ भयो राडू । तिहि पाप क्रम लीनी उपाडू ॥ संसार सकल तिहि दुष्प दीन । सेवकन सेवनिह द्रव्य कीन ॥ ई० ॥ ८ ॥ प्रज पीड़ माल संग्रह्यौ कोरि । भरि जनम मूढ़ भंडार जोरि ।। संसार सकल तिन दुष्प पाडू । सब श्राप दीन इह अगति जाइ ॥ ई० ॥१०॥ विन वंस इंसह तजै देह । इम प्रजा सकल कहि अप्पनेह ॥ कितनेक दिवस तिन तज्यौ श्रीर । भंडार पाहि वह सुनौ वीर ॥ छ० ॥ ११ ॥ कैमास का कहना कि इस काम में अकेले हाथ न डालिए चित्तौर के रावल समरसिंह को बुलवा लीजिए क्योंकि जयचन्द, शहाबुद्दीन, भीमदेव आदि शत्र चारों ओर हैं अप पास कढ़न नहिं जाइ राइ । चिचंग राव বিজী बुला॥ मिलि सुभट तास कट्ठी भंडार । तिन बिना दंद मच्चै अपार ॥ ई० ॥ १२ ॥ कनवज्ज राव जैचंद देव । नर असी लष्य तिन करत सेव ॥ गज्जन नरेस साहाब साह। दस लष्य मेच्छ सेवंत ताह ॥ छं० ॥ १३ ॥ गुज्जर नरिंद भीमंग देव । तिन अप्प अब्ब परिकंक केव ॥ ढिल्लीस तेज तूंबर नरिंद । तस बन्यो वैर उपजै सु दंद ॥ ई० ॥ १४ ॥ अप तुच्छ सेन इह मत्तमानि । मिलि समर सथ्य पुछि लच्छवानि ॥ ई० ॥१५॥ पृथ्वीराज का कैमास की इस सलाह का मानकर उसका सिरोपाव देना और उसकी बड़ाई करना। चौपाई ॥ राजा ढिग कैमास बुलाइय । पहराद्य सुउच्च सिरपाइय ।। बगलि अप्प पारोहन बाजन । करी सुपारस सुसर कि राजन ॥ ई०॥ १६ ॥ (२) मो.-उपज्यो । (१) ए.-च्छ।
६८४ पृथ्वीराजरासो। [ चौबीसवां समय ४ . टूहा ॥ हरषि राज प्रथिराज कहि । मति कैमास दै नाम ॥ मति कैमास कैमास तुम । सकल सुमति के धाम ॥ ई० ॥ १७ ॥ दूहा ॥ जां मंत्रह पूछत पति । सांई अंग सु काम ॥ समर सिंघ रावर मिले। धन का अभिराम ॥ छं० ॥ १८ ॥ पृथ्वीराज का चन्द पुंडीर को बुलाकर चिट्ठी दे समरसिंह के पास भेजना। मांनि मंत्र चहुन इह । बोलिय चंद पुंडीर ॥ समर सिंघ रावर दिसा। दै कग्गद मति धीर ॥ ई० ॥ १८ ॥ रावल की भेट को घोड़े हाथी आदि भेजना। दूहा ॥ दस हैबर इक बग्ग बर । अरु दिय सिंगिनि पानि ॥ कहि जुहार विधि जंपियौ । नृप पुच्छिय कुसलांनि ॥ छं० ॥ २० ॥ चन्द पुंडीर का रावल के पास पहुंच कर पत्र देना और गड़े धन के निकालने में सहायता के लिये रावल से कहना, क्योंकि पृथ्वीराज के शत्रु चारों ओर हैं। कवित्त ॥ लै कग्गद प्रथिराज । बीर पुंडीर संपन्नौ । सुबर जोर साहाब । मंडि गोरी धर थन्नौ । बर भोरा भीमंग। चंपि नाहर राउ नरिंद । सेन लष्षां असि दग्गा ॥ आषंड द्रव्य दिल्ली धरां । सुनि चढ़े दिगपाल सजि ।। कढियै मंच मंत्री अपुन । बर बिभूति लच्छी सुरजि ॥ ई० ॥ २१ ॥ रावल समरसिंह के योगाभ्यास और जल कमल की तरह राज्य करने की प्रशंसा। कवित्त ॥ समरसिंघ रावर नरिंद । समर सह संभर जित्तन । अरु जोगिंद नरिंद । चित्त जोगिंद समत्तन ॥ कमल माल सो भत्ति । चंद लिल्लाट बीय दुति ॥ चालुक्क बिलग्गा ॥ (१) मो.-कैबास ।
चौबीसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो। ६८५ नयन रंभ आरंभ । जोग पारंभ सिंभ मति ॥ मुंजीव ढाल जीपन विरद । नाग मुषी सिल्लार बनि ॥ सा चित्र कोट ओरह नृपति । महन रंभ मंडहि सुमनि ॥ ० ॥ २२॥ पत्र पढ़कर समरसिंह ने हंसकर चन्द पुंडीर से कहा कि संसार की यही गति है कि मांस के एक लोथड़े को एक गिद्ध लाता है और दूसरा खाता है, काई कमाता है कोई भोगता है यह देव गति है। दहा ॥ बंचि बीर कग्गद बपति । हसिय चित्त बर बंक ॥ ककु लज्जा सगपन सु हित । रष्य पुंडीरां संक ॥ ई० ॥ २३ ॥ कवित्त ॥ हसि जोगिंद नरिंद । वत्त में मुष उच्चारिय ॥ *एक अध्र समूह । मंस लधौ पल्ल हारिय ।। श्रब्ब ग्रिड विटयो । मंस चप्पो जै कारिय ॥ तब सुमंत उप्पनौ । मंस लधौ गहि डारिय ॥ भुगवैति कोइ गड्डैति कोइ । कोइक पढ़ कोइ लम्भवै दैवान दुसंकह दैवगति । जो निम्मान सु विम्मवै ॥ छं० २४ ॥ चन्द पुंडीर ने कहा कि आपने ठीक कहा पर पृथ्वीराज आपका बड़ा भरोसा रखते हैं सो चलिए । कवित्त || सुनि रुवत्त पुंडीर । बत्त जंपी सुनत्त जोइ ॥ तुम जोगिंद नरिंद। मत्त जंपा सुतत्त होई ॥ सुत्र सेमेस नरिंद । सुवन सगपन मिस पुच्छिय ॥ तुन चहुआना' गरुन । मुष्प कट्ठा किम ओक्यि ।। सामंत नाथ सामंत बल । मेर ठेलि दच्छिन धरहि ॥ प्रथिराज आज राजिंद गुर । इंद फुनिंद न से डरहि ॥ छं० ॥ २५ ॥ शहाबुद्दीन आदि पृथ्वीराज के प्रचंड शत्रुओं का सामना है इस लिये सहायता में आपका चलना चाहिए। * यह पंक्ति मो• प्रति में नहीं है। (१) मो. को.-लहुअाना । ।
पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय ६ कवित्त ॥ अग्गैहू रावर समर । करन साहस चहुवानिय ॥ हलहल अग्ग प्रचंड । संभ सेभ गर बानिय ॥ अग्गा अग्ग जुगिंद । अग्गि लग्गै विरुझांनिय ॥ अाग सिंध निडर नरिंद । उढ चपै परवानिय ।। अग्गे व काल सुनिये दुसछु । सह पिच्छ फिरि उड्डया' ।। चित्रंग राव रावर समर । संभरि वै दिसि चढ़या ॥ छं० ॥ २६ ॥ रावल समरसिंह का सेना आदि सजकर चलना सेना की तैयारी का वर्णन । रिंग्यो सबर नरिंद । सज्जि है गै चतुरंगिय ॥ ध्य गय दन्तु चतुरंग । जंपि माहा भर जंगिय ॥ महा सुभर गज्जत । धूदि पुरधर आहुहिय ॥ सेस सहस फन फहि । सकिलि सल मलि साहुहिय ।। फव्यौ सु सेस फन चंद कहि। तब फुकर करि जग्गयो । फन किंन्न उद कुंडल करिय । तब सु सेस बल भग्गयौ ॥ ई० ॥ २७ ॥ छंद भुजंगी। बरं बिटियं समर साहस नरिंदं । मनों बिंटियं उड़गनं अभ्य चंदं ॥ किधो इंद्र पास सबं देव राजै। किधों मेर तीरं सु पब्बै विराजै॥ई० ॥२८॥ उठ्यौछत्र सीसं विराजै कला की। मनों इंद्र इंदी बरं चंद जाकी ।। दुतीता उपम्मा कवी का बषानं। मनों हेम के दंड पर चंद जानं ।। ई० ॥ २८ ॥ कळू स्यांम पाटं विराजै करारी । मनो कहई सोम कालंक कारी । मयंमद गज्जं सब सु उ? । बरष्यंत दानं मनो मेघ बुढ़े ॥ छं० ॥ ३० ॥ बजैता जंजीरं अनेकं सबई । मनों बुल्लियं भिंगुरं मास भई ।। धज धज्ज हालै विराजैफिरती। मनों मंडियं बग्ग घन मभिक पती॥॥३॥ गजं उप्परं ढाल साहै ढलक्कै । मनों केलि उग्गी गिरं कज्जलकै * यह पंक्ति मो.-प्रति में नहीं है। (१) मो.-उट्टयो । (२) मा.-समर । (३) मो.-सफल । (४) मो.-बन्द । (५) मो.-ठलवक। (६) मो.-कज्जलक।
चौबीसवां समय ०] पृथ्वीराजरासो । ६८० 1 सितं अन हज्जार विंयौ नरिंदं। तिनं उपमा दिष्टि जंपी सु चंदं ई० ३२॥ सबै सेन चतुरंग सज्जी अनेक । मनों पारसं भान ग्रह एक एकं ॥ छ ॥ ३३ ॥ परामर्श करके रावल समरसिंह पृथ्वीराज के पास नागौर को चले। दूहा ॥ करि मत्ता च च पति । समर राव चहान ॥ नागोरह आए धरा। मवि कहि मेलांन ॥ छ० ॥ ३४ ॥ धर्मायन कायस्थ ने यह समाचार चुपचाप दूत भेजकर शहा- बुद्दीन को दिया कि दिल्लीश और चितौरपति धन निकालने नागौर पाए हैं। भ्रंमापन कायथ स्लभे । परठि दूत पतसाह || दिल्लि बै चित्तौर पति । धन कळे धरमाहि ॥ ई० ॥ ३५ ॥ समरसिंह का दिल्ली के पास पहुंचना और दूत का पृथ्वीराज को समाचार देना। कवित्त । जाइ संपत्ती समर । चंपि ढिल्ली धरवानं ॥ चहुआना रै हथ्य । दूत दीनौ फरमानं ॥ असम विषम साहसी । रत्त माया अनुरत्तं ॥ कमल पत्त जल जत्त । मध्य अरु न्यारी जत्तं ।। विप्पै न कलक काटन कलक । राज बंध बंध्यौ नहीं । दस कोस कोस ढिल्लीय तें । राज मुक्कि राजन तहीं ॥ ई० ॥ ३६ ॥ पृथ्वीराज का आध कास आगे से बढ़कर अगवानी करना । कवित्त || राज दै दरबार । सुबर आनंद उपन्नौ ॥ पुब्ब पाप कहनह । समर जित समर संपन्नौ । सुबर बीर जोगिंद। चंद विरदावलि दिन्नौ । दिल्ली ते अधकोस । राज अग्गे होइ लिन्नौ ।। छंद ३४-३५ मो.-प्रति में नहीं है और को. प्रति में ये ४० छंद के बाद मिलते हैं।
(१) मो.-जुन। पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ८ मंडरी मंडि देबै सु कवि । मति डंमरि लम्भे न दुइ ॥ समरह सु ग्रेह अरू समर अन्ति । समर सुबय अरु समर जु॥ छं॥ ३७॥ समरसिंह का अनङ्गपाल के घर में डेरा देना, दो दिन रहकर सब सामतों को इकट्ठा करके सलाह पूछना कि अब धन निकालने का क्या उपाय करना चाहिए । कवित्त ॥ अनंगपाल ग्रह जा विसाल । समर उत्तरिय प्रिथा पति ॥ विधि अनेक भोजन सु व्रत । राज उत्तर सु सार भति ॥ उभय दिवस बित्तीय । सब्ब सामंन सु पुच्छिय ॥ सांम दांन अरू भेद । कंक भजि कट्ठौ लच्छिय ॥ कं कान बंक तुम अनुसरहु । समरसिंघ रावर सुमन ॥ उपाइ मिटि सामंत करि । सु बर बीर कट्ठौ सुधन ॥ छं॥ ३८ ॥ कैमास ने कहा कि मेरी सम्मति है कि शहाबुद्दीन के आने के रास्ते पर दिल्लीपति रोके, और भीमदेव चालुक्य का मुहाना रावल समरसिंह राके और तब धन निकाल लिया जाय। कवित्त ॥ मनि सुचारु कथमा । द्रव्य कट्ठन उच्चारिय ॥ सेन मुष्य सुरतांन । राज दिज्जै प्रथुभारिय ।। चालुकां चंपै न सीम । रावल मुष दिज्ज अप्प अप्प मुष रष्पि । कठ्ठि लच्छी बर लिज्जै आलाभ जुच्छरे पय लाभ तुछ । सु का काम किज्जै नही ।। गोइंदराज षीची सुमति । मिलि विभूति कठ्ठ गही ॥ ई० ॥ ३ ॥ रावल समरसिंह का इस मत का पसंद करना और मंत्री की प्रशंसा करना। कवित्त | तब चिचंग नरिंद । चंदपुंडीर बरज्जिय ॥ तुम कुमंत बल मंत । भंत जांनी न सरज्जिय ॥ (२) मो.-यथ्य।
चैबीसा समय 1 पृथ्वीराजर सो। ६८६ ते मंत्री मंत्रंग। निगम आगम सब बुझ् । नंगन कै कुहत । घरह सुभ. मन बुभमें । अरि अरिन मुष्प रुकहि सुभर । तब सु द्रव्य मिलि कढियै ॥ सुरतान भीर भंजै समर । सुमन मंत करि चट्ठियै ॥ ई०॥ ४० ॥ नागौर के पास सब का पहुंचना, सुलतान के रुख पर पृथ्वी राज का अड़ना, शाह के चरा का पता लेना। कवित्त ॥ जाइ संपतो समर । मध्य नागौर प्रमानह ।। सुरताना रै मुष्प । कोट अड्डो चहुबानह ॥ धन असंष कढ़ तहां । साह चर बर पगधाइय ।। चरचि चित्त सत्र सरित । वित्त करि हथ्य दिषाइय ॥ साहाब सुकर फुरमान दिय । गांमी छल बल लगया ॥ कढी सुलच्छि आहु पनि । मुष चहुआन विलग्गया ॥ ॐ० ॥ ४१ ॥ दो दो कास पर पृथ्वीराज और समरसिंह का डेरा देना। कवित्त ॥ उभय दूत नागौर । दून चहुबान पास टुअ ॥ सब चरित्त धरि वित्त । लषन लष्यो सुसेन सुअ॥ है कोसां चहुन । कोस चित्रंगराज दुअ ॥ अवन गवन जानहु सुवत्त । अनुसरहु पंथ जुत्र । मन मध्य कथ्य जानहु सकल । चलहु करार राज धन धंम अर्थ कट्ठदू चरित । कहाँ वत्त दिष्यै दूत का शाह को समाचार देना कि नागौर में धन निकालने के लिये दिल्लीपति आगर । टूहा ॥ कलि चरित्त नागौर पछु । दूत सपत्ते आइ ॥ दिल्ली वै कट्टै सुधन । बज्जा बज्जन वाइ ॥ छ० ॥ ४३ ॥ नागौर के समाचार पाकर सुलतान का उमरा खां के साथ डङ्का निशान के सहित पृथ्वीराज पर चढ़ाई करना । ले ॥ । सु लै ॥ छं० ४२ ॥
६६० पृथ्वीराजरासा । [चौबीसवां समय १० कवित्त ॥ वज्जा बज्जन वाइ । देषि दैवान दुसंकह ॥ चित्रकोट रावर नरिंद। कहन भुज अंकह ॥ संभरि वै आठ । लच्छि व डन बत्तीसह ॥ गज्जन बै सुरतांन । दूत लै आइ चरीतह ॥ सुनि सच्छ नच्छ नीसान किय । बोलि उम्मरा पान सह । सज्जौ सुसज्ज संभरि दिसा । चाडुआन किज्जै बसह ॥ ई०॥४४॥ शाह का चक्रव्यूह रचना करके चलना, सेना की सजावट का वर्णन । कवित्त । साइ बदो सुरतांन । चक्का व्यूहं रचि चल्लिय ॥ एक एक असवार । विच्च पाइक तिह मिल्लिय। ता पच्दै गज पंति । पंति असवार समूहं । जमर जंग औराक । गौर जंबूरति जूहं । ता पच्छ पंति पुरसान षां । ता पच्छे बंधी अनिय ॥ तत्तार षांन निसुरत्ति षां । हांसिंमरू घोषर पनिय ॥ छं० ॥ ४५ ॥ पृथ्वीराज को बाई ओर से बचाता सुलतान धूमधाम से चला, शेषनाग का कँपाता पृथ्वी का धसाता रात दिन चलकर नागौर से आध कास पर जा पहुंचा। कवित्त ॥ वाम कोह प्रथिराज । भुक्कि सुरतान सुचल्लय ॥ सज्जि सेन चतुरंग । समर दिसि समर सुहल्लय । भूमि धस्यि धस मसिय । सेस कसमस्मि उक्रस्सिय ॥ कमठ विमठ हुअ विछ । दढ़ कूरंभ करस्सिय ॥ रिंगया सबल पुरसान दल । करि मुकाम सक्यौ न कोई ॥ नुर अड्च कोस नागौर तें। सज्जि बाज चप्पो सु जोइ ॥ छ० ॥ १६ ॥ यह समाचार सुन समरसिंह का धन पर मंत्री कैमास का रख- कर आप सुलतान पर क्रोध के साथ चढ़ाई करना। । (१) मा. ए.-साहावदी।
चौबीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो ६६ में कवित्त ॥ समर सिंघ सुनि श्रवन । बीर नीसान दिषंदे ।। सज्जि सेन चतुरंग । तरकि तोषार चढंदे ॥ थिर थप्पो कैमास । लच्छि उप्पर गहि रष्षिय ॥ तरकि तान सजि द्रोन । बलिय पारथ सम दिष्षिय ॥ भारथ्य कथ्य कवि चंद कहि । समर सार बर चल्लवै ।। उक्छारि सेन सुरतान को । हय अनि करि हल्लवै ॥ ई० ॥ ४७ ॥ समुद्र कमल फूले हों इस प्रकार से सुलतान की सेना ने डेरा दिया। दूहा ॥ साहस कर पत्तिय समुद । कमुद प्रफुल्लिय रंग ।। उतरि सेन सुरतांन तह । सह आई समरंग ॥ ० ॥ ४८ ॥ सवेरे उठते ही समरसिहं आगे सुलतान के दल की ओर बढ़ा, उसकी सेना के चलने से धूल उड़ने लगी। प्रात उदित रवि रत्त रँग । समर समर दिसि जग्मि । तब लगि दल सुलतान के । ह सु उड्डन लग्गि ॥ ॐ ॥ ४८ ॥ धूल उड़ने से सब दिशा धुंधरी हो गई, दोनों दलों का हथि- यार सज सज कर लड़ने के लिये तैयार हो जाना। कवित्त ॥ षह सुषेह डंमरिय । दिसा धुंधरी सुराजै ॥ श्रग्ग मग्ग उछ । चित्त उछछरै पराजै ॥ पवन बेग संजुरै । श्रवन लग्गा असि मंचं ।। रथ कुवेर चढ़ये । बांन बढुये सुमंत ।। दोउ दीन कर दुंद दल । लरन लोह सज्जे सु बर । चंप्यौ नरिंद पाठ पति । अगनि सार उड्डिय दुजर ॥ ई० ॥ ५० ॥ लड़ाई का प्रारम्भ होना । कवित्त ॥ धन नरिंद सुरतान । पान दोडू वीच समाहिय ॥ दोह मुष्प अरि रुक्कि । सिंघ बन की गति साचिय ।। । - (१) ए. को.कृ.-तरिक । * यह दूहा (छन्द) मो. प्रति में नहीं है।
६६२ पृथ्वीराज रासो । [चौबीसवां समय १२ धार धारब बज्जै प्रहार । न लग्गे नीसानं । संभरि वै सुरतान । मीर उठे झुकि षानं घरि च्यारि लग्गि तरवार झर । बहु उझार लग्गिय फरन । दोउ दीन भीन घट धुम्मि घन । उरि सेन लग्गे लरन ॥ छ ।। ५१ ॥ युद्ध का वर्णन । । छंद पद्धरी ॥ बलवंत सबल पाहार पुंज । कर धरै षग्ग धायौ सुनंज ।। लै पत्र चली कालिका नारि । पर बत्त गहै गय दंत भार ॥ छ॥५२॥ सिर तीर बुंद बरषत वारि । सिर नषै द्वंद अष्पित अपार ॥ षग्ग से पग वज्जै करार । धन टहै घाइ जनु मत्त वार ॥ छ० ॥ ५३ ॥ मस्संद मीर महुवत्त षांन । ढाहनह धीर धाया परांन । प्राचार कुंत क्रिय पुंज राज । समसेल चलै हनि षग्ग गाज ॥ छ ॥ ५४॥ तुम्यौ सु सीस संमेत पांनि । ढाहे कमंध महुबत्ति षांन । लघु बंधु रुस्तमा हनिय सूर । बर माल बरै ले चलीं हूर ॥ छ० ॥ ५५ ॥ जै जैत सवद पै जगत्त । पाहार करी अविगत्त वत्त । पाहार पुंज रुस्तम्म पनि । मुह जुरे मरद हये उतांन ॥ ई० ॥५६ ॥ है या षग्ग रुस्तम मरद । बाहयों षग्ग पुंजा दरद्द ॥ तुदृया सीस सा पुंज राज । अच्छरी वरै करि उर्द्ध काज ॥ ई० ॥ ५७ ॥ नारद नह ग्रह इंद मद्द । पलचरी कालिका करै नह ॥ प्राक्रम सूर देबै पहार । धनि धन्नि कदै भर सकल सार ॥ ५८ ॥ ब्रह्म पूरि भेदि गय सूर सार । अति उंच क्रम पामेव वार || ई०॥५॥ कवित्त ॥ बलिय फौज पाहार । दुतिय भारथ जिन मंद्यौ । अरि अच्छरि बर लीन । धार धारहु तन पंद्यौ ईश सीस संग्रह्यौ । इक्क में हथ्य न मुक्यौ । सुर सुरीय कँह जांनि । सरस सिंगारहु चुक्यौ । जानयो गवरि कह मानि किय । कहा जानि नंदी हस्यौ जांनये चंद इय कब्ब करि । चंद लिलाटहतें धस्यौ ॥छ० ॥ ६ ॥ (१) ए. कृ. को-भगा। (२) मो. प्रति में "बल उझझारिय पग भरज पाठ है चौबीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। ६६३ कवित्त ॥ मुत्ति लहत सामंत । सिद्ध मन डोलन लग्गा ॥ चुकि समाधि जगि सिंभ । बंभ आराधन भग्गा ॥ आपुतुचा तजि सूर । तुग म्हग्गन आराधी ॥ तन तुट्टिग अधि धार । मग्ग नहि अरिवाधी ॥ अचरिज्ज एक आतम गमन । देह मटी मुक्की निमुष ॥ पंषेरि षान्न मुक्किय जगत । सुकर किति चल्लिय सुरुष ॥ / ॥ ६१॥ दूहा ॥ षां ततार रुस्तम सुभर । अरु जे मीर समंद ॥ सोइ तत्ते गहि तेग परि । वर वीरा रस मंद ।। ई० ॥ ६ ॥ दूहा ॥ चंद बंध पुंडीर बर । लष्पन लष्पा सार ॥ मिले भीर मरदान मुष । धरि कर षग्ग करार ॥ छं० ॥ ६३ ॥ कवित्त ॥ षां ततार रुस्तम हुजाब । मुस्तफा महंमद ॥ है सज्जे बर सार । तथ्य आए मीरंबद ।। मार मार कहि धीर । मिले लष्पन लष्वेसर । सार धार वज्जत । भिस्यो मुष हम्भीर गुर ॥ पुण्डीर सुबर साहस बरह । करिव ष कातिग्ग देव देषत सिर । अरिय भूत नंचे अकल ॥ ई० ॥ ६४ ॥ छंद हनूफाल ॥ आए सुमीर मसंद । बर बग्ग धारिब इंद ॥ इक्कत हक्क करार । वज्जत कर करतार ॥ छं० ॥ ५ ॥ त्रिघ्घाय षग्ग त्रिकूट । बहि सार सामत जूट । पंडीर लष्पन लाइ । भर मीर आए दोर ॥ छं० ॥ ६६ ॥ बाहै दुसार करार । लरि लष्प लष्पन सार ।। झंडे सु बग्ग उझाहि । तुढे सु झल्लर तहि ॥ उकि उक्कि ईस रनदरे । नारद नंचि उमद ।। भमि मीर षुर घुर तार | जुरवंत मीर जुझार ॥ छ ॥ ६८ ॥ * "पिति संपुट पलभल्या । तुचा मगन आराधी” मा. प्रति में ऐसा पाठ है । (१) मो.-असि। (३) मो.-निमप। + मो.-प्रति में छन्द ६४ की प्रथम दो पंक्तियों का पाठ "खां ततार रुस्तम उजाव, खान मुस्तफा महांभर, है सज्जै वर सार, तथ्य आए सुर सरवर" है। (३) मो.-सुनद । ए.-नरद्द । ।
६६४ पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय १४ सुर।। भज्जत सेन सहाव । गज्जत लष्पन गाब॥ मत्तार नूरि हुजाव । रूस्तम महमुद श्राव ॥ ई० ॥ ६ ॥ बाद सुलष्पन सार । चिसि टोर किप्पर लार ॥ चौहनी लष्पन धार । परसंसि मीर झुझार ॥ छ० ॥ ७० ॥ गय सूर मंडल भेदि । भल कहत अच्छर बेद ॥ ई० ॥ ७१ ॥ कवित्त ॥ चंद बंध पुंडीर । नाम लयन लष्पे दुद देबि पञ्चार । दिया हुकार इक्कि गुर ॥ ईस सीस आनंद । पिंड गिधिन मन भाइय ।। टूर सूर अच्छरि बिमांन । चढ़ि देवन आइय ॥ आतम साई उतपति चल्यो । देव धान विश्रांम भय ।। जम लोक लोपि बसि ब्रह्म पुर । जंपि सेन दोउ सद्द जय ॥ ई० ॥ ७२ ॥ छंद दुमिला। छह गुर लहु पायं अछिर दायं विचि विचि रायं इंदोई ॥ दुमिनानय छदं पढ़य फुनिंदं कहि कविचंदं गुनगोई ॥ बज्जै रन तालं असि बर झालं भर भर हालं भंभीरं ॥ पारस सुविहानं छुट्टिय थानं चढ़ि मध्यानं कुटि तीरं ॥ छ०॥ ७३ ॥ गंजी जननं जरि भंगै हिकरि लरि रज उच्छरि गगनेदं । धर धीर धरंत जोग जुगंतं लरि लरि जोरं जरि मेछ । किरवांन करकै बिज्ज तरक्कै विच्छ उछक्के इन भेसं ॥ दो उप्पम भासं माधव मासं अति उल्हास दुति केसं ॥ ई० ॥ ७४ ॥ उडि सकै न गिई सरबहि विज्ञ हसयति सिईदै तारी ॥ षप्पर अधिकारी पंड उकारी जै जै कारी किलकारी ।। गज दंत न ब? दै पग चदै कुन सु कलै सिर चढ़े। कंदल परि उकै सीस विकुठे हनहि न रकै भर बढ्दै ॥ ई० ॥ ७५ ॥ दूहा ॥ सस्वन सस्त्र न उब्बरिय । मन बर कुहिय नांहि ॥ ज्या मध्या प्रिय तुच्छ निसि । सेरो सहर समांहि ॥ ७६ ॥ रावल समरसिंह के युद्ध का वर्णन। छंद रसावला ॥ रोस राजं भरी । चित्रकोटे सुरी ॥ (१) मो.-सरी।
चे बीसवां समय १५] पृथ्वीराजरासा । ६६५ ... ... ... हथ्थ बथ्थं जुरी । जुहि सोहै धुरी ॥ ई० ॥ ७७ ॥ नीच दौनं परी। बीर हक्कै उरी ॥ कुंत कठै कुरी । इय्य वथ्यं करी ॥ ई० ॥ ७८ ॥ दंद क8 सरी। कंध सोमै धरी ॥ लुथि आलुथ्थरी । जम्मता विकुकुरी ॥ ई० ॥ ७ ॥ देवता संभरी। ढिल्ल राजं भरी ।। जोग मत्ते जुरी । रंभ हूँदै वरी ॥ छं० ॥ ८० ॥ वीर जा संभरी । कुहि कुक्कै करी ॥ मात पित्तं उरी । षत्त कन्है नरी ॥ ई० ॥ १ ॥ स्वामिता सुइरी। पुप्फ नंषे सुरी ॥ । कित्ति जुग्गं करी ॥ ई० ॥ २ ॥ दूहा ॥ कित्ति जोग करनह समथ । मिले सक्क सासेन ॥ आए मीर सुकूद करि । परिय सिंह सिर जेन ॥ ई० ॥ ८३ ॥ अरिल्ला कोप्यो राबल राज महाभर । सेना साह सदाबह लिय पर ॥ हिंदुअ सेन हक्कि भर उठे। पंच षांन सिर सारह बुढे ॥ ई० ॥ ८४ ॥ छंद भुजंगो॥ उठे पंच षांनं बरं आसुरानं । बजे भेरि नफेरि चंब निसानं ॥ धमक्कै धरा नाग मज्जै सुगेन। चढ़े देव कातिम्ग देषत नैनं । छ० ॥ ८५ ॥ मिली अकुरी रथ्य अपार रंजै । नचै नारदं ईसुरं अप्य कज्ज ॥ करै कूह दौरै भरं आसुरानं । जुटे सूर सामंत लग्गे भरानं ॥ ॥८६॥ षगं टून बाहै भरै टोप मथ्थे । मनों झालरं देवलं कूटि हथ्थे । जुरै षांन सामंत दोसार मारं। कहै दीन रामं जपै इष्ट सारं ॥ छ ॥ ८७ ॥ षडे आइयं अष्ष आकूब मीरं । कुटै भ्रंम धीरज कंपै अधीरं । तबै आइ चामंड दाहिम रायं। या सेल मीरं गहक्कै गुरायं ॥छ०॥८॥ समं सेल पानं वहै षग्गभहं । पस्चा अश्व चामंड भग्गै सुघहं ॥ उठे चोंड रायं गदै षांन सारं । तुटै मंडल तुहि भाग पारं ॥ छ ॥८६॥ (२) मो.-लोथि लाथं परी। (१) मो.-खरी। (३) रा.-का-अंबे। (४) मो.-चारं।
६६६ पृथ्वीराजरासो । [ चौबीसवां समय १६ तायं ॥ -- ॥ १ ढयौ षांन थ्ये स चामंड रायं। इनै देषि मीरं निक सु व षग्ग ढाई चढ्यौ अप्प सायं । हली फौज साहं पे असुरायं ॥छ॥०॥ तवै केलियं षान पानां कुलाहं । दुग्रं धारि षग्गं तु. हिंदु थाहं ॥ तवै आइ अड्डो भरं अत्तताई । लिए सिप्परं घाव तिच्छे सुताई ॥ ई० ॥१॥ वहै टूअ षग्गं करै मार झहूँ । मनों रंभथभं दुचं सीस कह ॥ गुरं गज्जते अत्तताई अभंगं । भरक्कै सुसेना सबै मीर भग्गं ॥ छ० ॥ १२ ॥ इक सेर नमीर साहब्ब पानं । दुचं बंध पुत्तं सु आरब्ब जानं ॥ दुअंभ्रंम धारी उरं जागियानं। उभै दौरि वंधं लगे आसमान ॥ छ० ॥ १३ ॥ चपे मीर मुष्पं चवै मार वानं । लगे दाव घावं करै षग्ग पानं ॥ इयं जुद्द आनुव देष्यौ अपारं। भरं निड्डरं देषि धाया सुभारं॥ई० ॥८४ ॥ हए निड्डरं संगि हय बंध मीरं । मनों सीर' इक्कं वरे दो सरीरं ॥ इने नेग तुरियं सुकमधज्जराम। ढयौ अंस ओइंस उड्यौ तिसायं ॥ छ॥ ५ ॥ उठे निड्डरं इक्कि रठौर रानं । सितारे बीस चांडं सुषं मानि भानं ॥ इते श्राइ दीनो तुरंगं अपानं । चामौराव हयमीर कमधज्ज मानं ॥ छ० ॥ ६ ॥ धये आडू तत्ते करे अप्प पानं । भगे सेन मीरं ढहै पंच षांने ॥ बढी जैत देषी वरं हिंदुनं । रिझं नार छछरी गिद्ध सिद्ध । मनं बांछि प्रेमं जयं जस्म लिव ॥ जयंजंपियं जोगिनी जे गमत्ते। करी कित्ति चंदं गयं गतं पत्ते॥ई॥८॥ पृथ्वीराज की विजय, शहाबुद्दीन की सेना का भागना। कवित्त ॥ घरिय अद्ध दिन रह्यो । साह साहब बल्ल भग्गिय ॥ गात घंभ निरघात । हथ्य सामंतन लग्गिय ॥ पस्चौ षांन ाकूब । जेन सेना ढंढारिय ॥ केलीषां कुंजर कुलाह । तुहि तिन संग विछोरिय ॥ चहुओन सेन चव दंत चढ़ि । तनु तिन रव रनंषयौ । सुरतांन भीच पंची परत । जलधि मध्य पत्तांया ॥ ० ॥ ८ ॥ - ... ... ... (२) मो..-रत्तारे। (१) मो.-शीश । (३) मो.-स्के । (४) मो.-तंग।
चौबीसवां समय १०] पृथ्वीराजरासा । ६९० सूर्यास्त होना। गाथा ॥ अथ वत दीह सुधीरं । साहिब सेरंन हंति निडरयं ।। करि प्राक्रम अपारं। जलनिधि मद्धि गत पतंगं ॥ ० ॥ १० ॥ रात होना । सेना का डेरे में आना। कवित्त ॥ जन्न निधि मध्य पतंग। पत्त दिष्षिय तम ग्रासिय॥ कायर पंकज मुदिग । कुमुद उघघरि अलि वासिय ॥ तर को चितव विहंग । वाम विरहनि दुष बढ़िय ॥ संजोगिनि शृंगार | चित्त कामह रथ चढ़िय ॥ चक्रवाक चित चकित हुअ । चार बिटप मन उल्लसिय ॥ औसरे सेन विय उत्तरिय । स्वामि |म मन में बसिय ॥ छ० ॥ १०१ ॥ गाथा ॥ निसचर वरचित चित्तं । चितं जाग्रत उभय सयनेयं ।। जामं सर मरि हितं । वामीयं काम सपनायं ॥ छं० ॥ १०२ ॥ अरिल्ल ॥ पतत पतंग सुदिष्षिय अंबं । मानहु सीय सुद्ध प्रति व्यंबं ।। नष मयूष कोदह उप्पारे। मानो तिमिर जोग भारै ॥ छ० ॥ १०३ ॥ चामंडराय आदि सरदारांका रात भर जागकर चौकसी करना। कवित्त । जबधिराज प्रथिराज । सेन उत्तरिय रयन गत ।। सहि सुराजन कज्ज । रहे सामंत सु जग्गत ॥ राचा मंड निडुरकर्मध । अत ताइय ईस बर ॥ सु गुरु जैन पामार । अरिय भजन अलष्य भर ।। अवरें सु सब्ब सामंत भर । चढ़े राज चौकी समथ ॥ गुर लज्ज अवर भर सज्जि रहि । है पष्वर चवरार पथ ॥ ई० ॥ १०४ ॥ अरिज | डेरा करि बर राज महाभर । तुछ अंतर मिलि रहै सिंघ गुर । चौकी सेन चढ़े भर सिंघं । एक एक सक सूर अभंगं ॥ ई० ॥ १०५ ॥ टूहा ॥ राम रेंन पावार भर । अरु सु कन्द भत्तीज ॥ फुनि रघुवंसी राज घर । सब चौकी सजि नीज ॥ ई० ॥ १०६ ॥ ॥ (१) मो.-पतत ।
६९ पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय १८ भरिल्ल ॥ सजि चौकी अप सध्य सकल मिलि । चढ़त सर भर बप बरजिर बस्ति । गुरु सामंत अति अप्प गढ़ि। रबै सुच्यारि दुचाकी चढ़ि ॥ छ० ॥१०॥ दूक चाकी वर सिंघ राज सज । भर दुअ चढ़े अप्प अप्पन कज ॥ थान थान जकि रहे सूर बर । सज्जि सनाह रहे जु हंस नर ॥ ई० ॥ १० ॥ शहाबुद्दीन के सरदारों का रात को चौकी देना। छंद भुजंगी । चढ़ी साद चौकी सुरत्तांन षांनं । दोई दीन बज्जै निसानं रिसानं ॥ चमक्कै सनाई उपमा सुचंडी।मनो चंदनी रैन प्रति व्यंब मंडी॥छ०॥१०॥ फिरै पंति दंती नकी कंनि एमं । मनों कज्जलं कूट कंगर हेमं ॥ फिरै पध्यरी पंति कूदंत बाजी। तिनं देखतें बंदरं द्रोन लाजी ॥ ई० ॥ ११० ॥ लगे पारसी बोलनं मेछ सथ्थं । मनो प्रब्बतं बंदरं केलि कथ्थं ॥ एकं एक चित्ते दुअंचित्त नांही। तिनं पंचियै सार साधंम सांही॥ई०॥१११॥ षि मुष्य बोलै सुरक्तान दोही । करै भूमि दुज्जन पुरं काल कोही ॥ इसी सेनजोरी सु गोरी नरिंदं। मनों बंटियं पारसं नम चंदं ॥॥११२॥ पृथ्वीराज की सेना की शोभा का वर्णन । अरिन । सिलह सज्जि प्रिथिराज महाभर सेन सह । मनों प्रप्पन प्रति व्यंब प्रगहिय जानि ग्रह ॥ यापर आपम और विचार लो अष्पिये। ज्यों बहर में चंद दुरै कछु दिष्पियै ॥ छ० ॥ ११३ ॥ घुरि निसान घन सह खवन न संभरै। हय गय साजिय साज हक्कतें उम्भरै भेरि भनंकिय भकिन फेरिय नहयं । * एक तबे उन दिष्षि दल बल बद्दयं । कं० ॥ ११४ ॥ शहाबुद्दीन के सेना का वर्णन । कवित्त ॥ पा रुस्तम तत्तार । षांन चौकी बे लम्गा ॥ षां नूरी हुजाब षां । महमद असि जग्गा ।। (१) मो.-बररजि। (२) मो.-पंचियं। (३) मो.-प्रति में “है गै बाजिय गाज फूकते उम्भरै" पाठ है। * मो.-प्रति में ए 'दून वे उन दिष्य' पाठ है।
चाबीसवां समय १६ ] মৃৰ্মীৰাজৰী । ६६ सानी॥ केली षां भष्परी। रोम पावर षां पन्नी ॥ बर भही मच नंग । स्वामि मंद्यौ सा अन्नी ॥ बीरंग बीर वज्जर विरज । बर चरित्त चिहुं दिसि लगे । सुरतांन काम अरि भेजना । सुबर बीर बीरच पगे । छ० ॥ ११५ ॥ सुलतान के सरदारों के क्रम से सजकर खड़े होने का वर्णन । कवित्त ॥ अग्गिर्वान उजवक्क । धाइ धावड़ सुरतांनी । ता पा साहाब । षांन बंध्यौ तुल ला पाछै नूरी । इजाब सेई संचारी ॥ केलीषां कुंजर कुलाह । किन्नी कुट वारी । बांनिक विराह दुल्लाह बर । भाई षा भही सु सिर ॥ प्रिथिराज राज आहु ते । बर निसान बज्जै दुसर ॥ ई० ॥ ११६ ॥ घड़ी दिन चढ़े सुलतान का सामना करने के लिये पृथ्वीराज का आगे बढ़ना, दोनों सेना का साम्हना होना। कवित्त ॥ सुलतानां रै मुष्प । समर उत्तचौ नरिंदं । मनों विद्धि विहान । मोड सजाद समुंदं ॥ दोज सेन उत्तरिय । भ्रंम्म अप्प अप्पन उच्चारिया ॥ अरि समूह करि प्रांन । जुद्द बर मंडि उछारिय ॥ पड्ड फहि निसा पह फहि कर । घरिय बज्जि घरियार घन ॥ प्राची सुमंत दिसि वर झिलिया । अमर कित्ति चिंते सुमन ।। ई० ॥ ११७ ।। प्रातःकाल के समय दोनों सेनाओं की शोभा का वर्णन । छंद गीतामालची ॥ नव नवय प्रालय विरह प्रावय संष दिव धुनि बज्जियं । झलकंत पवनइ मधुर गवनइ सु अश्व हरज्जियं ॥ विकुरंत चंद सुमंत दंदं दिवस ता गम जानयं ॥ पह फहि चीरं परिग पीरं तारि भूषन नाषयं ॥ ई० ॥ ११८ ॥ नव मिलहिं अलिनी इलै नलिनी सद्द मंद प्रकासयं । (१) मो.-विच्चारिय। (२) - -मिलिय । ए.--मिलिय। (३) मा.-पाटय।
900 पृथ्वोराजरासो। [चौबीसवां समय २० । भय मुदिय कुमुदिय पचित प्रमुदिय सत्त पत्त सुभासयं । जुग जपत अजयं धरत सजयं चित्त मरन विचारयं । सामंत सूरय चढ़े नूरय देव तूरय तारयं ॥ छं० ॥ ११८ ॥ घरि अह भानय चढ़ि प्रमानय राज सेनय सज्जियं। उस्मारि बीरय बंधि तीरय अप्प अप्पय गज्जियं ॥ ई० ॥ १२० ॥ कवित्त ॥ अद्द सूर उग्गंत । ढाल ढुकी सुरतानिय । ठांम ठांम मधगंध । सज्जि चल्लै अगवानिय ॥ धर सर गिर धावत समूह । जूह चतुरंग जगाइय । दिल्ली के सुरतान । धुक्कि नीसान बजाइय। जा इथ्थ इथ्य कविचंद कहि । अल्लह देव सुपाइयै ।। सत्तार षांन निसुरत्ति षां । सुबर सेनरि गाइयै ॥ ई० ॥ १२१ ॥ रावल समरसिंह का सब सरदारों से पूछना कि क्या हाल है कौन दृढ़ है और डरता है। सभों का उत्साह पूर्ण वीरता का उत्तर देना। कवित्त ॥ प्रात समर रावर नरिंद । साहस गत पुच्छिय ॥ कदै सब्ब सामंत । मत्ति जपा मनि अच्छिय ।। कोन वीर को धीर । कोन साहस को कातर ॥ कवन दूत अबधन । जोग कावंध समातर ॥ बंधनह कोंन को बंधियै । अरु किन बंधन तन छुद्दया । चिचंगराज राजंग गुर । रहसि मंत बर कुदृया ॥ ई० ॥ १२२ ॥ रावल का कहना कि ऐसे समय में जो प्राण का मोह छोड़कर स्वामी का साथ देता है वही सच्चा बीर है दई वीर अवजोग । प्रान पति सथ्य न कुहै। चुक्कै न बीर अवसर प्रमांन । जिहि जोग अहु ।। इक बंधन बंधियै । इहत तन बंधन अग्गै॥ (१) मो.-नव । (२) ए.-को.-.-रंगाइए । (३) मो.-जुट्टयो । .
चाबीसवां समय २१] पृथ्वीराजरासो। 009 के दू स्वामि संकरें छांडि। स्वांमि इक्कारति भग्गै ॥ सोई बीर धीर साहस सुई । सुदू रन बीर सुबीर हुई ।। चिचंग राव रावल चवै । जल बुडतं रन कीर सोइ ॥ ई० ॥ १२३ ॥ दोनों सेनाओं का उत्साह साथ बढ़ना। हा ॥ उदित अर्क दिसि पुब्ब पहुं । जगे सेन दोह जंग ॥ अश्व अप्प बल बढ़ए । बल बजंगी अंग ॥ ई० ॥ १२४ ॥ पृथ्वीराज का सेना के साथ बढ़ना। कविक्त।तब प्रथिराज नरिंद. । समर उत्तरिय चढ़ाइय । सजिज सेन चतुरंग । बाम को दाव लसाइय ॥ स्थांम सेत धजबंधि। नेत निक्करि निक्काइय ॥ बंदि बीर विम्भत । लुलिय लिल्लाट लगाइय ।। नारद दह तुंबर सुचिर । सिव समाधि जग्गाय बसि ।। अदभुत जुद दोउ दीन को । अप्प भान दिष्य रहसि ॥ ॐ ॥ १२५ ॥ सुलतान का रणसज्या से सजकर सवार होना। दूहा ॥ सुनि रू वत्त सुरतांन चढ़ि । सजि नषसिष अपसिद्ध । अरुभर सकल सनाह कसि । चढ़ि अवधत सनद ॥ ० ॥ १२६ ॥ हिन्दुओं के तेज के आगे भीरों का धीर छूटना । टूहा ॥ जब हिंदू दल जोर हुअ । कुहि मीर धर धंम || * असमय भार बषांन चलि । करन उद्दसा क्रम ॥ छं० ॥ १२७ ॥ एक ओर से पृथ्वीराज और दूसरी ओर से रावल समर सिंह का शत्रुओं पर टूटना। दहा ॥ इत राजन उत समर बर । दुअ दन सज्जि असंष । तन तुरंग तिन बर करन । नमिय तेज च्य नंष । ई० ॥ १२८ ॥ . (१) मो.-बजंगिय । (२) मो.-कोदं। मो. प्रति में "अमरस मय साह करि पाखखां प्राक्रम" पाठ है।
9०२ पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय २२ . युद्धारम्भ, युद्ध वर्णन, अरब खां का मारा जाना । छंद भुजंगी ॥ मिले लोह हथ्थं सु बथ्यं हकारे । मनों बारूनी मत्त मै गंध भारे । दिठी दि दूनं भरं आसुरानं । पलं कूह कज्जै उभे सिंध जान छ॥१२८॥ जपै इष्ट मंचं मुषं राम नाम । कहै मेच्छ दीनं ग्रहै मुहि वाम कुटै तीर भारं द्रुमं कै निसांनं । मनों भादवं गज्जियं मघवानं ॥ छं० ॥ १३०॥ वजै भेरि तूरं बजै संघ नई । मनों सज्जई बीर अनहद्द सह ॥ भिरें मेच्छ हिंदू लरै लोह तत्ते । सचै ईस सीसं षहं देव पत्ते ॥ छ० ॥ १३१॥ हुए पंड षंडं भरं सो अलग्गं । मनों देव दांनै विचथ्थें बिलग्गं ॥ बिजै लोह आरब्ब वाहै कहरं । हली फौज चहुओंन गय सूर नूरं ॥छ॥१३२॥ सबै आह ठट्ठी भरं सिंघ सेनं । ननं आवरे वीर रूपं पथेनं । दिठंदि लग्गी समं षांन पानं । इयंती इयंती मुषं प्रासुरानं ॥ ई० ॥ १३३ ॥ तुरी कंडि राजं सहे संग पानं । इए सेल सथ्यं फटे षांन थानं ॥ जुटे सेल संन्ही बरे षग्ग झटं। परै टहरी झह लग्गै सुघडं ॥छ० ॥ १३४ ॥ भई भीर सिंघ अनुवं अपारं । कई बीर धीरं मुषं मार मारं ॥ रद्यौ आई अड्डो पतीधार स्यामं। हया षग्गांनं सु पंमार रामं ॥ ई० ॥ १३५ ॥ ढयौ आरबं षांन दो दीन साषी। जिने दीन के भ्रंम की लाज राषी॥०॥१३॥ पाँच घड़ी दिन चढ़े वीरता के साथ लड़ कर अरब खां का मारा जाना। कवित्त ॥ पंच घटी दिन चढ्यौ । उमरि आरब्ब षांन लरि ॥ हिंदु सेन समूह । छोह छंद्यौ सुकंक अरि ॥ असि प्रहार चढ़ि धार । मन तुन्यौ तन तुहिय । अस्त बस्त बज्जी कपाट । दहीचन जुहिय ॥ पग पगति सिंभ पग पग मुगति । भुगति भूमि कित्तिय चलिय ॥ धनि सेन साह सुरतांन दल । दरिय बीर मुत्ती षुलिय ॥ ई० ॥ १३७ ॥ खुमान खां का क्रोध करके लड़ने को आना । कवित्त । एकादस दिन जुद्ध । उमडि आरब्ब पनि जुरि ॥ (१) मो.-टट्टरं।
बाबीसवां समय २३] पृथ्वीराजरासो। ००३ बख घट्यौ पतिमाह । षबरि षुम्मांन षांन सुनि ॥ परि अरिष्ट सु बिहान । भए सब सथ्य उतारै ॥ अप्प अप्प मुष छडि । मंडि करि वार करारै घरियार सघन समघाइ बजि । लरत लोह भए लल्लरिय ॥ दोड़ दीन दुंद दारुन दरिय । करै बीर गुन गल्हरिय ॥ ई० ॥ १३८ ॥ ॥ युद्ध का वर्णन छंद मोतीदाम ॥ सुअंत कमंत बढे अनदोस । परै घन वत्त सरोसिय रोस । लठै जनु साड भयानक भति । करै घन गर्ज घनं बन कंति ॥ ई० ॥ १३८ । बदै असि अंक निसंक नि नारि । उतारत भाजन सूत कुंभार ॥ तकै सिरहंन तकत्तिय घाउ। बहै करि बार मंनो बहिबाउ ॥०॥ १४० ॥ जहां तहां धुक्कत उठत एक । सरफै तरफै रत तच्छिय तेक ॥ इलमल होत परम्भर फीर । बहै असमान अनुद्दिय तीर । ई० ॥ १४१ ॥ बहै सर पष्पर निक्करि जात । त कै तन घह करत निघात ॥ परै बर बज गुरज्ज सिरंन । वहै सिर रत्त कै पब्ब झिरंन ॥ ० ॥ १४२ ॥ अदभुत श्रावध बज्जिय मार । ढदै जिमि वृक्ष सुनद्द किनार ।। इलंमिल है दल पैदल एक । भयं इम युद्ध घरी भर एक ॥ छंद ॥ १४३ ॥ ग्यारह दिन युद्ध होने पर सुलतान की सेना का निर्बल होना । रावल समरसिंह का तिरछी ओर से शत्रु सेना पर टूटना। कवित्त ॥ एकादस दिन जुड़ । सबर संघट पंच घटि ॥ बल घहिय पतिसाह । षग्ग परभरिय षांन जुरि । हाइ हाइ आरिष्ट । सकल हिंदून सेन करि । समर सिंघ मुष छडि । जाइ भज्यौ तिरछौ परि ॥ धन घाइ बजाइ सु फौज फिरि । स्वरन लोह कदै भिरन । दोउ दीन दीन उप्पम बिसल । मद मैगल कुहे लरन ॥ छंद ॥ १४४ ॥ * यह पंक्ति मो• प्रति में नहीं है। (१) मो.-संपन्न ।
००४ पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय २४ युद्ध बर्यान । छंद विभगी ॥ मद मोष कि कुटुं दो बर जुहं संकर तुहं आहु । भर भर भूपाल बूथर हाल कर बजि नालं तर तुह ॥ करि कर बर कुंतं सजि बलवंत भिरि गज दंतं चढ़ि दंते । करि धन संमानं बीर भरानं उप्पम जानं करि नंतं ॥ ई० ॥ १४५ ॥ तज्जे सब सस्त्र बीर सुमित्रं बजि अनुरत्तं उत्तंगे। उर उर बर घहे रुधि रस लुहे छवि बल पट्टे रग रंगे ॥ धर धरति फुरक्कं चलत न दिष्पं अंतर रुष्पं अवरुष्पं ॥ बग्गं अघ जानं को किरवानं गिल हित षानं जह भष्यं ॥ छं०॥ १४६ ॥ है वै हिंदवानं नजै न थानं द्रोन समानं गुर पिंडं ।। रितु राज बसंतं दीपति चिंतं संकुचि जंतं मिल षंडं । नेजे बर पानं बलि लछि ध्यानं मीर धरानं भ्रमि दंदं । सब सेन समाहं सुरपति छाहं को तिग राह लै चंदं ॥ ई० ॥ १४७ ॥ खुरासान ख़ां का घोर युद्ध करना। कवित्त ॥ षां पुरसान ढहाइ । षांन पुरसांन गहन पति ॥ सत्त दून भर समर । समर आहुन्ति मंडि छिति । सेन नवत धित नक्त । नवत गजराज साज नव ।। ते समस्त नब मंत्र । यंच तंच नव्वंत सब ॥ दिन अदित हंस इक सथ्य उड़ि। रन आहुहिय बीर बर । दिदि सुजथ्य गंध्रव गुननि । जुबर कित्त वित्ती सुभर ॥ छ ॥ १४८ ॥ समर सिंह की बीरता का वर्णन । कवित्त ॥ पञ्चौ समर षावास । समर जित्तै सुरतानी ॥ परि भट्टी मह नंग। सस्त्र वाहे सुविहानी ॥ पचौ गौर केहरी । रेह अजमेरां सष्षियः ।। स्वामि भ्रम जस रत्त । कित्ति भारथ भर भष्षिय ॥ रघुवंस पंच पंचों मिले । बर पंचानन नाम क्रमि । चिचंग बीर पंचो परत । चब्यौ भान मध्यान नमि ॥ ई० । १४८ ॥ (१) मो.-पुरसानी (२) मो.-रणिय - सूचना । निम्न लिखित पुस्तकें “सेक्रेटरी नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस सिटी" को लिखने से मिल सकती हैं। मूल्य डांकव्यय .... LE) 8) ... ... ra ... ... उथेला-(बाब .... ( मल्या -प्रति भाग মলিন मुहम्मद की अखरावट कविवर बिहारीलाल-(बाबू राधाकृष्णदास रचित) दाकाव्यमीमांसा-(पण्डित अम्बिकादत्त व्यास रचित)... हिन्दी भाषा के सामयिक पत्रों का इतिहास (बाबू राधाकृष्णदास रचित) समालोचना-(पण्डित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री द्वारा. अनुवादित) समानोचनादर्श-पदा-(बाबू जगनाथ दास रचित) कर्तत्र्याकर्तव्यशास्त्र - ( पण्डित नारायणपाहे रचित) बसूचिका चिकित्सा हरिश्चन्द्र-पढय-(बाबू जगनाथ दास रचित) भगवद्गीता-(बाबू गदाधरसिंह द्वारा अनुवादित) गदाधरसिंह द्वारा अनुवादित) बागरी प्रचारिणी पत्रिका ( सभा द्वारा सम्पादित) ६ भाग छप चुके हैं ( पाठ भाग नहीं है। हन्दी लेकचर (बाबू हरिश्चन्द्र रचित )... ध्रुवदास की भक्तानामावली, टिप्पणी सहित उदलमिन की चन्द्रावती बदन कवि का सुजानचरित्र नाल कवि का छत्रप्रकाश नन्ददास की रासपञ्चाध्यायी गचीन-लेख-मणि-माला-१ भाग (बाबू श्यामसुन्दरदास लिखित ) प्रशोक का जीवनचरित्र ( ठाकुर सूर्यकुमार वर्मा लिखित ) नेपाल का इतिहास (पण्डित नारायण पांडे लिखित) पृथ्वीराजरासा-पहिला भाग (समय' १-११) समय १६-२४ कुमारसम्भवसार (पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा अनुवादित ) श्रीधर का जंगनामा धम्मद (ठाकुर सूर्यकुमार वर्मा लिखित ) DD POTOnman ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ ༨ བདཾ ༽ངོ དངོ དརྡོ ༨༠ ཚེ དུ 5 DAD .... ... ..... ... ... ..... .. ..... ... २) १५) .... .. り .00 .... ..... ..... २) ) ... .. ....
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