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Naye Aadami Ka Janma

Vinod Shahi · 2011/03

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नये आदमी का जन्मा

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कविता संग्रह नये आदमी का जन्म

नये आदमी का जन्म:
© लेखक के सर्वाधिकार सुरक्षित : प्रथम संस्करण--1989 1
आवरण : भारत भूषण भारती : मुद्रक : रोहिणी प्रिंटर्ज,
कोट किशन चन्द, जालन्धर शहर : आवरण : सुधेड़ा वुक
बाइंड, किला मोहल्ला, जालन्धर शहर : मूल्य : 45000 रुपये।
Nayo Aadami Ka Janma : a collection of poems by
Vinod Shahi : First Edition : 1989 : Rs. 45.00

कुछ स्वांतः सुखाय इस संग्रह की कविताओं का चुनाव करते समय यह सवाल मेरे जेहन में फिर उठा कि कविता क्या है ? सवाल पुराना है और इसका जवाब देते हुए अक्सर यही सवाल बार-बार उठाया जाता रहा है कि कविता क्या करती है ? जैसे कि अगर कविता की उपयोगिता को सिद्ध न किया गया, तो कविता लिखना ही वेकार हो जाएगा । इतनी तर्कशीलता मुझे कविता की प्रकृति के अनुकूल नहीं जान पड़ती। इतना ही ठीक लगता है कि उपयोगिता का सवाल काव्यानुभव की परिधि मे ही उठाया जाए । काव्यानुभव कविता के लिए पहली शर्त है । मेरे लिए काव्यानुभव का मतलव रहा है-सीमाओं से मुक्ति । सीमाएं आदतों की, दोहराव की, परंपरा की, दिखावे की, साधना की और यहां तक कि खास-खास किस्म के रसबोध की भी। ये सीमाए ही रुकावटें है जो सत्य तक पहुंचने से हमें रोके रखती है । इनकी वजह से 'एक भय उपजता है जो हमे बंधी बंधाई लीक पर डाले रखने के लिए जोर डालता है। काव्यानुभव शब्दों के सहारे की गई वह यात्रा है जो एक ओर इन रुकावटों को तोड- फोड़ डालने की खातिर जूझती है और दूसरी तरफ बंधी बंधाई लीक को फिर से अपनी तरह, अपनी दुनिया के रूप मे गढने की कोशिश करती है । इस काम के लिए पीछे की मारी काव्य-दृष्टि और काव्य-रूप हमारे मददगार भी होते हैं और हमारे दुश्मन भी । यहा तक काव्यानुभव मुझे एक खास किस्म की काव्य उत्तेजना देता है और इसके बाद खुलेपन के अहसास के बीच एक प्रश्नाकुल इंतजार करने का धीरज भी। जब मैं स्थिर रह कर इंतजार कर पाता हूं, कविता खुद को मुझ से लिखवा लेती है । और जब मैं स्थिरता का पल्ला छोड़ इंतजार में बने रहने का उपक्रम करता हूं, तो 'एक डरा देने वाली अराजकता मुझे और मेरी कविता को घेर लेती है । इन दोनों 'स्थितियों में एक तनाव हमेशा मेरे साथ चलता है.कही दूर गहरे अतल विस्तार में 'छलांग लेकर कूद जाने का तनाव । धीरे-धीरे सहज भाव मे कथ्य को पकने देने की प्रक्रिया में मुझे विश्वास नहीं । ऐसे लगता है, जैसे यह प्रक्रिया अतीत की कोई वस्तु हो कर रह गई हो-महाकवियों के विराट अनुभवों की परंपरा से जुड़ती हुई । आज वह न साध्य है और न काम्य । आज जहां इतना कुछ है, इतना विखराव, इतनी वैचारिकता ; वहा दुनिया के साथ आदमी का हार्दिक रिश्ता जोड़ने वाली कान्य-समाधि की जगह जाने अनजाने आयामों में कूद जाने का साहस ही उसे एकसूत्रता या आंतरिक ऐक्य का अहसास दे सकता है। अपनेपन को उस तक लौटा सकता है और उसके कर्मों को समूचेपन की संगति में अर्थ दे सकता है। जब पता चलने लगता है कि हमारी छोटी से छोटी हरकत, छोटी से छोटी घटनाएं भी दरअसल व्यापक समाज, राजनीति, दर्शन, संस्कृति और यहाँ तक कि पूर्ण या ब्रह्माण्ड के अनुभव से जुड़ती / टूटती हुई ही हो रही हैं--तो अविश्वास और शंका की वजह से उस अनुभव में छलाग लेने को ही विसंगति या झटके के रूप में देख कर संभव है कि कोई उसे बर्दाश्त ही न कर पाए । परन्तु इस अनुभव को काव्यानुभव की सीमा मान लेना मुझे स्वीकार्य नहीं । सो काव्यानुभव की परिधि में उपयोगिता के सवाल को उठाने का मतलब है--पाठकों से कविता के रिश्ते को साफ तौर पर समझना । मेरी कविताएं शायद सीधे तौर पर कोई संदेश नहीं देती, पर वे बदलने हुए युग मे संघर्ष के मुद्दों के बदल जाने की हकीकत को न सिर्फ पहचानना चाहती है, बल्कि इस बदली हुई हकीकत को स्वीकारते हुए वेचन और लोकभ्रष्ट न हो जाने की सामर्थ्य जुटाने के लिए भी काम करना चाहती हैं । युग का बदलाव आदमी के बदल जाने की पृष्ठभूमि हुआ करता है । एक नये आदमी का जन्म--यही मेरी काव्य चिंता है । क्योंकि इसी पर आधारित है-युग के बदलाव को सार्थक दिशा मे मोड देने की उम्मीद । जुझने के लिए बंधी बंधाई लीको पर चल देने का मतलब है-जीवन के रहस्य से अपरिचित रह जाने के आदमी के दुर्भाग्य को स्वीकार कर सेना । और जीवन के रहस्य के रूवह खड़े हो जाने का मतलब है-~-अवझ में छलाग. लेकर कूद जाने की हिम्मत और एक धीरज भरी इतजार, झटकों को स्थिर रह कर पचा जाने की कीमिया। विनोद शाही ई. क्यू. 219, पक्का बाग जालन्धर शहर-144000 अनुक्रम संघर्ष सूक्त /9 आत्म मिथक / 10 स्वांतः विरुद्ध | 11 आत्म जेता/12 खीझ/12 अणुयुग / 13 उड़ाते हुए बम गुब्बारों की तरह / 14 बांसुरी बजाओ, कान्हा !/15 स्वगर्भत्व / 16 उस पेड़ का नाम बताओ/16 आदमी का जन्म/17 नये आदमी का जन्म / 18 परशुराम /19 एक बालक का जन्म 120 असहयोग से असहयोग | 24 पूरा होने की ललक / 25 सौंदर्य की आंधी और भविष्य /26 पांचवें मोड़ पर/27 सप्रेपण और संवाद/28 अथ हल्कू कथा 129 खेल-खेल में /30 शक्ति बिंब की खोज 132 दुख और करुणा /34 मूक बहुमत से मुखातिब / 34 नीलामी/36 मुक्ति पल /37 एक पलक की प्रार्थना 138 कवि और साहिब / 40 कटघरे मे कवि/42 भस्मासुर/43 मध्ययुग के दलदल में फंसा आज ! 43 एक समाज प्रजातांत्रिक/45 एक प्रजातांत्रिक विद्रोह / 45 कछुआ सस्कृति 147 निर्णय का क्षण/49 चिड़िया फूल है। 50 तुम्हें पूरा जानने की कोशिश में/50 माया फिर होश/51 देखने भर का फर्क152 सीधी सच्ची आहुतियां 152 सहजता की तरफ/53. उद्घाटन / 54 कविता क्यों लिखें/55 हंस और बूढ़ी मा/56 मसीहा के खिलाफ 157 अस्मिता/57 उलट बांसी/58 अंधेरे के पर्यायवाची/59- रक्तजीवी ज्ञान/60 समय और स्थान से आजाद होते हुए/61 पीपल गाथा/63 बिल्लियों की आत्म कथा/65 कविता की धूप में खड़ा कर्ण/68 एक विचार कविता/69 समाधि के पत्थर/69. धूप जले 171 न लड़ने की लड़ाई / 79 स्वचालित मंथन/80 शिखरो पर कोहरे की झाईमाई/81 इतिहास मानव /82 विद्रोह से विवेक तक 1 83. खुद को उगाते हुए/ 84 राम रहित मानस / 84 महज एडवंचर के लिए / 87 खातों में जमा भविष्य 190 8 जनवरी, 1985 की ठंडी रात में धर्मनिरपेक्षता/91 आदिम भूल / 93 कालिय मदन/94 रास लीला/94 कुछ चित्र कविताएं/95

संघर्ष सूक्त
उस वक्त जब, हर आदमी अपना शासक खुद बनने से
हिचकिचाएगा नहीं
जब सत्य की खोज पर, कोई पहरा लगाने की जरूरत नहीं होगी
यथार्थ से गले मिलने के लिए
जब कल्पना को पूर्वाग्रहों से निपटना नहीं पड़ेगा
हमारी लड़ाई उस दिन क्रांति हो जाएगी।
समझौतों की
जगह,
जब विवेक झगड़े निपटाएगा
अपनी वाकफीयत आदमी जब धर्म से नहीं
अपने संघर्ष से पाएगा
जीवितों के युद्धस्थल मे, अतीत जब काम आएगा
हमारी क्राति उस दिन जीवन हो जाएगी ।
हमारी ताकतें बेरोकटोक
जब कविता की तरह अभिव्यक्त होंगी
जरूरतमन्द वर्ग की शिनाख्त कर
जब लोग संघर्ष के मुद्दों को बदलते वक्त
किसी तनाव का शिकार नहीं होंगे
भापा के बनावटी जाल में
अर्थ जब चाह कर भी छिप नहीं पाएगा
हमारी जिंदगी उस दिन ईश्वर हो जाएगी। 0

आत्ममिथक मेरे मित्र ! मुझे घृणा के दृश्य में मत वदलो प्रेम ही तो / रक्त है मेरा बह गया तो राख भी नहीं बचेगी | इस दृश्य मे । खाक दुश्मन हो तुम कुछ मित्रो की आंखों में भी 'तिनके की तरह सिकुडते हुए देखो मुझे मौत भी मेरी सीमा नहीं है। सुन सको / तो मुझे दिमाग में धड़कते हुए सुनो हंस सको / तो मुझे हिलती हुई पसलियों से रचो रीसको / तो बस एक गर्म सास- और मुझे पिघला दो। मुझे उठाओ धड़कती धमनियो को शस्त्र बनाओ खरे इस्पात को मुझ में खोलाओ खाक मित्र हो तुम 'कुछ दुश्मनों की आंखो में भी प्रेम के मोर्चे की तरह / खुदते हुए देखो मुझे काति भी मेरी सीमा नहीं है। प्रेम की आखों में धरती की तरह / फैलते हुए देखो मुझे आकाश भी मेरी सीमा नहीं है।

यह कैसा
“झूठा-झूठा-सा अस्तित्व है मेरा ?
एक बेचारगी से भरा भलापन
खिसियाहटों को अपनी गरिमा वना मकने का उपक्रम
मर्यादित तौर तरीकों की / लौह भित्तियो के बीच
चोर झिरियो से खेलना / आंखमिचौनी
आत्मविश्वास से गलतबयानी कर पाने का अभ्यास
उपहास का पात्र बनाने की मित्रों की कोशिशों पर
क्रोधपूर्ण अभिनय
सुविधाएं पाने के लिए
मामूली फरेब कर सकने का तनाव
लोलती हुई रोजमर्रा की जिंदगी के बीच
रचनाशीलता के सहन से दैनिक तौर तरीकों को
खोज लेने की असामध्य
इन सब से कभी फुर्सत मिली
तो सत्य तक भी पहुंच हो जायेगी मेरी ।
तब यह आखिरी काम करना चाहूंगा
'गिद्दत से जिसे करने से बचता आया हूं
तुम्हें ऊपर उठा सकने के काम मे
खुद को खो देने का अहसास ।
खोए विना अपने आप को
तुम्हे कैसे ऊपर उठा सकता हूं?
फिर भी अपने अदने से मूठे अस्तित्व को
सहेजे रखने की आदत से
पता नही क्यों, अभी तक जुड़ा है ?
अधूरेपन को जिंदगी मान कर
भला क्यो रुक गया हूँ? D
.11

आत्मजेता
हवा तक न लगने दीजे
गर कोई सूरज हो पास अपने
जिस से शर्मिदगी न होने पाए दोस्त को / अपने दिए पर।
साक्षी है दिया / उसके संघर्ष का
तिल-तिल जलने की योग्यता अजित करने का।
नम्रता के उस मुकाम छू
लीजे
कि निम्नतम के संघर्ष में शामिल होने को
शुकना भी ढिठाई लगे
और छोटी खोटा बातों पर का / दोस्तों का झूठा अहं
अलगाव की वजह न बन सके।
खुद ही खुद को / उस हद तक आजाद होने दौजे
कि अपनी सहज बुद्धि / कर्म बनने तक रुक न जाए
अभाव की बड़ी से बड़ी ताड़नाओ से घिरे दोस्त
खुद से भी पहले अपने लगें।
वे ही पांच होकर पंचायत लगें
गांव से लेकर राज्य तक आजाद लगें।
दोस्त और दुनिया के बीच
हर किस्म की खाई पर विजय
खुद की खुद पर विजय हो जाए
खोझ
एक अपनी बंद माख तो खुलती नहीं
किस किस की बेहोशी को जीऊं?
समझदार भी कैसी जिद का शिकार हैं
अब किस-किस के बचपने से व्यस्त होता फिरू?
12

अनगिनत नामों से टपकता है मेरा सहू
'रिस-किस में रन से हंसी बटोई?
जिदा लोगों की तलाश में धूमूं?
या जिम तिरा मे गव में संवेदनाएं रमाता फिह ?
मैंने अपने तरवास फे जितने मरितयाण
मित्रों के हाप दिए
मेरे ही मारा में गहने मे लिए लौट आए।
अपनी ही सारत को एक बीमारी की तरह
अपनी देह में कर तफ र ?
मय मिग-किम के विश्वासपात से
मानव होता फिर ? 0
अणु युग
यह देसो, भाकाश फिर से हो रहा है पंदा
शून्य को कोस से / एटमी धूल की पोल की तरह ।
एक नीले रंग का बहुत बड़ा माप
कुलबुला कर उलट जाता है पीठ के बल
ठीक हमारे सिरों के ऊपर ।
हमारी भूस और रोटियो के बीच रखे गए
छुरी कांटो, नक्काशीदार प्लेटों, सुराहीनुमा जगों
और कढाईदार मेजो पर/करती है जगर मगर
आकामा के जन्म के वक्त पंदा हुई/जेर की झोल
निगलना चाहती है हमारी भूख
को
समझ कर कोई पूण ।
कोलतार से पते नीली झाई वाले राजपथ
जहरीली हवाओं को शह देकर
ओंक रहे हैं हमारे घरों की दिशाओ में
i

बंद होती हमारी सासों को / देते हैं नाम कुंभक का
नाभीमंडल को ऊपर चढाता हुआ एक प्राणायाम
भेद डालता है जीवन के एटम का नाभिक
एक गरीब मुल्क जीता है
आकाश के जन्मदाताओ की एटमी धूल की पोल को तरह
लड़ता है / खुद सारी सीढियां चढ जाने वाले
सांपो के खेलघरों के खिलाफ।।
उड़ाते हुए बम गुब्बारों की तरह
कुछ बच्चे | खेल रहे हैं / गुब्बारों से
आसमान को छ लेने के बाद
अचानक फूट जाता है / गुब्बारा
हाइड्रोजन बम की तरह।
एक देश / भालू का लबादा ओढ़
खेलता है लुका छिपी
बच्चों में शामिल होकर ।
बच्चे नोच कर उसके बाल
सजा लेते हैं अपनी किताबों में ।
किताबों में लिखे
हाइड्रोजन बम बनाने के नुस्खे
बड़े मुश्किल लगते हैं उन्हें ।
सोचते है वे
क्या किसी हाइड्रोजन बम को
उड़ाया जा सकता है
तरह ?
और क्या किताबो मे बंद
गुब्बारो की
भालू के बालों से
14

बनाई जा सकती है पंटिंग
ऐसे देश की
जिसे सवादे ओढ़ने की जरूरत न होती हो ?
और जहां गुब्बारे उड़ सकते हो
गुय्यारों की तरह ? -
बांसुरी बजाओ
कान्हा
!
कहने को वे / तुम्हारी ही परम्परा के ध्वजवाहक थे कृष्ण !
लेकिन विरोधियों को दबाने के लिए
उन्होंने आतंक का सहारा ममा लिया
यह भस्मासुर उन्हीं के पीछे पड़ गया ।
हमें तो जरूरत है तुम्हारी एक अदद बांसुरी की
उस वांसुरी की कृष्ण!
जो आतंक और हिंसा के शोर को एक दफा फिर
संगीत के सुरों में ढालने की कर सके पहल ।
आह ! वह बांसुरी हमारे पास क्यों नहीं है
वह व्रज, वे ग्वाले, वे गोपिया
घास के मैदानों में निर्भय चरती वे गोएं
प्रेम आंधी को झुलाने के लिए / वेताब और खामोश
वे कुंज, वे बाग बागीचे ।
आज भी उसी तरह खड़े है प्रतीक्षा में रत
तेरी बांसुरी की धुन शुरू होने की उम्मीद मे स्तब्ध ।
हमारे रोम-रोम को होठ बना कर
फूक दो उनमे अपनी गर्म सांस
बजाओ कान्हा ! वह बांसुरी तो अवश्य बजाओ
अपने रास की उसी क्रांति को
आज झोंपड़ियों, बस्तियो और गली कूचों मे ले आओ।।
15

स्वगर्भव
प्रेम का एही मतमय है
पविता पना।
रपना पा एकही मनाय है
अन्त में धारा पो रचना
और आरम्म का कहीं अंत तर जाकर
थारम होना।
फिर यह राव जो रपा जाएगा
फविता बनेगा
यह मैं होऊंगा।
..
उस पेड़ का नाम बताओ !
पपड़ाए हुए अपने गोश्त को चाटता हुआ युधिष्ठिर
बोलता है सच
राजपय के किनारे-किनारे उग आते हैं जो पेड
गवाह उस सच के / तकरीबन सब को लगता है
आदमखोरो से कुछ मिलते जुलते जुलते है ये पेड ।
कौन किस्मत वाला सही-सही नाम बताएगा / उम पेड का
यह जानने के लिए
अपनी कमीजों को धारियां गिनकर
निकालते हैं लोग प्रतिभा के क्रमाक / राजपथ के किनारे-किनारे ।
अपने उपनामों का सही इस्तेमाल करने के लिए
लेखक लोग करते हैं दावे
झुठलाते है आलोचक / अपने छद्मनामों से
साझ होते होते
16

आकाश के होंठों पर अपने लिपस्टिकों से लिरा देती हैं
फेसनेवल औरत | उस पेड़ का नाम
बजाते हैं तालियां / बड़े बड़े अफसर / कोमी सभामों में।
सच | युधिष्ठिर फे माप-शाय
उतर कर राजपप से चल देता है पगडंडी पर
गोवर लिपी गह के किनारे-किनारे
उग आते हैं कुछ पेड़
गवाह इस गिरावट के / तकरीवन सब को लगता है
कल्पवृक्षों से फुट मिलते जुलते हैं वे पेड़।
तमाम मुल्क सोया रहता है
फोई नहीं बताता | उस पेड़ का नाम क्या है
हालांकि सब जानते होते हैं उस पेड़ का नाम । 0
आदमी का जन्म
रक्त पीने की परम्परा होगी कोई खरय वर्ष पुरानी
मस्तिष्क बना होगा पहली दफा जिस दिन इस धरती पर ।
पहली दफा उस दिन किसी सिर ने
रक्त चूसा होगा अपनी ज़ुओं का
हत्यारों की ताकत को जिंदगी ने
पहली पहली दफा आजमाया होगा
हुआ होगा पहली-पहली बार धरती पर जो समुद्र मंथन
किसी देवता ने छीन कर दानवों से
पहली दफा पीया होगा अमृत और हालाहल एक साथ ।
जन्म लिया होगा पहली बार धरती पर किसी आदमी ने।
जन्म लेकर पहली दफा किसी आदमी ने
रक्त पीने की आदत को बदल दिया होगा
रक्त पीने की परंपरा में पहली दफा ।

परंपरा की पीठ पर सवार
पहली दफा पहचाना गया होगा आदमीयत को
और हमेशा नया होने की उम्मीद को
दिया गया होगा नाम मात्मा का पहली दफा 10
नये आदमी का जन्म
मेरा भाई मुझे प्यार करने से पहले पूछना है
तय कर लिया है कि नहीं तुमने / अपने भविष्य का मकसद !
मां-बाप ममता दिखाने से पहले
तय करते हैं | किस झंडे को कौन-सा नारा देगा यह लड़का ?
पत्नी मेरे चेहरे को घर-घर कर देखती है
अभी तक अपनी संतानों के विकास तक को
परिभापित क्यों नहीं कर पाया हूं / पंचवर्षीय योजनाओ के रूप में ?
ऐसे वक्त लगता है मुझे
अपने आप को एक नयी शक्ल दे डालना लाजिमी हो गया है | मेरे लिए
प्रवेश कर जाना चुपके से / संस्कारों की मांस थैली मे
रूढियों के काले रक्त के तालाब में / रुधी हुई सांसें लिए ।
मब की दफा पूछता हूँ मैं
मुझे कौन जानेगा?
झेल कर प्रसव पीडा
मुझे नया जन्म कौन देगा?
नया जन्म
जो रिश्तों के मायने बदल देगा
एक दूसरे से जुड़ी लहू को अदृश्य धनिया
गर्भनाल की तरह
प्रेम को ले जाएंगी
नाभि से मेरी / सब के दिलों तक।
181

मकसद जिंदगी काजिंदगी से मिलेगा
लगातार जूमने के दरम्यान ।
फिर पकड़ कर अपनी रीढ़ को/हे की तरह
पूरे मस्तिष्क को ले चलूंगा / अपना अंडा बनाकर
जो कुछ भी बोलूंगा / नारा बन जाएगा
सुद अंस कर अपनी-अपनी प्रसव पीड़ा
हर मादमी नया हो जाएगा
कुछ भी नहीं होगा नियोजित
नये आदमी की संतानों की सातिर
बेहिसाब आजादी के साथ
उठा ले चलेंगी वे अपने युग के परचम
कुछ और करना / मुमकिन ही नहीं होगा
उनके लिए सब।
परशुराम
कोशिश करता है अकेला परशुराम
दुढे सूरज के सफेद रेगों को
अपने फरसे से काटने की।
हजार साल पुराना सूरज
कहता है परशुराम से / कर नमस्कार
कहता है परशुराम / पहले घर मे प्रवेश कर / कीटाणु मार ।
गुस्से से तमतमाते सूरज की भयानक बारिश में
फूटती हैं नकसीरें। फिर भी हंसते है
सुले मे काम करते हजारो परशुराम तरस राम
रंग कर अपनी खिच्चड़ दाड़ियों को अपने रक्त से
लगने लगते हैं जवान
बूढे सूरज के मुकाबले में परशुराम ।
बदल-बदल कर आकाश के नीले नकाब को
192

छिपाना चाहता है ऊंची जगह पर सवार सूरज
अपनी दाढी के सफेद बाल।
जानता है परशुराम / इस सूरज से कही भयानक है
उसके अपने कालीदास की हिमस्नात चांदनी रात
या जपदेव का कूजित कंज कुटीर
गुफाओं में होते गए हैं तब्दील ये
घर बूढे सूरज के गुप्त पड़यंत्रों के
ऐसे आड़े वक्तों मे रोके रहता है सूरज
अपने एकाधिकार में भाई गुनगुनी धूप को।
पीला पड़ जाता है रग
रेलिंग के सहारे खड़े बेकार नौजवानो का
नजरें हो जाती हैं सफेद ।
तब उन के ही बीच से होकर / बाहर निकल आता है परशुराम
अकेला है वह / फिर भी पता नहीं क्या सोच समझकर
करता है कोशिश इत्मीनान से
बूढ़े सूरज के सफेद रेशों को / अपने फरसे से काटने की।
एक बालक का जन्म
समझ के परले सिरे से
कुछ अर्थहीन से आकारो के बीच
एक बालक का जन्म लेना
एक इशारा था गोया
समझ की हद के पार अर्थ के फैलाव का
मुक्त था जो/ उपयोग के बंधन से
अर्थ, समझ, उपयोग | सब की कसौटी था पहली पहल ।
बाहर आकर / सबसे पहले
सुबूत दिया अपने जिंदा होने का / रोकर बालक ने
0

हमने घडियो देखी
उस क्षण को पवित्र माना
बालक ने चुप हो कर हैरानी से इधर-उधर निहारा ।
एक तरल निगाह
कमरे को मुर्दा दीवारों
और सामान की उपयोगी तरतीवों को
पृष्ठभूमि में उपेक्षित की तरह छोड़ती हुई
करने लगी तरोताजा
थकी हुई मां को
ठहरे हुए माहौल / और बेचन प्रतीक्षा में बैठे लोगों को।
मां की आंखो के इर्द गिर्द
खिंच आए स्याह दायरों में
हिलगुल-सी होने लगी। संतुष्ट उत्साह की
बंद कर आंख / पूर्णता के भाव को
देखा उसने / बालक के बिंब को
रोएदार नर्म त्वचा में लिखे जीवन को।
सो गया बालक फिर
जीवन के विराट अनुभव को बिखरा कर
अर्थ की पहचान के सफर को
समझ के परले सिरे से शुरू करने मे
हो गया वह हमारा वेबूश हमसफर ।
इस्पाती निगाह
चुल्लू भर आचमन कर द्वन्द्वों का
साधकर दम
घधकाने लगा मैं / एक नामालूम आग
कोमल प्रतिभा के मुकावले.
खड़ा करने लगा / ताकत मांसपेशियों की
21

सदियों से जो हमेशा जीतती ही आई होश से 'कृचल कर सस्य को जिसने इतने झूठ प्रचारित कर दिए / सच्वाई के नाम पर कि उनके बीच तय करना हो गया कठिन प्रामाणिक शक्लो और नामो को। कोन जाने जिससे विरोध है मुझे वह भी सिर्फ एक ट्रिक हो कैमरे की लेकिन ध्वस्त करने को उसका आभाचक्र काफी नहीं शोधन केवल सत्य का ताकत मांसपेशियों की फिर भी तो चाहिए बिना उस के टिकेगा कहा सत्य- इस्पात होकर भी कोमल जो आंख-सा दिशाओं तक फैली एक ठोस निगाह-सा । एक बालक जिसने अभी-अभी खोली है आँख उसका जिंदा होना सुबूत है ठोस सत्य की कोमलता का। एक दिन जवान होगा यह बालक तब मेरे द्वारा जोड़े गए नयेपन और सत्य के रिश्ते को मासल आयाम देगा जीत लाएगा जमीन इस्पात को तरल निगाहों में बदल देने की खातिर । 'पाश पूर्वानुमान के कितना सुंदर है बालक ? सिकोड़ कर भवो को देखता है खिड़की के पार ठीक हमारे पूर्वानुमान की शक्ल में . खोल कर होठों को मुस्कराता है :22 हाय में पकड़ कर उंगली को मेरी दवा लेता है / कुनमुनाती उंगलियों के पाश में) पिसी अनाम अदिखे हमारे ही पूर्वाभास में । मरसरा कर ऊपर को उठते प्राण सख्ती से कहते हैं मन को / ठहर ! देख ! जीवंत हो उठी अपनी कभी की दबी छिपी इच्छा को प्रकट झुका दे मापा भविष्य को पहले से जान लेने वाली / अपनी आंख के समक्ष । नही, इस बालक में करो हो सकती है मेरी पूर्व की इच्छा साकार ? मेरी रचना है मुझसे आजाद / आजाद है तभी तो जिंदा है । अपने पूर्वानुमान को बालक समझू और इस गलतफहमी में जब भी करू इच्छा कुछ ऐसी न देखे वालक इस या उस प्रकार या खिड़की दरवाजों से ही रहित हो मेरी इच्छा का घरवार न वांधे मुझको या इसकी मां को यह बालक/हो कर लाचार और या फिर अपनी तटस्थता मे दंग हुए रहें होंठ बालक के इस वार तब-तब खोल कर मुट्ठी अपनी खाली दिखा दे यह बालक किस कदर ये इच्छाएं हैं अयथार्थ ? दूसरों की बजाए / बांधती हैं खुद को ही अंधा कर ऐसे में क्या कर लेंगे हम ? अपनी इच्छा के हायो खेल कर क्या जीवंतता से खाएंगे खार ? सचमुच सिमटाएंगे अपनी कार्य को जब

जो जी उठा हो
उसके साथ हमरुदम हो चलना पहा
तो चामडा को साकार किया?
लेकिन इमी इच्छा को करता हुमा जीवंत
किलकार उठा सुशी से बालक
हमारी समझ के खिलाफ
हमारा करता हुआ अनवरत फैलाय ।
असहयोग से असहयोग
एक मार-सा गूंजता है मन में
मन ! मैं तुझ से मसहयोग करता हूँ
अपने मुपिन को झाड़ने के लिए।
जिंदा रहने दिखने की कोशिश में
वर्षों में भी कहाँ पीछे रहता हूं.
अपने विज्ञापनों को अपने हाथों में उठाए फिरने से
मित्रों और आसपास की दुनियां को
चकाचौध किए रहने से
असफलताओं के अहसास को
परंपरा के बोध का नाम देकर / फस से सहते जाने से
थकान को संन्यास का पूर्वाभ्यास मानने से
पत्नी के हाथों परोसे गए सादा खाने को
जीवन का आखिरी निष्कर्ष मानने से
टूटती हुई सांसों को प्राणायाम का नाम देने से
और लोलती हुई निराशा को वैराग्य कह कर
यूं ही सार्थकता महसूस करने से।
मुझे हताश कर के भी तू कहा हताश होता है
इसीलिए मन !
24

मैं तुझ से ही नहीं
तुझ से असहयोग करने की अपनी कोशिश से भी
बाहर पाना चाहता हूं
जिंदगी को ओढ़ कर जीने की वजह से
कभी मुर्दा तो कभी जिंदा हो जाने के
दुष्चक्र को हमेशा के लिए तोड़ना चाहता हूं
मगर इस से और भी घिरता चला जाता हूं।
यह कोई उपाय तो नहीं
फिर भी मन !
मैं तेरे असहयोग से असहयोग करता हूं।।
पूरा होने की ललक
पता नही कैसे
चेहरे के न जाने किस कोने में धंसी
किसी तरखान की आंखों में
बची दिखाई देती है
किसी हरे भरे पेड़ से कोई सार्थक बात करने की हसरत।
और किसी नाई के जीवन में
जगती है उम्मीद ऐसे समय की
कि गदिश जिसकी
झाड़ न पाती हो/ पेड़ों और लोगों के सिर के बाल ।
पता नहीं कब कहां से आ जाता है
वह गुमनाम-सा लम्हा
जब अभावों की तमाम सरददियों के बीच
अचानक दिखाई देने लगते हैं
एक ठेलेवाले को पहियो को रेलपेल की वजह में
घडक-धड़क उठते नजदीक के पेड़।
2B

गोया पूछते हों एक ही सवाल
'वह कौन-सा बोझ है | जिसे ढोकर
हल्की भी हो सकती है दुनिया ?
ऐसे नाजुक मौकों पर / पता नहीं कैसे
बची रह जाती है | इनकी आंखों में चमक पहचान की
यह वह आखिरी प्रकाश होता है
जो छू सकता है। हमारी स्याह मात्माओं को।
जूझती टकराती जमाने की होड़ के बीच
एक बेहद पहचाना हुआ-सा आदमी
सिर्फ गुना तकसीम ही नहीं करता / अपने हाथों पर
सिर्फ छूकर ही पूरा होने की ललक भी रखता है।
सौंदर्य की आंधी और भविष्य
आज मेरे हर रोंगटे में खिला है एक फूल ।
इस धरती के सारे फूल
मेरी त्वचा पर हैं।
चारों दिशाओं से / काले भूरे गोरे लोग
तितलियों के पंख लिए
चले आते हैं मेरी तरफ ।
'एक हल्की-सी बदली बन
मेरी त्वचा के बालों पे
घिर रही हैं मेरी धड़कनें
दुनिया भर की घास से तिप तिप कर
यह मैं चू पड़ा हूं
गोया सौंदर्य की आंधी वन
विश्व भर में फैल गया हूं।
कौन जानता है कि अगले ही पल
26

कच्चे चुंबनों को गंध से बने चेहरे
छिप नहीं जाएंगे किसी काले चेहरे के पीछे ?
ठोस-ठोंस कर अपनत्व की गर्मी को
देह जो बनी हैं गुदाज
मांसल तनों सी काट-काट कर
डाल नहीं दी जाएगी
कल तक सूखने की खातिर ?
ये खिले हुए फूल
उछल कर आंखों की कोटर से
नही होगे लहूलुहान ?
मोर उधड़ कर मेरी यह खाल
टूटे तितलियों के पंख सी
लावारिस हवा में नहीं उड़ेगी कल तक ?
चलो! कल के बच्चो को कुछ तो कौतुक होगा
'कुछ तो सुधरेगी
टेढ़े भविष्य की करुणाहीन वैज्ञानिकता ।
मुरझाने तलक खिलने का
फूलों को
कुछ तो अवसर मिलेगा। 0
यांचवें मोड़ पर
यक्ष भाई । चुकता हुए मेरे चार ऋण
इस आखिरी ऋण को भी बिना चुकाए नहीं जाऊंगा
बदलाव के संकट के यीच / सतरों से मुंह नही मोडूंगा ।
बीसवी सदी के सूर्यास्त के अनुभव
खुद रहे हैं मेरी त्वचा पर / एक नया रोमकूप बन कर
लेकिन इस कूप में ज्यों ही हुबकी लगाता हू
सहना पड़ता है मुझे / मित्र के हाथ का ही भरपूर वार ।

पर विश्वासघात नहीं करूंगा
ऋण को मित्रता की मर्यादा में बदल कर रहूंगा।
अपने इस कूप का पानी पीने को
पार यार सो पहले ही मर चुका हूं में
मेरे या मित्र! | युधिष्ठिर तो कर को हो चुका हूं मैं।
मेरे तलवे के एक फटे रोमकूप में / लाश है मोर पंख को।
दिमाग में दिए-मा जलता रोमकूप | मप्पदीप होने की कोशिश में
बुलता जाता है | ग्राह्मणवाद की आंधी में।
तीसे कण्ठ पर ना कधीर पंथी रोमकूप
मर कर / हिन्दुओ मुसलमानो मे बराबर बंट गया है
और बारूद के धुएं से मेरी छाती में घुटा
चिल्लाता है लंगोटधारी रोमकूप । है राम ।
मेरे देश के भविष्य को अपने कुएं में बंद करने वाले
तुम ठीक-ठीक कौन हो / यक्ष भाई !
यही जानने की कोशिश करते-करते
मर गए है मेरे चार रोमकूप
और पांचवें में मेरे मित्र घात लगाए हैं
मित्रता के इस ऋण को / बिना मरे नहीं चुकाऊंगा:
और चुकाए बिना भी नहीं मरगा।
संप्रेषण और संवाद
शाम सिंह किसकी सुने ?
जव यह बात साफ-साफ तय होगी
बारूद का धुंआ / उसी पल बैठ जाएगा।
राम लाल किस से बात करे?
जब यह बात दोस्ती दुश्मनी से / तय नहीं होगी
विरोध का जाल / उसी एल छंट जाएगा।
28

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काटता है। तो लोगों पर माक्तिपात हो जाता है
प्रश्न पूछो / वो उसकी दुम गोल भकोल पोल मुड़ जाती है
दम के दुभापिये गोल को शून्य / मकोल को मूर्धा
और कोल को चतुर्युगी कहते हैं।
अज्ञान की ताकत को हल्कू ने नये अयं दिए हैं
श्रम विधाम में बदल गया है | और साहिबी निरे दिसावे में।
बस एक ही चीज सायंक रह गई है
जिसे आजकल
हल्कूपन के नाम से जाना जा रहा है।
खेल खेल में
क्या हूँ मैं ?
शायद अपने आगे
या शायद अपने पीछे खड़ा हूँ मैं।
जब धूप में चमकते दिखाई दें
हवा में तैरते धूल कण
विसजित कर अपना अतीत / घर के लॉन में
देह समेत गिरू/ छोड़ कर अपना सब भार
मुक्त हो जाऊ / हल्के होने की उम्मीद तक से।
अंकुराएं (घास) बीन : अंकुराएं
रोएं पडोस के बच्चे : रोएं
उत्तेजना माहोल में कमेंटरी की घिरे : तो घिरे ।'
पर के पौधे पर लॉन फूल-सा लगे
देह मेरी लगे चार पत्तों का झुरमुट / मूली रहे।
लगा रहू अपने काम काज में
पर्दू / बच्चों को डॉटू / ऑफिस चला जाऊं
30

मगर भूली रहे / पीछे लॉन में / पत्तों के झुरमुट सी;
कंपती रहे | मेरी अतीत देह । -
?
कभी अपने पीछे खड़ा रहूं
कभी अपने मागे डटा रहूं
मगर खुद में रहने की तकलीफ से बचा रहूं।
दो
खुद में भी कहां हूं?
दृश्य हो चुका हूं / या अभी दृश्य होने को हूं मैं ?
दूर देखू / सूर्य से परे फैला आकाश / धूसर स्याह
भीतर देखू / पानी में सांस लेता / पत्थर में जड़ होता जीवन
टूट फूट कर देखू / आग और गति के चक
दुस्सह भयावह आकार
फैल-फैल कर देखू | प्रेम से लेकर युद्ध तक के आघात ।
इसी को सत्य का नाम दे दूं
या कुछ और खोजू
खोज के व्यर्थ हो जाने तक बस खोजू !
जो हो चुका-स्वभाव
उसकी नयी संभावनाओं को आए हुए देखना-कविता
होने और देखने के बीच
हाथ-पांव मारते रहना--जीवन ।
किसी के लिए मर जाने की उम्मीद
और फिर उसकी यादें-खोखल ।
और-और असंतोप-यही सब हासिल ।
नया क्या होने को है-शंका।
मृत्यु को तड़प ही है--तो जीवन का क्या?
और जीवन के दृश्य बनने का भी क्या ?
तीन
मर तो सकता हूं
पर उस अनुभव को लेकर कैसे जीऊ?

भर फर परपर बनूं
सो सुद को तराश सकू
अंकराऊं तो अपने फनों में
युढ़ाने टूटने का अनुभव भर
मिट्टी से केंचुआ वन निकलूं
तो फां पर पीछे / पानी के जीवित शब्द निसूं
चिड़िया बनूं तो अपने पोसले को
कविता-सा तो रचूं
चल बनूं | तो गले में बंधी घंटियों से
गति को संगीत से समझं
और मादमी ही बनू
तो बस इमी गनुभव में जीऊ
कहने लायक हो तो ही कहूं
'न कहना हो | तो मुस्कराऊं
और पूरा गुजर जाऊं
इस तरह कि फिर
विल्कुल शेष न रह जाऊं।
.
शक्ति विव की खोज
झूठ नही हरता है
मुझ मे है डर।
सुरक्षा की चाह जहर हो गयी
और मैं साप होकर शंकित-सा
धरती के अंधेरे विवर में घुस गया।
सच नही डरता है ।
भयाकुल मैं / खुद को बचाने के लिए
भाब्द ईजाद करने लगा ।
२२

जीभ को धनुप बना कर
स्वर तंत्रियों को डोर की तरह खीचा मैंने
हृदय के पल से
तुम पर कविताओं को फेंकते हुए
स्वयं को निर्विकार
न मारने योग्य
पूज्य बना लिया।
निर्भय होने की खातिर मैंने
असत्य की खोज की
और सत्य की भी।
मैंने पेड को सत्य माना
और वह अपने आस पास के आकाश में
अ-सत्य था / नहीं था।
यही घटना आकाश को सत्य मानने पर भी घटी।
दोनों की सत्ता बराबर थी।
अपने ही होने का अहंकार
यह दोनों में नहीं था-
यही निर्भय था।
वाणी पर अंकुश
और वाणी की चीख
दोनों में एक विष था--
एक डर से उपजी कविता ।
मगर निर्भय का यही कहना था
कि तब भी धरती
अपनी धुरी पर निश्शंक घूमती रही थी
और आकाश अडिग रह कर
सम्भाले हुए था सभी ग्रहों को
और सूर्यों को।

दुःख और करुणा
मुझ से मेरा आराम मत छीनो
उस ने चिल्ला कर कहा
मैंने उसके दुःख वापिस ले लिये।
दुःख ही तो मेरा आराम हैं।
वह फिर चिल्लाया
मैंने उसके दुःख लौटा दिये।
मुझे मेरे ही दुःख मत दो
इस दफा वह चिल्लाया ही नही / रोया भी
मैंने अपने दुःख उसे दे दिये !
किसी और के दुःख तो बहुत ज्यादा हैं
वह सचमुच शारोजार रोने लगा।
इस पर मैंने उसे सब कुछ
पहले जैसा कर देने की धमकी दी
फिर उसकी तरफ देखा
लगा जैसे वह कभी रोया ही नही था। D
मूक बहुमत से मुखातिब
तुम अपने लिये क्या मांगते हो
आजादी या टिकाव या बराबरी या अखंडता ?
तुम्हारे आजादी की सौध में आते ही
प्रतीकों के जंगल उगते हैं
और उग आती हैं संस्थाओ में
डिक्टेटर अमर वेलें।
234

तुम्हारे टिकाव की सीध में आते ही
जंगली फलों से टपकता रस
अमृत कहलाने लगता है
और धामिक जनन
साउड स्पीकरों के जरिये
जुड़ जाता है
सोधे तुम्हारे ड्राइंगरूमों के साथ
तुम्हारे बरावरी की सीध में आते ही
एक पेड़ ऊपर उठ कर
सारे जंगल को ढक लेता है
बदले में जंगल उसकी दाढ़ी वार करता है
सुबह उठ कर देखते हैं जंगली जानवर
कि जंगल सेत हो गया है।
अचानक जंगल के सब से ऊंचे पेड़ को
इंधन की तरह जलाती
लोगों की बस्तियां
जानवरों को जगह
लोगों का शिकार करने में दिलचस्पी लेने लगती हैं।
और तुम्हारे अखंडता की सीध मे आते ही
यह घोषणा होती है
कि ढकोसला हैं तुम्हारी सारी मार्गे
कि जब
हाथ पांव आंख नाक पेट गरदन
एक सीध में आ जाएं
खुद खुल जाते हैं सभी दरवाजे
कि यहा इस व्यवस्था में
भीख की सीध में आए बिना
क्या मांगते हो?
मिलता कुछ नहीं
भीतर और बाहर का तालमेल टूट जाता है | बस ।

इसलिए यविहीन आतंकवाद को भुगतने के मियाय
और पारा ही गया है तुम्हारे सामने ?
यस्त रहते
गंधों पर दोना ही ढोना है तुम्हें
परपरा का शाप ।
इन शापों के भूत फल
लार नीली पाली मफेर हरी गुमायो या फिगी और रंग की
पवित्र वेयफूफी केस में आएंगे
मंस्कृति और गत्ता में
अपनी-अपनी आजादी के बीज बोयर
तुम्हें तनों में चिनेंगे
फल सुद पाएंगे।
जंतर मंतर मे टिकाव की मणि सोजेंगे
तुम्हें सांप की योनि देंगे।
रीढ में विष भर देंगे तुम्हारे ।
वे तुम्हारे बराबर होंगे
वे ही तुम से छोटे भी होंगे
और वे ही तुम से बडे ।
जब तुम्हारे अलावा वे सब कुछ होंगे
तुम उन से कैसे जूझोगे ? -
नीलामी
जेबकतरों के हाथों की तरह छिपी हुई
शहर के सीमांतों की आत्माएं
फुटपाथ पर के रंग्ज के ढेर मे हाथ मारने पर
विदेशी लेबलों के रूप में
यहां वहां चिपकी हुई मिलती हैं
लगे हाथ खरीद लो इन्हे
बड़ी सस्ती हैं !
36

सरोद सो इन्हें / काम आएंगी
भाषण देते वक्त
जव पाहोंगे। ये हजूम से तालियां पिटवाएंगी
शांति का उद्घोष दोगे
तो अपने मिर को आपके पैरों पर रस / कसम साएंगी
और मान लो करवाने हो दंगे फमाद ही
निर्भय होकर सड़कों पर निकल आएंगो
परवाह नहीं करेंगी
और जब तक पूरा शहर मीमांत की बराबरी तक
टूट फूट जाने की नहीं देने लगेगा गवाही
पीछे नहीं हटेंगी।
आपके दिए रंज पहनने वाली आत्माएं
जब पाहोगे प्रायश्चित कर तंगी
और जब तक चाहोगे टिपी रहेंगी
जेबकतरे के हायों की तरह
फुटपाथ पर वे रंग्ज के ढेर से / कुछ वक्त के लिए
विदेश चली जाएंगी / महंगी होकर लौटेंगी
वक्त रहते सरीद लो इन्हें | बड़ी सस्ती हैं अभी।
मुक्ति पल
मंदान भर
घास पर
पल भर
वैठी चिड़िया
उड़ गई
ऊपर
आकाश के
बुलावे पर।
37

उस पल पास | मंदान भर
मिमट कर | एक बिंदु में
थोड़ी सी उठी/कपर
मदान ने सोच लिया | पर
बिखर गई
सारी घास
फिर से
मैदान में।
एक क्लर्क की प्रार्थना
मुझे समझना हो तो मेरे जैसा बन कर आ
या मुझे ही अपना अवतार बना
मेरे कृष्ण मुरारिक
और अगर हो सके तो एक रुपया रिक्शा पर खर्च कर
साथ ले कर अपने बीवी और बच्चों को
मेरे घर चाय पीने के लिए आ ।
चल, किसी दिन / धक्कम धक्का वसों में
साथ ले चलू तुझे नौकरी के लिए
और कंस मामा न करें
अगर कही रास्ते में हो जाए | वस को रोके खराव
और धडकते दिल से हम दोनों ही
दफ्तर में पहुंचे जरा लेट
हो सके तो शकुनि मामा-सा पासा एक फेंकना
या मुझे भी / चुपके से अपने हाथ में एक तिनका लेकर
सुझा देना बहाना एक ऐसा
कि अफसर भूल कर सारी डॉट डपट अपनी
हमें गले से लगाए / होकर भावुक कहे
मुझे आपकी तकलीफों का अंदाजा है।
-38

कि मेरे धन का वर्धन करना -सुना देना नंबर लाटरी का था दबदबा गालिब करना / मठाधीशों पर इंद्र से या लीडर बनवा करवाना चदों में घपला मोर या तबादला मनचाही जगह पर । बस एक काम कर देना सही रूप में करवा देना शिनाख्त दुर्योधनी व्यवस्था की और उन लोगो के बीच ले चलना उसका विरोध करने के लिए खड़े हों जहां भी दो चार सुदामा या एकलव्य इस दफा मत बनवा देना / इनके लिए कोई महल या गुरु की प्रवंचना पर खड़ा धोखे का कोई लाक्षागृह हो सके तो इन्हें महज / थोड़ी-सी सुविधाएं और जीने की समझ देना माथ में जूझने की ताकत न कि नपुंसक स्वीकृति अपनी कृपालुता की । 'देख, इस दफा अपनी भगवत् प्रकृति से भी नहीं डरना और हमे सीधे ही ले आना एक नयी क्रांति और जरूरी जरूरी सुविधाओं तक लेकिन इस तरह के सारथी न बन जाना कि तुम्हारे बिना हम जूझ ही न सकें । बम हम जैसे हो जाना / विराट रूप वाले गोपाल ! अक्सर वेचन रह कर देखना हमे और अपने प्रेम तक को / धोरे-धीरे आदत बनते हुए पाना अगर तुम सचमुच हम जैसे हो ही गए तो गहरे असंतोप से भर / दोबारा प्रभु होने की ख्वाहिश करना फिर जब तक प्रभु न हो जाओ / टूटे बिखरे रहना। शायद तब तक मैं भी तेरे संग / प्रभु होने को तेरे मार्ग पर चला आऊं। . 39

कवि और साहिब
एक मिनट के लिए | खो जाइए साहिब !
इतना कुछ किया कराया है आप ने
अव गया इतना भी नहीं कर सकते हैं माप ?
खो कर देखिए / फिर वह सब होने लगेगा
अक्सर आप के डर से ही नहीं हो पाता है
जो शायद हर बार।
गायब हो जाइए। फिर देखिए
कैसे हिलता है हाथ
झर जाता है पेड़ से पता
तरह-तरह की आवाजें निकालता है कौआ
सरसराती हवा / कैसे अचानक
पार करके निकल जाती है रोशनदानों को
माहौल की सा-सा
किम तरह चूक जाती है
कीचड़ का कमल बनाते-बनाते आप को।
पर आपको इस से सरोकार ही क्या है आखिर ?
नौकरों और टोस्ट मुरम्बो की फिक्र के लिए
महंगाई भत्ते और असबार पर बहस के लिए / भी तो
जरूरत पड़ती है किसी न किसी साहिब की ही।
वैसे तो माहोल और गरीबी को गालिया निकालते
ढेर लोग हैं
फिल्मों ढाबों पान मसालों मे / ज़िन्दगी उड़ाते
फिजूल योग है
उन सब से तो अच्छे ही न आप ।
रोटी पानी का ही तो मसला है
हो ही जाता है हल / देर सवेर सब का
फिर साहिद / संघर्ष और क्राति से भी क्या हो जाएगा
आप की जगह कोई दूसरा साहिब मा जाएगा।
40

हम कपि तोग भी यही उनाते हैं आप से पारणों, भाटों और गुरु गद्दियों वगैरह से उसस-उला कर भी/मायद मन नहीं आया है हमे हमी से फिर हारने की तैयारी किये है पंद पाटियों, परिवारों, डायरेक्टरों वगैरह से आगे याजोगरों और जादूगरों की नीयत तर शाई यविगिरि लिए यहे हैं। चलिए, हमारे मनोरंजन के लिए ही ही जरा इधर आइए माहिय वैठिए ! / धरती के इस नंगे टुड़े पर जम जाइए महसूम करेंगे | तो बहुत जल्द मगेगा कि धरती भी यह सांस लेती है अब बंद आसों से इस धरती को देखिए बहुत जल्द लगेगा कि यह धरती नहीं मांस का एक विशालकाय शरीर है यापके नीचे ही नीचे मासपास दूर तक फैला। इस नर्म गुदाज शरीर में घसने लगेगा बहुत जल्द आपका यह अरना-सा भारी भरकम शरीर एक मिनट के लिए सचमुच ही पो जाएगा आपका यह सोया-मोया शरीर । नहीं, जागिएगा नही भवरा कर साहिब । कोई सम्मोहन नहीं है यह आप के मुनासिब आपकी ही करतूत है आपको ही नजर है । नही बुरा मत मानिए मेरे इस हुनर पर सुश होइए माहिब ! डरिए मत मेरा वक्त कभी नहीं आएगा मेरे दरवाजे से निकल कर एक कोई और / साहिब बन जाएगा 10

T
कटघरे में कवि
पूछो कवियों से / उनकी कविताओं में इस कदर क्यों प्रचारित हैं
चांद या आग या क्रांति जैसे शब्द ?
इसमें भला इन चीजों का क्या दोष है ?
सवेरा उगा / पर कहीं कोई आवेश नहीं था उसमें
लोगों को जगाने या ओस को भाप बनाने का।
ऋतुएं भाई और गई | पर किस ऋतु ने चिंता की आदमी को ?
पतझड़ सब उजाड कर भी / कविता का विषय पता नहीं कैसे बना रहा ?
बरसात वाढ़े लाती हुई भी/ सौंदर्य की फेहरिस्त से बाहर क्यो न कर दी ग
और कर भी दी जाए | और कितनी भी कविताएं आग क्यों न उगलें
उसके खिलाफ / क्या फर्क पड़ता है ?
हालाकि अस्तित्व और भविष्य के बिब को प्रतीक बनाकर
कविता ने जरूर शोहरत पाई है कभी-कभी
पर इस में भला अस्तित्व और भविष्य का दोष ही क्या है ?
पूछो कवियों से !
अज्ञात के अधेरे में गुम होने से डरता हुआ चिंतक
हड़बड़ी में कुछ सूत्रों को पकड़ कर दोहराता है
किनारे बैठे चितक के डर में कवि / वेहिचक घुस जाता है
दोहराए जा रहे शब्दो से हट कर
अजानी दुनियां के नये अर्थ और लय को पहचान लेता है
और फिर इथे प्रचारित करता है | कविता के नाम से
अगर इसमें अज्ञात या अर्थ या कविता का
आखिरवार दोष है ही क्या/पूछो कवियों से! 0
42

भस्मासुर
राख को साद बनाने की नीयत से
भरे पूरे बाग को ही आग लगा दी तुमने !
आखिर सोचा क्या था
दुश्मनों को मिट्टी में मिलाकर
भभूत मल कर देह पर
निस्लोगे शिय बन कर पुरखों के वाग से ?
विपपायी भस्मासुर ! वाह !
पिए बिना भस्मामृत / विष पीने की
सूझ ही कैसे गई तुम्हें ?
हमारी भस्म को साद बना कर
इतिहास को गलत भाषा देकर
आदमी को भी करना चाहते हो परिभाषित
अपने भगवान की तरह ?
लेकिन हमे क्या तुम्हारे भगवान से ?
आदमी से मतलब है हमें ।
भगवान हो या न हो
'फलता है आदमी ही
और तुम्हारे बाग भी फलदार तभी होते है
जय फल जाता है
तुम्हारे भीतर का आदमी।।
मध्ययुग के दलदल में फंसा आज
दलदल है अंधेरे का
बाहर आने की कोशिश
तरकीब है उल्टे और भीतर धंसते जाने की।
43

एक सांवली झील है यहां / अपनी आंखों जैसी
दूसरों से हताश लोगों को जिसमें
दिखाई देता है अपना चेहरा
पहली दफा अपनी निगाहो से
लेकिन पहचान मे ही नहीं माता वह उन्हें
इसलिए हो कर हताश करना चाहते हैं वे
इस काली झील में आत्महत्या
असन्तुष्ट हैं दूसरों की आंखो में झांकती । अपनी छायाओं से है
दूसरों की भाषा में अपनी उम्मीदो से।
मध्ययुग का देती हुई अहसास / किसी की आवाज
मागती है हथेलियों पर रसे उनके सिर ।
लेकिन जब भी उतार कर अपने सिर
धरने लगे अपनी हथेलियो पर
पता नहीं कैसे गायब हो गए | उनके हाथ ?
हाथों की जगह / दिखाई देने लगे
दूसरों की चालाक निगाहो के सम्मोहन से रचे
पराई उम्मीदों की रेखाओं के जाल ।
और अब जबकिन उम्मीद बची है / न नाउम्मीदी
देता है दिखाई / कि जल्दबाजी है केवल
हर वक्त हथेली पर ही उठाए फिरना अपने सिरों को
भूले रहना धड़ के साथ उनके सम्बन्धों को।
खुद से मिल कर पाएंगे वै कल को
सिर के चले जाने पर / पीछे छूट गए उसके ख्याल भर को
अंधेरे के चले जाने के बावजूद
खाली दलदल होकर रह गए अपने भाप को।
D
44

एक समाज प्रजातांत्रिक
एक चीथड़ा अपनी आत्मा को बेचने निकला
खाली हाथ लौट आया
ख्याल आया कि जमाना बदल रहा है फिर
ऐसी चीजें छिपी रहें लौकर में
तभी कीमत पड़ती है उनकी
चीथड़ा लौकर कहां से लाए ?
क्या किसी न्यायाधीश के घर जाकर शक्तिप्रदर्शन करे ?
भयभीत कर दे बराबरी, भाईचारे और आजादी के सिद्धान्तो को?
और जब पेश हो किसी झूठे अभियोग के सिलसिले में
अन्यायमूर्ति के आगे
वह अपने पैन को अहिंसक बनाए रखने की जिंद.
उसे खोलना भी भूल जाए !
आत्मा की कोख से खंजर के जन्म की घटना का
साक्षी हो जाए !
और जब सचमुच हो जाए यह सब
उस दिन के बाद चीथड़े की जिंदगी
खतरे में पड़ जाए !
बेशर्मी से हंसे न्यायाधीश
और आत्माएं चीथडों की
खिसिया कर देती रहे उसका साथ ।
.
P

एक प्रजातांत्रिक विद्रोह वक्त के खिलाफ साजिश करने के इरादे से मैं जुलूस में तख्ती उठा कर / सब से आगे हो लिया। राजधानी की दिशा में चलते हुए नारों के दायरो में / कोल्हू के बैल-सा घूमने लगा कांच की दीवारो से महावत-सा टकरा गया सीख नहीं पाया / कभी कौआ, कभी बगुला होने की राजनीति बन कर रह गया / स्टोर में पड़ा गूंगा बहरा अनाज जिसे बाजार भाव चढ़ते ही / हाथों हाय बेच दिया जाना था। इस पर विद्रोह किया मैंने / राजनीति की ईंटो को चूर-चूर कर डाला / सख्त कंकालों पर मार कर / फिर चिल्लाया कंकाल नहीं है यह / मेरे देश का लहू है जम गया है शायद / विश्वास न हो तो अपनी धमनियां चीर कर देन जमे हुए खून को पसलियों में बदला पाओगे । लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया और मैं अपना चेहरा पहचानने की कोशिश में./ हलाक हो गया । इसलिए अब | अपने बिखरे लहू की याद आते ही लिटमस की प्रतिक्रिया के समान में लाल हो उठता हूं / और तुम पीले जल्द ही व्यर्थ हो जाता है वह युद्ध जिस मे तुम मुझे करते आए थे / बारूद की तरह इस्तेमाल । अब लगता है कि मुझ मे | और एक रैश ट्रक ड्राइवर में कोई फर्क नह कटे हुए भूगोल की तरह / अधूरा जन्म लिया है मैंने अब चेहरे लगाकर भला कव तक जिया जा सकता है ? और खड़ा किया जा सकता है । यार होने का धोखा जब कि मौसम आंधी भी हो सकता है | और तूफान भी। जरा ध्यान से देखो मुझे मैं गाव में शहर होने की प्रक्रिया मात्र हूं/ कोई क्राति नहीं हूं 48 ३

जब शहर हो जाऊंगा-/ तो खुद ही चल-दू
बदलाव का झंडा उठा कर
अभी तो सिसकती हुई जमीनों को मिल्कीयत पर,
हाथों की गिरफ्त मजबूत करते हुए / धर्म के फेवीकोल से
पेश किया करता हूं क्राति का नाटक भर
अपनी सरदारी और सरकार बनाने की खातिर ।
इसलिए मुझे खत्म करने के लिए अभी तक
तांडव नहीं / दियासिलाई की एक तीली ही काफी रहा करती है ।
मुमकिन नहीं लगता अव / कि साम्प्रदायिक दंगों में बहे खून से सने गुलाब
फिर से सफेद भी हो पाएंगे बहुत जल्द ।
इसलिए अब / जब भी हीनता से भरता हूं
कांपते हाथों से अपने आप पर इस तरह पिस्तौलें दागता हूं
कि हर दफा उनका निशाना चूक जाए
और में बचा रह जाऊं
माहौल, सरकार और दोस्तो को गालियां निकालते जाने के लिए।
प्रजातंत्र में इन बातों की आजादी की खर मनाने के लिए।
कछुआ संस्कृति
।
नीलो पट्टियों वाला हैट लगाए | आई लोकशाही
संवेदनहीन / अपनी ही उपजाई भयानक ठंड के बीच
खाए चकरघिन्नी।
धीरे-धीरे चले / फैलाए संस्कृति शनिश्चरी कछुओ की।
समय को यह किसने बांधा है
और प्रगति की रफ्तार को मात्र दृष्टिबंध से रोका है ?
फैलते हुए / मारक युद्धों के बीच से / गायब कर दिए है
किसने रोजी, सेहत और प्यार के आकड़े ?'
एक हिम पशु है वह / जो जमे हुए रक्त को
लोगो को धमनियों से उखाड़-उखाड़ पीता है

महाबलवान होकर भी छिप कर पात लगाता है मिलो तो मुस्कराहटें अपार लिए गले लग-सग चार-चार आंसू रोता है । गुपचुप । दूर को कोड़ियां और धर्म के पोई सत्ता की बिसात पर उसकी / चलते हैं आडे टेने और साहित्यकार उराके न होने का / रचाते हुए ढोंग और नक्कारखानों में बजाते हुए तृती बडी दुपदायी यात्राएं करते हैं शामिनवाजे से लेकर रजतपटो तक। सभी को हैरान करते हैं घड़ी-बड़ी सांस्कृतिक क्रांतियों का उड़ाते हुए परचम । उनसे मया उम्मीद इसलिए मैं तुझ से ही मुखातिब हूं। मेरे प्यारे जन ! हिमपशु से नहीं / लड़ तू सीधे बर्फ से ही अब यानी उस सायवेरिया और अटार्कटिका से ही जो अफ्रीका से लेकर एशिया तक ही नहीं फैला है पहले और दूसरे विश्व में भी । योरुप में जिसे सभी बसंत के नाम से जानते हैं और अमरीकी जिसे ताजी खिली धूप मानते है यह अलग है बात कि उसमे चाकी दुनिया के लोग ठिठुर-ठिठर कांपते है । यह बर्फ कल मेरे घर में भी गिरी है मेरे सारे कान्य और करुणा को कुंद कर गई है। अब सुविधाएं तक मुझे गर्क किए जाती है मेरी पत्नी और बेटी के दुख को ही बढ़ाती चढाती हैं। लेकिन काव्य से निष्कासित होने पर भी करुणा/ बिद्ध कीट-मी रात दिन मेरे सिरहाने के नीचे कुलबुलाती है और अपने फैलाव के लिए लफ्जों को ही नहीं / मित्रों को भी महाकाव्य के सों की तरह / इकट्ठा करना चाहती है। .48

इसलिए लड़ ! मेरे प्यारे जन ! तू मा से भी सड़।
अपनी सुपुप्ति के सोल को भेद कर
एक कछुआ भी चल निवासा / तो यही बहुत होगा
और कच्छप चाल से पीछे-पीछे उसके
जो चलता हुआ नजर आएगा
कल वह मैं भी तो हूंगा।
निर्णय का क्षण
गहरे में पास के
घास फूल
यानी झोंपड़पट्टी का / कर्णफूल
घास-पास चढ़ा
घर आंगन तक आया ।
बहुमत से
-सारी बनस्पति में
लो हुमा व्यापक !
प्रजातन में
फिर भी कोन
सत्ता का अधिष्ठापक ?
यूक्लिप्टस ! यूक्लिप्टस !
ठहर ! ठहर!
बस आ ही रहा हूं में
गहरे में घास के
49

चिड़िया फूल है
चिड़िया फूल के पास आई है।
चिडिया की सावली चोंच
रस पीने की प्यासी बेचनी में
फूल बन / उग आई है पैड़ की फुनगी पर ।
चिड़िया कहां है ?
फूल का रंग गंध भरा जादुई मन
बांझ कहलाता
अगर चिड़िया बन कर
खुद से इस तरह खेल न करता।
फिर कौन बताएगा
कि कोन आया है किस के पाम ?
फूल चिड़िया के पास
या चिड़िया फूल के पास ?
तुम्हें पूरा जानने की कोशिश में
कुछ है जो बौछार के गुजर जाने पर भी शेष रह जाता है।
स्मृति बड़ी चीज है | गुजरे हुए को वर्तमान पर देती है
पर यह लो । में अपने चित्त की आखिरी केचुत भी छोड़ता हूँ
भूल जाता हूं कि चूद की बेपरवाह घोट भी सकून देती थी
निस्संग हवा का स्पर्श सुरमुराता हुआ हड्डियों में उतर जाता था
भूलताहूं। यह बौछार थी कि निरा प्यार
मगर यह सब सो जाने पर भी कुछ है जो गुजरता नहीं है।
50

कर . अगर तुम आए होते / बौछार का बहाना बना के तो मुझ पर ही बरसते इन हजार-हजार पौधों के पत्तों मे / फूल-सी ताजगी न बन जाते इसलिए बौछार में जब-जब / तुम्हें देखने की कोशिधा करता हूं मैं खुद को उतना ही सोता चला जाता हूं। यही वजह है कि तुम्हें पूरा जानने की कोशिश में मुझे ही नाचना पड़ा उन पेड़ों पर पत्तों की तरह और सच जब मैं लोटा / तो खुद ही फूल बन कर लोटा अपने रोएं रोएं मे बौछार बन कर लौटा। कुछ है जो वौछार के गुजर जाने पर भी दोप रह गया है क्योंकि अब मैं ही बरसने लग गया हूँ । बौछार के आने पर शुरू में लगा था जैसे कि पेड़ भी हैं / पते भी है | बौछार भी है | और मैं भी हूँ अब बौछार के गुजर जाने पर लगता है जैसे पेड़ और पत्तों के साथ | बौछार अब भी हैं सिर्फ मैं ही खो गया हूं। आया फिर होश होश के पौधों पर आए है सहभाव के फल । होश के कारण | ये हवाएं ढूंढती फिर रही हैं तुम्हें एक पल का भी किए विना विधाम । तुम को ही खोज रही होंगी /ये ऋतुएं हरे भूरे सुनहरे और पीले कपड़ों में छिप कर भी लेकिन तुम कहां छिप पाओगे इन से? माओ कि होग अलगाव को व्यर्थ कर दे.' मिलो कि सूरज होश से और तपे । झरो कि होश-होश के लिए जगे. 1-01 ।

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असीम को हमेशा घसीटे लिए फिरना
मत छेडो यह गोरखधंधा
अभी मुझे जोने में स्वाद आता है।
भोजन को रस ले कर खाने से बड़ी पवित्रता
अभी मैंने नहीं जानी ।
जिस्म के प्रेम से रोमाचित होकर
जिस्म के भार से जो हल्कापन मिलता है मुझे
वह ही मुक्ति है मेरी ।
दोस्तो के वीच छोटे मोटे मसलों पर
हल्की फुल्की बौद्धिक बातें / मेरा आनंद है।
मैं जानता हूं अपने फर्ज भी / और उनके लिए लड़ना भी
बेशक अपने साधनों से आगे वह का
किसी की मदद भी नहीं की होगी मैंने
सब के साथ मिल-जुल कर चलना
और हमेशा अपने सीधे सच्चेपन के पक्ष में रहना
मुझे तो बस इतना ही आता है
मौत की आग में तिल-तिल जलना
मत सिखाओ मुझे
मुझे तो मिलें / बस सीधी सच्ची आहुतियां हो।
सहजता की तरफ
व्यर्थता बोध कही नहीं था
इसलिए जो कुछ चला आ रहा था आज तक
मेरे साथ-साथ / वह मब व्यर्थ हो गया था
मेरी गंगोत्री पर चोट कर डाली थी
उन्हीं पुरोहितों ने
जो मेरी जन्म की घटना के साक्षी थे।
5

..
देखने भर का फर्क
सिर्फ देखने भर का फर्क था
और तुम्हारी बिदिया / राग से आजाधक बन गई ।
अभी तक बीज भी नहीं लगते थे पेड़
और अभी-अभी / किसी गहरे आकाश मे फूल से गंधाने लगे।
एरोडा नदी की तेज धार / सिर्फ डुबाने वाली न रही
समुद्र में डूब मरने की मातुरता मे नाचती हुई मोरा हो गई।
अपने ही दोस्तों के लिए फेंको हुई मुस्कराहट ने
मुझे ईर्ष्या नहीं दी इस दफा
उनकी संतानों पर भी पिता होने का अधिकार दे दिया।
सच, देखने भर का ही तो फर्क था
और भोजन का स्वाद बना रहा
मगर स्वाद ने बांधना बंद कर दिया।
पहले मैं खोजता फिरता था मंत्रों को शास्त्रों में
अब हवाओं नदियों और पत्तों ने शास्त्र बन कर
मुझे खोजना शुरू कर दिया।
क्या हुआ यह सब / कैसे हुआ?0
सीधी सच्ची आहुतियां
कहा हो तुम / मेरी मौन !
यह तुम ने सिखाया है मुझे
खुद मे अन्य पुरुष की झाकी देखना
मरने की पवित्रता को पूंट-चूंट पीना
प्रेम को मूर्धा के स्वाद की तरह सेना
असमय को समय में संघनित करना

असीम को हमेशा पसीटे लिए फिरना
मत छेडो यह गोरखधंधा
अभी मुझे जीने में स्वाद आता है।
भोजन को रस ले कर खाने से बडी पवित्रता
अभी मैंने नहीं जानी।
जिस्म के प्रेम से रोमांचित होकर
जिस्म के भार से जो हल्कापन मिलता है मुझे
वह ही मुक्ति है मेरी।
दोस्तो के बीच छोटे मोटे मसलो पर
हल्की फुल्की बौद्धिक बातें / मेरा आनंद है।
मैं जानता हू अपने फर्ज भी / और उनके लिए लड़ना भी
वेशक अपने साधनों से आगे बढ़ कर
किसी की मदद भी नहीं की होगी मैंने
सब के साथ मिल-जुल कर चलना
और हमेशा अपने सीधे सच्चेपन के पक्ष में रहना
मुझे तो बस इतना ही आता है
मौत की आग मे तिल-तिल जलना
मत सिखाओ मुझे
मुझे तो मिलें । बस सीधी सच्ची आहुतियां ही।
सहजता की तरफ
व्यर्थता बोध कही नहीं था
इसलिए जो कुछ चला आ रहा था आज तक
मेरे साथ-साथ / वह सब व्यर्थ हो गया था
मेरी गंगोत्री पर चोट कर डाली थी
उन्हीं पुरोहितों ने
जो मेरी जन्म की घटना के साक्षी थे ।

'चाहता था मैं / कि मोरों के मंग ना
और प्रेयसी को समाऊं / सो बजाऊ / लोक साज छोड़
दोस्तों के साथ मिल कर अन्न साऊ
“मिन कर मेहनत करूं। पड़ोसियों के कपड़े पहन पाऊं
उन्हें मेरे कपड़े पहनने का हक हो
-सब मिल कर एक सी बात करे / एक-सा विचार
एक-सा संकल्प।
मगर सभ्यता और संस्कृति की दुहाई दे कर
चंद सस्त में लोगों ने मुझे
'मिद्धांतो से माथापच्ची करनी सिला दी
वक्त बीता / और सूरज ने चमकाना छोड़ दिया मेरे लिए
मुझे देश कर हवा / मस्ती से वहना भूल जाती
आसपास मेरी गंध पाकर / मुरझा जाते फूल
मेरे पांव के नीचे उग आता मरपट / अंधेरा वरसने लगता ।
इम पर मैंने / अपनी व्यर्थता को सहेजा / जीया
अपने मल मूत्र को उतार कर अपनी जडों में
अंकुरा गया अपनी निष्क्रियता के खोल को फाड कर
विरोध को बहा कर / नीचे से ऊपर की तरफ
अपने सार तत्व को समाने लगा / अपने अस्तित्व का उत्पादन ।
उद्घाटन
मैं अपने मित्र को तलाश रहा था ।
उसे वहीं होना चाहिए था
मेरी प्रतीक्षा में।
उसे जल्दी मिलने की
आतुरता
में
मैंने पहले से ही उसकी बाबत पूछना शुरू कर दिया
लोगों से।
54

कहे सुने मुताविक
पूरे शहर का चक्कर लगा कर
मुझे वही लौट भाना पड़ा ।
मेरा मिन अभी तक वहीं खड़ा हुआ
मेरी प्रतीक्षा कर रहा था ।
यह प्रार्थना का क्षण था
मैंने मांगा
मुझे मेरो ही आंखें मिलें।
कविता क्यों लिखें
अब तक कविता थो
साख कहाँ थी?
1
.
-
अब आंख भर है
न हम हैं / न कविता ही।
आंख / कविता की राख को
जीवन की गंगा में
विसजित करने निकली है।
हो सकता है | इसके पानी से
फिर उगने लगे
कविता के पेड पर पेड़।
उगेंगे पेड़
पर वृक्षारोपण करने वाले
न नेता होगे / न हार वाले
खो जाएंगे कर्ता
मगर उगेंगे पेड़।
पेड़ों की छाया में
55

ले कर मांस
हम सुद हो जाएंगे पेड़
फिर क्यों लिरोंगे कविता
अपनी या पेड की बावत ?
हंस और बूढ़ी मां
दूध पीने पाता हंस
उड़ो को है।
रे गर्भ गरे । अभी स ससस मानतो है
पूरी मt
गोहित / करती है पिरोरी
कि यह फिर से
area से पण हो जाए।
फिर रो जग रोने के लिए
साजिमी है गरगा
इसलिए उसने हंस को उड़ जाने दिया है ।
और माकी यावत / फयिताएं करने लगा है
प्रम में है
किमविताएं / जन्म दे डालेंगी / एक नये हंस को
लोगो के लिए
कौतुक की चीज हो गया है वह ।
उसके स्मारकरें और मूर्ति स्तंभों से
अनुपस्थित है उसका इंस।
वाक्य और विर
अभिशप्त है।
16

मसीहा के खिलाफ
पेड होकर भी मैंने उसे कहीं जाना
जिसने जडों से रस को ऊपर उठाया
और जो
फुनगियो पर अंकुर, पत्ते और फूल बनने का काम
मुझे सोप कर
सुद प्रलय का मसीहा हो गया ।
नाचता मैं रहा
नटवर वो कहलाया
बन बन कर मिटा मैं
प्रलयंकर वो हो गया
समय को रूप, रंग और परिभाषा मैंने दी
काल वो कहलाया।
सब कुछ कर करा कर भी
उसे कहा जान पाया!
और जिसे जान ही नहीं पाया
उसे छोड़ कैसे पाऊंगा?
विरोध को सार्थक कैसे करूंगा?
अस्मिता
अंधेरे को जीतने के सवाल पर
शंकित सवेरा / रुका रह गया कुछ देर
बंद अपने ही सोल में!
हैरान परेशान लोग धरती के
नगे खोजने | अंधेरा भगाने के अन्य उपाय !
67

ले कर सांस
हम खुद हो जाएंगे पेड़
फिर क्यों लिखेंगे कविता
अपनी या पेड़ की वावत ?
हंस और बूढ़ी मां
दूध पीने वाला हंस
उड़ने को है।
अपने गर्भ को | अभी तक सशक्त मानती है
बूढी मां
मोहित / करती है चिरौरी
कि वह फिर से
व्यस्क से भ्रूण हो जाए।
फिर से जन्म लेने के लिए
लाजिमी है मरना
इसलिए उसने हंस को उड़ जाने दिया है ।
और मां की बाबत / कविताएं करने लगा है
भ्रम मे है
कि कविताएं / जन्म दे डालेंगी/ एक नये हंस को।
लोगों के लिए
कौतुक की चीज हो गया है वह ।
उसके स्मारकों और मूर्ति स्तंभों से
अनुपस्थित है उसका हंस ।
वाक्य और विचार के बीच
अभिशप्त है / त्रिशंकु सी लटकने को
बूढी मा।
56

मसीहा के खिलाफ
पेड़ होकर भी मैंने उसे कहां जाना
जिसने जड़ों से रस को ऊपर उठाया
और जो
फुनगियों पर अंकुर, पते और फूल बनने का काम
मुझे सौंप कर
सुद प्रलय का मसीहा हो गया।
नाचता मैं रहा
नटवर वो कहलामा
बन बन कर मिटा मैं
प्रलयंकर वो हो गया
समय को रूप. रंग और परिभापा मैंने दो
काल वो कहलाया।
सब कुछ कर करा कर भी
उसे कहां जान पाया!
और जिसे जान ही नहीं पाया
उसे छोड कैसे पाऊंगा?
विरोध को सार्थक कैसे करूंगा ?
अस्मिता
अंधेरे को जीतने के सवाल पर
शंकित सवेरा/रुका रह गया कुछ देर
बंद अपने ही खोल में!
हैरान परेशान लोग धरती के
लगे खोजने | अंधेरा भगाने के अन्य उपाय।
57

जड़ाई के साधन जुटा कर
ओढ़ पर लोहे की चादर
अंधेरे में जा मिड़ा सवैरा
लेकिन जीत न पाया | अपने एमजोर दुश्मन को भी।
हार कर / करने से पहले आरम समपंग
फेंक कर लोहे की चादर
गिहारा उसने स्वयं को।
फिर निहारा अधेरे को
अब वह यहां नहीं था।
उलटवांसो
चूक जाता है तनाव
असफल होने के लिए हमारे होते ही तैयार
बिना हराए हमें / खुल जाता है रास्ता जीत का।
मुंदते ही तनाव के / दिखाई देते हैं सुली आंखों से
धूल भरे आकाश मे भेदियों से घूमते
धादलों के पारदर्शी टुकड़े
हमारी पकड़ से परे / हमारी टोह लेते हुए सदा ।
भगवा कपड़ों वाली असफलताएं
सहलाती हैं हमारे पसीनों भरै मायों को
आजाद सदी के गुम माहोल में
कभी कभार चलने वाली हवाओं की तरह
छुअन जिन की / लगती है
मेहनती हाथों की खद्दर जैसी साल की तरह।
जो हुए बिना असफल / तैयार हैं हार के लिए हरदम
सपते हुए सूरज मे मिलाते हैं अपनी आंखें
व्हर जाता है एक विब उनकी आंखों के पर्दे पर
sa

किसी सांवले गदबदे बच्चे का
होता हुआ पस्पां| इस मुल्क के हर आदमी के चेहरे पर
हर उम आदमी के चेहरे पर
-सफल होने की सीवातानियों में जो
कसता जाता है अर्गलाएं तनाव की | अपने अक्स पर
विवश / बंद रास्तों पर
स्थितप्रज्ञ निगाहों से झाने की खातिर ।
इस तनाव से कच्चे पड़ जाते हैं उसके हापों के स्पर्श
'रिश्तों की गर्मी से पके/घरों के खिलाफ ।
अब सवाल यह है | कि कौन चिनेगा
इम आदमी के मजबूत हाथों पर / इसके फल
राजी कर लेगा इसे भी/ असफल हो सकने की खातिर | कभी कभार
जिमसे हारने के लिए इसके होते ही तगार
ढीला हो जाएगा सारा तनाव
दिखाई देगा इसे भी / उड़ती हुई धूल के परे का आकाश ।
अंधेरे के पर्यायवाची
ऊपर रोशनी का तूफान गरज रहा है।
जर-जरें की नाभि से निकलता तेजस्वी आकाश
काल और दिगा की नुक्करों को झाड़ता हुआ
भंवर की नाई गुफानुमा रास्ते में खुलता है ।
यह प्रकाश-मार्ग है।
इसके पार मेरा पिता रहता है।
नीचे सीमित सुरक्षा के आशंकित आश्वासन से
अपने-अपने कमरों के दरवाजे खिड़कियां बंद करने में लगे हैं
इस धरती के हजारों प्राणी
भीतर अंधेरा कर के
फैशनेबल क्रांति, खद्दर ओर प्रेमिका की मांद मे
"घुसने की कोशिश करते हैं ।
59

लड़ाइक साधन जुटा कर
ओढ़ कर लोहे की चादर
अंधेरे से जा भिड़ा सवेरा
लेकिन जीत न पाया | अपने कमजोर दुश्मन को भी।
हार कर / करने से पहले आत्मसमर्पण
फेंक कर लोहे की चादर
निहारा उसने स्वयं को।
फिर निहारा अंधेरे को
अब वह वहां नहीं था।
उलटबांसी
चूक जाता है तनाव
असफल होने के लिए हमारे होते ही तैयार
बिना हराए हमें / खुत जाता है रास्ता जीत का ।
मुदते ही तनाव के / दिखाई देते हैं खुली आंखों से
धूल भरे आकाश में भेदियों से घूमते
बादलों के पारदर्शी टुकड़े
हमारी पकड़ से परे | हमारी टोह लेते हुए सदा ।
भगवां कपड़ों वाली असफलताएं
सहलाती हैं हमारे पसीनो भरे माषों को
आजाद सदी के गुम माहौल मे
"सभी कभार चनने वाली हवाओं की तरह
छुअन जिन की / लगती है
मेहनती हाथों की खद्दर जैसी साल की तरह।
जो हुए विना असफल / तैयार हैं हार के लिए हरदम
तपते
हुए सूरज से मिलाते हैं अपनी आँखें
रहर जाता है एक दिव उनकी आंखों के पर्दे पर
38

किसी सांवले गदबदे बच्चे का
होता हुआ चस्पा / इस मुल्क के हर आदमी के चेहरे पर
हर उस आदमी के चेहरे पर
सफल होने की खीवातानियों में जो
कसता जाता है अगंलाएं तनाव की | अपने अक्स पर
विवश / बंद रास्तों पर
स्थितप्रज्ञ निगाहों से झांकने की खातिर ।
इस तनाय से कच्चे पड़ जाते हैं उसके हाथों के स्पर्श
'रिश्तों की गर्मी से पके| घरों के खिलाफ ।
अब सवाल यह है कि कौन चिनेगा
इस आदमी के मजबूत हाथों पर / इसके कल
राजी कर लेगा इसे भी / अपफल हो सकने की खातिर | कभी कभार
जिससे हारने के लिए इसके होते ही तैयार
ढीला हो जाएगा सारा तनाव
दिखाई देगा इसे भी / उड़ती हुई धूल के परे का आकाश ।
अंधेरे के पर्यायवाची
ऊपर रोशनी का तूफान गरज रहा है ।
जर-जरें की नाभि से निकलता तेजस्वी आकाश
काल और दिगा को नुक्करों को झाड़ता हुआ
भंवर की नाई गुफानुमा रास्ते में खुलता है।
-यह प्रकाश-मार्ग है।
इसके पार मेरा पिता रहता है।
नीचे सीमित सुरक्षा के आशंकित आश्वासन से
अपने-अपने कमरों के दरवाजे खिड़कियां बंद करने मे लगे है
इस धरती के हजारों प्राणी
भीतर अंधेरा कर के
फैशनेवल क्रांति, सद्दर और प्रेमिका की मांद में
"घुसने की कोशिश करते हैं।
59

इस कदर रम जाते हैं उस घुटन में
कि कुछ ही सदियों बाद भूल जाते है
इस धरती पर कभी नाम-निगान भी था रोशनी का।
अपने व्यक्तित्व के विवरों में अंधेरा छिपाए
संदेह से निकलते हैं कमरी के बाहर
उनके और रोशनी के बीच अंधेरा पर्दे की तरह तन जाता है ।।
और वे जो अधेरे के प्रति जाग कर
सिड़कियां खोल रहे हैं
उनके कमरों से अंधेरा चुंबकीय धूल की तरह उठता हुआ
संसद् और सूरज तक को
गर्दा-गुवार में लपेट लेने की जुर्रत कर रहा है।
स्वार्थ और इंद्रियों के विषय
इंडियो और धवों की तरह
सुद को विपरीत दिशाओं में वेतरह खींचते हुए
उन्हीं के व्यक्तित्व को जैसे नष्ट कर देते हैं
अपनी अफरा-तफरी में जबरन घसीट कर।
अपने व्यक्तित्व, कमरे और अंधेरे को
धरती पर एक साथ छोड कर
रोशनी की तरफ निकल गया मैं
और अचानक मैंने जाना
कि अंधेरा, व्यक्तित्व और कमरा
ये तीनों चीजें पर्यायवाची थी।
रक्तजीवी ज्ञान
लपकती है छिपकली
हर हिलती हुई छाया पर ।
नोकरी, घर-परिवार, और अकेलेपन तक
ढेरों छायाओ का एक हुजूम हूं मैं।
60

न्ये सब किसकी छायाएं हैं | पूछता हूं छिपकली से
गोया उकसाता हूं उसे
झपट्टा मार कर निकल जाता है वक्त
मुझे पूरा निगले बिना
देकर चला जाता है
मिटा डालने के भय की एक और छाया ।
मेरा ज्ञान / एक बिंव की तरह
फड़फड़ाता है / मेरी किसी अधूरी कविता पंक्ति मे
कीड़ा है ज्ञान
पीता है रक्त मन और आत्मा का
इस अनचाही वस्तु से
छुटकारा दिलाने आती है छिपकली
सब विचारो को छूछा साबित करके
पता नहीं कहाँ चला जाता है वक्त ।
होते ही प्रकाश
-समो कर सत्र छायाओं को अपने भीतर
वक्त को ही इस्तेमाल करता हुआ / अपने ज्ञान की तरह .
कोड़े के धरातल से ऊपर उठ कर
जन्म लेता हूं / एक आदमी की तरह
समझता हूं
भय के जाते ही / चला जाता है साम्राज्य
अंधेरे की छिपकलियों का
वक्त खाली अंधेरा ही तो नहीं होता है।
समय और स्थान से आजाद होते हुए
घडी की ज्यादा चाभी भरते हुए देखा मैंने
वक्त की रफ्तार को और तेज होते हुए
और टूटते ही उस चाभी के / आजाद होते हुए वक्त से / अपने आप को।
वक्त से / या वक्त को मिलकीयत से ?
61-

यह भी तो पूछा मैंने / उस वक्त अपने आप से । अपने पिछड़ेपन पर होकर क्रोधित / चल दिया माथे पर सोग उगा कर ।" अपनी-अपनी जगह को जकड कर बैठी हुई सडको और पगडंडियों ने खुद को हुए लोगों के हाथों में / इंडों की तरह छोड़ दिया। और फिर खदेड़ दिया गया मुझे / शहरों, राज्यो और विदेशों से बाहर सभी जगहों से होकर निष्कासित चटखता हुआ ऊपर मे लेकर नीचे तक पीछे की तरफ उड़ते हुए बालो की तरह / छोडता हुआ कहीं पीछे वर्तमान को भाग की लपट के चाबुक-सा बोला-सटाक् फूटती नसों से गिरी लहू की चंद बूंदें किसी बूढ़े की लाल दाढ़ी में बदल कर जादू-सा करती / सड़क के अगले मोड़ से कही गुम हो गई- आजाद कर दिया स्थान ने भी वहीं से मुझे। स्थान ने / या स्थान की मिल्कीयत ने ? यह भी तो पूछा मैंने / उस जगह अपने आप से । अब लगा कि प्रकृति का भोजन होकर / शून्य हुआ जाता हूं जिस्म नहीं ! जमा हुआ कोहरा पहने हूं एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर मेंढकों-सा फुदकता जाने कहां चला जाता हूं फिर भी छत है कहीं और कोई फर्श / जो मुझे टिकाव देते हैं हिमालय मा ऊंचा या कीटाणु से छोटा-ये मेरे बनाए मूल्य जिन्हें तोड़ रहा था मैं खुद अपने हाथो से। बीजों को पचा कर बदल रहा था | पेडों के विबों में देसा मैंने अपने पीछे एक अधेरा/ आगे नियम और दोनो के बीच झूलती हुई अपनी आत्मा मरकंडो के जंगलो मे फैली अपनी दाढी और किरणों के ऊबड़ खाबड़ परावर्तन में / पलकों के बाल दिखाई दी यहां आकर एक और घड़ी मेरा होना ही चाभी थी उसकी / और वलना वक्त की रफ्तार लौट आया फिर अपने भीतर / वक्त के साथ साथ बांध कर पीठ को सामने की अर्गलाओं से पा गया स्थान के छिपे हुए ताले को ?

खुद को लगाकर उसमे चाभी की जगह / सचमुच हो गया आजादः
समय और स्थान की मिल्कीयत से ।
और साथ ही समय और स्थान से आजाद हो जाने की इच्छा से 4
एक नये आदमी की मानिंद जन्म लिया मैंने
हो गया कसौटी / इतिहास और परिवर्तन तक की
अब मुझे पछाड़ना या मुझ से पीछे रह जाना
मुमकिन नहीं था किसी के लिए
नष्ट करने की जगह द्वन्द्वों विरोधों तक को
समझ कर उन्हे / कर रहा या समर्पित
अ-समय ही प्रेम / हर जगह ही सहयोग के लिए 0
पीपल गाथा
ठीक जहां से / मुख्य तना पीपल का
बंट रहा था अनेकों टहनियों-उपटहनियों में
उसकी उलझी हुई जटिल संरचना पर रीझ कर
मारे से कटवा लाया वहीं से उसे
घर भर में सभी को दिखाता फिरा ।
सभी सुश थे
पत्नी के लिए सजावट / मां के लिए पवित्रता / पिता के लिए प्रकृति
और बच्चों के लिए एक नयी निराली चीज था
यह लकड़ी का टुकडा
जिसे आंगन में रखकर / आस पास गोल-गोल घूमने लगे थे / सभी बच्ने
-बोल मेरे मगरमच्छ कितना पानी !
तुलना ऐमी असभ्य-सी जान पड़ी मां को
खोजने लगी वह उसमें / नाग नर्थया की प्रतिमा को
मां के ऐमे बचपने पर हंस दिए पिता
सुबह की सैर को जाने की जगह / आग उसे छू दिया
और उसे ही प्रकृति की निकटता का चिन्ह समझ
बैठ गए पदने अखबार ।
गाते हुए

'यानिश ले आई पत्नी उस दिन बाजार से
'फिर लाल रंग को करने लगी पेंट/ कला कौशल से
वाहर की छाल के हर उतार चढाव को
और उभारने के अंदाज से ।
इधर कविता लिख रहा था मैं
छाल को इतना सजते संवरते देस
सोजने लगा उसमें मानव स्वमाव को
तमी उस गोपीम मे मुझे उगता दिखाई दिया / एक और पीपल ।
लगता था मानों भाषा में जीवन का विराट तना
खोजता हुआ अपने रूप को
अटका जाता हो उसी छाल में ।
अब तो हर लम्हे के बाद / एक नये रूप को प्रकट करता हुआ
छाल को केंचुल की तरह उतारता हुआ
'कुछ और ही उठ बढ़-सा जाता / लगता था पीपल ।
यह सारा करिश्मा धूप हवा पानी का खेल था
'या उसकी अपनी संभावनाओं का उद्घाटन
और या मेरे अपने भविष्य की चेतना
कर रही थी अख्तियार कोई शवल ?
'नहीं, इस पीपल के खड मे मौत ही छिपी नहीं पेड की
और न ही यह अकेला जूझता जाएगा
'मेरे ड्राइंगरूम में छाई चुप्पियो या अट्टहासो से
यही तो वह अवसर है | जब मेरी कविता सीखेगी
जीवन के सघर्प से
'कि कविता मे लड़ना नहीं / लड़ने का मजा जरूर उतर आएगा
लेकिन सघर्ष में जीत जाने से ही कोई कवि नहीं कहलाएगा ।
'ड्राइंगरूम में फूटता हुआ ! एक पूरा पेड पीपल के खंड से
दीखता रहेगा मुझे / अपनी कविता मे अखंड
जव कि हकीकत में जर्जर होता हुआ वह खंड
बहुत जल्द मेरी मा के पवित्र भाव को घर जाएगा

मेरे पिता की प्रकृति में | वूदी विचारधारा का विष मिल जाएगा
और बच्चो के कौतुहल और पत्नी की सजावट पर
पुरानेपन और आदत से जन्मी / ऊब का शासन हो जाएगा।
फिर एक दिन कयाडी के पास ले जाकर फेंते हुए उसे
मुझे याद आएगा गांधी की बकरी का जबड़ा
जिसे दक्षिण अफ्रीका में बीया
युवा कवि मोलीयज के रक्त से नहलाएगा
सारे विरोधों के बीच | तीसरी दुनिया के माथे मढ़ा गया
महाशक्तियों के साथ हर सघर्ष | फिर एक दिन
उसी जटिल पीपल के खंड में बदल जाएगा
जिस पर लिसा गया इतिहास
किसी के लिए परंपरा-सा पवित्र होगा
किसी के लिए प्रकृति की ओर वापसी सा सार्थक
भौर कुछ के लिए कौतूहल और प्रदर्शन ।
कबाड़ी को इस सब से क्या मतलब
चाहे विश्व इतिहास ने एक करवट और ले ली हो
या आगे बढ़ गई हो दुनिया की सभ्यता / एक कदम और
उसे तो चंद सिक्कों मे बोदा चीजों को खरीद लेना है
और इंतजार करनी है कि कब कोई
नवधनाढ्य या सिरफिरा शोधार्थी आए
और कन मे गड़ गए पीपल के इतिहास को
इस जटिल संरचना के सहारे
अनुमानों से फिर जीवित करे। .
बिल्लियों की आत्मकथा
घुटनों पर बैठ कर चिरौरी की / पूंछ हिताई
तब कही जाकर / देश के नक्शे की तरह टेढ़ी मेड़ी
जली फुकी एक रोटी पाई
चलो, हम बिल्लियों की मेहनत कुछ तो काम आई ।
65

नीचे की तरफ झुक कर डाल कर जोर अपने पंजों पर उछलने और हमला कर देने की कला को हमे इसी नम्रता ने बार-बार सिखाया । घाट-घाट की रोटियों को देखा है हमने चौकोर परांठों से लेकर पापड़-सी गोल रोटियों तक चखा है सभी का स्वाद / और पाया है एक ही निष्कर्ष जिस किसी भी आकार में बिली हो रोटी बेलने वाले की ओर से वह सिर्फ एक सूचना होती है या एक चेतावनी / कि उनकी सुविधा को दाल गले तो देश के नक्शे को वे | दिखा देगी एक दम सीधा कर के अपनी रोटी के आकार में काट तराश के। सब को सीधा कर देने के इस जोश में- सभी सीधी करते हैं अपनी रोटिया केवल और घात में रहती है हम बिल्लियां सीधी या टेढ़ी कैसी भी विली हो रोटी हमे तो मतलब होता है / रसोई द्वार के खुला छूट जाने से ही या रईमी की शान में कुछ ज्यादा ही जूठन छोड़ दिए जाने के / उनके सामंतीय अंदाज से । हमें लेना देना ही क्या / रोटियां पापने की मेहनत मुशक्कत से जबकि शहर के माथे पर जड़ी चट्टानों पर अपने दांतों को घिस-घिस कर तेज करते जाने की आदत हमे बनाती हो अनिवार्य हिस्सा | उनकी सभ्यता की शोकीनी का। और हमारे द्वारा की गई शेर बनने की रिहर्सल प्रेरणा देती हो उन्हें / हरदम कविता लिखने की खातिर । ऐसे में हम भला रोटियां सेंकने की दिक्कत को दरिद्र नारायणी पदकों की तरह / क्यों उठाए फिरें ? और फिर मौज भी तो कितनी है बिना आज्ञापत्र संसद भवन में बिना कपड़े पहने मंदिर गुरुद्वारे में जव चाहे प्रवेश कर जाती हैं हम विलिः 60 महाशक्तियों से पाए अतिशक्तिशाली नकली दांतों का पहन कर सैट जब चाहे बदल डालती हैं किसी भी देश के नक्शे को सचमुच की रोटी जैसी पाचक वस्तुओं में । फिर तो क्रांति जैसी महान वस्तुएं भी हमारी सेवा सुथूपा करती है और अंधेरे मे चमकती आंखो को भविष्य दृष्टि का देकर नाम वर्तमान को अपने मजबूत जबड़ों के द्वारा चिदी चिदी कर डालती हैं । रेलवे स्टेशन के बाहर फुटपाथ पर हाय से कच्चे आटे की गोलियां बांटता एक मरियल सा सूसार आदमी पहली दफा हमें | हमारा हिस्सा देने से इन्कार करता है और फटी आवाज करने वाली अपनी लाठी से हमे डराता धमकाता है। जैसे पहली दफा वराबर की चोट होती है और घात लगा कर भी । हमारे हाथ असफलता ही आती है. और इसकी वजह यह होती है कि एक जून खाने के अलावा उसके झोले से कुछ नहीं निकलता है दुख पर दुस सहते जाने की वजह से अव उसमे न करुणा बची है | और न परंपरा जबकि यही तो सुरंगें है हमारी और उसके अभेद्य दुर्ग में सुरंगें तो सुरंगे नज़र नहीं आते हैं | भविष्य के रोशनदान तक । हैरत में हैं हम / कि वह सांस कैमे लेता है ? और देखना है हमे कि वर्तमान के दरवाजों से ही | भविष्य को गुजरने के लिए मजबूर कैसे करता है वह ? ।

कविता को धूप में खड़ा कर्ण अंधेरे मे बैठे लोग / भुगतते हैं पावर कट लंपों मोमबत्तियों के जमघट के बावजूद रोशनी खोजते हैं कविता में / कटे हुए कविता से पूरी तरह खोजते हैं अपना चेहरा कवियों के चेहरों के इर्द गिर्द / सी जा चुकी बोरियों में पा अनुभूति के क्षेत्र में / बड़ी-बड़ी पोस्टें पाने वाली बिवाइयों में उतरती हैं जो / बड़े बड़े जूतो के अंधेरे तलबों में । मुगलिया जूतियो की नोक के समानांतर किसकी मूंछों के खम बरकरार है ? / कविता के ? जिस पश्चिम दिशा में | गाउन कस कर क्रिकेट खेलते ब्रह्म की असंगति / भूचाल बन कर फूटी है | उधर से कुछ कवि शिरोपर गुमड़ लिए चले आ रहे हैं पूछते हैं पूर्व के लोग / उन्हें देख कर किस आदि पुरुष के सिर से / लहू की बजाय कविता फूटी थी ? कौंच की क्या बात करते हो | उसका विज्ञापन तो आंवला केश तेल की बोतल पर छपता है? वाल्मिीकि ! / वह तो पी महाकाव्य की दर से / ढाई सौ रुपए सालान पारिश्रमिक पाता है / बैचारा! कविता के जन्म का गवाह । कैलेंडर की आखिरी तारीखो को सिद्धांत बना कर । विस्मयादिबोधक बनने वाली आज को कविता इतने भेस कैसे बदलती है। कभी नयी, कभी विचारित कभी समांतर और कभी हथियार कैसे बन जाती है ? मगर इस से क्या बुरा होता है शब्दों के अंगारों से भरे अलाव में तिल-तिल कर आहुत होता अर्थ देर तक फिर भी चमकता है अंधी आखो के बावजूद सूरज तपिश की तरह महसूस होता है खुद को अध्य की तरह दे डालने वाला आदमी कविता की धूप में कर्ण की तरह खडा मिलता है। 468

एक विचार कविता
मुझे अपने विचार टोचं की तरह लगते हैं
जो अंधेरे में बस वित्ता भर जमीन रोशन करते है
जबकि कुछ अदृश्य लोगों के हाथों में होते हैं | वटन उनके ।
इन विचारों को मैं जैविक गुण सूत्रो मे बदलना चाहता हूं
ताकि मैं उनसे एक भ्रण की तरह
खुद को दोबारा जन्म लेते हुए देख सकूँ
और उनके आस पास की गर्भ झिल्ली की / किलावंदी को तोड़
उनके शिकंजे से बाहर आ सकू
पहुंचा सकू अपने हाथों को / उनके बटनों के मुहानों पर।
ध्वनियो से खेलते गर्भ शिशु की तरह
चाहता हूं कि जन्म लेता हुआ रोऊ / ध्वनियों में अर्थ भरू
फिर रोने से करता हुआ पलायन
मैं भी अपनी भाषा में बोलूं ।
पापा को जानकार समझ / नये के कौतुहल से
कुछ उल्टा सुल्टा पूर्छ ।
रंगों की कहानिया सुन कर ही
बिना देखने की कोशिश किए रंगों की
रोशनी पर शोध करने निकल पडं, मैं भो।
यह सब करता हुआ भी मैं लेकिन
सूरज से बिछड़ जाने के गम को / टॉर्च से कैसे गलत करू?'
बटनों तक भूले भटके पहुंच जाने वाले अपने हाथों से
बटनों पर अधिकार करने की हालत तक कैसे पहुंचूं ?
समाधि के पत्थर
रंगमंच पर उतरी हुई परछाइयां पूछती है
व्यक्ति कहां है ?
जवाब देने के लिए पुनः
कुछ मुखौटे चले आते हैं
पहेली बुझाते हैं | बताओ हम किस के है ?
69

सवाल जब इतने नुमायां तोर पर बार-बार पूछा जाता है तो यह तय है कि व्यक्ति जरूर है छिपा हुआ पर्दो के पीछे किसी खास वजह से बाहर नहीं आता है। शायद सोचता है | जब आ जाएगा समाजवाद -मैं भी प्रकट हो जाऊगा क्योकि जब तक नहीं आता है समाजवाद मेरा प्रकट होना खतरे से खाली नहीं मेरी अधपकी विचारधारा या अनजीया अनुभव केवल ढोल ही साबित हो / कुछ ठिकाना नही "मुझे क्या पड़ी? असफल होने की नही यह घडी परछाई-परछाई है अगर यह व्यवस्था मुखौटा-मुखौटा बनी रहे यह जिंदगी इसी मे सुविधा है। “नही चुक सकती जिंदगी किसी की भी रंगमंच होकर ही और न नाटक करते हुए बनी रह सकती है अनाटकीय । लुकाछिपी के दर्शन मे डूब कर फिर पता चलता है एक दिन -कि जो परछाई-सा चला पहना गया मुखौटे-सा वह फिर भी कुछ कह गया "छिपा रहा जो / शुरू से अंत तक ममाधि के पत्थर-सा लाश के सिरहाने ही जडा रहा। हां, यह बिल्कुल अलग है बात 'कि नाटक की हर सफलता का सारा ब्योरा सूत्र रूप में अन्ततः उसी पर / इबारत-सा लिखा गया। 170

धूप जले
(1)
धूप भी कहीं ताकतवर होती है
झोंपड़े की छत पर तो रहती है ?
राजा है ताकतवर / कागज पे फसलें उगाता है
दानों की गिनती/पहाड़ों में करवाता है
उसकी ऊंची छलाग का फल
देश फी खाद्य समस्या को
सुलझाने के काम आता है
उसकी जनता
सूखे हाड की वासुरी बजाती है
सुदामा और कृष्ण | एक साथ कहाती है।
राजा ने हुक्म दिया है
कि नगर की शोभा के नाम पर
झोंपड़ो को जलावतन कर दो
आदेशों के नागफास उछालो
सूरज को धरती पे उतारो।
यह किस ने आदेश की / परवाह नहीं की है
पीली धूप / नगर में
लाल सुर्ख हो क्यों बिखरी है ?
(2)
धूप और खून का रंग एक कैसे हो गया ?
इन्सान के बराबर
यह कोई और कैसे हो गया?
धूप क्या है
हमारी वेधशाला द्वारा पकडा गया एक कीटाणु ?
पराए घर में
71

नाली के रास्ते घुसने वाला / मन्त्री का जासूम ? आग या गुस्से के तेवर वाती कविता ? रोजगार की सिफारिश? या इंटों के भट्ठे के आसपास की / फिजूल की मिट्टी ? हमारी व्याख्याएं तक कभी-कभी धूर से ज्यादा वजनदार होती है हमारे तक / धूप का मुंह खट्टा करते है उमे अपने जवावरहित होने की हालत पर शर्मसार करते है अस्तित्व से बुद्धि को श्रेष्ठ साधित करते हैं। अति प्रश्न है यह कि खून और धूप की रंगत एक कैसे हैं ? हमने नया दर्शन बनाया है जिस में इस सवाल को अप्रासंगिक करार दे दिया गया है। (3) एक अदद आदमी/ रोज आठ घंटे काम कर के एक धूप को खाना खिलाता है फिर अस्सी करोड आदमी रोज चौबीस घंटे काम ढोते हुए एक को कब तक खाना खिलाएंगे ? ओ री पगली धूप ! / दिन मत गिन यह काम इतिहासकार कर लेंगे सांस मत गिन जीवशास्त्री और क्या हिसाब रखेंगे जीने की फिक्र छोड़ तेरे अलग रंगों मे रगे खद्दर / वर्ना कसे जीएगे ? मन्दिरों गुरुद्वारो मे तेरे गुन कैसे गाएंगे ? दफ्तरों सचिवालयों मे तेरा नाम कैसे / ओढे बिछाएगे ? 2 (4) घूप का भाषण सुनने के लिए चले आए है सेय स्ट्राबेरी और अन्नानास के पेड़ तक धूप भी क्या कोई बड़ी तोप है ? पतो, इसी बहाने इस कस्बे की कुछ तो औकात है। धूप की आड़ में | यह कैसा अन्धेरा है ? सूरज ये कैसा है देखें तो रतौंध होता है ! بنا वचपन से आज तक धूप में हम भी नहाए हैं पर याज लोग / किस धूर को मंच पर लाए हैं ? यह कौन सिर्फ शब्द गुजाता है न गर्माता है न छह का संदेसा लाता है। (5) उनके गोदाम मे घुस कर धूपमुंहा हो कर / पीठ अन्धेरा हो गया मैं। कैसे कहते हैं वे धूप के घर अन्धेर नहीं होता ? उन्होने जब से धूप के राष्ट्रीयकरण का फैसला किया है मेरे लिए धूप तक में खड़े होने की जगह नहीं है और लोग हैं कि राष्ट्रीयकरण का नारा लगा कर खड़े हो जाते हैं । धूप का प्रतिनिधित्व करते-करते ऐयर कंडीशंड कमरों के / अंधेरों में खो जाते है । हम हैं श्रमिक धूप एक-दूसरे की तरह मरती हैं 73 और वे संरक्षक हैं धूप के सिर्फ अपनी तरह मरना चाहते हैं लेकिन इससे पहले कि उन्हे मौत आए वे भगवान हो जाते है भगवान की मूर्तिया घड़ती है / बेचारी धूप थक हार कर उनके / आश्रम के फाटक पर मर जाती है। धूप के संरक्षक सिर्फ अन्धेरे में अन्धेर करते हैं अन्धेर और धूप का झोंपड़ा हरिहर ! हरिहर ! कैसा लफड़ा ? (6) इतिहास की क्या खबर है ? धूप की शक्ल का / चिकना एक फर्ग है बड़ी फिसलन है। कुछ दुर्लभ शिखालेखों से पता चला है कि हमारे पूर्वजों ने / मिट्टी के पड़ों मे धूपरंगी स्वर्ण मुद्राएं दवाई थी। जमीन की खुदाई जारी है अभी तक कुछ पिजर निकले हैं / दुर्लभ पशुओं के कुछ पत्थर / अजायबघरों के लायक और कुछ पाडुलिपियां / अज्ञात लिपि मे शायद लोहे से सोना बनाने की विधियां है शायद पशुओं के खुरों की घिसकिरिया है शायद सोमरसी मत्र सिद्धिया है अटकलें तो अटकलें है सच यह है कि सोम अगु और रस एक बम है खालिस भारतीय बम क्रिश्चियन और इस्लामी बमो का तोड़ अहिंसक है / हथियार है निरस्त्रीकरण का। इसलिए अब हमे चाहिए कि हम युदो के विरोध में / चुटकुले बनाएं 74 इतिहास के तोड़ के लिए अफवाहों के मनोविज्ञान पर शोध कराएं। ताकि धूप के फिसलनदार फर्श पर हमारे बुजुगों के घड़े भरतनाट्यम कर सकें और कुछ सनातन वाजीगर दुनियां का मन बहला सकें। (7) आओ! धूप की छतरी बनाएं। हम इंतजार करते हैं हवा क्या करवट लेगी? हवा आमंत्रण समझती है अंधड़ बन उड़ती है झाग हो जाते हैं पेड़ और हम गुस्से के तने / तने हुए / तनतनाते हुए लाखों साल से नम्र बनी रही अब बस भी कर, अरी घास ! वह जो तेरा झुकना सहना था यह हवा को दिशा का आदेश दे बहने की तमीज दें। धूप की छतरी बन जाए तो उसके तले चमडी हो जाती है एक वैसी ही दूसरी छतरी। जो छतरी / या यह जो चमड़ी महसूसने की शक्ल में खुलती और सोचने की शक्ल मे सिकुडती / बन्द होती है अविश्वास या विश्वास जिस की सलाखे है / नाड़ियां हैं' संवेदनाएं जिस में / काले भूरे कपड़े-सी हशियो इडियनों सी यह TE धूप मे गर्म / क्रोधित हुई रहती है। यह यह पमही अगर अपने रोंगटों को सहा कर से अगु दर अण/ एक के ऊपर दूसरे को धर ले मासों सुइयों की / एक सुई हो फर पुभे तो यया हो। ओ गुरूर हवा! आदमी के सामने सू कुछ नहीं सू अंघट आंधी तूफान भी बने पर गाड़े पसीने की मोटी धूप यही की वहीं रहती है तपाती है | पकाती है। उसी धूप की छतरी से कर निकल आए हैं हम। (8) चितकबरी गाय रंभाई है धूप | गेहू की शक्ल में उग आई है । अरी ओ धूप गाय! मेहनत कर के / रंग काला पड़ गया तेरा और उधर / विदेश में कुछ देर रह क्या गई जैसे एक भंस गोरी हो गई । तेरे दिन दिहाड़े गोरी भैस खेत चर गई। एक चितकबरे बच्चे ने भैस का दूध पीने की जिद की तो खेतचरों के कोर्ट ने बच्चे को नाबालिग करार दिया और दूध पीने को अशोभनीय काम कृत्य। ए मेरे देश ! तेरे शास्त्र उलझे रह गए 7 स्तन और यन का भेद बताने में रह गया | स्तन को भी थन की तरह दोहने का भेद / अनकहा । यह फैसे हुआ | क्या हुआ? ऐ मेरी अमृत धूप तेरे दिन दिहाड़े गोरी भैस का बछडा / भूखा कैसे रह गया ? (9) धूप में छिप जाते हैं कीड़े और या हम सब जो कोहे मकोड़े हैं धूप से बचने की कोशिश में कोई बड़ी गलती करते हैं। पयों कभी-कभी हमारे देव और असुर कीड़े "मिल जुल कर / महाविप पैदा करते हैं ? आकाश बन्धी धूप क्यों हमे अमृत का धोखा देती है ? क्यों जिंदा रहते हैं हम कभी अस्तित्व मे न आने वाले विषपायी गले की उम्मीद में ? पर अब सफल नहीं होगे प्रश्नो के दुष्चक्र मे उलझाने वाले षडयन्त्र । हमारी बीज गलती हमारे ही सामने आई है 'धूप को सहने के लिए कीड़ों की सेनाएं मैदान में निकल आई हैं। मगर धूप तो मित्र साबित हुई है । अब ये सेनाएं अपने जहर को स धूप में पका कर स्वादू भोजन बनाएंगी फिर इस विष से बेहतर और कौन-सा अमृत पाएंगी ? (10) धूप ! तेरा छाया से झगडा क्यों नहीं होता ? आह ! वाणी को मारे बिना मैं भापा की छाया से मुक्त क्यों नहीं होता? मैंने तो मित्र दुनियां चाही थी शत्रु दुनियां के अभाव में वह कहां थी? आरे मेरे प्यारे दोस्त तुझे मैं अपने खून से सी आ रे मेरे कट्टर दुश्मन तुझे अपनी शिराओं से वान्धू तुम दोनों ही घर घुसरे हो तुम दोनो ही धूपजले हो । मुझे तुम दोनों में अपना ही अहसास होता है एक से प्रेम में रचा झगड़ा होता है तो दूजे से झगड़ा कर के / प्रेम हो जाता है। धूप ! तेरा जो छाया से झगड़ा नहीं होता इसमें तो बड़ी जटिलता है । और जो हमारा झगड़े के बिना / गुजारा ही नही होता इसमें बडा अपनापा है! मरर हम क्या करें धूपजले तो हो सकते हैं ? अब हम धूप ही कैसे बनें ? 78

न लड़ने की लड़ाई
वय की तरह जिन्हें समझा था
मूर्त आस्थाओं-सी प्रतिमाएं | हमारे छोटे सत्यों की
पकड़े गए मूठ की तरह तपाने लगी हमें
और गर्म सलाखाओं-सी उठती हुई ऊपर / रीढ़ में
दागने लगी हमारी बुद्धियों को
और कुछ पा सकने की हमारी / अदनी-सी हड़बड़ाहटों को ।।
टिका कर पाव मजबूत चट्टानों पर
करने निकले थे क्रांतियां
प्राप्तियां जिन पर बरसती हिमपात जैसी
क्या पता या गल जाएंगी वे ही घट्टानें
ज्यों बर्फ की हों मूरतें
पहली धूप के आगोश में ही ।
यह भी क्या अनुमान उसके क्षोभ का।
हाथ में जिसके कि अगला शिखर हो। बस आया कि आया
और वह ठीक उस पल देसे अचानक
मंजिलों का देवता वह लो चला है / मुंह मोड़ कर मैदान में
सत्य वेशक धूल धुंबां हो / अभी तलक
उन हदों तक दह यकीनन या हमारा
गर्व से भी हम भरे थे | याद कर उस साधना को
जो हमारी हड्डियां तक थी गलाती
उन नकारों की मद्धम गति की आंच पर
सम्बन्ध था जिनका / पदमान सुविधा के छलावों से ।
हर था हमे
सुविधा किसी के चरणामृत-सी
जहर बन कर उतर जाए न कही
पून से होकर हमारी खोपड़ी या धौंकनी तक ।
लेकिन कहा चाहा था ऐसा
कि हम से कुछ समय पहले / जो हमारे कष्ट के थे भुक्तभोगी.

अब
चे ही उठा कर डाल दें फिर से हमें
उन रास्तों के ही मुहानों पर
जहां से खुद उन्होंने शुरुआत की थी अपने सफर की।
और बोलें/बारम्भ से लड़ कर मध्य तक पहुंचोगे जब
तव ठहर कर / खड़े हो कर अलग
तुम भी भेज देना फौज को वापिस मुहानों पर
कहना / अपने स्वयं हो सेनापति
लड़ कर दिखाओ!
लेकिन भला क्या इतिहास भी बेताल होता
हजारों वर्ष से ये विक्रमी संवत् हमें जैसे धुमाता
इतिहास को न जीत पाते | उसके जवाब
फिर भी छोड़ कर श्रद्धा का पल्लू
'युद्ध को लड़ने से पहले
चाहती खोजना हैं अयं फोजें / कुछ पल ठहर कर ।
'पहली दफा ऐसा हुआ है
'आदेश मिलने पर भी कोई / युद्ध से मुनकर हुआ है। 0
स्वचालित मंथन
हर नयी संकट की घड़ी हृदय घड़काएगी
सांसों का आना जाना / लगने लगेगा बेमानी
घबराहट में दपनी ही पुतलियों में केन्द्रित हो जाएंगी
फटी-फटी-सी आं/ एक दफा फिर ।
हर दफा की तरह / कलेजा मुंह को आएगा
और मुंह इस स्थिति को
अपनी नयी
गुरुआत का नाम देकर
छिपने से उबर जाएगा।
180

वही सवाल एक नया जवाब पाने के लिए
फिर से भृकुटि को भवर में बदल डालेंगे
समुद्र की मरह मया-मया-सा लगेगा | एक पूरा समाज ।
और हमारा अपना अस्तित्व
पहाड़ होकर भी हिचकोले खाएगा।
विल्कुल पहचान में नहीं आएंगे
देवता और राक्षस के भेद / पहले ही संशय मे डूब जाएंगे।
हर नयी संकट की घड़ी
हमारे संकल्प और विकल्प / दोनो से आजाद होकर आएगी
मिटा डालेगी| जहर और अमृत के बीच का फासला
न हमें सफल होने लायक छोड़ेगी
और न असफल होने में समर्थ ।।
शिखरों पर कोहरे की झाईमाई
-
कुछ छिपी अछिपी मन की धुंआं भूमियों पर टिका कर पैर
खड़े हुए हैं अपने नाम के जो कुबड़े शिखर
छंटते ही धुंआं भूमियों के
हैरत में पड़ कर ढूंढते नजर आते हैं | अपने आधारों को
भड़भड़ा कर गिरने से पहले !
बड़ी नफासत से संभाले हैं | हवाओं में हम ने वे ही शिखर ।
चलो! होगे ही नहीं / लगे होगे धुएं की शरारत की वजह
से
वांधते हुए कोहरे को अपनी मुट्ठियो में / दिलासा दे लेंगे
जब-जब खिमकी हुई धरतियों पर से
टूट बिखर कर आ गिरेंगे झूठे शिखर
और उन पर बैठे रह पाने के हमारे भ्रम ।
सहलेंगे धरती की वाजिब ईयाएं
नीचे आ गिरने की दुखद और दुस्सह प्रक्रियाएं
लेकिन कैसे सह पाएंगे

आकाश में ही गायब हो जाना घरती का
चाहे वह धुआं ही क्यों न हो ?
अपमान से भी बदतर / आत्मसम्मान तक खो बैठना हमारा
चाहे वह वंचना ही क्यों न हो?
नहीं, सहने या न सहने की भी कोई बात नहीं अब
जबकि दुराशा पहुंच कर चरम पर अपने
आकाश में धरती को कोख ढूंढती है ।
और शिखरों पर कोहरे की झाईमाई को
तितर-बितर करने निकल पड़ी है। "
इतिहास मानव
गुजरते हुए नदी के पुल
पूछा इतिहास ने मुझ से
क्या यह नहीं हो सकता कि तुम
पोछे की तरफ मोड़ दो / नदी की धारा को?
तब जब कि मुझे / पुल पर आ रहा था गुस्सा
बंद कर के झगड़ना
अचानक फूल एक / मैंने उसके जिस्म से छुआ दिया ।
फिर देखा इतिहास के अहं को
गोया वही नदी पर बंधा पुल हो
मार दिया ताना
भूल कर ओढ़ी हुई पिछली मानवता
पुल, अरे ! सख्त बजरी से बने
नदी के अंग संग रह कर भी
क्यों नहीं सीख पाए
उछलना कूदना खेलना और बह जाना ?
इस पर इतिहास ने कर दिया इशारा
उस खाली जगह की तरफ
82

जो उसके और मेरे बीच
तनी हुई थी पुल की ही तरह
अचानक मेरे एक कदम धरते ही उस जगह
गायब हो गया पुल
और नदी उछलती कूदती सेलती
मेरे होश में आने से पहले ही
बहा कर ले गई हम दोनों को।
विद्रोह से विवेक तक
अब ढरें की तकलीफ और गले नहीं उतरती।
विचारों के कोलाज में लगता है कि
हजारों धागों के उलझने से बनी गांठ की तरह
समस्या जुड़ी ही हुई है अपने हल के साथ
कच्चा माल अपने उत्पादन साथ।
उत्तर छिपा हो सवाल में / तो क्या फायदा है ?
हमारे होने की वजह फिर क्या है ?
इसलिए चलो | विचारों मे ही सही
मैं कुछ झूठ मूठ समस्याएं पैदा करता हूं
'मान लो' से पैदा हुए / आंकडों के लाक्षागृह में कदम घरता हूँ।
अव अनिश्चित है सब कुछ
क्योंकि तुम्हारी टेस्ट ट्यूब में कोई संभावना नहीं
फिलहाल मेरे पुनर्जन्म के होने की।
इसलिए भव मैं वैखोफ नियम तोड़ता हूँ।
अरे भो इलेक्ट्रोन ! व्यर्थ की परिक्रमा में
क्यों अपने आवेश को जाया किया करता है ?
फोड़ दे अणुओं के खोल
सृष्टि को परिचप दे अपनी आग का ।
हगओ ! इतनी सहजता से क्यो चलती हो तुम

कि लोगों को सांस तक लेने का अहसास नहीं हो पाता ? बहो हवाओ1/ सारी धरती को अपने प्रयास में समेट कर उतर जाओ / समुद्र के भंवर में जलराशि को विवश कर दो / अपनी मर्यादा छोड़ने के लिए। ओ लहरीली गति से चलने वाली आवाजो । अपनी लकीर मत पीटी / अचानक दायरों की शक्ल में घूम कर गिरो मध्य मे | और धम्म से पृथ्वी को कंपाते हुए हजारों सूर्यों के परिमाण वाली चोख बन कर लील जाओ इस बूढे अंतरिक्ष को। -यह मेरी बांह कट कर गिरे / जांघ का मांस कवचों में छिपे कछुए काट खाएं / मांसपेशियों पर पत्थर पढ़ें 'फिर भी मरूंगा नही मैं / और न अमरता के लिए बचपन की तरह / बीतते वक्त के प्रति अचेतन होने का बहाना ही घडगा मैं / मुझे तो महज मनुमार्ग को काटते हुए किसी पुरोहित का कत्ल करने की जरूरत ही होगी और नियमों के धुन से खाए / बोदे हुए / इस विश्व में •एक कोहराम मच जाएगा /'जिस्मों पे उगे बाल -खड़े हो जाएंगे तीखी सुइयों की तरह / बाहर आ गिरेंगे गर्भाशय सतानों का जन्म लेना बद हो जाएगा। -मुर्दो के टीलो पर खड़ा मैं / खोपड़ियो से फुटबाल खेलूंगा और मस्ती से सीटियां बजाऊंगा। फिर एक लंबे अंतराल के बाद / जव अपने होने का प्रमाण जुटा-जुटा कर थक जाऊंगा / अकेला होने का नियम तोड़ / किसी एक और की इच्छा करूंगा और फिर किसी जबरदस्त अपराध बोध के / फणिघर से डस लिया जाऊंगा। अब मुझे मुर्दो को आंतों से | एक शक्तिशाली कोड़ा बनाने की जरूरत होगी जिस से मैं अपने आप को तव तक पीटता रहूगा जव तक यह पिटाई गहरे मे उतर कर मेरे अपने उन बंधनों को नहीं तोड डालती 'जो मुझे नियम तोड़ते वक्त उन्हें तोड़ने के विवेक से तोड डाला करते हैं। 4

हुद को उगाते हुए
अब कहीं जा कर
पेड के उगने / और रसधार के बहने में
फर्क नजर आया है।
फूल हैं पेड़ का प्राण :
मूंघने की जरूरत की शुरुआत
फल दिमाग:
मेहनत और कमाई से जुड़ने का परिणाम
कंपित पत्ते वाणी:
मौन का सतत वर्तमान ।
होगा यहां तक / मौत का अखण्ड साम्राज्य
क्या फर्क पडता है
जब कि यह साफ-साफ देखा जा सकता है
कि काल किस तरह / बनता है पेड़
और उसमें बहती है किस तरह
रसंधार बन कर / खुद को जन्म देने की समझ।
राम रहित मानस
राम ! तुम तो थे सूर्यवंशी
और यह हिंदोस्तान
तुम्हारे केन्द्र के इर्द गिर्द घूमती / धरती के
एक महाद्वीप का छोटा-सा हिस्सा ।।
धरती याती निति में छिटका एक ग्रह
और हम तुम
पडियों में मशीन की तरह चार्ज हुए
वक्त से कटे | आधुनिक मनुष्य ।
85.

हमारी फैक्ट्रियां हमे "किरणों की चादर के भीतर "धुआं-धुंआं करती हुई। हमारे ठेकों पर चढे जगल सरकारी पन्नों पर / हमारी मृत्यु के बाद वानस्पतिक औषधियों के अक्षर लिखते हुए। हमारी सास्कृतिक संस्थाएं जिस्म से लेकर चेतना तक -सीता वनवास से लेकर विचारधारा तक आमरण अनशन करती हुई। और राम ! तुम से पाई युगों-युगों मे जो सांत्वनाएं -अहसान से दबी हुई अहिल्याएं उनकी आवाज / मशीन की घिरं-घिर में मौन हो कैसे सुनें? अनाज की ज्यादा कीमत के लिए -संघर्ष करते माहौल मे राक्षसों की बजाए / जिमींदारों और अफसरों से भूमिहीन किसान / लोहा कैसे लें? कालिजों से पढ़-पढ़ कर निकले / नौजवान यूनिवसिटियों के ज्ञान को तरकस कैसे भरें? / लव कुश की मानिंद तुम्हारी सत्ता के यथास्थितिवाद को / कैसे चुनौतें ? यह बीसवी सदी है आज आदमी नहीं संकल्प-विकल्प / श्रद्धा-प्रथद्धा | प्रेम-आंतक और इच्छा-भय जैसे जोडे उम्र भर जूझने / उतरते हैं मैदानों में । परिवार और राजनीति में निजी और अन्तर्राष्ट्रीय में -86

एक लगातार फैलाव मिलता है | जोड़ नहीं।
ऊपर से राम ! तुम्हारी कथा आज
उपन्यासों, पटकथानों और अनुवादों का विषय है
बकौल आलोचकों के / तुलसी की प्रतिभा के राकेट
तुम्हारे खानदानी सूर्य की हद से परे
और बड़े सूर्यों की तलाश में निकले हैं
मगर ये सब भी
हमारे व्यंग्य बोध का हिस्सा हैं।
इसलिए राम!
हमे राम रहित मानस के दर्शन कराओ
हमारे संघर्ष को
-संदेह और आस्था की जकडनो से परे
थोड़ा सहज और मानवीय वनाओ।
हमें
हम तक आने के लिए
आजाद छोड़ दो
हे राम!
महज एडवेंचर के लिए
आपको क्या तकलीफ है | अगर इस वक्त मैं पौनक में हूं।
जानते हो / मेरे शहर की रामलीला की कमेटी
मेरे बारे मे बेहिचक यह ऐलान करती है
कि मैं एक ही वक्त / लहरिया पनवाड़ी भी होता हूं.
और सत्यवादी हरिश्चन्द्र भी।
फिलहाल तो नेपथ्य मे ही हूँ मैं
और फिर यहां एक खुला मैदान भी है एडवेंचर के लिए
तो क्या बुराई है | अगर मैं यह मान लू
कि मैं महज नाटक करता हूं
8.

और अपने दराजवन्द वक्तव्यो को बना देता हूं सपोलिये अलादीन को खुश-गवार पिटारियां । कचौड़ियों की गंध कीट खाकर / मैंने अक्सर महसूस किया है कि अब गले में फंदे की जगह / ट्राफी बांध लेनी बेहतर होगी क्योंकि दुर्घटनाओं की रिहर्सल बार-बार करना भी एक खतरनाक संभावना ही है। वे हिसाब उत्तेजना के बीच / आज मुझे अपने नाटक का पर्दाफाश करना है पिछले कुछ दिनों से मेरे रोमकूपों और नाखूनों के बीच रेंगने लगी है / कोई नामालूम खारिश और मेरे व्यक्तित्व पर हावी होने लगे है चीड़ के पत्तों नुमा आदिम कपड़े। आज मुझे अपना हिसाब चुकता करना है किरमिची जूतों से / जो बेहद कमजोर हो चुके हैं गारा रोदते तलवों की तुलना मे और उन हाथी दातो से / जिन से खाया खाना हमेशा मेरे पेट में मरोड़ बन कर उठता रहा है | रह-रह कर ! शायद वे जानते नहीं / कि अभिनय करने से पहले भी आदमी को तय करना पड़ता है मीना बाजार से लेकर प्रसूतिगृह तक का सफर और जिसे खत्म हुआ मान लेते हैं वे चाय की प्याली के होठों तक पहुचने के साथ ही । मेरा आज का नाटक / ऐतिहासिक निरर्थकता का नाटक है जिस में हर आदमी कमेटी के रजिस्टरों में दर्ज हो जाने के बाद खो बैठता है अपनी ऐतिहासिकता को और छिपाने के लिये इसी बात को पूरे जोर से पीटता है ढिंढोरा इतिहास का अपने रसोईघर के वर्तनो को खडका कर / और खोल कर , काश्मीरी टोपी के नीचे छिपी तीसरी आंख / बताता है मेरे बाप ने छह औरतों मे पैदा किये थे तेरह बच्चे मेरी किसी मे गिनती नहीं / सामंतीय भूल मेरे बाप की करती है वदनाम मेरी बहनो को जो रोते हुए चुपचाप जिलाती है मुझे सौगंध अपने गोश्त की | वदल डालती हैं मुझे | घरेलू फुसफुसाहटों में ।

ऐसे नाटक मुझे आजकल लिए जा रहे हैं | अभिनय के नये आकाशों में नचाते हैं नाच / ईडिपस से लेकर मंथरा तक बनाते हैं भंगिमाएं / कई-कई सदियों के तनाव को बदल डालते हैं हर नये मौसम के साथ / मेरे कपड़े, चेहरे, पत्ते में उभारते हैं हर रात पतले कागज की पीठ पर / सामने का उजला छापा दिन भर मेरा अनुत्तरित रहना । इसी से घबरा कर/ अपने व्यवहार को बदल जाने देता हूं उस मोमी कागज की चालाकियों में जो इतिहाम के फटे सैरन्ध्री पन्नों का छापा उतार लाता है अपने आप में | बिना इतिहास होने का खतरा उठाए । इस नाटक में | जिस्म की स्टेज पर खड़ा हो बेचता हूं प्रश्नों का कोढ़ लगाता हूँ फेरी / घंसी आंखों की अधूरी गलियों में अपने नाखूनों को दांतों से काटते है / मेरे अंगुली पात्र पैन झटक कर दीवार लाल पीली करते हैं / मेरे हाय पान 'दिमाग को कोल्ड स्टोर में बन्द कर धड़कते हैं | मेरे हृदय पात्र इतनी दैहिकता दर्शकों को वदल देती है | स्वप्नदर्शी ऋषियों में और बदले मे ये ऋपि दिखाई देते हैं सनहरे पैवंद सी पत्तियों का पुननिर्माण करते सतयुगी जनेऊ को बिजली के तीन तार बनाते अखबारों में अपनी मांस भूल / साधकों की तरह चित्त लेट शावर सेते और सभ्य आधुनिकों की तरह / बेडटी में उबलती मानिग वॉक की चुस्कियां लेते। ये सभी ऋपि / मेरे नाटक देखने का जुर्माना अदा करते हैं और अपने हमशक्लों को कभी विद्वपक बना डालते हैं | कभी मठाधीश । इस तरह मेरे इन नाटकों में / कई पीढ़ियां प्पयंता से लेपार आतंक तक का सफर तय करती है और अपने माहौल को बदल डालने से पहले गतिरोध के बीच / एक नये आदमी के जन्म लेने का इन्तजार करती हैं। इस तरह दर्शकों के मनोरंजन का इन्तजाम फरसा माटपकार अनुत्तरित खड़ा दिखाई देता है जिस पर करणा से भर कर उसके दर्शक उसे कभी सूंटियों पर टाग लेते हैं / कमी कन्धो पर उठा कर भी आभारी होते है गयोंकि इस रो राप्ति होती है। उसे एवंचर के भाव को। 89 कर

'खातों में जमा भविष्य
उन युवको के पास थे असन्तुष्ट शब्द ।
अपने आपको सुनाने की गरज से
वे जोर से चिल्लाए
हमे नेतृत्व दो / शस्त्र दो / शब्द दो।
इसके बाद वे भविष्य की बजाए
वर्तमान में व्याज देने वाले
बैंक की खोज में निकले।
मंच के लाऊड स्पीकर को
बंदूक समझ / छीन साए
और फिर अपने भविष्य को
बैंक में पास बुक में जमा करवा कर
सुश-खुश वापिस लौट आए।
कुछ इस तरह / मा-बाप ने
अपने लाडले बच्चों को / पास वुक बनते हुए देखा ।
उधर अपनी पार्टी की ताकत के सहारे
बैक के लॉकर से
बटोर कर ले गये नेता / कुछ थोड़े से शब्द
नोट शब्द | सिक्के शब्द | मत शब्द ।
"भविष्य को अपने ही खातों में जमा समझ कर
परीक्षाओं मे / फेल होती रही पास'बुकें
नौकरियों की भीड़भाड से
बचबचा कर लोटती रही पास बुके
लगातार बिना वसूली के
लौट कर आते रहे | उनके चक ।
हिंदोस्तान के खजाची की मर्जी
"वेचारी पास बुकें आखिर करें तो क्या करें?
शब्द उन्हें अन्धेरे मे ले गये
शस्त्र गुमराह कर गए
90

राह चलते नेताओं ने अटक कर छुड़ा लीं/ अपनी मोटी उंगलिया उनकी नन्हीं-नन्ही मुट्ठियों से । पास बुकों की स्याही फैलती रही उनके गज-गज आसुओं से। अव वे लगातार खोज रहे हैं | बडी-बड़ी किताबें । लास किताब से ऊब जाते हैं तो ग्रंथ को सिर पर उठा लेते हैं। सर्वोदयी उपवास के दिन लद जाने पर मात्मघात को बलिदान का नाम देते हैं। पर नाम तो नाम हैं| महज शब्द पासबुकों से छिटक क्या गए उल्टे और पवित्र हो गए ! वे अब बड़ी शिद्दत और गरिमा के साथ हर रोज दोहराते हैं अपनी प्रार्थना चीखते और चिल्लाते हुए- वे शब्द | जिनकी पवित्रता शस्त्र से खंडित नहीं होती जिन की खुदाई ऐरे गैरे नेताओं की वजह से भी आदमीयत में स्खलित नहीं होती वही कठोर भावहीन क्रूर शब्द हमे मन्त्र की तरह मिलें शस्त्र की तरह तोड़ें नेता की तरह मारें। हम तैयार हैं भाषा का सम्मोहन हम पर / आज भी सवार है । 8 जनवरी, 1985 की ठंडी रात में धर्म निरपेक्षता अभी-अभी खिच गई है एक स्याह लकीर अधेरे की / आकाश में । माठ जनवरी उन्नीस सौ पचासी का सूरज 'ढल गया है सरकार का हुक्म मान कर / बंद हो गया है यातायात लेकिन कामकाज कहां रुकता है ? 91 न सही बसें | आते जाते हुए ट्रक बोरियों के ऊपर तिरपाल की तरह / बिछाने की फिराक में है. जिदा यात्रियों की पति | खीसें निपोर कर ड्राइवर ट्रकों के / भरते हुए बसों के किराए अपनी खीसों में धकेल कर चला रहे हैं / जाम हुए धंध लोगों के । और उस वक्त जब एक घना अंधेरा लगातार होता हुआ गाढ़ा/ हिलने डुलने लगा हो क्रमशः सडक और फिर ट्रक की शक्ल मे तीखी जीरो डिग्री से नीचे की ठंड दांतों से उतर कर झुरझुराती देहों में करने लगी हो अवैध यात्राएं ट्रक के खुले पिछवाडे के यात्रियों मे जगता है अध्यात्म | तब । विरल हो जाता है आतक / संभावना अपनी हत्या की स्मृतियों से होने लगती है अनुपस्थित । ठंड को मिलता है एक मौका चुराया हुआ टक के खुले पिछवाड़े मे खुल कर गला रेतती हैं तीखी बर्फानी कटारें नहीं, ये छह इंच की भी नहीं और इन्हें ले जाने की कही मनाही भी नहीं फिर भी इस कदर तीखी है इनकी चुभन कि इनसे बचने की कोशिश / एक तरह के समाजवाद को जन्म देती है ठंड की वजह से एक पूरी व्यवस्था बदल जाती है। एक दूसरे में इस तरह घुसे जाते हैं हम सभी कि पता ही नहीं चलता कि मेरी बाह है यह या टाग है उसको छाती है उसकी या मेरी नर्म हुई कुहनी उमके शाल की गर्मी है यह / या उस पर ओढ़ाए गए मेरे कोट की. उधर फर्श पे बिछा है मेरा जिस्म / या मेरी टांगों में छिपी हैं इधर / किसी और की मांसपेशियों गुदाज । 92 अजब माहौल यह धर्मनिरपेक्षता का है। ट्रक इस बंद फर्श पर कुछ समझ नहीं आता यह किसका खुला घर उठा है ? देह को समर्पित करके ठड को यह कोन आतंक से ऊपर उठा है ? सोया है धर्म के अंधेरे फर्श पर या प्रजातंत्र के ठंडे शोर मे जगा है ? आदिम भूल हाकिम ने आग से कहा रियाया को सुलाए रखने की तरकीय वता आसान-सी एक तरकीब आग ने सुझाई सोए हुओ के घरों में जाकर आग कूड़ा कर्कट जला आई। उस दिन के बाद से / रिमाया मे नीद धर्म की तरह फैलने लगी। धीरे-धीरे हाकिम के इशारों पर कूडा कर्कट के साथ-साथ / जलने लगे लोगों के घर किस्मत या देवता का नाम लेकर बैठ गए लोग मन मसोस कर । हाकिम ने भी धर्म की लगाम पकड़ ली सोए हुओं को सुलाए रखने के लिए / उद्घोप हुआ- सभी कोशिश कर के देखें जागने का सपना रिहर्सल करें। शायद एक दिन नीद टूट ही जाए । लेकिन अफसोस ! सचमुच ही जग गए कुछ लोग भयानक आग की जीम से / लार की तरह टपक निकले और अपने पसीने को बना कर अपना हथियार निकल लिए / आग को ही बुझाने की खातिर ।

लेकिन सगी हुई आग को बुझे ?. वह आग आज / घर को हो कूड़ा कर्कट ममम लेने को आदिम भूल का / हाकिम से हिसाब मांगती है। अब न मिले जवाय / तो यह क्या करे / कैसे बुझे? कालिय मर्दन मे ऊपर कभी-कभी क्यों सूझती है जमीन की मिल्कियत से ऊपर उठे आकाश को घरती पर उगे पेडी के पिरों पर टप-टप् वरमने की बात? मिति प्रेम के लम्हो में बिखर जाती है फूल पत्तिया / अस्पष्ट शब्दों मी भाईचारे की पीडा से / नीले पड़ जाते हैं यादल कापते हैं मिट्टी के प्यासे पपड़ाए होंठ जूझने की उकसाहट से भरे | इस प्रेम के बुलावे पर उठ कर खड़े हो जाते हैं / समूहों के समूह इन्द्र की टक्कर के ग्वाले सब की पुतलियों में / सांवरी चेतना वाले कृष्ण पलको के पीले वस्त्र पहने | करते हैं नृत्य राधा के मन मंदर से लेकर / कालिय मर्दन तक यमुना किनारे की घास जैसे बालों को छू कर उन नये नवेले ग्वालों की पलको के बह निकलती है जन रक्षा की एक नदी। मिल्कियत से ऊपर उठे प्रेम के जन्मदिन पर गोया पल भर मे | भोग ली जाती है-एक सदी। 0 रास लीला धुंध की तरह मूडी धूप के कोट-सी गुनगुनी वेलों पर / फूलो के टागती हुई मिनी स्कर्ट से कुछ 194 झलकती है जो आसपास क्या तुम्हारी ही उपस्थिति है ? मुझे साधक बनाती है- सिमट कर / टांग पर टांग रख / खड़ा होता हूं पेड़ की सी मुद्राएं बनाता हूं लेकिन मेरे पत्ते-पत्ते को छुते हुए तुम धुंध बन कर / समेट लोगे / पूरे शहर को अपनी बाहों मे यह मैंने कब चाहा था? शायद यह तुम नही हो तुम्हें छूने की बेहिसाब आकांक्षा मेरी साकार होती हुई धुंध में फैल गई है-इस पूरे शहर में। तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारे स्पर्श का / रचाने लगी है स्वांग झूठ मूठ का एक सचमुच रास। कुछ चित्र कविताएं (1) सूरज भट्ठी में तपता हुआ तांबे और पीतल को मिश्र धातु का एक थाल । (2) चांद कहीं-कही से काले धब्बो वाली एक तश्तरी कलई करवाने के बाद ट्यूब लाइट में रख दी गई। (4) अन्तर्राज्यीय चौराहे गांव के सीमात पर झोपड़ियां परदेसी मजदूरों की: अन्धेरे में पुटी इच्छाएं सुनहरे भविष्य की। (5) झाड़ झंखाड़ थामने आकाश को उठे ऊपर को / झाड़ तार-तार 9A ज्यों थामने धर्म को निकल पुदी राजनीति र जत्थम, जया / धुओं धुआ. (6) आत्मा मेरे शहर को. शहर के बीचों बीच बीहड़ बीहड़ के बीचों बीच घर। आतंक का राज्य है. गर्मी की रुत में कैसा जाड़ा उतर आया है । CH पेड़ से झरता हुआ पीला पत्ता लचकदार वस्तु / कठोर काठ छोड़ गई एक बिल बहस वाद / कानून में बदल गया । हर रोमकूप-एक ओंठ सोने के पानी का / लेप कराने की इच्छा को पीकर सूख गया / पड़ गया वो पीला / सोने जैसा इच्छा पूरी करने की कैसी ये तरकीब निकाली। युग वदला साथ-साथ / बदल गया मूल्य परोपकार का ‘फल की खातिर मीठा रस / बना-बना कर उकताया चक्त से पहले हो गया रिटायर / कितनी देर और जीएगा क्या भरोसा! 'पुरानी चीजें पुरानी तो होती हैं | अपनी भी कितनी लगती हैं नोकदार मुगलिया जूतों की तरह ऊपर को मरोड़कर पतली की गई मूर्छ आज कुछ और भी अकड़ी हैं बुढापे में आत्मसम्मान की तख्ती उठाए हैं। उडती हुई धूल धीरे-धीरे / सब और जमती जाती है हड़ताल पर है धरती की धूल / उसके प्रतिनिधि 'पत्ते को चटाई पर | जमकर बैठे देते हैं धरना कोई । कवि भी क्या करे पेड के आतरिक मसले में हस्तक्षेप कैसे करे ? हा, चरमरा कर टूट जाएं / सूख कर पीले पत्ते तो उन्हें नाम देकर क्राति का / हो सके तो छुट्टी पाए । 96

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विनोद शाही-जन्म : चरखी दादरी (हरियाणा), 1 जनवरी, 1955 .शिक्षा: पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला तथा गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से एम ए हिन्दी एवं अंग्रेजी तथा पी-एच. डी.; आवकारी एवं कर निरीक्षक, डी. ए. वी. कॉलज, जालन्धर मे प्राध्यापक और अब राजकीय महाग्द्यिालय होशियारपुर के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में प्राध्यापन । साहिरियफ सरगर्मियां : कविता : 'शिविर' व 'अणु से ईयर तक' का संपादन व इन में कवि रूप में संकलित । दो सौ से अधिक कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा दूर- दर्शन व रेडियो से प्रसारित । कहानी संग्रह : धवण- कुमार की खोपड़ी। नाटक : मूठपुराण (प्रकाशित, मंचित एवं दूरदर्शन से प्रसारित); आओ, भगवान बनाएं जुआखाना, लीलाधर, मायानगरी तथा सभी लड़ाई जो करें (प्रकाश्य) उपन्यास : युयुत्सु के बाद (प्रकाश्य); शोध : हिन्दी काव्य-नाटकों में परम्परा 4 भाधुनिकता ; संपादन : सौरभ (लघुपत्रिका) तथा रंगकर्म ।

Naye Aadami Ka Janma

Author
Vinod Shahi
Title
Naye Aadami Ka Janma
File name
Naye Aadami Ka Janma
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2011/03
Publisher
Bharat Bhushan Bharti Jalandhar
Language
Sanskrit
Pages
106
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551617
Barcode
4990010032340.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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