Bharatiy Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Iskand Gupt

Jayshankar Prasad · 2010/12

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स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य
( ऐतिहासिक नाटक)
Freeतार
भी

प्रकाश मौर विवा
भारती मंगर
सौर प्रेस, इलाहाबाद
बापो संसाण
सं० २०१३ वि०
मूस्य १)
मुद्रक
वि.प्र. ठाकुर
जीमा प्रेस, पजाबाद

निवेदन (मयम सस्करण से) भी अपरकरप्रसाद के नाटकों ने हिन्दी-साहित्य के एक अंग की मही ही मुन्दर पूर्वि की है। उनकी करना किसनी मार्मिक और उभ्च कोटि की-सक विषय में कुष्करना पापाजता मात्र होगी। उनके नारक मारे स्थायी साहित्य के मगर प्रमूम्म रस्न पेन के सिया एक और महत् कार्य करणे, मसीहमारे इतिहास मा उदार। महाभारत युग के 'नागपा' से लेकर एलीन 'राम्पमी' प्रपति नाटको से पे मारे गुप्त इतिहास का पुनर्निर्माण पर रे। ऐसा करने में चारे बहुत-सी बाते स्पना प्रसन, किन्तु 'प्रसाद' बोकी ये कम्पनाएँ ऐसी मार्मिक और अपने उरिष्ट समय के अनुसार कि वे उस समय की पूर्ति कर देता है जो पिस्मृति के तिमिर में विलीन हो गया है। किसी काल के इतिहास का जो गूदा -अर्यात् महापुरुषों को वे कहानियां, मिनके कारण उस पास के इतिहास में एक पिरिए रूस पाया १, उसे यदि को लेखा अपने पाठको सामने प्रस्पच रख सके, तो उसने मदा नी , पर सत्य हो, चाहे वास्तविक हो या कस्मिता भगवान् शम्प ने गीता के रूप में दो प्रमूव में दिया , उसका पाई सो पुपण सौ स्त्र में पर्यन करें , पर यदि उन एगीन मरमों में से हम उस अमृत का पान कर सक है, तो वे सर सब उसक लिए समुचित मामन तो ठहरे--पर्य के कृत्रिम मारमर नह। गुप्त माल (२०-४... 6) प्रतीत भारत के उत्त कामप्पाद। उस समय भाम्प-सामाग्य मध्य एशिया से मागा-मुमाषा सा फैला हुआ था । मत परिण पर हमारी संस्कृति म मंग पाप ४ पापा। इसी गुप्या पसे उमप नचा पा-सन्दगुप्त । उसके मिासन पर बैठने के पहले ही सामाग्य में मीतरी पपपत्र सठ सो हुए थे । तापदी भामगका होचक देश में ब गया था और गुप्त-सिंहासन बायोल दो पला पाऐसी दुरपस्मा में जा विधियों पाते हुए मी विस लोकोचर उत्साह और पपाम से सन्द- गुप्त ने इस स्थिति से प्रार्य सामान्य की रक्षा की पी-पठ कर मर्यो में बिम्जी दौड़ बाकी है। अन्त में सामाग्य म एक-या मानविय मिलने पर भी उसे अपने एवं विरोपी माई पुरगुप्त के लिए स्माग देना, सपा स्वयं मावन्म प्रेमार-जीवन म्पटीत करने की प्रतिम करना, ऐसे प्रसंग यो उतके महान् चरिम पर मुग्भ ही नही कर रेते, बस्कि देर तक सरपयों को कम्पासगर में निमम्न कर देते है। कारणों से इस नाटक के निनक्षमे में चपतों की रेर हो । किन्तु उन्नी ही देरीताहिस्स प्रेमियों को-को पके स्वागत लिए लालायित हो रोमे-प्रतम रो उठी है। उनके नगरे-पर-तपारे मार, अतरण हम उनसे इस देर के लिए चमा-थी। भावगी पूर्णिमा कर - कुमारगुप्त का माई पर्पदच का पुत्र पुरुप-पात्र सम्वगुप्त- युवराज (विक्रमादित्य) कुमारगुप्त- मगध का सम्राट् गोषिम्दगुप्त- पर्णदर- मगध का महानायक चक्रपालित- बन्युवमा- मालय का रामा भीमपमा पग्नुवर्मा का माई मावगुप्त- काम्पका कालिदास अपपटि- पीर कापासिक शवमाग- अंतर्वेद का यिपयपति कुमारदास (घासुसेन)- सिाल का राजकुमार पुरगुप्त- कुमारगुप्त का छोटा पुत्र मटाक- मपीन महायलापित पृप्पीसेन- विगित- हरा माक्रमणकारी मुद्गल- चिपक प्रख्यातीति- सकाराज-कुलका प्रमण, महापोप विहार-स्थयिर महामविहार, महानायक, नदी-ग्राम का दरनायक प्रहरी, सेमिक इत्यादि मत्री कुमारामास्य

पषकी-
भनम्तदेवी-
जयमाला-
स्त्री-पात्र
कुमारगुप्त की बड़ी पनी-
स्वरकी माता
कुमारगुप्त की छोटी रानी-
पुरगुप्त की माता
पन्धुयर्मा की सी-मासव
की एनी
पन्पुषा की पहिन
मासव के धमकुबेर की कम्या
मटार्क की सनमी
शर्षनाग की सी
मावगुप्त की प्रायिनी
सनी, दासी इस्पादि
देयसेमा-
विजया-
कमला-
रामा-
मासिनी-

स्कन्दगुप्त

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प्रथम अंक [ उमयिनी में गुप्त साम्राम्य का स्रावार ] स्कंदगुप्त-(बलते हुए ) अधिकार-सुख जितना मादक मोर बारहीन है। अपने को नियामक और पा सममाने की बाबती सा उस पेपर कराठी है! उत्सयों में परिचारक और ममों में दाल में मी प्रपिता-बोलुप ममुप्प क्या प्रभो।(दरकर ठर। बो उपरो, हम वो समाग्य के एक सेनिको पदच-(पोरा करके) पुरपर की अप हो । स्कंदगुप्त- भाप पणदास को अभिवादन कर है। सेनापति कौस्या पाहा: पर्णदत्त- मेरी भा! पुषण भाप सम्राट् के प्रतिनिधि, मैं तो मामाघरी पर है। द ने गाया कर पाम्प पन्द्रगुप्त की सेना म बावन किया है। या मी गुप्त-मामाम्प की नासीर- सेना में उसी गापाकादया में पवित्र भानसम्म का पालन करसे हुए उसी के मान के लिए मर मिट्टी कामना है। गुप्ताल भूषण ! भागारिवारि, सर पदस की माता स्तन्य दिन हो। सदगुप्त-मार्प ! भारकी गोरखाका खेलपाता शिण और सिम्पु की लोग जारियों से जिती यावी है, शा भी उस वीरता की साना परत हुए मने गावे ।। मी सन्दर! पणदच-सोदो भागो से पुरराम! सगुप्त-रे कौन-की।

सन्दगुप्त
पदच-अपने भविष्म के प्रति प्रापकी उदासीनता और
प्रयोप्या में नित्य नये परिवर्तन ।
स्कंदगुप्त-क्या अयोध्या का कोई नया समाचार।
पर्णदच-सम्ममत समार वो सुम्पुर चले गये है, और
कुमारामात्य महापापित वीरसेन ने सर्ग की मोर म्यान श्मिा ।
स्कंदगुप्त-स्या ! म्हायलामिकत अब नही। शोक!
पर्णरत्त-अनेक समरों के पिता, ममापनी, गुप्त साम्राज्य
के महावन मास अब इस लोक में नहीं हैं। इपर पौड़ समाए
के विकास की मात्रा पर गई है।
स्कंदगुप्त--चिन्ता मा ! मार्य । प्रमी हो भाप है, सब मी मैं
दौसम विचारों का भार पान का अधिकार का उपयोग कर।
बर मी किस लिए।
पप्पंदन-किस सिर । प्रस्त प्रमा की रक्षा ८ शिप, सतीत्व
के सम्मान के लिए, देवता, बामण और गौ की मर्यादा में
विमास के लिए, पाठक मे प्रहति का प्रावासन देने के लिए
मापको अपने अधिकारों का उपयोग करना होगा । पुखराब ।
इमीशिर मैंने पाया किमाप अपने अधिकारों के प्रति उदासीन
६, जिसकी मुझे ही चिन्ता है । गुप्त-मामा के मादी शासक
अपने उत्तरदायिय प्यान नहीं !
म्भवगुप्त-सेनापरे ! प्रकृतिम्प होए । पाम मधरक महापमा
पिराब प्रारमेष पराम्म भीकुमारगुप्त मान्द्रादिस्प के मुशासित राय की
मुगानित प्रग को रमे का प्ररण नहीं है। गुण सेना की
मपादा की रक्षा के शिए पर्पदच मारा महावीर प्रमी
प्रस्तुत
पणदत्त-पठनीति, दारानिकता और कप्पना

मयम प्र.
नही। इस पर प्रस्पषवाद की समस्या की कठिन होती है।
गुप्य-माम्पको उचरोघर पृद्धि के साप उसन्न दायित्व मी पर गया
१, पर उस बोझ को उठाने के लिर गुप्ता के शासक प्रस्तुत नहीं,
स्पोकि सामाग्य लक्ष्मी को ये प्रा मनापास और प्रबस अपनी शरण
पाने बाकी बन्नु समझने लगे हैं।
स्करगुप्त-भार्य! ना म्मंग न कीथिए, इसके कुछ प्रमाय
मी
पणवत्त-प्रमाय | प्रमाण अभी सोमना है। मांधी पाने के
पाले माकाण जिस तरह स्तम्मित हो रहता ६, मियकी गिरने से पूर्ण
जिस मधर नोख पदामिनी का मनोहर पावरस महायून्य पर घर
बावा है, क्या येसी ही दश गुप्त-सानाम्प की नहीं।
स्कंदगुप्त -स्या पुष्यमित्रों के युद्ध को देख कर पर सेनापति
पक्ति हो । (हसता है)
पणदस-युगराज व्यंग न मोविए । फेबल पुष्यमियों के युर से
ही इतिश्री न सममिम, म्लेपदो के भयानक भारमण + लिए मी
प्रस्तुत एना पारिए । परों ने पानही पाए कि कपिणा को श्वेत
हयों ने पदराकान्त कर लिया। विम पर भी मुबाब पूछठे है कि
'प्रपिधरोपा उपयोग किस लिए! यही 'पिस लिए' प्रत्यक्ष प्रमाण
कि गुप्त के गामक इस सामाग्य को 'गो-यही बस्नु सममन
लगे।
(पाक्षित कर मेरा)
घापामिन-(सकर ) र पुषराम मी पहीं हैं। युपपन
की थर हो।
म्कंदगुप्न लामो चक्र प्राप्प पदन ने मुझ पर
दिया है।

सन्दगुरु
पाह-पितायो । याम ! कैसी बात है।
पर्ण-कस्याय हो, आयुष्मान् । मारे युवराम अपने प्रविण
से उबासीन है। पूछते है 'भरिभर फिस लिए।'
चक्र०-सात ! इस 'किस जिर' का अर्थ मैं समझता है।
पर्णा!
चक्र-गुप्त का प्रम्पयस्पित उपपिचार-नियम ।
म्फरगुप्त-पा, सावपान | Tमारे इस अनुमान कप व पापा
पक-पुषगम । या अनुमान नहीं है, पर प्रत्यवसिद है।
पर्ण०-( गम्भीरता से ) पक! यदि म बात हो मी, तब म
तुमको प्यान रखना चाहिए कि हम लोग अनाम के सेवा प्रसार
भान पालकी अपनी पंचनता को विष-ध का बीज न बना देना ।
स्कवगुप्त-मार्य पर्यपच धमा काबिए । एस की बातों
रामनोविक मापा में व्यक्त करना या नहीं जानता ।
पर्ण-ठीक,न्तुि उसे इतनी सीरता नहीं करनी चाहिए
(सर) बरमा पा६ पुरा नया समाचार स्या
(पर का पोरा)
मुषराम को बम हो।
पर्ण० -क्या दमाचार
पर--पर की बार पुप्पमित्रो त्र अन्तिम प्रयन है।
प्रश्नी मस्त रास्ति संकसित करने पड़ो।माठौर-सेना नाय
मेवापता मांगी है। दण्पुर मे मी त प्राया।
गुप्त-अप, गानो, उस मे दो ।
(पर पाता है, दरापुर के दूत का प्रदेश)

प्रथम अंक
'मुबराज मारककी अयो।'
समय-माजमपति सकुशत?
दूत-मराव पापडे हाप है। महापय विश्वबर्मामा पन्त हो
गया है। नवीन नरेश महापय पन्मुबर्मा ने सामिगारन भीपरमों में
सन्देश मेगा।
संमेद ऐसे समय में, सबकि हम लोगों को मालमपति से
सहायता की प्राण पापर स्वयं पौमिक भापलिये में फंस
गमे।
दूत- इसना ही नहीं एक पप्माण पक्षानमा
ग म्हपदाहिनी से सौराष्ट्र मी पपान्त हो पुनद इसी कारण
पश्चिमी मानव मी प्रम मुरक्षित न रप ।
(सदगुप्त पर्यदय की ओर देखते हैं)
पम-मीका स्या समाचार!
दूत-बामा का पठन प्रमो रहा है। पितु पर हपों से उसका
पचना फरिन । मालय की रक्षा के लिए मापन गनुर्मा ने सापवा
मांगी है। पयपुर की समस्त सेना सौमा परगी।
मालय और रामपुर में गो सन्धि गुप्त सामाम्म और
मालय पर में , उसके अनुसार मातम की रक्षा गुप्त-सेना
पर्वम्य है। महारान विश्वगर्मा के समय से ही समार समारगुप्त उनके
सरधा । पान दूत ! बड़ी कठिन समस्या है।
दून-रिपय-म्परस्सा होने पर मी पुषपर अपाम्प ने सरसता
पा मार शिप है।
पण-दूत ! सानु विदित नहीं कि पुपमित्रों से हमारा
यद पवा.

। सूत-तब भी माक्षर ने इघ समझार, किसी प्राया परी, अपनी स्पन्नताको सीमित कर लिया था। सर-दूत ! पर पन्धि नियम हो से हम जोग भाप्प नहीं है, चिन्नु परसागत धा मी धषियन धर्म है। तुम बिमाम मरो । सेवा पति पसरच समस्त सेना लेकर पुम्पमियों को गति पेगे । प्रमेय संरगुप्त माजय की करने के लिए समय है। मामो, निर्मय निमा प्रमुख को। सरगुप्त के गीये मी माखन का वन विगा सम्मा । दूत पुरापन पार्व-सामाप क मापी शासक के उपपुस्त ही परमात है।( प्रयामपरक वाता) पक-युवपन भान मा मुर, पप से मसम हुमा । और गुप्त- सायामकी मी मीसा होगी। सकता ! पुष्पमित्र-मुरमत दो समाप है। विजय निस्पट किसी दूसरे सेनिक को मेथिए । मुझे सुपर के साम बाने की अनुमति हो। म्बर-नीच, तुम विजयी होकर मुझसे मानव में मिली। प्यान रखना होगा कि रावपानी से अमीमाता मही मिली। हम लोगों को इस माम विपद में अपना ही भरोस। पप-ब चिन्ता नहीं पुषपय! भगवान् न मस्त रेगे, पणिए, निमाम करें। [पट-गरिकग]

[मुमपुर के राष-मन्दिर में सम्राट मारगुप्त मौर उनके परिपद् ]
पातुसेन परम मार! मापने मी स्वयं इन्ने रिफर मुद
पियरें । में तो सममा पा, रापदिासन पर बैठे-बैठे पादर
रिक्षा देने से ही इतना गा गुर-गामाम्म स्पारित हो गया
पा, पातु-
कुमारगुप्त--(सते हुए) मारी ला में अब रापस नही
रहते १स्यों पानुसेन।
पामुसेन-पत्र यदि कोई पाठो रिमीए और पद में
मी एक मुप्रीम हो गया था। दधियापप प्राव मी उनकी फरजी
का फय मोग पाt। पातु, एक प्रापचय की पाव कि
महामान्य परमापर परम महारको मी युर करना पड़ा! राम
चन्द्र ने दो, मुना था, बर के युगपत्र मी न य दमी पुर किया
पा। समार होने पर मी पुर !
कुमार०~पुर तो करना ही पाता न। अपनी सचा बनाये
रहने के लिए या भारी।
पामु०-अया तो साँप चाय समुद्रगुप्त ने पापुत्रों तक
का राम्प-विदय किया था, सो उनक लिए परम प्रापश्यक पा!
स्प पारगीरप फ समीर ही पापा
कुमार०-दुम भी शाति की मेना में में कोई बप हुए।
धातु-परम मारा की गय हो 1 पाक्ति की सेना न थी,
पोर पर युरन था । अब उसने ला पाने पाले मुपीर निकल
पर रि--
पुमारक-यो।
पातु-~ी पाो मुन्दर प्री में लाप्रपन मुगोमित
होता पा, प्रार सबडे सी बात तो पी गलिक शिर उनकी
वर का मलि । मुना है जार! श्री का मेरपा पही अनुसून

सन्दगुप्त
मोर उपयोगी होती, छालिए उमें एग्य की ममय से हम
घी मिल गई। परम महारद की दुराई । एक मी को मंत्री
भाप भी बना ले, पोयो दादी माले मंदियों के पदो तहको
एकान्त मैत्रगास्पायरियो ।
कमार०-(ससे ए ) लेकिन पनि हो मानवे ही नही।
पासु०-तर मेरी पम्मति से पे हो दिनों के लिए
समोसे गाय , यो कुमारामात्पी !
पप्पीसेन पर तुम हो ही नही हो, ये में मारा सम्मति
मान।
कुमार०-(सामा) तो माम्मे समुद्रगुप्त को विषय
होकर उन विद्रोही रिरेशिभ दमन करना पक
योनिमौर्य
खम्राग्प समय से ही सिप के उस पार देय मी मारव
साम्राम्पर प्रवर्गत पा । जगदिवा किन्दर के सेनापति सिम्स्कत
से उत्त प्रान्त को मौर्य सम्राट पनगुप्त मे लिया था।
पातु-पिर तो सर से लेने की एक परम्पयनी म
बाती है। उनसे उनाने, उनले उनसे, ऐसे ही सेवे पठे भाये
है। उसी प्रथा बाप!
पुमार-31 तुम समम नहीं । मनु मे इतको म्परा
पातु-नही परिवार ! समझ में जो श्वनी भाव मा गरे
किनारले लेना एक ममान ससस है। संसार में सीमा
बोकाला।
भटा-मही मोस्पा रोने से मीय मायने में अधिकार
मिकता ! जिसके बारे में बज नही, उला अषिधर हौ
सा। और यदि मांगकर मिक मी बार, वो शान्ति स्था
पौनकरण।

मयमक
मुद्गठन(प्रपेश कर के) रपा पेट कर लेगा, कोई दे मी
तो 1 अप एप्पार, प्रमय पर न खोगों ने सुना होगा, पन्त
इस प्रश्न मारण मेरे सिवा कोई नहीं मानता। इसके
मीतर घरमार देखो, मसी शान्ति से बैठा यता है।
(पासन से बैठ मासा है)
पुप्पीसेन परम मारक को बप ! मुझे अब निक्दन
करना है-पदि प्रहा हो दो!
कुमार-होकिरिए ।
पृप्पीसेन-सिमा के इस पार सामाम्प म सन्यापार स्थापित है।
माणदेय का पूत मी पा गया है कि हम ससैन्य युवराज के महामार्ग
प्रस्तुत है।' महानायक पर्यदच ने भी मनुस्य समापार मेगा है।
कुमार-मालवा इस प्रमिपान से कैसा भाप , श्य
पता बतायोकि यापुर वो बान-मार देस गया है।
पप्पी०-प्रम्ने मुझ से मालवेरा मे पूत से या तक या पा
कि पुषतरको पर दने की स्या मापापकता की, माझा पाने ही से
में पप इसे ठीक करता।
कुमार० महासपि-विपरित ! साधु ! या संय-परम्परागत
तुम्हारी ही विध
पृथ्वीसेन-मार के श्री परगों का प्रताप मौण से
मीनान समाचार मिलने वाला है। इसीलिए मुपपन को पहा
मेमने प्र मेप अनुरोष पा।
भटाक-चौराष्ट्र की गति लिपि देखने के लिए एकरणदप
सेनापति की भावश्यकता है। पतं राफ पपा पयश प्रम च
मयानक है।
पृप्यीमेन -गह रष्टि से देखते हुए ) महापशामिगत ! पात्र
.

अपमता होने पर प्रापको पहा माना ही होगा, दतस्ठा की भाग पपा नही। मटा नही, मैं वो कुमार-महाबलापिल ! तुमारी स्मरखीय सेमा स्वीट होगी। प्रमी पारस्पाया नहीं। भातुसेम--(बायोड) यदि दरियापय पर भामराम मायोजन हो तो मुम पास मिले। मप श पास है, मैं गाकर साता-यूमा र एंग, सेना को भी पार न होने पायेगा । (सम इंसते ४) मुद्गलब हो देव ! पायाला पर पवाई करना हो तो मुझे मात्रा मिटे । में प्रमी उसका स्वास्त कर गई। (फिर सपास है । गम्भीर माव से अभिवादन करते हुए- एक भार पृषीसेम और दूसरी भोर मटार्क का प्रस्थान 1) कुमार-मुगळी मारा पुष मुद्गल पारसी ने प्रार्थना की है कि मर महरफ की कम्पारा-समना के लिए पकापि मपमान की पूजा की सब साममा प्रस्तुत है। प्रार्यपुत्र का पहेंगे। पुमार०-( मुंह बनाकर ) भार वो पुथ पारसौल नफिया पाने मालीमापान मौहै। महादेवी से कर देना, असन्तुष्ट न हो, काल पत्म । सममा न मुद्गश मुद्गस-(साराकर ) परमपर परम भारत की अप हो। धातुसन--पा पारम्पच भाग पीवा पा। उसने लिखा है कि यमपुभ मेरिपे। इनमे पिता को संदेव भवमान पमा पारिए। कुमार०-पाप-नीति।

(मनातदेवी पुपपाप प्रपेरा)
भासु०-भूख गया। उसके बरये उस प्रापय को लिसना या
पमा खोग माही न करें, क्यो मेड़ियों-सी सन्तान उत्पम रों!
मनम्तदेवी-(सामने भाकर ) भार्यपुत्र की यय हो।
(धातुसेन मयमीत होने का-सा मुंह पनार पुप हो गाता है)
कुमार-भाभो प्रिये में खोर ही पा था।
अनन्त-नतषियों को मुजवाती पा रही है। अमापमास्य
पादि थे, मंत्रणा में बापा समझकर, मान-मार देर लगाई। भापको
हो देती है कि प्ररभरा ही नहीं।
(पातुसेन की भोर कुद रोकर देससी है)
कुमार-पर भोप विदेशी हसोही।
अनन्त तर मी सीमा होनी चाहिए।
पातु०-चाणक्य नाम री कौरिस्प है। उनके सूत्रों की
प्पाम्या करने वापराया पद मिला। घमा मिले तो एक बार
मोर पूष त क्योकि फिर इस विषय का मल न काँगा ।
मनम्त-पूछ लो।
धातु-उसके मनपणास्त्र में विपन्या का
पुन्मार०-(बाटार ) पुप रहो।
(नतमियों का गाते ए प्रदेश)
म देहमा उस प्रतीत स्मति से
लिपे हुए पीन-सार कोकिल
भरण रागिनी तड़प उठेगी
सुमा म ऐसी पुनर किन ।
दय भूल में मिला दिया है
उसे पर-पिथ-सा दिया है

सिझे पूस सब गिरा दिया है
न भव पसन्ती बहार कोक्ति।
सुमी
भानन्द-भैरवी
विगत हो की निशा-मापवी
रही न
भव शारदी करपी
म तो मपा की फुहार कोकिल ।
न लोग पागल मपुर प्रेमको
न तोड़ना और के मेम
या विरह मौन के क्षेत्रको
फुपात भपन सुधार कोकिल ।
[पट-परिपतन ]

प्रथम अंक - [पम मे यादगुप्त ] माए---कविता करना अनन्त पुण्य का है। इस प्रया और अनन्त उत्तस्ठा से कपि-बीवन व्यतीत करने की यो। संसार के समस्त प्रभारों को प्रसन्तोष पावर दर को बोला देता था। परन्तु केसी रिमना ! लक्ष्मी के बालों क मग और धोम की माता के अतिरित मिला क्या १-एफ प्रसनिक पसिनीव श्रीवन, गो कि दूसरों की दय में अपना अस्तित्व रखता है। सरित क्सकोप के अमूल्य रनों की उदारता, और दारिद्रय का पम्पास्मक कठोर प्रधास, दोनों की विषमता की नन्दी म्पबरपा होगी। मनोरप को-मारत के प्रश्रय पोर पबित को- पपस्स परने में मैं मी सबकी परांसा का मामन पना। परन्तु इमा मा (मुद्गल कर मेरा) मुद्गळ-पिए कविजी ! पाप तो बहुत दिनों पर दिवाई पो । पति की कृप से ही मप्यापन-वर्य मिस्ट गया। मावळ-में दो चमी को दी बेटा है। मुद्गमस्या बैठे-बैठे प्रम पर माता १ त ठो पाई, तुम यो माम्पमान हो । कविता करते हो न १ माई। उसे छोड़ दो। मा०पयोगी वो मेरे मूते का मापार कपिल- बामन त्रि, यो स्वर्गीय मारपूर सात पणा काय है! प्रचार का पालोक , असत् का स्व से, गका पठन से, और नाम जगत् का अन्तरगद से सम्मम्प प्रैन कराती है। पविता दोन! मुद्गल-मरान हापा मुख से, पेट का अनम और प्राची भनिद्रा से मी समपन्य होता है कि नही सको भी कमी झोषा- पिवारा भादगुप्त रोवर में क्या इतनी ही वस्तुएँ विधारने की पध मी इनकी चिन्ता कर लेते होमे । मुद्गल -और मनुप्प पशु नहीं है, स्पापि उसे माते बनाना पा- १-अपनी मूर्सयों को क्षिाना, पापों पर मुसिमानी का पावर पड़ाना प्राधा धीर पागमाल की सि उसके पास है। अपनी पो भावस्मातामों में कृषिमता पता कर, सम्म भोर पमु मे कुप में दिपर मनुष्य, पमु बनने से रव गाता है। मावगुप्त-पोग्ग, तुमारा तात्पर्य स! मुस-सप्न-मप बीवन कर मिसाएपूर्ण पालमि रिपति में भाभो । समय-मार हो, इसीलिए दया पाती। मातूगुप्त-क्या पह। मुद्गल-दो-चार दिन में मपन्ती दाने वाला है, पुषरा- मशरक पास गुर्गे सियाग । प्रवीति मियाने जग वाली मावणुप्त-पर में मेरे उपर पवनी या स्यौ? मुद्गल मारी हनिमचा देखबर में प्रसन इमा, ससी दिन से मैं सोनवा पा । तुम बानवे दो वि रायमा प्रपिारी मेरि आमा की प्रमोशोगों एकप पारणा होती है, 'मी टापने को ऐसे बहुत मामा-माम मापगप्र-तत्र तो गोमा है। मैं परस्य पदमा पाप्मार माय मरणोप्रपाक, सास्य और संसा-पिपा का कोई ए- पाता नहीं। म्यनन्त देश छोड़कर पानी में प प्रापा पा प्राभारद मरे पप-पदया है।

प्रयमक
गया
मुद्गल --प्रहा तो मैं माता , गीम ही मिलगा । तुम
बने के लिर मस्नुन रहना।
(पाता है)
मावगुप्त-कारामौर ! अन्मभूमि ! मिसकी भूलि में लोर कर
दोना सीखा, जिसमें पल मेलार शिक्षा प्राप्त की, जिसमें
जीवन के परमाणु संगठित पुर ये, ही दूर क्या । और रिसर
एक मनोहर सप्न, माह ! यही दो मरे इस दीपन-पय
का पाय !
पिय!
संसृति के ये सुन्दरतम क्षण यों ही मूल नहीं जाना ।
'मह उमलता मी भपनी-कहकर मन मत पहलाना ।
मादकता-सी सरल हसी के प्याले में उठती लारी।
मेरे निस्सासों से उठकर अपर घूमने को ठहरी।
में प्याकमा परिरम्म-मुहल में पन्दी भलि-सा काप रहा।
छमा उय प्याला, लहरी में मेरे सुत को माप रहा।
मग सुप्त सौदर्प हुमा, हो पपल पली मौहे मिलने
लीन होगा लहर, लगे मेरे ही नस बाती दिसने ।
रसामा घनतदान ममोहर मुसामों से मस्ति रहा।
बोपन के उस पार जाता हैसी, सहा मैं पतित रहा।
तुमने अपनी निप्तर कीमा के प्रम से, पकाने से ।
मुसी हुए रि लगे देखने मुझे पक्कि पापाने मे ।
उस मुस घ भालिंगन करने मी मूलकर भा जाना।
मिलन-चितिव-सट मधु जलनिधि में मृत रिसोर उटा गाना ।
जमारदास--(प्रवेश परके) साधु!
मावगुप्त-(भपनी मापना में तल्लीन पैसे घिमीचे म दस
रहा हो) अमृत २ नरोपर में सपकमल सिनु पापा,
-

सम्द्रगुप्त
भ्रमर गी बना पा पा, सौरम और पराग की वालपपर
थी। तबरे मम्मे की फिर उसे पूमने को जोरती
घूमने को जोरती थी, म्या में
पीतल चौपनी उसे अपनी चादर से ₹क पेती थी। इस मपुर
सौन्दर्य, उस प्रतीनिय जगत् की साधर प्रपना की भोर मैने
राप बवाया पापही स्वप्न टूट गया !
कुमारवास-समझ में न प्रागा, सिंण में और अमीर
में क्या मेद है। तुम गौरवर्स हो, यो हो, सिधी हुई भी
ठप होने पर मौ दिक्षियों की पुंपराकी खटे, उपना साम
गरी,स्या स्वप्न में रेसने की वस्तु नहीं।
मावगुण-(कुमारदास को जैसे सहसा दसकर ) पृषी की
समस्त माया कोमो प्रकृति ने अपने बर्फ प्राय से ₹क
दिमा, उस दिमाख्यो-
कुमारदास-और पापानव को मनन्त बलपथि से मो
पन्द्रप कर पा ठस लाकर को-प्रणा गाने दो नाफर
मापा , गम है। हिमालय मा गर्व से सर उदापे पता
अम हो कानमारकी उस हिमालय
मावगुप्त--उस दिमप्रणव + अपर प्रमात-स्र्य की मनारी
प्रमा से प्रायोपित प्रमा का, पीछे पोषपर कसा, एक मारामा।
उवा से नवनीत की पुरजी भांगर विश्व को रेसाती पी।
पादिम की सीतलवा से मुटपठित यो । मुनहरी किरणों को बलन
दुई । तत होकर मणको गज दिय । पुतली! उसप मंगल
हो, हमारे प्रभु की गौतनवा उसे मुरषित रख । सना की
मापा के पक्ष गिर बाते , मौन-नी में निवास करने दो।
को मत मित्र।
कुमारदास-तुम विशन् हो, मुफपि , इना मोह।

प्रथम मावगुप्त यदि य पिप इन्द्रमाय ही है, तो उस इन्द्र माली अनन्त पक्ष को पूर्ण करने का सामना मपुर मोर चिरसीया हो और प्रमिकापा से मरने वाले भूसे इदय से बाहर मिले। फुमावास-मित्र! तुमारी कोमल कस्मना, पानी की बीमा में मनघर उत्तम करेगी। तुम सचेए बनो, प्रतिभाशाली दो मारा मविप्स का उम्पनी। मावगुप्त-उसकी चिन्ता नही । दैन्य बीवन के प्रण पातप में मुन्दर ने मेरी चया बने । मुखमा हुमा बोमन मन्य दो गारगा। मारवास-मित्र ! न थोरे दिनों का परिचय मुम भागीवन स्मरण ऐगा । अब वो मैं सित गावा-देवकी पुकार है। इसलिए मैं स्वप्नों का देश 'मम्म-मारत' घोरता । करियर इस धोएमरिमय कुमार पावसेन को भूलना मत- पमोचाना। मारगुप्त-समार श्मारगुप्त के सर, पिनोदशील कुमार पास म क्या इमार पाहुसेन हो। कुमारणास-मित्र, संभ पुरापा । माग मित्र, एक पाल-सायर, प्रस्पातकाति, माओपि- मिर का भमए है। उम और गुप्त-समाम्म का बेमर देगन पम्पटक के रस में भारत पता आपा पा । गौतम के पद रस से पवित्र भूमि को मप देणा चौर रेसा दर्प से ठरत गुप्त-सामाप के तीसर पर कार्प। मार्ग प्रस्थान का पा स्परसाप पुग है। मिष, परिपतन उरस्थित है। मावगुप्त-समार समारगुप्त के जमाप में परिपन ! पातुसेन-सात पुरा! इस गतिशील जगत में परिवर्तन पर

सन्दगुत
मापवर्य ! परिपर्वन मा मि महापरिवर्तन-प्रलप-हुमा ! परिपाईन
ही सधि, बीरन है। स्थिर होना मृत्यु है, निपट शान्ति
मरण है। प्रति क्रियाशील है। समय पुरष और स्त्री की गेंद
सार दोनों हाप से सेवा है। पुलिंग और स्पीजिग की समापि
अमिम्पक्ति की कुंजी है। पुरुष उमा दिया जाता है, उतशय
रोता है। स्मी पापण करती है। श्री या प्रकृति का पतन
पस्य।
मावगुप्त-निस्सन्दो। अनन्तदेवी पणार पर कुमारगुप्त नाच
रो। मद्भुत पोली।
भातुसेनपरखी ! यह भी पस्य हो। पुस्प हैरण और
और स्त्री पिरोपण, उधर धौर सब बातो का समाधान ।
पुप प्रत्येक प्रान टचर देने लिए पर प्रस्तुत है। उसने
काल-उसके प्रभावों का परिपूर्ण परमे का ठाए प्रमान और धोवल
उपचार प्रमाया मनुप्प सर हे पन्चो . समान । पुर ने
परा', बी ने अर्थ लगा दिया-गोदा', पर, परररने सगा ।
विषय-विनत पूर तमार, वरपी की माकाबानों के साइन बन
। पास मेप वितिय में एकत्र ६, पास दो अन्पकार होगा ।
पन्न माया मा फेल षताप एक मुषा कर' है। निर्मम
मापारा में ग्राम से अनेक पप मेप रंग मरेंगे । एक पिकर अभिनय
का पारम्म होनेवाशा। तुम मी सम्मपत उसके अभिमेलामो
में से एक होगे । सायपान ! बिस तुम्हारे लिए प्रस्तुत है।
(प्रस्थान)
मावगुप्त-विवरण उदार परमार !
प्रश्न,
[प्रस्मात्र]
11

प्रयम प्रेक
[भनन्तद ध सुसखित प्रकोष्ठ ]
ममन्तषी-बया ! पत्रिका दितीय भर तो प्यतीत होता
१, मी मराफ के मानेमा समय नहीं भा !
जया-म्पामिनी ! पाप या मयानक लेख सेज ही है।
अनन्त०-मुद्र एप यो पो के शब्द से भी रोपित होते
बोधनी सास से ही पीक उठते हैं, उनके शिर उपतिका रक्ति
माग नहीं है। महत्वादाचा का दुर्गम सर्ग उनके लिए स्वप्न है।
जया पर एबडीय अन्त पुर की मर्यारा सी कठोर अप
पश्वा मे कोमल है।
भनम्ता-पानी नियति का पय में अपने पैर पलगी,
अनी शिक्षा पनेरे।
(बमा काट के समीप कान लगाती है, संकेत होता है. गुप्त
दार सुमसे ही मटाफ सामने उपस्थित होता है।)
भरार-महादेषी की जय हो !
प्रनम्त -परिदास न करो मगम के मसपापित देवको
फै रहने पिम सारस से तुम मुझे महादेवी पाते हो।
भाक मारा दय पाया, और माये न साताप
की
मनता, मका, समीऐगी।
मनन्त-मुझे विश्वास नहीं होता।
मटार-मादेवी ! ममार के समय को पिटर -
माय मुमसर परताये गप रे चन्तन में गो र । या
निकालने का प्रपन्न नहीं बरंगा, वे ही मापी रिटरनेम
दी । घुम-शुमार ये मुझे सपेव करेंगे। मैं उन पर
अनुसरण कांगा । पाहुणच मे, पौरा र
प्रभा परमो मे हो मुझ मगप प मार
P

रुनगुप्त
माननीय पद मिला है। शत सम्मान की रागा। महादेवी!
भाग मैन अपन इदप मार्मिक पस्य का प्रभस्माए उपाटन
र दिया है। परन्त का भी बान-मार-ममकर ।
स्य गृधे के लौराक बने के लिए है, पुर विष-वाम
पास के लिए नदी।
मनम्त-गुम पार हो मटाई पर मार उपमुस्त दी।
पीप प्रभाग मिट उमता से बदगा, उसे देखकर मुझे
पुरगुप्त के जीवन में न हो पा है। महावाधिकत, दुल
माता पर उसके लिए बाबही से चिन्तित है, पिण्य है।
सपा की मति एकही ना पती, में प्रामस्थित और पन
व अपस्या में निवास की अधिक मात्रा से यह औपन
कबरिण मुमोदी गुत्थियों राजमाने में व्यस्त है।
भटा-मैं पा समझ पा । पुममित्रों के मुग में मुझे
सेनापति की पदको नहीं मिली, इस पररानी मैं मानता हूँ।
में दूध पीनेवाला शिश नारी है। और पर मुझे स्मरथी कि
पृषीसेन लिरोष करने पर मी भापको रुप से मुझे महापणाविकत
पर मिला है। मैं PH महीमहासरी पाप निश्चिन्त ।
मनन्त-सुप्पमित्रों के पुरा में भेजने के लिए मैंने मा छ
समझार उपोग नहीं किया । ममई मन्ति उपरिपत है,
तुम्हारा पापना पाया।
मरा--प्रन्ति के पासना समाप उपस्थित होमे वो
कोई कषष मुमन्त्री दिखाई पान ।
आमन्त-पमशनी में अानन-विलास से और
पारसी मदिरा की पापा दनक स्थान पर रात की
पाप गी! मात्र तुम मालागुरु मम पूम से मनुष्ट से

प्रपम अंक
रो, बल इन उप सौप-मन्दिरों में प्रापियामी को पिप्शन
पाय पपगी। उस चियप की उत्कट गम्भ प्रसन्न होगी।
तब तुम मयर्क ! उस मागामी सह-महम के लिए प्रस्तुत हो कि
नही। (उपर देखती हुई), प्रपंचधुदि की कोई पाठ भाम तक
मिथ्या नहीं।
मटा-कौन प्रपंचबुदि।
अमाव--सूचीमेप भपिकार में सिनेमाली पस्यमयी
निपति का प्रम्पमित कठोर नियति का-नान प्रापरण उटाकर
मापने माला । ठमकी प्रशो में अभिचार का सफेत, मुम्कपाट
में विनायकी सूचना है, प्राधियों से सेक्षता है, या करता है-
चिमनियों से पार्मिगन
(अपंपबुदि सहसा प्रवेश)
मपंचधुदि-स्मरण है माद की अमावस्या !
(भटार्क और भनम्तदेवी सहमकर हाम मोहते है)
भनम्त-प्रमाण है, मिनु-गिरोमणे ! उसे मैं भूल सकती है।
मपब-कौन, महारपिकल तुम सदम
हे अमिताप पी डीला देखोगे, प्रक्षों में इसना बखयो,
नमम किया प कि इन मुसित-मस्तक वीर्य कबर मिनु
कालों में क्या परा है। देशो-गप चिता में नृत्य करती हुई
ताप का वाराण नस्य, गुन्म सपनायकारिणी प्रहति की मुरा
माशाभो गुरु का भयमेष से पुथे, उनके पालम्पम्प
महानरमेयम उपसंहार मी देतो (देवघर) तुमने-कोगा?
अशा महादेवी! मापस्पा के पाले पार में, या नील गगन से
भपाना और उम्म्म उस्मापात होण, महागून्य की भोर ऐलना।
बावासावधान!
(पापान)
-

-
सदगुप्त
पृश्योसेनाका परिक्षाम भमान है। मन्तिम शम्पा पर हरे
हुए मार की माम्मा को पर पहुंचाना होगा।
महाप्रति ग्रस (फ दस कर), गर्भनाग हा गया।
मायक-उसे सावजापित ने दूसरे स्थान पर मेगा है।
मरम्पति०-(भोप है) में शर्मनाग !
(मन्तापुर से घाण कम्दन
महादणनायक-( काम लगा कर सुनते)मा सप रोष
हो गया । म भय भीतर गाये
(तीनों तलवार तीन लेते है, मायक भी सामने भा जाता है,
भार सोलकर पुरगत भार मटार्क प्रोग)
पृथ्वीसम-मराई र म क्या है।
मटा-(तलवार खींचकर सिर से लगाताहमा ) परम भध
करामाभिराम पुरगुप्त की जय हो ! माननीय इमारामारप, महादया
नापा और महामविहार साम्राम्प के नियमामुगार, एस्प अर्पण करके
परम मघरकप्रमियापन कीगिर।
(तीनों एक दूसरे पर देरते है)
महामनिहार-ता स्था, समा इमारगुप्त मोन्द्रामित्व भर
पेपर में मही।
मटाकली।
पूर्यासेन-पानु उत्तराभिारी पुरम सगुप्त ।
पुरगुप्त-मर रहो। नुम लागों को पेठ र पजस्थाना
देनी होगी। उपापिरीम निर्माय सर्प स्वर्गीय समार.
पृासम्पन्न प्रमाव।
पुरगुप्त क्या मुगदे प्रमाण ना रोगा!
पृप्यासन-प्राप!

पुरगुप्त-महापापित ! इन विद्रोहियों को पन्दी करो!
( मटा मागे पडसा)
पायीसेन-टपणे मया ! मुमारी विजय हुई, पान्नु एक
पुरगुप्त-पापी पात मी नहीं, बन्दी करो।
पप्पीसेन-कुमार ! मुमारे दुबल और अत्याचारी रायों में
गुप्त-सामाग्य का राम्रा टिका नही। सम्भवत नुम साम्राम्प
पर विरचि पावादन करोगे । इसलिए मुनार ! इससे विरत हो
प्रो।
पुरगुप्त-मावस्यापित यो विलम्ब करते हो।
भटार्क -माप लोग शस्त्र रणकर माम मानिए।
महामतिहार-पाततापी ! यह मर्गाय माग्य चन्द्रगुप्त का दिया
दुपा मग तेरी मामा से नहीं रखा जा सका। उठा प्रश्ना गम्त्र,
और अपनी रचाकर।
पपासेन-मापटिहार ! सामपन ! क्या करते हो? या प्रकि-
दोरम समय नहीी! परिचम और उपर से पानी
भय, उमा रही ६, या समय बल-नारा करने का नही है।
प्रानो, म लोग गुप्त साम्राग्प फ रिपान अनुसार परम प्रतिकार
करें। बलिदान ना होगा । परन्तु मयाः मिने तुम पेश
समझ र राप में रहो, उस काल मुबंगो राष्ट्रनीति की-
मारा देकर मी-पा करना । एक नही, सौ सगुप्त उम पर
पोरगर हैं । प्राप्प-सामाग्य की उप हो । (पुरा मार
कर गिरता है, महाप्रतिहार और दरखानायक मी असा हो करते
पुरगुस-सागरा सर्व विक्ष से गपे-प्रदीमा ।
मार्क -पाट मूलई । ऐस सानिमस्स मेएक!

पुरगुप्त-३ नहीं ( मीतर पाता है।
मयई-तो बाग, ब बा , गुप्त साम्राज्य के हो
उम्म्मलनादय बोर, युगान हम पत, म मेरो प्रतिरिया प्रपती
लिए बशिरो!

प्रथम अंक
(नगर प्रान्त में पम)
मुद्गल-(प्रवेश करके ) किसी के सम्मान सहित निमंत्रण देने
पर, पवित्रता से हराय-पैर पोकर चौके पर बैठ गाना-एक दूसरी बात है,
चौर भटकते, पकते, उदाते, मदद, ठोकर पाते और मुमते-
पाप-पैर की पूजा करते हुए मार्ग पवना-एक मिय बस्तु है।
एम, और कहो या दौड़, कुसुमपुरी में प्रपन्दी और प्रान्ती से
मूलम्मान ! इस बार की प्राrा तो पालन करता है, परन्तु, पदित
दम्पनि, पुनरच, फिर मी, भी ऐसा माना मिली कि इस प्रामप ने
सागि प्रणाम किया । प्रथा, इस बम की छाया में बैठ पर विचार
कर सेतो योजन लोर पाना महा। कियोड़ा और पा कर
काम करना।
(गठरी रस पेठ पर उपने लगतारे माराप्त का प्रपेरा)
मावगुप्त-मुझे तो मुगराम ने मूलम्यान की परिस्पिति संभालने
लिए मेग, ऐपता है कि यह मुद्गश मी यहाँ भा पहुँचा ! चलें,
इसे पलंग करें, पोहा मनोविनोद दी दी।
(कपडे से मदिराकर, गठरी सोचकर पलता है)
मुगल-( उठ ) यरो माई, हमारे जैसे सामरण लोग भरनी
गठरी पारी टोत ₹ , मुम कष्ट न करो। (मासृगुप्त सर काटता
है, मुद्गल पीछे-
पीता है।)
मावगुन-(दूरसका रार ) अब मागे परे कि तुम्हारी यंग
री!
मुद्गल-मग्नी गटरी पराने में टाँग टना बुरा नही, अत्यन्त
नौ । नुन या न सममना हि म दूर पलने-पजते थक गये हैं।
तुम्हारा पौध न प्रगा। एम ग्रामग, एनमे शास्त्रार्प कर लो।
रान दिलायो।त, मरी गगरीबो तुम लवे हो, इस्मे पौन-डा
म्साप है। बोखो-

मारगुप्त-न्याय ! तप तो तुम प्राप्तयास्य अपाय मानते होगे।
मुद्गलमय वो तगाम लगाना पड़ेगा ?
मावगुप्ता, तुमने गीता पठी होगी !
मुद्गत- प्रवास, मामय और गोवा न पड़े!
मावगुप्त-उसमें वो विना है कि "न स्वाद मातु नाऽसौ न स्व
नेमेन हम है, न तुम हो, न या वस्तु है, न तुमारी रे, नरमारी,
कि इस घोटी-सी गठरी के लिए इवना मगा!
मुद्गह-पोहो । उम नहीं समम !
माहगुप्त-क्या।
मुद्गल-गीता मुनमे के बाद क्या हुमा ।
मावगुप्त-महामारत!
मुद्गल-तब मामा, इस गठरी के लिए महामारवध एक लघु
संकायोगाना भापायक । गठरी में हाप लगामा किया
जगम । (रंगतानता)
मावगुप्त-मुगल, या मत तानो में मेवा मूर्त नहीं कि सूप
माग के लिए दूम और मधु से बना हुआ एकर एक मी गिरा।
गठी देता है)
मुद्गल-परे फोन ! मातृगुप्त।
( मपम्प में कोलाहल)
मावगुप्ता मुद्गल पर दो शक और दूलों की सम्मिलित
सेना पोर मारेला पी, पापोर विप्न सामाग्म ।
निरी मारतीमा की पोर दिया है।
मुद्गल-और मैं महादेवी का संदेश जार प्रान्ती गा, पहा
गुनगम मही। पलापित पारस को मा दुई महापमपुष
गुप्त को, नित राहो, सो निभयो । यहाँ वो पिष्ट समस्या
हम लोग पार हो।
४

मावगुम-पुष नदी, बल मगवान् से मापना । सामाग्य में कोई
मुनने राणा नाही, असे युवराम स्कंदगुप्त क्या करेंगे।
मुद्गल-परन्तु मा हम बिर रोठे तोरन मनुष्यों की कोई
प्रार्थना मन नही । इनको श्रम में हमारी प्रासम्मकता पाती है।
में दो पारा माता, मका या तो कुछ मुरते मीर।
मावगुप्त-नाही मुद्गल, निरी प्रशा का नारा दसा नहीं पाता।
मापनकी उमतिका पी ठोय पा! क्या इना बीपन केवल
चीटियों के समान किसी की प्रविरिसा पूर्ण करने के लिए है ?
सो मा दूर पर कर हुए नागरिक और उन पर हरयां की नृस्तिर !
पोर।।
मुद्गल-भर । राप रे बाप !!
मागुप्त-साबधान ! भवाय प्रवस्था में प्रापना के अतिरिक्त
मोर कोई उपाय नहीं, मानो हम लोग भगवान से विनती करें--
(दोनों सम्मिलित सर से)
उतारोगे अषय
पार पार गयो फह रफ्ला मा लूगा में भवतार |
उमड़ रहा इस भूतल पर दुसरा पारावार ।
पाप लेलिहान गिड़ाय करता है विस्तार ।
प्रलय स्यापर परस रहे है रक भषध भार ।
मानवता में राक्षसस कब पूण प्रचार।
पहामही कामों में प्रयत क्या यह हाहाकार ।
सापपान होभा तमगानो मै तो मुख पुकार।
(हण सैनिकों का प्रवेश-पम्दियों के साम)
एणपुर पस्पा गाता है।
मुद्गल-६६, मीख मांगता है, गीत गाता है। पाप मां कुछ
दौगिरगा। (दौन मुद्रा पनाता है)
मुमार

स्कन्दगुप्त
इन-(पाका देतेर) बा, एक मोर सड़ा हो । जी,
इन दुपये ने कुछ देना प्रमी सीधर नहीं किया, पो कुचे।
नागरिक-म निम प्रमा हैं। हम डोगों के पास स्यप
गा यो पाप जोगों को दे । चैनिकों ने तो पपने ही छूट
जिवा।
इख-सेमापति-गुम जोग बाते बनाना लूप जानते हो । अपना
किया हुआ धन देकर प्राए पचाना हो तो ग्रीमता करो, नहीं तो गरम
किये हुए लोरे प्रस्तुत है--को और सेल में वर कपड़े मी। उस कष्ट
पस्मरण करो।
नागरिक-माग तो तुमारे हापों में है, बाबाहो के को।
एण-सेनापति-(कारे से मारता हुमा) उसे तो ले हो गये,
पर, धन पहा।
नागरिक-मही निर्दय ! पोर दिया कि नहीं है।
इम-सेनापति-(सैनिकों से ) इनमे बाज को वेव से मौगा
दुमा कसा गाल पर नजाभो और सियों को गरम जोरे से दागो।
लियाँ-नाय!
हमारे निजों के पल को हो।
हमारेपन के सम्मत करो।
पुरप-नही हो नाम होत नाम सा!
मुना केवल यही हो पा पहा ।
नियाँ -पुमा या किसी में तब सुना पा!
मा विश्वास सामने हो।
(तियों को पकाकरण सींचते है)
मावगुप्त--प्रमु!
हमें विश्वात दो अपना बना लो।
सदा सप्द हो-पाईदा ।

मपम श्रम
इन निराहों के लिए प्रास उत्सर्ग काना धर्म हैरायरोस्त्रियों
पर प्रत्याचार
(तसपर से पन काटता है। सपकते तप एक संन्यासी र प्रदेश)
सम्यासीमापु ! बीर | समसकर यो हो बामो-मगमान पर
विस्वास करके सो।
मुद्गल ( पचानता हुभा) बप हो, माराप्रपुष गोषिन्दगुप्त
कीय हो।
(सम उत्साहित होर मिह पाते है।हमा सैनिक मागते है।)
गोविन्दप्रय मुद्गल । तुम हो केसे । और पुपक ! म
कौन।
माणस-मुबपन सदगुप्त का अनुपर।
मुद्गम-धीर-गा! इतने दिनों पर दर्शन मा हुआ तो इस
पेय में।
गोषिदक-मगत ! क्या को सरल है?
मात्गुप्स-उरलपिनी में।
गोपिम्पल-अन्य , भुरक्षित है। लो, दुर्ग में हमारी सेना
पहुँच पुषी है, वहाँ विमाम करो । पाका प्राय करके हमको
सीम मावस्यक प्रर्य से मारमा बाना है। अब प्रातक का
र नहीं।
सय-बाय दो पजकुमार गोपिन्दगुप्त की।
गोपिम्द-मुप्पमित्रों के पुटप या परिणाम हुमा ।
मागुप्त-विजय ।
गोपिन्व-और मालया का।
मुद्गस-पुरराम पोड़ो सेना समरपुषर्मा की सहायता के लिए
गये।
गोविन्द--( उपर दसर) पौरपुष । सन्द ! माघरा के

देवता और प्रणीको जस्मी तुमारी रक्षा करें। भाग्य सामाम्म के
मुम्ही एमात्र मरोसा हो।
मुद्गल-उप महाराब-पुत्र ! बड़ी मूस लगी । माय बम
मूख का पाया हो गया शीप रचा कौथिए ।
गोथिम्द०, पत्र जोग पलो।
[सब गाते है]

प्रथम अंक
[मन्ती का दुर्ग]
(दपसेना, मिश्मा, जयमाला)
विधया-पिनयरिसकी होगी, कौन बनता है।
अपमासागुमको फेवल अपने मन की रक्षा का स्वना प्यान है।
देवसेना-और देश के मान का, विरों की प्रतिष्ठाप
को साथ नही।
पिजपा-(संकरित होकर ) नहीं, मेरा अभिप्राय यह नहीं था।
अपमामा-परन्नु एक उपाय है।
पिपापा स्या
खपमाता-रक्षा का निश्चित उपाय ।
देवसेमा-म्हारे पिता ने वो उस समय नहीं माना, न मुना, नहीं
तो पाम इस मप मप्रसाशन माता।
जयमाला-तुमारी अपार धन राशि में से एक दश वही
गदि इन पन-लोप्नुप मगाजों को दिया जाता ठो
विजयान्तु इस प्रकार प्रर्ष दकर विषय परीदना तो देश की
गीता का प्रतिकूल है।
अपमासा-ठहरो, कोई पापा।
(बन्षुरा य प्रदेश)
पापुरमा-पि! अमातक युरपरका कोई सन्देश नहीं मिला।
सम्भबत राह और हगों को सम्मिलित पानी से भाम दुर्ग की रपा
म कर सकेगा।
सपमाना-नापसप क्या मुझे स्कन्दगुप्त का भमिनप काना
रोग्य क्या मालपरा को दुमा की माता पर ही पम्प परने का
सारस हुआ पायो प्रमु । सना लघर सि-पित्रम से सेना पर टूट
रहो। दुर्गरघा का मार में लेती है।

संगुप्त
विजया महापस ! या फेवण वाचाजवा है। दुर्गनपा प्रमार
मुपोम्प सेनापति पर ना पाहिए।
पन्पुषर्मा-पापमो मत भेटिन्ये !
जयमाला-सर्यरन की चमक देसनेमाणी मासे वियनासो
सहवाग के बमोस सह सकती है। मेष्ठि-कन्ये । हम पाया
, चिरगिनी सहगलावा का हम जोयों से चिर-स्नेहए।
पापुषर्मा–प्रिये । गरमागत और विपक्ष की मर्यादा
रखनी चाहिए । अप्पा, पूर्ग का तो नहीं, अन्तःपुर मार तुमारे
उपर।
देवसेमा-मैया, पाप निश्चिन्त रहिए ।
पपुवर्मा-माम दुर्गम निरीक्षण करेगा । मैं गाता है।
(गावा है)
विजया भयानक मुद्ध समीप ही बान पर,पों पबमारी।
देवसेना-तुम दीया जो तो मैं गा ।
विजया-सीन करो पराकुमारी!
सपमासाप स्पा।
यिझया-पुस और गन।
अपमाला-पुर स्था गगन मही है। या रंगीनाद,
भैरणी का तारामनय, और यमों का पाप मिलकर भैरग-संगीत
को सपि होती है। जीवन के अन्तिम रस्म को मानते हुए,
अपनी आँखों से देखना, गोपनगास्म के परम सौन्दर्य को
नप्न और मपान पास्तविश्वा अनुमब रण सप्पे पौर
एप को होता है। समयी महामाया प्रकृति का निरन्तर संगीत
है। उसे सुनने के लिए एप में साहस और बल एक करो। मस्याचार
मियान में दी मग का, शिव का, सस्प मुन्दर संगीत समारम्भ
रोख।

प्रयम भक
देवसेना--तो मामी, मैं तो गाती है। एक बार गावं,
पमाप प्रिय गान फिर गाने को मिले या नहीं।
जपमाला-खो गाम्रो न।
पिनया-रानी 1 तुम लोग भाग को चिनगारियों से, या मी
। देगी ! बालामुली की सुन्दर जट के समान इम लोग
अयमाला नुनो, देवसेना गा दी है-
(गाना)
मरा नैनों में मन में रूप।
किमी छलिया व अमल अनूप ।
यज्ञ-यल मालत व्योम में यो छाया है सप भोर ।
सोज-सावकर सो गई में पागल प्रेम विमोर ।
माँग
मराहुमा यह पा
मरा मैनों में मन में रूप।
पमनी की सभी पीतू रहा लगाये पान ।
पलिहारी में, फोन तू है मेरा पौरन मान ।
सेलता पैसे पाया धूप ।
मरा नैनों में मन में रूप॥
(सहसा मीमवर्ना का प्रवेश )
मीम-मामी, दुर्ग का द्वार टूट पुफा ।हम मन्त्र पुर के
बारीशार पर है। अब तुम जोग प्रस्तुत एहना ।
सयमासा-उना स्पा समाचार!
मीम-अभी कुछ नहीं मिशा । गिरिफर में होने रापुमो
के माग को रोका थ, परन्तु दूसरी गङ्ग-उना गुप्त मार्ग से मा
। मैं बावा सापपान!
(जाता है)
(नेपप में लाहल, मयानक राष्ट्र)

विजया-- मायनी । किसी सुरचित स्पान में निकल पहिए।
अयमाला-(हुरी निशल फर ) रक्षा करनेवाली तो पास है,
र स्पा,क्यों देयसेना।
यसेमा-मामी ! मेष्ठि-न्या के पास नहीं है, उन मी रो।
विशया-न न न, में लेकर क्या करगी, भयानक !
देपसेमा-इतनी सुन्दर बस्तु फ्या कोने में रखने के
योम्प नही है।
पिडया-(पड़ाके का राद सुनकर ) मोर ! तुम लोग वही
निदय हो।
अयमाता-मानो, एक मोर घिरकर खड़ी हो गानो !
(रक्स से जपपम मीय का प्रवेश)
मीम-मामी ! रचा न हो सकी, अब तो मैं गावामी
परपीय मम्मान को अवश्य प्राप्त गा । परन्तु
जयमाला--दम लोगों की चिन्ता न करो। वीर मिमों की,
अपहों की पीडितों और मनापो की ए में प्राय बिसमन
करना, सविप का पम है। एक प्राय की बात अपनी
तलवार से फेला दो । मेरमक भगीनार के समान प्रबलाकार
से रान-एप ऊँग दो । पीर । बडो, गिरो तो मप्पा.
मापन सूर्य के समान !-भागे, पीये या प्राणोक और
उगपक्षता रहे।
(ममा परमाम द्वार का टूटना, विरामी राम-सेमापति का
पोय, मीम का भाकर राकना गिरते-गिरते मीम का समाप्ता और
देवसेना की सहायता से सुय । सहमा स्कन्दगुप्त का सैनिकों के
साय प्रमेय।)
'युवराम सन्दगुप्तडीब
(रा भार हए स्तम्मित हाते है)
।

प्रपम अंक
ro-मरो देखियो । स्कन्द के मौदित एवे स्त्रियों को
स्त्र नसीबखाना पड़ेगा।
(पुर सब परार्थित भौर पन्दी होते हैं)
पिजया-(मोकार ) आहा ! कैसी मयानक और सुन्दर
स्क-(पिसया की देसकर ) मामा कीन ।
[ पटाक्षेप

द्वितीय अंक [मालय में शिपा-सटकम] यसेमा-दती पप्पी पर है और अवस्य है। पिया-प्रा रामकुमारी? संसार में घन, प्रबम्चना और इस्पानों को देखकर कमी-कमी मान ही ना पाव कप जगत् ही नक। स्वमता और पासरा का सामान्य नही है। बीना माग, नोच-ससोर, म में से मामी रोरी बीन बर मागने बाले पिर गौर भी तो हैमथान के इत्तो से मी बाकर मनुप्पों की पवित पगा। देपसेनापमित्रता की माप १ मलिनता, मुसप मालोचक है दु, पुष्य की कसौरी पाप । विजया । प्राकारा के मुन्दर नवा प्रकों से केवल देने की बाते है। दे मुम कोमल कपा-बटोर-कौन न कता है। मामय में सेकसी हुई प्रेरित को करमामयी वाम को कर या नहीं, उसे देख नहीं पाते। रावल और पारिगत र पैरम विट रतने की बस्तु नहीं। परन्तु संसार में ही नया से उम्म्मत- किन्तु कोमल-मय संयोत की प्रतिमा तपा स्थायी की डोरम पाणे पाणी देते जाते हैं । उनी से स्वर्ग प्रअनुमान । दिया ग सफ्ताहै। पिया-गे, परन्तु मैंने नहीं देना। मेयमेना-गुमने सरमुच ई ऐमा म्पक्ति नहीं देन्य। पिजया नहीं तो-

हितीय अंक
देवसेना-समझ करो।
विजया, समझ लिया है।
देपसेना-
या मारा दय पट्टी पराजित नहीं हुआ। पिछया !
विचार कर पो, पिसा मी असाधारण माल से माप ठहर
सप अभिमूत नहीं हुमा । यदि हुमा १ तो नही मग है।
पो मारो सुन्दर स्पना पाद पर नौड़ बनाकर रिमाम
परती , गी स्वर्ग है। वहीं विकार , वही प्रेम करने
प्र स्पड सर्ग है, और वा सो कोक में मिलता है। मिसे
नी मिला, पर इस संसार में प्रभागा है।
विजपासो रामकुमारी,
मैं
यसेना, तुम्हे मना ही होग्य ।
पिया-मुझे तो भान तक किसी को देख कर हारना नहीं
पाहा, एक सुपएम के सामने मन टोला मा , परन्तु मैं उसे
छ पयकीय प्रमार मी र राज रे सस्ती है।
देपसेमा-नही किमया ! सागरने से, पहला देने से, नहीं
से सकता । तुम माम्बवती हो, देखो यदि परम्पर्ग तुमारे राम
हो। ( सामने देखकर ) पर लो। पर युवापस मा एम
लोम र पलें।
(दोनो जाती है, संदगुप्त का प्रपेरा, पीछे पालित)
स्कंद-विजय का पगिक उस्वास एदय की मृत मिरा
ऐमा १ मी मही । पीरों पमी स्याही म्पयसाप , स्याही
नन्मय मावना है। पायनित ! संसार में मो सब से महान् ,
पर क्या है। त्याग । स्पाग का ही दूसरा नाम मात्र है। प्राण
प्र मोर स्पण करना पारख का रहस्प है।
पा---गगन । सम्पूर्ण संसार कम्मएप पोरों की चित्र
ग्राम है। पारस्प एक सारलागी गुण है। प्राधियों का शिकार

सम्मत इसी विचार गर्षित होने से हुआ है। बीरन में पड़ी तो
बिजयी होता है, जो दिन-पत 'पुरस्पविगतम्बरका खनाद सुन्त
करवाई।
स्क-ऐसा मापन वो पिएम्बना,निसके लिए दिन-पत
जाना पड़े। प्राय मेंबर पीस गुम गरव-ययिका मिथास हो,
समी पाव-पर पावरले, मरियों को पापि हुए, पाच प्रोपों से एक
दूसरे को पूरा करे। बसन्त के मनोहर प्रभाव में, निमत घरों में,
चुपचाप मामे बाली सरियों समोठ याम क्त गाकर जान कर
दिरा वापसी, नगी फ! मेरी समझ में मानव-जीवन कापी
उदेस्म नहीं कोई और मी निगख पस्य, पारे उसे मैं स्पर्मन
भान सत्र।
या-मारपार पुरपनापेमापन में कोई काम करने
पाले एसे ही पुर्षण रिचार माते पाच प्रामों का मोर।
अपने को मगों से अक्षम रखने के चिर अपनी पारे लिए, र
उन्म र मन होता है। अयोप्पा पाने के लिए आपने रस
एमय निरित किया है पनि सवा ना ऐगा ! पुणमित्रों
और राम के पुर समाप्त हो ।
म्कंद-गुम मुझे उरेरित करे।
यदुरापरमुझेप प्रविपर।
सदनी पर प्रश्वमेध-मराकम सर्पप सम्राट्माणुप्ता
मास्न मेरे योग्य नहीं है। मैं मगहा परमा नहीं पाता, मुझे सिा-
उन न पारिए । पुरगुप्त को एमे रो। मेरा प्रमेला बीवन है।
मुझे
थापा मही होगा। यदि पम्पयक्ति केन में हो
अन्यप रोम, सर वो समर सपू प्रन्यायो का हीरा से
15

रितीय अंक
गया। प्रापको सबके प्रविम की रक्षा के लिए अपना प्रधि
पर सुरक्षित करना ही पड़ेगा।
(परका भाना, मथ संकेत करना, दोनों का प्रस्थान, देवसेना और
विषया का प्रदेश)
विजया-दस्या रामकुमारी ! युवराम तो उदासीन है।
वेषसेमा-नां विषया पुषपण की मानसिक अवस्था कुछ
रखी हुई है।
विजयानुकता परे पग्य से हय ही है।
देवसेना-पी हमारा सोचा हुआ युवराज के माप का
परदा वो नहीं त्य पाहै। क्यों विजया। मब भ प्रभाव में
सरमने तो नहीं लगा।
विषया--परमारी ! तुम वो निर्दय वास्पबागों का प्रयोग र
पोहो।
देषसेना-दी विजया, पात ऐसी नहीं है। मनवानों देशप में
पही एका विषा, सौन्दर्य, बन, पपित्रता, और तो क्या,
इस मी उसी से मापते।बामाप उनका ऐश्वर्य।
वित्रया-परन्तु पयकुमार । इस उदार प्टि से तो धक
परित या पुस्प नहीं है। अवश्य। वीर दय, प्रशस्त पर है,
उदार मुखमल है।
यसमा-और सबसे अच्छी एक बात है। तुम समझती
पर मास्थाकामी है। उसे तुम अपने अमर से कय कर
तो हो सो! माई, तुमको जेना है, तुम स्वयं समझ लो,
। दवाली नहीं पक्षेगी।
पिजया--आनो रामकुमारी।
देवसेना-एक गाना मुनोगी।

पिनया-मायनी सोनदी रोगी, अब पकना चाहिए ।
देवसेना सर तुम प्रमी प्रेम करने का, मनुष्य फैशने का, ठीक
सिकात नहीं मानती हो।
विजया-क्या!
देवसेना-नसे देग के शम्पय,मुन्दा पतन, मय हुमा पौषन--
या सब तो पाहिए हो, परन्तु एक बल और पारिए । सुपुष्प को
पीभूत करने के पाल चादिए, पोते की रम्टी । मेरा तात्पर्य है-
एक पेदना अनुभव करने प एक पिहयता कर, प्रमिनय उस मुख
पर ये जिससे कुछ मानितिरको रेखाएँ मुख पर पो, और मूल मनुष्य
उन्हीं को होने के लिए म्याकुल हो बाय। और फिर से पूर्व याम-गरम
प्रास, और वो पार एक तान पागेसरी को-रस कोमा तान ।
पिना इसम रंग फीका-
पिजया-उस समय मी गान!
देवसेना-बिना गान के गौ कार्य नहीं। विस्म के प्रत्येक
कम में एक वाक है। भारी वमने मुना नही १ दुर्माम्य तुमारा।
अनेगी।
यिमया~पयकुमारी | गामे न मी रोग होता है पमा राप के
अपनी रियाना, मर बनाकर एक मात्र प्रकट करना, फिर दिन में
रव गोर से दिला देना जैसे उस टान से गून्य में एक दिलोर
उट गई।
देषसना-बिसपा ! क परम्प के मिलने में एक वम
१, प्रयकरारी पक्षी + दिखने में एक लप है । मनुम्म मे
माना स्वर मिला कर रखा है, तो म तो उमा स्वर विष
पोशा में गौम न मिशता । पाटिल के मार मा रेको,
बह देखो, पेनाल-मुरा बोलग्न । पदियों को देखो, उनकी पापा
५४

शिवीय अंक
'म 'परख' में, पाली में, रागिनी है।
पिनया-बमारी, क्या पायी हो ।
देवसेना-तुमने एकति टीले पर, सबसे अलग, शरद
मुर प्रभाव में फूला हुभा, भलो से लदा हुमा, पारिजात-नच
विजया-नहीं तो।
देवसेना--उसन पर अप इधों से नहीं मिलता। यह
प्रान अपने सौरम की तान से दक्षिण-पपन में कम्प उत्पन करता
है, कलियों को पटाकर ताली यमाकर, मम ममकर नाचता
है। अपना नस्य, अपना संगीत, या स्पर्य देवता है-सुनता है।
उसा अन्तर में बीपन रासि पीसा बनाती है। यह वो कोमल स्पर
में माता-
पने प्रेम-सरु तले,
पेठ यौहलोमा भातप से तापित भौर बसे ।
छाया है विश्वास की प्रदा-सरिता-फूल,
मिनी आँसुभी से मृदुल है परागमय घूल,
यहाँ कौन पोचले!
पल पड़े पास से मरे दय का पाव,
मन की कया म्पया-मरी ये सुनते बाव,
कहाँ रहरले।
पी लो बपि-रस-मापुरी सोनी जीवन-येल,
पी लो सुन से भायु-मर यह माया का सेल,
मिलोस्नेह से गले।
पने प्रेम-सर-सले।
(पन्धुवर्मा का प्रोश)
यसेना-(संक्ति होती-सी) परे भैया-

परधुषा-देवसेना, तुझे म्पने प्रमी विपिन पेग है। देवसेना-रोग ठो एकन-एक टमी को लगा है, पन्तु म पेन अथी, इससे फिटने रोग अप्थे किये जा सकते है। पपुवर्मा-गली! मा देख, पुषपन मा, कुमुमपुर से कोई समाचार माया। यसेवा 1- उने बाना मावस्या होगा। मामी बुलातीय पागुपर्मा-हा, ग्नकी विदाई करनी होगी। समबत सिंहासन प पेठने-पग्पामिपेक प्रकार होगा। देवसेमा-कपा माप को ठोड नहीं मालूम ! पपुषर्मामही तो, मुझसे मानणे ; परन्तु मौहों के नीचे एक गमग, पाव छ समझ में नहीं पाती। देवसेना-मैया, तुम लोगो के पास पावे दिया इसमे का एक मारो पस्म है। जी मोर प्रदेने में पुरुषों की मर्यादा परती है। बब मारा हर भीतर से प्रदान करता है, तब दम लोग एक मुलार से उसे राल वे दो-पार की प्रपम्पना। पायुपा-(सन) अपामा उपर, उपरेश मत थे। (पिया और देवसेना जाती है) पापुपर्मा-उदार-बारदर, योपम-सौन्दर्य, ८ मार्या पर्व का एकमा प्राणपण इस युगपर पिशाव मस्ता देसी हिरिया से अस्ति है! ठरण में तौर अमिमान रेप विराग है।को में एक गोक्न पूर्ण ज्योति है। मविष्य साप इसका युर रोग्य, रेत मौन पिजपी होता है। परन्तु में प्रतिम परता से इस बार परोपकारी के लिए मेरा प प्रतिर। पत- (जाता है)

द्वितीय अंक
(मठ में प्रपमधुमि, मटार्क भोर रावनाग)
प्रर्पय०-बार देख लो, कोई है तो नहीं।
(शर्व पाकर लौट भाता है)
राय०~ों नहीं, परन्तु भाप इतना पीकते क्यों है? मैं तो कमी
या चिन्ता नहीं करता किदोन पाया है या भायेगा।
प्रपंच०-गुम नहीं जानते।
राषनहीं भमस ! सग हाप में लिये प्रत्येक मविप्यत्
1 प्रीया करता है। जो कुछ होगा, यहीं निवय लेगा। इतने
रकी, पाराहर की, मावश्यकता नही । विश्वास करना और
देना, पवने ही लघु म्यापार से संसार को हब समम्पाएँ एक हो
बागी।
मपंपल-प्रत्येक मिचि के विवादों के पान होते है, समझ लेना
पारिए, रेत लेना चाहिए।
शवप्रच्छी बात है, काहिए।
पटाई-तुम पाले पुर तो पो।
(रासं प राने की मुद्रा बनाता है)
मपंच-पम की रक्षा करने के लिए प्रत्येक उपाय मे काम लेना
रायंग-मि-गिरोमणे ! या कौन-सा पम है, जिसकी त्या हो
मर्पय०-यही हस्या रोक्ना, परिमा, गौतम का धम है।
यो पहियों का रोकना, काया और सहानुभूति की प्ररणा
ने पस्याए का प्रसार परना। तं, अपसर ऐसा है कि हम पर
काम मी करें जिसम तुम पीक उठो , पान्तु नही, या तो तुरे करना
दोहोगा।
मटार-स्पा
-

स्कंदगुप्त
प्रपच०–महादेवी देवकी के कारण पानी में विद्रोह की
संभावना उरे संसार से इयना होगा।
शय०–ठी, तभी प्राप चौफ्ते , और टमी पर्म की रक्षा
होगी । इस्पा केशाय इस्पाप निषेप कर लेंगे-स्पो !
मटाक-यपे गर्व! परन्तु महास्थविर ! क्या इसकी पन्त
मावस्यकता है।
प्रपंख-नितांत।
शव-बिना इसके नाम ही न बोग्य, धर्म ही न प्रचारित
होगा।
प्रपंच०-ौर या काम गर्वको करना होगा।
शर्ष०-(पौरकर ) मुझे ? मैं कापि नहीं
भटा--गीमता न करो राष! भविष्यत् के मुझो से इसकी
तुलना करो।
.
शर्प०–नाफ-सोख में नहीं मानता मुझे शत्रु दिमला दो। मैं
भूले महिये की मांति उसका रसपान पर लगा, बारे में ही क्यों न
मारा गाऊँ , परन्तु निरीह इस्या-या मुमसे नहीं
मटा-मेरी माना।
शर्य-तुम सैनिक हो, उठामो तलवार । चलो, दो सास
रानमा पर हम दो मनुष्य माध्मय करें। देते मरने मे कौन मागता
पापरता ! प्रपला महादेवी की हत्या ! पित प्रलोमन में तुम रियाच
बन रहे।
मरा-सापपान गर्ग। इस पळ से हम नहीं निम्न सचे।
स्तो परो या मरो। म वानवा पा स्वांग नहीं ल समता, मुझे पर
नहीं माता । मुम कुछ लना , र पैसे मिलगा-सँगा ! पाच दोगे,
हम मी लाम में पोये।
शप-नही मग! लाम दीलिए मनुष्य सब काम
।

रितीय अंक करता, तो पापना पना ही उसके लिए पर्याप्त पा । मुझसे यह नहीं होने का। - मपथ० उहरो मटाई । मुझे पूछने दो । यो राम ! तुमने बोस भस्वीपर फिप्प परमों ! पाप सममार। शर्ष प्रपश्य । प्रपप-तुम किसी धर्म को पाप नहीं कर सकते, या अपने मम्न रूप में पूर्ण है, पवित्र है । संसार ही युर चेपी, इसमें परा मित होकर शस्त्र प्रर्पण करके सीने से फ्ण जाम ? तुम युर में इस्पा करना धर्म समझते हो, परन्तु पूसर स्पल पर अपर्म ? शर्व०-हाँ। प्रपथ-- मार गणना, प्राणी का अन्त कर देना दोनों स्पनों में एकमा है, केवल देश और प्रजा भेद है। यही न ? शय-हो ऐसा ही हो। प्रपया--दय तुम स्थान और समय की कसौटी पर कर्म को परमजे रो, इसी से कम प्रच्छ और बुरे हाने की बांध - परते। शर्ष [0---सरा उपाय क्या। प्रफ्य० है क्यों नहीं [इम फर्म की जाँच परिणाम में करते है, और यही उरण तुम्हारे स्थान और समय पानी बार होगा। शप-परन्तु जिसक मापी परिणाम को भी नुम देश न सरे, उसके बल पर तुम कैसे पूर काय कर सक्त हो? प्रपंच-पाया पर, मो मृष्टि का पस्प है। भाभो इसका एक मन्पर उदाहरण दे। (मगिरा का पात्र भरता है, सर्य पीचर सप पिलाता है, यार पार ऐसा करता है।) मपंच०-क्यों, रेसीपी पी' राय--उदय र सहीर सिल गई ! 12

-
मटार्क-पानु भन तो एक मानन्द पासोत हदप में पाने जगम है।
एर्ष में ना! ( उठमा चाहता है)
प्रर्पय०-यपे, मेरे साथ।
( उठान दोनों मारते हैं, अकस्मात् लासलाकर प्रपंधि गिर
परवा चोट लगती है।)
मटा-परेरे! ( समलकर उठाता है)
मपंप चिन्ता नहीं।
पार्व-बड़ोपोर पाई।
मर्पष परम् परिपाम अन्धमा । तुम लोगों पर मारी
विपचिपाने वाली पी।
मार्फ -- राज गई स्पा ! (भारतर्ष से दसवा है)
शर्य०-पों सेनापति 1 टल गई।
प्रपंच-उस विपत्ति का निवारण करने के लिए ही मैने
याप मा। हम लोगों के मूग, मरिष्यत् और गर्वमान का
निपामक, पक और प्रप्त । नामो, तुम बोम निर्भय हो।
मटा-बन्न गुरदे!
शर्यः-स्पचर्य!
मार्फ-मा न करो, भया करो, प्रदान फल मिलेगा । ।
भाभी तुम विवाह नहीं करते।
शर्य-रामो प्रम दरोगी ही कहेंगा।
मपंच०-प्रधी बात है, चलो।
(सर पाते हैं। पासेम का प्रपेरा)
पातुमेन में प्रमी पी ए गया सिंहण नही गय । इस
पस्पपूर्ण अभिनय को देखने की इम्या बलरती हुई , परन्तु
मुद्गल हो प्रमी नहीं पाया, मी तो पाने को प(देखता)
लो, मापा गय।

दितीय अंक
मुद्गल-क्यो भैया, नमी पानुसेन हो ?
पातु०-(सकर ) पानानवे नहीं !
मुद्गल-हिती की पानु पानानना का असाधारण काय है।
न मिल पानुहो?
पातु-मा, सोना प्रम्यंत पन होता है, बहुत शीम गरम होठा
१, पोरालयबाने में सावन हो पाता है। मस्प मी दुत लगता
ने पर भी सिर पर बोझ-सा पचा है। मैं सोना नीपोंकि
उसकी रश के लिए भी एक पातु की पावसकता होती, 'लोरा।
मुद्गल-सब तुम लोहे के दो।
पातु-लोपा कठोर होता है। कमी-मी या जोरको मी
भर गया है। माई ! मैं तो मिट्टी-मिट्टी, विसमें से
सर निकलते हैं। मेरी समझ में तो मेरे शरीर की पाव मिट्टी है,
गो किसी कडोम की सामग्री नहीं, और पाम्तव में उसी दिर
तर पात पत्र बनार पलते ६, लाते हैं, बलवे ,
टूटते हैं, फिर मिट्टी ऐते है। इसलिए मुझ मिर्च समझोपूल
म्यो। परन्द्र पर तो बवामो, महादेपी की मुक्ति के लिए क्या
उपाय सोपा!
मुद्गल-मुस्तिका उराय 1 मरे प्रापरकी मुस्वि भोग्न करते
इए मरने में पनियों की दिगालो की पोर में गिर गाने में, और शूद्रों
म दोनों की टोकरों से मुक्ति-री-मस्ति है। मादेवी तो पापी
,मबत. उनकी मुस्ति शस्त्र से होगी।
पानुनुममे ठौर सोगा। भाम मरात्रि में पापणा में।
मुद्गत उप चिन्ता ना, युगपन मा गये है।
पातु०-मैं मा प्रस्तुत ग्य।
(दोनों पाते हैं)
[पट-परिवर्तन ]
।

संरगुप्त [देवकी के राममन्दिर का पारी माग] (मदिरोन्मप रानागप्रपेरा) शय--प्रदम्म, घमिनी, यन-समाला के प्रले प्रबर। करना होगा, पनी के लिए कर्म करना होगा। मनुष्य को यदि इन कवर्गों की बार नहीं वो धर्म में करे । फर्म में एक और बोस। सो, प्रची वर्णमैत्री होगी! अदम्म ! भोर प्यास! ( प्याले में मदिरा रेलसा है) जाण- पपस्या त ? पाह! सौ मीपण कमनीयता है । बाल मरिय वास मेषो से जात-जाख रक्त देखना चाहती है। किसन । एक प्राणी प गिसकेकोमल मास में रस मिला हो । भरे थे, नहीं, दुर्गन नारी। 3 माहेरी दुर्बलता है। पन प्रफ्ना प्रम देश, येन-धामने सोने का संसारमा (रामा का प्रवेश) रामा-पामर | सोने की लाल हो गई। कार्य-उसमें मदिरा न दी होगी मुन्दरी! रामा-मदिप का समुद्र उन कर पाया या-मदिय-समा के खट परीनपठौली। शर्य०-दर उसमें नुम-मैती होई कामिनी न होगी । तुम कौन --सर्ग की अप्ठप गासन की पोल रामा-स्त्री को देता ही दिशमिल हुए, प्रोस ना कर देखते १-से एप बायगे । मैं कोई । शर्ष०--मुन्दरी ! या तुमाराही दोपहै। तुम लोगो प्रवेश पिन्वात, मातों की जमा-मोरी, अंगों का सिमाना, चलने में एक कोड़ा, एक कौतरण, पुनर पर-टोक परमात --में देखो!" म क्या करें, रेतन ही बना है। । १२

शिवायक
रामा पुरच मपर अपनी स्त्री को नहीं पचाना है, पर
स्त्री समझ कर उसे पाता है?
शय-समहल कर ) प्रये ! पर मोह ! मेरी पमा, नुम हो ?
पमा-
राप०-(सकर ) समौ तो मैं तुमको मान कर ही बोजा, नही
मला में किसी पर-सी से-(बीम मिस कर कान पकडताह)
रामा-मण्या, या तो पतामो, कादम्म पीना पर स सीस्थी?
और पाया बाप
रापं०-परे प्रिये ! तुमसे न काँगा वो किससे काँगा, मुनो-
रामारा, कहो।
राय-मको पनी बनाऊंगा।
रामा-हँसकर ) स्या!
शयल-जमें सोने से लाद दूंगा ।
रामा-पिठ तरा!
श्यक- मी पतवानुम निम्प को भाती कि
निकम्मा ९ १८ नहीं –सो में कुछ कर दिखाना चाहता है।
समा-परमो मी1
शप-या पीप बताऊंगा । मान तुम मादी केन्दौर में
नाना, समभान'
रामा--( उत्सुकता से)स्प।
राप०---सोना लना हो, मान देना हो, तो ऐसा ही करना
रोड पाम यहा मोकार होगा, तुम उसे देख न सकोगी । मुम प्रमी
वर्ग स्प्पन से लौर मानो।
रामा०--(रसी)सा करोगे १ नुम पिशाच की दुपामना
से मी मानक दिखाई तो तुम क्या करोगे ! गोलो।

एर्ष०-( मपान करताामा)हस्य ! पोड़ी-सी मरिषदे, शौन
दे, नहीं तो खुप मोर गन । मोर, मेरा नया उसका यादा है।
रामा-पार क्या हो गया है। मेरे सामी ! मेरे
शर्म०-अमी में टेप कुछ नहीं है। सोना मिलने से हो बाया,
इसी ठपोगरपा।
(इमर-उपर देस कर बगल से मुरादी निकल कर पीता)
रामा-मोह ! मैं समझ गईने रेच दिया-पिशाच पर
तूने अपने को बेच दिया । महा 1 ऐशा मन्द, ऐख मनुप्पोधित मन,
औली के मोसमेर रिना । जोममरा मनुप्प से पह हो गया है। स्व.
पिपासु फर्मा ममुप्प सप्ना की कीच कोस! नरक की
दुर्गप! तेरी इन्ध पापि पूर्ण न होने देगी। मेरे रक्त के प्रस्फे
परमाणु में जिसकी मा की शक्ति मिसके स्नेहन प्राप्त है,
उनके प्रतिकूल प्राबरी पर मेरा पति तो स्पा, स्वयंवर मी हो,
नही करमे पायेगा ।
शर्व-सा -पो.
रामा हादरा, मैं न होमे रगी। मुझे ही मार से हत्यारे । मपप !
तेरी रक्त पिया शान्त हो भाये । परन्तु मादेवी पर हार नपामा यो
मैं पियापिनी-सी प्रशय की भली मापी बन कर कुरक्रियों के जीवन
की प्रती पर अपने शोर में जपेर कर अपाय नस्प कहेंगी ! मान
गा, इसी में सप मला है।
राय--अच्छ, न इसमें निम्न राजेगी। दोस्पा रिम्नों प
पहा मारोगा वो ठोकरों से प्य दिया जायगा । मुझे सोना और
सम्मान मिलने में कौन पारा देण!
रामा-मेगी। सोना में नहीं पाती, मान मैं नहीं चाहती,
मुझे अपना स्वामी
अपने उसी मनुप्पस में पाहिए ।

शिवीय र पता है।) स्वामी रिस पठ मी पिनसे पले सारे हैं, उन पर चोट नौकरने , मेरे नुम सो मस्तिष एमने पाल मनुर से। गर्यक-टकराता है ) , न हटवा, नरी तो मुम एक के रस्पन पर दा एग करना पोगी ! मैं प्रविभुत है, न दे जाई। रामा-(प्रार्थना करती हा ) सुमारास मूठा सत्य है। ऐनी प्रवियों का पालन एप नहीं करा पा सकता , ऐसे पोने कल्प लेकरही मसार में पाप और प्रसस्प बासे हैं। स्वामी । मान आमो। राय- -मोर, विजय होता है वो पल री- ( पाहना भोर मारना चाहता है। रामा गौप्रता से हाय हा पर माग पाती है।) (भनन्तदी, मपंपधुरि भोर मटाई का प्रयेरा) मटाक-राय! शर्यक-अप हो। मैं प्रस्तुत है, परन्तु मेरो स्त्री इसमें पापा सलना चाहती है। में पाया उसी को पकाना पाहता था, परन्तु वर शव०- अनन्तदेवी-सौगन्ध है। यदि विवासपात करे तो कुचो से मुरमा दिया गाया। मप10-! तुम वो स्पी नहीं। -नहीं, में प्रतिभुत है। परन्तु मटाक-मुमारी पर-पशि और पुरस्कार का प्रमाण-पत्र यह प्रभुत है। (दिसाता है)माम दो माने पर- दाप-तप गीय पलिए, उपपमा मीवर प₹म गई रोगी। [सप पाते हैं।

[बया में देशी और रामा ]
रामा-महादी में काम में सही है। मुझे हटा
और सेवा धर्म भिमभाए।मेय सामी
देवकी -~-पास हो रामा!दुरे दिन कासिम स्थान
এম ই যীশু-ঘি ম ন --মাসা, আন্ততি,
सत्पमध पालन करें, तो दुर्दिन भनी उस मुहमा की भोर
पास उठाकर देने । इसलिए इस छोर समय में मममान की स्निग्म
करनाशक प्यानहर।
पमा महापसी ! परन्तु भाप को माया होगी।
देवकी-मेरी दश । मेरो काका कोम ठप्पी पर मिलने
पपन रिण, गित पिपद मगन की प्रतीम दया अपना रिनय पण
दुखियों पर पोदने के लिए सदैव हाथ में जिरे एची है।
रामा-परन्तु उसने पियाष ध प्रधिनिमित्व प्रकिया है
और
पंपकी-
--- एपर रामा ! एक पिसाब नी, नको असर
पुति पैठ और पुर पिशापों का माल और उनकी माया दमानम की
रुटिपिन्दु से याद होती है।
(नेपाम से गाना)
पालका प्रलय लहा!
शीतलहोमाता की आँधी,
6 पम दारें।
दया कुलार करे, समर मी-
पाम् न यौ।
प्रोमिसाप सत्य तो,
मुष

रितीय अंक
!
(मटार्क भादि के साथ अनन्तदेवी का प्रदेश)
मनन्त-परन्तु म्मंग की विपन्याला रक्त-बाप से मौ नहीं
इमती देवकी! तुम मरने + लिए प्रस्तुत हो बाम्रो ।
देषकी-स्पा तुम मेरो त्या दरोगी।
मपंचशि-हा। सदम्म का विरोभी, हिमालय की निन उची
चोरी तपा भगाध समुद्र क घन्तम्तल में मी नही बपने पावेगा। और
उस महाबलिदान भारम्म तुमी से होगा। गर्व! मागे पडो ।
रामा-एक गर्व नमी, सुमार-जैसे को पिशाय भौ गदि मुर
कर मापे, वो भार महादेयी का अंगम्पर कोई न कर सकेगा।
(धुरी निकालती है)
शर्य० मै तेरा स्वामी हूँ पमा ! क्या तू मेरी या करेगी।
रामा-मोह ! वही धमसि नगी पिणाच को, और या
महादेवी वरी कौन है?
शर्य-फिर भी मैं सेप
रामा-स्वामी । नहीं नहीं, द मेरे स्वामी की नरनिवासिनी
मेवास्मा है। तेरी हत्या कैसी- तो कमी न मर चुका है।
देयकी -शान्त हो रामा ! देवकी अपने रमत के बदल और
पिसी परस्त न गिराना चाहती । चल रे स्तथासे कुचे ! पल,
आफ्ना मम कर।
(राप मागे पड़ता है)
अनन्तदेषो–को दमकी! पमसिंहरापन देने की स्पर्धा स्पा हुई।
देवकी -परमारमा की क्या है कि मैं स्वामी फे रस्त रिस
सिंहास्न पर न बैठ सकी।

संदगुप्त मार्क- :-मगवान् घ स्मरणालो। देयका-मेर अन्तर की काय कामना एक पी किसर' को दमले। परन्तु हम लोगो से हत्या स मैं उसके लिए मी प्रायना न करगी। प्रार्थना उसी नियम्भर भीयरया में बो अपनी अनन्त दया का प्रभेष पर पाना कर मेर रकंद को देव मुरक्षित शर्य०-प्रयो (भाग उटाता है, रामा सामने भार सही रोपातीहै)टमा प्रमागिनी ! रामा-मूत 'प्रभागा कौन है। गो मार रे सबसे पवित्र हाताको मूल बाता है और मन वाटा कि कप पर १ परत मापका निपात सगतिमान है, माया मैं । गया है कि अपनी लोप मुझ पैरो स न टुाराने रे! रामा-टुको पालोमी। सती का अपमान पर, पास सर्वात को स मी नुकी। पाल मैं माँगी, तब महादेपी । अनन्त (कोप से ) तो पलती का अन्त को शर्म। योमारो। शय-अहामोगारोगा ! (प्रसार करने पर उपतराता है) (मिर तोफर रूद मातर पुस भाता है-पीछे मुद्गल और भातुन । भाते हो नाग गदन दार तलवार धान लता स्थामटाई से ) क्यो र नौष पशु ! देरी क्स मटा-बकुमार ! पीर के प्रति उरित म्पपार होन. पादि।

दितीय अंक
स्कंद०- पीर। प्रदरात्रि में निस्साय अत्रमा महादेमी
की रमा , ठरएप से पुमने वाला पोर ! नुमे मी वीरता का
भमिमान है! तो दो मुर क लिए भामंत्रित करता है-पचा
प्रानको!
(मटाक दा-हाय पला कर पायम हाकर गिरता है)
स्कंद-मेरी सौतेली माँ ! तुम
मनन्त-रूद। फिर मी मैं तुम्हार पिता की पनी हैं।
(पुटनो क पल पेठ र हाम गोड़ती हुई)
स्क०-अनन्तदेवी ! मुमपुर में पुरगुप्त को लेकर पुपचार बेठी
यो। गो-मैं स्त्री पर राय नहीं उठाता, परन्तु सापपान । विद्रोह
कीद न करना, नहीं तो घमा असम्भव है।
'प्रामरीमा
देवकी-(भालिगन करके ) मानो मेरे वत्स ।
[भान्ती-दुग का एक माग पन्यवर्मा, मीमवर्मा भोर
जयमाला का प्रवेश
याघुपमा-यन्स मीम ! पोशो, नुमारी क्या सम्मति है?
भीम-सात ! भापकी इच, मैं पापा अनुसरह।
सयमालापरन्तु इसकी प्रावस्यकता ही क्या है। उनका
एना पा सामाग्य तर मीस्पा मावन ही बिना काम न
पघु०-देवी! काल सार्य पखने का अवसर नहीं है। यह
witteो क पतन काल में पुपरपारिपति स्वर्गाय माराम
स्थित मे एक सन्त्र पग्य स्थापित किया, और टनरगपर
से उस पग्य फ सस्याधिकारी, परतु उस राम्प का पंग से
पुरा य, म्हेन्दोकी सम्मिलित वादिनी उस घूध में मिला पुरी
पो, उस समप दुम घोगों को रेपल प्रात्मनस्पा पारी प्राम

सदगुप्त , निरोग या, पहनी गुप्त मे रश की थी, यह पस्य बन्द से उनी। भीम-परन्तु क्या ये मांगते । बन्पु०-नमी मीम ! युवराग सदगुप्त ऐसे हर योनी , ठनोंने पुरगुप्त को इस मान्य अपराध पर मी मगप अवाक बना दिया है। पातो सिंहाम्न मी नही ऐना पाते। सयमासा-परम्न माप माकन उने प्रिय है। बन्यु०-देवी, तुम नहीं देखती हो भावित पर निपनि की प्रम-मेषमाता पिर दी है, भार्यसाम्राम्प के मन विरोष और दुर्वलता को भामरामरी मनी-मांति जान गं । गोप देशम्पापी पुर की सम्भावना है। इसलिए या मेरी ही सम्मति है कि सामाम्प की मुमवस्था के लिए प्रार्म- पष्ट्र के पास के लिए अपराम उग्मपिनी में ऐ, इसी में सब का पप्पाय है। माना जीवन जल सदगुप्त स्थान से है। और, उरमपिनो में सामाग्यामिक का अनुष्ठान होग्य, नमार हो सन्दगुप्ता जयमाता-आर्यपुत्र ! अपना पैतृक राय इस प्रकार सा २ पातक में निस्संकोच अर्पित करते हुए एप कपिता नदी! या फिर ठीकी सेवा करते दुए दाम समान जीवन म्पात काना होगा। पर०-(सिर मुन्न कर सोचतेर ) तुम Famar समभ करोगा, पेमव और ऐपर्य लिए ऐसा परम प्रस्ताव दरोगी, इसका मुझे स्वप्न में मी प्पान न था। जयमासा-यदि होता। पम्पु०-वर में इस काम की मनीय सना को दूर ही से नमरभर कर और भागापन अविवामित रहता । पत्रिमे ।

दिवाब क बोम सडम प्र अपक्षमा रहने वाले है सैनिक उसे विवार की सामग्रियों का खोम नहीं रहता । सिंबाख्न पा, मुसयम गरों पर ऐरने के लिए या प्रकर्मस्मता और शरीर पेस्य थिए भनियों में लोरे को अपना भाम्पस नही बनाया। मीम-मैया ना कपुर-भीम ! धमियों का पम्प 1-मार्च वाय-पापस होना, रिसद का मते हुए भासिंगन करना, मिमौपित्रों को मुस्माकर अपोखा काना, और--और विपनों के लिए, अपने धर्म के लिए, एक लिए, प्रारना । (देवसेना का सहसा प्रश) पषसेना-मामी ! सरिमा के सर में, बारम-समर्पण के प्रतारा में प्रश्ने विशिष्ट पहिता का विस्मृत हो जाना... ममोर ग !! र स्वार्प, भामी, गने दो , भैया को उदा केसा महान और रिसना पनि देवसेना । समषि में मी म्परिवी है। मठियों मेरी बाति बनती है । पिकप्रेम, समभूत हित-कामना परम है, परन्तु इस पथ या भी हो सकता कि मरने पर प्रम न हो। परने ने स्म अन्याय मिा मो इसका परिघरो! याधु० दरो उपमाला। इसी मुद ममल ने इसको दुष्ट मापना की भार प्रेरित पिया सौ से स्म साप मधन करते है। इस पर दो अपमाला। इसके पीमन होम इम प्रस्त परिष वाणुमो में बहुत पूर हो जाये । बलिदान परमे योग्य या नहीं, जिसने अपना मापा नहीं होगा। मामल-मामी ! प्रानो । समान देशर कम्पास . - MP

सिए-एक ट्रम्प की भी नही, उसा वा स्थापों की पति
होमे दो मामी! m नाम उठा, माने दो इस नीर मसाब
यो। खो-माप पावर्ड विपन है, यदि इम मर-मिरम
भी इसकी कुछ सेवा कर में
जपमालासर मी लोगों की एसीबी मुझे स्था।
पापु०- माहदेश्वरी की जय हो! तुमी इस सिंहासन पर
मैटो । पन्धुवम् को प्रा से भाग्य-सामाम्य-मेना एक साधारस
पातिक सेनिको नुमे तुमारा ऐसय मुकरो।
(भाना चाहता है)
भीमा-ठाणे मेगा, हम भी पलत है।
पापालित-(प्रवेश करक) पन्म मीर । नुमने पत्रिएका
सिर वा किया है। वर्मा ! भार तुम मान हो हम तुमारा
अभिर न करते ।र में, बन में, विपधि में पानन्द में, हम
सर समागी होगे । पम्प मारी जननी-बिसने मापए का
पेसा सूर तेनिक उत्पम यिा।
पधु-स्वागत पक! मालपारी को अप हो। म
निगा।
याह-ठारो !एक मुख समाचार सुन लो । पिठासी
पप्रमी प्रमी पर पास किराए . गरों को निम्म कर
पाम महार मालपोलिर प्रस्थान कर पुरु।
परपु-मम्भात महाराजपुत्र उसरापम की सीमा की रक्षा
।
पत्र-तपा!
देपमना-पला माई, में माँ दुम कोयों की सेवा करदी।
जयमाता- पुरन रेजकर) माशापरा की पदो प्रय

द्वितीय प्रेक
न भरपप किया है, दर प्रमिए । पतिदेव पापी दासी समा
मांगती है। मेरी प्रसि खुश गा । प्राय हमने गो राम्य पाया है,
म पिप-सम्राय मे मी ऊँचा है-महान् है । मरे स्वामी भोर
ऐस म्मान् ! पन्य में
[पपुवमा सिर पर हाथ रखता है]

स्कंदगुप्त
[पब में मटाई भोर उस माता]
कमला ए मेरा पुष १ कि नीं!
मठाई-मा! संबर में पन्ना ही हो स्थिर और मुझे
पवने होपर मिला है। संसार के समस्त जनों को मैं तिरसार करण
., ति लिए केवल इसीलिए कित् मेरी माँ और महबीमित है।
कमला- और मुझे इसका तुम है कि मैं मर क्यो न गई ,
में मो अपने कलापूस ओपन को पालती पी । मटा ।
माँ को एक ही भाशा पीकि पुत्र देश का सेवक होगा मो
मे प-दलित मारतभूमि का उरार करके मेरा बलक पो गले
मेरा सिर चाहोमा । परन्तु हाय !
मटार्कमा । तो तुमारी मायामों को मैंने विमय किया
क्या मेरी बगलवा भाग रेल नहीं बरसाती' या मेरे र
नारमा पनि के समान शत्रु के गलेग नही पा देते ! क्य.
तर मयकालमा मारतपषिय नहीं मानते।
कमसा--मानसी से ठो और जानि ।
मटाक-परलोर मको मा जानि का।
कमला-सलिए कि देशद्रोही माल की गति
पा प्राप-मेप बन गया , और सामाग कमियों में से एक
है। मोर! मौष मामला जमिनी हो हावी है, परन्तु
बा नीरता, raमता, उसके रक्त में नहीं। (राती है)
(पिपया र प्रदेश)
पिजया -माता ! तुम क्यों रो पो हो । ( मटाई की भोर
दसम्र ) और कौन है या गो । मुमने इस वृदा प्रमो
अपमान किया।
कमसावी! या मेरा पुत्र था।

द्वितीय अंक चित्रपा -पा} या भय नहीं। समझा--नहीं, इस्ने महानवापिस होने वालर में अपने हाथ पैर प्रपन्या में सम दिये , भर फिर भी उज्यामिनी में भाग - किसी पात्र के लिए! पिनपा--कौन, तुम महापापित भय हो। और तुमारी माखनी पहदीन या! कमसाना टी! उससे छ मत कहो, में समा ऐवर्य स्म पर बसी पाई है। मसाज के मन्दिर में मिया मर कर इसी उपस्निी में पोरगी, परन्तु इससे मरा-मो! अब और सग्नित न करो। पलो --पर पल। पिमया-(स ) मा सीपीयपंजक मनोहर मूर्वि है। भोर गुप्व-साम्राम्पा महाकापिकत । कमसा-इस पिणाम ने दयनाक लिए रूप बदना। सपा का अभिषेक होने वाला है, उसी में को अपम्न बने माम है। मरी को न मुनेगा नहीं तो में सर्प इसे देरनामा को समरितरती। (सहसा मारण्ठ, मुद्गल और गोविन्दगुप्त न पोश) पौन ! म परे पहा मी 11" (मटामालपार निघालता, गोविन्दराप्त उसके बाप मे तलपार पीम सते) मुगस-मारामपुष गोपिन्दगुप्त की बप । गोविन्म-सम! औरता उन्माद नहीं है, पापी नही, बो सरित-अनुनित मा गिभार न परवी दोपत राम्रबल पर रिकी हुई पौरमा मिनार की होती है। उसकीद मिचि है -न्यायद उसे इम- हने पर सिर पा उटा र नहीं रासा ! मावगुप्त पन्दी को इसे । भोरम लो।

कमला-मैं इस स्सम की माता है। मध हुमा, मैं वो यम
भी विचार करती थी।
गोविन्य-पद तो मैंने अपने प्रनों से मुना । धन्य हो देगी!
तुम जैसी बननियाँ जब तक उसमहगी, सात प्राम्पराष्ट्र भनिनारा
असम्भय है।
पौर पर युवती कौन है?
कमला-मुझे मायना देवी पी कोई अमिमात पुजको क्या
है। इसाको अपराध नहीं।
मुद्गल-पर राम ! या मी प्रवास कोई मगन भी होगी !
मावगुप्त-परन्तु या अपना काई परिचय भी नहीं दे दी है।
विजया-में अपराधिनी, ममे मी मन्दी करो।
भटा-सा क्या इस बुगती से तो मैं परिचित मी नहीं है,
सध कोई अपराध नहीं।
पिजया-(स्पगत ) मोर इस मानन्द-महोत्सव में मुझे चैन
पूषनारे में माखन में अब किस काम की है। जिस मा' ने समस
राम भर्पसा दिया है-पर बसेना और प्रम! हम तो मेरा
परी (मटाई की भार देखती है)
गापिम-मातम प्रपना, स्पर परिचय दो।
पिमया-मैं अपराधिनी है।
मावगुप्त--पातु मारा और भी कोई परियम।
पिजया-यही कि म बन्दी होने की प्रमितापिनी है।
मला-पमे ! तुम प्रारम्प यो उटावी हो?
पिण्या-मरी । मुक बन्दी कीलिए। में अपना परि
पर न्यापिकरण में दूगी। पन में इन कहूंगी। मेरा यहाँ
अपमान किया मायगा, तो घाबराए के माम पर मैं तुम लोगों पर
अभियोग लगाऊँगी।

दिवीय ग्रंक
--
गोपिम्पल-पों मटक ! यदि तुमी कुछ कावे--
मटार्क में व नहीं मानता किया कौन है। मुझ मी
रिखमा रोपार, ग्रीम न्यायाधिकरण में ले चलिए ।
मुद्गल--और पृथा कमला।
मोयिम्द० पाबन्दी नहीं है, परन्तु एक बार कन्द के समय
उसे पहन्त होगा।
मातृगुप्त-दो फिर म च, प्रमिपेक का समय मी
समार है।
[सब जाते है]

[ रायतमा ]
( पग्घुबर्मा, मीमा मातृगुप्त तथा मुद्गल के साथ स्कन्दा
का एक भार से और दूसरी पार से गोपिन्दगुप्त र प्रदेश)
स्कम-(पीच में सहा होकर ) वात! गामे ! इस बार
पर अपारस कोष करका छिपे ।
(पर-वन्दन करता है)
गोपिम्म० -ठा बम ! मार्य चन्द्रगुप्त की अनुपम मसि
कृति ! गुप्ताल तिलक! माई स मैं मठ गया था, परन्तु तुमसे कदापि
नहीं, तुम मरी प्रात्मा हो वस्स ! (भालिगम करता है । भनुपारियों के
साबदबकी का प्ररेरा, स्कन्द देवको का परमसदन करता है।)
दयकी परत ! चिरविजयी हो ! रेटा तुमारे रक्षक हो।
महारामपुत्र ! इसे भागीर्वाद दीमिए कि गुप्तकुल ८ गुस्मनों के
प्रति मा पिनयार रहे।
गोथिम्प-महादेवी ! तुमारी कोष से पैदा हुआ य न, म
गुप्ताल के अमिमान का मिह सब पयोमरित ऐगा !
स्कम ( बाबुपमा से ) मिम मालवेश | बटो, सिंहासन
मेटोम लोग हमारा अभिनन्दन करें।
(बमाता भोर दरसेमा प्रवरा )
जयमाला-देव! या सिंहासन पाप का, मालवेशका इस
पर कोई प्रविधा नहीं। प्रारंपच के सम्राट के अतिरिक्त पत्र दूसरा
कोई मान सिंहासन पर नही पेठ पता।
( "मालय की राहो-मुल पनि )
वरघुपर्मा-(सर ) समार! मन तो मानो मे स्वर
सिंहासन स्पाग रिम, और मैं उमें बुध पा, इसलिए पर
मिमान पाने में विलमन मिथिए।
गोयिम् -स्व ! इन पाप माति २ रनों की कौन-सी
।
15

द्वितीय अंक
कम इन सार्प पाग दधीचि के दान से कम नहीं बढ़ो
समान पर मैठो, मैं तुमारा विणक कर।
सन्द०---तात ! विपक्षियों के बादल घिर ए, अन्तविद्रोह
को ग्वाला प्रावलित है , इस समय में केवल एक सैनिक वन महंगा,
पार नही।
-
गापिन्दगुप्त -माम मार्म-जाति का प्रत्येक बच्चा सैनिक,
नर और कुछ नहीं । प्रार्म-कन्याएँ अपारण की जाती है,
हो विष्ट वाराप से पवित्र भूमि पादाक्रांती, श्री वेपता की
दूम नही होती , सीमा की वर्षा मातिया की पदसी दृप्ति का प्रचा
पर फैला है। इसी समय गाति में पुकारती है सम्राट-होने
के लिए नहीं, उसर-मुर में सेनानी पनने के लिए-सम्राट् ।
( गाविदगुप्त भीर बन्धुपमा हाम पकड़कर सन्दगुप्त को
सिहासन पर पटाप्त है। मीम पत्र लेकर पैठता है। देवसेना पमर
भरती है । गहापय लकर बन्धुपा खड़े होते है । दपकी रामतिलक
कमी है। गापिग्मगुप्त तग ध उपहार दते है। पक गहक्ति
रामादता है।)
गापिन्दगुप्त-परम मारक महापमापिपर सन्दगुप्त की
पिहो।
सर-(समत सर से ) जय हो!
परपुर
To-माय-सामाग्य के महावलापित महापबपुत्र गोविन्द
गुप्त मी महो ! (सप वैसा ही करते है)
स्थम्द-प्राय ! इस गुल्मार उपरदापिका सय से पालन
सार, और भापरापूकी दा में सर्वस्व अर्पण कर सर, माप
खोग पता लिए भगवान से प्रार्थना कीलिए और भागीर्वाद दाबिए कि
सन्दगुप्त प्राने परम्पस, खदेर सेवा से, कमी निमलित न हो।

गोविन्द (o-माद् ! परम्परमा की प्रतीम अनुकम्पा से भाग
रेम । प्राय गोविन्द ने अपना सम्म पालन किया
बात पन्धुपा ! मुम इस नवीन मार्पराष्ट्र क संस्थापक हो।
इस भास्मसाग की औरष-गापा प्राय मावि का मुख उम्म
करगी। गौर ! इस पर में साम्राग्य के महाबलाधिकृत होने की
पमा नदी दुनी इसके उपयुक्त हो।
वरघु-ममी नहीं भर्म ! आपके चरणों में बैठ कर या माता
सदेश सेवा की रिपा प्राय करेगा । मालन का बम्म,
एक-एक बया माय गावि के स्पाय के लिए सोमन नासर्ग
करने को प्रमुख है। पार गो मास देंगे वही होगा।
'पन्य! पन्य IP
मकर-ताव ! पादच इस समय नदी!
घzo-~प्राट् ! १८ सौपए की धन्वा रानीति की देख-रे।
में लगे।
(कुमारदासपोरा)
मावगुप्त-सिबल र युवरार कुमार भानुमेन की यम !
(सप भारपर्व से दलम है)
स्कन्द-कुमारदास सिख युपपन!
मावगुप्त-दो मारामविपर!
स्कन्द-प्रमुवा पीर पुरराम! मुमाप स्मेह क्या कभी भी
सभामा स्वागत
(समर पर बैठते हैं)
गोबिन्दपनियों को ले पायो।
( सैनिकों के साथ मटाई, रानाग, मिरया तमा कमला प्रदेश)
सन्द०-क्यो ! म क्य पारवे से!

द्वितीय प्रक
उप-माट् ! मुझे पर की भाग दौदिए ऐसे नीच के लिए
भोर में नहीं।
सध्या-नहीं, मैं तुम इसमे मीसा दर दूंगा, बो बम से मी
उप होगा।
राष०-पहा हो समार! मिनी पत्रया से या पापी प्राय
विमला गाय, उठना ही उत्तम होगा!
समय-परन्तु मैं तुम मुरु करता, घमा करता है। तुमारे
मन्त्री मारे मर्मस्पन पर काो विमो सकी चोट करेंगे।
भावन नुम उसी कत्रा को मोगो, क्योंकि पमा-सापी पमा-
पा में प्रपनी मामा से निपवा न बनाउँगा। रामा सती! तेरे पुस्य से
पत्र दप पति मृत्यु से बना
(रामा समाट् च पर पकाती है)
राव०-बुराई सम्राट की! मुझे गम की मात्र पोमिए, नही तो
समस्या परगा। ऐसे देवता के प्रति मैंने दुरापत्य किया था।
हा (धरी निकालना चाहता है)
मन्द-टरपे गग! में गुमे भागीवन बन्दी बनाऊँगा।
(रामा भारपर्य भौर पुल से दतती है)
सम-राम! पहा मानो।
(रार्य समीप पाता है)
देसी [-बरस ! इसे किसी विषय प्रशासक बना कर मेगो,
ने एसिया पमा को किसी प्रघर प्रकट न हो।
सप-मासीकी अयो।
मम्मा-गरम भाव से अन्तद के विपरपति नियत से
ग्पा या लो-(सड्ग देता है)
ए० (रुद करठ से) सम्राट् देवता ! प्रापही गय हो!
(दार्थ के पर पर गिर कर )मा ! मुझे मा करो, में मनुष्य से

फ्त हो गया था! अब तुमारी दया से मैं मनुष्य मा । मायादि दो बगदात्री कि मैं पेरपरयो में मामबलि देकर गौवन साध देवकी-उठो। घमा पर मनुष्य का अधिकार है, पापा पास नहीं मिलती। प्रतिहिंसा पाशव धर्म है। उमे में धर्म सम्म करती है। (श लड़ा होता है) सम्पमटाई! तुम इस गुप्त-सामाष्य के महावळाविक नित किये गये थे, और तुमी जामाल-जमी महादेगी की कुषा में सम्मिलित हो! म तुम्हारा प्रथम प्रप- पर। मटाई-मैं पल परमाता की प्राधान देयकी-क्यों मयई! तुम स उचर सम्रप से देते हो स्प ऐसा कर र म स्वयं अपने को पोका देते हुए भोपेकोमा प्रचित नहीं रहो। मटाई-अपराम पा (सर मामा कर देता है) स्कम्ब०-मारे खड्ग पर सामान को मोटा पातुमारेर पर ही को मरोसा न रखेगा पिकार की बात है। माप इवना पवन। ( मटार्क स्तप रहता है या भोर देसर) और तुम पिगमम मो इसमें देवसेमा-पाट् ! पिया मेरी सत्ता है। विनया पास्नु ममे मयईको पास किया है। जयमामा-विनया! पिमया र की देगी। देवसेना -उस लिए नप उपाय न पा एमातिर !

द्वितीय अंक त्रिीय मनुष्य को इतना नारे गिप साठी! परन्नु निश्मा र ने नाका (समन्द जिया ये भोर दस हुए विधार में पड़ गाता है) पामिन्द-यपदा इसी ठा मयक की मात्रा है। मयाक गौर कमों से दुलो रोडरमा उम्पपिनी पली माई है। कम-पान विषया, मने पर स्पा किया। दरसेना-(सपा) मार! जिसकी मुम पाराध पी, हो है। विजय पाजत् हार कर मी गीत गई। दवी -स! भाग तुमारे एम महाभिषेक में एकदमी रस नरे। मुमारी मावा की मी पर ममश अमना है कि तुमाप प्रकारा पा समेत पर पक्षाको मात्र में लिए एमति। इमारदास-पापनारी सदी ! तुम धन्य हो ! इसी गौरर स वारे रेय प्रसिङगाऐगा। सम-सी माता की इन्ध- मारगुप्त-परमेसा परम मशरण महापापियन संदगुप्त 11 [पानिक तृतीय अंक [शिपा-तट] प्रपघयुधि-पर विफल पा । इस दुरास्मा सरगुप्त ने मेरी मायामों के मगर पर अशा लग्न दी। मुमपुर में पुरगुप्त और भनन्ददेवी अपने सिम्पना दिन मियमय मीबन्दी पुमा, उतफे प्राणों की रक्षा नहीं कर पों की अवतारमा से मी एक पार सदर्म के उठाने की प्राधा की परन्तु मर गया। (व सोच कर ) उग्रवाराकी साधना से विष्ट से भी गि कार्य सिम ने 1, वो पिर इस महाकाल में महाश्मशान से बात कौन उपयुठ स्थान होगा ! धर्ट- मटाई-मिशिरोमधे ! प्रणाम ! मर्पय-कौन, मयः प्ररे में स्पप्न देखा क्या! भटार्फ-नही भार्य, मैं बीपित है। मम०-उसने तुम यूजी पर भी पड़ाया। मटाईनही उसस बरकर! प्रम-सा मटाक-मुझे अपमानित कारुपमा मि। मरी गौरा पर गुगर उपभरमा बोमबार रिया। प्रपंघ---तुम मूल से। से बदरा बने प्र उपाय कर पारिने, मकि उसा उपमा प्रस्मरस । मटाक-मैं इतना नीच मही हैं।

तृतीय क
मफ्य०-परन्तु मैं तुमारी प्रचि मानता है। तुम बस्ने उम्भ भी
नहीं हो। चलो एकान्त में बात करें। कोइ धावा है।
(दोनों आते हैं)
(लिपया का प्रदेश)
विजया-में बाउँ ! उस उम्पाल मोर को मैं लौरसमा
पाना सगी ! उस अपने पाहुपाश में पका सकती है। दय.
विक्स मनोरप ! भार!
(गाना)
उमर पली भिगोने भाग,
तुम्हारा निरपल प्रपल चोर ।
नयन-अल-भारा रे प्रतिज!
देस लेतू फिरफर इस भोर ।
दमकी भन्सरतम मुसम्यान
कल्पनामय सेरा यह विश्न |
लालिमा में लय हालवलान ।
निरतते इन भासों को घर ।
यह मानमो! पकुमारी।
(पसेना ध्र प्रदेश-दर पर उसकी परिपारिका)
यसना-विजया ! सायंचल काप देषन शिप्रा-वट पर तुम
मीधा गई हो।
विजया- पाकुमारी ! (सिर मुश्य लती है)
देषममा-विषया, अप्य दुपा, मुममे भेंट हो गइ , मुम मच
पना था।
यिसपा-पूराना या है।
देयसना 1-पा गेलुमन किया है, उस सोच-समझ रही
.

रगुप्त
तुमारे दम्म ने तुममे व तो नहीं क्षिय वीर मनोचिकपणापाव
ने धर्म विपषगामिनी वो नहीं बना दिमा ।
विनया राजकुमारी ! मैं धनु । टस कसा को नहीं मून
सावी, मो मापने रिवाई है। परन्तु मर और प्रश्न का मुमे उमित
करना ठीक नहीं।
यसेना--(भारपर्य से )यो पिनमा ! मेरे समी-अनोचित
सरत प्रश्न में भी नु यंग सुनाई पाता है।
विजया-क्या इसमें मी प्रमाए की पाया पकुमारी।
मात्र से मेरी पोर देखना मत । मुमे या शमिणाप की माला
सममता और
यसेना-हाणे, दम ले लो! सदर गर्व में गिरने के पाल
विकमा अपलमनोविजया!
विजया-वारा नौवन विना मना होता -मानी
मानवी हो । यदिन मिस दीली हुरीको रखने * लिए मेरीती
उकार मा रही थी, मैं सममी 0 उमे रस लेना मेरे लिए
भाषाया था। रामकुमारी मुके न पाना। मैं तुमारी या।।
(प से देसी)
देवमेना--(भारपर्य से ) पारदोहो।
विमया-पही रिसे तुम मुन पी हो।
देवसेना पायो उन्मय माप अस्मात् सप
देश कर ग यान पाले प्राणी की जय-गया था। विषया! क्य
मेरे तुपार गुल में पापा दी। परन्तु मैने वो मुमार मार्ग को सण
परमे शिरोन पिधारे।
पिपा-उपभोको प्रोट से मेरे स्वर्ग को दिपा दिया, मेरी
सामना-लता को मूल उमारपल दिय!
.

तृतीय अंक
वेषसेना-भीमटा करने वाली मी ! अपनी प्रसावधानी दोप
दूमो पर न छ। देवसेना मूस देकर प्रथय भी जिमा पारती है ।
मन्दा, इससे क्या!
(पाती है)
विमया-बावीरो, परन्तु सावधान !
(मटाई भौर प्रपंचमि का प्रमेरा)
मटाफ-विजया ! तुम कम पाई हो
विजया-प्रमी प्रमा, तुमी को तो सोग दी थी।
(प्रपंपादि को देसर ) माप कौन है?
मटार्क-'योगापार-सपा के प्रपान भमय भार्य प्रपंचपुरि।
(पियमा नमस्कार करती है)
प्रपघल-स्पाय हो देवी! माई से वो तुम परिचित-सौ हो,
परन्तु मुझ मी गान मामोगी।
विजया-मार्गा! आपके भनुम्प-जाम की गडी भाकाधा है।
मपच०-एमे ! प्रमापारमिता-स्वरूपा वारा मारी रचा
बरे! क्या मुम सदमें की सेवा के लिए उत्सर्ग कर सकोगी!
(अम सोपपर ) तुमारे मनोरप पूर्ण होने में पिम और पिलम है।
इसीलिए तुगेममय पर्माचरण करना होगा।
यिनया-पायं ! मेरा मी एक साप है।
मपच०-क्या।
विजया-रामकुमारी देवसेना का अन्त !
प्रपंच०-और मुझे उमाराको सामना के लिए महामशान में
एक राशि पाहिए।
मटाफ-या तो प्रथा मुयोग।
पिमया-उसे श्मशान तक ये माना वो मेरा नाम है; मागे मैं
इन पर सड़गी।

अप-बायरम । उमताप को कृपा से सब इव सुसम्म
दरोगा।
भाई-पान्तु मैं FHOT से भक्ति होऊँगा, और स्कन्दगुरु
से में किस से नहीं, नहीं
प्रपमपान नगई मग ले बाहर ना समझाया,
For मी । तुम म अनन्तरेगी और पुरगुप्त प्रविभुत से
पुरेशे।
भटा-मोह ) पाप-पैक में लिप्त मनुष्य को ही नहीं ! कम
उसे कार अपने नागपाश में गमि लेता है। दुर्माम्प !
भावगुप्त-(निकल कर ) भगाना ! एक निर्मच कुसुम
कली को कुपलने लिए इन्नी की प्रथारखा की पाक!
मनुपा बुझे दिसा उतना ही जोम ६ जिवना एक मूल
मेहिये को तिर मी र पास उसे कुछ विशेष साधन -4,
अपर, पिग्मापाव, ममता और पैमे प्रम। इनसे भी पढ़
कर र लमे वाराणवा । देखा आवगा , मय। सम
कहाँ रो।
माता]

तृतीय अंक
(श्मशान में सापकनप से प्रपन्यदि। दूर से सन्दगुप्त
टरमतामा पाता है)
स्कन्द-इस साम्राग्य का बोझ पिसके लिए दस में प्रशान्ति,
राग्य में प्रगति, परिपार में प्रयान्ति 1 फेवज मरे प्रस्तिय से।
मालूम होता है कि समदी-विश्व-मर की-शान्तिनमनी में में ही
धूमकेतु पदि मैं न होता, तो यह संसार अपनी स्वामाषिक गति से,
मानन्द से, घना करता । परन्तु मेरा तो निगमकोई स्वार्य नहीं,
दय के एक-एक कोने को बन गणा-कही मी कामना की मन्या
नहीं। बलरती माया को प्रापी नहीं पक रही है । फेवल गुप्त
सम्राट् के परापर होने की दयनीय दशा मे मुझे इस इम्पपूर्य
क्रिया-जाप में संलग्न रखा है। कोई भी मेरे अन्त परण का
प्रालिंगन करके न रो सकता है, और न सो हँस सकता है। उस मी
विनय मोह! उसे स्मरण करके क्या होगा । जिसे हमने सुप
रामरीकी सन्मातारा के समान पर देखा, वही उल्कापित होकर
दिगम्त-दार करना चाहती है । विमया ! तूने क्या किया 1(देतार)
मोर ! केता मयानक मनुप्प है ! केसी र प्राकृति है ! मूचिमान
पिशाच ! प्रभ, मानगुप्त तो प्रमी तक नहीं पाया । दिम
कर दे।
(पिता)
(विजया रे साप देवसेनाच प्रोग)
देपमना-पाव फिर तुम पिस प्रमिप्राव से पार हो ।
यिमया-और तुम रामकुमारी स्पा तुम इस महा पीमन्म
प्रमशान में ग्राने स नही रती हो?
देयमेना-संस्पर का मूक पिक मियान' स्मारने की पम्म
११ मीपन को नश्वरता के सापही सबामा , उत्थाना ऐमा मुदर
स्थत धौर कौन है।

(नेपथ्य से गान)
संपर्यापन मीता पाता है
प्प पार के सेल सारा। सब.
समय मागता है प्रतिक्षण में,
ना अतीत के पार कण में,
हमें लगाकर मषिप्प-रण में,
माप कहाँ हिप पाता है।-सप०
गुरुतो, लहर, हवा के मोके,
मेप और विजली के टोके,
फिसका साहस है ब रोके,
जीवन का वह माता है। मा०
वशी को बस पर जाने दो,
मीठी मीने को भाने दो,
भात बन्द करके गाने दो,
जो का हमछे भाता है।
मिजया-(सगत) मार विमोर दर की रागिनी मुनती हुई
पर पुरंगी-सी कुमारी प्रार िरेसा मोजा मुममा! ही नहीं
गिजरा जपानप्रतिहिंसा (प्रकट ) पमकुमारी। देखो,
पर कोई सि ,यहाँ तक चलोगी?
देपमेना-जो, पान्नु मुझे सिद स क्या प्रयोगन ! बब मेरी
मनाएँ सिस्मृति के नीचे दवा परी गम्, तब पर पारे पर
ही से नो क्या ! तर मी एक साल , पलो-(निया देवसेना
पोमागे कर परमाधि के पास ल जाती है और भाप हट गाती है।
म्यान से भास मालकर पर उसे सता है।)
मर्पष०-तुमारा नाम देवसना है!
देयमेना-(भारपर्य से ) हा भगवन् !
.

तृतीय अंक
प्रपघ०-गुमको देवसेवा शिर राप्र प्रस्तुत होना होगा।
मारी ललाट लिपि काही कि तुम पड़ी माग्पषवी दो!
यसेना-ौन सी देससेगा।
मपच-पानसर शरीर, निसन उपमाग द्वारा प्रेमी मी न
कर सका और न करने की चाया, पसेपा में अर्पित करो। उप्रतारा
मुमारा परम मंगल करगी।
देवमेना-(सिहर उटप्ती है) क्या मुम अपनी बलि देनी
भागी ! ( घूमर देखती है) पिया ! विजया !!
अपघ-रो मठ, मुमारा समन इसीलिए मा। नित्य मार
ग्बाला में बजने से वो यही अशी कि तुम एक सापक का उपचार
कावी हुई अपनी नाखा शान्त पर दो।
यमेना-परन्तु
अपालिक! एक और मौ माया मर
एक में है। पर पूर्ण नहीं हुई है। मैं रखी नहीं है, केरल उसके पूरा
तोन की मतीदा है। पिनया के स्थान को मैं कदापि न प्राय करेंगी।
मे प्रमार, यदि पार गवा
मपय०-( उठ कर उसका हाय पा र सङ्ग उठाता है)
पर मुझे टारने का प्रकारा नहीं। उपवाराकीय पूरा !
देवसेना~-प्रियतम ! मेरे देवता युवराज! ! मुम्हारी बय हो!
(सिर मुकाती है)
(पीट स मामृगुप्त भाकर प्रपंप का हम पर मपम्य में
लगाता है, देपसेना पक्षित होकर स्कन्दप्रचालिगन करती है।)

( मगप में मनम्तदेषी, पुरगुप्त, पियमा और मटार्क)
पुरगुप्त-विषय पर विजय ! देखता है कि एक बार बंधुवट पर
गुप्त-समाम्प की पताका सिर प्रपपगी । गमणय के रेती
मैदान में प्रस्नी सर्गममा का विस्तार करेगा ।
अनन्त०-पान्तु तुमको सा! निर्पि, निरीह पाणक! तुम भी
इसको प्रसपता! दमा के गप में ही गाते। और मीथती
पुत्वाकर इस मानद मनाते हो!
विजया-अहा ! पदि माम पापिराग प्रकर युवरार पुरगुप्त
प्रमिनन्दन कर सच्ची।
मटाक-यदि में गीता रहा तो ना मी र विपऊँगा।
(दौारिक का प्रदेश)
दीयारिक-बय हो । एक पर पाया है।
भटार्क-2 प्रानो।
(दीपारिक पाकर पर को लिया लाता है)
घर-पुषराम की जय हो।
मटाक-गुम कहों में भामे से।
पर-नगरहार करारापापार में।
मटाफ-सा संदेरा।
घर-सेनापति सिगिश न पूछा है कि मगप की गुप्तपरिषद्
क्या कर रही है। उसमें प्रबुर म लेकर मी मुझे ठीक समय
पर पोसा दिया है। परन्तु स्मरण रहे किमबही हमारा प्रमिपान
मारे फुमुमपुर पर होगम, सन्दगुप्त का सामाम्प-प्स पाये होगा।
पल इमुमपुरी मणि-ब मांगा लय जायग्न । प्रतिष्ठान
पौर परमादिता गोदि २ दुर्गतियों को पन विद्रोह करने
प लिए परिषद् की शाम मेगा गया था, उस क्या फल
हुमार पन्त र पिपति की कुरित रहि न उस एप
२

तृतीय अंक
या उद्घाटन करफ पर पन मी प्रात्मसात् कर लिया और खावा
फ बदल हम लोग प्रचित हुए, जिससे हया को सिन्धु का हर
छोरना पड़ा।
मटाक-मोर ! शयनाग ने बड़ी सावधानी से प्रम लिया।
मामाय मर्पयसिप निपन होने से या सा दुर्घटना हुई दूत!
दूसराम से कहना कि पुरणुप्त को सम्राट बनाने में तुम्हें अवश्य
सहायता करनी पोगी।
घर-परन्तु उन पिपास से हो?
मटाक में प्रमाणपत्र दूंगा हु को एक बार दो भारतीय
सीमा से दूर करने के लिए संदगुप्त ने समस्त सामन्त को
प्रामपथ दिया है। मगप की रक्षा सेना मी उसमें सम्मिलित
होगी, और में ही उसका परिचालन करगा । वहीं इसका प्रपद
प्रमाण मिलेगा । और यह लो प्रमाणपत्र । ( पत्र लिसकर दब है)
पुरगुप्त-ठारो।
मनम्त-सुप रहो।
दूत-तो यह उपहार मी सामाजिए प्रस्तुत है।
(रत्नों से मरी हुई मेनूपा देता है)
मटाक-और उसरापय के समस्त पर्मसपों के लिए स्पा
प्या!
दूत-पाय महाभषयक
पास में दो भाय है। समस्त
समर्म प अनुपाई और हैप, रमनगुप्त - विन्द है। याशिक
किसानों की प्रबुरा स उनादय धर्मनारा मर से पारा
उटा सारिद्रोह करने लिए उत्सु।
मटार्फ-प्रय, गानो। नगपार गिरिमा का पुर इसका
निस्रायरगा। राम सप्रना सापपान , पीम नहीं मिलेंगा
(दूत प्रणाम परक पाता?)

सदगुप्त
पुरगुप्त-मस्या हो रहा है।
मनम्तमारे सिंहासन पर बैठने की प्रस्तावना है।
(सैनिक प्रमेरा)
सैनिक-मादेवी की बप हो ।
मटाया है।
सैनिक-सुमपुर की सेना बायबर से मी मागे पद की
है। सामाम्म क संपावार में सीम की उसके पहुँच जाने की
समावना है।
पुरगुप्त -विज्य ! बारा विजम्ममा । एक पात्र
(अनन्तदेवी समेत करती है, सिवा उसे पिलाती है)
मटाई- मेर भरवों की म्यबस्था ठीक न ! में उसके पाले
पाँचप।
सैनिक-परन्तु महाबाधित !
मार्क-क्यमो।
सैनिक-पप गए म प्रापरि काम है, पुस की प्रायोमनाये
पाखे हम कुसुमपुर में प्रापानकों का समारो देख ऐहै।
रामपानी पियाप्तिा का केन बन रही है। मारे मनुमों के लिए
विलासक उपकरण विखरे एने पर मी मापाप्त ।। नये नये
सापन और नवीन सनामों से भी इस विधाविय रापी का
पैर नहीं भर पा है। भला मग के विवासी सैनिक क्या करेंगे।
भाई-बाप ! यो विद्यासी न होम पर मी स्पा बारो
ममता मिस बावि में गीपन न होपा पर पिशास स्पा करेगी।
में ही विलास और कलानों नपादर होता है। गौर
एक कान समारों की और पूवरों से मुपूरों की मनभर सुनते हैं।
पित्रया-गात वो पही।
मामत राप
६४

सूतीयक
मैमिक -प्रारम्बावशापित है, इसलिए मैं अपनी गा !
मटाईनही तो।
सैनिक पदि दूसपको ऐसा प्रता, तो मैं यही उससे कावा
कि तुम देश के यारो!
मार्क-(कोप से)
सैनिक-दो, अपनों से उपार नी र सम्पवा नाम की
विलासिता र पीधे भार्य गाति उती वापी है, जैसे कुलपम्
को छोर कोई नागरिक या परणों में। देश पर पर
हणों की पढ़ाई और तिस पर मी या निला प्रामोद ! बातीय
बीवन निर्माणोन्मुल प्रदीप का परस्म है। प्राह ! बिस
मगर देश की सेना देव नासौर में एठी मी, मार्य चन्द्रगुप्त
कीही मिनीय सेना सबके पौधे निमंत्रण पाने पर साम्राग्य
सेना में बाप | महागलामिकत! मेरी हो या होती है कि मैं
मात्म-त्य र ल ! मैं उस सेना का नायक , मिस पर गरा-
पा की रक्षा में भार पता था। प्राप्प समुद्रगुप्त की प्रतिष्ठित
उस सेना का ऐसा अपमान!
मटा-अपने कोप के मनोमाष दयार ) अम्बा, मुम पदी
मयप की रक्षा काना, मैं जाता है।
सैनिक-अप तो पा सड्ग लागिए, मैं माय से मगम
की सेना भ नायक नहीं। (सरग देता है)
पुरगुप्त-(मयप की-सा पेप्टा पनाकर) या प्रवा दिया,
भाम्रो मित्र हम तुम कादम पीयें । गाने दोन इमें लाने दो!
मनन्तदेवी-(मटारे के सकेत करती ले जाती है, और
मिमा माइती रिमया ! पुरयम का मन पाखामो!
(सेनिक तिरस्कार का रष्टि से देखते हुए गाता है। मटाक और
अनन्तदेवी एक भार, पिरया और परगुप्त दूसरी ओर जात है।)

(उपमन)
( यमाता और देवसेना)
जपमाळा- उदार है कि प्रसप, म समझ में नारी
मावा ? जान् गावी ६ तब मेर मौतर की पगिनी रोती है और
या ततो हम से विपार की प्रस्तावना होती है!
-सनी-सबाट मुख-पात्रा में गये हैं और
२-सखी-तो क्या ?
देवसेना-जुम सा मी भाभी के गप मिल गई हो । यो
मामी। गाबा गौत!
जयमाला-मेरी प्यारी ! वी १। प्रहा। बीकी
प्राण तो परस्पती तास-सी कर दी है। त् एपी होती है। ल,
मैं भाती है। परी । तुम न इसे गमो। (जाती है)
देयममा-या महारषी हार कर ममे ! अब तुम सपना
मेनिने की पारी प्रथा तो ग्राम्रो ।
-सली-नहीं, पामकुमारी ! मैं पूती है कि स्मार्
मुमस कमी पापनापी!
२-मनी, मी तो प्रेम प्रमुख है।
३--सबी-तोक्पा मेपबमारी स्वयं प्रापिनी रोगी ।।
देयमेना-मार्थना किसने की १, मा पस्य की बात है।
क्ये १! मापना हुई है माजय की ओर से , जोग करेंगे कि
माग रेफर रेवसेना का म्यार किया बापा।
-समी-नसो, वा फिर क्या--रोहों की सी
में श्य लिख पाद-और क्या !
देयमेना-सेरा मुंह काला और क्या ! निदंप कर सात
मत १८, मम का कोमल है। कोई दूसरीती तुझे नहीं मावा !
(मर पर लेती है)

तृतीय भक
२-सस्त्री-स्पभेद ठीक हुमा-सा देखती है।
यसेना-या पार पर नमक शिक्षा है। मैंने कमी उनसे प्रेम
की पर्या करके उन अपमान नहीं होने दिया है। नीरव नापन और
एकान्त माकुशता, कचोटने का मुख मिलता है। सरदय में सदन
का सर उठता है, मी संगीत की बीया मिक्षा लेती है। उसी में सय
हिप मावा है।
(ौसों से भासू मासा है)
१- सत्री-१२, क्या तुम रोती रो। मेरा अपराप धमा
देवसना-(सिसकसी हुई ) नहीं प्री वी! भाग हो मैं प्रेम
नाम पर भी खोल कर रोतीबस, फिर नमी । यह एक क्षणका
रदन अनन्त सागका समन करेगा।
२-सखो-तुम इतना दुख है, मैं य इम्पना भी न कर
सकी थी।
देयसना-(सम्हलकर ) यी त मूलती है। मुझ वो इसी में
मुल मिलवाई, मेरा पर मुझसे अनुरोप करता है, ममता, स्ठता
है, मैं उसे मनाती है। प्रति प्रयप-मयर उत्पम कराती है, मित
उत्सगित करता है, मुदि मिाती है, मन कुथ मुनते ही नहीं ! मैं
को समभावी पिबाद मियठी है। सखी! फिर भी मैं इसी
गालू इदम में पस्प समालका, सस्प होकर, पेठती है।
३-ससो-पारपर्य! गगामारी ! कुरोएप में एक परसाती
नदी पेग से मरी।
देवसेना-कूलों में उन कर पाने वाली नदी, तुमुल वरग
प्रर पपन और मपाना पर्य! परन्तु उसमें भी नार पखानी
ही होगी।

(गान)
माझी ! साहस है से लोगे !
जर्जर तरी मरी पपिको से-
मा में पा सालोगे।
मलप्त नील एन कीदाश में-
बलबालो कील-माया में-
प्रना पद
सोलोगे।
अनमान तट की मदमाती--
सारे,तितिब मती भाती !
पे मन मेलाग! मामी-
(भीमवर्मा का प्रवेश)
मोमबहिन ! रामपाल से विजय पा समाचार प्रापा।
देवसेना-भगवान् को दया है।
मीम०-- परन्तु, महारामपुष गोबिन्न गुप्त दौरगति को प्राप्त हुए,
।
पसेना- धन्य है।
भीम०-वार-रामा पर सोते-सोते उहान अनुरोध किया कि
मापस बन्धुपमा गुप्त-मामाम्प प महावतापित बनाये मा, मलिए
प्रमी भागार में सरेंगे। उनश भाना प्रमी नही हो सका।
और मी कुछ ना देयमेना ।
पमेमा-
भीम०~-समार ने सुमे रवाने के पुरस्पर सार
मायाप्त को मम्मीर का शाम पनाशिमा पारशी पग
पप हा नही । पामार प्रय साप्रामक अन्तर्गत हो गया है।
te

तृतीय अंक
देयमेमा-मार की महानुभावता है। माई ! मेरे प्राणों का
इतना मूल्य
भीम
---माम मामाम्म काठमार हुमा है। परिन ! सिपु के
प्रदेश से म्लेभए राम प्वंस हो गया है। प्रबार सम्राट् सन्दगुप्त ने
पित्रमादिस्य की उपाधि पारण की है। गौ, ग्रामय और देववानों की
भोर कोई मी पावसामो लि उठा कर नहीं देसता । जोहित्य से सि
सक, हिमालय की पदरामों में मी, स्वछन्दवा-पूर्वक सामगान होने
लगा । पन्य १ हम लोग जो इस तस्य को देखने के लिए
जीमित है!
देषमेना-मंगलमय मगवान् सब मंगल करेंगे। माई, साहस
पाहिए, कोई बस्नु भसम्मय नहीं ।
मीम०-उत्तरापथ के मुणन की पपस्या करके परम मार
शीम भावेंगे। मुम ममी स्नान करना, गावा है।
श्वसेना-भाई ! तुम अपने शरीर के लिए कोही नियन्त
यम हो। और कामों के लिए दो
( भीम हँसता हुआ जाता है)
(मुद्गल का प्रोग)
मुद्गम -गो है सो कासाम रस या तो अपने में नहीं हो
पता। ठहै, या कोई न मिला तो फ्ट दोल की तरह मरे गले पड़ी।
देवमना-सारे मुद्गय ।
मुद्गर-यदी-पदी, सीता की सकी, मन्दोदरी पी नानी प्रियय।
पहा मानगुप्त ज्योहिनीको दुम ! अपने को रवि मी लगाता मा!
मेरो पुराली मिनार या कि मुझ मिट्टी में मिलाया। शाप ,गा। एक
शारदांत पीस, राप उठा कर, शिसा सोखते हुए पारस
पालादादा पन माऊँगा। मुझे इस ममर में पैसा दिया ! उसने
पामराम्पाराय
१

देवसमा- क्या बुरा किया ? मुद्गम-मत माप, गो । सो प्रणाम करके। देषसेना -अरे माह मी तुमारा होता। मुद्गर- न होता तो क्या इससे मी बुरा रहता ? पारा, अब तो में इस पर मौ प्रस्तुत है कि कोई इसको फेर ले। परन्तु म स्पा मौन अपने पादपषिगा। (सप सती है) षसेना-भाग न-सी विधि है। एवारी तो नहीं है मुद्गल-हो, पबमान के पर एकादशी और मरे पारण की पदी, सोकि ठीक मध्याह में एकादशी के ऊपर बादशी पर बैठती है, उसका रहा दबा देती है, पट परफन लगता है। देवसेना-अध, पान तुमाप निमत्रण है-तुम्हारी सी के साथ। मुद्गल- मोसो देवता सम हो, पापका प्यारा हो! फिर शीमता होनी चाहिए । पुण्यात पीत न बाप पक्षिए मैं उम मुला लेता है।(माता) [सम का प्रस्ताम] तृतीय अंक [ गान्धार को पाटीस क्षेत्र] (वरही पजती है, स्कन्दगुप्त और पन्धवर्मा के साथ सैनिक प्रवेश) याधु०- मोरो। तुमारी पिपनिमामिनी पौर-मपा मुर भुतरिमों की पीया साप मन्द पनि से नम्दन में गज उठेगी। असीम साहमी भार्य-सेनिक ! तुमार शम्म ने वर्पर एणों को पता दिया है कि विद्या स्वध नृयसता नहीं है। बिनके पातक से पार विस्वविस्मात स्म सामाग्य पादानन्द तमारा लोहा मानना होगा और तुमारे पैरों के नामे दम हुए कठ से उने मौकार करना होगा कि भारतीय दुब पीर है । समझ लो-माम पुर में प्रस्वावधन नहीं है। जिसे लौटना से, प्रमी मे जोट पाप । सैनिक-मार्प-सैनिकों का अपमान करने का पिकार महापलाधिव को भी नही है। हम सब प्राय देने मापे, लेखने नहीं। मान्य-स्प 1 तुम या ही बननी जन्म-मूमि की सन्तान हो। मैनिक-राजाधिराम मी स्कन्दगुप्त पित्रमादित्य की जय ! (पर राप्रपेरा) यर- परम महारक की जय हो! सम्प~मय समापारी? - देव ! इस थीम ही नदी पार होकर माझमय की प्रतीक्षा पर रस, परतु यदि माइमस न हुमा, सो स्पर्य भाटमय करेंगे। पघु०-~ोर फुमारे सत्र का क्या समाधार है। घर-मगप की सेना पर पिस करने + लिए मैं न प | मरा प्टि में पिशाप की मंशा पल हो । रगिल के भी मारे । पम्पादित उसर परको टोक कि नहीं, इसमें सन्देह है। घर- . - १.१

स्कन्द
बन्पुषर्मा ! तुम कुमा
के सक्षेत्र की और नामो, में
या देस लगा।
बघु०--समाधिरा! मगप की सेना पर अपिघर रखना
मेरे सामर्दी के बाहर होगा, और मातब की सेना पार नासीर
में है। पाम एस नदी की दीपप धारा कोनाव करके बस देने
की मेरी मविन है। माय मालर का एक भी सैनिक नासौर-सेना
से न हटेगा।
स्कन्द-मन्मुवर्मा ! या परा मुझस मट बौन लो।
वायु०-परन्तु सबसे प्राण देने के स्पान मिस है। यहाँ
माणन की सेना मरेगी, दूसर को यहाँ मार कर अपिकार ममान
र प्रवियर नहीं। और बन्धुबर्मा मरने-मारने में मिटना पटु,
उवना पर तोड़ने में नहीं । पापा एन मे सो पपुषर्मा उत्पा
ही। पाप पोपता कोमिए ।
स्कन्द-बन्पुवर्मा ! तुम पर कठोर हो।
पन्यु०-गीता कीथिए । महा हपों को रामना मरायी
उसे मैं ही करूँगा ! महावलापिल प्र अधिकार में न कोय ।
चक्रपाशित गौर है, परन्तु मी या नबयुष १, पापा का
पपना मावश्यक है । मय पर गिमास न कौगिए ।
सम-मैंने उमझा कि हरों क सम्मुख वा विषातका
कोगा
पभु-चोरी गित दिन ऐसा से भाग्य, उस दिन को
मी परोस उठाकर न रखगा। सम्रार ! सीमा कीजिए।
स्कम्म०-(प्रालिगन रताहै ) मालदेश की !
पपु०-रामापिराब भी सन्दगुप्त रिफमादिस्य की बब!
(पर साम स्कन्दगुफा बातेह)
म

तृतीय अंक
[ नेपथ्म में रणपापा रानुसना भाती है। हूणों की सेना मे विष्ट
मुराहणों का मरना, पायल होकर भागना बन्धुषर्मा की अन्तिम
मस्मा , गप्पन टक पर उस सममा]
पन्धु-(दम तोड़ते हुए ) विजय ! तुमारी विजय
मार्य-साम्राभ्प की जय!
राष-मार-साम्राग्य की अय!
याधु-माए ! स्मन्गुप्त से मना कि माला-वीर ने अपनी
प्रविश पूरी+ा, भीम और पमना उनकी शाप है।
महापर भाप क्या कर (सप साफ परतेह)
यम्धु-बन्धुगमण पर रोना नहीं, भानन्द का समय है।
पीन पीर इसी तरह मन्म भूमि की रचा में मास देता है, यही में ऊपर
में देसन गाता हूँ।
मैनिक महाराज बन्पुमर्मा की अप
(गापर की छाया में पघुपर्मा की मत्यु)
१०३

[दुर्ग के सम्मुस भा का रण क्षेत्र , पक्रपाशित भऔर सदगुप्त ] पा- समार ! प्रतारपा की पराकाष्ठा ! दो दिन से मान-म कर शत्रु ने उस ऊँची पााड़ी पर अमने अप्रकारा दिया मा रहा है। प्राक्रमस करने से में रोका जा पा है। समस्त मगप की सेना उसा सच्च पर पज रही है। मचन्द०-चक्र 1कुमा में मच बहुत कम पार ही उतरना होगा । तुमर्ग में एना पाहिए । मैं मगई पर विश्वास तो करता ही नही , परन्तु उस पर प्रकट रूप से प्रविश्वास का भी समय नहीं पा । घक-नहीं सम्रार ! उमे पती कौथिए । पा देखिए- प्रा रहा है। भटार्क-(प्रपेश करके ) रायपियन की मय हो। म्कन्द०-क्यों सेनापति ! यह स्पा होगा। मटाई-पाक्रमण की प्रतीमा तपाद ! मम्म०-पा समयको मटाक-तम्राट् पा मुझपर विश्वास नहीं है, य पा-विपास तो कही से प नहीं किया जाता। मटाफ-गुम प्रमोबावको। चापुरापारीप्न | प्रमो में से कजा पा साता, 1 मटाक-मावधान ! अब मैं सान नहीं कर साठा ! ( सससार पर हम रसता है) म्भन मग ! पर बालक है। पूरमणमा, पाचातरी नही मानता । पुर दो पक! ( पळपालित और मटाई सिर नीचा कर लेते है) -मराप । प्रईयना का समय नही । स्मरण

तृतीय अंक
रखना-मन और नीचों की श्रेणी में तुम्हारा नाम पाले
ऐगा।
यम---
( मटाई सुपरा पाता है)
म्फम्द०-युबलिए प्रस्तुत हो।
मटार्क-मेरा लग सामाग्य की सेवा करेगा।
म्कन्द-प्रच्छ सो अपनी सेना लेकर मुम गिरिसकर पर
पीछे से प्राहमण रो और सामने स मैं पाता है। चक! तुम
युग की रक्षा करो।
मटाकती माता । नगरहार , सन्यापार को मौ समा
यता प. सिप प्रजा दिया जाय तो अच्छा हो।
म्फन्द०-घर गया है। मुम सीम बानो । देखो-सामने
राभुगस पर हैं।
( मटार्क का प्रस्थान )
तो में बैठा है।
फ-मविष्य अप्य नही है प नगपार से समय पर
स्थापना पहुँनदी नहीं दिमाइ देती। परन्त, परि भासयमा
हो, तो ग्रीम नगरहार की पोर प्रस्पापर्तन फरना । मैं वहीं
अमस मिलगा ।
(पर छपरा)
पम्द०-गापार-पुरका स्त्र समाचार
र-विजय । उस पत्र में हूण नही रह गप्प , परन्तु सम्राट
पन्पुषर्मा नहीं है।
मन्द-मार पु! तुम चल ग र धन्य से पौर-उदय ?
(शोधमुद्रा स मंठ माता)
फ-सका समय नहीं है स्माट उटिए, म्ना भा रही है,
इम ममप यह समापार नहीं प्रसारित करना है।

कम्द०-( उटमे
टीकमा!
( मटाई साम समा का प्रदेश)
म्कन्द--देमो, कुभा के उस पप सावपान पना।
भाममय में पदि प्रसस्वा चौर रात्रु की दूसरी सेना कुमा
को पार करना पारे, तो उसे कार देना । देखो मय! तुमार
सिरसास कामही प्रमाग है।
मटाक-सीमापकी यात्रा।
(3 सैनिकों फ साप याताह)
मान्दछपक ! दुर्गमवक सनिका को लेकर तुम प्रतीक्षा करना |
हम श्वी पाटी-सी सना म माम्मए करगे । तुम सावधान ! ( नपग्म
स रणवाय) दबो-गस था रहे हैं! उम्पही रोना होगा ।
मकामा प्राशा। (जाता ह)
सन्द०-ौर मगप-मनिका प्राय स्कन्दगुप्त तुम्हारी परिपालना
कर पारे, या प्यान रहे, गारपरका मान प, मन ही प्राय मार्ग।
मगध-सेना-रामापिराम भी सन्दगुप्त विमपि की जय !
(सना पड़ती है उमस भरा होतो, पोर युग के बाद
हूण मागते ह । सामाग्म-मना घ, जमनाद घरते हुए, शिम्पर पर
भधिकार करना)
मापक-(उपर दसता हुमा ) मार! प्रापचय , मागा
इल मेना मुमा र उन पार उतर माना चाहती है !
मन्द-पण मा।
नायक गुरु मगप-नाना मी पो , पल्तु पर तो प्रेम
उनमा स्पागत कर रही है!
मन्न-पिपचासभात ! प्रतारण ! नीच मनाई।
मायक-शिक्षा प्रामा!

सृतीय क
न्मन्द-दुग की रक्षा होनी चाहिए। उस पार को हम मना
यमि मा गो, तो सप्प मटार उहे मार्ग बठापणा । धारा,
शीम ठहै उसी पार रोना होगा। प्रमी कुभा पार होन की
सम्भावना है।
( नायक तरही पजाता है, सनिक इट्ट हारो है)
म्कन्द (पपराहट मदलते हु ) शोमना कय !
नायक-क्या?
म्कन्द०-नीच माफ ने पथ तोर गिया है, पुभा में जन्म
पर यग म पारा। चलो शीम--
(सप उतरना पाहत है, मा में साम्पात् बल पद माता ।
सप पहत र दिमाद दत।)
[भन्पचर ]

चतुर्थ अंक
[प्रकोष्ठ
(विजया और अनन्त दवी)
ग्रनम्त०-पापा'
विजया-में प्राव ही पासा पलट सम्वी है। गो मूजा ऊपर
उउ पा है, उम एक ही झटके में पप्पी घूमने के शिए निगरा
पर सस्ती है।
अनम्त०-क्यों इतनी उत्तरना क्यों है । मुन मी तो ।
विजया-समझ सानो।
अनन्त-मही स्पारो।
पिशया-भराक मरा है
ग्रनम्त० तो?
यिनया-उस पर मे मरो को स्यना रोगा।
मन्त०-कौन बीन रहा।
पिजया-एक पाप-पक पसी हुई निलय नारी। सा
उमा नाम भी रखना होगा । समभो नही तो सामाग्य
मान गा पा कर भग फर रिया बामगा।
मनन्त०-(सती हु ) मूल एमपी ! तेरा मराक केरल
मर पाय-यापन 1 अग्न ६, और कुछ नही । पर पुरगुप्त
*पे मिहामन की सीबी, मममी।
पिनया-मममी पौर भी गान लो कि माप नारा
ममार है।
--
तुम

चतुर्थ अंक
अनन्न-(बनासी हुई)मा तुम पुरगुप्त क साप सिहासन
पर नहीं भेटना पाती दम्यो - गरमी तो कुमारगुप्त का पुत्र
है।
विजया-दा, वर कुमारगुप्त । पुष है, परन्तु वा सुमार
गम से उपर है। मम ठसम ए सन्तान-छि !
मनम्ट-स्पा पहा ! समझ करना।
यिसया-सी, और फिर कहूँगी । वोमन स, पमको से,
मम म, कोई मी मुमको भयई मे नही पम्मित कर सकता ।
प्रगप-म्बिता पियों भरनी पर को रो- विमों-का दूर करने
कलिए पा समीर होती है।दय को धान लने वाली खी
पप्रति वसपस्मा एमया पाड़ी नदियों से भमनक, मालामुखी
+ मिस्कार म पीमन, भोर प्रदय की अनल-शिमा स मी
लहरदार होती हैं। मुझे तुम्हाण सिंहासन नही चाहिए। मुझ
चा पुरगुप्त क. पिशाम र मन पार यौवन में ही जीप शरीर
पा अपलम वाचनीय नहरी । कदे देती है हर जामो, नहीं वो
मुम्हारी समम्म कुर्मरणामों को एकप में सादगी !
ममन्त०-क्या इतना स्यहम् । तुप्च स्पो ! मू मानता है कि
पिसा साप बात कर रही है। मैं वही है जो अश्वमेष-सपकम
कुमारगुप्त म, बालों को मुगन्वित करने ८ लिए गन्मजूरा जलपाती
पी-जिसकी एक दोषी कोर से गुप्त-सामाग्य त्रागेल होगा
है, उस तुम
एक मान्य नी मा-बाल प्रस्ने भटाई को,
मुम एसे कीट-पतंगों को मापापावा नहीं। परन्नु स्मरण रणना,
में अनन्तरेदी ! देरी नीति परपिता मानन की दादाग्नि-
तर गा-रोजगापर! मैं मर भाग लगाऊँगी, जो प्रमय सनद्र
से भी न बुझे।
(गाती है।

पिसया में श्री श्री न पी!षर माना पियार्या की
लोला मूमि, उपर गम्मौर समुद्र 'दुर्वच रमणीराव पोपी भाप
में गरम और गोवश राम फरसे ही लंदा कोप से अपने
मामीय मनों पर विप उमल देना ! दिनको क्षमा की ग्रामाता-
गि स्नेह पुरस्कार की मोम है उनकी मूल पर कठोर
तिरसपर और ना पराये हैं, उनके साप सोती हुईमानुभूति !
पर मन का पिए यह बदलने पाछे सय की गवा है। मोर !
अप एम अनमान लोगों की मून और दुचो पर पमा या
नानुभूति प्रार करते हैं तो भूल गाते हैं कि यहाँ मेप
पार्थ नहीं है। दमा और उदारता वही सपी है, की मी
बलि रो। अपना अतुन धन और दर दूसरों के हाथ में देकर
यो भिर-( उम्मत्तमाप से प्रस्थान करना चाहती है)
( पदपुत मापहचप्रोग)
मायक-ग्रान्त हो।
बिजया-कौन!
नापा-सैनिक
विजपा-पूररो, मुझे दनिको म प्रशा है।
नायक-स्पो मुग्दरी!
पिजया-करामात अपने मठे मान के लिए, बनापटी
पापन लिए, अपना दम्म रिसबने लिए, एक अनियमित
दय का लोते स ला पिटमाना है। किसकी रचा, पिस दौ.
ही मापता के लिए गुमार प्रस।
मापक-मामान्य की रक्षा रेजिए।
पिमया-मूठ । तुम तपको मंगली रिस होकर सम्म
लेना पाग! मोहमे ठोकरों के लिए प्रम्प मारय गीपन म
नायरनेशन मपानर मेरि

चतुर्थ भक
.
मायक-(स्वगत ) पागल हो गया।
विजया-स्नेहमयी देरमेना का फिर से विरम्कार किया,
मिते हुए सर्ग को पर्मा ने नुष्य सममा, देव-गुल्प मन्दगुप्त
में विद्रोर दिया, पिस लिए । फयक मफ्ना म्प, पन, यौवन
यूमर को दान र ठो नीचा दिखाने के लिए । स्वाथपूर्ण
मनुष्यों की प्रतारणा में पाकर नो दिया-इस शोफ का मुष,
उमलोसकी शान्ति प्रार!
नायक-गान्त हो।
विजया-गान्ति का अपनों को दर देने के लिए मैं म्य
उनन अलग हुई। उहे दिपाने क लिए-'मैं मी पुष अपनी
भूल थी उने प्रमिमान मे रनक सिर पोप कप में मन रमवा
था। उन पर झूग अभियोग लगाकर, नौप-रय को निम्म ठचे
सिरोपी उमका फल मिला।
मापक-एमपी मूला हुमा सौर प्रापा १, सोपा हुआ
मिल जाता है, परनु मो गानमार भूशमलइया तोहन क
अभिमान म उममें पुमना है, पर उमी पहम्मू में स्वयं माता
गुम को मी मारता है। यान्ति घ-म्याण का-माग उन्मुस्म
प्रो को घोड़ दो, मार्प को विम्मत , सर तुम्हारा।
पिनया-(मिसनी दुर) में घनाप नियाप ।
मायक(बनावटी रूप उतारता) मैं गवनाग हूँ। में सम्राट
का पनुपर है। मगप की परिम्पा देतार अपने विषय अन्न
दो लीरा ।
पिजपा-ममा पन्तदरे विषयपति शर्यनाग।
शर्य०-दा, पान्नु देश पर एक भौपय पातक है । मया
दी शिपनीला सफल होना चाहती है। रिमया ! पलो, दय
के प्रत्येक पम्प, हो और पुवक को उसकी मन्नार में लगाना
-
.

म्कन्दगुप्त
.
रोगा , कम्पम का मार्ग प्रशस्त करना होगा । मानो, पहिम
राममिदान न प्रस्तुत कर सकें, ता में प्रपौर न होना चाहिए ।
हम ऐश की प्रपेड गलीको मार देकर ही इवना सन्चार
कि उस पर चलनेवाल पममार्गममुख पायें।
यिनपा-( कुछ सोपकर ) नुमने सच मा ! सब को प्यारा
कशुमप्रगमन के लिए फरिषद होना चाहिए । पलो-।
[दोनों का पस्मान ]
--

चमुर्य भक
-
[ मटार्क का शिविर ]
(नर्तकी गाती है)
मा-निषि में लहरियों उठती तमी
मूल कर मी जब स्मरण होता कमी।
मपुर मुरली क दी तुमने मला,
नीद मुमका मा पली बीपस ममी।
सब रगों में फिर ही विलियों,
नील नीरद / मा न बरसोग कमी।
मक मौत भौर मल मानिल महा।
द्र कलिका र सिली बाती, अमी।
कोन मर-मर र पियेगा इस तरह,
यह समस्या हल न हागी क्या कमी !
(कमला भार देवी का प्रपेरा)
देवकी-मटाई का मेप सर्वस्व बता दे--मरे मानन्द का
उत्सब, मेरी माया का सहाय, मा।
भटार्क-कौन!
कमला-तम ! नही बनता है, या पही सी १-जिनोंने
तर नारकीय अपपप को घमा रिण या -बिनोने तुमसे
पिनौन की प्रेमी मरने से बचाया था, वही, पदी, ऐन प्रतिमा
मादेपी की।
मटाक-(पहचानर ) चैन ! मरी माँ !
कमला- 7 सकता है। परन्तु मुझे तुमको पुप पहने में
संप्रेरताप से गही या पा! मिस बननी की सेवान
रिकन प्रभाग्न पुम-ऐसा रेसोही दो, उसको क्या मह दिखाना
पाहिए ! मार माई!
मटाक-परमाता और मेरी मावा।

सन्दगुम
यकी वा मय पर पार्यावर्त
परेश का
पिना दाम पसेपक या मन-साधारण के हदय म स्वामी ।
उममें शगुण करते हुए तुझे.
कमसा-मोल दे मगा।
मा. -मामा की मुम कह से पूछो, हिममान की
पठानेयाजी र से पूछे कि वह प्रा। मैं नहीं
देयकी-बार या मेरा सन्द! ! मेरा प्राय !!
(गिरती है मृत्यु!)
समसा--( उसे समालसी) रस पिया | एक बार अपनी
विजय पर पता से मिशिला । नीर! पुरक-प्रतिमा को, सियों
की गरिमा को, पूल में लोरवा हुमा देखर, एक सरदर म्वोवा कर
स ले। रेखो।
मटार्क य! ( मपमीत हादसतारे)
कमसा-इस यंत्रणा और प्रारणा से भरे हुए संसार की पिशाप
मूमि को क्षेर पर प्रथम लोकको गई, और तू बीवा पा-मुली परों
में भाग लाने, शाकार मचाने और देश को मनाप बनाकर उसी
उरणा करने के लिए-मरकको तूमीठा रहा !!
मटाक-मा, अपितन हो। साप्रारमियोपराप
परम पर मरा उपरा नही थामक पुरगुप्त को खिामन पर बिठान
की प्रतिमा में प्ररित पर मैंने यह दिया ! सन्गुप्त न दी, पुरगुप्त
खबार होगा।
कमला~मरे मूर्त ! प्रपनी गुप्त बुद्धि को साप मान कर, रखा
राई में कर, मनु रिखना हा अपपपरममा पामर !
माटोमा नियमापन गया ! मैंने मूल की , पतिका प में दो सेरा
गला पोर पर स्पो न मार खा! माग्महत्या के प्रतिरिक्ष प्रा और
कोई प्रारिपच नहीं।

पतुर्ष चा
मटार-मा, दमा रो। पास मे मैने शम्भ स्पाग किया। मैं इस
मैपर म अलग , भव मना बुदि से नुमें कष्ट न पहुंचाया।
(सलगर सल दता है)
फमलासूने निक्षम किया मयई। महादी एक दिन जितक
नाम पर गुप्त-मायाम्प नतमस्तक होता था, ग्राम उसकी अनपेप्टिनच्या
लिए पाद उपाय नहीं ! दुर्देव !
मटाक (ताली पनाता है, मनिक भाते है ) महाली की
अन्त्येष्टि किया पबमम्मान में होनी पाहिए । पालो, सीमता
करो।
(वीराब
काप स्मान पर दाना मिल कर रखने हैं)
कमसा-मय इस पुरपरण कम्श म, मम्मर है, वेय पार
पूराय।
[ मटाक और कमला पर तीन भालाक

[ कारमीर ]
( मायाधिकरण में मारगुप्त)
(एक स्त्री और पटनायक)
मावगुप्त नन्दीयाम के दशमापक देवनन्द ! परमा है!
देषाम्द-कुमारामाप की सब हो ! बहुत परिमम करने पर मी में
पर रमची परत पन का पता न जगा सका। इसमें मेरा अपराम
अधिक नहीं है।
मावगुप्त--फिर किसका है। तुम गुप्त-सामाम्प च विधान महा
गरे! प्रमाको रवा के लिए 'कर' शिया भावा। यदि तुम उसकी
रथा न कर सक, तो पर पर्ष तुम्हारी पति से कर कर इस रमची को
मिलेगा।
देषनन्द-पान्तु मा इवना अधिक किमा दीपन-मा की पति
स भी उसन माना असम्भव है।
मावगुप्त-तब रान कोष उसे देगा और तुम उसका पल
मोगोग।
दयनन्द -परतु में पल ही निषेदन कर मा इसम मरा
परराए अधिक मही। मौनगर कीर से अधिक समरिणालिनी
बापापा अपने चन्तरंग लोगों प्र परिचय मी नहीं बताती , फिर
में से पता लगा गुप्तपर मौ का गए ।
मावगुप्त-दो इसका नाम मै मूल गर ।
धनन्द-पापिनी।
मावगुप्त-क्या ! मालिनी ( सोचता हुमा) चाय,
रायो, कोपपत्र को भग दो।
(दानन्द का परवान)
मावगुप्त-मालिनी ! प्रबगुएठन त्यो, विर ऊंचा परो, में
अपना प्रम निदाएपना पाहता।
-

चतुर्य अंक
(भागठन हटा कर मासिनी मातृगुप्त की भोर देसती है,
मातृगुप्त पकित होकर उसका देवता है।)
मावगुप्स-तुम कौन हो–माशिनी । ना ! मही-नहीं,
प्रम
मासिनी-नही मातृगुप्ठ, मैं है! अबगुल्छन केवल इसी-
लिए था कि मैं तुम मुक्त नहीं दिखता सकती थी। मानगुप्त !
में पही।
.
मावगुप्त-म ! नहीं मेरी माशिनी ! मेर हदय की धाराप्प
देवता-वेवासम्मव । परन्तु नमी वही है मुस । यद्यपि विलास ने
उम पर अपनी मलिन क्षा गल दी: -उस पर अपने अभिशाप को
पर लगा दी है, पर तुम यही हो । दुदैन ।
मालिनी-दुर्देप।
मावगुप्त-मैं भाव तक तुम पुगता था। तुमारी पवित्र स्मृति
पो गाण की निषि की मोति बिराये रहा। मूर्ख में पार
मालिनी ! मेर गन्य माग्यापारा के मन्दिर का हार बोल कर तुमरी
ने उनी उपा पारा झांका पा, और मेर भिकारी मार पर स्वय
पिलर पिया था। तुम्ही माहिनी ! तुमन सोने के लिए नन्दन का
अम्बान इमुम पगला । मानो मालिनी! राम्कोप से अपना
मनललो।
मासिनी-(मात्रगुप्त क पैरों पर गिरती हु ) एक बार चमा
पर रो मागुप्त
मावगुण में इवना त नहीं है मालिनी कि तुम इस अपपप
के परग मूल माऊँ । पर यह स्मृति दूसरे प्रभा करोगी। उसमें
माना न होगी। ना उटगा और तुम्हारी मूर्ति पती दोहर यमन
पायेगी। गानो!
( मालिमी प्रस्थान, पर कर पपेरा)

पर-मारामाम्म की बप हो!
मावगुप्त- समाचार सार्म पता सया !
नही । पवनर हचोक प्रपिशा में है, और पामीर पर
मी मामय या चाहते है।
मावगुणल्यामो
(परा प्रस्मान)
मावगुप्त--तो सर सा! मेरो कम्पना मुन्दर स्वप्नों का
प्रमाव से पा है। नाचती र नौहारनशिनों पर दाना
विरो माले } मोर! जोचा था कि देवता मागी, एकगा
पायरी में गौरप का सूप मा चौर पुस्पकमो समस्त
पापा मागे , दिमाग से निजी दुई सप्तमधु तय गेम्य
पमुना की पार्शि, किसी प्राप्प सशस्त्र
चार
परित मिन-सी, भूती वाति - निर्वाचित माथियों को प्रदान
देकर सन्तुए करेंगी। धीर भाम्पवाति अपने घर मल दामो में
वस्त्रमय पर पुरया पुरसार घोर पाप का शिकार
करतो, माल निमाल की भांति सिर कंचा पि, पिरो
सापरण के लिए सावधान परती रहेगी, मालस्प-मिण में
शप-पप-यापी अप्टिनाप मागे , सिमु में रखमल होगी
नार, एनपनिया पाप्मावत को बला-भूमि पर निगर
होगी। उसोधन गीत गाएं, हरस : उद्गार मुनाय, पान
पासा फार र मौन पलय ! प्रकार उदास साप्त, atte
सन, पाप्मीर ! तुझमे पिना
[प्रस्थान

चतुर्थ श्रम
[ मगर प्रान्त में पर
(पात मेन भौर परमातयति )
मल्पात-प्रिय पम्प ! भाग दुर्ग पाये तीन दिन हुए,
क्या सिखा राम्य में भारत-पम्पटन के बमम गुम्ब प्रतीत
सेवा
घासुसन-भारत समय नियम , भोर मयूए बमुभरा
साप्रम-भरा में भाम। धनादिचन म मान की, मानवता
कोग्याति या स्त्रिीर्ण कर पाई। मुपपदय-मारत-क्सि
मूस को प्यारा नही दुम देव नहीं किषि का सबम
ॐचा भंग इस सिरान, और सब से गार तया विशाल
म्मुद्र सर पर कनीय ! कम- मुन्दर र प्रकृति
ने प्रश्न इस पर में निषित कर रहा है। भारत स्याण
के लिए मप सपस प्रति है। किन्तु देसमा योर
ममता मोर संप मा साम्राम्प ८ पिस मागापि-गिर
के संप-महास्पदिर मे निवाथ-साम किया , उस पदक उपयुक्त
मारत-मर में परत प्रापावाति मस संघ की मलिनता बान
परपुल बायगा।
प्रख्यात-पायिक! मुमधमा कीजिए। मैं पम-साम रमर
दिर भि हुमा, मास्पषित बनने के लिए नहीं ।
धातुसन-निय ! में मात्रगुप्त म मिलना चाहता है।
प्रम्यात०-परा पिरत हर पूम पा!
पामुमेन-नुमको मेरे साप बामौर पलना होगा।
प्रयान-पर प्रमी तो मुष दिन टारोगे !
धानुमेम-जा का सम्मरहरा, सीम पहा ।
(एक मित्त घरा)
मिशु-पाराय ! मान अन!

सन्दगुप्त
प्रख्यात०-क्या है। कुछ मोमी ।
मिसु-विहार के माप मो चतुप्पय म पैस्य है, वहाँ
अब मामय पति मिमा पाते हैं । इमर मिषु और पौर मनता
उत्तेग्ति है।
पातु-चनो, हम लोग मौ चले, उन उत्तेमित जोगों ने शान्त
करने न प्रपा करें।
[ सब बाते है]
१२.

प्रपमक [बिहार कसमार पपस | एक भार मामण लोग पलि का उपकरण मिय दूसरी भोर मिक्ष भार पांद बनता उत्पमित । दानायक पोश] दानायक-नागरिका! सह समय अन्तपिछोर का नहीं है। देखत नही हो हि सामाम्प पिना करापार प्रपोत होकर गमग्न पा है, और मुम भोग मुद्र नाव के लिए परस्पर मगाठ हो। ग्रामस-नी मोदी ने गुप्त रामु प्र पाम किया है। पारक पिताहिट पनी लोगों की बायवा से पुन प्राय हैं। इन गुप्त अधों को प्रताप उचित दस मिन्टना चाहिए। भ्रमण-टीक । गंगा, यमुना और सरस् क तर पर गाए पर सर्मियों मेधती में टुडीएपीलो की तर आप मी सटस्ते हम लोग निस्वाप ५, क्या करत ! बिपी विदेशी की गरण में भी पदि प्राय पर गाय और गर्म की रक्षा हो । राष्ट्र भार समान मनुप्प के पाप पनते है उनी मुख लिए। बिम राय थोर समात्र से हमारी मुस-यान्ति में बाधा पाती हो, रमन हमें विसार करना होगा। इन संस्थानों प ठरेय है- मानों की समा। पदिने मी प्रप से बना पारें और हमारे परों को न स्या, तो हमें टमको सीमा पार गाना परगा। प्रामण- मामयों को सनी दीन अवस्था में बहुत दिनों तक विनिस्तानमा दसहरस। मोनाति शिव मस्तिकप्रशासन काना पिया लिपे टारण हुई है, बाकी परयो नाच न रगी। भार पर्दा यदि रोगी-मारे पमागरम में सर्प पिपाव भी पापा नाममा भमर- निप्रापिएफ में मन-सा पम, मामय'

सन्दगुत
तुम्हारी इसी हिब-नीति और प्रकारमूलक प्रारमगाद र खान
तथागत में किया था। उस समय मुमारामान-गौरमर्श था! वो
नतमस्तक होकर तमप्र समीप में उस शान समूमि क मपान मम्लक
समदार सीम्रर की तुम हमार पम पर प्रत्याचार किवा चाइठे हो,
पर नहीं हो सगा। इन पाप्रा के बदले इमारी बलि होगी।
रक-पिगमु दुन्ति प्राममादेम । तुम्हारी पियसा हम अपने पिर से
ग्रान्त करेंगे।
पातुसेन-(प्रारा करक ) घरमूलक प्रात्मबाद का तान
करफ गौतम ने विस्वात्मवाद को मप्र नी किया। परि पैसा परते तो
तिनीकरणाकामा मारकता पी। उपनिपा के नेति-नति से हो
गौवम अनास्मयाद पूक्ष है। यह प्राचीन मार्पियों का पित
सिधान्त, मप्पमा-प्रतिपा क नाम स, संसार में प्रचारित हुआ।
प्पनिरूप में चास्मा रे सारा पुष नहीं है। यह एक मुषार था, उमर
लिए रखपात क्यो।
बगरमायफ-सो, यदि यठो लोग पुछ तुम्हार समभाने म
मान गार्थ, अम्पया या पति न रोने दूंगा।
प्राण-क्यों न होन दोगे। प्रधार्मिक ग्रासका स्पो न होने
दोग। पाम गुप्त कुन से गुप्ततामाम्प शिपित है। कोई पवित
रामा नी बो ब्रामण धर्म की रक्षा कर सोपाबरगर
लिए अपने राममा को वरिपपो की बचा में निपुन कर | प्रा.
धर्मरेर ! तुम ।
पानुसन-मसि पु-प्राय नस हो स पन्त है। यानि
मीन और परत है और उसरा पर्म प्रमशाय अपम्पा में पते
मे इपमा पा। पपिप राग, धर्म का पालन पराम
पाला पगा, पप्पी पर क्यों नहीं गया ! मापन इम पिचारा
११ म्पो प्रामण समोर निर मन्य लोगों की उपविका
।
4
રર

चतुर्ष अंक पम बौन रो। यो एक पन्ध के जोग दूसरों की प्रभारी सिर्या हरा करने लगे। शाम ने तुम्हारे पर्म र म्पयसाय पवा दिया। दपिसानों को गोग्यता से--सर्ग, पुम, धन, यश, पिप और मोघ गुम परमे लगे। कामना से अपी बनवार पिलासी समुदाय के ग क लिए नुमारा गया है। जिस धर्म + धावरण लिए पुष्पक स्पष पाहिए, पर धर्म बन सापारण की सम्पत्ति नही पर पापे और ससन्ध रटिदार बात काप गय! और बवाय कौमाता से यह दम हो पाई। गिन पनपाना लिए तुमने पर्म को मुरमित रक्ता, उसने मममा किपम पन मे खरीदा गा सकता है, इसलिए धनोपासन मुमप दुमा पौर पम गौ। यो पारस्य दश को मूम्यवान् मदिरा पतको पी सकता है, पर पार्मिक बम एम + लिए प्रमाव म एक गो निमय भी कर सता है। पम को पाने + लिए नु रामषिकी पारसता हुई। पम इतना निपक्ष? किन पाराम बलय मुरमित होगा! ग्राक्षण--तुम कौन हो! मूत उपदेशका र मानो। तुम नास्तिक प्रथम पोम ! नुमको अधिकार क्या है कि हमारे पमकी म्याममा करो। घासुमन-माम क्यो मान है। इसीलिए शिव साग और समा की मति रावीक बल पर बापा सम्राट् उना भाभमोक निपर निररत्र पर गत प, और ८ वपस्थी शव और अमृत पति मगरन- निरत हुए सायं पात अमिशाला में भगान् म मापनाकरताप- सऽपि मुसिन मग्नु सय मन्नु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिदपुरमानुयान।।

सन्दगुप्त
-~~मार जोग उस पदों की सन्तान , मिल अनेक
को को पर पारदी पद पर दिया था। उनका धर्म समर
मुस्ता पम्पक परिपतन में स्वीपर करण, स्पोकि मानर
बुद्धिमान प-यो बोरा हमें मिथस्वार
गी, उसके पिघस के ताप परेगी, और यही पर्म की
.
प्रण्यातकीर्तिपर्म २ अरमको ! मनुष्य
अपूर्ण है।
मलिए एप विकास को उठा बाप होता है, अपूर्व रोता
है। यही पिनास का रहस्य है। यदि ऐसा न तो कान की
वृद्धि सम्भव हो पाप । प्रत्येक प्रपार में इनकम प्राचीन
घवापरमपयोग प्राय इसी से प्राय करना पाता है।
नबी बम, समय और देश की स्पिति के
धनुवार, विष्ठ
हो रे भोर हो। हम लोगों को इसी से उन मागन्तुक
कमिक पूणवा प्राप्त करनेवाले मना से मदन पाना चाहिए ।
रम लोग एक ही मूल पर्म की दो शाम ।। मानो, हम दोनों
भन्ने उदार पिसार पलो मे पुष मानको भरठोर पप
पोमस करें।
पहुत स सोम-ठीक हो , कोइम लोग स्पर्ष
पास में होगा और मातापियों को देश का पा में
गुरु मानो मामन बालारा हर योनी
नापक-यही दो पाठ नागरिका
मपातकीवि-इस बिहार का प्राय और मेरो
मम्मति पार्मिक भगो पोको पाननी पाहिए। मैं मानता
समपान ने प्राणिमात्र को बार बनाया , और आप रपा
सीलिए बम रितु सदुम लोग स स लिए पुर
.

पतुर्थ श्रे
करोगे, तो हत्या की संममा बागी हो। म यदि तुममें कोई सभा
पार्मिक हो तो पर पागे माये, और मामयों से पूर्व कि भाप
मेरी बलि देकर इतने मीयों में छोड़ सकते हैं। क्योकि इन
पानों से ममुप्पोम मूस्य ब्रामगो की प्टि में मी विशप होगा।
भाइये, न भाता है, किसे योपिस्त होने की रक्षा है।
(बांस में सघा नही हिलता )
प्रण्यात०-(सर) पो पापा पोन्माद था। एक
मुर करनेपाली मनोहति की प्रथा से उत्रित कर अपम
करना और धर्मापायी दुन्दुमी रमाना-पही मापकी काशाकी
सीमा ! माइये, पर जोर माइए । (पासण से ) ग्रामो रस
पिपासु पार्मिक ! लो, मरा उपहार देकर अपने देवता को सन्तुष्ट
रो!(सिर मा लेता है)
ग्राह्मण-(तलपार कर ) पन्य से महाममय ! में नरें
मानता था कि मारे ऐम पार्मिक मी इसी संप में है। मैं पति
नहींगा।
[ जनता म रयमय घर सर पारे-धीरे गाते

[ पक्ष में लिया और मातृगुप्त ]
पिजया-नहीं करियर । ऐमा नहीं।
मावगुप्त-कौन, विमय,
विजयापारबई और शोक का समय नही है। मुधि-
'शिशोमपि ! ग्न पुरे मिलन-नंगीत, गा चुकीमहकमलामो
नपाल गन, रो पुरे प्रेम क पयो । एकपार पर उसोपन-गीत गा
टोमारतावनी नपरला पर विश्वासको प्रमर मारसकी सेवा
कलिप पर होगा।
माल्गुण-कौन, विसार
पिडया-हा मानगुप्त। एक प्राण पचान के लिए जिसने
सुमारेाप में कामौर-मंगल रे पिया था, ग्राम तुम उसी समार
को पोरते हो। एक नही, एमे स कन्दगुप्त, पेस स्वों
स्प उदार युपस, इस जन्मभूमि पर उत्व हो पावै । मुना दो
पर गीत-हिम पाहिल बाप और समुद्र काप कर राम ,
अंगमाया र मुकुल की मोर निद्रा प भारतवासी धग पो।
म्म गली-गली कोने कोने पर्यटन करेंगे, और परेंगे, लोगों को
अपरेंगे!
मादगुम-पार पाले! तुम पन्ध हो । मास मे में यही बगा।
(सकर )पासो-पम्माक्षित मापा!
(पपालित का परा)
यसो भी खोला, पमा पचों पर मत-पिण,
माय मर-ममा-परे इनस मा र नरमपनों
की प्रभाग-टोना। मनुएको प्राप-विपि रेमी दर, मी प्रमि
मानों में जमए में मिली की खापन में मावलित,
एम' पय में रिलीन होने पाली ! मरिमा अनुमा एक मनुप्म
पण प्रतीत का मामी है।
१२६

पनुपर मादगुम-घु पराजित! घमा कौन, मानगुप्ता भीमसहसा प्रवेश परफ) हाई मप नार, नेर लयमा एल, भुगात, पमुन्परा घमार, बीरता का परपीर पु, मानुष-मुकर ग्राम्य पपुवर्मा। (परन्मातति और श्रमण का प्रदेश) मनपाठ०-सर पागल, एट ग-स, अनाप और मामय- दीन-पही तो हैं। प्राण फे पुत्र पुर भर मम मामाम्म-पोत क न ए परे और पतवार ऐसे उदार।। मागुम-तुम न हो' प्रम्पाव---सम्मपत. तुमी मागतरो' मागुप्त-(रोका सदसनामा) क्यों भरेरी इचोक ममान मपते हुए पी मी ! परनु तुम प्रत्यास०-- संदेश मत को माणुच ! ऐराव-वापर इमार पातुम्न की पारी में मैं नुम लोगों को सोम राई। पर लो प्रचार-पना मारगुन-(पद कर ) पन्य तिलक पुषरार भमर ! कर देना, मैं पाममुपर पगा, और कनिकष क समीर मेरोगी। अपत्यान-पस्वाग से!(जाता है) पिनया-चा पल हम लोग! मारगुम-उसी में। [मरोग गाते]

[कमला की फटी]
(पिचित्र अवस्था में स्कन्दगुप्त का प्रोश)
स्कन्द०-बौदों का निर्माण, पोगियों की मामि और
पागलो की-सी सम्पूर्ण विस्मति मुझे एक साप पाहिए । चना
प्रती कि पग है, और उत्तर में से कोई परवा कित
लिखौना है-उसी सिपाही परपत्रयायी पावक को म
खिोना है। मेरा मुकुट मममोदी की टोकरी से भी छ।
करता-सहवर-क्या बिस पर हसा होती, उसी प्रेम
पा प्रमोप दान देते हो । नाप ! मुझे सो से मप नमी, स्मरक
कोर पूर्ण कितों की लम्बा नही । मर की बिकनी कड़ियाँ
ट्रय्वी है, उतना ही मनुष्य बन्धनों से पता है, और तुमारी मोर
अपवर होता है। परन्तु ग ठीकरा इसी सिर पर फटने को या!
माम्य-सामाग्म का नारा नी मात्रा को दराना !
उठता ६ देशाभिमान गरमन लगता है। मेरा साप न हो,
मुम प्रधिपा की भाषश्यकता नही । या नीति और पदाचारों
का महान भावमय गुप्त सामाग्म-दरा-भरा है, और
मी इस उपयुठ एक से। मोर ! माने दो, गा, सब इप
गण ! मन परलाने को कोई वस्तु न हो । सम्म-पिस्मत ,
मपिप्प-प्रग्पकार-गर्ग, लमहीन और और अनन्त सागर का
मवरण।
पमा दागु मनमाहम ! पगादा।
हमारे सुत जीवन जगा दी
विमल सातंत्र्य घपस मंत्र का
हमें सप मीति पन्धन सपुड़ा ।
सहारा उन अंगुलियों मिले हा।
रमीले राग में मन प्रमिलाद।।
२८

धनुर्पक
-
बगी सतहोइपी पतना।
इसे प्रानन्दमय जीवन मना दा।
(प्रार्थना में मुकता उम्मच भाप से नाग का प्रपेरा )
गर्य-शेन लिया, गोद से पीन लिया , होने के लोमछ
मर लालो को यूज पर ४ मोस को तप सन्ने सगे! जिन पर
विश्व-मर का मांगा सुराने का में प्रस्तुत पा, उनी गुल्मी
लालों को रापमों ने-पूणों ने गुटरो ने लूट लिया ! किसने
मारों को मुना-मगान् ने नी, उस प्दिर ने नहा मुना ।
देसते मी न देय। मात प कमी एक पुनर पर, दौरव १
पभी भाषी भार पर, अपवार ने 4 कमी पापों दी इरशा
मदुमी रोकर । अब नहीं । देश होघनन रिता रन से है।
प्रभावी हुई नारा की पर माला दिग्मार कर ही है। अपने
पाल्पनियो को वर्ष की मोयै पादर में हिग रिमालय मौन
है, रिपल पर क्यों नहीं समुद्र में मिली प्ररे ग, मूक,
पभिर, प्रतिफल
(उमप मार से प्रस्माम)
सम्बनौन है? या रामनाग है क्या? या प्रवद मी
हपों मे पारान्त ! पर भारत दुरेर निम्ती ।
चन्नरो मा मषिप्य शिम पा है। भगवान् । पर अमित
शप। मार्मशानाय की दस्पा का देना मपाना स १
लिना पौमाम 1 मिनी विदाम्पनी में भृग्याल-द सड़ा
गेप नोर 1
(पगतीरामा सपोरा , रहन्द मोदेसर )
गमा--मुरपरेन मी पि टम्प, मेरी सुनी हो । वर
सीम गी ! रेस टो-हाय बढ़ाती है)
सम-कौन एमा ।
१२८

रामा-
(भारपर्य से ) में पाहा, रितको संतान को
हयो मे पीस गा !(यर कर ) मेरी मेरी संवान । इन प्रमागो
की-सी दे दी। वे वो ठखबार की पारीक भार पर पैर फैला कर
सोना बानती थी ! पपाती हुई ग्याला में सिले हुए पानी
थी । तुम ( दसती हई ) लुरे मी नहीं, पापर भी नहीं,
प्रकर्मपय मावों में भुलानेवाले तुम कौन हो ! देखा था एक दिन !
बही तो है जिसने अपनी प्रवर हुकार से दस्युमो को पा दिया
पा, पर मार कर सोई ई अकर्मस्व बनता को बगा दिया था,
निस नाम से रोएँ पो होगाते थे, भुबाएं पाम्ने जगती थी।
वही स्कन्द-मसियों का रथा, बालकों प्र विश्वास, दरों का
चाभय और प्राप्त की शाम । नहीं, प्रम दुमा ! तुम निष्पम,
निस्तेर, उसी क महिन चित्र तुम कौन हो।
( मरमाम)
स्कन्द-पैटार )पाद! मैं बहरी फन्द -अमेजा, निस्सहाय !
(कमला कुटी साप्तकर पाहर निकलती है)
कमला-कौन पछ है म पो हो । समम समार कुमार
आप है। स्वानुभूति को मात करो। यदि मविष्यत् मरते हो
कि माप पतन हो समीप है, तो तुम उस अनिपाप गौतम
का मानो। नमार प्रपा और विश्वासपूर्ण पापात से पिप्प
६ स्नान कोई ऐल उठ पढ़ा होगा, गे उस वित-सोत को लोय
देगा ! पम और एक समान क्या तुम भी अपवार नहीं हो
सपते । समझ लो, या अपमे पो पो पर का धर्म समझ कर
करता है, वही वर अपवार है। उठो सन्द ! मामुरी इपिका
का नारा करो, सोन बालो को जगानो, और ऐनेपाली को
राम्रो । प्राप्यात तुमार साप होगा और उस माम्प-पसारा
पनीय समम शिष होग्य । बीर।

मद० कौन एम' ममानी रन्नी।
(नत्यम प्रदन-माघगद )
१०-कौन । देशमन्त्र पा- TV ! नरा गागर
(दयसना घपीवाले )
यसेना-भीम ! मानुन प्रयागरी सरनामा, ग्य'
एण-कौन मुझे पता है'(पना पाहता, दर्सना
दी निश्चल का मालास्मा किसा पाहती है। पदच मामा एक
भोर समाहर हर महणध गदन, इस हाय म यमुना
घरी पाता है।)
हम-घमा हो।
पणच-पासचारी। बातुम 17
ला। बार्ग,
हम लोग परे मन को ममापि पर।
कमला-मो, नहीं-कनिक र क फन !
यमना-दोन मवादी'
फमला-मदी प्रमागिनी।
दयसेना-प्रथा, बानी ,लिमिर्ग।
(पपदचक साम दपमना का प्रस्थान )
(गन प्राय)
म्काद--कोई नगनिया । म र मारपी'मा
एदप माकुन से बगी। मम मित्र पुनर्मदा परमार
कमलानर मुरारित , पर। पनिर पर
पास पानी माता की ममापिही पर पाई।
कर-मासी ग्ननी । मीन!!
(मपितरोता है, कमा उममें उटा मा!)
[ पाइप

पचम अंक
.
[पम में मुद्गल ]
मुद्गह-पमा से फ और अपर से नीचे , मी दुसर
पाना, मी स्नेह-संगशित मानन , श्री बीक्षा की मनपर, भी
दीनवा विरसार ।(सिर पर हाम रस पर पेठ पाता है)
भाग्पालेरी बलिहारी! अपमाला सुन र किन्नुपर्मा
वीर गति को प्राप्त हुए, सती हो गई, और रेवसेना
को लेकर हा पदच देवकृतिक प्र-मा मादेवी की समापि पर
मोपन म्यतीत कर पा । पाणित, और भीमबर्मा और मात
गुर पगरियर को सोम | विदिष्ट! ना tis
रियया मन फिरा ,गा भी धनी लोगों के साप मिती
है, पानु उस पर विचार करने को मन नहीं करता । अनन्तरेकी
ने पुष्पप्य के साप सपि कर जी, मगर में मारेगी और
परम माल बनने का भमिनम से पा १ मा की उपाधि
प्रमादिप , परन्तु प्राय के स्थान पर पिप भारिस
में गमी नही । विहान सिंह सोने के समस्त मारत
पो के परयों में जोर पाहै, और भय मूल की बुद्धि के
समान अग्ने पो पर पश्चाताप का पा( सामने दसर)
पर निगमाया होदर बल।
( उपसर जाना पाहताह)
पिशया प्रा मुर्गा जैसे प्रमानवा हमरो।
समय पालम रखागों की मौत मौ बदल गती।
मुद्गम-प धेन से की ! मान-मरमान पाया
12

पंचम अंक . चप्पी नहीं लगती और तिस पर मैं हूँ योसिपी । यहाँ देयो बहाया प्रश्न होता है, मुझ उन बातों के मुनने में मी संकोच होता है-मुझसे ठे हुए किसी दूतरे पर उनका स्तरीमा सुन्दरी कर मिलेगी। मिलेगी या नहीं इस देश का देव और रसौली छोकरियों मे यही प्रान गुरुजी से पाठ में पता है । अभिसार के लिए, म पूर्व पावे। पिनया-म मुद्गवा ! मुझ पहचान लेने का भी तुरे प्रकार नहीं है। मुद्गर- :-प्रकाश से या नहीं, मुझ माया नहीं। पिसया-क्या धावप्याता न होने से मनुष्य, मनुष्य से यात न परे ? सब है, पारस्यावा ही संसार कम्यवहारों की दलाल है। परन्तु मनुप्पता मौकोई पस्नु है मुद्गल ! मुद्गल-उसका नाम न छो । मिट एय में प्रवर गदतीम नृपा से मो पूर्ण है, गो तपता और पुरतामोन मार, गो प्रस्ने सुरा-अपनी दृप्ति के लिए संसार में सब कुछ करने को प्रस्तुत ६, ठसे मनुप्यता सस्य सम्बपर? विजया-न हो, परन्तु इतना ही बता सकोगे, सपाट मन्दगुप्त स पो भेंट होगी। स्योंकि या पता पक्षालय बोषित है। मुद्गल-क्या नुम माग से मेरफोगी, रिस में स १ प्रबन्ती में एक दिन पद पात सरगनते रिणिपा मारेगाोगी। यिमपा-उसी एक दिन के बदले मुद्गल प्राय मैं पिर कुछ पाना नाती है। यही पकदिन म प्रतीत ग्राम का भविष्य दिसाय था मुद्गर-नमारा साहस तो कम नहीं है। पिनया-मुद्गम ! यता दोगे।

पचम अंक
-
[पम में मुद्गल ]
मुद्गल-मा से 16 और उपर से नीचे , कमी दरार
पाना, मी स्नेह-संगलिव मानब, घी बोया की भनकार, श्री
पानवा न विरसार । ( सिर पर हम रख र ठ पाता है)
मापमा ! मेरी मशिहारी। समाहा मसुन कर किमपर्मा
पीर पति
प्राप्त हुए, की हो गई, और रेपसेन्य
को लेकर हा पदप देवकुक्षिक प्र-सा महारेशीकी समाधि पर
मोगन पचीत कर पा है। पावित, और भीमबर्मा और मात
गुप्त एपिपर दो सोग र विक्षिप्त ! सुना है
पिसाच मन च पिर मौहमी लोग्ने माप मिली
९, परन्तु रख पर निवास करम को मन नही रखा । अनन्तरेकी
मे पएप्त साप सधि र जी, मपक्ष में महारेगी और
पाम महारत बनने का अभिनय से पा | हमार की उपासि
है यादिस्य , परन्तु पण स्पान पर पिपरामाविल
में गमी नही मिन सि सोने का समस्त भारत
परमों में कोर पाऔर मयाई मूलको मिरे
उभान प्रग्ने कर्मो पापाचात्यप कर पर है । ( साप देखकर )
पर लिया था दीपोटपर्ने।
( उठकर नाना पाहताह)
यिमया भर मग ! जैसे पापावता न हो। हम है,
ममपरखने पर सोने की प्रमि भी बदल गठी।
मुद्गम-गुम कौन हो नी । मान-पदमान र पापा

पंचम अंक
अशी नहीं लगती और विस पर मैं म्पोतिषी। यहां देखो ही यह
सन वा १, मुझे उन भावों के मुनने में मी संकोच होता है-मुमासे
म्ठे हुए । किसी दूसरे पर उनम्न स्लेमा मन्दराम मिलेगी।
मिनमी या नहीं 1-स देश के पाले वेव और रसीली क्षेकरियों
ने यही प्रश्न गुग्गी से पाठ में पड़ा है। अभिसार के लिए, मुर्च पूणे
गाते!
विजया-क्या मुद्गल ! मुझ पचान लेने का मी तुमे अपना
नी।
मुद्गर-प्रकार हो या नहीं, मुझे भावश्यकता नहीं।
विजया |--कपा मापस्यकता न होने से मनुष्य, मनुष्य से पात न
परें । सब, पावापावादी संसार कम्पबहारों की दलाल है। परन्तु
मनुस्मता मी कोई वस्तु मुद्गल !
मुद्गस-उसका नाम न हो । गित एस में प्रसर देगी
राप्मा से जो सूर्य है, गो स्वमता भोर रवानों का मांडार , मो
अग्ने पुरा--अपनी सृप्ति के लिए संसार में सब करने की प्रस्तुत
६, उसे मनुप्पया से क्या समप है।
मिनया-न वही, परन्तु इसना तो बता सकोगे, सबाट
सन्दगुप्त से भेंट होगी। क्योकि यह पता चला है कि
जीपित है।
मुद्गस क्या तुम महाराज से मैंट करोगी, पिस मद प्रबन्दी
में सदिन र पात सब मानते थे कि विजया महादेशी होगी।
यिमयाउसो एक दिन के बदले मुद्गल भाग में फिर इफ
पाना पारखी है। वही एक दिन का प्रतीत धाम कामपिम्प
वियप।
मुद्गर - नुमाय साहस को कम नहीं है।
पिश्या-मुगल रवा दोगे।

मुद्गत-तुम विलास योग्य नहीं। अब पर और तुम सा
कर जोगी। रेवसेना के साप यहाँ पाच एवे, पान समादेगी
इटौर से सम्राट पी अपना मनना की समाधि परवाने वाले, उसी
निमम्प के पास मम्मा, मैं बाटा है। देखो पिया। मैंने पता
दिया, पर सारान]
-
.
विजया-उसने मेरमा। मुझ सर्व अपने पर पिसाव नहो।
स्था में ठोकर खगठे हो मैं परमा की ओर दौर , पान क्या
पर सवा परिषवन ! सा में अपने को मूल पर देश सेवा कर
गी। म सोना
श्रोह फिर मेरे सामने प्रहरी समस्या
छान वो सन्दगुप्त मार नमी, प्रसिरिसे, सोगा। क्या मा।
नही, रेवसेना ने एक बार मूस्प देकर सरोवरा मा , पन्त विनय
मी एक मार नही करेगी। एएसंगा तो होगी ही, मरि में
अग्नी मी कामना पूरी कर दी 1 मेय एरण मी गरा
है, उसे सेना संकलन करने के लिए धमार को गौ, और रस
पार पनगी मादेवी । क्या मी रोग्न! अपम रोग्य | पाप में
पचीहिर उस एपित रमण को पाया है। उससे एकबामास
ते तस्वी! तो भार ही परगी, और इसमें रोनोमे--
पार्षौर परमार्थ
(प्रस्मान)
(मटाई )
मटाक-अपने कार्मों का न पखने में पारा, परन्तुति
पाम में मपुर रोता है। ऐसा पाप ऐसा उपपुस और ऐट
परोपकारी सार् । पान्नु गम-मीद भूख हर गया !
चार मी गप्प बम मा सात , गो रसमाप में
पर-मया, अपमान ! म पालमुरगी पट्रनीति को

पंचम प्रक
कर इस खेतो, प्राण देकर मी उतकी रक्षा करना। सपन
दम उसे पाने कर सरेघौरन हो उससे अलग हो सके। मेरी उच्च
पाटा, पीरता का दम्म, पासंर की सीमा सफ पहुंच गया ।
अनन्तरेपी-एक चुद नारी-उसो का में भागा के प्रलोमन
में, मैंने सर विगाह दिया । मुना है कि कहीं पही सदगुप्त मी,
पल उस महत् का दर्शन तो कर है।

[निष्फ सप के पास महादेवी श्री समापि]
(ममा सदा टहलते हुए)
पर्मवच-सूती रोटियाँ रचा कर रखना पड़ता है। दिने कुरी
को देते हुए संकोच होता पा, उनी कुत्सित प्रमो समय!
पवर निपि के समान उन पर प्रम देता है। मैं रोऊँगा नहीं,
पान सारदा मा केवल बीवन का पोम पान करने के लिए!
नमी, पपरोना मठ । एक मी प्रास् प्रोमो में न दिखाई पर।
दम गावे पो, हमारा देश सफल होगा | मगवान् बदि होंगे, तो
करेंगे मेरोपि में एक सपा सरपा। सेतोप कर उपयवे
हुए दया आलोप करत रोटियों के लिए नहीं बीता है, उसकी
मुच दिसाता है, जिसने नै उत्पाद है। परन्तु जिस काम
को कमी नहीं किया, उसे करते नहीं बनता, स्वांग मावे ना
देशबहुव-से दुर्दशा-मस्त पौषों को समाहिए
काना पोगा। में पत्रिप , मेरा य पाप दो मापदर्भ होगा , सादी
पना भगवान् ।
(एक नागरिक प्रपरा)
पवारापद दो।
भागरिक-चौर र मुम्हारी हो गई पर
करता)
प..मेरी बेटी स्नान करने गई। मारपरे से।
मागरिक-मुम उसका गान गा पाय लगता है, या
पर गाती, वो तुमे इष प्रारय मिस यावा । अध, फिर पाऊंगा।
(गाता)
पम-ति प्रेमरनार, दुरामा, विसाठ का नार
पायो। पाठो को मगर का अन्य को पाना, प्रय
मी पा में बना हुमा निविदा ! इलाओं का अपमान
बनठा,
.
। सम्म

चमक
-
प्रमने पल हुए भी प्रकार पण राी, अब तक विजास और
नीर बासना नहीं गई ! प्रिम परा के नपमुबक एस , उसे प्राप
मरों क पिकार में गाना चाहिए । परा पर पा विपरि, फिर मी या
निराकी पना
यमेना-(प्रवेश कर ) क्या है पारा । यो ति सरो
याने दो, मिठने नहीं दिया -उसने प्रस्ना
कुछ मारा तो
नहील गया।
पण-अपना ! देवमना ! मन पर सम्पी मूतों का और
पन पर म्पत्य है देशमामिचो का । प्रकृति न टरें हमारे लिए-हम
भूतों क लिए-रस हो । कर पाती है, उसे कोयन में पनी
कुरिलता ! रिलास लिए उन पास पुष्पल पन है, और दरिदो
लिए नहीं' ग्रन्पाप पा समर्थन करते हुए गुम्रे मूल न गना
पारिक
दयमना-पागा ! घमा रोमाने दो, कोरवोदेगा।
पप०-हमारे ऊपर सैकड़ों मनाप मी क बालकों का मार है।
मेटरी! पुर में माना ना , पाम् भाग म तार हुए उरे देश
परातो मे रह गिर पाया।
यमना-पापा ! महादगी की उमाधि सच पता
या पी। कई दिन से मीम नहीं पाया, मानगुप्त मी नाही ,
भरमहा।
पण०-माग मटी ! नुम रेगे, मैं प्रमी प्राता है।
(प्रम्पान)
दपमना---गौर समा को अन्तिम पर पीर मामन्तीन
तान, पूरान की एक पीग गम्भ ग्या, पान हुए फूलों का म्लान
सौरम, और उहप के पाछ का अपसा', इन टोली प्रतिकति मरा
तुद नारी-पौरन ! मर पिप गान! या सो गाऊँ चोर सपा मुनाऊँ ?

सदगुप्त
इस बार पार के गाये हुए गीतों में साभार्पण है क्या पक्षमो
गीपता है। वन सुनने की ही नहीं, प्रत्युत मिसके साथ अनन्त काल
तक उमिता रहनदीय प्रगती।
(गाती है)
शप गगन में सोचता से पन्द्र निरारा,
राध में रमणीय यह किसका मपुर प्रचारा।
इदम ! तसोमता किसको चिपा है कौन-सा तुममें,
मालता है बता क्या किया तुमसे म फष मुम में ।
रस-निधि में भीषम राहा, मिटी म फिर मी प्यास,
मुंह सोले मुरमयो सीपी स्वाती भास ।
हदप ! तू है पना पलनिपि, लारियों सेखती तुममें
मिला अप कौन-सा नारत्न को पहले म मा तुममें !
( प्रस्थान)
(पेश पदले हुए स्कन्दगुप्त का प्रदेश)
म्कंद०-जननी! तुमारी पवित्र स्मृति को प्रणाम |
(समापि के समीप पुटने टेक कर फूल पाता है)
मा। अन्तिम बार माशीपाद नहीं मिला, इसीसे पर कप,प
अपमान । माँ तुमारी गोद में पालकर मी तुम्हारी सेवा न कर सा-
यह अपरार घमा रो।
(सेना का प्रपेय)
देयतेमा-(पहचानती हुई) कौन १ भरे ! समार की मग हो।
क्यगुप्त-रेवसेना।
देवसेना-रामापिरान ! पन्य माम्य, प्रार दर्शन हुए।
म्कंदगुस-रेषसेना! बी-पानमनाएँ दी।
देवसेना-मार
बंदगुप्त-क्या नुमने का कोई कुटी बना ली।

पंचम अंक
देवसेना-दा, यही गाकर मौत मांगती और ग्राम्मे पर्वदच के
स्य पती हुई महादेवी की समाधि परिष्कृत करती है।
म्कन्द-मालमेरा-कुमारी देवसेना ! तुम और पा फर्म ।
समय गो पारे करा ! कमी हमने भी तुम अपने काम का
रेसमेना ! यह तब मेरा प्रापरिपत है। प्राय मैं पुषर्मा की
मात्मा को क्या उत्तर इंग्प ? जिसने निमार्य भाव से सब कुछ मेरे
परणों में प्रति कर दिया था, उसमे कैसे उस रोऊँगा ! मैं पा सर
रखता है, और जीव है।
वयसना- मैं अपने लिए ही नहीं मांगती रे ! मार्य पण
दस ने माग्य के बिखरे हुए सब एन एका किये, ये सर
निरबलम है। किसी के पास ही हुई तबार हो पपी है, सो
सिी और्ण पस्त्र-सा। उन सब की सेमा इसी मामम में
वीरें।
म्फम्ब०-पर फ्यदत, मत पगदच ! तुम्हारी या पया!
जिसके लोरे भाग परसती पी, या जंगल की लकडियों बयेर
पर प्राग मुलगता है! देपसेना! घर वा कोई काम नहीं ,
पलो महादगी की समाधि प सामने प्रतिभुत हो, हम दम
अप अनग न ऐग। सामाग्प तो नहीं है, मैं परा। यह
अपना मनस्य नुई मर्पित परक उभण रोग, और एकात
पामगा।
दपमना-मो न होगा समार ! ने गती है। माता न जो
देश सिर उत्सग दिया है, उसमा प्रतिदान लगा मत ग्राम्मा
पा परमान न कापी। हमार! देसा, यही पर सी बपमाष्टा
की मोहोरी-नी ममाभि १, उसफ गौरप की मी रपा रोनी चाहिए।

सनगुप्त
दय में
स्कन्द०-देवसेना वर्मा की मी दोपही हप्प पी।
प्यसेना-परन्तु घमा हो समाद् ! उस समय माप पियमा का
सप्न दस्ते पे , अब प्रतिदान शेकर मैं उस महत्व सन्ति न
ऊँगी। मैं प्रागीवन दासी बनी रहूँगी , परन्तु भापके प्राप्य में माग
नलगी।
स्कन्द०-देवसेना ! एकांत में, किसी कानन के कोने में, में
देसता दुमा, बीवन मतीत करगा। समाग की इच्छा नहीं-
एकबारकादो।
देवसेना-तम वो भौर भी नहीं ! मालाब का माप तोगी,
परन्तु उसका उऐरा मी सम्म होना चाहिए। पाप को पामयप
पनाने लिए ऐसेना जीवित न रोगी ! सम्रा , पमा से। इस
मार! काना दीपा, कन्दगुप्त को कोमर न तो
पोई दूसरा पापा और न बा बापगा। अमिमानी भठ के समान
निफाम होकर मुम उसी की उपासना करने दोषि उमे कामना
फ भैवर में सा कर पित न कौथिए । नाप ! मैं मापकी
। मैंने अपने को दादिया, पर उसके बरा धनिया नहीं
पाहती।
(पैरों पर गिरती)
मान्द०-(भांस पोंक्षा हुमा ) उठो देवसेना ! मुमारी विजय
दुई। पात्र से में प्रतिभा करता है कि कुमार भीवन हम्पीय
कारण । मेरी जननी की समापि इसमें साधा है।
देयमना-३, ६, यया मिया'
म्झम्म्०-स्पाया भीगणश! बरि सम्रामा उदारपर
नका, पो उसे पुरगुप्त फ लिए निराछोर मा सगा।
देपमेना--(निरास सार ) देवत्रत ! तुम्हारोपय हो । माई
माम्प पपरसा लिगा सा।(प्रस्थान )

पबमक
(विमया छ प्रदेश)
पिडया--इसना रक्तपात चोर ठनी ममता, इराना मोह--
गैसे सरस्सी र गोणित बल में इसपर का विनस । इसी
वारण र मी मैं मरती नेर मन्द ! मरे मायापार!
मन्द-(घूमच )पर कौन इन्द्रगल मंत्र १ अरे सिया !
यिनया-, में।
..
पिजया-मारे लिए मरे अन्तस्तान की धारा बीपित है!
कम्प-नही विजया ! उस पेल का खेलने की पचनी,
यदि दूसरी बात हो तो पहो। उन बातो को एन रो।
यिनया-नारी, मुम पाने दो। ( सिसकती ) में अब
मी
स्कम्ब०-पुर पो विमया ! ८ मेरी पारापना की-तरम्या
की भूमि ,इसे प्रदना से गुपित न करो। तुम में यदि सग
मी मिले, तो मैं उमम दूर ही रहना चाहता है।
पिया-मेर पाट प्रमी दो रन दिपे हैं, जिनम मना
एका बरफ मुम सही उन हगों को परास्त कर मक्ते हो।
मान्द-परन्नु, सम्राग्य लिए म भन्ने को नही देर
मुक्ता। पिजया पली साम्रो , इस निलम्स प्रलोमन को मार
पाय नहीं 1 यर मर्मग यही ठा
विजया--न दरवामियों का समर परनाकम्प पिपा
है, और भय का मर्ग का दिन है। मुमारी सपा ८ उर
युफ्त पनने का उपाग कर रही हैं। मैं माडर और नामो
मुमार दिर स्पवध रामा, अपलोमा ए-दस्यौ म उए
दुमा उना नेप काम है। परल नुम सीमार लो।
फन्द०-पिया 1 मने मुझ इटना होमी समन लिया
.

पशु भी एकादशी व्रत करेगा-कमी पिशाची अन्ति-पाठ पडेगी। पिजया-( सिर नीचा सरक) अपराध हुमा । मटाक-फिर मी पिसक साप ! जिसके ऊपर अस्पाचार पारे में मी लमित घिससे धमा-याचना करने में पा रहा था। नीच स्त्री। पिनया-पोर अपमान, तो पस (पुरी निकाल कर भारमलत्या करती है) स्कन-मटाई। इसके शव प्रसस्पर रो। भटा-देर ! मेरी मी वीणा समाप्त है। (री निकालकर अपने का मारना चाहता है, स्कन्दा पका लेता) कन्य-मुम पार हो, इस समय देश का पोरों की प्रारस्यस्य । म्हारा या परिषत नहीं । रममि में प्राण देकर जननी नाम भूमि का उपकार करो । मटाई । यदि कोई साभी न मिला, तो साम्राम्य लिए नहीं-जम्मममि के उसार लिए में अकेशा पुस करपा और नुमाप दिया पूरी होगी, पुरगुप्त को बिादन रेकर में पानमस्य- प्रामम महण करुंगा। भारम-रत्यक थिए मो अस्त्र तुममे पण किया ६. उस एक लिए मुरमित रहो। मटाक-सिन के सामने पुटने टेलर पिकमादिस्य की मन दो मो माझा रोगी, पही करूंगा। स्कन्द-पले इस घर मप्रकाध रोना पाहिए । (परयाम) मराक-(सगत) इस इणित एप प्रमि-संसार करना ठीक नहीं, लामो इसे यही गा! (भि खोदते समय एक मपामा राष्ट्र के साप रल या प्रष्ट रामा भोर मटाई प्रसव होजर पुधरना । ससम्माप्त कर भार ररन-गृह दतमा) -

पंचम अंग
म्कन्द-मय! या गुम्हारा है।
मटाई- समार! या मारा, इसीलिए देशभरे। ग्राम
से में सेना-सस्थन में लगाया।
म्कन्द पर पर पड़ी मी पहारमारे पास ।
मटा नागरिकों का उन्नत है। (रत्नए पद परके)
पहिए, देता

सन्दगुप्त
(स्तुप एक माग-नागरिकका भाना।उही में पेरा पदले
र मारगुप्त, मीमपर्मा कपालित, सर्वनाग, कमला, रामा इत्यादि।
दूसरी भोर से पर पसंदच का हार पर हर दरसेनाच प्रदेश)
१-नागरिक-भरे पा होकरी मा गई, इससे इष मना
२-मागरिकता रे छोकरी ! ग्य तो।
पर्ण-मौत दो पाया | देशपम्प भूते हैं, नंगे है, प्रवास
बदोमावा!
-भरे गाने मी हे।
पर्व-बाप रे प्रमागे रे!
(देवसेना गाती)
देश की दुरया निहारोगे,
धे कमी उबारोगे।
हारतेहीमहे, मरेषा,
दौर पर भाप महारोगे।
काकरोगे कि बस सदा रोन
दीन दो देर को पुकमरोगे।
सो रहेसम म माग्म सोता
भाप बिगड़ी कमी पारोग।
दीन जीवन बिता रहे अब तक
साहुर गा रहे, विचारोगे।
पण-बेटी, निन मी विचार नही करेंगे।
पापासित और भीमपमा-माम्मे पर्यटकीय
पम---मुझे अपनी पापिए-मौत पानिए । बोरे साधो
प्राने मारा, गो गन्मभूमि के लिए उत्सर्ग र माता भेगन, मेसे
पीर पारिए, कोरेगा मौष में!

मपन्द०-(मी से निकम्मर) में प्रमुख सात !
मटाक-श्री सम्गुन रिमादित्य की गयो।
( नागरिकों में से बह-म युगक निधन पाले)
सप-हम, हम भारी मारदिर प्रस।
स्कन्द-मार्य पर्गद!
पम०-मानोपस ! सबाट । (भाभिगन एता है)
[उत्साह से बनता पूजा के फूल बरसाती है। पाक्षित,माननर्मा,
पाहगुप्त, रानाग, कमला, रामा, समय प्रष्ट होना-चपनाद]

सदगुप्त
[महामोभि-पिहार ]
(अनन्त देवी, परगुप्त, प्रत्मातकोत, हसनापति)
अनन्त-सत्र उत्तर महाभमय देगे।
इप-सनापति-मुके उपर पारिए, पारे करे।
प्रख्याव-सेनापति ! मुझसे सुनो, समस्त उपपमप्र
पोर सेप गो तुम्हारे उतोर के प्रशोमन में भूल-गमा या, या
अपन होगा।
इस सेना-मी बौर स्नता से बो सहायता हरा-मेनिक को
मिपतीपी, सन्दरोगा, और सारा तिरस्मर!
मम्मात प्रम था। बोरो ने सिवात पाकर खोय
समा ठाधान करने में बनाया गे, परन्तु ऐसे दिसक लोगों को
समर्म को मामय नी देगा । ( Hश भोर सहर)
पपपि सप एसे अधर्मएप पुरक को भार्यसम्राम्म मिासन र
नही देता पाता, को भी पौर धर्मापार करने, पानीति में
मागन मे।
-मितुपा हो! समझ कर पाना ।
ह-सनापदि से समाचार मिळा ६ गुप्त तिर
गौ उटा है, और म्भुि इस पर उसके घर में
सामअन्तिम दुर रोग्य AREलिए संप को प्रतिम भय न
बानी पाहिए।
पुरात म लोगों को कोई पूरी भाव नही
अनन्त-पुरो।
पुरगुप्त र पार (सेपाता)
मख्यात.-अग्रमे । विहार में मपान ! निलो रहा है।
भनव---मिड इमझकर बोलो, नहीं हो मुस्ति मस्तक भूमि
पर लोरमै लगेगा।
IYE

बम प्रेक
इप-सेना०-सा की सब प्रपमना है। इसका तो मैं प्रायही
पपकरण।
मक्याव-पशिक और मनास्ममार में किसन कोन पप
परेगा मू!
पूण-सेना-पाना! मरने के लिए प्रस्तुत थे।
प्रप्यातल-खित के युबराम की प्रेरणा से हम लोग इस पप
पर प्रमतर हुए,से नही कर सकते हैं।
(पए मेनापति मारना चाहता है)
पुमार पासुसेम-(सहसा पेश करक) 'सम्राट् सन्दगुप्त
(सेनिक सव को पन्दी कर लते हैं)
पातु-पकिरो ! अपने पल मोगने के लिए प्रस्तुत हो गयो।
भारत के भीतर की पपी हुई समस्त हस-सेना के रपिर से या उसकी
जमाता शान्त होगी।
-पानुसेन ! पा स्या, तुम हो।
धातु- मारेगा। एक दिन मैंने समझापा पा मेरी
पोवा की गई। पर उसी का परिणाम है । ( सैनिकों से ) सपको
गौम जमाग्य मापावार में ले पको।
[समका प्रमान

सरगुप्त
[रखपत्र]
(सम्राट् सदगत, मटार्स, पाक्षित, पदप,मामृगुस,
मीमार्या इस्मादि सेना के साप परिप्रपा करते है।)
पौरो!
हिमालय के भागन में उसे प्रथम भिषों का दे उपहार।
उपा मेस ममिनन्दन किया और पहमामा रिकार।
पगे हम, लगे गाने पर लोक में फैसला पिन पालोक।
माम-तम-भातरमप्ट, मसित संसृति हाउरी अशोक।
बिमस पानी में पीया ली कमल-मज कर में सीत।
समस्पर सप्तसिंधु में उठे वि स मपुर साम-संगी।
पर पीय रूप से सप्टि, नार पर मेल प्रलय परास्त ।
अतए भाम लेकर निराहार वरूप पर ममममीत।
सुना है पीषिकामा साग rमारा जातीयता विस।
सिम्मा पिस्तृत और भगाह एक निर्गमित का उत्सा।
६ रही अभी रिसाद भाव मग्न रलायर में पर राह।
धर्म कसले लेखमा माम मा रती पलि, पर दीद।
हमो ने दिया शान्ति-सारा, सुत्ती होते दम भामम्द ।
विजय मेलि हर को नहीं, धर्म भरही परा पर पुस ।
मिट हाल राते सपाट या दिसलाते पर-पर धूम ।
स्परदिया दमा का दान
पति पाटि।
मिला या सर्व-मधे रम शालसिंहल प्रेमी सृष्टि ।
दिसा हमने मीना मही, पति परा पालमा यह।
स्मारी उम्मभूमि पी पी, कही से हम भायेरे मारी।
पातिमोघ उरपान-पतन, मॉपिया मही, पर समीर ।
सड़े दता मेला सते, पसप में से हुए हम ।
,

पयन
-
परित के पूत, मुमा में रालि, नम्रता रही सदा सम्पए ।
हृदय के गोरप में या गर्ष, किमी को दर न सके विपत्र ।
हमारे सत्र में या दान, भतिमि य पदा हमारे देष ।
पपन में सत्य, में तेय, प्रतिज्ञा में रहती मी टप ।
पही है रत, यही है देश की साहस है मेसर मान !
पही है शान्ति, ही है कि पाही हम दिम्य भार्य संतान ।
पिये तो सदा उसी के लिए यही अभिमान रहे, परस्य।
निछापर फर दे हम सपत, हमारा प्यारा मारतवर्ष ।
सर-(खममेत स्तर से ) अप! पगारियमसनगुप्त की।
(हस-सेना के साथ सिगिल प्रभागमम )
चिगिर गया था भाग्य मे, फिर सिंह के मुत में माना
भारता है। पिय पए के मारों से हमें अम्नी मूल स्मरण
हो जायगी।
स्कन्द-पर बात करने का स्वाद नहीं है।
(भोर युद, रिगिल पापस होल पम्दी होता है। सम्राट् को
चामे में पर्पदच की मृत्यु , गनप्प की पाया में पर लिटाया
पाता है।)
-~पम्प पीर धार्य पथरत।
मप-माप्प पश्चीय ग्रा! अमापकीय!!
(पन्दी-पेश में पुरगत और भनन्तली फ साप पातुर्मन नाप्रपेश)
कमल-परो ठोठेली माता ! इस दिश्य मे धाप मुवी होंगी।
अनन्त-यो लगि पाते हो रद मुस मी वो मरे
पुष हो।
स्पन्न--पार । यही पदि रोता मी दिमाता । वो देश की
इतनी दुर्दशा न होगी।
मनम्त--मुझ पया समार!

सगुप्त
[ रखक्षेत्र
(समा सामएस, मटाई, पाालित, पदप, मातगुप्त,
मीमवर्मा इत्यादि सेना के साप परिश्रमण करते है।)
औरो!
हिमालय के भागम में उसे प्रथम भिणों पदे उपहार ।
उपा ने स भमिनन्दम किंवा भौर पहनामा सरकार
पगे हम, लगे पणाने सि लोक में पता निभालोक।
नामनाम-परामा सम मष्ट, भासत संमति हो उठी मोक।
बिमल बाली ने बौथा सी कमल-प्रेमवर में समीत।
अवसर सप्तसिषु में उठे पिडा त मपुर साम-संगीत ।
बाकर पीर रूप से सष्टि, मात्र पर मेल प्रलय प्रशास।
अरुणाम सार नियाम परण पब में मदमी।
सुना है पीपिकापावाग मारा जातीवता विधस ।
सिमा विस्तृत और प्रसार एक निर्वासित र उत्साद।
दे रही मी दिसाइ भग्न मग्न रत्नाकर
पर्म घले र मा नाम हुमा करती बलि, दी।
हमी ने दिया शामित-सारा, सुती होते दर मानन्द ।
पिपर देरल मारेको नहीं, पर्म को ही परा पर पूम।
भिए हाहर रहते सम्राट् दया दिसतात पर-पर चूम ।
पपम दिपा दमदाननीय को मिली धर्माप्टि।
मिला पास भूमि धरम राम सिंहल प्रेमी सृष्टि।
दिमी का हमने पीना नही, प्रतिरक्षा पालमा यहीं।
हमारी पम्मभूमि भी यही, कही से हम प्राय रे नही।
गामापो स्थान-पतन, मोपियों मार, र समीर ।
राहे दता मेमा इससे, पलम में पसे हुए हम और।

पाम अंक
परित के पूत, मुगा में शक्ति, नम्रता रही सदा सम्पप ।
उदय के गोरप में या गर्ष, किसी को देख न सके विपण।
हमारे समय में मा दान, भतिमि ये सदा हमारे देष ।
पान में सस्प, हदय में तेय, प्रतिमा में रहती थी टेप।
पही है रस, वही है देश नहीं साहस है, पैसा मान ।
मही है शान्ति, यही है कि वही हम दिष्य मार्ग संतान ।
गि तो सदा उसी के लिए यही अमिमान रहे, पाइप ।
निधार कर दें हम समस, हमारा प्यारा मारतर्प।
सर-(समवेत स्वर से) जय ! समापियरसन्दगुप्तकाबद।।
(हण-सेना के साय सिंगिम भागमन)
बिगिल पर गया था भाम्प से, फिर सिरे मुख में भाना
पाहता है। मीपण परशु के महारों से तुमें मरनी मश स्मरण
हो मारगी।
स्कन्द-पद पात करने प्रस्प नहीं है।
( पोर युर, विगिस्त पायल होकर पन्दी होता है। सम्राट को
पाने में हर पएच की मृत्यु , गरदपर की काया मे पर सिटाया
पाताहै।)
स्कन्न-पम्प और प्रार्य पपरत!
सय-माप्प पापदच की रय ! प्राप्य बामाम्मकीय !!
(बन्दी-मेरा में पुरगुप्त मौर मनम्ती साप पानुमेन का पोरा)
म्फन्द–मेरी सौदेमी माता ! wिय में प्राप मुली रोमा।
अनम्त--पो लमित पर से समन न मी वो मेरे
पुष हो!
स्कन्द •-पार यही पदि वा मरी मिनाता ! वो देश की
श्वनी एर्दशा न रोती।
प्रनम्त--मुमपमा को सप्रार!

-
स्क-माता प्रदय प्रदेष पम्प है। तुम मिलोमन से
सम्म में प्रधि हुई हो, वही तो किसी ने किस मा । माय
इसमें दोप महीया तुमने मार मुझे पुत्र का, वो मैं भी तुम मावा
ही समझगा । परन्तु मारगुप्त व अमिटेन को तुमने अपने कुत्सित
कमों की पस से दिया । पुरगुप्त !
पुरगुप्त-देव अपगम हुआ। ( पैर पकाता)
स्कन्द-भय ! मैंने तुम्हारी प्रविम पूर्ण की। लो, धाम इस
स्व-भूमि में पुरगुप्त को रपर पनाव है। देखना, और बाद मन्मभूमि
को पुरंगा ( टी पुरगुप्त को लगाता है)
मटा दवरत अभी भापकी काया में हम लोगों को याद
सी पियप प्राप्त करना या पाप या पाते।
महम्म-गर यौर पर बहुत दिन मही पलेय, इसी
है मैने माकी साम्यनीति की घोपण काहीसहयोग
दो, पौरपदोलिसिपुरे इस पारपपिच रे में भी पाने
सातमको।
लिपिम-पाप्प पार ! मापी माश गिोपार्य है।
[राता

पंचम अंक [उधान का एक माग] देवसेमा -पदय की कोमल कम्पना । सो बा। बीपन में गिसकी सम्भावना नहीं, जिसे द्वार पर भाये हुए बोय दिया था, उसके लिए पुनर मपाना मा तेरे शिर में प्रथी बात है। भाव जीवन के मापी गुम्ब, प्राणा और प्राचा-सा से में विदा लेती है। भार। वेदमा मिली पिदाई। मेमे प्रमपरा पोरन सचिव, ममुकरियो की मीस सुटाइ । एसपल ये सपा के समकस, मासू-से गिरते ये प्रतिक्षण। मेरी यात्रा पर लेसी मी मीरपता अनन्त भगहाइ। अमित सान को मामाया में , गानविपिन की तह पाया में , पषिक उनीदी मुति में किसन- यह सिहाग की साम उठगा। लगी सतृप्ण पीठ यी सपकी, रही पपाये फिरती का की मेरी माया भार! पारती तूने सा दो साल पदर मरे पीरमरम पर , प्रलय पसरा अपने पय पर। मैने निग दुपल पद-पल पर, उससे हारी-मोड़ लगादा

मन-माता पर देव पन। म नित लोमन से
इस दुर्म में प्रमि हो, सो हेरेपी ने किया था। मुमारा
में रोष नहीं । म नुमने धाम मुझ पुप मा, तो मैं भी नुमे माता
हो खममा । परन्त कुमारगुप्त के इस प्रमितेम को तुमने अपने कुत्सित
कमों पर से ₹दिया। पुरगुप्ता
पुरगुप्ठ-देर ! मपराम हुमा । ( पर पकाता है)
ससम्ब०-मराई ! मैंने तुमसरी मविध पूर्व में सो, भारत
रख-भूमि में पुरगुप्त को पुरयर बनाता है। देखना, मर गार बन्मभूमि
कौतुरंग न हो। (सत कर टीम परगुप्त को लगाता है)
मटाई-रेगाव भी प्रापकी पचया
मे जो कोषा-
मोरियम प्राप्त पानी, समाप मा ।
मन्द-ए-पौर अप बहुत दिन नी पलेग्ध, इता
से ममे भावी खानाम्प-नीति पोपमा कर दी। इसस को कर
रो, और प्रोपिके इस पार फे परिण देश में कमी माने का
पारसन करे।
चिगिम-भाय्य उपार । भापका माम विरोधार्य है।
[ जाता है]

पंचम अंक
[उपान का एक माग]
देयसेना नाय की कोमश बापना ! सो बा। भीवन में
उसकी तम्माना नहीं, मिसे सर पर भाये हुए कोटा दिग या,
उसके लिए पुधर मचाना क्या मेरे लिए कोई अछी पाठ है।
प्राय मापन के भाषी मुख, प्राण और भाकांदा-सब से मैं पिदा
भार ! वेदना मिली पिदाइ ।
मेमे प्रम-परा बीपन समित,
मपुकरियों की मीस प्लुटार ।
पलपल में सन्या के समकण,
भासूस गिरते से प्रतिपय ।
मेरी यात्रा पर लेती थी
मीरपता मनमा भगहारा
ममित सप्न झी मामाया में ,
गान-विपिन की तह माया में ,
पनिक उनोदी भुति में किसने-
यह विहाग की तान उटार।
लगी सनृष्ण दी3 पो समसी,
रही पाये फिरती का को
मेरी माया माह। पापती
तून सादी समझ कमाद ।
सहकर मेरे जीवन-प पर ,
प्रलय पल रहा अपने पर पर।
मेने निर दुर्पल पदमत पर
उससे हरी-होड़ लगाई।
१४१

लोटा लो वह अपनी पाती,
मेरी रुसा सहा लाती।
!ि न समलेगी यह मुमसे ,
इससे मनी लाब गैवाई।
(स्कन्दगुप्त न प्रमेय)
स्कयरमैना।
पेय-भय से देय । मौररयों में मेरी माँ मुख माना है।
मन्द-मालमेछ-मुमारी ! क्या प्राशा है। पाव बन्युपा रस
प्रानन्द को देखने के लिए नहीं है। जननी मम मि का उमार करमे
की मिस पोर कीपमतिका दौ, पिता भूण कमी प्रतियोप नही
किया जा सकता, उठी पीर रघुवर्मा की मगिनी माजपेय-कुमारी
देवसेना की क्या प्रामा।
यसेना में मूठ मा स्थान पर पसाराठि सेवा करती थी।
भर मुझे मि।
मादेवी । र म यो । गोपन के शेप दिन, कर्मक
भाबाद में पपे हुए हम कुपो लोग एक दूसरे भ मुंह देख कर पर
बैंगे। हमने अन्तर की प्रेरणा से रानपको निदाता की मौ, या
इसी पप्पीको स्वर्ग पनाने के लिए। परन्तु नन्दन की सन्त-भी
इसमपरतीको शीत स्पर्म की समी म पाजी बायो-ऐसा
में रिय मैंर से कहूँ। (वरकर मारते हुए) और किस पर
कठोर बर से हो
रममा । देवसेना ।! तुम नामो । विमाग्प सनाप्य, भोला
सम्प, मोर।।
पंपसेना-नर दस वरी १, तपस्य प्रणि ।।
मार! परि इवना मी म रस तो स्पा । र पणिक मुषों
का मत है। मिसमें मुखोप पन्त न रोशिए मुसमाना

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सोटा तो यह भानी पाती।
मेरी फस्या हाताती ।
विश्व | न समलेगी यह मुमम,
इससे मन लाव पाई।
(स्कन्दगुप्त का प्रवेश
स्कन्दरसेना।
देवा हो देव ! भौचरणो में मेरी मौ कुछ प्रार्पना है।
स्कन्द०~मातवेरा-कुमाप ! क्या माशो। धाव घुम्ये इस
धानन्द को देखने के लिए भी है। बननी सन्म भूमि का सर करने
की गिव और की पवित्रा थी, जिसमा अप कमी प्रतियोप नदी
किपा मा सवा, रखी पौर पर्मा की भगिनी मार-कुमारी
देवसेना की क्या प्राश है।
देयसेमा~मैं मूव माई के स्थान पर पति सेवा करती थी।
मर मुझे हुटी मि!
स्थम्दगी ! र २ कोबीपन , प दिन, कर्म के
भासद में पधे हुए हम कुमो योग एकसरे का मर देणार
समे हमने अन्तर की प्रेरणा से रामगो निम्रता को भी पर
र प्रयाको सर्ग पनाने के लिए । परन्तु इस नन्दन की बसन्त श्री
अमरावती की गयी, इस सर्म को लक्ष्मी म बली वामी-ऐग
यस मुंद सेन (पहर कर सारतर) और किवा
मोर पसे तुऐ।
मना ! सेना।। म गौ । तमाग्प सरगुप्त, भोला
सन्द, घोर।
दपसेना-नए की सौरी ६, वस्त्र प्रति है।
पमार । परिवना मी न रस तो क्या । सब पणिक तो
पान्त । विमें मुषों का अन्त नशे, पशिए मुसकाना से

पंचमक
न पाहिए। मेरे इस बारन के देवता! और उस बीवन के
प्राप्य ! चमा
(पटने टेकती है, सन्द उसके सिर पर हाप रखता है।)
1
[पानिन]

Iskand Gupt

Author
Jayshankar Prasad
Title
Iskand Gupt
File name
Iskand Gupt
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2010/12
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Bharatiy Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514786
Barcode
4990010022469.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
hN3vnidC76x
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Iskand Gupt