Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Yoovan Ki Bhul
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गौवन की
भूल
पडपादन
शानन्द जी
प्रकाशक
काशी
प्रथम सस्करण मूल्य एक रुपया मुदक- प० पद्मनारायण आचार्य एम. ए गीताधर्म मेस, साचोविनायक काशी परिचय हेनरी रेनी अलर्ट गई-ड-मॉपासाँ, फ्रास ही नहीं, विश्व- कथा-साहित्य का एक रत्न है। यथातत्रवाद के स्कूल के इने. गिने लेसको में उसका अपना स्थान है। युरोप, अमरीका, एशिया, संसार के सभी कहानी-प्रेमी पाठक उसकी कृतियों को बड़े चाव से पढते हैं। वह ५ अगस्त, सन् १८५० में पैदा हुआ था। जीवन-सग्राम में उसने समाज के विभन्न अंग इस विराट् पर्यवेक्षण शक्ति का परिचय उसकी कहानियो में भलीभाति मिलता है। यौवन-काल के पूर्व ही उसे साहित्य से विशेष प्रेम हो गया। उसने अपनी प्रारम्भिक कृतियाँ, अपनी माता के मित्र, तथा सुप्रसिद्ध औपन्यासिक गुस्टाव कानेर को दिसलाई। तब से वह उसका पथ-पदर्शक यना । परन्तु तीस वर्ष की अवस्था के पूर्व वह ख्यातनामा लेसक न देखे। ।
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प्रशान्त सागर में ऑसें गडाये, हाथ में डोरी पकडे वृद्ध
रोलेन्ड घटो से चित्रलिखित-सा बैठा था। कभी-कभी वह
जलमग्न डोरी को हिला कर देस लेता कि कोई मछली फंसी
अथवा नहीं। सहसा पानी से बाहर डोरी खींचते हुए, वह चिल्ला
उठा-धत्तेरे की।
उसकी पत्नी नौका के एक कोने मे, मछली का शिकार देसने
के लिए, आमत्रित श्रीमती रोजमिली के बगल में बैठी उघ रही
थी। चौंक कर उसने ऑसें सोली, और पति की ओर देखते
हुए उसने कहा-ओह, अबकी तो तुमने बडी अच्छी मछली
फॅसाई।
'कहाँ जी -वृद्ध ने झुंझला कर उत्तर दिया-'दोपहर के बाद
तो यह एक मिली है। औरतों को साथ लेकर कभी न आये।
उनकी वजह मे चलते-चलते इतनी देर हो जाती है कि फिर
शिकार का वक्त नहीं रह जाता।'
पिएर और उपरों, वृद्ध के दोनों लडके, जो कि हाथ में एक-एक
पौवन पी मत डोरी लिये, पानी की ओर मुंह किये बैठे थे, अघरों के बीच हँस पड़े। जाणे ने धूम फर एक यार पिता की ओर देखा, लहना दिया-आप हमारे आतिथ्य के प्रति अन्याय कर रहे हैं। वृद्ध ने मेंप कर, श्रीमती गेज़मिली से क्षमा माँगी-आप मेरे कहे का बुरा न मानिण्गा, मेडम रोजमिली । युद्ध मेरी आदत ही प्रेमी है कि पहले तो मैं औरतों को बुलाता है, क्योंकि उनके बिना मुझे अच्छा नहीं लगता, पर मागर के वक्षस्थल पर पहुँचते ही मुझे कुछ नहीं दिखाई पड़ता, यम मदली। श्रीमती रोलेन्ड ने एफ अॅगाई ले, निद्रा को सचेत करते हुए, मागर के तट पर दूर तक फैली, क्षितिज को छूती, पर्वत श्रेणी की ओर देगा। जीवन की सारी चिन्ता, सारी विषम समस्या, मे उस अगाध में विलीन हो गई । श्रीमती रोलेन्द ने अपने अन्दर एक हलकेपन का अनुभव करते हुए, पति से मुस्करा फर कहा-पैर । तुमने काफी मछलियाँ इकट्ठी कर । वृद्ध ने उत्तर में मिर हिला कर नाहीं कर दी, परन्तु प्रसन्नता और सतोप की तरगों पर उसकी हृदय-तरिणी धिरक रही थी। उसने टोकरी उठाई, और घुटनों के बीच पकड उसे दोनो हाथों से हिला डाला। चाँदी-सी चमकती मछलियाँ सूर्य की प्रसर किरणों में झिलमिला उठी। एक हीफ-सी चारों ओर फैल गई। वृद्ध को प्रतीत हुआ , जैसे गुलाब के फूलों की सुगन्ध उडी हो । ६
यौवन की भूल
'अरे डाक्टर "-वृद्ध ने अपने ज्येष्ठ पुत्र की ओर निहारते
हुए, उल्लसित स्वर मे कहा-'तुमने कितनी पकडी ?'
मूछ-दाढी साफ, हष्ट-पुष्ट युवक पिएर ने उत्तर दिया-कोई
ज्यादा नहीं, यही चार-पाँच ।
तब पिता ने अपने कनिष्ठ पुत्र से पूछा-और तुमने ज्यों?
लम्बा चौडा जवान, जो अपने अग्रज की अपेक्षा कहीं सुन्दर
था, वोला -वस पिएर के ही बरावर, चार-पाँच ।
जब कभी वृद्ध रोलेन्ड यह प्रश्न पूछता, तो दोनों लडके यही
उत्तर देते थे। इससे वह भी वार-बार यही प्रभ पूछता था। उसे
इसमे एक आनन्द का अनुभव होता ।
'दोपहर के बाद मछली का शिकार सेलना बेकार है।'–कटिया
पानी में फेंक, डोर एक कील से बाँध, वृद्ध ने दोनो हाथ बाँधते
हुए कहा-'मछलियाँ धूप या कर ही इतनी छक जाती हैं कि फिर
वे निचारी चारे की ओर देसती तक नहीं।'
वह पहले एक जौहरी था, परन्तु मछली का शिकार खेलने
का ऐसा शौकीन था, कि जैसे ही उसके पास पाने-पीने भर को
रुपया हो गया, उसने अपना व्यापार बन्द कर दिया और हावेर
नामक प्राम मे आ बसा । एक नाव सरीद ली और दिन-भर
उसी पर घूमा धूमा मछली का शिकार सेलता। उसके दोनो
लडके पढते थे, इससे पेरिस ही में रहते थे। हाँ, छुट्टियो में वे
अपने घर आया करते थे।
"
यौवन की भूल डोरी लिये, पानी की ओर मुंह किये बैठे थे, अधरों के बीच हँस पडे। ज्यों ने घूम कर एक बार पिता की ओर देसा, जैसे उलहना दिया--आप हमारे आतिथ्य के प्रति अन्याय कर रहे हैं। वृद्ध ने मेंप कर, श्रीमती रोजमिली से क्षमा मांगी-आप मेरे कहे का बुरा न मानिएगा, मेडम रोजमिली। कुछ मेरी आदत ही ऐसी है कि पहले तो मैं औरतों को बुलाता हूँ, क्योंकि उनके बिना मुझे अच्छा नहीं लगता , पर सागर के वक्षस्थल पर पहुँचते ही मुझे कुछ नहीं दिसाई पडता, बस मछली । श्रीमती रोलेन्ड ने एक अंगडाई ले, निद्रा को सचेत करते हुए, सागर के तट पर दूर तक फैली, क्षितिज को छूती, पर्वत श्रेणी की ओर देसा। जीवन की सारी चिन्ताएँ, सारी विपम समस्याएं, जैसे उस अगाध में विलीन हो गई। श्रीमती रोलेन्ड ने अपने अन्दर एक हलकेपन का अनुभव करते हुए, पति से मुस्करा कर कहा-सैर । तुमने काफी मछलियाँ इकट्ठी कर ली। वृद्व ने उत्तर में सिर हिला कर नाही कर दी , परन्तु प्रसन्नता और सतोप की तरगों पर उसकी हृदय-तरिणी थिरक रही थी। उसने टोकरी उठाई, और घुटनो के बीच पकड उसे दोनो हाथों से हिला डाला | चाँदी-सी चमकती मछलियों सूर्य की प्रखर किरणों में झिलमिला उठीं। एक हीक-सी चारों ओर फैल गई। वृद्ध को प्रतीत हुआ , जैसे गुलाब के फूलों की सुगन्ध उडी हो। ६ ,
यौवन की भूल
'अरे डाक्टर ।'-वृद्ध ने अपने ज्येष्ठ पुत्र की ओर निहारते
हुए, उहसित स्वर में कहा-'तुमने कितनी पफी?'
मूछ-दाढी साफ, हृष्ट-पुष्ट युवक पिएर ने उत्तर दिया-कोई
ज्यादा नहीं, यही चार-पाँच ।
तब पिता ने अपने कनिष्ठ पुत्र से पूछा--और तुमने ज्यों ?
लम्बा चौडा जवान, जो अपने अग्रज की अपेक्षा कहीं सुन्दर
था, वोला-बस पिएर के ही बरावर, चार-पाँच ।
जब कभी वृद्ध रोलेन्ड यह प्रश्न पूछता, तो दोनो लडके यही
उत्तर देते थे। इससे वह भी बार-बार यही प्रश्न पूछता था। उसे
इसमे एक आनन्द का अनुभव होता।
'दोपहर के बाद मछली का शिकार सेलना बेकार है -कटिया
पानी में फेंक, डोर एक कील से बाँध, वृद्व ने दोनो हाथ बाँधते
हुए कहा-'मछलियाँ धूप सा कर ही इतनी छक जाती हैं कि फिर
वे विचारी चारे की ओर देसी तक नहीं।'
वह पहले एक जौहरी था, परन्तु मछली का शिकार सेलने
का ऐसा शौकीन था, कि जैसे ही उसके पास साने-पीने भर को
रुपया हो गया, उसने अपना व्यापार बन्द कर दिया और हावेर
नामक ग्राम मे आ बसा । एक नाव खरीद ली और दिन भर
उसी पर धूमा धूमा मछली का शिकार सेलता। उसके दोनो
लडके पढते थे, इससे पेरिस ही में रहते थे। हाँ, छुट्टियों में वे
अपने घर आया करते थे।
यौवन को भूल
प्रकट करने में हिचकती थीं। कोई वादा-विवाद चल पडता,
तो वे अनजाने में ज्यों का पक्ष ले, उसकी ओर से बोलने
लगती , पर इस बात का ध्यान आते ही वह सहसा चुप हो जाती।
अपने भावों को छिपाने का उपक्रम करते हुए, पे माथे पर
चमकती पसीने की छूटों को पोंछने लगतीं, अथवा कलाई पर
बँधी घडी को ठीक करने लगतीं।
ऐसे समय पिएर उसकी ओर घूर कर देसता ।
एक दिन बातों-ही-बातों में रोजमिली ने कहा था-मछली का
शिकार सेलने में तो बडा आनन्द आता होगा!
+
रोलेन्ड औरतों को अपने साथ ले जाते डरता था, इसलिए
कि उन्हें लेकर चलते-चलते ही दोपहर हो जाती है, और तव
शिकार का मजा किरकिरा हो जाता है, पर उस दिन शिकार
की प्रशसा सुनकर वह कुछ ऐसा पुलकित हो उठा, कि उन लोगों
को भी अपने हाथों का कमाल दिसाकर, वाहवाही लूटने की इच्छा
उसके मन मे प्रबल हो उठी।
'तो आप चलना चाहती हैं ?'-उसने पूछा।
'हाँ, अवश्य
'अव की मगलवार को?"
'हाँ, मगलवार को
'क्या आप पाँच वजे प्रातकाल तैय्यार हो सकेगी ?'
१०
यौरन की भूल
श्रीमती रोजमिली ने आश्चर्य से मुँह बना कर कहा-इतने
सबेरे। नहीं बाबा
'तो फिर किस समय तक आप तैयार हो सकेगी?"
'नौ बजे
'और इससे पहले नहीं ?"
'नहीं, यह भी बहुत जल्दी है।'
वृद्ध तो हिचकिचाया था, पर दोनो लडकों की प्रबल इच्छा
थी कि इस सुन्दरी को ले चलकर उसके सहवास का आनन्द लूटा
जाय । और इसी कारण यह प्रोग्राम निश्चित हुआ था।
उस दिन, मगलवार को सब लोग समुद्र तट पर आये, लेकिन
देर अधिक हो जाने के कारण इच्छानुसार शिकार न हो पाया।
श्रीमती रोजमिली को शिकार की अपेक्षा वह जल-मय ससार
अधिक आनन्दप्रद प्रतीत हो रहा था। इसीलिए रोलेन्ड, झुंझला
कर चिल्ला उठा था-'धत्तरी की ।' अतृप्त हृदय के ये शब्द, इतनी
देर के बाद एक मछली फँसने, अथवा औरतों को साथ लाने की
वेवकूफी, दोनों भावों को अपने में रजित किये थे ।
सन्ध्याकालीन अधकार को आते देस वृद्ध ने शासनयुक्त स्वर
में कहा- अच्छा लडको, अव घर चलना चाहिए ।
पिएर और ज्यों दोनों के मुस पर प्रसन्नता सेल गई। दोनों
पानी से डोर खींच, अपनी-अपनी कटिया साफ कर, उसे एक
काग में लगा, एक किनारे रसते हुए, पिता का मुँह निहारने लगे।
१२
यौवन की भून
तव ज्यों
पिता की आज्ञा पर अपने दोनों जवान लड़कों को कमीज
की बाँहें चढा कर, डाँडे चलाते हुए उन्होंने देसा। माँ का
'हृदय ममता से ओत-प्रोत हो उठा। ओठों को दाँतों से दनाये,
भौहें चढाये, पिएर खूब कडे हाथ डाँडों पर मार रहा था ।
कोमल गोलाकार भुजदण्ड के अन्दर चलती मास-पेशियाँ
इस कथन की पुष्टि करती थीं, कि जहाँ भी अपनी पूरी ताकत
से डाँडे चला रहा है। दोनों भाइयों में एक प्रतियोगिता के
भाव जागृत हो उठे थे। ज्एा कमजोर पड़ रहा था। सहसा
दोनो हाथो को ऊपर उठा रोलेन्ड चिल्लाया-बस।
दोनों टॉडे एक साथ पानी के ऊपर उठ गये।
अकेला ही नौका को घाट तक सेकर ले गया। पिएर हॉफ रहा
था। मस्तक पर प्रसवित श्रमकाणों को पोंछते हुए उसने कहा-
ओफ ! मुझे क्या हो गया ? इतनेसे ही पसीना-पसीना हो गया।
ज्यों के माथे पर बल तक न पडे थे। उसके अधरों पर
विजयी की मद मुस्कान थी।
ज्येष्ठ पुत्र को अधिक उद्विम देख माँ ने कहा-क्यों रे पिएर !
तुझे क्या हो गया ? इस तरह व्यग्र होने की क्या जरूरत है ?
अभी तक तेरा लडकपन नहीं गया ।
श्रीमती रोजमिली ऐसे बैठी थीं, जैसे वह कुछ देख सुन
ही नहीं रही है। वे पश्चिम क्षितिज की ओर मुंह किये
थीं। अचल प्रतिमा, नौका के प्रत्येक पग पर हिल उठती थी।
१४
-
.
यौवन की भूल फिनारे पहुँचते ही नगर का कोलाहल फिर स्पष्ट हो गया। समुद्र देखने के लिए आने वाली अपार भीड को चीरते हुए, वे पाँचों चुपचाप घर की ओर चले जा रहे थे। किसी अच्छे जौहरी की सजी दुकान, अथवा कोई भडकीली वस्तु देस, वे क्षण भर के लिए ठहर कर, उसे मुग्ध हो निहारते और फिर आगे बढते। 'अब भोजन भी हमारेही यहाँ होगा, क्यों मैडम रोजमिली।' रोलेन्ड ने पूछा। 'हा, और क्या ।'–श्रीमती रोजमिली ने किञ्चित मुस्करा कर उत्तर दिया-'दिन भर आप लोगों की मडली का आनन्द लूट कर, अब एकान्त में भोजन करने की कल्पना प्रिय नहीं मालूम पडती ।' छोटा-सा साफ सुथरा दो सड का मकान, उन्नीस वर्ष की चचल नौकरानी जोसिफिन, जो देखने में बुरी न लगती थी। मालिक के आने की आहट पाते ही उसने ड्राईग-रूम खोल दिया । 'एक आदमी आपको तीन धार पूछकर चला गया ।-फादर रोलेन्ड के चौखट के अन्दर पैर रसते ही उसने कहा । घर में रोलेन्ड सदा ही चीख-चीस कर बोलता था। नौकर- चाकर सभी उसकी इस आदत से परिचित थे। 'क्या कहा ? कौन आया था ?'- रोलेन्ड चिल्लाया। 'वकील साहब के यहाँ से एक आदमी।' 'फौन वकील साहब ? १५
यौवन की भूज
"
'वही, मानशोयर कानू"
'तो उस आदमी ने क्या कहा ?'
'यही कि वकील साहब आज शाम को आप से मिलना
चाहते हैं।
मानशोयर मैटरी-ली-कानू उनके घर के वकील थे। जब कभी
कोई आवश्यक कार्य होता, तभी वह इस प्रकार कहलवा भेजते ।
चारों आदमी कल्पना करने लगे कि कौन-सा काम हो
सकता है ।
'किसी ने वसीयत वगैरह की होगी' लीजिए अव क्या है -
क्षण भर पश्चात् श्रीमती रोजमिली ने मुस्कराते हुए कहा ।
परन्तु सगे-सम्बन्धियों मे कोई ऐसा नहीं था, जिसकी मृत्यु
की आशका की जा सके।
मैडम रोलेन्ड बडी तत्परता से इस विषय पर छानवीन कर
रही थीं।
'जोजेफ लेबस की दूसरी शादी किसके साथ हुई थी ?'–क्षण
भर पश्चात उसने उत्सुकता से चमकती आँसो को पति की ओर
धुमाते हुए पूछा।
'एक बची थी, डुमेनिल | किसी कागजवाले की लडकी थी।'
'उनके लडकेन्याले थे
'अनुमान तो है कि थे-चार-पाच ।'
निराश हो, श्रीमती रोलेन्ड फिर कुछ सोचने लगीं।
१६
यौवन की मूल
पिएर ने हँस कर कहा-मेरे विचार मे तो तण की शादी के
सम्बन्ध में कोई बात है।
सन चौक से पडे । मैडम रोजमिली के सामने ऐसी बात
उठा कर यह मुझे उसकी नजरो से गिराना चाहता है इस भाव
ने ज्पों को विचलित कर दिया।
'मेरी क्यो, तुम्हारी शादी के सम्बन्ध मे होगी । तुम बडे हो,
तुम्हारी पहले होगी। फिर मेरा तो अभी निवाह करने का विचार
ही नहीं है।'-उसने कहा।
पिएर ने नाक सिकोड़ कर कहा-तो क्या तुम किसी के
प्रेम जाल में फंसे हो?
दूसरे ने झुंझलाकर उत्तर दिया तो क्या इसके माने यह है
कि अगर आदमी विवाह नहीं करता, तो वह प्रेम-जाल में फंसा है।
'हाँ, और क्या । अव आये रास्ते पर। तो तुम अभी
विवाह की प्रतीक्षा मे हो ?'
'अन्छा हूँ, तब ?-ज्वाँ ने सिसिया कर कहा ।
सहमा रोलेन्ड ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा तुम दोनों
भी कैसे बेवकूफ हो, जो आपस मे लडने लगे। देग्यो, मैंने ठीक
ठीक अनुसन्धान कर लिया। मेटरी-ली-कान् हमारा मित्र है । वह
जानता है कि तुम दोनो नौकरी की तलाश मे हो । उसने इसी
सम्बन्ध में कुछ तजवीजा होगा।
'साना तैयार है। उसी समय नौकरानी ने आकर कहा।
यौवन की भूल
पाँच मिनट पश्चात् वे सब चुपचाप भोजनालय में बैठे अपन
अपना उदर भर रहे थे । रोलेन्ड से अधिक देर तक चुप न बै-
गया। उसके दिमागमे रह-रह कर वहीं वात नाच रही थी-आरि
कौन-सी ऐसी बात थी, जो उसने तीन चार आदमी भेजा, क्या व
लिख कर नहीं भेज सकता था ? वह स्वय क्यो कहने आवेगा।
पिएर की समझ मे यह कोई आश्चर्य करने की बात नर्थ
'कोई गुप्त बात होगी, जिमे उसने स्वय कहना ठीक समः
होगा।'-उसने सहज भाव से उत्तर दिया ।
पर तब भी वे सब हैरान रहे कि यात क्या है। उस सम
उन्हे अपने बीच एक बाहरी अतिथि का होना खल रहा था।
खुल कर बात-चीत न कर सकते थे।
भोजन करके वे सब ऊपर वाले कमरे में जाकर बैठे ही
कि वकील साहब के आने का संवाद मिला ।
रोलेन्ड ने बडे तपाक से उनका स्वागत किया।
क्षण-भर पश्चात् श्रीमती रोजमिली ने उठते हुए कहा-
अच्छा, अब चलती हूँ। दिर भर की थकी हूँ, अब सोऊँगी
किसी ने उन्हे रोकने का प्रयत्न न किया। वह चली गई। श्रीमत
रोलेन्ड नेलोकाचार दिखाते हुए नवागत अतिथि से कहा-महाशय
एक प्याला काफी पीजिएगा?
'नहीं, धन्यवाद । अभी सा कर आ रहा हूँ।'
'अच्छा तो एक प्याला चाय!'
यौवन की भूल
'धन्यवाद । अभी ठहर कर पीऊँगा। पहले काम की बातें
हो जायें-प्रकोष्ठ में एकान्त निस्तब्धता छा गई। बस, घड़ी
की टिक-टिक और नीचे नौकरानी के बर्तन धोने की सट-पट
उसे भंग कर रही थी।
'आप पेरिस निवासी महाशय ली-आन-मेरीकल को तो
जानते होंगे ??---मैटरी-ली-कान ने कहा।
पति-पत्नी, दोनो ने उत्तर दिया-हाँ, हाँ।
'वह आपके मित्र थे।
रोलेन्ड ने तत्परता से उत्तर दिया-हाँ जनाय, अभिन्न-हृदय
मित्र । पेरिस छोडकर कहीं आने जाने का उसका मन ही नहीं
करता । जबसे यहाँ आया हूँ, उससे मुलाकात नहीं हुई है। पहले
तो पत्र-व्यवहार होता था, पर आप तो जानते ही हैं कि इतनी
दूर बैठकर कौन किसको लिखता है और कौन जवान देता है।
'वह मर गरे ।'-मैटरी-ली-कान् का गम्भीर स्वर प्रकोष्ठ में
मुसरित हो उठा।
जैसा कि लोग ऐसे अवसर पर करते हैं, पति-पत्नी,
दोनो ने एक आह सींचकर शोक प्रकट किया।
मैटरी-ली-कान् ने फिर कहा-पेरिस से मेरे एक मित्र ने उनके
दान-पत्र की मुख्य यातें बतलाई हैं । ज्वाँ अब उनकी सारी
सम्पत्ति का मालिक है।
सभी आश्चर्य-स्तभित थे।।
१९
यौवन की भूल श्रीमती रोलेन्ड की आँसो से झर-झर आँसू वह चले थे । वे ऑसू द्रवित हृदय के कतरे थे। रोलेन्ड को मित्र की मृत्यु का समाचार सुन, दुस की अपेक्षा प्रसन्नता हो रही थी। दान-पत्र में क्या-क्या लिसा है ? सम्पत्ति का मूल्य क्या है ? ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछने के लिए उसका हृदय उछल रहा था, पर एक दम से इन बातों को पूछना शिष्टता के विरुद्ध है, इसीलिए उसने कहा-विचारा बीमार था क्या ? 'यह मैं नहीं जानता। मुझे तो बस इतना मालूम हुआ है कि विना वारिस के होने के कारण वह अपनी वीस हजार सालाना की सम्पत्ति ज्यों को दे गये हैं। अगर ज्यों उसे अस्वीकृत कर देगा, तो वह किसी अनाथालय को दे दी जायगी।'कान् ने उत्तर दिया। रोलेन्ड ने कहा कि वह उदासीन आकृति बनाये बैठा रहे , पर प्रसन्नता उसके अधरो पर फूटी पडती थी। 'देसो इसे कहते हैं सहृदयता । मित्रता के माने यही हैं।'- उसने उल्लसित स्वर में ज्यों की ओर देसकर कहा । वकील ने हँसी छिपाते हुए एक ऑस का कोना दवाकर, ओठ के कोने को ऊपर चढा लिया । 'यह हर्प-सवाद मैंने सदेह पधारकर कहना ठीक समझा।- उसने कहा। मैटरी-लो-कान् उस समय भूल गया था कि एक अभिन्न हृदय मित्रकी मृत्युका समाचार, हर्प-समाचार नहीं, शोक- यौवन की भूल . समाचार है। रोलेन्ड भी अपने मित्र की मृत्यु पर-जिसे घडी भर पहले वह 'अभिन्न-दृढ़य' सम्बोधित कर चुका था-प्रसन्न होरहा था। हाँ, लूसी और दोनो लडके शोक-भारावनत चुप बैठे थे। मैडम रोलेन्ड अपने आँसुओ को घोंट कर पी जाना चाहती थी, पर वे निर्दयी उनकी मूक-वेदना को सब पर प्रकट कर देने के लिए तत्पर हो रहे थे। रूमाल से मुँह छिपाये, वह सिसक- सिसक कर रो रही थीं। डाक्टर ने समवेदना प्रकट करते हुए कहा-विचारा बड़ा नेक आदमी था । वहुधा वह हमे अपने यहाँ भोजन के लिए निमत्रित करता था-मुझे और ज्यों को। ज्वाँ सिर झुकाये गाल खुजला रहा था। कुछ कहने के लिए उसने दोनार मुँह सोला , पर न मालूम क्या सोच कर, वह फिर रुक गया। अन्त में बहुत कुछ सोच-विचार कर उसने कहा हाँ, वह बहुत नेक आदमी था। मैं जाता, तो वह प्यार मे मुझे अपने गले लगा लेता था। रोलेन्ड के विचार दान-पत्र के चारो ओर ही दौड रहे थे। कल्पना के सिंहासन पर बैठा, वह देस रहा था कि सारी सम्पत्ति उसके पैरों पर रसी है। वह उन चाँदी के गोल-गोल टुकडो को -ट्र कर पुलकित हो रहा है । 'अन्छा, दान-पत्र के सम्बन्ध में कोई वसेडा तो न होगा? कोई हकदार तो नहीं है ?-रोलेन्ड ने पूछा
यौवन की भूल
तबीयत सराव हो गई थी। वह उसी दम डाक्टर के यहाँ दौड़ा
गया। जल्दी में अपनी हैट के बदले मेरी हैट पहन गया था।
मरते समय उसने सोचा होगा-'ज्यों के लिए मैं इतना दौडा-धूपा
था, अब उसके सिवाय है कौन ?'
मैडम रोलेन्ड कुर्सी मे सिर गडाये बैठी, स्मृति के आलोक में
अतीत के उन भूले दृश्यों को फिर देख रही थीं। एक आह
सींच, सिर उठाकर वह वडवडाई-विचारा कैसा नेक आदमी
था, कितना सहृदय । ऐसे आदमी दुनिया में कम होते हैं।
परों ने उठते हुए कहा-जरा मैं घूमने जाता हूँ।
पिता ने चाहा कि वह अभी न जाय । जायदाद का प्रवन्ध
कैसे होगा? भविष्य में अब क्या करना होगा ? इस विषय पर
वह उससे परामर्श करना चाहता था, पर ज्याँ एक जरूरी काम का
वहाना कर चला गया।
क्षण-भर पश्चात् पिएर ने भी उठते हुए कहा-जरा बाहर
ठढी हवा में घूम आऊँ।
लडकों के जाते ही रोलेन्ड ने पत्नी को बाहुपाश में आबद्ध
कर, उसके मुख पर न-मालूम कितने चुम्बन अकित कर दिये ।
'देसो प्यारी, इसे कहते हैं भाग्य । कौन जानता था कि आज
यह हर्प-समाचार सुनने में आयेगा।"
मैडम रोलेन्ड गम्भीर बनीं विचार-सागर मेडूब-उतरा रहीथीं।
'भच्छा, ज्ण का तो ठीक हो गया , पर पिएर ?
२४
यौवन की भूल
रोलेन्द्र ने लापरवाही से उत्तर दिया-अरे वह डाक्टर है।
स्वय लामो पैदा करेगा । फिर भाई क्या मदद नहीं करेगा ?
'यह ठीक है , पर क्या इमसे पिएर क्षुब्ध न होगा ?"
वृद्ध से कोई ठीक उत्तर न बन पडा।
'हम अपने दान-पत्र में उसे अधिक दे देंगे।'-उसने सरलता से
उत्तर दिया।
"उहुँ, यह ठीक नहीं।
वृद्ध ने झुंझलाकर उत्तर दिया-ठीक नहीं, तो न सही । तुम
भी व्यर्थ की बातों में परेशान होती हो। इस खुशी के समय
से झगडे लेकर बैठी हो। अच्छा, मैं तो चला सोने ।
और वह वड़बडाता हुआ चला गया ।
मैडम रोलेन्ड कुर्सी पर बैठी न मालूम क्या-क्या सोचती रही।
यौवन की भूल
.
रोजमिली से विवाह कर ले। और वह, पिएर मेहनत करे, पेट
भरे, जैसे-तैसे दिन काटे । अगर एक भाई मौज उडाये तो क्या
दूसरे गरीव भाई को क्षोभ न होगा ?
'मैडम रोजमिली से विवाह'-इस बात ने उसे और अधिक
विचलित कर दिया। क्या मै उस खूसट युवती से प्रेम करता
हूँ?-वह अपने आप कहने लगा। किसी सपक्ष समालोचक
की भाँति, वह उसकी बुराइयों को ही ध्यान में ला कर अपने
मन में यह चिठाने का प्रयत्न करने लगा कि मैडम रोजमिली
असभ्य है, असुन्दर है, वह उससे किंचित-मात्र भी प्रेम नहीं
करता , अगर वह खूमट युवती उससे विवाह का प्रस्ताव भी
करे, तो वह नाहीं कर देगा।
समुद्र का भीपण गर्जन सुन कर पिएर की विचार-धारा
भग हुई। आश्चर्य से उसने देसा कि वह समुद्र-तट पर
खडा है। पार्ववर्ती घाट पर जलती सर्चलाइट, जैसे उसके
हृदय में प्रवेश कर रही थी। दूर तक आँसें दौडाने पर
ऐसा प्रकाश प्रत्येक घाट पर आलोकित नज़र आता था। प्रकृति
की उस एकान्त नीरवता को भंग करता हुआ वह जैसे वहाँ भी
भेद-भाव का सृजन कर रहा था। अपनी लम्बी-लम्बी किरणों
द्वारा जैसे इगित कर रहा था यह मैं हूँ। यह मैंहूँ " यह मैं हूँ ।।
पिएर ने निरुद्देश्य,जेब से दियासलाई की डिविया निकालकर
एक तीली जलाई और उसके प्रकाश में पास ही गडे बोर्ड पर
२८
यौवन की भूल अकित आने-जाने वाले जहाजो का नाम पढने लगा। पर क्षण- भर पश्चात् , वह उस सलाई की रोशनी से विचक उठा। तब उन सर्चलाइटों का प्रकाश भी उसकी आँखों मे तीनतर होकर चमक उठा । उसे अपने चारों ओर आँसो में चकाचौध कर देने वाला प्रकाश व्यापता प्रतीत हुआ। वह पनडा उठा। इतना प्रकाश। नहीं, वह प्रकाश नहीं चाहता | उसे चाहिए अधकार, घोरतर अधकार । थोडी दूर जा कर वे सर्चलाइट अदृश्य हो जाती थीं। उस स्थल पर पहुँच कर पिएर ने एक सतोप की साँस ली। छडी के सहारे अपना बोझ टेकते हुए, वह सामने देखने लगा। वह जल-राशि ऊपर के गगन भी अधिक श्यामल प्रतीत हो रही थी। यत्र-तत्र चमकते तारे, मालूम पडता था, किमी ने विसरा दिये हैं। सागर का गर्जन सुन-सुन कर वे भय से कॉप रहे हैं। उनकी झिलमिलाहट मे एक करुणा है, सौहार्द है। उसी समय पीछे से क्षितिज के वक्षस्थल पर चन्द्रमा उठता दिसाई पडा। तारो ने चमक कर उसका स्वागत किया। उसकी सहस्रों किरणो ने, जैसे कण-कण मे प्रवेश कर उनमे एक नवजीवन का सचार कर दिया। चारों ओर एक नवीन आभा. सी फूट पड़ी। पिएर एकटक उधर देख रहा था। उसे मालूम पड़ा, जैसे वे शीतल किरणे शरीर में घुस-घुस कर उसके उद्विग्न हृदय को शान्त कर रही थी। २९ यौवन की भूल पिएर बहुधा उसकी दुकान पर जाया करता था। शान्त मुस-मण्डल, गढे में घुसी तेज आँखे, तथा चुप रहने की आदत- इन सब बातो ने उसके चारों तरफ रहस्य का ऐसा आवरण डाल रसा था, जिसकी ओर मन अनायास ही आकर्पित हो जाता है। दुकान पर केवल एक बत्ती जल रही थी। किफायतशारी के लिए सिडकी की वत्तियाँ बुझा दी गई थी। एक आरामकुर्सी पर दोनो टाँगे फैलाये, छाती पर मुँह लटकाये, मारोवसको सो रहा था। उसकी लम्बी नाक स्वर मे घर-घर कर रही थी। दुकान की घटी की आवाज पर वह जाग उठा, और पिएर को देखते ही उसने बडे तपाक से उससे हाथ मिलाया, और उसे अपने बगल में विठाता हुआ बोला-कहो डाक्टर, क्या हालचाल है ? 'कोई नई बात नहीं। वही रफ्तार वेढगी।' 'आज तुम प्रसन्न नहीं मालूम पडते।' 'मैं बहुधा ऐसा ही रहता हूँ। 'ह, गोली मारो इस उदासीनता को। जीवन मे सरसता को स्थान देना चाहिए। हाँ, एक प्याला क्यो ?' 'हाँ, हाँ, कोई हर्ज नहीं।' 'आज मैं तुम्हे एक नई चीज पिलाऊँगा। अभी तक अगूरों का रस ही निकलता था, मैंने उससे मदिरा तैयार की है। एक नया आविष्कार ३२
३
यौवन को भूल
और दवाइयो की मेज पर से एक लाल बोतल उठा लाया।
छलकते नेत्रों से उसने काग सोला और फिर दो गिलासों में
मदिरा उँडेली।
पिएर ने गिलास के भीतर देखकर मदिरा का रग पहचानते
का प्रयत्न करते हुए कहा-हलका गुलावी, क्यों ?
मारोवसको को मदिरा की गध ने उन्मत्त बना दिया था।
नशे में झूमते हुए उसने कहा- हाँ।
डाक्टर ने एक-एक चूंट पी कर गिलास साली कर, ओठ
चाटते हुए कहा-ओह, बहुत ही स्वादिष्ट । बहुत ही स्वादिष्ट ।
यधाई मारोवसको । तव, मारोवसको ने यह प्रसंग छेड दिया कि
उस मदिरा का नाम क्या रक्सा जाय । बडी देर की वहस के
बाद उसका नाम 'अगूरी' रसने का निश्चय हुआ। फिर, वे कुछ
देर चुप बैठे रहे।
आज सन्ध्या को एक नई घटना हो गई। पिएर ने प्रकोष्ठ
की नीरवता को भग करते हुए कहा- मेरे पिता के एक मिन की
मृत्यु का ममाचार मिला है। वह अपना दानपत्र ज्वरों के नाम
लिस गया है।
मारोवसको पहले तो बात ठीक तरह से समझ न पाया।
उसने सोचा कि आधी जायदाद परों को मिली होगी, आधी पिएर
को, पर जब पिएर ने वात स्पष्ट करते हुए उससे फिर कहा,
तो उसने आश्चर्य-मुद्रा धारण कर कहा-यह तो ठीक नहीं जंचता।
३३
यौवन की भूल
अन्तर्वेदनाओं से तडपते हुए, पिएर को मारोवसको के य
शब्द पडे मधुर लगे।
आखिर यह क्यों नहीं ठीक ऊंचता ? इसमें ठीक न जॅचने के
कौन सी बात है। पिएर ने सोद-खोदकर पूछना चाहा, प
वृद्ध ने इतना ही कहा-भई, मेरी समझ में यह बात ठीक नई
जॅचती। तुम दोनों को आधी-आधी जायदाद मिलनी चाहिए थी
और जब डाक्टर घर लौटकर आया, तब भी उसके कानों में
मारोवसको के उक्त शब्द गूंज रहे थे। यगल के कमरे में ए
के टहलने की पद-ध्वनि सुनाई पड़ी। उसने एक गिलास पानी से
अपना गला तर किया और फिर सो गया।
~
३४
३
.
दूसरे दिन प्रातकाल जन डाक्टर सोकर उठा, तो उसने स्वयं
रुपया पैदा करने का दृढ निश्चय कर लिया था। कितनी पार वह
ऐसा निश्चय कर चुका था, पर कल्पना के वे विशाल महल जरा-
सी ठेस लगते ही चकनाचूर हो जाते थे। और वह फिर किसी
नई कल्पना का स्वप्न देसवा था । लिहाफ में पडा, कोमल
शय्या पर लेटा, वह सोच रहा था कि कितने डाक्टर देखते देखते
करोडपति बन गये हैं, क्या वह नहीं हो सकता ? यस
आदमी में जरा दुनियादारी होनी चाहिए। कितने ऐसे
डाक्टरों को वह जानता है, पर उसके कथनानुसार वे सब
निरे गधे हैं, गधे। वह उन लोगों से कहीं अन्छा है। बस
हावेर के दस-पाँच बडे-बडे घरों में उसकी धाक जम जाय,
फिर हजार रुपये महीने की आमदनी तो निश्चित है। और वह
सोचने लगा कि जब वह इतना प्रसिद्ध डाक्टर हो जायगा, तब
उसका कार्यक्रम क्या होगा ?
सुबह के समय मरीजों को
यौवन की भूल " उनके घर पर देसने जाना। फीस बीस फ्राक । अगर दस मरीज रोज भी देसे, तो वहत्तर हजार फ्राक प्रति वर्ष तो पके रहे। दोपहर के समय मरीजों को अपने घर पर देखना । फीस दस फ्राफ । टस मर्गज रोज देसे तब भी छत्तीस हजार फ्राक की वार्षिक आय होगी । कभी-कभी कोई रिश्तेदार अथवा कोई मित्र आ जायगा, तो मुरौवत में वह उनसे फीस न लेगा, और अगर लेगा भी, तो नाममात्र । कभी घटनावश एक के दो भी तो मिल जाते हैं। बस लेसा-ड्योढा वरावर रहेगा। दस हजार फ्राक प्रति मास खाने-सरचने, और मौज उडाने के लिए काफी हैं। इस स्वप्न को सत्य में परिणत करने के लिए उसे प्रथम आवश्य- कता है एक शानदार वगले की, आकर्पण सबसे बडा विज्ञापन है । तब वह अपने भाई से अधिक अमीर हो जायगा, और अपने बल पर । वह एक ख्यातनामा प्रतिष्ठित नागरिक बन जायगा। माता-पिता भी, फिर फूले न समाएँगे। वह बीवी चचो का झगडा तो पालेगा नहीं । हाँ, जीवन का आनन्द लूटने के लिए, वह कोई प्रेमिका रस लेगा, खूब सुन्दर, नवयुवती, हसमुस । अपनी इन कल्पनाओं में डूबकर पिएर इतना होकुल्ल हो उठा कि वह विछौने पर से उछल पड़ा। उसने उमी समय कोई सुन्दर वगला सोज निकालने का निश्चय किया था। सड़कों पर भटकते समय वह अपने को धिक्कारने लगा कि
यौवन कीम
उसने यह निश्चय महीने भर पहले क्यों न कर लिया, मैरीय
फी वसीयत का समाचार मिलने से पहले। अब तक तो उस
प्रैक्टिस चमक चुकी होती, और इस घटना पर उसे इतना दु
भी न होता।
किसी मकान पर 'किराये पर जायगा' की तरही टॅगी देर
ही वह रुक कर उसे एक नजर देसता और फिर उसे मनोनुकू
न पा, आगे बढता। दोपहर को भोजन के समय जब यह
लौटकर आया, तो उसने कितने ही ऐसे बगलों के नाम, जो अन्
हैं और साली भी हैं, अपनी डायरी में नोट कर लिये थे। 3
उनमें से सबसे अधिक उपयुक्त वगले को छाँटना भर शेप
गया था। बड़े कमरे से तश्तरियों के सिसकाने की तथा चम्म
की सनसनाहट की आवाज आ रही थी। तो क्या अब मैं
की मक्ती हो गया ? किसी को मेरा सयाल ही नहीं, मेरे नि
ही भोजन आरम्भ हो गया। पिएर की भृकुटि चढ गई
माथे पर घल पड गया।
'पिएर । ऊँह, जल्दी आओ जी । जानते नहीं कि आज |
बजे वकील साहब के यहाँ जाना है । आज का एक-एक मिन
अमूल्य है ।'-पिएर के हाल में आते ही पिता ने कहा।
मों का मस्तक चूम कर तथा पिता व भ्राता से हाथ मिला
के पश्चात् वह एक कुर्सी पर बैठ गया। माँ ने उसकी रकार
उसके सामने जिसकादी। भोजन ठडा हो गया था।
दृ
यौवन की भूल
.
उसके आने के कारण होती बातचीत में विन्न पड गया था।
वह अब फिर आरम्भ हो गई।
'अगर मैं तुम्हारी जगह होती'-मैडमरोलेन्ड ने जहाँ की ओर
देसते हुए कहा-'तो जानते हो क्या करती ? एक शानदार वगला
लेती, जिससे लोगो का मन उमकी ओर आकृष्ट हो । रोव गाँठने के
लिए नित्य प्रति घोडे पर बैठ कर सैर करने के लिए जाती महीने मे
दो-चार अन्छे-अच्छे मुकद्दमे ले लेती, कोर्ट में अपना प्रभार
जमाने के लिए। मैं अपने को एक उच्चकोटि का वकील प्रदर्शित
करने का प्रयत्न करती। छोटे, गरीव मुवकिलो से तो बात न करती।
ईश्वर की कृपा से अब तुम्हे किसी बात की चिन्ता नहीं। अब
तुम जो चाहो कर सकते हो । हाँ, बेकार बैठना ठीक नही, आदमी
को कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिए । रुपये के लिए न सही,
तो सेवा के लिए ही सही।'
वृद्व रोलेन्ड नासपाती छील रहा था। उल्लसित स्वर मे
उसने कहा लूसी । जानती हो मैं क्या करता ? एक सुन्दर नौका
लेता, ऐसी नौका कि किसी के पास न हो, और फिर आनन्द-पूर्वक
समुद्र की सैर करता।
पिएर ने भी अपनी राय जाहिर की। 'यह दौलत नहीं है।'-उसने
कहा-'जो आदमी को आदमी बनाती है, वह बुद्धि है। धन तो
एक बहुत बडा अन है, अयोग्य
पुरुष
के
हाथ
में जा कर उसके
पतन का कारण बन जाता है और एक योग्य पुरुप के हाथ में
३८
यौवन की भूल
जा कर लोकोपकार का साधन हो जाता है। दुनिया में योग्य
पुरुप कम होते हैं। परों को चाहिए कि अब यह दिसा दे कि
उसमें भी कुछ योग्यता है। उसे चाहिए कि पहले से भी
अधिक परिश्रम करे। मुकदमों में सत्य का पक्ष ले। गरीयो
का गला न घोटे, उनकी मदद करे। और उसने अपना वक्तव्य
इस प्रकार समाप्त किया-'अगर मैं उसकी जगह पर होता
तो ऐसा ही करता!'
फादर रोलेन्ड ने कन्धा सिकोड़ते हुए कहा-यह सर कोरी
दार्शनिकता की बातें हैं। जीवन वही उत्तम है, जिसमे काम अधिक
न करना पडे, सरलता से, आनन्द से दिन कटते जॉय । हम
आदमी हैं, जानवर नहीं। अगर कोई गरीब है, तो उसे मजयूरन
काम करना पड़ेगा, पर जब हम अमीर हैं, तो क्यो न टॉग फैला
कर सो, आनन्द से दिन काटें ।
पिएर ने नाक सिकोडते हुए उत्तर दिया- हम लोगो में मत.
मेर है । मैं तो दुनिया में किसी चीज को महत्व नहीं देता, यस
केवल विद्या और बुद्धि प्रधान मानता हूँ। इनके सम्मुस और सब
चीजे हेय हैं।
चतुर मैडम रोलेन्ड ने झगडा वढने की आशका देख घात का
प्रसंग बदल दिया। थोड़े ही दिनों पहले पडोस में एक सून हो
गया था। उसने उसी विषय को छेड दिया। सब के मस्तिष्क
इस बात को लेकर नाना प्रकार की विवेचना करने लगे। सूनी
,
यौवन की भूल कैसे घर में घुसा होगा, भागा कैसे होगा, फिर क्या हुआ होगा।- आदि आदि । रोलेन्ड तव तक अपनी कलाई में बँधी घडी को देसता जाता था। सहसा उठते हुए उसने कहा-अच्छा अव चलना चाहिए, समय हो गया। पिएर ने देसा, अभी एक वजा है और इन लोगो को अभी से इतनी जल्दी है। उसके शरीर में एक आग-सी लग गई। 'वकील साहब के यहाँ तुम भी चलते हो ?'-माँ ने पूछा । 'मैं? नहीं जाऊँगा।' उसने रूसे स्वर में उत्तर दिया-वहाँ मेरी क्या आवश्यकता है? ज्यणें ऐसा चुप बैठा था, जैसे उसे इन बातो से कोई सरोकार ही नहीं। हाँ, जव सून वाला प्रसग छिडा था, तब उसने जब- तब दो-एक शब्द कह दिये थे, वह भी इसलिए कि वह एक वकील था। अब वह चुप बैठा था, पर उसको चमकती आँखें तथा आभायुक्त कपोलो को देखकर कहना पडेगा कि वह प्रसन्न है, अति प्रसन्न है। सन लोगों के जाते ही पिएर भी उपयुक्त वगला पसन्द करने के लिए चल पडा। बहुत देर की छान-धीन के पश्चात् 'बोलीवार्ड .कोयस' नामक सडक पर उसे एक मनोनुकूल बंगला मिल गया । बगला बाजार के निकट ही लबेसडक था। बाहर से दिखाई पड़ने वाले चमकते शीशे के खूबसूरत दरवाजों की ओर मन अनायास ही आकर्पित हो जाता
यौवन की भूल
-
था। बगला छोटा भी न था। बाहर की ओर दो बड़े बड़े
कमरे थे, जो कि मरीजों के बैठने के काम में आ सकते थे।
भीतरी भाग भी हवादार था, सुन्दर ढग से बना हुआ था ।
परन्तु जब उसे मालूम हुआ कि उसका वार्षिक किराया
वीन हजार फ्राक है, जो कि पेशगी देना होगा, तो यह सकुचित हो
उठा। उसके पास एक फ्राक भी न था। माता-पिता की
चार्पिक आमदनी केवल आठ हजार फ्राक थी, जो कि घर के
सर्च में काम आ जाती थी। दो दिन पश्चात् अपना निर्णय
देने के लिए कह कर वह लौटा । मार्ग में उसने सोचा-अगर
यह रुपया ज्यों से माँगू तो? इसमें हर्ज क्या है ? रुपया
बतौर कर्ज के लिया जाय । डाक्टरी चलते ही सब रुपया
उसे अदा कर दूंगा। बस यही ठीक है ।
उस समय चार भी न बजे थे। पिएर ने घर लौट चलना
उचित न समझा। निरुद्देश्य वह सड़को पर इधर-उधर
भटकता फिरा । मस्तिष्क शून्य-सा हो रहा था। दिन
भर की थकावट के कारण ऑसें झिपी जाती थी, अग.
'अग टूट रहा था।
ओह, जीवन में कितना परिवर्तन हो गया। वह किस व्यथा
और छेश में दिन काट रहा है। क्या जीवन का नम सत्य
यही है?
वह योंही सडकों पर भटकता रहा । उसकी अभिलाषाएँ
यौवन को भूल
एक सुन्दर घोडागाडी पर बैठ कर, नगर के एकान्त भाग
की ओर जा कर उन्मुक्त पवन के रोमाचकारी स्पर्श का
आनन्द लूटने के लिए मचल रही थीं। पर पैसा ? एक
प्याला मदिरा के लिए उसे पहले यह देसना पडता है कि जेव'
में पैसा है, अथवा नहीं। तीस वर्ष का युवक, जरा-जरा सी
बातों के लिए माँ के सम्मुख हाथ पसारे, छि। यह उसके
लिए कितनी लज्जा की बात है। और जरों ? अब वह
विचारधारा उसे एक प्रदेश की ओर घसीटे ले जा रही है
जहाँ ईर्ष्या की चिनगारियाँ धधकती रहती है। उसने दृढता-
पूर्वक अपने को रोका।
सडक के किनारे कुछ लडके खेल रहे थे। धूल से लिपटे,
फेश बिखेरे वे एकाग्र चित्त हो बालू का किला बनाने का प्रयत्न
कर रहे थे। सबो मे एक प्रतियोगिता-सी चल रही थी कि
देखें किसका किला सबसे ऊँचा बनता है।
'यही हाल हमारी अभिलापाओं का है।'-पिएर ने उन्हें
देख कर सोचा। और फिर उसने इन्हीं बालकों की भांति
सब कुछ भूल कर इसी तन्मयता से प्रयत्न करते रहने का विचार
किया । उसे इस समय अपने निकट एक स्त्री की आवश्यकता
प्रतीत हुई । अकेला न होने पर आदमी इस प्रकार चिन्तित नहीं
होता। कोई-न-कोई आकाक्षा उसे उलझाये रहती है। हृदय अपने
निकट एक स्त्री के हृदय की धडकन सुन कर इस प्रकार व्यथित
यौवन की भूल
हा होता । दिल की व्यथा दूसरे के सम्मुस कह देने पर, मन
हुत कुछ हलका हो जाता है।
तब वह त्रियों की कल्पना करने लगा। वह उनके विषय में
हुत कम जानता है । डाक्टरी पढते समय उसकी जान पहचान
|चार नमों से हुई थी , पर उसकी शुष्कता के कारण उस परि-
य से कुछ लाभ न हुआ। अगर वह कुछ साहस से काम लेता,
| अवश्य उनमें से कोई न कोई युवती अपने मनोनुकूल पा ही
ता। और उससे घनिष्ठता कर वह इस समय कितना प्रसन्न
ता । आह ।
सहसा, किसी प्रेरणा ने उसे मैडम रोजमिली के घर जाने
ने उत्तेजित किया , परन्तु वह फिर ठिठक गया। वह उसके
नोनुकूल नहीं । क्यों ? असभ्य है, शुष्क है, और फिर वह
रॉ को पसन्द करती है । और इसी बात से उसका मन उसकी
र से सट्टा हो गया है। ज्याँ उमका भाई है तो सही, पर अगर
ई उसके हृदय में बैठ कर देसे, तो पायेगा कि वह अपने को
एरों से श्रेष्ठ समझता है । और अगर मैडम रोजमिली उसकी
पेक्षा परों को पसन्द करती है, तो इसके माने हैं कि उसकी रुचि
य है। वह उस नीच के यहाँ कदापि न जायेगा।
'तो फिर क्या करूँ ?'-पिएर ने स्वगत पूछा। पिछली रात
की तरह, वह यह रात भी किमी नीरस स्थान मे ठंड से सिकुडते
हुए तो काट नहीं सकता।
पौवन की भूल
उसे इस समय चाहिए एक सुन्दरी युवती, जिसके आलिङ्ग
में बँध कर वह दुनिया को, अपने को, सबको भूल जाय । हृद
से-हृदय, मुँह-से-मुँह, कमर-से-कमर, जाँघ-से-जाँच-दोनों शरै
परस्पर में घुलमिल जाने की चेष्टा करने लगे। वह अपनी भा
नाओं का ठीक प्रकार विश्लेपण न कर सकता था; पर उस
थकित शरीर एव मन ऐसी अवस्था में था, जव कि पुरुप किर
वी के अक में होने की आकाक्षा करता है, उसके आवेशपू
आलिङ्गन तथा मधुर चुम्बन-द्वारा अपने ठडे हृदय में स्फूर्ति-सचा
होने का स्वप्न देसता है, उन प्रेम से छलकती दो नीली आँसों
सन्देश पर उन्मत्त होकर, उसके शरीर में अपना शरीर मिला क
किसी नई दुनिया का सुस लूटने की कल्पना करता है । औ
उसी समय उसे काफे में नौकर एक युवती की याद आई, जिस
साथ वह एक वार घूमने गया था, और तब से ऑसे कई वा
स्नेह का आदान-प्रदान कर चुकी थीं।
वह उस युवती को देखने के लिए चचल हो उठा। मार्ग में
वह सोचता जाता था कि क्या कहूँगा उससे ? वह अपने मन में
मुझे क्या समझेगी ? सम्भवत कुछ नहीं। वह जाते ही उसके
कोमल हाथों को अपने हाथों में लेकर, उन्हें धीरे से दवायेगा, ओर
के कोने चढा, ऑसों से मुस्करायगा, बस युवती उसका आशय
समझ जायगी।
काफे में कोई था नहीं । युवती खिडकी में बैठी ऊँच रही थी।
४४
योगन की भूल
मालिक आराम कुर्सी पर मजे से दोनो टॉग फैलाये मीठी
नींद ले रहा था।
पिएर को देखते ही युवती झट से उठ सडी हुई ।
'कहिए महाशय, सव कुशल !'-दुकान की सोढी पर पैर
रसते ही उसने एक युवती का कोमल कठ-स्वर सुना। पिएर
ने प्रसन्न नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए, उससे हाथ मिलाया।
हूँ, तुम तो अच्छी तरह हो ?'-उसने पूछा।
'हाँ, अच्छी समझिए। आप तो अब इधर आते ही नहीं।'
'छुट्टी कम मिलती है । जानती हो, मैं डाक्टर हूँ।'
'अच्छा । अभी थोडे दिन हुए मैं बीमार पड़ गई थी। पहले
मुझे यह मालूम होता, तो आप ही को बुलवाती। अच्छा,
क्या लाऊँ आपके लिए ?"
'अगूरी | और आप क्या पिएँगी?'
'जब आप कहते हैं, तो मै भी अगूरी पी लेंगी।'
और फिर वे दोनो एक मेज पर पाम-ही-पास बैठ गिलास
खाली करने लगे। वह चपल युवती बातचीत करती-करती उसकी
ओर एक कटाक्ष कर मुम्करा देती । वह गजव की मुस्कराहट थी-
चुम्वक पत्थर की भांति उसमे एक आकर्षण शक्ति थी, जिससे
सिंच कर पुरुप उन मुस्कराते कपोलो को अपने अघरों से दवा
देने के लिए चचल हो उठता है ।
पिएर का हाथ अपने हाथों में ले, वह उन्हे देवाती, जैसे
यौवन की भूल
,
,
के मुँह पर एक तमाचा जमाने के लिए हाथ तन गये। वह
इस चहकती चिडिया को कुचल देना चाहता था, मिट्टी में
मिला देना चाहता था
पर फिर भी उसने अपने को रोकते
हुए, ओठ चवाते हुए पूछा-क्या समझीं आप ?
युवती ऐसी भोली बन गई थी, जैसे वह कुछ जानती
ही न हो । सरलता से उसने उत्तर दिया-यही कि वह आपसे
अधिक भाग्यशाली हैं।
मेज पर एक फ्रांक फेंक, पिएर झपट कर वाहर चला आया।
उसके कानो मे युवती के व्यग्य-पूर्ण शब्द-'अव समझी 11
तव भी गूंज रहे थे। उसके इस कथन का आशय क्या है ?
उसके स्वर में व्यग्य था, अधरो पर एक कुटिलता थी, जैसे
कोई घृणा की बात कही हो । शायद वह छोकडी ज्यों को
मैरीकल का पुत्र समझ रही है। और इस विचार के आते ही,
भावो के अत्यधिक उद्वेलन के कारण वह क्षणभर के लिए स्तम्भित
हो गया। फिर, पार्श्ववर्ती दूसरे काफे में जा, मुँह मूंद कर
वह एक फुर्सीपर बैठ गया। नौकर के आने पर उसने उसे एक
गिलास मदिरा लाने की आज्ञा दी।
उसका हृदय तीन वेग से धडक रहा था। क्रोध के आवेग मे
अग अग कॉप रहा था, आँसो से चिनगारियाँ निकल रही थीं।
एक दिन पहले मारोवसको ने भी इस घटना को सुन आश्चर्य
प्रकट किया था-यह तो ठीक नहीं जंचता । आज काफे की इस
४८
४
योवन को भूल
साधारण युवती ने भी व्यग्य किया। गिलास में छलकती फेनिल
मदिरा की सतह पर उठते और दूसरे क्षण विलीन हो जाते
बुलवुलो को देखते हुए उसने स्वगत पूछा-क्या यह सत्य है ?
चाम के उस शरीर में एक तूफान-सा उठ रहा था। उसे
प्रतीत हो रहा था कि लोगों का यह सन्देह विना किसी जमीन
के नहीं है। वह कुँआरा पुरुप अगर अपने मित्र के दोनो लडकों
को आधी-आधी जायदाद दे जावा, तो इसमें कोई आश्चर्य की
वात न थी, पर जब वह केवल छोटे भाई के नाम अपनी
वसीयत कर गया है, तो लोग स्वाभाविक्तया इसमे किसी रहस्य
की कल्पना करेंगे। उसे आश्चर्य हो रहा था कि माता-पिता के
दिमाग मे यह बात क्यो न धंसी । सम्भवत वे दौलत की खुशी
में सब-कुछ भूल गये हैं। फिर, क्या कभी वे ऐसी घृणित यात
की कल्पना कर सकते हैं ?
पर पास-पडोसी तो सूब हँसेंगे, उसकी माँ का मजाक
उडायेंगे, जैमा कि उस युवती के कथन से प्रतीत होता है।
लोगों के मन में ज्याँ और उसकी आकृति में अन्तर देस सदेह
होता ही है। अब तो वे खुल सेलेंगे । जब कभी रोलेन्ड के
लडको की चर्चा होगी, तो कोई उत्सुकता से आँखें उठाकर
पूछेगा-कौन-सा, असली कि नकली?
वह एक झटके के साथ उठ खडा हुआ। माँ से सब बातें
साफ-साफ कहने के लिए उसने निश्चय कर लिया था।
४९.
यौवन की भूत
लान्छना का प्रतिकार करने के लिए, अब बस एक उपाय था-
प्परों दानपत्र को अस्वीकृत कर दे।
ड्राइग-रूम से गिलासों के सनकने की तथा तीव्र अट्टहास
की ध्वनि आ रही थी। भीतर जाकर उसने देखा कि गोलाकार
मेज के चारों ओर कैप्टन व्यूसायर, मैडम रोजमिली तथा घर के
तीनो प्राणी बैठे थे। रोलेन्ड ने इस हर्प-समाचार के उपलक्ष में
एक भोज का आयोजन किया था। नाटा-सा गोल-गोल आदमी,
कैप्टन
व्यूसायर, रोलेन्ड का मित्र तथा मैडम रोजमिली के
मृत पति का घनिष्ठ, अपनी हँसी से सारे वायुमण्डल को
कम्पित कर रहा था। उप प्रसन्नता से सब के गिलास भर
रहा था। मैडम रोजमिली ने जब दूसरा गिलास पीने से
नहीं कर दिया, तो कैप्टन व्यूसायर ने उहसित स्वर में कहा-अरे
पियो जी, पियो । मुझे देयो मैं कितने गिलास चढा चुका हूँ,
और अभी और पियूँगा। मदिरा की तरी से शरीर में एक
स्कृति का सचार होता है। विश्वास रखिए, यह कभी
नुक्सान नहीं करती।
उस समय रोलेन्ड भी सूव प्रसन्न हो रहा था। हँसते-हँसते
उसकी आँखों में पानी भर आया था । गोल-गोल शरीर, तोंद फुली
हुई, कुर्सी में घुसा, जब वह हँसता, तो एक अजीव प्रकार का
जन्तु प्रतीत होता था।
मैडम रोलेन्ड भी होत्फुल्ल हो ज्यों को देख रही थी।
योजन यी भूल
हँसी के इस बाजार को देस पिएर के माथे पर बल पड़
गये। अँझलाया हुआ वह एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया।
भोजन आरम्भ होने पर, ज्यों ने सव को परोसा । न्यूसायर
एक घटना बताने लगा कि कैसे एक भोज्य मे सर ने छक-छक
कर साया और फिर दूमरे ही दिन वे सब बीमार पड गये ।
मैडम रोजमिली, ज्वरों और माँ परस्सर एक सैर के लिए प्रोग्राम
बना रहे थे। पिएर उत्तरोत्तर क्रोधित होता जा रहा था।
किसी काफे में भोजन न करने से वह सिन्न हो रहा था। उसे
आश्चर्य हो रहा था कि अब वह कैसे अपना निश्चय माँ और
ज्यों से कह सकेगा। वे दोनों तो खुशी में फूले नहीं समाते ।
अभी तो भोज का ही आयोजन हुआ है, भविष्य मे न मालूम
कितने आयोजन होंगे।
नौकरानी ने शेम्पेन की बोतल सोली। होन्मत्त, रोलेन्ड
ने मुँह से वैसा ही शब्द सृजन करने का प्रयत्न करते हुए
कहा-मुझे यह आवाज पिस्तौल की आवाज से भी अधिक
मधुर प्रतीत होती है।
पल-पल पर क्रोधित होते पिएर ने मुँह सिकोड कर कहा-
और तुम्हारे लिए उसमे भी अधिक घातक है।
'क्यो
रोलेन्ड बहुधा अपने अस्वस्थ होने की शिकायत किया करता
आज सिर भारी है, तो कल चफर आ रहा है।
८
या।
यौवन की भूल
-
'पिस्तौल का निनाना तो चूक भी सकता है, पर यह अचूक है ।'
'है, तो फिर ?'
'तो फिर क्या ?'-डास्टर ने और अधिक झुंझला कर उत्तर
दिया-तथ शिकायत कीजिएगा कि यहाँ दर्द हो रहा है, यहाँ।
यह मदिरा रक्त को दूपित कर देती है, शरीर को गला
डालती है।
रोलेन्ड का चेहरा उतर गया। ओठ तक आये हुए गिलास
को उसने मेज पर रख दिया। झपा-सा वह पुत्र को देसने लगा।
व्यूसायर चिल्लाया-यह डाक्टर लोग ऐसे ही वका
करते हैं। न साओ, न पियो, कुछ न करो! तव जिन्दगी
का लुत्फ ही क्या ? मै तो, कहता हूँ, सब काम करो। जितना
आनन्द लूट सकते हो, लूटो। मै इतनी शराब पीता हूँ,
पर मुझे कभी कोई शिकायत नहीं होती।
पिएर ने रूसे स्वर में उत्तर दिया-एक तो आपका स्वास्थ्य
पिताजी की अपेक्षा कहीं अच्छा है, फिर भी जब साट पर
पडिएगा, तब कहिएगा कि डाक्टर ठीक कहता था। पिताजी
को अगर कोई अनुचित कृत्य करते देखू, तो यह मेरा धर्म
है कि उन्हें आगाह कर दूं।
मैडम रोलेन्ड ने क्षुब्ध होकर कहा- अरे पिएर, क्यो इतने
व्यग्र होते,हो,। एक गिलास मे कुछ नहीं हो जायेगा। समय
देसा करो। इस समय रग मे भग करना अशिष्टता है।
योवन पो भूल
कंधा सिकोडते हुए पिएर बुख़ुदाया- मेरा काम कहने का
था, कह दिया। जिसका जो मन आये करे।
परन्तु रोलेन्ड ने तन मदिरा न पी। वह ललचाई दृष्टि
से गिलास में उफनाती मदिरा को एकटक देखता बैठा रहा।
मिनट-भर पश्चात् उसने हिचकिचाते, विना पिएर की ओर
देसे धीमे स्वर में पूछा-क्या यह वाकई नुक्सान करेगी?
पिएर स्वय अपने ऊपर क्रोधित हो रहा था कि मैं क्यों
पोला। 'नहीं'-उसने कहा-'इस बार पी लीजिए, पर अधिक
पीना ठीक नहीं। किसी चीज की लत बुरी होती है।'
रोलेन्ड ने गिलास उठाकर, हिचकिचाते हुए उसे ओठों से
लगाया। एक घुट, दो बूंट, उसने पल भर में गिलास
साली कर दिया। और फिर इस प्रकार मुँह बनाया, जैसे उसने
जवरन मदिरा पी हो। हृदय में एक ताजगी और गर्माहट
का अनुभव हो रहा था।
सहसा पिएर की दृष्टि मैडम रोजमिली पर जा पडी।
ऑसो ने उसके हृदय की तह में पैठ उसे पढ़ने का प्रयन किया ।
मैडम रोजमिली ने एक बार उपेक्षा की दृष्टि से उसको देखकर
जैसे कहा-छि। ईर्ष्या में जले जाते हो, क्यों?
पिएर ने ऑसे नीची कर ली। उसे भोजन रुचिकर न
लग रहा था। वह चाहता था कि किसी दूर एकान्त स्थान में
भाग जायजहाँ यह हँसी-मजाक कुछ न सुनाई पड़े।
यौवन की भूल
रोलेन्ड पिएर का वक्तव्य भूलकर, ललचाई दृष्टि से शैम्पेन
की बोतल की ओर देख रहा था। उस उफनाते तरल पदार्थ
को ओठों मे लगाने के लिए उसकी इच्छा फिर प्रवल हो उठी थी।
चारों ओर आँसें दौडाकर वह सोचने लगा कि कैसे बोतल उडा
लू और पिएर भी क्रोधित न हो पाये । आसिर उसने एक चाल
खेली। कुर्सी पर से उठ, उदासीन भाव से उसने मेज पर से
बोतल उठाई और फिर अतिथियों का गिलास भरने लगा। सबके
गिलास भर कर जब अपना गिलास भरने की बारी आई, तो
सवका ध्यान अपने में आकर्पित करने के लिए वह जोर-जोर से
बाते करने लगा, और फिर जैसे अनजाने में अपना गिलास भर लिया।
पिएर ने पिता की यह चाल न देखी। उसकी आँखो में
मदिरा के लाल डोरे चमकने लगे थे। शरीर मे एक विद्युत-धारा-
सी दौडती प्रतीत हो रही थी। सब बातें ध्यान से उतार, वह
गिलास-पर-गिलास साली कर रहा था।
भोजन के पश्चात् व्यूसायर ने अपने मेहरवान मेजवान को
धन्यवाद दिया।
ज्यों ने हंसते हुए प्रत्युत्तर दिया-धन्यवाद तो मुझे देना
चाहिए, जो आप लोगों ने पधार कर इस घर की शोभा बढाई।
मैं शब्दों द्वारा आपकी कृपा का आभार प्रदर्शित नहीं कर सकता,
हाँ, अपने कृत्यों द्वारा करने का प्रयत्न करूँगा।
माँ ने ब्ण की पीठ थपथपाते हुए कहा-शावाश ।
योवन की भूल
व्यूसायर ने कहा-मैडम रोजमिली, आप भी कुछ कहिए ।
गिलास वाला हाथ ऊपर कर, नशे में लड़सडाते हुए मैडम
रोजमिली ने बैठ कर कहा-मैं आप लोगों से प्रार्थना करूंगी कि
क्षण-भर के लिए आप महाशय मैरीफल की मृतात्मा की शान्ति
के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें।
दूसरे क्षण कमरे में निस्तब्धता थी । समय बीत जाने पर
व्यूसायर
ने रोलेन्ड से पूछा-हाँ, यह तो वताइए, महागय
मैरीकल कौन थे?
वृद्ध ने लडसडाते स्वर में उत्तर दिया-भाई थे, भाई । ऐसे
मित्र कम देसने मे आते हैं। वस क्या कहूँ, मैं उन्हें अपने से
अधिक मानता था।
मैडम रोलेन्ड ने भी कहा हाँ, वे हमारे एक अभिन्न हृदय
मित्र थे। पिएर ने एक बार आँसें तरेर कर माँ को देखा और
फिर पिता को। फिर उसने एक गिलास मदिरा और पी।
जीवन की सारी चिन्ताओं को, दुस-स्मृतियों को वह मदिरा
से धो डालना चाहता था ।
४ दूसरे दिन दोपहर को जब पिएर सो कर उठा, तो उसका मन हलका था। पिछले दिनो को बातें उसे दुखद स्वप्न-सी प्रतीव होती थी, जिसमें कोई सत्य नहीं। काफे वाली छोरी के व्यग्य का आधार सम्भवत' मिथ्या था। ऐसी वजारू छोकरियाँ सव को अपने ऐसा समझती हैं। किसी सचरित्र स्त्री का उल्लेख अपने सामने होते ही, पतन के सड़ में गिरी यह कामिनियाँ दृष्टि में उवल कर चिल्ला उठती हैं-हाँ, मैं जानती हूँ उसे । उसके तो हम लोगों से अधिक यार हैं। पवित्रता का ढोंग रचने वाली यह विवाहिताएँ पति की आड में शिकार खेलती हैं ! और किसी अवसर पर अपनी पवित्रात्मा माँ के चरित्र पर सन्देह करने की कल्पना तक वह न कर सकता था। एक ईर्ष्या के भाव, जो अब तक चुपचाप उसके हृदय मन्दिर में सो रहे थे, मेरीफैल के दानपत्र का समाचार सुनते ही हडबडा कर जाग उठे हैं। उस काफे वाली युवती को इस दानपत्र का समाचार , यौवन फी भूल सुनाते समय क्या उसके हृदय में ईर्ष्या न विद्यमान थी ? सम्भ- वत उसी की कलुपित छाया के कारण उस युवती के मुँह से ऐसे वाक्य निकल सके। वह स्वय अभी अपने हृदय को नहीं 'समझ पाता। मैडम रोजमिली भी तो एक आदर्शवादी स्त्री है। उसे भी भले-बुरे का ज्ञान है । उसके मन में ऐसा सन्देह क्यों न हुआ ? उसने मैरीकल की मृतात्मा की शान्ति के लिए क्यों प्रार्थना की ? अगर उसे किंचित-पात्र भी सदेह होता, तो वह कभी ऐसा न करती। पिएर के मन में माँ और भाई के प्रति प्रेम और आदर को भावनाएँ फिर लहलहा उठी। उसने एक आनन्द-रश्मि देसी, जिसका उद्गम वह इन्हीं सद्भावनाओ में समझता था। उसने 'निश्चय किया कि अब वह घर में हर एक से नम्रता, विनय और प्रेम-पूर्वक पेश आयगा। प्रात काल जलपान के समय, उस की लल्छेदार तथा सरस बातो पर सन लोग हँसते-हँसते दुहरे हो गये। प्रकोष्ठ में एक आनन्द की धारा वह चली। माँ ने हँसी से सिलते हुए पिएर से कहा-अच्छे लडके, सम्भवत तुम्हें स्वय इस बात का ज्ञान नहीं है कि तुम कितने हँसमुस हो सकते हो। और, वात-चीत के वीच-बीच में पिएर कोई ऐसा शब्द कह
यौवन की भूल
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देता कि सब के मुख पर अनायास ही हँसी फूट पड़ती। जग भी
प्रसन्न नेत्रों से अपने भाई की ओर देस रहा था।
काफी पीते-पीते पिएर ने पिता से पूछा-आज आप नौका
पर तो न जाएँगे
'नहीं बेटे ।'
'तो आज मैं उसे ले जाऊँ?'
'हाँ, हाँ, इसमे पूछना क्या ।'
एक तम्बाकू वाले की दुकान से उम्दा सिगार सरीद कर
पिएर आनन्द से टहलता हुआ घाट की ओर गया ।
मल्लाह नौका पर पडा ऊँघ रहा था। पिएर की आवाज
सुनते ही वह जाग पड़ा।
'चलो, आज हम तुम घूमने चलेंगे।'–पिएर ने कहा और
लोहे की सीढियों से उतर कर वह नौका पर कूद पड़ा।
आसमान साफ था। दिन सुहावना प्रतीत होता था।
समतल पानी को चीरती हुई नौका आगे वढी। निग्ध पवन
बहुत धीरे-से पाल को छू-भर देता था। नौका, मालूम पडता
था, हवा पर अपने आप वही चली जा रही है। दोनों टाँगें फैलाये,
पीठ की ओर हाथ टेके पिएर आनन्द-पूर्वक सिगार पीता हुआ
पल-पल पर दूर होते घाट को देस रहा था।
सागर के मध्य भाग की ओर पहुँचते-पहुँचते नौका की गति
सहसा दुगनी हो गई । शीतल पवन का एक तीव्र झकोरा पिएर
यौवन की भूल शरीर से टकराया। चारों ओर जल, अर शान्त न प्रतीत ता था। छोटी-छोटी गन्दमय लहरी पर नौका डगमगा रही ।। किनारे से दिसाई पडते मकानात और पेड-पढ्व अब विशाल गगन के निचले भाग पर सिंची एक काली रेसासे जीत होते थे। पिएर एक अपूर्व आनन्द का अनुभव कर रहा था। अपनी नोरम कल्पनाओं का स्वप्न देसता हुआ वह पुलकित मन से सोच हा था-कल ज्वरों से रुपया उधार माँग लूंगा, फिर उस नये कान में जा कर रहूँगा, प्रैक्टिस चमक उठेगी, सर लोग मेरा म्मान करने लगेंगे, और और सहसा पूर्व दिशा की ओर केत करता हुआ मल्लाह चिल्ला उठा-महाशय, देसिए, बर्फ का फान आ रहा है। बादलों की भाँति एक भूरा घना कोहरा सा तैरता चला आ हा था। पिएर के आदेश पर नौका घाट की ओर मोड दी गई , र वे लोग घाट तक पहुँच भी न पाये थे कि वह तूफान उनके नकट आ पहुँचा। पिएर के अग-अग मे एक कँपकँपी-सी दौड ई। दम घुटने सा लगा। उसने दोनों हाथो से अपना मुँह मूंद लया। जब वे लोग घाट पर पहुंचे, तो बर्फ से भीग कर वे बेदम- हो गये थे। घर पहुँचते ही पिएर कपडे बदल कर गर्म विछौने धुस गया। सन्ध्या को भोजन के समय जब वह हाल में गया, तो माँ ५९
यौवन की भूल
पारों से कह रही थी-लोग उन शीशे के दरवाजों को देखते
रह जायेंगे। जब उनमें फूलों के गमले चुन दिये जायेंगे, तब
और अधिक आकर्षक हो जायेंगे। देखना, मेरा हाथ लगते
वह घर स्वर्ग-सा बन जायेगा।
'कौन-सा स्वर्ग, माँ डाक्टर ने पूछा ।
'ओह, एक बगला है, जो तुम्हारे भाई के लिए पसन्द कि
है !'-माँ ने कहा-'वाहर दो ड्राइंगरूम हैं। भीतर के कमरे
हवादार हैं। घर-भर मे शीशे के खूबसूरत दरवाजे लगे।
घडा सुन्दर बंगला है।
पिएर के माथे पर बल पड़ गये। भौहें सिकोड़ कर उर
पूछा-कहाँ पर है।
'योलीवार्ड फ्रैंकोयस' पर
सदेह के लिए अव किंचित् मात्र भी स्थान न था।
वही मकान था, जिसे डाक्टर अपने लिए पसन्द कर ओर
था। वह कुछ उद्विम हो उठा।
मैडम रोलेन्ड प्रसन्नतापूर्वक कहती गई-अट्ठाईस सौ रुप
साल पर तय किया है। मकान-मालिक तीन हजार वापि
माँग रहा था। मैने कह सुन कर दो सौ रुपये का
करवा दिये। वकीलों के लिए ऐसा
मुवफिलों को अपनी ओर
"
ज
साधन होगा।
६०
यौवन को भूल
.
और क्षण-भर चुप रहने के पश्चात् उसने फिर कहा-अब
तुम्हारे लिए भी एक अच्छा सा मकान दृढना शेप रह गया है ।
डाक्टरों को भी
नाक सिकोड कर पिएर ने वीच ही में कहा-मेरे लिए
आप चिन्ता न करें। मैं अपना भार अपने ही ऊपर रसना
चाहता हूँ।
माँ ने कहा हाँ, यह तो ठीक है, पर तब भी हमें तो कुछ
करना चाहिए।
भोजन करते-करते सहसा पिएर ने पिता से पूछा-आपसे
मैरीकल की जान-पहचान कैसे हुई थी ?
रोलेन्ड ने माथेपर हाथ फेरकर मोचते हुए कहा-देसो बताता
हूँ। वात पुरानी हो गई है न, इसीलिए हाँ, याद आ गया।
तुम्हारी माँ जब दुकान पर बैठी थी, तभी परिचय हुआ था,
क्यो ठीक है न लूसी ? उसने आ कर तुमसे कोई चीज माँगी
थी। और फिर वह एक ग्राहक से मित्र बन गया था ।
'कितने वर्ष हुए इस बात को ?'
रोलेन्ड ने फिर माथे पर हाथ रसते हुए, पत्नी की ओर देख
कर कहा-जरा बताओ तो लूसी। मुझे ठीक याद नहीं आता।
तुम्हारी स्मरण-शक्ति मुझसे अधिक तेज है।
क्षण-भर सोचने के पश्चात् लूसी ने गम्भीर स्वर में उत्तर
दिया--पच्चीस वर्ष से अधिक हो गये। वन पिएर तीन वर्ष
६१
.
का था। उसी साल तो इसे लाल बुखार आया था। उस
उस समय मैरीफल ने इसके लिए बहुत दौड-धूप की थी।
रोलेन्ड चिल्लाया-हॉ, ठीक, ठीक । विचारा रोज दवाई
लेने जाता था। वडा नेक नीयत आदमी था। तभी से तो
हम लोग गहरे मित्र बन गये। इसके अच्छे होने पर उसे
बडी प्रसन्नता हुई थी।
और तव अनायास ही पिएर को विचार आया कि यह
मनुष्य मुझे पहले से जानता था, मुझे प्रेम भी करता था,
मेरे ही कारण गहरी मित्रता हुई, तब भी उसने सारी जायदाद
केवल मेरे भाई के नाम ही क्यो लिखी ? मेरे नाम एक पैसा नहीं।
फिर वह खिन्न-सा हो गया। उसके हृदय में एक शूल उठ रहा
था। वह चुपचाप बैठा रहा।
भोजन के पश्चात् वह घूमने चला गया। सडकों पर घना
फोहरा छाने के कारण रात्रि का अधकार उग्र हो उठा था। चारों
ओर बिजली के वल्वों के घिरे क्षीण प्रकाश में जल-थल
स्पष्ट दिसाई पडते थे। ठडी हवा कलेजे में
घुसकर
जैसे उसे
कँपा देती थी।
पिएर कधे सिकोडे, जेवो मे हाथ छिपाये चला जा रहा था-
मारोवसको की दुकान पर । अधेड अत्तार सदा की भाँति कुर्सी
पर पैर फैलाये सो रहा था। पिएर के आने की आहट पाते ही,
उसने आँसें सोल दी। एक अंगडाई ले नांद को झझकारते हुए
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योनि को भूल गिलास साली करते ही उसने मारोवसको से हाथ मिलाया, और दूसरे क्षण वह सडक पर था। उसने म्बगत पूछा-मैरीकल ने अपनी वसीयत ज्यों के नाम क्यो लिखी? वह जनता था कि वह अपने से यह प्रश्न किसी ईविश नहीं पूछ रहा है, बल्कि अपनी शका के समाधान के लिए, अपने को शान्त करने के लिए। नहीं, वह कभी इस बात को सच नहीं मान सकता। ऐसी बात का मन मे ध्यान तक लाना पाप है। यह संदेह निष्प्राण है, निर्मूल है, उसे इसको अपने से दूर भगाना होगा, दूर भगाना होगा, दूर भगाना होगा । वह अपने चारों ओर प्रकाश चाहता है, अधकार नहीं। अधकार पाप का साथी होता है। बस, मनोभाव- नाओ का विश्लेपण करते ही यह अवकार अनायास ही दूर हो जायेगा, प्रकाश लहलहा उठेगा। तव वह घर जाकर चैन से सोयेगा। स्मृति के आलोक में वह सारी घटनाओ का अनुवीक्षण करने लगा-मेरीकल उमे बचपन से जानता था, जब ज्याँ पैदा भी न हुआ था तव से। जब मैं ज्वर-प्रसित था, तो उसने मेरे लिए सवा आदि लाने का प्रबन्ध किया, इसके माने कि वह मुझसे स्नेह करता था। मेरे ही कारण माता-पिता से उसकी गहरी मित्रता हुई। तब उसे मेरे नाम वसीयत करनी थी, क्योकि वह मुझे ६४
यौवन की भूल
याँ से पहले जानता था, और इसीलिए उसे उससे अधिक मुझे
प्रेम करना चाहिए था।
और फिर, पिएर ने मैरीफल को अपने सम्मुस चित्रित करना
चाहा-उसकी आकृति, उसकी चाल-ढाल, उसका रहन-सहन ।
पर इस तरह टहलते-टहलते विचार एक बात पर नहीं
जम पाते थे। घडी में कोई विचार आता है, घडी मे कोई। उसे
एक जगह निश्चिन्त वैठ कर इन बातों पर गौर करना चाहिए।
और उसने समुद्र-तट की ओर जाने का निश्चय किया ।
दूर ही से समुद्र के भीषण गर्जन की ध्वनि कर्णगोचर हुई।
पवन चीस-सा रहा था, जैसे कोई मानसिक व्यथा हो। पिएर के
अंग-अग में एक कँपकँपो-सी दौड रही थी। तब भी एक वेंच पर
वैठ कर वह मन बातों पर गौर कर रहा था।
'मैरीकल | मैरीकल "
और सहसा उसके हृत्पटल पर एक छाया स्पष्ट-सी हो चली-
अधेड
पुरुप,
जो कि देग्नने मे सुन्दर लगता है.। न बहुत लम्बा
है, न ठिंगना। ऑसो में एक विशेष आकर्पण है। वह दूर से
देखने में नेकदिल और एक अन्या आदमी जंचता है। पिएर
और जरों को 'मेरे बेटे' सम्बोधित करता था। अधिकतर वह उन
दोनो को अँगुली एक एक हाथ मे पकड कर अपने साथ धुमाने
जाता।
और तर पिएर ने यह याद करने का प्रयत्न किया कि कैसे
यौवन की भूल
वह उन दोनों से बोलता, बोलते समय उसके मुस पर क्या भाव
रहते ? क्षण भर पश्चात् उसकी आँखों के सामने वह कमरा नाच
गया, जहाँ वे तीनो बैठ कर भोजन करते थे, गपशप लडाते थे।
दो नौकरानियाँ उनकी कुर्सी से कुछ दूर हट कर हाथ बाँधे खड़ी
रहती थीं। वे उसे 'महाशय पिएर' और ज्वाँ को 'महाशय ज्यों'
कह कर सम्बोधित करती।
मैरीकल उन्हे आते देसफर ही उल्लसित स्वर मे चिल्ला उठता-
आ गये बेटे । आओ मेरे अच्छे बच्चो । कहो, घर पर सब कुशल
मंगल तो है।
चातें अधिक और भिन्न-भिन्न विषयो पर होती। कभी-
कभी वह उन्हें पैसे भी देता था, मिठाई खाने के लिए ।
तव पिएर ने स्वगत कहा-जव कि वह हम दोनो को घरावर
प्यार करता था, तो उसने सारी जायदाद केवल ज्वरों के नाम
क्यों लिखी ? उसके व्यवहारों से तो कभी न प्रतीत होता
था कि वह छोटे भाई की ओर अधिक आकृष्ट है। तो कोई
रहस्य है?
जितना ही वह सोचता, उतना ही अधिक उलझन में पड़ता
जाता था। एक शूल, भयानक शूल उसके हृदय में उठ रहा
था। वह अत्यधिक बेचैन हो उठा था।
'ओह, परमेश्वर । क्या बात है ? मुझे सब ज्ञान होना
पाहिए।"
यौवन की भूल उमने फिर उन भूले दृश्यों पर दृष्टिपात किया , पर अब दृश्य धुंधले से प्रतीत हो रहे थे । वह एक बार फिर मैरीकल को देखना चाहता था, पर धुंघलेपन के सिवाय उसे कुछ न दिसाई पड़ा। हाँ, इतना उसे अवश्य याद था कि मैरीकल कोमल-हदय था, आता था तो अपने साथ फूलों के खूबसूरत गुच्छे लाता था। पिता जब-तब कहा करते थे---यह क्या, तुम फिर फूलों के गुच्छे ले आये । आज, मालूम पडता है तुम इनके पीछे पडे हो। और मैरीकल उत्तर देता-कोई बात नहीं, मुझे यह बहुत प्रिय लगते हैं। फिर उसे माँ का चित्र दिसाई पडा-लालिमा-रजित कपोल और नीली आँखें, जिनमें प्रसन्नता का उन्माद । मैरीकल के हाथो को अपने हाथो से ले, उन्हे धीरे से दवा कर कहती है- धन्यवाद, ऐ मेरे सहृदय मित्र अवश्य माँ मैरीकल का इसी प्रकार स्वागत करती होगी, तभी तो उसे अभी तक वह मित्र याद है। हाँ, तो मैरीकल नित्यप्रति फूलों के गुच्छे राया करता था, उसकी माँ को भेट करने के लिए तो क्या वह उससे प्रेम करता था। इन व्यापारियों से मित्रता करने में अवश्य उसका कोई स्वार्थ रहा होगा? बहुधा वह कविता की पतिया गुनगुनाया करता था। क्यों? वह कवि तो न था। वे पत्तियों उसकी हत्तन्त्री की आवाज के साथ गूंज उठती होंगी, इसीलिए । हूँ। पिएर सन यातें अच्छी तरह समझ रहा है।
योवन की भूल
,
सुन्दर युवक जिसके पास धन था, हृदय था, भावुकता थी,
किसी दिन उस दुकान पर गया । वहाँ एक सुन्दरी युवती देसी,
लालसाओ ने उसे उकसाया। वह नित्यप्रति दुकान पर सरीदारी
के बहाने जाने लगा, उसे देसने के लिए, उससे बातें करने के लिए,
घनिष्टता करने के लिए। इस युवति के कोमल हाथो को स्पर्श
करने में उसको आनंद आता होगा।
तो, और फिर, और फिर ? उसने अपने हृदय मन्दिर में
उसी सुन्दरी की प्रतिमा विराजमान की, उसकी पूजा की । भक्ति
पर प्रसन्न हो, देवी ने उसकी मनोकामना पूर्ण की । जब वह मरा
तब भी वह अपनी देवी को याद कर रहा होगा, और इमीलिए
इसके पुत्र के नाम अपना दानपत्र लिस गया , परन्तु केवल
एक ही पुत्र के नाम क्यो?
सहसा एक नवीन विचार आते ही पिएर पसीना-पसीना हो
गया। मैरीकल भी सुन्दर था, ज्वाँ भी है। मैरीकल की वडी-
बडी आँसें भी, उसकी-सी थीं । तो क्या जयाँ मैरीकल की प्रतिमूर्ति
है ? और तब उसे एक फोटो का सयाल आया, जो कि पेरिस के
ड्राइंग रूम में लगा रहता था। वह मैरीकल का था। अब वह
कहाँ गया ? नष्ट हो गया, अथवा किसीने उसे छिपा दिया। अवश्य
वह उसकी माँ के पास होगा?
पिएर ने एक नि श्वास छोडा । वह निवास दिल का एक
फफोला था, जो भाफः बन कर उड गया , और वह जैसे इस
६८
यौवन की भूल
निश्वास का उद्गम, उसका कारण ठीक-ठीक समझ गया। वह
निश्वास, समुद्र के गर्जन से भी अधिक भयकर, तथा चारों ओर
उमडते अघकार से भी अधिक भयकर था। उसे प्रतीत हुआ
कि सारा विश्व एक निश्वास छोड रहा है।
घडी भर पश्चात् प्रकृतिस्थ होने पर पिएर अपने आप को
धिकारने लगा-मैं भी कैसा कृतन्न हूँ, जो माँ पर सदेह करता
हूँ। और मा के प्रति उसका प्रेम, उसकी श्रद्धा फिर उमड़ पड़ी।
माँ, सरलता, सहृदयता, और करुणा की सजीव मूर्ति माँ
भला वह उस पर सदेह कर सकता है ? नहीं अणुमात्र भी नहीं।
माँ अगर इस समय उपस्थित होती, तो वह उसके चरणों पर
गिर कर रोता, अपने अपराधों की क्षमा माँगता ।
भला माँ देवता पिता के साथ विश्वासघात कर सकती है?
पिता | सीधा,सरल निनोदी पुरप, जिसको हँसी में शिशु की हँसी
थी । भावुकताकी रानी, सौन्दर्य की साम्राज्ञी माँ ने इस व्यवसायी
को क्यों पसद किया? सभी लडकियाँ धन की ओर आकर्पित
होती हैं। अगर वह भी हुई तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है।
कल्पनाओं का एक मनोरम स्वप्न लिये हुए, उस नव विवाहिता ने
उस गृह में प्रवेश किया होगा, पर एक व्यवसायी का हृदय ?
जीवन का प्रेम न सही, धन का सुस तो प्राप्त हुआ होगा ?
तो क्या निना प्रेम-निवि पाये, सुसी रहना एक स्त्री के लिए
सम्भव है ? एक नवयुवती, जो भावुकता को दाद देती है,
यौवन की भूल . अभिनेत्रियो के प्रेम-पूर्ण अभिनय पर तालियाँ पीटती है, रोमा- न्टिक पुस्तकें पढती है, क्या जीवन मे विना प्रेम-रस पाये शान्ति से सुख-पूर्वक रह सकती है ? पिएर को किसी प्रकार विश्वास नहीं होता था कि ऐसा सम्भव हो सकता है, गो कि वह उसकी माँ थी। वह अधेड माँ एक नवयुवती भी रह चुकी है। कोमल कल्पनाओ को वह अपने हृदय मे पाल चुकी है। तो क्या उसका हृदय प्रेम की रग-रेलियो को सेलने के लिए लालायित न हुआ होगा। दुकान के जेलसाने में चन्द, एक व्यवसायी के बगल में बैठी हुई, क्या वह उन चाँदनी रातों का स्वप्न न देसती होगी, जब कि किसी पेड की शीतल छाया में एक आवेश-पूर्ण चुम्बन का आदान-प्रदान होता है । तो क्या उसने मैरीकल को न प्यार किया होगा ? वह उसकी माँ है, पर क्या उस ढले शरीर के अन्दर एक स्त्री का हृदय नहीं है ? तो उसने अपना सर्वम्व, प्रेमी के चरणों में अर्पण कर दिया होगा ? अवश्य । प्रेम की दुनियाँ मे उन्मत्त युवती अपना लोक-परलोक, तन-मन, धर्म-अधर्म, सब कुछ भूल जाती है । उस समय अगर उसके लिए इस ससार में कोई सत्य नाम की वस्तु है, तो वह प्रेम , अगर उसके यौवन का, उसके सौन्दर्य का उपभोग करने का हक किसी को है, तो उसके प्रेमी को । हूँ। तभी तो मैरीकल अपनी वसीयत ज्याँ के नाम लिस गया है।
यौवन की भूल पिएर बेंच पर से उछल पड़ा। उसकी आँसों रोप की चिनगारियाँ निकल रही थीं। मुठ्ठी कसे, ओठ चनाता हुआ वह चाहता था कि बस मार डालें। किसे ? अपने भाई को, पिता को, माता को, सव को। पर क्षण-भर पश्चात् पिएर निर्जीव-सा ओस से भीगी दूर्वा पर गिर पड़ा। उसके पैरों में खडे होने तक की शक्ति न रह गई थी। आँसें निकली पडती थीं। वह सिर थाम कर बैठ रहा । कुछ देर पश्चात् सीटी की आवाज के माथ ही उसने एक जहाज को जाते देसा। अधकार के वक्षस्थल को चीरती हुई वह बहती, प्रकाग-रेसा भी कितनी सुन्दर प्रतीत होती थी। पिएर मत्र-मुग्ध उसे देखता रहा। सारी पीडा जैसे उस प्रकाश-रेसा में निहित हो धीरे-धीरे ओझल हो गई । तर पवन के शीतल स्पर्श ने उसके अन्दर एक स्फूर्ति का सचार किया। चारों ओर वन- स्पति के साम्राज्य ने अपना हरापन उसके अन्दर भी उँडेल दिया। रात्रि की निस्तब्धता में उन्मीलित निद्रा-सुन्दरी ने उसे कुछ सन्देश भेजे। किसी शरानी की भाँति लडखडाता हुआ वह घर की ओर चला। ७१
५
घर आकर पिएर सो तो गया, पर उसे अच्छी तरह नींद न
आई । हृदय को रह-रह कर जैसे कोई नोच रहा था । मानसिक
वेदना के बोझ से वह दवा-सा जा रहा था। थोडी देर बाद जब
उसने ऑसे सोली, तो सर्वत्र अवकार छाया था। उसे बडी जोरों
से प्यास लग रही थी। दम घुट-सा रहा था। उसने उठ कर
खिडकी खोल दी। ठडी हवा का एक भैंकोरा उसके शरीर से
टकराया । सिडकी की ओर मुँह किये सडा वह जैसे ताजी
हवा को पीकर अपने को हरा करने का प्रयत्न कर रहा था।
चगल के कमरे से ज्याँ के सर्राटे सींचने की आवाज आई।
यह निश्चिन्त सुस की नींद सो रहा है । उसके हिसाब जैसे कोई
बात ही नहीं हुई है, उसकी मॉ का एक मित्र उसके नाम अपना
दान-पत्र लिस गया और वह उसे सहर्ष स्वीकृत कर, ऐसे सो
रहा है, जैसे कोई साधारण घटना हुई हो । उसे नहीं मालूम कि
लोग उसके और माँ के विषय में क्या कहते हैं । उसे नहीं मालूम
.
योवन की भून कि उसका भाई किस तरह वेचैन है । पिएर उस सुस की नींद में सोने वाले पर अत्यन्त क्रोधित हो उठा। कल ही तो उसने निश्चय किया था कि किस प्रकार वह अपने भाई को प्रेम से समझाएगा, उससे कहेगा-पाँ, इस दानपत्र को, जिसके कारण माँ के स्वच्छ चरित्र पर कलक का धब्या लगने का भय है, अस्वीकृत कर दो और आज वह कुछ नहीं कह सकता। वह पों से कैसे कहे कि वह उसके पिता का पुत्र नहीं है। नहीं, उसके मुँह से यह शब्द कभी नहीं निकल सकते। उसे इस सन्देह को विस्मृति की कत्र में दफना देना होगा। उसे इस कलक के धब्बे को अपने हृदय-प्रदेश के घोर तर अधकार-भाग में छिपा देना होगा, जहाँ कोई आसे उसे न देख सकें, कोई नहीं, उसका भाई भी नहीं। वह अब लोकोक्ति की परवाह न करेगा। समस्त ससार उसके ऊपर लाञ्छना का कीचड फेंके, उस पर हँसे, तन भी बह प्रसन्न होगा, यदि उसे विश्वास हो जाय कि माँ निष्पाप है, निकलक है, पवित्र है। छोटा भाई एक अजनबी के प्रेम का फल है--इस विचार को लिये हुए वह कैसे इस घर में रह मकता है? माँ कितनी शान्त और मरल प्रतीत होती है, जैसे उसे किसी बात की खबर ही नहीं। क्या यह सम्भव है, कि इतनी पवित्र और दृढ आत्मा-धारी यह स्त्री वासना की चकार्बोध में अपने कर्तव्य- ७३
योवन की भूल
पथ पर से विमुख हो गई, और अब उसे अपने कृत्यों के लिए
किंचित्-मान भी पश्चात्ताप नहीं। सम्भवत उसके हृदय में
पश्चात्ताप की चिनगारियाँ धधकी हों, पर अव समय के प्रवाह
में वह आग जलकर राख हो गई है। यह स्त्रियाँ कितनी शीघ्र
उन पुरुपो तक को, जिनको अपने कोमल अधरों का चुम्बन
प्रदान किया था, जिनके साथ प्रेम की रग-रेलियाँ खेली थी,
भूल जाती हैं। ओह, कितनी शीघ्र वे अपने को परिस्थितियो
के अनुकूल बना लेती हैं। उन मधुर चुम्बनों की स्मृति विजली
की चकाचौंध की भाँति हत्पट से विलीन हो जाती है। वह
प्रेम किसी आँधी की भाँति न मालूम कहाँ भाग जाता है और
हृत्पट फिर स्वच्छ नीलाकाश की भाँति चमकने लगता है
मालूम पडता है, उन पर वादल कभी छाये ही नहीं।
पिएर अब वहाँ एक क्षण के लिए नहीं ठहर सकता। पिता
का घर जैसे उसे काटे साता था, उसे प्रतीत हुआ कि कमरे की
छत जैसे उसके ऊपर गिरने को है, चारो ओर दीवारें उसे
दबोच लेने के लिए उसकी ओर बढ रही हैं। डरते हुए उसने
मोमबत्ती जला कर कमरे का अधकार दूर किया।
घडी-भर पश्चात् जब पिएर प्रकृतिस्थ हुआ, तो उसे फिर
प्यास मालूम पडी। जीने से उतर, वह रसोईघर से पानी लाने
गया। फिर लौटते-लौटते उसने एक साँस में भरा गिलास
साली कर दिया और जीने पर 'धम्म' मे बैठ गया। क्षण-भर
यौपन की भूल
तब
पश्चात् घर की निस्तब्धता फिर अनुभव होने लगी।
भोजनालय में टॅगी घडी की टिक-टिक क्षण-प्रति-क्षण तेज होती
प्रतीत हुई। वेसवर सोते रोलेन्ड के गले से निकली आवाज
घर-घर उत्तरोत्तर उग्र होती मालूम पडी।
पिएर मूर्तिवत बैठा सोच रहा था-एक ही छत के नीचे
धाप बेटे के आवरण मे सोते इन दो आदमियो में कोई बन्धन
नहीं। दोनो परस्पर प्रेम करते हैं, सुस-दुस मे भाग रेते है,
जैसे दोनों की नसों में एक ही रक्त तो बह रहा है ? यह नहीं
जानते कि हम मिथ्या के आवरण में बँधे हैं और पिएर इस
सत्य को जानता है।
पिएर के मुस पर एक क्रूर हमी दौड गई। क्षण-भर
उसके मन में आया-कही वह गलती पर तो नहीं है । अगर वह
उन दोनों की आकृति में जरा-सा भी सादृश्य पा सके, तो वह
फिर निश्चिन्त हो जायेगा। वह डाक्टर है, आँसो के बीच का
फासला, बालों का रग, दाँतो की बनानट आचार-व्यवहार उन
दोनों मे किंचित् मात्र सादृश्य को उसकी तेज आँखें उसी
दम देस लेंगी।
उसने बहुत सोचा कि देखू वाप-बेटे में कोई सादृश्य है,
पर विचारों के अन्धड में वह कुछ निश्चय न कर सका ।
जब वह अपने कमरे में जाने लगा, तो वह जीने पर बहुत
सावधानी से पैर रस रहा था, जिससे कोई शब्द न हो ।
यौवन की भूल
'कहने आया हूँ कि दोस्तों के साथ समुद्र-तट की ओर जा
रहा हूँ।
'अच्छा ठहरो!
नंगे पैरो द्वार तक आने की, तथा सिटकनी खुलने की
आवाज उसने सुनी।
क्षण-भर पश्चात् माँ की आवाज आई-आओ!
वह भीतर गया। माँ विछौने पर लिहाफ से शरीर ढॉके बैठी
थी। रोलेन्ड दीवाल की ओर मुँह किये, सिर पर एक रेशमी
रूमाल बाँधे सो रहा था।
पिएर ने माँ को अचकचा कर ऐसे देसा, जैसे पहले उसे कभी
देसा ही न हो । धीरे-धीरे जा उसने माँ के मस्तक का चुम्बन लिया।
'तो तुमने यह कार्यक्रम शायद कल ही निश्चित किया था ?'-
माँ ने पूछा।
'हाँ, कल शाम को।
'भोजन के समय तो लौट आओगे?'
'कह नहीं सकता। आप लोग मेरी प्रतीक्षा न कीजिएगा।'
पिएर माँ को बहुत गौर से देख रहा था। यह स्त्री, जिसे
वह शैशवकाल से देसता आ रहा है, जिसकी वोलचाल, हँसी,
एक-एक भाव-भगी से वह परिचित है, आज अजननी क्यों प्रतीत
होती है ? ममता से पूर्ण इस मुस को वह वर्षों से देखता आ रहा
है, आज वह भिन्न क्यों प्रतीत होता है ?
यौवन की भूल जब पिएर चलने के लिए उठ खडा हुआ, तो उससे यह पूछे पिना रहा न गया-हा, मुझे याद पडता है पहले डाइंग रूम में मैरीकल का चित्र टँगा था? वह पहले हिचकिचाई, पर क्षण-भर पश्चात् जैसे उसने अपनी इस हिचकिचाहट का अनुभव कर, साहस कर कहा-हाँ शायद टॅगा तो था! 'तो वह अब कहाँ है ? ' देखो मुझे ठीक याद नहीं पडता | शायद मेरी अल- भारी में है। 'कृपया उसे निकाल दीजिएगा।' 'अन्छा, देखेगी । उससे तुम्हें क्या काम है ? 'मुझे तो कोई काम नहीं, पर सोचता हूँ अगर वह ज्यों को दे दिया जाय तो, उसे बहुत प्रसन्नता होगी।' 'हाँ, ठीक तो है । सोकर उठूगी, तो देखू गी।' और वह चला गया। हवा तेज न थी। दिन साफ था। दुकान खोलने के लिए जातो लर्क युवतियाँ तथा तगादो पर जाते व्यवसायी-सव के नुस पर प्रसन्नता सेल रही थी। पिएर सिन्न-मन म्वगत पूछता जा रहा था-चित्र की वात मुन माँ क्यो हिचकिचाई थी? क्या उसने चिन नष्ट कर दिया है, अथवा उसे छिपा कर रस दिया है ? उसने छिपा कर रखा, तो क्यों ?
यौवन की भूल
और विचार-धाराओ को समेटते हुए उसने यह नि
निकाला कि एक प्रेमी का चित्र ड्राईग रूम मे सव की =
के सामने टँगा था। वह उस चित्र से ज्याँ का सादृश्य अद
कर डरी होगी। पाप को छिपाने के लिए उसने चित्र
दिया होगा, उसको नष्ट करने का साहस तो उसे हुआ न ह
तब पिएर को याद आया कि बहुत दिन हुए, वह चित्र
एक ड्राईग-रूम से गायब हो गया था , सम्भवत तभी से
ज्याँ के यौवन-पूर्ण चेहरे पर उस चित्र की छाप प्रतीत
अनुभव हुई।
समुद्र-तट का कोलाहलमय वातावरण स्पष्ट होते ही उ
विचार-तन्द्रा भग हो गई। पीली वालुका पर छितरी रग-वि
पोगाकों से सजी, वह असंख्य सूरतें दूर से किसी उद्यान मे।
लाल, पीले, नीले आदि रंग के फूलो-सदृश प्रतीत होती
बच्चों की किलकारी, युवतियों के कोमल स्वर, तथा पुरुपों
कर्कश हँसी से मुसरित वातावरण को वह चीरता हुआ ।
बढा चला जा रहा था। समुद्र-स्नान के लिए इकट्ठा इस अ
भीड को टेस-देस, उसके मन में कुतुहल की अपेक्षा घृण
भाव उदित हो रहे थे। भिन्न भिन्न रग के वस्त्रों को धारण ।
उछलती-यूदती, हँसती-सेलती, व्यग्य-कटाक्ष फरती यह रि
मानवजाति की एक दूपित अग हैं। यह नहाने की भडर्क
पोशाक पहन रक्सी है-ठारीर को डॉकने के लिए नहीं, पर
यौवन की भूल
स्निग्ध गोलाकार जाँघो तथा स्वस्थ उरोजो की ओर लोगों का
मन आकृष्ट करने के लिए । हँसती-उछलती हुई, यह पीठ की
ओर झुक कर दुहरी हो जाती हैं, कटिभाग और जाँघों के बीच का
गरीर का ढॉचा स्पष्ट करने के लिए पुरुपो के मन मे लालसा
जागृत करने के लिए।
पिएर को प्रत्येक ओर आकर्षण का बाजार लगा प्रतीत हो
रहा था, जहाँ मूर्स पुरुष लूटे जाते हैं। इस कोलाहल मे स्त्रियाँ
आती हैं-पर-पुरुषों से चुम्नित होने के लिए, उनके आवेशपूर्ण
आलिङ्गन-पाश में बँधने के लिए, उन्हें अपने रूप के बाजार में
निमत्रित करने के लिए। कहती है-इस अस्थायी यौवन-श्री से
रजित शरीर का, जिन पर दूसरों का अधिकार हो चुका है,
अथवा होने वाला है, तुम भी उपभोग कर लो, नहीं तो समय
बीत जाने पर पछताओगे । और उसने सोचा कि यह बात इमी
देश में नहीं, परन्तु मसार के सभी सभ्य कहलाने
वाले देशों में है।
तो उसकी माँ ने भी वहीं किया, जो सब त्रियाँ करती हैं।
सन ? नहीं, उनमें भिन्न भी हैं, परन्तु फैशन की इन पुतलियों के
लिए, जिनकी आँसो मे मद है, शरीर में रुपये की गर्मी है,
मस्तिाक में प्रेम की गध बनी है, विनाग ही अन्तिम शब्द है।
सच्चरित्र, नारियों, आडम्बर-विहीन, अपने घर की दुनिया
में रहती हैं।
८१
.
यौवन की भूल
उस भीड को देसकर पिएर के मन में इतनी घृणा :
रही थी, कि वहाँ से उलटे पैर लौट आया , शहर में आकर
काफे मे काफी पी, और फिर एक वृक्ष की छाया मे पड़ी
पर बैठकर सुस्ताने लगा। उसके मन में अब घर जाने की इ
जागृत हुई। वह जानना चाहता था कि माँ ने मैरीकल
फोटो ढूंढ निका अथवा नहीं। फोटो के लिए उसे फिर व
पडेगा अथवा वह योंही दे देगी? अगर फोटो देने में वह
टालमटोल करती है, तो अवश्य कोई गूढ रहस्य है ।
परन्तु अपने कमरे में पहुँचकर, उसे सब के सामने जा
हिचकिचाहट मालूम पडने लगी। इतने शीन लौट र
पर वे लोग क्या कहेगे ? परन्तु फोटो को देसने की इ
उत्तरोत्तर प्रवल हो रही थी। जब वह भोजनालय में पहुँ
तो सव के चेहरों पर प्रसन्नता थिरक रही थी। रोलेन्ड
रहा था-हाँ, तो तुम लोगों ने सब आवश्यक सामान स
लिया ? जब मैं जाऊँ तो घर लैस मिले।
माँ ने उत्तर दिया-अभी तो सरीदारी हो रही है।
पसन्द करने में बडा वक्त लग जाता है। फरनीचर का मार
ही ऐसा होता है।
मैडम रोलेन्ड का वह दिन जरों के साथ सरीदारी क
मे ही पीता था। वह भडकीली चीज चाहती थी, जि
देखते ही लोगों की नियत फडक उठे। व्या आडम्मर-विह
यौवन को भूल
वस्तुएँ चाहता था । माँ कहती थी-मुवक्किलों को आकर्षित करने
के लिए, उन पर शान गाँठने के लिए, भडकीला फरनीचर
चाहिए। जरों कह रहा था-मैं गधे मुवक्किलों से बात नहीं
करूँगा। घस, इने-गिने रईसो के मुकदमें लूँगा। फरनीचर
ऐसा हो कि जिसे देसफर कोई कहे-हॉ, यह एक चीज है । चाहे
वह आकर्षण-युक्त न हो। और यह वाद-विवाद इस समय
भी चल रहा था।
रोलेन्ड ने कहा-जो कुछ हो, मैं जब जाऊँ, तो घर लैस
मिलना चाहिए। मैडम रोलेन्ड ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से निर्णय की
याचना की।
'अच्छा तुम बताओ पिएर, क्या होना चाहिए ?'–उसने पूछा।
पिएर ने रूसे स्वर मे उत्तर दिया-ज्यों का कहना ठीक है।
सादगी हर जगह ठीक होती है, आचार-व्यवहार में भी
और घर-चार में भी।
माँ ने कहा-पर तुम्हे यह भी याद रखना चाहिए कि
हम लोग व्यापारियों के बीच में रहते हैं, जहाँ आकर्पण श्रेष्ठ है,
सादगी हेय।
पिएर ने उत्तर दिया--इसके माने कि कोई बेवकूफ हो, तो
हम भी वेवकूफ बन जायें। एक औरत पतन के पथ पर
इसलिए दौड़े कि और त्रियाँ भी ऐसा कर रही हैं ?
ज्याँ हँसने लगा।
यौवन की भूल
'तुम तो इस तरह उदाहरण देते हो, जैसे कोई आदर्शवादी
तोता बोल रहा हो।जरों ने पिएर से कहा।
पिएर ने कोई उत्तर न दिया। माँ-बेटे मे उस विपय पर
फिर कोई वातचीत न हुई। वह प्रात काल की भाँति माँ को
एक सोज-भरी दृष्टि से देख रहा था ।
पिता, वह उसे और आश्चर्य मे डाले था, वह गोलमटोल
नाटा आदमी ज्यों से किंचित् मात्र भी न मिलता था !
उसका परिवार ।
इन्हीं दिनो एक अदृश्य शक्ति ने, एक मृत मनुष्य ने, जैसे
अपने हाथों उसके और परिवार के बीच के स्नेह-बधन के टुकडे-
टुकडे कर दिये। अब उसके लिए इस दुनिया में कुछ भी
शेष नहीं रहा। माँ नहीं, क्योंकि हृदय में उसके प्रति आदर
और प्रेम के भाव नहीं। भाई नहीं, क्योंकि वह एक अजनबी
को सन्तान है। पिता, वह भी नहीं के बराबर है। जिस मनुष्य
को उसने अपने बाल्यकाल से ही प्रेम नहीं किया, उसे अब वह कैसे
प्रेम कर सकता है।
और सहसा उसने पूछा-माँ, तुमने वह फोटो ढूंढ निकाला?
उसने आश्चर्य से आँसें फैला कर कहा-कौन-सा फोटो?
'वही मैरीकल का।'
'नहीं, अभी मैंने उसे नहीं ढूँढा । अब देसूंगी।"
'क्या बात है ?-रोलेन्ड ने
पूछा
यौवन की भूल
पिएर ने उत्तर दिया-आपको शायद याद हो कि पहले
डाइग रूम में मैरीकल का चित्र टँगा रहता था। मैं समझता हूँ,
उपरों उसे पा कर प्रसन्न होगा।
उहसित स्वर में रोलेन्ड चिहाया-ठीक, ठीक । अभी पिछले
सप्ताह ही तो मैंने उसे देखा था। तुम्हारी माँ अपनी अलमारी
खोले बैठी थी तभी तो। बृहस्पतिवार का दिन था, या शायद
शुक्रवार का । मुझे याद है, मैं दाढी बना रहा था कि तुमने
मेरे बगल से कुर्सी घसीट ली थी, चिट्ठियों का बन्डल रसने के
लिए । आधी चिट्ठियाँ तो तुमने उस दिन जला दी थीं। आश्चर्य
है कि वसीयत का समाचार सुनने के दो ही दिन पहले तुमने
मैरीकल का चित्र देसा था।
मैडम रोलेन्ड ने क्षीण स्वर में कहा-देसो, अलमारी में
जाकर देसती हूँ।
सम्भवत वह पिएर से झूठ बोली थी। सवेरे ही उसके
पूछने पर उसने कहा था-देसो मुझे ठीक याद नहीं पडता ।
शायद मेरी आलमारी में है। वह सरासर झूठ बोली थी।
थोडे ही दिन पहले उसने उस चित्र को देसा, फिर चिट्ठियों
के बन्डल के साथ, जो सम्भवत प्रेम-पत्र होंगे, छिपाकर
रस दिया, और तब भी कहती थी-देसो, मुझे ठीक याद
नहीं पड़ता।
पिएर अपनी उस विश्वासघातिनी मों को क्रुद्ध नेनों से देख
पन की भूल
था। अगर उसका बस चलता, तो वह उसकी मूक प्रतिमा
चकनाचूर कर देता, उसे मिट्टी में मिला देता , परन्तु वह
का पुत्र है। भला वह उससे वदला क्यों कर ले सकता है ?
[ भी क्या उसके साथ विश्वासघात नहीं किया गया ?
नहीं, उसने पिएर के साथ नहीं, परन्तु अपने नारीत्व के साथ
श्वासघात किया है। माँ के आसन पर विराजमान होने पर
का एक कर्त्तव्य था । अगर पिएर अपनी माँ से क्रोधित है,
इसीलिए कि उसने पति के प्रति इतना विश्वासघात नहीं
या है, जितना अपने प्रति ।
पति-पत्नी का प्रेम-बन्धन-वह वासना की लहरों के
नुसार दृढ अथवा शिथिल होता रहता है, पर माँ का प्रेम,
अत्यन्त पवित्र है, सर्वोत्कृष्ट है। "स्त्री में माँ के हृद्य का
जन स्वय प्रकृति ने किया है, और प्रेमिका के दृदय का सृजन
सना ने। अगर स्त्री माँ का कर्तव्य पूरा करने से विमुस
ती है, तो वह कायर है, नाचीज है, उसकी उत्पत्ति का
ई मूल्य नहीं।
मैडम रोलेन्ड दोनीन मिनटो मे चित्र लेकर लौट आई,
: पिएर को प्रतीत हुआ, जैसे वह न मालूम कितनी देर
धात् लौटी हैं।
'यह रहा -मैडम रोलेन्ड ने फोटो मेज पर पटकते
र कहा।
यौवन की भूल
.
.
डाक्टर ने चित्र उठा कर देसा । उसे ज्ञात था, माँ उसे एकटक
देस रही है , पर तब भी उसने सहज गभीर भाव से आने
उठाकर चित्र और ज्वाँ का मिलान किया। दोनों में काफी मादृश्य
था-एक ही प्रकार की भौंहे, एक ही ढाँचे की नाक, पर तन
भी यह कह देना कि यह वाप है, यह बेटा, कठिन था। यह
एक प्रकार का कौटुम्विक सादृश्य प्रतीत होता था, जिनकी नसो
में एक ही सून वहता है। इस सादृश्य की अपेक्षा माँ का
आचार-व्यवहार सदेह की पुष्टि अविक करता था। पिएर को
यह मिलान करते देस, उसने किसी अपराधी की भाँति अचकचा
कर पीठ फेर ली थी। भावो को छिपाने के लिए वह चाय में
शकर मिलाने का उपक्रम कर रही थी।
'जरा फोटो मुझे भी दिसाना '-क्षण भर पश्चात् पिता
ने कहा।
पिएर से फोटो ले वह उसे प्रकाश में ले जाकर देखने लगा।
फिर करुणभाव से बुदबुदाया-आह ! पहले हमने कभी यह सोचा
नथा कि तुम इतने सहृदय होगे। लूसी, समय कितनी शीघ्रता
से भागता है। आज यह नेक आदमी दुनिया में नहीं है ।
लूमी ने कोई उत्तर न दिया। रोलेन्ड कहता गया -इसे
कभी क्रोधित होते तो मैंने देखा ही नहीं। यहुत ही शान्त-स्वभाव
का आदमी था । इसी से तो इमने हमारे दिल में घर कर लिया।
मरते समय इसने अवश्य हम लोगों को याद किया होगा।
-
यौवन को भूल
फिर, जपा ने फोटो ले कर देसा ।
क्षण-भर पश्चात् उसने भी सकरुण भाव से कहा-मैं तो अव
उसे पहचान ही नहीं पाता। मुझे तो उसके पके बालों वाला
झुर्रादार चेहरा याद पड़ता है।
तब उसने फोटो माँ को दे दिया। माँ ने डरते फोटो
की ओर एक बार देखा और फिर उसने गम्भीर स्वर में कहा-
ज्य । अव तुम इनके उत्तराधिकारी हुए हो। इस फोटो को
अपने
ड्राइग रूम में टॉगना।
और जब सब लोग ड्राइग रूम में चले गये, तो उसने फोटो
को ताक पर घडी के निकट सडा कर दिया।
रोलेन्ड हुका गुडगुडाने लगा। पिएर और ज्यों ने सिगरेट
जलाई । मैडम रोलेन्ड एक सोफे पर बैठी, एक कपड़े पर कसीदा
काढ रही थीं। ज्याँ का कमरा सजाने के लिए वह एक मेजपोश
बना रही थी। कपडे पर आसें गड़ाये वह कभी-कभी घड़ी के
निकट रसे मैरीकल के फोटो को देस लेती थीं।
पिएर का मन उद्वेलित हो रहा था। उसकी आँखों में
व्यथा भरी थी। मेरा सदेह अनुभव करके माँ को वेदना हो
रही है. यह भावना पिएर के सन्तप्त हृदय को सान्त्वना दे रही
थी। कभी-कभी आँखें उठा कर वह फोटो की ओर देस लेता ।
उसे मालूम पड रहा था, जैसे फोटो सजीव हो उठा है, और उन
लोगों को डरा-डरा कर हँस रहा है।
८८
यौवन की भूल
सहसा स्ट्रीट-बेल बजी, और दूसरे क्षण मैडम रोजमिली
'कमरे में थीं।
'सोचा, चलो चाय पी आऊँ'–सान्ध्य-चन्दन के पश्चात्
मुस्कराते हुए मैडम रोजमिली ने कहा ।
चाय पीने के समय हँसी का फौवारा फूट चला। पिएर
को यह सब अच्छा न लगा। वह उठ कर चला गया।
उसकी इस अशिष्टता पर ज्यों ने घृणा से नाक सिकोड कर
कहा-अजीब बहशी मालूम होता है।
मैडम रोलेन्ड ने कहा-तुझे क्रोधित न होना चाहिए, बेटे ।
देसता नहीं,आज-कल वह अशान्त रहता है । फिर आज समुद्र तक
घूमने गया था, थक गया होगा। रोलेन्ड ने कहा-यह तो ठीक
है , पर उसे ऐसी मूर्मता न करनी चाहिए थी। श्रीमती रोजमिली
ने सब को शान्त करने की गरज से कहा-अरे कोई बात नहीं,
मालूम पडता है, आजकल वह इगलिश-फैशन प्रहण कर रहे हैं।
।
28
६
एक-दो सप्ताह तक कोई विशेष घटना न हुई। रोलेन्ड मछल
का शिकार सेलने जाता। ज्वाँ, माँ के साथ नये घर को सजा
में व्यस्त रहता। उदास पिएर, वस भोजन के समय ही घर
दिखाई पड़ता।
पिता ने एक दिन उससे पूछा भी था- आजकल तुम्हारे चेह
पर हर समय मातम क्यो छाया रहता है ? क्या बात है?
डाक्टर ने उत्तर दिया था बात यह है कि आजकल मु
जीवन भार-स्वरूप प्रतीत होता है।
वृद्ध, पिएर का आगय न समझ पाया । मुँह सिकोडते हुर
उसने कहा-यह तो अच्छी बात नही । जव से हम लोगो वे
दिन फिरे, तभी से सन के चेहरे खुशी की मजार बन रहे हैं
मालूम पड़ता है, जैसे कोई दुर्घटना हो गई और हम सन मातम
पुर्सी कर रहे हैं।
'हाँ, मैं एक मनुष्य के लिए पश्चाचाप कर रहा हूँ।'
योधन को भून
'किसके लिए?
'एक के लिए, जिसको मैं अत्यधिक प्यार करता था।'
पिता ने समझा कि पिएर अपनी किसी प्रेमिका की बात कह
-
แนะ
'में समझता हूँ कोई स्त्री है ? --उसने कहा ।
'हाँ, एक स्त्री
'मर गई
'नहीं, यह अच्छा होता , पर वह पतन के सई में गिर गई।'
पिएर एक अजीब ढग से बाते कर रहा था, रोलेन्ड ने यह
अनुभव किया, पर तन भी उसने फिर कुछ न पूछा। उसके
विचारानुसार यौवन-काल की इन प्रेम-कहानियो को किमी तीसरे
पर प्रकट न करना चाहिए।
मैडम रोलेन्ड पीली पड गई थीं। ऐसा मालूम पडता था कि
वों की बीमार हों। जब वह कुर्सी पर बैठती, तो मालूम पडता,
जैसे कोई कटा पेड़ गिर पडा हो। उन्हे ठडी श्वामें छोडते देख,
एक दिन रोलेन्ड ने कहा भी था-लूसी, तुम बीमार प्रतीत
होती हो । सम्भवत उरों के साथ दौडते घूमते तुम थक गई
हो। अपने शरीर को आराम दो, समझीं। उन्होंने निरुत्तर सिर
हिला दिया था।
परन्तु आज उनकी दशा कुछ ऐमी गिरी मालूम पडती थी,
कि रोलेन्ड के हृदय में करुणा उत्पन्न हो आई।
९१
यौवन की भूल
और उसे अनुभव हुआ कि माँ को इस प्रकार व्यथित देख
उसके सन्तान हृदय में शान्ति का संचार हो रहा है। मिर उठ
वह माँ को ऐसे देस रहा था, जैसे अपराधी को दण्ड देने के पश्च
जज देसे।
सहसा मैडम रोलेन्ड उठी और अपने कमरे में भाग
भीतर से कुन्डी बंद कर ली।
रोलेन्ड आश्चर्यचकित पिएर की ओर देखता हुआ बोला-
क्या तुम इसका कारण बता सकते हो?
'बताया तो, हिस्टीरिया का दौरा है।'
सन्य बात तो यह थी कि पिएर की सदेह-भरी दृष्टि
मैडम रोलेन्ड को इतना विचलित कर दिया था, पर पिएर विचार
करे क्या ? वह भी तो हृदय-पीडा-प्रमित था। अब माँ के
प्रेम नहीं कर सकता, उसका आदर नहीं कर सकता-यह भावन
हर समय उसके हृदय में चुटकियों लिया करती है। और अब
जव कि उसने माँ के हृदय के घाव को तराश दिया है, वह उस
हृदय की असीम पीडा को समझ रहा है, उसे दुःस होता है
पश्चात्ताप होता है, चाहता है कि समुद्र के गर्भ में अपने इस
काले मुँह को सदा के लिए छिपा ले।
आह । वह माँ को क्षमा कर कितना प्रसन्न होता, पर
वह कैसे उन बातों को भूले । वह उसके हृदय को पीडा नहीं
पहुँचाना चाहता , पर वह यह कैसे करे, जय कि स्वय वेदना की
९४
-
योवन की भूल
आग में वडफ रहा है। अपने को धिधारता हुआ, पवित्र विचारों
को धारण करके यह भोजनालय में जाता है, परन्तु एक समय
विश्वास और पवित्रता मे भरी माँ की आँसों में अब डर और
हिचकिचाहट के भाव पढकर उसके अन्दर प्रतिशोध की अनि
भभक उठती है। वह अपने को रोकने का प्रयत्न करता
है , पर मुंह से ऐसे शब्द निकल ही जाते हैं, जो अचूक तीर
की भाँति उसके हृदय पर लगे।
माँ के उस कुत्सित प्रेम का ध्यान आते ही पिएर क्रोध से
उबल पड़ता है। यह भावना जैसे जहर की नाई उसके रक्त में
मिल गई है और रह-रह कर उसे किसी पागल कुत्ते की भांति
काट खाने को उसकाती है।
ज्यों अपने भाई के उच्छलता-पूर्ण व्यवहार का कारण
उसकी ईर्ष्या समझता था। उसने मन-ही-मन निश्चय कर
लिया था कि बच्चा को एक दिन ऐसा छकाऊँगा कि जन्म भर
याद रक्सेंगे, परन्तु क्यों कि अब वह घर से दूर रहता था,
इसलिए उसकी यह भावना शान्ति की चादर में लिपटी पडी
रहती थी। धन ने उसके अन्दर नवीन कल्पनाएँ भर दी थी।
जब-तब वह घर आता, तो किसी नये ढग का कोट अथवा
कोई वस्तु वनवाने या परीदने की इच्छा उसके मन में लहरें
भारती रहती।
उपा के नये घर के प्रवेश की खुशी में एक प्रीति-भोज का
यौवन की भूल आयोजन किया गया था। कार्यक्रम इस प्रकार था-प्रात काल स लोग सेंटजुइन सैर के लिए जायँ, और वहाँ से लौट कर नये घर भोजन हो । रोलेन्ड ने पहले प्रस्ताव किया था कि नौका-द्वारा में के लिए चलें, परन्तु अगर मनोनुकूल हवा न हुई, तो बड़ा क होगा यह विचार कर घोडागाडी पर चलने के लिए तय हुआ थ निश्चित किये हुए दिन, सब लोग दस बजे प्रात का रवाना हुए। सडक कच्ची थी, जिस पर धूल के बादल उडते थे सडक के दोनों किनारो पर पेडो की छाया थी, थोडी-थोडी द पर भरे-हरे उद्यान दिसाई पडते थे । गाडी हिलती-डुलती उस ऊँच चढाई वाली सडक को तय कर रही थी। रोलेन्ड परिवा श्रीमती रोजमिली, तथा कैप्स व्यूसायर, छहों आदमी चुपचा' ऑसें मूंदे, गाडी की गडगाड की आवाज सुनने में व्यस्त थे । हारवेस्ट-टाइम था। सुनहली फसल से लहलहाते खेत ने जैसे मूर्य की स्वर्णिम किरणों का रंग चुरा लिया था । यत्र-तत्र किसान-समूह सेतो की कटाई मे व्यस्त नजर आता था । दो घटे की यात्रा के पश्चात् गाड़ी एक सराय के सामने जा सडी हुई। गृह-स्वामिनी ने मुस्करा कर सब का स्वागत किया। हरी घास पर लगे सेमो की छाया में कुछ यात्री भोजन कर रहे थे। घर के भीतर से तश्तरियों के सडकने की तथा सिल-खिलाहट की आवाज आ रही थी। उन लोगों के लिए एक अलग कमरा ठीक कर दिया गया था। .
यौवन की भूत
१७
दीवाल पर छोटी-छोटी महीन जाकटो को टॅगी देस, रोलेन्ड
ने बच्चों की तरह किलकारी मार कर कहा-ओहो, इघर केंकडों
का शिकार होता है।
व्यूसायर
ने उत्तर दिया-हाँ, इधर यह जानवर बहुतायत
से होते हैं। ओहो, अगर जलपान के पश्चात् हम लोग
इनका शिकार करें, तो।
किसी ने इस प्रस्ताव का सडन न किया। जलपान के
समय लोगों ने नाम-मात्र को साया, सन्ध्या के समय एक
विशाल भोज का आयोजन हुआ था, इसलिए। तब रोलेन्ड
ने कई जाल सरीद लिये। गृहस्वामिनी ने कपडे लाकर दिये।
मर लोग कपड़े बदल-बदल कर,जाल अपने-अपने कंधे पर रख कर,
शिकार के लिए चल पडे ।
आज मैडम रोज मिली विशेष आकर्षक प्रतीत होती थीं।
गृहस्वामिनी की दी हुई पोशाक फिट बैठी थी। उस पोगाक
में कसे अगों ने माधुर्य को अपना दास यना लिया था। चचलता
उसकी ससी बनी थी। पथरीले मार्ग पर किसी अल्हड
नवयौवना की भाँति वह उछलती-कूदती, मचलती-सिलती
चली जा रही थी।
धन के आगमन के पश्चात् , ज्याँ बहुधा विचार किया करता
कि इससे विवाह करूं या नहीं। उसे देखते ही विवाह का
प्रस्ताव पेश करने की इच्छा लहलहा उठती, परन्तु वह फिर
यौवन फी भूल
सोचने लगता-पहले मैं अपने को स्थिर फरा। अब वह
अधिक धनवान था, परन्तु फिर भी वह ऐसी गरी
यी। दोनों की सामाजिक स्थिति समकक्ष थी।
और आज उसे देसते ही वह अत्यधिक चचल हो
'अब मुझे हिचकिचाहट मे न पडना चाहिए। इससे
स्त्री मिल नहीं सकती। उसने स्वगत कहा।
चारों ओर हरियाली से घिरी उस पहाडी चढाई
सव चले जा रहे थे। पार्श्व की ओर देखने पर दूर ला
समुद्र दृष्टिगोचर होता था। सूर्य की किरणें इस प्रकार पृथ्वीप
रही थीं कि पीछे उजियाला नजर आता था, आगे अँधेरा
एक मनोरम दृश्य था।
मदान्ध पवन के मधुर झकारों से उत्तेजित न, हसरत
निगाह मे मैडम रोजमिली के नग्न-स्निग्ध वाहुओं, मुर
विकसित मुख तथा उसकी लचकती कमर को देख रहा था
चढाई का सिलसिला सत्म होने पर उन्हें दूर-दूर तक
ऊवड-सावड भूमि दिसाई पडी। यत्र-तत्र पत्थरों के ढोंके ।
दिसाई पडते थे। बगल से घने जगली पेडो को चीरतं
एक पगडंडी चली गई थी, जो सम्भवत समुद्र तट को जाती
मार्ग मे उघड-खाबड़ जमीन देस । ने मैडम रोजमिल
और अपने हाथ फैला दिये। मैडम रोज़मिली ने प्रस
पूर्वक सहारे के लिए उन्हे थाम लिया ।
।
--
यौवन पी भूल मैडम रोलेन्ड न्यूसायर का, और फादर रोलेन्ड पिएर का सहारा लिये धीरे-धीरे चल रहे थे । कुछ समय के पश्चात् वे दोनों जोडे पीछे छूट गये। सहसा मैडम रोजमिली रुक गई। निकट ही एक मौसमी जल प्रपात था, जिसका कल-कल करता पानी, किसी नाली की भांति पगडडी को काटता चला जा रहा था। 'प्यास लगी है।'-मैडम रोजमिली ने बच्चों की भाति मचलते हुए कहा। पर वह पानी पिये फैसे? उसने अजलि बाँधकर उसमे पानी भरनाचाहा, पर ज्योंही वह जल भरती,त्योही सब जल अंगुलियों के बीच से यह जाता। रों ने जल के प्रवाह में एक चडा सापत्थर का ढोंका रख दिया। जल उस पर चढ कर, एक धार में आगे की ओर गिरने लगा। मैडम रोजमिली ने झुरु कर जैसे-तैसे अजलि बाँधकर हथेलियों से अपने ओठ लगा लिये। जय पानी पीकर वह सीधी हुई, तो उसकी छाती पर, घाली पर और मुख पर, यत्र-तत्र जल-कण चमक रहे थे। उपासी स्निग्ध, वह एक अनिंद्य सुन्दरी प्रतीत होरही थी। ज्याँ धीरे-से उसके कधो पर झुककर, उन्हें दवाता हुआ बुद- चुदाया-आह, तुम कितनी सुन्दर प्रतीत होती हो। जैसे कोई अज्ञात-यौवना वालिका झिझके, मैडम रोजमिली ने छिटक कर कहा-अच्छा अच्छा, आप तारीफ करना रहने दीजिए।
यौवन की भूल . ज्रों के हृदय को एक आकाक्षा गुदगुदा रही थी। शरारत से हाथ पकड कर, उसे सींचते हुए उसने कहा-आओ आगे बढ चलें, जिससे वे लोग हमें पकड़ न पायें । वे दोनों पुन दौडते हुए आगे बढे। अब पेडो का झुरमुट अधिक सघन न था, परन्तु पगडडी अधिक सकडी और चकरदार हो गई थी। समुद्र का गर्जन कोई मधुर स्वर-लहरी-सा कर्ण- गोचर होने लगा। इधर-उधर यरसाती पानी से भरे गड्ढे दिखाई पड़ते थे, जिनमें कितने ही केंकडे तैर रहे थे। सहसा पायजामा घुटनों तक चढा, एक छिछले गड्ढे में उतरते हुए मैडम रोजमिली चिल्लाई-अरे देसो तो, इसमे बहुत जहाँ भी पायजामा जाँघो तक चढाकर, मैडम रोजमिली के निकट गया। 'तुम्हें कुछ दिखाई पडता है ?- कोमल स्वर में उससे पूछा गया। मैडम रोजमिली के कधों पर झुककर पानी में देखते हुए, उसने उत्तर दिया-हाँ, तुम्हारा सुन्दर मुस 'तन तुम केंकडो का शिकार कर चुके ।' मैं तो तुम्हारा शिकार करना चाहता हूँ'-भावुकता की लहर में बहते हुए धीरे-से मैडम रोजमिली का कधा दवाकर ज्यों ने कहा। 'कोशिश करो, पर मैं तुम्हारे जाल में फंसने वाली नहीं।
यौवन की भूल
मैडम रोजमिली ने एक हृदय-वेधी कटाक्ष करके, ओठों के बीच
मुस्कराते हुए कहा।
'अगर फंस गई?
'अच्छा अच्छा, चातें न बनाइए।' और महसा पानी की
सतह पर उतराते एक केंकडे की ओर देखते हुए उसने कहा-
"लो, इसे पकडो।'
जरों ने उसकी ओर आँसें उठा कर देना, जैसे कहा हो-बड़ी
निष्ठुर हो। और फिर उसने पानी में जाल फेंका। केंकडा
डुबकी मारकर पानी की गहराई मे हो रहा, पर दूसरे क्षण किनारे
की ओर जाते हुए, पानी की सतह पर आते ही वह जाल में
फंस गया। तब जण ने उसे हाथ से पकड कर घास पर रसते
हुए कहा-लो।
मैडम रोजमिली, काँटेदार सिर के कारण, उसे छूने से डरती
थी। केंकड़ा तब भी धीमे-धीमे सांस ले रहा था। साहस करके
उसने दुम परुड़कर उसे उठाया, और अपनी टोकरी में पिछी गीली
घास पर रस दिया।
फिर तो वह इधर-उधर गड्ढों मे योज-सोज कर केंकडो का
शिकार करने लगी। उमका डर भाग गया था। वह उन्हें
वडी आमानी से अपनी टोकरी में रसती गई ।
केवल उसके पीछे-पीछे दौड रहा था। वह शिकार में
इतना निमग्न न था, जितना मैडम रोजमिली के अगों की गति
यौवन की भूल
निहारने मे। जब मैडम रोजमिली पानी मे जाल फेकने लगती,
तो वह उसके ऊपर झुक कर, जाल फैलाने में सहायता देता हुआ
कहता-देसो ऐसे। समझी। और वह उसके मुँह को देख
कर मुस्करा देता।
वह अधिक देर तक अपनी भावनाओ पर नियत्रण न कर
सका। सहमा, एक बार इस प्रकार मुस्कराते समय, उसने मैडम
रोजमिली को अपने बाहुपाश मे आबद्ध करके, उसके कोमल
अवरों पर एक आवेशपूर्ण चुम्बन अक्ति कर दिया ।
रोजमिली ने छिटक कर, ओठों पर लगी मिठास को पोछते
हुए आँखो से मुस्कराकर कहा-तुम भी कैसे खराब आदमी हो!
भला एक साथ दो काम होते है?
ज्यों के चेहरे पर उन्माद हँस रहा था।
'मैं तो देवल एक काम कर रहा हूँ-बस तुम्हे प्यार ।'
.
-
उसने कहा।
मैडम रोजमिली ने लज्जा से लाल होकर कहा--आज क्या हो
गया तुम्हे ? कुछ दिमाग तो नहीं फिर गया।
हूँ, मैं तुम से प्रेम करता हूँ। सच, हृदय से प्रेम करता हूँ।'
घुटनो पानी में सडी, हाथ मे जाल का कोना पकडे, मैडम
रोजमिली ने अकचका कर ज्यों की आँसों की ओर देखा और
कहा-उँह, इसके लिए क्या यही समय है । क्या कल तक नहीं
ठहर सकते, जो आज शिकार में बाधा डाल रहे हो।
यौरन की भूल
उसके स्वर में झुंझलाहट थी, पर प्रसन्नता-मिश्रित वह
झुंझलाहट भी कितनी मधुर प्रतीत होती है।
'परन्तु मुझसे तो एक क्षण के लिए भी नहीं रुका जाता।
कितने महीनों से इस हदय-कुड में प्रेमामि धधक रही थी। आज
तुमने उसमें और ईधन डाल दिया।'
तब उसने मुस्करा कर कहा-अच्छा, आओ चलो उस शिला-
सण्ड पर बैठे। वहाँ ठीक से यातें होंगी।
क्षण-भर पश्चात् वे दोनो धूप में चमकते शिलाखण्ड पर
बैठे थे।
मैडम रोजमिली ने ज्यों का हाथ अपने हाथों में ले, उसके
मुख को देखते हुए, प्रेम-पूर्ण, परन्तु गम्भीर स्वर में कहा-प्रिय
मिन, अब न तुम ही अबोध बालक हो, न मैं एक उच्छृङ्गल
नवयुवती । हम दोनों ने दुनिया अच्छी तरह देसी है। अगर तुम
मुझ से प्रेम करते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम मुझ से विवाह
करना चाहते हो।
ज्रों अभी विवाह के लिए किंचित्-मात्र भी प्रस्तुत न था, तब
भी उसने आवेग पूर्ण स्वर में कहा हाँ, और क्या।
'तो तुमने अपने माता-पिता से आज्ञा ले ली है ?'
'अभी तो नहीं। पहले मैं यह जानना चाहता था कि तुम तैयार
हो या नहीं।"
तब मैडम रोज़मिली ने ज्यों का हाथ चूमते हुए कहा-मैं प्रस्तुत
१०३
यौवन की भूल
हूँ | मेरा अनुमान है, तुम एक सहृदय तथा सज्जन पुरुप हो, पर
तब भी मै तुम्हारे माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध कोई काम
न करूँगी।
'माँ को कोई आपत्ति न होगी। वह तुम्हें प्रसन्नता-यूर्वक
अपनी पुत्र-वधू बनाना स्वीकार करेंगी।
फिर, मैडम रोजमिली सिर नीचा किये चुप बैठी रही।
इस विवाह के प्रस्ताव ने उसकी हृदय-तंत्री को झकृत कर
दिया था। ज्एँ भी चुप बैठा रहा । ज्वार के पश्चात् जो
दशा समुद्र की होती है, वही उसकी थी। आह, इन थोडे-से
शब्दों ने, एक क्षणिक उन्माद की लहर ने, उनको प्रणय-सूत्र में
बॉघ दिया।
सहसा रोलेन्ड की आवाज ने उन दोनों को चौंका दिया।
'इधर आओ बच्चो, इधर आओ। देसो तो, व्यूसायर ने
गडढे के गड्ढे साफ कर दिये ।'-वह उल्लसित स्वर में चिल्ला-
चिल्ला कर उन्हें पुकार रहा था।
घुटनों तक पायजामा चढाये कैप्टेन न्यूसायर एक-एक
गड्ढों को साफ कर रहा था। उसकी तेज आँसें केंकड़े पर
पड़ी नहीं, कि वह गरीव जानवर दूसरे क्षण उसकी टोकरी
में था। मैडम रोजमिली आश्चर्य और प्रसन्नता से उस निपुण
शिफारी की एक-एक गति देसने लगी।
सहसा रोलेन्ड चिल्लाया वह लो, लूसी भी आ गई।
१०४
.
योधन की मून
इस तरह यालकों की भांति दौड-दौड़कर शिकार करना
'उन्हें अच्छा न लगता था, इसीलिए वह और पिएर, दोनों
एक शिलाखण्ड पर बैठे आराम कर रहे थे। वह पिपर से
डरती थी, तब भी थकन के कारण पस्त, वह साहस करके
उसके पार्श्व में बैठी रहीं । समुद्र की ओर से आती गीतल
परन से धुली सूर्य किरणों का स्पर्श बड़ा सुसद प्रतीत हो रहा
था। उनके मन में भावनाएँ उठती, वह पुछ पहना चाहती,
'पर पिएर के डर से कुछ न फहती। जानती थीं कि पिएर कोई
सी ही बात कह बैठेगा, जो उनके क्लेजे में लगेगी।
पानी से भीगे पत्थर के टुकड़ों को गेंट की तरह एक हाथ
से दूसरे हाथ में उछालता हुआ बैठा, पिएर सब कुछ देख रहा था।
याना के आरम्भ से ही मैडम रोजमिली को ज्यों से सट
कर चलवे देस, तथा परों को हसरत-भरी निगाह से उसकी
ओर ताकते देस, उसने समझ लिया था कि आज दोनों पर एक
नया रग चढा है, जिसे उसकी भापा में मूर्सता कहते हैं।
पिएर उनकी ओर देस घृणा से हँसने लगा।
निना उसकी ओर देसे माँ ने पूछा-क्या बात है?
शिला-सण्ड पर पास पास बैठे ज् तथा मैडम रोजमिली
की ओर सकेत करके उसने मुँह सिकोड कर कहा था-जरा उन
लोगो को देखो तो। ऐसे ही मूर्स मनुष्य स्त्रियों के जाल में
फँसते हैं।
१०५
यौवन की भूल
.
माँ ने क्षीणः परन्तु व्यथित स्वर में जैसे अपने भीतर से द्वन्द्व
करते हुए कहा था-आह । पिएर, तुम कितने निष्ठुर हो । वह
स्त्री सहृदया है। तुम्हारा भाई उससे सुन्दर एव सञ्चरित्र पत्नी
नही पा सकता।
वायुमण्डल को अपने भीपण अट्टहास से गुजाते हुए, उसने
उत्तर दिया-सच्चरित्र ! जैसे सभी स्त्रियाँ सञ्चरित्र ही होती हैं।
तभी तो वे अपने पतियो के साथ विश्वासघात करती हैं।
माँ ने फिर कोई उत्तर न दिया। वह उसी क्षण उठ खडी
हुई। पैर लडखडा रहे थे, शरीर कॉप रहा था, पर वह
भागती
चली जा रही थी। गिर पडे, चोट लग जाये, हाथ-पैर टूट जाये,
पर वह पिएर के निकट एक पल भी नहीं बैठ सकती, एक पल
भी नहीं।
'माँ, तुम आ गई। ज्यों ने पुलकित स्वर से, उसके निकट
जाते हुए कहा। माँ ने जैसे गिरने से बचने के लिए कसकर ज्यों
को पकड लिया। वह हाफ रही थी। हृदय की तीव्र धडकन
स्पष्ट सुनाई पड़ती थी। मुँह फीका पड़ गया था। उसकी कातर
आँसे दया की भीख माँग रही थीं।
उसे इस प्रकार विचलित देस, ज्वरों ने घबडा कर सकरुण
भाव से पूछा-क्या बात है ?
उसने अस्पष्ट स्वर में उत्तर दिया-मैं मरते-मरते बची है।
एन भयावनी पहाडियो को देखकर डर गई।
१०६
योया की भूल
तष ज्यों उसको अपना सहारा देकर ले चला। मैडम रोलेन्ड
की अजीव हालत हो रही थी। वह चाहती थीं कि कोई मेरा मुँह न
देसे । कहाँजा छिपें कि जिससे इन लोगो की आरमो से दूर
हो जायें।
पुत्र का धीमा स्वर उसके कानों में पड़ा-जानती हो आज
मैंने क्या किया?
क्षीण स्वर में उसने उत्तर दिया-मैं नहीं जानती।
'सोचो।
'मैं नहीं सोच सकती। मैं नहीं जानती।'
'मैंने आज मैडम रोजमिली से विवाह का प्रस्ताव किया ।
वह राजी है।"
मों ने कोई उत्तर न दिया। उसके हृदय ने कहा था-ठीक
किया , परन्तु यह शब्द जैसे मुंह से निकले ही नहीं। वह
अत्यधिक व्यग्र हो उठी थी।
'हो, तो मैंने ठीक किया ?'-क्षण-भर उत्तर की प्रतीक्षा के
पश्चात् अपने फिर पूछा।
'हा, ठीक किया।
'परन्तु तुम इतने धीमे स्वर मे क्यो कह रही हो । प्रसन्न
नहीं दीसती।'
'मैं यहुत प्रसन्न हूँ। मैडम रोलेन्ड ने हँसने का प्रयत्न करते
हुए कहा।
१०७
यौवन को भूल
'सचमुच
'सचमुच !
और अपनी प्रसन्नता प्रकट करने के लिए उन्होंने फीकी हँसी
से ओठ फडका दिये । वात्सल्यपूर्ण प्रेम में ज्या का मुंह चूम लिया।
तब उन्होंने अपनी भीगी आँसें पोंछी और एक बार पीछे फिर कर
देखा। एक शिला-खण्ड पर औंधा मुँह किये एक मनुष्य
लेटा था, निर्जीवनमा । विचारो के गर्त में दवा वह पिएर
था। मैडम रोलेन्ड अन्दर-ही-अन्दर कॉप-सी गई । वह जहाँ के
बाहुओं के अन्दर सिकुड-सी गई।
जगाये जाने पर पिएर इस तरह कुनमुना उठा, जैसे सो
रहा हो।
१०८
दिन-भर की थकन से चकनाचूर होकर सर लोग नये-घर लौटे।
न्यूसायर में इतना भी दम न था कि द्वार पर दो मिनट के लिए,
ठहर सके। वह अपने घर जाने के लिए उद्यत हो रहा था।
प्रसन्न-मन ए के अन्दर, सन को विशेपकर दोनो अतिथियों को
अपना सुन्दर मकान दिसाने की लालसा उछल रही थी। उसने
विनम्रता-पूर्वक व्यूसायर से रुकने के लिए आग्रह किया और
फिर दौडादौडा अकेला भीतर गया सम्पूर्ण मकान को प्रकाश
से आलोकित करने के लिए।
अँधेरे में दीवार के सहारे सर लोग बेदम-से खड़े थे। सहसा
सामने जैसे इन्द्रपुरी का द्वार खुल गया। प्रकाश मे चमकता एक
चेहरा कह रहा था-आइए, आप लोग भीतर आइए।
हरे नीले फूलों के गमलों की ओर से आती प्रकाश-किरणो
से वह गैलरी जगमगा रही थी। वीचों-बीच एक सुन्दर झाड
टॅगा था, जिसमें से छन-छन कर आते तीव्र प्रकाश से गैलरी
१०९
औवन फी भूल की आभा दुगुनी हो गई थी। रोलेन्ड का हृदय हर्ष से घिर रहा था। उसके मन में आया कि तालियां बजाये। द्वार खुलते ही जैसे उसने कोई मनोरम दृश्य देखा हो। गैलरी को पार कर दूसरा ड्राइग-रूम था, जिसमें परों मुवकिल से बातचीत करेगा। चारों ओर स्प्रिंगदार कोच पडे थे, और बीच में एक गोलाकार सुन्दर मेज़ । मेज पर सुनहली जिल्टो मे बँधी न मालूम कितनी कानून की किताबें रक्खी थी। कमरा विशेष रूप से सजा न था, तब भी- उसमें एक आकर्षण था। बाई ओर का द्वार सोलने पर शयनागार दृष्टिगोचर हुआ। इसे सजाने में मैडम रोलेन्ड ने अपनी सारी बुद्धि चातुरी खर्च कर दी थी। चारों ओर दरवाजो पर सुनहले पर्दे टॅगे थे, जिन पर सुन्दर नवयुवतियाँ भेड़ चराने जाती दिखाई पड़ती थीं। उन भोले- भाले सुन्दर मुसडो को देखिए, वे सलोनी आँखें एकटक आपको देखती प्रतीत होंगी। एक किनारे विछा पलग, बीच में रसी आराम कुर्सियाँ तथा अष्टकोण मेज, सभी चीजो में एक सादगी थी। और वही सौन्दर्य उस शयनागार का सौन्दर्य था । मैडम रोजमिली ने आनन्दोल्लसित खर मे कहा-चाह । बडा , सुन्दर मकान है। 'तुम्हे पसन्द आया ?'-उपरों ने पूछा । ११०
मौवन की भूल
'मुझे असीम प्रसन्नता हुई।"
और मुस्कराते हुए दोनों ने एक दूसरे को देखा, जैसे परस्पर
"मावों को पढ़ लिया हो । दोनों के कपोलों पर एक क्षणिक
लालिमा दौड़ गई।
पिएर भूखे शेर को भाति उस मकान को एक-एक चीज को
देख रहा था ।
उसकी आँखों में ईर्ष्या प्रज्ज्वलित हो उठी थी। आह यह सुन्दर
मकान उसका होता।
मैडम रोजमिली का हृदय पुलक और सराहना से परिपूरित
हो रहा था। यह सुन्दर मकान शीघ्र ही उसका होगा। मालूम
'पड़ता है, मां-बेटों ने मेरे आगमन की तैयारियाँ अभी से कर
ली हैं। पलग लिया गया है, खूब लम्या चौडा, जैसे एक दम्पती
के सोने के लिए हो।
भोजनालय में एक गोलाकर मेज पर फल आदि सभी
चीजें कायदे से थाली में चुनी रक्सी थीं। किसी को ऐसी
भूस तो न थी, पर तब भी उन्हे साना पड़ा। घटों बाद सब
लोगो ने विदा माँगी। मैडग रोलेन्ड घर में आवश्यक चीजें
'धर उठा रही थीं, इसीलिए वह रुक गई ।
'क्या तुम्हे लिवाने के लिए मुझे फिर आना पडेगा ?'- रोलेन्ड
ने पूछा। वह पहले हिचकिचाई , परन्तु फिर कहा-नही, तुम
आराम करना। पिएर रुका है, मैं उसके साथ चली आऊँगी।
१११
यैवन की भूल
उन लोगों के जाते ही उसने अनावश्यक प्रकाश बुझा दिया ।
केक, शकर मदिरा आदि चीजे फिर अलमारी में चुन दीं।
फिर शयनागार में देखने गई कि सुराही में ताजा पानी भर दिया
गया है अथवा नहीं।
पिएर, ड्राइग-रूम मे एक कुर्सी मे घुसा बैठा, मजे से
धुएँ के बादल उगल रहा था
सहसा उसने मुस्करा कर जाँ से कहा-आज तो विधवा,
लिल्ली थोडी प्रतीत होती थी। है तो सूसट ही ।
इन शब्दों द्वारा अफित आन्तरिक चोट ने जैसे उका सारा
खून खौला दिया। क्रोध से मुँह तमतमा उठा ।
'देखो' मैं बतलाये देता हूँ, आज से फिर कभी मैडम रोजमिली
का अपमान करने का साहस न करना ।'-उसने चिल्ला कर कहा ।।
पिएर ने ईट का जवाब पत्थर से दिया ।
'तो आप मुझे हुक्म दे रहे हैं। दिमाग तो नहीं फिर गया ?"
शोधावेश में ज् पृथ्वी पर पैर पटकता हुआ चिल्लाया-मेरा
नहीं, तुम्हारा दिमाग फिर गया है। अब मैं अधिक नहीं
बरदाश्त कर सकता।
'ऐसे गर्मा रहे हैं, जैसे वह लिली घोडी इनकी कोई लगती
ही हो ।'
'हाँ, तुम्हें मालूम हो कि मैं शीघ्र ही मैडम रोज़मिली से विवाह
फरने वाला हूँ।"
११२
यौपन की भूल
पिएर के भीपण अट्टहास से कमरा गूंज उठा।
'अब समझा। तुमने बडे मौके से विवाह का आयोजन
किया है।'
क्रोध चरम सीमा तक पहुँच चुका था। पप का मुन्व पत्थर
की माति कठोर हो रहा था। आँसें विशेष रूप से चमक रही
थीं। पिएर के मुँह के पास जाकर उसने चिल्लाकर कहा-चुप
रहो । देसो मेरा मजाक उडाने का प्रयत्न न किया करो।
क्रोध में पिएर भी भयकर हो उठा था। इतने दिनों की
सचित ईर्ष्या आज धधक उठी थी। मूक वेदनाओ से पीडित,
वह पागल कुत्ते की भाँति हो रहा था।
'तुम्हारी इतनी हिम्मत । तुम्हारी इतनी हिम्मत ।। जवान
रोकोजी । मै हुक्म देता हूँ'-क्रोध से कॉपते हुए, गरज कर
.
उसने कहा।
उसे देस ज्यों क्षण भर के लिए स्तम्भित रह गया। क्रोध से
पागल, वह कोई शब्द अथवा वाक्य सोज रहा था, जो उसके
प्रतिद्वन्द्वी के हृदय पर अचूक तीर-सा लगे। क्षण भर पश्चात्
उसने धीमे, परन्तु कडे स्वर में पिएर के मुँह को देखते हुए कहा-
मैं आज से नहीं, वर्षों से जानता हूँ कि तुम मुझसे र्या करते
हो। मेरा क्रोध उभारने के लिए ही उस युवती का अपमान
करने का प्रयत्न करते हो।
पिएर के मुख पर एक पैशाचिक हँसी दौड़ गई।
११३
यौवन फो भूल
'आह । मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूँ ! मैं । मैं ।। और तुम
ज्यों समझ गया कि निशाना ठीक चैठा है। वह उसी प्र
कहता गया हो तुम, तुम, तुम मुझसे ईर्ष्या करते हो ।
से नहीं, बचपन से। और मैडम रोजमिली को अपने ब
मुझसे प्रेम करते देस, तुम्हारी यह ईर्ष्याग्नि धधक उठी है।
पिएर वैसी ही हँसी से वाक्य दुहराता रहा।
'मैं । मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूँ? उस खूसट
के कारण
जाँ उसी भाव से कहता गया।
'उस दिन नौका-विहार के समय तुमने मुझे उसके सा
नीचा दिखाने का प्रयत्न किया। हर मौके पर तुम ऐसा क
हो। और जब से मुझे धन मिला है, तब से तो तुम ईयां
पागल हो उठे हो। तुम्हारे ही कारण घर मे उदासी फैल :
है। तुम्हारे ही कारण
पिएर का मुख क्रोध से अत्यन्त विकृत हो उठा था। उन
मुट्ठी कस ली। आँसें तरेर कर भाई के मुख को देखते हुए
चिलाया-चुप रहो! धन का नाम न लेना !
ज्यों कहता गया।
'तुम्हारे रोम-रोम में ईर्ष्याग्निधधक रही है। चाहे तुम न मान
मैं सच कहता हूँ, तुम मुझसे ईर्ष्या करते हो। तुम मुझसे छु।
११४
,
7
यौवन की भूल
करते हो, इसी ईया के कारण । तुम मुझसे झगडामोल लेना चाहते
हो, इसी ईर्ष्या के कारण ! अब मैं धनवान हो गया हूँ, तो तुम्हारी
यह ईप्यामि और अधिक उप्र हो उठी है। तुम्हारे ही इस
विष-मय व्यवहार से माँ की यह दशा हो रही है।
अंगीठी के पास दिवाल से टिका हुआ पिएर, मुँह वाये,
आसें फैलाये भाई को देख रहा था। उसकी आरमों मे
आया। उसकी दशा उस समय ऐसी हो रही थी, जिसमें मनुष्य
भीपण-से-भीषण चोट करने के लिए कमर कस कर तैयार
हो जाता है।
क्षण-भर पश्चात जैसे अपनी भावनाओं से म्वय घुट कर
कठिनता से साँस लेते हुए, वह चिल्लाया-
बन्द करो
अपनी जवान । मैं कहता हूँ, खुदा के लिए अपनी जवान
सून चढ
चन्द करो।
'नहीं, मैं बहुत दिनों सब किये रहा। अब जव तुम
चोट करने से बाज नहीं आते, तर तुम भी इसका नतीजा देख
लोगे। मैं उस युवती से प्रेम करता हूँ, यह जानकर
भी तुम मेरा मजाक उडाने का प्रयत्न करते हो। हूँ, मैं समझ
लँगा। तुम्हारे इन जहरीले दाँतों को तोड न दूँ, तो बात नहीं।
मैं बताऊँगा कि इस तरह मेरा सम्मान करो।'
'तुम्हारा सम्मान
'हाँ, मेरा सम्मान
११५
यौवन की भूल
'ह ह ह । तुम्हारा सम्मान | जिसके कारण हमारे
पर धब्बा लगा।"
'क्या कहा ? • फिर तो कहो।"
'मैं कहता हूँ कि तुम्हारे ऐसे दोगले अव अपने सम्मा
चिन्ता करेगे ?
ज्याँ स्तम्भित रह गया। वह ऐसी लांछना सुनने के
स्वप्न में भी तैयार न था।
'क्या कहा ? जरा फिर से तो कहना।'
'मैं तो वही कहता हूँ, जो सब कहते हैं । तुम उसके है
हो, जिसने तुम्हारे नाम वसीयत की है । कोई समझदार बेटा,
वसीयत को स्वीकार करके अपनी माँ के माथे पर कलक कार
लगाने का साहस न करता ।
'पिएर । पिएर ।। सोचो तो, तुम क्या कह रहे हो ? मैं
सुन रहा हूँ?
'सत्य सुन रहे हो । जानते हो, इसी कडवे सत्य को जान क
इतना उद्वेलित हो रहा हूँ। न मुझे रात में नींद है, न दिन मे चै
लज्जा ने मेरा मस्तक नीचा कर दिया है। मैं नहीं जानता
दूसरे क्षण मैं क्या करूँगा।"
'पिएर, चुप रहो। माँ बगल के कमरे में हैं। कही
सुन न लें।
लेकिन अब पिएर ने जव कि अपने को सोल दिया है, तो
११६
यौवन की भूल तरह से सोल देगा । जो हो, वह अब अपने दिल पर रक्खा हुआ वोझ, हल्का करके ही रहेगा। वह भावों के तूफान में रुक-राक कर जण के सामने अपने दिल की सम्पूर्ण वातें उगल रहा था, जैसे रात को सोते-सोते कोई विक्षिप्त अपने आप बडबडाए । अब उसे माँ की लेश-मात्र भी परवाह न थी। वह ऐसे बोल रहा था जैसे माँ है ही नहीं । जब उसके हृदय का मवाद बहने लगा है, तो वह उसे साफ करके ही रहेगा । पीठ पर हाथ बाँधकर, शून्य में निहारता, कमरे में इधर से उधर, उधर से इयर टहलता हुआ, वह बके चला जा रहा था। ज्रों को जैसे किसी ने तोडकर चकना चूर कर दिया हो । दरवाजा थामे वह अपराधी की भाँति निर्जीव-सा सडा था। उसे अनुभव हो रहा था कि माँ ने मारी बातें सुन ली हैं, नहीं तो वह कमरे के बाहर अवश्य आती । अव उसमें साहस नहीं है, इसी लिए नहीं आती। सहसा पिएर जमीन पर पैर पटकते हुए चिल्लाया-मैं वहशी है, तभी तो इस प्रकार वक-चक कर रहा हूँ। और वह नगे सिर घर से भाग गया। जय बाहर के सदर दरवाजे के वन्द होने की आगाज आई, तो ज्ण जैसे स्वप्न से चौंक पडा । युगों की भाँति लगनेवाले कुछ क्षणों से वह सज्ञा-हीन सड़ा था। उसे अनुभव हो रहा था कि कुछ निर्णय करना चाहिए, पर तय भी वह हफा-यफा-सा विचार-
यौवन की भूल
-
.
शून्य खडा था । वह चैन की वंशी वजानेवाले उन मनुष्यो में से
था, जो सोचने-समझने का काम 'कल' पर छोड़ रखते हैं, और
जब समय आता है, तव क्षण-भर के लिए स्तम्भित रह जाते हैं।
जब पिएर की इतनी चीस-चिहाहट के पश्चात्, एक दम
सन्नाटा छा गया, तो ब्रों को यह सन्नाटा काल-सा लगा। कमरे
की छोटी-छोटी चीज तक उसे डराने-सी लगी।
तब उसने कल्पना-शक्ति का आवाहन करके
कुछ
सोचने-
समझने का प्रयत्न किया।
अभी तक उसे किसी कठिनाई का सामना न करना पड़ा था।
दुनिया में ऐसे कितने आदमी हैं, जिनकी जिन्दगी बड़ी सुगमता-
पूर्वक कट जाती है । सजा के भय ने उसे कर्तव्य-परायण और
परिश्रमी बनाया था। बडी आसानी से उसे विद्यालय से वकालत
की डिगरी मिली थी। उसे चारों ओर शान्ति प्रतीत होती थी,
और इसीलिए ससार की वस्तु में उसे नवीनता अथवा आकर्पण
न प्रतीत होता था। वह जीवन में सदा शान्ति और आनन्द की
इच्छा करता था, और अब इस विपम समस्या का सामना करके
उसकी दशा उस मनुष्य के सदृश हो रही थी, जो पानी में गिर
पडा है, पर तैरना नहीं जानता।
पहले उसने पिएर की बातों पर विश्वासन करके, उन्हें विस्मृतः
करने का प्रयत्न किया। सम्भवत ईर्ष्या और घृणा के कारण,
वह झूठ बोला हो।
पर क्या केवल इस द्वेष-भाव के कारण,
११८
।
यौयन की भूल
वह मौके परिन पर फलक का टीका लगाने का साहस कर सकता
है। उसके स्वर तथा वेदना-पूर्ण आकृति की ओर से सत्य झाँक
रहा था। हदय उसके कथन को मिथ्या मानने के लिए राजी
ही नहीं होता था।
दारुण व्यथा ने जैसे ज्र्यों की रक्त-धमनियों की उष्णता हर
ली थी। उसे विश्वास था कि बगल के कमरे में बैठी माँ ने
मन कुल अवश्य सुन लिया होगा।
अव उसकी क्या दशा है ? कमरे में तो एकान्त निस्तब्धता
छाई है। एक नि ग्यास अथवा हिलने डुलने तक की ध्वनि नहीं
सुनाई पडती । सम्भवत वह भाग गई हो । पर कहाँ? भागी
तो नहीं, पर शायद खिडकी में से नीचे सडक पर कूद पडी हो ।
ज्यों के ऊपर एक आतक सा छा गया। हाँ, ऐसा आतक, जो उसे
शयनागार में घसीट ले गया ।
कमरे में कोई न था। मोमबत्ती का क्षीण प्रकाश वहाँ के
अधकार को भगाने का असफल प्रयत्न कर रहा था। जाँ दौड
कर खिडकी तक गया, पर वह वन्द थी। तर उसने अँधेरे में
चारों ओर ऑसें गडा-गडा कर देखा। पलँग पर किसी मनुष्य
की छाया प्रतीत हुई। वह उसकी माँ थी। तकिये मे मुँह
गडाये, कानों में अँगुली डाले वह औंधी पड़ी थी।
पहले परों ने सोचा, सम्भवत वह बात को पी गई है। उसने
उसे झझकोर कर सीधा कर दिया। वह लपट तो गई, पर
११९
थोवन की भूल
तकिया उसके मुंह से ही दवा रहा। अपनी हृदय विदारक
चीस को रोकने के लिए उसने अपने पूरे जोर से तकिये को
जबडों में दवा रक्सा था। हाथ-पैर लकड़ी से हो रहे थे।
अपनी अकथनीय वेदना को वक्षस्थल मे छिपाये रसने के लिए
वह सजीव मूर्ति, जैसे अपनी सम्पूर्ण शक्ति खर्च करके अब निर्जीव
होकर पड रही थी। जाँ कोई योगी अथवा महात्मा नहीं था।
हाड-मास का बना वह एक पुतला था, जिसमें माँ के प्रति प्रेम
और मानव-हृदय की समस्त दुर्वलताएँ भरी थीं। पिएर के
मुँह से मुनी सारी बाते विस्मृत हो गई थी। करुणा से उसका
हृदय पानी-पानी हो गया था ।
माँ के मुँह से तकिया हटाने के प्रयत्न में असफल हो, ज्यों
उसे झझकोरता हुआ, हृदय-विदारक स्वर मे चिल्ला रहा था-माँ!
माँ।। मेरी प्यारी माँ !! जरा इधर तो देखो। माँ!
मेरी अच्छी माँ॥
माँ मूक रही, पर पुत्र की इस करुण चीत्कार ने उसे
विचलित कर दिया था। उसका रोम-रोम केले के पत्ते की भाँति
थर-थर काँप रहा था।
'माँ । माँ । मेरी तो सुनो। मैं जानता हूँ कि यह बात असत्य
है। मैं जानता हूँ कि यह बात असत्य है ।'
माँ के हृदय की दृढ़ता शिथिल पड़ गई। उसकी कसी अंगुलियाँ
ढीली पड गई । दाँत खुल गये। तकिया मुँह से अलग हो गया।
१२०
यौवन की भूल
,
वह विलकुल पीली पड़ गई थी। ऐसा मालूम पड़ता था
कि उसके शरीर में रक्त है ही नहीं। मुकुलित पलको से टप-टप
'ऑसू टपक रहे थे। ज्ण ने प्यार से माँ की कमर में हाथ
डालकर, उसकी भीगी पलकों को चूमते हुए कहा-रोओ न मा।
मैं जानता हूँ कि वह वात असत्य है । रोओ मत ।"
उसने अपने को छुड़ाते हुए ऑसें पोंछी, और फिर अपने स्त्री-
"हृदयका साहस बटोर करक्षीण-स्वर में कहा-नहीं वेटे, यह सत्य है।
क्षण-भर के लिए वे दोनों स्तब्ध रह गये। गला साफ करते
हुए तथा भावनाओं के तूफान के कारण दम घुट-सा जाने पर,
साँस लेने का प्रयत्न करते हुए, माँ ने फिर कहा-बेटे, वह
नितान्त सत्य है। झूठ क्यों बोलूं, वह बात सत्य है। अगर
मैं नहीं करूँ, तो और पाप होगा।
सन्तापों की जीवित-समाधि, माँ के मुस पर कुछ ऐसे भाव
थे, कि ज्ण किसी अनिष्ट की कल्पना कर भय से कॉप उठा।
माँ के पैरो पर गिर कर बोला-हिश, चुप रहो माँ।
माँ का मुख पत्थर-सा हो रहा था। न मालूम उसमें
-कौन-सी भावना झाँक रही थी, कियाँ विचलित हो उठा ।
'अच्छा, अव चलती हूँ बेटे । गुडबाई ।"
कह कर माँ द्वार की ओर बढ़ी।
उसने दौड कर उसे पकडते हुए कहा-माँ, यह तुम क्या
सोच रही हो। तुम कहाँ जाती हो?
पोवन की भूल
-
'स्वयं नहीं जानती कहाँ जाऊँगी। अब मेरा इस दुनिया में
कोई नहीं। अब मैं अकेली हूँ।"
उसने छूटने का प्रयत्न किया, पर ज्यों उसे कसकर पकडे रहा ।'
अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए उसे उस समय कोई
शब्द ही न मिल रहे थे। पागलों की भाँति वह धीमे स्वर में
रुक-रुक कर कह रहा था-माँ-माँ-माँ।
और माँ अपने को छुडाने का प्रयत्न कर रही थी।
'नहीं, अब मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ। मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ,
कोई नहीं।
अब तुम्हारे न बाप है, न माँ। मुझे छोड दो।
नादान बच्चे, मुझे छोड दो। गुडबाई ।
न मालूम किस भावना ने जरों से कह दिया था कि अगर
उसने इस समय माँ को जाने दिया, तो बस जाने दिया।
वह उसे फिर कभी न देस सकेगा। उसने जबरदस्ती गोद मे
उठा, उसे पलंग पर बिठा दिया। और फिर स्वय जमीन पर
घुटनों के बल बैठ, माँ को गोद मे अपना सिर रसते हुए उसने
कहा-तुम इस जगह से नहीं जा सकती, माँ। मैं तुम्हें प्यार
करता हूँ। मैं तुम्हें न जाने दूंगा। मैं तुम्हे प्यार करता हूँ,
तुम मेरी हो, मैं तुम्हें कभी न जाने दूंगा।
मों ने निराशस्वर में कहा-नहीं, मेरे बेटे, यह असम्भव
है। आज तुम मुझे रोक रहे हो, कल घर से निकालने के लिए
तैयार हो जाओगे। तुम मुझे कभी नहीं क्षमा कर सकते ।
રિર
यौवन को भूल
उसने उत्तर दिया-मैं। मैं ! तुम यह कैसे कहती हो ?
उसके इन शब्दों में, उसका स्वच्छ, सरल, ममता से पूर्ण
हृदय घुला था। माँ ने पुलकित हो, उसका सिर अपने
वक्षस्थल में दया लिया, और फिर ममता के आवेश में उसके
मुँह पर चुम्बनों की झडी लगा दी।
फिर, किसी छोटे बालक की भाँति उसे अपने पार्व मे बैठा,
वात्सल्य-पूर्ण हाथों से उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा-ज्यों,
मेरे प्यारे । तुम मुझे कभी नहीं क्षमा कर सकते । सम्भवत
तुम अभी स्वय धोसे में हो। सोचो तो, आज तुमने मुझे क्षमा
कर दिया और इस समा ने मेरी जान बचाली, पर कल मेरा
मुंह देसना भी पसन्द न करोगे।
ज्याँ, माँ की कमर में हाथ डालकर, उसके कधों पर सिर
रसता हुआ वोला-ऐसा न कहो, माँ।
'नहीं वेटे, मैं सत्य कहती हूँ। मैं स्वय नहीं जानती कि
कहाँ जाऊँगी, पर मुझे जाना ही होगा । अव मैं तुम्हे कभी आँसें
उठा कर भरपूर नजर देसने का साहस तक नहीं कर सकती।'
'नहीं माँ, तुम हरगिज नहीं जा सकती। मैं तुम्हें प्यार
"करता हूँ, तुम मेरी माँ हो, मै तुम्हे न जाने दूंगा।'
'नहीं बच्चे, ऐसा न कहो।।
'नहीं माँ, तुम्हे रहना होगा, रहना होगा। मैं तुम्हें कभी
न जाने दूंगा।
१२३
.
वन की भूल
"
'नहीं बच्चे, यह असम्भव है। मेरी उपस्थिति सब के लिए
सदाई होगी। अभी तो तुम ऐसा कह रहे हो, पर जब तुम्हारे
चार भी पिएर के ऐसे हो जायेंगे, तो तुम मेरी छाया तक से
णा करने लगोगे।
'मैं किसी दशा मे तुम्हे नहीं जाने दूंगा। इस दुनिया में तुम्हारे
सवाय मेरा है कौन "
'पर सोचो तो बेटे, हम लोगो के बीच अब एक दीवार सडी
। अब तुम मुझे कभी प्रतिष्ठा की नजरो से नहीं देस सकते ।'
'नहीं माँ। ऐसा नहीं हो सकता ।'
'हाँ, ऐसा ही होगा वेटे । मैं तुम्हारे गरीब भाई के हृदय को
च्छिी तरह जानती हूँ। जिस दिन से उसकी आँखों में सदेह
गाँफने लगा था, उसी दिन से मैं उसकी दारुण व्यथा का अनुभव
र रही हूँ। अब उसकी पद्-ध्वनि सुनते ही, मेरा हृदय इतने
रों से धडकने लगता है, जैसे वह विदीर्ण ही होकर रहेगा।
व तक मैं तुम्हे अपना समझती थी , पर अब वह आशा भी
नई। सोचो तो ज्याँ, अब मैं इस घर मे किस प्रकार रह
नती हूँ?
'वडे आराम से रह सकती हो । मैं तुम्हें इतना प्यार करूँगा
के तुम इन बातो को भूल जाओगी।'
'यह सम्भव नहीं।
'यह सम्भव है।'
१२४
यौवन की भूल
'मैं कैसे विश्वास करूँ कि तुम आज की बातों को भूल
जाओगे?'
'मैं विश्वास दिलाता हूँ कि भूल जाऊँगा।"
'नहीं पाँ, अभी तुम उन्माद मे हो । तुम इस बात को कभी
नहीं भूल सकते।
'माँ'-उण ने उत्तेजित होकर कहा-'अगर तुम चली गई,
तो जानती हो मैं क्या करूँगा, जानती हो ?'
ज्यों के मुख पर एक भयकरता सेलने लगी थी। माँ उसकी
ओर विस्फुरित नेत्रों से देखती रह गई। दूसरे क्षण उच्छवसित
हृदय के आवेश मे उसने उसका मुँह अपने वक्षस्थल में दना
लिया। उप कहता गया।
'मैं तुम्हें हृदय से प्यार करता हूँ। तुम मेरे इस प्यार की
कल्पना तक नहीं कर सकती। तुम मुझसे वायदा करो कि मुझे
छोड कर न जाओगी। वोलो वायदा करो माँ"
माँ के मुख पर एक फीकी मुस्कान सेल गई। ज्यों के मुँह
को दोनों हाथों से थाम, उसके मुँह को देस जैसे उसे पढने का
प्रयत्न करते हुए माँ ने कहा-अच्छा बेटे, अब हमें शान्त हो
जाना चाहिए। पहले तुम मेरी बात सुनो । अगर मैंने तुम्हारे मुँह
से कभी वह बात सुनी, जो आज महीने भर से तुम्हारे भाई
के मुख से सुन रही हूँ, तो फिर तुम मेरी सूरत कभी नदेख सकोगे।
तब मेरे मन में जो आयेगा, करूँगी।
१२५
योवन का भूल में कसम साता हूँ कि...' 'पहले मुझे कह लेने दो। जिस क्षण से तुम्हारे भाई की आँसो में संदेह का सूत्रपात हुआ है, मैं अकथनीय वेदना भोग रही हूँ। मेरा एक-एक रोआँ-रोआँ कलप उसके स्वर मे कुछ ऐसी व्यथा घुली थी कि ज्यों की आँसो में आँसू आ गये। वह कहती गई-'हाँ, देसो रोओ धोओ मत | पहले मुझे कह लेने दो। हाँ, मैं चाहती हूँ कि तुम्हें अँधेरे में न रक्खू । तुम्हारे सामने अपना हृदय खोल कर रख दूँ ! • तुम चाहते हो कि मैं रहूँ, जिससे तुम्हारे दिल मे हर समय यह भावना बनी रहे कि मेरे भी माँ है। तुम अपनी माँ को देख सको, प्यार कर सको। अगर तुम्हे ऐसा करना है, तो पहले मेरे सारे पापों को क्षमा करना होगा। तुम्हे इतना साहस बटोरना होगा कि किसी के सम्मुस, विना मेंपे, विना शर्माये कह सको कि मैं रोलेन्ड का पुत्र नहीं हूँ। मैंने अब तक बहुत सहा, पर अब एक क्षण के लिए भी नहीं सहन कर सकती। यह एक दिन की बात नहीं है कि हो गई, वर्षों की बात है। अगर तुम्हें मुझे अपनी माँ की तरह रसना है, तो तुम्हें अपने दिल में इस विचार को भी स्थान देना होगा कि यह तुम्हारे पिता की प्रेमिका है। वास्तव में, मैं उनकी एक पत्नी से बढ कर थी। मुझे यह स्वीकार करने में कोई लज्जा नहीं, कोई पश्चात्ताप नहीं कि मैंने तुम्हारे पिता १२६ यौवन की भूल को अपने तन-मन से प्यार किया। और मैं उसे सदा प्यार करूँगी । वह मेरा जीवन-सर्वस्व था, वह मेरी हँसी या, मेरीआशा था, मेरा सुस था, मेरा सब कुछ था। मैं ईश्वर को साक्षी करके कहती हूँ कि अगर मेरा उससे सम्बन्ध न हुआ होता, तो मैं अपना जीवन शून्य समझती। मैंने इस ससार मे तुम दोनों लडकों और उसके सिवाय कुछ नहीं पाया। मैं समझती हूँ कि ईश्वर ने मुझे तुम्हारे पिता के ही लिए बनाया था। मैं उसकी आँखों में अपनी दुनिया समझती थी। और जब एक दिन मैंने देसा कि उसका प्रेम घट रहा है, तो ओह ! तुम नहीं कल्पना कर सकते, मैं उस दिन किस प्रकार सिसक-सिसक कर रोई थी। उस दिन मेरे लिए ससार सूना हो गया था। फिर रोलेन्ड के साथ मैं हावेर चली आई। वह निर्दयी अपने पत्रों में निरन्तर लिसता रहा कि आऊँगा, परन्तु न आया, न आया। मरते समय उसने अवश्य मुझे याद किया होगा, तभी तो अपनी वसीयत तुम्हारे नाम लिसी है। मैं सदा उसे प्रेम करूँगी, तुम्हे प्रेम करूँगी, इसलिए कि तुम उसके लडके हो, उसके अश हो। मैं इस सत्य को कभी अस्वीकार नहीं कर सकती। अगर तुम्हें मुझे रखना है, तो तुम्हे निना किसी हिचकिचाहट के यह भी स्वीकार करना होगा कि तुम उसके लडके हो। और हम लोग जब-तब एक साथ बैठ कर उसकी याद करेंगे, उसके सम्बन्ध में बातचीत करेंगे। अगर तुम्हें यह सव स्वीकार, १२७
योवन की भूल
है, तो मैं इस घर मे रह सकती हूँ। हाँ, अब अपना
निर्णय दो बेटे।
ज्यों ने सरलता से उत्तर दिया-तुम रहो, माँ।
तब माँ ने उसे अपने बाहुपाश में आवद्ध करके उसके गालों
को अपने आँसुओं से भिगोते हुए कहा-अच्छा, तो फिर पिएर
का क्या होगा?
--
ज्पा बुदबुदाया।
'कोई उपाय सोचा जायेगा । अव तुम उसके साथ तो रह नहीं
सकती।
पिएर का विचार आते ही मां ने भयभीत हो कर कहा-
नहीं, मैं उसके साथ कभी नहीं रह सकती।
और सहसा उसने विचारों के प्रवाह से डर कर उ के
वक्षस्थल मे अपना मुँह छिपाते हुए कहा-बच्चे, मुझे उससे
घचाओ। मुझे उससे बचाओ । कुछ सोचो । मैं नहीं कह सकती,
पर तब भी तुम कुछ मोचो। मुझे बचाओ।
'मा, सम्र करो। मैं मोचूंगा।'
'अभी सोचो, इसी समय | मुझे अकेला मत छोडो। मैं
उससे बहुत डरती हूँ, यहुत
'हाँ माँ, मैं वायदा करता हूँ कि कोई उपाय सोच निकालूंगा।'
'अमी, इसी क्षण । तुम कल्पना नहीं कर सकते कि मैं उससे
कितनी ठरती हूँ।
१२८
,
यौवन को भूल
or
जण सोच-विचार में पड़ गया। भयभीत म का समझाने
के लिए उसे वडी देर तक बहस करनी पड़ी।
माँ कहती रही-अच्छा, तुम आज मुझे अपने घर में रहने
दो। कल प्रात काल रोलेन्ड से कहलवा भेजना कि बीमार
पड गई थी।
'तुम्हारा कहना ठीक है, पर पिएर अभी तुम्हे छोड कर
गया है। उठो, साहस करो। मैं वायदा करता हूँ कि कल
तक कोई उपाय सोच निकालूंगा। मैं कल नौ बजे तुम्हारे पास
हूँगा। लो, हैट पहनो, चलो तुम्हे घर तक पहुँचा आऊँ।'
'अच्छा, जैसा कहो।"
और उसने उठने का प्रयत्न किया, पर उठ न सकी । इस
भीषण आघात ने उसे नितान्त अशक्त कर दिया था।
तब ज्यों ने उसे ताकत की दवा पिलाई। और फिर सहारा
देकर बाहर ले चला।
घटा-घर ने टन-टन-टन तीन बजाये ।
घर पहुँचते ही लूमी ने शीघ्रता से कपडे उतारे और पिछौने
में घुस रही रोलेन्ड नाक बजा रहा था। घर-भर में केव
पिएर जाग रहा था।
.
यौवन की भूल
है, तो मैं इस घर में रह सकती हूँ। हाँ, अब अपन
निर्णय दो बेटे।
ज्यों ने सरलता से उत्तर दिया-तुम रहो, माँ।
तब माँ ने उसे अपने वाहुपाश में आबद्ध करके उसके गाल
को अपने आँसुओं से भिगोते हुए कहा- अच्छा, तो फिर पिएर
का क्या होगा?
उपा बुदबुदाया।
'कोई उपाय सोचा जायेगा । अब तुम उसके साथ तो रह नहीं
सकती।
पिएर का विचार आते ही मां ने भयभीत हो कर कहा-
नहीं, मैं उसके माथ कभी नहीं रह सकती।
और सहसा उसने विचारों के प्रवाह से डर कर के
वक्षस्थल में अपना मुँह छिपाते हुए कहा-बच्चे, मुझे उससे
बचाओ। मुझे उससे बचाओ । कुछ सोचो। मैं नहीं कह सकती,
पर तव भी तुम कुछ सोचो। मुझे बचाओ।
'मा, सन्न करो। मैं सोचूंगा।
'अभी सोचो, इसी समय | मुझे अकेला मत छोडो। मैं
उससे बहुत डरती हूँ, यहुत ।'
'हाँ माँ, मैं वायदा करता हूँ कि कोई उपाय सोच निकालेगा।'
'अभी, इसी क्षण | तुम कल्पना नहीं कर सकते कि मैं उससे
कितनी डरती हूँ।
१२८
.
यौवन की भूल
or
पड
ज् सोच-विचार में पड़ गया। भयभीत म का समझाने
के लिए उसे बडी देर तक बहस करनी पड़ी।
माँ कहती रही-अच्छा, तुम आज मुझे अपने घर में रहने
दो। कल प्रात काल रोलेन्ड से कहलवा भेजना कि बीमार
गई थी।
'तुम्हारा कहना ठीक है, पर पिएर अभी तुम्हें छोड कर
गया है। उठो, साहम करो। मै वायदा करता हूँ कि कल
तक कोई उपाय सोच निकालूंगा। में कल नौ बजे तुम्हारे पास
हूँगा। लो, हैट पहनो, चलो तुम्हे घर तक पहुँचा आऊँ।'
'अच्छा, जैसा कहो
और उसने उठने का प्रयत्न किया, पर उठन सकी। इस
भीपण आघात ने उसे नितान्त अशक्त कर दिया था।
तब ज्यों ने उसे ताकत की दवा पिलाई। और फिर सहारा
देकर बाहर ले चला।
घटा-घर ने टन टन टन तीन बजाये।
घर पहुँचते ही लूमी ने शीनता से कपड़े उतार और पिछौने
में घुस रही। रोलेन्ड नाक वजा रहा था। घर-भर में केवल
पिएर जाग रहा था।
मॉ को सडक तक पहुँचाकर जव ज्याँ घर लौटा, तो वह
निर्जीव-सा सोफे पर गिर पड़ा। पिएर की भयकर आकृति
विपाद और वेदना से कुचले हृदय के उस उग्र रूप ने जैसे उसकी
रक्त-चमनियो की सारी उष्णता सींच ली थी। उसे अपना
अग-अग टूटता प्रतीत हुआ। उठकर बिछौने तक जाना तो
दूर, अँगुली तक हिलाने की शक्ति उसमें न रह गई थी। पिएर
के विपरीत, उसे माँ पर किंचित मान भी कोध न आ रहा था ।
वह इस घटना को एक होनहार कह कर, मन से टाल देना चाहता था।
आन्दोलित जल के सदृश उसका मन कुछ देर पश्चात्
शान्त हो गया । तब उसने सारी परिस्थितियो पर एक दृष्टिपात
किया । वसीयत के सम्बन्ध का रहस्य, यदि उसे और किसी
अवसर पर ज्ञात होता, तो सम्भवत उसके हृदय पर साघातिक
चोट लगती, वह अपनी माँ से शायद घृणा करने लगता ,
पर ईर्ष्या और अन्तर्वेदना से उफनाते भाई के हृदय की उगली हुई
१३०
योगन की भूल
इन बातों ने जैसे उसके मन में उठने वाली सारी भावनाओं को
जला कर रास कर दिया था। वह विचार-शून्य हो गया था।
जिस समय सज्ञा लौटी भी, तो उसके पित हृदय में माँ के
प्रति ममता का स्रोत उमड रहा था, जिसके प्रवाह ने माँ के व्यभि-
चार का हाल ज्ञात होने पर एक आदर्शवादी पुत्र के मन में उठने
वाली भावनाओ को धोकर, उनका अस्तित्व ही मिटा दिया।
शान्ति का पुजारी उपाँ, अपने हदय के विद्रोह के डर से अव
इन वीती बातों को मन में दुहराना तक नहीं चाहता था।
कायर हदय को वस अब एक उपाय नजर आता था , वर्तमान
धन को काट कर, यह घटना अधकार में ढकेल दी जाय। वह
पिएर से अधिक झगडा मोल लेने में हिचकता था। खैर, उसके
पास तो अन अलग घर है, पर माँ का क्या प्रवन्ध किया जाय ।
उसने न मालम कितनी स्कीम सोची, पर उनमें से एक भी
उसे सन्तोप न दे सकी।
सहसा एक भावना उसके हृदय में हरहरा उठी-यह धन जो
उसे आकस्मिक मिला है, कोई योग्य-पुरुप स्वीकार करेगा अथवा
नहीं ? नहीं।-उसकी अन्तरात्मा ने उत्तर दिया और उसने उसे
गरीबो की सहायतार्थ दान कर देने का निश्चय कर लिया। वह इन
मव बहुमूल्य चीजो को बेच कर, कठिन परिश्रम से अपना पेट
भरेगा । इस विचार ने उसके हृदय को अझकोर डाला। वह इतना
विचलित हो उठा कि सिडकी के निकट जाकर शीतल पवन से
१३१
यौवन की भूल
अपने को ताजा करने की आवश्यकता उसे अनुभव हुई। सिडकी
के सहारे सडा हो, वह मोमबत्ती की कॉपती लौ को देसने लगा।
वह गरीब था, और फिर गरीब हो जायगा । तो इसमे डरने की
कौन बात?
सडक पर एक दुबली-पतली रमणी को जाते
देस, सहसा उसे मैडम रोजमिली का सयाल आ गया। कल्पनाओ
के उस सुन्दर प्रासाद को चूर-चूर होते देस, उसे दुख हुआ।
उसे एक नवीन जीवन धारण करना होगा। विवाह का स्वप्न
त्याग देना पडेगा , पर उस युवती से हाँ कह कर, क्या अब ऐसा
करना उचित होगा? यह जानकर कि वह अमीर है, मैडम
रोजमिली ने सहर्ष प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। अब वह उस
निर्धन को स्वीकार करने में हिचकेगी, पर क्या उसकी लालसाओ
की हत्या करना उचित है ? अन्छा, अगर अभी धन कोस्वीकार कर
लू,और फिर भविष्य मे उसे गरीयोकी सहायतार्थ दान कर दूं तो ?
और उसके हृदय-मन्दिर में, जहाँ स्वार्थ, न्याय का जामा पहने
तर्क-वितर्क कर रहा था, कितने ही विचार आये।
वह फिर सोफे पर आ बैठा। वह अपनी अन्तरात्मा की 'नहीं'
को समझाने के लिए कोई उत्तर सोच रहा था । न मालूम कितनी
वार उसने स्वगत यह कहा-चूँकि मै इस बातको स्वीकार
करता हूँ, कि मैं मैरीकल का पुत्र हूँ, तो फिर उसकी वसीयत
स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं, पर यह उत्तर उसकी आत्मा को
सतोप न दे सका।
१३०
योवन की भूज
फिर विचार आया-चूंकि मैं उम पुरुष का पुत्र नहीं है,
जिम मैं अर तक अपना पिता समझता था, इसलिए मुझे उसका
एक पैना न रेना चाहिए, न उसके जीवनकाल में, न उसकी
मृत्यु के उपरान्त । उसका सब धन पिएर को ही मिलना चाहिए।
और इम विचार ने उसे कुछ सान्त्वना दी । जब वह रोलेन्ड
के धन का कोई भाग न लेगा, तो यह मैरीक्ल की वसीयत स्वीकार
करने को बाध्य है । वह दोनो को तो अस्वीकार नहीं कर सकता,
ग्यो कि ऐसा करके वह दर-दर का भिसारी तो बनेगा नहीं।
यह विपम समम्या हल करके वह फिर पिएर को फुटुम्ब से
अलग करने का कोई उपाय सोचने लगा। सहसा दूर से आती
न्टीमर की सीटी ने उसके मन में एक नवीन आयोजना जागृत कर
दी। वह अपनी स्कीम पर प्रसन्नता से उछल पड़ा।
तब वह पलग पर जा लेटा । प्रात काल ऑसें खुलते ही
नौकरानी को घर के दा चार काम बताकर, वह पुराने मकान गया।
माँसकी प्रतीक्षा कर रही थी।
'तुम्हारे पिना में कमरे के बाहर निकलने का साहस न
करती।'-उसने कहा।
मिनट-भर पश्चात सीढियों पर रोलेन्ड की आवाज सुनाई
पडी है क्या, आज घर में साने को नहीं है ?
कोई उत्तर न मिलने पर वह फिर चिल्ला उठा-जोसिफिन ।
कहाँ मर गई।
१३३
यौवन की भून
नीचे से एक कोमल-स्वर में उत्तर आया-हाँ, मानशोयर,
कहिए क्या बात है?
'तुम्हारी मालकिन कहाँ हैं "
'ऊपर अपने कमरे मे | मानगोयर जपा भी वहीं हैं।'
तब ऊपर कमरे की ओर देखता हुआ वह चिल्लाया-लूसी ।
मैडम रोलेन्ड ने द्वार सोल, सिर वाहर निकाल कर कहा-
क्या है प्रियतम।
'उहँ, गोली मारो | क्या आज घर में कुछ साने को नहीं ?
'ठहरो प्रियतम, मैं आती हूँ।
और वह नीचे गई। ज्एाँ भी उसके पीछे-पीछे पहुंचा। उसे
देखते ही रोलेन्ड ने साश्चर्य कहा-अरे, तुम आ गये | यह घर
छोडने का मन नहीं चाहता, क्यो ?
नहीं पिताजी, आज माँ से कुछ आवश्यक बातें करनी थी।"
'जब ज्ण को अपने हाथों में वात्सल्य प्रेम से पुलकित पिता के
हाथों का अनुभव हुआ, तो वह काँप-सा उठा। ओह, यह
उसका पिता नहीं है । इन लोगों से सम्बन्ध विच्छेद
करना होगा।
मैडम रोलेन्ड ने कहा-पिएर अभी तक नहीं आया ?
पिता ने कधे सिकोडते हुए कहा-वह हमेशा देर से
आता है। कोई हर्ज नहीं, अगर हम उसके बिना जल-पान
आरम्भ कर दें।
१३४
,
यौवन की भूल
बुला
तय माँ ने ज्यों से कहा-बेटे, जरा कष्ट तो होगा, उसे
लाओ । हम उसकी प्रतीक्षा न करके, उसकी कोमल भावनाओं
पर प्रहार करते हैं।
'अच्छा, बुलाये लाता हूँ।"
और वह सचित-सा चला गया, मानो कोई आदमी द्वन्द के
लिए जा रहा हो और डर रहा हो। उसके द्वार पर हाथ रखते
ही, पिएर का उत्तर आया-अन्दर आइए
वह भीतर गया। मेज पर झुका हुआ, पिएर कुछ लिख रहा
था। गुडमानिंग -ज्यों ने कहा।
पिएर ने उठते हुए उत्तर दिया-गुडमार्निङ्ग । और दोनो
में कर-मर्दन हुआ।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
'क्या आप जल-पान करने चलेंगे?
'देसते हो, मुझे अभी कितना काम करना है 1-पिएर ने
शान्त स्वर मे सरलता से उत्तर दिया ।
'वहाँ, सब लोग आपकी प्रतीक्षा में हैं।"
'अन्छा। माँ भी हैं "
'हाँ, उन्होंने ही तो आपको बुलाने के लिए मुझे भेजा है ।'
'अच्छा, तब
मैं
चलता हूँ।
भोजनालय के द्वार पर पहुँचकर पहले तो वह हिचकिचाया,
परन्तु फिर वह अन्दर चला गया। गोलाकार मेज के आमने-
१३५
ין
यौवन की भूल
के पास गया,
,
सामने श्रीमती और श्रीयुत रोलेन्ड बैठे थे। वह सीधा माँ
और सदा की भाँति उसके सन्मुख मस्तक नवा
दिया। माँ के ओठों को मस्तक के निकट आने का तो अनुभव
हुआ, पर सम्भवत उन्होंने उसे स्पर्श न किया। जब वह कुर्सी
पर बैठा, तो उसका हृदय धडक रहा था। उसे आश्चर्य था कि
क्या बात हुई, जो यह लोग इतने शान्त हैं।
ज्य बडे प्रेम से उसे माँ अथवा अच्छी माँ कह कर सम्बोधन
कर रहा था। माँ का गिलास खाली होते ही, वह बडी तत्परता से
फिर मदिरा से भर देता, उसकी थाली में कोई चीज घट जाती,
तो उसी क्षण सरका कर रस देता। उसके प्रत्येक व्यवहार में
अनुराग झलक रहा था।
तव पिएर ने सोचा कि सम्भवत कल इन दोनों ने रो-रो कर
अपने दिल की व्यथा धो डाली है, पर वह उनकी मनोभावनाओ
को अच्छी तरह समझ न पाया । जप माँ को अपराधी समझता
है, या उसे ?
और फिर अपने उग्र हो उठने पर उसे पश्चाताप हुआ । उसका
गला भर आया। उसमे कुछ साया न गया। वह चुपचाप
,
बैठा रहा।
घर से भाग जाने की इच्छा, उसके अन्दर उत्तरोत्तर प्रबल हो
रही थी। इस घर में अब उमे शान्ति नहीं मिल सकती। उसके
कारण उन लोगों को दुस होगा, और उसे उन लोगों के कारण ।
योपन की भूल
ज्याँ पिता से बातें कर रहा था। पहले तो पिएर ने उस पर
कोई ध्यान न दिया, पर जब उसने ज्यों को किसी बात पर जोर
दे-दे कर कहते सुना, तो उसका ध्यान उधर आकर्पित हुआ।
ज्रों कह रहा था इस साल के बने जहाजों में सबसे सुन्दर
वही है। अगले महीने वह समुद्र पर निकलेगा।
गेलेन्ड आश्चर्य से घोला-अन्छा । मैं समझता था कि वह
जलयान गर्मियों के पहले कभी नहीं तैयार हो सकता ।
'कम्पनी वालों ने बहुत शीघ्रता से काम बनवाया, आज मैं
उसके एक डाइरेक्टर से मिला था।
'अच्छा, किसमे
'मानगोयर मारकेन्ड से । वह चेयरमैन का मित्र है।'
'ओह, तुम उसे जानते हो?'
'हाँ मैंने आज उससे
गेलेन्ड वीच ही में बोल पडा-तव तो मुझे उससे एक पास
दिलवाओ। मैं उस पर घूमने जाया करूँगा।
'अन्छा, यह कोई वडी बात नहीं।'
और तब साहस कर, उसने अपनी स्कीम प्रकट की।
विषय तक पहुँचने के लिए, भूमिका बाँधते हुए उसने
इस प्रकार कहा जहाजों पर बड़े आनन्द से दिन कटते
हैं। जिन्दगी तो वस समुद्र पर की कटती है, पर वहाँ भी
चडी विभिन्नता रहती है। हजारों प्रकार के यात्रियों से भेट
१
यौवन की भूल
होती है। एक-से-एक सुन्दरियाँ देखने में आती हैं। फिर
रुपये का सारा खेल है। वहाँ केवल कैप्टन को लगभग
पच्चीस हजार फ्रांक प्रति वर्प मिलते हैं।
रोलेन्ड प्रसन्नता से उछल पड़ा।
ज्यों कहता गया-सजाची को लगभग दस हजार मिलते
हैं, और डाक्टर को पाच हजार । यह पाँच हजार तो समझिए
जेव-सर्च के लिए मिलते हैं, नौकर, घर, साना, सब कुछ
फ्री रहता है।
पिएर ने ऑसें उठा कर भाई को देखा। वह उसका आशय
समझ गया था। क्षण-भर पश्चात् हिचकिचाते हुए उसने कहा-
पर वहाँ डाक्टर बन कर जाना सरल नहीं है।
'है भी, और नहीं भी । यह सब तो सिफारिश पर
निर्भर है।'
पिएर नतमस्तक होकर कुछ मोचने लगा। अगर वहाँ उसकी
पहुँच हो सके, तो क्या अच्छा हो । वह फिर स्वतंत्र हो जायेगा।
तब वह माता पिता पर निर्भर न रहेगा। दो ही दिन पहले
उसे अपनी घडी बेचनी पडी थी, इस कारण कि उसके जेब
सर्च को एक पैसा भी न था ।
कुछ देर पश्चात् हिचकिचाते हुए उसने कहा-अगर मुझे वहाँ
जगह मिल जाय, तो मैं बडा प्रसन्न हूँगा।
रौलेन्ड ने कहा-और तुम्हारी पुरानी स्कीम का क्या हुआ ?
१३८
यौवन की भूल
पिएर ने धीमे स्वर में उत्तर दिया-मानव-जीवन में कितनी
बार आशाएँ बँधती हैं, और विसर जाती है। यह कार्य बहुत
मरल और बिना किसी झझट का प्रतीत होता है।
रोलेन्ड के दिल में बात जम गई।
'कहते तो ठीक हो । लूसी, तुम्हारा क्या विचार
है?-उमने कहा।
उसने क्षीण स्वर में उत्तर दिया-पिएर का कहना ठीक है।
तर ज्याँ ने कहा-देसो, मैं मानशोयर मारकेन्ड से
सिफारिस के लिए कहूँगा।
पिएर ने कहा-मैं भी अपने कालेज के प्रोफेसरो से
सिफारिश करवाऊँगा। अगर मारकेन्ड ने सहयोग दिया, तो
आशा है, मफलता अवश्य मिलेगी।
'मेरा भी ऐसा ही विश्वाम है।'-जप ने कहा।
पिएर उसी समय अपने प्रोफेमरो को पत्र लिसने के लिए
अपने कमरे में चला गया।
तब ज्यों ने माँ से पूछा- अच्छा माँ, अब तुम क्या करोगी?
'कुछ नहीं, मैं नहीं जानती कि क्या करूँ "
'अच्छा, आओ, मैडम रोजमिली के घर चलें।"
जन वह दोनों सड़क पर आ गये, तो ज्यों उसे सहारा दे
चला। कुछ देर चुप रहने के पश्चात जा ने कहा-
देसो, पिएर तो जाने के लिए प्रसन्नता से राजी हो गया।
१३९
कर
यौवन की भूल
माँ धीमें स्वर मे वडवडाई-अभागा लडका ।
पॉ ने कहा-वह अभागा क्यों? जहाज पर मौज से रहेगा।
'नही, मैं कुछ और सोच रही थी ।'-माँ ने कहा।
और क्षण-भर विचार-धारा में बहते हुए, उसने फिर
व्यथित स्वर में कहा--आह । जीवन मे क्या है ? अगर भाग्यवश
सुख मिला भी, तो फिर पीछे उसके लिए पश्चात्ताप करना
पड़ता है।
ज्यों ने धीमे स्वर मे कहा-शान्त हो माँ।
'अच्छा' कह कर माँ चुप हो गई। वह अब अपने पतन
का कारण रोलेन्ड को समझ रही थी। अगर वह इतना
शुष्क न होता, तो मैं क्यों मैरीकल की ओर आकृष्ट होती -एक
लडका जहाज पर जिन्दगी बसर करेगा, और एक
उसकी आँखों में व्यथा के अश्रुकण
चमकने लगे।
ज्याँ भी विचारो मे निमग्न था। मनुष्य क्या सोचता और
क्या होता है। एक मिनट मे जीवन क्या से क्या हो गया।
उसे न अपनी माँ पर क्रोध था, न पिता पर । वह अब पिएर
को सहानुभूति की दृष्टि से देस रहा था। उसकी दारुण दशा
का अवलोकन करके उसके मन में दया उपज रही थी।
मैडम रोजमिली का मकान सडक पर ही था। उन दोनों को
आते देस, वह उनका स्वागत करने के लिए द्वार तक दौडी
आई। उसने अतिथियो को अपने ड्राइग रूम में दाखिल किया।
१४०
यौवन की भूल . ड्राइंगरूम फूलदार कागज तथा स्प्रिंगदार कुर्सियो से सजा था। दीवार पर समुद्र-मम्बन्धी तस्वीरे टॅगी थी। एक तम- वीर में मल्लाह की पत्नी समुद्र के किनारे सडी, नौका-आरूढ पति से विदा ले रही है। दूसरी तसवीर में, वह नौका क्षितिज के निकट पहुँच गई है, और पत्नी घुटनो के बल अपने पति के मगल की कामना कर रही है। तीसरी तसवीर मे, एक सुन्दर रमणी सजल नयनो से, घाट से दूर होते हुए जहाज को देख रही थी। ऐसा प्रतीत होता था कि उसके मुँह से एक हृदय विदारक चीख निकलने को है, पर वह चीस गले तक आते-आते रुक गई है। वह किमके लिए व्याकुल हो रही है ? चौथी तस्वीर में वह रमणी अपने घर की खिडकी पर बैठी समुद्र की ओर देख रही है। चिल्कुल पापाण-प्रतिमा प्रतीत होती है। शरीर निश्चल, ऑमें क्षितिज के निकट दिसाई पडते जहाज मे बँधी । पैरों के पास एक खुला पत्र पडा है । ओह किस निराशा ने उसकी यह दशा की है ? आगन्तुक इन चारो तस्वीरो को देखकर, करुणा मे ओत प्रोत हो जाते थे । तस्वीरें इतनी सुन्दर छपी थीं कि वे सजीव प्रतीत होती थीं। कुर्सियाँ भी इस प्रकार रसी थीं कि वे तसवीरें सामने दिखाई पड़ें। मैडम रोलेन्ड ने कुर्सी का रुस बदल कर उधर पीट कर ली। आज तुम प्रातकाल आई नहीं ? उसने मैडम .
यौवन को भूल
'सच पूछो, तो बहुत यकी हूँ।'
और उसने कल की आनन्द-यात्रा के लिए माँ तथा जा
को धन्यवाद दिया।
'मेरी इच्छा है, कि एक बार फिर ऐसे ही कहीं चला जाय
उसने अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए कहा।
ज्य ने कहा-पर अवकी मैं तो जाऊँगा नहीं ।
'क्यों ?'-मैडम रोजमिली ने पूछा।
'बेकार जा कर क्या करूँ? तवको तो एक पत्नी के
चोहनी हो गई। पर अवको. '
और उसकी हँसती आँग्ने, मैडम रोजमिली के मुख
भावो को पढ़ने का प्रयत्न करने लगी।
वह लज्जा से लाल हो गई थी। उसकी आँखें प्रसन्नता से
मुस्करा रही थीं।
क्षण-भर पश्चात् परों ने मुस्काराते हुए कहा हाँ, तो
हम लोग यह पूछने के लिए आये हैं कि विवाह की तिथि कच
निश्चित् की जाय'
'जब आप लोग उचित समझे । माँ से पूछो।"
मैडम रोलेन्ड के मुख पर एक फीकी हँसी दौड गई ।
'मैं। मैं कुछ नहीं कह सकती। मैं हृदय से तुम्हारी
आभारी हूँ। तुम मेरे ज्यों का जीवन सुखद बनाओगी।'
मैडम रोजमिली ने उठ कर पुलकित मन से माँ के मुस
१४२
यौवन की भूल पर एक चुम्बन अकित करके अपनी प्रसन्नता प्रकट की। मैडम रोलेन्ड के हृदय में वात्सल्य-प्रेम का आविर्भाव हो रहा था। एक जवान लड़के को सो कर, अब उमने यह एक जवान लडकी पाई थी। फिर, घडी देर तक विवाह के निषय मे वातचीत होती रही। मैडम रोजमिली ने कहा- आप लोगों ने फादर रोलेन्ड से तो अनुमति ले ही ली होगी। माँ-बेटे दोनो लजा-से गये। माँ ने कहा-नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं। और तव हिचकिचाते हुए उसने फिर कहा- हम लोग कोई काम उनसे पूछ कर नहीं करते। जव समय आता है, तो कह भर देते हैं कि यह काम करने जा रहे हैं। मैडम रोजमिली को कोई आश्चर्य न हुआ । वह मुस्कराती रही। जब वे दोनों लौटने लगे, तो मार्ग मे मैडम रोलेन्ड ने कहा- अच्छा, अगर मैं तुम्हारे मकान चलूँ तव ? वहाँ कुछ देर आराम करेगी। वह अपने को घर-विहीन समझती थी। अपना घर जैसे उसे काटे साता था। उसके घर जाकर माँ ने आराम क्यिा। वह घर के भिन्न- भिन्न कामों में अपना मन बहलाती रही। १४३ .
ह
-
एक दिन प्रात काल जोसिफिन के दिये हुए पत्र-द्वारा पिएर
को अपनी सफलता के समाचार मिले। जैसे कोई मृत्यु का कैदी
अपने छूटने का समाचार पाता है, वैसे ही पिएर ने एक संतोष की
साँस ली। पिता के घर में अव उसे अपनेपन का लेश-मात्र
भी बोध न होता था। किसी अजनवी की भाँति वह घर में आता,
भोजन करता , और दिन-भर अपने कमरे में पड़ा रहता।
रहस्योद्घाटन के पश्चात् से जैसे उसका हृदय टूट गया था।
घर मे किसी से बात करते समय उसे झुझलाहट होती थी। वह
अब उन लोगों से अपना सम्बन्ध बिल्कुल तोड देना चाहता
था। हर समय उसके हृदय में यह विचार उठते-माने ।
से क्या कहा-अपने अपराध को स्वीकर किया या नहीं ? जाँ
क्या सोचता है ? और जब वह इन प्रश्नों का उत्तर न पाता,
तो वह उद्वेलित हो उठता।
घरवालों को जब उसकी सफलता का समाचार ज्ञात
१४४
१०
यौवन की भूल
हुआ तो वे फूले न समाये। रोलेन्ड ने पीठ ठोककर उसे
शानाशी दी। ज ने कहा-बधाई मेरे अच्छे भाई । मै जानता
हूँ कि इस सफलता का श्रेय तुम्हारे प्रोफेसर को है जिन्होंने
तुम्हारी सिफारिश की।
नत मस्तक मा ने कहा- मुझे असीम प्रसन्नता हुई।
सामुद्रिक जीवन का हाल-चाल मालूम करने के लिए पिएर
जलपान के पश्चात् अपने एक डाक्टर मित्र से मिलने गया।
वह भी एक जहाज मे नौकर था और आज ही हावेर आया था।
जहाज के नीचे के भाग वाले एक कमरे में बैठकर दोनो मित्रों
ने बड़ी देर तक गपशप लडाई। ऊपर से आती कुलियों तथा
यानियो की धमचख की ध्वनि से मिश्रित मैशीन की सडासड
वडी कर्कश एव अप्रिय लगती थी।
जब पिएर वहाँ से लौटा तो, उसके ऊपर उदासी छाई थी।
चारों ओर फैल घने कोहरे में निहित किसी अपवित्र आत्मा ने
जैसे उसके स्वच्छ हृदय पर अपनी कलुपित छाया डाल दी।
वह पहले से भी अधिक दुस का अनुभव कर रहा था।
हृदय में वर्षों से पले स्नेह के भावो को जड-मूल से नष्ट कर
देना उसने एक सरल कार्य समझा था, पर अब यह कार्य
अत्यन्त दुसह प्रतीत होता था। अब कोई उमका अपना न
होगा। उसे अकेले जीवन-सग्राम में कूदना होगा। अब तक
तो हृदय मे यह भावना थी कि सुख-दुःस में सहानुभूति करने
१ एक दिन प्रात काल जोसिफिन के दिये हुए पत्र-द्वारा पिएर को अपनी सफलता के समाचार मिले। जैसे कोई मृत्यु का कैदी अपने छूटने का समाचार पाता है, वैसे ही पिएर ने एक संतोष की साँस ली। पिता के घर में अब उसे अपनेपन का लेशमात्र भी बोध न होता था। किसी अजनबी की भाँति वह घर में आता, भोजन करता , और दिन-भर अपने कमरे में पड़ा रहता। रहस्योद्घाटन के पश्चात् से जैसे उसका हृदय टूट गया था। घर मे किसी से बात करते समय उसे झुंझलाहट होती थी। वह अब उन लोगो से अपना सम्बन्ध बिल्कुल तोड देना चाहता था। हर समय उसके हृदय में यह विचार उठते-माने जा से क्या कहा-अपने अपराध को स्वीकर किया या नहीं ? जाँ क्या सोचता है ? और जब वह इन प्रश्नो का उत्तर न पाता, तो वह उद्वेलित हो उठता। घरवालो को जब उसकी सफलता का समाचार ज्ञात
१०
योगन की भूल
हुआ तो वे फूले न समाये। रोलेन्ड ने पीठ ठोककर उसे
शाबाशी दी । जाँ ने कहा-बधाई मेरे अच्छे भाई । मै जानता
हूँ कि इस सफलता का श्रेय तुम्हारे प्रोफेसर को है जिन्होंने
तुम्हारी सिफारिश की।
नत मस्तक माँ ने कहा-मुझे असीम प्रसन्नता हुई।
सामुद्रिक जीवन का हाल-चाल मालूम करने के लिए पिएर
जलपान के पश्चात् अपने एक डाक्टर मित्र से मिलने गया।
वह भी एक जहाज मे नौकर था और आज ही हावेर आया था।
जहाज के नीचे के भाग वाले एक कमरे में बैठकर दोनो मित्रों
ने बडी देर तक गपशप लडाई। ऊपर से आती कुलियो तथा
यात्रियों की बमचस की ध्वनि से मिश्रित मैशीन की सडासड
बडी कर्कश एव अप्रिय लगती थी।
जव पिएर वहाँ से लौटा तो, उसके ऊपर उदासी छाई थी।
चारों ओर फैले घने कोहरे में निहित किसी अपवित्र आत्मा ने
जैसे उसके स्वच्छ हृदय पर अपनी कलुपित छाया डाल दी।
वह पहले से भी अधिक दुःस का अनुभव कर रहा था।
हृदय में वर्षों से पले स्नेह के भावो को जड-मूल से नष्ट कर
देना उसने एक सरल कार्य समझा था, पर अब यह कार्य
अत्यन्त दुमह प्रतीत होता था। अब कोई उसका अपना न
होगा। उसे अकेले जीवन-सग्राम मे कूदना होगा।
तो हृदय में यह भावना थी कि सुस-दुस में सहानुभूति करने
१४५
अब तक
गोपन की भूल
पाला मेरा भी कोई है, पर अब इस भावना को बला करने के
लिए भी कोई जगह नहीं। वह घर वालों को चाहे जितना
अजनवी समझे, पर उन लोगों के हृदय में उसके प्रति प्रेम है।
पर, अब तो मचमुच उसके लिए सब अजनवी होगें। उसका जीवन
अप कितना संकुचित हो जायगा! घर की यह आजादी
छिन जायगी । अब वह अपनी इच्छानुसार कोई कार्य
नहीं कर सकता । यस दिन-रात जहाज के गर्त में पडे
रहो। ज्यादा तवियत घबडाये, तो डेक पर चले जाओ ।
इसके सिवाय घूमने-फिरने के लिए कोई स्थान नहीं। कैबिन,
डेक । कैविन, डेक । ओह, उसका जीवन एक कैदी से भी
भयकर होगा।
इन्हीं व्यथित भावनाओं में डूबा हुआ वह यात्रा को जा रहा
था। मार्ग में आते-जाते पथिकों को देसकर अब उसके दिल में
घृणा के भाव न उपजते, बल्कि वह उनसे बातचीत करके अपने
को हलका करना चाहता था । वह सब से कहना चाहता था-ए
पथिको, मानवता के नाते हम सब भाई-भाई हैं। हमें चाहिए कि
हम एक दूसरे के दुख-दर्द में शरीक हों, आपस में सहानुभूति
दिसलायें, आदि, आदि। पर, जैसे कोई नया भिसारी किसी के
सामने हाथ फैलाते झिझके, वैसे ही उसकी यह भावनाएँ उसी के
अन्दर उबल रही थीं, निकलती न थी।
पिएर को मारोवसको की याद आई। वह विचित्र मनुष्य
१४६
यौवन की भूल
सदा से उसके प्रति आत्मीयता प्रकट करता आया है। वह
उसकी दुकान की ओर चल पड़ा।
मेज के निकट पड़ा मारोग्सको कोई दवा कूट रहा था।
पिएर को देसते ही उसने काम छोड दिया।
तपाक से उससे
हाथ मिलाते हुए उसने कहा-कहो, तुम तो अब दिखलाई
ही नहीं पडते?
पिर ने यताया कि आज-कल उसे विकट परिस्थितियों का
सामना करना पड़ रहा है। फिर वह पूछ बैठा हो, यह तो
यताओ, आज-कल तुम्हारे रोजगार का क्या हाल है।
'रोजगार की दशा अन्छी नहीं। बाजार मे कितने ही प्रति-
द्वन्द्वी हैं। इसी कारण अब मुनाफा भी नाम मात्र को लेना
पडता है। डाक्टरों को जब तक कमीशन न दो, कोई दवाई
का परचा आता ही नहीं। अगर दो-तीन महीने यही हालत
रही, तो मैं दुकान वगैरह बन्द कर दूंगा।'-उसने अपना
कथन इस प्रकार समाप्त किया।
पिएर को दुस हुआ। समवेदना प्रकट करते हुए उसने
कहा-अन मैं भी तुम्हारी कोई सहायता न कर सकूँगा।
मारोवसको इतना उद्वेलित हो उठा कि उसने अपनी ऐनक
उतार कर उसके मुस को देखते हुए व्यथित स्वर मे कहा-तुम
भी नहीं। यह क्या कहते हो?
'मित्र, मित्र, मैं इस नगर से जा रहा हूँ।'
१४७
यौवन की भूल
पिएर ने मुस्करा कर कहा-इसी प्रकार मित्रों का स्वागत
किया जाता है?
तब युवती ने उसकी ओर एक बार देखा ।
'अरे, आप हैं। मैंने देसा नहीं। कहिए, सव कुशल.
मगल। आज एक मिनट की छुट्टी नहीं है। आपके लिए एक
पेग लाऊँ ?'-उसने जल्दी में कहा ।
'हाँ, एक पेग ।।
जब वह मदिरा का गिलास ले आई, तो पिएर ने कहा-मैं
तुमसे विदा माँगने आया हूँ। मैं बाहर जा रहा हूँ ।
'सच | कहाँ जा रहे हो?'
उसके स्वर मे किंचित्-मात्र भी स्नेह न था।
पिएर ने उत्तर दिया-अमरीका।
'सुनती हूँ, बडा सुन्दर देश है।'
और उसी समय एक दूसरे ग्राहक ने उसे बुलाया। वह
उधर चली गई। वह बेकार यहाँ आया।
पिएर पश्चात्ताप को लिये काफे के बाहर आया। थोडी देर
इधर-उधर भटकने के पश्चात् वह घर गया ।
सन्ध्या-समय, बिना उसकी ओर देखे माँ ने कहा-मैंने
अपनी समझ के अनुसार तो तुम्हारी सुविधा के लिए सब चीज
जुटा दी है। कोई चीज रह गई हो, तो बता देना।
'नहीं, सब ठीक है।'-पिएर ने धीमे स्वर में उत्तर दिया।
यौवन की भूल
और इसके बाद कई दिनो तक पिएर घर में किसी से अधिक
नहीं बोला-चाला । कोई उससे घोलता भी, तो वह इस तरह
खोज कर उत्तर देता कि बोलने वाला क्षुब्ध हो जाता, परन्तु
जिस दिन वह घर से विदा लेने को या, उसका व्यवहार एक दम
बदल गया। वह सब से हँस-हँस कर वोला।
मैडम रोजमिली तथा कैप्टन व्यूसायर उससे मिलने आये।
खूब हंसी-मज़ाक हुआ। सब लोग उसे जहाज तक पहुँचाने
गये। मैडम रोलैन्ड काली पोशाक पहने थीं, जैसे किसी की
मातमपुर्सी में जा रही हो।
पोर्ट पर असरय भीड थी। नगेनगे बच्चों को गोद मे लिये
गरीवी से अशक्त अनेकों चेहरे दिसाई पड़े। वे अभागिनी
स्त्रियाँ विदेश जा रही थीं, जीविकोपार्जन के लिए। कई पुरुप
तो ऐसे गदे थे कि उन्हें देख कर घृणा उत्पन्न होती थी।
पिएर ने अपने सह-कर्मचारियों से परिचय करके उनसे हाथ
मिलाया। फिर वह सब को अपना कैविन दिसाने चला।
चारों ओर दीवारों से घिरा कमरा था, जिसमें केवल एक
दरवाजा था।
एक ओर रखी आल्मारी में दवाइयों की
शीशियों चुनी थी।
फिर वे लोग जहाज के अन्य भागो को देसने गये।
सहसा न्यूसायर ने घडी देखते हुए कहा हम लोगों को
चलना चाहिए। जहाज के छूटने का समय हो गया।
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