Hindi Sahataya Samalayan
Kavita Sradhanjali
Front matter
শিলা
श्रद्धाञ्जलि
Terram
मन्त्री, भारतीय साहित्य-भवन,
कटराछपरा
सं. १९९१ विक
प्रथम बार-१०००
मृल्य-साहित्यानुराग
१ याबू महेन्द्र प्रसाद तथा स्व० वावू रामेश्वरलाल जैनकी
स्मति शातीय मेसर्स लाखर दरीराम फार्मके
TET
१.16
८१..
भश
SAIL.COMSAIN MEIN भवन हारा हुन नदि-सन्मानाने उलय-समय : कविता बिहान कविन होदयाने पट्टी है. उन्होंने कुछ उनी हई बिता । इस पुस्तिकानें संगृहीत हुई है। स्थानीय हिन्यालेवियों एवं ऋविया उत्साह- वन करने तथा सर्वसाधारण साहित्य प्रतियों तक उनकी सच- नाओंको पहुँचाने विचारले ही इस प्रकाशन किया जा रहा है : इले प्रकाशित करते एवं आपसजनक आगे रखते हमें जितनी ही प्रसन्नता हो रही है, उनका ही हमालदा उन दलनी व्यक्तियोंके अभाबले कारण शोकान्वित भी हो रहा है, जिनकी मनिलें इसका प्रकाशन किया जा रहा है। केवल छपरेमें नहीं, सम्पूर्ण बिहार प्रान्तमें कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो स्वर्गीय दाब महेन्द्र प्रसादले नानले सुपरिचित न हो ? कौन ऐसी स्थानीय सार्वजनिक संस्था होगी, जिसमें उन्होंने भाग लिया हो और जिसमें अपनी अपूर्व योग्यता एवं कर्मण्यताका परिचय न दिया हो? 'भवन के तो वे सभापति थे ही! इसकी भलाईके लिये वे सतत सचेष्ट रहते थे। उनकी एकान्त इच्छा थी 'भवन को अपने निजी भवन- में स्थायी रूपमें-देखनेकी; और इस चेष्टाले वे कभी विरत नहीं हुए। : जीवन की अन्तिम घड़ी तक उन्हें भवनका खयाल बना रहा । दूसरे, मैंगनीराम हरदत्तरायके सुप्रसिद्ध मानके स्वन्त्राधिकारी बालू रामेश्वरलाल जैन जैसे उदारचेताका शुभ नाल किले अविदित है ? आपली योग्यता देखकर सरकारने आपको म्युनिसिपल कमिश्नर तथा जेल-परिदर्शक ननोनीत किया था। आरने कुछ समय तक स्थानीय इम्पीरियल बैंकके कोषाध्यक्षका काम भी किया था। आप अपनी उदा- रता तथा गुप्त रूपसे दातव्य के लिये यथेष्ट प्रसिद्ध थे। कभी कोई बाधक आपके पास विफलमनोरथ नहीं लेगा। सार्वजनिक सेवाकार्याने आप यह सदा अनतर और मुक्तहस्त रहते थे। पुस्तकालयके तो आप हीशे ? जब जब पुस्तकालयपर आर्थिक अभावका पहाड़ टूटा, त तब आपने ही अपनी उदारतासे उसकी रक्षा की और उसके संचा नमें सदा सब प्रकारले सहायता देते रहे । आपने पुस्तकालयके लिये मन्त्र मकान बनवानेका पूरा व्यय-भार अपने ऊपर ले लिया था । यदि : चमें कोई विघ्न उपस्थित न होता अथवा आपका इस असमयमें देहार तान न होता, तो आप अवश्य ही अपना वचन पूरा कर दिखाते । इन्हीं दोनों सज्जनोंकी पुण्य स्मृतिमें यह संकलन प्रकाशित कि जा रहा है। आशा है, इसे सुधी-समुदाय हृदयसे अपनायगा। सा ही भी आशा की जाती है कि जिस संस्थाका उपर्युक्त सम्मा नीय व्यक्तियोंने अपने जीवन-कालमें समुचित रूपसे संचालन किया, उसे नींवपर सुप्रतिष्ठित किये रहने में हम उनके अनुयायी किसी कार पश्चात्पद नहीं होंगे एवं दिन दिन उसकी उन्नतिकी ही चेष्टा करते : गे। अन्तमें बाबू तेजपाल सरावगीको, जिन्होंने इस श्रद्धाञ्जलिको का- शित करनेका पूरा खर्च दिया है, हम धन्यवाद दिये बिना नहीं रह स ते । उनके अतिरिक्त स्थानीय रईस और कवितामर्मज्ञ वाबू भगवती साद सिंह भी हमारे धन्यवाद-भाजन हैं, जिन्होंने कविताओंमें यथ थान संशोधनादि करनेकी कृपा की है । साथ ही हमें यह प्रकट करते प्रः नता होती है कि इस पुस्तिकाको इस रूपमें लाने और प्रूफ आदि सं धिन करने में हिन्दी-संसारके सुपरिचित पं० कार्तिकेयचरण मुखोपा ायने भी हमारी पूरी सहायता की है । अतः वे भी हमारे धन्यवादके पा हैं। , सुदृढ़ . भारतीय साहित्य-भवन ५-७-३४ निवेदक- राजनाथ सहाय, मनो।
हा ! यात महाप्रसाद :
सबा सेक देश-नानि--साहित्य--धर्म का !
सैनिक साहस-त्याग--प्रेममय पूल-कर्म का ।।
धनियों का श्रादर्श. गरीबों का जो बल था।
दुखियों का सर्वस्वः शुष्क पौधों का जल था ।
प्रेस मूर्ति घनश्याम, प्रेम-पय बरसाता था ।
शान्ति-सुधा का स्रोत सदा जो सरसाता था ॥
अनुपम था वह रत्न अलौकिक दिव्य हमारा ।
सारन--स्वर्ग--नहेन्द्र, देश का परम दुलारा ||
-रामअयोध्या सिंह
हा ! बाबू महेन्द्रप्रसाद
FFIC
ah ah
है
यहाँ इन्सां नहीं रहता है लेकिन नाम रहता है।
कि लोगों के दिलों पर नक्श उसका काम रहता
वहीं इनसान है जिससे कि हिन्दू प्रो मुसलमां को ।
हमेशा चैन रहता
सदा आराम रहता
वहीं इन्सान है जिससे कि उसके मातहत खुश हो ।
जो अपने काम में मशगूल हो शाम रहता
वही है प्रादमी पैदा कर जो नाम दुनिया में ।
बराबर जिससे हर छोटे बड़े को काम रहता
बड़े लोगों में गिनती उसकी होती है जमाने में ।
दिलो में याद उसकी और ज़बां पर नाम रहता है
गज़ब है मौत 'अन्का' ऐसे नामी की जमाने में ।
समझ हैरान होती है खोदा के कारखाने में ।।
है
-महबूब अहमद 'अन्का' छपरवी
हा! बाबू रामेश्वर लाल जेन : बंभव-भक्त 'राम' प्रख्यात-नाम: गुणिजन आश्रय कीर्ति परायण सुयश धाम थे ! जीवन था वह दीन-दुःखितों का जीवन-धन , सहृदयता का स्त्रोत स्नेह-सुख-सुधा-सरस-धन ! 'अथक परिश्रम' कार्य-सिद्धि का मूल मंत्र था , सत्य विनय-सारल्य-विभूषित सफल यंत्र था । देश--धर्म--साहित्य-भक्ति का रत्न अनुठा । चला गया वह हाय ! हाय ! क्यों हमसे रूठा ? -रामअयोध्या सिंह। my- [ग
हा ! बाबू रामेश्वर लाल जैन
मर।
मौत का रंग क्या अलब है रंग ।
देख कर जिसको अक्ल भी है दंग
न यह लड़का न यह जवाँ समझे !
न यह घंश न यह घड़ी देखे ।
बुड्ड जीते रहें जवान
क्या कहें कहने वाले क्या न कहें।
उस का जीना है जिससे सुख पाये।
उस का मरना है जिसका जस गायें।
ऐसा दानी जो
गुप्त दान करे।
जो बिपत में हो उसका मान करे॥
-महबूब अहमद 'अन्का' छपरर्व ।
कृपाकर शुद्ध कर लीजिये। पृष्ट अशुद्ध शुद्ध व ३ पीट को प्रागारा ૧૨ यां हया उलझगई उरमत १५ सरुझ गई चख्य चख विखरगये विखरत " २० . १० ३ सुवन उशीर के तलकति है रहयो पंचाग्नि विरहिनि स्मृति धाती उशीर तलफति रहयो पंचागिनि विरह सुस्मृति घोती ११ १३ द्वापक दीपक
मन
निवेदन।
पूरी पुस्तक सजाने के बाद 'भवन' के स पति
बाबू भगवती प्रसाद सिंह जी ने इसे प्राद्यन्त देखने और
पाठक वर्ग के सुभीते के लिये यह शुद्धि-पत्र प्रस्तुत करने की
कृपों की है।
मन्त्री!
॥ श्रीः ॥
कविता-श्रद्धाञ्जलि
समस्याः-"ऋतु वसन्त को आई है।"
रचयितो-बाबू भगवती प्रसाद सिंह "शूर". छपरा !
फूलो में गंध समाई है। पत्ता पर रंगन बचाई है !!
भौरा ने गूज मचाई। कार लगाई है ।
स्वामी व वधाई है।
पहलव
KEE
हवा चाल अरसी :-
है बिलाला
शीतल नन्दन ... -: है राती ।
नहातपसका आई है।
३
-~
लतिकाओं में हरियाली है। अभिनव पुष्पों में लाली
विहग-वृन्द में खुशडाली है । मद में बाका बनमाली है ।
यह नूतन शामा बाई है।
क्या मृतु सन्त की आई है ॥
(४)
बन उपवन सब हैं लहराते । टेमू
फूले नहीं समाते ।
बिरहानल को क जगाते । नही जन हैं भस्म रमाते ॥
फिर बन की चाट समाई है।
जब मृतु वसन्त की आई है ॥
॥
यह जो वहशी कहलाते हैं ! हम उन से दिल बहलाते हैं ।
नरगिस से अांख लड़ाते हैं । अपना अपमान मिटाते
अब की भी आस लगाई है।
जब मृतु वसन्त की आई है ॥
॥
पंकज खड़े हुए पानी में । अाकर अपनी जालानी में ।
कुलकर कहते निज वाणी में । हम भी हैं इस हैरानी में ।
क्या ही यह शाने खुदाई है।
जा ऋतु बसन्त की आई है ॥
२
रचयिना-बाबू बच्चाल.ल. बम्मा दृपग।
चला गया सब राज शिशिर का इजा हटा नव छाई है !
उठी बागो में मेरे मन का माई
गगन विमल तरु-पल्लव नूतन कहिं सरल हिं राई है
हिय हुलसावन जीय लुभावन ऋतु वसन्त आई है।
कपिल कुहुक
।
रचयिता--श्री० दशरथ प्रसाद शर्मा 'प्रसून. उपना ।
बहुत दिनों के अतिसंचित मैं धन को आज लुटाती हूं:
इसी तुच्छ धन को लेकर ही सेवा में अब आती
माना सुखसरिता की धारा सब के उर में बहतो हैं:
पर इससे क्या हुआ हाय जब हृदय-कलो ही जलती हैं।
इसी तब्र उबाला से जलता अपना हृदय दिखाती है।
अश्रु पुग्प लेकर नयनों से माला मञ्ज बनाती हूँ।
एक सुमन झरने नहि पाता अन्य सुमन या जाता है।
पुष्प पुज से पुष्प निकलता उर कुछ ठप्ढक पाता है ।
नूतन फूलों की माला ले दासी कव की आई है।
ग्रहण करो इस तुच्छ भेंट को ऋतु वसन्त को पाई है।
रचयिता-बाबू राम अयोध्या सिंह, छपरा।
प्रिय पावन पुष्प वधाई है। अब तु बसन्त की आई है।
यह विमल प्रभा अगाई है । नीलिमा गगन में छाई है।
यह धूप इसन्नी लाई है। सब जीयो के ननभाई है
गत विषम शीत लुरबदाई है। नहिं ताप भयङ्करताई है ?
।
३
समता में मलाई है। पवनों में शीतलताई है।
म छा अनूठी पाई है। पीयूष प्रभा
प्रभा बरपाई है।
लुरू सुगबुधा संग लाई है। नूतनता सबले पाई है।
दुःखो की अाज विदाई है ! जब ऋतु वसन्त की प्राई है।
समस्याः
र देशका ताज हमारा भारत प्यारा
रचयिता-बावू भुवनेश्वर प्रसाद एम० ए० बी० एल०, छपरा।
कहाँ आज है इसका वह वैभव का आकर,
अखिल जगत पालित होता था जिसको पाकर ?
आज अपेक्षित है, औरों का इसे सहारा,
सब देशो का ताज हमारा भारत प्यारा ॥
( २ )
वलि से हैं बलशान कहां: वे भीम कहां हैं ?
मारूतनन्दन से वल में निस्सीम कहाँ हैं:
होकर खाता फिरता है वह दर दर मारा।
सब देशो का ताज हमारा भारत प्यारा॥
?
कहाँ अाज हैं पन्ना ? पद्मावती कहां हैं ?
रिपु से लोहा ले वह दुर्गावती कहां हैं
देख रहा हे अाज हाय ! लुस्ती निज दारा ।
लब दशा का ताज हमारा
भारत प्यारा॥
वे बानीकते हैं सन में उन्हें मुलायो।
याद दिलाकार उन्हें न हिय एरशुल चलाओ।
गत गौरव का काट रहे हो व्यर्थ नगारा।
सब देना
कोरी बानें अब न
वनात्री. ऋगे यात्री-
एज्य पूर्वजो से कुछ तो होकर इखलायो ।
हक रहा है. पा जाये तृण मात्र साहारा
सब देशों का ताज हमारा भारत
प्यारा
छोड़ो दुर्गा द्वष बैर अालस का तोड़ा
मिलकर आगे बढ़ो सभी से ममता जोड़ो।
फिर हागः “भुवनेश जगत में सब से न्यारा !
सब देशो का ताज हमारा भारत प्यारा ।।
१
रचयिताः-६० रामनारायण मिश्र काव्यतीर्थ, छपरा।
जिस के पद तल पड़ा हुआ रत्नाकर सारा ।
रजत-कनकमय मेरु मुकुट सा शाभित न्यारा !!
मणि-मालासी सुखद् गंग--
-यमुना की धारा
का ताज हमारा भारत प्यारा।।
सब देशो
( २ )
हरी मी लहलही मही जिसकी लोनी है।
सद' उर्धर, कहा कहां ऐसी
छोनी है॥
गुन गौरत्र गति ज्ञान भरा है न्यारा न्यारा ।
सव देशों का ताज हमारा भारत प्यारा ॥
( ३ )
भरा हुया है अस्त्र वेइ का बड़ा खजाना ।
अब तक जिनका नाम नहीं औरों ने जाना ।।
धर्म
युद्ध मन ठान
कब किसने मारा।
सब देशों का ताज हमारा भारत प्यारा॥
( ४ )
करते हैं जो पुण्य स्वर्ग को वे जाते हैं।
किया वहां भी पुण्य यहाँ फिर वे आते हैं ।।
सदा स्वर्ग से बढ़ा हुआ है विश्व--दुलारा-
का ताज हमारा भारत प्यारा ॥
मैदान
सब देशो
रचयिता-बाबू चन्द्रदीप सिह, वकील, छपरा ।
जहां बसत सब समय सबहिं
ऋतु सुखमय छाई ।
वर्षा शरद् हिमन्त शिशिर मधु ग्रीष्म सुहाई ॥
उत्तर हिमगिरि शुभ्र पाग निज शिर पर धारा ।
देशों का ताज हमारा भारत प्यारा ॥
( २ )
दक्षिण सागर धवल
धोत की काबनि शाद।
विन्ध्याचल दृढ़ बक्ष वृहत युन शोभिन पाछे !!
नटवर वेश विभूषित शुभ्र
सब देशों का ताज हमाग
जहँ सर्जन सर्वाधिकारि सम जग में सोहत ।
नील रतन से वैद्यराज सब के मन मोहत॥
श्री जगदीश समान
জান—নিজাল
प्रागारा।
सब देशों का ताज हमारा भारत
ব্যাথা श्रेष्ठ घोष सम को जगमाहीं ।
श्री गाँधी सम नीतिनिपुण नर जहं प्रगटाहीं॥
श्री गणेश सन गणित शास्त्र को जानन हारा ।
देशो ताज हमारा भारत
आशुतोष सम न्याय निष्ठ प्रगटे कित भू पर ।
श्री सुरेन्द्र सम भापक करें जगतो तल ऊपर ।।
संस्कृत शम्मी
किहि देश मैंभारा।
सब देशो
हमारा
रचयित- भगवतीप्रसाद सिंह "शुर छपरा
घरल हिमाचल जहाँ प्रनि विस्तारा !
हर हर हर हर जहां वो गंगा की धारा !!
मिन्यु-अङ्क युगल शाः-संयुक्त
मातृ-भूमि में रमा रहे
विश्व-तिलक-समाब, लोक-लोचन का तारा ।
सब देशां का ताज हमारा भारत प्यारा ॥
किनारा ।
समस्या-
- क के तपन में।"
रचयिता-६० रामनारायण मिश्र काव्यतीर्थ, छपरा ।
(१)
हयां ने गई कैसी अली केसी बनि आई भली,
पहुँच न पाई लली लाल के लपन में।
उलझ गई अलके विरुझ गई वेदी शिर,
सरुझ गई चञ्चल चख्य पलके झपन में।
टि गये चन्दन हू दूरि गई माला मञ्ज,
बिखर गये मोती मनु मैन के जएन में ।
कंधों न्हाय आई अवै कैधा धाय आई सखी,
कैधों स्वेद-बूदें हुई प्रीम के तपन में ।
afts
Age
-बाबू को हम भी कर
-
ए
पा
से रन
रतुमार इन के बाद सरकार
देवक बैंड कने बालदरी व
चन्दन कार पर घरे जिज
होने जा विहारा नुकोज भोजे चार लो.
प्रिया से लिपाने की जीत के तपन में
कारें हार अनि सोनल गुलाब जन.
परि रह्यो परिमल उशीर के इन
भरें 'भुवनेश
दीटि परे नीठि जीठि धार
TA
तार
पोढ़ी बल बदन साज में ।
मानो -
पागो
दीन न र ल तन में।
संग त्यागिः
लोभ रहद पर कार्य पार ली. वन में !
चित्त ना सिरायः प्रसाद त्रिकुट पंजीठ घरोः
बलमा ऐशादी हो नहीं भुने.
व्यर्थ पंचाग्नि लोगी श्री
रचयिता-३ चन्द्रदीप सिंह बो १० वी० एल., छपरा
जैसे विधा विहिन की बाकि है जाने पाड,
कन्न निकाय
सपन में॥
जैसे बिन वा रेत के तनिकन भावे 'चन्द्र'-
जस जारे डारत है --मात इल-कल,
दावाजल लगि केनियल वन में॥
पालो।
जारं तद बरही श्री के तपन में॥
रविन-श्री सरसाद "म": छपरा ! an- कोऊ लोमोट कर ली ल कोऊ द्यावी नाना मांति सजन नोभी. पाश्म नहीं हैं न श्री के तपन में रचा किला-रथला मी. इ. रथाला मी. परः । फूल न समाना था त भाग्य को सराहनः या. तू विचरता था वन्द-उपवन में। रे मलिन्द । मनाला बना फिरता था तब. मकरन्द पान कामना था संचय करनाः सविर्सल लेकर पूर्व ही ले. ना के अपन रोमो, असा उस मधुर . vasikaaamana- रचरिता- महबूब अनदाएर । विरक्षा अनल लगा है जब से हमारे मन में। मन हो रहा है साबुल इरू बोल के तपन में ॥
समस्याः-“परत लवाई है ।"
रचयिता-पं० रामनारायण मिश्र काव्यतीर्थ, छपरा।
तेरे हेत हीय हहराने से हमेश रहे,
हेर हेर हारे हरे ! होत ना सहाई है।
दूर दूर दौर
दौर देने इई द्वार
दिन दिन दुनो दुख दीनता दिखाई है ॥
कास कहीं, कौन सुने, कसक निकार कौन,
कोरे बकवाद कौन
मीज में न ममें न मन में न मन्दिर में,
मूरति ना परत लखाई है ॥
॥
करत
माधी ! मनु
रचयिता-श्री सरयूप्रसाद, कटरा, छपरा ।
ऐसी अधियागे रैन कारी नहिं सूझे कछु
भवन भयावन न पिया निज भाई है
पौन झकझोर कर बातक चकोर मोर
कूक उठे कोकिलादि
मधुर
सुहाई है।
काली घटा काम-रूप छाई
मण्डल में
हरी हरी भूमि पे लतान छवि छाई है।
पीय विन अबला इकान्त पाय सरयू जी
वीर विरहिन ज्वाल परत
लखाई है॥
छिति
रचयिताः-बाबू भुवनेश्वरप्रसाद एम० ए० बी० एल०; छपरा।
( १ )
शाटोदार मांग सटकारे कारे केसन की
त्यो ही पड़ो ओठन में पान की ललाई है ।
कवि भुवन श' त्यो हिमानी और पाउडर की
सारे मुखमंडल पे छवि छिटकाई है ॥
प्रांगुरी की मुंदरी में चमक कनी को चुन
रिस्टवाच भूषित त्या
नाजुक कलाई है।
नाबू बने बोबो कैसी छवि है निराली धाती
चूनदार चूनरो सो परत लखाई हैं।
( २ )
सेत भए केस पैन मन मलिनाई मिटी
कंप्यो सिर पै न अनुकंपा उर आई है ।
वैन भहराने पै कुबील की गई ना देव
अभिमान झुक्यो नाहि देह झुकि पाई है ।।
भुवनेश छाई शिथिलाई सब अंगन तो
विविध बिलासन पै रुचि अधिकाई है।
देह में बुढापे की दुहाई फिरी चारो ओर
तृष्णा तरूणी सो
लखाई है॥
अब परत
। १३ ।
रचयिता-चावूसरयूप्रसाद : भीम" छपरा ।
त्रयमासिक साहित्य-भवन उत्सद
छपरे की जनता आनन्द
आनन्द में समाई है।
पाये हैं समोद साथ ले के इष्ट मित्र सब,
तारा के समान प्राभा चारो ओर छाई है।
पूरति समस्या भांति भांति की सुनाते कवि,
मानो इन्द्रदेव धार
सुधा वरसाई है।
ऐसे ही रहा जो ये उत्साह श्राप लोग बीच,
उन्नति
शीघ्र परत लखाई है।
अवश्य
--
रचयिता-बाबू भगवती प्रसाद सिंह "शूर" छपरा ।
अन्नपूरना ने लक्ष्मी से पूछी एक बात,
"काहे मोसे दिन दिन जात कतराई है
नाही बहु भांति संग मेरे पाती जाती अब,
याही बस हाहाकार लोगन मचाई है "
लक्ष्मी कही" सखी, लोक मति मारी गई,
मोहि के विदेश भेज चीजन मंगाई है।
देश में विदेश में दुनी में आज याहि लागि,
आपदा अनेक भांति परत लखाई है।
१४
समस्या-“घोर घन छायो है"
रचयिता-बाबू राजाराम टण्डन, इन्जिनियर छपरा
श्रातप के कर व्यवहार बिनसायो सये,
सावन को साज यहि देश फिरि आयो है
नेह निरमोही, श्राश अपने पराये
प्यारे बिरही क्यों अाज अधिक
डरायो है।
जेठ की जरति प्यासे नाम रटि रटि गाया ,
तेरी एक बूद पाछे अङ्क धरि लायो है।
पपिहा पियारे !
नेकु,
पी ; पी ; पी! पुकार फेर घोर घन छायो है।
नैन तो उघार
B
रचयिता पं० रामनारायण मिश्र" काव्यतीर्थ" उपर
(१)
उर बन-माल नहीं, ए तो बकमाल आलो ।
पीतपट श्रोर नहीं, दामिनी दिखायो है।
वंशी की न धुनि सखी ! गरज गरूर भरे,
मुरली न शोभा सुरचाप चदि आयो है॥
मोर पंख धारे नहीं मोर हो करत शोर,
तन की न श्यामता, तमाम तम छायो है
आयो बरसात वर साथ नहीं लायो हाय,
ये तो घनश्याम नहीं घोर घन छायो है॥
[ १५ ]
(२)
उमड़ि घुमडि घेरे घहर घमण्ड भरे,
धूमि घूमि चहुधा ते मि झूामे त्रायो है ।
मोरन के सोर भरे गरज गुमान भरे,
झिल्ली झनकार भेष भोरु सो बनायो है ॥
विशद वियोगिनी के वध के कृपाण राम,
चपला चमकायो है चिनगो लगायो है।
विरह बढ़ायो वेग विषम सतायो काम,
कहर भचायो घोर घोर घन छायो है।
रचयिता-श्री कन्हैया लाल जैन, छपरा।
बीति गो निदाघ दाघ अायो ऋतु पावस को,
मोन के जोर भरे शोर मन भायो है।
छोर छोर छनदा को छूटि छूटि जात छटा,
अानंद शमन्द छकि छकि छिति छायो है॥
शीतल समीर गति धीर हो चलन लगी,
सरस संयोगी सज साज सुख पायो है।
विरही विचारन के विरह बढ़ाने लाग्यो,
देखो देखो आज नभ घोर धन छायो है।
है
न
रचयिता-श्री सरयू प्रसाद कटरा, छपरा ।
प्रायोरी आषाढ़ धन गरज गरज नभ,
उमड़ उमड़ पेरि घेरे जल लायो
ताही समै परी दोटि श्रौचक जमुन तीर,
वाके तन व्यापी पीर वीर मन भायो है।
बहत पवन वउवाई अब मोर मार,
दामिनी दमक अति जीय डरपायो है ।
घहरि घरि घेरि गरजत मन्द मन्द,
देखों ब्रज मण्डल पै घोर घन छायो है ।।
समस्या-
रचयिता-पं० रामनारायण मिश्र " काव्यतीर्थ", छपरा
नयन है
कैधौ रूप सागर में विषेले हैं प्राह युग,
कै धौ प्रोप अानन में बिन्दु युग जपान हैं।
कैधौ अर्द्ध चन्द्र के उपासक हैं तारे युग,
धौ इन्दु अङ्क में निशङ्क मृग शयन हैं ।
नासिका दुनाली हेन कैंधौं युग गोली धरा,
कैंधौं बङ्क भू-धनु पै साजे शर मयन हैं।
कधौं युग खञ्जन, के मीन मद गञ्जन ये,
कैंधौं युग वंज कैंधौ कामिनी के नयन है।
।
[ १७ ]
(२)
पावन पीयूष मय प्रम के पयोधि पूर
पोखी युग मझुमीन गखी मनु मैन है।
लगि लगिजात कहूं प्रीति पगि पगि जात,
मुरि भगि जात कहूं' नेक हूं न चैन है।
धोरज धंसावें कहूं हिय हुलसाधै कहूं,
रोष रंग जावें नौ चलावे फेर सैन है
त्रिगुण तिरंगे तीर धीर वीर पीर बने;
बाँके औ लड़ाके मद छाके बने नैन है।
.
रचयिता श्री बच्चा लाल बर्मा 'शल्य' छपरा ।
कैंधौ चल चपल दामिनी की है चकाचौंध,
फैधौ बरुनी के बीच नीलम जयन है।
कैंधों सुहागिन के ये बैन बोलिवे? के हेत,
काव्य कला कट अवगुण्ठित बयन है
शल्य लाल कैंधा वरछी की तिरछी है अनी,
कैंधो मान मानिनी की चढ़ती सयन है।
कंधौं ये विहारी के बिहार करिबे के हेत,
भाव रस भरे भीरु राधा के नयय है
[ १८ ]
रचयिता-श्री प्रभुनन्दन सिंह शम्र्मा, 'नन्दन' ।
(१)
देख कर भी देश की दयनीयता,
जो पड़ा गफलत में करता सैन है।
भरा निज स्वार्थ का जिसमें नशा
फूट क्यों जाता नहीं वह नन
नन है॥
(२)
वद नजर से घूरता पर-नारि को,
पाप में निशि दिन जो करता चैन है।
है निरखने में जो रत पर दोष को,
मार्ग है वह नरक का या नयन है ॥
(३)
चीर सकता है कलेजा शेर का,
वह नहीं दुश्मन को देता चैन है।
पल में तड़पाता कलेजा वीर का,
या खुदा यह तीर है या नयन है॥
रचयिता-श्री पुरुषोत्तम दास गुप्त, कटरा, छपरा ।
जाहिरंच प्रभा मिलि मृग मीन खंजन को;
वाहि विधि उपमा में कवि के वयन हैं
गजब रंगीली जाहि शान सुखमा से भरि
सांचे सनेहिन सुख दैनी सु सयन है।
देखत ही बने कहि पार नहीं पाबे कोऊ,
हेरि के हेरायो मति रति हृ मयन है।
सुठि सुकुमार कमनीय ऐसे और नहीं,
हरे-हरे जैसे सिय-पिय के नयन है।
समस्याः-“देखतो।"
रचयिताः रामनारायण मिश्र काव्यतीर्थ।
श्याम ही त्रिभङ्ग सङ्ग श्यामा रंगी श्याम रंग,
अङ्ग अङ्ग श्याम के अनङ्ग ढङ्ग देखती ।
डोलति तो श्याम वन बोलति तो श्याम श्याम,
हूंढती तो श्याम ही को श्याम 'दुति पेखती ॥
श्याम नभ श्याम महि पाठहूँ दिशान श्याम,
श्याम को निमेषती है श्याम ही निरेखती ॥
श्याम तन श्याम मन असन वसन श्याम,
प्रांखेंभई श्याम श्याम, श्याम श्याम देखतो ॥
रचयिताः-बाबू भगवतीप्रसाद सिंह, विशारद, छपरा ।
कहि गये श्रावन न आये मन भावन ये-
चिन्ता कलपावन ते भूमि नख लखती ।
द्वार लगि धावन अंदेश मन लान लगी,
उचरावन ते
सगुन
लगन लगावन में आगम
ग्रानन्द भो,
मन्द मुसुकान सो अमन्द भाग पेखतो ।
कुसल उसल पूछिवे को सुधि भूलि प्यारी,
प्यारे
मुखचन्द को चकोरी बनि देखती ।।
काक
परेखतो ॥
रचयिताः-पं० मुकुन्द शर्मा कथावाचक. कोरा सम्होता ।
मिथिला की नारी रसवारी सुकुमारी संब,
यौवन बहारी राग-रंग में उमेखती ।
साजि के समाज साज आनन्द में गाज गाज,
दौरि चली मार्ग में सखीन को सरेखती ॥
गाय रही गीत प्रेम रीति को दिखाय अली,
हंसती हंसाती कलो काम की समेखती।
सिय के स्वयम्बर में आई हुलसाई सब,
सानन्द 'मुकुन्द' भूप गम-रूप देखती ।
[ २१ ।
रचयिताः-श्री
सरयूमसाद
'भीम' तिनकोनियां, छपरा।
बार बार करती विलाप हो दया निधान,
और बार बार यह पाती लिख भेजती ।
एक द्रौपदी के हेत द्वारिका से दौरि आये,
आज केती द्रौपदी अपार दुख झलती ॥
किन्तु आप आते न तो देते हैं सहारा कछु,
हाय पत्र का भी न जवाब ही निरेखती ।
'भीम' विष खाय डूब जाती नाथ कब की न
किन्तु राह रावरे ही श्रावन की देखती ॥
स्वतन्त्र विषयः-
"
"दीपक
रचयिताः-प्रभूनन्दन
सिंह शर्मा निन्दन” विद्यार्थी
जिला स्कूल, छपरा।
( १ )
मैं मुफलिस का दीपक हूं मेरी यह करुण कहानी है।
किसे सुनाऊं समझेगी क्या? यह दुनियां दीवानी है ॥
यह जीवन भी जीवन है क्या? इससे तो मरना उत्तम ।
कुछ कुछ वुझा हुआ सा रहता हूँ मैं सन्ध्या से हरदम ॥
२२
...
( २ ) कितनी रातें पड़े-पड़े कोने में कट जाती यों ही कभी तो स्नेह नहीं है कभी स्नेह तो सूत्र नहीं ॥ कैसी चोट पहुंचती दिल पर है जब कोई परवाना । भूला भटका आ जाता है चूर प्रेम में दीवाना ॥ t- बुझ जाता हूं स्नेह विना में जब चलता होने वलिदान । फिर जाता है हा ! निराश हो वह मेरा पागल मिहमान ॥ रूप नहीं है, रंग नहीं है, नहीं शिखा में चञ्चलता । तेज नहीं है, नहीं उजालो, घुटक-घुटक कर रिक्त पड़ा हू, तरस रहा हूं कोई दानी आ जाता। बहुत नहीं दो चार वूद हो स्नेह-सुधा टपका जाता ।। जलता। पै बनाय रचयिताः-पं० मुकुन्द शर्मा कथावाचक, सम्होता छपर। । मृतिको को काट कूट चक्र चढ़ाय चट, दण्ड से कुलाल फेर घूर्मित कराता है। कर से मराड़ मोड़ प्राकृत नीकः सुवह से साँझ तक धाम में तपातो है॥ पोत के कषाय तिल ईन्धन जलाय फेर, प्रचण्ड अग्नि बार के पकाता है। ऐसे ऐसे दुख पाये दीपक “ मुकुन्द कामिनी के अञ्चल में आनन्द प्रवल जब उड़ाता है।
रचयितो
बाबू
रामअयोध्या सिंह अध्यापक,
सारन एकडमी
छपरा ।
अहह दाएक! दीपक मोद के,
वरद, विज्ञ विकेक-निधान हो ।
सरल है तव जीवन की कथा,
विशद हो तुम प्राप्त प्रकाम हो ॥
( २ )
निज छटा छवि के शुभ दान से,
कर रहे सब का उपकार हो ।
जल रहे तुम सन्तत श्राप हो,
उपकृतों पर ही वलिदान हो ॥
उपकता
मण्डली,
तव प्रभा परिपूर्ण प्रकाशिता
निज सदा सन है तम-क्रीड़ में,
सफल जीवन है तव धन्य हो ।
रचयिता:- रामनारायण मिश्र । काज्यतर्थ, छपरा
हे दीपक ! दीपक! प्रदीप! प्रताप तेरी
अाल्लेक लोचन
हे काम-रूप! अति सुन्दर वेश धारी.
है विश्व व्यापक महा महिमा तुम्हारी ॥
घनेरा।
--
रचयिता:-वावू भगवतीप्रसाद सिंह विशारद "शूर" करा !
( १ )
तुम्हें जब ध्यान में हम ला रहे हैं ।
अनेकों भाव मन में भी रहे हैं।
तुम्हारा रूप ऐ दीपक ! है न्यारा ।
नहीं मालूम किसने ये संवारा ॥
( २ )
वही तुमको जलाता या जिलाता ।
वही तुमको बुझाता या सुलाता ॥
हवा लगने से तुम क्यों शान्त होते ।
अपना स्वत्व निज हाथों से खोते ॥
( ३ )
भभक उठते हो जब है तेल घटता।
तड़प कर हो तुम्हारा दम निकलता ॥
नहीं मालूम किससे लौ लगी है।
कहाँ आशा तुम्हारी जा बंधी है ॥
(४)
कहां का मौन तुमने है ये साधा ।
नहीं मेरी समझ में कुछ भी आता !!
ये क्या अनरीति तुमने है विचारी ।
अरुण निकला हुई सन्ध्या तुम्हारी ॥
( ५ )
जगत सोता है तुम रहते हो जगते ।
जगत जगता है तुम आराम करते ॥
हो योगो या कि भोगो कह सुनाते ?
एशारे से हो कुछ आखिर बनाते ॥
?
फतिडो को हो किस कारण जलाते ?
इन्हें क्यों खाक में
तुम हो मिलाते
गजब की जोति तुमने है ये पाई ।
अंधेरे की लिश तुमने मिटाई ॥
पवन से किस लिए है द्वेष तुमको ।
दे देता किस लिए है क्लेश तुमको ॥
किसी से हाथ अपना क्यों बाते ।
अपना शंश क्यों उससे कटाते ॥
( ८ )
किसी से तन नहीं अपना ठुलाते ।
यो ही सौन्दर्य अपना हो लुटाते ॥
बताओगे तुम अपना माजरा कब
भला मुझसे तुम्हें कोई है मतलब ॥
"
उर्दू पूर्तियां।
आँख खुली हुई हैं।
रचयिताः-शैदाय सुखन जनाब लबी महब अहमद
साहन, अन्का छपरवी।
निकली न जिदगी में जो दीद की तमन्ना ।
मरने प भी हमारो आँखें खुली हुई हैं।
वह ाके देख लेते दीदार की ये हसरत ।
मरने प भी हमारी आंखें खुली हुई हैं ।
कब जान छोड़ता है संसार को झमेला ।
यारों की जिस घड़ी तक अांखें खुली हुई है ॥
जो काम के है बस में अन्धा उसे समझिये।
बेकार उसकी यो ही अांखें खुली हुई हैं ॥
इस उम्र में भी 'अन्को'तुमको नज़र न आया ।
बह कौन है कि जिसकी अखेिं खुली हुइ है ।
चल गई
रचयिता:-मौलवी मुहम्मद हनोफ स हब, 'हनोफ़' मुखतार छपरा
मुद्दत की आरजू मेरे दिल से निकल गई।
उस शोख को छुरी मेरी गर्दन प चल गई॥
वादा किया है आने को गो झूठ ही सही ।
कुछ देर तक तो मैरो तबीयत बहल गई ॥
शुक्र खोदा कि हाल मेरा पूछते हैं वो।
तकदीर मेगे बिगडी हई अब बदल गई ॥
क्यों देखा साथ यार के अगियार को हनीफ'।
आंखों का था कसूर छुरी दिल ५ चल गई ॥
२७
-
रचयिताः
मौलवी अमजद अली साहब, 'अमजद' मुखतार परा ।
उनकी छुरी निगाह की पै हम जो चल गई ।
कुलफत जो दर्दे दिल की थी एक दम निक गई ॥
दिल बानिय फसाद है आखों का क्या कसूर ।
इन्साफ था यही कि छुरी दिल पचर
चर्खे कुहन ने ऐसा उलट फेर कर दिया ।
एक पल में सारी हालते दुनिया बदल गई ॥
'अमजद वफूरे गम से था मगम्म रात दिन ।
बज्मे सोखन में आके तवीयत ब ल.गई।
गई॥
शोक पर शोक और संताप पर संताप उठाने शलों के
हृदय की वेदना अकथनीय होती है। यह संवाद सूत करते
हए असीम दुख होता है कि हम लोगों के काव्य- रषद के
एक बड़े योग्य सभासद पं० रामनारायण जी मिश्र, व्यतीर्थ
का हाल हो में असमय स्वर्गवास हो गया। हा! ण्डितजी
की उस मधुर वाणी में उनकी वे मनोहर रचनायें अ ' सुनने
को प्रांतान होगी। ईश्वर प्रांपकी आत्मा को शन्त प्रदान
करे ।
भा० सा
भवन।
२८
भारतीय साहित्यभवनके वर्तमान पदाधिकारियोंको नामावली बी. एल. " " : १. बाबू भगवतीप्रसाद सिंह, विशारद, ज़मींदार सभापति २. बाबू माधवचरण, इन्कम टैक्स अफसर उप-सभापति ३. बाबू नन्दकिशोर जैन, डिप्टी मैजिस्ट्रेट ४ बाबू रामरतन दास, रईस ५. बाबू भुवनेश्वर प्रसाद, एम. ए., बी. एल. सदस्य ६. बाबू साँवलिया विहारी लाल वर्मा, एम. ए.,बी. ७. बाबू पुष्पदन्त प्रसाद जैन, ज़मींदार ८. बाबू राजाराम टण्डन, इलेक्ट्रिक इंजीनियर ९. बाबू रामाप्रसाद सिंह, जमींदार १०. पं० उद्धव उपाध्याय १३. बाबू हरिहरनाथ वर्मा, वकील १२. बाबू सुखानन्द जैन, बैङ्कर १३. बाबू रामअयोध्या सिंह, अध्यापक, सारन एकेडमी १४. बाबू वासुदेव प्रसाद, व्यापारी ११ बाबू काशीनाथ सरावगी, रईस १६. बाबू तेजपाल सरावगी, बैङ्कर कोषाध्यक्ष १७. बाबू राजनाथ सहाय, अध्यापक, सारन एकेडमी मंत्री १८. बाबू नन्दकिशोर लाल जैन, रईस १९. बाबू चन्दन प्रसाद, क्लर्क, जिला स्कूल, छपरा उपमंत्री २०. बाबू द्वारका नारायण, एल. एम. पी. उपमंत्री २१. बाबू रघुनाथ प्रसाद पुस्तकाध्यक्ष २२. बाबू महादेव प्रसाद चौधरी, बैङ्कर व व्यापारी औडिटर . " संयुक्त मंत्री