Hindi Sahataya Samalayan
Padaya Parijat(41)
Front matter
पद्य-पारिजात
[सूरदास से लेकर आधुनिक काल तक की नवीन चुनी
हुई कविताओं का संग्रह]
सम्पादक
श्रीप्रफुल्लचन्द्र ओझा "मुक्त"
प्रकाशक
ओझा बन्धु आश्रम, इलाहाबाद
पहलीबार, एक हजार
मुद्रक
बाबू विश्वम्भरनाथ भार्गव, स्टैन्डर्ड प्रेस, इलाहाबाद ।
मई, १६३०
पद्य-पारिजात
तुलसीदास
(सन्त-असजन बन्दना)
बन्दउँ सन्त समानचित, हित अनहित नहिं कोउ।
अंजलिगत सुभ तुमनजिमि, लम सुगन्ध कर दोउ ।।
संत सरलचित जगतहित, जानि सुभाउ सनेहु ।
वाल विनय सुनि करि कृपा, रामचरन रति देहु ॥
बहुरि बन्दि खलगन सतिभाये । जे बिनु काज दाहिनेहु बायें।
परहित-हानि-लाभ-जिन केरे। उजरे हरष विषाद बसेरे ॥
तुलसीदास कहते हैं-समान हृदयवाले सन्तों की मैं वन्दना करता
जिनका न कोई मित्र है और न कोई शत्रु । जिस प्रकार, अञ्जलि में
रक्खा हुआ फूल, समान रूप से दोनों हाथों को सुगन्धित कर देता है।
सज्जनों का चित्त सरल होता है, वे जगत के हितैपी होते हैं, मेरा स्वाभा-
विक स्नेह जानकर, मेरी यह बालविनय सुनकर और मुझ पर कृपा
करके वे रामचन्द्र के चरणों की भक्ति मुझे दें।
बहुरि= पुनः । बन्दि = वन्दना करके, प्रणाम करके । सतिभाये:
सच्चे हृदय से। दाहिनेउ बायें - दुहने-बाएँ, प्रसन्न अप्रसन्न। दूसरे के
हित की हानि अर्थात् अहित ही जिनका लाभ है और किसीके उजड़ने पर
जिन्हें हर्ष और क्सने पर विषाद होता है।
.
॥ ( २ ) हरिहर जस राकेस राहु से । पर अकाज भट सहसबाहु से ।। जे परदोष लखहिं सहसाखी । परहित-घृत जिनके मन माखी। तेज कृशानु रोष महिषेला । अध-अवगुन-धन-धनी धनेसा॥ उदयकेतु सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नोके ।। पर अकाजुलगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम-उपल कृषीदलिगरहीं बंदउँ खल जस शेष सरोषा । सहस बदन बरनइ परदोषा ॥ पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अध सुनइ सहसदसकाना । बहुरि सक्र सम बिनधई तेही। संतत सुरानीक हित जेही ॥ वचन बज जेहि सदा पियारा । सहस नयन परदोष निहारा ।। -- विष्णु और शिव के यश रूपी चन्द्रमा के लिए जोराहु के समान हैं और दूसरों का काम बिगाड़ने में जो सहस हाथोंवाले -महा शक्तिशाली हो जाते हैं, जो सहस्रों आँखों से दूसरों का दोष निहारते हैं और दूसरों के हितरूपी वी में जिनका मन मक्खी के समान पड़ जाता है, जिनका तेज अाग के समान और क्रोध महिषासुर के समान है, पापों और दुर्गुणों के धन से जो कुबेर के समान धनी हैं, जिनका उदय सब लोगों के लिए केतु के समान है और जो कुम्भकर्ण के समान सोते हुए ही अच्छे हैं, दूसरों के अहित के लिए जो शरीर छोड़ देते हैं -जैसे, ओले खेती को नष्ट करके स्वयं भी गल जाते हैं, क्रुद्ध शेषनाग के समान वैसे दुष्टों की मैं बन्दना करता हूँ, जा सहसों मुंह से दूसरे का दोप वर्णन करते हैं । पुनः पृथुराज के समान उन लोगों को प्रणाम करता हूँ जो दस सहसू कानों से दूसरों का दोष सुनते हैं। पुनः इन्द्र के समान उन्हीं की मैं बन्दना करता हूँ जिन्हें देव- ताओं की सेना प्रिय है (अथवा, अच्छी शराब प्यारी है)। वजू के समान (कठोर) बचन जिन्हें सदा प्रिय मालूम होते हैं और जो हज़ार आँखों से दूसरों का दोष देखा करते हैं।
( ३ ) उदासीन-अरि-मीत-हित, सुनत जरहिं खल-रीति । जानि पानि जुग जोरि जनु, बिनती करउँ सप्रीति ॥ मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥ वायस पालिय अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा । बन्दउँ सन्त असजन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दारुन दुख देहीं । उपजहिं एक संग जगमाहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहों। सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ।। भल अनमल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक विभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू ! गरल अनल कलिमल सरि व्याधू॥ गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ।। यह दुष्टों की रीति है कि वे उदासीन, शत्रु और मित्र सभी का हित देखकर जल उठते हैं। यह जानकर, दोनों हाथ जोड़कर प्रीतिपूर्वक मैं उनकी बिनती करता हूँ। मैंने तो अपनी ओर से विनती कर ली; पर, वे अपनी ओर से न चूकेंगे । कौवा यदि बड़े प्यार से भी पाला जाय तो क्या वह मांस खाना छोड़ देगा ? सन्त और असजन दोनों ही के चरणों की मैं बन्दना करता । ये दोनों ही दुखप्रद हैं पर इनमें कुछ भेद है, जिसका वर्णन मैं करता हूँ। एक तो विछुड़ते हुए प्राण ले लेते हैं-अर्थात् उनके छूट जाने पर प्राणान्तक पीड़ा होती है; और दूसरे मिल कर दारुण दुख देते हैं । दोनों संसार में एक साथ ही उत्पन्न होते हैं, किन्तु गुणों में कमल और जोंक के समान अलग अलग हो जाते हैं । सन्त और असजन दोनों अमृत और शराब के समान हैं, जिन्हें उत्पन्न करनेवाला एक ही अगाध संसार समुद्र है। भले और बुरे अपनी ही करनी से सुयश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं । साधु लोग, अमृत, चन्द्रमा और गंगा जी के समान हैं, तथा असाधु विप, अग्नि और कर्मनाशा नदी के समान हैं । गुण और अवगुण को सभी जानते हैं, लेकिन जो जिसे अच्छा लगता है, वही उसके लिये भला है। . , - भलो भलाई पै रूहइ सुधा सराहिय अमरता लहइ निचाई नोच। गरल सराहिय मीच ।। . (वासस्थान निर्देश) पूछेहु मोहिं कि रहउँ कहँ , मैं पूछन सकुचाउँ। जहँ र होहु तहँ देहुँ कहि , तुम्हहिं देखावउँ ठाउँ । सुनि मुनि वचन प्रेमरस लाने । सकुचि राम मनमहँ मुसुकाने ॥ बाल्मीकि हँसि कहहिँ बहोरी । बानी मधुर श्रमिय रस बोरो॥ सुनहु राम अब कहहुँ निकेता । अहाँ बसहु सिय लषन समेता॥ जिन्हके नवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभाष लरि नाना ।। सरहिं निरन्तर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृहसरे ॥ लोचन बातक जिन्ह करि राषे । रहहिं दरस जलधर अभिलापे ॥ निदरहिं सरित सिन्धु सरभारी। रूप बिन्दु जल होहिं सुखारी॥ तिन्हके हृदय सदन सुखदायक । बसहु बंधु सिय सद रघुनायक ॥ भलों को भलाई अच्छी मालूम पड़ती है और नीचों को बुराई । अमृत की प्रशंसा अमर कर देने की है और विर की मार डालने की। सकुचाउँ =संकुचित होता, डरता हूँ। ठाउँ - स्थान, जगह । बहोरी पुनः। अभिय= अमृत । बोरी=दुबा कर । निकेता = घर, रहने की जगह । स्त्रवन = कान । सुभग :- सुन्दर, पवित्र । सरि= नदी । नाना=अनेक । निरन्तर = हमेशा तुम्हकहुँ = तुम्हारे लिए । रूरे = सुन्दर । चातक - एक पती, जिसकी प्यास स्वाती के बूंद के सिवा और किसी जल से नहीं मिटती और स्वाती के जल की आशा में जो साल भर तक मुँह बाये बैठा रहता है। दरस-जलधर = दर्शनरूपी मेघ । निदरहि =निरादर करते, तिरस्कार करते हैं। सरित =नदी । सिन्धु - समुद्र । सर= तालाब । रूप-बिन्दुजल = तुम्हारे रूप के एक बूंद जल से। सदन = घर । सह = सहित ।
( ५ ) जस तुम्हार मानल विमल , हंसिनि जीहा जासु मुकताहल गुनगन चुन , राम बसहु मन ताम्॥ प्रभुप्रसाद सुचि सुभग सुवासा । सादर जानु लाइ नितनासा ।। तुम्हहिं निवेदित भोजन करहीं। प्रम प्रलाद पटु भूषन धरहीं। सीसनवहि तुर-गुरु-द्विजदेखी। प्रीतिला तकरिविनयविसेखी ॥ कर नित करहिं रामपद् पूजा ! राम भरोस हृदय नहिं दुजा ! चरन राम तीरथ चलि जाहीं । राम बसहु तिन्ह के मनमाहीं॥ मंत्रराजु नित जपहि तुम्हारा । पूर्जाहं तुम्हहिं सहित परिवारा॥ तरपन होम करहिं विधि नाना। विप्र वाइ दहिं बहु दाना ।। तुम्हते अधिक गुरुहिं जिय जानी । सकल भायसेवहिं सनमानी ।। एकु फलु, रामचरन रति होउ । तिन्ह के मन मन्दिर बसहु, सिय रघुनन्दन दोउ । काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ।। । । सबुकर माँगहि , । . । % 3D जस= यश, कीर्ति । मानस-मानसरोवर। विमला = पवित्र । जीहा = जिह्वा, जीभ । जासु=जिसकी । सुचि= शुद्ध । सुभग = सुन्दर । सुवासा=सुगन्धित । लहइ-ग्रहण करना, सूचना । नासा नाक । निवेदितु = निवेदन किया हुश्रा, पहले तुम्हें खिलाया हुअा। पटु-भूषण = कपड़े और गहने । सीस =सिर । नवहि = नवाते, झुकाते हैं। सुर = देवता । गुरु= प्राचार्य । द्विज ब्राह्मण । विसेखी-विशेष, अधिक । कर हाथ । रामपद = रामचन्द्र के पैरों की। भरोस = भरोसा, श्राशा ! दूजा- दूसरा । राम-तीरथ = रामचन्द्र जी का तीर्थ, अयोध्या । माहीं मध्य में । मंत्रराजु-मंत्रों का राजा, रामनाम का मंत्र। तर्पण होम-हवन। विधिनाना अनेक प्रकार से। जेवाइ - भोजन कराके। जिय -हृदय में। भाय प्रकार, तरह । मनमानी = सम्मान, श्रादरपूर्वक । सबु कर =सभी का। दोउदोनों। काम = विषय वासना । कोह-क्रोध। लोभ = आकांक्षा । मोह =ममता, माया %D . ॥ % 3D D . ।
॥ ( ६ ) जिन्हके कपट दंभ नहि माया ! तिन्हके हृदय बसहु रघुराया ॥ सबके प्रिय सबके हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारो॥ कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी । जागत सोवत सग्न तुम्हारी ॥ तुम्हहि छाँड़ि गति दूसर नाहीं । राम बसहु तिन्हके मनमाहीं ।। जननो सम जानहिं परनारी। धनु पराव विषते विष भारी जे हर्षहिं पर सम्पति देखी। दुखी होहिं पर विपति विसेखी ॥ जिन्हहिं राम तुम्ह प्रान पियारे । तिन्हके मन सुभ लदन तुम्हारे। स्वामि सखा पितु मातु गुरु, जिन्हके सब तुम तात । मन मन्दिर तिन्ह के बसहु. सीय सहित दोउ भ्रात ॥ अवगुन तजि सब के गुन गहहीं । विप्र-धेनुहित संकट सहहीं। नीति निपुन जिन्हकहँ जग लीका। घर तुम्हार तिन्हकर मनुनीका॥ गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥ राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित वैदेही । जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥ सब तजि रहहिं तुम्हहिं उरलाई । तेहिके हृदय रहहु रघुराई ॥ सरगु नरकु अपवरगु समाना । जहँ जहँ देख धरे धनुबाना ॥ करम-बचन-मन राउर चेरा । राम करहु तेहि के उर डेरा ॥ । । छोभ = क्षोभ, दुःख । राग = अनुराग, प्रेम ! द्रोह =द्रोह, शत्रु ता । अभिमान । माया-पाखण्ड। सरिस-समान। गारी गाली। गति =उपाय, अवलम्ब । धनु - धन, सम्पत्ति । पराव = पराया, दूसरे का । विसेखी- विशेष, अधिक । सखा = मित्र । अवगुन =बुराई । गहहीं-ग्रहण करते हैं। सहहीं = सहन करते, भोगते हैं। जिन्हकर = जिनके लिए । लीका रेखा, चिन्ह । मनु = मन, हृदय । भरोसा=आसरा । जेही जिसे । अपवर्ग-मुक्ति । राउर = श्रापका । चेरा-भक्त, दास । डेरा - वास । .
( ७ ) जाहि न चाहिय कवहुँ कछु, तुम्ह सन सहज सनेह । बसहु निरंतर तासु मन, लो राउर निज-गेह ॥ अनुसूया की सीख) मातु-पिता भ्राता हितकारी । मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥ अमित दानि भर्ता वैदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥ धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपदकाल परषियहि चारी ॥ वृद्ध रोगबस जड़ धन हीना । अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥ सेहु पति कर किय अपमाना । नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥ एकइ धरम एक व्रत नेमा । काय वचन मन पति पद प्रेमा । जग पतिव्रता चारि विधि अहहीं। वेद पुरान संत सब कहहीं । उत्तम मध्यम नीच लघु, सकल कहउँ समुझाइ । आगे सुनहिं ते भव तरहिं, सुनहु सीय चित लाइ ॥ उत्तम के अस बल मन माहीं । सपनेहुँ बान पुरुष जग नाहीं ॥ मध्यम परपति देखइ कैसे। भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ॥ धरम विचारिसमुझिकुल रहई। लो निकृष्ट तिय स्रति अस कहई। बिनु अवसर भय ते रह जोई । जानेहु अधम नारि जग साई ॥ %3- सहज = स्वाभाविक । निज= अपना। गेहघर । मितप्रद =थोड़ा देनेवाला। अमित = जिसका परिमाण न हो, बहुत अधिक । दानि =दान देने वाला । सेव = सेवा । तेही-उसे। परषियहि- परखी जाती, परीक्षा की जाती है । जड़ मूर्ख, बुधू । दीन-दरिद्र, गरीब किय =करने से। काय =शरीर । अहहीं हैं। लघु = हलकी, निकृष्ट । भव = संसार । अस = ऐसा । बस = बसता है। आन = दूसरा । परपति दूसरे का पति । विचारि= सोचकर, जान- कर । अस =ऐसा। कहई= कहती है। बिनु अवसरमौका न मिलने के कारण । भयते- डर से । रह = रहती है। जोई =जो। साई =वही।
॥ पतिवंचक परपति रति करई। रौरव नरक कलप-सत परई॥ छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी। बिनु स्त्रम नारि परम गति लहई। पतिव्रत धरम छाडि छल गहई। पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई । विधवा हाइ पाइ तरुनाई ॥ सहज अपाधनि नारि, पति सेवक सुभ गति लहइ। जसु गावति स्तुति चारि, अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय ।। सुनु सीता तव नाम, सुमिरि नारि पतिव्रत करिहि । तोहि प्रान प्रिय राम, कहेउँ कथा संसार हित । (सीता की अग्नि परीक्षा) प्रभु के बचन सीस धरि सीता । बोली मन-क्रम वचन-पुनीता ॥ लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी। . वंचक = ठगनेवाली । परपति = दूसरे पति से । रति = प्रेम । कलप- सत=सौ कल्प; ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं । छन-सुख = क्षणिक सुख । जनम-सत-कोटी = सौ करोड़ जन्मों तक ! खोटी - नीच ! श्रम = परिश्रम, मेहनत । परम गति = वैकुण्ठ । पतिप्रतिकूल = पति से विमुख होकर । तरुनाई यौवन । अपावनि = अपवित्र । तुखसिका = तुलसीदल । हरिहि = विष्णु को । तव= तुम्हारा । सुमिरि = स्मरण करके । सीसधरि विनीत होकर, मानकर । मन क्रम वचन पुनीता= मन, कर्म और वचन से पवित्र । नेगी - पानी, नेग कहते हैं उस दक्षिण को जो विवाह आदि उत्सवों में नाई, ब्राह्मण आदि शुभ कर्म करानेवालों को दी जाती है; ये ही लोग नेगी कहे जाते हैं । पावक-अग्नि । बेगी: शीघ्र ही। an (8) सुनि लछिमन लीता कै बानी । बिरह-बिबेक-धरम-जुति-सानी। लोचन सजल जोरि कर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न अोऊ ।। देषि राम रुष लछिमन धाये। पावक प्रगटि काठ बहु लाये ! पावक प्रबल देषि वैदेही । हृदय हरप कछु भय नहिं तेही ॥ जौ मन वचक्रम मम उरमाहीं। तजि रघुबीर आन गति नाही ।। तो कृसानु सब के गति जाना। मो कहँ होहु श्रिपंड लमाना॥ श्रीपंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रशु मैथिली । जय कोसलेस महेस बंदित-चरनरति अति निर्मली। प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलंक प्रचण्ड पावक महँ जरे। प्रभु चरित काहु न लघे सुरनभ सिद्ध मुनि देवहिं परे। % 3D उसे । मम कै = के । बानी-बचन । जुति- युक्ति । सानी = भरी हुई। सजल =जलयुक्त, भरी हुई । जोरि कर दोऊ =दोनो हाथ जोड़कर । सन-से । अोऊ-वे भी। राम रुख = रामचन्द्रजी का रुख, उनकी इच्छा । धाये-दौड़े। प्रकटि = प्रकट करने, जलाने के लिए । काठ = लकड़ी । प्रबल धधकती हुई। हरप = प्रसन्नता । तेही ............. माही= मेरे हृदय में। तजिरघुबीर = रामचन्द्र के अतिरिक्त, उनके सिवा । धान = दूसरा । गति = उपाय, रास्ता। कृसानुः-- अग्नि । कै-की । जाना =जानते हो। श्रिपंड = चन्दन । मैथिली जानकी ने रामचन्द्र का स्मरण करके चन्दन के समान शीतल अग्नि में प्रवेश किया। उन्होंने कोशल देश के स्वामी की जयजयकार की, जिनके चरणों की वन्दना शिवजी करते हैं और जिनसे किया हुआ प्रेम मनुष्य को निर्मल बना देता है । उस धधकती हुई आग में सीताजी की छाया और लौकिक कलंक जल गये। ग्रोकाश में देवता सिद्ध और मुनिगण खड़े देख रहे थे, लेकिन प्रभु रामचन्द्र की यह लीला कोई न देख सका ।
( १० ) धरि रूप पावक पानिगहि श्रीसत्य स्नु ति जग विदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहिं समी प्रानि सो॥ सो राम बाम विभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव-नोल-नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥ (बरवै) का यूँघट मुख मूंदहु नवला नारि ? चाँद सरग पर सोहत यहि अनुहारि ॥ गरव करहु रघुनंदन जनि मन माँह । देखहु श्रापनि मूरति सिय के छाँह ॥ उठी सखी हँस मिस करि कहि मृदु बैन । सिय रघुबीर के भए उनीदे नैन ॥ । Makan- विरह ागि उर ऊपर जब अधिकाइ । ये अँखियाँ दोउ वैरिनि देहिं बुझाइ ॥ जो श्रुति और लोक में प्रसिद्ध हैं, जो सचमुच ही लक्ष्मी हैं, ‘उन सीताजी का हाथ पकड़ कर-शरीरधारण करके--अग्निदेव ने रामचन्द्रजी को सौंप दिया ; जैसे, क्षीरसागर ने विष्णु को लक्ष्मी समर्पित की थी। वह रामचन्द्र के बाएँ भाग में अत्यन्त सुन्दर शोभित हो रही हैं, मानो, नवीन नील कमल के समीप स्वर्ण की कमल-कली शोभित हो रही हो। नबला= नबेली; युवती । सरग= स्वर्ग; आकाश । यहि = इसी के। अनुहारि =अनुरूप; समान । गरब-गर्व; वमण्ड । मन माह = मन में। मूरति = प्रतिविम्ब; शकल । छाँह = छाया में। मिस = वहाना । बैन = बानी; बात । उनींदे =निद्राहीन; जिनमें नींद न हो। अधिकाइ = अधिक हो जाती है।
( ११ )
डहकु न है उजियरिया निलि नहिं घाम ।
जगत जरत अस लागु मोहिं बिन राम ॥
अब जीवन के है कपि श्रास न कोइ।
कनगुरिया के मुदरी कंकन होइ॥
राम-सुजल कर चहुँ जुग होत प्रचार।
असुरन कहँ लखि लागत जग अँधियार ॥
(पार्वती मंगल)
एक समय हिमवान भवन नारद गए ।
गिरिवर मैना मुदित मुनिहिं पूजत भए ॥
उमहिं बोलि ऋषि-पगन मातु मेलति भइ ।
मुनिमन कीन्ह प्रनाम, बचन श्रासिष दइ ॥
कुवरि लागि पितु काँध ठाढि भइ सोहइ ।
।
डहकु= तड़पना ; जलना । उजियरिया =उजाली । निसि-रात्रि ।
घाम = धूप । जरत = जल रहा है। अस= ऐसा। कनगुरिया = कनिष्ठा,
सब से छोटी उँगली। मुंदरी = अँगूठी । कंकन=हाथ का कड़ा।
अभिप्राय यह है कि इतनी दुर्बल हो गयी हूँ कि छोटी उँगली की
अँगूठी हाथों का कड़ा बन रही है। लखि = देखकर ।
हिमवान =हिमालय पर्वत । गिरिवर-मैना=हिमालय और उनकी
स्त्री मैना। मुदित = प्रसन्न होकर। मुनिहिं = मुनि को । उमहि:
पार्वती । बोलि=बुलाकर । ऋषिपगन = नारद जी के पैरों पर ।
मेलन = मिलाना। पगन मेलत भई = पैरों पर गिराया। मुनि......दइ
मुनि ने मन ही मन उसे प्रणाम किया और बचनों से आशीष दिया।
कुँवरिपार्वती। लागि पितु काँध =पिता के कन्धे से लगकर । ठाढ़
भई =खड़ी हुई । सोहइ= शोभित होती है।
१
( १२ ) रूप न जाइ बखानि, जान जोइ जाहइ ॥ अति सनेह सात भाय पाँच परि पुनि पुनि ! कर मैना मृदु वचन "दुनिय विनती, मुनि ! तुम तिभुवन तिहुँ काल विचार विसारद । पारवती-अनुरूप कहिय बर, नारद मुनि कह “नौदह भुवन फिरउँ जग जहँ जहें गिरिवर सुनिय सरहना राउरि तह नह ।। भूरि भाग तुम सरिस कतहुँ कोउ नाहिंन । कछु न अगम; सब सुगम, भयो विधि दाहिन । (जानकी मंगल) गिरि तरु बेलि सरित सर बिपुल विलोकहिं । धावहिं बाल सुभाय विहँग मृग सकहिं । सकुचहि मुनिहि सभोत बहुरि फिार श्रावहि। मतिमाय%3D बखानि = वर्णन किया । जोहइ-हूँढ़ता है । सत्यभाव से। परि= पड़कर। पुनि पुनि = बार बार । कह = कहती है। तिभुवन = तीनों लोक, स्वर्ग-मयं-पाताल । तिहुँकाल = तीनों काल, भूत, वर्तमान और भविष्य । विसारद-जानने वाले ज्ञाता ! अनुरूप = योग्य; लायक । वर = दूल्हा। कह = कहते हैं। सरहना- प्रशंसा; तारीफ़ । राउरि= आपकी । भूरि भाग = बड़े भाग्यवाला। सरिस-समान ! कतहूँ = कहीं। नाहिंन = नहीं है। अगमन जानने योग्य । सुगम = आसानी से जान लेने प्रोग्य । विधि - विधाना, ब्रह्मा । दाहिन = अनुकूल; पक्ष में। गिरि= पर्वत । तरु-वृक्ष । वेलि = लत।। सरित = नदी । सर 3 तालाब । विपुल = बहुत से। विलोकहिँ = देखते हैं । धावहि = दौड़ते हैं। सुभाय = स्वभाव से ही, अकारण । विहँग = पक्षी । बहुरि = पुनः, फिर आवहिं = लौट आते हैं पुनः, फिर तोरि फूलफल किसलय माल बनावहि । देखि विनोद प्रमोद प्रेम कौशिक उर । करत जाहि धन छाँह, सुमन बरषहि सुर ।। करि करि विनय कछुक दिन राखि बरातिन्ह । जनक कीन्ह पहुनई अगनित भाँतिन्ह ॥ प्रात बरात चलिहि सुनि भूपत्ति सामिनि । परि नबिरहबस नींद दीति गइ जामिनि । खरभर नगर, नारि लर विधिहि मनावहिं। बार बार ससुरारि राम जेहि श्रावहि ॥ सकल चलन के साज जनक साजत भए । भाइन सहित राम सब भूष सबन गए । सानु उतारि भारती करहि निछावरि । निरखि निरखि हिय हरहि मूरति साँवरि ॥ माँगउ विदा म तब, सुनि करना भरी । परिहरि सकुन्त सप्रेम पुलकि पायन्ह परी॥ . तोरि= तोड़ कर । किसलय= कोमल पत्ते। कौसिक-वशिष्ट । वन = बादल । छाँह = छाया। बरपहिं = बरसते हैं । सुर= देवता । कछुक दिन = कुछ दिनों तक। वरातिन्ह = बराती, बरयात्री, जो लोग वरपक्ष से बरातों में शामिल होते हैं, उन्हें बरयात्री कहते हैं। पहुनई =अातिथ्य; (पाहुन = अतिथि, आया हुआ)। अगनित भाँतिन्ह अनेक प्रकार से। चलिहि = चलेगी, प्रस्थान करेगी। भूपति भामिनि -जनक की स्त्री, सुनैना । जामिनि = रात्रि। खरभर = खलबली हल- चल । जेहि = जिससे। चलन के साज-प्रस्थान करने की तैयारी साजत भए = की । निछावरि == रुपये-पैले आदि उतारना, न्यौछावर करना । मूरति = मूर्ति, शरीर । साँवरि = साँवली । परिहरि सकुच = संकोच छोड़ कर । पायन्ह = पैरों पर । - - ।
( १४ )
सीय सहित सब सुता सौपि कर जोरहिं ।
बार बार रघुनाथहि निरखि निहोरहि।
तात तजिय जनि छोह मया राखबि मन ।
अनुचर जानव राउ सहित
पुर
परिजन
(गीतावली)
जबहिं रघुपति संग सीय चली।
विकल वियोग लोग पुर तिय कहै अति अन्याउ अली ।।
कोउ कहै मनिगन तजत काँच लगि करत न भूप भली!
कोउ कहै कुल कुबेलि कैकेई दुख विष फलनि फली ॥
एक कहैं बन जोग जानकी विधि बड़ विषम बली!
तुलसी कुलिसहि की कठोरता तेहि दिन दलकि दली॥
Pawan
निहारहि -विनती करती हैं। तजिय जनि =मत छोड़ना । छोह
प्रेम, ममता । मया = माया । अनुचर=सेवक, दास । राउ सहित = राजा
के साथ । पुर परिजन =नगर के लोगों को।
अन्याउ = अन्याय । अली-सखी। लगि=के लिए। कुबेलि
बुरी लता। फली= उत्पन्न किया। बली-बलवान । कुलिस
दलकि-ज़ोर से, बेग से। दली= नष्ट कर दिया।
सूरदास
सोभित कर नवनीत लिये।
घुटुरुवन चलत रेनु तन मंडित मुख में लेप किये ।।
चारु कपोल लोल लोचन छवि गौरोचन को तिलक दिये।
लर लटकन मानो मत्त मक्षुप गन माधुरी मथुर पिये।
कठुला कंउ बज केहरि नख राजत है सखि रुविर हिये।
धन्य 'सूर' एको पल यह सुख कहा भयो सत कल्प जिये !
mananews
मैया कबहिबढ़ेगी चोटी।
कितीवार मोहि दुध पियत भइ यह अजहूँ है छोटो।
| तू जो कहति बल की बेनी ज्यों है है लाँबी मोटी।
काढत गुहत नहावत अोछत नागिन सी वै लोटी॥
%-
नवनीत = माखन । घुटुरुवन = घुटनों से। रेनु = धूल । मंडित=भरा
हुा । लेप किये = लगाए हुए । चारु=सुन्दर । लोल=चंचल । गोरोचन =
गोरोचन, एक सुगन्धित द्रव्य विशेष । लर=गले की माला। मधुप:
भौंरा । कठुला=जो बच्चों के गले में पहनाया जाता है। केहरि
नख = बघनखा। राजत=विराजमान है । रुचिर-सुन्दर। हिये -
हृदय पर । सतकल्प सौ कल्प, एक कल्प ब्रह्मा के एक दिन का
होता है। कितीवार=कितनी देर । अजहूँ अभी भी। बल-बलराम,
कृष्ण के बड़े भाई । काढ़त- कंघी करना। अोछत= कपड़े से पोंछना।
बैं-ज़मीन में।
( १६ )
-
काचो दूध पियावय पचि पचि देत न माखन रोटी।
'सूर' श्याम चिरजीवो छोऊ भैया हरि हलधर की जोटी।
खलन अब मेरी जात बलया।
जबहि मोहि देखन्द लरिकन सँग तह खिमान बल भैया॥
मोसों कहत वात वासुदेव को देवकी
तेरी मैया।
मोल लियो कछु दे वलुदेव को करि करि जतन वटैया ॥
अब बाबा कहि कहत नंद को यनुमति को कहै मया।
ऐसेहि कहि सव मोहि खिझावन वय उठि चलो खिलैया ।
पाछे नन्द सुनत है ठाढ़े हँसत हसत उर लेया।
सूर नन्द बलिरामहि धिरयो सुनि मन हरख कन्हैया ॥
मैया मैं न हों गाइ।
लिगरे ग्वाल घिराक्त मासों मेरे भाई पिराइ ।
जो न पत्याहि पूछ बलदाउहि अपनी खोह दिवाइ॥
मैं पठवति अपने लरिका . श्रावै मन बहराइ।
सूर श्याम मेरो प्रति बालक मारत ताहि रिंगाइ ।।
काचो - कच्चा, बिना गर्म किया हुआ। पचि पचि =ज़िद से,
जबरदस्ती। हरि हलधर = कृष्ण और बलराम । जोटी - जोड़ी।
खिझत =चिढ़ाते हैं। तात = वेटा, पुत्र। कछु दे= कुछ देकर ।
खिलैया=नाराज़ होकर । उरलैया हृदय से लगाकर । धिरयो=
डाँटा, बुरा भला कहा।
सिगरे-सभी । विरावत धेरवाते हैं, रोकने को कहते हैं। पिराइ
दर्द करता है। पत्याहि = विस्वास करो। सौंह = सौगन्ध, शपथ ।
पठवति भेजती हूँ। बहराइ = बहला । मारत ताहि रिंगाइ -चिड़ा
मारते, तंग कर डालते हैं।
( १७ )
ऊधो योग योग हम नाहीं।
अबला लार ज्ञान कहा जाने कैसे ध्यान धराहीं॥
ते ये मूंदन नैन कहत है हरि सूरत जा माहीं ।
ऐसी कथा कपट की मधुकर हमते सुनी न जाहीं ॥
नवन चारि अरु जटा बँधावहु ये दुख कौन समाहीं ।
चन्दन तजि अँग भस्म बतावत विरह अनल अतिदाही ॥
योगी भरमत जेहि लगि भूले सो तो है अपुमाहीं ।
सूरदास ते न्यारे न पल छिन ज्यों घट ते परछाहीं ॥
--
मधुकर इतनी कहियहु जाइ।
अति कृशगात भई ये तुम बिन परम दुखारी गाइ ॥
जल समूह बरसत दोउ आँखें हूँकति लीने नाउँ ।
जहाँ जहाँ गोदोहन कीनों सूंघत सोई ठाउँ ।
परति पछार खाई छिन ही छिन अति आतुर है दीन ।
मानहु सूर काढ़ि डारी है बारि मध्य ते मीन ॥
4
योग
= लायक । सारज्ञान = तत्वज्ञान । ते=वे। जामाहीं = जिसमें
कपट छल । मधुकर = भौंरा । स्त्रवन = कान । समाही= बर्दाश्त करे,
सहे । तजि = छोड़ कर । अनल = आग । दाही-जलाने वाला । भरमत
भटकते फिरते हैं । जेहि लागि जिसके लिए । अपुमाहीं अपने ही
में। न्यारे अलग। घट = वस्तु, शरीर । परछाही = छाया, प्रतिबिम्ब ।
दुर्वल । गात = शरीर । हूँकति =(भाती, डकरती हैं। लीने
= लेने पर । गोदोहन = दूध दुहा है। ठाउँ = जगह । पछार = = मूछित,
बेहोश । आतुर-विह्वल । दीन=विवश । काढ़ि डारी है= निकाल लिया
है । वारि मध्य ते = पानी में से । मीन = मछली।
२
%
3D
( १८ ) प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो। समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो ॥ इक नदिया इक नार कहावत मैलेहि नीर भरो। जब दोनों मिलि एक वरन भए सुरसरि नाम परो। इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परो। पारस गुन अवगुन नहिं चितवै कंचन करत खरो॥ यह माया भमजाल कहावै सूरदास सगरो। अबकी बार मोहि पार उतारो नहिं प्रन जात टरो ॥ mema- चित न धरो-मन में न लाओ, खयाल न करो। समदरसी समान देखने वाला। नदिया = नदी । नार=नाला । मैलेहि = गन्दा ही। नीर =पानी । वरन = वर्ण, रंग । सुरसरि= गंगा । बधिक = कसाई । पारस नाम का पत्थर जो धातुओं को स्पर्श करके सोना बना देता है। चितवैदेखता है। कंचन =सोना । खरो=असली, सच्चा । सगरो -सारा । प्रन - प्रतिज्ञा । टरो-टली । पारस कबीर यह तन विष की बेलरी , गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिल , तो भी सस्ता जान ॥ दुख में सुमिरन सब करे , सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥ कबिरा गर्व न कीजिए , काल गहे कर केस । ना जानौं कित मारिहै , क्या घर क्या परदेस !! हाड़ जरे ज्यों लाकड़ी , केस जरे ज्यों घास । सब जग जरता देखि कर भये कबीर उदास ॥ पानी केरा बुदबुदा , अस मानुष की जात । देखत ही छिप जायगी , ज्यों परभात। पाछे दिन पाछे गये , गुरु से किया न हेत। अब पछतावा क्या करै , चिड़िया चुग गइ खेत ॥ माटी कहै कुम्हार को , तू क्या रूँदै मोहि । इक दिन ऐसा होयगा , मैं ऊँटूगी तोहि॥ या दुनिया में आइ के , छाडि देइ तू ऐंठ॥ लेना है सो लेइ ले , उठी जात है पैठ ॥ इक दिन ऐसा होयगा , कोउ काहू का नाहि । घर की नारी को कहै , तनकी नारी जाहि॥ বা। बेलरी= लता । गर्व = घमंड । गहे = पकड़े हुए है। कर= हाथ । सबाल । केरा=का । परभात = सबेरा । हेत=प्रेम, हितैषिता । दैमसलना, रौंदना । ऐंठ = गुमान, गर्व । पैंठ=बाज़ार । नारी = । नारी= नाड़ी, धड़कन ।
( २० ) भजोगे कब । , भया पाँव । . नाम भजो तो अब भजो , बहुरि हरिअर हरिभर रूखड़े इंधन हो गये सब्ब ॥ माली श्रावत देखि के , कलियाँ करी पुकार । फूली फूली चुनि लिये , कालि कालि हमारी हमारी बार अागि लगी आकाश में , झरि झरि परै अँगार । कविरा जरि कंचन भया , काँच संसार॥ सीस उतारै भुइँ धरै, दास कबीरा यों कहै , ऐसा होय तो श्राव ।। प्रेम न बाड़ी ऊपजे , प्रेम न हाट विकाय । राजा परजा जेहि रुचै , सीस देइ ले जाय ॥ जब मैं था तब गुरु नहीं , अब गुरु हैं हम नाहि । प्रेम गली अति साँकरी , तामें दो न समाहि॥ प्रेम छिपाया ना छिपे , जा घट परघट होय । जो पै मुख बोले नहीं , नयन देत हैं रोय ॥ नयनों की करि कोठरी , पुतली पलँग बिछाय । पलकों की चिक डारि के , पिय को लिया रिझाय ॥ जाति न पूछ साधु की , पूछ लीजिये मोल करो तरवार का , पड़ा रहन दो म्यान ॥ जिन ढूँढा तिन पाइयाँ , गहरे पानी पैठ॥ जो बौरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ। बुरा जो देखन मैं चला , बुरा न मिलिया कोय । जो दिल खोजो श्रापना , मुझ सा बुरा न कोय ॥ बहुरि= पुनः, फिर । हरिअर = हरे। रूखड़े वृक्ष । ईधन = जलावन, लकड़ी। कालि = कल । भुइँ ज़मीन। बाड़ी-घर। हाट- बाज़ार । परजा=प्रजा, अधीन । घट= शरीर । परगट = प्रगट, प्रकाशित । पाइयाँ-पाया। पैठ = घुसकर । बौरा = पागल ।
( २१ )
पाहन पूजे हरि मिलें , तो मैं पुजौ पहार।
ताते ये चाकी अली पीस
संसार
काँकर पाथर जोरि के, मसजिद लई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ।।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुत्रा, पंडित हुआ न कोय !
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय ।।
साँझ पड़े दिन बीतवै, चकवी दीन्हा रोय ।
वा देल को, जहाँ रैन ना हाय ।।
অল্প
चकवा
।
शब्दावली
मन फूला फूला फिरे जक्त में कैसा नाता रे॥टेक ।।
माता कहै यह पुत्र हमारा बहिन कहै बिर मेरा।
भाई कहै यह भुजा हमारी नारि कहै नर मेरा ॥
पेट पकरि के माता रोवै वाँह पकरि के भाई ।
लपटि भपटि के तिरिया रोवै हंस अकेला जा
जब लगि माता जीवै रोवै बहिन रोवै दस मासा।
तेरह दिन तक तिरिया रोवै फेर करै घर बाला
चार गजी चरगजी मँगाया चढ़ा काठ की घोड़ी।
चारों कोने अाग लगाया फूंक दियो जस होरी !!
मिलिया=मिला । पाहन- पत्थर । पहार=पहाड़, पर्वत ।
चाकी= चकरी, जाँता । चुनाय = वनवा । बाँग दे = अजान देना ।
खुदाय = खुदा, ईश्वर । मुना=मर गया । बीतवै= बीत जाता है।
जक्त= जगत, दुनियाँ । बिर = भाई । भुजा= हाथ । तिरिया = स्त्री।
हंस -प्राण । मासा= महीना। बासा=निवास । चरगजी = कपड़ा ।
काठ की वोड़ी=चिता ।
।
( २२ )
हाड़ जरै जस लाह कड़ो को केस जरै जस घासा।
सोना ऐसी काया जरि गई कोई न पायो पासा ।।
घर की तिरिया देखन लागी हूँढ़ फिरी चहुँ देसा।
कहै कबीर सुनो भाई साधो छाड़ो जग की प्राला ॥
रहना नहि देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया बूंद पड़े घुल जाना है।
यह संसार काँट की बाड़ी उलझ पुलझ मर जाना
यह संसार झाड़ औ झाँखर भाग लगै घर जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो सतगुरु नाम ठिकाना है।
॥
बिराना = दूसरे का । कागद = कागज़ । काँट=कंटक । बाड़ी-घर ।
उलझ पुलझ= उलझन में पड़ कर । बर = जलना। सतगुरु सच्चा गुरु ।
ठिकाना= ध्येय, लक्ष्य, अंतिम स्थान ।
-
रहीम
.
.
ए रहीम दर दर फिरहिँ, माँगि मधुकरी खाहिँ ।
यारो यारो छोड़िए, वे रहीम अब नाहिं ।।
कहि रहीम इक दीप ते, प्रकट सबै दुति होय ।
तन सनेह कैसे दुरै, दूग-दी एक जरु दोय ।।
कहु रहीम कैसे
निर्भ, बेर केर को संग।
वे सालत
रल आपने, उनके फाटत अँग॥
कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम ।
काकी प्रभुता नहिं घटी, पर घर गए रहीम ।।
खीरा सिर ते काटियत, मलियत लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय ।।
चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरस।
जापर बिपदा परत है, सो श्रावत एहि देस ॥
जैसी पर सो सहि रहे, कहि रहीम यहि देह ।
घरती ही पर परत है, सीत, घाम अरु मेह ॥
जो बड़ेन को लघु कहैं, नहिं रहीम घटि जाहिं ।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिँ ॥
दुति = द्युति, प्रकाश । सनेह = स्नेह, तेल । दुरै= दूर हो, अलग हो ।
.दोय-आँखरूपी दो दिये जल रहे हैं। केर =केला । डोलत =
झूम रहे हैं। जलधि = समुद्र । धीम =,धीमा अप्रसिद्ध । प्रभुता=
महिमा। पर दूसरे के। लोन = निमक । करूए = कडुए, तीखे ।
सज़ाय = सज़ा, दण्ड । रमि=निवास कर रहे । मेह = वर्षा । लघु-
छोटा।
%3D
दृग...
( २४ ) -- जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ॥ जा रहोम मन हाथ है, तो तन कहुँ किन जाहि! जल में जो छाया परे, काया भीजति नाहिं ॥ थोरी किए बड़ेन की, बड़ी बड़ाई होय । ज्यो रहीम हनुमन्त को, गिरिधर कहत न कोय । दुरदिन परे रहोम कहि, दुरथल जैयत भागि। ठाढ़े हूजत घूरपर, जब लागत श्रागि॥ धूरि धरत नित सीस पै, कहु रहीम केहि काज । जेहि रज ऋषिपत्नी तरी, सोइ ढूँढ़त गजराज ।। रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए, डारि जहाँ काम आवे सुई, कहा कर तरवारि॥ रहिमन ब्याह बिआधि है, साहु तो जाहु बचाय ! पायन बेड़ी परत है, ढोल बजाय बजाय॥ प्रीतम छवि ननन बसी, पर छवि कहाँ समाय । भरी सराय रहीम लखि, श्राप पथिक फिरि जाय॥ लहर लहरिया, लहर बहार! मोतिन जरो किनरिया, দ্বিগু भुजङ्ग = साँप । दुरदिन = बुरे दिन । दुरथल = बुरी जगह । जैयत = जाते हैं। धूर = कूड़ाखाना । धूरि = धूल । सीस=सिर । रज = धूल । ऋषिपत्नी-अहल्या। गजराज =हाथी । डार = छोड़ देना, अलग कर देना। कहा-क्या । विवाधि: व्याधि, रोग। जाहु बचाय = बचा जामो, अलग हो जायो। पायन... बजाय = ढोल बजा बजाकर पैरों में बेड़ी डाली जाती है। पर - -दूसरे की । सराय = धर्मशाला। फिरिजाय = लौट जाता है। लहरत=हिल रही है । लहरिया= लहरें । बहार = अानन्द । जरी=जड़ी हुई। किन- रिया=किनारा, पाड़ । बिथुरे= बिखरे % 3D --
( २५ )
बालम श्रल मन मिलएउँ, जस पय पानि ।
हंसिनि
भई सबलिया, लइ बिलगानि ।
ढीलि आँख जल अंचवत, तरुनि सुभाय ।
धरि खसकाइ घइलना, मुरि मुसुकाय ॥
दीन चहैं करतार जिन्हें सुख लो तो रहीम टरे नहिं टारे।
उद्यम पौरुष कीने बिना धन आवत आपुहि हाथ पसारे॥
दैव हँसे अपनी अपना बिधि के घरपंच न जात विचारे
बेटा भयो बसुदेव के धाम नौ दुन्दुभि बाजत नन्द के द्वारे !!
CamND KARNE
-
-
७
बालम = प्रियतम । मिलएउँ = मिलाया है। पय = दूध । बिलगानि
= अलग हो गई । ढीलि=छोड़कर, देखकर । अँचवत =हाथ धोती है।
सुभाय = स्वभाव से, सहज में ही । घइलना= गगरी । मुरि=फिर कर,
लौटकर ।
दीन = देना । टारे = टालने से । उद्यम = उपाय । पौरुष पुरुषार्थ,
कामधाम । दैव = भाग्य । अपनी अपना = आपस में । परपंचप्रपंच,
माया । नहिं जात बिचारे समझ में नहीं आते। बेटा भये-पुत्र उत्पन्न
हुआ । धाम = घर । दुदुभि = बधाई के बाजे ।
%
3D
*-
गिरिधर
.
जाय
साई बेटा बाप के, बिगरे भयो अकाज ।
हरिनाकस्यप कंस को, गयउ दुहुँन को राज ॥
गयउ दुहुन को राज, बाप बेटा सो विगरी।
दुस्मन दावागीर हँसै, महिमण्डल नगरी ।
कह गिरिधर कविराय, युगन याही लि पाई।
पिता पुत्र के वैर, नफा कहु कौने पाई ।।
साई ऐसे पुत्र से, बाँझ रहे बरु नारि ।
बिगरी बेटे बाप से, रहे सलुरारि ॥
जाय रहे ससुरारि, नारि के नाम बिकाने ।
कुल के धर्म नलाय और परिवार नलाने ॥
कह गिरिधर कविराय मातु झंखे वहि ठाई।
असि पुत्रनि नहिं होय, बाँझ रहतिउँ बरु साई॥
सोना
लादन पिय गये, सूना करि गये
देश।
सोना मिले न पिय मिले, रूपा दै गये केश !
रूपा है गये केश, रोय रंग रूप गवावा ।
सेजन को बिसराम, पिया बिनु कबहुँ न पावा ।।
कह गिरिधर कविराय, लोन विन सबै अलोना।
बहुरि पिया घर पाव, कहा करिहों ले सोना ॥
बिगरे: = अनबन, लड़ाई । अकाज = बुरा। दावागीर = दावा करने,
हक़ बतलाने वाला । बाँझ= बन्ध्या, पुत्रहीना । भख = पछताना, भाग्य
के नाम रोना । असि=ऐसे । रहतिउँ = रहती। रूपा-चाँदी,स फेद ।
गँवावा = नष्ट कर दिया। विसराम =विश्राम, सुख । लोन = निमक ।'
अलोना= स्वादहीन ।
१
.
-
दौलत पाय न कीजिए, सपने में अभिमान।
चंचल जल दिन चारि को, ठाउँ न रहत निदान !!
ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में यश लीजै।
मीठे बचन सुनाय, बिनय सव ही की कीजै॥
कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत ।
पाहुन निशिदिन चारि, रहत सब ही के दौलत ॥
गुन
के गाहक सहस नर, बिनु गुन लहै न कोय ।
जैसे कागा कोकिला, शब्द सुलै सब कोय ॥
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन ।
दोऊ को एक रंग, काग सब भये पावन ॥
कह गिरिधर कविराय, सना हो ठाकुर मन के।
बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुनके॥
साई सब संसार में, मतलब का व्यवहार ।
जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार ॥
तब लग ताको वार, यार सँग ही सँग डोलें।
पैसा रहा न पास, यार मुखसे नहिं बोलें ।
कह गिरिधर कविराय, जगत यहि लेखा माई।
करत बेगरजी प्रोति, यार बिरला कोई साई॥
साई घोड़े पाछतहिँ, गदहन पायो राज।
कौआ लीजै हाथ में, दूरि कीजिए बाज ।।
दृरि कीजिए बाज, राज पुनि ऐसो आयो।
सिंह कीजिए कैद, स्यार गजराज चढ़ायो ।
निदान = अन्त में। तौलत = वज़न करता है। पाहुन =अतिथि,
अभ्यागत । अपावन =अपवित्र । यहिलेखा=इसी के समान । बेगरजी-
बिना मतलब । आछतहि = रहते ही। गजराज= हाथी ।
२८)
कर गिरि घर कविराय, जहाँ यह बुझि बधाई।
नाद न कीजै भोर, साँझ उठि चलिये साई ।
माई अवसर के परं, को न सहै दुःख द्वन्द ।
माय बिकान डास घर, वै राजा
हरिचन्द॥
4 राजा हरिचन्द, कर मरघट रखवारी।
धरे नपची वार, फिरे अर्जुन बलधारी ।
का गिरिधर कविराय, नपै वह भीम रसोई।
को न करवटि काम, परे बालर के साई॥
.
M
भार संग । मरघटः
स्मशान । तपै = पकाना । घटिकाम=छे
बृन्द
नीको वै फीकी लगे. विन अवसर की बात ।
जैसे बरनत युद्ध में, रस शृङ्गार न लुहात ॥
फीकी पै नीकी लगे, कहिये समय विचारि।
सब को मन हर्षित करे, ज्यों विवाह में गारि ॥
अपनी पहुँच विचारि के, करतब करिये दौर ।
तेते पाँव पसारिये, जेती लांबी सौर ॥
विद्याधन उद्यम बिना, कहौ जु पावै कौन ।
बिना डुलाये न मिले, ज्यों पंखा की पौन ॥
रहे लमीप बड़ेन के, होत बड़ो हित मेल।
सबही जानत बढ़त है, वृक्ष बराबर बेल ॥
नयना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत ।
जैसे निर्मल भारसी, भली बुरी कहि देत ॥
अति परिचे ते होत है, अरुचि अनादर भाय ।
मलयागिरि की भीलनी, चंदन देति जराय ॥
भले बुरे सब एक साँ, जो लो बोलत नाहिं।
जानि परतु हैं काक पिक, ऋतु बसंत के माहि॥
सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय ।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय ॥
नीकी = अच्छी । सुहात = अच्छा लगता है। जेती-जितनी । सौर
-घर; जगह । पौन=हवा । हेत-अहेत=भलाई बुराई। पारसी=
आइना । जौलो = जब तक । जगावत =तेज़ करता; उद्दीप्त करता है।
%
3D
( ३० )
जे चेतन
ते क्यों तजें,
ज़ाको
जालों मोह।
चुंबक के पीछे लग्यो, फिरत अचेतन लोह ॥
जिहि प्रसंग दूषन लगै, तजिये ताको साथ ।
मदिरा मानत है जगत, दूध कलाली हाथ ।।
उत्तम जनसो मिलत ही, अवगुन लो गुन होय ।
घन संग खारो उधि मिलि, बरसै मीठो तोय ॥
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान ।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान !!
भली करत लागत बिलम, बिलम न बुरे विचार ।
भवन बनावत दिन लगे. ढाहत लगै न बार ॥
कुल सपूत जान्यौ पर, लखि सुभ सच्छन गात ।
हानहार बिरवान के, होत चीकन पात ।।
कछु
कहि नोच न छेड़िए, भलो न वाको संग।
पाथर डारे कीच में, उछरि बिगार श्रङ्ग ॥
बुरी तऊ लागत भलो, भली ठौर पर लीन ।
तिय नैननि नीको लग, काजर जदपि मलीन ।।
चेतन = जीवधारी प्राणी। अचेतन = अशरीरी । प्रसंग= बात; घटना।
मदिरा= शराब । कलाली= शराब बेचने वाला। उदधि =समुद्र । तोय
-जल । जड़मति= मोटी बुद्धि वाला । सुजान = चतुर । रसरी= रस्सी,
डोरी । सिल= पत्थर । निसान -चिह्न । बिलम =किलम्ब, देर । ढाहत
-गिराने में । बार-देर । बिरवान-पौधे । पात= पत्ते । वाको=
उसका। लीन = रखा हुआ, मिला हुआ। तिव= स्त्री। नैननि=
आँखों में । नीको लगै=अच्छा लगता है। मलीन = मलिन, काला।
विहारी
मेरी भव वाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाईं परे, स्याम हरित दुति होय ॥
अधर धरत हरि के परत, ओठ दीठ पट जोति ।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्र धनुष रँग होति ॥
अलि, इन लोयन को कछु, उपजी बड़ी बलाय ।
नीर भरे नितप्रति रहैं तऊ न प्यास बुझाय ॥
इन दुखिया अँखियान को, सुख सिरजोई नाहिँ ।
देखत बनै न देखते, बिन देखे अकुलाहिँ ॥
यद्यपि सुन्दर सुघर पुनि, सगुनो दीपक देह ।
तऊ प्रकास करै तितो, भरिये जितो सनेह ।।
बर जीते सर मैन के, ऐसे देखें मैं न।
हरिनी के नैनान ते, हरि नीके ये
सोहत ओढ़े पीत पटु, स्याम सलोने गात !
मनो नीलमनि सैल पर, आतप पख्यो प्रभात ॥
लाज लगाम न मानहीं, नैना मो बस नाहिं।
ये मुँहजोर तुरंग लौं, ऐचत हू चलि जाहिँ ॥
भव-बाधा = सांसारिक संकट । नागरि=स्त्री, रमणी । झाई
परछाई, छाया । दुति = द्युति, शोभा । दीठ = दृष्टि, नज़र । जोति=
ज्योति । हरित =हरे । लोयन = आँखों । सिरजोई =उत्पन्न हुआ।
तितो = उतना ही । जितो जितना । सनेह = स्नेह,तेल । बर=श्रेष्ठ ।
सर = बाण, तीर । मैन = कामदेव । नैनान - आँखों से। नीके= अच्छे
हैं । सलोने = सुन्दर । सैल = पर्वत । आतप = धूप । मुंहजोर लगाम
न मानने वाले । तुरंग - घोड़े। ऐचत = खींचने पर ।
नेन ॥
.
.
%
3D
-
(३२ )
तो लगि मो मन सदन में, हरि श्रावें हिबाट ।
विकट जटे जौलो निपट, खुलै न कपट कपाट ॥
पाँय महावर देन को, नायन बेठी प्राय ।
फिरि फिरि जानि महावरी, ऐंडी मीड़त जाय ।।
जब जब वे सुधि कीजिए, तब तब सब सुधि जाहिँ।
आँखिन आँख लगी रहै, आँखें लागति नाहिं॥
सघन कुंज छाया सुखद, सीतल मन्द समीर ।
मन है जात जो वही, वा जमुना के तीर ।
कहलाने एकत रहत, अहि, मयूर, मृग, बाघ ।
जगत तपोवनलों कियो, दीरघ दाध निदाघ ।
इहि अाशा अटक्यो रहै, अलि गुलाब के
ऐ है बहुरि बसन्त ऋतु, इन डारन
या अनुरागी चित्त की गति समुमत नहिँ कोय ।
ज्यों ज्यों बड़े श्याम रँग, त्यों त्यों उज्जल होय ॥
सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यहि बानिक मो मन बसो, सदा विहारी लाल ॥
वै
%3D
जटे= लगे हुए। निपट = अत्यन्त । कपाट= किवाड़। मीड़त
मांजती है, रंग छुड़ाने का प्रयत्न करती है । आँखिन रहै आँखों
से आँख लगी रहती है, प्रेम हो जाता है। आँखें लागति नाहि आँखें
नहीं लगतीं, नींद नहीं पाती । सघन =घना। अजौं-अाज भी।
अहि = सर्प । मयूर = मोर । मृग = हरिण । डाघ = दग्ध करने
वाला। निदाध-ग्रीष्म ऋतु, गर्मी। अलि-भौंरा । ऐहै = आवेगा।
बहुरि = पुनः । श्याम = कृष्ण, काला । उज्जल = उजला, निर्मल । सीस
=सिर । कटि-कमर । बानिक-वेप।
।
रसखान मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौ बजगोकुल गाँव के ग्वारन। जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो, चरौ नित नन्दकी धेनु मझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को, जो पुरन्दरछत्र करयो कर धारन । जौ खग हों तो बलेरो करौ, मिलि कालिन्दी कूलकदम्ब की डारन या लकुटी अरु कामरिया परं राज तिहपुर को तजि डारौं। आठहु सिद्धि नवोनिधि को सुख, नन्द की गाइ चराइ बिसारौं। रसखानि कबौं इन आँखिन सौं, बजके बन बाग तडाग निहारौं। कोटिक हैं। कलधौत के धाम, करील की कुंजन ऊपर वारौं । मोरपखा सिर ऊपर राखिहाँ, गुंज की माल गरे पहिरौंगी। ओढि पिताम्बर लै लकुटी बन, गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी। भावतो वोहि मेरो रसखानि सो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी यो मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी। श्रायोडतो नियरे रसखानि, कहा कहूँ तू न गई वहि ठेया । ग्वारन ग्वालों, अहीरों में। वसु=वश । धेनु गाय । मझारन - मध्य में, बीच में । पाहन = पत्थर । गिरि पर्वत । पुरन्दर = इन्द्र । कर यो कर धारन =हाथों पर धारण किया । खग = पक्षी। कूल =तट । लकुटी = लकड़ी, डंडा। कामरिया = कम्बल । पाठहु सिद्धि= आठ सिद्धियाँ, अणिमा-महिमा-गरिमा-लघिमा-प्राप्ति-प्राकाम्य-ईशित्व और वशित्व । नवो निधि नौ निधियाँ, महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व । चराइ=चराकर । बिसारौं = भुला दूं। तड़ाग = तालाब, बावली। निहारौं =देखू । कलधौत =सुवर्ण, सोना। करील = करीर, बबूर का पेड़ । गुंज-गुंजा, लाल रङ्ग की धुंधची । भावतो =अच्छा लगनेवाला, प्रेमी। नियरे नज़दीक । वहि छैयाँ- उसी जगह । ३
या व्रज में सिगरी बनिता, सब वारति प्राननि लेति बलैया॥
कोउ न काहु की कानि कर, कछु चेटक सो जु करयो जदुरैया।
गाइगो तान जमाइगो नेह, रिझाइगो प्रान चराइ गो गया।
मेरो सुभाव चितैवै को माईरी, लाल निहारि के बंसी बजाई।
वा दिनतें माहिँ लागी ठगौरीसी, लोग कहैं कोई बावरी आई
यों रसखानि धिरयो सिगरो, ब्रज जानत है कि मेरो जियराई॥
जो कोउ चाहै भलौ अपनो, तो सनेह न काहू सों कीजिए माई।
धूर भरे अतिसोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरे अँगना, पग पैजनि बाजती, पीरी फछोटी॥
वा छबि को रसखालि बिलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग कहा कहिए हरि, हाथ सो ले गयो माखन रोटी
द्रौपदी श्री गनिका गज गीध अजामिल से किया सेो न निहारो
गौतमगेहिनि कैसे ती, प्रह्लाद को कैसे हरयो दुखभारो॥
काहे को सच करै रलखानि, कहा करिहै रविनन्द विचारो।
कौन की संक परी है जु माखन चाखन हारो है राम्वनहारो॥
आपना सा ढोटा हम सबही को जानति हैं,
दोऊ प्रानी सबहिं के काज नित धावहीं ।
.
.
सिगरी=सभी। कानि = परवाह । चेटक= जादू । गाइगोगा
गया। चितैबे को देखने, पहिचानने को। ठगौरी=ठगी हुई सी,
सुधबुध खो गणी । जियराई =हृदयही।
पैजनी पैरों में पहनने का एक आभूषण, जो बच्चों को पहनाया
जाता है । कछोटी = काछ, घुटनों तक रहने वाली धोती। वारत = न्यौ-
छावर करता है। काग = कौश्रा । निहारो=देखो। गौतम-गहिनी
अहल्या । संक=डर । ढोटा लड़का ।
( ३५ )
ते तो रसखानि
सब दूर
ते तमासो देखें,
तरनि
तनूजा
के निकट नहि श्रावहीं॥
आनदिन बात अनहितुन सों कहौं कहा,
हितू जे जे पाये तेऊ लोचन दुरावहीं।
कहा कहैं। पाली खाली देत सब ठाली हाय !
मेरे बनमाली को न काली ते छुड़ावहीं॥
,
तरनि-तनूजा=सूर्य की बेटी, यमुना। आनदिन = दूसरे दिन ।
दुरावहीं= छिपाते हैं। ढाली = झूठी बात बनाते, धोखा देते हैं। काली-
कालीदह, जहाँ कालिय सर्प रहता था और श्रीकृष्ण ने जिसको पछाड़ा
.
sma पदमाकर जाहिर जागति सी जमुना जब बूडै बहै उमहै वह बेनी । त्यो पदमाकर होरा के हारन गंग तरंगन सी सुखदेनी ॥ पायन के रंग सो रँगि जाति सी भाँति ही भाँति सरस्वति सेनी पैरे जहाँई जहाँ वह बाल तहा तहाँ ताल में होत त्रिवेनी॥ थे ब्रजचन्द चलौ किन वा ब्रज लूक बसन्त की ऊकन लागी। त्यों पदमाकर पेखो पलासन पावक सी मनो फॅकन लागी। बै वजनारी विचारी बधू बन बावरी लौ हिये हूकन लागी। कारी कुरूप कसाइन पै सु कुहू कुहू क्वैलिया कूकन लागी॥ जैसा ते न मोसों कहूँ नेकहू डरात हुतो, अब है।हू नेकहूँ न तोसो कबौं डरिहैं।। कहै पदमाकर प्रचण्ड जो परैगो तो, उमण्ड करि तासों भुजदण्ड ठोंकि लरिहौं । चलो चलु चलो चलु बिचलु न बीच ही ते, कीच बीच नीच तो कुटुम्ब को कचरिहों। येरे दगादार मेरे पातक अपार, तोहि गंगा के कछार पछार छार करिहैं। ॥ में जाहिरै =प्रगट ही । उमहै = उमड़ती है। सेनी= श्रेणी, कतार । पैरे= तैरती है। लूक= गर्म हवा । ऊकनलागी= चलने लगी। पला- सन =किंशुक, टेसू । पावक= अग्नि । बावरी= पगली। क्वैलिया = कोयल । उमण्डकरि=उमड़ कर, चढ़ कर । बिचलु =हटजाना, विच- लित हो जाना। तो तेरे । कचरिहौं =कुचल डालूंगा। दगादार धोखेबाज़ । पातक= पाप । कछार= किनारा । छार= नष्ट ।
देव नरकिन्नर कितेक गुन गावत,
पैपावत न पार जा अनन्त गुन पूरे को।
कहै पदमाकर सुगाल के बजावत ही,
काज करि देत जन जाचक जरूरे को॥
चन्द की छटान जुग पन्नग फटान जुत,
मुकुट बिराजै जटा जूटन के जूर को।
देखो त्रिपुरारि की उदारता अपार जहाँ,
पैये फल चार फूल एक दै धतूरे का ॥
ज्याधहू ते बिहद असाच हौं अजामिल लौ,
ग्राह ते गुनाही कही तिनमें गिनाश्रोगे।
स्योरी हौं न सूद्र हौं न केवट कहूँ को त्यों,
न गौतमी तिया हौं जापै पग धरि अाओगे।
राम सों कहत पदमाकर पुकारि,
तुम मेरे महापापन को पारहू न पाओगे।
झूठो ही कलंक सुनि सीता ऐसी सती तजी,
हौं तो साँचाह कलंकी ताहि कैसे अपनाभोगे ।।
%D
गुनपूरे =गुणपूर्ण, गुणी । जाचक = प्रार्थी । जरूरे= आवश्यक !
जुग=दोनों । फटान जुत = फनों के साथ । फलचार=धर्म, अर्थ, काम
और मोक्ष, ये चार फल । विहद = बेहद, अत्यन्त अधिक। असाधु:
बुरा । स्योरी=सेवरी, रामचन्द्र को अपने जूठे बेर खिलाने वाली मशहूर
भीलनी । गौतमी तिया=अहल्या । हौं=मैं।
भूषण
बिना चतुरंग संग बानरन लै कै बाँधि,
वारिधि को लङ्क रघुनन्दन जराई है
पारथ अकेले दोन भीषम सों लाख भट,
जीति लीन्हीं नगरी विराटमें बड़ाई है।
भूषन भनत है गुसलखाने में खुमान,
अवरंग साहिबी हथ्याय हरि लाई है।
तो कहा अचंभो महाराज सिवराज सदा,
वीरन के हिम्मतै हथ्यार होत आई है।
ब्रह्म
के श्रानन ते निकसे ते अत्यन्त पुनीत तिहपुर मानी।
राम युधिष्ठिर के बरने बलमीकहु ब्याल के अंग सोहानी ॥
भूषन
यों कलि के कविराजन राजन के गुन गाय नसानी।
पुन्य चरित्र सिवा सरजै सर न्हाय पवित्र भई पुनि वानी ॥
चतुरंग= चतुरंगिणी सेना, जिसमें हाथी, घोड़े, पैदल और रथ होते
हैं । वारिधि समुद्र । पारथ = अर्जुन । भट=वीर । गुसलखाना=
स्नानगृह । हथ्याय= आत्मसात् करके, अपने कब्जे में करके । हरिलाई
है छीन लाये हैं । अचंभा = अाश्चर्य । हिम्मतै = हिम्मत ही । हथ्यार =
हथियार, अस्त्र-शस्त्र । आनन = मुंह । पुनीत = पवित्र । तिहूँ पुर = तीनों
लोकों, स्वर्ग, मयं, पाताल ने। बरने = वर्णन करने के कारण ।
साहानी=शोभित हुई । कविराजन = कविश्रेष्ठों, कवियों ने । राजन =
राजाओं के । सरजा सिवा के पुण्य चरित्र रूपी सर में स्नान करके फिर
वाणी पवित्र हो गई।
And 2- दान समे द्विज देखि मेरुहू कुवेरह की, सम्पति लुटाइबे को हियो ललकत साहि के लपूत सिव माहि के बदन पर, सिव की कथान में सनेह झलकत है।। भूपन अहान हिन्दुभान के उबारिये को, तुरकन मारिबे को बीर बलकत है। साहिन सो खरिबे की चरचा चलत श्रानि, सरजा के द्वगन उछाह छलकत है। राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यो अस्मृतिपु रान राखे ये विधि सुनी मैं । राखी रजपूती राजधानी राखी राजन की धरा में धरम राख्यो राख्यो गुन गुनी मैं ॥ भूषन सुकवि जीति हद्द मरहट्टन की देख देस कोरति बखानी तब सुनी मैं । साहि के सपूत लिवराज समसेर तेरी दिल्लौदल दाबि के दिवाल राखी दुनी मैं ॥ कत्ता की कराकनि चकत्ता को कटक काटि कीन्हीं लिवराज वीर कह कहानियाँ। । मेरु-मेल्पर्वत । कुबेर = धनाधिपति । लसकतातुर हो उठता है। जहान =संसार । उपारिवे को उद्धार करने के लिए । तुरकान%= मुसलमानों के । बलकत हैं = उबल रहे हैं। उछाह = उत्साह । हिन्दुवानी= हिन्दुत्व । धरा = पृथ्वी । बखानी = प्रशंसा होते । समसेर = तलवार । दिवाल = दीवार, मर्यादा । दुनी = दुनियाँ । कत्ता = एक अस्त्र विशेष । कराकनि = काटने के शब्दों से । कटक -सेना । अकह-अकथनीय ।
( ४० )
भूषन भनत तिहुँ लोक में तिहारी धाक
दिल्ली औ बिलाइत सकल बिललानियाँ॥
आगरे अगारन है फाँदती कगारन छवै
बाँधती न बारन मुखन कुम्हलानियाँ।
कीबी कहैं कहा ो गरीबी गहे भागी जायँ
बीबी गहे सूथनी सुनीवी गहे रानियाँ ।
वेद राखे विदित पुरान राखे सारयुत
रामनाम राख्यो अति रसना सुघर में।
हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की
काँधे में जनेऊ राख्यो माला राखी गर मैं॥
मीडि राखे मुगल मरोडि राखे पातसाह
वैरी पीसि राखे बरदान राख्यो कर में।
राजन की हद्द राखी तेगबल सिवराज
देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर मैं
॥
भनत = कहता है । तिहुँ लोक = तीनों लोक, स्वर्ग, मर्त्य,
गताल । धाक =रोब, अातंक । विलाइत=विदेश । बिललानियाँ
रो पड़े, तंग आ गये । अगारन = घर, मकान । ह= होकर ।
फाँदती कूदती है। कगारन=किनारों को ।
को । छवै=छूकर ।
बारन =केशों को । कोबी = करना । बीबी = मुसलमानों की स्त्रियाँ ।
सूथनी-पायजामा । नीबी=स्त्रियों की धोतीका वन्धान । बिदितः
मशहूर । रसना=जीभ । सुबर =अच्छी । गर=गले। मीडि=
मसलना । मरोडि= नष्ट कर देना, तोड़-फोड़ डालना । पातसाह =
मुसलमानी राज । कर-हाथ । हद-सीमा। तेगबल = तलवार के ज़ोर
से । देव-देवता। देवल-मन्दिर ।
केशव [ सीता की अग्निपरीक्षा] (मुजंगप्रयात) सबस्ना सबै अंग सिंगार सोहैं। विलोके रमादेव देवी विमोहैं । पिता अंक ज्यों कन्यका शुभ्रगीता। ललै अग्निके अंक त्योशुद्धसीता महादेवके नेत्रकी पुत्रिकाली। कि संग्राम के भूमि में चण्डिकासी मनो रत्नसिंहासनस्था सची है । किधौं रागिनी रागपूरे रची है। गिरापूरमें है पयोदेवता सी। किधों कंजकी मंजु शोभा प्रकासी कियौं पाहीमें सिफाकन्द सोहै। किधौं पद्मके कोष पद्मा विमोहै कि सिन्दूर शैलाग्रमें सिद्धकन्या। किधौं यद्मिनी सूर संयुक्त धन्या सरोजासना है मनो चारु बानी । जपापुष्पके पास बैठी भवानी ॥ किधौं औषधीवृन्दमें रोहिणीसी। कि दिग्दाहमें देखिए योगिनीसी धरापुत्रज्योस्वर्णमाला प्रकास। किधौंज्योतिसी तक्षकाभोगभासै विमोहैं = मोहित होजाते हैं। शुभ्रगीता=जिसकी पवित्रता विख्यात हो। अंक= गोद। पुत्रिका=पुतली । संग्राम = लड़ाई । सची-इन्द्राणी। गिरापूर = सरस्वती, प्रवाह । पयोदेवता-जलदेवी। कंज = कमल । मंजु=सुन्दर । पद्म = कमल। सिफाकन्द = कमल की जड़ । पद्मा- लक्ष्मी। सिन्दूर......सिद्ध कन्या =सेंदुर के पहाड़ की चोटी पर बैठी हुई सिद्ध कुमारी के समान । पद्मिनी कमलिनी। सूर संयुक्त सूर्य किरनों से युक्त। सरोजासना= लक्ष्मी। चारु-सुन्दर। बानी= वाणी, सरस्वती । जपापुष्प -जवाके फूल । औषधी वनस्पति, जड़ी-बूटी आदि । रोहिणी= एक नक्षत्र, चन्द्रमा की स्त्री। दिग्दाह-योगिनी- । दुर्गा की ६४ सखियाँ, योग करने वाली । धरापुत्र=मङ्गल ग्रह । तक्षकाभोग-तक्षक सर्प का फन या शरीर ।
( ४२ ). (उपेन्द्रवज्रा) प्रासावरी माणिक कुम्भ सोभ, अशोक लग्ना वनदेवता सी। पलाशमाला कुसुमालि मध्ये, वसन्तलक्ष्मी शुभलक्षणा सी॥ आरक्तपत्रा शुभचित्रपुत्री, मनो बिराजै अति चारु वेषा। सपूर्ण सिन्दूर प्रभा बसै धौ, गणेशभालस्थल चन्द्ररेखा ॥ (उत्तगयन्द सवैया) है मणिदर्पण में प्रतिबिम्ब कि प्रीति हिये अनुरक्त अभीता। पुञ्ज प्रताप में कीरति सी तप तेजन में मनु सिद्धि विनीता॥ ज्यों रघुनाथ तिहारिय भक्ति लसै उर केशव के शुभ गीता। त्यो अवलोकिय भानन्दकन्द हुतालन मध्य सबासन सीता॥ wasna "प्रासावरी... वनदेवता सी=मानो आसावरी रागिनी मणिका घड़ा लिए हो, अथवा अशोक वृक्ष या वनदेवी बैठी । पलाशमाला- किंशुक के वृक्ष । कुसुमालि = फूलों का समूह । भारत्तपत्रा= जिसके पत्ते लाल हो । चिनपुत्री तस्वीर की पुतली। चारबेपा-सुन्दर वेप वाली। धों -अथवा । अभीता=निडर । पुक्ष प्रताप =प्रताप के समूह में। तिहारिय= तुम्हारा ही । हुतासन =अग्नि । सबासन = वस्त्रों के सहित । - सत्यनारायण (भ्रमरदूत) पावन सावन मास नई उनई घन पाँती। मुनि मनभाई छयो रसमयी मंजुल काँती ॥ सोहत सुन्दर चहुँ सजल, सरिता पोखर ताल : लोल लोल तहँ अति अमल, दादुर बोल रसाल ॥ छटा चूई परे ॥१॥ अलबेली कहुँ वेलि द्रुमन सो लिपटि सुहाई। धोये थोये पातन की अनुपम कमनाई ।। चातक चलि कोयल ललित, बोलत मधुरे बोल । कूकि कूकि केकी कलित, कुञ्जनु करत कलोल ।। निरखि घन कीछटा ॥२॥ इन्द्र धनुष श्री इन्द्र बधूटिन की सुचि सोभा। को जग जनम्यो मनुज जानु मन निरखि न लोभा ।। प्रिय पावन पावल लहरि, लहलहात चहुँ ओर । छाई छवि छिति पै छहरि, ताको ओर न छोर ।। लसै मन मोहनी ॥३॥ उनई घिर आयी। पाँती पंक्ति, समूह । छई छाई, फैली । काँती = कान्ति, शोभा । पोखर=तलैया। चूई परे= छलकी जारही है। बेलि = लता । द्रुमन = वृक्षों । कमनाई = कमनीयता, सुन्दरता । केकी = मयूरी । कलोल = कल्लोल, प्रसन्नता का शोर । मनुज-मनुष्य । लोभा= लुब्ध हुा । लहरि = लहर । छहरिः = बिखरी हुई ।
( ४४ ) कहूँ बालिका-पुञ्ज कुञ्ज लखि परियत पावन । सुख सरसावन, सरल सुहावन हिय हरसावन ।। कोकिल कंठ लजावनी, मन भावनी अपार । भ्रातृ प्रेम सरसावनी, रागति मंजु मल्हार ॥ हिंडोलनि झूलतीं ॥४॥ कृष्ण बिरह की लि नई ता उर हरियाई। लोचन अस्त्र विमोचन दोउ दल बल अधिकाई॥ पाइ प्रेमरस वढ़ि गई, तन तरु लिपटी धाइ। फैल फूटि पहुँधा छई, बिथा न वरनी जाइ ॥ अकथ ताकी कथा ॥२॥ नारी सिक्षा अनादरत जे लोग अनारी। ते स्वदेस अवनति प्रचंड पातक अधिकारी ।। निरखि हाल मेरो लेउ समुझि सब कोइ। विद्या बल लहि मति परम,अबला सबला होइ ।। लखौ अजमाइ के ॥६॥ तेरो तन घनस्याम, स्याम घनस्याम उतै सुनि । तेरी गुञ्जनि सुरलि मधुप, उत मधुर मुरलि धुनि ॥ प्रथम, परियत = पड़ता है। रागति =गाती हैं। मल्हार = वर्षा में गाया जाने वाला एक राग । । बेलि =लता । ता उर- उसके हृदय में। हरियाई-हरी हो गई। अस्त्र = आँसू । चहुँधा = चारों ओर। छई= छा गयी । अनारी- निर्बुद्धि । पातक=पाप । अजमाइ = परीक्षा करके । सुरलि=सुरीली । मधुप = भौंरा । धुनि = ध्वनि, शब्द ।
( ४५ ) पीत रेख तव कटि बसत, उत पीताम्बर चारु । विपिन बिहारी दोउ लसत, एक रूप सिंगार ॥ जुगुल रस के चखा ॥७॥ नित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहुँ । जीवन को प्रानन्द न देख्यो जात यहाँ कहुँ । बढ्यो यथेच्छाचार कृत, जहँ देखो तहँ राज। होत जात दुर्बल विकृत, दिन दिन आर्यसमाज ॥ दिनन केफेर सो ॥८॥ टिमटिमात जातीय जोति जो दीप सिखा-सी । लगत बाहिरी ब्यारि वुझन चाहत अबला-सी ॥ सेष न रह्यो सनेह को, काहू हिय में लेस। कासों कहिये गेह को, देसहि में परदेस॥ भयो अव जानिये ॥ चारु-सुन्दर । चखा = चखने वाले । व्यारि=बयार, हवा ।
m
हरिश्चन्द्र
( १ )
तरनि तनूआ तट तमाल तरुवर बहु छाये।
झुके कूल सों जल-परसन हित मनहुँ नुहाये ॥
किधी सुकुर मैं लखत उझकि सब निज निज सोभा
कै प्रनवत जल जानि एरम पावन फल लोभा॥
मनु श्रातप वारन तीर को, सिमिट सबै छाये रहत।
के हरि-सेवा हित नै रहे, निरखि नैन-मन सुख लहत ।।
कहूँ नीर पर मालाकमल खोभित बहु साँतिन ।
कहुँ सेवालन मध्य सुमुदिनी लगि रहि पाँतिन ॥
भानु द्वग धारि अनेक जमुन निरखत निक्ष सोमा।
यो उमगे प्रिय प्रिया प्रेम के अनगिन गोमा।
कै करि के कर बहु पीय को, टेरत निज ढिग सोहई ।
पूजन को उपचार लै, चलति मिलन मन-मोहई ।
कूजत कहुँ कलहल कहूँ मज्जत
कहुँ कारण्डव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत।।
पारावत ।
N
तरनि-तनूजा= कालिन्दी, यमुना । तमाल = एक वृक्ष । परसनहित
=सश करने, छूने के लिए । किधौं = अथवा । मुकुर =दर्पण, आइना ।
उझकिझुककर । कै= अथवा । अनवत प्रणाम करते हैं। प्रातप=
सुन्दर । वैवाल =सेवार। कुमुदिनी कमलिनि । पाँतिन = सिलसिले
से, कतार से। दृग = आँखें । गोभा-प्रेरणा। पारावत = कबूतर ।
कारण्डव =हंस की एक जाति । जल कुक्कुट =बतक।
--
(४७)
चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगायत ।
सुक पिक जल कहुँ पिवत कहूँ भ्रमरावलि गावत ॥
कहुँ तट पर नाचत मोर बहु, रोर विविध पच्छी करत ।
जलपान न्हान करि सुख भरे, तट सोमा सव जिय भरत ।।
( २ )
सोश्रो सुख-निदिया प्यारे ललन ।
नैनन के तारे दुलारे मेरे बारे, सोश्रो सुख-निदिया प्यारे ललन
भई श्राधीरात, बन सनसनात, पलु पंछी कोउ श्रावत न जात ।
जग प्रकृति सई मनु थिर लखात, पातन नहि पावत तरुनहलन ।
झलमलत दीप सिर चुनत शाय, मनु प्रिय पतंग हित करतहाय,
लतरात अंग बालसजनाय, सनसन लगी सारी पवन चलन।।
सोये जग के सब नोंद घोर, जागत कामी चिन्तित चकोर,
बिरहिन, बिरही, पाहरू, बोर, इन कहै छन रैनहुँ हाय कलन॥
( ३ )
जग में पतिव्रत सम नहि श्रान
नारि हेतु कोउ धर्म न दूजो, जग में यातु समान ।
अनुसूया, सीता, सावित्री इनके चरित प्रमान।
पति देवता तीय जग अन धन गावत वेद पुरान ॥
-
।
चक्रवाक= चकवा । बक= बगुला । सुक=तोता । पिक कोयल ।
भ्रमरावलि-भौंरों का समूह । शेर पक्षियों का स्व, चहचहाना ।
-
न्हाल-स्नान।
थिर=स्थिर, चुपचाप । हतात =दीख पड़ती है। पातन ......
हलन =वृक्ष की पत्तियाँ तक नहीं हिलने पातीं। सतरात = अप्रसन्न होता
है। सीरी ठंढी। कल =चैन। यासु= इसके।
(४८)
धन्य देस कुल जहँ निबसत है नारी सती सुजान ।
धन्य समय जब जन्म लेत ये धन्य व्याह असथान ॥
सब समर्थ पतिबरता नारी इन सम और न श्रान ।
याही ते स्वर्गहु में इनको करत सब गुन गान ।।
( ४ ४ )
नव उज्जल जलधार हार हीरक-सी सोहति ।
बिच विच छहरति बूंद मध्य मुक्तामनि पोहति ।।
लोल लहर लहि पवन एक पै इक इमि आवत ।
जिमि नरगन मन विविध मनोरथ करत मिटावत ।
सुभग स्वर्ग सोपान सरिस सबके मन भावत।
दरसन मजन पान त्रिविध भय दूर मिटावत ॥
श्री हरि-पद-नख-चन्द्रकान्त-मन-द्रवित-सुधारस ।
ब्रह्म कमण्डल मण्डन भव खण्डन सुर सरबस ।।
शिव-सिर-मालति-माल-भगीरथ नृपति-पुण्य-फल ।
ऐरावत-गज-गिरिपति-हिम-नग-कण्ठहार कल ॥
सगर सुवन सठ सहस परस जलमात्र उधारन ।
अगनित धारा रूप धारि सागर संचारन ।
काली कह प्रिय जानि ललकि भेंटयो जग धाई ।
सपनेहूँ
नहि तजी रही अंकम लपटाई ।।
असथान-स्थान, जगह। पान-दूसरा।
छहरति=छिटकती है। लोल = चंचल । लहि = पाकर । सरिस
सम्गन । मजन= स्नान करना । त्रिविध तीन प्रकार के दैहिक,
दैविक और भौतिक । चन्द्रकान्त =मणि विशेष । द्रवित =पिघला.
हुा । ऐरावत = हाथियों में श्रेष्ठ, इन्द्र का हाथी । हिमनग = हिमालय
पर्वत । कल-श्वेत । सगर-सुवन =सगर नामक राजा
सहस-साठ सहस। परसस्पर्श । ललकि = दौड़कर । भेंटयो-
मिली। अंकम=छाती, हृदय ।
पं० प्रतापनारायण मिश्र
जपो
हिन्दी की हिमायत)
चहहु जो साँचौ निज कल्यान ।
तो सब मिलि भारत सन्तान ।।
निरन्तर
जबान।
हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान ।।
तबहिं सुधरि है जन्म निदान ।
तबहि भलो करि है भगवान ।।
जब रहि है निसिदिन यह ध्यान ।
हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान ॥
-
(बुढ़ापा)
हाय बुढ़ापा तोरे मारे अब तो हम नकन्याय गयन ।
करत धरत कछु बनते नाहीं कहाँ जान श्री कैस करन ।
छिन भरि चटक छिनै या मद्धिम जस बुझात खन होय दिया।
तैसे निखवख देखि परत हैं हमरी अक्किल के लच्छन ।
अस कुछ उतरि जाति है जीते बाजी बेरियाँ बाजी बात।
कैस्यो सुधि ही नाही आवत मूंडुइ काहे न दै मारन ।
.
साँचौ सच्चा, असली। निदान-अन्त में, कारण । नकन्याय
नकिया जाना, नाक में दम था जाना । गयन = गये । कैल-कैसा.
क्या । मद्धिम=मश्रम, मन्द । खन = क्षण, समय । निखवख निश्चित ।
उतरि जाति है भूल जाती है। बिरियाँ = बार, वख्त । बाजीबाज,
कोई । कैस्यो=किसी प्रकार । सुधि = याद । मूडुइ= सिरही।
-
.
( ५० )
कहा चहैं। कुछु निकरत कुछु है जीभ राँड़ का है यहु हालु।
कोऊ इहि का बात न समझे चाहे बीसन दायें कहन॥
दाढ़ी, नाक याक माँ मिलि गै बिन दाँतन मुँहु अस पोपलान।
दढ़िय पर बहि बहि श्रावत है कबौं तमाखू जो फाँकन ॥
बार पाकि गै रीरौ झुकि गै मूंडो सासुर हालन लाग ।
हाथ पाँव कछु रहे न आपन केहि के आगे दुख ावन ॥
यही लकुटिया के बूते अब जस तस डोलित डालित है
जेहि का लै के सब कामन माँ सदा खखारत फिरत रहन ॥
जियत रहैं महाराज सदा जो हम ऐस्यन का पालत
नाहीं तो अब को धौं पूँछ केहि के कौने काम के हन ॥
(भजन)
जागो भाई जागो रात अब थोरी।
काल चोर नहिं करन चहत है जीवन धन की चोरी॥
औसर चूके फिरि पछितैहो हाथ मीजि सिर फोरी।
काम करो नहि काम न ऐहैं बातें कोरी कोरी ॥
जो कुछ बीती बीत चुकी सेो चिन्ता ते मुख मोरी।
आगे जामें बनै सो कीजै करि तन मन इकठौरो॥
who
दाय = दफा, बार । याक= एक । पोपलान=पिचक गया, ढीला
पड़ गया।
रीरौ = कमर । हालन=हिलने । र्वावन = रोवें । लकुटिया =
लकड़ी, लाठी। बूते-बल पर । जस तस-जैसे तैसे। डोलित डालित
= चलता फिरता हूँ। जेहिका=जिसको । खखारत फिरत रहन = खखा-
रता फिरता, अकड़ता फिरता था। ऐस्यन =ऐसों। हन=हैं, हूँ। थोरी
-थोड़ी। औसर = अवसर, मौक़ा। मीजि=मलकर। कोरी-सिर्फ,
खाली। मोरी=मोड़ कर। बनै =भला हो । इकठौरी=एक जगह ।।
.
( ५१ )
मोरी।
कोऊ
काहू
को नहि साथो मात पिता सुत
अपने करम आपने संगी और भावना भोरी॥
सत्य सहायक स्वामि सुखद से लेहु प्रीति जिय जोरी !
नाहिँ त फिर 'परताप हरी' कोउ बात न पूछहि तोरी ॥
गोरी=स्त्री । भारी-भोली । जोरी-जोड़ । तोरी-तुम्हारा ।
पं० नाथूराम 'शंकर' शर्मा
( १ )
शैल विशाल महीतल फोड़ बढ़े तिनको तुम तोड़ कढ़े हो ।
लै लुड़की जलधार धड़ाधड़ ते वर गोल मटोल गढ़े हो ।
प्राण विहीन कलेवर धार विराज रहे न लिखे न पढ़े हो ।
हे जड़देव ! शिलासुत शंकर !! भारत पै करि कोप चढ़े हो ।
में
( २ )
भरिबो है
समुद्र
को
शम्बुक
छिति को छिगुनी पर धारियो है।
बँधिबो है मृणाल से मत्त करी
जुही फूल सो शैल बिदारिबो है।
बँधियो है सितारन को कवि 'शंकर'
रेणु सों तेल निकारिबो है।
कविता
समुझाइबो
सविता गहि भूमि पै डारिबो है।
मूरख को
%
3D
॥
महीतल = ज़मीन । कढ़े =निकले । कलेवर=शरीर । शम्बुक =
सीप, घोंघा । छिति = भूमि, पृथ्वी । छिगुनी=सब से छोटी उँगली,
कनिष्टिका । मृणाल-कमल की डण्डी । मत्त-पागल । करी=हाथी।
शैल पर्वत । बिदारिबो तोड़ना । सितारनताराओं को। रेणु
चालू । सविता-सूर्य । गहि = पकड़ कर । डारिबो-गिराना ।
।
( ५३ )
( ३ )
कजल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि
श्याम घनमण्डल में दामिनी की धारा है।
यामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि
राहु
के कबन्ध
कराल केतु तारा है।
शंकर कसौटी पर कंचन की लोक है कि
तेजने तिमिर के हिये में तीर मारा
काली पाटियों के बीच मोहिनी की मांग है कि
ढाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है।
다.
आँख से न आँख लड़ जाय इसी कारण से
भिन्नता की भीत करतार ने लगाई है
नाक में निवास करने को कुटी शंकर की
छवि ने छपा कर की छाती पै छवाई है।
कौन मान लेगा कीर तुण्ड की कठोरता में
कोमलता तिल के प्रसून की समाई है।
सैकड़ों नकीले कवि खोज खोज हारे पर
ऐसी नासिका की कहूँ उपमा न पाई है।
-
कूट = पर्वत । श्याम = काले । धनमण्डल =बादलों का समूह । दामिनी
विजली। धाराप्रवाह, रेखा। यामिनी रात्रि। अंक= गोद । कलाधर =
चन्द्रमा । राहु-एक अशुभ ग्रह । कबन्ध-घड़ । कराल-भयंकर ।
कसौटी= सोना चाँदी का परखने वाला पत्थर । कंचन=सोना । लीक
लकीर, रेखा। तेज = प्रकाश । तिमिर=अन्धकार । पाटियों-देशनों
ओर फेरे हुए बाल । भीत-दीवाल । करतार =विधाता। छपाकर :
'चन्द्रमा । कीर तुण्ड=तोते की चोंच । प्रसून = फूल । नकीले =नक ।
- । पं० श्रीधर पाठक (वन शोभा) चार हिमाचल आँचल में एक साल विलालन को बन है। अदु मर्मरशील झरे जल-स्रोत हैं पर्वत श्रोट है निर्जन है। लिपटे हैं लता द्रुम, गान में लीन प्रवीन विहंगन को गन है । सस्क्यौ तहाँ रावरो भूल्यो फिरै मदबावरौ सौ अलिको मन है। भारत में बन ! पावन तू ही, तपस्वियों का तप श्राश्रम था । जग-तत्व की खोज में लग्न जहाँ, ऋषियों ने अभग्न किया श्रम था ॥ जब प्राकृत विश्व का विभूम और था, सात्विक जीवन का क्रम था। महिमा बनवास की थी तब और प्रभाव पवित्र अनूपम (सुसन्देह) कहीं पै स्वर्गीय कोई बाला सुमञ्जु बीणा बजा रही है। सुरों के संगीत की सी कैसी सुरीली गुंजार पा रही है ॥ था॥ चारु-सुन्दर । आँचल = अंचल, प्रान्त । साल = एक प्रकार का वृक्ष। विसालन-बड़े-बड़े। मर्मरशील = मर्मरशब्द करनेवाले । जल- स्रोत = झरने । अोट= आड़, पर्दा । दुम=पेड़ । विहंगन = पक्षियों । राघरो =आप का । बावरो=पागल । अलि = भौंरा । अभग्न =अटूट, निरन्तर । प्राकृत-सत्य । विभ्रम = घबराहट । सुमंजु-अत्यन्त मनोहर ।
( ५५ ) हरेक स्वर में नवीनता है, हरेक पद में प्रवीनता है। निराली लय है औ लीनता है अलाप अद्भुत मिला रही है । अलक्ष्य पर्दो से गत सुनाती तरल तरानों से मन लुभाती। अनूठे अटपट स्वरों में स्वर्गिक सुधा की धारा बहा रही है । कोई पुरन्दर की किंकरी है कि या किसी सुर की सुन्दरी है। वियोग-तप्ता सी भोग-मुक्ता हृदय के उद्गार गा रही है । कभी नयी तान प्रेममय है, कभी प्रकोपन कभी विनय है। दया है दाक्षिण्य का उदय है अनेकों बानक बना रही है। भरे मगन में हैं जितने तारे हुए हैं मदमस्त गत पैसारे। समस्त ब्रह्माण्ड भर को मानों दो उँगलियों पर नचा रही है। सुनो तो सुनने की शक्ति वालो सको तो जाकर के कुछ पता लो! कौन जोगन जो ये गगन में कि इतनी चुलबुल मचा रही है। - तराना=गीत । सुधा=अमृत । पुरन्दर = इन्द्र । किंकरी-दासी। सुर=देवता। प्रकोपन = नाराजी। दाक्षिण्य = अनुकूलता। बानक=वेश । गगन = आसमान । गत-बाजा का स्वर । जोगन =योगिनी।
श्री मैथिली शरण गुप्त
(शकुन्तला की विदा)
त्यागी थे मुनि कण्व उन्हें भी करुणा भाई,
होती है बस सुता धरोहर, घस्तु पराई।
होम-शिखा की परिक्रमा उससे करवाई,
और उन्होंने स्वस्ति-गिरा यों उसे सुनाई।
( २ )
"तुझको पति के यहाँ मिले सब भाँति प्रतिष्ठा,
ज्यों ययाति के यहाँ हुई पूजित शर्मिष्ठा।
सार्वभौम पुरु पुत्र हुआ था उसके जैसे,
तेरे भी कुल-दीप दिव्य औरस हो वैसे।
गुरुओं की सम्मान-सहित शुश्रूषा करिया,
सखी-भाव से हृदय सदा सौतों का हरियो।
करे यदपि अपमान मान मत कीजो पति से,
हजो अति सन्तुष्ट स्वल्प भी उसकी रति से।
सुता= लड़की। धरोहर = अमानत । स्वस्ति-गिरा=आशीर्वाद ।
प्रतिष्ठा = आदर । सार्वभौम= चक्रवर्ती। औरस = पुत्र । शुश्न पा=
सेवा । मान= अभिमान । हो-होना। स्वल्प-थोड़ा । रति
-
प्रसन्नता।
( ५७ )
( ४ )
'परिजन को अनुकूल आचरण से सुख दीजो,
कभी भूल कर बड़े भाग्य पर गर्व न कीजो।
इसी चाल से स्त्रियाँ सुगृहिणी-पद पाती हैं,
उलटी चल कर वंश-व्याधियाँ कहलाती है।"
(स्वयमागत)
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर पाऊँ मैं ?
सब द्वारों पर भीड़ बड़ी है, कैसे भीतर जाऊँ मैं?
द्वारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते
शेष सभी धक्के खाते हैं,
कैसे घुसने पाऊँ मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर पाऊँ मैं?
मुझमें सभी दैन्य दूषण हैं,
न तो वस्त्र हैं, न विभूषण हैं,
लजित किन्तु यहाँ पूषण हैं,
अपना क्या दिखलाऊँ मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर श्राऊँ मैं?
मुझमें तेरा आकर्षण है,
किन्तु यहाँ धन संघर्षण है,
इसी लिए दुर्द्धर धर्षण है,
क्यों कर तुझे बुलाऊँ मैं?
परिजन =घरवालों।
दैन्य =दीनता, दरिद्रता । दूषण = दोष । विभूषण = गहना । पूषण
= सूर्य । आकर्षण=खिंचाव ।
खींचातानी। दुर्धर = न जीता जा सकने वाला । धर्षण = दमन करना,
'परास्त करना।
घन-गहरा ।
संघर्षण-टकार,
(५८)
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर पाऊँ मैं?
तेरी विभव कल्पना करके,
उसके वर्णन से मन भरके,
भूल रहे हैं जन बाहर के,
कैसे तुझे भुलाऊँ मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर आऊँ मैं ?
बीत चुकी है वेला सारी,
आई किन्तु न मेरी वारी,
करूँ कुटी की अब तैयारी,
वहीं बैठ पछताऊँ मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर आऊँ मैं ?
कुटी खोल भीतर पाता हूँ,
तो वैसा हो रह जाता हूँ,
तुझको यह कहने पातो हूँ,
अतिथि कहो क्या लाऊँ मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किससे होकर पाऊँ मैं ?
विभव=धन। अतिथि = आगत,
आये
पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय
(फूल और काँटा)
हैं जनम लेते जगह में एक ही।
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
रात में उन पर चमकता चाँद भी।
एक ही सी चाँदनी है डालता ॥
मेह उन पर है बरसता एक सा।
एक सी उन पर हवायें हैं वहीं ॥
पर सदा ही यह दिखाता है हमें।
ढंग उनके एक से होते नहीं।
छेद कर काँटा किसी की उँगलियाँ।
फाड़ देता है किसी का वर वसन ॥
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर ।
भौंर का है वेध देता श्याम तन ॥
फूल लेकर तितलियों को गोद में।
भौंर को अपना अनूठा रस पिला ॥
निज सुगन्धों श्री निराले रंग से।
है सदा देता कली जी की खिला ॥
है खटकता एक सब की आँख में।
दूसरा
है सोहता सुर-सीस पर॥
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे।
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर॥
मेह मेघ । वर=श्रेष्ट । वसन=कपड़ा । पर-पङ्ख । कतर=काट
। सोहता=शोभित होता । सुर=देवता । सीस=सिर ।
६० ) ( एक तिनका ) मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ। एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा॥ श्रा अचानक दूर से उड़ता हुश्रा। एक तिनका आँख में मेरी पड़ा॥१॥ मैं झिझक उट्ठा, हुश्रा बेचैन सा। लाल होकर आँख भी दुखने लगी। Dठ देने लोग कपड़े की लगे। ऐंठ बेचारी दवे पावों भगी॥२॥ जब किसी ढव से निकल तिनका गया। तब समझ ने यों मुझे ताने दिये। ऐंठता तू किस लिये इतना रहा। एक तिनका है बहुत तेरे लिये ॥३॥ . ( एक बूंद ) ज्यों निकल कर बादलों की गोद से। थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी॥ सोचने फिर फिर यही जी में लगी। आह क्यों घर छोड़ कर यों मैं कढ़ी ॥१॥ दैव मेरे भाग में क्या है बदा। मैं बनूंगी या मिलूँगी धूल में ॥ या जलूगी गिर अँगारे पर किसी। चू पड़ेंगी या कमल के फूल में ॥२॥ ॥ ऐंठा =तना। मुंडेरे-छज्जे । ढब= तरकीब, उपाय । कढ़ी- निकली। दैव-विधाता । भाग=भाग्य, प्रारब्ध । बदा-लिखा।
( ६१ ) बह गई उस काल एक ऐसी हवा । यह समुन्दर ओर आई अनमनी एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला। वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ॥३॥ लोग यों ही हैं झिझकते सोचते। जब कि उनको छोड़ना पड़ता है घर ॥ किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें । लौं कुछ और ही देता है कर ॥४॥ बूंद अनमनी-चंचल, अन्य मनस्क ।
पं० गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही ( लड़कपन ) चित्त के चाव, चोचले मन के, वह बिगड़ना घड़ी घड़ी बन के। चैन था, नाम था न चिन्ता का, थे दिवस और ही लड़कपन के ॥१॥ झूठ जाना कभी न छल जाना, पाप का पुण्य का न फल जाना। प्रेम वह खेल से खिलौनों से, चन्द्र तक के लिये मचल जाना ॥२॥ चन्द्र था और और ही तारे, सूर्य भी और थे प्रभा धारे। भूमि के ठाठ कुछ निराले थे, धूलि-कण थे बहुत हमें प्यारे ॥३॥ सब सखा शुद्ध चित्तवाले थे, प्रौढ़ विश्वास प्रेमपाले थे। अब कहाँ रह गई बहारें वे, उन दिनों रंग ही निराले थे॥४॥ सूर्य के साथ ही निकल जाना, दिन चढ़े घूम-घाम कर आना। काम था काम से न धन्धे से, काम था सिर्फ खेलना खाना ॥५॥ चाव-चाह, इच्छाएँ । चोचले नखरे । धारे धारण किये com ( ६३ ) फिर मिला इस तरह नया जीवन, पुस्तकों में पड़ा लगाना मन। मिल चले जब कि मित्र सहपाठी, बन गया एक बाग बीहड़ बन ॥६॥ भार यद्यपि कठिन उठाना था, किन्तु उद्योग ठीक ठाना था। हौसले से भरा हुआ मन था, और दिन और ही ज़माना था ॥६॥ अब दशा वह कहाँ रही मन की, फिक्र है धर्म-धाम, तन, धन, की। एक चूंसा लगा गई दिल पर. याद जब आ गई लकड़पन की॥८॥ -
खूनी होते हैं
जगत के
रंग।
लाला भगवानदीन
(मेहेंदी)
तुमने पैरों में लगाई मेहँदी ।
मेरी श्राखों में समाई महँदी॥
सब्ज़
दे रही है यह दुहाई महँदी ।
कुल से छूटी कूट कर पीसी गई।
तब तेरे पद छूने पाई मेहँदी ॥
कष्ट से मिलता है जग में इष्ट पद।
बात यह सच्ची बताई महँदी ॥
खैर कहता है कलेजा देके निज ।
मैंने है राती बनाई महँदी ।
है कथन मेरा मेरे अनुराग से।
ले गई है कुछ ललाई महँदी।
माई के लालों से यह लाली मिली।
इससे ढाँपे हैं ललाई मेहँदी ॥
वस्तु मँगनी की सुरक्षित ही रहे ।
दिल में रखती है ललाई मेहँदी॥
नील नभ में ज्यों छिपी ऊषा रहे।
त्यों छिपाती है ललाई मेहँदी ।
प्रात सन्ध्या से तुम्हारे पैर पर ।
व्यक्त करती है ललाई महँदी॥
सब्ज़हरे । दुहाई साक्षी । इष्ट= चाहा हुा । राती= लाल ।
( ६५ )
रागमय जन अंग हैं शृङ्गार के।
यह प्रकट देती दोहाई मेहंदी॥
दिल में रखना चाहिये अनुराग को।
सीख देती है सोहाई मेहँदी।
मेरी प्यारी के युगल-चरणों के साथ।
रखती है गाढ़ी सगाई मेहँदी ॥
पैर पड़ पड़ कर पकड़ लेती है हाथ ।
छल के वामन से सवाई मेंहदी॥
(वीर-माता)
वीरों की सुमाताओं का यश जो नहीं गाता ।
वह व्यर्थ सुकवि होने का अभिमान जनाता ॥
जो वीर-सुयश गाने में है ढील दिखाता।
वह देश के वीरत्व का है नाम लजाता ॥
दुनियाँ में सुकवि नाम सदा उसका रहेगा।
जो काव्य में वीरों की सुभग कीर्ति कहेगा।
'वाल्मीकि ने जब वीर चरित राम का गाया।
सम्मान सहित नाम अमर अपना बनाया।
श्री व्यास ने तब नाम सुकवियों में है पाया।
भारत के महायुद्ध का जब गीत सुनाया ॥
कब चंद भी हिन्दी का सुकवि आदि कहाता।
यदि धीर पिथौरा का सुयश गान न गाता ।
'होमर' जो है यूनान का कवि आदि कहाया।
उसने भी
सुयश
वीरों का है जोश से गाया ॥
राग= अनुराग, ललाई । सोहाई=शोभित होने वाली। गाढी-
अधिक । सगाई =अपनापन, मित्रता । ढील-आलस्य । सुभग-सुन्दर ।
श्रादि-पहला।
५
( ६६ )
'फिरदौसी' ने भी नाम अमर अपना बनाया।
जब फारसी वारों का सुयश गा के सुनाया ॥
सब वीर किया करते हैं सम्मान कलम का।
वीरों का सुयशगान है अभिमान कलम का ॥
इस वक्त हैं हिन्दी के बहुत काव्य सुरंधर ।
श्राचार्य कोई, इन्दु कोई, कोई प्रभाकर ।
काव्याद्रि कोई कोई हैं साहित्य के सागर ।
हैं काव्य के कानन में कोई सिंह भयंकर ॥
काव्य सुकुल-कामिनी का बाल हूँ अज्ञान।
इस हेतु मुझे भाता है माताओं का यशगान ॥
मैं
-
सम्मान= आदर । काव्याद्रि- कविता के पहाड़ । भाता है = अच्छा
मालूम पड़ता है।
।
पं० माखन लालजी चतुर्वेदी
'एक भारतीय प्रात्मा'
(नव-स्वागत)
तुम बढ़ते ही चले मृदुल तर जीवन की घड़ियाँ भूले।
काठ छेदने लगे सहसदल की नव पंखड़ियाँ भूले ॥
मन्द पवन सन्देश दे रहा, हृदय कली पथ हेर रही।
उड़ो मधुप ! नन्दनकी दिशिम ज्वालाएँ घर घेर रही।
तरुण तपस्वी ! श्रा, तेरा कुटिया में नव स्वागत होगा।
दोषी ! तेरे चरणों पर फिर मेरा मस्तक नत होगा।
(उन्मूलित वृक्ष)
भला किया, जो इस उपवन के सारे पुष्प तोड़ डाले।
भला किया, मीठे फलवाले ये तरुवर मरोड़ डाले।
भला किया, सींचा-पनपाओ, लगा चुके हो जो कलमें ।
भला किया, दुनियाँ पलटा दी प्रबल उमंगों के बल में।
लो, हम तो चल दिए, नये पौधो-प्यारो आराम करो।
दो दिन की दुनियाँ में आये, हिलो-मिलो कुछ काम करो॥
पथरीले ऊँचे टीले हैं, रोज़ नहीं सींचे जाते।
वे नागर न यहाँ आते हैं, जो थे बागीचे पाते।
सहसदल=कमल । हेर रहो-देख रही है, हूँद रही है। नत=
मुका। तस्वर=श्रेष्ठ वृक्ष । कलमें = पौधों की वह शाखें जो एक जगह
से उखाड़कर दूसरी जगह लगाई जाती हैं। नागर = भद्रपुरुष ।
झुकी टहनियाँ तोड़ तोड़कर, बनचर भी खा जाते हैं।
शाखामृग कन्धों पर चढ़कर, भीषण शोर मचाते हैं।
दीनबन्धु की कृपा! बन्धु, जीते हैं, हाँ, हरियाले हैं।
भुले भटके कभी गुज़रना हम वोही फलवाले हैं।
-
वनचर: बनैले पशु । शाखामृग = बन्दर । गुजरना=आना । :
श्रीजयशंकर 'प्रसाद'
(विषाद)
कौन प्रकृति के करुण काव्य सा
वृक्षपत्र
की
मधुछाया में,
लिखा हुआ-सा अचल पड़ा है
अमृत सदृश नश्वर काया में
अखिल विश्वके कोलाहल से
दूर सुदूर निभृत निर्जन में,
गोधूली के मलिनांचल में
कौन जंगली बैठा बन में?
शिथिल पड़ी प्रत्यंचा किसकी
धनुष भग्न, सब छिन्न जाल है
बंशी नीरव
में
तरकस का भी बुरा हाल है।
किसके तममय अन्तरतम में
झिल्ली की झनकार हो रही?
स्मृति सन्नाटे से भर जाती
चपला ले विश्राम सो रही।
पड़ी धूल
मधु-मीठी ।
अचल=निश्चेष्ट, स्थिर । नश्वर =नाशमान ।
अखिल =समस्त । कोलाहल = शोरगुल । निभृतः
= एकान्त । निर्जनः
जनहीन । मलिनांचम = धुंधली छाया।
प्रत्यंचा=धनुष की डोरी । भग्न =टूटा हुआ । नीरव चुक
रवहीन । तममय =अँधेरा। चपला-बिजली ।
(७०) . किसके अन्तःकरण अजिर में अखिल व्योम का लेकर मोती, आँसू का बादल बन जाता फिर तुषार की वर्षा होती ? विषयशुन्य किसकी चितवन है, ठहरो पलक, अलक में श्रालल? किसका यह सूखा लुहाग है ? छना हुश्रा किसका सारा रस? निर्भर कौन बहुत बल खाकर बिलखाता, ठुकराता फिरता, खोज रहा है स्थान धरा में अपने ही चरणों में गिरता? किसी हृदय का यह विषाद है छेड़ा मत, यह सुख का कण है; उत्तेजित कर मत दौडायो, करुणा का यह थका चरण है। ms- अजिर = आँगन । अखिल =समस्त । व्योम=आकाश । तुषार = वर्क विषयशून्य-निर्विकार, भोली भाली, सरल । अलक = बाल । धरा-पृश्वी। है - पं० सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' (विधवा) वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-ली, वह दीप-शिखा-सी शान्त, भाव में लीन, वह क्रूर काल ताण्डव की स्मृति-रेखा-सी, वह टूटे तरु की छुटी लता-सी दीन- दलित भारत की विधवा है षड् ऋतुओं का श्रृंगार, कुसुमित कानन में नीरव पद-संचार, श्रमर कल्पना में स्वच्छन्द बिहार- व्यथा की भूली हुई कथा है उसका एक स्वप्न अथवा है। उसके मधु सुहाग का दर्पण, जिसमें देखा था उसने बस, एकबार विम्बित अपना जीवनधन, अबल हाथों को एक सहारा- लक्ष्य जीवन का प्यारा-वह ध्रुवतारा- दूर हुश्रा वह बहा रहा है - दीपशिखा=दीपक की लौ । लीन = लगी हुई, भूली हुई। स्मृति रेखा याद की निशानी । तर = वृक्ष । छुटी=गिरी हुई । दीन = ग़रीब । षड् ऋतु=छ ऋतुएँ, बसन्त-हेमन्त-ग्रीष्म-वर्षा-शिशिर-शरद । कुसुमित= फूले हुए । कानन =वन । पद-संचार टहलना । विम्बित = परछाई पड़ती हुई।
( ७२ ) उस अनन्त पथ से करुणा की धारा। हैं करुणा-रस से पुलकित आँखे; देखो तो भीगी मन मधुकर की पाखें रसावेश में निकला जो गुंजार घह और न था कुछ, था बस हाहाकर । करुणा की सरिता के मलिन पुलिन पर, टूटी हुई कुटी का मौन बढ़ाकर छिन्न हुए भीगे आँचल में मन को- सूखे सूखे अधर-त्रस्त चितवन को दुनियाँ की नजरों से दूर बचा कर वह रोती अस्फुट स्वर में; सुनता है श्राकाश धीर निश्चल-समीर- सरिता की वे लहरें भी ठहर ठहर कर । (क्या गाऊँ) क्या गाऊँ ? माँ! क्या गाऊँ? गूंज रही हैं जहाँ राग रागिनियाँ गाती हैं किन्नरियाँ कितनी परियाँ कितनी पंचदशी कामिनियाँ, वहाँ एक यह लेकर वीणा दीन, तंत्री क्षीण-नहीं, जिसमें कोई झंकार नवीन, रुद्ध कण्ठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ ? माँ!-क्या गाऊँ? छाया है मन्दिर में तेरे यह कितना अनुराग! चढ़ते हैं चरणों पर कितने फूल, पाखें पङ्ख, डैना । सरिता=नदी। पुलिन = तट । छिन= फटा, टुकड़े टुकड़े हुा । अधर=ोठ । त्रस्त =ढरी हुई। किरियाँ स्वर्ग की स्त्रियाँ।
( ७३ )
मृदुदल, सरस-पराग।
गन्ध-मोद-मद पीकर मन्द समीर
शिथिल चरण जब कभी बढ़ाती भाती,
सजे हुए उसके बजते अधीर नूपुर-मंजीर,
कहाँ एक निर्गन्ध कुसुम उपहार !!
नहीं कहीं जिसके पराग-संचार-सुरभि-परिवार !!
कैसे भला चढ़ाऊँ?
माँ! क्या गाऊँ?
पराग= पुष्प-धूल । गन्ध-मोद-मद सुमन्धि की प्रसन्नता की
शराव । समीर =हवा । शिथिल =थके हुए । नूपुर-मंजीर-पैरों का
आभूषण । पराग-संचार = फैलती हुई सुगन्ध । सुरभि सुवास ।
पं० सुमित्रानन्दन पन्त
( १ )
।
?
स्नेह चाहिए सत्य, सरल !
कैसा ऊँचा नीचा पथ है
माँ! उस सरिता का अविरल
तेरे गीतों को
वह जिसमें
गाती है टल टल छल छल ।
मैं भी उससे गीत सीखने
आज गयी थी उसके पास
उसके कैसे मृदुल भाव हैं ?
उज्वला तन, मन सी उज्वल!
कितने छन्दों में लहरा कर
गाती है वह तेरे गीत?
एक भाव से अपने सुख-दुख
तुझे सुनाती है कल् कल् ?
माँ! उसको किसने बतलाया
उस अनन्त का पथ अज्ञात?
वह न कभी पीछे फिरती है
कैसा होगा उसका बल?
एक ग्रन्थि भी नहीं पड़ी है
उसके सरल मृदुल उर में,
उसका कैसा कर्मभोग है,
वह चंचल है. या अविचल ?
सरिता नदी । अविरल = निरन्तर । मृदुल = कोमल । प्रन्धि =
गाँठ । उर= हृदय । अविचल-स्थिर ।
( ७५ ) ( २ ) इस पीपल के तरुके नीचे किसे खोजते हो खद्योत ! जहाँ मलिनता विचर रही है, जहाँ शून्यता का है स्त्रोत । सदन लौटता प्रवासी तप्त-अश्रु-जल-अंजलि दे, पूत कर गया था जिस तरु को सकल स्वार्थ की निज बलि दे। क्षीण ज्योति में निज, किसका धन ढूँढ़ रहे हो कर तम भङ्ग? किस अशाता के जीवन को ज्योतित हो कर रहे, पतंग? उस निर्दोषा का क्या जिसकी वायु-भक्षिणी वेणी में, पड़कर तड़पा हाय ! प्रवासी लुटे हुओं की श्रेणी में! किन्तु शलभवर ! उसे न छेड़ो सोने दो उसको उस पार, तरु=वृत्त, पेड़। खोजते हो-हूँढ़ते हो । खद्योत = जुगनू । मलिनता-मैलापन । सदन = घर । प्रवासी-विदेश गया हुआ। तब স্বতন্ত্র अंजलि=गरम आँसुओं की अंजलि । पूत = पवित्र । ज्योति = प्रकाश । तम-भङ्ग = अँधेरा दूर कर के। ज्योतित - प्रकाशित । पतंग- कीड़ा, जुगनू । वायुभक्षिणी- हवा पीने वाली । वेणी = चोटी। श्रेणी समूह, क्रतार।
( ७६ )
वहीं स्वप्न में पा लेगी वह
अपने प्रियतम का उपहार।
जब जीवन के स्रोत सम्मिलित
हो जाते हैं किसी प्रकार ।
उन्हें नहीं तब बिछुड़ा सकता
सखे! स्वयं तारक करतार।
-
पं० रामनरेश त्रिपाठी
(अन्वेषण)
मैं ढूँढ़ता तुझे था जब कुंज और बन में।
तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में ॥
तू प्राह बन किसीकी मुझको पुकारता था।
मैं था तुझे बुलाता, संगीत में, भजन में ॥
मेरे लिये खड़ा था दुखियों के द्वार पर तू।
मैं बाट जोहता था तेरी किसी चमन में॥
बनकर किसी के आँसू मेरे लिए बहा तू।
मैं देखता तुझे था माशूक के बदन में।
दुख में रुला रुलाकर तू ने मुझे चिताया।
मस्त हो रहा था तब, हाय, अंजुमन में ॥
बाजे बजा बजाकर मैं था तुझे रिझाता।
तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में ॥
मैं था विरक्त तुझसे जगकी अनित्यता पर ।
उत्थान भर रहा था तब तू किसी पतन में।
तू बीच में खड़ा था बेबस गिरे हुओं के।
मैं स्वर्ग देखता था ! झुकता कहाँ चरन में ॥
तू ने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं ।
तू कर्म में मगन था मैं व्यस्त था कथन में ।
वतन-घर । चमन फुलवारी, बगीचा । माशूक = प्रेमी ।
चिताया=चेतावनी दी । अंजुमन सम्मिलन । अनित्यता = नश्वरता,
अस्थरिता । उत्थान = उत्कर्ष, उन्नति । पतन =अवनति, अधोगति ।
( ७८ ) हरिचन्द्र और ध्रुव ने कुछ और ही बताया। मैं तो समझ रहा था तेरा प्रताप धन में। मैं सोचता तुझे था रावण की लालसा में। पर था दधीच के तू परमार्थरूप तन में ॥ तेरा पता सिकन्दर को मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था फरहाद-कोहकन में ॥ क्रीसस की हाय में था करता विनोद तू ही। तू ही विहँस रहा था महमूद के रुदन में॥ प्रह्लाद जानता था तेरा सही ठिकाना। तू ही मचल रहा था मंसूर की रटन में॥ कैसे तुझे मिलँगा जव भेद इस कदर है। हैरान होकर भगवन् आया हूँ मैं सरन में। तू रूप है किरन में, सौन्दर्य है सुमन में। तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में॥ तू ज्ञान हिन्दुओं में, ईमान मुसलिमों में। विश्वास क्रिश्चियन में, तू सत्य है सुजन में ॥ हे दीनबन्धु ऐसी प्रतिभा प्रदान कर तू। देखें तुझे दूगों में, मन में तथा बचन में । कठनाइयाँ दुखों का इतिहास ही सुधन मुझको समर्थ कर तू बस कष्ट के सहन में दुख में न हार माने, सुख में तुझे न भलं । ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन (कहानी) आँख मूंदिए तो निज घर की मिलेगी राह आँख खोलते हो जग स्वप्न है विरह का। फरहाद-कोहकन = फरहाद के द्वारा पहाड़ से निकाली हुई नहर । सही असली । सुमन-फूल । विस्तार-फैलाव । गगन = आसमान । है
( 8 )
मन खोइये तो कुछ पाइये अनोखा धन
हानि में है लाभ यह अजब तरह का ॥
आँख लगते ही फिर आँख लगती नहीं
सुख है विचित्र इस घर के कलह का।
काल की कही हुई कहानी है जगत यह
मनुज इसी में रहता है नित्य बहका ॥
इन आँख।
आँख लगते ही प्रेम होते ही। आँख लगती ही नहीं-नींद नहीं
श्राती। बहकाभूला हुआ।
गोपालशरण सिंह
(चन्द्र खिलौना)
देख पूर्ण चन्द्रमा को मचल गया है शिशु
लूंगा मैं खिलौना यह मुझे अतिभाया है।
माता ने अनेक भाँति उसे समझाया पर
एक भी न माना और ऊधम मचाया है।
निज चन्द्रमुख का रुचिर प्रतिविम्ब तब
दिखाकर दर्पण में उसे बहलाया है।
हँसकर कौतुक से बोली चारु चन्द्रमुखी.
ले तू अब चन्द्र, वह इसमें समाया है ।।
देख श्रारसी में परछाई पूर्ण चन्द्रमा की
शिशु ने समोद निज हाथ को बढ़ाया है।
उसी क्षण चन्द्रबदनी के मुखचन्द्र का भी
देख पड़ा वहाँ प्रतिविम्ब मन भाया है।
जान पड़ता है उन दोनों को विलोक कर
एक ही समान उन्हें विधि ने बनाया है।
लूँ मैं किसे और किसे छोडूं हीन मानकर
इस असमंजस में वह घबराया है।
(अज्ञान)
पान मैं न खाती कभी तो भी ये अधर मेरे
लाल लाल होते जारहे हैं क्यों प्रवाल से?
मचलना-हठ, ज़िद करना । चन्द्रमुख मुंह रूपी चन्द्रमा ।
खबिर सुन्दर । प्रतिविम्ब परछाई। आरसी= दर्पण, आइना । हीन
निकृष्ट, नीचा । असमंजससोचविचार । अधर = ओठ । प्रवाल-मूंगा।
।
( १ )
बढ़ गये सत्य ही क्या मेरे ये विलोचन हैं
लगते न जाने क्यों वे मुझको विशाल से।
ज़ोर ज़ोर मुझसे चला है क्यों न जाता अब
सीख-सी रही हूँ मन्द चाल मैं मराल से।
सजनी भला क्यों मुझे यह गुड़ियों का खेल
खेलना न नेक भी है भाता कुछ काल से?
विलोचन-आँखें । विशाल = बड़े । मराल-हंस । नेकजरा ।
भाता अच्छा लगता। काल-समय ।
६
३
. बेटी को विदा प्यारी बहिन, लौंपती हूँ मैं अपना तुम्हें खज़ाना। है इसपर अधिकार तुम्हारे बेटे का मनमाना ॥ रक्त, माँस, हड्डी, तन मेरा है यह बेटी प्यारी । करो इसे स्वीकार, हुई यह अब सब भाँति तुम्हारी ॥१॥ पूजे कई देवता हमने तब इसको है पाया। प्राण समान पालकर इसको इतना बड़ा बनाया ॥ श्रात्माही यह अाज हमारी हमसे बिछुड़ रही है। समझाती हूँ जी को तो भी धरता धीर नहीं है ॥२॥ बहिन, ढिठाई माता की तुम मन में नेक न धरियो। इस कोमल बिरवा की रक्षा बड़े चाव से करियो । है यह नम्र मेमने से भी, भीरु मृगी से बढ़कर । कड़ी बात या चितवन से यह कैंप जाती है थर थर ॥३॥ है गवार यह भोली, इसने नहीं शिष्टता जानी। तिस पर भी गुरुजन की भाशा बड़े प्रेम से मानी ॥ साँचे में तुम इसे ढालियो कभी न यह तड़केगी। बहिन सिखाने से चतुराई बेटी सीख सकेगी ॥४॥ यह गुड़िया, यह लक्ष्मी अपनी, जीवन मूल दुलारी। हृद्य थाम कर करती हूँ मैं अब आँखों से न्यारी॥ माता-नेह सोच दुख मेरा अनुमानो। ममता छिपती नहीं छिपाए बहिन सत्य यह जानो ॥५॥ बिछुड़ रही है =अलग हो रही है । बिरवा-पौधा । मेमना= बकरी का बच्चा । भीरु= डरपोक । शिष्टता-सभ्यता, शिष्टाचार । तुम मन में ( ३ ) इसका रूप निहार दिव्य मैं पल पल सुख पाती थी। गान समान सुरीली बोली इसकी मनभाती थी॥ बहिन तुम्हें भी ये सब बातें जान पड़ेगी भागे। अपने नैन रखोगी इस पर जब तुम भी अनुरागे ॥६॥ पं० कामता प्रसाद गुरु अनुरागे=प्रेम से युक्त ।
अङ्गद-रावण संवाद
मम निवेदन है कुछ अापसे, सुन उसे उर में धर लीजिए।
अहण है करता जिस युक्ति से, मक्षुप सारस-सार सहर्ष हो ।
जनकजा रघुनायक हाथ में, तुरत जाकर अर्पण कीजिए !
परबधूजन से रहते सदा, अलग सन्तत सन्त तमीचर !
से रहना यदि है तुम्हें, दनुज तो फिर गर्व न कीजिए।
शरण में गिरिए रघुनाथ के, निबल के बल केवल राम हैं।
दुखद है तुमको जनकात्मजा, तुरत दूर उसे कर दीजिए।
सुखद हो सकती न उलूक को, नय-विशारद ! शारद-चन्द्रिका ॥
बहुत बार हुए विजयी सही, पर नहीं रहते दिन एक से।
सँभल के रहिए, अब श्रापकी, ग्रहदशा न दशानन ! है भली ॥
स्वकुल की करिए शुभ कामना, सपदि युक्ति वही नृप ! सोचिए.
न अब भी जिसमें करना पड़े, कठिन संगर सङ्ग रमेश के॥
स्वमन को वश में रखिए सदा, अनयसे परवस्तु न लीजिए।
नृप कभी सुखदायक है नहीं, सुत, रसा, धन, साधन के बिना।
समय है अनमोल कुकर्म में, तुम विनष्ट करो उसको नहीं।
दनुज है जग में सुखदायिनी, नियमहीन मही न महीप को॥
पं० रामचरित उपाध्याय ।
मधुप = भौंरा । सारस = इस नाम का एक पक्षी । सार = रस, तत्व ।
सन्तत -हमेशा । सन्त-भले आदमी । तमीचर -राक्षस, रावण । दनुज
- राक्षस, रावण । नय-विशारद नीति जानने वाले। शारद-चन्द्रिका-
शरदकाल की चाँदनी । सपदि = शीघ्र । संगर = युद्ध । रमेश = रामचन्द्र ।
अनय = अनीति । रसा-पृथ्वी, भूमि । मही=भूमि । महीप= राजा ।
ताजमहल पति-प्रेम का प्रभा-पुञ्ज-प्रासाद । हे भारत के विस्मयकर आह्लाद ॥ लखकर तेरा रूप अनूप विशाल । हुश्रा अतीव विचित्र हृदय का हाल ॥ स्थपति-शिल्प-सौंदर्य-सुरुचि का सन । प्रेम-पूर्ण पनि प्रियता का पद्म ॥ भूतल का प्रस्तर खनि-मणि-भण्डार। नारी-कुल के श्रादर का श्रागार ॥ विस्मय के रत्नाकर का श्रादर्श । पत्नीव्रती नृपति के हियका हर्ष ॥ 'शाहजहाँ' के शासन का उत्कर्ष । जय जय जय तत्कालिक भारतवर्ष ॥ ताज-महल ! तू महलों का सिरताज । सप्ताश्चर्यों का तू है नृपराज ॥ पं० लोचन प्रसाद पाण्डेय । --- प्रभापुञ्ज-दोप्तिमान । प्रासाद =महल । विस्मयकर आश्चर्य- जनक । श्राह्लाद-प्रसन्नता । स्थपति-बढ़ई । सन= स्थान । पद्म = कमल । प्रस्तर = पत्थर । खनिखान । विस्मय =अाश्चर्य । रत्नाकर = समुद्र । सप्ताश्चर्य = दुनियाँ की सात आश्चर्यजनक वस्तुएँ ।
में वन-विहंगम बन-बीच बसे थे, फंसे थे ममत्व में, एक कपोत-कपोती कहीं। दिन रात न एक को दूसरा छोड़ता, ऐसे हिले-मिले दोनों वहीं बढ़ने लगा नित्य नया नया नेह, नई नई कामना होती रहीं। कहने का प्रयोजन है इतना, उनके सुख की रही सीमा नहीं। रहता था कबूतर मुग्ध सदा अनुराग के राग में मस्त हुआ। करतीथी कपोती कभी यदि मान, मनाताथा पाल जा व्यस्त हुआ। जब जो कुछ चाहा कबूतरी ने, उतना वह वैसे समस्त हुआ। इस भाँति परस्पर पक्षियों में भी, प्रतीति से प्रेम प्रशस्त हुआ। दिन एक बड़ा ही मनोहर था छवि छाई बसन्त की कानन में। सब ओर प्रसन्नता देख पड़ी जड़ चेतन के तन में मन निकले थे कपोत कपोती कहीं पड़े झुण्ड में घूम रहे बन में। पहुँचा यहाँ घोंसले पास शिकारी शिकार की ताक में निर्जन में। उस निर्दय ने उसी पेड़ के पास विछा दिया जाल को कौशल से। वहाँ देख के अन्न के दाने पड़े चले बच्चे अभिज्ञ जो थे छल से ॥ नहीं जानते थे कि यहीं पर है कहीं दुष्ट भिड़ा पड़ा भूतल से। बस फाँस के बाँस के बन्धन में कर देगा हलाल हमें बल से॥ कपोत = कबूतर । नेह =स्नेह, प्रेम । प्रयोजन = अभिप्राय । अनु- राग-प्रेम । मान-अभिमान । व्यस्त-चंचल । प्रतीत=विश्वास । प्रशस्त = बढ़ा, फैला। कानन = वन, जंगल । जड़ =निर्जीव । चेतन प्राणवान् । निर्जन अकेले । कौशल = चतुराई । अभिज्ञ = यह प्रयोग यहाँ अशुद्ध है । इसका अर्थ है जानकार कवि ने अनभिज्ञ (अनजान) के अर्थ में इसका प्रयोग किया है। भिड़ा= लेटा । भूतल =जमीन । हलाल =मार डालना ।
न ( ८७ ) जब बच्चे फंसे उस जाल में जा तब वे घबड़ा उठे बन्धन में। इतने में कबूतरी आई वहाँ दशा देख के व्याकुल हो मन में ॥ कहने लगी हाय हुश्रा यह क्या सुत मेरे हलाल हुए बन में। अब जाल में जाके मिलूँ इनसे सुख ही क्या रहा इस जीवन में। उस जाल में जाके बहेलिये के ममता से कबूतरी श्राप गिरी। इतने में कपोत भी पाया वहाँ उस घोंसले में थी विपत्ति निरी॥ लखते ही अँधेरा सा भागे हुश्रा घटना की घटावह घोर घिरी। नयनों से अचानक बूंद गिरे चेहरे पर शोक की स्याही फिरी॥ यहाँसोचताथा यों कपोत, वहाँ चिड़ीमार ने मार निशाना लिया। गिर लोट गया धरती पर पक्षी बहेलिये ने मनमाना किया। पल में कुल का कुल, कालकराल ने भूत भविष्य में भेज दिया। क्षण भंगुर जीवन की गति का यह एक निदर्शन है बढ़िया ॥ हर एक मनुष्य फँसा जो ममत्व में तत्व महत्व को भूलता है। पर अन्त को ऐसे अचानक अन्तक अस्त्र अवश्य ही हूलता उसके सिर पे खुला खड्ग सदाबँधा धागे में धार से झूलता है। वह जाने बिना विधि की गति को अपनी ही गढन्त में भूलता है ॥ प्रिय पाठक श्रापतो विज्ञ ही हैं, फिर आपको क्या उपदेश करें। सिर पैशर ताने बहेलिया काल खड़ा हुआ है यह ध्यान धरें ॥ दशा अन्त को होनी कपोत की ऐसी परन्तु नाश ज़रा भी डरें। निज धर्म के कर्म सदैव करें कुछ चिन्ह यहाँ पर छोड़ मरें ॥ श्री रूपनारायण पाण्डेय । सुत=बच्चे । बहेलिया =शिकारी। निरी= केवल, सिर्फ । घटा- बादल, मेघ । नयनों से आँखों से। भूतबीता हुआ समय । भविष्य = आने वाला समय । क्षण- भंगुर =नश्वर, अस्थायी । निदर्शन = दृश्य, तस्वीर । तत्व = सच्ची बात। महत्व=बड़प्पन । खड्ग=तलवार । धागे=डोरे । विधि विधाता, स्रष्टा । गढन्त =गढ़नेवाला, उत्पादक । .
(१)
जाना चाहा किधर, विश्वगति मुझे कहाँ पर ले आई ?
विधि ऐसा प्रतिकूल हुश्रा, कुछ बात न बिगड़ी बन पाई ॥
पता नहीं मेरे जीवन की नाव किधर बहती जाती?
"है तुमसे बलवान विधाता"-यह मुझसे कहती जाती॥
(२)
है मुझसे बलवान विधाता कहता है मेरा जीवन ।
नहीं मानता लाख मनाया पर मेरा अभिमानी मन ॥
कभी न विधि को शीश झुकाया मैंने लाखों दुख सहकर।
'जो चाहे तू कर सकता है'-कभी न बैठा यों कहकर ॥
क्या हूँ मैं आखिर दुनियाँ में ? क्या हूँगा निजत्व खोकर?
रहना है क्या मुझे किसी के कर की कठपुतली होकर ?
क्या हूँ सो तो नहीं जानता, पर कुछ हूँ इतना है ज्ञान ।
'कुछ' की भी सत्ता होती है, सत्ता का होता अभिमान ।
(४)
कभी न वह पाएगी जीवन की नौका स्वतंत्र होकर ।
ले जाऊँगा उसे लक्ष्य पर मैं अपना सर्वस खोकर ॥
आफ़त के तूफ़ान उठे, पर होगी गति अपने कर में।
जिस दिन कर से छूट बहेगी ले डूबॅगा सागर में ।
विश्वगति = दुनियाँ की रफ्तार । विधि-विधाता, ब्रह्मा। शीश=
सिर । निजत्व = अपनापन । कर हाथ । सत्ता=अस्तित्व, रूप।
लक्ष्य निर्दिष्ट स्थान । गति =चाल, रफ्तार ।
.
( 8 )
(५)
हे अदृश्य की महाशक्तियो, मत करना मेरा उद्धार ।
मुझे देखना है इस 'मैं' की अन्तिम सीमा का विस्तार ॥
लाया हूँ मैं इस दुनियाँ में 'मैं' की सत्ता का उन्माद ।
पता नहीं क्या है अदृश्य में 'मैं के मिट जाने के बाद ॥
श्री विक्रमादित्यसिंह, बी० ए० 'विक्रम'
१
अदृश्य =न दीख पड़नेवाला । सीमा फैलाव, हद्द । उन्माद =
"पागलपन।
शव
(१)
इस धूलि में धरा क्या, जिसमें पड़े लपेटे ?
मेरे सरल
बटोही।
पथ-ताप से भरा क्या, किस हेतु मौन लेटे?
अनजान देश-द्रोही ।
(२)
ममता कहाँ चली है, यौवन कहाँ टहलता,
द्वग बन्द है तुम्हारे ।
सूखी कुसुम-कली है, भौंरा
नहीं मचलता,
उत्साह लुप्त सारे ।
(३)
भर कौन खेद मन में, किस सिन्धु-मध्य भोगी,
तरणी डुबा रहे हो।
कैसे सघन विजन में, सन्यास ले वियोगी।
जीवन डरा रहे हो।
मुरझा रही तुम्हारी, ऐश्वर्य-बेलि बोई,
प्याली शराब-हीना ।
सुरभित कनेर-क्यारी, बैठा उजाड़ कोई,
लूटा नया
नगीना।
बटोही-राहगीर, पथिक । ताप-गर्मी । हग -आँखें। कुसुम =
फूल । लुप्त = लोप होना, नष्ट होना। खेद = कष्ट । सिन्धु-मध्य =
समुद्र में । भोगी= विलासी, आराम तलब । तरणी = नाव । सधन =
धना। विजन-जनहीन, वन । कनेर-पुष्प विशेष ।
तारे। . ( १ ) (५) बहती न गीत-लहरी, स्वर हैं अपूर्ण मन के, चंचल कहीं इशारे। कैली अशान्ति गहरी, क्यों तुम बने गगन के, विक्षिप्त तुच्छ (६) उस पार से बुलाती, गोधूलि पंचरंगी, किस सोच में पड़े हो। बुलबुल बिहाग गाती, सोता मयूर किस तीर तुम खड़े हो। (७) चुनता न हंस मोती, कादम्बरी मलीना, भू रक्त-रंजिता है। उड़ती नहीं कपोती, वह आज पङ्ख-हीना, दुर्भाग्य-संचिता है। संगी, - कर टूक-टूक जीवन, तरुणी नवीन वाला, मूर्च्छित उधर पड़ी है। छूलो अछूत ! दामन, भर दो सुहाग प्याला, यम-यातना कड़ी है। (8) माँ का उदास क्रन्दन, सुनते नहीं बधिर ! क्यों, आखें अषाढ़-सी हैं। कादम्बरी =शराब । रक्षिता=गी हुई । दामन= आँचल ! क्रन्दन- रोना ।
( २ )
कोइ न सूझते फन, घेरे पड़ा तिमिर क्यों ?
घड़ियाँ विपत्ति की हैं।
(१०)
पागल पिता बिलखता, ज्वाला धधक धधकती,
है मौत का तमाशा।
बेटा उधर तड़पता, बेटी इधर सिसकती,
साथिन बनी निराशा।
(११)
तुम रम रहे जहाँ हो, उस देश से न कोई,
क्या भूल लौटता है।
कोकिल कहो कहाँ हो, भव-निधि अमूल्य खोई,
हाँ खून खौलता है।
(१२)
झूठा बना स्व-बाना, श्रव्यर्थ सिसकियों से,
दिल विश्व का दलेंगे।
कफ़नी ओढ़ा पुरानी, कस अंग रस्सियों से,
ले घाट पर चलेंगे।
(१३)
रोकर कुटिल पड़ोसी, मृदु फूल-सी तुम्हारी,
यह देह फूंक देंगे।
झुक जायँगे सदोषी, क्या मार दम कटारी,
अनुताप में मरेंगे
श्री गुलाबरन बाजपेयी “गुलाब
-
फन = तरकीब, उपाय । तिमिर = अन्धकार । भवनिधि = दुनियाँ का
धन अथवा दुनियाँ रूपी धन । स्व-बाना = अपना वेश । दुलेंगे-कुचल
देंगे।
विश्व कुसुम अनन्त की ओर आशाओं के स्वप्न क्षणिक जीवन के विषम विषाद विदा। भावों के सुख-स्वर्ग, कल्पना के सुन्दर प्रासाद विदा। विदा "अहं" की छलमय छाया, भ्रान्ति-पूर्ण उन्मत्त अशान्ति । उद्गारों के वेग, महत्वाकांक्षा के उन्माद विदा ।। माया और ममत्व, वासना के मतवाले राग विदा। के पागल करनेवाले मधुर-पराग विदा॥ विदा वेदना और हृदय की करुण-कथा के उपसंहार । परिधि-रहित परिताप और उस मौन व्यथा की आग विदा ।। लोलुप तृष्णा की उतावली-सी उन्मत्त-उमंग विदा। यौवन-मद के दीवानेपन की वह तरल-तरङ्ग विदा ।। विदा सुखों की विस्तृत लहरों की उच्छृङ्खल उच्च-उठान, और नाश के भीषण-स्वर की ध्वनि-प्रतिध्वनि के व्यंग्य विदा ।। श्री भगवतीचरण वर्मा pm- क्षणिक क्षणभंगुर, अस्थायी । विषम-दारुण, असमान । विषाद उदासी । प्रासाद = महल । भ्रान्तिपूर्ण =भ्रम से भरी हुई। उन्मत्त = पागल । उन्माद - पागलपन । पराग = पुष्प-धूल । उपसंहार = अन्तिम भाग । परिधि-सीमा। परिताप = पश्चात्ताप, सोच । लोलुप = लालची। तृष्णा प्यास, आकांक्षा । तरल = सजल । तरङ्ग = हिलोर। उच्छङ्खला -निरंकुश । प्रतिध्वनि = प्रतिशब्द, आवाज़ से उत्पन्न होनेवाली आवाज़।
-
भिखारिणी
हे जोवन की गली-गली में
फिरने वाली भिखारिनी,
यहाँ-वहाँ जाकर न माँग तू
आशा-वन की विहारिनी।
वे चुम्बन के फूल-और ये-
तेरे कलुषित होठ यहाँ-
कैसे खिलें ! बता दे, हिय में
लगी लगन की प्राग जहाँ ?
त्याग कहाँ ? वैराग्य कहाँ ?
हाँ, तेरा वह सौभाग्य कहाँ ?
राग यहाँ, अनुराग यहाँ,
है तेरा यह दुर्भाग्य यहाँ।
होठ नहीं तो, हाथ सही,
यदि हाथ नहीं तो चरण सही,
चरण नहीं तो, हे निष्ठुर ! उस
नूपुर का श्राभरण सही,
कुछ न सही तो उन श्राखों से
आश्वासन की शरण सही
प्राण-दान के मिस इस टूटे-
जीवन का संवरण सही॥
-पं० बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
-
विहारिनी-विहार करने, खेलने वाली। कलुषित = पापी, निन्दित । लगन
-अनुराग । नूपुर पैरों में पहनने का एक गहना । श्राभरण = पहनना,
पहनावा । श्राश्वासन-दिलासा। मिस-बहाने से। संवरण -समेटना ।
अज्ञात कौन तू उर-निकुञ्ज में बैठ, मृदुल स्वर में गा गा यह गीत- जगाता निष्ठुरता से छेड़, बता क्यों मेरा सुप्त अतीत ? थिरकने चंचल गति से वाह ! लगी हत्कम्पन पर तव तान । बिकलता से चरणों पर झुका,-रहा कर क्यों मेरा बलिदान ? देख अपने ही भीतर पैठ, कौन मैं ?-कह इतनी ही बात । बात-हत तरु-सा कर विच्छिन्न मुझे क्यों चला कहाँ "अज्ञात" प० जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज' सुप्त= सोया हुआ । अतीत =बीता समय । हृत्कम्पन-हृदय की धड़कन । वातहत हवा से उखाड़ा हुआ । तरु=पेड़। विच्छिन्न = टूटा हुआ।
आमंत्रण द्वग के प्रतिरूप सरोज हमारे उन्हें जग ज्योति जगाती जहाँ; जल बीच कलंब करंबित कूल से दूर छटा छहराती जहाँ; धन अंजन वर्ण खड़े तृणताल की झाई पड़ी दरसाती जहाँ ; विखरे बक के निखरे सितपंख बिलोक बकी बिक जाती जहाँ; दुम-अंकित, दूब-भरी,जलखंड-जड़ी धरती छबि छाती जहाँ; हर हीरक-हेम-मरक्त-प्रभा, ढल चंद्रकला है चढ़ाती जहाँ; हँसती मृदु मूर्ति कलाधर की कुमुदों के कलाप खिलाती जहाँ; घन-चित्रित अंबर अंक घरे सुषमा सरसी सरसाती जहाँ; निधि खोल किसानों के धूल सने श्रम का फल भूमि बिछाती जहाँ चुन के कुछ चोंच चला करके चिड़िया निज भाग बँटाती जहाँ; कगरों पर काँस की फैली हुई धवली अवली लहराती जहाँ; मिल गोपों की टोलीकछार के बीच है गाती श्री गाय चराती जहाँ; जननी धरणी निज अंक लिए बहु कीट पतंग खेलाती जहाँ; ममता से भरी हरी बाँह की छाँह पसार के नीड़ बसाती जहाँ; प्रतिरूप =समान । सरोज= कमल । कदम्ब= एक पुष्प विशेष । करम्बित =अंकुरित । कूल =किनारा । अंजन वर्ण = अत्यन्त काले । ताल =तालाब । झाई = परछाई । निखरे खिले हुए। सित = सफेद । दुम= वृक्ष । हर= हरण करके, छीन कर । हीरक= हीरा । हेम = सोना। मरक्त मरकत । कलाधर-चन्द्रमा। कुमुद कमलिनी। कलाप = समूह । धन-चित्रित= खूब गहरा खिंचा हुअा। अम्बर = आकाश । अङ्क = गोद। सुपमा=अत्यन्त शोभा। सरसी-नदी । कगरों किनारों। धवली=सफेद । अवली=समूह । कछार-तट । धरणी= भूमि । नीड़ =घोंसला। % 3D -
(७ )
मृदुबाणी मनोहर वर्ण अनेक लगाकर पंख उड़ाती जहाँ;
उजली कॅकरीली तटी में धंसी तनु धार लटी बलखाती जहाँ
दलराशि उठी खरे आतप में हिल चंचल चौंध मचाती जहाँ;
उस एक हरे रंग में हलकी गहरी लहरी पड़ जाती जहाँ;
कल कर्बुरता नभ की प्रतिबिम्बित खंजन में मन भाती जहाँ;
कविता वह ! हाथ उठाए हुए, चलिए कविवृन्द बुलाती वहाँ।
पं० रामचन्द्र शुक्ल
तनुधार =शरीर धारण कर के । दुलराशि = अंकुर समूह । खरे=
तीखे । प्रातप-धूप । चौंध = चमक । लहरी रेखा । कर्बुरता अनेक
रंग । नभ = आकाश । प्रतिविम्बित = परछाई पड़ती हुई। खंजन = एक
पती विशेष
उद्गार
मेरे जीवन की लघु-तरणी !
आँखों के पानी में तर जा!!
मेरे उर का छिपा खज़ाना,
अहंकार का भाव पुराना,
बना श्राज तू मुझे दिवाना,
तप्त-स्वेद-बूंदों में ढर जा!
मेरे नयनों की चिर-आशा,
प्रेम-पूर्ण-सौन्दर्य-पिपासा,
मत कर नाहक और तमाशा,
श्रा, मेरी बाहों में भर जा!
मृदुल मनोरथ तरु में फूला,
फूल रङ्ग में अपने भूला,
भूल चुका बस, जो कुछ झूला,
अब अपनी डाली से भर जा !
चढ़ी हृदय में चिता कराला,
ऊपर नभ तक उठती ज्वाला,
मरण-दुःख ! ले मुक्ता-माला,
गिर कर अब तू उसमें मर जा!
तरणी नौका । तर जा=तैर जा, उतरा जा। दिवाना=पागल ।
तप्त-गरम । स्वेद = पसीना। ढरजा-दुलक जा । चिर-पुरानी।
पिपासा=प्यास। नाहक = व्यर्थ । मृदुल = कोमल । तरु= वृक्ष ।
कराला-भयङ्कर । नभ-आकाश ।
( 88 )
बना नमूना,
ऐ मेरे प्राणों के प्यारे !
इन अधीर आँखों के तारे!
बहुत हुआ मत अधिक सता रे !
बातें
कुछ
भी तो अब कर जा!
मानस-भवन पड़ा है सूना,
तमोधाम का
कर उसमें प्रकाश अब दूना,
मेरी उग्र वेदना हर जा !
मोहित तुझको करने वाली,
नहीं अाज वह मुख की लाली,
हृदय-यंत्र यह रक्खा खाली,
अब नूतन-सुर इसमें भर जा!
पं० मुकुटधर पाण्डेय
RSS
मानस-हृदय । तमोधाम = अँधेरा लोक ।
PEDIA
किरण
वे जाने, न जाने किस द्वार से
कौन से प्रकार से,
मेरे गृह कक्ष में,
-दुस्तर-तिमिर-दुर्ग-दुर्गम-विपक्ष में-
उज्वल प्रभामयी
एकाएक कोमल किरण एक श्रा गई।
बीच से अँधेरे के हुए दो टूक;
विस्मय-विमुग्ध मूक
मेरा
पा गयाथानन्त घन।
रश्मि वह सूक्ष्माकार
कज्जल के कूट में उसी प्रकार,
जौलौं रही उज्वल बनी रही,
ओठों पर हास रहा हँसता हुआ वही।
किन्तु उसी हास-सी,
वीचि के विलास-सी,
विद्युत प्रवोहमयी
जैसी वह आयी बस वैसीही चली गयी।
।
गृहकक्ष =घर । दुस्तर = कठिन, घोर । तिमिर = अन्धकार । दुर्गम
= अगम, न जाने योग्य । विस्मय = आश्चर्य । मूक = मौन । रश्मि =
किरण । सूक्ष्माकार = पतली । कजल के कूट = अन्धकार का पर्वत,
घोर अँधेरा । वीचि = तरङ्ग, लहर । विलास = क्रीड़ा, खेल । विद्युत
=बिजली।
( १०१ )
एक ही निमेष में
मेरे मरु देश में
आकर सुधा की धार अमृत पिला गई,
और फिर देखते ही देखते बिला गई।
x
x
x
-
कोई दिव्य देवी दया-दीप लिये जाती थी
मार्ग में सुवर्ण-रश्मि-राशि बरसाती थी!
उनमें से यह एक रश्मि श्रा पड़ी थी यहाँ,
किन्तु वह रहती यहाँ कहाँ,-
मेरा घर सूना था,
अगम अरण्य का नमूना था।
रोकता उसे मैं यहाँ हाय ! किस मुख से,
बाँधता उसे में किस भाँति भव दुख
भाई वह, है क्या यही बात कम;
एकही निमेष वह मेरे एक जन्म सम
मेरे मनोदोल पै अनन्त काल भूलेगा;
सुकृति समान मुझको न वह भूलेगा।
श्री सियाराम शरण गुप्त
से?
निमेष = क्षण । मरुदेश = मरुभूमि, जलती हुई भूमि। सुधा =
अमृत । बिला गयी नष्ट हो गयी। रश्मि-किरण ।
अरण्य - जङ्गल, वन । भव-संसार । निमेष क्षण । मनोदोल
मन का मूला । अनन्त काल-अन्तहीन समय । सुकृति-पुण्य ।
--
१ । चोर प्राया, वह पाया, ऋतुपति-सा, बन-बन में छिपता आया। प्राया, वह श्राया, प्राणों-सा, तन-तन में छिपता पाया। पाया, वह आयो, मनोज-सा, मन-मन में छिपता आया। प्राया, वह पाया, तुझसा ही, जन-जन में छिपता पाया । नहीं छा गया जीवन-नभ में, घुमड़ मनोहर धन-सा। अरे ! हृदय में चुपके-से श्रा छिपा कृपण के धन-सा । श्री मोहनलाल महतो 'वियोगी' सुमन शूल चुभाना मेरा अनुकूल के देख के दैव ने ये गति मेरी। दण्ड-निकाला दिया वन-देश से, जो कुछथी हरली पति मेरी॥ छेदा गया क्षत विक्षत हूँ , है 'हितैषी' हुई छवि की क्षति मेरी। रूप पै फूलै न कोई कभी, यह फूलने ही से हुई गति मेरी॥ खिल अंक में तेरे कलंक ये लूँ, मिल धूल में ठोकरें खाऊँ कहाँ? ये बहार, ये बाग, ये बल्लरियाँ, ये सुशीतल वायु मैं पाऊँ कहाँ ? कहाँ प्रेमी हितैषी' मलिन्द मिलें, ये किसे रंग रूप दिखाऊँ कहाँ ? निज सौरभ व्यर्थ गवाऊँ कहाँ, विटपी तुझे छोड़ के जाऊँ कहाँ ? - ऋतुपति बसन्त । तम-शरीर । मनोज-कामदेव । जन- मनुष्य । नभ-आकाश । घुमड़ =घिरकर । धन = बादल । कृपण = कंजूस। शूल = काँटा । अनुकूल = पक्ष में । दैव= विधाता । पति= इजत । क्षत-विक्षत= सोड़ा-मरोड़ा हुआ । क्षति हानि। अंक = गोद । बल्लरियाँ =लताएँ । मलिन्द=भौरे । सौरभ =सुगन्ध । विटपी वृक्ष ।
( १०३ ) ( मछली) फंस के दुरदैव से मोह के जाल में दुःख के हाथों दली गयी हूँ। छुरियाँ चली छाती पैहैं छलको, ममता से 'हितैषी' मली गयी हूँ। पड़के विरहाग्नि में काल कराह में नेह में प्राह जली हुई हूँ। छली जाकर एक छली से अली बिना पानी की मैं मछली हुई हूँ॥ ( मैं और वह) बरसैं गई बीति वियोग में, ध्यान सँयोग का भी नहीं पानते हैं। फिर व्यर्थ व्यथा उपजाने को लोग कथा क्यों पुरानी बखानते हैं? अब मित्रता बाकी रही इतनी कि 'हितैषी' नहीं अनजानते हैं बस, जानते हैं उनको हम और हमें यह भी पहिचानते हैं । न करेंयदि नेकी तो क्या? हमको वो मिटाने का तो हठ ठानते हैं। न हितैषी' भलाई की बात करें पै बुराई तो मेरी बखानते हैं । न रही वह मित्रता, शत्रु ही जानके चित्त में तो हमें अानते हैं। इसी ध्यान में मग्न हूँ मैं कि मुझे कुछ तो अपना वह मानते हैं। ये गजरे तारोंवाले! इस सोते संसार बीच, जगकर, सजकर रजनीबाले ! कहाँ बेचने ले जाती हो, ये गजरे तारोवाले ? मोल करेगा कौन ? सो रही हैं उत्सुक आँखें सारी। मत कुम्हलाने दो सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी॥ दली = नष्ट की गयो, कुचली गयी। नेहस्नेह और तेल । अली-सखी। व्यथा-कष्ट । उपजाने = उत्पन्न करने । बखानते-वर्णन करते । अन-जानते- अपरिचित । नेकी भलाई। मिटाने नष्ट करने । बखानते=वर्णन करते हैं। प्रानते लाते हैं। रजनी-बाले =रात्रिरूपी बालिका । निधियाँ = वैभव, धन । न्यारी-अनमोल ।
( १०४ )
निर्भर के निर्मल जल में ये गजरे हिला हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमें तो किंचित विचलित मत होना ।
हो प्रतिविम्ब विचुम्बित, पर हो लहरों ही में लहराना।
"लो मेरे तारों के गजरे” निर्भर स्वर में यह गाना ॥
यदि प्रभात तक कोई श्राकर,
तुमसे हाय ! न मोल करे।
तो, फूलों पर श्रोस रूप में,
बिखरा देना
सब गजरे ॥
श्री रामकुमार वर्मा “कुमार" एम. ए.
दीप-दान
अब तो उन गलियों में कोई कहता नहीं पुकार-पुकार ।
बहुत दूर से आया हूँ मैं, झटपट श्राकर खोलो द्वार ॥
अब तो कानों में पड़ती है नहीं विश्व मोहक झंकार ।
टकराकर क्यों टूट गये हैं हाय ! विपंची के सब तार ? ॥
हे अनजान कहाँ भूला तू, खाली है कब से कुटिया।
श्रा, प्रकाश से भर दे इसको, कहदे-दीपक जला दिया ।
श्री प्रफुल्लचंद्र श्रोझा 'मुक्त'
= झरना । हहर= अधीर होकर । किंचित-कुछ भी।
विचलित = डरना, घबराना। प्रतिबिम्ब = परछाई । विचुम्बित = चूमे
जाकर । बिखरा = फैलाना । विपंची-वीणा।
परिशिष्ट तुलसीदास (अङ्गद-रावण-संवाद) कह दसकंठ कवन ते बंदर । मैं रघुबीर-दूत दस-कंधर ॥ मम जनकहिं ताहि रही मिताई । तव हित कारन पायउँ भाई॥ उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव विरंचि पूजेहु बहु भाँती॥ बर पायउ कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ नृप अभिमान मोहवस किंवा । हरि आनेहु सीता जगदंबा ॥ अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। खब अपराध छमहिं प्रभुतोरा। दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजनसहित संग निजनारी ॥ सादर जनकसुता करि भागे। एहिविधि चलहु लकल भय त्यागे। प्रनतपाल रघुवंस-मनि, त्राहि त्राहि अब मोहि । भारत गिरा सुनत प्रभु, अभय कर हिंगे तोहि ॥ रे कपि पोत न बोल सँभारी । मूढ़ न जानेसि मोहि सुरारी ॥ दसकंठ रावण । दसकन्धर-रावण । मिताई-मित्रता । तव- तुम्हारे । हितकारन = हित के लिए। पुलस्ति-पुलस्त्य ऋषि । विरंचि= ब्रह्मा । बहुभाँती-अनेक प्रकार से । नृप%= राजा । हरि-हरण करके। जगदम्बा=जगत् की माता । सुभकहा=मेरी कही हुई शुभ बात । छमिहि = क्षमा करेंगे। तोरा तुम्हारा। दसन......कुठारी दाँतों में तिनका पकड़ो और गले पर फरसा रखो, अभिप्राय यह कि रामचन्द्र की महत्ता स्वीकार करके उनके क्षमा प्रार्थी बनो। परिजन =नौकर चाकर । त्यागे= छोड़ कर । प्रनतपाल = झुके हुए की रक्षा करने वाले। आर्त = दीनता से भरे। गिरा-वाणी, बातें। कपिपोत वानर पुत्र । सँभारी सँभाल कर, सोच विचार कर । मूढ़ = मूर्ख । सुरारी= देवताओं का शत्रु।
( १०८ ) मिताई ॥ कबहु भई होइ भेटा॥ 'कहु निज नाम जनक कर भाई । केहि नाते मानिये अंगद नाम बालि कर बेटा तासा अंगदवचन सुनत सकुचाना। रहा बालि वानर मैं जाना॥ अंगद तहों बालि कर बालक । उपजेहु बंस अनल कुल घालक ॥ गर्भ न गयउ व्यर्थ तुम्ह जायहु । निजमुष तापस दूत कहायहु ॥ अब कहु कुसल बालि कह अहई । विहँसि वचन तब अंगद कहई । दिन दस गये बालि पह जाई । बूझेहु कुसल सपा उर लाई। रामविरोध कुसल जसि होई । सो सब ताहि सुनाइहि सोई॥ सुनु सठ भेद होइ मन ताके । श्री रघुवीर हृदय नहि जाके ॥ (दोहावली) 'मोर मोर' सब कहँ कहसि तू को? कहु निज नाम । कै चुप साधहि सुनि समुझि के तुलसी जपु राम ॥ हम लखि लखहि हमार लखि, हम हमार के बीच । तुलसी अलखहि का लखहि ? राम नाम जपु नीच॥ %3D जनककर = पिता का। मिताई मित्रता। भई होइ हुई होगी। भेटा=मुलाकात । सकुचाना= झेप गया। तहींतूही । वस= बाँस या कुल । अनल= आग; (तू अपने कुल का नाश करने वाला, बाँस में आग की तरह, उत्पन्न हुआ है।) गर्भ न गयउ गर्भ नष्ट क्यों नहीं होगया। "जाय = उत्पन्न हुए । तापस=तपस्वी, भिखारी । अहई है। कहई- कहता है । दिन दुस......उर लाई = दस दिन बीतने पर बालि के पास जाकर अर्थात् मर कर और अपने उस मित्र को हृदय से लगाकर उसकी कुशल पूछना। जसि=जैसा । सोई = वही। भेद-विरोध, गुप्त बात । ताके= उसके । जाके-जिसके। मोर-मेरा । को-कौन । के या तो। अलखहि = अज्ञय, न दीख पड़ने वाला। % 3D
( १०६ )
रसना साँपिनि बदन बिल, जे न जपहिं हरिनाम ।
तुलसी प्रम न राम सों, ताहि विधाता बाम ॥
रहै न जल भरि पूरि, राम ! सुजस सुनि रावरो।
तिन आँखिन में धूरि, भरि भरि मूठी मेलिए ॥
साहिब होत सरोष, सेवक को अपराधि सुनि ।
अपने देखे दोष, सपनेहु राम न उर धरेउ ॥
रे मन ! सबलों विरस है, सरस राम सो होहि ।
भला सिखावन देत है, निसि दिन तुलसी तोहि ॥
श्रापु आपने ते अधिक, जेहि प्रिय सीताराम ।
तेहिके पग की पानहीं, तुलसी तनु को चाम ॥
तुलसी परिहरि हरि हरहि, पाँवर पूजहिं भूत ।
अन्त फजीहति होहिंगे, गनिका केसे पूत ॥
वारि मथे घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिय, यह सिद्धान्त अपेल ॥
ज्ञानी तापस सूर कवि, कोविद गुन आगार।
केहिकै लाग विडंबना, कीन्ह न यहि संसार ।
।
.
रसना=जीभ । बदन =शरीर । बिल=छेद । वाम =
=प्रतिकूल।
भरिपूरि=भरा हुआ, पूर्ण । = ख्याति । रावरो-आपकी ।
धूरि-धूल । मेलिए = डालिए ।
सरोष =क्रोधित । उरधरेउ
=मन में रक्खा । निरस = उदासीन, विमुख । सिखावन शिक्षा ।
पानही= पनहीं, जूता । तनु =शरीर । चाम- चमड़ा। परिहरि छोड़-
कर । हरिहर-शिव और विष्णु । पाँवर = पामर, नीच । फजीहति-
बेइज्जत । गनिका वेश्या । पूत=पुत्र । बारि=पानी। बरु= बल्कि ।
सिकता=बालू । भव = संसार । तरिय=तरते हैं । अपेल=निश्चित,
तापस=तपस्वी । कोविदः पण्डित । बिडंबना=अटकाव, मुश्किल ।
( ११० ) श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि, प्रभुता बधिर न काहि । मृग नयनी के नयन सर, को अस लाग न जाहि ॥ नीच गुडी ज्याँ जानियो, सुनि लखि तुलसीदास । ढोलि दिये गिर परत महि खैवत चढ़त अकास ॥ बढि प्रतीति गठबंध तें, बड़ो जोग ते छेम । बड़ो सुसेवा साइँ ते बड़ो नेम ते प्रेम ॥ (कवितावली) तन की दुति स्याम सरोरुह, लोचन कंज की मंजुलताई हरें। अति सुन्दर सोहत धूरि भरे, छवि भूरि अनंग की दूरि धरै॥ दमकै दंतियाँ दुति दामिनि ज्यों, किलकै कल बाल-विनोद करें। अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी-मन मंदिर में बिहरें ॥ - श्रीमद =धनका अभिमान । वक्र =टेदा, अभिमानी। वधिर-बहरा। काहि =किसे । मृगनयनी-मृग की सी आँखों वाली, तरुणी स्त्री। नयन सर=नयन वाण, आँखों का तीर । को अस=ऐसा कौन है। जाहि-जिसे। नीच =अधम । गुडीपतङ्ग । महि =भूमिपर । बचत = खीचने से। अकास-आसमान । प्रतीति = विश्वास । जोग=अप्राप्य को प्राप्त करना। छम= पाये हुये की रक्षा करना । सुसेवक = भला सेवक । साई = स्वामी = ध्यान, व्रत । प्रेम प्रीति । दुति = द्युति, शोभा । स्याम सरोरुह = नीलकमल । लोचन = आँखें । कंज= कमल । मंजुलताई मनोहरता। हरै= छीन लेते हैं। सेहत= शोभित होते हैं। छवि-शोभा। भूरि= अधिक, विशेष । अनंग= कामदेव । दूरि धरै =अलग कर देते हैं। दमकै= प्रकाशित हो रही हैं। दंतियाँ-छोटे छोटे दाँत । दामिनि=बिजली। किलक किलकारी मारते हैं। बिहरै =बिहार करें। % 3D -
( १११ )
निपट निदरि बोले बचन कुठारपानि,
मानि त्रास प्रौनिपन मानों मौनता गही ।
रोषे माषे लषन अनि अनखौहीं बातें,
तुलसी विनीत बानी बिहँसि ऐसी कही ॥
"सुजस तिहारो भरो भुवननि, भृगुनाथ !
प्रगट प्रताप पापु कही सो कब सही।
टूट्यो सो न जुरैगो सरासन महेस जू को,
रावरी पिनाक मैं सरीकता कहा रही"? ॥
प्रेम सों पीछे तिरीछे प्रिया ही चितै चितु दै चलै लै चित चोरे।
स्याम सरीर पसेऊ लसै हुलसै तुलसी छवि सा मन मोरे ॥
लोचन लोन चलै भृकुटी कलकाम कमानहु सो तृन तारे।
राजत राम कुरंग के संग निषंग कसे
धनु
सों
सर
जोरे॥
निपट: -अत्यन्त । निदरि= निरादर करके। कुठार पानि परशुराम :
त्रास=डर, भय । श्रौनिपन=अवनिप गण; राजा लोग । गही=धारण
कर लिया। रोषे = क्रोधित हुए। माषे= ईर्ष्या की। अनि = देखना,
दृष्टि । अनखौंहीं= अनखाने, बुरी लगने वाली। विनीत =विनय युक्त ।
बिहँसि हँस कर । तिहारो तुम्हारा । भुवननि = चौदहों भुवनों में।
भृगुनाथ = परशुराम । सहीठीक है। जुरैगोजुड़ सकेगा । सरासन =
धनुष । महेस-शिवजी । रावरी=आपकी। पिनाक-धनुष । सरीकता
= हिस्सेदारी । कहा = क्या।
तिरीछे = तिरछे होकर । चितै देख कर । पसेऊ= पसीना । हुलसै
= प्रसन्न होते हैं। लोचन = आँख । लोल-चंचल । भृकुटी-भौंहें ।
कलकाम कमानहु सों तुन तोरै = कामदेव के चञ्चल धनुष से होड़ लगाती
हैं । राजत=बिराजते हैं। कुरंग=मृग । निषग-तूरीण, तरकस ।
सर-बाण ।
( ११२ )
गीतावली)
पगनि कब चलिहौ चारिउ भैया?
प्रेम पुलकि उर लाइ सुवन सब कहति सुमित्रा मैया ॥
सुन्दर तनु सिसु वसन बिभूषन नख सिख निरखि निकया।
दलि तृन प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया।
किलकनि नटनि चलनि चितवनि भजि मिलनि मनोहरतैया ।।
मनि खंभनि प्रतिबिम्ब झलकि छवि छलकिहै भरि अँगनैया!
बाल बिनोद मोद मंजुल विधु लीला ललित जुन्हैया ।
भूपति पुन्य पयोधि उमंग घर घर आनंद बधैया ॥
हैहैं सकल सुकृत सुख भाजन लोचन लाहु लुटैया।
अनायास पाइहै जनम फल तोतरे बचन सुनैया ॥
भरत राम रिपुवन लखन के चरित सरित अन्हवैया।
तुलली तबके से अजहुँ जानबे रघुबर नगर बसैया ॥
(राग केदारा)
चुपरि उबटि अन्हवाइ के नैन आँजै,
चिर रुचि तिलक गोरोचन को कियो है।
पगनि = पैरों से । सुवन पुत्र, बेटा । मैया =माता। निरखि =
देखकर । निकैया=सुन्दरता । दलि तृण = तृण तोड़ कर । लैहैं = लेंगी।
नटनि= नाचना । भजि=भाग कर । मनोहरतैया=मनोहरता, सुन्दरता ।
प्रतिविम्ब= परछाई । विधु = चन्द्रमा । जुन्हैया तारे। पुन्यपयोधि
पुण्य का समुद्र । सुकृत= पुण्य । लाहु = लाभ, सफलता। लुटैया
लूटने वाले । रिपुदवन =शत्रुघ्न । अन्हयैया = स्नान करने वाले । तब के
से पहले के समान । अजहुँ = आज भी । चुपरि=चुपड़ कर । अन्हवाइ
=स्नान करा कर । नैन = आँख । आँ= अंजन लगाती है । गोरोचन =
सुगन्धित द्रव्य विशेष ।
%
3D
-
( १९३ )
भूपर अनूप भासे बिन्दु बारे बार बार,
बिलसत सीस पर हेरि हरै हियो है।
मोद भरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि,
देव कहैं सबको
सुकृत
उपवियो है॥
मातु पितु प्रिय परिजन पुरजन धन्य,
पुन्य पुज पेखि पेखि प्रेम रस पियो है।
राग बिलावल
सोहत सहज सुहाये नैन।
खंजन मीन कमल सकुचत तब जब उपमा चाहन कबि देन ॥
सुन्दर सब अंगनि सिसु भूषन राजत जनु सोभा आये लैन।
बड़ो लाभ लालची लोभ बस रहिगै लखि सुखमा बहु मैन ॥
भोर भूप लिये गोद मोद भरे निरखत बदन सुनत कल बैन
चालक रूप अनूप राम छवि निवसति तुलसिदास उर ऐन ॥
-
।
मसि विन्दु = स्याही की , द । बारे बारे= छोटे छोटे । बार -- केश ।
सीस=सिर । हेरि देखकर । हरै =हरण कर लेता है। मोदभरी
प्रसन्न । लालति = लाड़ प्यार कर रही है । उपवियो है= उदय हुआ
परिजन घर के लोग । पुरजन = नगर के लोग । पेखि - देखकरः ।
है।
सहज-स्वाभाविक । खंजन = पक्षी। मीन-मछली । कमल =
जल में उत्पन्न होने वाला एक फूल । सकुचत = संकुचित हो जाता है।
राजत=विराजमान है। जनुमानो। लैन-लेने के लिए । रहिगैः
रह गया। सुषमा सुन्दरता । मैन = कामदेव । भोर प्रातः काल,
सबेरा । कल बैन = तोतली बोली। निवसति = निवास करती है । ऐन =
मन्दिर, निवास स्थान ।
-
(राग कल्याण)
मुनि के संग बिराजत बीर
काकपच्छ धर कर कोदंड सर सुभग पीत पट कटि तुनीर ।
बदन इन्दु अम्भोरुह लोचन स्याम गौर सोभा सदन सरीर।
पुलकत ऋषि अवलोकि अमित छवि उर न समाति प्रेम की भीर।
खेलत चलत करत मग कौतुक विलंबत सरित सरोवर तीर ।
लोरत लता सुमन सरसीरुह पियत सुधा सम सीतल नीर ॥
बैठत बिमल सिलनि बिटपनि तर पुनि पुनि बरनत छाँह समीर।
देखत नटत केकि कल गावत मनुप मराल कोकिला कीर ॥
नयननि को फल लेत निरखि खग मृग सुरभी ब्रजवधू अहीर ।
तुलसी प्रभुहि देत सब श्रासन निज निज मन मृदु कमल कुटीर ॥
काकपक्ष घर = जहाँ तहाँ रखाये हुए सिर के बड़े बड़े बाल । कोदण्ड
= धनुष । सर= बाण । कटि = कमर । तूनीर = तरकस । बदन = मुँह ।
इन्दु - चन्द्रमा । अंभोरुह = कमल । लोचन = आँखें । सदन =निवास ।
रास्ते में। कौतुक= तमाशा। बिलत = बिलम्ब करते, ठहरते हुए।
सरित=नदी। सरोवर =तालाब । तीर= तट पर । सुमन = फूल ।
सरसीरुख = कमल । सुधा-अमृत । सीतल=ढा । नीर=जल ।
सिलनि = पत्थरों । विटपनि =वृक्षों । तर = -तले, नीचे, छाया में । छाँह
छाया। समीर =हवा । नटत = नाचते हुए । केकी=मयूरी । मधुप =
भौरा । मराल -हंस । कोकिला- कोयल । कीर=तोता । खग=
पक्षी।
अंग हरिन । सुरभी गाएँ । ब्रजवधू = गोपियाँ । देत सब......
कुटीर = अपने अपने कोमल हृदय कमल के कुटीर में सब लोग आसन
-
( ११५ )
(गीतावली)
कैकई जब लौं जियति रही।
तौलों बात मातु सो मुँह भरि भरत न भूलि कही ॥
मानी राम अधिक जननी ते जननिहु गँस न गही।
सीय लखन रिपुदवन रामरुख लखि सब की निबही॥
लोक बेद मरजाद दोष गुन गति चित चखन चही।
तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम सनेह सही॥
(विनय पत्रिका)
बावरी रावरो नाह भवानी।
दानि बड़ो दिन देत दए बिन बेद बड़ाई भानी ॥
निज घर की घर बात बिलोकहु हो तुम परम सयानी ।
सिव को दई सम्पदा देखत श्री सारदा सिहानी ॥
जिन के भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी।
तिन रंकन को नाक सँवारत हौं अायों नकवानी ॥
दुख दीनता दुखी इनके दुख जाचकता अकुलानी।
यह अधिकार सौपिए औरहि भीख भली में जानी॥
=तक । मुंह भरिभर मुंह, भली प्रकार । गैस =बर,
शत्रुता । निबही == निभ गयी । मरजाद = मर्यादा। चखन = आँखों से।
चही-देखा । सही-असली, अकृत्रिम ।
बावरोः =पागल । रावरो=आपका । नाह =नाथ, पति । भवानी-
पार्वती । भानी= कही । सयानी = चतुर । दुई = दी हुई। सिहानी =
आश्चर्यित हुई। लिपि = लिखावट । निसानी=चिन्ह । रंकन = दरिद्रों।
नाक= स्वर्गलोक । सँवारत = शृङ्गार करते हुए । नकवानी = नाक में दम
आना, परेशान होना । जाचकता= मंगलपन । अकुलाती= व्याकुल होगयी।
औरहिं दूसरे को।
( ११६ ) प्रेम प्रसंसा बिनय ब्यंगजुत सुनि बिधि की बरवानी। तुलसी मुदित महेस मनहि मन जगत मातु मुसुकानी ।। - तू दयालु, दीन हों, तु दानि हों भिखारी हों प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुज-हारी ।। नाथ ! तू अनाथ को अनाथ कौन मोस। मो समान भारत नहिं, श्रातिहर तेोसे॥ ब्रह्म तू , हौं जीव, तुही ठाकुर, हों चेरो। तात मात गुरु सखा तू सब विधि हितु मेरो॥ तोहि मोहि नाते अनेक मानिये जो भावें। ज्यों त्यों तुलसी कृपालु चरन सरन पावै ॥ 0 ऐसी मूढ़ता या मन की परिहरि राम भगति सुर सरिता श्रास करत श्रोसकन की। धूप समूह निरखि चातक ज्यों तृषित जानि मति धन की ॥ नहिं तहँ सीतलता न बारि पुनि हानि होत लोचन की। ज्यों गच काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की ॥ टूटत अनि श्रातुर अहार बस छति विसारि श्रानन की। जुत =युक्त। विधि = ब्रह्मा । बर= श्रेष्ठ । मुदित = प्रसन्न हुए। जगत मातु= पार्वती । हौं =मैं । पातकी = पापी । पुज=समूह । हारी हरण करने, नष्ट करने वाला । मास = मुझसे । भारत = दुखी। भावे -अच्छा मूढ़ता= मूर्खता । परिहरि = छोड़कर । सुरसरिता=गंगा । जानि- मति धनकीबादल समझ कर । घन = बादल । बारिजल । लोचन -आँख । गच% चबूतरा, पलस्तर । सेन -श्येन, बाज़ । जड़ = मूर्ख, बुद्धिहीन । छाँह = छाया । आतुर = विह्वल । छति= हानि । बिसारि= भूलकर । आनन-मुँह । लगे। .
( ११७ )
कह लो कहीं कुचालि कृपानिधि जानत हो गति मन की।
तुलसीदास प्रभु हरहु दुसह दुख करहु लाज निजपन की।
मैं हरि पतितपावन सुने।
मैं पतित तुम पतितपावन दोउ बानक बने ।
ब्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने।
और अधम अनेक तारे जात कापै गने।
जानि नाम अजानि लीन्हें नरक जमपुर मने ।
दास तुलसी सरन पायो राखिए आपने ।।
जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो छाँडिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद
बिभीषन
बन्धु भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कन्त ब्रजबनितनि भए मुदमंगलकारी ।।
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटे बहुतक कहाँ कहाँ लौं ।
तुलसी सो सब भाँति परमहित पुजी प्रान ते प्यारो
जास होय सनेह रामपद एतो मतो हमारो॥
.
।
%
3D
कुचालि=बुरी चाल । निजपन = अपनेपनकी, अथवा अपनी प्रतिज्ञा
की। बानक-वेष, साज । गनिका=वेश्या । गज-हाथी । साखि-
साक्षी । निगम-पुराण आदि। भने कहा है। कापै= किससे।गने
गिने । मने = दूर होगये, नष्ट हो गये। मनियत =मानते हैं। सुहृद =
मित्र । सुसेव्य = भली सेवा करने के योग्य । लौंतक। पुंजीपूजी,
मूलधन । एता=यही । मतो-मत, राय ।
सूरदास
छाँडिमन हरि बिमुखन को सङ्ग।
जाके सङ्ग कुबुद्धी उपजै परत भजन में भङ्ग ॥
कहा भयो पय पान कराये बिष नहिं तजत भुअङ्ग ।
काम क्रोध मद मोह लोभ में निसिदिन रहत उमङ्ग ।
कागहिं कहा कपूर खवाए, स्वान न्हवाये गङ्ग ।
खर को कहा अरगजा लेपन मरकट भूपन अङ्ग ॥
पाहन पतित बान नहिं भेदत रीतो करत निषङ्ग।
'सूरदास' खल कारी कामरि चढ़े न दूजो रङ्ग ॥
प्रभु
मेरे अवगुन न विचारो।
धरि जिय लाज सरन भाये की रविसुत त्रास निवारो॥
-
हरि विमुख =नास्तिक, जो ईश्वर को न मानते हों । भङ्ग = गड़-
बड़ी, अड़चन । कहा भयो=क्या हुआ। पय- दूध । पान कराये -
पिलाने से । भुअङ्ग = साँप । उमङ्ग = उत्साह । कहा= क्या । खवाए =
'खिलाने से। स्वान =कुत्ता। न्हवाये = नहवाने, स्नान कराने से । खर :
गधा । अरगजा=एक सुगन्धित उबटन जो शरीर में लगाया जाता है।
मरकट =बन्दर । भूषण =गहना। पाहन ... भेदत = पत्थर पर फेंका
हुआ तीर उसमें छेद नहीं करता। रीता= खाली । निपङ्गः = तरकस।
कारी-काली । दूजो-दूसरा ।
अवगुण-दोष । विचारो- ख्याल करो। रविसुत =यमराज ।
त्रास= डर, भय । निवारो दूर करदो।
( ११६ )
जो गिरिपति मसि घोरि उदधि में लै सुरतरु निज हाथ ।
ममकृत दोस लिखें वसुधाभरि तऊ नहीं मिति नाथ ॥
कपटी कुटिल कुचोलि कुदरसन अपराधी मतिहीन ।
तुम्हहिं समान और नहिं दूजो जाहि भजौं है दीन ॥
जोग जग्य जपतप नहिं कीनो बेद बिमल नहिं भाख्यो।
अति रसलुब्ध स्वान जूठनि ज्यों अनते ही मन राख्यो ।
जिहिँ जिहि जोनि फिरौं सङ्कट बस तिहिँ तिहिं यहै कमायो।
काम क्रोध मद लोभ ग्रसित हे विष परम विष खायो॥
अखिल अनन्त दयालु दयानिधि अघमोचन सुखरासि ।
भजन प्रताप नाहिने जान्यो बँध्यो काल की फाँसि॥
तुम सरबग्य सबै बिधि समरथ असरन-सरन मुरारि ।
मोह समुद्र 'सूर' बूड़त है लीजै भुजा पसारि ॥
माधौ ! वै भुज कहाँ दुराये ?
जिनहिँ भुजनि-गोबर्द्धन धारयो, सुरपति गर्व नसाये ।
जिनहि भुजनि काली को नाथ्यो, कमल-नाल लै आये।
गिरिपति = हिमालय । मसि = स्याही। उदधि=समुद्र । सुरतरु
= कल्पवृक्ष । ममकृत = मेरे किये हुए। वसुधाभरि=सारी पृथ्वी पर ।
मिति=हद, समाप्ति । कुचीलिमलिन बस्त्र वाला। कुदरसन = देखने
में बुरा। मतिहीन =मूर्ख । भाख्या = कहा, पढ़ा। रसलुब्ध = रस का
लोभी । अन= दूसरी जगह । जोनि =शरीर । कमायो= अर्जित किया,
पाया । विषय - सांसारिक वासना । परम विष=भयानक जहर ।
अघमोचन = पापों का नाश करने वाले । नाहिन = नहीं ही। फॉलि=
फन्दा । सरबग्य = सर्वज्ञ, सव जानने वाले। बूड़त= डूबता । दुराये:
छिपाया। सुरपति = इन्द्र । गर्व = अभिमान । नसाये = नष्ट किया।
कालीप्रसिद्ध सर्प । कमल नाल = डण्डी के सहित कमलका फूल ।
%
3D
।
( १२० ) जिनहिँ भुजनि प्रहलाद उबारयो, हिरन्याच्छ को धाये॥ जिनहिं भुजनि दाँवरी बँधाये, जमला मुकति पठाये। जिनहिँ भुजनि गजदन्त उपारयो, मथुरा कंस ढहाये ॥ जिनहीं भुजनि अघासुर मारयो, गोमुत गाय मिलाये। तिहि भुजे की बलि जाय 'सूर' जिन तिनका तोरि दिखाये ॥ मोहि प्रभु ! तुमसों हाड़ परी। ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी ॥ पतित समूहनि उद्धरिवे को तुम जिय जक पकरी। में जू राजिव नैननि दुरि गयो, पाप पहार दरी ॥ एक अधार साधु-सङ्गति को रचि-पचि के सँवरी॥ भई न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी। मेरी मुकति विचारत हो प्रभु पूँछत पहर घरी ॥ सम ते तुम्हें पसीनो ऐहै कत यह जकनि करी। 'सूरदास' बिनती कहा बिनवै रोसहि देह भरी। अपनो बिरद सँभारहु गे तब या में सब निनुरी ॥ धाये = दौड़े, प्रहार करने के लिये झपटे। दाँवरी रस्सी। जमला=यमलार्जुन, अर्जुन नामक वृक्ष का जोड़ा। मुकति पठाये: मुक्त कर दिया । गजदन्त = हाथी का दाँत । उपार्यो = उखाड़ा । ढहाये = नष्ट कर दिया, गिरा दिया। तिनका तोरि दिखाये= भीम-जरासन्ध युद्ध के समय जिन हाथों ने तिनका को चीर कर यह दिखाया था कि इसी तरह जरासन्ध को मार डालो। होड़ = बाज़ी, बदाबढी । जक= ज़िद, हठ । दुरि = छिपा । दरी- गुना । रचि-पचि कै=मर मर कर, किसी प्रकार । सँचरी=सञ्चार किया, बरता । अपनी धरनि धरी= अपनी यात पकड़े रहा, अपने विचार पर अटल रहा। कत यह जकनि करी-क्या ज़िद की है। विरद-शरणागत, अपना जन । निनुरी=निपटारा, फैसला हो जायगा। % 3D
( १२१ )
कहाँ लौ बरनौं सुन्दरताई।
खेलत कुँवर कनक-आँगन मैं, नैन निरखि छवि छाई ॥
कुलहि लसत सिर स्याम सुभग अति बहु बिधि सुरंग बनाई।
मानो नव घन ऊपर राजतं मघवा धनुष चढ़ाई ॥
अति सुदेस मृदु चिकुर हरत मन मोहन मुख बगराई ।
मानो प्रगट कंज पर मजुल अलि अवली घिरि पाई ॥
नील सेत पर पीत लालमनि लटकन भाल लुनाई ।
सनि गुरु असुर देव गुरु मिलि मनौ मौन सहित समुदाई । :
दूध दन्त दुति कहि न जाति अति अद्भुत एक उपमाई ।
किलकत, हँसत, दुरत, प्रकटत मनौ घन में बिज्जु छपाई ।।
खण्डित बचन देत पूरन सुख अलप जलप जलपाई।
घुटुरुन चलत रेनु तनु मण्डित सूरदास बलि जाई ॥
कुलहि = बच्चों की टोपी। लसत = शोभित होता है। सुभग =
सुन्दर । सुगअच्छे रङ्ग वाला।
अच्छे रङ्ग वाला। घन% बादल। मघवा-इन्द्र ।
सुदेस =सुन्दर । चिकुर =बाल । बगराई = फैलाकर । कञ्ज= कमल ।
मञ्जुल =सुन्दर । अलि = भौंरा । अवली= समूह । सेत= स्वेत, सफ़ेद ।
लटकन =घुघरू । लुनाई सुन्दरता । गुरु-असुर = राक्षसों के गुरु, शुक्र ।
देवगुरु वृहस्पति । भौम = मंगल । समुदाई =समूह । दुति = द्युति,
चमक । दुरत= छिपते हैं । धन = बादल । बिज्जु = बिजली । खण्डित =
टूटे फूटे । अलप जलप जलपाई=थोड़ा थोड़ा बोलते हैं, अस्फुट स्वर
में बात चीत करते हैं। घुटुरुन = घुटनों के बल । रेनु =धूल। मण्डित.
=लगा हुश्रा, भरा हुआ।
,
%3D
कबीर पायो सतनाम गरे के हरवा। साँकर खटोलना रहनि हमारी दुबरे दुबरे पाँच कदरवा। ताला कुंजी हमैं गुरु दीन्हीं जब चाहो तब खोलो किवरवा ॥ प्रेम प्रीति की चुनरी हमारी जब चाहौं तब नाचौं सहरवा। कहे कबीर सुनो भाई साधो बहुर न ऐबै एही नगरवा ॥ कैसे दिन कटिहैं, जतन बताये जइयो। एहिपार गंगा वोहि पार जमुना, बिचवा मड़इया हमको छवाये जइयो । अँचरा फारि के कागद बनाइन, अपनी सुरतिया हियर लिखाये जइयो । कहत कबीर सुनो भाई साधो, बहियाँ पकरि के रहिया बताये जइयो । Abouna- करम गति टारे नाहिं टरी। मुनि वशिष्ठ से पण्डित ज्ञानी सोधि के लगन धरी। सीता हरन, मरन दशरथ को, बनमें विपति परी॥ सतनाम - सत्यनाम, गुरु । हरवा-हार, माला। सॉकर सङ्कीर्ण, तङ्ग । दुबरे= पतले, दुबले । बहुर= पुनः, फिर । ऐबे= पाऊँगा। -इस। मड़इया = झोपड़ी। सुरतिया-स्मृति, याद । रहिया = रास्ता । सोधि जाँचकर, शुद्ध करके । लगन = लग्न, मुहूर्त ।
( १२३ ) कह वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहँ वह मिरग चरी। सीता को हरि लै गो रावन सुबरन लङ्क जरी ॥ नीच हाथ हरिचन्द्र बिकाने बलि पाताल धरी। कोटि गाय नित पुन करत नृग गिरगिट जोनि परी॥ पाण्डव जिनके आपु सारथी तिन पर विपति परी। दुरजोधन को गरब पटायो जदुकुल नास करी ॥ और भानु चन्द्रमा विधि संयोग परी। कहत कबीर सुनो भाई साधेो होनी होके रही ॥ राहु केतु -- तेरा मेरा मनुवाँ कैसे एक होइ रे। मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी। मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाइ रे ॥ मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे। कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोहि रे॥ जुगन जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोइरे। तू तो रंगी फिर बिहङ्गी, सब धन डारा खोइ रे ॥ सतगुरु धारा निरमल बाहै, वा में काया धोइ रे। कहत कबीर सुनो भाई साधो, तबही वैसा होइ रे॥ मैं फन्द-फन्दा । पारधिः परिधि, सीमा । मिरगचरी-मृग के पीछे चलने वाला, रामचन्द्र । लैंगो ले गया । सुवरन =सुवर्ण, सोना । पुग्न करत-पुण्य करते, दान देते थे। गिरगिट योनि परी-गिरगिट का शरीर पाया । गरव-गर्व, अभिमान । पटायो नष्ट किया। मनुवाँ = मन । कागद की लेखी= कागज़ का लिखा हुआ । सुर- मावन-सुलझाना । अरुझाई उलझाना । मोहिमोहित । रंगी रंगीला । बिहङ्गी-चिदियों की तरह । बाहैं बहाते हैं। काया- शरीर। % 3D -
( १२४ )
तोहि मोरी लगन लगाये रे फकिरवा ।
सोवत थी मैं अपने मन्दिर में, सबदन मारि जगाये रे, फ०।
बूड़त ही भव के सागर में, बहियाँ पकरि समुझाये रे, फ०।
एकै बचन बचन नहिं दूजा, तुम मोसे बन्द छुड़ाये रे, फ०।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सत्त नाम गुन गाये रे, फ० ।
लोका मति का भोरा रे।
जो कासी तन तजै कवीरा रामै कौन निहोरा रे॥
राम भगति पर जाको हित चित ताको अचरज काहा ।
गुरू प्रताप साधु सङ्गति जग जीते जाति जोलाहा ॥
कहत कबीर सुनौ रे सन्तो भरम परौ जनि कोई।
जल कासी तस मगहा ऊसर हृदय राम जो होई ।।
-
लगन-प्रीति । मन्दिर-घर। सबदन -शब्द, गुरु की वाणी।
बूड़त= डूबते हुए । बहियाँ = हाथ । बन्द = कपड़े का छोर ।
लोका = लोग, दुनियाँ । निहोरा=प्रार्थना। अचरज =
काहा-क्या । भरम= श्रम । मगहा: मगध । ऊसर-परती जमीन ।
अाश्चर्य ।