Banasthali University

Nasiketopakhyan Bhasha Teeka

2010/03

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Front matter

नासिकेत
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नामुनते हैं
पुण्यवान्
पुण्यवान्
जीमने है
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येशपापनऋषि
जन्मेजयराजा
यमदूत
यमदूत
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पापी
यमदूत
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ना को
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अ०१
और बोले कि हे मुनिश्रेष्ठ । आपको भागमन अच्छो भयो आसनपर बेठिये और हे महाराज। तपोधन
भा०टी०
जा वात्ताक लिये आपको आवना भयाहै ताहि कहिये ॥ १० ॥ उहालकके या वचनको सुनिक पिप्प-
लाद मुनि उनसों बोलत भय ॥ ११ ॥ हे मुनिनमें श्रेष्ट ! आप मरा प्यारो वचन सुनिये. है
स्वागतमुनिशार्दूलविष्टरेचोपविश्यताम् ॥ यदर्थसिहचायातस्तद्वदस्वतपोधन ॥
॥ १०॥उद्दालकवचः श्रुत्वापिप्पलादस्वमब्रवीत् ॥ ११ ॥ श्रूयतांमुनिशाइलम
मवाक्यंचसूनृतम् ॥ अहोतपोमहत्तीवंत्वयातप्तंविदांवर ॥ १२ ॥ परंवनितयाहीनं
संयमेनह्युपस्थितः ॥ तवपाश्र्वेसपत्नीकाऋषयस्तपतिस्थिताः ॥ सपुत्राःसन्तिभो
ब्रह्मपुत्रहीनस्त्वमेवच ॥ १३ ॥
विद्वान्नम श्रेष्ठ । तुमने बडो तीव्र तप किया है ॥ १२ ॥ परंतु वनिता जो स्त्री है ता करि हीन
जे आप है तिनके समीप संयमसो आये हैं और तुम्हारे समीप स्त्रीसमेत ऋप तपमें स्थित हैं और ॥२॥

श्रीगणशाय नमः ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः श्रीगुरुभ्यानमः ॥ अथ नासिकेतोपाख्यानभाषा
टीकापारयः । श्रीकेशवं कशवसंज्ञको विनत्वा रमालालितपादनम् । सरांकुशाख्यं पितरं च नत्वा
श्रीनासिकेतन्य करोमि भाषाम् ॥ १॥ दोहा-नमस्कार नारायणहि, कार नरोत्तमहि
श्रीगणेशाय नमः ॥ अथनासिकेतोपाख्यानप्रारम्भः॥ नारायणनमस्कृत्यनरंचैव
नरोत्तमम् ॥ देवी सरस्वतीव्यासंततोजयमुदीरयेत् ॥ १ ॥ सूत उवाच ॥ गङ्गा
तारेसुखासीन कृतस्त्रानोह्यलंकृतः ॥ दानंदत्त्वाचविधिवद्विजेभ्योजनमेजयः ॥२॥
॥ वंदि गिरा व्यासहि रचत, भापाटीका सोमि ॥ १॥ सूतजी बोले ॥
सूतजी बोले ॥ शि, गंगाके
तीरमें सुखसों बैठे भये और स्नान करिके अलंकार जे गहने आदि हैं तिन करिके
शांभित राजा जनमेजय विधिपूर्वक ब्राह्मणनको दान देश वैशंपायनस बोलत भये ॥ २ ॥

वे सबरे पुत्रन समेत हैं हे ब्रह्मन् । तुमही पुत्रहीन हो ॥ १३ ॥ जाके पुत्र नहीं है वाको घर सुना है और परलोकहूमें वाकी गति नही हाय ताते सबरे जतननसों मनुष्यको पुत्र उत्पन्न करना चाहिये ॥ १४॥ उद्दालक बोले ॥ कि हे मुनिनमें श्रेष्ठ पिप्पलाद ! मोको ब्रह्मचर्यमें रहकर तप अपुत्रस्यगृहंशून्यपरलोकेगतिर्नहि ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेनपुत्रमुत्पादयेन्नरः॥१४॥ । उहालकउवाच॥ ॥ षडशीतिसहस्राणिव्यतीतावत्सराश्चमे ॥ पिप्पलाद मुनिश्रेष्ठब्रह्मचर्ययुतस्यवै ॥ १५ ॥ पिप्पलादउवाच ॥ कायेनमनसावाचानारीणां परिवर्जुनम् ॥ ऋतुसेवांविनास्वस्यब्रह्मचर्यंतदुच्यते ॥ १६ ॥ ऋतुकालाभिगम नवंशस्यैवतुकारणम् ॥ नतेषांपापमस्तीतिपुरास्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ १७ ॥ करते भय छयासी हजार वर्ष बीत चुके हैं ॥ १५॥ पिप्पलाद बोले ॥ कि कायासों मनसों और वचनसों नारीनको त्यागही है परंतु ऋतुधर्मके विना अपनी स्वीमें जो नहीं गमन करनी है वही ब्रह्मचर्य कहो जाम है ॥ १६॥ और ऋतुकालमें गमन करनो वंशके चलनेको कारण है जो या ICE नाक० भान्टी प्रकार गमन कर, उनको दोष नहीं है यह पहले स्वायंभुवने कही है ॥ १७ ॥ उनसों या प्रकार कहिके महामुनि पिप्पलाद उद्दालकको नमस्कार करि अपने आश्रमको जातभये ॥ १८॥ वैशंपा- यन बोले कि उद्दालक उस वचनको सुनिकै दुःखी हो अपने मनमें विचार करत भये कि एवमुक्त्वाततस्तवैपिप्पलादोमहामुनिः ॥ उद्दालकंनमस्कृत्यसमुनिः स्वाश्रमंय यौ ॥ ३८॥ वैशम्पायनउवाच ॥ उद्दालकस्तुतच्छ्रुत्वादुःखसंतप्तमानसः ॥ कया मिकन्यकांकस्माल्लप्स्यामीतिविचिन्तयन् ॥ १९ ॥ पुनरुक्तंतुयास्यामिप्रजापति निवेशनम् ॥ सप्रदास्यतिमेभार्या श्रेष्ठांवंशधरांशुभाम् ॥२०॥ प्रस्थितः सच तत्रैवयत्रदेवःप्रजापतिः ॥ प्रजापतितवोदृष्ट्वाप्रणम्यपुरतः स्थितः ॥ २१ ॥ कहां जाऊँ और कासों कन्या पाऊँ ऐसे चिंता करत भये ॥ १९ ॥ फिरि कहत. कि, प्रजापतिके स्थानको जातो हौं वे मोको श्रेष्ठ वंश चलावनहारी सुन्दर स्त्री देंगे ॥ २० ॥ और जहाँ प्रजापति देव स्थित वहां जात भये और ता पीछे प्रजा.' हैं पतिको दखि नमस्कार करिके उनके आगे स्थित होत भये ॥ २१ ॥ पीछे आये भये उन पुरुषनमें श्रेष्ठ उद्दालक मुनिसों परमेष्ठी यह वचन बोलत भये कि, हे मुनिनमें श्रेष्ट तपोनिधि उद्दालक ! आपको आवनी अच्छो भयो ॥ २२ ॥ और जाके लिये आप यहाँ आय हो वा तमागतंनरव्याघ्रपरमेष्ट्यब्रवीदिदम् ॥ स्वागतंमुनिशार्दूलउद्दालकतपोनिधे ॥ ॥ २२॥ यदर्थमिहचायातः कारणवद्वादस्वनः॥प्रजापतिवचःश्रुत्वाऽब्रवीदुद्दालको सुनिः ॥ २३ ॥ संतानार्थमिहायातोभायाथैचप्रजापते ॥ यथास्थान्ममपुत्रश्चकु लीनावशुभावधूः॥२४॥ कारणको मोसों कही तब प्रजापतिके या वचनको सुनिके उद्दालक मुनि बोलत भये ॥ २३ ।। कि, हे प्रजापति ! संतानके लिये और भार्याक लिये मैं यहाँ आयो हों जैसे मरे पुत्र होय और कुलीन सुन्दर वधू मिलै हे प्रजापति महाराज ! आप एसो उपाय करिये हे प्रभु ! आप

डा०के०
भा०टी०
अ० १
जगत्के उत्पन्न करनेहारे हो ॥ २४ ॥ ब्रह्मा बोले कि, पहले तुम्हारे पुत्र होगंगोता पीछे भार्या होयगी
और तुम्हारे वंशको बढावनहारो पुत्र होयगो ॥ २५॥ और सबरे लक्षणसों पूर्ण रघुवंशकी स्त्री मिलेगी
वा करिके तुम्हारो वंश बढेगा यह मेरो वचन अन्यथा नहीं होयगो ॥ २६॥ हे उद्दालक महामुनि ! आप
तथात्वंकुरुमेतातस्रष्टासिजगतः प्रभो ॥ ब्रह्मोवाच ॥ प्रथमंतवूपुत्रोवैपश्चाद्भार्या
भविष्यति ॥ २५ ॥ भविष्यतिचतेपुत्रोयोसौवंशविवर्द्धनः ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णारघु
वंशस्यसुन्दरी ॥२६॥ तयावदिष्यवेगोत्रममवाक्यंनचान्यथा ॥ गच्छत्वमाश्रमे
विप्रचोदालकमहामुने ॥ २७ ॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेउद्दालकचिन्तानाम
प्रथमोऽध्यायः॥१॥
अपने आश्रमको पधारिये ॥ २७ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृताया-
नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥

वैशंपायन बोले ॥ या वचनको सुार्नकै ता पछि उद्दालक मुनि अंतर्धान हो जात भये और अपने आश्रममें आयक मनमें यह चितवन करत भये ॥ १ ॥ कि मैंने भार्यासों पहले काहूके पुत्र न देख्यो हे सुन्यो न है ब्रह्माने तो झूठीही कही मेरी हांसी कन्हिी है ॥ २ ॥ मेरे केस पुत्र वैशम्पायनउवाच ॥ उद्दालकस्ततोवाक्यंश्रुत्वाप्यंतरधीयत ॥ स्वाश्रमेचागतस्त त्रमनस्येतदचिंतयत् ॥ १ ॥ भार्यायाः प्रथमपुत्रः श्रुतोदृष्टोनकस्यचित्॥ब्रह्मणा तुमषैवोक्तंपारिहास्यंकृतमम ॥ २ ॥ कथममभवेत्पुत्रः कथंभार्यालभाम्यहम् ॥ इतिचिन्तयतस्तस्यमन्मथाकुलितस्यच ॥३॥ उद्दालकस्यचमुनरेवः प्रक्खलितं तदा । तदीर्यपद्मपुटकेक्षिप्तंयत्नेनवैततः॥४॥ होयगो और मैं कैसे भार्या पाऊंगो या प्रकार चिंता करते भये वे उद्दालकमुनि कामसों व्याकुल होत भये ॥ ३ ॥ और वा समय उनको वीर्य स्खलित होते भयो ता पछि मुनीश्वर वा वीर्यको SS नाक० भा०टी० कि तुम या दोनाको ले आमओ ॥ १२ ॥ वाकी आज्ञाते वे सखी का कुशानसों लपेटे भये दोनाको लावत भई तब वह राजकन्या वा दोनाको ले वाकी गंधको सूंघत भई ॥ १३॥ फिरि चंद्रवतीने वा दोनाको गंगाकी धारमें डारि दीन्हो और वह वीर्य सुंघनेहीसों वाके नाभि- तदाज्ञयातयानीतंपुटकंदर्भवेष्टितम् ॥ गृहीत्वाराजकन्यासाघात्वासौगन्धिकंचत त् ॥ १३ ॥ क्षिप्तप्रवाहगंगायाश्चन्द्रवत्यावयापुनः ॥ आघातमात्रंवद्रीयप्रविष्टंना भिमण्डले ॥ १४॥ स्नात्वाचप्रस्थिातासातुसखीभिः परिचारिता ॥ प्रासादेस्वेच्छ यापूर्वक्रीडतिस्मयथासुखम् ॥ १५॥ अज्ञावगर्भस्तस्यासीच्चन्द्रवत्यास्तथाशृणु ॥ मासेतुप्रथमेतस्यामिलितंशुक्रशोणितम् ॥ १६ ॥ मंडलमें प्रविष्ट होजात भयो ॥ १४ ॥ और वह कन्या सखीन समेत स्नान कारक वहांते चलत भई और अपने महल में आयके इच्छापूर्वक सुखसों क्रीडा करन लगाई ३॥ १५॥ और विना aas जानो भयो गर्भ वा चंद्रवतीक भयो सो सुनौ पहले महीनामें वाका रुधर ओर वह गीर्य मिलि जात भयो॥ १६॥ और और दूसरे महीनेमें वाके रोमनकी पांति दीखन लगी और तीसरे महीनेके आवनेषै वाको शरीर बढन लगो ॥ १७ ॥ और ता पीछे चौथे मामें रोमराजितरंगश्चद्वितीयेमासिचाभवत् ॥ तृतीयेमासिसंप्राप्तेशरीरविपुलायते ॥ ॥ १७ ॥ चतुर्थेचततोमासेस्तनंकृष्णमुखंभवेत् ॥ पञ्चमेमासिसंप्राप्तेचोदरंव्यक्तमे वच ॥ १८ ॥ संभूतमुरंदीर्घमासेषष्ठेचसप्तमे ॥ दृष्ट्वाचाप्युदरंकन्याभ्रष्टतेजास्त दाभवत् ॥ १९ ॥ उद्विग्नमानसाजातापतिताशोकसागरे ॥ रुदतीतांततोभीताःपप्र च्छुःकन्यकाकिल ॥ २० ॥ वाके स्तननके मुख श्याम रंगके होजातभये और पॉचमें महीनेके आवनपै पेट दिखाई लगो॥ १८ ॥ छठे तथा सातवें महीनेमें पेटको बढोभयो देख्यो तब वह कन्या तेजसों रहित होजात भई ॥ १९ ॥ उद्विग्न कहिये घबराहटमें है मन जाको ऐसी होजात भई और . २ KI नाक० ॥ ७॥ માં જ अ०२ शोकसमुद्रमें परिगई तब राती भई वा चन्द्रवतीसों वे कन्या भयभीत हो पूँछती भई ॥ २० ॥ हे देवी । तू काहेको रोवे है या रोयवेके कारणको तू यथार्थ कहिदे तब सखीनके या वचनको सुनिक रोवती भई यह वचन बोली ॥ २१ ॥ हे सखियो ! मैं या अद्भुत दुःखको कैसे कहीं किमर्थरोदिषिदेविकथयस्वयथातथम् ॥ सखीनांवचनंश्रुत्वारोदमानाबवीदिदम् ।। ॥ २१ ॥ इदमप्यद्भुतंदुःखंप्रवक्ष्यामिकथंसखि ॥ अयुक्तममवचालिरघुवंशस्यदू षणम् ॥ २२ ॥ सगर्भमुदरंपश्यतेनरोदिमिकिंकार ॥ तस्यास्तद्वचनंश्रुत्वाविह्वला साभवत्तदा ॥ २३ ॥ तहातुकन्यकाःसर्वागताराज्ञीसमीपतः ॥ विज्ञापयंतिक न्यायाःकारणंमहदद्भुतम् ॥ २४॥ हे सखियो । रघुवंशको यह अयोग्य दूषण लग्यो |॥ २२ ॥ हे किंकरी । मैं अपने पेटको गर्भ समंत देखौहों ताते रायरहीहैं वासमय वाके उन वचनको सुनिकै वह किंकरीहू व्याकुल हो जात भई ॥ २३ ॥ तब सव कन्या भिलिकै रानीके समीप जात भई और चन्द्रवतीकन्याके IDR आत अद्भुत कारणका कहत भई ॥ २४ ॥ हे रानी । जो तुम हमको अभयदान करो तो विस्मयों परी भई हम सब आपकी कन्याको अद्भुत वृत्तांत कहैं ॥ २५ ॥ रानी बोली ॥कि हमने तुमको अभय दान कीन्हो तुम यथार्थ कहो वा रानीके या वचनको सुनिके वे कहनेको मोराज्ञिकथयिष्यामः कन्यायावृत्तमद्धतम् ॥ अभयंचेत्प्रदीयेतब्रूमःसर्वसुविस्मि ताः ॥ २५॥ राझ्युवाच ॥ अपयंदत्तमस्माभिः कथयध्वंयथार्थतः ॥ इतितद्वचनं अत्वातावक्तुसुपचक्रमुः ॥ २६ ॥ न्याऊचुः ॥ ॥ अत्यद्भुतंमहादेविनभूतंन श्रुतंकचित् ॥ तच्छृणुत्वविशालाक्षि कन्यायावृत्तमद्भुतम् ॥ २७ ॥ नदेवान चगंधर्वानासुरानचराक्षसाः ॥ तस्यादृष्टिपथेदेविनराणांचैवकाकथा ॥ २८ ॥ आरंभ करत भई ॥ २६ ॥ कन्या बोली ॥ कि हे महादेवी । यह अतिअद्भुत है न कहूँ ऐसो भयो न कहूँ सुन्यो हे सुन्दरनेत्रवाली । तुम वा कन्याके अद्भुत वृत्तांतको सुनो ॥ २७ ॥ हे देवी। वाशे हिटिमागमें न देवता न गंधर्व न असुर और न राक्षस आये हैं और मनुष्यकी नाक० अ० बातही कहां है ॥ २८ ॥ ताहूपे वा कन्याके कुलको दूषण देनहारो गर्भभयो है या प्रकार भा टी० कन्याको अद्भुत वचन सुनिकै ॥ २९ ॥ वह रानी दुःखसों भरिकै मूर्छित हो भूमिमें गिरती भई और कुछ देर पीछे चैतन्य हो उन कन्याको विसर्जन करत भई ॥ ३० ॥ तब रानी तथापितस्याग भूदुहितुः कुलदूषणम्॥ इतितासांकुमारीणांश्रुत्वावचनमद्भुतम् ॥ ॥२९॥ साराज्ञीदुःखसंपन्नामूछितापतिताभुवि ॥क्षणेनलब्धसंज्ञासाताःकन्याविस सर्जह॥३०॥राज्ञःसमीपंसागत्वाराज्ञीवचनमब्रवीत् ॥ राइयुवाच ॥ शृणुप्वेदमहारा जकन्यावृत्तमहाद्भुतम्॥३१॥पुंसःसंसर्गहीनायाः कन्यायागर्भसंभवः ॥ कुलस्यदू षणराजश्यश कीर्तिविनाशकृत् ॥ रघुस्तद्वचनं श्रुत्वासकंपश्चाभवत्क्षणात् ॥३२॥ राजाके पास जायके वचन बोलत भई ॥ रानी बोली ॥ कि हे महाराज । कन्याके महाअद्भुत वृत्तांत सुनिये ॥ ३३ ॥ पुरुपक संप्तर्गसों रहित कन्याके गर्भका संभव है हे राजा । यह गर्भ: ॥ ८॥ ट CRE

कुलको दूषण देनहारो ओर यश तथा कीर्तिको नाश करनहारो हे तव रघु रानकि यह वचन सुानेक
क्षणमात्र कंपयुक्त हातभयो ॥ ३२॥ ता पीछे राजा क्रोधितहोके कहत भयो कि, हाय पापिनी ! तने यह
कहा किया ऐस कहिक लजित हाके कन्याके त्याग करनेकी आज्ञाको देत भयो ॥३३॥ तब रोवतीभई
तत जुद्धो नृपः पापेहाकन्येकिमिदंकृतम् ॥ इत्युक्त्वाज्ञाददौराजामन्यात्यागेवि
लज्जितः ॥ ३३ ॥ रोदमानाचसाकन्याभृत्यैनीतावनप्रति ॥ रथमारोपयित्वा
चनिक्षिप्तानिर्जनेवने ॥ ३४ ॥ एकाकिनीवनेतस्मिन्वयात्रसिंहनिषेविते ॥ विह्वला
भयसंपन्नाकन्याकमललोचना ॥ ३५॥
वा कन्याका संवक रथमें बेठाक वनका लेजात भये और लके सूने बनमें छोडि देतभयं ॥ ३४ ॥ और
व्याघ्र सिंहोकर सेवन कर गय वा वनमें कमलके समान हैं चंचल नेत्र जाके ऐसी अकंली वह कन्या भयसो
भीत होक व्याकुल हो जात भई ॥ ३५ ॥

नाक० ॥९॥ भाटी अ०३ और ऊँचे स्वरसों राय शेयके एसे कहत भई कि, हाय विधाता तुमने यह कहा कियो और झुंडले बिछडी भई हरिणीके समान चारों दिशानकी ओर देख रही हो ॥ ३६॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतन यपंडितकेशवप्रसादशाहवोदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां चंद्रवतीपरित्यागोनामद्विती- रुदंतीतारशब्देनहाविधेकिमिदंकृतम् ॥ वीक्षन्तीचदिशः सर्वा यूथभ्रष्टामृगीयथा ॥ ३६॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेचन्द्रवतीपरित्यागोनामद्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ऋषिरुवाच ॥ कश्चितत्रसमायातः सत्यधर्मपरोमुनिः ॥ कंदमूलफलाकांक्षीतामप त्यत्तु कन्यकाम् ॥ १ ॥ दृष्ट्वातांसुंदरीराजस्तकयंश्चाग्रतः स्थितः ॥ हमयंती भवेत्किस्विच्चित्रलेखातिलोत्तमा ॥ २ ॥ योऽध्यायः ॥ २ ॥ ऋपि बोले ॥ सत्य धर्ममें पर अर्थात् सत्य धर्मही जिनको प्यारो है एसे कोई मुनि कंदमूल और फलनकी चाहनासे वहाँ आवतभयं ओर वा कन्याको देखत भये ॥१॥ हे राजन् । वा सुंदरीका वहाँ दैखिक अपने मनमे तर्कको करते हुए आगे ठाढे होत भये कि यह कहा दमयंती है अथवा चित्रलेखा है अथवा तिलोत्तमा नाम अप्सरा है ॥ २ ॥ उर्वशी है वा मेनका है वा अहल्या है अश्वा रोहिणी है वा यक्षिणीहै कि गंधर्वी है, कि किन्नरी है कि, नागकन्या है ॥ ३ ॥ अथवा कोई श्रेष्ठ उर्वशीमेनकावास्यादहल्यारोहिणीभवेत् ॥ यक्षिणीवापिगंध किन्नरीनागक न्यका-३ ॥ राजकन्याथवाश्रेष्ठाचेतिविस्मयमागतः ॥ शोभतेवनमध्येतुवि शुल्लेखायथाधने ॥ ४॥ कौरागेणशोभंतीविधात्रारचितौशुभौ ॥ नाभिश्चदक्षि णावात्रिक्लीमध्यसंस्थिता ॥ ५ ॥ अत्यद्भुतंचतद्रूपंदृवापोवाचकन्यकाम् ॥ कात्वंकस्यासिरमोरुकिमर्थवनमागता ॥६॥ राजाकी कन्या है ऐसे विस्मयको प्राप्त होत भये यह वनके मध्यमें ऐसे शोभित है जैसे मेघनमें बिजली शोभित होय है ॥ ४॥ विधाता कारकै रचेभये याके सुन्दर हाथ लाल रंगसों शोभाय- पान हैं और याकी नाभि दक्षिणावर्त त्रिवलीके मध्यमें शोभित है ॥ ५ ॥ वाको अति अद्भुत रूप A ना०के० ॥१०॥ भा०टी० अन् देखिकै वा कन्यासों बोलत भये, कि हे रंभारु ! तू कौन है और कौनकी है बनमें काहेको आई है ॥६॥ ऋषिको यह वचन मुनिक वह कन्या बोलत भई हे ऋषि महाराज । कुलको दूषण लगावनहारी जी मैं हौं तासों आप काहेको पूछ हैं न तो मैं सुरी हौं न गंधर्वी हौं न आसुरी हौं ऋषेस्तुवचनं श्रुत्वाकन्योवाचऋषिप्रति ॥ किमर्थटच्छसेविप्रमामत्रकुलदूषणाम् ॥ नाहंसुरीनगंधर्वांनासुरीनचूकिन्नरी ॥७॥ रघोस्तुदुहिताचाहपितामेगर्भदूषणात्॥ त्यक्तवान्निर्जनेऽरण्येरघुमित्रसुव्रत ॥ ८॥ ऋषिरुवाच ॥ अद्यप्रभृतिमेपुत्रीधर्म तस्त्वंशुभानने ॥ गृहीत्वातांततः कन्यामृषिराश्रममागतः ॥९॥ अस्मिन्ममाश्र मेरम्येमुखंतिष्ठनृपात्मजे ॥ उदरववृधेतस्याग सौदिवसैः क्रमात् ॥ १० ॥ और न किन्नरी हौं ॥ ७॥ मैं रघुराजाकी पुत्री हौं मेरे पिताने मोको गर्भके दूषणसों या शून वनमें त्याग कियो है ॥ ८ ॥ ऋषि बोले ॥ हे सुंदर मुखवाली ! आजसों लगाके तू मेरी धर्मकी पुत्री है ता पीछ वा कन्याको लेकै ऋषि अपने आश्रमको आवत भये ॥ ९॥ और ॥. १०४

कहत भये कि, हे राजाकी पुत्री तू या मेरे आश्रममें सुखसों वाप्त कर और दिननके बीतने पैक्रमसों वाके
उरदमें गर्भ वृद्धिको प्राप्त होतभयो ॥ १० ॥ और नवमें महीनामें वाके प्रसूति भई और नासिकाके
अग्रमे होकै वा कन्याके सब लक्षणनकरियुक्त पुरुष उत्पन्न होतभयो ॥ ११ ॥ ज्ञानवान् तथा
मासेतुनवमेतस्याः प्रसूतिरभवन्नृप ॥ नासाग्रेणतुकन्यायाः पुरुषःसर्वलक्षणः ॥
॥ ११ ॥ ज्ञानवान्बुद्धिसंपन्नो बालोसौविनयान्वितः ॥ एतादृशंपालयंतीदुःखा
तासमवर्तत ॥ एकदारण्यमध्येतंरुदंतंसानृपात्मजा ॥ १२ ॥ किमर्थरोदिषित्वमे
पापसम्पर्ककारक ॥ त्वदीयकारणेपुत्रावस्थेयममेहशी ॥ १३॥
बुद्धि और विनय करिकै युक्त वा बालकको पालती भई वह चंद्रवती दुःखित होती भई तब
वह राजपुत्री वनके मध्य में रोवते भये वा बालकको कहत भई ॥ १२ ॥ कि मोको पाप लगावनहारो तू
काहेको रोवे है हे पुत्र । तेरेही कारणसों मेरी यह दशा भई है ॥ १३ ॥

नाक० 1991 भावी अ०६ वंशपायन बील ॥ कि एक वर्ष पूरा होने वा कन्याने एक मंजूपा बनवाई ॥ १४ ॥ और जतनसों लपेटे भये वा पुत्रको वा मंजूपामें स्थापित करिकै वा वनमें गंगाकी पारमें डारि देतभई ॥ १५॥ और वा कन्याने पुत्रके आगे यह वचन कहो कि, मैं नहीं जाना हो कि तेरे या गर्भकी उत्पत्ति ॥ वैशम्पायनउवाच ॥ तयासंवत्सरेपूर्णेमंजूषांतत्रकारिताम् ॥ १४ ॥ तदाभ्यंतर तः पुत्रंयलेनपरीवेष्टितम् ॥ कृत्वातत्रवनोदेशेगंगामध्ये विलिक्षिपत् ॥ १५॥तया वाक्यंचकथितंपुत्रस्याओतुकन्यया॥ नजानामिकथंचिद्वैकुतस्तेगर्भसंभवः ॥१६॥ येनतेगर्भसंभूतिनजातोसिपुत्रक॥ तेनत्वमिलयः सम्यग्यद्यहंदोषवर्जिता॥१७॥ वैशंपायनउवाच ॥ गतोप्रवाहेगङ्गायातरकन्यासुतस्तदा ॥ आगतश्चनदी तारेयत्रतप्यतिवाडवाः ॥ १८ ॥ कहांते भई ॥ १६ ॥ ताते हे पुत्र । तू जाते उत्पन्न भयो है तासों तोका मिलाऊं हौं जो मैं सत्यही दोप करिक वर्जित हौं ॥ १७॥ वैशंपायन बोले ॥ वा समय यह कन्याको पुत्र गंगाकी धारमें बहतो भयो जहां 1931

ब्राह्मण तप करि रहे हैं वहाँ किनारेसों लाग जातभयो ॥ १८॥ उन ब्राह्मणके मध्यमें बड़े योगी उद्दालक
मुनि गंगाकी धारमे आई भई वा मंजूषाको देखत भये ॥ १९ ॥ वा बड़ी मंजूषामें शुभ हैं लक्षण जाके
ऐसे और जैसो पहले कबहूं नहीं देखो ऐसे सुंदर पुत्रको देखिकै विस्मयको प्राप्त होतभये ॥ २० ॥ तब
तेषांमध्येमहायोगीमुनिरुद्दालकस्तथा ॥ आगतंतंप्रवाहेणददर्शमुनिपुङ्गवः॥ १९॥
मञ्जूषायांचविन्यस्तंबालकंशुभलक्षणम् ॥ सुंदरादृष्टपूर्वतुदृष्ट्वाविस्मयमागतः ॥
॥ २० ॥ ध्यानेनज्ञातवान् सर्वस्ववीर्यप्रभवसुतम् ॥ ज्ञात्वाथस्वाश्रमेबालं वास
यामासलालयन् ॥ २१ ॥
ध्यान करिके अपने वीर्यसों उत्पन्न भये पुत्रको जानत भये और जानिकै वा बालकको प्यारसों अपने
आश्रममें राखत भये ॥२१॥

नाक० 11१२॥ भाटी अg 11 और वह बालक उद्दालक मुनिको पिता एसे कहतो और वहाँही अति सुन्दर आश्रममें आनन्दसों सदा रमण करतो ॥ २२ ॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयपण्डितकेशवप्रसादशम- द्विवेदिकृतायांनासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायोपितुः पुत्रापेस्पशन नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ पिततिवदतेबालोमुनिमुद्दालकंप्रति ॥ तत्रैवरमतेनित्यमाश्रमेचातिशोभने ॥२२॥ इति श्रीनासिकेतोपाख्याने पितुः पुत्रोपस्पर्शनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ वैशम्पायनउवाच ॥ रघुवंशोद्भवाकन्यारुदन्तीशोकविह्वला ॥ पुत्रशोकेनसंतप्ता गङ्गातीरेसमागता ॥ १॥ वीक्षन्तीच ततः पुत्रं क्रंदतीशोकविह्वला ॥ रुदन्तीसान दीतीरेप्रयावाव्रतचारिणी ॥२॥ वैशंपायन बोले ॥ रघुवंशमें उत्पन्न कन्या पुत्रके शोकसों व्याकुल हो राती भई गंगाके तीरमें आवत भई ॥१॥ तापछि पुत्रको देखती ओर पुकारतॉ शोकमें व्याकुल हो वह व्रत करनहारी रोवती भई गंगाके तीरमें जात भई ॥ २ ॥ वाने वहां गंगाके तीरमें सुन्दर आश्रम यो ओर वा आश्रममें खेलते भये वा पुत्रको देखत भई ॥ ३ ॥ वा आश्रममें वाके मित्र जे बालक हैं उनके साथमे खेलते भय वा बालकसों मृगके बच्चेकसे हैं नेत्र जाके और प्रसन्न है मुख जाको ऐसी वह कन्या पूछत दृष्टश्चैवाश्रमोरम्योगङ्गातीरेसुशोभनः ॥ पश्यविस्मसुतंवत्रक्रीडमानंतमाश्रमे ॥ ३ ॥ वयस्यैवालकै सार्धक्रीडमानंतमाश्रमे ॥ पप्रच्छमृगशावाक्षीबालकंमु दितानना ॥४॥कस्त्वदीयापितापुत्रकस्यायंचाश्रमाशुभः॥ किनामनस्य विप्रस्य पृच्छाम्येबद्दस्वमे ॥ हर्षितमेमनोभूरिदर्शनात्तवपुत्रक ॥५॥ भई ॥ ४॥ कि हे पुत्र । तुम्हारो पिता कौन है और यह शुभ आश्रम कौनको है और जिनको यह आश्रम उन मुनीश्वरको कहा नाम है यह मैं पूंछो हौं सो तुम मोसों कही हे पुत्रक ! तुम्हारे देखनेसों मेरो ३

न०के०
1980
भा०टी०
सुनिके पुत्र पितामों फिरिके बोलत भयो ॥ १४ ॥ हे पिता ! काम कारक पीछे गंगास्नान-
को गई है तब मुनीश्वर उद्दालक प्रसन्न होके अग्निहोत्र करत भये ॥ १५ ॥ देवकार्य
और पितृकार्य करिकै पुत्रसों बोलत भये कि, हे पुत्र ! तुम मोको अपनी माताको दिखाओ ॥
कृत्वाकर्मततस्तातगङ्गास्नानार्थिनीगता ॥ संहृष्टोसावृषिस्तस्मिन्नग्निहोत्रंचका
रह ॥ १५ ॥ सकृत्वादेवकार्यचपितृकार्यतथैवच । उवाचैनंवतःपुत्रंमातरंदर्श
यस्वमे ॥ १६ ॥ पुत्र उवाच ॥आगच्छस्वाश्रममानराहारतेददाम्यहम् ॥ पिताचै
वाश्रमप्राप्तस्तिष्ठमातर्यथेच्छया ॥ १७ ॥ मातोवाच ॥ अयुक्तंतेवचः पुत्रश्रुतं
वैरोमहर्षणम् ॥ अधर्मयुक्तवाक्यतेनप्रशंसंतिधर्मवित् ॥ १८॥
॥ १६ ॥ पुत्र बोल्यो ॥ हे माता ! अपने आश्रमको आओ तुमको मैं भोजन देउँ पिताह आश्रममें
आय गये हैं हे माता ! अपनी इच्छापूर्वक रहो ॥ १७॥ माता बोली ॥ हे पुत्र ! तेरो वचन अयोग्य
!
॥३॥

है और श्रवण करनेसों निश्चय रोमांच करावनहाते है और अधर्मयुक्त या तुम्हारे वचनकी धर्मके जाननेहारे प्रशंसा नहीं करें हैं ॥ १८ ॥ पिता अथवा भ्राता अथवा माता वा मामा लोकमें कन्या देतेहैं और पुत्र माताका लोकमें दान नही कर हैं ॥ १९ ॥ हे पुत्र ! ताइपे तुम जा स्थानमें पितावाप्यथवाभ्रातामातावाप्यथमातुलः ॥ ददातिकन्यकालोकेनपुत्रोमातरंदे त् ॥ १९ ॥ तथापितत्रगच्छत्वंयत्रपूर्वचविष्ठति ॥ २०॥ ततोनिवृत्तः संहृष्टस्तत्रैव चवराश्रमे॥गतोसौपितृपाश्र्वेतुमात्राप्रोक्तंतदब्रवीत् ॥ २१ ॥ एषामदीयाजननीपि तात्वमृषिपुङ्गव ॥ उद्दालकउवाच ॥ युक्तंसावदतेवाक्यपुत्रमेनिश्चयंशृणु ॥ २२ ॥ पहले हे वहांई जाओ ॥ २० ॥ ता पीछे वह बालक प्रसन्न होकै वाही श्रेष्ठ आश्रमको लौटकरि आवत भयो और पिताके समीप जात भयो और माताको कह्यो भयो वचन पितासों कहत भयो ॥२१॥ यह मेरी माताहै और हे ऋषिनमें श्रेष्ठ) आप मेरे पिता हैं ॥ उद्दालक बोले ॥ वह .

०के० १५॥ आन्टी तुम्हारी माता योग्य वचन कहे, हे पुत्र मेरो निश्चय सुनों मेरो निश्चय सुनों ॥ २२॥ हे पुत्र ! तुम मातासों पूछौ कि, तू कौनके वंशमें उत्पन्न है और मैं तेरो पुत्र कैसे भयो हौं और कैसे यहां आगमन कियो है ॥ ॥ २३ ॥ ऐसे न्यायपूर्वक कहा और सब यथार्थ छो तब वह बालक पिताको वचन मातरंपृच्छपुत्रत्वंकस्यवंशेसमुद्भवा ॥ पुत्रोहंतेकथंजातःकथमागमनंकृतम् ॥२३॥ एवंवदयथान्याय्यं सर्वपृच्छयथार्थतः ॥ सपितुर्वचनं श्रुत्वागत्वापप्रच्छमातरम् ॥ ॥ २४॥ कथयस्वाम्बिकेसत्यंपितात्वांपृच्छतेऽधुना॥ कस्यवंशेसमुत्पन्नाकथंपुत्रो ह्यहंतव ॥ २५ ॥ कथमागमनंयत्रसत्यंब्रूहियथाविधि ॥ मावोवाच ॥ सत्यंशृणु महाप्राज्ञयन्मांत्वंपरिपृच्छसि ॥ २६ ॥ सुनिक मातासों पूछतु भयो ॥ २४ ॥ है. माता ! तू सत्य कह या समय पिता तो- सों पूछे हैं कि 'तू कोनकै वंशमें उत्पन्न है और तेरो पुत्र कैसे ॥ २५ ॥ और यहां आफ्नो कैसे भयो सो सब तू विधिपूर्वक सत्य कह ॥ माता बोली ॥ कि, हे महाप्राज्ञ ! जो तू मोसों पूछे है वाहि सत्य सुन ॥ २६ ॥ पहिले कर्मके अनुयोगसों जो विचेष्टित भयो है वाहि मैं न्यायपूर्वक कहाँहौं एकागमन होके सुन ॥ २७ ॥ तीनों लोकनमें विख्यात रघुनामसों प्रसिद्ध राजा होत भयो ताके वंशमें मैं पार्वतीके समान पुत्री उत्पन्न भई हौं ॥ २८ ॥ धवल घरमें अर्थात् पूर्वकर्मानुयोगेनयत्तुजातंविचेष्टितम् ॥ कथयामियथान्याय्यंशृणुष्वैकाग्रमान मः ॥२७ रघुनर्नाम्नतिविख्यातोराजात्रैलोक्यविश्रुतः ॥ तस्यवंशेसमुत्पन्नापुत्री गिरिसुतायथा ॥ २८॥ धवलागारसंस्थाहंसखीभिः परिवेष्टिता॥ कन्यादशसहस्रे णरममाणासुखेनया ॥ २९॥ ऋतौवसन्तेसंप्राप्तेगङ्गातीरेसुपुष्पिते ॥ विज्ञापितास खीभिश्चगङ्गास्नानार्थिनीगता ॥ ३० ॥ महलमें स्थित में दश हजार कृन्यासों वेष्टित आनन्दसों विहार करती थी ॥ २९ ॥ एक बार वसन्त ऋतुके आने सुन्दर फूलनस शोभायमान गंगाके तटमें सखिनकारक प्रार्थना करी ना०के० ॥१६॥ भान्टी अ०४ गई मैं गङ्गास्नानको जातभई ॥ ॥ ३० ॥ वहां स्नान करती भई मैंने जलके ऊपर बहतो कुशानसों लपेटयो भयो कमलके पातनको दोना देख्यो ॥ ३३ ॥ मैंने सखिनसा लेके वा दोनाको मुध्यो यामें वामेंते वीर्य मेरी नासिकामें चलो जात भयो ॥३२॥हे विप्र! तासों मेरे गर्भ होजात भयो यामें तत्रस्नानंप्रकुर्वत्यामयादृष्टंजलोपरि ॥ संतरबेष्टितंदर्भ पुटकंकमलस्यहि ॥ ३१ ॥ तद्गृहीत्वासखहिस्तादाघातकंमलमया ॥ तस्याभ्यंतरतोवीर्यनासाभ्यंतरतोगतम् ॥ ३२ ॥ संभूतश्चततोविप्रममग नसंशयः ॥ सखीभिर्ज्ञापितोराजाकोपाविष्ट स्ततोरघुः ॥ ३३ ॥ अज्ञानगर्भामांतानोवनेतत्याजनिर्जने ॥ रुदंवीसाह्यहंदृष्टा मुनिनातुफलार्थिना ॥ ३४॥ सन्देह नहीं है ता पछि सखिनकरि जतायो गयो बह रघुराजा बहुतही क्रोधित होत भयो ॥ ३३ ॥ ता पीछे नहीं जानो है गर्भ जाने ऐसी मोको सूने वनमें पिताने छाड़ दियो तब सेवती मोको र फलनके लेबेको आये भये एक मुनि देखत भये ॥ ३४ ॥ और मेरे ऊपर दया करिके मोको अपने आश्रममें लावत भये तब उन मुनिके आश्रममें हे'पुत्र ! तुम उत्पन्न भये ॥३५॥ जाते तुम मेरे बालक नासिकाते उत्पन्न भये ताते उन महात्माने नासिकेत यह नाम राख्यो ॥३६॥ ममोपरिकृपांकृत्वाह्यानीतास्वाश्रमंप्रति ॥ प्रसूताचाश्रमेतस्यभवाआवोसिपुत्र क ॥ ३५॥ नासिकातःसमुत्पन्नोयतस्त्वंममबालकः ॥ नासिकेतेतितेज्ञात्वाना मप्रोक्तं महात्मना ॥ ३६ ॥ ततःसंस्थाप्यपेटायांनिक्षिप्तस्त्वंमयाजले ॥ पुन वियोगदुःखातीवीक्षतीत्वांसमागता ॥ ३७॥ एतदेवमयाप्रोक्तमात्मीयस्थितिका रणम् ॥ ततोगत्वापितुः पावैनासिकेतोन्यवदेयत् ॥ ३८॥ ता पछि मैंने तुमको मंजूषामें धारक गङ्गाके जलमें छोड़ि दियो फिर तुम्हारे बिछुडनेसे दुःखी हो तुमको ढूंढतीभई यहां आई हौं ॥३७॥ यही मैंने अपनी स्थितिको कारण करो ता पीछे नासि

शाके
१९७॥
SHAN
भातील
अ०४
केत पिताके समीप जायकै सब वृत्तांत कहतो भयो । ३८ हे तात ! मेरी माताने जो न्यायके
अनुसार कयाहै ताहि सुनो रघुराजकी पुत्री मैं गङ्गास्नान के लिये आई ॥ ३९ ॥ कुशानसों
लिपट्यो आये भये वा कमलके दोनाको और चामें धरभये वीर्यको देखि यह कहाहै ऐसे कहत
शृणुतातयथान्याय्यंमात्रात्वाभिहितमम ॥ घोराज्ञस्तुदुहितागङ्गास्नानार्थमाग
ता ॥ ३९ ॥ आगतंपद्मपुटकंदर्भेणपरिवष्टितम् ॥ दृष्ट्वापद्मगतंवीर्यकिमेवदितिचान
वीत् ॥ ४० ॥ ततःसातत्समाघ्रायजलेचैवव्यसञ्जयत् ॥ तस्मिन्नेवाघ्रातमात्रेजातं
गर्भस्यधारणम् ॥४॥ तच्छुत्वाकोधमापन्नोराजारचुरुदारधीः ॥ तत्याजकन्यकां
चैववनसिंहादिसेवते ॥ ४२॥
भई ॥४०॥ ता पीछे वह बाहि सूपिके जलमें छोड़ि देत भई वाके सूंघनेहीसों गर्भको धारण
भयो । ४३ ॥ सो मुनिक उदारबाद राजा रघु क्रोधित हो सिंह आदिकन कार सेवन करे गये
॥१७॥

पनमें कन्याको छोडे देत भये ॥ ४२ ॥ याप्रकार अपनो सब वृत्तांत नासिकेतने करो वाको वह वचन सुनिकै ऋषि विस्मयको प्राप्त होत भये ॥४३॥ और कहत भये कि, हे प्रजापति ! तुम्हारे वचन सत्य भयो ऐसे काहिकै वे मुनि फिर वा पुत्रसों बोलत भये ॥ ४४॥ कि हे पुत्र ! तुम एवंसर्वस्ववृत्तांतनासिकेतेनभाषितम् ॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वाऋषिर्विस्मयमागतः ॥ ॥ ४३ ॥ अहोप्रजापतेसत्यंसंभूतंवचनंतव ॥ इत्युक्त्वास्वगतविप्रःपुनःपुत्रंसचा ब्रवीत् ॥४४॥ तिष्ठपुत्रत्वमत्रैवमात्रासहतपोवने ॥ तस्याश्चार्थीगमिष्यामिरचो राज्ञश्चवेश्मनि ॥ ४५ ॥ एवमुक्त्वाततोविप्राकन्यार्थीसमगच्छत ॥ क्रमेणैवततः प्राप्तःशुभंचरघुमंदिरम् ॥ ४६॥ अपनी मातासमेत इहां तपोवनमें रहो और वा तुम्हारी माताके लिये मैं रघुराजाके घर जाउँगो ॥ १५॥ ऐसे कहिके वह विप्र कन्याकी चाहुनासों चलत भयो तापीछे क्रमसों सुन्दर रघुके मंदिरमें प्राप्त होत

नाका
1॥१८॥
भा०टी०
अ०४
भयो ॥४६॥ वह राजा रघु जलते भये आग्रके समान आवते भये ब्राह्मणको देखि आसनते
उठिक अयंपाद्य आदिसों उनका पूजन करत भये ॥ १७ ॥ राजा रघु उनकी प्रदक्षिणा करिक
मधुपर्कसों पूजन करत भये फिर सुखसों बैठेभये उन मुनीश्वरसों वचन बोलत भये ॥ १८॥
सदृश्वाविप्रमायान्तंज्वलन्तमिवपावकम् ॥ उत्थायचायंपाद्याद्यैरर्चयच्चासनाद्र
घुः ॥ ४७.॥ कृत्वाप्रदक्षिणचैवमधुपर्केणचार्चयत् ॥ सुखासीनंचविप्राषिरघुर्वचन
मब्रवीत् ॥ ४८॥ अद्यमेसफलंजन्माद्यमेसफलाः क्रिया ॥ अद्यमेसफलंदानंय
ज्जातंतवदर्शनम् ॥ ४९ ॥ गवांशतसहस्रमेहेमकोटिशतानिच ॥ तुरंगमादिस
मेराज्यंतुभ्यनिवदितम् ॥ ५० ॥
आज मेरो जन्म सफल भयो और आज मेरी क्रिया सफल भई और आज मेरो दान
जो आपको दर्शन भयो॥ १९ ॥शत सहस्र कहिये एक लाख गौ और सौ करोड सुवर्ण और
सफल
भय
1॥१८॥

घोडों आदि समेत सब राज्य आपको मैंने निवेदन कियो अर्थात् सब आपको भेंट कियो ॥ ५० ॥ उद्दालक बोले ॥ मैं घोडे आदि और सुवर्णके सौ करोड तथा राज्य नहीं चाहही एक कन्या मांगों हौं.॥५१॥ रघु बोले ॥ कि हे विप्र ! मैं तुमको राज्य देऊँहौं कन्या मेरे नहीं है पहले उद्दालकउवाच ॥ ॥ नाहन्तुरङ्गमादीनिहेमकोटिशतानिच ॥ राज्यनेच्छामिराजे न्द्रकन्यामेकामहवणे॥५१॥ ॥रघुरुवाच ॥ ॥राज्यंददामितेविप्रकन्याममनविद्य ते ॥ कन्यैकामेपुरायासीत्सामृतामुनिसत्तम ॥५२॥ उद्दालकउवाच ॥ नसामृता तुकन्यातेममतिष्ठतिचाश्रमे।मातादेहिराजेन्द्रसत्यधर्मपरायण॥५३॥रघुरुवाच॥ आश्रमेतुकथंकन्यात्वदीयेविप्रतिष्ठति॥ कौतूहलमिदंमन्येकथयस्वयथार्थतः॥५४॥ मेरे एक कन्या थी हे मुनिश्रेष्ठ ! वह मरिगई ॥ ५२ ॥ उद्दालक बोले ॥ वह तुम्हारी कन्या मरी नहीं है मेरे आश्रममें स्थित है हे सत्यधर्ममें तत्पर राजा ! तुम वा कन्याको हम दान करो ॥ ५३ ॥ रघु बोले ॥ हे विप्र ! वह कन्या आपके आश्रममें कैसे स्थित है मैं याको बडो ISid ४

जो
वचन
कहो
हो
वह
देवके
संयोगों
पूरो
भयो
और
वाको
सुर
तथा
असुरहू
निवारण
नहीं
लाका
28१९॥
भान्टी
वहां
अ०४
कौतूहल मानो हौं हे विष। यथार्थ कहौ ॥ ५ ॥ ऋषि बोले ॥ पहले प्रजापतिने मेरे लिये
करिसके हैं ॥ ५५ ॥ मैं वंशकी स्थितिके लिये पद्मभू जे ब्रह्मा हैं तिनके समीप गयो हो
ऋषिरुवाच ॥ ॥ प्रजानांपतिनावाक्यपुरायन्मेनियोजितम् ॥ निर्मितंदैवसंयोगा
हुरिंतत्सुरासुरैः॥ ५५॥ वंशस्थितेःकारणायगतोहूंयत्रपद्मभूः ॥ गत्वातत्रमया
राजनभायर्यावंशविवार्बिनी ॥५६ ॥ प्रार्थिताराजशार्दूलसूर्यवंशसमुद्भवा ॥ तेनोक्तं
प्रथमपुत्रः पश्चाद्भाभिविष्यति ॥ ५७ ॥ तवमार्याचविप्रेन्द्ररघुवंशसमुद्भवा ॥
एवमुक्त्वाततोब्रह्माक्षणेनांवरधीयत ॥ ५८ ॥
जायक हे राजा । मैंने वेशको बढावनहारी भायां मांगी ॥ ५६ ॥ हे राजानमें श्रेष्ठ ! तब ब्रह्मान
मोसों कह्यो कि, पहले तुम्हारे पुत्र होयगो और पीछे सूर्यक वंशमें उत्पन्न भायी होयगी ॥ १७ ॥
विप्रेन्द्र । सूर्यवंशमें उत्पन्न तुम्हारी भार्या होयगी ऐसे कहिक ब्रह्मा वहाई अंतधान हो जात
thc.
॥१९॥

भयो ॥ ५८ ॥ हे राजा । ता पीछे चिंतायुक्त होकै मैं आश्रममें आवत भयो कि मरे पहले पुत्र कैसे होयगो और पीछे भार्या होयगी ॥ ५९॥ वनमें तप करत भयो जो मैं हौं ताके वीर्यको त्याग भयो ॥ ६० ॥ वह वीर्य मैंने कमलके दोनामें यत्नसों स्थापित कियो फिर वाको कुशा- ततोहमाश्रमेराजनागतश्चितयान्वितः ॥ कथंमेप्रथमपुत्रोभायर्यापश्चाद्भविष्यति ॥ ॥ ५९ ॥ तप्यमानेचतपसिरेतरस्कनंबभूवह ॥६०॥ तन्मयापमपुटकेवीर्यक्षिप्तंप्र यत्नतः ॥ कुशैश्चवेष्टयित्वातुगङ्गामध्येविसर्जितम् ॥ ६३ ॥ तवस्तेकन्यकाराज गङ्गास्नानार्थमागता ॥ तदाघ्रायच्युतंसम्यगूगङ्गामध्येसमागतम् ॥६२॥ तेनैव गर्भसम्भूतिर्ममवीर्यान्नसंशयः॥ नासाग्रेणतुनिष्क्रान्तोनासिकेतइतिश्रुतः॥ ६३ ॥ सनसों लपेटिकै गङ्गाके मध्यमें छोडदियो ॥ ६१ ॥ हे राजन् ! ता पीछे वह कन्या गंगास्नान- को आवत भई तब गंगामें आये भये वीर्यको सूंघत भई ॥ ६२ ॥ वाही मेरे वीर्यसो गर्भकी उत्पत्ति भई यामें संदेह नहीं है नासिकेत नामसों प्रसिद्ध यह पुत्र नासिकाके अग्रमें होके निकरयो

ना के
Fher
॥२०॥
भा०सी०
अ०
॥
याहीते याको नासिकेत नाम भयो है ॥ ६३ ॥ वैशंपायन बोले ॥ ता पीछे बडे विस्मयको
प्राप्त हो वह रघुराजा रनवासमें जात भयो ता पीछे राजा उस वृत्तांतको रानीसों कहत भयो ॥ ६४ ॥
फिर राजा सभामें आयकै मुनिसों वचन बोलत भयो॥ रघु बोले ॥ कि, हे विष ! मैं तुमको
वैशम्पायनउवाच॥ ततोविस्मयमापन्नोरघुरंतःपुरेऽवजत् ॥ तवृत्तान्तंतवोराजा
स्वमहिष्यैन्यवेदयत्॥६४॥राजासभांसमागत्यमुनिवचनमब्रवीत् ॥ रघुरुवाच ॥
कन्यांददामितेविप्रगणुमेपरमवचः ॥ ६५ ॥ रथेशुभतरेरम्येस्थित्वागच्छस्वमा
श्रमम् ॥ ममानुजीविभिर्युक्तासानयस्वसुतांमम ॥ ६६ ॥ एवमुक्तस्ववतेनतथै
वहिचकारसः ॥ आनीताचतदाकन्यासपुत्रारथसंस्थिता ॥ ६७॥
कन्या देता हौं मेरे परम वचन सुनो ॥ ६५ ॥ बहुत अच्छे सुंदर रथमें बैठिक अपने आश्रमको आप
जाय और मेरे नौकरन समेत मेरी बेटीको ले आओ ॥ ६६ ॥ वा राजा कार ऐसे कहे गये वे
॥२०॥

. ऋषि वैसाही करत भये वा समय पुत्रसमेत रथमें बैठायकै वा कन्याको लावत भये॥ ६७ ॥ । तब राजाने प्रसन्न हो भक्तिकी बढावनहारी ऐसी जो वह कन्या है ताको दान कियो ता पीछे व्याह कारकै राजाने पुत्रहू उनके अर्थ निवेदन कियो ॥ ६८ ॥ और दास दासी मोतीनके गहने दत्ताकन्यातदाराज्ञाप्रोत्फुल्लाभक्तिवर्द्धिनी ॥ विवाह्यचततोराज्ञापुत्रैस्तस्मैनि वेदितः ॥ ६८ ॥ दासान्दासीर्धनधान्यमुक्ताभरणकुण्डले ॥ हारग्रैवैयकेयूराना नामाणिक्यसंयुतान् ॥ ६९ ॥ रथानगजानुहयान्वस्त्रमहिषीगोधनानिच राजा रघुरदात्सर्वदुहित्रेस्नेहसंयुतः ॥ ७० ॥ ॥ वैशम्पायनउवाच ॥ ततोवजन्वनंवि प्रोराजानं विनयान्वितम् ॥ धनंनानाविधंदृष्ट्वामुनिर्वचनमब्रवीत् ॥ ७१ ॥ और कुण्डल तथा हार गुलूबन्दु ओर बाजूबंद जिनमें नानाप्रकारकी मणी जडी भई हैं ये सब उन ऋषिको देतभये ॥६९॥ और स्थ, हाथी घोडे वस्त्र भैंसें और गऊनके समूह इन सब वस्तुनको राजा रघु अति प्रीति युक्त हो वा चन्द्रवती कन्याको देत भये ॥ ७० ॥ वैशंपायन बोले ॥ ता पीछे

ना के०
॥ २१ ॥
भान्टी
वनको जाते भये के उद्दालक द्विज नानाप्रकारके धन देखिकै नम्रतायुक्त जो राजा है तासों वचन
बोलत भये ॥ ७१ ॥ हे सुव्रत राजा । या बहूतसे धनको मैं कहा करौं यह सब भांति आपहीके
घरमें रहै ॥ ७२ ॥ ऐसे कहिकै सब राज्य राजाको देके तपोवनको जात भये और स्त्रीपुत्र
किंकरोम्यहमेतेनधनेनविपुलेनच ॥ तवैवसर्वथाराजनगृहेतिष्ठतुसुव्रत ॥ ७२ ॥
इत्युक्त्वाराज्यमखिलंप्रतार्यागात्तपोवनम् ॥ प्रविष्टःस्वाश्रमेविप्रःसपुत्रः सकलत्र
कः ॥ ७३ ॥ रेमेतयाचन्द्रवत्याततउद्दालकोमुनिः ॥ नासिकेतःसुतोभक्तोगङ्गाती
रेसुखान्वितः ॥ ७४ ॥ विजहारमुदायुक्तोवयस्यैर्वालकैर्वतः ॥ एकदातंनिजंपुत्रं
शशापचपितारुषा ॥ ततःसंयमनींगत्वातथैवपुनराययौ ॥ ७५ ॥
समेत अपने आश्रममें प्रवेश करत भये ।। ७३ ॥ तापीछे उद्दालक मुनि वा चंद्रवतीके साथ
विहार करत भये और बडो भक्त नासिकेतनाम पुत्र गंगाके तीरमें सुखसों रहत भयो । ७४ ॥
और मित्र जे बालक हैं तिनके साथमें आनंदसों विहार करत भयो एकबार क्रोध करिके
॥२१॥

पिता वा अपने पुत्रको शाप देत भये ता पीछे संयमनी जो यमराजकी पुरी है तामें जायके वैसेही फिर वह आवत भयो ॥ ७९ ॥ पुराण स्थित रम्य और पवित्र इस इतिहास कथाको कहै और जो सुने वह सब पापनते छूटि जाय ॥ ७६ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपंडितकेशवः इतिहासकथारम्यांपुण्यांपौराणिकींशुभाम् ॥ कथयेच्छृणुयायश्चसर्वपापैःप्रमुच्य ते ॥७६॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेचन्द्रवतीविवाहवर्णनंनामचतुर्थोध्यायः ॥४॥ जनमेजयउवाच॥ एतत्ष्टच्छाम्यहविप्रसंशयमेापानुद ॥दुर्लभपुत्रनामापिमनुष्या णांतपोनिधे॥१॥ किमर्थदत्तवाशापंपुत्रमुद्दिश्यसुव्रत ॥ कथंयमपुरींप्राप्तःक थचागतवानपुनः॥२॥ प्रसादशमद्विवेदिकृतायांनासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां चंद्रवतीविवाहोनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ॥ जनमेजय बोले ॥ हे विप्र । मैं तुमसों यह पूछोंहों आप मेरे संदेहको दूरि करो हे तपो- निधि । लोकमें पुत्रको नामहू मनुष्यनको दुर्लभ ॥१॥हे सुवत । उद्दालक ऋषि काहेके .

॥२२॥
UN
भा०टी०
अ०५
TA
ना के लिये पुत्रको शाप देतभये और वह कैसे यमकी पुरीको गयो और फिर कैसे आय गयो ॥ २॥
वैशंपायन बोले ॥ हे राजन्! पहलेको वृत्तांत जैसे शाप दियो गयो और जैसे प्रसन्न नासिकेत
पिता करिकै यमके लोकको पठाये गये ॥ ३॥ और फिर कर आगये सो सब तुमसों कहोंगो
शृणुराजन्पुरावृत्तंयथाशापोनियोजितः॥ पित्रावैप्रेषितोगत्वाहर्षितोयमसादने ॥
॥ ३ ॥ आगतःपुनरेवाथवत्सर्वकथयामिते ॥ उद्दालकोमुनिवरः सुव्रतंपुत्रमेक
दा ॥ ४ ॥ उवाचपुत्रगच्छेतिवशीघ्रंसमानय समित्कुशफलानीतिह्यग्निहोत्रय
थाभवेत् ॥ ५ ॥ इतिश्रुत्वापितुर्वाक्यंनासिकेतोवनंप्रति ॥ जगामतत्रसमुनियंत्रा
स्तेशोभनंसरः ॥६॥
एकबार मुनिवर उद्दालक सुव्रत पुत्रसों कहत भये ॥४॥ कि, हे पुत्र ! वनको जाओ और
समिधे कुशा तथा पत्ते शीघ्रही लाओ जासों आग्निहोत्र होय ॥ ५ ॥ यह पिताको वचन सुनिके
॥२२॥

नासिकेत मुनि वहाँ जातभये जहाँ एक सुंदर सरोवर हो ॥ ६ ॥ नानाप्रकारके वृक्ष लतानसे भरे भये और फलमूलनसोंयुक्त तथा नानाप्रकारके पक्षीन करि सेवन कियो गयो ऐसे वनको देखतभयो ॥ ७ ॥ नानाप्रकारके कमलनसों शोभायमान जो सुंदर सरोवर है तामें विधि- दृटवारण्यंशुभंरम्यंनानाद्रुमलताकुलम् ॥ फलमूलयुतंचैवनानापक्षिनिषेवितम् ॥७॥ शुभेसरोवरेतत्रविविधोत्पलमाण्डते ॥ स्नानंकृत्वातुतत्रैवविधिदृष्टेनकर्मणा ॥ ८॥ देवार्चनंकृतंतेनदिव्यपुष्पैश्चनीरजैः ॥ नैवेद्यफलमूलाधैर्देवतापितृतर्पणैः॥९॥योग मालभ्यतत्रैवधारणाध्यानकर्मणा ॥ देवार्चनंचयोगचनित्यंसंपाद्ययत्नतः ॥ १०॥ पूर्वक स्नान आदि कर्म करत भयो॥ ८ ॥ और वहां नासिकेतने सुंदर दिव्यकमलनसों देवतानको पूजन कियो और देवता तथा पितरनको तर्पण कारकै फलमूल आदिकी नैवेद्य करी ॥९॥ और धारणा तथा ध्यानकर्मसों वहॉई योगको आरंभ करि देवतानको पूजन और ना के than ॥२३॥ भावी MAA योगको जतनसों सदा करतो भयो ॥ ३० ॥ और शोचन लगो कि, मेरे पिताके अग्निहोत्रमें मेरो कियो भयो विघ्न उत्पन्न भयो है ऐसे मनमें निश्चय कारकै पिताके आश्रमको आवत भयो ॥ ११॥ ता पीछे उद्दालक मुनि देरमें आये भये पुत्रको देखि क्रोधसों लाल हैं नेत्र जिनके ऐसे पितुर्मेविनमुत्पन्नमग्निहोत्रेतुमत्कृतम् ॥ इतिनिश्चित्यमनसापितुराश्रममागमत् ॥ ॥ ११ ॥ ततउद्दालकःक्रुद्धोदृश्वापुत्रंचिरागतम् ॥ उवाचक्रोधताम्राक्षोह्यग्निहोत्रवि घातकम् ॥ १२ ॥ किंतत्रफलमूलार्थचिरंगत्वावनान्तरे ॥ स्थितंत्वयामदभाग्य यज्ञेविनः कृतोमम ॥ १३ ॥ अग्निहोत्रेणतृप्यतिब्रह्माद्यादेवतागणाः ॥ तथापितृग णाः सर्वैतेषांविघ्नः कृतस्त्वया ॥ १४ ॥ अग्निहोत्रमें विघ्न करनहारे वा पुत्रसों बोलत भये ॥ ॥ दूसरे वनमें फल मूल आदि लेने जायकै बहुत देरलौं काहेको ठहरो रे मंदभाग्य ! तैंने हमारे अग्निनहोत्रमें विघ्न कियो ॥ १३॥ अग्निहोत्रसों ब्रह्मा आदि देवतानके गण तृप्त होय हैं तैसे पितृगणहू सब तृप्त होय १२ ॥२३॥ हैं १४ पार करनहारो उनको तैने विघ्न कीन्हों ॥ ॥ पिताके वा वचनको सुनिक वह तपस्वी फिर बोलत भयो ॥ १५॥ कि. हे तात । यह अग्निहोत्र संसारका बंधन है और संसारमें परेभये जीवनको जन्म और महामोह निश्चय होय है ॥ १६ ॥ योगाभ्यासते परे संसारसमुद्रते पितुस्तद्वचनं श्रुत्वाप्रत्युवाचसतापसः ॥ १५॥ अग्निहोत्रमिदंतातसंसारस्यतुबन्ध नम् ॥ जन्ममृत्युमहामोहाः संसारेपततांध्रुवम् ॥१६॥ योगाभ्यासात्परंनास्तिसं साराणवतारणम् ॥ ब्रह्माद्यादेवताः सर्वेइन्द्रायाःकश्यपात्मजाः॥सर्वंयोगवशासि द्वागतास्ते परमां गतिम् ॥ १७ ॥ उद्दालक उवाच ॥ सर्वाश्रमेषु भो पुत्र ये चान्येतपसिस्थिताः॥ अग्निहोत्रमुपासन्तेस्वर्गलोकायसुव्रत ॥ १८॥ और कुछ नहीं है ब्रह्मा आदिक सब देवता और इंद्र आदिक सब कश्यपके पुत्र ये सब योगके वशसों सिद्ध भये और वे परम गतिको प्राप्त भये ॥ १७॥ उद्दालक बोले ॥ हे पुत्र ! सब आश्रमनमें स्थित तथा जे कोई तपमें स्थित हैं हे सुव्रत । वे स्वर्गलोकके लिये अग्निहोत्रकी उपा

नाके.
॥२४॥
भाटी
अ०५
सना करें हैं ॥ १८॥ नासिकेत बोल ॥ स्वर्गमें जायकै संसारमें निश्चय कार . फिर . जन्म होयह
योगाभ्याससे परे कुछ नहीं है और न भयो न होयगा ॥ १९ ॥ हे प्रभो । अग्निहोत्र न करनो
चाहिये योगाभ्यास करौ ॥ २० ॥ वैशंपायन बोले । उद्दालक वाको सुनिकै अपने पुत्रपर क्रोधित
नासिकेतउवाच ॥ स्वर्ग गत्वा पुनर्जन्म संसारे भवतिध्रुवम् ॥ योगाभ्यासात्प
रंनास्तिनभूतोलभविष्यति ॥ १९ ॥ नकार्यमग्निहोत्रंतुयोगाभ्यासंकुरुप्रभो ॥
॥ २०॥ वैशम्पायनउवाच॥ उद्दालकस्तुतच्छ्रुत्वाक्रुद्धःसंस्तनयंप्रति। उवाचग
च्छशीघ्रत्वंयमंपश्यसुताधम ॥ २१ ॥ ततःशापेनरौद्रेणपतितोधरणीतले ॥
प्रणाममितिप्रत्युक्त्वानासिकेतोमहात्मवान् ॥ २२ ॥
होत भये और बोले कि, हे अधम पुत्र! तू शीघ्र जा और यमराजको देख ॥२१॥ ता पीछे या भयानक
शापसो पृथिवीमें गिरत भयो और प्रणाम है अर्थात् मैंने आपको शाप अंगीकार कियो ऐसे वह महात्मा
॥२४॥

नासिकेत प्रत्युत्तर दुत भयो ॥ २२ ॥ हे महाराज ! जहां वेवस्वत कहिये सूर्यके पुत्र यमकी स्थिति है वाको मैं आपकी आज्ञासों देखोगो तब पुत्रको पतित देखिके ऋषि बहुतही व्याकुल होतभये ॥ २३ ॥ बड़े शोकसों संतप्त हो बहुतही विलाप करत भये और हा पुत्र । हा श्रेष्ट शिशु । वैवस्वतस्थितियंत्रपश्याम्येवतवाज्ञया ॥ पतितपुत्रकदृष्ट्वाऋषिर्जातोतिविह्वलः ॥ ॥२३॥ महाशोकेनसंततोविललापातिदुःखितः ॥ हापुत्रहावरशिशोहाज्ञानि न्हासुबुद्धिमन् ॥२४॥ अहंपापीदुराचारीयाँक्रोधीद्विजाधमः ॥ यत्रवैवस्वतोरा जादारुणानरकास्तथा ॥ २५ ॥ तत्रत्वयानगंवव्यंप्रायश्चित्तंविमर्शय ॥ एवंविल प्यमानतपुत्रः पुनरभाषत ॥ २६ ॥ हा ज्ञानी । हा अच्छी बुद्धिवाले ! ॥ २४ ॥ में पापी हौं दुराचारी हौं क्रोधी हौं और ब्राह्मणमें अधम हौं जहां वैवस्तराजा हैं और दारुण नरक है ॥ २५ ॥ वहां तुमको न जानो चाहिये प्रायश्चि- - ५

नाका
॥२५॥
भाटी
तको विचार करो या प्रकार विलाप करते भये मुनिसों पुत्र फिर बोलत भयो ।॥ २६ ॥ जाते मेरे
तुम्हारो नमस्कार है हे अनघ ! जो वचन तुमने कहो वाको में सत्य करोंगो कबहूँ अन्यथा न
होयगो ॥ २७ ॥ मैं आपकी आज्ञा करौंगो हे महामति । ऐसे मात कही सत्यसों सूर्य तपे है और
यतस्तेमेनमस्कारोयत्त्वयोक्तंवचोनघ ॥ तत्सत्यंचकरिष्यामिनान्यथास्यात्कदा
चन ॥२७॥आज्ञातवकरिष्यामिमैवंदमहामते ॥ सत्येनतपतेसूर्यः सत्येनपृथि
वीस्थिता ॥२८॥ सत्येनज्वलतेवह्निःसर्वसत्येप्रतिष्टितम् ॥ अश्वमेधसहस्रवैसत्येन
तुलयेन्नहि ॥२९॥ सत्येनगम्यतेस्वर्गःसत्येनपरमांगतिम् ॥ सत्यधर्मविहीनस्यनर
केपतनंध्रुवम् ॥ ३० ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेनशोकंत्यक्त्वास्थिरोभव ॥ ३१ ॥
सत्यस पृथिवी स्थित है ॥२८॥ सत्यसों अग्नि जलै है सब सत्यहीमें प्रतिष्ठित है हजार अश्वमेध यज्ञहू
सत्यके साथ नहीं तुलैं हैं ॥ २९ ॥ सत्यसों स्वर्गमें जाय हैं और सत्यसे परमगति कहिये मोक्ष
होय है और जो धर्मसों विहीन है वाको निश्चय नरकमें पतन होयहै ॥ ३० ॥ ताते सब यत्ननसों
॥२५॥

शोकको त्याग कारकै स्थिर होजाओ ॥ ३१ ॥ शीघ्रही यमके पुरको और धर्मराजके मंदिरको देखि शीघ्रही आपके चरणनमें आऊँगो ॥ ३२ ॥ वैशंपायन बोले ॥ पहले पिताके चरणको नम स्कार करि फिरि स्वयंभू जे ब्रह्मा हैं तिनको प्रणाम करि विनीत है आत्मा जाको ऐसो नासिकेत दृश्चायमपुरंसद्योधर्मराजस्यमंदिरम्॥शीघंचैवागमिष्यामितवपादसमीपतः ॥३२॥ वैशम्पायनउवाच॥॥पितृपादौप्रणम्यादौनमस्कृत्वास्वयंभुवे ॥ नासिकेतीविनीता त्माक्षणेनांतरधीयत॥३३॥तस्यसर्वप्रयत्नेनशापमेवप्रलापयन्॥ संप्राप्तोवायुवेगेन यत्रूराजास्वयंयमः॥३४॥दर्शधर्मराजानंज्वलंतमिवपावकम्॥ सिंहासनसमारूढं सूर्यपुत्रंमहाबलम्॥३५॥इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेयमदर्शनंनामपंचमोऽध्यायः५॥ क्षणहीमें अंतर्धान होजातभयो ॥ ३३ ॥ सब जतनसों पिताके शापको सत्य करतो भयो वह नासिकेत पक्नके वेगमों जहां यमराज है वहाँ प्राप्त होत भयो ॥ ३४ ॥ और अग्निके समान

ना के
॥२६॥
भान्टी
अब
प्रकाशमान सिंहासनपर बैठेभये ऐसे महाबली सूर्यके पुत्र जे यमराज हैं तिनको देखत भयो
॥ ३९ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्या-
नभाषाटीकायां यमदर्शनो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ वैशंपायन बोले ॥ विद्या और विनयसों
वैशम्पायन उवाच॥प्रविष्टस्तुसभामध्ये विद्याविनयभूषितः॥तेनस्तोत्रंसमारब्धंधर्म
राजस्यशोभनम् ॥ १॥ नासिकेतउवाच. ॥ ॥ नमस्तेधर्मराजायत्रैलोक्यस्य
पितामह ॥ सर्वलोकस्यसंगोप्वेनमःसर्वहितायच ॥ २॥ मार्तण्डसूनवेदिव्यदेहा
यामिततेजसे ॥ नमस्तेरविभक्तायनिर्मलायचतेनमः ॥ ३॥
भूषित वह नासिकेत यमकी सभामें जातभयो फिर वाने सुंदर यमके स्तोत्रको आरंभ कियो ॥१॥
नासिकेत.बोलो ॥ तीनों लोकके पितामह जे आप धर्मराज हैं तिनको नमस्कार है और तीन
लोकनके रक्षा करनहारे और सबके हितकारी जे आप हैं तिनको नमस्कार है ॥ २ ॥ सूर्यके पुत्र
॥२६॥

हैं दिव्य देह और अमित है तेज जिनको ऐसे जे आप हैं तिनको नमस्कार है और हे धर्मराज ! रविके भक्त निर्मल रूप जे आप हैं तिनको नस्मकार है ॥ ३॥ सुंदर कांति करिके युक्त है स्वरूप जिनका । और देवतानकरिके पूजित जे आप हैं तिनको नमस्कार है और धर्मके अधिकारी तथा बहुत रूप सुप्रभाट्यस्वरूपायनमस्तेसुरपूजिते ॥ धर्माधिकारिणेश्रीमन्नमस्तेबहुरूपिणे ॥ ॥४॥ नमोधर्मीयमहते नमः पापावकाय च ॥ ज्ञानविज्ञानरूपायधर्ममूतेन मोस्तुते ॥५॥ वैशम्पायनउवाच ॥ नासिकेतकृतस्तोत्रंप्रत्यक्षपापनाशनम् ॥ यःपठेत्प्रयतः सम्यग्धर्मराजस्यकीर्तनम् ॥६॥ धारण करनहारे जे श्रीमान आप हैं तिनको नमस्कार है ॥ ४॥ बडे धर्मरूप और पापके नाश कर- नहारे जे आप हैं तिनको नमस्कार है और ज्ञान विज्ञानरूप धर्ममूर्ति जे आप तिनको नमस्कार है ॥५॥ वैशंपायन बोले ॥ कि नासिकेतको कियो भयो स्तोत्र ला०के० भाल्टी ॥२७॥ प्रत्यक्ष पापको नाश करनहारो है जो सावधान होके धर्मराजके कीर्तनको भली भाँति पढे है ॥ ६ ॥ वाके आधि कहिये मानसी व्यथा और काय जो शरीर है तामें रोगको भय नहीं है और वाके ऊपर यमराज संतुष्ट होय है और वह नरकको नहीं देखे है ॥ ७॥ विप्रकरि कहे भये या स्तोत्रको सुनिकै धर्म- अ०६ नैवतस्यभवेदाधिः कायरोगभयंनहि ॥ यमस्तुष्टोभवेत्तस्यनरकांश्चनपश्यति॥७॥ श्रुत्वाविप्रेरितस्तोत्रंधर्मराजोवचोब्रवीत् ॥ तुष्टोहंतवविद्रबह्यागमनकारणम् ॥८॥ नासिकेतउवाच ॥ पित्राक्रुद्धेनशप्तोहंयमपश्योतिभानुज ॥ तदाज्ञयात्रसंप्राप्तो योगमार्गणवेगतः॥९॥ ॥२७॥ राज वचन बोलत भये हे विप्र ! में तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हों अपने आवनेको कारण कहौ ॥ ८॥ नासिकेत बोले ॥ हे सूर्यपुत्र । पिताने क्रुद्ध होके यह शाप दियो है कि, तू यमको देख सो मैं उनकी आज्ञासों यहां योगमार्गकार वेगसो आयो हौं ॥ ९ ॥ यम बोले कि हे महाप्राज्ञ ! तुम कहा पूछो हो वाको सुखसों विचार करौ और जो तुम्हारे मनमें होय सो वर मांगो मैं देऊँगो ॥ १०॥ नासिकेत बोले ॥ कि हे देव । जो तुम मोपर प्रसन्न हो तो मोको यह वर देउ कि, तुम्हारी सब पुरीको देखों और चित्रगुप्त लेखकहूको देखो यमउवाच ॥ किंपृच्छसिमहाप्राज्ञविचारययथासुखम् ॥ वरंब्रूहिप्रयच्छामिय तेमनसिवर्तते ॥ १० ॥ नासिकेतउवाच ॥ यदितुष्टोसिमेदेववरमेनप्रयच्छमे ॥ पश्यामितेपुरीसर्वाचित्रगुप्तंचलेखकम् ॥ ११ ॥ दुष्कृतीपच्यतेयत्रसुकृतीसुखमे धते ॥ एतदिच्छामिसंद्रष्टुंप्रसादंकुरुसूर्यज ॥१२॥ वैशम्पायनउवाच॥किंकरांस्त चाहूयधर्मराजेनभाषितम् ॥ एनविप्रंमहाप्राज्ञसत्यव्रतपरायणम् ॥ १३ ॥ ॥ ११ ॥ और जहां पापी दुःख पावें हैं तथा पुण्यात्मा सुख पावे हैं यह सब में देखो चाही हौं हे सूर्यके पुत्र । मोपै प्रसन्न होउ ॥ १२ ॥ वैशंपायन वाले ॥ तव यमराज अपने सेवकनको बुलायके कहतभये कि,

भा०टी०
अ०६
के । सत्यव्रतमें परायण या बड पंडित ब्राह्मणको तुम लेजाउ ॥ ॥ १३॥ और पिताके शापसों यहां आये-
॥२८॥
भये याको मेरी पुरी दिखाओ॥ १४ ॥ तब वे सब किंकर चित्रगुप्तके घरमें हे भारत ! नासिकेत समेत
जायके वे सब चित्रगुप्तके द्वारपालनसों कहत भये ॥ १५॥ कि, यह महात्मा नासिकेत ब्राह्मण यम
पितुःशापादिहायातंदर्शयन्तुपुरीमम ॥ तदावेकिंकराः सर्वेचित्रगुप्तस्यवेश्मनि ॥
॥ १४ ॥ गत्वावत्रैवसहितानासिकेतनभारत ॥ चित्रगुप्तस्यतेसवेद्वारपालमथा
ब्रुवन् ॥ १५॥ यमेनप्रेषितोविप्रोनासिकेतोमहात्मवान् ॥ श्रोतव्यंवचनंचास्य
दर्शयध्वंपुरंमहत् ॥ १६॥ इतिदूतवचः श्रुत्वाद्वारपालोऽब्रवीद्वचः॥ चित्रगुप्तनम
स्कृत्यधर्मराजस्यलेखकम् ॥ १७॥
कारकै पठायो गयो है सो याको वचन सुनिये और यह बडो पुर याहि दिखाइये ॥ १६ ॥ यह दूतको
• वचन सुनिकै द्वारपाल बोलत भयो और धर्मराजके लेखक चित्रगुप्तको नमस्कारकारकै कहत भयो ॥१७॥
॥२८॥

सुनता । कमा काम है सो कहो कहो ॥ २० ॥ दूत बोले ॥ हे महाराज ! हम महाभाग . देव । वचन सुनिये यम कारके पठायो गयो ब्राह्मण यमके दूतनसमेत आपके द्वार पे स्थित है ॥ १८ ॥ चित्रगुप्त बोले ॥ कि हे दूतो! वा ब्राह्मणको बहुत शीघ्र मेरे समीप लाओ ॥ १९ ॥ चित्रगुप्तको वचन सुनिके वह उन सवनको लावत भयो और चित्रगुप्त उनसों बोलत भये कि, वचनं श्रूयवांदेवयमेनप्रेषितोद्विजः ॥ सहितोयमदूतैश्चद्वारेतिष्ठतिवेऽनघः॥१८॥ चित्रगुप्तउवाच ॥ विप्रतुत्वरितंदूतसमानयममान्तिकम् ॥ चित्रगुप्तवचः श्रुत्वासो पिसानसमानयत् ॥ १९॥ उवाचचित्रगुप्तस्तान्किकार्यब्रूतसुव्रताः ॥ २० ॥ न्वाऊचुः ॥ प्रेषिताः स्मोमहाभागधर्मराजेनधीमता ॥ तेनाज्ञप्तमहाप्राज्ञतत्कु साबविलम्बितम् ॥२१॥ NAHI HA करि पठाग गये हैं ताते हे महाप्राज्ञ ! उनने जो आज्ञा दीन्ही है वाको तुण शीत्र

जाके०
भाबी
अ०६
करौ ॥ २१ ॥ बडो पंडित और सत्यधर्ममें परायण जो यह ब्राह्मण है सो पिताके शापके योगसों
यमपुरमें प्राप्त भयो है, सो यह जो जो वांछा कर सो सो करने योग्य है ॥ २२॥ चित्रगुप्त बोले ॥
(१२९॥ कि, हे महाप्राज्ञ । विप्र जो तुम चाहोही सो कही द्विजश्रेष्ठ । धर्मराजकी आज्ञा मोको प्रमाण
सोयविप्रोमहाप्राज्ञः सत्यधर्मपरायणः ॥ पितुः शापाच्चयोगेनप्राप्तोवैवस्ववंपुरम् ॥
अस्य वाञ्छाप्रकर्तव्यायद्यदिच्छति वै द्विजः ॥ २२ ॥ चित्रगुप्त उवाच ॥
बहिविप्रमहाप्राज्ञयत्त्वमिच्छसितद्वद ॥ धर्मराजस्यचाज्ञामेप्रमाणद्विजसत्तम
॥ २३ ॥ नासिकेतउवाच ॥ महावीर्यमहातेजोधर्माधर्मविचारक ॥ त्वंचित्रंसर्व
भूतानांसर्ववोत्सशुभाशुभम् ॥ २४ ॥ वैशम्पायनउवाच ॥ एवंचतोषितस्तेन
चित्रगुप्तोमहात्मवान् ॥ हर्षितोद्विजवाक्येनपुनरेवाबवीद्विजम् ॥ २५ ॥
॥ २३ ॥ नासिकेत बोले ॥ हे बड़े पराक्रमी ! हे बडे तेजस्वी हे धर्म अधर्मके विचार करनहारे।
तुम सब भूतनके शुभ अशुभ कर्मनको जानो हो ॥२४ ॥ वैशंपायन बोले ॥ ऐसे संतुष्ट
॥२९॥

ध करे गये महात्मा चित्रगुप्त वा ब्राह्मणके वचनसों प्रसन्न वासों फिरि बोलत भये ॥ २५ ॥ ज्ञानविज्ञानसों युक्त द्विजोत्तम । गैं तुमसों प्रसन्न हों और जो तुम्हारे मनमें है सो कर मैं तुमको देउहौं ॥ २६ ॥ नासिकेत बोले ॥ मैं तुम्हारी सब पुरीको देखों और दुःख तथा सुखनको देखों ज्ञानविज्ञानसंयुक्ततुष्टोऽहंतेद्विजोत्तम ॥ ददामितेवरंशीघ्रयत्तेमनसिवर्तते ॥ २६॥ नासिकेतउवाच ॥ पश्यामिवः पुरीसर्वांदुःखानिचसुखाानच ॥ एतच्छुत्वावचोभू यश्चित्रगुप्तोवचोऽब्रवीत् ॥ २७ ॥ भोदूताममवाक्येनसत्वरंद्विजपुङ्गवम् ॥विषम चशुभंसर्व दर्शयन्तुपुरंमहत् ॥ २८॥ यथानपीड्यतेविप्रोव्याधिभिर्नरकैस्तथा ॥ दर्शयित्वाचविप्रेन्द्रंपुनरत्रानयंतुच ॥ २९ ॥ या वचनको सुनिकै चित्रगुप्त फिरि वचन बोलत भये ॥ २७ ॥ हे दूतो। मेरे वचनसों तुम या श्रेष्ट ब्राह्मणको विषम तथा शुभः सब मेरो बडो पुर शीघ्र दिखाओ ॥ २८ ॥ जैसे यह विप्र नरक SIR ना के भान्टी ॥३०॥ अ०६ न कारकै और व्याधिन कार पीडित न होय ऐसे या विरेंद्रको सब दिखाकै फिरि यहाँ ला आओं ॥२९॥ चित्रगुप्त कारकै आज्ञादिये गये बहुत शीघ्र चलनहारे दूतनने धर्मराजकी आज्ञासों बडी वह सब पुरी नासिकेतको दिखाई ॥ ३० ॥ और फिर उनको चिगुप्तके घरको चित्रगुप्ताज्ञयासर्वैर्दूतस्त्वरितगामिभिः॥ दयित्वापुरींसाष्टथुलांधर्मशासनात् ।। ॥ ३० ॥ आनीतः पुरतस्तस्यचित्रगुप्तस्यवेश्मनि ॥ चित्रगुप्तउवाच ॥ नीयतांव द्विजः शीघ्रधर्मराजस्यसन्निधौ ॥३१॥ वैशम्पायन उवाच ॥ तंप्रणम्यगतस्तत्रय वैवस्वतः स्थितः॥ यमश्चाप्यागतंदृश्वानासिकेतमहत्तमम् ॥ ३२ ॥ अयपाद्यास नैरे नासिकेतमपूजयत् सुखासीनस्यविप्रस्ययमोवचनमब्रवीत् ॥ ३३॥ लावत भये ॥ चित्रगुप्त बोले ] या ब्राह्मणको शीघ्रही धर्मराजके समीप ले जाओ॥३१॥ वैशंपायन वोले ॥ चित्रगुतको प्रणाम कारके जहाँ वैवस्वत है वहां जात भये और यम हूँ अति श्रेष्ठ नासिकेतको आयो भयो देखि ॥ ३२ ॥ अयं पाय और आसन आदिसों नासिकेतको पूजन IA करत भये फिरि सुखसों बैठे अये वा ब्राह्मणों यमराज वचन बोलत भये ॥ ३३ ॥ हे नासिकेत महाभाग। तुम नाना प्रकारके स्थान और चित्रगुप्त लेखकको देखिके सुखसों आये ? ॥ ॥ ३४॥ नासिकेत बोल॥ कि तुम्हारे प्रसादसों मैंने स्वर्ग और नरक देखो मेरे पिता मेरे मोहसों माहित हो दुःखसों वार वनमें नासिकेतमहाभागह्यागतस्त्वंसुखेनच ॥ दृष्ट्वाचविविधंस्थानंचिगुप्तंचलेख कम् ॥ ३४ ॥ नासिकेतउवाच ॥ त्वत्प्रसादान्मयादृष्टः स्वगंश्चनरक स्तथा ॥ पितामेदुःखतोघोरेवनेतिष्ठतिमोहितः ॥ ३५ ॥ तस्यपादौप्रपश्या मिस्वामिन्नाज्ञाभवेद्यदि ॥ ॥ यमउवाच ॥ ॥ गच्छद्रिजवरश्रेष्टयत्रविष्ट तितेपिता ॥ ३६॥ स्थित हैं ॥३५॥ हे स्वामी ! जो आज्ञा होय तो मैं उनके चरण जायके देखों ।। यम बोले । हे द्विजवरमें श्रेष्ठ ! जहाँ तुम्हारे पिता हैं वहाँ जाओ॥३६॥ ६

नाक
॥३१॥
भान्टी
मार्ग-
अ०६
हे विणा तप और योगवलसों युक्त तुम अजर अमर और सब दोपन कारके रहित होउ ॥ २७ ॥
वैशंपायन बोले ॥ ऐसे कहेगये वे द्विजोत्तम धर्मराजको नमस्कार करि जा
सों गये हैं वाही मार्गसों फिरि आय जात भये ॥ ३८ ॥ आधेही पलमें जहां पिता है वहां आय
अजरश्वामरश्चैवसर्वदोषविवार्जितः ॥ भवत्वमक्षयोविप्रतपोयोगबलान्वितः॥३७॥
वैशम्पायनउवाच ॥ एवमुक्तोनमस्कृत्यधर्मराजंद्विजोत्तमः ॥ गतोसौयेनमार्गेण
तेनैवपुनरागतः॥३८॥यत्रस्थितःपितातंत्रसंप्राप्तोनिमिषाद्धवः ॥ उद्दालकोमहात्मा
नंदृष्ट्वापुत्रंसमागतम्॥ लवाचतंपरिष्वज्यनमंतंपादयोमुहुः॥३९॥ उद्दालकउवाच॥
अद्यमेसफलंजन्माद्यमेसफलाः क्रियाः॥अधमेसफलंसर्वयज्जातपुत्रदर्शनम्॥४०॥
जात भये तब उद्दालक आये भये महात्मा पुत्रको दोख चरणनमें नमत भये वाको छातीसों
लगायकै बोलत भये ॥ ३९ ॥ उहालक बोले । आज मेरो जन्म सफल भयो और आज मेरी
॥३॥

क्रिया सफल भई ओर पुत्रको जो दर्शन भयो ताते आज मेरो सब सफल भयो ।॥ ४० ॥ मैं क्रोधी दुराचारी निर्दयी और पाप कर्मनको करनहारो हौं विना अपराधके मैंने पुत्रको शाप दियो ॥ ४१ ॥ पुत्रको आयो भयो देखि हर्पित होकै माता बोलत भई ॥ ४२ ॥ मेरे पुत्रको अहंक्रोधीदुराचारीनिर्दयःपापकर्मकृत् ॥ विनापरा,पुत्रंतुमयाशापोनियोजितः ॥ ॥ ४१ ॥ दृष्ट्वापुत्रंसमायातमाताप्रोवाचहर्षिता ॥ पश्यपश्यप्रभाववैमत्पुत्रस्यसु शोभन ॥४२॥ ॥ शीघ्रचैवयमंदृष्ट्वाचागतोयमसादनात् ॥४३॥ उद्दालकउवाच ॥ कथंयमपुरीप्राप्त कथं शीघ्रमिहागतः ॥ कीडशोयमलोकस्यपन्थाश्चैवयम स्तथा ॥४४॥ सुन्दर प्रभाव देखौ जो यमको देखिकै यमके चरते शीघ्र यहां आय गयो ॥ ४३ ॥ उद्दालक बोले । यमकी पुरीमें कैसे पहुँचो और कैसे शीघ्रही यहां आयगयो और यमलोकको मार्ग कसो है और

ना०के०
॥३२॥
JI
भादी०
यम कैसे हैं ॥४४॥ हे पुत्र ! तुमने भोजन और पान कैसे पायो तुमने जो कुछ वहां देखो होय सो सब
हे पुत्र ! मोसों कहौ ॥ ४५ ॥ नासिकेत बाले ॥ हे पिता ! मैं तुम्हारे प्रसादसों यमके लोकमें पहुंचा
वहां नाना प्रकारके देवता देखे और भगवान प्रभु यमहूँ देखे ॥ ४६॥ और सब लोकके अनुशासन
कथलब्धत्वयापुत्रभोजनंपानमेवच ॥ यत्किचित्तत्रदृष्टंवत्सर्वब्रूहिमेसुत ॥४५॥
नासिकेतउवाच ॥ त्वत्प्रसादादहंतातसंप्राप्तोयमसादनम् ॥देवाश्चविविधादृष्ट्राय
मश्चभगवान्प्रभुः ॥ ४६ ॥ चित्रगुप्तोमयादृष्टःसर्वलोकानुशासनः ॥ दृष्टश्चधर्मरा
जोवैस्तुतिभिस्तोषितोमया ॥ तुष्टेनमेवरोदत्तोहजरश्चामरोभव ॥ १७ ॥
इति श्रीनासिकेतोपाख्यानेषष्ठोध्यायः ॥६॥
करनहारे चित्रगुप्त मैंने देखे और धर्मराज देखे और मैंने स्तुति करिकै उनको संतुष्ट किये
तब संतुष्ट भये यमराजने मोको वर दियो कि, तू अजर अमर हो ॥ १७ ॥ इतिश्रीमपत्पंडितपर
मसुखतनयपडितकेशवप्रसादशमदिवोदकृतायां नासिकेतोपाख्यानभापाटीकायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥३२॥

वैशंपायन बोले ॥ ता पछि सब ऋषि या उपाख्यानको सुनिके विस्मयको प्राप्त होत भये कि, यमके भवनमें जायक फिर यहां कैसे आय गयो ॥ १ ॥ वा समय तप र व्रतनके करनहारे बहुतप्ते मुनीश्वर वा उद्दालक मुनिके आश्रममें पूछिनेको आवत भये ॥ वैशम्पायनउवाच ॥ ऋषयश्चततःश्रुत्वासविस्मयमागताः॥ यमस्यभवनं गत्वा मुनिपुनरिहागतम् ॥ १॥ आगताश्चाश्रमेतस्यमुनेरुदालकस्यच ॥ प्रश्नार्थचसमा यातास्तपोववसमन्विताः ॥२॥ पक्षोषवासिन केचिद्येचान्येजलवासिनः॥ अधो मुखास्तथैवान्येवायुभक्षास्तथापरे ॥ ३ ॥ येचाग्निसाधकाश्चान्यनिराहारास्तप स्विनः॥४॥ ॥ २ ॥ कोई पक्षके उपवास करनहारे हैं और कोई जलमें वास करनहारे और कोई नीचेको मुख राखनहारे हैं तथा कोई पवनको आहार करनहारे हैं ॥ ३ ॥ और जे अग्निको साधन- हारे निराहार तपस्वी हें वेऊ आवतभये ॥ ६ ॥ और बडो जो दारुण तप है ताके करबेके

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मा०टी०
अ०७
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एक पावसों ठाडे रहत हैं वेज आवत भये और संन्यासी तथा वनवासी और मौन व्रतके धारन
करनहारेहू आवत भये ॥५॥ और जप तथा यज्ञमें तत्पर बडो उग्र है तेज जिनको ऐसे ऋपि
एकपादेनतिष्ठन्तस्तपस्तप्तुंसुदारुणम् ॥ संन्यासिनोवनस्थाश्चमौनव्रतपरायणाः॥
॥९॥जपयज्ञरताः केचिदृषयश्चोग्रतेजसः ॥ योगाभ्यासरता केचित्तापसाब्रह्म
चारिणः ॥ ६ ॥ शुष्कपर्णाशना केचित्तथामासोपवासिनः ॥ पप्रच्छुर्मिलिता
सर्वेनासिकेतंमहामुनिम् ॥ ७ ॥ उद्दालकात्मजप्राज्ञदृष्टंचैवत्वयाद्भुतम् ॥ ८॥
और काई योगाभ्यासमें लगेभये और कोई तपस्वी तथा ब्रह्मचारीहू आवत भये ॥ ६ ॥ कोई
सूखे पत्तनके खानहारे और कोई एक महीनाको व्रत करनहारे ऐसे बहुतसे ऋषि आवत भये
और सब मिलिक नासिकेत महा मुनिसों पूछत भये ॥७ ॥ हे बडे पंडित उद्दालकके पुत्र !
॥३३॥

तुमनें जो अद्भुत देखो है ।। ८॥ हे महाभाग नासिकेत । परलोककी कथाको कहो कि यमको लोक कैसो है और वाको मार्ग कैसो है ॥ ९॥ और यमके दूत कैसे हैं वहांकी मर्यादा कहा है और हे द्विज । वहां के लोग कैसे हैं क्रोधी हैं अथवा मीठो वचन वाले हैं ॥ १० ॥ और वहां नासिकेतमहाभागपरलोककथांवद ॥ कीदृशोयमलोकश्चवस्यमार्गश्चकीदृशः ॥ ॥ ९ ॥ कीदृशायमदूताश्चकास्थिाविवर्त्ततेद्विज ॥ कीदृशस्तत्रलोकश्चक्रोधीवा प्रियवाग्विज ॥ १० ॥ कीदृशानरकास्तत्रकेनपापेनकोभवेत् ॥ सत्यंब्रूहिम हाप्राज्ञऋषयःप्रष्टमागताः ॥ ११ ॥ नासिकेतउवाच ॥ श्रूयतामृषयःसवैयेचान्ये तपसिस्थिताः॥ नमस्कृत्यमहादेवधर्मराजमहामतिम् ॥ तत्रदृष्टप्रवक्ष्यामिमहान्तं रामहषणम् ॥ १२॥ नरक कैसे हैं और कौनसे पापते कौनसो नरक मिले है हे महाप्राज्ञ । सत्य कही ऋषि पूछिबेको आये हैं ॥ ११ ॥ नासिकेत बोले ॥ हे सब ऋषियो ! सुनो और जे अन्य ऋषि तपस्या

ना के
१३४॥
भा०टी०
अ०७
बैठे हैं वेफ सुनें मैं महादेव धर्मराज जे महामति हैं उनको नमस्कार करिके बडो रोमहर्ष करा-
वनहारो जो वहां देखो है ताहि कहोंगो ॥ १२ ॥ हे ब्राह्मणो पिताके शापसों
मैं संयमनी नाम जो यमराजकी पुरी है तामें पहुँचत्त भयो वहां मैंने धर्मराज देखे और स्तुतिनसों
पितुःशापादहंप्राप्तोविप्राःसंयमनीपुरीम् ॥ तत्रदृष्टोधर्मराजःस्तुतिभिस्तोषितो
मया ॥ १३॥ तुष्टेधर्ममयाप्रोक्तंदर्शयस्वपुरीतव ॥ वदायमाज्ञयासर्वापुरीदृष्ट्वाम
याद्विजाः ॥ १४ ॥ चित्रगुप्तोमयादृष्टःशुभाशुभविचारकः ॥ तवोवरंमयालब्धवि
नयाविष्टचेतसा ॥ अजरामरताचैवव्याधिदुःखविनाशनम् ॥ १५ ॥
उनको संतुष्ट करत भयो ॥ १३॥ और जब धर्मराज संतुष्ट भये तब मैंने उनसों कहो कि, अपनी
पुरीको दिखाओ। हे ब्राह्मणो ! तब उनकी आज्ञा लेके मैंने सब पुरी देखी ॥ १४ ॥ और शुभ
अशुभके विचार करनहारे चित्रगुप्तहू मैंने देखे और विनययुक्त चित्त होके मैंने बरहू पायो कि, तू
॥३४॥

अजर अमर हो ओर तेरे व्याधि तथा दुःख सब नाशको प्राप्त ॥ हाय ॥ १५ ॥ ओर अपने पिताके प्रसाद ते फिरि यहां आय गयो और यमलोकको विस्तार फिरि मैं कहाँगो ॥ १६ ॥ कि वह प्रमाणमें एक हजार योजन चौडोलंबो है वाके चारि कोने हैं और चारि वाके द्वार हैं और नाना आगतोहंपुनश्चैवापितुर्ममप्रसादतः॥ पुनश्वाहप्रवक्ष्यामियमलोकस्यविस्तृतिम् ॥ ॥ १६ ॥ शवानिदशविस्तीर्ण योजनानांप्रमाणतः ॥ चतुरस्रंचतुरिंनानारत्नो पशोभितम् ॥१७॥ नानाजनसमाकीण गीतवादित्रसंयुतम् ॥ धर्मराजपुरंदिव्यं सप्तप्राकारवेष्टितम् ॥ १८ ॥ तस्यमध्येमहादिव्यंधर्मराजस्यमंदिरम् ।। सर्वरत्न मयंवह्निविशुद्धालार्कवर्चसम् ॥ १९ ॥ प्रकारके रत्ननसों शोभित है ॥ १७ ॥ और नाना प्रकारके जे जन हैं तिन करिके समाकीर्ण कहिये भरो भयो है और जामे सदा गावनो बजावनो होए और सात परकोटानसों घिरो भयो वह दिव्य यमराजको पुर है ॥ १८ ॥ वाके मध्य में बहुतही सुन्दर धर्मराजको मंदिर है यह सब प्रकार D ना०के० ॥३५॥ मादी अ०७ RS के रत्ननसों बना है और बिजली तथा बाल सूर्यके समान चमकि रहो है ॥ १९ ॥ १९ ॥ और चित्र विचित्र स्फटिक जो बिल्लोर है ताकी सीढियां बनी हैं और हीरानकी कुटीनसों शोषित है वामें भग वान् धर्मराज जाकी उपमा नहीं होसकै है ऐसे सुंदर आसनपर विराजमान होय हैं ॥२०॥ सिंहा- चित्रस्फाटिकसोपानंवनकुट्टिमशोभितम् ॥ तत्रासौभगवान्धर्म आसनेऽनुपमे शुभे ॥ २०॥ उपविष्टःसतांश्रेष्ठःसिंहासनगतोयमः॥सभायांधर्मराजवंयोगिनःस मुपासते ॥ २१॥ अप्सरोगणगन्धर्वाविद्याधरमहोरगाः॥प्रविशन्तीददिग्द्वारे शिव भक्तिपरायणाः ॥ २२ ॥ ग्रीष्मोदकप्रदातारोमाघवहिप्रदायकाः विश्रामयन्तिये श्रांतानविप्रानध्वप्रपीडितान् ॥ २३ ॥ सनपर बैठेभये सज्जननमें श्रेष्ठ जो यमराज हैं तिनकी सभामें उनकी उपासनाको बडे २ योगी आवे हैं ॥ २१॥ अप्सरानको गण गंधर्व विद्याधर और बडे २ सर्प तथा शिवकी भक्तिमें परायण ये सव पूर्व दिशाके दारमें प्रवेश कर लें ॥ २२ ॥ गर्मीकी ऋतुमें जलके देनेहारे और माघ महीनामें , आगिसों तपावनहारे और जे मार्ग चलनेसों पीडित थके भये ब्राह्मणनको विश्राम देय हैं ।। २३ ॥ और दान तथा धर्ममें रत हैं और क्रोध तथा लोभ करिक रहित हैं और जे पिताकी भक्तिमें रत हैं तथा गुरुकी पूजामें सदा तत्पर हैं ॥ २४ ॥ हे ब्राह्मणनमें उत्तम । वे सब पूर्वके द्वारमें दानधर्मरताश्चैवक्रोधलोभविवर्जिताः ॥ पितृभक्तिरतायेचगुरुपूजारवाः सदा ॥ ॥२४॥ पूर्वद्वारेणतसर्वेप्रविशतिद्विजोत्तमाः॥ अतिथीन्पूजययुर्वेदेवब्राह्मणपूज काः ॥ २५ ॥ ब्राह्मणानांचयेभक्तास्तीर्थस्नानरताश्चये ॥ वाराणस्यांगोगृहेचमृता स्तेयांतिचोत्तरे ॥२६ ॥ सत्यव्रतधरायेचनित्यंधर्मपरायणाः॥परद्रव्येच्छाविहीनाः परनिन्दापराङ्मुखाः ॥ २७॥ प्रवेश करे हैं और जे अभ्यागतनको पूजै हैं और ब्राह्मणनको तथा देवतानको पूजे हैं ॥ २५ ॥ और ब्राह्मणनके जे भक्त हैं और जे तीर्थनके स्नानमें तत्पर हैं और काशीमें तथा गौके घरमें जे मरे हैं वे उत्तरके द्वारमें होके जाय हैं ॥२६॥ और जे सत्यवतके धारण करनहारे हैं और नित्यही

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अ०७
धर्ममें परायण हैं और जे पराये द्रव्यकी इच्छा राहत हैं और पराई निदाते विमुख हैं ॥ २८॥ और
जे महात्मा विष्णुके भक्त हैं और पराई स्त्रीनमें जे नपुंसक हैं और जे नित्य धर्मकी कथामें
॥३६॥ रहे हैं और पराई हिंसाते रहित हैं ॥ २८ ॥ ये सब निश्चय पश्चिमके द्वारमें होके सुखसों प्रवेश
विष्णुभक्तामहात्मानःपरस्त्रीषुनपुंसकाः॥नित्यंधर्मकथासक्ताः परहिंसाविवर्जिताः॥
॥ २८॥ एतेवैपश्चिमेद्वारेप्रविशतिसुखान्विताः । अन्येचदक्षिणेद्वारेप्रविशतिनरा
ऽधमाः ॥ २९ ॥ सदानृतपराः क्रूरागुरुदेवविदूषकाः पुराणवेदमीमांसामातृपि
तृविनिंदकाः ॥३०॥ हाहाकारोभवत्युग्रस्वस्मिन्दारेमयाश्रुवः॥ अन्धकारमयंघो
रनानारोगनिषेवितम् ॥ ३१ ॥
कर हैं अन्य नीच मनुष्य दाक्षिणके द्वारमें होके भीतर धसे हैं ॥ २९॥ जे सदा झुठ बोलें हैं क्रूर हैं
और देवता तथा गुरुनको दूषण देय हैं तथा पुराण
तथा पुराण वेद मीमांसा और मातापिताके निंदक
॥ ३० ॥ वा द्वारमें अति उय हाहाकार होय है मैंने सुनो है और अतिघोर अन्धकारमयी है और
॥३६॥

और नाना प्रकारके रोगनकारके सेवन कियो गयो है ॥ ३३ ॥ वहां पापी यमदूतन कारक पीडित होय हैं और मुद्रनसों तथा दारुण लोहदंडनसों ताड़ना किये जाय हैं ॥ ३२ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटी- तत्रवैपापकर्माणोयमदूतैःप्रपीडिताः॥ मुद्रैस्ताड्यमानांश्चलोहदण्डैश्चदारुणैः ।। ॥ ३२ ॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेसप्तमोऽध्यायः॥७॥ नासिकेतउवाच ॥ ॥ तत्रैवनरकादृष्टानानापीडामयाद्विजाः ॥ कुम्भीपाकमुखाघोराधौरेया कविंशतिः ॥ १ ॥ तानहंसंप्रवक्ष्यामिशृणुष्वद्विजसत्तमाः ॥ वदमानोपिनरकान्भयभीवो भवाम्यहम् ॥२॥ कायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥ नासिकत बोले । कि हे द्विज ! वहाई मैने' नाना प्रकारकी पीडानके देनेहारे नरेक देले वे कुंभीपाक आदि महाघोर इकईस मुख्य हैं ॥ ३ ॥ उनको मैं कहाँगो हे 8 नाक ॥३७॥ भान्टी ब्राह्मणो ! तुम सुनो जिन नरकनको कहता भयो में भयभीत हाउँ हो ॥ २ ॥ कुंभीपाक १ अवीचि २ महारोख ३ रोख ४ कक्षभेद ६ महाघोर रामनका हर्पित करावनहारो दारुण ६ ॥३॥ और महापार तपन ७ और बडो अद्भुत आनवास ८ तप्तांगार ९ तप्तभूमि १० तैसेही कुम्भीपाकोह्यवीचिश्चमहारौरवरौरखौ ॥ कक्षभेदोमहाघोरोदारुणोलोमहर्षणः ॥ ॥ ३ ॥ तपनश्चमहाघोरोऽनिश्वासोमहद्भुतः ॥ वप्तांगारस्तप्तभूमिरसिपत्रवनंत था ॥ ४॥ पूयपूर्णनदीचैवकूपश्चकामिपरितः ॥ विष्ठापूर्णस्तथाकूपःकर्णनासावि कर्तनः ॥ ५ ॥ घृतपाकस्तथाचैवगुडपाकस्तथैवच ॥ संवतवालुकश्चैववथैवक्षु खर्धकः ॥६॥ असिपत्र वन १३ ॥ ४॥ और पीवकी भरी भई नदी १२ और कृमीनसों भरो भयो कूप १३ और तसेही विद्यासों भरोभयो कूप १४ कर्ण नासाको विकर्तन १५ ॥५॥ तथा घृतपाक १६ तथा गुडपा- इखा क १७ संतप्त वालुक १८ तथा क्षुरवर्धक १९ ॥ ६॥ पर्वतारोहण २० शूलारोहण २१ ओर तपीभई सडसीनसों नेत्रोंको उखाडनो ॥ ७ ॥ वहाँ मैंने बहाहत्यारे गोके हत्यारे पिताके मारनेहारे और मित्रको विश्वास कराके जे मोहित होय हैं और जे गर्भके गिरावनेहारे हैं ॥ ८ ॥ और जे स्त्रीनके पर्वतारोहणंचैवशूलारोहणमेवच ॥ तप्तसंदंशकाग्रेणनेत्रोत्पाटनमेवच ॥ ७॥ ब्रह्मन्नास्तत्रवैदृष्टागोनाश्चपितृघातकाः ॥ मित्रंविश्वास्यमुह्यन्तियेचगर्भनिपातिनः ॥ ८॥ स्त्रीणांदोषग्रहीतारस्वथैवगुरुतल्पगाः ॥ परनारीरतायेचपरद्रव्याभिला षिणः ॥ ९॥ गोब्राह्मणपरित्यागीसाधुवृत्ताः स्त्रियस्तथा ॥ त्यजन्तिदूषकाराज्ञां परधर्मस्यनिन्दकाः ॥ १०॥ दोपनको ग्रहण करें हैं और जे गुरुकी स्त्रीसों रमण करें हैं और ज पराई नारीसों रत हैं और पराये द्रव्यके लेनहारे हैं ॥ ९ ॥ ओर जे गौ तथा ब्राह्मणको परित्याग कर हैं और जे .

नाक०
॥३८॥
भाटी
पतिव्रता स्त्रीनको त्याग करें हैं और जे राजानको दोष लगायें हैं और जे पराये धर्मकी निंदा
करें हैं ॥ १० ॥ और जे झूठी साक्षीके देनहारे हैं और जे क्रूर कर्मनके करनहारे हैं और जे
काहूको दुःखी दोखे प्रसन्न होय हैं और जे काहू सुखी देखि सदा दुःखित होय हैं ॥ ११ ॥ और
कूटसाक्षिपदावारः क्रूरकर्मरवाश्चये ॥ दुःखितेहर्षकारीचसुखितेदुःखितः सदा ॥
॥११॥ पापेपुरमवेनित्यंसत्यशौचविवर्जितः॥ सूचकःकलुषोनित्यंचौर्येणवोपजी
वति ॥ १२ ॥ भूहर्तागृहहर्ताचदेवद्रव्यापहारकः ॥ दयाहीनादुराचारादानधर्म
विवर्जिताः ॥ १३ ॥ महापापेनसंयुक्तास्तथायेबकवृत्तयः ॥ नश्रुतंचगुरोवाक्यंशा
स्त्रवातिथैव च ॥ १४॥
सत्य तथा शौच करि रहित जे सदा पापहीमें स्में हैं और जो चुगली करें हैं और जाको मन
सदा कलुष रहेहै और जो चौरीकी जीविका करें हैं ॥ १२ ॥ और जो काहूकी धरती तथा घर
छीनि लेय हैं और जो देवतानके द्रव्यको हारलेये हैं ॥ १३ ॥ और जे दुराचारी दयाहीन और
॥३८॥

. दान तथा धर्मसो रहित हैं और जिनको बडो पाप लगी है और जे बकवृत्ती हैं ॥ १४ ॥ जिनने गुरुके वास्य तथा शासकी नाता नहीं सुनी हैं और जाने पुराणको भाक्य नहीं सुनो ॥ १५ ॥ ओर जे बडे केशको करें हैं और अपने धर्मसो रहित हैं ये सन तथा और बहुतेरे अपने पुराणसंभवंवाक्ययेनगेनकदाचन ॥ महाकेशकराचैवनिजधर्मविवर्जिताः ॥१५॥ एतेचान्येचबहवोमयादृष्टाहानेकशः॥ नरकेपुचसर्वेषुपच्यमानाःस्वदुष्कृतः॥१६॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेऽष्टमोध्यायः ॥ ८॥ नासिकेतउवाच ॥ ॥ मर्त्यलोके तुपापिष्ठाः पापाचारयुतानराः॥ देहत्यक्त्लापुनलब्ध्वायातनादेहमेवच ॥१॥ दूतैः कृष्टाःपुरीयान्तिगृहीताइवमकटाः ॥ वैवस्वतस्यभोविप्राः सभायांसंस्थिवस्यच ॥२॥ पापनसों नरकनमें दुःख भोगते भये देखे ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्पडितकेशवप्रसादलतायांनासिकेतो पाख्यान भापाटीकायामष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ नासिकेत बोले ॥ मत्यलोकमें पापी और पापही आचारमें लगेभये मनुष्य देहको छोडिके फिरि यातनाको देड गावे हैं॥१॥और वे पापी पकरे भये नान- CHAN २९॥ विनो महामुनि अये यम भरद्वाज माटी ०१ रके समान यमके दूतनकारकै खेंचे गये पुरीको जाय हैं और ! समामें बैठे राजके समीप जाय हैं॥२॥ और हे द्विजोत्तमो! धर्मराजकी समाने जे स्थित हैं उनको सुनो, कृष्णदपायन, शृंगीऋषि और सभामध्येस्थितायेत्ताञ्छृणुध्वंद्विजोत्तमाः ॥ कृष्णद्वैपायनःशृंगीभरद्वाजोमहामु निः ॥ ३॥ दुर्वासागौतमश्चैवमरीचि गुरेवच ॥ पिप्पलादःपुलस्त्यश्चपुलहः सनकस्वथा ॥ ४ ॥ सुरभिःसुरदेवश्चवाल्मीकिश्चमहातपाः ॥ विश्वामित्रोव सिष्ठश्चक्रतुर्दक्षोहरिस्तथा ॥ ५ ॥ एतेचान्येचबहवोमयादृष्टाह्यनेकशः .॥ यमे नसहितास्सर्वेधर्माधर्मविचारणाम् ॥ ६॥ पिप्पलाद, पुलस्त्य, पुलह तथा सनक ॥ ४ ॥ और सुराभ, सुरदेव बड़े तपस्वी वाल्मीकि ओर विश्वामित्र, वसिष्ठ, ऋतु, दक्ष तथा हरि ॥५॥ ये सब तथा और बहुतसे में अनेक देख वेदके जाननेहारे और संदेहके दूरि करनेहारे ये सब यमके साथमें धर्म अधर्मको सदा विचार करें हैं॥६॥ और पापी मनुष्यनके पापको निर्णय करिके यमके दूतन करि दंड दिये जाय ॥ ७ ॥ ब्रह्महत्यारो जो पुरुष है वह कुंभिपाक नाम नरकमें पचायो जाय है गोके हत्यारे कुर्वन्तिसततं विप्रावेदज्ञाःसंशयच्छिदः ॥ निर्णीयपापिनांपापदंड्यतेहियमानुगैः ॥ ॥ ७॥ ब्राह्मणघ्नश्चय यापःकुम्भीपाकेसपच्यते ॥ गोन्नाश्चैवकृतघ्नाश्चयेचस्त्रीग भपातिनः ॥ ८॥ तेलयन्त्रेणपीड्यन्वयमदूतैर्भयंकरैः ॥ स्वामिद्रोहरतायचगुरु द्रोहकराश्चये ॥९॥ और कृतघ्नी तथा जे स्त्रीनके गर्भके गिरावनहारे हैं ॥ ८॥ वे भयंकर यमदूतनकारकै तेलके यंत्र- में पीडा दिये जाय हैं अर्थात् तेलकोल्हूमें पेरे जाय हैं और जे स्वामीके द्रोहमें रत हैं और ०० 1180॥ भा०टी० अ०९ गुरुके द्रोही हैं ॥ ९॥ और जे विश्वासघाती हैं वे आरानसों दो फाँक करे जाय हैं और जे जीव- नको विषके देनहारे हैं वे आनिमें मुंजे जाय हैं ॥ १० ॥ और जे क्षेत्रकी वृत्तिके हरनहारे हैं और जे पराई स्त्रीसों भोग करनेहारे हैं और जे जीवनकी हिंसा करें हैं वे गुडपाक नाम नरकमें विश्वासघातकायेचच्छिद्यन्तेक्रकचैर्दिधा ॥ गरदायेचजन्तूनांपच्यन्तेह्यनलेषुते॥ ॥ १० ॥ क्षेत्रवृत्तिहरायेचपरदारवाश्चये ॥ गुडपाकेषुपच्यन्तेयेचजीवविहिंस काः ॥ ११ ॥ परद्रव्येष्वमिध्यानमनसानिष्टचिंतनम् ॥ विवथाभिनिवेश श्चमानसंत्रिविधस्मृतम् ॥ १२ ॥ पारुष्यमनृतंचेवपैशुन्यंचापिसर्वशः ॥ असंब न्धःप्रलापश्चवाङ्मयस्याच्चतुर्विधम् ॥ १३ ॥ पचाये जाय हैं ॥ ११॥ पराये द्रव्यको चितवन करनो और मनमें अनिष्टको विचारनो और झुठको आग्रह करनो यह मानसी पाप तीनि प्रकारको है ॥ १२ ॥ कठोरपन झूठ और सर्वत्र चुगली करनो और विना संबंधको बकनो यह चार प्रकारको वाङ्मय पाप होय हैं ॥ १३ ॥ UA TA और नहीं दिये भयोंको लेने और विना विधानके हिंसा करनी और पराई स्त्रीकी सेवा करनी यह तीनि प्रकारको कायिक पाप कहो है ॥ १४॥ या प्रकार मनुकार कहे भये दश प्रकारके पापोंको जो करे हे द्विज ! वह बड़े घोर कालसूत्र नाम नरकमें पचायो जाय है ॥ १५ ॥ जो अदत्तानामुपादानहिंसाचैवाविधानतः परदारोपसेवाचकायिकत्रिविधं स्मृतम् ॥ १४॥ एवंपापंदशविधमनुनोक्तंकरोतियः ॥ पच्यतेनरकेघोरेकाल मूत्रेसतुद्विजाः ॥३५॥ अभक्ष्यभक्षयवस्तुमदिरांपिबतेचयः ॥ अगम्यागमनचैव गुरुनिन्दारतोनरः ॥ १६ ॥ एतेवैपापिलः सर्वैदृष्टावैवस्ववेपुरे ॥ यातनाभिः पीड्य मानानारकीभिरनेकधा ॥ १७ ॥ नर अभक्ष्यको भक्षण करे है और जो मदिरा पीवे है तथा अगम्य जे पुत्री भगिनी आदि है तिनमें गमन कर है और गुरुकी निंदा करे है ॥ १६॥ ये सब पापी मैंने यमलोकमें देखे कि, नरककी HA नाक० 88911 आली यातानानसों अनेक भांति पीडा दिये जाय हैं ॥ १७ ॥ जो पुरुष ,कुरु बड बक इनको वृथा काटे है वाको दूत धर्मराजके लोकमें छेदन कर हैं ॥ १८ ॥ जे पापात्मा अल्पबुद्धि मनुष्य वैश्वदेवके अंतमें आये भये भूखे अभ्यागतनको क्रूर दृष्टिसों देखे हैं ॥ १९ । उनका Etos शमीन्यग्रोधपालाशच्छेदनं कुरुतेवथा ॥ तस्यदूतैर्षमलोकेछेदपीडाप्रवर्तते॥१८॥ अतिथीनवैश्वदेवान्तेह्यागताचक्षुधयातुरान् ॥ बीक्षन्तेररिभर्येपापिनोऽत्यल्प बुद्धयः ॥ १९ ॥ तेषामुद्भियतेनात्रयुग्मंदत्वापदंहदि ॥ २० ॥ सदापापरताये तुक्षिप्यन्तेरौरवधुवम् ॥ येतुनिमन्त्रभोक्तारोवैश्वदेवविवर्जिताः ॥ २१ ॥ पाँव धरि दोनों आखें निकाली जाती हैं ॥ २० ॥ और जे सदा पाप ही करें हैं वे निश्चय कारकै रोवनरकमें डारे जाय हैं और जे मंत्रके विना भोजन करें हैं और वैश्वदेव कर्मसों रहित हैं ॥ २१॥ उनको मैंने विष्ठाके कूपनमें नीचको झुके हैं मुख जिनके ऐसे परेभये देखे हैं और जे धर्मशास्त्रनको दूपित करें हैं और तीर्थनकी जो निंदा करें २२ ॥ और आपको अच्छा समझे हैं और अहंकारी हैं वे शिलाके पीठिपर पीसे जाय विष्ठाकूपेषुपतितामयादृष्टाअधोमुखाः॥ दूषयेद्धर्मशास्त्राणितीर्थनिन्दांकरोतियः ॥ ॥२२॥आत्मसंभावित स्तब्धः शिलाप्टष्ठेषुपिष्यते॥ एतेवेपापिनोदृष्टायमलोकेसह स्वशः॥२३॥ इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेपापियातनावर्णनंनामनवमोऽध्यायः ॥९॥ नासिकेवउवाच ॥ अतःपरंमयादृष्टंमहतारोमहर्षणम् ॥ अद्भुतंतुशृणुध्वंभो मुन योयेसमागताः ॥३॥ एसे पापी मैंने यमलोकमें हजारन देखे हैं ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीमत्पडितपरमसुखतनयपडित- केशवप्रसादशम्मदिवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां पापियातनावर्णनंनाम नवमोऽ- ध्यायः ॥ ९ ॥ नासिकेत- बोले ॥ यात परे महजनोंके रोमांच करावनहारो- जो अद्भुत मैंने

18210
40
भाटी
अ०१०
ना के देखा है ताहि आये भये जे आप मुनीवर हैं वे सुनो। ॥ जलतीभई अनिके समान
कांति जिनकी ऐसे नरकमें मैंने देखे जिनमें यम दूतनकारकै पापी अनेक प्रकारसों जराय
जायहें ॥ २ ॥ ऊपरको जिनके केश और बड़ी कायावाले और पैनी हैं डा. जिनकी और
नरकाश्चमयादृष्टाज्वलदग्निसमप्रभाः॥ पापिनीयत्रदान्तेयमदूतैरनेकधा ॥२॥
ऊर्ध्वकेशामहाकायास्तीक्ष्णदंष्ट्राभयंकराः ॥ वक्रतीक्ष्णनखाग्राश्चसूचीवक्राभयं
कराः ॥३॥ त्रासका सर्वपापानांदूरदर्शनचक्षुषः॥ दूरश्रवणविज्ञानादीर्घकायाम
हावलाः ॥ ४॥ केशग्रहेणपापिष्ठान्संगृह्यव्यथयन्तिच ॥ विषयासक्तमनसांसु
खंचक्षणमेवहि ॥५॥
भयानक और टेढी तथा पैनी हैं नखोंकी नोंके जिनकी और सुइके समान हैं मुख जिनके ऐसे
भयानक ॥ ३॥ सब पापी मनुष्यनके त्रास देनेहारे दूरलौं देखनहारे हैं नेत्र जिनके दूरलौं सुननेको
है ज्ञान जिनको और दीर्घ कहिये लंबो है देह जिनको और बडे बलवान् ॥ ४॥ ऐसे दूत केश पकडकर
॥१२॥

पाप करनहारे पापी मनुष्यके केशनको पकडक दुःख देय हैं और - जिनके मन विपधनमें लगिरहे हैं उनके मुखनको भंजन करिकै पीडा देय हैं ॥५॥ हे द्विजो ! कल्पके अंत तप्त खंभोंमें बांधनेको दुःख होय है और जाने जो पाप किया है वह वा शुभ अशुभ कर्मको भोगे है ॥ ६ ॥ भवेदुःखंचकल्पान्ततप्तसूर्मीमयंद्विजाः॥येनयद्यत्कृतंकमसतर्भुक्तेशुभाशुभम्॥६॥ एवंतत्रमयादृष्टा पीडाः कर्मसमुद्भवाः॥हन्यमानानीयमानामयादृष्टाहानेकशः ॥७॥ तत्रकैश्चिद्धर्मदूतैरसिपश्चताडिताः ॥ कूटसाक्षिप्रदातार कूटकर्मरताश्चये ॥८॥ ऐसे वहाँ, मैंने कर्मनसों उत्पन्न भई पीडा देखी ओर मैंने मारे जाते ' तथा खेचे जाते अनेक ७ ॥ वहाँ कोई यमके दूतन करि असिपत्रनसों ताडन किये जाय हैं और झूठी गवाहोके देने- MARA

ना०के०
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०४३॥
ane.
भान्टी-
अ०१०
हार झूठे काम तत्पर मनुष्य ॥ ८ ॥ कुल्हाडानसों काटिक चोर नरकमें पहुंचाये जाय हैं और
प्राणिनक जे मारनेहार है वे यमके दूतनकार पीडा दिये जाय हैं और प्राणिनके दुःख देनहारे
हैं व रोगनके कष्टसों पीडित झोय में ॥ ९ ॥ घीको चुरावनहारा घीमें डारा जाय है और तेलको
नीयन्तेनरकेधोरेशिरश्छित्त्वाकुठारकैः ।।प्राणिनांघातकाश्चैवपीडितायमकिंकरैः॥
दुःखदा प्राणिनांग्रेतव्याधिकष्टेनपीडिताः ९ ॥ घृतचौरोघृतेक्षिप्तस्तैलेलापहा
रकः ॥ दुग्धचौरोभवेहुग्धेदिव्यवर्षसहस्त्रकम् ॥ १० ॥ देवतार्चनसेवायांभक्तिभाव
विवर्जिताः॥ दुष्टकर्मरतायेतुपाशैर्बद्धाःकदार्थनः ॥११॥ वाटिकाच्छेदितायेनदेव
प्रामादभंजकः ॥ कृतंकर्महत्येनपरात्रंद्विजपुङ्गवाः ॥ १२ ॥
चुरावनेहाशे तेल में डारो जाय है और दूधको चुरायन्नहारो दिव्य हजार पर्पलों दूधम पाडा
॥ १० ॥ देवत्ताक अर्चन और संवा जे भक्तिभावसे रहित होय हें और जे दुष्टकर्मनमें सदा
लगत रहे हैं के पाशनमें बांधिक कथित करे जाम हैं ॥ १३ ॥ और जे फुलबारीके काटनहारे
॥४॥

arer तथा पाये तथा देवताके मदिरको फोरनहारे हैं और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो फरेगये कर्मको चुराते अन्नको चुराते हैं ॥ १२ ॥ वे यमके इतनकार मारे भयो बडी करुणासों बहुत रोवें हैं और जे सव जीवनकी दयासों हीन हैं और निठुर तथा क्रूरमनवाले हैं ॥ १३ ॥ वे दूतनकरि तबताई नरकमें किंकरैर्वध्यमानास्तेरुदंतिकरुणनहु ॥ सर्वजीवद्याहीनानिष्टराफरमानसाः॥१३॥ नरकेपीडितादूतैर्यावचन्द्रदिवाकरौ ॥मार्गेषुच्छेदितावक्षाविकीर्णाःकंटकाःपथि ॥ ॥ १४ ॥ भवेत्तेषांवधोद्भूतैर्वजदण्डैश्चवाडनम् ॥ भोजनंविषसंमिश्रयोदद्यात्प्राणि नाहदि ॥ १५॥ तप्तलोहोमुखेतस्थदीयतेयमकिंकरैः॥ पतिसंत्यज्ययानारीप रपुंसिरवाभवेत् ॥ १६ ॥ पीडा दिये जाय हैं जबलौं सूर्य चंद्रमा रहेंगे और जे मार्गमें वृक्षनको काटें हैं और मार्गमें काँटे फैलाते हैं ॥ १४ ॥ उनको दूत वज्रके दंडनसों ताडन करें हैं और जो विप मिलायक प्राणिनको भोजन देय हैं ॥ १५ ॥ वाको मुखमें यमके दूत तप्त लोहको हैं और और जो नारी अपने पतिको भा के० है 1880 छोडिक पराये पतिसों रति कर है॥ १६ ॥ वा दुष्ट नारीको भयानक मुद्गरन ताडन करिके भाण्टी भयंकर यमके दूत दारुण दुःख देय हैं ॥ १७॥ और जलती आगिसों भरे भये लोहके खंभनसों बांधिक तपाये जाय हैं और जा पापीने अगम्यासों गमन कियो है ॥ १८ ॥ और जो सब शास्त्र- अ०१० तांना निरयेदृष्टांतडितांभीममुद्गरैः॥ दारुणैर्दीयतेदुःखंयमतर्भयंकरैः ॥ १७॥ प्रज्वलद्वनिसंपूर्णेलोहस्तंभेप्रतापनम्॥अगम्यागमनंयेनकृतंवैपापकारिणा ॥ १८॥ स्वगोत्रांमनसायातोयमलोकेसदुःखभाकू ॥ नैवपश्यतिदोषस्वपरदोषप्रकाशयेत्॥ ॥ १९॥ पच्यतेह्यन्धकूपेसपरकार्यविभेदकः ॥ दूषयेत्सर्वशास्त्राणिदेवतांब्राह्मणं नको दूपित करें है और जो अपने दोषको नहीं देखे है पाये दोपको प्रगट कर है ॥ १९॥ और पराये कामको बिगारनेहारो वह अंधकूपनाम नरको पचायो जाय है और जो सब शास्त्रनको दूषित करे है और देवता गुरु तथा ब्राह्मणको दूषित कर है ॥ २० ॥ वाकी जीभ काटी जाय है मैंने बहुतेरे देखे हैं और जो रत्नकी वस्तु और सोनेके गहने चुरावे हैं ॥ २१ ॥ और जो मूगनको तथा हीरानको चुरावे हैं वह कुंभीपाक नाम नरकमें पचायोजाय हैं और जो खल बालकनको धोखा देके एकांतमें जिह्वाच्छेदोभवेत्तस्यमयादृष्टोह्यनेकधा।योहरेद्नवस्तूनिसुवर्णाभरणानिच ॥२१॥ प्रवालवज्रहर्वायोकुम्भीपाकेसपच्यते ॥ एकान्तमिष्टमश्नातिबालकंवञ्चयन्खलः॥ ॥२२॥स्वमांसभक्ष्यमाणः समयादृष्टोद्विजोत्तमाः॥एतेपापामयादृष्टायमलोकेनरा धमाः॥२३॥इति श्रीनासिकेतोपाख्यानेनारकिकर्मवर्णननामदशमोऽध्यायः॥३०॥ मीठो खाय है ॥ २२ ॥ हे द्विजोत्तमो ! वाको मैंने अपनो मांस खातो भयो देखा है ऐसे नरन में अधम पापी यमलोकमें देखे हैं ॥ २३ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुरतत नयपंडितकशवप्रसादशमीझवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां कृतकर्मवर्णननाम दशमोऽध्यायः ।। 30 !!

मा०के० ॥४५॥ भान्टी अ०११ ॥ नासिकेत बोले ॥ या पीछे मैंने जो देखो सो तुमसों कहोंगों बालक, स्वामी, पंगा, वृद्ध ब्राह्मण और कन्या ॥ ३ ॥ इन सबनको छोडिक जो पहले खाय है और जो पतिव्रता पतिसों पहले खाप हैं ये बहुतसे शाल्मलीवृक्षमें स्थिर मैंने देखे ॥ २॥ वह वृक्ष मैंने देखो जरतीभई आ- नासिकेतउवाच ॥ अतःपरंमयादृष्टंयुष्मभ्यंकथयाम्यहम् ॥ बालकंस्वामिनंपगु वृद्धविनंचकन्यकाम् ॥१॥ त्यक्त्वाभुनक्तिपूर्वयोमरिचपवित्रता।एतेशाल्मालय क्षस्थामयादृष्टाानेकशः॥ २॥ सतुवृक्षोमयादृष्टोज्वलदग्निसमप्रभः ॥ पञ्चयोज नविस्तीर्णोदशयोजनमुच्छ्रितः ॥ ३ ॥ वस्मिन्बद्धाः पापिनस्तेवाड्यन्तेयमकि करैः॥ ताडितावनदण्डैश्चमुद्गरैर्भिन्नमस्वकाः ॥ ४ ॥ गिके समान वाकी कांति है पांच योजन अर्थात् बीस कोसको वाको विस्तार है और दश योजन अर्थात् चालीस कोसकी बाकी उँचाई है ॥ ३ ॥ तामें बधेभये पॉपी यमदूतनकार ताडना किये जाय हैं व वनके दंडनसो ताडना करे जाय ओर मुद्दरनसों उनके माथे झारे जाय हैं ॥४ फिरि वहां मैंने तप्तवालुक नाम नरक देखो वह जरतीभई अग्निक समान है वामें पापी जराये जॉय हैं ॥ ५ ॥ वामें हाय पाँव जिनके बँधे ऐरो पापी पीडा दिये जाय हें और जे आत्मघात करें पुनस्तत्रमयादृष्टोनरकस्तप्तवालुकः ॥ प्रज्वलदह्निसदृशोदह्यन्वेवत्रपापिनः॥५॥ शुधयावत्रपीड्यन्तेबद्धहस्तपदोनराः ॥ आत्मघातप्रकुर्वतिसत्यधर्मविवर्जिताः ॥ ॥६॥ तस्मिँल्लोकमयादृष्टाः पतिवास्तप्तवालुके । स्वधर्मपरित्यज्यपरधर्मरता नराः ॥ ७॥ नकृतंजलदानयैरन्नदानंचलोकृतम् ॥ नतोपिताविप्रगणास्तथाना निमुखेहुवम् ॥ ८॥ और सत्य धर्मसों रहित हैं ॥ ६॥ उनको वा लोकमें मैंने ततवालुक नाम नरकमें परेभये देखे और जे अपने धर्मको छोडिक पराय धर्ममें जाये हैं ॥ ७ ॥ और जिलने जलको दान ना के SOADCA- आ०टी० अ०११ Kocias तथा अन्नको दान नहीं किया है और न ब्राह्मणनके मणको संतुष्ट किया है और न अग्निके मुखमें होम किया है ॥ ८॥ और जे पुरूष गृहस्थीमें रहिक पंचयज्ञनको नहीं उनकी वा स्थानमें फिरि दूसरी देह होजाय है ॥ ९ ॥ वे मनुष्य अपनेही कर्मनसों कीरनकी गृहेस्थितायेपुरुषाः पञ्चयज्ञविवर्जिताः ॥ तस्मिनस्थानेमयादृष्टंपुनर्देहान्तरंभ वेत् ॥ ९॥ कृमियोनिषुजायन्तेनराः स्वेनैवकर्मणा कूटसाक्ष्यंवदेवस्तुकूटमानं करोतियः ॥ १० ॥ सोऽमुत्रस्वकृतेनैवदह्यतेवायुवहिना ॥ विप्रांश्चदेवताश्चै वगङ्गादिसरितस्तथा ॥ ११ ॥ नमन्यतेनरोयस्तुनरकेपीड्योभृशम् ॥ निर्दया- मानमारूढाजीवहिंसापरायणाः ॥ १२ ॥ योनिमें उत्पन्न होय है और जो झूठी गवाही देये हैं तथा धाटि तथा घाटि तालें हैं ॥ १० ॥ वह परलोकमें अपने कराये कर्मनसों पवन और आनि कारकै जराये जाय और जे नर ब्राह्मणनको नर ब्राह्मणनको और देवतानको तथा गंगा आदि नदीनको ॥ ११ ॥ नहीं मानें हैं वे नरकमें अत्यंत पीडित होय हैं ays ॥४६॥ क और जे निर्दयी हैं तथा मानी हैं और जीवहिंसामें परायण हैं ॥ १२॥ वे परलोकमें निश्चय यमके किंकरनकार पीडित करे जाय हैं और जे अधम मनुष्य मातृष्वसा जो मावसी है ताक पुत्रनको तथा गुरुके पुत्रनको ॥ १३॥ भाई करके नहीं माने हैं वे दंड जिनके हाथमें ऐसे महापोर यमके तेमुत्रनियतंचोरैः पीड्यन्तेयमकिंकरैः॥ मातृष्वस्सुतांश्चैवगुरोः पुत्रान्नराधमाः ।। ॥ १३ ॥ भ्रातृत्वेननमन्यन्तेपीडयन्तेमुत्रतेभृशम्॥ दण्डहस्तमहाघोरबंधबन्धा दिभिस्तथा ॥ एतत्सर्वमयादृष्टंद्विजा कौतूहलंमहत् ॥ १४ ॥ इति श्रीनासिकेनो पाख्यानेनारकिवर्णननामैकादशोऽध्यायः॥ १३ ॥ 22 दूतन करिके वध बंधन आदिसों परलोकमें बहुतही पीडा दिये जांय हैं हे ब्राह्मणो ! मैंने यह सब बडो कौतुक देखो ॥ १४॥ इतिश्रीमत्पण्डितपरमसुखतन्नयपण्डितकेशवप्रसादशम्मद्विवेदिकृतायां नाके० का ५४७॥ भान्टी अ० पर, नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायानरकवर्णननामएकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ॥ नासिकेत बाले ॥ या पीछे जो मैंने यमको शासन देखो ताहि कहाँगो वा दक्षिणके द्वारमें पाणीजन केशको भावे ॥ १ ॥ वहां नानाप्रकारके भयानक यमके दूत देखे जिनकी लंबी देह लंबे ओष्ठ और परको नासिकेत उवाच ॥ ॥ अथाव संप्रवक्ष्यामियदृष्टयमशासनम् ॥ तस्मिन्वै सक्षिणेद्वारेलिश्यन्तेपाणिनोजनाः ॥ १॥ तत्रनानाविधादृष्टादूतावैविभीषणाः ॥ दीर्घदेहाश्चलबोटाऊलकेशापयंकराः ॥ २ ॥ बराइलझाकाराः कृष्णवर्णाः कृशोदराः । अपरेसिंहपादाश्चव्याघ्ररूपास्तथापरे ॥ ३ ॥ माजीररूपिणश्चान्छे तन्नेत्रास्तुतथापरे । सर्पवृश्चिकरूपाश्चरौद्राभरणभूषिताः॥ ४ ॥ केश ऐसे अयायने ॥ २॥ उपमें काहूको सुआरको आकार है काले रंगके हैं पेट सुखोखो हुँ ओर उनके पाय सिंहकसे हैं और कोज व्यानक रूपमें हैं ॥ ३ ॥ भोऊ विलाबक्के रूपमें हैं और काहूके। ॥६ K

है
नत्र बिलावकले हैं और कोऊ साँप तथा विच्छूके रूपमें और भयानक आभरणनसों भूषित
हैं॥ ४ ॥ कोऊ त्रिशूलको लियो हैं और कोऊ दंड तथा शुद्रनको लिखे हैं और कोऊ खड्ग तथा
खटको धारण किये हैं और कोऊ भुशुंडी तथा परिघोंको लिये हैं ॥ ६ ॥ कोऊ मिंदिपाल जो
त्रिशूलधारिणः केचिदण्डसुदरधारिणः ॥ खगखेटधराः केचिद्धशुण्डीपरिचायु
धाः ॥ ५॥ भिदिपालघराः कचित्केचिन्मुसलपाणयः ॥ करालास्याः शक्तिधराः
केचित्परशुपाणयः ॥ ६ ॥ निर्मितायमराजेनयापानुग्रहकारिणा ॥ नानायुधध
रादूतास्ताडयन्तिदुरात्मनः ॥ ७॥
फन है ताहि लिये हैं और कोऊ देशल लिये हैं और कराल सुखके हैं और कोऊ शक्ति लिये हैं।
कोऊ फरसाको धारण किये हैं ॥ ६ ॥ पापीन पर अनुग्रह करनहारे जे यमराज हैं तिन
करिके बनाये गये हैं और नानाप्रकारके शस्त्रनके धारण करनेहारे दूत दुष्टनकी ताडना करें हैं ॥ ७ ॥

ना के SHA 1801 है भा०टी अ०१२ पाप कर्ममें जे रत हैं और जे क्रूर हैं तथा जिनको कलह प्यारा है ऐसे पापी मनुष्यनको यमदूत असिपत्रवननाम नरकमें डारे हैं॥ ८ ॥ और जे म्लेच्छकी वृत्तिसों जीविका करें हैं और जे चोरीके कर्मसों जीविका करें हैं ॥ ९॥ ये पहले जन्मके कर्मनसों बहुतसी यातना सहैं हैं और उनको कुत्ते पापकर्मरतानरांस्तथैवकलहप्रियान् ॥ क्षिपन्तियमदूतास्तेहासिपत्रवनान्तरे ॥ ॥ ८॥ पतिताः कालसूत्रेषुमयादृष्टाश्चकेचन॥जीवन्तिम्लेच्छवृत्त्यायेचौरको पजीविनः ॥ ९ ॥ पूर्वकर्मभिरेतवैसहन्तेबहुयातनाः ॥ भक्षयन्तिचताञ्जनः का कगृध्राःकुषन्विच ॥ ३० ॥ तत्रस्थानमयादृष्टामनुष्यानहुपीडिताः ॥ रौद्ररूपैर्म हाघोरयमदूतरितस्ततः ॥ ११॥ एकस्मिन्समयेदृष्टोमयावैवस्वतीयमः ॥महि षासनमारूढोमहाबलपराक्रमः ॥ १२ ॥ खाय हैं और कौआ तथा नीव चौथे }} १० ॥ वा स्थानमें मैंने भयंकररूप और महाघार यमदूतनकार बहुत पीडित मनुष्य देखे ॥ १३ एक समय मेंन्ने भैसके आसन पर बैठे भये 11४८॥

N महाबल तथा पराक्रमी वैवस्वत यमको देखो ॥ १२ ॥ हे द्विजो । कुंडलनसों शोभित श्रीमान् और दंड तथा फाँसीको लिये भये बुद्धिसों शोभायमान बडो है शरीर जाको और दूत करिकै वेष्टित है ॥ १३ ॥ क्रोधसे लाल हैं नेत्र जिनके ऐसे यम नरकनको देखते भये आये तब सब दूतगण उनको नमस्कार करिक कुण्डलालंकृतःश्रीमानदण्डपाशधरोद्विजाः ॥ बुद्धिशालीमहाकायोदूतैश्चपरिवा रितः ॥ १३ ॥ आगतोनरकान्वीक्षनक्रोधरक्तान्तलोचनः ॥ तदादूतगणाःसर्वेन त्वावस्याग्रतः स्थिताः॥ १४ ॥ यमउवाच ॥ शृणुध्वं वचनं दूताः शीघ्रं कुरुत माचिरम् ॥ विष्ठन्तिराक्षसाघोराभूतलेधर्मवर्जिताः ॥ १५ ॥ आगे आले होत भये ॥ १४॥ यम बोले ॥ हे दूतो। मेरो वचन सुनो और शीघ्र करो देरी न लगे पृथिवी- में धर्मरहित घोर राक्षस स्थित हैं ॥ १५ ॥ . 3 नाक ॥४९॥ भारी अ०१२. उनका शीघ्र लाओ और उन बलवाननसों डरनो न चाहिये धर्मराजके ऐसे कहने पे दून वेगसों महीतलमें आवत भये ॥ १६ ॥ और सब दूत मिलिकै जहाँ वे दानव स्थित हैं वहां जात भये और वहां उनके साथ भालो सुंदर तथा प्रास नाम शस्त्रसों युद्ध होत भयो ।॥ १७ ॥ तानानयध्वंत्वरितंनभेतव्यमहाबलान् ।। इत्युक्तोधर्मराजेनवेगेनैवमहीतले ॥३६॥ गतास्तमिलिताःसर्वे यत्रतेदानकाः स्थिताः ॥ तत्रतैरमवयुद्धंप्रासमुद्रतोमरैः ॥ ॥ १७ ॥ सायकैलोहदण्डैश्चखड्गैःशूलैर्भुशुण्डिभिः ॥ एवंतेषामभूशुद्धंमहद्वैरो महर्षणम् ॥ ३८ ॥ किंकरैःकालपाशेनजितास्तेराक्षसारणे ॥ पाशर्बद्धान्महादै त्यानानिन्युस्तेयमान्तिकम् ॥ ३९ ॥ और तीर लोहक दंडे तरवार त्रिशूल भुशुंडी इत्यादि अस्त्र शस्त्रन कारकै उन दानवन तथा दूतनों रोमांचित करनहारो वडा युद्ध होत भयो ।॥ १८ ॥ यमके किंकरनकरिके दे रासक्ष lak Nesil रणमें कालपाश कारके जीत गये और पाशनसों बंधे भये उन राक्षसनको वे दूत यमके समीप लावत भये ॥ १९ ॥ धर्मराजहू उनको देखिके बहुतही पोर होजात भये और अपने दूतन- को आज्ञा देत भयं कि, इनको तुम चित्रगुप्तके घर ले जाओ ॥ २० ॥ और चित्रगुप्तने उन धर्मराजश्चतानदृष्ट्वामहाघोरतरोभवत् ॥ स्वान्दूतान्प्रत्युवाचाथनीयन्तांचित्रवे श्मनि॥२०॥ चित्रगुप्तस्तुतात्सर्वान्कृमिकुण्डेषुन्यचिक्षिपत् ॥ एवं विप्राजगत्सर्व कालपाशवशंभवेत् ॥२१ ॥ युवानोबालकाः केचिवृद्धावैगर्भगाः परे ॥ एवंभू तानिसर्वाणिकालस्यवशवर्तिनः ॥ २२ ॥ येचपापेप्रवर्तन्तेधर्महीनाश्चमानवाः ॥ इहलोकेचदृश्यंतेदुःखदारिद्रयपूरिताः ॥ २३ ॥ सबनको कृमि जे कीड़े हैं तिनके कुंडनमें डरवाय दिये हे विप्रो । या प्रकार सब जगत् काल पाशके वशमें होय है ॥ २१ ॥ और कोई जवान कोई बालक कोई वृद्ध तथा और जे कोई गर्भ में स्थित हैं वे सब या प्रकार कालके वशमें हैं ॥ २२ ॥ और जे धर्महीन मनुष्य पापमें प्रवृत्त होय हैं ना०के० ॥१०॥ अ०१३ याहू लोकमें दुःख तथा दरिद्रता करि युक्त होयहै ॥ २३ ॥ और किया भयो शुभ अशुभ भान्टी कर्म अवश्यही ओगनो परे है ॥ २४ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपण्डितकेशवप्रसादशर्म- द्विवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ ॥ नासिकते बोले ॥ अवश्यमेवभोक्तव्यंकृतंकर्मशुभाशुभम् ॥ २४ ॥ इति श्रीनासिकेतोपाख्यानेय मशासनादिनिरूपणनामद्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ ॥ नासिकेतउवाच ॥ तत्रस्था नेमयादृष्टाधर्मिणश्चद्विजोत्तमाः ॥ फलंकृतस्यभोक्तव्यधर्मराजस्यचाज्ञया ॥ ॥ १॥ तत्रस्थानेमहानद्योमयादृष्टामनोहराः ॥ शर्करादधिदुग्धाज्यमधूनांच महानदी ॥२॥ और वा स्थान हे द्विजोत्तमो । मैंने अधर्मी देखे और धर्मराजकी आज्ञासों किये भयेको फल ॥५०॥ भोगनो आवश्यक है ॥ १ ॥ और वा स्थानमें मैंने मनोहर महानदी देखी और शर्करा दही AMA --- है दूध घी तथा मधु जो शहद है ताकी महानदी देखी ॥२॥ पूर्व तथा उत्तर दिशाके मध्यमें मैंने धर्मात्मा देखे वे सुंदर वस्त्र धारण करे भये और दिघ्यही आभरणनसों भूषित हैं ॥३॥ सुवर्णकी कुंडल धारण किये भये हैं और हार केयूर जे बाजू हैं तिनोंके धारण करन हारे और वीणा तथा वंशीके शब्दनकरि पूर्वोत्तरदिशोर्मध्येमयादृष्टाश्चधार्मिकाः ॥ दिव्याम्बरधरारम्यादिव्याभरणभू षिताः ॥ ३॥ हेमकुण्डलशोभाढ्याहारकेयूरधारिणः ॥ वीणावंशनिनादाढ्या श्चामरैरुपशोभिताः ॥ ४॥ उच्चासनसमारूढाह्यप्सरोभिरुपासिताः ॥ दिव्यत्र ग्गन्धलिप्तांगाविविधैरुत्सदैवताः ॥५॥ irr युक्त है और चमरनसों शोभित है ॥ ४॥ ऊँचे आसनपर बैठे हैं और अप्सरा उनकी सेवा करि दिव्य माला और दिव्यही हरिचंदन आदिके लेपनसों उनके अंग सुगांधत और नाना

सक०
मा
.
अ०१६
प्रकारके जे उत्सव हैं तिन कारके युक्त हैं ॥५॥ तपाये भये सुवर्णके वर्णके समान हैं वर्ण जिनको
ऐप्त सुकुटलसों शोभित या प्रकारके जे धर्मात्मा है वे यमके लोकमें निवास कर हैं ॥ ६॥ और
जिन पुरुपनने विप्रनमें जे मुख्य हैं तिनके लिये श्रद्धासों नाना प्रकारके दानदिये हैं अर्थात्
तप्तकाञ्चनवर्णाभामुकुटैरुपशोभिताः ॥ एवंविधाधार्मिकास्तेयमलोकेसमासते ॥
॥६॥ श्रद्धयाविप्रमुख्येभ्योदत्तानिविविधानिच ॥ अवदानानिवस्त्राणिहिरण्यंभ
क्ष्यभोजनम् ॥ ७॥ तिलदानभूमिदानंकृत्वं यैर्धामिकैनरैः ॥ तेलभन्तेऽखिलंसौ
ख्यं दानधर्मप्रभावतः ॥ ८ ॥ वर्णाश्रमस्थायेलोकानिजधर्मस्यपालकाः ॥
आगतान्वैश्वदेवान्तेह्यतिथीन्पूजयन्तिये ॥ ९ ॥
अन्नदान वस्त्रनको दान सुवर्ण भक्ष्य वस्तु तथा भोजनको दान कियो है ॥ ॥ ७॥ और तिलदान तथा
भूमिको दान जिन धम्मात्मा मनुष्यन करिके कियो गयो है वे दान तथा धर्मके प्रभावों पूर्ण सब सोख्य
पावे हैं ॥ ८॥ और जे लोग वर्ण तथा आश्रममें स्थित होके अपने धर्मको पालन करे और जे वैश्वदेवके
॥५१॥

पीछे आयेमये अभ्यागतनको पूजन करें हैं ॥ ९॥ दया तथा दाक्षिण्य करिक युक्त अपने धर्म में
स्थित जे संध्योपासन आदिकर्मनको और वेदाध्ययनको अपने धर्ममें स्थित होकै कर है ॥ १०॥ और जे
उत्तम नर गौ तथा ब्राह्मणको कष्टते उवारें हैं और जे वेद तथा शास्त्रनको सुनें हैं तथा ब्राह्मणनको
सन्ध्योपास्त्यादिकर्माणिवेदाध्ययनमेवच ॥ कुर्वन्तियेस्वधर्मस्थादयादाक्षिण्यसं
युताः ॥ १० ॥ गांचविप्रस्त्रियंकष्टादुद्धरन्तिनरोत्तमाः ॥ शृण्वन्तिवेदशास्त्रंयेकुर्वते
विप्रसेवनम् ॥ ११ ॥ तीर्थाटनंचकुर्वन्तिसदासंयमसंयुताः॥ पञ्चाग्निसाधकायेतु
क्रोधलोभविवर्जिताः ॥ १२॥
सेवन करें हैं ॥ ११॥ और जे सदा नियमयुक्त होके तीर्थाटन करें हैं और जे पंचाग्निको साधन करै
और क्रोध लोभ कारिक रहित हैं ॥ १२ ॥

नाके ३५२॥ भा अ०१३ और जाने कन्यादान कियो है और जाने धर्मसों वृक्ष लगाये हैं और यती तथा योगके करनहारे और निराहार व्रतमें तत्पर ॥ १३ ॥ और अकालमें अन्नके देनेहारे सस्ते समयमें सोनेके देनहारे और जाडेमें वस्त्रनके देनहारे तथा आगिसों तपावनहारे ॥ कन्यादानंकृतयेनरोपिताधर्मतोद्रुमाः ॥ यतिनोयोगयुक्ताश्चनिराहारायतव्रताः ॥ ॥ १३॥ दुर्भिक्षेऽन्नप्रदातारः सुभिक्षेचहिरण्यदाः॥ हेमन्तवस्त्रदातारोवह्निदाश्चतथै वच ॥ १४ ॥ परोपकारनिरताधर्माधर्मविचारकाः ॥ शास्त्रेषुनिरतानित्यनित्यं परहितेरताः ॥ एवेसर्वेमयादृष्टाधर्मलोकेनसंशयः ॥ ३५॥ इति श्रीनासिकेतो पाख्यानेपुण्यधर्मनिरूपणनामत्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ ॥ १४ ॥ और पराये उपकारके करनहारे और धर्म अधर्मके विचार करनहारे और सदा शास्त्रनको विचार करनहारे और जे नित्य पराये हितमें लगे रहते हैं ये सब मैंने धर्मराजके ::- ॥५२॥ 5 देखे यामें संदेह नहा है ॥ १५ ॥ इति श्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां नासिकेतो- पाख्यानभाषाटीकायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ नासिकेत बोले ॥ फिर मैंने वह स्थान देखो जहाँ धर्मात्मा रहें हैं और जहाँ पुष्पोदका नाम नदी है जामें निर्मल जल वहै है ॥ ३॥ और नासिकेतउवाच ॥ पुनःस्थानमयादृष्टंधर्मात्मायत्रतिष्ठति ॥ नदीपुष्पोदका नामजलंवहतिशीतलम् ॥ १ ॥ सुवर्णवालुकास्तस्यांतीरेनानाविधाद्रुमाः ॥ पुष्पाणिचसुगंधीनिधारयंतिचतेद्रुमाः ॥ २ ॥ नद्यास्तीरेहविप्रादृष्टवान्म न्दिराणिच ॥ तेषुक्रीडन्तिमनुजाः सदाधर्मस्यपालकाः ॥ ३ ॥ शीतमन्दसुग न्धैश्चपवनैःसेवितानराः ॥ दिव्यरूपधरानाय क्रीडन्तिनरपुंगवैः ॥ ४ ॥ वामें सोनेकी बालू है और किनारेमें नाना प्रकारके बहुतसे वृक्ष हैं और वे और वे वृक्ष नाना प्रकारके सुगंधित फूलनको धारण करे है ॥२ ॥ ॥ और हे विप्रो! वा नदीके किनारे बहुतसे मंदिर शीतल मंद सुगंध पवन देखे उन मंदिरनमें धर्मके पालनहारे मनुष्य क्रीडा करें हैं ॥ ३ ॥ शीतल मंद सुगंध पवन HTA ना के० ॥२३॥ भाषा अ० ११३ करिके सेवन किये गये मनुष्य और दिव्य रूपनको धारण करनहारी नारी श्रेष्ट नरनके साथ विहार करें हैं ॥ ४ ॥ और सिद्धनके तथा गंधर्वनके वृंदन करिके तथा किन्नरन करिके सेवित हैं और नाना प्रकारके वस्त्रनको पहिरे हुए नाना प्रकारके रत्ननसों शोभित हैं ॥ ६ ॥ रूपकी सिद्धगन्धर्ववृन्दैश्चकिन्नरैश्चोपसेविताः॥ नानावस्त्रपरीधानानानारत्नोपशोभिवाः ।। ॥ ५॥ रूपलावण्यसंयुक्तादृष्टमात्रामनोहराः ॥ संपूर्णचन्द्रवदनाःकर्णान्तायतलो चनाः ॥६॥ एवंविधाःस्त्रियोरस्यामोदतेपतिभिःसह ॥ पुष्पोदकायास्तीरतेनरानार्य श्वशोभनाः॥७॥ मुंदरताई है ता करिके संयुक्त हैं और देखनेहीसो मनकी हरनहारी हैं और पूरे चंद्रमाके समान जिनके मुख और कानों ताई हैं बड़े नेत्र जिनके ॥ ६ ॥ या प्रकारकी सुंदर स्त्र पतिनके साथ आनंद करि रही हैं वा पुष्पोदका नाम नदीके किनारे नर नारी हैं ॥५३॥ स ॥ और वहाँ बसते भये नर नारी पूर्व कर्मनसों नाना प्रकारके भोगनको भोगें हैं और धर्मराजके पुरमें बसनहारे नर तीनों लोकनमें विख्यात हैं ॥ ८ ॥ वहाँ न तौ क्षुधा लगे है और न पिपासा लगे है और न सरदी गरमीको भय है और न बुढापा है न मृत्यु हे न दुःख है और वसन्तेविविधान्भोगान्भुञ्जन्तेपूर्वकर्मणा ॥ नरास्त्रैलोक्यविख्याताधर्मराजपुरेस्थि ताः ॥ ८॥ नक्षुधानपिपासाचनापिशीतोष्णजंभयम् ॥ नजरानैवमृत्युश्चनदुःखं पलितानिच ॥ ९ ॥ एवंपूर्वकृतेनैवलभ्यतेसुखमुत्तमम् ॥ पापात्मानोदुराचारानि त्यंकलहकारिणः ॥ १० ॥ निन्दकाःसर्वजीवानांतवैसर्वत्रदुःखिताः॥विष्णुभक्तिर तायेतुविष्णुध्यानपरायणाः ॥ ११ ॥ न पलित है ॥ ९ ॥ ऐसे पूर्वजन्ममें किये भये सुकृतनसों उत्तम सुख प्राप्त होय है और पापात्मा दुराचारी और नित्य कलह करनहारे ॥ १० ॥ और सब जीवनके निंदक ये सर्वत्र दुःखी हैं ॥२४॥ ०१५ ना०के० रहे हैं और जे विष्णुकी भक्तिमें रत हैं और विष्णुहीके ध्यान में परायण हैं ॥ ११॥ वे मनुष्य भाटी यमलोककी वार्ताको भी नहीं सुनहैं और वे संसाररूपी समुद्रसे मुक्त होय हैं यामें संदेह नहीं है ॥ १२ ॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयपण्डितकेशवप्रसादशमंद्विवेदिकृतायां नासिकेतो शृण्वतेयमलोकस्यवार्तामपिजतेनराः ॥ संसारार्णवमुक्तास्तेभवन्त्येवनसंशयः॥ ॥१२॥इतिश्रीनासिकेतोपाख्यानेपुष्पोदकानदीवर्णननामचतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥ नासिकेतउवाच ॥ अथाहंसंप्रवक्ष्यामियममार्गस्यविस्तरम् ॥ अष्टाशीतिसहस्रा णियोजनालांप्रमाणतः ॥ ३॥ यमलोकस्यचाध्वानमाहुर्मानुषलोकतः॥२॥ याव्य पाशैर्वत प्रेतोहाहेतिप्ररुदन्पथि ॥ स्वगृहंतुपरित्यज्यपुरंयाम्यमनुव्रजेत् ॥३॥ पाख्यानभाषाटीकायां पुष्पोदकानदीवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४ ॥ नासिकेत बोले ॥ था पीछे मैं यमके मार्गको विस्तार तुमसों कहोंगो वह प्रमाणमें अट्ठासी हजार ॥५४॥ योजनको है ॥ ३ ॥ यह मनुष्यलोकके मार्गसों प्रमाण कहैं ॥ हैं २॥ या मार्गमें यमके हैं पाशन करि बॅधो भयो त हाय हाय ऐसे रोवतो भयो अपने घरको छोडिंके यमके लोकको जायहे ॥ ३ ॥ ओर असिपत्रवन कारकै युक्त वा मार्गमें बहुतसे दुःख क्षुधा तथा पिपासासों प्रेत सदा पीडित रहै है ॥ ४ ॥ तपी भई बालू करिक युक्त महाघोर वा मार्गमें मार्गेबहूनिदुःखानिअसिपत्रवनान्विते ॥ क्षुत्पिपासार्दितःप्रेतः प्राप्नोतिसततंद्वि जाः ॥ ४ ॥ नस्मिन्मार्गमहाघोरेतप्तवालुकसंयुते॥ क्वचिदङ्गारपर्यकाअन्धकारा वितद्विजाः॥५॥ क्रूरास्तेकिंकराःसर्वे पापिष्ठांस्वाडयंतिहि ॥ मूच्छितान्क्षणमात्रे णपतितान्पुनरुत्थिवान् ॥६॥ विनाधर्मणपापास्तेपात्यन्तेनरकेध्रुवम् ॥ महापा गोषपापानिजातिभ्रंशकराणिच ॥७॥ और हे द्विजो! कहीं अंधकारकार युक्त वामें अंगारनकी सज्जा हैं॥६॥ और क्रूर सब यमक दूत पापीनको ताडना करे हैं तब वे पापी मूच्छित्त होजाय हैं और क्षणमात्रहीमें गिरिके फिरि उठि आवे हैं ॥ ६॥ और धर्मके विना वे पापी निश्चय नरको डारे जाय है और महापाप उपपाप तथा ना०के० आब अ०१६ जातिसों गिरावनहारे पाप ॥ ७ ॥ और जे वर्णसंकर करनहारे तथा मलिन करनहारे और अपात्र करनहारे ऐसे पापनको जे अधम नर करें हैं ॥ ८॥ हे द्विजो । मनुकार कहे भये उन पापनको मैं कहाँगो ब्रह्महत्या मदिराको पीवनो चोरी गुरुकी स्त्रीसों गमन करनो ॥ ९ ॥ इन सबनको संकरीकरणानिस्युमलिनीकरणानिच ॥ अपात्रीकरणंपापंयेकुर्वन्तिनराधमाः ॥ ॥ ८॥ तान्यहंसंप्रवक्ष्यामिमनुनोक्तानिवैद्विजाः ॥ ब्रह्महत्यासुरापानस्तेयंगुर्वङ्ग लागमः ॥ ९॥ महान्तिपातकान्याहुःसंसर्गोपिचतैःसह ॥ गोवधोऽपेयपानंचपार दायर्यात्मविक्रयौ ॥ शुरुमातापितृत्यागःस्वाध्यायस्यसुतस्यच ॥१०॥ परिवितिता नुजेजन्तोःपरिवेदन येवच तयोदानंचकन्यायास्तयोरेवच्याजनम् ॥ ११ ॥ महापाप कहें हैं और इन पापिनको संसर्ग करनोहू महापातक है और गौको वयं अपेयको पीनो पराइस्त्रीसों गमन करनो अपनो विक्रय तथा गुरु माता पिता स्वाध्याय और पुत्रको त्याग ॥ १० ॥ और परिवित्तिपन और जीवको परिवेदन और उनको कन्यादान करनो तथा उन्हीको यजन करा- - बाग स्त्रा वनी ॥ ११ ॥ कन्याको दूषित करनो व्याजको सानो ऋतको छोडनो और तलाब तथा संतानको बेचनो ॥ १२ ॥ और वात्य अर्थात् संस्कारसों हीन होनो और वांधवनको त्याग और नौकरी लेके पावना और सब आकरनमें अधिकार करनो तथा बड़े यंत्रको चला- कन्यायादूषणचैववाधुषित्वंत्रतच्युतिः ॥ तडागारामदाराणामपत्यस्यचविक्रयः॥ ॥ १२ ॥ व्रात्यताबान्धवत्यागोभृतकाध्यापनंवथा ॥ सर्वाकरेवधीकारोमहाय न्त्रप्रवर्तनम् ॥ १३ ॥ हिंसौषधख्याजीवश्चाभिचारोमूलकर्मच ॥ इन्धनार्थमशु काणांह्रमाणामवपातनम् ॥ १४ ॥ आत्मार्थचक्रियारम्भोनिंदितान्नादनंतथा ॥ अनाहिताग्रितास्तैन्यमुपोषणमपक्रिया ॥ १५ ॥ वनो ॥ १३ ॥ और हिंसा औपध तथा स्त्रीसों जीविका करनी और मारण कम तथा मूलकर्म करनो और ईंधन के लिये हरे वृक्षनको काटनो ॥ १४॥ और अपने लिये कामको आरंभ करनो मा०० ॥५६॥ ANA अ०१६ तथा निंदित अन्नको सानो और अग्निहोत्र न करनो चोरी करनो और काहूको पोषण नभाल्टी करनो अपकार करनो ॥ १५ ॥ और धान्य अथवा पशुको चुरावनो और पुत्रकी स्त्रीको सेवन करनो और स्त्री शूद्र वैश्य इनको वध करनो और नास्तिक होनो ये उपपातक हैं॥ १६॥ ब्राह्म- धान्यस्याथपशोः स्वैन्यमपत्यस्त्रीनिषेवणम् ॥ स्त्रीशूद्रविकृतवधोनास्तिक्यंचोप पातकम् ॥ १६ ॥ ब्राह्मणस्यरुजाकृत्यं प्रातिर यमद्ययोः ॥ मैथुनपुंसिजैहयंचजा निभ्रंशकरस्मृतम् ॥ १७ ॥ खराश्वोष्ट्रमृगणानामजाविकवधस्तथा ॥ संकरी करणंज्ञेयंमीनाहिमहिषस्यच ॥ १८॥ णको दुःख देनो और न सूंघनेयोग्य वस्तुको तथा मद्यको सुंघनो ओर कुटिलता करनी तथा पुरुषमें मैथुन करनो ये सब जातिसों भ्रंश करनहारो अर्थात् जातिते मिरावनहारे हैं ॥ १७ ॥ गदहा घोडा ऊँट हरिण और एण जो एक प्रकारका मृग हे ताको वध तथा भेडी बकरीको वध और मछली साँप तथा भैंसेको वध इन सबनको संकरीकरण जानिये ॥ १८॥ निदित मनुष्य- नसों धन लेनो वाणिज्य करनो और शूद्रकी सेवा करनी और झूठ बोलनो ये अपात्रीकरण है ॥ १९ ॥ चिउंटी कीडे मकोडोंकी हत्या भोजनके साथ मद्यका संवन, फल, समिधा तथा फूलोंकी निंदितेभ्योधनादानवाणिज्यंशूद्रसेवनम् ॥ अपात्रीकरणंज्ञेयमसत्यस्यचभाष णम् ॥ १९ ॥ कृमिकीटकयोर्हत्यामद्यानुगतभोजनम् ॥ फलैधाकुसुमस्तेय मधैर्यचमलावहम् ॥ २०॥ एभिस्तुषविधैःपापैःपच्यतेतेनराधमाः ॥ पापकर्म रतायेचसर्वधर्मविवार्जिताः ॥ २१ ॥ अदत्तदानाः कृपणागवितालोभसंयुताः ॥ विषयासक्तमनसोबुद्धिमोहान्वितानराः ॥२२॥ ॥ इति श्रीनामिकेतोपाख्या नेपापनिरूपणनामपञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ चोरी और कायरता पापकारक हैं जे पापकर्मनमें रत हैं तथा जे सब धर्मनसों रहित हैं वे अधम नर इन छः प्रकारके पापनसों नरकमें पचाये जायें हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ जिन्होंने कबहुँ दान नही

०के०
१९७॥
માન
अ०१६
दियो है वे और कृपण गर्षित तथा लोभी और जिनके मन विषयनमें लगि रहे हैं और बुद्धिको
मोह जो अज्ञान है ता कारक युक्त है वे सब नरकनमें पचाये जाय हैं ॥ २२ ॥ इति श्रीमत्पण्डितप-
रमसुरुतनयपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां
पंचदशोऽध्या-
नासिकेतउवाच ॥ ज्ञालाज्ञातेषुपापेषुक्षुद्रेषुचमहत्सुच ॥ षट्सुषसुचमासे
पुप्रायश्चित्तंतुयश्चरेत् ॥१॥ निष्कल्मषोनरोविप्राःसकृतान्तनपश्यति ॥ प्रायश्चित्त
मकृत्वेहनरोभवतिनारकी ॥ २॥ प्रायश्चित्तंचरेवस्तुवाङ्मनःकायकर्मसु ॥ सप्रा
प्नोतिशुभाँल्लोकान्देवगन्धर्वसेवितान् ॥ ३ ॥
यः ॥ १९॥ नासिकेत बोले ॥ कि छोटे वडे जाने न जाने पापनमें छः छः महीना पोछे जो प्रायश्चित्त-
को करै है ॥ 3 ॥ हे ब्राह्मणो ! पापनसों रहित वे मनुष्य कृतांत जे यम हैं तिनको मुख नहीं देखें
और जो प्रायश्चित्तको नहीं करें है वह नारकी होय है ॥२॥ और जो मनुष्य वाणी मन तथा
॥९॥

कायके कर्मनसों प्रायश्चित्तको कर है वह गंधर्वनकारकै सेवन करे गये शुभ लोकनको प्राप्त होय है ॥ ३ ॥ सदा वेदाभ्यासको करनहारो और नित्यु तीर्थनको सेवन करनहारो तथा नित्य जितेंद्रिय नर सत्यही यमको नहीं देखे है ॥ ४ ॥ और प्रातःस्नान करनहारो पुरुप यमकी वेदाभ्यासरतोनित्यनित्यंतीर्थोपसेवकः ॥ नित्यंजिवेन्द्रियःसत्यंयमरौद्रंनपश्य ति ॥ ४॥ याम्यहियातनादुःखंप्रातः स्नायीनपश्यति ॥ प्रातःस्नानेनपूज्यन्ता पिपापकृतोनराः ॥ ५ ॥ पृथिवीकाञ्चनंगांचमहादानानिषोडश ॥ दत्त्वातुन निवर्तन्तेस्वर्गलोकाद्विजोत्तमाः ॥६॥ पुण्यासुतिथिषुप्राज्ञोव्यतीपातेचसंक्रमे ॥ स्नात्वादत्त्वाचयत्किंचिन्नैवगच्छंतिदुर्गतिम् ॥ ७ ॥ यातनानके दुःखनको नहीं देखे हैं प्रातःकालके स्नानसों पापीहू पूजे जाय हैं ॥५॥ हे द्विजोत्तमो । पृथि- वी सुवर्ण गौ तथा षोडश महादाननको देकरिक प्राणी स्वर्गलोकते नही लोटें हैं ॥ ६॥ पवित्र अमा- वस्या आदि तिथिनमें व्यतीपातमें संक्रान्तिमें स्नान करिके और थारोसो दान करिक दुर्गतिको

०के०
१९८॥
भा०टी०
अ०१६
नहीं प्राप्त होय हैं ॥ ७॥ दाता दारुण जो गैरवको मार्ग है तामें नहीं जाय हैं और मर्त्यलोकमें धनसों
वर्जित जो कुल है तामें नहीं उत्पन्न होय हैं।॥ ८॥ सत्य बोलनहारो तथा सदा मौन रहनहारो और मधुर
वचन कहनहारो और क्रोधको न करनहारो सदा क्षमा करनहारो और बहुत न बोलनहारो तथा
नैवाक्रमन्तिदातारोदारुणरौरवपथम् ॥ मर्त्यलोकेनजायन्तेकुलेधनविवर्जिते ॥
॥ ८॥ सत्यवादीसदामौनीप्रियवादीचयोनरः अक्रोधनक्षमाचारोनातिवागन
सूयकः ॥ ९॥ सदादाक्षिण्यसंपन्नःसर्वभूतहितेरतः ॥ गोप्ताचपरधर्माणांवक्तापरयु
णस्यच ॥ १० ॥ परस्वतणमात्रंचमनसापिनयोहरेत् ॥ नपश्यन्तिद्विजश्रेष्ठाएते
नरकयातनाम् ॥११॥
असूयारहित मनुष्य ॥ ९॥ और सदा चतुराईकार युक्त और सब प्राणीनके हितमें रत और पराये
धर्मका रक्षण करनहारे तथा पराये गुणनको प्रगट करनहारो॥ १० ॥ और तृणमात्रहु पराये धनकी
॥५८॥

जो मनसोहू जे चिंता नहीं करें हैं हे द्विनश्रेष्ठो! वे नरककी यातनाको नहीं देखें हैं ॥ ११॥ जो मन- सोहूँ पराई स्त्रीको सेवन नहीं कर है वा कारकै दोनों लोक समेत पृथ्वी धारण की गई ॥ १२ ॥ ताते धर्ममें रत पुरुषन करिक पराई दाराके सेवनको त्याग करनो योग्य, हे और जे पराई दारान. मनसाचपरेषांयाकलबाणिनसेवते ॥ सहलोकद्वयेनैवतेनावश्यंधराधता ॥ १२॥ तस्माद्धर्मरतैस्त्याज्यपरदारोपसेवनम् ॥ यान्तियेपरदारांस्तेनरानिरयगामिनः ॥ ॥ १३ ॥ मातरंपितरंयस्तुह्याराधयतिदेववत् ॥ संप्राप्तेवाईकेकालेनसयातियमा लयम् ॥ १४ ॥ अतश्चैवस्त्रियोधन्या शीलस्यपाररक्षणात् ॥ शीलभङ्गेननारीणां यमलोकःसुदारुणः ॥ १५ ॥ सों गमन करें हैं वे नरकगामी होय हें ॥ १३ ॥ जो देवताके समान माता पिताकी सेवा करें वह वृद्धावस्थाके आवनेपे यमलोकको नहीं जाय है ॥ १४॥ याहीते शीलकी रक्षा करनेसों ne

ना के०
६९॥
मा०वी०
स्त्रा धन्य हैं और शीलके अंग होनेसे नारीनको अति दारुण यमको लोक मिले है ॥ १६ ॥ गोके
देनेसों मनुष्य वा मार्गमें सुखसों जाय है और हाथी घोडे तथा रथ देनेसे यमको मार्ग मनुष्यन-
को सुख देनेहारो होय है ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदि-
तस्मिन्मार्गसुखशान्तिगोप्रदानेनमानवाः ॥ गजाश्वरथदानेनयममार्गःसुखाव
हः ॥१६॥ इति श्रीनासिकेतोपाख्यानेपुण्यकर्मवर्णननामषोडशोऽध्यायः॥ १६॥
नासिकेतूउवाच ॥ पुनरेवप्रवक्ष्यामियममार्गभयंकरम् ॥ तल्लिन्मार्गमहाघोरेवि
षमाः पर्वताः कचित् ॥१॥ कील काश्चकचिदोराअसिपत्रवनंकचित् ॥ क्वचिद्वर्ष
न्तिपाषाणान्कचित्संतप्तवालुकाः॥२॥
कृतायां नासिकेतोपाख्यानापाटीकायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ नासिकेत बोले ॥ फिरिहूँ भयं
कर यमके मार्गको कहोंगो वा महाघोर मार्गमें कहूँ २ अति विपल पर्वत हैं ॥ ३ ॥ और वा-
॥६॥

मार्गगें कह तो बडी घोर लोहेकी कीलें हैं और कहुँ असिपत्रनको वन हे और कहूँ पत्थर वर्षे और कहुँ संतप्त वालुका है ॥ २ ॥ और कहूँ हिमालयते सौगुनो अधिक वडो दारुण शीत है और कहूँ बडो भयंकर अंधकार है और कहूँ बडो दारुण घाम है ॥ ३ ॥ कहूँ he. हिमालयाच्छतगुणंकचिच्छीतसुदारुणम् ॥ अन्धकारमहारौद्रंकचिदर्भःसुदारु णः ।। ३ ॥ शुरधारामयोमार्गः कचिद्वैपयशोणितम् ॥ तत्रवैतरणीनामनदक्षुिद्रा अयंकरा ॥ ४॥ शतयोजनविस्तीणांकाकगृधैः समन्विता ॥ तस्यांमज्जन्तिपापि छादुःखशोकसमन्विताः ॥५॥ गार्ग छुराकीसी धार है और कहूँ पीव और लोह है वहां बडी भयानक क्षुद्र वैतरणी नाम नदी है ॥ ४ ॥ वह सौ योजन अथात् चारसौ कोशकी चौडी है और कौआ तथा गीधनकारक ना के. ॥६॥ . भान्टी वे ॥ अ०१७ युक्त है वह नदीमें दुःख तथा शोकसों युक्त पापी डूबे हैं ॥ ५ ॥ और हे द्विजोत्तमो! गौके दानके करनहारे मनुष्य वाके पार उतरि जाय हैं और जे मनुष्य तीर्थनके स्नानमें रत रहे हैं उनको वह नदी सुखसों उतरने योग्य है ॥ ६॥ वाही मार्गमें जे धमिष्ट हैं वे सुखयुक्त रहे हैं हे द्विजोत्तमो! गोप्रदानस्यकतारस्तेतरन्तिद्विजोत्तमाः ॥ तीर्थस्नानरतैर्मत्यैः सासारत्सुतराभ वेत् ॥ ६ ॥ तस्मिन्नेवतुमागैयेमिष्ठाःसुखसंयुताः एकएवास्तिसर्वत्रव्यवहारोद्धि जोत्तमाः ॥७॥ एकस्मिन्समयेविप्राधर्मराजसभांप्रति ॥ सूर्यतेजःप्रतीकाशोह्या गतोनारदोमुनिः ॥ ८॥ यमस्तुनारदंदृष्ट्वाप्रत्यूत्थायकृताञ्जलिः ॥ अयंपाद्यादि भिश्चैवनारदंप्रत्यपूजयत् ॥९॥ सर्वत्र एकही व्यवहार है ॥ ७ ॥ हे वित्रो ! एक समय धर्मराजकी सभाको सूर्यके समान हे तेज जिनको ऐसे नारदमुनि आवत भये ॥ ८॥ तव यम नारदमुनिको देखतेही हाथ जोरि अटके ठाठे होत ॥६०॥ D भये और अयं पाद्यादि कारक नारदमुनिको पूजत भये ।। ॥ और देवतानकोसो है दर्शन जिनको ऐसे नारदमुनि आपनपे बैठेभये ऐसे शोभायमान भये जैसे आकाशमें चंद्रमा शोभित होय है ॥ १० ॥ ता पीछे वैवस्वत राजा नारदमुनिसों बोलत भय कि, हे द्विजश्रेष्ठ । आपको आवनो आसनेचोपविष्टस्तुनारदोदेवदर्शनः ॥ शोभतेस्ममहातेजास्तारापतिरिवाम्बरे ॥ ॥१०॥ ततोवैवस्वतोराजानारदंप्रत्युवाचह ॥ स्वागतंभोद्विजश्रेष्ठब्रह्मपुत्रमहामुने ॥११॥ अद्यमेसफलंजन्मममाघसफलदिनम् ॥ अद्यमेसफलंसर्वभवदालोकनान्मु ने ॥ १२ ॥ किमर्थमिहचायातोह्यागमनकारणम्॥ नारदउवाच॥ भवनादर्शना थायब्रह्मलोकादिहागतः॥ धर्माधर्मस्यसर्वस्यनिर्णयद्रष्टुमागतः॥१३॥ इति श्रीना- सिकेतोपाख्यानेवैतरणीवर्णननारदागमनकुथननामसप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥ अच्छा भयो है ब्रह्माके पुत्र ! आपको नमस्कार ॥११॥ आज मेरो जन्म सफल भयो आज मेरो दिन सफल है । हे मुनि ! आपके देखनेसे आज मेरो सब सफल भयो ॥ १२ ॥ आप यहां काहेके A १

ना०के०
॥६॥
भान्टा
अ०१८
लिये आये हैं आवनको कारण कहिये ॥ नारद बोले ॥ कि, मैं आपके दर्शनके लिये ब्रह्मलोकते
यहां आयो हौं और धर्म तथा अधर्मके देखनेको आयो हौं ॥ १३ ॥ इतिश्रीमत्पण्डितपरमसु-
खतनयपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायां सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
नासिकेतउवाच ॥ ॥ तयोरेवंसंवदतो रदस्ययमस्थच ॥ तत्रस्थानेचदिव्यानां
विमानानांशतानिच ॥ ३ ॥ भेरीमृदंगादिघोषैर्गीतवादित्रनिरस्वनैः ॥ घण्टामई
लवीणानांरवेणपणवस्यच ॥ २॥ आगतानिसहस्राणितेजापुञ्जयुतानिच ॥ तेनवै
महसाविप्रायमोन्त नमागमत् ॥ ३॥
नासिकेत बोले ॥ नारद और यम ये दोनों ऐसे बातें कहरहे कि, वाही समय वहां
सैकरान दिव्य विमान आये ॥ १ ॥ जिनमें भेरी मृदंग आदि शब्द हैं तिन करिके और घंटा
ढोल तथा वीणानके शब्दनसों तथा पणवके शब्दसों शब्दायमान है ॥ २ ॥ ऐसे तेजके पुंजनसों
॥६॥

भये युक्त हजारनही विमान आवत भये हे ब्राह्मणो ! वाही तेजसों' यम अंतर्धानको प्राप्त होत ॥ ३ ॥ और ब्रह्मपुत्र जे नारद मुनि हैं वेहू आश्चर्यमें होगये और कुछ नहीं कहत भये और क्षण- मेंही भयसे पीडित तथा भ्रष्ट हे मन जाको ऐसो धर्मराज आवत भयो ॥ ४ ॥ नारद बोले ब्रह्मपुत्रोविलक्षोभूदवदन्नेवकिंचन ॥ क्षणे वागतोधौभया? भ्रष्टमानसः ॥ ४ ॥ नारद उवाच ॥ सत्यंब्रूहिमहाराजविष्णुतुल्यपराक्रम ॥ असुराराक्षसाघोराः सर्वैतेवशसंस्थिताः ॥ कस्मात्त्वंभयसंत्रस्तोवायुवेगेननिर्गतः ॥ ५ ॥ धर्मराज उवाच ॥ ॥ अतिगृह्यांमुनिश्रेष्टकांपापप्रणाशिनीम् ॥ ६॥ कि, हे विष्णुतुल्य पराक्रम महाराज तुम सत्य कहौ कि, असुर और घोर राक्षस ये सब आपके वशमें है सो तुम काहेसों भयभीत होक पवनकेसे वेगसों निकल गये ॥ ५ ॥ ॥ धर्मराज बोले ॥ हे मुनिश्रेष्ठ । बहुतही गुप्त पापनकी नाश करनहारी जो कथा है ताहि तुमसों २०० कहाँही हे विद्वन् ! संपूर्ण धर्मको बढावनहारी है ॥ ६ ॥ मृत्युलाकर्म बडा पंडित और सत्यव्रतमें परायण तथा प्रजानको पालन करनहारो जनकनाम विख्यात राजा होत भयो वह जितेन्द्रिय हो और दानके देनेमें तत्पर हो और क्रोध तथा मात्सर्यसों रहित हो ॥ ७ ॥ भाल्टी १६२॥ अ०१८ ब्रवीमिसकलां विद्वन्पुनर्धमविवर्धनीम् ॥मृत्युलोकेमहाप्राज्ञःसत्यव्रतपरायणः॥७॥ जनकोनामविख्यातःप्रजानांपरिपालकः ॥ जितेंद्रियोदानपरः क्रोधमात्सर्यवर्ज़ि तः॥ ८॥ तस्यपत्नीसुरूपासीनाम्नासत्यव्रताशुभा ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णासर्वधर्म परायणा ॥ ९॥ सत्यवता यह जाको सुंदर नाम है और सुंदर रूपवाली सब लक्षणसों संपन्न तथा सब धर्मनमें परा- यण ऐसी वाकी रानी रही ॥ ८॥ जो विष्णुकी बुद्धिसों सदा पतिकी सेवा करती आरे पतिही है प्राण जाके ऐसी वह सदा भत्ताके वाक्यमें रत रहती और पतिके सुखी होनपै नित्य सुखी रहती और वाके दुःखमें दुःखी रहती ॥९॥ चतुर ही और सदा प्यारी बात कहती और क्रोध कबहूँ नहीं करती और भतारविष्णुबुद्धयायानित्यंशुश्रूषवेशुभा ॥ पतिव्रतापतिप्राणामतवाक्यसदार ता ॥ १०॥ सुखितेसुखितानित्यंदुःखितेदुःखिताचया ॥ दक्षाचप्रियवानित्य मक्रोधाऽनृववर्जिता ॥ ११॥ कबहू झूठ नहीं बोले है और सब सुंदर गुणनकार शोभित वह नित्य अतिथिनको पूजन करती ॥ ॥ १० ॥ जनकराजाकी प्यारी भार्या जो धर्मके कार्यमें सदा रत रहे है वह श्रेष्ट विमानमें Fhar भान्टी. भाक० बठिकर ब्रह्मलोकको जाय है ॥ ११ ॥ इन्द्र आदि सब देवतानके गण वाके सन्मुख आये और हे विभो ! पितामहनेहू वाको प्रणाम किया है ॥ १२ ॥ और जनक इन्द्रालयमें प्रविष्ट rner अ०१८ ६३॥ - अतिथिः पूज्यनेनित्यंसर्वसद्धणशालिनी ॥ जनकस्यप्रियाभार्याधर्मकार्यसदार ता ॥ १२ ॥ सायातिब्रह्मणोलोकं विमानवरमास्थिता ॥ शकादयोदेवगणास्व स्याः संमुखमागताः॥१३॥ पितामहश्चतस्यावैप्रणतिकृतवान्विभो ॥ इंद्रालयस्य मध्येतुप्रविष्टोजनकस्तथा ॥ १४ ॥ भयो वह देवी वा पतिको लेके संपूर्ण देवतानके गण समेत ॥ १३ ॥ ब्रह्माके लोकमें गई. हे मुनी- श्वर ! मैं वाके तेजसों भयभीत होके छिपि गयो यह कारण मैंने आपसों निवेदन कियो ॥ १४ ॥ ।

नासिकेत बोले ॥ हे मुनीश्वरो । इत्यादि जो मैंने वहां देखोहो सो सब आप लोगनके आगे निवेदन कियो यामें संदेह न करनो चाहिये मैंने सब प्रत्यक्ष देखो है ॥ १५॥ वैशंपायन बोले ॥ हे जनमेजय है तंगृहीत्वापतिदेवी सर्वदेवगणैर्वृता ॥ गतासाब्रह्मणोलोकंतस्यावतेजसामुने ॥ ॥ १५ ॥ लीनोहंभयभीतस्तुकारणंतेनिवेदितम् ॥ नासिकेतउवाच ॥ ॥ इत्या दिसर्वमाख्यातंतत्रदृष्टमुनीश्वराः ॥ १६ ॥ संदेहोनात्रकर्तव्यः सर्वप्रत्यक्षदर्श नात् ॥ वैशम्पायनउवाच ॥ जनमेजयमहाराजपूर्वकल्पाश्रितांक थाम् ॥ १७॥ महाराज । पूर्वकल्प भई या कथाको श्रद्धायुक्त होकै सुनें है वह सब पापनते छूटि जाय है ॥१६॥ नासिकेत जाके ॥६॥ Flic कार कहो भयो यह आख्यान परम पवित्र है ॥ १७॥ धन्य स्वस्ति कल्याण ताको अयन कहिये स्थान है व्याधि रोग है ताको और दारिद्रयको नाश करनहारो है याको सुनतो भयो मनुष्य भाटी अ०१८ शृणोतिश्रद्धयायुक्तः सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥ नासिकेतेनकथितमाख्यानंपावनंमह त् ॥ १८ ॥ धन्यस्वस्त्ययनंचैवव्याधिदारिद्र्यनाशनम् ॥ शृण्वन्नरोविमुक्तःस्या जन्मसंसारबन्धनात् ॥ १९॥ ॥ इति श्रीनासिकेतोपाख्यानेधर्माधर्मनिरूपणं नामाष्टादशोध्यायः॥ १८॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः ॥ श्रीरस्तु ॥ ॥६॥ जन्मरूपी संसारको बंधन ताते छूटि जाय है ॥ १८॥ १९ ॥ इति श्रीमत्पंडित परमसुखतनयपडित-

केशवप्रसादशमदिवोदिकृतायां नासिकेतोपाख्यानभाषाटीकायांधर्माऽधनिर्णयो नाम अष्टादशो-
ऽध्यायः ॥ १८॥
वस्वब्यङ्कनिशाकरेश्वगणितेवर्षे शुभेवैक्रमे माघमास्यसितेदलेगुहतिथो श्रीसोम्यवारेशुभे ॥
दीकेयंसरलामनुष्यवचसाश्रीकेशवायद्विजानायिप्रहितायवैश्यमणये श्रीक्षेमराजाय या ॥१॥

"
इंद पुस्तकं कल्याणनगर्या श्रीकृष्णदासात्मज-गंगाविष्णोः अध्यक्ष
लक्ष्मीवेंकटेश्वर" मुद्रणालये पंडित-शिवदुलारे वाजपेयीत्यनेन
स्वाम्यथै मुद्रयित्वा प्रकाशितम् । संवत् १९८०, शके १८४५ ।
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास,
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर " स्टीम् प्रेस, "श्रीवेङ्कटेश्वर " स्टील प्रेस,
कल्याण-मुंबई.
खेतवाडी-मुंबई.

श्रीवेङ्कटेश्वरीय-क्रय्यपुस्तकोंकी संक्षिप्त-सूची।
नाम.
की रु. आ.
नाम.
पद्मपुराण सम्पूर्ण ५५०००ग्रन्थ बहुत
पुस्तकोंके द्वारा शुद्ध होकर छपा
तैयार है
२०००
हरिवंशपुराण सटीक
१०-०
साम्बपुराण-इसमें सूर्योपासनाकी सांगो-
पांग विधि कही गयी है
२-०
श्रीवाल्मीकीयरामायण संस्कृत मूल
और अत्युत्तम भाषाटीकामाहात्म्य
की. रु. आ.
और अनुक्रमाणका सहित मोटा
कागज सुंदर अक्षर
३०-०
श्रीवाल्मीकीयरामायण केवलभाषा दो
जिल्दोंमें
१५-०
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण तनिश्लोकी
रामानुजी भूषण संस्कृत टीकासहित ३०-०
श्रीवाल्मीकीयरामायण रामाभिरामीटीका १५-०
तथा देशी कागज
१५-०

जाहे-
नाम.
रात.
की. रु. आ.
की. रु. आ.
श्रीवाल्मीकीयरामायण सुंदरकांड मूल अध्यात्मरामायण केवलभाषा सुन्दर
२-८ जिल्दबंधी
३-८
अध्यात्मरामायण सटीक चिकना श्रीमद्भागवत श्रीधरीटीका और टिप्पणी-
४-० सह ग्लेज कागज
२०.०
तथा रफ कागज
३-८ भारतसार सस्कृत
अध्यात्मरामायण भाषाटीका सहित
श्रीमद्भागवतसचूणिक मोटे अक्षर उत्तम
अन्यात्मरामायण मूल (गुटकारेशमी)
कागजकी (सप्ताह बांचने में
पाठ करनेको अत्युत्तम
१-४ परमोपयोगी)
१५-०
पुस्तकें मिलनेका ठिकाना-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
"लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना कल्याण--मुंबई.

अत्रेयमभ्यर्थना। अस्माकं मुद्रणालये वेद-वेदान्त-धर्मशास्त्र प्रयोगयोग-सांख्य-ज्योतिष-पुराणेतिहास-वैद्यक-मंत्रस्तोत्र- कोश-काव्य-चम्पू-नाटका-ऽलंकार-संगीत-नीति-कथाग्रंथाः, बहवः स्त्रीणां चोपयुक्ता ग्रंथाः, बृहज्ज्योतिषाण- वनामाबहुविचित्रचित्रितोऽयमपूर्वग्रन्थः संस्कृतभाषया, हिन्दीमा ड्यादिभाषाग्रन्थास्तत्तच्छास्त्राद्यर्था- नुवादकाः, चित्राणि, पुस्तकमुद्रणोपयोगिन्यो यावत्यस्सामग्र्यः, स्वस्खलौकिकव्यवहारोपयोगिचित्रचित्रिता- लिखितपत्रवत्पुस्तकानि च, मुद्रायत्वा प्रकाशन्ते सुलभेन मूल्येन विक्रयाय । येषां यत्राभिरुचिस्तत्तत्पुस्त- काद्युपलब्धये एवं नव्यतया स्वस्वपुस्तकानि समुद्रयिषुभिः सुलभयोग्यमौल्येन सीसकाक्षरैः स्वच्छोत्त- मोत्तमपत्रेषु मुद्रिततत्पुस्तकानां स्वस्वसमयानुसारेणोपलब्धये च पत्रिकाद्वारा बोधनीयोऽस्मि । पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना-कल्याण-मुंबई.

इति नासिकेतोपाख्यानं भाषाटीकासहितं संपूर्णस्य

Nasiketopakhyan Bhasha Teeka

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Title
Nasiketopakhyan Bhasha Teeka
File name
Nasiketopakhyan Bhasha Teeka
Text
OCR done
Citation
1823
Published
2010/03
Publisher
Shri Lakshami Venkateshvar Steam Press, Kalyan Bombay
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Banasthali University
DLI number
327273
Barcode
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Scanning centre
Banasthali University
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