Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Prakrit-shripal Charitam Bhashantarsahitam

Panachand Bhagubhai · 2010/09

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॥ जिनदत्तसूरिपुस्तकोद्धारफंड-ग्रंथाङ्क २६ ॥ ॥श्री भाषाटीकासहितम् प्राकृत ॥ ॥श्रीपालचरित्रम् ॥ , . ॥ ॐ अहं ॥ प्रणम्य परया भत्त्या, यंत्रं श्रीसिद्धिचक्रक, श्रीश्रीपालचरित्रस्य, व्याख्यानं लोकभापया ॥१॥ क्रियते इति शेषः । अरिहाइ नवपयाई झाइत्ता हिययकमलममि । सिरि सिद्धचकमाहप्पमुत्तमं किंपि जपेमि ॥ १ ॥ अर्थ-श्रीअहंतादिक नवपदोंको हृदय कमलमें ध्यायके उत्तम श्रीसिद्धचक्र यंत्रराजका माहात्म्य किंचित् कहता हूं ॥१॥ अस्थित्थ जम्बुद्दीवे, दाहिणभरहद्ध मज्झिमे खंडे। बहुधणधन्नसमिद्धो, मगहादेसो जगपसिद्धो॥ २॥ अर्थ- इस जम्बु द्वीपमें दक्षिण भरतार्द्धके मध्यमखंडमें वहुत धन धान्य करके समृद्ध जगतमें प्रसिद्ध मगध नामका देश है ॥२॥ श्रीपा.च.

[ All rights reserved by the Trustees of the Fund. ] Printed by Ramchandra Yesu Shedge, at the Ninaya-sagar Press, No. 26-28, Kolbhat Lane, Bombay. Published by Javori Panachanda Bhagubhai Secretary Shri Jinadattasuri Jina Bhandar, Surat.

, चेडयनरिंद धूया, वीया जस्सत्थि चिल्लणादेवी । जीए असोगचंदो, पुत्तो हल्लोविहल्लोय ॥ ७ ॥ अर्थ-जिस श्रेणिक राजाके दूसरी रानी चेडा महाराजकी पुत्री चेलणा नामकी है जिस चेलणाका प्रथम पुत्र अशोकचंद्र कोणिक १ दूसरा हल्ल २ तीसरा विहल्ल ३ यह तीन पुत्र हैं ॥ ७ ॥ अन्नाओ अणेगाओ, धारणिपमुहाउ जस्स देवीओ। मेहाइणो अणेगे, पुत्ता पियमाइपयभत्ता ॥८॥ अर्थ-औरभी अनेक धारणी प्रमुख जिस श्रेणिक राजाके रानियां हैं जिन्होंकी कुक्षिसे उत्पन्न भए मेधकुमारादि अनेक पुत्र है कैसे है पुत्र पिता माताके चरणोंके भक्त हैं ॥ ८ ॥ सोसेणिय नरनाहो, अभय कुमारेण विहिय उच्छाहो। तिहुयण पयड पयावो, पालइ रजं च धम्मं च॥९॥ अर्थ-वह श्रेणिक राजा अभयकुमार करके किया है उत्साह जिसको ऐसा और तीनभुवनमें प्रगट प्रताप जिसका ऐसा राज्य और धर्म पालता है ऐसा ॥ ९ ॥ एयंमि पुणो समए, सुरमहिओ वद्धमाणतित्थयरो। विहरंतो संपत्तो, रायगिहासन्न नयरंमि ॥ १० ॥ अर्थ-इस समयमें देवोंकरके पूजित श्रीमहावीरस्वामी तीर्थंकर विचरते भए राजग्रहके समीप नगरमें आए ॥१०॥ पेसेइ पढम सीसं, जिटुं गणहारिणं गुणगरिहें। सिरि गोयमं मुणिंदं, रायग्गिहलोय लाभत्थं ॥११॥ R

श्रीपाल-
चरितम्
॥१॥
जत्थुप्पन्नं सिरि वीरनाह, तित्थं जयंमि वित्थरियं । तं देसं सविसेसं, तित्थं भासंति गीयत्था ॥३॥ भाषाटीका-
अर्थ-जिस मगध देशमें श्रीमहावीरस्वामीका तीर्थ उत्पन्न भया और जगत्में विस्तार पाया उस देशको गीतार्थ
सहितम्-
विशेष करके तीर्थ कहते हैं ॥३॥
तत्थय मगहा देसे, रायगिहनाम पुरवरं अत्थि। वेभार विउल गिरिवर, समलंकिय परिसरपएसं ॥४॥
अर्थ-उस मगधदेशमें राजगृह नामका प्रधान नगर है कैसा है नगर वैभारगिरि विपुलगिरि पर्वतोंसे आसपासका
भाग शोभित है जिसका ऐसा ॥४॥
तत्थय सेणिय राओ, रज्जं पालेइ तिजय विरकाओ। वीर जिण चलण भत्तो, विहिअज्जिय तित्थयरगुत्तो ५
अर्थ-उस राजग्रह नगरमें श्रेणिक नामका राजा राज्य पालता है कैसा है राजा तीन जगत्में प्रसिद्ध है और
श्रीमहावीरस्वामीके चरणोंका भक्त है ॥ विधिसे उपार्जनकिया है तीर्थंकर नाम कर्म जिसने ऐसा ॥५॥
जस्सत्थि पढमपत्ती, नंदानामेण जीइ वरपुत्तो । अभयकुमारो बहुगुणसारो चउबुद्धिभंडारो॥६॥
अर्थ-जिस श्रेणिक राजाके पहली रानी नंदा नामकी है उसके प्रधान पुत्र अभयकुमार नामका बहुतगुणोंसे
श्रेष्ठ है । और चार बुद्धिका भंडार है ॥ ६॥
॥१॥

19
515151-5115
अर्थ -भगवान् गौतमस्वामीभी जलसहित मेघके सदृश गंभीर स्वरसे सम्यक् धर्मका स्वरूप कहना प्रारंभ किया
कसे हैं भगवान परोपकार करनेकी इच्छाहें जिन्होंकी । ऐसे परोपकार करनेमें तत्पर ॥ १५ ॥
भो भो महाणुभागा, दुल्लहं लहिऊण माणुसं जमं। खित्त कुलाइ पहाणं, गुरु सामग्गिं च पुन्नवसा ॥१६॥
अर्थ-अहो महानुभावो भाग्यवंतो पुन्यके वससे दुर्लभ मनुष्य भव पाके और प्रधान आर्यक्षेत्र कुलादिपायके
और सद्गुरुका संयोगपायके ॥ १६ ॥
पंचविहंपि पमायं, गुरुयावायं विवजिउं झत्ति । सद्धम्मकम्मविसए, समुज्जमो होइ कायद्यो ।। १७ ॥
अर्थ-मद १ विषय २ कपाय ३ निद्रा ४ विकथा ५ ये पांच बहुतकप्टका कारण ऐसा प्रमाद शीघ्र छोड़के
सम्यक् धर्मकार्यके विषय उद्यम करना योग्य है ॥ १७ ॥
सो धम्मो चउभेओ, उवइट्ठो सयलजिणवरिंदेहि । दाणंसीलं च तवो, भावोवि य तस्सिमे भेया॥१८॥
अर्थ-वह धर्म चार प्रकारका सम्पूर्ण तीर्थंकरोंने कहा है चार भेद यह हैं दान १ शील २ तप ३ भाव ४ ॥ १८ ॥
तत्थवि भावेण विणा, दाणं नहु सिद्धिसाहणं होइ।सीलंपि भाव वियलं, विहलं चिय होइ लोगंमि॥१९॥
अर्थ-वहांभी भावविना दान सिद्धिसाधक अर्थात् मोक्ष देनेवाला न होवे निश्चय सीलभी भावरहित लोकमें
निष्फलही होवे है ॥ १९ ॥

श्रीपाल.
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२॥
अर्थ-तदनंतर भगवान अपने प्रथमशिष्य बड़े गच्छको धारनेवाले ऐसे गणधर गुणोंकरके गरिष्ठ श्रीगौतम
मुनीन्द्रको राजग्रह नगरके लोगोंके लाभके अर्थ भेजते भए ॥ ११ ॥
सोलद्ध जिणाएसो, संपत्तोरायगिहपुरोजाणे । कइवय मुणि परियरिओ, गोयमसामी समोसरिओ १२
अर्थ-वह गौतमस्वामी तीर्थंकरकी आज्ञा पाकर राजग्रह नगरके उद्यानमें प्राप्त भए कितनेक मुनि हैं साथमें
जिन्होंके ऐसे वहां समवसरे ॥ १२ ॥
तस्सागमणं सोउं,सयलो नरनाह पमुहपुरलोओ। नियनिय रिद्धि समेओ,समागओ झत्ति उज्जाणे ॥१३॥
अर्थ-श्रीगौतमस्वामीका आगमन सुनके सर्व राजा प्रमुख नगरके लोग अपनी अपनी ऋद्धिः सहित शीघ्र
उद्यानमें आए ॥ १३ ॥
पंचविहं अभिगमणं, काउंतिपयाहिणा उ दाऊण। पणमिय गोयमचलणे उवविट्ठो उचियभूमीए १४
अर्थ-पांच प्रकारका अभिगमन सचित्त द्रव्यका वोसराणा १ अचित्त द्रव्यका नहीं वोसराणा २ उत्तरासन करना
३ अंजलि करना ४ और मन बचन कायाका एकत्व करना यह पांच अभिगमन करके और तीन प्रदक्षिणा देके गौतम
स्वामीके चरणोंमें वंदना करके अपने अपने योग्य भूमिपर बैठे ॥ १४ ॥
भयपि सजल जलहर, गंभीर सरेण कहिउ भाढत्तो। धम्मसरूवं सम्मं, परोवयारिक तल्लिच्छो ॥१५॥
॥२॥

अर्थ-नव पदोंमें प्रथम पदमें निरंतर अरहंतोंको तुम ध्यावो कैसे अरहंत अठारह दोपरहित और निर्मल जो ज्ञान वोही है स्वरूप जिन्होंका और प्रगट किया है तत्व जिन्होंने और इन्द्रोंने नमस्कार किया है जिन्होको ऐसे ॥ २४ ॥ पनरसभेय पसिद्धे, सिद्धे घणकम्मवंधणविमुक्के । सिद्धाणंत चउक्के, झायह तम्मयमणा सययं ॥२५॥ अर्थ-अहो भव्यो तुम सिद्धमय है मन ऐसे जिन अजिनादि पन्द्रह भेदोंसे प्रसिद्ध ऐसे सिद्धोंको निरंतर ध्याओ कसे हे सिद्ध कर्मबंधनसे रहित और निष्पन्न हुआ है अनंत चतुष्क ज्ञान १ दर्शन २ सम्यक्त्व ३ अकर्ण वीर्य जिन्होंके ऐसे ॥ २५ ॥ पंचायारपवित्ते, विसुद्ध सिद्धंत देसणुज्जुत्ते । परउवयारिकपरे, निच्चं झाएह सूरिवरे ॥ २६ ॥ अर्थ-अहो भव्यो तुम निरंतर आचार्योंको ध्यावो कैसे आचार्य ज्ञानाचार १ दर्शनाचार २ चारित्राचार ३ तपा- चार ४ वीर्याचार ५ ये पांच आचारसे पवित्र निर्मल और विशुद्ध सिद्धान्त जिनागमकी जो देशना उसमें उद्यमवंत और परोपकारही एक प्रधान है जिन्होंके उसमें तत्पर ऐसे ॥ २६ ॥ गणतत्तीसु निउत्ते, सुत्तत्थझाणंमि उज्जुत्ते । सझाए लीणमणे, सम्मं झाएह उवझाए ॥ २७ ॥ अर्थ-अहो भव्यो तुम सम्यक जैसे होवे वैसा उपाध्यायोंकों ध्यावो कैसे उपाध्याय गच्छकी त्रप्तिः सारणा १

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥३॥
भावं विणा तवोवि हु, भवोहवित्थारकारणं चेव । तम्हा नियभावुच्चिय, सुविसुद्धो होइ कायदो ॥२०॥
अर्थ-भावविना तपभी भवसमूहके प्रवाहका विस्तार करनेवालाही है अर्थात् भवभ्रमण कारण है मुक्तिका
कारण नहीं है। इस कारणसे अपना भावही अतिशय निर्मल करने योग्य है ॥ २० ॥
भावोवि मणो विसओ, मणं च अइदुज्जयं निरालंवं । तो तस्स नियमणत्थं, कहियं सालंबणं झाणं ॥२१॥
अर्थ-भावभी मनोविषई है और मन आलंबनरहित अत्यन्त दुर्जय है अर्थात् जीतना मुशकिल है इस कार-
णसे मनको वश करनेके अर्थ सालंबन ध्यान कहा है ॥ २१ ॥
आलंबणाणि जइ विहु, बहुप्पयाराणि संति सत्थेसु । तह विहु नवपयझाणं, सुपहाणं विंति जगगुरुणो २२
अर्थ-यद्यपि शास्त्रोंमें बहुतप्रकारके आलंवन कहे हैं तथापि निश्चय करके जगद्गुरु श्रीतीर्थकरदेव नवपदोंका
ध्यान अतिशय प्रधान आलंवन कहा है अव नव पदोंके नाम कहे है ॥ २२ ॥
अरिहं सिद्धायरिया, उवझाया साहुणो य सम्मत्तं । नाणं चरणं च तवो, इय पयनवगं मुणेयत्वं ॥२३॥
अर्थ-अरहंत १ सिद्ध २ आचार्य ३ उपाध्याय ४ साधु ५ सम्यक्त्व ६ ज्ञान ७ चारित्र ८ तप ९ यह नवपद
का नाम जानना ॥२३॥
तत्थ रिहंतेवारसदोस, विमुक्के विसुद्ध नाणमए। पयडियतत्ते नयसुरराए झाएह निञ्चंपि ॥ २४ ॥
॥३॥

*54 अर्थ-जो अशुभक्रिया पापव्यापारोंका त्याग और शुभक्रिया निरवद्यव्यापारोंमें अप्रमाद प्रमाद नहीं करना वह चारित्र तुम पालो कैसा चारित्र उत्तम गुणों करके युक्त और कैसा निरुक्त पदभंजनसे निष्पन्न भया सो कहते है चयनाम ८ कर्मका संचय रिक्त खाली होय जिससे वह चारित्र कहिये ॥ ३१ ॥ घणकम्म तमोभरहरण, भाणु भूयं दुवालसंगधरं। नवरमकसायता चरेह सम्म तवो कम्मं ॥३२॥ अर्थ-अहो भव्यो तुम अच्छी तरहसे तप क्रिया अंगीकार करो कैसा है तप घनकर्म मजवूत ज्ञानावरणी आदि कर्मही अंधकारका समूह उसके दूर करनेमें सूर्यसमान और कैसा तप वारह अंगका धारनेवाला तपका १२ भेद होनेसे लोकमें १२ सूर्यरूढ होनेसे परंतु सूर्य ताप करनेवाला है कपायरहित तप तापरहित है ॥ ३२॥ एयाइं नवपयाइं, जिनवरधम्ममि सारभूयाइं । कल्लाणकारणाइं, विहिणा आराहियवाइ ॥ ३३ ॥ अर्थ-यह नव पद श्रीतीर्थकरके कहेहुए धर्ममें सारभूत है इसी कारणसे कल्याणके करनेवाले हैं इस लिए विधिःसे तुमको आराधना योग्य है ॥ ३३ ॥ अन्नं च एएहिं नव पएहि, सिद्धं सिरि सिद्धचकमाउत्तो। आराहतो संतो, सिरिसिरिपालुवलहइ सुहं ३४ अर्थ-और भी सुनो ये नव पदोंकरके निप्पन्न श्रीसिद्धचक्रको उपयोगयुक्त आराधता भया श्रीश्रीपालनामके राजाके जैसा मनुष्य सुख पाता है ॥ ३४ ॥ MESS श्रीपाल- प्चरितम् भाषाटीका- सहितम्, ॥४॥ 15 वारणा २ चोयणा ३ पडिचोयनामें अधिकारी और सूत्रार्थका अध्ययन करानेमें उद्यमवंत स्वाध्यायमें लगा है मन जिन्होंका ऐसे ॥ २७ ॥ सवासु कम्मभूमिसु, विहरते गुणगणे हि संजुत्ते । गुत्ते मुत्ते झायह, मुणिराए निट्ठिय कसाए ॥२८॥ अर्थ-अहो भव्यो तुम सर्व कर्मभूमिमें पांच ५ भरत ५ ऐरवत पांच महाविदेह इन १५ क्षेत्रोंमें विचरते मुनि राजोंको ध्यावो कैसे मुनिराज गुणोंके समूहोंसे युक्त ३ गुप्तिसहित सर्वसंगरहित दूर किया है कषाय जिन्होंने ऐसे ॥२८॥ सबन्नु पणीयागम, पयडिय तत्तत्थ सद्दहण रूवं। दसण रयण पईवं, निच्चं धारेह मणभवणे ॥ २९ ॥ अर्थ-अहो भव्यो सर्वज्ञोंने कहे सिद्धान्तोंमें प्रगट किया तत्वरूप अर्थ उन्होंका जो श्रद्धान वह है स्वरूप जिसका ऐसा सम्यक्त्वरूप रत्नदीपक निरंतर मनमंदिरमें धारो ॥ २९ ॥ जीवाजीवाइ पयत्थ, सत्थ तत्ताववोह रूवं च । नाणं सवगुणाणं, मूलं सिक्खेह विणएण ॥ ३०॥ अर्थ-अहो भव्यो जीवाजीवादिक पदार्थों का समूह उन्होंका जो तत्वावबोध तत्वज्ञान स्वरूप जिसका ऐसा ज्ञान विनय करके तुम सीखो कैसा है ज्ञान सर्व गुणोंका मूल कारण है ॥ ३० ॥ असुह किरियाण चाओ, सुहासु किरियासुजोय अप्पमाओ।तं चारित्तं उत्तम, गुणज्जुतं पालह निरुत्तं ३१ ॥४॥ RAI

२
गांव है किसके जैसा योगमें है प्रवेश जिन्होंका ऐसे योगियोंके जैसा जिस कारणसे योगीभी मनोगुप्त्यादिकसे गुप्त होवे
है और जिस देशमें ठिकाने २ नहीं उल्लंघे जाय ऐसे ऊंचे पर्वत हैं कुटुम्बमिलापके जैसे ॥ ३८ ॥
पए पए जत्थ रसाउलाओ, पणंगणाओव तरंगिणीओ।
पए पए जत्थ सुहंकराओ, गुणवलीउव्व वणावलीओ ॥ ३९ ॥
अर्थ-जिस देशमें ठिकाने २ जलसेभरी हुई नदियां हैं किसके जैसी वेश्याओंके जैसी वेश्याभी श्रृंगाररससे
आकुल होवे है और जिस देशमें सुखकारी वनोंकी श्रेणी है किसके जैसी गुणोंकी श्रेणीके जैसी गुणोंकी श्रेणीभी सुख
करनेवाली होवे है ॥ ३९ ॥
पए पए जच्छ सवाणियाणि, महापुराणीव महासराणि ।
पए पए जत्थ सगोरसाणि, सुहीमुहाणीव सुगोउलाणि ॥ ४० ॥
अर्थ-जिस देशमें ठिकाने २ पानीसे भरे हुए बड़े सरोवर हैं किसके जैसे महानगरके जैसे बड़े नगरभी वानियों
करके सहित होवे है और जिस देशमें ठिकाने २ शोभन गोकुल हैं दही दूधसहित हैं किसके सदृश पंडितोंके मुखके
सदृश पंडितोंके मुखभी गो नाम वाणीके रससहित होवे हैं ॥ ४०॥
तत्थय मालवदेसे, अकय पवेसे दुकाल डमरोह । अस्थि पुरीपोराणा, उज्जेणी नाम सुप्पहाणा ॥ ४१ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥५॥
IA
तो पुच्छइ मगहेसो, को एसो मुणिवरिंद सिरिपालो। कहतेण सिद्धचकं, आराहिय पावियं सुक्खं ३५
अर्थ-वाद गौतमस्वामीके उपदेशके अनंतर मगधदेशका स्वामी श्रेणिक राजा प्रश्न करे हे मुनिवरेन्द्र यह
श्रीपाल कौन उन श्रीपालराजाने श्रीसिद्धचक्रको आराधके कैसे सुख पाया ॥ ३५ ॥
तो भणइमुणी निसुणसु, नरवर अक्खाणयं इमं रम्म। सिरि सिद्धचक्क माहप्प, सुंदरं परमचुजकरं ॥३६॥
अर्थ-तव गौतमस्वामी बोले हे राजेन्द्र हे श्रेणिक महाराज ये श्रीपाल राजासम्बन्धी मनोज्ञ कथानक श्रीसिद्ध-
चक्रमाहात्म्यकरके सुंदर उत्कृष्ट आश्चर्य करनेवाला सुन ॥ ३६ ॥
तथाहि इहेव भरह खित्ते दाहिण खंडंमि अत्थिसुपसिद्धो। सवढि कयपवेसो, मालवनामेण वरदेसो ३७
अर्थ-वही दिखाते है इसी भरतक्षेत्रके दक्षिणार्धमें मालवनामका सुप्रसिद्ध प्रधान देश है कैसा है मालवदेश
सर्वऋद्धिःने किया है प्रवेश जिसमें ऐसा ॥ ३७॥
सोय केरिसो, पए पए जत्थ सुगुत्ति गुत्ता, जोगप्पवेसा इव संनिवेसा।
पए पए जत्थ अगंजणीया, कुडंवमेला इव तुंगसेला ॥ ३८ ॥
अर्थ-जिस मालव देशमें पगपगमें याने ठिकाने ठिकाने वाडोंकरके वेष्टित याने वीटाहुआ ऐसे सन्निवेण नाम
॥५॥

उस नगरीमें तो वनोमें अनेक केलियोंके वृक्ष हैं और जहां रति प्रीति ठिकाने २ है लोकमें रति कामदेवकी स्त्री और प्रीति देवाङ्गना एक २ है वहां तो सर्वत्र परस्पर राग और प्रीति है ॥ ४३ ॥ तीसे पुरीइ सुरवरपुरीइ, अहियाइ वन्नणं काउं। जइ निउणबुद्धिकलिओ, सकगुरू चेव सकेइ ॥४४॥ अर्थ-इन्द्रकी नगरीसे अधिक उस उज्जैनी नगरीका वर्णन करनेको जो निपुणबुद्धिः सहित कोई समर्थ होवे तव बृहस्पतिःही समर्थ होवे और नही लोकरूढ़िसे बृहस्पतिः इन्द्रका गुरू कहा जावे है ॥ ४४ ॥ तत्थथि पुहविपालो पयपालो, नामओ य गुणओ य। जस्स पयावो सोमो, भीमोवि य सिट्ठदुद्वेसु ॥४५॥ अर्थ -उस नगरीमें प्रजापाल नामका राजा है वह नामसे और गुणसे प्रजापालही है प्रजां पालयतीति प्रजापालः ऐसी व्युत्पत्तिः होनेसे और कैसा है राजा जिसका प्रताप सज्जनोंमें सौम्य है और दुष्टोंमें भयंकर है ॥४५॥ तस्स वरोहे बहुदेहसोह, अवहरिय गोरिगवेवि । अचंतं मणहरणे, निउणाओ दुन्नि दोवीओ॥४६॥ अर्थ-उस राजाके अंतःपुरमें दो रानी पतिका मनरंजनकरनेमें अत्यन्त निपुण हैं कैसी रानियां हैं शरीरकी शोभा करके पार्वतीका गर्व हरण किया है जिन्होंने ऐसी दो देवी विशेष करके अन्तेवरमें सौभाग्यवती हैं ॥ ४६॥ सोहाग लडह देहा, एगा सोहग्गसुंदरीनामा ! वीया य रूवसुंदरी, नामा रूवेण रइतुल्ला ॥ ४७॥ , श्रीपा.च,२

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥६॥
.
अर्थ--उस मालवदेशमें पुराणी उज्जैनी नामकी अतिशयप्रधान नगरी है कैसा है मालवदेश दुर्भिक्ष और उमर
नाम बलात्कारसे परद्रव्य हरना यह दुःकाल डमर इन दोनोंने नहीं प्रवेश किया है जिसमें ऐसा ॥४१॥
सायकेरिसा अणेगसो जत्थ पयावईओ, नरुत्तमाणं च न जत्थ संखा ।
महेसरा जत्थ गिहे गिहेसु, सचीवरा जत्थ समग्गलोया ॥ ४२ ॥
अर्थ-वह उज्जैनी नगरी कैसी है जिस नगरीमें अनेक प्रजापति हैं लोकमें तो एकही प्रजापति ब्रह्मा प्रसिद्ध है
उस नगरीमें प्रजा नाम संततिके अनेक स्वामी हैं और जिस नगरीमें पुरुषोत्तमोंकी संख्या नहीं है लोकमें तो एकही
पुरुपोत्तम श्रीकृष्ण प्रसिद्ध है और वहां बहुत उत्तम पुरुष है और जिस नगरीमें घर २ में महेश्वर नाम महर्धिक है
लोकमें तो एकही महेश्वर प्रसिद्ध है और जिस नगरीमें सम्पूर्ण लोग सचीवर हैं लोकमें तो एकही इन्द्राणीका वर
इन्द्र प्रसिद्ध है और वहां तो सब लोग वस्त्रसहित हैं ॥ ४२ ॥
घरे घरे जत्थ रमंतिगोरी,रंभासिरीओय पए पएय।वणेवणे याविअणेगरंभा,रईयपीई विय ठाण ठाणे४३
अर्थ-जिस नगरीमें घर २ में गौरियों जिनका रज नहीं देखा गया है ऐसी कन्या क्रीडा करे है लोकमें तो एकही
गौरी पार्वती कैलासपर्वतपर क्रीडा करती भई प्रसिद्ध है उस नगरमें तो घर २ में गौरिया हैं ॥ लोकमें तो एकही
श्रीलक्ष्मी कृष्णकी स्त्री है और जिस नगरीमें तो ठिकाने २ लक्ष्मी हैं लोकमें तो एकही रंभा देवाङ्गना प्रसिद्ध है और
॥६॥

, उस नगरीमें तो बनोमें अनेक केलियोंके वृक्ष हैं और जहां रति प्रीति ठिकाने २ है लोकमें रति कामदेवकी स्त्री और ग्रीति देवागना एक २ है वहां तो सर्वत्र परस्पर राग और प्रीति है ॥ ४३ ॥ तीसे पुरीइ सुरवरपुरीइ, अहियाइ वन्नणं काउं। जइ निउणबुद्धिकलिओ, सकगुरू चेव सकेइ ॥४४॥ अर्थ-इन्द्रकी नगरीसे अधिक उस उज्जैनी नगरीका वर्णन करनेको जो निपुणबुद्धिः सहित कोई समर्थ होवे तव बृहस्पतिःही समर्थ होवे और नही लोकरूढ़िसे बृहस्पतिः इन्द्रका गुरू कहा जावे है ॥ ४४ ॥ तत्थथि पुहविपालो पयपालो, नामओ य गुणओ य । जस्स पयावो सोमो, भीमोवि य सिट्ठदुढेसु ॥४५॥ अर्थ -उस नगरीमें प्रजापाल नामका राजा है वह नामसे और गुणसे प्रजापालही है प्रजां पालयतीति प्रजापाल: ऐसी व्युत्पत्तिः होनेसे और कैसा है राजा जिसका प्रताप सज्जनोंमें सौम्य है और दुष्टोंमें भयंकर है ॥ ४५ ॥ तस्स बरोहे वहुदेहसोह, अवहरिय गोरिगवेवि । अचंतं मणहरणे, निउणाओ दुन्नि दोवीओ ॥ ४६॥ अर्थ-उस राजाके अंतःपुरमें दो रानी पतिका मनरंजनकरनेमें अत्यन्त निपुण हैं कैसी रानियां हैं शरीरकी शोभा करके पार्वतीका गर्व हरण किया है जिन्होंने ऐसी दो देवी विशेष करके अन्तेवरमें सौभाग्यवती हैं ॥ ४६॥ सोहग्ग लडह देहा, एगा सोहग्गसुंदरीनामा ! वीया य रूवसुंदरी, नामा रूवेण रइतुल्ला ॥ १७ ॥ , श्रीपा.च.२ PRANARTA श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥ ७॥ अर्थ-उन दो देवियोंका नाम कहे हैं उनमें एक सौभाग्यसुंदरी दूसरी रूपसुंदरी उन्होंमें पहली रानी सौभाग्यसे सुंदर है देह जिसका ऐसी और दूसरी रतिके जैसी ॥ ४७ ॥ पढमा माहेसरकुल, संभूया तेण मिच्छदिवित्ति। बीया सावगधूया, तेणं सा सम्मदिवित्ति ॥ ४८ ॥ अर्थ-उन दोनों में पहली सौभाग्यसंदरी रानी महेश्वरीके कुलमें उत्पन्न भई है इस कारणसे मिथ्या विपरीत है दृष्टि जिसकी ऐसी मिथ्यादृष्टनीथी दूसरी श्रावककी पुत्री होनेसे रूपसुंदरी रानी समीचीन है दृष्टि जिसकी ऐसी सम्यक् दृष्टिनी थी॥४८॥ ताओ सरिसवयाओ, समसोहग्गाओ सरिसरूवाओ। सावत्ते वि पायं, परूप्परं पीतिकलियाओ॥४९॥ अर्थ-वह दोनो रानी कैसी है सदृश है यौवनअवस्था जिन्होंकी, और सदृश है सौभाग्य जिन्होंका, और सरीखा रूप सौंदर्य जिन्होंका, और सपत्नीका भाव रहतेभी निश्चय बहुलता करके परस्पर प्रीति सहित रहती थी॥ ४९ ॥ नवरं ताण मणट्ठिय, धम्मसरूवं वियारयंताणं । दूरेण विसंवाओ, विसपीऊसेहिं सारित्थो ॥ ५० ॥ अर्थ-इतना विशेष है कि अपने मनमें रहाहुआ धर्मका स्वरूप विचारते दोनों रानियोंके अत्यन्त विसंवाद याने विवाद होता था कैसा विसंवाद जहर अमृतके सदृश परस्पर विरुद्ध होनेसे ॥ ५० ॥ ताओय रमंतीओ, नव नव लीलाहिं नरवरेण समं।थोवंतरंमि समए, दोवि सगब्भाओ जायाओ॥५१॥ हु ra ॥ ७॥ .

अर्थ-यह दोनों रानियां राजाके साथ नवीन २ लीला करके अपूर्व २ क्रीडासे रमती भई थोड़ा है अंतर जिसमें ऐसी गर्भवती हुई ॥५१॥ समयंमि पसूयाओ, जायाओ कन्नगाउ दोहिंपि । नरनाहो वि सहरिसो, वद्धावणयं करावेइ ॥५२॥ अर्थ-दोनों रानियोंके गर्भस्थितिके पूर्ण कालमें कन्यायें भई राजाने हर्पसहित वधाई कराई ॥ ५२ ॥ सोहग्गसुंदरी नंदणाइ, सुरसुंदरित्ति वरनाम । वीयाइ मयणसुंदरि, नामं च ठवेइ नरनाहो ॥५३॥ अर्थ-राजा सौभाग्यसुंदरीकी पुत्रीका सुरसुंदरी ऐसा प्रधान नाम दिया और दूसरी रूपसुंदरी रानीकी पुत्रीका मदनसुंदरी ऐसा नाम स्थापा ॥ ५३ ॥ समए समप्पियाओ, ताओ सिवधम्मजिणमय विऊणं । अज्झावयाण रन्ना, सिवभूति सुबुद्धि नामाणं ५४ अर्थ-अध्ययन कालमें दोनों कन्याओंको शिवधर्म जैनधर्मका जाननेवाला शिवभूति और सुवुद्धि नाम पाठकोंको पढ़ानेके वास्ते राजाने सोंपी ॥ ५४ ॥ सुरसुंदरी य सिक्खइ, लेहियं गणियं च लक्खणं छंदं । कवमलंकारजुयं, तकं च पुराण समिईओ॥५५॥ अर्थ-सुरसुंदरी कन्या पहले लिखनेकी कला सीखें और गणित कला सीखें तदनंतर वस्तुओंका लक्षण और व्याक- रण सीखें तथा छंदशास्त्र और अलंकार सहित काव्यशास्त्र सीखें और तर्कशास्त्र तथा पुराणस्मृति सीलें ॥ ५५ ।।

श्रीपाल- चरितम् ॥८॥ सिक्खेइ भरहसत्थं, गीयं नटुं च जोइस तिगिच्छं । विजंमंतंतंतं, हरमेहल चित्तकम्माइं ॥ ५६ ॥ भाषाटीका- अर्थ-और भरतशास्त्र याने नाट्यशास्त्र सीखें तथा गीतगान और नाचना सीखें तथा ज्योतिषशास्त्र और रोगकी सहितम्. चिकित्सारूप वैद्यकशास्त्र और विद्या मंत्र तंत्र सीखें तथा चित्रकला सीखें ॥ ५६ ॥ अन्नाइं वि कुंटलविटलाइं, करलाघवाइ कम्माइं। सत्थाई सिक्खियाई, चित्तचमुकारजणयाइं ॥५७॥ अर्थ-सुरसुंदरीने औरभी कुंटलविंटल कर्म नाम कार्मण वशीकरणादि सीखें और करलाघवादिक याने हथफेरी वगैरहः कर्म सीखें औरभी लोगोंके चित्तमें चमत्कार करनेवाले शास्त्र सीखे ॥ ५७ ॥ सा काविकला तं किंपि, कोसलं तंच नत्थि विन्नाणं। सिक्खियं न तीए, पन्ना अभिओगजोगेण ॥५८॥ अर्थ-वह कोई कला नहीं है और ऐसा कोई कौशल्य निपुणत्व नहीं है ऐसा कोई विज्ञान चातुर्य नहीं है जो सुरसुंदरी कन्याने बुद्धि और उद्यमके योगसे नहीं सीखा ॥ ५८ ॥ सविसेसं गीयाइसु, निउणा वीणाविणोय लीणा सा । सुरसुंदरी वियढा, जाया पत्ता य तारुन्नं ॥ ५९॥ अर्थ-विशेप करके गीतादिक कलामें निपुण विचक्षण भइ और वीणाके विनोदमें लगा है मन जिसका ऐसी सुर- सुंदरी विचक्षण भई और यौवन अवस्था प्राप्त भई ॥ ५९॥ ॥८॥ जारिसओ होइगुरू, तारिसउ होइ सीसगुणजोगो । इत्तुच्चिय सा मिच्छा, दिहि उकिट्टप्पा य ॥६॥ 1

अर्थ-जैसा गुरू होवे वैसाही प्रायः शिप्यमें गुणका सम्बन्ध होवे इस कारणसे सुरसुंदरी कन्या मिथ्यादृष्टिनी
और उत्कृष्ट अभिमान युक्त है मन जिसका ऐसी भई ॥ ६० ॥
तह मयणसुंदरी विहु, एयाओ कलाओ लीलमित्तेण । सिक्खेइ विमलपन्ना, धन्ना विणएण संपन्ना ॥६१॥
अर्थ-तैसेही मदनसुंदरीभी यह कही भई लेखनादि कला लीलामात्रसे पढ़ती भई कैसी है मदनसुंदरी निर्मल है
बुद्धि जिसकी और धन्या है धर्म धनको जिसने पाया है और विनय युक्त है ॥ ६१ ॥
जिणमयनिउणेण झावएण,सामयणसुंदरीवाला।तह सिक्खविया जह, जिणमयंमि कुसलत्तणं पत्ता ६२
अर्थ-जिनमत विपयमें निपुण अध्यापकने मदनसुंदरी कन्याको वैसी सिखाई कि जिससे जैनधर्मके पदार्थों में
निपुण भई ॥ ६२॥
एगासत्ता दुविहो नओ य, कालत्तयं गइचउकं । पंचेव अस्थिकाया, दवछकं च सत्तनया ॥ ६३ ॥
अर्थ-सर्व पदार्थों में एकही सत्ता अस्तित्व है और दो प्रकारका नय द्रव्यास्तिक १ पर्यायास्तिक २ तथा काल ३
भूत १ वर्तमान २ भविष्यत् और गति ४ नरकगति तिर्यञ्चगति मनुष्यगति देवगति तथापांच अस्तिकाय धर्मास्तिकाय १
अधर्मास्तिकाय २ आकाशास्तिकाय ३ पुद्गलास्तिकाय ४ जीवास्तिकाय और ६ द्रव्य धर्मास्तिकायादि ५ और छठ्ठा काल
और ७ नय नैगम १ संग्रह २ व्यवहार ३ ऋजुसूत्र ४ शब्द ५ समभिरूढ़ ६ एवंभूत ७ ॥ ६३ ॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥९॥ अट्टेवय कम्माइं, नवतत्ताई च दसविहो धम्मो। एगारसपडिमाओ, बारसवयाइं गिहीणं च ॥६४॥ अर्थ-ज्ञानावरणी १ दर्शनावरणी २ वेदिनी ३ मोहनी ४ आयु ५ नाम ६ गोत्र ७ अंतराय ८ ये कर्म आठ हैं जीवाजीवादि नवतत्व क्षमामार्दवादि दशप्रकारका यतिधर्म दर्शनादि ११ श्रावककी प्रतिमा और स्थूलप्राणातिपात विरमणादि १२ व्रत ॥ ६४ ॥ इच्चाइ वियाराचार, सारकुसलत्तणं च संपत्ता । अन्ने सुहुमवियारेवि, मुणइ सा निययनामं च ॥६५॥ अर्थ-मदनसुंदरी कन्या इत्यादि विचार आचारोका रहस्यभूतपदार्थों में कुशलपना प्राप्त भई औरभी इन्होंसे भिन्न सूक्ष्मविचारोंको अपने नामके जैसा जाने ॥ १५ ॥ कम्माणं मुलुत्तर, पयडीओ गणइ मुणइ कम्मठिइं । जाणइ कम्मविवागं, बंधोदयदीरणं संतं ॥६६॥ अर्थ-और मदनसुंदरी कन्या कर्मोंकी ८ मूल प्रकृति तथा १५८ उत्तर प्रकृति गिने और कर्मोकी स्थिति ३० क्रोडाकोड़ सागरादिक जाने और कर्मोंका विपाक शुभ अशुभ फलरूप जाने और कर्मोंका बंध, उदय, उदीरणा सत्ताका स्वरूप जाने ॥६६॥ जीसे सो उवज्झाओ, संतो दंतो जिइंदिओ धीरो। जिणमयरओ सुबुद्धि, साकिं न हु होइ तस्सीला ६७ अर्थ-जिसका वह सुबुद्धि नाम श्रावक उपाध्याय है वा मदनसुंदरी कन्या गुरुके तुल्य स्वभाववाली क्या न होवे , अपि तु होवेही ॥ कैसा है पाठक क्षमायुक्त तथा मनको दमनेवाला जितेन्द्रिय धैर्यवान, बुद्धिवान् जिन मतमें रक्त ऐसा जिसका गुरु वा वैसी गुणवती कैसे न होवे ॥ ६७ ॥ सयल कलागम कुसला, निम्मल सम्मत्त सीलगुण कलिया।लज्जा सज्जा सा मयण, सुंदरी जुवणं पत्ता॥ अर्थ-मदनसुंदरी कन्या यौवन अवस्था प्राप्त भई कैसी है सम्पूर्णकलाशास्त्रोंमें निपुण है और निर्मल सम्यक्त्व शील गुणोंसे युक्त लज्जासे परिपूर्ण ऐसी मदनसुंदरी कन्या वाल्य अवस्थाको छोड़के यौवन अवस्था पाई ॥ ६८ ॥ अन्न दिणे अभितर, सहानिविटेण नरवरिंदेण । अज्झावय सहियाओ, अणावियाओ कुमारीओ॥६९॥ अर्थ-अन्य दिनके विपय अंदरकी सभामें बैठा हुआ राजाने पाठक सहित दोनों कुमरियोंको अपने पासमें बुलाई ६९ विणओणयाओ ताओ, सरूव लावन्न खोहिय सहाओ।विणिवेसियाउ रन्ना, नेहेणं उभयपासेसु॥७०॥ अर्थ-विनयसे नम्र और अपने रूप लावण्यसे चमत्कार प्राप्त किया है सभाके लोकोको जिन्होंने ऐसी दोनों कन्याकु राजाने स्नेहसे अपने दोनों तरफ पासमें बैठाई ॥ ७० ॥ हरिसवसेणं राया, तासिं वुद्धी परिक्खणनिमित्तं । एगं देई समस्सापयं, दुन्हं पि समकालं ॥७१॥ अर्थ-राजा हर्पित होके दोनों कन्याकी बुद्धि की परीक्षाके निमित्त दोनों कन्याको समकाल नाम एकसमय एक समस्या पद देवे ॥ ७१॥ , श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम. ॥९॥ अट्टेवय कम्माइं, नवतत्ताइं च दसविहो धम्मो। एगारसपडिमाओ, बारसवयाइं गिहीणं च ॥ ६४ ॥ अर्थ-ज्ञानावरणी १ दर्शनावरणी २ वेदिनी ३ मोहनी ४ आयु ५ नाम ६ गोत्र ७ अंतराय ८ ये कर्म आठ हैं जीवाजीवादि नवतत्व क्षमामार्दवादि दशप्रकारका यतिधर्म दर्शनादि ११ श्रावककी प्रतिमा और स्थूलप्राणातिपात विरमणादि १२ व्रत ॥ ६४ ॥ इच्चाइ वियाराचार, सारकुसलत्तणं च संपत्ता । अन्ने सुहुमवियारेवि, मुणइ सा निययनामं च ॥६५॥ अर्थ-मदनसुंदरी कन्या इत्यादि विचार आचारोका रहस्यभूतपदार्थोंमें कुशलपना प्राप्त भई औरभी इन्होंसे भिन्न सूक्ष्मविचारोंको अपने नामके जैसा जाने ॥६५॥ कम्माणं मुलुत्तर, पयडीओ गणइ भुणइ कम्मठिइं । जाणइ कम्मविवागं, बंधोदयदीरणं संतं ॥६६॥ अर्थ-और मदनसुंदरी कन्या कर्मोकी ८ मूल प्रकृति तथा १५८ उत्तर प्रकृति गिने और कर्मोकी स्थिति ३० क्रोडाकोड़ सागरादिक जाने और कर्मोंका विपाक शुभ अशुभ फलरूप जाने और काँका बंध, उदय, उदीरणा सत्ताका स्वरूप जाने ॥ ६६ ॥ जीसे सो उवज्झाओ, संतो दंतो जिइंदिओ धीरो। जिणमयरओ सुबुद्धि, साकिं न हु होइ तस्सीला ६७ अर्थ-जिसका वह सुबुद्धि नाम श्रावक उपाध्याय है वा मदनसुंदरी कन्या गुरुके तुल्य स्वभाववाली क्या न होवे , ॥९॥ . , 1-4 अर्थ-चाद राजाकी आज्ञासे मदनसुंदरीभी उस समस्याको पूर्ण करे कैसी है मदनसुंदरी जिनवचनोंमें रत और शान्त उपसमयुक्त दान्त नाम इन्द्रिय दमयुक्त और कैसी समस्या अपने स्वभाव सरीखी ॥ ७५ ॥ यथा विणय विवेय पसण्णमj, सीलसुनिम्मल देहु । परमप्पह मेलावडो, पुण्णहिं लब्भइ एहु ॥७६ ॥ अर्थ-विनय पूज्यादिकमें चन्दन नमस्कारादिरूप विवेक वस्तुओंका भेद जानना प्रसन्नमनः मनका निर्मलपना तथा ब्रह्मचर्यसे अत्यन्त उज्वलशरीर पाना और परमपथ मोक्ष मार्गके साथ सम्बन्ध होना इतनी वस्तु पुण्यसे मिले हैं ॥७६॥ तो तीए उवज्झाओ,माया वि य हरिसिया न उण सेसा, जेण तत्तोवएसो, नकुणइ हरिसंकुदिट्ठीणं ७७ अर्थ-समस्या पूर्ण किये अनन्तर मदनसुंदरीका पाठक हर्पित भया और माताभी हर्षित भई परन्तु और राजा- दिक लोगोंने हर्प नहीं पाया इस कारणसे तत्वका उपदेश मिथ्यात्वी लोगोंको हर्ष नहीं करे है उसका वचन तत्वउप- देशरूप है राजादिक तो वाह्य दृष्टि है इस लिए सुनके हर्प नहीं पाया कहा है गुणिनि गुणज्ञो रमते ॥ ७७ ॥ इओय कुरुजंगलंमिदेसे, संखपुरी नाम पुरवरी अस्थि ।जापच्छा विक्खाया, जाया अहिछत्ता नामेणं ७८ अर्थ-इधरसे इसके बाद जो भया सो कहते हैं कुरजंगल नाम देशमें शंखपुरी नामकी प्रधान नगरी है वह नगरी कितने कालके अनन्तर अहिछत्रा नामसे प्रसिद्ध भई ॥ ७८ ॥ ALS

श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका-
सहितम्.
॥१०॥
यथा “पुन्नहिं लब्भइ एहु,” तो तकालं अइचंचलाए ।
अच्चंतगव गहिलाए, सुरसुंदरीए भणियं, हुंडं रेमि निसुणेह ॥ ७२ ॥
अर्थ-यह समस्या पद है (पुन्नहिं लब्भइ एहु) पुण्यसे यह मिले है समस्या पद दियों के अनन्तर तत्काल सुर-
सुंदरी कन्या वोली अहो मैं इस समस्याको पूरी करूं आप सुनो कैसी सुरसुंदरी है अतिशय चपल याने चंचल है और
अत्यन्त गर्भसे गहली है ॥ ७२ ॥
यथा धनु जुवण सुवियड्ढपण, रोगरहिय नियदेहु । मणवल्लह मेलावडउ, पुन्नहिं लब्भइ एहु ॥ ७३ ॥
अर्थ-धन यौवन विचक्षणपना तथा रोगरहित अपना शरीर तथा मनोवल्लभ प्यारा जो पुरषादि उन्होंके साथ
सम्बन्ध ये वस्तुसमूह पुण्यसे मिले है ॥ ७३ ॥
तं सुणिय निवोतुट्ठो, पसंसए साहु साहु उवज्झाओ।जेणेसा सिक्खविया, परिसावि भणेइ सञ्चमिणं ७४
अर्थ-सुरसुंदरीका वचन सुनके राजा संतुष्टमान भए इस प्रकारसे प्रशंसा करते भए अहो इसका उपाध्याय पढ़ा-
नेवाला गुरू बहुत अच्छा है जिसने इस पुत्रीको ऐसी सिखाई पढ़ाई तव सभाके लोग बोले हे महाराज यह सत्य है
इसमें बिल्कुल झूठ नहीं है ।। ७४ ॥
तोरन्ना आइट्ठा, मयणा वि हु पूरए तं समस्सं । जिणवयणरया संता, दंता ससहावसारित्थं ॥७५॥
,
॥१०॥

,
अर्थ-तदनन्तर हपित भई धृष्टत्वयुक्त ऐसी तथा छोड़ी है लोकलाज जिसने ऐसी सुरसुंदरी बोली पिताके प्रसा-
दसे जो कोई प्रकारसे मुखसे मांगा हुआही मिले है ॥ ८३ ॥
ता सबकला कुसलो, तरुणो वररूव पुण्ण लावन्नो।एरिसओ होउ वरो,अहवाताओच्चिय पमाणं ॥४॥
अर्थ-तव सर्व कलामें कुशल चतुर और यौवन अवस्थामें रहा हुआ प्रधानरूप आकृतिसे पवित्र लावण्य सौंदर्य
जिसका ऐसा ये आगे रहा हुआ पुरुप भर्तार होओ अथवा पिता जो देवे वही वर प्रमाण है ॥ ८४ ॥
जेणं ताय तुमं चिय, सेवयजणमण समीहियत्थाणं। पूरणपवणो दीससि, पञ्चक्खो कप्प रुक्खुव ॥८५॥
अर्थ-अव सुरसुंदरी अपनी इष्टसिद्धि के लिए पिताकी स्तुति करे है हेपिताजी जिसकारणसे आपही सेवक
लोगोंके मनोवांछित कार्य करनेमें तत्पर दीखतेहो किसके सदृश साक्षात् कल्पवृक्षके सदृश ॥ ८५ ॥
तो तुट्ठो नरनाहो, दिविनिवेसेण नायतीइमणे।पभणेइ होउ वच्छे, एस अरिदमणो वरो तुझ ॥८६॥
अर्थ-तब राजा सुरसुंदरीका वचन सुननेसे संतुष्टमान भया और बोला, हेवत्से यह अरिदमन कुमार तेरा वर
होओ कैसा है राजा कुमरमें दृष्टि स्थापनेसे जाना है कुमरीका भन जिसने ॥ ८६ ॥
तोसयल सभालोओ, पभणइ नरनाह एस संजोगो । अइ सोहणोहिवल्ली, पूगतरूणं व निभंतं॥८७॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥ ११ ॥ तत्थथि महीपालो, कालो इव वेरियाण दमियारी। पइवरिसंसो गच्छइ, उज्जैणि निवस्स सेवाए॥७९॥ अर्थ-उस शंखपुरी नामा नगरीमें शत्रुओंके कालके जैसा दमितारी नामका राजा है वह राजा प्रतिवर्ष उज्जैनी नगरीके राजाकी सेवाके लिये आता है ॥ ७९ ॥ अन्नदिणे तप्पुत्तो, अरिदमणो नाम तारतारन्नो । संपत्तो पियठाणे, उज्जैणिं रायसेवाए ॥ ८॥ अर्थ-अन्य दिनमें दमितारी राजाका पुत्र अरिदमन कुमर राजाकी सेवाके वास्ते उज्जैनी आया कैसा है अरिदमन कुमर उद्भट तारुण्य यौवन है जिसका ॥८॥ तंच निवपणमणत्थं, समागयं तत्थ दिवरूवधरं। सुरसुंदरी निरिक्खइ, तिक्ख कडक्खेहिं ताडंति ॥८॥ अर्थ-उसवक्त राजाको नमस्कार करने के लिए सभामें आया दिव्यरूपधारनेवाला अद्भुत सौंदर्य है जिसका ऐसा अरिदमन कुमरको सुरसुंदरी राजकन्या तीखे कटाक्ष नेत्र प्रान्तभागोंसे ताड़ती देखे ॥ ८१ ॥ तत्थेव थिरनिवेलियदिट्ठी, दिवा निवेण सा वाला।अणियाय कहसु वच्छे, तुज्झवरो केरिसो होउ ॥८२॥ अर्थ -उस कुमरमें निश्चल स्थापित करी है दृष्टि जिसने ऐसी सुरसुंदरी कन्याको राजाने देखी और कहा हे वत्से कह तेरे कैसा भार होवे ॥ ८२ ॥ तोतीए हिट्ठाए, धिट्ठाए मुकलोयलज्जाए । भणियं तायपसाया, जइ लब्भइ मग्गियं कहवि ॥३॥ , , ॥११॥ , अर्थ-किस कारणसे सो कहते हैं जिस कारणसे कुलवालिका नाम सुकुलमें उत्पन्न भई कन्या ऐसा नहीं कहे मेरे यह भर्तार होवो जो निश्चय मातापिताका दिया वर होवे वही प्रमाण करना ॥ ९१ ॥ अम्मा पिउणोवि निमित्तमित्त, मेवेह वरपयामि । पायं पुत्वनिबद्धो, संबंधो होइ जीवाणं ॥ ९२ ॥ अर्थ-इस संसारमें कन्याओंके वरप्रदानमें माता पिताभी निमित्त मात्रही है परन्तु तात्विक कारण नहीं है प्रायै जिनोंने पूर्वभवमें जिसके साथ सम्बन्ध रचा हो उसकेही साथ यहां सम्बन्ध होवे है ॥ ९२ ॥ जंजेण जया जारिसमुवज्जियं होइ कम्म सुहमसुहं । तं तारिसं तया से, संपज्जइ दोरियनिबद्धं ॥ ९३॥ अर्थ-जो जिस प्राणिने जिस कालमें जैसा शुभाशुभ कर्म उपार्जन किया होवे उस प्राणिके उस कालमें अर्थात् उदयकालमें वैसाही कर्म उदय आता है कैसा वह डोरीसे बंधाहोय वैसा ॥ ९३ ॥ जाकन्ना बहुपुन्ना, दिन्ना कुकुलेवि सा हवइ सुहिया।जा होइ हीणपुन्ना, सुकुले दिन्नावि सा दुहिया ९४ अर्थ-जो कन्या वहुत पुण्यवाली होवे वह कुत्सित कुलमें अर्थात् दरियादिकुलमें दी भई सुखिनी होवे है और जो हीनपुण्यनी होवे वह अच्छे कुलमें दी भई दुःखी होवे है ॥ ९४ ॥ ताताय नायतत्तस्स, तुज्झ नो जुज्झए इमोगहो । जंमज्झकयपसाया,पसायओ सुहदुहे लोए ॥९५॥ अर्थ-इस कारणसे हे पिताजी ! तत्वके जाननेवाले आप हो आपको ऐसा गर्व करना युक्त नहीं है जो मेरा किया , , धापा.च.३ 15

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१२॥
अर्थ-उसके अनन्तर सम्पूर्ण सभाके लोग वोले हे महाराज यह इन्होंका संयोग निःसंदेह अत्यन्त शोभनीय
भया है किसके जैसा नागरवेल और सुपारीके वृक्ष जैसा जैसे नागरवेल सुपारीका संयोग है वैसा इन्होका
भी संयोग शोभन है ॥ ८७ ॥
अह मयणसुंदरी विहु, रन्ना नेहेण पुच्छिया वच्छे। केरिसओ तुझवरो, कीरउ मह कहसु अविलंबं ॥८॥
अर्थ-अथ नाम सुरसुंदरीके वर प्राप्तिके अनन्तर राजाने मदनसुंदरीसेभी स्नेहसे पूछा हे पुत्रि तेंभिकहै तेरे कैसा
भार मैं करूं मेरे आगे विलंबरहित जैसा होवे वैसा कहो ॥ ८८ ॥
सा पुण जिणवयणवियारसार, संजणिय निम्मल विवेया।लज्जा गुणिकसज्जा, अहोमुही जा न जंपेइ ८९
अर्थ-जिन वचनोंके विचारसारसे उत्पन्न भया है निर्मल विवेक जिसको ऐसी इसवास्ते लजा गुणोंमें एक सज्ज
नाम तत्पर ऐसी मदनसुंदरी नींचा किया है मुख जिसने ऐसी जितने नहीं बोले ॥ ८९ ॥
ताव नरिदेण पुणो, पुट्ठा साभणइ ईसिहसिऊणं। ताय विवेय समेओ, संपुच्छसि तंसि किमजुत्तं ॥९०॥
अर्थ-उतने राजाने और पूछा तव मदनसुंदरी थोड़ी हसके राजासे कहने लगी हे पिताजी आप विवेकसहित हो
यह अयुक्त मेरेसें क्या पूछो हो विवेकयुक्त आपको मेरेको यह पूछना अयुक्त है यह भाव है ॥ ९० ॥
जेण कुल बालियाओ, नकहति हवेउ एस मज्झ वरो।जोकिर पिऊहिं दिनो, सो चेव पमाणयबुत्ति ९१
॥ १२॥

यह , अर्थ-किस कारणसे सो कहते हैं जिस कारणसे कुलवालिका नाम सुकुलमें उत्पन्न भई कन्या ऐसा नहीं कहे मेरे भर्तार होवो जो निश्चय मातापिताका दिया वर होवे वही प्रमाण करना ॥ ९१ ॥ अम्मा पिउणोवि निमित्तमित्त, मेवेह वरपयाणमि । पायं पुवनिबद्धो, संबंधो होइ जीवाणं ॥ ९२ ॥ अर्थ-इस संसारमें कन्याओंके वरप्रदानमें माता पिताभी निमित्त मात्रही है परन्तु तात्विक कारण नहीं है प्रायै जिनोंने पूर्वभवमें जिसके साथ सम्बन्ध रचा हो उसकेही साथ यहां सम्बन्ध होवे है ॥ ९२ ॥ जंजेण जया जारिसमुवजियं होइ कम्म सुहमसुहं । तं तारिसं तया से, संपज्जइ दोरियनिबद्धं ॥ ९३ ॥ अर्थ-जो जिस प्राणिने जिस कालमें जैसा शुभाशुभ कर्म उपार्जन किया होवे उस प्राणिके उस कालमें अर्थात् उदयकालमें वैसाही कर्म उदय आता है कैसा वह डोरीसे बंधाहोय वैसा ॥ ९३ ॥ जाकन्ना वहुपुन्ना, दिन्ना कुकुलेवि सा हवइ सुहिया।जा होइ हीणपुन्ना, सुकुले दिन्नावि सा दुहिया ९४ अर्थ-जो कन्या बहुत पुण्यवाली होवे वह कुत्सित कुलमें अर्थात् दरियादिकुलमें दी भई सुखिनी होवे है और जो हीनपुण्यनी होवे वह अच्छे कुलमें दी भई दुःखी होवे है ॥ ९४ ॥ ताताय नायतत्तस्त, तुज्झ नो जुज्झए इमोगबो। मज्झकयपसाया,पसायओ सुहदुहे लोए ॥९५॥ अर्थ-इस कारणसे हे पिताजी ! तत्वके जाननेवाले आप हो आपको ऐसा गर्व करना युक्त नहीं है जो मेरा किया धापा.च.३

श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका-
सहितम्.
॥ १३॥
,
हुआ प्रसाद अप्रसादसे लोकमें सुख दुःख होवे है मेरे किए हुए प्रसादसे सुख और अप्रसादसें दुःख यह गर्व आपको
करना उचित नहीं ॥ ९५ ॥
जो होइ पुन्न बलिओ, तस्स तुमंताय लहु पसीएसि।जो पुण पुन्नविहूणो, तस्स तुमं नो पसीएसि ॥१६॥
अर्थ-जो पुरुष पुण्यसे बलवान होवे उसपर आप जल्दी प्रसन्न होवो हो और पुण्यहीन होवे है उसपर आप नहीं
प्रसन्न होवो हो ॥ ९६ ॥
भवियत्वया १ सहावो, २ दवाईया सहाइणो वावि । पायं पुबोवजियकम्माणुगया फलं दिति ॥९७॥
अर्थ-भवितव्यता १ स्वभाव २ और द्रव्य १ क्षेत्र २ काल ३ भाव ४ इत्यादिक सहाय करनेवालाभी बहुलता
करके पूर्व भवमें उपार्जन किया कर्मों के अनुगत उन्होंसे मिला हुआही फल देते हैं उन्होंसे अलग नहीं ॥ ९७ ॥
तो दुम्मिओ य राया, भणेइ रे तं सि महपसाएण। बत्थालंकाराई, पहिरंती कीसिमं भणसि ॥९८॥
अर्थ-उसके अनन्तर राजा मनमें उदास हुआ पुत्रीसे कहे अरे तैं मेरे प्रसादसे वस्त्र अलंकारादि नानाप्रकारका
अद्भुत नैपत्थ भूषणादि पहरती है और पूर्वोक्त कैसा कहती है ॥ ९८ ॥
हसिऊण भणइ मयणा, कयसुकयवसेण तुज्झ गेहमि । उप्पन्ना ताय!अहं, तेणंमाणेमि सुक्खाई ॥१९॥
॥ १३ ॥

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अर्थ-तब मदनसुंदरी हसके कहे हे पिताजी! पूर्व भवमें किया सुकृतके वशसे मैं तुझारे घरमें उत्पन्न भई हूं और
मुख भोगवती हूं ।। ९९ ॥
पुवकयं मुकयं चिय, जीवाणं सुक्खकारणं होइ। दुकयं च कयं दुक्खाण, कारणं होइ निभंतं॥१०॥
अर्थ-हे पिताजी ! जीवोंके पूर्वभवमें उपार्जन किया सुकृत पुण्यही सुखका कारण होवे है और पूर्वभवमें किया
हुआ पापही दुःखोका कारण होता है ॥ १० ॥
न सुरासुरेहि नो नरवरेहि, नो वुद्धिवलसमिद्धेहिं । कहवि खलिज्जइ इंतो, सुहासुहो कम्मपरिणामो ॥१॥
अर्थ-उदय आता हुआ शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कोई प्रकारसे देव दानव नहीं दूर करसकते हैं और राजाभी
नहीं हटा सकते हैं बुद्धिवल समृद्धभी दूर नहीं कर सकते हैं ॥१॥
तो रुट्टो नरनाहो, अहो अहो अप्पपुनिया एसा । मज्झकयं किंपि गुणं, नो मन्नइ दुवियडा य ॥२॥
अर्ध-मदनसुंदरीका वचन सुनके वाद राजा क्रोधातुर भया और इस प्रकारसे वोला अहो अहो लोगो
यह कन्या अल्पपुण्यवाली है दुर्विदग्धा याने चातुर्यरहित है इसी कारणसे मेरा किया हुआ गुण कुछभी नहीं
मानती है ।। २॥
पभणेइ सहालोओ, सामिय! किमियं मुणेइ मुद्धमई । तं चेव कप्परुक्खो, तुट्ठो रुट्टो कयंतोय ॥३॥

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श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥ १४ ॥
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अर्थ-बाद सभाके लोग कहे हे स्वामिन् ! यह बाला मुग्धमती भोली है क्या जाने आप संतुष्ट भए वांछित फल
देनेसे कल्पवृक्षके जैसे हो और क्रोधातुर भए यमराजके तुल्य हो शीघ्र निग्रह करनेसे ॥३॥
मयणा भणेइ धिद्धी, धणलवमित्तत्थिणो इमे सवे । जाणंतावि हु अलियं, मुहप्पियं चेव पंति ॥४॥
अर्थ-यह सभाके लोगोंका वचन सुनके मदनसुंदरी बोली इन सभाके लोगोंको धिक्कार होवो धनका लवमात्रकी
अभिलाषा करते हुए जानतेभी मिथ्या वचन मुखप्रिय बोलते हैं ॥ ४ ॥
जइ ताय! तुह पसाया, सेवयलोया हवंति सवेवि।सुहिया ता समसेवा, निरया किं दुक्खिया एगे॥५॥
अर्थ-हे पिताजी! जो आपके प्रसादसे सर्व सेवक लोग सुखी होते हैं तब तुल्य सेवामें तत्पर ऐसे कितनेक सेवक
लोग दुःखी कैसे सब सुखीही होना चाहिये ॥५॥
तम्हा जे तुम्हाणं, रुन्चइ सो ताय मज्झ होउ वरो। जइ अस्थि मज्झ पुन्नं, ता होही निग्गुणोवि गुणी ॥६॥
अर्थ-तिस कारणसे हे पिताजी ! जो आपको रुचे वह मेरा वरहोओ जो मेरे पुण्य है तो आपका दिया हुआ
वर निर्गुणीभी गुणवान् होगा ॥ ६॥
जइ पुण पुन्नविहीणा, ताय ! अहं ताव सुंदरोवि वरो। होही असुंदरुच्चिय, नूणं मह कम्मदोसेणं ॥७॥
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।
॥ १४॥

अर्थ-और हे पिताजी ! जो मैं पुण्यविहीनहूं तो आपका दिया भया सुंदर वरभी निश्चय मेरे कर्मदोषसे असुंदरही
होगा ॥७॥
तो गाढयरं राया, रुट्ठो चिंतेइ दुवियद्वाए । एयाइ कओ लहुओ, अहं तओ वैरिणी एसा ॥ ८॥
अर्थ-तदनंतर राजा अत्यर्थ नाराज हुआ विचारे क्या विचारे सो कहते हैं अज्ञानवती इस पुत्रीने मेरेको हलका
किया इस कारणसे यह मेरी वैरिणी है पुत्री नहीं है ॥ ८॥
रोसेण विवडभिउडी,भीसणवयणं पलोविऊणनि । दक्खो भणेइ मंती, सामिय रइवाडिया समओ ९
अर्ध-क्रोधसे विकरालचकुटीसे भयानक मुखजिसका ऐसे राजाको देखके अवसरका जाननेवाला चतुर मंत्री
कहे हे स्वामिन् ! राजवाड़ीका समय है अर्थात् वगीचे जानेका वक्त है ॥ ९ ॥
रोसेण धमधमंतो, नरनाहो तुरयरयणमारूढो । सामंतमंतिसहिओ, विणिग्गओ रायवाडीए ॥१०॥
अर्थ-तव रोपसे धमधमा हुआ राजा घोड़ेपर सवार होके मंत्री सामंतोंसें परिवरा हुआ राजवाड़ी चला ॥ १०
जाव पुराओ वाहि, निग्गच्छइ नरवरो सपरिवारो। ता पुरओ जणवंदं, पिच्छइ साडंवरमियंतं ॥११॥
अर्ध-जितने राजा परिवार सहित नगरसे बाहिर निकले उतने आगे आडवर सहित मनुष्योंका समूह आता हुआ
देखे ॥ ११॥

श्रीपाल-
चरितम्
,
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१५॥
तो विम्हिएण रन्ना, पुट्ठो मंती सनायवुत्तंतो। विन्नवइ देव! निसुणह, कहेमि जणवंद परमत्थं ॥ १२॥
अर्थ-बाद जाना है वृत्तान्त जिसने ऐसा मंत्रीको आश्चर्ययुक्त राजाने पूछा तव मंत्रीने विनती करी हे देव !
हे महाराज ! ये मनुष्योंके समूहका परमार्थ मैं कहूं आप सुनो ॥ १२ ॥
सामिय! सरूवपुरिसा, सत्तसया नववया ससौंडीरा । दुट्ठकुट्ठाभिभूया, सवे एगत्थ संमिलिया ॥१३॥
अर्थ-हे स्वामिन् ! सातसै पुरुष नवीन यौवन अवस्था जिन्होंकी अर्थात् जवान पराक्रमसहित ऐसे दुष्टकोढ़रोगसे
पीड़ित ये सब इकट्ठे मिले हैं ॥ १३ ॥
एगो य ताण बालो, मिलिओ उंबरवाहिगहियंगो। सो तेहिं परिग्गहिओ, उंबरराणुत्ति कयनामो॥१४॥
अर्थ-और उन कुष्ठी पुरुषोंकों एक वालक ? मिला है कैसा है वालक उम्बर व्याधि कुष्ठ रोग विशेषसे गृहीत है
अंग जिसका ऐसे बालकको कुष्ठी पुरुषोंने उम्बरराणा ऐसा नाम करके अपना स्वामी किया है ॥ १४ ॥
वरवेसरिमारूठो, तयदोसी छत्तधारओ तस्स।गयनासा चमरधरा, घिणि २ सद्दा य अग्गपहा ॥१५॥
अर्थ-वह बालक प्रधान खच्चरनी पर चढ़ा हुआ है श्वेतकुष्ठी पुरुष उम्बरराणेके छनधारक है गतनासा पुरुष
चामर धारणेवाले है रोगके वशसे घिण २ ऐसा है शब्द जिन्होंका ऐसे मनुष्य उसके आगे चलनेवाले हैं ॥ १५॥
॥ १५॥

गयकन्ना घंटकरा, मंडलवइ अंगरक्खगा तस्स । दुल थईयाइतो, गलियंगुलि नामओ मंती ॥१६॥
अर्थ-गट गए हैं कान जिन्होंके ऐसे पुरुष घंटा बजानेवाले है रक्त मंडल रोगवाले पुरुप उम्बरराणेके अंगरक्षक
है दादके रोगवाले पुरुप ताम्बूल धारनेवाले हैं और गलितअंगुलि नामका मंत्री है ॥ १६ ॥
केवि पसूइयवाया, कच्छा दद्दे (भे)हिं केवि विकराला। केवि विउंचियपामा, समनिया सेवगा तस्स १७
अर्थ-उस उम्बर राजाके कितनेक सेवक वातरोग युक्त हैं और कितनेक सेवकोंकी कक्षा दादोंसे विकराल है
फितनेक पामसहित है विचचिंका जातिकी पाम उस करके सहित है ॥ १७ ॥
एवं सो कुट्टियपेडएण, परिवेढिओ महीवीढे । रायकुलेसु भमंतो, मुहमग्गियदाणं पगिन्हेइ ॥१८॥
अर्थ-इस प्रकारसे वह उम्बर राजा कोड़ियोंके समूहसे चौतर्फसे परिवरा हुआ पृथ्वीतलपर फिरता हुआ राजा
लोगोंके घरोंम मुखमार्गित दान लेता है ॥ १८ ॥
सो एसो आगच्छइ, नरवर ! आडंवरेण संजुत्तो । तामग्गमिणं मुत्तुं, गच्छह अन्नं दिसं तुम्भे ॥१९॥
अर्थ-हे महाराज ! वह यह उम्बर राजा आडवर सहित आता है इस लिए इस मार्गको छोड़के और दिशि तरफ,
आप चलें ॥ १९ ॥
तो बलिओ नरनाहो, अन्नाइ दिसाइ जाव ताव पुरो। तं पेडयंपि तीए, दिसाइ वलियं तुरियं तुरिय॥२०॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१६॥
अर्थ-तदनंतर राजा जितने और दिशि तरफ चले उतने आगे कोढ़ियोंका पेड़ाभी जल्दी २ उसी दिशातरफ
पलटा ॥ २० ॥
राया भणेइ मंति, पुरओ गंतूणिमे निवारेसु । मुहमग्गियंपि दाउं, जेणेसिं दसणं न सुहं ॥ २१ ॥
अर्थ-तब राजा मंत्रीसे कहे तुम आगे जाके इन्होको हटाव जो मांगे सो देके इस कारणसे इन कोढ़ियोंका दर्शन
अच्छा नहीं है ॥२१॥
जा तं करेइ मंती, गलियंगुलिनामओ दुयं ताव । नरवर पुरओ ठाउं, एवं भणिउं समाढत्तो ॥ २२ ॥
अर्थ-जितने राजाका बचन मंत्री करे उतने गलितांगुलि नामका मंत्री शीघ्र राजाके आगे आके खड़ा रहके इस
प्रकारसे कहना शुरू किया ॥ २२ ॥
सामिय! अम्हाण पहू, उंबरनामेण राणओ एसो। सवत्थवि मन्निजइ, गुरुएहिं दाणमाणेहिं ॥२३॥
अर्थ-हे स्वामिन् ! यह हमारा स्वामी उम्बर राजा सब ठिकाने बहुत दानमानसे माना जावे है राजादिक लोग
सत्कार करे है ॥ २३ ॥
तेणऽम्हाणं धण कणय,चीरपमुहेहिं कीरइ न किंपि। एयस्स पसाएणं, अम्हे सवेवि अइसुहिणो ॥२४॥
॥ १६ ॥

अर्थ-इस कारणसे हमारे धन, स्वर्ण वस्त्रादिकसे कुछभी कार्य नहीं है इस उम्बर राजाके प्रसादसे हम सब अतिशय सुर्खा है ॥ २४ ॥ किंच। एगो नाह!समस्थि, अम्ह मणचिंतिओ वियप्पुत्ति।जइ लहइराणओराणियंति ता सुंदरंहोइ २५ अर्थ-परंतु हे नाथ एक हमारे मनमें मनोरथ है जो हमारा राजा अपने योग्य रानी पावे तव शोभन होवे ॥२५॥ ना नरनाह ! पसायं, काऊणं देहि कन्नगं एगं । अवरेणं कणगकप्पड, दाणेणं तुम्ह पज्जत्तं ॥ २६ ॥ अर्थ-इस कारणसे हे महाराज! प्रसन्न होके एक कन्या देवो और सोना वस्त्र वगैरह देनेसे सरा और पदार्थसे हमारे कार्य नहीं है ॥ २६ ॥ तो भणइ रायमंती, अहो अजुत्तं विमग्गि अंतुमए। को देइ नियं धूयं, कुट्ठकिलिट्ठस्स जाणंतो ॥२७॥ अर्थ-तव राजाका मंत्री कहे अहो तुमने अयुक्त मांगा कोढ़ रोगसे क्लेशयुक्त पुरुपको जानता भया कोन पुरुप अपनी पुत्री देवे अपि तु कोई नहीं देवे ॥ २७ ॥ गलियंगुलिणाभणिय,अम्हेहिं सुया निवस्सिमा कित्ती। किरमालवराया, करेइ नो पत्थणाभंगं ॥२८॥ अर्ध-यह राजाके मंत्रवीका वचन सुनके गलितांगुल मंत्रीने कहा हमने राजाकी ऐसी कीर्ति सुनीथी कि माल- चदेशका राजा किसी की भी प्रार्थनाका भंग नहीं करे है जो कोईभी वस्तु मागे उसको देता है ॥ २८ ॥ . ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१७॥
,
,
तोसा निम्मलकित्ती, हारिजउ अज नरवरिंदस्स। अहवा दिजउ काविहु, धूया कुकुले वि संभूया ॥२९॥
अर्थ-तिस कारणसे हम यहां आए हैं परन्तु आज राजाकी निर्मल कीर्ति हारीजावे है अथवा कुत्सितकुलमें
उत्पन्न भईभी कोई कन्या देओ तब कीर्ति बनी रहेगी ॥ २९ ॥
पभणेइ नरवरिंदो, दाहिस्सइ तुम्ह कन्नगा एगा। कोकिर हारइ कित्ति, इत्तियमित्तेण कज्जेण ॥३०॥
अर्थ-तब राजा कहे तुमको एक कन्या हम देवेंगे निश्चय इतने कार्यके वास्ते बहुत प्रयत्नसे कीर्ति उत्पन्न करी
जावे है सो कौन हारे ॥ ३० ॥
चिंतेइ मणे राया, कोवानलजलियनिम्मलविवेगो । नियधूयं अरिभूयं, तं दाहिस्सामि एयस्स ॥३१॥
अर्थ-क्रोधाग्निसे जला है निर्मलविवेक जिसका ऐसा राजा विचारे क्या विचारे सो कहते हैं मैं शत्रुके जैसी
अपनी कन्याको इस कोढ़ियेको दूंगा ॥ ३१ ॥
सहसा बलिऊण तओ, नियआवासंमि आगओ राया। बुल्लावइ तं मयणा, सुंदरिनामं नियं धूयं ॥३२॥
अर्थ-अकस्मात् उसी ठिकानेसे पीछा पलटके राजा अपने प्रासादमें आके मदनसुंदरी अपनी पुत्रीको बुलाके ॥३२॥
हुंअज्जवि जइ मन्नसि, मज्झपसायस्स संभवं सुक्खं । ता उत्तमं वरंते, परिणाविय देमि भूरिधणं ॥३३॥
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॥ १७॥

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अर्थ-क्या कहे सो कहते हैं हं यह अनादरमें है अनादरसे राजा वोले अरे तैं अवीभी जो मेरे प्रसादसे उत्पन्न
भया मुख मानती है तो में तेरेको उत्तम वर परणाके बहुत धन देऊं ॥ ३३ ॥
जइ पुण नियकम्मं चिय, मन्नसि ता तुज्झ कम्मुणाणीओ। एसो कुट्ठियराणो,होउ वरो किं वियप्पेण ३४
अर्थ-जो फिर अपने कर्महीको ते मानती है तो तेरा कर्मोंने लाया हुआ यह कुष्ठी तेरा वरराज होवो यहां विचा-
रका कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ३४ ॥
हसिऊण भणइ वाला, आणीओ सज्झकम्मणा जो उ।सो चेव मह पमाणं, राओ वा रंकजाओ वा ॥३५॥
अर्थ-यह राजाका वचन सुनके मदनसुंदरी वाला हसके कहे जो मेरा कर्म लाया है वही वर मेरे प्रमाण है राजा
होये या रंकका पुत्र होवे ।। ३५ ।।
कोवंधेणं रन्ना, सो उंवरराणओ समाहूओ। भणिओ य तुममिमीए, कम्माणीओसि होसु वरो ॥३६॥
अर्थ-यह कन्याका वचन सुनके क्रोधान्ध राजाने उम्बर राजको अपने पासमें बुलाया और कहा क्या कहा सो
करते है तुमको इस कन्याके कर्म लाए हैं इस लिए इसका भर्तार होवो ॥ ३६ ॥
तेणुत्तं नो जुत्तं, नरवर! वुत्तुं पि तुज्झ इय वयणं । को कणयरयणमालं, बंधइ कागस्स कंठमि ॥३७॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१८॥
अर्थ-यह राजाका बचन सुनके उम्बर राजा बोला हे महाराज! आपको ऐसा बचन कहनाभी युक्त नहीं है काग
निंदनीय पक्षीके कंठमें सोनेरत्नकी माला कौन पहरावे अर्थात् मैं कागके तुल्य हूं और कन्या सोनेरत्नकी मालाके
सदृश है ॥ ३७॥
एगमहं पुवकयं, कम्मं भुंजेमि एरिसमणझं । अवरं च कहमिमीए, जम्मं बोलेमि जाणतो ॥३८॥
अर्थ हे महाराज ! एकतो मैं ऐसा अनार्य पूर्वभवमें कर्म किया सो भोगवता हूं और जानता भया इस उत्तम
कन्याका जन्म कैसे डुबोऊं मेरेको यह कार्य करना युक्त नहीं है ॥ ३८ ॥
ताभो नरवर! जइ देसि, कावि ता देसु मज्झ अणुरूवं । दासिविलासिणिधूयं, नोवा ते होउ कल्लाणं ३९
अर्थ-इस कारणसे हे राजन् ! जो कोई भी कन्या देते हो तो मेरे योग्य दासी विलासिनीकी पुत्री देवो अथवा ऐसी
कोई न होवे तो तुम्हारे कल्याण होवो मेरे इस कार्यसे सरा ॥ ३९ ॥
तो भणइ नरवरिंदो, भो भो महनंदिणी इमा किंपि। नो मज्झकयं मन्नइ, नियकम्मं चेव मन्नेइ ॥४०॥
अर्थ-तब राजा बोले भो भो उम्बरराज ! यह मेरी पुत्री मेरा किया हुआ उपकार कुछभी नहीं मानती है केवल
अपने कर्महीको प्रमाण करती है ॥ ४० ॥
तेणं चिय कम्मेणं, आणीओ तंसि चेव जीइ वरो। जइ सा नियकम्मफलं, पावइ ता अम्ह को दोसो ४१
॥ १८ ॥

अर्थ-उसीही कर्मने इनका भार होनेको तुमको यहां प्राप्त किया है जो यह मेरी पुत्री अपने कर्मका फल पावे तो हमारा क्या दोप है ॥४१॥ तं सोऊणं वाला, उद्वित्ता झत्ति उंवरस्स करं । गिन्हइ निययकरेणं, विवाहलग्गं व साहंती ॥४२॥ अर्थ-यह राजाका वचन सुनके मदनसुंदरी कन्या उम्बर राजाका हाथ शीघ्र अपने हाथसे ग्रहण करे क्या करती होवे जैसी मानो विवाह लग्न साधती होवे वैसी ॥ ४२ ॥ सामंतमंतिअंतेउरीउ, वारंति तहवि सा वाला। सरयससिसरिसवयणा, भणइ एसुच्चिय पमाणं ॥४३॥ अर्थ-सामंत मंत्री लोग और अंतेवरकी स्त्रियां मना करे हैं तौभी शरद ऋतुके चंद्रके जैसा है मुख जिसका ऐसी मदनसुंदरी मेरे यही वर प्रमाण है औरसे कार्य नहीं है ऐसा वोली ॥ ४३ ॥ एगत्तो माउलओ, एगत्तो रुप्यसुंदरी माया । एगत्तो परिवारो, रुयइ अहो केरिसमजुत्तं ॥ ४४ ॥ अर्थ-उस अवसरमें एकदिशिमें मदनसुंदरीका मामा पुण्यपाल रोवे एकदिशिमें मदनसुंदरीकी माता रूपसुंदरी रानी रोवे एक तरफ़ उन्होंके परिवार के लोग रोवे अहो यह कैसा अयुक्त कार्य हुआ ऐसा विचारते भए ॥ ४४ ॥ तहवि न नियकोवाओ,वलेइ राया अईव कठिणमणो।मयणावि मुणियतत्ता,निय सत्ताओ न पचलेइ ४५ धापा.च.४

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१९॥
अर्थ-तथापि राजा अपने क्रोधसे नहीं निवर्त होवे है कैसा है राजा अत्यन्त कठोर है मन जिसका मदनसुंदरीभी
अपने सत्वसे धैर्यसे नहीं चले कैसी है मदनसुंदरी तत्त्वकी जाननेवाली हैं ॥ ४५ ॥
तं वेसरिमारोविय, जा चलिओ उंवरो नियय ठाणं। ता भणइ नयरलोओ,अहो अजुत्तं अजुत्तंति ॥४६॥
अर्थ-तदनंतर उम्बर राणा उस कुमरीको खचरनीपर चढ़ाके वहांसे अपने स्थान चला उस समय नगरके लोग
इस प्रकारसे बोले अहो यह कार्य अयुक्त भया अयुक्त भया ॥ ४६ ॥
एगे भणंति धिद्धी, रायाणं जेणिमंकयमजुत्तं । अन्ने भणंति घिद्धी, एयंअइदुविणीयंति ॥४७॥
अर्थ-उस अवसर कई लोग कहे राजाको धिक्कार होवो धिक्कार होवो जिस कारणसे राजाने यह अयुक्तकार्य
किया और लोग ऐसे बोले इस दुविनीत कन्याको धिक्कार होवो जिसने पिताके बचन नहीं अंगीकार किए॥४७॥
केवि निंदंति जणणिं, तीए निंदंति केवि उवज्झायं । केवि निंदंति दिवं, जिणधम्म केवि निंदंति ॥४८॥
अर्थ-और उस वक्तमें कईक लोग कन्याकी माताकी निंदा करे इसकी माताने सिखावन अच्छी नहीं दियी और
कईक लोग उपाध्यायकी निंदा करे अच्छी पढ़ाई नहीं कितने लोग कहें इसका भाग्यही ऐसा है और कितनेक जैन
धर्मकी निंदा करें जैनी कर्महीं कुंमानते हैं ॥४८॥
तहवि हु वियसियवयणा, मयणा तेणुंवरेण सह जंती। नकुणइ मणेविसायं, सम्मं धम्मं वियाणंती ॥४९॥
॥ १९॥

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अर्थ-तथापि निश्चय है मनमें जिसके ऐसी मदनसुंदरी कन्या उम्बर राजाके साथ जाती भई विकस्वर मान है
मुख जिसका ऐसी मनमें दुःख नहीं करे कैसी है मयना सुंदरी सम्यक् धर्मको जाननेवाली है इससे ॥ ४९ ॥
उंवरपरिवारेणं, मिलिएणं हरिसनिभरंगेणं । नियपहुणो भत्तेणं, विवाहकिच्चाइं विहियाइं ॥ ५० ॥
अर्थ-बाद इकट्ठा हुआ उम्बरका परिवारने विवाह कार्य किए कैसा है उम्बरका परिवार हर्पसे भरा है अंग
जिन्होंका और अपने स्वामीका भक्त है ॥ ५० ॥
इतो रन्ना सुरसुंदरीइ, वीवाहणत्थमुवज्झाओ। पुट्ठो सोहणलग्गं, सोपभणइ राय ! निसुणेसु ॥५१॥
अर्थ-धरसे राजाने सुरसुंदरी कन्याका विवाह करने के लिए उपाध्यायको सम्यक् लग्न पूछा तव उपाध्याय वोला
हे महाराज आप मुनो ।। ५१ ॥
अजं चिय दिणसुद्धी, अत्थि परंसोहणं गयंलग्गं । तइया जइया मयणाइ, तीय कुट्ठियकरो गहिओ ५२
अर्थ-आजही दिनशुद्धि है यह सम्पूर्ण दिन शुद्ध है परंतु केवल शोभन लग्न तो तव गया जव मदनसुंदरीने
कोढ़ी उम्बर राणेका कर ग्रहण किया ॥ ५२ ॥
राया भणे. हुंडं, नाओ लग्गस्स तस्स परमत्थो । अहुणाविहु नियधूयं, एयं परिणावइस्सामि ॥५३॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२०॥
-
अर्थ-हुं हुं यह अनादरमें है राजा अनादरसे बोले उस लग्नका परमार्थ जाना जिससे उसने कोढीको परणा मैं
इसी वक्तमेंही अपनी पुत्रीका पाणिग्रहण कराउंगा ॥ ५३॥
रायाएसेण तओ, खणमित्तेणावि विहियसामग्गिं । मंतीहि पहिढेहि, विवाहपत्वं समाढत्तं ॥ ५४॥
अर्थ-तदनंतर राजाकी आज्ञासे हर्षित मंत्री अमात्योंने विवाह उत्सव प्रारंभ किया कैसा विवाह पर्व क्षणमात्रमें
करीगई है सामग्री जिसकी ॥ ५४ ॥
तं च केरिसं उसियतोरणपयडपडायं, वज्झिरतूरगहीरनिनायं ।
नचिरचारुविलासिणिघ, जयजयसद्दकरंतसुभद्रं ॥ ५५ ॥
अर्थ-वह विवाह पर्व कैसा है सो कहते हैं ऊचे किए हुए तोरणोंपर ध्वजाएं वाधी गई जिसमें और बहुत प्रका-
रके वादिन वाजते हैं उन्होंका गंभीर ध्वनि है जिसमें और नाटक करती भई मनोज्ञ वेश्यादिकका समुदाय है जिसमें
और भट्ट लोग जय २ शब्द करे है जिसमें ऐसा ॥ ५५ ॥
पसुयघडओलिजमालं, कूरकपूरतंबोलविसालं ।
धवलदियंतसुवासिणिवग्गं, वुड्डपुरंधिकहियविहिमग्गं ॥ ५६ ॥
॥ २०॥

,
अर्थ-तथा नानाप्रकारके वर्णवाले उत्तम वस्त्रोंसे रचा है मंडप जिसमें तथा कूरादि नाम मिष्टान्नादि भोजनके
उपर कपूर कस्तूरी सहित ताम्बूल दियाजाय जिसमें और सुवासिनी और वहुवां धवल मंगल गावें हैं जिसमें तथा
वृद्धा पुत्र दोहिता दोहितियोंका परिवारवाली सधवस्त्रियोंने विवाहका विधिमार्ग कहा है जिसमें ॥५६॥
मग्गणजणदिजंतसुदाणं, सयणसुवासिणिकयसम्माणं ।
मद्दलवायचउप्फललोयं, जणजणवयमणिजणियपमोयं ॥ ५७ ॥
अर्थ-तथा याचक लोगोंको शोभन दान दिया जावे जिसमें और अपने सम्बन्धी लोग और सुवासिनियोंका सन्मान
बहुमान किया है जिसमें मृदंगोंका बजाना उससे बहुत लोग इकट्ठे हुए है जिसमें नगरके लोग और देशके लोगोंके
मनमें किया है प्रमोद हर्प जिसमें ऐसा ।। ५७ ॥
कारियसुरसुंदरिसिणगारं, सिंगारियअरिदमणकुमारं ।
हथलेवइमंडलविहिचंगं, करमोयणकरिदाणसुरंग ॥ ५८ ॥
अर्ध-तथा सुरसुंदरी कन्याको श्रृंगार कराया है जिसमें और अरिदमन कुमरको वस्त्र भूपणोंसे अलंकृत किया है
जिसमें और पाणिग्रहणके समयमें ब्राह्मण करके किया जाय मंडलविधि लोक प्रसिद्ध उस करके रमणीक तथा करमो-
चन समयमें राजाने हाथी घोड़े वगेरेह दान दिया उस करके सुंदर ॥ ५८ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥ २१॥
,
एवं विहियविवाहो, अरिदमणो लद्धहयगयसणाहो । सुरसुंदरीसमेओ, जा निगच्छइ पुरवरीओ ॥५९॥
अर्थ-उक्त प्रकारसे किया है विवाह जिसका और पाया है घोड़ा हाथी उन्हों करके सहित और सुरसुंदरी अपनी
स्त्री समेत हाथीपर सवार होके अरिदमन कुमर जितने उज्जैनीसे निकले अर्थात् रवाने होवे ॥ ५९ ॥
ता भणइ सयललोओ, अहोणुरूवो इमाणसंजोगो। धन्ना एसा सुरसुंदरी य, जीए वरो एसो ॥६०॥
अर्थ-उतने सर्व नगरके लोग याने बहुतसे लोग कहे अहो यह आश्चर्य है इन कुमार कन्याका अनुरूप योग्य
सम्बन्ध भया है यह सुरसुंदरी कन्या धन्य है जिसका यह अरिदमन कुमर भर्तार हुआ ॥ ६० ॥
केवि पसंसंति निवं, केविवरं केवि सुंदरिंकन्नं । केवि तिए उवज्झायं, केवि पसंसंति सिवधम्मं ॥६१॥
अर्थ-और उस अवसरमें कईक लोग राजाकी प्रशंसा करे कितनेक लोग कुमरकी प्रशंसा करे कईक लोग सुरसुं-
दरी कन्याकी शोभा करे कितनेक लोग कन्याकी माताकी और उपाध्यायकी प्रशंसा करे कईक लोग शिवधर्मकी
प्रशंसा करे ॥ ६१॥
सुरसुंदरि सम्माणं, मयणाइ विडंबणं जणोदटुं। सिवसासणप्पसंसं, जिणसासणनिंदणं कुणइ ॥६॥
अर्थ-उस अवसरमें सुरसुंदरी राजकन्याका सन्मान सत्कार देखके और मदनसुंदरीकी विडंबना देखके बहिर्दृष्टि
लोग जैसे होय वैसा शिवशासनकी प्रशंसा और जैनशासनकी निंदा करे ॥ ६२॥
॥ २१॥

SAPos
इओय नियपेडयस्स मज्झे, रयणीए उंवरेण सा मयणा । भणिया भद्दे निसुणसु, इमं अजुत्तं कयं रन्ना ६३
अर्थ-इधरसे अपना पेड़ा समुदायमें रात्रिमें उम्वरराजाने मदनसुंदरीसे इस प्रकारसे कहा हे शोभने तें सुन राजा
तेरे पिताने यह अयुक्त किया विगड़ा हुआ शरीर जिसका ऐसा मैं हूं मेरेकू दी ऐसा भाव है ॥ ६३ ॥
तहवि न किंपि विणटुं, अज्जवि तं गच्छ कमवि नररयणं । जेणं होइ न विहलं, एयं तुह रूवनिम्माणं ६४
अर्थ-तथापि कुछभी नहीं विगड़ा है अवीभी से कोई श्रेष्ठ पुरुप पास जा अर्थात् कोई निरोगी पुरुषको अंगीकार
कर जिससे तेरे यह रूपकी रचना निष्फल न होवे ।। ६४ ॥
इह पेडयस्स मज्झे, तुज्झवि चिटुंतिआइ नो कुसलं। पायं कुसंगजणियं, मज्झवि जायं इमं कुटुं ॥६५॥
अर्ध-इस समुदायमें रहती भई तेरेको कुशल नहीं है कैसे सो कहते हैं बहुत करके मेरेभी यह कोढ़ उत्पन्न
भया है सो तेरे कभी न होजाय ॥ ६५ ॥
तो तीए भयणाए, नयणंसुयनीरकलुसवयणाए। पइपाएसु निवेसियसिराइ, भणियं इमं वयणं ॥६६॥
अर्ध-तदनंतर मदनसुंदरीने यह वक्ष्यमाण वचन कहा कैसी मदनसुंदरी नेत्रोंमें जो आंसूका जल उससे
मला हुआ है मुख जिसका ऐसी और कैसी भर्तारके चरणोंमें स्थापा है मस्तक जिसने ऐसी क्या वोली सो
कहते हैं ॥६६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२२॥
सामिय! सवं मह आइसेसु, किंचेरिसं पुणो वयणं । नो भणियत्वं जं दूह, वेइ मह माणसं एयं ॥६७
अर्थ-हे स्वामिन् मेरेको और सब कार्यकी आज्ञा करो किंतु ऐसा बचन और नहीं कहना कैसे सो कहते हैं जिस
कारणसे यह बचन मेरे मनको दुःखावे है ॥ ६७ ॥
अन्नं च पढमं महिलाजम्मं, केरिसयं तंपि होइ जइ लोए। सीलविहूणं नूणं, ता जाणह कंजियं कुहियं ६८
अर्थ-औरभी सुनो पहले स्त्रीका जन्म अशुद्धही है वह स्त्रीका जन्म जो लोकमें ब्रह्मचर्य रहित होवे तब निश्चय
कुथी भई कांजीके सदृश अत्यन्त अशुद्ध आप जानो ॥ ६८ ॥
सीलं चिय महिलाणं, विभूसणं सीलमेव सबस्सं । सीलं जीवियसरिसं, सीलाओ न सुंदरं किंपि॥६९॥
अर्थ-जिस कारण स्त्रियोंके शीलही आभरण है और ब्रह्मचर्यही सर्वस्व सर्व सार है और स्त्रियोंके शील ब्रह्मच-
यंजीवितव्यके सरीखा है स्त्रियों के शीलसे अधिक कुछभी सुंदर नहीं है ।। ६९ ।।
ता सामिय! आमरणं, मह सरणं तंसि चेव नो अन्नो। इय निच्छियं वियाणह, अवरं जंहोइ तं होउ ७०
अर्थ-इस कारणसे हे स्वामिन् मरणपर्यंत मेरे आपहीका शरणा है और कोई शरणा नहीं है यह निश्चय युक्त
आप जानो और जो होनेवाला है सो होवो ॥ ७० ॥
एवं तीए अइनिच्चलाइ, दढसत्तपिरकणनिमितं । सहसा सहस्सकिरणो, उदयाचल चूलियं पत्तो ॥७१॥
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॥२२॥

-- अर्थ-फहे प्रकारसे अत्यन्त निश्चल उस मदनसुंदरीका जो दृढ़ सत्त्व धैर्य देखनेके निमित्त होवे वैसा अकस्मात् सहनकिरण सूर्य उदयाचल निषध पर्वतकी चूलिका शिखा उसपर प्राप्त भया अर्थात् सूर्योदय भया ॥ ७१ ॥ मयणाए वयणेणं, सो उवरराणओ पभायमी। तीए समं तुरंतो, पत्तो सिरिरिसहभवणंमि ॥७२॥ अर्ध-तव मदनसुंदरीके वचनसे उम्बरराजा प्रभातमें अपनी स्त्रीसहित शीघ्र २ चलता हुआ श्री ऋपभदेव स्वामी मंदिर गया ।। ७२ ॥ आणंदपुलइअंगेहिं, तेहिं दोहिंविनमंसिओ सामी। मयणा जिणमयनिउणा, एवं थोउं समाढत्ता ॥७३॥ अर्थ-आनंद हपंसे रोमोद्गम युक्त शरीर जिन्होंका ऐसे वधूवर दोनों श्री ऋषभदेव स्वामीको नमस्कार किया वाद जैन धर्ममें निपुण ऐसी मदनसुंदरी वक्ष्यमाण प्रकारसे स्तुति करनी प्रारंभ करी ॥ ७३ ॥ भत्तिभरनमिरसुरिंदविंद!,वंदियपय पढमजिणिंदचंद!। चंदुज्जलकेवलकित्तिपूर,प्रियभुवणंतरवेरिसूर! अर्थ-भक्तिके समूहसे नय नमनेका स्वभाव जिन्होंका ऐसे देवेन्द्रोंका समूह उन्हों करके वंदित है चरण कमल जिन्होंका ऐसे हेप्रथमजिनेन्द्रचन्द्र चन्द्रके जैसा आल्हाद करनेवाला और चन्द्र के जैसा उज्वल धवल सम्पूर्ण जो कीर्तिका पूर नाम वशका समूह उस करके पूरित भरा हुआ तीन लोक जिस करके उसका सम्बोधन हे चन्द्रो० और अंतरग शत्रु काम क्रोधादिकके जीतनेमे सूर उसका संवोधन ॥ ७४॥ 25

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२३॥
सूरूव हरियतमतिमिरदेव, देवासुरखेयरविहियसेव ।
सेवागयगयमयरायपाय,
पायडियपणामह कयपसाव ॥ ७५ ॥
अर्थ-और सूर्यके जैसा दूर किया है अज्ञानरूप अंधकार जिसने और वैमानिकादि देव भवनपत्यादि असुर और
विद्याधर उन्होंने करी है सेवा जिसकी ऐसा हे देव! सेवाके वास्ते आया और गया है मद जिन्होंका ऐसे जो राजा
लोग उन्हों करके नमस्कार किया है चरणोंमें जिन्होंके ऐसा हे सेवा० ? और किया है प्रसाद जिसने हे कृतप्रसाद! ॥७५॥
सायरसमसमयामयनिवास, वासवगुरुगोयरगुणविकास ।
कासुज्जलसंजमसीललील, लीलाइ विहियमोहावहील ॥ ७६ ॥
अर्थ-समुद्रके तुल्य समता अमृतके निवास इन्द्र गुरु लोकोक्तिसे बृहस्पतिः उसके विषयभूत है गुणोंका विस्तार
जिन्होंका उसका सम्बोधन हे वासव० इत्यादि और कास तृणविशेष उसके सदृश संयम शील चारित्र स्वभावकी
लीला जिसके ऐसा और लीलामानसे किया है मोहनीय कर्मका अनादर जिन्होंने ऐसे ॥ ७६ ॥
हीलापरजंतुसुअकयसाव, सावयजणजणियाणंदभाव।
भावलयअलंकिय रिसहनाह, नाहत्तणु करि हरि दुक्खदाह ॥ ७७ ॥
॥ २३॥

अर्ध-हीलनाही प्रधान जिन्होंके ऐसे जीव उन्होंपर नहीं किया है आक्रोश जिन्होंने और श्रावक लोगोंको उत्पन्न किया है आनंदका उदय जिन्होंने और भा नाम प्रभा उसका मंडल उस करके शोभित उसका सम्बोधन हे ? भा बलय० पूर्वोक्त विदोपणसहित हे ऋपभनाथ आप मेरे योग क्षेम करो मेरे दुःख दाह दूर करो ॥ ७७ ॥ इय रिसहजिणेसर भुवणदिणेसर, तिजयविजयसिरिपाल पहो। मयणाहिय सामिय? सिवगइगामिय, मणहमणोरह पूरिमहो ॥७८ ॥ अर्ध-इस कहे प्रकारसे हे ऋषभजिनेश्वर हे भुवनदिनेश्वर लोकमें सूर्यसदृश तीनजगतकी विजयलक्ष्मीको पालने- याला हे प्रभो हे कामका शत्रु हे स्वामिन् हे शिवगति गामिन् मेरे मनके मनोरथोंको पूर्ण करो यह तात्पर्यार्थ है और लपार्थ यह है तीन जगत् में विजय जिसका ऐसे श्रीपालका प्रभु उसका सम्बोधन तथा मदनसुंदरीका हित करनेवाला उसका सम्बोधन हे मदनाहित ! ॥ ७८ ।। एवं समाहिलीणा, मयणा जा थुणइ ताव जिणकंठा। करट्ठियफलेण सहिया, उच्छलिया कुसुमवरमाला अर्थ-इस प्रकारसे समाधि चित्तकी एकाग्रतामें लगा हुआ है मन जिसका ऐसी मदनसुंदरी जितने स्तुति करे उतने भगवानके कंठसे हाधम रहा हुआ विजोरेका फलसहित प्रधान पुप्पोंकी माला उछली ॥ ७९ ॥ मयणा वयणाओ उंबरेण, सहसत्ति तं फलं गहियं । मयणाइ सयंमाला, गहिया आणंदियमणाए ॥८॥ ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
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॥२४॥
I
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अर्थ-उस समय मदनसुंदरीके वचनसे उम्बर रानेने शीघ्र वह फल ग्रहण किया आनंदयुक्त मनजिसका ऐसी
मदनसुंदरीने स्वयं माला ग्रहण करी ॥ ८ ॥
भणियं च तीइ सामिय, फिहिस्सइ एस तुम्ह तणुरोगो।जेणेसो संजोगो, जाओ जिणवरकयपसाओ ८१
अर्थ-और मदनसुंदरीने कहा हे स्वामिन् यह आपके शरीरका रोग चला जायगा अर्थात् मिट जायगा जिस कारणसे
यह संयोग जिनवर श्री ऋषभदेव स्वामीने किया है प्रसाद जिसमें ऐसा भया है इससे जाना जाय है यह अर्थ है ॥८॥
तत्तो मयणा पइणा, सहिया मुणिचंदगुरुसमीवंमि । पत्ता पमुइयचित्ता, भत्तीए नमइ तस्स पए ॥२॥
अर्थ-तदनन्तर मदनसुंदरी अपने भार सहित मुनिचन्द्र नामके गुरूके पासमें गई तब हर्षित है चित्तजिसका
ऐसी मदनसुंदरी गुरूके चरण कमलोंमें भक्तिसे नमस्कार किया ॥ ८२॥
गुरुणो य तयाकरुणा, परित्तचित्ता कहति भवियाणं। गंभीरसजलजलहरसरेण,धम्मस्स फल मेवं ॥३॥
अर्थ-तव दयासे व्याप्त है चित्त जिन्होंका ऐसे गुरु भव्य जीवोंके आगे सजल मेघके जैसी गंभीर ध्वनिकरके
वक्ष्यमाण प्रकार करके धर्मका फल कहे ॥ ८३ ॥
सुमाणुसत्तं सुकुलं सुरूवं, सोहग्गमारुग्गमतुच्छमाउं ।
रिद्धिं च विद्धिं च पहुत्तकित्ती, पुन्नप्पसाएण लहंति सत्ता ॥ ८४ ॥
॥ २४ ॥

अर्थ-किस प्रकारसे धर्म कहे सो कहते हैं अहो भव्यो शोभन मनुष्यपनो और उत्तम कुल वहां भी शोभनरूप आकृति पांच इन्द्रिय पटु प्रगट वहांभी सव लोगोंको वल्लभ होना और निरोगता वड़ा आयुः और सम्पदा और वृद्धिः पुत्रादि परिवार और स्वामीपना कीर्ति इतनी वस्तुवां पुन्यके प्रसादसे धर्मके प्रभावसे प्राणी पावे है ॥ ८४ ॥ इच्चाइदेसणंते, गुरुणो पुच्छंति परिचियं मयणं । वच्छे कोऽयं धन्नो, वरलक्खणलक्खिय सुपुन्नो? ८५ अर्थ-इत्यादि देशनाके अंतमें गुरूने अपनी परचित मदनसुंदरीसे पूछा हे वत्से यह तेरे आगे रहा हुआ धन्य प्रशंसनीय और प्रधान लक्षणोंसहित शोभन पुण्य जिसका ऐसा कौन पुरुप है ॥ ८५ ॥ मयणाइ रुयंतीए, कहिओ सदोवि निययवुत्तंतो। विन्नत्तं च न अन्नं, भयवं ? मह किंपि अस्थि दुहं ८६ अर्थ-तब मदनसुंदरी रोती भई सवही अपना वृत्तान्त कहा और वीनती किया हे भगवान हे पूज्य मेरेको और बुछभी दुःख नहीं है ॥ ८६ ।। एवं चिय मह दुक्खं, जं मिच्छादिट्ठिणो इमे लोया। निंदति जिणह धम्म, सिवधम्मं चेव संसंति ॥८॥ अर्थ-किंतु यही पड़ा दुःख है जो मिथ्यादृष्टि यह लोग जैनधर्मकी निंदा करे है मिथ्या धर्मकी प्रशंसा फरे है।। ८७ ॥ ता पहु कुणह पसायं, किंपि उवायं कहेह मह पइणो। जेणेस दुट्ठवाही, जाइ खयं लोयवायं च ॥८८॥ r शीपा.घ

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२५॥
अर्थ-तिस कारणसे हे प्रभो हे स्वामिन् आप प्रसाद करो प्रसन्न होवों कोई उपाय कहो जिससे मेरे पतीका यह
कोढ़रोग क्षय होवे और लोकापवादभी क्षय होवे अर्थात् व्याधिका क्षय क्या होवे लोगोंमें जो निंदा होवे उसका नाश
होजाय ॥ ८८॥
पभणेइ गुरू भद्दे !, साहूणं न कप्पए हु सावजं । कहिउं किंपि तिगिच्छं, विज्झं मंतं च तंतं च ॥८९॥
अर्थ-तब गुरू कहे हे भद्रे साधुओंको कुछभी सावध दोष सहित वस्तु कहना नहीं कल्पे क्या सो कहते हैं
चिकित्सा वैद्यकशास्त्र और विद्या मंत्र तंत्र यह सावध साधुओंको नहीं कहना ॥ ८१ ॥
तहवि अणवजमेगं, समत्थि आराहणं नवपयाणं । इयलोइयपारलोइय,-सुहाण मूलं जिणुदिटुं ॥९०॥
अर्थ-तथापि एक नवपदोंका आराधन निर्दोष है कैसा वह इसभव परभवके सुखोंका मूल कारण है और कैसा
है श्री तीर्थंकरोंने कहा है ॥ ९० ॥
अरिहं सिद्धायरिया, उवझाया साहुणो य सम्मत्तं । नाणं चरणं च तवो, इयपयनवगं परमतत्तं ॥११॥
अर्थ-नवपदोंका नाम कहते हैं अरहंत १ सिद्ध २ आचार्य ३ उपाध्याय ४ साधु ५ सम्यक्त्व ६ ज्ञान ७ चारित्र
८ तप ९ ये नवपद उत्कृष्ट तत्व वतै है ॥ ९१ ॥
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॥२५॥

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एएहिं नवपएहिं रहियं, अन्नं न अत्थि परमत्थं । एएसुच्चिय जिणसासणस्स, सबस्स अवयारो ॥१२॥
अर्थ-इन नवपदों करके रहित और परमार्थ तात्विक अर्थ नहीं है ये नवपदोंमें सर्व जिनशासनका अवत-
रण है ॥ ९२॥
जेकिर सिद्धा सिझ्झंति, जेय जे यावि सिझ्झइस्संति । ते सव्वेवि हु नवपयझाणेणं चेव निव्भंति ॥१३॥
अर्थ-निश्चय जे जीव अतीत कालमें सिद्ध भया अर्थात् मुक्तिगया और जे वर्तमानकालमें सिद्ध होते हैं और
अनागत कालमें ये मोक्ष जावेंगे वह सर्व नव पदोंके ध्यानसेही होंगे नव पदोंके ध्यानसिवाय नहीं ॥ ९३ ।।
एएसिं च पयाणं, पयमेगयरं च परमभत्तीए । आराहिऊण णेगे, संपत्ता तिजयसामित्तं ॥९४॥
अर्थ-और इन नव पदोंमें एक पदभी परम भक्ति करके आराधन करके अनेकजीव तीनजगत्का स्वामित्व
प्राप्त भए है सकल कर्मके क्षय होनेसे तीन भवनका स्वामी भया ॥ ९४ ॥
पहिं नवपएहि, सिद्धं सिरिसिद्धचकमेयं जं। तस्सुद्धारो एसो, पुवायरिएहिं निद्दिट्ठो ॥ ९५ ॥
अर्थ-इन नवपदोंसे सिद्ध याने निप्पन्न जो यह सिद्धचक्र नामका यन्त्र राजका उद्धार पूर्वाचार्योंने कहा है ॥९५॥
गयण मकलियायंतं, उहाहसरं सनायविंदुकलं । सपणववीयाणाहय, मंतसरं सरह पीढंमि ॥९६ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥२६॥
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अर्थ-अव ग्रंथकार ग्यारह ११ गाथासे सिद्धचक्रका उद्धार विधिः कहते हैं गयण इत्यादि यहां गगनादि संज्ञा
मंत्र शास्त्रोंसे जानना वहां गगनशब्दसे हू ऐसा अक्षर कहा जावे यन्त्रके सर्व मध्यभागमें हु ऐसा अक्षर स्मरण करो
यहां स्मरणहीका अधिकार है स्मरणकी शक्ति न होवे तो पदस्थ ध्यान साधने के लिए मनोज्ञ द्रव्योंसे पट्टादिकमें लिख-
नाभी पूर्वाचार्योंका आमनाय है ऐसा आगेभी विचारना वहां पहले अकार अक्षरकी कलिका व्याकरण संज्ञा मई वक्र
ऽ ऐसा अक्षररूप उस करके सहित हकार लिखना ऽहु ऐसा भया यह गगनवीज कहा जावे कैसा गगनवीज ऊपर
नीचे रेफसहित ऽ हऐसा भया और कैसा नाद अर्ध चंद्राकारके ऊपर विंदु सहित अर्ह ऐसा भया और ओंकार ह्रींकार
और अनाहत कुंडलाकार सहित आम्नाय यह है अर्ह यह वीज ओंकारके उदरमें स्थापे यह बीज हींकारके उदर में
स्थापना वाद ह्रींकारका ईकार स्वरकी रेखा घुमाके दो कुंडलाकार अनाहत करके तीनों वीजको वीटना और कैसा
वीज चौतर्फ स्वर जिसके अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः ये सोलह अंतमें स्वर हैं जिसके ऐसा
मूल पीठमें ध्याओ ॥ ९६ ॥
झायह अडदलवलए, सपणवमायाइएसुवाहंते । सिद्धाइए दिसासु, विदिसासु दंसणाईए ॥ ९७॥
अर्थ-अथ पीठलिखके उसके पासमें गोलमंडल लिखे उसके ऊपर आठ पांखडीका कमल लिखे उन्होंमें चार
दिशाके पत्रमें ओम् ही सिद्धेभ्यः स्वाहा पूर्व दिशिमें १ ओम् ह्रीं आचार्येभ्यः स्वाहा दक्षिणमें २ ओम् ही उपाध्या-
येभ्यः स्वाहा पश्चिममें ३ ओम् ह्रीं सर्व साधुभ्यः स्वाहा उत्तरमें ४ इसीतरह विदिशामें दर्शनादि चार पद ध्याओ लिख-
॥२६॥

नेका विधि यह है ऑ ही दर्शनाय स्वाहा अग्नि कोणमें १ ओम् ही ज्ञानाय स्वाहा नैऋतमें २ ओ ही चारित्राय स्वाहा यायव्यमें ३ ओम् ही तपसे स्वाहा ईशानमें ४ इस क्रमसे लिखे यह अष्टदल पहला वलय भया ॥ ९७ ॥ वीयवलयंमि अडदिसि, दलेसु साणाहए सरह वग्गे। अंतरदलेसु अट्ठसु, झायह परमिट्ठिपढमपए ९८ अर्थ-प्रथम बलयके बाहर सोलह पाखड़ीका कमल मंडलाकार लिखे वहां दूसरे वलयमें आठ एकांतरित दिग् दलमें अनाहत वीजसहित आठ वर्ग अ १ क २ च ३ - ४ त ५ प ६ य ७ श ८ यह आठ वर्ग क्रमसे लिखके स्मरण करो पहले वर्गमें सोलह वर्ण है कवर्गादिक पांचोंमें प्रत्येक पांच २ वर्ण है अन्तिम दो वर्गमें चार २ वर्ण है वाद आठ वगांके अंतर पत्रों में परमेष्ठी पद ओम् नमो अरिहंताणं ध्यावो यह दूसरा वलय हुआ ॥ ९८ ॥ तइयवल एवि अडदिसि, दिपंत अणाहएहिं अंतरिए । पायाहिणेण तिहि,पंतियाहिं झाएह लद्धिपए १९९ अर्थ-तीसरे वलयमभी आठ दिशामें आठ अनाहत लिखे दोनोंके अंतरमें दो २ लब्धि पद ऐसे आठ अंतरोंमें सोलह सन्धि पद पहली पंक्तिमें एवं सोलहही दूसरी पंक्ति और सोलहही तीसरी पंक्तिमें इस प्रकारसे दीप्यमान आट अनाहतोंके अंतरमें प्रदक्षिणा करके तीन पंक्ति करके ४८ लब्धि पद तुम ध्यावो ॥ १९९ ॥ ते पणववीयअरिहं, नमोजिणाणंति एवमाईया । अडयालीसंणेया, सम्मं सुगुरूवएसेणं ॥ २०० ॥ अर्ध-लब्धिपद ओकार हीकार ऽह ऐसा सिद्ध वीज पूर्वक नमोजिणाणं ऐसा पद ओम् ही ऽई नमोजिणाणं

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥२७॥
इत्यादि अड़तालीस पद सम्यक् सुगुरूके उपदेशसे जानना इन्होंका नाम और माहात्म्य लब्धिकल्पशास्त्रसे जानना
इहां तो आराधन विधिः विना लिखने में दोष है ॥२०॥
तं तिगुणेणं माया,-वीएणं सुद्धसेयवण्णेणं । परिवेढिऊण परहीइ, तस्स गुरुपायए नमह ॥ २०१ ।।
अर्थ-वह पीठादि लब्धिपद पर्यंत त्रिगुण श्वेतवर्ण होकारसे चौतर्फ वीटके परिधिमें आव गुरु पादुकाको नमस्कार
करो यहां यह भाव है सर्व यन्त्रके ऊपर ह्रींकार लिखके उसके ईकारसे तीनवलय देके चौथा आधावलयके अंतमें क्रौं
ऐसा अक्षर लिखे उसकी परिधिमें आठ गुरु पादुका चरणन्यास लिखे ॥ २०१॥
अरिहं सिद्धगणीणं, गुरुपरमादिट्ठणंतसुगुरूणं । दुरणंताण गुरूण य, सपणववीयाओ ताओ य ॥२०२॥
अर्थ-अव आठ गुरुपादुका कहते हैं अहंत पादुका १ सिद्ध पादुका २ आचार्य पादुका ३ उपाध्याय पादुका ४
परमगुरुपादुका ५ अदृष्टगुरुपादुका ६ अनंतगुरुपादुका ७ अनंतानंतगुरुपादुका ८ यह आठ गुरु पादुका ओम् ही युक्त
लिखना ओम् ही ऽहत् पादुकाभ्यो नमः ऐसे सव लिखना ॥ २०२ ॥
रेहादुगकयकलसा,-गारामियमंडलंव तं सरह, चउदिसि विदिशि कमेणं, जयाइजंभाइकयसेवं ॥२०३॥
अर्थ-दो रेखा यन्त्रके ऊपर वाम दक्षिण निकली परस्पर लगा हुआ अंतभाग जिन्होंका ऐसी दो रेखा करके
॥२७॥

किया है कटसाकार अमृत मंडलके जैसा स्मरण करो अर्थात् कलसाकार लिखे पूर्वादि चारदिशामें जया १ विजया २ जयंती ३ अपराजिता ४ और अग्निआदि चार विदिशामें जंभा १ थंभा २ मोहा ३ गंधा ४ इन्होंने करी है सेवा जिमकी ।। २०३ ॥ सिरिविमलसामिपमुहा,-हिट्ठायगसयल देवदेवीणं । सुहगुरु मुहाओ जाणिय, ताण पयाणं कुणह झाणं ४ अर्थ-श्री विमलस्वामी सौधर्म देव लोकमें रहनेवाला श्री सिद्धचक्रका अधिष्ठायक प्रमुख समस्त देव और चक्रे- श्वरी वगैरेह देवियां उन्होंका ध्यान गुरु के मुखसे जानके मंत्रपदोंका ध्यान करो इन्होंका नाम कलसाकार यन्त्रके उपर चौतर्फ लिखे ओम् ही विमलस्वामिने नमः इत्यादि ॥ २०४॥ तं विजादेविसासण, सुरसासणदेविसेवियदुपासं। मूलगह कंठणिहि, चउपडिहारं च चउवीरं ॥२०५॥ अर्थ-अब दो गाथाका व्याख्यान कहते हैं वह श्री सिद्धचक्रयन्त्रराज पूजनेवाले मनुष्योंका मनोवांछित पूरता है फैसा है रोहिण्यादि विद्या देवी सोलह और गौमुखयक्षादि २४ शासन देव चक्रेश्वर्यादि २४ शासन देवी इन्होंसे सवित है वाम दक्षिण पार्श्व भाग जिसका और कैसा है श्री सिद्धचक्र कलसके मूलमें सूर्यादि नव ग्रह है जिसके और फंटमें नसर्पादि नव निधान है जिसके नैसर्प १ पांडुक २ पिंगल ३ सर्वरत्नक ४ महापद्म ५ काल ६ महाकाल माणव ८ शंखक ९ तथा ४ प्रतिहार कुमुद १ अंजन २ वामन ३ पुष्पदंत ४ है जिसके तथा ४ वीर मानभद्र १ पूर्ण- श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥२८॥ १ भद्र २ कपिल ३ पिंगल नामका जिसके ऐसा इहां १६ विद्या देवी ओम् ही रोहिण्यै नमः इत्यादि यन्त्रके चौतर्फ लिखे तथा शासन देव ॥ २०५ ॥ दिसिवालखित्तवालेहि, सेवियं धरणिमंडलपइटुं । पूयंताण नराणं, नूणं पूरेइ मणइटुं ॥ २०६ ॥ अर्थ-यन्त्रके दक्षिण दिशिमें लिखे शासन देवी यन्त्रके वाम दिशिमें लिखे और कलसाकार चक्रकी पड़धीके नीचे ओम् आदित्यायनमः इत्यादि नव ग्रहोंका नाम लिखे कंठमें नवनिधान ओम् नैसर्पकाय नमः इत्यादि लिखे तथा चार दिशामें क्रमसे कुमुद १ अंजन २ वामन ३ पुष्पदंत ४ लिखे तथा माणभद्रादि ४ वीर लिखे ५ दिक्पाल १० इन्द्र १ अग्नि २ यम ३ नैऋत ४ वरुण ५ वायु ६ कुवेर ७ ईशान ८ ब्रह्म ९ नाग १० इन्हों करके और क्षेत्रपाल करके प्रसिद्ध सेवित और पृथ्वीपीठपर प्रतिष्ठ रहा हुआ दश दिग्पालोंमें ८ दिग्पालोंको पूर्वादि क्रमसे लिखना ओम् इन्द्रायनमः इत्यादि ऊर्ध्व दिशामें ओम् ब्रह्मणेनमः, अधो दिशामें ओम् नागायनमः, अपने जीवने तरफमें यन्त्रके कोनेमें ओम् क्षेत्रपालायनमः लिखे इसके लिखनेमें सम्यविधिः आम्नायजाननेवालों के मुखसे अथवा लिखित यन्त्रसे जानना ॥ २०६॥ एयं च सिद्धचकं, कहियं विजाणुवायपरमत्थं । नाएण जेण सहसा, सिज्झंति महंतसिद्धीओ ॥२०७॥ अर्थ-ये सिद्धचक्र विद्यानुवादनामक दशम पूर्वका परमार्थरूप रहस्यभूत है जिसके जाननेसे अकस्मात् शीघ्र अणिमादि बड़ी सिद्धियों सिद्ध होवे है ॥ २०७॥ ॥२८॥ - , एयं च विमलधवलं, जो झायइ सुक्कझाणजोएण। तवसंजमेण जुत्तो, सो पावइ निजरं विलं ॥२०८॥ अर्थ--यह निर्मल उज्वल श्री सिद्धचक्रको जो पुरुप उज्वल ध्यान व्यापारसे ध्यावे वह पुरुष विपुल नाम विस्तीर्ण निजरा पावे अर्थात् वहुत कर्मका क्षय करे कैसा वह पुरुप तप संयम सहित ऐसा ॥ २०८ ॥ अक्खयसुक्खो मुक्खो, जस्स पसाएण लम्भए तस्स । झाणेणं अन्नाओ, सिद्धीओ इंति किंचुजं ॥२०९॥ अर्थ-अक्षय सुख जिसमें ऐसा मोक्ष श्रीसिद्धचक्रके प्रसादसे प्राणी पाते हैं सिद्धचक्रके ध्यानसे और सिद्धियां होवे इनमें क्या आश्चर्य है ॥ २०९ ॥ एयं च परमतत्तं, परमरहस्सं च परममंतं च । परमत्थं परमपयं, पन्नत्तं परमपुरिसेहिं ॥ २१० ॥ अर्थ-यह सिद्धचक्र उत्कृष्ट तत्व है और परम रहस्य गोप्य है और परम मंत्र है परमार्थ है और उत्कृष्ट स्थान है और परमपुरुप तीर्थंकरोंने कहा है ॥ २१० ॥ तत्तो तिजयपसिद्धं, अट्ठमहासिद्धिदायगं सुद्धं । सिरिसिद्धचकमेयं, आराहह परमभत्तीए ॥ २११॥ अर्थ-तिस कारणसे अहो भव्यो तीन जगत्में प्रसिद्ध अणिमादि आठ सिद्धियोंका देनेवाला शुद्ध निर्मल ऐसा श्री सिद्धचक्र उत्कृष्ट भक्सेि आराधन करो अर्थात् सेवना करो ॥ २११ ॥ ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥२९॥
खंतो दंतो संतो, एयस्साराहगो नरो होइ । जो पुण विवरीयगुणो, एयस्स विराहगो सो उ ॥२१२॥
अर्थ-अव इसके आराधकका स्वरूप कहते हैं क्षांतः-क्षमायुक्त दांतः-जितेन्द्रियः शांतः-मनका विकार जीता
जिसने ऐसे मनुष्य इस सिद्ध चक्रके आराधक होते हैं और जो विपरीत गुणवाला कामक्रोधादि युक्त वह पुरुष इस
सिद्धचक्रका विराधक होवे है ॥ २१२ ॥
तम्हा एयस्साराहगेण, एगंतसंतचित्तेणं । निम्मलसीलगुणेणं, मुणिणा गिहिणा वि होयत्वं ॥ २१३ ॥
अर्थ-इस कारणसे इस सिद्धचक्रका आराधक मुनिः और ग्रहस्थकोभी ऐसा होना कैसा सो कहते हैं एकान्त
निश्चय करके शान्त विकार रहित चित्त जिसका और निर्मल. शील गुण जिसका ऐसा ॥ ११३ ॥
जो होइ दुट्ठचित्तो, एयस्साराहगोवि होऊण । तस्स न सिज्झइ एयं, किंतु अवायं कुणइ नूणं ॥ २१४ ॥
अर्थ-जो पुरुप इसका आराधकभी होके दुष्टचित्तवाला हो उस पुरुषके यह सिद्धचक्र नहीं सिद्ध होवे किंतु
निश्चय कष्टकारी होवे अर्थात् कष्ट पावे ॥ २१४ ॥
जो पुण एयस्साराहगस्स, उवरिंमि सुद्धचित्तस्स । चिंतइ किंपि विरूवं, तं नृणं होइ तस्सेव ॥२१५॥
अर्थ-शुद्ध चित्त है जिसका वह शुद्ध चित्तवाला सिद्धचक्रके आराधक पुरुपके ऊपर कोई दुष्ट पुरुष कुछभी
अशुभ विचारे वह अशुभ विचाराहुआ निश्चय उसी विचारनेवाले पुरुषके ऊपर पड़े ॥ २१५ ॥
,
॥ २९ ॥

एएण कारणेणं, पसन्नचित्तण सुद्धसीलेण । आराहणिजमेयं, सम्मं तवकम्मविहिपुदं ॥ २१६ ॥
अर्थ-इस कारणसे प्रसन्न निर्मल चित्त जिसका वह और शुद्धशील जिसका ऐसे पुरुपको यह सिद्धचक्र सम्यक्
तप कर्म विधिपूर्वक आराधना तप यहां आविल होवे है और विधिः पूजन ध्यानादि सम्बन्धी तत् पूर्वक ॥ २१६ ॥
आसोयसेयअट्टमिदिणाओ, आरंभिऊणमेयस्स । अट्ठविहपूयपुवं, आयामे कुणह अट्ट दिणे ॥ २१७ ॥
अर्थ-आमाज शुदि अष्टमीके दिनसे प्रारंभ करके इस सिद्धचक्रकी अष्टप्रकारी पूजा करके आठदिनतक अहो
भन्यो आविलका तप करो यद्यपि मूलविधिःसे अष्टमीके दिनसे तप करना कहा है परन्तु वर्तमानमें पूर्वाचार्योंकी-आ
चरणासे सप्तमीसे किया जाये है ऐसा जानना ॥ २१७ ॥
नवमंमि दिणे पंचामएण, न्हवणं इमस्ल काऊणं । पूयं च वित्थरेणं, आयंविलमेव कायवं ॥ २१८ ॥
अर्थ-नवमे दिन सिद्धचक्रका दही दूध घी, जल, शर्करा स्वरूप पंचामृतसे स्नानकराके और विस्तारसे पूजा
करके आविलही करना ॥ २१८ ॥
एवं चित्तेवि तहा, पुणोपुणोऽहाहियाण नवगेणं । एगासीए आयंविलाण, एयं हवइ पुन्नं ॥ २१९ ॥
अर्ध-इस प्रकारसे चत्र महीनेमेंभी करना इसी प्रकारसे वारंवार करनेसे नव अट्टाई होनेसे ८१ इक्कयासी आविलों
करके यह तप पूर्ण होवे है ॥ २१९ ॥

श्रीपाल- चरितम् .. भाषाटीका- सहितम्- 1 ॥३०॥ एयमि कीरमाणे, नवंपयझाणं मणमि कायई । पुन्ने य तवोकम्मे, उज्जमणपि हु विहेयत्वं ॥ २२० ॥ अर्थ-यह तप करनेमें मनमें नवपदोंका ध्यान करना नव पदोंका, जाप यहां जघन्य १३ हजार होवे है ऐसा वृद्ध कहते हैं प्रथम पदका १२०० जाप दुसरे पदका ८०० तीसरे पदका ३६०० चौथे पदका २५०० पांचवें पद २७०० छठे पदका ५०० सातवें पदका ५०० आठवे पदका १००० नवमें पदका २०० सर्व मिलानेसे १३००० होता है और तप पूर्ण होनेसे निश्चय उजवनाभी करना ॥ २२१ ॥ एवं च तवोकम्म, सम्म जो कुणइ सुद्धभावेणं । सयलसुरासुरनरखर, रिद्धीउ न दुल्लहा तस्स ॥ २२१॥ अर्थ-जो प्राणी यह तप अनुष्ठान अच्छी तरहसे शुद्ध भावसे करे उस प्राणीको सर्व देवेन्द्र नरेन्द्रकी सम्पदा दुर्लभ नहीं है किंतु सुलभही है ॥ २२१ ॥ एयंमि कए न हु दुट्ठकुट्ठ,-खयजरभगंदराईया। पहवंति महारोगा, पुत्रुप्पन्नावि नासंति ॥ २२२ ॥ अर्थ-यह सिद्धचक्र आराधनरूप तपकर्म करनेसे दुष्ट कोढ़ १ क्षय २ ज्वर ३ भगंदरादि ४ महारोग नहींही उत्पन्न होवे और पूर्वोत्पन्न रोग नष्ट होवे ॥ २२२ ॥ दासत्तं पेसत्तं, विकलत्तं दोहगत्तमंधत्तं । देहकुलजुंगियत्तं, न होइ एयस्स करणेणं ॥ २२३ ॥ ॥३०॥ ॥

अर्थ-इस तपके करनेवाले मनुष्यके दासपना न याने होवे नौकर न होवे कलाहीनपना, दुरभाग्यपना और अनिष्ट- पना आंधा काणापना शरीर दृषितपना और जातिकुलादि दूपितपना यह इसलोकमें परलोकमें नहीं होवे है ॥ २२३ ॥ नारीणवि दोहग्गं, विसकन्नत्तं कुरंडरंडत्तं । वंझत्तं मयवच्छत्तणं च, न हवेइ कइयावि ॥ २२४ ॥ अर्थ-खियोंकभी यह दोप कभी नहीं होवे कौनसे दोप सो कहते है दुर्भागनीपना भर्तारके अनिष्ट और विप कन्या तथा कुलक्षण स्त्रीपना तथा विधवापना तथा वंध्यापना तथा मृतवत्सापना यह दोप न होवे ॥ २२४ ॥ किंबहुणा जीवाणं, एयरस पसायओ सयाकालं। मणवंछियत्थसिद्धी, हवेइ नत्थित्थ संदेहो ॥२२५॥ अर्थ-ज्यादा कहने करके क्या जीवोंके इस सिद्धचक्रके प्रसादसे सर्व कालमें मनोवांछित अर्थकी सिद्धि होवे है इसमें संशय नहीं है ।। २२५ ॥ एवं तेसिं सिरि सिद्धचक्क,-माहप्पमुत्तमं कहिउं । सावयसमुदायस्सवि, गुरुणो एवं उवइसंति ॥ २२६ ॥ अर्ध--इस प्रकारसे श्रीपाल मदनसुंदरीके आगे उत्तम प्रधान श्रीसिद्धचक्रका माहात्म्य कहके श्रावक समुदाय अजालु संघकोभी गुरुः वक्षमाण प्रकारसे उपदेश देवे ॥ २२६ ॥ एपहिं उत्तमेहि, लक्खिज्जइ लक्खणेहिं एस नरो। जिणसासणस्स नूणं, अचिरेण पभावगो होही २२७ पापा.च.

श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका-
सहितम्.
॥३१॥
अर्थ-यह उत्तम लक्षणों करके जाना जावे है यह मनुष्य निश्चय थोड़े कालसे जिन शासनकी प्रभावना करने-
वाला होगा ऐसा ॥ २२७ ॥
तम्हा तुम्हं जुज्जइ, एसिं साहम्मियाण वच्छल्लं । काउं जेण जिणिंदेहि, वन्नियं उत्तमं एयं ॥२२८॥
अर्थ-इस कारणसे तुम्हारेको इन साधर्मियोंका वात्सल्य करना युक्त है इस कारणसे तीर्थंकरोंने साधर्मियोंका
वात्सल्य प्रधान वर्णन किया है ॥ २२८ ॥
तो तुटहिं तेहिं, सुसावएहिं वरंमि ठाणंमि । ते ठाविऊण दिन्नं, धणकणवत्थाइयं सर्व ॥ २२९ ॥
अर्थ-तदनंतर श्रीगुरूके उपदेशसे संतोप पाए हुए सुनावकोंने श्रीपाल मदनसुंदरीको प्रधान आवास घर वगै-
रह रहनेको दिया धन धान्य वस्त्रादि सर्व वस्तु देते भए ॥ २२९ ।।
न य तं करेइ माया, नेव पिया नेव बंधुवग्गो य । जं वच्छल्लं साहम्मियाण, सुस्सावओ कुणइ ॥२३०॥
अर्थ-वह वात्सल्य माता नहीं करे पिताभी नहीं करसके और भाइयोंका समुदायभी नहीं करे जो वात्सल्य
साधर्मि सुश्रावक करे है ॥ २३० ॥
तत्थ ट्ठिओ सो कुमरो, मयणावयणेण गुरुवएसेणं । सिक्खेइ सिद्धचक्कपसिद्धपूयाविहिं सम्मं ॥ २३१॥
॥३१॥

अर्थ-वहां रहा हुआ श्रीपाल कुमर मदनसुंदरीके वचनसे तथा गुरूके उपदेशसे श्री सिद्धचक्रका प्रसिद्ध पूजा विधिका सम्यक् अभ्यास करे ॥ २३१ ।। अह अन्न दिणे आसोय, सेयअट्ठमितिहीइ सुमुहुत्ते। मयणासहिओ कुमरो, आरंभइ सिद्धचकतवं २३२ अर्थ-~-उसके अनंतर अन्य दिन आश्विन सुदि ८ अष्टमीके दिन शुभ मुहूर्तमें मदनसुंदरी सहित श्रीपालकुमर श्री सिद्धचक्रका तप प्रारंभ करे ॥ २३२ ।। पढमं तणुमणसुद्धी, काउण जिणालए जिणचं च। सिरिसिद्धचकपूयं, अट्ठपयारं कुणइ विहिणा ॥२३३॥ अर्ध-पहले शरीर और अन्तःकरणकी शुद्धि करके और जिनमंदिरमें श्री तीर्थकरकी पूजा करके श्री सिद्ध चक्रकी अष्ट मकारी पूजा करे ॥ २३३ ।। एवं कयविहिपूओ, पञ्चक्खाणं करेइ आयामं । आणंदपुलइअंगो, जाओ सो पढमदिवसे वि ॥२३४॥ अर्थ-दस प्रकारसे करी है विधिसे पूजा जिसने ऐसा श्रीपालकुमर आंविलका पच्चक्खान करे पहले दिवसमें भी आनंदसे रोमोद्म युक्त अंग जिसका ऐसा भया ॥ २३४ ॥ वीयदिणे सविसेसं, संजाओ तस्स रोगउवसामो। एवं दिवसे दिवसे, रोगखए वढए भावो ॥२३५॥ ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥३२॥
अर्थ-दूसरे दिनमें श्रीपाल कुमरके विशेष करके रोगका उपशम हुआ इस प्रकारसे दिन २ में रोगका क्षय होनेसे
शुभ परिणामकी वृद्धि होवे ॥ २३५ ॥
अह नवमे दिवसंमी, पूयं काऊण वित्थरविहीए। पंचामएण न्हवणं, करेइ सिरिसिद्धचकस्स ॥२३६॥
अर्थ-वाद नवमे दिनमें विस्तारविधिसे श्री जिनपूजा करके पंचामृतसे श्री सिद्धचक्रयंत्रराजका विस्तारसे स्नात्र
महोत्सव करे ॥ २३६ ॥
न्हवणूसवंमि विहिए, तेणं संतीजलेण सवंगं । संसित्तो सो कुमरो, जाओ सहसत्ति दिवतणू ॥ २३७ ॥
अर्थ-श्री सिद्धचक्रका स्नात्रमहोत्सव करनेपर उस शान्ति जलसे सर्वशरीरसींचा अर्थात् वह जल शरीरमें
लगाया तव वह कुमर अकस्मात् मनोहर अद्भुत दिव्य शरीर जिसका ऐसा भया ॥ २३७ ॥
सवेसिं संजायं, अच्छरियं तस्स देसणे जाव । ताव गुरू भणइ अहो, एयरस किमेयमच्छरियं ॥२३८॥
अर्थ-वैसा रूप श्रीपालका देखनेसे जितने सब लोगोंको आश्चर्य भया उतने गुरू कहे अहो लोगो यह कुछभी
आश्चर्य नहीं है किंतु ॥ २३८ ॥
इमिणा जलेण सबे, दोसा गहभूयसाइणीपमुहा । नासंति तक्खणेणं, भवियाणं सुद्धभावाणं ॥२३९॥
A
,
॥३२॥

,
अर्थ-इस शांति जल करके निर्मल मनपरिणामवाले भव्योंके ग्रह, भूत, शाकिनी प्रमुख सर्व दोप ततकालही
नष्ट होवे है ॥ २३९ ॥
खयकुट्ठजरभगंदर-भूया वायाविसूइयाईया । जे केवि दुट्ठरोगा, ते सत्वे जंति उवसामं ॥ २४० ॥
अर्थ-क्षय, कुष्ट, ज्वर, भगंदर तथा वायु रोग और विशुचिका अजीर्णादिक जे केइ दुष्ट रोग वह सर्व उपशम
होये है अर्थात् शान्त होवे है ॥ २४० ।।
जलजलणसप्पसावय, भयाइं विसवेयणा उईईओ। दुपयचउप्पय मारीउ, नेव पहवंति लोयंमि ॥४१॥
अर्ध-जल, अग्नि, सर्प, स्वापद, सिंहादिकोंसे भय तथा विपवेदना जहरसे भई पीड़ा तथा इति नाम उत्पात तथा
मनुप्य तिर्योंक मरीका उपद्रव लोकमें नहीं होवे ॥ २४१ ।।
वंझाणवि हुंति सुया, निंदूणवि नंदणा य नंदति । फिटति पुट्टदोसा, दोहग्गं नासइ असेसं ॥२४२॥
अर्थ-बंध्या स्त्रियोंकेभी पुत्र होवे मृतवत्सारोगवाली स्त्रियोंके पुत्र वड़े होवे तथा उदर दोप नष्ट होवे और
सम्पूर्ण दुर्भाग्य दूर होवे ॥ २४२ ॥
पभावं निसुणिऊण, दट्टण तं च पञ्चक्खं । लोया महप्पमोया, संति जलं लिंति सविसेसं ॥४३॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥३३॥ श्री सिद्धचक्रके स्नान जलका इत्यादि प्रभाव सुनके और प्रत्यक्ष प्रभाव देखके महान हर्ष जिन्होंको ऐसे लोग विशेष करके शांति जल ग्रहण करके अपने २ घरमें लेजाके छांटा विमारों शांति जल लगाया उससे अच्छे भए ॥२४३॥ तं कुट्ठिपेडयं पि हु, तज्जलसंसित्तगत्तमचिरेण । उवसंतप्पायरुअं, जायं धम्ममि सरुई च ॥२४४ ॥ अर्थ-वह कोढ़ी मनुष्योंका समुदायभी शांति जलको अपने शरीरमें लगाया तब थोड़े कालमें उपशांत प्राय रोग भया और धर्ममें रुचि अभिलाषा बढ़ी अर्थात् धर्ममें रुचिवाले भए ॥ २४४ ॥ मयणा पइणो निरुवमरूवं च निरूविऊण साणंदा। पभणेइ पइं सामिय, एसो सबो गुरुपसाओ ॥४५॥ अर्थ-और मदनसुंदरी अपने पतिका निरुपम अतिअद्भुत रूप देखके आनंद सहित भई श्रीपालकुमरकों कहे हे स्वामिन् यह सर्व श्रीगुरु महाराजका प्रसाद है ॥ २४५ ॥ मायपियसुयसहोयर,-पमुहावि कुणंति तं न उवयारं । जं निकारणकरुणा,-परो गुरू कुणइ जीवाणं ॥४६॥ अर्थ-माता, पिता, पुत्र, भाई प्रमुख ग्रहणसे औरभी स्वजनवगैरह यह सर्व वह उपकार नहीं करसके है वह उपकार जीवोंका निष्कारण करुणा प्रधान जिन्होंके ऐसे गुरू करे हैं ॥ २४६ ॥ तं जिणधम्मगुरूणं, माहप्पं मुणिय निरुवमं कुमरो।देवे गुरुमि धम्मे, जाओ एगंतभत्तिपरो॥२४७॥ AR ॥३३॥ , RS -- अर्ध-जिन, धर्म, गुरू इन्होंका सर्वोत्कृष्ट माहात्म्य जानके कुमर श्रीपाल देव वीतराग १ गुरू शुद्धसाधु २ धर्म सर्वज्ञका कहा हुआ निश्चयसे इन्होंकी भक्ति में तत्पर हुआ ॥ २४७ ।। धम्मपसाएणं चिय, जहजह माणति तत्थ सुक्खाई।ते दंपईउ तह तह, धम्ममि समुज्जमा निच्चं ॥२४८॥ अर्ध-वहां उज्जनीमें रहते हुए स्त्री भर्तार धर्मके प्रसादसेही जैसे २ सुखभोगवे वैसा २ सद्धर्मके विपय निरंतर उधम करे ॥ २१८॥ अह अन्नया उ तेजिणहराओ, जा नीहरंति ता पुरओ। पिक्खंति अद्धवुद्धि, एगं नारिं समुहमिति ॥२४९॥ अर्थ-उसके अनंतर स्त्री भार श्रीपाल मदनसुंदरी अन्य दिनमें जितने जिनमंदिरसे वाहिर निकले उतने आगे अर्ध वृद्धा स्त्रीको सामने आती भई देखी ॥२४९ ।। तं पणमिऊण कुमरो, पभणइ रोमंचकंचुइजंतो। अहो अणभा वुट्ठी, संजाया जणणिदसणओ ॥२५०॥ अर्थ-उस स्त्रीको नमस्कार करके श्रीपाल कुमर आनन्दसे रोमोद्गम युक्त इस प्रकारसे वोला अहो आज माताके दर्शनसे वादल विना वर्षात भया ॥ २५० ।। मयणाविहु पियजणणिं, नाउंजा नमइ ता भणइ कुमरो।अम्मो एस पहावो, सबो इमीए तुह बहुहाए॥ एक -

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श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥३४॥
अर्थ-मदनसुंदरीभी अपने भारकी माता जानके जितने नमस्कार करे उतने कुमर कहे हे माताजी यह प्रत्यक्ष
जो देखा जाय है यह सर्व इस आपकी वहूका प्रभाव है ॥ २५१ ॥
साणंदा सा आसीस,दाणपुत्वं सुयं च वहुयं च । अभिनंदिऊण पभणइ, तइयाहं वच्छ ! तं मुत्तुं॥५२॥
अर्थ-कुमरकी माता आनंद सहित होके आशीर्वाद देने पूर्वक पुत्र और पुत्रकी वहकी प्रशंसा करके कहने लगी
अपना वृतान्तसो कहते है हे वत्स उस वक्तमें मैं तेरेको यहां रखके ॥ २५२ ॥
कोसंबीए विजं सोऊणं, जाव तत्थ वच्चामि । ता तत्थ जिणाययणे, दिट्ठो एगो मुणिवरिंदो ॥२५३॥
कौसांबी नगरीमें सव रोगको मिटानेवाला वैद्यको सुनके जितने वहां जाऊं उतने उस नगरीमें एक मुनिवरिन्द्रको
देखा कैसा है मुनीन्द्र सो कहते हैं ॥ २५३ ॥
खतो दंतोसंतो, उवउत्तो युत्तिमुत्तिसंयुत्तो। करुणारसप्पहाणो, अवितहनाणो गुणनिहाणो ॥२५४॥
अर्थ-क्षमायुक्त दान्त नाम जितेन्द्रिय शान्तरस युक्त उपयुक्त उपयोगवान मन वचन कायाकी गुप्ति सहित और
निर्लोभी और करुणारस प्रधान जिसके तथा सत्य ज्ञान जिसका इसीसे गुणोंका निधान ।। २५४ ॥
धम्म वागरमाणो, पत्थावे नमिय सो मए पुट्ठो। भयवं किं मह पुत्तो, कयावि होही निरुयगत्तो ॥५५॥
॥ ३४ ॥

अर्थ-इस प्रकारका वह मुनीन्द्र धर्मका स्वरूप कहताथा तव अवसर पायके नमस्कार करके मैने प्रश्न किया है भगवन् में प्रश्न करती हूं मेरा पुत्र कव निरोग होगा रोगरहित शरीर जिसका ऐसा ॥ २५५ ॥ तण मुणिंदेणुत्तं, भद्दे सो तुझ नंदणो तत्थ । तेणं चिय कुट्टियपेडएण, दट्टण संगहिओ ॥ २५६ ॥ अर्थ-तब उस मुनिन्द्रने कहा है भद्रे हे पुत्रि तेरे पुत्रको उज्जैनीमें उन कोढ़ी मनुप्यों ने देखके ग्रहण किया अपने पासमें रक्खा है ॥ २५६ ॥ विहिओ उंबरराणुत्ति, नियपह लद्धलोयसम्माणो। संपइ मालवनरवइ,-धूयापाणप्पिओ जाओ ॥२५७॥ अर्ध-वाद उन कोढ़ी पुरुषांने तेरे पुत्रका उम्बर राणा ऐसा नाम करके अपना स्वामी किया है वह तेरा पुत्र लोकोमें सत्कारपाया है इस वक्त में मालवदेशका राजा प्रजापालकी पुत्री मदनसुंदरीका प्राणप्रिय अर्थात् भर्तार भया है ॥ २५७ ॥ रायमुयावयणेणं, गुरूवइटुं स सिद्धवरचकं । आराहिऊण सम्म, संजाओ कणयसमकाओ ॥ २५८ ॥ अर्थ-यह तेरा पुत्र राजपुत्री मदनसुंदरीके वचनसे श्री गुरूका कहा हुआ सिद्धचक्रयंत्रराजको विधि से आराधके सोनेके महश शरीर जिसका ऐसा स्वर्णवर्ण देह भया है ॥ २५८ ॥ सो य साहम्मिएहि, पूरियविहवो सुधम्मकम्मपरो।अच्छइ उजेणीए, घरणीइ समन्निओ सुहिओ २५९ 15

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥ ३५ ॥
अर्थ-वह तेरा पुत्र इस वक्त अपनी स्त्रीसहित उज्जैनीमें रहता है कैसा है वह साधर्मियोंने पूर्ण किया है स्वर्णादि
द्रव्य जिसको और शोभन धर्म कार्य वही है प्रधान जिसके ऐसा और सुख भया है जिसके ऐसा सुखी रहता है ॥५॥
तं सोऊणं हरिसियचित्ताहं वच्छ! इत्थ संपत्ता । दिट्ठोसि बहूसहिओ, जुन्हाइ ससिव्व कयहरिसो॥६०॥
अर्थ-वैसा गुरूका बचन सुनके हे वत्स मैं हर्षित चित्त भई ऐसी यहां प्राप्त भई हूं इस समयमें चन्द्रमाकी
चांदनी सहित चन्द्र के जैसा वहूसहित तुमको देखा है यहां कुमरको चन्द्रकी उपमा और वहूको चांदनी रात्रिकी उपमा
कैसा है तें किया है हर्ष जिसने ऐसा ॥ २६० ॥
तावच्छ? तुमं बहुया,-सहिओ जय जीव नंद चिरकालं। एसुचियजिणधम्मो, जावज्जीवं च महसरणं२६१
अर्थ-तिस कारणसे हे पुत्र तैं वहूसहित बहुतकालतक जयवन्ता होय सर्वोत्कृष्ट वर्त चिरंजीव रहो समृद्धि प्राप्त
होवो इस जिनधर्मका जावज्जीव मेरेभी शरणा है ॥ २६१ ॥
जिणरायपायपउमं, नमिऊणं वंदिऊण सुगुरुं च। तिन्निवि करंति धम्म, सम्मं जिणधम्मविहिनिउणा२६२
अर्थ-तदनंतर माता पुत्र वहू यह तीन जीव श्री जिनेन्द्र देवका दर्शन करके और श्री सुगुरू महाराजको वन्दना
करके सम्यक् धर्म करते हुए रहे कैसे हैं तीनों जिन धर्ममें निपुण है ॥ २६२॥
ते अन्नदिणे जिणवरपूयं, काऊण अंगअग्गमयं । भावच्चयं करिता, देवे वंदंति उवउत्ता ॥ २६३ ॥
,
॥३५॥

,
TRE
अर्थ-वे तीनों जणा अन्य दिनमें श्री तीर्थकरकी अंगपूजा और अग्रपूजा करके भावपूजा उपयोगसहित करते
है अर्थात् देववंदना करते भए उस वक्त क्या भया सो कहते हैं ॥ २६३ ।।
इओ य धूयादुहेण सा, रूप्पसुंदरी रूसिऊण सह रन्ना। नियभायपुण्णपालस्स, मंदिरे अच्छइ ससोया ॥
अर्थ-धरसे पुत्रीके दुःखसे रुप्पसुंदरी रानी राजाके साथ रूसके अर्थात् नाराज होके अपना भाई पुन्यपालके
घरमं जाके शोकसहित रही ।। २६४ ॥
वीसारिऊण सोयं, सणियं सणियं जिणुत्तवयणेहिं । जग्गियचित्तविवेया, समागया चेइयहरंमि २६५
अर्थ-वह रूप्पमुंदरी रानी धीरे २ शोकको दूर करके तीर्थकरके कहे हुए वचनोंसे जाग्रत हुआ है चित्तमें
निर्मल विवेक जिसके एसी जिनमंदिर आई ॥ २६५ ॥
जा पिक्खइ सा पुरओ, तं कुमरं देववंदणापउणं । निउणं निरुवमरूवं, पञ्चक्खं सुरकुमारव(रंव) ॥२६६॥
अर्ध-यह रूपसुंदरी रानी जितने आगे उस कुमरको देखे कैसा है कुमर देववंदनामें लगा है मन जिसका और
विचक्षण उपमारहित रूप आकृति सौंदर्य जिसका और प्रत्यक्ष देवकुमारके सदृश ऐसा ॥ २६६ ॥
तप्पुट्ठीइ ठियाओ, जणणी जायाउ ताव तस्सेव । दह्ण रुप्पसुंदरी, राणी चिंतेइ चित्तंमि ॥२६७॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥३६॥
अर्थ-उतने कुमरके पीछे रही भई कुमरकी माता और स्त्रीको देखके रूप्पसुंदरी रानी मनमें विचारती भई क्या
विचारा सो कहते हैं ॥ २६७ ॥
ही एसा का लहुया, वहुया दीसेइ मज्झ पुत्तिसमा। जावनिउणं निरिक्खइ, उवलक्खड़ ताव तं मयणं ६८
अर्थ-हि यह विचारमें है रानी विचारती है मेरी पुत्रीके सदृश यह छोटी बहू कौन दीखती है ऐसा विचारके
जितने अच्छी तरहसे देखे उतने उसको मदनसुंदरी है ऐसा जाने ॥ २६८ ॥
नूणं मयणा एसा, लग्गा एयस्स कस्सवि नरस्स। पुट्ठीइ कुट्टियं तं, मुत्तूणं चत्तसइमग्गा ॥ २६९ ॥
अर्थ-तब उसके अनन्तर इस प्रकारसे विचारे निश्चय यह मदनसुंदरी मेरी पुत्री उस कुष्टी पुरुषको छोड़के सतीके
मार्गका त्याग किया है जिसने ऐसी यह कोई पुरुषके पीछे लगी है ऐसा जाना जाय है ॥ २६९ ॥
मयणा जिणमयनिउणा, संभाविजइ न एरिसंतीए। भवनाडयंमि अहवा, ही ही किंकिं न संभवइ ॥७॥
अर्थ-मदनसुंदरी जिनमतमें निपुण वर्ते है उससे ऐसा अकार्यका करना नहीं संभवे अथवा ही ही इति अति-
खेदे भव नाटकमें जीवोंके क्या २ नहीं संभवे अपि तु सर्व संभवे है ॥ २७० ॥
विहियं कुले कलंक, आणीयं दूसणं च जिणधम्मे । जीए तीइ सुयाए, न भुयाए तारिसं दुक्खं ॥२७१॥
अर्थ-जिसने कुलमें कलंक लगाया जिन धर्मपर दूषण प्राप्त किया वह पुत्री मरजाती तो वैसा दुःख नहीं होता ॥७१॥
,
॥३६॥

SH जारिसमरिस असमंजसेण, चरिएण जीवयंतीए । जायं मज्झ इमीए, धूयाइ कलंकभूयाए ॥२७२॥ अर्थ-जैसा दुःख ऐसा अयोग्य आचरण करनेसे कलंकभूत पुत्री जीवती भईसे मेरेको उत्पन्न भया कि जिसने अपने पतिको छोड़के अन्य पुरुपको अंगीकार किया ॥ २७२ ।। एवं चिंतंती रुप्पसुंदरी, दुक्खपूरपडिपुपणा । करुणसरं रोयंती, भणेइ एयारिसं वयणं ॥ २७३ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे विचारती भई दुःखके पूरसे भरी भई रुप्पसुंदरी रानीभी करुणा स्वरसे रोती भई जैसा होय धेसा ऐसा वचन वोली || २७३ ॥ घिद्धी अहो अकजं, निवडउ वजं च मज्झ कुच्छीए। जत्थुप्पन्नावि वियक्खणावि, ही एरिसं कुणइ २७४ अर्ध-अहो इति आश्चर्ये इस अकार्यको धिक्कार होवो धिक्कार होवो और मेरी कुक्षि नाम उदरमें बन पड़ो इस मेरी कुक्षिमें उत्पन्न भईभी और विचक्षण होके ऐसा अकार्य करे है ॥ २७४ ।। तं सोऊणं मयणा, जा पिक्खइ रुप्पसुंदरी जणणिं।रुयमाणि ता नाओ, तीए जणणीअभिप्पाओ॥२७५॥ अर्थ-ऐसा वचन सुनके मदनसुंदरी जितने अपनी माताको रोती भई देखे उतने मदनसुंदरीने अपनी माताका अमिनाय मनका विचार जाना ॥ २७५ ।। 15555555 पापा.प.७ N

: श्रीपाल-
चरितम
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ३७॥
चिअवंदणं समग्गं, काऊणं भयणसुंदरी जणणि । कर वंदणेण वंदिय, वियसियवयणा भणइ एवं २७६
अर्थ-तदनंतर मदनसुंदरी संपूर्ण चैत्य वंदना करके अपनी माताको हाथजोड़के प्रणाम करके विकस्वरमान
मुख जिसका ऐसी कहा जायगा जिसका स्वरूप ऐसा वचन बोली ॥ २७६ ॥
अम्मो? हरिसठ्ठाणे, कीस विसाओ विहिज्जए एवं, । जं एसोनीरोगो, जाओ जामाउओ तुम्हं ॥२७७॥
अर्थ-सो कहते हैं हे माताजी हर्षके ठिकाने दुःख कैसा करो हो जिसकारणसे यह तुम्हारा जमाई निरोग भया
है इसलिए यहां हर्ष करना युक्त है ऐसा भाव है ॥ २७७ ॥
अन्नं च ज वियप्पह, तं जइ पुवाइ पछिमदिसाए, उग्गमइ कहवि भाणू, तहवि न एयं नियसुयाए २७८
अर्थ-और जो अकार्यका आचरण लक्षण अपनी पुत्रीका विचारो हो वह तो जो सूर्य पूर्वदिशिको छोड़के पश्चिम
दिशिमें ऊगे तथापि तुम्हारी पुत्रीसे नहीं होवे अर्थात् मदनसुंदरीसे अकार्य कभी होवे नहीं ॥ २७८ ॥
कुमरजणणीवि जंपइ, सुंदरि? मा कुणसु एरिसं चित्ते।तुज्झ सुयाइ पभावा, मज्झ सुओ सुंदरो जाओ।
अर्थ-तव कुमरकी माताभी बोली हे सुंदरि तुम अपने मनमें ऐसा विचार करना नहीं जिस कारणसे तुम्हारी
पुत्रीके प्रभावसे यह मेरा पुत्र ऐसा सुंदर भया है ।। २७९ ॥
धन्नासि तुमं जीए, कुच्छीए इत्थिरयणमुप्पन्नं । एरिसमसरिससीलप्प-भावचिंतामणिसरिच्छं ॥२८॥

अर्थ-ई सुंदरि तुम धन्य हो जिसकी कुक्षिमें ऐसा स्त्रीरत्न उत्पन्न भया है कैसा सो कहते हैं असदृश अनुपम उप-
मारहित जो ब्रह्मचर्य उसके प्रभावसे चिंतामणि रत्नके तुल्य है ॥ २८० ॥
हरिसबसेणं सा रुप्प-सुंदरी पुच्छए किमेयंति। मयणावि सुविहिनिउणा, पभणइ एयारिसं वयणं ॥२८॥
अर्थ-एसा वचन सुनके रुप्पसुंदरी रानी हर्पके वशसे कुमरकी माताको ऐसा पूछा यह क्या वृत्तान्त है तव
विधिको जाननेवाली मदनसुंदरी इस प्रकारसे वोली ।। २८१ ।।
चेझ्यहरंमि वत्ता, लामि कए निसीहियाभंगो। होइ तओ मह गेहे, वच्चह साहेमिमं सदं ॥२८२॥
अर्थ-क्या बोली सो कहते है चत्यघर जिनमंदिरमें वार्तालाप करनेसे निसहीका भंग होवे है तिसकारणसे आप
मर घर चलो जिमसे में यह सर्व वृत्तान्त कहूं ॥ २८२ ।।
तत्तो गंतॄण गिहं, मयणाए साहिओ समग्गोवि । सिरिसिद्धचकमाहप्प, संजुओ निययवुत्तंतो॥२८३ ॥
अर्थ-बादमें घर जाके मदनसुंदरीने सव अपना वृत्तान्त कहा कैसा है वृतान्त श्री सिद्धचक्रका जो माहात्म्य उस
फरक सहित है।। २८३ ॥
तं सोऊणं तुट्टा, रुप्पा पुच्छेइ कुमरजणणिपि। वंसुप्पत्तिं तुह नंदणस्स, सहि ? सोउमिच्छामि ॥२८४॥

श्रीपाल-
चरितम्
,
॥३८॥
,
अर्थ-वह अपने जमाईका वृत्तान्त सुनके संतोष प्राप्त भई रुप्पसुंदरी रानी कुमरकी मातासे पूछे, सो कैसे, कहते भाषाटीका-
हे सखि हे सम्वधनि तुम्हारे पुत्रकी वंशोत्पत्ति सुननेकी इच्छा है किस वंशमें उत्पन्न भया है ॥ २८४ ॥
सहितम्.
पभणेइ कुमरमाया, अंगादेसंमि अत्थि सुपसिद्धा । वेरिहिं कयअकंपा, चंपानामेण वरनयरी ॥ २८५॥
अर्थ-अव कुमरकी माता कहती है अंग नाम देशमें अतिशय प्रसिद्ध चंपा नामकी प्रधान नगरी है वैरियोंने नहीं
किया है कंप जिसको ऐसी ॥ २८५ ॥
तत्थ य अरिकरिसीहो, सीहरहो नाम नरवरो अस्थि । तस्स पिया कमलपहा, कुंकुणनरनाहलहुभइणी॥
अर्थ-उस चंपानगरीमें वैरीही हाथी उन्होंको भगानेमें सिंहके जैसा सिंहरथ नामका राजा है सामान्यसे वर्तमा-
नका निर्देश किया है अन्यथा सिंहरथ राजा होता भया उस राजाके कुंकणदेशके राजाकी छोटी बहिन कमलप्रभा
नामकी रानी है ।। २८६ ॥
तीए अपुत्तियाए, चिरेण वरसुविणसूइओ पुत्तो। जाओ जणियाणंदो, वद्धावणयं च कारवियं ॥२८७॥
अर्थ-नहीं विद्यमान पुत्र जिसके ऐसी रानीके बहुत कालसे प्रधान स्वप्न सूचित पुत्र भया कैसा पुत्र उत्पन्न किया
है आनंद जिसने ऐसा राजाने वधाई कराई ॥ २८७ ॥
॥ ३८ ॥
पभणेइ तओ राया, अम्हमणाहाइ रायलच्छीए। पालणखमो इमो ता, हवेउ नामेण सिरिपालो ॥२८॥

Nex 4-52-51 अर्थ-तदनंतर राजा कहे हमारी अनाथ राज्य लक्ष्मीको पालने में समर्थ है इस लिए इस कुमरका नाम श्रीपाल पुगर ऐसा होवो इस कहने कर उस कुमरका नाम श्रीपाल ऐसा स्थापा ॥ २८८ ।। सो सिरिपालो वालो, जाओ जा वरिसजुयलपरियाओ।ता नरनाहो सूलेण, झत्ति पंचत्तमणुपत्तो ॥२८९॥ अर्थ-वह श्रीपाल वालक जितने २ वर्षका भया उतने उसका पिता सिंहरथ राजाने शूल रोगसे शीघ्र मरण पाया ८९ कमलप्पभा स्यंती, मइसायरमंतिणा निवारित्ता । धाईउच्छंगठिओ, सिरिपालो छाविओ रज्जे ॥ २९० ॥ अर्थ-तव रोती भई कमलप्रभा रानीको मतिसागर मंत्री मनाकरके धाय माताकी गोदीसे श्रीपालवालककों लेके राज्य स्थापा ।। २९० ॥ जंबालस्सवि सिरिपालनाम रन्नो पवत्तिया आणा।सवत्थवि तो पच्छा, निवमयकिच्चंपि कारवियं ॥२९१॥ अर्थ-जो वालकभी श्रीपाल नाम राजाकी आज्ञा सर्वत्र प्रवर्ताई वाद राजाका मृतक कार्य अग्निसंसकारादि कराया ९१ चालोवि महीपालो, रजं पालेइ मंतिसुत्तेण । मंतीहिं सवत्थवि, रजं रक्खिज्जए लोए ॥ २९२ ॥ अर्थ-बालकभी श्रीपाल राजा मंत्रीकी व्यवस्थासे राज्य पाले यह अर्थ युक्त है जिस कारणसे सर्वत्र लोकमें मंत्रियों करके राज्यकी रक्षा करी जावे है कहाभी है मंत्रिहीनो भवेद् राजा तस्य राज्यं विनश्यति इति वचनात् २९२

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितमू
॥३९॥
कइवयदिणपजते, बालयपित्तिजओ अजियसेणो।परिगहभेयं काउं, मंतइ निवमंति बहणत्थं ॥२९॥
अर्थ-कितने दिनोंके बाद बालक श्रीपाल राजाका पितृव्य काका अजितसेन राजा परिवारका भेद करके राजा
और मंत्रवीको मारनेका विचार करे ॥ २९३ ॥
तंजाणिऊण मंति, कहिओ कमलप्पभाइ सबंपि। विन्नवइ देवि ? जह तह, रक्खिजसु नंदणं निययं ९४
अर्थमंत्री वह विचार जानके कमलप्रभा रानीको सब वृतान्त कहके विनती करी हे देवी हे महारानी यथा
तथा जिस तिस प्रकार करके अपने पुत्रकी रक्षा करो ॥ २९४ ॥
जीवंतेण सुएणं, होही रजं पुणोवि निष्भंतं । ता गच्छ इमं पित्तुं, कत्थवि अहयंपि नासिस्सं ॥२९५॥
अर्थ-पुत्र जीता रहेगा तो और भी निसंदेह राज्य होगा इसलिए इस बालकको लेके कहीं चलीजाओ मैं भी यहांसे
भागके जाउंगा ॥ २९५ ॥
तत्तो कमला घित्तूण, नंदणं निग्गया निसिमुहंसि । मा होउ मंतभेओत्ति, सबहा चत्तपरिवारा ॥२९॥
अर्थ तदनंतर कमलप्रभा रानी पुत्रको लेके संध्या समयमें निकली कैसी रानी इस विचारको कोई जानो मत
ऐसा विचारके सर्वथा दास्यादि परिवारका त्याग किया जिसने ऐसी एकाकिनी निकली ॥ २९६ ॥
निवभजासुकुमाला, वहियवो नंदणो निसा कसिणा। चंकमणं चरणेहि, ही ही विहिविलसियं विसमं ९७
॥३९॥

k अर्थ-राजाकी रानी है इस कारणसे सुकुमार शरीरवाली है और पुत्रको गोदीमें उठाके चलना होवे है तथा रात्रि अंधारी है और पगोंसे चलना है रथादिक सवारीके अभावसे इतनी आपदा एक वक्तमें पाई ही ही यह खेदकी वात है विधिका विलास अतिविपम है ॥ २९७ ।। पिय मरणं रज सिरी,-नासोएगागिणित्तमरितासो। रयणीवि विहायंती, हा संपइ कत्थ वच्चिस्सं ॥२९८॥ अर्ध-मार्गमें चलती भई कमलप्रभा विचार करे भर्तारका मरण राज्यलक्ष्मीका नाश एकाकिनीपना और वैरीका त्रास रात्रि जाती भई अर्थात् प्रभात होता भया दिखताहै हा इति खेदे अव कहां जाऊं ॥ २९८ ॥ इच्चाइ चिंतयंती, जा वच्चइ अग्गओ पभायंमि । ता फिट्टाए मिलियं, कुट्टियनरपेडयं एगं ॥ २९९ ॥ अर्थ-इत्यादि विचारती भई जितनें आगे चलती है उतने प्रभात समयमें एक कोढ़ी मनुष्योंका पेड़ा याने समूह विना विचाराही मिला अर्थात् अकस्मात् मिला ॥ २९९ ॥ तं दट्टणं कमला, निरुवमरूवा महन्धआहरणा। अवला वालिक्कसुया, भयकंपिर तणुलया रुयइ ॥३००॥ अर्ध-उन कुष्टी मनुप्योंके समुदायको देखके भयसे कांपती भई कमलप्रभा रोती भई कैसी है कमलप्रभा निरुपम अनुत है रूप जिसका और बहुत कीमतके आभरण हैं जिसके पासमें, और स्त्री होनेसे अवला है और वालक एक पुत्र है जिसके ऐसी ॥ ३०० ।। *

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥४०॥
तं रुयमाणि दटुं, पेडयपुरिसा भणंति करुणाए। भद्दे कहेसु अम्हं, काऽसि तुमं कीस वीहेसि ॥३०१॥
अर्थ-तब कोढ़ियोंके पेड़ेका मनुष्यो नें उस रानीको रोती भई देखके करुणासे बोले हे भद्रे तैं हमसे कह तैं कौन है
और कैसे डरती है ॥ ३०१॥
तीए नियबंधूणिव, कहिओ सहोवि निययवुत्तंतो। तेहिं च सा सभइणिव, सम्ममासासिया एवं ॥२॥
अर्थ-बादमें उस रानीने अपने भाइयोंके जैसा सर्व अपना वृतान्त कहा उन्होंसे, और उन्होंने उस रानीको अपनी
बहिनके जैसी समझके और वक्ष्यमाण प्रकार करके आश्वसना दिया कैसे सो कहते हैं ॥३०२॥
मा कस्सवि कुणसु भयं, अम्हे सवे सहोयरा तुज्झ । एआइ वेसरीए, आरूढा चलसु वीसत्था ॥३०॥
अर्थ-हे भगिनी तेरेको किसीकाभी भय नहीं करना जिस कारणसे हम सब तेरे भाई हैं इस खचरनीपर बैठी
हुई विश्वास युक्त सुखसे चलो ॥३०३ ॥
तत्तो जा सा वरवेसरीए, चडिया पडेण पिहियंगी। पेडयमझमि ठिया, नियपुत्तजुया सुहं वयइ ॥४॥
अर्थ-तदनंतर कमलप्रभा रानी प्रधान वेशरणी नाम खचरनीपर बैठी भई और वस्त्रसे जिसका शरीर ढका है और
कोढ़ियोंके पेडेके मध्यमें रही भई अपने पुत्र सहित सुखसे चलती है ॥ ३०४ ॥
॥ ४०॥

तापत्ता वेरिभडा, उपभडसत्थेहिं भीसणायारा । पुच्छंति पेडयं भो, दिट्ठा किं राणिया एगा ॥३०५॥ अर्ध-उतने वैरी अजितसेन राजाका सुभट आके कोढ़ी मनुष्योंके वृन्दसे पूछे अहो तुमने क्या एकरानी देखी कसे है सुभट उभट शस्त्रों करके भयंकर है आकार जिन्होंका ऐसे ॥ ३०५॥ पेड़यपुरिसेहिं तओ, भणियं भो अत्थि अम्हसत्थंमि । रउताणियावि नूणं, जइ कजं ता पगिन्हेह ३०६ अर्थ-तदनंतर कोढ़ी पेटकके मनुप्योंने कहा अहो सुभटो हमारे साथमें निश्चय पामा नामकी रानी है जो तुम्हारे पामसे कार्य हो तो अच्छी तरहसे लेवो ॥ ३०६ ॥ एगेण भटेण तओ, नायं भणियं च दिति मे पामं । सवं दिज्जइ संतं, तो कुट्ठभएण ते नट्ठा ॥३०७॥ अर्थ-तदनंतर एक सुभटने जाना और कहा यह कोढ़ी मनुष्य है पामा देवे है युक्त है यह जिसकारणसे सर्व विद्यमान होवे सो दिया जावे है वाद कोढ़के भयसे वह सर्व सुभट भाग गए ॥ ३०७ ।। तेहिं गएहिं कमला, कमेण पत्ता सुहेण उज्जेणिं। तत्थ ट्ठिया य सपुत्ता पेडयमन्नत्थ संपत्तं ॥३०८ ॥ अर्ध-बाद उन सुभटोंके जानेसे कमलप्रभा रानी क्रमसे चलती भई उज्जैनी नगरी सुखसे प्राप्त भई और पुत्रस- हित उजनी नगरी में रही कोढ़ियोंका पेडा तो और कहीं चला गया ॥ ३०८ ॥ भृसणधणेण तणओ, जाविहिओ तीइ जुबणाभिमुहो। ता कम्मदोसवसओ, उंवररोगेणसोगहिओ३०९ --

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥४१॥
,
अर्थ-वाद उस कमलप्रभाने गहना वेचके उस द्रव्यसे अपने पुत्रको यौवन अवस्था प्राक्ष किया उतने पूर्वकृत कर्म
दोषके वशसे उस बालकके उंवर कोढ़ विशेष रोग भया ॥ ३०९॥
वहुएहिपि कएहि, उवयाहिं गुणो न से जाओ । कमलप्पहा अदन्ना, जणं जणं पुच्छए ताव ॥३१०॥
अर्थ-बहुत उपाय करनेसेभी वह रोग नहीं मिटा तव कमलप्रभा रानी अधीर भई हरएक मनुष्यसे रोग जानेका
उपाय पूछे ॥ ३१०॥
केणवि कहियं तीसे, कोसंबीए समस्थि वरविजो । जो अट्ठारसजाई, कुठुस्स हरेइ निष्भंतं ॥३११॥
अर्थ-उतने किसी पुरुषने कमलप्रभासे कहा कौशाम्बी नगरीमें अठारह जातिका कुष्ट रोग मिटानेवाला प्रधान
वैद्य है निसंदेह सब रोगोंको मिटाता है ॥ ३११ ॥
कमला पुत्तं पाडोसियाण, सम्म भलाविऊण सयं । विज्जस्स आणणत्थं, पत्ता कोसंबिनयरीए ॥३१२॥
अर्थ-तब कमलप्रभा रानी अपने पुत्रको पाड़ोसियोंको बोलाकर अर्थात् सौंपके आप वैद्यको बुलानेके वास्ते
कौशाम्बी नगरी प्राप्त भई ॥ ३१२ ॥
तं विजं तित्थगयं, पडिक्खमाणी चिरं ठियातत्थ।मुणिवयणाओ मुणिऊण, पुत्तसुद्धिं इहं पत्ता ॥३१३॥
॥४१॥

अर्थ--उस वैद्यको तीर्थयात्रा गया भया सुनके कमलप्रभा रानी वैद्यकी वाट देखती भई कौशाम्बी नगरीमें बहुत
फालतक रही पीछे मुनिके वचनसे पुत्रकी खबर जानके यहां आई ॥ ३१३ ॥
साऽहं कमला सो एस मज्झ, पुत्तुत्तमो सिरिपालो । जाओ तुझ सुयाए, नाहो सवत्थ विक्खाओ॥१४॥
अर्थ-यह कमलप्रभा मैं हूं वह यह मेरा पुत्रोत्तम श्रीपाल कुमर है जो तुम्हारी पुत्रीका भर्तार भया है और सर्वत्र
लोकमें प्रसिद्ध भया है ।। ३१४ ॥
सीहरहरायजायं, नाउं जामाउयं तओ रुप्पा । साणंदं अभिणंदइ, संसइ पुन्नं च धूयाए ॥ ३१५ ॥
अर्थ-तदनंतर रुप्पसुंदरी रानी सिंहरथ राजाके पुत्रको जमाई जानके आनंदसहित जैसा होय वैसा पुत्रीके पुण्यकी
अनुमोदना करे याने पुत्रीके पुण्यकी प्रशंसा करे ॥ ३१५ ।।
गंतूण गिहं रुप्पा, कहेइ तं भायपुन्नपालस्स । सोऽवि सहरिसो कुमरं, सकुटुंवं नेइ नियगेहं ॥ ३१६ ॥
अर्थ-तदनंतर रुप्पमुंदरी रानी अपने घर जाके अपने भाई पुण्यपालके आगे वह वृत्तान्त कहे तव पुण्यपालभी
हर्षसहित मातादि कुटुंबसहित कुमरको अपने घर लावे ॥ ३१६ ॥
अप्पेइ वरावासं, पूरइ धणधन्नकंचणाईयं । तत्थऽच्छइ सिरिपालो, दोगंदुकदेवलीलाए ॥ ३१७ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥४२॥
अर्थ-प्रधान आवास रहनेके वास्ते देवे तथा धन धान्य कांचन वगैरहः सर्व वस्तु पूर्ण करे श्रीपाल कुमर उस
आवासमें दोगंदुक बायस्त्रिंशक इन्द्रके पुरोहित स्थानीय देवोंके जैसी लीला करके रहे ॥ ३१७ ॥
अन्नदिणे तस्सावास,-पाससेरीइ निग्गओ राया। पिक्खइ गवक्खसंठिय, कुमरं मयणाइ संजुत्तं ॥३१८॥
अर्थ-अन्य दिनमें श्रीपालके आवासके पासमें सेरी मार्ग विशेष उस मार्गसे राजा निकला उस आवासके गोख-
डेमें मदनसुंदरीसहित श्रीपाल कुमरको बैठा भया देखा सेरी यह देशी शब्द है ॥ ३१८ ॥
तो सहसा नरनाहो, मयणं दट्टण चिंतए एवं । मयणाइ मयणवसगाइ, मह कुलं मइलियं नूणं ॥३१९॥
अर्थ-तदनंतर राजा प्रजापाल अकस्मात मदनसुंदरीको देखके इस प्रकारसे विचारकिया, कामके वसपड़ी भई
मदनसुंदरीने निश्चय मेरे कुलको मलीन किया ॥ ३१९ ॥
इकं मए अजुत्तं, कोवंधेणं तया कयं वीयं । कामंधाइ इमीए, विहियं ही ही अजुत्तयरं ॥ ३२०॥
अर्थ-उस अवसरमें एक तो मैंने कोपान्ध होके अयुक्त किया जो कोढ़िएको अपनी पुत्री दी और दूसरा इसने
कामान्ध होके ही ही इति खेदे अयुक्ततर अतिशय अयुक्त किया जिसने अपने पतिको छोड़के अन्य पति अंगीकार
किया ॥ ३२०॥
एवं जायविसायस्स, तस्स रन्नो सुपुण्णपालेण । विन्नतं तं सवं, धूयाचरियं सअच्छरियं ॥३२१ ॥
,
॥४२॥

-- , अर्थ-एवं उत्तमकार करके उत्पन्न भया है दुःख जिसको ऐसे राजाके आगे शोभन पुण्यपालने वह सर्व पुत्रीका चरित कहा कसा है चरित आश्चर्य सहित वर्ते ऐसा ॥ ३२१ ॥ नं सोऊणं राया, विम्हियचित्तो गओ तमावासं । पणओ य कुमारणं, मयणासहिएण विणएणं ॥३२२॥ अर्थ-वह पुत्रीका चरित सुनके आश्चर्य पाया चित जिसका ऐसा भया थका मदनसुंदरीके आवासमें गया मदन- मुंदरी सहित श्रीपाल कुमरने विनयसे नमस्कार किया और सिंहासनपर बैठाया ॥ ३२२ ॥ लजाणओनरिंदो, पभणइ धिद्धी ममं गयविवेयं । जंदप्पसप्पविसमुच्छिएण, कयमेरिसमकजं ॥३२३॥ अर्ध-लज्जासे नम्र भए राजा बोले गया विवेक जिसका ऐसे मेरेको धिक्कार होवो विकार होवो जिस कारणसे अभिमानरूप सर्प उसका विष स्तब्धतालक्षण उससे मूर्छित होके मैंने ऐसा अकार्य किया ॥ ३२३ ॥ बच्छे! धन्नासि तुमं, कयपुन्ना तसि तंसि सविवेया। तं चेव मुणियतत्ता, जीए एयारिसं सत्तं ॥३२४॥ अर्थ-ह पुत्री ते धन्य है और कृतपुण्य है त विवेक सहित है तथा जाना है तत्व जिसने ऐसी तैही है जिसका ऐसा सत्य धर्य है ॥ ३२४ ॥ उद्धरियं मज्झकुलं, उद्धरिया जीइ निययजणणीवि। उद्धरिओ जिणधम्मो, सा धन्ना तंसि परमिका २५ प.च.८ 52

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
कओ मए
तं
वच्छे ॥ ३२६ ॥
॥४३॥
,
,
अर्थ-हे पुत्री जिसने मेरे कुलका उद्धार किया और जिसने अपनी माताका उद्धार किया और जिनधर्मका उद्धार
किया अर्थात् जिनधर्मको शोभा प्राप्त किया ऐसी एक ते ही धन्य है ॥ ३२५ ॥
अन्नाणतमंधेणं, दुद्धरहंकारगयविवेगेणं । जो अवराहो तइया,
खमसु
अर्थ-अज्ञान ही अंधकार उससे आंधा उस करके और दुर्धर जो अहंकार उससे गया है विवेक जिसका ऐसे मैंने
उस वक्तमें जो तेरा अपराध किया वह क्षमा कर ॥ ३२६॥
विणओणया य मयणा, भणेइमा ताय कुणसु मणखेयं । एयं मह कम्मवसेण चेव, सबंपि संजायं ॥२७॥
अर्थ-इस प्रकारसे राजाने वचन कह्यों के बाद विनयसे नम्र ऐसी मदनसुंदरी बोली हे पिताजी मनमें खेद मतकरो
यह सर्व मेरे कर्मके वशसेही भया है यहां थोडाभी आपका दोष नहीं है ॥ ३२७ ॥
नो देई कोइ कस्सवि, सुक्खंदुख्खं च निच्छओ एसोनिययं चेव समज्जियमुव जइ जंतुणा कम्मं ॥२८॥
अर्थ-हे तात यह निश्चय है कोई किसीको सुख या दुःख नहीं देवे है किंतु जीव अपना किया हुआ कर्मही भोगवे
है ॥ ३२८ ॥
मा वहउ कोइ गवं, जं किर कजं मए कयं होइ । सुरवरकयंपि कजं, कम्मवसा होइ विवरीयं ॥३२९॥
॥४३॥

अर्थ-निश्चय मेरा किया हुआ कार्य होता है ऐसा कोई गर्व मत धारो जिसकारणसे इन्द्रादिकका भी कार्य कर्मके
वससे विपरीत होता है ।। ३२९ ।।
ता ताय जिणुत्तं तत्त, मुत्तमं मुणसु जेण नाएणं । नज्जइ कम्मजियाणं, बलावलं बंधमुक्खं च ॥३०॥
अर्ध-तिस कारण से हे पिताजी तीर्थकरका कहा हुआ तत्व उत्तम जानो जिसके जाननेसे कर्म और जीवों का
बलावल जाना जावे है कत्थवि जीवो वलीओ कत्थवि कम्माइं हुंति वलियाई कभी जीव वलवान होता है कभी कर्म
बलवान होते हैं जीव अनंत वली है और कर्म महावली है और बंध मोक्ष जाना जाता है ।। ३३० ॥
तत्तो धम्म पडिबजिऊण, राया भणेइ संतुट्ठो । सीहरहरायतणओ, जं जामाया मए लद्धो ॥३३१॥
अर्ध-तदनंतर राजा धर्म अंगीकार करके संतुष्टमान होके बोले जो मैंने सिंहरथराजाका पुत्र जमाई पाया ॥३३१॥
तं पत्थरमित्तकए, हत्थंमि पसारियमि सहसत्ति । चडिओ अचिंतिओ च्चिय, नूणं चिंतामणी एसो॥३२॥
अर्थ-यह पापाण मात्र ग्रहणनिमित्त हाथप्रसारण करनेसे अकस्मात निश्चय विना विचाराही यह चिंतामणि रत्न
हाथ आया ॥ ३३२ ॥
जामाइयं च धूयं, आरोविय गयवरंमि नरनाहो। महया महेण गिहमाणिऊण, सम्माणइ धणेहिं ॥३३॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥४४॥
,
अर्थ-तदनंतर राजा जमाई श्रीपाल और पुत्री मदन-सुंदरी इन दोनोंको प्रधान हाथीपर बैठाके बडे उत्सवके
साथ अपने घर लाकरके बहुत प्रकारका द्रव्योंकरके सत्कार करे ॥ ३३३ ॥
जायं च साहु वायं, मयणाए सत्तसीलकलियाए, । जिणसासणप्पभावो, सयले नयरम्मि वित्थरिओ ३४
अर्थ-तव सत्वसील धैर्य ब्रह्मचर्य करके युक्त मदनसुंदरीका साधुवाद भया यह महासती है ऐसी प्रसिद्धि भई
तथा जिनशासनका प्रभाव सर्व नगरमें विस्तार पाया ॥ ३३४ ॥
अन्नदिणे सिरिपालो, हयगयरहसुहडपरियरसमेओ। चडिओ रयवाडीए, पञ्चक्खो सुरकुमारुव ॥३५॥
अर्थ-अन्यदिनमें श्रीपालकुमर घोड़ा हाथी रथ सुभटोंका परिवार सहित प्रत्यक्ष देवकुमारके जैसा राजवाड़ी चला
अर्थात् वगीचे क्रीड़ा करनेको जाता है ॥ ३३५ ॥
लोए य सप्पमोए, पिक्खंते चडवि चंदसालासु । गामिल्लएण केणवि, नागरिओ पुच्छिओ कोवि ॥३३६॥
अर्थ-तव हर्ष सहित लोग चन्द्रशाला घरके ऊपरकी भूमिपर चढ़के कुमरको देखरहे हैं उतने किसी ग्रामीण
मनुष्यने कोई नगरवासी पुरुषसे पूछा ॥ ३३६ ॥
भो भो कहेसु को एस, जाइ लीलाइ रायतणउव!।नागरिओ भणइ अहो, नरवरजामाउओ एसो॥३७॥
.
॥४४॥

,
For
अर्थ-अहो अहो त कहः राजकुमर सदृश लीला करके यह कौन जावे है ऐसा ग्रामीणने पूछनेसे नागरिक वोला
जही यह राजाका जमाई है ॥ ३३७ ॥
तं सोऊण कुमारो, सहसा सरताडिओब विच्छाओ।जाओ वलिऊण समागओय, गेहमि सविसाओ ३८
अर्थ-यह नागरिकका वचन सुनके कुमर अकस्मात् वाणसे ताडितके जैसा उदासभया और विपाद सहित वहां-
नही पलटकर अपने घर आया ।। ३३८ ।।
तं तारिसं च जणणी, दट्टण समाकुला भणइ एवं, किं अज्ज वत्थ ! कोवि हु, तुह अंगे वाहए वाही॥३३९॥
अर्थ-तब माता कुमरका वैसा उदास मुखदेखके व्याकुल भई इस प्रकारसे कहे है वत्स आज तेरे शरीरमें क्या
कोई रोग पीडा उत्पन्न करे है ॥ ३३९ ॥
किंवा आखंडलसरिस, तुज्झ केणावि खंडिया आणा। अहवा अघडंतोवि हु, पराभवो केणविकओते ४०
अर्थ-अथवा हे आखंडल सदृश हे इन्द्रतुल्य हे पुत्र तेरी आज्ञा क्या किसी पुरुपने खंडन करी अथवा अघटमान
भी निश्चय तरा अनादर किसीने किया जिससे ते ऐसा देखनेमें आवे है ॥ ३४० ॥
किंवा कन्नारयणं, किंपि हु हियए खडुक्कए तुज्झ । घरणीकओ अविणओ, सो मयणाए न संभवइ ॥४१॥

श्रीपाल-
चरितम
भाषाटीका-
सहितम्.
॥४५॥
अर्थ-अथवा कोई कन्या रत्न तेरे हृदयमें खटके है तथा अपनी स्त्रीका कीया हुआ अविनय भया है वह तो मदन-
सुंदरीमें नहीं संभवे है ॥ ३४१ ॥
केणावि कारणेणं, चिंतातुरमत्थि तुह मणं नूणं । जेणं तुह मुहकमलं, विच्छायं दीसई वच्छ ॥३४२॥
अर्थ-निश्चय कोई कारण करके तेरा मन चिंतातुर है जिसकारणसे हे वत्स तेरा मुहकमल उदास दीखता है॥३४२॥
कुमरेण भणियमम्मो, एएसिं मझओ न एकंपि । कारणमत्थित्थमिमं अन्नं पुण कारणं सुणसु॥४३॥
अर्थ-कुमर बोला हे माताजी इन कारणोंमें एकभी यहां कारण नहीं है किंतु कारण और है वह तुम सुनो ॥३४३॥
नाहं निययगुणेहिं, न तायनामेण नो तुह गुणेहिं । इह विक्खाओ जाओ, अहयं सुसुरस्स नामेणं ॥४४॥
अर्थ-इस नगरमें मैं अपने गुणोंसे प्रसिद्ध नहीं भयाहूं और पिताके नामसे भी विख्यात नहीं भयाहूं और तुम्हारे
गुणोंसे भी प्रसिद्धि नहीं पाई है किंतु मैं यहां सुसरेके नामसे प्रसिद्ध भयाहूं ॥ ३४४ ॥
तं पुण अहमाहमत्तकारणं वज्जियं सुपुरिसेहिं । तत्तुच्चिय मझमणं, दूमिज्जइ सुसुरवासेणं ॥ ३४५ ॥
अर्थ-वह जो सुसरेके नामसे प्रसिद्ध होना सो तो अधमाधमका कारण है जिस कारणसे कहा है उत्तमाः स्वगुणैः
ख्याताः मध्यमाश्च पितुर्गुणैः । अधमाः मातुलैः ख्याताः श्वशुरेणाधमाधमाः॥१॥ इस वचनसे इसीकारणसे सत् पुरु-
षोंने मना किया है स्वसुरेके घरमें रहनेसे मेरा मन उदास होता है ॥ ३४५ ॥
,
D
॥४५॥

तो भणियं जणणीए, वहुसिन्नं मेलिऊण चउरंग। गिन्हसु नियपियरज, मह हिययं कुणसु निस्सल्लं ॥४६॥ अर्थ-तब माता चोली हे पुत्र चार अंगजिसके ऐसी हाथी घोड़ा वगैरेहः वहुत सैन्य एकट्ठी करके अपने पिताका राज्य ग्रहणकर और मेरा हृदय निशल्य कर ॥ ३४६ ॥ कुमरेणुत्तं मुसुरयवलेण, जंगिएहणं सरज्जस्स । तं च महच्चिय दूमेइ, मज्झचित्तं ध्रुवं अम्मो ॥३४७॥ अर्थ-यु.मरने कहा है माताजी सुसरेके वलसे जो अपना राज्य लेना वह निश्चय मेरे मनको उदास करे है ॥३४७॥ ता जइ सभुयजिय सिरिवलेण, गिन्हामि पेइयं रज्जं । ता होइ मझ चित्तमि, निबुई अन्नहा नेव ॥४८॥ अर्थ-तिसकारणसे अपना भुजॉस उपार्जितकीभई लक्ष्मीके वलसे अपने पिताका राज्य ग्रहण करूं तव मेरे चित्तमें निवृत्ति होवे अन्यथा और प्रकारसे सुख होवे नहीं ॥ ३४८ ॥ तत्तो गंत्तृणमहं, कत्थवि देसंतरमि इकिल्लो । अज्जियलच्छिवलेणं, लहुँ गहिस्सामि पियरज्जं ॥४९॥ अर्थ-तिस कारणसे में एकाकी कहांभी देशान्तरमे जाके लक्ष्मी उपार्जनकरके जल्दी पिताका राज्य ग्रहण , करूगा ।। १४९ ।। तं पड़ जंपइ जणणी, वालो सरलोसि तंसि सुकुमालो, । देसंतरेसु भमणं, विसमं दुक्खावहं चेव ॥३५०॥ ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥४६॥
अर्थ-उस श्रीपालको माता कहे हे पुत्र तैं वालक है और सरल है सुकुमार तेरा शरीर है देशान्तरों में फिरना तो
कठिन है इसी कारणसे दुःखकारक है ॥ ३५० ॥
तो कुमरोजणणी पइ, जंपइ मा माइ!एरिसंभणसु । तावञ्चिय विसमत्तं, जाव न धीरा पवज्जति ॥५१॥
अर्थ-उसके बाद मातासे कहे हे अंब हे माताजी ऐसा वचन भतकहो कार्यमात्रका विषमपना तबतकही है जबतक
धैर्यवान पुरुष नही अंगीकार करे ॥ ३५१ ॥
पभणइ पुणोऽवि माया, वच्छय! अझे सहागमिस्सामो।को अह्म पडिबंधो, तुमं विणा इत्थ ठाणमि ॥५२
अर्थ-औरभी माता कहे हे वत्स हम तुम्हारे साथ आवेंगी यहां तेरे विना हमारे रहनेका क्या कारण है अपितु
कोई कारण नहीं है ॥ ३५२ ।।
कुमरो कहेइ अम्मो! तुम्हेहिं सहागयाहिं सवत्थ । न भवामि मुक्कलपओ, ता तुम्हे रहह इत्थेव ॥५३॥
अर्थ-कुमर वोला हे माताजी आप साथमें आवो तो मेरे सर्वत्र पग वन्धन होवे सर्वत्र मोकला पग नहीं होवे इस
वास्ते यहांही रहो ॥ ३५३ ॥
मयणाभणेइ सामिय!तुम्हं अणुगामिणी भविस्सामि,। भारंपि हु किंपि अहं, न करिस्संदेहछायुव॥५४॥
॥४६॥

भ 1254 अर्थ-तब मदनमुंदरी बोली हे स्वामिन् मैं आपके अनुगामिनी पीछे २ चलूंगी निश्चय कुछभी भार नहीं करूंगी शरीरकी छाया सदृश चलूंगी ।। ३५४ ॥ कुमरेणुत्त उत्तमधम्मपरे, देवि! मज्झ वयणेणं । नियसस्सूसुस्सूसण,-परा तुमं रहसु इत्थेव ॥५५॥ अर्थ-पुमर बोला हे उत्तमधर्मतत्पर हे देवि मेरे वचनसे ते अपनी सासूकी सेवा प्रधान जिसके ऐसी भई थकी यहाही रह ।। ३५५ ॥ मयणाह पइपवास, सइओ इच्छंति कहवि नो तहवि । तुम्हं आएसुच्चिय, महप्पमाणं परं नाह ! ॥५६॥ अर्थ-तब मदनसुंदरी कहे सती सुशीला स्त्रियों कोईप्रकारसे अपने पतिका विदेश गमन नहीं वांछती है तथापि मेरे तो आपकी आज्ञाही प्रमाण है ॥ ३५६ ।। अरिहंताइपयाई, खणंपि न मणाउ मिल्हियवाई। नियजणणिं च सरिजसु, कइयावि हु मंपि नियदासी ॥ अर्थ-~आप अहंतादि नवपद क्षण मात्र भी अपने मनसे दूर करना नहीं और अपनी माताको याद करना कोई वक्त में दासीर मरेकोभी याद करना ॥ ३५७ ॥ जणणीवि तस्स नाऊण, निच्छयं तिलयमंगलं काउं।पभणइतुह सेयत्थं, नवपयज्झाणं करिस्समहं३५८ ,

भाषाटीका-
श्रीपाल-
चरितम्
सहितम्-
॥४७॥
,
अर्थ-अथ माताभी श्रीपालकुमरका विदेश जानेमें निश्चय जानके तिलक मंगल करके कहती भई हेपुत्र तुम्हारे
कल्याणके वास्ते में नवपदोंका ध्यान करूंगी ॥ ३५८ ।।
मयणा भणेइ अहयंपि, नाह! निच्चंपि निच्चलमणेणं । कल्लाणकारणाई, झाइस्सं ते नवपयाइं ॥३५९॥
अर्थ-मदनसुंदरी बोली हे नाथ मैंभी निरंतर निश्चलमन करके एकाग्रचित्त करके आपके कल्याणका कारण
नवपदोंका स्मरण ध्यान करूंगी ॥ ३५९ ॥
तेणं मयणावयणा,मएण सित्तो नमित्तु माइपए। संभासिऊण दइयं, सिरिपालो गहियकरवालो॥३६०॥
अर्थ-मदनसुंदरीके वचनामृतसे सींचा हुआ श्रीपालकुमर माताके चरणकमलोमें नमस्कार करके मदनसुंदरीके
साथ भाषण करके तलवारलेके ॥ ३६०॥
निम्मलवारुणमंडल-मंडियससिचारपाणसुपवेसे। तच्चरणपढमकमणं,-कमेण चल्लेइ गेहाओजुम्मं ॥३६१॥
अर्थ-निर्मल जो वारुणमंडल जलमंडल उसकरके मंडित जो शशिचारप्राण चंद्रनाड़ि संचारि वायु उसका शोभन
प्रवेश होनेसे अर्थात् वामस्वररूप चंद्रनाड़ि वहतांथका उसी पगको प्रथम रखने करके ऐसे क्रमसे घरसे चले युग्म है ॥३६१॥
सोगामागरपुरपट्टणेसु कोऊहलाई पिक्खंतो। निब्भयचित्तो पंचाणणुव, गिरिपरिसरं पत्तो ॥ ३६२ ॥
॥४७॥

अर्थ-यह श्रीपाल कुमर ग्राम आकर पुर पत्तनोंमें कौतूहल देखता हुआ पंचानन सिंहके जैसा निर्भय चित्त जिसका ऐसा भयाधका एक पर्वतके पासमें पहुंचा ॥ ३६२ ॥ तत्थ य एगमि वणे, नंदणवणसरिससरसपुप्फफले । कोइलकलरवरम्म, तरुपतिं जा निहालेइ ॥३६३॥ अर्थ-यहां पर्वतके समीपदेशमें एक वनमें वृक्षोंकी पंक्ति याने श्रेणी जितने देखे कैसा है वन नंदनवनसदृश- सरस पुष्पफल है जिसमें कैसी है वृक्षोंकी पंक्ति कोयलोंकी मधुर धुनि करके रमणीक है ॥ ३६३ ॥ ता चारुचंपयतले, आसीणं पवररूबनेवत्थं । एगं सुंदरपुरिसं, पिक्खइ मंतं च झायंतं ॥ ३६४ ॥ अर्थ-उतने मनोहर चंपक वृक्षके नीचे रहा हुआ और प्रधानरूप आकृति वेप जिसका ऐसा एक पुरुप मंत्र ध्याता हुआ देखे ॥ ३६॥ सो जाव समत्तीए, विणयपरो पुच्छिओ कुमारेण । कोसि तुमं किं झायसि, एगागी किं च इत्थ वणे ३६५ अर्थ-यह पुरुप जाप समाप्ति होने पर विनयमें तत्परभया उसको कुमरने पूछा ते कौन है क्या ध्यावे है और इस- वनमें एकाफी क्यों रहा है ॥ ३६५ ॥ तेणुत्तं गुरुदत्ता विजा, मह अस्थि सा मए जविया । परमुत्तरसाहगमंतरेण, सा मे न सिज्झेइ ॥३६६॥ 45

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥४८॥
,
अर्थ-उस पुरुषने कहा मेरेपास गुरूकी दीभई विद्या हैं वह विद्या मैंने जपी परंतु उत्तर साधक याने सहायकारी
पुरुष विना सिद्ध होवे नहीं ॥ ३६६ ॥
जइहोसि महायस! मह उत्तरसाहगोकहवि अज । ताहं होमि कयत्थो, विजा सिद्धीइ निभंतं ॥३६७॥
अर्थ-हे महायशस्विन् जो तै कोई प्रकारसे मेरा उत्तर साधक होवे तो मैं निसंदेह सिद्धभई है विद्या जिसकी
ऐसा होजाऊं ॥ ३६७ ॥
तत्तो कुमरकएणं, साहजेणं स साहगो पुरिसो। लीलाइ सिद्धविजो, जाओ एगाइ रयणीए ॥३६८॥
अर्थ-तदनंतर कुमरने किया सहाय करके वह साधकपुरुष लीलाकरके एकरात्रिमें सिद्ध होगई है विद्याजिसकी
ऐसा भया ॥३६८॥
तत्तो साहगपुरिसेण, तेण कुमरस्स ओसहीजुअलं । पडिउवयारस्स कए, दाऊणं भणियमेयं च ॥३६९॥
' अर्थ-विद्यासिद्धभयोंके बाद उस साधक पुरुषने पीछा उपकार करनेके लिए कुमरको २ (दो) औषधिः देके
यह कहा ॥ ३६९।।
जल तारिणीअएगा, परसत्थनिवारिणी तहा बीया । एयाउ ओसहीओ, तिधाउमठियाउ धारिजा ३७०
॥४८॥

, अर्थ-क्या कहा सो कहते हैं इन औपधियोंमें एक औपधिः जलतारिणी है और दूसरी औषधिः परशस्त्रनिवारिणी है ये दोनों औपधिः सोना रूपा तांवा इन धातु मढवाके भुजामें तुम धारण करो ॥ ३७० ॥ कुमरेण समं सो विज्झासाहगो, जाइ गिरिनियंबंमि।ता तत्थधाउवाइय,-पुरिसेहिं एरिसंभणिओ॥३७१॥ अर्थ-वह विद्यासाधकपुरुष कुमरके साथ जितने पर्वतका किनारा वहां जावे इतने धातुवादिपुरुषोंने ऐसा वचन कहा ।। ३७१ ।। देव! तुम्ह दंसिएणं, कप्पपमाणेण साहयंताणं । केणावि कारणेणं, अम्हाण न होइ रससिद्धी ॥३७२॥ अर्ध-हे देव अन्यदर्शित कल्पप्रमाणे साधतां रससिद्धी करतां हमारे कोई प्रकारसे रससिद्धी नाम स्वर्णोत्पादक रसकी सिद्धी नहीं होती है ॥ ३७२ ॥ कुमरेण तओ भणियं, भोमह दिट्टीइ साहह इमंति।ता तेहिं तहाविहिए, जाया कल्लाणरससिद्धी ॥३७३॥ अर्थ-तय कुमरने कहा अहोपुरुषो मेरी दृष्टिके आगे यह रस साधो वाद उन्होंने उसी प्रकारसे किया करनेसे कल्याण रसनाम स्वर्णरसकी सिद्धि भई ॥ ३७३ ।। काऊण कंचणं साहगेहिं, भणियं कुमार! अम्हाणं । जंजाया रससिद्धी, तुम्हाणं सो पसाओत्ति ॥३७॥ पापा.घ.५.

भाषाटीका
सहितम्.
श्रीपाल-
चरितम्
,
॥४९॥
,
अर्थ-वादमें साधकपुरुषोने स्वर्णसिद्धि करके और वोले हे कुमार हमारे यह स्वर्णरसकी सिद्धी भई सो
आपका प्रसाद है ॥ ३७४ ॥
ता गिण्ह कणगमेयं, नो गिण्हइ निप्पिहो कुमारोय। तहविहु अलयंतस्सवि, कंपि हु बंधति तेवत्थे ३७५
अर्थ-तिस कारणसे यह सोना आप लेवो परन्तु कुमर निस्प्रही है नहीं लेवे तौभी नहीं लेता थकांभी कुमरके
वस्त्रमें साधकपुरुष कितनाक सोना बांधे ॥ ३७५ ॥
तत्तो कुमरो पत्तो, कमेण भरुयच्छनामयं नयरं । कणगबएण गिण्हइ, वत्थालंकारसत्थाई ॥ ३७६ ॥
अर्थ-तदनंतर श्रीपालकुमर भृगुकच्छ (भरुवच्छ)नगर पहुंचा वहां सोनावेचके वस्त्र अलंकार शस्त्रादि ग्रहण करे ३७६
काऊण धाउमढियं, ओसहिजुयलं च बंधइ भुयंमि । लीलाइ भमइ नयरे, सच्छंदं सुरकुमारुव ॥३७७॥
अर्थ-और औषधि जुगल तीन धातुमें मढ़वाके भुजामें वांधे बाद कुमर देवकुमरके जैसी लीला करके स्वइच्छासे
नगरमें क्रीडाकरे ॥ ३७७ ॥
इओय कोसंवीनयरीए, धवलो नामेण वाणिओ अत्थि।सो बहुधणुत्ति लोए, कुवेरनामेण विक्खाओ७८
अर्थ-इधरसे कोशाम्बीनाम नगरीमें धवल नामका वानियाहै वह धवल वहुत धन जिसके इस कारणसे लोकमें
कुवेरनाम करके प्रसिद्ध भयाहै ॥ ३७८ ॥
॥४९॥

वहुकणयकोडिगाहिय, कयाणगोणेगवाणिउत्तेहिं । सहिओ सो सत्थवाई, भरुयच्छे आगओ अत्थि ३७९
अर्थ-यात करोड़ों सोनयोंका किरयाना जिसने ग्रहण किया ऐसा और अनेक वानियोंके पुत्रो सहित वह सार्थवाह
भरांच नगरम आयादै ।। ३७९ ॥
जाओ य नत्थ लाहो, पवरो सो तहवि दवलोहेणं । परकूलगमणपउणो, पगुणइ बहुजाणवत्ताई ॥३८०॥
अर्थ-उस भराचनगरमें बहुत लाभ भयाहै तोभी वह सार्थपति द्रव्यके लोभसे परकूलनाम समुद्रके परतट जानेके
लिए तत्पर भया बहुत जहाज तय्यार करे ॥ ३८० ॥
मज्झिमजुंगो एगो, सोलसवरकूवएहिं कयसोहो। चत्तारि य लहुजुंगा, चउचउकूवेहि परिकलिया॥३८१॥
अर्ध-उन जहाजोंमें एक मध्यमजुंगनामका जहाज सोलरधान कूपकस्तम्भोंकरके करीहै जिसकी शोभा ऐसाहै
और चार लघुजुंगनामके जहाजह चार २ कूपस्तम्भों करके सहित है ।। ३८१ ॥
बडसफरपबहणाणं, एगसयं वेडियाण अट्ठसयं,। चउरासी दोणाणं, चउसट्ठी वेगडाणं च ॥३८२॥
अर्थ-वृहत सफर नामका जहाज एकसौहै वेडिका नामका जहाज १०८ है द्रोण जहाजविशेप ८४ है वेगड़ नामका
जहाजविशेप ६४ है ।। ३८२ ॥
सिल्लाणं चउपन्ना, अवात्ताणं च तहय पंचासा । पणतीसंच खुरप्पा, एवं सयपंचवोहित्था ॥३८३॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ५० ॥
,
अर्थ-सिल्लनामका जहाज ५४ है आवर्तनामका जहाज ५० हैं और क्षुरम नामका जहाज ३५ हैं इस प्रकारसे ५००
जहाज तय्यार किए हैं ॥ ३८३ ॥
गहिऊण निवाएसं, भरिया विविहेहिं ते कयाणेहिं । नाखुइयमालिमेहि, अहिट्ठिया वाणिउत्तेहिं ॥३८४॥
अर्थ-राजाकी आज्ञालेके वह जहाज नानाप्रकारके किरियानोंसे भरेहैं और नाखुयिक (नाखवा) और मालिम
जहाजके अधिकारीओं करके तथा वणिक पुत्रों करके अधिष्ठित नाम आश्रित हैं ॥ ३८४॥
मरजीवएहिं गम्भिल्लएहिं, खुल्लासएहिं खेलेहिं । सुकणिएहिं सययं, कयजालवणीविहिविसेसा ॥३८५॥
अर्थ-समुद्रके जलमें प्रवेशकरके वस्तु निकाले वह मरजीवक कहे जावें और गम्भिलकनाम खलासीलोग और खेल
और सुंकाणिक अपने २ जहाज सम्बन्धी व्यापारके अधिकारियो करके निरंतर कियाहै साचवण विधि विशेष जिन्होंमें
ऐसे ॥ ३८५॥
नाणाविहसत्थविहत्थहत्थ,-सुहडाणदससहस्सेहि। धवलस्स सेवगेहि, रक्खिजंता पयत्तेणं ॥३८६॥
अर्थ-और वह जहाज कैसेहैं अनेक प्रकारके शस्त्रों करके व्याकुलहैं हाथ जिन्होंके ऐसे दसहजार सुभट धवल
सेठके सेवकों करके प्रयत्नसे रक्षा करी गईहै जिन्होंकी ॥ ३८६ ॥
बहुचमरछत्तसिक्करि,-धयवडवरमउडविहियसिंगारा। सढदोर सारनंगर,-पक्खरभेरीहिं कयसोहा॥३८७॥
॥ ५० ॥

अनि अर्थ-और जहाज कैसे हैं बहुत चामर छत्र सिरिकरी जहाजका आभरण विशेष ध्वजा और प्रधानमुकुट इन्हों करके कियाहै शृंगार जिन्होंका ऐसे और सढ नाम वडा वस्त्र मई उपकरण विशेष वायु देनेमें प्रसिद्ध और बड़े २ रस्से और सारनंगर लोहमय जहाजको खड़ारसनेका उपकरण और जहाजकी रक्षाके उपकरण भेरी दुंदुभी इन्हों करके करीहै शोभा जिन्होकी एसे ॥ ३८७ ॥ जलसंवलइंधणसंगहेण, ते पूरिऊण सुमुहुत्ते । धवलोय सपरिवारो चडिओ चालावए जाव ॥ ३८८ ।। अर्थ-जल संयल इन्धनाका संग्रह करके उन जहाजोंको पूर्ण करके अच्छे मुहूर्तमें धवल सार्थवाह परिवार सहित जहाजपर चढा और जितने जहाजोंकोचलावे ॥ ३८८ ॥ ताव वलीसुवि दिजंतयासु, वजंततारतूरेसु । निजामएहिं पोया, चालिजंतावि न चलंति ॥ ३८९ ॥ अर्थ-उतने देव देवियोको वलिदान देता थकां ऊंचेस्वरसे वादिन बजानेसे और निर्यामक जहाजोके चलाने वालोंने जहाज चलाए ताभी जहाज नहीं चले ॥ ३८९ ।। तत्तो सो संजाओ, धवलो चिंताइ तीइ कालमुहो। उत्तरिय गओनयरिं, पुच्छइ सीकोत्तरिंचेगं ॥३९०॥ अर्थ-तदनंतर वह धवलक चिंताकरके श्याममुख होगया तव जहाजसे उतरके धवलसेठ नगरीमें गया और एक सिकोत्तरी खीसे पूछा ।। ३९० ॥

भाषाटीका सहितम्. श्रीपाल- चरितम् ॥५१॥ सा कहइ देवयार्थभियाइं, एयाई जाणवत्ताइं । वत्तीससुलक्खणनर, वलीइ दिन्नाइ चल्लंति ॥३९१॥ अर्थ-वह सिकोत्तरी स्त्री बोली यह तेरे जहाज देवताने स्तंभित किए हैं ३२ लक्षणा पुरुषको देवताको बलिदान देनेसे जहाज चलेंगे और उपाय करनेसे नहीं चलेंगे ॥ ३९१ ॥ तत्तो धवलो सुमहग्ध,-वत्थु भिट्टाइ तोसिऊण निवं । विन्नवइ देवग, वलिकजे दिजउ नरं मे ॥३९२॥ अर्थ-तदनंतर धवल सार्थपति बहुत कीमतका भेटनालेके राजाके पासमें गया भेटनादेके राजाको संतोष उत्पन्न करके वीनतीकरे हेदेव एकमनुष्य देवताको बलिदानके वास्ते देओ ॥ ३९२ ॥ रना भणियं जो होइ कोवि, विदेसिऊ अणाहो य । तं गिन्ह जहिच्छाए,अन्नो पुण नो गहेयवो॥३९३॥ अर्थ-तव राजा बोले जो कोई परदेशमें रहनेवाला अनाथ स्वामीरहित जिसके पीछे पुकार करनेवाला कोई नहीं आवे ऐसा मनुष्य होवे उसको तुम अपनी इच्छासे लेलेओ और कोई नहीं लेना ॥ ३९३ ॥ तत्तो धवलस्स भडा, जाव गवेसंति तारिसं पुरिसं।ता सिरिपालो कुमरो, विदेसिओजाणिओ तेहिं ३९४ अर्थ-तदनंतर धवलसेठका सुभट जितने वैसे पुरुषकी गवेषणाकरे उतने उन्होंने श्रीपालकुमरको परदेशी . ॥५१॥ जाना ॥ ३९४॥ वत्तीसलक्खणधरो, कहिओ धवलस्स तेहिं पुरिसेहि।धवलेण पुणो राया,-एसो गहिओ य तग्गहणे ३९५ ,

अर्थ-उन पुरुषोंने बत्तीस लक्षणका धारनेवाला श्रीपालकुमारको देखके धवलसेठसे कहा तव धवलसेठने उसको
पकड़नेके लिए अर्थात् श्रीपालकुमरको पकड़नेके लिए और राजाकी आज्ञा लिया ॥ ३९५ ॥
सो सिरिपालो चउहयंमि, लीलाइ संनिविट्ठोवि । धवलभडेहिं उभडसत्थेहि, झत्ति आक्खित्तो ३९६
अर्थ-तव वह श्रीपालकुमर बजारमें लीलासे बैठाहै तथापि उद्भट शस्त्रवाले धवलसेठके सुभटोंने शीघ्र प्रेरणा किया३९६
रेरे तुरियं चसु रुट्ठो तुह अज्ज धवलसत्थवई।तं देवयावलीए, दिज्झसिमा कहसि नो कहियं ॥३९७॥
अर्थ-कैसे आक्षेप कियासो कहते हैं अरे २ ते जल्दीचल आज तेरेपर धवल सार्थवाह नाराज हुआहै तेरेको देव-
ताके लिए बलिदान देगा नकारा करना नहीं ॥ ३९७ ॥
कुमरेणुत्तं रे रे, देह वलिं तेण धवलपसुणावि । पंचाणणेण कत्थवि, किं केणवि दिग्झए हु वली ॥३९८॥
अर्थ-तब कुमर बोला अरे २ पामरो तुमारास्वामी धवल पशुहै उसकाही वलिदान देओ कारण सर्वत्र दुर्वल
पशुकाही बलिदान दिया जावे, परंतु सिंहका बलिदान कहीं भी नहीं दिया जावेहै ।। ३९८ ।।
तत्तो पयडंति भडा, किंपि वलं जाव ताव कुमरकयं । सोऊण सीहनायं, गोमाउ गणुव ते नट्ठा ॥३९९॥
अर्थ-तदनंतर जितने धवलसेठके सुभट कुछ वल प्रगटकरें उतने कुमरका कियाभया सिंहनाद सुनकर वे धवलके
मुभट शगाल समूह के जैसा भाग गया ॥ ३९९ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥५२॥
h
धवलस्स पेरिएणं, रन्नावि हु पेसियं नियं सिन्नं । तंपि ह कुमरेण कयं, हयप्पयावं क्खणद्धेणं ॥४००॥
अर्थ-धवलसेठकी प्रेरणासे राजानेभी धवलका कार्य सिद्ध होनेके लिए अपनी सेना भेजी वह सेनाभी कुमरने
आधे क्षणमें नष्ट होगयाहै प्रताप जिसका ऐसी करी ॥ ४०० ॥
धवलाएसेण भडा, नरवइसिन्नेण संजुया कुमरं । वेढंति तिपंतीहि, मायावीयंव रेहाहि ॥ ४०१ ॥
अर्थ-धवलकी आज्ञासे सुभट राजाकी सेनाके सुभटों सहित श्रीपालकुमरको तीन पंक्तिसे वीटा अर्थात् चारो
तरफ तीन घेरादिया किसके जैसा तीनरेखा करके वीटा हुआं मायावीज हीकारके सदृश ॥ ४०१॥
धवलो भणेइ रे रे, एयं इत्थेव सत्थछिन्नतणुं । देह बलिं जेणेसा, संतुस्सइ देवया अज्ज ॥ ४०२ ॥
अर्थ-तव धवलसेठ बोला अरे २ सुभटो इस पुरुषको इसी ठिकाने शस्त्रोंसे शरीर छेदके बलिदान देओ जिसकार-
णसे आज यह देवता संतुष्टमान होवे ॥४०२ ॥
ताण भडाणं सरसिल्ल-भल्लखग्गाइया न लग्गति । कुमरसरीरंमि अहो, महोसहीणं पभावुत्ति ॥४०३॥
अर्थ-उन राजा और धवल सम्बन्धि सुभटोंका वाण सिल्ल भाला खड्गादि अर्थात् बाण वी भाला तलवार वगैरह
शस्त्रोंका प्रहार कुमरके शरीरमें नहीं लगे वहां हेतु यहहै महौषधियोंका प्रभाव आश्चर्यकारी है ॥ ४०३ ॥
कुमरेण पुणो तेर्सि, केसिपि हु केसकन्ननासाओ। लूणियाउ नियसरेहि, करुणाइ न जीवियं हरियं ४०४
॥५२॥

56-15
,
अर्ध-और कुमरने राजा और धवल सेठके कितने सुभटोंका केस कान नासिका वगैरह अवयव अपने वाणसे काटा
परंतु दयासे किसीका जीवतव्य नहीं लिया अर्थात किसीको मारा नहीं ॥ ४०४ ॥
तं पासिऊण धवलो, चिंतइ एसो न माणुसो नूणं । खयरो व सुरवरो वा, कोइ इमोऽणप्पमाहप्पो ४०५
अर्ध-ऐसे श्रीपाल कुमरको देखके धवलसेठने विचार किया निश्चय यह मनुष्य नहींहै किंतु बहुत माहात्म्य जिसका
ऐसा यह कोई विद्याधर अथवा देवहै महानहै प्रभावजिसका ऐसा ॥ ४०५ ॥
काउण अंजलिं मत्थयंमि, तो विन्नवेइ तं धवलो। देव तुममेरिसीए, सत्तीए कोवि खयरोऽसि ॥४०६॥
अर्थ-तदनंतर धवलसेट मस्तकमें अंजिलीकरके श्रीपालकुमरको विनतीकरे हे देव हे महाराज आपऐसी शक्तिसे
कोई विद्याधरहो ॥ ४०६ ॥
ता मह कुणमु पसायं, थंभियवेडीण मोयणोवायं। किंपि हु करेह जेणं, उवयारकरा हु सप्पुरिसा ४०७
अर्थ-जिस कारणसे मेरेपर प्रसन्नहोके मेरा जहाज स्तंभितभयाहै इन्होंके चलानेका उपाय करो जिस कारणसे
सत्पुरुप निश्चय उपकार करनेवाले होवह ।। ४०७ ।।
कुमरेणुत्तं जइ तुह, मोयाविनंति जाणवत्ताई । ता किं लब्भइ सोवि हु, भणेइ दीणारलक्खंति ॥४०८॥
अर्थ-कुमरने कहा जो तुसारा जहाज चलावे तो क्यापावे तव धवलसेठ बोला १ लाख सोनयिया देउं ॥ ४०८ ॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥५३॥ तत्तो चल्लइ कुमरो, वियसियवयणो य लोयपरिअरिओ। चडिओय धवलसहिओ, अग्गिल्ले जाणवत्तंमि॥ अर्थ-उसके बाद कुमर विकस्वरमानमुख जिसका ऐसा और लोगोंसे परिवरा हुआ अर्थात् बहुत लोग जिसके साथमें है ऐसा चले धवलसेठ सहित आगेके जहाजपर चढ़ा ॥ ४०९ ॥ निजामएसु नियनिय,-पवहणवावारकरणपवणेसु । कयनयपयझाणेणं, मुक्का हका कुमारेणं ॥ ४१० ॥ अर्थ-तब निर्यामक जहाज चलाने वालोंने अपना २ जहाज चलानेमें तत्पर होनेसे कियाहै नवपदोंका ध्यान जिसने ऐसे श्रीपालकुमरने उंचे स्वरसे हक्कारव किया अर्थात् हाक भरी ॥ ४१०॥ सोऊण कुमरहत्वं, सहसा सा खुद्ददेवया नट्ठा । चलियाइं पवहणाई, वद्धावणयं च संजायं ॥ ४११ ॥ अर्थ-कुमरकी करीभई हक्का सुनके अकस्मात् वह क्षुद्रदेवता दुष्टदेवी भागगई और जहाज चले वधाई भई ॥४११॥ वज्जति भेरिभुंगल,-पमुहाउज्झाइं गुहिरसदाइं । नञ्चंति नट्टियाओ, महुरं गिजति गीयाइं ॥ ४१२ ॥ अर्थ-तथा भेरी भुंगल प्रमुख दुंदुभि वगैरह; वादित्रोंका गंभीर शब्दहै ऐसे वादित्र वजाए जावे हैं और नाचने- वाली स्त्रियां नांचती हैं और मधुर गीतध्वनि होवेहै ॥ ४१२ ॥ तं अच्छरियं दृटुं, धवलो चिंतेइ एस जइ होइ।अम्ह सहाओ कहमवि, ता विग्धं होइ न कयावि ॥४१३॥ , ॥ ५३॥ , कर

अर्थ-बह
c
आश्चर्य देखके धवलसेठ मनमें विचारे जो यह पुरुष कोई प्रकारसे हमारे सहाई होवे तो कोईवक्त
कोई ठिकानेभी विघ्न नहीं होवे ॥ ४१३ ॥
इय चिंतिऊण धवलो, तंदीणाराण सयसहस्सं च।दाऊण विणयपणओ, भणेइ भोभो महाभाग! ४१४
अर्थ-इस प्रकारसे विचारके धवलसेठ लाख सोनयिया कुमरको देके नय होके नमस्कार करके कुमरसे इस प्रकारसे
चोला भोभो महाभाग हे महाभाग्यवान ॥ ४१४ ॥
दीणारसहसइकिकमित्तयं, वरिसजीवणं दाउं । संगहिया संति मए, दससहसभडा ससोंडीरा ॥४१५॥
अर्थ-एक २ हजार सोनयिया एक वर्पका जीवन याने आजीवका देके मैंने सौंडीर पराक्रम सहित दसहजार सुभ-
टोका संग्रह कियाहै अर्थात् दसहजार सिपाही रक्खेह ॥ ४१५ ॥
जइ तं पि हुओलग्गं, गिन्हसि ता कहसु जीवणं तुज्झ। कित्तियमित्तं दिजइ,जेण तुमंगरुयमाहप्पो ४१६
अर्थ-जो तुम सेया अंगीकार करो हो तो तुम्हारा जीवन कहो तुमको कितना द्रव्य देवें जिस कारण तुम बड़े
प्रभाव वाले हो॥४१६ ॥
हसिऊण भणइ कुमरो, जित्तियमित्तं इमेसिं सवेसिं । दिन्नं जीवणवित्तं, तित्तियमित्तं ममिक्स ॥४१७॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥५४॥
अर्थ-यह सेठका वचन सुनके कुमर थोड़ा हसके बोला इन सब सुभटोंको जीविकाका जितना द्रव्य देते हो उतना
मेरेको चाहिए ॥ ४१७ ॥,
तो सहसा विम्हिअओ, लिक्खं गणिऊण चिंतए सिट्ठी। दीणारकोडि एगा, सोसि जीवणं अत्थि' ४१८
अर्थ-तदनंतर धवलेसेठ आश्चर्यपायाहुआ शीघ्र सोनयियोंकी संख्या गिनके विचार करे सव सुभटोंका एक करोड़
सोनयिया होवेहै ॥ ४१८ ॥
एगो मग्गइ कोडिं, अहह अजुत्तं विमग्गियं नूणं। एएसिं किं अहियं, सिज्झिस्सइ कजममुणाऽवि ४१९
अर्थ-यह अकेला करोड़ सोनयिया मांगताहै अहह इति खेदे खेदकी बातहै इसने अयुक्त मांगा निश्चय यह अकेला
दसहजार सुभटोंसे जादा क्या कार्य करेगा ॥ ४१९ ॥
इय चिंतिऊण धवलेणुत्तं, जइ कुमर! दससहस्साइं। गिन्हसिता देमि अहं, जं पुण कोडी तयं कूडं ४२०
अर्थ-ऐसा विचारके धवलसेठ बोला हे कुमार जो वर्षका दसहजार सोनयिया लेओ तो मैं देऊं और जो तुमने करोड़
सोनयिया मांगा सो तो मिथ्याहै ॥.४२० ॥
कुमरेणुत्तं मह तायतुल्ल, तुह जीवणेण नो कजं । किंतु अहं देसंतर,-गंतुमणो एमि तुह सत्थे ॥४२१॥
॥ ५४॥

अर्थ-तब कुमरने कहा हेताततुल्य पितासदृश आपके पास जीविकाका द्रव्य लेनेसे कोई प्रयोजन नहीं है किंतु म देशान्तर जानेवालाहं इसवास्ते में तुम्हारे साथमें आऊं ॥ ४२१ ॥ जइ भाडएण चडणं, देसि ममं हरसिओ तओ सिट्टी। मग्गेइ भाडयं पइमासं, दीणारसयमगं ॥४२२॥ अर्थ-जो भाडालके मेरेको जहाजमें बैठाओ तो में तुम्हारे साथमें आऊं तदनंतर सेठ हर्पित होके एक २ महीनेका सो २ सोनयिया भाड़ा मांगे ॥ ४२२ ॥ तं दाऊणं चडिए कुमरे मूलिल्लवाहणे तस्स । भेरीउ ताडियाओ, पत्थाणे रयणदीवस्त ॥ ४२३ ॥ अर्थ-यह भाड़ा देके श्रीपालकुमर सेटके मूल जहाजमें बैठा रत्नद्वीपके सन्मुख चलनेकेवास्ते भेरी वजाई गई ॥४२३॥ हकारिजंति सटे, तह वद्विजंति सिक्वयाओ य । चालिज्जते सुकाणयाई, आउल्लयाइं च ॥ ४२४ ॥ अर्थ- उस बत्तम पढ वस्र मई जहाजका उपकरण विशेपवायुपूरणेके लिए जहाजपर प्रसारण किया जावे तथा छाया र जमई चढ़नेका उपकरण विशेष चढ़नेकेवास्ते बांधा जावे तथा सोकानक जहाजोंके अग्रभागवती ऊर्ध्व काष्ठ चाटु विशेष चलाए जावें आवुल्लकानि काष्ठमई चलानेके उपकरण चलाए जावें ॥ ४२४ ॥ एगे मवंति धुवमंडलं च, एगे हरति घामत्तं । एगे मवंति वेलं, एगे मग्गं पलोयंति ॥ ४२५ ॥ भास....

श्रीपाल-
चरितम्
॥ ५५॥
भाषाटीका-
सहितम्.
अर्थ-और उसवक्कमें कितनेक जहाजके चलाने वाले ध्रुवके तारेका मंडल देखे उससे दिशाओंका प्रमाण करे और
कईक अंदर प्रवेशकिया जलको निकाले कईक काष्ठप्रयोगसे समुद्रकी वेलाका प्रमाण करे और कितनेक मार्ग जोवे ॥४२५॥
कत्थवि दटुं मगरं, एगे वायंति ढुक्कलुक्काई । एगे य अग्गितिल्लं, खिवंति लहुढिंकलीयाहिं ॥ ४२६ ॥
अर्थ-कोई प्रदेशमें मकर महामत्सविशेषको देखके कईक मनुष्य दुकलुक्क नामका चर्मसे मढ़ा हुआ वादिन
विशेष बजावे और कितनेक लोग लघुटिंकिलिका पात्र विशेषमें अग्नि जलाके तेल डाले ऐसा करनेसे वादित्रका शब्द
सुनके अग्निज्वाला देखके मगरमच्छ दूर चले जावें ॥ ४२६ ॥
चोराण वाहणाई, दई निययाई पक्खरिजंति । पंजरिएहिं भडेहिं, चोरा दूरे गमिजंति ॥ ४२७॥
अर्थ-और कोई प्रदेशमें चोरोंका जहाज देखके जहाजके ऊपर पिजरेमें बैठेहुए पुरुष अपने जहाजके सुभटोंको
तयार करें तव वीर पुरुषोंको देखके चोर दूरसे चलेजावें ॥ ४२७ ॥
उग्गमणं अस्थमणं, रविणोदीसेइ जलहिमझमि । वडवानलपज्जलिया, दिसाउदीसंति रयणीसु ४२८
अर्थ-और उस वक्तमें सूर्यका उदय अस्त यह दोनों समुद्र के अंदरही देखाजावे तथा रात्रिमें वडवानलअग्निविशेष
करके दिशाएं जलती भई देखनेमें आवें ॥ ४२८ ॥
एवं बिहाइं कोऊहलाइं, पिक्खंतओ समुदस्स । जा वच्चइ कुमरवरो, ता पंजरिओ भणइ एवं ॥४२९॥
॥ ५५ ॥

P
अर्थ-इस प्रकारके समुद्रके कौतूहलनाम कौतुक देखता हुआ जितने कुमरश्रेष्ठ श्रीपाल चले है उतने ऊपर पीज-
रेमें रहा हुआ पुरुप वक्षमाण प्रकारसे बोला ॥ ४२९ ॥
भो भोजइ जलइंधण-पमुहेहिं किंपि अस्थि तुह्माणं । कजं ता कहह फुट, वावरकूलं समणुपत्तं ॥४३०॥
अर्ध-अहो लोगो जो तुम्हारे जल इन्धन प्रमुखसे कुछभी कार्य होवे तो प्रगट कहो जिस कारणसे ववर कूल
नामका बंदर आया है रलद्वीप हालमें दूर है ॥ ४३० ॥
संजत्तिपहिं भणियं, ववरकूलस्स मंदिराभिमुहं। वच्चह जेण जलाई, गिन्हामो मा विलंवेह ॥ ४३१ ॥
अर्थ-एमा वचन सुनके सायानिक जहाजके वाणियोंने कहा वघरकूलवंदर के सामने चलो जिससे जलादिक
इसमें देरी करना नहीं ॥ ४३१॥
पत्ताय तत्थ लोया, सपमोया उत्तरंति भूमीए । दससहसभडसमेओ, धवलोवि ठिओ तडमहीए ४३२
अर्थ-उस वंदरमें जहाज पहुंचे लोक हर्पसहित जहाजोंसे उतरे पृथ्वीपर तव दसहजार सुभटों करके सहित धवल
सेट समुद्रके तटकी भूमिपर रहा ॥ ४३२ ॥
इत्थंतरंमि तेसिं, हलवोलं सुणिय आगया तत्थ । ववररायनिउत्ता, मंदिरलागत्थिणो पुरिसा ॥४३३॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥ ५६॥ अर्थ-इस अवसरमें उन जहाजोंके मनुष्योंकी हलवोलनाम अव्यक्तध्वनि सुनके उस प्रदेशमें ववर राजाने अधि- कारी किया बंदरका लागालेनेवाला पुरुष आए लागा मासूल विशेष है ॥ ४३३ ॥ मग्गंताणवि तेसिं, लागं नो देइ जाव सो सिट्टी। ता तेहिं महाकालो, वहाविओ ववराहिवई ॥४३४॥ अर्थ-लागा मांगते भए राजपुरुषोंको जितने सेठ लागा नहीं देवे उतने उनपुरुषोंने महाकाल नामका ववर कूलके राजाके पासमें जाके कहा तब राजा उन्होंकी प्रेरणासे प्रेरित भया ॥ ४३४ ॥ महकालो भूरिबलो तत्थागंतूण मग्गए लागं । सिट्ठी न देई पद्धर-पएहिं सुहडे पंचारेइ ॥ ४३५ ॥ अर्थ-उसके बाद बहुत सैन्य जिसके ऐसा महाकालराजा उस बंदरमें आके लागा मांगे परंतु धवलसेठ पाधरे पगे लागा नहीं देवे सुभटोंकी युद्धके वास्ते प्रेरणा करे ॥ ४३५ ॥ तो धवलभडाउब्भड,-सत्था सहसत्ति बबरभडेहि। जुज्झंति जओ लोए, मरंति पञ्चारिया सुहडा ४३६ अर्थ-तदनंतर धवलकेसुभट उद्भट भयजनक शस्त्र जिन्होंके पासमे ऐसे शीघ्र तत्काल ववर राजाके सुभटोंके साथ युद्धकरे जिस कारणसे लोकमें सुभट पौरष उत्पादक वचनोंसे प्रेरा हुआ अपने स्वामीके सामने प्राणोंका त्याग करे है अर्थात् मरते हैं ॥ ४३६ ॥ पढमं धवलभडेहिं, भग्गं महकालभडवलं सयलं। तो महकालनिवेणं, उट्ठवियं सवलतुरएणं ॥४३७॥ ॥५६॥ " , अर्थ-तब पहले धवलसेठके सुभटोंने महाकाल राजाके सुभटोंका वल नाम सैन्यको भगाया तदनंतर महाकाल राजा बलवान घोड़पर सवार होके आपसंग्रामके वास्ते आया ॥ ४३७ ॥ नटुं धवलभटेहिं, ववरवइतेयमसहमाणेहिं । पयचारी जुज्झंतो, धवलो पुण पाडिओ वद्धो॥ ४३८ ॥ अर्थ-तव वपरपति वपरकृलका स्वामी राजाकातेज नहीं सहते हुए धवलके सुभट दशोंदिशमें भागे वाद प्यादल युद्ध करता हुआ धवलसेटको पृथ्वीपर गिराके वांधा ॥ ४३८ ॥ तंबंधिऊण रुक्खे, राया सुहडे निओइऊण निए। सत्थस्स रक्खणत्थे, सयं च चलिओ पुराभिमुहं ४३९ अर्थ-राजा महाकाल उसधवल सेठको वृक्षमें बंधवाके सार्थकी रक्षाकेलिए अपने सुभटोंको वहां रखके आप अपने नगरके सामने चला ॥ ४३९ ।। इत्थंतरंमि कुमरो, धवलं वुल्लावए कहसु इन्हिं । ते सुहडा कत्थगया, जेसिं दिन्ना तए कोडी ॥४४०॥ अर्थ-सअवसरमें श्रीपालकुमर धवलसेठसे बोला अहो धवल तुमकहो इसवक्त तुम्हारे सुभट कहां गए जिनोंको तुम करोड़ सोनयिय्या देते थे ॥४४० ॥ धवलोभणेद भो भो, खयंमि किं कुणसि खारपक्खेवं । किं वा दट्टाणुवरिं, फोडयदाणक्कियं कुणसि ४४१

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ५७॥
अर्थ-तब धवलसेठ कहे भोकुमर घावके ऊपर खारकाप्रक्षेप क्या करो हो अथवा जले हुएके ऊपर क्या जलाओ
हो यह आप जैसों के अयुक्त है ॥ ४४१ ॥
तो कुमरो भणइ फुडं अजवि जइ कोवि तुज्झ सबस्सं । वालेइ तस्स किं देसि, मज्झ साहेसुतं सवं ४४२
अर्थ-तदनंतर कुमर प्रगट कहे कि भो श्रेष्ठिन् जो अभीभी तुह्मारा सर्वस्व पीछा लेआवे तो उसको तुम क्या
देओ सो सत्य मेरेसे कहो ॥ ४४२ ॥
धवलो भणेइ न हु संभवेइ, एवं तहावि तस्स अहं । देमि सबस अद्धं, इत्थ पमाणं परमपुरिसो॥४४३॥
अर्थ-तब धवलसेठ बोला निश्चय ऐसा नहीं संभवे गया हुआ पीछा कहांसे आवे तौभी जो मेरा सर्वस्व पीछा
लेआवे उसको मैं आधाधन देउं इसमें परमपुरुष परमेश्वरही प्रमाण है अर्थात् साक्षीभूत है ॥ ४४३ ॥
तो कुमरो धणुहकरो, अंसेसुणुबद्धउभयतूणीओ। बुल्लावइ महकालं, पिट्ठी गंतूण इक्विल्लो ॥ ४४४ ॥
अर्थ-तदनंतर धनुष है हाथमें जिसके तथा कांधोके पीछे बांधा है बाणोंका भाथड़ा जिसने ऐसा कुमर एकाकी
पीछे जाके महाकाल राजाको बुलावे ॥ ४४४ ॥
भो बव्वरदेसाहिव, एवं गंतुं न लब्भए इन्हि । ता बलिऊण वलं मे, पिक्खसु खणमित्तमिक्कस्स ॥४४५॥
॥ ५७॥

अर्ध-कैसे बुलावे सो कहते हैं भो वघर देशाधिप इस वक्तमें इस प्रकारसे तुम नहीं जा सकोगे इसलिए एकवेर
पीछा पटटकर क्षणमात्र मेरा हाथ देखो अर्थात् मेरा वल देखो ॥ ४४५ ॥
तो बलिओ महकालो, पभणइ वालोसि दसणीओसि । वररूवलक्खणधरो, मुहियाइ मरेसि किं इक्को॥
अर्थ-तब महाकाल राजा पीछा पलटके कुमरसें कहे ते वालकहै तै देखनेयोग्य है रूपलक्षणप्रधानहे तेरा अर्थात्
प्रधान रूप लक्षणका धारनेवाला ऐसा ते एकाकी व्यर्थ निकम्मा क्यों मरता है ॥ ४४६ ॥
कुमरोवि भणइ नरवर, इय वयणाडंवरेण काउरिसा। भजति तुह सरेहिंवि, महहिययं कंपए नेव ॥४४७॥
अर्थ-तय कुमरभी कहे हे नरवर हे महाराज यह वचनके आडवरसे कायर पुरुष भागते हैं मेरा हृदयतो तुमारे
याणांसे भी नहीं कापे इस वास्ते वृथा वचनका आडंवर मतकरो मेरा हाथ देखो ॥ ४४७ ॥
इय भणिऊण कुमरो, अप्फालेऊण धणुमहारयणं, । मिल्लं(ल्ह)तो सरनियरं, पाडइ केउं नरिंदस्स ४४८
अर्थ-इस प्रकारसे कहके कुमर अपने धनुपको आस्फालनकरके वाणोंके समूहकी वर्षात करता भया राजाके
आगेका शंटा गिरादिया ॥ ४४८ ॥
तो क्वारनुहडेहि, विहिओ सरमंडवो गयणमग्गे।तहविन लग्गइ अंगे, इक्कोवि सरो कुमारस्स ॥४४९॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ५८॥
अर्थ-वादमें ववर देशाधिपके सुभटोंने आकाशमार्गमें बाणोंका मंडप किया याने इतने वाण चलाए कि जिससे
वाणोंका मंडप होगया तथापि कुमरके शरीरमें एकभी बाण नहीं लगे ॥ ४४९ ॥
कुमरसरेहिं ताडिय, देहाते ववराहिवइसुहडा। केवि हु पडंति केवि हु, भिडंति नासंति केवि पुणो ४५०
अर्थ-कुमरके वाणोंसे ताडित देहजिन्होंका ऐसे वह ववर राजाके सुभट कितनेक पड़े याने गिरे और कितनोका
शरीर आपसमें मिले और कितनेक भाग गए ॥ ४५० ॥
महकालोवि नरिंदो, मिल्लइ सयहत्थियं सहत्थेण । सोविन लग्गइ ओसहि,-पभावओ कुमरअंगंमि ४५१
अर्थ-महाकाल राजाभी अपने हाथसे शस्त्रको चलावे वह भी शस्त्र औषधिके प्रभावसे कुमरके शरीरमें नहीं
लगे ॥ ४५१॥
तो वेगेणं कुमरो, गहिउं सयहत्थियं तयं चेव । अप्फालिऊण पाडइ, भूमीए बबराहिवई ॥ ४५२ ॥
अर्थ-उसके बाद कुमर राजाके हाथको शस्त्रलेके और आस्फालन करके याने राजाके सामने फेंकके ववराधि-
पतिको पृथ्वीपर गिरावे ॥ ४५२ ॥
तं बंधिऊण कुमरो, आणइ जा निययसत्थपासंमि । तं दटुं ते नट्ठा, सत्थाहिवरक्खगा पुरिसा ॥४५३॥
1
॥५८॥

,
अर्थ-बादमें उन राजोको बांधके कुमर जितने अपने सथवाड़े के पास लावे उतने अपने राजाको बंधा हुआ
देयके सथवाडेकी रक्षाके वास्ते जो पुरुप रक्खे थे वह पुरुप भाग गए ॥ ४५३ ॥
भवलो बंधविमुक्को, खग्गं चित्तृण धावए सिग्छ । महकालमारणत्थं, सिरिपालो तं निवारेइ ॥ ४५४॥
अर्थ-
-अब धवलशेठ बंधनसे रहित हुआ खगलेके महाकाल राजाको मारनेके वास्ते जल्दी दौड़े तव श्रीपाल कुमर
धवलमेंटको मनाकरे ॥ ४५४ ॥
गेहागयं च सरणागयं च वद्धं च रोगपरिभूयं । नस्संतं वुढ वालयं च, न हणंति सप्पुरिसा ॥४५५॥
अर्थ-क्या कहके मनाकरे सो कहते है अहो सेठ अपने घर आया १ शरणे आया २ और बंधाहुआ ३ और
रोगले पीडित ४ और भागता हुआ ५ तथा वृद्ध नाम जरासे पीड़ित ६ और वालक इतने वैरी होवे तथापि सत्पुरुप
नहीं गारे ऐसे नीति के वचनसे यह राजाभी अपने घर आया है और बंधाहुआ है इसलिए अवध्य है अर्थात् मारने
योग्य नहीं है ।। ४५५ ॥
जे दससहस्ससुहडा, ववरसुहडेहिं ताडिया नट्ठा। तेसिं रुट्ठो सिट्टी, जीवणवित्तीउ भंजेइ ॥ ४५६ ॥
अर्थ-जे दमहजार मुभट वपरराजाके सुभटोसे ताड़े हुए भागगएथे उन्होंपर धवलसेठ नाराज होके उन्होंकी
भाजीपकाका निषेध किया ॥४५६ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥ ५९॥
ते सबेवि हुकुमरस्स, तस्स मुहियाइ सेवगा जाया। कुमरेण ते निउत्ता नियभागागयपवहणेसु॥४५७॥
अर्थ-बाद वह सर्वही सुभट अन्यत्र आजीवीका नहीं पातेहुवे श्रीपालकुमरके विनाही मूल्य सेवक भए तब कुमरने
उन सुभटोंको अपने भागमें आए भए जहाजोंका अधिकारी किया ॥ ४५७ ॥
सयमेव महाकालं, बधाओ मोइऊण सिरिपालो । नियभागपवहणाणं, वत्थाईहिं तमच्चेइ ॥ ४५८॥
अर्थ-बाद श्रीपालकुमर आपही महाकाल राजाको बन्धनसे छुड़वाके अपने भागमें आए जहाजोंमें लेजाके वस्त्र
आभूषणोंसे सत्कार करे ॥ ४५८ ॥
सवेवि हु ते सुहडा, पहिरावेऊण पवरवत्थेहिं । संतोसिऊण मुक्का, कुमरेण विवेयवंतेण ॥ ४५९ ॥
अर्थ-और विवेकवान कुमरने सर्व सुभटोंको प्रधानवस्त्र पहराके संतोष उत्पन्न करके राजा सम्बन्धी सुभटोंको
छोड़े और महाकाल राजाका विशेष सत्कार किया ॥ ४५९ ॥
महकालोवि हु दङण, तस्स कुमारस्स तारिसं चरियं। चित्ते चमक्किओ तं, अब्भत्थइ विणयवयणेहिं ४६०
अर्थ-महाकालराजाभी उस कुमरका वैसा आश्चर्यकारी चरित आचार देखके चित्तमें चमत्कार प्राप्त भया ऐसी
कुमरसे विनययुक्त वचनोंसे प्रार्थना करे ॥ ४६० ॥
॥ ५९॥

पुरिमुत्तम ? महनयरं, नियचरणेहिं तुमं पवित्तेहिं । अम्हेवि जेण तुम्ह, नियभत्तिं किंपि दंसमो॥ ४६१॥
अर्थ-हे पुरुषोत्तम तुम अपने चरणोंसे मेरा नगर पवित्र करो जिस कारणसे हमभी तुझारी भक्ति करें अपनी
भक्ति दिखावे ।। ४६१ ।।
कुमरो दक्खिन्ननिही, जा मन्नइ ता पुणो धवलसीट्ठी। वारेइ घणं कुमरं, सवत्थवि संकिया पावा ४६२
अर्ध-दाक्षिण्य परचित्तानुकूल उसका निधान कुमर जितने राजाके वचन अंगीकार करे उतने धवलसेठ कुमरको
पात मना करे हे फुमर शत्रुके घरमें सर्वथा नहीं जाना इत्यादि वचनोंसे, किस कारणसें सो कहते है जिसकारणसे
दुष्ट प्राणियोंको सर्व ठिकाने शंका रहती है उत्तम निःशंक रहते है ॥ ४६२ ॥
वारंतस्सवि धवलस्स, तस्स कुमरो समत्थपरिवारो। पत्तो महकालपुरं, तोरणमंचाइकयसोहं ॥ ४६३॥
अर्थ-धवलसेठ मनाकरतेभी अर्थात् धवलसेठका वचन नहीं मानके सर्वपरिवार सहित कुमर महाकाल राजाके
नगरमें पहुंचा कैसा नगर तोरण मंचादिकसे करी है शोभा जिसकी ऐसा ॥ ४६३ ॥
महकालो तं कुमरं, भत्तीइ नियासणंमि टावित्ता । पभणेइ इमं रज्जं, महपाणावि हु तहायत्ता ॥४६४॥
अर्ध-अथ महाकाल राजाभी कुमरको भक्तिसे अपने सिंहासनपर बैठाके विशेप आदरके साथ कहे यह राज्य
तुम्हारे आधीन है जादा कहनेकर क्या निश्चय मेरे प्राणभी तुह्मारे आधीन हें ॥४६४ ॥

भाषाटीका-
सहितम्-
श्रीपाल अन्नं च मज्झपुत्ती, पाणोहितोवि वल्लहा अत्थि । नामेण मयणसेणा, तं च तुमं पसिय परिणेसु ॥४६५॥
चरितम्
अर्थ-औरभी मेरे प्राणोंसेभी वल्लभ मदनसेना नामकी पुत्री है उस पुत्रीका प्रसन्न होके पाणिग्रहण करो ॥४६५ ॥
॥ ६०॥ कुमारेण भणियमहं, विदेसिओ तह अनायकुलसीलो, । तस्स कहं नियकन्ना दिजइ सम्मं वियारेसु ४६६
अर्थ-कुमरने कहा मैं परदेशी हूं और मेरा कुलाचार तुमने नहीं जाना है अर्थात् अज्ञात कुलशील मेरेको अपनी
कन्या कैसे देते हो हेमहाराज कन्या प्रदानमें अच्छी तरहसे विचार करना ॥ ४६६ ॥
पभणेइ महाकालो, आयारेणावि तुह कुलं नायं । न य कारणे वि एसो, कुणसु इमं पत्थणं सहलं ४६७
अर्थ-इस प्रकारसे कुमरने कहा तथापि महाकाल राजा बोले हमने आचारसेभी आपका कुल जाना है और
अपना विदेशीपना जो कहा उसपर कहते हैं कन्या परदेशीको नही देना ऐसा नियम नहीं है इसलिए यह हमारी
प्रार्थना सफल करो ॥ ४६७ ॥
आमिति कुमारेणं भणिए, महया महसवेण निवो। परिणावइ नियधूयं, देइ सिरिं भूरिवित्थारं ॥४६८॥
अर्थ-तब कुमरने राजाका वचन अंगीकार किया बड़े उत्सवके साथ महाकाल राजा अपनी पुत्रीको पर्णावे बहुत
विस्तार जिसका ऐसी लक्ष्मी देवे ॥ ४६८ ॥
.
॥६०॥

नवनाइयाई दाइज्झयंमि, दाऊण चारुवत्थेहिं । परिहावइ परिवारं, कुमरेण सहागयं सयलं ॥४६९ ॥ अर्थ-पाणिग्रहण के समयमें वहवरके देने योग्य पदार्थ देते नवनाटक देके कुमरके साथमें आयाहुआ सव परिवा- रको प्रधान पटकूल रेशमी वस्त्र वगैरेह पहरावे अर्थात् देवे ॥ ४६९ ।। एगं च महाजुंगं, वाहणरयणं च मंदिरे पत्तं । काऊण कुमरसहिओ रायावि समागओ तत्थ ॥४७॥ अर्थ-और एक महानुंगनामका प्रधान जहाजपात्र वंदर में प्राप्तकरके कुमर सहित राजाभी उस वंदरमें आए ॥४७०॥ सिट्ठीवि महाजुंगं, दटुं चउसट्टिवयसणाहं । मणिकंचणपडिपुन्नं, चिंतइ निययंमि हिययंमि ॥४७१॥ अर्थ-तव धवलसेठभी ६४ कूपस्तम्भों करके सहित और मणिरल और सोने करके भराहुआ ऐसा महाजुंग नामका जहाजको देखके अपने मनमें विचार करे ॥ ४७१ ॥ अहह किमेयं जायं, जं एसो मज्झ सेवगसमाणो। सामित्तमिमं पत्तो, भाडयमित्तं न मे दाही ॥४७२॥ अर्ध-क्या विचारे सो कहते हैं अहह इतिखेदे यह क्या होगया जिस कारणसे यह श्रीपाल मेरे सेवकके समान था इस वक्त में स्वामी होगया अब मेरेको भाडाभी नहीं देवेगा ॥ ४७२ ॥ इय चिंतिय सो जायइ, कुमरं गयमासभाडयं सोवि। दावेई दसगुणं तं, ही केरिसमंतरं तेसिं ॥४७३॥ भापा.स.१२ श्रीपाल- परितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥६१॥ अर्थ-ऐसा विचारके वह धवलसेठ कुमरके पास जाके भाडा मांगा तब कुमरभी दसगुना भाड़ा दिलावे हि यह आश्चर्यमें है शास्त्रकार कहते हैं कुमर और सेठ इनदोनोंके आपसमें कितना अंतर है अर्थात् बहुत अंतर है॥ ४७३ ॥ आरोविऊण कुमरं, तत्थ महापवहणे सपरिवारं । मुकलाविऊण धूयं, महकालो जाइ नियनयरिं ४७४ अर्थ-बाद महाकाल राजा उस महाजुंग जहाजपर परिवार सहित कुमरको चढ़ाके पुत्रीका मुकलावा करके मुक- लावा यह देशी वचन है कुमरीकों भौला करके राजा अपनी नगरी जावें ॥४७४ ॥ पोएण जणा जलहि, लंघिय पावंति रयणदीवं तं । जह संजमेण मुणिणो, संसारं तरिय सिवठाणं ४७५ अर्थ-लोक जहाजोंसे समुद्रको उल्लंघके रत्नद्वीप पहुंचे यहां दृष्टांत कहते हैं जैसे मुनि संयमसे संसार समुद्रको तिरके शिवस्थान मुक्तिपद पाते हैं वैसा ॥ ४७५ ॥ तत्थ य पोए तडमंदिरेषु, गुरुनंगरेहि थंभित्ता। उत्तारिऊण भंडं पडमंडवमंडले ठवियं ॥ ४७६ ॥ अर्थ-वे द्वीपमें तट मंदिर में जहाजोंको नंगर गिराके खड़े करके जहाजों के अंदरसे क्रियाणा उतारके पट मंडप- याने तंबुओंमें रक्खै ॥ ४७६ ॥ कुमरोवि सपरिवारो, पडवंसावासमज्झमासीणो। पिक्खेइ नाडयाई, विमाणमज्झट्ठियसुरुब ॥४७७॥ ॥६१॥ , F- अर्ध-श्रीपाल कुमरभी अपने परिवार सहित तंबुओं में रहा हुआ सिंहासन पर बैठा हुआ नाटक देखे किसकेजसा विमानमें रहा हुआ देवके जैसा ।। ४७७ ॥ सेट्ठिवि तंमि दीवे, बहुलाभं मुणिय विन्नवइ कुमरं । देव नियवाहणाणं, कयाणगे किं न विकेह ॥४७८॥ अर्थ-धवल सेठभी उस द्वीपमें बहुत लाभ जानके कुमरसे वीनती करे हे देव हे महाराज अपने जहाजोंका किचाना कैसे नहीं बेचते हो ॥ ४७८ ॥ तो भणइ कुमारो ताय, अम्हतुम्हाण अंतरं नस्थि । तं चिय कयाणगाणं, जंजाणसितं करिज्जासु ४७९ अर्थ-तदनंतर कुमरकहे हे तात सदृश हमारे तुम्हारे अंतर नहीं है क्रियाणोंकी व्यवस्था जैसी तुमजानोहो वैसी करो ॥४७९ ॥ हिट्टो सिट्ठी चिंतइ, हुं हुं नियजाणियं करिस्सामि ।जेण कयविकओ चिय,वणिणो चिंतामणिं वित्ति ४८० अर्थ-यह श्रीपालका वचन सुनके सेठ बहुत खुशी हुआ विचारे अव में अपना जाना हुआ करूंगा जिस कारणसे पाणियोंक क्रय विक्रय चिंतामणि वांछित अर्थ साधक रलके सदृश लोक कहते हैं ॥ ४८० ॥ इत्तो य कोवि पुरिसो, सुरसरिसो चारुरूवनेवत्थो । सुपसन्ननयणवयणो, उत्तमहयरयणमारूढो ४८१ ।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥६२॥
अर्थ-इधरसै कोई पुरुष देवसदृशरूपआकृति वेष मनोहर जिसका ऐसा, नेत्र और मुख अतिशयप्रसन्नहर्षित जिसका
प्रधान घोड़ेपर सवार हुआ ऐसा ॥ ४८१ ॥
बहुपरिअरपरिअरिओ, पत्तो कुमरस्स गुड्डरदुवारं । पिक्खेइ नाडयं जा, तो सो कुमरेण आहूओ॥४८२॥
अर्थ-और बहुत परिवारसे परवरा हुआ ऐसा कुमरके तंबूका दरवाजा वहां प्राप्त हुआ जितने नाटक देखे उतने
कुमरने उसपुरुषको अपने पासमें बुलवाया ॥ ४८२ ॥
युग्मं सो कयकुमरपणामो, आसणदाणेण लद्धसम्माणो। विणयपरो वीसत्थो, उवविट्ठो कुमरपायंमि॥
अर्थ-वह पुरुष किया है नमस्कार जिसने ऐसा तथा आसन देनेसे पाया है सन्मान जिसने और विनयमें ततपर
विश्वास युक्त स्वस्थ चित्त जिसका ऐसा कुमरके पासमें बैठा ।। ४८३ ।।
सुरपिच्छणयसरिच्छं, तं पिच्छणयं पलोइऊण खणं । चिंतइ एस इमाए, लीलाए कोवि रायसुओ ४८४
अर्थ-देवताके नाटक सदृश वह नाटक क्षणमात्र देखके विचार करे इस लीलाकरके यह कोई राजकुमर है ऐसा
जाना जावे है॥ ४८४ ॥
थक्कंमि नाडए सो, पुट्ठो कुमरेण कोसि भद्द तुमं । कत्थ पुरे तुह वासो, दिटुं अच्छेरयं किंपि ॥४८५॥
॥६२॥

अर्ध-अथ नाटक पूर्ण होनेसे उस पुरुपको कुमरने पूछा हे भद्र तें कौन है किस नगरमें तुम्हारा निवास है और
कोई आश्चर्य देखा होय तो कहो ॥ ४८५ ॥
सो जंपइ विणयपरो, कुमरं पइ देव ? इत्थ दीवंमि । सेलोस्थि रयणसाणू, वलयागारेण गुरुसिहरो ४८६
अर्थ-इस प्रकारसे कुमरके पूछनेसे वह पुरुष विनयमें ततपर होके कुमरसे कहे हे देव हे महाराज इस द्वीपमें कड़े
के. जसी गोल आकृति ऐसा रत्नसानु नामका बहुत हैं शिखर जिसके ऐसा पर्वत है ॥ ४८६ ॥
तम्मज्झ कयनिवेसा, अत्थि पुरी रयणसंचयानाम । तं पालइ विज्जाहर, राया सिरिकणयकेउत्ति ४८७
अर्थ-उस पर्वतके मध्यभागमे करी रचना जिसकी ऐसी रत्नसंचया नामकी नगरी है उस नगरीको श्रीकनककेतु
नाम विद्याधर राजा पाले है अर्थात् रक्षाकरे है ॥ ४८७ ॥
तस्सस्थि कणयमाला, नाम पिया तीइ कुच्छिसंभूया। कणयपह कणयसेहर, कणयज्झय कणयरुइपुत्ता।
अर्थ--उस राजाके कनकमाला नामकी रानी है उसकी कुक्षिसे उत्पन्न भए कनकप्रभ १ कनकशेखर २ कनक
ध्वज कनकरुचि ४ इन नामके चार पुत्र हैं ॥ ४८८ ॥
तेसिं च उवरि एगा, पुत्ती नामेण मयणमंजूसा । सयलकलापारीणा, अइरइरूवा मुणियतत्ता ॥४८९॥

.
श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥६३॥
अर्थ-और उन चार पुत्रोंके ऊपर मदनमंजूसा नामकी एक पुत्री है कैसी है सम्पूर्ण कलाका पारपाया जिसने और
रति कामदेवकी स्त्रीका रूप सौंदर्य उल्लंघा जिसने और जाना है तत्व जिसने ऐसी ॥ ४८९ ॥
तत्थ य पुरीइ एगो, जिणदेवो नाम सावगोतस्स । पुत्तोहं जिनदासो, कहेमि चुजं पुणो सुणसु ४९०
अर्थ-उस नगरीमें एक जिनदेवनामका श्रावक है उसका जिनदास नामका मैं पुत्रहूं आश्चर्य अब मैं कहूं सो
सुनो ॥ ४९०॥
सिरिकणयकेउरन्नो, पियामहेणित्थ कारियं अत्थि । गिरिसिहरसिरोरयणं, भवणं सिरिरिसहनाहस्स ॥
अर्थ-श्रीकनककेतू राजाका पितामह दादाने इस पर्वतके शिखरपर रत्न जैसा श्रीऋषभदेव स्वामीका मंदिर
बनवाया है॥ ४९१॥
तं च केरिसं, संतमणोरहतुगं, उत्तमनरचरियनिम्मलविसालं ।
दायारसुजसधवलं, रविमंडलदलियतमपडलं ॥ ४९२ ॥
अर्थ-सत्पुरुषोंका मनोरथ ऊंचा होवे है वैसा वह मंदिर ऊंचा है और उत्तमपुरुषोंके चरित्र जैसा वह मंदिर
निर्मल और विशाल है तथा दातारके जसके जैसा वह मंदिर धवला है सूर्यमंडलके जैसा अंधकार जिसने दूरकिया है
ऐसा वह मंदिर है ॥ ४९२ ॥
,
॥६३॥

4-575
तम्मझे रिसहेसर, पडिमा कणयमणिनिम्मिया अस्थि । तिहुयणजणमणजणिया,-णंदा नवचंदलेहत्व ।।
अर्ध-उस मंदिरमें सोने और मणिरलसेंवनीभई श्रीऋपभदेवस्वामिकी प्रतिमा है कैसी है प्रतिमा नवीन चन्द्रमाकी
रेखाके जैसी तीनभवनके लोकोंके मनमें उत्पन्न किया है आनन्द हर्प जिसने ऐसी ॥४९३ ।।
तं सो खेयरराया, निच्चं अच्चेइ भत्तिसंयुत्तो । लोओवि सप्पमोओ, नमेइ पूएइ झाएइ ॥ ४९४ ॥
अर्थ-वह विद्याधरोंका राजा भक्तिसहित उस जिन प्रतिमाकी नित्यपूजा करे है नगरमें रहनेवाले लोगभी हर्पसहि-
तहोके उस प्रतिमाको नमस्कार करे है पूजाकरे है ध्यावे है ॥ ४९४ ॥
सा नरवरस्स धूया, विसेसओ तत्थ भत्तिसंजुत्ता । अट्ठपयारं पूयं, करेइ निञ्चं तिसंज्झासु ॥ ४९५ ॥
अर्थ-वह पहले कही मदनमंज़पानामकी राजकुमरी विशेष भक्ति संयुक्त उस जिनमंदिरमें तीनों संध्यामें निरंतर
अष्टमकारी पृजाकरे है ॥ ४९५ ॥
अन्नदिणे विहिनिउणा, सा नरवरनंदिणी सपरिवारा । कयविहिवित्थरपूया, भावजुया वंदए देवे ॥१६॥
अर्थ- अन्यदिनमें विधिमें निपुण चतुर वह राजकुमरी परिवारसहित विस्तारविधिसे करी पूजा जिसने ऐसी और
शुभभावयुक्त देवनंदना करे ॥ ४९६ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥६४॥
ताव नरिंदोवि तहिं, पत्तो पूयाविहिं पलोयंतो। हरिसेण पुलइअंगो, एवं चिंतेइ हिययंमि ॥४९७॥
अर्थ-उतने राजाभी पूजाविधि देखता हुआ उस जिनमंदिरमें आया विशेष पूजाके देखनेसे हर्षसे रोमराजी
जिसकी विकस्वर मानभई ऐसा मनमें इसप्रकारसे विचारे ॥ ४९७ ॥
अहो अपुवा पूया, रइया एयाइ मज्झ धूयाए । अहो अपुत्वं च नियं, विनाणं दंसियमिमीए ॥४९८॥
अर्थ-जैसे राजा विचारे सो कहते हैं अहो इति आश्चर्ये इस मेरी पुत्रीने अपूर्व पूजा रची ऐसी पूजा पहले कभी
भी नहीं देखी और यहभी आश्चर्य है इस पुत्रीने अपूर्व अपना विज्ञान कलामें कुशल पणा दिखाया ॥ ४९८ ॥
एसा धन्ना कयपुन्निया य, जीए जिणिंदपूयाए । एरिसओ सुहभावो, दीसइ सरलो अ सुहहावो ४९९
अर्थ यह मेरी पुत्री धन्या है और किया है पुन्य जिसने ऐसी कृतपुन्या है जिसका श्रीतीर्थकरकी पूजामें ऐसा शुभ
भाव वर्ते है और जिसका सरल, शोभन स्वभाव है ॥ ४९९ ।।
थिरियापभावणाकोसलत्त, भत्तीसुतित्थसेवाहिं । सालंकारमिमीए, नजइ चित्तंमि संमत्तं ॥ ५०० ॥
अर्थ-जिनधर्ममें स्थिरपना १ प्रभावना धर्मको शोभाप्राप्तकरना २ कुशलत्व जिनप्रवचनमें निपुणपना ३ भक्ति
तीर्थकरादिकमें अंतरंगप्रीति ४ सुतीर्थसेवा स्थावर जंगम शोभनतीर्थकी सेवा ५ इन पांच अलंकारों करके इसके
चित्तमें सम्यक्त्व अलंकार सहितवर्ते है॥ ५०० ॥
॥ ६४॥

R
R-56
ता एयाए एयारिसीइ, धूयाइ हबइ जइ कहवि । अणुरूवो कोइवरो, ता मज्झमणो सुही होइ ॥५०१॥
अर्ध-तिसकारणसे एसी मेरी पुत्री के योग्य जो कोई भर्तारहोवे तब मेरे मनमें सुखहोवे ॥ ५०१॥
एवं नियधूयाए, वरचिंतासल्लसल्लिओ राया। अच्छइ खणं निसन्नो, सुन्नमणो झाणलीणुव ॥५०२॥
अर्थ-इस प्रकारसे अपनी पुत्रीके वरकी चिंतारूप सल्यसे सल्लितभया सल्य युक्त राजा क्षणमात्र उसी विचारमें
लीनमन जिसका एसा शून्यमन होके वैठा ।। ५०२ ॥
सावि हुनरिंदधूया, पूयं काउण विहियतिपणामा।नीसरइ जाव पच्छिम,-पएहिं जिणगभगेहाओ ५०३
अर्थ-यह राजकुमरीभी पूजाकरके किया है तीनप्रणाम नमस्कार जिसने ऐसी जितने मूलगुंभारेसे पीछे पगोंसे
बाहर निकले ।। ५०३ ॥
तकालं तह मिलियं, तद्दारकवाडसंपुढं कहवि, । जहवलिएणवि केणवि, पणुल्लियं उग्घडइ नेव ॥५०४॥
अर्ध-उतने ततकाल उस जिनमंदिरके दरवजेका कपाट कोई प्रकारसे वैसामिला अर्थात् बन्ध होगया जैसे कोई
यलवान पुरुपकी प्रेरणासेभी नहीं खुले अर्थात् उघड़े नहीं ॥ ५०४ ॥
तत्तो सा निवधूया, अप्पं निंदेइ गरुयसंतावा । हा हा अहं हयासा, किं कयपावा असुहभावा ॥५०५॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥६५ ।। अर्थ-उसके अनन्तर वह राजपुत्री बहुत संताप जिसके ऐसीभई अपने आत्माकी निंदाकरे किया पाप जिसने ऐसी अशुभ भाववाली मैं हूं ॥ ५०५ ॥ जेण मए पावाए, पमायलग्गाइ मंदभग्गाए । संकरकयाइ पूयाइ, दंसणं खणमवि नलद्धं ॥ ५०६ ॥ अर्थ-जिस कारणकरके मैं पापनी प्रमादमें लगीभई और मन्दभागिनीने संकरभाव शुभाशुभ रूप मिश्रभावसे पूजाकरी जिससे प्रभुका दर्शन क्षणमात्रभी नहीं पाया ॥ ५०६ ॥ ही ही अहं अहन्ना, अन्नाणवसेण कम्मदोसेण । आसायणंपिकाहं, किंपिधुवं वंचिया तेण ॥५०७॥ अर्थ-हही इति खेदे खेदसे कहती है मैं अधन्य हूं अज्ञानके वशसे कर्मके दोषसे कोई आशातना विराधनाकरी है इस कारणसे निश्चय मैं ठगी गई हूं ॥ ५०७ ॥ एवं ममावराह, खमसु तुमं नाह कुणसु सुपसायं । मह पुन्नविहीणाए, दीणाए दंसणं देसु ॥ ५०८ ॥ अर्थ-हे नाथ यह मेरा अपराध क्षमाकरो आप सुष्ठुनाम शोभन प्रसाद नाम अनुग्रह प्रसन्नताकरो पुन्यविहीन दीन मेंहूं ऐसी मेरेको दर्शन देओ ॥ ५०८ ॥ एवं तं रुयमाणि, दट्टणं नंदणि भणइ राया । वच्छे(वत्थे)तुहावराहो, नत्थि इमो किं तु मह दोसो ५०९ अर्थ-इस प्रकारसे रोती भई पुत्रीको देखको राजा कहे हे वत्से यह तेरा अपराध नही है किंतु मेरा दोष है ॥५०९॥ ॥६५॥ , जं जिणहरमझगओ, तुहकयपूयं निरिक्खमाणोवि। जाओऽहं सुन्नमणो, तुहवरचिंताइ खणमिकं ५१० अर्थ-कैसे सोकि जो मै जिनमंदिरमें आया हुआ तेरी करीभई पूजा देखता हुआभी तेरे वरकी चिंता करके एक क्षणमात्रतक शून्यमन होगया ॥ ५१० ॥ तीए य मणोणेगत्तरूव, आसायणाइ फलमेयं । संजायं तेण अहं, नियावराहं वियकमि ॥ ५११ ।। अर्थ-उसमनसे अनेक प्रकारकी आशातना होती है उस आशातनाका यह जिनमंदिरका द्वार बंधभया यह फल हुआ उस कारणसे मैं अपना अपराध विचारूं हूं ॥ ५११॥ देवो य वीयराओ, नेवं रूसेइ कहवि किंतु इमं । जिणभवणाहिट्ठायग, कयमपसायं मुणसु वच्छे ५१२ अर्थ-देवतो वीतराग है कोई प्रकारसे नहीं नाराज होवे किंतु हे पुत्रि यह जिनमंदिरके अधिष्ठायक देवका किया आ अमसाद अप्रसन्नपना त जान, ॥ ५१२ ।। तत्तो नरेहिं आणाविऊण, वलिकुसमचंदणाईयं । कप्पूरागुरुमयनाहि,-धूवरूवं च वरभोगं ॥५१३ ॥ अर्थ-उसके अनन्तर पूजाके निमित्त पुप्प चंदनादि सेवक लोगोंके पाससे मंगवाके और कपूर अगर कस्तूरी प्रमु- सका प्रधान भोगदेवयोग्य द्रव्य मंगवाके ॥ ५१३ ॥ FIRK-4 श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. राया धूयाईजुओ, धूवकडुच्छेहि कुणइ भोगविहिं । निम्मलचित्तो निञ्चल,-गत्तो तत्थेव उवविट्ठो ५१४ अर्थ-राजा पुत्री सहित धूपधानोंमें भोगविधिः नामधूपदानादि विधिः करे कैसा है राजा निर्मल है चित्तजिसका और निश्चल शरीर जिसका ऐसा जिनमंदिरमें बैठा ॥ ५१४ ॥ युग्मं, उववासतिगंजायं, धूयासहियस्स नरवरिंदस्स। तो रंगमंडवोवि हु, रंगंनो जणइ जणहियए । अर्थ-जिनमंदिरमें धूपदानादि विधिः करते पुत्रीसहित राजाके तीनउपवास भया तब रंगमंडपभी लोगोंके मनमें राग नहीं उत्पन्न करे ॥ ५१५ ॥ सामंतमंतिपरिगह,-पउरजणेसुवि विसन्नचित्तेसु । उवविढेसु निरंतर,-जलंतदिप्पंतदीवेसु ॥ ५१६ अर्थ-सामंत और मत्रवी और परिवार और नगरमें रहने वालेलोग खेदातुर भया है चित्तजिन्होंका तथा निरंतर दीपक जलरहे है उसवक्तमें ॥ ५१६ ॥ केवि हु दियंति कन्नाइ, दूसणं केवि नरवरिंदस्स । एवं बहुप्पयारं, परप्परालावमुहरजणे ॥५१७॥ अर्थ-कईक लोग कन्याको दूषण देवे और कितनेक राजाको दूषण देवें इसप्रकारसे यथा तथा लोगोंका परस्पर भाषण होनेसे लोगदुर्मुख हुआ इच्छामे आवे ऐसा बोले ॥५१७ ॥ तइयाए रयणीए, पच्छिमजामंमि निझुणिसहाए। सहसत्ति गयणवाणी, संजाया एरिसी तत्थ ॥ , .

अर्थ-तीसरी रात्रिके चौथे प्रहरमें ध्वनि निकली अर्थात् उस रंगमंडपमें अकस्मात् ऐसी आकाशवाणी भई ॥५१८॥ दोस न कोइ कुमारियह, नरवर दोस न कोइ। जिणकारणि जिणहरु जडिओ, तं निसुणउ सहु कोइ॥ अर्थ-यह वाणी दोहा छन्दोसे कहते हैं यहां कुमरीका दोष कोई नहीं है और राजाकाभी दोप नहीं है जिस कार- णमे जिनमंदिर ढका गया है वह कारण सबलोग सुनो ॥ ५१९ ॥ तं सोऊणं वाला, संजाया हरिसजणियरोमंचा। रायावि हु साणंदो, संजाओ तेण वयणेण ॥ ५२० ॥ अर्थ-तदनंतर देववाणी सुनके राजकन्या हर्पित भई रोमराजी जिसकी विकस्वरमान भई राजाभी उसवाणी से आनंद सहितभए ॥ ५२० ॥ लोयावि सप्पमोया, जाया सवेविचिंतयंति अहो । किं कारणं कहिस्सइ ! तत्तो वाणी पुणो जाया ५२१ अर्थ-लोकभी हर्पसहित हुआ ऐसा सब विचारे अहो यह आश्चर्य है क्या कारण कहेगा वाद और वाणी भई ।। जमु नरदिट्ठिहिं होइसइ, जिणहरु मुक्कदुवारु । सोइज मयणमंजूसियह, होइसइ भत्तारु ॥५२२॥ अर्थ-जिस मनुष्यके देखनेसे जिनमंदिरका दरवाजा उघड़ेगा अर्थात् खुलेगा वहही नररत्न मदनमंजूषा राजपुत्री भार होगा ।। ५२२ ॥ गाटयरं तो तुहा, सबै चिंतंति कस्सिमा वाणी। एवं च कया होही, तत्तो जाया पुणो वाणी ॥५२३॥ पा ii.१२ श्रीपाल- चरितम् भापाटीका- सहितम्- ॥६७॥ , , अर्थ-तदनंतर सवलोग अत्यन्त संतुष्टमान हुआ विचारे' किसकी यह वाणी है और कब वह पुरुष आवेगा और कव जिन मंदिरका दरवाजा खुलेगा ऐसा विचारोंके अनन्तर और वाणी भई ॥ ५२३ ॥ सिरिरिसहेसर ओलगिणि, हउं चक्केसरिदेवि । मासभंतरि तसु नरह, आविसु निच्छइ लेवि ॥ ५२४ ॥ अर्थ-श्री ऋपभदेवस्वामीकी सेवाकरनेवाली मैं चक्रेश्वरी देवी हूं १ महीनेमें उस पुरुपको लेके निश्चय आऊंगी २२४ इत्थंतरंमि जायं, विहाणयं वजियाइं तूराइं। रायावि सपरिवारो, समुट्ठिओ नियगिहं पत्तो ॥ ५२५ ॥ अर्थ-इस अवसरमें प्रभातहोगया प्रभातयोग्य वादिन्न बजे राजाभी परिवारसहित अपने घरगए ॥ ५२५ ॥ तत्तो कयगिहपडिमा,-पूयाइविहीहिं पारणं विहियं । सवत्थवि वित्थरया, सा वत्ता लोयमज्झमि ॥२६॥ अर्थ-तदनंतर घरदेरासरमें जिनप्रतिमाकी विधिः से पूजाकरके पुत्रीसहित राजाने तीनउपवासका पारणाकिया वह वार्ता सवलोकमें प्रसिद्धभई है ॥ ५२६ ॥ आवंति तओ लोया,सपमोया जिणहरस्स दारंमि।अणउग्घडिए तंमिवि, पुणोवि गच्छंति सविसाया २७ अर्थ-तदनंतरलोक हर्पसहित जिनमंदिर जावे मंदिरका दरवजा वन्ध देखके विषादसहित हुआ पीछा अपने ठिकाने जावे ॥ ५२७ ॥ तं जिणहरस्स दारं, केणवि नो सक्कियं उघाडेउं । किंतु कओ बहुपहिंवि उग्घाडो निययकम्माणं २८ अर्थ-वह जिनमंदिरका दरवजा कोई उघाड़नेको समर्थ नहीं हुआ किंतु बहुतलोकोंने अपना भाग्य उघाड़नेका उपाय किया परन्तु किसीका भाग्य उघड़ा नहीं ॥ ५२८ ॥ एवं च तस्स चेईहरस्स, टंकियदुवारदेसस्स । संजाओ किंचूणो मासो, एयं तमच्छरियं ॥ २९ ॥ अर्थ-इम प्रकारसे जिनमंदिरका दरवज्जा बन्धहोनेको आज कुछ कम एक महीना हुआ है यह आश्चर्य है ॥५२९॥ जइ पुण पुरिमुत्तम,? तंसि चेव तं जिणहरस्स वरदारं । उग्घाडेसि धुवं तो, मिलिया चकेसरीवाणी॥३०॥ अर्थ-हे पुरुषोत्तम जो फेर तुमही उस जिनमंदिरका दरवज्जा उघाडो तो निश्चय चक्रेश्वरीकी वाणी मिले ॥५३०॥ तो तं कुणसु महायस,? जिणभवणुग्घाडणं तुरियमेव । उग्घडिए तंमिजओ, अम्हाणवि उग्घडइ पुन्नं ३१ अर्थ-तिसकारणसे हे महायशस्विन आप जिनमंदिरका दरवजा जल्दी उघाड़ो इसमें यलकरो जिसकारणसे जिन मंदिरके उपड़नेसे हमारा पुन्य उघड़े है ॥ ५३१ ॥ तत्तो कुमरो तुरियं, तुरयारूढो पयंपए सिद्धिं, । आगच्छसु ताय ? तुमंपि, जिणहरं जेण गच्छामो ५३२ अर्थ--उसके अनन्तर कुमर घोडेपर सवारहोकर शीघ्र धवल सेठसेकहे हे पितासदृश हेसेठ तुमभी आओ जिससे जिनमंदिर जावे ॥ ५३२ ।।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्
॥६८॥
तो सिठी कुमरं पइ,जंपइ तुभ्भे अवेयणा जेण, भुञ्जह अणज्जियं चिय, निचं निक्खीणकम्माणो ॥५३३॥
अर्थ-तदनंतर सेठ कुमरसे कहे आप अवेदन है नहीं विद्यमान है वेदन विचार जिन्होंको ऐसे किसकारणसे सो
कहते है जिसकारणसे आप निरंतर क्षीणकर्मी हो विनाकमाया हुआ भोगवोहो ॥ ५३३ ॥
नूणं तुह्माणंपिव, अझेवि न तारिसा इहच्छामो, गच्छ तुम चिय अझे, नियकज्जाई करिस्सामो॥५३४॥
अर्थ-निश्चय आपके जैसा हमभी इसवक्त निक्षीणकर्मा नहीं कमायाहुआ खानेवाला नहीं रहें इसलिए आपही
जाओ हमतो हमारा कार्य करेंगे ॥ ५३४ ॥
तो धवलं मुत्तणं, अन्नो सबोवि सत्थपरिवारो,। चलिओ कुमरेण समं, पत्तो जिणभवणपासंमि ॥५३५॥
अर्थ-वाद धवल सेठको छोडके और सव परिवार कुमरके साथमें चला तब कुमर जिनमंदिरके पासमें पहुंचा ५३५
कुमरो भणेइ भो भो, पिहु पिहु गच्छेह जिणवरदुवारं,जेण फुडं जाणिज्जइ, सो दारुग्घाडओ पुरिसो ५३६
अर्थ-तब कुमर कहे अहो लोगो तुम अलग अलग जिनमंदिरमें जाओ जिससे प्रगट दरवजा उघाड़नेवाला पुरुष
जानने में आवे ॥ ५३६ ॥
तो जंपइ परिवारो, मा सामिय ? एरिसं समाइससु, । किं सूरमंतरेणं, पडिबोहइ कोवि कमलवणं ५३७
॥ ६८ ॥

ज-तदनंतर परिवारके लोग कहें हे स्वामिन् ऐसी आज्ञा मतदेओ जिस कारणसे सूर्य विना क्या कोई कमलोका
चन विकस्वरमान कर है अपितु नहीं करे ॥ ५३७ ।।
ससिमंडलं विणा किं, कमुयवणुल्लासणं कुणइ कोवि, । किंच वसंतेण विणा, वणराइं कोवि मंडेइ ५३८
अर्य-तथा चन्द्रमाके मंटलविना क्या कोई कुमुदोंके वनको विकस्वरमान करसके है अपितु कोई नहीं करसके
और बसतातु विना वनरानिको कौन प्रफुल्लित करसके किंतु कोई नहीं करसके ॥ ५३८ ॥
कि सहकारण विणा, उग्घाडइ कोवि कोइलाकंठं, । ता देव तं दुवारं, तुमं विणा केण उग्घडइ ५३९
अर्थ-तथा आमकी मांजरविना कोयलका कंठ कौन उघाडसके है किंतु कोई नहीं उघाडसके तिसकारणसे यह जिन
मंदिरका दरवजा आपविना कान उघाड़े अर्थात् कोई नहीं उघाड़े ॥ ५३९ ॥
तो कुमरो तुरयाई, मोइत्ता विहिय उत्तरासंगो, कयनिस्सीहीसद्दो, सीहदुवारंमि पविसेइ ॥ ५४०॥
अर्थ-तदनंतर, कुमर घोड़ेसे उतरके कियाहै उत्तरासन जिसने ऐसा उच्चारणकिया है निसहीका शब्द जिसने ऐसा
पत्यका सिंहद्वार नाम प्रथमद्वारमें प्रवेशकरे ॥ ५४० ॥
जा जाइ मंडवंतो, कुमरो उप्फुल्लनयणमुहकमलो, ता कयकिंकाररवं, अररिजुयं झत्ति उग्घडियं ॥५४१॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
,
॥६९॥
अर्थ-अब कुमर विकस्वरमान है नेत्र और मुखकमल जिसका ऐसा जितने मंडपके अंदर जावे उतने किया है
किंकारव शब्द जिसने ऐसा कपाट युग्म दोनों कपाट जल्दी उघड़े ॥ ५४१ ॥
सो तत्थ रिसहनाहं, बत्थालंकारघुसिणकयपूयं, अमिलाणकुसुमदाम, वंदिय ढोएइ फलमउलं ॥५४२॥
अर्थ-वह श्रीपालकुमार उसजिनमंदिर में श्रीऋषभदेवस्वामी देवाधिदेवको नमस्कार करके सर्वोत्कृष्ट फल चढावे कैसे
हैं श्रीऋषभदेवस्वामी उत्तमवस्त्र और अलंकार आभूषण करके और केसरकरके करी है पूजा जिन्होकी और विकस्वर
मान फूलोंकी माला कंठमें है जिन्होंके ऐसे ॥ ५४२ ॥
इत्थंतरंमि राया, धूयासहिओ समागओ तत्थ,। अच्छरियकारिचरियं, पिच्छइ कुमरं निहुयनिहुयं ५४३
अर्थ-इस अवसरमें कनककेतुराजा पुत्रीसहित उस जिनमंदिर में आयाभया आश्चर्यकारी चरित्र आचार जिसका
ऐसे कुमरको निश्चल दृष्टि से देखे ॥ ५४३ ॥
कुमरोऽवि हरिसवसओ, पंचंगपणामलीढमहिवीढो।सिरसंठियकरकमलो,रिसहजिणिदं थुणइ एवं ५४४
अर्थ-कुमरभी हर्षके वशसे पंचांगप्रणामकरके पृथ्वीका स्पर्श किया है जिसने मस्तकमें अर्थात् ललाटदेशमें अंजलि
करी है जिसने ऐसा कहाजाय प्रकारसे श्रीऋषभदेवस्वामी की स्तुति करे ॥ ५४४ ॥
सिरिसिद्धचकनवपय, महल्लपढमिल्लपयमय जिणिंद।असुरिंदसुरिंदच्चिय,-पयपंकय नाह! तुज्झनमो ४५
॥६९॥

अर्ध-श्रीसिद्धचक्रमें जे नवपद उन्होंमें वड़ा जो प्रथमपद वह स्वरूप जिसका ऐसा उसका सम्बोधन हे श्रीसिद्ध० हे जिनेन्द्र और चमर बलिन्द्र आदि असुरेन्द्र सौधर्म ईशानादि सुरेन्द्र उप लक्षणसे नागेन्द्रादिककाभी ग्रहण है इन्हों करके पूजित है चरण कमल जिन्होंका ऐसे आपको नमस्कार होवे ॥ ५४५ ॥ सिरिरिसहेसरसामिय, कामियफलदाणकप्पतरुकप्य !। कंदप्पदप्पगंजण, भवभंजण देव तुज्झ नमो ॥ ५४६ ॥ अर्ध-हे श्रीमपमेश्वरस्वामी वांछितफलदेने में कल्पवृक्षके सदृश और कंदर्पनामकामकां जो अभिमान उसको मर्दन करनेवाले है भवभंजन हे देव आपको नमस्कार होवो ॥ ५४६ ॥ सिरिनाभिनामकुलगर,-कुलकमलुल्लासपरमहंससम, । असमतमतमोभर, हरणिकपईव तुज्झ नमो ४७ अर्थ-श्रीनामिनाम जो कुलगर उनोका जो कुलरूपकमल उसको विकास करनेमें उत्कृष्ट सूर्यसदृश उसका सम्बोधन है श्रीनाभि और नहीं विद्यमान है तुल्य जिसके ऐसा अज्ञानरूप अंधकारकासमूह उसके हरनेमे अद्वितीय प्रदीप समान एसा ह देव आपके लिए नमस्कार होवो ॥ ५४७ ॥ सिरि मरुदेवासामिणि, उदरदरीदरियकेसरिकिसोर।घोरभुयदंडखंडिय,-पयंडमोहस्स तुज्झ नमो५४८

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श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
.
-
।
॥ ७० ॥
।
।
-
-
।
-
-
अर्थ-श्रीमरुदेवी स्वामिनीका उदरही गुफा उसमें निर्भय केसरी सिंहके बालक सदृश और प्रचंड भुजदंड करके
खंडित किया हैं दुर्धर मोहको जिसने ऐसा हे देव आपके अर्थ नमस्कार होवो ॥ ५४८ ॥
इक्खागुवंसभूसण, गयदूसण दुरियमयगलमइंद, चंदसमवयण वियसिय, नीलुप्पलनयण तुज्झनमो॥
अर्थ हे इक्ष्वाकुवंशभूषण और गए हैं दूषण जिससे ऐसे हेगत दूषण और पापही मदोत्कट हाथी उन्होंके हटाने में
सिंहके जैसा और चन्द्रके तुल्य मुखजिसका और विकसित नीलकमलके सदृश नेत्रजिन्होंके ऐसे हे प्रभो आपको
नमस्कार होवो ॥ ५४९॥
कल्लाणकारणुत्तम,-तत्तकणयकलससरिससंठाण ?। कंठट्ठियकलकुंतल, नीलप्पलकलिय तुज्झ नमो ५०
अर्थ-कल्याणका कारण जो उत्तम तपा हुआ सोना उसका जो कलश उसके सदृश संस्थान आकार जिन्होंका उसका
सम्बोधन और कंठमें रहे हुए मनोहर पांचवीमुट्ठी सम्बन्धी केश वह ही नीलोत्पल उन्हों करके युक्त अर्थात् कलशके
कंठमें नीलोत्पल कमल होते हैं वैसा प्रभुके कंठमें बाल शोभते हैं ऐसे आपको नमस्कार होवो ॥ ५५० ॥
आईसर जोईसर, लयगयमणलक्खलक्खियसरूव, भवकूवपडियजंतुतारण,-जिणनाह तुज्झ नमो॥५१॥
अर्थ-हे आदीश्वर और योगीश्वरोंके लयगत मनसे जाना जाय स्वरूप जिसका उसका सम्बोधन हे योगीश्वर और
भवरूप कूपमें गिरते हुए प्राणियोंको तारनेवाले ऐसे हे जिननाथ आपको नमस्कार होवो ॥ ५५१ ॥
,
॥ ७०॥

.
सिरिसिद्धसेलमंडन, दुहखंडण खयररायनयपाय ।
सयलमहसिद्धिदायग, जिणनायग होउ तुज्झ नमो ॥ ५२ ॥
अर्थ-ह श्रीसिद्धर्शट शāजयगिरिका मंडन और विद्याधर राजाने नमस्कार किया है चरणोंमें जिसके और मेरेको
मर्य सिद्धी देनेवाले ऐसे हैं जिननायक आपको नमस्कार होवो ।। ५५२ ॥
तुझ नमो तुझ नमो, तुझ नमो देव तुज्झ चेव नमो, पणयसुररयणसेहर, रुइरंजियपाय तुज्झ नमो।
अर्च-आपको नमस्कार हो आपके लिए नमस्कार हो आपके अर्थ नमस्कार हो हे देव आपहीको नमस्कार होवो
और अतिशय नमस्कार किया देवाने उन्होके रलोंके शेखरोकी दीप्ति करके रंजित है चरणकमल जिन्होका ऐसे हेदेव
जापको नमस्कार होवो ॥ ५५३ ।।
इति स्तवनं, रामावि सुयासहिओ, निसुणंतो कुमरविहिय ।
संधवणं, आणंदपुलइअंगो, जाओ अमिएण सित्तुद ॥ ५५४ ॥
अर्थ-यह स्तुति करी तव पुत्रीसहित राजाभी कुमरकी करी भई स्तुति सुनता हुआ आनंदसे रोमोद्गम युक्त अंग
जिसका ऐसा भया अमृतसे नीचा हुआ होय वैसा ॥ ५५४ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥७१॥
कुमरोवि जिणं नमिउं, सीसंमि निवेसिऊण जिणसेसं, । वहिमंडवंमि करवंदणेण, वंदेइ नरनाहं ५५५
अर्थ-कुमरभी तीर्थंकरोंको नमस्कार करके और अपने मस्तकपर प्रभुका निर्माल्य पुष्पादिक रखके बाहिरके मंडपमें
राजाको नमस्कार करे अर्थात् हाथजोडके प्रणाम करे ॥ ५५५ ॥
नरनाहो अभिणंदिय, तं पभणइ वच्छ जह तए भवणं, उग्घाडियं तहा नियचरियं,-पि हु अम्ह पयडेसु ५६
अर्थ-राजा श्रीपालको आशीर्वादसे संतोषितकरके बोले हे वत्स जैसा तुमने जिनमंदिर उघाडा वैसा अपना चरि-
तभी हमारे सामने प्रगट कहो अर्थात् कुलादिक कहो ॥ ५५६ ॥
नियनामपि हुन जंपंति, उत्तमा ता कहेमि कह चरियं,।इय जाचिंतइ कुमरो, ता पत्तो चारणमुणिंदो॥
अर्थ-
-हु यह निश्चयमें है उत्तम पुरुष अपने मुखसे अपना नामभी नहीं कहे है तो मैं अपना चरित्र कैसे कहूं ऐसा
जितने कुमर विचारे उतने वहां आकाशमार्गसे चारण मुनीन्द्र आए ॥ ५५७ ॥
सो वंदिऊण देवे, उवविठ्ठो जाव ताव तं नमिरं । उवविद्वेसु निवाइसु, चारणसमणो कहइ धम्म ५५८
अर्थ-वह चारणलब्धिमान साधु देववंदना करके जितने बैठे उतने राजादिक उन साधुको नमस्कार करके सामने
बैठे तव चारणलब्धिमान श्रमण राजादिक लोगोंके आगे धर्म कहने लगे ॥ ५५८ ॥
,
॥ ७१॥

A भा भो महाणुभावा, सम्मं धम्म करेह जिणकहियं । जइ वंछह कल्लाणं, इहलोए तहय परलोए ५५९ अर्थ-नही माानुभावो तुम तीर्थकरका कहा हुआ धर्म अच्छीतरहसे करो जो इसभवमें और परभवमें कल्याण मुम्बकी इच्छा करते हो ॥ ५५९ ॥ धम्मो जिणेहिं कहिओ, तत्ततिगाराहणामओ रम्मो, । तत्ततिगं पुण भणियं, देवो य गुरू य धम्मो य ॥ अर्थ-तीर्थकरने तीनतत्वकी आरानधारूप रमणीक मनोज्ञ धर्म कहा है तीनतत्व देव १ गुरू २ धर्म ३ देवतत्व १ गुरुतत्व २ धर्मतत्व ३ यह है ॥ ५६० ॥ इकिकस्स उ भेया, नेया कमसो दु तिन्नि चत्तारि । तत्थऽरिहंता सिद्धा, दो भेया देवतत्तस्स ॥५६१॥ अर्थ-नौर एक एक तत्वका क्रमसे २-३-४ भेद जानना देवतत्वके २ भेद गुरुतत्वके ३ भेद और धर्मतत्वके ४ मंद यहां देवनत्यक २ भेद अरदंत १ सिद्ध २ ॥ ५६१ ॥ आयरियउबउझाया, सुमाहुणो चेव तिन्नि गुरुभेया। दंसणनाणचरित्तं, तवो य धम्मस्स चउभेया ५६२ अर्थ-आचार्य १ उपाध्याय २ सुसाधु ३ यह तीन गुरुतत्वके भेद जानो। तथा दर्शन सम्यक्त्व ? ज्ञान तत्वका अवबोध २ विरतिरूप पारिन ३ अनशनादि तप ४ यह धर्म तत्वका चार भेद है ।। ५६२ ।।

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥ ७२ ॥ एएसु नवपएसु, अवयरियं सासणस्स सबस्सं । ता एयाई पयाई, आराहह परमभत्तीए ॥ ५६३ ॥ अर्थ-यह नवपदोंमें जिनशासनका सरवस्व याने सर्वसार अवतीर्ण है तिस कारणसें अहो भव्यो तुम यह पद परम भक्तिसे आराधन करो अर्थात् सेवो ॥ ५६३ ॥ जहा जियंतरंगारिजणे सुनाणे, सुपाडिहेराइसयप्पहाणे, । संदेहसंदोहरयं हरंते, झाएह निच्चपि जिणेरिहंते ॥ ५६४ ॥ अर्थ-जीता अंतरंगशत्रु कामक्रोधादि जिन्होंने और प्रधान ज्ञान जिन्होंका तथा शोभन अशोक वृक्षादि प्रातिहार्य अतिशयों करके प्रधान ऐसे और संशयोंका जो समूह वही रज धूलि उसको दूर करनेवाले ऐसे अरहन्तोंको निरंतर ध्यावो ॥ ५६४॥ दुट्ठकम्मावरणप्पमुक्के, अणंतनाणाइसिरीचउके । समग्गलोगग्गपयप्पसिद्धे, झाएह निचंपि मणमि सिद्धे ॥ ५६५ ॥ अर्थ-दुष्ट आठकर्मही आवरणों करके प्रकर्षपने करके मुक्त अनंत ज्ञानादिलक्ष्मीचतुष्क है जिन्होंके अनंतज्ञान १ अनंतदर्शन २ अनंतसुख ३ अनंतअकर्णवीर्य ४ इन्हों करके युक्त तथा सम्पूर्णलोकका ऊपरका स्थान वहां प्रसिद्ध सिद्धपना प्राप्तभया ऐसे सिद्धोंको तुम निरंतर मनमे ध्यावो ॥ ५६५ ॥ ७२ ।।

न तं मुहं देइ पिया न माया, जं दिति जीवाणिह सूरिपाया, । तम्हा हु ते चेय सवा महेह, जं मुक्खसुक्खाई लहुं लहेह ॥ ५६६ ॥ अर्थ-इस संसारमें जीयोंको जो सुख मातापिता नहीं देवे है वह सुख आचार्य देवेह ऐसा आचार्योंको तुम निरंतर पूजो जिनसे मोक्षमुख शीघ्र पावो ।। ५६६ ॥ मुतत्थसंवेगमयस्सुएणं, सन्नीरखीरामयविस्सुएणं, । पीणति जे ते उवझायराए, झाएह निचंपि कयप्पसाए ॥ ५६७ ॥ -~-उपाध्याय सूत्रार्थ संवेगमय श्रुत करके भव्यजीवोंको तृप्तकरे है उन उपाध्याय राजको निरंतर तुम ध्यावो सूत्रमीठे पानीक जैसा अर्थ दूधके जैसा संवेगमयश्रुतको अमृतकी उपमा है कैसे हैं उपाध्याय राज किया है प्रसाद अनुग्रह जिन्होंने ऐसे ॥ ५६७ ॥ खंते य दंते य सुगुत्तिगुत्ते, मुत्ते पसंते गुणजोगगुत्ते, । गयप्पमाए हयमोहमाए, ज्झाएह निच्चं मुणिरायपाए ॥ ५६८ ॥ अर्थ-क्षमायुक्त दमयुक्त नाम इन्द्रियमनको दमनेवाले मनोगुप्त्यादि गुप्त और मुक्त निर्लोभी प्रशान्त नाम शान्त रस युक्त गुणोंके सम्बन्ध सहित गया मदादि प्रमाद जिन्होंसे मोमाया रहित ऐसे मुनिराजोंको तुम निरंतर ध्यावो ॥५६८ ॥ N こだ

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
,
॥७३॥
जं दबछक्काइसु सदहाणं, तं दंसणं सत्वगुणप्पहाणं, ।
कुग्गाहवाही उ वयंति जेण, जहा विसुद्धेण रसायणेण ॥ ५६९ ॥
अर्थ-जो षड् द्रव्यादिकका श्रद्धान वह दर्शन नाम धर्म सर्व गुणोंमें प्रधान वर्ते है जिस सम्यक् दर्शन करके कुग्राह
हठवाद ही रोग दूर होते है जैसे निर्मल रसायन करके, यह भाव है जरा व्याधिको मिटानेवाला औषध रसायन कहा
जावे है उस रसायनसे जैसा सवरोग अच्छे होवे हैं वैसा ॥ ५६९ ॥
नाणं पहाणं नयचक्कसिद्धं, तत्तावबोहिक्कमयं पसिद्धं ।
धरेह चित्तावसहे फुरंतं, माणिकदीवुव तमोहरंतं ॥ ५७० ॥
अर्थ-नैगमादि नयोंका चक्रनाम समूह उसकरके सिद्ध निष्पन्न और तत्वज्ञानही है एक स्वरूप जिसका ऐसा
सर्वत्र प्रसिद्ध प्रधान ऐसा ज्ञान अपने मनमंदिर में धारो कैसा ज्ञान देदीप्यमान माणिक्य दीपकके जैसा अज्ञानरूप
अंधकारको दूर करनेवाला ॥ ५७० ॥
सुसंवरं मोहनिरोहसारं, पंचप्पयारं विगयाइयारं ।
मूलोत्तराणेगगुणं पवित्तं, पालेह निचंपि हु सच्चरित्तं ॥ ५७१ ॥
,
॥७३॥

15 , अर्ध-अहो भन्यो गोभन संवर है जिसमें तथा मोहका निरोधही है श्रेष्ठ जिसमें ऐसा और सामायकादि पांच. भेद है जिसका और गया अतिचार जिससे ऐसा और मूलउत्तररूप अनेकगुण हैं जिसमें मूलगुण प्राणातिपात विरम- णादिक चरणसत्तरी और उत्तर गुण पिंटविशुद्ध्यादि करणसत्तरी इन्हो करके पवित्र ऐसा सत्चारित्र निरंतर तुम पालों ॥ ५७१ ॥ बझं तहाभिंतरभेयमेयं, कयाइदुव्भेयकुकम्मभेयं, दुक्खक्खयत्थं कयपावनासं, तवं तबेहागमयं निरासं ॥ ५७२ ।। अर्थ-जहां भव्यो तुम यह वाह्य अभ्यंतर भेद है जिसका ऐसा तप तपो कैसा है तप अतिशय दुर्भद कुकर्मोका विदारण किया जिन्होंने ऐसा इसी कारणसे किया है पापका नाश जिसने और कैसा तप गई आशा जिससे ऐसा तपको दुःस क्षय करनेकवारते ॥ ५७२ ।। एयाइं जे केवि नवप्पयाई, आराहणंतिट्टफलप्पयाई। लहंति ते सुक्खपरंपराणं, सिरिं सिरीपालनरेसरुव ॥ ५७३ ।। अर्थ- कोई जीव यह वांछित फल देनेवाले ऐसे नवपदोंकी आराधना करे वह श्रीपाल राजाके जैसी सुखकी परपरा और लक्ष्मी पावे ॥ ५७३ ।।

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥७४॥ , राया पुच्छइ भयवं, को सिरिपालुत्ति तो मुणिंदोवि, करसन्नाए दसइ, एसो तुह पासमासीणो ५७४ अर्थ-तव राजा पूछे हे भगवान कौन श्रीपाल तव मुनिवरिंद हाथकी संज्ञासे दिखावे यह तुम्हारे पासमें बैठा- हुआ श्रीपाल है ॥ ५७४ ॥ तं नाऊणं राया, सपमोओ विन्नवेइ मुणिरायं, भयवं ? करेह पयर्ड, एयस्स सरूवमम्हाणं ॥५७५॥ अर्थ-राजा उनको श्रीपाल जानके हर्पसहित मुनिराजसे वीनंती करे हे भगवन् इन्होंका स्वरूप हमारे आगे प्रगट करो ॥ ५७५ ॥ तत्तो चारणसमणेण, तेण आमूलचूलमेयस्स । कहियं ताव चरित्तं, जिणभुवणुग्घाडणं जाव ॥५७६॥ अर्थ-वाद चारण श्रमणने श्रीपाल कुमरका सर्व चरित जिनमंदिर उघाडा वहां तक कहा ॥ ५७६ ॥ इत्तोवि परं एसो, परिणितोणेगरायकन्नाओ । पियरज्जे उवविट्ठो, होही रायाहिराओत्ति ॥ ५७७ ॥ अर्थ-तिसके अनंतरभी यह श्रीपाल कुमर अनेक राजकन्याओंका पाणिग्रहण करके पिताके राज्यमें बैठा भया राजाधिराज होगा अर्थात् राजालोगोंमें वडा राजा होगा ॥ ५७७ ॥ तत्थ सिरिसिद्धचकं, विहिणा आराहिऊण भत्तीए । पाविस्सइ सग्गसुहं, कमेण अपवग्गसुक्खं च ५७८ ॥ ७४ ।।

अर्थ-उस महाराज अवस्थामें श्रीसिद्धचक्रका विधिसे आराधन करके देवलोकका सुख पावेगा क्रमसे मोक्षसुख
पायेगा ।। ५७८ ॥
तत्तो एस महप्पा, महप्पभावो महायसो धन्नो। कयपुन्नो महभागो, संजाओ नवपयपसाया ॥५७९ ॥
अर्थ-तिसकारणसे यह महात्मा महाप्रभावजिसका और महायश जिसका ऐसा धन्य और किया हे पुन्य जिसने
ऐसा कृतपुण्य महाभाग्य जिसका ऐसा महाभाग नवपदोंके प्रसादसे भया ॥ ५७९ ॥
जो कोइ महापाचो, एयस्सुवरिपि किंपि पडिकूलं । करिही सच्चिय लहिही, तकालं चेव तस्स फलं ५८०
अर्थ-जो कोई महापापी पुरुष श्रीपालकुमरके ऊपर कुछभी प्रतिकूल विरुद्धकरेगा उसका फल वह करनेवाला
तत्काल पावेगा ॥ ५८० ॥
एयस्स सिद्धसिरीसिद्धचक्क,-नवपयपसायपत्तस्स । धुवमावयावि होही, गुरुसंपयकारणं चेव ॥५८१॥
अर्ध-सिद्ध याने निप्पन्न श्रीसिद्धचक्र उसमें जो नवपद उन्होंका जो प्रसाद पात्र ऐसा यह श्रीपाल इसके निश्चय
मापदाभी पहुत सम्पदाकी कारण होगी ॥ ५८१ ॥
एवं चेव कहतो, संपत्तो मुणिवरो गयणमग्गे। लोओ अ सप्पमोओ, जाओ नरनाहपामुक्खो ॥५८२॥
अर्थ-एस प्रकारसे कहता हुवा मुनिवरिन्द्र आकाश मार्गसे अन्यत्र गए राजादिक लोक आनंद सहित भए ॥ ५८२॥

भापाटीका- सहितम्. श्रीपाल- चरितम् ॥ ७५॥ , , तत्कालं चिय कुमरस्स, तस्स दाऊण मयणमंजूसं । काऊण य सामग्गिं, सयलंपि विवाहपश्वस्स ॥५८३॥ अर्थ-मुनिराज गयोंके अनन्तर राजा तत्कालही श्रीपाल कुमरको अपनी कन्या मदनमंजूसा देके और विवाह उत्सवकी सर्व सामग्री तय्यार करके ॥ ५८३ ॥ तस्स भवणस्स पुरओ, मिलिए सयलंमि नयरलोयंमि।सहया महेण रन्ना, पाणिग्गहणंपिकारवियं ५८४ अर्थ-उस जिन मंदिरके आगे सर्व नगरके लोग मिलनेसे वड़े उत्सवके साथ पाणिग्रहण कराया ॥ ५८४ ॥ दिन्नाइं बहुविहाइं, मणिकंचणरयणभूसणाईणि। दिन्ना य हयगयावि य, दिन्नो य सुसारपरिवारो ५८५ अर्थ-बहुत प्रकारके मणिरत्न जडे हुए ऐसे सोनेरत्नोके भूषणदिए और घोडा हाथी बहुतसे दिए सार परिवार दिया५८५ दिन्नो य वरावासो, तत्थ ठिओ दोहिं वरकलत्तेहिं । सहिओ कुमारराओ, जाओ सव्वत्थ विक्खाओ ५८६ अर्थ-प्रधान आवास प्रासाद रहेनेके वास्ते दिया उस आवासमें रहा हुआ दोय स्त्रियों सहित राजकुमार सर्वत्र प्रसिद्ध भया ॥ ५८६ ॥ निचंपि तंमि चेइयहरंमि, कुमरो करेइ साणंदो। पूयापभावणाहिं, सहलं नियरिद्धिवित्थारं ॥५८७॥ अर्थ-निरंतर उस जिनमंदिरमें कुमार आनंद सहित पूजा प्रभावनादिक करके अपनी समृद्धिका विस्तार सफलकरे ॥ ५८७॥ ܩ ॥ ७५ ॥ ,

,
अह चित्तमासअट्टाहियाओ, विहियाओ तत्थ विहिपुत्वं ।
सिरिसिद्धचक्कपया-विहीवि आराहिओ तेण ॥ ५८८ ॥
अर्थ-तदनंतर श्रीपाल कुमरने उस नगरीमें विधिपूर्वक चैत्रमासकी अट्ठाई करी सिद्धचक्रकी पूजा विधिसे
आराधन करी ॥ ५८८ ।।
अन्नदिणे तस्स जिणालयस्स, सुवलाणयंमि आसीणो।
राया कुमारसहिओ, कारावइ जाव जिणमहिमं ॥ ५८९ ॥
अर्थ-अन्य दिनमें उस जिनमंदिरका वलानक नाम लोगोके बैठनेका मंडप वहां कुमरसहित राजा बैठे हैं
जितने भगवानका महिमा करावे है ।। ५८९ ।।
ता दंटपासिएणं विन्नत्तो, देव ? सत्यवणिएणं । एगेण दाणभंगं, काओ आणावि तुह भग्गा ॥ ५९०॥
अर्ध-उतने कोटवालने आके राजासे वीनती कही हे देव हे महाराज एक सार्थ वाणिएने दाण भंग किया अर्थात्
महालकी चोरी करी इसलिए आपकी आज्ञाका भंग किया है ॥ ५९० ॥
सो अस्थि मए बड़ो, एसो को तस्स सासणाएसो। राया भणेइ आणा,-भंगे पाणा हरिजंति ॥ ५९१ ॥

-
श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका
सहितम्.
॥७६ ॥
अर्थ-उस सार्थ वाणिएको मैंने वांधा है उसके लिए क्या आज्ञा है क्या शिक्षा दी जाने तब राजा बोले आज्ञा
भंग करे उसका प्राण लेना ॥ ५९१ ॥
कुमरोभणेइमा मा, मारणादेसमिह ठिओ देसु । सावज्जवयणकहणेवि, जिणहरे जेण गुरुदोसो ५९२
अर्थ-ऐसा राजाका वचन सुनके कुमर कहे हे महाराज इस जिनमंदिरकी भूमिमें रहे हुए मारनेकी आज्ञा मत
देओ जिस कारणसे जिनमंदिरमें सदोषवचन कहनेमेंभी महादोष होवे हैं ॥ ५९२ ॥
तो राया छोडाविय, आणावइ जाव निययपासंमि । तं दट्टणं कुमरो, उवलक्खइ धवलसत्थवइ ॥५९३॥
अर्थ-तदनंतर राजा उसको छुडवाके जितने अपने पासमें बुलवावे उतने कुमर श्रीपाल देखके धवल सार्थ वाहको
पहिचाने यह तो धवल सार्थवाह है ऐसा जाने ॥ ५९३ ॥
चिंतइ मणे कुमारो, अहह कहं एरिसंपि संजायं । अहवा लोहवसेणं, जीवाणं किं न संभवइ ॥ ५९४ ॥
अर्थ-कुमर मनमें विचारे अहह इति खेदे ऐसा अकार्य कैसे भया अथवा जीवोंके लोभके वशसे क्या २ नहीं
संभवे है अर्थात् सब अकार्य संभवे है ॥ ५९४ ॥
तं नियजणयसमाणं, कहिउं मोआविओ नरिंदाओ।उवयारपरो कुमरो, विसजए निययठाणे य॥५९५॥
,
॥७६ ॥

अर्थ--उसके अनंतर उपकार करनेमें तत्पर कुमर उस धवल सेठको अपने पिताके समान कहके याने यहमेरे
पिताफे तुल्य है ऐसा कहके राजासे छुड़ाया और अपने ठिकाने जानेकी आज्ञा दिलाई ॥ ५९५ ॥
अह अन्न दिणे कुमरो, विन्नत्तो? वाणिएण एगेण। सामिय पूरियपोया, अम्हे सवेवि संवहिया ५९६
अर्ध-अथ अन्य दिनमें एक वानिएने कुमरसे वीनती किया हे स्वामिन् हे महाराज क्रियाणोंसे जहाज भरे है
यहांगे चलनेके वारले सब लोग तय्यार हुए है अर्थात् जो क्रियाणा लाएथे वह सव यहां वेचा है यहां सम्बन्धी क्रियाणा
परीदकर जहाज तय्यार किए हैं हम लोग देश जानेके वास्ते तय्यार भए है ॥ ५९६ ॥
तो जह चिय कुसलेणं, अम्हे तुम्हेहिं आणिया इहयं ।
तह नियदेसंमि पुणो, सामिय तुरियं पराणेह ॥ ५९७ ॥
अर्थ-तिम कारणसे जैसे आप कुशलसे हमको यहां लाएहो उसी प्रकारसे हे स्वामिन् अपने देश शीघ्र पहुंचाओ ॥५९७॥
तो कुमरो नरनाहं, आपुच्छइ निअयदेसगमणत्थं । कह कहवि सो विसज्जइ, काऊणं गुरुयसम्माणं ५९८
अर्थ-तदनंतर कुमर राजासे अपने देश जाने के लिए पूछे तव राजा वहुत सत्कार करके देश जानेकी आज्ञा
मुस्किलसे देवे ॥ ५९८ ॥
दाउं सुयाइसिक्खं, कुमरस्स भलाविऊण धूयं च। पोयंमि समारोविअ, कुमरं वलिओनरवरिंदो॥५९९॥

भाषाटीका-
सहितम्-
,
॥ ७७ ॥
श्रीपाल-
अर्थ-राजा पुत्रीको सिखावन देके मेरी पुत्रीको अच्छी तरहसे रखनी इत्यादि कथन पूर्वक पुत्री कुमरको सौंपके
चरितम् पुत्री सहित कुमरको जहाजमें चढाके राजा पीछे चले स्वस्थान प्रति ॥ ५९९ ।।
कुमरो बहुमाणेणं, धवलंपि हु सारसारपरिवारं । नियपोयंमि निवेसइ, सेसजणे सेसपोएसु ॥६००॥
अर्थ-कुमर सार २ परिवार और धवलसेठको आदर सहित अपने जहाजमें बैठावे और लोगोंको दूसरे जहाजोंमें
बैठावे ॥ ६००॥
पत्थाणमंगलंमी, पहयाओ दुंदुहीउ मेरीओ । सज्जीकया य पोया, चल्लंति महल्लवेगेणं ॥ ६०१ ॥
अर्थ-प्रस्थान मंगलके समयमें दुंदभी नामकी भेरिओं वजाई गई और सजकिए हुए जहाज बहुत वेगसें चलते हैं ॥६०१॥
पोयारूढो कुमरो, जलहिमिवि अणुहवेइ लीलाओ।जह पालयाहिरूढो, देविंदो गयणमग्गेवि ॥६०२॥
अर्थ-अथ जहाजपर बैठा हुआ कुमर समुद्र में लीला(क्रीडा) अनुभवे कैसे सों कहते हैं जैसे पालक विमानमें
बैठा हुआ देवेन्द्र आकाशमार्गमें चलता हुआ लीला अनुभवे वैसा ॥ ६०२ ।।
दट्टण कुमरलीलं, रमणीजुयलं च रिद्धिवित्थारं । धवलोवि चलियचित्तो, एवं चिंतेउ माढत्तो ॥६०३॥
अर्थ-तव धवलसेठ कुमरकी लीला तथा दो २ स्त्री और ऋद्धिका विस्तार देखके विशेष करके चलचित भया
ऐसा इस प्रकारसे विचारने लगा ॥ ६०३ ॥
50
,
॥ ७७ ॥

अहह अहो जणमित्तो, संपत्तो केरिसं सिरिंएसो। अन्नं च रमणिजुयलं, एरिसयं जस्स सो धन्नो॥६०४॥ अर्थ-अहह इति खंदे अहो इति आश्चर्ये यह श्रीपाल एकाकी मनुप्यमान था थोडे दिनोंमें कैसी लक्ष्मी पाई और इसके अति अद्भुत रूप सौदर्य वाली दो स्त्रियों है इसलिए यह धन्य है ॥ ६०४ ॥ ता जइ एयरस लिरी, रमणिजुयलं च होइ मह कहवि । ताऽहं होमि कयत्थो, अकयत्थो अन्नहा जम्मो ॥ अर्थ-न कारणसं जो यह श्रीपालकी लक्ष्मी और दो स्त्रियों कोई प्रकारसे मेरे होवे तो मैं कृतार्थ होऊं अन्यथा उन्होंकी प्राप्तिबिना मेरा जन्म अकृतार्थ याने निष्फल है ॥ ६०५ ॥ एवं सो धणलुडो, रमणीझाणेण सयणसरविद्धो । दुज्झवसायाणुगओ, न लहेइ रई ससल्लुद ॥६०६॥ अर्थ-इस प्रकारसे परद्रव्यका लोभयुक्त तथा कामके वाणोंसे ताडित इसी कारणसे दुष्ट परिणामयुक्त यह धवल सेट शत्य सहितके जैसा रति शाता नहीं पावे ॥ ६०६ ॥ इक्षिकाओविलोहो, बलिओ सो पुण सदप्यकंदप्पो।जलणुव पवणसहिओ, संतावइ कस्स नोहिययं६०७ अर्थ-एकाकीभी लोभ बलवान है और दर्प, कंदर्प याने अभिमान काम सहित किस पुरुपके हृदयको नहीं गंताप करे किंतु सबके हृदयको संताप करे किसके जैसा वायुसहित अग्निके जैसा जैसे वायु प्रेरित अग्नि सबको नंताप करे है ।। ६०७ ॥ म

श्रीपाल-
चरितम्
,
,
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ७८ ॥
,
तत्तो सो गयनिद्दो, सयणीयगओवि मज्झरयणीए । दुक्खेण टलवलंतो, दिट्ठो तम्मित्तपुरिसेहिं॥६०८॥
अर्थ-तदनंतर वह धवलसेठ गई निद्रा जिसकी ऐसा आधीरात्रिके समय शय्यापर लुठता हुआ मित्रोंने देखा ६०८
पुट्ठो य तेहिं को अज, तुज्झ अंगंमि बाहए वाही । जेण न लहेसि निदं, तो कहसु फुडं नियं दुक्खं ६०९
अर्थ और उन मित्रोंने पूछा अहो सेठ आज तुह्मारे शरीरमें क्या रोग पीड़ा उत्पन्न करे है जिससे तुमको निद्रा
नहीं आवे हैं इसलिए प्रगट तुम आपना दुःख कहो ॥ ६०९॥
कह कहवि सोवि दीहं, नीससिऊणं कहेइ मह अंगं । वाही न बाहए किंतु, बाहए मं दुरंताही ॥६१०॥
अर्थ-वाद' धवलसेठभी दीर्घ निश्वासा डालके वड़े कष्टसे कोई प्रकारसे बोला मेरे शरीरमें व्याधि नहीं है किंतु
मेरेको आधिनाम मानसिक दुःख पीड़ा करता है ॥ ६१० ॥
पुट्ठो पुणोवि तेहिं, का सा तुह माणसीमहापीडा ? । तो सो कहेइ सवं, तं निययं चितियं दुटुं ॥६११॥
अर्थ-तव उनमित्रोंने औरभी पूछा तुम्हारे मनमें क्या दुःख है तव धवलसेठने अपना सब दुष्ट विचार मित्रोंको
सुनाया ॥६११ ॥
तं निसुणिऊणतेवि हु, भणंति चउरोवि मित्तवाणियगा।
हहहा किमियं तुमए, भणियं कन्नाण सूलसमं ॥ ६१२ ॥
॥ ७८॥

, । अर्थ-वह धवल सेटका विचारा हुआ सुनके वे चारोंही मित्र वाणिया बोले अहह इति खेदे तैंने कानोंमें शुल तुल्य यह क्या कहा ।। ६१२ ॥ अन्नस्तवि धणहरणं, न जुज्जए उत्तमाण पुरिसाणं । जं पुण पहुणो उवयारिणो य, तं दारुणविवागं ६१३ अर्थ-उत्तम पुरुषोंको किसीकाभी धन हरना युक्त नहीं है जो फेर अपना प्रभु स्वामी और उपकारीका धन हरणकरना उसका तो भयानक फल होवे है ॥ ६१३ ।। इयरित्थीणवि संगो, उत्तमपुरिसाण निंदिओ लोए । जा सामिणीइ इच्छा, सा तक्खयसिरमणिसरिच्छा ॥ ६१४ ॥ अर्ध-उत्तम पुरुषोंको अन्य सामान्य लोगोंकी स्त्रियोंकाभी संयोग लोकमें निंदनीय है और अपनी स्वामिनीकी जो पच्छा है वहतो नागराजके मस्तककी मणिकी इच्छाके तुल्य है महादुःख दाई होनेसे ॥ ६१४ ॥ अन्नस्सवि कस्सवि पाण, दोहकरणं न जुज्जए लोए । जंसामिपाणहरणं, तं नरयनिवंधणं नूणं ॥६१५॥ अर्थ-और फिसीभी प्राणीका प्राण हरना लोकमें अयुक्त है और जो स्वामीका प्राण हरण करना वह तो निश्चय नरक दुर्गतिकाही कारण है ॥ ६१५ ॥ ता तुमए एरिसयं, पावं कह चिंतियं निए चित्ते। जइ चिंतियं च कह, कहियं तुमए सजीहाए ॥६१६॥ भापा.प.४

श्रीपाल-
चरितम्
भाषार्टीका
सहितम्
॥७९॥
अर्थ-इसलिए तैंने अपने मनमें ऐसा पापं कैसे विचारा और जो विचारा तो तैंने अपनी जिव्हासे कैसे कहा
तेरेको लज्जाभी नहीं आई ॥६१६ ॥
आसि तुमं अम्हाणं, सामि य मित्तं च इत्तियं कालं। एरिसयं चिंतंतो, संपइ पुण वेरिओ तंसि ॥१७॥
अर्थ इतने कालतक तें हमारा स्वामी और मित्रथा इसवक्तमें ऐसा विचारता हुआ तैं हमारा वैरी है ॥ ६१७ ॥
पोयाण चालणं तं, तह महकालाउ मोयणं तं च, विजाहराउ मोयावणं च, किं तुज्झ वीसरियं ॥१८॥
अर्थ-जहाजोंको देवताने स्तंभित किया था सो इस महा पुरुषने चलाया महाकाल राजाने तेरेको बांधा था सो
इस कुमरने छुड़ाया और विद्याधर राजाने मारनेकी आज्ञा दिया था सोभी इसी उत्तम पुरुषने बचाया इतना उप-
भूलगया ॥ ६१८॥
एवंविहोवयाराण, कारिणो जे कुणंति दोहमणं । दुजणजणेसु तेसिं, नूणं धुरि कीरए रेहा ॥ ६१९ ॥
अर्थ-इस प्रकारके उपगारोंके करनेवाले पुरुषके ऊपर जो दुष्ट द्रोह युक्त मनकरे उन पुरुषोंकी दुष्ट पुरुषोंके
आदिमें रेखा दी जाती है निश्चयसे ॥ ६१९ ।।
मलिणा कुडिलगईओ, परछिदरया य भीसणा डसणा, पयपाणेणवि लालंतयस्स मारंति दो जीहा ६२०
अर्थ-द्विजिव्हा सर्प और खल पुरुष किसको सुख देवे है अपि तु किसीको नहीं देवे अब दोनोंका सदृश विशे-
कार ते
॥ ७९ ॥

पणसे तुल्यपना बतलाते है द्विजिव्हा सर्प दूध पिलानेवालेकोभी मारता है वैसा दुष्ट पुरुषभी जो लालनेवाला उसकाही नुकसान करे दोनों कैसे मलीन, सर्प वर्णसे मलीन होवे, और दुष्ट पुरुष भावसे मलीन होता है और कुटिल, सर्प पक्षमें वक्रगति और दुष्ट पुरुषके पक्षमें वक्र चेष्टा जिन्होंकी ऐसे और परछिद्रोंमें रक्त दुष्टके पक्षमें दूसरोंका दोप कहनेमें रच सर्प पक्षमें औरोके मूपक वगैरेहके विलोंमें रक्त और भयानक दांत जिव्हासे दूसरोंका घात करनेवाला ॥ ६२० ॥ पयडियकुसीलयंगा, कयकडुयमुहा य अवगणियहा । मलिणा कठिण सहावा, तावं न कुणंति कस्स खला ॥ ६२१ ॥ अर्थ-अव ज्वरकी उपमा करके दुर्जनका स्वरूप कहते है दुर्जनपुरुष ज्वरके जैसा किसको संताप नहीं करे अपितु सबको करे केस में दोनों प्रगट किया है कुत्सित स्वभाव शरीरमें जिन्होंने नहीं गिना है स्नेह प्रेम जिन्होंने ज्वर पक्षमें मोह मृतादिक खल पक्षमें स्नेह प्रेम उन्होंको नहीं गिणने वाले तथा मलिन स्वभाववाले दोनों दुर्जन भावसे मैले होवे है अतएव इसी कारणसे दोनोभी कठिन स्वभाववाले ज्वर पक्षमें देहको कठिन करनेवाला ॥ ६२१ ॥ विरसंभसंति सविसं डसंति, जे छन्नमिति सुंघता । ते कस्स लद्धछिद्दा, दुजणभसणासुहं दिति ॥६२२॥ अर्थ-अव यानकी उपमा करके दुर्जनका स्वरूप दिखाते हैं वह दुर्जन भुसनेवाले स्वानके जैसे छिद्रपाके अर्थात् एलपाके फिसको मुख देवे अपितु किसीको नहीं देवे कैसे वह सो कहते हैं गया रस मधुरात्मक जिन्होंसे विरल जैसा श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. , ॥८॥ होय वैसा दूसरेकी निर्भर्त्सना करे स्वान पक्षमें अव्यक्त शब्द करे सविष डसे और प्रछन्न संघते हुए फिरें दुर्जन पक्षमें दूसरेका विनाश होवे ऐसा छिद्र प्रकाशन करना और परछिद्र देखनेके लिए जाना ॥ ६२२ ॥ तातं न होसि धवलो, कालोसि इमाइ किन्हलेसाए । ता तुम्ह दंसणेणवि, मालिन्न होइ अम्हाणं ६२३ अर्थ-इस कारणसे तैं धवल नहीं होवे है किंतु इस कृष्ण लेश्यासे काला है तेरेको देखनेसे हम लोग मैले होते हैं ६२३ इय भणिय गया निय निय,ठाणेसु जावतिन्नि वरपुरिसा। तुरिओ कुडिलसहावो,पुणोवि तप्पासमासीणो अर्थ-ऐसा कहके जितने तीन प्रधान पुरुष उठके अपने २ ठिकाने गए उतने कुटिल वक्र स्वभाव जिसका ऐसा चौथा पुरष औरभी धवल सेठके पासमें आके बैठा ॥ ६२४ ॥ सो जंपइ धवलं पइ, न कहिज्जइ एसिमेरिसं मंतं । जं एए अरिभूया, तुह अहियं चेव चिंतंति ॥६२५॥ अर्थ-वह पुरुष धवल सेठ से कहे कि अहो सेठ ऐसा विचार इनतीनोंको नहीं कहा जावे जिसकारणसे वे तुम्हारे शत्रु हैं तुम्हारा अहितही विचारते हैं ॥ ६२५ ॥ इकोहं तुहमणवंच्छियत्थ,-संसाहणिक्कतल्लिच्छो। अच्छामि ता तुमं मा, नियचित्ते किंपि चिंतेसु ॥२६॥ अर्थ-एक मैं तुम्हारा मनोवांछित अर्थ सम्पादन करनेकी इच्छा जिसकी ऐसा तुम्हारा अर्थ साधनमें तत्पर रहता, हूं इसलिए तुम अपने मनमें कोई प्रकारकी चिंता मत करो ॥ ६२६ ॥ , ।।८०॥ .

किंतु विसेसेण तुम, सिरिपालेणं समं कुणसु मित्तिं । जंसो वीसत्थमणो, अम्हाणं सुहहओ होई ६२७
अर्थ-किंतु तुम विशेप करके श्रीपालके साथ भत्री करो जिससे विश्वासयुक्तमनजिसका ऐसा श्रीपाल सुखसे मारा
जायगा ।। ६२७ ॥
तो धवलो तुट्ठमणो, भणेइ तुमं चेव मज्झवरमित्तो । किंतु मह वंछियाणं सिद्धी होही कहं कहसु ६२८
अर्ध-तदनंतर धवल संतोपमान होके कहे ते ही मेरा प्रधान मित्र है किंतु मेरे वांछितकी सिद्धि कैसे होगी सो
त कर ।। ६२८ ॥
सो आह जुज्झणत्थं, दोराधारेण मंडिए मंचे। कह कहवि तं चडाविय, केणवि कोऊहलमिसेण ६२९
अर्ध-यह कुमित्र बोला डोरोंके आधारसे युद्धादि करनेके लिए मंचा वांधेगे कोई प्रकारसे कोई कौतुकके
एलसे श्रीपालको उस मांचेपर चढ़ाके ॥ ६२९ ।।
छन्नं चिय छिन्ने दोरयंमि, सोनिच्छयं समुदंमि । पडिही तो तुह वंच्छिय,-सिद्धी होही निरववायं ६३०
अर्थ-प्रच्छनही टोरा काटनेसे श्रीपाल निश्चयसे समुद्रमें पड़ेगा तदनंतर निरपवाद जसे चने वैसा तुम्हारे वांछितकी
सिडी होजायगी लोकोंमें अपवाद निंदाभी नहीं पाओगे ॥ ६३० ॥
तो संतुट्ठो धवलो, कुमरसहाए करेइ केलीओ । बहुहासपेसलाओ, तहा जहा हसइ कुमरोवि ॥६३१॥

श्रीपाल-
चरितम
भाषाटीका-
सहितम्.
॥८१॥
,
,
अर्थ-तदनंतर धवल सेठ संतुष्टमान होके कुमरकी सभा में बहुत हास्य सहित रमणीक क्रीडा करे अर्थात् वैसा हास्य
करे जिससे श्रीपाल कुमरभी थोड़ा हसे ॥ ६३१॥
अन्नदिणे सो उच्चे, मंचे धवलो सयं समारूढो । सिरिपालं पइ जंपइ, पिच्छह पिच्छह किमयंति ६३२
अर्थ-अन्यदिनमें धवल सेठ आप ऊंचे मंचपर चढा हुआ श्रीपाल कुमरसे ऐसा कहे कि भो कुमार आप देखो
२ कैसा आज आश्चर्य है पाणी दौड़ता है समुद्रमें बहुत आश्चर्य दीखता है ॥ ६३२ ॥
दीसइ समुद्दमज्झे, अदिट्ठपुर्व मइत्ति जंपतो। उत्तरइ सयं तत्तो, कहेइ कुमरस्स सविसेसं ॥ ६३३ ॥
अर्थ-मैंने पहिले ऐसा कभी नहीं देखा है वाहनसे मुसाफिरी करते बहुत वर्ष होगए हैं परंतु आज समुद्रमें अपूर्व
आश्चर्य है ऐसा वोलता हुआ मांचे से उतरे और विशेष करके कुमरसे कहे ॥ ६३३ ॥
कुमर अपुवं कोऊहलंति, तुज्झवि पलोयणसरिच्छं। जंजीवियाउबहुअं, दिटुं पवरं भणइ लोओ ६३४
अर्थ-क्या कहें सो कहते हैं हे कुमार अपूर्व कुतूहल आज है इसलिए तुम्हारेभी देखने योग्य है जिस कारणसे
लोग जीनेका फल बहुत देखनाही प्रधान कहते हैं ॥ ६३४ ॥
तो सहसा कुमारोऽवि हु,चडिओ जा तत्थ उच्चए मंचे।ता मंचदोरच्छेओ, विहिओय कुमंतिणा तेण ६३५
॥ ८१॥

, अर्थ-तदनंतर कुमरभी धवलकी प्रेरणासे अकस्मात् जितने उस ऊंचे मांचेपर चढ़ा उतने उस कुमित्रने मंचेका टोरा काट दिया ।। ६३५ ॥ तो सहसा मंचाओ, कुमरोवि पडतओ नवपयाई। झाएइ तक्खणं चिय, पडिओ मगरस्स पुट्ठीए ॥६३६॥ अर्थ-उसके अनन्तर अकस्मात् शीघ्र मांचेसे पड़ता हुआ कुमरभी नवपदोंका ध्यानकरे उस ध्यान के प्रभावसे तत् कालही मकर महामत्स विशेपकी पीठपर पड़ा ॥ ६३६ ॥ नवपयमाहप्पेणं, ओसहियवलेण मगरपुट्टि ठिओ, खणमित्तेणवि कुमरो, सुहेण कुंकुणतडे पत्तो ६३७ अर्थ-तदनंतर नवपदोंके महात्म्यसे और औपधिके प्रभावसे मगरमच्छकी पीठपर रहा हुआ कुमर क्षणमात्रमें मुखसे कुकणदेशके तटमें प्राप्त भया ।। ६३७ ॥ तत्य य वर्णमि कत्थवि, चंपयतरुवरतलंमि सो सुत्तो, जा जग्गइ तो पिच्छइ, सेवापर सुहड परिवेढं ६३८ अर्थ-वहा पुंकण तटके किनारे प्रधान चंपक वृक्षके नीचे श्रीपाल सोता निद्रा आई वाद जितने जगे उतने से- वा करने में तत्पर ऐसे मुभटोंसे अपना आत्मा वीटा हुआ देखे ॥ ६३८ ॥ विणओणपहिं तेहिं, भडेहिं पंजलिउडेहि, विन्नत्तं । देव ? इह कुंकुणक्खे, देसे ठाणाभिहाणपुरे ६३९ .

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितमू.
॥८२॥
अर्थ-विनयसे नम्र इसी कारणसे हाथ जोड़के उन सुभटोंने वीनती करी सो कहते है हे देव इस कौंकण देशमें
स्थाना नामका प्रधान नगर है उस नगरमें ॥ ६३९ ॥
वसुपालो नाम निवो, तेणं अम्हे इमं समाइट्ठा। जलहितडे जं अचलंतच्छायतरुतले समासीणं ॥६४०॥
अर्थ-वसुपाल नामका राजा है उन्होंने हमको ऐसी आज्ञा दी है सो कहते हैं समुद्र के तीरपर अचलछाया जिसकी
ऐसा वृक्षके नीचे रहा हुआ पुरुष रत्नको ॥ ६४० ॥
पिच्छेह पुरिसरयणं, अज्झदिणे चेव, पच्छिमे जामे । तं तुरियंचिय तुरया, रूढं काऊण आणेह ६४१
अर्थ-आजही दिनके पीछेके प्रहरमें तुमदेखो उस पुरुषरत्नको शीघ्रही घोड़ेपर चढ़ाके लावो ॥ ६४१॥
ता अम्हेहिं तुमंचिय, दिट्ठोसि जहुत्ततरुतलासीणो। सामिय पुन्नवसेणं, ता तुरियं तुरयमारुहह ॥६४२॥
अर्थ-यह राजाका आदेश है इसलिए हे स्वामिन् हमने यथोक्त वृक्षके नीचे रहे हुए आपको पुण्यके वशसे देखे
हैं इससे शीघ्र कृपा करके घोड़ेपर सवार होओ ॥ ६४२ ॥
कुमरोवि हयारूढो, तेहिं सुहडेहिं चेव परियरिओ। खणमित्तेणवि पत्तो, ठाणयपुरपरिसरवणमि ॥६४३॥
अर्थ-कुमरभी घोड़ेपर सवार होके उन पुरुषोंके साथ परवरा हुआ क्षण मात्रसे अर्थात् थोड़ी वक्तसे थाना नगरके
पासके बनमें पहुंचा ॥ ६४३ ॥
,
॥ ८२॥

" तस्साभिमुहं रायावि, मंतिसामंतसंजुओ एइ । महया महेण कुमरं, पुरे पवेसेइ कयसोहे ॥ ६४४॥ अर्थ-राजा यमुपालभी मंत्री सामंत सहित श्रीपालके सामने आया करीशोभाजिसकी ऐसे नगरमें महोत्सवके माथ कुमरको प्रवेश करावे ॥ ६४४ ॥ काऊण य पडिवत्तिं, तस्स कुमारस्स असणवसणेहिं । पभणेइ सवहुमाणं, राया एयारिसं वयणं ६४५ अर्थ-और कुमरकी अशनपान वस्त्र वगैरहसे भक्ति करके राजा वसुपाल बहुमान सहित ऐसा वचन कहे ६४५ पुर्वि सहाइपत्तो, एगो नेमित्तिओ मए पुट्ठो। को मयणमंजरीए, महपुत्तीए वरो होही ॥ ६४६ ॥ अर्थ-कसे वचन कहे सो कहते हैं पहले मेरी सभामें एक नैमित्तिया आयाथा उसको मैंने पूछा मेरी मदनमंजरी पुत्रीका कान भर्तार होगा ॥ ६४६ ।। तेणुत्तं जो वइसाहसुद्ध,-दसमीइ जलहितीरवणे । अचलंतच्छायतस्तल,-ठिओ हवइ सो इमीइ वरो अर्थ-ऐसे पूछनेसे उस नैमित्तिएने कहा वैशाख मुदी दशमीके दिन समुद्रके किनारे जो वन है उसमें अचल छाया जिसकी ऐसे वृक्षके नीचे जो रहा होवे वह पुरुप इस कन्याका भर्तार होगा ॥ ६४७ ॥ अजं चिय तंसि तहेब, पाविओवच्छ पुण्णजोएणं। ता मयणमंजरिमिमं, मह धूयं ज्झत्ति परिणेसु ६४८ श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम् ॥ ८३॥ अर्थ-आजही हे वत्स पुण्य योगसे नेमित्तिएने जो प्रकार कहा उसी तरह तुम मिले हो इस कारणसे वह मदनमंजरी मेरी पुत्रीका शीघ्र पाणिग्रहण करो ॥ ६४८ ॥ एवं भणिऊण नरेसरेण, अइवित्थरेण वीवाहं । काराविऊण दिन्नं हयगयमणिकंचणाईयं ॥ ६४९ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे कहके राजाने अत्यन्त विस्तारसे पाणिग्रहण कराके घोड़ा, हाथी, रत्न स्वर्णादिक दिया ॥ ६४९॥ तत्तो सिरिसिरिपालो, नरनाह समप्पियंमि, आवासे । भुंजइ सुहाइं जं पुन्नमेव मूलं हि सुक्खाणं ६५० अर्थ-तदनंतर श्रीमान् श्रीपाल कुमर राजाके दिए हुए आवासमें सुख भोगवै जिस कारणसे सुखोंका मूलकारण पुन्य है पुन्यवान जहां जावे वहां सुख पावै ॥ ६५० ॥ रन्नो दितस्सवि देसवासगामाइअहिवत्तंपि । कुमरो न लेइ इकं, थइयाइत्तं नु मग्गेइ ॥ ६५१ ॥ अर्थ-देश नगर ग्रामादिकका स्वामिपना देते हुएभी कुमर नहीं लेवे किंतु एक ताम्बूल देनेका अधिकार मांगे ६५१ राया तं हीणंपि हु, कम्मं दाऊण तस्स तुट्ठिकए । अञ्चंतमाणणिज्जाण, तेण दावेइ तंबोलं ॥६५२॥ अर्थ-राजा वसुपाल कुमरको संतोपके लिये ताम्बूल देनेका हीन काम है तथापि वह अधिकार देके अत्यन्त माननीय पुरुपोंको कुमरके हाथसे ताम्बूल दिलावे ॥ ६५२ ॥ , ॥८३॥ -- इओ य जइया समुद्दमज्झे,पडिओ कुमरोतया धवल-सिट्ठी,तेणकुमित्तेण सम,संतुट्ठोहिययमझमि ५३ अर्थ-इधरसे जब कुमर समुद्र में गिरा तव धवल सेठ उस कुमित्रके साथ मनमें बहुत संतोप पाया ॥ ६५३ ॥ लोयाण पञ्चयत्थं, धवलो पभणेइ अहह किं जायं, जं अम्हाणं पहु सो, कुमरो पडिओ समुदंमि ६५४ अर्थ-लोगोको प्रतीति उत्पन्न करनेके लिए धवल प्रकर्पपने करके कहे अहह इति खेदे यह क्या भया बहुत चुरा कार्य भया जिसकारणसे जो हमारा स्वामी कुमर समुद्रमें गिरा ॥ ६५४ ॥ हिययं पिटेइ सिरं च, कुद्देइ पुक्करेइ मुक्कसरं । धवलो मायावहुलो, हा कत्थगओसि सामि तुमं ६५५ अर्थ-अब बहुत है माया जिसके ऐसा धवल सेठ छाती कूटे और मस्तक कुटे और ऊंचे स्वरसे जैसा होय वैसा पुकार करे फैसे सो केहते है हे स्वामिन् आप कहा गए हो इसप्रकारसे पुकार करे ॥ ६५५ ॥ तं सोऊणं मयणाओ, ताओ हाहारवं कुणंतीओ। पडियाओ मुच्छियाओ, सहसा वजाहयाउव्व ॥६५६॥ अर्ध-यह धवलका किया हुआ पुकार सुनके मदनसेना मदनमंजपा दोनों स्त्रियों हाहारव करती वजाहतके जैसी मूच्छित होके गिरी ॥ ६५६ ।। जलणिहिसीयलपवणेण, लद्धसंचेयणाउ ताउ पुणो। दुक्खभरपूरियाओ, विमुक्कपुकाउ रोयंति ६५७

श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका-
सहितमू.
॥ ८४ ॥
,
अर्थ-समुद्रके शीतल वायुसे याई 'चेतना जिन्होंने ऐसीदोन स्त्रियों दुःखके भरनामपूरसे भरा है हृदय जिन्होंका
इसी कारणसे ऊंचेस्वरसे रोती भई कैसी रोती भई सो कहते हैं ॥ ६५७ ।।
हा प्राणनाह गुणगणसणाह, हा तिजयसारउवयार।हा चंदवयण हा कमलनयण, हा रूवजियमयण६५८
अर्थ-हा- इति खेदे हे प्राणनाथ हे गुणगण सनाथ गुणोंका समूह करके सहित हा तीनजगतमें सार उपकार
जिसका ऐसा हे चन्द्रसम वदन हे कमल सदृश नेत्रवाला हा इति खेदे रूपसे जीता है कामको जिसने उसका सम्बो-
धन हे रूपजित मदन ॥ ६५८ ॥
हा हा हीणाण अणाहयाण, दीणाण सरणरहियाण। सामियतए विमुक्काण, सरणमम्हाण को होही ६५९
अर्थ-हाहा इति खेदे हे स्वामिन् आपने हमको छोड़ दी इसी कारणसे शरण रहित हमारे किसका सरणा होगा
कैसी हैं हम दीन हैं हीन हैं अनाथ हैं ।। ६५९ ।।
तो धवलो सुयणो इव, जंपइ सुयणु करेह मा खेयं । एसोहं निच्चंपि हु, तुम्हं दुक्खं हरिस्सामि ६६०
अर्थ-इसप्रकारसे उन्होंका रोना सुनके तदनंतर धवल सेठ स्वजनके जैसा उन्होंके पासमें आके इस प्रकारसे
वोला हे सुतनु शोभन अंगवाली स्त्रियो तुम मनमें खेद मत करो मैं तुम्हारा दुःख दूर करूंगा मैं तुम्हारा आज्ञा
कारी हूं॥ ६६०॥
॥८४॥

तो सोऊणं ताओ, सविसेसं दुक्खियाउ चिंतंति । नूणमणेणं पावण, चेव कयमेरिसमकजं ॥ ६६१ ॥ अर्थ-तदनंतर धवलसेठका वचन सुनके वे दोनों स्त्रियो विशेष दुःखी होके विचारकरे निश्चय इसी पापी क्रूरने एसा अकार्य किया यह जाना जाता है ॥ ६६१ ॥ इत्यंतरे उच्छलियं जलेहिं वियंभियं उभडमारुएहिं । समुन्नयं घोरघणावलीहि, कडक्कियं रुदतडिल्लयाहिं अर्थ-इस अवसरमें समुद्रका पानी उछला तथा दुःसह वायु वजने लगा और भयानक मेघकी घटा उत्पन्न भई चातफ फैल गई और विजलियों चमकनेलगी और विजलियों कड़की ॥ ६६२ ॥ घोरंधयारेहिं विवाहियं च रउद्दसद्देहिं समुट्टियं च। अटट्टहासेहिं पयटियं च, सयं च उप्पायसएहिं जायं ६३ अर्थ-और घोर अंधकार विशेष करके बढ़ा और भयानक ध्वनियां होने लगीं अट्टहास होने लगा सैकड़ों उत्पात आपहीसे हुआ ॥ ६६३ ॥ तत्तो हल्लोहलिएसु तेसु पोपसु पोयलोएहि, खलभलियं । जलजलियं, कलललियं मुच्छियं च रवणं ६६४ अर्थ-तदनंतर जहाजोका लोक व्याकुल हुआ और खलवले और झल झलितभया और कल कल शब्द युक्त भए और क्षण मात्र मूर्थित होगए ।। ६६४ ॥ डम २ डमंतडमरुय,-सदो अन्चतरुद्दरूवधरो। पढमं च खित्तवालो, पयडीहूओ सकरवालो ॥ ६६५ ॥ श्रीपरा.प.५ है श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥८५॥ , अर्थ-वादमें क्या भया सो कहते हैं पहले क्षेत्रपाल प्रगट भया कैसा है क्षेत्रपाल डम २ शब्द होवे जिसमें ऐसा डमरु बजाता हुआ और अत्यन्त रौद्र रूपका धारने वाला और खङ्ग है हाथमें जिसके ऐसा तलवार सहित ॥ ६६५॥ तोमाणिपुन्नभद्दा, कविलो तह पिंगलो इमे चउरो । गुरुमुग्गरवग्गकरा, पयडीया सुरा वीरा ॥ ६६६ ॥ अर्थ-तदनंतर क्षेत्रपालके पीछे माणिभद्र १ पूर्णभद्र २ कपिल ३ पिंगल ४ यह चार वीरदेव प्रगट भए कैसे हैं ये वीरदेव बड़े मुद्गरशस्त्र विशेष हैं हाथमें जिन्होंके ऐसें ॥ ६६६ ॥ कुमुयंजणवामणपुप्फदंत,-नामेहिं दंडहत्थेहिं । पयडीहूयं च तओ, चउहिंवि पडिहारदेवेहिं ॥ ६६७ ॥ अर्थ-और तदनंतर कुमुद १ अंजन २ वामन ३ पुष्पदंत ४ ये चार प्रतिहार देव प्रगट भए कैसे हैं ये देव दंड है हाथमें जिन्होंके ऐसे ॥ ६६७ ॥ चक्केसरी य देवी, जलंतचक्कदुयं भमाडंती । बहुदेवदेविसहिया, पयडीहूया भणइ एवं ॥ ६६८ ॥ अर्थ-और चक्रेश्वरी देवी प्रगट होके इस प्रकारसे कहे कैसीहैं चक्रेश्वरी देवी देदीप्यमान दोनों हाथोमें चक्रघुमा- वती और बहुत देव देवियां करके सहित ॥ ६६८ ॥ रे रे गिन्हह एयं, पढम दुव्बुद्धिदायगं पुरिसं । जं सवाणत्थाणं, मूलं एसुच्चिय न अन्नो ॥ ६६९ ॥ ॥८५॥ ,

,
अर्थ-चकन्वरी देवी क्या कहे सो कहते है रे रे देवो तुम पहले यह दुर्बुद्धि देनेवाले पुरुपको पकड़ो जिस कारणसे
गर्न अनयाका मूल येही पुरुष है दूसरा नहीं ॥ ६६१ ॥
तो झनि ग्वित्तवालण, सो नरो वंधिऊण पाएहिं, । अवलंविओ य कूवय-खंभंमि अहोमुहं काउं ६७०
अर्य-चक्रेश्वरीके वचनके अनन्तर क्षेत्रपालने शीघ्र उस दुर्बुद्धि देनेवाले मनुष्यको पकड़के पग वांधके नीचा मुख
करके कृपस्थंभमें लगादिया अर्थात् नीचा मुख ऊपर पग करके बांध दिया ॥ ६७० ॥
दाउण मुहे अमुई, खग्गेणं च्छिन्निऊण अंगाई। सो दिसिपालाणं वलिव्ब, दिनओ संतिकरणत्थं ६७१
अर्थ-उसक मुखमें अशुचि विष्ठा देके खनसे उसके अंग वाह वगैरह काटके दिक्पालोंको वलीके जैसा शांति कर-
नके लिए गरीरका टुकड़ा २ करके दशों दिशामें फेंक दिया ॥ ६७१ ॥
नत्तो सो भयभीओ, धवलोमयणाण ताण पिट्ठिठिओपभणेइ ममं रक्खह, रक्खह सरणागयं निययं ६७२
अर्थ-तदनंतर उराहा धवलसेठ मदनसेना मदनमंजपाके पीछे जाके और इस प्रकारसे बोला कि मैं तुम्हारे
मरण आया मेरी रक्षा करो रक्षा करो ॥ ६७२ ।।
ता चफेसरिदेवी पभणइ रे दुट्ट धिट्ठ पाविट्ठ । एयाण सरणगमणेण, चेव मुक्कोसि जीवंतो ॥ ६७३ ॥
अर्ध-तदनंतर चवरी देवी कहे अरे दुष्ट अरे धेठा इन महा सतियोंके सरणे जानेसे तें जीता हुआ रहा है ॥६७३॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥८६॥
विणओणयाउ ताओ, मयणाओ दोवि विम्हियमणाओ।भणियाओ देवीए, सपसायं एरिसं वयणं ६७४
अर्थ-विनयसे नय और आश्चर्य भया मनमें जिन्होंके ऐसी दोनों मदनाओंको चक्रेश्वरी देवी प्रसन्नता सहित ऐसा
वचन बोली ॥ ६७४ ॥
वच्छा वल्लह तुम्हतणउ, गरुईरिद्धिसमेउ । मासभितरिनिच्छइण, मिलिसइ धरहु म खेउ ॥६७५॥
अर्थ-हे पुत्रियो तुम्हारा वल्लभ भर्तार बड़ी ऋद्धिसहित एक महीनेमें मिलेगा तुम्हारे खेद करना नहीं ॥ ६७५ ॥
एम भणेविणु चक्कहरि, परिमलगुणेहिं विसाल । मयणह कंठिहिं पक्खिवइ, सुरतरुकुसुमह माल ॥६७६॥
अर्थ-इस प्रकारसे कहके चक्रेश्वरी देवी मदनसेना और मदन मंजूषा दोनों स्त्रियोंके कंठमें सुगंधगुण करके विशाल
कल्पवृक्षके पुष्पोंकी माला पहनाई ॥ ६७६ ॥
तुम्हह दुटुन देखिसइ, मालह तणई पमाणि । एम भणेविणु चक्कहरि, देवि गई नियट्ठाणि ॥६७७॥
अर्थ-मालाके प्रभावसे तुमको दुष्ट पुरुष नहीं देखसकेगा ऐसा कहके चक्रको धारनेवाली चक्रेश्वरी देवी अपने
स्थान गई यहां तीन दोहा छंद है ॥ ६७७ ॥
पभणंति तओतिनिवि, ते पुरिसासरलबुद्धिणोधवलं । दिटुं कुबुद्धिदायग,-फलं तए एरिसविबागं ६७८
॥८६॥

, अर्थ-तदनंतर ये तीनों सरल वुद्धिवाले पुरुप धवलसे कहे हे धवल कुवुद्धि देनेवालेको ऐसा फल भया सो तुमने देखाही है ।। ६७८ ॥ एयाणं च सईणं, सरणपभावेण जहवि जीवंतो । छुट्टोसि तहवि पावं, पुणो करंतो लहसिऽणत्थं ६७९ अर्ध-और इन सतियोंके शरणेके प्रभावसे यद्यपि जोतें जीता वचा है तथापि और पापकर्ता हुआ अनर्थ पावेगा ॥६७९॥ जो पररमणीरमणि,-कलालसो होइ रागगहगहिओ।जइ सो वुच्चइ पुरिसो, ता के खरकुकुरा अन्ने ६८० अर्थ-~-जो पुरुष पर स्त्रियोंके साथ रमनेमें एक लालसा तृष्णाजिसकी ऐसा कामरागग्रहसे ग्रहीत नाम ग्रहण किया जिमने ऐसा मनुप्य रूपसे गर्दभ कुत्तेके सदृश कहा जावे ॥ ६८० ॥ शिद्धी ताण नराणं, जे पररमणीण रूवमित्तेण । खुहिया हणंति सवं, कुलजससग्गापवग्गसुहं ॥६८१॥ अर्ध-उन मनुप्योको धिकार होवो धिकार होवो जे पर स्त्रियोंके रूपमात्रसे चल चित्त भया सर्वकुल वंश स्वर्ग अपवर्गके मुखका विनाश करेह कुल उंचा गोत्र यश कीर्ति स्वर्ग सुख प्रसिद्ध है अपवर्ग सुख मोक्ष सुख ये न होवे ॥६८१॥ जलहिमि वहताणं, पोयाणं जाव कइवयदिणाई। जायाइं तओ पुणरवि, धवलो चिंतेइ हिययंमि ॥६८२॥ अर्थ-समुद्र में जहाज चलता थकां कितनेक दिन भए तव औरभी धवलसेठ मनमें विचारे ॥ ६८२ ॥ अस्थि अहो मह पुन्नो,-दयंत्तिजं सो उबद्दवो टलिओ।फलिया एसा य सिरी, सदावि सुहेण मज्झेव ६८३ भाषाटीका सहितम्- श्रीपाल- चरितम् ॥८७॥ अर्थ-क्या विचारे सो कहते हैं अहो इति आश्चर्ये मेरे पुण्यका उदय है कि जिस कारणसे वह जिसका स्वरूप कहा वह उपद्रव टल गया और यह सर्वलक्ष्मी सुखसे मेरे सफल भई है अब मेरे विना इस लक्ष्मीका कौन स्वामी है ॥ ६८३ ॥ जइ रमणीओ, ऐयाओ कहवि मन्नति महकलत्तत्तं। ताऽहं होमि कयत्थो, इंदाओवा समब्भहिओ ६८४ अर्थ-जो ये दोनों स्त्रियों कोई प्रकारसे मेरी स्त्रियां हो जावे तो मैं कृतार्थ होउं अथवा इन्द्रसे भी अधिक हो जाऊं ॥ ६८४॥ इय चिंतिऊण तेणं, जा दुईमुहण पत्थिया ताओ।ता ताहि कुवियाहिं, दुई निभच्छिया वाढं ॥६८५॥ अर्थ-ऐसा विचारके धवल सेठने जितने दूतीके मुखसे उन स्त्रियोंकी प्रार्थना कराई उतने क्रोधातुर हुई दोनों मदना दूतीकी अत्यर्थ निर्भर्त्सना करी अर्थात् तर्जना करी ॥ ६८५ ॥ तहविहु सो कामपिसायाहिडिओ, नट्ठ निम्मलविविओ।तेणज्झवसाएणं, खणंपि पावेइनो सुक्खं ६८६ 'अर्थ-तथापि निश्चय कामरूप पिशाच दुष्टव्यन्तरसे आश्रित इसी कारणसे नष्ट भया है निर्मल विवेक जिसका ऐसा धवलसेठ उस अध्यवसायसे नहीं निवृत्त होवे और क्षणमात्रभी सुख नहीं पावे ॥ ६८६ ॥ अन्नदिने सो नारीवेसं, काऊण कामगहगहिलो। मयणाणं आवासं, सयं पविट्ठो सुपाविट्ठो ॥ ६८७॥ , ।। ८७॥

अर्थ-अन्यदिनमें वह धवलसेट स्त्रीका वेप करके कामग्रहसे गहला भया आपही मदना श्रीपालकी स्त्रियोंके आवा- समें प्रवेश किया कैसा है धवल अतिशय पापिष्ठ है ।। ६८७ ॥ जाव पलोपइ तहि, ताव न पिच्छेइ ताओमयणाओ। पुरिओ ठियाउ मालाइ,-सएण अदिस्सरुवाओ॥ अर्थ-जितने उस आवासमें देखे उतने आगे रही भई दोनों स्त्रियोंको नहीं देखे कैसी हैं दोनों स्त्रियों मालाके प्रभावसे अश्य भया है रूपजिन्होका ॥ ६८८ ॥ सो गगंधो अंधुत्व, जाव भमडेइ तत्थ पवडतो । तो दासीहिं सुणउव्व, कढिओ कुहि ऊण वहिं ॥६८९॥ अर्थ- -यह धवल कामरागसे आंधे पुरुपके जैसा इधर उधर गिरता हुआ जितने मदनाओंके आसपासमें फिरता है उतने मदानाओंकी दासिक्ने कुत्तेके जैसा कृटके वाहिर निकाला ॥ ६८९ ॥ इत्तो ते बोहित्था, मग्गेणऽन्नेण निजमाणावि । सयमेव कुंकुणतडे, पत्ता मासंमि किंचूणे ॥ ६९० ॥ अर्ध-घरसे वे जहाज और मार्गसे लेजाता थकां आपहीस कुछकम एक महीना होनेसे बुंकण तटमें प्राप्त हुए ॥६९०॥ पढर्म उत्तरिउणं, धवलोजा जाइ पाहुडविहित्थो। रायकुलं ता पासइ, नरवरपासंमि सिरिपालं ॥६९१॥ अर्थ-अब धवल पहले जहाजसे उतरकै भटना लेके राजकुलमें गया राजाको जाके भेटना देवे उतने राजाके पासमें चटारमा श्रीपाल कुमरको देखे ॥ ६९१ ।।

श्रीपाल.
चरितम्
भाषाटीका
सहितम्
॥ ८८॥
रायावि सत्थवाहस्स, तस्स दावेइ गुरुयबहुमाणं । तंबोलं तेणं चिय, सिरिपालेणं विसेसेणं ॥६९२॥
अर्थ-राजाभी उस सार्थवाहको श्रीपालके हाथसे विशेष सत्कार करनेके लिए ताम्बूल दिलावे ॥ ६९२ ॥
सिरिपालकुमारेणं, नाओ सिट्ठी स दिट्ठमित्तोवि । सिट्ठी पुण सिरिपालं, दट्टणं चिंतए एवं ॥ ६९३ ॥
अर्थ-श्रीपाल कुमरने धवल सेठको देखनेसेही पहिचान लिया और सेठ श्रीपालको देखके इस प्रकारसे
विचारे ॥ ६९३ ॥
धि द्धी किं सो एसो, सिरिपालो धवलसिट्ठिणो कालो। किंवा तेण सरिच्छो अन्नोपुरिसोइमो कोऽवि६९४
अर्थ-क्या विचारे सो कहते हैं धिक्कार होवो धिक्कार होवो वह यह श्रीपाल है कैसा है श्रीपाल धवलसेठके काल
सदृश है अथवा श्रीपालके तुल्य यह कोई दूसरा पुरुष है ॥ ६९४ ॥
ठाऊण खणं नरवर,-सहाइ जा उढिओ धवलसिट्ठी। पडिहाराओ पुच्छइ, थइयाइत्तो इमो को उ ६९५
अर्थ-ऐसा विचारके धवलसेठ क्षणमात्र राजाकी सभामें बैठके जितने उठा उतने बाहर आके द्वारपालसे पूछे यह
ताम्बूल देनेका अधिकारी कौन पुरुष है ॥ ६९५ ॥
तेणं कहिओ सबोवि तुस्स कुमरस्त चरियवुत्तंत्तो। तं सोऊणं सिट्टी, जाओ वजाहउव दुही ॥६९६॥
अर्थ-उस प्रतिहारने कुमरका सर्ववृतान्त कहा उस वृतान्तको सुनकर सेठ वजाहतके जैसा दुःखी भया ॥ ६९६ ॥
--
॥८८॥

150-15 चिनइ हिययमझे, ही ही विहिविलसिएण विसमेण, जं जं करोमि कज्जं, तं तं मे होइ विवरीयं ६९७ अर्ध-तय हृदयमें सेठ विचारे ही ही इति खेदे विषम विधिक विलाससे जो जो कार्य मैं करूं हूं वह सब विपरीतही होता है।॥ ६९७ ॥ एसो सो सिरिपालो, जाओ जामाउओ नरिंदस्स । गुरुओ ममावराहो, किं होही तं न याणामि ६९८ अर्ध-यह श्रीपाल राजाका जमाई हुआ है मेरा अपराधतो बड़ा है अव क्या होगा सो नहीं जानू ॥ ६९८ ॥ तहवि नियकजविसए, धीरेण समुज्झमो न मुचव्यो।जं सम्ममुज्जमंताण, पाणिणं संकए हु विही ६९९ अर्थ-तथापि बुद्धिमानको अपने कार्यमें अच्छी तरहसे उद्यम करना अर्थात् उद्यम छोड़ना नहीं जिस कारणसे सम्यक् उद्यमवान् प्राणियोंसे निश्चय विधिः देवभी शंकता है ॥ ६९९ ।। एवं सो चितंतो, जा पत्तो निययंमि उत्तारे । ता तत्थ गीयनिउणं, डुंवकुटुंबं च संपत्तं ॥ ७०० ॥ अर्ध-वह धवल सेट इस प्रकारसे विचारता हुआ जितने अपने उतारे पहुंचा उतने वहां गीत कलामें निपुण हुं मोका फुटुंय आया ॥ ७०० ।। सो ताण गायणाणं, जाव न चिंताउलो दियइ दाणं । ता डुवेणं पुट्ठो, रुट्ठो किं देव अम्हुवरि ॥७०१॥ .

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥८९॥
,
अर्थ-वह धवल चिंतासे आकुल हुआ जितने उन गायनोंको दान नहीं देवे उतने डंबने सेठसे कहा हेदेव हे महा-
राज क्या हमारेपर नाराज भयाहो इससे दान नहीं देवो हो ॥७०१॥
एगंते डुंबं पइ सो जंपइ, देमि तुज्झ भूरिधणं । जइ इवं मह कजं, करेसि केणवि उवाएणं ॥७०२॥
अर्थ-यह दुमका वचन सुनके सेठ एकान्तमें डुमसे कहे तेरेको बहुत धन देउं जो कोई उपाय करके एक मेरा
कार्य करे ॥ ७०२॥
डुंबोवि भणइ पढम, कहेह मह केरिसं तयं कजं । जेण मए जाणिजइ, एयं सज्झं असझं वा ७०३
अर्थ-यह धवलका वचन सुनके डंव वोला पहले मेरेको वह कैसा कार्य है सो कहो जिससे जाननेमें आवे वह
कार्य साध्य है अथवा असाध्य है ॥ ७०३ ॥
धवलो भणेइ जो, नरवरस्स जामाउओइमो अत्थि। जइ तं मारेसि तुमं, तो तुह मुहमग्गियं देमि ७०४
अर्थ-तव धवल सेठ कहे जो यह राजाका जमाई है जो तैं राजाके जमाईको मार देवे अर्थात् प्राणरहित करे तो
मैं जो मांगेसो देउं ॥ ७०४ ॥
डुबो भणेइ तं मारणंमि, इक्कुत्थि एरिसोवाओ। जं अन्नायकुलं तं, पयडिस्सं एस डंबुत्ति ॥ ७०५॥
॥ ८९ ॥

अर्ध-टुंब कहे उस राजाके जमाईको मारनेमें एक ऐसा उपाय है जिस कारणसे राजाके जमाईका कुल याने वंश
किसीने जाना नहीं है में उस राजाके जमाईको डॉम करके प्रगट करूंगा ॥ ७०५ ॥
तत्तो राया जामाउयंपि, तं जमगिहमि पैसेही । एवं च कए गंण, होही तुह कज सिद्धीवि ॥ ७०६ ॥
अर्थ-तदनंतर राजा उस जमाईकोभी यमराजाके घर पहुंचा देगा ऐसे करनेसे निश्चय तुम्हारे कार्यकीभी सिद्धी
होगी ।। ७०६ ॥
मंतण तेण तुट्टो, धवलो अप्पेइ कोडिमुलंपि नियकरमुद्दारयणं, वेगेणं तस्स पाणस्स ॥ ६०७ ॥
अर्थ-
-उस विचारसे संतुष्टमान भया धवल कोड़ कीमतकी अपने हाथकी मूदड़ी डॉमको शीघ्र देवे ॥ ७०७ ॥
तुट्टो सोवि हु इंबो सकुडुंवो जाइ निवगवक्खस्साहिटिममहीइ चिट्ठइ, गायंतो गीयमइमहुरं ।। ७०८ ॥
अर्थ-यह टॉमभी मृदड़ी पाके बहुत खुशी भया कुटुंव सहित राजभवनके द्वार जावे अत्यन्त मधुर गीत गाता
हुमा राजाफे गोसड़की नीचेकी भूमिमें रहे ॥ ७०८ ॥
ताणं कोमलकंटुब्भवेण, गीएण हरियमणकरणो। राया भणेइ भो भो, जं मग्गह देसि तं तुज्झ ॥७०९॥
अर्थ-उन लामाका कोमल कंठसे उत्पन्न भए गीतसे हरण भया मन और श्रोत्र इन्द्रिय जिसका ऐसा राजा वसु-
पाद बोटे अहरो गायनो जो तुम मांगो सो में तुमको देउं ॥ ७०९ ॥

i
श्रीपाल.
चरितम्
।
॥ ९० ॥
भाषाटीका-
सहितम्-
पाणो भणेइ सामिय, सवत्थाहं लहेमि बहुदाणं । किं तु न लहेमि माणं, ता तं मह देसु जइ तुट्ठो ७१०
अर्थ-तव डोंम कहे हे स्वामिन् मैं सर्वत्र बहुत दान पाताहूं किंतु मान सत्कार कहांभी नहीं मिले है इस लिए हे
महाराज जो आप संतुष्टमान भए हो तो मेरेको मान देवो ॥ ७१० ॥
राया भणेइ माणं, जस्साहं देमि तस्स तंबोलं । दावेमिमिणा जामाउएण, पाणप्पिएणावि ॥७११॥
अर्थ-राजा कहेहै जिसको मैं मान देउं हूं उसको यह प्राणोंसेभी प्यारा जमाईके हाथसे तांबूल दिलाताई ॥७११॥
डुबो सकुटंबोऽवि हु, पभणइ सामिय! महापसाउत्ति । तो रायाएसेणं, कुमरो जा देई तंबोलं ७१२
अर्थ-तव कुटुंबसहित डोंम राजाको नमस्कार करके बोला हे महाराज हमारेपर महाप्रसाद याने वेसी प्रसन्नता
करो तब राजाकी आज्ञासे कुमर श्रीपाल जितने तांबूल देवे ॥ ७१२ ॥
ताव सहसत्ति एगा, बुड्ढी डुंबी कुमारकंठमि । लगेइ धाविऊण, पुत्तय पुत्तय कओ तंसि ॥ ७१३ ॥
अर्थ-उतने अकस्मात् तत्काल एक बूढी डोमनी दौडके कुमरके कंठमें लगी हे पुत्र हे पुत्र तैं यहां कहां से है
कहां से आया है ऐसा वचन वोलती ॥ ७१३ ॥
कंठ विलग्गा पभणइ,हा वच्छय कित्तियाउ कालाओ। मिलिओऽसि तुमं अम्हं,कत्थय भमिओसि देसंमि
॥ ९०॥

अर्थ-और कंटमें लगी भई कर्नेलगी हा इतिखंदे हे वत्स कितने कालसे ते हमको मिला है और किस २ देशमें फिरा है ।। ७१४ ॥ मुणिोसि हंसदीये, पत्तो कुसलेण पबहणारूढो । तत्तो इह संपत्तो, कहं कहं पुत्तय कहेसु ॥७१५॥ अर्थ-हे पुत्र ते जहाजपर चटके कुशलसे हंसद्वीप पहुंचा ऐसा हमने सुनाथा वहांसे किस प्रकारसे यहां आया सो हमसे कह ॥ ७१५ ॥ एगा भणेइ भतिजओसि, अन्ना भणेइ भायासि । अवरा कहेइ महदेवरोसि, पुन्नेण मिलिओसि ७१६ अर्थ-एक टोमनी कहे मेरा भतीजा है भाईका पुत्र है और डोमनी कहे मेरा भाई है और कहे मेरा देवर है पुण्यरो मिला है ।। ७१६ ॥ इंचो भणेइ सामिय, मह लहुभाया इमो गओ आसि।संपइ तुम्ह समीवे ठिओविनो लक्खिओ सम्म। अर्ध-अब टोम राजाके सामने देखके बोला हे स्वामिन् यह मेरा छोटाभाई कहांभी चला गयाथा इस वक्त में आपफ पासमें बैठा हुभा अच्छी तरहसे पहिचाना नहीं ॥ ७१७ ॥ एण्ण कारणेणं, माणमिसेणं अणाविओ पासे । उवलस्त्रिओ य सम्मं वहुलक्षणलक्खिओ एसो ७१८ श्रीपाल- चरितम् ॥९१ ॥ 'अर्थ-इस कारण करके मानके मिससे पासमें बुलाया और अच्छी तरहसे पहिचाना हे स्वामिन् यह मेरा भाई बहुत भाषाटीका गुणवान हैं प्रशस्त लक्षणों करके युक्त है हे महाराज हम तो डोम हैं हमको कोई मान देवे तो हम क्या बडे हो जावें सहितम्. डोम तो डोमही रहे परंतु इसको पहिचाननेके लिए यह प्रपंच किया सो क्षमा करें ॥ ७१८ ॥ राया चिंतेइ मणे, ही ही विद्यालियं कुलं मज्झ । एएणं पावणं, तो एसो झत्ति हतहो ॥ ७१९ ॥ अर्थ-यह डोमका बचन सुनके राजा मनमें विचारे हीही इति खेदे इस पापी दुष्टने मेरे कुलको विटालदिया दोष सहित किया इस कारणसे यह पापीको शीघ्र मारना योग्य है ॥ ७१९ ॥ नेमित्तिओ य बंधाविऊण, आणाविओ नरवरेणं । भणिओ रे दुट्ठ इमो, सायंगो कीस नो कहिओ ७२० अर्थ और नेमित्तिएको राजाने बंधवाके बुलवाया और कहा अरे दुष्ट यह मातंग डोम कैसे नहीं कहा ॥ ७२० ।। नेमित्तिओवि पभणइ, नरवर एसो न होइ मायंगो। किंतु महामायंगा,-हिवई होही न संदेहो ७२१ अर्थ-नेमित्तियाभी बोला हे महाराज यह मातंग चांडाल नहीं है किंतु महामातंग नाम महागजोंका अधिपति स्वामी होगा इस अर्थमें संदेह नही है ॥ ७२१ ॥ गाढयरं रुटेणं, रन्ना नेमित्तिओ कुमारो य । हणणत्थं आइट्ठा, निययाणं जाव सुहडाणं ॥ ७२२ ॥ ॥९१ ॥ ,

अर्थ-तदनंतर अत्यन्त क्रोधातुर हुए राजाने नैमित्तिया और कुमरको मारनेके लिए अपने सुभटोंको आज्ञा दिया ॥७२२॥
तामयणमंजरीवि हु, सुणिउण समागया तहिं ज्झत्ति।पभणेइ ताय किमियं, अवियारियकज्जकरणंति॥
अर्थ-उतने मदनमंजरी राजकन्याभी यह वार्ता सुनके शीघ्र राजाके पासमें आई आके कहनेलगी पिताजी यह
बिना विचारा कार्य क्या करते है ॥ ७२३ ॥
आयारणवि नझइ, कुलंति लोएवि गिज्जए ताय । लोओत्तरआयारो, किं एसो होइ मायंगो ॥७२४॥
अर्थ-और क्या कहे सो कहते हैं हे तात आचारसेंभी कुलजाना जावे है ऐसा लोकमें कहते हैं आचारः कुलमा-
ख्याति इस वचनसे सवलोगोके उपरिवर्ति प्रधान आचार वर्ताव जिसका ऐसा यह कुमर क्या चंडाल होवे अपितु
फदापि नहीं होवे ।। ७२४ ॥
तो पुछइ नरनाहो, कुमरं भो नियकुलं पयासेसु । ईसि हसिऊण कुमरो, भणइ अहो तुज्झ च्छेयत्तं ७२५
अर्ध-तदनंतर राजा कुमरको पृछे अहो कुमार अपना कुल कहो तब कुमर थोड़ा हंसके कहे अहो आप बहुत
विचक्षण है जिस कारणसे पहले अपनी पुत्री देके पीछे कुल पूछते है ॥ ७२५ ।।
अह्वा नरवर! तुमए, एयं अक्वाणयं कयं सच्चं । पाऊण पाणियंकिर, पच्छा पुच्छिन्नए गेहं ॥७२६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्,
॥ ९२ ॥
अर्थ-अथवा हे राजन् आपने यह आख्यानक लौकिक कथन सत्य किया कि पहले पानीपीके पीछे घर पूछना अर्थात्
कोई ब्राह्मण वगैरह मारवाड देशमें चला जाताथा बहुत तृषालगी बादमें किसीसे कहा भाई पानी पिलाओ उसने पानी
पिलाया वाद ख्याल हुआ और पूछा घर किसका है उसने कहा ढेड़का है इत्यादि ॥ ७२६ ॥,
सिन्नं करेह सज्जं जं मम हत्था कुलं पयासंति । जीहाए जं कुलवन्नणं,-ति लज्जाकरं एयं ॥७२७॥
अर्थ-जो मेरा कुल श्रवणकी इच्छा हो तो यह करिए कि अपनी सेना तय्यार करो जिससे मेरा हाथ-कुल कहेगा
अपनी जिव्हासे कुल कहना यहतो लज्जाकारी है ॥ ७२७ ॥
अहवा पवहणमज्झ,-ठियाओ जा संति दुन्निनारीओ।आणाविऊण ताओ, पुच्छेह कुलंपिजइ कजं ७२८
अर्थ-अथवा जहाजमें दो स्त्रियों हैं उन स्त्रियोंको यहां बुलाके जो आपके कार्य होवे तो कूल पूछो ॥ ७२८ ॥
तो विम्हिओ य राया, आणाविय धवलसत्थवाहपि । पुच्छइ कहेसु किं संति, पवहणे दुन्नि नारीओ ७२९
अर्थ--तदनंतर राजा आश्चर्ययुक्त भया धवल सार्थवाहको बुलाके पूछे अहो सेठ कहो जहाजमें क्या दो स्त्रियों हैं ॥७२९॥
धवलोवि हु कालमुहो, जा जाओ ताव नरवरिंदेणं । नारीण आणणत्थं पहाणपुरिसा समाइट्ठा ७३०
अर्थ-यह राजाका बचन सुनके धवलसेठ जितने स्याममुख होगया उतने राजाने उन स्त्रियोंको बुलानेके वास्ते
अपने प्रधान पुरुषोंको आज्ञा दिया ॥ ७३० ॥..
॥ १२॥

- तेहिं गंतृण तओतहिं, भणियाओ नरवरिंदधूयाओ। पइणो कुलकहणत्थं, वच्छा आगच्छह दुयंति ७३१ अर्थ-यह प्रधान पुरुष यहाँ जाहाजोंमें जाके उन राजपुत्रियोंको इस प्रकारसे कहा है यत्से पुत्रियो तुम अपने पतिका पुट कहने के लिये शीघ्र जाओ॥ ७३१ ॥ तं सोऊणं ताओ, मयणाओ हरिसियाओ चित्तमि । तेण मणवल्लहेणं, नूणं आणाविया अम्हे ॥७३२॥ अर्थ-वर प्रधान पुरुपोंका वचन सुनके दोनों मदना मनमें हर्पित भई और विचारती भई अपने भारने अपनेको पुटाईऐसा विचारके हर्पित भई ॥ ७३२ ॥, सिवियाए चडियाओ, संपत्ता नरवरिंदभवणंमि । दळूण पाणनाहं, जाया हरिसेण पडिहत्था ॥७३३॥ अर्थ-तदनंतर पालकीमें बैठके दोनों स्त्रियों राजा वसुपालके भवनमें प्राप्त भई और वहां अपने प्राणनाथ भर्तारको देसफे आनंद व्याप्त भई अर्थात् परिपूर्ण आनंद पाया ॥ ७३३ ॥ रन्नावि पुच्छियाओ, वच्छा भंजेह अम्हसंदेहं । को एसो वुत्तंतो, कहेह आमूलचूलंति ॥ ७३४ ॥ अर्थ-राजानेभी इस प्रकारसे पूछा हे वत्से हे पुत्रियो तुम हमारा संदेह दूरकरो यह क्या वृतान्त है यह क्यावात है मूलसे लेके चूट पर्यंत कहो ॥ ७३४ ।। : ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ ९३ ॥
तो विज्झाहरधूया, कहेइ सबंपि कुमरचरियं जा। ताव निवो साणंदो, भणइ इमो भइणिपुत्तो मे ७३५
अर्थ-तदनंतर विद्याधरराजाकी पुत्री मदनमंजूषाने सर्व कुमरका चरित कहा कुमर समुद्रमें पड़ा वहां तक उतने
वसुपाल राजा आनंदसहित बोले यहकुमर मेरी बहिनका पुत्र भानजा है ॥ ७३५ ॥
गाढपरं संतुट्ठो, राया कुमरस्स देई बहुमाणं । डुंब सकुडंबंपि हु, ताडावइ गरूयरोसेण ॥ ७३६ ॥
अर्थ-तदनंतर अत्यन्त संतुष्टमान भया राजा कुमरका बहुत सत्कार करे और बहुत क्रोधसे कुटुंबसहित डोमको
अपने सेवकोंके पास पिटवावे ॥ ७३६ ॥
डुबो कहेइ सच्चं, सामिय कारावियं इमं सवं । एएण सत्थवाहेण, देव दाऊण मज्झ धणं ॥७३७॥
अर्थ-तब डोम सत्य कहे हे स्वामिन् हे देव हे महाराज इस सार्थवाणिएने मेरेको धन देके यह सर्व अकार्य
कराया सर्व अनर्थका मूल यह सार्थवानिया है ॥ ७३७ ॥
तो राया धवलंपि
हु,
बंधावेऊण निविडबंधेहिं । अप्पेइ मारणत्थं, चंडाणं दंडपासीणं ॥७३८॥
अर्थ-तदनंतर राजा धवल सार्थवाहको मजबूत बंधनोंसे बंधवाके अत्यन्त दुष्ट कोटवाल पुरुषोंको मारनेके वास्ते
देवे ॥ ७३८ ॥
॥ ९३॥

- कुमरो निरुवमकरुणारस,-वसओ नरवराउ कहकहवि । मोयावइ तं धवलं, डुवं च कुडुवसंजुत्तं ३९ अर्थ-कुमार श्रीपाल उपमा रहित जो करुणारस उसके वशसे धवलसेठको कोईप्रकारसे राजाके पास छुडवावे और पुटुंबसहित टोमकोभी छुडवावे ।। ७३९ ॥ मायंगाहिबइत्तं, पुट्ठो नेमित्तिओ कहइ एवं । मायंगा नाम गया, तेसिं एसो अहिवइत्ति ॥७४०॥ अर्थ-वादमें राजाने नैमित्तिएको मातंगाधिपतिका अर्थ पूछा तव नेमित्तिया कहे हे महाराज महामातंग नाम हाथी उन्होका अधिपति नाम स्वामी ।। ७४०॥ संपइऊण राया, सम्म नैमित्तियं विसज्जेइ । भयणीसुयंति धूया, वरंति कुमरं च खामेइ ॥ ७४१ ॥ अर्थ-राजा वसुपाल नेमित्तिएका वस्त्राभरादिकसे सत्कार करके विसर्जन करे और कुमर वहिनका पुत्र है और पुत्रीका पर है इस कारणसे विशेप करके खमावे ॥ ७४१ ।। राया भणेइ पिच्छह अहह अहो उत्तमाण नीयाणं । केरिसमंतरमेयं, अमियक्सिाणंव संजायं ७४२ अर्थ-राजा कहे जहह इति खेदे अहो इति आश्चर्य अहो लोको तुम देखो देखो उत्तम पुरुष और नीच पुरुषोंमें यह फितना अंतर है अमृत और जहरके जैसा अंतर है ॥ ७४२ ।।

भाषाटीका
श्रीपाल-
चरितम्
सहितम्
॥९४॥
धवलो करेइ एरिस,-मणत्थमुवगारिणोवि कुमरस्स । कुमरो एयस्स अणत्थ-कारिणो कुणइ उवयारं
अर्थ-धवलसेठ उपकारी कुमरपर ऐसा अनर्थ करे है कुमर अनर्थ करनेवाला धवलसेठका उपकार करे है ।।७४३॥
जह जह कुमरस्स जसं धवलं, लोयंमि वित्थरइ एवं। तह तह सो धवलोवि हु, खणे खणे होइ कालमुहो४४
अर्थ-जैसे २ कुमरका उज्वल यश लोकमें कथित प्रकारसे विस्तार पावे वैसा २ निश्चयकरके धवलसेठभी क्षण २
में स्याम, मुख होवे ॥ ७४४ ॥
तहवि कुमारेणं सो, आणीओ नियंगिहं सुबहुमाणं ।भुंजाविओ य विस्तामिओ य, नियचंदसालाए ४५
अर्थ-तथापि कुमरने बहुमान सहित अपने घर जैसे बने वैसा बुलाया नाना प्रकारका भोजन कराया वाद चन्द्र
शाला अपने घरके ऊपरकी भूमिमें रक्खा ॥ ७४५ ॥
तत्थ टिओ सो.चिंतई, अहह अहो केरिसो विही वको।जमहं करेमि कुजं, तं तं मे निष्फलं होइ ७४६
अर्थ, वहां चन्द्रशालामें रहा हुआ वह धवलसेठ विचारे क्या विचारे सो कहते हैं अहह इति खेदे अहो इति
आश्चर्ये विधि, देव मेरेपर कैसा वक्र है मैं जो २ कार्य कर्ता हूँ वह २ मेरे निष्फल होवे है ॥ ७४६ ॥
एवं ठिएवि, अज्जवि, मारिजइ जडु इमो मए कहवि । ता एयाओ सिरीओ, सबाओ हुंति महचेव ७४७
-
॥ १४॥

, . अर्थ-एसे रहते भी जो इस कुमरको मैं अवीभी कोई प्रकारसे मारूं अर्थात् प्राण रहिन करूं तो यह लक्ष्मी मेरेही धोये ॥ ७८७ ॥ अन्नं च इत्थ सत्तम,-भृमीए सुत्तओ इमो इक्को । ता हणिऊणं एयं, रमणीवि चलावि माणेमि ७४८ अर्थ-औरभी यहां सातवीं भूमिपर कुमर इकेला सोता है इस लिए इस कुमरको मारके इसकी तीनों स्त्रियोंको जनपदग्नीसे में भोग ॥ ७८८ ॥ इय चिंतिजण हिट्ठो, धिट्ठोदुट्टो निकिट्ठपाविट्ठो । असिवेणुं गहिऊणं, पहाविओ कुमरवहणत्थं ॥७४९॥ अर्थ-ऐसा विचारके वह धवल हर्पित होके छुरी लेके कुमरको मारने के लिए चला कैसा है धवल धेठा है और दुष्ट सी पारणसे निकृष्ट नाम अधम है और अतिशय पापी है ॥ ७४९ ॥ उम्मग्गमुकपाओ, पडिओ सो सत्तमाओ भूमीओ। छुरियाइ उरे बिद्धो, मुक्को पाणेहिं पावृत्ति ७५० अर्ध-भय और उतावल के चशसे उन्मार्गमें चढ़ते पग डिगगया सातवीं भूमिसे गिरा अपने हाथमें रही भई छुरी या पापी है ऐसा करके मानो पेटमें प्रवेश करगई अर्थात् प्राणोंसे रहित भया ॥ ७५० ।। सो सत्तमभूमीओ, पटिओ पत्तो य सत्तमि भूमि । नरयस्स तारिसाणं, समत्थि ठाणं किमन्नत्थ ॥७५१॥ ,

भाषाटीका-
श्रीपाल-
चरितम्
सहितम्-
॥१५॥
अर्थ-वह धवल सातवीं भूमिसे गिरा और सातवीं नरक पृथ्वी याने सातमी नरक गया यह अर्थयुक्त है जिसकार-
णसे ऐसे दुष्टोंको सातमी नरकसे और कौन ठिकाना है अपि तु कोई नहीं ॥ ७५१॥
तं दटूण पभाए, लोओ चिंतेइ इमाइ चिट्ठाए। कुमरहणणत्थमेसो, नजइ आहाविओ नूणं ॥७५२॥
अर्थ-प्रभातमें लोक अपने हाथकी छुरीसे मराहुआ धवलको देखके विचारे निश्चय इस चेष्टासे धवल कुमरको
मारनेके लिए ऊपर चढा है और गिरके मरगया ॥ ७५२ ॥
अहह अहो अहमत्तं, एयस्स कुबेरसिट्ठिणो नूणं । जो उवयारिक्कपरे, कुमरेवि करेइ वहबुद्धिं ॥७५३
अर्थ-और क्या विचारे सो कहते हैं अहह इति खेदे अहो इति आश्चर्य इस कुबेरसेठका अधमत्व आश्चर्यकारी है।
कैसे सो कहते हैं निश्चय उपकार करने में तत्पर ऐसे कुमरपर यह दुष्ट मारनेकी बुद्धि करता है ॥ ७५३ ॥
एएणं पावेणं, जो दोहो चिंतिओ कुमारस्स । सो एयस्सवि पडिओ, अहो महप्पाण माहप्पं ७५४
अर्थ-इस पापी क्रूर धवलने जो कुमरका द्रोह विचारा वह इसीहीपर पड़ा और महापुरुषोंका माहात्म्य आश्चर्य-
कारी है ॥ ७५४ ॥
कुमरोवि हु तच्चरियं, चिंतंतो सोइऊण खणमिकं । काऊण पेयकिच्चं, दावेइ जलंजलिं तस्स ॥७५५॥
॥ ९५॥

अर्ध-कुमरभी धवलसेठका चरित आचार विचारता हुआ क्षणमात्र सोच करके उसका मृतककार्य अग्निसंस्का- रादि करके उसको जलांजलि दिलावे ।। ७५५ ॥ बरबुद्धिदाइणो जे, मित्ता धवलस्त आसि तिन्नेव । ते सवाइ सिरीए, कुमरेणहिगारिणो ठविया ॥७५६॥ अर्थ-प्रधानवुद्धिके देनेवाले धवलके तीनमित्रोंको कुमरने धवल सम्बन्धी सर्व लक्ष्मीका अधिकारीकिया ॥ ७५६ ॥ मयणानिगेण सहिओ, कुमरो तत्थ ट्ठिओ समाहीए। केवलसुहाइ भुंजइ, मुणिव्व गुत्तितयसमेओ ५७ अर्थ-तीन मदनासहित कुमर उस नगरमें समाधिसे रहा हुआ केवल सुख भोगवे किसके जैसा तीनगुप्ति मन, वचन, कायगुप्तिसहित जैसे मुनि सर्व सुख भोगवे वैसा यहभी ।। ७५७ ॥ अन्नदिणे सो कुमरो, रयवाडीए गओ सपरिवारो। पिच्छइ एगं सत्थं, उत्तरियं नयरउजाणे ॥७५८॥ अर्थ-अन्य दिनमें परिवारसहित कुमर राजवाड़ी गया हुआ नगरके उद्यानमें एक सथवाड़ा उतरा हुआ देखे ७५८ जो तत्थ सत्यवाहो, सोवि हु कुमरं समागयं द8 । चित्तूण भिणाइ, पणमइ पाए कुमारस्स ७५९ अर्थ-जो यहां सार्थवाह है वह कुमरको आया भया देखके भेटना लेके कुमरको नमस्कार किया याने भेट ना दिया ॥ ७५९।।

श्रीपाल.
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥ ९६॥
,
कुमरेण पुच्छिओसो, सत्थाहिव!आगओ तुमंकत्तो। पुरओवि कत्थ गच्छसि, किं कत्थवि दिवमच्छरियं
अर्थ-कुमरने सार्थवाहसे. पूछा हे सार्थपते तैं कहांसे आया है आगे कहां जाता है कहांभी कोई आश्चर्य जो
देखाहो तो कहो ॥ ७६० ॥
तो भणइ सत्थवाहो, कंतीनयरीओ आगओ अहयं । गच्छामि कंबुदीवं, निसुणसु अच्छेरयं एयं ७६१
अर्थ-तव सार्थवाह कहे मैं कंती नगरीसे आया हूं · कंबुद्धीप जाता हूं मार्गमें आश्चर्य देखा सो सुनो ॥ ७६१ ॥
इत्तो य जोयणसए, कुंडलनयरं समत्थि विक्खायं । तत्थत्थिः गुरुपयावो, राया सिरिमगरकेउत्ति ७६२
अर्थ-इस नगरसे सो योजन दूर प्रसिद्ध कुंडलपुर. नामका नगर है वहां महाप्रताप जिसका ऐसाथी मकरकेतु ना-
मका राजा है ॥ ७६२ ॥
तस्स कप्पूतिलया देवी कप्पूरविमलसीलगुणा, । तक्कुच्छिभवा सुंदर,-पुरंदरक्खा दुवे पुत्ता ॥७६३॥
अर्थ-उस राजाके कपूरतिलका नामकी रानी है कैसी है कपूरके जैसा निर्मल सीलगुण जिसका उसकी कुक्षिमें
उत्पत्ति जिन्होंकी ऐसें सुंदर पुरंदर नामके दो पुत्र है ॥ ७६३ ॥
ताण उवरिं च एगा, पुत्ती गुणसुंदरित्ति नामेणं । जा रूवेणं रंभा, बंभी य कला कलावेणं ॥७६४॥
,
।
॥९६॥

अर्थ-टन पुत्रोंके ऊपर एक गुणसुंदरी नामकी पुत्री है रूपलावण्य सौंदर्य करके वह कन्या रंभा देवाङ्गनाके तुल्य
है और कलाके समूहसे नाही सरस्वतीके तुल्य है ।। ७६४ ॥
तीए कया पइन्ना, जो मं वीणाकलाइ निजिणइ । सो चेव मज्झभत्ता, अन्नेहिं न किंपि मह कजं ७६५
अर्थ-उन कन्याने प्रतिज्ञा करी है जो पुरुष वीणा बजानेकी कलामें मेरेको जीते उसीको भर्तार करना और पुरुषसे
मेरे फुछ प्रयोजन नहीं ।। ७६५ ॥
तं सोऊणं पत्ता, तत्थ नरिंदाण नंदणाणेगे । वीणाए अन्भासं, कुणमाणा संति पइदिवसं ॥७६६ ॥
अर्थ-यह प्रतिज्ञा सुनके उस नगरमें बहुत राजपुत्र आए है निरंतर वीणाका अभ्यास करें हैं ॥ ७६६ ॥
मासे मासे तेसिं, होइ परिक्खा परं न केणावि । सा वीणाए जिप्पइ, पञ्चक्खसरस्सईतुल्ला ॥७६७॥
अर्थ-महीने २ में उन राजकुमरोंकी परीक्षा होवे है परन्तु किसी राजपुत्रने उसकन्याको वीणा बजानेमें नहीं जीती
की है कन्या साक्षात् सरस्वतीके तुल्य है ॥ ७६७ ।।
एगपरिक्खादिवसे, दिवा सा तत्थ देव अम्हेहिं । रमणीण सिरोरयणं, सा पुरिसाणं तुमं देव ७६८
अर्ध-एक परीक्षाके दिनमें वह राजपुत्री हमनेभी देखी परन्तु हम ऐसा जाने हैं हे देव हे महाराज सव स्त्रियोंके
शिरो रस यह कन्या है सब पुरोक शिरो रन आप हो ॥ ७६८ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥९७॥
अघटतोवि हु जइ कहवि, होइ दुन्हपि तुम्ह संजोगो। ता देव पयावइणो, एस पयासो हवइ सहलो ७६
अर्थ-यद्यपि नहीं संभवे है तुम्हारे दोनोंका सम्बन्ध तथापि कोई प्रकारसे सम्बन्ध होवे तव हे महाराज प्रजापति
विधाताका तुम दोनोंके रूप रचनेका प्रयास सफल होवे ॥ ७६९ ॥
तं सोऊणं कुमरो, सत्थाहिवइं पसत्थवत्थेहिं । पहिराविऊण संझा,-समए पत्तो नियावासं ॥७७०॥
अर्थ-वह पूर्वोक्त सुनके कुमर सार्थ पतिको प्रशस्त वस्त्र पहराके संध्या समय अपने आवास आए ॥ ७७० ॥
चिंतेइ तओ कुमरो, कह पिक्खिस्सं कुऊहलं एयं । अहवा नवपयझाणं, इत्थ पमाणं किमन्नेणं ॥७७१॥
अर्थ-तदनंतर कुमर विचारे यह कौतुक कैसे देखूगा अथवा इस कार्यमें अहंदादि नवपदोंका ध्यानही प्रधान है
और विचारसे क्या प्रयोजन है ॥ ७७१ ॥
इय चिंतिऊण सम्म, नवपयझाणं मणमिठावित्ता। तह झाइउं पवत्तो, कुमरो जह तक्खणा चेव ७७२
अर्थ-ऐसा विचारके सम्यक् नवपदोंका ध्यान मनमें स्थापके कुमर श्रीपाल उस प्रकारसे ध्यान करना सुरू किया
जिससे तत्कालही ॥ ७७२ ॥
सोहम्मकप्पवासी, देवो विमलेसरो समणुपत्तो । करकलिउत्तमहारो, कुमरं पड़ जंपइ एवं ॥७७३॥
॥ ९७ ॥

16-555 अर्ध-सौधर्मदेवलोकमें रहनेवाला विमलेश्वर नामका देव वहां आया हुआ कुमरसे इस प्रकारसे कहे कैसा है देव हाथमें प्रधान हार है जिसके ऐसा इस प्रकारसे कहे ॥ ७७३ ।। इच्छाकृतिव्योमगतिः कलासु, प्रौढिर्जयः सर्वविपापहारः । कंठस्थिते यत्र भवत्यवश्यं, कुमार! हारं तममुं ग्रहाण ॥ ७७४ ॥ अर्थ-हे कुमर तुम इस हारको ग्रहणकरो यह हार कंठमें रहनेसे यह पांच कार्य निश्चयसे होते है वही कहते है जैसी इच्छा करे वैसा रूप बनाये १ और आकाशमें गतिनाम गमन २ सर्वकलामें निपुणपना ३ शत्रुओंको जीतना ४ सर्व प्रकारके जहरका उतरना ५ ।। ७७४ ।। एवं वदन्नेव स सिद्धचका,-धिष्टायकः श्रीविमलेशदेवः । कुमारकंठे विनिवेश्य हारं जगाम धामाद्भुतमात्मधाम ॥ ७७५ ॥ अर्थ-वह श्रीसिचमका अधिष्ठायक श्रीविमलेश्वर नामका देव कुमरके कंठमें हारपहराके अपना धाम तेजसे मनुत ऐसा स्वग गया ॥ ७७५ ।। लण कुमारो, निञ्चितो मुत्तओ अह पभाए । उलुतोवि हु कुंडल,-पुर गमणं नियमणे कुणइ ७७६ तं

श्रीपाल-
चरितम्
॥ ९८॥
अर्थ-कुमर उस हारको पाके चिंता रहित होके सोता वाद प्रभातमें उठता हुआही कुंडलपुर जानेकी इच्छा करे ॥७७६॥भाषाटीका-
हारपभावेणं कय,-वामणरूवो गओ पुरे तत्थ । पासइ वीणाहत्थे, रायकुमारे ससिंगारे ॥ ७७७॥ सहितम्,
अर्थ-हारके प्रभावसे किया है वामनरूप जिसने ऐसा कुमर उस नगरमें गया हुआ वीणा है हाथमें जिन्होंके ऐसे
शंगारसहित राजकुमरोंको देखे ॥ ७७७ ॥
कुमरो वामणरूवो, राया कुमारे हिं सहगओ तत्थ । जत्थथि उवज्झाओ, वीणासत्थाई पाढंतो ७७८
अर्थ-कुमर वामनेका रूप किया हुआ और राजकुमारोंके साथ जहां वीणाशास्त्र पढ़ानेवाला उपाध्याय है वहां
गया।। ७७८ ॥
जह जह उवज्झायं पइ, वामणओ कहइ मंपि पाढेह । तह तह रायकुमारा, हसंति सत्वे हडहडत्ति ७७९
अर्थ-जैसे २ वामन उपाध्यायसे कहे मेरेकोभी पढ़ावो अर्थात् वीणा बजाना सिखावो वैसा २ सर्व राजकुमर हड
२ शब्द करके हसें ॥ ७७९ ॥
दहुँ अपाढयंतं, उवज्झायं झत्ति तस्स वामणओ । अप्पेइ हत्थखग्गं, हेलाए अइ महग्बंपि ॥ ७८० ॥
अर्थ-तव वामन उपाध्यायको नहीं पढ़ाता हुआ देखके बहुत कीमतका अपने हाथका खड्न लीलासे शीघ्र उपा-
ध्यायको देवे ॥ ७८०॥
॥ ९८॥

तो उवज्झाओ तं आयरेण, पुरओ निवेसइत्ताणं । अप्पेइ सिक्खणत्थं, नियवीणं तस्स हत्थंमि ७८१
अर्थ-तदनंतर उपाध्याय उस वामनेको आदरसे आगे बैठाके सिखानेके वास्ते अपनी वीणा उस वामनेके हाधमें
देवे ॥ ७८१॥
वामणओ तं वीणं, विवरीयत्वेण पाणिणा लिंतो। तंतिं वा तोडंतो फोडतो तुंवयं वावि ॥ ७८२ ॥
अर्थ-यामना उस वीणाको हाथसे विपरीतपने लेता हुआ तांत तोड़ता भया तूंचेको फोड़ता हुआ ॥ ७८२ ।।
सवेसि कुमराणं, हासरसं चेव वट्ठयंतोवि । केवलदाणवलेणं, अग्घइ उवज्झायपासंमि ॥ ७८३ ॥
अर्ध-सर्व राजकुमरोंके हास्य रस बढ़ाताहुआमी केवल दानके वलसे उपाध्यायके पास आदर योग्य होवे ॥७८३।।
सोवि परिक्खासमए, रक्खिज्जंतोवि तेहिं सोहि । कुंडलदाणवसेणं, कुमरिसहाए गओ झत्ति ॥७८४॥
अर्थ-वह वामनामी परीक्षा समयमें सवलोगोंके साथ अंदर प्रवेश करताथा द्वारपालने मने किया तव कुंडलदेके
शीघ्र कुमरीकी सभामें गया ॥ ७८४ ॥
तं कयइच्छास्वं, कुमरी पासेइ निरुवमसरूवं । अन्ने वामणरूवं, पासंति निवाइणो सवे ॥ ७८५ ॥
अर्थ-फिया र इच्छासे रूपजिसने ऐसा कुमरको कुमरी राजकन्या निरुपम उपमा रहित रूप जिसका ऐसा देखे
और राजादिक सबलोक वामनेका रूप देखे ॥ ७८५ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितमू.
॥ ९९ ॥
,
चिंतइ मणे कुमारी, मज्झ पइन्ना इमेण जइ पुन्ना । ताहं पुन्नपइन्ना, अप्पं भन्नेमि कयपुन्नं ॥७८६॥
अर्थ-तव कुमरी मनमें विचारे यह राजकुमर मेरी प्रतिज्ञा पूर्णकरे तो मैं अपने आत्माको कृत पुण्य जानु करा है
पुण्य जिसने ऐसा और मैं पूर्ण प्रतिज्ञ होजाऊं ॥ ७८६ ॥
जइ पुण मज्झ पइन्ना, इमिणावि न पूरिया अहन्नाए । ताहं विहियपइन्ना, सवैरिणी चेव संजाया ७८७
अर्थ-और जो इस पुरुषने भी मेरी प्रतिज्ञा नहीं पूर्णकरी तो अधन्या अकृत पुण्या मैंने करी प्रतिज्ञा वाही मेरी
वैरिणी भई अर्थात मैंही मेरी वैरिणी भई हूँ॥ ७८७ ॥
उवझायाएसेणं, तेहिं कुमारेहिं दसियं जाव । वीणाए कुसलतं, ताव कुमारीवि दंसेई ॥ ७८८ ॥
अर्थ-तदनंतर उपाध्यायकी आज्ञासे राजकुमरोंने वीणा बजानेकी कला दिखाई अर्थात् वीणा बजाई उतने कुमरी
ने भी अपनी वीणा बजानेका कुशलपना बताया ॥ ७८८ ॥
तीए कुमरिकलाए, संकुडियं सयलरायकुमराणं । वीणाए कुसलतं, चंदकलाइव कमलवणं ॥७८९॥
अर्थ-उस कुमरीकी कलासे सव राजकुमरोंकी वीणा. वजानेकी कला मुद्रित होगई जैसे चन्द्रमाकी कलासे कमलका
वन मुद्रित होवे है वैसा ॥ ७८९ ॥
,
॥९९॥

तं च कुमारीइ कलं, सयलोवि जणो पसंसए जाव । ताव कुमारो वामण,-रूवधरो वजरइ एवं ७९०
अर्थ-जितने उस कुमरीकी कलाकी सवलोक प्रशंसाकरे उतने वामनरूप धारनेवाला कुमर श्रीपाल इस प्रकारसे
कर ।। ७१० ॥
अहीं सुजाणो कुंडल,-पुरलोओ केरिसो इमो सहो। तो संकिया कुमारी, उवहसियं मन्नए अप्पं ७९१
अर्थ-कैसे कहे सो कहते हैं अहो इति आश्चर्य झंटी प्रशंसा करनेमें यह सब कुंडलपुरका लोग कैसे विचक्षण है
अर्थात् ज्ञानवान है पाद ऐसा कुमरका वचन सुनके कुमरी शंकित भई कुमरने मेरा हास्य किया ऐसा मानती भई ॥७९१॥
अप्पड़ नियं वीणं तस्स कुमारस्स रायधूयावि । कुमरोवि सारिऊणं, तं च असुद्धं कहइ एवं ॥७९२॥
पर्ध-तर राजकन्याभी उस कुमरको अपनी वीणा बजानेको देवे कुमरभी उस वीणाको सारके अशुद्ध कहे ॥७९२॥
तंनी सगभरुवा, गलगहियं तुंवयं च एयाए । दंडोवि अग्गिदटो, तेण असुद्धा मए कहिया ७९३
अर्थ-कसे मो करते है इस वीणाकी तंत्री सगर्भरूप जिसका ऐसी फटी भई हैं और तूंवा गले में लगा हुआ है और
एमका दंड अमिसे जला हुआ है इस लिये इस वीणाको मैने अशुद्ध कही ॥ ७९३ ।।
ते दंसिउण सम्म, आसारेऊण वायए जाय । ताव पसुत्तुष्व जणो, सदोवि अचेयणो जाओ ॥७९४॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका
सहितम
॥१०॥
अर्थतन्त्री वगैरह दोषोंको दिखाके अच्छी तरहसे स्वरावट मिलाके जितने कुमर वीणा बजावे उतने सब लोक
सोते होवें वैसा अचेतन भया ॥ ७९४ ॥
कस्सवि मुद्दारयणं, कस्सवि कडयं च कुंडलं मउडं । कस्सावि उत्तरीयं, गहिऊण कओय उक्करडो ७९५
अर्थ-तव कुमरने किसीका मुद्रारत्न किसीका कड़ा किसीका कुंडल किसीका दुपटा लेके ऊंचा ढिगला किया ॥७९५॥
अह जग्गियंमि लोए, अच्छरियं पासिऊण सा कुमरी । धन्ना पुन्नपइन्ना, वरइ कुमारं तिजयसारं ७९६
अर्थ-उसके अनन्तर लोकोंके जागनेसे कुमरी वह आश्चर्य देखके तीन जगत्में सार ऐसे श्रीपाल कुमरको वरे कैसी
है कुमरी धन्य है और पूर्ण भई है प्रतिज्ञा जिसकी ॥ ७९६ ॥
रायाईओ य जणो, जा चिंतइ वामणो हहा वरिओ। ताव कुमारो दंसइ, सहावरूवं नियं झत्ति ७९७
अर्थ-राजादिक लोक मनमें विचारे अहह इति खेदे वामनेको वरा उतने कुमर शीघ्र अपना मूलरूप दिखावे ७९७
आणंदिओ य राया, परिणावेऊण तेण नियधूयं । दावेइ हयगयाई, धणकंचणपूरियं भवणं ॥७९८॥
अर्थ-तब राजा हर्षित भया उस कुमरको अपनी पुत्रीका पाणिग्रहण करावे और घोड़ा हाथी वगैरह देवे धन
सोने वगैरहसे भरा हुआ घर देवे ॥ ७९८ ॥
॥१०॥

,
or
तत्य डिओ सिरिपालो, पुनविसालो महाभुयालोय । गुणसुंदरीसमेओ, निच्चपि करेइ लीलाओ ॥७९९॥
अर्थ-उस भवनमें रहा भया श्रीपालकुमार गुणसुंदरी अपनी स्त्रीसहित निरंतर लीलाक्रीडाकरे कैसा है श्रीपाल
पुण्य । विगाल नाम विस्तीर्ण जिसके और प्रचंड है भुजदंड जिसका ॥ ७९९ ।।
अन्नदिण नयराओ, रयवाडीए गएण कुमरेण । दिट्ठो एगो पहिओ, विसेसवत्तं च सो पुट्ठो॥८००॥
अर्थ-अन्यदिनमें कुमर नगरके बाहर राजवाड़ीमें गया वहां एक पथिक याने काशीदको देखा और विशेपवार्ता
पृठी ॥ ८०० ॥
सो भणइ देव कुंडिण,-पुराओ पट्टावणीइ पट्टविओ। नयरंमि पइट्टाणे, इभेण धणावहेणाहं ॥८०१॥
अर्थ-तब यह पथिक कहे हे देव धनाढ्य धनावह नामके सेठने मेरेको कुंडनपुर नगरसे प्रतिष्ठानपुर नगर दिनके
नियमसे भेजा है ।। ८०१ ॥
आगच्छंतेण मए, कंचणपुरनामयंमि नयरंमि । जं अच्छरियं दिटुं, पुरिसुत्तम! तं निसामेह ॥८०२॥
अर्थ-आते भए मैंने कांचनपुर नगरमें हे पुरुषोत्तम जो आश्चर्य देखा वह तुम सुनो ॥ ८०२ ।।
तत्थथि कंचणपुरे, राया सिरि वजसेणनामुत्ति तस्सस्थि पट्टदेवी कंचणमालत्ति विक्खाया ॥ ८०३॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका
सहितम्-
॥१०१॥
?
अर्थ -उस कांचनपुर नगरमें श्रीवज्रसेन नामके राजा हैं उन्होंके प्रसिद्ध कंचनमाला नामकी पटरानी है ॥ ८०३ ॥
तीए कुक्खिसमुब्भव, पुत्ता-चत्तारि संति सोंडीरा।जसधवल जसोहर, वयरसिंह गंधव नामाणो ८०४
अर्थ-कांचनमाला रानीकी कुक्षिसे उत्पत्ति जिन्होंकी ऐसे चार पुत्र हैं कैसे हैं ? पुत्रपराक्रमवंत हैं यशोधवल १
यशोधर २ वज्रसिंह ३ गंधर्व ४ यह नामके हैं ॥ ८०४ ॥
ताण उवरिं च एगा,-पुत्ती तियलुक्कसुंदरी अस्थि । तियलोएवि न अन्ना, जीए पडिछंदए कन्ना ५
अर्थ-उन पुत्रोंके ऊपर एक त्रैलोक्यसुंदरी नामकी पुत्री है जिस कन्या सरीखी तीन लोकमें कन्या नहीं है ॥८०५॥
तीए अणुरूववरं, अलहंतेणं च तेण नरवडणा । पारद्धो अस्थि तहिं, सयंवरामंडवो देव ॥ ८०६ ॥
अर्थ-उस कन्याके योग्य वर नहीं पाता हुआ राजाने हे देव उस नगरमें स्वयंवरा मंडप प्रारंभ किया है ॥ ८०६॥
तत्थथि सुविच्छिन्नो उत्तुंगो मूलमंडवो रम्मो। मणिकंचणथंभट्ठिय, पुत्तलिया-खोहियजणोहो ८०७
अर्थ-उस स्वयंवरा मंडपमें अतिशय विस्तीर्ण ऊंचा रमणीक मूलमंडप है और कैसा है रत्न सोनेमई स्तंभोमें पुत-
लियोंने क्षोभित किया है लोकोंका समूह जिसमें ऐसा ॥ ८०७ ॥
तत्तो चउपासेसुं, रइया कोऊहलेहिं परिकलिया। मंचाइमंचसेणी, सग्गविमाणावलि सरित्छा ८०८
--
,
॥१०१॥

4 अर्थ-उस मापसे चारों तरफ री भई कौतुक सहित मंचातिमंच श्रेणी है अर्थात् सिंहासनों किश्त्रेणी रची भई है जैसे देव लोकमें विमानाकी श्रेणी होवे वैसी ॥ ८०८ ॥ जे संति निमंतियनरवराण, पडिवत्तिगउरवनिमित्तं । तत्थ कणतिणसमूहा, ते गरुया गिरिवरहितो ८०९ अर्ध-उस प्रदेश में बुलाए भए राजाओंकी भक्ति के निमित्त अन्न और तृणसमूहका ढिगला पर्वतोसे भी बड़ा किया राजा है ।। ८०९॥ आसाट पढमपक्खे, बीयाए अस्थि तत्थ सुमुहुत्तो । कल्ले सा पुण वीया, मग्गो पुण जोयणे तीसं ८१० अर्ध-नापाद वदी दुजका उस नगर में विवाहका मुहूर्त है वह द्वितीया कल है और मार्ग यहांसे तीस योजन है ॥८१०॥ तं सोऊणं कुमरेण, तस्स पहियस्स दावियं झत्ति । नियतुरयकंठकंदल,-भूसणसोवन्नसंकलयं ॥८११॥ अर्ध----वह पथिकका वचन सुनके कुमरने उस पथिकको शीघ्र अपने घोड़ेके कंठका सोनेका कंदोला दिया ॥८११॥ कुमरा य नियावासं, पत्तो चिंतेइ पच्छिमनिसाए । काऊण खुज्जरूवं, तं पि हु गंतूण पिच्छामि ॥ ८१२ ॥ अर्थ-और कुमर अपने जावासमें आया और रात्रिक पश्चिम नहरमें विचारे कूबड़ेका रूपकरके वह स्वयंवर मंडप दएं ।। ८१२ ॥

श्रीपाल
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१०२॥
हारस्स पभावेणं, संपत्तो तत्थ खुजरूवेणं । पिच्छेइ रायचक्र, उवविटुं उच्चमंचेसु ॥ ८१३ ॥
अर्थ तदनंतर कुमर हारके प्रभावसे उस नगर के पासवर्ति स्वयंवर मंडपमें कुन्जरूप करके पहुंचा ऊंचे सिंहासनों
पर बैठे हुए राज समूहको देखे ॥ ८१३ ॥
कुमरोवि खुज्जरूवो, सयंवरामंडवंमि, पविसंतो। पडिहारेण निसिद्धो, देई तओ तस्स करकडयं ८१४
अर्थ-कुमरभी कूबड़ेके रूपवाला स्वयंवर मंडपमें प्रवेश करताथा तब द्वारपालने मना किया तदनंतर उस द्वार
पालको कडा दिया और अंदर प्रवेश किया ॥ ८१४ ॥
पत्तो य मूलमंडवथंभट्ठियपुत्तलीण पासंमि । चिट्ठेइ सुहं निसन्नो, कुमरो कयकित्तिमकुरूवो ॥८१५॥
अर्थ-और मूल मंडपके थंभोमें रही भई पूतलियोंके पासमें जाके सुखसे बैठा कैसा है कुमर किया है कृत्रिम
कुरूप जिसने ।। ८१५॥
तं उच्चपिट्ठिदेसं, संकुडियउरं च चिविडनासउडं । रासहदंतं तह उट्टहुट्ठयं, कविलकेससिरं ॥ ८१६ ॥
अर्थ-अब विशेष करके कृत्रिम रूपका वर्णन करते हैं उस कूबड़ेको देखके यहां सम्बन्ध है कैसा है कूबड़ा उंचा है
पीछेका भाग जिसका और संकुचित हृदय जिसका चीपडी नासिका गधेके जैसा दांत जिसका ऊंटके जैसा होठ जिसका
पीला केश मस्तकमें जिसके ॥ ८१६ ॥
॥१०२॥

पिंगलनयणं च पलोइऊण, लोया भणंति भो खुज्ज । कजेण केण पत्तो, तुमंति? तत्तो भणइ सोऽवि ८१७
अर्थ-और पीले नेत्र जिसके एस उस कृवड़ेको देखके लोक कहे अहो कुन्ज त किस कार्यके लिए यहां आया है
तर कुनड़ा कई क्या कह मो कहते है ॥ ८१७ ।।
जण कजण तुम्भ, सवे अच्छेह आगया इत्य। तेणं चिय कज्जेणं, अहयपि समागओ एसो ॥ ८१८ ॥
अर्थ-जिस कार्य के लिए तुम यहां आके रहे हो उसी प्रयोजनके वास्ते में भी आया हुं ॥ ८१८ ॥
हहहड हसंति संदे, अहो इमो एरिसो सरूबोवि। जइ न वरिस्सइ नरवर,-धूया तो सा कहं होही ॥१९॥
अर्थ-या कुन्नका वचन सुनके सब राजकुमरादिक हड २ शब्द करके हसे और इस प्रकारसे वोलेकि ऐसा स्वरूप
घाला ते है जो राजपुत्री तरेको नहीं वरेगी तो कैसा होगा ।। ८१९ ॥
इत्थंतरमि नरवरधूया, वरनरविमाणमारूढा । खीरोदगवरवत्था, मुत्ताहलनिम्मलाहरणा ॥ ८२०॥
अर्ध--एम अवसरमें उयल रवीरोदक प्रधान वस्त्र पहरे हैं जिसने मोतियोंके निर्मल हारादिआभरण पहरे हुए है
जिसने ऐसी राजकुमारी पालफीमें बैठके ॥ ८२० ॥
करकलियविमलमाला समागया मृलमंडवे जाव । ता सहसच्चिय कुमरं, सहावरूवं पलोएइ ॥८२१॥

श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका-
सहितम्.
।१०३॥
अर्थ-और हाथमें निर्मल वरमाला है जिसके ऐसी जितने मूलमंडपमें आई उतने अकस्मातही शीघ्र कुमरका
स्वाभाविक मूलरूप देखे ॥ ८२१ ॥
तं दट्टण पमुइयचित्ता, चिंतेइ सा निवइधूया ।रे मण ! आनंदेणं, वसु एयस्स लाभेणं (लंभेणं) ८२२
अर्थ-तब राजकन्या स्वाभाविक सुंदररूप है जिसका ऐसे श्रीपालकुमरको देखके हर्पित चित्त जिसका ऐसी विचारे
रे मन तैं इस वरके लाभसे आनंदमें वर्त अर्थात् आनंद युक्त रह ॥ ८२२ ॥
धन्ना कयपुन्नाऽहं, महंतभागोदओऽवि मह अत्थि। मह मणजलनिहिचंदो, जं एस समागओ कोऽविट२३
अर्थ-मैं धन्य हूं और किया है पुण्य जिसने ऐसी कृतपुण्य हूं मेरा भाग्योदयभी बड़ा है जिस कारणसे मेरा मन
रूप समुद्रको उल्लास करनेमें चन्द्रसदृश यह कोई पुरुष आया है ॥ ८२३ ॥
कुमरोवि तीइ दिढेि, दळूणं साणुराग सकडक्खं । दंसेइ खुज्झयपि हु अप्पाणं अंतरंतरियं ॥८२४॥
अर्थ-कुमरभी उस कन्याकी दृष्टि अनुराग सहित और कटाक्षयुक्त देखके वीचवीचमें अपना कूबड़ेका रूप दिखावे २४
इत्तोवि हु पडिहारी, जंजं वन्नेइ नरवरं तं तं । विक्खोडेइ कुमारी, रूववओदेसदोसेहिं ॥ ८२५ ॥
अर्थ-इधरसे प्रतिहारीणि स्त्री जिस २ राजाका वर्णन करे उस २ राजाको कुमरी रूप, उमर, देशके दोपोंसे
दूपितकरे इस राजाका रूप ठीक नहीं है इस राजाकी वय ठीक नहीं है इसका देश रमणीय नहीं है इत्यादि ॥ ८२५ ॥
,
-
॥१०३॥

,
जाजझ्या वन्निजइ,सो तइया होइ सरयससिवयणो।जो जइया हीलिज्जइ,सो तइया होइ साममुहो ८२६
अर्ध-जिसवक्त जिस राजाका वर्णन होवे तव उसराजाका शरदऋतुके चन्द्रमा जैसा मुख होवे और जव राज-
कुमरी जिस राजाकी रूपादिकसे हीलना करे तब वह राजा स्याममुख होवे अर्थात् उदास मुख होजाय ॥ ८२६ ॥
जापडिहारी थक्का, सयलं निवमंडलंपि वन्नित्ता। ताव कुमारी सप्पियं, खुजं पासेइ सविलक्खा ॥८२७॥
अर्थ-जितने प्रतिहारी सर्व राजमंडलका वर्णन करके मौन धारके रही उतने कुमरी स्वप्रिय कुजको देखे कुजको
देसक कसी भई जिसका मुख उदास भया ॥ ८२७॥
इत्यंतरंमि थंमट्टियाइ, वरपुत्तलीइ वयणमि । होऊण हारहिट्ठायग, देवो एरिसं भणइ ॥ ८२८ ॥
अर्थ-दम अवसरमें धंभे में रही भई पूतली के मुखमें प्रवेश करके हारका अधिष्ठायक देव ऐसा कहने लगा ॥८२८॥
यदि धन्यासि विज्ञासि, जानासि च गुणांतरं । तदैनं कुजकाकारं, वृणु वत्से नरोत्तमं ॥ ८२९ ॥
अर्थ-हे परसे हे पुत्री जो तै धन्य है वह विशेप जानने वाली है और गुणोंका अंतरभेद जाने है तो इस कुवडेका
आकारवाला इस पुरषोत्तमको वर पण अर्थात् भतार पणें अंगीकारकर ॥ ८२९ ॥
तं सोऊण कुमारी, वरेइ तं झत्ति कुजरूबंपि । कुमरो पुण सविसेसं, दंसेइ कुरूवमप्पाणं ॥ ८३०॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
।१०४॥
अर्थ-वह सुनके कुमरी शीघ्र कूवड़ेका रूप जिसका ऐसे कुमरको वरे और कुमर अपना विशेष करके लोकोंको
कुरूप दिखावे ॥ ८३० ॥
इत्थंतरंमि सबे, रायाणो अक्खिवंति तं खुजं । रे रे मुंचसु एयं, वरमालं अप्पणो कालं ॥ ८३१ ॥
अर्थ-इस अवसरमें सव राजा उस कूबड़ेपर आक्षेप करे कैसे सो कहते हैं रेरे कुब्ज इस वरमालाको छोड़ कैसी है
वरमाला यह तेरी काल रूप है ॥ ८३१॥
जइ किरि मुद्धा एसा, न मुणइ गुणागुणंपि पुरिसाणं। तहवि हु एरिस कन्नारयणं, खुजस्स न सहामो ८३२
अर्थ-जो वह मुग्धा भद्रक स्वभाववाली पुरुषोंका गुण औगुण नहीं जाने तथापि ऐसा कन्या रत्न कूबड़ेको
नहीं दे सकते हैं ॥ ८३२ ॥
ता झत्ति चयसु मालं, नो वा अम्हं करालकरवालो। एसो तुह गलनालं, लुणिही नूनं सवरमालं ॥८३३॥
अर्थ-इस कारणसे शीघ्र मालाको छोड़ जो नहीं छोड़ेगा तो हमारी तलवार वरमाला सहित तेरा मस्तक छेदेगी
अर्थात् वरमाला सहित तेरा मस्तक लेलेवेगी ॥ ८३३ ॥
हसिऊण भणइ खुजो, जइ किरि तुब्भे इभीइ नो वरिया। दोहग्गदट्ठदेहा, कीसन रूसेहता विहिणो८३४
अर्थ-तव कूबड़ा हसके कहे जो इस कन्याने तुमको नहीं वरा कैसे हो तुम दुर्भाग्यसे दूषित है शरीर जिन्होंका
॥१०४॥

एमे तुम हो तो अपने भाग्यपर कैसे नाराज नहीं होतेहो जिस दुर्भाग्यने तुमको दूपित किया मेरेपर नाराज क्यों होते
॥ ८३४ ॥
इन्हि पुण तुम्हाणं, परिस्थिअहिलासविहियपावाणं । सोहणखमं इमं मे, असिधारा तित्थमेवत्थि ॥८३५॥
अर्थ-इस बफमें परखीकी अभिलापासे किया हैं पाप जिन्होंने ऐसे तुमहो तुहारे पापकी शुद्धि करने में समर्थ यह
मेरे सदाफी धारा रूप तीर्थही है ॥ ८३५ ॥
इय भणिऊणं तेसिं, खुजेणं दंसिया तहा हत्था । जहते भीइविहत्था, सदेवि दिसोदिसिं नट्ठा ॥८३६॥
अर्थ-ऐसा कहके फूबने उन राजाओंको वैसा हाथ दिखाया कि वह तव राजा भयसे व्याकुल भए दिशो दिश
भाग गए ।। ८३६ ।।
खुजेण तेण तह कहवि, दंसिओ विक्कमो रणे तत्थ। जह रंजियचित्तेहिं, सरेहिं मुक्का कुसमवुट्ठी ॥८३७॥
अर्थ--उस कृषटेने यहां संग्राममें उस प्रकारसे ऐसा पराक्रम दिखाया कि जिससे प्रसन्नभया मनजिन्होंका ऐसे
देवाने फूब पर पुप्पोका वर्सात् किया ॥ ८३७ ॥
तं दणं सिरिवजसेण, रायावि रंजिओ भणइ।जह पयडियं वलं तह, रूवं पयडेसुवच्छ नियं ॥८३८॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्,
॥१०६॥
अर्थ-कुमरी उन सखियोंके आगे कहे जिनशासनमें रक्त अपने जो कोई जैनधर्मका जाननेवाला वर होवे तो
अच्छा होवे ॥ ८४६॥
जेणं वरो वरिजइ, मणनिबुइ कारणेण कन्नाहि, । सा पुण धम्मविरोहे, पइपत्तीणं कओ होई ॥८४७॥
अर्थ-जिस कारणसे कन्या मनमें सुखके वास्ते भार वरे है वह मानसिक सुख भर्तार और स्त्रीके धर्ममें विरोध
होनेसे कहांसे होवे प्रायः नहीं होवै हैं ।। ८४७ ॥
तमा अझेहि परिक्खिऊण, सम्म जिर्णिदधम्ममि, जो होइ निचलमणो, सो चेव वरो वरेयवो ८४८
अर्थ-इस कारणसे अपने अच्छी तरहसे परीक्षा करके जो पुरुष जिनधर्ममें निश्चल मनवालाहोवे वहही भार्तार
अंगीकार करना ॥ ८४८ ॥
भणियं च पंडियाए, सामिणि जुत्तं तए इमं वुत्तं । किंतु निरुत्तो भावो, परस्स नजइ कवित्तेण ॥८४९॥
अर्थ-तब पंडिता नामकी सखीबोली हे स्वामिनी आपने यह ठीक कहा परंतु और पुरषका निरुक्त अप्रकाशितभाव
अभिप्राय कवित्वसे जाना जाय है जैसा मनमें होवे वैसा कवित्वसे प्रगट होवे ॥ ८४९ ॥
ता काऊण समस्सा,-पयाइं सदिटिपूरिणिज्जाइं । अप्पेह जेहिं नजइ, सुहासुहो धम्मपरिणामो ॥ ८५० ॥
॥१०६॥

अर्च-तिस कारण सम्यक्ष्टि पूर्ण करनेको समर्थ होवे ऐसे समस्या पद बनाके देओ जिन्होंको पूर्ण करनेसे
शुभाशुभ धर्मका परिणाम जाना जाय ॥ ८५० ॥
तो ती कुमारीए, अस्थि पइन्ना कया इमा जो उ । चित्तगयसमस्साओ पूरिस्सइ सो वरेयवो ॥८५१॥
अर्थ-तदनंतर उनकुमरीने यह प्रतिज्ञा करी है कि जो मनोगत समस्या पूर्ण करेगा वह पुरप हमारे वरना ॥८५१॥
लोउण तं पसिद्धिं, समागयाणेगपंडिया पुरिसा। प्रति समस्साओ, परं न तीए मणगयाओ ॥८५२॥
अर्ध-उस प्रसिद्धिको मुनके अनेक पंडितपुरप आए भए समस्या पूर्ण करे है परंतु उस कन्याकी मनोगत समस्या
फोई पूर्ण करने को नहीं समर्थ भया है ॥ ८५२ ॥
एवं सा निवधृया, सुपंडियाईहिं पंचहिं सहीहि । सहिया चित्तपरिक्खं, कुणमाणा वदृइ जणाणं ॥८५३॥
अर्थ-न प्रकारसे वह राजपुत्री सुंदर विचक्षणा पंडितादि पांच सखियो सहित लोकोके चित्तकी परीक्षा करती
भई रहे है ।। ८५६ ॥
तं सोऊणं सबो, सहाजणो भणइ केरिसं चुकं । पूरिजंति समस्सा, किं केणवि परमणगयाओ ॥८५४॥
अर्थ-यह वचन सुनके सव सभाके लोग कहें अहो कैसा आश्चर्य है दूसरेके मनोगत समस्या क्या कोई पूर्ण कर
सफ॥ ८५४॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१०५॥
अर्थ-वह कूबडेका पराक्रम देखके श्रीवज्रसेन राजा रंजित भया कहे हे वत्स जैसा तुमने अपना बल प्रगट किया
वैसा अपना रूप प्रगट करो ॥ ८३८ ॥
तत्कालं च कुमार, सहावरूवं पलोइऊण निवो । परिणाविय नियधूयं, साणंदो देइ आवासं ॥८३९॥
अर्थ-तब राजा तत्काल मूल रूपयुक्त कुमरको देखके अपनी पुत्रीको परणाके आनंद सहित रहने के वास्ते प्रधान
प्रासाद देवे ॥ ८३९॥
तत्थ डिओ सिरिपालो, कुमरो तिलुक्कसुंदरी सहिओ। पावइ परमाणंदं, जीवो जह भावणासहिओ ८४०
अर्थ-वहां रहा हुआ त्रैलोक्यसुंदरी सहित श्रीपालकुमर परम आनंद पावे भावना सद्अध्यवसाय सहित जीव
परमानंद पावे वैसा ॥ ८४० ॥
अन्नदिणे कोइ चरो, रायसहाए समागओ भणइ। देवदलपट्टणंमी, अस्थि नरिंदो धरापालो ॥ ८४१॥
अर्थ-अन्यदिनमें कोई चर खबरदेनेवाला पुरुष राजसभामें आया कहे देवदल नाम पत्तनमें धरापाल नाम राजा
है ॥ ८४१॥
तस्सुत्तमरायाणं, पुत्तीओ राणियाउ चुलसीई । ताण मज्झमि पढमा, गुणमाला अस्थि सविवेया॥८४२॥
॥१०५॥

,
अर्थ-उस राजाके उत्तमराजाओंकी पुत्रियो ८४ चौरासी रानी है उन्हों में पहिली गुणमाला नामकी विशेष विवे-
कवती रानी है ।। ८४२ ॥
तीए य पंचपुत्ता, हिरण्णगभो य नेहलो जोहो । विजियारीय सुकन्नो, ताणुवरि पुत्तिया चेगा ॥८४३॥
अर्थ-उसरानीके पांच पुत्र हैं उन्होंका नाम कहते है हिरण्यगर्भ १ स्नेहल २ योध ३ विजितारी ४ सुकर्ण ५ इन
पांच पुत्रांक उपर एक पुत्री है ॥ ८४३ ।।
मा नामेणं सिंगार, सुंदरि सिंगारिणी तिलुक्कत्स । रूवकलागुणपुन्ना, तारुन्नालंकियसरीरा ॥ ८४४ ॥
अर्थ-उसका नाम भंगारमुंदरी है कहिं तीनलोकमे शृंगारशोभाकरनेवाली है और रूप कला गुणों करके पूर्ण है
यौवन अवस्थासे अलंकृत है शरीर जिसका ऐसी ॥ ८४४ ॥
तीए जिणधम्मरयाइ,पंडिया तहवियक्खणा पउणा। निउणा दक्खत्ति सहीण,पंचगं अस्थि जिणभत्तं८४५
अर्थ-जिन धर्ममें रक्त उम कन्याके पांच सखी है उन्होंका नाम कहते है पंडिता १ विचक्षणा २ प्रगुणा ३ निपुणा
४ दक्षा ५ फंसा है सखी पंचक तीर्थकरका भक्त है ॥ ८४५ ॥
ताणं पुरो कुमारी, भणेइ अह्माणजिणमयरयाणं । जइकोइ होइ जिणमय-, विऊ वरो तो वरं होई ॥८४६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१०६॥
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अर्थ-कुमरी उन सखियोंके आगे कहे जिनशासनमें रक्त अपने जो कोई जैनधर्मका जाननेवाला वर होवे तो
अच्छा होवे ॥ ८४६॥
जेणं वरो वरिजइ, मणनिवुइ कारणेण कन्नाहि, । सा पुण धम्मविरोहे, पइपत्तीणं कओ होई ॥८४७॥
अर्थ-जिस कारणसे कन्या मनमें सुखके वास्ते भर्तार वरे है वह मानसिक सुख भर्तार और स्त्रीके धर्ममें विरोध
होनेसे कहांसे होवे प्रायः नहीं होवै हैं ॥ ८४७ ॥
तमा अझेहि परिक्खिऊण, सम्म जिणिंदधम्ममि, जो होइ निचलमणो, सो चेव वरो वरेयवो ८४८
अर्थ-इस कारणसे अपने अच्छी तरहसे परीक्षा करके जो पुरुष जिनधर्ममें निश्चल मनवालाहोवे वहही भाार
अंगीकार करना ॥ ८४८॥
भणियं च पंडियाए, सामिणि जुत्तं तए इमं वुत्तं । किंतु निरुत्तो भावो, परस्स नजइ कवित्तेण ॥८४९॥
अर्थ-तव पंडिता नामकी सखीबोली हे स्वामिनी आपने यह ठीक कहा परंतु और पुरषका निरुक्त अप्रकाशितभाव
अभिप्राय कवित्वसे जाना जाय है जैसा मनमें होवे वैसा कवित्वसे प्रगट होवे ॥ ८४९ ॥
ता काऊण समस्सा,-पयाइं सदिटिपूरिणिज्जाइं । अप्पेह जेहिं नजइ, सुहासुहो धम्मपरिणामो ॥ ८५० ॥
॥१०६॥

अर्थ-तिस कारणसे सम्यकदृष्टि पूर्ण करनेको समर्थ होवे ऐसे समस्या पद बनाके देओ जिन्होंको पूर्ण करनेसे
शुभाशुभ धर्मका परिणाम जाना जाय ॥ ८५० ॥
तो नीइ कुमारीए, अस्थि पइन्ना कया इमा जो उ । चित्तगयसमस्साओ पूरिस्सइ सो वरेयवो ॥८५१॥
अर्थ-तदनंतर उनकुमरीने यह प्रतिज्ञा करी है कि जो मनोगत समस्या पूर्ण करेगा वह पुरप हमारे वरना ॥८५१॥
सोऊण तं पसिद्धिं, समागयाणेगपंडिया पुरिसा । पूरंति समस्साओ, परं न तीए मणगयाओ ॥८५२॥
अर्थ-~-उस प्रसिद्धिको सुनके अनेक पंडितपुरप आए भए समस्या पूर्ण करे है परंतु उस कन्याकी मनोगत समस्या
कोई पूर्ण करनेको नहीं समर्थ भया है ।। ८५२ ॥
एवं सा निवधृया, सुपंडियाईहिं पंचहिं सहीहिं । सहिया चित्तपरिक्खं, कुणमाणा वइ जणाणं ॥८५३॥
अर्ध-स प्रकारसे वह राजपुत्री मुंदर विचक्षणा पंडितादि पांच सखियो सहित लोकोके चित्तकी परीक्षा करती
भई रहे है ॥ ८५३ ॥
तं सोऊणं सबो, सहाजणो भणइ केरिसं चुजं। पूरिजंति समस्सा, किं केणवि परमणगयाओ ॥८५४॥
अर्थ-यर वचन मुनफे सब सभाके लोग कहें अहो कैसा आश्चर्य है दूसरेके मनोगत समस्या क्या कोई पूर्ण कर
सके है ॥ ८५८ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१०८॥
,
अरिहंताईनवपय, नियमणु धरइ जु कोइ । निच्छइ तसु नरसेहरह, मणुवंच्छियफलहोई ॥ ८६३ ॥
अर्थ-अहंदादि नवपदोंको जो कोई अपने मनमें धारण करे निश्चय उस नरशेखरके मनो वांछित फल होवे ॥८६॥
तओ वियक्खणा पढेइ, अवर म झंखहु आल, तओ कुमरकरपवित्तो, पुत्रलओ पूरेइ । अरहंतदेव
सुसाधु गुरु, धम्म तु दयाविसाल, मंतुत्तमनवकारपर, अवर म झंखहु आल ॥ ८६४ ॥
अर्थ-तव विचक्षणा नामकी दूसरी सखी कहे अवरम झंख हु आल यह दूसरा समस्या पद तव कुमरके हाथसे पवित्र
भया पूतला समस्या पूर्ण करे सो कहते हैं अरिहंत देव सुसाधु गुरु दयासे विशाल धर्म मंत्रोमें उत्तम नवकार मंत्र यह
देवगुरुधर्ममंत्र प्रधान है इस कारणसे इन्होंको सेवो और सर्व अनर्थक वस्तु अंगीकार मत करो ॥ ८६४ ॥
तओ पउणा पढेइ, करि सफलउं अप्पाणु, पुत्तलओ पूरेइ, आराहिय धुरि देवगुरु, देहि सुपत्तिहिं
दाणु, तवसंजमउवयार करि, करि सफल अप्पाणु ॥ ८६५ ॥
अर्थ-तब प्रगुणा तीसरी सखी कहे करि सफलु अप्पाणु यह तीसरा समस्या पद तव पूतला पूर्ण करे धुरि नाम
आदिमें देव वीतराग गुरू सुसाधु इन्होंकी सेवा करके सुपात्रको दानदेवो और तप संयम उपकार करके आत्माको
सफल करो ॥ ८६५ ॥
,
॥१०८॥

तओं निउणा पढेई, जित्तउं लिहिउं विलाडि, पुत्तलओ भणेइ, अरि मन अप्पिउं खंचि धरि, चिंता जालि म पाडि, फलु तित्तिउं परिपामीयइ, जित्तरं लिहिउं निलाडि ॥ ८६६ ॥ सर्व-नब निपुणा चौथी सी कहे (जित्तर लिहिओ लिलाडि) यह चौधा समस्या पद पूतला कहे अरे मन तें भागाको सींचके धार चिंता जालमें मतगिरा फलतो उतनाही मिलेगा जितना कर्मरूप लिलाटमें लिखा हुआहे ॥८६६॥ नमो दक्खा पढेइ, तमु तिहुयण जण दासु, तओ पुत्तलओ भणेई, अस्थि भवंतरसंचिउं। पुन्न समग्गलजानु, तमु वल तनु मइ तसु सिरिय, तसु तिहुअणजण दासु ॥ ८६७ ॥ अर्थ -तव दक्षा नामकी पांचमी सखी कहे (तमु तिहु अणजण दासु) यह पांचवां समस्या पद तव पूतला कहे जिस पुग्यफे भवान्तरमें सचित जादा पुण्य है उस पुण्यके वलसें पराक्रम और बुद्धि लक्ष्मी और शोभा होवे है और तीन भुवनका लोक दास होवे है ।। ८६७ ॥ दगुण तं समस्सा,-पूरणमइविझिया कुमारीवि । आणंदपुलइअंगी, वरइ कुमारं तिजयसारं ॥ ८६८ ॥ अर्थ-यह समस्या पूर्ण भई देसके कुमरी अत्यंत आश्चर्य पाई इसीकारणसे आणंद हर्पकेवससे रोमोद्गमयुक्त अंग भिसका गली कु.मरको परे कैसा है कुमर तीन जगतमें सारभूत है ।। ८६८ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१०७॥
तं सोऊण कुमारो, धणियं संजायमणचमुक्कारो । पत्तो नियावासं, पुणो पभायंमि चिंतेइ ॥ ८५५ ॥
अर्थ-वह वचन सुनके अत्यन्त मनमें चमत्कार भया ऐसा कुमर अपने आवास गया रात्रि व्यतिक्रान्त करके
प्रभातमें विचारे क्या विचारे सो कहते हैं ॥ ८५५ ॥
हारस्स पभावेणं, मह गमणं होउ पट्टणे तत्थ । जत्थरिथ रायकन्ना, विहियपइन्ना समस्साहिं ॥८५६॥
अर्थ-हारके प्रभावसे वहां देवदलपतन में मेरा गमन होवो जिस नगरमें राजकन्याने समस्यापूर्णकी प्रतिज्ञाकी
है ॥ ८५६॥
पत्तोय तक्खणं चिय, सहावरूवेण मंडवे तत्थ । जत्थरिथ रायपुत्ती, संयुत्ता पंचहिं सहीहि ॥ ८५७॥
अर्थ-वाद कुमर तत्कालही स्वाभाविक रूपसे उस मंडपमें प्राप्त हुआ जिस मंडपमें ५ सखी सहित राजपुत्री है ॥८५७॥
दळूण तं कुमारं, मारोवमरूवमसमलायन्नं । नरवरधूयावि खणं, विझियचित्ता विचिंतेइ ॥ ८५८॥
अर्थ-कामके जैसी उपमा जिसको ऐसा रूप जिसका इसी कारणसे अतुल्य लावण्य जिसका ऐसे कुमरको देखके
राजपुत्रीभी क्षणमात्र आश्चर्य युक्त चित्त जिसका ऐसी विचारे क्या विचारे सो कहते हैं ॥ ८५८ ॥
जइ कहवि हु एस मणोगयाउ, पूरेइ मह समस्साओ। ताहं तिन्नपइन्ना, हवेमि धन्ना सुकयपुन्ना ॥८५९॥
॥१०७॥

अर्थ-निश्चय यह पुरुप जो कोई प्रकारसे मेरी मनोगत समस्या पूर्ण करे तव में पारपाया प्रतिज्ञाका जिसने ऐसी धन्य मृतपुण्य होऊ ॥ ८५९ ।। पुच्छह तो कुमारो, कहह समस्सापयाइं निययाइं।तो कुमरिसंन्निया, पंडियावि पढमं पयं पढइ ८६० अर्थ-तदनंतर कुमर पूछे तुम अपना समस्या पद कहो तब कुमरीने संज्ञा किया ऐसी पंडितासखी एक समस्या पद पद ॥ ८६०॥ मणुवंच्छिय फलहोइ, एसा सहीमुहेणं, जं कहइ समस्सापयं तयं मएणावि, पूरेयवं केणवि, पुत्तलयमुहेण हेलाण ॥ ८६१ ॥ अर्ध-कौनसा समस्या पदसो कहते है मणुवंच्छिय फलहोइ यह पहला समस्या पद है यह समस्यापद सखीके गुसे सुनके फुमर विचारे यह राजकन्या सखी के मुखसे समस्या पद कह्वाती है वह में कोई पूतलेके मुखसे समस्या पद पूर्ण करा ॥ ८६१॥ इय चिंनिउण पासट्ठियस्स, थंभस्ल, पुत्तलयसीसे, कुमरेण करो दिन्नो, ता पुत्तलओ भणइ एवं ॥८६२॥ अर्थ-पला विचारके कुमरने पास के थंभे में रहा हुआ पूतला उसके मस्तकपर हाथ रक्खा तव पूतला ऐसा वोला ॥८६२॥ .

G
श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१०८॥
अरिहंताईनवपय, नियमणु धरइ जु कोइ । निच्छइ तसु नरसेहरह, मणुवंच्छियफलहोई ॥ ८६३॥
अर्थ-अहंदादि नवपदोंको जो कोई अपने मनमें धारण करे निश्चय उस नरशेखरके मनो वांछित फल होवे ॥८६॥
तओ वियक्खणा पढेइ, अवर म झंखहु आल, तओ कुमरकरपवित्तो, पुत्रलओ रेइ । अरहंतदेव
सुसाधु गुरु, धम्म तु दयाविसाल, मंतुत्तमनवकारपर, अवर म झंखहु आल ॥ ८६४ ॥
अर्थ -तव विचक्षणा नामकी दूसरी सखी कहे अवरम झंख हु आल यह दूसरा समस्या पद तब कुमरके हाथसे पवित्र
भया पूतला समस्या पूर्ण करे सो कहते हैं अरिहंत देव सुसाधु गुरु दयासे विशाल धर्म मंत्रोमें उत्तम नवकार मंत्र यह
देवगुरुधर्ममंत्र प्रधान है इस कारणसे इन्होंको सेवो और सर्व अनर्थक वस्तु अंगीकार मत करो ॥ ८६४ ॥
तओ पउणा पढेइ, करि सफलउं अप्पाणु, पुत्तलओ पूरेइ, आराहिय धुरि देवगुरु, देहि सुपत्तिहिं
दाणु, तवसंजमउवयार करि, करि सफलउं अप्पाणु ॥ ८६५ ॥
अर्थ-तब प्रगुणा तीसरी सखी कहे करि सफलु अप्पाणु यह तीसरा समस्या पद तव पूतला पूर्ण करे धुरि नाम
आदिमें देव वीतराग गुरू सुसाधु इन्होंकी सेवा करके सुपात्रको दानदेवो और तप संयम उपकार करके आत्माको
सफल करो ॥ ८६५॥
,
॥१०८॥

. तओ निउणा पटेई, जित्तरं लिहिउं विलाडि, पुत्तलओ भणेइ, अरि मन अप्पिउं खंचि धरि,- चिंता जालिम पाडि, फलु तित्तिउं परिपामीयइ, जित्तउं लिहिउं निलाडि ॥ ८६६ ॥ अर्थ-तब निपुणा चौथी सखी कहे (जित्तर लिहिओ लिलाडि) यह चौथा समस्या पद पूतला कहे अरे मन आमाको खींचके धार चिंता जालमें मतगिरा फलतो उतनाही मिलेगा जितना कर्मरूप लिलाटमें लिखा हुआहै ॥८६६॥ नो दक्खा पटेइ, तमु तिहुयण जण दासु, तओ पुत्तलओ भणेई, अत्थि भवंतरसंचिउं। पुन्न समन्गलजानु, तसु वल तसु मइ तसु सिरिय, तसु तिहुअणजण दासु ॥ ८६७ ॥ अर्थ-तब दक्षा नामकी पांचमी सखी कहे (तमु तिहु अणजण दासु) यह पांचवां समस्या पद तव पूतला कहे जिस पुरपके भवान्तरमें सचित जादा पुण्य हे उस पुण्यके वलस पराक्रम और बुद्धि लक्ष्मी और शोभा होवे है और तीन भुवनका लोक दाम होये है ।। ८६७ ॥ दट्टण तं समस्सा,-पूरणमइविमिया कुमारीवि । आणंदपुलइअंगी, वरइ कुमारं तिजयसारं ॥ ८६८ ॥ अर्थ-यह समस्या पूर्ण भई देखके कुमरी अत्यंत आश्चर्य पाई इसीकारणसे आणंद हर्पकेवससे रोमोद्गमयुक अंग जिसका ऐसी चुमरको वरे फसा है कुमर तीन जगतमें सारभूत है ॥ ८६८ ॥ sran.. SAX

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१०९॥
रायपमुहोवि लोओ, भणइ अहो चुज्जमेगमेयंति । जं पूरिजंति मणोगयाउ, एवं समस्साओ ॥ ८६९ ॥
अर्थ-राजा प्रमुख लोक इस प्रकारसे कहे अहो यह एक बड़ा आश्चर्य है कि औरोंकी मनोगत समस्या इस प्रका-
रसे पूर्ण करे ॥ ८६९॥
जं च इमं सकरेणं, पुत्तलयमुहेण पूरणं ताणं । तं लोउत्तरचरियं, कुमरस्स करेइ अच्छरियं ॥८७०॥
अर्थ-जो अपने हाथके स्पर्शसे पूतलेके मुखसे समस्याका पूर्ण कराना वह कुमरका लोकोत्तर चरित है सर्व लोकोंसे
प्रधान चरित आश्चर्य उत्पन्न करे है ॥ ८७० ॥
राया नियधूयाए, तीए पंचहि सहीहिं सहियाए । कारेइ वित्थेरण, पाणिग्गहणं कुमारेणं ॥ ८७१ ॥
अर्थ-राजा पांच सखियों सहित अपनी पुत्रीका विस्तारविधिसे पाणि ग्रहण करावे ॥ ८७१ ॥
इत्थंतरंमि एगो भट्टो, दद्दूण कुमरमाहप्पं, पभणेइ उच्चसदं, भो भो निसुणेह मह वयणं ॥ ८७२ ॥
अर्थ-इस अवसरमें एक भट्ट कुमरका माहात्म्य देखके ऊंचे शब्दसे कहे कि अहो २ लोको मेरा वचन सुनो ॥८७२॥
कुल्लागपुरे नयरे, अस्थि नरिंदो पुरंदरो नाम । तस्सत्थि पट्टदेवी, विजयानामेण सुपसिद्धा ॥ ८७३ ॥
अर्थ-कुल्लागपुर नगरमें पुरंदर नामका राजा है उस राजाके विजयानामकी अतिशय प्रसिद्ध पटरानी है ॥ ८७३ ॥
॥१०९॥

1-51 १ हरिविकमनरविक्कम,-हरिसिरिसेणाइसत्तपुत्ताणं, उवरिंमि अत्थि एगा, पुत्ती जयसुंदरीनामा ॥८७॥ अर्ध-हरिविक्रम १ नरविक्रम २ हरिसेण ३ सिरिसेणादि ४ सातपुत्रोंके ऊपर एक जयसुंदरीनाम की कन्या है ॥८७४॥ तीए कलाकलावं, रूवं सोहग्गलडहलावन्नं । दट्टण भणइ राया, कोणु इमीए वरो जुग्गो ॥ ८७५ ॥ अर्थ-~-उस कन्याका कलाका समूह और रूप आकृति सौभाग्यसे सुंदर लावण्य देखके राजा कहे इस कन्याके योग्य भतार कौन होगा ॥ ८७५ ॥ तो तीए उवज्झाओ भणइ महाराय तुज्झ पुत्तीए । सयलकलासत्थाइ, अवगाहंतीइ एयाए ॥८७६॥ अर्थ-~-तब उस कन्याका उपाध्याय राजासे कहे हे महाराज सर्व कला शास्त्रका अभ्यास करती इस आपकी पुत्रीने शख कला प्रस्तावसे || ८७६ ॥ सत्यप्पत्थावपत्तं, राहावेयस्स साहणसरुवं । विणएण अहं पुट्ठो, कहियं च तयं मए एवं ॥ ८७७ ॥ अर्थ-शाच कलाके अधिकारसे प्राप्त भया राधावेधसाधनका खरूप विनयसे मेरेसे पूछा मैंने राधा वेधसाधनका स्वरूप इस प्रकारसे कहा ।। ८७७ ॥ मंदिनंते थंभदियट्टा-चकाइं जंतजोगेणं । सिट्टिविसिट्टिकमेणं, एगंतरियं भमंताई ॥ ८७८ ॥ .

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥११०॥
AMA
अर्थ-थंभेमें रहे हुए आठचक्र रचे जावें यन्त्रके जोगसे सृष्टि विसृष्टि क्रमसे एकके अंतरसे भ्रमणकरे एकसीधा फिरे
दूसरा उलटा फिरे ॥ ८७८ ॥
चक्कारयविवरोवरि, राहानामेण कटुपुत्तलिया। ठविया हवेइ तीए, वामच्छी किज्जए लक्खं ॥ ८७९ ॥
अर्थ-चक्रोंका अरोंमें जो छिद्र है उन्होंके ऊपर राधानामकी एक पूतली थापी होवे है उसका डावा नेत्रका लक्ष
लेके वेध किया जावे ॥ ८७९ ॥
हिट्ठियतिल्लकडाहयंमि, पडिबिंबलद्धलक्खेणं, उड्दुसरेण नरेणं, तीए वेहो विहेयवो ॥ ८८० ॥
अर्थ-नीचे रक्खा हुआ जो तेलका कडाव उसमें पड़ा हुआ जो राधाका प्रतिबिंब उससे पाया लक्षका वेध जो
मनुष्य वाणकों ऊंचा खांचके राधाके डावे नेत्रका वेध करे वह राधावेध कहा जावे ॥८८० ॥
सो पुण केणवि विरलेण, चेव विनाय धणुहवेएण । उत्तमनरेण किजइं, जं गिज्जइ एरिसं लोए ॥८८१॥
अर्थ-और वह राधावेध कोई विरला उत्तम पुरुष करे है जिसने धनुर्वेद अच्छी तरहसे जाना होवे वही राधावेध
साध सके है । जिस कारणसे लोकमें ऐसा कहा जावे है ॥ ८८१ ॥
विणयंता चेव गुणा, संतंतरसा किया उ भावंता। कवं च नाडयंतं, राहावेहंतमीसत्थं ॥ ८८२ ॥
अर्थ-विनय अंतमें जिन्होंके ऐसे गुण हैं सर्व गुणोंमें विनयहीका प्राधान्य है तथा रसोंमें शान्तरस प्राधान्य है
॥११०॥

और देव दर्शनादि क्रियायोंमें भावशुद्ध अध्यवसायही प्रधान है काव्यमें नाटकही प्रधान है इसी तरह शस्त्र कलामें
राधाबंधही प्रधान है ।। ८८२ ।।
तं सोउणमिमीए, नरवर! तुह नंदणाइ सहसत्ति। बहुलोयाण समक्खं, इमा पइन्ना कया अत्थि॥८८३॥
अर्थ-यह राधावेधका स्वरूप सुनके हे महाराज इस आपकी पुत्रीने अकस्मात वहुत लोकोंके सामने यह प्रतिज्ञा
किया है सो कहते है ।। ८८३ ॥
जो किर महदिट्ठीए, राहावेहं करिस्सए कोवि । तं चेव निच्छएणं, अहं वरिस्सामि नररयणं ॥ ८८४ ॥
अर्ध-जो कोई पुरुप मेरी दृष्टिके सामने राधावेध करेगा उसी नररलको में भर्तार पने अंगीकार करूंगी ॥ ८८४ ॥
एयाइ पइन्नाए, नजइ पुरिसोत्तमस्स कस्सावि । नूणं इमा भविस्सइ, पत्ती धन्ना सुकयपुन्ना ॥ ८८५॥
अर्थ-इस प्रतिज्ञा करके जाना जावे है यह आपकी पुत्री कोई पुरपोत्तम उत्तम पुरुपकी स्त्री होगी कैसी है यह
धन्य है गत पुण्य है ।। ८८५ ॥
ता तुभवि नरेसर !, एवं चिंतं चएवि वेगेण । कारेह वित्थरेणं, राहावेयस्स सामगि ॥ ८८६ ॥
अर्थदन कारणसे हे नरेश्वर यह पूर्वोक चिंताको छोड़के शीघ्र राधावेधकी सामग्री विस्तारसे करावो ॥ ८८६ ॥
तं च तहा मंडाविय, रन्नावि निमंतिया नरिंदाय । परमिकेणवि केणवि, राहावेहो न सो विहिओ॥८८७॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥१११॥ अर्थ-वह राधावेधकी सामग्री उसी प्रकारसे करवाके राजानेभी और राजाओंको बुलाया है और बहुत राजा आए हैं परन्तु एकने भी राधावेध नहीं किया है ॥ ८८७ ॥ सो विहु जइ होइ अणेण, चेव कुमरेण गुरुपभावेण।नो अन्नेणं केणवि, होही सो निच्छओ एसो॥८८८॥ अर्थ-निश्चय जो वह राधावेधभी होवे तो इसी कुमरसे होवे बड़ा है प्रभाव जिसका ऐसा यह कुमर है और कोई पुरुससे नहीं होगा ऐसा निश्चय है ॥ ८८८ ॥ एवं कहिऊण नियट्टियस्स, भट्टस्य कुंडलं दाउं। कुमरो वि सपरिवारो, निवदत्तावासमणुपत्तो॥ ८८९ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे कहके निवृत्त हुआ भट्टको कुंडल देके कुमरभी ख्यादि परिवार सहित राजाका दिया हुआ आवासमें प्राप्त भया ॥ ८८९ ॥ तत्थ ढिओ तं रयणिं, रमणीगणरमणरंगरसवसओ। पञ्चूसे पुण पत्तो, कुल्लागपुरे तहच्चेव ॥ ८९० ॥ अर्थ-स्त्रियोंका जो समूह उसके साथजो क्रीड़ा करना उसमें जो राग वह ही रसकास्वाद उसके वश सबरात्रि वहां रहा प्रभातमें उसी प्रकारसे हारके प्रभावसे कुल्लागपुर पहुंचा ॥ ८९० ॥ उवविडेय नरिंदे, मिलिए लोए कुमरिदिट्ठीए । कुमरेण कओ राहा,-वेहो हारप्पभावेणं ॥ ८९१ ॥ ॥१११॥ , , * अर्थ-राजा लोक बैठे है और सवलोक जहां मिले हैं जिस मंडपमें वहां कुमरश्रीपालने कुमरीके सामने हारके प्रभावस राधावेध किया ॥ ८९१ ॥ वरिओ तीए जइमुंदरीवि, कुमरो पमोयपुन्नाए । नरनाहोवि हु महया,-महेण कारेइ वीवाहं ॥ ८९२॥ अर्थ-आनन्दसे पूर्णभई ऐसी जयमुंदरी कन्याने कुमरको वरा राजाभी बहुत उत्सबसे विवाह कराया ॥ ८९२॥ नरवइदिन्नावासे, सुक्खनिवासे रहेइ जा कुमरो।ता माउलनिवपुरिसा, तस्साणयणत्थमणुपत्ता ॥ ८९३ ॥ अर्ध-सुरसकारी निवास जिसमें ऐसा राजाके दिए हुए प्रासादमें जितने कुमर रहे उतने मामा राजा वसुपालका पुरुप मेयक पुमरको बुलाने के वास्ते आया ॥ ८९३ ।। कुमरो नियरमणीणं, आणयणत्यं च पेसए पुरीसे। ताओवि सुंदरीओ, सवन्धुसहियाउ पत्ताओ ।। ८९४॥ अर्ध-गुमर अपनी स्त्रियोको बुलाने के वास्त पुरुपोंको भेजे वह खियों भी अपने २ भाईयोके साथ वहां आई ८९४ मिलियं च तत्थ सिन्नं, हयगयरहसुहडसंकुलं गरुयं । तेण समेओ कुमरो, पत्तो ठाणाभिहाणपुरं ।।८९५॥ अर्ध-और यहां बहुत सेना इकट्टी भई घोड़ा हाथी रथ प्यादलोंसे व्याप्त उस सेनासहित कुमर थाणा नगर आणंदिओय माउल,-राया तस्सुत्तमं सिरिदटुं। सुंदरि चउकसहियं, दहण पइं च मयणाओ॥८९६॥ भाया।। ८१५ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥११२॥
अर्थ-और मातुल (मामा) राजा वसुपाल कुमरकी उत्तमलक्ष्मी देखके आनन्द प्राप्त भया और मदनसेनादि कुम-
रकी तीन स्त्रीयों चार सुंदरी सहित अपने भर्तारको देखके आनन्द सहित भई ॥ ८९६ ॥
तत्तो माउलयनिवो, अणेगनरनाहसंजुओ कुमरं। सिरिसिरिपालं थप्पइ, रज्जे अभिसेयविहिपुत्वं ॥८९७॥
अर्थ-तदनंतर मामा वसुपालराजा अनेक राजाओं करके सहित श्री श्रीपाल कुमरको अभिषेकविधि पूर्वक राज्यमें
स्थापे ॥ ८९७॥
सीहासणे निविट्ठो, वरहारकिरीडकुंडलाहरणो। वरचमरछत्तपमुहेहिं, राय-चिन्हेहिं कयसोहो॥ ८९८ ॥
अर्थ-राज्याभिषेकके अनन्तर जैसा राजा भया सो कहेते हैं सिंहासनपर बैठा भया प्रधान हार मुकट कुंडल
वगैरहः पहरनेको जिसके और प्रधान चामर छत्र प्रमुख राजचिन्हों करके करी शोभा जीसकी ऐसा ॥ ८९८ ॥
सिरिसिरिपालोराया, नरवरसामंतमंतिपमुहेहिं । पणमिज्जइ बहु हयगय,-मणिमुत्तियपाहुडकरहिं ८९९
अर्थ-श्रीपालराजाको राजा 'सामंत' मंत्री प्रमुख आके नमस्कार करें कैसे राजा वगैरह घोड़ा हाथी मणि वैडूर्यादि
रत्न मुक्ताफल वगैरह भेटना है हाथमें जिन्होके ऐसे ॥ ८९९ ।।
पवहणसिरिसमेओ, असंखचउरंगसिन्नपरिकरिओ।
चल्लइ सिरिपालनिवो, नियजणणीपायनमणत्थं ॥ ९०० ॥
M
॥११२॥

55-15 अर्थ-जहाजांकी लक्ष्मी करके सहित नहीं विद्यमान संख्या जिसकी ऐसा असंख्य जो चतुरंग हाथी, घोड़ा रथ प्यादट रूप सन्य करके सहित श्रीपालराजा अपनी माताके चरणोंमें नमस्कार करनेके लिए चले ॥ ९०० ॥ सो विहु आगच्छंतो, ठाणे ठाणे नरिंदविंदेहिं । वहुविहभिट्टणएहिं, भिहिज्जइ लद्धमाणेहिं ॥ ९०१ ॥ अर्थ-श्रीपालराजा मार्गमें चलता हुआ ठिकाने २ नृपसमूह करके अनेक प्रकारके भेटनों से भेटा जावे कैसे राज- समूट पाया है सन्मान जिन्होंने ॥ ९०१॥ सोपारयमि नयरे, संपत्तो तत्थ परिसरमहीए । आवासिओ ससिन्नो, सो सिरिपालो महीपालो ॥९०२॥ अर्ध-ऐसे प्रयाण करते हुए क्रमसे सोपारक नाम नगर प्राप्त भया वहां नगरके पासकी भूमीमें श्रीपालराजा सेना- महित निवास किया ।। ९०२ ॥ पुच्छइ पहाणपुरिसे, जं सोपारयनिवो न दंसेइ । भत्तिं वा सत्तिं वा, तं नाऊणं कहह तुरियं ॥९०३॥ अर्थ-तदनंतर श्रीपालराजा प्रधान पुरुषोंसे पूछे सो पारक नगरका राजा भक्ति प्रसन्नता अथवा सक्तिसामर्थ्य फसे नहीं दिखाये है यह जानके शीघ्र कहो ॥ ९०३ ॥ नाऊण तेहिं कहियं, नरनाहो नाम इत्थ अत्थि महसेणो। ताराय तस्स देवी, तकुच्छि समुद्भवा एगा९०४ श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥११३॥ अर्थ-उन प्रधान पुरुषोंने वह स्वरूप जानके राजाके आगे कहा हे महाराज इस नगरमें महासेन नामका राजा है उस राजाके तारा नामकी रानी है और उन्होंके तिलक सुंदरी नामकी पुत्री है ॥ ९०४ ॥ तिजयसिरितिलयभूया, धूया सिरितिलयसुंदरीनामा।अज्जेव कहवि दुटेण, दीहपितॄण सा दट्ठा ॥९०५॥ अर्थ-कैसी है तिलकसुंदरी तीन लोककी लक्ष्मीके ललाटमें तिलक सदृश ऐसी तिलकसुंदरी कन्याको आजही कोई प्रकारसे दुष्ट सर्पने डसी है ॥ ९०५ ॥ विहिया वहुप्पयारा,उवयारामंतओसहि मणीहिं । तहविन तीए सामिय?,कोवि हुजाओगुणविसेसो९०६ अर्थ-मत्र औषधी मणियों करके बहुत उपचार किया तथापि हे स्वामिन् उस कन्याके निश्चय कोई गुण विशेष नहीं भया ॥९०६॥ तेण महादुक्खेणं पीडियहियओ नरेसरो सोउ । नो आगओत्थि इत्थं, अपसाओ नेव कायवो ९०७ अर्थ-उस महादुःखसे पीडित हृदय जिसका ऐसा वह राजा नहीं आया है यहां अप्रसन्नता नहीं करनी ॥ ९०७ ॥ राया भणेइ सा कत्थ, अत्थि दंसेह मज्झ झत्ति तयं । जेणं किज्जइ कोवि हु, उवयारो तीइ कन्नाए ९०८ अर्थ-तव राजा श्रीपाल कहे कन्या कहां है शीघ्र मेरेको दिखाओ जिससे उस कन्याका उपाय जहर दूर करनेका किया जाय ॥ ९०८॥ ॥११३॥ . ।

:-- . एवं चेव भणतो, नरनाहो तुरयरयणमारुहिउं। जा जाइ पुराभिमुह, ता दिट्ठो वहुजणसमूहो ॥९०९॥ अर्थ- इस प्रकारसे कहता हुआ राजा श्रीपाल घोड़ेपर सवार होके जितने नगरके सामने जावे उतने नगरके वाहर बहुत लोकोंका समूह देखा ॥ ९०९ ॥ नायं च नरवरेणं, नृणं सा आणिया मसाणंमि। तहवि हु पिच्छामि तयं, मा हु जियंती कहवि हुन्जा॥९१०॥ अर्थ--और राजाने जाना निश्चय वह कन्या इमसानमें लाई भई दीखे है तथापि उस कन्याको देखू कदाचित् जीवता न होये ।। ९१० ।। एवं च चिंतयंतो, पत्तो सहसत्ति तत्थ नरनाहो। पभणेइ इक्कवारं, मह दंसह झत्ति तं दटुं ॥ ९११ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे विचारता हुआ राजा अकस्मात शीघ्र वहां प्राप्त भया हुआ कहे अहों लोको सर्पकी इसी भई कन्याको एक वक्त शीघ्र दिखाओ ।। ९११ ॥ भणियं च तेहिं नरवर ?, किं दसिज्जइ मयाइ वालाए।अम्हाणं सबस्सं, अवहरियं अज्ज हयविहिणा ९१२ अर्थ-उन लोकोंने कहा हे महाराज मरी भई कन्याको क्या दिखावें हत इति खेदे आज विधि देवने हमारा सर- वस्व हरण कर लिया ॥ ९१२ ॥ राया भणेइ भोभो, अहिदट्ठा मुच्छिया मयसरिच्छा।दीसंति तहवि तेसिं, जहा तहा दिज्जइ न दाहो ९१३ -

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
थी ११४॥
,
अर्थ-राजा कहे अहो लोको सर्पके डसे हुए। पुरुष भूञ्छित होके मरे हुए सदृश दीखते हैं तथापि उन सर्पके उसे
हुए पुरुषोंको जैसे तैसे दाह देना नहीं ॥ ९१३ ॥
तो तेहिं दंसिया सा, चियासमीवंमि महियले मुक्का । कंठट्ठियहारेणं, रन्ना करवारिणा सित्ता॥ ९१४ ॥
अर्थ-तदनंतर उन पुरुषोंने चिताकेपासकी भूमिपर रक्खी भई कन्याको दिखाई तव कंठस्थित हारके प्रभावसे
राजा श्रीपालने हाथमें जल लेकर छांटा ॥ ९१४ ॥
तकालं सा वाला, सुत्तविबुद्धत्व उठ्ठिया झत्ति । विम्हियमणाय जंपइ, ताय किमेसो जणसमूहो ९१५
अर्थ-तत्काल वह कन्या सोती भई जगे बैसी तत्काल उठी और आश्चर्य युक्तमन जिसका ऐसी शीघ्रबोली है
पिताजी इन लोकोंका समूह क्यों इकट्ठा भया हैं ॥ ९१५ ॥
महसेणो साणंदो, पभणइ वच्छे तुमं कओ आसि । जइ एस महाराओ नागच्छिज्जा कयपसाओ ९१६
अर्थ-तब महसेन राजा आनंद सहित कहे हे पुत्रि जो यह महाराज यहां नहीं आते तो तें कहां थी कैसे हैं यह
महाराज किया है अनुग्रह जिन्होंने ॥ ९१६ ॥
एएणं चिय दिन्ना, तुहपाणा अज परमपुरिसेण । जेण चियाओ उत्तारिऊण, उट्ठावियासि तुमं ९१७
अर्थ-इसी परम पुरुषने आज तेरेको प्राण दिया जिसने चितासे उतारकर तेरेको उठाई ॥ ९१७ ॥
॥११४॥

तो तीए साणंद, दिट्ठो सो समणसायरससंको । सिरिपालो भूवालो, सिणद्धमुद्धेहिं नयणेहिं ॥९१८॥ अर्ध-तदनंतर उस राजकन्याने आनन्द हपं सहित श्रीपाल राजाको स्निग्ध मुग्ध स्नेह सहित रमणीक नेत्रोंसे देखा कमा श्रीपालराजा अपने मनरूप समुद्र के उल्हास करनेमें चन्द्र के जैसाजैसे चन्द्रोदयसे समुद्र उल्लास पावे है वैसा ॥९१८॥ महसणी भणइ निवं, अम्हं तुम्हेहिं जीवियं दिन्नं । तो जीवयाओ अहियं, एयं गिन्हेह तुझेवि ९१९ अर्थ-पाद महसनराजा श्रीपाल राजासे कहे आपने हमको जीवित दिया है तिस कारणसे हमारे प्राणोंसे भी अधिक प्यारी इस मेरी पुत्रीको महणकरो॥ ९१९ ॥ इय भणिऊणं रन्ना, नियकन्ना तस्स रायरायस्स । दिन्ना सा तेणावि हु, परिणीया झत्ति तत्व. ९२० अर्थ-एमा कहके महसेन राजाने श्रीपाल महाराजको अपनी कन्यादी श्रीपाल महाराजनेभी शीघ्र उसी ठिकाने इस कन्याका पाणिग्रहण किया ॥९२० ॥ तीए यतिलयसुंदरी, सहियाओताओअमिलियाओसिरिपालस्स पियाओ,मणोहराओपरंतहवि९२१ अर्थ-तिलक मुंदरी सहित मनोहर सब लोगोंका मनहरनेवाली श्रीपालराजाकों आठरानी मिली तथापि श्रीपाल राजा नवी मिया मदनमुंदरीको याद करे ॥ ९२१ ।।

-SG श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥११५॥ जह अट्ठदिसाहिं अलंकिओवि, मेरू सरेइ उदयसिरिं।जह बंछइ जिणभत्ति, अडग्गमहिसीजुओविहरी॥ अर्थ-कौन किसके जैसा आठ पूर्वादि दिशा करके अलंकृत शोभित मेरु सूर्योदय लक्ष्मीको याद करे है और जैसे आठ इन्द्रानियों सहितभी इन्द्र नवमी जिन भक्तिकी वांछा करे है ॥ ९२२ ॥ अवि अट्ठदिद्विसहिओ, जहा सुदिट्ठी समीहए विरई। साहू जहट्ठपवयण,-माइजुओवि हु सरइ समयं ९२३ अर्थ-और जैसे आठ दृष्टि मित्रा १ तारा २ वला ३ प्रदीपा ४ स्थिरा ५ कान्ता ६ प्रभा ७ परा ८ सहितभी सम्यक् दृष्टि आत्मा विरति सावद्ययोग त्याग रूपकी इच्छा करे है आठ दृष्टिका स्वरूप योगदृष्टि समुच्चय ग्रंथसे जानना और जैसे आठ प्रवचन माता समिति ५ गुप्ति ३ सहितभी साधु निश्चय समता समभावरूपका स्मरण करे ॥९२३ ॥ जह जोई अट्ठमहासिद्धि,-समिद्धोवि ईहए मुत्तिं। तह झायइ पढमपियं, सो अटुपियाइं सहिओवि ९२४ अर्थ-और जैसे योगी ज्ञान, दर्शन चारित्रात्मक योगयुक्त पुरुष आठ महा सिद्धि अणिमादिक करके समृद्धभी नवमी मुक्तिकी इच्छा करे है उसी प्रकारसे श्रीपालराजा आठ स्त्रियों सहितभी पहली स्त्री मदनसुंदरीका निरंतर हृद्- यमें स्मरण करे ॥ ९२४॥ तो, तीए उकंठियचित्तो, जणणीइ नमणपवणो य । सो सिरिपालो राया, पयाणढकाओ दावेइ ॥९२५॥ ॥११५॥ .

अर्ध-तदनंतर मदनसुन्दरीके साथ मिलनेमें उत्कंठित मन जिसका और माताके चरणोंमें नमस्कार करनेमें तत्पर श्रीपालराजा सोपारक पत्तनसे प्रयाण भेरी दिलाने ॥ ९२५ ॥ मग्गे हयगयरहभड, कन्नामणिरयणसत्थवत्थेहि, । भिहिजइ सो राया, पए पए नरवरिंदेहिं ॥९२६॥ अर्थ-वह श्रीपालराजा मागमें ठिकाने २ राजाओ करके भेटनोसे भेटा जावे है हाथी घोड़ा रथ प्यादल कन्या मणि चन्द्रकान्तादि रतमाणिकादि शस्त्र, वस्त्र वगैरहः भेटना राजालोक लाके देते है ॥ ९२६ ।। एवं ठाणे ठाणे, सो बहुसेणाविवद्वियवलोहो । महिवीढे नइवद्विय, नीरो उयहिब वित्थरइ ॥९२७॥ अर्थ-इन प्रकारसे श्रीपालराजा टिकाने २ वहुत सेना करके वढाहै सैन्य समूह जिसके ऐसा पृथ्वीपीठपर विस्तार पाये जैसा नदियों करके बढ़ा हुआ समुद्रका जल वैसा श्रीपालराजाका कटक पृथ्वीपर विस्तार पाया ॥ ९२७ ॥ मरहट्टय सोरट्टय, सलाडमेवाडपमुहभूवाले । साहंतो सिरिपालो, मालवदेसं समणुपत्तो ॥ ९२८ ॥ अर्थ-महाराष्ट्र सोरटलाट देशहित मेदपाट प्रमुखदेश विशेपके राजाओंको स्वाधीन करता हुआ मालवदेशमें पहुंचा ९२८ तं परचकागमणं, लोऊणं चरमुहाओ अइगरुयं । सहसत्ति मालविंदो, भयभीओ होइ गढसज्जो॥९२९॥ अर्थ-मालय देशका राजा प्रजापाल घर पुरुपके मुखसे वहुत बड़ा परसन्यका आगमन सुनके अकस्मात भयभीत मागद तय्यार करके रहा ॥ ९२९ ॥ ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥११६॥
कप्पड चुप्पडकणतिण, जलइंधण संगहाय किजंति । सजिजंतिय जंता, तह सजिजंति वरसुहडा ९३०
अर्थ-तथा वस्त्र और घृतादि धान्य घास जल इन्धनवगैरहका संग्रहः किया जावे है और यन्त्र शतघ्नी वगैरह
तय्यार किए जावें प्रधान सुभटोंकी प्रशंसा करी जावे ॥ ९३० ॥
एवं सा उज्जेणी, नयरी बहुजणगणेहिं संकिन्ना,। परिवेढिया समंता, तेणं सिरिपालसिन्नेणं ॥९३१॥
अर्थ-इस प्रकारसे वह उज्जैनी नगरी बहुत लोकोंके समूहसे सांकरी भई और श्रीपालकी सेनासे चौतर्फ बीटी गई
अर्थात् श्रीपालकीसेना नगरीके वाहर चौतर्फ वीटके उतरी ॥ ९३१ ॥
आवासिएय सिन्ने, रयणीए पढमजामसमयंमि । हारपभावेण सयं, राया जणणीगिहं पत्तो॥९३२॥
अर्थ-सेनाका उतारा कियोंके बाद रात्रिके पहले प्रहरमें श्रीपालराजा हारके प्रभावसे माताके घर गया ॥ ९३२ ॥
आवासदुवारि ठिओ, सिरिपालनरेसरो सुणइ ताव, । कमलप्पभा पयंपइ, बहुयं पइ एरिसंवयणं ॥९३३॥
अर्थ-श्रीपालराजा माताके घरके दरवजेके बाहर खड़ा हुआ जितने सुने उतने कमल प्रभा माता मदनसुंदरी बहूसे
ऐसा वचन कहे ॥ ९३३ ॥
वच्छे परचक्केणं, नयरी परिवेढिया समतेणं। हल्लोहलिओ लोओ, किं किं होही न याणामि ॥९३४॥
॥११६॥

1-5 अर्ध-कसा वचन कहे सो कहते है हे वत्से परसेनासे नगरी चौतर्फ वीटी भई है सवलोक व्याकुल भए हैं अब क्या २ छोगासो नहीं जानृ ॥ ९३४ ॥ वच्छस्स तस्स देसंतरंमि, पत्तस्स वच्छरं जायं। वच्छे कावि न लभइ, अज्जवि सुद्धी तुह पियस्स ॥९३५॥ अर्थ-यह मेरा पुत्र देशान्तर गयाहै उसको एक वर्ष भया है हे पुत्री अवतक तेरे भर्तारकी सुद्धीभी नहीं मिली अर्थात् विल्युट समाचार नहीं आया है ॥ ९३५ ॥ पभणइ नओ मयणा, मा मा मा माइ किंपि कुणसु भयं । नवपयझाणमि मणे, ठियंमि जं हुंति न भयाइं॥ अर्थ-तदनंतर मदनसुंदरी प्रकर्षपनेकह हे माताजी मनमें कुछ भय करो मत जिस कारणसे नवपदोंका ध्यान मनमें रहने भय नहीं होये है ॥ ९३६ ॥ जं अजंचिय संज्झा, समए मह जिणवरिंदपडिमाओ। पूयंतीए जाओ, कोइ अपुत्वो सुहो भावो ९३७ अर्ध-और आजही सध्या समयमें तीर्थकरकी पूजा करते मेरे जो कोई अपूर्व शुभभाव अध्यवसाय उत्पन्न भयो ३७ तेणं चिय अजवि मह मणमि, नो माइ माइ आणंदो। निकारणं सरीरे, खणे खणे होइ रोमंचो॥९३८॥ अर्थ-तिस कारणसेही हे माताजी अबतकभी मेरे मनमें आनन्द हर्प नहीं मावे है तथा क्षण २ में शरीरमें विना- कारणही रोमोझम होये है अर्थात् रोमराजा विकस्वरमान होवे है ॥ ९३८ ।।

भापाटीका
सहितम्.
श्रीपाल-
चरितम्
॥११७॥
अन्नं च मज्झ वामं, नयणं वामो पओहरो चेव । तह फंदइ जह मन्ने, अज्जेव मिलेइ तुह पुत्तो॥९३९॥
अर्थ-औरभी मेरा डावा नेत्र और डावा स्तन वैसा फरके हैं जैसे आजही आपका पुत्र मिलैगें ऐसा मानती हूं ॥९३९॥
तं सोउणं कमलप्पभावि, आणंदिया भणइ जाव । वच्छे सुलक्षणा तुह,-जीहा एयं हवउ एवं ॥९४०॥
अर्थ-वह वचन सुनके कमलप्रभामाता आणंदसहित चित्त जिसका ऐसी जितने कहे हे वत्से तेरी जिव्हा सुल-
क्षणी है यह इसी तरह होवो ॥ ९४०॥
ताव सिरिपालराया, पियाइ धम्ममि निच्चलमणाए । नाऊण सच्चवयणं, बारं बारंति जंपेइ ॥ ९४१॥
अर्थ-उतने श्रीपालराजा धर्ममें निश्चल मन जिसका ऐसी अपनी स्त्रीका सत्यवचन जानके द्वारं २ दरवजा खोलो
दरवजा खोलो ऐसा कहे ॥ ९४१ ॥
कलमप्पभा पयंपइ, नूणमिणं मज्झ पुत्तवयणंति। मयणावि भणइ जिणमय, वयणाइं किमन्नहा हुंति॥
अर्थ-तव कमलप्रभा राजाकी माता कहे निश्चय यह मेरे पुत्रके वचन हैं तव मदनसुंदरीभी कहे जैनधर्मकी सेवा
करनेवालोंका वचन क्या झूठा होवे है अपितु नहीं होवे है ॥ ९४२ ॥
उग्घाडियं दुवारं, सिरिपालो नमइ जणणि पयजुयलं । दइयं चविणयपउणं, संभासइ परमपिम्मेणं.९४३
॥११७॥

अर्थ-तदनंतर दरवजा उघाड़ा श्रीपालराजा माताके चरणों में नमस्कार करे और विनय करनेमें तत्पर प्रिया मदन मुंदरीके साथ परमप्रेमसे भापणकरे ॥ ९४३ आरोविउण खंधे, जणणि दइयं च लेवि हत्थेण । हारप्पभावउच्चिय, पत्तो नियगुटुरावासं ॥ ९४४ ॥ अर्ध-तदनंतर श्रीपालराजा माताको कांधपर बैठाके स्त्रीको हाथमें लेके हारके प्रभावसे अपने तंवूमें आए ॥९४४॥ तत्थय जणणि पणमितु, नरवरो भद्दासणे सुहनिसन्नं।पभणेइ माय तुह,-पयपसायजणियं फलं एयं९४५ अर्थ -- यहां तंबमें राजा श्रीपाल भद्रासनपर बैठी हुई माताको नमस्कार करके कहे हे माताजी तुम्हारे चरणों के प्रमादरे उत्पन्न भया यह फल है ।। ९४५ ॥ पणमंति तओ ताओ, अट्ट पहुहाओ ससासुयाइ पए। अवि मयणसुंदरीए, जिट्टाए निययभइणीए ॥ तदनंतर नाट पुत्रकी याने श्रीपालराजाकी रानियों सासुके चरणोंमें नमस्कार करें तथा बड़ी वहिन मदन मुंदरी, चरणों में नमस्कार करें ॥ ९४६ ॥ अभिणंदियाओ ताओ, ताहि आणंदपूरियमणाहिं । सबोवि हु वुत्तंतो मयणमंजूसाइ कहिओ य॥९४७॥ अर्थ-उन मासु और मदनसुंदरीने आशीर्वाद देके आनंदसहित करी कैसी है श्रीपालकी माता कमलप्रभा और मदनमुंदरी जानंदसे पूरित है मन जिन्होंका ऐसी और मदनमंजूसा विद्याधर राजाकी पुत्रीने सर्ववृत्तान्त कहा ॥ ९४७ ।। , भाषाटीका- सहितम्. श्रीपाल- चरितम् ११८॥ , तासिं च नवन्हपि हु, वत्थालंकारसारपरिवारं । देई निवो साणंदो, इकिकं नाडयं चेव ॥ ९४८ ॥ अर्थ-तब श्रीपालराजा आनंद सहित नवरानियोंको प्रधान बस्न अलंकार और सार परिवार देवे और एक २ नाटक देवे ॥ ९४८॥ पुट्ठा जिट्टा मयणा, तुह जणयंपि हु कहं अणावेमि। तीए वुत्तं सो एउ, कंठपीठट्ठिय कुहाडो॥९४९॥ अर्थ-तब राजा बड़ी रानी मदन सुंदरीसे पूछा तुम्हारे पिताको किस प्रकारसे बुलाऊं तव मदनसुंदरी बोली हे स्वामिन् वह मेरे पिता कंठपर कुहाड़ा जिसके ऐसे होके आओ ॥ ९४९ ॥ तंच तहा दूयमुहेण, तस्स रन्नो कहावियं जाव। ताव कुविओ य मालवराया मंतीहिं भणिओ य॥९५०॥ अर्थ-वह वचन उसी प्रकारसे दूतके मुखसे प्रजापाल राजाको जितने कहवाया उतने मालवराजा क्रोधातुर हुआ तव मंत्रियोंने कहा ॥ ९५० ॥ सामिय असमाणेणं, समं विरोहो न किजए कहवि।ता तुरियं चिय किजओ,वयणं दूयस्स भणियमिणं ॥ अर्थ-हे स्वामिन् अपनेसे अधिकके साथ विरोध नहीं करना कोई प्रकारसे इसलिए शीघ्र यह दूतका कहा हुआ वचन करो ॥ ९५१॥ ॥११८॥ १ .

n काउणं च कुहाई, कंटे राया पभायसमयंमि । मंतिसामंतसहिओ, जा पत्तो गुदुरदुबारे ॥ ९५२ ॥ अर्ध-तदनंतर प्रभात समयमें कांधेपर कुहाड़ा रखके मंत्री सामंतों सहित राजा जितने तंबूके दरवाजे आया ॥९५२॥ ताव सिरिपालरन्ना, मोयावेऊण तं गलकुहाडं । पहिराविऊण वत्था,-लंकारे सारपरिवारो ॥ ९५३ ॥ अर्ध-उतने श्रीपाल राजाने कांधका कुहाडा दूर करवाके प्रधानवस्त्र आभूषण पहराके सारपरिवार सहित ॥९५३॥ आणारिओ य मझे,दिने य वरासणमि उवविट्ठो, सो पयपालो राया, मयणाए एरिसं भणिओ ९५४ अर्थ-तंबूम बुलाया प्रधान आसन बैठनेको दिया तव सिंहासनपर बैठा हुआ प्रजापाल राजाको मदनसुंदरीने ऐसा अमन कहा ।। ९५४ ॥ ताय तए जो तइया,मह कम्मसमप्पिओवरो कहिओ। तेणज्ज तुह गलाओ, कुहाडओ फेडिओएसो ९५५ अर्य-क्या कहा मो कहते है पिताजी आपने मेरे पाणिग्रहणके समयमें मेरा कर्मलाया ऐसा वर कहाथा उस मेरे भारने आज आपके कांधसे फुहाड़ा दूर कराया अर्थात् मालवका राज्य आपको दिया ॥ ९५५ ॥ तो विह्मिओ य मालवराया, जामाउयपि पणमेई। पभणेइ असामि तुम, महप्पभावोवि नो नाओ ९५६ श्रीपाल- रितम् भाषाटीका- सहितम्. अर्थ-तव आश्चर्य पाया हुआ मालवराजा प्रजापाल जमाई श्रीपालको नमस्कार करे और कहे हे स्वामिन् महा प्रभाव जिसका ऐसा मैंने आपको नहीं जानाथा ॥ ९५६ ॥ सिरिपालोवि नरिंदो, पभणइ न हु एस मह प्पभावोत्ति। किंतु गुरुवइट्ठाणं, एस पसाओ नवपयाणं ९५७ अर्थ-श्रीपालराजा कहे यह मेरा प्रभाव नहीं है किंतु गुरूके कहे हुए नवपदोंका यह प्रभाव है ॥ ९५७ ॥ सोऊण तमच्छरियं, तत्थेव समागओ समग्गोवि । सोहग्गसुंदरी-रुप्पसुंदरीपमुहपरिवारो ॥ ९५८ ॥ अर्थ-वह आश्चर्य सुनके सौभाग्यसुंदरी रूपसुंदरी प्रमुख सर्व परिवार वहांही पर मंडपमें आया ॥ ९५८ ॥ मिलिए य सयणवग्गे आणंदभरेय वहमाणे य । सिरिपालेणं रन्ना, नाडयकरणं समाइडें ॥ ९५९ ॥ अर्थ-अथ स्वजन सम्बन्धियोंका समूह मिलनेसे अधिक आनंद होनेसे श्रीपाल राजाने नाटक करनेकी आज्ञादी॥९५९॥ तो झत्ति पढमनाडय, पेडयमाणंदियं समुढेइ । परमिक्का मूलनडी, बहुपि भणिया न उठेइ ॥९६०॥ अर्थ-तदनंतर शीघ्र प्रथम नाटकके पेड़ेका वृन्द याने समूह वाला हर्पित चित्त जिन्होंका ऐसे उठे परन्तु एक मूल नटवी बहुत कहा तौभी नहीं उठी ॥९६० ॥ कह कहवि पेरिऊणं, जाव समुहाविया निरुच्छाहा । तो तीए सविसायं, दूहयमेगं इमं पढियं ॥९६१॥ - , ॥११९ ॥ ।

अर्थ-गया है उत्साह जिसका ऐसी निरुत्साह मूल नटयीको कोई प्रकारसे प्रेरणा करके जितने उठाई उतने उस मृल गटयर्याने दुःसहित यह एक दोहा नामका छंद कहा ।। ९६१॥ कहिं मालब कहिं संखउरि, कहिं वबरु कहिं नह। सुरसुंदरि नचावियइ दइविहिं दलवि मर१ ॥९६२ ॥ अर्थ-पाहां मालव नामका देश जहां जन्म भया कहां शंखपुरी नगरी जहां परणाई कहां वघर देश जहां विक्रीता- नाम घेची कहां लोकों के सामने नाटक करना देवने गर्भको चूर्ण करके सुरसुंदरीके पास नाटक करावे है ॥ ९६२ ॥ तंबवणं लोऊण, जणणीजणयाइसयलपरिवारो।चिंतेइ विलियमणो, एसा सुरसुंदरी कत्तो॥९६३॥ अर्ध-यह बचन सुनके माता पिता वगैरहः सर्व परिवार आश्चर्य पाया विचारे यहां सुरसुंदरी कहांसे आई ॥ ९६३ ॥ उवलक्खियाय जणणी, कंटमि विलग्गिऊण रोयंती, जणएणं सा भणिया, को वुत्तंतो इमो वच्छे॥९६४॥ अर्थवाद पहिचानी साने जानी तव माता कंटमें लगके रोती भई सुरसुंदरीको पिताने पृछा हे वत्से यह क्या गृनान्त है ।। ५६४ ॥ भणियं च तओ तीए, ताय तया तारिसीइ रिद्धीए।सहिया निएण पइणा, संखपुरिपरिसरं पत्ता॥९६५॥ अर्थ-तदनंतर मुरसुंदरीने कहा है पिताजी उस अवसरमें मैं अपने पतिसहित आपकी दी हुई ऋद्धियुक्त शंखपुरी नगरीके पासमें पहुंची ॥ ९६५ ।।

श्रीपाल-
चरितम्
सुमुहूत्तकए बाहिं, ठिओ य.जामाउओ स तुह्माणं । सुहडाणं परिवारो, बहुओ य गओ सगेहेसु॥९६६॥
अर्थ-वह आपका जमाई शुभ मुहूर्त के लिए नगरीके बाहिर रहा सुभटोंका परिवार बहुतसा नगरीमें अपने २ घर
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१२०॥
गया ।। ९६६ ॥
,
रयणीए पुरबाहि,ठियाण अह्माण निब्भयमणाणं। हणि मारित्ति करिती, पडिया एगा महाधाडी॥९६७॥
अर्थ-रात्रिमें नगरके वाहिर रहे हुए निर्भय मन जिन्होंका ऐसा हमारे पर मार मार ध्वनि करती भई एक बड़ी
धाड़ पड़ी अर्थात् लूटने वाले आए ॥ ९६७ ॥
तो सहसा सो नट्ठो, तुझं जामाउओ ममं मुत्तुं । धाडीभडेहिं ताए, सिरीइ सहिया अहं गहिया ९६८
अर्थ-तदनंतर वह आपका जमाई मेरेको छोडके अकस्मात भागगया मेरेको आपकी दीभई लक्ष्मी सहित धाडके
सुभटोने पकडी ॥९६८॥
नीया य तेहिं नेपाल,-मंडले विकिया य मुल्लेणं । गहिया य सत्थवइणा, एगेणं रिद्धिमंतेणं ॥९६९॥
अर्थ-और उन धाडके सुभटोंने नेपाल देशमें ले जाके कीमतसे वेची एक ऋद्धिवान सार्थ वाणीएने ग्रहण करी ॥९६९॥
तेणावि ससत्थेणं, नेऊणं सह बब्बरंमि कूलंमि । महकालरायनयरे, हट्टे धरिऊण विकणिया ॥९७०॥
॥१२०॥

अर्थ-उस सार्थ पतिने भी अपने सार्य के साथ बच्चरकूल महाकाल राजाके नगरमें ले जाके दुकानमें खडी रखके घची ॥ ९७० ॥ एगाए गणियाए, गहिऊणं नहगीयनिउणाए। तह सिक्खविया य अहं, जह जाया नहिया निउणा ९७१ अर्थ-नृत्य गीतमें निपुण एक वेश्याने सरीदी उसने मेरेको उस प्रकारसे सिखाई जिससे मैं निपुण नर्तकी भई ॥९७१॥ महकालनामएणं, बब्बरकुलस्स सामिणा तत्तो, नडपेडएण सहिया, गहियाऽहं नाडयपिएणं ॥९७२॥ अर्थ-तदनंतर महाकाल नामका वर्चरकूलके राजाने नटसमूहसहित नवनाटक इकट्ठा किया उसमें मेरेकभी ग्राणकरी कसा महाकालराजा नाटक है प्यारा जिसको ऐसा ॥ ९७२ ॥ नाणाविहनहेहि, तेण नचाविऊण धूयाए । मयणसेणाइ पइणो, दिन्ना नवनाडयसमेया ॥ ९७३ ॥ अर्थ--उस राजाने यात प्रकारका नाटक करवाके मदनसेना नामकी अपनी पुत्रीके भर्तारको नव नाटकके साथ मरकोनीदी ॥ ९७३ ॥ तस्स य पुरओ नचंतियाइ, जायाई इत्तिय दिणाई। परमहुणा सकुडुवं, दणं दुक्खमुल्लसियं ॥९७४॥ अर्थ-टस मदनसेनाके भर्तारके आगे नाटककर्ता मेरे इतने दिन भए परंतु इस वक अपने कुटुंवको देखके गरेको दुःख भया ।। ९५४ ॥ H श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१२१॥ तइया नियगरुयत्तं, मयणाइ बिडवणं च दट्टणं। जो य मए मुद्धाए, अखब्बगब्बो को आसि॥९७५॥ अर्थ-तव पाणिग्रहणके अवसरमें अपना महत्त्व और मदनसुंदरीकी विडंबना देखके मैं मूर्खनीने अखर्व गर्वनाम महान् अहंकार किया था ॥ ९७५ ॥ तं भंजिऊण मयणा, पइणो नरनाहनमियचलणस्स । जेणाहं दासत्तं, कराविया तं जयइ कम्मं ॥९७६॥ अर्थ-वह गर्वका चूर्ण करके नरेन्द्रों करके नमस्कार किया है चरण कमलोंमें जिसके वह मदनसुंदरीके भर्तारका दासपना जिस कर्मने मेरे पास कराया वह कर्म जयति सर्वोत्कृष्ट वर्ते है ॥ ९७६ ॥ इकच्चिय मह भइणी, मयणा धन्नाणधुरि लहइ लीहं, जीए निम्मलसीलं, फलियं एयारिसफलेहिं ९७७ अर्थ-धन्य स्त्रियोंके आदिमें एक मेरी बहन मदनसुंदरीही रेखा पावे है जिसका निर्मलशील ऐसे फलोंसे फला ॥९७७॥ कयपावाण जियाणं, मज्झे पढमा अहं न संदेहो । कुलसीलवजियाए, चरियं एयारिसं जीए ॥९७८॥ अर्थ-किया पाप जिन्होंने ऐसे जीवोमें पहली मैं हूं जहां पापियोंकी गिनती होवे है वहां पहिली रेखा मैं पाऊं हूं इसमें सन्देह नहीं है कैसे सो कहते हैं कुलसीलवर्जित उत्तम कुलाचाररहितका ऐसा चरित वर्ते है ॥ ९७८ ॥ मयणाए जिणधम्मो, फलिओ कप्पदुमुव सुफलेहि। मह पुण मिच्छाधम्मो, जाओ विसपायवसरिच्छो , - , -- ॥१२१॥ - - अर्थ-मदनसुंदरीके जिनधर्म कल्पवृक्षके जैसा शोभन फलोंकरके फला और मेरे मिथ्याधर्म विषवृक्षके जैसा भया दुष्ट फल देनेवाला होनेसे ॥ ९७९ ॥ मयणानियकुलउज्जालणिक,-माणिक्कदीवियातुल्ला अहयं तु चीडउम्माडियब, घणजणियमालिन्ना ।। अर्थ-मदनसुंदरी अपने कुलको उज्ज्वल करनेमें १ अद्वितीया माणिकके दीपिका सरीखी है मैं तो अपने कुलको मला करने के लिए स्यामकाचकी मणिके तुल्य भई ।। ९८० ॥ मयणं दट्टण जणा, जएह सम्मत्तसत्तसीलेसु । मं दट्टणं मिच्छत्त, दप्पकंदप्पभावेसु ॥ ९८१ ॥ अर्थ-मुरसुंदरी कहती है अहो लोको मदनसुंदरीको देखके सम्यक्त्व सत्व सीलमें यल करो और मेरेको देखके मिध्यात्य १ दर्प २ कंदर्प ३ इन्होंमें यल करो ॥ ९८१ ।। इवाइ भणंतीए, तीए सुरसुंदरीइ लोयाणं । उप्पाइओ पमोओ, जो सो न हु नाडएहि पुरा ॥९८२॥ अर्थ-इत्यादि पूर्वोत कहती सुरसुंदरीने लोकोंको जो हर्प उत्पन्न किया वैसा हर्ष पहले नाटकमें कभी उत्पन्न नहीं आया ॥ ९८२॥ सिरिपालेणं रम्ना, वेगेणाणाविओ य अरिदमणो। सुरसुंदरी य दिन्ना, बहुरिद्धिसमनिया तस्स ॥९८३॥ -

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१२१॥
KET
,
तइया नियगरुयत्तं, मथणाइ बिडवणं च दट्टणं। जो य मए मुद्धाए, अखब्बगब्बो कओ आसि॥९७५॥
अर्थ-तव पाणिग्रहणके अवसरमें अपना महत्त्व और मदनसुंदरीकी विडंबना देखके मैं मूर्खनीने अखर्व गर्वनाम
महान् अहंकार किया था ॥ ९७५ ॥
तं भंजिऊण मयणा, पइणो नरनाहनमियचलणस्स। जेणाहं दासत्तं, कराविया तं जयइ कम्मं ॥९७६॥
अर्थ-वह गर्वका चूर्ण करके नरेन्द्रों करके नमस्कार किया है चरण कमलोंमें जिसके वह मदनसुंदरीके भर्तारका
दासपना जिस कर्मने मेरे पास कराया वह कर्म जयति सर्वोत्कृष्ट वर्ते है ॥ ९७६ ॥
इकच्चिय मह भइणी, मयणा धन्नाणधुरि लहइ लीहं, जीए निम्मलसीलं, फलियं एयारिसफलेहिं ९७७
अर्थ-धन्य स्त्रियोंके आदिमें एक मेरी बहन मदनसुंदरीही रेखा पावे है जिसका निर्मलशील ऐसे फलोंसे फला ॥९७७॥
कयपावाण जियाणं, मज्झे पढमा अहं न संदेहो। कुलसीलवजियाए, चरियं एयारिसं जीए ॥९७८॥
अर्थ-किया पाप जिन्होंने ऐसे जीवोमें पहली मैं हूं जहां पापियोंकी गिनती होवे है वहां पहिली रेखा मैं पाऊं हूं
इसमें सन्देह नहीं है कैसे सो कहते हैं कुलसीलवर्जित उत्तम कुलाचाररहितका ऐसा चरित वर्ते है ॥ ९७८ ॥
मयणाए जिणधम्मो, फलिओ कप्पडुमुव सुफलेहि। मह पुण मिच्छाधम्मो, जाओ विसपायवसरिच्छो॥
॥१२१॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥१२१॥ तइया नियगरुयत्तं, मयणाइ बिडवणं च दणं। जोय मए मुद्धाए, अखब्बगब्बो कओ आसि॥९७५॥ अर्थ-तब पाणिग्रहणके अवसरमें अपना महत्त्व और मदनसुंदरीकी विडंबना देखके मैं मूर्खनीने अखर्व गर्वनाम महान् अहंकार किया था ॥ ९७५ ॥ तं भंजिऊण मयणा, पइणो नरनाहनमियचलणस्स । जेणाहं दासत्तं, कराविया तं जयइ कम्मं ॥९७६॥ अर्थ-वह गर्वका चूर्ण करके नरेन्द्रों करके नमस्कार किया है चरण कमलों में जिसके वह मदनसुंदरीके भर्तारका दासपना जिस कर्मने मेरे पास कराया वह कर्म जयति सर्वोत्कृष्ट वर्ते है ॥ ९७६ ॥ इकच्चिय मह भइणी, मयणा धन्नाणधुरि लहइ लीह, जीए निम्मलसीलं, फलियं एयारिसफलेहि ९७७ अर्थ-धन्य स्त्रियोंके आदिमें एक मेरी बहन मदनसुंदरीही रेखा पावे है जिसका निर्मलशील ऐसे फलोंसे फला ॥९७७॥ कयपावाण जियाणं, मज्झे पढमा अहं न संदेहो । कुलसीलवजियाए, चरियं एयारिसं जीए ॥९७८॥ अर्थ-किया पाप जिन्होंने ऐसे जीवोमें पहली मैं हूं जहां पापियोंकी गिनती होवे है वहां पहिली रेखा में पाऊं हूं इसमें सन्देह नहीं है कैसे सो कहते हैं कुलसीलवर्जित उत्तम कुलाचाररहितका ऐसा चरित वर्ते है ॥ ९७८ ॥ मयणाए जिणधम्मो, फलिओ कप्पडुमुव सुफलेहि । मह पुण मिच्छाधम्मो, जाओ विसपायवसरिच्छो॥ ॥१२१॥ k

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अर्थ-मदनसुंदरीके जिनधर्म कल्पवृक्षके जैसा शोभन फलोंकरके फला और मेरे मिय्याधर्म विषवृक्षके जैसा भया
दुष्ट फल देनेवाला होनेसे ॥ ९७९ ॥
मयणा नियकुलउजालणिक, माणिकदीवियातुल्ला। अहयं तु चीडउम्माडियब, घणजणियमालिन्ना॥
अर्थ-मदनसुंदरी अपने कुलको उज्ज्वल करनेमें १ अद्वितीया माणिकके दीपिका सरीखी है में तो अपने कुलको
मैला करने के लिए स्यामकाचकी मणिके तुल्य भई ॥ ९८० ।।
मयणं दण जणा, जगह सम्मत्तसत्तसीलेसु । मं दणं मिच्छत्त, दप्पकंदप्पभावेसु ॥ ९८१॥
अर्थ-मुरमुंदरी कहती है अहो लोको मदनसुंदरीको देखके सम्यक्त्व सत्व सीलमें यल करो और मेरेको देखके
मिथ्याल १ दर्प २ कंदर्प ३ इन्होंमें यल करो ॥ ९८१ ।।
इन्चाइ भणंतीप, तीप सुरसुंदरीइ लोयाणं । उप्पाइओ पमोओ, जो सो न हु नाडएहि पुरा ॥९८२॥
अब-इत्यादि पूर्वोक्त कहती सुरसुंदरीने लोकोंको जो हर्प उत्पन्न किया वैसा हर्प पहले नाटकमें कभी उत्पन्न नहीं
दमाया ॥ ९८२ ॥
सिरिपालेणं रना, वेगेणाणाविओ य अरिदमणो। सुरसुंदरी य दिन्ना, बहुरिद्धिसमन्निया तस्स॥९८३॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥ १२२॥ अर्थ-तदनंतर श्रीपालराजा शीघ्र अरिदमनकुमरको बुलाके सुरसुंदरीको बहुत ऋद्धिसहित अरिदमनकुमरको दिया ॥९८३ ॥ सुरसुंदरिसहिएणं, अरिदमणेणावि सुद्धसमत्तं । सिरिपालरायमयणा,-पसायओ चेव संपत्तं ॥९८४॥ अर्थ-सुरसुंदरीसहित अरिदमन कुमरने श्रीपाल राजा और मदनसुंदरीके प्रसादसे सुद्ध सम्यक्त्व पाया ॥९८४ ॥ जे ते कुट्ठियपुरिसा, सत्तसया आसि तेवि मयणाए।वयणेण विहियधम्मा, संजाया संति नीरोगा॥९८५॥ अर्थ-जो ७०० कोढ़ी पुरषथा वह मदनसुंदरीके बचनसे किया धर्म जिन्होंने ऐसे निरोग भए हैं ॥ ९८५ ॥ तेवि हु सिरिसिरिपालं, भूवालं पणमयंति भत्तीए । रायावि कयपसाओ, ते सत्वे राणए कुणइ॥९८६॥ अर्थ-वह ७०० पुरुष श्रीयुक्त श्रीपाल राजाको भक्तिसे नमस्कार करें राजा श्रीपालभी किया प्रसाद जिसने ऐसा उन सर्वोको राणा ऐसा पद छोटा राजा विशेष देवे' अर्थात् राणा किया ॥९८६ ॥ मइसागरोवि मंती, आगतूणं नमेइ निवपाए । सोवि पुवंव रन्ना, कओ अमच्चो सुकयकिच्चो ॥९८७॥ अर्थ-मतिसागर मंत्रीभी आके राजा श्रीपालके चरणोंमें नमस्कार करे राजा श्रीपालभी पहलेके जैसा मतिसागर- को मंत्री किया कैसा है मंत्री शोभन कार्य है जिसका ऐसा ॥ ९८७ ॥ ससुराण सालयाणं, माउलपमुहाण नरवराणं च । अन्नेसिपि भडाणं, बहुमाणं देइ सोराया ॥ ९८८ ॥ ॥१२२॥ RS अर्थ यह श्रीपालराजा सुमरा और साला और मामा प्रमुख राजाओंको औरभी सुभटोंको वहुमान सत्कार देवे ९८८ ते सवेवि हु बहुभत्ति, संजुया भालमिलियकरकमला। सेवंति सया कालं, तंचिय सिरिपालभूवालं ॥ अर्थ-ये सर्व राजा बहुत भक्तिसहित इसी कारणसे लिलाटमे मिला है करकमल जिन्होंका ऐसे सर्वकालमें श्रीपाल राजाकी मेवा करे ॥ १८९॥ आह अन्नदिणे मइसायरेण, सामंतमंतिकलिएणं । विन्नत्तो नरनाहो, भूमंडलमिलियभालेणं ॥९९०॥ अर्थ-गके अनंतर अन्य दिनमें सामंत मंत्रीसहित मतिसागर मंत्रीने श्रीपाल राजाको वीनती करी कैसा मति- मागर भूमंडल में लगा है लिलाट जिसका ऐसा ॥ ९९० ॥ देव ! तुम बालोवि हु पियपद्धे ठाविओवि दुट्टेणं । उट्ठाविओसि जेणं, सो तुह सत्तू न संदेहो ॥९९१॥ अध-गे विनती किया सो कहते हैं हे देव हे महाराज आप बालक थे पिताके पट्टपर स्थापित किये थे जिस इष्टने उठाया वह आपका शत्रु है इसमें सन्देह नही है ॥ ९९१॥ संतेवि हु सामत्थे, जो पियरजंपि सत्तूणा गहियं । नो मोयावइ सिग्धं, सो लोए होइ हसणिज्जो ९९२ अर्थ- यामधरहते भी निश्चय जो पुरुष शत्रुने ग्रहण किया अपने पिताका राज्य शीघ्र पीछानहीं लेवे वह लोकोमें हनने योग्य होये है ।। ९९२ ।। है ३

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका
सहितम्-
॥१२३॥
एसो सामिय? सयलो, तुम्हाणं रिद्धिसिन्नवित्थारो। पावेइ किं फलं जइ, नहु लिज्जइ तं नियंरजं ९९३
अर्थ हे स्वामिन् आपका सर्व यह ऋद्धि और सेनाका विस्तार क्या फल पाया अर्थात् निष्फल है जो वह अपना
राज्य नहीं लिया जावे अपना राज्य ग्रहण करनेसेही यह सर्व सफल होवे है ॥ ९९३ ॥
ता काऊण पसायं, सामिय गिन्हेंह तं नियं रजं । जंपियपट्टनिविटे, पई दिटे मे सुहं होही ॥ ९९४ ॥
अर्थ-इसलिए हे स्वामिन् प्रसन्न होके आप अपना राज्य ग्रहण करो जिस कारणसे आपके पिताके पट्टपर
आपको बैठा हुआ देखूगा तब मेरे मनमें सुख होगा ॥ ९९४ ॥
तो पभणइ नरनाहो, अमच्च ? सच्चं तए इमं भणियं । किं तु उवायचउक्क, कमेण किजंति कज्जाइं ९९५
अर्थ-तदनंतर राजा श्रीपाल कहे हे मंत्रिन तुमने यह सत्य कहा किंतु साम १ दान २ भेद ३ दंड ४ यह चार
उपायोंसे कार्य क्रमसे करना ॥ ९९५॥
जइ सामेण सिज्झइ, कजं ता किं विहिज्जए दंडो। जइ समइ सक्कराए, पित्तं ता किं पटोलाए ॥९९६ ॥
अर्थ-जो साम मधुर वचनसे कार्य सिद्ध होवे तो किस वास्ते दंड किया जावे इसी अर्थको दृष्टान्तसे याने अर्था-
न्तरन्याससे दृढ करते हैं पित्त रोगविशेष जो शितोपला मिश्रीसे शान्ती होवे तब कोशातकी किरायतो, कटुक नीम
गिलोय वगैरह किसवास्ते दिया जावे ॥ ९९६ ॥
॥१२३॥

तत्तो मंती पभणइ, अहो पहो ते वओहिया बुद्धी। गंभीरया समुदाहिया, महीओऽहिया खंती ॥९९७॥
अर्थ-तदनंतर मंत्री कहे अहो इति आश्चर्ये हे प्रभो आपकी बुद्धि उमरसे अधिक वर्ते है आपकी गंभीरता समुद्रसे
अधिक है और आपकी क्षमा पृथ्वी से भी अधिक है ।। ९९७ ॥
ता पेसिजउ पसो, चउरमुहो नाम दियवरो दूओ।जो दूयगुणसमेओ अस्थि जए इत्थ विक्खाओ॥९९८॥
अर्थ-तिस कारणसे यह चतुर्मुस नामक द्विज ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ दूत भेजो जो चतुर्मुख दूतके गुण वाचाल वगैरहसे
गुफ हे और जगनमें प्रसिद्ध है ॥ ९१८ ॥
सो ओयतयमइबलकलिओ, सम्माणिऊण भूवइणा । संपेसिओ तुरंतो, पत्तो चंपाइ नयरीए ॥९९९॥
अर्थ-आज मानसवल तेज शरीरकाप्रताप मति बुद्धिवल पराक्रम इन्हों करके युक्त ऐसा वह दूतका श्रीपाल
महाराजाने मत्कार करके भेजा वह दूत शीघ्र चलता हुआ चंपानगरी पहुंचा ॥ ९९९ ॥
तत्थाजियसैणनरेसरस्स, पुरओ पसन्नवयणेहिं । सो दूओ चउरमुहो, एवं भणिउं समाढत्तो ॥ १००० ॥
अर्थ-वहां पानगरीमें वह चतुर्मुख दूत अजितसेन राजाके सामने प्रसन्नवचनोसें अर्थात् मधुरवचनोंसें इस
प्रकार करना प्रारंभ किया ।। १००० ॥
नरवर तग तया जो, सिरिपालो भायनंदगो वालो। भूवालपयपइट्ठो, दिट्ठो भूभार असमत्थो ॥१००१॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१२४॥
अर्थ-हे महाराज आपने उस वक्तमें जो भाईका पुत्र श्रीपाल बालक राज्यमें स्थापा हुआ बालक होनेसे पृथ्वीका
भार उठानेमें याने सम्भालने में असमर्थ देखा ॥ १००१॥
तो तं भारं आरोविऊण, निययंमि चेव खंधमि।सयलकलासिक्खणत्थं, जो य तए पेसिओ आसि १००२
अर्थ-तदनंतर वह राज्यके भार आपने अपने कंघेपर स्थापके और श्रीपालको सर्वकला सीखनेके वास्ते आपने
विदेश भेजाथा ॥ १००२ ॥
सो सयलकलाकुसलो, अतुलबलो सयलरायनय।चलणो, चउरंगबलजुओ तुह लहुयत्तकए इमो एइ ॥
अर्थ-वह श्रीपाल सर्व कलामें कुशल और सर्वोत्कृष्ट बल सैन्य जिसके और सर्व राजाओं जिसके चरणोंमें नम-
स्कार किया है ऐसा और चतुरंग जो वल सैन्य उस करके युक्त यह आपको हल्का करनेके वास्ते आवे है ॥ १००३॥
ता जुजइ तुझवि तंमि, रज्जभारावयारणं काउं, जं जुन्नथंभभारो, लोएवि ठविजइ नवेसु ॥१००४ ॥
अर्थ-तिस कारणसे आपकोभी उस श्रीपालमें राज्यका भार अवतरण करना युक्त है जिस कारणसे लोकभी
जीर्ण स्तंभोका भार नवीन स्तंभोंपर थापा जाय है ॥ १००४॥
अन्नं च तस्स रन्नो, पयपंकयसेवणत्थमन्नेवि । वहवेवि हु नरनाहा, समागया संति भत्तीए ॥ १००५ ॥
॥१२४॥

अर्थ-और मी सुनिए श्रीपालराजाके चरणकमलोंकी सेवाके वास्ते औरमी वहुतसे राजा भक्तिके वास्ते आए ॥१००५ ॥ जं तुम्भे निययावि हु, नो पत्ता तस्स मिलणकज्जेवि । सोवि हु तक्विजइ दुजणेहिं, नूर्ण कुलविरोहो । अर्थ-जो आप श्रीपाल राजाके निजकेहों और मिलनेके वास्तेभी नहीं आए सो वहभी घरमें विरोध जैसा मालूम मा वह कुल विरोध निश्चय शत्रु बांछते हैं ।। १००६ ।। जो पुण कुले विरोहो, सो रिउगेहेसु कप्परुक्खसमो। तेण न जुज्जइ तुम्हं, परुप्परं मच्छरो कोवि॥१००७॥ अर्थ-भीर जो कुलमें विरोध है यह शत्रुवोंके घरमें कल्पवृक्षके सरीखा होवे है याने कुलमें विरोध होनेसे शत्रुवोंका मनोरथ फले ॥२००७ ।। सोवि हु किजउ जइ, किर नजइ अहमम्हि इत्थ सुसमत्थो। कत्थ तुमं खज्जोओ, कत्थ य सोचंडमत्तंडो॥ अर्थ-या विरोधभी करो जो निश्चय में इस विरोधमें अतिशय समर्थ हूं ऐसा जाना जावे तर तो करनाही वाजवी है परन्तु कहां तुम रायोत ( आगिए)के जैसा और कहां श्रीपाल प्रचंड सूर्यके सदृश आप दोनोंके खद्योत और सूर्य के तमा गहुत अंतर है।। १००८ ।। कत्थ तुमं सरसरसब, ससय समाणोसि देव हीणवलो। कत्थ य सो रयणायर, मेरुमयंदेहि सारित्थो॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१२५॥ अर्थ-और हे देव हे राजन् कहां आप और कहां श्रीपाल कैसे सो कहते हैं आप सरोवर जैसे हैं और श्रीपाल समुद्र सदृश है और आप सरसों जैसे हैं और श्रीपाल मेरु जैसा है और आप शशक नाम खरगोस जैसे हैं और श्रीपाल सिंहके जैसा है इसी कारणसे आपहीन बली हैं इसवास्ते आप दोनोंमें बहुत अंतर है ॥ १००९ ॥ जइ तं रुटोसि न जीवियस्स, ताझत्तिभत्तिसंजुत्तो। सिरिसिरिपालनरेसरपाए, अणुसरसु सुपसाए १०१० अर्थ-जो तुम अपने जीवितव्यापर नही नाराज हुआ हो तो शीघ्र भक्तिसहित श्रीश्रीपालराजाके चरणोंकी सेवा करो कैसे हैं श्रीपाल राजाके चरण शोभन है प्रसाद जिन्होंका ॥ १०१०॥ जइ कहवि गवपवय,-मारूढो नो करेसि तस्साणं । तो होहि जुज्झसज्जो, कज्जपयं इत्तियं चेव ॥१०११॥ अर्थ-जो कोइ प्रकारसे अहंकाररूप पर्वतपर चढेहुए श्रीपाल राजाकी आज्ञा नहीं करो हो तो युद्धके वास्ते तय्यार होवो यहां कार्यपद इतनाही है यातो श्रीपाल राजाकी सेवा करो नहीं तो युद्धकी तय्यारी करो ॥ १०११ ॥ तं सोऊणं सो अजियसेण, रायावि एरिसं भणइ। दूओ य दिओ य तुमं, नजसि एएण वयणेणं ॥१०१२॥ अर्थ-यह दूतका वचन सुनके अजितसेनराजाभी ऐसा वचन कहे अरे तैं इस बचनसे दूत और ब्राह्मण जाना जाता है ॥ १.१२॥ पढम महुरं मज्झमि, अंबिलं कडुयतित्तयं अंते । वुत्तुं भुत्तुं च तुमं, जाणतो होसि चउरमुहो॥१०१३॥ ॥१२५॥ 55 अर्थ- पहेले तैने मधुर वचन कहा मध्यमें खट्टा अंतमें कडुवा और तीखा ऐसा वचन कहने के लिए ऐसा भोजन करना जानता हुआ धतुर्मुख होवे है ॥ १०१३ ॥ निययान केविअम्हे, तस्स न सोकोवि अम्ह नियओत्ति।सो अम्हाणं सत्तु,अम्हेविय सत्तुणो तस्स१०१४ अर्थ-हम तेरे स्वामीके घरके नहीं हैं और वह तेरा स्वामी हमारा नहीं है किंतु वह तेरा स्वामी हमारा शत्रु है हमभी तेरे स्वामीके शत्रु हैं ॥ १०१४ ॥ जंजीवंतो मुको, सो तइया वालओत्ति करुणाए। तेण अम्हे हीणवला, सोवलिओ वन्निओ तुमए १०१५ अर्थ-तेरा स्वामीको उस अवसरमें बालक है ऐसा जानके हमने दयासे जीता हुआ छोड़ा तिस कारणसे तैने हमको हीनपली वर्णन किया और उस अपने स्वामीको बलवान् वर्णन किया ॥ १०१५ ॥ नियजीवियस्स नाहं, रुट्ठो रुट्ठो हु तस्स जमराया।जेणाहं निचिंतो, सुत्तोसीहुव जग्गविओ॥१०१६॥ अर्थ-अरे मैं अपने जीवितव्यपर नहीं नाराज हुआ हुं किंतु निश्चय तेरे स्वामीके ऊपर यमराजा नाराज हुआ निमसे तेरे स्वामीने सोते सिंहके जैसा मेरेको जगाया ।। १०१६ ॥ जंतंदूओसि दिओसि, तेण मुक्कोसि गच्छ जीवंतो। तुह सामियहणणत्यं, एसोहं आगओ सिग्धं १०१७ RSS

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
अर्थ-जो तें दूत है और ब्राह्मण है इसकारणसे छोड़ा है तें जीताहुआ चलाजा तेरे स्वामीको मारनेके वास्ते में
शीघ्र आया ॥ १०१७॥
दूओवि दुयं गंतुं, सत्वं नियसामिणो निवेएइ। तत्तो सो सिरिपालो, भूवालो चल्लिओ सबलो॥१०१८॥
अर्थ-तदनंतर दूतभी शीघ्र जाके सर्ववृतान्त अपने स्वामीसे कहे तदनंतर श्रीपालराजा सबल सैन्यसहित
॥१२६॥
चला ॥ १०१८॥
चंपाए सीमाए, गंतूणावासियं समग्गंपि । सिरिपालरायसिन्नं, तडिणीतडउच्चभूमीए ॥ १०१९ ॥
अर्थ-चंपानगरीकी सीमामें जाकर सम्पूर्ण श्रीपाल राजाका सैन्य कटक गंगानदीके तटपर निवेश किया ॥१०१९॥
सो अजियसेण रायावि, सम्मुहो आविऊण तत्थेव। आवासिओ य अभिमुह, महीइ सिन्नेण संजुत्तो॥
अर्थ-वह अजितसेन राजाभी सामने आके उसी गंगानदीके तटपर सन्मुखभूमिमें अपनी सेनासहित उतरा १०२०
सोहिज्जइ रणभूमी, किज्जइ पूयाय सयलसत्थाणं। सुहडाणं च पसंसा, किज्जइ भद्देहिं उच्चसरं ॥१०२१॥
अर्थ-तदनतर संग्रामकी भूमि पत्थर कांटा वगैरह दूर करके शुद्ध करी जावे और सम्पूर्ण शस्त्रोंकी पूजा करे और
भट्ट लोक ऊंचे स्वरसे योद्धारोंकी प्रशंसा करे ॥ १०२१ ॥
किज्जति भूहरीओ, सुहडाणं चारु चंदणरसेण । पूरिजति य सिहरा, चंपयकुसुमेहि पवरोहिं ॥१०२२॥
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॥१२६॥

अर्थ-तथा मुभटोंके मुंदर चंदनके रससे आड़ा तिलक विशेप करा जाये और प्रधान चंपेके पुष्पोंकरके सुभटोंके
ममाकों पर मेहरा पूग जाये ॥ १०२२ ॥
वामपयतोडरेहि, दाहिणकरचारुवीरवलएहिं । वारणयचामरेहि, नजंति फुडं महासुहडा ॥ १०२३ ॥
अर्थमाये पगमें तोदर मालविशेष तथा जीवने हाथमें मनोहर वीरवलियां वीरत्वसूचक कड़ा विशेपों करके
और लव चामगे करके प्रगट महामुभट जाने जावे ॥ १०२३ ॥
गयगजियं कुणंता सुहडगणा तत्थ सीहनायं च । मुच्चंता नचंता, कुणंति वरवीरवरणीओ ॥ १०२४ ॥
अर्थ-यहां दोनों सेनामें सुभटोंका समूह हाथीके जैसा गर्जारव कर्ता हुआ सिंहनाद करतेहुए नांचतेहुए प्रधानवीर
व नाम परस्पर लाखोंके ग्रहारकी याचना करे ॥ १०२४ ॥
जणयपुरओवि तयणं, काबि हु जणणी भणेइ बच्छ तए! तह कहविजुल्झियवं,जह तुह ताओ न संकेइ॥
अर्गकोईक माता पिताके आगे पुत्रसे कहे हे वत्स तेरेको उस प्रकारसे युद्ध करना कि जिससे तेरे पिताको शंका
न होये अर्थात् लोक ऐमा न कहे कि अमुकका पुत्र शूर नहीं है ॥ १०२५ ॥
धीपा.स.२२ अन्नाभणेइ वच्छाह, वीरसुया पियाय वीरस्स । तह तुमए जइअवं, होमि जहा वीरजणणीवि ॥१०२६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहित.
॥१२७॥
१
अर्थ-अन्य कोई स्त्री पुत्रसे कहे हे वत्स मैं शूरवीरकी पुत्री हूं और शूरवीरकी स्त्री हूं अब तेरेको वैसा युद्ध करना
कि जिससे मैं शूरवीरकी माता हो जावें ॥ १०२६ ॥
धन्ना सच्चियनारी, जीए जणओ पईय पुत्तोय । वीरा-वयाय पयवी, समन्निया हुंति तिन्नि वि ॥१०२७॥
अर्थ-वही स्त्री धन्य है जिसका पिता १ और पति २ और पुत्र ३ यह तीनोंभी वीर पदवी सहित होवें ॥१०२७॥
कावि पइं पइ जंपइ, महमोहो नाह नेव कायवो। जीवंतस्स मयस्स व, जंतुह पुटुिं न मुंचिस्सं ॥१०२८॥
अर्थ-कोईक स्त्री अपने भर्तारसे कहे हे नाथ मेरा मोह नहीं करना जिस कारणसे मैं तुह्मारे जीते हुए और मरे
हुएभी साथहीमें रहूंगी अर्थात् मरनेसे सती होंगी ॥ १०२८ ॥
कावि हु हसेइ रमणं,मह नयणहओवि होसिभयभीओ,नाह तुमं विजुज्जल,-भल्लयघाए कहं सहसि १०२९
अर्थ-कोई स्त्री अपने भर्तारको हंसे हे नाथ तुम मेरे नेत्रोंसे ताड़े हुए भयभीत होवोहो तब वीजलीके जैसा
उज्ज्वल भाला खड्गादिकका प्रहार कैसे सहोगे ॥ १०२९ ॥
इत्थंतरंमि उब्भड,-सुहडकयाडंबरं व असहंतो । सूरो फुरंततेओ, संजाओ पुंवदिसिभाए ॥ १०३०॥
अर्थ-इस अवसरमें उद्धत सुभटोंने किया आडवर नहीं सहता होवे वैसा सूर्य पूर्वदिशिमें उदय हुआ कैसा सूर्य
बहुत है तेज जिसका चलता हुआ ऐसा सूर्य उदय भया ॥ १०३० ॥
॥१२७॥

हु
मिलिऊण तक्षणं चिय, अग्गिमसेणाइ उभडा सुहडा।
मग्गणमसिक्खियंपि कुणंति पढमासिघायाणं ॥ १०३१ ॥
अर्थ-तब आगेकी सेनाका सुभट उद्भट तत्कालही परस्पर मिलके पहले खड्ग प्रहारोंकी मांगना नहीं सीखे हैं
तीनी याचना करें ।। १०३१ ।।
खग्गाखम्गि मरासरि, कुंताकुंतिप्पयंडदंडं च । झुझंता ते सुहडा, संजाया एगमेगं च ॥ १०३२ ।।
अर्थ-सावाले सवालोंसे युद्धकरें वाणवाले वाणवालोंसे युद्धकरें भालावाले भालावालोंसे युद्धकरें दंडवाले
देउवालोंमे युद्ध करें ऐगे युद्ध करते २ मुभट दोनों सेनाके इकडे होगए ॥ १०३२॥
कस्सवि भडस्स सीसं, खग्गच्छिन्नं च वालविकरालं। रविणोवि राहुसंकं, करेइ गयणमि उच्छलियं १०३३
अर्थ-किसी मुभटका मस्तक शत्रुने खड्गसे काटा वालोंसे विकराल आकाशमें उछला हुआ सूर्यकोभी राहु ग्रहकी
गंका उत्पन्न करे अर्थात् जैसा ग्रहण होगया हो वैसा मालूम होवे ॥ १०३३ ॥
कोवि भडो सिल्लेणं, गयणे उल्लालिओ महल्लेणं । दीसइ सुरंगणाहि, सग्गमियंतो सदेहुब ॥१०३४॥
अर्थ-कोर्दक सुभट पछी शससे आकाशमें उछालागया ऐसा देवानाओं सहित शरीर जिसका ऐसा स्वर्गसे
आता होरे ना देखने में आये ॥ १०३४ ॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥ १२८॥ को विहु भडो भिडंतो, च्छिन्नसिरो खग्गखेडयकरो य, गयसरुणसीसभारो, पणचए जायहरिसुव्ब १०३५ अर्थ-कोई सुभट युद्धकरता वैरीने मस्तक काटदिया जिसका ऐसा ढाल तलवार जिसके हाथमें है ऐसा ऋणा जिसका गया होवे ऐसा मस्तकका भार गया वैसा मानता हुआ इसीकारणसे भया है हर्ष जिसको ऐसा सहर्षके जैसा रणाङ्गण नाटक करता है ॥ १०३५ ॥ तत्थय पप्पडभंगं, भजंति रहाय कोहलयभेयं । भिजति गया तुरया चिब्भडच्छेयं च छिज्जति ॥१०३६॥ अर्थ-उस संग्राममें रथोंका भंग पापड़के जैसा होवे है और हाथी कुष्मांडके जैसा विदारण किए जावे हैं और घोड़ा काकड़ीके जैसा काटे जावे हैं ॥ १०३६ ॥ तओ सत्थत्थरिया, बहुमुंडमंडियाधउडिया भड । धडेहिं, अंतेहिं निरंतरया, भरिया मयहयगयसएहिं अर्थ-तदनंतर वह संग्रामभूमि क्षणेकमें ऐसी भई यह दूसरी गाथाके अंतपदमें अव्रण है कैसी भई सो कहते हैं शस्त्रोंसे आस्तृत भई बहुत मस्तकोंसे भूषित भई और वीरोंके कलेवरोंसे ऊंचीनींची भई आंतर शरीरके अवयव विशेषसे व्याप्त भई और मरेहुए सैकड़ों हाथी घोड़ोंसे भरीगई ॥ १०३७ ॥ रुहिरोहजणियकदम,मज्झविमदिजमाणमडयाणं। कडयडसदरउद्दा, खणेण सा रणमहीजाया ॥१०३८॥ ॥१२८॥ जय

अर्थ-तथा लोहका प्रवाह उससे उत्पन्न भया जो कर्दम उसमें चलते हुएके पगोंसे मर्दन होवे मृतकोंके शरीर
उन्होंका जो कई २ शब्द उमकरके भयंकर ऐसी संग्रामभूमि भई ॥ १०३८ ॥
युग्मं सिरिपालबलभडेहि, भग्गं दण नियवलं सयलं, उट्ठइ अजियसेणो, नियनामाओ व लज्जंतो॥
अर्थ-श्रीपाल राजाको जो बल उसमें जो सुभट उन्हों करके भागाहुआ सम्पूर्ण अपने सैन्यको देखके अजित-
मेन राजा अपने नाममे लजित हुआ होवे ऐसा उद्यतवान होवे किसीने नहीं जीती है सेना जिसकी ऐसी व्युत्पत्ती
होनेमे ॥ १०३०॥
जा सो परवलसुहडे, कुवियकयंतुव संहरइ ताव । सत्तसयराणएहि, समंतओ वेडिओ झत्ति ॥१०४०॥
अर्थ-का अजितसेन राजा क्रोधातुर हुआ यमराजके जैसा जितने शत्रुसेनके सुभटोंका संहार करे उतने ७००
मस्यावाले राणा लघुराजा विशेष श्रीपाल राजाके सेवकोंने शीघ्र चौतर्फसे वीटा अर्थात् घेरा दिया ॥ १०४० ॥
पचारिओ य तेहि, नरवर अजवि चएसुअभिमाणं। सिरिपालरायपाए, पणमसु मा मरसु मुहियाए १०४१
अर्थ-और उन्होंने बतलाया नाम कहा हे महाराज अवीभी अहंकारको छोड़ो श्रीपाल राजाके चरणों में नमस्कार
करो व्यर्थ क्यों मरते हो अर्थात् व्यर्थ मत मरो ॥ १०४१ ॥
तहवि हु जाव न थक्कइ, झुझंतो ताव तेहिं सुहडेहि। सो पाडिऊण वद्धो, जीवंतो चेव लीलाए ॥१०४२॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१२९॥
अर्थ-ऐसे कहने परभी जितने युद्धसे नही निवृत्त होवे उतने उन श्रीपाल राजाके सुभटोंने अजितसेन राजाको
नीचा गिराके लीलासे बांध लिया ॥१०४२ ॥
सिरिपालरायपासे, आणीओ जाव सो तहा बद्धो। ताव तेणं च रन्ना, सोविहु मोयाविओ ज्झत्ति १०४३
अर्थ-श्रीपाल राजाके पासमें जितने अजितसेन राजाको वांधके लाए उतने श्रीपाल राजाने अजितसेन राजाको
शीघ्र बंधनसे छुड़ाया ॥ १०४३ ॥
भणिओय ताय मा किंपि, नियमणे संकिलेसलेसंपि। चिंतेसु किं तु पुवंच, नियभुवं जसु सुहेणं १०४४
अर्थ-और कहा हे तात अपने मनमें कोई प्रकारसे संक्लेशका लेशभी मत विचारो किंतु पहलेके जैसा अपना राज
सुखसे करो ॥ १०४४॥
तो अजियसेण राया, चित्ते चिंतेइ ही मए किमियं। अविमंसियं कयं जं, दूयस्स न सन्नियं वयणं ॥१०४५॥
अर्थ-वाद श्रीपाल राजाका वचन सुनोंके अनन्तर अजितसेन राजा मनमें विचारे हि दूतिखेदे मैंने क्या यह
विना विचारा कार्य किया कि जो दूतका वचन नहीं माना ॥ १०४५ ॥
कत्थाहं वुढोवि हु, परदोहपरायणो महापावो। कत्थ इमो बालोवि हु, परोवयारिकधम्मपरो ॥१०४६॥
॥१२९॥

अर्थ-निश्चय में वृद्ध हूं तौमी परद्रोह करनेमें तत्पर महापापी हूं यह श्रीपाल बालक है तथापि परोपकारही एक धर्म वही प्रधान जिम ऐमा है कहां यह कहां में ।। १०४६॥ गुत्तदोहेण कित्ती, नासई नीईय रायदोहेण । वालदोहेण सुगई हहा मए तं तिगंपि कयं ॥१०४७॥ अर्थ-और विचार करे गोवद्रोहसे कीर्ति नष्ट होवे है और राजद्रोहसे नीति न्याय मार्ग नष्ट होवे है तथा बाल- ग्राहले मुगति देव गत्यादिक नष्ट होवे है ह इति खेदे मैंने यह तीनों किया ॥ १०४७ ॥ कस्यस्थि मझठाणं, नरयं मूत्तूण पावचरियस्स । ता पावघायणत्थं, पवनं संपविजामि ॥ १०४८ ॥ अर्थ-एमा पाप आचरण करनेवाला मेरेको नरक सिवाय और कौनसा ठिकाना है इसलिए इस पापका विनाश करनेके पाले जनी दीक्षा अंगीकार कलं ॥ १०४८ ॥ एवं च तस्स चिंतंतयस्स, सुहभाव-भावियमणस्स। पावरासीहिं भिन्नं, दिन्नं विवरं च कम्महि १०४९ अर्थ-अनन्तरोक्त प्रफारसे विचारता इसी कारणसे शुभ परिणामसे भावित मन जिसका ऐसा अजितसेन राजाका पापसमूह विदीर्ण हुआ और कर्मराजने विवर दिया ।। १०४९ ॥ तो सरियपुत्रजम्मेण, तेण सिरिअजियसेणभूवइणा, पडिवन्नं चारित्तं, सुदेवयादत्तवेसेणं ॥ १०५०॥ अर्ध-तदनंतर अजितसेन राजाको जातिस्मरण ज्ञान उत्पन्न भया अर्थात् पूर्व भवजाना ऐसा अजितसेन राजाने

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम.
॥१३०॥
सर्ववृत्तिरूप चारित्र अंगीकार किया कैसा अजितसेन राजा सम्यक् दृष्टि देवताने दिया रजोहरणादि साधुका वेष
जिसको ऐसा ॥ १०५० ॥
तं च पडिवन्नचरित्तं, दुहुँ सिरिपालनरवरो झत्ति । पणमेइ सपरिवारो, भत्तीइ थुणेइ एवं च ॥१०५१॥
अर्थ-अंगीकार किया चारित्र जिसने ऐसे अजितसेन राजर्षिको देखके श्रीपाल राजा शीघ्र परिवार सहित नम-
स्कार करे और भक्तिसे इस प्रकारसे स्तुति करे सो कहते हैं ॥ १०५१ ॥
जेणेस कोहजोहो हणिओ, हेलाइ खंतिखग्गेणं। समयासियधारेणं, तस्स महामुणिवइ नमो ते॥१०५२॥
अर्थ-जिसने यह क्रोधरूप योध क्षमारूप खड्गसे लीलासे हन दिया ऐसे आप महामुनि पतिको नमस्कार होवे
कैसा क्षमारूप खड्ग समताही है तीक्षण धाराजिसकी ऐसा ॥ १०५२ ॥
माणगिरिगरुयमयसिहर,-अट्टयं मदविक्कवज्जेणं । जेण हणिऊण भग्गं, तस्स महामुणि-वइ नमो ते॥
अर्थ-और जिस मुनिने मान अभिमानही पर्वत उसपर बड़े २ लाभ ऐश्वर्यादिक आठ मद रूप शिखर उन्होंको
मार्दव रूप एक अद्वितीय वन करके तोड़ा उस आप महामुनिको नमस्कार होवे ॥ १०५३ ॥
मायामयविसवल्ली, जेणज्जवसारसरलकीलेणं । उक्खणिया मूलाओ, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०५४
॥१३०॥

अर्थ-और माया स्वरूप जिसका ऐसी मायारूप विपकी वेलको जिसमुनिने आर्जव सरलताही श्रेष्ठ सरलकीला शंकु उम करके मूलने उपाइदी उस महामुनिको नमस्कार होवो ॥ १०५४ ॥ जेणिच्छामुच्छावेलसंकुलो, लोहसागरो गरुओ। तरिओ मुत्तितरिए, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०५५ अर्थ-जिम मुनिने बड़ा लोभसमुद्रको मुक्तिनाम निर्लोभतारूप जहाजसे तिरा अर्थात् पार उतरे उस महामुनिको नमस्कार दोनो कैमा लोभ समुद्र इच्छा मूर्छा बेलासे संकुल व्याप्त इच्छा सामान्य प्रकारसे वांधा मूर्छा विशेष तृष्णा इच्छा युक्त मूही बेला जल वृद्धि करके व्याकुल ॥ १०५५ ।। जेण कंदप्पसप्पो, विवेयसंवेय-जणिय जंतेण।गयदप्पुच्चिय विहिओ, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०५६ अर्थ-निम मुनिने विवेक समवेगसे उत्पन्न किया जो यंत्र उस करके कंदर्परूप सर्पको गत दर्प किया अर्थात् गया अभिमान जिमका ऐसा किया उस महामुनिको नमस्कार होवे ॥ १०५६ ॥ जेण नियमण-पडाओ, कोसुंभ-पयं-गमंगसमरागो। तिविहोवि हु निद्धओ, तस्स महामुणिवइ नमो ते ॥ १०५७ ॥ अर्थ-जिम मुनिने अपने मनरूप वरसे कुसुम्भ १ पतंग २ मंग ३ सदृश कामणा १ स्नेहणा २ दृष्टि एग ३ यह तीन प्रकारका राग दूर किया उस महामुनिको नमस्कार होवो वहां कसूमल रंग सरीखा कामणा और पतंग रंग

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१३१॥
सरीखा स्नेहणा और मंगणां सरीखा दृष्टिणा मंग रंजन द्रव्य विशेष उसका राग दुस्त्यज होवे है ॥ १०५७ ॥
दोसोदुट्ठ-गइंदो, वसीकओ जेण लीलमित्तेणं। उवसमसिणि निउणेणं, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०५८
अर्थ-और जिस मुनिने लीला मात्रसे द्वेषरूप दुष्ट हाथीको बसकिया उस महामुनिको नमस्कार होवो कैसा
वह महामुनि उपशमरूप अंकुशके प्रयोगमें निपुणा जाननेवाला ॥ १०५८ ॥
मोहो महल्ल-मल्लोवि, पीडिओ ताडिऊण जेणेसो, वेरग्ग-मुग्ग-रेणं, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०५९
अर्थ-जिस मुनिने यह मोहरूप महा मल्लकोभी वैराग्य मुद्गरसे ताड़के पीडित किया उस महामुनिको नम-
स्कार होवे ॥ १०५९॥
एए अंतर-रिउणो, दुज्जेया सयलसुरवरिंदेहि । जेण जिया लीलाए, तस्स महामुणिवइ नमो ते १०६०
अर्थ-सम्पूर्ण देवेन्द्रो करके दुर्जेय ये क्रोधादिक अंतर शत्रु जिस महामुनिने लीलामात्रसे जीता उस महामुनिको
नमस्कार होवो ॥१०६०॥
पुर्वपि तुमं पुज्जो, आसि ममंजेण तायभायासि । संपइ पुणो मुणीसर, जाओ-पुज्जो तिलुक्कस्स १०६१
अर्थ-पहलेभी आप मेरे पूज्य थे जिसकारणसे मेरे पिताके आप भाई हैं इस वक्तमें मुनीश्वर होनेसे तीन जग-
तके पूज्य भए हो ॥ १०६१ ॥
॥१३१॥

एवं थोऊण नमंसिऊण, तंअजियसेणमुणिनाहं । सिरिपालनिवो ठावइ, तप्पुत्तं तस्स ठाणंमि ॥१०६२॥ अर्थ--इन प्रकारमे उस अजितसेन मुनिराजकी स्तुति करके और नमस्कार करके श्रीपाल राजा अजितसेन गजाके पुत्र को उनके स्थानमें बैठावे ॥ १०६२ ॥ कयसोहाग चंपापुरीइ, समहुसवं सुमुहत्ते । पविसइ सिरिसिरिपालो, अमरपुरीए सुरिंदुव ॥ १०६३ ॥ अर्थ-करी है शोभा जिसकी ऐसी चंपानगरीमें श्रीपाल राजा अच्छे मुहूर्तमें उत्सव सहित प्रवेश करे किसमें फिनके जमा अमरपुरी देवनगरीमें इन्द्र के जैसा ॥ १०६३ ॥ तत्थय सयलेहि, नरेसरेहि, मिलिऊण हरिसियमणेहिं । पियपदमि निवेसिय, पुणोभिसेओ कओ तस्स ॥ १०६४ ॥ अर्थ-यहां चंपानगरीमें हर्षित मन जिन्होंका ऐसे सर्व राजा मिलके पिताके पट्टमें स्थापके श्रीपाल राजाका और भी राज्याभिषेक किया ।। २०६४ ॥ मूलपट्टाभिसेओ, कओ तहि मयणसुंदरि-एवि । सेसाणं अटुन्हं, कओ अ लहु-पहअभिसेओ १०६५ अर्थ-वहां मदन मुंदरीका मूल पट्टाभिषेक किया अर्थात् मूल पट्टरानीपदमें स्थापित करी और आठ रानियोंको अटी पदरानी की ।। १०६५ ।।

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥१३२॥ मइसागरोय इको, तिन्नेव य धवलसिविणो मित्ता। एए चउरोवि तया, रन्ना नियमंतिणो ठविया १०६६ अर्थ-उस वक्तमें एक मतिसागर और तीन धवल सेठका मित्र यहचार श्रीपाल राजाने अपने मंत्री स्था– १०६६ कोसंबीनयरीओ, आणाविओ धवलनंदणो विमलो । सो कणयपट्टपुब्बं, सिट्ठी संठाविओ रन्ना १०६७ अर्थ-तथा कौशम्बी नगरीसे बिमल नामका धवल सेठके पुत्रको बुलाके श्रीपाल राजाने सोनेका सिरपेच बंधाने पूर्वक नगर सेठ थापा ॥ १०६७ ॥ अट्ठाहियाओ चेईहरेसु, काराविऊण विहिपुवं । सिरिसिद्धचकपूयं, च कारए परमभत्तीए ॥ १०६८ ॥ अर्थ-तथा श्रीपाल राजा जिनमंदिरोंमें अट्ठाईका महोत्सव कराके विधिपूर्वक परम भक्तिसे सिद्धचक्रकी पूजा करवावे ॥१०६८॥ ठाणे ठाणे चेइयहराइं, कारेइ तुंगसिहराइं । घोसावेइ अमारिं दाणं दीणाण दावेइ ॥ १०६९ ॥ अर्थ-ठिकाने २ ऊंचा है शिखर जिन्होंका ऐसे चैत्य ग्रह जिनमंदिर करवावे तथा अमारी उद्घोषणा करवावे सर्व जीवोंको अभय दान दिवावे और दीनोंको दान दिवावे इस प्रकारसे पुण्य कृत करे ॥ १०६९ ॥ नायमग्गेण रज्जं, पालंतो पिययमाहिं संजुत्तो। सिरिसिरिपालनरिंदो, इंदुव्व करेइ लीलाओ॥१०७०॥ अर्थ-न्यायमार्गसे राज्य पालता हुआ स्त्रियोंसहित श्रीपाल राजा इन्द्रके जैसी लीला क्रीडा करे ॥ १०७० ॥ ॥१३२॥ स अह अजियसेणनामा, रायरिसी सो विसुद्धचारित्तो। उप्पन्नावहिनाणो, समागओ तत्थ नयरीए १०७१ अयं अब अजितसेननामराजर्षि चंपानगरीके उद्यानमें आके समवसरे कैसे हैं अजितसेनराजर्षि निर्मल चारित्र जिन्होंका इसी कारणसे उत्पन्न भया है अवधि ज्ञान जिन्होंको ऐसे ।। १०७१ ॥ तस्सागमणं सोऊण, नरबरो पुलइओ पमोएणं । माइपियाहिं समेओ, संपत्तो वंदणनिमित्तं ॥१०७२॥ अर्थ-उन रातपिका आगमन मुनके श्रीपाल राजा हर्षसे रोमोद्गमयुक्त माता और रानियोंसहित मुनिको गांदनेको गया ॥ १०७२ ॥ तिपयाहिणितु सम्म, तं मुणिनाहं नमित्तु नरनाहो। पुरओ य संनिविट्ठो, सपरिवारो य विणयपरो १०७३ अर्थ-राजा सिरिपाल अजितसेन राजपिको तीन प्रदक्षिणा देके अच्छी तरहसे नमस्कार करके आगे बैठा कैसा सिरिपाल राजा परिवार सहित और विनयमें तत्पर ॥ १०७३ ।। सोविसिरिअजियसेणो, मुणिराओ रायरोसपरिमुको। करुणिकपरो परमं, धम्मसरूवं कहइ एवं १०७४ अर्थ-यह श्रीअजितसेन मुनिराज रागद्वेपसे सर्वप्रकारसे रहित और करुणाही प्रधान जिन्होंके ऐसे वक्ष्यमाण प्रकार करके प्रधान धर्मका स्वरूप कहे ।। १०७४ ॥ भो भो भवा भवोहमि, दुल्लहो माणुसो भवो । चुल्लगाईहिं नाएहि, आगमंमि वियाहिओ ॥१०७५॥ पात्र.२३

श्रीपाल
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
L
॥१३३॥
अर्थ-अहो भन्यो भवोधनाम संसारमें मनुष्य सम्बन्धी भवसिद्धान्तमें चुल्लग पासगधने इत्यादि दश. दृष्टांतों
करके दुर्लभ कहा है ॥ १०७५ ॥
लद्धमि माणुसे जम्मे, दुल्लहं खित्तमारियं । जं दीसंति इहाणेगे, मिच्छाभिल्लापुलिंदया ॥१०७६ ॥
अर्थ-कदाचित मनुष्य भव पानेसे आर्य क्षेत्र पाना दुर्लभ है जिस कारणसे इस भरतक्षेत्रमें अनार्य देशोंमें बहुतसे
म्लेच्छ, भील पुलिन्दादिक रहते हैं वे धर्म क्या जानें ॥ १०७६ ॥
आरिएसु य खित्तेसु, दुल्लहं कुलमुत्तमं । जं वाहसुणियाईणं, कुले जायाण को गुणो ॥ १०७७ ॥
अर्थ-आर्य क्षेत्र पानेसेभी उत्तम कुलपाना दुर्लभ है जिस कारणसे आर्य क्षेत्रमेंभी व्याध कसाइ वगेरेह; के कुलमें
उत्पन्न होनेसे क्या गुण होवे अपितु कोई गुण न होवे ॥ १०७७ ॥
कुले लद्धे वि दुल्लंभं, रूवमारुग्गमाउयं । विगला वाहियाऽकाल, मया दीसंति जं.जणा ॥ १०७८ ॥
अर्थ-उत्तम कुल पानेसेभी रूप पांच इन्द्रिय परिपूर्ण तथा आरोग्य निरोगता और बड़ा आयुष ये तीन बात पानी
दुर्लभ हैं. जिस, कारणसे उत्तम कुलमें भी उत्पन्न भए बहुत लोक विकलेन्द्रिय रोगी और अकालमेंही मरते हुए
देखते हैं। १०७०॥
तेसु सवेसु ल सु, दुल्लहो गुरुसंगमो । जं सया सवखित्तेसु, पाविजंति न साहुणो ॥ १०७९ ॥
॥ १३३॥

अर्थ-यह रूपादिक सर्व पानेमेभी सद्गुरुका संयोग दुर्गम है जिस कारणसे सर्व क्षेत्रों में सदा साधु नहीं रहतेहैं १०७९
महंतेणं च पुन्नेणं, जाए-वि गुरुसंगमे । आलस्साईहिं रुद्धाणं, दुल्लहं गुरुदंसणं ॥ १०८० ॥
अर्थ-कदा महान् पुण्योदयसे सद्गुरुका संयोग होनेसेभी आलस्यादिक त्रयोदश तस्करोंने रोके हुए प्राणियोंको
गुरुका दर्शन होना दुर्लभ है वह तेरे काठिया यह है आलस्स मोह वन्नाथं भाकोहा पमाय किवणत्ता भयसोगा अन्ताणा
स्रो वरु तुहलार आलम १ मोह २ वर्ण ३ मान ४ क्रोध ५ प्रमाद कृपणपना ७ भय ८ गोक ९ अज्ञान १० व्याक्षेप
११ रुतूहल १२ क्रीड़ा १३ ये १३ काठिया गुरूका दर्शन नहीं करने देवे ॥ १०८० ॥
कहं कहंपि जीवाणं, जागवि गुरुदंसणे । बुग्गाहियाण धुत्तेहि, दुल्लहं पज्जु-वासणं ॥ १०८१ ॥
अर्थ-गीचोंके कोई प्रफारसे गुरूका दर्शन होनेसे भी धूताने चित्तमें भ्रांति करदी होवे ऐसे जीवोंसे गुरुकी सेवा
करनी दुलभ होवे है ॥ १०८१ ।।
गुम्पासेवि पत्ताणं, दुल्लहा आगमस्सुई । जं निदाविगहाओय, दुज्जयाओ सयाइवि ॥ १०८२ ॥
अर्थ--गुम्के पासमें जानेसे भी सिद्धान्तका सुनना दुर्लभ है जिस कारणसे निद्रा विकथा सदा दुर्जय है इसलिए
मुनना मुश्किल है ॥ १०८२ ।।
संपत्ताए मुईपवि, तत्तबुद्धी सुदुल्लहा । जं सिंगारकहाईसु, सावहाणमणो जणो ॥ १०८३ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१३४॥
अर्थ-सिद्धान्त सुननेसेभी तत्व परबुद्धि अतिशय दुर्लभ है जिसकारण लोक शृंगारहास्यादिककी कथा सावधान
होके एकाग्र चित्तसे सुनते हुए बहुतसे दीखते हैं ॥ १०८३ ॥
उवइटेवि तत्तंमि, सद्धा अञ्चंतदुल्लहा । जं तत्तरुइणो जीवा, दीसंति विरला जए ॥ १०८४ ॥
अर्थ-गुरूने तत्व कहां थकां आस्तिक्य श्रद्धा अत्यन्त दुर्लभ है जिस कारणसे तीर्थकरके कहे हुए पदार्थोंपर रुचि
है जिन्होंकी ऐसे तत्व रुचि जीव विरला दीखते हैं ॥ १०८४ ॥
जायाए तत्तसद्धाए, तत्तबोहो सुदुल्लहो । जं आसन्नसिवा केई, तत्तं वुझंति जंतुणो ॥ १०८५ ॥
अर्थ-तत्व प्रतीति होनेसेभी तत्वका बोध होना दुर्लभ है जिस कारणसे जिन्होंके नजदीक मोक्ष जाना है ऐसे
जीवोंको तत्वका बोध होवे है औरोंको नहीं ॥ १०८५ ॥
तत्तं दसविहो धम्मो, खंती मद्दवमज्जवं । मुत्तीतवो दयासचं, सोयं बंभमकिंचणं ॥ १०८६ ॥
अर्थ-तत्व क्या है सो कहते हैं तत्व दश प्रकारका यतिधर्म सो कहते है क्षमा १ मार्दव २ आर्जव ३ मुक्ति ४ तप
५ दया ६ सत्य ७ शौच ८ ब्रह्मचर्य ९ अकिंचन १०॥ १०८६ ॥
खंतीनाममकोहत्तं, मद्दवं माणवज्जणं । अज्जवं सरलो भावो, मुत्ती निग्गंथया दुहा ॥ १०८७ ॥
॥१३४॥

अर्थ-अब इन्हीसा अर्थ कहते हैं क्षमा नाम क्रोधका अभाव १ मार्दव मानका त्याग २ आर्जव सरलभाव ३ मुक्ति
निलाभता दो प्रकारकी द्रव्यभावसे परिग्रह रहितपना निग्रंथता और निर्लोभता ४ ॥ १०८७ ॥
नवो इच्छानिरोहो य, दया जीवाणपालणं । सञ्चं वक्कमसावजं, सोयं निम्मलचित्तया ॥ १०८८ ॥
अध-इच्छाका रोकना तप कहा जाये ५ जीवोंका रक्षण दया ६ निर्दोपवचन बोलना सो सत्य कहा जावे ७ निर्मल
निसपना गान कहा जावे ८॥ १०८८॥
बंभमट्ठारभेयस्स, मेहुणस्स विवजणं । अंकिंचणं न मे कज्ज, केणाविस्थित्तिऽणीहया ॥ १०८९ ॥
अर्थ-अठारह प्रकारके मथुनका त्याग ब्रह्मचर्य कहा जावे वहां औदारिक वैक्रिय भेदसे दो प्रकारका मैथुन वह
एक २ भी मन वचन कायासे करना कराना अनुमोदन भेदसे ९ प्रकारका होवे है दोनोंके मिलानेसे १८ भेद होवे
२०॥ किमी वस्तुगे मेरे प्रयोजन नहीं है ऐसी निस्पृहता अकिंचन कहा जावे १०॥ १०८९ ॥
एसो दसबिहुइसो, धम्मोकप्पडुमोवमो । जीवाणं पुण्णपुण्णाणं, सबसुक्खण दायगो ॥ १०९० ॥
अर्थ-यह दश भेद जिनका ऐसा यह धर्म कल्पवृक्षके सद्दश पूर्ण पुण्यजीवोंको सर्व सुखका देनेवाला है कल्पवृक्षभी
दा प्रकार का है इसमे धर्मको कल्पवृक्षकी उपमा करी ॥ १०९० ॥
धम्मो चिंतामणी रम्भो, चिंतियत्थाण दायगो।निम्मलो केवलालोय, लच्छिविच्छिड्डिकारओ॥१०११॥

श्रीपाल-
भाषाटीका-
सहितम्.
। तम्
.
६॥
अर्थ-इस कारणसे अनन्तरोक्त नवपदोंका समाहार नवपदी कहा जावे उसको सर्व भव्य प्राणियोंको तत्वभूत
समझना और ध्यान करना ॥१०९९ ॥
एयं नवपयं भवा, झायंता सुद्धमाणसा । अप्पणो बेव अप्पंमि, सक्खं पिक्खंति अप्पयं ॥ ११०० ॥
अर्थ-ए नवपदीको जानके शुद्ध मनसे ध्याते हुए मनुष्य अपने आत्माको साक्षात् नवपदमई देखते हैं ॥ ११०० ॥
अप्पमि पिक्खिए जं च, क्खणे खिज्जइ कम्मयं । न तं तवेण तिवण, जम्मकोडीहिं खिज्जए ॥११०१॥
अर्थ-आत्मा नवपदमई देखनेसे क्षणमात्रसे जो कर्म क्षय होवे वह कर्म तीव्रतपसे करोड़ जन्मसेभी नहीं क्षय होवे ११०१
ता तुज्झ भो महाभागा, नाऊणं तत्तमुत्तमं । सम्मं झाएह जं सिग्धं, पावेहाणंदसंपयं ॥ ११०२ ॥
अर्थ-तिस कारणसे अहो महाभाग्यवंतो आप यह उत्तम तत्व जानके अच्छी तरहसे जैसा बने वैसा ध्यावो जिस
कारणसे शीघ्र आनंद सम्पदा परम आल्हादरूप पावो ॥११०२॥
एवं सो मुणिराओ, काऊणं देसणं ठिओ जाव, ताव सिरिपालराया, विणयपरो जंपए एवं ॥११०३॥
अर्थ-वह अजितसेन मुनिराज इस प्रकारसे देशना देके जितने रहे उतने श्रीपालराजा विनयमें तत्पर होकर इस
प्रकारसे कहे ॥ ११०३॥
नाणमहोयहि भयवं, केण कुकम्मेण तारिसो रोगो। बालत्ते मह जाओ केण सुकम्मेण समिओ य॥११०४॥
॥१३६॥

अथ नानममुद्र हे भगवान किस कुकर्मसे मेरे बाल्य अवस्थामें वैसा रोग भया और किस सुकर्मसे शांत भया ॥ ११०४॥ कणं च कम्मणाह, ठाणे ठाणे य एरिसे रिद्धिं । संपत्तो तह केणं, कुकम्मणा सायरे पडिओ ॥ ११०५॥ अर्थ-किम उममे मैने ठिकाने २ ऐसी ऋद्धि पाई और किस कुकर्मसे मैं समुद्रमें पड़ा ॥ ११०५ ॥ तह केण नीयकम्मेण, चेत्र डुबत्तणं महाघोरं । पत्तोहं तं सवं, कहेह काऊण सुपसायं ॥ ११०६ ॥ अर्थ-तथा किम नीच कर्मके उदयसे मैंने महाभयंकर डोमपना पाया वह सर्व कृपा करके कहो ॥ ११०६॥ नोभणइ मुणियरिंदो, नरवर जीवाण इत्थ संसारे। पुवकयकम्मवसओ हवंति सुक्खाई दुक्खाई ॥११०७॥ अर्थ-तदनंतर मुनिवरीन्द्र कहे हे राजन इस संसारमें जीवोंके पूर्वकृतकर्मके उदयसे सुख दुःख होवे है सो सुना।। ११०७॥ इत्येव भरहवासे, हिरन्नपुरनामयंमि वरनयरे । सिरिकंतो नाम नियो, पावहिपसत्तओ अत्थि ॥११०८॥ अर्थनी भरतक्षेत्र में हिररायपुर नामका प्रधान नगरमें आखेटको आशक्त ऐसा श्रीकान्त नामका राजा था ।।११०८॥ तस्सस्थिसिरिसमाणा, सरीरसोहाइ सिरिमई देवी। जिणधम्मनिउणवुद्धी, विसुद्धसंमत्तसीलजुआ ११०९ श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१३५॥ अर्थ-धर्म चिंतामणि सदृश मनोज्ञ वांछित अर्थका देनेवाला है कैसा है धर्म निर्मल, निर्दोष केवलज्ञानरूप लक्ष्मीका बिस्तारके करनेवाला ॥ १०९१ ॥ कल्लाणिकमओ वित्त,-रूवे मेरुवमो इमो । सुमणाणं मणो तुढ़ि, देइ धम्मो महोदओ ॥ १०९२ ॥ अर्थ-धर्म कल्याण मंगलके करनेवाला मेरुपर्वतके सरीखा मेरु पक्षमें कल्याण नाम स्वर्णमय मेरु है और प्रसिद्ध है और मेरु पक्षमें वर्तुल मेरु है और बहुत ऊंचा है धर्मभी ऐसाही है धर्मकाभी बड़ा उदय है और शोभन स्वरूप है और यह धर्म शुद्ध मनवालोंको अर्थात् निर्दोष मनवालोंको संतोष देवे है मेरु पक्षमें देवोंके मनमें संतोष होवे है ॥ १०९२ ॥ सुगुत्तसत्तखित्तीए, सबस्सव य सोहिओ। धम्मो जयइ संवित्तो, जंबुद्दीवोवमो इमो ॥ १०९३ ॥ अर्थ-सर्व घरके सारसदृश अच्छी तरहसे रक्षा करी गई सात क्षेत्र जिनभवन १ जिनप्रतिमा २ पुस्तक ३ साधु ४ साध्वी ५ श्रावक ६ श्राविका ७ इन्होंकी जिसमें और सम्यक् आचार जिसमें ऐसा धर्म जम्बूद्वीपके जैसा सर्वोत्कृष्ट बों जम्बूद्वीपमेंभी भरतादिक सात क्षेत्र हैं और गोल आकार है इस वास्ते जम्बूद्वीपकी उपमा करी ॥ १०९३ ॥ एसो य जेहिं पन्नत्तो, तेवि तत्तं जिणुत्तमा । एयरस फलभूया य, सिद्धा तत्तं न संसओ ॥ १०९४॥ अर्थ यह धर्म जिन्होंने कहा है ऐसे तीर्थकरदेवभी तत्व कहे जावें हैं धर्मका फलभूत सिद्ध तत्व है इसमें सन्देह नहीं है ॥ १०९४ ॥ ॥१३५॥ ५ ।

दंसंता एयमायारं, तत्तमायरियावि हु । सिक्खायंता इमं सीसे, तत्तमुझावयावि य ॥ १०९५ ॥
अर्थ-उस धर्मरूप आचारको पालते हुए और उपदेश देते हुए आचार्यभी तत्व है तथा शिष्योंको यह धर्म सिखाते
हुए उपाध्यायमी तत्व कहे जावें हें ॥ १०९५ ॥
साहयंता इमं सम्म, तत्तरूवा सुसाहुणो । एयरस सदहाणेणं, सुतत्तं दंसणंपि हु ॥ १०९६ ॥
अर्थ-इम धर्मको सम्यक् प्रकारसे साधता हुआ सुसाधु तत्वरूप है इस धर्मके श्रद्धानसे जो सम्यक् दर्शन है वहभी
गोभन तल ॥ १०९६ ॥
गयस्सेवावयोहेणं, तत्तं नाणंपि निच्छयं । एयस्साराहणारूवं, तत्तं चारित्तमेव य ॥ १०९७ ॥
अर्थ-इन धर्म का अवबोध सम्यक्ज्ञान वस्तु निर्णयात्मक ज्ञान भी तत्व कहा जावे और इस धर्मका आराधनारूप
पारित्रभी तत्व है ॥ १०९७ ।।
इत्तो जा निजरातीए, रूवं तत्तं तवोवि य । एवमेयाई सवाइं, पयाइं तत्तमुत्तमं ॥ १०९८ ॥
अर्थ-इस नारित्रसे जो काफी निर्जरा वह सरूप जिसका ऐसा तपभी तत्व है इस प्रकारसे यह नवपद उत्तम
न:स्कृष्ट तत्व ॥ १०९८ ॥
नत्तो नवपई एसा, तत्तभूया विसेसओ। सवेहिं भवसत्तेहिं, नेया झेया य निचसो ॥ १०९९ ॥

श्रीपाल.
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१३६॥
अर्थ-इस कारणसे अनन्तरोक्त नवपदोंका समाहार नवपदी कहा जावे उसको सर्व भव्य प्राणियोंको तत्वभूत
समझना और ध्यान करना ॥ १०९९ ॥
एयं नवपयं भवा, झायंता सुद्धमाणसा । अप्पणो बेव अप्पंमि, सक्खं पिक्खंति अप्पयं ॥ ११०० ॥
अर्थ-ए नवपदीको जानके शुद्ध मनसे ध्याते हुए मनुष्य अपने आत्माको साक्षात् नवपदमई देखते हैं ॥ ११०० ॥
अप्पंमि पिक्खिए जं च, क्खणे खिज्जइ कम्मयं । न तं तवेण तिवण, जम्मकोडीहिं खिज्जए ॥११०१॥
अर्थ-आत्मा नवपदमई देखनेसे क्षणमात्रसे जो कर्म क्षय होवे वह कर्म तीव्रतपसे करोड़ जन्मसे भी नहीं क्षय होवे ११०१
ता तुज्झ भो महाभागा, नाऊणं तत्तमुत्तमं । सम्मं झाएह जं सिग्धं, पावेहाणंदसंपयं ॥ ११०२ ॥
अर्थ-तिस कारणसे अहो महाभाग्यवंतो आप यह उत्तम तत्व जानके अच्छी तरहसे जैसा बने वैसा ध्यावो जिस
कारणसे शीघ्र आनंद सम्पदा परम आल्हादरूप पावो ॥ ११०२॥
एवं सो मुणिराओ, काऊणं देसणं ठिओ जाव, ताव सिरिपालराया, विणयपरो जंपए एवं ॥११०३॥
अर्थ-वह अजितसेन मुनिराज इस प्रकारसे देशना देके जितने रहे उतने श्रीपालराजा विनयमें तत्पर होकर इस
प्रकारसे कहे ॥ ११०३ ॥
नाणमहोयहि भयवं, केण कुकम्मेण तारिसो रोगो।बालत्ते मह जाओ केण सुकम्मेण समिओ य॥११०४॥
॥१३६॥

अ- ज्ञानसमुद्र है भगवान किस कुकर्मसे मेरे बाल्य अवस्थामें वैसा रोग भया और किस सुकर्मसे शांत भया ।।११०४॥ केणं च कम्मणाई, ठाणे ठाणे य एरिसे रिद्धिं । संपत्तो तह केणं, कुकम्मणा सायरे पडिओ ॥ ११०५॥ अर्थ-किन कर्ममे मने ठिकाने २ ऐसी ऋद्धि पाई और किस कुकर्मसे में समुद्र में पड़ा ॥ ११०५॥ नह केण नीयकम्मेण, चेव कुंवत्तणं महाघोरं । पत्तोहं तं सवं, कहेह काऊण सुपसायं ॥ ११०६ ॥ अर्थ तथा किन नीच कर्मके उदयसे मैंने महाभयंकर डोमपना पाया वह सर्व कृपा करके कहो ॥ ११०६॥ नो भणइ मुणिवरिंदो, नरवर जीवाण इत्थ संसारे। पुवकयकम्मवसओ हवंति सुक्खाइंदुक्खाई॥११०७॥ अब-तदनंतर मुनिवरीन्द्र कहे हे राजन इस संसारमें जीवोंके पूर्वकृतकर्मके उदयसे सुख दुःख होवे है सो मुना ॥ ११०७॥ इत्येव भरहवासे, हिरन्नपुरनामयंमि वरनयरे । सिरिकंतो नाम नियो, पावहिपसत्तओ अत्थि ॥११०८॥ अर्थ-मी भरनक्षेत्र में हिररायपुर नामका प्रधान नगरमें आखेटकम आशक्त ऐसा श्रीकान्त नामका राजा था॥११०८॥ तस्सस्थिसिरिसमाणा, सरीरसोहाइ सिरिमई देवी। जिणधम्मनिउणबुद्धी, विसुद्धसंमत्तसीलजुआ ११०९ म

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१३७॥
अर्थ-उस राजाके शरीरकी शोभा करके लक्ष्मीसमान श्रीमती नामकी पटरानी है कैसी है श्रीमती देवी जिनधर्ममें
निपुण बुद्धि जिसकी और निर्मल सम्यक्त्व और ब्रह्मचर्य करके सहित ऐसी ॥ ११०९॥
तीए य नरवरिंदो, भणिओ, तुहनाह जुज्जइ न एवं। पावड्डिमहावसणं, निबंधणं नरयदुक्खाणं ॥१११०॥
अर्थ, उस श्रीमतीने राजासे कहा है स्वामिन् यह पापर्द्धि महाव्यसन तुमको युक्त नहीं है यह व्यसन नरकके
दुःखका कारण है ॥ १११० ॥
भीसणसत्थकरेहि, तुरयारूढेहिं जं हणिज्जंति । नासंतावि हु ससया, सो किर को खत्तियायारो ॥११११॥
अर्थ-भयंकर शस्त्र है हाथोंमें जिन्होंके ऐसे घोड़ोंपर सवार भए मनुष्य जो भागते हुए मृगादि जीवोंको मारे वह
क्या क्षत्रियोंका आचार है अपितु नहीं है ॥ ११११ ॥
जत्थ अकयावराहा, मया वराहाइणोवि निन्नाहा। मारिजति बराया, सा सामिय केरिसी नीई ॥१११२॥
अर्थ-जहां नीतिमार्गमें अपराधीको शिक्षा देनी ऐसा कहा है परन्तु जिन्होंने अपराध नहीं किया ऐसे मृग वराहा-
दिक दुर्बल जीव मारे जावे हे स्वामिन् यह कैसी नीति है ॥ १११२॥
हंतूण परप्पाणं, अप्पाणं जे कुणंति सप्पाणं । अप्पाणं दिवसाणं, कए य नासंति अप्पाणं ॥ १११३ ॥
॥१३७॥

अर्थ-पर जीवोंको मारके उन्होंके मांस करके अपने प्राणोंको बलवान करते हैं वह दुष्ट थोड़े दिनोंके लिए अपने
मात्मा का नाम करते हैं ॥ १११३ ॥
इन्चाइ जिणिंदागमउवएससहिं बोहियंतीए। तीए न सकिओसो, निवारिओ पाववसणाओ॥१११४॥
अर्थ---इत्यादि जिनागम सम्बन्धी सैकड़ों उपदेश देनेकर समझाया तौभी राजा पाप व्यसनसे नहीं निवृत्त भया॥१११४॥
अन्नविणे सो सत्तहिं, सपहिं उल्लंठदुवंठेहिं । मिययासत्तो पत्तो, कत्थवि एगंमि वणगहणौ ॥१११५॥
अर्थ-अन्य दिनमें बद श्रीकान्त राजा ७०० उलंठ बंठ पुरुपोंके साथमें मृगयामें आसक्त भया कोई गहन बनमें
प्राप्त भया ।। ११२५ ।।
दगुण तत्व पगं, धम्मझयसंजुयं मुणिवरिंदं । राया भणेइ एसो, चमरकरो कुठिओ कोवि ॥ १११६॥
अब-उम ननमें एक रजोहरन सहित मुनिवरिंदको देखके राजा बोले यह मक्खियों उड़ाने वास्ते चामर हाथमें
निम ऐमा कोई कोढ़ी दिसता है ॥ १११६ ॥
तं चेव भणंतेहिं, तेहिं वंठेहिं दुट्ठचित्तेहिं । उवसग्गिओ मुणिंदो, खमापरो लिगुलट्ठीहि ॥ १११७ ॥
अर्थ--ऐमा राजाके कहे हुए वचन बोलते हुए दुष्ट चित्तवाले वंठ पुरुषोंने मुनीन्द्रको पापाण लकड़ियोसे उपसर्ग
किया कैसा है मुनिवरीन्द्र क्षमा है प्रधान जिसके ऐसा ॥ १११७ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१३८॥
जह जह ताडंति मुणिं, ते दुट्ठा तह तहा समुल्लसइ । हासरसो नरनाहे, मुणिनाहे उसमरसोय ॥१११८॥
अर्थ-वह दुष्ट वंठ पुरुष जैसे २ मुनिको ताड़े वैसा २ राजाके हास्यरसका उल्लास होवे अर्थात् राजा हंसे और मुनि-
श्वरके शान्तरसका उल्लास होवे ॥१११८ ॥
ते कयमुणिउवसग्गा, निब्भग्गा हणियभूरिमियवग्गा। नरवइपुट्ठिविलग्गा, पत्ता निययंमि नयरंमि १११९
अर्थ-किया मुनिको उपसर्ग जिन्होंने ऐसे इसि कारणसे भाग्यहीन और मारे हैं मृगसमूह जिन्होंने ऐसे वंठ पुरुष
राजाके पीछे लगे हुए अपने नगरमें आए ॥ १११९ ॥
अन्नदिणे सो पुणरवि, राया मिगयागओ नियं सिन्नं । मुत्तूण हरिण-पुट्ठीइ, धाविओ इक्कगो चेव ॥११२०॥
अर्थ-अन्यदिनमें राजा मृगयागयाभया अपने सैन्यको पीछे छोड़के अकेला हरिणके पीछे घोड़ेको दौड़ाया ११२०
नइतडवणे निल्लुक्को, सो हरिणो नरवरो तओ चुक्को । जा पिच्छइ ता पासइ, नइउवकंठे ठियं साहुं ११२१
अर्थ-वह हरिण नदीके तटपर जो वन वहां सघन वृक्षों करके आच्छादित होनेसे उस वनमें नहीं देखनेमें आया
तब राजा मृगसे चूका हुआ जितने इधर उधर देखता है उतने नदीके किनारेपर काउसग्गमें खड़ा हुआ एक मुनीको
देखा ॥ ११२१॥
तं दट्ठणं पावेण, तह पिल्लिओ मुणि-वरिंदो । सहसत्ति जहा पडिओ, नईजले तो पुणो तेण ॥ ११२२ ॥
॥१३८॥

*
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अर्थ-उन माधुको देसके उन क्रूर राजाने वैसी हाथोंसे प्रेरणा करी कि जिससे मुनीन्द्र अकस्मात नदीके पानीमें
निग नगंतर औरभी उन राजाने ॥ ११२२ ॥
संजायकिंपि करुणा,-भावणं कहिऊण सो मुक्को। को जाणइ जीवाणं, भावपरावत्तामइ-विसमं ॥११२३॥
पान भवा कुछ दयाका परिणाम ऐसे राजाने उस मुनीन्द्रको उसी वक्त जलसे निकालके नदीके तटपर
गना या हरे भया मो कहते हैं जीवोंके भाव परावर्तन अति विषम है कौन जाने अतिशय ज्ञानी विना कोई जानसके
नयी पहले गिगनेका भाव हुआ पीछे निकालनेका परिणाम भया ॥ ११२३ ॥
गिहमागगण तेणं, नियावयाओ निवेइओ सहसा।सिरिमइदेवी पुरओ, तीए य निवो इमं भणिओ ११२४
जय-घर आके राजाने शीघ्रही श्रीमती रानीके आगे अपना निर्गल भाव कहा याने मैंने आज एक मुनिको नदीसे
बाहर निकाला नाद श्रीमतीने राजासे यह कहा ॥ ११२४ ॥
अन्नेसिपि जियाणं, पीडा-करणं हवेइ कडुय-फलं जंपुण मुणिजणपीडा, करणं तं दारुणविवागं ॥११२५॥
अर्थ-औरभी जीवोंको पीडाका करना उसका कड़वा फल है और जो मुनिजनको पीडाका करना वह भयंकर
विपाक पर देनेवाला है ॥ ११२५ ।।
जओ साणं हीलाप, हाणी हासेण रोयणं होइ । निंदाइ बहो बंधो, ताडणया बोहिमरणाई ॥११२६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१३९॥
अर्थ-जिस कारणसे शास्त्रमें कहा है साधूकी हीलना करनेसे घरमें हानि है होवे साधुओंका हास्य करनेसे रोना होवे
है साधुओंकी निंदा करनेसे वध बंधन होवे है साधुओंकी ताड़ना करनेसे रोग और प्राणवियोगादि होवे है ॥ ११२६ ॥
मुणिमारणेण जीवाण,-णंत संसारियाण बोही वि। दुलहा च्चिय होइ धुवं, भणियमिणं आगमेवि जओ२७
अर्थ-मुनिके मारनेसे अनंत संसार बधे है और उन जीवोंको जिनधर्मकी प्राप्तिभी निश्चय दुर्लभ होवे है जिस कार-
णसे सिद्धान्तमेंभी कहा है ॥ ११२७ ॥
चेइयदबविणासे, इसिघाए पवयणस्स उड्डाहे । संजइ चउत्थभंगे, मूलग्गी बोहिलाभस्स ॥ ११२८ ॥
अर्थ-जिनमंदिरके द्रव्यका विनाश करे अर्थात् भक्षण उपेक्षणादिकसे मूलसे विध्वंस करे तथा साधुका घात करनेसे
और प्रवचन चतुरविध संघका उड्डाह कलंक वगैरह देनेकर अपवाद करने में तथा साध्वीका चौथा व्रत ब्रह्मचर्यके भंग
करनेमें इतने कामोंमें हरकोई काम करनेवाला बोधिलाभ अर्हत् धर्मकी प्राप्तिके मूलमें अग्नि दिया इस कहनेसे यह
अनन्तरोक्त करनेसे जन्मांतर में धर्मकी प्राप्ति दुर्लभ है यह आवश्यक नियुक्तिमें कहा है ॥ ११२८ ॥
तं सोऊण नरिंदो, किंपि समुल्लसियधम्मपरिणामो।पभणेइ अहं पुणरवि, न करिस्संएरिसमकजं ॥११२९
अर्थ-वह रानीका वचन सुनके राजाका धर्ममें परिणाम भया और बोला मैं अब ऐसा अकार्य नहीं करूंगा ११२९
कइवयदिणेसु पुणरवि, तेण गवक्खट्ठिएण कोविमुणी। दिट्ठोमलमलिणतणू, गोयरचरियं परिभमंतो३०
॥ १३९॥

chc' 1- अर्थ-फितने दिनके बाद और भी गोसड़में बैठे हुए राजाने कोई मुनिको देखा कैसा मुनि पसीनेसे आला भया गरीरमें मैल जिमके उनीगे मला है शरीर जिसका ऐमा और गोचरी फिरता हुआ ॥ ११३० ॥ तत्तो सहसा वीसारिऊण, तं सिरमईइ सिक्खंपि । सोराया दुट्ठमणो, नियवंठे एवमाइसइ ॥ ११३१॥ अर्थ--गुनि देख्यों के अनन्तर दुष्टमन जिसका ऐसा राजा अकस्मात श्रीमतीकी दी भई सिखावनको भूलके अपने वंठ पुरुषों को ऐसी आज्ञा देवे ।। ११३१ ॥ २रे एवं कुंवं, नवरं विद्यालयंतमम्हाणं । कंठे चित्तूण दुयं, निस्सारहनयरमज्झाओ ॥ ११३२ ॥ -अरे २. सेव को हमारा नगर विटालता हुआ अर्थात् अशुद्ध करता हुआ इस डोमको गल हत्था देके शीघ्र नगरम बाहिर निकालो ॥ ११३२ ॥ नेहिं नरेहिं तहञ्चिय, कतिबंतो पुराउ सो साहू । निययगवक्खठियाए, दिट्ठो तीए सिरिमईए ॥ ११३३॥ अर्थ-इन प्रकारले राजाने कयों के बाद उन वंठ पुरुषोंने नगरसे निकालता हुआ उन साधुको अपने गवाक्षमें दी गई श्रीमतीने देगा ।। ११३३ ।। तो वियाग नीग, राया निभच्छिओ कडुगिराए। तो सो विलजिओ भणइ, देवि मे खमसु अबराहं ३४

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
अर्थ-तदनंतर क्रोधातुर भई रानीने कटुक वाणीसे राजाकी निर्भर्त्सना करी तब राजा लज्जित होके बोला हे देवी
मेरा अपराध क्षमा करो और ऐसा नहीं करूंगा ॥ ११३४ ॥
सो मुणिनाहोरन्ना, तत्तो आणाविओ नियावासं। नमिओय पूइओ खामिओ य, तं निययमवराहं ११३५
अर्थ-तदनंतर राजाने उस मुनिनाथको अपने घर बुलाया और नमस्कार किया वस्त्रादिकसे पूजा और अपना
॥१४०॥
अपराध क्षमा कराया ॥११३५ ।।
पुट्ठो य सिरिमईए, भयवं अन्नाणभावओ रन्ना। साहूणं उवसग्गं, काऊण कयं महापावं ॥ ११३६ ॥
अर्थ-श्रीमतीने पूछा हे भगवन् राजाने अज्ञान भावसे साधुओंको बहुत उपसर्ग करके महापाप उपार्जन किया है
तप्पावघायणत्थं, किं पि उवायं कहेह पसिऊणं । जेण कएण एसो, पावाओ छुट्टइ नरेसो ॥ ११३७ ॥
अर्थ-उस पापका विनाश करने के लिए प्रसन्न होके कोई उपाय कहो जिस उपाय करनेसे यह राजा पापसे छूटे ॥
तो भणइ मुणिवरिंदो, भद्दे पावं कयं अणेण घणं । जंगुणिणो उवघाए, सबगुणाणंपि उवधाओ॥११३८॥
अर्थ-तब मुनिवरीन्द्र कहे हे भद्रे इस राजाने बहुत पाप किया है जिस कारणसे गुणवान पुरुषका विनाश करने-
से सव गुणोंका उपघात होवे है ॥ ११३८ ।
तहवि कयदुक्कयाणवि, जियाण जइ होइ भावउल्लासो।ता होइ दुक्याणं, नासो सबाणविखणेणं ११३९
॥१४०॥

अर्थ तथापि किया है पाप जिन्होंने ऐसे प्राणियों के जो भावका उहास शुभ परिणामकी वृद्धि होवे तो सब पापका भोको नाग होये ॥ ११३९ ॥ भावस्सुवासकर, अरिहाइपसिद्धसिद्धचकरस । आराहणं मुणीहि, उबटुं भवजीवाणं ॥ ११४०॥ अर्थ-भावके महान करने के लिए अहंदादि पदों करके प्रसिद्ध सिद्धचक्रका आराधन भव्य जीवोंके वास्ते मुनि- गौने कहा है ।। ११४०॥ ता जड़ करेइ सम्म, एयस्साराहणां नरवरोवि । ता छुट्इ सयलाणं, पावाणं नस्थि संदेहो ॥११४१॥ अर्थ-तिम कारणमे राजाभी जो अच्छीतरहसे सिद्धचक्रका आराधन करे तो सर्व पापांसे छूटे इसमें सन्देह नहीं 11 ११४१॥ तो सिक्खिऊण प्रया, तबोविहाणाइयं विहिं राया। भत्तीइ सिद्धचकं, आराहइ सिरिमइसमेओ ११४२ अर्थ-तदनंतर राजा पूजा और तपका जो करना इत्यादि विधि सीसके श्रीमतीरानी सहित भक्तिसे सिद्धचक्रका आराधन कर॥ ११४२॥ पुन्ने अतयोकम्मे, रन्ना मंडाविए य उज्जमणे । सिरिमइसहीहिं अट्ठहिं, विहिया अणुमोयणा तस्स ११४३ ॐ

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१४१॥
अर्थ-और तप क्रिया पूरण होनेसे राजाने उज्जवणा मांडा तव आठ श्रीमतीरानीकी सखियोंने उजवणा सहित
तपकी अनुमोदना प्रशंसा करी ॥ ११४३ ॥
सत्तहिं सएहिं तेहिं, सेवयपुरिलेहिं तस्स नरवइणो । दट्टणं धम्मकरणं, पसंसियं किंपि खणमित्तं ११४४
अर्थ-सातसै ७०० सेवक पुरुषोंने राजाको धर्मकार्य कर्ताहुआ देखके क्षणमात्र कुछ प्रशंसा करी आजकल तो
अपना स्वामी सम्यक कार्य करे है इत्यादि प्रशंसा करते भए ॥ ११४४ ॥
ते अन्नदिणे राया,-एसेणं सीहनामनरवइणो । हणिऊण गाममिकं, जा वलिया गोधणं गहिउं ११४५
अर्थ-अन्यदिनमें वह ७०० पुरुष राजाकी आज्ञासे सिंहनामके राजाका एक गाम लूटके गायां वगैरह लेके जित-
ने पीछे चले ॥ ११४५ ॥
ता पुट्टि पत्तो सीहो, बहुबलकलिओ पयंडभुयदंडो। तेण कुविएण सवे, धाडय पुरिसा हया तत्थ ११४६
अर्थ-उतने बहुत सैन्ययुक्त और प्रचंड भुजदंड जिसके ऐसा सिंहराजा पीछे आया क्रोधातुर भया ऐसा सिंह
राजाने उस प्रदेशमें सर्व धाड़के पुरषोंको मारे ॥ ११४६ ॥
तेवि मरिऊण-खत्तिय, पुत्ता होऊण तरुणभावेवि । साहूवसग्गपाव,-प्पसायओ कुट्ठिणो जाया ॥११४७॥
॥१४१॥

अथवा नातमै ७०० राजाके सेवक मरके क्षत्रियोंके पुत्र होके यौवनअवस्था भी साधुवोंको किया उपसर्ग इन पापके प्रसादसे कोढ़ी भए ।। ११४७ ।। जो सिरिकंनो राया, पुन्नपभावेण सो तुमंजाओ। सिरिमइजीवो मयणा,-सुंदरि एसा मुणियतत्ता ११४८ अर्थ-जो मिरिकान्न राजा था वह पुण्यके प्रभावसे तै भया श्रीमतीरानीका जीव यह मदनसुंदरी भई कैसी है रह मदनगंदरी जाना है तत्व जिसने ऐसी ॥ ११४८ ।। जं गुनिपि हु धम्मुजमपरा, तुहहिचिकतल्लिच्छा।आसि इमा तं जाया, एसा तुह मूल पहमि ॥११४९॥ अर्थ-निशय निग कारणसे पूर्वभवमेंभी धर्ममें उद्यम करनेमें तत्परथी और तेरे हितकरनेकी इच्छा जिसकी ऐसीर्थी तिन फारण वह तेरी मूल पटरानी हुई ॥ ११४९॥ तुमग जहा मुणीणं, विहिया आसायणा तहाचेव । कुद्वित्तं जलमजण,-मवि डुबत्तं च संपत्तं ॥११५०॥ अर्थ-तैने जिम २ प्रकार मुनियोंकी आशातना विराधना करी उस २ प्रकारसे तैंने इस भवमें कोढ़ीपना समुद्र में गिरना और दूमपना पाया ॥ ११५० ।। जंच तप तीण सिरिमईइ, वयणेण सिद्धचकरस । आराहणा कया तं, मयणावयणा सुहं पत्तो ॥११५१॥ ।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥ १४२॥
अर्थ-और जो तैंने उस श्रीमतीके वचनसे सिद्धचक्रकी आराधना करी इस कारणसे यहां मदनसुंदरीके वचनसे
सुख पाया ॥ ११५१ ॥
जो एसो वित्थारो, रिद्धिविससस्स तुज्झ संजाओ।सो सयलोवि पसाओ, नायवो सिद्धचक्कस्स ॥११५२॥
अर्थ-वह यह तेरे रिद्धिविशेपका विस्तार भया सो सर्व श्रीसिद्धचक्रका प्रसाद अनुग्रह जानना ॥ ११५२॥
सिरिमईसहिहिं जाहिं, विहिया अणुमोयणा तया तुम्ह। ताओ इमाओजायाओ, तुज्झ लहुपट्टदेवीओ५३
अर्थ-जिन श्रीमतीकी सखियोंने तुम्हारी अनुमोदना करी थी वह तेरी यह छोटी पटरानियों भई ॥ ११५३ ॥
एयासु अट्ठमीए, ससवित्तीसंमुहं कहियमासि । खज्जसु सप्पेण तुमंति, तेण कम्मेण सा दट्ठा ११५४
अर्थ-इन आठोंमें आठवीं रानीने पूर्वभवमें अपनी शोकके सन्मुख कहा था तेरेको सर्प खावो इसी कर्मसे इस
भवमें सर्पने डसी ॥ ११५४ ॥
धम्मपसंसाकरणेण, तत्थ सत्तहिं सएहिं सुहकम्म।जं विहियं तेण इमे, गयरोगा राणया जाया ११५५
अर्थ-धर्मकी प्रशंसा करने कर पूर्व भवमें ७०० सेवक पुरपोंने जो शुभकर्म किया उस शुभ कर्मसे गया रोग
जिन्होंका ऐसे ये राना भए ॥ ११५५ ॥
सीहो य घायविहुरो, पालित्ता मासमणसणं दिक्खं । जाओहमजियसेणो, बालत्ते तुज्झ रज्जहरो ११५६
॥१४२॥

4-मिंट नामका राजा प्रहारोंसे पीड़ित भया एक महीनेकी अनशन सहित दीक्षा पालके में अजितसेन राजा मा मैं बाल्य अवस्थामें तेरा राज्य लेनेवाला ऐसा ॥ ११५६ ॥ नणंचिय वरेणं, बद्धोहं राणपहिं एहिं । पुवकयभासेणं, जाओ मे चरणपरिमाणो ॥ ११५७ ॥ अथ उसी वैरगे इन राणाओंने मेरेकू बांधा पूर्वभवमें जो कीना दीक्षाका अभ्यास उससे मेरा चारित्रका परिणाम भवा ॥ १२५७॥ मुद्धपरिणामेण मग, जाई सरिऊण संजमो गहिओ। सोहं उपन्नावहि, नाणो नरनाह ? इह पत्तो ११५८ अर्थ-मने शुभपरिणामसे जातिस्मरण पाके संयम ग्रहण किया हे नरनाथ उत्पन्न भया है अवधिज्ञान जिसको ऐमा में यहां आया हूँ ॥ ११५८ ॥ एवं जंजेण जहा, जारिसकम्मं कयं सुहंअसुहं । तंतस्स तहा तारिस,-मुवट्ठियंमुणसु इत्थ भवे ॥११५९॥ अर्थ-इस प्रकारसे जिस प्राणीने जो शुभ अशुभ जैसा कर्म किया उस प्राणीके वह वैसा कर्म इस भवमें उसी प्रका- रमे मीपमें रहा दुआ जानो ॥ ११५९ ।। नं सोऊणं सिरिपाल, नरवरो चिंतए सचित्तंमि । अहह अहो केरिसयं, एयं भवनाडयसरूवं ॥११६०॥ ANS

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१४३ ॥
अर्थ-श्रीपालराजा वह मुनिका बचन सुनके अपने मनमें विचारे अहह इति खेदे अहो इति आश्चर्ये यह भवनाट-
कका स्वरूप कैसा अति विषम वर्ते है ॥ ११६० ॥
पभणेइ य मे भवयं, संपइ चरणस्स नत्थि सामत्थं । तो काऊण पसायं, मह उचियं दिसह करणिज्ज ११६१
अर्थ और राजा श्रीपाल कहे हे भगवन् इस वक्तमें मेरा चारित्र ग्रहण करनेका सामर्थ्य नहीं है इसलिए प्रसन्न
होके मेरेयोग्य धर्मकर्तव्य आज्ञा करो ॥ ११६१ ॥
तो भणइ मुणिवरिं-दो, नरवर जाणेसुनिच्छयं एयं। भोगफलकम्मवसओ, इत्थभवे नत्थि तुह चरणं ६२
अर्थ-तदनंतर मुनिवरीन्द्र कहे हे नरवर यह निश्चय जानो भोगफलकर्मके वशसे इस भवमें तेरे चारित्र नहीं
है ॥ ११६२॥
किं तु तुमं एयाई, अरिहंताई नवावि सुपयाई। आराहंतो सम्म, नवमं सग्गपि पाविहिसि ॥११६३॥
अर्थ-किंतु तैं यह अहंदादि नव शोभन पदोंको अच्छीतरहसे आराधन कर्ता हुआ नवमा आनतनामका देवलोक
पावेगा ॥ ११६३ ॥
तत्तोवि उत्तरुत्तर, नरसुरसुक्खाइं अणुहवंतो य । नवमे भवंमि मुक्खं, सासयसुखं धुवं लहसि ॥११६४॥
॥१४३॥

अर्थ-और उन नवमे देवलोकसे भी अधिक २ मनुष्य देवका सुख भोगवता हुआ नवमे भवमें निश्चय शाश्वत सुख महा ऐसा मोक्ष पायेगा ।। ११६४ ॥ तं सोऊणं गया, साणंदो नियगिहमि संपत्तो। मुणिनाहोवि हु तत्तो, पत्तो अन्नत्थ विहरंतो ॥ ११६५ ॥ अर्थ-वर मुनिका वचन सुनके राजा श्रीपाल आनंदसहित होके अपने घर गया तदनंतर मुनीन्द्रभी विहार करके और नगगदिक गए ।। ११६५ ।। सिरिपालोचि हु राया, भनीए पिययमाहिं संजुत्तो। पुव्बुत्तविहाणेणं, आरहइ सिद्धवरचकं ॥ ११६६ ॥ अर्थ-धीपालराजाभी नवरानियों महित भक्तिकरके पूर्वोक्त विधिसे सिद्धचक्रका आराधन करे ।। ११६६ ॥ अह मयणमुंदरी भणइ, नाह ? जड्या तए कया पुविं । सिरिसिद्धचक्रपया, तइया नो आसि भूरिधणं ६७ अर्थ-मथ मदनसुंदरी राजासे कहे हे नाथ जब आपने पहले श्रीसिद्धचक्रकी पूजा करी थी तब बहुत धन नहीं KARECRACCORICORRC गा।। ११६७ ॥ हि च तुम्ह "सा, रजसिरी अस्थि वित्थरसमेया। ता कुणह वित्थरेणं, नवपय पूर्व जहिच्छाए ११६८ अर्थ- इस वक्त आपके यह राज्यलक्ष्मी विस्तार सहित है इस कारणसे आप अपनी इच्छासे विस्तार विधिसे गरपदोंकी पूजा करो ॥ ११६८ ।।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषादीका-
सहितम्.
॥१४४॥
तं सोऊणं अइगुरुयं, भत्तिसत्तीहिं संजुओ राया। अरिहंताइपयाणं, करेइ आराहणं एवं ॥ ११६९ ॥
अर्थ-वह मदन सुंदरीका बचन सुनके अत्यन्त भक्ति शक्ति सहित राजा वक्ष्यमाण प्रकारसे अहंदादि पदोंका आरा-
धन करे ॥ ११६९॥
नव चेईहर पडिमा, जिन्नुद्धाराइ विहिविहाणेणं । नाणाविहप्याहिं, अरिहंताराहणं कुणइ ॥ ११७० ॥
अर्थ-सो कहते हैं नवजिनमंदिर नवप्रतिमा नवजीर्णोद्धार इत्यादिक विधिसे करवाके अनेकप्रकारकी
करके अहंत पदकी आराधना करे ॥ ११७० ॥
सिद्धाणवि पडिमाणं, कारावणप्यणापणामे हिं । तग्गयमणझाणेणं, सिद्धपयाराहणं कुणइ ॥ ११७१ ॥
अर्थ-सिद्धोंकी प्रतिमाका कराना और पूजा करना नमस्कार करना और सिद्धोंमें मन जिसका ऐसा ध्यान करने
कर सिद्धपदका आराधन करे ॥ ११७१॥
भत्तिबहुमाणवंदण,-वेयावच्चाइकज्जमुज्जुत्तो। सुस्सूसणविहिनिउणो, आयरियाराहणं कुणइ ॥११७२॥
अर्थ-भक्ति मनमें निर्भरप्रीति बहुमान वाह्यप्रतिपत्ति वंदना वेयावञ्च इत्यादि कार्यों में उद्यमवान तथा सेवाकर-
नेका विधिमें निपुण ऐसा राजा आचार्यपदकी आराधना करे ॥ ११७२ ॥
ठाणासणवसणाई, पढंतपाढंतयाण पूरंतो । दुविहभत्तिं कुणतो, उवझायाराहणं कुणइ ॥ ११७३ ॥
॥१४४॥

अर्थ-पढ़ता हुआ पढाता हुआ साधु वगैरहको रहनेको स्थान और भोजन वस्त्रादि पूर्ण करताहुआ द्रव्य भावसे
गति करता हुआ उपाध्याय पदकी आराधना करे ।। ११७३ ॥
अभिगमणवंदणनमंसणेहिं, असणाइवसहिदाणेहिं । वेयावच्चाईहिं य, साहुपयाराहणं कुणइ ॥११७४॥
अर्थ-सामने जाना स्तुति करना नमस्कार करना और आहार वगैरह और उपाश्रय देने करके इत्यादि वेयावच्च
करने करके साधु पदका आराधन करे ।। ११७४ ॥
रहजत्ताकरणेणं, सतित्यजत्ताहिं संघप्याहिं । सासणपभावणाहि, सुदंसणाराहणं कुणइ ॥ ११७५ ॥
अर्थ-रथयात्रा करनेकर तीर्थयात्रा और संघपूजा करनेकर शासनकी प्रभावना करनेसे सम्यकदर्शन पदका
भाराथन करे ।। ११७५ ।।
सिद्धतसत्यपुत्थय,-कारावणरक्खणचणाईहिं । सज्झायभावणाहिं, नाणपयाराहणं कुणइ ॥ ११७६ ॥
अर्थ-मिसान्तका पुस्तक लिसाने करके और यनसे रक्षा करनेकर और धूप चंदन वस्त्रादिकसे पूजना और स्वा.
ध्याय वाचनादि पांच प्रकारका करनेसे तथा भावना ज्ञानका स्वरूप विचारने रूप करके ज्ञानपदकी आराधना करे ।।
वयनियमपालणेणं, विरइक्कपराण भत्तिकरणेणं । जइधम्मणुरागेणं, चारित्ताराहणं कुणइ ॥ ११७७ ॥

• श्रीपाल-
चरितम्
भापाटीका
सहितम्.
॥१४५॥
अर्थ-व्रत अणुव्रत और नियम अभिग्रहादिक पालने करके तथा विरति सावधव्यापारनिवृत्तिही एक उत्कृष्ट
जिन्होंके ऐसे साध्वादिकोंकी भक्ति करनेकर दशप्रकारका यतिधर्मपर प्रीति रखनेकर चारित्रपदका आराधन करे ॥७७॥
आसंसाइविरहियं, बाहिरमम्भितरं तवोकम्मं । जहसत्तीइ कुणंतो, सुद्धतवाराहणं कुणइ ॥ ११७८ ॥
अर्थ-आसंसा इसभव परभवके सुखकी वांछाकरके रहित ६ वाह्य उपवासादि ६ अभ्यंतर प्रायश्चित्तादि यह बारह
प्रकारका तप यथाशक्ति अपनी शक्तिके अनुसार करता हुआ निर्मल तपकरने करके तपपदका आराधन करे ॥११७८॥
एवमेयाइं उत्तमपयाई, सो दवभावभत्तीए । आराहतो सिरिसिद्ध,-चकमञ्चेइ निच्चपि ॥ ११७९ ।।
अर्थ-इस प्रकारसे राजा श्रीपाल यह उत्तमपद द्रव्यभावभक्तिसे आराधता हुआ निरंतर श्रीसिद्धचक्रकी पूजा करे ७९
एवं सिरिपालनिवस्स, सिद्धचकच्चणं कुणंतस्त । अद्धपंचमवरिसेहि, जा पुन्नं तं तवो कम्मं ॥ ११८० ॥
अर्थ-इस प्रकारसे श्रीसिद्धचक्रकी पूजा करते श्रीपालराजाको साढाचार वर्ष भए उतने वह तप सम्पूर्ण भया॥४०॥
तत्तो रन्ना नियरजलच्छि,-वित्थारगरुयसत्तीए । गुरुभत्तीए कारिउ,-मारद्धं तस्स उज्जमणं ॥११८१॥
अर्थ-तदनंतर राजाश्रीपालने अपनी राज्यलक्ष्मीका जो विस्तार उस करके और बड़ी शक्ति और भक्ति सहित उस
तपका उज्जवना करना प्रारंभ किया ॥ ११८१॥
॥ १४५॥

कस्थवि विछिन्ने जिणहरंमि, काउंतिवेइयं पीढं । वित्थिपणं वरकुहिम,-धवलं नवरंगकयचित्तं ॥११८२॥ अर्थ-कहांनी वीग्नीर्ण जिनमंदिरमें तीनवेदी विस्तीर्ण प्रधान भूमि करके उज्वल नवीन रंजक द्रव्योंसे किया है मानित जिममें ऐमा पीठ करवाके ॥ ११८२ ॥ सालिपमुहेहिं धन्नहि, पंचवन्नेहिं मंतपूपहिं । रइऊण सिद्धचकं, संपुन्नं चित्तचुजकरं ॥ ११८३ ॥ अर्थ-माति प्रमुल पांचवणों के धान्यों करके चित्तको आश्चर्य करनेवाली सिद्धचक्रकी रचना कराके ॥ ११८३ ॥ तत्यय अरिहंताइसु, नवसु पएसु ससप्पिखंडाइं । नालियरगोलयाई, सामन्नेणं ठविनंति ॥११८४॥ अर्थ यहां सिद्धचरुके अहंदादि नवपदोंमें सामान्य प्रकारसे घी खांडसे भराहुआ नारियलका गोला स्थापे ११८४ तेण पुणो नरवड़णा, मयणासहिएण वरविवेएण । ताइंपि गोलयाई, विसेससहियाई ठवियाई ११८५ अर्थ-और मदनसुंदरी सहित श्रीपालराजाने वह गोला विशेषवस्तुसहित चढ़ाया कैसा राजा विवेकसहित वर्ते ऐमा! कसे मो कहते हैं ।। ११८५ ॥ जहा अरिहंतपण धवले, चंदणकप्पूरलेवसियवन्नं । अडककेयणचउतीस,-हीरयं गोलयं ठवियं ॥११८६॥ अर्थ-धरल वर्ण करके व्यवस्थापित गर्हतपदमें चंदन कपूरका विलेपन करनेसे श्वेतवर्ण जित्तका ऐसा और आठ

भाषाटीका-
सहितम्.
श्रीपाल-
चरितम्
k
॥१४६॥
करकेतन श्वेतरत्न विशेष और चौतीस हीरा सहित गोला चढाया आठ प्रातिहार्यकी अपेक्षा आठकरकेतनरत्न और
चौंतीस अतिशयकी अपेक्षा चौंतीस हीरा चढाया ॥११८६ ॥
सिद्धपए पुण रत्ते इगतीसपवालमट्ठमाणिकं । नवरंगघुसिणविहियप्पलेवगुरुगोलयं ठवियं ॥११८७॥
अर्थ-लालवर्ण करके व्यवस्थापित सिद्धपदमें इकतीस मुंगिया और आठ माणिक सहित नवीन रक्तत्वयुक्त केसर-
का विलेपन किया जिसमें ऐसा गोला चढावे ॥ आठकर्मके क्षय होनेसे उत्पन्न हुआ आठ गुण उन्होंकी अपेक्षा आठ माणिक
चढाए इकतीस गुणकी अपेक्षा इकतीस प्रवाला चढाया ॥ ११८७ ॥
कणयाभे सूरिपए, गोलं गोमेयपंचरयणजुयं । छत्तीसकणयकुसुमं, चंदणघुसिणंकियं ठवियं ॥११८८॥
अर्थ-सोनेके जैसा वर्ण ऐसे आचार्यपदमें पांचगोमेदरत्न और छत्तीस सोनेके पुष्पसहित चंदनकेसरका विले-
पन सहित गोला चढाया ज्ञानादि पांच आचारयुक्त होनेसे पांच गोमेद रत्न और छत्तीसगुणयुक्त होनेसे छत्तीस सोनेके
पुष्प चढाए॥११८८ ।।
उज्झायपए नीले, अहिलयदलनीलगोलयं ठवियं । चउरिंदनीलकलियं, मरगयपणवीसपयगजुयं ११८९
अर्थ-नीलवर्णसे व्यवस्थापित उपाध्याय पदमें नागरवेल के पत्रोंसे वीटा हुआ गोला चढाया ४ इन्द्रनील नीलमणि
॥१४६॥

K
युक्त २५ पनेकी मणिमहित चार अनुयोगकी अपेक्षा चारइन्द्रनीलमणि पच्चीसगुणकी अपेक्षा पञ्चीसमरकतमणि सहित
गोला पढाया ।। ११८९ ॥
साहुपाए पुण सामे, समयमयं पंचरायपदकं । सगवीसरिट्ठमणिं, भत्तीए गोलयं ठवियं ॥ ११९० ॥
अब-श्यामवर्णसे व्यवस्थापित साधुपदमें कस्तूरीका विलेपन सहित पांचराजपट्ट वेराट रलो करके शोभा जिसकी
नया पांच राजपट उत्संगमें अर्थात् मध्यमें जिसके और सत्ताईस नीलम रत विशेष जिसमें ऐसा गोला भकिसे चढाया
पांच महारतकी अपेक्षा पांच राजपट्ट और सत्ताईस गुणकी अपेक्षा उतनेही नीलम चढावे ॥ ११९० ॥
सेसेमु सियपरामु, चंदणसियगोलए ठवइ राया। सगसट्ठिगवन्नसयरि,-पन्नमुत्ताहलसमेए ॥११९१॥
अर्थ-अपशेष दर्शनादि चारपदोंमें श्रीपालराजाने चंदनका विलेपनसहित धवला गोला चढ़ाया कैसा गोला ६७
मामट, '५१ मावन ७० सित्तर ५० पचाम मोतियों करके सहित यहां यह भावहै दर्शन पदमें-४ श्रद्धान ३ लिङ्ग
इत्यादि ६७ सदमठ भेद है ज्ञानपदका स्पर्शनइन्द्रियव्यंजनावग्रहादि ५१ इक्कावन भेद है चारित्रका व्रत ५ श्रमणधर्म
१० गंवम १७ इत्यादि ७० भेद हे तप पदका इत्वरअनशनादि ५० भेद है इतनाही मोती चढ़ावे ॥ ११९१ ॥
अन्नं च नवपयाणं, उद्देसेणं नरेसरे तत्थ । तत्तवन्नाई सुमेरु, मालाचीराइं मंडेइं ॥ ११९२ ॥
अर्थ और राजा श्रीपाल नवपदोंको उद्देश करके उस पीठपर उस वर्णका सुमेरु माला, वस्त्र वगैरह चढावे ॥११९२॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१४७॥
।
सोलस अणाहएसु य, गरुयाई सकराइ लिंगाई। मंडावेइ नरिंदो, नाणामणिरयणचित्ताई ॥११९३॥
अर्थ और सोलह अनाहतोंमें सोलह शर्कराका ढिगला करे नानाप्रकारके मणिरत्नों करके विचित्र ऐसे मंडावे ११९३
इगिसोलसपंचसु सीइ, दोसु चउसद्धि सरसदक्खाओ। कणयकचोलियाहिं, मंडावइ अठवग्गेसु ११९४
अर्थ-आठ वर्गों में पहले अवर्गमें सोलह सरसदाख पांच वर्गों में एक २ में सोलह २ चढानेसे ८० दाख और दोवर्ग
यवर्ग शवर्गमें बत्तीस २ दाख चढानेसे ६४ यह दाख सोनेकी कटोरियोंमें चढावे ॥ ११९४ ॥
मणिकणगनिम्मियाइं; नरनाहो अट्ठवीयपूराई । वग्गंतरगयपढमे, परमेट्ठिपयंमि ठावेइ ॥ ११९५ ॥
अर्थ-राजा श्रीपाल मणिरत्न और सोनेसे रचे हुए आठ विजोरेके फल वर्गोके अंतरमें रहा हुआ प्रथम परमेष्ठी
पद नमो अरिहन्ताणं इसमें स्थापे ॥ ११९५ ॥
खारिकपुंजयाई ठावइ, अडयाललद्धिठाणेसु । गुरुपाउयासु अठ्ठसु, नाणाविहदाडिमफलाई ॥११९६॥
अर्थ-अड़तालीस ४८ लद्धि पदोमें खारिकका ढिगला करे और आठ गुरुपादुकामें नानाप्रकारके दाडिमके फल
चढावे ॥११९६ ॥
नारिंगाइफलाइं, जयाइठाणेसु अट्ठसु ठवेइ । चत्तारि उ कोहलए, चक्काहिट्ठायगपएसु ॥ ११९७ ॥
॥१४७॥

65655
अर्थ-तया गाठ ८ जयादि स्थानोमें नारंगी वगैरहके फल चढावे और सिद्धचक्रके अधिष्ठायक विमलेश्वर १ चके.
परी २ क्षेत्रपालादि ४ पदोमें ४ कूष्माण्डके फल चढावे ॥ ११९७ ॥
आमन्नसेवयाणं देवीणं, वारस य वयंगाई। विज्झसुरिजक्खजक्खिणि, चउसट्ठिपएसु पूगाइं ॥११९८॥
अर्थ-तथा निकट सेवा करनेवाली १२ बारहदेवी उन्होंको वयंग फल विशेष चढावे चौथा अधिष्ठायक और बारह
देवियों का नाम मा सम्प्रदाय न होनेसे नहीं जाना जाय है तथा १६ सोलह विद्यादेवी २४ यक्ष शासनदेव २४ चौवीस
शाननदेनी यह चीनटपदोंमें सुपारी चढ़ावे ॥ ११९८ ।।
पीयवलीकूडाई, चत्तारि दुवारपालगपएसु । कसिणवलीकूडाई, चउवीरपएसु ठवियाइं ॥ ११९९ ॥
अर्थ-चार द्वारपाल कुमुदादिपदोंमें चार पीतवर्ण पक्वान्नादिकके पुंज स्थापे तथा चार ४ मणिभद्रादि वीरपदोंमें
काले पर्णका पकानादिकका ढिगला स्थापा ॥ ११९९ ।।
नवनिहिपापसु कंचण, कलसाइं विचित्तरयणपुन्नाइ। गहदिसिवालपएसु य, फलफुल्लाइं सवन्नाइं १२००
अर्थ-नव निधानोंमें नाना प्रकारके रलोंसे भरेहुए सोनेके कलश स्थापे तथा नवग्रह और दश दिक्पाल पदोंमें
अपने २ वर्णके फल पुष्पादि चढ़ाए ॥ १२०० ॥
इचाइगरुयवित्थर,-सहियं मंडाविऊणमुज्जमणं । ण्हवणूसवं नरिंदो, कारावइ वित्थरविहीए ॥१२०१॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्- ॥१४८॥ अर्थ-इत्यादि बहुत विस्तार सहित उज्जवणा मंडबाके राजा श्रीपाल विस्तार विधिसे स्नात्रमहोत्सव करे करावे ॥१॥ विहियाए पूयाए, अट्ठपयाराइ मंगलावसरे । संघेण तिलयमाला, मंगलकरणं कयं रन्नो ॥ १२०२ ॥ अर्थ-अष्ट प्रकारी पूजाकरी वाद मंगलके अवसरमें संघने राजा श्रीपालके तिलक किया माला पहराई यह मंगल किया तदनंतर आरती करके और चैत्यवंदन करे सो कहते हैं ॥ १२०२॥ तओ, जो धुरि सिरिअरिहंतमूलदढपीढपइट्ठिओ, सिद्धसूरिउवज्झायसाहु चउसाहगरिट्ठिओ, दस- णनाणचरित्ततवहिं पडिसाहहिं सुंदरु। तत्तक्खरसरवग्गलद्धि गुरुपयदलडंबरु, दिसिवालजक्खज- विखणिपमुह, सुरकुसुमेहि अलंकिओ।सो सिद्धचक्कगुरुकप्पतरु, अम्हह मणवंछिअ दिअओ ॥१२०३॥ अर्थ-श्रीसिद्धचक्ररूप महान कल्पवृक्ष आदिमे अरहंतही जो मूल दृढपीठ उसमें प्रतिष्ठित और सिद्ध १ आचार्य २ उपाध्याय ३ साधु ४ इन चार शाखाओं करके बहुत बड़ा और दर्शन १ ज्ञान २ चारित्र ३ तप ४ रूप प्रतिशाखा करके सुंदर और तत्वाक्षर ओंकारादिक स्वरअवर्णादिक वर्ग अवर्गादिक ४८ अड़तालीस लब्धिपद अहेत् पादुका गुरु पादुका यही है पत्रोंका आडवर जिसके और दिक्पाल यक्ष यक्षिणी प्रमुख देव पुष्पोंसे शोभित श्री सिद्धचक्ररूप महान् कल्पवृक्ष हमको मनोवांछित देवो ॥ १२०३ ॥ १ ॥१४८॥ R

चाइ नमोकारे, भणिऊण नरेसरो गहीरसरं । सकत्थयं भणित्ता, नवपयथवणं कुणइ एवं ॥१२०४॥
अर्थ इत्यादि नमस्कार कहके राजा श्रीपाल गंमीरस्वरसे शकस्तव कहके वक्ष्यमाण प्रकारसे नव ९ पदोंकी स्तुति
करे ।। १२०४ ॥
उम्पन्नमन्नाणमहोमयाणं, सपाडिहेरासणसंठियाणं । सद्देसणाणंदियसज्जणाणं, नमो नमो होउ सया
जिणाणं ॥ १२०५॥
अर्थ उत्पन भया है मद्ज्ञान केवलज्ञान वोही तेजस्वरूप जिन्होका और प्रातिहार्य छत्र चामरादि करके सहित
यने रेला जो मिहामन उसपर बैठे हुए और शोभन धर्मोपदेशसे आनन्दउत्पन्न किया है सत्पुरुषोंको जिन्होंने ऐसे
मिनेन्द्र अरहन्ताको निरंतर नमस्कार होवो ॥ १२०५ ॥
सिद्धाणमाणंदरमालयाणं, नमो नमोऽणंतचउकयाणं । सूरीण दूरीकयकुग्गहाणं, नमो नमो सूरसम-
पभाणं ।। १२०६॥
अर्ग-परमानन्द लक्ष्मीका निवास और अनन्तचतुष्क ज्ञान १ दर्शन २ सम्यक्त्व ३ अकर्णवीर्य ४ है जिन्होंके
ऐगे सियोको नमस्कार होवो तथा दूर किया है कुत्सित अभिनिवेश जिन्होंने ऐसे और सूर्य के समान प्रभाज्योति जिन्होंकी
एम आचागामो नमस्कार होवे ॥ १२०६ ॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१४९॥ सुत्तत्थवित्थारणतप्पराणं, नमो २वायगकुंजराणं । साहूण संसाहियसंजमाणं, नमो नमो सुद्धदयादमाणं अर्थ-सूत्रार्थका विस्तार करनेमें तत्पर उपाध्याय कुंजर हाथीके सदृश गच्छकी शोभा करनेवाला होनेसे और समर्थ होनेसे ऐसे उपाध्यायोंको नमस्कार होवो तथा सम्यक् प्रकारसे साधा है संयम जिन्होंने ऐसे शुद्ध दया दम जिन्होंके ऐसे सर्व साधुओंको नमस्कार होवो ॥ १२०७ ॥ जिणुत्ततत्ते रुइलक्खणस्स, नमो नमो निम्मलदंसणस्स। अन्नाणसंमोहतमोहरस्स, नमो नमो नाणदिवायरस्स ॥ १२०८ ॥ अर्थ-तीर्थकरके कहे हुए तत्वोंपर जो रुचि वह लक्षण जिसका ऐसे निर्मल दर्शनको नमस्कार होवो अज्ञानसे जो संमोह मतिभ्रम वही अंधकार उसको दूरकरे ऐसा ज्ञान सूर्यको नमस्कार होवो ॥ १२०८ ॥ आराहियाऽखंडियसकियस्स, नमो नमो संजमवीरियस्स । कम्मद्रुमुम्मूलणकुंजरस्स, नमो नमो तिवतवोभरस्स ॥ १२०९ ॥ अर्थ-तथा संयम विषयमें पराक्रम उसको नमस्कार होवो कैसा संयम वीर्य आराधन किया है अखंडित सक्रिया साध्वाचार रूप जिससे ऐसा । कर्मवृक्षोंको उखाड़नेमें हाथीके सदृश तीव्र तप समूहको नमस्कार होवो ॥ १२०९ ॥ ॥१४९॥ R इय नवपयसिद्धं लद्धिविज्जासमिद्धं, पयडियसरवग्गं हीतीरेहासमग्गं । दिसिवइसुरसारं खोणिपीढावयारं, तिजयविजयचकं सिद्धचकं नमामि ॥ १२१० ॥ अर्थ-इस प्रकारने नवपदों करके सिद्ध निष्पन्न और लब्धिपद और विद्या देवियों करके समृद्ध और प्रगट किया है बरवर्ग जिनमें गौर ही ऐमा अक्षर ऊपर जिसके उसकी कारकी रेखासे चारोंतरफ वीटा हुआ सम्पूर्ण, और दिगपाल गैरटः सम्पूर्ण देवोंसे मेवित प्रधान पृथ्वीपीठपर अवतरण जिसका तीन जगत्के विजया चक्रके जैसा चक्र ऐसे सिल पाको में नमस्कार करों ।। १२१० ॥ इति सिन्दचक्रस्तवः वजंताहि मंगलतूरेहि, सासणं पभावंतो । साहम्मियवच्छछं, करेइ वरसंघपूयं च ॥ १२११ ॥ अर्थ-मंगल वादिन वाजते जैनधर्मकी प्रभावना करता हुआ राजा श्रीपाल साधर्मी वात्सल्य करे और प्रधान संघ पूजा करे ।। १२११ ।। एवं सो नरनाहो, सहिओ ताहिं च पट्टदेवीहिं । अन्नेहिंवि बहुपहि, आराहइ सिद्धवरचकं ॥ १२१२ ॥ अर्थ-इन प्रकारसे महाराजा श्रीपाल उन पटरानियोसहित और भी बहुत लोगों सहित सिद्धचक्रका आराधन करे १२१२ अह तस्स मयणसुंदरि, पमुहाहिं राणियाहिं संजाया। नव निरुवमगुणजुत्ता, तिहुयणपालाइणो पुत्ता १३

-
श्रीपाल-
चरितम्
भाषाढीका-
सहितम.
॥१५०॥
अर्थ-उसके अनन्तर श्रीपाल राजाके मदनसुंदरी प्रमुख नव रानियोंके निरुपम गुणयुक्त त्रिभुवनपालादि नव पुत्र
हुए ॥ १२१३ ॥
गयरहसहस्सनवगं, नव लक्खाइं च जच्चतुरयाणं । पत्तीणं नवकोडी, तस्स नरिंदस्स रजमि ॥१२१४॥
अर्थ-उस श्रीपाल राजाके नव हजार ९००० हाथी और नव हजार ९००० रथ और नव लाख ९००००
जातिवान अच्छे लक्षणवाले घोड़े और नव करोड ९००००००० प्यादल सेनाके सिपाही इतनी सेना थी ॥ १२१४ ॥
एवं नव नव लीलाहिं, चेव सुक्खाइं अणुहवंतो सो। धम्मनिईए पालइ, रजं निकंटयं निच्चं ॥१२१५॥
अर्थ-इस प्रकार नव २ क्रीड़ा करके सुख भोगवता हुआ वह श्रीपाल राजा धर्मनीतिसे निरंतर निष्कंटक राज
पाले ॥१२१५ ॥
रज्जं च तस्स पालंतयस्स, सिरिपालनरवरिंदस्स । जायाइं जाव सम्मं, नव वाससयाइं पुन्नाइं ॥१२१६॥
अर्थ-राज्य पालते उस श्रीपाल राजाको जितने ९०० नवसैं वर्ष अच्छी तरहसे पूर्ण भए ॥ १२१६ ॥
ताव निवोतं तिहुयणपालं, रज्जंमि ठावइत्ताणं। सिरिसिद्धचकनवपयलीणमणो संथुणइ एवं ॥१२१७॥
अर्थ-उतने राजा श्रीपाल वह पूर्वोक्त त्रिभुवनपाल अपने बड़े पुत्रको राज्यमें स्थापके श्रीसिद्धचक्रमें जे नवपद
उन्होंमें लगाहै मन जिसका ऐसा वक्ष्यमाण प्रकारसे स्तुति करे ॥ १२१७ ॥
॥१५० ॥

M
सेसतिभवहिमपहि,जेहिं विहियारिहाइ ठाणेहि अजिजइ जिणगुत्तं, तेअरिहंते पणिक्यामि ॥१२१८॥
अर्य-बाकी रहे हैं तीनभवजिन्होंके ऐसे मनुष्यभवमें रहे हुए सेवा है अहंदादि बीसथानिक जिन्होंने ऐसे तीर्थ-
करनाम कर्म उपार्जन करते हैं उन अरिहंतो को मैं नमस्कार करूं ॥ १२१८ ॥
जे गगभवंतरिया रायकुले उत्तमे अवयरंति । महसुमिणसूइयगुणा, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२१९॥
अर्थ-निके एक भवके अंतरमें उत्तम राजकुलमें अवतरे है अर्थात् तीर्थकरके भवमें १४ महा स्वप्नों करके सूचित
किया है गुण जिन्होंने ऐसे उन अरिहंतोंको में नमस्कार करूं ॥ १२१९ ॥
जसि जम्ममि महिमं, दिसाकुमारीओ सुरवरिंदाय । कुवंति पहिट्ठमणा, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२२०॥
अर्थ-जिन्नोंका जन्म होनेसे महिमा ५६ दिग् कुमारियों आके सूतिकर्म करे हैं और हर्पितचित्त जिन्होंका ऐसे
१४ देगेन्द्र मेशिसरपर लेजाके जन्ममहोत्सव करें हैं उन अरिहन्तोंको में नमस्कार करूं हूं ॥ १२२० ॥
आजम्मंपि हु जेसिं, देहे चत्तारि अइसया हुंति । लोगच्छेरयभूया, ते अरिहंते पणिवयामि ॥ १२२१ ॥
अर्थ-निश्चय जिन्होंके शरीरम जन्मसे लेके आश्चर्यभूत चार अतिशय होवे है अद्भुतरूप सुगन्धयुक्त निश्वास-
वायु अहार निहार अदृश्य और श्वेतमांस रुधिर जिन्होंका ऐसे अरिहंतोंको मै नमस्कार करूं ॥ १२२१ ॥
frपा न.३ जे तिहुनाणसमग्गा, खीणं नाऊण भोगफलकम्मं । पडिवजंति चरित्तं, तेअरिहंते पणिवयामि ॥१२२२॥

श्रीपाल.
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१५१॥
अर्थ-जिके तीनज्ञान मति श्रुत अवधिकरके सम्पूर्ण भोगफल कर्मको क्षीण जानके चारित्र अंगीकार करे है उन
अरिहंतोको मैं नमस्कार करूं ॥ १२२२॥
उवउत्ताअपमत्ता, सियझाणा खवगसेणि हयमोहा । पावंति केवलं जे, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२२३॥
अर्थ-जिके उपयोगयुक्त और प्रमाद रहित शुक्लध्यान ध्याया जिन्होंने इसी कारणसे क्षपकश्रेणीकरके क्षयकिया
है मोहका जिन्होंने ऐसे केवलज्ञान पावे है उन अरिहंतोंको मैं नमस्कार करूं ॥ १२२३ ॥
कम्मक्खइया तह सुरकया य, जेसिं च अइसया हुंति। एगारसुगुणवीसं, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२२४॥
अर्थ-और जिन्होंके कर्मक्षयसे उत्पन्न भया ११ अतिशय होवे है तथा देवोंका किया हुआ १९ अतिशय होवे है
और ४ अतिशय जन्मसे एवं ३४ अतिशयसहित उन अरिहंतोंको मैं नमस्कार करूं ॥ १२२४ ॥
जे अट्ठपाडिहारेहि, सोहिया सेविया सुरिंदेहि । विहरंति सया कालं, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२२५॥
अर्थ-जिके अशोकवृक्षादि आठ ८ प्रतिहार्यों करके शोभित (अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिर्दिव्यध्वनिः चामरमासनं
च । भामंडलं दुंदुभिरातपत्रं सत् प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणां ॥१॥) अशोकवृक्षः १ पुष्पवृष्टिः २ दिव्यध्वनिः ३ सिंहा-
सन ४ चामर ५ भामंडल ६ दुंदुभिः ७ छत्र ३॥८ देवेन्द्रो करके सेवित नित्य विहार करे है उन अरिहंतोंको मैं
नमस्कार करूं हूं ॥ १२२५ ॥
॥१५१॥

पणतीसगुणगिराए, जे य विवोहं कुणंति भवाणं । महिपीडे विहरंता, ते अरिहंते पणिवयामि ॥१२२६॥
अर्थ-पंतीमगुण निममें ऐसी वाणी करके भव्योंको बोध देते है ऐसे पृथ्वीपर विचरते हुए अरिहंतोंको मैं नमस्कार
कम ॥ १२२६ ॥
अरिहंता वा सामन्नकेवला, अकयकयसमुग्घाया। सेलेसीकरणेणं, होऊणमजोगिकेवलिणो ॥१२२७॥
मर्मतीर्थकर अथवा सामान्य केवली नहीं किया अथवा किया केवली समुद्रात जिन्होंने ऐसे योगीन्द्र शैलेसी
करण करके आत्मप्रदेशोंका घन किया जिन्होंने ऐसे अयोगी केवली होके ॥ १२२७ ॥
जे दुचरमंमिसमए, दुसयरिपयडीओतेरस य चरमे । खविऊण सिवं पत्ता, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं १२२८
अर्थ-दो नरम समय आयुक्षयके पहले समयमें बहत्तर ७२ प्रकृति अघाती कर्मोकी उत्तरप्रकृति क्षय करके और
परम ममयमें तेरत १३ प्रकृति रापाके मोक्ष प्राप्त भया वह सिद्ध मेरेको सिद्धि देओ ॥ १२२८ ॥
चरमंगतिभागेणा, वगाहणा जे य एगसमयंमि । संपत्ता लोगग्गं, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं ॥ १२२९ ॥
अर्थ-विभागऊन धर्मशरीरकी अवगाहना जिन्होंकी ऐसे एकसमयमें लोकाग्र प्राप्त भया वह सिद्ध मेरेको सिद्धि
देशो ॥ १२२९ ॥
पुनपओग असंगा, बंधणच्छेया सहावओ वावि । जेसिं उहा हु गई, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं ॥१२३०॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका.
सहितम्-
॥ १५२॥
अर्थ-पूर्व प्रयोगसे धनुषसे फेंका बाणके जैसा निसंगताकर कर्ममलके जानेसे तूंवेके सदृश तथा बन्धन छेदसे
कर्मवन्धन का छेद होनेसे एरंडफलके जैसा तथा स्वभावसे धूमसदृश जिन्होंकी ऊर्ध्वगति प्रवर्ते है वह सिद्ध मेरेको
सिद्धि देओ ॥ १२३०॥
ईसीपब्भाराए, उवरि खलु जोयणमि लोगते । जेसिं ठिई पसिद्धा ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं ॥१२३१॥
अर्थ-ईपत् प्राग्भारा नाम सिद्धशिलाके ऊपर एक योजन लोकान्त है वहां स्थितिजिन्होंकी ऐसे सिद्ध मेरेको
सिद्धि देओ ॥ १२३१॥
जे य अणंता अपुणब्भवा य, असरीरया अणाबाहा। दसणनाणुवउत्ता, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं ॥१२३२॥
अर्थ-और अनन्ता अपुनर्भव जिन्होंका और शरीर रहित पीड़ा रहित और ज्ञान दर्शन का उपयोग युक्त जिन्होंके
पहले समयमें ज्ञानका उपयोग होवे है और दूसरे समयमें दर्शन का उपयोग होवे है ऐसे सिद्ध मेरेको सिद्धि देओ ३२
जेऽणंतगुणा विगुणा, इगतीसगुणा य अहवअट्ठगुणा। सिद्धाणंतचउक्का, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं १२३३
अर्थ-जे सिद्ध अनन्तज्ञानादि गुण जिन्होंमें तथा वर्णादि जानेसे इकतीस ३१ गुण सहित और आठकर्मके क्षय
होनेसे आठ गुण भया है जिन्होमें तथा निष्पन्नहुआ है अनन्तज्ञानादि चतुष्क जिन्होंके ऐसे सिद्ध मेरेको सिद्धि
देओ ॥ १२३३ ॥
॥१५२॥

जह नगरगुणे मिच्छो, जाणतोवि हु कहेउमसमत्थो।तह जेसिं गुणे नाणी, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं १२३४ अर्थ-जेने म्लेच्छ नगरके गुण प्रासादमें निवास मधुररसभोजनादि जानता हुआभी और म्लेच्छोंके आगे कहने को नहीं ममय होये वैसा भवस्थकेवली सिद्धोंका गुण जानते हुए भी कहनेको नहीं समर्थ होवे ऐसे सिद्ध मेरेको सिद्धि देओ ।। १२३४॥ जे अ अणंतमणुत्तर, मणोवमं सासयं सयाणंदं । सिद्धिसुहं संपत्ता, ते सिद्धा दितु मे सिद्धिं ॥१२३५॥ अर्थ-जे सिनिमुखप्राप्त हुआ वह सिद्ध मेरेको सिद्धि, देओ कैसा है सिद्धिसुख नहीं विद्यमान अंत जिसका ऐसा अनंत और नहीं विद्यमान उत्कृष्ट जिससे और अनुपम शाश्वता सदा आनन्द है जिन्होंके ऐसे ॥ १२३५ ॥ जे पंचविहायारं, आयरमाणा सया पयासंति । लोयाणणुग्गहत्थं, ते आयरिए नमसामि ॥ १२३६ ॥ मध-निके ज्ञानादि पांच प्रकारका आचार आचरण करता लोकोंके अनुग्रह के लिए निरंतर प्रगट करे हैं उन आचार्यों को मैं नमस्कार करूं हूँ॥ १२३६ ॥ देसफुलजाइरुवाइपहि, बहुगुणगणेहिं संजत्ता । जे हुंति जुगे पवरा, ते आयरिए नमसामि ॥१२३७॥ अर्थ-~-जे देश कुल जाति रूपादिक बहुत गुणोंके समूह करके संयुक्त सहित भए युगमें प्रधान मुख्य होवे हैं उन आचायोको मैं नमस्कार करूं हूं ॥ १२३७ ।।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१५३॥
जे निच्चमप्पमत्ता, विगहविरत्ता कसायपरिचत्ता । धम्मोवएससत्ता, ते आयरिए नमसामि ॥१२३८॥
अर्थ-जे गुरु निरंतर प्रमाद रहित राजकथादिक विकथाओंसे विरक्त क्रोधादि कषायों का त्याग किया जिन्होंने
और धर्मोपदेश देनेमें समर्थ ऐसे आचार्योंको मैं नमस्कार करूं हूं ॥ १२३८ ॥
जे सारणवारणचोयणाहि, पडिचोयणाहिं निच्चंपि। सारंति नियं गच्छं, ते आवरिए नमसामि ॥१२३९॥
अर्थ-जे आचार्य सारणा वारणा चोयना पडिचोयना करके निरंतर अपने गच्छ की सम्भालकरे भूले हुए को याद
कराना सो स्मारना १ अशुद्ध पढ़ते हुए को मना करना सो वारणा २ अध्ययनके लिए प्रेरणा करना सो चोयना ३
कठोर वचनोंसे प्रेरणा करना सो पडिचोयना इन ४ प्रकारसे अपने गच्छ का रक्षण करे हैं उन आचार्योंको मैं
करूं हूं ॥ १२३९॥
जे मुणियसुत्तसारा, परोवयारिकतप्परा दिति । तत्तोवएसदाणं, ते आयरिए नमसामि ॥ १२४०॥
अर्थ-जाना है सूत्रोंका सार जिन्होंने इसी कारणसे परोपकार करने में तत्पर भए जे गुरु तत्त्वोपदेश
रूप दान देते हैं उन आचार्योको मैं नमस्कार करूं हूं ॥ १२४० ॥
अत्थमिए जिणसूरे, केवलिचंदेवि जे पईवुव, । पयडंति इह पयत्थे, ते आयरिए नमसामि ॥१२४१॥
नमस्कार
॥१५३॥

अर्थ तीर्थकर रूप सूर्य अस्त होनेसे और सामान्यकेवलीरूप चन्द्रके भी अस्त होनेसे जे गुरू दीपकके जैसा इस
लोकमें पदार्थों को प्रगट करें हैं उन आचायाको में नमस्कार करूं हूं ॥ १२४१ ॥
जे पावभरकंते, निवडते भवमहंधकूवंमि । नित्थारयति जीवे, ते आयरिए नमंसामि ॥ १२४२ ॥
अर्थ-पाएका समुह उम करके आक्रांत ऐसा संसार रूप महान् अंधकूप उसमें पड़ते हुए जीवोंको जे गुरू तारै उन
माचार्याको में नमस्कार करूं।। १२४२ ॥
जे मायतायवंधवपमुहेहितोवि इत्य जीवाणं । साहति हियं कज्जं, ते आयरिए नमसामि ॥ १२४३ ॥
अर्थ-दम संमार में जिके आचार्य जीयोंके माता पिता भाई वगैरह से जादा कार्य सिद्ध करे है उन आचार्योको
में नमस्कार कम्॥ १२४३ ।।
बहुलद्धिसमिद्धा, साइसया सासणं पभावंति । रायसमा निचिंता, ते आयरिए नमसामि १२४४
अध-बहुत लब्धियों करके समृद्धिवान इसीसे अतिशयों सहित जिनशासन की प्रभावना करे हैं कैसे गुरू राजाके
ममान और गई है चिंता जिन्होंसे ऐसे निश्चिंत आचार्याको मैं नमस्कार करूं ॥ १२४४ ॥
जे वारसंगसझाय, पारगा धारगा तयत्थाणं । तदुभयवित्थाररया, ते ऽहं झाएमि उज्झाए ॥ १२४५॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१५४॥
अर्थ-जे द्वादशाङ्गी के स्वाध्याय का पारंगामी और द्वादशाङ्गीके अर्थको धारनेवाला और तदुभय नाम सूत्र
और अर्थक विस्तार करनेमें रसिक ऐसे उन उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं ॥ १२४५॥
पाहणसमाणेवि हु, कुणंति जे सुत्तधारया सीसे । सयलजणपूयणिजे, ते ऽहं झाएमि उज्झाए १२४६
अर्थ-जे गुरु निश्चय पाषाण के समान शिष्योंको सूत्ररूप तीक्ष्ण शस्त्रधारासे देवकी मूर्ति के जैसा सब लोकोंके
पूजने योग्य करते हैं उन उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं ॥ १२४६ ॥
मोहाहिदट्ठनट्ठप्पनाण, जीवाण चेयणं दिति । जे केवि नरिंदाइव, ते ऽहं झाएमि उझाए ॥ १२४७॥
अर्थ-मोहरूप सर्पसे डसे हुए इसीसे नष्ट होगया है आत्मज्ञान जिन्होंका ऐसे जीवोंको जे गुरू विषवैद्यके जैसे
चैतन्य देवे है उन उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं ॥ १२४७ ॥
अन्नाणवाहिबिहुराण, पाणिणं सुयरसायणं सारं। जे दिति महाविज्जा, ते ऽहं झाएमि उझाए ॥१२४८॥
अर्थ-अज्ञानरूप रोगसे पीड़ित प्राणियोंको प्रधान शास्त्ररूप रसायन महारोग मिटानेवाला औषध महा वैद्यके
जैसा जे गुरू देवे है उन उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं ॥ १२४८ ॥
गुणवणभंजणमय, गयदमणकुससरिसनाणदाणंजे,दिति सया भवियाणं, ते ऽहं झाएमि उझाए१२४९
॥१५४॥

दि
अध-गुणकप बनके विनाश करनेवाले जातिमदादि आठ मदरूप हाधियोंके वश करनेमें अंकुश सदश जे गुरू
जान दान भन्योंको देवे है ऐसे उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं ॥ १२४९ ।।
दिणमासजीवयंताई, सेसदाणाई मुणिउं जे नाणं । मुत्तित्तं दिति सया, ते ऽहं झाएमि उझाए १२५०
अर्थ-और दान दिन मान जीविततक जानके जे गुरू मुक्ति पर्यत फल जिसका ऐसा ज्ञानदान देवे है ऐसे उन
उपाध्यायों को में ज्याकं ॥ १२५० ।।
अन्नाणंधे लोयाण, लोयेणे जे पसत्थसत्थमुहा । उग्घाडयंति सम्मं, ते ऽहं झाएमि उझाए ॥ १२५१॥
अमे-जे गुरु अज्ञानसे आंधे लोगोंके नेत्र शास्त्ररूप प्रशस्त शस्त्रसे उघाड़ते हैं उन उपाध्यायोंको मैं ध्याऊं १२५१
यावन्नवनचंदणरसेण, जे लोयपावताबाई । उवसामयंति सहसा, ते ऽहं झाएमि उझाए ॥ १२५२ ॥
अर्थ-पावनाचंदन का जैसा रस उसके जैसी शीतलवाणी करके जे गुरू अकस्मात् लोकांका पापरूप तापको उप-
जमाये उन उपाध्यायोंको में ध्याऊं ॥ १२५२ ।।
ने रायकुमरतुल्ला, गणतत्तिपरा य सूरिपयजुग्गा । वायंती सीसवग्गं ते ऽहं झाएमि उझाए ॥१२५३॥
अपने राज कुमार तुल्य गच्छ की तृप्ति और समाधान करनेमें तत्पर तथा आचार्य पदके योग्य शिष्यवर्गको
पापना देरे उन उपाध्यायोंको में ध्याऊं ॥ १२५३ ॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१५५॥
जे दसणनाणचरित्त,-रूवरयणत्तएण इक्केण । साहति मुक्खमग्गं, ते सत्वे साहुणो वंदे ॥ १२५४ ॥
अर्थ-जे दर्शन, ज्ञान, चारित्र रूप तीनरत्नसे मोक्षमार्ग साधे कैसा दर्शनादि तीन एकीभाव प्राप्तभया अर्थात्
मिला हुआ तीनोंके एकत्व विना मोक्ष मार्ग नहीं सिद्ध होता है उन सर्व साधुवोंको मैं नमस्कार करूं ॥ १२५४ ॥
गयदुविहदुट्ठझाणा, जे झाइय धम्मसुक्कझाणा य । सिक्खंति दुविह सिक्खं, ते सत्वे साहुणो वंदे १२५५
अर्थ-गया आर्त रौद्र दो प्रकारका दुष्टध्यान जिन्होंसे और धर्मध्यान शुक्लध्यान ध्याया जिन्होंने ऐसे दो प्रका-
रकी शिक्षा ग्रहण आसेवना रूप सीखे उन सर्व साधुओंको नमस्कार होवे ॥ १२५५ ॥
गुत्तित्तएण गुत्ता, तिसल्लरहिया तिगारवविमुक्का । जे पालयंति तिपइं, ते सवे साहुणो वंदे ॥१२५६ ॥
अर्थ-तीन गुप्ति मन, वचन, काय गुप्ति लक्षण करके गुप्त अर्थात् गुप्तिवंत और मायाशल्य १ नियाणाशल्य २
मिथ्यादर्शनशल्य ३ इन्हों करके रहित ऋद्धि १ रस २ शाता ३ इन तीन गौरवोंसे रहित होके त्रिपदी ज्ञान दर्शन
चारित्ररूप पालते हैं उन सर्व साधुओंको मैं नमस्कार करूं ॥ १२५६ ॥
चउविहविगहविरत्ता, जे चउविहकसायपरिचत्ता । चउहा दिसति धम्म, ते सवे साहुणो वंदे ॥१२५७॥
अर्थ-चार प्रकारकी विकथा राजकथा १ देशकथा २ स्त्रीकथा ३ भोजनकथा ४ इन्होंसे रहित और अनन्तानु-
॥१५५॥

मासुमोको में धन्धादि नारकाय क्रोधादिक का त्याग किया जिन्होंने ऐसे दान शील तप भाव चार प्रकारके धर्मका उपदेश करें उन न माधुओंको में नमस्कार कनं ॥ १२५७ ॥ उजियपंचपमाया निजियपंचिदिया य पालेंति, पंचेव य समिईओ, ते सवे साहुणो वंदे ॥ १२५८ ॥ अर्थ-पांच प्रमाद मयादिकोंका त्याग किया जिन्होंने मद १ विषय २ कयाय ३ निद्रा ४ विकथा ५ और पांच न्द्रियों के जीननेवाले से पांच समिति पालते हैं इरिया १ भाशा २ एपणा ३ निक्षेपणा ४ पारिठावणिया ५ उन सर्व नमस्कार कन्दं ॥ १२५८ ॥ च्छजीवकायरक्रवण,-निउणा हासाइ छक्क मुक्का जे। धारंति य वयछकं, ते सवे साहुणो वंदे ॥१२५९॥ अर्थ-वी १ अप २ तेजो ३ वायु ४ बनस्पति ५ त्रशकाय इन छै जीव कायकी रक्षा करनेमें निपुण हास्यादि ने गतहत ऐसे प्राणातिपातविरमणादि रात्रिभोजनविरमण पर्यंत ६ व्रतांको धारे उन सर्व साधुओंको में नम. रकार कमः ॥ १२५९ ।। जे जियसत्तभया गय, अट्ठमया नवावि वंभगुत्तीओ। पालंति अप्पमत्ता, ते सत्वे साहुणो वंदे ॥१२६०॥ अर्थ-जीता है इहलोक भयादि सातभय जिन्होंने और गया जातिमदादि ८ आठ मद जिन्होंसे और प्रमादरहित भए नव प्रकार की प्रमगुप्ति को पालते हैं उन सर्व साधुओंको में नमस्कार करूं ॥ १२६० ।।

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१५६॥
"
दसविहधम्म तह बारसेव, पडिमाओ जे य कुवंति । बारसविहं तवोवि य, ते सत्वे साहुणो वंदे ॥१२६१॥
अर्थ-और दशप्रकारका क्षमाआदि श्रमणधर्म धारते हैं बारह साधु सम्बन्धी प्रतिमा अभिग्रह विशेष धारते हैं
और अनशनादि बारह १२ प्रकारका तप करते हैं उन सर्व साधुओंको मैं नमस्कार करूं ॥ १२६१ ॥
जे सतरसंजमंगा, उबूढाठारसहससीलंगा । विहरंति कम्मभूमिसु, ते सवे साहुणो वंदे ॥ १२६२ ॥
अर्थ-सतरह प्रकारका संयम शरीर से धारनेवाले और उत्कर्षकरके धारण किया है अठारहहजार शीलांगरथ
जिन्होंने ऐसे ५ भरत ५ एरवत ५ महाविदेह इन पनरह कर्म भूमिमें विचरते हैं उन सर्व साधुओंको मैं नमस्कार
करूं॥ १२६२॥
जं सुद्धदेवगुरुधम्म, तत्तसंपत्तिसदहणरूवं । वन्निज्जइ समत्तं तं सम्मदंसणं नमिमो ॥ १२६३ ॥
अर्थ-शुद्ध निर्दोष देव गुरु धर्मही तत्व सम्पदा का श्रद्धान रूप स्वरूप जिसका ऐसा सम्यक्त्व सूत्रमें वर्णन किया
जावे उन सम्यक् दर्शनको मैं नमस्कार करूं ॥ १२६३ ॥
जावेगकोडाकोडी,-सागरसेसा न होइ कम्मठिई । ताव न जं पाविजइ, तं सम्मईसणं नमिमो ॥१२६४॥
अर्थ-जितने एक कोड़ा कोड़ सागरोपम कर्मोकी स्थिति वाकी न रहे तवतक वह नहीं पावे है उन सम्यक्
दर्शनको मैं नमस्कार करूं ।। १२६४ ॥
॥१५६॥

भत्राणमढ़पुग्गल, परियहवसेसभवनिवासाणं । जं होइ गंठिभेए, तं सम्मदंसणं नमिमो ॥ १२६५॥ अर्थ-भन्यों के आधापुद्गलपरावर्तप्रमाणे संसारमें रहना जब होवे तब यह सम्यक्त्व घनरागद्वेषका परिणाम सप प्रधिक भेद होनेसे होये है उन सम्यग्दर्शनको मैं नमस्कार करूं ॥ १२६५ ॥ जंच तिहा उपसमियं, खउवसमियं च खाइयं चेवाभणियं जिणिंदसमए, तंसम्मदंसणं नमिमो १२६६ अभ-जो सम्यकदर्शन तीर्थकरों के सिद्धांतमें तीनप्रकारका कहा है औपशमिक अंतरमुहूर्तकी स्थितिवाला १ ल्यायोपशामिक कुछअधिक ६६ सागरकी स्थितिवाला २ और क्षायिक ३३ सागरकी स्थितिवाला ३ इन्होंमें क्षायोपश- मिक पाद्गलिक है और २ अपाद्गलिक है उस सम्यक्दर्शनको में नमस्कार करूं ॥ १२६६ ॥ पण वारा उपसमियं, खओवसमियं असंखसो होइ।जंखाइयं च इक्कसि, तं सम्मदंसणं नमिमो॥१२६७॥ अर्थ-औपशमिकसम्यक्त्व एक जीवके संसारमें पांचवेर होवे है और ख्यायोपसमिकसम्यक्त्व असंख्यातिवेर होये हैं और स्थायिकसम्यक्त्व एकवार होवे है उस सम्यक्दर्शनको हम नमस्कार करें॥ १२६७ ॥ जं धम्मममूलं, भाविजइ धम्मपुरपवेसं च । धम्मभवणपीढं वा तं सम्मइंसणं नमिमो॥१२६८॥ अर्थ-जो सम्यक् दर्शन धर्मरूपवृक्षका मूलके जैसा मूल सदृश विचारा जावे और धर्मरूपनगरमें प्रवेशकरनेका मार जमा और धर्मरूपप्रासादका पीठ जैसा है उस सम्यक्दर्शनको में नमस्कार करें ॥ १२६८ ॥ HI

'श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्,
॥१५७॥
जं धम्मजयाहारं, उवसमरसभायणं च जं बितिं । मुणिणो गुणरयणनिहि, तं सम्मदंसणं नमिमो १२६९
अर्थ-तथा जो सम्यक्त्व धर्मरूपजगत्के आधार के जैसा आधार है और सम्यक्त्व उपशमरूपरसका' भाजन
सदृश है तथा जिसे सम्यक्त्वको गुणरूपरत्नोंका निधान मुनि कहते हैं उस सम्यक्दर्शनको हम नमस्कार करें १२६९
जेण विणा नाणंवि हु, अपमाणं निष्फलंच चारित्तं।मुक्खोवि नेव लब्भइ, तंसम्मदसणं नमिमो॥१२७०॥
अर्थ-जिस सम्यक्त्व विना ज्ञानभी अप्रमाण होवे हैं और चारित्रभी निष्फल कहा जावे है और मोक्षभी नही ही
पावे उस सम्यक्दर्शनको हम नमस्कार करें ॥ १२७० ॥
जं सद्दहणलक्खण,-भूसणपमुहेहिं बहुयभेएहिं । वन्निजइ समयंमी, तं सम्मइंसणं नमिमो ॥ १२७१॥
अर्थ-जिस सम्यक्त्वका परमार्थसंस्तवादि चारश्रद्धान समसमवेगादिक लक्षणपांच जिनशासनमें कौशल्यादि
भूपणपांच इत्यादि बहुतभेद सिद्धांतमें वर्णन किया जावे उस सम्यक्त्वको में नमस्कार करूं ॥ १२७१ ॥
सवन्नु-पणीयागम, भणियाण जहट्ठियाण तत्ताणं। जो सुद्धो अवबोहो, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥१२७२॥
अर्थ-सर्वज्ञोंने कहा सिद्धांत उन्होंमें कहा जो सद्भूततत्त्व जीवादिपदार्थ उन्होंका जो ज्ञान वह सद्ज्ञान मेरे
प्रमाण है ॥ १२७२॥
जेणं भक्खाभक्खं, पिज्जापिजं अगम्ममवि गम्म, किच्चाकिच्चं नज्जइ, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥१२७३॥
॥१५७॥

con
अर्थ-निम ज्ञानकरके भक्षाभक्ष, भक्ष अन्नादि अभक्ष मांसादि पेय वस्त्रसे छाना हुआ पानीआदि अपेय मदिरादि
गम्य स्वरत्यादि अगम्य परस्त्री भगिन्यादि कृत्य अहिंसादि अकृत्य हिसादिक जाना जाये है वह सद्ज्ञान • मेरे प्रमाण
॥ १२७३॥
सयलकिरियाणमूलं, सद्धा लोयंमि तीइ सद्धाए । जंकिर हवेइ मूलं, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥१२७४॥
अर्थ-लोकमें मयंक्रिया सर्वशुभअनुष्ठानका मूल श्रद्धा है श्रद्धाका मूल ज्ञान होवे है वह सद्ज्ञान मेरे प्रमाण
11 १२७१॥
जं मइसुयओहिमयं, मणपज्जवरूवकेवलमयं च । पंचविहं सुपसिद्धं, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥१२७५॥
अर्थ-जो ज्ञान पांचप्रकारका मुप्रसिद्ध मतिज्ञान १ श्रुतज्ञान २ अवधिज्ञान ३ मनपर्यवज्ञान ४ केवलज्ञान ५
स्वरूप जिमका वह मज्ञान मेरे प्रमाण है ॥ १२७५ ॥
केवलमणोहिणं पि हु, वयणं लोयाण कुणइ उवयारं । जं सुयमहरूवेणं तं सन्नाणं मह पमाणं॥ १२७६ ॥
अर्थ-वल ? मनपर्यय २ भवधि ३ इन तीनज्ञानधारनेवालोंका वचन भव्यजीवोंके मति श्रुतज्ञान रूपसे
उपकार करे है वह मद्ज्ञान मेरे प्रमाण है ॥ १२७६ ॥
सुयनाणं चेव दुवालसंग, रूवं परूवियं जत्थ । लोयाणुवयारकर, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥ १२७७ ॥

श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१५८॥ अर्थ-लोकोंके ऊपकार करनेवाला आचारादि द्वादशाङ्गी रूप श्रुतज्ञान ही जो कहा वह मेरे प्रमाण है ॥ १२७७ ॥ तत्तुच्चिय जं भवा, पढंति पाढंति दिति निसुणंति।पूयंति लिहावंति य, तं सन्नाणं मह पमाणं ॥१२७८॥ अर्थ-इस कारणसे भव्य जिस श्रुतज्ञान को पढ़े है पढ़ावे है सुने है सुनावे है देवे है और पूजते है और लिखाते हैं वह सद्ज्ञान मेरे प्रमाण है ॥ १२७८ ॥ तस्स बलेणं अजवि, नज्जइ तियलोयगोयरवियारो। करगहियामलयंपि व, तं सन्नाणं मह पमाणं १२७९ अर्थ-जिस श्रुतज्ञान केवलसे आजभी तीनलोकके पदार्थ हाथमें आमले के जैसा जानते हैं वह सद्ज्ञान मेरे प्रमाण है ॥ १२७९ ॥ जस्स पसाएण जणा, हवंति लोयंमि पुच्छणिज्जा य। पूज्जा य वन्नणिज्जा, तंसन्नाणं मह पमाणं ॥१२८०॥ अर्थ-जिस श्रुतज्ञान के प्रसादसे लोकोंमें पूछने योग्य और पूजने योग्य वर्णन करने योग्य होते हैं वह सद्ज्ञान मेरे प्रमाण है ॥ १२८० ॥ जं देसविरइरूवं, सबविरइरूवयं च अणुकमसो। होइ गिहीण जईणं, तं चारित्तं जए जयइ ॥१२८१॥ अर्थ-जो देशविरती रूप गृहस्थों के होवे है और सर्वविरतीरूप चारित्र साधुओं के होवे है वह चारित्र जगत् में जैवन्ता होवो ॥ १२८१॥ ज ॥१५८॥ १

नाणंपि दसणंपि य, संपुन्ना फलं फलंति जीवाणं । जेणंचिय परिकरिया, तं चारित्तंजए जयइ ॥१२८२॥
अर्थ-ज्ञान और दर्शन जिस चारित्रसे सहित ही जीवोंको संपूर्ण फल देते हैं वह चारित्र जगत् में जैवन्ता
होगों ॥ १२८२॥
जं च जईण जहुत्तर, फलं सुसामाइयाइ पंचविहं । सुपसिद्धं जिणसमए, तं चारित्तं जए जयइ ॥१२८३॥
अर्थ-और जो चारित्र जैन सिद्धान्तमें साधुओंके शोभन सामायकादि पांच प्रकारका यथोत्तर उत्तर २ अधिक
फल मिमका ऐमा वर्ते है वह चारित्र जगत् में जैवन्ता होवो ॥ १२८३ ॥
जं पडियन्नं परिपालियं च, सम्मं परूवियं दिन्नं । अन्नसिं च जिणेहिवि, तं चारित्तंजए जयइ ॥१२८४॥
अर्थ-तीर्थकरांने जिस चारित्रको अंगीकार किया और पाला और सम्यक् प्ररूपणा करी उपदेश किया औरोंको
दिया यह चारित्र जगत्में जयवन्तो होवो ॥ १२८४ ॥
छरखंडाणमडखं, रजसिरिं चइय चक्कवहीहिं । जं सम्म पडिवन्नं, तं चारित्तं जए जयइ ॥ १२८५ ॥
अर्थ-चकवतियोंने अखंड छ खंडकी राज्य लक्ष्मीका त्याग करके जो चारित्र अच्छी तरहसे अंगीकार किया वह
पारिव जगत्में जयवन्तो होयो ।। १२८५ ॥
जं पडियन्ना दमगाइणो वि, जीवा हवंति तियलोए। सयलजणपूयणिज्जा, तं चारित्तंजए जयइ॥१२८६॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१५९॥
अर्थ-जिस चारित्रको अंगीकार करके रांक वगैरहभी जीव तीनलोकके सवलोकोंके पूजनीय होते हैं वह चारित्र
जगत्में जयवंता वर्तों ॥ १२८६ ॥
जं पालंताण मुणीसराण, पाए नमति साणंदा । देविंददाणविंदा, तं चारित्तं जए जयइ ॥ १२८७॥
अर्थ-जिस चारित्रको पालता हुआ मुनीश्वरोंके चरणोमें देवेन्द्र दानवेन्द्र हर्ष सहित नमस्कार करें है वह चारित्र
जगत्में जयवन्तो होवो ॥ १२८७ ॥
जं चाणंतगुणंपि हु, वन्निजइ सत्तरभेय दसभेयं । समयंमि मुणिवरोहि, तं चारित्तं जए जयइ ॥१२८८॥
अर्थ-और जो चारित्र अनन्तगुण जिसमें ऐसा निश्चय सिद्धान्तमें मुनिवरोंने पांच आश्रवसे विरमण और पांच
इन्द्रियका निग्रह और चार कषायका जय तीनदण्डकी विरति यह सत्तरह भेद वर्णनकिया है तथा क्षमा मार्दव आर्य-
वादी दशभेद जिसके ऐसा प्रसिद्ध चारित्र जगत्में जयवन्तो होवो ॥ १२८८ ॥
समिईओ गुत्तीए, खंतीपमुहाओ मित्तियाइओ। साहति जस्स सिद्धिं, तं चारित्तं जए जयइ ॥१२८९॥
अर्थ-इरियासमित्यादि समिति ५ मनोगुप्त्यादि गुप्ति ३ क्षमाप्रमुख दशप्रकारका यतिधर्म मैत्री १ प्रमोद २
करुणा ३ मध्यस्था ४ भावना सर्व प्राणियोंमें मैत्री १ गुणवानमें प्रमोद २ दुखियोंमें दया दुष्टोंमें माध्यस्थ यह पदार्थ
जिस चारित्रकी सिद्धिनाम निष्पत्तिको साधे है वह चारित्र जगत्में जयवन्ता होवो ॥ १२८९ ॥
॥१५९॥

..
बाहिरमभितरयं, बारसभेयं जहुत्तरगुणं जं । वन्निज्जइ जिणसमए, तं तवपयमेस बंदामि ॥१२९०॥
अर्थ-जो तप जैन सिद्धान्तमें ६ वाह्य ६ अभ्यन्तर बारह भेद वर्णन किया जावे है यथोत्तर अधिक २ गुण हैं
जिममें ऐसे तप पदको में नमस्कार करूं॥ १२९० ॥
तम्भवसिद्धिं जाणंतपहि, सिरिरिसहनाहपमुहेहिं । तित्थयरेहिं कयं जं,तं तवपयमेस बंदामि ॥१२९१॥
अर्थ-श्रीमयभदेव स्वामीप्रमुख तीर्थंकरोंने उसी भवमें अपनी मुक्ति जानते हुए भी जो तप अंगीकार किया उस
तप पदको में नमस्कार करूं ॥ १२९१ ॥
जेण ग्यमासहिएणं कपण, कम्माणमवि निकायाणं। जायइ खओखणेणं, तंतवपयमेस वंदामि ॥१२९२॥
अर्थ-क्षमा सहित निम तपके करनेसे निकाचित कर्मोका क्षणेकमें क्षय होवे है उस तपपदको मैं नमस्कार
॥ १२९.२ ॥
जेणंचिय जलणेणव, जीवसुवन्नाओ कम्मकिद्दाई।फिटंति तक्खणं चिय, तंतवपयमेस वंदामि ॥१२९३॥
अर्थ- अग्निके जैना जिम तपसे जीवरूपसोनेसे कर्मरूप कीटा कठिनतर मैल तत् कालही दूर होवे है उस तप
पदको म नमस्कार कर॥ १२९३ ॥
जस्स पसागण धुवं, हवंति नाणाविहाउलद्धीओ।आमोसहि पमुहाओ तं तवपयमेस वंदामि ॥ १२९४ ॥

भाषाटीका-
सहितम्.
श्रीपाल-
चरितम्
॥१६॥
अर्थ-जिस तपके प्रसादसे आमर्पऔषधिप्रमुख अनेक प्रकारकी लद्धियां होवें हैं उस तपपदको मैं नमस्कार
करूं ॥ १२९४॥
कप्पतरुस्स व जस्सेरिसाउ, सुरनरवराण रिद्धीओ।कुसुमाइं फलं च सिवं, तंतवपयमेस वंदामि॥१२९५॥
अर्थ-कल्प वृक्षके सदृश जिस तपका देवेन्द्र और राजाओंकी सम्पदा पुष्प है और मोक्षसुख फलवर्ते है उस
तपपदको मैं नमस्कार करूं ॥ १२९५ ॥
अच्चतमसज्झाइं, लीलाइवि सवलोयकज्जाई । सिजति झत्ति जेणं, तं तवपयमेस वंदामि ॥ १२९६ ॥
अर्थ-अत्यन्त साधनेको अशक्य सर्वलौकिककार्य जिस तपके प्रभावसे लीलासे सिद्ध होवे है उस तपपदको मैं
नमस्कार करूं ॥ १२९६ ॥
दहिदुवियाइमंगल, पयत्थसत्थंमि मंगलं पढमं । जं वन्निज्जइ लोए, तं तवपयमेसवंदामि ॥१२९७॥
अर्थ-लोकमें दही दुर्वादिक मंगल पदार्थोंके समूहमें जो तप पहला मंगल वर्णन किया जावे है भावमंगल रूप
होनेसे उस तप पदको मैं नमस्कार करूं ॥ १२९७ ॥
एवं च संथुणंतो, सो जाओ नवपएसुलीणमणो।तह कहवि जहा पिक्खइ,अप्पाणं तंमयं चेव ॥१२९८॥
॥१६॥

अर्थ-इस प्रकारसे मन्या स्तुति करता हुआ श्रीपाल राजा कोई प्रकारसे नाम बड़े प्रयत्नसे नवपदोंमें लीन मन जिनका गंगा मरने आत्माको नवपदमई देखे ॥ १२९८ ॥ गयंमि समयकाले, सहसा पुन्नं च आउयं तस्स । मरिऊण सिरिपालो, नवमे कप्पंमि संपत्तो ॥१२९९॥ अर्थ-श्रीपाल गजा नवपद मई अपने आत्माको देखे तिस समय रूप कालमे अकस्मात् श्रीपाल राजाका आयुः पूर्ण भया तब श्रीपाल राजा काल धर्म पाके नवमे आनत देवलोकमें देव हुआ ॥ १२९९ ।। माया य मयाणसुंदरिपमुहाओराणियाओ समयंमि।सुहझाणा मरिऊणं, तत्थेव य सुरवरा जाया॥१३००॥ अ-माता कमलप्रभा और मदनसुंदरी प्रमुस रानियों अपने आयुः के अंतसमयमें शुभ अध्यवसायसे मरण पाके उमी नवमे देवलोकमें प्रधान देव भए ।। १३०० ॥ तत्तो चविउग इमे, मणुयभवं पाविऊण कयधम्मा।होहिंति पुणो देवा, एवं चत्तारि वाराओ ॥ १३०१॥ अर्थ-तदनंतर नवमे देवलोकसे च्यवके सर्व श्रीपालादि जीव मनुष्यभव पाके धर्म करके और देव होवेगा इस प्रकारले चार बार मनुष्यका भव और ४ देवका भव होगा ॥ १३०१॥ सिरिपालभवाउ नवमेभवंमि, संपाविऊण मणुयत्तं । खविऊण कम्मरासिं, संपाविस्संति परमपयं १३०२ CSC ,

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१६१॥
MORE
अर्थ-श्रीपालके भवसे नवमे भवमें मनुष्यभव पाके कर्म समूहका क्षय करके मोक्ष जावेगा ॥ १३०२ ॥
एवं भोमगहेसर, कहियं सिरिपालनरवरचरितं । सिरिसिद्धचक्वमाहप्प, संजुयं चित्तचुज्जकरं ॥ १३०३ ॥
अर्थ-श्रीगौतम स्वामी श्रेणिक राजासे कहे है हे मगधेश्वर इस प्रकारसे श्रीपाल राजाका चरित्र कहा कैसा चरित्र
सिद्धचक्रके माहात्म्यसहित और लोकों के चित्तमें आश्चर्य करनेवाला ॥ १३०३ ॥
तं सोऊणं सेणियराओ, नवपयसमुल्लसियभावो। पभणेइ अहह केरिस, मेयाण पयाण माहप्पं ॥१३०४॥
अर्थ-उन श्रीपालके चरित्रको सुनके श्रेणिक राजा नवपदोंमें उल्लास पाया है मन जिसका ऐसा प्रकर्षपनेकर कहे
अहह इति आश्चर्ये इन नवपदोंका कैसा अचिंत्य माहात्म्य वर्ते है ॥ १३०४ ॥
तो भणइ गणी नरवर, पत्तं अरिहंतपयपसाएणं । देवपालेण रजं, सक्कत्तं कत्तिएणावि ॥ १३०५॥
अर्थ-तदनंतर गणधर श्रीगौतमस्वामी कहे हे राजन् अरहंत पदके प्रसादसे देवपाल नाम सेठके सेवकने राज्य
पाया और कार्तिक सेठनेभी इन्द्रपना पाया इन्होंकी कथा कहनी ॥ १३०५॥
सिद्धपयं झायंता, के के सिवसंपयं न संपत्ता । सिरिपुंडरीयपंडव,-पउममुणिंदाइणो लोए ॥ १३०६ ॥
अर्थ-सिद्ध पदको ध्याते हुए लोकमें श्रीपुण्डरीक पाण्डव और रामचन्द्रादिक कौन २ शिवसम्पदा मुक्ति समृद्धि
नहीं पायीं किंतु बहुतोंने पाई है ॥ १३०६ ॥
॥१६१॥

नाहियवायसमजिय, पावभरोवि हु पएसिनरनाहो।जं पावइ सुररिद्धिं, आयरियपयप्पसाओ सो १३०७ अर्थ-नास्तिक वादसे संचय किया पाप समूहका जिसने ऐसा परदेशी राजा उसने जो देव ऋद्धिः पाई वह आचार्य- पदका प्रमाद है ॥ १३०७॥ लहुयंपि गुम्बइठें, आराहतेहिं वयरमुवझायं । पत्तो सुसाहुवाओ, सीसेहिं सीहगिरिगुरुणो॥ १३०८ ॥ अर्थ-मिंहगिरि गुरूने कहा छोटी उमरकाभी बज्र नामका उपाध्यायकी आराधना करते हुए सिंहगिरि गुरूके शिष्योंने सुमाधुवाद नाम अच्छे विनीत शिष्य है ऐसी प्रसिद्धि पाई ॥ १३०८ ॥ साहुपयविराहणया, आराहणया यदुक्खसुक्खाई। रुप्पिणिरोहिणीजीवहिं, किं न हु पत्ताई गुरुयाई १३०९ अर्थ-माधुपदकी विराधना और आराधना करके क्रमसे रुक्मिणी रोहिणीके जीवोंने बहुत दुःख और सुख स्या नहीं पाए अपि तु पाए हैं ॥ १३०९ ॥ दसणपयं विमुद्धं, परिपालंतीइ निच्चलमणाए । नारीइवि सुलसाए, जिणराओ कुणइ सुपसंसं ॥१३१०॥ अर्थ-विशुद्धनिर्मल सम्यक दर्शनपद सर्वप्रकारसे पालती भई और निश्चल मन जिसका ऐसी सुलसा नामकी नाग मारधिकी स्त्रीकी प्रशंमा श्रीमहावीर स्वामीने करी ॥ १३१० ॥ नाणपयस्स विराहण, फलंमि नाओ हवेइमासतुसो।आराहणा फलंमी, आरहणं होइ सीलमई ॥१३११॥ t श्रीपाल- चरितम् भाषाटीका- सहितम्. ॥१६२॥ - अर्थ-ज्ञानपदकी विराधनाके फलमें मापतुष साधुका दृष्टांत है आराधनाके फलमें शीलवती सतीका उदाहरण है ॥ १३११॥ चारित्तपयं तह भावओवि, आराहियं सिवभवंमि। जे णं जंबुकुमारो, जाओ कयजणचमुक्कारो ॥१३१२॥ अर्थ-शिवकुमारके भवमें भावसे चारित्र पाला था उस आराधनसे जम्बूकुमर भया कैसा जम्बूकुमर लोकोंको किया है आश्चर्य जिसने ऐसा ॥ १३१२॥ वीरमइए तह कहवि, तवपयमाराहियं सुरतरूव । जह दमयंतीइ भवे फलियं तं तारिसफलेहिं ॥१३१३॥ अर्थ-वीरमती नामकी राजाकी रानीने कोई प्रकारसे तपपदका · आराधन किया तिलक तपस्या करके अष्टापद तीर्थपर चौबीस तीर्थकरोंको तिलक चढ़ाया इसके प्रभावसे दमयंती नलराजाकी पटरानीके भवमें वह तप कल्पवृक्षके सहश फलोंसे फला ॥ १३१३ ।। किं बहुणा मगहेसर, एयाणपयाणभत्तिभावेणं। तं आगमेसि होहिसि, तित्थयरो नत्थि संदेहो ॥१३१४॥ • अर्थ-हे मगधेश्वर जादा कहने करके क्या इन नवपदोंका भक्तिभाव करके तैं आगामि भवमें तीर्थकर होगा इसमें संदेह नहीं है ॥ १३१४ ॥ तम्हा एयाइं पयाइं, चेव जिणसासणस्स सवस्सं । नाऊणं भो भविया, आरहह सुद्धभावेण ॥ १३१५ ॥ ॥१६२॥ R अर्थ-तिम कारणसे इन नवपदोंको जिनगासनका सरवस्व याने सर्व सार जानके अहो भव्यो शुद्धभावसे आगधन करो ।। १३१५॥ गयाई च पयाई, आराहताण भवसत्ताणं । हुंतु सयावि हु मंगल, कल्लाणसमिद्विविद्धीओ ॥१३१६ ॥ अचयह नवपदोंका आराधन करता भव्यजीवोंके निरंतर निश्चय मंगल कल्याणसमृद्धियोंकी वृद्धि होवे ।। मंगल उगदा मांति कल्याण सम्पदाका उत्कर्षरूप समृद्धि वृद्धि परिवारादि वृद्धिरूप होवे ॥ १३१६ ॥ एवं तिकालगोयर, नाणे सिरिगोयमंमि गणनाहे। कहिऊण ठिए सेणियराओ, जा नमवि मुणिणाहं १७ अपइम प्रकारमे त्रिकाल विषयी ज्ञान जिन्होंका ऐसे श्री गौतमस्वामी गणधर कहके रहे तब श्रेणिक राजा गतमस्वामीको नमस्कार करके जितने ॥ १३१७ ।। उठेइ तओ हरिसिय, चित्तोता तत्थ कोवि नरनाह। विन्नवइ देव वद्धाविजसि, वीरागमेण तुमं ॥१३१८॥ अर्थ-जितने वहांसे उठे उतने हर्पित चित्त जिसका ऐसा कोई पुरुष वहां आके राजासे कहे हे देव हे महाराज भगवान् श्रीमहावीरस्वामीका यहां आगमन होनेसे में आपको बधाई देता हूं ॥ १३१८ ॥ तं सोऊणं सेणिय, नरनाहो पमुइओ सचित्तंमि । रोमंचकवचियतणू, वद्धावणियं च से देई ॥१३१९॥ H

SRIES
१
भाषाटीका-
श्रीपाल-
चरितम्
सहितम्-
॥१६४॥
सहित समवशरणमें रहे हुए १ पदस्थ अहं इत्यादि पवित्रपदका ध्यान २ पिण्डस्थ पिण्डशरीर उसमें रहे सो पिण्डस्थ
पहले पिण्डस्थ पीछे पदस्थ पीछे रूपस्थ ध्याना यह क्रम है ॥ १३२७ ॥
रूवाईयसहावो, केवलसन्नाणदंसणाणंदो। जो चेव य परमप्पा, सो सिद्धप्पा न संदेहो ॥ १३२८ ॥
अर्थ-रूप पौद्गलिक उल्लंघा जिन्होंने ऐसा स्वभाव जिन्होंका इसी कारणसे परिपूर्ण ज्ञानदर्शनरूप आनन्द
जिन्होंके ऐसे परमात्मा सिद्धात्मा कहे जावें इसमें सन्देह नहीं है ॥ १३२८ ॥
पंचप्पत्थाणमयायरिय, महामंतझाणलीणमणो। पंचविहायारमओ, आयच्चिय होइ आयरिओ.१३२९
अर्थ-पांच प्रस्थानं मई जो आचार्यसम्बन्धी महामन्त्रके ध्यानमे लीनमन जिन्होंका और पांच प्रकारका
आचार प्रधान जिसके सो आत्माही आचार्य होवे है पांच प्रस्थानके नाम विद्यापीठ १ सौभाग्यपीठ २ लक्ष्मीपीठ
३ मंत्रयोगराजपीठ ४ सुमेरुपीठ ५ इन्होंका अर्थ सूरीमंत्र कल्पसे जानना भावध्यान माला प्रकरणमें तो अभय-
प्रस्थान १ अकरणप्र० २ अहमिन्द्रप्र० ३ तुल्यप्र० ४ कल्पप्रं० ५ इन्होंका स्वामी पंचपरमेष्ठी कहा है ॥ १३२९ ।।
महपाणझायदुवालसंग,-सुतत्थतदुभयरहस्सो, सज्झायतप्परप्पा, एसप्पा चेव उज्झाओ ॥ १३३०॥
अर्थ-महाप्राणायाम ध्यानविशेषसे विचारा है द्वादशाङ्गी सूत्रार्थका रहस्य जिसने वह तथा वाचनादि पांच
प्रकारके स्वाध्यायमें तत्पर आत्मा जिसका ऐसा आत्मा ही उपाध्याय होवे है ॥ १३३० ।।
॥१६४॥

.
रवणताण सिवपह,-संसाहणसावहाणजोगतिगो, साहू हवेइ एसो, अप्पुच्चिय निच्चमपमत्तो १३३१
अर्थ-रतनयज्ञान, दर्शनचारित्ररूप मोक्षमार्गके साधनेमें सावधान मन, वचन कायारूप तीनयोग जिसका ऐसा
और निरंतर प्रमादरहित यह आत्मा ही माधु होवे है ॥ १३३१॥
मोहम्सम्बोवसमा, समसंवेगाइ लक्खणं परमं । सुहपरिणाममयं, नियमप्पाणं दसणं मुणह ॥१३३२॥
अर्थ-मोहका बयोपशमसे उत्कृष्ट शुभ परिणाम मई अपने आत्माको सम्यक्त्व जानो कैसा सम्यक्त्व सम समवे-
गादि लक्षण, निमके ऐमा ॥ १३३२ ।।
नाणावरणस्स खओ, वसमेण जट्ठियाण तत्ताणं । सुद्धाववोहरुबो, अप्पुच्चिय वुच्चए नाणं ॥ १३३३ ॥
अर्थ-जानावरणी कर्म के अय उपशमसे जो यथावस्थित सद्भूत जीवादितत्वोंका शुद्धज्ञान स्वरूप जिसका ऐसा
आत्माही ज्ञान कहा जावे ।। १३३३ ॥
सोलसकसायनवनोकसाय,-रहियं विसुद्धलेसागं । ससहावटियं अप्पाण,-मेव जाणेह चारित्तं ॥१३३४॥
अर्थ-कोशदिक मोलह १६ कपाय हास्यादिक नव नोकपाय इन्होंसे रहित इसी कारणसे निर्मल लेश्या जिनकी
पना स्वभारमें रहादा आत्मा चारित्र जानो ॥ १३३४ ।।
इच्छानिरोहओ, सुद्धसंवरो परिणओय समयाए । कम्माइं निजरंतो, तवोमओ चेव एसप्पा ॥१३३५॥

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्.
॥१६३॥
अर्थ-उसपुरुषका बचन सुनके श्रेणिक राजा अपने मनमें हर्षित भया और रोमांचित भया शरीरजिसका ऐसा
होके उस पुरुषको बधाइका द्रव्य देवे ॥ १३१९ ॥
इत्थंतरंमि तिहुयण,-भाणू सिरिवद्धमाणजिणनाहो। अइसयसिरीसणाहो, समागओ तत्थ उजाणे २०
अर्थ-इस अवसरमें त्रिभुवनभानु तीन लोकके सूर्य श्रीवर्धमानस्वामी प्रातिहार्यादिअतिशय लक्ष्मी सहित उस
उद्यानमें आए ॥१३२० ॥
देवेहिं समवसरणं, रइयं अञ्चंतसुंदरं सारं । सिरिवद्धमाणसामी, उवविट्ठो तत्थ तिजयपहू ॥१३२१॥
अर्थ-देवोने अत्यन्त सुंदर प्रधान समवसरण रचा उस समवसरणमें तीनजगत् के प्रभु श्रीवर्धमान स्वामी बैठे १३२१
गोयमपमुहेसु गणीसरेसु, सक्काइएसु देवेसु । सेणियपमुहनिवेसुय, तहिं निविटेसु सवेसु ॥ १३२२ ॥
अर्थ-श्रीगौतमस्वामी प्रमुख गणधर सौधर्मादि इन्द्र और श्रेणिक प्रमुख राजा यह सब उस समवसरणमें बैठनेसे २२
सेणियमुदिस्स पहू, पभणेइ नरनाह ? तुझ चित्तंमि । नवपयमाहप्पमिणं, अइगुरुयं कुणइ अच्छरियं २३
अर्थ-श्रेणिक राजाका नाम उच्चारण करके प्रभु श्रीवर्धमानस्वामी बोले हे नरनाथ यह नवपदोंका माहात्म्य
तुम्हारे चित्तमें बहुत आश्चर्य करे है ॥ १३२३ ॥
॥१६३॥

तं च इमेसि पयाणं, कित्तियमित्तं इमं तए नायं । जं सवाणसुहाणं, मूलं आराहणमिमेसिं ॥ १३२४ ॥ अर्थ-यह नवपदोंका माहात्म्य तुमने कितना जाना है अर्थात् थोड़ाही जाना है इस कारणसे इन पदोंका आरा- चन सर्व सुसोंका मूल यत है ।। १३२४ ॥ गयाराहण मूलं च, पाणिणं केवलो सुहोभावो । सो होइ धुवं जीवाण, निम्मलप्पाण नन्नेसि १३२५ अर्थ-यह नवपदोंके आराधनका मूल कारण प्राणियोंके केवल एक शुभभाव है जो शुभभाव निश्चय निर्मल मात्मा जिन्नोंका उन जीवोंके होवे है अशुद्ध आत्मा जिन्होंका ऐसे जीवोंके न होवे ॥ १३२५ ॥ जेविय संकप्पवियप्प,-वजिया हुंति निम्मलप्पाणो। ते चेव नवपयाई, नवसु पएसुं च ते चेव ॥१३२६॥ अर्थ-जिकेमी संकल्प विकल्प वर्जित छोड़ा है संसारिक शुभ अशुभ विचार जिन्होंने ऐसे निर्मल है आत्मा मिन्द्रों का ऐसे जीव नवपदों में हैं ॥ १३२६ ।। जं झाया झायंतो, अरिहंतं रूबसुपयपिंडत्थं । अरिहंतपयमयंचिय, अप्पं पिक्खेइ पच्चक्खं ॥ १३२७ ॥ अर्थ-कहे हुए अर्थकोही दृढ़ करते है जिस कारणसे ध्यान करनेवाला ध्याता पुरुप रूपस्थ १ पदस्थ २ पिण्डस्थ ३ नरहन्त परमात्माको ध्याता हुआ प्रत्यक्ष अहंत पद मई अहंत पद स्वरूप आत्माको देखे वहां रूपस्थ सर्वअतिशय-

श्रीपाल-
चरितम्
भाषाटीका-
सहितम्-
॥१६४॥
सहित समवशरणमें रहे हुए १ पदस्थ अहं इत्यादि पवित्रपदका ध्यान २ पिण्डस्थ पिण्डशरीर उसमें रहे सो पिण्डस्थ
पहले पिण्डस्थ पीछे पदस्थ पीछे रूपस्थ ध्याना यह क्रम है ॥ १३२७ ॥
रूवाईयसहावो, केवलसन्नाणदंसणाणंदो । जो चेव य परमप्पा, सो सिद्धप्पा न संदेहो ॥ १३२८ ॥
अर्थ-रूप पौद्गलिक उलंघा जिन्होंने ऐसा स्वभाव जिन्होंका इसी कारणसे परिपूर्ण ज्ञानदर्शनरूप आनन्द
जिन्होंके ऐसे परमात्मा सिद्धात्मा कहे जावें इसमें सन्देह नहीं है ॥ १३२८ ।।
पंचप्पत्थाणमयायरिय, महामंतझाणलीणमणो। पंचविहायारमओ, आयच्चिय होइ आयरिओ १३२९
अर्थ-पांच प्रस्थानं मई जो आचार्यसम्बन्धी महामन्त्रके ध्यानमे लीनमन जिन्होंका और पांच प्रकारका
आचार प्रधान जिसके सो आत्माही आचार्य होवे है पांच प्रस्थानके नाम विद्यापीठ १ सौभाग्यपीठ २ लक्ष्मीपीठ
३ मंत्रयोगराजपीठ ४ सुमेरुपीठ ५ इन्होंका अर्थ सूरीमंत्र कल्पसे जानना भावध्यान माला प्रकरणमें तो अभय-
प्रस्थान १ अकरणप्र० २ अहमिन्द्रप्र० ३ तुल्यप्र० ४ कल्पप्र० ५ इन्होंका स्वामी पंचपरमेष्ठी कहा है ॥ १३२९ ॥
महपाणझायदुवालसंग,-सुतत्थतदुभयरहस्सो, सज्झायतप्परप्पा, एसप्पा चेव उज्झाओ ॥ १३३०॥
अर्थ-महाप्राणायाम ध्यानविशेषसे विचारा है द्वादशाङ्गी सूत्रार्थका रहस्य जिसने वह तथा वाचनादि पांच
प्रकारके स्वाध्यायमें तत्पर आत्मा जिसका ऐसा आत्मा ही उपाध्याय होवे है ॥ १३३० ॥
.
॥१६४॥

ह
स्यणतारण सिवपह, संसाहणसावहाणजोगतिगो, साहु हवेइ एसो, अप्पुच्चिय निश्चमपमत्तो १३३१
अर्थ-ग्लयज्ञान, दर्शनचारित्ररूप मोक्षमार्गके साधनेमें सावधान मन, वचन कायारूप तीनयोग जिसका ऐसा
और निरंतर प्रमादरहित यह आत्मा ही माधु होवे है ॥ १३३१ ॥
मोहस्सग्योवसमा, समसंवेगाइ लक्खणं परमं । सुहपरिणाममयं, नियमप्पाणं दंसणं मुणह ॥१३३२॥
अर-मोहमा योपटामसे उत्कृष्ट शुभ परिणाम मई अपने आत्माको सम्यक्त्व जानो कैसा सम्यक्त्व सम समवे-
गाविण जिसके मा ॥ १३३२ ॥
नाणावरणस्स खओ, वसमेण जहट्ठियाण तत्ताणं । सुद्धावबोहरूबो, अप्पुच्चिय बुच्चए नाणं ॥ १३३३ ॥
मानापरणी कर्मके क्षय उपगमसे जो यथावस्थित सद्भूत जीवादितत्वोंका शुद्धज्ञान स्वरूप जिसका ऐसा
भारमाही ज्ञान कहा जावे ।। १३३३ ॥
मोलमकसायनवनोकसाय, रहियं विसुद्धलेसागं । ससहावठियं अप्पाण, मेव जाणेह चारित्तं ॥१३३४॥
अर्थ-कोषादिक मोलह १६ कपाय हास्यादिक नव नोकपाय इन्होंसे रहित इसी कारणसे निर्मल लेश्या जिनकी
ना म्यभावमें रहाआ आत्मा चारित्र जानो ॥१३३४ ॥
इन्छानिरोहओ, सुद्धसंवरो परिणओय समयाए । कम्माइं निजरंतो, तवोमओ चेव एसप्पा ॥१३३५॥

भाषाटीका-
सहितम्-
श्रीपाल-
चरितम्
॥१६४॥
सहित समवशरणमें रहे हुए १ पदस्थ अहं इत्यादि पवित्रपदका ध्यान २ पिण्डस्थ पिण्डशरीर उसमें रहे सो पिण्डस्थ
पहले पिण्डस्थ पीछे पदस्थ पीछे रूपस्थ ध्याना यह क्रम है ॥ १३२७ ॥
रूवाईयसहावो, केवलसन्नाणदंसणाणंदो । जो चेव य परमप्पा, सो सिद्धप्पा न संदेहो ॥ १३२८ ॥
अर्थ-रूप पौद्गलिक उल्लंघा जिन्होंने ऐसा स्वभाव जिन्होंका इसी कारणसे परिपूर्ण ज्ञानदर्शनरूप आनन्द
जिन्होंके ऐसे परमात्मा सिद्धात्मा कहे जावें इसमें सन्देह नहीं है ॥ १३२८ ॥
पंचप्पत्थाणमयायरिय, महामंतझाणलीणमणो। पंचविहायारमओ, आयच्चिय होइ आयरिओ १३२९
अर्थ-पांच प्रस्थान मई जो आचार्यसम्बन्धी महामन्त्रके ध्यानमे लीनमन जिन्होंका और पांच प्रकारका
आचार प्रधान जिसके सो आत्माही आचार्य होवे है पांच प्रस्थानके नाम विद्यापीठ १ सौभाग्यपीठ २ लक्ष्मीपीठ
३ मंत्रयोगराजपीठ ४ सुमेरुपीठ ५ इन्होंका अर्थ सूरीमंत्र कल्पसे जानना भावध्यान माला प्रकरणमें तो अभय-
प्रस्थान १ अकरणप्र० २ अहमिन्द्रप्र० ३ तुल्यप्र० ४ कल्पप्र० ५ इन्होंका स्वामी पंचपरमेष्ठी कहा है ॥ १३२९ ॥
महपाणझायदुवालसंग,-सुतत्थतदुभयरहस्सो, सज्झायतप्परप्पा, एसप्पा चेव उज्झाओ ॥ १३३०॥
अर्थ-महाप्राणायाम ध्यानविशेषसे विचारा है द्वादशाङ्गी सूत्रार्थका रहस्य जिसने वह तथा वाचनादि पांच
प्रकारके स्वाध्यायमें तत्पर आत्मा जिसका ऐसा आत्मा ही उपाध्याय होवे है ॥ १३३० ॥
A
RECENSE
॥१६४॥

ग्यणनगण सिवपह,-संसाहणसावहाणजोगतिगो, साहू हवेइ एसो, अप्पुच्चिय निच्चमपमत्तो १३३१
अर्थ-लत्रयनान, दर्शनचारित्ररूप मोक्षमार्गक साधनेमें सावधान मन, वचन कायारूप तीनयोग जिसका ऐसा
और निरंतर प्रमादरहित यह आत्मा ही माधु होवे है ॥ १३३१॥
मोहस्सखओवरामा, समसंवेगाइ लक्खणं परमं। सुहपरिणाममयं, नियमप्पाणं दंसणं मुणह ॥१३३२॥
अर्थ-मोहका भयोपशमसे उत्कृष्ट शुभ परिणाम मई अपने आत्माको सम्यक्त्व जानो कैसा सम्यक्त्व सम समवे-
गादि लक्षण: निमके ऐमा ॥ १३३२॥
नाणावग्णस्स ख़ओ, वसमेण जहट्ठियाण तत्ताणं । सुद्धाववोहरूबो, अप्पुच्चिय वुच्चए नाणं ॥ १३३३॥
अर्थ-ज्ञानाचरणी कर्मके क्षय उपशमसे जो यथावस्थित सद्भूत जीवादितत्वोंका शुद्धज्ञान स्वरूप जिसका ऐसा
गारमाही ज्ञान कहा जावे ॥ १३३३ ।।
मोलसकसायनवनोकसाय, रहियं विसुद्धलेसागं । ससहावठियं अप्पाण, मेव जाणेह चारित्तं ॥१३३४॥
अर्थ-होचादिक मोलह १६ कपाय हास्यादिक नव नोकपाय इन्होंसे रहित इसी कारणसे निर्मल लेश्या जिनकी
ऐना न्यभारमें रहामा आत्मा चारित्र जानो ॥ १३३४॥
इन्छानिरोहओ, सुद्धसंवरो परिणओय समयाए । कम्माई निजरंतो, तवोमओ चेव एसप्पा ॥१३३५॥

भाषाटीका. सहितम्. श्रीपाल- चरितम् ॥१६५॥ अर्थ-इच्छाके रोकनेसे शुद्ध सम्बर जिसके और समभावसे परणित कर्मोकी निर्जरा करता हुआ यह आत्माही तपस्वरूप तप मई है ॥ १३३५ ।। एवं च ठिए अप्पाणमेव, नवपयमयं वियाणित्ता । अप्पंमि चेव निच्चं, लीणमणा होह भो भविया १३३६ अर्थ-इस प्रकारसे होनेसे आत्माहीको नवपद मई जानके अहो भव्यो आत्मस्वरूपमेंही लीनमन जिन्होंका ऐसे होवो ॥ १३३६ ॥ तं सोऊणं सिरिवीरभासियं सेणिओ नरवरिंदो । साणंदो संपत्तो, निययावासं सुहावासं ॥ १३३७ ॥ अर्थ-यह श्रीमहावीरस्वामीका कहाहुआ वचन सुनके श्रेणिकराजा भगवान्को बन्दना करके आनन्दसहित सुखका स्थान ऐसे अपने घर गया ॥ १३३७॥ सिरिवीरजिणोवि हु, दिणयरुवकुग्गहपहं निवारितो। भवियकमलपडिबोह, कुणमाणो विहरइ महीए ३८ अर्थ-श्रीमहावीरस्वामीभी सूर्यके सदृश कुग्रहपथको अर्थात् कुमार्गका निवारण करता भव्य कमलोंको प्रतिवोध विकास करता पृथ्वीपर विहार करे ॥१३३८ ॥ एसा नवपयमाहप्पसार,-सिरिपालनरवरिंदकहा । निसुणतकहताणं, भवियाणं कुणइ कल्लाणं ॥ ३९ ॥ ॥१६५॥ FAS अनव पदोंका माहात्म्य श्रेष्ठ है जिसमें ऐसी यह श्रीपाल राजाकी कथा शुद्धभावसे सुनते हुए और कहते हुए भन्यों के कल्याण करो।। १३३९ ।। सिरिवजसेणगणहर, पट्टप्पहू हेमतिलयसूरीणं । सीसेहिं रयणसेहर,सूरीहिं इमा हु संकलिया॥१३४०॥ अर्थ-श्रीवमेन आचायके पदमें हुए श्रीहेमतिलकसूरि उन्होंके शिष्य श्रीरलशेखरसूरिने यह श्रीपालकी कथा ग्गी प्राीन स्याको देखके ।। १३४०॥ तस्सीसहेमचंदेण, साहुणा विक्कमस्सवरसंमि। चउदसअट्ठावीसे, लिहिया गुरुभत्तिकलिएणं ॥ १३४१॥ अध-उन्होंके शिष्य हेमचन्द्र साधुने विक्रम सम्बत् १४२८ में चौदहसे अट्ठाईसमें लिखीं कैसा हेमचन्द्र गुरूकी भनिनादित मा ॥ १३४१ ॥ सायर मरु जा महियलंमि, जा नहलंमि ससि सूरा, वति तावनंदओ, वाइज्जंता कहा एसा १३४२ -जयतक पृषीपर समुद्र और मुमेरु पर्वत यह दोनों वर्ते है और आकाशमें जबतक चंद्रमा सूर्य है तबतक याद श्रीपाल गाफी कथा वाच्यमाना समृद्धि पाओ॥ १३४२ ॥ यह श्रीपाल नरेंद्र प्राकृत कथाकी संस्कृत टीका अनु- गार भागटीका वृहत् परतर गच्छोय भ० श्रीजिन कृपाचंद्रसूरिने लिखि वि० सं० १९८० स्वपरअनुग्रहके लिये श्रीरस्तु ।। इति श्रीपालनरेंद्रकथा श्रीसिद्धचक्रमाहात्म्ययुता समाप्ता ॥ AC-ARMA

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श्रीपालचरितं भाषान्तरसहितं समाप्तम् ।
S
32-53-54
-32-CURR-STS
हो

Prakrit-shripal Charitam Bhashantarsahitam

Author
Panachand Bhagubhai
Title
Prakrit-shripal Charitam Bhashantarsahitam
File name
Prakrit-shripal Charitam Bhashantarsahitam
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2010/09
Publisher
Surat, Shri Jinduttsuri Gyan Bhandar
Language
Sanskrit
Pages
349
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326987
Barcode
99999990002469.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
hZEcLBRDPQ0
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