Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Taittiriyopnishad
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श्रीहरे
भूमिका
मागुम्योपनिषद् मपीपेडीय ग्रामणमागके मन्तर्गत है। इसमें
कळ बारद मग्न है। कपरकोरपिसे पहली दस ग्पनिपयोंमें यह
सबसे छोटी। किन्तुगमका महम्य किसीसे कम नहीं है। भगवान
गोपादाचार्य ने इसपर परिच मिसकर इसका महत्व भोर भी
पड़ा दिया है। बारिका भीर शाइरभाप्प सहित पद स्पनिषत्
मदतसिखाम्सरसिकोंक लिय परम मादरणीपा हो गपी है।
मोरपापीय परिकामो मसिद्धान्तका प्रपम मिबम्प कहा सा
सकता है। उसी प्रम्यान मापारपर भगवान पाइपचार्यमे मरव
मभिरकी स्थापना की थी। यों तो प्रवासम्म मनादि किन्तु
उसे खो साम्प्रदायिक मतबारका म्प प्राप्त हुमा । उसका प्रधान
मेय भाचार्यप्रवर भगपार शारको मीर उसका मूग प्रन्य
गौडपातीय परिका।
कारिकाधार भपवान् गौउपायाबारे जीवन तथा प्रीतम
असके विषपमें पिरोप विवरण महीं दिया जा सकता । अंगमामें
शाम्बार्शनेर तिसकलेला मामी भीप्रमानानम्पनी सरसतीने
उम्हें गौरदेशीय (गामी ) पतमापा है। इस विषयमें गो मेकम्प
सिरिकार भगवान सुरेभरापापक पद खोक प्रमाणरूपसे गपृत
किया गया:-
एवं गोडदायिनि प्रयरथ प्रभावित ।
वज्ञानमात्रोपाधि मामादिनीयर I
(४in)
• समधर सेनाधात् भगवन ही मसानोतिर मागरम
मार्श (ब) हुमा । उस परमाप-ताप स्मारे पूत्रीय गोरेशीर
मीर बिर मापापाने पनन सि[पने गौरवणय मापार्य
श्रीगेर वाचार्यको मायोर गिरेगीप श्रीराचागो।]
। - भीगौरपावामार्य भी संम्पासी ही थे। उनके शिप्य भी मोरियपादाचार्य ये मौर गोपिम्वपादापार्यके शिम्प भगवान मारामार्य थे। शाइरसम्प्रदायमै सो मापार्यपदमारमा मगछापरम्म मसिर उसमें भारम्भसे मेकर भीपापादामार्य मादि भगवान शारके शिष्योपर्यन्त इस सम्प्रदायक माचापाकी शिप्प-परम्पप इस प्रकार पतसापी- नारापर्ण पामर्ष पसिष्ठ शकिं च सपुषपराशर । म्पार्स पुर्क गौम्पद महारत गोविन्दयोगीन्द्रमपास्य शिष्यम् ।। मीनराधार्यमपास्म पमपादश्य रखामकर व शिम्पम् । तं त्रोटक मार्तिककारमभ्यामस्मद्गुरुम्सम्ततमानतोऽस्मि ।।* इससे विदित रोता कि भीगौरपादाचाय भगवान् शुकदेष जीशिप्पथे। भगवाम् पौरपादाचार्य के प्रयोमे रमकी कारिप बगरमसिड मध एक प्रस्य मीउत्तरगीताकर माम्प भी है जो बानी विकास मेस श्रीरंगम्से प्रकाशित है। उस भाप्पसे उनका महान पोगी रोना सिर होता है। इनके सिवा समय वाहमा एक सांस्य परिकामोध भाप्प भी प्रसिर है। परन्तु पासा पापा नहीं-नस विषपमें विधानोका मतमेर।मस्तु हमें तोरस समय सनकी कारिकामापरीक्षण विचार करना। परिपोषी रचना बड़ी ही सवाल और मर्मस्पर्शिनी। उनकी गणमा संसारके सोकर साहित्यमें हो सकती है। यह तो मपरा ही या पुम कि मतसियाम्ठकी मापारशिक्षण । मिस मघर भामनगवद्गीताके विपपमै पर प्रसिद 'गीता जगता जेम्पा किमयो शामषिक्षारो' सी प्रकार मौत पापक छिपे यह इसापूर्वकामा सवा कि पम्माष (स मापन सापपानतापूर्वक किपा मा मनुशीमम से पास हो सस्ता हममें मापन सिदान्त परमनिराकरण भौर समत •णापुरमपरायम पामरामसे पूर्व भाचार्य और शिष्माण इस मारपरपका स्पारण यसले संस्थापन-समीका शाससम्मत सयुक्तिक वर्णन किया गया है। यह पफ हो मन्प मुमुक्षुमाको परमपरकी प्राप्ति कप सकता है। इस प्रम्य पार प्रकरण । उममें क्रमश २९, ३८, ४८ मोर १.०इस प्रकार का २१५ कारिकाएं हैं। पहला मागम प्रकरण है। इसमें सम्पूर्ण माम्योपमिपद मीर उसकी पाम्पाभूत कारिकामी के सिवा जगदुत्पत्ति के भने प्रपोमनोका गमन करके सनका स्नान किया गया है। कोई भगवानकी इप्समात्रको पएिम हेतु मानते है, को काठसे भूतोकी उरपति मानते है कोई मोगके छिपे सपि सीकार करते हैं और कोई भीडाके लिये अगवकी स्त्पधि मामते है। इस सय पसोको मस्वीकार करते हुए भगपान् कारिका. कार करते है–यस्वैप स्वभाषोऽयमाप्तकामस्य का स्पा (१/२) मयात् पूर्णकाम भगवानले सएिका कोई प्रयोजन नहीं है। पातो रनल स्वभायी।मतः पहजो कए प्रपs बिना हुमा दी भास रहा है। परमापदशिंपोका इसके प्रति मावर महीं होता। । - माणूफ्पोपनिषदम मोघरकी तीन मात्रा म म के माप स्यूस पम भोर कारण शरीरके मभिमानी विश्व, तेजस मोर मार का पर्णन करते हुए उनन्च समधि पभिमामी भ्यानर हिरण्यगर्म एक यरके साप ममेकिंग गरा। इमकी मभिम्पत्रिकी मयस्याएं मश जामत् म्पन्न भीर सुपुप्ति है ज्या लके भोग स्कूल, पुरम मीर मानम्र है। साइपम्पा सीप पसिम मेमें रवा मनापम्पमें कममें मोर पुशिके समय उपमें रहता है। इसी माम प्रपञ्च । परमापतरव इस सपसे विखसण इसमें मनुगत तपारमका अधिष्ठान मोर सासी है। उसे मोभरके पर्य पार ममान तुरीपारमापसे पर्वत किया गया है। कोई भी भ्रम पिता मधिष्ठान नहीं समा मता इस अपसम्मका भी कोई पता होना चाहिये। पर मधिष्ठाम हुरीप हो। तुरीप निम्प गुर पानमसप सपामा मोर सपसाती है। पर प्रशसाप। गममें मम्पपाप्रपाप म्पण मोर स्यामसाप सुपुधिर सपा समार। हिम समय मनादिमापासे सोपा मा सीप भगवा उमी ममय उमेदम मामा तयामण मार मिनाते रदित मत - [ ६ ] पसका पोष होता है। इसी पातको भाचार्यमयर गौरपाद इस प्रकार कहते हैं- मनादिमायया मुप्तो पदा बीच प्रमुप्पते । भजमनिद्रमसप्नमति पुप्यते इस प्रकार मागमपकरण पस्तुका निर्देश पर सीप मोर प्रह की एकता सपा प्रपक्षका मायामयत्व प्रतिपादित करते हुए पैतम्य- प्रकरणमें उसीको पुदि मौर उपपत्तिपूर्वक पुए किया है। पहाँ सबसे पहले म्यानरपच मिप्याव प्रतिपादन किया है क्योकि सपकी रपमधि देहके भीतर किसी मारीविशेषमें होती है। जिसमें स्पानामाव के चरण पर्वत मोर पापी माविका होगा सर्पया मसम्भव है।समापस्वामें सीव देहसे बाहर माकर स्वाप्प पदार्थों को देखता रा-पा भी सम्भव नहीं। पोंकि एक सप्पमें ही सैकड़ों पोजन पूरके पदार्थ दिखायी देने जपते है मौर ग्स मवस्था सिम म्पतियों से पर मिग्ता माग यामपर ये ऐसा नहीं कहते कि हमने तुम्हें देखा था। इसी प्रकार तरह-तरह की युझियोंसे मणका मिप्याम्प सिर कर उससे रश्यस्यमै समामता होमके कारण सामठीन राध भी मिप्यास्त्र प्रतिपादन किया है। यहाँ या पतळाया गपा कि जिस प्रकार स्वप्नायस्वामें वित्तमें कसपमा किप हुए पदार्य मसाप मोर पाहर से मानवाहे परार्प सस्प जान पड़ते हैं किन्तु यस्तुता पे दोनों दी मसाप है उसी प्रकार साप्रवन्पामें भी मानसिक मीर इन्द्रियमान दोनों ही प्रपरके पदार्थ मसम्य इस प्रकारसपत् मीर सण दोगी। मवस्थामोका मिष्यत्य सिय होमपर पह प्रश्न होता किन विपरिकास्थित मौरपाचपोको देवता कौन है? सके उत्तरमें कारिकाधर कहते हैं- कसरपारमनारमानमारमा देव स्वमायया। स पर पुष्पते भेगनिति वेदान्ततिपय ॥ (२११२) (म प्रचार भगवान् गोरपादापायरे मतमें पक्षकी प्रतीति माणके दी कारण है। मापाच मदिमासे ही भाग्मदेप भम्पक पासनारूपसे स्थित मेइसमूरो पर करता है। यह माया न सत् है मसती मौरम सदसत् । म भिम भमित है मौरन भिभाभि पहन सावपपमनिरपपपौर न उभयरूप है। पस्तुना स्परूपविस्मृति हो माया मता सहपशामसेती उसकी निति होती है। जिस प्रकार मन्द मम्मकारमें रम्जुतस्पका निमय म होनेपर उसमें सर्प पाप मुग्छिन मावि ममेक प्रकार के विकल्प हो साते है किन्तु एम्वा भान होनेपर एकमात्र एम्सही प माती उसी प्रकार मायामोहित नीषको ही मेवप्रपाकी भ्रान्ति हो रही है। मायाका पर्दा हटते ही एकमात्र मतग मद्रत पस्तु ही मपशिए राती। इसके मागे भाचापने प्राणारमवाद) भूतारमवाद गुजारमवाद तस्थात्मवार पादारमबाप विषयाग्मबाद सोकरमवाद देषात्मषार पदारमवाद मौर पहात्मवाद मादि भनेको मववादोन रस्सेज किया है। ये कहते है कि मोमें गुरु सिसको जिस भापकी शिक्षा दे देते हैं वह तम्मय भावसे उसी भावका मानह करमे गा. मौर मन्तमें उसे उसी भावकी प्राप्ति हो जाती है। किन्तु मोहन पिभिभ भापोसे मक्षित इनके मधिष्ठामभूत माहितीय मारमतत्वको जामता पर निशा होकर पेार्यकी कल्पना कर सकता। मपात इन मम भायोकी सगति मगा सकता है। पस्तुता तो जैसे स्वम माया मोर गन्धवनगर होते है वैसा ही पिकसन इस प्रपो देखते हैं तो फिर परमाय पपासका उत्तर भाचार्यमे इस परिकासे विपा। म निरोधो न पोत्पतिर्न पदो न च साधक । म मुमधर्म । मुक इस्पेषा फरमार्पता ॥ (२।१२) वात्पर यह कि एक भक्षण रिपन पस्तुको प्रेमकार उत्पत्ति प्रसय पर सापक मुमुठ मोर मुर किसी भी प्रकारका प्पबहार नहीं है। पर तस्व भस्यम्त दुर्श ६ फ्याँकि निम्बर प्पवहारमें ही रहमेपासे म्यापारिक सीपी पि इस म्पपदापतीत बस्तुनक पपनी बहुत ही कठिन है। मिन येदके पारगामी मुनि अनौपग भय और भोपादि विकार सर्पया नियुक्त हो गये है उग्दीकोरस प्रपनातीत माय परय योष होता सय बाप दोमामेपर पह महारमा सया मित मौर निर्मय हो जाता। सपा स्तुति नमस्पर मोर स्वधानपरि व्यवहारकोरिसे ऊषा सठकर पायेह मोर मारमामे ही विमाम करमेबाला पपरप्पासाम सन्तुए रोखावा।फिर पार-भीतर इसी तपच्चे मोमोत देय पा तस्यमय होगामेसे उसीमें रमण करवा इभकपी तत्पस्युत महीं होता। इस प्रकार वैतापमहरप्पमें युक्तिपूर्वक मेवाभावका प्रतिपादन कर फिर मागमप्रकरणमें शासप्रमाणसे सिय ए मततस्पको पुतिहाप सिय करमेके लिये मदेवप्रकरणका प्रारम्भ किया गपाही मारम्भमें ही यह बताया गया १ मेप उपास्प मापौर में मम्पस प्रकारका उपासनामित धर्म माया (कार्यत्रम) में है। किन्तु उत्पत्तिसे पूर्व यह सारा जगत् मसम्मा प्रक्ष दी। मता कार्यमपरायण होने कारण पद उपासक रुपण ही है। केनोपनिपमें भी कई पर्यापम मना पाणी मोर प्रापारिक सामीप्रम पतलाकर 'मेवं पवित्रमुपासते इस याम्पसे उपाम्पच मनमत्त प्रतिपादन किया गपास प्रकार कापपत्र निर्देश कर अधातिसमतां गतम् मपात् समभावमें स्थित ममाति-ममम्मा बस्तु ही मकार्पण्य-ऐसा कहा है। इसके पभात् प्रसाशादि राम्दसे मौपापिक मेवर रस्लेख करते हुए मापशखामीप म्परमतापकी मनुत्पत्ति भीर मसंगताका मविपारम किया है। वहाँ पर पवसापास मपर पर पटाकायले पूम मोर पूणि विखे पास होमेपर मय समस्त पाचश उससे विहत माही होवे उसी प्रकार एक सीबके मुल. सुबिसे समस्त भीष मुनी पा दुखी ही होते) मोर बस्तुवा एलि मादि मारक संसर्ग ही नहीं होता। सीमर मरमा का भी सुष-बादिसे कभी सम्पर्क नहीं होगा। जीवके मरण गपति गमय भागमन पौर सिदि मारिसे भी मारमा परे मिन्समवा नहीं होती। क्योकि सारे संपाव सण समाम मारमात्र - [१] मायासे ही स्पित है। मना मात्मा एक ममण्डमजम्मा मौर मिठेप सीसे एकमेषाहितीपम्' द स यदपमारमा' या शिवीयादै भयं मयति उपरमातर कुरते मय वस्य भप भपति मावि मुतियोंसे ममेदरएिकी प्रशंसा मौर मेवाटिकी निन्या की गयी । छान्दोग्योपमिपदमें मृत्तिष पर मम्नि-विस्फुलित और मोह मलनिकम्तनादि पतासे जो पएिस वर्णन किया गया है पर विकासकी पुद्धिमें प्रपञ्चका प्रझके साप ममेर विग्रनेके लिये है। वस्तुतः प्रपत्रमे सिय करने के लिये नहीं है। भता सिशाम्त यही कि जो कुछ मेद यह प्यबहाररपिसे । परमार्पता उसकी गाय मी नहीं है। यदि पास्तपिप मेद माना जाय तो परमातस्थ त्पचिशी सिर होगा और इस मघर परिणामी होने के कारण पर निस्य मानो सन्ताइसके सिषा पदि विचार किया साप वोम तो सबस्तुब जम्म हो सकता है मौन मसाही, पपोषि मोदी ससच जम पया होगा पीर को शशके समान मसत् उसकी मी कैसे उत्पत्ति हो सकती है। मता पद सारा मेव मनोपमा । मनके मममीभाषको प्राप्त होते ही वकी पमिक मी उपलब्धि नहीं होती। इस प्रकार मारमसत्यका दोष होनेपर मिस समय पित्त संस्प नही कप्ता उसी समय मन मममताको मात खावा है। इसका पह माह मिरापनमित नहीं होता परिक माझ पस्तुध सभाप होने के कारण होता है। इसीको प्रमाकारपति या पति पाति भी। उस मवस्यायकारिकाकारमे संतीससे पर मड़तीसवीं कारिकातकारी मार्मिक पर्णन किया है। पहीबोप मिति सी सिये मियासुध सारा मया पोता । मीर इसी सिति को प्राप्त होमेपर मनुप्प ताप होता।कारिकाकारमे से मम्पर्श योग कहा। इस मभपम्पितिसे भम्प योगिजन मय मानते है क्योंकि यहाँ महंकारर मरपाताभाय होमेके कारण उन्हें मारमनाश दिखायी देता है। यह पोग केयह उत्तम मभिचारियों नियमिम इसमें प्रवेश नहीं रमको ममपस्थिति गुम्बसप, दोष मोर भतपशान्ति मनोनिग्रहके मपान है । षद मनोनिमय जापते ॥ । १० ] भी पड़े पीर-चीरका काम है। उसके लिये भरपन्त उत्साह ममपरत भप्पपसाय मौर परम पैर्यको मायापकता है। उसमें माना मकरके पिन माते हैं। भगवान् कारिकाधारने पयाससे लेकर वासीसी कारिकातक उम विनोंकी निवृत्तिके उपाय वठलापे हैं। उनके मनुसार साधन करत-करते सप वित्त मिक्स हो जातातो बोक का उदय होता है। उस स्थितिका वर्णन भाचार्य ने सोक मीर ४७ में किस प्रकार मदेववस्य मीर उसकी उपम्पिक सापनोंका विपेपन कर साहोंमे निम्नसिमित सोफसे इस प्रकरणका उपसहार करते ए मपना सिखाम्त स्थापित किपा- म कभिप्रायते मीत्र सम्मयोऽम्य न मियते। एतदुचम सस्प पत्र (३।४८) इसके पापात् मातणम्ति नामक पीपे प्रकरणमें मापार्यम मम्प मतापम्बियोंके पारस्परिक मतमे विलम्पते परीकी पुलिपोसे ग्यापन किया है। मात' आपका मर्थ रहा या मसाल है। मसापचे मामेपर मग्निी तब-सरहकी मारुतियों दिखायी देती है मौर ग्सका घुमाना बंद करते ही समय विचार्य पना पंह जाता । यदि विचार किया जाय तो बस्तता धे मसामसे म तो निकलती है म उसमें झीन होती है मौरन की मापसे ही उमत्र माना जाना होता है। उनकी प्रतीतिरेख मसाळके स्पम्पनका ही फी पस्तुता पमकी सत्ता नहीं हैइस मकार पदरच-अप ममके स्पादन कारण प्रतीत होगा। मौर मम मममीभापत्रे प्राप्त होते दीन गाने कहाँ पन मात है। किन्तु ये मपाले मतीति मौर ममतीति दोनों की प्रातिनिर परमारपिसे रसकी उत्पत्ति होती है मौर म प । इस मास्तिका भापार परब्रह्म स्पोकि कोई भी मम्ति निपपार नई सकती । मता रम्समें सर्प भपया शुटिम रखतरे समान पाना में ही इस प्रपशनमकी प्रतीति हो रही है। यही इस प्रकरमा संक्षिप्त तात्पर्य है। इस प्रकरण माचार्य ने साद मसदार बीमा हरसम्पतिवाद विधानवाद एवं शुम्पपाद मावि सभी पिपसी मतों का मारा फरके मसातवावकी स्थापना की है। ये एक ही कारिकामे सारे पमोकी अनुपपत्ति दिसलाते हुए कहते हैं- न सतो वा परतो पापि न किधिस्तु नायते । सदसम्मरसतापि किधिवस्तु जायते ॥ (४१२२) मर्यास् कोई भी यन्तु म तो भपनेसे उत्पन्न हो सकती है मौर नबिसी पम्पसे ही। जो पर मभीतक तैयार नहीं हुमा उससे यही घट कैसे रस्पम्म रोगा। तथा तेयार एप पटसे भी कोई मम्य पट मपमा पट कैसे रत्पम्म दरोगा। यही नहीं सत् मसत् मपया सदसर ससे भी काई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकसी । सो पस्तुरसकी सत्पत्ति फ्पा दोगी भोर जिसन मत्पन्ताभाव उसकी भी कहासे सत्पत्ति होगी। सपा जो मोर नहीं भी ऐसी तो कोई वस्तु ही होमी सम्भव नहीं है मतः किसी भी प्रकार किसी वस्तुको उत्पति सिर महीं होती। इसी प्रधर कुछ भागे चलकर पेसप प्रकार कार्यकारणभापकी मनुपपत्ति दिसलामके लिये कहते है- मास्पसमेतुकमसरसदसदेत सप समेतुई मास्ति वपा। सहेतुकमसात ॥ (४|) मयात् न तो माकाशकुसुमादि मसत् कारणपाला कोर मामशासमादि मसात् पदार्य हो सकता है मीर न पसे मसकारणसे कई सवस्तु ही उत्पन्न हो सकती है। इसी प्रकार परादि सत्पदार्य मी किसी मम्प सत्पदायके करप मदीरा समते फिर उनसे कोई मसरपप उत्पन्न होगा-ऐसी हो सम्भायमा ही इस प्रकार ममको युक्किपास सिमे सम्मके निमित्तमूत तकर पत्पम्ताभाष मनुभप दो गया है मोर जिसने सर्प-कारणमापम्प परमार्पनापजाम सियापही सप प्रचारकोचमीर संपरसे मुखदर मभपपद मास कप्ता है। उसई स्थितिका वर्णन करते हुए भाषा कहने- [ १२ ] निवत्तस्याप्राचस्य निधन मिता सिति । विषय स हि युशमा ससाम्पमनमायम् ।। (४८) बबमनिद्रमक्षप्न प्रमात मवति खपम् । सादिभाता पौष धर्मों धातुसमाक्त ॥ (४८१) इस प्रकार उस निरास स्पितिश्च वर्णन कर भगवाम् गोर पादाचार्य करते है जिस-जिस धर्मका मामद हो जाने पर सर्पमिशेपम्प परमार्यतत्त्व मनापास ही माणपित हो जाता है मौर फिर वा पर्श पड़ी कठिनतासे हरता है। इससे पर मपमान भरपम्त वुपर्श है। इसे माध्यापित करमेमानी कौन-कौन-सी कोटिपों --उनका पिन कपमके लिये ये कहत है- अस्ति नास्त्यति मास्तीति मास्ति नास्तीति पा पुन । पहिरोमपामारावणोत्पेन बाशि ॥ (४१८) मर्याद कोई काते भगवन् । कोका 'मही" किनी मनमौर महीं भी और कहते नहीं। ही इनमें मस्तिभाव पर पीकि पद पटावि मनिस्प पापोंसे विषमणमास्तिभाव पिरो कारण उसमे को विशेषता मही मसित मासिभाप ( सदसवार) उभपम्प मौर मासित भास्तिभाव मभावरूप है। भगवम् इन सभी मानोसे विस्मण, पोंकि ये सभी पवहारकोटिके मम्तर्गत है। उस सर्वभावातीत भगवायचे मो जामतापही सर्वर -सप इसलिये पर सारे प्रपत्र मधिष्ठानको सामना है और जो मषिधाम यानम से मापस्तबगकी मसविपतका कामही। जिसे पेसा बाम समरपनामपदमै स्थित हुए महात्माके लिये फिर कुछ भी संम्प शेष महीं रहता । उस शम पम मावि सास्तिक म्पवदार भी कसेमरके लिये बस छीसम्पत्र हावा है। बस्तर सकी गानगतिका मवगाहन करत गेई भी समर्प नहीं है। पहली मीरिक सितिको सबमें रखकर भगमान्मे मीमापाताम [१३] या निशा सर्वभूतानां सस्पा मागति संयमी । यस्पो बामति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने ॥ (२।६९) यो संसार संसारी पुरुषोंकी रएिम तुषसत्य है उसका घे मस्पम्ताभाष देनते है भीर जिस मखण्ड चिमनसत्तामें उनकी भविषम स्पिति रहतीसतक परिवंशी भषिवेकियोंकी रएि मही पहुँच सकती। इसीसे उमकी टिम दिन-रातका मन्तर बतलाया गया। इस प्रघर समस्त वादियों की कुरएिपोका बन कर मावार्य मे एक भाप भवप तस्व स्थापित किया। मौर मम्तमें उसी की पावन्ध करते हुए प्रम्यष उपसहार किया।करते है- दुर्दर्शमतिगम्भीरम सार्प विशारदम् । मुम्मा पदमनानाम नमस्कुर्मो पपाक्नम् ॥ (४।१ ) इन कारिकाोंके द्वारा भगवान् गौरपावापामे ममातवापकी सापना की है। इस सिद्धान्तको प्रहण करमेके सिपे पात घे मपियरकी मावश्यक।सो सब प्रकार सापनसम्पम्न सच्चपिपरी ही इसे ठीक-ठीक पयाम कर सकते हैं। जिनके इस भी विषपमषण है इससे मधिक माम न रख सगे- इतमा रीमही मपि तु गहें रानि होने मी सम्भावना पह तस्प पत्पम्त दुर्योध है-ऐसा तो सय भाचार्यपरपने ही पह विपा-दुर्शमतिगम्भीग्म् । फितु मिस माभाग महापुरुषकी रपिस पामतपतक पच जाती है उसके लिये फिर कुछ भी कसंग्प महीं पता । यह मय बीचम्मुक से माता है भीर दूसरे मधिकारी पुरुषांचे भी भषषम्भनसे मुक्त कर देता है। महामुनि सपथ परमीय है सपन गुरु मौर सभीका परम पाद है। भगवान हमें ऐसे महापुरषोंके चरणकमलोंका मामय देकर हमारे ससाळापसम्तप्त मतादरपोको शान्ति प्रदान करें। -अनुवादक विषय-सूची विषय 0 पान्तिपाठ बागम प्रकरण २ भामारामाचरण सम्बनाप्प २ ૨૨ ४ ५. मोपरबाम्प प्रमकी सबाग्मता मास्मान प्रबम पार-बैरामर आम्माधरितोय पार-बध ८ भारमानवीय पार-माश पासप्रसनरमल एकहोमरमाकेबीन मेर विवादिविभिग्म सान विद्यारिमप्रितिष मोग मिनिष भोच्य भोर मोम्परेशानमा मामीर सकिरदार सीपिरपमै मित्र-भिप किस १६ तुर्य पार बरप्प तुर्यपहा सस्त १८ दुरपय प्रमार . रिप भौर देगनते तुरीरम भन् २ मारनेरम मेर दुरीमा स्व-निशाएम्पत्त पौषरखा। मम भस्वाभाष गुरुशिमासिसम्मारिका भारमा भौर सतोपतोसाय भोकार मोर उसकी मायामात्र ५२ १८ पिन प ७ ૨ -- ८२ भकार मोर विषासादरम्म उचर मौर सेबसका वादात्म्य २८. मार और प्रासका वादरम्प मात्राौन विवादिस्मता मौनरोपासकन प्रमाण मोपरकीमखोपासनाका भमान और भारमान तादात्म्य समत मौर परत मौकारोपासना मोकारार्पशी मुनि वैतध्यप्रकरण २५. सनरापदायोंका मिपाव बादाम्प पदायोंके मिथ्यात्व हेतु स्वप्न में मनासिव मौर इरिकमान दोनों ही प्रचारफे परार्म मिप्पा २८ बामत्म भी दोनों प्रकार पराप मिथ्या है न मिप्या पराकी पस्सना करनेगम कौन है? Y इनी नाना फरनेवाण मौर इनका पक्षी भाग्मा हो। पशकस्सनामिपि ४२ भावरिक भौर बाम दोनों प्रकारक पाप मियाँ माम्तरिक मोर पाम परापीका मेद पहामिद्रमनिवरे पारस्पनाकी मूग श्रीवासना ४५ गोवपनानख मानो महाननिधि ही मामान है विकसकी मूम माया? ४८. मूलसमबीपिमित मतपर मारमा सवापिसन ऐन बननेवाडा ही परमार्परता ५ रतन मतपरमेशतरपी परमासा। ५१ भदेवभावही मरम्मय! बलोच मानावका भरपम्वामाव! इस रासपी सैन १२ ९२ ८ - ११४ [१६] ११८ ८७ १२२ .. १२० १४ वामपनकामादेश वसदन भाचरण मविपाठ तनिशामिपान अवप्रकरण .८ मेरा काम है मप्ररम्पनिस्सी प्रतिम जीप ठायसिक विपमें रणन्त जीव विधीन होने पन्त ૧૨ मारमाली भाषा रणन्त ६५ म्यागारिक सीमे श्रीष मारमा विकर या भवस नहीं। ३५ मारमात्री मनिता भगनिमी शिम ६५ मारमेली समीचीन है भृषक बीमामेव गोय ५८. पाठपुत उपविभूतिय म्पपस्या चिलिमधिभौर उनके लिये उतनाविक मरवारमदान लिपिरोपी मही! भरवारमश्नो भरियेषी होने हेतु છર मामा मेर मापारी कारण है ०५ बीबशभरपा भगत उत्रक्षिपीडीब ममर मही समय सरिपविधी गति .. भूति बार भोर पाप दानी प्रविषधरती भनाग्मतीष मामा भारमा प्रकारे .८ सासु उत्ति माविकानी? ०९, भमरा पनि सपा मगम्भत है ८ मन मर गति मनोनित वाले ममीभाव मामन सिहोता। ८५ ८४ दणि भोर ममापिका भ- १४८ " .4 १५८ १० २०१ १०० [१७] विषय मपयोगकी दुगमता १०८ १८. न अन्य मोगियोंकी शान्ति मनोनिग्रहके अधीन है ८८ मनोनिमा मेयपूर्वक ही हो सकता है ८९ मनोनिमा निम्न मन कर प्रारूप होता है। ९१ परमार्थ सत्य क्या है? अलावशान्तिप्रकरण १८८ १९२ १ २ १२ नारायणनमस्पर ९५ मतदानी बन्दना १४ देतवाधियों पारस्परिक विरोप ९५ देतवादिगोदारा मावि अबातिका अनुमोदन समानविपर्पम भसम्भव वीवा मरा मरण मानने में दोप साम्पमतपर पैशेषिकी भापति १९. ख और फारे मम्पोन्मघरकतम दोष मनबाद-निरूपण सदसरादिबादीकी भनुपपति १२ तु फात्र अनादित्व उनकी अनुसतिघ्रपकरे पामार्यबाद निस्मप विखनवारिकतंक मापवानिपेप विज्ञानमारका लणन उपम्मका उस्तार प्रमो मतपय व सननमिप्यास्त्वनिरूपण स्वप्न भौर नामका कामकारकत्वमावहारिक जगदुत्पन्धि उपदेश किनके लिये है। सम्मापैगामी पारियों में गति उपमबि मोर मारपत्र मप्रमापता परमार्प पस्तुपा। मिनाभातम भमवरफरमनपात २१५. भास्मा कास्पारणभार क्मतम्भव है। ११५ नुसार भभिनिवेशनमा ૨૨૨ २१८ ૨૨ १८ २२२ ૨૨૬ ૨૨૬ २२८ मा त २- [१८] २४२ २४८ २४८ २५ , . २५१ २५५ हेतु-परो अभिलिनेसमें रोष २१८ बीप्रसन्म मासिको आश्माकी अनियंपनीयता रेवाभारम बनाया १२१ ममाति ही उत्तम सप १२२ चिची मतंगवा मापारिक वस्तु परमार्पत नही शेती १२४ अम्मा अमपापम्पना भी म्पावहारिक १२ देवामाबसचामार विशनची मभरपरमासि मनोरियाकी परिभम प्रसाभारकार १२८ मामाकी तुला रेत १२९ परमार्थामावरम करनेवाले मसदभिनिषेध सनीका कार्य चितिष २२२ विविएसमोर शाम सवा बरी पब मायके समान भनारि मौर मभिम! भारमतत्वनिरुपम आरमश मापपरे भारमा महाशामित्व सम्वादम रोपवन १५८ मात्माषा स्वाभाविक स्वरूप ममायाद रदर्शम महा। परमार्थपरवन्दना भाम्पकारकाईक मना १४२ प्रन्तिराठ २५१ २५१ २६५ २६० २६९ २० २०१ २०२ २०३ २०.
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له ديشا الكلام کا على
माण्डूक्योपनिपट
Karan
पमिम्पलयमरमियर सर्वम्
अभी भावार्य दिनपचद्र शान गण्डार
ससस
मी शम्वर स्वध्यासी जैन भाषक संघ, पयपुर
असाए ममः
माण्डूक्योपनिपद्
गौरपादीय सरिका मन्त्रार्य, मारमाप्प
गौर माप्यासहित
साप्रदाविषयोम्मुक्त सामशादिमय तथा !
मोहारकानुसषेध पत्पदं तनमाम्पहम् ।
1
सान्तिपाठ
ॐ मद्र फर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
म्भिररणास्तुष्टुवारसस्तनूभिर्पनेम दबारित
यदायु ॥
ॐ शान्तिः !म्तिः ॥ शान्ति !!!
हे देवगा । हम कामोंसे यम्याणमय बचन सुनें । यहफर्ममें समर्म
होकर मेयोंसे झुम दर्शन करें तथा अपने सिर बा और शरीरोंसे स्पति
करनेवाले हमलोग देवतामों के लिये हितकर वायुका भोग फरें । प्रितिम
तापकी शान्ति हो।
म्वन्ति न इन्द्रो परमया स्वस्ति नः पूपा विधयेदाः ।
स्वस्ति नस्तायों अरिष्टनेमिः म्यस्ति नो पृहस्पतिर्दधातु ।।
शामिना ! शान्तिा ! शामिता !!!
महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करे परम वानवान् [ अपना
परम पनवान् ] पूना हमारा कात्याग करे, मो वरिये ( वापचियों) के
लिये पका समान [ घातक ] है पागमा हमारा कल्याण करे तपा
परस्पतिमी हमारा कापाम को । त्रिविध तारकी शान्ति।
मागम-पकरण प्रशनांशुमताने स्सिरपरमिफरापापिभिर्याप्य सोधन मुक्त्वा भोगाम्स्पविष्टाम्पुनरपि धिपमोन्द्रासिताकामसम्यान । पीस्वा सर्वारिपशेपासपिति मधुरमुर मायपा भोमयनो मायासंम्पातुरीय परममृवमर्म र पचनतोऽमि॥१॥ मो बफ्नी पराचरम्मापिनी जानरश्मियों के निस्तारसे सम्पूर्ण मेकोको म्पास कर [ भाप्रत्-अपस्मामें ] स्यूळ विषयोफा भोग करनेक मान्तर फिर [ सप्नावस्खा ] मुदिसे प्रकाशित बासनागमित सम्पूर्ण मोर्गका पानकर मापासे हम सब जीयोंको मोग करता वा [ सय } बामदका मोय होकर शयम करतातपा यो परम वपत पर वसम्मा मम मापासे पुरीया (चौपी ) संख्यावाम है, उसे हम नमस्कार करते ॥१॥ पो किनारमा विमिवधिपयान् माप भोगासाविष्ठान पाचम्पान्तमतिविभवाम् म्यातिपा स्पेन सामान् । समेताम्पुनपि रामे स्परमनि स्पापपित्वा रित्या सर्वाम्पिशेपाविगतगुणगणा पारपती पस्तुरीपान २ ॥ जो सास्मा [ भाप्रत्-यवस्थामें ] धुमाधुम कर्मनन्ति त्या मोको भोगकर फिर [ सप्नका ] अपनी बुदिसे परिकम्पित सूक्ष्म सियोको [सूर्य वादि यात्म म्योक्यिोंका वभार होने के कारण ] मपमे री प्रकाश- से भोगता है और फिर धीरे-भीरे इन समीको बफ्नमें सास्तिका सम्पूर्ण चियों को अमर निणरूपसे सित हो जाता है तुरीप परमारमा हमारी रक्षा करे ।। २॥
शा.भा.] मागम-प्रकरण २१ सम्पन्धमाप्य भोमिरमेतदषरमिदं सर्वम् । ip यह पक्षर ही यह सब Fat। उसका म्याश्यानहस तथा तमोपन्यास्पानं केदान्तार्यका सरसंहभूत यह चार अनुन वेदान्तायसारसमा प्रकरणोवान्न प्रप 'वामित्येतदक्षर भूतमिद प्रकरण मिर वादि मन्त्रधारा बारम्म पतुष्टयमामिस्पेसावरमित्मापा किया जाता है। इसीरिये इसके दिश्य और प्रपोजना रम्पते । अत एमन प्रपसम्पन्धा- पृषक वर्णन करमेकी नावस्यकता बेगम्तशासमें नो-नी भिषेपप्रयाप्रनानि पक्तम्पानि । सम्माब, विषय वीर प्रयोजन पुमा पान्येप तु घेदान्ते समन्धामि | करते हैं ये ही इस पम्पमें मी हो मकसे । सो मी [भ्याख्याफार प्रेयप्रयोयनानि तान्येषेह भवितु ऐसा मानते है कि जिरे किसी मन्ति । तथापि प्रकरणम्या प्रकरण झपकी व्याख्या करनेकी हो उन सक्षेपसे उनका वर्णन पिरम्पासना संक्षेपतोषकम्पानि। कर ही देना चाहिये। सत्र प्रयोजनमस्साधनाभि यहाँ, प्रयोजनसिद्रिके वरण साधन अभिम्यक करनक कारण परवेनामियसमदं शासं भने प्रतिपाप जियो सन्ध रसमेबाला शाब रम्परासे शिशिर पारम्पपेण विभिएसमन्धाभिषेप समभ, विषय और प्रयोजनवाण प्रपोजनमवति । पुनस्त मा करता है । मन्म सो, [इस शासकह क्या प्रयोमम है। प्रपोजममित्पुमते ? रोगामो याममा नाता है-त्रिस स्पेव रोगनिाची म्बम्पना । प्रकार रोग पुश्पको रोगको निति होमेपर समता होती है उसी सपा इसारमसारमनो देव | प्रकार दुसानिमानी वाराको ईत २२ माहत्योपनियत् [गो. प्रपत्रापशमे स्वस्पता । मदत | प्रपनकी निधि होमपर स्वस्थता मिसी है। मतगतभावही इसका मावः प्रमोचनम् । प्रमेयन है। तप्रपञ्चस्वाविधाकवस्वादि देसप्रपथ मनिपानित है इस पया तदुपसमा स्मादिवि | लिये ठसकी निधि विषासे ही हो प्रमवियाप्रकाशनायास्पारम्भ सकती है। प्रामविपाको क्रियते। "यत्र हितमिम भवति" प्रकाशिस करनेके लिये ही इसका वारम्भ किया मावा हैजाँ (१०८० २।४।१४) "पत्र के समान हाता है" "बदा पान्पदिष स्माचत्रान्योन्यत्स | मिमके समान हो वहाँ कोई दूसरा श्वेदन्योन्यदिवानीयाव" (वृ० सरेको देस सकता है भपया दूसरा ४०४ । ३ । ३१) “यत्र पास्स सरेको जानता है। जहाँ इसके सर्वमास्मैवामूचकेन * पम्ये | लिये सब कुछ वात्मा ही हो गया हाँ पर किसके द्वारा किसे देसे। स्केन के विवानीपाद" (पृ०३० और किसके द्वारा किसे जाने " २।४।१४) इत्पादिमुतिम्मो इस्पादि श्रुतियोंसे इसी बातकी सिद्धि सास सिद्धिः। पत्र वायदोहारनिर्नयामा प्रथम छन (चारों प्रकरणे) में पहत्म सरा प्रकरणमागमप्रधानम्, | प्रकरण तो बोधारक सम्पका निर्णय बास्मतत्वप्रतिपयु | रनक किये है। वह भागम- प्रप्रिपामा पापमतम् । (कृति) प्रधान मोर वारमतत्वकी विकार | प्राप्तिका उपायम्त ।। रममें देवप्रपास्योपशमे सधि बिकम्पकी निति होमेपर उदेसप्रतिपची रन्नामिप सर्पा- जिस प्रकार रम्मुर मरूपया काम हो मावासी प्रकार मिस रेत- दिविकस्सापशमे प्रपत्रकी निवृत्ति होनेपर मौत प्रतिपचिस्तम्प तस्स इतुता | तत्सफर बोध होता है उसी इतका यस शा० भा०] मागम-प्रकरण २३ चैतष्पप्रतिपादनाय द्वितीय । युधिपूर्वक मिथ्यास्त्र प्रतिपन्न करने प्रकरणम् । स्थावस्यापि के लिये [ मैतम्यनामक] द्वितीय वैतम्यप्रसाप्राप्ती युक्तितस्तथा | प्रकरण है। इसी प्रकार बईतके भी मिप्यास्त्रका प्रसा उपस्सित म हो त्वदर्शनाप तृतीय प्रकरणम् । नाय इसलिये युक्तिवारा उसफा भदेसम प्यास्वप्रतिपतिप्रतिपक्ष मरपत्व प्रतिपादन फरनके लिये | तृतीय (बईत ) प्रफरण है। तथा भूतानि यानि पादान्तराण्पयदि भौतके स्पस्व-निधयके विपक्षी मो अन्य वैश्फि मतान्तर हवे कानि तेपामन्पान्पविरोधि- परस्परविरोधी होनेके कारण मिथ्या स्वाथार्यस्वेन तदुपपत्तिभिरेव | ६, गत उन्होंकी युक्तियों से ठमका निराकरणाम चतुर्थ प्रफरणम् । | सणन करनेके लिये पाप (मलात- शान्ति) प्रकरण है। कथ पुनरोद्वारनिर्णय भारम भोकारका निर्णय किस प्रकार वाविपच्युपायत्म आरमारतको प्रातिका उपाय होता मात्मापति-प्रतिपद्यत इत्युपत- है, सो अब बनलाया जाता है- साथमत्वम् "मोमित्येतद" (फ. उ.१।२।१५) "एसदा |". पही [ पर पद] "हो सम्पनम्" (क० उ०१ १ २ बाटमन है" " सम्पकाम ! पह १७)"एवई सत्यकाम" (प्र. [ जो मोचर है वही पर मोर नपर उ० ५10) "मामित्पास्मान पीत" (मभ्यु• ६ । ३) बन] ' "आरमार इस प्रकार "भामिति प्रम" ( है. उ० प्पान परे।" यही बन पर १.८) "मोशर पवेद सर्पम्" (छा० उ०२ ॥२३॥ सबमार हो त्यो भुतियोंमे ३)म्पादिश्रुसिम्पः। पही बार मानी जानी । रग्यादिरिष मपादि मर्गशि विकायका अधिष्ठानम्। रिपरसम्याम्परालय | भाप ममान शिम प्रकार परमार्थ विनियमामा रमाय सम्प दान मप्राणादिषिकन्पम्पा [ मी प्रसिमय पर ARTH स्पदो पथा माणक्योपनिषद् [पो.प. तथा सर्वोऽपिसी प्रकार प्राणादि विकारको वाक्प्रपनः प्रावायात्मविकल्प | वियप करनेवास्प सम्पूर्ण बाविस मोकार ही है। और यह (बोकार) विषय मोहार एष । स बारमाका प्रतिपादन करनेबाम पात्मकरूपमेव, समिधाय होनसे उसका सहप ही है तथा कस्वास् । मोद्वारविकारपम्दाभि | बोकारके विकाररूप शोके प्रति- धेयम सर्व प्राणादिरास्म | पाप मारमाके विकल्परूप समस्त प्राणा भी अपम प्रतिपादक शमोसे विक्रपाभिधानम्पविरेकेण मिग्म नहीं, जैसा कि विकार नास्ति । "वाचारम्मर्ण विकास केवल पानीका विलास भौर नाम- नामयम्" (छा० उ ६।। ( मात्र है। उस समय यह सम्पूर्ण ४) "तदस्पेदं पापा सन्या | अगर बाणीबप सूत्रद्वारा नाममपी नामभिदाममि: सर्ष सितम्" | गोरीसे प्याप्त है यह सब नाममय "सहीद नामनि" इत्यादि इत्यादि श्रुतियोंसे सिंह भुतिम्पा। होता है। इसीलिये करते- ही एक ओमित्येतदक्षरमिद५ सर्व तस्योपव्याख्यान मृतं भवद्भविप्यदिति सर्वमोसार एव । यचान्य त्रिकालातीत तदप्योङ्कार एव ॥१॥ यह बभर ही सब कुछ। यह जो कुछ मूत, मविप्यस् और समान ९ सीपी पास्या है। इसलिये पर सम गोवार दी। इसके सिपा को बम्प शिकाडातीत पस्तुला मी ओंकार ही ॥१॥ मामिरयेतदक्षरमिदं सर्म यह मक्षर ही सब है। मिति । यदिदमर्यमासमभिषेप | यह अमिषेय प्रतिगप) सप भूव तस्याभिपानाम्पतिरेकात, । तिनम पायसम्रा अपमे मतभार ० भा०] मागम-प्रकरण भभिधानस्य चाहाराष्पतिरका | वमिधान ( प्रतिपादक ) से अमिम होनके कारण वीर सम्पूर्ण मभिधान दोहार एवेदं सर्वम् । परं च मी भोंकारसे पमिम झनके कारण यह सब कुछ मोकार ही है। पर प्रमाभिधानाभिधेयोपायपूर्वकमेव प्रम मी अभिधान-अभिषेय (बाप्प बाचक) रूप उपायके द्वारा दी गम्पत इत्योहार एव । जाना जाता है, इसपिये बह मी बोकार है। तस्पैवस परारनामरूपस्सा या जो परास प्रमाप बक्षर परस्वामिस्येमस्यापष्पास्मानम्। उसका उपम्पास्पान-ग्रामकी प्रातिका उपाय होनके कारण उसके प्रमप्रतिपस्युपायवाद्रमसमीप समीपतासे स्पए बया विस्पष्ट प्रकपनमुपव्यास्पान सपण्यास्थान है वही यहाँ प्रस्तुत नानना चाहिये। इस बास्पमें प्रस्तुरु वेदितन्पमिति वास्पशेषः। प्रस्तुत वेदितम्यम् ( प्रस्तुत आनना चाहिये ) या वाक्यशेष है। मूर्त भवाविप्पदिति काल मूत वतमान और भविष्यत् इन प्रयपरिच्छे यचदयाहार तीमों काणसे जो पुछ परिचोप बह मी उपयुक म्यायसे गोकार हो पवाफन्पायतः। पपाम्पत्ति । स सिवा दो तीनों बालों से कालातीत कार्याधिगम्प काला- परे, बान कार्यसे ही बिपित होने परिछेपमम्पाकवादि पाठा और काठसे बारिऐप तद अभ्यात भादि वह भी भोपार प्योहार एव ॥१॥ ही है ॥१॥ पपनका नाम मोकारवाममधीसारसना अभिपानामिषेपपारेमवेऽप्यन बाधक और बाम्पकाममदोन भिधानप्राधान्पन निर्देशान्तः ||र भी मारकली प्रधानतासे ही मोमिस्पेठदपरमिदं सर्पमित्यादि। | पर मपर ही सब पु.
माणपयोपनिपद [गी० कर -- मभिधानप्राभान्येन निर्दिष्टस | इत्यादि स्पसे निर्देश दिया गया है। पाचककी प्रधानतासे निर्मित पुनरमिधेयप्राधान्येन निर्देशा वस्तका फिर पापको प्रधानतासे ऽभिधानामिषयपोरेकत्वप्रति किया दुभा निर्देश वाचक और पश्पर्धः । वरपा पभिधान | पाप्पका एकरण प्रदिपादन करमके लिये है यथा वाष्पकी प्रतिपति तन्त्रामिधेपप्रतिपचिरिस्पमिषे पाचकके अधीन होनेके कारण यसाभिषानत्वं गौगमिस्पानडा बाप्पका पाचारूप होना गौण होग-ऐसी भाका हो सकती स्मात् । एफपप्रविपधेम प्रयो । किन्तु माप (B) और मनममिपानामिपयोरफेनैव | पाचक (मोकार ) की एपल्य- प्रपस्नेन युगप-प्रबिलापमस्त प्रतिपतिका वो यही प्रपोमन है कि उन दोनों को एक ही प्रयासे एक दिलषण सम प्रतिपद्यतेति । साप न करके उनसे विल्क्षण तथा च पक्ष्यति "पादा मात्रा ममको प्राप्त किया जाय। ऐसा ही मात्राय पादा" (मा उ०८) | "पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है" इस युनिसे कहेंगे भी। इति । सदाइ~ अब यही बात का है- मर्वर ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुप्पात् ॥ २॥ पर सबनी है। पर वारमा बम पर या बारमा पार पाने(शों) पासा ॥ २ ॥ सम पठायति । स यदुक्त पर सबसमी वर्षात् यह माशरमात्रमिति सदेतद्रप सप सब मा भेगारमान कहा गया है, मन परायामिदिरा मझ है। माता पक्षमापसे प्रत्यथवा बताये हुए वसुब्रमको विशेषतपसे 1) विषम निर्दियनि-अपमारमा । प्रत्यवतमा 'पह बारमा मन है।
शा० भा] भागम-प्रकरण । ममेति । अपमिति बतुप्पारवेन | ऐसा करकर निर्देश करते हैं। यहाँ प्रविमज्यमानं प्रस्पगास्मतयाभि 'अयम् शम्दवारा पतुप्पा रूपसे बिमक किये मानबाले बारमायनेबपने नयेन निर्दिशति-अयमात्मेति । अन्तरारमसत्पसे ममिनय (अगुछि- सोऽयमात्मोद्वाराभिषेप परापर | निर्देश ) पूर्वक 'अयमारमा मम' ऐसा स्पेन म्पपस्थितपतुप्पात्मापा | काफर बतलाते हैं । ओंकार नामसे कहा जानेवासा तया पर और भपर पणवान गौरिषेति । प्रयाणां सूपसे म्पबस्थित यह यह वारमा कापणकासमाम पार पाद (अा) विचादीनां पूर्वपूर्वप्रविलापनेन बाग है, के समान मही। विम तुरीपस्स प्रसिपत्तिरिति करण चारि तीन पार्टी से कमश पत्र का ब्यकरते हुए तमें सुरीपत्राफी साधन पादशन्दः । तुरीयस्स | उपसम्धि होती है। का पाने पपस इति फर्मसाधनः पाद तीन पादमि पाद' शद करणवाध्य है और मुरीयमें 'प्रो प्राप्त किया सन्दः ॥२॥ नाय' इस प्रकार कमवाप्य है ॥२॥ मारमा प्रथम पाद- कथ पतुप्पास्यमिस्या वह किम प्रकार पार पादोदाम हैसो बताते है-- अचानर जागरितस्थानो वहिप्प्रज्ञ मप्ताङ्ग एकोन विंशतिमुख स्थूलमुग्वैश्वानर प्रथम पाद ॥३॥ मामत्-अवस्पा मिस [ की अभिव्यक्ति ] का स्थान है, जो बहि प्रद (मारियोको प्रकाशित फरमबाला ) सात बगोधना, ठमीम मुम्ापारा भार स्यूम पियोंकर भेटा चामर पाइस पर || .मीरमे प्रचलित Hि माम पारन। परनामर पाच तामिरप पार पनी मपरा पर पोराने मी पर उनपर पा-मान गरे ।
२८ मापस्योपनिषद् [ मी० का. प्रायः जागरित सानमस्पति नाम-बरसा जिसका स्थान बागरितम्यानः । पहिम्मत है उसे जागरितस्लाम कहते है। म्वारमध्यतिरिके विषये प्रमा विसकी क्रमसे मिम विषयोंमें प्रया यस्य स परिपालो पहिरिपयेव सिकी विषाक्त पुनि बाम है उसे बहिष्णा करते हैं बर्यात् प्रभाविद्याकचावभासत इत्यर्थः । विषयोंसे सम्पयू-सी भारती है। इसी स्था सप्ताहान्पस "तस्स हा प्रकार मिसक सात वर्षात एतस्माग्मना अपानरस मभव | "इस उस बेवानर मारमाका पुलोक सुनमापचिस्प मि, सूय मेत्र है, मायु प्राण है, बाकाश मम्पस्साम ( देह), वम प्रथग्वरमात्मा सदोहो पालो (भमका करणतर नस) ही मत्र- पस्तिरेष रमिः पृथिम्येष पादो" सानो बौर पृपिषीही परण है इस (छा०उ• ५।१८।२) इस्प | युति अनुसार बरिमहोत्रकम्पनामें निहावल्पनाशेपम्पेनाहवनीयो / बात होनेके कमण माननीय ऽग्निरस्स मुखम्वेनोक्त इत्येव सप्ता-गया है। इस प्रकार जिसके सात वनि उसके मुसरूपसे बताया प्रानि यस स सप्ताः । से ही समाज करते है। संकानविंशतिर्मुखान्यस्स तपा मिस्के उमीस मुस, दश तो डामन्द्रिय और कोन्द्रिय, पुदाद्रियाणि कर्मेन्द्रियामि व पाँच प्राणानि वायु तपा मन, पुखि, दश बायाम प्राणादयः पश्न महार वीर विध-पे गिसके मनो पुदिराशरमिचमिति मुसके समान मुम्बर्मात् उपटभि सम्मानीय मुम्बानि तान्पुपलम्धि के द्वार है, प ऐसे विशेषणोकामा द्वारागीस्पर्थ, म एपिशिष्टी चार उपयुक घरोसे शा मारि मानरो पाता। स्यूल रिपोको मोगता है इसरिये | वा स्यूसमुफ् । सम्पूर्ण मरोंको दीनपूसान्विपया यस इति [अनेक प्रकारकी पोनियो ] मवन म्पूलमा । पिपेपा नराणा- (परम ) परनक कारण वह पैचा मनेकपा नपनापानरः || मर' परमाता है, पपा • भा] मागम-प्रकरण स्वात् स या विसमासो नरश्षेति। ( समन) मररूप है इसलिये विनामर है। विधानर ही [ खापम विधान । विधानर एन तदित वर्णमापय होनेसे वानर धान । सर्वपिणास्मानन्य | पहलाता है। समस्त देहोंसे भमिम्म होनेके कारण वही पाला पाद है। प्रथमः पादः। परवर्ती पार्दोक्त ज्ञान पासे इसका एसपूर्वकस्वादुचरपादाधिगमस्स |सान होनेपर ही होता है, इसलिये प्रापम्पमस्य। यह प्रपम है। कथमयमात्मा प्रोसि प्रत्य सड़ा-अयमारमा प्रम" इस श्रुतिके अनुसार यहाँ प्रस्परामाको गास्मनोऽस्य घसुप्पारधे प्रकृते | चार पारोंवाला बतलानका प्रसङ्ग पा। उसमें फुडोकारि को उसके मूर्धा पुलोकादीनां मूर्मावङ्गत्वमिति । नादि वारूपसे कैसे बतलाने ठगे। नप दोपः । सर्पस्य प्रप समामान पर कोई दोष नही बबरण मसाल श्वस्य सापिदवि (t, क्योंकि इस बानाके द्वारा ही तारितिपादने अधिदेवसहित सम्पूर्ण प्रपञ्च चतु फसानेनात्मना प्पात्वका प्रतिपरम करमा ए है। चतुप्पाविस विवक्षितस्वात् । ऐसा होनेपर ही सारे प्रपत्रके एवं प सवि सर्वप्रपोपसमे निपथपूर्ण बातकी सिद्धि हो सकी। समस्त मममि सित एक ऽतसिदिः । सर्पमतम्यमास्मैको मारमा पर भारमा सम्पूण भूतोंका टः स्यात् सर्वम्तानि पास्मनि। साक्षात्कार हो सकेगा और इसी “यस्तु समाणि भूतानि" (03. प्रकार 'नो सारे भूतोको [ मारमा ही देखा ' इस्पाटि तिपोंके ६) इत्यादिचस्पर्थ उपसरतश्च वर्षका उपसंहार हा सफेण । नहाँ स्मात् । भन्यथा हि स्वदेहपरि तो सांस्पान वारिक समान छिन पर प्रत्यगारमा सारख्या |वन देदमें परिस्सिम भरमार दिभिरिप यः स्यापारी दशन होग्य । पसा ऐमार ।
मागुम्योपनिषद् [पी०ब. सत्य समिति सविता विशेषा | 'मौत । इस सुतिप्रतिपादित विशेष माफी सिद्धि नहीं होगा न सात्, साल्पादिदर्भनेना-गोंकि सामन्यादि दर्शनों की अपेक्षा पिपात् । इप्पते प सर्वोपनिपदों में कुछ विशपता नहीं रोगी । परन्तु सम्पूर्ण उपनिषदोको भरमाके सर्यास्मैक्सप्रतिपादकत्वम् । अतो एकलका प्रतिपादन तारी। युक्रमेयास्साम्पात्मिकस पिणा | इसध्येि इस पाप्यामिक पिण्डारमा- का पुत्रोक बादिके लाम्पसे वाषि- स्मनो गुलाफापनपेन विराठा दैविक पिण्यायाके माप एकल त्मनाघिदेविकेनैकस्वमभिमन्य प्रतिपादन करनेकवमिप्रायसे उस- का समाव प्रतिपादन अधित ही सप्तास्ववचनम् । “भून वे है। इसके सिबा [वारमाकी म्पहा म्पपतिप्पन्" (छा• उ० ५। पासनाके मिन्दक ] तेरा शिर गिर १२१२ (स्यादिलिगदशनाप । माता मादि पाप भी इसमें शेत है। विराजकत्वमुपलक्षमा हिरण्य यहाँ गो विराटके साप एकल मभाम्पाकवात्मनो । उक्त बैठ प्रतिपादन किया है यह हिरण्यगर्भ और बम्पाइसके एकपको उपाधित न्मधुमाम"मायमस्यां पृथिमा करानके लिये है । मधुराणमें एसा पहा मी-नाइस पृष्लीम सेवामयोऽमतममा पुरुषो ममाम जोम्म एवं अमृतमय पुरुप विषा मापारमम्"(१०४०२।५।१)|यह जो बयात्मपुस्य [ने दोनों एकात्यादि । को विशेषता इस्पादि। मप्रतापादयोस्स्वे म एनेक कारण सोये हुए पुम्स पर्व सिरमेव निर्विशेषताद । और वम्पारसका एकल वा सिब है। ऐसा होनेपर ही या सिब एव च सस्पतम्सिई भविप्पति होग्य कि सम्पूर्ण देतकी नियति सर्वदेवोपक्षम् पादैतमिति ॥३॥ होनेपर कति हो । ।
शामा ] मागम-प्रकरण ३१ मात्र मारमाका द्वितीय पाद-तेजस स्वप्मस्थानोऽन्त प्रज्ञ सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुख प्रविविक्तमुक्तैजसो द्वितीय पाद ॥ ४ ॥ समान विसका सान है तपा चो मन्त प्रम, सात भगोपाला, उनीस मुसनमा बौर सूक्ष्म विश्पोंका मोका है वह तंत्रस [इसका दूसरा पाद है। म्वमः सानमस्स राजसस्य स्वप्न इस तैयसका सान है इसलिये यह सनस्सानवाला [ पहा म्वमम्यान: । जाग्रत्प्रज्ञानेक माता ] है। बनेक साधनपती साधना पदिविपयेवावभासमाना | जाप्रम्यादीना मुद्धि मनका सुरण- होनपर भी बाविषय मनःस्पन्दनमात्रा सती तपास्त समधनी मी प्रतीत होती हुर सरकार मनस्साधच। सन्मनस्तथा | मममें पैसा ही संस्कार उपम करती है। चित्रित बसक समान इस संस्कृत चित्रित व पटा पाप प्रकरके संस्कारोंसे पुलमा वह साधनानपेक्षमविपाकमकर्मभिः | मन बपिपा, कामना और कमके प्रर्यमाण जानन्दपभासते । सथा | कारण बाप्रसाधनकी मपेक्षाके निमा ही प्ररित सापर भापत्-सा पातम्--"मम्य लाम्प सदा मामन Bाता है। पमा दी पता मात्रामपादाप" (पृ० | पहा मी -"म सर्वमापन सम्पम म्वय सस्पार वाण परके उ.४।२९)ति । तथा "परे [ मम दम्बना है' या तय दर मनम्पीभवति" (प्र.माग भूनिय मी [ समस्वादियो] "परम (इन्द्रियादिसे साठ) देर उ०१ । २) इति प्रस्तुम्प (प्रा) मनमें SITE "पदव सप्न महिमानमनु जाती है। इस प्रकार प्रनापना कर मरति" (प्र. उ०४।५)महापा-मातम्या या देश इस्पायर्वने। मम्मी महिमापनुमा माना।'
३२ [गौ -CC - मापफ्पोपनिषद् इन्द्रिमापेक्षयामासस्थान्मम पत्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा मम पनिक वन्त स है, समावस्थाम सस्तहासनारूपाप खाने प्रमायस्पे- मिसकी प्रज्ञा ठस (मन ) की स्पन्न प्रमाविषयभून्याय प्रशाया वासमाके अनुरूप एती उसे लन्त प्रा करते हैं, वह अपनी केवलप्रकार स्वरूपायांषिपपिस्पेन | विपशम्प मौर केवळ प्रकाशमरूप भवतीति सेजस । विधस्स | प्रहाका विषयी (अनुमब करनेवाला) होनेके कारण तैवस' कहा जाता सविपयस्वेन प्रवास स्थूलामा है । विस मानविषययुक होता है, भोज्यत्वम् । पुनः फाला | इमलिये भागरित अवस्थामै स्पूछ प्राम उसकी मोस्य है। किन्तु सैजसके लिये पासनामात्रा प्रथा भोज्येति केवल बासनामात्र प्रडा मोनमीपा है। प्रविविको मोग इति । समान इसलिये इसका मोग सूक्ष्म है। शेष वर्ष पहलेडीके समान है। यह म समाद्वितीय पादस्तैमसः॥४॥ तेजस ही दूसरा पाद है ॥ १ ॥ दर्शनादर्शनपरयोसवाप्रवाह [तल्यामका समापहप ] पापा बस्साके दर्शत (नामस्थान ) बोर लधपस्स स्वापस सुस्पतात् | बार्शन (समस्थान) हम दोनों ही सपप्तिग्रहमाप पत्र सुप्त इस्मादि | तिमि समान होने के कारण सुमि- ससाको [ उससे पृषा ] मरण विक्षेपणम् । भव पा विपपि करनेके किये 'पन सप्त स्पादि विक्षेपण दिये गाते है अपना सीमों म्पानेपु तचापविमोपलमण: वासाचमि तय भवानरूप खापोऽविशिष्ट इति पूाम्या | निमा सम्पन ही है इसज्येि पहले दो सामोसे ससिका दिमाग मुषप्तं विमनसे- करते- शां० मा.] मागम-प्रकरण ------ । धारमा तृतीय पार-पास यत्र सुप्तो न कञ्चन काम कामयते न कञ्चन स्वप्न पश्यति तत्सुपुप्तम् । सुपुप्तस्थान एकीमूत प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दमुक्तोमुख प्राज्ञस्तृतीय पाद ॥५॥ जिस अवस्थामें सोया दुआ पुरुष किसी मोगकी हम नहीं करता और न काई स्वम ही देखता है उसे सुपुति कहते हैं । वाप्ति विसका म्पान है तया यो एकमत प्राट मानस्वरूप होता हुआ ही जानादमय, मानन्दका भोका और चेतनारूप मुसबाया है प्रावही तीसरा पाद है।५।। पत्र ममिन्म्माने काले या नहीं पनी मिस सान अपना समय सोया हुआ पुरुष न कर मुप्तो न फञ्चन स्वप्नं पश्यति न | सम देसवा और न किसी मोगकी धन फाम कामयत । न हि ही इण्टा करता है, पोंकि सुषमा स्मामें पहली दोनों साम्पाक मुपुप्ते पूर्षयारिपान्पधाग्रहणलषण | समान भम्पया महणलप म्वप्नदर्शन म्वप्नदर्शनं कामो षाकपन विपसे। अयवा किसी प्रकारकी कामना नही होती, वह यह सप्त जस्सा ही सदेतत्पुप्त म्यानमस्पति निसा स्थन है उसे सुसम्पान मुपृप्तम्पानः। म्यानश्यप्रविमक्त मन:स्पन्दित निस प्रकार रात्रिके अपफारसे Pिम भाग्यदित हो पाता है उसी देवजात सथारूपापरित्मा- प्रवर पूर्वोक्त दानों सानोंमें विमिन मपमे प्रतीत होनमण मनका पुरण गेनापिकापन्न नेमतमोग्रतमि- रूपरतसमूह [इस भास्था] प्रास बादासमपनमेकीभूसमित्युच्यते। कसहित बसने उस (विशिट)म्परूप पा त्याग न कर अनमे नाप्रति भतएवम्बम्जामन्मनास्सन्दनानि होगा। इसग्पि इसे एकीमत माउ -- मागम्योपनिषद् [गी.. प्रज्ञानानि पनीमूवानीव सेपमष | ऐसा कहा जाता है त मिस मसामें सम और जामत्येनके साविकरूपत्वात्मनानपन सरणहप प्रहाम पनीमूत-से हो चातेयवस्था प्रविवेक सम्पते । यथा रात्री नैशेन | रूपा होनके कारण प्रनामस्म कही पाती है। मिस प्रकार रात्रि वमसाविमन्यमान स पनमिव | रात्रि मन्धकारसे पृपावकी प्रतीति न होनेके कारण सम्पूर्ण प्रपत्र तरस्पक्षानमन एव । एषाम्दाम नीमूत-सा जान पड़ता है उसी प्रकार यह प्रजानपन हीहै। एष। मारपन्तर प्रयानम्मतिरेकपा- | शब्दसे पा तात्पर्य है कि उस स्तीत्यर्थः सम्प प्रशानके सिवा कोई अप बासि मही रावी। मनसो विषयविपय्याकार मनका को वियप और विषयी- | रूपमे स्फुरित होनेके मामासका सन्दनागासासामावादानन्द स है उसका नाम होमक मप वानन्दप्रायो नानन्द एव । कारण पर वानन्दमय वर्षात वानन्दवास है, केवल मानन्दमाप अनात्पन्तिकत्वात् । यथा लाके की मही है, क्योंकि इस बस्थामें भानन्दकी मात्पन्तिकता नहीं है निरायासस्मिता सुस्पानन्द मिस प्रकार मेक अनायासरूपसे गुप्यते, भत्पन्तानायासरूपा स्सित पुरुप मुम्प या मानन्द मोग फरनगर कहा जाता है, उसी हीम स्पिविरतेनानुम्यत इत्या- प्रकार, स्मोकि इस अवस्थामें या भरमा इस भस्फ्त अनायासरूपा नन्दसक "एपोस परम स्थितिका मनुमन करता है, इसलिये मानन्द" (१० उ०४।। पर वानन्दमुक कहा पाता है जैसा कि या इसका परम वानन्द २२) इति भुतेः। है इस सुषिसे सिर बोसा है।
शां० भा ] मागम प्रकरण ३५ म्पप्नादिप्रतियोषषेतः प्रति सामादिशामरूप चेतमाके प्रति द्वारसरूप होनके करण यह शारीभूतत्वाप्पेसोमुस । पोष- गोमुख है। भपका स्वमादिकी लक्षण वा तो द्वार मुस्लमस | प्रातिके लिये हानस्वरूप चित्त ही म्वप्नापागमनंप्रतीवि तोमुखः। इसका शर यानी मुस। इसध्येि | यह चेनोमुस है। मूत-मविष्यत्का भूसमविप्पन्नातत्व सर्पविषय | सया सम्पूर्ण विषयोका हाता यही सारस्लमस्यैवेति प्राम।सुप्तोऽपि | है, इसलिये यह प्राश है। मुम होनेपर भी इसे मूतपूर्वगतिसे हि भूतपूर्वगत्या प्रान्न उपते। 'प्राम' कहा जाता है । बयवा मथषा प्रहप्तिमात्रमस्पैमासा | केछ प्राप्ति (हान) मात्र इसीका असाधारणरूप है, इसरिये यह पारम रूपमिति प्रामः, इतरयो- प्रा है, क्योंकि दूसरोंको (विश्व और तैमसको) तो विशिष्ट शिाम विशिष्टमपि विज्ञानमस्ति । सोय मी होता है। वह यह प्राह ही प्रामस्वतीयः पादः ॥५॥ सीसरा पाद है॥५॥ प्रामका साकारणल एप सर्वेश्वर एप सर्वज्ञ एपोऽन्तर्याम्येप योनि सर्वस्य प्रभवाप्ययो हि भूतानाम् ॥६॥ या सबका इपर 1, या सर्व है, यह अन्तर्यामी है और समस्त जीकी स्पति तथा म्पका सान होनेके कारण या सबका कारण मी है ॥६॥ पप हि स्वरूपावस्थः सर्वेपरा बने म्परूपमें स्पिन यइ (प्राइ) सापिदैविकप मेदवातस्य सर्वस्मे | ही सर्वेघर है, अयात् अधिदेखके सहित सम्पूर्ण मेसम्हका ईश्वर- शिता नैवसामास्पन्तरम्तो- शिम (शासन ) करनेअठा है। पेपामिव । "प्राणानं हि । हे साम्प | यह मन (बीच) प्राय मागूपयोपनिषद् [गो.ब. सोम्म मना" (छा० १.६ ८१, (प्राणसंशक म) रूप बन्धनमाम है। इस सुतिसे वन्य मालम्बियों- २)इविश्वेश्यमेव हि सर्वस्य- सिमतानुसार [सध परमेश्वर] सर्वभेदापस्यो भावस्पेप सर्वशः। इस प्रामसे कोई बिनातीय पार्य मही। सम्पूर्ण म सित हमा एपोऽन्तर्याम्पन्तरनुप्रविश्य सर्वेपां यही सबब माना है। इसलिये यह सम है। [स] पर भूतानां नियन्ताप्पेप एव । अत [अन्तर्यामी है अपात् समस प्राणियों- के भीतर अनुपविर होकर उनका एप ययोक्तं समेदं जगत्प्रस्यत | नियमन करनेवाध्य भी यही है। इत्येप मानिः सर्वस । यव एवं इसीसे पूर्वोह भेदके सहित साय नगर उपम होता है इसम्पेि पी मममाप्ययम प्रमवाप्पयो हिसमा कमण है। क्योंकि ऐसा है सठिये यही समस्त प्राणिपोका भूतानामेष एव ।।६ | उत्पत्ति और मपस्तान भी है॥६॥ J एक ही बारमाके तीन भेद मोवे पोका मन्ति- इसी वर्भमैं पे श्मेक है- श्लोका मवन्सि-~ मौतमिन यथोक्तध्य एते , महाँ इस पूर्णेल अर्थमं ये एक्लोक अहिप्प्रज्ञो विमुर्विधो अन्त-प्रसस्तु तैजस । भनप्रसस्तया प्राज्ञ एक एष भिषा स्मृतः ॥१॥ विमु विष प्रिप्रा असमत प्रदीक्या प्राधापनमा (प्रशानमन) है। इस प्रकार एक ही बारमा तीन प्रकरसे कमा याता॥१॥ पहिया इति । पर्यापण । बहिव स्यादि । इस स्मेकका विसानस्यात्सोप्रमिति स्मृत्या | तत्पर्य है कि कमा तीन भागम-प्राण ३७ ० मा ] प्रतिसन्यानाथ सानत्रयम्पतिरि | स्थानोवाध्य होनेसे और मैं दी। इस प्रकारकी स्मृतिधारा अनुसन्धान कस्वमेवं शुद्धत्वमसात्व प] किया जानेके कारण भात्माका तीनों स्थानोंसे पृपात, एकस्व, मुदम सिमित्यभिप्राय । महामस्स्पादित वौर सङ्गत्व सिख होता है, जैसा कि महामारस्पदि रसान्तका मन ध्यान्तमुतेः॥१॥ करनेवाली नुति सखाती है| पिस्वारिक पिमिष स्थान धागरितारम्यायामेव विधा चामत्-मास्या ही विस बार दीनां त्रयाणामनुमवप्रदर्शनार्थोऽ- तीनोंका अनुमव दिखानेके लिये यश्लोफ यह एक कहा जाता है- दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजस । आकाशे च हदि प्राज्ञस्त्रिघा देहे व्यवस्थित ॥ २ ॥ दक्षिणनेप्ररूप पारमें दिख रहा है, तेजस मनके भीतर राता है, प्राव पाकाशमें उपठन्म होता है । इस प्रकार पा [ एक ही बारमा ] शरीरमें तीन प्रकारसे स्थित है ॥ २ ॥ दक्षिणमत्येव मस्स तमिन् | दक्षिण नेत्र ही मुल (उपलम्भि का स्पान) है, उसीमें प्रधानतासे प्रामान्पेन द्रष्टा स्यूठानां विधा- स्यूम पदार्पोक साझी पिका अनुभूपते । "पोर नामैप अनुभव होता है। यह नो दक्षिण नि प्रभर ती नदीम यस्नेवण कोई यसपन् माप उप प्रमादले विचलित न र उसके ऐन तमेपर माता का गवा है। न्तु उन मेस प्रपा दोनेके कारण उनके गा-रोपति पुल नही ऐवा ठसा प्रिमर पापा पक्षी भाषायम सदगतिसे गवा यता है उनी मकार सन्न मौर गन् ऐनों साम समार नेगण मारम्प एक ममा भौर पर ऐता मानना सवितही। (रेलिपे । उ ४।१।१८११) -न " माणूपयोपनिषद् [गी.. याध्य दक्षिणेऽवन्पुरुषः' (पृ० | नेप्रमें स्थित पुरुष है 'इम्ध' मामसे उ० ४ । २ । २) इति श्रुतेः । प्रसिद्ध है। इस सिसे भी यही प्रमागित एघो दीप्तिगुणो वैश्वानरः। | होता है।दीसिगुणविशिर चामरको आदिस्पान्तर्गता राज आत्मा | रानसंज्ञक मा धौर मेमि स्थित 'न्या करते है। आदित्यातर्गत चापि च द्रप्टकः । साक्षी ये दोनों एक ही है। नन्वन्यो हिरण्यगर्म पत्रमा मर-हिरण्यगर्भ अन्य है तथा दक्षिण नेत्रमें स्थित नेप्रत्रियका दक्षिणेऽक्षम्पायोनियन्ता द्रष्टा | नियत्ता वीर साझी देईका सामन पान्या देशस्वामी। क्षेत्र अन्य है। [ उन दोनोंकी एकता कैसे हो सकती है.] न, स्वता मेदानम्युपगमात् । समापाम-नहीं [ ऐसी बात | मही], क्योकि उमका स्वाभाविक "एका दवा सर्वम्सेपु मेद मही माना गया, पकि (श्मे ० ६ । ११) इति | "सम्पूर्ण भूमि एक ही देव सिरा भृतेः । "क्षेत्र वापि मां विदि मा । इस शुतिसे सपा भारत ! सर्पक्षेत्रेषु मारव" (गीता १३ ।। समस्त क्षेत्र में क्षेत्रा मुसही मान" ). 'अधिमकं च भूतेषु विमल "[प कस्तुत ] विमळ न होकर भी मिळके समाम स्मित है" इत्यादि मिव च सितम्" (गीता १३ । स्पतिवैसे भी [पही कत सिम १६) इति स्मः । सर्वेषु करणे होती t] । सम्पूर्ण इन्मियो, समाम पबिशेपेऽपि दक्षिणाषष्पप रूपसे स्थित होनेपर मी दक्षिण मेनमें उसकी उपम्भिकी स्पला लम्भिपाटमदर्शनाचा विशेषण देखनेसे मी विषका विशेषरूपसे निर्देषो पियाम । मितेश किया जाता है। दस्मिाधिगतो रूपं हानि पक्षिणनेत्रस्थित जीवात्मा रूप मीलिवाक्षस्तदेष मरन्मनसन्तः | को देखकर फिर मेत्र मद मममें १ यो बागरिव मपमा परायोन मोठा होनेके कारण पर-पीस होगा। २ भागम-प्रदरण शा.मा.] म्वप्न व तदेव मासनारूपामि-सीका स्मरण करता हुआ पाना- रुपमे अमिन्मय उसी सपका बममें पकं पश्यति । ममात्र सपा उपलबकी तय दर्शन करता है। विस प्रकार इस मस्पाम एता है, स्वप्न । अतो मनपन्तस्तु खसो बैक सा ही सममें आता है। [ इसलिये या भामत्में समी] ऽपि विप एष। बल मनके मीर सित तैनस भी माझाशे च हदि भरणारम्प तथा म्मरणरूप म्मापारके मिहत्त हो मानेपर इदमाकाशमें सित प्रात म्मापारोपरमे प्रक्ष एकीमूतो | मनोभ्यापारका भमाव हो जानेके पनमम एव मषति, मनोव्यापर | कारण एकीभूत वीर ना ही हो जाता है। दर्शन और स्मरण ही रामापात्। दर्शनसरमे एक हि मनके स्फुरण ६ उनका प्रभाव मनास्पन्दितः सदमामे पिया जानेपर को मीना पने विशेषेण प्राणास्मनागस्थानम् । भीतर ही निसिप प्राणरूपसे रस "प्राणो परवान्सन्सिार" {ोना [पी बामद हामि है। "प्राणहीन सबको वनमें मौन (छा० १० ११३१३) इतिश्रुतंग कर मेला' इस शुतिसे यही वैजसो हिरण्यगर्मों प्रम्पगित होता है। मन स्मित होने के कारण तेवस ही दिया स्पस्वास् । "लिङ्ग मना" (पृ. मा वायवाला उ.४१४१६) "मनोमयोऽय रूप "प्पर पुरुष मनाप " इत्यादि मुतिस मी पुम" (पृ०१० ५/६१) [बस और हिरण्यगर्भकी एकता इस्पादिश्रुतिम्प । सिद्ध होती है। ती उपाधि पी मन मोर हिरण्यगर्मीमा मम व उमरिम्पपीता परस्सर म। १ पहा हिरण्यकर्मी दोपुपमा गया है। है ---- नेप दोप, मापनाम् माण्डफ्योपनिषद् [गी का ननु न्याहता प्राण मुफ्ते । शध-सपप्तिमें मी प्राण तो प्पाहत (विशेषमावाफम ) ही होता १. तपा [ "प्राणो वैतासम्म सदात्मकानि फरणानि मवन्ति । रके इस श्रुविके अनुसार ] इपियों मी प्राणरूप ही हो जाती है। फिर फपमन्यारुतता? उसकी क्षम्याक्तता से कही गयी। अन्पारुवस्स समापान-पर कोई दोष नही है, क्योंकि अन्यात पदार्यमें देश सौ दमफालविशेपामा | काय विशेष मागका बाप होना पात् । यद्यपि प्राणा-है। पयपि [पैसा कि स्वमास्थामें सम्परा मिमाने सति म्पा-Jहोता है ] प्राणका अभिमान रहते हुए तो उसकी भ्यासता ही तपापि रुववैव प्राणस्थ क्यापि पिण्ठ सरप्समस्या प्राणमें पिपरिणिम परिच्छिविक्षेपामिमाननिराधः विशेश्वर बभिमान [वर्पर यह मरे शरीरसे परिपिाम प्राण- प्राणे मबतीत्यम्पाकत एम प्राणः | एसा अभिमान ] नही रहा, म परिमिदहामिमानिपि लिये मी मुपुप्ते परिच्छिमामिमानप्रवाम् । उस समप पहपाल ही है। यथा माणठय परिन्छिमा जिस प्रकार प्राणमा म्य[वर्षात् मृम्यु] दामर पटिम देवा- मिमानिना प्रामाऽप्यास्तम्तया निमानियोका प्राण अन्यालरूपमें प्राणामिमानिनाऽप्परिनपापसाय | रहता है उसी प्रकम माग्मभिमानियों पा भी प्राणकी भरिता प्रप्त प्पासनता समाना प्रमपरीक्षाम होनार उसी मालता और प्रयभीतरपना पैसी दीन फवन सदप्पथ प्याकता- [भन्यारत और पानि ] इन दानों • र पुतो लादुए एगोघे ग माft शामा ] मागम-प्रकरण --------------- घस । परिच्छिन्नामिमानिना- | अपस्याओं का साक्षी मी भन्यास मस्या रहनबाम एक ही [चेतन मम्पक्षाणां च तेनैकस्वमिति भात्मा ] है । परिशिन देहकि बमिमामी और उनके साक्षियोंकी | उसके साथ एक्ता है, बत [प्राइक पूर्वोक्तं विशेषणमेकीभूतः प्रमान लिये ] एफीमूठ प्रज्ञानन ' आदि पूर्वोक विशेषण उक्ति ही है, पन इत्पायुपपन्नम् । तसिन्नुत विक्षेपत इसलिये भी, क्योंकि इसमें [बधिदैव, मम्यात धौर वप्पात्म देतस्वाप । प्राइकी एकवारूप ] उपर्युक हेस मी विमान है। फर्य प्राणशम्दस्वमव्यारुतस्य। मन-किन्तु अप्पास्त 'प्राण' शम्दपप्प कैसे ? "प्राणपन्मन हिसोम्प मन समापान-हे सोम्प | मन प्राण ही वधीन है। इस श्रुतिक (छा० उ०६।८।२)इतिभुत । मनुसार। ननु पत्र "सदेव साम्प" सहा-किन्तु यहाँ तो "सदेव सोम्य इस श्रुतिक बनुसार प्रसा- (म० उ०६।२।१) इति प्राप्त सम्म ही 'प्राण' शम्दका प्रक सरस प्राणशम्दवाम्मम् । बाप्प है। नेप दोपः, पीनारमकस्वाम्यु समाषाम-पों पर दोष नहीं सगडवस्य पगमात्सतः। पपपि | हो सकता, पकि [उस प्रसङ्गमें ] पौन- सहम प्रामम्म्दवाच्य | समकी बीमारमकता स्वीकार की परत्वम् तत्र क्यापिजीवप्रसप | है । यपनि कहाँ 'प्राण' शब्दका पीजात्मकस्यमपरित्य ग्रम्प सम्म तयापि पीगेको परिकी वीयरमकताका न्यैव प्राणमन्दत सवा सप्छन्द न करते हुए ही उस समय पाप्यता । यदि हि निर्षीजरूप प्रागादत और 'सत्' पदका विधित प्रमामविप्यत् "नेति बप्पा माना गया है ! पदि हो स्पाग माणपोपनिषद् [गी.. नेति (१० उ०११९१२१२, सव' सम्पसे निर्धामग्रम करना "यतो पायो इस हो तो उसे " मही, यह महो।मसि वाणी गेट निषन्से" (३० उ० २।९) माती है। वह पिरितसे जन्म है "अन्पदन पदिदितादयो बधि और मवितिसे मी पर ।' इस्पति प्रकारसे कहा पाया, जैसा दितात्" (फ० ० १ १ ३) कि "यह न सह क्या मता है और इस्मस्पन "न सपमासष्यतन मसत्" इस स्पतिसे मी सिम रोप है। (गीता १३११२) इविस्मतेः। निमीखवयैव चेत्सति जीनाना और यदि को [ 'सत्' शमसे ] प्रामा निवरूपसे सपतालमयोः पूनम्त्यानानु ही निर्देश करमा सहो तो ससि और प्रकम (मरण) परस्मा सदमें पपत्तिः सात् । मकानो प कीन हुए पुस्योका फिर उठना [पात् उत्पम होना] सम्म माही होग्य वपर मुष्ठ पुस्पीक पुन रुपम होनेका पुनरुत्पचिप्रसझा, पीबामावा प्रसा उपस्तिो पापायोंकि [मुळऔर सदमें जीनाए पुरुषोम ] विशेषात् । वानदासपीखामा बसेर मात्र समान ही है। ( मनसे दक्ष होमेगाले बीचका सामानस्पप्रसकावसासपीम, अमन हमेस धानको म्पसाका मी प्रसाउपस्थित हो मामगा। व साम्पुपगमेने सतः प्राण- सारमी सबीनता सीकार करके पपदेशः सर्पतिः परमत्व ही उसका प्राणरूपसे समय मुखिया प्यपदेशः कारणरूपले समेत रित्या गयti • स्पोति नियम मेन पुए मुको पुनर्जन्म माना नही गमा मोर गरि उत्स अपलामें मी पुनर्मम सीधर बिना बाग का मुखिहो भनि पार मी पुनम मानना पड़ेगा।
शां• मा०]
मागम-प्रकरण
अत एव "अक्षरात्परसः पर सीलिये बह पर बक्षरसे भी
(म० उ० २।१ । २)। पर है" "यह नाम (कार्य) और
"सबापाम्पन्सरो पज" (स० | बम्पन्तर (करण) के सहित
उ० २ । १ । २)। "पतो | { उनका अधिष्ठान होनेके कारण ]
अम्मा है' "महाँसे वाणी छोर
पापा निवर्तन्ते" (ले० ०० २।
बाती है या नहीं है या नहीं
९)। "नेसि नेसि" (१० उ०, इत्यादि मुनियोंारा शुर प्रमका
४।४। २२) इत्यादिना पीय-निर्देश पीवत्वका निरास करके
वस्थापनयनेन म्पपदेशः । ही किया गया है । उस 'प्राध'
वामवीनावम्पां तस्मैव प्रामश्चम्द
शप्दवाय मीवकी, देहादिसम्बन्ध
| तथा बामत् धादि वास्थासे रमित,
वान्पस सुरीयस्वेन देहादिसपन्य
उस पारमार्थिकी अबीगास्पाफा
माग्रदादिरहिता
पारमार्थिकी | सुरीयरूपसे मसग वर्णन करेंगे।
प्रथम्वत्पति । पीजाबम्पापि न | नीनावस्थामें मी चामत् होनेपर 'मुझे
किचिदवेदिपमित्पुत्थितम पुछ मी पता नहीं रहा' ऐसी प्रतीति
देख्नसे शरीरमें अनुमत्र होती ही
प्रत्पपदर्शनादोऽनुभूपत एवेति
है। इसीसे वह हमें तीन प्रकारसे
विधा देहेम्पपस्थित इस्युच्यते॥२॥ स्थित है ऐसा कहा गया है ।।२।।
पिसादि त्रिविध मोग
विश्वो हि स्थूलमुनित्य तैजस प्रविविक्तमुक् ।
आनन्दमुक्तथा प्रालिघा भोगं नियोघत ॥३॥
विध सर्वदा त्पा पदापोकोही मोगमेश्राम है, सैमस सूक्ष्म पापा
का मोका है क्या प्राय भानन्दको मोगबाम है। इस प्रकार इनका
सीन तराका भोग नानो ॥३॥
स्थूल तर्पयते विश्व प्रविविक्त तु सैजसम् ।
आनन्दम तथा प्राज्ञ त्रिधा सप्ति नियोघत ॥१॥
माइक्पोपनिपद [गौ.का. त्यूय पदार्प पिचको काम करता है सम्म तैबसकी तृप्ति करमे वाम तथा आनन्द प्राइकी, इस प्रकार इनकी दृसि मी तीन तहकी समयो॥१॥ उकाची लोकौ ॥३-१॥ इन दोनों स्कोका बर्ष कहा या चुका है॥३॥ २४॥ विपि भोट मोर भोग्यके मानका फल त्रिपु धामसु यद्रोग्य भोक्ता यम प्रकीर्तितः । दैतदुमय यस्तु स मुजानो न लिप्यते ॥५॥ [जाप्रत, स्वप्न बौर समिन ] तीनों स्थानों को मेम्य और मोका बताये गये है- -इन दानोंको जो जानता , यह [ भोगोंको ] भोगते हुए मी उनसे मिस नहीं होता ॥५॥ त्रिपु धाम बापदादिपु जामत् आदि तीन स्थानों को स्यूस, सूक्ष्म और वानम्दसहक सीम स्थूलप्रविषिक्कानन्दाम्पं मोज्य- | मनोम य इस एक हो मोम्य । मग त्रिपामतम् । यम विम- वौर पम इस प्रकार एकरूपसे अनुसन्धान किये जाने वपा रस्त्वमें सेजसप्रामास्पो भोक्तकः सोऽह को विशेषता म होने के कारण विम, तबस वौर प्राङ्नामक जो मित्करपेन प्रतिसन्धानाद्रप्ट एक ही मे मतमाया गया है- स्वाविशेपाच प्रकीर्तितः यो येदै | इस प्रकार मोग्य और मोक्ताहमसे भनेक प्रकार विमिन ए इन दोनों तदुभयं मोन्यमोक्तृतपानेकया | ( मोका और मोम्पो यो चानता है या मोगता मा मी लिस मही भिन्न स मुभाना न सिप्पते; होता, क्योंकि समस्त भोम्प एक ही मोज्यस्स सर्वस्पकस्स मोक्त- मोष्यका म्ोग है। वैसे अग्नि अपने विश्य काधादिको बार [ग्यूना ोन्पत्वात् । म दिपस्स या रिपयः | पिक मही ऐना । अपने स्वरूप, वा०मा०] मागम-प्रकरण स तेन हीयते पर्वते पा, न | सदा समान रहता है ] उसी प्रकार मिसका जो विषय होता है पर उस पमि स्वविपर्य दगम्वा काष्ठादि विपके कारण हास अपवा दिको यन्त् ॥ ५॥ प्रास नहीं होता ॥५॥ प्राण ही सपकी मष्टिगता है प्रमव सर्वमावाना सतामिति निनिमय । सय जनयति प्राणश्चेतोंऽशून्पुरुप पृथक् ॥ ६ ॥ पद मनिधित पात कि जो पदाय विपमान होत ६ उम्ही सपकी उत्पति आ करती है। बीजानर प्राग ही सबकी उत्पति परता है और चेम्नामा पुरुष चैतन्यरे मामासभूत जीयोंकर अरग- भरग प्रकर परता॥६॥ सता विपमानानां स्वेनाविद्या सत् अपात् नमन अरियार मापिए मरपमे सतनामरूपमायाम्बरपण सर्य | मामपामा पिमान एि मेमस और प्रास भागना विषो जसप्रारमदाना | भेरल सा पर्थोपी ठापत्ति प्रमय उत्पति । यस्पति प-कमी है। आग(प्रा० ३र० "पप्पापुत्रा न सत्येन मायया | 24 में) पद कहेंगे भी "यन इन । परि म तो पटत और न मायाग हीटम घमनाम अम म्पारणा होता है।"प असत् ( मरमे बपिमन) काही टपनि rr पर आप प्या मरममा परग्मुमपादी प्रदान कम्मरनिर्ग नामरिपाहमापाचापपाना ! भमुरग मा उनि रन्न्यापामना सम्मम् । न हि । a पर निगम्पदा रन्नुमपमृगइजिनमे T"पर एक पपिपरम्पन्न | गन्भे मः Pr, वापि बापत ऽप्याम्म प्राणारामाराम मागायोपनिषद् [गौ.का. यथा फेनधित् । रन्न्वो किसी भी पुरुषने निरामय रास प्राक्सोत्पले रन्मात्मना सर्प अपना मवृष्णा बादि कमी नहीं सन्नेवासीद, एवं सर्वमाया | देखे । मिस प्रकार सर्पकी पत्तिसे पूर्व या रम्जुमे रशुरूपसे सत् ही नमस्पचे प्रास्त्राणवीवात्मनैव था उसी प्रकार समस्त पदार्प मपनी सत्यम् । यता मुविरपि मक्ति उपविसे पूर्व प्राणामक बीबरूपसे "प्रतिदम्" (मु•ठ२।२।११) सत् ही थे। सीसे भूति भी करती "आत्मैवेदमग्रमासी" (१०३० "पह ग्रामी"पल या १।४।१) इति । मामा ही पा" इत्यादि। सर्व जनमवि प्राणश्तों सब पदापोंको [बीवरूप] प्राण ही उत्पम करता है। तपा जो प्रशूनंशष इस रवैभिदात्मकस्य वामें प्रतिविम्बित सूर्यके समान पुरुषस्व तोरूपा बलासमाः | देव, मनुष्प बोर तिर्पणादि बिमिम तेजस एवं विसरूपसे प्रापतेजसपिभमेदेन देवतिर्म चिदात्मक पुष्पके गादिठहमेषु विमाम्पमाना- किरणरूप चिदाम्पस , म विषयमाक्से मिलक्षण तथा अमिकी स्वेतोऽनमोपेवान्पुरुषापपम्मिपर- चिनापरी पोत सम्में प्रतिविम्बित भाषविरूषणानपिपिस्फुलिङ्गवत् सूर्पके सम्पन सनातीय जीवोंको सठपणालावध बीपलक्षमा पुस्य वा ही उपम करता है। स्त्मितरान् सर्वभावान् प्राणो उसके सिवा कन्य समस्त पदापा कोमीयामक प्राण तापम करता है, पीजात्मा अनमति “पयोर्य । जैसा कि "रिस प्रकार मकी नामि "(१०3० १११।७)"मया- [साथ बन्पती है ]" तया से बपिसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ मुद्राविफलिगाः" (पृ० ० मिकती है। इत्पानि मुनिसे ।१।२)(इस्पादिभुते ॥६॥'सिद होता है ॥ ६ ॥ हामि प्रब मासमान शा.मा ] मागम-प्रकरण - सारिक विषयमें मिप-मिष पिकल्प विमूर्ति प्रसव त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तका । स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥७॥ सरिक विषयमें विचार करनेवाले दूसरे लोग भगवान्की विभूतिको ही मगरकी उत्पति मानते हैं तथा दूसरे होगद्वारा यह सरि खम धौर मायके समान मानी गयी है।॥७॥ वितिनिस्तार ईपरस्स सृष्टि र सृष्टि ईश्वरकी विभूति यानी उसका विस्तार है-ऐसा सस्कि रिति सष्टिचिन्तका मन्यन्ते न | विषयमें विचार करनेवाले अंग मानते है। तत्पर्य यह है कि परमार्य- तु परमार्थपिन्तकानों सृष्टाषादर निम्तन करनेवाल्मेका सप्लिके विषयमें इत्पर्य । “इन्द्रो मायामिः पुरुप | सादर नहीं होता, जैसा कि "न्द्र (परमात्मा ) मापासे अनेक रूपमा इयत" (२००२।५।१९) हो जाता है इस मुतिसे सिद्ध इति मुतेः । न हि मायाविन होता है, [ केला बहिर्मुस पुख्य ही उसकी उपरिक शिवपमें सरह सत्रमाकाक्षे निषिप्म तेन | तरहकी कम्पना किया करते है। वाकाशमें सूत फेंककर उसपर सापुपमारुम पक्षुर्गोचरतामतीस्प | शोसहित भासा ऐ नेप्रेम्रिएकी पषसे परे जाकर युदो हारा युद्धेन स्वपश्छिन्नं पतित बनेको टुकोंमें विभक्त होकर गिरे पुनरुत्थितं च पश्पा तत्तत |माले पुस्याको सकी रची दुई माया हए मायावीको पुन उठता देख्ने- मायादिसतवचिन्तापामादरो बादिक सहपके पिम्तनमें आदर मपति तवायं मायाविनः सूत्र नही होता । उस मायापीके सूत्र- | विस्तारके समान ही पे माप्ति एवं प्रसारमसम सुषप्तस्वमादिपिका- समादिके विकास है, तथा उस (स) पर को हुए मापापीके सस्तदास्मापापिसमय सस्था समान ही न ( माति भादि ४८ मास्योपनिपद [गी. प्राहदेवसादिमतदाताम्मा-पायों ) में सित प्रा एवं तैपस बादि । शिस्त पास्तविक मन्यः परमार्षमायापी स एष मायावी सो स्त्र और उसपर बड़े पए मापातीसे मिल और बी मुमिठो मामाम्छमोऽश्यमानएप से मायासे बा अदित रहने के सितो पषा तथा तुरीयासम्म फरण दिखायी देता यादी पृफ्धिीपर स्मित रहता है पैसा ही परमार्थतस्यम् । भवस्तचिन्ताया- रीपसजक परम्पर्य तत्व भी है। बत मोक्षकामी वार्य पुस्पोका सी- मेपादरी सुमनामा मां नक चिमनमें भादर होता है। निष्प्रयाजनामा स्टापारिपत्यता प्रयोमनाहीन समिमें उनका जादर नहीं होता। ये सब स्किल्प सटिपिन्तकानामेवे विझल्पा | सृष्टिका चिन्तन करनेवास के ही सीसे कहा है-मनमायासरूपा इस्पाह-स्वप्नमायासस्पेवि इति' मा सरे इसे ] सप्नरूमा समरूपा मामासरूपा पेति मागसपा मतलते है l इच्छामात्र प्रभो मृष्टिरिति सृष्टी विनिमिता । कालात्प्रसूति भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तका ॥ ८ ॥ कोई कोई सस्केि विषयमें ऐसा निसप रस कि प्रमुकी इस ही सति। तपा कारके पिम्पमें विचार करमेवाले [म्पोसिपी सोग काम्मे दी जी की उत्पत्ति मानते ॥८॥ इन्छामा प्रभा: सस्पसंकल्प मावान् सपसंपापा का बामुनिपटादिः संकल्पनामा पयरिकी सपि प्रमुक कम्पमाः । मिमा मही न संकल्पनादिरिन्छम् । कासादेव तथा सटिरिवि फेपिन शां०भा०] मागम-प्रकरण भोगायं सृष्टिरित्यन्ये क्रीसरार्थमिति चापरे । देवस्यैप स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ ९ ॥ कुल ग सरि मोगक हि सा मानते हैं भोर कुरा 'झीगफ लिया है मा सनमसे है । [परम मानवमें वो] यह भगवान्का समाग ही है क्योंकि पूगकामको या ही क्या हो सकती है ! ॥०॥ भोगाय मोडामिति चान्ये| दूसरे छाग सएिको पा भोग्य बपना मोगर्य है। ऐसा मानते हैं। सष्टिं मन्यते । अनपोः पक्षयो पस्यैर खमानोऽयम् इस बारपसे दूपर्ण दास्यप स्वभावोऽममिति | देवके समापनका आश्रय सेक्स दवस स्वभावपसमाभिस्य, सर्वेषां इन दोनों पक्षोंको दोषयुक्त बनाने है। अपवा 'प्रप्तकामस्य फाराहा पापयाणामाप्तकामम्प का सहेति। | यह भौमा पाद सभी पक्षोका दोष न हि रज्ज्वादीनामवियाम्यभाष | युक बतलानबाग है, क्योंकि अधिपारए वरन स्पमाबके बिना प्पविरेफेग सर्पयामासस्वे रग्गु मारिफा सर्ग की अभिम्पनि- में कारण म्ही बवामा मा कारण एक्स पफम् ॥ ९॥ सकता ॥९॥ पतु पादपिरण पतुध पाद: कममाता पतम्य अप कमसे प्रास मा पापा पार भी बागपास पही इस्यार-नान्त प्रवामित्यादिना। पति नन्त प्रजम्। यानि न्यमे कहते हैं। पर (पीपा ) सम्पूर्ण प्रातिनिनियसे रहित समदपपिनिमिसान्यता ६,बल सप्दसे उसरा वगन नदी रिपा वा सपना । ये एप्ति सम्म सदानभिधयन्पमिमि | | अत:प्रारमिपमा माणस्योपनिषद् [गौ.. पिशेपप्रतिपेषेनैव ष सुरीय प्रतिबंध करके ही उस तुरीयका निर्दिदिधति । निर्देश करनेमें प्रवृत होती है। शून्यमेव तस्वित् । पूर्व०-तब तो पह शूम्परूप ही वा। मिप्याविकल्पस सिगम्ती-म) पोंकि मिप्पा निनिमिचस्वानुपपचेः । न हि | विकल्पका बिना किसी मिमिके रबतसर्पपुरुषमगवृष्णिकादिवि होना सम्भव नही है। चांदी, सर्प, कसानुक्तिकारसाणूपरादि पुरुष वौर मृगतृष्णा मादि विकम्प म्पविरेकमावस्पास्पदाः शक्या [क्रमश ] सीपी, रस्सी, टूठ बोर उसर धादिके बिना निरामय ही कल्पचितम् । कल्पना नहीं किये जा सकते। एवं सर्दिप्राणादिसर्वविकल्पा पूर्व०-यदि ऐसी बात है तब तो प्राणादि सम्पूर्ण विकल्पका नामम सदस्वातुरीयस सम्बवायलम् | होनेके कारण 4 तरीप एप्पका (बाप्य सिय होता, चम्के शविन प्रतिपेयः प्रस्पाप्पस्वम् । आधारभूत घट सादिक समाम [[मन्त प्रात्पादिक] प्रतिषेपवारा उस उदकापारादेरिव पटादे।। की प्रतीति नहीं पायी जा सकती। मा प्राणादिविकल्पस्सासमा सिसी-ऐसी बात मही है। क्योंकि मुक्ति बारिमें प्रतीत होने पतिकादिप्तिा रमतादेः । पाठी पोरी वादिके समान प्राणादि विकास न हि सदसतो समन्धा पम्प मसयूप तपा सर और पसदका सम्बन्ध वास्तुरूप होनके महधिनिमिपमागवस्तुस्सात् । कारण शम्दकी प्रालिका व महाँ हो सकता। पोर म गो मादिके नापि प्रमागास्तरपिपयन स्वरूपेच समाम इस्पापसे फिसी कम्प गवादिषा मास्मना निरूपापि प्रमाणका ही विषय हो सकता स्पोंकि वास्मा उपाधिदित है। फत्वात् । गपादिममापि प्राति सी प्रकार परित्तीयप होनेके शा० मा ] मागम-प्रकरण नापि गुणवत्व मत्वमद्वितीयत्वेन सामान्म कारण सामान्य अफ्या विशेष माव का धमाव होनेसे उसमें में बार्दिक विशेपामावात् । नापि क्रियावस्य समान नातिमत्व भी नया है। पौर पाचवादिबदविक्रियत्वात् । न अधिकारी होने के कारण उसमें पाचकादिक समान कियायाप तपा नीलादिन निर्गुण होने के कारण नीता नादि मिर्गुणत्वात् । अतो नाभिधानेन | के समान गुणाव ही है। इसलिये उसका किसी भी मामसे निर्देश निर्देशमईति। महीं किया जा सकता। समविपाणादिसमत्वामिरर्य पूर्व-तब ये शशक्षादिके फत्व । समान [ अस्प होमेके कारण ] ना मारमस्वावगमे तुरीय | उसकी निरर्पकता ही सिद्ध होती है। स्थानात्मकृष्णाष्या सियाम्ती-नहीं, क्योंकि मुक्तिका प्रतिहेतुस्वाग्छक्तिशान होमेपर मिस प्रकार [ उस खवर कावगम व रक्त में बारोस्ति ] पानीकी तृष्णा नए हामायाः । न हि तुरीयस्सात्म हो जाती है उसी प्रकार तुरीय हमारा स्वाषगमे सस्पचिपावणादिदो बारमा है- ऐसा ज्ञान होनेपर वह पापा सम्मवाऽस्ति। न च सुरीयसा बनारमसम्वधिनी तृष्णाको निाच स्मतानपगमे फारणमस्ति; सर्यो- करनेका कारण होता है। दरीयको पनिपदों सादनापक्षयात् । वपना वास्मा बान सेनेपर वरिया एवं "सुषमसि (छा-ठ०६।८।१६) सृष्णादि दोपौकी सम्मानना मही "मयमात्मा प्रम" (पु.३०२। | राती । वो तुरीपको अपने नाम- ५।१९)। "सत्सस्प स आस्मा" (छा० उ०६।८।१६) स्वरूपसे न मानमेका कोई कारण भी "परसाधादपरोक्षा" (पृ.महा है, क्योंकि "तत्वमसि - उ०३।४।१)। "सबाया मारमा प्रयासर्व सभास्मा" म्पन्दरा पछ"(मु० उ०२। साक्षादपरोक्षामा स
५२
माफ्योपनिरन् [गी० का.
। २)। "मात्मैवेदर सर्वम्" । मायाम्यन्तरा पर " आत्मैदर
(छा० उ० ७ । २५ । २) सर्वम् । इस्पा समक्ष उपनिषदाम्पों
इत्यादीनाम् ।
का फ्यवसान इसी मर्यम जमा ।
सोऽयमास्मा परमार्थापरमार्थ यह यह धारमा परमाय वौर
म्पमतुप्पादिरयुक्तस्तस्मापरमार्थ- बारमार्थरूपसे चार पादवाला t-
| ऐसा कहा है। उसका बीजापुर
रूपमविपारुव रन्जसदि
| सामीय पार प्रयवरूप अपरमार्प-
सममुक पादत्रयरुपण बीजार र रसादिके समान बतिया
बरसानीयम् । मपदानीम | मनित कहा गया है। पत्र साधि
बीमात्मक परमार्थस्वरूप रह
स्थानीय तक तो पायोका निरा
फरण कर नास्त प्रशम्। अपादि
सानीपं सर्पादिस्यानीपोकसान
रूपसे
रखुस्सानीय
प्रयनिराफरणेनाइ- नान्तःप्रह
बबीनारमक परमार्यस्वरूपका वर्णन
मित्यादि।
तरीमा स्वरूप
नान्त प्रान्त न यहिष्णन नोमयत प्रज्ञेन प्रज्ञान
घन न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । मदृष्टमन्यवहार्यमग्रायम
लक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपनो
पशम शान्तं शिवमठेतं चतुथ मन्यन्ते स आत्मा
स विज्ञेय ॥७॥
ससक
विकीमम तुरीयको ऐसा मामते १ किया म बसन
परिजन उमपत (पालि ) प्र.९, प्रकलपन,
प्राचौर म प्रदपरिक गण, पप्परहार्य, वप्राध, परक्षण,
अधिमय, चम्पपदेश्य एकामप्ररययसार, अपचका उपशम, शFa, शिष
और बीवलपमही भारमा है और यही साक्षात् माननेपाय ॥७॥
शां. भा०] मागम-प्रकरण पर प्रापम् नन्यास्मनमतुप्पास्त्र प्रतिवाय पूर्व-विस्तु वास्मा चार पाों- पाला - ऐसी प्रतिधाकर उसके पादप्रयमयनेनैप प्यतुर्थस्पान्तः तीम पार्टीफा वर्णन कर देनसेही प्रमादिम्पोऽन्मत्वे सिद्ध नान्त चौघे पादया बम्तःप्रहादि विशेषणों से भिम होना तो सिटी क्तः प्रमिस्पादिप्रतिपेषोऽनर्भका । या "नान्त प्रहम्" इत्यादि प्रतिषेध तो म्पर्य ही। ना सादिविकल्पप्रतिपेषेनेष मिलती-रेसी बात नहीं है, क्योंकि मिस प्रकार सपदि निकम्प रन्जुस्वरूपप्रविपरित का प्रतियेप करनेसे ही रमुके परम्पबम्पस्पैवात्म- बनारम्पतिष स्वरूपा पान हो माता है उसी नस्सुरीयस्वेन प्रति प्रमा वैसा कि "तत्वमसि इस्पादि पिपादपिपितत्वात् वाक्पमें देखा जाता है, यहाँ "सत्यमसि" (छा० उ० ६।८। [मामदादि तीनों मनसायोंमें स्थित वारमाकर ही वरीपरूपसे प्रतिपादन १६) इवियत् । पदि हि पप करना है। यदि तुरीय बात्मा वयस्थाप्रमविशिए वास्मासे सर्पग म्पास्मविउधणं तुरीपमन्यचत्र [ भिम होता तो उसकी उपलम्पिका कोई उपाय रहनेके कारण विपतिद्वाराभाषान्छामापदेशा | शास्रोपदेशकी म्पर्मता शून्पादकी प्राप्ति हो जाती । जब नर्थक शून्यतापधिर्वा । कि सरि (सर्प, मारा, मष्टिवादि) सपसे विकरियत रसके समान रम्परिन सादिमिविशम्प्य [जाप्रवादि] तीनों सालोंमें एकरी माना सानत्रयेऽप्पास्मैकएमान्तान बारमा अन्त प्रादिरूपसे मिपित हो रहा है तो मत प्रादिक प्रचारितेन विकारप्पत पदा) प्रतिपदिशामरूप प्रमाणकी उत्पत्ति पदान्त महासादिप्रतिषेपविमान के समान बारमा बनर्फ पपपा मणस्योपनिषद् [ग का प्रमाणसमयसमेपात्मन्सनप्रपा प्रपनकी निवृधिहप का सिद्ध हो यातायत तुरीयका साक्षात्कार निविलक्षणफल परिसमातम्, परनेके लिये इसके सिवा किसी पति दुरीयारिममे प्रमाणान्तर क्न्य प्रमाण मया साधनकी पोष फरमेकी बालश्यकता नहीं है, वैसे साधनान्तर वा ने मुग्यम्। किरण मोर सपकार विक शेनेक रन्जुसर्पविकसमकाल इस समामका में दो रनमें सर्पनिाति रचा सर्पनिचिफसे सविरूप फरकी प्राप्ति होघे ही रमुका बाम हो जाता है उसी प्रकार यहाँ रनधिगमय । सफामा चाहिये । येपा पुनतमोऽपनयष्यविरेफेम किम्त पिनके मतमें पटहाममें मनकारकी नितिक सिम किसी पटापिगमे प्रमाण व्याप्रियते और काम मी प्रमाणको प्रति सेपो छैधानमरसमापियोग होती है उनका तो मानो ऐसा कपन कि सेप पाक नपर्चाका व्यतिरेफेणान्यवरापाषेऽपि सम्बनविद करनेके तिरिफ मी छिदिापिषत इम्युक्तं स्यात् । परमक्रियाका बस्तुक किसी एक पदा पुनर्घटतमसोस्विकारणे पापबमें कोर म्पापार है- हेप बापाका सम्बन्धपोर प्रस प्रमाणमनुपादिस्सिवपमो । परन प्रवृत्त एनरिया जिस वापर्प दिन प्रपर मरधरम पो हुए परम भर मात करने मिपाकी मधिमार ही मापक भय ीि नियात्री मात्र मही है उसी प्रकार पुरीष मन मात करने मे तवम मारोत मम्वमालारानपण। ये मोग परगनम मार निधिमरा हो असार ममापाई और मागर भी सीNR परते मानो ऐसा स्टेमकिरा परापर भपती समारपीर करनेमिया उमरेली भी मसमें कोई मम्प प्रम भी र देवी है । परम् पापा सम्मान मासपेपर विराम नाम गायर मारो । सीमियरनमकपन माननीय महा है। "प्रपा मगरपदी निगरा पिपरो स्फुरण होने • भा०] मागम-प्रकरण निाफिलापसानं छिदिरिम | प्रकार उसके अनमोंकि विभक्त हो जानेमें समाप्त होनेपाली यावयवसम्पन्धविषेककरणे है उसी प्रकार जब कि घट प्राचा वदवयवधीभावफसा वीर पकारका पापम्प करनेमें मरच प्रमाण बनिए क्वारकी पसाना ददा नान्तरीयकं पट | निाविकप फमेही समाप्त हो माने बाछा तब घटवान तोवरमाभाषी विज्ञानं न सप्रमाणफ्लम् । या प्रमाणका फल नहीं है। न प सन्दप्पारमन्यध्यारो उसीके समान जारमा भारोपित पिठान्तःप्रवस्वादिवियफफरणे मन्त प्रहत्यादिके रिक फरममें प्रपत्र प्रतिपेषविधानरूप प्रमाणका, प्रातम प्रतिपेषविधानप्रमाणस्य मनुपादिस्सित (बिसका स्वीकार अनुपारिस्सिवान्तःप्रस्वादिनि (करना इष्ट नहीं है सामन्त प्रमत्वारि चिम्मतिरेकेण सुरीये भ्यापारो-को निवृत्ति के सिवा तुरीय बास्मामें कोई अन्य व्यापार होना सम्भव पपषिः । मन्ताप्रास्यादिनि मही है, स्पोकि भरत प्रत्यादिकी निषिके समकालमें ही प्रमावलादि चिसमकालमेव प्रमासस्वादि मेकी निति हो जाती है। ऐसा मेदनिाचे प्रथा च पश्यति-ही मान हो बामेपर रेत मी रहता पानास्पधरा बागेगे "धावे देस न विद्यत" (माण भी, क्योंकि विधमकी भी सिति का०१।१८) तिमानस देशनिवृत्ति क्षणके सिम सरे पण महो रही और पदि मिति देवनिरिक्षणम्पविरेषण पणा । मानी माप ममपरसाका प्रमा कोई मरण तापी महा या भवः विषयमन ऐनयनरी पारिप-- ऐसी भाडामागडी मारे। माखनीरो मे चिन-बिन ममा भाग लिया या अब तपो मतगव निविदेत निविपरनेगम पनि भी सिहर रोनेके भरण देतरी अगव । गरिमा सम्पूर्ण रेप भी बना रे तो उमली मिचि रिसे ये भय चिकी भला होग्न मापस्योपनिषद न्वरानवसानात् । वासाने । उपस्थित होनेसे दैतकी नाति भानवस्याप्रसङ्गातवैवानिवृत्तिः । ही नही होगी। मत या सिर पुवा कि प्रतिषविज्ञानरूर प्रमाणके ससास्त्रविषविज्ञानप्रमाणम्पापा- प्रदर होमेके समकाल में ही स्मामें रसमकालयात्मन्ययारापिसान्त वायप्ति समयादि बनर्षकी प्रपन्यापनर्यनिाचिरिवि सिद्धम् । निधि हो जाती है। नान्तःप्रममिति सैजसमविपेपः। यात.प्रा नही है। ऐसा करार विसका प्रतिबंध दिया। बाद न पहिरप्रसमिति विषप्रतिषेधः प्रा नहीं। इससे विषय निषेध नोमयसम्मममिति माग्रस्समयो / किया है, 'उमपत प्रा नी । इस पास्यसे वापत् और सप्नके रम्परालापम्पाप्रतिपयः । नबीचकी यासाकर प्रतियेच किया है। प्रशामपनमिति सप्तापम्पाप्रति प्रझानधन मही है। इससे मसिका प्रतियप वा स्योंकि मीन पभः पीजमावाविधकरूपत्वाव। ] मात्रमप-अविवेकम्मरूपा है, प्रा नप्रदमिति युगपरस विपाशा नहीं है। इससे एप साप सब विषयो कारला प्रतिपय किया? तत्वप्रतिपमा । नाप्रममित्म त भाइ नही समे वन्यप्रतिपमा बचेतमताका निपप दिया। कर्ष पुनरन्त प्रपरषादीना रितु जबकि त मला धर्मवरमा प्रत्यक्ष पद तो केवल प्रविषयकेही कारण मात्मनि गम्पमानानां रन्नादी | उनका में प्रतीत होनबाले सलिये समान भमस्पर से सिय भौर उds | पर अनपसा बारास्थित दो रापान भीर निधि भी न स पाोगी। लाय निनि परने। इनमें से चिगन भी नाघमामा-पही मद नमी पान है।
ग. मा.1 माराम-प्रकरण - सदिसत्प्रसिपेघाइसम्म गम्पन हो सकता है । इसपर करते हैं- एमु काश्मेिं प्रतीक होनेवाले सर्प, दस्युम्पते । प्रस्वरूपाविशेपेऽपि धारा नादि विकापमक समान स्तरेवरव्यभिचारान्जिादाविष उनके वित्खलपमें की मद म सर्पधारादिविकसितमेदयत होनेम मी परस्पर एक सरेका पमिका छनफे कारण रे बसप सर्पधाम्पमिनारान्यस्वरूपस्य है। किन्तु विभागका की मी (म्ममिधार महा १, इसटिये बह सत्यतम्। सुपुले मभिधरतीति चेन्न । पदि योनि सिमें उसका सुपससानुभूयमानत्वात् । "न म्पमिधार होता है तो ऐसा कहना दि विनासर्विधावविपरितापो भी मेव नहीं , क्योंकि मासिका मी मनुमा एना करता है, वैसा कि विपते"(२०४०४।३।३०) विज्ञानाची जातिका भोप नही इति सरे । होगा। इस प्रतिसे सिर दोग है। बत एषारएम । यसादार इसीलिये पर मारप। और सम्पादम्मामार्यम् । मनाय को क्योकि मास है इसस्टिये अश्याहार है सपा बनियोंसे नाव और न्द्रियः असमगमनिगमित्येतद् कण पानी विरहित है। ननुमेपमित्यर्थ । यस पया (तापय पद है कि उसका अनुमान पिन्स्यम् । मत एवाप्यपदेन (मापिय ना सका । इसीसे र बपिनय मास शरा एकात्मप्रत्यपसार वरपनीय र एकारम्पपसार मागदादिम्यानेजमेऽयमात्मेस्प र नव नाम था स्पानि पक ही मापा १-पमा जी प्पभिमारी ५ प्रत्ययम्नानु अभिवानी प्रपप भुमे सरपीपम्। अपामारमप्रत्पपा अनुम्यूग पेि पान बाप। मा प्रमाण पम्प तुरीयस्यापिगम पावा -A HERE ।
माणस्योपनिषद् {नीका सतुरीयमेकात्मनस्यपसारम || उपासमा करे" इस मुतिके अनुसार विसतरीयका मान प्राप्त कर में "आस्मेस्येवोपासीत" (पृ. १० एक बारपणापम ही सार पानी प्रमाण ११४१७) इति श्रुतेः। या वरीय एकात्मप्रत्ययसार है। अन्सुम्प्रचन्वादिग्यानिधर्म मन्त.प्रासासिानिया (जामत मादि बासा के अभिमानियों) प्रतिपयःकताप्रपोपनममिति धोका प्रतिपेष किया गया, जाप्रदारिसानधमामार उन्मसे। मग प्रपोपशम इरमादिसे जामत् नि सामों (नरस्पामों) के मान्तमविनियम्, भोकर बमार बताया माता है। इसीलियेर शाम्त पानी शिष यतोऽग्रेत मेदविकास प्रतिकार मोरक्योकि पोत रदिवम् । चतुर्ष तरी मन्पन्नवत् मेदरूप विफम्पसे रहित । इसरिये शिव उसे चतुर्ष पामी प्रतीयमानपादत्रपरूपमपापा। राम मामवेद, क्योंकि यह प्रतीत म भारमा स रिपेय इति सेनाले पूल तीन पानेसे विलक्षण है। यही परमाऔर बड़ी प्रतीपमानसपंतिरादिम्म उम्प है। या मिस प्रकार र तिरिका रन्नुम्च्या भपन में प्रतीत होमेवारी सर्प, दण तस्वमसीस्पादिनारपा) मारमा और भूमिण भासपा भिम उसी प्रकार हससि इत्यादि "मरटोश"(ए.उ.मायोकर अयसकर मामा, मिसर fruस होफर मी देखनेपालग" २३)"महिनापचिपरिसोपो या रिका मोर नही हातात निपते ' (१.३.११३१२३) पा सुनियोंने प्रनिगा न किया है, पिन वापस मामदादिवास्यामों पादिभिरुका पास पिप से मांग मिनाही लम्प गेगा गूगतिसे. या माता इणि मनागम्या, माते , पोषि उमा प्रम होनेपर सामाप ॥७॥ रोपाला॥७॥ .भार मापारमा मामा औसा मान पागल सभामrum मामलामा भार भरतीमधीमा यथा ० भा० ॥ मागम-प्रकरण ----60-09- सुरीप प्रभाव म सोच भवन्ति इसी ममें ये श्लोक है- - निवधेः सर्वदुःस्वानामीशान प्रमुरव्यय । मत सर्वभावाना देवस्तुर्यों विभु स्मृत ॥१०॥ वरीय वरमा सब प्रकारके दु सोंकी मिति ईशान-प्रमु (समप) है। अविकारी, सब पापोंका भौतरूप, देव, तरीय मोर म्यापक मामा गया है॥१०॥ पाइपसहिपलषणानां तरीय बास्मा प्राज, सैमस मौर सर्पहासाना निचरीमानस्तुरीय विवरूप समस्त दु लोंकी नितिने ईशान है। ईशान' इस पदको मास्मा । ईशान इस्पस पदस्स म्पारूपा 'प्रभु' है। तम्पर्य पर म्याग्मानप्रसारिति । दासनिापि कि या दुपनिहदिमें समर्थ है, प्रति प्रधभक्तीत्यर्थः । विमान क्योंकि उसका विज्ञान दु सनिधि निमित्तस्वाद दुःसनिपचे । का कारण है। अम्पयो न म्पति स्वरूपान वामप-यो म्यय (विकार ) को प्राप्त नही होता बर्यात् गो मभिपरतीति यावत् एतत्तवरूपसे म्पमिपरित पानी युत महा होत्य । मो प्युवमही होता। पसादतः सवमाषानो रन्छ क्योंकि बात बन्य सब सर्पगन्मपात्वात्स एप देखो पदार्प रसम वयस्ता समे समान मिथ्या है इसलिये प्रकाशनशील पोसनातुरीयमा विसापी एनके कारण वह यह देव वर्ष पानी चतुर्प भौर. विभु पानी व्यापक स्मृतः ॥१०॥ माना गया tnton माणूपयोपनिषद [पी० ०का. जाता है-- विम और तैयसस तुरीया भेद विषादीनां सामान्यविशेप तरीयका यथार्थ सरूप समममेके रिये मि आदिक सामाम्प और भाना निरूप्यते पुर्यपाथात्म्पा विशेष भाषका निरूपण किया पधारणापम्-- कार्यकारणयही ताविप्येते विश्वतैजसी। प्राज्ञ कारणघटस्तु हौ सौतुर्ये न सिध्यत ॥ ११ ॥ विस और सैमस-पे दोनों पाप (फलामस्सा ) और कारण (बी बावस्था ) से मंधे दुर माने जाते हैं। किन्तु मात्र केवळ कारणावस्सा- से ही बर। नपा पमें तो प दोनों का महा ११॥ काये नियम इति पठभाव । जो दिया जाप उसे कार्य कहसे वा फळभाष धोरगो करता कारण फराठीसि पीजभाषः । । उसे फारण करते ए पीन सम्याग्ररणा यथापदणाम्या भाव है। ये उपर्युष विच कार जिस तरपके भमण सम्पपा पोमपसमाचाम्पा मी पपाको प्रणम्य भीनमाप और फलमानसे विपतमापदोसरीतामिप्यते।।धे भात् सम्यक् प्रकारसे पको ए मान बसे । रिन्तु प्रार प्रापमा पीपभाषेनंप पर ।
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09-2--22--09--- माषफ्पोपनिषए [.. "नारिऐतिपरिकोपोरियते" बम्य-प्रकाशन सम्भव नहीं। (१० उ० ४ । ३ । २३ ) इति पैसा कि प्रत्यकी पत्रिका विपरिप नहीं होता इस सुतिसे सिक भुवः। होता है। अपना मामस्वप्नयो सर्व अपना नाम एम समावहाके भूतावस्पा सम्बस्तुरगाभास | सम्पूर्ण मूतोंमें स्थित और समस्त स्तुरीय एवेति सर्वरक्सदा पदाकि साक्षीलपसे तुरीम हो म्पसमाम है इसलिये वादा "नान्यदताऽस्ति इष्ट (१० सर्वसाक्षी, जैसा कि "इससे मिम उ० ३ । ८।११) इस्मादि बार कोई वा नहो" इस श्रुतिसे सुतेः॥१२॥ प्रमाणित होत॥ १२॥ देसस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्रानतर्ययोः । वीजनिद्रायुत प्राक्ष सा च तुर्ये न विद्यते ॥१३॥ इतका बामण तो प्राइवोर परीय दोनोडीको समान मिला प्राइमीनमनपा निवासे पुल और पीपमें यह निदामही ॥१३॥ निमिचान्तरमाप्ताभरकानि यह एक निमितान्तरसे प्राप्त माशाशकी नियतिके लिये है। प्रत्यर्थोऽय ब्लाक कर्ष देसा प्राणस्स सुस्पस्वास्कारगमन मी t1 ०भा०] मागम-प्रकरण पीननिछा, तमा पुतः प्राज्ञः । वीम है, बत उसे भी अनिवार सदा करते हैं--प्राइ ठससे युक्त है। रस्वभावस्वाचवाप्रति किन्तु सदा सर्परकसरूप होनेक मोधनक्षमा निद्रा सुरीये न कारण पुरीयमें पह वीअनिदा नहीं वियते । अतो न पारणपन्ध-|t, नत उसमें कारणपरता नहीं स्वस्मिन्नित्पभिप्रायः ॥ १३॥ है- यह इसका तात्पर्य है| तुरीयका सप्न-निद्राभूमल स्वप्ननिद्रायुतावाधौ प्राशस्त्वस्वप्ननिद्रया। न निद्रा नैव च स्वप्न तुर्ये पश्यन्ति निम्मिताः॥१४॥ विष वीर तैवस-ये स्लम और निद्रासे युफौतपा प्रासमरहित निवासे मुहै, किन्तु निषित पुरुष तुरीयमें न निद्रा ही देखते है और न सप्न ही ॥११॥ खप्नान्यथापदणं सर्प स रम्जुमें सर्प-मणके समान रन्याम् । निद्रोका तमापति वन्यपाम्हणका माम सम है, सत्ता वप्रतिबोपरूप समको निदा मोपलक्षणं तम इति । वाम्पो करते हैं। उन सज धौर निवासे स्वप्ननिद्राम्पा युक्ती मिथतेचसो। विष बीर सैजस युक्त , क्त ने कार्यकमणवर कहे गये हैं। किन्तु मतसौ कार्यकारणपद्धाषित्युक्तो। प्रास तो स्पनरहित केवल निदासेही मासस्सु स्वप्नवरितफेवलपैप | युक्त है, इसलिये उसे कारणबद्ध कहा है। निषित पानी मसमेत निद्रया युत इति कारणपद | मेग तरीप पे दोनों ही बातें नहीं रस्थकम् । नोमयं पश्यन्ति तुरीये | देसते, क्योंकि सूर्यम यम्भकरके निभिसा प्रमविदो विरुदस्वात् | समान थे उससे विस्म है । वत तुरीय कार्य भपका कारणसे बषा सवितरीव समःयतो न कार्य दुबा मही-ऐसा कहा गया कारणादायुक्तस्तरीयः||१||॥ १९ ॥ तपा माफ्योपनिपद् [गो.. कदा तुरीये निमितो भब यह बताया जाता है कि मनुष्य परीयमें कर निधित होता भवतीस्पुच्यते- अन्यथा गृहत स्वप्नो निद्रा तस्वमजानत । विपर्यासे तयो क्षीणे तुरीय पदमश्नुते ॥१५॥ बम्पपा प्रहण करनेसे सप्न होता तथा तषको म मानमेसे निद्रा तेती है और इन दोनों विपरीत बानोंका क्षय हो मानेपर तुरीय पदकी प्रानि होती है।॥ १५॥ स्वप्नवागरितमोरन्पचारन्ना। रममें सर्पणके समान स्वप्न और जागरित अवस्थामें तत्पके सप इब गृहतस्तवं स्वप्ना भवति। मायपामाइणसे स्वप्न होता है तपा निद्रा तसमबानवस्सिप्प | तबक म आमनेसे मिदा होती है जो तीनों बास्माओंमें तुस्प है। बस्सास मुख्या । स्वजनिद्रयो- इस प्रकार स्वप्म और निवामें उम्प तुरपत्वादियवसपोरेकराशि होमेक कारण विच और गसकी स्वम् । अन्यथाग्रहणप्राधान्माष एक राशि है। उममें सम्पपा प्राणकी प्रधानता होमेके कारण गुणस्ता निद्रति तस्मिन्विपर्यासः | मिया मेण है का उन पत्रस्पानों- स्वप्नः । तीये तु म्याने सस्था में स्वमरूप विपरीत ज्ञान रहता है। किन्तु तृतीय स्थान (सपनि) में पानरुक्षमा निद्रेय केवठा काष्ठ परवामाणरूप निमा ही विपासा। | विपर्यास है। अवम्तयाकार्यधरणस्यानयोः नcom अन्यथागरणाप्रणयक्षमविपर्या कार्यकारणावरूप समप्रतिमोधवः क्षीणे पदमश्नुते ।।
शां• भा] मागम-प्रकरण रूप सत्रापश्यस्तुरीये निमिवो पुरुप सुरीयमें निश्चित हो जाता भवतीस्पर्थः ॥ १५॥ है-एमा इसका तात्पर्य है ॥१५॥ पोप का होता है। अनादिमायया सुप्तो यदा जीव प्रयुध्यते । अजमनिद्रमस्थाममद्वैत वुध्यते तदा ॥१६॥ जिस समय अनादि मापासे सोया हुमा नीम नाता है [अर्थात् वत्तहान अम करता है उसी समय उसे बम, अनिद्रवार सप्नररित बत वारमतत्वका बोध प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ योऽय ससारी बीवः स यह यो संसारी मीप हैर उभरतक्षगेन तत्वाप्रतिपोषरूपेण | तत्वाप्रतियोघरूप भी शारिमका एवं मन्पपागाणरूप सनाटिकारसे बीवात्मनान्पयाग्रहणलपमेन च प्रवृत्त मायारूप निवाके कारण अनादिकालपापेन मायालयमेन ] [ सप्म वीर नागरित ] दोनों ही वसायोंमें यह मेरा रित, पह स्वप्नेन ममाम पिता पुत्रानं पुत्र है, यह माती है, ये मेरे क्षेत्र, नप्ता क्षेत्र पक्षबोजमेपां सामी गृह है, में इनका स्वामी सुसी दुःसी परितोजमनेन | ई तपा इनके कारण समी-दु सी, पर्षितमानेनेत्येषप्रकारान्समान् क्षीण और वृदिको प्राप्त होगा। | इत्यादि प्रकारक स्वप्न देसता या सानोऽपि पश्यन्सुप्त । सा रहा। पदा वेदान्वार्थवश्वाभिवेन मिस समय मेदान्तार्यकालको परमारुणिकेन गुरुमा नास्पर्ष माननेवाले किसी परम कारुणिक गुस्के द्वारा ' इस प्रकार जव वं हेतुफलामक किंतु सब फसलरूप नहीं है, किन्तु मही। मसीति प्रविमापमाना, सदेई | इस प्रकार माया जाता है उस प्रतिपुष्पक- समय उसे ऐसा योध प्राप्त रोग- और पठ माण्डफ्यापमिपद [नौ०. कथम् ? नामियाममाम्पन्तर बिस प्रकारका बोध हाता! [ Aसास 8-] इसमें बाय बाब मादिभावविकारोऽम्स्यता अपना साम्पम्सर अम्मादि कर ऽम समामाम्पन्तरसर्वभावविकार | मही है, इसलिये यह मनग्मा पानी सम्पूर्ण मार विकारोंसे रक्षित । पतिमिस्पर्ध । यमाअन्मादि | और क्योंकि इसमें सम्मानिकी पारणमूर्त नामिमविधासमारीचं पारणभूत तपा भरियावर बाप कारकी बीजभूत भविषा नही है निद्र। विपत इत्पनिद्रम् । मनिद्र | इसलिये पह मनिद है। पतरीय बनिद्रइसीहिये जसप्न भी है। हि उत्तुरोपमत एवास्वप्नम् । क्योंकि बम्पपाग्रहण तो [ तत्ता- प्रतियोषरूप] निदाहीके कारण वभिमिचस्वादन्पपाग्रहणस । मा कर। इस प्रकार क्योकि यसायानिद्रमम्वप्नं समादसमदतं | वह पनि मोर नस्वप्न है इसलिये दी उस समय जम्मा और बदत तुरोपमात्मानं पुष्पते वदा। १६॥ ' जीव बाराका होता है ॥१६॥ प्रपञ्चनिहरया येत्प्रविपुम्यते ऽनिचे प्रपम्पे कथमदेव पदि बोध प्रपञ्चनिधिसे ही होता है तो चमतक प्रपाकी मिति म हो तस्तक बात फैसा! इसपर कहा जाता है- मित्युपत- प्रपत्र मरमताभार प्रपञ्चा यदि वियेत निवर्तेत न सशय । मायामाप्रमिदं दैतमदत परमार्थत ॥१७॥ प्रपञ्च पदि होता तो निहत हो माता [समें सन्दह नही। फिन्त [ वास्तबमें ] या देत वो मायामात्र है, परमार्वतः तो मौत
s- मा.]
भागम-प्रकरण
29
सत्यमेन स्पास्त्रपनो पदि। पर प्रपत्र विपमान होता वो
सचमुच ऐसा ही होता, कि वह
विपेत, रन्ना सर्प
नो गजुर्मे सर्पके ममान परिपत
फरिपतस्वाम तु स वियते । होनक कारण [बस्तुत है ही
विद्यमान भिवसेव न संशयः।
मही । यदि बह हावा तो, इसमें
सन्देह मही, नियत भी हो जाता ।
न हि रत्न्या म्रान्तिपुदधा रग्गु भ्रमदिसे काफ्ना किया
कल्पिता सो विधमान मा सर्प [ वस्तुत ] विधमान
रहते हुए विवेकसे निाच मही
सन्निवेकतो निाचः। नेप मामा
होता । मायावीशरा फेलापीर
मावाविना प्रयुक्ता हर्जिना
माया, देखनेवाके रवि धनक
पर्प भापगमे विपमाना सती हयपे नानार, पहरू विधमान
यती निवृत्त नहीं होती। इसी
निाचा । तर प्रपत्रास्प
प्रकार यह प्रपत्रसेबकत भी
मापामात्र देत रहन्मामाथि
मायामात्र ही परमार्थत वा
बच्चाई परमार्थततस्मान्न रमु षयमा मायावीक समान बत
ही है। मत सम्पर्प यह कि
पमित्मपना प्राधा निाजो कोई भी प्रपत्र प्रास नवा विध
पास्तीत्यभिप्राय: ॥१०॥ होमवाला नहीं है ॥ १७॥
गुरु-शिप्यादि पिकस्य पापारिक है
ननु शास्ता शात शिप्प इति
यर कहा कि शासक, शान
और शिष्य-इस प्रकारका विकास
विकल्प कप निवत इत्पम्पते- किस प्रकार मित हो समता।
तो इसपर कहा जाता है--
विकम्पो विनिवर्तत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदशादय यादो ज्ञात द्वैत न विद्यते ॥१८॥
१८
माणस्योपनिषद्
[गौला
इस [गुरु-शिष्यादि ] विकम्पकी पदि किसीन कल्पना की होती
तो यह मित्त मी हो जाता । यह [ गुरु-शिष्याPि ] बाद तो उपदेशक
ही किये है। बारमबाम हो मानेपर देत नही रहता ॥ १८ ॥
विकल्पो पिनिपत पदि। यदि किसीम इसकी कम्पना
फेनविस्कसितः सात् । यथाय
की होती तो यह विकास नित
हो माता । जिस प्रकार यह प्रपत्र
प्रपत्रो मापारन्मुसर्पवच्याय
माया वोर रम्मुसर्पके सश है उसी
सियादि मेदविकारपोऽपि प्राफ प्रकार यह शिष्यादि भेदविकम्य
प्रतियोपादेवोपदेशनिमिचाय
भी वात्मज्ञामसे पूर्व ही उपदेशक
निमित्त ।मत शिष्य, शासक
उपदेशादयं षादः शिष्य शास्ता और शासपा माद उपदेशाके
शास्त्रमिति । उपदेषम ही गिये है । उपदेशके कार्यस्वरूप
शाने निर्माते मासे परमार्थतत्वे | परमार्फतवा कान हो जानेपर
शामके निष्पन होनेर, वर्षात
देस न विपते ॥ १८॥ देवकी सपा नही पती ॥ १८ ॥
।
-
मारमा बौर उसके पादोक साय मोहार और
उसकी मात्रामोध तादाम्प
ममिपप्रधान आवशरम
जस्तक गिस भागाररूप चतु
पाद पारमाका अमिषेप (वाम्मा)
सुम्पादास्मेति ध्यास्याताया की प्रधामवासे वर्णन किया है--
सोऽयमात्माध्यक्षरमोशरोऽधिमात्र पादा मात्रा
मात्राम पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥
पापा भामा वारशिसे मोशर, मात्रामोको विषय फरक
क्षित । पाद ही मात्राबर मात्रा हो पर मामा बार,
उकार भौर मपम ॥८॥
शोभा भागम-प्रकरण . साऽपमारमाध्यमरमसामधि वह यह मास्मा नप्पक्षर , अक्षरका मामय पर निसका कन्याभिधानमाधान्येन पर्य बमिधामकी प्रधानसामे वर्णन किया मानोऽप्पथरम् । किं पुननद- नाय उसे पप्यार करते है। किन्तु यह मक्षर है पा! इस्पर घरमि साह, मोहार । साय- करते - बोहार है। मोशर पादाः प्रपिभन्नमान , यह बोहर पादनपसे विमक किये जानेर वधिमान पामी भधिमा माषामपिरुत्य धर्मत मात्राको मायय करके तमान रहता है, इसशिप से अधिमात्रा स्पिधिमात्रम् । कपम् १ आत्मना करते हैं। सो किस प्रकार । क्योंकि ये पादाम्त पातारम्प मात्रा । बास्माक यो पार है वेदी मोशारकी मात्राएँ । मात्राएँ काला अकार उकारी मकार बौन-सी हैं। भकार, उकार और इति ॥८॥ मकार-येीरे मागार १Jal महार और पिया नादारम्प नत्र पिपनियम निपते अब उनमें मेिर नियम मित्या जागरितस्थानां वैश्वानरोऽकार प्रथमा मात्रा प्तेरादिमत्ताहामोति ह वे मन्किामानातिय भवति य पर वेद ॥ ६ ॥ मिसमा सान्तरित मानबह पामर म्याति और मारिमापक फारण [बारी } परटी मात्रा मार है। जो उपासक हम प्रकार पानमा मात्रा कामको प्राम पर लेप मौर [मदापुरी मा (प्रधाम) होनाnol गागागा पाना समर म मारिम्नम्मान प्रधानामामा बामनियमानबाडा काना An मासपोपनिग्न [ने.. - । फ्नमामान्पनेत्यार प्राप्तगतिमकार है । किव सान्त के परन म्याप्तिकारण मुवा वाग्याता मी मात्रा है-सर करते है- मातिय कार, सशर्यमाति "माग में समा गा" (ए.] | "प्रकार ममप ही आ०२।३।६) इति श्रुतबा है। इस दुनिके अनुसार नया बंधानरण जगत; "तस्स | सकारसे समस पाणी म्पत है। . या पतम्या मना मानरम्प | नया "टम इस बयानर लामाका मस्तक ही फुयक है। इस श्रुतिके मुभा मुतना " ( छा० ३०५॥ अनुसार यानरसे सारा सन्द १८।२) इस्पादिभुवे । | म्याप्त है। अभिधानाविषेपमारकरव अभिधान (पापक) और बमिमय ( वाप्य ) की एकता से पायोपाम । मादिरस विपत हम कर हो चुके है। मिसमें आदि त्पादिमपषादिमदकारास्पम-मरते । रिस प्रकार मार (प्रवमता) हो उसे मादिमव घर पर पैपानरस्तमादा | मामक नक्षर मादिमान् । ससी प्रकार चामर मी है। उसी सामा पादकारस्व पैश्वानरस । समानताके वैशभरकी काररूपता है। उनकी एकता सदेवस्यमिदः फसमार-चामोति | चाममेवाले के लिये फळ तामा माता है-धो पुख्य ऐसा नामवा दपै सबान्कामानादि प्रथम वर्षात् उपर्युक एकापको जानने भपति महतो य एवं वेद, पागम समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है क्या महापुरम पपोफमेकस्व देत्पः॥९॥ बादि--प्रपम होता है ॥९॥ उपर गौर गाव तादात्म्म स्वमस्थानस्तेजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षा दुभयत्वाद्वोत्कर्पति ह वै ज्ञानसन्तति समानभ भवति नास्यावझवित्कुले भवति य प्रा ॥१०॥ कारण
शां. भा.
मागम-मकरण
.
स्वप्न मिसका स्थानीय तैनस उरकप तया मध्यवर्तित्वक कारण
मोहमकी दिलीप मात्रा उकार है । जो उपासक ऐसा मानता है यह
अपनी घामस्तानका उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और
उसके मशमें कई प्रमशानहीम पुरुष नही होता ॥ १० ॥
स्वप्नस्सानस्तवमो या स
जो स्वप्नस्थानबाग सनसमा
जोहारकी दूसरी मात्रा उकार है।
वोहारस्मोकारो द्वितीया मात्रा । विस समानताके कारण दूसरी
मात्रा है-इसपर करते हैं अर्प
फेन सामान्पेनेरया-उस्कपात् । के कारण | जिस प्रकार वारसे
सकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार
महारादत्तए पुकारस्तथा विससे तमस उस्कृय है। अपवा
मम्पबतिसके कारण [ उन दानों
तैसा विचादुममत्वाहाकारम
समामता १]। मिस प्रकार उकार
फारयोर्मम्मम्म उफारम्तथा
षकार भोर मकारके मध्यमें स्थित है
ससी प्रकार विष और प्रापक मप्यमें
विमानयोर्मप्ये संजसोऽततस है। इस उमपरताप
समानसाक कारण भी [ उनमें
उमपमारपसामान्यात् । अमिमता t]
विस्मलमुष्पो–उस्मर्पति वा इस प्रकार जाननबालेको
जा फरर मिटता है पर बनाया
मानसन्ततिम् । विमानसन्तति)
जाजा इस प्रकार मानता
वर्षयतीस्पर्धः । समानस्तत्पम
है यह मानसन्तति वपात् विज्ञान
सन्वामका उपप पामी पदि करता
मित्रपक्षस्पेष पशुपयाणामप्पण
१, सबके प्रति ममान-म्प होता
१र्षात् मित्रपक्षक समाम शान-
प्पा माति । अप्रामविदम्प पक्षका मी वाध्य होता है तपा
उमक कुम्में कर अमदानहीन
इल न भवति य एष पद || पुरुष नही होता ॥ १० ॥
मागफ्पोपनिषद् [गो. मार वीर पाल तामारम्म सुषुप्तस्थान प्राज्ञो मकारस्तृतीया माना मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इद सर्वमपीतिथ भवति य एव वेद ॥११॥ मुपप्ति जिसका स्वामी का प्राइ मान और म्मके कारण कोहार की तीसरी मात्रा मकार है। मो उपासक ऐसा जानता है वह इस सम्पूर्ण जगत् का मान-प्रमाण कर लेता है और उसका पस्नान हो जाता है।॥ ११॥ मुपप्तस्थान प्रानो यःम सुपुतिस्पामवाम भी प्रा। यह मोहारकी तीसरी मात्रा मकर ओहारस मकारस्वतीया मात्रा ।। किस समानताके कारण ! सो बतलाते है-यहाँ इममें पर फेन सामान्येनेत्याह सामान्य समामता है-ये मिति के कारण मिदमत्र, मिर्मितिर्मानं मीयते | [समान है] । मिति मानको कासे ।। | जिस प्रकार प्रस्स (एक प्रकारके बार) स हि विश्ववैमसो प्राधेन से जी तौले मावे । उसी प्रकार प्रलपोत्पत्योः प्रवेषनिर्गमाम्पा र निर्गमनके द्वारा प्राइसे प्रम्प और सत्परिक समप मानो प्रस्पेनेव याः । यपोहारसमाप्तौ बिस बोर सैनस मापे जाते है। क्योकि बोरकी समासिपर उसका पुनः प्रयागे प प्रविश्प निर्गत पुम प्रयोग किसे मानेपर मानो इलाकारामारी मकारे। सकार और उकार मकरमें प्रवेश करके उससे पुन मिकराते है। अपीत। मपीतिरप्पप एकी बफ्षा नीतिके कारण भी उनमें एकता है। पीति बप्पप मायः । आशारोपारणे ग्रन्स्ये वर्षात् एकीमाको करते हो [जिस प्रकार ] मोद्वारका उचारण कामपर वपम वीर सफार अन्तिम ऽक्षर एफीमूनानिषाकाराकारी । बक्षरमें एकीमत से हो माते ।
शां भा] मागम प्रकरण तथा वियतेचसी सुप्रसिकाले । उसी प्रकार मुसिके समय विध बौर वैषस प्राइमें छीम हो माते प्रा । अतो पा सामान्मादेकत्व है। मो, इस समानता के कारण मी प्राइमकारयो । प्राइ और मकारकी एकसा है। विवस्फलमा, मिनोति । पर इस प्रकार मानवामेको यो फल मिलता है पर आते है- पा र सर्व जगापासम्म [नो ऐसा मानता है ] 4 इस सम्पूर्ण नगरको माप लेता है, खानावीप । अपीतिय वर्षात इसक्न पार्थ सस्प बाम सेता, तया पीति मानीवगतका मगत्कारणास्मा भवतीस्पर्य । कारणसहप हो गता है। यहाँ अत्रावान्तरफलवपन प्रधान | नो वान्तर फा मतगये गये। प्रधान साधनको उतिक सिम्ये साधनस्तुस्पर्पम् ।। ११ ॥ 11॥११॥ मात्रामोकी पिचारिकता मते डोन भवन्ति- इसी वम ये श्लोष भी है- विश्वस्यात्यविषक्षायामाविसामान्यमुत्कटम् । मात्रासप्रतिपत्ती स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥ समय तिसका मस-कारमानात बममा सो, वर्षाद प बघरमारूप है ऐसा पाना नाम तो उनके प्रानिकी समानता सरही है तथा उनकी प्यातिरूप समानता भी फट ही है ॥ १९॥ विमस्सास्वमकारमात्रमं पदा बिस समप विषामा पानी पक्रमात्रल र घेता पिस्पते सदादिस्वसामान्य १ उस समय पूर्वोक्त म्पापसे उनके समन्यायेनोत्कटसर्व रयत । प्राथमिकलको समानता एस्कट
मापदूपयोपनिषद् {गो का
इस्पर्षः । अस्वविवक्षायामित्यस्म | अर्यात् छूत (प्रक्ररूपसे)
[दिखायी देती है। मानसप्रति
म्भारपान मानासंप्रतिपचाविति | पचो-पर पविषयायाम्।
इस पदकी ही म्याप्त्या है।
विपस्माकारमात्रस्म
तात्पर्य यह है कि जिस समप
सप्रतिपयत इस्पर्थः । माप्ति विवके मकारमात्रत्वका बान होता
है उस समय समकी म्यासिकी
सामान्यमेष घोत्कटमित्मनुवर्तते । समानता तो स्पष्ट ही है । पहाँ 'क'
शम्दसे 'उत्कटम। इस पदकी
चश्याम् ॥१०॥
ब्नुति की जाती है ॥१९॥
॥
सैजसस्योत्वविज्ञान उत्कर्षों दृश्यते स्फुटम् ।
मानासप्रतिपत्तौ स्यादुभमत्व सथाविधम् ॥ २.
तेबसको ठकारकप नाममपर वर्षात् तेमस एकारमात्राम्स है पेसा
माननेपर उनका तस्कर्स पर दिखायी देता है।तपा उनका उमपच मी
स्परही॥२०॥
असमोलविधान उकारत सैनसके उप-निशान वर्षात
उसका कामरूपसे प्रतिपादन करने
विषयापासूको रपवे स्ट
मेंउसका उत्तोपतीमिपी
स्सर इस्पा उमपस्म व स्फट देता है। इसी प्रकार उभयत मी
मेति । पूर्वपस्सर्षम् ॥ २०॥ पापी शेष सब पूर्णपद |२०||
मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामाम्यमुत्कटम् ।
मानासप्रतिपची
लयसामान्यमेव च ॥२१॥
प्राकी महाररूपता बत् प्राइ मकारमानारूप है ऐसा
मानने वनकी मान करनेशी समानता स्पन है। सी प्रकार का प-
मान दोनेकी समामता मी सप ही है ॥२१॥
• भा०] मागम-प्रकरण BIRD- मकारस्थे प्रामस्स मिविलया प्राइके मकाररूप होममें माग और भ्यरूप समामता स्पट - घुस्कप्टे सामान्ये इस्पर्य ॥२१॥ । यह इसका तात्पर्य है ॥२१॥ मोहारोपासका प्रमाप त्रिपु धामप्नु यस्तुल्य सामान्य धेति निश्चित । स पूज्य सर्वभूतानां क्यमेव महामुनि ॥२२॥ नो पुरुष वीनों स्साममि [बसलायी गपी] तुम्यता अपवा समामताको निभयपनक जानता है या महामुनि समस प्राणिपोका पूजमीप कौर मदनीय होता है॥२२ ।। पपोतरखानप्रये पस्तुस्पात उपर्युल तीनों सामि तुस्य सामान्य वेत्येवमेतदिगिनिमिता रूपसे बतलायी गयी समानताको | जो यह इसी प्रकार है ऐसा निमय- पास पूम्पो पम प्राविछोफे पूर्वक मानता है यह समवेचा प्रेकने भवति ॥ २२॥ पूममीय एवं वादमीय होता है ॥२२॥ योधरकी म्पस्तोसनाके पल ययो। सामान्पैरास्मपादानां पूर्वोत समानतावोंसे अात्माके मात्रामिः सोफवं कत्ता पादोका मात्रा के साप एकाल पपोकोहार प्रतिपय योभापति | करके उपर्युक मौकारको मानते हुए यो उसका ध्यान करता है उसे- भकारो नयते विश्वमुकारभापि तैजसम् । मकारच पुन प्राज्ञ नामाने वियते गतिः॥२१॥ बार सको प्राप्त करा देता १ तपा उकार सैनसको और मार प्रायको, पिन्त नमात्रमें किसीकी गति नहीं ॥२॥ -- ७६ माइपयोपनिषद् [गी. अकारो नपते विश्व प्रापयति। नकार विभयो मास का दा है; वर्षात वारके वाधिववाशर यकारालबनोशार विशन्वैधा को जाननबाडा पुरुष मैपानर राय नरा मवतीस्पर्षः। वीफार है। इसी प्रकार फार तैमसको सैमसम् । मकारमापि पुन देता है। शम्से नपते' ( प्राप्त बोर मकार पुम प्राहको प्राप्त करा माझम् । पशम्दान्नपत इस्पनु | करा देता है। इस विमाकी बनाति पर्वते । क्षीणे तु मझारे पीपभाव होती। तपा मकारका होनेपर बीवभावका क्षय हो जानेसे धयादमात्र बोडारे गविन वियो | माशीम बोकारमें कोई गति कहाँ कपिदिस्पर्थ ॥ २३ ॥ होती-पर इसका वरपर्य॥ सप बमात्र बोर गारमा तादात्म अमात्रचतुर्थोऽव्यवहार्य प्रपञ्चोपशम शिवोऽ द्वैत एवमोझार मात्मैव सविशत्यात्मनात्मानं य एच वेद ॥ १२॥ मात्रारहित मोशर तुरीय मारमा ही। परमम्यबहार्य, प्रपझोप शम, शिव और मौत है। इस प्रकार वोहार बामा सो उसे इस प्रकार आमता हैा सत वपमे मात्मामें ही प्रपेश कर जाता॥१२॥ समायो मात्रा पस नास्ति अमात्र-गिसकी मात्रा महो। सोमात्र बोहारपतुर्पक्षरीम पवमात्र बोहार पोषा वर्षात वरीय फेमस बास्मा हो।अमिषान पास्मैव कसोऽभियानाभिधेय रूप वाणी और वमिषेयाप मनका रूपयोधिनसमोः पीपस्वाद रुप हो बालके करण 4. पपहार्यः । प्रपशोपश्चमा म्पयार्य क्पा पर प्रपाकी शिवोऽतः पाच एवं पथोक | सभापनि, ममम पोर बाव- -
या भा.]
भागर्म-प्रकरण
विमानवता प्रयुक्त आहार | सम्प है। इस प्रकार पूर्वोत
विज्ञानवान् उपासकद्धारा प्रयोग
सिमावहिपाद भान्मच । संवि किया हुवा तीन मात्रावाला मोहार
सीम पादमाम बारमाहीहै।
पत्यास्मनास्पनेव। स्वपारमार्मि- इस प्रकार जानता वर्षात्
इस प्रकार उसकी उपासना करता
कमारमान र एप वेद । परमात ही वपने पारमार्थिक
| वामा प्रवेश करता है। मार्फ-
दर्टी प्रमविस पतीय पीधभावं | दर्गा माता तीसरे बोगमाका
भी दग्ध करके बारमा प्रवेश करता
दग्यारमान प्रविष्ट इति न इसरिये उसका पुनर्जन्म नही
हाता, क्योंकि तुरीय पात्मा बीमा
पुनर्वापते तुरीयस्वामीनस्वात् । मक।
न हि रन्सर्पयायिक एमु और सर्प विवेक हो
ररमो प्रविष्टः सो पुद्धिसस्का-
जानपर रगमें हीन हुना सर्पमिन
उसका विक हो गया है उन
रापुनः पूर्णवद्विवेकिनामुत्था-
पुस्यों को पुद्धिके संस्कारमश पुम
स्पति । मन्दमम्पमधियां । प्रतीत महा हो सकता । किन्तु जो
प्रतिपमसापकभाषाना स मार्ग-/ मद घोर मध्यम पुदिना, साधक
मारको प्राप्त, सम्मागमगामी सन्यासी
गामिनो सन्यासिनो मात्राणां
पूर्वोत मात्रा और पके निधित
पापना प वसपामान्पविदा
सामा पभाषका माननेबाम उनके
यथारदुपाम्पमान माशरा प्रम (लिये ता विधिवत उपासमा किमा
प्रतिपय मालम्पनीमपति स्था] मा भाशर प्रमप्राप्तिक लिये
पपस्पति-"प्राधमासिविषा"बापस्वयप हाना। पीपात
(माय. का. ३ । १६)। तीन प्रफमफ भाप है। स्पादि
इत्पादि ।।१२।।
पपासे कहेंगे॥१०॥
मागहफ्योपमिप [गो का - समस्त मोर पस्त बोकारोपासना पूर्वपत्- । पहलेक समान- भवेत सोकर भयम्ति- इसी में ये श्लोक मी है- मोकार पावशो विद्यात्पादा मात्रा न सशय । ओङ्कार पाशो ज्ञात्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२४॥ बोहारको एक-एक पाद करके माने पाद ही मात्राएँ एनसमें सम्ह मही । इस प्रकार मोहारका पारकमसे मानकर पुस भी चिन्तन न करे ॥ २१॥ यपोक्ता सामान्यैः पादा पव पूर्वांत समानताकि कारण पद ही मात्राएं है और मात्राएँ मात्रा मात्राम पादास्तमादोहार दी पाद ।। स तापर्य यह है कि मोहारको पादक्रमसे गाने । पावभाविपादित्यर्थः । एषमाद्वारे इस प्रकार बोहारका शाम हो पानपर कार्पो मानेके कारण मातेप्टार्थमाशा वान किंचित् किसी मी घ्यर्प (ऐहिक ) अपना प्रमोचन चिन्समेस्कत्तास्वादि ) मरणार्प ( पारगैकिक ) प्रपोमनका चिन्तन न करे-पह इसका त्पर्यः ॥ २४॥ अमिप्राप है ॥२॥ युलोत प्रणवे चेत प्रणयो ब्रह्म निभयम् । प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भय विपते कचित् ॥ २५॥ चितको बोडारमें समाहित करे बोहर निर्मप बसपद । बादारमें मिस्य समाहित रहनेवामे पुरुषको कही भी मय नहीं होता॥२५॥ सुधीत समादध्यायबाप्पा मिसकी पहले म्याश्या की जा स्माते परमार्थरूप प्रणवे पेता चुकी है उस परमार्पसरूप गोदारमें
शा. भा-1
मागम-प्रकरण
मन । यमाप्रणवो प्रम | विषको पुल-समाहित कर, क्योकि
भोशर ही निर्मप प्रम। उसमें
निर्मयम् । न हि सत्र सश
मिप समाहित नवास पुरुषको
पुक्कस मय विपते कपिद । कही भी मप मही होता, असा
विद्वान् कड़ी मी मपका प्रास नहीं
"विद्वान विमेठि स्तपन"
होता" इस मुतिसे प्रमामित होता
(103०२।१)तिवते॥२५॥18॥ २५॥
प्रणयों मपर ग्रह प्रणवथ पर स्मृत ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽयायोऽनपर प्रणयोऽव्यय ॥२६॥
लोहार पर और बारार ही अपराम माना गया है।
पर बाहर अपूर्व (वारण) अन्तममम्प, काप तपा मम्पय
१॥२६॥
परापर मममी प्रणवः । पर।
पर और बार प्रम प्रणा है।
मात्रालप पाक धीम
मार्पतः क्षीणपु मात्रापादे पर जमेपर पर अामा होमसरिये
पवारमा प्रयति न पूर्व कारणमस्सरसा कई पूर्व पानी कारण है
होने से परहै। इस को
विपत इत्यर्वनाम्पान्तर भिम
बतर-मिनमानीप भी महा
बादीय सिगिविपनापनन्तर । यि पद बनम्तर है तपासमे
2 भी पा और महा १,
सपा पापमपम विपन रय परिपे या और इसका
पापः । अपरं सापमम्प नापार-पाप मा महाम
यह भनार हत्यर्प या
रिपत इत्यनपर । मरापा
निरभरमे परम्मा
मन पर सपनान् म समान मातरम
प्रधानपन एप ॥२६॥
॥२६॥
माणम्योपनिषद [गो. सर्वस्य प्रणवो यादिमध्यमन्तस्तथैव च। एवं हि प्रणव ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥२७॥ प्रणव ही सबका बादि, मम्प मोर पन्त है। प्रणबको इस प्रकार बाननेके बमन्तर सम्पप्ताको प्राप्त हो जाता है ॥ २७ ॥ मादिमम्मान्ताउस्पचिसिवि सबका वादि, मप्य और बात प्रलया। सर्वस्व । मायाइस्ति वर्षात् उत्पति, सिति पौर प्राप प्रणव ही। मिस प्रकार कि माया रनसर्पमगमणिकास्त्रमादिषद् | मप हापी, रम्मुम प्रतीत होनेशन उस्पपमानस्स बिपदादिप्रपत्रस | सर्प, मृगतृष्णा और पनादिके समान उत्पच होनेवाले भामाशादि यषा मायाम्पादयः। एवं हि रूप प्रपञ्चके कारण मापाची कादि प्रमयमारमान मापाग्यादिसा [९सी प्रकार मायावी वादिस्सानीम उस प्रणवमाप वास्माको नामकर नीय शाला वस्थणादेप तदारम- मिन् कालही तपताको प्राप्त हो भाष म्पस्नुस इत्यर्थः ॥२७॥ बावा है-ऐसा इसका तात्पर्य २७॥ प्रणव हीश्वर विद्यात्सर्वस्य हदि संस्थितम् । सर्वव्यापिनमोहार मत्वा घीरो न शोधति ॥२८॥ प्रणवको ही सबके एपमें सित मर जान । इस प्रकार सम्पानी नाकारको मानकर मुदिमान् पुरुष शोक मही करता ॥२८॥ सर्वप्राणिमातस्य स्मृति प्रणयको ही समस्त प्राणि- प्रस्पयास्पदे हरये पितमीमर| समुपके स्परिप्रापयक वामपभूत यमें पिता ईपर समझे। पुद्धिमान् प्रणय विपास्सर्वप्यापिनं म्पोम पुरुष नाकाशके समान सम्पिापी पदावारमारमानमससारिणं पीरा बोहारका संसारी भारमा [-पुर पुदिमान्मस्या शापति परमतरप] जामफर, दोक्फ कारण न ० भा०] मागम-प्रकरणं शोकनिमिचानुपपत्तः । “तरवि | का अभाव हो बानेसे शोक नहीं करता जैसा कि "भारमबेचा शोक शोकमारमवित्" (छा० त०७। को पार कर जाता है। यादि ११३)इत्यादिभुविम्पः॥२८॥ वतियोंसे प्रमामित होस है ॥२८॥ , मोराही मनिहै भमानोऽनन्तमात्रय द्वैतस्योपशम शिव । ओडारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः ॥२९॥ मिसने मात्राहीन, मनम्त मात्रावाले, दैतके उपशमस्थान और मामय बोकारको नामा है वही मुलि है। बौर को पुरुष नहीं ॥२९॥ ममात्रस्तरीय आहार॥मीयते अमात्र तुरीय भोशर । निस- से मान किया जाय उसे 'मात्रा' ऽनमेति मात्रा परिच्छित्तिः सार्यात् परियत्ति करते है, मनन्ता यस्य सोऽनन्तमात्र मात्रा जिसकी अनन्त हो उसे 'अनन्समात्र' कहा जाता तात्पर्य नैतावसमल परिच्छेतु एफ्पत यह है कि इसकी इयत्ताका परिच्छेद मही किपा पा सकता । सम्पूर्ण इस्पर्पः । सर्वतोपचमत्पादव | इतका उपशमस्थान होमक कारण क्षिण । मोहारा पयाम्पारपातो की वह शिब ( मङ्गलमय ) । इस प्रकार म्पल्या किया जा पिदिवो येन स परमार्थतत्वस्म ] वोकार मिसन माना है यही परमार्थ तत्वका मनन फरनगाहा दोनसे मनना मुनिः । नेतरो बनः] 'मुनि' है, दूसरा पुष शाखा समपर भी मुनि नही-ऐसा शास्त्रविदपीत्यर्थः ॥ २९ ॥ इसका सास्पय॥२९॥ इति भीगेविन्दमगापूमा शिपस्य परमहंसपरिमानकापार्यस्य पारमगत ताशगमशासविपरणे गौडपाहीयकारिका- सहिमाम्म्योपनिषदाम्पे प्रपममागमप्रकरणम् ॥१॥ हस्सत् ।
वैतष्यमकरण । पाते द्वैतं न वियत इस्युसम्, "एकमेवाद्वितीयम्"स्पादि युति- "एकमेवाविसीयम्" पोके अनुसार (वागमा प्रकरणी १८ वा कारिफामें ) यह कहा गया ममम (छा. १०६ । २ । १)| किशान हो मानेपर देत नाही मोक्नम् इस्मादितिम्पः यता । बहकल बागम (शाम बचम) मात्र पा। किन्तु दैतका मागममा तत् । सनोपपश्यापि मिप्यात्व पुकिसे मी निषय किला देतस्स पैतप्य शक्मवेयपारपि जा सकता है, इसीलिये इस दूसरे तुमिसि निती प्रकरणमारम्पवे- प्रकरणका बारम्म किया जाता है- समार पदावोस मिपाल घेतथ्य सर्वभावानां स्वप्न माहुर्मनीषिण । अन्त स्थानातु भावानां सवृतत्वेन हेतुना ॥१॥ [सजावस्थामें ] सब पदार्प शरीरफे भीतर स्थित होते हैं, मत स्थानके सहोचके कारण मनीविगग सममें सब पदापोका मिप्यान प्रतिपादन करते ॥१॥ विस्थस भाषो तप्यम्, विवप (मिप्या) के भाका मसत्पत्वमिस्पर्थः। स सर्वेपी | माम तप्पा वर्षात् वसपा । पापाप्यास्मिशाना | फिसफा तथ्य ! सप्नमें प्रतीत भाषानां होनेयमे सम्पूर्ण मास वोर मातरिक पदापाना स्वप्न उपसम्पमाना पदापोंका ममीविगग वर्षात् प्रमाण- माम, माहुः कथयन्ति, मनीषिणः कुमठ पुप तप्प बताते है । प्रमाणशलाःतिथ्ये हेतमाह-उनके मिथ्यात्वमें रेत तणते हैं- माग न भा-] तप्यमकरण अन्तःस्मानात मन्त बन्दसनेक कारण, जन्तर वर्यात् शरीरक मायमें सान शरीरस मध्ये स्थान है जिनका [ ऐसे होने के कारण ], क्योंकि यहाँ पर्वस एवं हस्ती बादि येपास् । समस्त पदार्थ उपम्प होते है, माना उपलम्यन्ते शरीरसे बाहर उनकी उपलम्धि नहीं होती इसलिये में मिप्या होने भाहिये। पवास्त्पादयो पहिः किम [ यदि शरीरके भीतर पम्प होनके कारण ही समध पदाप शरीरान् । तमाचे पितथा भवितु | मिप्या है तो ] गा पायिके मईन्तिानन्यपवरकापन्तइपसम्म भीतर दिखायी देनेवाले पट बादिमें तो परम्पमिचरित हो पापम्प मानपठादिमिरनैश्चन्तिपो देव [क्योंकि गोबो उनकी प्रतीतिरेप तो सस्प ही-ऐसी शादा रोन रिस्मापार-संपतरवेन हेतु | पर करते है-पानके सोषके कारणसे । तात्पप यह कि पारीरक नेति, मन्तः संतसानादिस्पर्षः। मीतर समुचित म्मान होनेसे [उन का मिमान का गाता है| न मन्या सहते देशान्तर्नारी दोके बताता संकुषित नारीयामें पर्वतास्त्यादीनां धम्मयोऽस्ति, न पर्वत पाहायी बारिका हाना सम्मा मही है। देके भीतर पर्वत मही बिहे पर्वतोऽस्ति ॥१॥ हो सकता ॥ १ ॥ स्वप्नापानी भाषानामन्त: सप्नमें दिखायी दबाते पाप का पारीरके भीतर सकृषिव साम है-यह पव सिद्ध महाँ हो सकती, संवतस्मानमिस्मेतदसिदा क्योंकि पूर्व दिशा सोपा मा पुरुप उपर Pा सन देसवा-सा पसात् प्रान्पपु सम्म उदभु देमा बाय[पत पहारसे माणपयोपनिषद म्पप्नान्पश्यनिष रपव इश्य बाहर यहाँ माकर सम्दै देस्ता होग वदारयाद--- -ऐसी वारदा मरके फरसे हैं- अदीपत्याच कालस्य गत्ता देशाम्न पश्यति । प्रतिबुरम वै सर्वस्तस्मिन्वेशे न विद्यते ॥ २ ॥ समयकी बदीर्घता होनके कारण ना देसे बाहर जाकर उमें मही देसमा तया जागनेपर मी काई पुरुष उस दशमें विपमाम महाँ रहता । [इससे मी ससका अप्नाट रेशमें म गाना ही सिद्ध होता है] ॥ २ ॥ न देहानाहिदेशाम्तरं गस्वा गह देहसे बाहर देशान्तरमें स्वप्नान्पश्यति । यमा | जाकर स्वप्म महाँ देखसा, स्पेकि अवमाप्रप त्सप्तमात्र एव दर | यह सोया हुवा हो देहके स्पानसे मिबत्वम् देखायोमनशतान्तरित एक मासमें पाचने योम्य सौ मासमात्रप्राप्ये देशे स्वप्नान्पश्य योजनकी दूरीपर सज देस-मा मिष रयते । न च तदेशप्राप्त में पाने वार यहाँसे गैटमे ( देखा माता है। [उस समय उस रागमनस्य पदीर्घः काठोऽस्ति । योग्प दहीही नही। बत असोऽदीर्घत्ताप कालस्प नकदीपता के कारण पसन- स्वप्नागेशान्तर गच्छति । प्रय मित्सी देशान्सरमें माही पाता। कि प प्रविमुश्म वै सर्वः यही मही, मागनेपर भी करें स्वप्नदश सज देखनेके स्मानमें नहीं स्वप्नापखप्नदर्शनदेशन वियते। राता । यदि यसप्णके समय यदि व सप्ने देशान्तरं ग | किसी देशान्तरमें बाता तो निस देशमें सण देससा तसीमें भागता । पमिन्देक्षे स्वप्नाम्पश्येतत्रैव वित ऐसी बात नहीं होती । प्रवियुम्पेत । न वदस्ति । राधी यह रानिमें सोया हवा मानो दिनमें पदापाको देखता है और मातोसे मुसाहनीय भावान्पश्यति बहुमिा मिलता है बत मिनसे उसका मे संमतो भवति, यम संगत होता है उनके द्वारा यह गीत .
शा. भा.]
देवघ्य प्रकरण
स्तैपेत । न प गृपते; गृहीत , होना चाहिये पा । परम्त गृहीत
श्षेवामय
वोपलग्भयन्ता रोता नहीं; यदि ग्रहीत होता ते
हमने तो महाँ पाया था ऐसा
पसमिति अमः । न चैवदस्ति,
। परन्तु ऐसी बात है महाँ
वमान्न देशान्तर गन्छवि वत सममें या किसी देशान्तरका
महाँगाता ॥२॥
करते
खप्ने ॥२॥
भावा
इतब
सप्नमें दिसायी देनवासे पार्ष
पिवथा पत:-
इसलिये भी मिथ्या है, माँकि-
अभाषम्य रथादीनां श्रूयते न्यायपूर्वकम् ।
वेतय्य तेन वै प्राप्त स्वप्न माहुः प्रकाशितम् ॥ ३ ॥
मुनिमें भी [ सप्ना ] रपादिका अमाप युधिपूर्वक सुमा गया है।
बत [ उपर्युक युफिसे ] सिट हुए मिप्यायको ही अप्नमें स्पष्ट मतछाये
अभापश्चैव रमादीनां स्वप्न "इस बासा रप महाँ"
रवाया पहले स्यानो भूयते न्याय (इस्पानि तिमें भी समाए रपार
निष्पपर पूर्व पतिता भुती"न का जमाव युक्तिपूर्वक मना गया
तपरया" (पृ०३०४।३।०)। बन्त सान तमा सानके
इत्पत्र देहान्त पानसरतस्वादि | संकोच बार देवोंसे सिदामा
हेतुना प्राप्त पैतम्य सदनुपादिन्पा | मिप्याय, उसका अनुवाद करनेवाली
भुस्पा स्वप्ने स्वयंन्पोतिष्टप्राप्ति | तपा सममें नारमाका सर्पप्रकासन
पाइनपरया प्रकाशिवमाय | प्रतिपादन करणारी युनियन
विद ॥३॥
प्रमेता स्पट बनते ॥
पामाम पदाकि मियालमें देत
अन्त स्यानातु भेदानां तस्माज्जागरिते स्मृतम् ।
यथा सन तथा स्वप्ने संवृतत्वेन मियते ॥४॥
माणूश्योपनिषद् [गी इसीसे चामत्-अमस्मामें मी पदार्योका मिपाल क्योंकि जिस प्रकार ये हाँसमानस्सा [ मिप्पा ] होसे है उसी प्रकार बामस्में भी होते । फेवस शरीरके मीवर स्थित होने मौर सानके स्कषित होने ही स्वप्नार पदापोका मद ॥१॥ खामाश्यानो भाषानां पैत मामह-मवस्था देखेर पदार्थ मार व्यमिति प्रतिक्षा । मिम्मा -या प्रतिया है। ma श्यस्वादिति हेतुः । होनके कारण या उसका व मिभातम् समाल्पभाववदिति है। सममें देसै हुए पदार्पोक सम्मन -यह वात पिस प्रकार यहाँ टान्य । यया स्वप्ने में देने हुए पदापोका मिथ्यात रस्पानां भाषाना बसथ्य तथा [, उसी प्रकार याप्रदमें भी उनका बागरितेऽपि स्वमविभिए (श्यप समानापसे है-यहरेक- मिति हेतूपनयः । तसाझाग | पनप है। क्त जागतिमें मी ठन- रिसेऽपि वैवष्य स्मृतमिति का मिपाव माना गया है-मा निगमनम्। अन्तास्पानाtra | मिगमन ।। तस होम और स्पेन स्पप्नरपाना मावाना सानका संकोच होनमें समय मायाका थापामेम्पो मेदः । पत्वम स्पस्म और बसपा तो दोनों ही सरपत पारिशिष्टमयत्र॥ ४॥बसानों में समाम ॥॥ मामा मागोसे मेद । स्वप्नजागरितस्थाने ोकमाहुर्मनीषिणः । मेवानां हि समत्वेन प्रसिडेनैव हेतुना ॥ ५ ॥ इस प्रकार प्रसिद से ही पदामि समानता होने के कारण तिकी पुरुर्गेमे सम्म बोर जागरित अवस्थामों को एक ही पतनपा ॥५॥ पातितिर पप १-पता प्रतिपादन करना मैतूपनर पाया है।
शा-भा०]
वेतप्यप्रकरण
प्रसियनैव मेदानां प्राथ
पदाकि ग्राभग्राहकावरूप प्रसिप
पारपरक प्राहकस्पेन हेतुना खसे समानता होनेके कारण ही
तार समस्पेन सप्न | विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित
वागरितमानयोरेकस्थमाइक्वेि
स्मार्चाका एकत्ल प्रतिपादन किया
किन इति पूर्वप्रमाणसिद्धस्पैव -इस प्रकार यह पूर्ण प्रमाणसे
सिर एकाही फर॥५॥
फलम् ।।५॥
इतब तथ्य मानवाश्याना जाप्रत्-यवस्पामें दिखायी देने
पाळे पदार्पोका मिथ्यात्व इसलिये भी
मेदानामापन्तयोरभावात् ।
हैम्पोंकि वादि और क्तमें उनका
धमाष है।
आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तचथा ।
वितयै सहशा सन्तोऽवितथा इव लक्षिता ॥६॥
गो बादि और पन्त, महाँ [वर्षात् गादि वीर तमें बस-
प] पर वर्तमान में भी वैसा ही है। पे पदार्थसम्ह बसतके समान
होकर मी सत्-वैसे दिखायी देसे हैं ॥ ६ ॥
पदादावन्ते च नास्ति वस्तु। बो मृगतृष्णादि वस्तु बादिौर
मसमें महामप्पमें भी नहीं
पाचे मपदाप्णिकादि कम
पेऽपि नास्तीति
होती --या बात करें निषित
निपिसं लोके तमे ही है । इसी प्रकार ये मामत्
भवस्पामें दिएमपी देनेषामे मिम
मापदाया मेदा । धापन्तपोर मिन पदार्थ मी बादि और वन्तम
मावादितपैरेव मृगणिकादिमिः
म होनेसे मृगतृष्णा वादि बसा
सरशस्वाग्विथा एव क्याप्पनि स्तुमकि समान होनेके कारण वसत्
सपा इन उपिता रनारम | पानि मह बनारमा पुग्में
राये सप समझे नाते ? nn
मिशिः॥६॥
सकातमात्मान मन्यते । यथा 'बिना भोजन किमावा मानवा, ८० माणूश्योपनिषद् [गी. का. -0-0--2------- स्वप्नापवागरिवरश्याना सहा-सप्नास्यों के समाम माग- मप्पसत्यमिति यदुक्त तदयुक्तम् । रित वास्थाफे श्योका मी नो यसाजानटश्या ममपानवाह वापत बताया गया है यह टीक नादयः सुत्पिपासादिनिाति नहीं क्योंकि मामय नाम, पान और बाहम बादि पदार्थ भूख-प्यास कई तो गमनागमनादिकार्य व की मिति तय गमनागमन बान सप्रयाडना एटा । न तु कार्यो के करन के कारण प्रयोजनाले साप्नश्याना सदस्ति । तमात्स्सम- देखे गये है। किन्तु सप्नापकि रियमें एसी बात नहीं है। बत रम्यवसायाश्यानामसच मनो- स्वप्नाइयोंके समाम जाम्दस्योंकी रपमात्रमिति । मसत्यता के ममोरपमात्र है। वन । फसान् ? यसाद-- समापान-ऐसी बात मही है। क्यों नहीं है। पोंकि- सप्रयोजनता तेषां रवप्ने विप्रतिपयते । तस्मादायन्तवत्वेन मिप्यैव खलु ते स्मृता ॥ • ॥ सनमें उन ( मापत् पाँ) की सप्रपोवनता विपरीतता वा जाती है। मत मारि-मन्तपुळ होमेक कारण व निषय मिप्या ही माम गपे है ।।७॥ सप्रयोबनतारा मान्नपाना [मागरित नबस्सा ] मो कम पानादिकी सप्रयोगमता देषी गयी दीनां स्वप्ने विप्रतिपयसे। हैसममें नहीं रहती। मागरित भापरिवे हि सवा पीस्था च अवस्था में वा-पीकर तृप्त हुवा पुम्म | पवारहित होकर सोनेपर मी [सप्नमे] वतो विनियर्तितवट्सप्तमात्र एष वपमेको झुपा पिफ्सा मादिसे मार्ग, दिम रात सपवास किया गया और सुत्पिपासापामहोरात्रोषियम म. मा०] घेतप्यप्रकरण समे एक्स्वा पीरवा पासप्तोरिथ | जिस प्रकार कि स्वप्नमें, सा-पीकर मागा हुवा पुरुष अपनको मतप्त वस्तपा । वमाजाग्राममाना अनुमव करता है। वत समावस्या- सप्ने विप्रतिपपिरीया । असो | में जामद् दृश्योंकी विपरीकता देती मन्पामहे तेपामप्यसाप म्यान बाती है। इसलिये स्वप्नयोंक | समान उनकी मसस्पताको भी हम स्यवदनाशरनीयमिति शारा न परमेयोग्य मानते हैं। इस प्रकार दोनों ही परस्पामोंमें मार तसादापतनावममपत्र समान अन्तवप समामहैस वे निथप मिति मिपसल से स्मृताः॥७॥ मिप्या ही मामे गये है ।।७।। । स्वप्नमापदादयोः समस्यामा खम मोर नामत् पदार्पोके समाम होनेसे मापत् पदापोंकी जोमसत्यता प्रदानामसमिति पदुक्तं क्तशायी गयी है यह ठीक नहीं है। पदसत्, कमाए ? रटान्सस्सा क्यों ? क्योंकि यह यन्त सिद्ध नहीं हो सकता । फैसे सिद्ध नहीं हो सिदस्वास् । कपम् ? नहि सकता ! क्योंकि जो पाय जापत् वापरष्टा एवैते मेदा स्वप्ने अबस्थामें देने जाते है वे ही बम मही देपे जाते। तो उस समय रस्पन्से । किसहिं? और क्या देखा जाय। अपूर्व स्वप्ने पश्पति चतुर्दन्त सनमें ता पर मपूर्ण बस्तु देसताभरमको चार दोनोंपामे गममाहमष्टमुममात्मानं मन्यते। पीपर पड़ा सा तपा पाठ मुमोबाडा मानता है। इसी प्रकार म्वनमें और भी गपूर्ण वस्तुप देमा म पदप्पेत्रप्रसारमपूल पम्पति करता है। रेपिमी बम्प ममत बस्तु समान नहीं होता, इमठियेरे म्पप्ने । समान्येनासमा सममिति सद ही का पहरात मिद माणपोपनिषद् [गौ.. सरेप । भवो रटान्तोऽसिनः।। महाहो सकता। क्त सजके समान तमात्स्वमवसागरिवस्सासक्षमि बागरितकी मी अस्पतामह स्पयुक्तम। फफ्म ठीक माही। समः सप्ने एमपूर्व ऐसी बात नहीं है। सममें देसी यन्मन्यसे न सत्स्वसः सिद्धम् । १ बिन बस्तुमोको वपूर्ण सममता कितर्हि वे मत विन महा। कसी। अपूर्व स्थानिघों हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् । तानय प्रेक्षते गत्वा यथैवेह मुशिक्षितः ॥ ८ ॥ लिस प्रकार [इनादि ] स्वर्गनिवासियोंकी [ सहसनेऋचादि ] वर्गकिक बसाएँ एमी जाती है उसी प्रकार यह (ल्म ) भी सामी (सप्नदय वाहमा ) का अपूर्ण धर्म है। उन स्वाप्न पदापोको यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस छोकमे [ किसी मार्गरिशेयके सम्बन्धमें ] सुशिक्षित पुरुष [ उस मार्गसे जाकर अपने बमीर भस्पपर पाँचकर उसे देखता है]॥ ८॥ अपूर्व सानिधर्मों हिस्सानिनो पेसानीका सर्वधर्म सानी द्रष्टुरेप हि समसानमतो पर्याद सप्नस्थानमा का ही धर्म धर्म है। जैसे कि सर्गनिवासी इन्वादिके । पमा स्वर्गमिवासि सहवाधवादि धर्म है इसी प्रकार नामिन्द्रादीनां सहसावत्पादि खप्नद्रपाका या अपूर्ण धर्म है। तया स्वप्नशोषोऽय धर्मः । वय सरूपके समाम यह सता न स्वतः सिदो द्रष्टा स्वरुपयत् । सिप महा। इस प्रकारके अपने वानप्रकारापूनिवषिवि | चिचद्वारा कम्पना किये पर उन [भमोंको यह जो सन देसनेपाल कत्सानप यानी स्वमरम्वनसान स्वामी समस्सान गाकर देखा गस्वा प्रभवे । पथैवेर ठोके ता, जिस प्रकार इस लोकने मुशिक्षिता दशान्तरमार्गस्तेन देशान्तरक माफि विपमें प्रशिक्षित शां०भा०] पेसप्यारण । मार्गेण देशान्तर गस्वा| पुस उस मार्गसे देशान्तरमें जाकर वान्पदान्पश्पति तम् पहकि पक्षणेको देखता है उसी प्रकार [ यह मी देखता है मत समापमा स्पानिपर्माणां रन्नु | मिस प्रकार स्मामीफे भम रग्नु-सर्प सर्पमृगणिकादीनामसकल सयाऔर मृगतृष्णा मादिकी वसपता है समश्यानामपूर्वानां स्पानिधर्म | उसी प्रकार सनमें देखे नानेवासे | अपूर्व पदापोंका भी सानिधर्मल ही स्वमेवेस्पसवमनोन स्वमष्टान्त |t, ad वे भी बस है। इसलिये स्सासिस्थम् ॥ ८॥ स्तन शतकी बसिपतानही है सममे मनासिव मोर दिसमास दोनों ही प्रकार के पदार्थ मिग्मा है मपूर्वत्वामा निरासा। सप्नशान्तके भपूर्वस्वकी बारा शका निराकरण कर दिया। जब समध्यान्तस्य पुनः स्वमतुत्पा पुम जाप्रपाकी सनतुस्पताका विस्तृतसपसे प्रतिपादन करते हुए वाप्रदान प्रपचपमाह- फरसे - म्वप्नसृञ्चायपि त्वन्सश्चेतसा कल्पित त्वसत् । पहिश्चेतोरहीत सद्दष्ट वैवध्यमेतयो ॥ ९ ॥ सनावस्पामें भी चिपके भीतर यसपना पिया एमा पाप क्सत् और विचसे बाहर [तियोगरा ] प्रहण किपा मा पर्प सब जाम परता है, किन्तु इन दोनों ही मिप्पाल देमा गपा सनात्तापपि स्वप्नम्यानेऽपि सनीतिवादसनस्पानमें मी रितकमतर मनोरपसे सारण अन्तपितमा मनारपमापिठम |पी बनु मसद हालीपों दिए मरस्यक पभात् तग सना सत्यानन्तरममग्रतमेश सिपी मही देती। नपा उम
मागायोपनिय
[गी.
दर्शनापय स्वप्ने परिश्षेसा समावस्यामें ही घिरसे मार पर
वादिद्वारा ग्रहण किये एक
गृहीण चक्षुरादिद्वारेगोपलम्धे
वादि सत् होते हैं। इस प्रकार सान
पादि सत् । रपयमसत्यमिति परम है-ऐसा निश्चय हो जानेपर
निधितsपि सदसद्विभागो रटा)
भी उसमें सद-असदका दिमाग देखा
माता। मिस्तु पिचसे कामना मिसे
उमसारप्यन्तर्षहि पेवाकस्पितयो ए एन वारतरिक और बाह्य दोनों
ही प्रकारके पापोपा मिप्पाव
देसा गया है॥०॥
तप्यमेव रटम् ॥ ९॥
पापात्में मी दोनों प्रचारक पदार्म मिग्या है
जाप्रपृचाबपि तन्तश्चेतसा कस्पितं त्वसत् ।
चदिश्वेसोगृहीत सयुक्तं चैतथ्यमेतयो ॥१॥
इसी प्रर जामपसा भी बिचके भीतर कापना विपा एखा
पग वसव तथा वितसे बाहर प्राण पिया इमा पप सत समय
। परन्तम दामोश दी मिप्पाप मामना उचित ॥१०॥
मामलाप
इन सर और नमत् पापा
| गिप्पात प.हीरोगिएक
अन्नवारिताकामियाविशेषा | भीतर पा बादर पमितदानसे उनमें
पोरिता मही होती।
दिति प्यारगाहम यत् ॥१॥ की पाया ॥१
सामा
-
माओवीएमा ।
नादार
ग]mt-
उभयारपि चैनष्ण मैदाना म्यानयोर्यदि।
१ मा मुम्पने भेदारी पे रोपा विषम्परः ॥११॥
शा० भा०] बैतप्पप्रकरण यदि [ भागरित और स्वप्न ] दोनों ही स्थानों पदापोंका मिप्यास्य है तो इन पदार्थों को मानता कौन है और कौन इनकी कल्पना करने वाला है।॥ ११ ॥ स्वप्नजाग्रत्म्मानयोर्मेदानां यदि यदि सप्न और मागरिस [ दोनों ही सानों के पदापोका मिग्यास्य वैवष्य फ एतानन्तर्षहिमेतः । सो चित्तके भीतर या बाहर कल्पना किये हुए इन पदार्पोको फरिसतानमुपसे । को पै तेपी जानता कौम है ! और कौन उनकी विकल्पकः । स्मृतिज्ञानया क कम्पना करनेवाला है । तात्पर्य यह है कि पदि निरामवाद बीर मही आलमनमित्यभिप्राया; न है तो [यह बताना चाहिये कि उक्त स्मरण (स्लम) और ज्ञान (जागरित) घेभिरारमबाद इष्ट ॥ ११ ॥ का मालमन कोन है।॥ ११ ॥ इनकी कल्पना करनेवास्प वीर इम साझी आरमा ही कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देव स्वमायया । स एव पुध्यते भेदानिति बेदान्तनिधयः ॥१२॥ सर्यप्रकाश भारमा मफ्नी मायासे सपं ही फायना करता है और पही सप मेोको नामता है-पही वेदान्तका निधय है ॥ १२ ॥ स्वय स्वमायया स्वमात्मान स्वयंप्रकार वारमा मपनी मापा मात्मा देव आस्मन्येव पक्ष्यमाणं से रग्समें सर्वाधिके समान अपन में बापहीको वागे बकाये मानेपासे मेदाफार फल्पपति रन्ज्यादापिय | मेवरूपसे कल्पना करता है और सादीन् स्वयमेव प तान्मुमसे मप ही उन मेोको मागता है- इस प्रकार यही देहातका निपप भेदस्तिदेवेस्पेय घेदान्तनिया है। उसके सिवा स्मृति और शान . माटूक्योपनिषद नान्योऽस्ति पानस्मृस्मामयः ।। का कोई और नामय मही है। न च निरास्पदे एव मानम्मृती के कपनके समान ये शान और वात्पर्य यह कि नाशिकों (बौदों) पैनाशिनामिवेस्पमिप्राप|१२|| स्मृति निरापार नही है ॥ १२॥ - पदार्मस्पना पिषि सहस्पपन्फेन प्रकारेण यह सफम्प परते र किस प्रकार फापना करता है। से फत्पमतीस्युपते-- बतसाया माता है- विकरोत्यपरान्भावानन्तभिचे व्यवस्मितान् । नियताच पहिचित्त एवं कल्पयते प्रमु ॥१२॥ प्रमु वात्मा अपने पति करणमें [मास्नाहपसे ] ति बाप (मेकिक ) भाषोंको नानारूप करता है तथा बहिथित होकर पूपिणी वादि निक्त मौर मनियत पदापोंकी मीइसी प्रकार कम्पमा करता है॥ १५ ॥ विकरोति नाना करोस्पपरान् || पर विपके भीतर पासनारूपसे सौकिकान् मावान् पदार्थान् | स्थित बम्यारत लौकिक मानों- शम्दादीनन्यांपान्तमिवासना शब्दादि पापोंको तपाप प्रची वादि मिफ्त और फापनाकालमें ही रूपेण म्पपस्सितानम्पारुवान् | सपम होनेवाले बनियत पापोंकी निपताप पृष्ठ्यादीननियांध परिचित होकर एवं मनोरपाविरूप कल्पनाकाठावहिपिता संखया पदायोंको अन्तपित्त होकर वित तमिचो मनोरयादिलक्षणा करत्व वर्षात् माना करता है-स निस्पेयं मत्स्यवि प्रसरीघर | प्रकार प्रमु-मिस पर्वात् वात्मा वास्मेस्पः ॥ १३ ॥ कम्पमा करत्य॥१३॥ मामारिक बौर वाम दोनों प्रकार के पदार्म मिस्या है स्वप्ननधिचपरिकल्पित सर्य समके समाम सब कुपिचका मित्येवदासम्म्यते । यसावित ही कम्पमा किया इमा है-इस श- भा] बैतप्पप्रकरण परिकल्पितेर्मनारयादिलक्षणमित्त विषयमें यह शहा होती है क्योंकि केवट चितपरिकस्मित और पिसे ही परिण्ठप मनोरयारिसे बास परिन्छेयासक्षण्यं पापाना पदापौकी क्यान्यपरिछपवरूप | विरक्षणता [मत समके समान मन्पोन्पपरिच्छेद्यत्वमिति । | ये मिथ्या नहीं हो सकसे ]| सा न युकाशा समापान-पहश टफ महाँ है, [क्योंकि-] चिचकाला हि येऽन्तस्तु द्वयकालराम ये पहि । फल्पिता एव ते सर्वे विशेपो नान्यहेतुक ॥१॥ जो बाम्तरिक पदार्य केवड फायमाकारतकदी रहनेवाले हैं और मा बाध पदार्प रिकाठिक [वर्षात् बम्पोम्पपरिपोप १२ समी कतिपत है। उनकी विशेस्ता [भर्यात् बान्तरिक पाप मस्या है और बाम सरप -स प्रकारकी भेकम्पमाका ] को दूसरा कारण मही है।॥ १०॥ पिचकाता हि येऽन्तस्तु को भारतरिक र वर्षात् वित चिधपरिच्छेपार, नान्पपिस | परिपोपने पितकाल है जिनका वितकारके सिा वीर फोह कास कालम्पविरेकेण परिच्छेदका परि महो उन्हें घिसका फाला येपो वे पिघालाः || मरते है।बपात् ये केवट करना कपनाकाल एवोपउम्पन्त | के ममप ही उपउप होते है । तपा इरपर्यः । दयाराम मेदकाला पार्षदो पा पाने में का पानी अम्पान्पारिप है। जैसे मन्पोन्पपरिप्पा । मानरफ्त मा पानी गोदानमास्ते याबदास्ते नापढ़ी जबतफान ने दुरता दारिप मापदादाभितारदाम्ते। || उमन ममता पर रहता १ सय दुलातक मागनरमेवागन्म पनि परम्पर नमन- मधा माणस्योपनिषत् [गौत्र परिच्छेपपरिच्छेदकावं पायान | इस प्रकार मान पायोंका परस्पर मेदानां ते इयकालाः अन्त परिठेप परिचंदपाल है, वत ने दो कालवाने है। किन्तु मान्तरिक पिचकाला पायाम इयकालाः पित्तमालिक और बाम शिकालिक फरिपवा एष वे सर्वे । न पाया ये सब कल्पित हो है। पाप पदारों- दयकालस्वविशेषः फस्पिवस्त | की मो दिकारिकवरूप विशेषता है वा कम्पितालके सिवा किसी कम्प पतिरेफेणान्पोतुकः । अथापि कारणसे नहीं है । इस विषयमे मी हिस्वप्नस्टान्ता भवत्पेष ॥१४॥ सप्नका रणत है॥॥ १४ ॥ GENERAL मान्तरिक भीर वाम पदापोका भेद केवल इन्द्रिमयनित है अव्यक्ता एवं येऽन्तस्तु रफुटा एव च ये बहि । कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥१५॥ जो बान्तरिक पदार्थ है वे बम्यक है और जो बाध स्ट प्रतीत होममाले हैं। किस वे सब करिस्त ही । ठमकी विशेषता हो केवळ इन्द्रियोंके ही मे में है॥ १५॥ यदप्प वरपक्तस्वं भाषानो चितकी पासमामात्रसे वमिम्पत मनोमासनामाषाभिष्पकानां हुए पदापोका यो मन्त्र करणमें सम्यकस्य (वस्फुटस) और बाम स्फुटस्व वा परिमारादीन्द्रि पर बानि बम्प इन्द्रियों को पान्तरे विशेपा नासी मेशना | उनका सुटल है बिशेस्ता मस्तिस्माता म्वप्नेऽपि त्या पायोको सचाके कारण नहीं है, क्योंकि ऐसा ही खनमें मी देसा दर्शनात् । किंतदि इन्द्रियान्सर | जाता है । तो फिर इसका क्या कव पय | मतः फरिसता एक कारण ! पहाधियों भेगकेही •भपा नाम समान मन भी पिवरिसित पदार्थ कामना पनि भौर पन पारिपतिकही होते। परन्तु पे होते रोगों की मिया सनी प्रसार भापत्में भी समझो।
शा• मा०] वैतापमकरण माग्रमालामपि स्वप्नमावषदिति | कारण है । मत सि मा कि खामके पदाकि समाम भाप्रस्कालीन सिनम् ।। १५ ।। फाप भी कम्पित ही है॥१५॥ पापात्मनाकी मूल पीप फरपमा है पापाच्यारिमकानो भावाना घाव और वास्तरिक पदापोंकी परस्पर मिमित वीर नैमित्तिकापसे मिवरेतानि मिचनमिधिकसया करना होनेमें क्या कारण है। सो कल्पनामा कि मूलमित्युपसे- । वताया जाता है- जीष कल्पयते पूर्व ततो भावा पृथग्विघान् । चायानाध्यात्मिकांश्चैव यथाविधस्तथास्मृति ॥१५॥ [ वह प्रमु ] सबसे पहले नीषको कल्पना करता है फिर तरा तरह के पाप धौर माध्यामिक पदापोंकी कम्पना करता है। उस नीला पैसा बिहान होता है वैसी ही स्पति मी होती है ॥ १६ ॥ ची हेतुफलात्मकम्; अहं सबसे पहले मैं करता है, मुझे करोमि मम सुखदुःखे इस्पेष | सुस-सुप। इस प्रकारके देत फलामक जीवकी [यह प्रस] इन- रूषणम्। भनेवलक्षण एष शुद्ध | से विपरीव सक्षणेवाले पुरवारमा भास्मनि रजाविव सर्प फल्सयत रगमें सपके समान कल्पना करता पूर्वम् । तवस्तादयन क्रिया | । फिर उसीक लिये क्रिया, कारक कारकफलमेदेन प्राणादीन्नाना- | और फटके मे से प्राण बाPि नाना विभा भामानामानाम्पारिमका प्रकरफ बाप और बाप्पारिमक इपेव फरपये। पापोंकी काम्पना करता है। सत्र फरपनाया न देतुरि सम फरनामें क्या हेतु ई-पम- पर कहा माना-पा मा सर्य स्पुन्यते । याऽसौ स्वयंकलितो कापना फिया हुभा जीव सप प्रकार बीत मर्यसनायामपिता सकी सपनाका अधिकारी , मी - मा ७- मागम्योपनिषद् [गौ पपापिया, माशी विद्या विधान विधावाम होता है बर्षात् उसकी मस्मेति यथाविधः तयाविषैत्री स्मृति भी होती है । बत मैसी विषा यानी विहान होता हैसी स्मृतिस्तस्मेति तपास्मृतिमवति पर पैसी ही स्मृतिवाडा होता है। इस प्रकार [ असमक्षणादि हेतुकी स इति । अतो हेतुकत्सना | सपना के विधानसेही [दसि वादि] विधानात्मसपिवान वताहेतुफछ फलमा विधान होता है, उससे सरे दिन मी ] उनछ और फम्की स्मृति स्मृतिस्त्रवस्वविमान तदर्थक्रिया होती है और उस स्मृतिसे उनका मान | तथा उनके पिये होनेवाले [पाकादि] कारकतत्फउमेदविधानानि । कर्म, [तनुदिकारक और उनके [तसि धादि] फलमे केशान होते हैं। मेम्पस्वरस्मृतिस्तस्स्मतेष पुन । उनसे उनकी स्मृति होती है तथा उस तद्विमानानीस्पेवं पापानामा | विज्ञान होते हैं। इस प्रकार यह भीष स्मृविसे फिर उन [देख पा ] के रिमांश्चेवरेनानिमिचनमितिक बाप और वाम्पामिक पदापोंकी पारस्परिक मिमिच-नैमितिकमाणसे भावेनानेकधा फत्तपते ॥१६॥ | अनेक प्रकार काममा करता है।॥१६॥ जीव मापनात जाम है समीपकल्पना सर्वासना पातिक जीवकासमा ही सब मम्पमामोंका मूछ-पर कहा गया मामित्पुक सैप जीवकल्पना निमिति रटान्सेन प्रति मिनसे -इस बातका खातसे पिस्तु या भीम-कापमा है किस पादपति- । प्रतिपान करते है- अनिश्मिता यथा रज्जुर घमारे विकल्पिता । सर्पधारादिभिर्भावस्तदात्मा विकल्पित ॥१०॥ -
शा. मा ]
खेतम्पप्रकरण
मिस प्रकार [भपने सरूपसे ] निभय न की रम्नु बमकार
में सर्प-मारा मादि मावोसे कम्पना को साती , उसी प्रकार मारमामें भी
रह-रहकी कल्पनाएँ ऐही. १७ ॥
पमा लोकेमोनरूपेणानिधि दिस प्रकार अपने सरूपसे
सानाधारितेबमेवेति रज्जुमन्दा
अनिधित भात या ऐसी ही है-
इस प्रकार निर्धारण न कोई रम
म्भकारे किं सर्प पदकधारा
मन्द पकारमें प्यासर्पन
दम वि पानेकपा विकल्पिता की धारा था दम है"
इस प्रकार
भवति पूर्व स्वस्पानिमयनिमिचम्
र-पासेसे सरूपका निचय
म होने के कारण चमेक प्रकारसे
भवि र पमेव रन्ट स्वरूपेण फापना की माती है, यदि रस
निमिता साया न सपरिवि पहले ही अपमे सरूपसे निश्चित
तो उसमें सपदिका विकास नहाहो
कम्पोऽमविप्पद यथा स्वास्ता-
सकता, जैसे कि मापने हापकी गुम
पुस्पादिपु, एप रशन्ता बार में { ऐसा र विकल्प नहीं
वातफलादिससारचमानवि होता ] । यह एक At सी
(मर हेतु-फलादि सांसारिक धर्मरूप
तषणतया स्पेन विमुद्धविधप्ति
समपसे शिक्षण बने विर
मानसपाइयरूपेमानिमितन्वा विशतिमात्र दिवीप सवासरूपसे
माणापनन्तमापदरास्मा- (मिमित म होने के कारण ही भास्मा
गोब एवं प्राग वादि बनम्त विमिन्न
विकल्पित इत्येप सर्बोपनिपदा मासे विपित हो रहा है यह
सिवान्त ॥१०॥
सम्पूण पतिपदाका सितारा
महामनिधिबामझाम है
निम्मितायो यथा रज्ज्यों विकल्या विनिवर्तते ।
रम्जुरेवेमि चाव
सददात्मविनिमय ॥१४॥
माणपोपलिपद्
[पो.का.
मिस प्रकार रघुका निश्चय हो जानेपर इसमें [ सदिका ]
रिकाप निच हो माता तया यह रही है। ऐसा कौर निवप
होता है उसी प्रकार बास्माका निश्चय है ॥१८॥
रन्छरपेवि निभये सबमि
या रही है। ऐसा निश्चय
पाल्पनिवचौ रन्तरेषेति पातं ) होनेसे सर्पादि विकल्पको मिति
यथा तथा "नेति नेति" (10ो बानेपर जिस प्रकार यह रम
१०४।४।२२) इति पर्व है। ऐसा अद्वैत-माग हो माता
संसारपर्मशून्यप्रतिपादकपासव | है उसी प्रकार मन्ति मेतिय सि
नितविधानधर्यालोककतारमपि
सर्वसंसारपर्मशम्य भारमाका प्रति-
निममा "मारमैवेदं सर्वम्" | पादन करमेवाल शाअसे उत्पन्न हुए
(छा० उ० ७ । २५ । २) विज्ञानरूप सूर्पके प्रकाशसे वास्माकर
"मर्पमनपरमनन्तरमबामम्"
एसा निधय होता है कि पर सब
(१० उ०२ । ५ । १९) रहित और बतप्रशूग्योबाहर
वात्मा हो है कारण-कार्यसे
"सपापाम्पन्चरो भया" (P० मीतरसे ( कार्य-कारण दानों रशियों-
8. २।१।२) "अमरोऽमरो- से ) बग्मा है। पर जराशूम्म
ऽभवोऽभयः" (१० उ०४।४। वमर, अमृत और समय है" तपा
२५)"एकमाइया सि॥१८॥ एक बदितीय ही" ॥१८
पचास्मैक एवेति निमयः
यदि यह बात निश्चित है कि
कर्म प्रामादिमिरन्धर्मावरेते साररूप प्राणादि ममन्त मानोंसे
मारमा एकही वो पर इन
मंसारसपणेविकसित
कैसे विकम्पित हो रहा है।
इति, मिमें कहा जाता
उपते, मणु-
६, मुनो-
पिपकी मूस मामा
प्राणादिभिरनन्तम भावरेतर्विकरपत ।
मायैपा तस्य देवस्य यया संमोहित स्वयम् ॥१६॥
शां. मा०] मेवभ्यारण यह बो इन प्राणादि बनात मावोंसे विकस्पित हो रहा है सो पर उस प्रकाशमम बामदेवकी माया , मिससे कि एसपही मोहिस हो रहा है॥ १९॥ मायैपा उसास्मनो देवस्य । पह इस भामदेवकी माया है यथा मापामिना विहिसा माया जिस प्रकार मापापीहरा प्रयोग की गगनमविपिमल सुमितेः । एई माया गति निर्मक याकाशको सपलास्तरुभिराकीर्णमिव करोति पम्पपुक पुस्ति पादपोंसे परिपूर्ण कर देती है ससी प्रकार पर भी सपपमपि देवस्स माया ययायं उस देवकी माया है जिससे कि यह म्वपमपि मोहित स मोहिणे सर्व भी मोहित एके समान मोह प्रस्त होगा।"मेरी मायाका पार मवति । "मम माया दुरस्पया" पाना कठिन है। ऐसा [ मान्ने] (गीवा ७११४) इत्युक्तम् ॥१९॥ ' कहा भी है।॥ १९ ॥ मूलतत्तसम्बन्धी विभिन्न मापद प्राण इति प्राणविदो भूतानीति च तद्विदः । गुणा इति गुणविदस्तस्वानीति च सद्विद ॥ २० ॥ प्राणोपासक कहते है-'प्राण दी मगरका कारण है।" मूतों (प्रस्पक्षपारी चार्वाफादि ) का कपन है-[पृथिवी बार पार भूत दी परमार्थ है। गुगों को जानने वाले [ सांस्यवारी करते हैं-गुण ही सठिक हेतु है।' तपा सरसह (ोष ) कहते हैं- [ वामा, मविपा और शिव-ये तीन ] तरख दी मगरक प्रतिम है। ॥२०॥ पादा इति पादविदा विपया इति तद्विदः । लोका इति लोकविदो देवा इति च तद्विद ॥ २ ॥ पता फासे - आ ही मग परगरप वर" [परन्यापनादि] रिपा पदव - पिपदी माप पस" मापूक्योपनिषद् [गो. बोकोवाओं (राणिको ) का कथन है.~ोक ही सम्पka देवोपासक करते है-मन्दादि देवता हो सरिफे सघालय ॥२१॥ वेदा इति वेदविदो यज्ञा इति च तदिद । भोक्तति च भोसृविदोभोज्यमिति च तद्विद ॥ २२ ॥ वेश करते है अगादि चार वे ही परमार्य है ।' यधिक करते है या हो ससारफे मादिकारण है। भोकाको मानने मोवाका हो प्रधानता बसलाते है तथा मोपके मर्मज ( सूपफारा) मोग्पपदापोंकी दी सारवयाका प्रतिपादन करते है ॥ २२ ॥ सूक्ष्म इति सूक्ष्मविद स्यूल इति च तद्विद । मूर्त इति मूर्तविदोऽमूर्त इति च तद्विव ॥ २५ ॥ सम्मबेचा करते है (~-खामा सूक्ष्म (पशु-परिमाण) "स्पूच्यादी (पाका ) पाते - स्यू है। मादी ( साकारोपासक) करते है-परमार्थ मस्त मर्तिमान् है।" तथा बमवादियों (शूम्पपारियों) का कपन है कि वह महिीम | २३ ॥ काल इति कालनिदो विश इति च तद्विदः । धावा इति वादविदो मुक्नानीति तद्विद ॥ २४ ॥ कथा (पतिय लंग) कहते १- ही पमार्य है" दिशाभ नाममपस (सरोदयशाची ) करते है-शाएँ ही सम पस्तुर । पायेचा करते २-माबाद मत्रवार बाहिरी रूप पस्त है। तथा मुवनकोपके माता का कपन है कि मुम हो परमाप ॥२१॥ मन इमि मनोविदो पुद्धिरिति च तद्विद । चियमिति चिचविदो भर्माधर्मी व तद्विदः ।। २५ ॥ ममाविद् करते है-मनीवरमा है, मौका पन है-पुद्धि हवामा है, बिचौका दिपार है-विच ही सत्यवस्तु है। तमा धर्माधर्मरचा ( मीमोसा) पर्माधर्मको ही समाप मानते हैं ॥२५॥ - शां. भा०] तथ्यमकरण पश्चविशफ इत्येके पडविंश इति चापरे । एकविंशक इत्याहुरनन्त इति चापरे ॥ २६ ॥ कोई ( सम्पमारी) पचीस तस्वोक्ने, काई ( पातधरमताक्टम्बी) एमोसोंका और फर्य ( पाशुपत ) इफ्तीस सरवोंको सत्य मानते हैं सपा बम्प मतापपुम्बी परमापरे अनन्त मेदोवाणा मानते है ॥ २६ ॥ रोकॉलोकषिद प्राहुराधमा इति तद्विद । स्त्रीपुनपुसक परापरमयापरे ॥ २७ ॥ माविक पुर सोकानुरचनको मौर थानमवाली बायोफो से प्रभाम बताते है । शिवादी श्रीटिश पुलिस और नपुसकोिका वा दूसरे लोग पर धौर पर प्रझको ही परमाप मानते हैं ॥ २७ ॥ सृष्टिरिति सृष्टिविदो लय इति च सद्विद । स्थितिरिति स्थितिविद सर्वे चेह तु सर्वदा ॥ २८ ॥ सरिरेच परते 8-मुहिदी सप है, Bारी करते २-४प हो परमाप बस्नुपातियता करते हैं-स्थिति ही सपास प्रकार ये [महे ए और बिना करे ] समी बार इस वामतरतमें सन परिपत॥ २८ ॥ प्राधा मीवात्मा प्राग बीमम्पप्रावको कावे । तस्कायमेदादीवर स्थिम्पन्ता । ठरक मितिश्यम्स सब रिपम्प मन्य प सर्वे सौमिश्च स | उसी कायम है, साण प्रागिपों- परितिभप सब टोकिसन प्राणितरिकासिता मदा रनमा पर रामें मम समान दम मिर मपाइय: उदय मारम से गूप बाम में म. न मामा मामा मामा Feriबापा पपशि भर मर- पान दामो नित मनांतर सन र सपनare UिE 47 AM पर पोरम-मोर। प्राण २०४ माफ्योपनिषत् [गो०. न्यारमस्वरूपानिधपहेवारविधया । सम्पकमानिभयके कारण विपासे कल्पिता इति पिण्डीमतोमः। करना किये गये है-यह इन प्राणादिकानां प्रत्येक पदार्थ श्लोफोका समुदापार्य है। प्रामादि ध्यारम्पाने फरगुप्रपामनस्या मेकि प्रत्येक पदार्थ म्पास्यान- सिद्धपदार्थस्वाध परनो न कारण तपा में सिद्ध पदार्थ है-इस- का मस्पत पत्र प्रयोयन होने के रुतः ॥ २८॥ लिये प्रयत्न मही किया ॥ २८॥ किंबहुना- | अभिक क्या !-- य माय दर्शयेचस्य तं भाव स तु पश्यति । चावसि स भूत्वासोतद्ग्रह समुपैति तम् ॥ २९॥ [ गुरु ] बिसे गो मात्र विस्म देता है मह उसीको बास्मसरूफ्से देसने लगता है तपा इस प्रकार देसनबामे उस म्पळिकी वा भाग सप होकर रक्षा करने लगता है । लि ठप्स ( मात्र ) में होनेवाष्प ममिनिवेश उस [ के बारमभाव ] को प्राप्त हो बासा ॥ २९ ॥ प्राणादीनामन्यतममुक्तमनुफ मिसका वाचार्य वपन को मान्य माष पदार्थ दर्थयेषस्सा कम्य बाप्त पुरुष जिसे प्राप्णागि मेसे किसी को हुए बपना किसी बिमा चार्योऽन्पा याप्त इदमेव सम्वमिति कडे ए वन्य भाषको मी यही परमार्थ तत। इस प्रकार सा स स माघमारमस पश्परयय देता है पर उसी भाषको मारममूत महमिति पा ममेति वा । या देखता है [ौर समनता है कि-] म पही, वपना पही द्रष्टार स भाषाऽमति यो दर्षियो | मेरा सहप है।तपा उस बयाकी मावोऽसो भूत्वा रक्षति । स्वेना | भी, नो माय उसे दिसम्मपा गया है, तठप होकर रक्षा करता है। स्मना सर्वतो निस्मादि ।। मर्पात् उसे सब प्रकार अपने सरूप- छा० भा.] बैतप्पमकरम वभिन्यास्तद्ग्रास्तदमिनिवेशः।। से निरुद कर देता है । उसी मावमें गोर-जामह वर्षात् यही ताल दमेव तत्वमिति स तं ग्रहीवार है। इस प्रकारका ममिनिवेश है सपैति । तस्मारमभा निगच्छ- यह उस माषके प्रहण करमेवारसको प्राप्त होता है, वर्षात् उसके वात्म वीपर्यः ॥ २९॥ सहपको प्राप्त हो नाता है ॥२९॥ मारमा सर्वाधिष्ठाम है ऐसा गामनेवाला ही परमादमी, एतैरेपोऽपृयग्मावे पृथगेवेति लक्षितः । एव यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशक्ति ॥५॥ [इस प्रकार सबका अविष्ठान होनेके कारण ] इस प्राणादि वयम् मामोंसे [ पृपक न होनेपर भी बहानिपोद्वारा ] पारमा मिन ही माना गया है। इस बातको गो वास्तविकरूपसे नामता या मि शंक होकर [दायकी ] कल्पना कर सकता है ॥१०॥ एते। प्राणादिभिरारमनो रडमें पथित सरि मायासे अपग्मूसरपथग्भायरस आस्मा | रग्गुके समान या बारमा बपनेसे रमरिय सादिविकसनास्पैः अपग्मूत प्राणादि भट्टपरमावेसे प्रयगेदेवि ठवितोऽभिलषितो | पृपक ही है-ऐसा मुखौको उचित- निमिता मूरिस्यर्थः । विमिना बभिरक्षित बर्षात् निषित हो रहा तु रज्यामिव फस्पिताः सदियो १ । विवेकियोंकी में तो " सो कुछ है सब बारमा ही "स नारमम्मतिरकेण प्राणाया युतिका अनुसार रस कमिमता सन्तीरपभिप्राय: "द सर्व | सरिक समान ये प्रागारमा पदयमात्मा" (पृ०३० २१४||से मिम ही माएसा इसपर ६,४।५।७) इति सुते । एवमारमन्पतिरेकेणास इस प्रकार रसु कास्थित सपके रन्जुमर्पयदास्मनि कनिरवाना | सनान हो ममा करित पापा | तात्पर्य है।
मायापनियन् मारमान च कपलं निर्विकल्पका बारमा सिधा बसत्पत्व सममता यो वेद सवेन भुतियो युक्तितम परमार्थत निर्विकल्प जानता है है तया बारमाको श्रुति वीर युकिसे सोऽपिशाकिवा पदार्थ विभागत' निशंक होकर बेनाकी या दाम्प कल्पयेत्कल्पपतीस्पर्षः-दमेव इस मका प्रतिपादन करनेपाल १ भौर यह न्यापपरक है। इस परं पाक्यमदोऽन्यपरमिसि । न प्रकार विभागलक कल्पना कर मनपास्मविद्वेदाप्रमातुं शक्नोसि सकता है-यह इसका तात्पर्य है। मो मप्पारमतत्वको नहीं बनता तपस । "न पनध्यात्मविस्कभि पर पुरुष तत्वत को भी नहीं कियाफलम्पानु" ( मनु० जान सकता । "अप्परमतत्वको न ६ । ८२ ) इति हि मानष को प्राप्त महा करता ऐसा मनुबी- पाननेवाग पुरुष किसी भी क्मफल- वपनम् ॥ ३०॥ का मी पचन है॥३०॥ देतच मसरपल पेदारतव पदेवदेवसासवमुकं युक्ति या मो युलिपूर्वक सकी वसत्पता बतायीपदात वस्तदेवदान्तप्रमाणावगत- प्रमाणसे बानी गपी है-साशपसे मिस्याह- स्वप्नमाये यया सृष्ट गन्धर्धनगर यथा । तया विश्वमिदं दृष्ट वेदान्तेषु विषक्षण ॥३१॥ मिस प्रकार सम्म और मापा देखे गये तथा पैसा गन्धर्ष-मार माना गया है उसी प्रकार पक्षण पुस्यनि बेमि इस नगएको वेशा॥२१॥ स्वमम माया पखममाये मरिकी पुरुषोधारा सम और बसास्लामिके भसस्पो सद माया, बो बसपारूप बात शो.मा. ] बैतप्पारण स्त्वात्मिके लक्ष्येते | बसस्य १ सदस्वरूप देने जाते हैं। भविषेकिभिः यया प प्रसारित | मिस प्रकार विस्तृत चूकान, घाभार, गृह, प्रासाद और मगरनिवासी बी पम्पापणगृहप्रासादरखीपुमनपद पुरुपोंके म्यवाहारसे भरपूर-सा गन्धर्ष म्पपहाराकीपमिष गर्वनमरं मगर देसते-ही-देखते वकस्मात् एश्यमानमेष सदकमादमावता अमात्रको प्राप्त होता देखा गया है और मिस प्रकार ये सप्त वीर माया गतं एम्, यथा च स्थममाये वसद्प देने गये हैं उसी प्रकार रप्टे असापे, सपा विश्वमिदं मैत यह विच वर्षात् समस्त दैत वसत् समस्तमसष्टम् । देमा गया है। फेस्पाइ-वेदान्तेषु । "नेह कहा देसा गया है ! इसार नानास्ति किंचन" (क००० २।११ करते हैं गतौ । यहाँ नाना ११, २०४।४।१९) "इन्द्रो कुछ नहीं है" "न्द्रने मापासे, मापामि" (पृ. २०२।५।१९) पहले यह वास्मा ही पी" "आरमैवेदमन आसीत्" (१०३० ११४११७)"प्रमपा एमप्रथा- पहले यह प्रमही पा" "दूसरे सी"(१००-१५०१०)"दिती | से मिपय मय होता है। "उससे या मयं मपति" (१०१०१।४। दूसरा को महो। यहाँ इसके २) न तु तद्धितीयमस्ति" ये सब वारमा ही हो गया है। (१० उ०४।३ । २३) “यत्र | इस्पादि मेदाम्वमि विपक्षण अर्यात् स्वस्स सर्वमात्मैवामू" (पृ. उ०४।५। १५) इस्पादित निपुणतर बखदी पण्डितोबारा विपानिपूणतरपस्तुदर्शिमि गया है-पह पण्डितरिस्पर्पः। तात्पर्य है। "समापननिम रप्ट पर्पपुर "यह मगर मोरे गोके समाम और पर्याकी दक साश नाशप्राय, मुस्से रहित और मापा जनान्तर मुदसनिमम् | नाशप्राय मुखाममात्रको प्राप्त हो मानवाला देस १०८ माणपयोपनियर [गी.. दीन नाघोचरमभावगम्" इति | गया है। -इस म्यासस्मृतिसे भी भ्यासस्मृतः ॥३१॥ यही मात प्रमाणित होती ॥१॥ परमार्थ क्या। प्रश्नपार्थोपसंहाराघोज्य या ( मागेका ) स्मेक इस सोका । यदा विवर्ष तमाम प्रकरणके विषयका उपकार करने के पैका परमाव: संसदेदं निप्पम किये है। कि त बस्द। एकमात्र वाम्मा ही परमात मति सोम लोकिको वैदिकम सत् । स्पे पर निश्चित होता है कि म्पवारोऽपिपाविपप रवति । या सारा मैकिक पौर पदक प्पकार अविपाका ही विपय । उस अवस्थामें- न निरोधोमवात्पचिर्न पदोन च साधक । न मुमचर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥१२॥ न प्रलय, न सत्पति है, म भ न साधन भुम। और न मुक्त हीरे-पही परमार्पता ॥ १२ ॥ न निरोपा-निरोधन निरोप म निरीष है। निरोधमा भाम निरोध यानी प्रय। अपवि प्रलया, उस्पपिर्जननम्, बदा मनमको, पद-संसारी मीलको ससारी बीमा, साधका साधन साधक मोक्षक साधनपासको, मम पान्माषस्य, समोपनार्थी, मुहानकी दयावामको और मुळ एका विसमभः । उपधि | मनसे स्टे एकत्र करते हैं। उपति और प्रध्यमा बमान दानके प्रलयकारभावामदादया मारण ये गाना भी मदार- मन्तीत्यपा परमान मही परमार्पा । फसमस्पणिप्रलपपोरमा, उ पति और प्रामथकर मार स्युपस, तसावधान । "यय । पिरा प्रपार गर या माता • भा०] घेतप्यप्रकरण हितमिष भवति" (१० १०२।। -सकी मसम्यता होनेक कारण ४।१४)"मानानेप पश्यति" [ इनकी भी सत्ता मही है । (फ० उ०२।१।१०,११)'भारमै हाँ दैत-जैसा होता है जो घेई मर्षम्" (छा० १०७७२५।२) | यहाँ नानावर देस्ता है" "पह "प्रमंवेदं सर्पम्" (नृसिंहाचर० | सब भारमा ही है" "यह सब प्रम ७) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा ही है। एक ही वद्धितीय" "पह उ० ६ । २।१) "इद सर्प मो कुछ है सब बात्मा है" इत्यादि यदयमात्मा" (१० उ०२॥ वनको भुतियोंसे दैतकी बसस्पता ४।६, ४ । ५१७) इस्पादि सिद होती है। नानाभूतिम्मादेतस्सासरप सिदम्। सता मस्पधिः प्रलया पा टपति अपवा प्रख्य सकी ही हो सकती है, शशमा बस स्थामासतः शविपामाद। इस्तुकी नहीं हो सकती । इसी नाप्पदैवमुत्पपते हीयते पा। प्रकार at बस्तु मी उत्पम या हीन मही होती। जो जय हो आर्य पोस्पचिप्रलपपम्पेति विप्र यह उत्पत्ति प्रलयवान् मी हो-पह विपिदम् । | वो सवया विम्द है यस्तु पुनतसम्यवहार स इस सिधा जो प्राणनिरूप रन्जुसपैयदात्मनि प्राणादिलथपः तम्याहार । बर रग्गुने सर्पके समान वारमामें ही पमिस्त -पह फल्पित इस्युक्तम् । न हि मनो |मात पहलपही जा चुपी हार- विफल्पनाया रन्जुमपादि समिप मनाविकम्ययी भी राम सथणाया रग्ना उपछि या प्रलप मही हानी । उत्पनियो । मनमें ही भी है और न [ मन रज्मुसर्पम्यापतिः प्रठया या न भार रणदानोदी । मी प्रकार गो"पता या। तथा मानसत्या तया मनामपत्र भी समान दी, । न च मनमि | रतुमपको उत्पत्ति या प्रसपना पवाराहा माणग्योपनिपन् [गी. विशेषादेवस्म । नरिनियले , पोलि मनके समाहित अपमा मन मनासि साप्ने वा देव गृपते । हो जानेपर इतका ग्रहण नहीं होता। मता मनोमिकल्पनामा मत यह सिद्ध शुभा कित वैतमिति सिद्धम् । तसात्पर्क मनकी कामनामात्र है। इसरिम्म | यह टीक ही क्या है कि तभी देतस्सासचाभिरापापमाव: बसस्मता दोनके कारण निरोभादि परमार्यवेति । का वभाव ही परमार्थता पपेव साभाव शासष्पापारो १०-पदि ऐसा है तो शामा म्पापार ईतका धमाष प्रतिपादन नादेत विरोधात् । करमेमें ही 1,बईत मोधर्मे मही, बर्षिय उमाप सत्पतिसक्योकि इससे मिरोष बाता है ऐसी क्वसामें पतके पस्तुत्वमें करें पस्तुले प्रमाणाभापाछन्यवाद प्रमाण न होनेके कारण शूम्यपारमा प्रसंग उपस्थित हो जाता है कि प्रसाः, दैतस्म घामापात् । इनका तो बार ही है। ना रन्मुसादिविकल्पनाया मिशमी-ऐसी बात नही। निगस्पडम्बानुपपपिरिति प्रत्यु क्योंदि रघु-सावि विमास्का निराधार हाना सम्मन मही-इस कमेतस्कपममीवयसीस्माइ प्रकार पामे निराकरण कर ये | जानेपर मी इसी शंकाको फिर क्यों रज्मुरपि सपविकल्पस्यास्सदमता रखता है। इसीपर [षम्यवाही करता पिकवितपेति एशन्तानुप है-सर्पभमकी अधिष्ठामभूता रड भी कस्पिता ही है। इसछिपे या पतिः। एम्त टीम महो।" न, विपनापयविफल्पि सिमारती-मही, अस्पाधिकारिपसरपादेव सस्थाप आपापामार मषित बारमा मालिनि मभाव प्रतिपादन करनेमे दीया कमवा नवनिमको भारतीय मभीर है। कापनाका शा०भा०] वैतध्यप्रकरण परः । रन्जुसर्पपदसत्वमिति की सत्ता उसके अविकन्यितत्वके कारण ही सम्मा हो सकती है। घेद ? न, एकान्तेनाविझल्पि | यदि कहो कि रग्लु-सर्पके समान उसकी बसा है, तो ऐसा सम्पादविकस्पितरज्ज्यपस्या काना ठीक नहीं, क्योंकि इ पविकस्पिस रग्ज-अशके समान सपामावविज्ञानात् । विकल्प | सर्पामावक विधानके पहले से ही सपा अविकल्पितरूपसे हिपमान पितुप प्राविफल्पनात्पते है। इसके सिपा, यो विकल्पना करनमान होता है उसे विकसकी सिस्वाम्मुपगमादसमानुप उत्पत्तिसे पहले ही पिषमान स्वीकार करनेके कारण उसकी बसवा मही पति । मानी गा सकती। कई पुन स्वरूप व्यापाराभावे पूर्व-किन्तु सामसरूपमें प्रमाणपी गति मोनपर मी शास शास्त्रस्य दैवविज्ञाननियर्तकत्वम् ! | विज्ञामा निवर्तक कसे है। नंप दापः । रन्यां सपादि सिदाम्ती-[पही यह टोर मही बदात्मनि देवस्थाविधाज्यस्त [१, पोंकि रग्नमें सन्धि समान भारनामें पबिया पारण देता स्वात् । कथम् ? सुस्म्या दु ग्वी | मप्याम है। किस प्रकार - मैं मुसी मूना बाता मृता बीर्णो दयान् दुमी, माउपम कुमार मरा, राप्रत ईदचारी, पश्यामि म्पकाऽम्पत कता देमनाई म्पक है, बम्पक का फली संपुझा विमुक्त धीणा | , पप्पान् । संपुष्ट है, विपुल भीग है पर ये मर - पदीय मर्मत इत्येवमादयः सम स्यानि प्रकारके सम्पूण विकास मारमा भारास्ति दियमाने तथा पारमन्यम्पासम्पन्ठे । आरम 'आरमा म अनुपात क्योंकि मागफ्पोपनिषद [गौ०. सेन्चनुगतः सर्वत्राम्यभिचारास् । उसका कहाँ मी म्पभिघार नहीं है, जैसे कि सर्प और धारा पानि मेय यथा सर्पधारादिभेदेपु रन्। रज्जु । यदा धैव विशेप्यस्वरूपप्रत्ययस्म जब कि ऐसी बात है तो नशेप्य- सिदत्वान्न कवष्यत्व शाखण । रूप प्रमक सरूपकी प्रतीति सिर दोनके कारण उसके समाधम बतास च शास्र कनानु शासको कुछ सभ्य मशाम सो बसिन् पस्तुको सिम् करनेवाम कारिस्पेऽप्रमाणम् । यताऽपिया है, सिर वस्तुया अनुवाद करनेसे ध्यारोपिठमुस्लिादिविशेषप्रति वा प्रमाण नहीं माना जाता । पन्यादेवारमनः स्वरूपेणानवस्वानं क्योंकि भविमासे बारोपित पुसिष वादि शेष प्रतिभापकों के कारण ही स्वरूपावसानं च भेय इठि | आरमाकी सरूपसे स्थिति नहीं है मुसित्वादिनिवर्तक शास्त्रम् | जोर स्वरूपसे सिसि ही भेय है, इस छिये नसि नतिः मोर 'धरम आरमन्यसुविस्वादिप्रस्मयकारणेन वादि बास्पोंसे भात्मा बमुधि- नेसिनत्पस्यूठादिशामै बारम- स्वारिकी प्रतीति करानके हाण शाम [ उसमें बारोपित ] मरिस स्वरूपपदसुजिलापपि सुखिता बाकि निधि करनेवाला है। दिमेरेपु नानुपचाऽस्ति धमः | बारमतवपके समाम मामिल भारि भी मुनिस्व बार मम पपनुप स्पानाम्यारापिट अनुत धम नहीं। यदि मी मुखिस्वादिलराणा विशेष । माग होता तो उसमें अमित वारिगप निशेष पर्मा भारोप नहीं पाणस्थगुणविशेषरस्यग्नी विया जा सपना था जिस प्रकार उणयधमरिरि अम्निमें शीतलपा पीसना । सम्मानिणि एका पाप नही दिया जा सकता। रमनि मुखित्वादया विशेष: 'मम समित्यादि ferin शॉ. मा.] देतष्पप्रकरण फसिसा । यश्वसुस्तिस्पादिशास्त्र | भारमामें ही काम्यना किये गये हैं। इससे सिद रा कि भरमाके मात्मनस्तस्सुविस्वादिविशेपनि | विषयमें नो अमुसित मारि शाममा मुसित वादि विशेषकी पर्पमेषेति सिद्धम् । "सिद्ध तु | निवृत्तिके ही हिये है । शास्त्र वेचा बोका सूत्र मी है [मुस्लिम निरवकत्वात्" इस्यागमविदां वादि भोंका ] निमर्षक होनेसे [बस्थतम् वादि ] शासकी प्रामा स्त्रम् ॥ ३२ ॥ णिकता सिव होती॥ ३२ ॥ बदेतभाष ही महतमम पूर्वश्लोकार्थस्म हेतुमाह पूर्ण श्भेकके वर्षका हेतु बत ठाते - भावेरसद्धिरेवायमद्वयेन कल्पित । भावा अप्यदयेनैव तस्मादद्वयमा शिवा ॥ ३३ ॥ पह (बारमतरस ) प्रागार बसमासे मोर बीतापसे बारित है। रेखममाण मी मनसे ही फयमा दिये गये हैं। इसष्टिये बतिमात्र ही मामय ॥ ३ ॥ पपा रन्न्यामसनि सप निस प्रकार रहमें पश्चिमान भागदिमिरदपेन च रन्जुद्रम्पेण | सर्प धारा मारि मार्कोसे तय विपमान अदितीय रग्युरप्पमे पह सतार्य सुप इर्य पाग दणाऽप सर, यह पारा, पर मिति पा रन्जुद्रम्पमेव परम्पत | इस प्रकार रग्गुदम्प ही पम्पमा एक प्राणादिभिरनन्तरमदिरया- | विषा जाता है उसी प्रकम प्रामा भनम्न मसर-मविपमान रिपमान भोट् जो रमापत नदी , [उन पप्रचठिम ममि कमिनार | म मेलामा निरोग्दा न परमार्थत मार- माणक्योपनिपद [गौ.. उपस्थपितुं शक्यते फेनधि | क्योंकि पिचके पठणयमाम म होने पात्मनः प्रचलनमस्ति; किसी के द्वारा कोई माव पक्षित मही हो सकता, और बारमा प्रचलितस्पेवापतम्ममाना भाषा प्रधान नही, या फेमस पाय- न परमार्थवः सन्तः कस्पपित मान पितमें ही उपाय हानेको भाव परमार्यत सस्य है-ऐसी कल्पना शाया अवासझिरख प्रागादि मही की जा सकती । मन या मापरतयेन च परमार्थसता | वामा, खप एकमात्र सासमार होने रमना रसपस विकल्पास्पद । 'म भी असम प्राणानि मासे तथा रमुफे समान सब प्रकार के मुसेनार्य खपमेवारमा फरिपतः पिके वापसमूत परमार्थ सद सदैकम्पभापोऽपि सन् । वात्मसरूपसे पापित है। हे प प्रामादिभाषा मप्यर बेप्राणादि मावभी वापससरूप येनैव सतात्मना विकल्पिता बरमासे ही कायना किये गये है, क्योंकि भी कम्पमा मिरापार नहि निरास्पदा काफिकल्प मही रो सकती । पर समक्ष नोपलमवे, असा सर्वकल्पना | पनाको बापमूठा होनेसे और सदस्वास्वेनारमनावपस्साम्प अपने सहपसे बापा कमी म्पमिवार नोमेसे काफ्ना ववस्वान मिधारात्कम्पनापसापामप्या में मीनदूपता ही माममपीकर बता विषा । कल्पना एवं कम्पमा ही मलमपी है क्योंकि लधिमाः । रन्नुमादिवत्रामा मह रण्ड-सारिके समान मप आदि दिकारिण्यो हिताः । अश्यता उत्पन्न करनेवाले है। पदयत्व बमपरपा इसध्येि वही मा ममातः सैव विषा ।। ३३ ॥ मयी ॥ ३३॥ ततलासी एमे नानात सत्तामा कुवमाश्यता निषा नाना। और यी वश्यता क्यों मामयी ० भा०] पैतम्पप्रकरण पृथक्त्वमन्मस्पान्यसापत्र रप्ट है। जहाँ एक वस्तुसे दूसरी बस्तुका मानाम्त पार्थस्य देखा जाता है तनाशिय मषेत् । वही धमाल हो सकता है। [किन्तु-] नात्ममान नानेद न स्वेनापि कथचन । न पृथट नापृथकिचिदिति तत्त्वविदो विदु ॥ ३४ ॥ या नानात्व न तो बास्मस्वरूपसे है और न अपने ही सरूपसे कुछ है । कोई भी वस्तु न तो प्रझसे पृथक है और न वापक ही-ऐसा तत्ववेता १॥ ३४ ॥ न पत्रादये परमार्थसत्यात्मनि इस अदितीय परम्पर्ष सत्य बारमा यह प्राणानि ससारजातहर प्राणादिससारबातमि बगदा जगत् बारममावसे-पामायसरपनपसे रममावेन परमार्थस्यरूपप्प निरूप्य निरूपण किये जानेपर नाना वर्षात माणं नाना वम्त्वन्वरभूत भवति । | पृषक् बस्तुके बन्तमूत महाँ रहता । जिस प्रकार प्रकाशनारा रसुम्पसे यथा रन्नुस्वरूपण प्रकाशेन | निमपित होनपर कथित सर्प पृपय निरूप्पमाणा न नानाभूत | सपसे नहीं रहा उसी प्रकार फन्पित सोऽस्ति दत् ।नापि | [ परमापरपसे निरूपग किया जानार जगत व्यमासे पृपय बस्तु मही म्येन प्राणायाम्मनेदं विपत । सदरमा और न यह, रग्गुमपक कदापिदपि ग्ग्नुमर्पवकसि | समान पारित होनम कारण ही, आन प्रारमियपसे कभी पुरा तस्यादेय । सधान्यान्य न पृथक्यानादि सवा निम प्रकार पोदसे भस पम्नु यधाप मदिप पृथगित पम् । उस प्रकार प्रागा बरतु जारमने भी पृपा नही सी- ज्वम् । अतोऽसपामापरिपस लिये समक्ष दानमे भारसमें अपना मापूक्योपनिपद् [गोवा भन्योन्य परेण वा किंचिदिति , किसीके अन्यसे कोई पस्तु अपृषकी एवं परमार्थतषमात्मविदो नहीं है-ऐसा वारमा ब्रामणलोग माममा विदुः । अतोऽशिषहेत | परमार्थतत्वको मानते है । पत्र समगरकी हेतुताका बमाष होनसे स्थामाषावस्यदैव शिषेत्म बापता ही मङ्गलमयी ई-पहासका भिप्रायः ॥ ३४॥ तापर्य है।॥ ११॥ इस रत्यके साधी कौम मे। सदेतत्सम्पदर्शन स्तूपवे- वा इस सम्यमानकी क्षति की नाती है- वीतरागभयकोघेर्मुनिभिर्वेदपारगैः निर्विकल्पो भय हटः प्रपश्योपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥ गिमके राग, मप बोर कोष मित्त हो गये उन वेदके पारगमी मुनियोहारा ही यह मिर्षिकम्प प्रपशोपशम बम तल देखा गया है॥३५॥ विगतरागभयपक्रोधादिसर्व गिमके राम्ग, भय और क्रोधादि समस्त दोष निच हो गये। उम दोपैः सर्वदा मुनिभिर्मननशीले | मुनियों अर्थात् सर्व। मनमशीस हिरोकियों और वेदक पारगामियों विकिभिषेदपारगैरमगतमेदार्थ पानी वेदार्यके मर्मज्ञ गत वर्षमानिमिनिर्विकल्प सर्वरि । परापण तरखानियों द्वारा प्रकारक सिम्पोंसे रहित करसन्माऽपमारमा उपलम्भनर्विकास और प्रमाणाम-तिराए, वेदान्तार्थवत्सराप्रपनापशम माके विस्तारका नाम प्राध प्रपभो तमेदपिम्परम्नम्याप | उसकी जिसमें निहत्ति हो जाती है पर मामा प्रपशोपाम -मीक्षिसे माऽभाषा यमि स मारमा योबाप एसा पास्मानित .. पा सब शा-भा.] वैवप्यप्रकरण प्रपञ्चोपशमोऽस एवाइयो | यामी वेदान्तार्यमें तत्पर, दोपहीन विगतदोपरेव पणिसैदावार्थ सन्यासियोगरा ही देखा जा सकता है। जिनके पिच रागादि दोबसे तत्पर संन्यासिभिः परमारमा इम्ति है और जिनके दर्शन वपमे नई शप', नान्यै रागादिकख | पक्षका वामह करनेवाले है उन जन्य ताकिंकादिको इस बामाका पितपेशाभिः सपक्षपानिदर्शने साक्षात्कार नहीं हो सकता या स्वामिकादिभिरित्पमिप्रायः॥३५।। इसका बमिप्राय है ॥ ३५ ॥ सापशमका बादेस यसारसर्वानर्थप्रशमरूपत्वाद पोकि सम्पूर्ण मनोका निक्ति स्थान हानसे बरपल ही मक दर्य शिबममयम् ~ मप और बमपरूप है- तस्मादेव विदित्वैनमते योजयेत्स्मृतिम् । अद्धत समनुपाप्य जहवाल्लोकमाचरेत् ॥३६॥ इसलिये इस (माग्मतप) को ऐसा जानकर वती ममोनिवेश करे और वास्तवको प्राप्तकर कमें चाप म्पहार परे ॥ ३९ ॥ अत एवं विदिस्वनमदते स्मृति इसलिये इसे ऐसा नामकर बात में मनोनिवश परे नपा नवमान योभयन । मसापगमायैप स्मृति के लिये ही पिस्तन फरे । और प्यादिस्पर्धामावगम्या | उस दैतको जामफर वर्षांत में सीमामा शान प्राप्तकर, इमम्मि परं प्रावि विदित्वा | पानी मापूर्ण होपम्पबहारसे गन्प, मोमनाला वादिसे बीता साधार एनायाधती सायादपरोपादन रामग्मा बारपाको बनुमा मात्मानं समोफन्परागतीत रोपने महसत बाधरण गरे।
मागुम्योपनिपन् [गीका घरपल्लोकमाचरेत् । अप्रस्पाप वात्पर्य यह है कि मैं ऐसा है यमात्मानमामवविध इस्पभि- | इस प्रकार अपमेको प्रकट न करता प्राप ।। ३६ ॥ दुधा म्पवहार करे ॥१६॥ तत्वमीका आपरण कया चर्पया लोकमाघरे छोकमें ऐसे म्पहारसे वापरण दित्माह- करे सर करते हैं- निस्तुतिनिनमस्कारो नि स्वधाकार एव च । चलाचलनिकेतच यतिर्यादाग्छिको भवेत् ॥३७॥ पतिको स्वति, नमस्कार और साकार (पत्रकर्म ) से रहित हो पळ (शरीर ) वौर मघा (वारमा ) में ही विनाम करनेपाम होकर पाररिया (बनायाससम्म वस्वधरा सन्तुए हमेवान) हो आमा चाहिये ॥ २७ ॥ स्तुविनमस्कारादिसर्म स्तुति-नमस्कारा सम्पूर्ण काँसे पतिस्त्पत्तसपापमा प्रति | रमित तपा समरस माम एपणाबोका पमपरमहंसपारिवान्य इत्पमि स्पागी हो, बर्षात् "मिथप इस उस भारमाको जामकरण इत्पादि मुति प्राप:-"एत पे तमात्मान और "मिनकी पुषि, भात्मा बीर विदिस्वा" (प०३० ३।५।१)| निष्ठा उसीमें अनि ई है तथा जो इत्मादिभुतेः "युद्धग्रस्त | उसी शरणान" इस स्मृतिक दास्मानम्तनिष्टान्तस्परायणा" वनुसार परमदंस पारिवाज्यमा को (गीता ५ । १७) इत्यादि प्राप्त मो-प्रतिक्षण भम्पा मापको प्राप्त दानवापा हानेरो पहरीर स्मृतय-पल शरीर प्रवियण पो करते ६ सया पठबारम स्मवेष- -पल शरीर प्रशिक्षण- तसा नाम है-दस प्रकार पर मन्पथामावात, अचठमाम्म तप माननादि म्पहारफे मिमिसे तवम् पदाकदापिझोपना वादाशये रामाम अविवस मन पा० मा-] येतस्पप्रकरण दिम्पवहारनिमिचमाकाशवदचलं | मरूपम्त आरमतत्वको नो बफ्ना निकेत यानी बाश्रय है उसे बर्षात् म्यरूपमारमतवमात्मना निफत भारमस्पितिका मृखकर मन में माघपमारमस्मिति विस्मृत्पा | इस प्रकार अभिमान करता उस ममय 'चल' पानी शरीर हो मिति मन्यते यदा सदा घलो देहो मिसका निक-इस प्रकार विद्वान् निपेठो पस्प स्रोऽपमेव पलापरू पणनियम होकर वर्ष भित्र बाल वियोंका भानप न करके निफेसा विद्वाम पुनर्वाचविपपा यारम्छिर हा नाय तात्पय यह कि यमः स प यान्छिका भवे बनायास ही प्राप्त हुए कोपीन, परछाप्राप्त झोपीनाच्छादनग्रास | माच्छादन धौर प्रममाप्रसे निम्की मात्रदेइम्पितिरिस्पर्थ ॥ ३७ ॥ देहस्विति है-ऐसा हो जाय ॥३७॥ गपित तापनिहाकर पिपाम सत्यमाच्यात्मिक दृष्ट्वा तस्व दृष्ट्वा तु पामत । तस्मीभूतस्तदारामस्तत्वादमपुतो भवेत् ॥ ३८॥ [फिर पर विवेकी पुरुष ] बाप्पारिमा तरवको देखकर मौर बाप तमका मी मनुमा कर सरखामून और तत्तमें से रमग करनेवाग हरान तबसे प्युत महो ॥ ३८ ॥ पाय धिम्पादितषम् आप्पा पृषी वारि बाम तप और | 7 माप्यामिय मिर्क पदादिलक्षण रन्नुसपो "पापारम्मण विक नामयपम् दिवस्यप्नमायादिसप असत् इस्पारि श्रुति अनुसार रख मारिके समान मन या मापाप "वापारम्मम विकागे नामधेयम्" समान मिप्पा तथा पर सप (छा० १०६ । ११) इत्या हवामा र बार बहीन है। दिभुते ।अात्मा प समाधा इस अतिरे बनमार मा ।
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शा० मा ] भारतमकरण १२१ भूतेषु" (गीता १३ । २७ ) | मायास प्रमाणत होता है ॥३८॥ भूतोंमें समान मावसे स्मित' वादि इत्यादिस्मृते। ॥ ३८॥ ही श्रीगोविन्दमगपूरपपादशिष्यस्य परमहसपरिजयापार्यस्य मीशाररमगत ली गौष्पापीयागमशाखमाप्ये तप्पासप विसीय प्रकरणम् ॥ २ ॥ मवेतमकरण आकारनिर्मय उक्तः प्रपत्रो [भागमप्रकरणमें ] बोकारका निर्णय करते समप यह मात केपल पसमः शिवोऽव आत्मेति प्रतिवामाप्रसे कही है कि भारमा प्रपत्रका मितिस्वाम शिप और प्रविधामाषण | माते त न मरतस्वरूप । तपा हान हो गान मियत इति च । तत्र देसामावस्तु पर ईन नहीं रहता । किर देतप्प प्रकरणमें सप्न, माया और गधर्म- तथ्यप्रफरणेन स्यममायागमई मगरानिक प्रयन्तोसे परपस एवं नगरादिष्टान्तमत्वापन्त वादि अन्तात वाद वारा सकसे मी धक्के बमारका प्रवियरन पसादिहेतुभिस्तण प प्रति किया गया। किन्तु बावरत क्या शाममात्रसे ही बातम्प १ मा पादिसा । अतं किमागममात्रेण तसे भी जाना जा सकता है । प्रतिपसम्ममारोस्थिपगापीत्यत | इसपर कइसे है-तफसे भी माना जा सकता है। सो किस प्रकार ! मार-शस्यते वगापि भातुम् | इसी बातको मतअनके लिये मत प्रकरणका वारम्म किया जाता है। तस्कथमित्पईतप्रकरणमारम्पते उसस्प और उरासमा मादि सम्पूण उपाम्योपासनादिमेदवाते स मे मिप्पा , पछारमा दीमाप १२२ माणस्योपनिषद् [गौ १ विध केवलपारमादयः परमार्थ | परमार्पस्मरूप है-यह बात सिने इति म्भिवमतीसे प्रकरणे पता- प्रकरणमें निमितहई है, क्योंकि-- भेददी पण उपासनाधितो धर्मो जाते ग्रामणि वर्तते । प्रागुत्पत्तरज सव तेनासौ कृपण स्मृत ॥ १ ॥ उपासनाका मामय लेनेवाला जीव कार्यमममें ही रहता [ मर्मत उसे ही अपना उपास्य मानता है, और समझता है कि ] उत्पत्ति से पूर्व ही सब बम [ अर्पात् बान्मा ममसरूप ] था । इसलिये यह रूपण (दोम) माना गया है॥१॥ उपासनामिव उपासनामात्मनो 'उपासनाधित --उपासनाको माक्षसाधनस्पेन गत उपासको वने मक्षिक साधनरूपसे मानने वाश पुस वर्षात् मैं उपासक s ममोपास्मं प्रम । सदुपासनं 1, मोर बम मेरा उपात्प है। स्वा बाते ससकी उपासना करके इस सम्म मममीदानी कार्यक्रममें यता मा सरीरपातके पर्वमानोज प्रम शरीरपाताध्य बनन्तर में मनम्मा ममको प्राप्त हो प्रविपस्स्मे प्रागुत्पधेमाममिर पाउंगा तथा उत्पपिके पूर्व मी या मब वोर में ममरूप ही थे। । यदारमको उत्पत्ति से पूर्व में जैसा पा मग सपथ प्रागुत्पपरिवानी बावा बाते | होकर नाप्तासमें वर्तमाम हमा मन्त उपासनादाराम फिर उसी प्रदणि प वर्तमान उपासनया आपको प्राप्त हो आपस प्रकार पुनम्तदेव प्रतिपरस्स इस्पेय |सपासनाका वानप नेपला सापक सपासनाधिता धर्मः साधका और क्योंकि अमानवधा , इस पेनेप सुद्रमविचनासौं बरगेन | कारणसे ही यह सदा बनमा प्रझा दशम करनेवाले महामामों कपणा दीनोपका स्मृती | धरा परण-दीन माद क्षुद्र मामा समां ब शा.भा. ] मनाकरण १२५ नित्पाजनमदर्शिभिरित्पमिप्रापः। गया है—यह इसका अभिप्राय है, वैसा कि जो वाणीसे प्रकट नहीं "यद्वापानम्पदिस येन पाग होता बल्कि जिससे पाणी प्रकट म्युपते । सदेव प्रमत्व विदि नेद | होती है, वही ब्रह्म है-सा जान मिसकी उपासना करता है वह यदिदमुपास"(० उ०१।४) अझ नहीं है' इत्यादि तप्लपकार इत्यादिश्रुवस्सलपकाराणाम्॥१॥ मृतिसे प्रमाणित होता है ॥ १ ॥ मकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिमा समापाम्पन्तरमामास्मान बाहर पौर मीतर वर्तमान नमम्मा बास्माको प्राप्त करनमें प्रविपतुमशफ्नुपपविधया दीन वसमप होमके कारण विधायश मास्मान मन्यमानो बातोत्र बनेको दीम माननेवाण पुस्प, क्योंकि में उत्पन्म एमा उत्पन्न माते माणि पते तदुपासनाभितः पए प्रममे ही वर्तमान वीर ठस- सन्मम प्रविपस्स्स इस्मेवं प्रतिपमाः | की उपासनाका बाश्रय लेकर ही मामको प्राप्त होऊँगा इस प्रकार रुपमो भवति यमात्- मामनेके कारण दीन है- अतो यक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतम् । यथा न जायते किंचिम्जायमान समन्ततः ॥ २ ॥ इसलिये वर में सर्वत्र समानमात्रको प्राप्त जग्मरहित वापणमात्र (वमन्मा प्रम ) का वर्णन करता है [ मिससे या समधर्म वा गायगा कि किस प्रकार सबभोर उत्पन होनेपर मी मुछ टापन नहीं हुआ। अतो यस्याम्पफार्पम्पमकपण इसलिये में बकापण्य भाषण भावमर्च प्रम। तदि कापम्पा मात्र मर्षात् भयग्मा प्रसपा वर्णन करता हूँ। वह वन्य बन्पको सदम् "पत्रान्याऽन्परपश्पत्य देसता है, बन्यको सुनता है और न्पपट्टयोस्पन्यविचानाति सदम्प ' बन्यको ही मानत्य मा utar.- १२४ माणदफ्योपनिषद् - मस्पमसद" (छा० उ००।२४।। मरणशी वोर बसदक, १ ) "पापारम्भण विकारा पाणीसे भारग्म होने वाला माम " स्पा सुतिर्योंकि जनु नामधेयम्" (छ।०४०६।१।४) उपर्युक मातरम तो रुपणताका इत्यादिविम्प । विपरीवा। उससे विपरीत मा मीसर पर्नमान माम्मा मूमा सवासाम्पन्चरमप्रमकार्पयं भूमाम अकार्पण्यरुप , जिसे म. मयं ग्रप । यस्प्राप्पानियारुत शानपर बरियारत सम्पूर्ण rea सरकापण्मनिचितहकार्यम् की निवि हो जाती है उसकपण भावसे रहित प्रम में वर्णन कर पक्ष्मामीस्पर्थः। या सय वार्य है। ववजाति, पविधमाना जाति पर नमाति वर्षद विसई रस समता गत सर्वसाम्य पाति न से और समस्याको RA वर्ण सम्की समानताको प्राप्त है। गतम् । कमात् । अवयववैपम्पा | ऐसा क्यों है। क्योंकि उसमें, अपयोको बिषमताका समान है। भाषात् । यदि सापय पस्तु जो पस्त साक्या होती है वदयापम गमवायत इत्यु वाययोंकी विमताको प्राप्त होनेक पते । निरषयवस्था करण सपम्म एती है एसे की बाती है। किस्त या प्रम तो स्सम गतमिति न पिपपदे निरवयर होने के कारण समताको प्राप्त है इसलिये किसी भी पचपर्यो- एफुरत्यतोऽशात्पकार्पम्पम् । क सपमें प्रकटित नही हो । बत पासपोरसे जगातिपदि समन्ततः समनापान बायते मकार्षष्परूप है। जिस प्रकार कि कुशमी सत्पन्न महामनर्मात किंचित्पमपि न परति रमम-सर्पके समान बानियालिसे रन्नुसर्पदविपातररपा प्रोता मा भी विस प्रकार शा-भा.] मौतमकरण १२५ मान येन प्रकारण न बायते | उत्पन नहीं होता-सव बोर नजमा सर्वतोऽवमेम प्रम भवति तथा त प्रम ही रहता है उस प्रकारको प्रवण करो-यह इसका अभिप्राय प्रकारं भूमित्यर्थ ॥२॥ है॥२॥ बीपकी उत्पपिके विषय हशन्त अजाति प्रमाकार्पण्यं मल्पा में ममम्मा प्रमका, मो कपण मापसे रहित है, वणन करता ई- मीति प्रतिज्ञातम् । तस्सिदपर्थ | ऐसी प्रतिज्ञा की है। उसकी सिदिके किये हेतु और रात भी बताता हेतु प्यन्त प पल्पामीस्पाह ---इस वमिप्रार करते है-- आत्मा माकाशवजीर्घटाकाशैरिवोदित । घटादिवच्च सपाते॥तावेतन्निदर्शनम् ॥ ३ ॥ भारमा वाकाशक समान है। घामाशोंक समाम जीपरूपसे उत्पम हुआ है। तपा [ मृविकासे ] पटानक समान देहसपातमापसे मी उत्पम्न मा कक्षा माताबारमाकी उत्पत्तिके विपमें पही यात ॥३॥ आस्मा परो दिपमादाफाम स्पोंकि परमात्मा ही माकाशरद सर्वगत मर्यात् भाफाशके समाम मूक्ष्म आकाशयदुका मी धर्पग | निरवपा और सात पहा गया है पारिव पगकामतुस्प उदित बार नही पटाकाशमाश क्षेत्रह जीकि नामें प्रस्न मा कहा उका स एषाकासम्म पर गया है, इसध्येि वह परमारमा ही मारमा। भाषाशक समान है। अधा पगमायथाकाश अपग पो सनना कि जिस प्रकार पनकापि ममें मारा उदित उगमनपा पगे शीपारम- उगन मा मी प्रकार मम मा वस्यमा निरवयव १२६ माफ्योपनिषद् [गौ० का मिस्त्पन्नः।बीवात्मनां परमान भीवास्माचोंके रूपसे दापनमा तात्रय यह है कि पेरिमें दारमन उस्पतिमापसे वेदान्तमा परमारमासे जीयास्माओंकी उत्पत्ति सा महाकावाषराकाशासचिनी माती है पर महाकापासे घरकाशोही पत्तिके समान है, समा न परमार्थत इस्पभिप्रायः। परमात नहीं । यस्मादनाफामापादयः उसी वाकाशसे जिस प्रकार घर भाति संघात अपम होते हैं, उसी सपाता पोस्पयन्व पषमाकाष्ठ प्रकार पाक्शसानीप परमात्मासे स्थानीयात्परमात्मनः पपिम्मा- रमु सर्पक समान विश्स्पित ए दिमूतसंपाता भाम्माग्मिझाय, पृथिवी माह मूतसंगात मोर शरीर फार्यकरपलषमा रन्धसर्पति सपा इन्द्रियप नाप्यामिकमाष उत्पम होते । इसीसे कहा जाता फसिता जापन्त ( मत उम्पले है-पादिके समान हासिंमात- घटादिव सपावरुदित इसि । रूपसे भी उदिता है। मिस पदा मन्दसद्धिप्रतिपिपादमिपया समप मम्दादि योक प्रति प्रति अस्पारमना बाविन्यसे चीवा पादन करनेकी इम्यसे सुनिन बाल्मा जीपारिकी उत्पतिका वर्णन दीनो सदाबावामुपगम्पमानामा किया है उस समय उमकी उम्पपि मेत मिरचनं शान्ता यवादिता मारममें यह उपयुत वाफाशाफे कामरदित्या ।। ३ ॥ समान ही मिरमान-रात ६॥३॥ पीपा विलीन होनमें शिश घटादिपु प्रतीनेपु पटाकाशादयो यथा । आकाश सप्रलीयन्ते सारखीवा इछात्मनि ॥ ५॥ घाल्कन हराना शिस प्रगम प्रकाशात महान एक क्षा सात र तमो प्रकार-बार स मामा कीमnandan .. ..
शा.भा ] मदेवप्रकरण १२७ ---40-40 यथाघटापुस्पल्या घटाकाया मिस प्रकार पादिकी उत्पपिसे पटाकाशादिकी उत्पति होती है और पुस्पत्तिः, यथा वा घादिप्रलये जिस प्रकार धादिक भाशसे घटा- घटानादिप्रलयस्तरेतादि काशादिका नाश होता है उसी प्रकार देहा- मेघातकी उत्पतिसे सपातोस्पामा चीयास्पचिस्त जीवकी उत्पति हावी बार उनका प्रमये च जीगानामिहात्मनि व्य होनेपर जीयोकर इस आरमामें व्य हो जाता है। तात्पर्य या प्रलयो नम्बत इत्यर्थ ॥४॥| कि सप्त उनका सप नहीं होग॥१॥ बारमात्री असता शमा सर्मदेवारमैकस्य एकस्मि सम्पूर्ण मि एक ही बास्मा होनपर तो एक वास्माके जन्म-मरण अननमरणसुखादिमस्पारमनि | वोर मुम्न थादिमाम् होनेपर समीको उसका समय हातपा सरिमना सस्सम्पधा कियाफ्ठ कर्म और फरकी संकरता होगपी [वर्षात् कर्म किसीका होगा और सास्य ष सादिति म आहुति | उसका फल कोई वीर ही मोगेगा ] इस प्रकार बोतवाली करते, नस्ता प्रतीदसन्यते- उनके प्रति कहा जाता यथैकस्मिन्घटाफाशे रजोघूमादिभिर्युते । न सर्वे सप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवा मुखादिभि ॥ ५ ॥ निस प्रकार एक पट्याश्ये धूमि और धुएँ बारिसे युक दोनपर समस्त घटाकाश उनमे युछ नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुसदि धर्मसि सि नही होते [ वर्षात् एक गोवा मुमादिमान् होने पर सर सीव मुखाग्मिान नहीं हो जाते। ॥५॥ परेशम सितमममा पाहिये सौतिनीलम नाप विनागनदी दो वारे रे मागते नहीं। -- १२८ माणस्योपनिषद् [गौ० का ययैकसिन्धटामशेरबाधमा जिस प्रकार एक भटकायके दिमिर्यवे सयुक्त न सर्वे पटा धि और घुसे युक्त होनार समस्त | घटकाशादि उस लिनौर पुरेसे काशादयस्तद्रजोषमादिभि संपुल नहीं होते उसी प्रकार मीर संयुज्यन्ते तद्वन्धीवा मुस्खादिभि || मी मुम्बारिसे लिस नहीं हावे । नन्येक एवात्मा । o-मामा तो एकीन! पाढम्। ननु न भुत प्रया मियान्ती हो, क्या ने यह | नहीं सुना कि सम्पूर्ण सपातमि कासरस्सर्वसरासेप्नेफएषारमैति। नाशके समान म्याप्त एक हो वारमा है। ययेक एवात्मा तहिं सर्वत्र पूर्व-पदि वरमा एक ही मुम्भी दुःखी च साद । सो सत्र मसी-पु स्त्री होगा । न पेसांस्पचा सम्भवति । सियाम्ती-सांस्यपदीकी या न हिसारण्य आरमनः वापत्ति सम्भव नही है। सांस्य बारमाका पुसमुसारि मत्व स्वीकार निन्छति पुदिसमवाया | महीं करता, क्योंकि मुम्म हुम्मानित म्पपगमारमुम्मदुःखा | युद्धिसमवेत माने गये १ तपा इसके दीनाम् । न चापलम्भिस्वरूपखा | सिमा बनुमनसराप मास्माकी भेर स्मनो मदफापनायो ममानमन्ति। कम्पमा को प्रमाण मी महा। मदामा प्रधानस्य पाराध्या पपिहोफि भै म हामपर तो प्रधानको परापता भी सम्म मही नुपपपिरिति घेत, ना प्रधान १ तागा करना टीक मही कृतम्पार्धम्यास्मन्पसमयापान् । योनि प्रभामाग समातिाप बा मामाक साप राम्भ मदी। यदि हिमपानकता या माया पा प्रभानवर्गक पपा मेध पार्थ पुरुषा मेदन समवैति परम पृषा परपसे समवेत मन प्रभातम् पागम्यमारकाव न तो मारमा ON मनन साप मुम्मा सादिमवमि - भा.] मदतमकरण नोपपपत इति युक्ता पुरुषमेद | प्रधानकी पराईता सम्मत्र नहीं हो कल्पना । न प सांस्पेर्पधा सक्ती पी और तब पुरुषों के मैदको मोधो पार्थ पुरुपसमवेतोऽम्पुप | कल्पना करमी ठीक थी। किन्तु | सारसबादी तो बप या मोक्षको गम्पते । निर्षिशेपाय घेसन पुरुषसे सम्बर ही नहीं मानते, मात्रा आत्मानाऽभ्युपगम्पन्ते । तो वात्मा को निषिीय बौर चेतन अतः पुरुषसचामात्रप्रतिमेष | मात्र ही मानते हैं । मा प्रघामकी प्रघानस्स पारामं सिद्ध न तु परार्यता तो काळ पुरुषको सण मात्रसे ही सिर, पुरोक मेदके पुरुपमेदप्रपुतमिति । अठ कारण मही। इसलिये पुरुषों पुरुषमेदकल्पनायां न प्रधानस्य ] मे कम्पनामें प्रभानकी परापता पाराय हेतुः। कारण नहीं है। न पान्पत्पुरुपमेदकल्पनाया इसके सिरा सांध्यवादियों के प्रमाणमस्ति सांग्स्पानाम् । पास पुरुषका भेद मानने वीर कोई प्रमाण नहीं है। र परसवामानमेव पठनिमिची (मामा) की सत्तामात्रको । कस्य स्वयं बम्पते मुम्पते पमित्त बनाकर प्रधान सर्म कम और मोक्षको प्राप्त होता है और प्रपानम् । परमोपलम्भिमाष मा पर देषठ उपन्धिमात्र सपा- सचाम्वरूपेण प्रभानप्रती हेर्न सकपसे ही प्रधामकी प्रकृति हेतु फ्नचिदिपेगति कालमडनयर , फिमी विशेम्वाके कारण नहीं । बन केउ मावासे पुरपमेदसपना घेदार्धपरि मानावर गाईका परियाग स्पागपा पिपा जाता। येस्लाहु शपिफादय इण्डादस इसके मिचा पिादि मार आमममयापिन इतिहमी जो करते हैं कि इस बार मारमाकम,सोटमका पदापन दप्पसन् । स्मृति मीटर महा। पौकि सारे देतूनां संस्कारागाम-चिम्न संस्था प्रदेशात मा.- ३० माणस्योपनिषद् [गी.का. प्रदेशपस्यास्मन्पसमपापाद ( निरषयत्र ) वास्मासे समय- सम्बन्ध नही हो सकता । यदि वारममनःसंयोगाच्चस्मृस्पत्पः पारमा और मनके सयोगसे स्मृतिको पति मानी जाय तो स्मृतिका कोई नियम ही सम्भव नहीं है स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्धा पपया एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियों की उत्पत्तिका प्रसा उपस्सित हो सर्वस्मृस्पुरपचिप्रसा। मायगा । नघ भिमनातीपाना स्पर्श इसके सिवा स्पर्शादिसे रहित दिहीनानामात्मना मिनप्रातीय धारमाओंका मन बादि मनपरिमि- मनमादिभिः संपषो के साप सम्बन्म मानना ठीक भी एपसमोगा- शुपति एकः । न १ द्रष्मा नहीं है सपा सरोके मतमें इम्पसे पादयो गुणाः फर्म | सप मादि उसके गुण एवं कर्म, सामान्यपिशेपसमनाया पा| सामाम्प, बिगेप वौर समाप भिम भिमाः सन्ति परेपाम् । यदि | भी महार। यदि दूसरों के मरने • उस समय ऐसा नियम नही हो सकेगा पदके प्रत्वा ममुभवले समर उसकी रमति न हो, सोषि रमविन भसमपानी भरप भारमा और मनका योग तो ममुभवमउमें भी है हो। तरे सिवा मनमानी भरपाई ग्रवारे कारण एक गप समय स्मृति उत्सविता प्रण भी उपक्षित गा। रिपोक स्मृतिक सरप्रका दोष न रोने कारण एक शाप स्मृति नहोसवी वो ऐसा प्रना ठीक मही, कि संस्थर भीर मन उदीप से रोनो भारमा हरा-इस पिपलमै रमा एक मठ मही है। एसिये इनमे मनन्न स्मृति सामधारे मातर्मत मही हो सकती। +पीक मतम तापारबतया द्रम्म गुत्र कर्म जमाव विशेष भीर सममय-ये प्रकार भाप परा है। उनमें हम उसे पायेनितो गम उन पर मार समान मागास गुज- कए गाय मारने प्रवे714-मनादिया। मामान्य-जाति मनुमाप पसार। सिं-परमाणुोप परस्पर भेर नेवाय धर्म निर पारष रिभिष मार परमाणु भिम्न प्रप्रणा का उत्पन्न होता है। सममाप- माRO RANIB गुण एप पा मारिम दम्प नाप है।
० भा] माकरण -- ---------- न मस्पन्त मिश्रा एष द्रम्पास्य । दम्पसे तथा इम मादि वास्मासे अत्यन्त मिन हो तो ऐसा होनेपर रिफ्छादयमारमनस्तपा च ससि तो दम्पके साप उनका सम्बन्धी द्रम्पेण सेपो सम्मन्पानुपपपि, सिद्ध नहीं हो सकता । अपुतसिद्धानां समवायसषमः यदि कहो कि नमुतसिम्पदापों- समभो न विरुष्यत इति घेव, महावो ऐसापामा एक नही, का समबाप-सम्बन्ध माननेमें विरोष । इन्छादिम्पोऽनित्येम्प स्मोकि इम्य वादि बनिस्य प से भास्मनो निस्पस्स पूर्वसिद्धस्सा- नित्य बारमा पूर्णसिब होने के कारण ठमका परस्पर वपुतसित सम्भव भापतसिदत्तापपति यात्मना नहीं है। मदिराम वादि नामाके यतसिदत्वे घेच्छादीनामात्म | साप बयुतसिद्ध हो तो वास्मगत माहत्वके समान उनकी भी मिस्पता- गवमारपवभिस्यत्वप्रसङ्गः। स का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात ए महाँस्योंकि पानिष्ट । बास्मनोऽनिर्मोक्ष | इससे नामाके बनिर्मोक्षा प्रसा प्रसङ्गात् । मा जाती। समवायस चम्पादन्यत्वे यदि सममाय ब्रम्पसे भिम है सति द्रव्येण समधान्तरं मान्यं वो दम्पके साथ उसका कई माप सम्बन्ध बताना चाहिये, जैसा कि यथा द्रम्पगुपयाः । समवायो दम्प और गुणका भोर पदि कोई निस्पसमधएवेविनधान्यमिति को कि समबाप तो निस्पसम्बन्ध पेचया समवापसमन्मात ही, इसलिये उसके साप कोई १बी पर्व परसर मिररिए हो। • भयुवयिलमें चार पध-१ मभिप अममें सेना १ मभिम रेशम दोना एमभिमबमाषय होना ४ोग भौर वियोग ममोपामारी रोना । उममें से प्रथम पान परमते- १३२ मापपपोपनिषद [गी. निस्पसमधप्रसङ्गास्पपपस्वा सम्क्यपतगनेकी भावश्यकता महाँ है तो ऐसी अवसामें समवाय- सम्बग्यमामेका निस्यसम्बन्ध होनेके नुपपधिः। भस्पन्तपथपरवे च कारण उनकी पृषक्ता सम्भव नयाँ है। और यदि म्यादिको परस्पर पात्यन्त भिम मामा जाय तो बिस द्रष्पादीनां सर्भवदसर्भद्रम्प प्रकार स्पर्शमान् और स्पर्शहीम बॉमें पत्र सम्बन्ध होगा सम्मा मही है उसी प्रकार ससका सम्म मोरिष पष्ठपर्षानुपपतिः। ही नहीं हो सका। इम्साघुपमनापायवद्गुकारणे पदि बारमाको इच्छादि उत्पति चास्मनोऽनिस्पष विनाशशीठ गुणोंबाम मामा माप बातयR- प्रसङ्गः । देहफलादि तो ससकी बनिस्पताका प्रसा पवनोबा- बस्सावयप विकि उपस्थित हो पापग्य । क्या उसके यावत्वं च देवा देव वौर फलादिके समान सावपकल दिनदेवेति रोपायपरिचायौं एव पेहादिके समान ही क्रियामा -पे दो दो भी बपत्तिा ही पषा स्वाकाशमापियाम्पारो होगे । बिस प्रकार कि बास पिवरबोधममसपत्पादिदोषवत्वं बवियाप्यारोपित स्टादि उपाधियों के | कारण ही धूलि, पूम और मासे तयारमनोऽपिपामारापिट्या युक होना है उसी प्रकार वरमाका पुपाधिकवसुसासादिरोपवले मी बरियासे नारोक्ति दुनि बाहि उपाषिके कारण पुमादि दोपसे पन्धमोक्षादयो म्पापहारिका न युक्त होनेर, म्पारणारिम प, निरुपन्ते । सर्वपादिमिरमिपा | मोक्ष आदि होनमें कोई विरोष महाँ है, क्योंकि सभी पादियोंने सम्पबहाराम्युपगमास्परमा- प्पहारको मनिपास माना, मम्मुपगमाम्प । तमादारममेद | परमापरूप नही मामा । मया प. मा.] मौतमकरण परिकल्पना प्रथैव सार्कि, पाकिस्बेग पीकि मेदकी कम्पना फ्रियत इति ॥ ५॥ पपा ही करते ॥ ५॥ म्मानहारिक जीवभेद कथं पुनरारममेदनिमिच इस किन्तु एकहीमात्मा, बामामों के मेदके कारण होमेषालेके समान, म्पबहार एकमिन्नारमन्यविया पविषाक्त म्पबहार किस प्रकार फत उपपपत इति, उच्यते- सम्भव है। इसपर करते- रूपकार्यसमाख्याभ भियन्ते तत्र तत्र वै। आकाशस्य नभेदोऽस्ति तद्वज्जीवेपु निर्णयः ॥ ६॥ [घनदि सपानियों के कारण प्रतीत होनेपाले मिम-मिम नाकारों के रूप, कार्य बोर नामोमें तो भेद है, परन्तु वाकाश सो को मेद महाँ है। उसी प्रकार मीकि विषयमें मी निभय समाना चाहिये ॥ ६ ॥ ययेहावस एकसि घटफर मिस प्रकार इस एक ही वाफा घट, कमण पोर मयदि कापवरकायाकामानामत्पत्वम हवादिरूपाणि मियन्ते तया मानार्थोके मम्पय महत्त्वादि सपोंमें भेद है, सपा नहाँ-या म्पबहारमें फार्यमुदफाहरमधारमशयनादि उनके पिसे हुए सउ अना, बल समारूपाय पराकासकरकाकास परम करना चोर शपन करमा इस्पापातस्तवाम भिन्ना दृश्यन्ते। यदि कार्य एवं घटापरण, करकाश वत्र सत्र में पत्रहारविपय मादि माम मिन मिग्न देसे माते है। इस्यर्थः । सोऽममाका रूपादि | किन्तु वाकाश रूपादिपे कारण भेदकता म्पमहारो न परमार्थ समेगा यह सब म्पहार पार मायिफ ही नहीं है। परमापत ar एव । परमार्थतस्त्वानप्ठस्य न बाफाशपत्र को भ. महापाप भेदोऽम्ति । न वाफाममेद उपापित निमिचक निमा पस्तुम निमियो प्यारोऽस्त्पन्वरेण बाकायफ भेदके कारण होमेवात्य ------ माणपोपमिपद् [गी परोपाधि द्वारम् । यतष | कोई पदार है ही नहीं । पैसा कि यह [ आकाशका भेद ]t देहापाधिमेदकतेषु बीवे उसी प्रकार देहादि उपाधिके मेदसे क्येि घटाकाप्सम्यानीयेप्यात्मसु नि हुए घटाकाशस्थानीय जीवोमें भेदफा निरूपण किया नामेके कारण रूपणाकतो पुरिमझिनिर्णयो | पदिमानोंने [उस मेदका अपार मापिपरवनिम्य विस्पा -पर निमय इस्मर्थ ॥ ६ ॥ इसका तार्य है। बीर मारमा पिकार मा भाका मही? ननु सत्र परमार्थकत एप। किस्त पटाकाशा में गो रूप बौर कार्य गरिमा भे-म्पबहार पटापशादिपु रूपमार्यादिमेदबह तो वास्तविक ' [ ऐसी पाहा होनपर कहते है-] यह बात म्यपहार इति । तदस्ति, पसात्मही है, क्योंकि- नाकाशस्य पटाकाशो विकारावयवी यथा । नैवात्मन सदा जीवो मिकारावयमो तया ॥ ७ ॥ निम प्रकार पाकाशमापनका सिर पाबापर मदासी प्रकार गीर भी पाक रिकार या बापा पमीनीp७॥ परमायाननस्प पगामा परमावाशमा पटापारा मत न विकार, पपा सस्प फिर , से कि पापा हगमादिर्पधा बाा फलपुर | वामृगता मा पेन, मुसुर नरम और म से पुरत्मिादि, नाप्रपा पथा पामा सपा उम प्रयम्प भाग्गदिन नया गानापरी बापाप पगनना ATAR माश पी पपा ममा नाग्मन Im narTE शा. भा०] मतप्रकरण परस्प परमार्थसता महाकायस्सा प्रकार, पर्यत् उपर्युत प्यतानुसार नीयस्य घटाफावसानीयो बीय हरी, महाफाशस्थानीय परमार्थ स्व परमारमाका घटाकाशस्थानीय नी, सदा सर्वदा यपोकाया सन्न किसी वयस्मामें विकार या भायप विकारो नाप्पवयवः । मत महीं है। क्त ताप पर है आस्ममेदरुतो ध्यपहारा मुपै | कि भारममदनित म्पहार मिप्य वेस्पः ॥७॥ - मारमाकी मलिनता महामियों की टिम है ममापया पटानाशादिमेद क्योंकि मिस प्रकार पटाकाशादि पुदिनिबन्धनो रूपकार्याश्मेिद मेदपुद्रिके कारण उसका रूप एवं कर्प आदि मदम्पमार है ससी व्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवमेद प्रकार देहोपाधिक बीवमेदके कारण कतो बममरणादिम्पवहार । हो मग्म-मरण नादि म्यवहार समाचस्कतमेवफ्लेशकर्मफलमल | इसम्मेि उसका किया मा 0 सवमास्मना न परमार्थत बारमाका क्लेश, कर्मफल और मस्से मुक्त होना है, परमार्पत महा- इत्येवमय रशन्न प्रतिपिपा | इसी पातको प्यान्तसे प्रतिपादन दपिपन्ना- | करनेकी इम्मसे कहते हैं- यया भवति पालानां गगन मलिन मरे । तथा भक्त्यबुदानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥ बिस प्रकार मर्स ग्रेगोंको [भूमि मादि] मम्के कारण वाकाश मभिम नाम पता है उसी प्रकार बलियकी पुरषोंकी समिम वारा मी [ राग-देवादि ] मासे महिम हो पाता है ॥ ८॥ यथा भवति साफे पालानाम डोको लिस प्रकार बाछ मर्याद विवकिनी गगनमाकाश पन | मतिरेकी पुरुषोंपी टिमें वापरत र सामादिमलमलिनं मलवत | मघ पूछि वीर पुी वादि मक माणस्योपनिषत् [पी.का. मगन मलपपापारम्पपिकिनाम्, कारण मछिन-मध्युको गाता है, फितु भाकाशके पयार्य सहपको तथा भवस्पास्मा पराऽपि यो जाननेवागेकी रहिमें ऐसा नहीं होगा उसी प्रकार वयुद प्रत्य- विधाता प्रस्पसलेशकर्मफलमले | गत्माके विवेकसे रहित पुपोंकी | इरिमें, जो प्ररपक्वोर सबका साक्षी मछिनाऽमुदानां प्रस्पमात्मविवेक १५ परमात्मा मी क्मेश, कर्म और फारूप मयंसे महिम हो जाता है। रदिवानां नाम्मविवेकयताम् । किरत आरमशानियोंकी निमें ऐसा नहीं होता। नमुपरदेशस्तवत्प्राण्यम्पार-तापर्य यह कि मिस प्रकार उसरदेश तृपित प्राणीके वारोपित पिवादकफेनवरादिमांस्तथा | दिये हुए मटके फेन और तसाद से युक नहीं होता उसी प्रकार नात्मापुधारोपितळेशादिमलमलि | वारमा भी वज्ञानियोद्वारा मारोपित मलेशारि मासे मकम मही नो मातीत्यर्थः ॥ ८॥ होता ॥ ८॥ पुनरप्युक्तमेवार्थ प्रपत्रपति- पिर भी पूर्वोऊ वर्षका विस्तार करते है- मरणे सम्म चैव गत्यागमनयोरपि । स्थिती सवशरीरेषु आकाशेनाविलक्षण ॥ ९ ॥ पद भरमा सम्पूर्ण शरीरोम मापु, जग्म, टोकान्तरमें गमनागमन और हित रहनमें भी पापाशसे परिरक्षणवाद इन सब ध्यपहामि रहते हुए भी या माकाशव समान निER भौर विगु ॥९॥ पगाबमनागमना पापा मम्म, नाश, गमग भागमन भार सिलये समान सम्पूर्ण गमनम्पिमिपरसशीरपारमनो सरीरोम आनाफे जन्म-मरणादिया शा- मा.] मतिप्रकरण चन्ममरणादिराकाशेनापिलक्षणः माक्शसे भविझण ( भेदररित) हो अनुभव करना चाहिये-या प्रस्पेठष्य इस्पर्म ॥९॥ इसका वभिप्राय ॥९॥ । सघाता स्वप्नमत्सर्वे भात्ममायाविसर्जिता । भाधिक्ये सर्वसाम्ये या नोपपचिहि विद्यते ॥१॥ देहादि समस संघास सप्नके समाम बारमाकी मामासे ही रचे हुए है। उनके अपेक्षाहत उत्कर्ष अपना सबकी समानतामें भी कई त महीं है ॥१०॥ पादिस्मानीयास्तु देवादि । घटारिसानीय देहादिसराव संपाता स्वप्नाश्मदरादिसन्मापा- खप्नमें दीसनेमामे देहादिके समान विगतदेहादिवचारममामामि तपा मापातीक रचे हुए देहादिके साश पारमाकी मापासे दी रचे सर्जिताः; मास्मनो मायाविद्या वया प्रस्पुपम्पापिता नपरमार्थतः हुए हैं [ तात्पर्य यह है कि बारमाझी माया जो भविषाद उसके प्रस्तुत सन्तोत्पभः । पारिक्यमपिक- किये हुए है, परमार्फत नहीं है। भावस्तिर्मग्देवायपक्षमा देयादि । मदि सिपानि यहाँको मपेमा देवता कापकरणसंधावानां यदि पा मारके शरीर चौर इन्द्रिपोकी सर्वेपो समय नेपालपपचिः अधिकता-उतरता है नपणा पदि सम्भवः समावप्रतिपादको [तसारिसे ] सरकी समानता ही है तो मी, क्योंकि उनके समाला इतुर्विपते नास्ति, हि पसाध प्रतिपादन को हेतु महा है, इसलिये भादमियाहत एव न परमार्पतः वे वरिपात ही 1, परमार्पत महा सन्तीस्पः ॥१०॥ है-ऐसा इसका तात्पर्य ॥१०॥ उस्पस्यादिभितसाइपसारम पनि दिसे रहित बदितीप प्रारमतला कृषिप्रमाणकलप्रदर्शित - माणस्योपनिषद [गी. पत्तख भूविप्रमाणकस्व प्रदर्शनार्य करने के लिये [उपनिषद् ] बायो- पाक्यान्युपन्पस्सन्ते का उस्लेग किपा माता- रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातारतैचिरीयके । तेपामात्मा परो जीवः ख यथा संप्रकाशित ॥११॥ पिरीय मुतिमें निन रसादि [अन्नमयादि ] कोशोंकी पाल्पा की गयी है, माकाशवत् परमहमा ही उनके वात्मा गीवरूपसे प्रकाशित विसा पा॥११॥ रसादयोऽभरसममा पागमर जिीयक मद तैत्तिरीयक इस्मेवमादया कोशा इस काशा शाडोपनिषद्स्लीमें किन रसरि- बस्सादेरिवाचोचरस्सापेषमा अन्नरसमप एवं प्राणमय पारि कोशोकी प्यास्पा-हमर विरेचना पाहि शार्वर्वस्म म्पारपातायो । और को उत्तरोत्तरको पिस्पटमासमावास्तपिरीयक | अपेक्षा पूर्ण-पूष बदि सिल होनके देपिरीयध्याम्योपनिपातयां तपा कारण समले कोशके समान कोश कोशानामात्मा पेनात्मना पत्रापि कई गपे । उम कोशीचा वापा, कोश भास्मवन्तोऽन्तरतमेन, पाको प्रारमवान् है, वही सबके बिस मन्तरतम बारमाके कमण पर सपा बोरनानिमित्तस्वा जीवनका निमित्त होने के कारण मावा श्री करता है। पार करते हैं- य पूर्वम्"सस्पं मानमनन्ध माया यह परमात्मा ही है, जिसफा पाने (d• • २११) इति प्रफ HERE और जिस "सय पाममनम्न प्रम" इत्यादि यम्मादारमन म्यानमायादिस्दा अादिकमेण रमादयः शाशा आमापी मापामे ही मे काऽसाबिरयार-पर एपारमा | भारमागे रपन और माया मक समान भाशाप्रसे पोषारप शा.भा.] मतप्रकरण ठस लपवा संपाता बास्ममाया |गये -ऐसा कहा गया है विमनिता इस्युक्तम् । स आस्मा- | बारमाझो हमने "चारमा पाकाश- माभिर्पपास सवेति सप्रकाशितः पत्यारिलोकों, वैसा माकाश है उसीके समान प्रकाशित किया "धारमा माकाश्वत"(मदेव० वपर्य यह है कि यह ताकिलो ३) इत्यादि सोमन वार्किक कम्पमा किये गए मात्माके समान परिकरिपवारमपरपुरुपदि मनुष्यकी पुलिसे प्रमाणित होनेवाग प्रमाणगम्प इत्पभिप्रायः॥११॥ नहीं है ॥ ११ ॥ .. यो यार्मधुशाने पर ग्राम प्रकाशितम् । पृथिव्यामुदरे चैव ययाकाशः प्रकाशित ॥१२॥ को मिस प्रकार पपिपी मौर सदरमें एक ही बारा प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार [ पृहारम्पोछ ] मधु पासणमे [अभ्यारम और अधिदेवत-इन ] दोनों सानोंमें एक ही प्रम निरूपित किया गया है ॥१२॥ कि चाधिदेवमापारम च तपा बषिदेव और बप्पाम- भेदसे जो तेजोमय और बमूतमप रोमोमपाऽमृतमय पुरुपः प्रथि । पुरम थिषीके भीतर है और जो म्यान्तर्गतो यो विज्ञासा पर | विज्ञासा परमारमा मम ही सब पुग -स प्रकार इतका भय होमेपर्वत एपारमा समिति दोमो सानोम परमपका ही प्रति- पायन किया गया है। कहा किमा पाईयोरादेवधमात्पर प्रम गया है। सो मतपते-विसमें प्रकाशितम् । फस्याह-मम मविपाक ममु पामी बमुक्का मान मानन्दका देत होनेके विधासम्मं मम्ममृतमस्तस्वं मोद | कारण उसका वपुल-उस नहेतुमानिमायत यसिमिति मधुबान पानी मागगर्ने [ उसका प्रतिमान किया गया है । मधुनाने मधुमानणं तम्मिनि । किसा समान प्रतिमदन किया है।
मागुपयोपनिषद् [पो.. स्पर्यः किमिवेत्पाह-पथिम्या । इसपर करते हैं किमिस प्रकार को सदरे चैव यक माकानोऽनुमा अनुमान पृपियी और उदरमें एक मेन प्रकाशितो ठोके वददि उसी तय [इनकी एकता समझो] ही भावाश प्रकाशित होता है, पर इसका अभिप्राय है।। १२ ।। स्पर्यः ॥१२॥ बारमै कल ही समीपीम है जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते। नानात्वं निन्यसे यश्च तदेव हि समन्जसम्॥१५॥ योकि जीव और बारमाके बमेनपसे पवस्यकी प्रशंसा की गयी है और उनके मानावकी निन्दा की गयी है। इसन्येि वही [ पानी उनकी एफ्ता ही ] करे ॥ १३ ॥ यतित ववितभनिधारित क्योंकि युकि भार क्षुतिमे खोवस परम्प चाग्मनी बीमा निधय पिए मीर बीर परम्ममा स्मनारनन्पत्यममेदेन प्रशस्यतेने पापको शाख और प्यासारि म्नयत शारोण प्यासादिभिय। मुनिपन समानमासे प्रशंसा पानी पघमरप्राणिमाघारगंम्वाभाषिकसरि पी & बार शारकार शानपरिकतावास्पिपिरपित किरा परिव समामि नानामधन निपत "न साधारण सामारिक मानापानकी उहितीपमनि" (१० उ०४1"ससे भावरित राय कामा ३ । २३ ) "द्वितीया भय || मरेरो निभव भप दाता t भवति" (प. उ०१।४।२)| मायोरा-सा भी - परता, "उदरमन्तर पुस्त, मप सम्प | ठमे मप प्राप्त होता " पर पर भनि' (1.30 MITakn it 1.)मापदपमापा' माना rrrut (प. सरा६,४५) ": गगापमानानि [P Tere rrk .
शा भा०] मदेवप्रकरण । नानेव पश्यति" (फ० १०२ वारा निन्दा की गयी है । यह दो १।१०) इस्पादियाक्पैया- [ बताया गया ] है या इसी पेम ममविह्निः । यच्चतचदेव प्रकार समानस-सरठ बोधगम्प हि समयसमृनायोघं न्याय्प वर्षात् म्याययुको । तात्यार्किको मित्पर्य । पास्तु तार्किकपरि की कम्पना की हुई गोकुरष्टियॉरने करिपता रुष्टयस्ता अनन्म्यो | सरत नहीं। वभिप्राय यह कि निरूप्पमाणा न पटनांप्रान्ती | वे नित्पण की बानपर प्रसंगके स्पमिप्रायः॥ १३ ॥ बनुहप मही यरता ॥ १३ ॥ हस्युफ पीप-सभेद गौण है जीवात्मनो पृथक्त्व यत्प्रागुत्पचे प्रकीर्तितम् । भविष्यवृस्या गौणं सन्मुस्यत्व हि न युज्यते ॥१४॥ पामे (उपनिषकि कर्मकाण में ) उत्पत्तिबोधक वाक्योंतास बो मील और परमात्माका पृपक्रम बताया है पर मनिप्प रिसे गौण है, उसे मुम्प वर्ष मानना ठीक महा। १॥ ननु भुत्यापि भीमपरमात्मनो! मका-यब हस्तिने भी पहले- कर्मकाणमें उपचि प्रतिपादक उप- पृथत परप्रागुस्पचेक्स्पायर्पोप निफ्ट्याम्पोारा पदकाम । 'बद काम 'मादि प्रकारसे [कर्मकाणमें निपदारपेम्पः पूर्व प्रकीर्तिवं मिम-मिम काममा वाले कर्माधिकारी कर्मकाणे मनेका काममेव | पुस्पक समाम ] बनेको कामनामों- के मेइसे गीष और परमात्माका भेद इदकामानाकाम इति परम प्रतिगान किया है तथा परमारमाका "स दाधार पृथिवी पाम्"। उसन पृपिरी और पुमोकको (१० सं १०।१२११ स्पादि धारण किया गया मन्त्रागसि पृपा ही निर्देश मिस्प है, तब इस मन्त्री सत्रकर्षकर्मशानपण प्रकार कर्माण और शाकाण्डके पसमादात्मन भाकामा सस्ता उपम मा "उसने माफमोपनिषद् [00 माक्पपिरोघे ज्ञानकाममाया मायोमें निरोप उपस्थित होनेपर फेरस शानकाम्प्रेत एकपका ही स्पैवैवस्वम्म समयसमवघार्यत सामवस्म (यपार्थम) किस प्रकार इति? निभय किया जा सकता है। भवानते-"यतो पा इमानि समापाम-स विषयमें हमपरा भूतानि वायम्" (ले० उ०३। कपन है कि "वहाँसे ये सव मूत उत्पन्न होते " मिस प्रकार १)"मधामसुदा विम्फुलिङ्गा" (१०४०२।१।२०)"समारा भमिसे म-ही-मन्दी बिमारियों [मिकम्तीk] "सी इस बास्मा- (d० २०२१११२) "पदेवता ईक्षण किया""सने सेमको रमा" ( छा० ७० ६ । २ । ३) इस्पारि सत्यर्पक उपनिवडूनास्पोंसे "तसेवासमत" (छा० • ६। पहले कर्मकाण्डमें बो पुपालका २।३) इत्मापुत्पपर्थोपनि प्रतिपादन किया गया है पदाक्येम्प मापार कर्मकार परमार्पत मही है। तो कैसा है। प्रकीर्तित यचम परमार्थम् । किक महाकाश और घटाकायारिके वार ? गौण महाकालपटा | भेदके समाम गण और निस काधादिमेदयत् । पचौदन प्रकार भविम्पटिसे 'भात पकाया पपतीति भविप्पदामा यत् । । ऐसा कहा जाता है उसीके न मेदनाक्यानो कदाचिदपि प्रतिपादक समी सम्मन मही वारम-मदवास्योका मुस्स मुसममेदार्यस्वमुपपपते । स्यामा- है, क्योंकि मेवपाप हो बानी सिकारियापत्प्राणिमेदाप्यनुवा पुरुषों की सामाषिकी भेदाप्टिका की दिस्वादात्ममेदवाक्पानाम् । बनुवाद करनेग्रमे है। दापोरनिपत्रापचिमठपादि यहाँ उपनिरदमितले पर पास्य पिपरमात्मनारेषत्वमेव पर अन्य है और में कम्प • भाव' उप ए पात्र प्रते। वो पावर पप्रमे । उनमंग भावना है। भाइसमा यो उनको भा एम प्रयोग हुमा ११ मविपरि है। समान है शा.मा. पीतप्रकरण प्रतिपिपाइपिपितम् "वषमसि" [ ऐसा जो धानता है] (छा० उ०६।८-१६) भन्यो मही बानता" इत्पादि सुतियोंक ऽसामन्योभमस्मीति न स वेद वनुसार उपसि-प्रलपादि-पोषक (१० उ०१ । ४।१०) पापोंसे भी जीव और परमा इत्पादिमिः । अत उपनिपरसु रमाका एकलही मविरादम करना है।बत उपनियों में शुनिको एकस्वं सुस्पा प्रविपिपादमिपित एक्स्व की प्रतिपादन करना इए भविष्यतीति भापिनीमेकाचि होगा-नस मविप्परतिको वायय मामित्य लाके मेरष्टयनुनादो करके छोकमें मेदापिका मनुवाद गौण एवेत्यभिप्रायः। | गणही है-पर इसका वभिप्राय है। अथ पा सदैवत" (डा० षमा "ठसने इसण किया। ठ०६ । २।३) "तचेचो | "उसमे तेनको रथा' इत्यादि स्वत" (छा० उ०६।२१३) सुतियोहारा यो उत्पत्तिसे पूर्व एक- इस्पा स्पचे प्रास् "एकमेगा | मेवाद्वितीयम्' इत्यादि प्रकारसे | एकलका निरूपण किया हैमा एकल द्वितीयम्" (जा-उ• ६।२।२) है यह सपना बारमा १ भोर इत्पेकस् प्रकीर्तितम् । तदेप ष यही। इस प्रकार मागे एक्स्प "स्सस्पं स मारमा तत्वमसि" बापणा इस मविप्पदापिसे है। (डा. उ० ६१८-१६)इत्पेकस्य बत हाँ कही किसी दास्पमें नीम भरिपतीवियां भविप्पचिम | वीर बारमाका पृषकल मामा गया है पश्य ममोपास्मनोः पृपावं यत्र उसी प्रकार-गेम से कि 'भास कपिटापे गम्पमान सद्गोमम्, | पकाता है। इस वाक्पमें [ 'माव' पचौदन परतीवि सन्द ॥१४॥ शम्मका प्रयोग ] ॥ ११ ॥ रतपुक उत्पषि-मुति पारमा ननु याम्पचे प्रागर्म सर्प । पर परो कि उपधिसे पूर्ण सुब वयम्मा तथा एक ही परितीय मेकमेवामितीय पाप्पुत्पचे तपास ससक पी४ तो सम समान माणपये पनिषद् [मी मातमिदं सर्व बीयाप मिन्ना उत्पन्न नाही है और तब जीव [ मी भिन्न ही है-वो ऐसा करना इति, मैवम् मन्पार्यस्वादस्पचि नहीं, क्योंकि उत्पतिसूचक धृवीनाम् । पूर्वमपि परिहा युक्तियाँ दूसरे ही अमिप्रापसे ।। पहादिसपात सप्नके एवार्य दोपः स्वप्नवदात्ममाया बारमाकी मामासे ही प्रस्तुत किए ६, तथा घटाबासकी तापविले विसर्मिया सपावा पटाकानो होनेवाले भेदके समान जीयोंकी अपक्केि भेद है इम पास्पोद्वारा सचिमेदादिवतीवानामत्पधि पहले मो इस दोषका परिवार किया मेदादिरिपि । इस एपोस्पति-हो मा पुका है। इसीलिये पूर्वोळ सत्पपि भेदारिसूचक हतियों से उन मेदारियविम्म भारुप्प का निकल कर यहाँ फिर उम पुनम्पविभुतीलामैपयमविपि उत्पविकृतिमोका मास्मैक्यपरत्व प्रतिपादन करनेकी न्यसे उपम्पास पादपिपयोपन्यास:- किया गाता मृलोहविस्फुलिङगापैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा । उपाय सोऽवताराय नास्ति मेद कथचन ॥१५॥ [उपनियम ] बो मृतिका, गहणधीर पिकविता द्वारा मिन्न-भिन्न प्रकारसे सटिका निरूपण किया है वह [ प्रमात्मैश्यमें ] मुदिध प्रवेश करनेका उपाय है परतत उनमें कुछ भी मेर महाँ - है॥१५॥ याडोइफिरिमादिरशान्ता एतिका, परिणीतिक- रिवारिक समतोका पाठ करके पन्यासः सृष्टिो पारिता को भिन्न मिस प्रकार से पथिको प्रकाशित पद कामत मिसा प्रकाशिवाम्पधान्पया ष स सर्वः गया है इसपिका सम्पूर्ण प्रम शां. भा. मतप्रकरण सृष्टिप्रकारो बीयपरमात्मैकन्ध | हमें जीव और परमात्माका एकल निधय करानेपाली युद्धि प्राम कराने पुधातारायोपायोऽस्माकम् । दे दिये है, जिस प्रकार फिप्राण- यथा प्राणमयाद पागापासुर | संसार में प्राणको मापनाका बोध परानेके लिपे वापर इन्द्रियोंके पाप्मयधायास्पापिका कल्पिता | असुरों द्वारा पापसे मिद हो जानेकी प्रागयशिष्टयतोषावताराय । वास्यापिका कामना की गयी है। तदप्यसिद्धमिति पेत् । पूष -परन्तु यह बात भी सो मिल नहीं हो सकती। न; शाखामेदप्यन्यथा पधा सियाम्ती-नहीं; भिम-भिन्न प प्राणादिसवान्भवणात् । यदि | शाखा भिम-मिन प्रकारसे प्राग- संग्रा मुना बानक परग [उम्- हि संयादा परमार्थ एषामदारूप का यही तत्पर्य होना चाहिये ] It एव संवादः मर्वधारनाम्बभोप्यत | यदि यह संग बस्तुत हुआ होना तो मार्ग शासभोमे एक ही विरुदानेप्रकारण नायाप्पत ।। संग' सुना जाय, परस्पर सिन्द •मोप उपनिदा प्रथम प्रयास दिनीय तग पर माम्यायिका इस मगर मारी ?-एए बार देखनाभास भनुरे साप पुर जिग्ना । पहा भमुरमे मन पानानि भौर देखनाते रिचमारि समझनी चारि । इन रोनों सियोंम पाररर पुर चिर प्रमिल है। विद्यमाने मनुको सीपविधा प्रभावले पगम प्रा पापा 1 मा उनाने वार मारि प्रत्येक र एक-एर म उनीप-नमें निपुन या मिनु प्रदीप स्वापरतो पाने मी मने पल गपी । मन्नमें मुग्ण मत्सम निगुन T गय नीर A समान मारमे सामान प्रने सण मा मात्र समाइ मन बिरसा भोर रेमभंगसिर मात । 1ममा उन मगर रमोश हायर मरमें शाप रोष सबमरी +rm भायप एर मानसा पेनिार माया FE मेरे मामा र मनार मात्र 1 माप्रपोपमिपद् [गौ. भूपते तु, तमाम वादथ्ये | मिम-मिम प्रकारसे नहीं । पस्तु पेसा सुना ही मात है, इसलिम संपादभुतीनाम् । तपोस्पत्ति | समादतियोंका तात्पर्य यपत्र पापानि प्रस्पेसम्पानि । अर्धम महा है। इसी प्रकार उपति- पाक्य मी समलने पाहिपे। कल्पतर्गमेदात्सवादमुवीना पूर्व-प्रस्पेक कल्पकी सृष्टिक सस्पत्तिभुवीनां च प्रविसर्ग मेदक कारण स्वादधुति और उत्पति- हतियोंमें प्रत्येक सनके अनुसार भेट मन्पयात मिति घेद ? है-पदि ऐसा माने तो। न; निष्प्रयोजनवापाक सियामती-महाँ, क्योकि मुनिका | उपर्युक [नमारमैकापमें ] पुखि मुरुषपतारप्रयोवनम्पविरेकम ।। प्रदेशका प्रयोगमफे नतिरिक कम्प कोई प्रपोजन दी नहीं है। प्राण- न अन्पप्रभोधनपर संपादो- संपर और उत्पत्तियुतियोंका इसके स्पपिसीना शक्यं कल्पयितुम् सिवा और कोई प्रयोजन नही कल्पना किया जा सकता । मर स्यास्पप्रतिपतये ध्यानार्थ | कहो कि उनकी स्यूपता प्राप्त करने- मिति मा कलहोत्पधिप्रठयाना के प्रयोजनसे म्पानके लिये ऐसा कहा गया है, तो ऐसा भी सम्मा प्रतिपचरनिष्टस्मात् । वमा नहीं है, क्योंकि कह क्या उत्पछि या प्रमकी प्रासि किसीको इए तुम्पत्यादिभुतम मात्मैकत्व नहीं हो सकती । क्त उत्पत्ति मुपवतारायैव नान्याः पारि प्रतियान करनेवाी भुतिया मामकलकप युनिकी प्राप्तिके ही यता लिमे ३, म्हें किसी और प्रपोम्म नास्त्युत्पत्याविकतो के लिये मानना अमित नहीं है। मेद: मत उपति बार के कारण होने क्यनन ॥१५॥ बाठा भेद कुल भी नहीं है ॥१५॥ कल्पयितुं युक्ताः श०भा०] पदेवप्रकरण विपिप अधिकारी और उनके लिये उपासमाविधि पदि पर एवात्मा निरयशुदत मर-पदि एकमेगाद्वितीयम्' पुदमुक्तस्वभाव एकः परमार्थ इत्यादि मुनिपरि अनुसार परमार्यतः सन् "एकमेवाद्वितीपम्" (छा० | एकमात्र नित्य-अदपुर-मुक्कसमाव उ० ६ । २ । २ ) इस्पादि ) परमात्मा ही सत्य है, प सब श्रुतिम्पोऽसदन्यत्किमपमुपा मिथ्या है, सो "अरे, इस रमाका सनोपदिय "आत्मा वा मरे | साक्षात्कार करना चाहिये "नो द्रएष्पः" (पृ०३०२।४1५) मारमा पापरहित है। यह (अधिकारी) "य मास्मापदरापाप्मा" (छा०] कतु ( उपास्पमुम्बन्धी संकल्प ) उ०८।७।१, ३) "समतुं करे" "जारमा है-इस प्रकार ही कुर्भात" (छा० ०३।१४।१)| उपासना करे" स्या शुतियोंशय "आस्मेत्येवापासीत्" (प० ठ० | इस उपामनाका उपदेश क्यों दिया १।४।७) इत्यादिश्रुतिम्पा, | "पा है ! सपा अग्निहोत्राति कर्म कर्माणि पाग्निहोत्रादीनि ? मी श्पों पाये गये है। मृणवत्र कारणम्- समापामसमें जो कारण है, सो सुनो- आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टय । उपासनोपदिप्य सवर्थमनुकम्पया ॥१६॥ बायम ( अधिकमी पुर) तीन प्रकार है-दीन, मम्पम और उमए भिगरे । उनपर ग पर उन्हीं लिप पर टामना उपदेश पी गयी है।॥१६॥ आममा आश्रमिणोऽपिस्ता जायमा साधिकारी आयमी पणिनय मार्गगा, एवं समार्गग्मी बायगक्योंकि मायम आमा गद उनपर भी उम्- सदस्य पदमनास्पास्थिपिधाः। एम पानश्रम ई-मीन परक कपम् । दीनमध्पमानएरएप । । स्मि प्रम दीन, मध्यम दीना निहध मायमाता पमरागिने। भगद विनी 4 + ૧૪૮ माणस्योपनिषद् [गी. चटिदर्शनसामप्यं येषां ते मन्द | प्टि यानी दर्शनसामर्थ्य होन- मम्पमोचमपदिसामोपेता निस्य, मध्यम और सार ऐसे मन्द, मम्पम और उचम मुदिकी इत्यर्थः। सामसे सम्पम है। उपासनोपदिस्टेयं तदर्थ मन्द उन मद और मध्यम सिपाडे वाममादिके लिये ही इस उपासना मम्पमस्टधाममापर्ष फर्माणि पौर कर्मका उपदंश किया गया है प, न घात्मैक एवाद्वितीय इति | 'धारमा एक और अद्वितीय ही है।' निमितोचमष्टप | ऐसी निमकी निषित उत्तम प्टि पालना है, उनके लिये उसका उपदेश महा देनानुफम्पया सन्मार्मगाःसन्तः है । याच वेदने टसका इसीलिमे कथमिमामचमामयत्वष्टिं प्राप्नु उपवेश किया है कि जिससे ये किसी प्रकार सन्मार्गमी होकर युरिवि । “मन्मनसा न मनुते | "मिसन मनसे मनन नहीं किया मेनाडुर्मनो मतम् । तदेव प्रम जा सकता, बस्कि जिसके बारा त्व विदि नेदं पदिवसपासत" मन ममन किया कहा पात है उसीको प्रम गान, प, मिसकी (फे. उ०१।५)"तत्वमसि"] उपासना करता है, प्रम नहीं (छा०००६।८-२३) "मात्मवेद र पार पह सव बारमा सर्वम्" (छा० उ०७।२५।२) 0" इत्यादि सुनियोशाय प्रति- पादित इस उचम एकस एटिको इत्यादिश्वविम्पः ॥ १६ ॥ प्राप्त कर सकें ॥ १५॥ मदतारमरमान किसी पिरोपी मही शाखापपधिम्पामपधारिस शाम वीर युक्तिसे निषित होने करण अद्वितीय भारमान स्वाददगास्मदर्भनं सम्पदर्शनी सम्पदर्शन , उससे यम होने कारण और सब वन मिया वायत्वाभिप्पादर्शनमन्पत् । । तपादियोंके दर्शन (सत्रिम • मा ] मविप्रकरण इतम मिथ्यादशनं तिनां राग | मी मिथ्या है, क्योंकि वे राग यदि दोके वामय है, किस प्रकार पादिदोपास्पदत्वात् । फयम् ।। [ सो क्तलाते हैं- खसिदान्तव्यवस्था तिनो निम्धिता दृढम् । परस्पर विरुध्यन्ते तैरय न विरुध्यते ॥१७॥ दैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तोंकी व्यस्सा आम्ही होनेके करण वापसमें विरोध रहते हैं, परन्तु यह [बतास्मदर्शन ] उनसे पिरोप मही रखता ॥ १७॥ स्वसिदान्तःपयस्सासु म्यसिदा स्वसिदान्सम्यवस्था अपात् अपने-अपने सिमान्तकी रचनाके न्तरचनानिपमेपु फपिलफमाद निपर्मोमें कपिल, कण, पुर और मुद्धाहवादिष्टपनुसारिणो देवि महत (जिन) की दृष्ठियोंका धनु- स्मरण करनेवाले सवारी निश्चित नौ निमिताः । एवमेवैप परमार्पो, मर्याद यह परम्साल इसी नान्पपेति तत्र पत्रानुरक्ताः प्रकार है अम्पा नहानस प्रकार अपने अपने सितमें अनुरक हो प्रतिपक्षं पात्मनः पश्यन्वस्त अपने प्रतिपक्षीको देखकर उससे दिपन्त इत्पेवं रागपापेताः प करते हैं। इस तरह राग-पसे ससिशान्तदर्शननिमिधम् एष दर्शनके कारण ही परस्पर एक पुक हो सपने-अपने सिदान्तके परस्परमन्योन्य विरुष्प। दूसरेसे विरोष मानते हैं। वरन्योन्यविरोधिमिरम्मदीयो उन परस्पर विरोष मानमेवायें से हमारा यह मामेपलानरप ऽयं वैदिकः समानन्पस्वादास्मैक | किसिमान्त स्पसे ममिल होनेके स्वदर्शनपको न विरुष्पवे यथा परण विण्य महा मानना, निम प्रकार कि अपने हापौष मानिसे स्वास्तपादादिभिः एवं फिमीर रिरोप महा दाता । व १५० मापूक्योपनिषद [गी.. रागपादिदोपानास्पदत्साहा- स्मैकत्वमुदिरेष सम्पन्दर्भनमित्प भिप्रायः ॥ १७ ॥ प्रकार राग-द्वेषादि दोयोका जाप न होनेक कारण भास्मैकलमुनि ही सम्पम्हाशि है पर इसका तात्पर्य है ॥१७॥ भदैतारमपर्मनके पिरोपी होने में रेत केन हेतुना तैर्न विरुष्पव किस कारण उमसे इसका इत्यूप्यते- विरोध नहीं है-इसपर करते :- अद्वैत परमार्थो हि द्वैत तद उच्यते । तेषामुभयथा द्वैस तेनाय न विद्यते ॥१८॥ यस परम्पर्प है और रेत उसीका मेद (कार्य) कहा जाता है सपा उन (तवादियों ) के मतमें [परमार्थ और अपरमार्थ ] दोनों प्रकारसे सही है इसलिये उनसे इसका विरोध नहीं है ॥ १८ ॥ यदैतं परमार्थो हिमसात बईत परमार्थ और क्योकि नानात्वं सस्सादेवस्य मेदस्त देत यानी नानात्व उस कारक पस्तम कार्यमित्यर्थः। "एकमे | भेद बाद उसका कार्य मेस वाद्वितीयम्" (छा० उ०६/कि एकमेवाद्वितीयम्।। तमो २ । २) "वयोग्यत" | ऽसवत' स्यादि वतियोंसे तप (छा० उ०६ । २।३) इति | समाधि महर्म वा सुषुप्तिमें नपरे युवेरुपपचेष स्वधि- पिच फरणका वमान हो पानेप सन्दनामावे समाधी मूर्खयां इतका भी मान हो जानेक कारण मुषप्तो पामावात् । अतस्तद मुफिसे भी सिद्ध होता है। इसभि उप्पते दैवम् । इत उसका मेकहा जाय। देविना तुवेपो परमार्थतबा किया उन तिवादियों की प्रति परमार्थतयोमययापि देवमेव । तो परमार्पत- भीर मारमार्पत यदि प पो ग्रान्तानां दैत | दोनों प्रकार देत ही है । पदि उ. पष्टिरम्माकमदेसरएिरमान्ता भान्त पुरुषसरस और • भा०] मौतमकरण नाम, वेनाय हेतुनामस्पषो न भ्रमहीनोंकी भौताठि है तो इस विरुष्प है।"न्द्रो मायाभि | कारणसे ही हमारे पक्षका उनसे पुरुरूप ईयते" (:. ८०२ ।। विरोष नहीं है । इन्द्र मापासे ५।१९) "नतु सद्धिवीपमन्ति। अनेक रुप धारण करता है। (पृ० ३० ४ | ३१२३) इति । "उससे मिन दूसरा है ही नहीं, इल्पादि श्रुतियोंसे भी यही प्रमाणित भो । होता है। यथा मचगवान सन्माचं मिस प्रकार मामाले एपीपर पड़ा या पुरस किसी उन्म ममिष्ठप्रति गलास्टोमग वाइस मिस्त मनुष्य के प्रति, उसके ऐस्य करनेपर भी दि में मेरे प्रतिबन्दी मो प्रतीति भुषाणमपि के प्रति अपीयर पदा इमाईर अपना हापी मेरी बोर बना दे, विरोधबुद्धि नवादयस्पविरोधषुधा तात् ।। म होने के कारण उसकी कोर एपी नहीं ले जाता, उसी प्रकार [ हमारा ततः परमार्थतो मारिदात्मम भी उमसे विरोध मह 16, परमार्यत तो प्रमोधा तिरियों दैविनाम् । तेनार्य हेतुनासत्सको भी वरमा ही है। इसीसे वर्षात इसी कारण उनसे हम्परे पक्षका नबिरुम्पते सः॥१८॥ विरोध महा है ॥ १८॥ मारमा भेद मापाडीके प्राण है मतमदेसमेद इत्युक्त देव रत-भरतका मेऐसा पानेर धिमी-सिमीयो चार मप्यदेवात्परमार्थसदिति सान् (साली है कि मदतके सम्पन हैत भी परम्पर्य सही होना पाहिपे- कसविदागास्पद मार- मागम्योपनिषद [गौ० का मायया भियते झेतन्नान्यथाज कथचन । तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृत व्रजेत् ॥ १९॥ इस अजमा मातमें मायाहीके कारण भेद है और किसी प्रकार नाही, यदि इसमें वास्तविक मेद होता तो यह अमृतसरप मरणशीनाको प्रास हो जाता ।। १९॥ यस्परमार्थसदरेत मायया नो परमार्प सत् कौत है पर मियते पेतचैमिरिकानेकपद्र तिमिरदोषसे प्रतीत होनेवासे अनेक चन्द्रमा और सर्प-भारादि भेदोंसे पद्रन्मुः सर्पधारादिमिर्मेदै रिष न विमिम दीसनेवाली रस्मुके समान परमार्थतो निरषयपत्वादात्मनः । मायासे ही भेदवान् प्रतीत होता है परम्पत नहीं, स्पोंकि वास्मा सावपर्य अपयवान्यपारधेन | निरस्पर है ।बो वस्तु साक्या भियते । यथा मृद् घटादि मेरे । होती है वही अक्योंक भेदसे मेरे को प्राप्त होती है, जिस प्रकार घट वसाभिरवयवमनं नान्यथा | वादि मासे मूषिका । मन निरवपत अपचन केनचिदपि प्रकारेण न वीर वाम्म वारमा [मायाके सिप] और किसी प्रकार मेइको प्राप्त नहीं भिपत इत्पभिप्रायः। हो सकता-यह इसका अभिप्राय है। सुस्ववो भिधमाने पमृतम यरि उसमें तत्त्वत मेद हो हो अमृत का पत्य वीर समरसे जमदर्य स्वभावतः सन्मर्पत सासरूप होकर भी मामा माताको प्राप्त हो नायगा, जिस तरह किवधि प्वीतताम् । शतिनाको प्राप्त हो आप । वीर अपने समको विपरीत काम्माको सधानिए समापदंपरीरमगमनम्, | प्राप्त हो माना सम्पूर्ण प्रमाणसे सर्मप्रमाणविरोधात् । अबमम्पय विश्व होन के कारण किसीकोट नहीं हो सकता ।बत परवीर बाहितीप मारमठ मायौप भिपतनबारमा मापास ही मेवको प्रास ममता ययाग्निः
शा. मा.]
मतप्रकरण
परमात । तमाम परमार्थ होता है, परमायत नहीं, इसलिये
सदैवम् ॥ १९ ॥
देत परमाप सत् महाँ है ॥ १९ ॥
वीवोदिया यसंगत
अजातस्यैत्र भावस्य जातिमिच्छन्ति वादिन ।
अजातो अमृता भात्रो मर्त्यता कथमेष्यति ॥२०॥
सवादीबेग जन्महीन आत्मा भी मम्मकी दया करते हैं कि
मो पदार्य निषय हो भजन्मा और मरणहीम पर मरणशीलताको
किस प्रकार प्राप्त हो सकता है॥२०॥
ये तु पुन फेचिदुपनिष किन्त जो कोई उपनिरी
पास्यातारी मममादिनो म्याम्भ्या करनेपाचे यामानी मावादी
श्रेग मनात और अमृतम्ममाप आम-
पालका अजावस्पैपात्मतमस
तपयी जाति पानी उत्पत्ति परमार्फत
ममतस्स स्वभावतो आतिम् | ही सिद परमा चाहते हैं उनके मतमें
उस्पपिमिच्छन्ति परमार्थत एव पनि पार उत्पन होता है सो वाम
क्षेपी जात पेपदेव मम्वामेप्य ही मरणशीताको भी प्रास हो
स्पवश्यम् । स पाजावो ममतो समासे मनात और अमृत होकर
जापा । फिन्तु द मामवाल
भाष स्वभावत समात्मा का भी किस प्रक्स मरण प्रियाको प्रस
मर्पयामेप्पति १ न कथशन से सस्ता है। अत सम्पय यह है
मर्पस्वं स्वमाषपरीस्पमेप्पती
किएपसी प्रकार अपने समापसे
विपरीत मरणशीराको प्राप्त नही
स्पर्थः ॥२०॥
हो समय ॥२०॥
पसा---
| पोषि-
न भवत्यमृत मत्यं न मर्त्यममृतं तया ।
प्रकृतेरन्ययाभावो न
कपंचिद्रविष्यति ॥ २१॥
१५४ मापूक्योपनिषद् [गो. मरणहीन मज कमी मरणशील नहीं होती और मरणशील कमी मम्म नहीं होती । किसी भी प्रकार स्वमाक्की विपरीतवा नहीं हो सकती ॥२१॥ न भवत्पमृत मस्यै लोके नको मरणहीन पहा मरण शीठ मही होती और न मरण नापि मस्येममृतं क्या । ततः शील पक्ष मरणहीन ही ऐसी प्ररुते स्वभावस्पान्पयामाषः ।। ममिकी मणताके स्वता प्रतिन कयविनाविपति, पिता-आने मरूपसे प्युति समान प्रकृति वर्षाद समाकी भग्नेरिवौम्पस ॥ २१ ॥ किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥२१॥ बत उत्पपिसोल पोषणमर नही हो सकता खभामेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम् । कृतकेनामृतस्तस्य कयं स्थास्यति निश्चलः ॥ २२ ॥ निसक मतमें स्मासे मरणहीन पदार्थ भी मर्यत्वको प्रम्स हो माता है उसके सिगन्तानुसर सक (जन्म ) होनेके कारण यह अमृत पदार्प चिरसायी कैसे हो सकता है।॥ २२ ॥ पस्स पुनदिन समावेन फिन्तु मिस मादी मतमें सम्यक | से बरस पदार्प मी मस्पताको प्रस्त अमूवो मानो मर्मतो गप्ठसि होता है वर्षात परम्पर्पत सम्म परमार्थतो मापते वस्स प्रागुत्पा) उत्पपिसे वह पदार्य सक्से मेता है उसकी पर प्रतिप कि स मावः म्वभावतोम्मत इति अमरणधर्मा है--मिप्पा ही है। [पदि ऐसा म मानें] बेरि तक प्रतिमा सुव । कप तहिं होने के कारण उसका सभाष भामरान स्वनामृतम्नस भाव ! फत से समता है। और इस प्रकार |लक होनेसे होकर पृत पदार्म नापतः स क मास्पति नप यामी मस्तम्पमात्र मी पैसे व • भा॰] मदेवप्रकरण निमलोऽमृतसमावस्तथा न | सकता है। अर्यात् यह कभी ऐसा नहीं र सफवा । भव मात्माका नन्म मयभिस्मास्सत्पात्ममातिवादिनः | बानेवालेके मतमें तो अजन्मा सर्पदामं नाम नास्त्येव सर्व ! वस्तु कोई है ही नहीं। उसके लिये यह सब मरणशील ही है। इससे यह मेतन्मर्मम् । अतोऽनिर्मोक्षप्रसा वम्प्रिाय हुआ कि [उसके मतमे) मोक्ष इत्पमिप्रायः ॥ २२ ॥ होनेकाप्रसाईही नहीं ॥ २२ ॥ समितिमी प्रगति नन्धवाविवादिना समिति मछ-किन्तु बजातिवादीके मस- पादिमा सुतिर्न संगच्छते में सरिका प्रतिपादन करनेवाली प्रामाम्पम् ? तिकी प्रामाणिकता सिदमही होती। बार विद्यते पुष्टिप्रतिपादिका समापान-हाँ ठीक है, सएिका प्रतिपादन करनेवाली शृति मी अतिः सा स्मन्पपरा । उपायः किन्तु उसपर उपश्य दूसरा है। "उपाय सोताराया। इस प्रकार सोऽयवरायेत्पयोचाम । इदानी- हम उसका उद्देश्य पहले ( बरत० १५म) बता ही चुके हैं। इस प्रकार सकेऽपि परिकारे पुनमोप- यपि इस शहाका पहले समाधान किया जा कर सो भी सरिनुतिके परिवारो विपक्षिवार्ष प्रतिपक्षरोंकी अनुहल्ताका हमारे निक क्षित मर्पसे गिरीष । इस शारका सृष्टिभुत्पधराणामानुलोम्प परिहार करनेके रिये ही इस समप तसम्बन्धी शश और समाधानका विरोधाशकामात्रपरिहारापी पुन उपरोस किया नाम है- भूतसोऽभूततो पापि सृज्यमाने समा श्रुतिः । निमित युक्तियुक्तं च यत्पूवति नेसरत् ॥ २३ ॥ १ पावसमेलम मुसिभ प्रदेश कमेके लिये उपाय है।
माणफ्योपनिषद्
[गी.
L-
पारमार्षिक भयया अपारमार्षिक मिसी भी प्रकारची सुष्टि होनेमें
श्रुति सो समान ही होगी। मत उनमें जो निमित्त और युक्तियुक्त मत
होनही [ शृतिका बम्प्रिाप]ो सफता है, अन्य नहीं ॥ २३ ॥
भूपतः परमार्थत सन्यमाने वस्तके मूतत पानी परमार्पत
रचे जानेमें वपना बमूतन यामी
बस्तुन्यभूषतो माझ्या
मायासे मायानगरमे पानेमें सरि
मापापिनेर सन्ममाने वस्तुनि कृति सो समान ही होगी । यदि
समा सुस्पा सष्टिभुतिः । ननु कहो कि गीग बोर मुख्य दोनों वर्ष
गोममुस्पयोर्मुस्प सम्दार्थ
होनेपर शब्दका मुम्न्य अप लेना ही
उक्ति, तो ऐसा कहनाटक नाही,
प्रतिपत्तिर्युका । न, भन्मभा [योंकि अन्य प्रकारसे म तो सरि
सप्टेरप्रसिद्धस्वामिप्प्रयोजनस्याचे- सिर ही होती और न उसका
कुछ प्रयोजन ही है पर हम
स्पयोचाम 1 अविपासष्टिविपर्यव | पहले कर चुके हैं । जामा पार
सर्वा गोणी मुस्मा च सूरिन ] मीतर विपन्धन बोर बना
परमार्चवा "सवामाम्यन्तरी
इस वतिके अनुसार सब प्रकारको
प्रम" ( ० 3 २११ १२) सरिसम्बन्भिनी ही है, परमाप्त
| गौण और मुख्य सूचि याविषक
इवि भुते।।
तमापुस्पा निपित पदेकमेवा का तिने जो एक, भवितीय,
जनमा और अमृत तल निति
द्वितीयमजममृतमिति पुक्तियुर्फ किया हैदी युखियुक्त वर्षात
पयुक्त्या च सम्मन्नं वदेवेस्प | युक्तिसे मी सिद्ध होता । ऐस
| प्रतिपादन कर चुकेबी तिमा
बोधाम पूर्वावदेवत्पर्यो तापर्य हो सकता है स्य बर्ष
कमी और किसी साम महासे
मपति नेसरस्कदाचिदपि ॥२३॥ | समता ॥ २३ ॥
० भा.] मदेवप्रकरण १५७ - न पप भूतिनिमयात्माह- यह शुतिका निभय किस प्रकार है। मो मसभाते है- नेह नानेति चाम्नायादिन्द्रो मायाभिरित्यपि । अजायमानो बहुधा मायया जायते तु सः ॥ २४ ॥ 'नेह नानाम्नि किंरन' पन्द्रो मायामि पुरुषप ईपतेसपा पनायमानो बहुधा मिजायते' इन हतियास्पोके अनुसार मा परमात्म्म मापासेहरी उपम होगी॥ २१॥ यदि हि मुक्त एष सृष्टि यहि मास्वपमें ही सृष्टि हुई। स्साचत सत्यमेव नाना परिस्पति तो नाना वस्तु समय ही हैं ऐसी पदमाषप्रदर्शनार्थमाम्नायो भयभामें उनका समाप प्रशित करनफ लिये कोई शाम-वपन नहीं सात् । अम्ति प "नेह नानास्ति होना चाहिये पा । किन्ता तमानका सिंचन" (६० उ०२।१।११) मिषेध करनेके ध्येि "यहाँ मामा इत्पादिराम्नायो दैवमारप्रति बस्तु र नहीं है।" इत्पारि दान पेशा । समादाम्मकतप्रति वचन है ही। क्त प्राणसंपादक पपर्या कल्पिता सरिम्संग समान मात्मैवतकी प्राप्तिके ये प्राणसंवादयस् । "इन्द्रो मायामि कम्पना की सरि पा ही है। क्योंकि पन्द्र मायासे [बनेकरूप हो (प० उ० २।५.१९) इत्य जाता]" इस सनिमें सरिका, भूतार्थप्रतिपादन मापानदेन क्या प्रतिपादय मापा' हा से म्पपदशा। निर्देश किया गया। ननु प्रशासपनो मामातम्या मामा शम्द तो प्रया वाम [इमलिये इससे सरिता | मिपाप सिर महाँ होता] । सस्पम्। इन्द्रियप्रवापा समा-क, प्राधिक होनकै परम इन्द्रिप्पामा मायाप मनियामपस्पेन मायारपाम्पुप ! पना गया है इसलिये उसमें को- मातम्योपनिषद् [गी.का. ५ मायासे ही गमाददोपः । मायाभिरिन्द्रिय । दोप नहीं है । त मायासे अर्थात् प्रशाभिः अपियारूपाभिरित्यर्थः | अविचारूप इन्द्रियप्रवासे; जैसा कि "उत्पन्न न होकर भी अनेक प्रकार "ममापमानो पहुधा विखायते" से उत्पन्न होता है इस तृतिसे सिद इति सुतेः, वमान्मापर्यष बापते | होता है । अत तु सः । तुझदोऽवधारणार्थ:- उत्पन्न होता है। यहाँ शब्द निभयार्थफ है। अर्थात् मापासे ही माययैवति । न मबापमानत्वं [ उत्पन्न होता है ] । अग्निमें बाहुपा बम पैकत्र सम्मवति, शीतता और उष्णताके समान सम्म न लेना और अनेक प्रकारसे जन्म अग्नाविप स्पमोम्यं च । | सेना एक ही वस्तुमें सम्मय नहीं है। फलवस्वाचास्मैकत्वदर्जनमेव अपस्थामें भूविनिमितायः "त्र को साक्षात्कार करनेवाले पुरुपको स्या मोह और क्या शोक हो सकता है।" मोदक लोक एफपमनुपश्यतः" इत्यादि क्षुप्तिके अनुसार फम्युक (६० उ०७) इस्मादिमन्यपनाता होने के कारण तथा "[ नो नानात्व | देसता] वह मृत्युको मुस्फुसे प्राप्त "मृस्पोः स मृत्युमाप्नोति" (ोता है। इस श्वतिसे सृष्टि वादि उ०२।१।१०)पति निन्दि | भेददृष्टिको निन्दा की गानेके कारण भी वारमैक्काशन ही श्रुतिका वस्वाथ स्टपादि मदरप्टः॥२४॥ निबित वर्ष ॥ २४ ॥ "उस सुति म मोर कारण दोनोक प्रतिपेप करती है सभूतेरपवादाच सभव प्रतिपिप्यते। को न्वेनं जनयेविति कारणं F भुमिमें सम्भूति (हिरण्यगर्म ) की । किया गसपा से कौन उत्पन प्रतिरोप दिया गया है। २ .
शा. मा०] मौतप्रकरण । - "अन्ष पमः प्रविशन्ति ये, "को सम्मति (हिरण्यगर्म ) की संमृतिमुपासते" (ई. उ० १२) उपासना करते हैं ये घोर अधकारमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार सम्मूक्ति- इति समूटरुपासत्वापषादा- के उपास्यत्वकी निन्दा की जाने संभव प्रतिविम्यते । न हि कारण कार्पाका प्रतिषेध किया परमार्यतः संम्तायों संमती गया है। यदि सम्भूति परमार्य सरप होती तो उसकी निन्दा पदपवाद उपपद्यते। की नानी सम्भव नहीं थी। ननु दिनान समूते सहा-सम्मतिके उपास्यसकी समुषयविध्यर्थः संभृत्यपवाद । जो मियपी गयी होमिनाश (कर्म ) के साप सम्मति ( देवतो. पपा "भन्ध धम प्रविशन्ति | पाना ) का समुच्यविधान करके लिये जैसा कि जो भविपाकी येऽपियामुपासते" (२००९) उपासना करते१रे घोर अन्धकारमें प्रश करते हैं। इस नाक्यसे सिर होता है। सत्यमेव देवतादर्सनम्प संमृति- समामान-सपमुष ही, सम्भूति विपयम्य विनास-रिक देशाशन और विनाशा शपाप कर्मका समुन्नपविधान पोखर करनके लिये ही मम्मूनिश बरगद समुपपविधानार्थ किया गया तयारि विस प्रफर संमूत्पपपाद । धापि विनाश | 'पिनाश' संज्ञक कर्म म्यामाणिक म्पस कर्ममा स्वाभाविकाशान नरनित प्राधिप मापुको प्राधिस्पस मृत्योरतिवरणार्थ | पार करने मे है उसा प्रकार बगावतादर्शनकर्मधषपस अषक मत्परफेस्पेिशिशित देशा पुरुषसस्परार्धस्य फर्मफलराग |शन और धर्मपा समुप कम प्राविरूपम्प साध्यसाधनपणा |फरक ग्रगमे होनप प्रष्टिम्पा दपतषणस मुस्पारतिवरमा [गो सप्प-सानग्गा दो प्रमकी स्वम् । परं पेपमाश्यरूपा पिसनामयी मृत्य। टसे पार बननके इति। गन्दयाम्पस्प फर्मण माणपोपनिषत् [गी का न्मस्पोरशदेवियुक्तः पुरुपः । लिये है । इस प्रकार एपणास्यरूप संसातः स्यादतो मृस्पोरतित [ मृत्युकी वारिसे मुक हुवा पुरुष ही रणार्या देवसादानकर्मसमभय | सस्कारसम्पन्न हो सकता है । कत देशादर्शन और कर्मसमुच्चयलक्षण लयमा प्रविधा। | अविया मृत्युसे पार होने के लिये ही है। एवमेय एपमारक्षणाषियामा इसी प्रकार एपणापक्षण मृस्पोरतिवीर्यस्ख बविचारूप मृत्युसे पार हुए सप उपनिषयमके मर्यकी भालोचनामें विरक्तस्पोपनिपच्छा तस्पर विरक पुरुषको मारमैस्परूप सार्यालोधनपरस विपाकी उत्पति दूर नहीं है इसीरिये ऐसा कहा जाता है कि पहले नान्तरीकी परमात्मैकत्व होनेवाठी भविपाकी अपेक्षासे पीछे विद्योत्पपिरिति पूर्वभाविनीम- ) प्राप्त होनेवाली प्राविया, जो अमृतम विपामपेक्ष्य पचानाविनी प्रय का साधन है, एकही पुरुषसे सम्बन्ध रस्नेके करण पत्रिपासे समुचित वियामतत्वसाधनकन पुरुषेण की जाती है । पत अमृतपके सम्पप्पमानाविधया समुपीपत | साक्षात् साधन प्रमविपाकी वपेक्षा मन्य प्रयोजनयम होनेसे सम्भूविका इत्युप्यते । मतोऽन्पार्थस्वाद बफाद निन्दाहीके सिमे लिया मृतस्वमापन प्रमविपामपेत्य गया है।बह पपपि पशुदिके क्षपश्च निन्दार्थ एवं भवति संमत्य कारण है, तो मी अतन्निष्ठ (मोक्षका पवादः । यद्यप्यादिवियोगात साक्षात् हेतु म) होनेके कारण बदन्निष्टत्मात् । मत एष समूत इसलिये सम्भूतिका अपवाद विस्य [ उसकी निन्दा ही की गयी है। मपषादासंम्तेरापषिकमेप सत्व गाने कारण उसका सत्त मापेक्षिक मिति परमार्थसदारमैश्वमपक्ष्य ही इसी भाशयसे परमार्य सक्ष मामकारकी अपेक्षासे अमृतसाफ अमृवाण्या संभव प्रतिपिम्पसे । सामूतिमा प्रनिश्च किया गया है।
• भा०] मदेवप्रकरण अनुपपति नाचे एवं मायानिर्मितस्पैन इस प्रकार परिपारा रा बीपस्याषिचया प्रत्यु किया गया मापारमित बीप चल निपालनतर मविपाका नाश होनेपर अपने बारम्बार पसापितस्याविधा सरूपसे रिक्त हो जाता है व उसे परमार्पत कौन उत्पन कर सकता समानरूप t.रमें मविपासे आरोपित सर्प प्रीपापवर वास्परमार्थतः को को, किसे नष्ट हो जानेपर, फिर न्येनं अनयेत् । न हि रन्ज्याम | कोई उत्पम नहीं कर सकता । उसी [प्रकार इसे मी कोई उत्पान नहीं कर विचारोपित सर्प पुनर्षियेतो सफता | 'को न्नम्। त्पाद शुति नटं अनयेत्तमिद । तया न आक्षेपार्थक है [प्रलापक नई कमिदने चनयेदिवि को विस्पा इसलिये इससे करणका प्रतिम क्षेपार्थवावरणं प्रतिपिम्पते । किया जाता है। इसका तात्पप यह कि भविपासे उत्पम ए इस अविपोदतस्य नएस्प बनपिस गीतका विषवारा नाश हो बानेपर फारम न किंचिदस्तीस्पमिप्रापः | किर इसे उत्पन्न करनेवाला को मी "नापं स्वपिम पमूब फमित्" | कारण नहीं है, वैसा कि "यह कहासे (किसी कारणसे) किसी (क. १०१।२।१८) इति समें तापम नही हुआ" इत्यादि सुतेः ।। २५॥ प्रतिसे प्रमाणित हो।२५।। अमारमप्रतिपेपसे भयामा माला प्रमित होगा। स एप नेति नेतीति व्याख्यातं निहते यत । सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाज प्रकाशते ॥२६॥ स्पोंकि स एर मेति मेतिी (इ पा वास्मा यह मही है यह महो) स्पादि ति जस्माके बालके कारण [ उसके विषय ] पहले महाये ए सभी माऊका निरोप करती हैबत रुप के माहौवामा मारमा प्रकाशित होना है। २६॥ इस [ निपेत्र- २१२ माझ्योपनिपर सर्व विशेषप्रतिपेभेन "अथाव "क्यात पादेयो नेति भति आदेशो नेति नेति" (प० उ० इस प्रकार समस्त विशेष प्रतिय २ । ३ । ६) इति प्रतिसारा प्रतिपान किसे इए आमाश पादिसस्थात्मना दुर्योध्यत्व दुर्बोप्पल माननेपछी अति वारंवार मन्यमाना भूति पुनः पुनरुपा | दूसरे उपायमे उसीका प्रतिशत पान्तरत्वेन तस्यैव प्रतिपिपाद करनेकी म्यासे, पहले जो कुछ पिपया पदधारयात उत्सव व्याख्या की उस समीर महा ( असत्यता प्रतिपान ) करती है। निहते, ग्राम बनिमपुद्धि पए मायमुद्रिके क्न्य विषयोछ विषयमपलपति । मर्याद "स अपगप करती है । अपार "स एप एप नति नेति" (पृ. उ०३। नति नेति। इस प्रकार भापकी ९ २६) इस्पास्मनाशाश्मता हिसाबाली श्रुति, दर्मपन्सी सतिः उपायस्योपैम उपायको उपेपनिष्टनाको न जानने- निष्ठतामजानत बाले अगोंको उपापहपसे बताये उपायत्पन पविश्य उपेयके समाम प्रान न हो म्यास्यातस्यापेमपद्मापता मा गाय-इसलिये, अग्रामभकप जिसे भूदिस्पग्राममापन हेतुना फारमेन उनका निक्य करती है...पही उसका निलत इत्पर्य । तसश्चैवमुपा- अम्ब्रिाय है । तानन्तर इस प्रकार मखोपेयनिष्ठतामेव उपायकी उपेपनिमाको जाननेवाले चानव उपेमस्य च नित्यकरूपत्वमिति और उपेपकी निप्पैकरारपताको भी मममनेवाले पुरुषों को बाहर सपाणाम्पन्तरमषमात्म मस्तिर विधमान वमम्मा अस्पताल रामप्रकाप्रसे स्वयमेव ॥२६॥। स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है ॥२६॥ सहतुकी उत्पपि माविक होती है एवं हि अतिवापः। इस प्रकार को सुनियोंसे सवायाम्पन्तरमनमारमवत्समदर्य | पही निश्चित होता है कि माया १इस (गर्त और भभूतक तपमान) मनन्तर [भिर्विरोष माय कोषमाने सिमे पान पर नही--पेय उपरेप।
शा.भा. मदेवकरण मसमें परतुन नवतोऽन्यदस्तीति निमितमेसन् । भीतर मनमान–अन मा मरम्मत्व | अदिनाय है, उससे भिन्न और कुछ युस्त्या च अधुनवदय पुन नहा। पही बात अप युकिसे त्रि निमय पी जाती है, इसीसे निधायत इया-- सता हि मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वत । तस्यता जायने यस्य जात तम्य हि जायते ॥ २७ ॥ माला जन्म मायामे ही हो मया। यम्मुन नदी । निमः जम दाता ६ उमके मिदा नानुमार भी टपतिमीठ यस्तुयाही सन्मदा मरता ६ ॥२७॥ पवम्यास्सदानापमय घेदन उग जानतत्यक विग्यमें यह नवादानी पि यरि आमाल दयान्मवयमिति । ठग्न, फाय मग पाच टीनाद असत् ग्रहणात । यथा गुता मापापिना होना पदिय । परन्तु मा पादना टीर मही कशेरि उगा पाप मायया जन्म कायम् । साग पता जिस प्रार सव जगवा म फाग ग्रामास माय मग मना पपदं मीरा - जिसपी मायाग्निमिट परमार्थमन्तम निमा गरि कार्य मा मानं गमनापामदम् का माप अवमूत पामा गत् माग न म मरगमयति । एमाग्मता हि का पार पायद, बीमागे पिमानागारमा मापानिमि सरहा र गरन गा" पिमन पर सत्परम्पादिपापम्पर जगनम TAMIREना गमा परन दा-मे नाता पपन नामन परमात् । न रामपालमनामपुपनामantोमा।
माणूस्योपनिषद्
पौ.
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बममा भारमाका तमत
मष वा सतो विषमानस्स पवा [यों समयो कि] मिस
प्रकार रज आदिसे सपदिके सम्पन
बस्तुनो रज्ज्वादेः सादिवत्
| सत् अर्याद विधमान पस्सका अन्म
मायया सन्मयुन्यते न तु सस्तो मायासे ही हो सकता है, तलव
पषा वयाग्रायस्यापि सस एवा नहीं, उसी प्रकार अमल होनेपर
मी सरस्वरूप बारमाका, रमसे
स्मनोरन्जुसर्पवमगरपेण मायया
सर्पक सम्मन, जगतरूपसे उम्म
मन्म गुन्पते । न तु सतत होना मायासे ही सम्भव है-उस
एमामस्थात्मनो चन्म।
मही हो सकता।
यस पुनः परमार्थसदबमात्म किन्तु जिस पादीके मत
परमार्य सत् वामत्व ही अगर
तत्त्व जगदपेण घायवे पादिनो | रूपसे उत्पन्न होता है उस
नहिस्सार्म बायत इति शम्म
| सिदान्तानुसार यह नहीं कहा म
सफ्टा कि धनम्मा मस्तकाही मन
पतुं विरोधात् । ततस्तस्सा-
होता है, क्योंकि इससे लिये
उपस्थित होता है। छत पर मात
च्चिात
जायत इस्पापन्न | सिम हो माता है कि सो
मतानुसार किसी सम्मका
सम्मानपत्रा बावामायमान
बग्म होता है। किन्तु इस प्रकार
चन्मशीम्से ही सन्म मान्नेपर
स्वेन समावयमेकमेवारम- मानवसमा उपस्थित मात ।
फत यह सिमाना कि ममतल
तत्वमिति सिद्धम् ॥ २७ ॥
| अम्मा और एक ही है।॥ २७ ॥
बसदस्ती उसविसर्पमा असम्म
असतो मायया जन्म तत्त्वतो नैव युज्यते ।
पन्ध्यापुत्रो न सस्पेन मायया वापि जायते ॥२८॥
० मा.] भदेवप्रकरण मसातका चन्म तो मायासे अषय तक्त किसी प्रकार भी होना सम्मय महो। मम्प्याका पुत्र न हो वस्तुत उत्पन्न होता है और म मायासे ॥२८॥ असावादिनामसतो भावस वसादियोंके पक्षमें मी, घसद मायया तत्ववो पा न कथचन बस्तुका नम्म मायासे रुपया पस्तुत किसी प्रकार होमा सम्मत नहीं है, बन्म युपते, अष्टत्वात् । न क्योंकि ऐसा देखा नहीं जाता । कप्पाका पुत्र न तो मायासे उत्पन्न हि मन्मापुत्रो मापया सघतो | होता है और म बस्तही। मत पा चामते तसादप्रासादो दूरत | सापर्य यह हुआ कि वसाद को एवानुपपन्न इत्यर्थः ॥२८॥ सर्वया मयुक्त है ।।२८॥ फर्य पुनः सतो मायमेव सत्मस्तुका सम मायासे ही कैसे मन्मेत्युपते- | RATE यथा खप्ने द्वयाभास स्पन्दते मायया मन । सया जाग्रद्वयाभास स्पन्वते मायया मनः ॥२६॥ जिस प्रकार सप्नकालमें मन मापासे होतामासरूपसे परित होता है उसी प्रकार मामत्काउमें मी वा मापसे ही ईवाभासरूपसे कुरित होता है॥ २९ ॥ यथा रज्यो सिरिसता जिस प्रकार रामें कस्पना क्यिा हमा सर्प रग्गुरूपसे देखे सो रन्टरूपेणापेक्ष्यमाणःसमे मानेपर सत् है उसी प्रकार मन मी परमार्यशानसप आग्मसरापसे मनः परमार्थरिषफ्यास्मरूपेणा- देसा पानेपर सत् है। रगुमें सपि मम्मन मनास्पा येत्पमापं स प्रापग्राफरपेण में मापासे ही मार-माहराए | इनके वामपमनपसे सरित होता दयामास सन्दते खप्ने मापया, सी प्रकार या मन ही जामत माण्डत्योपनिषद् [गी. रब्यामिष सर्प । तथा तददव | अवस्थामें मी मापासे [ विविध रूपों में] सरित होता है, अर्थात् सरित मानज्मागरिते स्पन्दने मायया होता-सा माश्म होता है [वास्त मन स्पन्दत इथेत्यर्थ ॥ २९ ॥ सरित भी नहीं होता ] ॥२९॥ स्पन और पाति मन ही पिल्यास है अद्य च दयाभास मन स्वप्ने न सशय । मन्य च द्वयाभास तया जामन सशय ॥३॥ इसमें समेह मही सप्नामस्सा भरत मन ही देतरूपसे मासनेत्यम , सी प्रकार जामत्कार्मे भी नि सन्या वाप मन ही रेतरूपसे माम्सा ॥१०॥ गन्नुरूपण सर्प व परमार्थत रघुनपसे सद् सर्पके समान भारमरूपेणादयं सदयाभास भय मारमहपसे सत् मन ही सप्नमें तहपसे मासनेपाल मनः स्वप्ने न संशयः । नहि है-इसमें सन्देह नहीं । सममें हाभी वा माय पदाप और उन सने इस्त्मादि प्रार्थ सदग्राहक प्रहण करनेवाले पक्षु आदि दोनों पा पक्षराविवर्य विज्ञानम्पति ही विहानके सिवा और कुछ नही ऐसा ही नाम में भी है- रेफेलाति । यामदपि तपैवेत्यर्थः। इसका तात्पर्य है, क्योंकि दोनों ही क्यस्यामि परमार्थ सस् शिान ही परमार्थसविमानमात्राविक्षेपात् ३०/ समानरूपसे विधमान है ॥ १० ॥ परमापत रन्जसर्पषधिकारपनारूप देत | रमुर्म सपके समान विकल्पनारूप यह मन ही ऐतबपसे स्पिन-- रूपण मन एवेस्पतम् । तत्र ऐसा पो कहा गया । इसमें हो. भा०] मदतप्रकरण किं प्रमाणमिस्पन्वयम्पतिरेफ । प्रमाण क्या है। इसफ म्पेि छन्वय- म्पतिरेकरूप अनुमान प्रमाण का लक्षणमनुमानमा । कपम्- जाता है सो किस प्रकार-- मनोहश्यमिद हत यत्किषित्सचराचरम् । मनसो छमनाभाये द्वैत नैवोपलभ्यते ॥३१॥ यह जो कुछ चराचरत है सब मनका श्य है, क्योंकि मनका बमनीमात्र ( संक्त्यरत्यच) हो जानेपर की उपाधि नहीं होती ॥ २१ ॥ सेन हिमनसा विकल्प्यमानेन उस विकस्पित होनेवाले मनहरा प मनोध्यमिदं स सर्व दिलमयी देने योग्य यह सम्पूर्ण रेत मन ही है- या प्रतिधा है, क्योंकि मन इति प्रतिज्ञा । समाने | उसके वर्तमान बनेपर पर भी वर्तमान रहता है तया उसफर अमात्र भावाघदमाऽमावात् । मनसो हो भानपर इसका भी अमाम हो आमनीभाष निरोधे विषक | जात्म है । मनका जमनीमात्र- निरोध वर्यात् विवेकरिके बम्पास रनाम्पासवैराग्याम्पा रन्मा | और वैराम्पद्वारा रजु, सर्पक समान व्य हो जानेपर, वपय मिव सर्पलम गते षा सुषुप्ते दैत मपति-अवस्थामें तिथी उपलस्त्रि नमोपलम्प इत्पमावास्सिई नहीं होती । इस प्रकार ममाव हो जानेके कारण इतकी असता सिर देवस्थासप्पमित्पर्ध ॥ ३१ ॥ ही-पर इसका प्रत्पर्य ॥३१॥ तसपोपसे नमनीमार कथं पुनरमनीमाषः १ इति किन्तु या नमनीमान रोता किस प्रफम है। इस विश्यमें कहा उम्पवे- माणदफ्योपनिषद् [गी. आत्मसत्यानुयोधेन न सङ्कल्पयते यदा । अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे सदग्रहम् ॥१२॥ 'जिस समय नामसापकी उपाधि हानेपर मन सफाप मही करवा उस समय इ मनीमापको प्राप्त हो जाता है, उस अवस्था प्रापकर अमर हो जानेके कारण बह ग्रहण करनके विवायसे रहित हो यात्॥ ३२ ॥ आत्मैव सत्पमात्मसमृधि "[पयदि ] पाणीसे मारम्भ होने पाय विकम नाममात्र मृतिका कावत् "वाधारम्भकं विकारो ही सत्य है। इस प्रतिके अनुसार नामधेय मृचिकस्पेव सस्यम्" मृत्तिकाके सम्मन बग्मा ही सम (छा० उ० ६ ॥१॥ ४) इति है । उस आत्म-सस्पका शाम और आचार्य उपदेशके नन्तर योप भुतेः सस्स शाखापार्योपदेव होना बारमसमानुयोभ है । उसके मन्ववयोषा आरमसत्यानुपोषः । कारण सरस्पयोग्य बस्तुका वान हो जानेसे, दाप बस्तुका जमा रोन सहरप्पामावतया हो जानेपर मनिके दरकारपके सहल्पमते, दापाभावे चलन | वाक्के समान, जिस समय वित मिवाप्ने, मदा यमिन्याले उदा स्प नहीं करता उस समय 4 धमनस्कल्प वर्षात् बमनीमबछे रासिन्कालेऽमनस्ताममनोभावं प्राप्त हो जाता है। प्राय सफा पावि, प्राधाभाये तन्मनोऽग्रावभाव हो जानेसे प मन मस बर्षात् प्रहण-विकस्पनासे प्रामविकापनापतिमिस्पी३२ 'हो बाता है ॥ ३२ ॥ न वास्पशान सेि होता है। यपसदि दैतं फेल स्वमम- यदि यह सम्पूर्ण तवसत्प मारमतर्ष विपुष्यते १ इति । सो प्रात सत्य भस्मतत्वका जान उपके- लिसे हो। इसपर करठे- of. भा.] भदेवप्रकरण अकल्पकमज ज्ञान ज्ञेयाभिन्न प्रचक्षते । मज्ञेयमज नित्यमजेनाज वियुध्यते ॥१३॥ उस सर्वकल्पनाशून्य भवन्मा हानको विवेकी ग्रेग क्षेप प्रभसे अमिमा मतमाते हैं मम निस्का विषयमा हाल वनन्मा और निस्य है। उस बसमा धानसे मन म्प भारमतत्व सपही माना जाता है|॥ ३३ ॥ अकसर सर्वकल्पनावर्जित अल्पक सग मरम्नासि मत एवाई झार्न अप्तिमा | रहित कारण वनम्मा वाद चयेन परमार्थससा प्रणामिन्न मिम्ध धानको मसा मेग प्रचक्षते कान्ति प्रदिप पानी समायमस्काप बमसे न हि विधातुर्विवशतेरिपरिलापोवमिम बताते हैं । पग्निकी उष्णता- पे सम्पम मिल्यो शानका कमी विपसेन्यष्णात् "विधानमा लोप नहीं हावा । म शान नन्द प्रम" (३.० ३.९॥ बोर मानन्दस्थापन मुम्य, २८) "सस्यं झानमनन्तं प्रम" पान और मनन्त " स्यादि (ले० उ० २।१) इत्यादि वतियोंसे यही बात प्रमाणित भूविम्प । होती है। सस्यैग बिशेपणे प्राय उस (धान) केही विशेषण सागवे -मयम्' अपाद यस सम्य दिद ममय प्राविसका दानवनि मोण्यस्मेनामिपदभिभम् । तेना से न के समान मनसे अमित स्मम्बापेमार्जन मानेनाव मेय है । उम भरमसाप लामा मारमवस स्वपमेष नियुप्पत शमसे बाप जगन्छति। नित्यप्रकाशम्पम्प पही गाना जाता है। पर्य पर निम्म्याप पो पर सविता नित्यविशानेरस सुमन निस्परिबानमा मनाए पनवान मानान्वरमपेय दलो कारण र रिमी क्य इस्पः ॥ ३५॥ शानरी मोसा मला परम ॥१३॥ भाग्मात माणस्योपनिषत् [गो.का. सान्तचिका स्वरूप आत्मसत्पानुबोधेन साल्पम- आम्मपत्यकी उपलब्धि होनेसे कुर्वनाविपपामावे निरिध संपाप न करता या पिथ, नाम- विषयका वभाव हो जानेसे, इन्धन- नामिवत्प्रशान्तं निगृहीतं निरुद रहित बग्निके समान शान्त होकर निगृहीत अर्यात् निरुद हो जाता मनो मघवीत्युतम् । एवं च है-ऐसा कहा गया । इस प्रकार मनका धमनीमाव हो जानेपर देत- मनसो ममनीभाषे दैता का मी मात्र बनाया गप्पा । उस भाषमोक्तः । तस्मैषम् इस प्रकार-- निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमत । प्रचार स तु विज्ञेयः सुपुप्तेऽन्यो न तत्सम ॥ ३४ ॥ निग्रहीत, निर्विकल्प और किसम्पन्न घिसका जो म्यापार है विशेगपसे बातय है । सुषुप्ति-भास्सामें गो विचकी अति है पइ पम्प प्रकारकी है, पर उस ( निस्दावम्पा ) के समान मही है।॥३१॥ निगृहीतस्प निरुद्धस्स मनसो निगृहीत-रोके हुए, निर्विकम्प निर्विकल्पस्स सर्वसनावर्धित सब प्रफारकी कल्पनाओंसे रहित स्स धीमता विपकवता प्रचारा बोर धीमान्-शिकसम्पन्न चित्तका पः स तु प्रचारो विशेषेण या| उसका र म्यापार विशेरूपसे जो प्रचार-म्यापार है, योगियोंको योगिभिः। जानना चाहिये। ननु सर्पप्रस्पयामावे यायः मक्षा-सब प्रकारफी प्रीतियों का अभाव हो जानेपर जैसा म्यापार सुलिस मित्तका होता हैसा ही माप्तम्पस्य मनसः प्रचारस्तामा निस्तका भी दोग्य, क्योंकि प्रतीति काममात्र दोनों ही भरस्मामि मा०] महतप्रकरण एवं निरूदस्यापि प्रस्पयामाषा | समान है। उसमें विशेषमपसे विशेपास्फि तत्र विशेयमिति । जाननेयोम्प फौन-सी पात है। अनोन्यते-नेयम् पसात् समापान-स पिपयमें हमारा कहना है कि एसी बात नहीं है, मुपुप्तेऽन्य प्रचारोऽविधामोह क्योंकि मुसिमें वविपा-मोहम्प तमोग्रस्तस्पान्तीनानेपानर्थ | अधफमसे मस्त हुए तथा जिसके मीतर अनेको अनर्थ प्रतिफी पीन प्रचिलीमवासनावदो मनस | मूत वासनाएँ टीन हैं उस मनका म्यापार दूसरे प्रकारका है और मात्मसत्यानुवाधहुतामविप्लष्टा । मान्मसमय बोधरूप अग्निमे जिसकी अतिपायपी अनर्य-प्रतिका मीन विपानर्थप्राषिपीजस्म निरुत दग्ध हो गया है तया जिसके सम सान्पण्व प्रशान्तसईक्लेमरजसः | प्रकारके सेमाम्प दोर शान्त हो गये है उस निरुस पिचका स्तम्भ स्वतन्त्रः प्रचारः । मतो न प्रभार दूसरे ही प्रकारका है । अत. सत्ममः । वसापकास निमातु / उसके सनान नहीं है । इसलिये ताफ्प पर कि उसका मान मिस्यभिप्राय ॥ ३४॥ आय प्रात पाना चाहिये ॥३॥ मुगुप्ति मार समापिय मे- उन दोनौर प्रचारमेन्में छ प्रचारमददतुमाह- बताते सीयते हि सुपुप्ते तन्निग्रहोत न लीयते । तदेव निर्मय प्रक्ष ज्ञानारोक समन्ततः ॥ ३५ ॥ मानि वाम्बाम मन [अरिफरें] मन का माध, किन्तु मिर दोमार सद उसमें सीन नहीं होता। उम मार सोमब रमे हिमा निर्भर प्ररोह.n माणत्योपनिपद् [गोपा साम्तवृषिका साप आत्मसत्यानुवोमेन साइल्पम- भारमसस्पकी उपाधि होनेसे कुर्वनायविपयाभाषे निरिध संकल्प न करता वा पिस, बाग- | विश्यका अमात्र हो जानेसे, इम्पन- नामिवत्प्रशान्त निगृहीतं निरुद रहित अग्निके समान शान्त होकर | निगृहीत पर्यात् निरुप हो बाता मनो मवतीत्युक्तम् । एषं च है-ऐसा कहा गया । इस प्रकार मनका धमनीभान हो मानेपर देत- मनसो पमनीभावे देता का भी समान वस्मया गप्प | उस भावपोक्तः । सस्पैषम् इस प्रकार- निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमत । प्रचारः स तु विज्ञेयः सुपुप्तेऽन्यो न तत्समः ॥ ३४ ॥ निगृहीत, निर्विकल्प और विकसम्पन्न पित्तका जो म्यापर है विशेक्सपसे हाताप है । मुप्ति-अवस्थामें जो वित्तकी प्रति है बइ मन्य प्रकारकी है, यह उस (निरुमावस्या ) के समान नही ह ॥ २४ ॥ निगृहीतस्य निरुदस मनसो निग्रहीत-के हुए, निम्पि- निर्विकल्पस सर्वकारसनावस्ति | सब प्रकारको कल्पनाओंसे रहित स्य धीमता विषफसवः प्रचारा वीर धीमान्-विकसम्पन्न विष्का मी प्रचार-म्पापार है, पोगियोंको य: सुप्रपारो दिशेपेण शेयो | उसका ५ म्यापार विशेहपसे योगिमिः। जानना चाहिये। ननु सर्गप्रस्पयामाचे याच मरा-सुप प्रकारकी प्रतीतियों का अमाव ही मानेपर वैसा म्यापार समिस निचा होत्यसाही सुपसम्पस्प मनस प्रभारस्ताम्य | निम्मा भी होगा, क्योंकि प्रतीति. फाजमार दोनों ही स्वाम शा.भा.] मदतप्रकरण -------40- ममध स्वरूप अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् सकृद्विभात सर्वज्ञ नोपचार कथचन ॥ ३६॥ पर मम जन्मरहित, [बहानरूप ] निवारहित, स्वप्नशून्प, नाम- रूपसे रहिस, नित्य प्रकाशस्वरूप बौर सर्वह है, उसमें किसी प्रकारका फर्तम्य नहीं है॥ २६ ॥ बमनिमिचाभावास्सबापा जग्मके कमणा अभाय होमेसे ग्राम पाधाम्यन्तरा और वनन्मा म्यन्सरमजम् । भविषानिमिर्च है। रग्गु सर्पक समान नीवका जन्म हि बन्म रन्जुसर्पवदित्ययोधाम । बरिया के कारण है-ऐसा हम पहले कर चुके हैं। स्पोधि बारममयका सा भाविपात्मसस्पानुपापेन | अनुभव होनेसे उस अविपाकर निरोध हो गया है इमपिये मम वमन्मा निरूदा यतोऽनमत एवानिद्रम् । ६और इसीसे अनिद्र भी है। यहाँ अविपाठक्षणानादिमाया निद्रा । अविधानप मनारिमाया ही नि है। अपने अश्यस्यसपसे यह स्पप्नमे जप खापात्प्रदाऽवयम्बस्पेणात्मनाम: मा है इसलिये नसान है। उसक अस्सप्नम् । अप्रयापकते पस्प | मामरूप भी बहानक ही पारण है। नामरूपे । प्रमोधाप से रन्नुमर्प शाम होनर के रसमें प्रतीत दान बाले सर सपान नष्ट हो जावे पदिनप्टे इति न नाम्नाभिधीयते । ।त. अन्न किमी नामारा कपन मम रूप्पते पान कनचिरमका | मही किया जाता चौर म किसी रेगत्यनामारपफ च सन् । प्रकम सग सादी बनाया जान "यतो पापो निगर्वन्ने" (मठिये यह बनाम भार बार वैमा मिसिनगी छोर पानी उ०२।४।१)त्यादिमुतेः। - प्रतिमे मिर हा है। किं प सरुदिमात मदेर पीभही, इवण, पण रिभातं सदाभाम्पमप्रगान्पपा का तपा मिनिमम्मे १७२ माणम्योपनिषद् [गौ.. लीयते सुषप्तो हि यस्मात्सर्या- क्योंकि समसिमें मन अस्पिानि मिरविपादिप्रत्ययपीवपासनाभि | सम्पूर्ण प्रतीतियोंकी बीनमूत्र तम स्पमान सह वमोरूपमविशेषरूपं पोज- व्यसनायोंके सहित वपिरोक्हप पीचभाको प्रत हो भावमापपते वद्विषेकपिमानपूर्षफ नाता और उसके पिक पान- निरुद्ध निगृहीतं सम लीयते | पूर्वक निम्य किया जानेपर मैन मही वमोपीवभाष नापपते। समायुका | ऐता, वर्षात् जबानरूप बीसमाये प्रचारमेद: सुपप्तस्स समादिवस प्रत नहीं होता।बत सुपात और समाहित चित्तका प्रचारमेव बैंक मनसः। यदा ग्रामग्राहकाविचारुत जिस समय चित प्राम-मारकरूप पश्चिासे होनेवाळे दोनों प्रकारके मलइयवति तदा परमर्म | मोंसे रहित हो जाता है उस मन तत्संवधमिस्पतस्तदेष समय वह परम अद्धितीय अमरूप ही हो जाता।मतदैतमामरूप निर्मयं तयाणस्य भमनिमिचस्पा | मपके कारणका अभाव हे मानेसे [ग्स नक्स्थामें ही निर्मम होत भाषात् । शान्तमभयं प्रम]प्रम शाम्त मौर बम्पपद जिसे जान मेभेपर पुरुष किसीसे पदिशाम बिमति मुखमन। महारता । तदेव विशेप्यते प्रतिनि उसीका मिशण पतमा हे। मान्मस्खभाषचैतन्य सदेव पान-पानका वर्ष शनि अर्यात् मारम- मालोका प्रकाशो यस सास सहप पैतन्य है, इ मन की पानातोकं मिशानकरसपनमि-निसका भागेक पानी प्रकार है स्पर्षः समन्ततः समन्तात्सप्ता पइ मा बानाम्येक नर्यात शिनका रसत्ररूप है। समस्तत.-सब मोर प्पोमवन्नरन्तर्येम प्यापक वर्षात् बाकाशके सम्मन निरन्तरता से सब ओर म्यापको॥५॥ मिस्पर्धः ॥ २५॥ -+HD+- प. मा -] मदतमकरण ममसरूप . अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् सकृद्विभात सर्वज्ञ नोपचारः कथचन ॥ ३६॥ पर प्रम जन्मरहित, [बहानरूप ] निवारहित, स्वप्नशून्प, नाम- रूपसे रहित, निस्य प्रकाशस्वरूप और है, उसमें किसी प्रकारका काव्य नहीं ॥२६॥ चन्मनिमिचाभावात्सवामा चन्मके कारणका अमाप होनेसे ग्राम मायाम्फ्तरी और बन्न्मा मन्तरमबम् । अषिचानिमिर्च है। रम्जुमें सकि समान मीयका मन्म हि सन्म रज्जुसर्पवदित्पपोधाम । अविपाके कारण है-ऐसा हम पहले कर चुके हैं, क्योंकि बारमसम्यका सा पाविचास्मसत्पानुषोपेन | अनुभव होनेसे उस अक्पिाका निरोप हो गया है, इसलिये ब्रम नजन्मा निरुदा यतोऽममत एवानिद्रम् । है और इसीसे बनिन भी है। यहाँ अषिपालपणानादिर्माया निद्रा । | मनिपारूप पनादिम्पय्य ही निया है। अपने बायस्परूपसेर सप्नसे नग स्वापात्प्रपुरोऽदयस्वरूपेमात्मनासः हुवा है, इसलिये वस्पन है। उसके अस्वप्नम् । मप्रबोधकवे भस्म | नाम्हण मी वानके ही कारण है। नामरूपे । प्रबोपाच ते रन्मुसर्प | मन होनेपर वे रग्गुमें प्रतीत होने मासे सर्पक समान ना हो जाते पदिनप्टे इति न नाम्नाभिधीयते है ।बत प्रम किसी मामद्वारा कपन प्रम सप्पते पान कनचित्यकामही किया जाता और न किसी रेणस्पनामकरूपकं च सत् । प्रकार उसका रूप ही बताया जाता "यतो पाचो निवर्तन्ते" (३० इसीलिये यह वनाम और वरूप है, पैसा कि पहसि पाणी मै पाती उ० २।४।१)इस्पादिभुतेः । इस्पादि मुतिसे सिद्ध होता है। किं च सफदिमात सदैव यही माही, पक्षण, चम्पा- विमासदामारुपमग्राणान्पया तपा वाचिव सोमायसे प्राण
मास्योपनिषद [गोमा
ग्रहणाविमायाविरोमावर्जित रदित होनर पारण साहिवन-
त्यात् । महमाग्रहणे हि राम्पानी | सा हो मासनवाया वर्षाद निक-
प्रयासत्याप । रण और
तममाविद्यालयणं सदाप्रमातत्वे
चपदण ही राग्नि और न है सप
कारणम् । सदभावामित्यचतन्य | अपिपासप अन्धकार ही मा
माके प्रमाशिन न होने परम
भाम्पस्वाप मुक्त सहदिमात
है
। उरामा अमात्र दोनमे और
मिति । अव एप सर्व प निम्यवेतन्यस्तरम्प होनसे प्रमा
वन्सम्यरूपं घेति सर्वत्रम् । नेह निम्पप्रकाशस्यम्प होना ठीक ही है।
मन सब भार मिरप होनसेर
प्रक्षम्मेवनिध उपधरणसुपचारः सच है। इस प्रकारक मझमें कोई
फतम्य । यथान्येपामात्मस्तम ) उपचार यामी क्लम्प नहीं है, जिस
प्रकार कि दूसरे मामलापसे
मिम समाधि आपसम्म है।
नित्पादमुकम्पभावस्था
तात्पय पाकिम निम्प-शुद्ध
पण: फर्थचन न कथंचिदपि
पुर-मुकत्सम्यम है इसडिपे माता-
फर्तम्पसंभषोऽपिधानाम इत्यर्थः
का मान हो जानेपर विहानको
कुछ भी पम्प रहना सम्मा महा
भ्पतिरफेण समाधानापुपधारः ।
अनामकस्वायुकार्यसिदये बनामकल वारि उपर्युक वर्ष
देसुमार-
सर्वामिलापविगत सचिन्तासमुत्थितः ।
सुप्रशान्त सकृज्योति समाधिरचलोऽभय ॥२७॥
र सब प्रकारके वाभ्यापारसे रहित, सब प्रकरके चिन्तन
(ककरण म्यापार ) से उपर अस्पन्स शान्त, निपाकाश, समाधि
सम्प, अपर और निभप ॥१०॥
शा० भा०]]
मठेवप्रकरण
मभिलप्यतेऽनेनेस्पमिलापो पिसके ारा शब्दोधारण किपा
जाता है 'धमियप' अर्यात्
पाकरण सर्वप्रकारस्यामिभानस्प, ! 'चा' है, जो सब प्रकारफे शम्दो
धारणका साधन है, उससे रहित ।
तमाद्विगतः। पागनोपलक्षणार्या | यहाँ वागिन्द्रिय उपलक्षणक लिये है,
वत तात्पर्य यह है फिर सध
सर्वपापकरणवर्जित इत्येवत् ।
| प्रकारकी वाध इन्द्रियोंसे रहित है।
तथा सर्वाचिन्तासमुस्थित । तया सब प्रकारफी चिन्तासे
चिन्त्योऽनयेति चिन्ता पुद्धि
उदय हुआ है। जिससे चिन्तन
किया जात्म है वह युदि ही चिन्ता
स्तस्याः समस्थितोऽन्त करण |है, उससे उठा हा है नात्
वर्जित इत्यर्थ "अप्रामो पमना
क्त फरणसे रहित १ मा कि
"प्राणरहित मनोरहित और शुद्ध
शुम्रो पक्षरात्परतः पर" ( म०1। तया पर अक्षरमे मी पर है
उ०२।१।२) इत्पादिमते । इत्यादि पतियोंमे प्रनारित होता है।
यमात्सर्व विषयवर्दितोऽत क्योंकि यह सपूर्ण विषयोंसे रक्षित
है इसपिय मयत शाम्त है,
मुप्रछान्त , सफज्योति सदैव | सायोति अर्थात् वाग्मचैन्यरूप
न्योविरास्मतन्यस्वरूपण,
से साही प्रश्न स्वरूप, साधिके
परणसे होनपरी प्रहासे उपरम्प
समाधि समाधिनिमिचप्रमाप | होने कारण सम्पति है, अप
इसमें विच समाहित पिया जाता
गम्पत्वान
समाधीयतऽसिमिति
है इसम्पेि इसे समानि कहत है,
पा समाधिः, अपसोऽपिफिय ,
बघड अपात् अविषारी और
इसी वितरफा अमाव होने कारण
यत एवामपा विक्रियामापात् ३७ ही मप है ॥ ३७॥
मागुपयोपनिषद् [गी.. यसादव समाधिरचलोऽभय क्योंकि प्रमही सम्पपिसरूप, वछ वीर अभय है ऐसा कहा इत्युक्तमत गया है, इसम्पेि- ग्रहो न तन नोत्सर्गचिन्ता यत्र न विद्यते । आत्मसस्य तदा ज्ञानमजाति समतो गतम् ॥ ३८॥ निस (प्रमपद ) में किसी प्रकारका चिन्तन नहीं है, उसमें किसी तरहकर ग्रहण और त्याग मी मही है। उस बास्मा बारमनिष्ठ धाम अमरहित और समताको प्राप्त मा रहता है ॥ ३८ ॥ न तत्र तसिन्ममणि ग्रहो नहीं -उस प्रझमें म तो मर- प्राण यानी उपादान है और न प्राणमुपादानम्, नोस्सर्ग उस्सर्जन उत्सग उत्सर्जन अर्याद त्याग ही हानं पा वियते । यत्र हि । अहाँ विकार नपवा स्किारकी निक्रिया वदिपपस्वं या तत्र | विषयता (विस्त होनेकी योग्पा) होती है वहीं ग्रहण और स्पाग भी हानोपादाने स्माता न सममिह किन्तु यहाँ अममें उन प्रमणि संभवति । विकारहेतोर | दोनोंहीकी सम्माना नहीं है न्पस्सामामाभिरवयषस्वाद ।। क्योंकि उसमें रिकारका तुम्त करें गतो नत्र हानोपादाने इत्यर्पः। क्न्य पदार्प है नहीं वीर बहस चिन्ता पत्र न विपते । सर्व | निरक्या है । इसलिये सात्पर्य यहीक | उसमें प्राण और स्याग भी सम्मा प्रभाव चिन्ता न संमपति! महा है। वहाँ चिन्ता नही है बर्मात मनोरहित होनेके करण जिसमें पत्रामनस्त्वासवखत्र हानो- किसी प्रकारको विम्ता सम्भव मही पादाने इस्पर्षः। हैपदाँ स्पाग और प्राण कैसे व | सकते हैं। यदैवात्मसस्पानुबोधो बात- जिस समय मी वारमसत्यकामोष स्वदेवास्मसंस्थ विपयामाषा-होता उसी समप मामास भवति । शं० भा.] मदतप्रकरण दग्न्युष्णवदात्मन्येत्र सितं मर्याद पिम्पका अमाय होने के कारण ममिकी उष्णताके समान अजाति जातियर्जितम् धारमा ही सित झान भजाति- समतो गत परै साम्पमापन्नं नमरहित और समताको प्राप्त हो जाता है। परम्दो प्रतिझावमलो पक्ष्या- पहले ( इस प्रकरणके दूसरे स्मक ) जो प्रतिमा की थी कि म्पकार्पण्यममाति समतां पसलिये मैं समान मायको प्राप्त, गवमितीदं तदुपपचितः मात्र बामा मतपणनाका कर्णन कहेंग्या उस पूर्वक्षनया ही यहाँ बासि तमोक्तसपसंहियते, अबाति सम्ता गतम् ऐसा कहकर युक्ति समवां गवमिति । एतसादात्मस और शासधारा उपसंहार किया गया है। हे गर्गि ! जो पुरुष इस त्पानुपोधात्कार्पग्पविपपमन्यत् अक्षर ग्रामको विना आने ही इस "यो पा एतदक्षरं गार्यवि | छोपसे पग चावा है यह कृपम है। इस वक्केि अनुसार कृपणताका दिलामारलोकास्पैवि स रुपणः" विषय तो इस बात्मायके गोधसे (१० उ० ३ । ८।१०) इति | मिम ही है । तात्पर्य यह है कि इस तरको प्राप्त कर स्नपर तो हर मुतेः । प्राप्तस्सर्ष इतकस्यो | फोर कृतास्य ग्रामण (प्रनिष्ठ ) हो मामवोमवतीत्यभिप्रामः ॥३८॥ याता॥२८॥ - मस्परायोगकी दुर्गमता पपपीदमित्यं परमातलम् । पपपि र परमार्य तत्त ऐसा है तयापि- अस्पर्शयोगो घे नाम दुर्दशः सर्वयोगिभिः । योगिनो विम्यति झस्मादभये भयदर्शिनः ॥ ३९॥ मट १२- ----------------- माणफ्योपनिषद् [पो.का [सव प्रकारके स्पर्शसे रहित ] यह मस्पर्शयोग निभय ही योगियों के ये कठिनतासे दिखायी देना है। इस मप पदमें भय देखनेयसे योगी-मेग इससे मप मानते हैं।॥ ३९ ॥ मस्पर्शयोगो नामापं सर्ष यह नस्पशयोग नामबाब है वर्षास् सर्वसम्बन्धरूप स्पर्शसे संबधारस्यस्पयर्जितस्वादम्पर्श रहित होनेके कमण या उपनिक मि योगो नाम ये सर्यते प्रसिद्ध | रपर्शयोग नामसे प्रसिद्ध होकर स्मरण किया गया है। यह भेदान्त- मुपनिपस्सु । दु खेन रयत इति प्रतिपादित विधानसे रहित समीयोगियों- ईद " सर्वेयोगिमिः वेदान्त | को कठिनत से दिसयी देता है, इसलिये उसके रिये दुर्दर्श है । तात्पर्य या विहितविज्ञानरहिते सर्वयोगि , कि यह एकमात्र भारमसत्यके मि ।मारमसत्यानुमोवायासलम्प अनुपम भौर [ श्रवण-मनन एवं | प्राणायामाटि ] धापासकि हारा 0 एपेग्यर्थ । प्राप्त होन योग्य है। योगिनो पिम्पति प्रसास्सर्व पोकि सम्पूर्ण भपसे रहित मपपर्जिवादप्पात्मनाशरूपमिम | होनपर भी इस योगको वामनाश- योग मन्यमाना भय कुर्वन्ति रूप माननेके कारग इस बभप योगमें भय देसनेपाजे-मपा समयेऽसि भयदर्शिनो भयन निमित्तमूत मारमनाश देसनवाले निमिचात्मनामदनशीला मर्यात् अपिकी योगलोग इससे मविपेकिन इस्पर्क ॥ ३९॥ । भय मानते है॥ ३९॥ । बम्प पोगियो शान्ति मनोनिमाले पीन है येपा पुनप्रसस्त्ररूपम्पतिरफेन पिनकी परिमें ग्रामसपसे रन्जमुपवस्फसितमेव मन अतिरिक मन और इन्द्रिय वादि इन्द्रियादि पन परमार्यतो रग्समें सपने समान कल्पित ही
शा. भा०]
मदेवमकरण
मिपते तेपो प्रमखरूपाणामभयं | है-परमार्यत है ही मही, उन
प्रमानेकी निर्मयता मोर मोक्ष
मोक्षारुपा पाथया शान्तिः |संक अक्षय शान्ति सो समासे
ही सिद है, किसी के अधीन
समाषत सिदा नान्यायचा
नहीं है, जैसा कि उसके लिये
नोपचारर फरचनेत्यवोचाम । कुछ मी फर्नम्प नहीं है ऐसा हम
| पहले (छतीसमें श्लोकों ) कर चुके
मे त्वचोऽन्ये योगिनो मार्गगा है। किन्तु नो इनसे धन्य परमार्य-
हीनमभ्यमएयो मनोऽन्पदात्म | पयमें घटनवाले हीन और मप्यम
रहिवाले योगी मनको भाग्मासे मिन
म्यतिरिक्तमात्मसमधि पश्पन्सि
बारमाका समन्धी मानवे है, उन
तेपामात्मसत्यानुमोधरहिवानाम्- बारमसम्यक बोधसे रहित--
मनसो निग्रहायत्तमभय सर्वयोगिनाम् ।
दुःस्वक्षयः प्रमोषधाप्यक्षया शान्तिरेव च ।। १. ॥
समस्त योगियोंके अमय, दुख्शय, प्रबाघ भीर अक्षय शान्ति
मनके निमाके ही भवीन है॥१०॥
मनसो निग्रहायचमभर्य समस्त योगिपोका ममप मनके
सर्वेपां योगिनाम् । किं च
निप्रहके अधीन है। यही नहीं,
दुसमप मी [मनोनिमाके ही
दुःलवयाऽपि,न पात्मसंवन्धिनि अधीन ], क्योंकि बाग्मामे
मनसि प्रचलित दासलपोऽस्ति | सम्बन्ध रखनेअले मनरे पडायमान
राते हुए अविवेकी पुरुषोक दुस-
भविवेकिनाम् । किं धात्म
क्षप मही हो सफरप । इसके सिपा
प्रमोधोऽपि मनानिग्रहायच एव । उनका बारमझान भी मनके निमाइके
हीकीन है तामाक्षनाम्नी उनकी
तपायपापि मावास्या सान्तिः
मशय शान्ति भी मनोनिमहके ही
वेपो मनानिप्रहायचय ॥४०॥ अधीन है॥ १० ॥
मागस्योपनिषद [गी ममोनिमा पूर्वक ही हो सकता है उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकयिन्दुना । मनसो निप्रहस्तद्वद्भधेदपरिखेदत ॥११॥ निस प्रकार [ उहिमता छोड़फर ] कुशाके अममागसे एक-एक दारा समुद्रको उठीचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकारको सिवाका स्याग कर देनेपर मनका निग्रह हो सकता है॥११॥ मनोनिग्रहोऽपि वेपामुदधे कुशक अप्रमागसे इशाग्रे वैफपिन्दुना उत्सेचनेन यूदके द्वारा समुद्रके उसेचन वर्षात् मुखानेके प्रफनके समान नोपणम्पयसापबष्यषसायमा भसिमपित भौर उपमशीन मनवसभान्त करणानामनिर्वेदा रानेवारे उन योगियोंके मनका निह भी खेदशून्य रानेसे होता दपरिखेदतो भवतीत्यर्थः॥४१॥ | है-यह इसका तात्पर्य है ॥ ११॥ मनोनिमाके विम किमपरिस्विमव्यवसायमात्र तो क्या स्सेदरहित उयोग ही मेन मनोनिग्रह उपायः !न, | मनोनिग्रहका उपाय है! इसपर इत्युपते । कहते हैं-'मही उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्त कामभोगयो । सुप्रसन्न लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ ४२ ॥ काम्पपिप और गेम विक्षिप्त हुए पित्तका उपायपूर्णक निम्स करे तथा व्यावस्पामें अस्पत्त प्रसमताको प्राप्त हुए पिचका भी संपम करे, क्योंकि जैसा [ वनकारक ] काम है मैसा ही व्य मी ॥१२॥ अपरिसिन्नम्पवसायमान्सन् भएक उपोगशील होकर बागे पस्यमाणेनोपायेन काममोग करे मामेवाले उपायसे काम और विपयेषु विक्षिप्त मनो निगृही- | मगलप वियोंमें विक्षिस ए पिका ० मा.] मतप्रकरण । माभिम्पादास्मन्पेवेत्यर्थः । निमारे, वर्मात् उसका बारममें ही निरोध करे । तण, मिस स्मामें कि च लीयतेऽसिमिति सुप्रप्तो | चित्त लीन हो जाता है उस सुषुप्ति- का नाम य है, उस रूपापस्मामें लयस्तस्मिल्लये प सुप्रसन्नम् | अत्यन्त प्रसन्न अर्पात् आयासहित पायासपबिंदम् अपि इत्येतन, निह परे । यहाँ निगृहस्पावर स्थितिको प्राप्त हुए पितका मी निगृहीयादित्पनुवर्तते। इस परमी बनुचि की जाती है मुप्रसन्न पेस्कस्माभिगमन यदि उस भवस्मामें पित्त अस्पत प्रस्न हो जाता है सो उसका इत्युप्यते । यमापया कामो | निग्रह क्यों करना चाहिये ! इसपर कहा जा 8-पोंकि जिस प्रकार ऽनयरितस्तथा लयोऽपि । अतः काम अनवका फरण है उसी | प्रकार एप भी सम्येि तात्पर्य फामपिपपस्य मनसो निग्रह | यह है कि फामविश्पक मनके निहफे समान उसका उपसे भी पाल्लपादपि निरोदरूपमित्यर्थ४२ | निराध करना चाहिये ॥ १२ ॥ -- का म उपायः इस्युच्यते यह उपाय पाइम रिय- में पहा आत्य है.-- दुख सर्वमनुस्मृत्य कामभोगानिदर्तयेत् । अजं सर्वमनुस्मृत्य जात नैव तु पश्यति ॥ १३ ॥ सत्यति दुगुना है-ऐमा निम्न स्मरण करते र बिचको फाममनित भोगमे यो । इस प्रकार निरम्र सय सीमो धनमा प्रम स्मरग परता आटि फो जात पा न देत ॥१३॥ तमविपाविम्मित मरियमे प्रनीत दनगर मारा इसमपम्पनुम्मन्य भ्रमभागा मापदी मा Pree माणग्योपनिषद् [गी. स्फामनिमिचो भोग इछापिपय स्मरण करता हुआ काममोगसे- | कामनानिमित्वक भोगसे मात् स्वमादिप्रस्तं मनो निवर्तये मजनित विश्पसे उसमें फैलाए चितको पेराम्यभावनाबारा नित राम्पमापनयेत्यर्थः । अब प्रम को यह सका तात्पर्य है । नि 'यह सब भन्मा प्रमही. सर्पमित्येवच्छासापार्योपदेशतो- | ऐसा शास और भाषाके उपश्य- नुसार निरन्तर स्मरण करता जा ऽनुस्मृत्म वरिपरीत देसजातं नैव उससे विपरीत तनातको-उसका अमाव हो बानेके कारण हमही तपश्मवि, अमावात् ॥ ४३ ॥ देसा ॥ १३ लये संबोषयेधित विक्षिप्त शमयेत्पुन । सकषाय विजानीयात्समप्राप्त न चालयेत् ॥ ४ ॥ पित [अप्तिमें ] मन होने यो सो उमे पारमविक नियुष्ठ करे, पदि विछिप्त हो जाय वो उसे पुन पन्त करे भौर [ पदि दोनोंक बीयकी अवस्था ये तो उसे ] सकपम्परागयुक्त समझे । स्या सम्पापस्थाको प्राप्त हुए पिसको परम करे ॥१०॥ एपमनेन झानाम्यासपेराम्य इस प्रकार पानाम्पास वीर प्रमोपायेन ये अपने लीन वैराग्म-इन दो उपापोंसे, म्प वर्षाद सुषुप्तिम स्मन ए विचको सम्बोधित संबोधयेन्मन आरमविवेक-वर्षात् भात्मविवेकदर्शममें नियुत दर्शनेन योजयेत् । पिचं मन करे । पित्त और मन-ये कोई मिन्न पदार्प नतिमा कामना और इस्मनपान्तरम् । मिषिप्त प] मोमें विशित हुए विकको पुन अमभोगेष इममेपुनः । एवं शान्त करे । इस प्रकार पगार पुनः पुनरम्पसको छपारस पोधित अभ्यासमरा लयापरवास सम्बोधित शां. भा०] मतप्रकरण विपमेम्पय व्यावर्तित नापि , और विस्पोंसे निवृत किया हुआ साम्पापन्नमन्तरालायस्थ सम्पाप, पित नव पक्राणवस्थामें सिव सरागं पीजसंयुक्त मन इति | होकर सम्पको भी प्राप्त न हो को यह समझे कि इस समय विजानीयात् । सतोऽपि यमत मन सकवाय-रागपुक अर्थात् मीना- साम्पमापादयेत् । यहा हु | मस्सासंयुक्त है। उस क्लासे भी उसे पनपूर्वक साम्पापसा स्पिन समप्राप्त मवति समप्राप्स्पभिमुखी | करे । किन्तु निस सम्प का भवतीस्प। ततस्तन्न विचाल- | समताको प्राप्त हो वर्षात् साम्या- बस्साप्राप्तिके अभिमुख हो उस सम्म येदिपयाभिमुख न कुर्यादि उस भास्मामें उसे विचम्मित न करे, अर्याद बिरयाभिमुख न परे ॥११॥ स्पर्धः ॥४४॥ नास्वादये सुख तत्र निसङ्ग प्रशया भवेत् । निमल निधरश्चित्तमेकीकुर्यात्पयनत ॥१५॥ उम माम्पावस्था [ प्राप्त होनेवाले ] मुमुका आस्वा न म करे, गम्कि मिलेकाली पुदिके द्वारा उमसे नि सा रे । फिर पर रिच वाहर निकम्ने ग्मो तो उसे प्रयत्नातक निपठ और एफ्यम करे ॥ १५॥ समाधिसतो यागिनो। माविकी इबाले योगको यत्मुल जायते सन्नास्माइयेव, जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न परे वर्षात् उममें राय सय नरन्तेत्यर्थः । कथं तर्हि ? | नरेनो ति कसे रहे । म निःसनो नि पर प्रसपा विवेक ] सा वर्षात् नि सह होकर प्रहा- सिरनी पुदिसे मी म्परना करे पुदपा यदुपलम्पते मुख पद र यह जो पुर मुए अनुमप से रियापरिकसित मृपयेति हाम अपि परिकम्पित और निप्या ही है। दयय मह कि उस विभारयेत् । ततोऽपि मुम्न मुराम रागसे भी रिचा निह रागान्निगृसोयादिस्पः। | करे।
मास्योपनिषद्
[गी.
पदा पुनः सुखरागान्निा मिस सम्प मुखक रागसे निरच
निमलम्बमाष सन्निपरहहिनि होकर निघस्समाप हुआ चित्र फिर
गच्छमवति चिचं ततस्ततो याहर निकाल्ने टगे तब उसे उपर्युक
उपायसे म्हसि मी रोक्कार प्रफल-
नियम्पोक्कापायेनात्मयैकी
पूर्वक आरमामें एकाग्र करे । ती
कत्प्रियसतः । चित्स्वरूपसचा | यह है कि उसे चित स्वरूप सध
मात्रमेवापादयेदिस्पर्थ ॥४५॥ | मान ही सम्पादित करे ॥ १५ ॥
।
मन रूप पपरूप होता है।
यदा न लीयते घिस न च विक्षिप्यते पुन' ।
मनिलंगनमनाभास निप्पन्न ब्रह्म तचदा ॥ ४६॥
मिस समय चित्त सुपप्तिमें छीन हो वीर फिर विक्षिप्त भी न हो
तपा निघउ र स्याम्पससे रहित हो जाय उस सम्प यह मान ही
हो जाता है॥४६॥
पथाकापायन निराही उपर्पक उपायसे निह किया
आ पित्त विस समय पुन
विष यदा मुषप्ते न सीपते नमीन महीं होता और न किन
प पुनविषय विधिप्पते, निरमि ही पक्षिम होता है वा
अनिझनममलं निवातप्रदीप मायुम्य स्थानमें से ए दीपके
| समान लिया और बनामास अर्पाव
कस्पम्, अनाभासे न फल-
जा मिमी भी वस्थित रिपारमे
चिम्पासियसन पियमावेनाय प्रति नहीं होता-ऐमा निस
मामत पति, पदेवतपणं विक) गमय पद रित हो जाता है उस
| गमय पर नही जाता है,
तदा निपन मन प्रमस्वरूपण [अात् वरा माम्मा चित -
निपनंवित भरतीरपः ॥४६॥ गमे निफ्न हा गाय ॥१९॥
ज०मा] मवारण स्वस्य शान्त सनिर्वाणमकथ्य सुखमुत्तमम् । मजमजेन ज्ञेयेन सर्वन परिचक्षते ॥४॥ [साम्भामें वो बानन्द अनुमा होता है उसे प्रशन लाग] स्वम्भ शान्त, निर्वाणयुक, अवयनीय, निरामयसम्मन्नम्प, मनग्मा, अमन्मा देय (मन) से अमिन और सह बताते है॥ १७ ॥ पयोत परमार्थमुखमारम उपर्पक जाम्मपानुमाफरप सत्पानुपाधलक्षण स्यम् वात्मनि परम्पर्थ-मुख 'सस्थम्'-अन आमा में ही स्पिन, दान्मम्-मब प्रकारचे स्थितम्, शान्तं सर्वानोपमम | अनयी नितिनप, 'सनिवागम् - स्पम्, सनियोग नितिनियाण निर्वाग निति अर्थात् पंपम्पको पात, उस निर्गगक सहित, कात्म सह निर्माणन बढेव, (नया भरप्पम्'-दो पहा मजा सके, सुगाकये न सम्पत फयापितम्, स्योंकि उमपा सिप अपन भस्यन्तामाधारगविपयत्वाद असार मुम्मुखमम्' यागियों पाहीमपक्ष होनवागहानापारण मुम्बमुसम निरति हि निरतिशय मुगानमा अगम्' जो ववागिप्रस्पक्षमय । न जातमि-| उक्न न घा, निम प्रहार कि सिपमम्मी मुग आ पाता है, स्पई पथा विपपविषयम् । और अन पनी टपन नहान अजनानुत्पनेन पेनापतिरिन पिसे भकिन दोना पसग भरन सरस्पन समनपा सरर्म प्रयच मासे म मन्नती र सुग परिमयन फपपदि-मा माग [ उमर शिपमें] मनविदा ॥४७॥ पहा॥१०॥ . पया net मा मनानिमामि । Ftr: मन तारासिमकिसनना पाना मनात मागम्योपनिपत् [गौ० प. परमार्थस्वरूपप्रतिपस्युपायत्वेन न, उपासना परमार्थस्वरुपकी प्राप्टिके उपायम्पसे ही कहे गये हैं। ये परमार्थसत्य नहीं है। परमार्पसस्प परमार्थसत्पेति । परमार्थसमं तु | तो यही है कि- न कधिज्जायते जीव' सभवोऽस्य न विद्यते । एतचदुत्तम सत्य यत्र किबिन जायते ॥४८॥ कोई भी सीव उत्पन्न नहीं होता क्योंकि उसका कोई कारमही मही है। जिस अजन्मा प्रममें किमीकी उत्पति मही होती पही सर्वोत्तम सस्य ॥ १८ ॥ न फपिजायते मीच फा| को भी नीव उत्पन्न नहीं होता- भोक्ता च नोस्पयते फेनचिदपि अर्यात् किसी भी प्रकारसे कर्ता- प्रकारेण । मवः स्वभावतो- मोक्ताकी उत्पचि नहीं होती । मत ऽअस्सास्पैकस्पात्मनः | समावसे ही इस एक जनन्मा बास्मा- कारणं न पिषत नास्ति । क्योंकि इसका कोई कारण महा। का कोई सम्भप-पारण महा।और मसान्न पिपरोऽस्स कारम वमान्न | इसलिये किसी भीषकी उत्पति मी फभिमापसे जीप इरपेतत् । पूर्व | नहीं होती-पही इसका तात्पर्य है। पूपायरयनोक्तानां सत्पानामेव | पहले उपापरूपसे बताये ए दुचर्म सस्यं पसिन्मत्यस्वरुप | सस्पमि यही उत्तम सत्य , निस प्रसपशुमात्रमपि किंचिन्न स्पस्वरूप में कोई भी बस्त जायव इति ॥४८॥ मगुमात्र मी रूपम नहीं होती ॥१८॥ समय: इति श्रीप्रेरिन माम्म्पपा शिष्यम्य परमाईसपरिपत्रकापार्यस्य श्रीशहरमगरत सीग्रपादीयागमासमाम्मेजतारूप गृतीयं प्रकरणम् ॥३॥ वत्सद अलातशान्तिमक्षरण मोझारनिर्णयारेणागमन योहारके निर्णयारा बागम प्रकरणमें प्रतिज्ञा किसे पतका- प्रतिज्ञातस्पाइतस्य जिसे कि (तम्पप्रकरणमें ] पास पापविपममेदवेतप्पा विषयभेदके मिष्यावद्वारा सिप किया र सिदस्य पुनरदेसे है और फिर मौतप्रकरणमें शाम शानयुकिम्पा साधान्निर्धारित | और युधियोंसे साक्षात् निश्चय किया है, [ पिछले प्रकरणके ] स्पैवदुसम सस्यमित्युपसंहारः | मन्तमें एतदुसम सम्पम्' ऐसा करकर उपसदार किया गया । क्य वोऽन्ते । तस्पैतस्पागमार्यस्या- के सहपर्पमत इस बातदनिके रैवदर्शनस प्रतिपक्षमता रैतिनो विरोभी ना देसवादी बोर नाशिक (बोर वादि) उनके दर्शन परस्पर पैनाशिफाय वेपो चान्पोन्म विरोधी होनेके कारण राग-पादि पोशाक अध्य, मत विरोधादागपादिक्तेशास्पद मिथ्यादर्शनल होता है। और राषादि पोका दर्भनमिति मिम्पादनत्व भाभय म होनेके कारण पत्तदर्शन ही सम्पम्दर्शन है-इस प्रकार उसकी पचिवम् । सेशानास्पदत्ता साति की मस्ती है। मब यहाँ, सम्पदर्भनमित्पदैवदर्शन परस्पर विरोधी होनेके कारण विस्तारपूर्वक उन (देवबादी वादि स्तूपते । बदिर विस्तरेणान्योन्य (पानिकोक दशन ) का मिप्यार दर्शमस्व प्रदर्शित कर उमके प्रति- विरुस्त्यासम्पम्दर्भनव प्रदर्य | पेघदरा पायायायसे. वातान- .मनुमान रो परचमक्सी मोर पसरे मा भनुम्मन- मैं एक परी बचाये दूही रखकी सप सिंह की बाती व परिसीम एकमखमभाषते पूजी पक्षन ममा यि किया बाय है। इस अतिरेको भनुमानचदीप नाम भाषीय मनुमान भी। उनका महापापभिर [it. प्रतिधनादेगदानमिदिरुप की सिदिफा टपमहार बाना ई-सी सम्पापीत पायनस्यठात लिये पातशान्तिप्रकरणमा नाम मातिगरम्पन। थित्या पाल। मप्रादमानसम्पाप तामसम्प्रदायक प्रदरम्परपण नाकारापी पति अतसे ही नमस्कार ज्पमापन्गका थापापपूजा परनय लिये यह पहला शौक है, पोकि शावक भारम्भमें लाचार्यकी পশিমবাষমিষ রান্না गुना अभिप्राव बी मिटिके लिये गारावननगमस्कार भानेनाकाशफापेन धर्मान्यो गगनोपमान् । याभिनेन मयुद्धरत पन्दे द्विपदा घरम् ॥ १ ॥ गिन (मा) से जमिन बाघमश भामरो जावस्था म (सी) को पाना ६ उम पुरुषोत्तमा नमम्वर परता भाशनगमासमाया प्रो मायावी पपेक्षा पुस फरमासमतुल्यमेतत् । वना मार्ग दो सगे पायाशवाय अगर आकाशवाप परते। मापन पानेन, पिम् १ अपानमा पामो-विगे। प्रशिगजो भी । पिस र मौसमीपम धमाकोर मापमा गगनमपमा नगण (RJ बिमली उसम्मा कायमाणानापना भोaytmme - जाग्यम •miumm .
- भा०] मळावशास्तिप्रकरण माकाशसश वानस्पैष पुनर्षिशेषणम्- के धर्मोको । झानका ही फिर विशेषण देते हैं-अग्निसे उष्णता पैमरास्ममिरमिन्नमग्न्पुप्पण चौर सूर्यसे प्रकाशके समान जो पत्सविवप्रकाष्ठवच बानं तेन पान प्रेय घों मर्षात् बास्माओंसे श्रेयामिन्नेन बानेनाफाटकरपेन अमिन है उस यामिन्न अर्थात हेय वामाके पहपसे अम्पप्तिरिक मेमात्मस्वरूपाध्यतिरिकेन गग- झानसे जिसने नोपमान्धर्मान्य संयुद्धःसमुदया- माकाशोपम धर्मोको सा ही सम्यक् निवि, अपमेवेश्वरोयो नारायणा | प्रकार बाना है-ऐसा मो नारायण- साईम है उस द्विपदों पर- स्पस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदावर दो पर्दोसे उपलक्षिस पुरुषोंमें श्रेष्ठ दिपदोपलधिवानो पुरुपाणां परं | यानी प्रधान पुरुषोत्तमकी वन्दमा- प्रधानं पुरुपोचममित्यभिप्रायः । समिवादन करता है। उपदेष्ट्रनमस्कारमुखेन शान उपदेश्यको ममस्कार करनेसे मेगनासमेदरहितं परमार्थतत्त्व पर प्रतिक्षा की जाती है कि इस | प्रकरणमें विश्व पक्षके प्रतिधारा वर्षनमिह प्रकरणे प्रतिपिपाद पान, श्रेय वौर हाताके मे से रविस पिपित प्रतिपक्षप्रतिपेधद्वारेण | परमावर्शनका प्रतिपादन करना प्रविज्ञातं भवति ॥१॥ अमीर है॥१॥ पदेताममकी बम्दमा मधुना मतदर्शनयोगस । अब करतदर्शनयोगको, उसकी सुतिके लिये, नमस्कार किया नमस्कारस्तस्स्सुतये- जाती- अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वमुखी हितः । अविवादोऽविकरम देशितस्त नमाम्यहम् ॥ २ ॥ *नो मोक्तम्प्रदायरे भारि आचार्य परिमभमाषीधर मतानगम्प भीमारपत्र बन्न्त की गयी है।
- माणम्योपनिषद् [गौ. [ शामि ] जिस सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मुस्कर, हितकारी, निर्विवाद और विरोधी अस्पर्शयोगका उपदेश दिया गया है, उसे मैं ममत्कार करवा ॥२॥ स्पर्शन सर्व समधो न मिस योगका किसीसे कमी स्पर्श यांनी समान्म नहीं है उठे विपते यस योगस फेन अस्पयोग करते हैं, हम चित्कदाचिदपि सोऽस्पर्सयोगो समाव ही है। नाम न प्रमस्वभाव एव, दै नामेति पदोंका यह तात्पर्य है कि प्रपषिदामस्पर्शयोग इत्येवं प्रयताओंका स्पर्शमोग इस नामसे प्रसिर और समत प्रसिद्ध इत्मः । स च सर्व प्राणियों के लिये मुस्थर होता है। सत्वसुखः । भवति फमिदस्यन्त | कोई विक्य सोबापत मुम्सक्न सुखसाधनपिशिष्टोऽपि दास्वरूपः, विशिष्ट होनेपर मी दुसरूप होता है, जैसा कि तप । पित्त यह ऐसा यथा वपः । मयं तु न तपा। नहीं है। तो फिर पाया है । किं सहि सवसत्त्वानां मुसा। सभी प्राणियोंके लिये पुसायक है। तया मवति फाधिदिपयोप इसी प्रकार इस कमें कोर करें मोगाः मुस्लो न सि अप विश्पसाममी सुखदायक तो ऐसे है किन्तु शितकर नहीं होती । सुली दिसप नित्यमप्रचलित | किन्तु यह तो सर्वदा अनियम- समाव होनेके कारण मुस्थामक स्त्रमापत्वात् । किं पाविपादा मी है और हितार मी | पही नाही, विरुदवदनं विवादः पक्षप्रति ( पविषाद भी है। जिसमें पम- प्रतिपक्ष सीकर करके दिमय पचपरिग्रहेण यसिन्न विपते | कपनमप विवाद नहीं होता उसे ववियर करते है। ऐसा मह क्यों सोऽपिवादः । कमात् १ पवो है। क्योंकि पर सबसे वविन्न । गो गागो | ऐसे जिस योगा शासने उपदेश ।
शा- भा०] मसावशान्तिपकरण देशितः उपदिष्टः शास्रम व किया है, उसे में नमस्कार यानी नमाम्पा प्रममामीत्पर्य ॥२॥ प्रणाम करता ॥ २ ॥ | विरोध ह सो सजाया जाता है। - देतपादिमोह पारस्परिक विरोध कर्ष दैविना परस्पर देवारियोंमें परस्पर किस प्रकार विरुध्यन्ते । इस्युपते- भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिन केचिदेव हि । अभूतस्यापरे धीरा विवदन्त परस्परम् ॥ ३ ॥ उममें से कोई कोई नारी तो सत् पदार्पकी उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे युदिशाटी परस्पर विवाद करते हुए ममपाकी उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥ मृतस्य विधमानस्स पस्तुनो कोई-कोई वादी-केवळ सांस्य- मतालमी, सम्पूण इतवारी नहीं - बाविमुत्पचिमिच्छन्ति पादिनः भूत पानी मिपान वस्तुपी चाति- केघिदय हि सांस्पा न सर्व | उत्पत्ति मानते हैं और योफि एप तिनः । पसादभूतस्या | इमरे धीर-मुद्धिमान् पानी प्रामा- विचमानस्सापरे योपिका भिमानी शेस्थि और नयापियन ख्येग अभूत अर्थात् अविपन्न बस्तु नयायिकाप धीरा धीमतः फा नम स्वीकार करते हैं, इसठिये माझाभिमानिन इत्यों पिच | परस्पर विवा- पानी मिद मारण दसो विरुद्ध पदसो पन्यान्य परते हुए प एप-मरेको जीतनकी एम करते रहते हैं- --पर सर मिग्छन्ति नेतुमित्यभिप्राय ॥शा पप ॥३॥ तरख विरुदवदनेनान्यान्य पक्षपतिपेपछि:कि स्थापित भरस्पुम्पते- परस्पर सिर परप एफ्नमरे ये पश्वा न करने पर उन बारिया पिया मिदासरा प्रधारा रिपा गाय सो बनत - मागायोपनिषद् [गी प्र. भूत न जायते किंचिदभूत नैव जायते । विवदन्तोऽद्वया धेषमजाति ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥ [कियाका मत है-] कोई सदस्त उत्पन्न नहीं होती और [कोई कहते हैं- ] 'असास्तुका अम ना होनस प्रकार परस्पर विचार करनेवाले पे बातबादी* अनाति ( अगाववार) को ही प्रकाशित करते है।॥ १ ॥ मूतं विधमान वस्तु न जायद कोई भी भूत वर्गात शिपमान किपिद्वियमानत्वादवात्मवदिस्पेयं मस्त विधमान होनेके कारण की उपम नहीं होती जैसे कि वामा- पदन्नसवादी सांम्पपर्व प्रति | इस प्रकार पाकर मसद्वादी, सान्य पेपति सन्मम्म । तथास्तम विध | के पक्ष सशदका साइन करता है। तपा सांस्य भी अभूत-पविधमान मानमविपमानवान्नव जायते वस्त थपियमान होनके कारण ॥ शष्ठविपाणवदिस्पे पदन्सां शाके समान उत्पन्न नहीं हो सम्पोऽप्पसदादिपधमसमन्मप्रति- पक्षमें धमाकी म्पत्रिका प्रतिष सकती-ऐसा महकर क्सबादीके पेधति । विषदन्सो विरुदै मदन्यो फरसा है । इस प्रकार परस्पर विवाद | यानी विलय भरण फरसे ये ऽनमा बौविनो मते अन्योन्यस्म मतपदी क्योंकि वस्तुप्त ये बहोत पधौ सदसवोर्न मनी प्रतिपेपन्तो पदी ही है एक सरेके पक्ष सम्पन्म और मसम्ममा पसन ऽमातिमनुस्पचिमवात्समापयन्ति करते हुए पर्यत पानि अनुपपति- प्रकाशयन्ति ॥४॥ को ही प्रकाशित करते ॥१॥ देतपारियोद्वारा पर्मित बमातिा बनुपोदम स्याप्यमानामजाति तैरनुमोदामहे वयम् । विवदामो न तैः सार्धमविवाद नियोधत ॥ ५ ॥ •पहातबारिक होम्संगो मासपीमा।
शॉ० भाग मसावशातिपकरण उनके द्वारा प्रकाशित की हुई अवातिका हम भी अनुमोदन करते है।हम उनसे विवाद नहीं करते त सुम उस निर्विवाद [ परमार्थ दर्शन ] को भी वह समझ लो ॥५॥ तेरेव रूपाप्पमानामबातिमेष उनकधारा इस प्रकार प्रशित की गपी प्रजातिका हम ऐसा ही मरिस्वत्यनुमोदामह केवलं न हो' इस प्रकार केक्स अनुमोदन है सार्च विवदाम पक्षप्रतिपक्ष करते हैं। तात्पर्य यह है कि पक्ष प्रतिपक्ष लेकर उनक साप विवाद अरमेन, पपा वेऽन्योन्पमिस्प नहीं करते, जैसा कि मे मापसमें भिप्राय । प्रवस्तमविवाद विवाद किया करते हैं । बस हे शिष्यगण । | हमारेद्वारा उपदेश किये गए उस रहित परमार्थदर्शनमनुमातमसा- अविवा-विवादरहित परमाया र्शन भिनियोधत हे शिम्पाः ॥५॥ को तुम अष्ठी तर समझाया अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिछन्ति वादिन । अजातो झमृतो धर्मो मर्त्यता कयमप्यति ॥ ६ ॥ ये पालोग मनात मस्तका ही जन्म होमा स्वीकार करते हैं। किन्तु जो पदार्थ निषय ही बात और अमृत है वह मरणशीलताफा पैसे प्राप्त हो सकता है। ॥६॥ सदसदादिन सर्वेऽपीति यहाँ [म्याग्नि पदसे ] सभी साभार असदी अभिप्रत हैं। पुरस्तात्रतमाप्पालाफा ॥६॥ | इस श्यायका भाप्प पडला किया जा चुका है ॥२॥ समापरिपर्यप मसम्म भवत्यमृत मत्यं न मर्त्यममृत तथा । प्रकृतेरन्यथाभावा क्यचिदविप्यति ॥ ७ ॥ • दलिये मनाप रोक न कायप।
माणफ्योपनिषद् [गौ.. मरणरहित वस्तु कमी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील मरणमीन नहीं हो सकती, स्पोंकि किसीके स्वमाकर पिपप किससे प्रकार होनेयाम नहीं है॥७॥ स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् । कृतकेनामृतस्तस्य कथ स्थास्यति निमलः ॥ ८ ॥ जिसके मतमें स्त्रम्पक्से ही मरणहीन धर्म मरणशीमताको प्राप्त हो नाता है, उसमें सिदान्तानुसार सक (जन्म ) होनेके कारण पर अमृत पदार्प निमाळ (चिरस्थायी ) कैसे रह सकेगा ॥ ८ ॥ उतार्थानां श्लोफानामिहोप मिनमा वर्ष पहले कहा वा भुका है ऐसे उपर्युच्छ [ तीन ] समेकों न्यासः परमादिपधामामन्पोन्य | का उन्लेस यहाँ विपक्षी पादियोंकि पिरोपरम्पापितानुत्पत्यनुमोदन- | पोके पारस्परिक विरोधसे प्रकाशित अनातिका अनुमोदन प्रदर्शित करन- प्रदर्शनार्थः ॥ ७८॥ के लिये किया गया ॥८॥ पमाहौफिक्पपि प्रतिर्न क्योंकि मैकिक प्राकिर भी निफ्पप नही होता [किर पारम्पर्षिकी विपर्येति, सावित्पाह- कास्मे कैसे होगा ! ] किन्ता प्रकृति क्या ! इसपर करते है-- सांसिरिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या । प्रकृति सेति विशेया स्वभावं न जहाप्ति या ॥ ९ ॥ जो उत्तम सिवितारा प्राप्स, स्पभावसिद्धा, सहमा और भारत . तथा कमी अपने समाया परियाग महा करती भी प्राति है- सा जानना चाहिये | ॥ सम्पपिसदिः ससिद्धिस्तत्र सम्यक् मितिका माम संसिमि भमा मामिदिपी यथा योगिनां | उममे होनवानीमा समितिकी शॉ० भा.1 भावशान्तिप्रकरण सिद्धानाम् अणिमायपर्यनाप्तिा पहते हैं, जिस प्रकार कि सिद्ध पोगियोका अनिम्पनि ऐश्यकी प्रामि प्रकृति । सा भूतभविष्यत्काल । उनकी प्रकृति है । यागियोंकी उस योरपि योगिनां न विपर्येति प्रतिया मून और मविप्यत् कालमें तौन सा । तथा स्वाभाविकी (मो विषयय नहीं दातामह बसी की तसी ही रहती है। तया सामाविकी द्रम्पखभावत एष यथान्या वयक म्बमाक्से सिद्ध जैसी है. दीनाम् उप्णप्रकाशादिलक्षणा, अनि भादिकी उमा ए१ प्रकाशादि सपा प्राति होती है। उसका भी सापि न मालान्सरे म्मभिपरति कामतर और वेदान्तरमें म्प- देखान्तरे च । तथा सहवा | मिघार नहीं होता। तथा 'सहमार- अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली, मात्मना सदेष खासा पपा पक्ष्या- स स पक्षी सादिकी आकाश दीनामाकासगमनादिलषमा गमनारिरूपा महति होती है। अन्यापि या काचिदस्ता और भी ना करें याता- किसीके नाय सम्पान न पीई, फेनचिन्न वा पयापी निम्न असे कि नमी प्राति निम्न प्रदेश देसरामनादिलक्षणा | अन्पापि की ओर जानेकी है । तया इसक मिथ अन्य मी हो कोई अपन समान या काचित्स्वभाव न जहाति सा फो नहीं सपी रम मयको ठीक सर्वा प्ररुतिरिति विझया गक । नारसे ही मिप्याकरिसतेषु लोरिकप्पपि | चाहिये । निव्या पाल्पना की हा पस्तुप प्रतिर्नान्यथा मावि हाकिम बस्तुओंमें भा उनकी प्रात पपा नहीं होती फिर अमम्ममार मित्राबस्समावेषु परमार्थ परमायलोंमें उन भनक एक्षा प्राप्त भयया मही हा वस्तुपमहत्परपमा प्ररुविना- मुरम्य-समें सपना ही स्प पमा मयसीत्पभिप्रायः ॥ ९॥ है। यह मा भभिधाय ॥९॥ माना माफ्योपनिषद [पो.का. पीपका परा-मरण माननेमें दोप किंपिया पुनः सा प्रकृति पालीलोग बिसफे मन्पपामाकी यस्पा अन्यथामापो पादिभि कम्पना करते हैं उस प्रतिका विश्य क्या है। और उनकी फरप्पते कल्पनायां पा को दोपकापनामें क्या दोर है । इसपर कहते है- जरामरणनिर्मुक्ता सर्व धर्मा स्वभावत । जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तमनीषया ॥१०॥ समस्त जीव समावसे ही जरा-मरणसे रहित हैं। उनके जरा-मरण सीकार करनेवाले लोग, इस विचारके कारण ही, म्ममावसे शुप्त हो नाते॥१०॥ मरामरणनिर्मका:--अरा 'नरामरणनिर्मुका । मत् गरा- मरणादिसर्वविधियावर्धिता मरणादि सम्पूर्ण विकारोंसे रहित इत्पः । के ? सर्व धर्माः सर्व | हैं ! कोम । सम्पूर्ण धर्म स्यात् समस्त जीवारमा, खमाक्त पानी आत्मान इस्पेतत्समावत: | प्राक्सेि ही । ऐसे समाश्यले प्रतितः । एवंस्वभाषाः सन्तो धर्मा चरामरणमित इच्छन्त होनेपर भी चरा-मरणके मुकर समान इष्म करनेवासे पर्यात् र इच्छन्तो रज्यामिम सर्पमारमनि में सर्पको मन्ति ममममें अरा-मरण- फरपय तश्प्पयन्वे स्वभापवम की फम्पना करनेवाले पीप, लन्सीत्पर्यः, तमनीपया चन्म ! उसकी मनीया-जरामरणको बिस्तासे मरणचिन्तया सझावमापितत्व | दोश अपने समापसे अर्पात् उस मावसे भाक्ति होनेके पुत दोषेणेत्यर्थः ॥१०॥ |-विचलित हो जाते हैं ॥१०॥ सारयमातफर सेपिसीमापति फर्य समाविवादिमिः समातिवादी सामन्यमान बियोका कपन प्रफार सांस्पैरनुपप नाम्पत इस्याह असतो। सो शेषिकमातमी बपिफा- बतलाते है- - शां० भा०] मातशान्तिप्रकरण कारण यस्य वै कार्य कारण तस्य जायते । जायमान कथमज भिन्न नित्य क्थ च तत् ।। ११॥ जिस ( साम्यमतापपम्पी) के मतमें कारण ही कार्य है उसके सिदान्तानुसार पारण हो उत्पन्न होता है। किन्तु वम कि वह बम पनवायी तो भवन्म कैसे हो सकता है और मिग्न (विदीर्ण) होनपर भी निस्प से हो सकता है ॥ ११ ॥ कारण मृदुपादानलक्षण जिम गादीक मतमें मृत्तिकाके समान उपाान कारण ही कार्य पस्प पाटिनो कार्य कारणमेव अथात् जिसके मतमें कारण ही कार्याकारेण परिणमत यस्य | कार्यरएपमें परिणत होता है उसके मिवान्तानुसार प्रधानादि करण बादिन इत्यर्भ, तम्पासमेय अजमा ऐना हुआ भी महदार सत्प्रधानादि कारणं महदादि कापतपसे उत्पन्न होता है ऐसा इसय नापर्य है। किन्तु यदि कार्यम्पण मायत इयर्थ प्रधान महानिमपसे उत्पन्न होने महदाचावरण पेजायमान | गाया है तो ये उसे मनमा पसे मायाम है। पम्न होना है और प्रभान फपमजपुग्यते सर्वि बाना मी ६-ऐमा क्यन सो प्रतिपिद घेदं आपसज्ज पति परम्पर पिस्ट है। नित्यं परल्यस प्रधान इसके मिपारे प्रधानमो निम्प भी मागते हैं। किन्तु यह मिन्न- भिन्न विदीर्ण स्फश्विमेकरोन दिया वर्षात् एक देशमें सरित मत्कयं निम्प भवेदित्यर्थ न पानी मिसाल होनाट्य- दोयर भी नियरमेहामुरमा सयप पद र सावपर्य परादि पदसत घरि सरपर पाय, आ एष मग्नर्मि निम्प रए सार शर्म स्फुरित होनेवाले हैं, कमें • र भारत भाषापोपनिषद् इत्यर्थ । मिदीर्ण व साठेकदसे । कमी निम्प नहीं देखे गये । अपने एक देशमें विदीर्ग होता है नार्च नित्य पेति पतविप्रतिपिद्धतया मन मोर निन्य भी है। तो उनका विरुप कफन ही है- सरभिधीयत इत्यभिप्राय ॥११॥ सा इसका अभिप्राय है ॥११॥ उक्तस्यैवार्थस्य स्पष्टीकरणार्थ उपयुक अम्प्रिापका ही स्पी माह- करग करना किये कहते हैं- कारणाघधनन्यत्वमत कार्यमज यदि । जायमानादि वे कार्यात्कारण से कथ ध्रुवम् ॥ १२॥ पदि कारगस फापकी अमिना है तब तो तुम्हारे मसमें कार्य में मनन्मा है और पनि ऐमी सात है तो टापन्न होनेवाले कार्यस अभिन्न होनेपर कारण मी किस प्रकार निमल र सस्ता है॥ १२ ॥ कारणावनात्कार्यस्म सपनन्म यदि तुम्हें काम करमसे स्वमिट त्वया व कायकी अनन्या है तो हमारे अभाप्यो पारमनमिति प्राप्तम ।। पार्य मी ममा है। किला माय मतमें ] यह बात सिद्ध होती है कि अभिय इद चान्यतिप्रविपिद कार्यमन सि वय है और अजन्मा है यह तुम्हारे कपनमें एक दूसरा विरोध है । कि धान्मत्स्यर्यकारणपोरनन्यस्पे | इस दिवा, कार्य और कारणको मापमानादि चे प्रास्फारण / अनापता होनेपर उत्पत्तिशीन कसे अभिम उसका कारण निस्प बीर मनन्यन्निस्म म प ते पप निम से रह सकता है। ऐसा मवेत् । न हि पाया एफरस मी नहीं हो सकता कि मुगका एक बातो पाया जाप और पप्पर एकदाः प्रमपाप दमा गन्सामापत्तिके योग्य बनाये पत्यत॥१२॥ खाप |॥ १२॥ . निरधि शां० मा०] भसातशान्तिप्रकरण किं चान्यत्- - | इसके सिवा और मी- मजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति । जाताम्य जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥ १३ ॥ जिसके मतमें भत्रमा पस्तुसे ही किसी कार्यकी उत्पत्ति होती उसके पास निमय ही इसका कोर यन्त नहीं है। और यदि जात पदार्पसे ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाप सो अनरसा उपस्थित हो मातीहै॥ १३ ॥ मघादनुत्पमावस्तुनो जायते जिस प्रतीक मनमें मन-मनु यस्य पादिन फाय, पन वस्तुसे कार्यको उत्पत्ति होती है उसके पास निम्म्य ही करें उममेरपि प्टान्तम्तस्स नास्ति अन्त नहीं है। मन तात्पर्य यह 4, रटान्ताभावे | हुआ कि प्रान्तमा ममात्र होनेके कारण यह बात स्नय सिह हो ऽदिवान किंचिन्मायत इति | जाती है कि अज पस्तुसे किसीकी भरतीस्पर्य । यदा उत्पत्ति नहीं होती । और नव किसी जात उत्पन होनेण्टी वस्तुसे पुनर्मातामायमानस्य वस्तुन | कायर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है तो वह भी किसी अन्य नास बस्तुसे सम्पुपगमा सदप्यन्यसाद उत्पन्न होनी चाहिये और पर किसी मावाचदप्यन्यसादिति न औरहीसे उत्पन्न होनी चा प्रकार कोई म्पबम्पा ही मही रहती म्पपस्सा प्रसज्यते । अनवम्पान पर्यात् अनवम्भा उपस्थित हो स्पादित्यर्थ ॥१३॥ सिद जानी है।॥ १३ ॥ रंतु मोर पसके मम्मोपकारणसमें गेप "पत्र त्वस्य सर्वमारमवामद" "गिम मवम्भामें इसपी रसिमें २०. माणपोपनिषद [गी. का परमार्थवा वामाव भुत्पोक्त | तिन जो परमाणत ईसा मा पतटापा ६, ठसीको जागिन करके स्तमाथित्याह- कहते हैं--- हेतोराठि फल येपामादिहेतु फलस्य च । हेतो फलस्य चानादि कय तैरुपनपते ॥ १४॥ जिनके मतमें हेतु कारण फोर पकाकरण हेत ख और फरके बनाविषका प्रतिमान पैसे परत है।॥१४ देतो मदिरादि फारणे जिन प्रादिपक मन हेतु वर्मा देहादिसंपातः येषां धर्मारिका वादि-कारण देहारि संघातकप पाल तया देवारि वादिनाम् । तपादि कारण संघातहप फरका बादिकारण देतधमाधर्मादि फ्तस्य च दहा धर्माधर्मात • इस प्रकार दिसंपातम्प | एस हेतुकलयोरिव | और फका एकसरेके रेतरकार्यकारणस्वेनादिमर्च पार्य-भारणरूपसे संकरणय मापने अवझिर तो फउस्म पाना पासे उन छोहारा और फरमा दिस्व अमारल किस प्रकार प्रतिगरन तरुपवर्माते ! कष विमविपिद्धमित्यर्थ । न हि किया बास्य है । अपांत् उनका या पपन सपा मिस्त है। निस्पष्टस निस्पस्प फटसम्भारमनो ३० वरमाको रुपमामाता तो किसी फलामता समयसि ॥१४॥ प्रकार मी सम्मन नही ॥१॥ सेविड्मम्पपगम्पत वे किस प्रकार विस्य मतको इत्युपते- मानते हैं, सो मापा जाता है- हेतोरादि फल येषामादिहेतु फलस्य च । तथा जन्म भवेचा पुत्राज्जन्म पितुर्यया ॥ १५ ॥ ० भर्मात् से धरिये गरीपरिध माविम भरप और शरीर परि-सम्मानका कारण मान्ने। -
at० भा०]
भष्टावशान्तिप्रकरण
जिनके मतमें हेतुका कारण पर है और फरका कारण है
उनकी [ मानी हुई ] उपति ऐसी ही है मैसे पुप्रमे पिताका जन्म
होना ॥ १५॥
हेतुजन्पादेव फलादेतो हेतुसे उत्पन्न होनेवाले फम्से
र्ज माम्पुपगच्छा
ही हेतुका जन्म माननेवाले उन
तेपामीरशो
खोकि मतमें ऐसा ही विरोध कहा
विरोध उक्तो भवति पथा | जाता है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म
पुत्रासम पितु ॥१५॥
दत्यनमें ॥ १५॥
पयोको पिराधो न पुको यरि सुम ऐसा मानते हो कि
उपर्युक विरोष मानना उचित
ऽभ्युपगन्तुमिति मन्यसे-] नहीं है तो---
सभषे हेतुफल्यारेषितज्य कमरत्वया ।
युगपत्सभवे यस्मादसयन्घो विषाणवत् ॥ १६ ॥
मुम्हें हेज और फकी उपधिमें फ्रम स्वीकार करना चाहिये,
स्पोंकि उनके माथ-साप उत्पन्न होनेमें तो [ दा-यायें ] सींगक समान
परस्पर [काम कारगरूप ] सम्बन्ध ही नहीं हो मक्ता ॥ १६॥
सभव हेतुफलयोस्त्पचौ मम। तुम्हें हल और फलकी उत्पत्ति
एपितम्यस्त्वयान्वेएम्पो हत
क्रम वर्षात् पहले हेतु होता
और फिर फल-इस प्रकार दोनोंका
पूर्व पात्फले पेति । इतष | पौर्वापर्प सोनमा चाहिये, क्योंकि
जिस प्रकार गौथे साप साप यमन
पुगपत्सभषे यसादतुफलयो
होनेवाल गायें गौर वा साँगका
फार्यकारणरवेनासाधा, पथा| परस्पर समय नहीं होता उसी
पुगपत्संभवतो सम्पेतरगा
प्रकार साय माय उत्पन्न होनेपर सो
हेतु और फरश्या परस्पर पार्य-कारण-
विपामयो ॥१६॥ गरसे सम्बग्रहीमही होगा॥१६॥
२०२
माएपोपनिषद [गोमा
कामसंवधा ? इत्याह-~
उनयत किस प्रकार सम्बन्ध
मही होग्य' सो मतप्यते हैं-
फलादुत्पद्यमान' सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।
अप्रसिद्ध कथ हेतु फलमुत्पादयिप्यति ॥ १७ ॥
तुम्हारे मसमें यदि हेतु फरसे उत्पन्न होता है तो वह [तुल्पसे ]
सिम ही नहीं हो सकता, और बसिद हेतु फको उत्सम कैसे करेगा ! ॥१७॥
बन्पास्वतोऽलम्धात्मात्
जम्प पर्यात् यो सात प्राम
नही है उस शशयके समान
फलादुस्पचमानः सम्सस
असद फारसे उत्पम होनेवाब होनेर
विपाणादरिषासतो न
खः ( सो हेस ही सिद्ध नहीं होत
प्रसिम्पति बम न लभते ।
अर्थात् उसीका अम्म नहीं हो
बलम्पारमकोऽमसिद्धः सम्पर-
सकता । इस प्रकार शशाके
समान मिसकी सात उपाधि
विपाणादिकत्यस्तष की फस- नहीं है वह प्रसिद्ध स तुम्हारे
मुत्पादपिम्पति ! न हीतरेतरा | मतमें किस प्रकार फर अपम कर
पेक्षसियोः भविषाणकाल्पयोः नखाले तपा शशाके समान
देग्य ! एक-दूसरेफी अपेक्षासे सिम
कार्यकारणभावेन
सपा क्सद पापोत कार्य-कारण-
मापसे बना किसी और प्रकार
कपिष्टा, मन्पमा वेत्म- मी सम्बम्ब नहीं देखा गया
मिप्रायः ॥१७॥
इसका वमिप्राय है॥१७॥
मान्य:
यदि हेतोः फलात्सिदि फलसिरिम हेतुतः ।
कनरत्पूर्वनिष्पन्न यस्य सिदिरपेक्षया ॥ १८॥
[उपारे मतमें ] पनि फरसे देवकी सिदि होती है और उसे
फरकी सिदि होती है तो उनमें से कौम बा ! भिसकी अपेपासे
कि सरेका आनिर्मात माना माप ॥ १८ ॥
to भा०] भसातशान्तिप्रकरण २०३ मसंवधतादोषणापादितेऽपि हेतु और फटके कायकारण- हतुफलयो कार्यकारणभाषे यदि माश्वर भसम्पन्धत्तोरसे निरा- करण कर Pया जानेपर भी पर हेसुफलपोरन्योन्यसिद्धिरम्पुप सम हेतु और फायी एक-दूसरेसे गम्यत एम त्वया फसगत्पूर्व सिदि म्नत ही हानी इन त निप्पन्न हेतुफलयोर्यस्य पयादा बार फरमेस पहल कोन हुआ मो पिनः सिदिः स्मात्पूर्वसिद्ध- तमओ, जिसकी पूर्वसिदियी अपेक्षा से पीछ होनेपालकी मिदि मानी पपया तमूहीस्पर्भ ॥१८॥ जाय। यह इमामाप है ॥१८॥ अर्थतन्न शमयते पस्तुमिति और यदि तुम ऐसा मानते हो शि पर नही मागपा मा सस्ता मयसे- अशत्तिरपरिज्ञान प्रमकोपोऽथ वा पुन | एव हि सर्वथा पु?रजाति' परिदीपिता ॥ १९ ॥ यह अशक ( अमामय ) अज्ञान है, अपया नि नोममे टर्युक कमया भी विपपप हो जाच [ोपि इमप पूरिस्पया शान न हानमे इनमें जो बनाए कारग है और पीछ होनेवाग फाप है पेमा कोरनिपम भी मही रह सकता ] म प्रकार उन युदिमानोंने मापा जातिको ही प्रमागिल रिया है।॥ १०॥ सेपमशक्तिरपरिमानं वषा पद अलि [उम्दारा ] भरि निसको मोरयर्थ । अथ पालन सय अपेक्षेप অশ্বর पाज्य सोक्त फ्रमो मरना ही है। अपग नुमन सा प.उम्प मिति फ्लाप को परसोरा र दम पारिलो कपी सिदि पिदिग्विीतरतगनन्तपरायण और में मुर्ग, उमग नम्यापोरिपर्यापापपामार कार-गि आतु सम्परा
मागुम्योपनिषद [पो
स्पादित्यमिप्रायः । एवं हेतु । हो नायगा-ऐसा इसका अम्मिाप है।
फलयो कार्यकारणभावानुप
इस प्रकार हेतु और फका कर्म
पोरवाति
कारणभाव वसम्मष होनके कारण
सर्वस्पानुस्पषिः
एक-दूसरेके पक्षका दोष स्पने
परिदीपिसा प्रकाशितान्पान्य
पाछे प्रतिपक्षी बुद्धिमानों वर्षात
पक्षदोपं हुननिर्वादिभिर्पद पमितोंने सबकी वजाति-मनुस्पति
पमित रिस्पर्थः ॥ १९ ॥ ही प्रकाशित की ॥ १९ ॥
ननु देसुफलमो कार्यकारम
पूप०-मन नो कहा कि तु
माष इत्पसामिरुत क्षम्दमात्र
और फलका परस्पर कार्यकरणमा
है, सो तुमने हमारे शम्मत्रको
माभिस्पच्छलमिद त्वयोक्तं | पकाकर एक ऐसा कह दिय
पुधामन्म पिसुर्पथा, विपाण
कि 'जैसे पुत्रसे पिताका म होना
है। [लायें बायें ] सीकि समान
पचासंग
इस्मादि । न [उनका परस्पर ] सम्बन्ध ही नहीं
ममामिरसिदादेतोः फलसिदि
हो सकता' इत्पादि। हमने वसिय
हेतुसे फलकी नपवा असिद्ध फासे
रसिदादा फलादेतसिद्धिरम्पप | हतुकी सिद्धि कभी नहीं मानी । ते
गता । किं तर्हि १ बीमार | फिर स्पा मामा है ! हम तो बीज
पस्कार्यफारममावोऽम्पुपगम्पत
और बारके समान के उनका
इति।
कार्य-कारगमाष मानते हैं।
भयोध्यरा-
सिवाती-इसपर हमें
कहना है कि-
वीजा राख्यो दृष्यन्त सदा साध्यसमो हिस' ।
न हि साध्यसमो हेतु सिही साध्यस्य युज्यते ॥ २० ॥
बीनार नामर जो प्यन्त है वह तो सदा सायके ही सम्झन
है । भीर बोहेज सापके ही साश होता है वह साप्पी सिर
योगी नही होत ॥२०॥
भा० मसावशान्तिप्रकरण २०५ पीबाराम्यो दृष्टान्तो य मीमाङ्कर नामका जो घणन्त है परता साप्यक ही समान है. ऐसा स साम्येन तुल्यो मेरा अभिप्राय है । यदि कहो कि वोगारामम ममेत्यभिप्राय । । सालसमप्तम् . - (वीम भार भास्कर कम्प-कारगभाष तो प्रत्यक्ष ही अनादि है, सो ऐसी ननु प्रत्यक्षा | बात नहीं है क्योंकि उनमेंसे पूर्व कार्यकारणभावो पीनार पूर्व [अङ्कर औरफल ] को परवर्तियों- मोरनादिः १ न, पूर्वस्स पूर्वस्या के समान आरिमान् माना गया परषदादिमस्याम्पुपगमात् है। जिस प्रकार इस समय बीजसे यदानीमुत्पमोऽपरोजरोपीना उत्पन्न हुवा दूसरा भार वादिमान् है उसी प्रकार क्रमश सरे आरसे दादिमानवीजे धापरमन्पसाद उफ्न दुवा दूसरा बीर मी वारिमान् रादिति क्रमेणोत्पमस्वा | है। इस प्रकार पूर्ण पूर्व बार और दादिमत् । एम पूर्व पूर्वोजुरो | स्व-बीब खादिमान् ही है। पीन प पूर्व पूर्वमादिमदेवति मत सम्पूण मीगारवगका प्रत्येक बीम और बार आदिमान् होनेक प्रवकं सर्वस्स बीमारवात करण किसीका भी अमादि होना सादिमस्वास्कसथिदप्पनादि मसम्भव है। पही न्याय प्रेस और स्वानुपपत्तिः । एवं हेतुफलानाम् । फलफे विश्पमें भी समझना चाहिये । मथ पीलारसन्वरनादि यदि कहो कि वीगारपरम्परा तो वनादि हो सकती है तो मापमिति चेत् १ न, मोगर एकसमानुपपणेः । न | ऐसा कहना धक नही स्पोंकि निक्सि उसका एकल मही माना गया । हि पीपारम्पति जगारका मनाविल प्रतिपादन रेफेम बीमारसन्तति मैफा करवायेने रीज और गुरसे मिन बीगारपरम्परा भवा त म्युपगम्पत देसफरमन्ततिका पमपरमग मामा को सदनादिस्वादिभि । तमाम | मप्य 'दाय ना मन । अन तरुपवर्मत इति । तथा चाय । २०६ माणफ्योपनिषद् [गो हेतोः फलम चानादि कय | थे लोग हेतु और फम्पा कनादित किस प्रकार प्रतिमान करते हैं यह कपन बहुत ठीक है। इसके तिला दप्पनुपपधर्नछसमित्यभिप्राय अनुपपत्ति होने के कारण भी हमरा कपन टळ नहीं है-ऐसा सका न घ लोक साम्पसमो हेत: तात्पर्य है। बम्ब्रिाय यह साध्यसिदौ सिद्धिनिमिर्च सोको प्रमाणकुशल पुरा साम्पकी सिनिक थिये सापके ही प्रपुस्पसे प्रमाण लैरित्यर्थः । साश हेतका प्रयोग नहीं किया हेसुरिति रटान्तोऽत्राभिप्रेतः, जाता । यहाँ हेतु' शम्मका अभिप्राय प्रयास है, क्योंकि यह सीका गमफस्पात् । प्रच्या हिप्शन्तो झापक है यहाँ रणामतकरी प्रकरम न देसुरिति ।। २० ॥ भी है-सका नहीं ।। २० ।। भपातपा-निरूपण कर्य पुढेर मातिः परिदीपिते पण्यिाने अजातिको हो किम प्रकार प्रकाशित किया है। इसर स्पाइ- पूर्वापरापरिज्ञानमजाते परिदीपक्म् । जायमानादि ये धर्मात्कथ पूर्व न गृह्यते [ हम और फसके ] पौर्वापर्यकर जो आान है पर अनुपतिका ही प्रकाशक है। क्योंकि यदि कार्य [ सबमुष ] उत्पन हमा होतात उसका कारण क्यों म प्राण किया जाता ॥ २१ ॥ यदेवदेतफलया पूर्णपरापरि । यह या बार फसके पी सान वचतदजात परिदीपमम- पसका अहान है वह अनातिकाही परिदीपक अर्थात शापर । परि पवाधरुमिपम । शायमाना हिताप उपन हाय पण किया पो० मा० मठावशान्तिप्रकरण २०७ - घेर्मो गृमसे, फर्भ तसात्पूष | जाता है तो उससे पूर्ववर्ती कारण मपों नहीं प्रहण किया जाता कारणं न गृमत । अवश्य हि उत्पन्न होनाली मस्तुका ग्रहण | परनवाले पुरुपारा उसकी उत्पत्ति बायमानस्स ग्रहीया रामनर्क का कारग भी अवश्य ही ग्रहण किया जाना चाहिय, स्पोकि जन्य ग्रहीतम्यम् । बन्यजनकयो | और ननफ फार्पोका सम्बन्ध मनिवार्य है। इसलिये तात्पर्य यह संप धस्मानपतरषात् । समाद है कि यह मजातिकाही प्रकाशन बाविपरिदीपकं तदित्य ॥२१॥1 || २१ ॥ सरसारिवादोशी गनुपपाधि इसम न बापते फिपिन्, इसलिये भी करवस्तु उत्पम नही यन्यायमानं वस्तु- होनी स्पोंनि उत्पन्न होनेवाली बम्तु- स्वतो वा परसो वापि न किंचिद्वस्तु जायते । मदसत्सदसद्वापि न किनिद्वस्तु जायते ॥ २२ ॥ मत बफा परत [किसी भी प्रकार } कोई वस्तु उत्पम नही होस्मोपि सत, असत् वपन सत्सत् ऐसी कोई भी वस्तु उत्पन्न महाँ होती ॥ २२॥ स्पत परव उभयतो पा मानेसे, मासे अपवा गोदासे मत, भसत् नया स सदरसे सदमस्सदसदा न आयत न | सम्म नहीं होती-किमी मी प्रकार उस कनचिदपि प्रकारण सन्म | उसपा गम हाना सम्म महो। निस प्रस्म पका उर्मी पासे उत्पन्न संभवति। न तावत्स्वयमेापरि महा दो मकाप उसी प्रकार फोर निप्पमात्स्वतः स्वम्पाम्सयमेन | मी बस व अम्न भारनिम्न आपत यथा परम्तमादप पटान् । मनही उपस्न नही हो मातः । (तपा तैयार म ए ) मापसे मापि परतापमादनगा गया। अस्मि भी अपी २०८ माणस्योपनिषद् [गी.. पटो पा , पटापटः पटास्पटान्तरम् । तथा | उत्पत्ति हो सकती है, जैसे पटस पटकी अपना फसे फ्यन्तरकी । नोभयत विराधात् यथा तया इसी तरह विरोध होनके कारण दोनोंसे मी किसीकी उत्पति मा पटपटाम्या घट हो सकती; जिस प्रकार कि श्रोत पर दोनोंसे घर या पट करें न बायत उफ्न महाँ हो सकता। ननु मृदा पटो बायते पिसम यदि कहो कि म्हिीसे पा उत्पन्न होस्प है और पित्तसे पुत्रका पुत्र' । सरपम्, अस्ति वायत चन्म होता है तो, ठीक है परन्तु इति प्रस्पर सम्दय मूढानाम् । 'उत्पम होता है ऐसा शब्द मार वादेव अम्दप्रत्ययो पिपेकिमिः उसकी प्रतीति मुझेको हो तुषा परती है। विकी गोस्न परीक्ष्येते किं सस्पमेव वाघुव शम्द और प्रतीनिकी सप । सपेति । यावता परीक्ष्यमाणे अपवा मिथ्या-रस प्रकार परिक्षा किया करते है। किन्तु परीक्षा की शप्दप्रस्पयविपय बस्तु घट नानपर ता दाद और उसकी पुत्रादिलक्षण सम्दमात्रमेव सत् । प्रतीति विस्यमत पर "रापारम्मणम्" ( छा० उ० पुत्रादिरूप वस्तु व शम्दमात्र ही है जैसा विचारम्भणम्" ६।११४) इति भुते । | इत्यादि सृप्तिसे प्रमागित होता है। सन्धेम नायत सस्थान्मृपिया पदि बस्तु सत् ( पिपमान ) है तालिका बोर पिता भाकि समान सत् होने के कारण ही उत्पम दिवत् । पपसत्यापि न बायत नही हो सपनी पदि असद है, ताभ दाराशासिय ममान असत् दामफ कारण ही उपन्न माहीं । मपादप प्रमविपागादिपत् ।। मम्मी! अर या मम्मत् है शा. भा.] मातान्तिप्रकरण २०१ भय सदसत्तथापि न वापते। मी उत्पम नही हो सकती, क्योंकि एक ही पस्त विरुद्ध सभामाठी भिडस्पैकम्पासमवात् । मतो होली सम्मत ।। न पड़ी न किंधिवस्तु जामव इविसिझम् । सिर मुथा कि फोर्ड मी कत्तु तत्पन नहीं होती। पेपा पुनर्वनिरेन बायत इसके विपरीत मिन (मोरों) के मनमें अमक्रियाका बम हासा क्रियाकारफफलफत्वम् स प्रकार जो क्रिपा, कारक और अभ्युपगम्यते क्षणिमत्व फाकी एक्वा तपा वस्तका क्षणिक सीकर करते है ये तो किकुल री घ यानः, ते दूरव एवं पक्तिशून्प है, क्योंकि प्या ऐन' इस प्रकार निसप फरमेके शमसे न्मापापेवा । इदमित्पमित्पर । दूसरे ही क्षणमें स्थिति न यमेक कारण [ पदार्पका अनुमा नहीं पारणक्षणान्तरानवस्मानादननु हो सकप बोर बिना अनुमत्र दुए पदार्षकी स्मृति होना असम्मा भूतस्य स्मृत्पनुपपम ॥ २२ ॥ ॥ २२ ॥ वकपम् । हेत-फलक भनारित मी अमुत्पपिका सूपकी कि रेफसयोरनादिस्वम् यही नहीख और फटका म्युपगम्छता स्लपा बलातुफल- कनादित्व सीकार करनेवाले तारे प्रारा तो समस्कारसे और फसाकी योरमन्मेवाम्युपगत सार । मनुत्पति ही स्वीकार कर गयी है। सो किस प्रकार -- हेतुर्न जायतेऽनादे फल चापि स्वमावत । आदिर्न विपते यस्य तस्य शादिर्न विद्यते ॥ २३ ॥ भन्नादि फलम सो रेतु सपन्न नहीं हो सका और इसी प्रकर समावसे ही अनादि से] फको भी उपधि नहीं हो सकती मागफ्योपनिषत् [गौ०० पटात्परः पटास्पटान्सरम् । तथा | उत्पति हो सकती है, जैसे पटसे पटकी अपवा फसे पटान्तरकी । नोमयत , विरोधात यथा | तया इसी तरह पिरोध होनके कारण दोनोंसे मी किसीकी उपसि महाँ पटपटाम्पां घटः पटो पा सकती, मिस प्रकार कि पर नचायते । और फ दोनोंसे घट या पट करें उत्पन्न नही हो सकता। ननु मृदो घटो बायते पितम यदि कहो कि मिलीसे पहा उत्पन्न होता है और पितासे पुश्का पुत्रः । सत्पम्, अस्ति बायत जन्म होता है तो, क है, परन्त इति प्रत्ययः शम्दय मयनाम् । 'उत्पम होता है ऐसा शब्द और सायेव शम्दप्रत्ययो निषेकिमिः उसकी प्रतीति मूसेंको ही जा | करती है। विवेकी मेग हा उम परीक्ष्ोते कि सत्यमेव वाघुत | पाद और प्रतीतिकी परे मृपति । यापता परीक्ष्ममाणे अपना मिप्पा-स प्रकार पक्ष किया करते है। किन्तु परीक्षा शम्दप्रस्पयशिपय पस्तु घट मानपर सो शब्द और उसकी पुत्रादिलक्षण शम्दमाप्रमेव तत् । प्रतीतिको विषयभूत पर "वाचारम्मणम्" (छा० उ० पुत्रादिरूप मस्तु कमल शरमात्र ही है जैसा कि नाबारम्मणम्।" ६।१।४) इति भुते । इत्यादि पतिसे प्रमाणित होता है। समजायते सत्वान्मृत्पिमा परि बल सत् ( रिपान ) है ता मृतिका और पिता कि समान सत् होनक कारण हीपम दिवत् । यसत्यापि न मायने नहीं हो सकती य िमसत् । ता भा गशभजातिय ममान असत हानफ रामदी उपम्न माही ऽसाय गमविपाणादियन् ।। मनी । भर यति मग्मत् है ता शोभा] ममतशान्तिप्रकरण इसक सिषा [ अम्निदा वादि] क्लेशकी उपलम्बिसे मी अन्य मता- पमियोंक शाहवारा प्रतिपादित ईतकी सच्च मानी गयी है॥२१॥ प्रशन प्राप्ति शम्दादि प्रज्ञान वर्षात् शम्दादि-प्रतीति प्रतीतिस्तस्याः सनिमित्त्वम्। का नाम प्रहमि है। सनिमित्त है। निमित-कारण वर्षात् विस्पको निमिर्च फारम विपय इत्पे-कहते है, अत सनिमितसविषय क्सनिमिचस्व सतिपयस्व पानी अपमेसे अतिरिक विस्या स्वास्मष्यतिरिक्तपिपमतेस्पेत सहित है-ऐसी हम [ उसके विक्प में ] प्रतिज्ञा करते है। [वर्यात् प्रतिवानीमा। न हि निषिपया हमारा कपम है कि] प्रासि पामी प्रअप्तिः शम्दादिप्रतीतिः स्पाद, शम्दारमतीनि निर्विक्या नहीं हो | सकती, क्योंकि वह सनिमिच है। सस्पा सनिमिचस्यात् । मन्पया अपया उसे निर्षिय माननेपर तो निविपयत्वे शम्ठस्पर्शनीलपीत | शम्द स्पर्श एवं नील, पीत और लारितादिप्रत्पमवैचिम्पस्स इयस्स मेरित वादि प्रतीतिकी विचित्रता- रूप देवका नाश हो जापान नाशता नायोऽमाष प्रसन्पेवे- अपात् उसने नारा पानी वमानका स्पर्थ । न च प्रस्पयव चिम्पस प्रसंग उपसित हो पाया और द्वयम्पामावाऽस्ति प्रत्यवत्वात् । प्रस्पक्ष-सिब होनके कारण प्रत्यय वित्र्यरूप इतका भाव नहीं । मतः प्रत्यपवैचित्र्यस्य दयस्य प्रस्फ्यवैचित्र्यरूप देतकी दर्शनात, परेपो तन्यं परतन्त्र उपम्बिसे परतत्र यानी सरोक उन परकीय सत्रओंका मिस्पन्पशास्त्रम्, तस्स परतन्त्रस्य अर्पत् परकीय सत्रोंके अभित को परवन्त्राप्रपस्स बाबास महानक अतिरिक अप बाघ पदाप है उनका अस्तित्व मी स्वीकार म्पतिरिक्तस्मास्तिता मनामिप्रेवा। किया गया है। न हि प्रो. प्रासमात्रम्य देबठ प्रकाशमानरूपा प्राप्ति रूपापा नीलपीसादिमामालम्पन-की या विचिता मीठ-पीता माणफ्पोपनिषद् [गी.. क्योंकि मिस वस्तुका कोई वादि ( कारण ) नहीं होता उसका यदि (पग्म ) मी नहीं होता ॥ २३ ।। अनादेरादिरहिसास्फलादेन मनादि अर्यात् षादिरहित फर- जायते । न मनुस्पपादनापति महा ई ऐसे अनादि से हेतु उत्पम मही होता । मिसकी फलादेसोर्चन्मेप्यते स्वया । फलं फलसे तो मुम हेतका सम्म मानते पादिरहिवादनासोरवात्स्स ही नहीं हो, और न ऐसा ही मानते हो कि अनादि-मादिरहित माक्स एव निर्निमित्रं चाप्त वर्षात् कममा हेतुसे बिना किसी इति नाम्पुपगम्यते । निमित्तके समाक्त ही मसकी ससादनादित्वमम्युपगच्छता उत्पत्ति हो जाती है। मत देव और फसबमारित स्वया हेतुफलपोरमन्मेवाम्पुप | मामनेवाले तुम्हारे स उमकी गम्पते । यसादादिः कारन वनुत्पत्ति ही स्वीकार कर की माती है, क्योंकि मेकमें मिस वस्तुका मियते मस्स लोके तस्स मादि। वादि-कारण नहीं हो उसन पूर्वोक्ता मासिन विपते । कारन- | मादि भर्षात पूर्फत मम्म भी मही होता । रिसका कोई कारण होता है पत मादिरम्पुपगम्पते | उसीका जन्म भी माना जाता है, नाकारणवतः ॥ २३ ॥ कारमशित पदार्पका म॥२॥ पामार्यमाद निरुपम उत्तरपवार्थस्स स्टीकरण पूर्वोक मर्पको ही पुष्ट करमकी चिकीर्पया पुनराधिपति- प्राप्ते सनिमिचत्यमन्यया द्वयनाशत । सक्लेशस्योपलव्धेस परतन्यास्तिता मता ॥ २४ ॥ प्रास (शम्सचा मान ) पो सनिमित्त (बामविषयपुक) माम्ना पाहिपे; महा तो [शादि] त मारा हो नाफा।
। सन्त शाभा-] ममतणास्तिमकरण २११ इसमे सिवा [भग्निदाह वादि] क्लेशकी उपलम्बिसे भी अन्य मता- समिपोक शाखवारा प्रतिपादित इतकी सत्ता मानी गयी है।॥ २१ ॥ प्रज्ञान प्राप्तिा अम्दादि प्रज्ञान वात् शम्दादि-प्रतीति प्रतीतिस्तस्याः सनिमित्त्वम्। का माम प्राप्ति है।ह समिमित्त है। निमित-कारण वर्षात् विक्पको निमिर्च फारमं विषय इस्पे-कहते हैं, त सनिमित–सविषय सनिमिच सतिपयत्व पानी अपनेसे अतिरिक विषयके | सरित है-ऐसी इम [ उसके विषम स्वास्मम्पतिरिक्तविषयवेस्पेनन् | में ] प्रतिज्ञा करते है । [भर्यात् प्रतिमानीमहे । न हि निविपया हमारा कपन है कि ] प्रासि पाभी प्रप्तिः शम्दादिप्रवीति: शम्दादि-प्रतीति निर्विक्पा नहीं हो | सकती, क्योंकि पा सनिमिया है। तस्मा सनिमिचस्पात । भन्यया | मया तसे निर्षिय माननेपर तो निर्षिपयत्वे समस्पर्शनीलपीत | शम्द, स्पर्श एवं नील, पीत और ठाहिताविप्रत्ययवंचिभ्यस पस भहित भादि प्रतीतिकी विचिश्ता- सूप इसका माश हो बापग नास्तो नाशाऽमाव: प्रसन्पेवे मर्यात् उसपे नाश पानी धमाका स्पर्ध । न च प्रस्पपपविश्यम प्रसंग उपस्थित हो नापमान भौर अयम्पामाषोऽस्ति प्रत्यक्षस्वाद । प्रस्पा-सिद होमेक कारण प्रत्यक- बचिम्पहप देवका अमान नहीं। मत प्रस्पयर्षविस्मस यस मत प्रत्पपौषिप्रमहप तिकी दर्शनात, परेपो पन्त्र परवन्त्र | उपपिसे, परतन्त्र पानी दूसरकि सन परकीय ताकर मिस्पन्पशास्त्रम्, तस्स परतन्त्रस्प स्यात् परकीय तत्रोंके आमित ना परततामयस्स पापा प्रानब अतिरिक अन्य वाय पदार्थ पान है उनका अस्तित्व मी सीकार म्पतिरिक्तस्सास्तिवा मतामिप्रता। किय गया है। न हि मङ्गले प्रकाशमानस्स कास प्रकाशमानबहपा प्रजामि रूपाया नीतपीवादिपासातम्मन-[की पर विभिप्रता मीर-पीतानि २१. माइक्योपनिषद् [गो का क्योंकि मिस बस्तुका कोई श्रादि ( कारण ) नहीं होता उसका परि (भम्म ) भी नहीं होता ॥ २३ ॥ अनादेरारिरहितात्फलादेतुर्न अनादि स्यात् अादिरहित - मायते । न अनुत्पमादनादेः कमी उत्पत्ति नहीं हुई ऐसे मनादि सेतु उपम नहीं होता । जिसकी फलाइवोर्जन्मेप्पते स्वया । फलं फलसे तो तुम हेतुका पन्म मामले पादिरहिवादनाठेखोरवास्व ही नहीं हो, और म ऐसा ही मानते हो कि धनादि-आदिरहित मायत एष निर्निमित मायत अर्थात् अम्मा हेतुसे बिना किसी इति नाम्युपगम्पते । निमित्तके समान ही फरकी तमादनादित्वमम्पपगन्छन्ता उत्पत्ति हो जाती है। मत हेतु और फलका नाशिक स्मया हेतुफलपोरबन्मैपाम्पुप | मानमाले उपहारे द्वारा उनकी गम्यते । पसादादिः फारमं न अनुत्पति ही स्वीकार कर ली गाती वियते यस लोके तम पादि। है, क्योंकि छोको मिस बसका पादि-कारण नहीं होता उसका पूर्वोक्ता मावि विपते । कारण- | आदि वर्याद पूर्खेत बग्म भी नहीं पादिरम्पुपगम्पते होता । मिसका कोई कारण होता है उसीका बम भी माना जाता है। नाकारणवतः ॥ २३ ॥ कारणारित पदार्यका नहीं ॥२३॥ पत पासावाद निरुपण उक्तस्पैमाधम चीकरण पूर्वोक भर्पको ही पुए करमेकी चिफीर्पया पुनराधिपति- प्राप्तेः सनिमित्तत्वमन्यथा द्वयनाशतः । सक्लेशस्योपलम्घेश परतन्त्रास्तिता मता ॥ २४ ॥ प्रालि (शदत्त्पदि शान) को सनिमित्त (बामविषययुष) मानना चाहिये नहीं तो [ शम्दत्पशदि ] दैतका माश हो माया ।
शां०भा०] भन्नतशान्तिप्रकरण इसके सिवा [ अम्निदार वादि] क्लेशकी उपलम्धिसे भी अन्य मता- पसम्बियोके शासवारा प्रतिपाति देतकी सच मानी गयी है॥२१॥ प्रमान प्राप्तिः अन्दादि प्राान वर्षात् शम्दादि-प्रतीति प्रतीविस्वस्सार सुनिमिचत्वम्। का नाम प्राति है। बहसमिमित है। निमित-कारण मर्यात् विश्पको निमिसं कारणं विषय इस्पे महते हैं, अत सनिमित्त--सविषय सस्सनिमियत्व सविषयत्व यानी अपनसे अतिरिक्त वियपके | सहित है-ऐसी हम [ उसके लिपप स्मात्मप्यतिरिक्तविषमतेत्येस में ] प्रतिज्ञा करते है। [अर्याद प्रतिवानीमहे। न हि निविषमा हमारा कपन है फि] प्राशि यानी प्राप्तिः पम्दादिमतीहिः स्वाद, शम्दारि-प्रतीति निर्विक्या नहीं हो सकती, क्योंकि इ समिमिज है। तस्पाः सनिमिचत्वात् । अन्यथा | मपा उसे निषिय मामनेपर तो निमित्वे शम्दसनीलपीक- शम्, एवं मील, पीत और लोहिवादिप्रस्पयवैविध्यस यस्म छादित पादि प्रतीतिकी विधिनता- रूप देशका माध हो जायग नासतो नाप्योऽमाव प्रसम्मेते. अपात् उसके माश पनी भमायका स्पर्थः । न च प्रस्पपचिम्पस) प्रसंग उपस्थित हो जायगा और द्वपस्यामाषाऽस्ति प्रस्पषत्वात् । प्रस्पा-सिर होने के कारण प्रत्यप- वैविश्पकप दैतका अभाव है नहीं। अस प्रत्यपर्व चिम्पस व्यस्स मतपस्वैविध्यारस ऐनकी दर्शनाव, परसा उन्नं परतन्त्र उपलम्धिसे, परतन्त्र पानी रोक म परकीय प्रकार मित्पन्पश्चासम्, वस्स परतन्त्रस्य अर्पात् परकीय सत्रोके वाशित को परतन्त्राश्रयस्म मापास प्रकार अतिरिखमय वाप पार्प है उमफा वस्तिव मी स्वीकार प्यतिरिकमास्तिवा मवामिप्रता। लिमा गया है । नहि प्राप्त प्रकाशमावस्व देवस प्रफाशमाश्रलरूपा प्राति रूपापा नीलपीतादिमामालम्पन की या विपिता नीपीता
૨૧૨
मायूपपोपनिषद् [गी का
वैचिश्यमन्तरण म्यमावमदेनेष बाघ आलम्बोकी विचित्रताक
सिमा क्यठ समावभासे ही हानी
वैचियं संभवति । सरिकस्येव
सम्मत नहीं है । तात्पर्य पद है
नीलाघुपाप्याययविना पैचिम्यं | कि स्फटिका समान, नीट-पीतादि
| उपाधियोको भाप्रय किये बिना
न परत इस्पभिप्रायः।
या विचित्रता नहीं हो सकती।
इतम परवन्यामपस्य पाशार्थ इसके सिवा इसलिये भी दूसगे-
के शास्रक बाधित झानम्पनिरिक
स शानस्पतिरिक्तस्पास्तिता
बाध पदायाँका अस्तित्व स्वीकार
संक्लेवन संकशा समित्यर्थः। किस्पा गया है कि अग्निदाहादि
के कारणसे होनमम सक्लेश मानी
उपलम्पसे पपिदाहादिनिमित्त
इस उपभ होता है। संक्लेशका
दुःखम् । यपम्न्यादिपामं दाहादि पप सक्सेशन अर्थात् दुख है। परि
| बिशामसे बतिरिक दहानिका
निमिर्च विमानव्यतिरिक्तं न निमित्तमूत अग्नि आदि को नाम
सातो दाहादिदुख नाफ-
पार्य न होता तो दाहादिमनित
दुस उपमध मही होना चाहिये
सम्मेव । उपलम्पते तु अतस्तेन | पा । फिरतु उपसम्म होता ही है
मन्पामोऽस्ति पापाऽर्थ इति । वस । बमिप्राय या है कि
| इससे हम मानते है कि यास पर्प
न हि विहानमात्रे संक्लेखो युका,
फेमा विज्ञानमानमें क्लेश होना
सम्मत नहीं है, क्योंकि मपत्र
अन्पत्रावर्धनादिस्पमिप्रायः।२४। ऐसा नहीं देखा गया ॥ २४ ॥
।
पिमानवादिर्जक पासावादनिपंप
यत्रोच्यते-
इस विश्यमें हमारा कयन कि-
प्रसप्ते सनिमिस्त्वमिष्यते युक्तिवर्शनात् ।
निमिचस्यानिमित्त्वमिष्यते भूतवर्शनात् ॥ २५ ॥
शा. मा.] भावशान्तिप्रकरण ૧૧ पूर्वोक युक्तिके अनुसार तुम प्रजातिका सश्चियन सीकार करते हो । परन्तु तससिसे हम उस विषयका अविश्व मानते हैं ॥ २५ ॥ पाटमेम प्राप्तः सनिमिचस्व ठीक है, इस प्रकार दु समय दतकी उपलम्विरूप युक्तिके अनुसार प्रयमक्लेशापलम्धिपकिदर्शना- तुम प्रजातिका सविषमस्व स्वीकार दिप्यस स्वया । सिरीमव करते हो, परन्तु युधिदान वस्तुकी तावत्वं युक्तिदर्शनं रस्तुनस्तया ययार्पवाके बानमें कारण है। अपने स्वाम्पुपगमे कारणमित्पत्र । इस सिदान्तम तुम स्पिर हो जाये। प्रति कि सव इति । बामापादी-करिये, उससे क्य आपति होती है। उच्यते । निमिक्स्स प्रह विमानमानी-हमारा कपन है कि प्राइसिके व्यरूपसे स्वीकार प्स्मालम्पनामिमतस्स घटादेर किसे हुए घटा विषयका हम निमिचस्वमनासम्मनस्व वैविध्या- अविषयम-प्रतीनिका मर्षात् विचिश्ताकर बहेतुय मानते इतुतामिप्यतेऽमामिः । कथम् ।। से मानते हैं ! भूतारिसे मूकदर्शनात्परमार्थदर्शनादिस्पे मर्षात् परमापाठिसे। जिस प्रकार अससे महिप पृपा है, उस प्रकार वस् । न हि घटा यथामतमप | मृचिकाके पथार्थ स्वरूपका बान दर्शन ससि सदम्पविरेफेम्मास्ति, होनेपर, घर उससे पृषण् सिर नहीं होता । इसी प्रकार से प्रपा मपाश्वान्महिपः पटो वा सन्तु पट दौर शुसे प्रपक् सन्त मी म्पतिरेफेग, तन्तपांशुम्पति | सिद मही ते । तत्पर्य यह है रेफणेत्येवाघरोघरमवदर्शन मा कि इसी तरह सरोवर यपार्प वलको देखते देखते मप्रतीतिया सम्प्रत्ययनिराधान्नैव निमिच निरोष हो मानेपर हम फोरें भी विषय महा देसते। धनाप्रयाण सपम्मामह इत्यर्थः ।
--48-40-48 इन निमितोंका मागम्योपनिपन् [गौ.. अथ पाभूतदर्शनासामार्थ अपया [ यो समझो कि जिस स्मानिमित्त्वमिम्पते, रज्ज्वा प्रकार रम्मु वारिमें अरोपित पनि बस्तुत प्रतीतिके आरम्पन नहीं है दाविव सपरिरिस्पर्पः । प्रान्ति- | उसी प्रकार अमूतदर्शनके कारण दर्शनविषयम्याच निमित्तस्या- हम बापायोको प्रतीतिका अपम्बन नाहाँ मानसे । भ्रान्तिरिक विषय निमित्तस्वं मवेत् । तदमाघे | होनेके कारण बनिमितत्व है, कि उसका बमात्र ऽमावात् न हि सुपुप्तसमाहित होनेपर इनकी भी उपलम्धि महा होती । सोये ए, समाधिस्स और सताना प्रान्तिदर्शनामाष मुज पुरुषों को, उनकी भान्तिीका आरमम्पतिरिक्तो बामोऽर्थ अमार हो जानेपर, पारमासे अतिरिक्त | किसी बाध पदार्थको उपसम्धि नहीं उपलम्पते । न पुन्मतावगत | होती । उन्मत पुरुपको रिकामी |दनेमात्र वस्तु उम्मादम्य मनुष्यको पस्स्वनुन्मवैरपि वषाभूगम्पते। म क्या नहीं पाम पाती। इस एतेन पदर्शन सक्लयोपसम्मिथ | कपनसे इतरशन और सेशी | उपाधि दोनोंहीका निराकरण प्रस्युका ॥ २५ ॥ किया गपा॥२५॥ यस्मानास्ति या निमित्तमतः | क्योंकि पाह्य विषय है ही नहीं, इसछिये- चित्त न सस्पृशत्यर्थ नार्थाभास तथैव च । अमूतो हि यतभार्थो नार्थामासस्ततः पृथक् ॥ २५ ॥ पित किसी पार्यका स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार म फिमी ध्यामप्रसका ही प्रक्षण करता है। क्योंकि पदार्पदी महा इसलिये पार्षाम्पस मी उस पित्तमे पर मह ॥ २६ ॥ ।
शा०भा०] मछातशान्तिप्रकरण २१५ चिच न स्मृमस्मर्थ वामा पिच, पित्त होनेक कारण ही स्वमपिसके समान, बाप भाउम्पन लम्बनविपयम्, नापर्धामास के पिपमूत किसी पदायको स्पर्श चिचत्वास्थमपिचरत् । अमूतो नहीं करता और न र्याम्पसको ही प्राण करता है, क्योंकि उपर्युक हि जागरितेऽपि स्वप्नार्थववच तसे ही स्वप्नात फायकि समान यामः शम्दापों यत उक्तहेतु | नागरित कास्थामें मी शम्दादि माय | पदार्प है नहीं, और न वितसे नाप्यमासपि पृपक मामास ही है। यदि पासपक्विचमेव हि घटापर्थ | पदाकि सम्पन चित्त ही मस्ता है, जैसा कि प सममें भासा पदवभासते यथा स्वप्ने ॥ २६ ॥ करता है ॥ २६ ॥ । ननु विपर्यासस्तसति भ्यारिके न होमेपर भी चिचको यदिकी प्रवीति होना-या तो पटादौ पटापामासता चित्तस्य । विपरीत शन है। ऐसी पास्मामें तथा च सस्पविपर्यासः कषि- वरिपरीत (सम्पा) शान का होगा। यह परमना चाहिये । एकम्प इति । मत्रोन्यते- इसपर करते है- निमिर्च न सदा चित्रं सस्पृशत्यप्यनु त्रिपु । अनिमित्तो विपर्यास कय तस्य भविष्यति ॥ २० ॥ [ मूत, भविष्यत् और समान ] तीनों वास्पाम पिच कमी किसी पियको स्पर्श नहीं करता। फिर उसे बिना निमित्तके ही परीत मन कैसे हो सकता है. ॥ २० ॥ निमि विपपमतीवानागत बतीत, अनामत और बतमाम- पर्तमानाध्यमु प्रिप्यपि सदा | इन तीनों ही मासामि पित कमी चिसं न स्पशेदेव हि । यदि हि निमिठ पानी विस्पो स्पर्श मही ,
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श- भा०] मातान्तिप्रकरण २१७ 42-42-4LAL वा उसके यस्मादसत्येव घटादौ भटापा स्पोंकि विज्ञानषादीने घटादिक न होनेपर भी विचको घटारिकी मासता पित्तस विज्ञानषाठिना प्रवीति होनी स्त्रीकार की है और म्युपगवा तदनुमोदि यथार्षदष्टि होमेके कारण उसका तम् अस्माभिरपि मृतदर्शनात्, हमने मी अनुमोदन किया है, इसलिये उसकी मानी [ चित्तकी तसाचसापि चिचस्प मापमाना उत्पत्तिकी प्रतीति भी उसकी उत्पति- पमासतासत्व बन्मनि पुक्का के अभाव में ही होनी सम्भव है भवितुमित्पतो न जायते विचम्, अत जिस प्रकार घिचके दृश्यका सम्म नहीं होता उसी प्रकार चिर- पथा विधाय न वापते । की भी स्पत्ति नहीं होती। अवम्तस्य चिचस्स ये जाति इसलिये यो विशामवाटी उस पश्यन्ति विज्ञानपादिनः पणि चितकी उत्पत्ति कत्सास्सित्वश्न्यस्वानारमस्वादि | क्षणिकप, हुलिप, शून्पत्य एवं घ, सेनैव चित्तेन चिवस्वरूप कनारमा श्रादि देखते है-स चितसे , जिसका देखना सनषा इप्टुमसम्म पश्यन्तः असम्मा है ऐसे विचके सरूपमा पश्यन्ति ते पदं पक्ष्यादीनाम् । देनेवाले वे निमय ही बाकाशम मत इतरेम्पोऽपि तिम्पो | पक्षी मानिने धरण देखते है ।का तात्पर्य यह है कि ये पम्प स. त्यन्तसाहसिका इस्पर्ष येऽपि गादियोंकी अपेक्षा मी अधिक साहसी शून्पवादिनः एप और वो धूम्यादी सबकी सर्पशून्यता बदर्शनस्पापि | शुम्पशा देखते हुए अपने दर्शनकी मी शूम्यताको प्रतिक्षा करते है शून्यता प्रतिवानसे वे तताऽपि तो उनसे भी बहकर स्मसी के माइसिकाराः सं सृष्टिनापि बाकाशको मुट्ठीसे ही पकाना विषन्ति ॥ २८॥ चाहते है ॥ २८ ॥ पध्यन्त माणक्योपनिषद् [गौ.प. उपक्रम उपतहार उक्त भिरबमैफ अमेति पूर्वेच हेमोंसे या सिर इश कि एक धमन्मा प्रमही है।का, मि यत्पुनरादौ प्रतिसावं ( पहले जिसकी प्रतिज्ञा की है उसके एलका उपसंहार करने के लिये र सफलोपसहारार्थोऽये लोका- अजातं जायते यस्मादजाति प्रकृतिस्तत । प्रकृतेरन्ययामावो न फर्यचिदविष्यति ॥२० ॥ क्योंकि पबमा [ चित ] का ही चन्म होता है इसम्येि अगानि ही उसका क्षय है और समावकी विपरीतता किसी प्रकार महाँ होगी ।। २९ ॥ अमातं मरिसर्च प्रमेय वायत जमात गो सप विच है इति पाविमि परिकत्म्यते ही उत्पन्न होता है. एसी बाहिर्मों बारा कम्पना की माती स्पोकि समान मापते पस्मादमाविः स अमातका ही जन्म होता। प्रतिस्प | वस्तस्मादबाव इसलिये अयाति उसका समाप । तब, इसीठिये टस बनातरूप समा- पायाः प्रवेरन्पपामावो बन्म ) का अमरूप परीक्षमाप किसी न फपिनपिप्पप्ति ॥ २९ ॥ प्रकार मही हो ॥२९॥ धर्म पापर मारमना संसार आरमाके संसार और मोक्ष- दोनोंहीका पारमार्षिक बक्षिता मोहयोः परमार्थसझावमादिनों सीकार करनेवाले मादियों के प्रकका यह एक दूसरा दोष मनप दाप उप्पते- पाया है- • भा०] महाशस्तिप्रकरण अनादेरन्तयत्व च ससारस्य न सेत्स्यति । अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति ॥ ३.॥ अनादि संसारका तो कभी मतपत्त सिद नहीं हो सका और सारि मोशकी कमी अनन्तता नहीं हो सकेशी ॥ ३० ॥ अनादेवीतकोटिरहिसस्प मनादि-अनीतकोरिमे रहित ससारस्पान्तवय संसारका मन्तवरक अर्याद समाप्त होना समाप्तिर्न | मुक्किमे सिर नहीं होगा। छोकने को सेत्स्पति युक्तित सिद्धिं नीप | भी पार्ष अनादि होकर भन्सवान् होम नहीं दया गया है। यदि कहो यास्पति । न पनाह समन्त | कि बीमारसम्पन्भको निरन्तरमाका पान्कमिस्पदार्थो टो लाक । विष्रे हाता टम्मा गया है! तो | ऐसा कहना टर नहीं, क्योंकि पीजापुरसंबन्धनरन्तर्यविन्छदो बीमाङ्करसन्तति कोई एक पदार्थ न होनक कारण उसके मनासिका इए इति चेत्, न; एकवस्व निराकरण तो पहल कर किया मानापादितत्वात् । गया है। सथानन्ततापि विधानप्राप्ति इसी प्रकार विज्ञानप्राप्तिके समय होनेवळ सार मोशकी कालप्रमवस्य मावस्पादिमता न अनन्ताय मी नही होगी, क्योंकि | घटादि [ जम्य पगों ] में पसा | देखा नहीं गया। यदि पदो कि मषिप्पति, पगदिषदर्मना । घयाग्निाशके ममाम भानप होनसे [ मोसमें ] यह दोर नाही पटादिविनाशवदयस्वाददाप 4 सपना हो इसमे मोक्षक पारमार्पिर समावरित प्रतिमापी इति पेन, क्या व मावस्य हानि दागी । इमर मिया [पनि | मोरी अमापी माना पर तो परमार्थसहावानिशाहानिः 1मी ] शक समान असत्
२२.
मामूक्योपनिषद
[गौर
यसम्पादप प्रश्नविपाणस्पयादि | होने के कारण भी उसके दिमत्त
मस्यामावय॥३०॥
का धमाय है ।।१०॥
प्रपथके बसस्पतमें हेस
आदायन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितयः सदृशा सन्तोऽवितथा इव लक्षिता ॥३१॥
मोबादि वौर वन्समें नहीं। वर्तमाममें मी म [अर्माद
मसल्प ] ही है। ये पदाथसमझ क्सत्वं समान होकर भी सत्-मै
रिसायी देते है ॥२१॥
सप्रयोजनता तेपां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादायन्तवत्स्वेन मिध्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ३२ ॥
उम ( मामत्-पदापों ) की सप्रयोजनता समापामें मसिम
हो जाती है । अत आदिक्तयुफ होनेके कारण वे निक्ष्य ही मिप्या
मान गये १० ॥
सम्ये कतय्यारम्पानी बैतप्पप्रकरणम
सोकोंकी म्यास्पा की या पुकी ।
स्लामविह ससारमोधामाप- | यहाँ संसार और मोझरे वभाषके
प्रसाने म्न्हें सिर पर विष
प्रसभेन पठिती ॥ ३१ ३२॥ 18॥ ११ १२ ॥
इन
सर्वे धर्मा मृपा स्वप्ने कायस्या तनिदर्शनात् ।
समृतेऽस्मि प्रदेशे वै भूतानां दर्शनं कुतः ॥ ३३ ॥
सकि शरीरक भीतर देम पानेके पमण सप्नावसा समी पर्प
मिथ्या है तो इस संकुचित सानमें ( निरकार अम) ही मूनोपा
दर्शन से सा॥१३॥
शां० भा०] मध्यवशास्तिमकरण ર निमिचस्सानिमिचस्वमिप्पठे इन श्पकारा निमित्तस्पानि मित्तलमिष्यवे भूतदक्षनाग भूतदर्शनादिस्पयमर्थ प्रपञ्च्पस (१।२५) इस लोक्के ही भर्षका विस्तार किया एते श्लाकः ॥ ३३ ॥ गगया है॥ ३३ ॥ समा मिय्यासमिरूपण न युक्त दर्शन गत्वा कालस्यानियमाद्गतौ । प्रतियुहम वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥३॥ देशान्तरमें जानमें बो समय सना है, [समावस्थामें ] उसका नियम न होनेके कारण म्ममक पदापोको उनके पास जाकर दसना सो सम्मन नही है। इसके सिध जागनेपर भी फो। उस (समरणि) दाम नही रहता ॥ ३५॥ जागरिते गस्यागमनकालो जागतिमें से आन-बानक सम्प नियता देस प्रमाणठो यस्तस्पा और प्रमाणसिद देश निपा १ उनका नियम न होनये करण नियमाभिममस्यामावास्स्सम न स्त्रनामस्मामें दशान्तरमें जाना नहीं दक्षान्तरगमनमित्यर्थ ॥ ३४ ॥ हो यह इसका अभिप्राय है ॥२०॥ मिनाये सह समन्व्य सचुटो न प्रपद्यते । गृहीत चापि यत्किचित्प्रतियुद्धो न पश्यति ॥३५॥ [म्पमाबम्पामें ] मिरिक साप मत्रग पर [ यह म्वना पुरुष ] गगनपर उसे नहीं पाता तपा ठसन जो कुछ [ म्यमापस्मामें ] प्रहण किया होता है उसे सामनेर नहीं दमणा ॥ ३५॥ मित्राचः सह समन्य तदेष [ सममें ] मिप्रारिक सप मप्रगा फाफ बाग पानेपर मित्र मन्यणं प्रतिपदो न प्रपपते ।। टसी मश्गको मही पाता भौर ૨૨૨ मागम्पोपनिषद् [गौ.. गृहीत प यत्किचिदिरम्पादि | [ उस समय J उसने भो मुन क्षदि प्रहण किया होता है से न पामोति । अव न देशान्तर मी प्राप्त नहीं करता । इसलिये में सप्नामा बह किसी देशस्तरको गन्छति स्वप्ने ॥ ३५॥ नही चाता ॥ ३५॥ स्वप्ने चावस्तुक काय' पृथगन्यस्य दर्शनात् । यथा कायस्तथा सव चिचदृश्यमवस्तुकम् ॥३६॥ सममें मो शरीर होता है भी यस्तु क्योंकि उससे मिष एक मा शरीर [ पाप्यापर पका हवा ] देखा नाता है। वैसा कर शरीर । सा ही सम्पूर्ण विवश्य बालरूपी स्वप्ने चारनपते या कामा खममें धूमन इमामो शरीर देख बता र वस्तु है, साऽमस्तुकास्ततोऽन्यस्य स्वाप- पोंकि उस मानप्रदेशस्त शरीरसे मिम एफ और शरीर शम्पायर प्रपकामान्तरस पड़ा पूषा ] देश साता। मिस दर्शनाद । पया समस्या प्रकार सप्नमें पसायी बनेकम शरीर असत् है उसी प्रकार पारित कामोऽसम्तमा सई विद्यापम- अस्मामें सारा वितरस्य, मोस पिचका ही श्य होनेके कारण, पस्तुक वागरितेsपि पिचरस असत् है-पई इसका तात्म्य है। स्वादिस्यर्थः । स्वमसमस्वाद प्रस्त अर्थ या किस्मनके समान होनक करण जामत-जाम्पा भी सझागरितमपीमि प्रकरमा ३६ असत् ही है ॥२६॥ सन मार आमधारणत माहारिक इतपासव जाग्राम्तुन' चापाकी असा इसलिये भी कि- - शा.मा. ] मसतशान्तिप्रकरण २२३ ग्रहणाजागरितवसहेतु स्वप्त इप्यते। यरेतुत्वानु तस्यैव सज्जागरितमिप्यते ॥३०॥ माप्रतके समान ग्रहण किया चानके करण खप्न उसका कार्य माना जाता है। किन्तु नामका कार्य होनेके कमण समाके लिये ही चामत्-मास्मा रूप मानी जाती है ॥ ३०॥ जागरित्यजागरिवस्म जागरितके समान ही मन ग्रहणावप्रामग्राहकरूपेण स्वमस्स | प्राहकालपमे सप्नका भी पहण होनसे इस खप्नापस्थाका मामत कारण है, समागरिव इतरस म्पमस्स स इसलिये वह समारमा क्तक म्पमस्तदेवांगरिसकार्पमिप्यते । यानी जामत्का कार्य मानी जाती है। वदेतत्यामागरिवकार्यस्मात्तस्पैर तदेतक र्षात् जाप्रत्फा कार्य स्वमरश्य एवं समागरित न होना करण उस मानवायके ही स्वन्पाम् । पपा सम इत्पलिये नहीं; जैसा कि सप्न-पह छिये जामत् भवस्या सस्प है, चौकि मिप्राया। इसका तात्पर्य है। पथा स्वमा समश्य एवं जिस प्रकार मन मनमको मन्मापारणविधमानषस्तुबदर ही सत् अपात् साधारण विपनाम पस्तुके समान मासता . उसी मासद उपा तत्कारणस्था प्रकार उसका कारण हानसे शाम साधारमषिधमानवस्तुपदर की भी साधारण नियमान बस्तुके समान मीम हाती है। पिस्तु माममान न तु साधारण म्हप्नर समाम ही पद पिषमानवस्तु स्वमवदवेस्प साधारण विपनाल पमही- मिप्राय ॥३७॥ | पर इसया अभिप्राय १॥३७॥ " ननु समकारणरवेऽपि सामना पाणहानपर भी मागरितमम्तुना न स्पमपद {माप्रपाका प्नप समान [मौ० -- माणुपयोपनिषद पस्तुलम् । अस्यन्तम्ला दि। अपस्तुल मही है, कि सप्न तो समो नागरितं तु सिर । अत्यन्त चबाल सत्यवे। मस्या सिर देखी जाती है। सम्पमवमधिदेफिना स्यात् । समाधान- ठीक है, परिकियों- कहिये ऐसी बात हो सकती है विवेफिनो तुन कम्पषिद्धस्तुन | किन्तु विवेकियोको तो किसी मस्तु की उत्पति सिर ही नही है। उम्पादा प्रसिदोस:- उत्पादस्याप्रसिदत्वादज सर्वमुवाहतम् । न च मूतादभूतस्य सभवोऽस्ति कवचन ॥३८॥ रूपचिके प्रसिद्ध म हानेके कारण सब स भनी हा माता है। इसमें सिध सत् पस्तुसे असत्की तत्पति किसी प्रकार को भी मही सकती ।। २८॥ अप्रसिदत्तादुत्पादस्पास्मैव स्पषिके सिर न होनेसे सब सर्पमित्यम सर्पमदार वेदान्तेषु मामा की "समाधाम्पतरो "सबाधाम्पतरो रुपसे सपका भग ही कहा। (103०२१११२) इति । चौर तुम जो मामस हो कि सत् यपि मन्यसे सागरिवारसको आमदमे असत् पनकी स्पति सत्स्वमो मायत इति सदसद । शेती है सा भी ठीक महाँ; क्योंकि न भूतादिपमानादम्पसासता को मन नियमान वस्तुसे असद सम्माऽस्ति लाक। न पससाका अन्म नहीं करता। पारी गसपिपाणाद: सम्मयो रट गाविपदापोका अम्म किसी कपमिदपि ॥ ३८॥ भी प्रकार देनमें माही १८॥ इसपिये मामि मम स्पति ननूक्त स्वयन स्पमा आगरित वन जागरितका पर्य है; किर महा-यह तो तमाम कमाया
शामा०]
महाशान्तिप्रकरण
२२५
कार्यमिति तत्कपमुत्पादोऽप्रसिद | ऐसा क्यों कहवे हो कि पति
इत्युच्यते।
सिद्धही मही होती।
म तत्र यया कार्यकारण-
समाधान-म मिस प्रकार
उनका कार्यकारणमा मामते है,
मावोऽमामिरमित इति सो मुनो-~-
असजागरिते दृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मय ।
असत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतियुद्धो न पश्यति ॥३९॥
[नौत्र ] भापत् अक्लामें वापदारों को देखकर उन्हीक संस्कारसे
युज हो उन्हें सप्नमें देखता है, किन्तु समावस्पाम भी वस्पदाको ही
देखकर बागनपर ट नही देसता ॥ ३९ ॥
असदविपमान रन्मुसर्प
जागरित मवस्था असत् पर्याद
रघु सर्पक समाम कल्पना कित्ये
वनिकरिस्पतं वस्तु बागरित पान
हुए अमिषमान पदायोको देसकर
सहावभाषितम्तन्मयः म्वप्नेऽपि | उनके मावसे मक्ति हो सनमें
मी वामममाषसे नागस्तिके
नागरिवग्राभग्राहकरूपेण
समान मान-माहरूपसे विकल्प
विकल्पयन्पश्यति । वासरस्वप्ने करता ना करें देता है। क्या
सप्नमें भी मसपदार्पोको देसकर
अपि न च प्रतिबुद्धो न पश्म | मागमेपर विकल्प न करनेके कारण
ने नहीं देना।'' शम्दसे
स्मविकल्पयन । पशम्दाच्या
पर अमिग्राप किसी प्रकार
मागरितेऽपि पा स्वप्ने न कमी नाप्रपमें देखकर भी उन
पदापोको सनमें नही देखता ।
पम्पति कदाचिदित्पर्यः । तस्मा | इसीलिये पहा गया है कि
बाप-बाला सनका कारण है,
भागरित सप्नईसरुप्यते न तु उसे परमार्थसत् मानकर ऐसा नयाँ
परमार्थसदिति कस्वा ॥३९॥
काहा माता ॥३॥
मसत् कारणाम बसपदार्प ૨૨૫ मायोपनिषद् [गी.. परमार्थवस्तु न फसविस्फेन परमार्पत तो किसीका किसी चिदपि प्रकारेण कार्यकारणमाष मी प्रकार कार्य-कारणाम होन्य सम्भव नहीं है। किस प्रकार । उपपपते । कथम् -- [सो बताते हैं- नास्त्यसहेतुकमसत्सदसदेतुक तथा । सब सहेतुकं नास्ति सहेतुकमसत्कुत ॥४॥ म तो बसपदार्पही मसत् कारण और न सर पदार्य ही नसत् कारण है। इसी प्रकार सत् पदार्थ भी सत् कारणछा मनी है, फिर क्सत् पदार्थ ही सत् कारणमात्र कैसे हो सकता है॥०॥ नास्त्यसदेतुफमसच्छश- पिपामादि हेतुः कारणं पस्पासत | मी नहीं है-विस काकाशपुष एष सहसमादेस्तदसतफमसम मादि वसम्पदार्पका करें शृङ्गादि जस कारण हो ऐसा को विपवे । तथा सदापि घटादि बस्तु मसदेतुर्फ शमविपामादि नहीं है। तवा पटावि सात मी क्सबेतुक असत् पार्प भी लिममान फार्म नास्ति । तथा सब सबेतुक माद राशक्षिाप्यादि विधमान पटादि विधमान | [सपदार्प] का कार्य ही है। इसी घटादियस्वन्तरकार्य नास्ति । प्रकार सत पानी दिपमाम पर गादि किसी अन्य वस्तुका भी कार्य सत्कार्यमसतास एष सम्भवति ।मही है। फिर सत्का कर्म असत् ही पान्य कार्यकारणभावः कसे हो सकता है। इनके सिवा किसी मम्य कार्य-करणम्पकी म तो सम्मववि शश्या वाफाल्पयितुम् ! | सम्माना है और म पम्पना अता निवेफिनामसिद एम फार्य | क आ सकती है। सारपर्प पाए कि विकियोंके लिये कारममाव: कम्पपिदित्य सा किसी वस्तुपर मी सर्प कारण- मिप्रायः ॥४०॥ भाव सिनदीमही ॥१०॥ शास- न
० मा०]
ममवशान्तिप्रकरण
आह
पुनरपि जायत्स्वममोरसतोरपि बागत् मौर सप्न असद होनेपर
भी टनके कार्य-कारणमाय सम्बम्ब
कार्यकारममावासकामपनयन् में जो शहा है उसकी निति
करते पुए फिर भी करते है-
विपर्यासाघथा आप्रवचिन्त्यान्भूतवन्सशेत् ।
तथा स्वप्ने विपर्यासारास्तत्रैव पश्यति ॥४१॥
निस प्रकार मनुष्य भान्तिमश नामकरसीन अविनय पापोंको
पपार्षवत् प्राण करता है उसी प्रकार सममें भी भान्तिकश [ समकामन ]
पापोंको कही ( उसी धास्वामें ) देखता है ॥ ११॥
विपर्यासादविवेकतो यथा
निस प्रकार कोई पुरुष सिपर्पस
अपार वविवेकक कारण गामव
माप्रमागरितेऽचिन्त्यान्माषान
अपस्मामें रण-सरि बचिन्तनीम
सम्पचिन्तनीयान् रन्दुसर्यादीन् र्गत् बिनका चितम मही किया
जा सकता ऐसे पापोका मत-
भूतपत्परमार्पवत्साशमिव घि
परमापवर स्पश करते हुए से
फन्सपेदिस्पर्य फपियथा, तथा कम्पना करता है। उसी प्रकार
स्वप्ने विपर्यासाद्वस्त्पादीन्धर्मान् सप्नमें पिपयासके कारण ही
महापी माविको देखता एमा-सा
पश्पभिव विकल्पमति; सर्वच
कम्पना करता है, मपात् उन्हेंबर
पश्यति न तु भागरितादुस्पप- | उसी असामें देखता है कि
मानानिस्मयः ॥ ४१ ॥ जामत्से उत्पन्न होते हुए 10॥
जगदुविध उपस मिला लिये।
उपलम्भात्समाचारादस्तिषस्तुत्ववादिनाम
जातिस्तु देशिसा पुरैरजातेस्त्रसता सवा ॥३२॥
[स्तु की ] उपलब्धि और [ वर्गाश्रमावि ] बापारके कारण
जो पापोकी सखा स्वीकार करते है तथा अमालिसे मम मानव , निशानोंने
सर्वठा उम्दकि सिये पालिका उपदेश दिपा ॥ १२ ॥
२२८
भाणायोपनिषद [गौ
मामि बुद्धशतवादिमिना
सयापुर पानीक्तगदी विानों
विदेशितोपविष्य, उपलम्मनम् । उपदेश दिया है [ उसका पद
ने जोमाति (जगत्को स्पवि) का
उपलम्मस्वभादुपलपरिस्पः, कारण है- उपसम्मनका मम
समापारावर्णाभमाविधर्मसमा-
उमसम्म है उस उपसम्म अर्थात्
उपसम्बिसे और समाधर--
पस्थान, ताम्मा तुम्पामस्ति प्रमाद धर्मोक सम्पन नाचरणमे-
बस्सुत्ववादिनाम् अस्ति पस्तु
इन दोनों पारसि साका
अस्तिव मामनेमले अर्षाद वैत
माव इत्येवं पदनशीलाना | पदार्योकर ] पस्त है पैसा करने
साग्रहमा भरधानानो मन्द
पारने र आमही, प्रदान और मन्द
कितीह पुस्योको प्रारम्प
विवेकिनामोपायत्वेन सा मेषफी प्रासिंहप ] भपके उपाय
रुपसे उस जातिका उपदश नपा
रेगिता चाति । वां गान्तु || { उसमें उनका यही वाल्पम है
कि 'ममी मर ही उमे सीकर
तायन । वेदान्ताम्पासिनो मु
कर के,परन्तुमासामम्पास करते-
म्वममवाचामयात्मविपयो विवेको करते उन्हें सही अमग्मा और
महितीप मारमा सम्बन्धी विकतो
ममिप्यतीति न तु परमाय- माया उन्होन परमायुनिसे
उसका उपदेश नही पा स्पोंकि
पुदया । हे हि श्राप्रिया स्पछ-३ पास युनि-परायण अधिवकी
मुद्वित्वाइजाता अधातिवस्तुनः
व्येग रसूति होममे करम
अपना नाश मानवे नमाति
सदा अम्पन्स्यारमना मम्पमाना
अदि अन्मरक्षित बासे सा मप
मामले ₹-यह इस तात्पर्य है।
अविवेकिन इत्यी । उपायही पात हमने आप मेरा
राप इत्याचिोक (भतिप्रमाण
साध्यवारापेस्पुरतम् ।। ४२॥ श्येक १५ में बही ६॥७॥
शां. भा०] मम्वास्तिमरण २२. सम्मार्गगामी देतवादियोंकी गति अजातेनसता तेपामुपलम्माद्वियन्ति ये । जातिदोषान सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥१३॥ देतकी उपलब्धिके कारण जो विपरीत मार्ग, प्रपट होते अनातिसे मय माननवाले सन स्पेगोकि डिये आतिसमन्धी दोष सिद्ध मही हो सकते [योंकि देतबादी होनेपर भी वे सम्मानमें प्रात्त तो हुए ही राते ] [ और यदि होगा मी तो ] घोड़ा-सा ही दोर होगा | ये वापतम्भात्समाचाराचा मोग इस प्रकार[पापोंकी ] बावेरजातिवस्तुनमसन्तोऽम्ति- उपाधि और [ वर्णाश्रमादिके ] पस्त्वित्पनयादात्मनो विमन्ति | काबारीक कारण असन्मा क्रतुसे उरमेवाले और त पदापर पिरुदै पन्ति दूतं प्रतिपयन्त ऐसा समझकर भय आमासे विस्ट इत्पर्य । तेपामजाक्ससा | पलते है, अर्थात् ति स्वीकार करते भधानानां सन्मार्गावलम्पिना) , उन बमासिसे मप मानमग्रास चादिदापा जात्युपलम्मकता भदाल और सन्मानमानी पुरुषों तापा न सेत्स्यन्ति सिदि को नातिशेष मानिकी उपलम्पिक पियास्मन्ति, पिफमार्गप्रश्चरण होनाले दोष सिम नहीं होंगे क्योंकि वे विवेकमामि प्रवृत्त स्वात् । भवपि पत्रिकाप है। और यदि पुस र दोन मी सास्सोऽप्यल्प पर भविप्पति । तो म भी बम्प ही होगा, वर्षात् सम्पदर्शनाप्रविपतितुकात्पर्य के सम्मानिकी मासिक ।।१३।। करण होनेवासादोपदीहोगा ॥२॥ नेनपसम्मसमाचारपो-प्रमाण- उपपिऔर मारणीमपमाणता परिकहो कि उपम्धि और आचरग तो प्रमाम, सरिये २६० माणपयोपनिषद [गी. स्वादस्स्पेष स परिस्वति, नतस्तु है ही, सो ऐमी बात मही है। क्योंकि उपलब्धि और कारण- उपलम्भसमाचारपाय॑मिषाराद। कर तो म्पमिषार भी होता है । फिम प्रकार म्पमिचार ना! फच म्पभिचार इस्युम्यते सो बतलाया जाता है-- उपलम्भात्समाचारान्मायाहस्ती यथोम्यते। उपलम्मात्समाचारादस्ति वस्तु तथोम्यते ॥१४॥ उपसम्धि और आचरणके कारण निस प्रकार माणनित हापीको [ 'हापी है-इस प्रकार ] कहा जाता है उसी प्रकार उपधि और वाचरण कारण प्वम्त । पमा कहा जाता॥१५॥ उपलम्पसे हि मायाहस्ती हापीक समान ही मापाननित हायी मी देखनमें आता हावी इम्तीय स्तिनमिवात्र के समान ही यहाँ [ मायाहस्तीक मन्ति, पन्धनारोहपाठिशस्ति- साय] भी धन आरोहण आणि स्ति | सम्बन्धी धर्मोंना म्यवहार करते सम्पचिमिस्त्रिीति चोच्यते । बिस प्रकार असत् रोने ऽसमपि यथा स्वोपलम्मात्समा- पर भी हाथी । ऐसा पहा जाता है, उसी प्रकार उपाधि पाराद्वैत मेदरूपमस्ति पस्त्वि और भावरणके कारण भेदरूपल- स्पुयत । तमामोपसम्मसमा-वस्त है-ऐसा कहा पाय है। बमिश्राप या है कि उपाधि पारौ दैववस्तुसमापे हतू मवत और भरण देत बस्तके समाव इत्पमिप्रायः॥४४॥ कारण नहीं ॥१॥ ममा परमार्थ पस्तुमा है। किं पुनः परमार्पसदस्तु पिसकेगाभपसे गाति वादि प्रदरिया होती है
• भा०]
भावशान्तिप्रकरण
૨૨
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यदास्पदा बारपापसव्यय | परमाय बस क्या है !
इसपर
इस्याह-
कहते है-
जात्यामास चलाभासं वस्त्वामास तथैव च ।
अजाचलमवस्तुत्व विज्ञान शान्तमद्वयम् ॥१५॥
जो कुछ बातिके समान मासनेवाले, पटक समान मासनवाण
भौर बसके समान मास्नेवाम है वह बस अक्ल धौर भास्वरूप शस्त
एवं मरतीय शिान ही है ॥ १५ ॥
मजाति समाविरदयमासत यो ममाति होकर भी जातिक्त
इति बात्मामासम् । व्यथा
प्रतीत हो उसे जास्यास करते है,
उसका उदाहरण, वैसे-देवदत्त
दपदचा जायत इति । पलामासं
अपम होता है। जो पल्के समान
पछमिवामासत इति । यथा स प्रतीत हो उसे पटामस करते है
से-पही देवरत जाता है।
एवं उपदचा गष्यसीति ।
सग्रमासम्स्तु पर्मा इम्पको
वस्त्यामास वस्तु ट्रम्प धमिरते हैं, ने उसके समान प्रतरित
सहदसमासठ इति पस्स्वामासम् । सो ह बतबामास है । जैसे ही
यथा स एष दक्दचो गोरो दीर्ष | देवदत्त गौर गौर दी है। देवता
ठत्पम होता है, पछठा सपा
इति जापत दवदचा सन्दते
प गौर और दी है-इस प्रकार
दीर्षों गौर इस्पेवमयमासत । प्रसता किन्तु परमायट तो अब,
परमार्थतस्त्वमफलमयस्सुस्पम- मस, भवस्तुल भोर अम्मन ही
है। ऐसा पर काम [रसार करते
द्रयं पतिदेमंप्रकारम् ।।
(१- हिान अपात् विति वपाप
विज्ञान विज्ञप्ति' । जास्पादि | मावि अदिमे हित हानेके कारण
रदिवस्याप्टान्तम् । अत एपादय शस्त है और इसीसे बाप भी
प सदित्यर्पः॥४५॥ -सा उनका तात्पर्य ॥१५॥
माइयोपनिषद् [नी.. एव न जायते चिचमेवे धर्मा अजा स्मृता । ज्वमेव विजानन्तो न पतन्ति विपर्यय ॥४॥ इस प्रकार शित फिर मही होगा सीसे शामा असन्मा माने गये है। ऐसा माननासे अंग ही भ्रममें महाँ पाते॥१९॥ एवं ययोक्तेम्पा इम्पो न इस प्रकार उपयुक दोस। विटपर सम्म महीं होता, और मामत पित्तमेस थमा आरमानसीसे प्रवेशाने धर्म यानी ऽजा स्मृता प्रभामिनि । धर्मा परमाओंको बममा मना है। मिल पिम बेहोकर अनुगमन करने रवि पाइपचन रमेदानुविधा सम हानेसे एक अदियि मामाक लिये ही उपचासे धर्मा। इस मित्यादरपम्पैवापचार। बापपनका प्रण मिया गया। परमेर मपोर्क मिशान! इसी प्रकार उपर्युक धिानको मात्पादिरदिवमदममात्मवर्ष मपात भात भादित परिताप धामापको बाननेवासे विमानन्तस्मतमामेषणा पुन एपणा से मुख ए मेग किर पवन्त्यवियाध्यान्तसागर विप विपप पर्पत् वरिपारप अपकार * सम्में नहीं मिले इस ये। पत्र से मोहक बसमें एकल्प देनेवाले पुस्यको कपा माह और क्या सोको एकत्तमनुपायता" (६०३०७) सक्तपादिमभरपसे ही इत्यादिमन्ववर्णात् ॥ ४६॥ बात प्रमाणित ती॥१६॥ बा विहानामा बलतपुरमा राना यथोक परमादन प्रपत्र- पोत परमाननका दिORसे मिपम करेंगे, इसरिसे पिप्पमार--- मलातशान्तिप्रकरण લા दिकामासमलातस्पन्दित यथा हकामास विज्ञानस्पन्दित तथा ॥४७॥ जिस प्रकार भव्यत (रका ) का घूमना ही सीधे-टर मार नपाम भासित होता है उसी प्रकार विज्ञानका सरण ही म्हण और प्राइफ भादिसमि मास हाई॥१७॥ यथा हि लाफ अजुपक्रादि जिस प्रकार ओको सीप रेटेमादि मुपोंमें मासमाम होनबाठा जातका प्रकाराभासमलातस्सन्दितमुका- स्पन्द स्यात् उम्बर (जती ॥ | बनैती) का घूमना ही है, उसी प्रकार पलन तथा ग्रहणप्राहकामास] प्रहण और मारकरपसे मासन बाम्य भषात इन्द्रिय और विषयसम विपपिपिपयामासमित्यर्थ । कि मे मसनवासा भी। हकीन । विज्ञानका रफ्नमा मविपाके सविमानस्पन्दिवम् । स्पन्ति- कारण ही सन्दप ममान सान्द मिव सन्दितमविधया । नमा प्रतीत पाता है, बस्तुर बरिचम द्विाना रकम नही हो सस्ता, प्रचलम्प पिमानस्य स्पन्दनमन्नि । क्वेवि [ उपयुक्त श्लोक ४७ में ही परभर भरपर पेमा कदा प्रजापतमिति मुक्तम् ।। ४७ ॥ जा Sukn १७ ॥ अम्पन्दमानमरातमनामासमज यया। भरपन्दमान विज्ञानमनामासमज तथा ॥१८॥ जिस प्रकार मानि माप और बरमी प्रामनरदिन निमारसम्न्य भीरtuen तिम प्रदीप मरटनम दिसतर नदपाठातमन्यापासारपावाप मम्मन्दमान मन्दनावित
-
माणस्योपनिषद् [गो.
मानमनामासम यथावधाषिधमा मारि नाकामि मासित म होनके
कारण बनामास और वर पता
है उसी प्रकार अविपासे स्पषित
स्सन्दमानमवियोपरमेऽस्पन्दमान
होनेवाम शिम अश्विाकी निति
होनेपर साति बादि सपसे स्पन्दिव
मात्यायाकारणानाभासमजमचलं /म होकर नाभास, भय और अक्स
हो माया ऐसा इसका तात्पप
भविष्यवीय ॥४८॥ ॥ १८॥
| इसके सिवा-
अलाते स्पन्यमाने वै नामासा अन्यसोमुव ।
न ततोऽन्यग्र निस्पन्दान्नाला प्रविशन्ति से ॥१९॥
अहातके सनित होनेपर मी व लाम्पस किसी अन्य कारणसे मही
होते, तपा उसक स्पन्दरहित होनेपर भी कही वन्य नहीं पले नाते
लोर न से मार ही प्रवेश करते ॥ १९ ॥
समिन्नेवालावे सन्दमान | उस जमाफ स्पन्दित होनेपर
भी दे सीधे-रो भनि बामास
सवमापामासा जावादन्यतः
मपतसे भिन्न पडीमपत्रसे बाकर
सचिदागस्थालाते नैव भवन्ति मातमें उपस्थित नहीं हो जाते
इति नान्यवोससानप सस्मा
अन वे किसी नम्पसे होनेवाले मी
निस्सन्दादसाताद या निर्गया। मही ११ वा निस्कन्द र उस
भारतसे ये कही बम्पर नही पले
प निस्पन्दमतासमेर प्रवि जावे कोर म स निस्पद मातमें
शयिते ॥१९॥
ही प्रवेश कर पाते है॥४०॥
। सो समिति-
मिगता अलासारो मन्यत्वामावयोगसः ।
(सपि तथैव रसुराभासस्पाविशेषतः ॥ ५॥
शा०भा०] भलातशान्तिप्रकरण २३. उनमें उम्पपके अमावस योग होनेके कारण ये अनमे भी नहीं निकलते हैं। इसी प्रकार आमासस्थमें समामता होनके कारण भिवानक विषयमें भी समझना चाहिये ।। ५०॥ न निर्गता अलावाच मामासा न्यवाभावयोगय कारण म्प प भावका माम प्रपत्र है। उसके ग्रहादिपद्रष्यस्वाभाषयोगत भभाषको दम्यतामाब परते है, उस द्रम्पस मावो द्रव्यत्वम्, तद | दम्पपामाबयोग अपात् ब्रम्पया मावरूप एकिक फाण पानी बस्तुल मावा द्रव्यत्वामार , द्रष्यत्वा काधमाव होममे वे अभास पर भाथि माघयोगता द्रम्पस्वामामपुर्व मेनिफस्न समान असातसे मी नहीं स्तुत्वामाषादित्य , पस्तुनो हिनिको क्योकि प्रवेशालि बने तो प्रधेशादि सम्भवति नापस्तुनः वम्मुफ ही सम्भा | अबस्सुके नहीं। क्षिानमें [ प्रतीत होनवास ] जास्यादि विशानेऽपि मात्यायामासास्तव बामास मी ऐसे ही समन्चन पाहिये, म्पुरामाससाविशेषतस्तुस्प प्योंषि आमासकी सामान्यता दोनमे वान् ॥५०॥ उनकी गुम्यता है ॥५०॥ फथ तुल्यस्वमित्याह- उनकी तुम्यता मिस प्रफर. सोबतम्यते - विशाने स्पन्दमाने ये नाभासा अन्यतोमुवः । न ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्न चिनानं विशन्ति ते॥ ५॥ न निर्गताम्ने विज्ञानाद्र व्यत्याभावयागत । कार्यकारणतामानाचतोऽचिन्त्या संदंव से ॥ २॥ पिनपन्न होनेर भी उमरे मामास ठिी भम्प वार मी मुकेमात हानेपर पदी अम्पर नी रमान और म निमें से प्रवेश पर नागर ॥ ५१ र जमरस माणूक्योपनिषद् {को कर पेश निकारण ये लिहानसे मी मह निकले, क्योंकि कार्यकरमाका बम हानेके कारण वे सदा ही मचिम्तनीय (अनिर्वचनीय ) ||२|| बलावेन समान सर्व चिा स्पिाम विश्यमें मी सम 5 WAT ही समान है। निस्पक नस । सदाषठत्व विधानस रानाही शिमकी शिता विशेपा । पास्मायामासा विशा-पचर विनमें जाति बार अम्मस किस कारणले होते है। नेऽपले किकता इत्या । कार्य इसपर करते है-स्पॉमिका फारसामावान्वन्पवनकलानुप कारणास अमात्र मत अमान- रूप के कारण अम्यानमारकी पचेरमानरूपस्वादपिन्यास्से अनुपपति होनेसे में सवारी पता सदर । अस्तिनीय है। यपाससानापामासेपुर [एक दोनो श्योपों सम्मिलित अप या है कि जिस प्रकार न्यादिमुदिरयालासमा सपा-(साग) बारिमाकिन बानपर मी बदम्पप्रमें ही बार मुद्धि सस्प बास्मादिषु विद्वानमारे होती देसी जाती है उसी प्रकार जाति मात्यादिपुद्धिमपति सा अदिक महोनेपर भी शिन- मात्रमें पाति मादि मुभि होमा मिस्या यार्थः ॥ ५१-५२॥ ही है। ५१५२ ॥ मारमा कार्यकारणभार यो असम्म ! अजमेकमारमतापमिति पित | या निपप कि एक सत्र पैरपि कार्यकारणभाष अमरमा भारमल।उसमें जो रोग बर्मधारणाची कम्पना करप्यते पाम्- करते है उनके मसमें भी द्रव्य द्रव्यस्य हेतु स्यादन्यदन्यस्य चैव हि । द्रन्यत्वमन्यमायो वा धर्माणां नोपपयते ॥ ५॥ -- शां० भा.] मनावशान्तिप्रकरण २२७ --- दम्यका कारण दम्प ही हो सकता है और वह भी अन्य दम्पका मम्प ही दम्प कारण होना चाहिये, कित पारमामि दम्पत्व और बम्परम दोनों ही सम्भव नही है ।। ५३ ॥ धन्यव्पका कारण अन्य दम्प द्रम्म उम्मम्मान्यमान्मदेत ही हो सकता है न कि उस दम्य फारण साम तु तस्यैव तन और ओ वस्तु मध्य नहीं नाप्पद्र्म फस्पचित्कारणं स्वतन्त्र है उसे अपने विमीका सम्म फारण होस नहीं देख । स्या रम साफान पद्रष्यत्व घमाणाधारमाकर इम्पप सपा कम्पन मात्मनामुपपद्यतेऽन्यत्वं पात किसी मी प्रकार सम्भव नाई, निससे कि ये किसी जम्प द्वयक मिपेनान्यस्य कारणस्व कार्यत्व कारण भा कर्मवको प्राप्त हो या प्रतिपयत । अपोम्पत्वा मरे । न तात्पर्य यह है कि वनन्मत्याप में सम्मविस्तार्य नभ्याप और अमन्यवक कारण भारमा किर्सका भी कार्य वपना कारण वात्मेत्यर्थः ॥ ५३॥ कारण नदी || १३॥ एष न थिजा धर्माश्चित वापि न धर्मजम । एव हेतुफलाजासि प्रविशन्ति मनीपिण ॥ ५४॥ इस प्रकार म तो मान पदाप ही पिचमे परम पित्त दी माम पदामि सपम भाबत ममयी ग कार्य-ममणकी अनुत्पति ही मिभित करते ॥५॥ पपपाकेम्पो हाम्प आत्म इस प्रकार उपयुकदमोसे पित वात्मविज्ञानम्मरूप ही । म तो विमानस्वरूपमेन रिपमिति न बार पापी पिसे अपन र पिचमा पापपर्मा नापि पाम और म विच ही बारा पदायसि पर्म विचम् । विमानम्यरूपा- अमन कुमा! मी सारे ही माभूक्योपनिषद् [गो०० मासमाप्रत्यास्सर्वधर्माणाम् । एष | धर्म विज्ञानवरूपके आम्नसमात्र है। न देखो फलं मायते नापि फला इस प्रकार म तो हेतुसे फम्मी उत्पत्ति होती है और म फसे देतुरिति हेतुफलयोरबाति हतु देवकी अत मनीषी स्पेग देत मौर फलाघाति प्रविनन्स्यव्यवस्पन्ति फरकी समुत्पति ही निश्चित करते है। तात्पर्य यह कि ममता आत्मनि इतुफलयोरमायमेव ध्येग बारमा रेस और फरका प्रतिपपन्चे नमविद इत्यर्थः॥५४॥ अमाप ही देखते हैं ॥ ५ ॥ । हेतु-फलमायके वमिनिपेतका फल ये पुनर्वेतुफलयारमिनिविष्टा किन्तु बिनका हेतु और फलमें स्तेषां कि सादित्यन्यते-पा- | अभिनिवेश है उनका क्या होगा । इसपर कहा जाता है-पर्मधर्मसंघक धर्मास्पस्स देतोर फर्ता मम हेतुका में कर्ता , धर्म और धर्मापमा सत्फलं कालान्तरे अधर्म मेरे १, फायन्सर, किसी कचिस्पाणिनिकाये चाटो मोप्य | प्राणीके शरीरमें सम्पन्न होकर उनका फल मोगेंगप-स प्रकार- यावदेतुफलावेशस्तावस्तुफलोद्रय क्षीणे हेतुफलादेशे ससारं न प्रपद्यते ॥ ५५॥ याक हेतु मोर फलका आग्रह है तक्तक ही हेतु और फकी उत्पत्ति भी है । हेतु जोर फलका कोश क्षीण हो जानेपर फिर हेतु और फरारूप संसारकी उत्पत्ति भी मही दोती ।। ५५ ।। यापदेतफलयोरावेशो जबतक हेतु वीर सपा आवेश खापार अर्पत उग जाम्पमें फलाप्रद मारमन्यम्यारापण भागवितरमा यानी तपित्तता वग्यित्तस्यर्थः, तावदेतफल तता हेतु भौर परपी पति पारा धर्माधर्मयाम्तस्फरस्प | मी १ वात् ताप भर्माधर्म और A शा. मा०] मनातशान्तिप्रकरण पढा पानुछेदन प्राचिरित्पर्य ।। उनके फसफी प्रविष्टिम्न प्रचि मी है कित जिस समय मन्त्र और भोषधि- पुनर्मन्यौपविषीर्येणेव की सामप्पमे महके भावेशके समाम प्रहावेशो यथोत्तादिनदर्शनेना | उपयुक बतिबोधसे अविधाममित विद्यात्मवहेतुफलावेशोऽपनीतो देव और फलका भावेश निात हो जाता है उस समय उसके क्षीण मावि तदा ससिन्क्षीणे नास्ति हो मानेपर हेतु और फलकी उत्पत्ति हेतफलोय ॥ ५५॥ मी मही होती ॥५॥ इस-फरसके ममिनिषसमें दोष यदि हेतुफलोरपस्तदा को पदि हेतु वीर फरफी उत्पति रहे तो इनमें दोर स्पा ! दाप इत्युच्यते -- सो बसलाते :- यावदेनुफटावेश समारस्तावदायत । क्षीणे हेतुफ्लादेश ससार न प्रपद्यते ॥ ५॥ जबतक हेतु और फटका आrt तबतय संसार बड़ा हमारे। देवभोर फरका आवेशा नए हानर पिम् Eसरको प्राप्त नही गा।॥ ५६॥ यापरसम्पदर्शनेन इतफता जबतय सम्पानसे ६ भौर पश्या आमद निर नहीं होता पेनो न निवर्मतमीण मंमार | सार संमार ईग न म्नापदापना दार्थों मवतीम्पप गित THE गता। रिम् जोर FT IF या धीप पुनौतमगा मंमारं न पाम रहामे गिन् संसारमा प्रश्पन कारणामापात् ॥६॥ 'प्रम नी पला ।। ५६ ॥ वापर
२४०
AAL-
माण्डफ्योपनिषद्
[गी..
नवजादात्मनोऽन्यन्नास्त्मेव
मा-अनन्मा वास्मासे मिन्न
तो और कोही मही। फिर वेद
तत्कर्ष हेतुफलयो ससारस्य बौर फल क्या संसारके उत्पति-
पोस्पधिषिनाशान्येत त्वया ?
विनाशका तुम कैसे वर्णन का
समाधान-सन्म एनो-
सवृत्या जायते सर्व शाश्वत नास्ति तेन ।
सदायेन मज सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥ ५७॥
सार पदार्थ म्यावहारिक ररिसे उत्पन्न होते हैं, इसलिये थे निस्य
नहीं है । परमार्पररिसे तो सब कुछ मम ही है, इसलिये किसीका पिनास
भी नही है ।। ५७॥
संवस्या संवरणं संपति 'संहत्या'-मवरण अर्पत
रविवाविपयो लौकिको व्यव
मविपाविषयक ठौकिक म्पहारका
नाम संवति स सातिसे ही
हारस्तपा सात्या बायते सर्वम् । सबकी स्पति होती है। का
वनाषियाविपये शाम्पतं नित्यं | उस विधाके अधिकारमें को मी
बत शायत-निष्प नहीं है।
नास्ति पे । मत उस्पतिविनाश | इसीलिये उत्पत्ति-दिमाशशीठ संसार
लक्षणः संसार मायत इस्पुम्पते । विस्तृत है-ऐसा कहा पाता है।
परमार्थसमावेन स्वख पर्वमात्मैव क्योंकि परमापसवासे तो सब कुछ
यमात् । मतो जास्पमाला-
अयम्स वात्मा हीरात जन्मका
अमाव होने के कारण किसी मी
दुम्छेदस्तेन नास्ति नै कस
या फास भाविका मोदमही होता-
पितफलादेरित्पः ॥ ५७॥ ऐसा इसका तात्पर्य है ।। ५७ ॥
थीयोकर पम्म मार्मिक
घर्मा य इति जायन्ते जायन्त ते न तत्त्वतः ।
जन्म मायोपमं तेषां सा च माया न विपते ॥ ५८॥
० मा
भसावशान्तिप्रकरण
348
बे
धर्म (जीव) नो उत्पन्न होते कई बाते हैं मे मान उत्पन्न
नही हाते । उनका बन्म मायाके मराश है और वह माया मी पस्तुत ]
है नहीं ।। ५८ ॥
येऽप्पास्मानोऽन्ये च धमो जो भी बामा नया दूसरे धर्म
'उफ्न हाते स प्रकार कल्पना
वामन्त इति भरपन्ते स इत्पर्ष में जाते हैं । इस प्रकारक
प्रकारा ययोका संविनिर्दिश्यत समी धर्म संहतिमे ही उत्पन्न होते
है। यहाँ भनि शम्दसे इससे
इति संवत्येव धर्मा बापन्तन से पहले की कही । संतिका
तसह परमार्थसो बापन्त । निर्देश किया गया है। तरका-
परम्पपत उत्पन्न नहीं होते।
मत्सुनस्तरसंवत्या
मम पां
क्योंकि उन पूर्वोक धोका को
धर्माणां पयोक्तानां यथा मायया सतिसे होनेवाला जन्म है यह
ऐसा है जैसे मापासे होनगम
जन्म तथा उन्मायोपम प्रत्य
जम होता है, इसलिये उसे मायाके
वष्यम् ।
सारा समझना चाहिये ।
माया नाम पसुतहि नवम्।
तब सो मत्या एफ सप्प बस
विद होती है। नहीं, ऐसी यात महा
माप मान विपते, मायेस्प/पाया मी महाँ । पर्य
पर है कि मापा' या अधिकार
विद्यमानस्यास्पेत्यभिप्रायः॥५८॥ वस्तुका ही माम॥४॥
फर्म मायोपम पां धर्माणा उन धर जम्म मापा माश
मिस मर सो बताते हैं-
यथा मायामयाद् बीजाम्जायते तमयोऽधुरः ।
नासो नित्यो न चोछेदी तदरपु योजना ! ५९ ॥
जिस प्रकार मायामप भीमसे मापामय भार उत्पन हात और
परमती निम्प ही होता है और न नाशवान् हो, मी प्रथम धर्मपि
पिम्पमें भी पुजि सम्पनी पदिय ॥५॥
२४.
माइक्योपमिपद्
नन्नवादात्मनोपन्नास्त्येव
मा-भमन्मा वास्मासे मिग्न
वो भौर कोई है ही नहीं, मिर हेतु
तत्कयं हेतुफलयोः संसारस्प और फल तपा संसारके उत्पति-
योत्पचिविनाशावग्येत स्पया ?
विनाशका तुम कैसे वर्णन कर
पृणु-
समाधान-सन्म, मनो-
सकृत्या जायते सर्व शाश्वत नास्ति तेन थे।
सद्भावेन छज सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥ ५७॥
सारे पदार्प प्यावहारिक ररिसे उत्पन्न होते है, इसलिये ये निस्प
नहीं है। परमार्पदधिसे तो सब कुछ बम ही है, इसलिये किसीका विनाश
-
भी मही है ॥ ५७ ॥
समस्या संवरणं संदति सास्या'—संवरण पात्
रविपाविपयो लौफिको घ्पष-
भविमाविषयक गैकिक म्यवहारका
नाम संशति है, उस संपतिसे ही
हारस्तपा संवत्या जायते सर्पम् । सबकी उत्पत्ति होती है। का
सेनाविधाषिपय साथ निस्प | उस अविधाके अधिकारमें कोई मी
वस्त शामत-निस्य नहीं है।
नास्ति हैं । बत उस्पचिविनाश
इसीलिये उत्पति-बिनाशशीक संसार
लक्षणः संसार थापत इत्युपते । विस्तृत है-ऐसा कहा जाता है।
परमार्थसमावेन त्वयं सर्वमात्मैव क्योंकि परमापसत्यसे तो सब कुछ
पमात् । अवो पास्पमावा
अममा बारमाहीत सम्मका
दुप्छेदस्तेन नास्ति दै
अमाव होनेके कमण किसी भी हेतु
या फवारिका उम्मेदमही ऐसा-
पिवेतुफलादेरिस्पर्यः ॥ ५७॥ | ऐसा इसका तात्पर्य है ।। ५७ ॥
जीवोध बम माषिक
धर्मा य इति जायन्ते जायन्त ते न सत्स्वत ।
जन्म मायोपम तेषां सा च माया न विपते ॥ ५८॥
शौ. भा०] महातशान्तिप्रकरण ર! - परमापन धम (जीव) जो उत्पम होने यह जाते हैं व प्रस्तुत उत्पन नहाँ हाते । उनका जन्म मायाम मास बार यह माया मी [ वस्तुत ] नहीं ॥ ५ ॥ याप्यात्मानोऽन्य च धर्मा) वा भी भागमा नपा हमर धर्म 'उत्पन्न होते हैं-स प्रकार कम्पना मायन्त इति करप्यन्ते स इत्पर्य मिये जात है व इस प्रकारक प्रकाग यथोक्ता संशतिनिर्दिश्यत ममी धर्म मातिमे ही उत्पन्न हाते है। पहाँ प्रति शम्दसे इससे इति संपत्यष धर्मा जायन्त न ते पाहस को कहीं ए सहतिया तस्पत परमार्थता बापन् । निर्देश दिया गया है । म तत्त उत्पन नहीं होते। पत्पुनस्संवत्या बम तेषां योकि उन पूर्वोत धर्माका जो भमाणां पधाक्तानां यथा मायया) सहतिसे हानाय जन्म ६ र एमा । म मायाम हानवाला जन्म तथा मायापम प्ररये जन्म हाय, मठिप उसे मायाफ तम्पम् । सा मममना पाहिप । माया नाम पस्तुमहिं? नरम्। नब तो मापा एफ मुप्प पल मिद होनी है। मह, मापात महा सा प मापा न निघते, मायेन्य || मपा मी महो। पहरिमापा T पान विधमानसाम्पत्पभिप्राय पाय दीनान॥॥ रन माग्न म्परम बमरपाह- रिम प्ररमो यात- यथा मायामयाद् यीम्जायते समयाऽर । मासी नित्या न पोरेदी तहरमपु यातना ॥ ५९ ॥ रिम प्रशFT मारे CARATHEE मी प्रत y निस भइदिसला फार्थ मापारम तर्पा धमाया| २४२ मागफ्योपनिषद् [गी.. यथा मापामयादानादिनी मिस प्रकार मापामप बाम मान्जायते सन्मयो मापामयोs | सारिक बीनसे तन्मय वर्मात् हुरो नासाकारो निस्पा न मायामय भार उत्पन्न होता है और यह आर न तो निम्य ही होता है घोच्छेदी विनामी वाभूतत्वाच | और न नाशवान् ही, उसी प्रकार प्रदेव धर्मेपु सन्मनाशादियोजना | भसत्य हानक कारण धमि भी युक्तिः । न तु परमार्थता गमनाशादिकी योजना युति है। तात्पर्य यह है कि परमार्फत धमाका धर्मागां बन्म नाशो मा युन्पत जम अथवा नाश होना सम्मा | मही १ ॥ ५० ॥ इस्पर्षः ॥ ५९॥ मारमाफी मियपनीयता नाजेषु सर्वधर्मषु शाश्वताशाश्वताभिधा । यत्र वर्णा न पर्तन्ते विवेकस्तन नोग्यते ॥१॥ इन सम्पूर्ण अजन्मा धमि नित्य-अनिस्प मामेकी प्रति मही। यहाँ शम्द ही नहीं है उस वारमतत्त्वमें [ निस्प बनिस्प ] विवेक भी नही करा पा सकता ॥ १०॥ परमार्थतस्वारमखजेषु नित्यै बास्तबमें तो निस्य एकरस करसविज्ञप्तिमात्रसचाकेषु धाव विधानमात्र सपसरूप वारमामि निस्प-यनिस्प-ऐसे वोऽमाश्यत इति वा नामिया मिधान वर्षात् नामकी भी प्राति नामिपानं प्रवत इस्पर्षः । यत्र नहीं है। यहां-मिम महारमामि मेषु वर्पन्ते पैरास्ते पर्णाः -मिनसे पदापोका वर्णन किया जाता है ये वर्ण पानी शब्द पदा न प्रवर्तन्तेऽभिधातुं प्रका-नवर्षाप उसका वर्णन करने के शपितुं न प्रवर्मन्त इस्पर्थः । ये प्रात मा होते हैं, उसमें छ मा०] मावशान्तिप्रकरण २४ इदमे दमिति विवेको विनिता । यह ऐसा है अर्थात् निस्य अपय अनित्य है। इस प्रकारका विक मी सत्र नित्याऽनित्य इति नोच्यते । नहीं कहा जाता, जैसा कि जहाँ "या पाचो निर्वन्ते" (सै० से पाणी सोट जाती है।" इस श्रुति- उ०२१४११)इति भुते ॥६० से मिट होता है ।।६०॥ यया स्वप्ने द्वयाभासं चित्र चलति मायया । सपा जाणवयाभास विच चलति मायया ॥ ६१॥ जिस प्रकार खप्नमें वित्त मामासे तामासरूपसे स्कुरित होता है सभी प्रकार समकालीन तिमाहसे भी पित मापासे ही सरित हा मद्य च द्वयाभास चितं स्वप्ने न संशय । अद्वय च द्वयाभासं तथा आमन्न सशय ॥१२॥ इसमें सन्दह नहीं, खप्नावसाम मय वितही तापसे मामनपा इसी प्रकार जाप्रत्फाम मी बाप मन ही तिसपसे मासनेमाला समें मो मन्मही ॥ १२॥ परपुनवाग्गोचरस्मे परमार्थ अश्य मिशनमात्र जो मातिस्प शनाई बहमनका तोऽपस विज्ञानमावस्म सम सरगमार दी ६,इ परमात नस सन्दनमान न परमात महीनस प्रान इन शमी म्पान्या पाल (पान. २९३० इति। उताम्लिाको ॥६१-६२॥ में ) की जा चुकी है ॥१२॥ परमात देतामाप सण राना याग्गोचरस्यामागे पाणी रियमन उमयि भी अनाप- तस्प- माणग्योपनिषद् [गोपा खप्नहक्मचरन्स्वप्ने दिनु वैदशा स्थितान् । अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्स दा॥ ११ ॥ खप्नवा सप्नमें घूमते-घूमते दशों दिशाओंमें स्थित निन असम अपना स्वेदन जीवोंको सर्वदा देखा करता है। क्तुत उससे पुपक् महाँ होते ]]६३॥ सप्नान्पश्यतीति स्वप्नरकम जो सप्नोंको देखता है उसे सप्ताच्य परन्पर्यटन्स्वप्नेसनमाने दिसु कहते हैं, बावन मर्पत सनस्पति ने बस स्मितान्वर्तमानाप्रीला घूमत्य हुवा शो शाओंमें स्थित दिन स्पेदन क्या असर प्राणियों न्मापिनोमानान्स्वेदवान्या पा से सर्मदा देना है [रे खम न्सदा पश्यति ।। ६३ ।। उसस मिन्न महाँ हाते] ॥१३॥ यथर्ववता किम् सम्पते। यदि ऐसा है तो इससे सिम स्या वा सो बसमवे है- स्वप्मविपश्याम्ते न विद्यते सत पृथक् । तथा तद्दश्यमेवेद स्वप्नाविषञ्चमिप्यते ॥ १४ ॥ मे सब सजायके चित्तके प उससे प्रपा मही होते। इसी मबार उस सप्नदगमा यति उसीका स्य मामा ॥६॥ सप्नमाधिसनस्चित्तम्।। सनवणपर पित्त सप्नास्विच सेन रस्पास्ते भीमा-कहता है उससे देसे आनेबारे वे मीर उस सप्नद्रपके विचसे स्वप्नपश्चिचामन विचन्ते पृपक मार-मह इसपर कार्य नवीयप विचमेव पने-है । बनेफ बीका िभेदरूपसे पिच ही पम्पमा निया पान। जीवादिमेदारेण विमप्यते । सपा पदापि स्वप्नपपिचामिद "समय"। इसी प्रकार उस सनद्रराव पा.
• भा०]
मसातशान्तिप्रकरण
ववषयमेव, सेन स्वमाया । उस वप्नद्रवसे देख जाता है,
इसलिये उसका क्या है।बत तात्पर्य
सदश्यम् । अत स्वप्नहरम्पवि
यह है कि बनायसे मिन्न पित
रेफेण चिघनाम नास्तीस्पर्थः।६। भी कुछ नहीं ॥ ६ ॥
चरजागरिते जाग्रदिश्च वै दशम् स्थिसान् ।
अण्डजान्स्वेद जान्यापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ५५॥
जाग्रचिचेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते तत पृथक् ।
तथा तद्दश्यमेवेद जाग्रतधिक्षमिप्यते ॥६५॥
जामत्-अस्मामें घूम-घूमते जामत्-वरस्साका साक्षी दशों
Pशाओमें स्थित दिन अगा अपवा स्वेदन जीवाको सर्वदा देखता
है॥६५॥ नाप्रश्चितके पश्य उससे पृथक् नहीं है। इसी प्रकार
पहनापचित्त भी उसीका श्प माना जाता है॥६५॥
मानवो हश्या नीषास्तपिचा माप्र पुरुषको साथी देने-
माले जीव उसके पित्तसे अपक्
प्पतिरिकात्तिक्षणीयस्वात्म्बान
है, क्योंकि वभनयके मिससे देखे
जानेवारी जीवोंके समान में उसके
चरिचचधणीपजीववत् । तर
चितसे ही दसे जावे। सपा
सीवेषमारमक पिचं द्रष्टुरम्पति गीतों को देखनेवा मह रित्त मी
द्रयमे वमिन है, क्योंकि स्वाचित
रिक द्रष्टाश्यत्वात्स्वप्नचित्तवत् । के समान वह मी नामद्राफा
दश्य है। शेर वर्ष पहले कहा मा
उतार्थमन्पत् ।। ६५-६६ ।। पुर ६ ॥ ६५-६६ ।।
उमे भग्योन्यदृश्ये से कि सदस्तीति नोच्यते ।
लक्षणाशून्यमुभय
तन्मतेने
गृह्यते ॥६॥
[गौ- । २४१ माणस्योपनिषद् २ [जीर और चित्त ] दोनों एक दूसरे स्य है । कम्नुमा महा मही आ सकता । ये दोनों ही प्रगन्य ये के तम्भितारे कारण ही प्रग शिये जाते ॥६॥ बीपषिच उमे पिचचेस्ने जीव और पिठ वर्माद विध और ति विस्य-से दोनों ही मन्पान्परम्प इतरतरगम्य । अन्योन्याश्य अर्याद एक्लमके जीपादिषिपपाप हिपि नाम | विषय है। मीषा िविपकी मपेशा- माति । पिचापक्ष हि बीमादि से पिच और विकी अपेक्षसे बीयदि स्प | वे एक-दूसरेके रयम् । अतस्ते अन्योन्याश्य । पसलिये ऐसा प्रस्त होनेपर किये है म्या । विवेकी प्लेग ही वसाम किंचिदस्तीवि पोम्पते करते है कि पिच श्यया पिका विध पा भिवेक्षणीय बा किंस-नमसे कोई भी मत है ना ! तदस्तीति विकिनोपसे । न इससे उन लिनेकी पुरोका पनी वनि प्राय है कि जिस प्रकार सममें हापी हि सपने इस्ती इस्तिथि का भौर हापीको प्रहण करनेवाश्म पिच नहीं होता उसी प्रकार की विपते परापि विवकिनामित्प (भाम-वासा ) मी उनका भिप्राय:। बमार। मम् ! तपमान्य सस्म पिस प्रकार महामयि वे पिठ बार चैप दोनों ही मला वेज्नयति सक्षमा प्रमाणे प्रमाण शुन्य-प्रमाणादित। जिससे को शून्पसमपं पिट पं पार्ष पनि होता है उसे क्षमा पानी प्रमाणा पहावीर पवस्त मसनेव तपिपतष वा तमा-पिचासेही प्रहण कि गृपते । न हि घटमति प्रत्या | जाते हैं, क्षेकि न पारित स्यागपर भकारी मण पिल्या गम्याय पो गृपते नापि पर माता ६ भोर म माया स्पागर प्रस्पाम्पाय परमतिः । न ।
शा. भा.] पानशान्तिप्रकरण २६७ सत्र प्रमाणप्रमयमेदः यस्मते । उनमें प्रभाग और प्रर्मया भेदयी फसयितुमित्यभिप्राय ॥७॥ करना नहीं की जा सकती ॥७॥ यथा खममयो जीवो जायते नियतेऽपि च । तया जोश अमी मर्व भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६८॥ जिम प्रकर मनर जीत उपन होता है और मरता मी है, उसी प्रकार ये सब जीव भी उपन होत और मते भी हैं ॥ ६८ ॥ यथा मायामयो जीवा जायते म्रियतेऽपि च । तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥१९॥ निम प्रकार मायामर जीर मान्न होगद और मरना भी है, उमी प्ररर ये गुर जीप उगम हान है और माने भी है ॥ १० ॥ यथा निर्मितका जोवा जायते म्रियतेऽपि या । तथा जीरा अमी स भवन्ति न भवन्ति च ॥७॥ निम प्ररर मयादिग रवा दमाजीर कपन द भीर मरता भी उसी मर मर र नहानभर मत मी६॥ ७० ॥ मापामया मापाविना ५ म मप-त्रिमे मपान रमा कना निमिना मन्यापम्पादिहा निर्मिना-पय अर ओपि भिनिंपादिन । मममापानि | म मान किया दामन, और मामेि निगम एप मिवय अगवादया नीरा यथा मार जी ब्रिग प्रार वापन्त प्रिपन्न म सपा मनु | THA और मन मी उमी पादिनमा परिपमाना बारम्नुनिया परन दीले र६ पिला नि पितरिम्सनामामा इल्य th-- मम २४८ माफ्यापमिपन् ममातिही उत्तम सल न कमिम्जायते जीव समवोऽस्य न विद्यते । एतचदुसम सत्य यत्र किंचिन्न जायते ॥१॥ [बस्तुत ] कोई जीव उत्पम नहीं होता, उसके बाकी सम्माना ही नहीं है। उत्तम मुस्प तो यही है कि जिसमें किसी वस्तुकी उत्पति ही नहीं होती ।। ७१ ॥ व्यवहारसत्यविपये जीवाना म्पाहारिफ सलामें मी जीर्थक मो सम-मरणानि खप्नादिके सन्ममरणादिः स्वमादिनीवयदि जीवोंके ही समान है-ऐसा पहले स्पुक्तम् । उपमं तु परमार्थसत्यं पटा जा चुका है। किन्तु उत्तम न फपिज्जापते जीव इति । सस्य तो यही है कि कोई भी बीत उत्पन्न नहीं होता । क्षेत्र मेशकी उतार्थमन्यन् ।। ७१ ॥ म्यास्पा पहसे की जा चुकी है।।७१॥ पिची संगता विचस्पदितमेवद ग्रामग्राहकयद्वयम् । चिच निर्विषय नित्यमसग तेन कीर्तितम् ॥७२॥ विश्य और इत्रियों सहित यह सर्ग त पित्तकर दी हरण किस्तु पित निर्षिश्य । इसीसे उसे नित्य वमंग कहा गया है || ७२ ॥ प्रापमाइक्वचिपस विश्य और इन्द्रियोंसे पुल न्दितमेर दयं पिच परमार्थ सर्गत पितका ही पुरण है। आमबति निविपय दन निर्विप किन्तु पित परमापत पास्मा ही है इसउिपे पह निसिप है। उस परपन नियममई दीक्षितम् । निर्विरोमण उसे सर्वश असंग "मपला पर्य पुरुष " (प. उ० | कहा गया है। मैसा कि यह पुस सव श० भा] मलातशान्तिप्रकरण ४।३।१५,१६) इति ।। बसंग ही है" इस निमे प्रयाणित सविषपस हि विपये सतः । होग है। जो सविषय होता है उसी- का अपने विषयसे संगहो सकता है। निम्पिमत्वाविचमसङ्गमिस्पर्य वत तात्पर्य यह है कि निर्विश्य ॥७२॥ होने के कारण पित्त असंग है।। ७२ ॥ नेपदोप, कस्मात्- ननु निर्षिपयत्वेन दसगावं मन-यदि निम्पिके करण ही असता होनी है तो पित्तकी पिचम न निःसङ्ग्वा मवति ] असंगता तो हो ही नहीं सकती क्योंकि यस्मान्छास्ता मात्र शिप्पयस्येव धाता (गुरु), साम और शिप्य इत्यादि उमके स्मि मादेपियस विधमानत्वात् । विषमान है। समाधान-पर दाय नहीं हो सक्सा, स्पोंकि- पापहारिक वस्तु परमार्थता नही होती योऽस्ति कल्पितसवृत्या परमार्थेन नारत्यसी । परतन्त्राभिसवृत्या स्यान्नास्ति परमार्थत ॥ ७३ ॥ ज्ये पदार्प कम्पित म्यवहारके कारण होता है इ परमार्थत नहीं होता; और परिपन्य मानम्मिकि शामोंकी परिभाषाके अनुसार हो तो मी मा परमार्यत नहीं हो सस्ता ॥७३॥ या पदार्थ मासादिपिपते स जो मी शासादि पार्षद कम्पित म्यबारसे ही है वर्मात् फस्सितसंवस्पाफपिता रसा रिस प्यमारकी परमालकी उपाधिके उपापहपसे कल्पना की परमार्थप्रविपस्युपायत्वेन सागपी है उसके कारण जिस फार्म- की सचाईमा परमार्थसे महो। तिम सा, वया पोऽस्ति परमार्थेन | "धान हो जानेपर ईत नहीं हत्या माणफ्योपनिषद [गी. न विद्यत इत्युक्तम् । नास्त्यसो न विद्यते । पाते है । ( भागम० ओ०१८) ऐमा हम पहले कर ही चुके हैं। यम परतन्याभिसंमत्मा पर इसके सिमा ओ पदार्प परमा संनिसे-अन्य मताभम्पोंकि शाखम्पपहारम स्मात्सदार्य सशसम्पहारमे सिर है परमार्थतो निरूप्यमाणो ना | परमार्पत लिहपण किये भानपर नहीं है।बत मसासे उसे क्सा स्त्येव । सेन अकमकममा सन कहा गया है-यह कामन टेक ही फीवितमिति ॥ ७३॥ साविक स्मात् ? धारमा बम-पापना मीमापारिक है ननु शाम्रादीनो संक्मेिन मका-कासारिको म्यापारिक माननपर तो जन है। ऐसी रतीयमपि प्रत्सना कल्पना मी पाहारिक मित्र होगी। सत्यमेवम् । समाभान-हो, यात सो ऐसी है। मज फल्पितसवृत्या परमार्थेन नाप्यन । परतन्त्राभिनिप्पस्या सवृत्या जायते तु स ॥७॥ आरम्म 'अजा भी कम्पित म्पसारखे कारण ही कहा जाता है। परमापन तो भा भी महा है। मनावम्पियरि शासि मिल जो संगति ( भवनिम पार ) है उसके अनुसार उसका जन्म हो। [मत उमा मिषम करके मिही ठसे हराया गया है ॥४॥ गायादिपरिपतसाम्पवास शाचारिपरिमा प्पा करण ही उसे 'मन ऐमा पा स्पुम्पते । परमार्थेन नाप्यतः मान्य । परमार्थन तो बाबा
• भा.]
मातान्तिप्रकरण
२५१
मसात्परतन्त्राभिनिष्पापा पर भी नहीं है। क्योंकि यहाँ मिसे अन्य
शाससिदिमपेक्ष्य योऽच इत्युक्तः
शासकी सिद्रिकी अपेक्षासे पर
ऐसा कहा है, सतिसे ही
स संस्था मायते । सोज्व
चम्म भी लेना है।चाइमन
इठीयमपि फल्पना परमार्थविपये। ऐसी कल्यनात मी परमार्थ
नैव मत इत्यर्थः ॥ ७४॥ राम्पमें प्रदेश नहीं हो सकता ||७||
देतामापसे जम्मामार
पसादसतिपयस्तमात् क्योंकि विस्प असत् है, इसलिये-
अभूताभिनिवेशोऽस्ति दूय तत्र न विद्यते।
द्वयाभाव स पुद्ध्यैव निनिमित्तो न जायते ॥ ५॥
मेगोंका असम्य [देत ] के विपमें फेठ बामह है । यहाँ
[ परमार्पसत्त्वमें ] ईत है ही नहीं । जीत देतामाषा बोध प्राप्त करने
पी, फिर काई फरण म रानेसे पन्म नहीं देता ॥ ७५ ||
ममत्पस्ते दैतभिनिषशोऽस्ति
मसत्पमूत देवम का फेल
मिछमिति फेमलम्।अमिनिवेश | अभिनिवेध है। बाम्हमात्रका नाम
अभिनिवेश है।कहाँ[परमापास्तम)
माया माग्रहमानम् ।
प्रयं
दिल ही नहीं । यदि मिया
सत्र न विपते ।[भिनिवेशमात्र ही जीवके जम्मका
मिम्माभिनिषध कारण है। देवामानको जानकर
गो निनिमित्त हो गया वर्षात
माधवबमन पारण पसाच
जिसका मिभ्या इतरिस्पक वाह
मायामा पुषा निर्निमित्तो
निश्च हो गया है उस [भपिकारी
निाचमिप्यादयामिनिषेशो या बीय ] का फिर जन्म महा
सन जायवे ॥ ७५ ॥ होता ॥ ७५॥
यदा न लभते हेतूनुत्तमाघममध्यमान् ।
तदा न जायते बिच हेत्वभावे फल फुतः ॥ ७९ ॥
२५२ माणपोपनिषत् [गी . फरमामाप । जिस समय वित्त उत्तम, मध्यम और अवम हेतुओंको प्रास नहीं करता, उस समय उसका जन्म भी नहीं होता, क्योंकि हतुका बल होनेपर क्ति फल कहाँ हो सकता है॥७६ ॥ खात्पाश्रमविदिसा आधीर्ष । निष्काम मनुप्पोहाय अनुष्ठान परप्रभाषा बितरनुष्ठीयमाना किये जाते पर देवादिकी मासिके धर्मा | हेसुभूत वर्गाश्रमविहित धर्म, जो देवत्यादि | केवल धर्म ही है, उत्तम सी और प्राप्तिहतव उच्चमा | मनुप्फत्वादिषी प्राप्तिके हेतुभूत नो फबलाम धर्माः । अधर्मम्पामिया | अधममिश्रित धर्म हमें मप्पम त । मनुम्पत्वादिप्राप्रपा मम्पमा । तया निर्यगारि योनियोंकी प्रासिकी हेतुम्त अधर्ममयी विशेष प्राति विर्यगादिप्राप्तिनिमिचा मधर्म- अधम हेतु है। निस समप सपूर्ण सक्षणाः प्रधिषिशेपामाधमाः । कम्पनासे रहित एकमात्र वद्वितीय सानुचममम्पमाधमानविपापरि बारमतत्वका बान होनेपर टन उचम, फरिपवान्पदामपादिसीपमात्म मम्पम और अधम हेतुओंको मनुष्य इस प्रकार उपलम्ब माही करा, सर्व मर्यकरपनारर्जितं जानन्न असे कि विवेकी पुरुष वाक्य समते न पश्यति यथा पारस्प बायको दिसायी देने मान गगने मल विषकी न पश्यति | मनिएको महाँ देरामा, उस सम्प पाचदा न यायत नाम्पपते पित्त उत्तम, मध्यम और अधम फल- मित्र दबायाफाररुधमाधम रूपसे देवादि शरीरोंमें उत्पम मा। होता । बीमारिक समावमें जैसे मम्पमातरूपण मगर उपम नहा वे उसे हेवी पलमुम्पपवे बीजापमाव | प्रकार हेतुफे म होनेपर फरमी में व सम्यादि ॥ ७६॥ उत्पति नहीं होती ॥ ७६॥ न प्रसति इस्वभाव पितं नास्पयर इति छपर समाप ही गानेसमित सरन नहीं होगा-ऐमा पते पर पा भा०] मावशास्तिप्रकरण मुक्तम् । सा पुनरनुत्पविधिवस्य | गया। किन्तु यह चिसकी अनुत्पत्ति कोशीत्युच्यते- कैसी होती है इसपर कहा जाता है- अनिमिवस्य चित्स्य यानुत्पत्ति समावया । अजातस्यैव सर्वस्य वित्तदृश्य हि तथत ॥ ७७ ॥ [ इस प्रकार ] निक्विशून्य चितकी मो अनुत्पत्ति है वह था निर्विशेष और अद्वितीय है। [क्योंकि पहल भी ] मह सा अमात [ अर्थात अविसीय ] पिचकी ही होती है, क्योंकि यह जो कुछ [प्रतीयमान इतवर्गह, सब पित्तका ही रस्य है ।। ७७ ॥ परमार्थदर्शनेन निरस्तधर्मा- परमार्यशान वारा जिसका धर्मास्योत्पधिनिमिपस्पानिमित्त भमाधमरूप उत्पत्तिका कारण निवृत्त हो गया है उम निमित्तशून्प चित्तको स पिचस्पेति या मोधास्पानु जो मोक्षसाक अनुत्पत्ति है यह स्पतिःसा सर्वदासर्वायसामुसमा | सदा समस्याओंमें समान अर्थात् निर्विशेष और अद्वितीय है। पर निर्मिपाइया प । पूर्वमप्पया पहले से ही बमात-अनुत्पम और तस्पैवानुत्पमस पिपस्य सर्वस्सा | सर्प अथात् बस्य धितकी हा होती दयस्पेस्पर्पः । यमात्मागपि है। क्योंकि बोध होमेक पूर्व मी पर ति और कम पिचकाही स्य विज्ञानाधिचात्य सदद्वयं मम था, अप्त सर्ग अबात विचकी घ ससाइजातस्य सर्वस्य सर्पदा अनुत्पत्ति सन सन्गन और वाय पिचस्य समादयमानुत्पचिर्न पुनः | ही होती है । ऐसी नहीं है कि फमी होती है और कभी नही होती। फदाधिपति पदाचित्रा नपर्य यह है कि यह सर्पदा मपति।सर्पदफस्पंपत्य 500 एकरूपा ही है ॥ ७ ॥ विद्वान्टी समय मामि पयोक्तेन न्यायेन अमनिमि उपयुद्ध म्यापसे गमके भूत उस पसाभावा- J- নাসিম (गो. अधानिमिततो सत्यों हेतु पृथगनाप्नुवन् । वीतशोक तथाकामममय पदमश्नुते ॥८॥ वनिमितताको ही सत्य बालकर और ( दादि योनिकी प्राप्तिके ] किसी कपको म पाकर विहान् शोक मोर कामसे रहित सम्पपद प्राप्त कर बा॥७८॥ अनिमिक्तों च सत्या पर पनि मिलताफोही रूम यानी मार्थरूपा बसपा हेतु धर्मादि । परम्पर्यहप मानकर सपा अति फारम दवादियोनिप्रासये प्रथ योनियोंकी प्रासिके लिये किसी भय (घमदिवमणकोन पाया निशान ] गनाप्नुपमनुपाददानस्त्पधया पाप एषणासि मुको कामना एवं पणः सन्धमधोकादिपछि- शोकादिसे रहित अविधाएम्प नमः मविवादिरहितममर एमनुते पदक प्राप्त कर से है, वर्षाव पुनर्न बापत इस्पर्ष meenर जन्म नही लेखा ।। ७८ ॥ अभूताभिनिवद्यारि सदशे सत्प्रवति । वस्त्रभाव स पुद्ध्यैव नि समग विनिश्र्सते ॥ ७९ ॥ रिम्प (देल] के मिनिशसे ही तनुरूप दिया Foorti (त] बस्तुकै वभावका योग होनेपर हो कर उससे wिer t॥७॥ पजादवापिनिवेशादसति पोंकि ममताभिनिोरासे यो त पदयातित्वनिमयोऽभ्वामि- मजत असर है उसके अधिकार विष्य रमा पमूवमिनिस, निसमापियाम्पामोइस्पा-- नित मोरूप कि मध्ये तदनुरूप पनि ल्याभिनिवेशके कारण होत सदनुस्म विस्पोम प्राव हो। पाल्ने । तम यस्म पसुनौ- सि ममय ह म त बस्तुका
at. भा. मावशान्तिमकरण
भाष यदा पुर्यास्तदा तसानि षमात्र जान सता है उस समय उस
मिथ्या ममिनिषशननित विषयसे
# निरपक्षं सहिनियोऽभूता | नि सग-निरपेक्ष हाकर अट आता
भेनिवेशविपयात् ॥७९॥ है ॥ ७९ ॥
मनोवृषिपोडी सन्धिमे ममसाक्षात्कार
निवृत्तस्याप्रवृत्वस्य निधला हि तदा स्थिति ।
विषय स हि पुराना तत्साम्यमज्मयम् ॥ ८ ॥
इस प्रकार (रेतसे निहत और [विययान्सरमें ] प्रात्त न हुए धितकी
उस समय निस स्पिनि राती है। यह परम्पदा पुस्पोका हरी स्थिय
है और पड़ी फ्रम साम्प, मन और पश्य है ॥ ८०॥
नियस मैतपिपयादिपया उस समय देतविषयसे नित
चापाखाभाषदर्शनेन और रिययान्तरमें अप्रास चिप्तकी
विपस्स निषता पठनपर्मिता अभावदर्शन कारण नियमापन
नमस्तस्मा सदा स्पितिः । पापनिता अर्मात् मममसपा स्थिति
प्रमखरूपा सितिमिवसादय
राती है। पिवकी ना यह
विधानकरसपनलक्षणा, समयविधानकरसनस्वरूपा
मपी स्थिति है यह, क्योंकि
पथदिपपो गोधरा परमार्थ
| परमादी शानिर्योका विनय गोधर
दक्षिमा पुरानो समाचरसाम्य । इसलिये परमसाम्प-निर्विशय
पर निर्मि क्षेपमजमलय प॥८॥बन और बश्य है ॥ ८ ॥
विपय इस्पाह--
पुनरपि कीसथासौ पुराना सानियोंका विश्य किस प्रकार
अजमनिद्रमस्वप्न प्रमास भवति स्वयम् ।
सकृतिमातो वैप पो
धातुखमाक्त ॥ ८१ ॥
माफ्योपनिषद [पो. मह बज, अनिद्र, अस्सप्न और सर्य प्रकाश है। यह [जाप नामक ] धर्म अपन पस्तु-वमायसे ही निस्य प्रकाशमान है ॥ ८१ ॥ म्वपमेव तत्प्रभा भवति, वह स्वयं ही प्रकाशित हमा नादित्यायपेषम् स्वयन्योति स्व ||-श्रादिस्प बादिकी अपेक्षासे नही मावमित्यर्थ । सरुदिभातः | अर्थात् र स्वर्य प्रकाशनमात्र है। सदैव विमास इत्येतदप एवलक्षण | यह ऐसे पक्षणेवारस वात्मान्यात आस्मारम्पो धर्मों धातुस्वभाषतो धम घातुस्वभाव प्रस्तुस्खम्पक्से ही पस्तुस्त्रमावत इस्पर्पः ॥ ८१ ॥ | सादिमात सदा मासमान है॥८१॥ इसपर - मारमाी दुर्दमताका रेत एषमपमानमपि परमार्थतत्र इस प्रकार करे नानपर भी छोक्ति पुरुपोंको इस परमार्पतलका फम्सालौफिकर्न गुभव इत्युपत- योध क्यों नहीं होता। करते हैं- मुखमावियते नित्य दुस विवियते सदा । यस्य कस्य प धर्मस्य प्रहेण भगवानसौ ॥ ८२ ॥ मगवान् निस-किसी तितुके बाम्हसे बनायास बाष्पादित हो जावे? वीर सदा कटिनतासे प्रफ्ट होते हैं। ८२ ॥ पमापस्म कस्सचिवापवस्तुनो स्पोकि जिस किसी धर्म--त धर्मस्स ग्रहेण प्राणावशेन मिध्या-वस्तुक प्रहण-भाइसे निष्मा भिनिवेशके कारण मे मतान् पर्यात् मिनिषिस्तमा मुम्वमाप्रियते अश्य भारमग सहम ही बात ऽनापासेनाप्यात पर्यः।इयो | हो जाते हैं र्पात् बिना मापासके पलम्धिनिमि हि तवापरणं न ही बाग्मदित हो जाते है-मोकि देतोपाम्बिके निनिसे होनेवा यत्नान्यरमपेक्षते । दुलं पावामण किसी भय पनकी वफेशा मे शा.भा. मडावशान्तिप्रकरण विप्रियते प्रकटीक्रियते, परमार्य । नहीं करा और परमार्पहान दुम्म ज्ञानस्य दुर्लमत्वात् । भगवान होनेके कारण इससे प्रकट किसे जाते हैं, इमरिये बान्ताचाकि सावात्माइयो दर इत्पर्य भनेक प्रकार निरुपण कानेपर मी अतो वेदान्तराधायम पाल जाननेमें नहीं आ उम्ममानोऽपि नेव पन्त सस्य इसका तात्पर्य है । "ममा वणन पत्नशग माधवप है तथा इसे इस्पर्थः। "आषयों पक्का इश प्रहण करनेवाग्य भी कोई निपुण ठोऽस्य लम्पा" (क० १०१। पुरुष ही होता है। इस युनिसे मी २१७) इति भूत् ।।८२॥ पही सिर होता है ।। ८२ ॥ सकते-मह परमामय मारण करनेवाले बसमिनियम अस्ति नास्तीस्पादिरस्मविपया? मस्ति नास्ति इत्यादि सम्भावस्प अपि पणिताना प्रहा भगवत मी, जो पणिक वापर हैं, परमात्मन भावरणा एप स्मित | भगवान् परम्पमा वारण ही है, किर मूस टाके युखिरूप बाहों- मृदयनानां पुदिक्षणा इत्येव की तो बात हो पा । इसी मा प्रदर्छयन्नाह- बारको दिखाते हुए कहते हैं--- अस्तिनास्त्यस्ति नातीसिनास्त्रिनास्तीति वा पुन । चलस्थिरोभयाभावराणोत्मेव यालिश ८३॥ अमन नहीं भी बार नही भी है तथा नहीं - - इस प्रकार प्रमश पर, स्थिर, उमपम्पनर अमाप फोरेपासे मूर्वग्रेग परम्मरम्प बसदित ही फरत है ॥ ८३ ॥ अस्पारमति यादी फपिम्प की पारी पहत्य -माया सन नाशिक पहnt- विपपत् । नाम्नीत्यपग यना- 'नहीं। सीपरा अनाशिर शिर । अनि नास्तीत्यपराल मसAPr-घर पहर
AL
.
मास्योपनिषद् [गी..
पैनाशिफा सदसदादी दिम्बा- 1 मी और नहीं भी है । त्य वापत
शून्यवाीका पपन है कि नही
साः । नास्ति नास्तीस्पन्समय नहीं है। इनमें अस्तिम्यत्र
पादी । सत्रास्तिभावपल , पा-[पता है, पोधि हर बार
| अनित्य पदार्थोस भिन्नतापर्य
पनिस्पषिसमणरणात् । नास्ति- ] यह है कि भटादिका प्रमाता मुसार
विशेष धस युक होनेके कारण
भावः सिर! सदाविशेषस्वात् । परिणामी-च है ] । सदा अविशे-
रूप होनेसे मासिमाब सिर
उमप घस्सिरविषपस्वासद
पछ और स्थिरविषयक होनेसे
समापोऽभागोऽस्पन्तामाषः
सरसमान समयलपोत्या बाब
पस्यन्तामाबरूप है।
प्रकारचतुष्टयस्यापि वरे-
इम चम, सिर, चस्सिर और
पलखिरोममामा. सदसदादि
षभारूप चार प्रकारके मासे सभी
मून पर्याव विकीन सदसदादि
बादी सोऽपि भगवन्तमारणो- मादीगण मगवान्को मा अहित
स्मेष पालिचाऽपिडी । पयपि ! ही करते हैं। ये पयपि परिणत
पमिवो बालिन एप परमार्थ
तो मी परमार्फतलका शान न होने के
कारण मुख ही है। क्त तापर्य या
तस्वानवमोपास्किम स्वभावमूढो कि फिर स्वमाक्से ही मूर्सलोगोंकी
मन इस्पभिप्राया ॥ ८३ ॥ तो बात ही क्या है।॥ ८३ ।।
।
कीरपुनः परमार्थतत्त्व यदन तो फिर परमाक्सल कैसा
योभादवासिमा पमितो भवती
है मिसका शाम होनेपर मनुष्य
मालिश वर्षात् पमित हो जाता
स्पाइ-
'सपर करते है-
कोटयवतन एतास्तु महर्यासां सदावृतः ।
भगवानाभिरस्पृष्टी येम दृष्ट स सक्षम् ॥८॥
शो भा ] मठावशान्तिप्रकरण भवापस मिनके अभिनिवेशसे बारमा सा ही वाहत हवा है , ये धार ही कोरिया हैं । इनसे असस्पृष्ट (कते ) भावान्को त्रिसने दस्सा है भी समा है॥ ८१ ॥ कोटयः प्रावादुफश्वासनिर्व उन प्रबाद करनेवाल यादियोंकि अनुप्पोटियक्ति यान्ता एता उता शमशारा निणय की हुई ये मस्ति- अस्ति नास्तीस्मा नाति वादि चार कोरियों हैं। सारपवन पामवस्रो मासा | बिम कोरियोंकि इ-प्रहणसे ही, कोटीनां प्रमाणे अर्थात् उन प्रावादुकि इस उपलम्भि कालम्धिनिमयैः सदा सर्वदाइत ननित निश्चयसे ही बो मगलान् सा आफ्छादिवस्तपामेव प्रावादुफा | आवृत है उसे मिस मुनिने इन नां यः स भगवानाभिरखिना | अति-नास्ति आदि चारों ही कोरियों- स्तीत्यादिकोटिभिमतभिरप्प- से अस्पृष्ट अर्थात् बस्ति-नास्ति सष्टोऽत्यादिविपनावर्जित आदि विकल्पसे सपदा रहित देख इत्येतपेन मुनिना प्टो जातो, यानी उसे वेटामि [प्रतिपादित] भेदान्तेप्योपनिषद' पुरुपः स वोपनिषद पुरुफ्लपसे नाना ही सम्प्क्सवः परमार्थपमित | सर्वरक सर्व वर्षात् परम्पर्पको इस्पर्यः ॥ ८४ ॥ बानमेवाम।। ८१ ॥ सामी नकम प्राप्य सर्वज्ञता कृमां ग्रामण्य पदमद्वयम् । अनापन्नादिमध्यान्त किमत परमीहते ॥ ८५ ॥ इस पूर्ण समता और बादि मप्प एवं मवसे रहित वड़िसीय प्रामण्य परको पार मी स्या र विकी पुरुष ] फिर को पेय पारा ॥५॥ प्राप्पा ययोका रुत्व इस उपयुक्त सम्पूर्ण सर्वका समस्या सर्पशवां प्रामण्यं पदं | और "[ जो इस वक्षरफो बानकर "म प्रामणा" (ए. उ० इम लोक्से बायाण ~ माइपयोपनिषद् [. ३।८।१०) "एप नित्यो | an “यह प्रामगी शाश्वती महिमा महिमा प्रामणस" (प० उ०J' इत्यादि वनियो अनुसार ४।४।२३) इवि अत्रे, माझम्पपका प्रसफर--मिस बाप पाये वारि, मम्प और बस आदिमम्पान्ता उपधिसिति- पर्यात् उपनि, सिति और म्य लया अनापन्ना भप्राप्ता यस्ताद मनापन्न–प्राप्त है अर्थात् मही है यम्य पदम न विपन्से सदना वह अनापन्नादिमप्पान्त नामपर पन्नादिमध्यान्तं माझम्य पदम्, है, उसीको पाकर इससे पीछे-स तदेव प्राप्य छन्पा किमता आरमअमके अनन्तर कोई प्रोजन परममादारमठाभार्तामीहते पो बस परत्न है । वर्षात म रहनेपर मी क्या [मह विशन् ] एसे निष्प्रयोजनमित्पर्धः । "नेय नहीं करता] पैसा कि "उसका सस रुपनार्थ:" (गीता॥१८) किसी कार्यसे प्रयोमन मही रहता" इस्पादिस्सवेः॥ ८५॥ इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ॥८५।। - विप्राणा बिनयो घेष शम प्राकृत उप्यते । दम प्रकृसिवान्तत्वादेव विद्वाशम प्रजेत् ॥ ८६ ॥ [मसरूममें स्फित राना र ठन प्रामका निय है, पही उनका सामाविक शम कहा पाता है तथा समाक्से ही दान्त (निसेन्द्रिय ) नेके कारण ही उनका दम भी है। इस प्रकार विशन् शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ८६ ॥ विप्रायां प्रापणानां मिनयो ग्रामोंका जो पर भामस्वरूपसे विनीतत्वं स्वाभाविक यदेतदारम- | स्थित होमारूप विनय-नियम है मह लाभाविक है। उमका र स्वस्पेपावसानम् । एप विनया पिनय भौर यही प्राहक-सामापिक शमोऽप्येप एव प्रास्ता स्वामा-भर्षात् बालक शम भी कहा गाव्य विकोफतक उम्पते । दमोऽप्पेप || प्रमस्वपक्से पशातरम
श-भा]
मठावशाम्तिमकरण
२५१
एप प्रतिदान्तत्वात्स्वभावत एष | है, मत प्राप्ति दान्त होने
योपशान्तरूपत्वाइमण । एवं | कारण यही उनका दम भी है।
पथोक स्वमानोपशान्तं मम
इस प्रकार उपयुज समाप्त
प्रमको माननेग्रम पुरुष शम माया
विद्वाम्मममपशान्ति स्वामाविकी
स्वरूपा सामाक्किी उपशान्तिको
प्रमस्वरूपो बजेद्रमस्वरूपेमाष
प्राप्त हो जाता है, अर्यार प्रमरूपसे
विष्ठत इत्यर्थः ॥ ८६॥ स्थित हो जाता है।। ८६ ॥
बात
विधि सेब
एषमन्योन्यविरुदस्यास्संसार इस प्रकार एक-दूसरेसे विक्रय
कारणानि रागवेपदोपास्पदानि
होने के कारण प्रापदुः ( वादियों)
के दर्शन संसारके कारणस्वरप
प्रापादुनो दर्शनानि । मतो राग-द्वपारि दोपोंके आप है। बत
मिध्यादर्शनानि वानीति सप्पु |ये मिथ्या दर्शन है-पाह
तिमिरेव दर्शयित्वा चतुष्कोटि
उन्होंकी युक्तियोंसे दिसधाकर चारों
कोरियोंसे रहित होनेके करण
पनिवस्वाद्रागादिदोपानास्पद
रागानि दोोया
वनाध्यमूत
स्वमाषशातमतदमनमय म बमावत शान्त अरशन ही
सम्पशन-स प्रकार उपसंहार
म्पग्दर्शनमित्युपसंहतम् । अमे
किया गया । मन यासि वपनी
दानी समझियाप्रदशनार्थ । प्रक्रिया दिखानके लिये परम्म
आरम्म:-
फिया जाता है
समस्तु सोपलम्म च द्वय रौकिकमिप्यते ।
अवस्तु सोपलम्म च शुद्ध लौकिकमिप्यते ॥ ८॥
बस्तु और उाम्नि दोष सहित गोईत उसे बौकिक
(मारत ) करते हैं तया जो ति बस्तुके बिना पा उपकम्भिक
सहित उसे शुद लौकिक (बन ) कहले ६॥ ८७ ॥
सह पर्वत मागुम्योपनिषद् [गो०. सबस्तु संदतिसता वस्तुना सक्स्तु-पाशारिक सत् बस्तुके इति सहित रहता है, इसरिये बो भैभम् समस्तु, दया चा- सत्तु तया उपसम्म यामी उप- पलम्धिरुपलम्मस्तेन सा पर्वत सम्बिके सहित है, इसरिपे मो 'सोफ्लम्मा है ऐसा दामारि इति सोपसर्म च झालादिसर्य सम्पर्ण म्पहारका आश्रयम्त माम- पवहाराम्पर प्राग्राहकलधण प्राणकप जो देत यौषिम- प्रय लौकिक लोकपदनपेठ लौकिकं कसे दूर न रहनेवाय वर्षात भागरितमित्येतत् । एवंलक्षणं जागत् कामता है। देश में मागरितमिप्यते पेदान्ते। मारितको ऐसे वमोवारण माना है। भमा सातेरप्पभावात् सहतिकर भी बम्पर होनेके कारण यो प्रस्तु' है-किन्त एकिकर सोपटम्म है-यस्तुरे न होने- परम्मनमुपलम्भो पर भी पस्तुके समान उपसम्म ऽसस्पपि वस्तुनि तेन सह बर्तत होना 'उपछम्म' करमता है इति सोपलम्म च । शुद्धं फेवलं सोफम र सम्पूर्ण प्राणियों उसके सहित होनेके कारण जी प्रविमकं बागरितात्स्यूलाली- के छिपे साधारण होने के कारग मुस किर्फ सर्वप्राप्पिसाभारणत्यादि पेठ अर्थात् जागरिताप स्पष्ट मैक्सिसे मिम्म मैकिक माना जाता प्पते वन इस्पर्षः ॥ ८॥ अात्मह सप्नातला ॥८॥ सोपलम्मं पवन अवस्त्वनुपलम्म च लोकोत्सरमिति स्मृतम् । ज्ञान क्षेय व विज्ञेय सदा पुरै प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥ यो वस्तु और उपलभि दोनोंसे खितम् भासा मेकोचर (सुषुप्ति ) ममी गपी है। इस प्रकार क्विामे सर्व ही [वासा- प्रपरूम ] शाम और हय सपा [ घरीयरूप ] ओयका निरूपण किया है ।। ८८॥
घो• भा०]
मसातशान्तिप्रकरण
२३
अवस्सनुपलमं च प्राप अवस्तु और अनुपम्म अर्थात्
ग्रहणवर्सितमिस्य | माझ और ग्रहणमे रहित जो अवस्था
है
उद, लोहोचरम्।
मह कोतर' अतएव लोका-
तीता कहलाती है, क्योंकि प्राय
अत एव छाकावीतम् । प्रासग्रहण | और हणका विषय ही मेक है
विपयो हि लोफतदभावात्सर्व | उसका नमाष होनेके कारण यह
प्रचिपीज मुषप्तमिस्पेतदव | सपा असा सम्पूण प्रवियोंकी
स्मृतम्।
| बीजभूता है-ऐसा माना गया है।
सोपान परमार्थसम्म लौकिक उपाय सहित परमार्पतत्त्व तया
| स्मैकित, शुद छौकिक और डोकोत्तर
शुदसौफिर्फ लोगोचर प फ्रमेण
अवस्थाओंर जिम ज्ञानके द्वारा
यन पानेन बापते तन्दानम् ।
प्रमश मोष होता है उसे माम'
कहते हैं क्या ये तीनों मास्साएँ
झेपमेवान्पेव त्रीणि । एतदम्पति |ही 'य' हैं, कि समस्त
वारियोंकी कल्पना की हुई पस्तुओं-
रेफेम मयानुपपणे सर्मप्रापादुक
पाइन्होंमें वन्तर्भाव होनेके कारण
करिपववस्तुनोऽपान्तमावात् । उनके मित्रा किसी अन्य शेपका
होना मम्मत्र नहीं है। जो परमार्य
विनेय परमार्थसत्यं तुर्यास्पम | मप्य तुरीयसंमफ अाप मनग्मा
यमममारमतवमित्यर्थः । सदा
आरमास बही विझेय है
ऐमा
वमिप्राय है
सर्मदा एतरलौकिकादिविनेयान् | उन लौकिकमे का निपपपन्त
बुदः परमार्थदर्भिभिर्ममविनिः बनने स-साना ही निरूपण
प्रकीर्तितम् ।। ८८ ॥ रिय है।॥ ८८॥
-+
विपि भार मानधाता समई
झाने च निविधे शेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
मर्षमता हि सर्वय भयतीह महाधिय ॥ ८॥
- मागुम्योपनिषद [गो.ब. हान और तीन प्रकारके बेपको क्रमश जान लेनेपर इस मेको उस महायुविमान्को स्वयं ही सर्वत्र समाता हो जाती है ॥ ८ ॥ माने घ लौकिकादिविपये, मेकिमानिविषयक जान चोर धेये घ ठौकिकादो त्रिविधे- लौकिमादि तीन प्रकारके आपको जान लैनपर, अर्याद पहले म्यूड पूर्व लौकिक म्पुलम्, तदभावेन | मेकिला, फिर उसके धमावमें पमाच्चाई सौकिकम्, सदभावेन शुर भौकिकयो तपा उसके में भमात्रमें अकोत्तरी-इस प्रकार लोकोपरमिस्पर्ष क्रमेण सान क्रमश तीनों बरसाकि वमान- प्रयाभाषेन परमार्थसस्पे सुपें |हारा परम्पर्पसस्प बाम, नमन्मम यऽऽभपे विहिते स्वममेवात्म ! मोर अमयहप तुरीयको बान नेपर, इस भेफमें उस महामुडिको स्वरूपमम सर्वनवा सर्वमासौ । सर्वप्र यानी सर्वदा सर्व भारतरूप मम सर्वदमझायः सर्पक्षता, ही सर्वहता-मो सर्मलप स (जानी ) हो उसे सर्व करते है, उसीकी रहास्मिलोके मवति महाधियो मात्रलपा सर्वात प्रस होती है, महाबद्धः । सर्पलाकाविलय मयोंकि ऐसा नामनेपालेकी मुदि ममण कसे ही पखको पस्तुविषयपुद्धिवादवविदः सर्वविय करनवाटी होती है। वात्स्य सर्षदा मपति । समद्रिदिवे व यह है कि सरूपका एक मार बान हो जानपर उसका कमी म्पमिपार रूप म्पभिषाराभावादित्यर्षः। म होमेके कारण [ उसकी सक्रिम सर्वदा रहती है, स्पोंकि मिस नहि परमार्थविदो ज्ञानोबा- प्रकार बन्य बात्रियों के हानके उपय और वस होते खते हैं उस प्रकार भिमषौ स्तो यया येपो प्रानातु परम्मवत्ता धानीके शामके उदय कानाम् ॥ ८९॥ और वस्त्र मड़ा होवे ।। ८९ ।।
शां. भा.] भमानणातिमकरण - लौकिकादीनां क्रमेण यत्त्वेन ( [ उपयुक करें ] ठोक्किादि का कमरा ऐसपसे बताये माने निर्देशादस्सिस्वाभा परमार्पयो कारण उनक परमार्थत पवित्वको भाराला म हो जाम-सिलिये मा दिरमाह- कहते है- हयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयायग्रयाणत । सेवामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भत्रिपु स्मृत ॥ ६ ॥ [ बामदादि ] हेम, [सपासप ) झेप [ पानिपानि प्राकम्प साधन और । रमा-यदि ] प्रशमनीय दोर ये सबसे पहले जानने योग्य हैं । इनसे प ( गम ) को शेषकर छन तानो तो फेवक उपम्म ( अविष्णकरियरल) ही माना गया है।॥ ९०॥ हेमानि लौकिनादीनि पैसियार हीन रेय है। तात्पर्य यह है कि नागान्ति, सन श्रीणि भागरिमस्वप्नसपसान्यात्म और पुनि ये रनों पामार न्यसवेन ज्या सपपदावम्पा ( रग्गु सर्पके समान बारमा असत् नास्पर्ध मिह चतुष्कोटि हानके कारण त्यागने योग्य है चारों कौरियोंसे रहित परमार्थतत पति परमातमम् । माया ही नहीं शेप माना या है। 40 मीनो एणपछि स्याग देनेवाले न्यासम्मानि पकवानपगारमेण मुमसके लिये पावित्य, बाम्य और मिथुणा पादिपाल्पमोना- मौन मामक सन साधन ही आप्प स्पानि साधनानि ! पापमानि मोह जाति पापसंत दोषी -प्रासम्प, तप राग, पीर रागडेपमोहादयो दीपा फपाया-[उसके लिये ] पास्प-पाक (बी) करने योग्य हैं। वापर यदि सम्पानि पक्कय्यानि । समाम्ये मुमशुगे हेय, डेय, नाप्य और पानि हेमभपाप्मपापयानि विशे | पाय इन सबको ही समयाव - , माणपोपनिषद . मानि भिसुनोपापस्नेत्यर्थः । सबसे पइसे अपने सामनरूपसे अप्रयाप्णवः प्रथमत । | जानना चाहिये। वैप ईयादीनामन्यत्र बिहे उन देय आरिमसे केतक पक या परमार्थसस्प विशेष पर परमार्थ सत्य शेप प्रमको आकर शेर डेय, भाग्य और पाप-इन उपलम्भनमुपल- सानोम अनदेयभान रेषठ उपरम्म म्भोऽविधापनामानम् । हेया पानी परियापर पपास्मेपु विषपि स्मना मन- विहिन परमार्थसस्यता प्रयाणा | तीनोंकी परमार्यसम्पत्य वीकार यल्पनामात्र ही माना है, अपात् इन नहाँकी ॥२०॥ पर्जयित्वा, --उपछम्मन मिन्यर्थ ॥२०॥ जीरा समान बनाविभौर अभिव परमार्थदस्तु- पास्तबमें तो- प्रकृत्याकाशवजेया सधै धर्मा अनाथय । विधो न हि नानात्व तेषां पचन किनन ॥५१॥ गगनीको अभावगेरी आमाशो समान ओर जमा पारना माझिय । उमर मान पही कुर भी नहीं ६ ॥ १ ॥ प्रहरपा म्पमारत आरम मुमशुभारी सामर, निरवनयभर गगता भाभि पारग सभी पदासमतुल्या गामनिरम्मनपा-मासे मासे मपन् मदगनन्यं मरें थमा आग्मानो गनान और जा पानी प पपा मनुभिग्नादया निया। जानना नापि । न गापन: पागनाध्यमदामो परगान श्रीन निरा समापन रिंगन पि लिना पना, यमदार माया-अपायो -- गो. भा भावशान्तिप्रकरण २१७ C------2--02-2--0 पशुमात्रमपि सेपो न विद्यते । किचन कुछ मी वर्षात् अणुमात्र नानात्वमिति ॥ ९१ ॥ भी नानाव नहीं ॥९१ ॥ परमार्थत इत्पाह- मात्मवालनिस्सण मेयतापि धर्माणां संात्पेषन बारमाभोंकी जो झेपता परमी म्यावहारिक ही है परमार्यत नहीं- इसी भम्मिापसे कहते हैं- आदियुद्धा प्रकृत्यैव सर्वे धर्मा मुनिम्मिता । यस्यैवं भवति शान्ति सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ९२ ॥ सम्पूर्ण भारमा स्वमावसे ही वोमस्वरूप भोर मुनिभित है- जिसे ऐसा सम्बधान हो जाता है अमरत्व ( मोक्ष ) प्राप्तिमें समर्प होता है ॥ ९२ ॥ समादादौ पुरा भादिवशः क्योंकि जिस प्रकार सूर्य निस्प प्रकस्यैव स्वभारत एव पथा | प्रकाशस्तरूप है उसी प्रकार सम्पूर्ण नित्यप्रकाशस्वरूपा सवितव | धर्म पानी बारमा प्रति-समासे ही बार युद्ध-आरम्ममें दी जाने हुए निस्पयोधरसरूपा इत्पः सर्वे वाद निस्पयोपसरूप । उनका धर्मा सर्व आस्मानः । न च निमय भी नहीं करना । वर्षात् मेपो निधम कम्पो नित्य |ये निस्यनिधितस्वरूप है-ऐसे निमितस्वरूपा इस्पर्धन संदि । वपना नहीं हैं। इस प्रकार पमानस्वरूपा एवं नैवं पेति । सन्दिग्धस्वरूप महा है। यस सससोरेष यपोकप्रमा जिस मुमुगुको इस सर- | उपर्युफ प्रफारसे अपने क्या पराये- रेण सर्वदामोधनिश्यनिरपेक्षता रिये सर्पग योपनिमय सम्बन्धिनी स्मार्प परापा पषा सविता निरपेक्षता है मिस प्रकार सूर्य निस्पं प्रकालान्तरनिरपेषः बाध | अपने अपना परापेलिपे साहो २७० मागायोपनिषद [प.. - मारमाध महाशामिल पदिदं परमार्थतत्वममहारम-1 यह जो परमाफ्तत मुदषित अस्विकी तथा बेगता भिरपमितदान्तपति मुरैर अनधिकारी झुर और मदमुनि पुयाँकी समझमें नहीं वा सर स्वधरनवगाममिस्पाह- इस माशक्से कहते है- अजे साम्ये तये केचिद्रविष्यन्ति मुनिश्चिता । ते हि लोके महाझानास्तच लोको न गाहते ॥ ९ ॥ जो कोई उस मन और साम्यरूप परमार्फतलपमें अत्यन्त निमित होंगे रेशीमेकमें परमानी। उस तलका सामान्य छोक वाइन नाही कर सकता ।। ९५ ।। मजे साम्ये परमातल एप उस धन और साम्पहप परमा मेषति ये केचित्सम्पादयोऽपि तस्कमें मो कोई-बी वादि में सुनिषिवा भविम्पन्ति पेच एव | यह ऐसा ही है इस प्रकार हि लोके महमाना निरविक्षय | पूर्णतया निषित होंगे । मेरो सत्पविषयमाना इस्पर्धः। महायानी वर्षात निरतिशप त विस्मक बानासे है। तप तेषां गर्म सपा रिदिन उस उनके मार्ग माद में परमार्थवष सामान्मपुतिरन्या [मिति र परमार्थताप अप साधारण युविवाग मनुष्प मापन लोको न गाहवे नाववरविन पारण मही करता वर्षात् उसे विश्य नहीं कर सकता । गे विपपीकरोतीत्पर्यः । “सर्प मार्ग मोका जात्मभूत और सब प्राणियों हितमसी उस भूवात्मभूतस सर्पमदिवस । पररहित (प्प पुरुषार्थहीन ) देवा अपि मार्गे मुमन्स्यपदस्य महात्म्पक परको माननेकी इस पारे दमा भी सो मागम मारको परपिगः महनीनामिपायले माम हो मा भाग शां. भा.] भावशाम्तमकरण क्योंकि अब अनुपम गविनयोपलम्पन" (मरा० शा० । बसे पक्षियोका माग नहीं मिला उसी प्रकार उसकी गतिका पता २३९ । २३, २४) इत्यादि | नहीं पा स्यानि स्मृतिमे मी यही प्रमाणित होता है ॥ १५॥ सरमात् ।। २५॥ कप महायानस्पमित्माह उनका महासामिप किस प्रकार सो पताते हैं- भजेप्वजमसक्रान्त धर्मेपु ज्ञानमिप्यते । यसो न क्रमते ज्ञानमसा तेन कीर्तितम ॥ ९६।। अजन्मा आरम्पोंमें सित अन (नित्य ) मान मसान्त (अन्य वियोंसे न मिलनेभ ) माना जाता है। पोंकि यह ज्ञान अन्य विषयों मझमित नहीं होता इसरिये उसे जसंग बताया गया है ॥२६॥ बनेप्पनुस्पन्नेषचलपु पानी भा-आम सूर्यमें पात्मखममपठ प शानमिप्पते | उष्णता और प्रकाशके ममान अर अपार आपण पान माना जाता समिवरीमीप्य प्रशम यवस्त भन भान्सरमें जमान्त (वन साइसमान्तमपान्तरे सानमनपरिर ) शानका परम्म्म (निस) बीरम पिया जाय। क्योंकि मिप्पच । यम्मान प्रमतान्तर न मर मियाम संशयित मही हाल रमरिये उमे वर्गग परा सानं न धरणनामन सत्कीवि गया । अर्यात् पद बफागारे समानारत्पमिस्पतम् ॥१६॥ ) समान है-पमा मदा ६ ॥६॥ जातपाइ दोषाम अणुमायेऽपि वैधम्र्ये जायमानेऽविपमित । असङ्गना सदा नास्ति किमुसापरणप्युति ॥१०॥ अपल २७२ माणफ्योपनिषद् [पो. [अन्य वादियों के मतानुसार ] किसी वणुमात्र भी विधर्मी मस्ती उत्पत्ति माननेपर तो अविवेकी पुरुष मसंगसा भी कभी नहीं हो सकती फिर उसके आवरणनाशके विस्यमें तो कहना ही क्या है। ॥२७॥ इवोऽन्येपो वादिनामणुमात्र इससे मिम जो अन्य की ऽपि वैभर्मे घस्सुनि पहिरन्तर्वापा-सी मी विधर्मा वस्तुके बाहर उनके मतानुसार अणुमान वर्षद जायमान उपायमानेऽधिपधि | या भीतर उत्पम होनेपर तो 4- पिपभित्-अविवेकी पुरुषकी कमी वोऽविकिनोऽसङ्गता असङ्गत्वे | मरमाता भी नहीं हो सकती किर सदा नास्ति फिसव पक्तन्यमापर | उसकी मारण युति मर्पात् बन्ध नाश नहीं होता-इसके सम्पन्भ पम्युतिर्मन्मनाशो नास्तीति ॥९७| तो कहना ही क्या है ! ॥ ९७ ।। मारमाका स्वाभाविक सरूप वेपामावरषम्युतिर्नास्तीति उनकी वारणप्पुत्ति नहीं होटी- | ऐसा फरफर तो तुम्ने वपन सिमान्तमें भी अपमाळकर वापरम पसा स्मसिदान्तेऽभ्युपगसं साई सीकर कर म्पिा [-ऐसा यदि कोई कर तो] इसपर हमारा करना धर्माणामावरणम् । नेस्युम्यते । ' है-नही, मलण्यावरणाः सर्वे धर्माः प्रकृतिनिर्मला । आदी पुडास्तया मुक्ता युध्यन्त इसि नायका ॥ ९८ ॥ समस्त व्यस्मा बामणशून्प, समाक्से ही निर्मक तथा निस्य पुर और मुक्त है । सयापि खामीग्रेग ( केशरताधार्पण ) नामे जाते ऐमा [ उनके विरूपमें पहते हैं ] ॥ ९८ ।। -अलन्धमा 'मम्बामणा -निम्हें कारण धन येपा अर्थात् अविपदिकप कपन प्रम अलम्वावरणा श. भा०] भावशास्तिकरण २७३ से धर्मा बलम्भावरणा बन्धन मर्यास् प्राप्त नहीं दवा है धम रहिता इत्पा, प्रतिनिर्मला | अलम्धारण अर्थात् मन्धनरहित स्वभाषशक्षा आदी पुदास्तथा | और आरम्भमें ही वोधको प्राप्त हुए प्रति, निम्स-मभावसे ही गुम मुक्का पसान्नित्पशुद्धपुरसत मया मुसरूप है, क्योंकि निस्य समाता। गुमधुरमुक्कसमाव है। पये कप दई पुम्पन्स मध-परि सी बात है तो उनक विषयों में आन जाते है इस्पपवे ? ऐमा यों कहा जाता नायकाः स्वामिन समया समापान-मायक-स्वामी पोषक्तिमत्स्वभावा-जाननेमें समय वर्याद गोषशति- युछ स्वभावामा उमक विषयों पषा नित्यप्रकाश | उसी प्रकार ऐसा करते हैं जैसे कि स्मस्पोऽपि सविता प्रफाक्षस निस्य प्रकाशम्बरप होनपर मी इस्पयवे यमा वा नित्यनि-सूर्यके रिस्पर्मे 'सूप प्रकाशमान गतमोऽपि निस्पमप सास्तिष्ठ- है एसा कहा मात्पना सर्वा गतिशम्प होनेपर भी पत सा न्तीस्युम्पत वाद ॥ ९८॥ है ऐसा कहा जाता है | ९८ ।। बाग पोवृधु इत्यर्पा, समातपाः बीस साम महा कमते न हि युद्धस्य ज्ञान धपु तायिन । सर्व धर्मास्तथा ज्ञान नैतमुखेन भापितम् ॥१९॥ पण प्रहामवान् परमार्पाकर जान पा (रिस्मों) में संक्रमित मही होता र म [उसके मनमें ] सपूर्ण धर्म (मरा) कड़ी नावे है। परन्तु ऐसा नाम मुसदन महा कहा [वर्षात् बीर सिवान नहीं है बधि आनित RE || ८ | मागूपयोपनिषद [गी. साय . यसान्न हि क्रमते पदस तापी-मिसयन यानी परमार्थदर्शिना शानं विपयान्त- (किस्तार ) हा उसे तायी कहते हैं। रेषु धर्मेष धर्मसंस्थ सवितरीव क्योंषि साथी-सन्नानवान्-निरन्तर वर्यात् भाकाशस श पूजापान् प्रभा, मामिना सायाऽसास्तीति असा प्रशवान् पुर-परम्पपीका तापी, ससानयको निरन्तरस्या मान घर्मि-विषयान्तरोंमें सकम्ति काशकल्पस्सेस्पर्मः, पूधारतो नहीं होता अपितु सूर्यमें प्रकाशकी या प्रक्षावतो पा, सधै धर्मा | मति बारमनिष्ठ सत्व है, उसी प्रकार मात्मानोऽपि तथा मानवदेवा बानके समान ही पाकशाश (सम्पूर्ण धर्म अात् मारमा भी पाठकल्पत्यान्न मन्ते कचिद होनेके कारण की वर्षान्तरमें प्पन्दिर इत्पर्यः। | सममित नहीं होते वर्षात नहीं मासे । पदादाश्पन्पस्त सानेनाका इस प्रफरक वारम्भमें जिसका सफापेनेस्पादि सदिदमापस पानेनाकाशकल्पेन (एकवारा उपम्पाम किया गया है, करपख पापिनो मुदस्य तदनन्य | वाफाशसाश निरन्तर योधवान्का- सादाबावल्पं झान न क्रमते | इससे भिन्न होनेक कारण-ही कपिदप्पान्तरे । क्या धर्मा | अर्षान्तरमें संक्रमित मा होता, पति । आकाशमिमाचलमविकिम और ऐसे ही धर्म भी है दि वे भी आकाशके समान निरवपर्ष नित्पमविसीयमसम अविक्रिय, निरपक्व, निस्प, मरपमग्राममनायाफ्ती F. परिसीप, असा, साश्य, वय मात्मवाच्यम् । "न हि ईप्टे और सुधा-पिपासादिस रहित र स्मतत्व ही मैसा कि यापी विरिलोपो विपत' (१० उ० मिका लोप महा होग" इस श्रुति- ४।३ । २३ ) इति इतेः। से सिद्ध होता है। पानपायदाद मेदगहिर्म पर मान, प्रेय और माता के मेसे या माकाशसाश पान कमी 4.भा.] भावशान्तिप्रकरण २७५ कहा जाता है- माससमवयम् एतन्न पुढेन [रहित इस पदय परमार्थतस्पका भापितम् । यद्यपि पामार्थनिरा | सुदन निसपग नहीं किपा, पपरि उमने याचपस्तुका निराकरण भार करण मानमात्रफल्पना चाइम | केवल ज्ञानको ही पम्पना ये बन्य वस्तुके समीपयनीही विसय कहे हैं, घस्सुमामीप्यमुक्तम् । इद तु मात्पर्य यह है कि इस औत परमार्थतघमदत वेदा सप्पेष | परमायतत्वको तो पास ही विनेपमित्यर्थ ॥ ९९ ।। विषय जानना चाहिम ।। १० ।। परमार्थप मदना शाखसमाप्ती परमार्थसच अप शार की समाप्ति होनेपर परमार्थतत्व सुनिये रिपे नमस्कार स्तुत्पर्य नमस्कार उप्यो- दुर्दशमतिगम्भीरमज साम्य विशारदम् । घुन्सा पदमनानाय नमरकुर्मों यथायलम् ॥१..॥ दर्दन, अपत गभीर, पब, निर्विर मार विशुर पदका भैरक्षित जानकर दम उमे पपशक्ति नमस्कार करते ३ ॥१०॥ दुर्दा दुगेन दम्रनमस्पति निमरत पाटिननामे नि हो ईम, अम्नि नाम्नीसि पतु है ऐसे दुश का अमित साविर्जितम्पादनियमिन्य | नास्ति चारों फोरिपसे दिल भ: । अत एपाविगम्भीर दुष्प्रवर्ग होनफे पर दक्षिय, आप पति महागमुद्रपदवप्रम, अर्ज | गम्भीर-मन्दयुरिपके रिय महा- साम्य विधारदम्, पिपदम- मनुबर सम्पन दुर तपा नाना नानापति भसम्मा, साम्पमर (निPि) भोर परम्पा पगम्य पदना मन्ता नगर्म विद-पस पा भादित न HTTोअर म अमाप मम्म पदाप, अपमपि नेभसाग मित्र - प्पाहारगाणामाराप पधार पर उमर भर पपाननीयथ ॥१०॥ नगरप..॥
७६ माइपयोपनिषद् [गो० का. मापारनक परना मनमपि मनिपोर्ग मापपर्ययोगा प्रगति प गहिम प्रापरेकरानेषम् । विपिपपिपपपर्म प्रारिमुग्पेसपानां प्रयतभयविहन्द प्रक्ष पत्तम्मतोऽसि।।। जिसने अजन्मा होकर भी अपनी गिरीय शकिके योगसे जन्म महण किसा, गतिशम्प होनेपर भी गति म्वीकार की सया जो माना प्रफारफे विषयमप धोको ग्रहण करनेगल महाटि छोके विचारसे एफ होकर भी बने एमा है और जो भरणागत-मपहारी है उस प्रमको में ममस्कार करता हूँ॥१॥ प्रशादेशानषेपामुभितमलनिवेदनाम्मोऽस्तरस्प भूनाम्पासोफ्प मग्नाम्पविगतजमनप्राहमरे समुद्रे । कारम्पारपारामृतमिदममा दुर्मम भूवठेतो यस्त पूस्याभिषम्य परमगुरुम, पादपोतनतोऽसि ॥२॥ नो निरन्तर जम्म-अम्मान्तरम्प प्रादेफि कारण मरफ्त मपानक १ ऐसे ससारसागर जी को झे हुए देसफर निम्होंने पाणावश अपनी लिभुख सुदिप मापनदणके भाषातसे झुमिन हुए पेट नामक महासमुद्रके भीतर स्थित इस देवर्सम अमृतको प्रागियोंकि कन्यागके लिये निकाय है उन पूजनीयोंके भी मनीय परम गुरु (श्रीगोपादाचार्य ) कोम उनके घरोंमें गिरकर प्रणाम करता है॥२॥ परमहामोकभासा प्रतिसिमगमासाम्तमोडधकारो मखोरमसप मोरे यसहनुपमनोवम्मति भासमे में। पत्पादामामिवानो भुतिरामविनयमामिरप्रयाप्रमा वत्पादी पापनीयो भवभपविनुवी सर्वमानमस्से ।। मिनके जानाखोकली प्रमासे मेरे अन्त करणका मोइसप अन्धकार नाशको प्राम्स इबा तथा इस मपार संसारसागरमें पारंबार इफ्ना उलम्नारूप मेरी म्पपाएँ शान्त हो गया और जिनके चरणोंका वामय मेनेजाक पि कृतिज्ञान, उपशम वीर विनयकी प्राप्ति भमोम एवं पहले की होनेवाली है उम [भीगुरुदेवके ] मामपहारी परम पवित्र घरण मुगको में सतोमासे ममस्कार करता हूँ ॥३॥ इति श्रीगोपिनमगवायूम्पपा शिम्पस्प परमहसपरिणामकापास्प पशङ्करभगका कती गौडपादीपागमशासपिपरणे अतशाम्स्यार्प या प्रकरणम् ॥ ४॥ शान्तिः शान्तिा शान्ति !!!
शान्तिपाठ
ॐ भद्र कर्णेभि शृणुयाम देवा
पश्येमाक्षभिर्यजया ।
भद्र
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा २ सस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायु ॥
स्वस्ति न इन्द्रा पृथवा
स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमि
स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥
पारिता ! शारिता पाप्तिा"
पनि उत् ॥
गौडपादीयकारिकानुक्रमणिका माया. १ ७४ २५ २५५ २१८ २१ ६ Y २२९ २०१ २० ४ २ परिकप्रधि भास्पषम मानम् भनरो नमते विषम् मम कम्पितसंस्था भरमनिद्रमस्वप्नम् अबमनिद्रमस्वानम् मग बापते परमात् भगवस्यैव धमस्म भमावस्यैव मावस्त भक्तेमळवा पेयाम् मबाई बायवे यस भोप्यमनवम् मोतामे तुयेषित् मणुम्योऽपि मेषम्य भतो वासाम्पचापम् भदीपाच काम भापपामातम् माम पनामा कम् यो परमार भनादिमापया सुमा अनारेनवान मनिमिचम्प पिचरस भनिभिता पवार मन्तमस्थाना मेरानाम् भम्पा गा.पन भपूर्व पानिपों R ममायभरपारीनाम् मभूमिनिरेशान मभूताभिनिरोमि भमामोन्नवमाधम भडापावरण भराने सन्दम्पने २ ६२ १८ २४ १ २१९ ४ २ २ १७ ४ ६४ २ ४ Y ४९
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[१८.] प्रमण कारिका GY २५८ ५ १८ Y २६ ४ २४८ ४ Y २ परिकारीप्रति प्रेटपमतम पतास्त कामते न हि मुरस म्यमानामति है। महणाबारवक्त प्रहो न न नास्सर्गः परिषु मसीने परशारिते आमत रियन सस्पृशत्पर्षम् विचमा हिडवस्तु विचस्पन्दिवमरम् मामरणनिर्मुकाः चाप्रविधीमास्ते बाप्रवासवपि मत बास्याभास पामतम्, बीव पस्पावे पूर्वम् बीबारमनोः पूषकल पर बीचममनोरमम्पत्वम् बने पपिरिये मननायकस्पेन पानमाम्मास्मि तस्मादेव विविखनम् तस्मान्न बाप निचम् वैखम्मोचविताने मिसु पखलम् मित कोम्पम् दक्षिणाभिमुझे विस्था इम्स मनुस्मत दुर्दमतिमाम्मीरम् २ १ १८८ Y २१५ २८ १ १ ५ ४४ १ २१९ पोगोमामने रतस्यामा लम् बर्मा व इति बावन्ते मभिमायतेब नभवायवेष २४ [२८] ४ २३४ ४ ५२ ४ . २२१ २ ४ ૨૪૨ ११५ २ १२ ४ २२१ १८३ ३ २ ७ १४ २७ ८ २५५ अरिभावीपानि न निरोपो न पोत्पचिः न निर्गता भगवावे न निर्गतास्वे विनात् न मत्पमूते मार्गम् न मयापमत मर्मम् न पुक रन गावा नामस्प पटानया नायु ज्वचषु नारममावेन नानेवम् नारमान न परस्प नासपस्तम्मसत् नास्वादयेस्मुख तत्र निास्तुविनिमय निणीवस्म मनसा निमिन हा चिचम् निश्चस्याप्राप नाचे कुलानाम् निभिताया था रमवाम् नेह नानेति चाम्नापार पाचबिंधक इलेके पाना इति पारविदः पूफ्रािपरिगनम् मलायमाझेयाः प्राप्त सनिमित्वम् प्राप्ते सनिमितवम् प्रण दीर विषाद प्रणपो अपर प्रम प्रपत्रो यदि वित ममयः सर्वमावानाम् पाच इति प्रापविर मायादिभिग्नन्ध मापर्मस्तानाम् मनुस्पषमानान् पदिशो बिमुर्दिया बीएस्सो माता १ २ . २४ २५ २ ९१ ४ २९६ २१. २१२ ८ २५ १ Y २ [ २८२] मरण ४ २ ४ २५ ५ Y २१ २५ ૨ ३ - १५२ २२१ २९ ७ २० परमपीपनि उद्भानिमिच्या सयाम् मार गिरेवारम् मूत्र न मारते श्रिीधर भूतोऽभूरायो मापि भूवस्प बानिमियान्ति भन्न सपिरियन्ये मकारमाबेमासस मन इति मनोविदः मनसो निमहायचम् मनोपपमिर तम् मरणे सम्मवे व मापयामिपते मेवा मिश्राप सेमरम्प महरिताकिशाचे मातापिचस्व या निर्मितीचा सपा मावि बामनाम् बमा मापामपादीत् पया मायामयो बीया पपा स्वभमयो बीय पथा स्वाभातम् सपा स्वनेसामानम् यसिम्पयनशे पदा म समवेदन पान मेपवे नियम् पदिलो परिवदित पारसुरामायण पारायण पुतीय रे पैम पोमिम्पिाला रनारो दिमेकीयाः आम्रपरमानध कोमम्प्रेषयितम् को दिलासा ८ ५ १२० २५१ १४ १८ ४ ४ ४ ३ [२८] परिणाम पनि राय मेकॉस्मेविर प्रा प्रभार २ २ परिणा २० १८८ ४ Y २५० २२० २६ ra ४ १ १ १ ४३ २ २ २ १ ८२ २५ २ विमोत्मपरान्मावान् पिम्पो बिनिम्न विग्रने स्पन्दम्पने में विपासापपा अप्रत् शिप्रामा पिनयो मेष विभूति प्रत वन्ये विपस्यारवविरुपागम् विभो हिरपूममुनिमम् वीतरामरा पेरा इति वेदविद देवप्न उर्वमापानाम् बेशरचनानि वएप नवि नवीन सपा स्वमबल सम्मले देवास सम्भूरपपापाप संस्पा मापदे उपम् होरिमापरा पम समानता देपाम् ताप्रपोग्नता गम् सरप परष्यति सबभिन्मरिणा में धर्मा गासने सम्परया मानिसीपीमागिता मुनमानिपत निस्पम् मापदाम राशिणीति परिपत विपम् ममा समापन परम्पले मनसावे गपारपामा २१ १५८ २५ २० २ ૨ ७ ८८ ८ . १०४ ८. ४ ४ ८२ २३ २ २ ४ --- [२] मपरमा अरिमर . । १ २२ ३ परिमापनि स्वप्ननिवासवापाचो स्वप्नमामे यथारप्टे स्वप्नपत्तायपि त्वता स्वप्ने पापस्तुपमा समावेनामतो पस्प स्वमाबेनामतो रस्म स्वसिद्धान्तम्पवसामु स्वस्थ भP निर्माणम् देखोगरि मेपाम् देवारादि पर पाम् खर्न वामनाये देसमाप्रपाम्पनि २२ ८ ४ १४ २ २ ४ ४ २३ ९ मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका पास भमानमर्षोऽम्पमा ५ एप पर २४ मोमित्रादपरमिदरतम् चामरितसानो बद्रिप्पा बापरिवसानो स्थान पर नान्तमसम् मासमा पपोत ५२ ०२ ८ ८ सोनमारमा सनसानस्मता सनसानोरताप ३१
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