Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Tuti Ikaiya

Devda,sharad · 2010/12

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टूटती इकाइयां
भिन्नु महा ई वे ईमती दुई मां भोर हरल का भोर चौड़ी
बाती और गर्म-गर्म मोठे हार जो इस चिर-भूवी नारी-देह
की आदिम भाग को शान्त रें। हर वह नन्हा शिरा
बो
मातृत्व को प्यासी इस देह को मुखो छातियों को मीठे
दूध म मर कर । पीन पयोषरों में बदल दे।
यो, कहा है तू, मरे भरप, भगोचर पुरुष !
भो कहा है तू मरे मन मे गिय ॥
मुझे रम समय फिर सगता है कि तुम्हें पहचान नहीं पारहा
या तुम्हारे जिसम्म को पहचानता रहा हवा यह
नहीं इस समय तुम तुम नहीं रो, लगता है,
हजारो वर्ष आयु की एक बुदिया हजार कोस पैदल चलन
के कारण पक चुसौ है, और भव अपनी मजिल के
श्राम्रीि पड़ाव की मोर गहाती चलो मारही है।
-पुरुष
भब मुझे महसूस रहा था कि हम दोनों के बीच केवल
एक देह का सम्बन्ध-मूत्र था रठी ने अब तक हम दोनों
को एक साथ जोड़ रखा था अब वह सूत्र टूट चुका था,
और कि हमें एक साथ ओड़नेवाला और कोई सूत्र
नही था इसलिए अब हम दोनों अपने-अपने दायरे में
सिमटे अपना भन्दग मजग दिशा में बहन रंगे थे।
-पत्नी

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टूटती इकाइयाँ
[ एक विशिष्ट कथा-प्रयोग ।
शरद देवडा
अपरामकारान
क्लरत्ता'

प्रथमकरण बनी १९८४

I sec
Broadbent : I find the World quite good
mough for me-rather a jolly place, in
fact
Keegan (looking at him with quiet wonder) :
you are satisfied ?
Broadbent : As a reasonable nan yes
no cvils in the World-except of course,
natural cviis-that cannot be remedied
by freedom, self government and English
Institu ions I think so not because I
am an Englishman, but as a matter of
common sense
Keegan : You feel at home in the World
then ?
Broadbent 1 Of course Dont you ?
Keegia (from the very depth of his nature)
No
BERNARD SHAW
(John Ball's other Island, Act IV)

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*** नारी ये पुरष पिस तरह गारी देर स पिल्वाड परते हैं । समची प्रदशनी के अस्मी प्रतिपात में अधिक चित्र नारी से सम्बधित थे जिनम नारो. दह के विविध गा पा विभिन्न कोणा में उभार कर दिखाया गया था। और विपरर वह चिन । उप जब भी उमकी याद स सिहर उठनी हूँ दुही हुई गाय के थना में स्टक्त स्तन कमर के नीचे जरा-जरा पूरा हटिया-मा पेट टोली नीली जायें और उनका ढवे हुए दाहिन हाय पी हये। वह प्रौटा नारी गदन वायी आर मारे इस अराज में सड़ी थी गाया अपनी ही नग्न दह म बचना चाहती हो। लेकिन दावा की निगाह था कि जय चित्रा स हाती हुइ पाखिर उमी पर आर अटक जाती बागेसी से उसका निरीक्षण करती, गीचे से ऊपर तक उसे परसती, और अन्तत हथेली के पास आकर ठहर जाता लेपिन जव उन्ह महमूम होता वि उम एव चित्र के मामने व जारत से ज्यादा दर खडे रह गये हैं और अय दृष्टिया कुतूहल म उही की जार देग रही हैं ता व मजदूरन वहा से हट जात पूर हार पा जल्दी जल्दी चार लगाते और अन्त में फिर वहा था जमन और उनकी ममूची नग्न दह पर उन्ती-मी दप्टि डारवर जाहिर हपली पर पहुंचकर जटक जाते और पुष्पा " नाम पर नारीह का नग्नता का यह प्रदान की भूखी गिगाह' जब म आर्टिस्ट्री हाउस से यह फोटो प्रदानी देखकर लौटी है एक विचार मन में चकार काट रहा है कार, एक ऐमा कमरा हाना जो

१२ टूटती इकाइया
क्वल बाह्य अगा को नहा, कवर आता को नहा, बल्कि आसा के भीतर
छिप भाव का भी पर पाता तो म इस पुरष जाति को तयारथिन
वाप्रियता म छिप ढाग का भण्डा पार देती, और नारी-नेह को देखते
रामय इनरी आँखा में लुरे टिप विभिन भावा का कमरे की आस में
बांध रती फिर उन नग्न आँसा की आटिस्ट्री हाउस में इसी तरह
प्रदानी करती।
*
*
:
*
यात जीवन में "म उतीम माला चौराह पर सडी हापर पलटती हूँ और
गुजर ए जीवन-पथ पर दष्टि हानी हूं ता अना जाटो पापा का
अपनी आर घूरते पाती है
गर्मी की उमम भरी गत और गांव मवान का छत पर बमवर सोपी
हुई म । पचानर यांग पर जाता है ता पटिया र पाग जमान पर घुरना
बयर बटे हुए चवर माइ का अपने उपर पुरे हुए पाती है। आज,
मुप मनगर कवा मार देगती है कि उन औना में पप गिर
मुमतुरता म उम्र 40 प्रति म अनबन जिनामा में
अतिरिक्त और कुछ नग या
गरिन तवम उन आपापकर
मर गचौर उरी था ता आमपामगार चाचा चाचा जाग उदय और
रहान वचार का परी तरह गया। मुदा जानन-गय र ग छार

नारी १३ सै, वे एक जोडी विगार आयें मुझे आज भी अपनी ओर उसी तरह घूरती दिखाई दे रही हैं। गांव से हाइस्कूर पास कर शहर में लडविया के कॉलेज में दाखिला लेने के लिए जव सक्रेटरी से मिलती हूँ ता व जाखा मे म्नेह भर पर मेरी जार देखते हैं और अपने मफेद वाला में अगुलिया से घी करते हुए मुझे अपने पाम बुराते है । मैं निशक्ती हुई उनकी कुर्सी के पास जाती हूँ। वे स्नेह से मेरा पीट पर, मेरे सिर पर हाथ फेरत है और मेरे वाये गाल को पायपार आश्वासन देते है कि मुझे जब भी कोई तालीफ हो, म निमकोच उनमे जाकर बता दिया कहें। यह कहते समय और मरे गाल को थपथपाते समय, क्षण भर के लिए उनकी बूढी आखा में एष घमर आती है-~स्नेह की नही, बुमते अगार का पर मारने पर जसी रपट निक्लनी है वमी चमब और म सहमपर एक पदम पीछे हट जाती हूँ। इमो वाद का दिना तक मुझे लगता रहता है कि नाग की वह पट मरा पीछा कर रही है मये चारा आर मे धूर रही है मुझे झुलमा देना चाहती है और परिणाम यह होता है नि म उसके वाद मेनेटरी कमरे में कभी नही जाती। कॉरन लडक्यिा का है और छात्रावास म भी देवर र इक्यिों ही है, इस- लिए रामय हमी-वशी गुज़रता जाता है । जब कभी कॉग्ज या छात्रावास की दीवारों के बाहर की दुनिया म जाने का अवसर आता है~-मसरन् मिनेमा बाजार या पिकनिक आदि-नो मेरे गाय मेरी हम उम्र रडविया सादर होता है इसलिए हमारी ओर घरती अनेर जोगे आंपा स मुझे वमी पवराहट नही महमूग हाती । मुझे सत्य सगीत और ड्रामा में विशेष रुचि है, इसलिए कॉलेज के याशियोत्सव और अय वायत्रमा में सक्रिय भाग रेता हूँ रफिन ऐस १४ टूटती इकाइयां अबमरा पर म अपने नत्य या सगीत या अभिनय में इस कटर डया रहती है कि मेरा दह क जग अग को भेदती मम्ता जारी निगाहा की तेज धार का भी म मन ही सह जाती हूँ। । छात्रावास में हर कमर म दा रडपिया के रहने की यवस्था है। मरी माथिन म पर यवा मिलन आया करता है। विजिटस आउस समय जय दरवान उमर जान वी सबर दता है मरी माथिन हाथ का उपयाम छत की जोर उछार देती है और सर भी उछरकर राडी हा जाती है । राकी समसा जलमा सहमा गायव हा जाती है और जगभग नाच उरता है । वह जल्दी-जल्दी वाग पर ब्रा परती है चहरे पर पाउडर के पर मारती है और मादी बरवर मये टाटा पहती हुई भागता-सी कमर सनिएर जाती है। कभी-कभी तो वह विजिटम आवस 4 आध पटक भातर हा गट आती है तब उसक हाया म पूग का गुग्दस्ता हाता है गाग पर गुलान और हाठा पर हसी-गुशी दोना बहनें सह नत्य कर रही हाती है। कभी वह दो-तान घट वाद लौटती है तब उसर जून में चमरा व ताजा फला का घेणी हाती है। वह आत ही पग पर घम म वठ जाती है तरिय का छाती में नीच हा म भाचर रट पानी और दर तक मी तरह लटी रहती है। पिर अपन-आप उनानीन घटा की दास्तान मुनाने लगता है कि किस तरह पहल उन्हान विगारिया ममारिया व मामने म पूरा की वणी री फिर ट्रिकाज में बटयर नय दग्दत हुए दिनर पाया। वह तक्यिा गा- में पर नाना हनिया उम पर रग रती है और चहरा हालिया में एकर बिकी व बाहर गय में सपती बताता है जिव परम उसरा मा नहा रगता पाता निकाय छायमा मदगूरत-मा घर बमा । म अन्यमनम-मा मुनती रनी १ जानती हूँ कि नहा भी गुनू और रटा पता र? तब भा वह अपना बात मी तर यही रगी सावि अमर वर मुराग नहीं अपने आपम यह रही होती है।

नारी १५ अचानन मां की गीमारी का तार पाकर वह घर चली जाती है। नाम का दरवान उम युवर वे थाने को सपर देता है। एक बार तो इच्छा हाती है कि दरसान स ही कहरवा दूं, रविन न जाने क्या साचवर म आग्ने के मामने सडी हारर मुद पर एक विद पर दष्टि हारती हैं फिर अपनी ग्राम पमर वाले साटी गाउज निकारती है। तयार होने के बाद पूर पांच मिनट तर आईने गामने पनी स्वय का आगे-पीछे मे दखती रहती हैं, मतुष्टि और सुविधा दी मिरी जुली मुस्थान मेरे होठा पर आ जाती है। "निजिटग स्म' में मुझे महमा अपने सामने पापर वह हटवावर सडा हो जाता है। म बनाती हूँ कि म तो अचानर तार पारर घर चली गयी है। वह पा का गुलदस्ता हाथ म रिये अममजस में पड़ा रहता है और गदन नोची क्यि पडियां नाचता रहता है । एक युवक के सामने मेरे हा का मेरा यह पहा ही अवमर है इसलिए म समय नही पाती वि क्या ।ह कुछ देर की चुप्पी ये वाद मासूम नजरा स मैरी ओर देखना है और विपक्ने हुए रहता है 'मने ता दिकाज में आज शाम के लिए एक मज़ रिज़व करवा ली थी रेपिन, सरता मुक्षम काई उत्तर न पावर वह फिर उसी तरह गदन यकाये पखुड़ियां ताडने गना है। पिर जम साल पर अटकन-अटपते रहता है अगर आपका आज काई साम वायत्रम न हो और आपका आपत्ति हो तो तो यह वाक्य अधूरा छोड देना है और अपराधी की मुद्रा में मेरी और देखता है। मेरे सामने अपनी उन हम-उम्र साथिना की सूरत घूम जाती है जो अक्गर ही गाम को कोई नपाई बहाना बनाकर अपने मिश्रा के साय बाहर जाती हैं और रोटरर रगीन मामा की दास्तान बय छात्रामा को

१६ टटतो इकाइ
रा रे लेकर मुनाती हैं लेकिन साथ ही मुझ एक जनजान पिस्म का भय
भी लगता है । इसा उडवन म म कोई उत्तर नहा द पाती। युवर
समझता है गायट मन उमा प्रस्तान का पुरा मान लिया है दलिया
वह क्षमा मागार जान लगता है। सहमा म निणय पर लेती हूँ।
कहती हूँ आप दो मिनट रविय, म जाती हैं।
डिनर के वा काफी पात रामय वह मज़ पर रखे मर हाथ वा अपनी
होली से दवार मयम डान्म + लिए पूना है। म इन्कारी म सिर
हिलाती ह और हाय हो मे गीच रेनी है।
लौटते समय वह रियान से साथै छात्रावास ही नाता | कार का रेड रोड
की ओर मा देता है और विस्तारिया के बगर से होता हुना लेक्म की
ओर हाइब करा है। रास्त म एक बार जपने बायें हाथ से मरा क्या
दवाकर रदत्य भरी हसो हमाा है रक्नि म तलाल उमना हाय
हटा देती हूँ।
लवर किनार यह गारी को चार धीमी करता है। पहला है ' आपके
साय आन यात अच्छा लगा । आगा है हमारी यह पहली मुलारात ही
अन्तिम मगरात नहीं होगा।
में रहती है रेफ्नि म ता एप नि में लौट आयगी।
वह बिना दुधिया के रहता है म होस्टल नहा आया वगा हम लोग
मिलने के लिा दूसरी जगह तय कर लेंगे।'
मैं समा नहीं पाता आ चय म उसो चहर कोआर देखती हूँ। लग्नि
'' तो वहतो थी बाप दोना जरी ही गादी वरन वार हैं।
-
वह वमिव करता है इस गाम के पह' तर यह बात सच था लगिन
बार बारम किन पर मुझ मगुम हुआ है मि में गनी पर था।
आपने साय गुजारी यह गाम मुप सना या रगी।

-- नारी १७ राहमा उपरी भाग्यो म मुझे आग की वीरपट दिपाइ देती है जो कभी बूढे सदरी की आँसा में दियाइ दी थी। न जाने मेरे भोलर वॉ की घटना आ जाती है । कडाई से कहती हैं, "मुझे होस्टल छाड दीजिय । अभी, इसी ममय ।' वह घबडा लाता है। उनकी आसा पी याग तसा गुना जाता है। वह रिरियार रहता है, 'देसिय, आप नागत हो गयी। मेरा मशा यह नही था। मुझे माफ कर दीजिये।" छानावास के दरवाजे के सामने कार मन ही म पुर्ती म उत्तर जाती हूँ, और रिना बुद्ध वह भीतर चरी जाती हैं। 'टसक वाद ये तीन दिन वह राज आता है रविन में दरवार स मना करवा देना हूँ। चौथे दिन म रोट आती है । म उमस सब बात बनाकर बहती हैं, 'म तो तुम्हाग सयार पर ही उमपे साथ चली गयी थी। मये क्या पता था, वह ऐमा निकरगा। दरअमर, ये सम्मापुत्र दिन ‘भर दाग में काम कर थर जात है और में किसी 'स्वीट कम्पनी में रिलाना चाहल है। तुम्हार दम मजन की भी यही मजिल है और इधर तुम न जाने क्या-क्या पने पाल रही हा "स' तकिये में मुह छुपावर रोने रगती है। उस दिन मे, मर मन स पुष्पा की निगाहा में छिप दानव का भय सत्म हो जाता है। अब म उनकी निगाहा से बचती नहीं, बल्कि सीधे उनके भीतर तर देपन को वापिरती हूँ कि स आरी परदे क नीर यह दानव कितनी गहराइ म छिपा वठा है जो मौरा पाते हो पर बदर ऊपर आ जाता है। विनता दिलचस्स हाना है आखा का पह पर }

१६ टटती राहा
रा रेनेगर गुणाती* HIT गाय माननामिना भय
भी लगा है। इसी उधेच्या म म यो उरार TI पाती। सुरक
रामदाताहै पाय मैन उगाप्रपारमारामा पिया मागा
यह क्षमा मांगार II एगा। गगा म तिणय पर है।
जाप दामिनट सप मजागीर
महती है
।
हिगरायपीत गमय पर मा पर ग मर ग या अपनी
हथेली रो यार मारा गन्न य fP पूछा '। म राम गिर
हिलाती जोर हाय हो' ग गात ती।।
लौटते समय पर दिशागे गाय TT TRI ना 1 पार पा र रोड
थी ओर मार दता और पितरिया ६ वगर गाता आ रग की
ओर ड्राइन परगा है। रारते म पर वार अपन या हाय ग मग पा
वापर रहस्य गरी हसी हगता है तिम पसरा उगाय
हटा देती है।
लना रिनारे पर गादी पीपारधीगीरापरा है आगो
साय आज यहाा लगा। आग है हमारी यह परली मनान ही
अन्तिम मुलाात नहीं होगी।
म कहती है रेरित ग तो गेलि में लो आपगी।
वह बिना दुविधा । पहता है मै होस्टल रहा आया यगा हम लोग
मिलन के रिशा दूसरी गह तय पर एग।
में समान नहीं पाती आश्चय स उरा हर यो पर देराती हूँ। रेरिन
'रातो पहनी थी आप दोना जरूरी ही गादी परने वाले है !'
वह वेगिहाय रहता है दरा गाम के परो तय यही बात सच थी पिन
बाज आपस मिरन पर मुा महगूस हुआ है नि म गलती पर था।
आपरे साथ गुजारी यह नाम मुगे सदा याद रहेगी।

नारी १७ सहसा उसकी जाखो म मुये आग का वही रपट रिसाई देती है जो कभी बूढे सेनेटरी की शाखा में दिखाई दी थी। न जाने मेरे भीतर यहाँ की दरना आ जाती है । कडाई से कहती हूं, "मुझे होस्टल लाड दीजिये 1 अभी, इसी समय । मेरा मशा यह - वह घबडा जाता है। उसकी आंसा की आग तत्यार बुझ जाती है। वह रिरियार कहना है, 'दखिये, नाप नाराज हो गयी नहीं था। मुये माफ कर दीजिये।' छातानाम के दरवाजे के सामने कार रुक्ते ही म पुर्नी से उतर जाती हूँ, और बिना कुछ बहे भीतर चली जाती हूँ। इस बाद पे तीन दिन वह राज आता है रेविन मै दरवान स मना करवा देता हूँ। चौथे दिन 'स' लौट आती है । म उसस सर वाते वतावर कहती हूँ म तो तुम्हारा खयाल मरके ही उसवे साथ चली गयी थी। मुझे क्या पता था, वह ऐसा निकगा। दरअसल ये लदमापुत्र दिन भर दातरा में काम करके थक जाते है और शामें किसी स्वीट कम्पनी' में बिताना चाहत है । तुम्हारे इस मजन की भी यही मजिल है, और इधर तुम न जाने क्या-क्या सपने पार रही हो।" 'स तकिये म मुह छुपाकर रोने रगती है। उस दिन से मेरे मन में पुस्पा की निगाहा में छिपे दानव का भय खत्म हो जाता है। जव म उावी निगाहा स वचती नही बरिक सीधे उनके भीतर तक देखने कोशिश करती हूँ कि इस ऊपरी परदे के नीचे वह दानव कितनी गहराई म छिपा वठा है जो मौका पाते थट कदकर ऊपर आ जाना है। रितना दिरस होता है आमा का यह सेल ।

१८ टूटतो इकाइयो
पहर ही दिन पनिरगिटी वी गगग में प्रारा गमप -गजन निगा'
बन वो पा में मरा आरती* T तार गाय मगर
दृष्टि ग देगार अपनी सियारिया पर ा जाता है न कुछ
इतनी ढीठाती है कि मरी दहा गाय गमगा मिगार
घग्ना और जगाया पर मर वठ जान वा" भी मा अपन जू
गदन और गपट उपारण नानगापार और ममर पर
उनकी तीण पार का भाग हाना रा है।
चूकि म रोज़ जना वनारर आती र गला गाय उहान मरा ग्राम
जूनवारी रम पिया है। पीर्य पी गाय याच भार इम
ग के प्रयाग की भनर मरे याना मनाती है। समाव मागरितार
या नादमबहान माग बातचीत परामी भी शातिापरत हैं और
हर बात व माय उनी जसा व परत मार को पग्न में मर गहरा
रम जाता है।
अपने एक सहपाठी को मप विप या है। वरनता नतर उगार
हमारी वन पी आर दगा है और न आन गाथिया की बातचीत या
हूँसी मशार म गामिर होता है। दीवार व पास सदा एक ही जगह
बठना है और बहुत कम वारता है अगर प्राफमर उमम पुछपूर
बटता है ता उस चहरे पर घबराह उभर आती है और यह हागने
लगता है। एकाध बार मा भी होता है शिलास में हमारी वेंचवालिया
में जलावा और वाई नहीं रहता और अचानर (हालारिपूर-योगाव
अनुमार जान-यूपकर) हमारी वच स कोई उसम कुछ पूछ बटनी है ता
मारे सकाच क उमव मह में पावार नहीं निकलती और लगता है उसका
बस चर तो यह पास की दीवार ही में समा जाये। मन उराना नाम
गाव की गरमीरी बहू रख छग है।
एक दिन देखती ह यि गाम को जिस ट्राम म म होस्टल लौटती हूँ उसी में
वह भी एक आर खड़ा है। पहले दिन ता म ध्यान नहीं देती लकिन इसमें

मारो १९ मी पान-दुमान बार अक्सर उसे रोज उमी टाम स जात हुए दखती हूँ । जरा गौर करने पर पाती हूँ कि वह दाम से उत्तर पर पदल भी मेरे पछि पीछे आता है और मर वाइ० इन मी००० वे होस्टल में घम जाने पर लौट जाता है। एक राज म ट्राम से उतरसर मटा सिनेमा ये मामने चरते चरते सहसा रव जाती है और शो वेम में लग फिल्म के चित्र दखने लगती है। वह भी पल भर ठिटकर गड़ा हो जाता है फिर भी वे साय मेरे पाम सा हुआ आग निकल जाता है और मोड पर एक जाता है। म मोड से हाती हुई अपन हाम्टर की ओर मुड जाती हू और सहसा यू० एम० आर० एम० लारी के बगलवाली पाटा को दुवान म धुम जाती हूँ। वह दुकान के सामने से जली-जानी चलता हुआ आगे बढ जाता है तो म दुकान स निकलकर उमरे पीछे कुछ दूरी पर चलती मझ इस घर में अदभुत आन द आता है। वह अपनी जांखा मे मुझे साजता-मा भीड को चीरता जागे बरता जाता है और एलाट सिनमा के पास से गुजर कर क्षण भर के लिए होसर ये सामने ठिठक जाता है। तभी म पाछे से पहुचती हूँ, और इस तरह माना अपाना उसे दे पा हा बहतो हूँ अरे आप आन इधर कैसे ? वह इस तरह घबरा उठना है गोया चागे करत पका गया हो। उसके मुह मे एकाएक आवाज नहीं निकलती हालात हुए गदन नीची विय मुश्किल से यहता है जी वात यह है कि महाँ यू० एस० आइ० एम० प्रेरी में पहने जाया करता हूँ। होठो पर आता हमी का राप र म कहती हूँ, जोह , लेकिन लाइब्रेरी तो आप पीछे छोड आये हैं।" - उसफी घबराट घर जाती है। एक पागवि पिरम + आनद से मेरा मन नाव उठता है। चाहती हूँ वह एक वार गदन ऊँचो परे तो उसको आपावो पर सर पुतलिया के भीतर झार कर देख म वि दारव क्मि गहराई में बठा हुआ है। लेकिन वह गदन ऊँची नहीं करता, बमुश्किल

२० टूटनी सहया
हकलाते हुए पता है I यात पह है fr आज पर TTM
मिल्ने ताना है।
पहा म और प्रन न कर भन ग व रिनाम गिनालाय
जाता है और उत्तर की प्रती हिर पिता हा जगम पर पर
चला जाता है । म होत ग हगती है।
मुझ आग परन और जया पिया र पोछ पार परत मनास्तिान के
विश्पण बरा पा राग हा गया है। काम का सितारें पन या गह
इस पाद म मरा मन अधिन रमता है। हमार जाये दाराप्रापार भी
मरी "म सनर म नहा यव पाते । मुगे उनमें ग शिपारमा
अधिा यार है। 1 4 वाग्ने ता उना हाटा में यूर म घाट
उछरबर उनकी मूछा य गुरमुट में अदर नात जोर आँग
सिकुकर वाली लपीर-सी रह पाता जिना भौतर स य एटा हमारी
वेंच को जार दपते हुए एपचर पिया करते । कलाम म जोर भी
वेंचे हैं इस महसूस करन की ये जररत नहा समझते। चूति व सस
पुरान और प्रभावशाली प्रारगर हैं इसलिए किया का पाग पन परला
उन रे हाय म है और पिछ न कुछ वर्षों के उगहरग द्वारा व सर कर चुके
है नि फस्ट-कलम फट जान की योग्यता बवर धागाआ में है
छानामा में भी विपकर उस छात्रा में जाना पटव सबम क्या।
चार रगा सरनी है। बलि समर होता यह है कि पमर
चार लगाने की हाट लग जाती है और पस्ट-कास पम्ट की
उम्मावारी एक से अधिक छात्राए करने लगती हैं तो उनमें से सपने
अधिक चार लगानवारो का मप्रथम स्थान के लिए चुनना पता है
और राम का उसी क्रम स उसरे वाट वार स्थाना के लिए। इस तरह
अवसर प्रथम तीन चार स्थान पहले से मुक्ति हा जाते है।

नारी २१ एक वार मेरी एक साथिन मुये उन 'कहैया के पल्ट पर ल जाती है। वे बडे स्नेह मे हमारा स्वागत करते है नौर को आवास दर वापी बनान का हुक्म देते हैं, और सुद परग पर वठे चेन स्मोकिंग करते रहते हैं । यहा, घर में परेंग पर उनकी मांसा की दरार कुछ बड़ी दिखाई देती है उनम चमर भी अधिक है उनर मुह मे थूर वे छाटे भी अधिर उधरत है जा रभी-कभा म छा के झुरमुट का पार कर हमारी साडिया पर भी था गिरते है। व बड़े स्नेह से मरी पढाद ये वार में पूछन हैं और परीक्षा म सफरता- प्राप्ति के कई उपयागी सुझाव दते हैं जिनम एक यह भी है मिहें अपने पर 2 पर पूरा अवमा रहता है मुये अपनी पढ़ाई में जब कभी असुविधा हो, या बुर पूखना हो निस्सरोच उनस यावर पूछ लिया करें। मुझ चे धाफी दिलचस्प लगते हैं उसकी मूछा का घरमुः, यूक वे छोटे सिर के सिचडी वाल और 'चन स्मोकिंग-~-दिर चम्पी के ये सब मारण तो हैं ही लक्नि मेरा सबसे अधिर ध्यान आकर्षित होता है उनकी आँखा की दरार म निररती चमर की धार जो इम वीच २३ ग बदल चुकी । हाती है और हर रग अपनी बरस बहाना कह रहा होता है। यहाँ रा लोटत समय म अमेरी होती हूँ। मेरी माथिन को पाद सम्बधी पुछ माँ पर प्रान पूछने है, इसलिए यह वही स्व जाती है । प्रोपगरा मी जात में भी क्स-र से घिरापाभास हात है । विनन विद्वान, सभ्य और मुमरात, दि लगे गरिमा पे भनेर ऊच-ऊच पिसर जिनमें धरणा में पाम बट र समूचा जीवन गुजारा जा सकता है, रेपिन जब इनवी वाला को मोर देती है, श्रद्धा का यह भाव तिरोहित हा जाता है,

२२ टूट ती इकाइयां
जोर य म छार घाट fT एगन गते जिम
'यानमार
जंगरी पर नना साती है।
आपाप इस अध्ययन में म व मी एमपर TT TT T। जब कभी
जांखा वा काई या जागती' मा IIT गामी नियम
उपमाए मूगन रगती र पनपा य ग भानभा मा पर "ग
कदर हावी हा जाता है मिम ममय म्यार और पापा रा भूर Tी हूँ
और मुग नार रहता है ना मज जान मामन पारा ओगाया।
मुय जपना जार "म तरह पूग्न पार Tमा पभा मागनगाय परा
पाता है और जयार गतामा पी भी गभाना रती
रेपिन मथ मरा हा पहा रहता।
मा परप जनन-गा मगर
रहता है।
+
।
वाद० -० सी० ० व हाम्रम भी मय इगलि ममाग
मिरता रहता है। मरी मवामिविया ग मिन जम्नवा में पर
ऐस दिचस्प यकिरा है जिारी आय मरा ध्यान अपनी और पाचना है।
मुझे एर मरलारजी की विगप या है उसपी धनी दादी म छोर माटी
भौहाय वाच अगार-मी दहाती आयें दावती ता मनमग्ध-मो यती
ही रह जानी। मरारजी अपना बहा वा नापिग पर जोर रस्त्रामा
में जान लग है क्यापि उनकी बह्न जि करो मुझ भी अप माय र
रती है। रस्तो म खान या चाय कापी पीते समय सरदारतीमरा विष
खयाल रयते हैं। उसे आग्रह पर म भी किसी चीज़ सरकार नहा वर
पाती क्याबि मरा ध्यान तो जगार-मी दहकती उनकी आंवा को जार
सिंचा रहता है। उहें दसार मरे सामने तवाल चिडियाघर के
सीपचा म बन उस वखार गर वा डरावना चहरा उभर जाता है
जिसकी आखा की आर दखते हुए आपको भय भी लगता है लकिन साथ
ही एक एसा जावपण भी कि आप अपनी र ष्टि हटा नहीं पाते ।

नारी २३ मुझे भय रगने लगता है कि यह रोग मुझे किनी मुमीत्रत में न डाल दे। सरलारजी की हिंसर आता नाद के समय भी मरा पीछा नहीं छाडती । "मी दा म म एम० एवी परी राए दती ? औरपाम बरन पर उसी गल्ल कालेज में पढ़ाने लगती हू जिमम भ स्वय पनी थी। साथ ही वह हाम्टर छोडवर र अलग पट विराय परत एती हूँ। इम एकान्ल पट म म धीर धीर कापि स म ग म पोछा छुड़ा स्ता ह । यद्यपि यहां भी जब कभी सीढिया पर चढत उतरते समय ऊपर के पटवाला काय च'मा जोर नीच ३ पटवारी माटे यांच की ऐनक देखी हू ता मर पर फिर वहां जनून सवार हाने लगता है, इच्छा होती है एक बार इन काली और मोटी दोधारा का भदकर इनकी पुतलिया भीतर भाकार दयू तो दिन दानव विम गहराइ म छिपे पठे है, रेफिन अपनी पिछी दा की याद पर म स माह पर काबू कर रैती हूँ और बिना उनकी आर द सीना अपने रास्त चली जाती है। समय के सुतीघ अन्तरार से लाज जीवन में म उन्ताम साग चौराह पर पडी होवर परटती हूँ, ता य अनव जारी मापे मझे आज भी अपना ओर घरती दिखाई देती है। हर साँख वा अपना अलग रग है अपनी अलग रास्तान है, लकिन एक बात न्न मत्र म समान रूप से दृष्टिगत हाती है वह है नारी तह के प्रति भूग। भूख का यह दानव कभी विकराल जवड निकाल ऊपर ही दिखाई दे जाता है, किन अक्सर यह नीचे पदी म छिपा वैठा रहता है, और ज्याही शिकार दिखाई देता है, टूटती इकाइयो यह उचव पर उपर या जाना और अपनी पिररात पाडा ग उगगी और झपटना है। भूप आतिम भूग'11 नारी र प प्रति पिर पामि मृग ।।। यसी ही जसी रि आज म हमारा-रामा परपूर प्रागतिणगिर यग के जगली पुग्प में थी अलर पर इतना दि अब उग पर गया या बला का ढाग पा मुमोग पटा रहा है दम मगोरे नीच हिमा हुआ आदिम भूरा का दानव र वापरण पारपर र माता वितना विकराल और घिनौना हिगाई रता है। या कोई ऐमा कमराहाता जा वेवर वाहा अगाशी नहा पद हारी ऑपा की नहा यत्वि जोगा में छिपे पटरा दार की इमा विभिन रगा और स्पा में सही तस्वीर याच पाता ता म उन तस्वीरा की आर्टिस्ट्री हाउरा में प्रगानी पसीआर पुरण पाति की तथापयित क्रा- प्रियता के ढाग का नग्न रूप दुनिया के सामने गारपर रप देती। * रेपिन आज जब जीवन के स्तीस सार पूरे कर चुकी तो महमूम करती हूँ कि क्या या भूय येवल पुरष में हाती है नारी में नहीं होती ? और स्पष्ट पूछू तो क्या यह मुगम नहीं है ? क्या अपना दह की परता के नीचे टिपी इस जादिम आग को वहा दवाये रने के लिए ही मोजाज नारी २५ , तव कृत्रिम साधना का सहारा नहीं लिया है ? क्या इसीलिए नत्य नही सीखा। वर्षों स्वय को विश्वला की रेसाआ में उलझाये नहीं रसा? सगीत के सुरा सुटको भरमाये रराने की कोशिश नहीं की? ओर, क्या इसीलिए आजकल इन विताया में स्वयं का नहीं डुबोय रसनी म बई सामाजिक और सास्कृतिय सस्था से सम्बद्ध हूँ मने ड्रामा में भाग लिया है और काल्पनिक पात्रा का जीवन जीने में स्वयं को खाने का प्रयत्न किया है। आखिर क्या क्या इसीलिए नहीं कि इस बडवानर की रपटा को नीचे ही दवायें रख सकू और ऐसा तो नही कि म एपरम असफर ही रही हूं। सच ही मैन न पराया में कुछ समय के लिए सुकून महसूम दिया है रविन गल्ती यह हुई दि मने इनसे अधिक की उम्मीद करती थी, सोच रिया था इही ३ महार अपना पूरा जीवन गुजार दूंगी। अपसास यह छलावा था आत्म प्रबनना थी। भने अपन जीवन साखरपन का इनम भग्ना चाहा था, लेकिन चल्नी के असरय छिद्रानी तरह ये शर गयी, और म अब भी वसी की वसी रोता हूँ। वमरका दीवार पर झरत ये चित्र जिन पर मगव किया करती थी आज क्तिने अयहीन रगते हैं । बोने में रखा मितार गाल हण्डिया मा बजान मालूम देता है । पाच की आलमारी में रखें घरू तिने मानी लगते है और शेल्फ में करीने से सजी क्तिावें तिनी निर्जीव " कमरे का सूनापन एवं भारी शिला की तरह मेरे मन प्राण को पीस इस साधी रात के समय भी, सडक पर ट्राम और वसा का शोर है, लोगो की आगजें हैं जीवन की चीख-पुकार है। रेक्नि मेरा यह यमरा मितता सारी है, क्तिना यापला है-~ठोर मेरी पोखरी और सारी 2 २६ टूटतो इशाय देह की तरह। मरी मृत आ मा का सरह परी मौत का भयावह सन्नाटा है। आधुनिक डिजाइन के बने हा गिर पड़ेगम हायपिला गद पर उसे हुई म जरहीन मछली-मी तपा रही है। तरिय वा दाना योहा में भीचपर छाती व नीच यस वर दपारती हूँ और निर राती हैं। मरा पोर पोर न अझ पीग स ट रहा है। विनना चाहता हूँ म, कि कोई इस समय अपनी मरल वाहा में भरखर मरा इस ह को भीच, से और कमता चला जाय वमता चगजाय यहाँ तक कि मरीह का जोड-जाड सुरवर अलग हो जाय बिगर जाय। सरिन, कहाँ है वह ऐसा तो नहीं दि म इस दर का वारण नहा नानती यानि मुगनिशान का पता नहीं । नही, निदान दिन के प्रकाश-मा स्पष्ट है। कुछ समजार क्षणा में सोचन भी लगती हूँ कि तो नियति सामान्यत हर नारी की हाती है उसे म भी स्वीकार कर लू लेकिन जब उपर २ पल्ट पर नि रात बच्चा की चिल्लपा सुनती हू और पटवाली को अपन पीछे पांच बच्चा की कतार लगाये और छठवें स पट पुलाय भाडे पटमा मे सीढ़ियों उतरत देखती हूँ , या नीचे वाले पलट से मार-पीट के धमारे और गहिणी के मुवक-सुबक कर रोने की जावाज सुनती हूं तो इस सब-मुभि निगन के प्रति मेरा उत्माह खत्म हो जाता । फिर भी, कभी-भी साधने लगती हूँ कि जब नारी मात्र वी यही नियति है ता म ही इन अनिश्चित खतरो से क्या डर? लेकिन सवाल येवल इन अनिश्चित सतरा का ही तो नहीं है। सवाल मेरी स्वाधीनता का भी है प्रश्न मरे अह का भी है । मान लो स्वाधीनता की भी वलि देदू, मह को भी भुला दूं। रेक्नि कहाँ है वह उपयुक्त सायी जिसरे हाथा में म अपनी जीवन-नीता की पतवार थमा दू और निश्चिन्त होकर अपने अस्तित्व को भूल जाऊँ उमने व्यक्तित्व में अपने को एकाकार वर दू--कहाँ है ऐसा यक्ति' कैसे खोजू उसे?

नारी २७ तो क्या इसी तरह प्रा जीवन गुजार दू ? जिस तरह कि जीवन में ये पिटले उन्तीस पतझड बीत हैं ? लेकिन अब तर तो उठनी आयु का उत्साह था देह में जोर था, और जीवन को एष आशवाटी ढरे पर ढालन के सपन थे। लकिन अब उन सपना का माह भग हो चुरा है और दह मदरती आयु का अहसास है जिसके लक्षण दिन पर दिन अधिक स्पष्ट होते जाते है। अभी उम दिन सुबह उठकर दह तोऽती हुई आईने वे सामन सदी हो गई थी तो सहमा स्वय को पहचान नही सकी था। ज्या की-त्या ठगी सी खडी रह गयी थी। अचानक पहली बार महसूस हुआ कि मरी देह से यह क्या हाता जा रहा है। सिर-लम्वे कश पता नहीं कर इतन अधिक झड गमें थे और कनपटिया के पास से सफेद हान लगे थे। गाला पर ये मुहासे और फुसियाँ कब और कहा से उग माय ? बड़ी बडी तरल आसें जा रभी सभा-मोमाइटिया में चर्चा का विषय बनी हुई था, आज उही पर पसी एक सफेद परत आ चढ़ी है और नीचे स्याह धारियां बन गयी हैं। होठा पर भूरे बाल उग आय है, वर ढीले होकर झूल गये हैं और यह एक प्रौढा की तरह फरी फैलरी, पसरो-पसरी लगती है । अपना अनावत दह (मुझे सदा ही विवस्त्रा सोना पसन्द रहा है) की यह भपावनी असलियत देस म चेहरा हाया में छुपारर मिमर उठी। भया शृगार मेज पर मजे हुए ये समस्त गोदय प्रसाधन भी मेरी ढलनी दर यष्टि यो वौध रखने में समय नहीं हो सरते। क्या धीरे धार उजाड होती यह धरती या ही वज़र रह जायगी । वहाँ है तु यो दपा र पहले वाल, जो सदिया से प्यासी इस धरा को अपनी पहली चौछार स तप्त पर दे ओ, वहाँ है तू? तू? क्या यही वह आदावादी जीवन है जिसरे म कभी सपने देखा करती थी? वैवरूप रडविया को रोज राज वही एक पाठ पढाना जो मेरे मन प्राण यो पोरियत से भर देता है । गाम वा थकी हुई, और ऊत्री हुई, जब .

२८ टूटती इकाइयो कॉलेज के गट स बाहर निवरती हतापरा में बग-टापता आनी भी तारत नहीं रहती न मन में घर रौग्न या उत्साह ही रहता है । आगिर विमके लिए घर लौट । उस यूढी नौकरानी व लिए जिगका मग हुआ चहा देखते ही मुझ रापत होती है। इस कापत में बनने व सिगा ही में किसी मित्र के गाय रम्य व रगीन और जा माहौल में जागर बछ जाती अगर कोई खाम मित्र तत्काल उपलब्ध नहा होता तो यॉफी हाउम जावर अनय मित्रा बदर में शामिल हो जाती हूँ। पिन पर तर । आसिर मभी उठ-उठवर जान लगते हैं तो मुझे भी वमन में उठना परता है। व घर की मीटियां चटकर निर्जीव अगरीम अपन पर दरवाजे पर लगी घटी टोपता हूँ तो पापर मुह ग न जाने क्या बाती हुई बुटिया दरवाजा पालनी है, और उसका मडा हुआ हरा नापते ही मरा पार-पार एय अवूझ घणा मे सिहर उठता है । क्या मेरा नारी मन यह नहीं चाहता कि वॉलेज पी पलामेज सरम होते ही जल्दी जली घर को जोर दोर पड और उत्माह में भरपर एक ही फ्लया में -कइ सीरियां चरता हुई अपनी पूरी होने के जोर से दरवाजे की घटी दवाऊँ ता दरवाजा सालार दा हसता हुई आंखें मरा स्वागत वरें दो पहुए सबल वाहु अपने घरे म स्कर मुझे छाती में छपाले दा गम-गम मीठ हाठ आतुरता स मरे फक्त हाठा पर आ चिप- क्या मेरा यह चाहना गुनाह है कि भरे इस सूने कमरे मे विल्वारियां मारता एव न हा-सा गित हो जो मुझे देखते ही अपने प्यारे प्यारे गुडिया जसे हाथ मरी ओर पला दे और म हुलस कर उमे बाहो में भर लू वक्ष म छपा " इन मूखी छातिया की जगह रस में पग पयोधर हो हि वह शतान अपने नहें नन्हें हाथा में भरखर निझोडे और होठा से चूसे और दांता से काटे झिंझोडे और चूसे, और काटे?

नारी २९ विन्तु, [काश, जीवन में पह किन्तु नहीं होता 13 वहाँ हैं वे हंसती हुई खें और सबल वाहू और चौडी छाती और गम गम मीठे हाठ जा इस चिर भूसी नारा दह को नादिम आग को शान्त पर कहाँ है वह नहा शिशु जो मानत्व की प्यासी इम देह की सूखी छातिया का मीठे दूध से भर कर इहें पीन पयाधरा में बदल द? ? ओ, कहाँ है तू मेर अदृश्य अगाचर पुरुष ओ, यहाँ है तू, मेरे अजमे शिश * * * तुम नहीं, नहीं, तुम नहीं हो सकते । जिसे हम गांव की शरमीरी बहू बहा करते थे, जो लडकी मात्र का मूरत देखते ही मारे सकोच ये बगल की दीवार में समा जाना चाहता था, प्रापेसर के कुछ पूछ रने पर घबराहट से कांपने लगता था, और हकलाहट के कारण जिसके मुह से गल नहीं निकलत थे। नहीं, नहीं, तुम वह कसे हो सकते हो। तुम मच पर सम्मा य अतिथि के रूप में बठे हा। तुम्हारे गले में पूतो पा हार है। तुम पूरे आम विश्वास के साथ मान के सामने खडे होवर वारते हो, हाराहट तो दूर, तुम्हारे चेहरे पर किसी किस्म की पवराहट का भी चिह नहा है। युगल वक्ता की तरह तुम बीच-बीच में ऐसी चुटपियां भी रेते जाते हो जिसम दशा में हसी और प्रामा भी सहरिया दौह जाती हैं। नहीं, तुम वह पस हो सकते हो ३० टूटतीरमाइयां रबिन, क्या मरी आग इतना वहा धागा गा सकती है ' पररा यहा है हालागि अब उग पर अनुभव बामनिवाग और प्रौढ़ता की छाप है पर पहर में कुछ लम्या हा गया है भी आसान स्वस्थ और भरी भरी है और वरिया गूट और टाईन तुम्हार व्यक्तिर का निमार दिया है। ये गर परिपतन पर है पिन ऐस ता नहीं मि मूल व्यक्ति ही पहिान में नहा आय' कायम की समाप्ति के बार म सटा रोग नहा पाती मच पर चली जाती है। जय तुम्हार गामने म गुजरता है ता पर भर र लिए ठिटय जाती है। तत्याल तुम्हारा चेहरा पूर्व-परिचय की मुसान स सिर उटता है बडे पलामा ढग में तुम्हारे दोरा हाय र जाते हैं मुह से निकलता है। अरे आप! म भी हलवे से मुस्वरावर हाप जा' देती हूँ। मेरी सुरचिपूण पोसार यहुत सतरता से किये हुए मवअप वाल चेहरे और चमली ये ताजा फूला की वणी की आर तुम प्रमात्मक निगाहा से दखते हो। हम पुराने दिना की याद ताजा करते हैं। तुम बताते हो कि एम. ए. की परीक्षाए देने के बाद विन सघर्षों से गुजर र आज इस स्थिति तर पहुंचे हो। म सक्षेप में अपना इतिहास दुहराती हूँ। फिर तुम्हें अपने घर का पता बताती हू और अगल दिन शाम की चाय साथ पीने के लिए तुम्हें आमश्रित करती हूँ। अगले दिन तीन वजे क्लासेज खत्म होते ही म जल्दी-जल्दी घर पहुचती हूं और उत्साह के मारे एक ही फ्लांग म कई-कई सीढियां च कर दरवाजे मी घटी हथेली में पूरे जार स दबाती हूँ। भीतर से बुढिया ये बड़- नारी ३१ - वडाने की आवाज आती है और दरवाजा सुरता है। लेकिन आज मुझे बुढ़िया का चेहरा मडा हुआ नहीं लगता, कोपत भी नहीं होती। मुझे जीवन में पहती बार कॉज मे इतनी जल्दी घर मापी देसवर बुढिया की बडबडाहट उसवे पोपले मुह में ही दवी रह जाती है वह भौचर पडी मुमे दस्ती है। म एक हाय स उस हटावर भीतर घुसती है, कमरे में जाकर कितावें मज पर पेंस देती हूँ और एक वार गोल घूमकर पूरे कमरे का निरीक्षण करती है। ति आवर कमर में चारा पार रपट रेती हूँ और युढिया यी और पलटती हूँ। वह आश्चय से मुह वाये रमर के दरवाजे पर खडी है। म उसम याड लाने के लिए कहती है वह झाड सरार देती है तो उस कुछ रुपये देवर नाश्ते का जरूरी सामान लाने बाजार भेज देती हूँ। उमरे जाते ही मै दरवाजा बद कर रेती हूँ। दीवार पर टगे चिया को उतार कर माही मे पाछती हूँ कितावा और गिडविया की गद झाडती हूँ मेज और सितार को रगड रगड पर साप परती हू कमरे के कोना में लगे जारे हटाती हूँ, और पा के कारन कोपीट-पीटकर हेरो धूर निवारती हूँ। कमर को सफाई हो जाने पर म खिदक्यिा और दरवाजा २ पदें बदलती हूँ मज़ पो नया रगाती हूँ सापाक गद्दी पर नये सोर चढाती हूँ। सपा और सजावट पूरी हो जाने पर म एडी के वर गाल घूमकर पिर से पूरे कमर का निरीक्षण करती हूँ, तब आईने के सामने जाार सही हो जाती है। धूल और गद म पुन हुए चहर को देखकर म एक्वारगी पहचान नहीं पाती रगता है यह किमी और वा चेहरा है, इसलिए नहीं कि इम चेहरे पर धूर और मिन्टी लगी है, बल्कि इसलिए कि इस चेहरे पर मुझ अपने चेहरे वार मुहासे और पुसियां दिखाई नहीं दते, आँगा के नीच वी स्याह धारियां भी नजर नहीं पाती और ममूचे चहर पर नव यौवन को दीप्ति झरपती दिसाई देती है। मकाफी देर तक पार्दने व सामने पहो मुग्ध-मी देखती रहती हैं। जव बुढिया रोरती है तो ३२ टूटती इकाइयो उसे नाश्ते के आइटम्म बनाती है और गुर वायम्म में घुगार समनी देह को रग रगड पर नहाती हैं। नहार अपनी विशेप पसन् के मरद रेामवार माडीगाउज पहनती हूं और जतन से मार करती हूँ। तुमने साढ़े पांच बजे आने का गमय लिया है अभी मवा पांच बजे हैं और म तुम्हारे स्वागत के लिए तयार हार आईन के सामने सडी हूँ। म पुरषा के सम्पर में आती रही हूँ और सास्कृतिक-मामाजिर कापत्रमा वे मिलसिले में मुये अनेक तरह के लोगा स मिलने जुलन के अगर मिलते रहे हैं रविन इस तरह को उत्वठा और घबराहट एक अनजान बननी का अनुभव मने कभी नहीं किया। यह पद्रह मिनट का समय काटना मेरे लिए पहाड हा जाता है । कमर में इधर से उधर चकार लगाते हुए म इस बीच कितनी ही वार आतुरता स घडी देव चुरी हूँ लकिन लगता है घडी की सुइया सरक्न का नाम ही नहीं लती। भर पान राडा की ओर लगे हैं पल्ट के नीच से गुजरन थाठी हर मोटर की आवाज के साथ मेर कदम र जाते हैं और म कान लगाकर ध्यान से सुनती है, लेकिन जव आवाज वहाँ रक्न की जगह आग बढ जाती है, ता म फिर दूनी वचनी स चहलकदमी करने लगती हूँ। इन पद्रह मिनटा में म कई बार आईन में खुद को निरस-परख कर मेकअप में रह गयो किन्ही अनजान कमिया को सुधार चुकी है। घडी का बड़ा काटा जब ६ की सस्या से आगे सरकने लगता है तो मेरी उद्विग्नता वैहद वर जाती है। मुझे जाने कसोक्सी आपकाएँ होने लगती हैं म जपने-आपका रोग नहीं पाती और खिडकी में लगे जाली के परदे से नाख लगाकर सडक को आर देखती हूँ तभी मेरे परट के नीचे एक टक्सी रक्ती है उसम से आस्मानी रग का मूट और उसी रग की टाई पहन तुम बाहर निकलते हो और जेब से पस निकालकर नारी ३३ रेयसी का किराया देते हो। फिर पल भर ठिठ, गदन उठाकर, उपर पलट की खिडकी की आर देखते हा। में जारी के पर्दे के इस पार हूँ, जानती हूँ कि तुम मुये दख नही सक्ते, फिर भी एकाएक मेरी साँस याद हो जाती है और सीने में धक वर बी आवाज़ मुझे साफ सुनाई देती है। तुम सधे क्दमा स दरवाजे की योर बढते हो । मीदिया पर तुम्हारे जूता की आवाज सुनाई देती है। एक तल्ले पर मेरे दरवाजे के सामने आकर जूता की आवाज बद हा जाती है। म सांस रोके घटी की आवाज की प्रतीक्षा करती हूँ, कल्पना करती हूँ कि तुम दरवाजे के सामने खडे हुए मेरी नेम-परेर को हाय से छूकर देख रहे हो, तुम्हारा हाय घटी की ओर बढ रहा है घदी के बटन पर अपनी अगुली रसे तुम कुछ सोचत-से खडे हो और - श्री की आवाज सुनकर म इस तरह चौंक उठती हूँ गोया क्सिी ने गहरी नीद से झक्झार कर जगा दिया हो। हडबडावर दरवाजे की आर बढ़ती हूँ, परदा उठाकर बाहर निकलना चाहती हूं कि फिर परट भाती हैं और आईन के सामने खड़ी हार खुद पर अतिम नजर डारती हूँ, माथे स ट गयी लट का सावधानीपूर्वक मारे पर लाती हूँ, वणी को दानो हाथा से छूकर देखती हूँ और भागती हुई-सा जाकर दरवाजे की सिटकनी गाल दती हूँ। बडे क्लारमर दग म दाना हाय जारकर, तुम मुस्कुराते चहर से मुये ऊपर से नीच तक देखते हो, और देवत ही रह जात हा मेर माथे की लट पर स तुम्हारी निगाहें जम हटना ही नहीं चाहती। म सकुचावर एक कदम पीछ हटती हूँ, वहती हूँ, 'आल्ये।" बिना पर द ही समय जाती है कि तुमपीछे-पीछे आते हुए मरे जूड़े में लगी चमेली के ताजा फला की वेणी लाउज़ ऊपर की बनावत पीठ और ३४ टूटती इसाइयो नीच की अनावत कमर का प्रामारमा दृषि म देख रह ।।। तुम्हारी दृष्टि के रपा म मुगे अपनी गान और पीठ और कमर पर गुन्गुना-मौ महसूम हाती है। मज म पर्दा हमार यमर में दागिर हाती हूँ. और हाथ में पर्दा हा एप आर गरी हा जाती हूँ। तुम भीतर कदम रमत हा तुम्हारी पर आम एर हादति में अन्दर के हर सामान का मरमरी नौर पर निरीक्षण पर रती हैं। तुम मध कटमा से कमर वीच में आर पारीन पर पद हा जात हा और वहा बडे-बडे गोल घूमगर एक बार फिर हर चीज का दपत हा। फिर दीवार पर टॅग उम चित्र पाम जात हा जिसमें मोर की डल पोल में गिकार पर चप्पू चराता एक वरमोरी वालिया मा दृश्य अस्ति है । गौर से चित्र को देपने क वा तुम एडियां ऊंची उठानर चित्र पर लिमा नाम पढते हा तत्वार पलटकर मरी आर देगते हा और आश्चय- मिश्रित आल्हाद भरे स्वर में पूछन हो अरे क्या तुमने बनाया है यह चित्र? म स्वीकृति में सिर हिलाती हूँ। तुम्हारी आखा में झाक्नी प्रामा को लक्ष्य कर मुझे आज पहली बार इस चित्र के बनाने को साथकता का अहसास होता है। तुम दीवार पर टगै अन्य चित्रा का भी एकनाक पर गौर स देखते हा और हर बार पट वर प्रासा भरी दष्टि से मुझे देखते हो। मदप्टिक उस स्परा से विभोर हो हो उठती हू चित्रा बाद तुम योन में रखे सितार को देखते हो और उसने तारा को छूवर एक हल्का कम्पन पदा करते हो। फिर तुम झुक्कर कांच के पल्ला वाली छोटी आलमारी में पाक्ते हो, और वहां घुपरला यी जोडी देराकर अपनी प्रग्नमूक निगाहें मरी ओर नारी ३५ हा उटती उठाते हो । म सजावर कहती है "कॉलेज दिना में मुझे न य का शोर था, य मब महल्म और वम मुझे उन्ही दिना उपहार-स्वरूप मिले थे।" मैं आलमारी म धुधरुआ ने आमपाम रमे मडल्म और क्प्स की ओर मकेत करती हूँ। तुम प्रशसा की भरपूर नजर स मुझ दसत हो और दसत रहते हा। म उस दृष्टि को विभोरता मे अम्त यस्त-मी हूँ जल्दी म रहती हूँ "आप वठिये, म चाय रे जाती हूँ। में जाने रगती हूँ कि तुम्हारी आवाज सुनकर व जानी हूँ, 'मुना, एक अनुराध है।' म पलट कर खड़ी हो जाती हूँ। तुम एक कदम मेरी ओर बढकर अपनत्व स कहते हो 'देपा हम दोना साथ पढ़े हुए हैं। तुम्हारा यह जाप का क्या तुम्हें अच्छा लगता है?' तुम्हार शब्द का और दृष्टि का अपनत्व मरी दह के तारा का पत कर देता है इच्छा होती है, अपने छात्र-जीवन व दिना की तरह झूम- झूम कर नाच उठू । लक्नि प्रक्ट में म कुछ उत्तर नहीं दती और नृत्य की मुद्रा म थिरसते पणा से पिचन को ओर चली जाती हूँ। पांच-सात मिनट बाद दोना हाया में पटें रिये आती हूँ तो तुम्हें मज के पास पडे हुए एर वितार के पते पलटत पाती हूँ। युरी विनाव हाया में लिये तुम चुपचाप मेरी मार देखते हो। म प्लटा को मेज पर रख देती है तो तुम बायें हाथ में किताब लिये दाहिना हाय मेरे क्धे पर रस दते हा, 'तुम मचम्च, तुम हो।" म समझत्त हुए भी न समपने की तरह तुम्हारे मुह की आर देखती हैं। तुम अपना हाय हटा लते हा और पुस्लर रा टाहिट पृष्ट बोरकर दिखाते हो, 'यह विमका नाम है?'

३६ टूटती इकाइयो
म चुप रहनी । काई जवाब दो नहा बनता ।
तुम आजिजी रा कहत ही अच्छा तुम्हें आपत्ति न हो तो इनमें से एक
गीत सुनाओ न
पहर चाय पीला कहार म चाय को लान किचन को आर चली
जाती हूँ।
चाय-नाश्ते क वा तुम फिर गीत मुनान का आग्रह करत हो। म मितार
के मुरा के साथ अपना सबस प्रिय गीत सुनाती हू जो इमा पहल भी कई
अवमरा पर गा चुकी है। क्मरा सगीत व जादुइ वातावरण से भीग
उठता है । तुम आँखें वर क्येि मात्र मुग्घ स बठे रहो हा।
गाना खत्म होने के बा- भी तुम कई क्षणा तर आंखें नही बालने माना
अभी तक सगीत को उन लहरिया में डूब उतरा रहे हो। और आंखें
खालन के बाद भी तुम कई क्षणा तर कुछ नहीं कहते महज मरी ओर
देखते और जब बात हो तो लगता है तुम्हारी आज बहुत दूर
से, दिल की अतल गहराइया स आ रही है तुम्हारे जसी लडकियो
सचमुच समाज के लिए घरटान होती हैं।
अपने लिए लडकी का यवहार मुझे एक बार चौकाता जाहर है
लवित अच्छा भी लगता है।
तुम घडी देवकर उठने का उपक्रम करते हो अच्छा, तो अब
म टाककर कहती हूँ ऐसी जल्दी क्या है ? जरूरी काम से कही जाना
नहीं हो ता
.
तुम कहते हो नहीं म तो इसलिए उठ रहा था कि गाय तुम्हें कोई काम
को और तुम सोच के नारण न कहो ।'

नारी ३७ म जल्दी स कहती हूँ, 'नही मुझे गाम का कोई काम नहीं रहता। कॉलेज से आने के बाद म प्राय खाली ही रहती हूँ।' इसके बाद तुम साहित्य-चर्चा करते हो। आधनिर कविता की वारीव खूबिया या विश्लेपण करते हो। बाट गलरी में चर रही अखिल भारतीय-वापिक चित्र प्रदानी के संबंध में अपने विचार पतगत हो। आपिर चवा हिदापिल्मा की निकृष्टता और वंगला तथा अंग्रजी फिल्मा की कहानी सम्बधी विशेषताा पर था जमती है। तुम्हारी विद्वनापूर्ण वातें मेरी निगाहा में तुम्हें और ऊँचा उठा दती हैं। सडक पार सिनमाघर में फिल्म खत्म होने कारण बाहर निकली हुई भीउ की आवाजें सुनकर तुम फिर पड़ी की नार दावत हा जोर सड हा जात हा । दा पदम मेरी आर वढार करत हो 'मर्ड, बहुत समय र लिया, दमान नौ बजने वार हैं। रविन मच तुम्हारे साय गुजारी इस नाम की यार मना मन पर छायी रहेगी, भुराय नहीं भूरेगी। याा है, हमारी यह मुराकात भाखिरी नहीं होगा हम याने भी मिरते रहेंगे। . म सही होवर कहती हैं, 'म बलिज से जल्दी साली हो जाती हूँ, और नाम को घर में प्राय 'पी' रहती हैं। माप जब भी गाम का फ्री हा, निस्मकाय मा जाया करें। आपकी विद्वत्तापूण बाता से कितना नान बढ़ता है क्तिनी नई-नई बाना की जानकारी होती है। तुम होठा पर गरारत भरी मुस्वान राबर बहते हा, 'फिर वही म आँचल दांता में दबार सोच मे हेस पडता हूँ। * ३८ टूटती इकाइयो अब म राज कामज मत्म हाने ही घर की आर दौर पडती हैं और तयार होकर तुम्हारी प्रतीक्षा करती हूँ। मुझे पता है, तुम पांच वन कार्यालय म खारी हाने हा इगलि गमा पाँच वजन ही मर वान तुम्हारी टक्मा की आवाज की प्रतीया परने लगते हैं । मुई का यौटा मार पांच पर पहुंचत ही मरो वचनी बन्न लगता है और में पर की जारी सजाय एगार आतुरता स सड़क को जार दान रगती है। तुम अमर शाम को आ जात हा, और सब पार मिनेमाघर या इनिग गा खत्म होने पर चर जान हो। मुझ लगता है मेरा नवजीवन हो रहा है। अब आईने में सामने विवस्त्रा खडी होती हूँ ता मुझे अपनी दह भरी भरी माम देती है। गाला पर मुहामे और फुमिया वो जगह स्वास्थ्य और यौवन की रालो नजर आती है, आसा में विशेष प्रकार की चमक दिखाई देती है और स्याह धारियाँ खोजने से भी दृष्टिगोचर नहीं होता । मुबह उठने पर म देर तक पलंग पर वठी गुनगुनाती रही हू बुढिया नौकरानी के आकर याद दिलाने पर ही मुझे आभाम होता है कि वॉलेज भी जाना है और समय काफी हो चुका है। लेकिन अब तयार होन में पहले की तरह मुझे घटे दो घंटे का समय नही रगता कुछ ही मिनटा में तयार होर कॉलेज चल दती हूँ। गाम को लौटते समय लगता है किसी ने परा में पर लगा दिय है और म उडती हुई-सी पर पहुच जाती है। तुम मुझमे खुलते जाते हो और साहित्य चर्चा, क्ला चर्चा और फिल्म चर्चा करते-करते अपन मोफे से उठकर डबल सोफे पर मरी वग़ल में आ वठते हो, मेरा हाथ अपनी हथेलिया म ले रते हो और मरे लम्बे नाखूना से खलते रहते हो। कभी मरे माय पर झूलनी स्ट को संवारते होता कभी गल में लटक्त सोने के लारेट को होठा के बीच सहेजते हो।

नारी ३९ धीरे धीरे साहित्य चचा, कला चचा और पिल्म चर्चा का स्थान गौण हाता जाता है और हाया ना खेल प्रमुख । कभी तुम मेरी भोहा को सहलाते हा ता कभी जूडे के नाचे गदन में अपनी दा अगुलिया से गुदगुदी करत हो। स्थिति यहाँ नर पहुँचनी मि तुम आत ही हाथ पकड कर डवर साफे पर मुये अपने पास बैठा लेते हो और विना कुछ वाले दाहिना हाथ मेरी गदन के पीछे से लाकर मेर दाहिने वये पर रखकर हीर-होले दवाते हो और बायां हाथ ऊपर स ब्लाउज के भीतर सरका देते हा ऐमा नही कि तुम्हारा यह सब करना मुझे बुरा लगता है। मच ता यह है कि तुम्हारे हाथ का स्पश मुये अलौकिक आनद से भर देता है, महमूस होता है काई मुझे थपकी दवर सुरा रहा है, म खुद को भूलवर अद्ध निद्रा की स्थिति में पहुँच जाती है। मेरी इच्छा होती है, अपना सिर तुम्हारी छाती में छिपा 7 और चिर निद्रा में सा जाऊँ, और कभी न जाएँ। रेगिन पता नहीं, यह नारी जीवन की क्सी विडम्वना है कि उसकी देह और प्रवृनि म सा एक विरामाभाम रहता है, जो बात उसकी देह पसन्द करती है अपने स्वभाव की मजबूरी के कारण वह प्रक्ट रूप में उसीमे इनार करती है। में भी अनिच्छापूवर तुम्हारे हाय हटा देती हूँ, और तुमस दूर हट जाती हूँ। कहती हूँ, 'देखो, यह मव ठीक नहीं है।" तुम ठने का अभिनय करते हा, क्या ठीक नहीं है? क्या तुम मुझम प्यार नहीं परता?" "वात यह नहीं है लेकिन म मला आगे कुछ कह नही पाती। तुम गुम्मे से कहते हा, "तो फिर वात क्या हैं? क्या प्यार महन दाशनिव होता है। उसमें देह का कोई महत्त्व नहीं होना?"

४० टूटतो पाइयाँ म विवा हारर महती हूँ 'देया बात यह नहीं है मन मुम या मर ठीक नहीं लगता। तुम जर माहित्य पर्ग या बग पा करत हा तो मुझे अधिष अछे रगते हो। य मर माधारण लागा की बातें हैं तुम्हें इन सवम पर रहना चाहिये। क्या क्या मधमान नहीं तुम उसी तरह म्ठी हुई आवाज़ में वन हा हूँ' मरी इच्छाएं नहा है। 7 म आजिजी म कहती हूँ दया तुम ममान की वापि क्या नहा यरते ? म आखिर नारी हूँ। मम ममाा में रहना है। मरे मामन रम्बा जीवन है जा जा मुये ज.५ जाना है। T मये रगता है वह क्षण आ गया है जब तुम मगे अपना वाहा में भरकर पहागे क्या 17 क्या जीना है। म जा तुम्हार माय हूँ। तुम्हारा यह वथन मुनन के लिए मर कान आतुरता में प्रतीभा परते हैं लेकिन तुम स्ठ हुए बिना कुछ योर चले जाते हो। जिस तुम्हारे मह म सुनने के लिए मरे कान सदिया से आतुर हैं मेरी आत्मा यगा-यगास प्रतीक्षित है तुम वह विना वर चर जात हा रक्नि म जानती हूँ कि कभी-न-कभी तुम यह अव म यहागे --आज नहीं तो कल कल नहा तो परसा कभी-न-कभी वह दिन अवश्य आयगा जव तुम मुझे अपनाओग क्यापि मने अब तक बहुत आखें देखी हैं उनकी गहराई में छिप भावा को पढा है तुम्हारी आंसा में घर पता निश्छल स्नेह निश्चित आ'वासन मुयसे छिपा नहीं है। नहीं मरी आखें धोखा नहा या सरती । वह दिन जरूर आयेगा और म उस दिन की प्रतीक्षा स्गी जम जमातर तक प्रतीक्षा वरूगी मेरे प्रिय । * नारी ४१ भगले दिन तुम 'इवनिंग शो' को दो टिकटें रेकर आते हो और मुपसे साय चलने के लिए जिद परते हो। तुम्हारी jि-सुलभ जिद पर जहाँ मुरे खोज होती है वही प्यार भी याता है। मैं हमार रहती हूँ "देवा, सारे पाच बज चुवे है, अव सिनेमा जाने का समय कहाँ है तुम उसी तरह मुह पुराये रहत हो, 'तुम पांच मिनट में तैयार हो जाना। टैक्सी नीचे खड़ी है। हम लोग अभी 'लाइट हाउस पहुंच जाते हैं।' में फिर हंसकर बहती हूँ, 'रेविन भरे आदमी, म पाच मिनट में की तयार हो सकती हूँ। मझे कपडे वाने हैं और दुलकरला है।" तुम जिद नहीं छोडते मवर पर रहते हा 'वाह, और भी बहुन-कुछ क्या करना है? तुम तैयार होता हो।' में मन ही मन बहती हूँ कि तुम्हें वसे ममगाऊँ नारी होते तो समयते। यतन म हार मान रती, और दोना हाथ जोडपर कहती हूँ 'अच्छा भावा, तुम नीचे चलो, म अभी पांच मिनट में तैयार होकर पाती हूँ।" और भी बहुत- पुरुष-स्वभाव की कमजोरी के अनुप तुम्हारी भी इच्छा यही है कि तुम दही यटे-य मुझे तयार होते हुए देखा यो कि में विस तरह साठी पोरती हूँ, लाउज और चाली उतारती हूँ, और अन्त में पटीकोट खोल्पर, विम तरह दूसरा पेटीबाट और चोरी और साउन और माडी पहनती हूँ किस तरह वगरा में और गरे पर पारडर लगाती है घरे का मेपअप करती हैं, वाल बनाती हैं। तुम यह सब अपनी यांला से देखना चाहते हो, एक ए२ बात अपने सामने घटते हुए देखना चाहते हो, लेकिन यहाँ मरी जिद के आगे तुम्हें हार माननी पडती है, और तुम मन में नीचे घरे जाते हा~~यह कहते हुए नि म जर म-जन्द तयार Tytary ४२ टूटनी माइयां म मन ही मन हँसती हूँ कि आमिर पुरुष हाता पुरुष ही है मान आदिम पुरप, उसी आदिम पागम्य पुष्प की तरह यह मान भी नारा को उगा नग्न स्प में देखने के लिए रालायित रहता है फिर चारे वह पुष कितना ही सभ्य और सुसरात और विद्वान् और बौदिर और कला प्रिय क्या न हो। ये मब चीजें भा अपनी जगह टार है रग्नि जहाँ नारी या प्रश्न आता है पुग्प आज भी मूरत वहा आदिम युग या भूमा बवर पा है। म कपडे बदलत हुए कुछ समय के लिए इन विचारा में गा जाता हूँ अचानक नीचे टैक्सी के हॉन की आवाज सुनार चौर उठता हूँ, और पुर्ती से तयार होकर दौटती हुई-सी नीच पहुचती हूँ। मुझे अपना आदिम पुरुष सूट और टाई में सजा हुआ टक्मो के पाम फुटपाथ पर व्यग्रता से चक्कर काटता दिखाई देता है। म प्यार से उनकी जार दखती हूँ और हौले से मुस्कुरा देती हूँ। हाल में जधेिरा होते ही तुम मेरा वाया हाथ अपने दाहिले पजे में पाड लेते हो। तुम्हारी पक्ड की दृढता देखकर म समझ जाती हूँ कि तुम आज बुछ निश्चय करवे आये हो, और तुम्हारे पजे स अपना हाय छडा स्ने का मुझे साहस नहीं होता। तुम मरा हाय अपनी गान में रखते हो और दबाते हो म हाथ खाचने की काशिा करता हू ता तुम उसे और ज़ोर से दवा लेते हो। म थानी दर निश्चल बठी रहती हूँ फिर सिहर कर एक झटके में अपना हाथ हटा लेती हूँ। कुछ मिनट बाद तुम अपना दाहिना हाथ मरी गदन के पीछे से दाहिने कधे पर ले जाते हो और वहा से नीचे सरका कर मेरे लाउज़ के भीतर डाल देते हो। जब मुझसे सहन नहीं होता तो म जबदस्ती तुम्हारा हाय हटा देती हूँ।

नारी ४३ तुम स्पष्टत दुग मान नान हो, मुयस पर हट जाने हो, और अपनी कुर्मी वे बायें हाथे पर कुहनी टिवार मामने दयने लगते हा । कुछ देर बाद मै तुम्हारी बार दवती हूँ,ता पाती हूँ कि तुम्हारी आयें वन्द हैं। तुम्हारे प्रति न जाने क्मो एक याणा में मेरा मन पसीज उठना है। तुम्हारा दाया हाय अपनी दोना येरिया में पर प्यार मनुहार भर भाव म दाती है, और अपना गाद म व रेती हूँ। तुम्हारा हाथ में हो-होते यावनी हूँउम तरह जम नि मा यपने स्ठे हुए थेट को मनाने और रारी गावर मुगते ममय करती है। कुछ दर तक तुम्हारा हाथ मेरी दाना हयेलिया र बोच निर्जीव-मा पडा रहता है। रि उममें हसत होती है। तुम बलिया व बीच में अपना हाय निकाल त हा और मरी गाल में नीचे की ओर दवात हो। तुम्हारा यह दवाव धीरे धीर भागे हाता जाता है। मैं प्रतिवाद करती हूँ तुम नहीं मानत तुम्हारा हाय फिर स बैरिया में एना चाहती हूँ, तुम नहीं रेने दत टमस अधिक प्रतिवाद करने का मुचे माहस नहीं होता और म पिदा होकर गान्त घट जानी है । अपनी जांधा दे वीच मरे चिनचिनाइट-सी होती है गदगुदा लगती है, और म अमहाप यठी रहनी हूँ। तुम्हारी मापा को बार दपने नर वा मुझे माहम नही हाता भय रगता है कि कहीं वहाँ भी वही दानव परा हुआ, नजर नहीं आ जाय, जिम म आज तर ननेतने पुरपा की निगाहा में दप चुकी है, और जिगस म तुम्हें दूर और ऊपर ममलती रही है। थोड़ी देर में ही मुग रगता है दि जिम पाय म मिहर कर मने तुम्हारी गाल से अपना हाय हा पिया था उमी म मरी अपनी तह भीग उठी है, वह अगग्य पिनाने कीडामा मरी दर व पारपार पर रो रहा है, अमस्य धापना-उपधारामा में होवर मर पर स प्रवाहित हो रहा है और में उसमें दूद रही हूँ म्दुद कोठूबने से बचाने के लिए, मुझे ४ टूटती पहा लगता है, मर मुह से एक भयावनी चीरा निार पडेगी म गल तर आयी चीस को विमा तरह रोमने या प्रयन घरती हूँ रपिन रगता है ज्वालामयी वो पोड पर उवर पडनवा' रावे की तरह वह चीम मरे गर बी नमा का फाड पर बाहर निरल आयेगी में एक्दम खडी हो जाती हूँ। कहती हूँ 'मुगे पर ले चलो। मेर स्वर का कम्पन और आंसा में छरछराय मासुमा को देखकर तुम सहम जाते हो और तत्यार उठ सडे हाते हो। सीढिया उतरत समय तुम मुरायमियत म मरा हाय दवाते हो, और कहते हा मुझे माफ कर दो। में रुधे गले स कहती हूँ तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर मेरे गले से चीख निकर जाती तो तो आगे के गद मेरे गरे म अटक जाते हैं । लगता है म रो पडू गो। गले तक आयी रलायी को रोकने के लिए म रलिंग का सहारा लेकर पल भर सीढिया पर सडी रह जाती है। तुम मुझे सहारा देने के लिए अपना हाथ मेरी ओर बढाते हो लेकिन पास से गुजरत लोगा की ओर देवकर हाथ रोग लेते हो और आजिजी से महते हो 'मुझे इस बार माफ कर दो। पता नही, उस समय मेरे भीतर कसा तो एक दानव समा गया था दानव का नाम सुनकर मेरे होठा पर पीकी मुस्कान आ जाती है। म तुम्हारी आसा की तरफ देखती है। वहाँ गहरा पश्चाताप है और है वही चिर-परिचित अपनत्व और आश्वासन का गीतल भाव । म मा वस्त होकर सीरियां उतरने लगती हूँ।

नारी ४५ तुम टैक्सी में अपने घुटने पर मेरा हाथ रखे उसे स्नेह से होले-होले सहलाते हो। टक्सी रेड रोड की चौडी सडक पार कर विक्टोरिया मदान के बगल से सरपट दौडती है । जब करीब आधा मैदान हमारे बगल से पार हो चुक्ता है, ता तुम अचानक ड्राइवर से टक्सी रोकने के लिए पहत हो, और खिड़की से बाहर गदन निवालकर कुछ देर मदान वी आर देखते हो फिर टक्सी मा दरवाजा सोलकर नीचे उतर जाते हो। म प्रश्नमूचक दृष्टि से तुम्हारी ओर देखती हूँ। तुम कहते हो, इम समय जी बहुत खराब है। सीधे घर जाने का मन नहीं है। आओ, थोडी देर यहा पदर चरेगे।" तुम टक्मी का किराया चुकाते हो । और कोई चारा न देख म भी नीचे उतर आती हूँ, और तुम्हारे वगर में पदी हो जाती है । हम दोना सडक किनारे बिजली के सभा के नीचे एकाकी सड़े है और हमारे बगल से कारें आ-जा रही हैं। हमारे सामने घुध में लिपटा धाम का एक लम्बा चौडा विगाल मदान पसरा पड़ा है जिसके उस पार भी कारा की रम्बी कतारा की छोटी बत्तियां रेंगती-सी दिग्वाद दे रही हैं। तुम मेरा हाथ पपडे घुध में लिपटे उस पास के मैदान पर उतर पडते हो। घास की मुलायम पत्तियां परा के नीचे दबने से एक अथव्य-सी मधुर आवाज होती है जो बेहद भरी रगती है। हम बुछ देर सामोश चलते हैं। कोहरे से कुछ-कुछ सीली हुई दूद की मुलायम पत्तियां मेरी चप्पल के किनारा से ऊपर उठकर तरवा का स्पा परती हैं। उनका शीतल स्पर्श मेरे अन्तस की समस्त जलन दर कर देता है।

४६ टूटती इकाइयों
सहमा तुम वहते हा तुम्हें पता है दम मगन में नई वारगत
हो चुकी है
.
म तुम्हारा आगय नहीं समा पाती।
पूछना है
पानी,
यानी पियरत्ता नगरी के ठीर सीन में बगा दा यह मूगूरत पाम
का मदान रात के समय वह बनाम समगा जाता है। यज्ञ आय ग्नि
व्यभिचार और बरासार और गाजनी और यहाँ तक गिर जाहि
की भी वारदातें होती रहती हैं। रात अधेर में इम मगन में जाना
काफी सतरनाव समता जाता है।
7
7
म मन ही मन सिहर उठती हू रग्नि कुछ करती नहा ।
तुम सीधे मेरी ओर दखबर पूछने हो क्या तुम्हें डर नहीं लगता
म तुम्हारे निकट खिसक आती
और गट पर चरते हुए कहती हूँ
'तुम्हारे साथ रहने पर भला मये किस बात का डर
तुम सहसा चरने चलते रुष जाते हो और पूछने हो इतना
विश्वास है तुम्हें मेरे ऊपर
हाँ। म सक्षिप्त उत्तर देती है।
तुम मरे कधै पक्ट रते हो और युकवर मेरी आँखा में दखते हो देराते
हो और देखते रहते हो । मुझे लगता है कुछ ही क्षणा में कई कल्प बीन
जाते हैं । तुम उसी तरह मेरी आसा में देखते हुए कहते हो सच में
तुम्हें बहुत चाहता हूँ बेहद चाहता हू अपने मन और प्राण और आत्मा
वी समस्त गति से चाहता हूँ।
मुझे लगता है आखिर वह क्षण आ गया है वह क्षण जिमको म सदिया
से प्रतीक्षा करती आ रही हूँ वह क्षण जब तुम कहोगे कि
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नारी ४७ लेकिन तुम वह नही रहत। तुम कुछ भी नहीं कहते। मिफ मेर क छाड देते हो, और कमर वे गिद वाह लपट कर चलने लगते हो। हम मदान बहुत-कुछ बीच में हैं। जिपर से हम आये हैं उम रेड रोड के होता किनारे दूधिया बिजली की बत्तिया के सभे दूर तब एक पतार में खड़े दिखाई दे रह है और बीच में इक्वी-दुक्की कारावी धामो वत्तियाँ रेंगती-मी सरक रही हैं। निस बार हम जा रहे हैं उधर चौरगी की व्यस्त सडक है जिस पर रेंगता कारा को वत्तियां दूर तक सीधी कतार में जाती दिनार दती हैं और पहर की अपेक्षा अव काफी निवट मालूम देती हैं। हमारी वाया आर कापी दूर धमतरे की ऊंची इमारता पर जलती हुई रग विरगी नियोन रास्टम जगमगा रही हैं जिनमें 'प्रन वाण्ड' चाय यौर 'कैप्स्टन' मिगरेट ये बडे-बडे रार अक्षर इतनी दूर से भी साफ पढे जा सकते हैं। हमारी दायी आर विक्टोरिया ममारियल की सफेद सगमरमरी इमारत है जो धुध में लिपटी हो के कारण इतनी नजदीक होते हुए भी माफ दिग्वाई नहा देती, महल उसके धरेगे आवार का मामास होता है। उम घुधर आकार के ऊपर आस्मान की बाली गहराच्या में पौवे ने चांद का आधा का टुपहा तर रहा है। मैं चांद की ओर देखकर विभार यावाज में पढ़ती हूँ, 'देपो, देवो, कितना प्यारा चाँद है। तुम एक बार चांट की ओर देखत हा फिर चाँद के नीचे घुप में लिपटी महारानी विक्टोरिया की सफेद मगमरमरी इमारत पी आर। फिर नम अपने में ही बरत हो दिन के समय इस सगमरमरी इमारत गुम्बज पर एप काली परी पस लगाये लास्मान की ओर दयती दिखाई देती है। म जब भी उमे दयना है मयं महसूस होता है पिसी ऋपि से पाप मे काई देव-बया स्वग म च्यत हावर मत्यराब पर उतर आयी है, और पत्थर की वाली मूत्ति में परिवर्तित होकर सदिया स इसी वरह इस इमारत व गुम्बज पर बडो-यहीस्वगरख ये अपने घर को और ४८ टूटती इकाइयाँ ताव रही है जहाँ उसमा नेवता उगको प्रना में आने विछाये वठा है। इम समय गुम्पन | ऊपर वह पयर की देव-नया रिमाई नहीं दे रही है, लगता है म यलोर पर छायी इम धुध का लाभ उठाार यह दव-कन्या ऋषि को आंग्या में पूल झार पर अपने पग फराय आस्मान की काली गहराइया में तर गयी है, और इस ममम अपने दवता की गो में सिर रखे सुप स सा रही है। तुम क्षण भर रककर फिर कहते हो रिन हमारे ऊपर ता क्सिी ऋषि का नाप नहीं है फिर हम लाग एक-दूमर स क्या नहीं मिल पाते ? इतने नजदीर होते हुए भी इतने दूर वया रहते हैं ? हमारे वीच से यह दीवार क्या नहीं हट जाती और क्या नहा हम मिलकर एक हा पाते ? तुम्हारी बोह का घेरा मरी कमर के गिद अधिर कम जाना है। इस पर में भी तुम्हारी देह की गर्मी मुझे अपने गरीर में महमूस होती है। मे अपना सिर तुम्हारे चौडे सीने में छिपा रती हूँ। तुम दोना वाहा में मुगे कम कर भीच लते हो। तुम्हारे सीने वे भीतर धडक्ते दिल को जावाज मुये साफ सुनाद देती है। लगता है यह आवाज़ अपनी हर धडकन के साथ मेरे काना में कह रही है तुम मरी हो तुम मेरी हो तुम मरो हो।" मुझे लगता है यही गर कहन के लिए तुम्हारे होठ भी फड रहे हैं लगता है बस भी ये शब्द तुम्हारे होठा से निकल कर मरे कानो में अमृत-वर्षा कर दगे और म पागल होकर इस कोहरे के सागर में झूम यूम कर नाच उगी कि सहसा हम छिटक कर एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। हमें लगता है, कोहरे की परता के पार वही पास से ही घास पर क्सिी के चलने की आवाज़ आ रही है। हम आखें गडावर देखते हैं लेकिन सिवाय धुष को अभेद्य दीवार के कुछ दिखाई नहीं देता। आवाज निकट आती भारी ४९ मालूम दती है। लगता है, दो भारी घट घास को रोदते हुए हमारी ओर बढे आ रहे हैं। मै भय स काप कर तुमसे चिपट जाती हूँ। तुम आश्वासन देने के भाव से मेरी पीठ थपकते हो, मजबूती से मंगै कलाई पक्ड रेने हो, और कोहरे के उस सागर में मुझे घसीटत-से दौडने लगते हो। हमें अपने पीछे -बूटा के दौडने की आवाज सुनाई देती है। रेविन हम पलट कर नही देखते, और बेतहाशा उस कोहर की दीवार को चीरते चले जाते हैं । कुछ ही क्षणा में हम मदान के इस पार बिजली के सभ के नीचे पहुंच जाते हैं। मेरी सांस धौनी की तरह चल रही है। म स्वकर सुस्ताना चाहती हैं लेकिन तुम मेरा हाथ पकडे तेज-नेज क्रमा से चौरगी की चौडी सडक पार करत हो, और एक खाली रसो को रकने का इशारा करते हो। म पुर्ती से टक्सी में चढ जान है। मेरे पलट के सामने जब टैक्सा रक्ती है तो म पूणत स्वस्थ हो चुकी होती है। तुम स्नेह स मेरा हाथ दवाते हो, और होने से मेरा गाल मपथपाते हो। म टक्सी से नीचे उतर जाती हूँ। टैक्सी चल्ने रगती है तो तुम खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आश्वासन भरी मुस्कान से मेरी आर देखते हो, और अपना दाया हाथ हिलाकर विदा रेत हो। म अपने हाथ का रूमाल हिलाकर तुम्हें विदा देती हूँ। जय तर टक्सी आँखा से आझल नहीं हो जाती, में रूमाल हिलाती रहती हूँ। फिर होठी के भीतर ही भीतर बुदबुदाती हूँ 'विदा, मेरे दश्य गोचर पुरुष, विना । विदा, मेरे अजमे शिशु के भावी जनक, विदा ।"

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पुरुष ५४ टूटती इकाइयां अपनी वाइ जोर बठी साथिा रावात परने वलिला तुम अपना पहरा 'म ओर घुमाती हा और दाण ये उम एक या में मगे जर में तुम्हारी नजर मिलती है तुम अविरम्य अपनी दष्टि हटा ग्ती हो । लेकिन क्षण व उस एप में ही म तुम्हारी दृष्टि में जो कुछ पाना हूँ वह मपेपोर-पार तत्र दहा दना है-गहरी उपमा तोपी हिरल । इसर वाट पूरी गाप्ठी वे दौराा तुम एक वार भी मरी आर नहीं देती उस उपक्षा और हिकारत भरी दप्टि म भी दुरारा मरा आर देखना तुम जरूरी नहीं समझता। इसके बार मुगे भी पता नहीं गाष्ठी में जोर क्या-क्या होता है। तुम्हारा दृष्टि की उपेक्षा और हिनारत की रपट में पुरुमता हुआ ममी उधेड-बुन में उलया रह जाता है कि क्या मैन सचमुच उस दिन भूल की' जो म कहना चाहता था और जो तुम सुनना चाहती थी और जिमक लिए गायद हम दाना ही महीना स प्रतीक्षा करते आ रहे थे और जिसका उम दिन हमें पूण सुयाग भी मिला था क्या सचमुच उम उस दिन न कहकर मने भूल की। लेकिन अब भी उस दिन की बात सोचता हू तो समय में नहीं आता कि जो कुछ मने किया उसके अलावा कुछ और कर भी क्मे सकता था? उस दिन का एक एक क्षण आज भी मरे सामने इस तरह स्पष्ट है गोया अभी घट रहा हा *** पुरुष ५५ * * * तुम जपन घर के दरवाजे पर पडी हो । टैक्सी रक्ते हो म बाहर निकलता हूँ और तुम्हारी ओर देखकर अपराधी की तरह मुस्कुराता हूँ। तुम भी कहती कुछ नही, महज हौले से हंस देती हो। मैं टवमी का खुला फाटक पक्ड कर एक जोर हट जाता हूँ ताकि तुम पहले वठ सका। अपने हाथ क गाति निकेतनी धग का पुरातो हुई तुम सहज मथर चाल मे टमी तय जाती हा, और सामने वठे ड्राइवर पर एक उडती-सी दणि डालकर पीछे की सीर पर बठ जानी हो एक पच से टशी चरनी है, तो में भर नजर तुम्हें देखता हूँ। तुम क्तिनी ताजा और प्रगल हो । तुम्हारी वाजीवरम की साडी और उसी डिजाइश के गउज़ स मट की तेज रपट चेहर पर हाल ही म किये मेर-अप से श्रीम, पाउडर और रूज़ को मिली-जुली महप जडे में लगी हुई फूला की वेणी मे चमेली की मीठी मीठी खुशबू, और सद्य-स्नाता युवा देह में एक विशप रिम्म को अनाम गघ निसत हो रही है। अभी-अभी पिली पलिका की मम्पूण ताजगी स्वच्छना और खुशबू तुम्हारी हर चीज़ में बनी हुई है। नती देर दरवाजे पर धूप में सडे रहने के कारण तुम्हारे ऊपरी हार वे वहुत मसण और भूरे चाला पर दो चार बुदिया. मी झलप यायी है। तुम अपने शान्ति निवेतनी बग से लाउज़ के कपडे की जिाहा का स्मा' निकालती हो और उन बुदिया को बहुत हले हाप स पुगारने की मी अदा से पाछती हो, फिर बैग से एक छाटा आईना निवार कर हाठा पर पाउडर का एक पफ दती हा तब सब चाजें वापस बग में रस रेती हा और मरी बार देखकर होल से मुस्कुराती हो। तुम्हार व्यक्तित्व में एक सुरुषि और विशेष प्रकार का आवपण सुदा रहा है जो इस समय अपने चरम पर है।

५८ टूटतीपाइयां एर हलके मटने से टक्मी करनी है। एम्प्टनर + चौराह पर लाल बती चमर रही है और हमारे आग-पीछे तया ताइ र कारा बमो और टक्सिया की लम्बी कतारें हैं। दाइ आर पी एक कार में अगली-सीट पर एक विगी-युगल यठा है। यवर या दाहिना हाथ स्टीयरिंग हील पर है और यायो हाय अपनी मायिन की कमर पर युवती का सिर युवर र कप पर है और पूण तप्ति एव मुम की भावना से उमने आँखें बन कर रखी है। युवक झुक्कर कभी उममी बन पलको भी माये और कभी रिपस्टिम' गो होठा को चूम रेना है। दोनो को इसकी तनिक भी परवाह नहीं है निजाम-पाम और आग-पीछे की कारो वाले उही की ओर देय रह हैं और गाय उन्ही की बातें भी कर म तुम्हारा ध्यान उनकी ओर दिलाता हूँ। तुम कुछ देर उदासीन भाव से उघर देखती हो विदेगी-युगल का ध्यान भी हमारी ओर आकर्षित होता है वे दाना अपन बाएं हाथ हिलाकर हमें विग' करते हैं और बत्ती के लाल की जगह हरी होते ही उनकी कार तेजी से आगे निकल जाती है। मैं तुम्हारी ओर देखकर प्यार से हमता हूँ कहता हूँ कि दरअसल जीना तो ये लोग जानते हैं मुक्त भाव से जीवन और देह को नियामता का उपभोग करते हैं । म एक बार फिर तुम्हारे नजदीक विमाने का प्रयत्न फरता हू , बीच के वग को उठाकर अपनी गोद में रखता हू तुम्हारा दाहिना हाथ अपनी दोनो हथलिया में ले रता हूँ और फिल्मी प्रेमियो के से अदाज में तुम्हारी आँखा में झांककर वहाँ अपनी तस्वीर देखने की रोशिश करता हूं। स्पष्ट ही में इस समय भावुक हो उठा हूँ मेरी साँस कुछ जल्दी चलने लगी है हाथ होले-हौले कांपने लगे हैं गिराआ का रक्त गरम हो उठा है और आवाज म भावावेग के समय की थरथराहट उभर थायी है। इसी आवेग में पता नही कसे कब मेरे वाएं पर का जूता तुम्हारी काजीवरम् साडी के नीचे झूलते छोर से छू जाता है । तुम्हारे ऊपर इस सब की प्रतिक्रिया विशेष अच्छी नहीं होती। ठडी हँसी हँस पुरुष ५९ कर तुम अपना हाय छुड़ा एनी हा, वैग वापस बीच में रख देती हा, और वही औपचारिक मुस्थान होठा पर लाकर बहती हो तुम फिर भटवने लगे न । सीधे वठो 11" मुये लगता है उपनते दूध पर विसी ने ठडे जल का छीटा मार दिया हो। मेरे तने हुए अगदीरे हो जाते हैं और म तत्क्षण अपनी स्वाभाविक दशा में लौट आता हूँ। तुम साडी के निचले छोर पर मेरे जूते से लगी हुई मिट्टी को झुककर स्माल से झाडती हो, फिर वहनी हा इन विदेशिया और विदशा सम्यता ने हमारे समाज को नष्ट कर दिया है। इनके सेक्स सम्बधी उद्धत व्यवहार ने हमार नाममा युवक-युवतिया को पय भ्रष्ट कर डारा है। तुम एक वजुग औरत के अदाज़ में वोर रही हो, हालांकि तुमने स्वय अभी पूरे तीस वसन्त भी नहीं देखे हैं। अपने क्थन की पुष्टि लिए तुम कॉलेज को छात्रामा के किस्से सुनाने रगती हो 'जद ये रडवियां हाइस्कूल से पहली बार कॉलेज आती हैं तो कितनी सीधी और भारी होता हैंजसे कुछ जानती ही न हा और पढने के सिवाय जीवन वा और काई रम्य ही न हो, रविन कुछ दिन बीतते न बीतते इन्हें कॉलेज की हवा लगनी शुरू हो जाती है और ये पिल्म-तारिवाओं को भी मात करने लगती हैं।' और तुम फिर बा में से आईना निकाल कर चेहरे का मकअप देखती होठो पर लिपस्टिर की एक ताजा परत चढ़ाती हो। "अभी उम दिन की बात है । म एक तले पर स्टाफ स्म के मामने खड़ी नीचे वडमिरन खेरती रक्षिा को देख रही थी। उनमें एक लड़की सरवार पुरते में पी। जब कभी 'कार' को जमीन से उठाने के लिएवह ६० टूटती माया नीच सुरती, उमा लोपट कुरत में सदाना वा माफ लियाई दे जात । मुझे बेह बुरा रगा और वितपणा हुई । मन वही म पुधार कर कहा वि खेल सम्म हान व वा मुझग स्टाफ म्म में मिट । जब यह आयी तो मन उस बहुत पिया कि कुर तीन महीन पहर करिज में भर्ती हात समय वह कितनी सीधी थी और अब उसा क्या रग-दग हैं। साप स्म स बाहर अप बहुत-गी लडकियो गानें पायदापर दरवान के भीतर झार रही थी, और मुह में दुपट्टा या साडी वा पल्ला टूग हम रही था। वह सड़की जब तक भीतर रही नीची गगन पिये चुपचाप मेरा प्रवचन सुनती रही, लेकिन स्टाफ रूम स बाहर निकलते ही अप लडरिया व साथ मिलकर वैगम की तरह हेमनी हुई माग गयी। कोर के मारे मेरा खून उवर उठा लेकिन उपाय हो क्या था। टक्सी ये फाटर का कांच नीचे गिरा हुआ है और घूप तुम्हारे सुल गले स होती हुई ठोडी हाठ और नासिका छिद्रा पर पड़ रही है। तुम्हारे गरे की सलवटा और होठा पर पसीने की हल्की नमी आ गयी है । तुम स्माल से उमे पाछनी हो और कांच ऊंचा उठा रती हो। टक्मी बडा पुल से गुजर रही है। पुल के दाएँ चारों नदी के दाना किनारा पर छोटी-बडी नाव और छोट छोटे स्टीमर खडे है। कुछ नावें और स्टीमर पुल के नीच से आ-जा रह है। पुल की ओर आते एक स्टीमर की रेलिंग के सहारे धोती कुरते म एक युवक और चौडे पाड की साडी में एक युवती खडी है। युवक का हाथ रेलिंग पर रखे हुए यवती के हाथ पर है। दोना रह रहकर प्यार भरी नजर से एक-दूसरे की और देखते है दवे-दचे हंसते हैं और फिर नीचे झववर जल में कुछ देखने लगते है। युवती की मांग में गहरे लाल सि दूर की मोटी लकीर चमक रही है। उनकी आसा वे सलग्ज भाव और दबी-दबी हंसी से लगता है कि वे नव विवाहित हैं और इस समय स्टीमर पर पूरे पुरुष ६१ परिवार के साथ हैं पारण व रह रहकर छिपी नजरा से पीछे की ओर भी देखते जाते हैं। नव-परिणीता दम्पति के सम्पूण हाव भाव म एक ऐसा माहब आकषण है, एक ऐसा घरेलूपन है, अपनापन है कि मुझे लगता है उस जनरहे को तुमसे कहने का यही उपयुक्ततम क्षण है। मैं तुम्हारा ध्यान उस युवा दम्पति की ओर दिलाता हूँ और कुछ कहने के पूर्व, प्रतिक्रिया जानने के लिए गौर से तुम्हारे चेहर की ओर देखता हूँ। तुम एक उडती-सी नजर उस दम्पति की ओर डालती हा, फिर पूववत अपनी बात म लग जाती हो। तुम इस समय अपने कॉलेज को अव्यापिकाआ वी चर्चा कर रही हो, और नारी-मुलभ ईर्ष्या तया द्वेष का यथेष्ट परिचय दे रही हो। तुम बताती हो कि किस तरह तुम्हारी एक साथिन का दिन भर बनाव शृगार से ही फुरमत नही मिलती, तो दूसरी का बॉय फ्रेण्डस से मिलने-जुलने और फोन करने तथा शेष समय में उहा की चर्चा करते रहने का राग है। तुम क्षण भर रक्ती हा, और एक अयपूण मुस्वान से मरी आर देखकर अपनी तीसरी माथिन की बात बताती हो कि कुल एक महीने पूर्व उसकी गानी हुई, अभी-अभी वह कश्मीर से हनीमून मनाकर लौटी है और अव किम तरह मांग में ढेर-मा सिन्दूर या कॉलेज में चहक्ती फिरती है और मारे जाग तीन-तीन चार चार सीढियां एक ही फ्लांग में चढ जाती है और स्टाफ रूम में हर सास के साथ पांच बार अपने 'उनकी और हनीमून की चर्चा करती है। अपनी साथिना की चर्चा करने में तुम्हें इतना रम आ रहा है कि स्वय को योडी दर क लिए एक्दम भूल जाती हो-भूल जाती हो कि तुम्हार गले की सलवटा पर जूड़े के नीचे गदन पर और होठा व बाला पर फिर स पसीना झर आया है स्लीवलेम ब्लाउज के दाना काने वगरा में भीज उठे हैं और अब रिपस्टिव तथा चेहरे क मेकअप पर भी प्रमश धूप का असर होने लगा है।

६२ टूटतो इकाइयां अचाना हबडा पी तग गरम पर टक्मी रक्ती और ड्रा'वर बताता है कि इजन गरम हो गया है और उसे टकी में टडा पानी भरना होगा जिसमें पांच-मान मिनट का समय रग माता है। तुम्हें तवाल अपनी देह और मेकअप पा ध्यान आता है। तुम गान, गर हाट भौहा और वगला का पसीना पाछनी हा, फिर वग म आईना पाउडर आदि निकालकर मकअप संवारने में लग जाती हो । बस्ती की यह सडक तग है और दोना आर छोटी छोटी दूकानें हैं। टक्मी को सहसा बते देवार कुतूहलवा आस-पाम भीड लग जाता है। कुछ झांककर भीतर शृगार करती नारी को भी देखने में नहा हिवक्ते रेक्नि तुम निश्चिन्त होकर अपने माज-गंवार में मग्न रहती हा । मुझे न जाने यह मब वसा कमा लगता है। मैं उतरवर सडर उम पार की दूकान पर चला जाता हूँ, और उस समय तक वही सडा सिगरेट पीता रहता हूँ जब तक कि ड्राइवर मीट पर नहा वठ जाता। मरे ट क्मी में आकर बठते ही तुम हवडा की इस तग और गी वस्ती सडक के दोना ओर सडती नालिया छोटी छोटी धूल भरी बदतमीज़ लोगा की शिकायत गुरू कर देती हो यहाँ तक कि सूरज की तेज धूप को भी नहीं छोडती । म होठा पर वही औपचारिक मुस्कान ले आता हूँ जो अब तक तुम्हारे होठा की सगिनी रही है । लेकिन तुम इस परिवतन पर ध्यान नहीं देती, और पुन कालेज की साथिना की चर्चा शुरू कर देती हो और निस्सकोच होकर एक-एक का भण्डा फोडने लगती हो। बीच बीच में हवडा और शिवपुर की तग और गदी बस्तियो की धूल और धप पर भी नाक भौं सिकोडती रहती हो । आखिर बोटनिकल गाडन के विशाल लौह-कपाट के सामने टक्सी रक्ती है ता तुम चेहरे और गरे और गदन से धूल और पसीना पोछती हुई टक्सी दूकाना और पुरुष ६३ से बाहर निकलती हो, और लगभग एक छोटी बच्ची की तरह उमग में भरकर गेट की ओर दौड पडती हो। में टक्सी वा किराया देकर गाडन के भीतर आता हूँ ता तुम्हें ताल के किनारे मत्रमुग्ध-सी सडी पाता हूँ। तुम हुलस कर मेरा हाथ पकड रेती हो, और ताल की ओर इशारा करके कहती हो 'देखा, देखो क्तिने वटे-बडे पत्ते हैं । विनने हरे, चिकने और गोल । बहुन बडे थाल की तरह गोल-गाल । समूचा तार इन कमर-पता से भरा हुआ है। अच्छा अगर म उस पत्ते पर पालथी मार कर बैठ जाऊँ, तो . तुम एक मासूम बच्ची की तरह मचलकर रहती हो। इस बात की तुम्हें अब विरकुर चिता नहा है कि रास्ते की धूल और धूप ने तुम्हारा मेकअप नष्ट कर दिया है। मोद में भरी हुई, मुझे लगभग खीचती. सी, तुम डामर की उस दपण-सी स्वच्छ सडक पर बढ चलती हो जिसके दोना मार ताड के रम्वेरम्वे पड हैं । दूर तक एक ही कतार में खड़े रंगभग समान आकार के ये पेड क्तिने सुदर दिखते हैं कि इनके साये जड़ा के पास भयभीत-मे सिमटे हुए हैं और पूरी महक मूरज की तेज धूप में कांच की तरह चमा रही है । वहा-कही तावामी खून-सा गाढा डामर भी झरक आया है। हम दोना की परस्पर गुयी हुई हथेलियों पसीने से पसीज उटती हैं तो म अपना हाय छुटाकर रूमाल से हथेली का पसीना पाछता हूँ। तुम अपनी हथेली को साडी में रगडकर पाछ रेनी हो। हमारी दृष्टिया छायादार जगह की तलाश में भटक रही हैं लेकिन सब कुछ तेज धूप में झुलस रहा है। तुम्हारा प्रारभिर उत्साह मद पड़ने लगा है, और हम राना के मन में इम ममय एक ही वात चक्कर काट रही है कि कही कोई सीतर छायादार जगह होती, जहाँ वठपर हम पमीना सुखा सकते।

मडगे ६४ टूटती इकाइयो दूर हमें एक छाटा पोवर रिपाई देता है जिगो किनारे पर ऊंचा छायागर पड़ मा है। गह्न की मांग ल हम पावर की ओर वरते हैं और वहा पाम मूगे पता और निनराव ऊपर बन धूप-छाया के बल-बूटा पर रूमार विद्यावर वठ जात है। बठते ही तुम अपने नीच स रूमाल निकाल एना हा क्यादि पसीना पाछने के लिए तुम्हें उनकी जरूरत महमूम हाता है। तुम खूब रग' रगड कर चेहर गदन, गरे और वगला वा पमीना पाटनी हा । तुम्हारा रूमाल पसीने स भोज उठता है लेकिन तुम्हें पिर भी मतोष नहीं हाता। तुम अपनी साडी के पल्ल म रही-मही कमर पूरी करती हा फिर रूमाल का निचारवर सूखने का फ्ला देती हो महिला का फीता ढीला कर उसे खाल दती हा, पर पाकर आराम स वठ जाती हा, एक तिनका उठावर दांता से बुतरने लगती हा और मरी आर दखती हुई महावी का एक गीत गुनगुनाती हो । पास से किसी चिडिया के बालने की मीठी आवाज़ आती है, तो तुम गदन ऊंची करके इधर उधर देखती हा रेविन चिडिया दिखाई नहीं देनी हालांकि आवाज़ बरावर आती रहती है। अब तुम चिडिया की आवाज में सुर मिलाकर गुनगुनाती हो। सटक के छोर पर छात्र जसे तीन युवा दिखाई देते हैं। वे एक्टव तुम्हारी आर देखते हुए आ रह हैं। निकट आने पर उनकी सीटी और अकारण जोर-जार से हसने की आवाजें सुनाई देती हैं। बगल से गुजरकर जब तक वे आखा से ओझल नहीं हो जाते, बराबर पलट पलट पर तुम्हारी ओर देखते रहते है। उनकी इस बदतमीजी की आर म तुम्हारा ध्यान दिलाता हूँ ता तुम महज हंस देती हो--ऐसी हसी जिसम सतोष और विजय का मिला-जुला भाव पुरुष ६५ निहित हाता है। तुम अयपूण दप्टि म मेरी और दखनी हो, और इस वार कोद फिन्मी धुन गुनगुनाने रगती हा। तुम्हारी दष्टि में प्रतीक्षा है यह प्रतीमा कि म तुमस गाना मुनाने के लिए कहूँ, रेक्नि म ऐमा कुछ नहा कहता, तो मग तुम्हारी बासा का भाव वदरने लगता है, उनमें अपमान-जनित क्षाम उभर आता है लेकिन म तव भी चुप रहता हू। इसलिए वि में इस समय तुम्हारे चेहरे को गौर से देख रहा हूँ जहा कुछ हिम्मा का रग ता अभी तब भी त्रीम और पाउडर की तहा के कारण सफेद है, लेकिन शेप हिम्मा का मेकअप उतर जाने के कारण भीतर की असली मटमली-मी खाल निकल आयी है, गाला पर लगा हुआ रूज ग्रायव हा चुका है और नीचे से मुहासे और पुसिया बड़े आकार में उभर आयी हैं। यही हाल हाठा की लिपस्टिक् का है जिसका रग गहरे लाल की जगह वही गुलावी, कही कारा और कही-वही सफेद हो आया है कुल मिलाकर तुम्हार चहर का रूप इम ममय कुछ ऐसा अजीबागरीव है कि म उघर में दष्टि हटा नहीं पाता। या एक्टर तुम्हारी ओर देखने का गायद तुम गल्त अय लगा रेती हो। क्षाभ की जगह तुम्हारी आंग्या में पिर उम्मीदें झरक आती हैं। तुम रजाने का अभिनय करती हुई दष्टि परे हा रती हा चहरा आँचल स ढक लेती हा और एक रजीली नव विवाहिता वधू के म अदाज में कहती हा 'ऐमे क्या देख रह हो हमारी आर मुझमे और महन नहा हाता। गले में कुछ अटक्-मा जाता है और विनष्णा समुह वा स्वाद खट्टा-खट्टा हो उठता है। म एक्दम उठ उडा होता हूँ, वहता हूँ "यहां मच्छर बटुन वाटते हैं और प्यास भी लग आयी है। चरी, पायद कही पानी मिल जाये। तुम पिम-सारिता की तरह मचर कर कहती हो "हमसे उठा नही जाता। हमारा परमा गया है । लो, हमें सहारा दो।' १ ६६ टूटती माझ्या प्रयत्न तुम एक हाय मगे ओर वटा रती हा और मुझे लगता है, अचाना तुम्हारा गरीर बहुत भारी हो उग है मर उगप उगा नहीं। 4 बावजूद मरे हाय की परडम तुम्हारा हाप छर जाता है और तुम आधी उठी हुई वापम वठ जाने को मजबर हो जाती हो या पहें गिर-मी पडती हा। तुम्हार मुह म एक्त्म निकलता है जानवर। मुये अपने कृत्य पर ग्लानि महमूम होती है। म तुमसे क्षमा मांगता हूँ। लेविन तुम्हारा गुस्सा गान्त नही हाता। तुम खडा हार मुह पुगए चरने लगती हो। हम चुपचाप चलते हैं। मरी निगाहें पानी तलाती हैं लेकिन सिवाय काई जमे हुए पोखरा के और वही पानी का चिह्न नजर नही आता। सब कुछ जसे तेज धूप में झुलस रहा हो। सड़क के दोना ओर की हेज फूल, क्यारियां, यहां तक कि घाम और पेडा के पत्ते तक जैसे प्यास से व्याकुल हो । मुझे याद आता है इस बोटनिकल गाडन्स में एक बड़ा भारी बरगद का पेड था जिसके नजदीक दो-तीन होटल थे। पूछने पर पता चलता है कि कुछ दूर आगे जाकर वाएँ मुडते ही वह बरगद का पेड है । और जब बरगद का पेड़ दिखाई देता है तुम्हें खुश करने के इरादे से म कहता हूँ 'तुम्हें मालूम है यह पेड दिनने सौ वर पुराना है ? देखने में तो या लगता है गोया यह एक पेड नही वरन सो से भी अधिक पेडा का झुण्ड हो, बता सकती हो इनमें मूल पेड कौन-सा है ? कहते हैं मूल - पुरुष ६७ पड को जो जटाएँ निकरी उन्हाने नीचे झुक्-युक्कर जमीन में अपनी जहें फ्राला, और अब यह बताना भी मुश्किल है कि मूल पेट कौन-सा है, बल्कि रोगावा तो यह विश्वास है कि मूल पेड कभी का नष्ट हो चुका है, और अब यह जो कुछ बचा है वह उमी का एक पूरा परिवार है।" तुम कुछ जवाब नही दती। पडा ये झुण्ड के भीतर मे चरती हुई एक तने के पास रखती हो जिम चारा आर गोर चबूतरा बना हुआ है। रुमाल से चबूतरे की मिट्टी और गद झाडनी हो फिर वैठने हुए कहती हो "तुम पानी पी आओ, म यही वठी हूँ। पानी अभी तक तुम्हारा गुम्मा शान्त नहीं हुआ है। मै कुछ कहूँ इसके पहले तुम चबूतरे मे वापस खडी हो जाती हो और कहती हो "यह चवूनरा तो जल रहा है । म यही सही हूँ। तुम्हें प्यास लगी है, जामो, पानी पी आयो।' में आजिजी से बहता हूँ 'दसो, मैं तुमसे क्षमा मांग चुका हूँ। सच कहता हूँ मने जान-बूझ कर तुम्हारा हाय नही छाडा था। पना नही, उस समय मुझे क्या हो गया था? एक्दम अनजान में ही हाथ छूट गया। लो, में कान पकडता हूँ, अव तो एक बार हम दो।" तुम्हारे राल और गुलामी और मफेदी मिश्रित तिरगे होठा पर एक फ्रीकी मुम्बान याती है। मैं उमाहित होकर तुम्हारा हाय परहता हूँ, बहता हूँ 'प्याम ता तुम्हें भी लगी होगी, बल्वि तुमने अब तक कुछ माया भी नहीं है, पग, कुछ या हैं। तुम अपना हाय छुड़ा रेती हो, और मेरे गाय चग्ने रगती हो।

कुछ कम और ६८ टूटती भाइयो आसिर एव पनार में पुराने फ़्म के छपर वाउ तीन हाल निमाई ने हैं। तीना की छत एक है और मन में भी य एष जम गित हैं। तीना में ही गदी-गी कुछ बुमिया और मजें पड़ी है। हम विनार बाल होटल की एप मज व आमने-सामने वह जाते हैं। म मर हाप पंट और बनियान वाल डब म दा आमरट, चार टोल, दो कप चाय लाने व शिा बहता है। भिनभिनाती मक्सियावाली जिन गी प्लेटा में वह कम, आमल्ट और टोन कर आता है, उन्हें दसपर छूने की भी इच्छा नहीं होती रविन शाप तुम्हें भूप बहुत जार से लगी है। म जन तक चम्मच स उन्हें उलट-पलट कर देखता हूँ तब तक तुम जल्दी जल्दी खाना शुरु कर दती हा । तुम्हार तिरंगे हाठा और दांता की विचित्र हरवत की आर स में वकिल अपना दृष्टि हाता है। तुम्हारे साने के टग को देखकर मुझ उम भिकारिन का ध्यान आता है जो जूठन मिलने पर इमी व्यग्रता स रोटी का टुकडा चवाया क्ली है। मर गले में कुछ अस्व-मा जाता है टोस्ट व टुबडे को चबापी हुई गदी को म पानी की घूट के साथ किसी तरह निगलता है। तुम्हारे प्रति, इम हाटल प्रति और सब कुछ के प्रति एक लिजलिजी वितृष्णा म में सिहर उठता हैं। खा-पीकर तुम तप्ति की सांम रतो हा और दाना बहि पलार देह तोडती हुई उठ खड़ी होती ।। होटल के बाहर आकर तुम मेरा हाथ पक्ड रेती हो और कहती हो मुझे नाव में बटना बहुत अच्छा लगता है । हम नाव में वापस चलग । में जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता हू नाव द्वारा लोग्न में अमित समय लगने की सभावना है लेकिन म तुम्हारे प्रस्ताव का विरोध नहीं करता असहाय होकर जसे स्वय को तुम्हारी मर्जी पर छोड़ देता हूँ। तुम्हारा पुरुष ६९ 1 हाय मुये बेहद टण्डा और निर्जीव रगता है, जसे वह किसी ताजा लाश मा हो। म सिंगरट जलाने के बहाने हाय छुड़ा लेता हूँ। हम घाट के पास पहुंचते है तब तक सूरज सिर पर से नीचे की ओर सरप चुदा होता है, पडा के माय भी लम्बे होकर पमरने लगत हैं कि पूप में तेनी अब भी वैसी ही है। घाट के ऊपर पद्रह-बीस लोगा की भीड है निनमें स्नियां, पुग्प और बच्चे मभी है। तुम्ह ऊपर घाइवर म नौच जाता है, और पानी के पास वाली मवो निचरी मोढी पर खडा हविर लहरा के झूले पर हौले-हो झूलती नाग में से एक छोटी नाव बाल में बात तय करता हूँ। वापस आता है ता पाता हूँ कि तुम नर के पास की हुइ मुह धो रही हो। गीली हान से बचाने के लिए तुमने मागे कुछ ऊची चयावर घुटना के बीच दबा रखी है, जिससे तुम्हारी पिपरिया ग्विाई दे रही है-~-मटमले रंग की , भूर वाला वाली ढीली होती पिडरिया । मरी द प्टि रदय से तुम गरमा जाती हो, और धुरनाक बीच दबी हुई साडी वट नोची हो जाती है । 4 स चहरा पाठ कर जब तुम मरी ओर मुखातिब होती हा तो म एकाय तुम्हें पहचान नहीं पाता। लगता है तुम भोई और हो । "गता है तुमन अपने चेहर में एक नर उतार दी है और अब जो चेहरा मामो है वह इमक पहले मग दबा हुआ नहीं है। तुम्हारे चेहरे पर अब तक छिप हुए गढे अधिक गहरे हो गये हैं नया मुहास और पुमियाँ बडे हावर उभर आये है। लिपस्टिव पा-गुछ जान में कारण होठ एक्दम मफेद शिवाई देते है, लगता है, उनमें पन बिल्कुल नहीं है। मामने के चार तिरा गये हैं, और काना मे हट जाने के कारण बडे-बडे कान निवाई दने लगे हैं। जडे के घाट उपर नीच निकर आये हैं, जिनमें अटकी मूवी देणी अजीबोगरीब लगती है । मुझम अधिक देर तक तुम्हार चहरे की ओर देखा नही जाता। - घाट ७० टूटती इकाइयां वी सीरिया की आर यदुना हुआ वहता हू पि नार बार से बात हो गयी है, और वह हमारा इतजार कर रहा है। तुम कमर न पाम स माग ठीव करती हुई मरे पीछ-पीछे सीरिया उतरन रगती हो। नावका देखकर तुम युग हा उटती हो, चहार कहती हा 'ओह कितनी अच्छी लगती है ठीर जसी बगारी फिमा में दिखाई जाती है।' मेरे हाय का महारा लेकर तुम नाव पर चरती हो और चटाई की अद चद्रावार छत के नीच जाकर धम् म वठ जाती हा । म भी दीवार का सहारा लेकर घट जाता हूँ। यहाँ छाया है। लकडी के जिस परटे पर हम बठे हैं वह भी नीचे पानी से सम्पवित रहने के कारण ठप है। नाव के चलते ही नटी की गीली हवा का एक झाका भीतर आकर हमारे सतप्त तन मन की शीतल कर जाता है। म मुकून की सांस लेता हूँ। नदी का तट मा दूर हाता जाता है। वहां खडे स्त्री-पुरुष और बच्च कमश छाटे होते हुए खिलौना जसे लगने लगते हैं। उस पार जट मिला की चिमनियां अब अपेक्षाकृत निक्ट और बडी मालूम देती हैं । लहरा की ममर धुन और एक लय में वधी हुई चप्पुआ की आवाज़ हमारे तन-मन का तनाव ढीला कर देती है। समूचा माहौल सहसा सगीतमय हा उठता है। हमारी नाव लगर डाले हुए एक जहाज + बगल से गुजरती है तो डेव पर खडे तीन चार खलासी जोर से एक फिल्मी गाना गा उठते हैं । तुम होले से हंसती हो फिर मरी आर जरा झुक्कर कहती हो "उन लोगो को हमारी यह सोनार-तरी क्तिनी रहस्यमय और रोमाटिक रग रही होगी ।

पुष ७१ "तुम मोने के बल लेट जाती हो और अथपूण दृष्टि से मेरी ओर देती हुई टोगें हिलाने रगती हो। फिर नजदीर खिसक कर चेहरा मेरे घुटना पर रख देती हो। कुछ देर घटना के पास फूली हुई पतलून को दौता में भीचकर खिरवाड करती हो फिर घुटना पर अपने गाल रगडती हुई बिना मेरी ओर देखे हौले-हौले रहती हो 'तुम सुवह टक्सी में कुछ कहना चाहते थे न" मेरा ध्यान इम समय तुम्हारे वाला की ओर है। मुझे लगता है, चाला की एक पूरी तह तुम्हार सिर म खिसककर अलग हट गयी है। एकाएक मैं कुछ समझ नही पाना, आँखा में आश्चय रिए विमूढ-सा देखता रहता हूँ इमलिए जब बात समझ म आती है तो एक अप्रत्याशित धक्का-सा स्गता है, और इस सब में मैं तुम्हारा श्दन नही सुन पाता। पूरे एक मिनट तुम उत्तर की प्रतीक्षा करनी हो, फिर चेहरा उठापर मेरा और देग्मती हो कुछ देर एक्टक देखती रहती हो गोया मेरी आँखा का भाव पढने की कोशिश कर रही हो और पता नही मेरी आँखो में क्या पडती हो, कि सहमा एक झटके मे उठकर बैठ जाता हो और इसके पहल कि म कुछ कह, दोनो हथेलिया में अपना चेहरा छिपाकर सुवरने लगती हो। में चुप वठा खता हूँ। थोडी ६ रो लेने के बाद तुम जसे कुछ निश्चय कर लेती हो, मेरी और पीठ करके रेट जाती हो, और कुहनी के बल सधै हुए बाएं हाथ की हयेरी पर सिर टिका पर नदी की लहरा और दूसरे किनारे की चिमनिया को देखो रगती हो। जिस अदाज से तुम लेटी हो, उसमें तुम्हारा गउन सीने के पास से फूर आया है, और ला पट' ब्लाउज के गले में से तुम्हारे उभार माम के दो भारी और निर्भाव रोयडा-से दिखाई दे रहे हैं।

७२ टूटतो इकाइयाँ शायद तुम्हारी वुहनी दुपने लगती है । तुम ल्टीनी ही सीधी हो जाती हो और दोना बाहें सिर के नीचे एगाये पूय दष्टि म घटाइ की अद्ध चद्राकार छत की ओर तापनी हो । इस समय तुम स्तिनी बडी दिख रही हो। तुम्हारा गरीर रिम कदर फैला हुआ और ढोला रग रहा है । भ्रम होता है गोया नगे भीतर से निकाल कर एक प्रौटा की लाा वहाँ लिटा दी गयी हो । में एक अनाम भय से मिहर उटना हूँ। तुम्हारी आर मे आम हटा लता हूँ और अद्ध चद्राकार छत के नीचे से निकल कर बाहर चप्पू चलाते एक मांझी के पास पटरे पर वठ जाता हूँ। आउद्राम घाट पर नाव रगती है तो म पहरे नाचे उतर जाता हूँ। जब तुम उतरने लगती हो तो सहारा देने लिए अपना हाय तुम्हारी ओर बढाता हूँ। लेकिन तुम मरी ओर नहा देसती मेरा हाथ भी नहीं थामती बिना किसी सहारे के ही संभल-संभल कर पर जमाती हुई नीचे पथरीले ढाबा पर उतर आती हो। हम सीरियां च कर उपर आते हैं, तो म तुमसे पूछता हूँ कि क्सिी रेस्तरां में चलकर एक कप काफी पीना पसन्द करोगी या सीधे पर जाना । तुम उत्तर नहा देती और सामने से जा रही टक्सी को हाथ से रखने का सकेत करती हो । रास्ते भर हम दोना चुप रहते हैं। घर के सामने टक्मी रक्ने पर तुम बिना कुछ बोरे उतर जाती हो और बिना मेरी ओर एक बार भी देखे दरवाजे की ओर बढती हो। टक्सी के सुले फाटक पर एक वाह रखे म तुम्हारे दूर होते आकार को देखता हूँ। मुझे इस समय फिर लगता है कि तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ या तुम्हारे जिस रूप को पहचानता रहा हूँ वह यह नहीं है । इस समय तुम तुम नही हो लगता है हजारा वप आयु की एक बुढिया हतारा कोस पदल चलने के कारण

पुरर ७३
यक चुकी है और अब अपनी मजिर आखिरी पडाव की ओर
लंगहाती हुई चरी जा रही है।
*
*
*
और आज
तुम प्रशमका में घिरी पडी हा जा तुम्हारे गीत की गारीफ पर रहे हैं ।
होटा पर अपनी चिर-परिचित जौपचारिप मुस्थान चिपाये तुम सबकी
प्रामामा और वधारया को ग्रहण कर रही हो ।
तुम इस समय कितनी ताजा और यायपा लग रही हो-~जाने दिना
में आम-नहायी मफेर पातीगी।
में पांच यप पहले वे गाद परिचय पारी मुस्कान यरवम अपने हाठा
पर र आता हूँ, और तुम्हारी और बत्ता है।
*

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. पत्नी

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पती मुझे किस जनम के पापा का पर दे रहे हो भगवान अपनी जान म मने इम जनम में नो कोई पाप क्येि नहीं, पता नहीं, किस जनम में कौन-में पाप क्यि थे जिनवा अब पिगश्चित करना पड़ रहा है। मेरी जान को यह क्या जजाल लगा दिया है मेरे परमात्मा নিয়তি मरने भी नही, बस, मेरी जान का चिपक रटते हैं। मरवहा बडकू गरी किये जा रहा है कि खाऊगा ता तेरे ही हाथ से । अव म तुझे खिलाऊँ कि ये बची हुई रोटिया संक? यह लो, छोटर भी गला काटने लगा। अभी-अभी ता उसे यपरवर, किमी नाह कमरे मे सुगर आयी थी और रसोई में बैठार दो रोटियाँ भी नहीं सकी हागी कि उमने पिर गीत गाना गुF बर दिया। उसे लाकर ये मूखी छातियां जब तक उस मुह में नही ठूम दूगी करमुहा इसी तरह सप्तम स्वर में चीयता रहगा। 7 हैं,अबता चुप हा जा अर, क्या चवा ही डारेगा, मरभुक्षा छाद, अरे छोट न, दूध है यहाँ न मूली छातिया मजा झिंयोडे जा रहा है। रेवर दिन में दो बार स्पी-भूत्री गाटिया खाने को मिली हैं, तो दूध यहाँ न उतरे तर वाप की ममूचा कमाई ता उम चहनी' के पीछे सरच हो जाती है, मुझ पर भर खाने को मिले तो यहाँ से? लो, अर इम वन्दे ने पिराना शुरू कर दिया। छोटा को गाद ७८ टूटतो इकाइयों मैं क्या र लिया, इसकी जााही निकर गयो। अब म तुम नाना वो गर में लिये वठी रहूँ या परात य ग आरे वा सनम यर । हगापिया ये नाय पर मुनाग मरी पुर गत वी एव पुकार पर तुम नग परा दौडे आय ५ जवामिया कीरमा गिा अपनी एक अगुरी पर गावरधन परवत का धारण कर लिया था आवाज तुम तर नहीं पहुंचती मर कान्हा क्यामरी २ अरे कुछ बोलगा भी या इसी तरह गग पार जायगा' टीर म बोल यू मेरी समझ में नहीं आती तरी भाषा क्या वहा तमतम सायेगा? यहाँ राटियावे लार पडे हैं, और तुये चमचम खाने की अच्छा अगर चमचम ही खाना है ता थाडी दर जा को बस में रग्द । अभी तरे पापा उस चुडर' के साथ मिटादया व पाक्टि रवर जाते हागे-तुझे भी बचा-खुची मिर जायेगी । मूझ रही है। । । चुडर बेगरम कही की। क्स रडिया की तरह सालह मिणगार वरखे तुम्हारे साथ गयी है ।।। मने तो लाज मारे मुह फर लिया था लेकिन वह निरलज्ज तो लाज गरम जसे घोलकर पी गयी है अव भी याद करती हूँ तो घिरणा सीमिचाने लगता है क्षा तक नगी वाहे, पीठ पर तो लाउज जस था ही नहीं, सामने भी छातिया ता पटा हुआ था पता नही, ये आजकल की परी लिखी छोरियां पेट और कमर क्या दिसाती फिरती हैं | लाउज तो हम भी पहनती हैं किन क्या मजाल जो दह का कोई अग दिख जाए । लकिन ये पढक्वड लडकिया तन ढकने को कपडे थाडे ही पहनती हैं इनवा बस चल तो नगी ही सडरा पर घमा करें। ला, वैचारा छाटक आखिर भूखा ही सो गया । दूधवारा भी ता अभी पत्नी ७९ तक नहा आपा, वरना इमे शीशो से ही घोडा दूध पिला दती, तो रात भर पोयी-सा मोया रहता। अरे, अरे, गिर जायेगा, बेटा! आखिर तू भी तमतम वरता-करता ही उँघने रगा न च तुये भी कमरे में मुला आऊँ। तेरे पापा आयेंगे तो तुरो उठाकर चमचम सिरा दूगी। चर बेटा सोजा। तुम दोना की तकदीर में विरखना ही गिवा है तो म दया करें, मेरे राट'वर । ये थोडी-मी रोटियाँ और सेंक लू ता छुटटी मिरे। तुम रागा का क्या भरामा, क्वतक वापस आओ। वह ता गये थे कि घटा भर में सैट माएंगें, वम अपनी म वह्न के लिए (आग लगे ऐमी वह्न का। चुडेर अभी तक भी स्वय को तुम्हारी बहन ही कहती है।') योना-मा फर्नीचर और खिडरिया • दरवाजा के परदे मरीदने है। लेकिन पया म ममयती नहीं कि पर्नीचर और परदा का ता वहाना है विसी होटल या मिनेमा में वटे मजे उहा रह हागे । और मै यहाँ चूल्ह के पास बैठी राटियां में रही हूँ। खर, यह चुडेल तो जमी है है, लेकिन तुम्हें यह क्या हाता जा रहा है। तुम तो ऐमे नहीं थे।। जरूर इम चुडल ने ही तुम्हार उपर कुछ वर दिया है। मुझे व्याही आये पूर चार माल हो गये तुम्हारे साय विताये इन चार वरसा की एक एक बात मेरे दिल पर रिखी है कितने कितना प्यार करते थे मुये। इन चार वरसा का एव एक पर मुझे याद है सूब अच्छी तरह यार है अच्छे थे तुम * * ७८ टूटतो इकाइयां में क्या र लिया, इसकी जान ही निपल गयो। अब म तुम द को गोर में लिये वठी रहूं या परात व ग आटे वा मतम । . है गोपिया ये नाप | का मुनाग मरा पुरार गज वीक पुजार पर तुम नगे परा दौर्ट आय थ अजवासिया की रक्षा कला जपनी एक अगुली पर गावरधन परत का धारण कर लिया था आवाज़ तुम तक नहीं पहुँचती मर वान्हा । क्या मेरी , तमतम बर कुछ वोल्गा भी या इसी तरह गग पाडे जायगा ठीर स बोल यू मेरी समय में नहीं आती तरी भाषा ? क्या रहा खायेगा? यहाँ रोटिया पदे हैं और तुझे चमचम खाने का अच्छा अगर चमचम ही खानी है ता यारी दर जा का बस में रख । अभी तेरे पापा उस चुटर के साथ मिठाइया व पाक्टि लेकर जात हागे-तुये भी बचा-खुची मिर जायगी । सूर रही है। चुडैल । बेशरम नही की ।। क्से रडिया की तरह साह मिणगार परवे तुम्हारे साथ गयी है 111 मने तो राज व मारे मुह फेर लिया था लेकिन वह निरलज्ज तो लाज गरम जसे घोलकर पी गयी है अब भी याद करती हूँ तो पिरणा से जी मिचलाने लगता है क्या तक नगी वाह पीठ पर ता ब्लाउज जस था ही नहीं सामने भी छातिया तक कटा हुआ था पता नही ये आजवर की पनी रिखी छारियां पेट और कमर क्यो दिसाती पिरती है। ब्राउज़ तो हम भी पहनती हैं, लेकिन क्या मजाल जो दह का कोई अग दिख जाए। लेकिन य पढक्कड रडक्यिा तन ढरने को कपडे थोडे ही पहनती है इनका बस चल ता नगी ही सडका पर घमा करें। ला वेचारा छोटक आखिर भूखा ही सो गया। दूधवाला भी तो भी पत्नी ७९ । तक नही आया, वरना इसे शीशी से ही थाडा दूध पिला देती, तो रात भर पोथी-सा सोया रहता । अरे, अरे, गिर जायेगा, बेटा । आखिर तू भी तमतम करता-करता ही उघने ला न चल तुझे भी कमरे में सुला आऊँ। तरे पापा आयेंगे तो तुये उठावर चमचम सिला दगी। चर वेटा साजा। तुम दाना की तकदीर में विल्खना ही लिखा है तो मैं क्या कहें, मेरे लाडकुवर ये योरी-सी रोटिया और सब लू तो छुटटी मिले। तुम लोगा ना क्या भरोसा, क्वतक वापस आओ। कह ना गये ये पि घटा भर में लोट आएँगे, बस अपनी इस बहन के रिए (आग उगे एमी बहन को । चुडेल अभी तक भी स्वय को तुम्हारी वह्न ही कहती है 11) थोडा-सा फर्नीचर और खिडक्यिो - दरवाजा के परदे खरीदने है। लेकिन क्या म समझती नही मि फर्नीचर और परदा का तो वहाना है, दिमी होटल या सिनेमा में बैठे मजे उड़ा रहे हागे । और म यहाँ चूल्हे के पास बैठी रोटिया सक रही हूँ। खर, यह चुडल तो जसी है है रेक्नि तुम्हें यह क्या होता जा रहा है। तुम तो ऐसे ही थे ।। जरूर इस चुडल ने ही तुम्हारे ऊपर कुछ पर दिया है। मुझे व्याही आये पूरे चार साल हो गये तुम्हारे साथ विताये इन चार वरसा की एक एक बात मेरे दिल पर लिखी हैं कितने कितना प्यार करते थे मुये। इन चार बरसा का एक एप पर मुझे याद है खूब अच्छी तरह याद है अच्छे थे तुम ८० टूटती पाइयो * * * 'हां खूब नच्छी तरह या है जर आज में चार वरम पहर तुम पहली बार हमार यहाँ आये थे। तुम्हार जाने के मनाह भर पहरे ताऊजी में बताया था कि वे बरवते में एक लवा देखकर आय हैं जो बहुत पटा लिखा और विरान है माय ही मान आठ मो की अच्छी नौकरी पर भी है। घर में और कोई नहीं, आला है और कलात्ते में एक बदिया पलट म रहता है। ताऊजी ने कहा था कि मयोग से ही ऐमा लहवा मिल गया है हमारी गीता को तातीर ही अच्छी है, नहीं तो हमें ऐसे रड की कहा उम्मीर थी। वम, अब तो ठाकुरजी से यही प्रायना है कि हमारी गीता उसे पसन्द आ जाए। और घर में ता जम्मा और चाची ने ठाकुरजी के लिए सवा-मवा रपये के परमार की अलग अलग मानता मान ली थी। तुम अपने दोस्त के साथ आये। हमारे छोरेम करने के घर घर में इस बात की चर्चा थी कि गीता वो देखने के लिए करबत्ते से वोट पतलून वाल दो बाबू नाये हैं। हमारे घर में मोहल्ले की औरता और बच्चो का जमघट-सा लग गया था। म गुडिया की तरह सजी हुई जब भीतर के कमरे से बठन में दाखिल हुई तो मेरी आँख लाज मे युवी हुई थी और घबराहट के कारण पर काप रहे थे। अगर बुआ ने मुझे कधे से पकर नहा रखा होता तो गाय म गिर पाती। नज़रें नीची स्यि हुए म चुपचाप दुर्मी पर बठ गयी। तख्त से नीचे लटकत हुए केवल तुम्हारे पर मुये दिखाई दे रहे थे तुमने आस्मानी रग का पतलून उमी रग के मोने और धमरते हुए काले बूट पहन रखे थे। मेरी बहुन इच्छा हुई कि एक बार पलमें उठाकर पत्नी ८१ तुम्हार चेहरे को और दयू, लेकिन साहम नहीं हुआ। तुम जो पूछने गय, में किसी तरह उत्तर देती गयी। तुमने अपने हाय की एक पत्रिका पदकर सुनाने के लिए मेरी आर बढाइ, मैने कांपते हाथा से पनिका पकड ली नजरें खुले पष्ठ पर डाली तो सामने तुम्हारा नाम छपा था। हर प्रयत्न के वावजूद म तुम्हारे नाम का उच्चारण नहीं कर सकी, तो केवल शीपर पढकर ही लेख पटना शुरू कर दिया। मुझे अपने चेहरे पर तुम्हारी दृष्टि का स्पा महमूस हो रहा था, लेकिन मेरी नजरें नीचे ही युकी रही। एक बार तुमने पहा भी कि मैं बहुत गर्मीली हूँ कि आज के युग म हरा की लडकिया तो लडका से भी ज्यादा तेज-तर्रार होती है। इसके बाद ताउजी ने भी कई बार कहा कि वटा चेहरा ऊपर करो, इममें गरमाने की कोई बात नही । तर एर बार वम एक बार मने माहस करने पर ऊंची की क्षण भर के लिए भरी निगाहें तुम्हारे चेहरे पर ठहरी, तुम्हारी जाग्वा स मिली और मन घबगार तत्काल फिर नीचे का री। इसके बाद मझे छुट्टी मिल गयी, और बुआजी मुझे सहारा देकर भीतर ले आयी । पेठक से लगे हुए भीतर वाले कमरे म औरतो और बच्चा का जमघट 'लगा था। दरवाजे की सधिया में यक का दृश्य दखने के लिए परस्पर छीना पपनी हो रही थी। भीतर पहुँचते ही बुआ ने मेरा क्या छोडा और खुद दरवार म चिपक कर खडी हो गयी। . म कुछ देर बमे ही खडी रहा। वाहर बठर से तुम्हारी आवाज आ रही थी तुम ताऊजी से कह रहे थे मने अपने काना मे स्पष्ट सुना, तुम वह र थे कि लडकी देखने में सुन्दर है मुगीर और गीधी भी लगती है पनी रिवी नहीं है, लेकिन तुम्हारी दृष्टि म यह एक अवगुण होने की जगह गुणही है। तुम कह रह थे कि अगर तुम्हें पढ़ी लिखी लडकी मी ही जरूरल हातो ता इतनी दूर इस गांव में आते ही यया क्या कवते में परीलिमा लडविया की कमी है? लेविन सच्ची वात ?

८२ टूटती इकाइयां ता यह है कि तुम्हें इन पटी ग्मिी रक्पिा के धनावरीपन म नफरत हो गयी है। तुम बता रह थे नि हग की ये पढ़ी लिखी सरिया ऊपर स नियती कुछ हैं और दरअमल हाती कुछ और हैं 'नकी चमडा काती पीली या नीशी कमी भी क्या न हो जब ये चहर पर रीपा-पाती वरक बाहर निकलती हैं ता रगना है सौन्य प्रतियोगिता में भाग रने जा रही हैं। इन चहर की तरह इनकी बातें भा वनावटी हाता है और यह सब देखते-खत तुम्ह इन गरी नितरिया म घणा हा गयी है। प आग पत्ता बन ही नहीं सकता। तुम अपने लिए ऐसा पनी चाहत हा जिसपी मुदरता बनायटा नही हा महा क्षणिक नहा हा याना घटा-दा घटा धूप म चल्न ही जिसकी मुन्दरता माप की परतें न उतर जाएँ और भीतर का अमरी खाल नहीं निकल आये मचमुच सुटर हो जिसरी मुन्दरता महन स्वाभावित हो चिरस्थायी हो। वरन जा तुम नाम म तुम्हारे इन भारी भारी गदा का कुछ भी अथ नहा समय सकी लक्नि फिर भी मत्रमुग्ध-सी सुन रही थी। मेरी समस्त इद्रिया मरे पाना म आ वठी थी। तुम कह रह थे कि तुम्हें एसी पत्नी चाहिए जो तुम्हार छोटे-स घर को संभाल ले और उमी वा अपना स्वग समये को दफ्तर में थके हुए घर लौटा तो तुम्हे घर साफ-सुथरा और व्यवस्थित मिले, कपडे बदलकर आराम-कुर्सी पर बठो तो कोई तुम्हारे सामने एक कप चाय और हवा-सा गरम नाता लाकर रख दे तुम गान्ति से अपने कमर में बठे लिखते-पत्ते रहो और जव खाने का समय हो जाए ता तुम्हें कोई गरम-गरम ताज़ा और स्वादिष्ट साना खिलाये । हर की पटी लिखी रडकी स इन सबकी अपेक्षा करना निरी मूसता है-यह वात तुम जपने दास्ना के पारिवारिक जीवन को देख कर अच्छी तरह समझ चुके हा। यही कारण है कि तुम कलकत्ते से इतनी दूर पत्नी खोजने आये हो और तुम्हें इस बात की खुशी है कि तुम्ह वे सब गुण मुझ में दिखाई दिये हैं जिनकी तुम्हें तलाश थी।

पत्नी ८३ गाँव की मच रहकिया और उनके मां-बाप मर भाम्प म ईप्या वर रह विमुये विन-मांग दनना अष्टा घर वर मिल रहा था।न तुमने दर्ज की माग को, और न प्रचल्ति नेग चार किये। तुम सीधे-गात ढग स कुछ दोस्ता क माय आये और मोघे-माट ग म मझे ब्याह पर अगले ही दिन पस्ट बरामदे में कतारे जाये। आह मर जीवन का वह माम मुखा रिन था। मर को गद्देदार सीट के एक पाने में राज स मिमी घुटना में मुह छिपाये वठी थी। गाडी चग्ने नगी ता नुमने हमत हुए अपने माथिया म विनारी कुछ दर दरवाजे दर वा पक पीठ की मार भागत गान कालवन रह फिर तुमने भीतर म दरवाजा बंद कर रिया । मेरी छाला जार-जार स घर रहा थी। एक अनाम भय म मिहरवर मकान में और अधिक दुवक गयी। बिना गदन उठाये ही समझ रही थी कि तुम बन्द दरवाजे व पास बने मरी आर तय रह हा। घोर और निकर आत परा की आवाज सुनाई दती है पाम आपर तुम कुछ दर मौन गडे रहते हो तुम्हारे दिल की गहराइया म ववल एक र निकरता है----मिठाम में मना हुआ में कुछ और मिमट जाती हूँ तुम आहिम्न स मरे पाम सीट पर वठ जाते हो, वृध दर मौन बढे रहत हा पिर घुटने पर रया मेरा दाहिना हाय अपनी दोना होलिया में मज रते हा काफी दर ना महनी रची ही और गलिया और शादी की नई आठिया से खेरते रहते हो पहाम्टे गन पाता है, गाडी कुछ मिनटाव लिए बार फिर चग्ने रगती रेविन उमी तरह मग हाथ अपना दाना होलिया में महेने दमवे याद ता पद स्टेशन आने है गाडी रक्ती है और पिर चग्ने लगती है रविन तुम उमी तरह बट रहले हा सहमा दूसरी बार तुम्हार मुह म वही गाद निकलता है आर भी अधिक मिठाम में मना हा गीति' है घठे रहते हो ८४ टूटती इकाइयां म इस बार भी नहीं वारती, ता तुम यदुन प्यार-मनु गाना अजु रियो में वर मरा चहरा ऊंचा उगत हा चहा ऊंचा होन पर भी मेरी पर नीच ही शकी रहती है तुम तीसरी बार उनना ही मिगम से मेरा नाम पुकारते हा गीतिर । फिर वह हा 'क्या मतना बुरा हैं शिमरी जार ए बार भी नहा दमागी' अनायाम मरी पर ऊपर उठ पाती है ता तुम अपना चहग निर लाकर मरी ऑपा में शक्ति हा तता मरी पा फिर झुक्न रगती हैं, तो तुम जल्ली में मनुहार भर पाना में कहत हा नहा राना नहा इन्हें कामो मत या ही रहने दा। म तुमम और कुछ नहीं चाहता बस, मेरी इतनी प्राथना मान ला। मर और सर बार हवा टन तर तुम एक भी नहीं बार हाया से सरने रहे और मेरी आमा की गहराई म दूबे हुए पता नहा क्या सोचते रह । मुझ जीवन में पहली बार लगा था कि म मफे। वादला पर वठी हुई वहा अनन्त में उरी जा रही हूँ। कल्पत्ते के जिम घर म मने पहली बार कदम रसा उम दब कर एक बार तो दग रह गयी। अब त म गांव जिम घर में रहती थी उममें मरे पिताजी, ताऊजी और चाचा ताना एक साथ रहते थ । तीना परिवारा के लिए एक-एक बडा कमग था और कमर व नागे दालान था उसी कमरे और दालान म समची गहस्थी का सामान जम्न-व्यस्त पा रहता था और वही एक कमरा एक पूर परिवार र सोने के काम जाता था। कच्चा रमोद थी जिसमें मका साना वनता था और आगन में कुआँ या जिस पर वठकर हम लोग हा लिया करते थे। घर में दिन रात बच्चा की चिल्लपा छीना झपटी और मार-पीट मची रहती थी, और नीना परिवारा की जोरला में यात-बवान पर तूतू मम हो जाती थी। यहाँ जिम पट में मने कदम रखा वह मरे लिया एव नयी दुनिया थी।

पत्नी ८५ तुमने मुये क् स पाडकर अपने साथ सटा लिया और सहारा देवर साथ ले जाते हुए एक-एक कमरा दिपाने गगे। पहर कमरे के बीच में फ्श पर मुलायम गरीचा विछा था जिस पर बहुत डरते हुए मने चप्पलें साल पर कदम रखा। गलीचे पर बढ़त चिक्ने और चमचमाते वाट के माफ रखे थे जिनके बीच में काले रंग की मेज़ थी। मैने गरमाई नजरें उठाकर देखा पि दीवारा पर साद फ्रेम में मढी हुइ तस्वीरें टंगी थी। मेरी पहली नजर जिम तस्वीर पर पडी उनमें वफ से ढंका हुआ एक सफेद पहाड और वहुत-से लम्बे-लम्बे सीधे पडे हुए पड थे मैने इस आशा मे अपनी नजर घुमाई कि शायद मेरे इष्टदव राधाकृष्ण की भी कोई तस्वीर वहा हा ता म अपने इस सौभाग्य के लिए उहें मन ही मन प्रणाम करलू, रेपिन जिस दूसरी तस्वीर पर मरी नजर पड़ी उसे देववर गम से मेरी पर नीच झुक गयी हाय राम, पलंग पर एक नगी औरत लेटी हुई यी-एक्दम नगी दाना याहे बेशर्मी समिर के नीचे लगाये। इसर बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई चि और तम्बीरा की ओर नजर उठा सव। तुमने मुये और अधिक मटा लिया था और बहुत प्यार में बता रहे थे, यह हमारा ड्राइंग रूम है रानी। जब बाहर से मिलने-जुलने वाले आते हैं तो इमी में वठाये जात हैं।' फिर तुमने हमकर कहा था, हम तुम्हारे घर गये थे तो तुम्हार ताऊजी ने हमें जिम पटक में तख्त पर बैठाया था, समय ला यह ड्राग म्म उमी का गहरी और आधुनिक "जब मैं पूछना चाहती थी कि तुमने इम वमर की दीवारा पर ऐसी गदी तम्बीर क्या टांग रखी और यहां भगवान की तस्वीरें क्या नहीं हैं, रेविन मकोच के कारण मेरे मुह मे आवाज नही निकर मकी। तुम मुझे दूसरे कमरे में रे गये जिममें दीवार के पास एक मेज-कुर्सी थी और मज़ पर पिताना काढेर था। मने कमरे में चारा और निगाह ८६ टूटतो इकाइयां दौगयी तो टगो-मी गनी रह गयी पाराआर दीवाग ग गा हुइ लाह की ऊंची ऊगी रसग रगी था जा रितानाही विताराम भरी था। अनायाम मर मह म निरल गया हाय राम जनी माग किता। तुमने प्यार से मरा गार यपयपान हुए कहा हां रानी यह मरे लिगने पढने का कमरा है। मन आश्चय स पूरा सचिन तनी-मारी किताबा का आप क्या करते हैं। रिता वचने का धपा करते हैं क्या? में बोल ता गयी सकिन इतनी जल्दी इतना सब बोल जाने की बेशर्मी पर स्वय ही गरमा गयी और मन दांना म अपनी जीभ कारली। तुमने मुक्कर प्यार मे मेरा माथा चूमा और हमार कहा, नहीं पगली बेचन का नही किता। लिमने-पढने का धधा परता हूँ। फिर तुम मुझे तीसरे कमरे में ले गय । वहाँ बहुत ही बढिया विस्म के बिल्कुल नये दो पलंग एक-दूसरे में सटे हुए लगे थे और उन पर नया पलंगपो बिछा था। पलंगा पताने की ओर दीवार के सहारे एक शृगार मेज़ थी जिसमें एक बडा आईना लगा था और आईने में दाना पलंगा का पूरा प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा था। इस कमरे के फर्ग पर भी एक नया गलीचा बिछा था। तुमने मुझे क्धे से पक्डे हुए इस कमरे का एक चक्कर लगाया और फिर आईने के सामने खडे होकर मेरी आँखा में झाकते हुए कहा और यह हमारे साने का कमरा है रानी । हमारा स्वग। तुमने मुझे क्सार बोहा में भीच लिया झुक्कर अपने होठा मे मेरा समूचा चेहरा टटोलने लगे फिर मेरे होठा पर तुमने अपने होठ रख दिये और उन्हें चूमने लगे मुझे घिन लगी कि यह तुम क्या कर रहे हो मुह का गदा यूक चिगलना छि छि और मने तडपार स्वय को तुम्हारी वाहा से छुडाने की कोगिकी लेकिन दूसरे ही क्षण मेरी पलके अपने-आप भारी होकर बद हो गयी, मेरी समूची देह निगल होकर तुम्हारी बोहा में झूल गयी मुझे लगा कि मैं फिर पली ८७ उही मफेट बाद ग पर बटी हुई आस्मान की अन त नीली गहराइया म बती जा रही हूँ। ग्गा जैस यगा वाद तुमने जपना मुह हटाया और हाथ का सहारा देकर मुझे उन अतल गहरादया में से बाहर निकाला। फिर तुमने आश्वासन के भाव से होले हौले मेरी पीठ थप थपाई मझे कधे में पकड़े हुए कमरे में बाहर निकले और दूमर हाय से सकेन करते हुए वाले वह हमारा किचेन है और उसके बगल वाग वाथामा यहो है हमारा समूचा ससार और यह सब कुछ तुम्हारा है रानी सब कुछ। यह समूचा घर और इस घर का स्वामी, दोनो तुम्हारे है। इन दोना को मभालकर महज कर रखना, गीते।" तुमने एक छोटे से बच्चे की तरह अपना मुह मेरे सीने में छिपा लिया । मने उमो क्षण--उस घर में अपने प्रकार उम पहले ही क्षण-मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली कि मैं अपने घर को और तुम्हे, दोनो को भरसक सहेजवर, संभारकर रखूगी। और मेरे राधाकृष्ण इस बात के गवाह है कि मने इसमें अपनी ओर मे कोई कसर उठा नहीं रखी। फिर भी अगर मुझसे भूल चूक हुई और मै अपने इस प्रयल में सफल नहीं हुई, ताम तुम्ही से पूछती हूँ कि बताओ, इसमें म कहां तक दोपी ? तुम्हारे इस शहर के तौर-तरीके मने इसके पहले यहाँ देखे थे? तुम्हें क्या पता कि तुम्हारे इस फ्लैट में आने के पहले म जिस घर म रह्नी थी उसमें सब कुछ क्वाडखान की तरह याही अस्त-व्यस्त पड़ा रहता था तुम्हारे इस आधुनिक फट की गफाई और व्यवस्था मैन इसब पहले क्व देखी थी। इसलिए अगर मुझसे गाहे-बगाहे काई भूल चूक हो जाती थी तो इसम मेरा वहा दोष था जसे कि, तुम्हें अपने लिखने-पढने के कमरे में कोई किताब या कागज-पत्र इधर- उघर किया जाना बिलकुल पसन्द नही था तुम चाले थे कि जब तुम शाम को दफ्तर से लौटो तो तुम्हें रस्म की विताएँ उसी तरह करीने से - पर डाल देती ८८ टूटती पाइयो राजी हुई मिरे, मज पर रखे हुए कागज-पत्र ठार उमी तरह रम हुए मिलें जिस तर तुम उहें छाड कर गये थे, पावर डॉट पन उमी जगह और उसी वाण से रखा हुआ मिर जमा तुम जात गमय रख गये थे। गुरु-शुरू में मुये तुम्गरी इम आरन वा पता नहा या, मला म दापहर में पढने के लिए तुम्हारी रस्म से पितारें निरारती और अपनी पमन की एकाध किताव पर शप याहा रक्स के ऊपर या मठ पर या कुर्सी अपनी मां का चिट्ठी लिपना हाती ता तुम्हारा पाकर टाट पेन र एती और तुम्हार पठ पर चिठी लिगता। मुग मा पहल चिटिठया लिसने की आदत ता यी नहा इसलिए एक-एर वात गाव पर और धीरे धीरे लिखती। अक्सर यह होगा कि म एक दिन में पूरी चिटठी नहीं लिख पाती और अधूरा चिटठी रिसा हुआ पड और मम सार्ने ये कमर में पग पर छाड देती। तुम गाम का दफ्तर स या हुए आत मुरे वाहा में भरकर चूमते कपडे घरमर पन्ने र कमर में आते और किताचे स्त-व्यस्त देवकर वहा से तेज आवाज़ में पूछत य मरी किता- क्मिने निकारी थी? म नागर अपराधिनी की मुद्रा में कमरे की दहलीज पर सडी हो जाती ता तलाल तुम्हार चेहरे का तनाव दूर हो जाता और तुम हँसकर पढे लोह ता हमारा रानीजी दापहर में अध्ययन पर रही थी। यह बहुत अच्छी बात है तुम जहर पढा परो, पढने से इसान वा मानसिक विकास हाता है। और तुम कितावा का करीने से रक्म में सजाने लगते । म तुम्हारे लिए चाय लाने रसाई- घर की जोर चली जाती कि फिर तुम्हारी युझलाई हुद नागराज माती, 'भई, मेरा पेन नहीं मिल रहा है और रादटिंग पड भी गायब है । चाय का प्याला हाय म लिये हुए जल्दी जल्दी आती और प्याला मज पर रखकर भागी भागी साने के कमरे से तुम्हारा परम और पंड ल आती। तुम फिर हाठा पर वरखम मुम्कान लापर मेरे गाल पर हरको चपा रगाते और कहते थाह तो रसक की पत्नीजी ने लिखना भी शुरु कर दिया है।' इसके बाद तुम चाय पीने और लिखने-पढने में लग जात और म रसोई में तुम्हारे लिए साना दनाने चली जाती। म पत्नी ८० इसी तरह, शुरू शुरू में, मुझसे और भी कई भूले हो जाती थी। मुझे सिलाई-कढाई का बचपन से शौक था, और मेरी छोटी बहन की गादी जल्दी ही होने वाली थी इसलिए म दोपहर में अश्मर ड्राइग रूम में बैठी हुई गरी की साडिया-गरजा पर वल-बूटे टोक्ने का काम किया करती और अपनी पुरानी आदत के अनुसार उन्हें याही अस्त-व्यस्त अवस्था में मेज-वृसिया पर छोड रेती। जब तुम शाम को आकर उसे डाइम रूम में या विश्वरा हुआ पाते, तो क्षण भर के लिए तत्कार तुम्हारे माथे पर शिकन पड़ जाता लेकिन तुम मुझस कुछ नही पते या तो स्वय हो उन्हें समेटने लगते या नौकरानी को बुलाकर कह देते वि ड्राइंग रूम में चीजो को या दिग्दरा पर नहीं रखा करे। बक्सर म रात को सोते समय माडी और राउज़ नीचे गलीच पर डाल देती और सुबह उठकर नहा धोकर दूसरे कपडे पहन लेती और पूजा- पाठ में लग जाती। तुम्हे सदा से ही देर से उठने की आदत रही है। तुम उटकर विना चश्मा लगाये पलग से उतरते और पैरा के नीचे साडी- ब्राउज़ का स्पा लगत ही तुम्हारा मूड खराब हो जाता लेकिन तुम फिर भी कहते कुछ नहीं। माडीगाउन को उठाकर आलमारी के अदर मरे कपडा में डाल देते। आज महसूम वरली है कि तुम उन दिना क्तिने अच्छे थे । क्तिने स्नेही लौर सहनशिल थे। तुम्हें मेरी ये हरवन विल्कुर पसन्द नहीं थी, लेकिन फिर भी तुमने मुझस भी कुछ नहीं कहा, कभी डॉटा फटकारा नहीं। तुम चुपचाप सब कुछ सहन कर लेते क्यापि तुम ममयत थे कि में अभी नयी थी और घोरे पोरे मुरे इनकी आन पड जायेगी। आज पार करली हूँ तागता है कि वही मरे जीवन के मबमे मुग्गी दिन में जब तुम मुद्दो इतना अधिक प्यार परते थे मेरा इतना वयात रसते प। 6 ९० टूटती सादया जब तुम्हें म व बच्च की 7 सुम्हारी आनधी मि तुम गत का गाना जन्नी मारत और मोने के यमरे में या ता पर ग पर सीध पार पा पुगर पात या उर लटार हाती तरिया दगार बुधगा TET एगा हाना कि में रमाईया गावाम काज पिपगार और रस गाना गा र सान रे पमर में आ जाती पलग पर तुम्मा पाग 43 नाता और पुर्ती रा पह पर घरत तुम्हारे हाय और परम का पनाप देगा परता। मेरा उपस्थिति का पता चला तो पुनरम पड पर रणदत और हाठा पर एप माहा मुस्वान गरर मरी आर दगा। सरर भापन स पूछती तुम रोज राग ना मर क्या पिते हो तुम हसपर पहले यहानियो । म दुलमर रहता पहानियो लिगते हा? मरी दानी भी हम सब भाइ-बहना वा रोज रात में अच्छी-अच्छी कहानियां सुनाया वरती था। यमी एव राजा और उसकी सात रानिया की कहानी ता कमी विट में व राजकुमारी पी तो कभी परिया और रालसा दी। हम सर पार-बहना को व बहुत अजीरगती था। क्या तुम भी दही सब पहानियां लिवने हा हमें मा मुनाओ न अपनी कहानियां । तुम हसकर अपना करम और पड पग के पास की छोरी मेन पर रस देत वा हाय पी उनी तकिये पर टिकावर हथली पर चेहरा रस ने तथा नजर हा मरी आखा में न जाने क्या देखने लगते। हमपर कवर इतना कहते तुम बहुत भोली हो बहुत मागूम और बहुत प्यारी नी । इसा वाद तुम उसी तरह मेरी आंवा म दसत रस्त मरे हाया म सलते रहते और घटा पता नहीं विन सयाला म साये रहत। कभी तुम सीर स्टे-रट मरा सिर अपनी छाती पर रख लते मेरे दाला में अपना मुह गाये पिणे गीत या कविता की बाई पक्ति गुनगुनाते और एक हाय से मरे माये और गाला को सहलात रहते थपक्ने रहते। मुझे इसी हाल म ना आ जाती पली ९१ कभी तुम आवश मे आकर मुरे गाल या गले या सीने पर जोर से चूम रेत और मेरी गोरी चमडी पर एक गोल गोल र दाग उभर आता, तो तुम अपनी गुरिया पोरा से उमको घटा सहलाते रहते । ऐसे अवमर पर तुम अक्सर एक ही बान बार-बार कहा परते, “सचमुच रानी, तुम बहुन सूबसूरत और बहुत नाजुर हो। मुझे तो तुम्हारा देह यो छूते हुए भी उर लगता है। इच्छा होती है इन पितावा की तरह तुम्हें भी काच की आलमारी म वठा हूँ और दूर से तुम्हे देखा कहें तुम्हारी पूजा रिया पर ।' इस बार नुम न जाने और भी क्या-क्या करते जिसका अय मेरी समझ में पुछ नहीं आता। जिस दिन तुम्हारी प्यार करने की इच्छा होती उत्तेजना से तुम्हारा चेहरा लार हा जाता, कनपटी की नसें फूट उठनी और चश्मे के भीतर से आयें बहुत वडी-बडी दिखाई देती । तुम आग में जाकर मुझे वाहा में भीर रन ओर मेरी समूची देह पर जगह जगह चूमने-काटने लगते । जव तुम प्यार पर रह होत और म बीच बीच में आह' उर्द जादि रहती तो तुम चितित हार पूछने क्या रानी, तुम्हें कष्ट हो रहा है क्या ?" मवारी में मिर हिलती तो तुम करते फिर तुम इस तरह क्यो पर रही था म राज के मारे चुप रहती रेविन तुम जानने रीतिद पड रेतना गरमागर वहती, औरता को ताएया करना ही चाहिये, वरला मन्द ममाता दैवि यह औरत पिननी वेगरम है जरूर इमरा भी च्या होगी। सुम आश्चय मेपून 'यह तुमस विमने मपिर चुप हा गातो और तुम पिर जिद करत ता म जानमार की तरह जवार देती, इसमें विनी ने की क्या बात है । मैं गुद ही जानती हूँ मिने म्पप जानी आँमा म देपा भी है। और मैं परमारर पिर चुप हो जातो, ता तुम बढावा देते हुए वरले, 'हा, हाँ वताआ, तुमने अपनी आंग से क्या देगा है। इसमें मुगमे गरमाने की क्या बात है? हाँ, बाग तुमने अपनी आँखा स क्या देखा है " म दोना हरिया से चहा ढाप रेती, और रजावर बहती 'गांव में हम " कहा ९२ टूटती माया तुम्हें चुपचाप गब भाई-बहा और मरे मां-बाप एक ही कमरे में मात थे। रात में मेरे छोटे भाई-बहन तो सा जाते दिन मुझे ना नहा आती थी में नी का यहाना रिय चुपचाप लग रहती। रात में जर पिताजी प्यार परले तामां अगर इसी तरह किया करती थी। मुनते देखकर म चेहरे म हरियो हा रत। और कहती 'इगरे अलावा कभी-भीम रात में वायवा वाहर निती तो वगबाल कमरे से ताईजी की भी इसी तरह की आवाजें आया करता था। एक बार तो मैंने उनमे दरवाजे की पोर में झांसर भी देगा या। तुम्हार चहरे पर आश्चय का भाव देवरर म नाग कहती रगी तरह मने रात क ममय कई बार अपने चाचा व कमर में भी रिकर देखा है। एक बार दिन क समय मने चाची स इसके बारे में पूछा ता उमने हमकर मेरे गाल पर चिकोटी काट ली और कहा कि रानीजी की गादा हागी तव पता लगगा। मैंने तुमसे स्वीकार किया कि मुयस चाची न ही बताया था कि एसा नही करने से मरत अपनी औरत को बेशरम समझता है इसलिए औरत को यही दिखाना चाहिए कि उमको ता यह काम करने को बिलकुल इच्छा नही है वह तो कवल अपन मर का सुरा करने के लिए ही यह करती है। मरी बात सुनकर तुम्हारा प्यार करन का उत्साह खत्म हो जाता और तुम मुझे समझाने के अन्ाज में कहते छि छि रानी क्सी बात करती हो तुम भला, पति-पत्नी में इस तरह के रिसावे और धोखे की क्या जरूरत? पति-पत्नी व वीच यह एक सहज-स्वाभाविक कम है और इस कम को इसी सहन स्वाभाविक ढग से करना चाहिए । पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक हैं और यह पम दाना का ही समान रूप से गारीरिक और मानसिक तप्ति देता है उन्हें पूर्णता प्रदान करता है उन्हें परस्पर और गहरे आत्मिक सूत्रा जोडता है। फिर दोना के बीच पोखे की इस विभाजक रेखा की क्या जररत है। म तुम्हारी वात नही समय पाती इसलिए विवा-सी अपनी वही बात पत्नी ९३ दुहरा देती "लेकिन सभी तो ऐमा करते हैं। मेरे मां-बाप, ताऊ-नाई, चाचा चाची सभी वो ऐसा करने मने स्वयं देखा - फिर भी तुम खोजते नहा मुझे गाति मे समझाने की कापिया करते, 'दो, पहर के जमाने में तुम्हारी बात लागू हो सकती थी आज भी जो अगिभित हैं वे इमी को टीप समझते हैं रेक्नि आधुनिक मनोविश्ले पण की खाजा मे जो परिचित हैं वे इसे गलत समझते हैं। में अब भी तुम्हारी बात का तात्पय नहीं ममय पाती फिर भी उपर से स्वीकृति और सहमति में सिर हिंग देती। इसके बाद तुम उस दिन और कुछ नहा करते काई किताव पढने लगते और पढते-पढते मो जाते। म तुम रात म याने व बार' अक्सर परेंग पर रेटवर लिखते पढने थे। खुद भी मार और रमोई का काम निपटाकर तुम्हारे पास आ जाती, रेरिन तर तक काफी देर हा चुकी होनी और मेर पास साडी बदलने या घी आदि परने का ममय नहीं रहता बल्कि सच तो यह है कि मैं इसे धमा जारी भी नहीं समझता थी। परिणामत जब तुम्हारे पास आनी तो अक्सर वही दिन भर की मुची सिकुडी माडी पहने होती और घेहरा भी सुबह का ही धोया हुमा रहता । रू-शुरू में तो तुम इन याता की आर ध्यान नहीं देते थ, दरअसल तुम्हारा पूरा ध्यान मेरे हाया और मरी आँखा पर ही वैद्रित रहता था। लेकिन धीर धीर हाथा और आँमा के अगवा मगे दह वे अय अगा की बार भी तुम्हारा ध्यान जाने लगा। मुर्य याद है एक दिन तुमने मेरे उल्झे वाला की र मुलताने हुए कहा था, देवा, ति, तुम्हारे बाल विस बदर रूाने और राता है, तुमने कई दिना से इनमें तल नही डाला है और न ही कपी वी है।" तुम स्वय उठवर 'बाथरूम' से हेयर क्रीम की ९४ टूटतो पाइयों सीनी उठाये अपन हाया ग मर यात्रा में बहुत मारी टीम लगायी पिर कपी से मेरे यार मुलगा तर उन रम, पिसने और का का भरे मुगडे पर टिनगरिया ता उन काग घामा में मरा पूर चेहरा छिप गया तुमने हुल्ग पर या कार म ही मर माये के चूम लिया और कहा अब त्पा तुम्हार ये का तिने प्यार गते हैं । तुमने बेकार ही इनरी दुगन पर रखी थी। अपना ममूचा चेहरा याग ग छिप जान व कारण मुग कमा-कमा रहा था। भने मांगा परम वाल हान लिए अपनी दाना 45 उठाइ तो पता नहीं क्या देखवर तुम मम दूर हट गये। मैन बहिँ उठायें ही तुम्हारी जोर प्रदन भरी निगाहा में तावा ता तुमने मरी वगला की ओर जगली से इशारा करत हुए कहा छि छि गीति दवा ता तुम्हारी वगलो पे पाग से ब्लाउज पिना गा है पमोने पार-पाले पब्बे हो गये हैं क्सी दुग आ रहा है । मने मताच म वाहें नीची कर ली और वगला का अपनी हलिया से देर लिया । लेकिन तुमने जिद करके उमा समय मरा राउामुग्खाया और जबदस्ती मेरी वाहें ऊंची उठा दा। वहा भूर भूर बैहर लम्ब और दुगध भरे वाला को देखकर घणा से तुम्हार चेहरे को नौं तन गयी । मने पहली बार तुम्हारे चहरे पर यह भाव देखा था और म महम उठी थी। लेकिन तुमने अपने ऊपर नियत्रण कर लिया और बीज भरी हँसी हंस कर इस तरह कहा गोया लाइ-प्यार ग विगडे हुए किमी नाशन बच्चे को डाट-ममया रहे हो छि पगरी कगे रहा जाता तुम तत्काल उठकर अपना सफ्टी रेज़र उठा लाय और ना में शेविग टीम लगातर तुमन अपना हाथ मेरी वगला को आर वाया। हालांवि मुगन विरोध करने का साहम नहा या फिर भी मने किमी तरह डरते डरत वहा वगर के बाल काटने म तो जाँस कमजोर हा जाना हैं ? तुम इस पर युझला उठे और जबदस्ती मरी वाह उठावर बगल वाले भूरे गुच्छे पर सागुन लगाने लग तया साथ ही माय बन्दनन है तुममस तरह पत्नी ९५ भी जाते थे, "पता नही, कहाँ-वहा की दक्यिानूसी बातें दिमाग में भरी हुई हैं एक हो तो वोइ उन्हें दूर भी करे, यहा तो समूचा भेजा इन्ही से भरा पड़ा है।' मैने पहली बार तुम्हाग यह युझलाहट योर पीज वारा रूप देखा था, इमरिए मन ही मन सुबक उठी थी। उसके बाद तुम तो जल्दी हो गहरी नींद में सा गये, रेकिन मुझे हर कोशिश के बावजूद काफी रात गये तक नीद नहीं आयी और मै रह रहकर तक्यि में मुह छिपा कर सुवक उठती। पता नही कसे एक बार मेरा जी इतना भर आया कि अपने भीतर को रगई मुझसे फ्मिी भी तरह रोने नहीं रकी, और म रात के सन्नाटे में पफ्र फपच पर रो उठी। तुम नीद में हत्या कर उठ बैठे और मुझे पू रोती देवकर एक बार तो कुछ भी नहीं समझ पाये, हो चक् स मेरी बार देखते रह गये, लेकिन दूसर ही क्षण पूरी स्थिति तुम्हारी समझ में आ गयी, और तुमने तडप वर मुझे अपनी बाहो में भीच लिया, सीने में छिपा लिया। म और भी फूट-पटवर रोने लगी। तुम अपने हाटा स मेरे ओस् पाठते जा रह थे मुझे दिलामा दे रह थे, और बार-चार मेरी पीठ और मेरा मिर सहला रह थे। - उस दिन तुमने मुये चाह जितनी दिलमा दी हो, योर अपने-आपको चाहे जितना धिक्कारा हो, लेकिन आज मुने स्पष्ट महसूस हो रहा है कि उमी अमागे क्षण से मेर दुर्भाग्य का श्रीगणेश हो गया था उसो याद की एक एप बात मेर इग क्यन की पुष्टि करती है , हालांकि उस दिन + बाद वापी दिना तय तुम मेरे प्रति अपने व्यवहार में बनुत सतक और सत्य रहने की कोशिश करते रहे। जर यभी चीज़ या असन्तोष का कोई अवसर आना (और मर गॅवारपन के वारण ऐसे अवसरा की कमी ही रहती थी 1 ) ता तुम अपने ऊपर सप्रयाम नियत्रण वर रेते और मुहम कुछ नहीं कहते रेविन क्षण भर लिए तुम्हारे चेहरे पर १६ टटतीराइयो आन याला यह भार मरी योमा स छिपा नहा रहता और म मन ही मन मांग उठती। इमर गायद दा-गई महीने बात की बात है। उम ग्नि नौकरानी नहीं जापी थी, और मुझे चौर-वतन पा वाम निपात निपटात पापी रात बीत गयी। अपनी आत्त के मुताविक म उम रात भी रमोई से सीधी तुम्हार पाम चली आयी। तुम कुछ उद्विग्न-म थे। तुम्हारी छाती पर किताव उत्टी पड़ी थी और तुम एत की आर देखते पुछ सोचते-स रेटे थे। म चुपचाप आवर तुम्हार पास बठ गयी मने स्नेह रो तुम्हारे बाला पर हाथ फरा क्नपरी की तनी हुई नसो को सहलाया। तुमने एक यार मूनी-सूना निगाहा से मरी ओर देखा फिर उमडकर मुझे वाहा में भर लिया। लेकिन जिस पुर्ती स तडपकर तुमने मुझे वाहा में भरा था उसी पुर्वी से तडपपर परे ढक्ल दिया, परवट बदल कर लेट गये और तकिये में मुह छिपा कर पता नहीं क्या बडबडाने लगे। मुझे इस तरह टल जाना अच्छा नहीं लगा सक्नि तुम्हारी स्थिति से स्पष्ट था कि तुम्हें गहरी चोट लगी है, इसलिए मने अपनी भावना पर काबू किया और दुवारा निक्ट हावर तुम्हारे सिर पर हाथ फरने लगी। सुम तडपकर उठ वठे, और सामने झूलत मेरी सादी के आचल को दोनो हाया में पकडकर चर से चीर दिया। म रोने लगी तो तुम्हारा गुस्सा और भडक उठा तुम लगभग चीसते हुए से बोले वेहया कही की। हजार बार कहा कि मेरे पास आओ तो ठीक से रपटे बाल्कर आया करो रकिन मेरे कह कि परवाह किस है। जब आयेगी, दिन भर की वही सडी साडी पहने हुए जिसमें पसीने और आटे और तरकारियो को दुगध आती रहती है।

पत्नी ९७ - रगे हुए है भरी गई रोक नहीं पक रही थी, म लिख दिलपकर रोये जा रही थी। तुमने कुछ देर झर पर शरते आमुआ की ओर देवा, फिर अपेक्षा- कृत नरम आवाज में बारे, मने क्तिनी वार और क्तिनो तरह से कहा है गीता, कि अब तुम गहर में एक पडे लिग्वे आदमो के माय रहती हा । तुम्हें अपने गाँव-नेहात की गदी आदते छोट कर इस शहर को, और अपने आदमी के पसन्द-नापसन्द को यात समझनी चाहिएँ, उमा ध्यान रखना चागिए, लेकिन तुम्हारे उपर कुछ भी असर नहीं होता ।' फिर तुमने ठोडी के पास से मरा चेहरा ऊंचा उठाकर कहा 'क्या मेरे पास आने के पहरे तुमने कभी आइने में झाँक्कर अपना चेहरा दग्वने का कष्ट किया दपा तुम्हारे हाठा के दोना कोना पर कटी के पीले दाग रिपस्टिक लगाना तो दूर तुमने खाना खाकर ठीक से मुह तक माप नहीं किया है। देखो, इन आँखा में जाले लटक रहे मायद दोपहर में सोकर उठने के बाद इनमें पानी की एक बूद भी नहीं छआइ गयी है। क्या अपनी इन बी-बडी और खूबसूरत आंबा वा इमी तरह नष्ट कर डालागी ? क्या जिदगी भर इनमें काजल या मुरमे की एक गया तब नहीं पीचने की कसम सा ली है ? ये गुगब जमे गाल पसीने की धारिया और धुएँ की कालिप स बदनाल हो रह हैं । म पूछता हू आखिर इस शृगार मेज पर सजे हुए श्रीम और पाउडर म्नो और रिपस्टिक रज और काजर क्पी और तेल और मेटभीगीशिया का क्या अचार डालागी?' बोलतेयाल्ते तुम्हारी आवाज फिर तेज होती गयी और माया के मारे तुम्हें आगे बोलना सभव हा लगा तो तुम क्षण भर मुस्तान के लिए एक गरे। फिर काफी गात आवाज में तुमने कहा, 'मन तुमसे कितनी दार महा है रानी, रि म जब दफ्तर से रोटू ता तुम माफ-सुथरे अपडा और तर ताजा खिले हुए चेहरे म दिया, ताकि तुम्हें देखते ही मेरी दिन भर की थकावट और परेशानियां दूर हो जाएं मेरी इस यात पर ध्यान दने की जरूरत ही नहीं ममता , और में जव रेविन तुम १०० टूटती साइयां परीव घटा भर वार म नहा धाार योर धुले हुए कप पहनकर लौटी तो तुम गहरी I में बैगुध सो रहे थे। तुम्हार आदेशानुगार मने बाईने वे मामने खडे होकर स्वय वा देगा और मुबार दोना हरिया में अपना चेहरा छिपा लिया। इम अगर दिन नाम को करीव सवा छ बज जब घटी बजी तो अपनी साही वे आंचल स आंसुभा को पाठते हुए मने मुर जाकर दरवाजा माला। तुमने क्दम दरवाजे के भीतर रपा और मुग देखार ठिठक सटे रह गये पूरे दो मिनट तक खडे हुए चक्ति-मे मुझे देखते रहे गली रग की जरी की नयी साडी और वसा ही लाउज ममूचे चेहरे पर पुता हुआ सफेद पाउडर गाल। पर दूर-दूर तक फा म्ज होठा पर लिपस्टिक की गहरी लाल तह जो होठा के ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं पली हुई थी आसुआ व कारण आम्खा व वाहर तक बहर आया काजल बेतरतीब ढग से बना हुआ जूडा और उसमें टेढी-मेढी लगी हुई चमरी के ताजा फूला की वेणी तुम्हारे हाठ एक हता मुस्कान से विकृत होते-हाते रह गये--शायद तुमने मेरी आखा में छलछलाये और देख लिये थे-- तत्काल तुमने वह विकृत मुस्कान होठा के भीतर दबा ली स्पक कर मुझे बाहा में भीच लिया और लिपस्टिक लगे मर गहरे लाल होठो को कई महीनो वाद उस दिन, खूब प्यार से चूम पिया। फिर मुये अपने मे सटाये और वाह के घेरे म समटे समेटे अपने पढने के कमरे म ले गये और हाथ की कितावे जार वागजात मेज पर रखकर मुझ दोना वधा से पाह कर मेरी काजल-पुती आंसा में झांकते हुए उत्माह से भरकर कहा गावाग | गुरू-शुरू में तुम्हें यह सव अजीब लग रहा होगा अम्यास नहीं होने से बाज इनका उपयाग जरा अमतुलित भी हो गया है लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा तुम्हें इनका सही उपयाग आ जायेगा तब देखना, स्वय तुम्हे ही यह सब कितना अच्छा लगता है। इसके बार तुमने मरे रूज और पाउडर पुते गाल पर प्यार से गुरू दिना पली १०१ की तरह एक हल्की चपन लगाइ और कहा 'जाया, अर अच्छी रानी- विटिया की तरह मेरे रिए एव कप गरम-गरम चाय ल आया।' गत में तुम सदा की तरह ल्टे हुए कुछ रिख रहे थे जब मै सफेद रेशमी साडी और ब्लाउज पहने तथा ताजा धुर हुए शमी कशा को पीठ पर रहराये कमरे में दाखिर हुई। तुम गायद मेरा ही इन्तजार कर रहे थे मेरे भीतर कदम रखत ही तुमने उत्साह में पलंग मे उछलने हुए दोना बहि फंग कर मेरा स्वागत किया। रामी साडी-ग्लाउज में आवत, रेशम जमी चिकनी मेरी देह का अपनी वाहा म भीचत हुए तुमने मेरे रामो केगा में अपना मुह छिपा लिया। फिर मुये बाहा में लिये- लिये ही शृगार मेज वाले आईने के मामने र गये। मुये आईने के मामने की मार करणे, स्वय मेरी पीठ स मटकर खडे हा गये और पीछे मे दोनो चाहा का हार मेरे गरे में डाल कर उल्लसित आवाज़ म बाले देखो मुल ही देखा, क्या एक्टम श्वेतपरी-सी नहीं लग रहा हा ?" मैने गरमाकर तुम्हारे मोने में अपना मुह छिपा लिया। अग्य वाद मेरी आँखें व बार फिर खुशी मे छलछला आयी। उस रात तुम अपने गुरु दिना वार उत्साह म मुझे प्यार कर रहे थे मेरी दह का महला सुचवार रह थे । थायी देर में ही तुम्हाग अग अग उत्तेजना से पवने रगा तुम उठकर शृगार मेज़ की दराज से रवड की पतली नली निकार लाये। इसके पहले भी तुम सटा इसका उपयोग परते आये ये हालांकि मुझे इससे घिन रगती थी, रविन तुम्हारी नाराजी का रायार करके भने कभी विरोध नहीं किया था। आज तुम्हें अच्छे मूड में दयार मो पहा, "हमें यह तरी विपुल अच्छी नहा तुमने हमपर उत्तर दिया 'अच्छी ता मुझे भा नही लगती लेविन इमका उपयोग जरूरी है। मेरा आवा में प्रश्नवाचर चिन्द्र रेसवर तुमने हैरत मे पूठा अर, तो क्या तुम्हें यह भी नहीं पता कि में आज तक इसका उपयोग क्या वरता बा रहा हूँ मो इन्धारी में गनी।

१०२ टूटती इकाइयो
सिर गिने पर तुम्हार चहरे पर र वार पिवता का भार उभर
आया, पिर तुमने पक्ट पर उछार पर उम यच करते हुए कहा,
तुम राचमुर प्रति-युषी हो । मानिए दुनिया की किमी भी वात
वा तुम्हें पता नहा। ममा में नहीं आता कि यह सर सीपने लिए
तुम्ह
क्सि
स्वर
में भरती पराऊँ। परी पाली, यही ता है वह जादुई
चीज जिम प्रताप से हम लाग अभा तर बघायचा की पाटा से
निश्चिन्त हारर मुग्न गाति म जीवन-यापन पर रह है।
मने अचानप उठने की वाशित करते हुए पहा ता क्या दमा उपयोग
रो बच्चे नहीं होत?
तुमने सम पाया, एक जमाना था जब सन्लानात्पत्ति का हम अपने
जधिकार वीमामा वे बाहर समयते थे समयते थे कि सनान का
हाना या नहीं होगा भगवान की मर्जी पर निभर है। रविन आज
दिनान न सन्तान का हाना या नहीं होना मान की मर्जी पर निभर पर
दिया है।
मने तुम्हार इम भापण का एव ' भी नहा सुना उमी तरह अपना
पहला प्रश्न दुररा रिया, ता क्या इस रमान रा बच्चे नहीं होते।
तुमने जविव' समान वा प्रयल यय समयकर मरज स्वीति में सिर
हिला दिया।
भरे लिए अरेट रहना सभव नहा था। एक यटो में उठकर घट गयी
और जापा में तुम्हारा हाथ पर डर पूछा तो क्या जब ता तुमने
जान बूझयर बच्चे का हा राम रमा था?
तुमने एक बार फिर स्वीकृति में गिर हिग दिया कुछ बोट नहा क्यादि
अपने काय के समय तुम्हें यह बाधा अच्छी नहीं लगी तुम जद से जल्द
इस प्रसग वा सत्म करना चाहते थे।

Tuti Ikaiya

Author
Devda,sharad
Title
Tuti Ikaiya
File name
Tuti Ikaiya
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2010/12
Publisher
Kalkata,apra Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514954
Barcode
4990010022620.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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hBQFHok3m6P
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