Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Laxmi Narayan Mishr Ke Samajik Natak
Front matter
- [] पंकन में मिपनी पोसी अपनाई से प्रारम्भिक प्रागोषों में इसन पौर बर्षमा का अनुकरण सिद्ध करने का प्रयास घ्यिा। अपने माटों की भूमिका में मिमगी मे पो समेत प्रस्तुत किये रे उनकी मोर प्यान न देकर पामोपा विगाह प्रेम काम पार पौन मार्पण के परावस पर मिनी की माट्य कृतियों का मूस्पोकन परते समय इन पर विरेपी प्रभाव की पा सोचने में व्यस्त हो गये। इस प्रयास से मिली की प्रतिमा को स्वीकृति मिमी या मही विस्तू उनकी स्वाति एक साप हिणी-चमद में माप्त हो गई। नाट्यकारों में पुमान्तरकारी लेखक मान मिये नये और उनके नाटकों की पर्यापनेकपों पौर पनेक सरो में होने मगी। इसमें सराहनहीं कि इसन पार पाने प्रपने माटकों में सामरिक समस्यापों को ही प्रापार-भित्ति बनाया पा, मिममी के सामायिक माटकों में मी समस्याओं की उहापोह ही प्रपिक मत' नरें भी समस्पा नाटकों में परिवपित कर लिया गया। यपपि मिमग्री में अपने सामा सिफ नाटकों को सपस्मा पर सीमित नहीं माना। समस्या को प्यापन दृष्टि से देखना-सरबमा उचित मानकर पाश्चात्य परिमापा के अनुसार प्रपमै नाटकों को समस्यामूना मामने से उन्होंने प्रत्यास्पान भी किया। राषित इसी मिए प्रपने पामोपों के मम्तयों से में पूरी तरह समझौता नगर सके। मुझे पोपा भी ममता दिइसीलिए उन्होंने अपने परवर्ती नाटकों की निपय परिपि कोप्पापा बनाने के लिए इतिहास-मुराम पौर संस्कृति से विविध पानकों का चयनकरनामावस्या समा। में मिमी की मादय कृतियों को मौमिक प्रतिमा-प्रमून मानकर मस्पोकन करने का मामह खता है। किसी विदेपी प्रभाव से वारें पमिभूत या पास्त बानकर मयास्वीकार नहीं करता कि उनके प्रारम्भिक सामाजिक माटकों में किसी पापारय पेसा का पाबानुकरण है। हयुमनप की परिस्थितियों को समान मासे पान करने में परिवहीं पाम्प समित होवो मे अनुकरम ही क्यों सममापाय। मिमी मे जिन रामप नाटक निधना प्रारम्भ किया उस समय हिमी में पायाबार- दी धूम । छापा पेसब काम में मिली स्पर्म उससे प्रमाणित रे पार पाडायन्' काम्प निसार रगोन पपनी भारता का परिचय रिया पा। स्मुिमिपत्री मै पीप्र ही ग्रा सार भापता से अपना शिकार पुस्लिम्मा तामाथि पालन को ग्रहण कर लिया। सम्पासी से पुष्ट एवं रित नाटकबीरपना उगोन मपने विद्यार्थी-बीवन में हीपीसीगिम ह सामागिल नापारम मिधरी को दिनीया में ग्याति मिमी म समी तीस वर्ष की प्रायु तक मिडे गये है। सामायिक नाटकों के बार पारित प्रस्वास्थ्य तमा पारिवारिक समम्मों के कारन सबमम बारह वर्ष तक उनकी मेखमामिभामणी गी। इस विभामबाप सनकी मनपाराही परिवर्तित हो पई । सामाजिक समस्यामा के स्थान पर सांस्कृतिक पुनपान की प्रेरणा से उन्होंने माटक बना प्रारम्भ की। इस मारों में कुछ परित प्रधान नाटक भी है जिनमें सेना ने भारतीय महापुस्यों की गौरव-गरिमा को यात्मक धेसी से पपमाटित किया है। भारतीय इतिहास तथा पुराप काम पयार्यों पर भी मिमनी की ष्टि मापौर पनेक सासहतिक प्रसंगों को उमति इन नाटकों में समेटने का प्रयास किया। पामुनिक हिन्दी नाटककारों पर पामधारय विधारमारा मा भारपाय धीयम- पर्धन माप प्रभाव मक्षित र मियनी ने पपने परवर्ती नाटकों में सुषि- पारित स में भारतीय वीरम-वृष्टि को प्रमुखता देने का वापस प्रमरम किया है। उनकी माम्पाकिस्मता राष्ट्रघाहित्यकारों को अपनी परम्परामों में मास्पा कर ही साहित्य सर्वन करना चाहिए। अब समय प्रा नया है कि हप रहें और हाप उठाकर नम सम्मता के ठेकेदापे से कहा कि नहीं, हमें पर पापडी सम्मता पीर संस्कृति की प्राणायकता नहीं है। पौतिक पीबन के निर्मा लिए बिहार में हम पूसरों से भले ही सी पर साहित्य समापौर चिन्तन म, पर समकारगिट राना हमारे लिए चोर पम्मा की बात होमी। हम पाम कि कला का प्रधान मर्म-मृत्यु से रक्षा है। मृत्यु भूमा नहीं। हमारे लिए पृष्टि मूम में ही प्रानन मौर कस्यान पमित मानन कही सृष्टि का कोई भी कार्य संभव है। हमारी अपनी मोर सूरोप की सति की गही मेर-रेपा है। एक मोर बीचमकासम्म प्रयोगम और मामार पामर है, दूसरी पोर यही सर विपाप प्रकृति मौर मिराणा । कहाँ जीवनम में तमा मौनिक tutमा और संस्कृति में रहामा सामाविक ही है।' मिपत्री परिवादी विचारधाराको साहित्य में स्पान देने का काम सर में शिष करते हैं। हमके पाटकों में भी पस्तिरावी पई के समर्थक पात्र इसीलिए सम्पुष्प का नाम प्राप्त महार पाते नियस की हो पात ही करना प्प। मियगी की पारमा बम की कि साहिय में एक तर पस्तित्व का मोहमही फूटवा वर तक मन की मामसाएं पोर ठाएँ ही सेकको प्रमित करती रहेंगी। पर्ष पर काम की समस्याओं के समाधान मिए भान हम मार्म पीर धारदीपोरडी पापामरी दृष्टि से बिहार पोर उनके हल रमन महर निकर्ष निकालने का बेटा ले है। इस उस समय इस बाते । [स] कि भारतीय साहित्य में पूर्व पोर घम की तस्वस्पर्धा प्यारया रबर पार उपनिषद् काम से ही पनो पा रही है। हमारम्पा का वरण वो स्पर्य फादर में मी प्रपनी पुस्तक में इसी संदर्भ में मत दिया है। मिमगी के मत में वर्ष संपर्प पीर तारमर भौतियार हमारी सति के लिए उपग्रीष्म नहीं सकते। इन एफामीवारों के सहारे हम किसी धावत समस्या काम तो हम निकान समये है पोर न साहित्य में किसी उपलपि की माठा पर सकते है। मिपणी परम्परा पास्मा पौर धारण को छोड़ने की बात करमे मानों को चुनौती कर भारतीय संसति वर्मन और चिन्तन झी गौरव-गरिमा को समझने का पायह व्यपत करते है। मिपणी की साहिम विषयक माग्यतापों में परम्परामा मोह देखकर भाग निक पुम के बुनियादी पाटको मुछ प्रम हो सकता है किन्तु उनी सामाजिक नाटकों में रस प्रम का समाधान भी निहित है। विवेक अनुभूति पोर विचार का परातन बब मुदर होता तब परम्परा की बातावक को मामान नही परपाती-मिममीकी नाटप रपमाएँ इसका प्रमाप है। मिमी की नाट्य हतियों के पनुपीनन से हम महल ही में "स परिणाम पर पहुंचते है कि निस्सना मिपी मापुनिक हिन्दी नाटना के नामों में अग्यतम है निमकी प्रतिमा में हिणी नाटका में पुगान्तर सत्पम्न किया है। मिपीक क माटक लिमिाण विश्वविद्यालयों में पाय पसरूप मे स्पीकत है। उनको पभिप्पबना कमा उषा नाट्य शिम्प पर समीयों का प्मान गया है और ममी उनके नाटकों के विषय में जो पुछ सिण पमा है वह मोतिस्व का प्रमक है । पिसारी पाप्तोपकों ने उन हिम्पी का मौसिक एवं पुम प्रपत्तक नाटककार माना है। शिस्तु पभी तक उनकी पतियों का सर्वांगीन पप्ययन-अनुशीमम प्रस्तुत नहीपा। प्रासपिर पप से उनके मिस प्रादि के सम्बग्य में बो कुछ मिया गया है मह उनके सविल कोरेगाइए पपा है । मुम हादिक सेतोप है पी भारतभूपको इस रिण म यो मप्यवसाप एवं प्रम्पयनपुपक मिमनी माटों पर अपने मा प्रबन्ध में रिचार मिया है। मैं हम प्रचो मूस्पोकन की दृष्टि पूरने की पृष्टता सोमी वा रिनु दिन रमपम का एक रखुरप प्रयास से प्राय मानता है। मी भारतभूषण कोसिपन-पतिताय । मिपनी के मारकों से प्रमिमूहोर पुमपान पला मा मदमर हो घटना उनके समान में नहीं है। पतरान में महरे पंटकर प्य की सोररमे में ये गुण्स ।। मनेक स्पतों पर रगनिया मिर्धा भार से पनी पसहमति पात करते हुए मिपानी [] को माग्यतामों का मन किया है। उनके साम की भित्ति प्रमाण और रिक है। मुझे हर्ष है कि भी मारतभूपम इस मा प्रबंध से प्रभ्येतामों काम्यान एक बार फिर मिमयी के नाट्य साहित्य के मूल्यांकन की पोर पायया पौर भी भारतभूषण अपमे बरे प्रबन्ध में विस्तारपूर्वक मिममी की समस्त नाट्य हतियों का विषय म्म से मूल्यांकन प्रस्तुत कर सगे। रिस्ती विश्वविधासय, बिजयेग स्नातक
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श्रद्धय मिश्रजी का शुभाशीष उम्मेसन मात्र प्रयाम प्रियवर मेरे सामाजिक नाटकों की पानोपना विषयक मापकी रचना प पुरी है पौर पर प्रकासित म होबीबर तक मरेद्वार मंगम कामना केस में रसम न पा पाये। ऐसा निर्णय पाप न करें मार अपनी यह ति पाठकों, मानों भावार्यों के हार्यों में पाने। उनसे गिरामी निकामना मिले उपपती के प्रसारस्तम सिर महाकर पहन करें। भारतीय परम्परा में करि पति नहीं निभाता है। यह सत्य पिण्मी पापी पती में इस देश के बो से परे माहित्यकार भूमापुरे । पश्चिम का कवि पिन वीन सहम बों में बताया है और बराबर पपने पस्तित्वका साज सिमापार पोर प्रसार करता रहा है। बिरेली साहिप के प्रभाव में इस देश का रवि या साहित्यकार भी प्रब यस पति है और यही सब भरपाई को विधी साहित्यकार करते पामे है। जब पापी की हत्या होती है हमारे कवि पीर्वो की भी सपा पार चीन पाम्ममकता है इसका समूह ऐप को रेखानी-बान देने का संकस्स मेवा है।कोई नहीं सोचता बांधी की हत्या में इसकी पानी में इतना बैग से मा पदा? यि की मृत्यु फिट को मारने पाने की बीम के मामय के पूर्व इसकी मेवनी किसके हित में चमतीही? यह सब कार्य हमारे साहित्यकार पपने पाक्तिलप्रसार प्रसार और राबवतान पक्ष विचार या मोम में करते रहे हैं। लो साहित्य मौर बीवन के मूल्यों में भारतीयता का सपा बोप पौर विरही म्पतिवार को पासना है। इस पुरिन में हमारे पासक पौर साहित्यकार एक सर मैं प्यक्तिवाद की पोसारम्परित की पूरा-पर्श मैमोक का समर हेमक्ति प्रवाम मोक नहीं। पक्ति-दिस प्रधान है मोहित नहीं । म्पत्ति मोर कान का पेय नहीं मोर से भिन्न उपसे मार म्मर है। पिता की ऐसी भवर में बिछ मावि सासक पौर साहित्यकार एक धार पा से है उस भाति की पभोमति सर्व हि।
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श्रद्धय मिश्रजी का शुभाशीष सम्मेलन मार्म प्रयाम प्रियवर मेर सामाजिक मारकों की प्रामोचना विषयक मापकी रचनाप की। और वह तब हा प्राषित न होगी पर तक मेरे यो गम मंगल कामना केस में रस म पाबा । ऐसा मिर्गप भाप न करें और अपनी यह कृति पाठक, छाओं, पापा के झों में राम पनसे रिटनी मंगल कामना मिते सरस्वी के प्रभाव स्वस सिर मुसाकर एम करें। भारतीय परम्परा में कवि पत्ति नहीं निपाता है। यह सत्य पिडमी पापी पती में इस पसेपो साहित्यकार भूम पुरे परिचम का पि पिके तीन सहसों में केवल परिहाई और यबर अपने व्यक्तित्व का सार सिपार, प्रचार और प्रसार करता पारिखपी साहित्य प्रभाव में इस रेप काकरिमा साहिपकार भी प्रब केरम व्यक्ति प्रार यही सब कर पाह बोरिवली साहित्यकार करते पाये है। बर मामी को हत्या होती मारे कपि गीतों की भी ममा देवे पर पीन प्राध्यपकाइमा समूह पेट को नेसनी-पामाइने का संकल नेठा है। कोमिहीं भोषता पाभी की हत्या में इनकी वापी मेंना वेप से पा पया? प्रिय की मुरम किस को मापने पामे देयोपान के पात्रममा पूर्वमा महनी किसके हित में बसती रही। यह सब कार्य हमारे साहित्यकार ने म्पत्तिलपार-प्रसार मार रावल से नाम रहाने विरामोसमें करते ऐनके साहित्य पोर बीपन के मुस्मों में भारतीयाकार पोर विरेणी पश्विमार की उपासना है। इस लिरेता पौर साहित्यकार एक घर में म्पतिवार की गोलारमामा' में सोनाक्षम कर पति पानोरमा म है मोडविहीं पति मोफ कामराय नहीं मि सेट मारा परिणामी ऐवी मेंबरसि पाठियत्न करें- एकताप पर प रस गाति की प्रतिमte मापने मेरे सामायिक नारों की मामापना की है 1ो नाटक मेरे करि कमीतर माते हैं। अपने कपि-कर्म के विषय में अपने मुंहपुछ भी करना चन गरि । प्रारम प्रबार पक्ति का काम है जो विदेशी साहित्य के प्रमाण के पूर्व किसी पिने नहीं किया। साहित्य अकादमी के उपाटम मापम में भी सपागन में रिस कालिदास को मात का प्रतिनिपि रबि माना पा उस पानिदास ने पापहपूर्वक मिष-पर्म प्रर्ष काम के पोग के लिए हो कवि-कर्म पिमा पाजीपन की पामोचमा के लिए मही पोर इसी पर्प में व्यक्ति नहीं विपावा छाहित्य में उनके पति का नहीं रनको सृष्टि का विस्तार पूसरी पोर रिस पसपिपर को उसी मापम मे मग का प्रतिनिधिकार महापा जिसकी पार सौपी पपाती पिज्म रिलों इस देश में भी पूमनाम से मनायी गपीएबम म्पत्ति है जिसके साहित्य में हत्या मारमाहत्या माना मिमि राम म्यापार बोन माफ माई भोर पहूदी बातिप्रति रिसत प्रचार पक्ति का प्रसापमार बिसरी जयन्ती इस एप में मनाएर कामिरासदापि कर्म की कपार पिया की जा रही है। पापी पुस्तक मिसन पर नंगा माग तर मठिने पानी में हाहूँ। मानिसानाम बार भीमपरामिासके पितम मिकर मार ऐपसपियर कितने पर। मेरिट सफलता की कसौटी मी यही होगी।हिन्दी साहित्य पिहास में पचतम परीधामों के पाठ्यपम में मेरे ये नाटक समस्या नाटक कहे गये है। पमिशान पाएम्तसम् से बाहर सिट समस्या-मारकम परती पर पूसरा नहीं पापा । यह मेरा मिपिषत मात्र है। पुस्तर में उपयोग के लिए से पप्प पो पाप पा इस प में स्वीकारवर पाहे वो तो रासस में उपोषरचिारकास पर भी रिपारकर दे। । इदि पुमम् स्नेही मामीनारायण मिप प्राक्कथन पारधारय माम्यतामा कममारमक संदर्भ में हिन्दी नाटक की माति एवं सम्म का साविक विषम स्मिा पपा है। इसमें नाटक प्रायेक उत्त की भाभार मूत पितापों को भी पृएकापसे (पष्ट का प्रयास है। इस पतिरिक्त गम मेरो कारण मायपिस्स में होने वाले परिवर्तनों को भी मषित किया पपा। मितीय माप में समस्या-नाटकको मौलिक प्रापारमूत पिपतामो विरेचन है। इसके अतिरिक्त समस्या मारपिस्प बिपि विषम में भग्य माटकों में सका मेर स्पट करते हुए समस्या मारक कीम्पारक पिताओं को पारित करने का प्रपास पाततीय भाप में नाटकों के पापा पापार एवं पविषयक दिनारों का सत्सेव करते हुए निमबी सम्पूर्ण मारणों का रिम्प के मापार पर किरण दिया गया है। इसकेसरात रस सामाभिक मारका बिटम के पापार पर दणकरतेए पापप करने का प्रपल कि अमुक मारक को अमुक वर्ग में ही रपने पपा विप - नवीप प्रध्यापही इस प्रबाप का प्रमुख पम्माम में प्रापकर्न प्रत्येक नाटकही पक-पृषक समीक्षा की गई है। प्रत्येक नाटक बस्तु-पक्ष यह पपरमे का प्रयास पाकिपरकार इस बार या करना चाहता रमने र सिमाप्पम एवं किस ऐमी से कहा है ? उसमें बह कहां तक सममा मार पप सामाधिक मूल्य क्या है ? पिल-परा में पाक विग्यालिपि पौर संपाप संपोबम में नाटककार की उपलता की पारनीय दृष्टि से समीक्षा की गई है। यहां यह स्पष्ट करना पाबस्यक हैक रस प्राप में मारपीरप के पापाए भी प्रापेक वर्ष की सामाग्य प्रवृत्तियों के उत्तेवपलेही नमी का पतरम नहीं दिया गया। इसका मुम्प परममा माटों के वस्तु जल पिषम में विमिन निरोपी मत पाए पापोर ऐतोरण में प्रत्येक मारकप पृषक विषम करने पर मेरा मन भीएफ मत माप होकर पाता। पौरपरि तिमिम विरोधी माका सिमेपण एवं निराफरने का प्रयास किया जाता को प्रतिम पिस्तार कारण म म प्राय का पाप हो पापा रस पाता। प्रत पिरोपी मा कोष्टि में रखते र सम्पूर्ण विश्व को विभिन दृष्टियो । पमातरमा भारही पाकर समा गया है। पश्चिम ममाप साहार में परालीन पुष मतियों मोर एमाबारी पार-पाएमपिपली भारों की प्रेरणादमानिया कोप कए गरपापिणन औरणम्पनुपरम पारोपकारितेपन करने का प्रयत्न पिमा या है। इसी प्रयास में सनर नाटकों की समीक्षा का सार भी सेमेप में प्रस्तुत कर दिया गया है। हिन्दी भारत में उनके योगदान को पर्णा करणे इए पातु पक्ष एवं पिस्स पक्ष के हाव-साप उनमदीन प्रयोगों की उपादेयता की पी पी की गई है। परवर्ती नाटकों को पति देने की दृष्टि से भी इन मारकों का मूल्यांकन किया गया है। पात में हिली नाटक में मिथ बीमा स्थान निर्धारित करने की दृष्टि से उनके नारकों की दुनना उनके सम कासीमा पर नाटककारों से भी की मां है। इस प्रथम में मैं मियची के मायकों के महत्व को समझने में कहा तक सफल हुमाया निर्मम तो विराम ही करने, परन्तु म मपन में मेरी चिन्तन शक्ति का विकास प्रवरय हपा, मेरे लिए बही कम सम्तोपजनक मही। कोई भी तम्म पप तक मेरे मस्तिष्क में स्पर नहीं हपा ममे ससे सीकार नहीं किया है। साकारम मिषनी विषय में प्रचलित धारणामों से कही-कहीं मेय मतभेद बीहो नया है। ऐसे पों पर मैंने अपने मस्तिष सम्पूर्ण मापोह को तर्क रिव सहित प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भावरणीय ग. विजयेग स्नातक की रीपर हिन्दी बिभाम, विस्मी गिल- विधान निधन में ही प्रबल के प्रमयन का सौभाम्प मुझे प्राप्त हमा है। उनके संरक्षण में मेरी प्रमित एवं स्वप मेखमी मे उपय-समय पर मो माम मामा, रसके लिए मेराय सदा ही उनके प्रति मया से गप ऐसा । इस प्रथम सिरे बने पापा भी पहोंने समय-समय पर बो मेरी माहितिक पपि को प्रोत्साहित किया है उससे जीवन संभ में मुझे पो पारमबन मिता है यह प्रमूस्य है। इसकी भूमिका सितकर भी सममि मुझे विप म से पास्त किया है। उनके इस स्नेह को सम्बो की पीपचारिकतारामत करो मैं हरम को सेकार का अनुभव होता है। पीपुव तामीलापनगी मिश्र का मी में विशेष रूप से पामारी जिन्होंने मेरे रामो प्रायों का समय-समय परस्पप्ट एवं विस्तृत उत्तर भेषकर मुम पिन प्रति परमा स्नेह प्ररक्षित किया है। इस पुस्तक के लिए पापीन भाषि दो पम्प सित भेजने की मैरी प्रार्थना को स्वीकार कर महमि को मेरे ध्रपा कीम लिए मेराएर उमरा भी रहना। पाररमीम ग. मपेननी का भी माय से पामारी चिन्हनि एक बार वाप्रबन्ध सिबमे रौमाम्य है ठिप माने पर भी पुरसकी जाति कोणा की। परि एम. ए. में यह प्रबाबत मिरा पया होगा तो पान बीम कोरणा दूसरी ही होती।
पारनीय स. हरिमरमसिंहनी पप्पस हिन्दी विभाग, भी दर तेगबहादुर शासपा कामेर साहिरिया मेष में मेरे प्रथम मुर। रही परमा में पार कर मने पाहित्यिक पतियों की पोर देखना सीवा।। प्रत्येक वर्षे पूर्वाग्रह को छोकर, प्रमही सत्व को पोरने की प्रकृति मे मेरे पीपन को परयास से विष प्रभाषित किया है। राम नामे मुफे निष्ट पाने का असर कर इसे मारनी भनुम बना दिया। पान पनको मह पुस्वा समर्पित कर मुझे हारिक प्रसन्नता हो रही है। पी. स्परप प्रोमागी मे कतिपय पमुगमग नाटकों को मपम पत्यालय मोमिए ने की दो पाको उसके लिए पिमा प्रकट करमा में अपमा पर्वम्म समझता हूँ। पुस्तक प्रकासन में पो पचि मेमात पसिधिम हाउस के सरापमा उनले पम्प सहयोगियों की भोर से मी गई है उसके सिए पी में प्रमोवा पष्ट पारवाई। मिर मायु परिवन बन या विविध पत्रों में सम्पई पै पाने वाले सभी पर मुझे अपने कार्य की पूति में डामोपी ही रिपाईए । सबके प्रति पाभार स्वीकार करता हुमा में प्रभु से प्रार्थना का किये सभी मेरे ममुहम एर सहायक बने रहे। २४/१२ पगमगर परिली-2 भारतमपरता बिवादमी २.२६ दि.
विषय-सूची
प्रपम पम्याय पृष्ठभूमि
पृष्ठ
भाग (0) सामीपारापम मिभ-लिप्त बीस-परिचय
(1) मिनी से पूष मिमी नाट्य परम्परा पौराणिक
ऐतिहासिक राष्ट्रीय रोमांटिक प्रहसन सामात्रिक पारसी समय
परित धाराएं-निष्प।
द्वितीय प्रध्याय सहास्तिक विवेचन
भाल (S) ARE परिमापा नाटक के तल, संस्कृत नाट्न पार
में पाराम मादम पास्त्र में सिप सपटम का प्राभार--रस प्रदान
पटना-अपान परिष-अपान, सपस्याश्रमान विचार प्रवाम माट्य
पिपाहिली नाटक हत्तों का बिपा-मामा-मोमिकता
सामग्री पवन विग्यास, दृश्य-मुम्प पोगना प्रस्तावना मपरा पोर
भाव का महल । परिष-चित्रणमामय मन का विरोपम परिमों
का वर्गीकरण । मापा-मी-संसा माट्य-शास्त्र की दृषियों का
वास्तविकर्ष संमार के पुण। माग तत-पापमया, तीव्रता
विचार तस्व-प्रन्जन मामपिष्ट पारवा, म्मम्ममा-समुनय में
शिवरण में।
२११२
(प) समस्या-मारक पमिपा पोप में एमस्पा-नाटक विमिस
अभिवान। पस्तु पस-यापक विपदाएँ। पिस्प पप-मर्ष
पिण्यास एवं परिनत भारतकरिषताएं। मियप।
(ग) पित्री के सामाणिक नाटकों का बीरप वर्गीकरण का
प्रापार, मिपी के सम्पूर्ण मारों की सूमो सिमपामार पर
बर्मीकरम पिपठन के प्रापार पर वर्गीकरण प्ररपेकमारतको
विषिष्ट पर्म में एनेकेदारम।
२
हमोप प्रप्याप सामामिल नाटकों की समोसा
(क) समस्या नाटक
(१)ग्पातीवस्तूमन -समस्या विचन, पान एकपामापन
निप्प। मिस्प-पथ-कामा पिम्पास परिष-विषम संसार।
(२) पापी राठ-वस्तुमच-समस्याएँ पिन निक।
पिस्प-पम-पान विम्यात परिप-शिवसंगारबीन प्रयोग
निय।
(स) विचार प्रपान मारक
(1) रामस का ममिर -विका का स्वाप बस्तु-सम-मूर्त
प्रतीक, प्रतिपाच पार निष्कर्ष । पिस्प पपकवान विम्यास
परिप-मिस मगर निक।
(२) मुत्तिा एस्प-वस्तु पम-प्रतिपाच, विषन । चिस्प
पापानानन्यास पपिणि घर नि।
(१) रायपोग-वस्तु-पर-प्रतिपाय, विवेक निक) शिस
पापानम्-पिम्पास परिणविषबार।
(ग) समस्या एवं पटना प्रधान नाटक
तिमूर को होनी-वस्तु पप-अभिनित विकार अभिप्पम्बित
समस्याएं, तारा प्रदिपारित समस्या, पानपापार एवं
पुष्प परिम्पार अपशिस पह-पानपिम्पास परिष
विषबार नि।
चतुर्म मप्यार उपसंहार
पमापारी मारक परम्परा पौर मरमीनारायण मिम माना
अमार सापारिक मारों के प्रयोजनका लिपप गिरी नाटकको
पित्रीका योगराम-तुमय पिस-पय नबीन प्रपोष। मिमी
भारदी प्रपति पौर पिपगी। लिमाटर में पिती या स्पान ।
परिशिष्ट
रत्नं पाप पुषी ीि प्रेरी संसद
प्रभम मम्माय
पृष्ठभूमि
(क) सक्षमोमारायण मिश्र सक्षिप्त औपन-परिषय
(e) मियो स पूर हिस्सी मादम परम्परा
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लक्ष्मीनारायण मिश्र संक्षिप्स बीवन-परिचय पाराम पामोपमा-सति में पैसा की श्रीमती को एक विशिष्ट महल प्रापर रहा है। मेरे सामाशिक परियेम एवं पावावरन के प्रापार पर एसके तिल का माकमर मौर विपन मीबिया पाता है। किसी सीमा तक यह विलेपम म्यायसंमत भी है परन्तु माग बटिम गीपन में किसी * जीवन की मानसिक प्रतिक्मिामों को मानने को न वो मुषिमा है और सामा राममति में इस रिस्पष की क्षमता ही। पत मने बोवनी का भम्पयन कपल भपनी जानकारी दाने और मानसिक पप्तिोप के लिए ही किया है पम्वत्वन के विलेपन के लिए नही। इस प्रयाय में केवल मिपणी मोतिका पीरम की स्यूत रेवाओं को मिापेमा मार से गित करने का प्रयास किमा मया है। इस पीरन-त का पापार ग्नके साथ किया पमा मेरा परम्पबहार एवं पदमसिएपर्मा समसमर में एनसे मिला' मामक सेब है। मिमी कायम पीप शुक्म सम्म १२९. विमी (ईसवी सन् १९.२) को रिना पागममा यस्ती मामक प्राम में हुपा। पापके पिता पं. कमता- मसार मिस पपने वि सम्मान्त पार उन्मसीन पक्ति माने पाते पे पपपि बना से पाप अधिष्ठ गोषी मानी भिम बाहर पे परन्तु पाप मुन म पौर कार पौड़ियों से सपियों से ही ये। मममग सा वीम सौ वर्ष पहसे ठरू पापके पूर्व निमा बस्ती केपनी नामक पाम में एक तिगामी असो पश्वार मानी पूर्व के मपर पम्प के राणा से इसका पुरा हुमा पार इनके पूर्णगों को मूम स्थान छोड़ना पड़ा । यहाँ सपने स्थानों पर समठे हुए देवरिया के ममोनी पम्प में भाए पार यहाँ सेाई सौ वर्ग प्रापयात प्राममानमा जित के पूर्वी पाप में पा से। गां भी भापके पूर्वगगेको समाज में रिसेप सम्मान पोर पारर प्राप्य पा। प्रथम सातरम्प-सग्राम (१८५७) में प्रापरे प्रपितामा मी पावममा मैदर पार में सम्मिलित हुए पे। सामन्ती संस्कारों में प्रस्तपारी मांसाहार - Y मम्मीनारायन मिमसामाधिक माटक पार पतरजतो इनके पिताजी के समय तक चमता रहा । ब्राह्मण वर्ग का मूस फर्भ पान मना हलके रस में पूर्षयता निपिरगा। उसी पापा की मर्याय में मामीनारामा मिस ने भी पपने गिवाह में किसी प्रकार का नाम-पोष पपने समुर से मेने है इनकार कर दिया। इस प्रकार ईपीदिमों से सामन्ती मोर अभिजात धर्म के संस्कार होने के कारण सपा की परम्परामों में बाह्मपत्य पौर सनियममा एक प्रपूर्ण सम्मिमम हो गया है। मिमणी साव वर्ष की पाक रोगी पौर नियंत ये। इनका अपरावना पूर्वममा कि परिवार के म्यक्तियों को लरे बीमित पहने में भी सम्ह रहता पावास्यकाम में पड़ने की प्रवृत्ति न होने पर मौ पिताबी के भय और कठोर घासन के कारण उनका पप्पयन पारी रहा। विधारम्भ समका पर में पारपर्ष की मामु में हपा । गांव को पाठसामा पौषी भेणी मीर बोसो र मिति स्कूल से साती मेषी पास कर सन् १९११ मे दमाहामार के मान हाईस्कूल में प्रविष्ट हए । यही उनकी जी पिया का मारणामा। परन्तु इयरे ही बर्ष राष्ट्रीय विचारों के प्रार्पण में ये हो । अष्ट्रमनसून कापी बसे पाए । यहाँ सन् २१ २२ में लिई प्रविमाधानी म उमरे सहपाठी प गिनमें मार के हित मिवियासय में हिन्दी विभाग प्रमग. पमनाम प्रसाद शर्मा मामनीय पं. कमलापति त्रिपाठी मारिका नाम विप पसे उस्मखनीय कापी केहि सूत से पिछमिपन' की परीपाजार उन्होने उसी विश्वविद्यालय में ६ सन् १९२४ में इस्टर की पापणी या में प्रवेश लिया। पोर. सन् १९२८ में राजनीति इणिास पौरपंपेगी गाहित्य दिपोंरे पापबी.ए. की परीक्षा पास की। मिभनी का विवाह सन् १९२३ में सम्पन्न हुपा पारिवाह के पांच बर्ष पार सन् १९२८ में उनके पहले पुष श्री दिगम्मरलाप मिममा बम हमा। एमा पापाद पौने तीन-तीन पमन्तर में उनके यहाँ रामनाम मिष पौर रोमनाप मिम मा पग्न हुपा । और पपम्न मन्तिम बाम रबीग को बाताबस्पा में ही पार नकी धर्मपत्नी सन् १९में परतो सिकार मा। पनीदेहात के समय मिमी को पापा लकीपी। बीरन विभिन्न नौ में स्वस प्टिकोप को तोरी पाह पाप में प्रारम्म से हो रही । मानिए र गीपन से ही विभिम विपरीकी पुरठकों आप पार पपने ग्राम पारी समृदऐ। भारतीय साहित्यप्रति तो पापी मामा मीही ीि धारिस को जी अपने मान लिए पारे। पूनानी पोमामिलामी सेपर योरोप मप सभी को मार मामीपारायण मिप्र संक्षिप्त जीवन-परिचय कारों नाटक भी पाएका मनोविज्ञान इतिहास बताधारण पचम समायपास्म के प्रधान प्रायों से मोये पूनतया परिचित है। परन्तु बिपी साहित्य में प्रत्य उनके परिवतरोपनिमूत नही कर सके। उमका प्रमा पित करने पर प्रम्पकर, उपनिषद् मीठा प्रोमभागमद, संसत पार मापा के काम्य अन्य परिसि का योगसूत्र और पारस्पायन मा काममूष । इस विस्तृत प्रम्पयन पोर चिन्तन के कारण ही भारतीय गोगन प्रभावी कार्यशानिक भार सम्मत मापके मस्ठिक में स्पिर हो मया है। युवावस्था में भी पियरी एय में राष्ट्र विन्ना पिनी पारी पी स्मतामता की कितनी रपट प्रमितापा पी यह 'मग्यासी मारक के राब मौतिक प्रमों से समय मुधारित होता है । वन वितारों और सरगर्मियों से अंग्रेस सरकार को उपमा पर पुष्पर सदा उनके पास ममे रहे। १९५५ में पर भय मताभ्य रोमी रेस में नमक के मासे रिषिरमा विचा नम में भर्ती हुए भी रिशी सत्ता में मौसमें निकम्मा समर काम के बिए सन्तोप किया। परन्तु सन् १९१ में पुन रहें पपर बनाकर पारमन्स बेस में भरकर रिपा मया। साहित्य-जन की असपिक प्रतिमा कारप मिममी को सिसने कापसा १।११ वर्ष की अवस्था में ही बन गया था। मिरिन स्कूल में स्पेि-छिपे 'सगरवती' * पत्रों में मपनी साहिरिपक पति को तृप्त करणे गते थे। नमी से मोरवाहित हो येठे कविधा रीतु मोठे रहतनिम्मी तुकबन्दी इसका स्मरम पर मिपत्री को भी नही रो पंपिवयां इस प्रकार- "माहण्ठ मुरसरि मार में सब मनुमरे या सोहते, मानो दिमत माप में न मम मोदते।" सेष्ट्रत हिल स्मन काणी साहित्यिक पावावरण में ही निभवी का साहिम्य की पोर बास्तविक प्रयों में मारा पीर मैट्रिक की परीक्षा ते नेते सन २३ २४ में प्रापन छायारारी कविता पुस्तक 'पारंगत की रपमा कर पौरपार इसका प्रकापन मी गगहा पितो पो गिममम सहाय पोर यो एम सनीपुरीरा पुस्ता मपार नहेरियासपपी मोर म होगमा 'प्रम्त पंप प्रशासन के साथ ही पायापार के पाय पणाली परियों का सत्यान हमा । 'प्रहारमो का मानव बार मिया गया। इसके पापा पाप , 'म एम सिमरामा सष्मीमारापम मिया सामाजिक नाटक माटक रपमा में प्रवृत्त हुए । इप्टर की माध्यमिक शिक्षा के भीतर ही मापने 'भोर' मारककी रचना की। कनिक जीवन में ही भारतीय एष बिपी साझिय के मिनिष परवों के अध्ययन में रगड़े मस्तिष्क में भारतीय वादन प्रबानी हानिक एवं हर्ष सम्मत परिसर होने लगा । उन्होंने अनुभव किया कि हमारा नपुरा समान सत्य के पमिमान को स्पाम र परिषम प्रधानुकरम में पवन की पोर पा पाजाम ए पाएं पा चास्प पाप मका प्रकार के ममोरिमार्गे थे पाठोपालम्पो मोसमी मुम्म दृष्टि सीमा से अमुभम किया इस को ठेस परेपी और इसका मम्म स्वाप समार* सामने रखने के लिए उन्होंने संम्पासी नाटक की रचना बी. ए.के पिपणास मे हीर दी। उस समय की मारनामों के भाग को मारकर ए मिमी पप करवे । 'समस्मानाटोपी रमसा स्रािवामी देन है उसी प्रकार से प्रेम। इसर पपात होने पर 'परास का मरिश मुम्ति का एहस्य 'नयोग मिर की होती पोर प्राची रात-पायापारिक मारक पौर निगे। गरीबीच २. पमस्त १६ को उनके ससे अनुर मिरिमाकर को सापपा पो मै पत को पन पर गहरी नीद कापावीऔर स्वप सप रे पसाम्म रोगी के रूप में विस्सामय में भी हो गए गिरासे रनको मेगनी ने भी रिमाम रिसा। भाई की हत्या एक वर्षमीवर ही उनकी पमपरनी भी पन बमी । और हमारे साहिरपपार के पारपम पनुराम पौर पर्म के सभी प्लव मय गए। सन २४ में उन्होंने भाषीप मिपा पावस पा२पी मम्मी प्रयधि बीतने पर मार की बीमा' मिया गया। स प्रार एन ४ Bागाहपोक लिए हि माहिप रनरी प्रविमा मैतिहा। मन्परा मताप से पापपीतसनीमारठी पापों में एसप उत्तम मारमपित करती रही है। सन् ३४पारने सामारिक माटरू निगे पे परनु के परमात् सासनिक मार बन गए। उनके छह एतिहामि एष पौराणि नार मरापित हो परे। पुप-प्रवर्तक मनीपिमा प्रापारमार भी महान टीम वीरतीयूनर Serfण और पारीसममी पाणी स्वाति प्राप्त की। महाभारत पर पर पापुन , गादि रोकना ए."
सामीनारायण मिम मेक्षिप्त जीवन-परिचय - महाशयको रचना भी नम्होंने प्रारम्प की पी बिसदेई मर्ग ममी ऐप है। महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात् सभाम की एक पंपित भी मलित सके, मानो रमकी प्रेरणा का मोत ही मूख गया हो। म प्रभू रसना को पूर्ण करने के पतिति मिथका मार मार भियने का विचार है। पापी प्रतिभा का प्रमुख प्रमहमौसिम्ता । इस मोनिका कारण सुम की रिण मोरने में मार सपा पापी ऐ छायादी परिता पमी रित हो रही थी कि मापका पात प्रकाशित हपा । नाग मेष में समस्या- प्रधान कारकों के प्रथम प्रपेशा भी प्राइसके परवान माग्योय रसवादी पारा कोहिन्दी नाट्य साहित्य में प्रतिप्यापित करने का पर भीपापो है। बीरनी को माशर बनाकर नाटक निबने में भी बत भाप ही पहुए है। भापमापतित्वमा ही नहीं प्रबर भी है। पाप साहित्य कला पीपन पनि प्रादि के प्रति विचार सपा निम्ति प्रोर स्पष्ट है। 'बर बोलते है यो प्राण प्रसाइ परिपूम मरने की भांति उसको पानी काप मोचा कोपपताल करता है। 'भाप प्रवत पस्तिता प्रामाम इससे भी मिनहा कि पाप सापतिति निवार सम परिवर्तन नहीं करते। पापोतों में भी पापके प्यक्तिको प्रमता पमुपानि की साठी है। पाप सिम बात को कहना भाहले है ने पूर्ण देश में कहा है कि पापका विरोधी मी उन को को पर हेसमा नहीं कर पकना मारने की भूमिकाओं में भापकी मुला मी देशमन हो न सुपर नियोजन का काम है पापको पास्म के प्रति ईमानपाएपा प्रतीत होता है कि प्रापने अपने ममी विचारों को अनुभूति में पात्पमा कर निपा सीमिए किमी भी तक में शिपिलता नहीं। पार व्यक्ति में बही तना प्रास ही प्रत्येक नवीन विचारको पहप करमे पाखा भी है। यही सरप है कि पापणे रियर स्तरोत्तर विकसित होते हुए पुष्ट हो गए। प्रापने परर्न मागविषय विमा पौर नाम कोस रचितमममा लिा हिपरिवाइट हे परिचित पिपासास्तव में बुद्धि के मिषय पर सत्य कोपरपने माता मक्ति कभी भी यादी नहीं हो मुमता। गए प्रपने रासारिखमाही प्रा प्रतिपालको दुरापहीरींरहा नापगा। प्राय वमी रिया परिणाम करने वाले साकारों को प्रारम्भिक प्रम में पासोरों द्वारा कति सम्माम महीं मिलवा समिए उई पनी प्रतिमा तारा साहित्य मगन में माथ-साप बमारिकामा निविलापता है। पास में १ महबमे मिरा कमश•m . ही ए.
मम्मीनारायम मिपके सामायिक माटक भी सामनुमन किया। उनका कपन ई- 'प्रत्येक महान एवं मौमिक मेलाको तिने मप ममा महाल प्रबरा मौमिक अपनी मौमिकता पा पास्वादन कराने लिए ममता की प्रमिलपि का निर्माण करना चाहिए, अपनी पोर मे पाने का दृष्टिकोन प्रान करला पाहिए।' मिमणी भी इस सिमना के शिकार बमे । यह एक संयोग की बात है कि भारतीय संस्कृति के रंग में रपे हए इस साहित्यकारको फेरम पपापवावीसी पारण मापा गुणस जैसे द्विान मातीचा ने विरंची प्रमाव में देया। पार समी से सभी प्राप्तोषक पापको उसी दृष्टि से रेमत है। सहानुभूति पौर या स्पता से विचारला तो पूरा मातोपतों की भी परहेनना कर गए। थोरलपास ने अपने इतिहास हिन्दी माट्य साहित्य में मिमी के 'पपोक' माटर पर प्रसार के 'पगार की शामा बसाई महिपोक'माप्त से कई वर्षे पूर्व प्रमाणित हो पुका पा। पामोचना में ज्याय न मिमने के कारण मिपनीको सपन नारकों की भूमिकाी में स्वय अपना पक्ष प्रस्तुत करना पड़ा। पणमि प्राप्त पानोपना-सामग्री बितरन नारकोंगी भूमिकाएं ही नारी को समझने में सहायक होती है। परन्तु मूर्य मकारा कर तक मेपाम्म राता । समय के साप-पाव विधामा पाप नाटों की महत्ता को स्वीकार किया । पाप नारक रसापों मे पाठयपुस्तकों के रूप में स्वीकृत हुए। पाप का माहिरिया अधिवेपनो म सभापति निर्वाचित पिएमए । पसिनमार तीयामायनीसम्मेमन के सयोगापी पपनारापण माचार्मीर मानवाम्पस पीनीकरमा उपचुनपति हिम् विश्वविधालय बाराबतीपा रक्त सम्मेलन सरस्य मगरमी मोर पापको सन् १९५८में एक मानपत्र भेंट मिया ममा। उसी मानारकीरोक्तियो- -ममतगत की ज्योति से प्ररित किया 'मान कार-पूर। में साहित्य तिहास की एक घटना स्वीकार मित्रीमी पुगप्रवर्तक विमा कारषित सम्मान पिपापा । मिनीलग्ध प साहिप-सापना करते है। पीरितामिए मौरी "Erry Pun 100 wa mtit b proportiou mi or onal cost armeibe by uld be toto te daked, Ho the int by the han to KTS." - ordnerb tron & Toan led by Oward, tant 111 मक्ष्मीनारायण मिम सक्षिप्त जीवन-परिचय - करना उन्हें प्रभीप्ट नहीं। पाप सहन सहानुभूति म मिमने की स्थिति में मी अपने जीवन पर भादर्स दोनों की रसा साहिप के माध्यम से करते रहे यह अद्भुत ही है। 'भारतीयता उमका प्रान है पर रविवादिता के घोर भत्रु रामकी मार तीयता की प्रपनी मौतिक प्यासा । बिसमें ये मपने रंग से सुम की उस समस्त पास्यकतामों की पूर्ति सम्भव मानते है जिनके लिए हम पाश्चात्य सस्कृति की पोर देखते हैं। सप्टता उनका सबसे बगा तुम है। उनके तर्क अकाट्य होते है पौर उनके पीछे पर्याप्त पिम्तन और मनन की गक्ति रहती है।" १ मनसे मिलापसिंह रार्माकमा ..
सामीनारापम मिमपामानिक मारक मी इसका पनुभव किया। उनका कपन है- 'प्ररमेक महान एवं मौमिक देशकको जितने पंछ में पह महान प्रपया मौसिक है, अपनी मौनिकता का मास्वारन कराने के लिए जनता की मभिरुचि का निर्माण करना चाहिए, अपनी पोर र पाने का दृष्टिकोन प्रान करना पाहिए। मियनी भी इस विम्बना के पिकार बन । या एक संयोग की बात है कि भारतीय संस्कृति के रंग में रंगे हुए इस साहित्यकारको रस यमाहारी नी कारण प्राचार्य शुगह बघे मिटान भानोबा मे मिरेपी प्रभाव में ऐसा पार चमी से धमी पासोपा पापको ससी दृष्टि से देखते ऐ । सहानुभूति पार पा वयता से विचार करना तो दरमामामोधा सयों की मौसममना कर गए। थोपरलास ने अपने इतिहास दिल्ली माटय साहित्य मे मिभवी भगोई मारक पर प्रसारली चारपुप्त' की छाया बताई कि प्रपोक वनगुप्त से का पर्प पूष प्रकापित हो चुका था। मामोचना में ग्याय न मिलने के कारण मिमणी को भपन मारकों की भूमिकाओं मे सर्व मपना पक्ष प्रस्तुत करना पगा। भवाभि प्राप्त मालोचना-सामग्री में पवन इन नाटकों की भूमिकाएँ ही नाटकों को समझने में सहायक होती है। परन्तु सूर्य का प्रकाश पर तक मेवानाम्न पता। समय के साथ-साथ विधामों ने माप माटकों को माताको स्वीकार मिया । मापके कई नारक उपमार्यों में पाठ्यपुस्तकों के पप मे स्पीयाए । पाप कई साहित्यिक परिवेसमा म समापति निर्वाचित पिए गए। पसिन भार दीय कामायमी सम्मेलन में संबोबा मी पपनारामम पाचार्य और स्वागताध्यम श्रीयेमीकर मारपकुमपति हिन्दू विश्वविद्यालय बारामती वा उपप सम्मेलन समस्प मपन की पोर से प्रापको सन् १९५८ में एक मानपत्र में किया गया। उसी मामपत्रीपफ्तियों- -'अन्तयत की ज्योति से, प्ररित छिया पाप-दूर।" में पाश्यि के इतिहास की एक परनामीकार कर मिममी की पुपश्यत्तक प्रतिमा साचित सम्मान रिपाया। मिपी स्वतापम्प से साहित्य-सामना करते हैं। बीपिका लिए नौकरी "Every put upd orpoal wither to proportions beta are or orlatot, boot wate the texto by biti bolto be realed, be 0 vach thrunbhshthbuttotrem." -Wardeworth Prote & Poetry odhted by Orford op 111 है मामीनारायम मिथ संक्षिप्त बीवन-परिचय - करना उन्हें प्रभीप्ट महीं। पाप सहन सहानुभूति म मिलने की स्थिति में मी अपने बीवन प्रौर प्रादर्श रोमों की रक्षा साहित्य के माध्यम से करते रहे यह प्रभुतही है। भारतीयता उनका प्राम है पर परिवादिता के मोर पत्रु है। उनकी मार तीयता की अपनी मौमिर पाया है। जिसमें वे अपने रंग से युग की उस समस्त पावश्यक्तामों की पूर्ति सम्भव मानते है जिनके लिए हम पाश्चात्य समति की मोर देखते हैं। स्पष्टता उनका सबसे मरा गुम है। उनके हई पाट्य होते है पौर उनके पीछे पर्याप्त चिन्तन और मनन की पापित रहती है।" १ मनसे मिसरामा कारा पृ.सं.११ मिश्रजी से पूर्व हिन्दी नाट्य परम्परा हिन्दी नाटक होयम के साप ही मारतेन्दु हरिगतसे प्रतिमामाती पौर प्रापमा मनाकार का प्रापय प्राप्ठ मा ! फार प्रारम्भ ही उसका बामुखी विकास प्रारम्भ हो पया। मारो कान में ही नाटकों को प्रेषिया हो गई मो पम्प सावायों को प्रस्फुटित करती हुई उत्तरोतर विकास करती मा। इस कारनाटकाको प्रमुख तोरियों में विभाबित किया जा सकता है-पौराधिक पविझसक राष्ट्रीय रोमाटिक सामानिक मार बम्पारमक (प्रहसन)। पौराणिक पारा भाववादी नारोंकीयो पाएम् पी-पौराणिक और ऐतिहाधिक उग्री सरी पती पौराणिक पाप प्रपत ही। इसमें रामग्रीमा पौर रायमीमा के अत्यधिक प्रचारका विधिप योग है। उम्पासपी पती के मध्यकाल में मिले पर माटकम-पिम्पमाप दिन बी रीवा मरेम का पानदरमम्मन' मा का 'छमान नाटक' रुपण पर्मा वायु का 'रामनोसा बिहार बाट हरिराम का 'बालकीररित गोपालपनमा 'भार' मारिसमाव के मोस्ट प्रमान! किमनीमा पारि प्रभावित पार्मिक बनवा प्रारम्म में पौराषित नाटकों की पोर सामाषिक सरे सम्मुख हुई। ल मादलों की रचना अनुपात दो गोपयों की दृष्टि है की मापी पी-एक तो परने पूर्वजों का स्मरण रमाकर मातीन गौरव को गहरले के मिए और दूसरे पौराविक परिमों के प्राचार पर भारतीय प्रापों की कुल प्रतिप्य करने तमा नबीन पुप-बेतना को प्रतिमासिक करने के लिए। नार-पारा में मारमारों के लिए भी कम पानमा। पानक परन सुगम मी पर पौर सरम बीमारिकास लिए प्रत्येक पटना को एक एप प्रपरा अंक में रखार मन्तिम पटनाये ऐश्व की प्रति पर माती मोबान में मासिकता रिसाने का पानी मारिप-शिप में मनोनशमिता दिखाने की तो पारवाना हममी मिपी में पूरहिली नाट्य परमा मक्ष्मीनारायण भिपके सामाजिक माटक विकास संस्थत नाट्यशास्त्र की पति के अनुसार कार्यावस्थापों सपा सन्धियों के नियमों के प्राचीन पिपिस पति से मापान सपठन में एम्परता मोर पटनापों में समानुपात र पि को मसित करते हुए म. पाहणतात सिपये है 'तीन सौ वर्षों तक मुस्तकों के प्रभ्यस्त होने के कारण हिन्दी कमियों का मस्तिक पौर प्रतिमा कुछ ऐसे साये में जम मई को किये गौवन के बम विसी निरोप अंग की धमत्तारपूर्व भागमा पर ही प्टि रात पाते थे। इसलिए इन करियों के नाटक लिखना प्रारम्भ च्यिा तो ये बीवन की छमत परमापों का संकमा एक प्रम्पपस्थित हामी के रूप मे पर बसे निममेको कार्मा की एकरपता होती म मानकों का प्रवाप प्रवाह । सममें To ऐसे भी होते मिनकामाटकसे इस विप समत्वहीन होता पीर भनेक एसे वृपय मी होते चिमका केवल सम्मेल मात्र हो पर्याप्त होगा। उदारपरेमिए पाहवास के सिर नाटक 'महारामा प्रतापसिंह' या स्थान देसरी' में प्रथम पक के शिवीय दृश्य और पूर्व पर प्रपम म नाटक के मुममानक कोई सम्बन्ध नही रखते पौरपामिना किसी पापा के नाटक में निकाले जा सकते हैं।' परिण-भिमा की दृष्टि से भी इस युपक नाटकों का विशेप महत्व नहीं । ऐसा पान पणा किनारक पात्र स्वयम पोपोच ही सकते हैन -सनका कोई पक्रिन ही। गूगे पोर गहरे से मरे रहते है पोर करिमाम फारी पार पारेको होकर बोला करते है। 'संगारों की दृष्टि से वोइन भारकोंपी स्पिति पौर भी शोचनीय है। सापारमा भापण नाटकीय कार्यो की भूमिका पार पसाहार -कार्य के परिषय पप में ही प्रयुक्त होते । 'मसाप पस्वामाविक और पसमत है। समम ममो समानुपात का दोष (Sene of proportion) हम निगन (direction)|tनमें एतिकारियों की मानिसमा मार दर की सुमनूनही पी। नामावली नाटिका से भापती रिपोग का उमरण प्रस्तुत करते हुए हा• भौगप्पमान अपने इतिहास में लिखते हैं ऐसा मालूम होता है कि वनावनी पौर ममिया रीतिकाम की कोई कलिपोपपय-असमय की उपेक्षा करना मुगदर मुमानों की रचमा काम काबहाना निकालकर पिता पापी। इनमें सक्ति-विम्य दो मरस पर मारक विए विस महाकायत मौर कीमत भारपापो को पत्रमा मानिक रिनोलाविहीनमाल - .... * . मिपी से पूर्व हिन्दी माट्य पणा चपका होती है यहममें नहीं। भारतेन्दु मपस के मारमारों ने प्रसस्त नाट्यभारत के मनुकरण से प्रारम्म किया और समय की पति के अनुसार पारचात्य भारपणा एवं बनवा की धिप्रमाव से माटकीय विधामो में अनेक परिवतन मिया मादीपालन में शिपिसता भामा प्रस्तावना का मीका नाटकों में मोप हो मसर । मर्को श्री मेवा और वनका बिमारन पौपचाग्रितारप ही होता था। पर पारा में कमा के विकास के प्रथम दम बहीनाय भट्ट 'यम बहन' (१९१२) में होते है।इसी समयोपियस्तम के 'परमाता' पासनतात चतुगी के इप्पान पुर' पौर सुबर्मन त परना' पादिनारकों में बीस किासकासष्ट परिचय मिलता है। इनहायस्तुरिम्पास सरम एका पौर मुसम्बर होने के कारण सपर है। यान में संभप का स्वप भी अधिक स्पष्ट है। परि म नाटककारों की दृष्टि स्पानक सौन्दय और कमविकास को पोर ही मषिक मातापि इनमें परिणों का मुन्ना मगन है । मनापों में मयागर का नियम हुमा है। इस पारा में कमारा परम शिम प्रसार के मारा मै एमा । प्रसादजी प्रमुख ऐतिहासिक नाटक - रावभी' (१६) विभा' (१९२१) 'भरावपा (१२२२) 'जनमेवय रामापयन (१९२६) स्कन्दमुप्त (१९२८) 'अन्नपुप्त' (१९३१) । यधपि मम्मीनाण्यम मिभ का बम सामाणि नाटक 'म्बासी (१९२७) में प्रकापित हो पा पा पापि मिमी के सामारिक पाटकों के मकानी होने के कारण सकाराप्त और पतपुप्त का विषम भी पूर्व परम्परा के प्रशांत करना ही नमाचीत समन्ध गया है। प्रसारजी में मारकों में इतिहास पृष्ठावार पर सांसातिक सामायिक, गगनीतिक पार्मिक पादि विभिन्न ससम्मी की बम प्रक्रिया प्रस्तुत की गई। समर मापक रीवन-वन पोर निपूर युप-सन्देशों में उमविषयवस्तु को मपीन महत्त्व प्रदान किपा। ममाटरों में मुख्य रूपाना के प्रतिमिनु पापमह पायकों के समारोप कारण जानाका प्रम-विकास रमा पटिन हो पया है परन्तु प्रमाषनी की पातिक प्रविमा इसागर पत्रों मुसम्म निर्वाह करने में सफल हुई है। भाटकों में सबसपए सौ रत्तरोतरबरने माती ठीपणाकारग मी पकानुन मारने की सृष्टिहा है। परिवरिषष में प्रसार के भार महिन्दी १ पानिलिभावित भ.गप्पान १ मम्मीनारायण मिम के सामाधिक माटक नाटक में युपान्तर स्थापित किया है। एही माटकों में पात्रों को पहली बार म्यक्तित्व प्राप्त हुआ है। प्रसाद ने अपने पात्रों को प्रषिक से पपिक सहानुभूति री पौर स्नो पम्तन्नों क्षमा बाम सर्पो को प्रत्यन्त मार्मिक प से पिषित किया। वस्तुत इन नाटकों की समता का एक प्रमुख पस्प पय से भी कठोर पौर घिरीप पुष्प से भी कोमम पाों के परिणाम में ही है। इन नाटकों में काम्पस्व के समायेम के कारण एक पूर्व मार्मिकता पा पा है। नाटकोम एप्टि से यह उनकी मोरी परम्तु इसी कमजोरी में उनकी महत्ता ममुस्पूत है। कठोर से कठोर और कोमम से मोमम माव की पंगना तो यह प्राव पिस्पी है। प्रसार के मारतों में प्राकर नाटकीय विमान मीण स्पिर सप प्राप करने ममे थे। हिन्दी की पारगावी बारा की एक पपनी परम्परा मुस्विर होने ममौ । इस काम माटककार में पापचास्य नाट्य कसा कायपावार पौर रंगमंच की मुविधाएँ तो मनी परन्तु संसार का कवित्तमय वातावरण नहीं पाने रिया । पारधारय प्रमाव से प्रस्तावमा का अन्त हुमा पौर नाटक में कमानक पिम्प पर कबामक-सौदर्य की प्राण प्रतिष्ठा हुई। मौ को एमों में पिमा नित किया पया परन्तु कवित्व की रक्षा के लिए मचमीता मौर गानों का उपयोम पिया गमा । माटकीय विमानों में रममंच पीर कमाना-चिपके लिए अनेक प्रयोग किए मए परन्तु पारिस्त भाववार और काप्य ग्याप के विषय में इन्होंने संकटमाटकों का पावर्ष ही पाग दिया। इस प्रकार हम देखते हैं किमिममी पानिर्माण के समय में पारम्वारी मारा अपने परम विकास पर स्थित पी। राष्ट्रीय भावना को माटक-पारा मारवेमु ने राष्ट्रीय भावना के प्रचार के लिए 'प्रेममोयिनी' 'भारत पुरंपा' मारिनाटक मिथे। इनकी परम्परा भी घर पनी । पम्बिकारत पास का 'गोसफ्ट' पौर 'भारत सीमाम्प' गाय महागुर महत का भारत सतना' भपत. मापयन मर्मा का 'भारत पुरिन' बहीनारायण चौपरी का 'भारत सामाग्य इस बार को प्रारम्मिक कास की रचनाएँ ।। वस्तुत नाटक प्रचार का माध्यम नहीं इसलिए पदपार के परिपत स्पहीणमा ठो माये के माटकों में प्रबल है। परन्तु इसका म्यून प्रचार उत्कृष्ट साहित्यिक माटकों में कम ही प्टिमत होता है। प्रसार के नाटक हो मानो राष्ट्रमार की प्राचार भूमि पर ही सो।।
निपनी से पूर्व हिनी माट्य परम्परा रोमांटिक नाट-धारा इस पाप के प्रममन में पारधारप संस्कृति पारसी रंगर्म तपान एवं सिकालीन गंगारी प्रेम का प्रस्पमिक प्रभाव है। इन माटकों पानकों पर परी प्रेमाम्मानकों का प्रभाव भी शाबासक्ता है। इनमें मारक मासिकामों को प्राप्त करने में पूर्व साहस दिखाते (पौर वियोग म हिरहामि को तीन बासा में बसते हैं। इनकी मारिकार्यों पर तो यह प्रमान भोर भी स्पष्ट है "प्रेममोहिनी पौर मय मेगरी प्रादि नायिकाएं रिपिमस रीतिकामीन है वो पलानीनामबागी पंगणार, हीरेनसर पार पधारेबाजी की कला में प्रवीम है। फिर भी हमका प्रेम ऐकान्तिक मौर एकनिष्ठ है।" मारतेन्दु के मारकों में इस पाराका समस्पपष्ट मही होता । 'बम्बाममी माटिका मे कोप इस पेपी के प्रेम का संपान पाते । परन्तु बनावती मारिकामप्रेम का मही भक्ति का काप्प है।" से पाप्यारिमक प्रेम की कोटि में रखा पा सकता है। इस पारा के प्रमुख मार-माता पीनिवास पास का 'रफार प्रेममोहिनी' {१८म.) और 'तप्दा सबरण' (१८८३) पम्बिकादत्त प्पास की मसिवा' (१८९४) प्रमनसिंह गोविमा की 'मरम पंजरी (१८८४) रिपोरीलाल पोस्वामी की 'मयंक मेबरी प्रापि। इन मारकाका प्रमुख गोप्य भी मोपों को उपदेश देना ही है। पार पौर प्रेम मोहिमी' को भारतेन्दु सिक्षित प्रस्तावना में सूमबार इसका स्पप्ट रस्मेवा स्तु विपाक परिष-विप्रम मंबार मारि की दृष्टि सेन नारों में भारतम् कान के अन्य नाटकों से होरिपिप्प नाही। पस्तुत प्रेम मानव की एक पारगत प्रवृति पौर प्रसार के प्रतिय मारक सीका प्राधार बनाकर मिलेगा। प्रेम के सम्प में युग चिन्तन के मनुस्म रिपतन होता रहता है। प्रत्येक विषारपाप इसका रिसेपन पपमे दृष्टिकोण से करती है। मारवर काम में रीतिकामीन परम्परा परोपों के कारण रीतिकासीन रोमांस के furs प्रेम की स्पष्ट झमक मिठो है। पुरा के विदास के साथ परवर्ती कारों में प्रेम रे पाप में भी प्रमहरमा पारी पुर के मुपारपार में इस पाराका सरप प्रारबार में बदाम पया जिसकी स्पष्ट छाप प्रसारक माटकों में मिमी है। तामीनारायम मिम के सामारिक मारकों में भी सदवावादी पाओं का समावेश हमा है परन्तु पनी स्वाद मी मात्र रम्पतमि .४ माहिल m4मार दी..
मम्मीनारायण मिप सामाणिमार प्रतिविकालीन रोमांस से समा भिान है। इस बार प्रवृत्ति का मिषन वो पारधारप शिक्षा और पापात्प सतिक सम्पर्क प्रविरिणत विहान पार वयोम विकास पर पतिवार उपयोमिताबार पौर मुग्मिार पम्वत किया जा सकता है। प्रहसन प्रहसन भारखेड-पुण पाटकों की प्रधान विशेषता है। पंतप्रहातों का मुख्य गेम हास्यविनोर की सृष्टि कामा पा परत हिन्दी में इसका नाम पत्कालीन सामागिर गवनीषिक पार पार्मिक रीतियो पौर रोपों पर हाम्प मिपित पंप करना हो गया । हामारिफ पीर सांसाविक दृष्टि सेरेचारिक अधिकार नाही हमारे पास होगा। एक पोर मरन विचारों में मामोफ में प्राचीन कवियों पर परम्परामों पर पार दिए गर दूसरी भोर पाश्चात्य सम्पापा में पड़नेबानेसोग मी पप्प पार हास्यासम्बन बने। पहले प्रकार आसनों के पामम्मन हुए पपरिवासी परिवारी धर्म की भोर में अपना सम सिम करने वाले परे पुरोहित पौडर पेसापानी पुस्प मीर सरे प्रकार के प्रासनों के मुम्म प्रासम्बन है पात्चात्य संस्कृति मरे हर पिक्षित। इस कान हिसकों की निमादिनी मेनमारको विकास में बिग्रेप सपोप रिया समाप के प्रवर्तन का पेप भी मापनको ही है। उनके परिकीनिवा हिमा भाष्टि' (१८७1) पिस्प विपमापनम्' (१८७५) अम्बरे नमरी ( ११) भार बहन मोकप्रिय इए। इसके अतिरिक्त देवकीनन्दन पिपाठी का 'बब मार सिंह की' (१८९३) को एक एक को दीन तीन (१८७१) कनियुसी पोज (१९८५) वापर पोस्वामी का महास' {१८५) धिोपमान मोस्वामी का पोपट पपेर (१८९) पीर प्रताप मारापम मिमा कमि कोई भी मभिक प्रतिमाए। इनमें भारती के नाटकों के सम्म पपेशात कितीवे एवं छात्म सन्चकोरिकापौर पिष्ट। हिनी काम में प्रहसनो विषयवस्तु पौर ऐनी का विकास हमा प्रमुख विषय को पुणे पार पापागाडी पुष्प प्रापि। इसके पति रिम्स पर काम प्राममों में कोतमा गरटरों पोर मनोपान पुस्तित अपार्यों मुभारमा वा प्रभारफ बएसममी नामको पार नवयुगतियों चपनहारों पार मानोरी मरिस्ट्रेटों वस्याओं का सकी गाई, ग्रामों के पासपमा मारपोरेमीष मबहार पार मभिधार मारि पर हास्य पौर विमली से पूर्व हिन्दी नाट्य परम्परा मेय की मुष्टि की मई ।। इस काम के प्रमुख प्रहसन बी. पी. पीवास्तव के उलट फेर मबार पाश्मी' 'मामा' 'मरसानी पौरत', गोरिमवस्मम पम्त की यूसकी चोपड़ी बहीमा भाका मा पायो' विवाह विमापन' मिस प्रमरीमा मेषम पर्मा उप्र का यह ता पार पारें और मुराग का पानth मबिस्ट्रट' पारिश्री. पी. पीवास्तव के नाटकों में हर हास्य की सृष्टि । सुदन भट्ट और उपगी की पनामों में उनकोटि के दपा शिप्ट हास्प और वाले पंप की कमी नहीं परन्तु इन्होंने बहुत पोर प्रहसमों की रचना की है। 'ल प्रहसनों मे पडसे काम में पपावादी माटकों के लिए मार्ग प्रशस्त किमा पापामी काम के समस्या-नारकों के मिए जनता का यार कर दिया।' सामाणिक मारक मारतेमुकाम के सामाजिक मानामरण में माटककार सामारिकममम्मामों पर विचार करने के लिए भी प्रवृत्त हो गए थे। तत्वामीन समस्या का मुम्म म नारी-समस्मा पी बिछके पूम में प्राचीन मामा और मयीन विकारों का समन्धित मुपारवारी रष्टिकोम बा। एक मोर पविनिष्ठा की प्रतिष्ठा की गई मो दूसरी पीर साम-विवाह पाप्रपा का विरोभ मोर सी पिक्षा' तपा 'विपरा विवाह' मादि का समर्थन किया गया। इस काम के प्रमुख सामाजिक पाटक, मानहष्ण मट्टा 'वैसा काम पैसा परिणाम (tem) रामाराम पार का 'मिनी बासा (१८५.) माताभकारमान का 'कमम माहिमी भवरसिंह मारक (१८९५) पोर नामोपाम पम पमये का रिचा विनोद । 'मा काम जैसा परिणाम में एक पोरबहामारी के पाक्षिणात्य की प्रतिष्ठान पई सरी पोर बरे प्रभावोत्पाबकम से मरिरापार मौर श्याममम के पुरे परिचायों को निरामया है। पिनी बासा में मान-रिषदा की मानसिक परिस्थिति का चित्र सर रखे इए विधवा विवाह की समस्राको प्रस्तुत किया पमा है। प्रविपि की दृष्टि से यह मारक विपेप महत्व मही रखते। परन्तु इससे महसष्ट मामास पिना है कि नाटकमार सापारिक समस्यामों पर पिचार करते हुए मो यायप्रति भी पागल होमे भरे पे। १ बीमा समातोपामा सिरानाभा। १. लामालोमामा इक्षिस पास मा Eि मम्मीनारायण मिश्र के सामाजिक नाटक दिवसी-युप में अन्य सामायिक मारक मी मिदे गए इनमें बमुमाराम मेहरा का 'पाप परिपाम' मिश्र बन्युमो का 'नेयोग्पीथम' (१९१५) मुंशी प्रेमबाप का संचाम' (१९२२) नमनसिंह का पुनामी का मशा' (१९२४) बमलाप प्रहार चतुरी का 'मधुर मिसन (१९२३)पारमानन्द का 'समार (१९३०) सम्मेलनीय है। पाप परिणाम' से वेश्यागमन एवं सहर प्रेम प्रारि भनेर कुरीतियों पर प्रकाश राता पया है। 'सयान' में प्रसूतोवार के समान में प्रेम की समस्या का मित्रम निमा गमा है। संपाम' में प्रेमबार ने समीगरों और किसानों के संपर्प का चित्र प्रस्तुत करने का प्रयाप्त दिया है। इम माटकों में समार्यबारी बातावरण मोर समी परिष पपई पौर सने है। माकी एप्टि से यह मारक कोई महत्वही रमते। उनकी पार्षबारिता ही नमकी युबमता है। 'यपावादी माटकों में मारकार एक सामान्य परिण मेकर प्रविधिम बीवन का या चित्रसीचने का प्रयत्न करतातरम पर पर पर यमार्प बीबग के प्रकरण की धुन में गौवन के प्रतापराया पोंक विषम की प्रारका सम्रा बनी रहती है पौर कोमन गदपारों सपा माफ सनामिए उपयुक्त अबसर नहीं होता। पपावादी नारकों को प्रभावपूर्ण प्रतिपामी पौर पारकपनाने के लिए एक पत्पम्त प्रापण्यक बात मत्व मोर माणिकता (Slgrificance) नामभिस्या से रहित समाचारी माटकातना ही मयात्मक (Promis) पौर प्रमाणहीन होता है बितमा करित्वपूर्ण मार्यो सपा कोमन उद्गारों से पीत पारगारी मारक। हम सामारिक और एनीतिक माटों में भक्तिपानी तपा मम्भीर माधमिकताका मिवात प्रभार मिलता है।' - पारसी रगम इन माटक-पारामा को प्रभाषित करमे पामीरो पाराएँ है-पहमी पारसी रणमीप मारा और दूसरी मनुवाद की पाप। पारसी रेपमंच का पागमन मारतवर्ष में हिसी साहित्यिक नाटकों के प्राषिर्माद सापही हमा। १९४. में पोरिजिनन भिमेट्रिपस कम्पनी की स्थापना। इस परम्परा नपरेनू रममच पान पर सिपीरियन रपमंच की भारतीय वातावरण के अनुकूम प्रस्थापना की। नाटकों का पाठापाणपकाप्प की पोती पाडार और परख सपा मापार प्रम रखा पान पारसी की प्रेमकथामों पंप्रेसी साहित्य को रोमांचकारी पटनामों नाटकों पीर मापानों या पुरानो की मनोरंजक मन्यामों - औरणत मानिस हिन्दी स्पतिवासिम 1 ॥
मिपी से पूर्व हिन्दी नाट्य परम्परा से मिपे और मनोरंजन की सामग्री ममता में प्रचमित स्यामा माप मार-मानों या भारों से नधार मौ।इस परम्परा मे बनोपान के मध्य में नाट्यकला का सास्तविकतरपन हर समससे एक हानि पहई किसमसापारण में बाट के प्रति प्रारम्भ से ही एक पतन धारणा बन गई मौरसे मनैतिक मानापों का प्रेममा निमासही सामग्री मानमेसनेमी संसार कारण राष्ट्रीय रंगमत्र न बन सहा पौर उसी के फास्त्रम्प साहित्यिक माटों का विकास मौतमति से न हो पाया पारा में श्रीस वाली में पाकर बत साधारणको परररत के लिए पौराणिक मास्यामों को भी माधार बनाया पया परप्तुमा के सरप में विक्षेप अन्तरमाया । पामेसकर मधिल *निर्माण के कारण होमका शिकार ही पद पर पया । पभूदित नाटक मनुनाव करने की प्रति हिनाटक-पारा में प्रारम्भ से ही पम पड़ी दी। ये अनुवाद पनिषता मा पसा और मेषी मार से होते थे। भालेग्यु काम में RE नाटों के मनुजारों में हिन्दी नाटक-पारा को प्रभावित किया पौर मसत साटमणस्पून मारकीय विपा -मादी भूभपार प्रस्ता बमा पारिका पामत हमा बंगला से गिरीक्ष पोप पौर • एम. राप के मारोपा पनुरा- हमागिरी भोप पारपार मे मार्षमादी नारों से प्रमाणित ५ पार विगहास पर अक्सपीयर समा संसात नामशास्त्र के विपूर्ण पावावरण मे।हिन्दी में नाट्पमता में गिरोध भोप का प्रमुकरप, हमा परन्तु हिनेतमाम राय के ऐहिासिक माटों का पिप्प प्रमाण पड़ा। वास्तन में पादपारप नाट्यममा का हिन्दी नाटक पर पोथा प्रभाव पार बिन्द्रमा राम पाम्पम हो पाए। अंग्रेजी नाटकों का भी प्रमुगार मा पाशु रसमे परी माहिती मामकारी तो बही पर माट्य-कमा पर सीप प्रभाव पड़ा। हिन्दी माटों पर प्रो-माहित्य-गरमका प्रमा प्रवी बागमे गानों ागहो पड़ामनुवारों में वो भीम बानने मामों को प्रावी साहित्यापरिषय मागहरवाया। इघार ममी पारामों की कता बाप हा पाम्हरिक सम्मों के विवचन के सवा एक रात स्पष्ट होती है बिस मारक के साप को स्पिर फरलोमिए भारतेन्यु साम मिम्म निम्न प्रयोग हुए रमको पारवानी पाए पामार Pett. मगमम 'गुभमन मोर परमाना पारिभाटों कनिर्माप पाय स्थिर और भएप पारग करने लगा । इस स्थप कापाम तस्मीनारायण मिमो सामायिक माटक विकास प्रसार की नाटय-मा में हमा। इसमें पारवार और साम्यवाकार देसाप कपिलपूर्ण पावागरणका पपूर्व समम्बर पार पति-पस्य, पन्त का पर्व इसकी प्रपुष विपाएँ । पपाकाय माय की मयस्या निम्न स्तर पर होने पर भी विकास के लिए पीच पर्वमानो। पुनवना के विकास ने इसमें पिसेप पारोग रिमा मौर एपार्थवादी पारा मे पापीनारायण निभ सामाजिक माटोका भामिदिमा।
द्वितीय अध्याय
सैद्धान्तिक विवेचन
(क) नाटक
(स) समस्या-माटक
(ग) मिमगी के माटों का वर्गीकरण
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नाटक परिमापा और तस्व मारक कामप्रसारमा पर से रेगने में विना सरम पीर पप्ट प्रतीत हो, माहित्यिक दृष्टि से उसे किसी निश्चित परिमापा में गोममा चिना ही कठिन है। विश्व-साहित्य में नाटर हे राने वाले सभी स्सों में इतना प्रषिक मिम्म्म है जिउनो प्रापार पर नाटको मादिपिक स्वरूपमा परिमापा रस्तुत करना भी अपने पास में पर कसा है। मसत नाट्यशास्त्र में सकस भेद है और प्रत्येक मेररसय-गमग हप विधान एवं विधेपठाएँ भोर म मेरों की मी पुप के प्रमुरूप मिन-मिम परिमापाएँ की गई है। ग. दसरम भोमन ममूरे संसार नाट्यशास्त्र के संरक्षण के पास इसी परि भापार को मक्षित रखे हए लिखते है विभिन्न भाषामों में अपने-अपने भुग के पास की परिभाषाएँ री तक दृष्टियों में स्पा सस को बेलामा मता।" मसा के भी माट्य मो में से मेद स विषय पात्र रप पारिको मारने कारण मात्र हो पपिक है कोई वानिक निरोपमही क्योंकि ममी माययों का गेय रस-पिही है। परन्तु पावास्य नाट्यशास्त्र में या असर भी है। मारकरे ऐप म माया होने के कारण सस की परिमाया तपासम में भी सामायिकप में भिन्नता पाई जाती है। बड़ी माटर्म बन मए । इन्ही मार्गानिकहर बर्मनी के प्रसिय पासोचक बार मनापन नि! 'प्राचार्यों रा नाटक की परिभाषा निशियम एक विभिन्न विषों से की मई, पिसीमा कपन, कि नाटक वार्म का मरने बाने परिपपर प्राइव हाता पाहिए. इसरे ने से मानव परिष का नहीं पर काय एक बोवन का अनुपाप मानये हुए परिष पिप कोपानी परेपानोप मिदया।ठीसरे मेमे मामय संगस्प मौरमपापों गप्प मदार यादि स्पादि।" मप्रभा नारकरे गेम को Drie has been analy deled by iba sobou to doce dort २४ भस्मीनारायण पिप के सापारिक मारक लेकर पारपात्म मादर साहित्य में माटकों केईम बन पए है। गस्प में अन्तर होने पर प विमान में मेर हामा सामारिक है। इस स्परिधान की विभिन्नता के ऐतिहासिक कारणों का विश्वपत्र कसे हप रोना पीका मिब है, "समान पपदा म्यमिता की परिस्थितियों मेरो कारण माटम के प्रत्येक पर्य ने अपना मौलिक रफ-विपान बुधवा है पिएस घिउ वा माटक प्रमेकम्पक्तियों के लिए पनेक पिपय पाहै। श्वमे पधिक पिम्प के पिपप में म उममवे ए सामान्य भारम्भिक विपठामों के मापार परमारक के सस्पको प्रकार साश सकता है 'भाटक में कार्य एवं गति से पुष्प एकपा हो सत्यता एम मानवीय पापार पर पामों का परिबकिन हा पभिनय के लिए उपयुक्त संचार एवं पश्य-विधान हो पीर मत मैं दम सबने वोपन का एण् गोपप हो प्रोपा कि प्रेमको हत्य एवं मस्तिकको स्पर्म करे। एली स्मृम विश्वामों के भागार पर नाटक के सरप को सममाना सपटाई और नाटककी कसा परीक्षण एवं पिरमेपक कोषिक शानिक एक सुबोप्प बनाने के लिए नाटक तत्व निर्धारित किए जा सकते है ।मी सत्तों के मापार पर नाटकको मामा की माती है। पातु लोके मिरिम के बारे में भी शिामाका मतपय नही। फिर मी हिम्मी माटकको वृष्टि में रब हर हिग्गी मार पर प्रमाय गमने काम माट्समारों (संसात एवं पारपारप) प्राधार पर इस तत्वों का निवारण पिशवासमता है। दिमी के पषिकाश मिानों के अनुसार संसार मारपारप में नाटक तीन यलबस्तु मेता पौर रन । परन्तु गणित सीताराम पतुरीन तत्वों पर पाप करते हुए मिनय नाट्यशास्त्र में निबते है "बहुत से पाना रसपक के मन मेवा खातेपी भेषको मातु, नेता मर्माद नायक पौर रसके कारण उनके (पर्यो रपम्पकों) मेप किए गए my Dream on wot be broadcacarncourad the action Proceed fromchucter Drupe'ttpsiasisoter brot nute thon al pun but ofta attoo odor litt, chander woodwry 10 ktlou Drum promotor #mother Abhradd rekixcbmadhu0000000 - Eropa. Tulad Drios Papt tattype bmarinival my of motiatmy dramstle form Wbu view of the bold by tba todety of an befindou ud from beau burs forcibly that Dan bos beta maoy that to my crook - The Art of Dr. Lond Precock, tap 15 - सेवान्तिक बिदेचा बारक २५ १] पापार पर यता, नेता प्रौर रस को मून से मारक का तस मान लिया वास्तव में सों और पहपकों का और इसी प्राचार पर हिरनमें या वो सिसी प्रकार की विशेष वस्तु है या काई विधप प्रकार का नायक है या पिसी विभेप प्रभार प रस है। वैसे प्रहरम का नायक 'पीरधागत होता है। नाटक की पाबस्तु इतिहास प्ररित होती है। और मक में करम रस की प्रधानता होती है। परन्तु मेता पौर रस को रुपकों का वम मानने की भूम मही करनी चाहिये। पह सम्पक तत्व निर्धारण के लिए आप का भय पप करते हुए मिनट "किसी वस्तु को हत्त करने का यह अभिप्राय है कि यदि उनमें से एक तत्व भी निकम वाम दोबस्तु मिरमको जाए। हम्मो से किसी बरतु के अस्तित्व पाबोध होता है।" उन्होंने तस्य श्री इस परिमापा मापार पर माटकर टीम तरम माने!-या धम्मार और रन निरंभ। सामान्य प्रचमित देयकाम परिविजन पौर मीको तरयों मम्तव म रसन के कारण का विरमेपन रहे एएसेलित पर्याद कपारो कारण होते है पटना और पान । का कार्य , पटना पौर पात्र कारण है इसलिए कबादी मूम उत्त है। रेप सकाई ही नहीं है। महतो कपाबस्तु पार पामरामों में निहित है। बोई मी पटना या पाम निसी रिसेप रेस या काम से ही सम्बर होम सपा स्वर्य रमहा विवरण देवी । देष और शाम बस्तुगमोई समय GR की। ती भी कोई भी हो मारामाश्रम है। पानी पौर संरार का प्रमाण तत्व मानमाहीमा भारी भ्रम है मौर मेस्य दो साप्य है या वसमे से ममता है। परन्तु मदिवस से यही मभिप्राय लिया बाय पोर परिधरप-योष कामे बाम पम में कम तत्वों को ही तत्व मामा प्रायोगितजीवोदो मी और मीमित पिया बासमता समाप और रंग-बिरंप स्पान पर प्रभिनय को वरब मान मन से मारका प्रस्तिर पर ऐसा क्योंकि अभिनमक पाति में बारपा सास्थिर मार पोपिक में रक-निरम स्वप मा पाई। इस प्रकार पहुए मा और प्रभिनय । गिन रोमाबार पर पेप तयाँ को काटा गया है सही नकों को मरिपोड़ा पीर पाय तो एक ही सत्य पाएमा पौर र साहिरपापत्रकार विपनाम की परिमापा से मिम नही मम्मीनारायम मित्र के सामाजिक नाटक " होना । प्रदि तपारोपितु स्पकम् अर्भात रंगमय पर किसी पार का राम या सीता का प्रारोप करके यो प्रभिनय रिखाया पाता है रस समस्त प्रश्मिा कोपिक की सजा दी पाठीहै।' इस प्रकार समे एक ही तत्व हगाएमा 'पारोपित मभिनय की प्रकिया। इसमे वस्तु तप स्वप हो समाहित हो पाता है पर्योकि यह पारोप पाप की किसी पटना पावि का ही होगा। पास्तव में तत्त्वकी या परिमारा ही प्रामक है। तत्व प्रस्तित्व का बोष कराने के लिए नही प्ररपुत् कमारमक सोप्य को प्रस्ट करण के लिए कपिके मिए अवसर है । नाटक किसी भी पा का सबार के माध्यम से पानों का पमि मग मात्र नहीं है पासा मिमकर मी बिना सौष्ठव के नाटक नही बन सकते। पत यह मस्तित्प-गोबर ही कैसे पर मन मिल पाने पर भी नाटक का मस्तित्व माही बनता । पत यह मानना पड़ेगा कि ती नाटककार को सौष्टय प्रकट करने के लिए निरिष्ट दिसाएँ। बिनम बह अपनी प्रतिभा के बात से नाटक में कमारमाया ना सकता है। पावस्तु की मौलिकता पौर विग्याप्त परिष चित्रण में मूदमता भाषा में स्वाभाविकचा एवं परिमा ही नाटक में कामय के मापपप गितनी प्रपिक कुपतता से हम तत्वों का गठन किया पाएमा एवं बमें सौष्ठव होगा उतना ही माटफ प्ररिक सम्म कहा पाएगा। इस दृष्टि से ही नाटक के पत्तों का निवारण किया पाना चाहिए । बएस्पा के बस्तु नेता रसस्तेपा मेरको को परिमाके भरों के प्राचार पर ही मान लिया गाए ठोमानमा पहेगा किनाटक तत्वों का इस प्रकार का प्रत्यक्ष पिम्मेषम सा नाट्यशास्त्र में नहीं प्रा। परन्तु इसका यह पर्व माहाँ कि उन्होंने इस विधा में विचार ही नहीं लिया । नाटक मिन-बिन प्रयो की विरेचना उन्होंने विस्तार से की है उगी में हमारममता रिखमाईबाए, ऐसा उन्हाप पा इसलिए नई ही संसार नाट्यसास्त्र के अनुसार नाटक का तत्व मानना मुक्तियुक्त होगा। संसहत नायसास्त्र मे कमावस्तु का रिचार प्रति विस्तार से किया पपा है। प्रत पावस्तु नाटक का प्रथम तत्व इमा । परिवचित्रम के विरेचन में माटक मे सम्भावित प्रत्येक पार यहाँ तक कि पास-रासियों के भी गर्म पौर रखभाष का विस्तार से रस्मेन पिया गया है ताकि परिमविष मे पस्मामाविषना म पाए । नायक-मापिका मेरपति विस्तारक मूस में परिष चित्रण में प्रभा मोत्सारकता बाना ही तो है। पत परिमनपणन को उत्तम मानना कितनी पर मोचारमोन में । - संशान्तिक विषम माटम पड़ी युम होगी। प्रत सय तहमा परिम-विक्रम। माट्य-अत्तियों का विरोधम भी पाचार्यों मे मनोयोम से किया है। हम इत्तियों कोसमाम मालोचना शास्त्र की मापा में मापा-मेची नाम से प्रमिहिन किया पा सकता है। प्रव वीसरा तवा भाषा-समी। भमिमय का मी नाटयसास्त्र में विशेषत है। मरठ मे इसका विस्तार से विषम किया है परन्तु यह साग विपर रंगनिक का है। भरत मुनि स्वयं माटका का संचालन एवं मिरपन भी कहे पे इसलिए सनका इस तस्वको विस्तार देमा सामारिक है। अमिनम की सम्पूप पिचना पाने के पापात् उसे गि (माटककार) के उपयोग कामही पहा पा सकता । कायिक सात्विक मौर पाहार्य ता स्वतः स्पष्ट है कि मारकहार से अधिक सम्बवनहीं रखते बाधिक प्रमियम में भी सर प्यार और अन्य की दृष्टि में प्रमुकरण की विभिनी बताई गई है। 'भरत भूमि मे वामी के प्रभिनय में स्वरपास्त्र म्याकरण पा एमास्त्र का परिचय कराया है जिससे कि अभिनेताओं को सादि का पूरा पूराशाम हो बाय । गेसने पार पाठ करने की विधियों का भी समय हुमा है पौर रसों के प्रमुख तो और राों का भी निरंप पिमा मया है।" पठ प्रनिमय का सम्बन्ध रंग निबंधक स मानना ही अधिक मुक्तिसंपत है। परिका काम ठो पात्रों की मियामों और संपादों में स्वाभारितामा मा पाचवाकि मिनेय बन सकें। इसम समारों का कोटा होना मकी पभिनेयता सानु मता पारि मायानांसी के पम्तयन पाने पार पकयोजना स्प-रिमान पारि कमाविम्यास के रिपय है। प्रत प्रभिनम को संसत माट्समारम के अनुमार तत्व मानना पुस्तिपुस्त मही। ऐधकाम सिमको यो समय से अधिक महत्व नही दिया पया परन्तु मारक के कमान में सबोषठा पार पाड़ों में स्वामारिनतापोर पिवना म्मान दिया गया है उससे यह स्पष्ट है कि म्होंने इस तस्ल की परहेनना नहीं की। पत' इस प्रश्पप पिपपन के कारण इसे सारा नाट्यपाल के ममुसार मारकावलमही माना या साया। देयके विवेषम के लिए संसह नाटयणास्त्र में प्रतिपादित काम्पो प्रयोजन पौर म मीमांसा का मिलेपम भरला पोगा। गश्य के विषय में पारस्प पारम्पो में कितना हो भिद रहा हो, भारतीय पासा पपनी समितिका एवं वार्मनिक परम्मरापों के कारण सरा एस्माऐ है । मममम सभी प्राचार्यों १ गुलाब समोर " मम्मीनारायण मिमहामाणिक नाटक - मेवपमे सम्बके पारम्म में काम्पले प्रयोजनों ने बारे में रिपार किया है। उम * मौका मिलेपन करने के पश्चात् म प्रयोजनों को से भामों में विभामिव दिया गा पाई।' पुण्काम्म प्रयोगम से प्रामद भीति, मए परमिट पम्हालयकार प्रादि म्पक्तिगत पात मिठिया और उसके परिपाक से सम्पन्न होती प मोमोपदेशमनने परहारपिए मिसायपये वर्म पिट पारि सामाणिक रात थिरिमा को नामनन के स्वर्गत माती है और काम्प में स्वत पत्रित होती है। वैसे तो मानव को ही मूमभूव प्रपोधन माना गया है परन्तु फिर भी पेप पबित होन पाने प्रयोगों की पहेलना नहीं की गई। प रस-सृष्टि को ही मुख रस्म मामते ए म्यूम सामानिक मोहमनम को भी पीभ गरेम मागमे में कोई बाधा नही। रस विषय मे एक बाठ पर भी विचारणीय है रस भी अपने पुर कप में सामपन की पारना पुमत है। प्रभारी रस मी नोकर्मनस स की माग कसे हए लिखते - 'रम में मोकमपम की कम्पमा प्रामस से मम्वनिहित है। सामाधिक स्पून मसे बही विमुदानिक मुस्मता पातार रक्षा में पासनारमतया मित ममोतिया जिनके हारा परिषी मुष्टि होती । मापापीकरणका प्रावमय बना की पाठी सलिए पहबासपा का संगोपन करके उसका सापारपाकरमरता है। इस सपोकरमरा जिस प्रमिग्नता की यह मुष्टि करवा है उसमे पति की विनिम्नता बिपिटवा इट जाती है और साथ ही सब तरह की भावनामों को एक पपवत पर हम एक मानवीय पातु का एकन। सब प्रकार भाव एक दूसरे पूरक परपरि पौर पियरे पापार पर सफा बनाकर रस की मुष्टि दरले पर एमारी यही पूर्णखा है।" इसलिए ही इस ww वर्मास सिलिन् । पोलोरेखनन मामय ममरति । (स) - - नातिकोनिक सामान लिम्॥ (ap) मरासेयो सारशिशिरेग्ने। नर पर रिसने भासम्मिनोपय ।। (बप्रम) शास-तुम लामदनिय राम पारसेम कन्वरममावा मिले। मरोन मतिमूर्त समाचार एमापनसम्पूपन्दरमा (प्रकाश) . भक्तमयर और मागभाव nि .
सैदान्तिक विरेचन मारक प्रापार पर रस को भी सोरुममनोरदात सिद्धि मान लिया जाय तो मनुषित पर निप्पप निरमा किकाम्प में मारपस के लिए दोतरवार नियोजन होता है एक भार हल गो कि प्रमुख ई एक पिसके परिपुष्ट हाम पर ग्य परिपाक होता है या अपने प्रानन्द प्रास्वादन मानन सहोरर कहा जाता । दूसरा विचार तत्त को स्पष्टत मोरमय सामायिक समितिक पारि पास पोको पुष्ट करता है, पररातु काम्प में प्रथम एवं निपूर पता है और सम्बना के माध्यम से पमित होतानों के प्रस्तिस्वरो प्रस्वीकार मही किया समता परका सम्बल पति से है दूसरे का समान से । मे तो अपने उहात्त ससस म पपिठ और समाहित निम्म नही कहा पा सकता परन्त विपमपन के लिए एक विभाग, रेवा (भमे ही मासून हो) मानमी हो पाती है। पत संस्कृत नाट्यशारररस्य बी पी में पिसमत प्रामम्प पौर मोकमपम की भावना रोगों को ही मम्मुख रमना युक्तियुक्त होमा। पर का पाधार भाव है वो दूसरे कामि विधा । मत उहेश्य मन्तर्मत को उत्तर भाव दत्त पौर विचार कर। इस प्रकार ससत नाटयपात्र में कुम भारतत्प मानमा समीचीन है-वस्तु परिवविधा भापा-ती तथा रेप (जिसमें पाप व पारिवार का समावेध है)। पारधारय नामसार में परस्त में नासदी अंग मानेकपामक परिष-विपन पर रखना विचार व पप विपान पीर गीत। इसमें विचार वत्त मपमे म्यापक प्र में भाग ताव को भी समाहित पिए हप है। परिवार उत्तम का अर्थ प्यापक समै बुद्धिमत्ता पायाम्म होते हुए भी मार तसा अन्तमान है। परापमा और पीत ना मापा ममी र पम्तर्गत प्राव है। दृस्य रिपान होसपे प्रास्तू हो पपिद मास नहीं रो। उनका कपन । 'माटक भूनव काम्प है रंगकीमम से उमरे पापन में वृद्धि पाप हावी पितु मूम प्रमाव के लिए बा मनिषाय नहीं।" पर्वाचीन पारस नाट्यशास्त्र में पिामों मे नाटक के हसल माने है -वस्तु, परिष-विप पोपकपन को दस-नाम पीर परश्य । मरे पति- पिता पनि पात प्रतिपात का भी प्रपिक पात्त प्राप्त होने के कारण निसीसमको भी ममम म तल मान सिराहै। १ भूमिग वर भवामपाल समय १.९ ११० . पी. से.११ २८ मामीनारायण मिप्र सामाजिक नाटक ने अपने पम्प के प्रारम्भ में काम के प्रयोजनो के बारे में विचार किया है। उन के मतों का विश्लेषण करने के पाचात् इन प्रमोशनों मोदो मार्गों में विभानित च्यिा पा सकता है। कुछ काम्प प्रपोगन से प्रानम्म प्रीति सम पनि पम्पश्चपकार प्राधि पतिपत उपात्त मिडिया और रसके परिपाक से सम्पन्न होती। ऐप मोकोपोममनन, व्यवहारवि मित्तरमध्ये धर्म हित मादि सामाजिक साठ सिरिया है जो लोकमंगल के पासनेत प्रादी है पार काम में बव पश्चित होती है। वैसे तो मानाय को ही भूमभूत प्रयोजन माता ममा है' पर फिर भी उप प्पम्बित होने बामे प्रपोजना की अबहेमना नहीं की गई । पद रस-सृष्टि को ही मुख्य उदेश्य मानते पनि सामारिक सोफममत को भी पौन म मानमे में कोई बाधा नही । रस के विषय में एक बात पार भी विचारणीय रस मी अपने सुटरप मे लोकमपन्न की भावना से युक्त है। प्रसादनी रस रे इसी नोकमनन स्म की थापा मावे हुए है- 'रम में मोममयत की कल्पना प्रश्न रप से भत्तमिहिन । सामाणिक समय से नहीं किनुपर्मनिक भूषमता के मामार पर। रसपाद में पापनारमाया स्थित मनोवृत्तिा जिनके बारापरिपकी सृष्टि होता है साधारमीकरण के द्वारा मानतमय मा श्री बाती सनिए पहपासना का संगोपन कर उनका सागरमीकमरठा है। इस समीकाम के द्वारा मिस भभिन्नता की परभूष्टि परदा है उसमे पछि की भिमटा शिशिमा हट बादी है और साथ ही माता की भावनाओं को एक पपन पर हम एक मानवीय बस्तुरसत है। सब प्रकार के भाष एक दुसरे पूरक कर पति और भिम पापार पर सपा माकर रस की मृष्टि करने पर सरकी यही पूर्वता। समिए परिस पार-पर्म परामापुर्व निपुति सिनन् । मोमेरदेशबनने माम्बोज मटि निरा) पामा-गर्मामो मं मामु च। पीति बोधिसमम निभवम् । माया-बासे कपात पादित शिवराये । मुपा पर लिए सम्मियोपोरामुम।। (मम्मप्रसा) yw- बामग्रिम टिम पामा पेग बन्यत्मसाय को सतत प्रयोम मौतिपूर्व तमनरपेब रमालारनसमासून नगरियरमा () भार कमी पाव निकम t १ २ - सेवास्तिा विषम मादक पाथर पर रम को भी सामंगलमीरात सिरि मान लिया मापता पनुरित म होमा। मत निप्पं निरसा शिकारप में साक्र्ममस के लिए वो तत्वों का निपोरन होता। एक भाग वस बोकि प्रमुएई एक रिमो परिपु हाने पर ग्म परिपालोता है बामपन मामतरपारबाइन मनमानम महार हा पाता मिरा विचार हत्त यो स्पप्रत मोरममा सापारिक समितिक प्रादि माएर्पोको पुरा करवाई परमतु काम्य म ममम एर निगूर रहता है और म्यम्पना के माप्यम से पनित हता है।मों प्रस्तित्व को अम्मीकार नही कियारा साता। एक का सम्बन्ध पपिठ मसर का ममार साहो अपने राचसम्पपप्पषितौर ममान हिन मिन नहीकामा सकता पर विलपन के लिए एक विमा बा (फ ही यह म्यूस हो) माननी हो पाती है। प्रत सहा नाट्यशास्त्र के गेप की पर्श में व्यक्तिमत पानम्र पौर मोहममान की भावना दानों को स मम्मुल पाना मुश्तियुक्त हामा। एक का मापार भाग है हो इसरे का निपूर विचार । अव उपम क पन्तमतको तलाए मार तस्स प्रौर विचार तस्क। म प्रकार समा माग्यमान में कुम पार उ मानना समीचीम पातु परिपरिणम भारागैती तपा रेप (निममें भाग व तपा विचार का समावेश है)। पागलाय माग्यमास्त्र में परस्पू में नामबी के हग माने (मानक परिवपिन पर मा रिपार उत्सव रिकाम पीर मीत।समें पिचार उत्त पने प्यापक प्रर्प म मार हत्त को भी समादिव पिए हुए है। "विचार हरयाप प्यापर है इसमें दुषि तत्व का प्राधाम्य होते हुए भी भाव तत्वका पसार पर रखना और मौत का मापा पीक पम्तगत पाते हैं। क्य पिन कोस प्रास्तूही प्ररित मारण नहीं । रमरा कथन है 'मारक मा काप है, रम-कीपन में उसके प्रारूप में विपरस्प होती है किन्तु मूल प्रभाष मिए मह प्रनिवास नहीं।" प्राचीन पारबारव माट्यशास्त्र में निशानों में मारकरे इम्प माने । -TET, परिष-विषम पोपकपन पैकी रेप-माप्त पार रेप । म पति- रिक्त पद पात-प्रतिपात का भी पधिक मात्र प्राप्त होन के परम म्मिीसी में इसको भी समन मे तल मान मिया नमय भर का MORE .नोन मामीनारामम मिमकेसामाधिकमारक हिणी नाटक त पोर पापबारम रोनों नाट्यशास्त्रों पे प्रभारित है। संस्कृत नाट्य परम्परा इसकी पतृक सम्पत्ति । मोर पापात्म माटों की इस पर गहरी छाप है। मत दोनों के प्रभाव के पम्तर्गत हिन्दी नाटक का विकास हुमा। सात नाटक गय तत्वको प्रमुख रूपों में से हिन्दी नाटककार में भाव त्तिको उद्देश्य के स्थान पर एक साधन मान लिया है। केवल विचार तरल ही उसका पमिर्पन रागमा है । ससन्त माटक का भाग पत्तो पपनी रस सिक्त प्रवस्था में मानद सहोदर कमाता पा पर हिन्दी नाटककारारा रिचार पो पहरा करने माम भाव कप में ही सीमित कर रिया गया। इस प्रकार नोएस में विचार की स्थिति प्रभम पौर माव की हितीम हो गई। प्रत हिन्दी माटको तलामा विवेचन करत हए गयो मन्तर्गत भाष पौर विचार को प्रमग ममग मानना भपिर समापीन होगा। फलव हिग्दो माटो पाच तत्व हए-पानक परिष-विषम भापा भी मान वल तपा गय। रेप के पन्तर्मत विचार तत्व पाएपा बा कि प्रमाल होने पर ही काम की बस्तु बनता है। गिस्प-सगठन राप्रापार नाटक का निपूर गेय सभी तत्वा म मरितप्ट रुप में म्पन होता है। परन्तु कमी-कमी नाटककार अपने प्रमिप्यम को स्पष्ट करमे के लिए किसी एक तत्व को प्रमुखता मापार बनाता है और ऐप पत्तों को भी उसी के अनुकस स्पष्ट करता है जिसके कारण नाटकों के पिस्प-संगठन म मी मन्तर हो पाता है। मिन्न मिग्न तत्त्वों को प्रमुखता देने के कारण नाटकों के गिम्प-पठन पाचार पर वर्ग बम मर ।। इन विभिन्न पिस्प-संगरटलों म प्रत्येक तत्व के स्थाप में भी स्वाभाविक पन्तर मा पासा से पानक एक तत्व है परन्तु रमसृष्टि केमेष्य में इसका पाप भिन्न होता है पर विमान को प्रमुखता से समप इसका स्पस्म भिन्न विचार प्रेपन में भिन्न और समस्या विस्तपण में सम्मा भिम्न । मत वसों के विधान से पूर्व यह मान नेमा पायरया होता है कि उस नाटक तत्व किस पापार भूमि पर करे? माटाकार का पिस्प-संगटन में गया एप्टिकोप है। उसने अपने अभिषयमो पात मारने के लिए रिस पत्तको प्रपानतावी? पारि । इसके प्रमाब म नाटक का उचित मूम्पारन नहीं किया मा सरता। एक गिल-मंगठन में मो पुप है वही एसरे मे दोष हो माता। मे पान में सीमित मपर्प रस प्रमान मारक पा गुप है परन्तु पटना प्रधान माटक में यह माटो पिम्प का परिचायक है। भवः ततो विवेचन है . संसान्तिक पोषम भारक पूर्व विभिन्न मापार भूमियों पर प्राकृत माटम-पिसों का विषन अधिक समीचीन होना। रस-प्रपान शिप-संयन ऐसात मारकों में तरलॉक समनापामार रसा। पाठक या प्रक्षक हाय को रसमोर रसमड़ी पृसियों का आतीकरण ही नाटककार का प्रमुरा नस्य बा। साधारणीकरम ए मार में प्रस्ताहित प्रसन्न विचार उसके माप-पत् को वस्तु बन पाएँ इस उद्देश्य से ही माटककार परममित कर मिामत का का। पह हिस्प का विकार करते हुए रस परिपार पानी सारी सामग्री जुटाईबादी दी। सीरम स संमत भारको मनामक विम्याम में तीप सर्प का प्रभाव है. पति पिम मुस्पात बम एक प्रापई परिमाका भया किया गया ! बार में मापा के लिए रम के मनुका कृधि के लिए प्राह है दाय एवं पूण्य कपामा के विमान में भी अमुल प्रापार पहील भावारमा एर मार्मिक स्पसौ दो दृश्य प म गमा पाए मादित हिरी नाटक में प०पि पूर्णठ रस प्रामार पर घिस्प-सगठन नहीं किया परत मिशन-पम में भाग भी रत का प्राधान्य ही प्रादर्थ है। समाज में प्याफ बौदिरता एब नामयिक समस्याओं के प्रभाव के कारण परित्राम काते हुए पसमा बटनाओं का पपन परत ए विचारों का सम मिमम रे मरना सरास कि जिस कारण हिनी नाटकमार रागभिप्या भास की स्थिति तकी पहुँचता । तत्वों की पतग-पल बिसेषताएँ बसावे एए यह स्मारकर रिया पाएमा कम मटन के पत्तन पम्प करने का सपना होता है। सह सही म्पष्ट कर ला भाषयक लिहिणी मारकमा पद मार प्रवाम सरा सूनानी पोकाम्तिकापों के मात्र प्रधान घिस्प-संगटन मे मिल है। यूनानी सोकान्तिकापो का प्रपर प्राचार काम भार कमाकरण समानास टोकशापही मनोविकारों का विरेषन मा विशावाहिन्दी मारक संसय नाट्यशास्त्र की परमरा के काम यूनानी शोकारितामों के परित प्रधान प्रिनगर पर माटमकार अपने प्रमिम्मर को रिम्पत करने के लिए प्रभुप स्पधे पर पापप को अपनाता है और पेप पत्तों का संगठन पी उसी अनुकूम परताहीमा नाटक पिस भी पि से परिप-प्रधाम नाटक कमाएका । पारवाय नाट्यशास्त्र म परिण-पिएको रिस्प-सेमा काभाशर मान पाने १० मरमीनारायण मिमसामायिक मारक नाटककार इतनी सूक्ष्मता से परिम-सृष्टिकरणे है कि उसमे मामिकता एवं मान स्वयमेव मन्तकोमाता है। मानव सभाष की पन्त प्रवृत्तियों पौर समाप का निस्सम ही उनका एकमात्र सध्य होता है रिऐप परिस्थितियों में मानव स्वभाव की पहरी छानबीन कारम सम साहित्य मे स्वामित्वमा गाया है। इस बम म प्रभाषित हारर पिपी मारककार भीम-पिथपरक परिष-मपि की पोर पाइष्ट एमा । परन्तु सा कि परत स्पष्ट किया दावा है हिदी नाटक के चिन्तन-पस मे पार मी साप्य रूप से रस का ही प्रापाग्य है। मत यह परिण पूष्टि मी पाचार्यो की प्रासोबना में मुफ्त नही । नम्यामारे पापयी इसकी दुमना मारतीय रस तत्वक साप प मियते -- नाटक में परिवत्रिम पौर समाप निरपन प्रस्तत साधनही साध्य नहीं । मनोविज्ञान के पापार पर मनुष्य की सूक्ष्म पितामों सामिग कितना ही मामिक क्यों नहा पाम्प में पस्तु चित्र मात्र है। याकाम्योपयोबी कमी होया पर कपि वा नाटककार को मूमबर्वी मान-सत्ता या कला का प्रप बनकर पाये काम मे पन्त न हो पाए। मानव प्रकृति की पावागी सोग मन्तत विहान का पिपई परिमी विधारण भले ही से काम के लिए सब कुछ मानस परतुबह सारी मामिस्ता उपा शामिमता कपि स्पना का समुचित मन न होन पर मिरी निरर्थक भी हो सकती है इस प्रमिमा तप्प को भी स्वीकार करना हो शेया। ' प्रयारी में भी मस्तिषम्य मन्तर्गत किए गए परिष भटम कोरस म पापात पहुंचाने के कारण साबन ही माना है। उनका कथन है-"या विचारणीय है कि परिणाम का प्रमानता देन पाने ये दोनों पद रस से कहाँ कसम्म होते हैं। हम रोनो पक्षों का रस मे सीमा मम्मत तो नही विखाई देता पर्योकि इसम बर्तमान पुम की माननीय मान्यताएं पक्षिक प्रमाण गम दी। जिधर्म पक्ति अपने को मिस स्थिति में पाया फिर से साधारमन ममेर माती कापना रस का साबारमीन रन से एपमम । रतमाम युग बुटिबानी। पापावत से पुनको प्रत्यक्ष माम बना पाए। उसके लिए संपर्प काला प्रमिवाया। भारतीय प्राचार्यों को निराम श्री कनरत पा उसमै रमा-महानुभूति की फसमा से अधिक की रसानुभूति । वाहोने प्रामेक पारना में प्रमेर निस्किार पार मेने को मुष माना। पर इस भारतीय रमबारका भारतीय दर्शन से सम्मान समारपे सनिक साहिल रापो गावी पर पान और माता पनि मकर मार पप स्वर पैवान्तिक विषन माटक । इपरे निष्कर्ष निकाससे कि “प्रारमा की अनुमति प्यक्ति और परिष-वियों को मेकर ही सपनी मुष्टि जी रही है। भारतीय दृष्टिकोबास के सिए रम परिष-विमोको सामन मानता पहा है साभ्य नाी।" पति-प्रविश्य अन्तर्मत किए गए परित्रावन की सामाजिक उपयोमिता भी। यह पानव समान की गहराइयों को प्रपर र समान में रमके प्रति सहानुभूति उत्पन्न करती है होरी के परित्रांकन द्वारा पिसान के प्रति समार की सहानुभूति उत्पन्न करना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। परन्तु यह या पौर सामूति भी माखीय वर्गम के अनुभम म होने के कारण प्राश नहीं ऐसा स्पष्ट मत प्रसादी का पा-"सामारिक इतिहास में साहित्य-मुष्टि के द्वारा मानवीय बासनामाको घोषित करने वाला पश्चिम का सिवातम्यापारों में परितारा ममाम पाया, वो साहित्य में संसोधन का काम कर मिया । श्या पौर महानुभूति उत्थान र देसा ही उसका मेयरहा है और है मी। वर्तमान साहिरिपा प्रेरणा जिसमें मस्ति-रिम्प मौर पपार्यबार मुम्म है-मूग में संसोपनात्मक ही रहीं मक्ति से सहानुभूति उत्पन्न कर समारया ममोकन है पौर काही समार की दृष्टि से व्यक्ति का किया और सहानुभूति सत्पा करके भी पाएमको प्रषिक प्रतिषित करता है निरापा को पति पापय देता है। भारतीय दर्धन में मिसन प्रमागत की सृष्टि मुरम है। पर सारे निपम से स्वत स्पष्ट होता है कि हिम्पी नाटक परम्परा में रस की स्पिति का पम्पम स्पान होन के कारण परिष-पिता की स्पिति प्रपेमार मौन ही हीसमें परिवनि की दृष्टि म पारचात्य प्रमाब परराय पो। कपाल परराफना-प्रधान विस्यमय पापारय मागमात्र में कमानक को मापार तल मानने वाला एक प्रमुत्त वर्ष है। सबध प्रबम परस्त ने इस महत्व पराम करते हुए मासरीकी मात्मा कहा था। उनका कहा है, 'पावस्तुमासदी की प्रारमा है। इसके कारण है मासी मक्ति ही जीवन की पनाति है। मौसम कार्म-यापार है। बिना कारं-म्यापार के आसरी नहीं हो मक्ती पाहिबिना परिण-चिपके हो म पारिम्प-मेगा मापम विचार और परारती से पपिका- निक प्रमाण पहनामों का मारमा एफ ए करवा है। मितिविपर्यय १ भमरा तथा मनिषत्र .
३४ मदमौनाराम मिपके सामाणि मारक पौर प्रत्पमित्रान मौकपामक ही मंग।" इसी प्रम्य परपी पिनों ने भी कयामक महत्वका निकग से प्रतिपादन किया है। पमा प्रबन (Action speath louder than the words) कार्य यों को प्रपमा पमिकमानी होता है। रोना पीडाक कपामा महल का सम्मेवारते हुए मिलते है-"चामक में दो भार मिहियापाई माटकीय सपोमन रे मोर साप हो साप पर्ष एवं नोस्प की मोर टिका सापन भी।" इस प्रकार र पारस एवं विचार व बोगों कापण है। मैप्यू मारने कयामक के पयम पर परमिक बम रिया। उसके दिपार से कबामक ही प्रग्यतम होता है जो मानव की मूम पत्तियों एवं मानों को प्रभावित करे और कात के मुक्त होकर पात समरनामों से समरो।' हिदी मरटकरार मे बस्तुको मषित महत्त्व ने काम गर्ग से भी प्रमाण प्रहण किया। वास्तव में सात नामशास्त्र में भी यस्तुको कम महत्व प्राप्त मही परम्तु मह तापीन है। प्रत हिन्दी में मौ बरतु वत्तको रस से पपिष महरप नही दिया गया। प्राचार्य सम्पासारे गारपेयी भारतीय नारक और पाचारय मारको के वस्तु उसकी तुपमा पाठे इए निमते !- 'भारतीय नाटक नाट्य-म्यापार की टीपौर मविधीस बनामक पप में उत्तमे 41 नाटक में रमना मानते में पटनामों सामरोहमामानहीं।" परन्तु दिल्ली नाटक में बस्तु उत्त रमापीन होते इप भी पारप हास्पि के दस बजे से विचित प्रमाविव हुमा । प्रत हिम्पी मारक के बस्तु तत्त कारण स्वरम बना पड़ मारकतों की प्रामीचना में स्पष्ट किया बायया। । मृमिका परर काकापUR अपद १. सं १ . Pot has two spects. It be concept of drink ecstruction and tho . derket for the potpuno don or ibo mapie -Loonlucock The Art of Drum Ar 194 For Anroll, ther for Astou, the plot be the first thing Ha firm is to relect on tutti col suo uctionmentain the monewellent 1 Andbe repliee nlod which most porolony upon to the great propery bus ut rections to do retary fathokh pobet ferescoth to the face od khan todepoodcut attor -lumaniansortiumtarp266 मानिक मारमामालारे समपेयी, प.स २५ सेवामिठा विरेचन मारक समस्पा-प्रपाम निस्प-संगम पापपारप मादपपास्त्र में दापित यमापारी नाटमदारों में नाटके पापार तत्व से सरया बदल दिया । सौम्यादी दृष्टिकोग से किंपित अधिक सामयिक समस्यापों की पोर उग्मुराए । प्रेम को मानदित दरमा उनके लिए यस अपनी बात को सुनाने लिए रोक रखने का सामन पा बाई काका इस बारे में म्पष्ट कसम है कि मादक पापुछ भी है मा भोला मगासीको दो- पढ़ाई पटेतच मनोरनितरइससे नाटक काप सर्वथा बदल ममा। इसमें बारिता का समावेश हो ममा नाम का प्रभाम्म विचार तरण व्यस्तो पया और मानव हलो पात पापस सूम सापम रहमया । इस बारका दिमो नाटक पर प्रस्पषिक प्रभाव पा पर हिनदी में भी समस्या-मारकापी एक पारा पसी हिन्दी की भूमी मारम-भारा पर मी अमका प्रभाव पड़ा, जिसमें रस तत्त्वता पमुम्भ रा परन्तु माटक में मामयिक सलाका सिपप भी होने तमा । सामाजिक मामा को कर लिये जाने बाम मारों में पारवान नाटकों को छोड़कर, पामयिक सपोनिया का तत्व अधिक प्रय हो गया । इनकी पृष्ठभूमि में अधिकारी तर्क पे पातु माटर में वे माव पापित होकर ही पाए । इस प्रकार हिदी नाट्यशास्त्र में विचारतोकि संत नाट्यशास्त्र प्रभान एवं निमा पापा पपिक मयत एवं प्रति होगमा पऔर एक स्टाप रप से तत्व कमाने का अधिकारी हो गया। पारसय मेहमी विचार तत्व का पर्याय ही पाचात्य तयों में गेम तत्व है। इसस सरा रिस्तुत किम इसी प्रयाय के दूसरे माग में बय से किया गया है। विवारपाल सिल्प-साउन पारपारय नाट्य साहित्य में एक गर्म है बो मारक पापारभून उस मनु- पूरनिचारों का प्रपग मानवायर्ग प्रमुख नाटकमार टी. एस. इनि- मटा मव है एकोहल रिकारों का सम्म प्रेपण ही नाटक की सफलता की कमाटी है। बहरम हत्त को इतमा प्रपिक मातले है कि परियों की मम्- म्बरता को भी इस मूव पर सहपामे के पस में ।' इसके बारे में इमिरट साहब सकिनेमा उमी पपानका मन HApytambhutiahtereumodtepce forthobesand . ball on the more of the there." "He traxmanusyaflow chasmto briant commistantly butody whetat toderpet coosistency* - Drina From Ibron to Enst Volt मापीनारायन मिप सामाविमाटक करता है जिसके साप पमकी अनुभूति का साम्य होता है। प्रत या उस रिचार पो मभिम्पात करमे के लिए पपा बीचम में से पानों का पवन करता है पोर रनमें अपनी अनुभूति का मापेप करता है। परन्तु कमी-कमी देवा भी होता है किया पात्र मेहक की ममुभूति को पूर्णत पमिश्यक्त करने में असमर्थ होता है। इसलिए यदि से स्वतन पर दिया बाय तोमाटो पिचार के एकीकरण में पापा पोचती है। उनका स्पष्ट मत है कि नाटकबीरन नहीं बीवन का पकात विचार इसलिए पासपरिष-विपकी सत्यता की सपेक्षा करके भी सममें समाहित विकार का सफल निर्माह होगा भागायक है। यपि इस वर्ग का प्रत्यास प्रभार हिन्दी नाटा पर नहीं पका होमा पर्योकि इस वर्ष की प्रविधि की प्रग्य विपेपताों का हिन्दी पर पमिष प्रभार नही तो मी हिम्मी नाटक मैं दुग के प्रमाण के कारण विचारको प्रमुखता स्वाभाविकप में मिम परिसर पेपन में उसके लिपिम पों का प्रस्तुत करने के लिए कपानको विन्यास को तरनुप नाममा विशेप दृष्टिकोप माने परिणों को परिष-मुष्टि पारि अनेक बातें इस वर्ग के भाटकों में रेबी पा सकतीस वर्ग के मामिान एवं विकास के लिए हिन्दी रमकी पविकसित स्थिति भी एक कारप।म्गि के प्रषिकांप पपेमारक पर्मबको दृष्टि में परमही मिले गए। पत माटकों के पास होगामे परमब प्रमानारगपिन्तन का यह विकास स्वाभाविक हो । एकीकृत विचार जिसकी अनुभूति माटरफारमे की अपनी सफर पमिम्पक्ति के कारण पाठक के दम में पैठ बाने के लिए साभाविक रूप से समर्प होता है। इन नाटकों के विस्प में परिवति दिपार को मार ही होती है। इनमें पटना परिण प्रादि के पापा पर अमिति रने से रोम पिसाईट है मिसके कारण माटक का रचित मुम्यांशन नहीं हो पाता । नामी नारायण मिमप्रनेक मारपसौर्य के मम्तव मावे है। हिली मारक क तस्व पारधारप मारक की भिन्न-भिन्न प्राधार मृमियों विहिप के पारा माव सपा सप्टो पाठी हिन्दी नाटक के मापार सत्तपम रस को को पनापामा भिन्न-भिन्न प्रभासकारण एक ऐसा मिपण हे पका, पोरस्त पापार तल रस से मिशन है जिसमें कमानकरस्पारि रस मनु इतनही। कपान में संबई की मात्रा अधिक परिणामति पितरेग होडा विचार पल पषिक प्रमान नहीं प्रौर मी एवं मापा मे माट्स पिरों के मनुमान के साथ-सापनी प्रधानता हो ।
संगन्तिक विषन नाटक हिन्दी नाटक विकास में पान की स्थिति यही है। इसके सम्मुख पापर्ण नाटक के एप में स्पपि हव नाटम परम्परा ही है जिसमें विपार पमिझान पान्तम' 'उत्तररामचरित और 'महाटिक' मादि प्रमुख पौर निस पर हिन्दी कारकको पर्व भी समापि इसके विकास में एक्सपीयर इम्सन मा भारि का भी पूरा-पूरा पोम है। हिनी नाटक की प्राचार भूमि ससत पणे पाश्चात्य दोनों माट्रमास्त्रों से प्रभावित हो एक सत्र मात्र का मममम्बा कादी हुई पसी। मत इसके तत्वों मैं नुस्मन नाटकों के तत्वों से भिमता पाई जाती है। कमाना की प्रथम विपना पाकी पौमिकता है। मोमिकता से पभिप्राय कपा के विषय से मही प्ररपुर उसकी पमिष्यक्ति कोपन से है। कपा का विपप यदि विहाय मोकमाता या बनभूति से मिवा गया है तो यह मेकर की बसा की हीनता का परिचायक नहीं क्योंकि नाटककार का काम वोतिपुरा में मारकीयानाकर पपनी मानिकता का प्रान करना है। महाभारत - सापामानको कामियास की प्रतिमाने सपा कायाप करके एक नवीन सरे दिया पही रसकी मौलिकता है। पान की पूसरी पिता उसकी पूर्ववा है। नाटककार उतने ही पिपय कापन रखा है जो उसके दोष को सफलता से गहन कर सके। उसकी पूर्णता रामक समुषित पठन में है। इस पन्विति के बारे में प्रसिद्धिान् श्रीम मोसन नियते । पान बस एक और सम्पूर्ण कार्य को अनुरुति है। इसके अंगस प्रकार अमित अनुपात में पासा मयूष एक प्रषित हो कि किसी भी प्रकार से गिना समपति को भति पाए किसी अंग का विशेष एवं परिवर्तन सम्भव नहीं कमाल के दिम्पास की पोर संसात एक पारचात्य दोनों नाट्यपारों में प्रषिसम्मान रिमा है। संसस माट्यधारण मनुमार माटक में एक कार्य होवा है। उस कार्य को सम्पन्नता तक मिया-प्यापार को मुप्पमस्पित एवं प्रमिक 1 The table k cited the lustation of our site and perfect 100 Mompeman tojood and it topethern batNosatbe aracters are bo tored ot takto ry without impairiyar totalbehole of old there a proportlooubke uptode htbeneumbers, (Dea Jomsoa Tuber Dxcorte de apon Mia rod ato) -To Evropen Theoria of Daina Lt. Cut Ppt 109.
सामोनापयप मिपके सामाधिक नाटक सप से रिण के लिए उ पाच मार्कों में गिमात किया गया है-भारम्भ, प्रपल प्रापपापा नियवाप्ति पार फसायम। इस कार्य-म्यापार की पिया के सामान संबटन भी सम्परा रहे इसलिए मानक के माम संगठन में भी पांच भेव किए गए हैं--(चिन्हें पर्वप्रहतिया कहते है) वीर विन्दु, पताका पररी पार पार्य। इस बाप कयानक संगठम भार प्राप्तरिक काय-मापार का विकास समान गति से पर समरम्प से हो इसलिए दोनों के पमानान्तर भर्गो गो परम्पर निजाम के लिए चमत्कारी स्पसौ(सपियों) की मोरना की यदि यह सरिप्रया कार्य की गति मीर पस्त कविकास को परस्पर समरखती है। ये सम्धिया मी गांच ६-मुप प्रतिमुप गर्भ गिमई और निम्हण । इस सिरप से स्पप है कि माटक पिपास की भोर स्मित प्रापार्यों में मिप पान दिया। एपस्तु विम्यास से सप्ट है कि कपामा में एक कार्य होता है बाधाएँ भाती है समर्प होता है और उसके पाबाद पार्य की सिद्धि होती है । परन्तु इसका पारपात्य माटर संपपरम्प से एक मौषिक मेर है। पारपारय मादयशास्त्र में पचप कपारस्तु का प्राय माना पपा है। बिमा कोरिया मारह की बचा (माटकीय पा) का सही नहीं शरप कर सकती। भी हसन इसके महलको प्रापित करते हुए मिस नाटकीय जपानकर लिए संप कैसा भी हो एक स्वीत मनिवार्य सत्व है। समय के पाएभ से ही वस्तुत पानापारम्भ होता है और इसकी समाप्ति के साथ हो मानक सम्पन्न होता है। इसके स्मरूप की पर्या परते हुए में मितवे है कि प्रत्येक भारतीय मानकमा उभर किसी सपप र होता है, यो किदो पश्तियों मागे पपमा हितो के टकराने से उत्पन्न होता है। इस प्रकार पाक में संपर्प का तस पोनों ही मादधाम्नों में मामा पया है परन्तु हिर भी परे सम्म में एक मौसिक भव है और इसीपारण कसानक पिपास में भी मेव हो जाता है। भारतीय नाटक में संपर्प का तर बल प्रपस्न नापकाविस्पा से मकर प्रापपापा नामक चिस्या तक ही . - . Sono todo cook borcier tbe dalam tad iery buckbode of drac Hory Mut the peole of the coat the real plot teptes who coactolatbal plor each -Hation An IntrodomsontothosotyotLL. 199 Estry drama kory aun out of some coolat - Hot chart of oppondlodindostorpauloosrtemsta -Hotton Apterodostlo to by Shody of Pep सकाधिक विषम नाटक पनिरिषद स्थिति में बसता है। इसक पाए तो प्राप्ति की प्रापर के कारण संचप के साप में प्रस्तर पर जाता है। परन्तु पापबारय माटको म तो यह पप या प्रारम्म के साप मारम्भ होता है और क्या के अन्त के साथ इसका पन्त शेतापार प्रधिकीच प्रसिस कपानका म तो यह म्पमितगत पारण पर नता है और भाताई और पूर्ण मध्य का यह संपप गायक मौर प्रति मारक के माम्पम से हाता है। इससे स्पिति पन्त तक भनिश्चित एती है। इस प्रकार दोनों संघर्षों की तुलना करते हुए एक को विरास कहा सता हैवा दूसरे काला एक मे गीरन का स्वाभारिक समर्पमव चित्र है तो दूसर में परबीन मय पंच। पार इस मन में कोहन पौर विशेप नम से हमार की स्थिति का होना पनिवार्य है। मबारे म भी रोनस पी का कपन है कि भाटकीयता के वास्तविक समन बनाव भोर कातहत महा। प्राय मे कम से ही रत्पान होते । परन्तु सदैव ऐसा नहीं हावा पसे किट कम माम है पर पनाव मोर कोतहत नहीं। बहरम उसी स्थिति म प्रकट होता है कि एक-पाप पैर से ही देश का निषेप होने पामा हो मत काम रही स्पिति नाटकीय होपी इमरी और एक रेलगाड़ी एक टूटे इए पनकी पोर पूर्ण गति से पा रही। इसमें कोई नयमही परस्तु तनार की पपेपा हाने के कारण यह स्थिति मारकीय हा मकती है। इस प्रकार मातीपमापके मंत्र का पापार विकास पौर पारात्प माटर के सरपं का पापार साय एवं कौतूहल-ममा दन्त है। la tbe bon clementary scd smout popular type of wory wc condi utos personal for the colhiog # betweto food and u embodied respectively to the hero ad the bar of the place. -Hedsco An Introduction 10 ibe Stody o Lulae Pap 189 It boomooly bold that cool au mata dnm, but spre Led paniederly loorlop in the treet Apoptoth, They both are from Ookt, of course bat tot 9, 100 copia is only drottle when they do. A akce mosch tarotres i tot, rt with mout morlable teostor, u fondla poctitori na to obent u only u dramelo conitant particular soramento su the pace att and take on the babe Do te ober band sasha mon Annathe theat trulo morty at tpeed ionndi brota redoa? Ya the booty kot petmin bery, do coatia Ronald Pokok The Art of Drum, Py 100.
सामानारायण मिश्र के पाग्रामिट माटक पर्व इस मूम मेद कारप दोनों के कपा-दिग्मास म भी भर पाधाना सामाणिक मत मास में कार्य की पति की विना पीये कीमा की है पसभी पा कार्यावस्थामों-पारम्म प्रयल प्राण्याठा नियताप्ति पोर मागमको रेखाचित्र द्वारा इस प्रकार समम्बा सादा nAM कथाका पारम्भ (१) रेखा से माना ममा विसपे केवम काम के लिए पौत्सुम्य मान होता है और प्रप्राति की वृष्टि से इसी स्थिति में सभी प्रमुख पाों एवं पटनापों बोरों का समारोप होता है। कलापम का रेसा लिनु ऊँगा इसलिए माताईयोंकि कार्य का पर्व होबो पहिलो प्रसस्न-साप हो इसलिए कार्य की मिति को प्रारम विन्दुम्मर माना है। (२) रेशा में प्रयल पारम्ब होता है।रेमा की पाठा संरकी पोतक है। रेखा पर की भोर पाती है तो सातादीपुरक है और नीचे की पोर मसफलता की। मग पप भी तीताई महिमपा पपार प्राप्पाहा को स्थिति हो पाठी । म को पीवता कम हो जातीपौर रस प्रकार सफलता की मासा साली पाती है और मन्त में माप की स्पिति प्राप्त हो पाया है। पाश्चास्य नाट्पमात्र में कार्य की गति का नाम समामिल है। एवमें समाय माता पाता है और न ममी नायक सफल होता दिखाई देता कमी प्रतिमाया मार मात्र में संभ की गोलवम रिपति पर पोकर नायक सफम होता या प्रतिमाया पौर नारक समाप्त हो पाता है। इसी प्रम के विधान की पोर नाय काये हुए बीम पमिन 'भार मभिप्त पारपाय विचन (Summary Potticot the Drma) में निमोहक 'कामरी मारमा रोगों में उत्तम मानक में एक से पापक प्रमुग्न कार्य नहीं होन्द पप गीष कार्य रसी से समय ही भावति' (Unity of Action) पावा। प्रपप प्रा में पारे प्रमुख वन्तु स्पष्ट किए माणे सरे में उसम्म पारात्र होती। वोहरे में माता सतारे सैदान्तिक विवेचन माटक में स्थिति निगशाप्रद हो जाती है और मन्तिम मक में गठि दुमती है। 'इस विग्यास को रमाविषबाग इस प्रकार म्पप्ट किया था मझता है -VAJAVM A कवि से पपा प्रारम्भ होती है यदि म पर बाकर कपापी परिसमाप्ति होती है तो यह प्रामहरी हुई और यदिन पर ता कामरी। प्रपम प्रकल में कपा सब तन्तु स्पष्ट हो पाएमे समिएम बरेला मीमी है। बप में उम भमा मातीए में म्याकुमता पार एव में सपप प्रतिम सीमा को स्पर्य करता है यदि कसा भासदी है ठो म पर कमा समाप्त होगी पौर परि कामदी है तो म पर। हिदी मारक का बिन्याम इन दोनों प्रमाणों से युक्त है मौर संसदमाटर की पार रसमा रिप मुकाब है इसलिए उस मरि रेपाचित्र पारा पिनामा हो तो उसका पइस प्रकार हाया म AAR क मारक मुगान्त हान पारण यहोया सदरा पर की मोर ही प्रवृत्त होगी। > lothar tragedies and come i food plot pret bad more than oft petoetpaltloc, toth the otheti ett related. This bar a termed Uoky o tloo yy x y Inttefit act the rrincipal points of the fory art de sint in the record complicalon het, in the third the trootte deepezs bibe fcunt, malers Look deretur in the dih ibe tootloored. -The Europeo Tt coria c Droi AH Clark ४२ मम्मीनारायण मिपके सामाविकमारक कुछ मामीन म में कपासन्तु पार इत्यादि स्पष्ट होमि । प्रयत्न है पारपाठा पियवाप्ति और म पर समागम है। स्पष्ट है इसम कार्य में सफलता तो मिष ही योनि से मार है और इसे पारि परम्तु सर्प की मात्रा रस की स्थिति के लिए पूर्वतया अनुहम नही पौर म ही नाम की स्पिति तापी। मारकर सौमिद प्राकार के कारण नाटककार को पानकम 4 विशेष स से गुगतता दिसान को पावपाता होता है।कपा के समीप मंच पर विहान की पावापपता नहीं होती क्योंबितरत से प्रेमक को रक- मिस्त नही किया मा साधा और मही उममे मारकामता होती है। इसलिए नाटकमार दृश्प प म रिणाम के लिए महत्वपूर्ण एष प्रभाषा दम्पो को औटवा है पेय पीबह बास्पान सूचना देता रहता है। कथा के मुष्प माय मेर मृत्यु मोगन विशा गर्म राम विमार ननर का पेरा प्यार इस्प प्रमुख पप से पाते हैं। समस्त नाट्य महेश्य-कपा में रिसाना अमित नरे सिरेपण से पर होता हैन बनामो में से ६ नम रनमत लक्ष पर पान पारि परोपकार से मामन पयन पनुनपन पादि बास एष मय पार से बप माप, गाप पारि का रसमा की सीमा से बाहर की है मे ममरका पेरा प्राविशनपनापों से स्पष्ट फि रस पिरोपी है या रंगमप की सीमा में पनाभिमेय । पर संमत नापार में से मुख्य भाग म रया गया है। पापवास्प माटपगार में माना ये नाटकीयता का पुष प्रपात होणारे प्रत इस प्रकार की पर्यनाएँ यहाँ प्रस्पक्ष पप से महीन परि महान नाटक- कारों शादियों में ही नहीं मा पर। हिनी नाटक में इस पृष्टि से पापाप नाटक का अनुसरण किया पौर में अपन मानियन पारित पय मी रपमय पर रिला पिए पर । इसका एक परम यह भी हो ममता है किनारम्पानहारिक प मरपा नहीं ने पए और मौकारण उनमें मारतीय संसति और वन पिरोपीयता कीजानवीन नहोमपी। मुष्प भाग को प्रेक्षक के सम्मुत मान के लिए ससत मात्रा में मका- पपेपकाकीपोजमापीरो प्रकाराम मसेदोईपटना घटी हो) उप प्रोगामा क मा रिहाया का । पर पाापारय माटरों में रम पारात का प्रश्न हो नही उठा पा श्य भाग में ही इसे पायों के बारे माम्यम से ही पदमा दिपा पाता है।हिली नाटक में इस मुन्ध भामोपाको सम्मुप माने क लिए माप प्रपनाए है। दुरूमाप संसान्तिक विषन माटर कारों ने नाटक कमकों का छोटे-छोटे रयों में विभाजित कर कया क प्रमिकांप माम को रंगमय पर हो दिवा दिया है। मिस्मन्ह हिमी का नामार रम का वातावरण बनाए रखता था परन्तु इतन छोटे एस्यो स रस की स्थिति साम्या पात पारवा रहा । इसर माय अपनाने पाला न प्रकों को दृश्यों में विमा जित करन के स्थान पर परों में ही पामारे संवारों द्वारा प्रसंग माकर मुख्य माग कामहनवाया है। परन्तु यह म्पिति भी रमक वातावरण मनुहम नहीं पौर इमम पानरको यति में भी शिपिमता पाती है। इस प्रकार मा मोर पाषाम्य नाट्यशास्त्र मिश्रित प्रभाव पारम दिसा म काई ममम्बित रप मम्मुष नहीं पाया । पर यह मानना पडेगा कि मुख्य प्रौर प्रमान पाक नियोजन का कोई मुम्पपस्मित एवं निश्चित विधाम हिन्दी नाटक ने नहीं पप मापा बन बही नाटक सफम है निमें या ता मूख्य भाग ही पम है या दृश्यों को पवित्र माना बनाकर टमी में रस का वातावरण बमा लिया गया है। कपाना मटन में मरमता एवं वामपम्यता का गुणहाना मी पति भार यक है। पमिमीत होन के लिए ता यह गुण अनिवार्य होगात है। पाम र प्रारम्भ में ही परि सारी वस्तु-स्पिति स्पष्ट न हो ता प्रेक्षक उसका पूर्णतया पामन्द मही उरा मरना। प्रारम्मका सरल एवं सप्टर देन के लिए ही मसत म प्रम्ठा- बना की याचना की पाती थी। टमम प्रेक्षा बस्तु स्थिति को ममम नाम पारण मोचन पोमोसा रममग्न हा जाता था। पाश्चात्य नाटों में भी इस पावस्यकता के महत्वको मममा गया । हामम मै माटक क पारम्भिाग में ही पात्रों का पपमापों की स्थिति मापाटोको स्पण करना मुभाष मारक कार क मम्मुन बा है। उनका पन है कि प्रारम्भिक परिचय पा विवरण (Exposition) मा गाय ही यह रिबह प्रेम का ऐसा स्थिति में पहुंचा दकि यह उस नाटक के मभी प्रभीप्ट बत्तान्त स युमनाए यह पावश्यक है कि प्रेम यानीप्र गान गाए किप पान कौन है पौर काप पारम्भ स पूर्व ही यह स्पष्ट हा गाए कि यह किम समय मे परस्पर मम्मुख लोहै। पारम्भिक दृश्य में प्रशिक्षण म्यान्मारमक अंग होना चाहिए।" माधु- The purpose of the latrodo 100 or exposition is to put the spectator la posetion of 21 rocta formaron a decimary for the proper moderstanding of the play be about to wkretard n it cabal bat be sbould leam u quchly us pouble bo 201 wat boy an, ubat tbe redulons to bich they food to one acto belord be actloa bertes, the opentot DO of seed of soy drome ROX be Larrety occupled with erplanatory catur -Hodson Aa lotroduction to the Sady of LIL, Part 20 मम्मीनारायण मिथके सामाजिक नाटक निक हिम्मी नाटक ने प्रस्तावमा की पहानिक एवं उपयोगी प्रौपचारिकता मा दो गिसमें बस्तु स्थिति को नाटककार स्वयं ही तटस्थ भाव से मारक के पूर्व स्पष्ट कर देता था। प्रप्रपतित ऐतिहासिक कामों पर मापृव माटकों में तो यह पार भी मावस्यक है क्योंकि यहाँ तो बस्तु-स्पिति से मी मापारण पाठक मन भिन्न होता है। कमानक की मून पिसेपता यह होनी चाहिए कि उसका पापार जीवनमत पटनामों से कहीं भिन्न न हो पाए । पाश्चात्य नाटक पिसमें कि कौवान संघर्ष पन्न प्राधि पसाधारण पटनामों पर बस रिमा बाठा है यह भी इसका मुत भापार जीवन ही मानते है। यह प्रसाधारण घटनाएं मानव बीवन की सीमा से परे मही होनी चाहिए । इस बारे में रोनहर पीक मिसते हि परिमापने माटर की विधा का चयन किया है तो इसमें अनुवर्षी वपनों सहित बीवन का सम्बबस्वीकार करें।" परिवचित्रण परिष पिसम के विवान में भारतीय और पाश्चात्म दृष्टिकोण से पम्तर जानने में पूर्व मानर परिशके मून मन का निमेषग कर मेना परिक पुक्तियुक्त दोपा । मन ही मानव के कर्म पीर बबन दोनों की मून प्रेरमा । मन में पनम्त माप विद्यमान रहते है मिमको दो वर्गों के अन्तर्यत रहा बा सकता है-प्रथम दुष्प्रवृत्तियों का वर्ग जिसमें काम कोष मोह माम पहकापर्णा मादि पाते है रिलीय साप्रवृत्तियों का पर्व गिसमे रवा समा ग्माय पहिसा करना बर्म पारिका ममावेश होता। प्रापक प्रिया में प्रवृत्त होने से पूर्ण मानव-मन में यह रेब-समय पर होता है। इस सरप्रवृत्ति प्रौर पुष्पवृत्ति के सामूहिक मुर के अतिरिक्त कमी-कमी सत्प्रवृत्तियों का भी प्रम्त संघर्ष हो पाता सेवा पौर ग्याय के मम्प पर्प और इसी प्रकार पत्तियों में मी पैसे मोम और मोम में संप। नप्रवृत्तियों की सफलता-ममममवा इनकी पापारभूमि-संस्कारोकी प्रबमता पर निर्भर करती है। प्रत्यक प्रवृत्ति के पापार संसार हो । जिमके दो वर्ष है-एक सम्मनान संस्कार बाकि पति पपनी पुरि के स्वतम सपयोग से पूर्व समार से पर माता-पिता से पहन कर महा। यह संस्कार प्रपथाव प्रथम If you choor ons u yoor form, you wocept s motion of the fb conquest obl piton -The Art of Drima ko Proct, Pro 14 मैमान्टिक सिषन भादक होते हैं। एसरे यह यो मनुष्य परिस्थिति र मनुराम में सर्प वृदिरा पहष परता । प्रर्या परिस्थितिसम्मान समारों की प्रममता मापार पर इनके मी तीन-तीन बर्म किए बा ममते ।-एक प्रथम कार को प्रतिकूल परिस्थिति में भी स्पिर रहतई दूसरे एन मंकार, से प्रतिम परिस्थिति में मतमाम हो बारे और तीसर मप्र काटि के सरकार प्रतिम परिस्पिति मदर गाते पोर परिस्थिति के प्रमुम होने पर पुन पाहा पाते हैं। परिस्थिति- गम्प मार पाम दुईम हाते है परन्तु परित संसारित होने पर र प्रबम बम वाम मारी मस्कार भूटियो मापार बनाएर समाटयकार प्रप्त पात्र हारिका समर्म माभारिपना महल ही पा पाती है। मीलिए पार सफल एप ममोरेगानिक पवित्र नम ही कहा जाता है जिसमें नाटक- पार पारदरिब निमाग्ने पापा टम स्वतब हर उममें बीप बीच में इस्सप फरफ उस पर मनापाकी पोर साना परियों के माननीय म्पक्षिण कोरिपरदेशा। कम में प्रवृत्त होते प पूर्व मामा के हार में ममार पौर परिस्थिति के पप्प न होता है। समसाप को बिमाने क पाणही रम कम में प्रमुख रिवार से एकमरिरोपीय भीमाभाविक दिनानिपते है पौर निर्म की मति संस्कार के प्रश्न हा हो भी मम्ता दिखाने में मामय कम्पमिता में सनीवता भाती है । पत पांच दिवाना रानों ही म्पिनियों में पाएक समतांगरिमान में सपासमार कोठा कोई रिमाई मही हाती पारिवहसय पाषायलोसपर मरता है। नारक मैं उस पर सोने कारण पुसममारयपाषामापाया स्वमा का पिपान पिया पासियत के प्रम्ममान पात्र अपने परिपके मूम्म तन्नोस्र्य समान रहा है पिससे परिण पर एम्पन बना कर प्रेपरी भावानुभूति को वापरम्प के लिए मार प्ररित करता है। प्रानिक व्यामिन पावारी नाराका मासे प्रस्वाभाषिकार, पम्हामको प्रष्ट परमे पास श्री प्रयमर मिाणे एवं मा सिधारमान स्थिति को सारन बनाया। पर मामिपनि लिए पानी का सामरक्षा प्रति दिन कारपरिकों पर छाने लिए दुनिया प्राथम मना परका है। दिनारको मुमनी परामराम भी सादही पपिक यप रिसा परिपरी प्रारहार स्थिर (Hat) दार गमीत round) पिर जियो लिके सम्मान प्रसार सम प्रयन होने दिया मम्मीमारायण मिम के मायापिकनाटक प्रतिम परिस्थिति में भी पते नहीं। उनमे गमन हो सकता है परन्तु विषय चम्ही की होती है। यतिथीम परिण ये होते है जिनके नामधात संसार ने प्रवन नहीं हवि किये प्रतिकम परिस्थिति के पपेड़ों को सास । लो परिण विक्षनेपब में अधिक सतर्मता की पावरयकता है। प्रम्सम्मका स्वरूप विकी सप पर हो जाने पर ही परिपतन स्वाभाविक प्रतीत होया । परिमो के पुग-सभाब भाषिके अनुसार मी परियों के रोमर्य किए जाते है-वर्ग प्रतिनिधि परिष तपा मक्तिवादी परिण। वैसे तो प्रत्येक परिममेष पिठम पीर वक्त विधेपत्तापापा समन्वित स्प है परतु परि नाटककार ने उस परिण को बर्नगत रिपतापों के वपाटन में होनीपत रिक्षामा पोपह मर्ग प्रतिनिधि परिषहमाएगा और यपि उसकी म्पत्तिमादौ विधपतामों को हो वाम दिया गयाtोपा पक्तिवादी परिज कहलाएगा। संसत नाटकों में प्राय स्थिर परिमों काही मषिक प्रामय मिमा गया है। इसके कई कारण हो सकते है प्रथम मामय परिण बरमजात साका मोरने के मिए इसके प्रत्येक पहन पर विस्तृत मतान्त रिसाए जाने से ही स्वाभाविकता बनी ए सकती है जोकि नाटक के सीमित पाकार में सम्मर माही। इनारे स्थिर परियों में पारणं निहि मी प्ररिक सम्भव है। परन्तु इससे उनकी कला की हानि नही हुई मोक्कि नम्होने स्थिर परिम-पाहे मह शिवना भादर्य पुरप क्यों न पाहो को मामयीपणापार पर ही प्राण प्पिा है। सापि की किसी मम्म पिपा में परिषमानवस्व पाना बम पिया बाय पपा नही परतु माटक मे परिष को प्रातम मिोन रिखाने से कमा की हानि होती है। बाहरण लिए मारा पुष्योत्तम राम पैसे परिण को मामूति वन समूह काय करते विहाते प्रो रमाइपय दया के भाव से भर भाताई मही दूसरी पार उसी घटना के वन मे बारमोदि राम के व्यक्तिाब को पूर्णत तरा सडा पीरता के मायको प्राप्ति करते है और इसके हर्प म देवतापों द्वारा पुष्पष्टि भी परवा देते है। रामायणराम बातीय नेता हारक पाति रक्षक मोर पारर्म पुष्प है उनमें पाय सम्मता मूर्णिमान होकर पाती सत्तररामति के राम म्यक्ति के रप में पाते है।पमा है मिस्तु गरा के सारा पपना निजी मुष-मुन मी रखते हैं। मत स्पष्ट हुमा कि सव भाटा में पूर्व स्पिर परिषों में मां मम्वाम निमार मारदार समाना भूमि के अधिक निकट से पाया है। - . मास तिमरो पुतHI.प.१५ सैदान्तिक विषम नाटप पाश्चात्य नाट्यशास्त्र में महिशीस परिभों को भी महत्व प्राप्त है। प्रत हिन्दी नारय पर उमा भी प्रभाव पड़ा। हिन्दी माटक की प्राइमामानी ऐतिहा सिक सास्मतिम पागम प्रमुख परिण यद्यपि स्पिर ही है परनुनी उपप्रमुम परित्रों को गतिमीस भी गितामा मया है। ससत माटों में बययन परिण और प्यक्तिवादी परित्रामों के समम्बित पुणों से या परिणामा निर्माप नगी नगमता म एमा। परिज प्रपनी वर्षपत विशेषताओं में पुष । म राजा वा उमा पाय रामपर्म र अनुप है परन्तु फिर नी मवर्ग को विपनामापी मामा के भग्दर ही उमम व्यक्ति मारी रिपताप्रामा मागेप हुप्रा रिमक पारण उस परिग म महानता पा पई है सौन्दर्य प्रा गया है। दुष्यन्त राय का हाम कमारप बगमन विधप सानों में पर नहीं है परन्तु उसके पतिवार की भनक भी स्पष्ट है। पारम्पतिवार का प्राधान्य हानक कारण बर्गपत विठामों में परे मोचन के लिए प्रतिक माह है। मामाणि मारत में मास्सामाणिनीकहा वा सकता है ममोकि पात्र ममार भावष्टि म पूर्णतया बगीन एक स्पन्सब है।प्ररपा म्पपिन पर मिन्न माने रे पश्चात् प्रपना मामाम्य नागरिक परिकारों को समझने के पश्चात् पूजना सन्द रीति से मात्र महा। इममिए यदि प्ररपर्प रमाए भी पाए तो वह मधिक पारक होंगे मै पुष्प वर्ग पुरक बग बास बप मादि। जिनमें स्मभान विषप लिए पूर्ण क्षेत्र है। हिन्दी माटक परम्परा की मूनवरी पारा मदामों प्रकार के चरित्रों का ममान है। पपामक और परिणका पम्पोम्म सम्माप कहा गया है। जितनी महान एवं प्रमापारण घटना होगी उतने ही महान परिमों की मृष्टिहागी। प्रमापारण बटनामानिरप पर परिष चित्रण में सौम्य भाएपा निमम उमर पैय उम्साह पमसीरता प्रामवियाम मादि गुण प्रकाश म पाएग। इसी प्रकार प्रमापारप परियों के बिना प्रमापारण पटना भी मम्भव नहीं। परिष का उपाटन माटरपार कई विधियों में करता है। पात्रों के मामा जोशि उनक पक्तिस्व की प्रतिमाया हा परिषोंगो स्पष्ट करने म महापक होते है म मतिरिक्त पानी पिलाम्माप मम्य पात्रों का उस पात्र बारे में कपन और पानों के बगड-मापप मारि मी परिणा पाटन करते है। मापानांती - ससा माट्यगारों के प्राचार्यों ने भाषा की रमानुसमता पर प्रपिक बम Yς नक्ष्मीनारामम मित्र के सामामि नाटक रिया। मादप-पत्तियो से रमका यही प्रयोजन पा।' गंगार रस है दो उसमें सिकी पत्ति का प्रयास होना चाहिए पाहि ! परन्तु यसा कि सिर किया था पुना है कि हिन्दी नाटक के रस में प्रग्य तत्वों का सम्मिमम हा पान के कारण सस्कृत स प स मिलता प्रा हि मत समारो पर मो नतका प्रभाव पड़ा। पपार्दवारीपारा के प्रमागरण सबार में भाष में प्रतिरिक्त तई की प्रपामता होना भी एम बिशेपत्ता हो मई । मापा परस्पान पर मच प्रवाम हो गई परतु रसानुकुम बाताबरण बमाने के लिए गीत का प्रापालन माटको मे कही-बही परमाया मया । संवाद का उपयोग वरिपरि एक कथा के विकास में योग ना मुल्य मामा जाने मगा। पं. पीताराम चतुती नाटकीय गाय की परिमापाते इए कहते है- नाटकीय पापप उस पाप-समूह को कहते १५ो किसी पारे मुह से हारकार द्वारा निविष्ट मिति ६ पस्त होकर माटीप कसाबस्तु, वरिष भाव अपना परिस्थिति को समझने म वर्मयोको योर रें।" संगार की परिभाषा की एक प्रमुख विशेपता स्मामाविकता मानी मर परन्तु साभाविकता से यह पमिशम महीकि बातचीत में बो गामा पसंमति मावृत्ति पुनरावृत्ति हरित पारय पार निलम्बा बोच-सच में मती । महापसाठी ऐ। उसमें साहिरियकता होनी भाषाया है। पी एस इनिपट गव पौर पच भाषा का प्रस्तर बवाप साधारण बोमवात की मापारी पर से तुमना करत हए मिडते है कि परपती पौदिरों द्वारा पर पौर मे पाने बासे स्थायी नाटकको माया साशरण मोनाम की भाषा मपनी मुरपया बनी परिरण प्रणमाम का पापप मेने की प्रवृत्ति प्रौर पम्पयस्पिव एमपूरे पापों के कारण उसी भरार पम प्रयोप मप और बाप-बम्पास में मिल होती है जिस प्रकार पा से।' प्रसादिस्वरंब कार मीरा ने बामो अमेति ति:-सिके गरप रस बच्मावोबो (सरपार प्रान मारपो पाचिस प्रणा का भूपति-गमन एबापा। पाराम साममुगर स." १. मिना मारायचाराम पनी ५ ॥ . la tbovo pass which ranire which ar raad tot prodeord oo the Hape by later nxrotloosthe prone bobkha tbe chanter tut urtmote for the best part from the roabutary on mod rhythm of our ordery percbb hoging for orth, a cop #piscono to approulottlos, hdborde eodomoposed mom tonom-uaeb -Poetry and Druwa TSEllor Pipal सेवान्तिक रिचम नाटक इसने स्पट हुमा किस्सा एवं महान भारको को मापा सोप्ठप एवं गरिमापूर्ण होती है। वास्तव में सामाविकता का प्रभ पात्र की प्राति की पनुम्मवा है। बारों में बार-चोर के प्रत्युता हो बाहिर बिससे रनम समीक्षा बनी हे। इस पतिरिक्त समार की भापा में प्रसाद-गुष का होना भावश्यक है। मरिचसमें शामिक या पारिमापिक सापनीका प्रयोग अधिक होगा तो उस मे परमवा एष बोपमम्पका का प्रमाण हो जाने के कारण नाटक सरसामारम की मस्तु न ऐगा। पास्ता में संपाद काई मानक परिषषि प्रादि से पूर्णत मिनरल मही है। प्रत्युत् इसका न पनिष्ठ सम्मान है । परि कपिल पात्रों की मनुति या मारममाव कर यो संवाद साभारिता एवं साहिरिया परिमा सार ही लिये रोप । पाश्चात्य साहित्य में पैनी पीर विचार को परीर पौर मारपा के समय से सर किया गया। स्कार बेम्स धनी पौर विचार के सम्बाप रो पटप मियते । मपि पैपी सदा पाएस होती है पापि इसे केरम नापास होनही मानना चाहिए। यह पैसा कमेन्ही में कहा, 'ािर का परीर पपरा से बम भोम्बन का कान है कि अभिव्यक्ति मे पद पर घिरीर पर मारमा यी माति सम्व" प्रतीको भी उचित महार जा चाहिए। पालानुरूप भापा मी सामारिकता निर्वाई में सहायक होती है। से निशान पात्रों की माषा परिष साहिरियर ही पौर प्रधिमिव पात्रों की मापा सो पक्किा की परिचाया। मतभारकों में सी पापार पर दो मापाएँ इसवी वी एक संस्थत रुपमा पत पाप की भापा घापन कास पौर सम्पत्ति को समय परवा वाहिए। समत मादरपास्त्र अनुसार भारसारासम्म पासमा एप में स्थित स्थानी मार को रिमाल पनुमार पौर चारी पोम से रस में परिणत करना Stk, tbord very atas, molto be theopht dumady etteral. A bodd be * De Qatacy uk, 40 hecanoa of thoren Dra Jobmonsiburch, routaand tbopbatin utubedyndrom' ThekatardLionh-307 मामीनापयम पिप सामाविमाटक पा । परन्तु हिन्दी-मारक में परमारप प्रमाल कारप उसकी स्थिति निमित मिम्म हो गई। यह प्रयास में परिणत होकर मानन की मुत पासमा वृत्तियों के उदात्तीकरण में समर्थ मही हो पाता। उसे पकानाको प्रभविष्णु एवं रोष बनाने, परिशों में मानवीय पितामों को प्ररमित करन वा विचारों को पहप करने के लिए पापम पप में प्रयुक्त किया जाता है। परन्तु मार की व्यापक महत्ता मारक में भब भी उछी प्रकार बनी हुई है। भाष की दृष्टि से नाटक के मुख्याफन को प्रमुमत से सौटिगाप्रपम भारी मापपता बुमरे मार की तीव्रता। मितने पषिक प्यापक भाग का नाटककार पयन करेगा इवना ही मारक प्रषिक मभविष्य पर सफल होया । बीवन के साथ इसके प्यापक पौर पनिष्ठ सम्मान के लिए इसी कारप भाग्रह रहता है। संसत नाटयशास्त्र मे दो माटक पम्प काम को पेवा बीमन के अधिक निष्ट होने पर बल दिया गया है। इसी कारण से काम मी सामी भाषा में से कम तीन रत्साह रवि और पोक को ही नाटक लिए उपयुक्त माना गया है क्योकि यही भान नौपन के प्रमुख व्यापारों को प्यार करने में समर्प है। पारधारय नाट्यशास्त्र में भी बीमन सार इमरी पनिप्टवा पर वियप प दिया गया है। रोनस पीकाक सियते! "पदि पापमे मारक की विमा का चयन लिया है तो इसमें मनुनी बाधनो पहिच गोवन का समान स्वीपारकर माधुनिक युग म बीचम-क्षेत्र में बपिम्प पोर म्यापकता के कारण टिलताएँ बह मई पिसके कारण बौदिसता का समावेप प्रषित हो मया है परन्तु मारक तो सापारमबीबमोरिस्ता पूर्ण विविषयमो से सफल नहीं हो सकता। नाटक में तो गिरानी मसापारपता होपी सलाहीमा सफत होपा पार पसापारण कर्म के कगार रस्सार रवि पाक पारिपुर और मापक मारी हो सकते है। प्रत का पा सकता है कि भारकमार ने रिवनी मतवा मीबम की प्याप्त करने वाले भानों के चयन में रिपाई उसी अनुपाप में नाटक सम्म होगा। दूसरे भाप की तीव्रता प्रार महराई मा नाटक को सफल एक प्रमषिप्पु बनाने का मापार है। गिनी प्रतिक मामिक विधियों का निर्याम नाराकार पोया जिनमें भाग पीप्त होकर प्रक्षक के हरम को सर्म दरसर उतना ही प्रषिक माटरकार सपन होगा। पस्तुत भाों को ठीबता पर ही पान की . -- "If yoncoomdramayor form, you accepthrocartoofth kbconquest obipanions -The Art of Drama Local coct, 194 सैशान्ति विषम मारक प्रारिता मोर परिमाइन की सूक्ष्मता निर्भर करती है। मतपस्पर्धी मापों के पयन पोर मार्मिक स्थितियों में उन्हें धोव बनाकर पालको पर्वमय कराने में माटककार मितना डोस दिखाता है उतना ही नाटक सफर होता है। चारवल प्रत्येक नाटक का कुछ न कुछ गेश्य होता है, पर्व होता है जिसको प्रपित पसे के लिए ही नाटककार नाटकथमा में प्रयुक्त होता है। मह उदेस्य गया हो इसे सीमित नहीं किया जा सकता। 'पारिपार ठप पार्मिक-गतिक भार भारमक भाग मनोज्ञानिक किसी भी प्रकार का हो साताबोकि प्रक्षक के हरप या मस्तिएको स्पर्श करो।" रमकी सीमा का मित्रासही उपयोपिया के माप को दृष्टियों से म्यिा पा सस्ता हैपिार तत्व निवमा प्रपिक सास्वत एम महान होमा नाटक ना ही मषित स्थायी एव महान् बनने में समर्थ होगा पार विस अनुपात में रसको स्पयोगिता एवं महत्ता सामयिक होमी नसी भनुपात में उसकी सर्व कानीनता सचिव हो पाएगी। दूसरी सीमा विवार की सामामिकता की दृष्टि है। बिना यह मान की मून समस्यामों के निकट होगा उवमा ही अधिक यह महान होगा। संसात-बारों में रिचार पत्त प्रम एवं निपुर पा। वह भागकीतही में प्रागप्टिक होकर ही पित होवा पा । पारधारप प्रमाण के कारण यह मधिक स्पष्ट एरे पप हो पा है। प्रस्तुत मह जितना अधिक प्रमान एवं मियूर होगा सतना ही पनि प्रमाविष्प एवं स्यावीप्रभाव सेगा । विस्तासमा पण से समय पर प्रभाव कम हो मायया । इसको बना निमम एवं प्रणाम होते हुए पी मुघर होनी चाहिए। परंप की मह मंगना को मामों से प्यक्त होती है- प्रथम, ममुपाय (design) से पूसरे, विवरण (detail) से। समुपयरे मम्वर्गत मारकर काम धमन प्रभाष भारमा। पटना-अमान नाटक में परमा का परिण प्रशाम नाम परिह का पोर रिचार प्रधान नाटक में विधाराको ममए प्रमार पाठक पा प्रेशहरप को सभ करता है, उसे ममुपसका प्रभाव हा , MAndt best most bosome omtai paribe moril, emotional or pucholokal bike urtes bome to the worauch bead ud ban -The Art of Drma RomadracocklInit htha idishows, सामीमारायण मिमसामायिक मारक पाएमा । र समुभम के प्रभाव के पतिरिक्त नाटक समों से उसके दमों से विशिष्ट परिषों सेवकों की प्रसरता मा दीवा से गायों की गह से यो प्रभाव मन पर परे पियर के प्रम्तर्गत माए। प्राय पिरम से म्पम्मित होने वात प्रभाव मूल प्रभाव के पोपक हो । परन्तु कभी कमी में पतिरिक्त प्रभाव भी रखते हैं। पैर सिदरमी होनी में समुप का प्रभाव दो मुरारीसास के काय-पापारों से होता है, परन्तु समस्याएं तथा इनवे सम्बन्धित विचार विवरण यि हात है। परन्तु प्रभारी एवं स्पष्ट पिना ठमी होती है म विपरम और समुभम दोनों से एक ही मार डी पम्पमा माटपही तत्वों के प्राधार पर ही माटक की सारमा समीक्षा समस्या-नाटक-संवास्तिक विमेधन दमस्या- मामिवार्य से पनि नियमती समस्या-माटरह नारकरिसमें किसी समस्या का निधन किया जाए। परन्तु इस पृष्टि से विचार करने पर तो प्राय समी माटकों को समस्या नाटककहा या समया है। वासियसका अभिज्ञान शाम्मम' भी एक समस्या मारक कहा दाएगायोकि उसमें गबर पिराइको समस्याका मास्यान है। पारय मानणारत्र में समस्या-नाटकाप्पापक स्प में प्रपोम बर्नाड में अपने चपा एम्मममाटो लिए किया था। इस माटक के मिर्मग और भिना ती दोनों में परमपात नाट्यरूप में मिलता पीपरन्तु इस मीन भाम में रन नाट्परप की ममत्व विपठामा को माप्त करने की साप होने के कारण मह नाम भी पापधारय मातोपना प्रपद में सम इमा । पानोरों ने अपन-अपर दृष्टिकोण के प्रनुसार से मिग्न-भिन्न नामों प्रबिहिव किया। प्रमिद मातारक मरहमन मारहों को रिचारा- सा माटर' पार बा के नाटकों को 'पगारपक बाटर' पदा।' पाराय मादप-बगत प्रसित पानातक ग. निकम मे बाँकनारकों के लिए 'गोग्यपूर्ण साक्षाम (purponald laughter) गम प्रयुक्त लिया।' इसी प्रकार मानारों में रिलीममा प्राधार पर से त-वितर्षपूर्ण नाटक (discussion play) कहा तो किसी ने नारकीय संपाहिली में इस पा का प्रवर्तन हुमा तो मना ना द्वारा दिया गया नाम 'सरस्सा नारकरी पर मित हो गया। माविमाम विरन सटही गायमा दिपानापानाती सपूर्ण पिपतामों को पपिया कम में समर्थ नहीं पापि पोडियामाम Thou Sbre considered to the lix dospe u repertotalhe of the dama o stint 100 Deco, Is the first, a tope of the da -Prefae Chanda Aspects of theModen Drama Afryce No World Dret . Hothon (L) Twentlett Ceatory Drama (Chapter TEAutbesmatam) मम्मीनारायम मिमो सामाजिक माटक हिन्दी-चमद में कई प्रों तक सहो चुका है इसलिए इसी माम का प्रयोग समीधीन होमा । म नाम से रिसिप्ट मर्ष का पोवन करन के लिए इसके साप तथाकपित' पम्प का प्रयोग किया जा सकता है। समस्या-माटर का वस्तुपक्ष इस माटयस्प की प्रथम विपता है कि इसमे नाटककार का गेस्य रस मेरना नहीं समस्या चित्रप है और समस्या के सफल शिक्षण के लिए मारक- कार माटम की निषा को सापनप में प्रयुक्त करता है। सौन्दर्य-सृष्टि पपया प्रेवर को प्रानन्दित करना उसक सम्मुख पौष महत्व रण है। समस्या दीप वम सप को प्रेपित कर पाठक की पिधारणपित को रपुर करना हो उसे प्रमौष्ट है । वह नाटक के पम्प तत्व-पानक चरित्र संचार प्रावि की पागना इसी गप्प को दृष्टि में रक्षार करता है। प्रम्य तत्व किस सीमा तक अपने परम्परागत माग्याप से भिन्न हो पात है, इसका मिधार पिपपस मे लिया पाया। इसरे पा कि इस माटयस्प मे समस्या से पभिप्रेत पर्व समाज की सामयिक समस्या है जो समाज के प्रविधि बम को गोषित करने के कारण प्यमात भी कही जा सकती है। यह समस्मा ममार भीतर प्रकट रहस्म की तरह प्याप्त होती है परन्तु सचाई को तटस्थ भाव स खासकर ससमें पूष का इप और पानी मा पानी करने का साहम समान में नही होता यही नाम यमार्यबादी माटरफार करता है। पा इस मिपय म अपने मारियम्स पौर पायमिस्ट" नाम मेव में विस्तृत वर्षात ए मिलते है कि हम स्पप्टतया प्रादौ की प्रबहेलनायव हए भी पा र मते या समस्या समान अधिकांग के सम्मुम उपस्थित होती है परम्त पायेर पनि भपने को परेमा समम कर समार के पास रिकहने का साहस मही मरता। इस बारे में उरण ते हए बहकि समान में प्रत्येक सास म्पत्तियों में से ७ • पति मर्याशपरावण होने के कारण विचार ही मही करते २१६ पक्ति सन पारस से दुखी है परन्तु सामाधिक पायरी के नाम के कारण यस दोपको सहते हैं और मुंह मोसने का साहस नहीं करते । फेवात एकम्पनि पपारंवारीमाटककारयो उनकी समस्याकोरनहे सम्मुम पोनकर रखता है और समार को अपने पादौ प्रति पुनरिसार करने के लिए प्रेरित १ Quintamence Ibremium समस्यानारक-शामिक विपन 7 करता है। प्रवास्प ह कि समस्या मे पर्प मामविक समस्या ही नहीं ममन्त समस्या हैरिसम परिकाम मोर पोषित है। नाटकमार का समन्न समस्या को चित्रित करने का प्रमुन नद्देश्य समान के निधारों दिशा-परिमन करना है। उसके पास एक निश्चित विचार है, सन्दप है रिमाप्रपग के लिए बह नाटक को मामम बनाता है।पीसम्मी- नारापन मिप मम्मामी से भूमिका मसिनो है यह मुम कसाकार का नहीं पम्मी कत्ताकार मारिसे तुम्हार शॉ महोदय मे फिलासफर पारिस्ट कहा है। रमक (माटमार के) जीवन की अनुमति तुम्हारे जीवन में प्रवेश करती तुम भीतर ही भीतर पाम गात हो। पूरें पता नहीपमा पर तम जमव पर दृष्टि रासन हो देश हो यह बदन गया दम भी बदन यए । यो कुछ पा परबत पया। वह पा? मर कुछ मपा या काम रमाकार पा नहीं सभी मार का है। इस प्रसार सप्टमा कि समस्या- पाटकसर सपस्या-विर में हाल ए भी एक मश्य मिये हो है। प्रसिव पानोपकनिकम का पीजोमारकों के लिए गर्म पाम' पर का प्रयास इसी तम्प का परित करता । पाने सर्य मी मिसिव रेग्य प्रोग्राम की भूमिका में इस उम्प को साकार किया है। सम्पन है कि मी अपने विचारों के प्रपम सिए ही माटम के माध्यम को अपनाया है पही रिपा मुझे गाने मरर प्रतीत हुई। इस मारक का पी एवं प्रथम विपना यह है कि इसमें काम समस्या पाविषम मार ही नहीं होगा प्रत्पुर उप पक्ष एवं परमसिन पिया गवासी वन के माध्यम से माररकार मपत्या के विभिन्न पहनो को एहि निवप पर परमाता है और प्रेक्षक मुम्मुत सारी समस्या एक गुमो पुम्सर रो भाति पर हा गाती है। यह त-बिताई पूर्ण विशेषन ही म पापम्प को पम्प नाटकों से मिन करता है। माखनु काम कनारों में भी मापारिक एवं सामयिक समस्याों का पिम किया गया था परन्तु विचारपूष गोरिचिई प्रनार में नन्हें तपारमित ममस्यालाटरी श्री प्रेमी में नही मिना पा सका। ममा-नार में हामिड की अनिशतामा विरार करते हुए जतिको "मारकरिसम गोई नही आई ममस्या भी मम्मीर मारों की • भूमिमी..
२१ मामीनारायण मिसामायिक मारक मेषी में नही रसामा सवा। इस नाटक के प्रणेताओं का विचार प्रमाण के लिए उपयोगिता प्रार स्थापित की पुष्टि से यह माटक प्रम्प मारकों की अपेमा कही बाहोंन मारकों को तुममा सामाम्प परमा प्रभान नाटक से करते हुए मिलते है कि सामान्य मारक मिनर्म रोप्रमियों मप्प प्रतिरपी की कथा का विषय होता प्रेम कोरस-बीस कबापों के प्रेम पाचात सन समी स्पितियों का समय सम्मापित परिवर्तनों से परिचित करा देता है कि प्राधार पर पन मामलों का संगठन किया पाता है। इस प्रकार छ दिन के पापाव प्रेमको सिप बटमापों में कोई माम नहीं रहता। फिर कुछ दिल कह पमिनेतामों पौर प्रभिनत्रिों सम भमिनप का मांसक बनकर माटक रेने बाता है परन्तु का भी प्रषिक दिन तक रपे माइट नही कर सकता। पौर का ऐसा विचारले कि विचारपूर्व माटाका षकर बिना संगीत के किसी मारक का कोई भविष्य नहीं है। बहस नाटक स्सस्स और उपयोगिता के बारे में हिमते, 'उसी मारक की वस्तु प्रकृति मनोरंजक हो सकती है गिसमें पति- गव परिष की महत्वपूर्ण समस्या को उठाया चार प्रौर नस पर भावपूर्ण वर्ष वित किमा पाय प्रेमा पसे नाटकों से साभाबित होया इस प्रकार हम केवल अपने मन के भरले ही कुण प्राप्त गरेमा प्रत्युप सामग्री पहम्मामी सम्पतिकस्यममी पसमाट्यम्प के पिम्पपक्ष में मी सामान्म नाटक से अन्तर पाबान के कारण इसका पासप मिषन पानावक। "But anybos the play bowlch bere o urso cot rod do con Do lonte cogmta u vrloor drama, ~Quutcomoad lbeenbasurat, र Andometerolarum om larmy dans thout works arcept thedansattboopbr -Enarpean Tboory of Drura Grtm473 Now a tot ruiny play catoon to the pitore of thtop pad 195- tbtory bat e pury to be proudemol coctuct to character perrocal important to be todka in pled expirety coard Propebansuity tom of ating mynomethina frog at plays they dot only ban bed something for bof booty but they read that something as pemo pontulo -Quintomeneratlamim PM " नपस्पा-माटर- दाम्ति विपन तित्पपम मारपसारा प्य सामयिक ममस्यामा त्रिम परमात सामिए म्ने गमावस्तुपा पपन भी माम मार हा परमा पोपी मम्मी माएपम मिप इमी के लिए देश हुए मियते । “विन मामारिक और राय मोतिक सम्मनों क सीमागे माना पार पा रही है। यदि हम बाई यो हो उनका समावेश रनिहाम + महान् परियों में नहीं रा मन। इस पारपहारकर हर्षे मामारिफरिमोमीस्पना करनी परमी।" मप्रकार के पारामापासा पयन भी निन्न मामार पर किया दाता हमरे लिए पटना समान पामक पषित मही। क्योकिएम नायर बिममें नायक और समातिन्दीका प्रेमिका क लिए हो और उसके द्वाप पपनी उपमा भिए मिन-सिम्म उपाय-मिग्यारोप : प्रम एयादि बरसे गाय कीरिक बिका पापोरनाप हास्यास्पर पाठ हामी बासर में से मारों में तनवर्ष पूष दिन भिए कोई मामी हो महीं होती। ममस्या-माटकोप्यानलका मापार समारसम पस्पिर मारणों के सर्भ पनि पौर रमापपिपले मप्प बहाना है। इसमें समस्या पर बोटिक उठिरेमिए पर्यापण पायम रहता है। कपाना की प्रनितिमी ममम्पा-मारक में विप महत्व नहीं लिया माता रम्पति और उसके परिवाराही मी ममान दो मुरमा प्रपप महत्त्व नोकामा दो ममम्यान्मारमा पस्तिस्य मी रावा । बार मिरे महत्व प्रतिपादित काले ए मनम पारका मन मुनानु राप्रपामा प्रपमा गाणवीपमा गोई भी पन्त हो परन्तु मपप प्रसियाम्प है मभ नहीं वो नाम मामान्य रुपानी में प्रमाणात एक रिपपा माना गाडिमा प्रभापारम पानर लाई रमा ही रम पमा गय ममोपन राग १ भूमिका सम्पानमा कि The wd doy be a scosciatico a catalog to feel then may be bo od tobollia is toti pasible to catct, -Harper & replente Prolaze, Pwj मरमीनारापम मिमक सामाजिक मारक मनारंपक एवं प्रमविप्नु बनाया मा सस्ता है। परन्तु समस्यामारको में प्रसा पारमालको पपेमा निस्पप्रति के पिरषिद जीवन को प्राधार बनाया पाता है । वसनमारकों की समीक्षा में निवते कि "या मामा भाग शसि जितनी सामारन माटकीय स्थिति होगी नाटक तना हीपेष्ठ होपा पर मन में इसके विपरीत निपार पात किया है, चिनी परिचित वस्तु स्थिति होगी उतना ही माटम प्रपिक मनाहारी होगा।" पापार-भूमि इस परिवर्तन के कारण कमानक विम्यात में मी सामान्य नाटकों से भिन्नता पाई जाती है। समस्या-नाटक कमानरके बनाई पोपमुसार तीन पाप होते है-परिचय (Expontion) मा (Situation) att ordfrad (Discusson) प्रथम भाम में नाटककार समस्या के प्रत्येक पहम् को स्पष्ट करने माता एक वित्र उपस्पित करता है सि पाठारे सम्मुख समस्या का एक पम पर हो माता है और प्राय यही प्रथम क समाप्त होता है। इस अंक में पोपहन को पायात संपत रसमा पठा। मारक के दूसरे भाग में सपा के विकास के काम समान रसम्म होती है और इसी महान कारण पात्र समस्या के हरे पक्ष पर विचार करने को पाभ्यो गाठे। पर परिस्थिति पूर्व परिस्पिति के समान से उत्पन्न होती है परतासका सप अधिक पसमा इपा और अटिन हवा । पूर्वपाएर सत्तरपदा के विधार परम्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। इस प्रकार उपस्पा के दोनों पों का निराक यहाँ परम बिल्यु पर पहुंचकर पूर्ण बेप से एक दूसरे को पपनी और सीता उमर की स्मनी कहलाता है। समस्या-नाटकका तीसरा भार ही सबसे महत्वपूर्ण होडापौर यही से तरनाटकों सपा मिल करता है। पामे इस समस्मा नाटयपरको कचोटी कहामि भाकार दोनों पारितारों का पानी पिउन प्रस्तुत माता और निप्पन भाष टिक- विप पाठक की युति को यस समस्या की प्रोर विचार करने लिए प्रेति करता है। नाटकमार सय किसी भी पक्ष में परमा मिर्भय म प प्राय पमिर्भातरा में हो नाटकको समाप्त कर देता पोफि से यह पाटक का विषारोदामन ही ममीप्ट . Add has bdu ibu the northe menton the bettet i be phy Ibno on the trotary the moro fat. Daribo Statoo the poor laterthung tho play -Quintencaor becpkar Four PHP 14 18 समस्या-मारक-साम्पिक विषन पा। शाम इस स्पिति को स्पष्ट करत हए इम्मन के 'ए गबारम रेप्रतिम एवं महत्वपूग दृश्य का उदाहरण दिया है रिममें मोरा मली है-'पामा हम विगत परिस्थितिका ठणे मस्तिष स पिबार करें।" इस बस्तु विस का इतर नाटोबस्तु-विम्यास से भेद स्पष्ट करत हुए माँ निसले । 'पूर्ववर्ती मुमठिम कहे गाम बास नाटों के प्रथम अंग में परि पय जितीय पंक में उतम्त पौर दृतीय पंक में पटना मुसम साती पा परन्तु प्रब परिषय, उममन मोर ता-बितर ही तीन माम है जिममे हर वितही नाटककार की प्रतिमा को मसौरी।" मौन समस्या की दृष्टि से बस्तु विम्याम के इस स्वाभाविक प्रम मो बवान हुए भी इस क्रम पर पति बम नहीं दिया । इसमें समस्या तपा पाना मनु रूप परिवर्तन हो साता है। बस्तुब पटना मौर टाई-वितक को अभिनयप देना ही मक्य है जिसकसिए ठक-वितर्क कभी बाद म होता है और कभी-कभी परमा म पारम्भ से पन्त न बसता है पो इसे स्पष्ट करत हुए मिलते है सदनु- सार हमारे न माटकों में जिनम कुछ मेरे माटक भी सम्मिलित है एप में प्रारम्भ तर्क-वितक स हाता है पोर पन्त पटना से मार दूमरों म तर्क वितर्क पौर भटनाएँ पारम्म से पम्त तक परस्पर अनुस्यूत होती है।" परिध-चित्रम परिवपिप की दृष्टि सेन नाटकों का मामार यपापंदार है। से इन माटों की घटनाएं हमारी परिचित होती है उसी प्रकार पात्र मीणाी मांति मावारप म्तर के होते हैं। साधारमन' पात्र मयगत विधेपवार्मों से युक्त होते है। पी सक्ष्मीनारायग मिम इस बारे में संम्पामी की भूमिका में तिशत है 'मने अपने परियों को पचायक्ति जीवन के पनुन बनाया है उनके हमने पौर i Qatate score of Ibsenian Formah you bed tobal ni called well made play an exposition to the first act, a milop in the recoot. and unraveling to the third. Now you are reportloo shuttle and discanion and di cusaloa b the Ick of the play rett Qalatastact of Ibsenho, Pope 135 Accordingly s bave cow plays bactadure some of my ons, bich beria ttb dacomioo tad rod b milos, and oto la bicha iba discussion at tocrates the Klion from topinabot to cod. -Qolaicene of Itakum Tage 138 ६. मम्मीनारायण मिमके सामायिक मारक . रोने में तुम्हें पपने बीवन की बातें मिलेंपो । "इम परिमों में सवाल स्पषितस्य का प्रतिष्ठापन कर माटककार हमें ऐसी परिस्थितियों में सादर बाकरवा है निधसे ये अपने परम्परामत विचारों से भिन सोचते हुए मीमाभाविक प्रतीत होते हैं। परियों के स्पताण पक्तिरब के बारे में मिप्रवी निखते मने अपने परियों को गिम्दगी को साफ पर माफर र रिया है। अपनी प्रवृत्तियों पौर परिस्थितियों के करदार मेरे में होकर मतेहप, पड़ते ठोकर खाये हुए भाये गाठे पए है पौरमराबर एक मने निझामु की तरह उन पीचे सी सापपानी से बना है। मे परिज वर्गगत बिपतामों से युक्त होते हुए भी अपने स्वतन म्पत्तिस्य के कारण परिस्थिति के अनुसार विचार में परिवतन मी कर मते । इस प्रहार य परिज किसनशीम (round) परिकामाई। ये परिपकार वो पावे कि सपा पस्वाभाविक से प्रतीत होने लपवे । म से जा इम परियों की प्रस्वाभाविकता गरे में पूणा गया वो पसन पीम-पिम्प का प्राधप मेइए कहा कि परिष की भावनाएँ किस परिस्थिति में परिवविध इस सारी प्रधिया की स्वाभाविकता को मदेसार प्रेम सापारिक भारत के कोर पनुसार सितारेने गार्मों में नाटककार कर या पर निर्माण पिम्पकार। परिणों की एक तीस विऐपठा यह किये प्राय गर्मपीन होने की प्रपेक्षा विचारधीन प्रषिक होते हैं। जीवन में पतिरोप तत्पान होने पर ये समस्मा पर विचार ही प्रषिक करते है। इसका प्रमुख कारण यह है कि मम्मम वर्ग के परिणों में इतिहास प्रसिद्ध नामकों की तरह मसीसता नहीं होगी। प्रतिम परिस्पितियों से संबप करने की अपेमा समस्या पर सोच-रिवार ही पपिक इस माट्याप में पात्रा का वर्गीकरण पा और प्रापण पात्र की दृष्टि में नहीं छिया जा सकता पौरम हो रहें देव पीर दान की देवी-बाई प्रमियों में रपाका एकभी पापों में दोनों प्रकार की विमेपतामों का सामंजस्म होता। पीर नाटककार का चिन सामधि में करता है। कपामक के - सम्पानी मनीराम मि ममेका... मफको तस्मानाब मित्र भूमिका 1. The Author Apology from Ho Warrea's Trombone .
समस्पा मारा-मास्तिक विमान विमान परिपत्रण कीस शिपठासारण नाटक ममाया और प्रति- मायक की पृषा विशेषताओं का मानना नही हो सकाशॉ का तापम कि स नाक में नापक मार प्रतिनायक होता ही नही । पग्लिसिस पाफम- निरम' में बनिसते हैं, 'नाटक मदन पुर राई प्रभा भमाई क मम्य नहीं होगा। प्रदिनापक मी उतना ही सम्मा बईमानदार होता है जितना कि नामक। पस्तुल यह प्रान ही नाटक को ममोरंबा बनाता है (यदि वह मनारनक हो) कि इसमें मामर कौन है पौर प्रतिनायर कौन । या इमरे थानों में इसमें कई नायक मही पौर को प्रविमाया नहीं । परित पिसम में छिपकर शिमोन परिचमामारिकता माने के लिए पम्वर की प्रश्मिा विताना नितान्त पनिकाय है। मारक म रमके लिए सरत पीर मुपम मार्प सगा भापगाई। पर ममम्यान्मारक में जीवन की पारंवार मापार पर सगा भापप का बहिष्कार किया जाता है। मक स्थान पर मारपकार मूक प्रभिनय प्रभय देता है। भी मम्मीनारामण मिम मिमय और स्वमत मापद की दुमना करत हुए मिसव -"ाों की भीती भाषनामों और प्रतियों को निम्माठ करन म जिउमा महापा मुफ पिनय होता है रखमा स्वपद नहीं 1 मनुष्य कमीतरी मार एकान्त में भी उसकी बाग मगी हरेमी प्राठि पामी-कभी किसी तरह काम कर देन में पद हो।पापा पर टर पारपाई पर लेटकर या समीम पर वा होरप्यास्यान रेमे में मी मूक मभिनय के प्रशिक्षित प्रस्तियो मारि पीको स्पट करने में महाया होती है। मापा-नो समस्या-नाटकों में पामराव पनि संगायों के विध्य प्रतिमिया : मापा को कसम्म एष भावना की परियों में उतार सामायिक एवं पाप- परिसर पर माया पपा जाम पारे ! दिपा भीमन मोमोबाने बासी सरल और प्रकट भापायो मिलमा पपेशात टिन कार्य . The could be betreta carottet det er da bu corackosloot te bero Ko tort to, la ret be quarto suuya (abea.sotrethabahbe Handiththebeo ortuputhtootber Undermato vabo rad so beroa. -QAstoncereotbraem SonHT139 . पुपियाराम तापम भूमिका १.५ ૧૨ मामीनागरम मित्र के सामायिक मादक है परन्तु मेरी मम मामय पिकको पकित करने की पी। पता ने उन्हें देखतामो की भाषा मरोसने की अनुमति नहीं।" इस प्रसार मापा में प्राचीन मनियों का सपा परित्वाम र रिमा मया। सप्तव नाटयपात्र मियतयाम्प प्रभाम्म सर्वग्राम्य पारि बार प्रस्थामा रिकतारकारकाम नाटक में प्रानीय नहींए । पीत गर-गीच दानिक सदावली मी वहिपत कर दी गई। सबारों मे तापरिकों में किसी भी तत्प के प्रयोग के लिए निकप बताते हुए मा नाटक की प्रविधि की म्याम्मा इस प्रकार करते। माटक पोवामा मह विश्वास कराने की कला किया ग्पसियों में सार या पानाएँ पटिस हो रही है।" इस प्रकार प्राचीन सहयों के स्थान पर मापा में व्यावहारिकता के मन पीन पुमों की पोरना की गई। मापा के ऐसे माप को प्रमय दिया गया। पिसमें कई को पहन करने की सापमं हो मापा को मानती या पामती मापा की सबारी बा सकती है। मापा में पंग्य प्रकार उपमा साधषिकता, इप्टान्त मारि सामाविक प्रमोग हरा उसे जीवनगत समेगा के प्रेप पोप बनाया पपा। इसम नाराकार उन प सपार्यों का प्रयोग करता मोकिएकपत परेसा मारता पपने मौतारपक गिरन-वत्व को प्रपन परिकार में माने के लिए मिा करता है। समारों की प्रेमी को पि मी म मारक में परम्परात नाटकों से भिग्नताबाई पाती है। इस मिलर की भोर सोच करते हुए सो निखते है. 'इस माटम म नादार वम विधियों का बीफार करता है जिनके पाण पूर्वी नाटककार महापाग्य पात्रों की पसापारण परिस्थितियों में भी अपने पोतागमकाममोरंजन करताना। इनके स्थान पर यह परासतीप पीठ-मगित पार भनियोन समाने बानी मी में प्रारपाकी सपा पर विचार करतापीर इसमें पान व प्रगत हा विमानों योग प्राप्त करवाईवि राम सा उपरेशक काम या महाकाम्पकार AR the very mort dicht ert of riting the bo, pa korupt rokenrol. My destre mu to depta hemen being andiharstomjpaid not mubtheorepeakthungapooisodi" --DImafrom tbeatoTHer WMem Drama) bibe in a mattos ibe ndio babiera bat na iblar ut happeals to real people * -BSI (Locyclopedia Anemletes) समम्पा-माटक-माविक दिन ग्योम ध्यिा करत 'रमन म मा लिए एमोमीरा प्रयोग किया है शिपादन वागे भार से मानपूर होकर उभरे वेपित दिपार पनुस्प माकन के लिए साम्य हह । पया की मानसिक रामानों का ही बोरी यमाता पम्पहन के कारण मबार टूटे-फटे हल। परन फिर भी मंगारों मप्रगाह रमा एसा है। उन पर का ममापन बियप स होता है। मंगार प्राय मह हाल प्रौर के विम्याम में मिला भी कम मिली। निरम्प ममम्मा-मारकी परिधि शितपर पानिपरसमे राग माना किस मार रोप्रादारभूत पिशपठाएँ मस एप मे पार रामे पर नारकों में भिन्न करतीम विपता है ययापार प्रर्या नारा रोमाम प्रतिरपना पारिका महिपार। सी विशेषतामा प्रनाम सपना पात्र मार भापा प्रभिनय मनी पर दिपेप मम पाया है। दूसरी विपण बपिता पिर पवागत रिकार एक दिन माता है। भारतार सरिनी पहरी पर होयो मार रानाही म्पापी होगा। नीमरीचिपठाई भ्यक्ति और समानों के समय में प्रारोलिसपना पही नाटक- पार पारिसम अनुर हर इनारकरना में प्रश्न एता है। पौर मामे पन में परिसर दिपायों में हार एए मा पहनाएर है पार-बार पोपी नही । ममें मारकर मईप मन्दृषित गल भादायक! हाधिमागारममारोमा प्ररान पाए पन रिपामा प्रपम करमा १ -behinsdddsantabyabatoliance bud to bettaadiotubean interesta walprophed improbabetreenances odthusiasmindaforeokuchainoxofmuchration dateslon to protetor tercan Hal to track, hente o ube tutorial balami of of 900 is pricker x flada od -Qamanadserime- मिश्रजी के नाटकों का वर्गीकरण वर्गीकरण का प्रापार मारकों का वर्गीकरण भनेक दृष्टियों से किया जा सका है। परन्तु बिसी नाटकको पिपिष्ट वर्ष में पमिरित करने + मिए यो पापार प्रमुख राम माटम में पिषित बिमाप्रापार और दूसरे सिस्प-सपठन का पापार। नाटककार अपने उद्देश्य को विचारको पठिप्रत करने लिए पनिवार्यत समार किसी विम्ब को माध्यम बनाता है। यह विम्म मतीत का हो पपरा बर्तमाम मा परिवार का हो पपरा समारा मानसिक हो पपमा मौतिक मष्टिमत हो पपरा समष्टिवत इसका होना अनिवार्य है। या विमा पाके मम पर एक सेरिनष्ट एवं स्वामी प्रभाव जामदा है जिसके कारण नाटकका स्मरप प्रेरर में पमुग्म रहता है। इस मस्तिष्ट प्रभाव पापार पर ही बददो मारों में ध्यावत करता है पठ मारक पर्माकाम में इसे पापा मानना समीचीन होगा। हुमय दृष्टिकोण पास्त्रीय है। नाटक पस्तुत पावस्तु, विचार परिष पारि विभिन्न तत्तों की एक ईनिष्ट का पालन पत्नों के संपपन के मनुपात के प्राचार पर माटक के मर्म बनाए जा सकते है। सीमा में कवान पर प्रति बम रिवा पाता है किसी में परित पर टिसी में समस्या परमार सिी विचार को प्रेषित करने पर। इसमें विचारपोय तम यह है हिनाटक एक तल परयन रेने पर ोप तत्त मी उसी के अनुस्स परत भाते है मिस सारे नाटक पिस्प-संगठन में अन्दर प्रा पाया है। (माent पेशालि चिन में सका विचार विस्तार से किया पयात नाटक कत्रिम तल प्रापार पर पम्प पत्तों को मंपित किया गया है वही पिस समनापागारमा पारगा। इसी प्रापार पर माराम प्रविवि भी सर नवापानी पा सस्तीस प्रापार पर माटोका बनीपरपस प्रकार होमा-पटना-बान नाटय परिष-प्रधान मार विचार-अमान नाटक एस- प्रधानमारकमारि। पत स्पएहमा बिमारों पर सिए अपुष मार 1-- एक रिकसप परिमान हरामों पापार पर निपनी के मिपपी के माटोकाकरण . माटों का बमीकरण करना समीधीन होमा । मिश्री के माटकों की हासत्रमानुसार सुभी इस प्रकार है- प्रकासम-विपि महक कपनानुसार मेहन-तिषि प्रयोग सय ११७ सम् १९२१ २ पम्पासी सन् १९२१ सन् १९२० ३ रामसका मन्दिर सन् १९५२ सन् १९३. . मुक्ति का रहस्स सन् १९५२ सन् १९५. राजयोग सन् १९३४ सिन्दूर की होमी सन् १९२४ सन् १९५२ माधी राठ सन् १९५० सन् १९५४ भारए कौवीपा मपप्पम सन् १९४१ दपाश्यमेव सन् १९४९ बत्मराम सम् १२१. १२ रितस्वामी महर एन् १९५२ सन् १९५० सन् १९५१ मन् १९५४ सन् १९५८ मृत्पुश्यप सन् १९५५ सम् १९६२ अपरामित सन् १९५३ कवि मारते पासी में बसन्त बळीकाप रिम्म प्रापार पर इन मारों को पारी में विमलयादा सकता (5) सामायिक मारकसप में मार पाते है--संम्वासी समस का मन्दिर, मुक्ति का पस्स परपोण सिदर की हानी पोर पापी पद । (4) ऐतिहासिक वारक-पस बम के अन्तर्गत मिममी का प्रपम नाटक 'मयोपासनता प्राप्तिपरायणमाटावराण स्वास्थमेर विस्तापी नहरें, मापार, पणती में पसन्द पोर परती काहप पाते है। (ग) पौराधिक मामा-सपर्प में सम्पूर पपरिव' fun 'नारएकी बीमाकोसामा हातापाम्पूरपोर 'परपति मम्मीनारायण मिमसामायिक नाटक महाभारत चित्रकूट का रामायण पौर 'मारकीदीमा स्पनिक परन्तु पर्योकि उसमें पौराणिक वातावरण को पसन्म एका मया है और पाठक इससे पौरामिक बिम होगाम करता है मत से पौराणिक नाटकों के ही धर्म में रखा गया है। (५) बीवनी पा परितमूना मारहसबब के मन्तर्गव की मारणेम, बमार और मृपय तीन मार पाते।बपटक में कराचार्य और मृत्यु ज्यय में महारमा गोपीपीवन के प्रधान कर्मों को मारक काम दिया गया है। यपि ये नाटक ऐतिहासिक नाटकों के वर्ग में मी र चा पाते है परम्तु में पड़ने के पापात् पाठक हरप में स्थायी बिम म पति-नामों के पक्विरवाही पड़ता है जिसके कारण इसे पसप बर्म में रखा गया है। प्रस्तुत प्रामका विषय केवल सामारिकमाटों का पप्यपम! पर पिस्फ संपटन की दृष्टि से कमान सामायिक नारकों काही वर्गीकरण किया गया है। शिल्प-सपटम पी दृष्टि से नाटकों का वर्गीकरण मौर समका नामांकन करने से पूर्व पीकरण के विषय में कतिपय सीमापों का विचार करना पापम्पक है। सर्वप्रपम नाटक रेणिमरे किसी वर्ग के लिए कोई मुस्बिर परिमाया नहीं बनाईरा सकती। परेक नाटककार उस पपने विपम एवं ममुम्प बोग-बगत परिवर्तनका नेता। दूसरे प्राप दो प्रकार के निकटवर्ती पित्तों में पावर्तन पवना मूल्म हावा है कि धिम्म की सीवामों में कोष के कारण मारक को दोनों में से किसी एक में पाराही का का सपना है से परमा- अमान नाटक प्रौर परिष-प्रपाम मारक में। इस पहिरिपाठ कमी-कभी एकही मारक को चिप की रिपतामों का समायोग हो पाता हैस सिन्दूर की होनी में सम्पूर्ण का घटना को पात करके चमती है परन्तु पार्यो में समस्पापों का भी पूर्ण विषम हो गया है। पग्य नाटकों में इस प्रकार का सामवस्य इना स्पष्ट नहीं होता परन्तु मिस्टपीकरों के पिप-तत्वों को एकही नाटक में सरफिया बासमता है। मिमी के भाटीकाकरण करणे समय पातमी समस्याएं प्रमुख स्प से सामने पाती है। मिपी के पूर्व हिलोनार में सभी को मुनिश्चित परम्पराम पी। मिपी मन पोरगा की प्रेमी प्रमावित हर परतुपरेग्म की मित्रता केकारम पिस्प-सदन में कई प्रकार परिवर्तनों का माना स्मा- भाविकोपारपट मिमीमाटोसपार्षवाय प्रतीकमार विधाप्रेषण पेमी नमस्या सिरमो और मेव सी भारि मिनमा एमातियों का पापोम हमारामा वर्गीकरम मे मिस वर्ष के हतों को प्रति प्राटित मिषनी के नाटकों का वर्गीकरण पाया मया है उसी वर्ग में नाटक को अभिहित करना समीचीन समय मया है। मिस्म-समन की दृष्टि से सामायिक नाटकों को मिम्नसिक्षित बर्मों में रखा पा सकता है- (4) समस्या-नाटक १ संन्यासी २ प्रापी पत (ब) विचार प्रधान मारक १ राक्षस का मन्दिर (प्रतीक माटक) २ मुक्ति का रहस्य ३ राबयोम (म) समस्या एवं धरना-प्रभान नाटक १ सिन्दूर की होनी प्रत्येक माटक को विशिष्ट वर्म में प्रमित करने के कारमों का विश्मेपप इस प्रकार किया जा सकता है- संन्यासी समस्या-नाटकों के पिस्प की पर्वा करते हुए हमने समस्या-नाटकमी तीन विपताएं निश्चित की थी। प्रथम उसमें किसी बमम्त सामयिक समस्या का विवेचन होना चाहिए दूसरे उसमें प्रतिरबमा मावुकता मोर रोमांस काहि कार कर सपा को पपमामे का प्रारह हो और तीसरे, उसमें समस्याका बौद्धिक तर्क-वितर्ष पूम मिषम हो। इस निकप के भावार पर 'सम्यासी' को समस्या माटक की संज्ञा देना मर्यपा मंगत है क्योकि इसमें रपयुक्त तीनों विशेषताएँ विध मान है। इसमें समाप प्रेम की समस्या का माधुनिक युग के संदर्भ में चित्रण पिया मया है। समस्या का मासिक तर्क वितर्कपूर्ण विवेचन है मौर पपाप दृष्टि स समस्या पर विचार करने का मागह। प्रत इसे सहमही समस्या-नाटकमी कोटि में रखा जा सकता है। राक्षस का मन्दिर इस मारक में मिपदी मे अपने प्रभियंग को प्रतीकों के माध्यम सेम्पषित घ्यिा है। यपि मारक में मूर्त पम को भी स्वतन्त्र महत्त्व प्राप्त है परन्तु प्रमा- मता प्रतीसरा से स्पष्ट होने वाले प्रमूर्त पन की ही है। भारी को मारी का प्रतीप मानकर ही माटगेश्य से प्रगतमा मा सकता है। परन्तु मी इसे प्रतीक नाटक की अपेक्षा रिचार प्रभान मारक की ममी में रसमा ही सामीनारायण मित्र के सामाजिक नाटक पशिक समीचीन होगा क्योंकि एक तो प्रतीकका प्रकोप सूपम प्रबरों तक नहीं है इसरे, प्रतीक की अपेक्षा विचार और प्रेपणका मात्र पपिक गुर। स्वयन प्रेम की समस्या विवेचन कारण इसमें कतिपय तत्व समस्याबाटको मी मिलते हैं। परन्तु उसके सौपीपोप तर्कपूर्ण विषम के प्रभाव में इसे समस्या माटक नहीं करा पा सकता । इसमें प्राथनिक म्पतिवारी मामय के पिलबिम्न सम्माचार्य पित्र विधाने मे नारपसारने कृपया विचाई भार इस प्रापार पर सेमेषत पभावारी नाटक कहना भी असमत मही। परन्तु प्रमुखता विपार पत्र की होने के कारण से विचार-भान मारक की भैली में प्रथि विकरमा समीचीन समम्म गया है। मुक्ति का पत्य इस नाटक का शिप-संगटन पूर्वबती नाटकों से पर्षपा मिल है। इसमें मिममी का परस्य किसी सामरिक समस्या का पिन नहीं भरपुर बीवन के प्रति अपने दृष्टिकोणबीपवना है। कमानक पापपादि सभी तत्वों का निवास इसी दृष्टि से किया पमा है कि विचार का परिकापिकामनाया जा सके। सकारणबाम पार पापों प्रादि स्यामाषिक विकास में भी चिपिता प्रागस नाटकमा पातावरण नीधिक मही पौरन ही व-विवर्ष की मोरगा है। पर विचार प्रेपपीवता के गम से किए गए नाट्यविमान को विचार प्रभान नाटककी कोटि में रखना ही समाधान होगा। रामयोग रापयोग में 'समस्पा-माट' एवं पारग्राम माटर' रोगों की गिरेप तामोश सुम्पर सामगप हमा है। सपस्या-माटर की पिसे इसमें कोरिष्ठा है, कई निवर्षपूर्ण निषेचन है पौर मातात समस्या का विषय है। परन्तु धो माटक को समाप से बचने से इसमें विचार-यमान नाटक की पिधेपठाएँ ही प्रपिर प्याप्त विमोचर होती है। नाटकको समस्या-नाटकमी मी मम रखने का एक कारण यह भी है कि नाटक का काम प्रारम पार पात्र मी जन-जीवन मानदिक उपारीका सही प्रतिनिपिल नहीं करते। मारपरका रेप किसी समस्या का निषण करने की प्रयासमस्या के प्रति विचार करने प्टिकोप को प्रेपित करलाई विवके लिए उसने एक सामाफियामक की सपना करती है। पर हरे भी विचार प्रसार मारक की भेनी में रखना समीचीन होपा। पा मारकवार को मो रामयोग' पौर मुलि का रहसनरो पिथबीमारकोनीदरम माटों को समस्यालाटर की मिमा पम्तगत रममा प्रमित नहीं पा सीसिए उसने इन दो नाटों के नाम के साप मुखपृष्ठ पर, पेप माटों की तए 'समस्या-भाटक नहीं मिला। सिन्दूर को होसी इस नाटक में समस्या-नाटक' की सभी विशेषताएँ विधमान है। तीन पालन्त समस्याओं पर तयुक्त बोटिक विषम है। परन्तु फिर भी यह केबस समस्या-नारक नहीं पोंकि माटक का भूम कमानक मुरारोमास पर केनित पार पसी के जीवन की घटनामों के प्राचार पर नाटककार ने कर्म प्रतिफल सिम्त की बड़ी मुन्दर परना की है। वास्तव में नाटक में 'समस्या-मार' और पटना-प्रमाण नाटई दोनों का मुन्दर मार्मस्प है और माटककार उद्देश्य एवं हिस्स-सेमटन की दृष्टि से कोई भी पन दुर्वम समभार रिस्मत नहीं किया वा सकता। दोनोपो समन्बय में भी नाटककार मे प्रमात सलता प्राप्त की पत रस नाटक की रिमा के लिए एक मिम्म गर्ग की कल्पमा कामी पड़ी समस्या एवं पटमा प्रधान मार। पापी रात इस मारक में समस्या-मारक की सभी पिपपता-बौमिक्ता करित- पूष मिषन मौर ममम्त समस्या का विष रिचमान होने के कारण इसे 'समस्या-नारकी निवासतर्पत रममा ही समीचीन होगा।
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सृतीय अध्याय
सामाजिक नाटकों की समीक्षा
१ समस्या-नाटक
(क) अन्वामी
(प) मामी राव
२ पिचार प्रधान माटक
(क) राक्षस का मन्दिर
(स) मुक्ति का दम्य
(म) रामयोग
३ समस्या एक घटना-ग्रपान माटक
(क) मिन्दर की होती
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(क) समस्या नाटक (१) सन्यासी बस्सुपक्ष मिपी मे इस नाटक में प्रमुख रूप से घिरम्तन नारीस्व की समस्पापा विवेचन किया । इस मूम समस्या से उभाषक कारपोका विवेचन करते हए मनमेल विवाह एव सहशिक्षा की समस्या का भी प्रासंगिक म्प से चिन हमा है। इसके अतिरिक्त नाटककार मे देश-स्वावाश्य की समस्या के कतिपय पासुमों का मी कपानक के माध्यम से विचार किया है। मूत समस्याबाटक की मून समस्या पिरम्तम नारीस्व (यह नाम माटक कार काही दिया हुपा है) के पम्तगत नारी-जीवन के रो पहमो-प्रेम-स्था समय पौर मर्यादित विवाह का विस्तृत तुलनात्मक विवेचन हपा है। यह समस्या मानव की एक मारबत समस्या है परन्तु मिथनी मे इस समस्या का माम्मान भारतीय एव पारधारय बीवन-दर्शमक द्वन्द्वमय समर्म में करते हुए इसकी साम मिक महत्ता को प्रमुग्प रखा है। पापचाप ससति रे सम्पर्क से नवधिमित युवक-समार मार प्रम मीन विचारों से प्राप्टमा बयोकि एक तो मारियों की पटिलता की अपेमा स्वनाम्दता की मोर मन का फिसमना स्यामा विक ही पा दूसरे, स्वभाग प्रम के प्रमक हमारे शासक ये यो मौतिक दृष्टि से भी हमसे प्रषिक सम्पग्न एवं मबीये। मत शिक्षित समार के सम्मुस एक समस्या उत्पम्म हुई। पौन-सा पप प्रहम पिया पाय-स्पन्न प्रेम का अपमा मर्यादित विषाहकार ऐसी पारम स्थिति में पारधारय मनुकरण से प्रभावित सामायिक विधान का मन विषण एवंझानिय विमेपन कर समार के लिए उपयागी एवं हितकारी बीवन- नन पा उपाटन करला सामयिक महत्व की ही वस्तु कही बायपी। विवन-इस समस्यापिन के लिए नाटकमारन एक प्रेमी-युपम जीवनका कारपिक चित्र उपस्थित किया है। बिनकाम्त और मालती अपने शिक बीवन में ही ससमा प्रेम को प्रोर पप्रसर हाते है पीर प्रम की मी निपों एवं पस्सना बगद में विचरण करने मपत है। समार पी पोर से एवं मायामापरच मिसामायिक नाटक अममेम विवाह में भी पति-पत्नी के सम्मान इसने बिपाका किपरली कहती कियाँ देकर मुझे अपने पिता की पार पाठीमार व प्रसार परिस्थिति वियर हुए यहाँ तक पहुंच जाती है कि सीमामा कोमामा परा है ममममा किसी मेटिनम में या होटन में दो प्रारमी परे। मानसिए योंगर लिया है तुम भी सहन पोर में को। हम वो एक-दूसरे की सीकर।" स्वपिनारस पनस्याकारों परिपामा पाससका निमेषण पिया पसा है पीर सस मिए पुरतने का भी प्रापय किया गया। वापि नाटककार को समस्मा विरेचन में अंपती सफम हा मासा समें एक या दोप या माना है कि गेमाटिक प्रेम और पार्म प्रम रोगों एकही रिला पाये है। दोनों ही चिों में प्रेम में इतनी पवित्र पाएँ रियाई महिपाठक मम में मा सना ही नहीं मानी किचनी पापापीको पातकापने पाले प्रेमी या पासना प्ररित होकर प्रेम कर रहे हैं। किरणमयी पौर मुरतोर का प्रेम तो सप्टत मम्माम प्रेम काम पार करता है। मुरलीपर रिहान्त पावाद भी उसे अपने हर में बैठा मा सीकार करती कहती है-या मेरे भीतर है पर पका रस पिनी में दूसरी तिमी में, बकमी गम्म हुमी बमिनमा । प्रम का पाप सम्म समान पनुमोदित होने पर भी समार को महानुभूति का पार होगा। इसीलिए मालक इस प्रम को मारक के प्रारम्म से भम्त का पहा मुभूतिपूरक ही रेषा और मन्द मे पूर्ण विश्लेपन उसे प्रस्था भाषिक से नपते है। रोमांटिक प्रेम मिसका विरोषनीवारि गि है सकी चना दारोमानाप और हिरनममी के प्रेम में मिलती है। प्रेम की मनापासै पनि सरबियस पोरगरा से की पा सकती है। पर नाटककार को दो इस प्रेम माध्यम से प्रेमाटिके मानों का विषम करवाइए मनोम मिाहीवितामा टिकनको मारश्याम माया पोप के कारण पाना ही पषिक समीपमकिपमस्या में मादककार प्रगत होपान है। प्रम्प माया-सपूत समस्या के प्रतिरिक्त विषम मच पायाएँ भी प्रापि पमित हो गई है। सममें प्रमुख समाधान की समस्या । एशियाईपकी पापना पाकारिता माध्यम माविका मास.११ (म) समस्या नाटक (१) सन्यासी यस्तुपक्ष मिमग्री ने इस नाटक म प्रमुख प मे विरम्हन नारीस्व की समस्या का विशन किया है। इस पृम समस्या से उभार कारपाका विपन करते हए भनमेल विवाह एवं महतिमा समस्या का भी प्रासयिक स से पिवन इपास पविरिष्ठ नारमार ने एय-साहय की समस्या के प्रतिपम पहनुपोंस भी पानक माध्यम से विचार किया। भून समस्या-नाटक की यूम समस्या पिरन्तम नारीस्व (यह नाम नाटक फार काही रिया हुपा है) अन्तगठ मारी-बीवन के दो पहसमो-प्रेम-स्था समय पर मर्यादित विमा का विस्तृत तुलनात्मक विरेचन मा है। यह समस्या मानव की एक प्रारत समस्या है परम्न मिपी ने इस समस्या का मास्पान भारतीय एवं पारप बीपन-दान के ममय मर में करते हुए इसकी माप पिक महत्ता को पग्न एया है। पारारय समति के प्रम्प पिक्षिय पुरा-माम स्वार प्रेम के मकान विचारों से पाएमा पयोकि एक तो गहों की गरिमा की पपेमा सत्ता की पोर मन की फिसलनासामा रिकही पा दूसरे, सन्म प्रम के प्रामक हमारे पासको यो भौतिक दृष्टि से मोहममे प्राधिक सम्पान एवं मुभो । प्रत शिक्षित समान के सम्मुक एप समस्या उत्पन्न होन-मा पर प्रण लिया गप-सभामा पपरा पारित बिमाका ऐसी नापक स्पिति में पारप अनुकरम से प्रमादित सामाधिक विमान का मत्रिण एवं महानिक सिनेपगाकर उमार के लिए रपयोगी र हितकारी पोरनवन का सपाटम करला सामरिक महत्व की बस्तुरीगाममी। रिशचन-नए समस्या के दिन के लिए मारकरार, एक प्रमी-युक्त पीपल का कारनियमित उपरिपत यिा है। विरकात पार मानती अपने मंशिकीमती समर प्रेम हो मोर पएमर होने पर प्रेम की रणी मिएर समापम मरिण परने मगते हैं। समारकी पोर से एवं मम्मीनारायन मिमसामायिक मारक बिसकात प्रतिशमी की पोर बाधाएं प्राती है परन्तु रहे प्रचलता से सर मवे। परस्टूरे विवाह के बयान को भी स्वीकार नहीं करना चाहते। विश्वकान्त पर मानती पिता की मार से एवं उसके अपने गुरु-तुम्म बरेय मुरलीपर की भोर से पी पपासा पाता है परन्तु यह रेस-सेबा कीन्छा को सम्मुख रखकर विवाह से इनकार कर देता है । देख-रोमा लिए दबिश पाता है। परन्तु मा पर अपनी प्रेमिका मानवी का विवाह इयरे के साम निषित पा ममता को निम्न हो रहा है। उसके प्रेम की पादर्श मारमा उस ठोकर मारती (मार मह एक मिमम नत्तर मिल मेयता है जिससे मामती के माने पीर निरपराध मन को हम पहुँचती है और यह विभकाम्त से बरमा लेने के लिए उसके प्रतिनी रमाशकर से पिरतीस समाचारको पाझर विमान्त असन्तुमित हो पाता है और देश हित के लिए पिए गए सफर संबटन पर भी नाव मारने का निरषय करमता है। इस प्रकार रोमांटिक प्रेम कारपदोनो काबीपन किराना पाकिम गया यही बिहाता नाटककार को प्रमीप्ट है। मानतीस सारे प्रेम-यापार काम में बौशिकपिलेपण करती है यो सारी समस्या मातमय विधबन पाता समस्या-नाटककी सफलता वास्तव में रम गहरे विचारपूप एष मुक्तियुक्त वकों में ही है। मामती प्रेम के सरप को स्पष्ट करदी हरिहती है, "म रामाटिक प्रेम मही पाइती हिम्मकाम्त साप मेग यहा बारमा प्रेम पाहती हूँ को मार कर दुनिया में समझदारी माप निमाया जा सका रोमाटिक प्रेम की परिमापा करती हई बह पाती रिसे प्रेम करे रसके सामने नाबामा- विसुम मर पामा-उसकी एक-पर बात पर प्रपों को न्योडायर कर ना मा- टिक प्रेम होता है।" तुम मुझे प्रेम सिमा पा पर मैंने भी इन्हें प्रेम किया पार मारा कर कीमत परीर मसीसीपार तुम्हारे पस की बिजली तुम्हारा पर सपा मुझे पागल बना देता था। मुझे रात मर मीर नहीं पाती बी 4 सोषाकरखीवी में मरमे मगती मार दुम पन्त समम पाकर मुझे अपनी मोर में उठा सेत यह मरना रिना मुपमम हाता" परन्तु इस प्रेमा मापार चिनामिक होता है इसकी पराठी पिताती है कि इस मोगों के . . 1 की सामानिमारकों की समीक्षा प्रेम कामापार वासना पर पानी में समभोगको इन्हा पार पी।इम प्रेमको यह पाप बताती है "विम तरह मामन या पानी बिना पाप महींपस सध्या यह प्रति की बात सामीप मोरेना माहिए या रस्त परे सब पर रानाम उसी की निम्ता में पोपना और इसे प्रेम का नाम बना यही पाप है।" मिषीने समस्या के प्रम्प पहनों को म्पष्ट करने के लिए एक भग्य प्रमी दुपत का विष भी उपस्थित किया है। किरणमयी पौर मुरलीपर मी युवावस्था में परस्पर प्रेम करने मयेप पर सामारिक परिस्थितियों के कारण किरणमयी का विवाह भापर हो पया मिप विवाह के पापात् हिरमममी पपने बाहिक जीवन में सफर म हो सकी (पसपि इसक पम्प कारण भी है) पौर मुरलीपर के वरममित मसती हो वाम पर और गत में उसकी मृत्यु हो गान पर रही बहाम हो जाती है। वह समाज की मशिमों को ठोकर भी अपने प्रेम को पप्प रखती रही। इस प्रकार उसके पमन्तुलित जीवम का कापिकषि दिलाकर मापार में रामाटिक प्रेम की सीमरसता काषित उपम्पित पिया है। पसा मतिरिणत मोती के बीवन कीपिका सिर यह पी परित रिपा गया है कि समारा प्रमनुमोटिव रोमारिक प्रेम म परिमीन सम्पाय सापित हो पाय तो उसके कम-पार सम्ताम को-तिमा भारतीय एवं पारमपित पनपापन प्रलापण है। स्वन्टम्प प्रेम की ग्यमापना के लिए उत्तररामी पाठावर पित्रण में नाटककार में प्रत्य समम्यापोरा पिप दिया है। ये समस्याएं हैं- समिया रामा मनमेत पिशाही सरोनो समस्यापोंकोसता स्पसेनहीं उठाया गया। इन परपस दौशिक मितपण भीमानी पिया गया है। इनका महत्व हासभम प्रेम के पारिर्मा कपारप म्पप करने में है। यानी पौर दिन- कान्हाप्रम परिपा पुचिपूर्ण भावापरम में हुपर मार हिरणमगरी सपा मुरलीपर काम किरपमपी पौर रीनामाप के अनमेल विवाह कारण परम तिहमा ( महशिया के माताररपाटपून विवरा बार्णमा में कराया गया। एकात्र मौमामासाहुमाएका है," में सिम पोर परिया मैत्री मालने ही “सुनो सुरती की पोर पर युपराt. माँ का पिनामफी नहीं होती बम बही समपान पसराप 'मी प्रहार *दानी .. । २ मक्ष्मीनारायण मिम के सामाधिक मारक प्रबमेम विवाह में भी पति-पत्नी के साथ इतने रिप बात है कि पली बहकी मे देखकर मुझे अपने पिता की बाद पाती है पर इस प्रकार परिस्पिति विपाते हुए पहा तक पहुंच पाती है कि रीनानारको गहना परा है 'समम्मा किसी येटिक स्म में या बोटम में दो प्रारमी ठहरे है समीकमी मना साने के लिए याही बातें कर लिया करते है तुम भी स्थान प्रारम भौ। हम रोनों एक पूररे की बेटी काट दे" मपि नाटक में समस्या के कारणों परिणामों तपास्म का विरोपप किया गया है पर उसके लिए पुरतों का भी भाभर लिया । वापि मारकवार को समस्या विधान में प्रसव ही सफल कहा जा सकता है। इसमें एक दोप यह भा गया है कि रोमांटिक प्रेम पोर पावर प्रेम दोनों एक ही रिता परत दोनों ही चिों में प्रेम म सनी पषिकामाएँ दिखाई गई। कि पालके मन में यह स्पना ही नहीं पाती किमी बाबामाकोबीवकराने वाले प्रेमी या वासना से प्रेरित होकर प्रेम कर हे किरणमयी पौर मुरमीपर काम सोस्पष्टत प्रम्यात्म प्रेम का रूप धारण कर मेवा है। यह मुरमीयर के गेहात पाए भी उसे अपने हाय में बैठा हुमा स्वीकार करतीवो ~~ भी भीतर पर पेगा इस रिमी में इमरी शिरमी में पाकमी पाम मूंपी पर मिमेपा । भाग स्वरूप पमान रा भनुमारित न होने पर भी समाव की सहानुदक्षिा पार होता है। सीमिए पास प्रमको भारको प्रारम्म से मम्त तक महा मुभूतिपूर्णकवीखता है और पन्त मै मेबा के पूर्व मिस्मेपर उसे पस्या भाषिक से नहरोमाटिक प्रेम मिसा विरोप पनि भारि में किया सकी पवना को मानाष पार किरणमयी प्रेम में मिलतीसग की तुममा गोरे'मा एपको सरियत पोर पपान के प्रेम सेकी वा सस्तो पर भाटभारी हो स प्रेम माम्पमरे रोमांटिक प्रेम कारों का मिलेपण करते हुए पनमेत विवाहकाही पिपन परिवारोमा Ter प्रेम की भार परापण पाम्मा दोप के कारण यह गहना ही भमिक समीषी सिम्पाचिन में मारामारपटही। प्रय समपाएं -इस मूम समस्या पतिरिक्त कतिपय मान्य समस्याएँ भी प्राविकप से पम्मिा हो गई।समें प्रमुग है ध-स्वादाम्पका समस्पा। एपिपाई संघको स्थापना पत्रकारिता ' माध्यम रेपमतिका 30 जामानिम्पाटकों की समीक्षा पार और लिस्टिक मनिस्ट्रेट बारा पररों प्रयाय विरोध म त्यागपत्र देने का सकस पारि प्रसों के माध्यम से नाटक में साग-हत का रिचार किया गया है। परन्तु इस समस्या का सामोपगि ईयूम विषम न होने के कारण से पपिट मापनी रिया या समता। अपामा एक पात्र मारामार में अपमे पामका विपप एक ऐसे सीमिठबम को बनाया है को पााचारय मसतिरे वातावरण से ना अधिक प्रमापित कि भारतीय संमति के परमरागत साधारण संस्कार भी उममें नही ।। अपनी समस्याओं को समाप एवं उपरोमिता की दृष्टि से सोपते हुए कही भी उपके मन में भारतीम परम्परापत इष्टिकोन नकर इन मही हवा । बमबीवन की पर मरामों को पूमतया अपने मन से निर्गमित करने वाला बर्गे जनजीवन से दूर हो का भायगा । पापों में विषान्त भोर मुरतीपर रेप-स्वावगम्य की प्रेरणा परिवामित। परन्तु जैसा कि जिन किया गापुकारे काटक में काम प्रसंग माग और इससे मुम समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पाता रिसास्त रेस-मेगा रतन पाकर भी म मनका।। वस्तु प्रम मी सम्म एप मानसिक समस्या के दार्मनिह पक्ष कोरिक मिषन के लिए यह उपयुक्तीवाकिनाटकार सम्पन्म एवं सिमित या के पाक को मापार बनाए, परन्तु रम पदि पानिकता का समारंग हो पान कारण समस्याएं जन-जीवन सेरोपई। सिल्पपस विमा--हानियादुपत्र में विवालिया ना मारक का राय एक माषिक समस्या का रिकत-पितारा माटम ही है मत एवं समस्या-मारको कोपेनी में ही रहना ममीवानापौर सिल्प-दृष्टि से विचार करते हुए मनाया- नाशिकोही निष्प माममा पाहिए। मानवम्याम समस्या-नारक में मामा कामहरम मसपा प्रस्तुत करने एवं उमर सस्नपूर्ण गिरेपन के लिए परिकविट पासर प्रान में है। सपि मे पानहानियोन माम माटककार ने समस्या के कारणों एवं परिणामों को रिझाते हुए प्रत में मारे गामक की मौदिक मीमांसा मी मासी पाई।पन पत्र में समस्या के प्राविधिकारा पिसोगा। मुरमीपर पौर किरणमयी उमा मानवी पौर विय- मम्मीनारामण मिमके पापारिक मारक बान्त प्रेम के सम्म में गापाएँ । मोर उमका निराकरण है। दूसरे पक में रनका प्रेम रसवा है, मिह मा प्रेम यह स्पिति सप्ट होती है। तीसरे प्रक में प्रेम कोहराम में समशेर पिसात-सेवा करते हुए प्रमिका के विवाह से तिम होकर उसे निमम पत्र मिसवारमौर पम्हिप कमें मामतीका परिप परिवर्तन होता है और यह सारी समस्या का विपनौटिकारा करती है। इस प्रकार कमान का मिग्यास पमस्या-माटक के पास पनान का प्रयल किया गया है। परन्तु इस रिम्यास के वापर कमानक को मारमा पृपि से सफल महो कहा पा सकता । इसके कतिपय दीप निमारनीय है। सबमे प्रगम साधारण माटक में एक प्रमुख कार्य की उप समस्या नाटक में प्रमुख कप से पक समस्या होनी चाहिए। जिससे उसके विरोध में मुगपता एवं सम्मता हो और प्रभाव मनी पम्पिति का निर्वाह किया जा सके। मम्यासी माटर में महमिया एवं मारेम मिाह की स्पार्मो का अन्तर मूल समस्या के मम्वमव कर मी में वो भी देम-साताप की समस्या को मोड़ना तो किसी भी दृष्टि मे त समठ मही कहा जा सकता । टम राममिक समस्यामा के साप इस स्म माविक समस्या का मेम किसी तरह भी पेयया नही जा सकता। समस्यामों के त भमिनबनको माय करके गमग मित बीवन की सम्म समस्मामों के साथ यह समस्याएँ को पनमित रंग से पी हुई। रेसम के माने में यह मोटे-मोटे पार पागे गंपकर प्रभाव-ऐषय में मारात सत्पम्म करते है और मार दी यूनिटी प्रप्ट हो पाती है। समस्याों के ग सम का यह पम्प भियगी के नाटकों की सबसे बड़ी भुटि है। माटक में मम ममम्मा + भातर्गत दिए गाने मासे पान में कहीं-कहीं यसकों को प्रपिङ्ग विस्तार मिल गया है निमसे पाठकबाप्पान मूल समस्या पानित म पर गौन समस्याओं पर बना जाता है। पैसे सानिमा तपा पममेव रिसाद मून समस्या के कारण मापी परत इसके विस्तृत विषम हो देखकर पाठक पम पमस्या की अपेक्षा ही से अधिक भिभूत हो पाता है। में समस्याएं इस प्रकार महापक होने की अपेखा भून वमस्पा मिए सरित मूमि सपने देने में पापक होती है। पान का पूर्व मान जिसका प्रयोगन दोर्नी प्रभवी-युग्मो मार्षिक पिपरिपाना मात्र है पारस्ममता से पषिक जमा हो गया है पिस प्रमुख - मफेय, 1 सामारिकभाटकों की समीक्षा सप से तीन कारण है (क) प्रासंगिक एष यौन समस्याओं को प्रषिक विस्तार रेमा । {) यशर्म के मोड़ के कारण भी पालक विस्तृत हुपा है मारपकार मे प्रत्येक पटमा के कारणों को देकर इसे स्यामादिकलाट-बनाते स ममों को अनावश्यक बिम्सार दिया है। एक साहरण मारिए । माटमदार को हिरम मयी पौर मुरलीपर के पविष को पूछा देने के लिए मुरसीवर की मृत्यु दिवानी भावायक थी। प्रतः मृत्यु के प्रबंग को स्वामाषिकता को बनाए रखने के लिए सरकार की असावधामी विलाई पई और फिर स्ट्रिपट मजिस्ट्रेट को मेष परमार सरकार के पिय स्यागपत्र भी दिलवाया गया। इस प्रकार ने मम्मे प्रसप मिस पारमा एक रिसोही परित्र की पिटाई यह प्रयामा विकता दिसामे लिए कितना ही युक्तियुक्त पयों म हो मूमपानमा प्रभाव के लिए सबा पसेमत है। तना मधिर विस्तृत विकण उपायासपार लिए तो सम्मम है नाटककार मिग नहीं। इस प्रकार वामद को गह-तरी एक विया में श्रींचने का साहरण मितवे है। (म) तीधरा कारण है परिण की सामाविकता का निर्माह। इस कारण पीकपामक प्राधिक सम्मा हो गया है। परियों को सामाविणता निर्वाह के लिए ऐसी पटनापों की पोरना की गई है जो मूस मारक से कोई विशेप सम्बाप नहीं पचती । वस्तुत प्रत्येक पटना में यह गुप होता है कि यह परितको मी विकिरती है और कमान को मी पति देती, परन्तु इसमें परिषगत जिपपार बताने * मिए पटनामी कीमो मोगमा की गई है उसका पानसे कोई समय नहीं। से दीनामापसे गौण पालिको स्पष्ट करने लिए बारीपत्त के माय रसपा पप्रासनिक विषयों पर वार्तामाप करना। पटमार बान पिपिम संमठमकी परिचापक है। माटर में दृश्य एक सय दिमागम की मोउना मी इस नाटक में ठीक नहीं । भगभग सभी पटनापों को दृश्य स्म में रिवाया गया है रिसचे मारेकपा ना में एक तीवता माना है। एक पवाद दूसरी पना बुरा पति धरती पसीना ही है बिसके कारन विषय के अनुरूप गम्भीरता नहीं मा पाती। मानवी के पिता और विराट के पिता रेवस गाने के पश्चात् भासती और विनमत पर इसकी मा प्रतिक्रिया हुई उनकी भावनाएँ रिस रिया को प्रोर उम्मुच इस सारे NिIर म परमारफार इन पेनों कोही पी से पसरा है।रमी तरहणम्य एप भी घोटे एवं मम ।। लरोपों के होते हुए भी निपनी की नैसर्गिक प्रतिमा का प्रामाच पालक सब सक्ष्मीनारायन मिमोसामाजिक नाटक में कई स्थानों पर होता है । रनमें सुगर नाटकीय स्पितिया नियोजन की अपूर्ण शक्ति है पचपि प्रारम्भिव रबमा होने के कारण उसका नम्बर निर्वाह नहीं हो पाया। मातठीको पिकात की चारपाई पर छिपाकर रोमों के पिवार्मों को दोनों के विवाह की बातचीत के लिए यही से मापा मारकीय दृष्टि से एक मुमर स्थिति ही पा सकती है। इसी प्रकार विपहाव के प्रपयों को रमात के पास पहुंचाना मुरमीपर की टोपी सिपराकर बिसात के हार में रेदमा मादि। नाटककार ने इस मार5 में विभिन्न श्रेणियों के परियों की सुष्टि की। मुखपरिष मावणे है पसे मुरतीपर किरणमयी वादि । पुष्परिण हीन-धिरे से रमाकान्त मानाप भादि । विश्वकान्त का परिम रोहरा परिण. एक पोर उसके पास कोममतम हपयरी पार कठारतय संस। बारा सफरप करता है तो वो रप्टों को सहर्ष सीकार कर देता है और दूसरी पोर पर उस हाय पर ठेस पहुँचती है वो यह किसी प्रकार सत्तरगापिरम को मामले में परामर्ष हो पाता है। मारकार ने सभी परियों को मानवीय सरेनापों से मुक्त विचारा पिक्से किपिल कसना की वस्तुमा पाएँ । मुरलीधर में पति के प्रार्छ में पोषण की भावी मारी। परन्तु पागकारा इसकी स्थिति मानव भूमि पर ही रिसाईया है। केसम मामती परिककोफर पेप समौ परिण स्पिर है । मानवी के विचारों में परिबन पाता है परन्तु रख पारिरोपी अपकरप उसके जीवन कोण रोक कर बाहो बात है। वह अपने प्रेमी की निष्ठता पर नको यह नीकर सरती पौर समर्पमतमा पाल की यह मूर्ति भरपी बरपाठी है। इस परिवर्तन में सपा स स माह ही मासाभापिता रिमाईदे परन्तु मालती परिण की दृष्टि में यागा स्वाभाविक है।ाति करता उसके लिए अनिवार्य राहो पाता है। मारामार होर-पति के पाों का मीणि सहानुभूतिपूर्वक किया। वीनामाप पौर रमाकर हीन-क्ति के पार यो मिमिव होत हुए भी शार होन।परन्तु समस्यामारकर मामाकोई भी पारितम समे प्रन्या या पुरा नहीं सामारिक कार ही रसदो मसाया गया तिर उत्तरदारीमीलिए मह प्रवेश पार कौशिति को सहानुभूतिपूषा प्रापित करता है। दोमायाप की घोपनीय परिस्पिति र उपकी गिरफ्तार त्रिम सामारिकमारकी सुपीता माटमकार ने मुम्बरम से किया है। परमीशे अपने अधिकार से बाहर रखते हुए भी समार-निमा क भय से पूरा नहीं कर सकता। परिश-चित्रण में पम्तनको प्रकट करने के लिए माटमकार ने सपत के स्थान पर मूर ममिमया पायप मिया है। उमने मन यतिविधियों सणों एवं भाों को स्पष्ट करने के लिए पात्रों मारों की अपेक्षा उमको प्रियाओं कामधिक चित्रण किया । (क) मारतीमा पिसकान्त के जिसे अपना मुंह तमा। (ब) रमाकात का विकान्त पौर मावठी को दूर करेसवे पना, (म) मुस्मनी पोर मानती वापरस्पर मान समापण प्रारि। ये कियाएँ एमपंप पर अभिनीत होने पर तो प्रेक्षक को प्रमुभूति प्रथाम कर सकती है किन्तु रासम्म में भागों को पूर्ण पान नहीं दिया जा सकता। मम्तईन्टको प्रकट करनेमिए नाटकमारने का मटनामों की भी योजना पौ।ये पटनाएं रूपानक की पिछे मपि प्रसनर हा पास्नु परिम-विषम की दृष्टि में प्रस्तामा प्रकट करने में सफर है। विश्वकाच की मानसिक स्पिति को रिसाने के लिए नादरकार ने मासीर के प्रति भुषमाएर की पोरमा संचार मेदार का प्रथम गुण है कि यह मानक को गनिज समादमपानक कीमत में बाधा पहुँचाए रस नाक की दृष्टि से अनावश्यक हीरहा वायगा। पपिप प्टि मह मारक सफ्नही पा बामगा हपापि प्रारम्भिक हति होने के कारण यारोपपुस्तमही पार पगामियों पामर पार तिकी पापी पपिणि मायामासो पोई योय महीला। संवाद का इमरा पुम परिमों दो स्पष्ट रना। हम प्टि में भी यह माटर पंण्ठ मत है। भारम्निा नाटक होने के कारप इसमें प्रौपता नहीं पाई है। हमरो दृष्टिमों से संसारका पयोग परत ए भी मारहार उसमें सा. मारिया का नियहि करता है ताहिरषित बातावरण की मृष्टि में योग। है। या सामापिपता संपारी सापा एवं पति को विषयानुरूप एवं पार मुरूप बनाने से ही मार है। इस नाटक में विपम भार प्रधान मौ! पोर त भपात भीमान प्रदान विषयों में मापा सरन रपमा पारि मर्मकारों का प्रमोग भी नही। उसमें मानापो को परोसी मति पूर्ण पापों के स्थान पर प्रतिरों के प्रयोग से नाई गई है। प्रोड पति की गाम रामनाम पुतार समय की पापा से ससम्म रिपमपी पी पानि एवं रोष की
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मामीनारायम मिम के सामाषिक नाटक
भावमा मो नाटरकार किसने सीमे परम मौर टूटे-फटे माया पवित्र
करता है-
फिरणममी-को सर में) सो चोर से रसो। तुम्हैसी प्रा
पी पौर मुझे? पर नहीं तर तुम forमे कोई भी समय हो र
होमा दिन हो राबर भरे में 1 सपरे रख्ती बोबड़ी र सरसीमे
मही पड़ते तुमें रेलवी की कांप जाती है।
हर्म-प्रधान सेर यपि कुछ मम्मे हो गए परन्तु उनमें वर्ष की भूखना
कारण प्रवाह पापों के टूटे हुए विन्यास के द्वारा म्ये भागारमा परे
दिया गया है। इसीलिए नये संरा भी नाटक में पसरते नहीं।
बातावरम में सर्वत्र विषयानुरुप यम्भीरता नहीं है।
निष्कर्ष में कहा पा सकता कि नाटक प्रारम्भिक कति होने के
कारण बस्तु पर पिम्प रोना ही दृष्टियों से संपत ही समान है। पर फिर
मोहिम्मी-नाट्यसादियापम उमस्या-मार होने के कारण इसका ऐतिहासिक
महत्व भन्म।
(0) आधी रात घस्सुपक्ष मिभनी ने इस माटर में दो समस्यामों को तयुक्त रिपन गा विषय बनाया है। प्रथम है पिरन्तम नारीत्व का मायर्स पार दूसरी साहित्यकार नापमान के प्रति उत्तरामित्व । पोमों ही पाबत समस्याएं है परन्तु मिमयी ने अपने प्राय नाटकों की भांति इस नाटक भी इमका पिम मारतीय पौर पापधारय मारपापमय संदर्भ में किया है जिसके कारम इन समस्यामों का सामयिक महत्व भी प्राण है। प्रपम समस्या है पिरम्तम मारीत्व । इसके अन्तर्गत मारी-साठाभ्य पौर मर्यादित विवाह का तुममारमक चित्र है। समस्या के विवेचन के लिए नाटक- कार ने पारधारप सकारों में पती एक मिक्षित भारतीय नारी के चरित को भाभार बनाया है। नारी-स्सातम्भ्य के मोह में उसने से प्रेमियों को प्रेम किया परम्त प्रतिनिता के कारण एक मे दूसरे को गोली मार दी। इस प्रकार एक मारा पवा पौर मरेको कासे पानी को ससा हुई। इस पटमा से प्रेमिका-भायादी हम को उस पी और उसका एम नारी-साताभ्य एष स्वाम्म प्रेम के मोहको त्याग र मर्यारित एवं एकनिष्ठ समर्पप के लिए प्याकुम हो सठा । उसमे अपनी रिपति परमात्ताप के लिए सेवा एवं समर्पणपूर्ण विवाह दिया । मह दोनों स्थितियों का तर्कपूर्ण विपसेपण करतीकहती है तमी वेरना पानी की वासना पोर नग्मार को प्रेप्रेमी पड़ी समी भाकियों श्री ए ने भी मारी-स्मातरम्य पार मारो-समस्मा कहकर दुनिया का हिना देना पाहा पा" पूराप के नारी-पार भाम्बोजन में गिन स्तियों ने माप लिया था, उर्गम देना समझती पी।मदिन मया सभी कहीं पारमपञ्चमा पोरम स्थत वता माम परबासना की पभिवृप्ति नही पीए पापात्प सम्म प्रेम पर मायूत विवाह पर भारतीय विवाह की इतना करती हुई कहती है- *इस देश में विवाह कामो मार हैनधी पुरप का दो गोरम पोर से २ मामी .w मम्मीनारामममिभ के सामाकिनाटक भास्मामों का मिनार पर होपामा-चाको पमितमत भिमता कामाय मार पर सम्मिमित व्यक्तिस का गप इसका प्रयासर मुझे नहीं मिला। मेरा विवाह का मजीप में हुमा पा जिसमें सनेह है, गामोर्म है पुष्प प्रति प्रतिहिंसा है। रिसके मम में या भावना है कि नया हो किसी दय काबग्पा महो। इस सुमनारमक पिन तिरिसत नाटककार न स समस्या के मारे विरेचन सिए नारी की भक्ति की परते हुए पवना म नारो के पार की पोर समेत दिया है। मापावठी भारत के प्रार्य को पाने के लिए एक फुष्टिय पक्ति प्रकायना से जो अपनी नकार एवं प्रपा पत्नी से पसम्युष्ट की उसे छोड़ का विवाह कर ली है। और अपने माम्यात्मिक प्रेम प्रयोग बारा उसके सार का निरषय करती है। यह पांच वर्ष तक पति-गली रूप में एवं इए मी इतनी सावधानी और संयम से काम मेतीप्रापचन एक बार भी सामना है उलित नहीं होता। इस प्रकार प्रापषम गाम वासना के रिल बीत गाते है और मायावती के बाद में उसमें एक महान परिवर्तन प्रा पाता है, वह कहती है मगर तुम सोचो तो पहले से बुरे नहाइए, बोले पर पी हो या पुरया में उमस भी महान हो पर हो । यसरे रिम निकाल गए । पमर माह पूर्ण पुष्प पूर्ण पोपी हो सकते हो । प्राति से समाप एक भामा मृत्युकारा पाना है।" इस प्रकार नाटककार मासिटकरतापुर परम की रक्षा पुष्प के नहीं स्त्री रे पापीन है "कहीं भी पुष्पत्तका पठन होगा उसकी जिम्मेरारी किसी महियो रप में स्त्री पर होगी। इसके सापही गया सिमकाता पिापित कम पी के ही पास है पुरुष पास नहीं। वापरावा, पुम्प की सामानी रिकाकी लेकिन जी की पारपानी उस बदन को विसमें विपकी दो मिम्म समपाए, निम्न विमान विकी पुष्टि एकसरे के विरोधी उपकरणों से होती मिलकर एक होगा। मीर भीडा करती है। सामपानी स्पीके लिए पुरप के लिए नही। इस प्रकारमारीकी पषितापिपरमारणकार पिरान भारत के रिकार २ • ही .१ ४ ५५ भाषी रात एवं मार्च की स्पमा समान के सम्मुख रसता है। इस माम समस्या के पिषम की पापार भूमि भवस्य मारी। तई भी पृष्ट है परन्तु फिर मी नाटककार विचार प्रपन में पूर्णव मफस नहीं कहा पा सम्मा। माटक मामक एक ऐसे प्रार्य की सीमा को स्पर्ष कर रहा है पिसकी उसना मानव मन को सहर ही नहीं होती। परिब तक पति-पत्नी कामापते हुए पप्यारम प्रेम का प्रयोग करना पक रमपमा-माम्म पाया है। पाठक इस विष को प्रयतम महीं कर पाता। मन माटककार पंसद ही सफ्स दूसरी समस्या है साहिम के मृगन में कविका रापिस्व । नाटककार का रुपमा विकषि प्रपनी पतिपत सीमामों को लांघकर पर समष्टि की समस्या को पारमसाट पर मठा है सभी पर पम्मे साहित्य का सूरन कर पाता है। पपती म्पत्तिष्मत इष्टापा के पत्तपत किया गया सूमन वैश्विक पति की प्राता के कारण सौम्यपरक भरे ही हो, पररात समाव के लिए रसका क्या सपबोरा रससे मरे में मूमने बारे पोर केबस मुस-सौन्दम के एक मोगों कोही पप्ति हो सकेगी। इस समस्या के विवेचन के लिए माटमकार में एक कम्पना की मीनियों में सप्त मने पामे भाबुक कषि कोमाधार बनाया है पापपनी पगार एवं प्रपा पली से पसन्दर हा एक मुद्रा युषठी के प्रारूप में फस गया । संयोग ऐसा मा कि यहाँ भी रस मारी के साप विवाह करने पर भी उस प्रभ्याम प्रेम के प्रयोग के कारम उसे निर्वामिव सा रहना पड़ा।पत उमने उस सौम्पय ये प्रेरमा ने अपनी पृष्ठा की भनिम्पति कविता में भी गिसमें यह सौन्दयपरक रचनापों के मारन मफल भी हुमा परन्तु पन्त में प्रारमनिरीमन करने पर उसन स्वीकार प्रिया पास्त मन हो कोई मेरापमा उदय है मौर , मैं अपने प्रविही ईमानदार मरे पतिरिक्त दारपसारने ससे प्रेत का सिकार बनाकर भी यह सिर लिया है कि यह मामसिक दुईतवाम युक्त है। इस प्रकार पारम-प्रपाम सौदयपरक माहिम के रचमिटर की अनोभूमि का पूर्व शिवचन कर मारपकार या मित्राये का प्रयत्न कणा हिम्यक्तिमत गार्यों से उत्पन्न माहिरप समार में बुराइयों को पाना देता है। नाटक पद में प्रापा कहता है 'म पनुमा राई मे मो पुण् मय वर मिहापिप्या है इस मिया पोबत याने शैगिए।"पोरगह पपन १ पापी न.. १ ही.. in मक्मीनारायण मिम सामाविकमाटक - सारे साहित्य को बसा देता है। समस्या के इस विरेचन में प्रात्म-प्रमान सौम्यपरक साहित्य के पिता बाप पपनी कुण्ठामों की स्वीकृति गराकर भी नाटककार पाठक की दुटि को अभिभूत नहीं कर पावा बोकि पाठक यह कैसे मान में कि ऐसे साहित्य की रचना करने पासा प्ररपेक कपि पवाय ही अपनी दुष्ठामों से प्राकाम्त होगा। पौर ऐसी करिता रोपी होने पर ही मिती वा सकती है । तो में बुधि की अपेक्षा भावना का प्राय प्रषिक लिया गया है इसीलिए उनम प्रषिक गई नहीं। मसापारम पिनों में बिस बुरिमारी तक ही समस्या के उपाटन में सफल होते है जिसका इसम प्रमा। इस प्रकार दोनों समस्यामों के विषम में नाटककार मण्त ही सफल है। ऐसा प्रतीत होता है हिनाटककार के पास एक निषित विचार है जिसके प्रभाव से पारात होकर यह समस्या के विपक्षी वटस्व निधन की प्रपेक्षा अपनी बात ही प्रषिक रहना चाहता है। हमरो समस्यामों के विरेचन के प्रतिरिक्त माटककार ने पान माम्पम से मानव की पायनिक इत्ति पर म्पप पिया है। पुष्प की ग्राम पासना का चित्रम कर उसने यह स्पष्ट रिया है कि भीमय पर पुरप में कभी सरय होकर विचार नहीं दिया । पिस स्त्री के जीवन में पार प्रेमी ये हो बह पपने जीवन का निर्वाह कैसे कर सकती है। रापाचरण पमों में माटककार म्पप करता है 'पिस स्त्री के बीपन में एक से तीन बार प्रेमी हो पठे--सिमा पारमहत्या पर और कर ही क्या सकेपी ?" मायावती के गोपन में पाने वाले गार प्रमिों में समान सुधारस का पम्म करने वाले भी है। इसी को सप करके मापारती कहती है-"पाप पोर पाप ही की तप बहुत से लोग है पो न तो मुबारक ! म उपरेप पोर न सेवक । मनुष्य की पो मनुष्यता पप का कापूस रही है।' यह यंग पाठकहरप पर बाम गहरा प्रभार गलत परम्त माट- कार मे उदेतीवरले का कहीं प्रयास मही छिया। मारपकार का नाप तो राम यो समस्यापों विपन में ही है जिनमें मापत सफल हुपा है। शिस्पपक्ष कपानक-विन्यास यानक पपन और समठन मी दृष्टि समाटरपार के कोयन का विशेप मीरा १५ मापी पव परिचय मिलता है। माटक में दो मुख्य पात्र कामचन्द्र पार पायावती । प्रावन की प्रपनी स्वताप समस्या है परन्तु उसके लियेषन में पूर्णता नाने के लिए मायावती पैसे पार का समावेस मावश्यक है। इसी प्रकार मायावती की अपनी समस्या है और उसके प्रयोग में प्रमुख भाम प्रकाशचन्द्र का है। इस प्रभार दोनों पात्र बोहपरिपतापों (एचपि दोनों में ही समाधारण शिप तामों की भावस्पता) से युक्त है। रोनों में अपनी पा दूसरे की समस्या के मिहिरे लिए उपयुक्त पुनों का सामंजस्य किया गया है। परनामों पर्व परिणों कोरिक दृष्टि में कहीं भी प्रस्वाभाविक नही महागा सपा प्रत्येक धम्माक्ति प्रस्मामाणिकता के लिए भारफार प्रस्तुत कर दिया है। और इस सबमिपम और सम्पसवा साप साप मारक का पाकार मी प्रपेमास्ट गमा नहीं है। यह सब नाटककार की या पिठन-सक्ति का ही परिवारक समस्या-नाटक पाना कापत बिग्यास कम नही माता मावा पिसमें सपस्या पर तर्कवितर्कपूर्व विरेचन के लिए पूर्भ भवाय थे। इस दृष्टि धे यह नाटक सरमा सफर है। इसमें कबामा के परम पौर धूप भाग को इस प्रकार विभाजित किया गया है कि पोनों समस्यामों के पूष बिन में भी समान में सामाविकता बनी एती है। कपालक को पति माय मोबाती है परन्तु पौशिक विषम में एसा होना स्वाभाविक मारक ये पो समस्याएँ एक छाप उठाई । यपपि समय सम्परता पाई जाती है पापि रायसे नाटक में रहता है और इस एरहवा पोर परिनता के कारण नाटक में नागव पोम्प को पति हुई है। परि बोगसेनिक एमस्यामों की पपेक्षा एक ही समस्या का निम्मिा पासा वो नाटक अपेक्षा स्त अधिकाम हाता प्रमार की दृष्टि से भी यह पानक प्रगत सफल है, क्योंकि प्रेत का पाना रापापरणारा सससे बातें करमा पारि सना परिक प्रभाव पवा है कि भून उद्देश्य पाप हो पाता है। कपानवीय में माटककार नेशनमय स्पिति को योगमा को है परतु मरे विषय में भी मारताविक की प्रथामवावारण पंशत अतिविपन "परिवविषयोधि में यह नाटक परिपाइन सोभानिस्तम विशेष ताण पुत है। यह रिपता इस बार के पूर्वी प्रवरा परपी किसी ८८ मामीनारायण मिसामायिक नाटक हिन्दी माटक में नहीं पाई पाती। परिण- चिन की सामान्य री में पानी पार वाटक या प्रेक्षकारापात्मक सम्बम्प स्थापितोमाता जिससे उनके पीबम की पटनामों का पायल दो पत्तियों से सीमा समाप पाता है। यमबद पाप पारे पक्ष म और राबममत् पार पापा महोबा है। इस प्रवृत्ति का विभाम-युग में विकार हपा पोर पाठक प्रसेक पात्रकी समस्या का उसकी परिस्थितियों एवं परिवेष के मम्प सहानुभूति से विचार करने ममा ! यह माना जाने लगा कि पाम के एकारी के लिए प्रमाण पत्तर पायी है। मिपनी के भय सामाशिक नाटकों में हमें बही प्रवृत्ति मक्षिा ऐती है यहाँ हमें माना मुरारीलाम प्राधारेवी पौर नबरारसिंह मैसे पात्र से भी धर्म सहानुभूति है । रिमान की प्रति के साथ हम परिणको मात्र की प्रपंचा विचारारा समझते हैं। परिणों के कार्यों से पूर्णतया तटस्थ पर हम मन्त प्रतियों का पूरा पम्पयम करते है। शामिक परिमोकन को इस रिपक्षा का इस नारक म मुम्बर एवं पफम प्रयोग है। किसी भी पार के साथ हमारा रागात्मक सम्बन्ध स्थापित नही होता तगमप सनी पार्टी में गुण भी प्रार अर्पण भी परम्परामारी प्राप्रति किसी * पाप नही । रसपारी दृष्टि से यह निरोपता यपि रोप ही दीपायगी परन्तु विधानस में मिलेपप एर परिणाम की इस पानिकतम तीको समस्या-नाटक का गुम ही कहा भायगा । इस कमी को हिमी मार परतरित करने का मेप मिभनी कोही प्राप्त है। भारत में पपेक्षित विस्तार की कमी एक प्रमुख दोप है। यपि दोनों प्रमुभ परियों को बोरिक दृष्टि से मालामाविक नहीकामा सस्ता पस्त पानी पिक पसापारमता पाठक के मस्तिष्क में बस प रा नहीं स्वतीया प्रापकको नकर उसका पिरेषन करे पोर फिर सी पापार पर परिप्रति पारमा बमाए, यह उम प्रपेधित नही । इदने परिकप्रसामा- रपपरियों के लिए माटकदार को नाटक पाहार विस्तार पर सकर प्रपिक पिपरमा साहिए बापत एकतई से परिम का स्मरण सयमहीं होता। इसलिए यह परिण सामाविक होते हुए भी प्रहमीप महीं। परिप-पग में प्रकापमापरित में परिवर्तन रिवाया मरा है परन्तु उसमे भी मारक का सपना पौरिसका है कि पाटरमा रस स्वाभाविकता का पामार मी नहीं होता । बस्तुत वने मताधारण परियों की गिनता की देखकर परि मारलकार पर यह मारोप तगापा गाय बिरसके पास स्वतः म्पत्तिापहीन पार नारसारकी मापी में ही मौत परत न होगा।
मामी राव E8 संबार प्रम्प नारकों पीठास नाटक के संबार मी स्वाभारिक एवं सफल है। वापमिक विपर्यों को भी सरम एर व्यायपून योमधाम की भाषा में प्रतिपारित किया गया है। परन पूरती मारकामी यपेभा इस नाटक संगार्यों में भागत प्रोपता का मी मामास होता है। संगाद की दृष्टि से एक नवीन प्रयाग मी माटरकार ने किया। नाटक में प्रेत और गमाचरम बारहमा मामावती और प्रकाशन संबादों को एकही समय प्रमिमीत किया गया है, जिसके कारम बेरम संबारा प्रबाही पष्ट नीहाटा प्रापुर परम्परता मारम भाव भी प्रस्पष्ट पहनाते है मार पायर को पर्ष सममन मिएसबार संपादों को पना पाया है। प्रमिमय में पायर यह एटिना कुछ कम हे परातु प्रवाह रनवारण एक बार में पर्ष समम ममा तो रही मी पटिन होगा। इस नाटक की पैती में प्रम्य नाटकों की प्रपेक्षा एक नदीम पिता यह कि इममें मारकार में विकास के लिए प्रतीक सैनी का भी समबर प्रयोम किया है। मायावती अपने बीपन प्रमोम की पूर्णता या पात्महत्मा की बात को रामा पार रानी के मम + माध्यम से कह देवो है- मायावती-"दही कहानी यार? प्रयापषम---"कौन सी? मापापती- बहीबाही गनी रीबी इममा एक पिम पमा । राबा उसे हारनलिए ग्यों या काम समम प्रचार पतमी पोर पिटता गया । में रागा मी एप पपा और फिर रही एक मी पगह को उम पम में और मेरे प्रमोग में मोर पम्वर मही। बिपरी टिमता और सामनियता म पछोर पस्पना काम कही नही मारह भी हो गए। निपप प में पापा ममता हि यपपि मिपी पौ नाट्य पुपमा कारसम यो परिचय भिमठा है पर विपम को नटिमता स रत्पन्न हुई श्रीरमता एवं रहता धारप इस मिपगी प्रथम मपी मारमों में नहीं रवा पा माना। होगा। M मर्थ र द" (4) दिपार प्रपान नाटक राक्षस का मन्दिर (प्रमीक नाटक) (१) इम भारी समीया से पूर्व इसके सम से प्रबमठ होना पाबायक होया पपोकि इसका रिस्प विमान घय मारोहे सपा भिन्न है। मारक में मुरूम परीपना के लिए मारपार प्रतीर-पधिमा प्रयोग किया है। वैसे तो समस्या-माफया रिपार प्रधान मारकम प्रतीक-पतिका पम्पपठ प्रपाप मनिपात होता है। परन्तु इस नाटक में प्रतीकका प्रयोग रसना पाव पौर निखरामा कि यदि कोई इसे प्रवीर मादक भी यह तो परत गहामा । परन्तु इसमें प्रतीक माप कामना' 'पोस्मा मा 'प्रयाप पागोरप की तरह स्पष्ट नहीं है। हम माटों में तो भूर्त एवं प्रमूर्त सावनी घमामाम्बर बसठी है जिसमा पुरम पपयों ममी मिशत काम्पसना की नमः मिलती है नबार कार्य-म्पापार पूर्वपल की अपेक्षा भमूर्चपोषिक पति वेव ममाप्ट रिपार अपना सिवात प्रतीक एरपोप के कारण विस्मृग मसीहारे पाठा । परन्तु इस नाम प्रदोष का Rango पषिक म्यापक है। सिसारा रिकारी परमा मुदम परययों के स्थान पर केरस समाप्रमार से होती है। मूग का अपना स्थान महत्व है और उसका Eि मी सहप पति से पाई। दूसरे इस नाटक में प्रतीक मानिस कापत है रिया परा है कि मूत कपाम सेईमती की परमारोगीबिमा कारण मारका महत्व पौर भी या मया है। बस्तुपक्ष मृतपम इस मारक में एक पानी कम्पा-प्रारी उमाम पी मारिसमे उसकी पत्तिमात्र उषा सापारिक पापामों एवं समस्याणा में रामममा गरी काम भय मस्तिमराराप्रपगमक पात्रममा प्रमा to प्रापयामेनकर सामपि समा। प्राना मीयर मगम् ॥
पक्षस का मन्दिर गिरप्रिन्तिम अंक में वेश्या सुधार प्रामम की वास्तविक स्पिति का विणकर नाटकमार मे हमार पित मुपारवादियों की पोस होमन का भी सफल प्रयास निमा बिससे समस्या सामापि स्पा भी प्राछा परिचय मिलता है। इस प्रकार मूत्तरपारकर सदन महरम से प्रयोग नहीं दिया था समता। - प्रतीक पमानक के मृतपक्षमा मस्तित्व स्तम्म होते हए भी मेश्य की दृष्टि से गौण महत्व रखता है। नाटककार मै इसे बन पपने प्रतीक मापार बनाया है। प्रतीष्मी की एक महत्वपूर्ण विधेपता यह है किसम विविध एवं महरी यंचना मिए पर्याप्त माय एका है। प्रतीक के माध्यम से पाठक परेकामा पोको पी गान मेता है। प्रीको मिमी मी शोपित बस्तु का प्रतीक मानकर सम्पूर्व पानको स्पष्ट पिया वा सामापरीके लिए मारी मानयता प्रादि प्रतीक तो सहर हो पहप लिए पा सकते । पम्प प्रठीकों को प्रपेक्षा मारी प्रतीमरा सबसे समुन्नत पक्ष है पोर पायद मुरप रूप स इसी का प्रपन माटापार से भी प्रमीप्ट है। मनु नारीरो प्रतीक मामफरोपामा कीषिधिकोसष्ट निया पायगा । माटरीनारोगप्रतीकाबह बास्यास्पा में संप में भाई दी। मुगाहा पाने पर रहप्पमा प्राप्य प्राप्त करने के लिए देवता गम और मान ठीों प्रकार के पार्थों में प्रवीक रामप्तास मुनीर और रपुनाप के पाम पाटी है, परन्तु उसकी समस्या को यथार्थ दृष्टि से समभार सत्याग ल में कोई मौ तत्पर नही होता । राममान रहा है वह पाक की प्रारतिम मुमारों की भी सममने में असमर्व है। एपने मोग में इवा मस्त है कि नमे अपने संसप में होने वाम पार्षापा भी ज्ञान नहीं होता। प्राकी मरमt से प्रम भी करवा कर तिर स्पाय भी कर सकता है परन्तु उसकी मनाप समस्या को समझने में प्रममई है। दूसरा पार मुमीपर (रासस) उसे हसन सानिए प्रेम करता है। प्रीद्वारा पनुरोष रिए जाने पर भी माप्रपर रो स्थायी काम लिए उसे भगा में गाय को मार नहीं। प्रारी के साथ प्रगर दो निमटर मारे लिए अपने समयमा मास को रिप देने को भी प्रस्तुत हो जाती है पर यह सा रूपापियो को बार ही नहीं। तीसरा पार पाप (मान) श्री पारी में प्रेम करता है पस्तू पाहन पार से अभिप्यात मही पर साता। उसी मारनाऐं प्रन्थि बनरपाप्प में प्रकार होती है। भारीप- मिदन परमासक - १२ पक्ष्मीनारायण मिपके पामारिकमाटक को स्पष्ट स्वीकार भी महीं कर सकता। इस प्रकार समी पोर से मिराम हो प्रशारीबिना किसी के सामोम के निजी सरपान के लिए प्रवृत्त होती है। वह अपनी प्रणय कृति का पम्मपन मिर मतिमाप्पम से करती है पौर प्रापिक पारश्यकताओं के लिए प्रप्यापिका का कार्य स्वीकार की है। परन्तु नारफकार का स५ मत है कि निंगी इत्तियों के पनयम के पापा भी नारी का सामंजस्य समार पाप न हो सकता क्योकि पिरोपी परिस्थितियो सप्रिय होती है और एकापीपा पपने तक सीमित समयमनमणिय । पत पकरीको भी समान में इस रप में म यमे दिया। राधस प्रपमी वासनात्तिके प्रपीन से पुम पास म फैमाने प्रयल में रहा। मानद (रपुनाप) भी उसके सरन भवत स्प को देखकर प्रनय का परवान मनिए म्यादुक हा पठाससिता भो उसके गतबीयन से परिविको भक्तपकोय सममकर 8 पर पे निकाम तीस मार रमपम के परबाद भी समावरे प्यावहारिप बीपल के पाप समक्षा समझौता न हो सका । मन्तिम प्रम मे पाकी एकांगी मारम से होकर पाने मारपस्पर्म सक्रिय होती है। यह मानव को भी राप्रसपी पामों में प्रामे पेसाती और स्वयं मी उसकी सारी बातों को रिफम करती है.मारीमाति के उत्थान के लिए सर्प मातृ-ममिर की परस्पापिका मन बावत करती है। म कमानका सापामारी को पवनति + गतं से निकलने के लिए स्प समार राम के विस सकियोमा परमा। पछी प्रकार परिपारीको मानवता प्रतीक मानाबायपोपम्बितिस मसार हापी मानववा मी प्राधियों (देवता मानव मौर रामस) पास मपन विकास के लिए गई पर कहीं भी उसे पपोषित सहयोग न मिना । समी मिराय हो समय पपने निजी सत्वान में प्रवृत्त हो परत यई भी उसे सपमतान मिती । मत अन्त में बह रामसाविप प्रार मामय की छापता कोइए सम्पूर्ण मानवता के सामूहिक उत्पान म प्रहई । म निरप हमा मानपठा को पीड़ा से मुक्त होने के लिए स्वयं पनपता +रिर सश्यि होना पईया। इम मुम्प प्रतिपाप के पतिरिक्त मारपपार म एक प्रग्य समस्मा का भी सिमरिया। समने समिठा और रपमान के साम्पम से रोमांटिक प्रेम मौर रमित प्रेम मा मपा प्रेम प्रकवि गिगा की रिमय दिया है। समिता पौर रमाप परस्पर भाप परन्तु एका प्रेम रोमाटिषता (प्रेम की प्रतिरम्मना) और सरेका प्रेम सम की मामा को स्पर्ष करा पा जिसके राक्षस का मन्दिर कारम दोनों में परस्पर पूरी बमी रही। अन्त में रोनों अपनो स्थिति की माता को पहचान र परस्पर विवाह करना सीकार करते हैं। बालों अपनी स्पिविका विपप गरेपूम ईप से है। सनिता क शो म गर्मा दिवा का विमोह दखिए- नाप-- (रोमांटिकता दिमा) 'पर यह बीमन फितमा ममा यहाँ - ममिता--- 'पर सापही सार हितमा सुमर मौर कितना सुखी रोपापय के भीतर चिन्ता पीर विचार का समुद्र नहर मही मारेमा । यह बात म होगी मिसराम या मार दक्ष भने सावर सुम मा पप काप उध्या। सबकुर भूत बाली पी। इसी प्रकार रहनाप यम की प्रतिरक्षमा का वपन करता है- रममाव- मुझे पयामा मया या अपनी साससामों कोपरामो पुरती के प्रमरपा मह सब माया है पीयन ससे बिगर पाता है। मैं पोते की उपप्रपना पाह मारकरता पाठापा। प्राव भमेले में मैंगोपन को नहीं समझ सका। इस प्रकार नाटककार में प्रेम और संपम दोनों की प्रविरमयमा पान किया है। पात्र माटर में पानीसम्मासिस्व भी एक सिष्ट प्रभार की प्रमिकमा करता है। पर इसका विचार भी पस्तुप पन्तर्गत परमा समीचीन है। नाटक में मुस्स सप से मिल पार पात्रों का प्रा है। मारक बापान पात्र मुनीर पक्षमा प्रतीक है। उसके पति की प्रमुख पिता हमरों से न करता और अपनी चतुराई के कारण उसकी मा भानम होने देना।माप्रपनी सार्य-सिद्धिमिए पिता परली पुष, मित्र प्रेमिका पौर समार मभी मे एस रखा है परन्तु मोई भी उसी पपा शति को नहीं धमझ पाता प्ररपेट पित-मुषित उपाय द्वारा अपना काम मिशान इस मी परमार में मम्मान ग पार है। नाटक इस प्रधीक से समारी उस प्रवृत्ति को मना किया tो गीवन-पर्प प पपमा मस्तिल रमाए एकमे मिएमगे भी मरसता में नाम उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है। इस पापभिर १ १५५ mur सामीना पण मित्र के सामाजिक नाटक प्रवृत्ति में निजी स्वामिए दूसरों से भरपरमा प्रमाननीय मही क्योकि योग्य सम् पनप ही सृष्टि का प्राधारभूत सिमाम्त है। समाज में इस प्रवृत्ति का परमम्बन करने वासा वर्ग सश्यिता के कारण मोरिक दृष्टि से प्रतिष्ठिा एवं प्रगतिशीन कहलाता है। पूसरा पात्र रमनाम मानर का प्रतीक है। उसमें नाटककार में निष्क्षिमता पारम मम पमापन साहस का प्रभाव पारित वृत्तियो के साथ या ममा सरसता का सामवस्प किया । वह अपनी इन पुन प्रतियों के कारण प्रत्येक काय में असफल होता है। केवल नाटक के पात में सब पोर से ठोकरें माने में परपात् उसमें उत्साह जाग्रत होता है और पासमार्प को पहचान कर बर्तम्य की पोर पसर होता है। या परिष भी प्रामुनिक युग की देन म्पतिवार की एक प्रवृत्ति का प्रतिनिधिलाता है। तीसरा पान रामप्तान रेषता का प्रतीक है। यह पूर्णतया अपने-माप म मस्त है। उसकी दो ही प्रावस्यकताएँ । सुरा प्रौर मुनरी बस हम दो से भिन्न उसे किसी बात की विस्ता महीं । उसके संसाग में क्या-क्या पाप हो हे इसकी भी उसे चिन्ता नहीं। इसके अतिरिक्त उसमे संपम स्याम उराता और विचार-स्पातय की भावना का भी नाटककार में समायेस म्मिा है। परन्तु उसके मे समी पुन उसकी तटस्थता की प्रतिकारप समार के किसी उपयोग नहीं। इस परिप के माम्पम से माटफहार पामुनिक युग के एक ऐसे बम मोपनाबूत करता है जो सम्पन्न है और प्रपने पाप में मस्त है। समार की ग्स कोई बिम्ता नही। प्रानिक पुम में विद्वान और उद्योग के विकास के कारण समान में एक चारिफ शान्ति पाई। निसने समान नौ पारनामों विचारों और जीवन-मूल्मों को सर्वपा बदम रिया । जीवन की पति प्पषितवार को मामूटपरके परिचालित होने ममी। इस पवित्रमार की तीन प्रमुख प्रवृत्तियों-तटस्मता निषियता एवं सार्प सिदि को मेकर ही नाटककार ने मत राममान रसुनाप पोर मुनी पपरपरिणकान किया है पौरखता मानव मार रामसरा पभियान मी पापुनिक युग के मैनिक मौ पौर मानणों के अनुसार रियास प्रभार इन तीनों परिमों द्वारा नाटककार में प्रापुनिक युग की प्रवृत्तियों का गपाटम करना सम्म प्रयास यिा है। प्रापरीपरिषदमप-परिवलन से पूर्वका रस प्रानिक नारी को विषपदापों का प्रतिनिधि कताई पिसमें वह अपने प्राप्यमिएमयम सीम है परम परिबन के पवान् मह एक पीपा प्रतिस्प रिममें मापने हिसका मदिर मिहीं ममम मारी भर्म के सामान के लिए प्रवृत्त है । परिवर्तन से पूरा स्म समार पिप निकट है। पन प्रकरी के देवीनर को पोरफर मेप परिमो को वन परित्रों के म्यंत रहा पायमा। सम्पपम बा कि यस्तुपस में स्पष्ट पिया गरा है कि माटक में मुस्प पर्ष की मं बना प्रतीक क माम्यम से हुई है पद प्रतीक माटक की सीमाओं को दृष्टि में रखते हए ही एमके नाट्य पिस्प की पानोरना करना समीपीम हागा ! प्रतीक पची में मिले पर नाटक की रिपठाएँ मावाग्म माटक की विपनामों से भिन्न होती है। यहां उसका पिन्डन पम पहरी एवं विजिमयमामा के कारण प्रगम हो माता है यहाँ रस पिरप का भपेक्षारत हाम होता है। इसी बात को लक्ष्य राए प्रसिर मासोचकोतर मिल 1- 'मुम्पपस्थित प्रवीर होने पर भी प्रतीक नाटक में कमामा अभियाना सीमित होती है मोंकि इसका मम्वन इरन से न होकर मस्तिक मे होगाई और पोंकि इसमें भीवन के स्थान पर प्रमौतिक विषापौर जीवित पात्रों के स्थान पर पर्यगत मामों का निर्वाचन होता है। स्पष्ट है कि नाट्य पोपम में हास का प्रमुख कारण कपानक को निधार र पमुम्प गटित परमादमा परियों को प्रतीकों की पमना के प्रमुन भाषापूर दामना है जिससे स्वामारिकता और सोरता को मति पती है। इस नाटक में माटारपोरोबा ममीप्ट होती है एक पोर सोरहप्रपन करता है कि मारकीय उत्ताका प्रषिकाषित रोष पौर स्वामाषिक पटम हो मरे वह अपन दिपार का पूर्ण प्रेपन का सके। न पोमो रे समयय में हो माटरमी सफरवा निहित है। मत सभी तत्वों के परीक्षण में विचारमीय यह है कि मारपकार भूत्त एवं प्रमूर्त दोनों पक्षों कमसम्पय तक सफर हा बस एक पक्ष को देखकर उसकी प्रस्बामारिखतापों से मार-माँ मिकोड़ना करना। च्यान-सिम्पास पानामर्नरपदी पाटक के मम्मुष मणि महत्व रखता है। पर 1 Mortoret the tombollal play creo beo properly Abeled Tooted to it and prel bereksptab to the botele natter than the heart beat It fubtitula for a pletent of the dentodiedsannd for lives or androceedburnt typer -To Aspects of lodena Druva Chanda ng 100 १५ धक्ष्मीनारायण मित्र के सामानिमारक न्सका एक सीमा तक निदि होमा प्रमिवाय है। उसमें हिनावेपण म प्रमा भाविकता पारिरोप मत हो र पिए बाएँ परन्तु मोरे तौर पर उसमें प्रविति मा होना पावरमक है। इस नाटक के मतं कमानक म प्रबितिबा सफन नियहि हमा है। यदि प्रतीक को विस्मृत भी कर दिया नाम तो भी कमान में एक स्व रिपार एक सीब समस्या है और उसमे प्रायोपान्त एकमुमता है। इसी एकसूत्रता मी पृष्टि से नाटक के विग्यामननम का भी परीक्षण किदामा सस्ता है। पानको पादि मम्म पार पन्त ल तीन भागों में प्रकानुसार मुपमता बारा पा सकता है। इस प्रकार पान-पिग्मास पोर पर योजना में सामंजस्य बनाए रखने में भी नाटककार सफ्म है। प्रतीकार्य की दृष्टि से वो पम्पिति पौर कबानक बिम्पास बी मोरना और भी संगत है। म सफमतामों के साप साप मूत कपान रोप भीमसे पटनापों मे सापेक्ष अनुपात की कमी पटनापों का सम्पस करमे मासे तन्तुओं की पति सूपमता मस्थामाविक पटनाएँ मादि। परन्तु इन दोपो का बहुत प्रभों पर पहिार प्रवीका स्पष्ट हो पाने पर हो पाता है। बसे रामसात गे मोपी म्पत्ति मना संयम दिवाना कि बह पपने हाथ पर सपा मार करन की पारगा परन्तु उ% Or म करे। प्रत्यक्ष बपद में यह पटना सम्पा मस्वामाशिक पर रामसान पर देवा के प्रतीयोपरितार्य करने के लिए उसमें मस्ती और संयम का सामसम्म दिवाना पायापक या। सीप्रकार प्रतीक स्पष्टहापामे पर पम्प पोपों का प्रभाव भी जाणो पाताई। प्रतीकारे पर हो भान पर भी मारक का प्रयास पिता के पोप से मुक्त मही कहा पा सकता। दीसरेक ये साहित्वारा पातोपरी प्रोफेसरों की पर्धा उनकी देश सेवा पापीगीकी देशभक्ति बादी पारि श्योम प्राइ पारि पर मिले पप सपना १५ पृष्ठ रिसी भी प्रसार मूत समस्या केसाप नहीं बोईवा एकते। कसानक को रोकता का प्रापार मुस्थत कोरम होता है। परन्तु पर माटर के विकास में कौन जिससे पापे का हाल जानन रस्तुरता बनी पती म होने पर भी रोषमताका निहस पटनाए रिम रिपा कोपोर परिवर्तित होनी इसका मामात पटनापूर्व सर्वया नहीं होता। इस कमानम्-पिम्पास की दुनना परद-साहित्य पाना-नापास से पीना पकती है। प्रवीकार्य को स्पष्ट करने माती पटनापों पतिरिक्त मून पामर में कोई मी पक्षापारप पटना नही है । मुनीसर यपपि एत-कपट में भारी परस्तु १७ रामस का ममिर विपम की दुस्मता के कारण उसका संपर्व कही भी उम्र का स पारम नहीं करता के प्रभाव में मानक का विकास मन्पर गति से होता है। साधा रप नाटक की दृष्टि से यह दोष कहा जा सकता है परन्तु म्यम्यार्प दो स्पष्ट करमे मे इसकी दुष्टता का कर प्रमों का परिहार हो जाता है। प्रतीक नाटक की सफलता बास्तब मे परिम-चित्रण की समता पर निर्भर करती है। प्रतीकाप की म्यंजना पौर परित्रों की सजीवता रानो में सामजस्म बनाए रपना ही नाटककार के कौसम का परिचायक है। पंसा कि कस्तुपम में विरेचन किया जा चुका है केवम प्रारी देवी रूप कोएकर शेप सभी परिण व परित्र है। परन्तु वर्ग परियों की मपी मे रमकर मी सम्ह हम अपने प्रतीकों को प्रभिश्यक्त परमे में पूर्मत सफम नहीं कह सकते । वर्ग परिण होते हुए भी सामाजिक दृष्टि से प्रसाधारण परित्र है मोंकि माटरपार मै बीवन के अन्य भनेक पहनुमों की अपेक्षा बस प्रतीकार्य का मिह परने पामी विवेपताों का ही उनमें प्रतिष्ठापन किया है। इस कारण परिमों में सजीवता का प्रभाव कहीं-कही मटकता है। परिकों को स्पष्ट करने के लिए मारककार ने उन भागों की अपेक्षा उनके विचारों का भविक स्माम दिया है। तई एवं विचार मनुष्य के शान एक बौद्धिक प्रत्युत्पम्नमति का परिचय प्रवस्य देते है परन्तु सम्पुम परिसस्व का उद्घाटम इनस नहीं होता। यहाँ भावपूर्ण प्रसय माए है वहाँ भी पात्र अपनी स्वार्थ सिदि के लिए रिम प्मबहार करते हैं। मुनीर और उसके पिता का मेस कितनी भावनारमक स्थिति में इमा-पिता अपने पुत्र के एस्यारे का प्राणपण से पीण करते हुए हरयार स्थान पर अपने पुत्र को ही प्राप्त कर लिखना हरयम्पर्शी एवं भावमात्मक मेन है परन्तु माटककार न इसे मावनापूग्य एवं बारिकपना दिया है। मार का ऐसा परिकार जीवन में सम्भव नहीं। यह प्रसाधारणत्व की सीमा है। मत' इसके कारण परिषों में स्वाभाविकता एवं समीपता की पति हुई है। रामनास के परिण-सूरन में नाटककार प्रशत सफम है । नाप पौर मुनीश्वर के चरित्र में गिन पटमामों का उत्तर दिया गया है ये व्यक्ति- बार की सीमा को स्पर्ष करते हुए मी बीवन पर समार के साप समरित की पा सकती है। परन्तु रामसात के परिमाकन के लिए ये घटनाएँ प्रत्यय बोरन की दृष्टि से पूर्णतया मस्वाभाविक है। इतना अधिक संयम पार इतनी अधिक मस्तारिसी म्पक्तिवारी बोरिक परिष में मितनी प्रसम्भव है कि यह स सेन्या से गम संपम के प्रार्थन के लिए हाप में पाए मारकर तुम ८९ सक्ष्मीनारापम मिमसामाणिकपाट की पारबहा उसका एक सीमा तक निर्वाह होना अनिवार्य है। उसमें शिाम्मेपण से प्रसा मापिकता पारियोप ममे ही लिए पाएं परन्तु मोटे तौर पर रसम प्रबिधि का होना प्राणायक है। इस नाटक मूर्त रमानाम प्रमितिका सफल निर्मा, हमा है। परि प्रतीकार्य हो विस्मृत मी कर पिया पायता भी पाना में एक स्पतग्म निधार है एक सगीय समस्या है पौर उसमे पापोपान्त एकसूत्रवाई। इसी एकसूत्रता की दृष्टि से नाटक के विम्याम श्रम का मी परीक्षण किया सरता है । कपानक को मारि मम्म पोर पन्त इन तीन मागो में प्रकानुसार मुममता से गोटा पा सकता है। इस प्रहार पाना-पिम्पास मोर पा-योजना में सामरस्य समाए रखने में भी नाटककार सफम है। प्रतीकार्य की दृष्टि से तो प्रविधि प्रौर कपान बिभ्यास की योगमा पौर भी उपत। इन सफमतामों के साप-साय मूर्त मानक के रोप भी यो पात है जैसे पटमामों में सापेरा पनुपात की कमी घटनाओं को सम्पर करने बामे तस्तुओं की पति सूक्ष्मता पस्वाभाविक घटनाएँ पारि। परन्तु इन परोपों का बहुत पंपों तक पपिार प्रतीका स्पष्ट हो पाने पर हो जाता है। स राममान से मोमी पक्ति मतना मम रिवाना कि वह पपने बाप पर स्वम पाक मारकर मून परन्तु फ त म करे। प्रश्परा जपत् में यह भटमा सर्वमा भस्माभाविक है परन्तु राममान पर देवता के प्रतीक को चरितार्थ करन लिए उसमें मस्ती पौर संयम का सामंजस्म रिवाना ग्रामस्या पा। इसी प्रकार प्रतीक स्पष्ट होपामे पर पम्प पोपों का प्रभार भी क्षीण हो जाता है। प्रवीकार के स्पष्ट हो जाने पर मी नाटक का मप्रासंगिकता केोप से नहीं कहा जा सकता । दोसरे पक मे साहित्पारो प्राप्मोपों प्रौफेमनी पर्चा उनकी रण-मेगा गांधीगी की देशभक्ति बारीपादिप्रमोममाण प्रादि पर मिब गए सममम १५ पृष्ठ किसी भी प्रकार मून समस्मा के पाप नहीं पोपासते। कयामकको रोचता का प्रापार मुस्पत कविहम होता है। परन्तु इस नाटक के विकास में मौतरम विससे पाप का हात बामने की उत्सुकता मनी राती है कम होने पर भी ध्या का निर्वाह है। इसमे पटनाएँ रिम रिपा की भोर परिवविध होगी इसका मामास घटना से पूर्व सपा नहीं होता। इम पान-पिम्पास की सना परद-साहित्य के पपानकमाव से की या सकती। प्रवीका को स्पष्ट करने वाली पटनामों । पसिरिम पूम कबाना में को भी पसामारण पटना नही है। मुनीरवर पप उत्तमपन में बतुर परस्तु १७ समका मन्दिर पिन की दुर्गमता के कारण रसका एक कही भी दम का स पारग मही करणाम के प्रमाण में पान का विकास मन्पर पति से होता है। सामा रप नाटक की दृष्टि में यह दोष कहा जा सकता है परन्तु प्यमार्य को स्पष्ट करने में इसकी पृष्टवा कापों तक परिहार हो गाता है। प्रतीक मार दी सफलता मास्तव में परिवचित्रण की गुमनता पर निर्भर कती है। प्रतीकाप की पबमा पार परिमोदी सरीमता होली में सामनस्य बनाए रखना ही मारमारपस का परिचायक है। साकि वस्तुपम में किचन किया था बम प्रकरीबो सप को हर क्षेप सभी परिण बने-परिक है। परन्तु गर्ग-परियों की सभी म रखकर भी एमे हम अपने पतीका पमियमस करने में पूर्मत सफल मही कह सक्छ । पर्ग परिण होते हुए भी सामारिक दृष्टि से प्रसाधारनपरिष पनि नापार में बीवन के प्रम्प भनेक पानुषों की अपेमा यम प्रतीवर्ष का निर्वाई करने वाली विपितापों का ही उनम प्रतिष्ठापन निमा है। इस परम परिमों में सीरता का ममाम बही-की बरकता है। परिकों को स्पष्ट करने के लिए माटककार मे समा मार्गारी पपेक्षा उनके पिरों को पवित्र स्थान दिया है। स एवं विचार मनुप्पोमाम एबमोरिक प्रामुत्तम्मपति का पतिय पपरपर है परन्तु सम्पूर्ण सपिठय का पाटन इनस नही होता। वहाँ भाषपूष प्रापि पाएह भी पात्र पपनी स्थाप-तिथि के लिए गिय मवहार करता है। मुनीर और उसके पिता का मेस तिनी भावनात्मक स्थिति में हुमा-पिता अपने पुत्र के पार का प्रामपम से पीडा कणे एप एयारे स्थान पर अपने पुरको ही प्राप्त र सिमास एन मावनारमक मेम है, रक्त नारफारम से मावनापम्प एवं डिकमा दिया। भाषा ऐठा परिकार श्रीवा में मुम्भव नहीं। यह प्रसापारमल की पीपा है। मठ के पारण परिषों में सापारिकता एर्ष समीपता को पति हुई है। यमसात के परिण-मन म माटरपार पमत समरमाण पौर मुनीर परिण में निम पटना रा रस्लेख किया यमा हरेक पार की पीनामाकोस करते हुए भी मील पोर अपार माय समनित की पा सपती ।। परतुरामवात परिमाण लिपपमा प्रत्पम औरन की दृपि में पूर्वतया प्रस्थामाविक है। ना पति संपप पौर मी परिफ माती पिसी पक्लिपारीदिर परित में मिलनी पसम्मान सपाल पम प्रान लिए एप म पा पारकर न मम्मीमारामण मिमकेसामाणिक नाटक की दाप बहारे। भारसार मे रममायके परिम-मिग म उसरी पत्तियों को पारित का स्पर पन्तको निमितरने का सफल प्रयोग किया। तीसरे भर में सपे रामम के विस्त प्रोत्साहित करने बामे सुषक उसके इसकी वृत्तियों केही प्रतीक है। प्रकरी के परिण मे परिपतम ही प्रक्रिया को छोड़कर स्वामानिया का बहुत गोंदक निर्वाह हमारे परम्तु फिर भी असामारमता के कारण यह प्रतीकार्म कोही अधिक स्पष्ट करती। पुम मिलाकर इस नाटक के परिज ही इस सबा पध! मोर परिष ही इसमे त परा है। परिणों के मन में नाटककार में मिस कोषस का परि बम रिसामगि रनका नियहि मी उसी के अनुरूप होता तो यह नाटकहियो माट्य-बयर में एक मात्वपूम पाम का प्राधिकारी होता। मारक के र प्रतीपक्ष की अपेमा मृतपक्ष कारी गति से है। प्रतीम भाटर में विचारों को पंबित करने के लिए नाटककार सामारपात सगारको माप्यम बमाता परन्तु र माटक में प्रतीकार्य की प्यममा म्यापक स्तर पर होने के कारण सवार में पहन विचारों का पनाव है। पानक में हम एक गतिक पमा कारण समारो में तीयता मही है। मसी विषप समस्या पर सई- विपभार में संवादो में गीता का गुम भीमही प्रापा है। प्रत भागात पोर पुति की स्थान पर बाततिाप सापारम स्तराईको पटनामों का परिचय मान देता है । मुभीरपर के स्थापित मिए पिए पर लगीनही पाटर कीर्ति को भगाय पाएर मेवे है। परन्तु यह साभारम पर पानको र शित मनुस्म होने कारण मार का न ही कहा पायगा। मारकमपाम के रिकास में मी प्रतीक मी का सुन्दर प्रयोगमा है। प्रारकरी मसिवा कोरपानीमानी माध्यम से पपने पीवन की समस्याओं को स्परररेती। निपर्प-प में महापासावा किमारक में प्रदीफाप विषार-प्रपण के प्रयोग में नाटकरार महब ममों में सफममा।
(२) मुक्ति का रहस्य वस्तुपक्ष नाटकहार रोस नाटक म यपार्यबाद एक बुवाद (मिश्रमी का सपा- कपिल दुविवार) का पेपर ममील है। गोने इसके लिए सम प्रेम और पायर्म प्रेम के कार यसाई प्रेम पति विरामी पियर रियलाई है। मिधार प्रेपण के लिए नाटककार ने दो पस प्रस्तुत किए। पानीमाबाद का गिसकी प्रतीक है मायादेबी पोर इसरा भादगाद एवं पतिवार का विसका प्रतीक उमायकर पर्मा। दोनों पय प्रपने-अपने मिजात की मीमामों को स्पर्ष करने के कारण प्रधफस हहै। माधादेमी उमा में प्रेम ली है और इस प्रेम में एकाधिकार स्था- पित करने के लिए उपकी पत्नी को विप देती है यपपि इस प्रेम प्रतिमान में रमे उमाकर भी पोर मे कोई नौ मति नहीं मिमा बहस सीकार जाती है 'म सपना हश्य निकाम कर तुम्हारे परों पर रस लिया पर तुमने उसका मान नहीं किया । धिस ममम में तुम्हारे प्रेम के लिए तुम्हारी मुस्कराहटपिए तुम्हारे स्पर्ग के लिए मा म्मी पपने पुरप चाहती है उसके लिए मरी पा रही पो उम समय तुम मेरा सम्मान भने थे. मेरी प्रमा करते थे। मेरे मामने उस उपए गाने पे मे मोग भरा. मत में जाते है। हम प्रकार प्रतिपक्ष में लिपित प्रेम मी न पाकर नापति करना रोमोमबार की पराकाप्टा ही नहीं बापपी। इसके अतिरिक्त परिस्थिति में विग होकर प्रगर को मोम मेने के लिए मतीत कोस देना रामामार की सीमा को भी साप गाना होगा । जीरन माप रोमांड की इस प्रतिभा कमा मामय निम प्रकार होता । प्रक्ष यह प्रपने कर्म का मापपिरती है पोर दिप माकर प्रारमहत्या करने का प्रयास परवी है। काम के इस पक्ष पानिपर्ष है.-रोमाम का पम पारमहापा। इमरा पप पारावार । उपार पासी से प्रेम रता है पर समो पुछ . मुनिरापर मवपीमारायण मिमोसामाकिनारा उसके प्रेम की स्मना उनी पीडिभम्पारम की सीमा को स्पर करती है। सप्रेमबिए वह समावदी परमाही काण पापा मानापमान मुम कौसा पारिमी से पिता नहीं पारामाचों की सम्पचित्रीगने को तैयार हो वागावा पान रस प्रेम के लिए है जिसमें भौतिकता नही। मार प्रमिकाससम्म विपरप की मी पूरी पर है। प्रेम की पराकाष्ठातर समित होती है पर परमिका को पलो की पारित होने पर भी ममा करने को तैयार है। परन्तु पन्त में प्रेमिका द्वारा ही प्रेम पुरावा करमाटार सर पराजितने मई माव से सरी पया प्रेम भी मधात्म की सीमा में पषमाने के कारण प्राप्त नहीं किया था पOTI इसके लिए पार्य की पीमा पर मनुष्य बनना पोपा रस्ता नहीं। नाटक का पतिय पाय कि "वेषवा का समारपकम पना' पारंमार के ऊपर एक कठोर म्यम है। नरोनोमिएर परिपाम बताने के पापा नाटककार मे एक पीयगति वारंवार का दिया है। पानी पिप निकात पिए पाने पर पुनः जीवित हो पातीमार प्रब रोमास हो कर जीवन के सार समयोग करती है। टर भी ससके विप-ग्रहण से प्रभावित होकर रायश्चित करता है, उसके मम का मन म बाता मार बरसने विस से समा मापता है। मापा भी पता को पपविण करमे के लिए सामाननीय पुषों से अमिभूत होहर से ही पोवन साथी बनाने का पेपमा परीस प्रकार माटरमार पादार पौर समसार हमर पापबार की गिरफ दूसरा रितार सिडा पन मारकार को प्रभीष्टद है एरियार निसम विधी के पनुसार एक प्रमुध हल है अपने पाप को स्वीकारणा से किपाने की अपेक्षा गोमार अब सम्मुख रमना। इससे उनके पनुसार समस्या सुसमामे में सहायता मिमती है। इसका प्रतिपाय पनि तपमान भी मारकों में मिास माटर में भी भाणारेगी पपनी हमाया को सिवादी दृष्टिकोर मुमती है। यह अपने पाप को छिपाने की पपेमा ग्माकर सम्मुख बोसकर बताती है पोर पाप में पपमा रोप सौहार करती है। उमा मंगर को गारो मारने के लिए दौड़ने समता । सके सम्मुख निरपपासा प्रकार इस पम्मीर एवं उनमी समस्या का यह गुपियार केरा समनवा से समापार करती है। समिधापतिरिक्त मारक में हमारा भारी मारि विपदों पर भी पायनिक बिमारया मया है परन्तु उनमाविप मारकही।
मुक्ति का परम ११ शिल्प-पक्ष पान-विग्यास काम की वृष्टि से यह मारक मित्री के सभी मारमों है परिक सहम इसमें सभी विशेषताएं पिवमान है मो एक सफल मान लिए प्राय इमामही पा सकती। पामक का परातम धर्म-धाम के सिमान्त पर भाभूठ है इस कारण इसमें रोषावा का समावेग सामाविक स से हो पया है। प्राधादेवी मे उमाकर के प्रेम पर एकाधिपरम स्थापित करने के लिए पह भग्य कर्म किया। सारामह रमाकर की पत्नी का पानापान बनना चाहती थी। परम्त इस कर्म के पावाद मामयं ही इस कर्मयान में रं बादी है। उसे अपने कमी का कामपने पाउमाकर की पत्नी की मोर से नहीं मिलता, परन्तु कर्म-पाय सिरान्त (theory of oemess) के कारण ही मिमता है। इस प्रकार कहा- माके और पापारबारमकपामक का सपठन सम्म कहा बायमा । इस काम की दूसरी दिया है पबिति। मिनी पूरी माटकों में इसका प्रमाणा। पचपि माटबहार में दो सवाभिम त्रिों का नियो बनम्यिा है परन्तु गनों परस्पर इस प्रकार समरिही थी सनम पृपया नहीं रिसाई देती। इसम्मान प्राति के प्रसंग कुछ प्रशासनिक को पा सकते है परत उमापेकर परिण की माता एवं पार्ष-पराममता बताने के लिए ये मानक बिग्यास भयको इष्टि में भी सका है। पथपि पापादेवीका पृणित कर्म नाटक से पूर्व ही हो का है परन्तु नाटककार ने पहती ही दृष्टि में सम्पूम भावम्म विपरप पाठक के सम्मुख स्पष्ट कर दिया है। इसके पापात् *पा ग्यों-ज्यों बसती है पाटा उसे ग्रहण करता पाता है। दूसरे पर मैं उमर माती है और तीसरे में माटरफार प्रमाणात प्रस्तुत करता है। मस्तृत से मिम पियों को एक पाक में बावकर उसके पिम्पास का हफापम माटक- कार की मत्तता र परिचायक है। कान में नाटकीय स्विठियों की योजना भी बयत (प में की पी है। प्रथम प्रक में टर पार मारगी का दाताप सर में विष माने की स्पिक्षिपोरतीमरे में मार्मर या प्राणादेवीमा मानिाप बनावपूर्ण एवं कोरमक स्पिति शासके कारण रोकाता में ची निपप दिई है। मारक का पानपनापाप नामों पर प्राप्त होने के कारण मानक मम्मामारापम मिपामाविक पाटक में पेषता भारि पुगों का सहर समावेश हुमा है। कपानक को प्रमविपनाने के लिए भाष का मापार बसे प्रबल है। भाष का जितमा पपिक विस्तार होमा माफ उतना ही हायस्पी होगा। इस नाटक स्पान में पारिवारिक स्थितियों की उन भावनामों को पापार माया पया हजो भरपन्त कारपिक होने के कारण हाप को स्पर्श करती है। मनोहर का प्रपनी मां की स्मृति में पास्सस्पपूर्ण बाते करना पिप सेहपको पिठ माटक में मुख्य परिषदो है----मासकर भार मापारेगी 1 पोनों ही पत्ति- पिप्प कसन्तप्त पसाधारण परिष परम्त इनके परिम का निर्वाह मारक- कार मी पुगमता से लिया है। उसके पूर्ववर्ती नारकों के पाओ की भांति पात्र पविलीम नहीं है। उनके कार्यकलाप एम एवार उनके परिष पनु नाटकसीमित मापार और सीमित साधनाकारण स्पिरपरिका परिवहन ही अधिक समता से हो सकता है। मतियोस परियों के रवान पतन को वो सपन्यास में ही पनि समता से रिपाया पा सकता है। इस माटक म उमापकर का परित्र स्पिर सीनिए उस दिखने में नाटककार पूर्ण का सफल है। पाशारेगी का परिच पतिणीम है। यह विकास पर रिकारों में परिवर्तन विप वाने के सपरात ही पापा पत उसका भी पिप पाने में पूर्व पापिग एफमतापूराव हा है। उस पाचात् यपि उसके परिवर्तन निए भातावरण बनाया गया है परन्तु फिर बीवन परिपतम को दोबार पृष्ठों परिखाना प्रमुषित मही शापा सम्वा । परियों में मम्ता प्रास्तान पोपमता स्पिाया है। प्राण रेपो र परित्र महापबा स्पष्ट है। उसके भीतर का देवनागर-पुर बामक मनोहर से बातचीत मरते हुए सए मुपरित होता है। रमाकर का परिण पाप हाने पारप रसमे मतग कम विणारा गया है परन्तु मा उसकी पानीनता पौरपरिमार अनुप ही है। पहिलो सपन जिम का एक पारप उनकी मसापारमा मोहै। महापारम्पक्तियोंपरिष मी माटायरको मापने कौशल का परिम देने पापति पराध पता है। प्रामादेवी पौर उमाकर रोनों पक्षागारम परिणाम में मारपार मे मानवीय सहानुभूति का स्थान नही किया) मुक्ति का एस्य उसमे पापी से मना नही की देवम पाप से की है। मामादेवो मे पाप अवश्य किया है परन्तु मनाहर के साप काभिक वार्तामाप में वह हमारी सहानुभूति की पात्र है। हम उममे भूषा मही करते प्रत्युत उसकी घोषनीय स्पिति पर करुप हो उठते है। उमामकर परिण में पु विचित्रताएँ । मो पाठक का म्यान माइष्ट करती है। समाचार से सच्चरित्र पान के प्रति माटककार भारम्भ से सहानु- भूति बनाए रखता है। सामारण पाय पोर निएएम सेवा से यह पाठक की प्रदा का विषय बन पाता है। ऐसे निष्कपट और प्रादर्श परिष वाला व्यक्ति अन्त में किस प्रकार की कारगिक स्पिति में पहुंच जाता है देखकर पाठक के मन म उमन होता है पीरा सोचने लगता है क्या त्याग सेवा निस्वार्यता का फल यही है ? वास्तव में परि नाटरकार को इसका मम्त कामिक दिशामा पाता पारम्म मे ही उसके परिण में मे सकेत रेने प्रावश्यर। परन्तु मा म होन पारप परिष काम्य-म्याय की दृष्टि से धर्मगत ही कहा बायपा। उमामकर के वरिष में एक विविधता यह भी है कि यह व्यक्तिबार का प्रबल समर्थक होते हुए भी सामायिक कार्यकता है। परन्तु नाटककार मे इन दोनों बिरापो पुपों का सामयस्य यो सुन्दर एवं सफल ग से किया है। बाना मनोहर बा परिष उसकी कानिकम्पिति के कारण सबसे सुन्दर बन पड़ा है। यपि पापा काशीनाथ का परिप बगपत विपतापों से युक्त है परन्तु एक प्रस्वाभारिश्ता भी प्रवरती कितने बनी और मानी व्यक्ति ने नया बस स्सय के मामर में मार पपने भतीरे से मी प्रिय पोतेको गोदी में बठाकर मारी में नौकरोंक कमरे में बैठा दिया और उसका इतना भी ध्यान नरमा फियह पाड़ी में बैठा है या ा गया है। उसके परिण की यह पम्या- मारिकता माटरपार की परित्र- विलोम दोपहा पायगा। इसी प्रकार एक रोप मागादेवी के परिव चित्रण में भी विद्यमान है। वह यह निश्चय हो गाने पर भी किएर उमाशंकरको सारी बात कह रेया भयभीत होने के स्थान पर हई करतोबत नाटककार मे उसके परिव में इतने बोपरिपतन के लिए अपेक्षित मम्तामा एक वातावारणका निर्माण मही किया। इनकतिपय दापों के वापर परिण पिणन में मारपसार पपने पूर्ववर्ती मारकॉम प्रपिक मफम हुपा है। संबार मबारपा उपयोप नाटक में राष्टियों मे होता है कथानक को पति मामीमापदम मिमोसामाजिक मादक में मोर परिषणिकमिए। इस माटक के संवारों में पा रोना पिपेपवाएँ विपमान। कपा महमा को बनाए रखने के मिए एक ही प्रकभिन्न-भिन्न प्रसों को मिनाने के लिए को मार मार को एक मिरक बाकी मामना करनी पड़ती है बोकिपा-संगठन में रोप माना जाता है। मारक के संचारों में इस बप का प्रभाव रोबार में स्वाभाविकता एवं पार्वता होने पर मौ रसमें एक प्रपेक्षित गरिमा एवं पातीमता की रक्षा की भावी पिसके पारमहति साहिब में प्रपमा स्थायी स्पाम प्राप्त करती है। इस नाटक में मनोहर और मोटर के सवादों में भी मंगार का प्रमित तर विधमान है। मपोर और सम्मानी' के संपादों में सबर यह पूष नियमान महीं। संगारकी परिमा पम्वामाविकता सम्बे भाषाको प्रपेठा समिप्य साक्ष्यों मार पानाप की मी में अधिक होती है। एक पानोपक में नारको संचारों की इसमा पृटपाल के नेतको निसबर नियम पनि परोसे पापे परती है ना ही दिन सफल माना जागी प्रकार नाटक में संभार जिसमे प्रषिक कोरे होत है, ना ही संबाराम मामा माता। नारक के संबाद इस दृष्टि से भी सफल है। पविकांप देवार पांच-सात समोरही है।नीमापन और समाधकर के पार्वामाप मबहाँ संसार मम्बे भी हो गए है यहाँ मीप्रवाह में शिपितामही है। मारपसार इस नाटक में बरारों की पोचमा मी ऐ राम की किमान संकार के माप्पम ने स्वत पर हो बाय । शिव पाने से पूर्व पापादेवी को ऐसे मुम्बरम से प्रापित किया है कि यह कदमा भीनरी पाहती पौर कहती मी गा रही है। मापारेपी-"पाल सामते महा। इस गटर में पापपी पिचनी हानि रमार्गहा- मेरी हानि गमरमे।" प्रापारी-हो निस लिमाप बागे।" उमाकर--"मुमी" भाधागो-"मैं महीनेवी या पाने के पहले मेरी बीम गिर पड़ेगी।" रमाकर-(प्पान से रस मोर रेपमे समता पाया सिरमौर मेठी)"बाद क्या है? इस तरह काप क्यों होछ। पाता मुमित का इस्व बटर ने कोई पुराई नहीं हो मेरी। प्रामापी--(सांस सीकर) सिर को यही सब हो यो म यह कह पाठी। मिपं स में कहा मा सम्वा हिम नाटक के सेबारों में में सभी पुष विद्यमान हैबा सफल मारक के संबाद म भपेक्षित। संगार की दृष्टि से यह माट मियगी के सभी नाटक से प्रषिक मा है। बाताबरन की दृषि से भी इसमें प्रसंगानुइस गाम्भीर्य की ग्मा की गई है। ठिकमा के प्रमाण के कारणहा मी बरिमता एवं राहता महीं माने पाई। पाठकका मनमा के साप समरम हाता है। प्रग्म मामानिक मारकों में किसी में भी यह गम इस मात्रा में नारी है। पभिनय की दृष्टि में भी यह नाटकमयमे अधिक फल है। प्रभिनय बास्तव में कपा-मगठन परियों की सामाविशता भार सेवा प्रवाह पर निर्भर करता है। इसमें कया समस्त परिन मोर सबाद सभी प्रमिनय के पनाम है। स्मत से हापम को मस्सामाषिक मानकर हारने पर भी माटककार पामों के मन्म को स्पष्ट परम में सफामा है। प्रक-विमान और दृश्य-सरियन भी अमिनप के पनुन वा का पय भाम र समनवा मे संगठित ख्यिा गरि सम्पूर्ण कपातीन पंकों में प्रदक्षित हो पाई। मिस्सममेह भार-बार पर्दा उसाने पार गिराने की पम्मामारिकता से रपमर की रमा की गई है। विकप स्म में गाया ममता कि ममाधारण पटनार्मों एवं प्रभावारण पानी योजना करके भी नाटककार इममाटर में अपने रिचार-प्रेपण में सफम हुमा। इसका मुस्स कारण इस नारका सपस शिप-मंगटन है। पानक रणि सेगार और मार सभी दृष्टियों से नाटक सहम है। १ मुक्ति पारा,.r (३) राजयोग । पस्तुपक्ष इस मारक ये मिपी में राग्य रपवारों की पा सम्म में अपने दृषि पारसिताम्त को प्रतिपारित किया है। नाटककार मे अपने सभी सामाजिक मारकों मइस मिसान्त का पापम म्यिा है । नाटकों की भूमिकाओं में भी पारमे इमका द्वारा प्रतिपारन किया है। इस सिमान्त का एक प्रमुख तत्व है-- पपमे परामका स्वीकार कर से समाप क सम्मुख प्रकट करते हुए मुहम जीवन का पप निर्धारित करना । मायबापा मानसिक अपिमा पारकर जीवम विपास मोरोकरंगा पत प्रत्येक समस्या की सबापता को स्वीकार कर उमा पिडारा ही उसरा मिरापरम करमा पुगिनार का सिखाम्त है। इस माटर का मूम प्रतिपाद इसी हिवासी मरमा है। नागार विचारोमा प्रतिनिधिमकामे पाना रामदोगी मरेमकहता है- 'मचाईको पावाडीवो पाप। इस विचार के प्रतिपादन के लिए नाटककार में एक रामा पराने का पित प्रस्तुत किया है जिसमे सभी प्रमुख पात्र अपने पाप को मीहर बसाने के कारण आप है। उनका पाप उनके लिए मानसिक पम्मिन पसा है जिसने उनके जीवन का रिकाम गरिया है। प्रपम पार पसरलमिह परमार है। पसने पहनी परमी के रह एग्पसत्ता पम स एक ऐसी मादी में विवाह किया है मिनी समाई मत्री के साके मरमस हो एसीबी यह मामी चम्पा सम भी मत्री माफ को प्रेम करत मपी पी।सकारण विवाह होने के उपराव भी गहुमार का पीपन मुखी नही हपा। पांच पप बीत गए पर मह पम्मा कोमपीत साब अपने दम पपगप दीपमावा कोसीपार कर समस्या विलेपम को तैयार नही यह म बाप । मुनमा भी नहीं पाहवा इसीमिर ली है। दसरा पान मसरामसिहोरारा यहाँ एक पारिवारिक है। मका बीम वर्ष दूर एक मारमा पानी से प्रबंध समाप हो गया रिससे एक मेन - - रामोम नामी मी उत्पन्न हुई। इस पाप के कारण यह बीस वर्ष से रहिम्न है कि कहीं भेर न जुम गाय और इमी ननिम्नता के कारण हमने पारी समनहीं दी। तीसग पार पम्पा मोहदय तो मन्त्रीमा नरेन्द्र को कार में ही समर्पित कर की है। अब शास्त्रीय मर्यानो अनुमार अपने पर सपम रमन का पूरा प्रयत्न करती है और मरम्म का नाम भी सुनने म पगाररती है। अपने पति की हर इच्छा पूर्ण करत हए भी रम पित्त में माम्ति नही । उसका मन को पत्रिम स मे रवाना प्रयि बन मपा है। पोमा पाप रसिह मम्मी है अबस्पा पम्मी पप है । उसे भी एकहपय विदारक पाया सपा है। उमका कसोता जवान बेग मरेग पांच बप हए पर में भाग यया है पौर पर उसक न पान पर उसका पुनमी मात्रो-पद मी पिन जायगा महमाकाही उस उमिन कर रही है यह स्थिति की यमाता को स्वीकार करने को तैयार नहीं। पाना मैं मरेण रामयोपीकेम्प में मातामार योगबल से गाराम मिह की ममी गुप्त बाते उम पचतपर पूछ सता है। रहस्य क प्रमर होगामे पर गररायसिंह की मारी ननिता शाम्त हो जाती है और वह पाकार कर मना है किपमा उसकी पप सम्ताम है। मूल पम्पा को मष सन्तान जान पर पहन पृपाकरन मपठा है परन्तु ममस्या का पौर पपिक रसमता नामकर दविवारी प्टिकोप से ममस्या को सोचरर नरेन की प्ररणा म पुन पम्पा मो स्वीकार करना है। पम्पा भी मरेप कागद योगीक सप मदतती है मौर पान मेती किया प्रदरसे कमी स्वीपार महीं रेगा ता उता ममको पनि भी मुनम गाती है। पुरामिह भी अपने नापी स्पिनि काममनपर फिर पुतनी महीपी पिना महीपणा इस प्रकार पाप घट हो मान में मौर उस पर ययार्य दृष्टि में विचार रन र परमात् सभीपी सिनता दूर हो राती है। मबीमारपरटे। "इमा पिटमे पर्म यो दिए गाय पिएमी बजार पाटकर हवी बाय। यह अपन मन में मान लिया जाप कि हम मागोमा पाम पार हा रहा है। हम लोग पास नहीं पपा पुष्पा हमाग भून पा इम पणी पर हम पार उतरे है मोर मार से ही हम मोगों पापपनी यात्रा प्रारम । दुविवारसमे प्रबल प्रतिपादन के पश्चात् भी यह प्रश्न रटवार कि पुदि की यह मुक्ति पया हायपो स्वीकार माती' या काई मी रात १ रामरोग मम्मीनारामममिमसामायिकमारक हरय से निकाम देना सम्मको सका है। अपने पार्पोकीमार में अपना सभी ममुष्य पापी । मह सर्व मानकर पीमन की मूस मागायतामों से अपमाता मसे ही कर लिया वाव परस्तुमा उस स्थिति में व्यक्ति सम्मति कर पाता है। इस प्रकार स-ससे जीवनयापन भी ही हो पा मा पाप प्रष्ट हो पाने के पाबाद बीवन में महत्त्वाकांक्षा प्रेरमा प्राय सम्मति की भागता पहने की सराही पहेमी? इस पिकात के बारे में दूसरी बात मित्रारमीय यह है पाप का को भयंकर बप नाटककार मै दिसाया है यह मचा होते हुए भी पसामाग्य है। स्वमा मकर पाप मास्वर में ममुप्प नही पा सकता पौर प्रटम करने की स्थिति में ना पारमामि एक प्रारपपीहा में विभिप्त-माहा उम्या पातु परिये सिखाम्तक्षेप में स्वीकार कर लियाबाय हो गया मनपाने पामे प्रत्येक साधारण से साधारण पाप को प्रारकर हेमा मानब मोर समान के लिए हितकर होगा। गिल्पपक्ष कमामा पिम्पास मानक के चपम एवं संगठन में मारपसार भी ममता सराहनीय है। कमामा की योजना इस प्रकार की कि चुत पांच पाम है मौर पात्रों की मिम्न मिल सभापाएँ । परन्तु पासपी सार समाकि एक गांठ मन बाने से समीकी समस्याएं मुनम मादी है। नाटक का मानक पूर्वतमा मुगरिन है। कोई भी पटना मया पात्र प्रार्य गिकी कहा बासमता प्रति किसी भी पंग बिमा कपान को प्रति पपाए कारा महीना माता । पौर महोपान के सेवन म किमी प्रकार का कोई पूनमा रिपाती। नाटक में एक ही परित मानक होने के कारण मानक विधान की नाम भीगी मिषित नहीं। मानविग्याम में पमिति का पूरा पालन किया गया है। विम्यास कम की दृष्टि से भी मार मफरोपही में सभी की समस्याएँ पर हो माती यह प्रारम्भ सरेर में माराममह रोग का निमारमा जाने कारण ममी ममस्पारएनमा प धारप कर मती यह सममन को स्पिति वीसो ममी की ममस्याओं के समाधान के माप मारक मपात होना है। कोदहन करा पीरोपाता एक प्रमुख पामार है | मरामि भी गयोम मारक में बी एफमता से किया गया है। प्रारम्भ में ही समस्यामों को स्पष्ट करते हुए नाटककार गमराबसिंह पाप के सिपाने भोर पपने को ही सबके दुरका कारण मानने का इस प्रकार चित्रण करता है कि पाठक उसके अपराम को मानने को सत्सुक हो उठता है। उसका पाप स्पष्ट हो जाने पर भी कौवहन में सही होती है योनि समस्या पर भी रमझ पाती है। माटर में दमपूर्ण नाटकीय स्पितियों की मी सुन्दर नियोजना है। यह बन्द एपसिंह मार पासूवनसिह के मध्य मिशतपाक है। मधुसुदनसिह मीम विचारों के कारण मन्त्री पर के पुष्वनी प्रधिकार को नहीं मामता परन्तु रसुषमनिह मात्री पद के छिम बामे के विचार से ही पिक्षिप्ठ-सा हो पाता है। इसी प्रकार पम्पा पौरपासूरनसिंह में समझते से पूर्व इन के प्रतिषित प्रस्त ईन्द्र की तीता मे भी नारदीय स्पिति को पपिक पाकर्षक एवं प्रभावपूर्ण बनाया है। रघुपसिए परावसिंह पत्रमूरनसिंह और पम्पा सभी के म पन्त है। वस्तुतः यह पन्धत ही अपनी मयेकरता के कारण उनकी समस्या पमा इपा है। माम भनेक प्टिमा ससफल होने पर भी सपा दोप-मुक्त नहीं कहा पासवान पान संपध्म में एक बाप को मग्य सामाजिक नाटक में प्रषिक, इसमें भी ग्पून पंप में विधमाम है। कपालक म किसी पछी मसाधारण घटना की कल्पना की जानी चाहिए जो नाटक के मुम प्रमाग को क्षति पहुंचाए। इस नाटक में योग के बमलाकी पटना इसी प्रकार की परम्तु फिर मी गवरार पोशापयो रहस्मोपाटन होता है यह इतना अधिक यायिक है किपाका पान पुन मूमपान की भोर भगत होता है। बयान में यही परमाए पारा हपय को स्पर्म का सपसी जिनकी कस्सना उसका मनपर माता है । मरेन्द्र का प्रपम प्रकका अभिनय पाटरी समम में बिस्छुस नहीं पाता । गोली की मस्पमा साधारप पाठक के मम में ही इममिए बह कुछ पावति और प्रधम्भिवमा होबर रह पाया है। पारन अपने गन पर मरेन की नंगी तसवार रेलकर तनिक भी मपमीत नहीं होना ता तर मही पोर फिर मोपी उसे समय पान सारसब समामा पकही बदि से पादरकोषस्तु है। पम्पा र प्रतिरिक्त मारक के समीपरिष सिमित परिध पम्पा के विचारों में परिपन प्रापा। बह पासे हिल पलो रे प्राणों के अनुसार मामीनारायण मिम सामाजिक माटक पाचरण करती है परन्तु बाद में नारी पौर पुस्प के मामारिक सम्बायों को कर देवता मान माने माने पुरप-वर्ग पर कठोर पग्मपणी है। इस परिवर्तन की प्रध्यिा का विस्तृत चित्रन न होने पर मी इस परिवर्तन में प्रस्वाभारिश्ता नहीं मा पाई योनि रसके परिपतन का प्राचारभूत कारम प्रबम है । मिस माधर्म को पर पांच वर्ष तर निभाती भाई यह उसे सुनीम बना सका पोर जिस पति को गरेवता मानकर सर्वस्व अर्पण करती रही रही उसे पकरम छोड़ने के लिए तैयार हो गया। इस प्रकार पय उसके बीमम का प्रदन ही उमम गया हो तो चसे पीवम को अपने व्यक्तिगत पनुमयों के पापार पर देखन का सर्वमा पभिमार है। इसके पतिरिक्त ससके गृहस्प बीवन में प्रसन्तोप एवं मन्तई भी परिवर्तन की भूमिमा बन गाते हैरिसके कारण पाठक को इतना बड़ा परिवर्तन मी स्मा. भाषिक नहीं प्रतीत होता । गमयमणि रणित मार अनुसूदनसिह विकमित परिण है। दोनों का परित एकारा पीर सरम है परन्तु परिस्पिति के पारण उममे एक बियेप मौमार्य मा ममा है। परिस्थिति की उत्तमन कारण रन मन में एक ठी संपर्ष होवाइ सिकारित करने में मारपसार पूर्णतया सफम है। र मधमिह स्वामितिको भी निभामा पाता है और पुप्रीमी पती-पानी रक्षा भी पता पाएका है। एक मात्र से उलित हो पइ राम्य पोरता है पारपूसरे भार से विषय हो रह पुनः नोट पाता है। पासूरमसिह सात्तिपा है यह प्रपमे स्माई के प्रमुख सिमान्तों परी प्पासा करता है यह रासह को वेपन साता है पर पाहिको नहीं। पापी माबित भी होता है एप्प का वदमाटम भी दमक प्रत्येक कार्य द्वारा होता है। यह पापुनि पिपारों पौर परिमव पिरों (मोमियों का विश्वाम) दोनों को ही अपने स्मार्म की सिडिमिए अपनाता है। अन्त में चम्पा को स्वीकार करने में भी उसका दुबम हाप सत्तरदायी है। प्रमुवनसिंह वास्तव म रामकुमार होते हुए भी एक विधिप पान नहीं पहबम हुदप का स्वाी म्पमित है या अपने स्वार मनाम पपन मिशान्त बनाता है। भानु मरेण परागसिंह पार पतसिह विशिष्ट पात्र है परन्तु पम्पा पालमिकी ममस्याएँ विषार एवं प्रति एक सामारम पुस्प पीर स्त्री हरमा प्रतिनिपिस्व करती है। सेबार सबारों की पपिपि सफमाकपाना एवं परिपविमणी सपामता पर निर्भर करती है। इस नाम में भी मुक्ति पाएस्पदी दरह संगों की 1 । राजयोग सरसता का एक प्रमुख कारण यही है। इसके प्रतिरिवत यह मिमी का पौधों मारकासन-सी में विकास कारण भी यह प्रीरता प्राभाना मामाषिक म माटक में मंगार सभी पुष बिनकी पर्या पूर्णपती भाटको में की जा की है ममाविष्ट है। समार भाषाभियंजन में समर्थ है पौर भारतीय गुणों से युक्त है। मोम के समार तीसरे पक में कहीं-कहीं मम्मे मय हो गए। परन्तु उसमे नाटक वातावरण में नीरसता नहीं पाती। समारोंम पारिता प्रभार के कारण कही नोटिलता यापुरता मही है। मवादों में प्रौड़ता पा गाने पर भी ये सपा रोपमुक्त नहीं करेगा सकते। महीमही ममें माहिरिया गरिमा मभान पटकसा है। माराममिह को परेन पर रस एप को बप मरले समय गमयमिह और मरम्ह का पानाप सासारण स्तर पाहो या है। पभिनय की दृष्टि से नाटक सफ्म होने पर भी इसमें एक समाप सटकता है । मरेख पायक के सम्मुख एक योगी के रूप में पाया है। माटककार नाटक म पोयीस्थान पर नरेन लिवकर पाक को इसका परिचय दिया है, परम्नु प्रेषक तो इसे योगी के रूप में ही धमनवा रहेगा क्योंकि दृश्य-प में तो उसका हास्य नाटक के अन्त में हो बार गुमला है। इसके पहिरिनु मरेन का परिषय पारम्म में न मिलने पर नाटक प्रेम के लिए रामो पपिक हो पायमा। निक रूप में पहा पा सकता है कि मिपी इस बार मापने शिवरार पोप्परित परने में सफल हुए यहाँ मा पप में भी यह एक सप्टन पति श्री यमरमाप मा माटक की भूमिका में स्टाए गए प्रश्नों के प्रमुमार नाटकों के बारे में हमें प्रपिकार केवम इन प्रश्नोमा पूछमेका है-- पमा रविकर है बिमा ? परिष-सिम में महावा ममता हुई है ? पात्रों का पानाप मनोरया है कि मही! विमो पंप में पस्मामागिता तो नहीं प्रामे पाई ? मारा पाने प्रपदादेखने पर पिच पर क्या प्रभाव होता है? पार प्रसतिस्पपीर पश्चिम प्रान स्पष्ट पारे मैं । माकि पर विवस स्पष्ट किया गया है मारमाही पक्षों में बाल ठक - । रामग, ममि...
(ग) समस्या एव घटना प्रपाम नाटक (१) सिंदूर की होली पस्तुपक्ष इस नाटक म पूर्व मिमनी में मारकरमा-विधान के लिए पा प्रकार की पैनियों का प्रयोग किया है। एक धमस्या-मारक कीनी बिसरे पावनंठ सग्यासी' को रख सदमी में काम का मिजान इस दृष्टि से किया गया है कि पारों को समस्या पा-विपक्ष में पूर्व विवेचन के लिए पूर्व भरका हे। एसी कई निवर्ग के माध्यम से बह समस्या केबिनमारा पाठक की पुरि को प्रभावित करते हैं। पापा का महत्व हग ऐमी मे नीम है। दूसरी पांसी के पतर्पत गरयोग' पार 'मुक्ति का हस्पद कामक में बौधिक ठ-पिवई प्रधान नही प्रत्युत् सम्पूर्ण स्थान के माध्यम स है निपार की पंचना की गई। परन्तु इन नाटका में दिसाम्त एवं विचार का प्राह ना प्रथम है कि पाक को उसके अनुप बाम से पानी रिमी सौम्पर्म मिस हो गया है। ये कपामा पति से युक्त होने पर भी रोष एवं पनोमेशानिय पिट से सफम पामक नही पाए । इस प्रकार पूर्व मारकों की रोगों ही संलिपों मे मारक में रोषा का पोहचानक के सामाजिक विकार से उत्पन्न होती है प्रभाव है। सिमर की होली में नाटककार में आप को म्यवित करने के लिए इस पोनों पतियों का प्रयोग किया है परन्तु गेस्य का प्रतिपादन सम्पूर्ण कथानक म र कपामा मेघों के पियासमोर पाना मन मस्तित्व का निर्माप एक मनोरंगानिर पर रोषक पटना के प्रापार पर पिया घटना का पराठम-कर्म-प्रतिप्रस-पास (theoryof nometi).सपीयर परिणाप मामी विमान के पगम पर पिठ विनीपहा प्रपने पूगमती नाटकों में एक-एक सी को पपनापर मोबामा को रोक नहीं बना सके यहा रस नाटक में विभिन्न नियों में अपने गेम्पों की पमिपंचना काते हए भी पेपर कपामा निहारने में सफल हए याक एवं गेप के सारस्प के पारवही या नाटक रहे सामायिक नाटकों में अधियों से। सिर की होती सरपेठहै। माटककार के इस नाटक में दो मेश्य है-एक समस्या-विषम सरे अपने मिसान्त (बुद्धिवार) का प्रतिपादन मिसे यह सभी समस्याओं का मून समझता है। इस यो कमिए माटककार में दोनों पैलियों का प्रयोग किया है।प्रयम हाय को प्रभावित करने बानी व्यंजना सैनी बिसमें पटना परिण एवं समस्या को चित्रित मात्र कर दिया गाता है दूसरी बुद्धि को प्रभावित करने बामी तर्क-वितक दोपी जिसमें समस्या कारणों परिणामा मारि मे युग तक पूर्ण विचन होता है । नाटककार में दानों ही मयों के लिए दोनों मियों का प्रयोग दिया है। प्रत नाटक में प्रतिपारित श्यों का पप्पयन मुस्पत निम्न माता- प्पंगना शैली के माध्यम से (E) नाटक में हुए ऐसे पात्रों की योरना की गई। जिनके जीवन से माटककार का सिसाम्त (विवार) सम्पत्रित होता है। मनोमयंकर पौर माहिर मतो ऐम ही पात्र। (ब) पुए पटनामों की योरना इस रंग से की गई है कि उसमन के मुत मने का एकमात्र कारण माटककार का सिद्धान्त ही पवित होता है और उस सम्मको मतमान पात पात्र भी इसी सिमान्त का प्रतिनिपित करता है। (म) नाटक में कुछ ममम्यामों का चित्रण भी कपानक के विकास के प्रम्तगत स्वतःहा गया है। तर्क वितरोनी के माध्यम स (4) नाटककार ने अपने मिशाम्त का समर्पन बहाँ-वहाँ बोरिक तरी आप भी किया है। () नाटर में दर्द-वित द्वारा भी समस्यामों के कारणों सापों और परिणामों का विसपा पिया पया है । नाटक मे एकरो पात्रों को बुनिवारी बरा दिया है यो ममस्या तईपूर्म विपमेपन हारा पाठक की युतिको समस्या पर रिचारपरने के लिए प्रवृत्त करते है। कमानक माध्यम से (१) यह पमिम गेय समूग पान के मूस में मिहित है गो पाठक के मन में दिना पापा के एक प्राधिक एवं मनोमानित मिराम्रा प्रति निय को गित परसा है। इसमें मारपकार का पाप प्रमान न होने के कारण इमा स्वमत महल है। पौर मी कारण इस मारक को ममस्या एवं पाना प्रधान मारनाम से एक प्रमग बर्य बनाकर रखना पहा।
मामीनारायण मिप सामाशिमाटर -- इन नोंकामा विस्तार से सि प्रकार है- (1) पैसा कि मुक्ति का रहस्य' और 'एमपोम' नारकों विदेवन में स्पष्ट किया ना पुरा है कि मिषमी का जीवन एक कला रिपपक एक निश्चित सिसन्त -बुनिरारापोर उसकी म्यामा भीरनकी प्रपनी है। इसका प्रति पारन उन्होंने नाटकों की भूमिकाओं में विस्तार से किया है। इसकी प्रामा करते हुए कहते कि हमें प्रत्येक समस्या के पुषपात एवं दोपपम दोनों का पारन मिस कोष करना चाहिए, इसमें किसी भी प्रकार सत्य को (मते ही बह कद से) पाना अवसर नहीं । इस पस्य को पार इष्टि से सम मने पास बियफ प्राण में इस मार्च निकामना ही समस्या के स्थापी निराकरप का एकमात्र उपाय है । परसोग में रे कहते सारं को छिपाना पाप है।'परि समस्या का समाधान सापको मिाकर प्रार्थ एवं सम्पदा मुनाले में स्पिा पापगाठोपा कर भय मानसिक पिकास पार कर नको पम्प या सिने पीवन का विकास सभापगाहस का सत्य गपाटन को समाव के लिए हिनावावे हुए कमाते ई-बुरिवार में गुमर-कोटेर कुनीन की परवाही नहीं तो तीन ल। उसका पार पहरा होता है लेकिन ब-मय करने के लिए नहीं मार निकामरे के लिए, हमारी प्रमुप्त चेतना को जगाकर हमारे भीतर नवीन बीन पीर नवीन सति बराकरमे के लिए। इसी सिमान्त के प्रतिपादन के लिए नाटककार ने पानी पाहिर पदी पौर मनोमवार को पोगना दी है। माहिर प्रती मे रस पर्व पूर्व मनोगपर के पिता की स्पा में योप रिपापा बहस पाप से शाम सापको प्रष्ट करने में उसे फांसी का भय है, परतु रमनीकान्तकीमा न पाप को पुन' इरा कर दिया और बारिधिप्त-सा हो गया। उसे जान पोर रिसाई देने से और अन्त मे पास पापरे रहस्य को प्रारकर ही मामी सीमा को कर पार करवाई पार पार फांसी पापामा रोगकी फांसी पा!"पापा सके विरमा मोम मर मया प्रारमहसस्प होमपा। मनोरर को बताया गया पारिप पिता ने मममहत्या की है। । 4 - १ मुस्सियस (मिम) सस पिन चितुर की होमी मबाई को डिपाए पाने के कारण उसके मन में एक इन्धि हो गई। वह स्वयं म्वीकार करता है इसी पिता में मेरा स्वास्थ्य विषयमा मानसिक बीमारी होमा परामरक्को में उन्हें सण में रहता था और सारा दिन उसी स्वप्न की मारना में पाया पणा पा । पाई में भी पहनीपत महीं समी किसी वरद विपद वैपारकर परीक्षा पास करता पाया। यही बात भगर पाने माधम होती पार से पांच-सात वर्ष पहले तो मेरा बीपा तमा नौरस म होना।" "भार मेरी प्रारमा का मोम नहर मया। इस पोझ के कारण ही यह पन्नामाको अपमै प्रति माष्टमकर धाया क्योंकि उसके पास रजनी भात की मुस्कान का पार पा सपी मौकी कम्पन और मस्तीपी प्रपूर उसके मन में विपार की भान यो बस दीपी।' इन दोनों पात्रों के चित्रण वारा कहि पवित करता है किमाईको पिपाना मामदम्पस्तित्व की प्रपति और विकास में बाबा है और मनुष्य रोपी मारता है। (प) माटककार में समस्यार्मों के रनम्ने परदिवारी पाों द्वारा समस्या का समय समापान करवाया है। नाटककार ने रोपानों को बुद्धिवादी प्रति परि पाहार पर स्थिति का रिहवन कर से भारों मोर लगाम कर उससे मना करने पामा बमाया है। मनोरमा पूर्वत शिवादी पाम है पौर माटककार के विचारों का प्रतिनिश्स्वि करती है। मनोजमकर पब प्रेमी प में उमरे पास पाया है ग्रोमा उसे प्रेम के उत्तर में मवाती है। यह विपमा मसिए सासारिक दृष्टि से उसके साप प्रेम का कोई सपनही पौर गरिबह वास्तव में से प्रेम करता है तो उस प्रेम काम रस प्रसार काही जाता है निमम वासना और विकार नहीं। संसार में एक नया पावर पा करमा पाती है। वह उसे बताती है बिगार की समस्याएँ नि लिए पामलखना पर मचा है वरा के पमरे पर नहीं सुतम्चाई जा सकती राह है दुरि से पौर रिसे उमडा उत्तर भी भिनमा।"प्रय पप पिटकोन कोमेकर प्रारमाारस सोग मेरे लिए भी पौरों के लिए भी। और । यी ६ बही, .
मम्मीनारायण मिपके सामापिस भारफ - मनोमकर यह सब मान पाया है वह विषया साप मार रहकर इस मुनि भाप के भार का प्रचार करना स्वीकार करता। पसी शिमा परवार ममोपर भी मियादी महर विपार का समर म मचाकर पानम्मका पर बजाता है। मुपरीनाम के एबी होने पर भी यह बांसुरी भगाता है क्योंकि यह समस्या से मिप्ठ न होकर बुद्धि की दृष्टि से विधार करता है। यह मुरारीलाल साप उसकी मोम-ति पौर इस हत्या पर प्पंग भी करता है।पहरसे पूर्ण विशोप रा समम्यता है कि यह समयमा को क्यों प्राहटम कर सका। सारी परिस्थिति को समममा पौर सत्य को तार-तार करके देखना ही इद्धिपाद है। इस पर गटर से पी मानसिक विपिरता परत करता है। यह प्रसस्य को पांच मूरकर स्कार रने को तैयार नहीं । तत्पश्चात् मनोमा में यह स्पप करने पर कि तुम्हारा मेरे साम अविवाहित पएमा प्राति के प्रतिकूल है और तुम्हारी यस प्रविना का कारण सुमारा मोरया पर इस तरह तुगारा निवारबमा हेना । पपित यही तुम पाकमा को पहप करबो मह मुरिमारी होने के कारण स्वीकार कर मठाई।पष्ट किसानों पाप विषारी इन दोनों दुधियारी पानों द्वारा दिए गए सभी कारों को सफल रिसतार मायाकार या मिटरमा पाहवा है कि पर्योकि परिवार के मापार पर किए गए समापामों के समापान सफल होते लिए परिवार रचित पिकोष। मनोमकर नापी पिपिस्ता में मून सपन दिपसारा पया है यपपिका कमा का उसी समय उसार माता प्रस्थामाषिक सा भी गया है। मनोरमा पटकमा (मुरारीलाम की हाली) की समस्या काहरित मान मनोरकर को बम समभार ही कर देती है। मुरारीनाम इस सारी बात को चोरी से सुनकर माम पाता है और मोपित करता है कि "तुमने (मारपार की पंचना में मुनिबार ने कर दिया जिसकी मुझे पाया नहीं की। पार पायक पर मुझेमी । यस प्रकार माटारमोनों पुरिमारी पानों की प्रस्पेस स्पाम पर समरितमायापन एक स्थान परमनोमबार पसा रहबर्षकी १ दूर होती. १.४ .पी .11 . पी.. 1 सिपूर की होनी पायहमन्द्रमा की सैर परमे पाने के पश्चात् भी पुसिषा के द्वारा उसके पर को बात नहीं सका। उसके लिए भी मारकार ने दिया है यह ममी पूरा परिवापी मही है मनोरमा के सिवाने से समझा है। मनोरमा ने बलापा पा किसे क्षमा करना पहले तुम यह सीकार कर सो कि तुम भी मोह में हो और वह पी मोड़म है म तुम उससे पो मोर न मह तुमसे दुरी है। परन्तु पर इसका पूमतया पामन महर सका। पम्पमा बताती है "मनोध सबद से मोम्म , क्षेकिन सबके भीतर एक प्रकारका सम्देह एकप्रकारका परिकार है दो समझ नहीं सकती। ' स्पष्ट है कि वह पनी पूर्वतपा दुनियादी नही बना इसके लिए उसकी मानसिक अग्पि उत्तरदायी है। इस प्रकार यहाँ प्रथम में परिवार से पति पानों की प्रसफलता का मिमकर सिद्धान्त के निपेपारमकस का प्रविपाश्म किया है महा इसमें इरिगावी पामों की सफलताओं का पिप कर सियाम्त के पिपेयात्मक म को पुष्ट किया पया। (4) वीतरे रेश्म में रम पम्ही समस्याओं का विचार किया पपाई जिनका पिन नाटककार में पंजना से किया है। प्रत्पमत पौशिक बिचित समस्यामों को चार ममिया बापगा। पंजना दापनियषित समस्याएं गो-कावून बारा मुख्या की समस्या पोर विपणा-समस्या। बालूगारा सरहा की समस्या कानून मुरमा की समस्या को पाटककार में गो विकराम स्म में पास धम्मुख रखा है। पचास हजार रुपये मेकर एक ऐसे भोले-भाले मक्ति को स्पा करका देमा विश शिवाय कोई प्रपणनही कि उतरे पिता का हान्त हो गया है और यह एक सोभी इति पामे मीरा पट्टीपार है। समस्या का एक भबकर पाम् यह भी है कि वह मरकाम्यामावप में पार पपमी रक्षा के लिए पशम को उत्तरमापी पीबना गया है। पौर उसका साथ कोई भी अपराध मारने के लिए भी प्रमानित किया जा सका।' इम निर्मम प्रत्यापार को ऐसार पाठकका पप इस समस्या की भयंकजा हे सुग्म हो रहा है। रिपका समाया-पाटककार ने इस समस्या के प्रवर्गह मियादेवन . ..
मामीमारायण मियापाविमाटर उसीम को विधित घ्यिा है जबकि महस्सय पुननिकाह के पम में नही। उस का भीषमा पुरुषकी वदाम बाप्तमा से किस प्रकार मुरमित ? पनोरमा पास रिपरा है। पोषनावस्था में उसके लिए समान में रहने का कोई स्पान नहीं। चालीस वर्ष के मुरीनाम की प्टि से मीमा सुरक्षित नहीं। उसने बीपन यापन के लिए कमा को पामार बमामा यह पमना को पिर-कमा सिखाने मगी । परन्तु कमा भी रसपम्प की रक्षा में असमर्थ है। उसी के चमों में या मपने को चूम पाने के लिए मैंने अब तक रेप पीर मम से सिसवाद मनि म रेवती रमेणय भनी मापारी अपने निर्जीव चित्रलिप में सब जीवन की कामना करतीनही उसके पाप मुझे एक प्रकार का मुप पोर सहबास मिझा है मेकिन मुझे इसका पषि कार कही पा? 4 प्रपनी मारमा बेपती पी। हो मैं पहरे हो भी पी और पूरा भूस्य भी म लिया पा। इसलिए उसने रंग और पी फार भाषिकेश पाकर मासा मेने का रिचार किया है। इस प्रकार यह समस्या उसी मिपाकीबो पपमपम्प को पाप प में निभाना पानी।। (4) इस मौके पातपत रेश्म के मिजन के लिए माटकार पित के माध्यम को पपमाया है। स्व भूमि को प्रभावित करने वामा मह वर्क-वित समस्या-मारक का मान है। इस सर्क-वित का प्रयोग माटरफार मे दो प्टियों में पियाई-प्रपम सिमान्त के प्रतिपादन के लिए द्वितीय समस्या केबिनधन पिए। सिमाम्त का प्रतिपाइम माटककार में समस्या-विरेचन मम्प परिहों से किया है परन्तु उनका महल समस्या के विवेपन मापीन ही पाना बाना चाहिए। ऐसे तई सभी समस्पानों के विरोधन में मिम माते है। एक बाहरप पर्याप होगा- समार की समस्याएं मिम मिए प्राराम ना हो मचाई साद केस परमही नुताई ना सकती मेरा मुरिमार समका तर भी दिही मिनेगा।" (1) मारफार प्रमुख रूप से वितपूर्ण विषम रा समस्यामा विश्लेपन को ही गस्प-फस में पाप किया है इसलिए उसने मुमपृष्ठ पर भाटकमाम साप ममस्या-मादक सिसा है। बैमा कि पहले भी विषन किया गया है माटक में बिन पाापी योजना शनी !"
की यही समस्यायों की मीमांसा करते हैं। वहावहाँ उसमान रखते मही सारा रसहा विषम करते है जिससे नाटक में कई समस्याओं का समावेश हो गया है। सारे माटक को एक मूम समस्या पर केन्द्रित करना मनुरित है ।मारकारले तीन समस्यामा परबौशिक ई-मित द्वारा प्रकाश पिरतन नाम की समस्या-अपम एष मुल्य समस्या है पिरतन मारीत्व की समस्या पदि नारी की प्राति का सम्मा स्वस्प सप्रेम-- जिसमें मारावगम्य की दुहाई दी माती है भपका मर्यादित विषाह में पिसमें सामानिक मर्यागमों के अनुभप नारी को अपने मन की अपेक्षा समाज की एम्पार अनुपम समर्पप करना पड़ता है। यपि या समस्या एक स्वत समस्या है परन्तु भारतीय सामाजिक जीवम पर पारधारय गौषम-वन बाट हुए प्रभाव के कारण इसका विरेपण सामपिक पड़ाव ही अधिक रखता है। सपस्या के चित्रण एव सिंचन की सध्यता समस्या के पक्ष एष विपक्षम रिए पाने पामे सकों की पानता पर प्राप्त होती है। साधारण परिस्थिति में श्वमा नारा पिरेषन नाटक के लिए पस्मामाविक हवा और नाटक मारनबाद माप्ठी का प्रतिस्प बम रावा मसिए मारककार मे गहर पिचन का प्रकार निकास के लिए पापामारिकता को स्थिर रखने के लिए इसे ऐसे भसामाम्प पागेदो योनासीयोपारिरोपी पारशीको सीमामाको स्पा करो। मनोरमा शासनिपगा। मह स अपने त्रिप प्रेम को मपिता पमुभूति की अनुपम्पिति में भी प्रिप की कस्पना कर सामाजिक पा! के परत निर्वाह करती है। वह अपमे मन को हेयमाप्रामाजिक मर्यादामों के मार्म परताठी है। इनरी पोर पापमा सामायिक माराों की प्राइमना कर पपन मन की अनुभूति एवं परितोप सोही प्रापभिरता देवी है । एक मोर सामाजिक मारा (ग) की पराकामा है तो दूसरी पोर बपिता परिताप की। मीमो मारररार परमार्ग में इस प्रकार पर किया है--"तुम्हारी मारी पहने मामारिक पौर फिर मानसिक ई पेरी मारी प्रारम्भ में ही मानसिक हो गई। इस प्रकार सीमामों का प्रतिनिपित करने पार पात्रों राए माटमकार ने ऐसी परिस्थिति का योगन किया है पिसमें ममम्या का महगाई से रिचार हाने पर भी मारकरी हानिमोह। एन समस्याकरिएप में मारपसार नै पत्यारे मगमग प्रत्येक पान . निए...
लक्ष्मीनारायण मिपके सामालिमाटक t यो समय-समटकर देता है। यहाँ कम प्रेम के भीतर प्रतिपत सपाईप स्त्रीररता है प्रेम परमा विपत स्त्री के लिए कमी पराई वहीं तीनातिकी स्तुति त सपिए होती है कि यह प्रेम करती है प्रेम लिए ही उसका सम्म होवाई स्त्री परिन की सबस बड़ी रिभूपि उसका सबसे पाप प्रेम माना गया है। प्रेम पास से राय का पब से मनिकार-मेकर तो किया नहीं पाता को पात स्वत समान है प्रातिहा तो परिपका गुप अवमुप नहीं। पर इस प्रेम में सामा जिम मर्यालयों की मबहेमना करवस ममस्मुख पापहमें संयम को र देना ही प्रमत्मा प्रति सका भाई पर मन को इस प्रकार यहाँ-वहाँ पके मोम में पौड़ने ऐना मानसिम ममिपार है 'पोसारिक पमिधार से भी पथिक मकरान यह है कि चिरन्तन नारीमतपय के माम पर भारीमाताप के पक्षपाती चिरम्न पम-मृत्ति की मोर तो नही रठे पाते !" हम समस्या का विस्तार के विश्लेपन कसे हुए मिपीसद प्रेम को म का नोन सिर करते हुए ममोरमा रागों मे रुसी हसी रसी मुस्कराष्ट पर की मुम्परता और सका विकास "माबों की पिसी मारतों का माद उस कोटिका रतने यो संसार मै इमरान होगा? और तुम्हारी बामधील प्रति हाँ मी म उस पापमो ।" इसके पतिरिक्त स्मरम माद मोम की पायनिक क्ति को भारविहीन सिट करते हुए मनोरमा देवी है यह सब सोल नाम पर फापना कार्य मन की रिखारे पौर माता की वरद सम्म छ समय के लिए प्रस्था भी मिरादे परन्तु यह स्वत परस्पा नही हो सकता। इस प्रसार प मोम की मुक्ति का विच भएन किया गया है यहाँ प्रम बास्तविक साप विवाह के पग में भी मुम्बरा उपस्थित किए पए मारपरकपन है कि विवाह वह सामारिका प्रवाह निधर्म मोर मात्र प्रापि + सामारिक संस्कारों राम में से सन्देह के उम्युमन री मारमा मिससे पारीहरस मत विभूति-प्रेम में पतिरोप उत्पम्म होने की सम्भावना हीमहे ।इस सामाजिबन सब किससरे मित.. .
सिगर की होती काममा कम होता है प्रत प्रेम प्रपिष्ठ पनिष्ठ एवं दाहोपाई। समस्या के विषय में माटककाररोनों पक्षों को तटस्थ भाव में प्रस्तुत किया है मौरी पाप किये हुए है व इस समस्या के विषम में माटरकार की सफलता को सीार करना अनुपित म होगा। विपदा रिसाइकमाया दूसरी समस्या रिसका नई वितर्कपूर्ण विवेचन किया गया है वह विषमा गिराह की ममस्या। इसका विरोषन मनोमर पौर मनोरमा के पाताभाप में हुआ है। ममौरमा पानविपरार परस्त यह विषमा-विवाह के पक्ष में पोट नहीं देती। यह विषया-पिवाह को नारी की प्रकृति प्रतिकूल समम्सी है क्योंकि इससे प्रेम में एकरूपता के स्थान पर सनेह के पस्तित्व को स्वीकृति है। विवागाहको साकार करने का पर्व है निगाह में प्रेम का पाबार पानसिक नहीं प्रत्युत् मारीरिक मोम-बापमा श्री तृप्ति माग है। विवाह स विगाह में मामसिक एकरूपता का सपन हो जाने से सम्बार उत्पन्न होना बो अपने साथ तसार पारि प्रस्य पार्यों को मी प्रमय नाटककार मे समस्या के रियाया एवं निधारमा दोनों पयों को कई आप पुष्ट किया है। रसने एक पोर विधवा-विवाह से उत्पन्न पुपायों की मोर रित किया सरी मोर विधवा-विवाह के म होमे पर समाज के सम्मुष नारी प्रापध की प्रतिष्ठा होमी इसे भी मित किया है। मनोरमा इसी दूसरे पास की विशेषमा करती हुई कहती है. 'तुम नीरन का विमपर स्त्री के बोपन समय पहलू भी सममले हो देपोहो उसकेभीवा समस्प है साथमा त्याच पार पपस्या है 'यही विषा का पादई मोर यह पावर्स तुपारे निए पारसकी पीरई। बास्तर में रस समस्यामा विषम केरल प्रापर्य एवं सिखात के स्तर पर सुपा है स्मारहारिक पक्ष को नारामार ने नया ही नही है । नारी केस प्रेम ही पस्प मा स्वाभिमानपूर्ण पीयन की पाहमी सत्य है । परन्तु फिर भी इन पाप पक्ष को तपत निपनाप सप्ट कर पायर्स को निषि एवं मुर रेला कम महत्व की पस्तुमही । बीवन की प्रमति में मार का एक रिप महत्व है। यह जीवन की पापारिक समस्यामी को मुतमान में एक टिकोष प्रदान करता है। प्रत मारककार का पाप्रपल जल पारध पक्ष को लिए होने पर मी सुत्प ही कहा बापमा । । । एकोहोती.
१२२ सामीनारायण मिमसामाणिक माटक रोगोपचार-समस्या-तीसरी समस्या मारकपार मे रोग के उपचार की ग्यारे। किसी भी प्रकार का रोग होने पर बिना कारणों की जांच के पटर को बुमा मैमा प्रेयसर नही पर्योकि मानसिक चिकित्सा प्रभाती भान के बिना पारीरिक विकिरसा प्रभामी प्रारी है और कई बार मानसिक रोम पौर शारीरिक रोगबाध उपसमग समान होने के कारण गटर भानसिक रोगको पारीरिक रोग समझकर रोगीमीरोग परीर मेवाके माध्यम से रोम ही मर रहे हैं। प्रामुनिक ऐमोपी के राषटर पम पारीरिक विकिरसामान से परिचित समिए ये रोम के निरान और उपचार में प्रसमस पर्योकि 'पपिकाप बीमारियां मानसिक विक्षोभ के कारण होती है। इस विएसपण से पाठक का हानरर्थन होने के साथ उसकी विधान प्रति निष्ठा को भी ठेस पहुँचती है। विज्ञान की सीमाों को मकर पा सके मबीन मासर्पों पर, बो पपनी पहापाप के कारण बमार ही उसके मस्तिष्क पर पनिकार मरते गा रहे है पुनर्विचार के लिए प्रवृत्त होता है। माटरकार ने रोम के निराम का दूसरा पभ भी प्रस्तुत किमा।। रोग के मामधिक मारनों का अनुमग्बान करना मौर उनकी प्राति से प्रतिसता समाप्त कर पून पातिक निम्ह पाना । मनोरकर पर है प्रहति के रास्ते पर मौट भामा मीरोग होना दोनों बराबर।। (1) माटमकार मे उन बहुमुखी नोपयों और उनकी पमिप्यक्ति के लिए प्रवनी म्यापक पौर पुष्ट सामग्री का उपयोग करत इए भी पाना मिनी मस्तित्व को रिण ममित महीं होने दिया यही म नाटक की सफमता का एस्प है। माटर के पानसमा मूम पामार है-कर्म प्रतिफल म्याय (theory of pernesh) पर्मात पर कोई कम किया जाय तो विपक्षी की मोर से पर भी गर्म के प्रतिफम से मनुप्प मुमत नहीं मरता । सी सिगातको मारत में माटाकार मनोगपरगाहारा स्पष्ट करता पति फल मिमताम? मप और रजनीकान्त का सपना भी तो" "हम मोपों में इसके लिए पोई प्रयल नही पिया रित नप को बाहते है पप समते इसमें हममें से रिसो का पोप नहीं।" . १ गिरीरोग.
मिर की होनी १२३ मारकरूपानर का मायक है मुरारीमान । सारी मासी को रेट मानकर शिपिठ होती है। पेप पान समायामों का उपाटन पपया विस्मपम करते। परन्तु पम्पून कमाना कोरेन्द्रित नहीं कर सरते। मुणीना ने इस रप पूर मोम की पापारिक गुत्ति के बक्षीभूत हो एक पाप किया। दस हवार रपये के लिए अपने मिन की हत्या कर री। इसमें पह अपनी सतता के कारण समार और कानून दोनों फसे पर पया। मफिन कर्म-प्रतिफमम्पाप मारण उसे इसका फल भोपना पहा । उसन पपने मन में गहानि हई। मारपणना मे अभिभूत हो उसने प्रायश्चित करने का निरषय किया । उसने मित्र के मारे को सल पिका रिसाकर दामाव बमामा सीकार किया। उसका विचार मा "कोई भी पुराई प्राषित मे मिट बाती।" परतु कर्मों का प्रतिपम इवन में समाप्त नहीं हमा । मकर फम उसकी मारी पदमा को मी भोगमा पर। उमने मपोगका बार-बार मेस रे साल में सता पाई।बह स्वर माती "मरे बाप की हत्या पापम हुई और उसका बरमा ऐ मुझसे बार-बार ठोकर मार कर । इस पाव इस सारे कार को दो बार भोर भात्ति होती है मुरारी- माम की मोम की वृत्ति पुन प्रबस हुई और उसने पास हमार रपये के बरस एसनीपत की हत्या का पबमर प्रराम किया। एया के इस पपराम भी मृतक ने उससे कोई पता नहीं मिया कानून पनि से भी बह मुक्त था परमिरीय विधान ने रम मंत्रित कों ने उसे इस पपास इगर का बरमा पा लिया। पमकी पान मर्यारा नष्ट हो मई, गोंदिउमीमाकी में प्रस्ताम म पाकर ए मारे गए सारे कमरे सहमाए। इसप साकार परता। "दुनिया बाम पाकिमो तापी भस्पताम में एक मारे हए की गहानुभूति में यहाँ विष नई पी में कम विस मुह मे पारी बागा। "सरा प्रतिपम प्रौर मी पाक मिमा उमकी माकीम पौवना पापा में ही पम्पासामा पहन मिमा और भा यह उसके भर में पना भी सीपारीकरती । ममोराकर जिसे यह मामाकी वाह पाम एए पाया मौसम और मारपीर मुरारीमा पूर्णतया सहाम परस्पा शेष रह पाता है। नम भपने कर्मों का प्रतिपम प्रतिपक्षी की पारी मैम्पाय से ही १ किरी 1 १२४ पापी पायपद मियायायिक नाटक मिमा। इस सिगात का पास्पान ही मूम फबाना इसेपर है और यही सिरे सौम्पर्य का पापार है। नाटक में पाए ए प्रमुख पात्र मी पाठक के एप में अपना मान प्रभाग पाव पार होकवान मूल पाता है परन्तु पात्र मार दमकी प्रति अपना गाप प्रभाव बनाए रखते हैं। इसीलिए पात्रों की विवेचना भी बस्तु- पप्रमतर्गत करना समीचीन है। नाटक में प्रमुपम्प से पार परिक-मनोरमा पम्हकप्ता मनोगकर पौर मुरारीमाम। इनम से मुरारीसाम को छोड़ ऐप तीनों परिण पसामान्य पौर पक्ति-पिय मार्गत पाते हैं। मनोरमा बामविषमा परन्तु भारतीय पारयों की पाम्याता है, हा मुम्परत कर सकती है और विस्ता में पिवास रखती है। इस परितकी मोना माटकमार ने बेबस भपने रेप की एष्टि ही की है, यह परिण पारर्प की पपाठा है। मनोजर पपने पिता की हत्या का एम्यम मान सकने के कारण एक पिसेप प्रसार की पृष्ठा से पीड़ित है जिससे उसके पीरन का विकास क माता है यह पामही सरता से मानसिक रोग हो पाता है पून की उस्टियां तक भावी है। परन्तु बार में पा मनोरमा से रिश्ता की पिमा पाकर जीवन को सन्तुनित कर मेता है मामा के प्रेम को पुन प्राप्त करना चाहता है परन्तु मानमिक पन्धि के प्रमाण के कारप सफा नही हो पाता । स्पष्ट कियह प्रया माम्प परिया बमामा परिण भी पति-चिप के प्रस्ताव पाता है। परमनी पात कम पर मोहित होकर सापानिक मनिरामों की पूर्णतया परहेनना कर altबह से पत्यधिक प्रमाणित है, और मानसिक अनुभूति की ही पिपारों में प्रापपिस्ताती है। तीन परिस्थिपियो मलमतरोने कारण परिवार में जन गोगनपरिकनिकट नहीं पातुमको रक्तियों को फिइनके परिवा पास्पान करती है, जानीरन के स्पेयाहत पथिक निर। मनोरमा पोर पवरना मग शिया मोरया प्रसार और भानामा समान प्रार पति का अपवर प्राचीर परमपीन का प्रतिनिधिलकरती। और इस प्रकार कालप्रपेकय में होगा रोगी के म्पत्सित के माध्यम से महाग कुण् प्रति परिव कर सट पिया गया है। मुरापतामापत्ति प्रतिनिधि पारित है उसमें प्रप्टमपपिस्ट्रेटरी - सिमूर को हानी १२ के सभी मग पिपमान है। बामपने स्वार्थ के लिए, मोम-त्ति के मापीन होकर न्याय का ममा पोट देता है। सोम की भांति उसकी काम-भावना भी उसे पपन पापीन कर कुकर्म करने के लिए प्ररित करती है। माहिर प्रमी मयमन्तसिंह और हरनन्दनसिंह भी पर्व के लिए अनर्ष करने में नही एकते। इन चारों परियों के द्वारा मारककार सगर के उस सम्माम्त बर्म के परिमों परित को अनावरण करने में सफल हुमा है बो समाज में सम्य शिक्षित एवं मुसमत रहेगाते हैं। प्पेग बस्तृपक्ष में माटककार के गायों की बहमुखी पर्चा के पश्चात् भी मारक में पाए हए स्पुट एवं दीप मंगों को विस्मृत माही किया था सकता। उनका अपना स्वतन्त्र मात्व है। सम्पूर्ण माटक में इनकी पर्याप्त संस्था है। उदाहरण के लिए दो तीन संप दिए जाते है- "पुरप पास सोमुप होते है-विपत स्त्रियों के सम्बम्प मे मृत्युपप्या पर मी मुमर सो इसके लिए सबसे बड़ा सोम हा माती है।" "मारकम का कानून हो ऐसा है। इसमें समा नमको नहीं दी जाती यो किपपराध करता है सग दो देवम उसको होतीपो अपराब पिपाना बानता। "यह क्षमा दुम नहीं माप रही हो। दुमहोबो मने बी.ए. हम प्रती नापी तुमारीही पक्षमा माप रही है।पो भीतर पानकम पीमिक्षा में पोंका बिनबाद पूर्व मिसनापा पाता है।" गिम्पपक्ष जपानर विम्यास पैसा बिस्तपक्ष के विवेचन में सिर पिया पया है मूम या मुरारीमाम को देन मानकर ही विकसित हुई है। मुरारीलान न एक पाप किया और उसका उसे प्रतिफल मिवता है। इस पानर का पिम्पास संपत नाट्यशास्त्र की परति पर नहीं मौका पा सपता है क्योंकि इसमें मासक सम्मुख को 'कार्य नहीं। इसका रिम्यास तो पारधारय माणक मनुरुप हमारे निस १ सिर सीहोती.
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चक्ष्मीनारायण मिश्र के सामाभिमादक
प्रारम्म पन्त साल विधमान एका है पौरपापिस से साथ
इसकी वीणा भी गम्ती पाती है कमी एक पर सफल होता दिखाई देवा यो
कमी सरा यहाँ यह भी स्पष्ट कर रेमा पापपरहि मुराणकाम म पापि
पाहमा करवाई है परन्तु मनोरावर के पिता की हत्या का हम मम्त में
सुनवाई समिए कमातक के विमास-कम की दृष्टि से मेवव रजनीकारत की
हत्या का त हो सम्मुत पाता है। मन रमको हो प्रमुख मत मामला
चाहिए।
कमानका वियाह रेखामी भाम्पम है इस प्रकार स्पष्ट किया जा
ल
A
अ
प्रपम में मुरारीतामार पपे स्वोभर पर हमारे
लिए प्रवसर प्रदान करने की स्थिति कमोबात (Exposition) मह
रेवापत में माप की स्थिति यह उसका कर्म ।।
इसारा वधे की ममता से एगार रस मिम मए पौर मीठ
हजार का मिमने प्रारवासन मिना । मुरारीमान की पुष्टि से मह वार
की स्थिति पा रसारित में यह पति पाई बिमामा हारे
कारण पास पश्चात् पराा रस मारे गए मा पर मातमाहो
मानबह पुन हानि प्रवरेणा मोमेको मोर पूमती है यह स्थिति है।
पदी ममम ममाप्य हामीमाकर उस पर हो जाती है।
रितीप पपसमा सो पदमारे कारन पुण्रातान पाप की
प्रतिमा स्पष्ट प्रतिक्षित होती रिपाई देती है। पाटक को नगवा पार
मुराधमात होमे दुई। यह स्पितिपदुिको। गार मौर मनोहर
पानाप में पनामा की मस्सस्पना काम भयकर प्रतीत होता है।
वो परमाए पुम पाक में मोर भाषा है। पममा सहो पाती
मोर प्रमोग्र मापनमा पुर भारी पीपल के लिए समझोडाकसे
मिमूरी होमो १२७ सिप मेर पर बस रेत है। सारी समस्या मुनम पाती है। मुरारीतास का पय पदम हो मादा है। ऐसा प्रतीत हाता है कि उसका पाप उमे पर पया है भास्पति म बिमुनी है। इस पार को पानेन पर बह पुन पाप करता है। एपालीम हमार पौर स्वीकार र मता है। यह उसकी दृष्टि से साम है। प्रत यह बिन्दुस की स्थिति है। यही दुसरा प्रक समाप्त होता है। इसके रपयत तोमो घर में समन गम्भीर रूप धारण कर मेवी पोर मामा मारे गए माझयों सिन्दुर परार समम्म स्वीकार कर मेठी। मुरारीनापी मान-मर्मास समाप्त हो पाती है क्योंषि प्रसताम में मुभी रस घटना को गान गाते हैं। इसके अतिरिका चन्द्रमा पर एमरे पास एना भी स्वीकार नहीं करती। यह पाप का प्रतिफम पिसके कारप रेशा-पिन्दु पुम पर पा गाउ है। इस प्रकार माग पूभवया एक गामी काप पारपरमेता है। इस रिम्यास रासष्ट है हिनाटक में जम एक मोह यहाँ पान मफपना एवं प्रमफलता को सौमार्यों को स्पर्ण करता है। इसलिए यह स्त्री कार करमा पोगा किनाटकार में इसे टीन पक्षों में विभातिर पा मक के साप उपित सामगम्प स्थापित किया है। इस मुमत के विरिषा मारककार में एक भार पर भी सहायरस्प मपिवितरिया है-मनोकर पौर पमपमा सम्मायको सकर रस वृत्त का दिमाम भी पापाप माट्यशाम्ब के विधान के पमुहम है और निका भी सामरम्प तीनों मंडों में मुन्दरप से हमा है। मनोरकर और पासा भाषी पति-पली कप में एनपुरको प्रम परत है। पारम्म में दोनों एक-दूसरे पी चिन्ता से है यह मितिमा परिचय प्रपा मापार है। मरे पापा मुरारीलाल और पता मातिाप में इमो पिपिता का प्रासाम हो पाता है और प्रपम पन्त में पनामा रमनोकात पर पार हो जाती है। यह समन पागम होती है। दूसरे प्रेक के पाप्न में एक-दूसरे से दूर हो पाते हैं मोलि पमरमा रस्नीमान्त रे मोह में प्रस्पस्म हो गई है। यामी एक सीमा है । परम्दु पुत्र स्वस्प होगह दोनों परसर समोर का तिर लेसिसमे पान मोर पूमता है। यहाँ इमराम समाय होगा और धोसरे पामें पुन पनों एक दूसरे से मापा निम हो गावे। यह मासी भी स्थिति है। म प्रारपसारेगापित भी मनपा समानामा ही सेवा।
१२८ नापीमापण मिपमामानिफनाटक स प्रमुख पार पहायक इतके अतिरिक्त नाटककार से पम्य पत्तों का उपयोग मी कसाहको विकास के लिए किया सरपनीकान्त पौर मरबन्दसिंह का पुत रचनावात मौरहरनम्नतिकात्त मुपरीमान बारा मनोरकर के पिता की हत्या का वृत्त और मनोरमा मृत । ये सब वृत्त स्य नाट्यशास्त्र की पारिमापिठ शायनी में 'प्रारी कहे जा सकते है। मकाकपा को गति देने से मिन प्रपना कोई परस्य नहीं। इस प्रकार स्पष्टामा किनाटककार में मृत पान के प्रतिरिक्त पांच अन्य पृषों का सपोम मिा है । वस्तुत इन सब इत्तों का सामवस्य परत में भाटककार सफल हुआ है। नाटक वना सम्पर किसी भी चिपिनता का पापास नही होवा । पिची मी प्रसप का दौसिसई विवर्ष होने से मापन मुन पान से विन्धेर महीं किया पा सकता । प्रत इस भार मानक को बीमा पानक मनाएर मुमति (Orpalc) पानक ही कहा पाएगा पो किनारक का एक प्रमुन गुम होता है। माटक पाक में पा की गति में पोषवा होमा नाटक के लिए पापापक गुप।सकी पति की तुलना उस पर्वतीय निर्मर की नाही गठि निरन्तर प्रपने नाम की पोर बता जाता है। इस तीरता का विवार को दृष्टियों से किया जाता है-एक कार्प में तीप्रता दूसरे मामल पाह-संगठन में कोठा । काय का समाय सिपूर की होगी की कपात पति से अपने नाम की पोर पाती है। कितनी पटनाएँ एक ही दिन म पटित हो बापो ६ पौर पम्त में फम की प्राप्ति होगापी है। वाय-मटन में यहाँ वरपूर्ण समारही गति में TV रिता परय भावी परत भारकीपटनामों के प्रस्थामाविक प्रतीत राम पाने मोगों को स्थानाषिक प प्रामारने के लिए मायापक। इनको बिमा कमानर मे प्रमा भाषिकता पा पाती। इसके प्रतिषित कार्य की जो पानकापारिक प, पति पवनी शशिमा-गंगठन में पाने दामी शिक्षित स्थिरता विषेष प्रभार नहीं गसती। कपाल में मुख्य पार पाप की पोरना ही पान की सफलता का यस्य है। सारनाटका में इसका विचार रसपी दृष्टि से होता पा परन्तु पापचारय नाटक में इसका भापार भाटगीय रिचविलममप पिटिपी पोरनाम। सिनरी होनी का पान-रिवान पूर्णत पातरम से प्रभा- वित है प्रत इसम हगमप स्थिति की पनुइमता को मोर मी म्यान रा रा । प्रथम पंक में रिपत पोर हामाहीमा माघार है पागमय रिपर्यो सिर की होली १२६ बरे मनोगमारलदकता-सम्ब, मनोनकर के पिता सम्बादी रहम्प का परिषय मान कामाया गया है। सरेक में मनोगकर और मनोरमा मम्म प्रम पर और पनामा के राप के उपचार पर टीपन है। तीसरे पक में पकता पार समोरमा के मध्य प्रार्थोपाठीवनम है। न पाह्मणों के साप पाों के प्रातरिक पतन का भी मफत चिरप हुपा है। पाके सूम्प माप का संकेत भी उपयुक्त पाों को स्वाभाविक म्प से मर पर मार पाया गया है जिससे पपारा म भोगही महीं टूटता पौर नोकपा में रही इस बात का प्रामास होता है कि यह बात माटक में पृपा मोबन पा बोहर के लिए कही गई है। मिमका पुष नाटने में मह पिपता नहीं है। नाटक में पारिम्यासही पोरना इस प्रकार की चाहिए जिसमे उसमें पापोतात कानुहमा निर्वाह हो सके ताकि पाटककी परकता बनी रहे। मपाममपिम्प का मामय मने पास पटना-प्रपात पापों में यह निधेपणा स्वाभाविक रूप से होती है। मियूर की होमो में कपाननिय बामे पारन कोवास की स्थिति निरिमार है। ममागगकर करिड न के कारण इस कौरस में और भी दिए है। प्रथम भर म ममी परनामों एवं परिमों का परिचय ही उस्मुमता सत्पन्न कर पाता दिया गया है। दूसर पर में रतमारें पोर पपिका पाती है और सारी रममा का मन्त मानन को पाठक पर हो रहता है। परिदम प्र में इस सममन को मारा भी बड़ी दुपता से लिया पया है। मनोरखबरपरिष में पूर रहस्मस की हम को गामक रपमे लिए मुरारीनाम बब बात करत ! उनि हो पाठे है। माहिर पसी पर बात पर है उन्मुपता माते और मन्तिम पक में माहिर पसी की रदिनवा में यह पोपना कि पार प्रसयपी पव। मार राहम बातावरण बनाए रखने म सफम होता है। पमा किस माफ कीरि निगम में ग्प दिया गापुर यह मा ममता एक पटनायभाव है। पटनारी दृषि से पराकमा रिब रशिया पुल है। समस्या को परिकारका पति सभाटा में समस्याएँ, मिनरा दौटिस पिन नारफार कोड है,तीर-परम्तन नारील निमारगाह पर रोयोरार बमात्या-नाटकपास में माटरगारमोदो बा पीराती- प्रयम समस्या देखिन में निम्नसिरेमिक पारा मानना मिठीय सेवाव-बार मोप्पासमबन नामोंरे ममगर में - मापीमारायष मिमोसामाजिक नाटक नापों में युवा + माटक की सफसवा निहित है। इस माटक में समस्या विषम + लिए माटफडार मै सम्म कमानका भाषय नहीं लिया। उसने मिपिष्ट पार्मो सपा मसापारण पटनामों के सामाषिक विषमाए ऐसी स्थितियों की मोचना की जिममें मदन रामा गम्भीर सर्व विदाई होने पर भी तबीयता एवं सामारिकता पिपमान रहती है। नाटक में इस प्रकार की तीन स्थितियों की पोरा की गई है जिनमें माटमकार यात मंगों में सफा पाई। पत निष्कर्ष रूप से कहा जा सका है कि कमानक-पिस्प की दृष्टि से मारक सफर है। उसमें एक सफल कलामक नगमय सभी तुम विषयाम है। परिष पित्रण पैसा किस्तुपा में विपन मिया पापका भाटपार मे इस नाटक में दो प्रकार के परिमों की सृष्टि की है। मनोरमा चमकता तपा मनोग कर परिष म्पक्ति-चिम्म के पापार पर स्थिवभोर मुरारीमान, साहिर पो रनमदनसिह मपवरतसिह तपा Rर के परिव पगंग रिप । प्रथम वर्ग + परिण पसाभारणार सरे धर्म * साधारण । दाना वो परिभावन की धनी में भिन्नता होतीपत इमा परा प्रसग बिचपन मिया बायया। पक्ति-पिम पम्तगत पात वा परिषों में सामागिता माने लिए माटार का उनकी मानमिक प्रघिया काप पपिक विस्तार से सिमामा पापक हाता है। परन्तु ममम्मा-नाटकमार के लिए मह माय पीर मी कठिन होता है। साधारण परियोहा उपधारा मगार और प्रियामों + माध्यम सोता है परन्तु बौदिर परियों में ये शाम भी अपना मीमित मात्र रपते है । संवार गर सबित पाप पारप कर रहा है को मनुष्य पागर पाती मीमाता जिन परम्पर्य म्बीपार करतापौर उन पर प्रापर करता है प्रग्युत् पार ठरमिए भी कई देता है। -रत में अपने विचारों को प्रतिपारित कर गाने में प्रममता प्राटपरमा मानव रिप पये प्यक्तिवारी मानम के मई पनुपूस नहीं। यमिएस में प्रतिपापित पिपाको एक सीमा दही सोपरिष प्रेगमप में स्वीकार पियाणा सावा। इमी प्रसार प्रियाएँ भौगोरि रिमों परिष-उपारन में मभिा योग मरों सी का पीडित परिए प्राय कार्य को दृष्टि से निकिम हो। म कार पर निधारी भरि ठिास मानिस मामों को सर रनर परिषद मधीमता नहीं होती। प्राय प्रकारों के परिप रपारर लिए मारपार पास एक मात्र रिगहोसो सात प्राम। पन्तम मिना सबसे समापन समय मापन। परन्तु प्रामुनिक मारमार सानापियामाम पर इसका भी वहिपार कर रहा है। बाद सपा प्रामक मबार माय किए गए मास्तिक पुरममिमप के माधार पर ही परितका रझारम करता है। भाषिक भूकमणिमय की मी पादप मार में एक मीमा है। पाटय मारक में पिक विस्तृत मा प्रमिमय पाटाइप पर प्रभाव गमन की सानिन मात्र र पाया है। इन बडीपापों से मापा मापार बोरिक परिवार परितापपाम करता है। मनोरमा का परिए मुबस पदिय बौदिक एनेक माप-माप माणसे पपाटा पर स्थित है। पर मायार करने कोम शरापहीदी रसका माननीय प पूमिम महीने दिया। पदरमा बम वित्त पर, समय पिकापर पर भानोचना परमी का रह पधार हो स्टटी से इस बार उत्तर देने के लिए पुन पायम प्रारमनपा मेय करमर पाता है। भारकारने उपर रिसर मैं मालिक एक मिमय का भी प्रमय निया फम एकता में भी मनिष पनहीं। इनको का प्रवाह टोसपना दम मरिगा उमारन करना है। मनोरमा परिण में ममति के नियमन का कारण यामी लिपिमित परिम है। उसके पित्र मिन विभपतामोरा माटरपार न पागप पिया एम् उनी माम मार ली। पामा परिण में पारादीपराप्य दिवाई मामा शिम श्री पूनतया इमनारसप्टर प्रमाण मोमा ठक पर गाठी रसके माग पोप पाम हो पाता, निम्नुपम बषय रामौ पिरतन नागरवालय मानतीन मापारमपरित को पसामाणिक रनन से पाने मिए भारकार ने नमपी पृमि पर मनोरेशानिज पानार मा लिए. टपप्ण बाताबरी मुष्टिी। पकनारी मिसाझा पाय बाजारप में ही सन्म प्रम रिपारी बार माप में प्रदरित होना स्वामाविरमा प्रति रिस पकाने पर गादी योर-मादमा मkि free fए उपोएम में भारी परिप्रेमम मम मन परामर्श पिपित की पार न र म एता । या कामी पति है मिर्म कोई भी परिवार परा पुरानदय मानसिक डिसी निशा सेपर में सिर मारा। इस मनावमानिक पृमि र सिरप ११२ नाभीनारामन मिमोसामाकिनाटक - ही परिण मे सामारिकता का मिहिो पाया है। शिक्षित पक्ति अपने मन की दुहवा को किछ gutt foपाया है, या मी कसा परिणामाटरकार ने बड़ी सफलता से स्पष्ट किया है। यह सिक्षित ने कारण तई करमा मानती है। पर बनीकान्त पर मोहित होन पर इसे बोगराईभ पवनो से पिपाती है। मनोरमा के उसके प्रेम कपार में पूमने पर पावत्ता देती है- म बापती में किस प्रेम करती है प्रमरोर से तो हो नहीं सकता और फिर पर प्रपम दर्गन म प्रेम का समय भी मी रहा। वह तो पुन इसग माग हदय का रस पित एका पा पौर प्रवायास किसी भोर बह स्वा पा । म तो पकी मात्रा अपच से पषिको पई। उस साप प्रम की नही रिमोय की भाव हो सकती थी उसके सर सिमराहो सावी पी बीमत गमाईमा सस्ती पो।' घिमित म्पपित परिण के इस दोहरेपन का निर्वाह नाटककार मे पायोपान्त सी दुरामवारे पियापकता एक मारतो सपा के कारण प्रम को छिपाती है और दूसरी पोर पारमापिमान 8 मुक्त कई पौर अपने प्रेम की स्पर मोपगाराती है। भामुनिक पिता से प्रसन्न होने वाम पामार की पृष्ठभूमि में विचार करने पर स प्रस्मामारिएता कापी निरा काग हो जाता है। मन या कहने में लिपिद भी संकोची किनासकार मेबद्रकमा गे पस्वाभाविक प्रतीत होन बाम परिसिप भी सफलता मात दी है। इस सफलता का एक कारण मा भी कि मला रिसिवति। मनोयार ही माटर में एक मात्र विकसनपीत परिध है। इसके चरित्र म भारफार मनारपा मारा परिपन नामा।हपारम्म में अपने पिता की मापापा का कारक ग्राम सक्ने कारम मानक्षिक परिब म पीडित बानिसकारण उसके जीवन का मिनप ही बया पार पण अनिवारी वहने से इतना पीप परिवर्तित होकर उसीबम की मभिव कर भमा पाठक की अस्वाभाविक-सा लगतापी भी प्रभावित होने भनिए पनि उसकी मनोरमा प्रति पासपको भी प्राधार माना पा सकता है परन्तु अपने पति सना अनुपरावी हो पाने पामा परिव अपने रोपनासम उपवारवा पा पार पमरमा के ऐप निसिपम में ने पिरोसी ५० सिन्दूर की होती स्पिर का एकीकृत पिधार रखता है प्रससामाजिक-सा प्रतीत होता है। भास्तव में मानधिक ऐप के उपचार की समस्मा विपन का भपिक विस्तृत पर मम्भार पनेरेमोम को नाटककार घबरच न कर एका पिसकारण मनोवर परिण में हुए प्रस्सामाश्रिता पा मई है। परतुप पाकि मारक के सैगन्टिक मिषन में सप्ट किया पाका किसनदीम परियों का निर्वाह नाटक सीमित पाकार और साधनों म सम्मथ नहीं मह ठा उपम्पार की वस्तु है। वस्तुत- मनोरकर परित्र में पाई हुई कतिपय भस्वाभारिपवाएं नाटक में ओपय के प्राह के कारण ही है। यपपि इन पत्वामापितामों का पक्निरिय पम्वयात मूष्म सिन द्वारा मिए करण भी किया या समवा है तो भी समग्र प्रभाव केस में पाठक को प्रस्था मारियवाही सरबती है। पर्पयत पितामों से मुमत पात्रों में मुरारीतास हरमन्दनसिह नमबम्न सिंह पार गार वर्ग प्रतिनिशिपाय पाठक के लिए परिचित हारे। पर उनके पवितत्वको स्पष्ट करण के लिए मारककार को अधिक प्रयान नहीं करना पड़ता । हें माटककार अपने उद्देश्य के लिए ही प्रयुक्त करवा है। पटरका पति सी पेमी का है। बीयर ममपतसिंह भी केवल बयत बिपतापो का प्रतिनिधित्व करता है। मदनसिंह और माहिर ममो पति में पतिगत पितामों का भी समावेध होने के कारण मम्तांत का मम पित्रण हुमा है। दोनों की भावनाएं उन्हें पापकरण से रोकती है परन्तु प्रत में पाप पुटन टेररते है। बर्ग-प्रतिनिधि परियों में परसे मुनर एवं पोरानिक सिप मुरारोमात का है। उसके मन को मोम-क्ति पार पपा की भाषामों कालको पररम विपितयिा नयापने कोमकी पाकि तिमीन होकर प्रयम हत्या की।वमसे पते परममा हपौर रमने प्रावित करलका विधान कर दिया ममोजहरको सन् शिक्षा दिवाकर रामारबनाना सीमारपर रमन प्राप रसा करनी । परन्तु मोर को पुति को पहले पबन स में पी मर से माती बी पर हमनौगांपरपितापट गाने के पकी मीमी प्रारमेकर पाई। पुनरी पार पममे कानुनी मोयरिएमारा भी पमा तो गपमासको कानून की सीमित शक्ति के कारप पर दीपाएंगे। मय मोम-वृत्ति प्रन्टन पी परन्तु पीने वापरण में । परम्नु पर उसे पापमा दिदस्या होणे होनी तो रमका पानीय प पुन प्रान हो गया एक निरपगप पति मारामा पा, एयह सहन नहीं कर माता । मोम वृधि तीसरी बार फिर प्रबन नवमीनारायण मिसामायिक मारक गई, पर यावरण ा म भिलवा इस प्रकार बन मेकर ही पपसाहर से हत्या, पापी म्परित पोरण दिया जा सकता है और रजनीकान्तबच जाम परवा पपा से ही वरिया पायगा। परन्तु पानीस हजार मेकर उसकी हस्पा के लिए अपराधी को पूट दे दो पापी । मानवीय मुत्ति सबके मर पाने के परषाद उसके सरस बयान से पुन' पाठ पातु तो सन निरर्पक पा। इस प्रकार यी मार दानगी-धि का सट दिमाकर नाटककार मुरारी माम परिण विषय में पूर्णत सफल हमा। नाटककार र सभी परियों का विशेषन सहामुभूतिपूर्ण किमाई परितों के दुषमा की पृष्ठभूमि का मनोमंशानिक निषष कर यह उनके एपमों के लिए समार को उत्तरदायी ठहराया है। उसके रिपार में कोई भी पुष्प 'भपकों मिए स्वर्य उत्तररामी नहीं उसे गिम बातावरण में संस्कार मिमै पा उसके पनुम्म प्रापर करेपा ही प्रकार म्याप छापारिक बस्पा पर मम दिया गया है। मनोरमा पाकमा बनोकान्त पर मोहित होकर माम सिक रामी होन के कारणों का वितपण कर सारा रोप परिवरा पर गमती है। वह कहती है- 'ऐमा पनुमान करना कि पानीपत को पपने पुरपोप में प्रेम ही नही है । उसके दरप पर उसपी हेसी पौर उसी सरलता सा ही माम उसरे मुगर परीर का भी मोहक प्रभार पापा पो समय पाप-साब से मिट पाता सपिन रसका पायम हो पाना पौर पद भीमामाठिक प म निमम बहुल पोप मुरारीमान महागय काई यह सब मिलकर पहार हो रख पए सम्हास नही सकी। बहुव कुश दुर्गा तो मेरे पिसेहई।" इस मारे पिन पदपाद कहा गा माता किनारमकार परिष- चित्रा में बहा पंचम सफर है।म मनोजरामरके पतिको भोगारोप सेतो वक्षसी समता निरिवार। संधार मेरो ममत दो पंप-एक भाग मरा भापा । भारपानको गति देता है परिपका स्पष्ट करता है पौरोप का पत्रित करता है। मापा मारानुन एक विषयानुक्र होकर स्वाभाषिता पोषनाए रसही है। हम प्रसार राप्रबम सार्य है पानाको पनिमा । एवा संमार ' मिमा NINE.
सिन्दूर की होनी या कशमक विकास की दृष्टि से रिपयान्तर हो सम्बर एवं कलात्मक होने पर मी स्याम्य है। जिन्दाकी होती के संबारों में प्रमुश्त से भर है। मुरारी- खाम की मम कपा समर संपादों में कपामिकाम को गति देने का पुष रिपमान है परम्नु -विता के स्पनों पर प्रयुक्त माविक काँका तारतम्य पाठ है। पर इनकी दिपानुरूपता प्रसारण है। संचार का इसरा प्रधानमणि को स्पष्ट करना । परित्र प्रह- न की सप्टना के लिए यपारमाही माटककार सपत मापा की अपेक्षाा मूक अभिनय को करता है। परन्तु मुरुता की प्रमिअपिठ भै पविप्प का प्रमाण है। इसलिए नाटककार एक मौमा रही इसका उपयोग कर सकता है। मन में रविणता प्रामाम मुफ अभिनय मे हो जाता है परन्तु उसमें किमीकम प्रकार के निधार रहे, यह स्पष्ट नहीं किमा गा माता म माटककार को पाखामको म्पए करने के लिए मुम्प र मे संबाद ही मामय ना पाता है। मिपनी ने इस दृष्टि से मेवादों को योगना यो सफल उस से की। माटककार पापे पार से पाना एक पल मिमी साधारण पात्र के मम्मुत प्रस्तुत करवा देता है और फिर पिसो पविरोध के कारण वहीं पाम मरा पक्ष भो स्वयं ही प्रस्तुत करता है। मुरारीमान रे पास को स्पष्ट करने के लिए पहल उसका रया का माष बोषवा है- मुरारीलात-" बार ऐमी यात दी। उBा बहरे थे पैतानो पायी भी। और मानुस होता पा उसकी भी राय से मारा गया होगा। मनुष्य का इसके लिए पारमी पपा नही र मनता? (कमीर दी भास्वोन समेटकर र वो मेर रोयें फूट मए। से सिर मेपरकर पापा स्या समझते हो पर हमारा गया तो मम मरोगह माहिर पनी-"मैन पहत पहावा यह प्रारको पग में माप पया होमामानुन र मेहम ईमान की हिम्मत स्वनीमही होती।" पौर म प्रकार माहिर पमी डागदाप दिए पाने पर मुरारीनाम एकरम परम नाता है और काम की पिता मादिगा पन को निशेप मिट करने ममता है। पायक के सम्मुन उसके दोनों मापो के पा पाने पौर मममीसरहा पाता है। म पधारमा सामाधिपता भी बरी रहती है पौर पसारे स्पष्ट होगगने में परिवरपरिवारमा सिलीप एप मामीप बन पाता है। मगारारा गो-मापा। भापा का विषयानुरूप एवं पात्रानुरूप होना सापारिनिगाह लिए प्रावाया है। मारक में प्रसार के विषय n सम्मीनारायण मिमसामायिक नाटक है-एक भार प्रधान को मुरारीनाम के कपान से सम्पर पौर दूसरे को समस्या स समार है। रोनों की मापा में भी विषय के प्रमुरूप भिन्नता है। मार प्रपान घरदावती में बोलचाल की भाषा का पधिक प्रयोग है जिसमें बोलबान के उडू मावि पन्य मापापों के धम्न मी मा गए हैजसे बयान प्रामात मुमकिन समसार स्तार हमीमत पारि। या प्रमाबमी भटकने बानी नही प्रामु स्वाभाविकता निहि में यह नाटक का मुणही कही बामगी। पाकिम स्पों पर भापा प्रपिक परिणत और ससन्तनिष्ठयाकि यहाँ परमार की पपेमा विचारफा प्रामाम्म है । परन्तु इस सम्बामसी में भी नाटकी यता का पुण गुप्त नहीं हो पाया। नगमग समी पात्र शिक्षित है इसमिए पात्रों की भाषा में मिलता का प्रश्न ही नहीं सता। बम विषय के पनुम समझी मापा में भेद पा गया है। वैसे माहिर मनी रोग के समय समय यो 'परमम' काता है। बाद में नाटकीयता होना संवाद का पर्यापम गुप है । यपपि यह कपा मा गोस्स एवं परियों को प्रभिम्पमत करने का साधन है परन्तु इस माम्पम में मी सका एक निजी सौदर्य है जिसके कारण उसे एक पिसेप महत्त्व प्राप्त इस सौम्पर्य में मिमी पावों में सफमा रनके बारों में एक निरोप प्रकार की मोहवा बिमके कारप पाठक कोशिक ई-मित भी पमरखा मही। संबाद मे हरप को एर पस्तिष्क को गित करम की इस प्रकार की प्रति कमाया कही भीमता नहीं। इसी संचारनुपमता के कारण ही मार मपिय भानों को मुख्य-कवा के प्रम्तगत रमते एप भी उसके प्रभार की परना पाठक को करवाते है। निष्प प में कहा गा सकता है कि सिन्दुर ही होमी' मिमी सामा निकनारों में सर्वश्रेष्ठ कृति है। माटाकार इसमें अपने गेय की पंगना के साप मापकता को भी प्रसन्न रमने में राफरहमा है। - - चतुप प्रध्याय उपसहार उपसहार पापाय रामघम पुफ्त मे मिप्रगीर नाटको को पानोपना रखए तिखा है-मादक का पो मया सस्म मपीनारायण श्री योरप से माए उसमे काम्पल का प्रवयव मरसा नहीं माने पाया।"पत विचारनीय है कि क्या वस्तुत मिममी के नामों की परम्पराएं भारत की न होकर पोरप की है? पाचार्य मुकम पीर उमर कई परवर्ती प्रासावों में उन्ह पाश्चात्य प्रमाव में क्यों ऐसा? मिममी के साहित्य का मूल्यांकन करने से पूरा इसे स्पष्ट परसा समीचीन भारत के पर्पो परमात् प्रसाद की प्रतिम प्रतिमा ने हिन्दी माटक को सहन बहने पानी पाप को अपनी राष्ट्रीय एव सोरहतिक हतियों से एक नया जीवन प्रदान किया। उनके नाटकों में मस्त ग्राम पटीत की माली ने पार पतग मौत-सी प्रवाहित पहरी रसाएमा सरना में समार पो काफी दूर तक मनुभूतिमय बना दिया । उत्पान की इस मशीन कारोष से मभिभूत वमान में मिपनी मम सपा और रिश्तापूम माटों को रचित सम्मान मिमना प्रषिक सम्मर मौनपा। पारवानीपायपरम विकास की समारों पर पर हिन्दी-समाज को मर गति से प्रवाहित पपामारीपारा लुप्त प्राय मनी पौर उसने मिमनीकापसात्मकता और जाप को बिदेस में प्रवाहित पपानी धारा से समर कर दिया। मा पाकि माताप गुगर पैसे रिसान पामोधर से सिय तदेवा पौर प्रधिकांग परवी पामोर में उमी सीक पर पनवे ऐ। मन मिम करमे लिए उनकी पाषित म समाप स्पष्ट कर देना हम मिपानीको माटयरसाई भारतेयुगाम में ही समारी -- १ किमी तापकास रा उपसंहार प्रारम्भ हो पया पा। पपापबादी एव प्रावधगदो रोनों पारामों के अधिकांश माटकों में समाजवि मरगता पाई जाता है। पिरीयाम के कई नाटका में तो इस प्रबनिक प्राधिय के कारण पतागत हास भी हुमा है। प्रत मिमी की इस प्रतिमा इम्मन पोर पाका प्रमुरम कहना तक मत मिमगी ने मन और शौकी भाति सामयिक समस्यामोपापन माटमा का विषय बनाया। परन्तु हिन्दी-नाटकार मारतदुगम से ही इस पोर प्रयून हा सापा। मारततुकाम में ये समस्याएं स्यूत पी से पापा-ममस्या विपना-भिमाह-ममस्या मारा-शिक्षा प्रादि । परन्तु युग-विसमा विकास र पारन मियनी नाटकों मइयोन सन्म्द प्रम मो मुश्म समस्यामा का कप पारण कर लिया। पत स्यूम म मनी मोर यह प्रयास स्वाभाविक विकास का मुबर है मादिक अमुकम्पका मही। मिपबीमाकोम मम्म सपापोदेबर भी पासोषा अधिक। पाम्नु निशान पोर पोम स उमृत बौदिरता म ममार काफ्ट पपा का पार उग्मुख होमा एर पानाविध प्रवृत्ति है। नाकों में इस वीर मिमी से पूर्व मी मिरते हैं। रापारगम के 'दुखिना चावा माटक की नाविका मामा मगेर स्वाभाविक धर्म का नियन्त्रण पर मरने के पारम पर-मुरप है मुमारा स्वीकार करती है। माटषकार नसरा माम भी पहन विपमा-विवाहमार रसाया। इसका पानोपनाल एएस.रमन मिह मियो है “विसमा-विवाह नाटक में गा यथार्थवारी प्टिमाम रिजाई पाता है यह बार में पारगारमें बदल दिया गया है। माना है कि भारत पौर सुधार कमपुर में पार पाय के प्रति भी मयक वापस होन मप ५। पर मामाणिरियों से ठिरसारमी गति उनमें म माई दी। पवादी पार रग्मुमतामा युगपी प्रवृत्ति मानना हा परिष ममीचीन है। प्रिभावमा प्रम उत्सम्म फरने पानी प्रयुत प्रवृत्ति है मायों में म्यान बौदिखता। यह मिममी के नारको मनोन मदिमान प्रथम उमरेका पात्र दुरिमारा। इमर उमका समस्या पर विचार करने का दृषि काप वोटिक है और तामरे रनरे मबारों में नौनिक रसिक बीमारना पीमई है। यहाँ हा पात्रोमोगरिपारितामा प्रानमा ममाहार ययाप बाके ममवतरियामा परममारमामदिराविषम - उपसहार प्राचार्य रामवर तुम ने मिषनी के नाटको की पानोपना करते हुए मिता है- नाटक का मो नमा स्वाप मम्मीनारायण की योरप से नाए उसमें काम्पत्य का प्रण भरसक मही पाने पाया है।'पत रिचारणीय है कि या रस्तुत मिपनी के नाटकों की परम्पराएं भारत की न होकर योरप की ? पाचार्य मुका पौर सनकी परवर्ती भानोषकों ने उन्हें पारचात्य प्रभाव में पर्यो ऐना? मिमजी के पाहिप का यूपाकम करने स पूष से स्पष्ट कर वेमा समीचीन होया। भारत माँ पापार प्रसारी प्रतिम प्रतिमा मे हिन्दी नाटक को सहर बहने वाली पारा को अपनी राष्ट्रीय एवं सास्कृतिक प्रतियों से एक नपा पोवन प्रदान किया। उनके नाटकों में माप मम पतीत की की म प्रौर परमात-सी प्रवाहित गारी रसारमा एना मे समार को काफी र मनुभूतिमय बना दिया । स्पान की इस मबीन पकाचि से पभिभूत ममार म मिपी के मान पपा पोर पौरिश्तापूर्ण नाटकों को वषित सम्माम मिमना प्रषिक सम्मर भी न था।मारवादी कायपरम विकास कमारों पर राशिसपार को मे पति से प्रवाहित मपार्पपादी पारा गुप्त प्रायनगी पौर रसने मिपनी बीमारमा पर गापरता से विषय में प्राति यथापबादी पारा से समद कर दिया। यह एक सपोप होपा कि पाचार्य पुरम से सिाद पाप्तोर भी इसे विरेपी प्रभार मसत पा पीर प्रषिकाय परपी पातोपण मी पुषनजीवन की पृष्ठभूमि में उसी पीक पर समठे रहे। प्रा मिनी विपया इस प्रचमित पारनाको निमून करने + मिएमसी पापित विस्तापितामों का पूरी मारपरम्परा मरम्बाप सप्टरला समीचीन होगा। पिपीही भाट्पामा की प्रमुप पिपता है समारप्रति मापाता। मारमेपुलाम में ही समाज की मुटियोपोमाटक के माध्यम से रणने का प्रयास रिलीमनाराम राम राम 1 उपसंहार प्रारम्न हो गया था। यपापबादी एव मावशमादी दोनों पारामों के प्रभिलाश माटकों म समायक प्रति मजपता पाई जाती है। नियमान के कई नाटका में ता इस प्रवृति के प्रापिषय के कारण मापत हास भी एपा है। प्रत मिमी की इस प्रतिका इम्मन पार थापा प्रमरम कहना सक सपत नहीं। से पूर्व मिमनी मम्मन और शौकी भांति सामयिक समस्यामोका प्रपन माटों का विषय बनाया। परन्तु हिन्दी-माटमार भारतम्दु-नाम से ही इस पार प्रबन हाका था। भारतन्दु-कात में ये समस्याएँ म्यूम पी बसे बम्या-ममस्या विमा-विवाह-ममस्या मारी-मिमा प्रादि । परन्तु युग-बिनुन र विकास कारा मिपी नाटोंम नोंने समान्द प्रम-4मी मूरम ममम्पापा का अप पारमकर सिया। पत स्म से मृदमरी पोर यह प्रचार स्वाभाविक विकासाबर है गौ मादिक अनुरुप का नहीं। मिपनीमारमा म मान यबायकोबार भी मानावर अषित पर। परम्तु विमान पोर जाप स सद्भुत बौदिषता म ममार का कद ययार्प पी पार सम्मुम होना एस्सामाणिक प्रवृति है। नाटयों में सा और मिपी भी मिलते है । रापामाम दलिना रामा माटकसरी मारिता दमामा परीर स्वाभाविक पम का नियम नरमपन के पारण पर-युग्प मम्मम्पक मुन्धरा स्वीमार बरमती है। माटमार ने इसका नाम भी पहने बिषरा रिवाइमाटर' रगापासी पानापनापणहए गगन मिह निकले है विपना-बबाह नाटर में गा सभापमारी इप्टिकाप रिवाई पड़ता है वह बादमपानार में परम दिया गया है। मपा है कि भारत पौर सुधार इस पुर में पार पपा प्रति भी मेणकापमा होन मप । पर मामारिमारियों से निरसारपीपाति रनमें मपाईपी।" यबाप की भार रामुगतामा गमी प्रवृत्ति मानना ही प्रथिए ममीचीन है। दिणी प्रमावा प्रम उत्सम्म करने पानी प्रमुख प्रनि नामों म म्यानौसिता। यह मिमी नाटकों म तीन पम विद्यमान प्रपन उनका पात्र बुद्धिवाश है इमर उनका समस्या पर पिपार कामे मा दृष्टि बाप बौसिमोर तोगरे उनके संपादोंम बौसि सक- विकीदारना पीन।महाँ उपायों मीसिरिनामाप्रम! "मा ममाहार पपाय बाद पनगरियाबामाकोपरममा मामदिराणि मम्मीनारायण मिम सामाबिमाटा अमीष्ट पा तो पुप मनुरूप बौशिक परिमों का सरम अनिवार्य ही पा। अरिवादी दृष्टिकोण को भी इसन और पोकी मपेक्षा तरकामान युग की प्रवृत्ति रेप में समभमा पपिक मपत है। पापीयन के प्रत्येक पहम् पर यूरिक दृष्टिकोम से विचार परमे का प्रबम पापा पार्यसमाज पारा किया जा पामा वो इन समस्याओं बुद्धिवार में इमाम पोर पोका प्रभाव बना कहा तक मुक्तियुमन होगा। संबारों की तर्कपीमता भी सपार्षबार पौर मुगानु प्रामित शिवार से-दिममें पार्यसमान की मात्रार्प-मति का बियप योग है-प्रभाषित मानी पा सकती है। इसके अतिरिक्त नाटककार के सभी नाटा मीरिकता मिये 1 मई-प्रपाम है। मुक्ति का रहस्य' और 'रामयोप' बारिता-प्रमान नही मिटूर की होनी में मुरामीसाम का मृत्त सर्वपाबौदि कता सम्प है। पत सम्पूर्ण तरिम को प्रभाव में लिखा गया कहना भी प्रथमत है। इसके प्रतिरिक्त धमी की पूष्टि से बिना पौत का मार एक कम एक दृश्य को रसमा ठीन का नाटक मिसायादि पिपताएँ पापात्प पबासरीपारा ममान होमे के कारण उसे प्रभावितकही पाती है। परन्तु एक तो ये बात बहुत परी है और इनका विशेप मालमही मरे इर्ग मी पाश्चात्य परम्परा से उबार माया पया ऐमा पापहपूर महीरा पा सकता पयोंकि ये तो पपागार में सदर विकास के ममग है। एक में एक एस्प रखने की प्रवृत्ति हमें मिमग्री से पुरवियोरीमान गोस्वामी के 'भयक मगरी' माटक में भी मिमती है। यहाँ यह पप्ट कर देना भी मप्रापिषम होगा कि मामीनारायण मिम और पाक नाटकों में कई और इतने स्पट है कि इन मारक सस्प को किसी प्रकार भी योरप से ताया गया मही कहा था ममता । मन पाने सर्कारादिका विरोध किया है पदि मिममी सन्नी मनुपरब पर नाटक रपना में प्रवृत्त होते वो बहसमारीयों के विरोध में ही मारम सिसर्व पौर भारत मस्त ममात्र इसके लिए सामग्री का चपन भी अधिक नुपम होता। परम मित्री ने दी इसके विपरीत सामायिक भादरा प्रतिपादन किया है। इम्मन पोरन समार पौर म्पपित केम्पस्तिरिय का समर्थन यिा। परनु मितीने म्पपित की प्रवृत्ति को पणु प्रवृत्ति बताकर गामा निसारो कोम मियापम का एक प्रमुम मापन बताया है । इस प्रकार रोगों में म्पक्ति पौर ममारहरिमान में समानता प्राय है परन्तु दोनों पिकोनों में पौमिक मेरा मरे पतिसित दोनों की दुपार को परति में भी उपहार मेव है। धान समार में देवारिक माम्ति साने के लिए उपहास को प्रमुख माम्मम बनाया है परन्तु मियरी ने उपहास को इतना अधिक महत्व नहीं दिया। रहॉन पंप रिचार कई और अनुभूति सभी का मापस लेकर अपन रिचारों का प्रतिपादन किया है। इस सब किचन परपाद कहा जा सकता है किसम्मीनारायण मिप की परिस्थितिमा और उनसे उदभूत प्रेरणाएँ मौसिमरनकी परप्प हिन्दी की प्रपमो परम्पराएँ । एमा कहना कि वह नारक पा का भया स्वरूप पाश्चात्य से नाए, उन मात्र पौर दी माटर की मयार्यवादी पारामाब पम्पाय ना होपा । वन पर रखना ही पारपाय प्रभाव मानमा ममीचीन होगा जिवना दिया की पम्प साहिस्पिक धारापों पर एक हिन्दी के प्रग्न माहित्य- कारों पर माना पानापने निरक मस्तित्व का बनाए रखनए इसर *प्रपार पाप करना एक गुम है मित का पाता है। बस इतना ही प्रमावासार नाटककार पर ममम प्रादि मारकासा मामा मामा । म प्रकार हमारे साप मन मारहार मान मने क परमात मक रिपय में प्रचमित प्रम्प कई प्रान्तिया सत स्पष्ट हो जाती है। सभी भार वीयता के प्रति निष्ठाका ममभने में पासोरको को पो भवविशेष दिखाई परवा एका मोमिन होता है। समम मूस्योपन कसे हुए यह कहना किमाने पा की परमरा दो पपनापा परतु मह पूर्वतमा विसरोमो सह विरोधाता। सामाणिक नाटकों से मूस्यांकन का निपर्थ समस्या-प्रपामारा- मिपी के समस्त प्रमान भाटगोमम्पासी' और 'पानी रात'। "सम्मासी में सम्म प्रेम की समस्या का विरोरन काहए उस पर मर्यादित प्रेम मर्यात विमाह की मिटर रिणमाई है। इस प्रम भाषा कारणों में नाटपरा मनमेत पिारदपा महपिया परामा निरि दिया है। और इस पर पाप wि में पुरप की माम वासना पर भी पम्प दिने पए प्रारम्मिहिने कारम लिप-दृष्टि में मारकशिक्षित है। प्रापी गत में समाए प्रेमको समम्मा साप नारीशी जिवाभी सिरिया पमा है।ए पन मम्मारम प्रयोग राष्टिय पुरप में मुगार में इस हानी ! मायानगरपन में भारतीय पोर पापाप नारी- नम्मीमापयम मिपसामाधिक माटक मारों का तुलनात्मक विवचन बोर्षपूर्म मसे पिया गया है। दूसरी समस्या यौन पुछाओं से उसन पश्विमारी साहित्य हे सामायिक मुस्यों की बाट कर स्मादि द्वारा पस साहित्य को जमाकर सिट करता किमयमित पितारा रचित समी मादित्य मिप्या है। पिस्प-पस में माटककार ने कई मये प्रयोग किए हैं जिनमें उसकी प्रतिमा का पाभास झाकता यपपि नाटक म पटिमठा पा गाने के कारण यह इनमें पंरात ही सफल है। विचार प्रपात मारक य नाटक तोन है-'रारामा मन्दिर 'मुक्ति का पस्प' 'रामयोग'रास ममिर' म नाटककार मे प्रापुनिक शिवारी युग की प्रवृत्तियों को प्रतीक बना कर नारीकी समस्या मानटिक पाम्पान किया है। नारी को राधस मानग पौर पबता मम वियराता बताकर उसे व्यक्तिपात उत्पान की पपेक्षा सम्पूर्ण नारी-जाति के उत्पान के लिए प्रेरित किया है। बौशिक दृष्टि से नारी के समापन पा पर पति प्रबन इस नाटक म रासस पोर मानव के परियों २ सर्मन में मारामार की पपूर्व रिचायक रसना का परिचय मिमता है। शिस्प की दृष्टि मे मारक में कई मूनताएं है। एक जटिलता मी पा गई । मुक्ति कास्प' म बीरा में प्रतिसम्ममा नापरिकार पर पपाप को अपनाने पापा है। प्रेम मे रोमाम को मतियता प्रान करने वाली प्रामारेबी पोर रमे पाप्याग्मित परेने पाना उमाकर दोना प्रमफम होता है। पार्ष भूमि पर या होकर अपने पाप को सीधारने मे ही समस्या मुमम्मी पा इसापूसरा प्रतिपाच ।बामनवग्याम परिम-विषम संगाव मभी दृष्टियों से नाटक मफम है। 'राजयोग में मारकहार पगित करता है-सस्प को मत हिपापो छिपाने में बह मानमिक मम्पिाप पाप कर मंगा पारम्पत्ति खरे रिपाम को गेम देसा । मारः म पापा गगराममा पमुनसिंह मारि सभी प्रमुग पार्टी यही ममस्या है। मम्त म ममी प्रपने प्रपराप को सोशर कम है और समस्या मुमम गाती है ।शिपको दृष्टि है नारर सपत है। पटना एबममापाप्रपामारक सिरपी होमी पामपूर्भ इत्त मुगर्गमाम की पपा नामित कर बमना है जिसमें पम-माप-मिगन (Th-ory of reness) बारा मुम्बर माम्यान है। माटामरा परा पार्थों जाग ममस्याओं पर पिए गादक पूर्व विरेचन में समय है। मुम्ब प म सार प्रम विमा-बिमार पौर रापोवारी समस्यामा पर महरा एवं तटस्य पिपषम पिया नपामा - म ४५ उपसंहार अतिरिक्त नाटक के मोण वृत्तों से भी अन्य कई मिसान्तों की सफस व्यंजमा की गई है। मनोरमा पार मनोरकर के प्रत्येक काय को समम रिलताकर मुविवार की सफलता का उदयाप किया गया है। माहिर प्रमी प्रौर मनोर एंकर की प्रन्थि का विषयहर उमके व्यक्तिम्बर प्रवास विकास का चित्रण पिया है । इसके अतिरिपत कानून द्वारा मुरक्षा की समस्या क्या विषबा के जीवन-यापन की समस्या का मो विषम किया है। गित्पनी दृष्टि से भी यह मारक मिपसी सामारिक नाटकों में सर्वश्रेष्ठ है। इतने रहमुखी उपयों और पांच वृचों का रूपानक-विन्यास में बड़ी मुण्मता से यामयस्य किया गया म कौतूहम समता पारि उत्तम कपानक के सभी गुम इसम विद्यमाम परिम-चित्रण में मुरारीमान का चरित्र माटककार को प्रपूष सृष्टि है। पक्तिवारी परिणों में चन्द्रकला के दोहरे प्यक्तित्व का मफम निर्वाह है। संबार में प्रारला प्रतिरिक्त एक निबी मौन्दर्य है। मिरर्पस में सिन्दूर की होमी सामाजिक नाटकों में मोतप्ट गबना है। मिमीना योगरान मिपी ने विपम एवं तो दोनों ही दृष्टियों हिन्दी नाटक यारा को समर पिया प्रत दोनों पा पृथक पृथक विपन करमा ममीचीम है। बस्नुपम पपापबार-यपार्पगार मे ममिप्रायदि यो पद पगोमन है ममान की दृष्टि से रमित है नमका भी उपाय करना। माटरगार मा तटस्प मगन र ममार को राम प्रति बामकरता है। बहसमें पपमा कामत ल मकर ममार का पपक मम्मुम सा कर देता है। मिरी ने य विमप दीप्टिम मामर की बामना-ति, मोम-त्ति पार दूसरे की मितामों में पपमा सार्प मिर करने की दृनि पापा मुन्दर उपाटम स्या है। बामना-तिका रपाटन 'मन्यामी' 'मापी गन' पौर मिन्दर मी होमी' में करते हुए नाटककार ने इसके प पापा परिक्षण पर भी विपरिया है। सोमपी वृत्तिका मुगगेमार पीर यमाय मरम्ममिह के मम्म से प्रमात पिया है। साप का इत्ति का प्रमावरण 'रानस पा मन्दिर में मुनीपरपरिष हारा हुमा है। इस प्रकार माटरकार म पर पदार्प को ममार मुम्नुम रन हुए रमे रिपार परने के मिए प्रबत्त किया है। विवार-प्रेपन-हिमी मारकरे पिम्नरप में ममापिमान + मिसाम्तों समावेशमा प्रेस भी मिपा है। मनाविधाना मिजास है पाराम तस्मीनारायण मिप के सामायिक माटक को छिपाने से पह मानसिक विकास पारम कर मेता है और पवित्र विकास को रोक देता है। इस सियाम्त का निस्पय नाटपकार मे मनोगकर, माहिर पनी परमसिह बरामसिंह पौर पम्पा के माप्यम से यो सुम्पर न से किया है। इन सब पात्रों के मन को प्रेपियों का भैर प्रकट हो पाने पर इनका जीवन सस हो जाता है। इन सिदान्तों को फायर के वासनाओं के एमन के सिवान्त की पृष्ठभूमि में बड़ी सुममता से समझा जा सकता है। 'राक्षस मम्मिा' में नारी-उदबोपन का स्वर भी का प्रमुख है। नारी को अपने जागरण तपा विकास के लिए, अपने ही नहीं सम्पूने मारी-पातिक रवारमिए सक्रिय होने की प्रेरणा है। भीषम की पठिरंजना के शिकार की प्रेरणा भी मुक्ति का इस्म' में बड़े सफन डेम से व्यरित की गई है। प्रेम को रोमांव का सपने मामी पापा देवीपौर उमे प्रमोविएप देने बाता उमाकर दोनों ही परफम रिसाए गए है। पौर पन्त में पापादेवी पोर गपटर के विवाह केरा दोनों पर सम्मुमित यपार्य की विजय रिणाने में माटककार सफल हुमा है। 'राराम के मदिर' में मुनीबर क तरोगपतिवार पोर सिन्दूर की होमी' में चमकमा के वारा प्राठिवा का मी प्राधिक साप स्पष्ट हो गया है। इस प्रकार नाटककार ने प्रकारान्तर सम्पत्तिबार (Indirldmliam) पौर प्रतिकार (Naturalism ) के स्परप से मी पाठमों को परिचित करा रिया है। इस प्रकार नाटककार ने मिन मिन विचारों का रिमपम उपस्थित कर हिन्दी नाटक की समुसता में विशेप पाप रिया है। समस्या-पारसकार भाटों में सपस्पामों का सिम दो मापों से किया है-पंचनाहारा एवं वारा। मना ताप नाटककार में विषया समम्पा म्पाप हारा सुरक्षा की समस्या मममेत रिगाह की समस्या पौरा मिसानी समस्या काविषम किया है। पौर तारा पप्पर मममी ममस्या विषमा विवाह समस्या तपारोपोपचार भी समस्या का विषम लिया गया है। परनारा विपिन समस्याओं में यहाँ एक ही पमा उपपादन हुपा हमहा सहाराविधित समस्यापों में नाटकर समस्या खटस्प पिची पिन में समा हुपा है। पार-मारकार परिषष्टि में मुनापर पौर रपुनाप के माध्यम से पानिए पठिनारी मानवी प्रतियोगमा मुग्दर निस्परिया है।बर परिषों में प्रणब मोरेनरों समाचारों पौर ग्यापापीमा ।
उपसंहार परिपको प्रमाइत परमे का मुख्न प्रयास दिया है। माटों में भय का पायव यवपि प्रषिक नहीं लिया गया तो भी या ता माए पर पंग अपनी प्रसरता कारम बहुप महत्व रखते हैं। शिप कामक-विम्मास की दृषि पे मारकर की रमा का परम विकास सिपुर की होमी में हपा। इस प्रधिक गोपयों को म्यजिव करते हुए सपा पाच गो का निर्वाह करते हुए भी पानक इतना सुनाशि है कि म ही किसी पंचकारिद किया था सकता है और कही उसमें कोई म्यूनता भारती है। पूज्य पार पृय का विसावन भी इस मामता से किया गया है कि कारकीय स्पितिया कादहन मादि का सामाविक रूप से समावेश हु। हिन्दी नाटक में सफम परम के ऐसे इतर नवाइएन कम ही पुष्टिगोर होते परिष- विपकी ष्टि से भी मार कार की गला का परम विकास सिर की होली में पायोम-पिम्पो विपन में चन्द्रकला का परिण मनुपम बना है। रसकी भयामारणता की मनोमानिक पृष्ठभूमि से हुए भारकार ने सपरिणको कही भी सिपित नहीं होने दिया। उसके परिण के दोहरेपन का दुपाटन मौकी धनता से किया गया है। ई-रित्रों में मुरारीमान परित्रकाणि मारपसार की पूर्व विषम पति का परि पाया है।कोम का पाप और मोम का पयामा है पाटम में मारस्कार मानव की सूपम पत्तियों को मुखरित किया। मवार की दृष्टि से मारकारको पूर्व है । प्रत्येक विषय सापारण मता प्रमाधारण बार प्रधान प्रपा बाम सरस प्रपा पोरस मरस प्रया गरिन सभी में सामापिकता एवं एबीयता बनाए रकमे में मारमा स है। मिषयी नारों संगार मानक को पति ने पोर परिपको स्पले मतिरिक्त माटवीयता कारण मिनी सौदर्य भी रनवे मोदरे-पटे पापोंज निम्यास भी प प्रकार है कि उसकी परमता में भी माहिरियर मरिमा प्राण पती है। मीरी बिसे राक्षस रे मन्दिर प्रतीक मी काया पसात प्रयोग पिया पणा है। परन्तु इसमें प्रवीका प्रयोग प्रयोष पनोरम और कामना की हर पप होने के कारण पात्रों में भीषता मी पूरा-पूरा विवाह ममता-न विषापों के पविलित कर्ता की परि माटमार १४१ मदनीनारायण मिश्र के सामाजिक नाटक मै कुछ मीन रसोय भी पिए | गितमें नहीं गा पूर्मतमा सफल पोर नही प्रयत। पानर-विम्यास की दृष्टि से नाटककार ने 'पाधी रात में एक ममीन प्रोग किया है। सम्पूर्ण पान में कार्य एवं गति का पूर्णतया प्रभाव है, प्रत वारा किए गए विपप वोपाटम के प्रतिरिक्त नाटक में कोई पटमा नहीं परती। ऐप सम्पूर्ण कथामक का विग्यास बात पर पाबुत होता है। इसे तो मिषनी के ऐप नाटकों में भी कार्य को मुष्प भाग में रप कर कथानक का विकास हुमा है परन्तु इस माटक संगारों में भी प्रपिकांध भाव सेवातिक तर्ष का है। इससे कपानक में कौतूहल एवं रोषता में कमी पा पाना सामाणिक है परम्नु नाटककार मे बस्तु विम्याम मी मोरना एवं सायों की माटकीयता के कारण इसका कमरों में परिहार किया है। परिण पिषण की दृष्टि से मी नाटककार ने पापी रात में एक मबीन प्रयोग किया है। माय प्रणाम नाटकों में प्रति हिन्दी की मावर्षगारी पारा नाटकों में नाटककार परियों की मोगमा इस दृष्टि से करता किटाक पा माया के साप तारात्म्य हो जाता है। सम प्रापेक गर्म में उसे सहानु भूति होती है मौर वा प्रतिमापक को अपना प्रतिगी बना मेता है। पुग चिन्तन के विकास साप इम पारणा में परिवर्तन एमा पौर यह माना पाने मया कि कोई भी पाप मूम म्प से व या रामप मही सबम एरिया पीर पत्तियां मममा से विधमान ( । रमपी कौन सी प्रवृत्तिमा पथिक सिस हुमा । यह इसी परिस्थितियों एवं परिवग पर निर्मगपत प्रत्येक व्यक्तिक दुप्पमों के गिए सामामि म्यबापा को उत्ताबापी मामा गया। प्टिकोप प्रापार पर माटार प्रत्येक पात्र मा चित्रपस दुपा के गवर गहानुभूविषया। मिती रेप सभी मामाणिक मारकों में परिवनिधन के लिए मी पति का प्रमुगरण पिया गया है। गिरीधनी म मुगरीमाम मा परापी पात्र निगमे मोम पारण सोयापों में योग रिया भी गहानुभूविगम्य महीलानि प्रपति साप साम पिग्म-पारा पा और प्रमित विपास हुमा ! मानक परिव की नरम प्रवृत्तियों का विरपेपग मानुभूति की अपेमा तटस्म दुधि से पिबार हारा रिया गाना परिमारि प्रोमा परि मा ray में गमिया । माटार पारेक पान के परिष मो उमड़े सरपमा पोर एफर्मों पो तटस्पष्टि से पस्तिकाने लगा। परिष चित्रप की म मनाउन मति का परो। मारपसार मे पापी गत में प्रिया है। नाटक रोमो प्रमुग ।
उपहार परिमों-मापारती पौर प्रकाशचन्द्र साप हमें कोई सहानुभूति मही होती पौर म ही कोई मा हानी है। हम उनके परिपके परिवर्तनों को बात दटस्प दृष्टि से विचार करते हैं। परिम-विमान की इस पानिकतम प्रवृत्ति को हिन्दी माटक में उपस्पित करने का पेप पर वी नाटक को है। रित त्रिम में समठमहिकार के पारण चसम्म होने वाली प्रम्पष्टता परिहार मिपमाटमार 'राहसका मदिर और मामी रामे मी का प्रयोग लिया है। ऐसे प्रसंगों में पात्र स्वयं अपने परिपके विषय में प्रतीक बबा के माध्यम से मापा कह देता है। इस प्रकार का बनने में हो एक मोर मूम मतप्रवृत्तियों का सपाटम होता है यहाँ परिव में स्वा- भाषिता भी बनी रहती है । TRE का मन्दिर' में प्रारी एक वेश्या की पहानी के माध्यम से अपनी सारी समस्या दो प्रकारान्तर से पट कर देती है। मामी रात' में मापारी मपन प्रयास की पूजा की तरा पारमहत्या की बात रामापीर रानी की पाके माध्यम से देती है। पापो कामको विकाम में भी सहायता मिमी है। माटककार का यह नवीन प्रयोप दोनों ही मारकों में धाप है। सामारिकता के निधार से 'पापी रात में माटार मेरो समारों को एक साय एक ही समय में दिखाया है। दितीय पंर में मायावती पौर प्रकासन पमा प्रेत मार रापावरब के सबार सार-साप बमठे है। परन्तु इससे प्रसंग में परवा पाने के कारण नाटकदार को इस प्रयोग में सफल नहीं कहा था हिन्दी भारत में स्वगत को पद्धति का प्यापकप से बहिफार सर्वप्रथम एहीं नाटकों में प्रा। यपि प्रसाद पौने नियतप्राय और समाप पारि का प्रस्थामारिया के कारण मीकार किया था तयापि मदत का प्रपोम उम मममम ममी नारकों में मिलता है। वस्तुत स्वमत भस्रामाविक होते हुए श्रीपरिणाम के लिए एक परिणाम सा उपकरण है। मरिना मन की मुम्म पतत्तियों का विशेषण सम्भव महाबोटिन मारप है । इम पस्मा- पारिवाहिकार मे साधारण नाटककार सफल नहीं हो सध्या पर मिपरी ही पपनी अप्रतिम प्रतिभा के कारण सावरे प्रभार में प्रसापारण पटना एवं प्रमापारण परिवारे पापा प्रतगसिप मे गफमाए हैं। मुरारीनान के परिणामपरिहान प्याप मनाम रनको दुधमता का परिवाया है। मानों की प्रधान गप-सी मिपी * योगाम का द्वापर सबसे १४ मम्मीनारायम मिमी सामाफि माटम समस्त प है। सेतो इस काम क गप-क्षेत्र में मिल-मिम्म मिर्यो मा परिपत सप प्रभामित हो चुका था परन्तु माटा रे मेत्र में स्तनी स्वाभाविक सनीय मोर नारकीय मी का प्रयोग इससे पूर्व महमा पा। प्रसार के मारकों में सेमी का परिणत म मिमता है परन्तु उसमें नाटकीयता के गुमपी पूर्ति कामों में काम्पत्त से की गई है। मिममी की मन-मी की प्रमुख निपटा हैमाटकीयठा। प्राय बापय छोटे-छोटे है पौर विपम की पति के अनुसार परस्पर सम्पय। यहाँ बापय नम्मे भी गहमी घनमें मार के प्रवाह पम्प स्पान-स्पान पर स्वाभाविक यति है, जिससे पारय स्वयं स्पष्ट पाता है। इस प्रकार प्रवाह मे कही पिषिमता मही। एमी में स्वामाविक मोमबाम पा गुग होन के कारण पापों में म्यंग्य विमोर ममता धिपता मारि पुणों का सहन समानेपमा है। पर्योक्तियों के प्रयोग मे इसमें विशेप पोग दिया है। सिर की होमी में पापे पृष्ठ हे मी का संबार है परन्तु ही भी ऐसा प्रतीत नहीं होता कि पात्र विचार प्रेपन के लिए मोम रहा है। सुरवईक स्पमी पर मी माटयार पाठयको खने नहीं देता। एक सिटाम्तपरक पापय बिग्यास के प्रवाह को रेपिए- मनोरमा-विरा तरह की । यही तो समाज का भाव है। सभी पौर पुष्प का सम्मिलित बीवन मुम सुख रोगों मा म तो कोई का न समेह पौर नवमासिी भी परिस्थिति में समझौता और पामगस्म । इस प्रकार समान की मिति है। मम्मन है इसमें भी बुराई हो मेखि बीवन निवाम्त ममा का? विषया-विवाह पौर तलाक से दुरायों में से एक को पसम्र कला पड़ेगा नहीं तो दोनों दुराइया वो समार को नियम बापी।" इस प्रकार त-प्रशन पसे नीग्स स्पों पर भी माटरमार ने पूसर को अभिभूत करने भी पैमी के माफ-माप नाटकीयता का प्रपूर्व समाप पिया है। सापारप स्पर्मों पर तो इसका पौर मी परिपतस्प प्टिमोचर होता है। म प्रपार निष्पप-प में पहा बा सपता कि मिपी सामाषिक माटों मे दिली नाट्मशाहिप को विषय एवं मी दोनों दृष्टियों से समय दिया इस योमवान का महत्व और भी बह पाता है पर हम उनकी पूर्वानीन पपार्षबारी बाराकी प्रविकसित मा पापबमोपन करतापमान पर परम्परामों को बग्म रेकर प्रौर परम्परामों को सिसित करणे हिदी माटम को मपामारी पारा दो युम-चिम्तन समामा र सदा मरने म प्रपूर्व पहपीय रिया है।
उपसंहार हिम्को माटक की प्रगति प्रौर मिममी मिममी ने सामारिक नाटो द्वारा म बम हिन्दी साहित्य को समृर ही किया प्रत्युत् परम्परामों का निर्माण कर परवर्ती नाटकों के लिए मार्ग मी प्रस्तुत हिया । परन्तु हिन्दी नाटक के विकास की मा पतिक कारप और उस में भी सामायिक नाटकों को मार हिम्ग माटमारपी पराक मुखता के कारण परम्परा की दृष्टि से इनके योगरान का उचित मूस्यांकन नहीं दिया था सकता । फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि इस नाटकों के प्रनाम समारण परवर्ती सभी पारामा नाटक में 'प्रमाद' मौर री. एम. राम की मानुकता रार्थ मिठा और प्रतिरपना की पेक्षा ययार्यता और ममाविज्ञानको प्रषिक प्रमय मिमा। हिम्नी मारकपारा में विमा-परिबनम का यह प्रेम मिनबी के सामारिष माटकोंको सहर ही दिया जा सकता है। हिन्दी नाटक की यथार्थवादी पारा में मिममी पा स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि इस पारा के प्रपिकांग नाटक स्पूत समस्यापों तक ही सीमित है मो छ इने-पिम नारक मुरुम ममम्मामों को लेकर बने है बम पृथ्वीनाप शर्मा का 'दुविधा उपेन्द्रनाप मकका 'मर्ग की भनक पौर 'छठा बेटा' उपयशकर मट्ट का 'नया समाज' मादि भी बिम्मन की दृष्टि में पक्षात प्रोक नहीं रहेगा सकता बैंमे दो यथार्थवादी और पासवादी पारा के माटपकारों की परम्पर तुनना पवितयुक्त नहीं पोंकि दोनों भागोरी प्रति मनपा निम्न है परन्तु यदि इस प्रकार मा मापद विपा भी गाय ता दोनों पारामा क मापारभूत भेरों को दृष्टि में रबारी किया पाना पाहिए। मादापारी भारा में मिमगीनी तुममा बम प्रसार के मावहीनी गा सपती है। दुतना में प्रपम निरप पतियों रे सामाजिक मूल्य पाहाता ।इस एष्टि मे बोनापौरपमामों को एक की दृष्टि से नहीं रमा गा मरता। एक अतीत की सम्पमतम मांगी प्रस्तुत कर समार गुपों परिणाम लिए रिणा देना है दूसरापमान पौटियों की छानबीन कर उमा सिरान पपी मीमांसा कर रहे पूर करन पी मरमा देता है। एक की पति दिपेमारमर मरेपी निवाग्मक एकोपाधिराम पाशा? मग भूटियों मा परिमारम । दोनों पति पा सपना मिमी महत्व है पर इस दृष्टि स तुलना ममीचीन नहीं। यदि मामाफि मम्म को प्रारमे का पापार मोरप्रियता को माना गय तो निस्म प्रमार जी की पोस दृष्टि से भेट पहा गया । परम्त यह भी स्पष्ट कर देना प्रभामंपिक मही रिमारपार प्रसार रीमारप्रियता में प्रों तक परिप्रसारमा भी - मदमीनारायण मिश्र के सामाबिमाटक योग है। मरा मिरप मनोविज्ञान का है पर्वाद मनोषमानिक दृष्टि से जीवन की पा किसकी पहरी है। इस विषय में भी कोई एफपसीप निपंप नहीं रिया पा समता क्योंकि दोनों ही मपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण परिवार रखते हैं। एक पाणमय स्हरगुप्त देवसेना पैसे महान् पार परियों को मानीय स्परेने में सफर है वो दूसरा मुरारोमात से भष्ट परिपके मानम-प को विस्मृत महीं होने देता। पीसरा मिकप पास्त्रीय है। मा की दृष्टि से मियनी का मानक-मगठन पपिक मुमपर पूर्ण एवं मुनिम्पित है। परिष चित्रा में भी मानव-मम की मूषम पम्त प्रवृत्तियों का उभारन हुमा है मत मिपी को प्रसार पी की तुमला में स्पिी भाति मी मितीय श्रेणी का कसापार महीं कहा जा सकता। पाठ सभी दृपियों विचार करते हुए यही कहना समोबीन है कि दोनों अपने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ । इस प्रकार निप्प-प में बस इतना कह महन कि पावरारी भारा में जो स्पान प्रसार को माप्ती स्थान पार्षमादी पारा में मिमी को प्राप्त है।
सदभ अप-सूची हिम्सी १ प्रमिमर नाटयशास्त्र २ अरस्तू का काम्पशास्त्र ३ भापनिक साहित्य ४ मापुनिक हिम्मी माटक . प्रामुनिक हिन्दी साहित्य का विकास काम्य भौरममाया प्रम्य निबंध काम्मम पं. सीताराम चतुर्वेदी ग.मगेन्द्र नम्दानुसारे वामपयी ग. मयेग ग.पीकृष्णनाम जयशंकर प्रसार गुमाबराय पुसावराय पपसिंह शर्मा 'हममेय पाममुम्दर दास ग. पचनसिंह ८ नाट्य विमए में इनसे मिमा (भाग १) १. परपस्य ११ हिन्दी मारक १२ हिन्दी माटक साहित्य या पानोपनात्मक प्रध्यमन १३ हिन्दी साहिप १४ हिपी साहित्य का इतिहास बेदपास पम्ना बिमम' •यारीप्रसार हिदी रामपशुपम Hudson Williams प्रपती 15 An latroduction to the study of llicrature 16 Drama From Ibsen to Eliot 17 Encyclopaedia Americana 18 Plays Pleasant & Unpleasant 19 Poetry and Drama 20 Quintessence of Ibsealsm 21 The Art of Drama 22 The Aspecus of Modern Drama Bernard Shab TS Ellot Bernard Shah Ronald Peacock Chandler
मामीनारापम मिश्र के सामाजिकमाटर
२१२
23 The Euorpean Theories of Drama
24 The Making of Literature
25 The Trentieth Century Drama
26 Wordsworth Poetry & Prop
27 World Drama
BH.Clark
Soott James
Hodson (L)
Odford
Allardyce Nicolt
मम्मट
मामह
संरहत
२८ काम्प प्रमादा
२६.काम्यानमार
1. पक्तिमीवितम्
११ माट्यशास्त्र
इतक
भरत मुनि
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