Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Prashamaratiprakaran

Swati, Shrimaduma · 2011/08

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पेठ मणीयाम, रेबारीकर नगीवन गौरी
भानरेश मल्पा-सिमभुप्रमावा मेटा,
पौषत बम, बातम्या गौहरो पामर, पई १
एएमाप वीपाशी रसाई
म्यू माय प्रिमिल
माही बान ४

प्रशमरतिपकरणकी विषय सूची । पृष्ठत विषय . " ८ पृष्ठांक संकभीम भगमापरण १.३-पतीय मधिकार-गानि- सारिका २४-१५ १पर भाउ मेद २८ मापारीमान । ४-चतुर्प मधिकार-भाट कर्म- कारण १४-१८ प्रबरी बनाने मनिग उत्तमरिक मर २६ तस-पासनमें प्रवेशके भरिपरी पभरमौका वर्णन -मपम मधिकार-पौउपन्य- कारिप १५ हेलाका साप वा उमरे मेव बचरी ना भारमारे सावधर्मपन्य हो बामगर सा होतो? महामति मापानि यो घासतरमुवार मोहन च मापुरेशा मचार न कर पुनम से कब मनाने प्रतिमा प्रपन यो पर इन परमवा १२ मचिौर प्रेममय सम्म उपत्र ग्नेशा रचना ५-पंचम भपिपर-पपेन्द्रिप लिपप- बनानेनापन ९ कारिक १९-७१ समनोका स्वमाव- पायोनियोरे पाच विषय भौर उसके PM राम्पमागी पगई विशनों से सम्मत होमी । इस कामयन्त नईत समाधान स्पेभियरे वयस्त हिरणके नारामान पानिपरे मन मरिक नाशका सात पूर्वापारने भनेक प्रचलिरममा प २३ सोमनाते। इस समायाम मंबरे शिवानोके बीभूत मौनो नाश सात मदिव १२ सनेनिरके मागीभूत एपी नाशपात खबमानमायोलमा परेका १४ पायो पत्रीके पास भक्ष्यमी बनी दशा पैगम्परे पर्यायवाची शप १५ एमा प्रेो विषय नहीं बिसक बार बार सेवन राय परमेसे तृप्ति होती परे १५ भनिए विषप मानेमापिस निम्न चोरेरनेसे भागमा रामपके बची मी मनिश १. प्रोमनोमनुसार इन्द्रिपम्पायर करमाकी २-मितीच पधिकार-पाप पारिका १५ २३ मरिक्ष प्रेमबाहे पिपप बालबम नसar ।। रामरान् भाभाकीपा या दोनी है। मभनिए सब मनाना राम नही मोरे मोरे एगाोपी बोरो इसमेव मौर परमेम ।। मनाममनसे मापवावा होगी २ गुणकी रमना मही3171 २ कोपापापा बन्न नर्मक होनेरे सिबाय की पुत्र न होनेवाA. २२ मारमा परेसे पर्मपुर वि. मान नेपालमा गीत पर मुह दो पद मममममा मालीपन' समे सम नर-पोरनेपर h 111 - रापयनशासमास [सिप स्पी प पाक . भर विश्व सापकीपुरमा ४५ रे मार, शान, मासु, मोग * में मम देसा! विविधमारेसन हमें मे रसि गुमोरे होनेपर मी पुसामा बिन प्रथम है को निमित्त के सम्मानम गुरु बाबौना ये बना प्रम परिणामोरे रिपति सि रामपम स्वाम दित पाय उसे गुरूको नाम लम और इमिगोको पात परमेनपान सन्म पमा बाहर ४९ चाहिए स्परेण ते दो मरने पुषमा समने -सप्तम प्रषिधर-बापार-कारिका १२-१४५ गुरु मुसवमा मामी ४१ प्रतिमा। ७१ उपरेरा शिमोनमारने रिपोम मनुमने पोहा सोना। पभाचार्यपि मा प्रक्कम बार सरकल्प उपर ५ पूरा उपाय " रासेपिरन समोर ५१-प्रमो मममन ममय प्रेमाचार मी मनुमोसा भोगना पाया। मनुपम र उती गा मा पारिए ५२मापार मेरो चितवन बात समर्थनमपात ५५ भापक प्रम मतभी मचपन। समधिपर-पारमा परेन.-११ मो भाषा भाभदोन लोमान्स बम्बा सचिन स्थमय करने में मान मरासी रिखप पुकम्प पूरियो भनिन ८ पात्रता यसी विवीप विरे मनिमम बनव मवार करने उपरेण विठगायुधमनभाचारमें रम बाजी मागे परको की मोमुचिसोपात मलायी मद लिप-गुरुती भमिका काम 24 -मम्म पपिपर-मामा-भारण- रेमवणे प्रशम्भून पाशिम पार ८ को शिरोमेन मरनमा पारिए सामी इस्पिोप अनिरमोगसे दोन प्र मरममा बाहिर १४ बीमाको पाना ममही विस-मुखले प्राममान सीमा ८६ परसे समय दुमा मनुल इसमेकम प्रष्ठमा पुनःमता ८८ यितीव्य पुष्ट होता है। 1.मेडी पियरमममम ममम-परम लनाची मात्रा से करोगास प्रश मापन निवासमेगमा पारिए। १८Jीया स्कनेम ८१ के मरने M ८८ " १९ नो एनडी शिवा मेरो नी भए विषय-सूरी] प्रशमतिप्रकरण H मागर्म । ७ बिफ्प पृष्ठांक विषय पृष्ठाक सपु माप मरने पोम्प स्या है। और जोड़ने समानकी प्राप्तिको दुर्गमता ११२ गोम्प पारे। वन इसौनस पपेन २ पारिष मोमनबारेम ९५९-नवम मषिकार-धर्म- कारिन १५७-१८१ पामारी मासे प्रहप किया मोबन मार्ग पमा माय मार्गर भारि दए पर्मोन सपिठ मारि रोग पैरा नही पता मोबम पाच पद प्राइम करनेवाय सामग्री पमान बन मी से हो wat! इसघ्र समान ९. | मार्म उसी निष्परिणाम सा कपन रोमेसे मरे प्रेम ११८ पर भौर उमरेसाब पमर्म सम्पप रस ए दोसि सि सों माधम मही होता! इस प्रका तमाशन | सम्पषम यशव । तपपर्य निर्णयप्रखप ९८ माम्पस १२१ सस्प (मम्म) भौर मारप्प (भप्रामप्रताप ९अमचर्म , १२५ इसी पठाता . भारिप-मय १२३ बस्तुएँ र पम्प होची और सभास्प! १ धर्मा १२४ बाम्नमादरे भनुसार प्रप मास्पदी बिपि विस दिसे पराम रिमना होगम उपना परिए समरन बम पर पोय नशमें परनेमसंजिन ११|१०-दाम मधिकार-बम-का-प्र १८१-१८८ इमिरवणरनेम विरेस चार प्रचार वर्मा मारेपनी विषयी मनिलमयरम जार २मान भिम सही भी भरनी समस पारप्रसारप्रवि-पौरमा भीरमामा भनिएपमानाका स्वरूप और देवासो सामना पादिए १४|पिद पानाकरन १२८ छाम पीपुलचि १शाम्रप्रसस्प ममचिम करेपर १५-पपरा अधिघर--बादि मनकाप- भरिमा १८ १९३ उंबर निर्णय २ मम्प पोम मान पदार्थ बासमें मेगमामा मों को। बाबो भेद इनमोषि ११ संसारीमाधी मैद १४ " M - " सानपाव M प्पचनशालमामा [विषय-सूची विषय पृष्ठोंक विषय पठांक १२-हावा मधिर-उपपोर-परिन १४१५ समावन जान, मोर चारित वनों मिमर मोपरे ११४ सामीपाएसएकतामापान ११२ भाठौर बार मरोप स्वपन ३४ सम्पन्न पत्र भार प्रकार करना पाहिए। १५-पोरश मधिकार-माब-परिघ्र १९५ १९० मिनारमे किन सामोरे मानोधन २२५ मोपामर मेहनगर १५-पोशमपिचर-सी के भंग- १४ २५ इमारमा पयावारमा पोमात्मा मार माठ मार्यमाए १३० प्रथमगुनी सा हो तो हा मगोधी साना द्रमामा मारिन सम्प १५८ समय पर सत् मौर मन्द मारना चाहिए चौमसरा हमार भय और टमी ससचिने सगरमान वरम उपाय १-पतुरंश बधिकार-परम-प १-२२०१७ -सप्तदश पिचर-पान-मरिम १९ जीबद्रमाक पणन कर्मधानले मेरोंका वर्णन पुरम सम्पमें १४ माशाविषय मपाय पपका स्वरूप १.२ औरविरमा मार्मि मारमामोरे विपाविषमरमानविन तस्म या मात्र हो। mपरम्पपसे पधारा १०० मेरामनन गोपीन मागोमतम १८-भणश मधिपार-सम्मेली- १. २०१ १४८ सानु माविम्मकार एकोणसे सारव होनेवाम पमा माफास प्रमाया हो। अनेक कामे बुर भाठा मर्यकरम कौन कौम म्प एकौन समेत गुमरवान प्रास सुनिले भनेक पूर्गम कीपी प्रत है नौन परमास ममापनी रस्ता परमपम उपहार पार मौरीबाम्पना स्पर मुनियों नौकदिनों प्राप्त होती है मास कारि पंसि सकारोवी पुन मोर पार पावर्षम मुनियों को प्रसारियों सामने इमभामित्रो भासा पर निम्न निका और मोर निरामय वित्र रनेवाले ओमार सोच पैन मुनि समापन सम्म करियोपर विजय प्रातर यसमपात- सम्मममो मेर १५. रिने प्रसमज सम्ममा मेव मोल्लीवामी मनी प्रमिय समापाप मोर सपागान मैद मोनीयम्मी २८ मधीयाना होनेस मुनि १५-वरा मषिपर-बाप प्र २१८२४२ बौराय हो बाधा समचारिणय परिपारम सोभमा काम १८२ १६१ वापरा " " १८५ विली] प्रशमतियकरण विषय पृष्ठांक विषम पृष्ठाच मोहनीयाम भप होनेपर पप मात्र सप परीरका पन भाठों मात्र एप को मुजीब भवस्य माता १८५ मनुष्पम्मेकम नहीं मला ठारने न कोर नमान प्रतिष मार सिप वर्मन काय नभाभय मौर म पागर २. १९-एकोमपिति मषिकार सम्मान- मुकाब वा नहीं ठहस्त्रो न टहरो रितु उसे उपर ही माना चाहिए, ऐला नियम करिब २७२२०५ सिभरमसेसना समाधान २२ सम्मात निषि-मालमें किस समय कौन मर मुधिविकिपा मी नहरो कार्यगमन योग होता है। १८८ से पलानन समापान २०-शिति मभिर पोगनिरोप- २०७-२८२ मुलीवर भनुपम मुन मिरिका बन बोगनपेपरने राति २सानितिमपिपर-मम्स २ ५११५ योपनिरोप समापी गंभोम समापन ११ पास्पक्यानबमेन मनोरोग बाद योमनिरोष वा उसन पर भवन पीन गुना पार शिक्षH मार निरूपण भावरिमोचपन २१ बोमनिषनेपर परमभगवानकी भवरचा पडता मापन माहाम्प बामते हुए, परत इस प्रथम मादिसे कर मुस्तकिमानिसम्मिान समय को हम सपनमें विपमान है, भवस्थाने प्राप्त करता है भपनी युग्मेि फस्मित नहीं मारे मूभाभ २१ पशिति भधिकार-मोरुपमाविबान- प्रमना भरिका २८१२८ भाप मेग बसी मतिम ममममें भर्तमान मदनिकको प्रमाप्रपति नगत रस तप मेदनीप भानु नाम मौर प्रबनना समय योगामार को एक साचं मर दर । परिसिए- १मभूति २९० १९८ २ मामनिधनकी प्रस्चिमोली मनुकमवित्रा २० पुलमा मोवर भमा सारा मानन समीक्षा मा पोशी भनुम्मपिता ૨૧ मप्र मिसन ४ विसर पी बर शेती प्रकाशकका निवेदन । 2HC भीमामालानिम तिर म समापमानापियन (मोपताम) प मैनछाममाम र पात प्ररर चुमा उमममा सरस्पना प्रमनियमच प्रतिस्पतीमय सदुमा है। इस जन्म में विमार सेखमर दोनों सम्पदा में मान्यताका बोन मायभम जानीरसेना बनेमा। इस दो तल का स्वामोहन बमोनल ग्रीवा में प्राचीन रोमरिमरिकी बोरसमें इद्रित । मरेनीतालतमा मनारसे पर १४१५ में रित बोनस पाप है। दूसरा मैच देकरमा पुस्तकार से १ मे पापी मो प्राप। ममम ५८ बप पा समुषाद स्याहार महम्म प्रयो प्रचनापास सामने एक मिाा पर बधहोनेसे साहिलाचा रामकुमार शमीने मला । में बीमे सनित प्रति भौर ४-५ सिमित पीयो बामसे और संकलमात्र योन सम्पारन पो परिझम पाt मायनमगाव पर विचलिए दोनों शिमो विनामबार मा बायेगा। मोफेज एणमारमा रस प्रसकी एक मिला बना सिरे प्रयको पीय प्रभमनसे बारा प्रपोसार सामान्य है। मप प्रासमा न होते ही उसे पल पिट र पाठकों मपनेस मैगमार्ग। नर्मप्रवल समारेखाईसवी चीख ठिमी भाभर भौर रेममा पुग दृष्यमा मनपदी नाममामे गौरीने प्रय हित प्रतिमेसी विर इनमीकरण है।रामसपनामम २-१मरे का प्रभवन हो यार यो भप व होंगे। गौरी माया . ममेरक -मनीडामोदरी नमो बीवरमय रायचन्द्रजेनशास्त्रमालायां भीमदुमास्वातिविरपित प्रशमरतिप्रकरणम् मीहरिमप्रिविरभिवटीकाहित हिन्दीमापानुवादसहितध। टीकाकारस्प मागवरणम् 'प्रशमस्येन येने सखा पैराग्यपदति । तस्मै पापकमुस्पाय ममो भूतार्पमापिणे ॥१॥ प्रशमरतिप्रहरपारम्म मामिपान विवसिवप्रकरणार्यस्पामस्पदेन परिसमापपर्य मिस्पाइ- कारिका-नामेयाद्या सिद्धार्थराजसूनुचरमाधरमदेहा । पञ्चनवदश च दशविधधर्मविधिविदो जयन्ति जिना ॥१॥ संमत टीका-मामिः फुसकर । मामेरपर्व नामेया अपमनामा माविदेष, समायो पेपा तीर्थरता के नामेमापाः । सिदार्थो राजा, तम्प सूर्यमामानपा, स परम पमिमो पेपा से सिदापपमसनुपरमा । परमा पमिमो ऐहो पा से परमदेह । ततः पर संमतेरमा पाइन्पशरीरमाणासमका कमामावान् पम्पिादिमाणशकामाव, तरमाणाप शरीरामावा, तक सांसारिकालातीता एकास्तिकास्पन्तिकानतिशया निपवामम्वाधीनमुतिसुखमा संहता इस्पय । कियतस्ते पुना इति सम्पा निरूपपति-पचममवश च इति वदन्दसमासाः पतुर्विशतिः इत्पपा । मन्ये पयादिपु पिपपि पदेषु प्रयमाषपचन विवपति। च' समुपये। सच ते शास्तारो मम्पसत्स्वानामुपदेयारो पमस्प पाविषस्य समादेवनपया पसानम्प इम्याइ-वसापिपपर्मपिपिपिया इति । निमित प्रकार समादिम्त विनम्तीति । स पोपरिशदस्यते- सेयः साम्तिमावर इस्पादिना । विदियों परमानेनोपनिम्ति (प्रामारिबरपायमो वरमालास्मो-प.विनामो-मुकाम प. VARMामुन रायचन्द्रनिदानमामपाम् [गवरम मुमुक्षुम्पः सस्तेम्मा त एविया बन्ति सर्वान् मम्पतीयोऽमिमय च एव बपन्ति नाम्ये । पपाइ मापारी सिरसेनः- “मम्मेपि मोइपिबयाप निपीडम मामम्पत्पितास्वपि मित्रसमानमामा। ममाप्य ते तर गति रुपपावसानास्त्वामेव पीर शरणे पपुस्खाम्ताः ॥१॥" के पुनस्ते माभेपाषा: सिदार्परावसमुधरमा । पाह- बिना पति । प्रगट वारो मिना । पगदेपी पम्पमापी मोहनीवर्मप्रवेमेंदी तशाणाच समनमोहमति मेरमाणम् समयेच सामदर्सनावरणान्तरापानि कपमुपपान्तीति । मतो पातिकर्मचरणमा पात पाहानमातरापिा । मतो पगवेपमा सूचनमानमिति।। भाषाटीककारका मागचरण धि भीमामास्वादी, रामा मे चिवमरे। सम्मागदर्शिका पस्प मुममूना सक्षम । पोहा माग्मय म्यारन मङ्ग-सिविनिधान । मेरे मन मन्दिर बसो. उमास्वाति भगवान । इस प्रसमाति नामके प्रकरन के प्रारममें इसकी निषित समाधिके नए प्रपामामधाम परवे- मप-जामिराएक पुत्र पमरेको माय मर रामा सिबार पुत्र प्रेममानताम्म पर्फत इस प्रकार धर्मकी A4 पाननेवाले परमशरीरी बीस निदेव प्रान्त है। मापाप भी अमर इस युगके प्रपम किरा वोर मनमानसलामी बातम कर है। समी कार परमशते है।तीकरके मरके बाद उनके संसारका होने के कारम बम्प पर मारन मही करवे । तथा मोका समाप्त होनेसे इलिय मोर माग भी उनके नही रहते । बम उनके मपे घरीरा नमार हो बाब परकर बमाल दो बानेसे सांसारक उसे मुल होकर एकान्त्रिक मापन्तिक मिरशिप और बावहित मुखिके मुखा बनुमबन करते है। ये टीकर ** +१-है। सभी क्षमा, माई, बार्यमादि श धोको जामकर मोषक मम्प पीयोंको उनका उपदेश देते हैं, मत धर्मको रस पिरोंका को पाते है।माग और रेपके बोक्मे बारहो करनवे सभी गिन कागते है।रग मोर मोहमीप पके मेर। उनके प्रमाणसे मोहनीपड़े सब मेदोर प्रम समशाना चाहिए। और मोहनापको पीत परमावरम सनावरन घऔर परावर्स ए हो बाते है। मत पा मासिक पहरोमानेसे केलाममा सूर्य प्रकट होता है। इस प्रकार के वर मारतकको परास्त करके बात होते है। क्योकि सीबम सब गुण नही पापे पाते। जैसा बाचार्य सिरसेमने कहा- भगमम् | बन्परेप मापके उत्कर्षको समान न करके मोह-तीयपके लिए पारए परम्त में -- कारिका २] प्रशमरविप्रकरणम् मोरो नही बीत सके।उने बापका पद प्राप्त नहीं हो सका। उनका प्रपल निम्फर गपा पोर बन्तम रे बापका ही सफल शरणमें बागये।" मरतोषसमूतवीपरुवातुविशयो प्रकरणकारो ममस्या पिपाप संम्प्रति समस्तकर्म भूमिवर्तिनो मिनादीन् पणिनिमुण- मरक्षेत्रमै उत्पमार चौबीस तीर्यकों को नमस्कार करके बब समस्त कर्ममूमिके तीर्षफर बारिको नमस्कार करने की इच्छासे प्रवकार करते है- जिनसिद्धाचार्योपाध्यायान प्रणिपत्य सर्वसाध्य । प्रशमरतिस्थैर्यार्थ वक्ष्ये जिनशासनात् किचित् ॥२॥ टीका-पूर्वोक्तामणाविना, वीर्पहता सामाम्मपग्निोगा। सिद्धास्तु निष्टिवसकर प्रयोजना समेत पर्मविनिर्मोमासोकशिलपम्पासिना सामीनसुला सापपर्यवसाना । पडविपापारस्पास्तदुपदेशवामानाचार्या परेमापप्रवचमार्यनिरूपमे निपुणा । उपेस्प उपगम्य पतोऽपीयन्ते शिप्पाः इति ठपाप्यापा- सम्योपरहितम्भसंपदा । मम दम्दसमासस्तान् । बानपानवारिसमणामि पौरपेपीमिः शसिमिो साथमम्तीति सामगः । सर्वप्राणा फेम्पेि प्रतिपचार समस्तसापपयोगविरतिसमर्ण सामापि तेऽपि प्रणिपाताई इति पायति । मपवा सर्पशवा सनिमापेक्षते मम्पमर्तित्वात् । 'सर्मान् बिनान् सर्वान् सिदाम् समानापार्यान् सर्वानुपाप्पापाने, सबसाय प्रणिपस्प इति प्रस्पेकममिसम्मम्मः। एपमिटदेक्तोपोनामिशितः मणिपातः । वनस्तरमाणपकारित्वावापापादीनपि प्रणम्म सम्पर्पसभापकप्रकरणक्रिया प्रतिमानीते प्रतिनिशिएप्रपोवन पति कारिफान-- प्रामतिस्पैपिम्' इति । मर्प-वरित, सिर, भाचार्य, उपाभाप मोर सर्वसाधुनोंको नमस्कम करके 'प्रशमति' बर्षात् पराम्पमें प्रीतिको सकरनेके लिए पिनशासनके वापरपर हुए कोगा। मागाप-मिमका मन पारेका बाप है। रसको बाबा सामाप केतकियोंको बिम पाते है। बिनके समी प्रयोजन हो चुके हैं, बर्षात् गोहतास्य है। गिमें कुल करमा बाकी नहीं। वना समस्त मासे मुजोमानेसे जोगेको बम माग पिराजमान है, जिनका मुबलापानी और यो साद वे एमी बन्नई मेसिव है। दो दर्शनासावानाचार, बीर्याचार, चारित्राचार गार पाचार इन पाँच वाचारोंका सपं भाचरण करते है और दूसरोंको सनका उपदेश दते है बाचार्य । पेपर मारामारी साबके बर्ष करनेमें निपुण होते हैं, वर्षात् मिनागमोशाता मोर कुसम्पास्माता होते हैं। मनके समीपमें गाकर सिम्पर्ग सका दोषोंसे रगत सूत्र-पम्पोंका बम्पपन करता ये १गम्प मु । - । ४ पारमर्पप्र-प। ५ एमाप.। •ामाता म । - मातापप ।

। पपचनशासमागपाम् [पी उपाप्यार है। सम्पम्वर्धन, सम्पवान पोर सम्पचारित्रहपी अपनी सक्रिके हत यो मोक्षको साफ्ना करते है सर्वसाप है। साधुके पहले 'सर्व निपम गानेसे प्रकार बमिप्राप पाकि मिनोने बाग ही समस्त पापमपी प्रवृत्तियों के स्यागरूप सामापिक सपाको बारम किया ये मी नमस्कार से धानेक पोग्य है।ममा सर्प धम्म मपमें होनके कारण पाँचोंके साप माया पाण है। बर्माद स्वरोको, सब दोको, सब बाचस्पोको, सब उपा-पापोंको और सब सामोंको ममत्कार परफे इत्यादि। इस प्रकार शक्ताके उपरेससे बरगत र मिहोना कट सपकारी होनेके करम भाचार्य औराको भी ममता करके कारिका के प्रथमरविताम् ' प्रमादि उत्तरास म नामकी साकता तथा प्रयोगमको ताते हुए पनकम मन्च कमाने की प्रक्षिा करते हैं। भरवदिस्ता प्रसमो परममिति । परस्पति उपरि माम्पसम्पराग्बम् पत्पमा वा पग्परमणे मममे रवि कि प्रीति वा स्पर्म निमसा मसमातिस्पैर्यम् । मामा प्रपोजनाचना । 'प्ररामप्ती क माम स्पिरो ममममम्मास्पात् इस्पतो सम्से प्रकरणम् । वय निमशासनादेश पलामि, मम्मच प्रामामामात् । यता समिपनिरोकर हिने पासनम् । मपाम्परेपनिपमस्ति । प्रसमकारि मापन शासनं पावणमापाराविरनियापपर्यन्तम्, तब पनामरक्यनेनापनिमानम् तस्मात् विभिन मनात पसे । समस्तामियाने पपपि भक्ति मर्मास्ति, तथापि प्रमाणाधावपारपपरियामा मम्मान स्वरूपोऽपि प्रक्षमास्तविम्युरमेषु पातितो मरम्म्तमुपमा प्रसो उपकाई म मम्पोपकाए स्परहिवप्रतिनिधिष्टकम्मापी बाबत इति वदा-परम बिनशासनात् विचित् ।। राग और पके नमारको प्रशम करते है।सीय नाम नाक प्रकार मापस्म शमम् इत्यादि कारिकास बार बणगे । उस समय रूप प्रधममें गो रवि बर्दि प्रीति, उसमे यो मा बर्षात् समप प्रविध वर पना सो 'समरतिस्पेयम् ' बर्ष से समिप्राप प्रमोसनका ससे ममा अमिप्राप पर कि प्रसमारी' में राम्पके प्रेम में समा मम्प जीव किस प्रकार पर इस प्रयोगबस में इस प्रबको ना ! मानो उसकगा परिनसाएनके मापारीगा क्योंकि माप धोम प्रसनका ममाल । निधाम्नका परि कोई एक रस होगह सब प्रकारकेपालका लाdिप मोम एप नही। बाधाराणसे कर रिपारपत समस्त विचारूप प्रवचन प्रथमायको करने भागना रामाकर-समयको नापनेक मवरममप मोकन पका-सानि । ससार नमनत्योपनलामी ग्रामपोगरारेमका पवयम् । रोममेडमोनमार र इस बमोम प्रथम बोस और मेडल मामलाम धर्म प्रचार सामी मावि बाराी ममतार कर लिए म प्रतीमत्मा परेबर पाईए । मेध, अपस्लम९ कारिका २] ! प्रशमतिप्रकरणम् काँगा । पपपि समस्त वादशाके कसन करनेकी शकि मुझमें नहींतपापि प्राग, पारण वीर वर्षका निश्चय करने में मी पीर बन्पत एक है। मर्यात् जो समस्त को न तो माण कर सकते म पनी स्पनिमें रस सकते हैं, वो न उनका वर्षही समा सकते है, उन बीमोंके होम निराई गई प्रशमरूपी अमृतको दो-पार भी महान् उपकार करती है और उपकार कपनबाडेका पा उपकार अपने मोर दूसरों के हितक लिए विशेष फलदायक होता है।मता प्रम्पकार करते कि मिनशासनसे पर कुछ करेगा। "स्प' इस्पतम्। मनासताना तु सकष्टस्ता प्रवेश इति मार्यादयेमाइ- वसानिका बिनशासनमें प्रमश करना कठिन है, पापात दो कारिकामों से करते है- यद्यप्यनन्तगमपर्ययार्थहेतुनयशब्दरनाम्यम् । सर्वज्ञशासनपुर प्रवेष्टुमबहुश्रुते? खम् ॥३॥ टीका-समस्तामिघाममसस्य यधपि मातेनास्मदिन सपनशासनपुरपयेषा भाषादेव । तदि परमदुर्ग दुरवगाहम् अमम्तगमपपापार्यत्वान् । तपा चोक्तम्- 'मतगमपचा मृत्तम्' इति । मर्पो हि मनम्वर्गमै पंपापम पस्प सर्वमशासमपुरम्प सदनम्तगमपपापार्यम् गमाः स्यादस्ति स्पामास्तीति विकल्पा । पर्यापास्तु महवपस्सपेमाः धूमपदस्पैकस्पाया परमः । हेतु कारणमाप्रम् मम्वयम्पतिरेकमान् पा। मनेकरूप पाउम्पना मन्यबसापविरोपा भेगमसनहाइपो मया इस्तिवर्षानेज्यानाम- म्पपसापवान् उत्तरोत्तरसूक्ष्मवानात् । सदमामृतामितिसममाः साधुरामा प्राप्ताः संसह साम। शम्ममामृत प पूपान्त-पाति पत व प्रास्तम्पाकरण संसबम्पाकरण पाहटम् । मनम्तगमपर्यापाप हेवनय सदा पष रमानि ग्यास्यावागिरी मण्डलानि भूपणानि एमिराप ऋदिमत् । मारनाम्या प्रमूवषयमा मनम्तशमोवा सर्वप्रामिसम्मपते-मर्यस्यानम्स्पातलो नपाः पापामानन्तः । तया माठयशम्प भातपवन, तैपटपम् 'मार्स गहनम् इति । तदेवि सर्पदशासनपुर प्रवेष्टुम्-मम्वनिपत्य बातम् मवाता-मनपिगतसफलपूपि, पुलम्-पराक्पमेप, वर्तते । इति गोपा, प्रमेष्टुमिस्पर्पः ।। मय-पचपि ममम्त मङ्ग पर्याय, बर्ष रेत. मय और धम्मरूपी रनौस मरपुर सद शासन रूप नगरमें बरसानियों का प्ररेस करना एकर। मावार्य-निशासन एक मगरके समान है। से दुर्ग वगेरहके कारण मगरमें प्रवेश करना कठिन होता है से ही मनन्त मा पर्याप वगैरसे मरन शेनेके कारन मेरे से बस पानी उस बिनधासन मगरमें प्रवेश नहीं कर सकते । वस्तु कपवित् , कपवित् महोदमादि सात मङ्गोको मम करते। एक वस्तु कार-कमसे होनेवाली हातोंको पर्याप करते है। वैसे मिलाकी पर्याप पहा वगैरह। पदोंक (मासि पानि पी। १प गई ५ । पूर्वपुर-मु । पाव ५ पार्षम्मु । मला। सप्त 1 रापचयनशासमासापाम् [प्रमोऽपिक माको वर्ष करते हैं। करमकेगा साप्मफे साप मिस म्पास हो उसे करते हैं। विस प्रकम बारे मनुफको हापके एक एकपका बान होम उसी प्रकार बनेक पर्मात्मक बस्तके एक एक भी कर यो शामविशेष होते है, उमें नप रते हैं। समके मेद मेगम, समा बगेर। इनका पप सत्तरोपर सम्म होता है। गौरा मतर्गत शम्दप्रारम माम्म कागया सन सतबीर प्राहसके पर शौँको एम् करते है। धम्मास्तके वापारपर ही संसस और प्रातसके पाकरन बने है । मनम्त सम प्रमेका साप जाना चाहिए । इस तरह सहदेव शासन बनम्त मासे, बनम्त पापोंसे बनात वर्षासे, बनम्त रेमोंसे, बनम्न मोसे और ममन्त राम्दोंछे जग गहन हो गया है। उसमें दो गासन मानिन्होंने जपरिप सकस साध मापन हाफिलामका प्रवेश पानावसम्पती। पपपि पति भपेसमाप इवमाद- श्रुतविविभवपरिहीणकस्तथाप्यहमशक्तिमविचिन्त्य । द्रमक इवावयवोञ्छकमन्वेष्टं तत्त्वेशेम' nen पेपि मशक्यप्रदेश सर्वप्रसासनपुरमस्मादिपेन तपापि भूतादिनिमयपरिधीनोऽपि मपिगवसकसपूर्वापविमरस्तेन पहिीम परिपकर, सपा दिविमापरिदीपकप- देविमा फोरमुदितं पीनगुमिस्त पदानुसास्तिमित्पादि। माम् इति मारमान निर्षिगति प्रकरणापा । मशक्तिमात्मगतामविचिस्प ममपेस्य मनातत्यास्मनोऽ सामग्म सोऽई समुफ्ता गर्न प्रमक इव। इमको निम्तो पहिवतापमि- सिम्पाचप्युचिस्पोचिस्यै पिपानि पोपमात्मनः करोति मालिस पीरिकमान् मुनि निपतिवान उचिप पारीपसिति वियते । तेषां विपकीना संगमममुम्हमेव उमाम् । एक मामपि पूर्णपुरमसिहमहामतिमिपम्पमापे प्रवचनानेको पपपपनावमार्पता पटित पिवित् तदम्प गरेपपितुं सर्पशासनपुर प्रबेष्टुमिमामि । परिटिवाक्पयोबपनमागण साशासनपुरषदेसमामियामीस्पपा । मादयस्पै उपनपो पपा-पवर रखाम्मपुरमन्त प्रवेमपिमा सर्ग तक्त सपसगासनमयो सकस मर्तव इस्पर्मः ।। मर्यादाम्पास और धुमिको सम्पास विद्या हम पर मी में पनी समताको FRIK कर, सेफ ए मनुष्प मापके कोको बोनक रिए पगरमें प्रवेश करना परव. सेपी प्रवचन के पोधे गेमनेके नए में सर्व-शासकरूपी कमरमें प्रवेश करना । मानार्थ- एमत्त सा साप मम्बास किया है और न मे तुम्ही गत मे पास न तो शासको सम्परा र कोमुनि बीमुम, पानुसारी १पपरम्प जमीन पर्व पामे माथि मु तीन रनर-प-प-1 रमाण-प । पति-प. १ माचवस मलारम खेरली पर पासोमाधिप।

पारिका :-4-21
प्रशमतप्रकरणम्
वगैरह भुमिकी ही सम्पदा है। फिर भी जिस प्रकार कोई दीन-हीन मनुप्प देवताको पराये गये प्रसारके
पर-उमर पराए कोंको मीन-धीन कर वपमा पेट मरवाया सेतोंके काट दिए जानेपर जमीनमें
गिरे हुए मायके को सिगास वपना निर्वाह करपसी प्रकार मैं मी-मेष्ठ पुरुषोंने सपनो मुरिसे
अनेक मार प्राचनके बिस बर्षका बागेडन किया है और ऐसा करते सम्म प्रवचमके वर्षकै यो कुछ
कण इमर-उपर हिटफ गपे-समें सोबनेके लिए सब-शासमरूपी मगरमें प्रवेश करमा बाहर
वर्षात् दिनमासनके नम्र वसकर उसके रहस्योंको निम्मा मेरी शक्ति के बारकी बात
किन्तु सोने उसमें पुसकर कुछ सोचा है, उनकी सोमके फासरूप पाए एक बालके कण
शायद मो मी मिना, इसी लिए में बिनासनमें प्रवेश करमा पाहता । सारांश यह है
जिनशासनको समझना पपा कठिन है।
वामेकोम्वृतितामात्मनो दर्शयति कारिकाइयेन-
दो कारिकाओंसे वपनी उसी पूर्वतिको पति है:-
वामिार्जिनवचनार्णवपारगते कविवृपैर्महामतिभिः ।
पूर्वमनेका पयिता प्रशमजननशाम्रपद्धतय ॥५॥
टीका-विनापनमर्णव इफ, पारगमनाशस्यत्वाग्मचमतिमिः। महामतिमिस्तु दिगिमक-
प्राप्त
सुगमपार ' इति पति । बिनपचनामवपारगतिवामिमहामतिमि मतगपूविधि
पासप्रतिषदकाम्पारणनिपुर्ण सस्कविमिः पादायदोपपरितकाम्पारिमिा कमिपि कविनमान
मत पूर्व प्रयमतरमेव भनेका बहप प्रशमनमशास्त्रपयतपः प्रपिताः प्रकाशिताः । प्रमो
पैराग्यम, सबम्पते येन शास्त्रेण व प्रशमनमनशासम् तस्य पदतयोरपना पराम्पीया'
इत्पपासमहामतिमिया पिरपिता शासपदतप ।५।
मप-गिन पचनरुप समुद्रके पारको प्रम्म पुए महामनि करिबरों ने पहले रामधे उत्पम
करनेवाले बनेक शाबर है।
मावाप-निमगमनके पचन समुद्र के समान है क्योंकि मधुरिपाठ बीब उनका पार
मही पा सकते । पर युनिकी समगरासे पुल महामति पुस्प उसे एगमनसे पार कर सफ्ते पही
बात बताए धारकार करते कि मुझसे पाले गैरह के माननेपाछे और सबके पो
कर काम्प बनाने में निपुण बनेक श्रेष्ठ कारयोंने मेरम्पको उपम करनेछठे धाओं की रचना की है।
दितीपारिका पति सो कारकको करसे है-
ताम्यो विसृता शुतवाक्पुलाकिका प्रवचनाग्रिता काभित् ।
पारम्पर्यादुत्सेपिका कृपणकेन सहत्य ॥ ६॥

। [प्रमोद - एपषजनशासमालायाम् टीन-ताम्पो विधता पिमिगता मुतग्रम्पानुसारिण्यो पाप प्रपानार्यप्रतिपदा या विष ()पर पुमकिक पुग्मीरूपा निस्साए पः शटिवा प्रशनापाः । प्रवचनानुसारियो पावशाशयानुगताः । वापि काभिदेवन सर्मा समाविता । पारम्पपोइस्पेपिका इति गममर शिप्प पतुदशादिपूनपरेकामानिनिय सपनाम्परहार शिम्सेपिका परिपाटीपावा हमा पपन ऐन व संहत्य संपीम।। मप-ननस निकले ए साथमहा मुकाम हरसालके वर्षके अनुसार है। परम्परा- समपात पोरगये परत मैंने उमें एक समान एकत्रित किया है। भावाय-उन महापति भावानि यो शारे है, उनसे बो भावनचनरूपी कल निकन कोमो मुछ मिनशासनके अनुसार है क्योंकि उन्ही पालकी कुस मागेको बार मप्पाने मी माने बागम बना राव उपसे निकाए समी पन-कम दिन- घासनके बनुसारी मत। गमभरोको शिप अधिप्प-गरम्पपसे उनम-कोको मन प्रमचनका प मिगतो और भी सशित हो गये । गरीब के समान जी कोंको एकत्र करके १२ पहशाबरा। किकृतम् इत्याद-क्या किया ! सोते हैं- तद्भक्तियलार्पितया मयाप्पविमलास्पया स्वमतिशत्या । प्रशमेटतयानुसता विरागमार्गकपदिकेयम् ॥ ७ ॥ टीका-पता नपानाकिका विमता मुक्तास्तेपू मात्तिः प्रीतिसेषा वासु वा सतवार पुलाधिपमु मन्तिस्तावमाप्रेगा परितोपात तसतस सामप्य तेन तमतिमन भर्पिता उपनीता ममनिशक्ति पिशपामतिरेव पलारपोसाइपति मे म्ममविशति बनपति वा तरा तहनियमार्पितपा ममाविशत्तपा, मपाऽपि तदुत्पनुसारेण प्रपिता । पुनः तस्या पर विरोपणम्, प्रविमलासपा प्रतिमानापरणामामपितवादविमला, मस्सा म्वोधा पत परमपूषपप मपि परम्पानपतिता मास्ति किं पुनरम्मादया ! पुनरर्य नियोगोशापतमा प्रकरण कलापम्पाद-परामेष्टतपा। इष्टम्य माप इरता प्रशमम्येस्ता मामेटता प्रथमबममता सपा समनपा निरागमाग एवं पपई पम्पा विराणपर्य म्पानम् मामयो पम्पा से रिरागमारपरिका पलवि।। मप-मुभावन का पापा को मेरी यो मधि, उस मधिक सामर्षसे मुझे गोपी -पडसहित बोर दोही बुद्धि प्रा बनी उसी दि सकपके प्रमाण म बसप-मार्गको पगरकप प्रमा। मानामात-। मारित प प्रो। t-- I rula । ५मारिवारमा पxdiwwप-म । एक । - कारिका प्रशमरतिप्रकरणम् मावाय-मुझे बो कुछ मुद्धि प्राप्त हुई है मह मिस अरबमाप पाम्पक का निकले है, उनमें भपया अपचनरूप पापक कोंमें मेरी यो मधि-प्रहा है, उसीका प्रसाद है। आपाधानावरमसे कामषित होने के कारण मी बुदि निर्मठ मी नहीं और पोकी मी ।। मन बार पूर्वके पाठियोंका धान मी पट्सानपति हानि-निको लिए ए होता है तब हमारे से प्राभियोंके मानकी कपा ही क्या है। शा-क्या यह कोई मयोग है कि प्रम्य वाश्म बनाना ही चाहिए। समाधान-मुरा राम्प बहुत प्रिय है। बुधवार शाम बस रोनेपर मी उसी प्रेममश मैंने रायको उत्पप करनेवाली यह छोटीसी रचना की है। मनुप उछिया भुतपापुमारिकाः परिगम या रपिता कय सा सर्ता सम्मता मविप्पतीस्या- दूसरों के द्वारा छोरे गप बिनबानीके कोंको रेकर की गई रचना सप्रनों कैसे माप होगी! इस बाकका समाधान करते है. यद्यप्यवगीतार्था न वा कठोरप्रकृष्टभावार्था । सद्भिस्तथापि मय्यनुकम्पैकरसैरनुप्राह्या ॥८|| टीका-मवगीतोऽमारतः परिभूतोऽर्यो यम्याः सामगीताथा यपपि । कर्ष पुमरवगीता पस्वमारते । यतो नपा कटोरमस्टमावाया । वा शम्दोषमारणापा । म कठोर मासप पपिारपरिशुदः प्राप्टो पार्क शर्मा प्रतिपाय नाता परमम्पोऽर्योऽस्ति ' इति सम्मकारकम्मापसाम्या प्रापमानापनोऽयों मैप सम्याम् । सहि तयापि मुगुणोप विलिः मम्पनुकम्पकरसैरनुप्रामा। मपि इति उस्सेपिकामाप्रसंपनीने रुपणके प्रमकतेऽ मुकम्पाई। मनुकम्पब एको रसः समाको ये सम्बनाना है ममुकम्पकरसः । इसमनुप्रती तम्पा मनुप्रहार इत्यया । सम्तो हि फरणापापमपलोत्पावत्यंतयानुप्रतीति ।। मय-पपपि इसमें दो कुल कहा गपाप मादरम पोम्प महावीर म उसका भाष ही गमीर मौर ऊँचेका तपापि दपाय सप्रनाको मुझपर बनुमा करना चाहिए । मापाप-स प्रपमें न तो वा-तिक उठाकर शशसमाधानफ पापोंका परिहार पा गपा,ौर म इसमें गो बर्ष कहा गया है इसने उत्तर मास्को उपेकपाका जा सके कि इसमें कार हुए बस बाकी कोई मर्द परमके लिए नहीं है। इसलिए कहा गुमाए वारके पोग्य नहीं है। फिर भी में चालक कोंको बीननेपाल रए मनुप्पो समान दयार पात्र और सप्रनोंका समाव दया करने का ही होता ६, बर मुमपर पा करक मेरी इस रपमा पर मी भरप ही सपा काँग। मपमेव म्ममा समनानाम् इति दशपबार- सनोका पही समाव है, यह बतगk- रायचन्द्रधनशाग्यमानापाम [प्रपमोऽधिपर फोन निमित्त वक्ष्यति निसर्गमतिमुनिपुणोऽपि वा धन्यत् । दोपमलिनेपि सन्तो यद् गुणसारग्रहणदक्षा ॥९॥ यन-मिसगाममायामामाविको मति मासानिनिमा। साहिम, ममोपा भवति तपा मम्या सुद निपुणोऽपि पुगतोऽपि मम मम सता सायम्पे निमित्तं कारणमम्पपस्पति समागाइते। म गनु माननीपुप्पागामापेपः सुमिमग्य नापि ! समावसत्ताम् । दिशादी पम्माई। यमान् सुनिपुणो पि ममानमन्तरेण माम्पमिमित्त पणपितुं समय, तस्मात् 'ममाष एवायं मना पागुणोलीसन दोपामिमाने प बस्वम् इति प्रधान या परियोमानो पि दापयुनऽपि परकीयवास गुणान् सारभूतान् एंटते सम्मा परगुणप्राणनिपुणाः ।। मप-स्सामारिश पुम्हमे पुरात मनुष्प मी इसमें दूसरा स्पा मग बसावेगा कि समन पुस दोन परस मी सारमन गुर्गोबरे ही मान पाने माग होते है। माराध-सारीक पुनमामि होनका कारण सम्पन होती है। बात् स्मारिक पुरिसे जोरात गली गीहरिकुम रीफ होती है। पसा पुरवाडा मनुष्य मी समोरी समानता समाप मापा पमग पहा सा! मानी जो गम होता है उसका मी सभा सा मा पा कारग समा! पत दुर्वमान्स बुद्धिमान् बाम भी इसमें राम मसाप मग बारमनीला साता, भामरोके गुणों करमा गोर दोन परना पा समोस समासी बारा उतरास पार करने सजन पुरुष सो गुमाग पानी मत मासोक दोरखनमें मौ सारभूत गुणों को ही मान। पामारपाई पूरापुरमोम्माविका पुरधाममुपिय तिये विगगमागपरित मनाम गम्मता विद्याम् तपापि- गरापारी बागुनगे लोको साप-भाग परी पापो मम्मत महासाती- सद्धि मुपरिगृद्दीन यत् किञ्चिदपि प्रकाशता याति । मलिनोऽपि यया हरिण प्राशते पूर्णवन्दम्य ॥१०॥ प-मम्म सुमनाम सुपिगम् मादरण पतिपत्रम् ।पपिपिपिपिनि माग्मपिता प्रभागमा पानि माप, ति मुसमाना माममा ती परियान- गुमय वनाविपरिलिम्ममा मरगपति मरिमा पि स्यामा। पम्मगठमापानी .. तो।

कारिका ९-१०-११] प्रशमरसिप्रकरणम् कुरण कृप्णिमानमपि विभने प्रकाशते शोमते पुणवनस्पः। माप्रयगुणो हि मर्य यम्मसिनोऽ पिरिणो मामते । एव यव समिः परिगपत निस्सारमपि तस्सदाभयावेव मारत इति ॥१॥ मय-समन निस बस्तुको बादरके साप महल कर मेत है, यह सार होनपर मी प्रकाशमें वा नाती १ । मिस प्रकार पूर्णमासीके पम्नमाके हमके बीच यवाग हिरन काग होनेपर मी प्रकाशमान होगी। मावाय-या मानपश्य ही गुम है कि चममा यमेनाग काठा हिल मी सदर माश्म देता है। इसी प्रकार सम्बन पुरुप बिस बस्सुको तीकार है, यह निःसार होमेपर मी सम्जनों का वामय पाकर सुन्दर माने खाती है। पारम्पपि ममुष्मिमेव मुसनम्पतिकरे प्रकरणावर उदाहरवि- समनोंके इसी म्पतिकरके सम्बन्ध प्रन्पकार दूसरा ठराहरण देते हैं- वालस्य यथा वचन काहलमपि शोभते पितृसकाशे। तवत्सबनमध्ये प्रलपितमपि सिद्धिमुपयाति ॥ ११ ॥ टीफा-वाशिमुः ममभिम्पकवणवपनः । तेस्प पचन काइलम्-फा स्तरसरगहदम् पित समीपे विराजते परितोपजनकत्वान् कौतुकमापत्ते पुनः पुनष तदेवानुवप्नाति पिता। सदन पति बारकादम्पबमवत् समनाना मप्पे प्रपितम्-मसम्पदम् मपि प्रसिदि प्रत्यातिमुपपातीति । ११॥ मप-विस प्रकार बाळाली भत्सर बोरी मी माता-पिता के पासमें पारी माती है, उसी प्रकार सम्मनों के बीच में बार मी प्रसिद्धि पा बा ! मापाप-या बाक बोम्मा मुरू करता है, तो उसकी नहाती हुई सीभी गद्गद् भाभी मावा-पिताको बदौ मीटी और प्यारी लगती है। इसी प्रकार सप्रनाक बीच गोपाल कदा बार यह सम्मरपोर म्पपकर ही प्राप क्यों म हो गुगसम्पम सपनोंको वडा ही माइम होता और इससे उसे स्पान्ति ही मिन्टी । साश या सगोत्र वामप पाकर मेरी बसम्पर सपना मी प्रसिदो बारेगी। पनि पूर्वमनेका प्रपिनाः प्रपामजनमानपदतपो महामतिमिा तत्को:- ये प्रामरतिप्रकरणकरणे पुनपर० सा एपाम्यम्पनीपा प्रामामिणा । उम्पते- कोई करता है—ा महामति बावापोन राम्पको उत्पमा परनामे ममेक शा। तो इस 'प्रारतिप्राम' को बनाममें भाप इसना मरों है। बेशपके इक सपनों को उन्ही पाय बम्पास करमा पदिए । इसका समाधान करते हैं- PAL:-मु.मरमर प । मारपुरा-मु रापन -मु । मान्दि पसमिर प्रथे। भप्राहे पर:

१२ पयपनशासमासापाम् [प्रपमोऽधिकार ये तीर्घकृत्मणीता भावास्तदनन्तरेभ परिकयिता । तेषां बहुशोऽप्यनुकीर्तन भवति पुष्टिकरमेव ॥ १२ ॥ टीन-पागपवस्तीपकरी प्रपीताः । तदनन्तर गणपः सामापिप्पा मगवताम् वेम सूमपविपन्न परिकपिता। भूपस्तवनम्तरगणपपिप्पमतसिप्पैच पारम्पमापावा। भाषा ति बीपारपा पदाया मममविपानामुपोगदारपाकमेण प्रपिता । रोपा भाषानाम् पासा मनेकपा पथात् कीतनम् मनुकीवर्न मनोवाकार्यपम्पमोममक्रियानुप्रासपा पुष्टिकरमेष भवति । पुरिरुपचयो पानदरानपारिमाणाम् । तदुपरयाध कमनियरणम् ततो मोम इति मास्ति कमिदोष । १५॥ मर्पीकरोंने बिन पदापोको पाया है और उनके पथात् गमभर गयने निका निषेचन किया है उसका बार बार पन करना मी उन पुगि हो करना है। मापाप-पहर तीकरोंने बीमादिक पदायका बर्षहपसे करन किया । उसके पचात् उनके साक्षात् धिप्प गमरोंने उन्हें सूबरूपमें कहा । उसके पात् गमक सिमोंने पा उनके हिप्पोंके मी सियोंने परम्परासे स्मन वनुयोगहार बगैरके शमसे उनका कान किया। उन पराका मन, पचम और कापके द्वारा वनेक बार फापन करना, बन्ध बौर मोषको प्रक्रिया अनुपाहक से पुषिका करनेवाम है ।बर्गत् पदि हम परापीका मनमें पिस्न किपा माप, लमसे उनका काममा बावे और कापसे उमा बाचरण पा पारेको सम्मान सम्पबान बोर सम्पचारित्रको मृवि ही होती वोर सनको पनि होनेसे कमाकी निर्गरा होत और कोकी निरा होनेसे मोप होता।मतपूर्वचापोंके हा मारपके मन माझे बामेपर भी इस प्रशमति बनाने कोई दोष मा। पुनश्चयोपोऽपि म रीको प्रकारान्तरेण पम्पम्पासारारोग्यापिनो भैपरोप योगम् एस्मार- वा इममें पुमाळ दोन मी नहीं है, क्योंकि भारोग्यके कि मनुष्पको बोपरि सेना की ना इसमें प्रकास्तरसे मामले मम्पास करमेन ही काम किया है। यही बात करते हैं- यदुपयुक्तपूर्वमपि भेषजं सेव्यतेऽर्तिनाशाय सद रागार्तिहर पहुशोऽप्युनुयोन्यमर्यपदम् ॥ १३ ॥ टीका पम्पप्रात्पपमुपयुकमीपर्प प्रथम पुनपुनस्तदेषोपयुभते । तदुपयोगाध मम्पसता प्रतिदिन मापेम्पमापरिपतमासाइ एम् । म्पापिहरी दुल्लम् मर्सि-वेदना । उपयुसपूर्णमपि प्रत्पनेन सम्पप्रत्पपत्तमाचरे। सन् तपा। रागातिदरम्-पगमा देपावीन् माधि परमिरम्। - .

कारका १२ १३ १४ १५] प्रशमरतिप्रकरणम् १५ पिनुनपति । रागदेपोपात्तकोपप्रसूनापास्तीबादिवेदनातेरपहारकारि पुनः पुनरम्पम्पमाम- मप्यतुष्टमय मयप्रपान पदमझोपम्, मनुयोम्पम् मनुपोबनीप वाक्प्रपशेनामेकश इति ॥ १३॥ मर्म-मिस प्रकार पहले सेवन की हुई मी वोपचको पीपा र करनेके सिरिसे सेवन करते है, उसी प्रकार रागसे उत्पम ई पीडाको दूर करनेवाले उपर्युक्त पदोंका मी वनेक बार प्रयोग करमा चाहिए। मावाप-मिस बीपषपर पियास हो जाता है दुबारा मी उसीका सेवन किसा माता है। उसका सेवन करनेसे प्रतिदिन रोगकी अधिक पविक शान्ति देसो गाठीहै । उसी तर राग-पसे बाप र कर्मोक तदपसे होनेवाली वान्तरिक पीडा बिन सारवान् पचनोंसे दूर होती है उनका पार-बार मी दोहराना मायकही। तया- यद्विपघातार्थ मन्त्रपदे न पुनरुतदोपोस्ति । तद्वद् रागविपन्न पुनरुतमदुष्टमर्थपदम् ॥ १४ ॥ टीका-मिकाविवष्टानामपमान इमन्तो मन्मवादिनः तविपवनितवेदनाविपात विपिस्सन्तः पुनः पुनस्ताम्येव मन्भपवानि मावतपन्ति ! एम प्रविमर्म विपतिमातः । तम् पानिपम पराम्पामिसम्पुसमप्रवपममेकशोऽम्पस्पमानं रागदपविपपिपातितात्न पुनरुतदोप- मासमतीति । १४॥ मर्प-मिस प्रकार विपको र फरनेक सिए मन्त्रका बार-बार उम्पारण करमेमें पुनरत दोप नही है, उसी प्रकार सगरूपी विपकने पातनेबारे दोपरहिस वर्षपदका बार-बार काम करनेमें मी पुनरुज दोप नहीं है। मावाप-गिन गेगोंको सौंप विछु बादिकबाट देते हैं, उनका विप उत्तरने के लिए मनमानी गेग बार बार मन्त्रके उनी पदोंको दोहराते हैं और बेसे-पैसे ये मन्त्रको रोहराते गाते उतरता गाय, बतः रोहराना म्पर्य महो। इसी प्रकार यगरूपी हिपको सबनेको पम्पहपी ममिको प्रम- जित करने में समर्प पचोंके बार-बार बम्पास करने में मो पुनरल दोप महा। पोकि समका निर म्सर पिन्सन वादि करमेस रागसपका बात होता है। तपा परमप्मुवाहरति मस्मिमेगा- इस बात के समर्थन में एक और मी उदाहरण देते है- वृत्यर्थ कर्म यया तदेव लोक पुन पुन कुरुते । एव विरागवार्ताहेतुरपि पुन पुनभिन्त्य ॥१५॥ मालि परमिप मनौ । १ पयामिणम्मे-५ ।१ पनपरिक-म ।

गपचन्द्रमप्सासमारायाम् [प्रथमोऽधिकार टीकापन इत्तिा-मात्मनः तमस्य वा पोपणम् । तदर्य हप्याविकर्म करोति सोकर समुचितवनमाम्पोऽपि प्रतिर्प माती सम्पदमिच्छम् प्रापवतीम् । एवं पिरगावा-धि- रस्पां पिपत इति पातारापति राम्ये पवनम् । तस्या निरागवावाया यो देवः कारण स पुनः पुनधिनपा मम्पसमीपः । स पता पम्पपल्पापनि शास्त्राणि । पानि मानोम्प भाष्य प्रतिम परिस्पाप गगालीन पेपम्पमेवामपत प्रति । १५॥ मास प्रवर बागोरिक ए ग्रेग बार-बार उसी को करते है, इसी प्रकार बेरायकेपरणका मी मार-बार पिम्तन करना चाहिए। मावाप-पन मापसे मरपूर होनेपर मी ग बिस प्रकार प्रतिवर्ष दूब पनी बनेकी इमसे अपने घरमा बपने मुहम्मके पोपणके लिए बार-बार सेटी कोहका रोमनार करते है। इसी प्रकारास करमसे रम्य प्रकृति हो, ससस्त्र बार-बार मम्यास करना चाहिए। मकरम रेराम्या फालन करमेपारे शासी जिनकी बागेचमा कर करके प्रतिसपप रागादिकको कोलकर रापत्र ही सब लिया जाता। क्य वैराग्यमविच्छेदेन पया मजुव्यस्यन्वयक एवं वपानुष्ठेपम् इस्याह- पर माम्प बरामर बना ये वीमें ही नए बाले ऐसा प्रश्न करना चाहिए । यही व्यत FIR मते है- दृढतामुपैति पैराग्यभावना येन येन मावेन । समितस्मिन् कार्य कायमनोवाग्मिरम्यास ॥१६॥ टीमा राम्पवासमा प्रतिदिन पेन पेन भाषेम बम्मवयमरमारीपासरकारमा मोचनादिना म रिषिपते एतामेपोपति तत्र वा सम्पासा कार्फ प्रममनोपारिमा । मपणा 'ऐन पेन मारेन रति ममापरिपामेन मस्पर्प निविगापेण माम्पमारेन सीमपति पग्मे वम पिपोऽम्पास इति । मर्ष-सि बिस मामसे पेराम्यमानना प्रताको प्रात होती है मन पचन और पापसे सप्त ससमें बम्पास करना चाहिए। मारा-म, मुगापा, मरप मोरे सर बाकि उत्तर कारबोधी माणेचमा रमा मावि रिस रिस मासे सम्बमामा प्रसिदिन मनमूद होती है, मनसे, पचमसे, और पारसे ठस इस माकपास करना चाहिए । बया मनसि A और संग परामकी माला परमेसे मेरम्प जोता तस्का बम्पास करना चाहिए। मुलापमोपप्र परचना पम्पयाचिमा पर्यापरावामावरे- प्रमी रसमा मुबलक सामे पाने के लिए कैम्पक मनाची पाप धमाको पाते है- रमेव प.

. इति पाया, करिव ११८] प्रशमविप्रकरणम् माध्यस्थ्यं वैराग्यं विरागता शान्तिरूपशम प्रशम । दोपक्षय कपायविजयम वैराग्यपर्यायाः ॥१७॥ टीका-मरागडेपवृत्तिमम्पस्सा, तस्प माषः कर्म वा माम्पस्म्यम् । विगतरागदेपता पग्यम् । विगतपगो विराग तापो पियगता । शमः शान्तिः पामेव रागावीनामनुष पापबस्पा । गग्यस्य सामीप्येन शम उपशम | महट शमो पगारीनामेव प्रशमा । पयन्तीति दोपा भपूर्वकर्मोपादानेन वीर्ष अनुपयन्ति त पप रागाइया तेषां मय- मात्पन्तिक उप्टेया । कम्यम्सेऽस्मिन् बीमा इति पा ससार तस्म माया उपादान कारणानि तेपी विषयाः-भमिमको निराकरणम् । एवमेते सब एम रेपग्यपर्यापा मिताः ॥१७॥ मर्प -माप्यस्प रम्प, गिता, शान्ति, उपशम प्रसम, दोपभप भोर कपारिप-य सब सापके मामवर हैं। मागाप-गिसकी प्रति राग बौर देपसे रहित होती है उसे मध्यस्थ करते है और उसके मात्र अपना कार्यको माप्परम्प करते हैं । राग पोर इपके पडे गानको परम्प करते हैं। रागीत को रिराग करते है, और विरागके मापको निरागवा करते हैं । श्रम शान्तिको कहते है, मर्यात उन्ही रागादिकका ठरप पोर म होना अप है। राम्पकी समीपतामें गो शान्ति होती है उसे उपशम कहते है । पगादिकले ही उसए रामको उपशम करते हैं। पे मये कोको कर यो नीमको दूषित वर्षात् कमपित करते हैं उन्हें दोप करते है। वे दोप रागारिक ही है। उनका बिस्कुस भय से पाना दोप-क्षय ।रिसमें गौर करें उसे 'क' भर्पात् समार करते हैं, वोर संसारके उपादानकारों कपास करते हैं । उनका बीतना कपानिमय है।ये समा राष्पके नामागसर है। विगतो पगध विरागः । पुनरर्प रागो नाम ! वमपि पपापदारेणायटे- परतिको विराग करते हैं। अगको सम्मानके लिए प्रत्यार उसक मी मामला इच्छा मृर्छा काम स्नेहो गायं ममत्वममिनन्द । अभिलाप इत्पनेकानि रागपर्यायवचनानि ॥ १८ ॥ टीका-ना-प्रीति, एमपीयेषु योपिदादिपु मारमपरिणामा । मृष्ण मामबस्तामा सा पकीमबनाप्परसापळसगा परिणाम । कामः पापनारिशेप इष्टम्प पस्तुम । मोहः प्रति विशिष्टप्रमादिलमणः । पद्धता गाप्पम्-ममिक्षा मामवविपया । ममेव घाता-निरपि पारिमामु । . स्वग्र- रायपशनशासमासापाम् प्रथमोऽस्किार मामम्प मामी इति पिसपरिणामो ममस्वम् । इटपस्नुमाती परिवोपोऽमिनन्दः । ममि सपणममिलाप नरमाप्त्पप मनोरमः । एरमेमिः पयापादयोऽर्पोऽभिधीयते स रागःta मप-नम्म मपी, कार, स्नेह गार्प, मम, अभिमन्द ममिसार इमाद बनेक रागके पर्यापापी माम है। मागाय-मुम्दर खो बामि यो प्रीति होती है उसे इजा करते हैं। माम पस्तौद साप पपेक दोन भए यो परिमाम होता है उस म्पूर्ण कहते हैं । इए पती अमिठापाको काम करते TIME प्रेमी को सेहत है। मप्राय पस्तुकाराम मरनेको गार्म पर है।पर बस्तु समसामी। एसे मन मारको ममत्र करते हैं। इस पस्तुक मिसमपर गो सम्तोप होत्या है उसे अभिनय करते हैं। पलकी प्रातिको मनोरपद ठस प्रमिला करते हैं। ये सब शर मोदी पर्यापश्तर है। 'पोपसयाराग्यम् । पुस्तम्। तप पपायकपनेन दोपं निरूपपति- दोपरापको राम्प कहा। दोषक पर्याप नाम करते है- ईप्या रोपी दोपो उप परिवादमत्सरासूया । वेरप्रचण्डनाद्या नेके टेपस्य पर्याया ॥ १९ ॥ सा- पारिमादिनापित्तपरिणामो जायते वियुपतामेप पतेन विमलेन ममेगास्त रिमयोऽपम्प मा भून् तिरप्या । तथा सामाग्यम्प-मोकपिपत्वादिपिपपेपर काम सपीति दीपा मर्मातिसक्षणो देपा परदापोस्कीतन परिवार। मणिपति प्रवति समात् पनि मस्सरामम्पा मसमा । परम्परपपादिमनिवकोपसमुपं देरम् । महरण प्रपन पप शाम्तम्पापि पाम संपुराणम् । एवमापा पामोऽम्पेऽपि देपपपापा.. मप-प्पा, शेर, दोरल पमा मासा बग्पा, २ मा प्रथगन हयादि बने पाप माम। मालप-माको सम्पति मोरगारमन सा मलहोमिस पर सापति परदोरे पाग ही मनतिरी बाप मिमीर मी पास सम्मानिस मागोमाते मोरा गोरापन रोगहा मादिको मारो हो। उसपेर करते गेसामोरेल बसमधना । मरममा ममराहम गुमोको गा माना जा है। THA बोनस गरम से मार पैराबाबमात गुरखो बप matो मौसममी बने तो मामPATI Pintrमु । १५ । पक्ष्मप - कारिका १९-२०-२१-२२-२३] प्रशमरतिप्रकरणम् का पुन शिपायमास्मा रागदेपवागो मवति ' इति कारिकामयेण समाह- किन किम कामोंके करने से यह बास्मा राग बौर पके अधीन हो जातातीन कारिकाओंसे पर मतगत है- रागद्वेपपरिगतो मिथ्यात्वोपइतकलुपया दृष्टया । पञ्चाश्रवमलबहुलातरीदतीवाभिसन्धान ॥२०॥ कार्याकार्यविनिमयसलेशविशुदिलक्षणेढ । आहारभयपरिप्रहमेथुनसज्ञाकलिग्रस्त ॥२१॥ शिष्टाटफर्मवन्धनबद्धनिकाचितगुर्गतिशतेषु । जन्ममरणैरजस्र बहुविधपरिवर्तनाम्रान्त ॥ २२ ॥ दु खमहस्रनिरन्तरगुरुमाराकान्तकर्पित करुण । विपयसुखानुगततृपः कपायवक्तव्यतामेति ॥ २३ ॥ टीन-पयायवारेणोक्तो रागदेपी ताम्यां परिगत–सासापरिमामयुक्तः । मिग्यात्वं तस्वापामदानम्, ममिहीतामनमिशहीव-सम्मेहमेदार मिरियम् । ममिगृहीतं पाणां मिपएपपिकाना पालणिशतामाम् । मनमिगृहीतम् मप्रतिपभदेवतापासणापम् । सन्दिग्पम् एकस्पाप्पारस्प पदस्प पाऽप्यपेचमाग्मिप्यापर्शनम् । तेमोपातत्तात् कम्पा प्टिः बुदि मरिना' इस्पप । तया एपसूत्रपा पा उदपा कारणभूतया। पयाभवाः पयेन्द्रिपाणि प्राणातिपातादीनि मा। मामपन्ति-मावदते कम इति मामा । पधाभवोपात्तकमा मल बाल उपपितकमराशिः। मात चतुपा । ममनोविपयसंम्प्रयोगे सति तदियोगकतानो मन निरोपो प्यानम् । तपाऽसदेवनायाः। तमा मनोसपिपपसंम्प्रपोगे तदविप्रपोगमतानभित निरोप सतीपमातम् । चकात्यादीनामृदिदशनात् ममाप्यमुप्प तपस' फलमेनियमेव स्पादम्पबम्ममि इति विसनिरोप भनुपमा निदानकरणमामिति । प्रतमिति पुतिं सहिरा, तम मवमातमिति । को मृदासः, तस्पर रोवम् । तदपि चतुपा । तम प्रयम सानुषधि मनानेन प उपायेन गपाशयम्पादिना भामिनो म्पापापा इति । ततानो मनो मिपेपो गई प्यानम् । दितीपममृतानुबम्पि-येन पेन उपायेन परो पनपते सासिबाना- दिना वकतान ममो पदम् । वतीर्य स्तेपानुपम्पि-पेन पेम प्रकारेण परससमादीयते पुपुरक- रिकाटेमालामखननादिना तमस्तान मनो दम् । पनपाम्पादिपिपयसरमणतान मनो विवानिशि तुर्य दम् । ममिसम्पानममिसग्विः ममिप्रापा । सब मावरीम्पान पोस्तीका प्रयोऽमिसग्धिः । पचाबमसमारभासी भातरायतीवामिसम्पानभेति PRोषित मुस-7 ।

१८ पचम्बनपानमावापाम् पिलीयोऽभिकार, कापा कार्व बीपरमाधिम् । भकार्य वीरपपादिकम् । तयोविनिमयो निर्णमास तया। सहमा अप्पम् । विद्यादा मर्मम्मम् । तयो क्लिष्टचित्तवानिमहचित्ततापपोजमनानि पशिानानि । सपा तानि चेति समासः । के परमभूर्तमगा-मुम्मा। सपा माहारमपपरिणा मैमुनसका प्रसियापा । ता एव नपा करमा कमितत्वात् । प्रस्ता-मामात इति ॥ २१॥ गतिसवेषु पी गतिए पुमा पुनराहत्या प्रमणाम्, हिसमयमा ममियरमन वेन पर पयनिकाचितत्वात् गुरु, बम्मयपमरपानि तैरजर्व पुनः पुना, पपपिपपरिवर्तनमा परम् भतो मास्तः परिवर्तनन । २२ । कुम्मसासमिति । पाल्पपतिपावनाप सहस्रमाणम् । ससाखाण्येर निरन्तराणि सम्पबामिनानि । नारतियम्मनुप्पामरमरेप गुमार सेनान्तस्यात्-मवष्टम्पत्ता पारित काता मीतो तुमसवां गतः' इति यावत् । करुणास्पदत्वात् करणाः । दम्पतीति तपाः पिपासितः । क्पिमा पाम्बावप, तमनितं पुर्व विपपपुलमातबगता तमासक्तः । रिपयमुनानुगतमासी पति विपयसमानुगतवृपा । उपमातविपपसुतोऽपि पुनस्तम्पति विशिस्तरममिम्पत्ति' एपी । पपंपियो बीयापापा कोपारीना पकापतामेति-कोपी, मानी मायावी, गोमामेति। उसमका कसायरामा । कपायसम्पानोपाविमिरिस्पः ॥ २३॥ मर्प-बो राग और पसे पुछ है, जिसकी पुषि मिप्याबसे प्रस्त होने के कारण मकिन और मरिम बुद्धि के कारण पाँच थिों भरा सादि पाँच पापोंके जा होनेवाले कर्मोक बागमनसे मिसभा बात्मामें ना कर्मम इकट्ठा होगया है, जिसके बाप्पा मोर अप्पान सपतीय परमाम मामा -राग और पके नामान्तर पारे पता बापे।।मो उमसे पीपी रम और केबीन होता । सार्वक महान न करनेको मिपाल करते है।पहर प्रकारका गडाच, भगृहीत कौर सन्देह । तीनसा प्रेसठ पायणिमत गत मिप्पाच क्योंकि इसके उपदेश और ग स मान करते हैं। किती पासणी देवाको उपदेशक प्राम करना, बर्गर जन्म हो उसमें अमिष रोना भगत मिप्पालापानके एक मी बार बरबा पदमें कषि न होनेसे सन्दिाय मिपाव होता है।बिसके मिप्यात होता है उसकी पुदि ममि हो जाती है, बार युक्षिके मारिन हो जाने से प पाँचों इन्द्रियों के दिलों बासक हो गाता है। हिंसा, एक चो। कुमार मौर परप्राइन पांचों पापों को करता है। इससे उसके कमोका वास होता है र माकपासन होमेसे उसको मात्मामें कर्म पी पशि एकही हो पाती है। ऐसा बल मी एण मोर पीक होता है। तथा बापान चार प्रकारका है-अप वस्तुके सम्बन्ध हो बानेपर उसकेर करने के लिए यो एस-विन न्याय करना पाग मापान है। कोई रोग रोगनपर उसके पूर करने के लिए १७ - एष परमिदप प्रवीमाया।

कारिका २४]
प्रामरतिप्रकरणम्
रात-दिन विम्य करते रहना, दूसरा वार्डप्पान है। इस पस्तुके विमोह हो मानेपर उसकी पुन' प्राप्ति
के लिए चिन्ता करना तीसरा बाप्पान है। चावची वादिकी सम्पतिको दपकर मुझे मी इस सपका
फर परोकने इसौ रुपमें मिरे, ऐसा सोचते रहना निदान नामका बीग बार्गप्पान है । अत दुप
बपना सीशको करते हैं, उससे जो प्यान होता है, पानाम्पान है।कर बपना निर्दयको मते
है, उसका गोप्पान होता है, हरोइप्पान है।ग मी चार प्रकारका है: पहा हिसानुबन्मिवर्षात्
हिंसा मानन्द मानमा। झूठी गवाही देमा वगैरह अमुक अमुक सपापसे दूसरे ठग बावे, इमादि उपाय
सोचनेमें मनका तन्मय होना दूसरा बसम्मानन्द पप्पान है।ची फारसा, वगैरा निम दिन उपार्योसे
दूसरों का मन हरा मासकवाउन उपायोंके बिम्तममें मनका एकाग्र होना स्पेयानुपरि नामका तीसराबार्स
प्पामा । भन पाम्प वादि परिमाके सरक्षणमें रात-दिन मनका गा राना विपयानन्दि मामकर चौपा
मथान है। इन दोनों दुर्पानोंमें धारमा मात्र यो तीन होते हैं, और जिनके से मात्र होते हैं या
रग वार देषकेबपीन होता है॥२०॥
भर्पयो कार्य पर कार्यका निमय करने में महद साठेश और मिशुदिके सरूपको महा
समहता, बाहार-मप-परिमा मार मैथुन सवारूपी कम्ममें गो फैसा हमारे।
मापार्य-चीरको रक्षा मादि कार्य है और बीको हिंसा पर कार्य है। मलपित परिणामोंके
होमेको कासम्प का है, वोर निर्मठ माोंके होनेको विशुदि करते हैं। इसको दो मही समजता तपा
बाहर बनेकी पाहमें फंसा का पहरागादिक वापीन है॥२१॥
मप-यो माठ प्रकारके किए काँके नियचितवन्मसे मारी से होता सफरों गतियों
भार-बार सम्म मेने और मरनके कारण अनेक प्रकार के परिप्रमणके पर पड़ा हमारे ॥२२॥
मप-सदा स्मारों ओंके गुरु मारसे बाान्त होनके कारण मोरोहा बयाका
पात्र, विपक-पुरमें पास होकर उमका और चाइना करना है. या पार पापबाण कहा जाता।
भाषाप-इसकी अधिकता बताने के लिए दबा हुआ' कर दिया है। बाद मरकारिक
गतियोंमे बराबर सर सहते बिसको मात्मा के मारसे दब गई। इसी रिए गोदपा करमके
पोपी, या यो विषम सबमें इतना मासळीक विषय-मुम्के मिटमेपर मी उसकान्छा शान्त होनके
बजाय भार बहती है। गोभी इस प्रकार के होते हैं, पर मोर पके मचीन होते हैं। रामापका
ही नाम कपाप है। मरेकपापा अर्थात् कोपी, मानी, मापाप बोर होमी को बाते है ॥२३॥
स पुनः कपायपत्तम्पा गत्या दिमकानोति । इस्पार-
बा कसापरान् मामाको स्पा दशा होती है. यह पवगते
स क्रोधमानमायालोमेरतिदुर्जये परामृष्ट ।
पामोति यानमर्थान् कस्तानुद्देमपि शक ॥२४॥

रापचनबनकाममालावाम् [रतीयोप्रविफारः, करापा टी-सलाह एपंविधा समुपवतापावपरिमामा कोमादिमिः पयपण। मदीप दुर्व- रिति । नास्ससत्तेत शक्पाः माया इति दुईपा, तो परामटर परिमूवः पापशंगतः स्पर्क। पामोति पाननमान्-मापविशेपान् पमपम्यादीन् । पस्ताननन् पचनमानेपापि म्पारम्पा समक। ममर्पमपसि संसारे किरतोऽनन् वान् नामप्राई प्रतिपादवित स्वरम् इति। मर्प -सत्पात दुप कोप, माम, माया मोर ठोम कसाोंके वापीन मा भीम बिन बिम कों को उठाया है, उनें करनेके मि मी कोष सम। मापाप-कमजोर प्राणी कसायोंको नहीं जीत सकते, मळ उमें दुर्षय का है। बोइन दुर्वप कलापोंके गुमें फंस बात ससको कुमाही। मिम दिन कोंको भोगता में कोई कर मी नहीं सकता। क मी पा संसार बालोंका पर समसे किसमे बाके माम कर गिनाया जा सकता। पपपि सम्माननाएम्पातुमराम तपापि स्यूम्रपतिपमानापानमपापेम्पो मम्वपिछोरपस्पेव इस्पाह- पाप सब बनोको करना सम्म नावापि पुल मोटे-मोटे बमोको ठग रेनेसे मम्प जानों को उनसे रक्षा ऐ सकेसी, बत उमें करते हैं- मोषात प्रीतिविनाशं मानाद् विनयापघातमानोति । शाम्पात्मत्ययहानि सर्वगुणविनाशन लोभाव ॥२५॥ टीका-कोपर्न कोषा-भास्मना परिपामो मोरफोरपबनिकः। तस्मादेविमा परिणामा रिमेके पर प्रीतिम्पपमेयो मक्तीति भियतमपि साकम् म्पबामिळवावाच प्रीतापनिईति- पस्मनः । मानो गवस्तम्मा 'मामेष बानी दावा पूरा इस्पाविक मास्मपरिमामा । तस्मात् रिनपोपमातमामोति । क्लिपमूगम धर्मः । रेडमुम्सापुर मपानोव पिनका कार्य । स उपमातम परिनामस्म हिम्मते पिणियते इति बोरासायपरिणामो मायावसात् प्रत्पपदानि मत्पयो गेम्पमापतिचा कचित् पुस्पे सत्पबादित्व म्यासकलस्पर्पणा इत्पादि । तयानिा-मसस्पमापने शाम परिणामात् पासापहरति । वप्पा होमपरिणाम मात्मनः । तस्माच सर्पगुणविनासमार भवति । स ते गुणाथ ममामाईबाइप, वा सोमाभिमृता सम्ममा पति। मामोति प्रति मम्पपतिमा क्रियापदने सर्पवामिसम्माय ।२५। मर्प-कोषसे प्रतिक माय होता है, मानसे बिना बात होता, मापाचारसे रिलास बात पता, और गेमसे समी गुण मारोपाते है। लम् । स्पानि छ ।

कारिका २१-२५-२] प्रशमतिप्रकरणम् मावाप-मोहफर्मके उदपसे उत्पम ए बारमाक कोष करनेसप परिणामको कोष करते है। क्रोष करनेसे इसी गेको वपन वसन्त प्रिय बोके साप मी प्रमका माता टूट मानेस मारमाको पास दुख होता है। में ही हानी में ही दानी में ही शरीर इत्यादि रुप मारम-परिनामको पमर बा मान करते हैं। मान करनस विनय महीपती, और धर्मका मूग बिनप देष, गुरु, साधु बौर पर पोंकी पपापोम्प पिमप करना चाहिए । विस्तु मम मानका उदय होता है तो पानिए मए होगाती है। भमुक मनुप्प सच मोक्ता और उसके पास मो कुछ परोहर रक्सो उसे पाटा देता कम्पपहर बमुसार इस तरहकी बातों को प्रस्पप बत् निवास करते हैं। झूठ बोबो मोर बोहरको रूप मानेसे वह विश्वास उठ गाता है। तमा तृष्णाको गेम करते है।गेम करनेसे भमा माईकवादि सभी गुम नए हो पाते हैं। सम्पति एकस्य झोपायो पसनोपार्य परापमाह- भब क्रोपारिक प्रत्येक कपाको दुर देनेवाली बताते है क्रोध परितापकर सर्वस्योद्वेगकारक क्रोध । वैरानुपङ्गजनक क्रोध क्रोध सुगतिइन्ता ॥ २६ ॥ टीका-परितापो हि बाहनरामिभूतस्पैच कोपिना परिवहनम्-मस्तस्यता । उदेगो मपम् । सर्पस्पेवि मारकतियात्मनुप्पदेवालयस्पास्मनो मपमुत्पाइपति । तधिनिमित्तानुस्पनो बसपम्पनीमपातादिसम्तानो परम् । तस्य मनुपर -मनुगम्पा मम्बया, सं बनपति-उत्पाद पति । कोपा सुगति मोसा, तो इम्ति । मुक्त्यमापणसामा 'हन्ति' रस्पुभ्यते। क्रोपा विष्टाय सुम्मपरशुरामादपा भूपम्ते दुर्गतिगामिना पारमर्षे प्रावने । तम्मादिपरलोक- पोरपापकारी कोष इति युक्त पणितम् । २० । मप-कोष परितापको करता है। कोषसे समीको र माता। कोप २रको पैदा करता है और कोष मुगतिका बावक है। भाषाप-दारगरसे पीडित ममुपके समान कोपीको मन्तरारमा श्रेषसे सराबला करती है। कोभासे समी गतियों के पीर मप साते है । कोषमें बाकर किसीन किसीका वर करपा, या उसे असा मिना दिया तो उस की परम्परा पोदो दरपीड़ी तक चली रहती है। क्रोष मुगति पर्वात् मोक्षका मी धाम क्योंकि कोणी मनुष्यको मुधि नही होती । सार्बोम समा जाता है कि सम्म र परमुराम वगैरहको नेपक कारण दुर्गतिमें गया पहा है। प्रोष इस गेम को परोर दोमाम हानिकारक है।बत उसे टोपना ही योग्य है। श्रुतशीलविनयसपणस्य धर्मार्थकामविमस्य । मानस्य कोवकाशं मुहूर्तमपि पण्डितो दद्यात् ॥ २७ ॥ मानोगार..

૨૨ एपपत्रोनशाम्पमातापाम् [रतीयोऽस्किम्, पापा टीका--प्रतम्-मागमः । शीत प समसमपीतागमामुसारि क्रियानुमानम्। उमपमप्ये- तत् गर्यो प्रशंपपति सतबामप्पपमेवं गर्षित, भवेन तु मानापागा काः इति पते. मर्य व सेनग मतो मानी माता नम्पेर्ष अततोपर्ण वं मपति, अवस्य उम्पते-अतमपि पित मपति पुतकार्याकरणान् । मानेन हि महो निमप्यते म पासा निमयित इति इतने पित भवति । ममेदो मा धानपानिनोपिति म रोपः । एवं शीलमपि पाम्पम् । दिनपदिक सोशी पपापमिति । पर्माप्रमाना रिमकारी मानः । पमस्प बिनपम्मस्वार् पर्मरिम कारों मानः । तपनुष्ठानशुम्पत्वावर्पोपादानम्पापि प्रत्पूरपरी। पतो रागाईया सेवास्पापि दिनयत पर मन सहयोगनं कुर्वन्ति, मेतरस्य । कामम्पापि सम्माप्तिर्षिमयसम्पतम्या ममति । उलयोपिता बेश्याना परिसानुपपसमगपा पेष्टया कामी पुसमाग् भवतीति । एपिमस्प गबस्पारपानीकनमात्मनि सपमाप्रमपि मतिमान् को पात् इति ! म कमि गुण दोपसो पपात् इत्पर्पः ॥ २७॥ मप-मुत सीक और रिनपके पनरूप तपार्म, अर्प और कामक समरूप मानको और पहिमाल एक माइतके लिए मी खान देगा। मावाप-भागमको मुन करते हैं। और नाव मागमके अनुसार वाचरण करनेको शोक करते हैं। गई इन दोनों को ही पित कर देता है। भावानीको समर करते देखकर मेग करते है-- पर पान-पानी होनेपर मो गई करता है। शव पाकर तो मानको भेना पाहिए। ऐसा गा गाता है। परन्तु पर तो उसी से अमिमामी बन गया है। हो बुवान्का पन म किता। समापान-अपमा काम न करने पर भगको मी दोर गता से मर र होतात हादरमहीमा पर इससे इनको दोप माता है। बमान और शाना बमद होता तो शेष नही इस तरह धीरे बारमें मी बाम मा बीए । बर्षात् पदि कोई पीयान् मी मान करता है तो सब ही करते मनपी न होनेसे पा रही है। वषा मान धर्म, वर्ष और काममें मिल करता है। मूग मिनय , बता मान धर्मम AR करता है। वर्ष उपादान कारन धर्म और पानी के दोवा मत मान बम मी तिज करनेवाग।पोंकि पग गरर सेवक मिनपसे प्रसनो कर उसे कर देते है। चमकी प्राप्ति मी निमपाको हो होता है। इसलियो वोर लामोंके मनके मन- इस बाबरन करनेसे मम्मीको मुख मोगनेको भिडता है। इस प्रकरके गर्दको अपने मना एक समके ए मौकीन मुनिम्मन् ताल देगा। बात् हानि-गमको समामेबाग कोई भी सान मारेगा । मायाशीलः पुरुषो यद्यपि न करोति किश्चिदपराधम् । सर्प इवाविश्वास्यो भवति तथाप्यात्मदोपहतः ॥२८॥ मावि मिरर म्यारविषयम-प..

। कारका २८-२९] प्रशामरतिप्रकरणम् २५ टीका-माया शाट्यमनावम् । ती तस्म्ममाव मारमा। पपपि न कि बिप्प परामं करोति मापागनितम् । समावितस्प मापापिस्पेन पूरएकोपः । सम्पति तु विश्वस्त होपात् । तपाप्यात्मीयेमव दोपेणोपातो मपति मुबङ्गवापिचास्यः । उदृतवष्ट्रोऽपि मुबाङ्गो रक्त परिहिपते मोफेनेति । शुकादयो मापाफरमावा भूपम्त एवेति Ra मर्प–पति मायापारी मनुष्य कुछ अपराध नहीं करता तपापि अपने दोपसे उपात-पीरित वा, सर्पको तय किसीका नासपात्र नहीं होता। मावार्य--मो मनुम्प पहरे मापाबारी रहा बारको पदि यह मापाचारको छोर मी दे, तो मी उसकी पाणबारको स्मरण करके कोई ठसन पिवास नहीं करता है। यह सपने दोपसे ही मरा जाता है जिस प्रकार सौरका दाँत तोर दिये गनेपर मी गेग उससे दूर ही रहते हैं। सर्वविनाशायिण सर्वव्यसनेकराजमार्गस्य । लोमस्य को मुख्गत क्षणमपि दु खान्तरमुपेयात् ॥२९॥ टीका-सपा विनाशानामपापानामापभयो मोम सानम् । उपमापौरपारदारिकार सम्तानादयः सर्वे विमाशाचार्याविनिमित्चाः । सर्वविनाशामपणशीलः सर्पविनाशामणी । समाणि म्पसनानि स्त्रीप्तमद्यपानास्लेटकवचनवणपारम्पार्पपणास्पानि हिता म्पसपम्ति पुस्पमिति म्पसमानि । नेपामेप लोमकपाप पको परमागः । सर्वाणि म्पसनानि प्रेमाभिमूख पोग्पमामपमासाप विमाम्पन्ति । रामार्गो हि दिवा विमिभागासाविमिश्च सर्वे अपते पया तया गोम एष पबमार्गः सर्वम्पसम सुपते पविपस्प होमस्य मुलगत-गोचरीभूतः सोमपरिणाममा बस एलान्तर मुख-माला- पम्पत् पुलम् उपेपात्-उपगछेत् इति । प्रवीतिम्पापात् प्रार्य सुसमवेति। मैव माथि सुख प्राप्नुयात् 'स्पयाRu मप-होम सब विनाशोंका आपरे और सब म्पसमात्र एक राम मार्ग है। गोमक मुसमें गपामा फोन मनुष्प क्षण मरके पि मी मुरा पा सका। भावार्य -सब प्रकारके देर-विरोष वार चोरी वगैरह विनाओंका पर लोम दोहै। पुरा, माप पाना, शिका, पचन मोर दणकी कठोरता मोर अपपनप सब म्पम्न हैं। वो पुरुषको उसके दिलसे दूर करते , उन्हें म्पसन करते हैं। गेम कायाप उन म्पसनोका एक राग-मार्ग शमीको पाकर समी म्पसन उसमें अपना पासन बमाकर बैठ जाते हैं। जिस प्रकार राजमार्गसे माम, क्षत्रिय, वैश्य तपा घाणार पणेरह मी बेरोकटोक बागा सकते हैं उसी प्रकार गेमरूपी पम्मा समी म्पसनों के लिए मुगा रहता है। ऐसे गेमके मुसमें गया गेमी मनुप्प दुबके सिवाय मोर क्या मोग सकता!बर्षात् उसे धममरके लिए मौ पुस महामिता है। १ प्रतिपामिर प्रवेमत्परम् मु.।।मामी-०।४ पसमापोरा पपवयनमासमालायाम् [रिपोऽभिर, नामा सम्पति पदोपकपापापमुपसारबाद- बार बहुत रोपोसे पुल कशापके वर्मनका उपसंहार करते हैं- एव क्रोधो मानो माया लोभम दु खहेतृत्वात् । सत्त्वानां भवससारदुर्गमार्गप्रणेतार ॥ ३० ॥ टीका-सप पते पापा तीमस्प प्ररूपमासम्प नरकगत्याविर लस देताः बनाः कारणमूता इति । के कुलतकसत्तामा प्राणिमाम् । पुलदेवस्वाच भवसंतार दुर्गमागप्रमेता भवन्ति । भयो नरकादियाम तदेव संसार पुनः पुनर्गमनागमना दुगा- विषमो भयानक तस्प पो मार्ग पम्पा तस्प प्रणेतारा प्रतका नापका देशाका का पुनरसी माग: हिंसानृतापावरफसमनः ।।। मर्प-स प्रकार के कारण होलसेप, मान मापा, वीर गेम प्राणियों के चारमतिलपी मपानक संसारक मानके प्रबर्दक है। मापाप-पे समी पायें मरकारिक गतियों में प्राणियों को पत्र इसके रेनगामे होनेके कारण मयानक संसारके मर्गको दिखाने वाली है। भासप पाक रिसा मुठ गाह पाप करना संसारका मार्ग सापके वशीभूत प्रागी इन पार्कोको करवा | कपाप संसारको बाने बागी। पपामेर फसावाणामापविम्सदपप्रदर्शनार्पमाह- एहो पाके दो मद बताते हैं ममफाराहकारावेपो मूल पदद्वय भवति । रागद्वेपावित्यपि तस्येवान्पस्तु पर्याय ॥३१॥ टीका-ममकारो ममत्वम् मेमेई ममेरम् इति मायामापायपोगानम् । मापे गई, सच ममिमानपसमा । मापामपि इम्योपादानाप बगिमा उम्ति कर किस्पारित, मतो ममगारान्त पातिम्ग । क्रोमो हि ममिमानादेष क्रियते- विमिस्पर्य मामाकोमतीति माइन्तिमा नबम्पा सन् इति । मतोछार पर। पपाम् इति पादीना मूह पीवमेतदेव पवर्ष ममहापार इति च । तवा पगपापि पीवभूती कोमा- पीना एम्पी । वस्पैक पपरयस्थाप० पर्यायो ममकार-गा, मधा-पः ३१ मर्पम सामों के मूग दो पद -एक ममकम बार इसरा बरंकार । ग पोरोष मी - मापाप-प मेरा इस प्रकमके ममको ममकार करते हैं। इसमें मापा और प्रेम क्याप प्रामहोब। गोपकार करते है। पर मान करताप और गोषमापत्रम। १ सदलित मु.।

भरिका ११२-२१] परामरतिप्रकरणम् धन कमाने के लिए बनिये गेन मेन-देनमें मापामार मी करत है, क्त मापा ममकारके ही बात है। कोप भी उसी मासे ही किया जाता है। 'पह मामूी बादमी होकर मी मुझपर मों विनाता है। मममा मुम क्यों मारता है। यह महफा ही है। पतः इन नेपादि कपापोंके मूह बर्षात् मीनके दो ही पद है। तपा राग बोर देप मी कोषादिके बीच चानने चाहिए। ये दोनों ही दो परोंके मामान्सर है। ममकारका माम राग दौर मईकरका नाम रेप है। मौपा कोपारीमा चतुमा पापापा को रागः, कोपा देपस्तविस्याह- इन कोषाद पाोंमें राग और रेषा माग करते है। माया लोमकपायथेत्येतदुरागसहित इन्द्रम् । कोषो मानध पुनप इति समासनिर्दिष्ट ॥ ३२॥ टीका-उक्ततसपो मापासोमौ । सादेव इम्ब मिथुमम् । रागसमित रागनामकम् । कोपमानौ चोक्तामणी । पतबपि ई 'देप इति निर्विश्पते संमेपतः ॥ २२॥ भर्य-सक्षेपमें माया और गेम कयायके पुनम्र नाम रग मोर कोप तपा मान कमायके पुगका माम इपी। मापार्य-मापा वोर गेमको रग करते है, मोर मान दवा कोषको रेप करते है। तो पुनर्ममकारापारी रागदेपो पा कि पलायो हानावरनीपादिकमबन्धे पर्याप्ती मयाम्पमपि चित् सतापमपेमेते । स्याह- पारी ममकार और नाकार अपना राग मोर वेष बोहरी भानावरमादिक कोका पास कराने में समर्थ है पा किसी दूसरी सहायता से है।पकार इसका उत्तर के मिथ्यादृष्टपविरमणप्रमादयोगास्तयोर्षलं दृष्टम् । सदुपगृहीतावष्टविधर्मवन्धस्य हेतू तो ॥ ३३ ॥ टीका-मिप्पाइर्शन मिप्पाणि) तामिर्क तस्यार्पामवानग्मपम् । मरिरमय- मपिरवि-मनिाति पापासपात् । पिपवेनिपनिद्राविकपास्यः पवर्षियः प्रमादा। मनोबा- बापारम्पा पोगा। पातुए सहायामपेमेते ममकारहारी पगपापा धर्मणि पम्धिसम्मे। तयो स्पेताय सम्मम्पते। बसम् इति उपचारपस्वम् । उपचारका मिथ्यादरामावया यो पगदेपपोः । मोपीवावेती मिम्यादानादिमी पगोपी मष्टमकारस्प बमबम्मस्प वर्ष प्रतिपयते इति ॥५॥ मर्प-मिप्पाल, अमिति, प्रमाद बोर मोग पे एन गोरेपकी सेना है। उसकी सहपवासे वे दोनों पाठ प्रकारको कारण होते हैं। मापाप-पालका माम नपाका महामन करमा' पारेका मापारमार्गा से पिरति न होने मनिति कात है। विषय लिप नापौर कि पे प्रमाके मेद है। मनोपोन, ४प पचायनशानमामापाम् [पतीयोऽधिकार, मादक चमपोग और योग-पटीन मोग है । मरम्बम ममकार और मकर मा एग मौरीप इन पार सापकोंको सपेक्षा करते हैं। उनकी सहायता पाकर दोनों बार प्रकार कर्मपमें . मराषिर्ष बम्पमादशपनाह- अप्परकबाट मद करते। सन्तानदर्शनावरणवेद्यमोहायुपां तमा नान्न । गोत्रान्तराययोमेति कर्मवन्धोष्टधा मोल ॥ ३४ ॥ टीका-स मनु तदेवफ कमबन्यो हातावरणीपादिभेदेन मष्टपा मपति। मानावरण मनावरण वेध मोहनीयमायुनाम गोप्रमन्तपयम् इति मी मूसमेदार। मपोपशमन मापि प मानमानिपते पेन फमणा तम्पानावरणम् । पादशनापानिपते येन कर्मना तर दामादरणम् । मिद्रापियाम, तदपि हि दशनमागोस्पेष । पेपं सुनामुमबम दुतामुमबसमय। मुमति मनेन बीयः इति मोहोऽनम्तालुवम्यादि। पम्प मनः प्रसार मीपति' इस्युप्मदे, पापान पारयति, तवायुः । नाम्यन्ते मापते पेन गतिमास्पारिस्पानानि विशिरकुलमाप चपादिमापनसमर्षमुर्गोमम् । सदिपरीत मार्गोम् । दानामादिविमकारि मतरायमिति। मौसम इति मूठे भयो माम कमाया| मप-म् कर्मबन्धक भार भर चालतरण दानारण बेदनाप, मोर माप, माम, गोरसराप । भावाप-क कारनास होनेवाग कामावरण भादिके मेदसे माठ प्रकारका होता जाताण, रसनातरम, बेलाय, मोहलप, बापु, नाम, गोत्र को बताय-बार मूत मेराको पापोग्रामिक और पापियारको लापहमारन। यो फर्म पान बमेरको राय हमारण है। पानी न मी दर्शनाएमके होमोकि मी दोलनास मनुमा गोकर्म का पानीमा मिस कर्मम जीर मोकामा बा मोह है। उसो द समानुपादित रिस कर्मके सरपसे गौर गोला प्रानोको पारन करता है, पर बायु है। जिस कर्मी उससे मति गतिमयको प्रसिदोसीमाम है। प्रिम परे हापसे ARE गति का ऐधर्म मार प्रम दोप गोर। उसस उगमाप मोड । गोकर्म पान म य ताबा अमराप है। पपर मानोति भयोता तिपिपा स्पर- अब सत्तर कम मेहरते- २७ करिब ११३३] प्रशमतिप्रकरणम् पञ्च नव उत्पष्टाविंशतिकश्चतु पट्सप्तगुणभेद । द्विपञ्चमेद इति सम्नवतिभेदास्तयोचरत ॥३५॥ टीका-पामापरपस्पोन्सरमतिमेवा पछ मविधानावरपादपः । वसनावरमस्पोत्तर प्रहसयो मा पमुबामावरणाविषतुष्ट निवादिपेचकना वेदनीपं दिगिर्म सदेपमसदेपा । मोहोत्तप्पासपोर्षिशवि-सम्पत्वं मिम्माम सम्पग्मिपास्वम् ममम्वानुगन्धिनसत्वारः क्रोपाइप, भमस्पाल्पानावरमाश्चस्वार प्रत्यामपानावरमारवस्तार, संम्पसनाभस्वार, हाम्प रतिरराति मर्प शोको युगुप्सा स्त्रीवेक नपुंसकोदति । मापुपवतत्र उत्तरपातपः- मारवायू, तिर्यगायु, मनुप्पायुः देवापुरिति । पद सप्तगुणा विचत्वारिंशद् मनम्ति । मतो मामकर्मम उत्तरप्रकलपो दिवस्तारिमा मन्ति । प्रतिपक्षपाठात पम्ते । तपपा-गविनाम, पातिनाम शरीरनाम मोपाङ्गनाम, निर्माणनाम बम्मननाम संस्थाननाम समातमाम सामनमाम, स्परानाम रसनाम बमनाम गम्मनाम, मानुपूर्वानाम भगुरुमनाम उपमातनाम, पराभावनाम, भातपनाम, उपोतनाम अासनाम पिदापोगतिमाम प्रत्येकशरिनाम साधारण- पारीरनाम प्रसमाम, स्पावरनाम, गुमनाम, मनुमनाम मुमगनाम दुर्मगनाम, मस्परमाम, स्रनाम सामनाम पावरलाम, पपातनाम, मपपातनाम स्पिरमाम मस्पिरनाम, मादेप नाम मनादेपनाम, पशोनाम, मपसोनाम वीर्यकरमाम पेति। गोमस्पोचपहाविश्यम् । उबर्गो मार्गोत्रणा मन्तपपोत्तरप्रसपा पहचानास्तरापम् सामाम्तरापम् मोगाम्त- रपम्, उपमोगाम्तरापम् वीर्याम्तरापति । एवमेपामरानामपि कमणामुत्तरमातमा ससनबतिर्मषम्तीति । मामकर्मणः पुना मर्षिषा गति बस्पादि माममेदेन सप्तपष्ठिस्तर मतमो मवन्ति । दोपापा पनपचासत् । पनामपमेकीहर्ष वापिस्तर परुतिशत मपति। तमापि वित्युत्तरपतिशवस्प बम्पा, सम्पग्मियात्तयोर्नास्ति बमः। मिम्मामरिकमेन पिपुर्व सन सम्पपलमुम्पते, सम्पग्मिध्यारसमपि देखपिादं मिथ्यात्वमेगाम्पत इति ॥ १५ ॥ मर्म-पाँच नी, दो बाईस, चाप, बपाठीस, दो और पाप इस प्रखर उपरकमके १. मेद होते है। भावार्यमानारपकी उसप्रतिया पाच-बानावरम अशामारम बाकि बानारण, मनपर्यप्पानावरम मोर जमानाबरण । पर्सनाबरमकी उत्तरप्रकृमियों नौ-सुदर्सनावरण पगारनावरम, अविदर्शनारम मौर केपदर्शनावरण वा निवा निमानिया प्रचा, प्रचगप्रचग पौर स्पानगदि। मोरको सवालिया बाईस-सम्पाय, मिपाच और सम्पमपाल, ममन्वानुमन्दी- शोधादि पार, अप्रमामानारण चार प्रनाम्पानावरम चार मगाम चार हास्प मि, मरति, मम पोक गुप्ता, पपेर, बोवेद और नपुसकोद । PAARI९गुप्ता २० बीनगरमेलि मुसिएरेनहमसे।

२८ रायपद्रवनशौसमाप्रपाम् [चतुर्षोऽविकार, वीर्षकर्म भाएकी उत्तप्रातमा चार नारकाम्बु तिवायु मनुम्मा पौर देगा। मको सास् गुमा परमेपर बबालीस होते हैं। नाम की उत्तरासिया बपास होती-ति मासि, परी, कोपछ निर्माब, बन, संस्थान, संघात सहनन स्पसे, रस गन्ध वर्म, मानार्मा, गुरुग्म, उपमाद, परमात, बावाप उचोत, सास बिहायोगति प्रत्येकथरीर साबरमय, बस, स्था, एम, मधुम मा दुर्मग मसर उत्तर, सम्म, बार, पति बपति, रव, बलिद मादेष, बाप, पच अपप्त बोर तोर्पकर भाम । गोत्रको उत्तरप्रसाद राजगोत्र और मीरगोत्र । बतायी प्रतिमा पाँच-दामताप, समाजराय, मोनान्तराय, उपमोगावराप बार निर्यात्म्य इस प्रकार इन बाठों काकी उपमहतिमा सचालयें होती है। नमकर्मकी उत्तरमतियों के मेरोंको मिासे पैसे गतिक बार मेद, मामकर्मको उत्तयाँ ६७ होती है। बोर के कमोसी उच्माता पचपस होती है। दोनोंको मिनेसे १२२ उत्तरमातिया होता है। अनमेंसे मोमब १२ रुविनाश होता है। सम्पसव मोर मप्पापके दविकीपर होनेपर सम्पर फरेब ता उसी मिप्यान पुरसम्मम्मम्मान करते है। प्रकृतिरियमनेकविधा स्थित्पनुभागप्रदेशतस्तस्या । तीनो मन्दो मभ्य इति मवति कन्भोदयाचशेप ॥ ३६॥ सन-पपमित्र प्रतिरपिपा शासियुत्तरमवमेदा इत्पर्प । स्पाम प्रह। स्पित्पनुमागमवेसम्मेम्पा स्थितिषम्पालमागबम्पपदेशवबा तेम्पा प्रहविनम्मपिसेपो मपति ती मम्बा मप्प इति पा । उसमपिरोपोऽपि वीमादिमेशा महसीना मगति । तीवासपस्तदा अपेपु पर्तमानस्ती प्रतिषम्य परोति, ममासपो मम्मम् मम्मापापो मम्पमिति मम्म रिशेषापोप इति । तप स्पितिजन्मो शानदीमापरलोपावण्याना सिस्वामरोपम कोटीकोटम अहार। मोहस्प स्पितिगण कर समविसागरोपमोटीकोटमा । मामगोपयो म्पितिमानो विपतितागपेपमकोटीकोटमा प्रष्ट स्पिविषम्म मापुमा प्रयसिंमस्सागरोप मानि । बेनीपस्थ अपम्पा पम्पस्पितिवारणमा । मामगोपोरी मुस्ता । गोपामपामर्सनुहस्पिति। भनुमागरम्पो विपाकास्पा कर्मपा शुमस्पाशुमस्त्र का पम्पस एव रसमियोप नितपति। स्पानुमबर्न विपास पपा नामझम गस्यादिस्यापरिपप्पमानोग्नुभूपते। पदेशवपस्त, एकस्मिनारममोरोशातावरणाम मनम्ता, दया सेपकर्मपामपीति । सभी । वाम पाये । ] २१ कारिक्त २६१] प्रशमरतिपकरणम् भव-इस प्रतिके वनेक मेद हैं। ता स्विति, बनुभाग लौर प्रदेशकी नपचासे उसक बमबार उदयके तीब, मम्द मप्पम मेद होते हैं। मापाप-पुणेक प्रकारसे उत्तरप्रकृतियों के एक सौ बाईस मेद होते हैं। स्पितिवन्ध, वनु मागबन्ध मोर प्रदेशबन्धका अपचासे या प्रकृतिसम्म तीव्र, मम वा मप्पम मेद होता है, तथा उसका सदय मी तीन मन्द बया मप्पम होता है। ठीक परिणामोस तौर प्रहलिन्म होता है और मध्यम पार गार्मोसे मध्यम प्रतिबन्ध होता है। पथमें विशेषता होनेसे उपपमें भी होतीमाशय यह है कि सब प्रकृतिका सहर स्पिति होती है, तब उसका मनुमय और प्रदेशबम्घ मो उत्कृय होतेर उसस उस टाहरपतिमें पम्प बोर उपप-दोनों टीन होते है। इसी प्रकार बम प्रहतिकी स्थिति पम्प होती है, तो अनुभव पौर प्रदेश मी चपन्य होते है और उससे लिविका बन्न-उरम मन्द होता है। इसी का मप्यममें पानना चाहिए। पानावरण, रमितरण पदनाप और बातरापका सितियन्म तीस कोकाकोसी सागर प्रमान होता है। मोहफा सतर वितिकम्प सत्तर कोसाकोसी सागर प्रमाण होता है। माम और मोका उत्तम विविध बीस कोकाकोली सागर प्रमाण होता है। मेदनीयका अन्य स्थितिबन्ध मारा मार्त ऐसा है। माम बोर गोत्रका मपन्य स्थितिबन्ध माठ माहर्त होता है। शेप कोका वतर्मुईत स्वितिसम्म होता है। विपाकको अनुमागरण करते हैं। तुम बना बामर्मका गब बन्ध होता है उसी समय उसमें रस विशेष मी पाता है। उस रस सिपके बनुमसको विपाक करते । पब गति मेरा स्वामि कर्मा उदप बाह्यता पर विपाक अपने अपने नामके अनुसार होगी। कर्मदरिकोंके समाको प्रदेशाध करते है। जिस प्रकम एक बारम-प्रदेशमें बनन्त दागि रह। तापक्रमों के मी बनात दकिक रहते हैं। बपके काम करते हैं- तत्र प्रदेशबन्धो योगाचदनुभवन कपायवशात् । स्थितिपाकविगेपस्तस्य भवति लेश्याविशेषेण ॥ ३७॥ टीका-तम वेषु चतुपु बम्बमदपु प्रदेशबम्धस्तावन् पोगान् मनोबाहायससमा मपति- मास्मप्रवेशेषु पानावरपाधिपुरमोपचपो वापते इस्पपः । तम्य मदेशवदम्प कमनोनुभवनं सपायरसार विपाक स्पपः। स्पितिरिसेप. पाकर्षिशपाच तम्प मेन्या विशेपमनितो मपति उमाशा मध्यमः अपम्पा इस्पा ३७n मप-योगमें प्रदेसम्म होता है, क्यापसे अनुमागवान होता है, और पाकी शेषतपसे स्थिति और पाल मिशेपत्ता पाती। मावाप-पके पार मेलों में से प्रदेसबम्प बोगसे होता है। वर्षात् मनोयोम पचनपोन बोकापोगके कारण बामाले प्रदेशोंमें बानापरणाई कर्मपुगेका समय होता है और पाय- - एपचन्द्रमैनशाम्पमाछापाम् [चर्चाविकार, बानिय कर्म के कारण उन पर हुए को बमुमबन बनात् एक होता है, तग पिस प्रकारका क्या होती है उसी प्रकारका तत्का, मप्पम, बोर परम्परिवतिमय होता है और उसी प्रकारको ससमें रम पछि पता है। वन श्या' इतिक पदावा कति पा मपन्ति सेरपा इस्पाइ-- पाका सरूप तवा उसके मे बताते हैं- ता कृष्णनीलकापोततेजसीपाशुलनामान । रूप व वर्णवन्धस्य कर्मवन्भस्थितिविधात्र्य ॥३८॥ टीकाकर सेस्पो-मनसा परिणाममेदाः । स प परिगामस्तीमोऽम्पासापोऽधुमो बम्फमुमुमुपटपुरुपायम्ताविसाप्पः । मपरे वा- योगपरिणामो मेोपा । यस्मात् कापमाग्म्पापापेऽपि मनापरिणामापेमस्तीब एवाभुमो भवति । मममममा सामा बान्तपरिणामा बारम्ते पापिना परमेति । किन हप्तिागिरिकादया मादी विश्वणि स्पैर्यमापावपति सेपो वर्णाना पाये सरपम् । एवमेता मेश्या धर्मवन्म- स्पितिपिपाम्पा। तीनपरिणामाः स्थिति कर्मणामविवीर्षा सिपति कुखी हनीड कापोतारम्पा निकामावस्थापनेन । मसीपमझनामानः धुमस्त्र कमबम्पस्पानुफडदा सुभासामेब कर्मस्पिति विमति मोठी पिमुख बिन्यवरा विमुरतमाम उत्तरोतरा भवन्तीति ॥१८॥ मप-नमक, कापोत बस पमपाके मेर। पिस प्रकार मेससे रंग पक्का और तापी हो जाता है उसी प्रकार ये स्मार मौर्मको वितिकोप करनेपाल मापार्योस्पायोंक म मेर है। परिमामनिषको दपा करते है। जामुन खानेके एक पुस्पोंके पतको कर उन पुरुषों के अपने अपने से तर मर पा ममम परिणामसी ही उनकी पा गानमा चाहिए। बम्प बापापों का मनोक पोगपरिमाम- को हो या कहते है। पति मर और पचनका पापर मनके परिणामको अपेप्सासे हो न होता है और वन होनेसे बागम होता है। बासप यही का मममें होनेवाले मागेको रसाका नाम है। मितुप वाचाम् कायिक और बालिकाको मौका पर है। उनका कहना है कि मनुष्प अब इस करता है, या दोन्वा tar मी उसके करने बा बोम्मे मनके मार्योकी ही मुपता एवं ।। मनमें परि कोष होता है तो उसकी शारीरिक क्रिया और मापनिकलपा बाबर उसका बसर पापा बावा है|बट पोग- पवादाता परियामाहाटी-मु परयामापर्व ।। गुरुमा- प । ४मा म ।

मारिका ३८९५ ] प्रशमतिप्रकरणम् परिणामको यो करते हैं।निस प्रकार दीवार वगैरहपर वियोंको रपाया बनानेक लए रगों में सरेस गादते सरेसप्त रंग पका और स्थापी हो जाता है। इसी प्रकार पेरेदपार कर्मपकी स्पितिको प करती है। वर्षात् हम्ण मील मोर कापोत सपारूस तीन परिणामोसे मोकी स्थिति अवि दीप और तुम्च दबासी होती है। तपा तेरस पन और शुभम्पपासे धुम कोकी स्थिति अधिक र गुम फल देने वाली होती है। ये तीनों रेश्या सतरोन पिपुर भुक्तर भR AHदस्म होती है। 'तस्मिम् पुनः कर्मणि पदे मात्मसात कि मवति । इत्पाह- मात्माके सार कोका बन्य होगानेपर क्या होता है। यह पतात- कमादयाद् भवगतिर्भवगतिमूला शरीरनिवृत्ति । देहादिन्द्रियविपया विषयनिमित्ते च सुखदुःखे ॥३९॥ टीका-उदिते विपाकप्राप्ते तस्मिन् कमाणि मनो मरकादिगतय समोत्पत्ता मरगती सपा नरकाशिरीरानिईत्तिः । मरगतिमूर्न पनि पस्पाः सा भवतिमूसा दारीपनिष्त्तिः । पहामिरिच स्पर्शनावीन्द्रियनितिमा सतः स्पाामादिपिपपप्रहणशतिः । ततपेष्ट पिप मिमित मुखानुभय, भनिएविपपनिमित्तम दासानुमयः । ३१ । मप-कर्मक उदपसे जीरको मरकादिक गतियोंमें गाना परसा ।। मरकादिक गनियों में बाने से शरीर बनता है। शरीरमें इन्द्रिपादोती म्द्रोंमें रिपयको प्राण करनेकी शक्ति होतीसमोर दिपोंके माण करनेसे सम्मुषहोते है। मावार्य बाँधा मा कर्म या उदपमें बागवानीयको नरकादिक गतिमि से बाला है। यहाँ पर बनता है। मरमें इन्द्रियों होती है, और उनमें पियों को प्राण करने की शक्ति होती है। इस विपके मोगसे पुस मोर पनि पियके मोगसे इस ऐता है। मप्रममावादेव सा पाणी मुलममिसपति पुलायोदियते । मोहान्यो गुण रोपानपिचाप मुलसापमाप पतमानो यो यो क्रिपामारमते सा साऽम्प दापोतुमति ' इति दापति- इस संसारमें समापसे ही समी मानी मुप चाहते हैं भर दुससे उरते हैं। मोहसे मापा एमा गर मसे दुरेका विचार न करके मुखको प्राप्ति के लिए रोका काम करता है उसके दुपही कारण होते हैं।सीबतको प्रत्यकार निम्म पारिकास बतात- दु सद्विद सुखरिप्मुर्मोहा धत्वाददृष्टगुणदोप । यां यां क्रोति चेष्टा तया तया दु समादचे ॥४०॥ टीका-इल देति पुनदिद। मुत निप्मते तालिम सुनरिमु । मोदो शर्षि पातिमे तेनाम्पो म गुर्ग दोपं वा पश्यति । मेरा कापिकी पापिकी मानती वा किया। १- मी समाविमा मितिमु ।

A 1 राममननशासमाशायाम् [पञ्चमोऽधिकार, पोधिप्रसपा. तेन पारसी वा क्रियते किया तया तया दानमावते-दुल्लममुमपति। मैच या पुलम् पारने कापाचापम् । तावत-एलपरणं गर्म पनाति स्पिपी॥ मर्यसकारी और पुसमा पाइनेमाग प्रामी मरेका प्रचलन फरता राम, मोहसे क्या होकर यो गो काम करता है उससे दुम्सको ही मोगता है। मापाप-मुख पामेकी असे बिना विचार मोहमें पसर प्राणी को कुछ मनसे, पचनसे, बोर कापसे पेश करता है गण कर्मक्का काम है और कर्मकार का कारण होनेस है।बत कममम काका उपचार करके चेयसे भागनुमब करता है। ऐसा का दिपा ।।से दो उससे कर्मबन्ध करता है, और कर्मच से दस मोगता है। तत्र पाठ इन्द्रियापु एकाविषयमहत्तावपि प्रस्पपापा पडमियपति- पाँचों इन्द्रियों के पाँच विषय है। उनमें से एक एक लिपपमें मी प्रति करनेपर यो बापदाएँ माती है, उन्हें पाप arतोंसे मगर फलरिमितमधुरगान्धर्वतर्ययोपिद्विभूपणरवाये । श्रोत्रावषहदयो हरिण इव विनाशमुपयाति ॥ ४ ॥ टीर-कमा मस्मिन् पियम्त इति कर्म मामापुर प्रामरागरस्पा युक्तम् । सिमित मपुर भोप्रमुखम् । गान्पर्षविलेपनान्येतानि । तूप बावित्रविरोपा, तस्स पनि । योपिता बिभूपणानि मपुररसनाविषिणि चविष्यनितानि तेपी एक समः । एवमादिमिमनोहारिमि मा। भोरेन्धिपापपरयः-भोरे भोपेन्द्रिपरिपवेद दर्य पेन स प्रोभापारमा । हो विनासमानु पामोति गोषपालेटके । तदवपरोऽपि ममादीति ॥ १ ॥ भब-गायक मनोहर और मधुर संगीत, पाच तराशयों के बाभूपोंके सम बरहसे विसका पय मोजेन्द्रिय लिमपौ बास दिनको तानाशको प्राप्त होता है। भावार्थ-विसमें कहा है उसे करते हैं। उतार-बहाव तथा प्रा-राको गतिसे पुठ पानों को बरेनेवाण मापकोंका समित, बागेकी मधुर भनि और बोंके मिश्र, करनी पुरस बाद मामूगों का सम्स प्रकारके मनोहारी समोंको सुनकर जिसका मन को Aपमें सातार उसी प्रकार अपमा सर्वनाश करता है, जिस प्रकार शिकारी के संगीतको पनिमें मासळ होकर दरन अपना सर्वनास कर बैठता है। गतिविम्रमेकित्ताकारदास्यलीलाकटाक्षविक्षित । रूपावेशितचक्षु शलम इव विपद्यते विवश ॥ १२ ॥ टीका--गतेपिप्रम-महपानए सपिभरा गति इस्त्रया । पहित निरीक्षित मिग्मपा एपापमोचनम् । माकार-तम्मुमोम्सविमपिसेपा । हास्म तबिमस वली Pारण पु.। २ामिद म मस्विमी। वि मु.।

कभरिका ११-१२-१३-१४] प्रशमतिपकरणम् इसितम् स्पप । काम-भपाङ्गसनिवेशिवरष्टिः सामर्पा । एमिशिपः विमिता प्रेरितो पनितारूपादौ निषेपितषनु शसम इस विपपते बिनस्पति । शठमो हि दीपशिखारोपमा मितोऽमिमुख पतितः सभैव भस्मसार मपतीति ॥ ४२ ॥ भर्य-परमाती गति, प्रेमम पितवन, मुख, माप गैरह पबपन, मदमरी सी तपा कटाक्षसे पागावा मनुष्प बीके सपपर भासळ होकर पतकी मह रिपरिका शिकार बनता है। भावार्य-विस प्रकार पतन दीप-शिवापर मुग्ध होकर उसी नम्बर एस हो पाता उसी प्रकार मनुप्प मी बीकी प्रेमी रामों मोर उसके रूपपर मुग्ध होकर अपमा सब कुछ गया बेटते है। सानागरागवर्तिकवर्णकधूपाधिवासपटवासे । गन्धम्रमितमनस्को मधुकर इव नाशमुपयाति ॥४३॥ टीका-कतिपयसुमिदम्पसमाहार लालम् । महरागा-पदनामादिपिके- पमम् । चूपत्रम्पकता तिरेष वर्तिका । (सब भूपो पतिकाप एषासौ संबायते।) सेव ममाना भूपापते । षणका रुप्मावः । मधिवासो मामतीसुमादिमिः । पटवासो गम्मनग्यचूणा । एमिः स्नानादिमिर्गन्धः अमितम्- मासित ममो पम्यासी गम्पप्रमितममाः । मधुकर सिसीमुन र विनाश प्रामोति । मुरमिणा पभग पेन माइएमबरीकम्तम्मम्पपलिंगम्म मानिमस्तमिते सपितरि संकुषपस्पपि मग्नेि माशमुपयाति । निरुदत्ताव तमेव पपमुता समत पति। मई-माम बाराग, पपतो, मुगन्धित प अक्षिाप्त पोर पटबासकी गम्भसे पागल इवा मनुप्प भैरिके समान मत्युको प्राप्त होता है। मावार्य-समें कुछ सुगन्धित प्रमोंको गिमाया गया है। चन्दन केसर गएका लेप कर मेको काराग करते हैं। पूपकी बनाई गई बचको धूपबची करते है। उसे बस बगते हैं सब बह पकी ही तरह मगध देती है। किसी चीमको मारती बगैरके अगेकी मुगक्स पासित करनेको अधिवास करते हैं। कपाको पारित करनके लिए पार किसे गपे पुगन्धित पूर्णको परयास करते हैं। इनकी पुगसे विनका मन पर हो उठता है, ए मारेकी तर मासको प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार मास कमकी मुगन्धसे बाइप्ट रोकर उसके मीतर बैठकर ससको गन्ध मिपा करता है। सूर्य हा पायबोकमा बन्द हो पाता है। कमलके पर होते ही प उसके बना पर हो नाता है। और उसके बाद होनेसे पाहामर पाता है। मिष्टान्नपानमांसोदनादिमधुररसविषयगृहात्मा । गलयन्त्रपाशवो मीन व विनाशमुपयाति ॥ ४४ ॥ १परिण-मु.। परिपूणे 1 प्र । सपनशासमालापाम् [पनमोऽपिकार, पनि पविषयाः टीका-मिश्मस्पातस्थापु सर्वदोपरहिवं मसमाग्प पिपिमम् । पानादि मर्य प्रसादिमा पानम् । मर्सि गरिसरमशशमारनदीनाम् । शास्त्योदनारिका मधुरो रस सणारारादि। स एष विपयो रसमायाः। तस्मिन् गया सक्त मारमा पस्प । गोप गो। पन्माणि बांगादि-मर्माणि सिंहम्माप्रवीपिपिकादिम्पापादनको नियन्ते। तामपा पाशा विविरमकमाविम्यापचये निमिप्यते। मपमा यन्त्रमामाया स एष पामादेन पदो पधीहतो मीन पेमा मृत्युमुखमाविमति nwr मर्प-मीठा लादिर भोग्न पररा समय को अब ममुर पेप मांस मुगम्बित बालका मात दमा बरिसर और रसना इन्धिपके सपर्योम सिकी भामा भास होके मंत्र गरमा वाम्में फस पर मानके समान मासको प्राप्त हो गता है। मापाप-गेहेक बने हुए पत्र गम्पन्न करते है और उससे कर प्याप पूरे अंगण पकने जाते हैं। मानोंका बना पास होता है। मातीवरगवा मोर गरम पक्षियों के पकाने के काम जाता है । रिस प्रकार भीम गेहेके काटेको सम्में रास्ता है और उसमें बगे हर मौसके हानेके गेममें जाकर मग मयुके मुख पवावी, उसी प्रकार रसमा त्रिपके पियोंक गेममें पत्रकार पर प्रामी मी पधिमें फस गावी। शयनासनसेवाहनसुरतस्नानानुलेपनासक । स्पर्शन्याकुलितमतिर्गजेन्द्र इव वध्यते मूढ ॥१५॥ टीका- सपन म्बप्रमाचा सम्पा तुत्योपपानपणानपटसनापा । मासनमपि मासेमवि म्मपगटोपवर्ग मुरणपहाविमुतम् । संगाहसम्-मामाईनम् । पुर कोका- गावपणे मियामा गुमनाङ्गिनादि । स्मामानुपन पूर्वोक्त । वेप सक्तो पसनी । धम्मावि संस्पन विस्पर्मेन माइकितमति-मोविधि गोम्न र गणिभारिपीमिा हरामी संस्पतमान-कीम्पमानब सकसमः पाठय प्रेमिट सूप! फाभित् बम्तमान मेरपन् कापियवा कामित् पृष्ठतो पिपाप, पापतधाम्पा सम्रपारी कायनेपियों (कपा) पारि (स) परमम्पमानीता, वतभामारमेनापिमस्तीमामाप्रप्राइप्रस्तमस्तक परमपोग्रेमधर दासम्मुमतीति । ५॥ मम्-विमनन मिसा पोरसे पसमित सम्पा, कोम बासन मगर्दन, सभोग मान मोर मुपनमें बासछावा मनुण प्रिपा करके वाभिमसे पास ए के मात्र बको प्राप्त होता है। १ माम मो-पास कप । यस ५ वरनाममा ।पारिवानिमा । स्नायु-पम ८प्रपामा पप्पा • मामाचा म मा । मन परमिर म. मा मुखापा-पिबाला-मु.११मा म मा ।

. कारिका ११६] प्रशमरविप्रकरणम् मापाप-नापीको पकाने के लिए अनेक पिनियों की पाती है। उसे बफ्नी सरोसे एती है, मगे और पर्चासे मरी टानियोंको सबमें दबाकर उसके ऊपर डोरती हैं। उनके पर्ससे मोहिवामा पापी किसी हपिनीको स्पर्श करता है। किसीक्ने दांतोस काय देता है। किसीको बागे करता किसीको पीछे करता और किसीको अपनी गठमें करता है। इस प्रकार क्रीडा करते ए उस पापीको हविनिया हापा पकाने के खानपर बाती हैं, वहाँ उसके पका चानेपर हायावान् ससपर सवार हो पाता है और उसके मस्तक मकश गामसाकर उसे बछमें करता है। इसी प्रकार स्पर्श इन्द्रियके फरमें परफर मनुप्पको मी पाठ दुम्स सहना पड़ता है। स्ममेकेम्बियक्पियगृशनामपापदारमाबमुक्तम् इति उपसहरति- इस प्रकार एक एक इन्द्रियके निषोंमें मासक हुए चीयों के एम्सोंका संकेतमात्र करके उसका सपसहर करते हैं- एवमनके दोपा प्रणएशिष्टेटदृष्टिचेष्टानाम् । दुर्नियमितेन्द्रियाणां भवन्ति पाधाकरा बहुशः ॥ ४६॥ टीम एवम्-उक्तमकारेण प्रत्पमप्रमाणसमापिगम्य पक्षको दोपः प्रदर्शितः । तदारेण च परसोकोऽप्यनिहतविपयसाना बापो दोपा मारकतियग्योनिमाविपु मन्ति । केषामेते पोपा ! प्रणटशिष्टेटरप्टिवेटानाम् । शिष्या विकिना परसोकपपपपणामुष्ठाम- निपुणा, पामिष्टा रसिधेश । रएि सन्मार्गोपदेसि भानम् । चेष्टा क्रियानुनम् । ठमपाते मिणएिचटे प्रणष्टे पेपा ते प्रणष्टशिष्टेटरएिचेष्टा, तेपाम् । दुनियमितेत्रिपाणाम्-पोपेप म नियम प्राहितानि इन्द्रियाणि पै।-भोमादिविपपग्पसमानि दोपा-तेपो दुर्निपमितेन्नि- पापाम् । नापाक पीगका शारीरमानसाशमकारिणोऽनेकशः ससारोदमी परिवान मापरतामिति मप-बिनके शिर रनोंके पोग्प बाम वीर चारित्र मही है तथा जिमकी इन्द्रियों मी मछमें नही, मनमें इस प्रकारके पीना पचानेपा प्रापः भनेक म्पसन पाप बाते है। मावार्थ -स प्रकार उक्त रीतिसे इनियों के विपोंमें बासळ करनेछ एक एक दुर्गा माई २मो प्रत्यगोचर है।यो समारर मनुप्प पागेको उपयोगी मार्गका कान और भाचाम करने मपुन होते हैं उने सिट करते हैं। उनमें सन्मार्गका उपरेण करना वोर स्वयं उसका बाचरण करना पिप होत्याबो ऐसे महापौर पोंके संगसे मरत नहीं ए हैं ठरें उनके ममम मरक, पिंड बाद योनिमि बनेक शारीरिक मोर मानसिक पीकाएँ मोगनी परती है। मपि ते कराइयो विनासमायः साता परिपपासना । पापुन पयसापि इम्निपार्येषु सक्तः स किस पभोवति तदेव चिनम् इति उपसंहरबाह- परत्वमेवेनिर-मु । हम्माता मु ।

राषचनमासमाशवाम् [पनमोऽकार, पञ्चेवापनिया' वमा पेरिन पर एक एक सिपके विषयमें वास होकर निमाराको प्राप्त होते है। यो पनि हो इत्रियो रिपो बासपरोस मी जाता है, ससा बाना बरसकी ही बात है। सपसंहार करवे हर सी बातको कहते हैं- एकेकविषयसंगाद् रागद्वेपानुरा विनाष्टास्ते । किं पुनरनियतात्मा जीव पवेन्द्रियवशात ॥ ४७ ॥ टीका-सम्बायेगापिपपर्सगार पगोपरागतत्वादनुपस्तेडफादयो पिनासं गताः। माम्पामिमतापथ्यास्पातुरवत् । किं पुनरनियवास्माइति। नात्मा नियम प्रादिवः निवारिता बादिपिपयेषु प्रीतिमनुपमम् पयानामिन्द्रियाणां पसी । मत पप मात- मप्राप्तान विपपातमिपा प्राप्तांघानियोगतमिम्तयति ।। मर्प -का पनीर रेफ्से पीपित ये हिरन पर एक एक पिके सम्मन्यसे बाधा प्रान ए र पाँचो इन्द्रियों को परापानवासे पीवित बसपमा बोका नाहीसा। मावार्य भन्दाप्रसे पीतव अपप्पसपी बीमारको तया, रग मोर पसे पीमित नळ हिरन पर पत शम्दादिक एक एक सपके से पके मुखौ को पाते हैं, जो सम्पादिक वियम प्रीति परमेसे अपनी परमाको महा रोक्योमा पाँचों दियोको पिप एप्पासे पारित रोकर बस बिपोकीम करता है, और प्राप्त तपकिरन होने की विम्य करता है उसका वो कामात न कमियादिपिपे समस्ति पोऽम्पस्पमाना तरपा पनि परिप्पति त्पेत झवापनार- बापर कराते है ऐसाई अपय महावि बार-बार सेवन करनेसे सपा तमि होतो- न हि सोऽस्तीन्द्रियविपयो येनाम्यस्तेन नित्यतृपितानि । तृर्षि मामयुरक्षाप्यनकमार्गमलीनानि ॥१८॥ टीका-मेगास्ति इन्त्रिपरिषपः स पापारिक पेनाम्मस्तेम-पुना पुनपम्पमानेन नित्पदापितानि-मित्पमेर सामिपाणि सपिपासानि पनि प्राप्नुमा ममानिमियापि भनेकस्मिन् मार्गे सम्पादाबनेकमेरे प्राण लीनामि तम्मपां गतानि वासयनि पुनः पुमपकासम्स्पेष स्वपिपपान् ॥ १८॥ मर्प-पका ऐसा कोई पप नयाँ बिसके बार-बार सेवन करनेसे सराको पासी मोर अनेक रिपोम भासव इन्दिो पति हो सकता हो। रमाले ममम मा । -म मा ।

। प्रपोजन होमसोनुसार उस Aपम मेन इस ममा बनिएको सना करते है। भन्येपा यो विषय स्वाभिप्रायेण भवति पुष्टिकर । स्वमतिविकल्पामिरतास्तमेव भूयो द्विपन्त्सन्ये ॥ ५१ ॥ टीध-पिरमितपुरमापेऽन्ये वेपो यो विपप समावि, सामिप्रायेण उत्तम राणापा स्वममापरिणामस्मात् पखिोपमापत्ते । मपरे । समतिविपत्सामिरवा अपर पपसार समनोविपक्षिसपटनपा वमप पिपप पुननिसपा विपम्ति ॥ ५९॥ मर्प-पिताको अपने अभिप्रायके अनुसार यो पप वा मावाससी पपसे से मेगबपने अभिप्रानुसार रेप काये हैं। मागर्म संसRमें ऐसा नयाँ बोलिपप एक मनुप्पोमचा कमवा मे मी परपा प्रना चाहिए और बो एको बुरा सरेको भी पर बुरा मनमा बाधिए, मास्तममें Rो बापुरम् मनुष्पके प्रपोजनके उपर निर्भर है। मी मनुष्पा किसी पाईये इस प्रयोजन सिस होता है तो सस परासे एग रता वोर दूसरेध पनि उससे जबर्ष सिर नही होता है वोपी पवाई से पाविकर हो जाता है। परममवस्पिवेप्रमाणो विषपाः परमार्पतो न पमपाः पवि पनवार- इस प्रकार परिर प्रेममा मप बास्तबमें न होते है और न बन पाते- तानेवार्यान विक्तस्त्रानेवार्यान् प्रलीयमानस्य । निमयतोऽस्यानिष्ट न विद्यते किचिदिप्टे वा ॥ ५२ ॥ टीका-सानेप बराम् सपायी दिपवो सिपमुबस्तानेष पम्पान्मुपसीपमानस वन्मपता गच्या समुपगातरागस्प निधपता-परमापतो नेवास्प संभवति रिधिदिएमनिर ना। ५२॥ मब-कबीर सहा विषसे देप कर और दो मोसे एम करताबर मम्पसे इसका कोई और न कोई बनिए। माषा ममुम्प बिन लिमयोंसे राम करता है, उसे स भी करता है इससे या निर्म निम्ता नियाबरवा बाना महो। म्नुपबिपनी रागापमयी परमसके कारण अपये प्रयोगोपनुसार उनमें सवरण बनाएर रखते।पी पर लिपपोशमला बनित गोवे बेबो लिप एक म्मुप्पको इस होता, पर समीको सही होना चाहिए और यो एकको गपपानमानमानापाम् [पामोर, पर म्नद्याम्यक्तटाराग्म्य रेणुना शिप्यते यया गानम् । गगदपाहिन्नस्य कमवन्धी भवत्येव ॥५५॥ नवरादिना नानाम्पकापा पमा रमाकपा सिप्पम्ति मानिसम्ममा नपा गजामनगदम्प प्रमावरमादिषगणायोग्पा कमपुरमाः प्रदेशेषु मारमा संगमाम्यय भष-frezo रिमा घर की माहिश है, उसो शरीरका ruicen,यही गापम मौनी र बामाककर्मबन्ध हो । भागाव-पामा पाग- पगमे पास आने पर पाठेशाने एप मागे निवित पाकर मामास उसीय बिपट बअसे वाम उमाकरिता मिनिट पालर प्रौरस चिट गते । मम्पनि गगरानान कमन्यातून समम्तामा उपसारमार- बर-1 प्रमुष कमक साकारों को बताये हुए ठपसहार करते हैं- पत्र रागडेपो मोदो मिथ्यात्वमविरतिमेव । पमि प्रमाल्योगानुगे ममादीयते कर्म ॥५६॥ -मनमणा गगदपा मोर-मोहर्मापम् । मिरपात उत्तापाप्रदानसतमम् । मगिरनि-पानहमि मानम्या । एमिा गगारिमिकिपादिपमारपासीतिमलो पापपोगानुगाम भापत पचन मा भाम्मना निर्मापते इत्पपा । वाम पीपलम्पापेन रागादीनामा इमपोऽपि गारिपरिणामः ॥ ५ ॥ अप-स प्रकार प्रम मोगस मुदित राज प मोह मिम्पा और बवितसे पर कसको प्रापरता। मानाप-पग पराग पहले कर बाये। ARTA पाँच प्रमादों वीर मनोपोन तय कारपोगसे सति FRIENatगारिक और कर्म पर निमित्तनशिल समात्र गारिक मापसे गारिक परिणाम होते हैं। - कर्ममयः ससार संसारनिमिचर पुनर्दु खम् । तस्मष्ठागपादयस्तु भवसंततेलम् ॥ ५७ ॥ टीका-विधानात तिपर्व मनपर्व देवस्वम् । नारकादिपार मारा प्रापर मानस था। हमारको चमनमति परमितरत्रापि तस्माद रागवादप पवर्मपन्नोवो नारारिमा परम्पया पीय प्रतिमेति ॥७ राषचन्द्रमप्राममानपाम् (पनमोऽभिवाद, पत्रिका स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य रेणुना लिष्यते यया गानम् । रागदेपाक्विन्नस्य कर्मवन्धो भवत्येवं ॥५५॥ टी-सादिना स्नोमाम्पतरपुपो यया रवाना झिम्पम्ति मातिसम्ममा वया पगोपपरिणामस्लवादस्प बामावरमादिवगमापोग्पा पमपुरमा प्रवेशेषु मात्मनो हगम्तीस्पप ५५॥ मर्द-गिस प्रकार बिसफे भीमपर कमी म्प्रधिमकी नई , उसके भीरपर पनि के कम बाकर चिपट पासेरी राम और पसे मौनीबामाकेर्मयोता है। मावार्थ-पापाके योग-परिवारसे कर्म यो है, यह पारे मत मापे है। बार बासे एर्म के एगोरेपहप मानिमित्त पार बारमासे उसी का बिपट बाते है से हवाले उपकर मानेगा भू-कम चिकनाईका निमित पाकर सीरसे चिपट जाते हैं। सम्पति पगपपपानाम् कमवायरेतून समस्तानेव उपसारवार- बर राग प्रमुगर्मपके समी कामोंको बसमवे गए उपहार परते हैं- एव रागद्वेपो मोहो मिथ्यात्वमविरतिमेव । एमि प्रमादयोगानुगै समादीयते कर्म ॥ ५६ ॥ टीका-उतरणी एगोपी। मोह-मोहनापम् । मिम्पावं वसायाभवानसभणम् । मविपति-भनिति कर्माभम्पा । पमिा पगादिमिकिपादिप्रमारपयकसवितर्मनी पावापपोगानुगः कम मादीप नमते समयमेषु मात्ममा निपीपते इसका। ततक पटीमन्नम्यारेन एगादीनां धर्मबम्पोतुत्वं मणोऽपि रागादिपरिणामः ॥ ५॥ मर्प-पस प्रकार प्रभार और मोम सहित राम रेप मोप, मिष्मान और निविसे प्राचीन कोको प्राम का मावार्थ-राम गोदाम्पम पहले हपये है। सिपाहि पाँच प्रमों और ममोपोन उप कापपोनसे सहित एगारको लाल कर्मवर परख । गादिक और कर्म परस्परमें निमितने मिहिक सम्प। रामारकसे कर्मस्प होगी और कर्मापसे प्रमादिक परिणाम हो। फर्ममय संसार ससारनिमित्तक पुनर्दु खम् । तस्माद्रागपादयस्तु भवसंततेमूलम् ।। ५७ ॥ टीम-धर्मपितरो मारफत तिपय ममुष्पवं पेवस्वम् । नारफमाविकपमसार पर मसापर मानस पा। विमनारको मरफ दुम्सममुमति पथमिवरमापि । स्मार पगदेपावकः पजर्मरम्पोतको भारहिमक्सम्तो मपपरम्परापाः मूमी प्रविष्ठति ।

पपचम्नवासमाशापाम् [पञ्चमोऽस्किम्, पवेदियविपना
स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य रेणुना शिष्यते यया गात्रम् ।
रागद्वैपाक्लिनस्य कर्मवन्धो भवत्येवं ॥ ५५ ॥
टीका-सादिना म्मनाम्पकापुपो पपा रवानाः सिम्पम्ति मातिसम्ममगा,
समा गगदेपपरिणामस्नेहावस्प बाभावरणादिवर्गणायोग्या कमाया प्रोमेषु भात्मनो
मगम्तीस्पमा ५५॥
मर्ष-किस प्रकार मिसके सरीरपर तेम्मी माविकी नई उसके शरीरपर पूरिक कम
बाकर चिपट पाते हैं, वैसे ही राग मोर पसे मानो मामाके कर्मभ होता है।
भाषा-पात्माक मोग-परमामसे कर्म पाते हैं या पाया पाप है। और पापे
पए कर्म करके राम और पिरूप मायोका मिमित पाकर बारमासे उसी बप पिट गाते हैं, से
हवासे उपकर बागाने पूर-फल किनाईका ममिच पाकर पीरस चिपट बाते हैं।
सम्मति रागदेपप्रमानान् कमबम्पोतून समस्ताने उपसारवार-
बब राग-रेप प्रमुख कर्मवयफ सभी कामोंको बताते हुए पसहार करते हैं-
एव रागद्वेपो मोहो मिथ्यात्वमविरतिमेव ।
एमि प्रमादयोगानुगे समादीयते कर्म ॥ ५६ ॥
टी-उत्तमणी पगपी। मोह-मोहमीपम् । मिम्पात्वं तत्वापाभदामलमणम् ।
मविपति-भनिातिः कमा भनेम्पा । पमिा पगारिमितियाविप्रमारपत्रकसहितमनो-
पारापपोगानुगत कम मादीप रामते सप्रदेशेषु भात्मना विपीपवे इत्पपा | सतम
पीपसम्पापेन पगादीनां कर्मवम्पदतुर्व कर्मणोऽपि रागारिपरिणामा १५॥
भर्व-स प्रकार प्रमा और योगसे सहित राग रेप मोह, मिपाल और बारतिसे पानीप
बमाको परम करता है।
मावाप-राम मरहका मन पहले का माये हैं। किवादि पाच प्रमाणे बार मनोयोग
तथा कापपोमसे सहित गारिकका पार कर्मवयरता है। रागारिक और बबका परस्पामें
निमिचनैमितिक सम्पन्न गायिकसे कम होता है और कापसे (गादिक परमाम हो।
कर्ममयः ससार संसारनिमित्तक पुनर्दु खम् ।
तस्माद्रागद्वेपादयस्तु भवससतेमूलम् ॥ ५७ ॥
टीका-विधरो मार तिर्वक्त मनुप्पल देवस्वम् । मारकादिरूपतसार
परर्ण हात शारी मानम बामहिमनारको मरके कुलमनुमति एषमितरपापि । वस्मार
रागदेवाइपः पमम्मपमहतको मारकादिमासम्वते. भरपरम्परापाः मूस पीय प्रतिष्ठति ॥१७॥

पपम्नमासमाछापाम् [पथमोप्रथा, पचत्रिीय स्नेहाभ्यक्तशरीरस्प रेणुना क्लिष्यते यथा गात्रम् । रागपाक्लिन्नस्य कर्मवन्धो भवत्येवं ॥ ५५ ॥ टीप-समादिना स्नेहेमाम्पकापुपो पपा रवाना सिम्पम्ति मातिसम्ममा सपा पगदेपपरिणामस्नायस्प सामावरणादिवर्गमापोग्पा: बमपुद्रमा प्रवेशेषु मारमनो छगम्तीत्पर्यः ।। ५५॥ मर्प-विस प्रकार जिसके परपर ऐम्मी माविकी गई उसके मीरपर भूमिके का बार चिपट बावे है, से राग और पसे मौनी बापाप होता है। भाषा-बामाके योन परिणाम कर्म आते है यह पारे मत पे मोर बापे परर्म का राम और पहप माघ ममित पाकर मामासे उसी कप चिपट नाते हैं, जैसे बासे उपर बामेवा पु-कम विकनाईप निमित्त पाकर परसे चिपट गये हैं। सम्प्रति रागपप्रपामान् कमबम्पोतून् समस्तानेष उपसारा- व एमनेष प्रमुख सापके समीकरणोंको पक्षमते हुए उपसंहार करते हैं- एव रागद्वेपो मोहो मिथ्यात्वमविरतिमेव । एमि प्रमादयोगानुगे समादीयते कर्म ॥ ५६ ॥ टीक उक्तनसप्पी पगदेपी। मोह-मोनीयम् । मिथ्यात्वं तत्तापाभवानग्मणम् । मपिरति-मनिहामि कर्माप्रवेम्पा । एमिः रागादिमिडिपाविममारपसातर्विमनो पासपोमाग कम मादीपते-पबते, सरदेस मास्मना विपीयवे इत्पर्कः । ततम पटीवचम्पायेम पगादीना धर्मपम्पोतुस्वकर्मणोऽपि रागाविपरिपामा ॥ ५॥ मर्ष-स प्रकार प्रमार और पोनसे सहित रमा, रेप मोर, मिपाल और मितिसे पनीर फमाको ग्राम करता। भावार्य -रग वका मन पारेका है। किसान पाँच प्रमादों और मनोपोन कम्पमोगसे परित पगारिफकेपील कर्मचारागादिक बोर का परस्परम मिमिलनैमिति सम्पब 1 रागारिक खबर कर्मापसे प्रमाविक परिणाम होते हैं। बर कर्ममयः संसार संसारनिमित्वक पुनर्दु खम् । सस्मानागपादयस्तु भवसततेर्मूलम् ।। ५७ ॥ टीका धर्मनिरो मारत विर्यपत्र ममुप्यत्व ऐकलम् । मारप्रदिपसंसार भरण एक पारी मामस मामबममारको नरके डासम्मुमपति पषमिवरमापि । तस्मात पगपाबप परम्मवापोतपो मारविमक्सम्बत भरपरम्परापाः मूक मी पाविति ।

रापपनसाममागपाम् [पञ्चमोऽधिकार, पोतिरिक्त
स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य रेणुना लिप्यते यया गात्रम् ।
रागढपाक्लिनस्य कर्मवन्धो भवत्येव ॥५५॥
टी-मदिना सोनाम्पसमपुपो पया रमपमा सिम्पम्ति मातिषस्मस्पूना,
तपा रागदेपपरिणामस्नेहास्प सामावरणादिवगणापोग्पा मारमा प्रवेमेषु मात्मनो
गम्तीस्पपा ॥ ५५॥
भर्प-रिस प्रकार जिसके सरीरपर तेलको प्रशिकी नई उसके शरीरपर पूमिके कर
बार बिपट जाते है, से हो रग पोर पसे मानी ईमात्माके कर्मम होता है।
मागार्ष-बारमाके योग-परिमामसे कर्म पाते हैं या पारे बा बाप है। और बासे
र कर्म के राम र परूप मायोका निमित्त पाकर बारमासे इसी सय पिट जाते है वैसे
एखासे उसकार बानेगाने पू-काम विकसाईका निमित्त पाकर मरिसे चिपट गाते हैं।
सम्प्रति रागदेपमपानान् प्रमबम्पोतून् समस्ताने उपसारमार-
जब राग-रेप प्रमुख कर्म समीकरोंको बताते हुए उपसंहार करते हैं-
एव रागद्वेपो मोहो मिथ्यात्वमविरतिभेव ।
एमि प्रमादयोगानुगे समादीयते कर्म ॥ ५६ ॥
टीका-उपसरणी पगोपा। मोह-मोहमीपम् । मिप्यात तत्त्वापामयामरमणम् ।
मनिरति-मनितिः कमामोम्पः । एमिः पगादिमिकिपारिममारपसासतिर्मनो
पाहायपोगानुगतः हम मादीयते-गपते सपदेषु मारमना रिमीपते इस्यमा । ततप
कीपन्नम्पापेन रागानां फर्मरम्मतत्वं कमणोऽपि रागादिपरिणामा: ५५ ॥
भप-स प्रकार प्रमाद चोर पोगसे सहित पन, रेप मोर, मिपाल और बनिरतिसे पानी
कमाका प्रहम करो।
भावाप- पनेरका म्ग पारेप्रमाये है। किवादि पाँच प्रमादों मोर मनोयोग
पा कापपोगसे सहित गादिक्के मागील कर्मवम्ब करता है। गारिक और कर्मकपका पात्परमें
निमित्तमिलिक सम्मलागारकसे कर्मबन्ध होता है और कर्मवयसे रागादिक परमाम होते हैं।
फर्ममय. ससार ससारनिमिचक पुनर्दु खम् ।
तस्माद्वागढपादयस्तु भवसततेमलम् ॥ ५७ ॥
टीका कर्मविद्यरो मारकर्व तिपर्व मनुपर्व देवतम् । मारपहिस्पसमाए
प्ररण डाव शारी मानस पाम दि भनारको मरके राममनुमति पत्रमितरप्रापि । तस्मार
रामपाइप पचकमरम्मतको भारकादिमबसन्तको मनपरम्पपया मून पी प्रतिष्ठति ॥५॥

पचम्मनसासमाायाम् [पनमोऽमिनट, पञ्चायनिक स्नेहाभ्यक्तशारीरस्य रेणुना श्लिष्यते यया गात्रम् । रागपाक्लिनस्य कर्मवन्धो भवत्येवं ॥ ५५ ॥ टीप-समादिना सोनाम्पतरपुपो वा वाकमा सिम्पन्ति मातिसम्ममा सपा पगढेपपरिणामस्नेहाईस्प शाभारणादिवगवायोग्पा कमपुरमा प्रवेशेषु मात्मनो मगम्तीत्वपः ।। ५५॥ मर्प-विस प्रकार सिके शरीरपर हेम्की प्रक्रिसकी गई उसके सरीरपर शिके म वार दिपट पा से राम मोर पसे भीगी ईमामाके कर्मबन्ध होता है। मापाप-चापाके योग-परिणामसे कर्म है, पर पारे बा बाप है। बोर बाये एए कर्म करके राग बोर पाप माघ निमित पाकर बारमासे उसी प चिपट पाते, असे मासे उसकार बनेपा-कम कमाईका निमित पाकर सरसे चिपट गते । सम्मति पगपप्रमानान् कमबन्योतून समस्ताने उपसहरमा- म पाग प्रमुख कर्मरन्बके सभी कारणोंको बक्कम पाए उपसंहार करते हैं- एवं रागद्वेपो मोहो मिथ्यात्वमविरतिमेव । पमि प्रमादयोगानुगे समादीयते कर्म ॥ ५६ ॥ टीका उत्तमपणी एगोपी। मोह-मोरनीपम् । मिप्यात्वं सत्तापानवानसभवम् । ममिति:-मनिधि कर्मामवेम्पा । एमिा पगादिमिकिपाविप्रमारपासवितर्मन पासपयोगानुमत कम मादीय समवे. ससप्रदेस मारममा विपीपते इत्पः । ततम पटीपमपायेन रागादीनां धर्मवन्पोक्तं कर्मणोऽपि रागादिपरिपामा ५ ॥ मर्ष-स प्रकार प्रमाद और पोनसे सहित एम वेप मोह, मिथ्याल और रितिसे पास फको प्रम कम्यौ। मावार्य-राम बोएका क्षण पहरे का मापे है। किसान पाँच प्रमादरों और ममोपोग तवा कम्पपोनसे सहित गारिकके शरागात कर्मकता है। रागादिक पर कबाब परस्परम निमित्त मितिक सम्मन है। रागादिकसे कर्मान्य होता है और कर्मापसे गादिक परिणाम होते हैं। कर्ममयः ससार संसारनिमिचक पुनर्दु खम् । सस्मानागदेपादयस्तु भवसततेमूलम् ॥ ५७ ॥ टी-कर्मविपे नारपसं तिपक्त मनुषसं दसम् । नारप्रदिपसंसार पर सारीर मानसंपा। म हि मनारफो नरके समनुमति पथमिवरमापि । तस्मार रागवादर पवार्मरम्मोतो नारप्रविमासम्तो मापरम्परामा मनपी पतिति ।।

कारिका १५५५५८१९६-१]
प्रधमतिप्रकरणम्
मर्य-या
-या ससार कर्ममय है और ससारके निमित्तसे इस होता है। इसएि राग-रेप कर
संसारको परम्परा के मूह है।
मावाय-यह ससार चार गविसपी और चारों गतिपा कमाके उदयसे ही होती है।
गलियोंमें गानेसे शारीरिक और मानसिक दुस होता है। उससे राग-वेप होते हैं। रग-रेप बादिसे पुन
गति होती है। गठिमें मुभर होता है उससे एग-क्षेप होते है । इस प्रकार राग शेप बगेरह ससारकी
कपुनरस्प राग पाविवनितस्प संसारचक्रस्य मोपाप' इत्याह-
बाबा रामदेषसे सत्पमाए ससार-पक्रकेटोग्नेका पाप बसा हैं
एतदोपमहासचयजाले शक्यमप्रमचेन ।
प्रशमस्थितेन घनमप्युद्वेष्टपितु निरवशेपम् ॥ ५८ ॥
टीका-कोपाणां पगपादीनां सजनितकममात्र मासययः-उपपया । पोप
महासाप एष गाउम् । बाममिव जाखम् । पया मीनमकरादीनामावापर्क बास बीफ्नापहादि,
ववववपि बम्मान्तरेषु सत्वानामनेकुलसंध्याबदारपे मस्पर्स बीक्तिापहारि चेति ।
तदेतपम्पमप्रमत्तेन वेष्टपित बिनाप्रपितुम् । प्रमाया मायनिद्रादिर, तपदिसेम प्रथम
सिवेनेदि, प्रामापितमनसा प्रामगरसेन पनं गानम्, एवन् बार निरपशेपम्
मामूलाइमिति ॥ ५८॥
मर्यको प्रमादा है और सम्पमें स्पित ६ प इस रामादि दोषोंके महान् सचपरूप
पने गाम्को पूरी तरह से नए करनेमें समर्प है।
मापाप-विस प्रकार मगर मछको पकानेके लिए बनाया गया मार पीव-पातक होवा
से ही एग-प फोर स्पा उनसे सुचित कमौका पाया मी जन्मान्तरों में प्राणियोंको भोक
एमपूर्ण सकटो गम्नेबाग है। गोकपाप-निदा फोरह प्रमादोंसे रहित पा मिसका मन रम्पके
रस्में इमामाशी इस पने कर्मचाको शिप-मिप कर सकता है।
अस्य तु मूलनिवन्ध ज्ञात्वा तच्छेदनोथमपरस्य ।
दर्शनचारिनतप स्वाघ्यायच्यानयुक्तस्य ॥ ५९ ॥
प्राणवधान्तभापणपरधनमैथुनममत्वविरतस्य ।
नवकोटपुद्रमशुदोच्छमानयात्राधिकारस्य ॥ ६ ॥
जिनमापितार्थसद्भावभाविनो विदितलोकतत्त्वस्य ।
अष्टादशशीलासहस्रधारणे कृतप्रतिज्ञस्य ॥६१ ॥

- -- -- पपचम्बनशास्त्रमामपाम् [पञ्चमोऽधिकार, पचनियविपया परिणाममपूर्वमुपागतस्य शुभभावनाप्यवसितस्य । अन्योऽन्यमुत्रोचरविशेषममिपश्यत समये ॥ ६२ ॥ वैराग्यमार्गसंस्थितस्य ससारवासचकितस्य । स्वहितार्याभिरतमते शुभेयमुत्पद्यते चिन्ता ॥ ६३ ।। टीका--पामिा प्ररित्रमिः डम् । मस्प मापसबापमासम्म मूठनियन्म मारपरक शिाय । तफेदने उपमा-प्रसाए परो यस्प मपदम्मामा ऐतम्पम् । पर्मने वत्तार्पभवानलमणम् । पारिम सामापिकादि । तपोवादशमेवमनशनादि । सानामा पनपत्र पापमापपानादि । म्पानमेनापिन्सानिरोपण्स पम्प मुझच । ममापनपत्र पम्पम् भावापापविपासंस्पानविषयमेदावतुविधम् । मुहमप्पस्पतिविमुदायस्पप क्स्सैकस्यविवर्षसम्मकिपाप्रतिपाविम्मुमतक्रिपारस पतुया। एमिः सम्पग्दशनाविपरिया मर्पकस्म ॥ ५९ । तया- प्रमत्तपोगात् प्राणम्पपरोपने पाणया । मनुतमापर्ष सतानि नास्त्यात्मा पति, ममतोमापन सपगत मास्मा' इति विपरीत रसायपाविषपन प। मामर्थ मापमापस्त विपरीतम् । कई पम्पमाप्रेमादि। सागपावनम् मनेन मार्गेण मगपमुम् गतम् इति सम्मनपाचगे। चौपायपा परस्समात्मसास्करोति परपमारणम् । मैमुन इयो योग सचित्तयो सपित्ताचित्तपोर्चा । मिमुनस्य माषो मैयुनं मीनपुसकोदवायासेक्नम् । ममत्वसमर्मः परिपए ममेदं सम् ' मामस्म सामी इति। मूर्ण परिणा (तत्त्वापसून ११ सम) प्रति अपनात् । पम्पा प्राणिवपादिम्पो वितस्प । निशिमोबन तु परिणाम मावसाबलम्समेनचाम्पमाषितम् । एवं मूण्गुमानभिपाय उच्चरगुमानमिमिस्मुण- ग्रेटि-मंसम् पमा पदोटिस्वम्मः परमिः पद्या स्पर्फ। म सम इम्ति, नाम्येन पातपति, मन्तम नामुमोरते. एतास्विमा प्रेटया । सपा मसाप परति म पाचपति, पम्पमान नानुमोदते, इस्पेता मपि विमा भोटमा । तपा न सपं श्रीमाति नकापयावि, कीपानमम्पमपि मानुमोदत प्रपेतामाम्पास्तिमः । पण समारता नवग्रेटमा पुनरिमा विषा मिपाचे-मविरकोटेंपो पिपुरोटपम । माषा परिमुवोटमा पापात्पा स्तिसो भपन्ति बिमुदकोटमा । उम-मम्मेपणम् पवा उग्गम सेम पुभिमा स्पादि । तेन वामगुबम् । उपमिव उप्राम् एसबारपवितमीशिक्षणानुबयनमुमन स्पापित सीमाये पीगचरि। सपा मावाकारितासंबसिवाननुमतमनिस सनीवमादीपमान १-स पातमान विचारक्षम-ए-।-सामगिरबा रामा-फ। तर्मास्तम् । पति-म । ४ मरियप्रेमि-मु । सिरिय-मु । सपा अंग-मु सकिए। ८-मु । - , कारिका १२-१] प्रशमविपकरणम् म कंचन सलमपन्ति । उप्रामेब उम्समापम् तेन तारणा मामायामपिकापे यस्प स उन्नमात्रपाप्राधिकारा । यात्रा तु महोरापाम्पम्तरे पिहितक्रियाशुष्टामम्, तप्राषितस्म नियुक्तस्प' इस्पयः ॥१०॥ मिनर्मापितोऽप उत्पादम्पयनौम्पयुको बीमादिः सप्तविया । स गपपरैः सूमेण सूषितः । वस्पार्थस्पसनाचे मागपति तपछीतस्य। एवमेतत् - तपपा मगपनिसर्फ गणपर पत्र तपैयापम्, माम्पया इति विनमापितायसवाषमापिनः । विदितम्-भगत नोकतत्व पेनासौ विदितमोक्तस्थः । बीमाबीपापारमे का तस्प धत्त परमाय-नास्त्यम पाठा- प्रमाणोऽपि प्रदेशो या प्रसत्वेन सावरत्वेन वा नोस्पषो मृतो पा ययासमषम् । मपरा ममोमुसमावि, मम्पे स्वागकार उपरि मासकसमुझाकारो नारकतिपग्मानुप वेवामिनासो बम्मबरामरणोपद्रपा । मष्टादशाशीगासहस्रपारणे स्वप्रतिमस्य-मष्टावशीनगर सामाणि उपरि पस्यमाणानि पर्मादम्यादीन्द्रिय इत्पस्पा कारिप्रपाम् । मष्टादनशीगा सहखाणि मारपितम्यानि यापयो मया इति मारहपतिस्प ॥११॥ विशुदिपकपयोगावपूक परिणाम उम्पते मनस, तमनुप्राप्तस्य । शुममावनाप्पबास- वस्प । मम्पबसितमम्यवसाया । शुममावमा-पद्याना महलवाना पचविंशतिमाक्मा परि पठिता, ममित्पत्वादिका पा पापमाणा शाप मावना, सम्यवसायस्प । समये-सिदान्ते। मम्पोन्यम् परस्परम् । 'योपियोरयमुत्तए प्रमानम् भमुप्मादप्पर्प विशेपा प्रमामवर स्पाविपिसेपमतिशय पश्यतो मारनामपेन शानेनेति ॥ १२ ॥ पम्पपपपस्पितस्य । सम्पग्दशनाविषय पैराग्यमागः । संसारपासचक्तिस्प मस्तस्य इत्पर्यः । स्वहितम्-ऐकान्तिकादिगुणयुक्त मुतिसुलम्, तपापा। सरिता मामिमुरम्येन रखा पदा प्रीतिर्मतिर्यस्प वस्पंपचारस्य गुमेपमुत्पपवे चिन्ता। इयम् इति यस्पमाणा निबरातत्त्वात् शुमा बापते चिन्ता । मम परिसमाप्तिः ॥ १३ ॥ भप-इस रोम मारक म्ए कारमको बानकर यो उसको छ नेमें पुल , सम्पादर्शन, सम्पचारित्र, उप स्वप्पाप और प्पानसे पुत्र है, हिंसा, एल, चोरी मेधुन और ममापसे पर, माकोटि और उगमसे पुर बम धमार मनसे अपना सिर करता है बिनभगवान्क सारा को गपे बीपारि तलोंके बस्तिपको मानता है,गेकके सहपको चामता ६ शीबके बहाय म मरोंच पान करनेकी प्रथा से पुका, वर्ष परिमामबाग प्रम मारनामोंमें नियको बागम लिपप- में परस्परमै यो उपरोचर विशेषता र उसे जानता है वैराग्यके मार्गमें स्थित है संसारके मिपाससे मपमीत मोर वपने हित-मोक्ष मोम है, उसीको बागे कही गई घुम चिन्ता उत्पन होती। माषा-पाणी कारिका गो दोर्पोका चाउ माया गपा, उसके मुह कारपको जानकर यो उसके दमें उत्साह करवा कि मुझे पा महागास मि-मिम करना चाहिए' या सिमें पर कशी बम्प बातें पाई माती , उसको ही पाने कही गई मुम चिन्ता उत्पन्न होती है। १०ी-मु २ पपरपामागसबारिका-मु । परम-म । म्मरमा ५ भनिसलारिन स्क-मु०॥

रापवमानसासमासाबाम् [पञ्चमोऽभिकार, पनियनिषमाः तताका मदान रनेको सम्पादर्शन करते हैं। सामायिक गयको पारित है। वपके मनचन गैरह बाग मेद है। स्पाप्मापके पापना पज्जा पर पाच मेद है। किसी वस्तु मनके एकाम करनेको पान करते हैं। मर्म र पुम पान है। धर्मविषयक एकाप चिन्ताको पर्पप्पान करते हैं। उसक चार मेद हैमसाविचय, भपापविषय, विपाविषय बोर मसानवियप। निम्तपिपुर परिणामी बीबके प्राप्मान होता है। उसके पर भेद-पुत्पषितर्क, एकस्यनिवर्क सम्मक्रियाप्रतिपाति दौर म्युपराभिमानिापि । प्रमारके पोगसे किसीक पाव पामेको हिंसा करते है। बसपाचा वनेक प्रकारका रोय - सत्को सत् काना मेसे, बारमा नहीं है। मसतको सत् पाना से बारमा म्पक है। विपरीत पवन, से, नामको घोगा कामा । १ का वचन बोना । ५ सामय पचम--स मार्गम हिरनों पण गम है ऐसा सिकारीको बक्षण देना । रिसाके कारण होनेसे कटुक सावण पचन भी असमी गाते हैं। रामेकी बुझिसे परके पनको हरना चोरी है। जीवेद, पुर मोर नपुंसक- बेवके ठरयसे रपन करनेको मेयुन मते है। 'पा मे बस्तु है' इसका सामी' इस तर के ममको परिग्रह करते हैं मोकि वत्सूत्रमें ममत्वको ही परिणा करारे। परिमाणमा चोरीके क्षम विमोक्न बन्नाव कर म्मिा गपापोंकि राविमोचन ति मासाका सूचक है। इस प्रकार म्मानोंको का उत्तरगुणोंको करते हैं- मस्र्य मरता नदूसरेसे मरवा पोर न सरेको मताबा देसकर उसकी अनुमोदना करता है। तीन छोटिया है। सपा, मत्स्से पकाता न दूसरेसे पाता और न किसीको पात्य जमा देकर उसकी अनुमोदना करता है। ये मी तीन कोटिया है। बालप परीदता है न रेसे सरीरमाता है और न सरेको परीदते हुए देखकर उसको गनुमोदना कर है। मी टीन कोटिपा है। इस प्रश्वर मिम्मर पे मी फोटियाँ होटी है। दो प्रकारको होती -- एक अविनर कोट और दूसरी पिपुर कोटि । बादिका मोटियाँ बमिपुर कोटियों पर व वीन पुर कोटियार। बाहार पोरमेको उम कातेको बाहर उससे दुर होता रेमा उन्माष्टर है। फाटे गपेक्तमें पराए पापक को गनेको वम्ह करते हैं। विस प्रकार उमा किसी किसान पोराको कडापक मही होग, से होगाIR सब नबापा गपा, मोवाक सससे बनाया गया है और न उस उसमें बनुमति दी, उस वायरकोनसे किसी प्रामीके पात्र मन नही प्रय। इस प्रकारके बाहारसे पीस पात्रा करनेमें मिसन बभिचार वर्षात् बिनमनमान्ने उत्पाद पप मोर प्रोम्पसे पुष गीचा सात पाचपन दिया है। बौर गणपदेपने उन पदापाको हारसांगरूपमें संकरित किया है। बेसा मगन्ने का और गमोंने साधारण दिमा -गीबार सात ससेक्पा महो'स प्रकासे यो उपका स्मात पानखो। यापर जीव की बगल दम्प हते है उसे मेक करते है। उसके तो बाद इस गेको बाम्मी मोकळे मला मी ऐसार्ग सान महा ६ गाँस बोर वासरूपसे पडू पान कारिका ६४] प्रपामरविप्रकरणम् ४५ उपस पा र मनोमय नीचा मुख किसे हुए माठयक बाकार वोगेक । पाके बाकर मम्पोक है। ऊपर मुस किये हुए मछकके बाकार अर्पोक ।। इस गेम नारक, विश मनुम्प बोर देव बस्ते हैं, सपा बम, मरण, पुकापा आदि उपद्रोंसे पहम्पाप्त है। मोकके इस तालको यो गाना है। धीम्के बहारह बार मेदोंको बाग करेंगे। निसने उमक परम करने की प्रक्षिा की है।विका प्रकर्ष होनेसे निस्के परिणाम धर्म है। पाँच महामोशी पचीस मानाएँ बर्गा गई मा बागे बनियान वादि ARE मावनामोंका कान करेंगे । उन भावनावोंजो बिन्धन करता रहता है। वा बागममें वर्णित अमुक बात प्रधान है और अमुक बात उससे मी प्रपान, इनादि विशेषको दो बानता है। सम्पारशन सम्पमान और सम्माचारित्रमपराम्पके मार्ग पव है। संसारम एनेसे रता है। बपने मित-मोक्ष-अपमें ही यो मुस्पतासे प्रीति करता है, उसके ही जागे को गानेवाण शुम चिन्ता होती है। निराका कारण होनेसे इस चिन्ताको शुभ । तामेव पिता सएपमाह- उसी बिताको स्पट करते है भवकोटीभिरसुलभ मानुष्यं प्राप्य क प्रमादो मे। न च गतमायुर्मूय प्रत्येत्यपि देवराजस्य ।। ६४ ॥ टीका-पोटिझम संपावाची। स प मनन्यसम्पायाः सपा मग मारपतियग्देवापा, तेपा मसीमि फोटिमिः मनम्ताभिरतीतामिरपि न पुरम दुलममेष, मनुप्पस्प मागो मानुप्पम्, मनुप्पबम्म इत्पय । तदेवंविषमतिमाप प्राप्प ऽप मम प्रमादोऽवमुम्पमानस्पैक मममुष्ठानम् । प्रमाबो शानारिषु मुकिसामनेषु । कदापिविवमाठ मम मनुष्यत्वमेवास्त सर्वदा सुन्दरममीणम् इति । तब म यतः न १ गतमायु इस्पादि । प्रविमणमुपप्राप्त देमालमनुभूपके मनुमगार परिगति । न प मीण पुनपतते सौपर्माधिपतेरपि शकस्प म प्रत्सागवि किं पुनमरस्पेति ॥१५॥ मप-मो मो दुर्गम भनुम्प पर्यापको प्राप्त करने मुझे या प्रमाद सो रेराव इन की मी बोती ईनाम पुनः गेटकर नहीबादी। माषा--पों कोटि सम्द सस्पाका प्रवको । मोर पर बमका सूचक है। बर्षात अनन्त मा बोदनेपर मी मनुप्पका मा मम्मा का ही दुर्गम है। इस प्रकरके दुर्गम मनुष्प-सम्मको पाकर मोधर सापन शाल बगेरहमें मुझे प्रमाद नही करना चाहिए । शायद यह सोचेर मनुप्प- पर्यास सदा बनी रहेगी कि एसा सोचना येक नहीं है क्योंकि प्रविस्मय उदयमें बानेवारी बामु बपना फ रेकर धीम रोटी नाती है, और बीम हई बापु तो सौधर्मस्वर्गके इनकी भी गेटकर महाबादी-मुम्प की बात ही क्यारे! सु ।मग्री-सु -मनुभनम् म ४ पेषमागममताप परम्परम् ।

1 । रापचम्बनधासमाभवाम् [पञ्चमोऽधिकार, पनियापा मनिवन्न मनुप्पसम्म पस्मात- और मनुष्प चन्म निर्मात मी नहीं है। क्योकि- आरोग्यायुर्वलसमुदयाभला वीर्यमनियत धर्मे । तल्लम्वा हितकायें मयोद्यम सर्वया कार्य ॥६५॥ टीका-नीरबलमारोग्यम् सचम्म् भनिस्पम् इस्पा । नीम्बोऽपि रोगाम् उमम्वे सनहरुमारादिक्त् । मायुरपि प्रविन्बोपमा नात् प्रति गमकौमारपीनस्पपियवस्था प्रतिम अपयुक्तम् मम्पक्सानादिमिथ प्रश्न सप्तमिर्भवमुपैति । कर प्राणः । उस्सादो भीर्यास्तरापमयोपशमया सामम्पविशेषः । स च परमतो दर, पुनस्तस्पीच दुर्गगस्वामी न सभमतीति मनिस्प एष। समुइया इति मनपाम्पाविनियमाः सबमङ्गुण । वीर्यच उत्साह । परीपाबयादी वनिपत विनधरम् । धर्म मान्त्यादिके तमामा पाप्प दिवा-पित पानावि, तदेव पर्यम्, तम । मरा रस्साए सपपा समकारमविप्रान्त्या धर्म इति ॥५॥ मर्प-भारोग्य, वायु, २० और ममा ये सभी पहा । वर्मम तासाहकी स्थिरता नही ।इमें प्राप्त करके मुझे सब प्रकारसे हिकारी कापी प्रफल करना चाहिए। मागाप-नीरोगता सर्वदा यही यती । नीरोग मनुष्प मी समाजमार भारती की कमी रोपात | मी गर्म पार पानी और फापमें प्रशिक्षण न होती त । विपके भयोपशमसे होगामी मान्में ही देश माता है। वही पा करो नाता नही प्रय । मन का मी बनिस्य है । धन-बान्य बामि मा मी धनमार है। परपाके जीतने बनेसमें मनुप्पका बो उरसार पदमी सदा नही रहा । अतः इन्हें प्रत करके शानाम्पास वगैप बायोमें मुझे सब प्रकारसे प्रयत्न करना चाहिए। किं पुनस्तश्विम् । स्पार- हित पास है शास्त्रागमाइते न हितमस्ति न च शास्त्रमस्ति विनयमृते । तस्माच्छानागमलिप्सुना विनीतेन भवितव्यम् ॥ ६६ ॥ टीका-सासबसपमुपरिश पते शान्ति इस्पायी। शासनात-उपदेसदानात मानाष शासम् । मगरतो मुलपामावनिर्गमा, गमपरास्पामडेम्पा समनिर्गमा । उभय बैक्छ शामसम्पदाम्पम् । शासमबागमा सामागमः गपपरपमृत्माचार्यपरम्पामा मागत प्रति मागमा । सासागमारते शासागमाविना नापर शिवमस्ति । न च शामसमो मरने बिनीवस्त्र माचापाविमुष्पपा पिनीवेन भान प्राप्यते । सम्माष्णसागमाममिता सासागमविप्मुना विनीतेन मषितम्पमिति ।। १।। 'एमकमुष-मु.। २साम+मु । बुदाणमगरसमस । म मी नाति-नक्स मु. 3 । , कारका २९५६-६७] प्रपामतिप्रकरणम् मर्म-धारकेशानके बिना हित महीं हो सकता, वौर बिनयके बिना शाब शान मही हो सकता । इसरि पो शावक दानका मुक हो उसे बिनपी होना चाहिए। मागाप-शसका सक्षम बागे करेंगे । गो सम्मानका उपदेश देता है और दुर्गनिसे बचाव्य हैपचार है। मगवान् मुम्म्मममसे निकाागाई वोर गगमादेवके मुस-कम से निकले हुए सूत्र-पे दोनों की शान शम्से को गाते हैं। शासकने की बागम करत मोंकि गमपर बनेर वाचार्य-परम्परासे पाबाता है। शासगमके बिना कोई हित नहीं हो सकता, और शासका नाम मिनपके बिना नहीं हो सकता । बाचार्य बादि को सेपासेही नयीको शासकी प्राप्ति हो। इसलिए वो शामागमका गम चाहता है उसे विनपी होना चाहिए। सत्स्वपि भनेषु गुणेषु पुंसा विनय एष भूपण परम् नाम्वपम्पसीमाम्पादीनि इति पापमार- अनेक गुमौके होनेपर मी पुस्पोंका मनप ही प्रभान भूपम है। पंस, रूप सोमाय वगैरह भूपप नही यही पदावे हैं- कुलरूपवचनयोवनधनमिनेश्वर्यसम्पदपि पुसाम् । विनयपशमविहीना न शोभते निर्जलेब नदी ॥ ६७ ।। टीका-विशिष्टाम्बय कुळे क्षमिपादि । रुपारीपरयानां समापितः समिनेश- विक्षेपः । पचन मपुर प्रियमापित्तगाम्मिम्पादि । पौरन यूनो मायः। पुनराम मम्मरूपोऽपि शोमवे पायो पौवनगुमादेप । पन हिरण्पसुपनमणिमुपचालविगोमरिम्पमानिकादिया। मिर्म स्नोपाम् पुम्पो विमम्मस्पानम् । ऐनयमीश्वरम्प भाषा प्रमुस्वम् । सम्ममा मस्पेकममिसम्बम्भनीया -मनसम्प पसम्पर इस्पादि । सम्पन् प्रकपविधपा । एपाऽपि माविसम्पद् न मारते पुरुषार्णा बिनपप्रामविहीनस्वान् । विनया मम्पुत्थानासन प्रदानाबविपमहादिरूपधाराम्प । प्रशमो भाम्पस्म्पमाहासीम्पम्। माझ्या रहिता म घोमवे निजमेर नही । पया सरिमन्यम्पा ससारसम्पबायसेम्पमाना म भाग्वे मतिदीभगतमाममरमणीपमुदेयकमेव मरताति । एवं रिमपरिवः पुमानिति ॥ १७ ॥ मम-पुरापोंकी कुछ रुप बपन, यौबन परम और ऐसर्व सम्पदा मी विनय और बेमपसे दियो मिठ मदानी र छोभित हो होती। मागाय-पप्रिय र विशिरोमो दुर करते हैं। शरीरकब-उपाकी एम मन सविता राशिपमे रूप करता है। मीम, प्यारा बोपना पबन बगता । पोरन जातीचे करते १मायाविर्ग-मु.॥ २ मोरिपा (प्रे) बारिताराम १-मीराम । ramपयामिल। ५४ नासदीपगमार-मुन्।

. रापपयनशास्त्रमागपाम् [पश्योऽभिकार, पत्रपत्रिपा समान मारमा, मुरुप न होनेपर मी समानीके कारण प्राप' मुन्दर गयो। चाँदी, सोना, ममि, मुना, मग मंगेश तवा गाप, मैस, गोपे वादि को धम करते हैं। स्नेही बोर मयासी पुरुप मित्र पगा। मासीको एवर्य करते है। सम्परा शम्दका सम्बन्ध रफके साप माना चाहिए। मैस कुछसम्पदा, अपसम्पदा मगर । उठना, बेठोके भए वासन देना बार गोरमा, पोरा बिनय कराती है। माम्पस्वा उदासीनताको प्रथम करते है। जिस प्रसार स सरस, पका पदक पुगेसे बिरामी भरी पदि नियस होतो सुन्दर महो ममती, केवर एकमा महासा दिसला परनेके कमप ममानक नती है से ही पम्प सम्पदामोंसे मरा पूरा होनेपर मी मनुम्प परिनी हो तो वा सम्पर नौगावा। न तथा सुमहारपि वस्त्राभरणैरलतो भाति । श्रुतशीलमूलनिकपो विनीतविनयो यथा भाति ॥ ६८ ॥ टीका-न तमा मोमते ममहावसामरणभूपितः पुस्मा पपा भुतमविभूषितः । भुवमागम, सीट मृगोचरगुणमेव परणम् तपोनिका परीक्षाम्मानम् । पवि विनीवस्त सस्तस्य तथ्युवम् यदि पक्निीतस्ततः शीठम्। मन्यबा मूर्यो दुःसील पप च स्यात् । मुक्त परीधा पापामा निमा इवि प्रतीतम् । सवत् अवधीपपेमापिनपनिरपे तम्मे रिपन मीता प्रापितो बिनयो पेनासी विनीतविनय पति । १८॥ मप-बापत मामम्प पर और बाम्पोंसे मपित मनुप्प भी बेसा मुम्हा मी नका, जैसा त भोर पीसको मूह कसौटीरूप विसपी मनुष्प सम्बर मय है। मागाप- सापको करते है और धोड पाचारको बसे। पर मनुप्प मनात वे उसका कुन चिोर सोड सीरमपरा उसे और उसी के समाना चाहिए। को धुर बोर , पक्षा करनेके दिए कसोटी समान ६ ता मनयसे भूपिक ५ सबसे मपि और भी- गुवायचा यस्माच्छाम्रारम्भा भवन्ति सर्वेऽपि । तस्मात गुर्वाराधनपरेण हितकांक्षिणा माव्यम् ॥ ६९ ॥ टी-गपन्ति प्रतिपावपत्ति शाम्पायमिति गुरमा। तदापता शालारम्म्पः । सूप पापातिरपभरपाधि गुणापत्ता कानप्रापस्थाप्यापपपारससमुरसानुपापरिकर पायारम्भा सपि इत्युप्पन्त । सम्मान गुगरापनपरण इति । गुपगपपना- Pyat-मु ।

मारिका ६८६९-७०] प्रशमरविप्रकरणम् 'मानिश पादसेपा सम्पम् झियानुष्टयम् नृवमन्नानम् एणप्राणम्, तत्प्रवृत्ती गमन मिषिधारम् तवमिहितानुष्ठानम् इत्यापापपनम्-अभिमुखीकरणम् । सस्परेणेति । तापयुक्तेश मषितम्पमिति ।। १९ ॥ भर्य -पतः शासक समी बारम गुरुकेबाधीन है, वत' बो अपना पित पाहा, उसे गुरुको सेवा पर होना चाहिए। मावाप-बो शासक बर्षका काम करते हैं, ठमें गुरु करते हैं। सूत्रों के पाने और उनके वर्षको मुनमें प्रदर होना, काम्-महण, स्वाप्पाप बादि शासक वारम्म को जाते हैं। ये समी वारम गुस्की पापर निर्भर है । बतः रात-दिन गुस्मी पाद सेवा के लिए स्पार रहना चाहिए । बसा ये कारें, सा करना चाहिए। उनके ठपकरम पगेरह रसने उठानेमें तत्पर रहना चाहिए । गुरी चोपविशति 'पुण्यमानामिति प एपमनुमामो गुरुणाम् बहुमतम्य एष न मिसया मग पर बलाते हैं कि जब गुरु उपदेश देते हो तो उस समय ऐस्त्र पार कि में जमा पुष्पवान् है जो मुझपर गुरुका इतना अनुग्रह है। ऐसा विचारना चाहिए धन्यस्योपरि निपतत्यहितसमावरणधर्मनिर्वापी । गुरुवदनमलयनिसृतो वचनसरसचन्दनस्पर्शः ॥ ७० ॥ टीका-पनं सामावि तहमा भन्यः पुम्पवान् । वस्पोपरि निपतति पचनसरस पमानस्पक्ष इति बम्पति कीरगसापपनसरस पम्दनस्पशा ! मदिवसमापरणयम निवापी । मरितम्-प्रसपम् समापरणम्-झिपानुष्ठानम् मदिवसमापरणमेव माता- विशेप, त निपापयति-मपमपति निरस्पति तशील ति। गुम्बदममन्पनिमवः इति । गुये-मापार्यादेवन मुलम् तदेव मलपपर्वता, तस्माभिमतो निगता । पपनमेव सरस पम्वनं स्नहोपवृहितहितोपरगमम् वदेष क्रमम, तस्प स्पर शीवो पमापनपनसमयः । मध्ये तु सरर्स पदनमात्रमभिनयरिएमम् तम्य सर्मो धमापदारी भगति मुवयम् । मपया रसमनदनस्पच । रसो बता पमनपा सपानीपा इस्पया..॥ भय-TAR भापरमरूपी तापको र कानेपण गुरु महाराज मुखरूप मम्प पससे परनेपरचमरूपा सरस पहनकर प सही पुष्पान्छे प्राप्त पेवा है। भाराप-बस प्रकार मरस बरनको गानसे जीवको बार मिट गम्ती से गुरु म्हारा लेर पुत्र हितको सपनोंको पुनकर मम्पनोंच नदिवरूपी माप मिट गयी। गुरु मारामका उपदेश पुमकर ये मान सम्म बाचरमचे पोगर माथापित बारमाने गत है। गुरुचे पापनुकम्पा र पुम्पमारी जीफो प्राप्त होती है। ऐसा भी पाठहै। । रसभन्दनरमशः रापपचनशास्त्रमागवाम् [पञ्चमोऽस्किार, पञ्चत्रिपकिपमा एवं हितोपदेपोमानुगमता सिप्पान् मापार्यस्प प्रत्युपकारा शिप्पेन विमा' स्पार- इस प्रकार हितकारक ठपदेशकेरा विम्याच उपकार मेगडे बापाका लिप्पोमो प्रत्युपकार करना चाहिए, प्रयागते दुष्पतिकारो मातापितरो स्वामी गुरुभ लोकेऽस्मिन् । तत्र गुलरिहामुत्र च सूदुष्कतरफ्तीकार ॥७१॥ टी-समाप्पा प्रवीकरो पर इति पा दुष्प्रतीचा। मातापितरी तान् पती- भरी। माता च बातमावस्याम्पमानस्वनसीबानम्मानुषिसाम्मादिनोपकारेण चिमुक मपति, परमेवातापहारप्रदानेनोपभरक्ती मारपस्या तोपभरस्प पापपस्प पुमतीकाप। गरि स्पा प्रत्युपकारा भक्यते पतम्। पिताऽपि हितोपरसदामेन सिमापाहणेम मतपरिधान प्रावरणाविनोपप्रोन मनमानो इप्पतीपर । सामी पवारिसस्पाना बयानापराविना सो मनपपकारक। मृत्पातुन तपा प्रत्युपरसमम प्राणम्पपमहापपपिभिपमानपन्ति सामिनो सस्पास्तपापि पूर्वमहतोपकारापामेव मृत्पानामुपकारक स्रामी, मुस्पास्महतोपत्रण प्रत्युपम्ति। गुम-मापादि। स प प्रतिभा सम्मार्गोपदेशवापिलात, भासा मानात, संसारसागपेधारमावस्यात् । मासुम-मोके सर्जमवर प्रवीकारो पस्त गुणे रिति । दुर्गमका प्रतीकार इति ॥१॥ मनसोक्ने माता पिव स्वामी और गुरुप प्रत्युपकाम करना बया नि है। उसमें गुस्का प्रत्युपकार वो इस गेमें मी कापत एकर मोर परफोरमें भी पन्त कठिन है। माषाम-माता-पिताका प्रत्युपकार मा भर। माता वो के पसे ही तेकी मानित करना सूप पिकाना, मूत्र कौरा गरनीको मोना भारि पपरके RT उसका पाणपोषन करीसनको पहले उसने कमी देख मी महीपा मोर बिसवे उसका कोई उपकार मी माही कमा ८ उसे माप पिलाकर बोर बोम्पप बाहर रेर उसर उपकार करती है। बत मायके उपकारका पण पुना सावपिन मी मकारक उपदेस रेखाम्न Ruint मोबम-कायगयसे मन-पान करव। उसके उपकारका मण पुना मी कठिन है।लामी रामा बनेर माया रेप सेक्सका उपम करते हैं। सेपक रस उपकारका रामही जबसमा पाप सेकने प्राव देकर समीकी मामाको सातापि सामी पारे पाएको उपकार ने विमा हो सका हपकार करते मि सेक्स स्पीका उपकार पाकर ही ठसा उपकार करते हैउनक उपकारका पर पुषमा मी कठिन विस्त गुरु समगा उपदेश देते है सामोप भई समाते है और संसार-समुद्रसे पR मा है। उपके उपकारका गाना वो इस रम्भमें ही साप और ममम जन्म में एसप है। 14 ()मु । मालियापास-पु.।

कारिका .१२-७३] प्रशमतिप्रकरणम् सम्प्रति क्लियस्प पारम्पर्पण पयस्वपति मोमाप फल वरायमाह- वर या पतमाते कि परम्परास बिनपका फर मोक्षो विनयफल शुश्रूपा गुरुशुश्रूपाफल शुतन्नानम् । ज्ञानस्य फलं विरतिविरतिफल चावनिरोध ॥ ७२ ॥ टोध-दिनपस्प फल शुष्पा-मोतुमिष्ण। पदाचाय उपदिशति तत् सम्पर मुस्पटे. अत्ता व मनुविष्यति । गुरो सनशालाकम्प किं फसमिहापाप्यते । मत मार-गुरु सुधपापा फन मुलपानम्-'भागमयानगमः' इत्पमा । भानस्प किं फलम् । विरवि-माभव धारेम्पो मिवृधि । रिते. फळमामबदारसगनम् । पिरती सत्यामाभवशारापि स्पगितानि मनम्ति । ततधामवहारस्पगनात् सबरो बायसे। फबभूवः सहतात्मा ममति, पपूर्वकम प्रवेश निरोपः।७२। मप-मिनपका फर मुनमेको । गुरुके ममनेका छ सुनवानको प्राप्ति फा निति और विरतिका का वासबका मना-संकरो। माषाप-जापाप दो उपदश देवे उसे मळे प्रकार मुनता और मुनकर उसका पास काय यामिनका फल है। गुम्के मुससे शाब-परम करनेसे बागोका काम होता है। गुम्से मरनेका है। शासनानकेनिपर उन कार्मोच्च कमाना मे देता है जिनके करनेसे बोल बाप रोता है। यह शानका फल है। उन कामोते रित होनेपर वास AR Rोगाते है। 4 के मौके पर हो गानेसे संप होय है।बत मिसका पर अपेको पासको सवरफल तपोवलमय तपसो निर्जराफलं टम् । तस्मात् क्रियानिवृत्ति क्रियानिवृत्चेरयोगित्वम् ॥ ७३ ।। टी-संपरस्प फ सपोऽनुमान प्रातमकमभपणापम् । वपसि म तपोषग्म-तपति सम्पे शक्तिपिपा । पसरत निमयफलसर्मपरिशाटनम्। तस्मात् मापगमात् किया निरीत, संग फल निर्भयपः । क्रियानिचनिम्दयोगस्पात मयोगित्वात् ॥३॥ मम संरक फर पस्या मेको प्रतिक होना है। एका फट मिरारा गया है। सविता मोच नियनसे मति होती है और किसको मिपिसे मन पन पोर आपली प्रति सप मोग समायो। मावाप-निफका सापारण हा महापारी मारक को गपे कम नुसार विवपसे बाकी प्रारीही समसे पसलिमाटो पराका मन भर मिराको किमासे मुटका मिकतामा किरा-मिस्सेि मन पान पप गोरोप होगी। इस म एक विनयापके प योगनिरोधक रसा गाता है।

५२ रापचम्मशासमामपाम् [पञ्चमोऽधिकार, पोधिपनिया: योगनिरोधाद्भवसन्ततिक्षय सन्ततिक्षयान्मोक्ष । तस्मात् कल्याणाना सर्वप भाजन विनय ॥७४॥ टी-योगनिरोपस्प का बम्मवयमरणप्रवम्बरसमाया मरादिमवसम्तवेराव तिम सप । बम्माविसम्तविमपाच मोसावाप्तिः । ऐकान्तिकास्वस्तिकारिगुपयुक्त सास्मम्म पस्पान मोमा । तस्माद पारम्पपदारेण सर्पकस्यामाना मावनम्-मायो विनय । सर्वकल्याण म्पो मोसा। मपया गुरुभूपाविमपापं यायोमित्वं मसन्ततिपथ, सातानि कस्पापानि ऐना फा मोस इति ।। पर्व-पोनोंके स्कोसे मरकादिरूम मयोंकी परम्पराका नाश हो पाता है। मरम्परा- केनासो गानेसे मोपकी प्राप्ति होती है। बता दिनव समरूपामोंका है। माता-दिनका फल पोग निरोष ही नहीं है। पोम-निरोपसे नरक, तिर्पज मनुष्प बोर रेबाप मोकी कली माहोगाती और इस मा परम्पराके माठस बपिमरर मोपकी प्राप्ति हो पाटी। इस नियका ममान् फर है। इस गुपके कारण परम्परासे मोपतक प्राप्त हो जाता है, और पा जीव सदा के लिए सरक बनन्त जोंसे सूट बाय है। पे पुनरपिनीतास्वेपार फरविपाका पाद- बम बपिनपी मनुमोको चोकमा मोनमा परब, ससे बताते हैं विनयव्यपेसमनसो गुरुविद्वत्साघुपरिभवनशीला । त्रुटिमात्रविषयसगादजरामरखनिद्विग्ना ॥७५ ॥ टीच उसनमणो विनमः । तस्माद् म्पपेवं विगत ममो पेपी पिनबम्पपेतमनसः । गुरुपाम्-माचादिरीनाम् । विदाम्सा-मम्पेऽपि पक्षपूर्वापार । कानाविसापनायेन मोस- ममिम्मम्स सापपम्त साप पेपा परिमया-मनाबरो परनाम्पत्पामारिमविपरकरणम् वाशी सभाको पेपाम् । भूटिरमम्तपरमापुसाविम्ममाप्रपा सविकिरण प्रकाशित । पावापनादिपु भमन् एस्पतं । तम्माको विपपसास्कसने मिस्सार समादिपियेषु का साहस्तस्मादासके प्रस्पपपमागामिनमवेतपत्ता ! मयपमरविधिनाः। बरा व मरम अपम, मविषमानी बरामरौ पस्पासी मबरामरा, सवधिविना-निर्मया! मुक्ता एप भरपमा सर्वसानिर्मुक्ता, सबवामान मम्पते नम्बर प्राप्स्पामि मच मरणम्, समसक- पियमुलासमत्वात् इति ॥ ७ ॥ मर्प-यो बबिनपी है गुम्यों मिानों और सापुबोकर नार करते है और पुटिरेण के बराबर विषयोंमें भासत होकर बगममर मुकापके समान मर्म हो गाते है। मावाप-विमो मनमें लिपारस मी नही पवईबापापोंकापार्वत के पास मानो मोर सापोंका बनावर करमेमें समारसे प्राच यते ।रोरोंके दप पाने - ।

कारिका RA] प्रसमरतिप्रकरणम् । बामे सूर्य-बिरयों के प्रकाशमें जो पूरके का दिखाई पड़ते हैं, उन्हें त्रुटिरेणु करते हैं। उसके मराम मत छ रिपोंको भी पाकर ये में वासध हो जाते हैं। पर मपनको कवर-अमर मानकर बागामी संकटका मय नहीं करते। पसदेव प्रत्यवापापिपिपया स्पष्टवरममिपचे- जब उस सकटका सुगसा करते हैं केचित् सातर्दिरसातिगौरवात् साम्प्रतेक्षिण पुरुषा । मोहात्समुद्रवायसवदामिपपरा विनश्यन्ति ।। ७६ ॥ टीका केविदेवाविदितपरमार्याः । साव सुषं सदेवनीयम् । ऋदिविमा कनकरबत पमपगम्बनीसमरकतादिमणिसम्मत् गोमहिष्पवाषिकरितुरगरपारिसपत्र । रसा वित्त बटुकम्पापाम्लममुरलक्पाम्पा । एतेषु सातादिप गौरवम् माइः मुलाप सम्पदया पसरसाम्पमहापर्पधादर । मतीव मुनु गौरवम् । मतिगौरवादेतो साम्पतमेव पतमानपान मेरेमन्वे नागामिनम् । त एषविधा पुस्पाः महात् मनानात् माइकर्मोदयादा समुद्रापसवका मिपपरा बिनस्पम्ति मृतकरिफलेवापामप्रविष्टमांसास्वादनगृयकाकवत् । अलपिमम्पमध्यास्प माने पसेपरे विनिर्गस्य तेनैवापानमार्गेण सकल दिग्मणम्मवलोक्य विग्राम्तिस्पाममपश्यन् मिठीयमानम पपसि नियनमुपगतः। मामिपपपः इति रसगौरवस्यैष प्रत्पवापमा वण्यामास प्रकरणकाए । न तपा सातदिगौरखे बापत्पपाये पमा रसगारगम, मपास- अणपादिपु प्रकृति प्रापवयमन्तरेण दुस्सम्पापा । मर्य-कुछ वनिनपी मनुष्प पुस, श्रम वीर रस वसन्त बादर रमने के कारण केवल वर्तमान कामको ही देखते हैं। और मोहके वसीमृत होकर सके गेमो समुनी कोमेको माश को प्राप्त होते हैं। मापार्य-बो परमाईको नही मानते मे सांसारिक मुस सम्पति गौर इए रसव स्पद नेमें ही मन पते और सन्दकी प्रालिका प्रपाल किया करते हैं। बताये केरल तमामको ही देते मागे विचार नहीं करते। ऐसे मनुप्प मानके वसीमत होकर ए हामीके सीमें गुदामासि पुसकर मांस डानेमें मासक कोनेको मह नामको प्राप्त होवे है। जैसे एक कोमा मांस साने एक पेटमै पुस गया। बोरकी यकि कारप एपी मकर समरमें गा पाना। बेचारा कोषाहारीकी गुरासे निकलकर स्पन पानके पि एस-उपर ठका वोर कोई स्थान न पार पुनः उसी हाके पेटमें या पुसा, मोर इस व्य में पानीमें इबफर पर गया। इसी प्रकार विपय-मुले गाची मनुष्प मी ससार-समुरमें ब बाते हैं। मांसके लाइन गेमी (मामिफ- फ्य) विशेषण गानेसे प्रकारने रसनेन्द्रिपके मिपपको बासधिको वधिक दुरा बताया है।पों कि पिसा किये दिवा मब मांस बोपकी प्रति नहीं होती। परप-फर०।१-मम्परत-प..

५४ रापचनशास्त्रमाप्रपाम् [पञ्चमोऽधिकार, पत्रिपरिपत्र 1 - - ते जात्पहेतुदृष्टान्तसिदमविरुद्धमजरमभयक्रम् । सर्वस्वागरसायनमुपनीत नाभिनन्दन्ति ॥ ७७ ॥ टी- पर्ष मुखदिरसगारवप सत्तमः । बास्पादितम्सामारिकास्तम्या । उत्पति स्मितिम्पपप परस्ति । तदुस्पयतेऽअविष्ठते विनस्पति प तम्माद् उत्पनिमतान मितिमा निबाम सर्वे पाया नित्याभानिस्पाम इति सप्तमङ्गीमम्तो मवम्तिा यस्ताभारपादपः । पपा पस्मियप कापी मूतत्वेनामास्थिता कारकम पिनश, ऋजुत्तेनोपच उत्पाद स्पितिम्पपपती, तमा मात्मादपा सर्व पदापा. मात्यहमियतम सिद प्रतिष्ठितमम्पादक मविद मिति । न लस निस्पानिस्पपोषिरोपोऽस्ति प्रम्पामतया नित्पस्वमम्पपं समझीस्प पीकपाठसम्मरिपु सस्मोविधियत् मृत् इति प्रस्पप । पर्यापास्त भटम्पानामा, पपापर्नपाङ्गीकरणात तरनिस्पतम् । मिनिमित्तस्थापन सहानबस्पानमाणो विषयोऽस्ति । तस्माइपिम्पम् । सगावाग्रासापनम् समाचार बादशाहप्रवचन वा रसापनम् । पमा रसापप्पुम्पमान नी वा स्यति सपरितवनितम, तया मापनमप्युपयुम्पमान विमिना सम्पमापारि भगति बन्ममरणप्रपथ निरासश्चेति । मविपमानावरापमतदबरम्। विगतमरीत्वपमपि मरणादिकमव एवं तप मास्ति । बरामरपामावतार मगरमपारम्' पकम् । उपनीले गकिमपि मा भामिनन्दन्धि-न परिशस्तदुपपोर्ग सन्ति ॥७॥ मसामायिक ों और प्यान्टोंसे सिमोष रहित बमोर बसयम रेपचनरूपा रसायनको पाकर मी उसका बार नहीं करते है। मावर्ष-योस या उत्पम होगमरवारे बोर नए होता है। बटमपति, तिबोर ममाम्से बुख रोनेके परम समी पाई निस्प भी होते है और बनिस्प मी होते। बिस पुकार सोई घुगको फैलानेपर एक ही सम्पमें उसमें तीनों धर्म पापे जाते हैं। बाम रूपसेप असित यव यफ्नो बफेलासे व नए हीमोर साधापन पेशासे 4 उपप हो। योनि टेवासे साली करनेपर टापन वा बाबोर सीमाप है। इसी प्रकार बारमा मानिक समी पदार्थ साभानिक खमों और पातोसे सामगोमय सिर। या पारोिप रहित मी पोधि निरपवा बोर बनिपवा को रोक महाइम्पी पासे मिल पाना ही घट, कमा मेयरको को प्रा वाघ है। और पप्पानिको मामलेपान घटमाय बनिपामतः सत्यवान निमित्त मिबोर प्रतिमा मिच मिम । इसलिए दोनों धर्म एक बगह पा सकते है और दोनों कोई रोग मोम प रेखों से सब तसा निरोप रहित सर्वमगमका रूप प्रबचन रसानके सपनो। से रसाएनके सेक्नसे मीर परिर्पो मे सफेद से रमित होकर मीरोग होगा, उसी प्रकार १.बिपासाचनतिमा सम्पति-पापमपमा पम्पमा फनामानिनोमानी-प । पत्र-प । मुस-पा-परमे-फ-11-दि-फ- पायाम कारिका ७७८-७२-२ ] प्रशमरतिपहरणम् रिभिर्यक दिनममबान्के रचनोंका बाबरण करमेसे सम्म-मरणकपी प्रपत्र मा हो जाता है। इसी लिए निमगवान्के वपनको बनर-अमर और वमयकारी कशा है। उक रीतिसे वो सांसारिक मुख, अदि बोर रसमें बासक पते वे उस रसाफ्नके मिथ्नेपर मी प्रसन से उसमय सेबन नही करते हैं। एनमेवार्य राम्तेन समर्पयकि- इसी बालक समर्थनमें रगत देते हैं। यद्वत् कभित् क्षीरं मधुशर्करया सुसस्कृत उद्यम् । पित्तार्दितेन्द्रियत्वाद्वितथमतिर्मन्यते कटुकम ॥ ७८ ॥ टीका कमिन् इति पित्तमाला प्रपितपित्तमातुः । भीर गोमहिम्यादीनां समारमैन स्वाइकिं पुनमगाकरपायुतम् । मुसंस्कृतमिति सुकमित निम्पातमाजनसम्परपेष्टम् । पिचवितेन्त्रिपस्वादिति-पिवेनादितो ग्याप्तः पित्तोदपेनाइजीताम्ताकरपो वितपमति-विपरीत बुदिमम्पतेऽपगच्छति ष्टकम् इति मपुरमपि सदिति ७८ ।। मर्यत्रियों के पितसे पीषित होने के कारण परीत मुविमा कोई ममुप मधु वीर सारसे पुल उतम रीशिसे वेपार किय गये भको काम सम्पाय। सम्पत्ति शतेन पार्शस्तिकमर्ष समीपार- तको पातमें पटाते है- तमिभयमधुरमनुकम्पया सद्भिरभिहित पथ्यम् । तथ्यमवमन्यमाना रागद्वेपोदयोवृत्ताः ॥ ७९ ॥ जातिफुलरूपवललामयुदिवालम्पकशुतमदान्धा । क्लीया परन चेह च हितमप्पयं न पश्यन्ति ॥८॥ टोप-पपपि मनसा परीपोन्त्रिपमिरोपसंपावावाट्रिक तपापि निभय पपन्त पो मपुरम्-मनेकपापयागाद् रमणीयम् । मनुसम्पपा साि-मविधपमानर्गमापर रमिषितं मम्पसत्तानामनुप्राय पैम्पम् । तम्मे परमपिसबादि । तपमम्पमाना मनाधिप मामा निराकरणादला पगपोदपेनोरमा सन्छनचारिणो न हितापदेशमामिति पम्मुवमा किमाचरन्तीत्पादनावि माममयः। इसे पिमम्मयम र्प शरीराषयबसविदेशविशेफ। पापरं स्वबमवर्ग दम्पपतिा सामोपचाप्रापिसपालि युनिभर्षिया भीत्पतिस्मादि। १-३-फ .। -मुम्-प० चरिता-प...। । फरा-व-पू. - T- रापपत्रमशास्त्रमाणपाम् [पष्टोऽधिकार, ये सदस्पानानि पारम्प कस्म प्रिपपिगमस्वम् । भुतमागमा शास्रपरिक्षामम् । एतद बास्पादिताम्त महतत्वात् मदो गवसेनाम्पा । पपाम्मामधुविण्य न किविप्रमीय पश्यन्ति, तपा बास्पादिगपाएनन्या हितावितविपारपारहिवाशीया पिपपपदानमा इमादप्ता सम्मामपरि तोपादित परमोकरिव म पश्यस्तिनापति पेति। ८० मर्म-से ही परिमाममें मपुर वोर गमाविकके मा दया पुरिसे कोनो किरक सपको निरादर करनेवाले, पग बोर के उससे सदचारी होता है। माति, कुम, रूप माम मुरि, मेकधियता मोर साMPRE मइसे करे ए लिफ्र- सपी मनुप्प इस मेक और परगेको विवकारक बस्तुको भी नहीं देते है। माषाम-पपपि गणर पोयने मम्पनीयोंक कम्पागके लिए जो सत्पऔर रिवकारक उपदेश दिया है, यह बसप परोपा और इवो रोकने कोबके कारण प्ररममें उप देनेगा। गा, किस्त बम्पमें उसका फस मला ही होता है। परन्तु उदवारी मनुष्प उसकी वोर पान महाया बिस प्रकार बाये मनुष्प देखने योग्य बस्तु भी नहीं दे सकता है से ही नी करके मइसे बन्धे पर पिप-सपी मनुष्य मी मित बोर वरिवका विचार नहीं करते है। सखारे परिममता सत्त्वाना सार्मोदयात् साचित बाह्मणवाति, भाषिबाणा बाति, माचित् ममियादिबातफ, न निस्पन बातिमपति इति एसयभार- ससारमें भ्रमण करते पाए जीयोको अपने अपने कर्म के ठपसे कमी पापम पानि, कमी पाण्डाकी गाति मोर कमी क्षत्रिय पोराको जाति होती गाति सारामही पी। पही ज्ञात्वा भवपरिवर्ते जातीनां कोटिशतसहस्रेषु । हीनोत्तममध्यत्व को जातिमदं युष कुर्यात् ॥ ८१॥ टीका-मयो नारकरिबम्म, तम्म परिपता परिभ्रमणम्-नारका भूत्वा तिपम्पोनी मनुप्पबाती पाबापते मर्मसात् भय पैवविक्षिणपोम्बिवणाताहत्तपते । वा पनि पाला सस्पाने पारावासुप्रविमेदा पाए । एषमसेगोवायुबलस्पसीमामपि पारस्पय योलपस्तापल्स्पेव गाविसतसामणि । तपा देवानामपीति । मतपय गुरमीतिबानिसमा संसारा । स पोत्पचमानो हीनोत्तममम्यमे मसेपु बम्म मते । एविषमसमबसं पा संसार मपगम्प हाताप्रे माम पिताम् नातिमामासम्मेत् ॥ ८ ॥ भप-संसममें परिभमन करते हुए मा करोड़ों गतियोंमें बम्प उत्तम और मप्पमपये को जानकारी बुद्धिमान् बालिका मर करना ।

१७
रिका ८१८२-२१
प्रशमविपकरणम्
मापाय-यह जीव नारकी होकर सिर्पयोमि भवा मनुम्पमोनिमें जन्म मेता है। पुनः
एकन्निप, दोइन्द्रिय, बन्द्रिय पौन्द्रिय बौर पधेन्द्रिम मातिम उत्पम होता है। उसमें भी एकेन्द्रियोंमें
पपिपीकापक धरा, बासुका पौरह एक्से मेद है। इसी प्रकार पड बनि, माप और बनस्पतिकी
भी मिखनी योगियों है, उतनी ही गर नातियाँ हैं। देवाति मी ऐसा ही धाममा पाहिए । इसी
लिए ससारको चौरासी गड योनियोगाना कहा गया है। उस संसारमें उत्पम मा बीब बपम्प, मप्यम
पौर उत्तम कुळमें बम भेट है। ससारकी इस सिमनाको जानकर कौन विरान् पातिक मद कर
सकता है।
एतदेव स्फटतरमाप-
इसी बातको भोर मी सतासे करते है
नैकान् जातिविशेपानिन्द्रियनिर्वृत्तिपूर्वकान् सत्त्वाः ।
कर्मवशाद् गच्छन्त्यत्र कस्य का शाश्वता जाति ॥ ८२ ॥
टीका-बातिविशेपानमेकसंस्पान् इम्पिनि तिषकान् इम्पिनियत्तिा पूर्ण कारण
पो वाविपिसेपाषाम् । एकसिविम्बिये सपनारपे निरचे एकन्द्रिपनातिः । सर्भनरसमतो
दीन्द्रियवाति । स्पर्शमरसमबाणनिती प्रीम्बियबातिः । स्पशनरसनमाणपभुमिहती व
परिन्त्रिपमातिः । स्पशनरसमप्रापयामोमनिती पस्क्रिपयावि।सामशाद गान्ति,
मम कस्म का शाबता बाप्तिः। तमाम युक्त बाविमदः ।। ८२ ।
मप-कर्मके से प्राणी इन्द्रियों की रचनासे होनेवाण बनेक गलियम पम्म व्य
है। यहाँ कसको कैन नान सामी !
भाषायाति मेदाच कारण इन्द्रियों को रचना है। एक स्पर्शन इतिपके होनेपर एके-
निप गाति । स्पर्शन मोर रसनाके होनेपर दोदिय बात होती है। स्पर्धन रसना और मान-
केरोनेपर त्रिप पाति होती है। सर्शन रसना प्राण मौर चभुक होनेपर चन्द्रिय गाति
है। स्पर्मन रसना, घाग पा और भोके होनेपर पवेन्द्रिय गति होती है। इन गादियोंमें पीर
अपने अपने कर्म अनुसार जन्म देता है। किसीको ई गाति हमेश्य नही पी। बता
बातिका मह करमा टीकम।
उमदम्पुवासाममा-
कम कुम्के मदको दूर करनेके लिए उपदेश है-
रूपवलश्रुतिमतिशीलविभवपरिवर्जिस्तिथा दृष्ट्वा ।
विपुलफुलोत्पनानपि ननु कुलमान परित्याज्य ॥ ८३ ॥

पपपयनशास्त्रमागपाम् [पठोऽस्किार, ये महत्वानानि टी-पिम्पया इमम् । तप विस्तीम गेमपातम् । वम पोसको स्पपरिपीपक पुस्पोपोपिदा विरूपा पस्पाण्यापारबामनावमा परशारीरम् तेन पपिीमा सघस्प परिस्तः । भूतेन पपिीनोऽरमम्तम्मा निरुये मावषामपि गानावि । मतिथिसापि हितावितप्राप्ति पचिारममा नास्तीस्पेठया पपिीपा । शीत सदाचारसा पतपरबारामृतमाषणवसरत निष्टरवादिपरिस्पारसमणम् । विमको पनपाम्पकनकरबताविसम्पत् । बिपुरेपुपूत्तमामपि बीमाम् विरूपाविकानोफ्यान्नु नियमेनेषनमानो गय पणिवम्पा गारवधामापादेवा। मर्प-कोक-प्रसिस कुक तापम ए मनुप्पों को पी रूप ७ साबमान मुलि साधार और सम्पपिसे धूम्य देखकर मुखमा मनिष ही भेषनेक पोप है। भाषाप-का भारी कुम्मे उन्म नेपर मी श्री वा पुरुप यदि फुलपाया, मर्यक रामा पन्त बामदेव बोर बहिवका विचार करनेको बुद्धि न ई शुमारी, परसोगामी ( पर पुरमगामी), बसस्पबारी मोर पोर पुमा, पास धन-पम्प सम्पदा माई तो समी उसका मिस्कार करते है। बता कुम्का मद निषमसे नही करना चाहिए । स्मोकि उसमें गफ बिए कोई तान महा। मपि - और मी- यस्याशुद शील प्रयोजनं तस्य किं कुलमदेन । स्वगुणाभ्यलक्तस्य हि किं शीलवतः कुलमदेन ॥८॥ टी-मीवमेव पस्पोपातमसमापारापुमनात तर स्पाम्प एष ममदाप्रपोजना मापात् । अये तु शी मरतु माम गर्न, मशीयस्प हि गर्यो पीपीसमेव सरदपति । सगुमा स्पकर बुधिषिमवावयो यस्प सन्त्रि सा तरेगाव मता भीमवोऽपि न किंचित - मन । इति परिफर समय पति पणिाou मप-विस सीड इपित है, उसका फाके मद करनसे क्या प्रपोजन है। और गो खम्बान पपने गुपोंसे हो भूपित है। उसे मी मुबमा मर करनेसे पा प्रपोग्न है। भाषाप-मौके पर होमेपर गर्व कामा मेरमा मनुप्पकर गई वो इसी ताको माता रितो रुप र श्व, बुद्धि, सम्पति पोहसे भूपित होते ए धीमान् से मी कुना मद करना शोभा नहीं देता स्पोकि उसके गुम मरकानेक मि पास है। उसे एका मद करनेसे क्या गम । पदोऽपि मर्य बतिपक्षपति- रूपका मी ममममा चाहिए, यह गते है भारतमा-401 मा गम्ममाम-का-मु.1 फवाम एक-- - - कारिका (1-1-१] प्रशमरतिपकरणम् क शुक्रशोणितसमुद्भवस्य सतत चयापचयिकस्य । रोगजरापाश्रयिणो मदावकाशोऽस्ति रूपस्य ॥८५॥ टीका-शुक्र पिमा निसएं पीपम् । शोणित मातुर्पोमा स्फुटितस्फोटपभुतम् । एत- स्माइयात समुद्रवस्प शरीरस्य । विम्दोरापानात्ममृति फवाईमासपेक्ष्यापाकारपोपपप गमन् गर्मः शिरोग्रीवायाहूरोस्पोवराविमावेन वरते, रसारिण्या पवनम्पम्पपरतापार रसोपयोगात् सम्पूमानपयो नरमे मासि दशमे वा मातुरदयधिगच्छति । ततोऽपि स्तमभीर पातमम्पयत् कुमारयीपनमध्यमस्पविरावस्यामि शरीरं चयापचययुक्तम् । पप्पेप्टाहारपरि गतेस्पचपो दिए मपम्पानियाभपानोपयोगापचयो हानिः । तो चयापचयी यस्प तबमाप पपिकम् । निरुबस्प का उपपया, माम्पादिमिरपचया । रोगो म्पपासारकासपासादयः । गरा पूर्वावस्पात्यागेनोत्तयणस्पायस्कन्दमं पावत्यन्तस्पविरापस्येति । पेगमरपोरपामपि स्पान पापरकमाभया । पर्वई मुकाविसपकनिम्पने ते को मरवकाश कि गर्मी रूपस्पेति ॥५॥ मप–पहरूप और से उत्पन होगरे । सदैव पटना-बदल सवारोग और बराका पर है। उसमें मद मेकामा स्थान है। मावाय-पिताके वीर्य और माताके रबस शरीर बनता है। शुक्रापानसे और कम बबुर माँसपेशी बगेर वाकार परम करता या गर्म सिप गर्दन म, छाठी उदर पोय रूपसे पता ६ वीर माताके द्वारा गाये गये भोजनके रससे बा ठपाल रेबन पानेपर मोरे बममा दसमें माइमें माताके उदरसे बाहर बाग है। उसके बाद मी माताके स्तनोंका म पीकर कुमार, यौवन प्रौर और पर सस्पाको पारण करता र हामि और रिसे मुक्त है। पम्प बोर मचकर भोजनके मिनेसे पुन अपप्प तवा वाषित मोबमके मिन्नेपर दुर्वक ऐ गायब मीरोग दशामें पुए होता है और पदामि वगैरह होनेसे दुग हो नाता है।म्म बटोसार, पासी, स्पस पोय रोगोंघ वा मुसापेका पर है। पसे घरममें कौन ऐसी बात है, मिससे इसके रूपका गर्न किया जाता नित्य परिशीलनीये त्वरमांसाच्छादिते कलपपूर्णे । निभयविनाशधर्मिणि रूपे मदकारण किं स्यात् ।। ८६ ।। टी-निस्ममिति सर्वदा, परिशीलनीय संस्कृतम्पम् । पस्मामरमिा 'भावोदार सरैवान्तर्गत मळ पिकासिंपामनिछप्तमालास्तोम्मपुरीपापुदमति धर्मारकम् । सपनपन -दीपम्-१ ।२-रुमेहामुक्म मु ! १-6- Iात पार पैगमन के ५ । ५-रपतसम्ममा-फ। -पस्म-प । पात प-प । पारमधन-प। -गोप । १-दिप । ११-ए ए-फ, ।१५-भोगाफ। , रापपनशासमानापाम् [पयेऽधिकार, परी हस्सानानि समाजमादि पतिमपमपमापति मनिषिपणो रूपवान् । सपा पमणामकारता मसिन पाठादित स्थगिते । सर्प मूमपूर्वपरपिरमेवोमनास्पिस्नायुप्रति तेम पूर्ण म्माप्त । विनामपर्मो यस्पास्ति सदिनाभमि । निमपेनमवायचपा भम्पोववनस्मानानुरेपनप्रति विशियमपानमतिमपि बिनस्पति पपम्ने सम्पादिपु पा भस्मेपपिपा पुचमास्मि परमा वा भवति । एवाप प पे कि पुनभवेत् मरभरण पन मापम्ति निधिका रूपमाया मप-पह मिली सस्कार करने पोग्म है। धर्म और मौससे का मामसे या और नियासे मर होनेवालो। ऐसे रूप ममप स्पा करम है। भावार्प-गरमें मो मार है। उनसे सदा रीर, नाक, थका, र्म मूड, विठा, पसेप योग माया कर। रूपवान् रानी ममुप्प हरसमय उसकी समय का पाल रखो। बोर व मौससे पारामा। किन्तु उसके कदर मह विठा, सून, वर्ग, मग्गा, सी, से बनेट मदीपा मसाल बटना, नाम पर मसान-पानसे इसका गम पाम करनेपर मो यह प्राय नए होता है। क्वमें पापा तो कीमोंकार बन जाबीन राबकार कन बावा , माही और चमदा मात्र या । एसे रूपमें मर करनेकर पा कारन है! जिससे मासमा रूपमा ठसका मद करते है। बमा मरमही करना चाहिए पलसमुदितोऽपि यस्मामर क्षणेन विवलत्वमुपयाति । बलहीनोऽपि च क्लवान् संस्कारवशात् पुनर्भवति ॥ ८७॥ टीका पोल गारिप समृद्धिका सम्पनों' परवानपि परमात् सपेन-सम्पनर कान मतितीवर विभिनवना सन् विगतमगे मयति । मम्मीनोऽपि दुर्पर सबपि पविमान पातरसा म्पसारसंस्कारमगावाशेव मटसम्पची भपति बापते। संस्कारो पातमा कर्मविपाक, स्वधात् पीम्तिरापसयोपणमपिपान् स्पः ॥ ७॥ मर्ष-परमान् मनुष्य मी पपमा ममीन बार वो ममीन मी पुहिकर मोजम करके सेवनसे अपना पर्मान्जापफर्मक पपोपशमसे भान् हो पाता। मापार्ष मनुष्पको चपनो का मौ सानही करना चाहिए । पोंकि पार विसका मनुप्प मर्य करता को स्पापी बरत नहीं है।बसे मज मसान् मी प्रबह रोग मारिके ममय- सेवनमरमें समान रेशा बाबी और महान पमुष्प मार्मास्वापके पपोपचम और माद सामोसे पारवा बावरा मीरनेकी मस्त मही। १-रोकेर। --फब। साहरा- । -म्-फ।५-दोनपे - ( 1 कारिफा ८७८८] प्रशमरतिप्रकरणम् तस्मादनियतभाव वलस्य सम्यग्विभाब्य बुदिवलात् । मृत्युवले चौऽवलता मद न कुर्याउलेनापि ।। ८८ ।। टीका-मनियतो माफ सप्ता यस्य कदापिपति फवाधिम मपति' प्रति बसम् उत्तम म्पायेम इति सम्यग षिमाम्य विधाय पयावत् । कर्य पुमरमामो बसस्प !' इत्यार- बुदिगम्यमेतत् इति प्रतिपादपति । मृत्युपले पोपतिष्ठमाने म परीरबल म स्खननबले न प्रापपर्स क्रमते प्रतिक्रियाम् । मतो मदन यात् सम्पग्विमाश्वित्ताइसमो पठेनापि ।।८८] मय-- मुखिकी शळिके शराबम्की वस्थिरताको मनमाति मानकर का मौवके सामने सारिक बळकी निम्बाको देखकर बठका मद नहीं करना चाहिए। मावाप- सर्वदा नही बना रहता, पह बावरेकको पुछिमें समा सकटी हावीर मौत सामने बामेपर को समी बस मेघर होगते हैं। वह बछर मद नहीं करना चाहिए । गमका मद नहीं करना चाहिए उदयोपशमनिमित्तो लाभालाभावनित्यको मत्वा । नालामे वेलव्य न च लामे विस्मयः कार्य ॥ ८९॥ टीकामाम्तापक्मणा मयोपसमात्रामो मति मकपानवसपाप्रमतिमप पीठफसका।। सामान्तपयकर्मोदयाय न समते प्रिनिदपि। मतो मास्ति निस्पो मामा, नाप्पामा निस्पानिस्पो चकामारामौ विशाप माटामे पैलम्प पीनवा चपा नातिगमे सति विस्मयो गया कापः । यदिम्पते ततो समसापन शरीरमाप दराविश्वमालर्सामाचारी समाचरणसमय मविप्यति । न पेलम्प तपाप्पबीमतसा सामोनिगरामा मरिष्यति । फर्मोवयमयोगमबनिता सतपमावो न स्क्तो पामारामत्सम प्रति मप-गमावरम्पर्म के षयोपशमसे गम होता है पर गमात्तापकर्मके उदयसे एक भी गम न हो। मम मी निल नही मोर बमम मी मिल्प महा। ऐसा गानकर बगममें दीमा नहीं करनी चाहिए और गम होनेपर गर्म नहीं करना चाहिए। मावार्य-परि साधुको बाहाररिकका गम भा हो पपर्म सामनके भापारमत पर वगैरान पान करता है और परि गम नामा तो मी दोनता एपित विचमारे सापुके कोकी भरा होती। जम बोर बगमको कर्मक पयोपञ्चम बौर ठरपका पर मानकर दोनोम सम- भाष सना चाहिए। १-पार-प...। २-योग-प ..। -प्रति- प्रीिय । --4.1 ५-नाम ।

। रायचन्द्रनणासमाप्रपाम् [पष्ठोऽधिकार, वो मदस्वामान परशक्त्यभिप्रसादात्मकेन किचिदुपभोगयोग्येन । विपुलेनापि यतिवृपा लामेन मर्द न गच्छन्ति ॥ ९०॥ टी-परोपाता ग्रहस्पादित वस्पानाम्तफ्यमयोपशमीनता शक्ति, सयप नुरूप पदाति । ममिप्रसादात्मनेति-पपमिप्रसभं चेतो भवति सापु प्रति, मुक्तिसाधर्म मातोऽयं तपस्सी मिसन समारम्मादिफ पामभूतोऽस्म पर्व बाफ भवति । पर्ष गमा परपसापारमक । सबमपि तपशादि विधियोपमोगान्तरे साधपति म पुनराबीविताबस्तृप्ति पपेति । एष पसादरपि मनित्पत्वात् विधिपमोगयोग्यत्वम् । एपपिपेन गमेन पविपा पधिप्रशानभूता रिपुन पिस्तीन पाना न मनागपि मामुदान्ति । ९० ॥ मर्प-ताकी कि मोर प्रसमय के अनुरूप प्राप्त हुए - उपमोनके पोग्य को मारी गमसे मी मुनीसको मद मोता है। मावाप-दानाम्तापके धपोपभमसे दाता रान देनेकी शधि प्रकट होती है। रावा अपनी ससी सति बनुसार राम देवा।।तका परि दावा बिच साधुके प्रति प्रमोद कपा माऽ मुहिकी साबना मा मातपत्ती वारम्म बोर परिपासे रमित मात्र है इसे दान रमेसे बगा पुष्प होना, ये दावा ठस अपनी सक्केि बनुसार रान देखी।बट गम रस्साको सति बोर असमयपर मौ निर्भर है। सपा रानमें प्रम्स एवम कौन सही सपके लिए सौरफी पस करवट ऐसे जमसे, मामा भारी रो, भेष्ठ मुनि कमी मरको प्राप्त महा। पुरिका मद करना पोम्प नहीं। प्रइणोद्राइणनवकृतिविधारणायावधारणाधेषु । चुधाविधिविकल्पेष्वनन्तपर्यायवृद्धेषु ॥ ९॥ पूर्वपुरुपसिंहाना विज्ञानातिशयसागरानन्त्यम् । थुत्वा साम्पतपुरुपा कयं स्ववुधा मद पान्ति ।। ९२ ।। टोका भषसूपापपोप्रापसममा सुदि पहीत सूममयों का नामा-मम्पस्मै प्रतिपाईं मादिविपेन । नवकृतिपिति-नवम्-मभिन सममा प्रहरपाम्योपनिबन्धनादि करोति । रिकारमा नाम सम्मेषु मास्मभ्मबम्पमोसारिपु मुफ्स्पनुसारिणी जिप्रासा । भाषा जपाप्यायाविरुषमापिनिगवस्प शमापस्प सफ्लेव ग्राम विनिया। परमायपु पति मावि १-योरो-प । -सोप-प |हिमापक ब-दिन-५-सम्म क । - वाय-- । -यम-प कर मु । ८-करराषमाणा- Fगम पास गरेर मा न विचारपारिपबाम-गर।

परिका ९०९१-२२-२५] प्रशमरविप्रकरणम् ११ बमा पारणा परिप्रमते । पुदेणानि मुश्पाप्रतिप्रमाणादीनि रोपा पिपि-विधाम आगमन प्रतिपादनम् तस्य विमेरिकपास्तेप। रिपत्सु ! ममन्तः पयायानेषु । मपोपकाममा दिविसाः परस्सरममम्तै पपायैकदा मसैपयापसर्वत्रम्पविषयत्ता मतिमुतयो, समस्त पिनम्पनिमग्नत्वाचावयः तदनम्तमागविरूपित्रम्यनिबम्पनपाच मनःपर्यायो । इस्पेय नदपपिमिरिकल्पेषु मनन्तपयापायेप साप्सु ॥११॥ पूषपुरुपा गमपरप्रसूतय मतुर्दशपूर्वपराइयो मायादशाङ्गादिवसानाः । सिंहा इस सिंहापसिंहाः शौर्यगोपमानम् । परीपापायेत्रियऊरशनिदनमात् पूर्वपुरुपसिंहा। निशा नाविपो विज्ञानप्रकमा स एष सागरा समुद्रो बिस्तीमत्वात् । मनम्तस्प भाव मानन्स बास्सम् इस्पर्पः । सपोपशमजमानस्य प्रकोपकपणत्पादनम्ता विज्ञानातिशयसागरा पार रस्पयः । ममवा पाते सर्वश्रुतग्रम्पे बैफियतेमोठेश्याघ्रशगमनसभिप्रमोमादयोऽतिशया मामकारा त एव सागराः एकस्मापतिशयस्य दुरवगादत्तात् । तदेतत् पूर्वपुरूपसिंहाना मला साम्पतपुरुषा कुमाशवर्तिनः कप केन प्रकारेण सत्सया सपिपमया मापन्तीति ॥ १२ ॥ मप-पान, उरण, ममीन रचना करना, विचारमा या वर्षको बापारण करमा बनेय और बुद्धि के वनोंका वागममें दो विमान है, उसके भगन्त पर्यायोंकी परिको भए हुए मेरो पूर्व महापुरुप सागरके समान महान् जानकी मनम्वताको सुनकर भाव कळके पुस्प अपनी मुहका गर्न कसे करते हैं। मावाप-अपूर्व सूत्रों मोर उनके वर्षको ग्राम करनेमें, दूसरों को समझानेमें, नवीन प्रकरण वगैरह में, सम्म पापोका विचार करनेमें भाचार्य कोराके मुखसे निकले हुए बध एक बार ही बधारण करने पगैरहमें हमारे मर रख प । तया शा@में बुद्धिके मनेकी रम्य' वगैरह जोबा माये है उनके मेद मन्धिान भादि नो पात्पर, मन व पर्यायोंकी पारिको लिए ए है। पोंकि मति मोर भुत सब दोको विपप रते हैं। बपि समत रूपी दम्पको जानता र मन पम्प उसके बनम्तो माग कसी इम्पको बाना। इस प्रकार परस्परमें अनन्त पापोंकी परिको किए हुए गोपिके भेद है, वे मी हमारे मन चोदा क पाठीस मेलापारवा बाप संगमें पाये जात थे । इस प्रकार उनका माल सागरके समान गोर मोर बाम्त पा । उनके इस पानातिश्पको पुनका मास्को मुन जुम्दिवार मनुष्योंको बम हानका ग नही करना पारिए। म.सीके प्रिय होने मद मी नही करना चाहिए द्रमकरिव चाटुकर्मकमुपकारनिमिचक परजनस्य । कवा यद्वाल्लभ्यकमवाप्यते को मदस्तेन ॥ १३॥ १-पार्म-क। -पर-प । -पर-4 1-मदिर प -1 प -नानाना-मु । --प। -प-प्रानुब-प | प्रातल-प.।

रामचनमानमालावाम् [षष्ठोऽभिकार, बहो महत्पानानि
टीका-रिष पादुशमन समानार्थ पटुसम्बोऽपि पिफ्ते । पामवनाश उम्परा
प्रत्ययो मयति । पटकमेव बर्मकम्। मनुवृत्तिः वायोबनानुष्ठानं तापपासा पिएपरि
पानम् इस्पे इर्माणो बोकस्म परमो मवति । माचार्यादीनामामोदितमम्पुस्पामावि द्विपमाष
बटुकर्म म पोपमापति । उपकारो निमित्तं यस्य दुर्मम तदुपारनिमित्तकम्। उपकारोऽनेन
पार मम हत परिप्पते पात मटुकर्म करोति। परबनस्प इति गाविसपनम् । तबटुकर्म
सत्वा यवपाप्यते पापको महस्तेनेति-पारोमाविवापिना पुरा स्विस्वा भवम्पुस-
पापनाविलोपकारस्प यदायम्पकमयामोवि कि वन विपमिति ॥९॥
मर्प-उपकारके निमित दीन ममुर्पो समान दूसरे गेमोंको चापसी करके वो समय
प्रेम प्राप्त किया जाता है उसका क्या मर'
मावालसने मेरा उपकार किया , बपना बागे फोगा पह सोचकर मनुष्प मिचाR
पोको सब सोको वापसी करता है। उसके पीछे-पीछे गा एता उसका काम करता,
उसकी बनाई करता है, और उसे बैठनेको बामन देता है। जिस प्रश्वर कुता रोटीका दुवा हाम्ने
पाक बागे समाहोकर अपने काम वीर शहिगता है। इस तरह के कर्मोसे दूसरोंका को प्रेम प्राप्त
होता, उसमें कोई बचरन महा।ब उसका मर करना बेकार है।
गर्व परप्रसादात्मकेन वालम्यकेन य कुर्यात् ।
तयलम्यकविगमे शोकसमुदय परामशति ॥ ९४ ॥
टीका-ई-ममिमान पबनावमोशम् इति परप्रसादेन अमिता । पपे हि
पटुकर्मकारिणः परितया कथित् प्रसार करोति बसाचपानादिकम् । तापमान व गर्षियो
भवति। तपटुर्मकारिणं गचम्पपिगमे विगते सामने वेपत्ते मासे, शोकसमुवया पर
पति पति-पपानुरक्षितोऽयमेकपद पर निमाहो बासा । पापम्ति घटुर्माणिस्तानि तावन्त
पर शोका सोकसमुदपस्तेन स्पृश्यते । गोभीपचपीनविरोपा ॥ १४ ॥
मर्पयूसरों के बमुमासे प्रामपए प्रेमका को मनुप्प गर्म करता है, उस प्रेमफे पर हो
मानेपर उसे बसा मी रजवाद।
भावाय-बापसी करनेवासे प्रसन्न होट से मनुष्प ठसपा बनुमा करते हैं उसे
बम-ब देते है। उसने होसे पर गई पता है कि में बातसे मनुप्पोको प्रय| मब प्रेमका
स्थान पान उसने शिवनी हो सुक्षा कमी, उखमा उसे रंग भी उठाना परता।
कानी सुसामद करनेपर मी अमुक मनुष्य एकदम ही दुश्मन बन गया।
भूका मामही करना पारिए
मापतुपोपारव्यानं श्रुतपर्यायप्ररूपर्णा चैव ।
श्रुत्वाति विस्मयकर विफरणं स्थूलभद्रमुनेः ॥ ९५॥

कारिका ९५९५९६ ] परामरतिषफरणम् - सम्पकाँधमसुलम चरणकरणसाधक तन्नानम् । लम्वा सर्वमदहर तेनेव मद कथ कार्य ॥ ९६ ॥ टीकासस्पेनापि सुवेम मापतो हीतेन परमतिनाऽपि निवाण साम्पते । मसमर्पो बहुमागममप्पे करमासात् मेपाचारणारियाद । तस्पषिपस्प गुरमिरमुकम्प पवयमपितम् मा सस मा तूस इति रागदेपनिप्रागमम् । संस्प तद् मोपपता करण मैफल्याइम्पया स्पिरीभूतम् मापतुप अति । भूयते च सस्प निर्माणापातिः । सस्म पातिं मपाऽपम परिज्ञायते इति मिप्कारणो गयः । तपपापप्रकपणा पम्-भु मागमः, तस्प पयापा मेदा'--कृमिकापम्पास्याकारी, कमियपश्यमापी सपाऽप मायाम्पायी एकस्पर समस्येति भूतपयायधाकरप। मतिविस्मयकरम विकरम कि सिंहस्पनिमाण स्मूखमद्रमाजामिमापिकाणा पचनाप भागमामियोगपनि मिषिकर भुवसम्पदापपिच्छे । तस्य श्रुत्मा को नामविकापापास्पाऽपि अतमद उपाद । ९५ मागम बहमुतैराचापाविमिः सह सम्पक-संसगा, उपम-उत्साहोऽम्पेतम्पाय प। सम्पॉपमाम्पा सुगमम्-प्रमापासेन प्राप्पम् । परणं ममगुणा, करणमुत्तरगुणा ते सापडम् निप्पावपम् । भूतधान सम्बा-समासाप, सर्वेपी बास्पादिमदानामपमपनका मूपस्तेनैव कप मदमारपीत मात्मनि ! मह विपापहारि ध्युम्पमानमगद पिपर्ण करोतीति। ९॥ मर्प मापतुप मुनिके कपानकको मुनकर, भुखानके मेदोंकी प्ररुपमाको मुमत स्पृामद मुनिक सत्परत वाधनक पियाको उनकर कौन मनुष्प अनका मर करेगा पाहत बाचार्योंके ससर्गसे और अपने ठासारसे बमापास प्राप्त होनेगा, मुगुम 4 उत्तगुणों के साक सपा सब मदोको हरमेवाळे सामानको प्राप्त करके उसका मद को यासक्या मागाय-मानक माप किस हुए पोडेसे मी अनसे समबुद्धि मनुम्पको भी मिन प्रा हो सका है। मापतुप मुनि बरबुधि दोनक कारण गाव बागे पड़ने बसमर्प । उनपर र करके गुरु महाराग्ने उमें दो पर सिमग दिये-'मा रुस और माम' भात् प. मन को और दूप मत करो। उन पदोकर समारण करते करते उमें मापतुष पार रगपा इतने मासेही निमकी प्राति मुनी बाटो हैमैंने त पड़ा और में बपको सा मामता ऐसा गई करना निसार । बागमभान गवस भेद है। को एक वर्षकी प्यासा करता है और कोई दो वर्षध म्पासा करता है। कोई इस एकर सूर बनेक बर प्रायो। २-रवा-प।-आमिका-प. | ४-प्रेरापमानवा-फार । ताए-फ..।

- उपपद्रनसानमामपाम् [पोऽवकार, मो मास्वाना तवा अचान हो समी मदोंको दूर करनेवाग। बानो पार मद करमे गमा कातक उपिati Aयको र परम दी गई बोपनि परेमाटी नही। स्पष्ण मार्पिको RARE भुवाम्पाससे विधिया अधि प्राई और उसके गम भाकर उमोने पर्समा बाई बापिकामोको मपमीतकर -सम्प्रापका वियर किया। 'बट कम म्पजिहोगा गे इस घटनाको पुनकर सत्र मद को। एतेषु मदस्यानेषु निमये न च गुणास्ति कमिदपि । केवलमुन्माद स्वरदयस्य संसारवृदिन ॥ ९७ ॥ १ पासपुषमै एस दुर मार-ब श्रीमानास बम माणुस्वामी पूभुक्की पायाने र मार रोपे सर पर एमोर्य पूर्म ने पार, मी रममें और मारपर बावाम पारे । ५ पानीवार्थ एवं मरे परिवारका मागहुरे ARR) भवन निमिव गरे । परन्तु वामावसकर मनुस्मोनो बाम गये मातम पसरलेनमें ससूनमः । य पये और ग्गा सप्तासमपन से हुए योगा र सलिए । एक स्मन एकाम्मे म्म्प पूर्वका मगर रामपर ना परिने भातापोरग मर रमोने परम्मकोन रेकर मगाम्लाले सम्पबमें प्रम। मापाने में मका प्रिय क्या रिसा। गापि सूबमारे रमना प णमोने अपर्म भु-पकिन परिचर कपने पीने बियप भारत माता । वापि र गई और पालामा निराकरले पी-4-KARI परम्भा ०८ : Act मापने क्या सम्माबि का बना है। अपि पुकारबमापन वा । दो बार नया माप पार पापमा परे। समय पर पुर, व इभेषम बी एम्मा एप मुखमनमा सनम रेबार बार मीर बाबर । पपना रेमे नमार मापा गम्भारकलेमे-"बा! पेम्पोरर बामपौळन। गमरने भोर पर अपने माना किए बाब ममुर-पिनाकी परम्परापरे मे-धमनो रिलियब रमापमा पारेममुपोष मानNो प्रदिप पाय भास समता भी यसबाहोशय स्वाय र म प्रचार कायम मरे सुबमा पनि बामए अत्याबरको । मया बावे ऐप भरपूसाय REOया पाल समाप्रेस प्रेमप्रेमाने भाग। (RR सूरमा शानिमा म नगरीमामा। लो गर-मित्र पर मोर महामनन .

कारिका ९.२८] प्रशमतिपहरणम् टीका-मास्पादिप्परसु मइस्पाभेपु एतेषु निधये परमापपिपारमायां पयबसाने पा म खत कमि गुणो रश्यते परिक मामुप्मिको बा । यदि माम वातिर्विसिष्टा ततः किस्पात् । होना चेततोऽपि किम् । पठमुम्मावः स्पापस्प-पदि परमुन्माद उम्मत्तता प्रापिएस्पेय पकिचन प्रमपित्व ससारपस्पेति । स्ववित्तपरिपोमादेतानि मबस्मामानि ममन्ति । स प पपपरिणामो बहितिन्पा माझायपेष्टयाऽगम्पते। सतम संसारदिः-अग्मबरामरण- प्रबन्ध ससाय तस्य दिपीपीकरपमिति ।। ९७ : मर्प-पस्तवमें इन मदोंके करनमें कोई भी गम महो।पर के अपने एसका उन्मार हैमोर उससे संसारको पनि दी। मावाय-स प्रकार शान, पूना, कर, वाति, मक, ऋतिप और शरीर-इनमेंसे एक मी एसीपस्तु महोरिसके मदसे मनुष्पका कुछ मप गम हो। इनके मदमें मनुष्प देख उम्मत बना पतारमात्म-सरूपको मुहार मनात ससारका पर फिसा सवा है। इसम्मि गई किसी प्रकारका मी बामौर मेपस्कर माही। जात्यादिमदोन्मत्त पिशाचवद् भवति दुःखित ह । जात्यादिहीनतां परभवे च नि संशय लमते ॥ ९८ ॥ टीका बास्पादिनाप्रपरेप मदेनोम्मतो परकमसमपिसोपा म्पाली सुतान्तःकरणपुस्पात् पिशाचपदा मपति कुचितमा । धिप्रविपिधारक बनातीर्ण देशमुत्सम्य समुद्रमध्यपतिनं दीपमनुप्रविण । तम को मणिर दिमित्रपोत प्रपमवर गत । तम पाटा प्रवाः । बसपानात् प्रेरणात् गुमाकानीप गुप्मुनेन विसशनि । पुरी- परिणामान्तराणि तानि तपाध्यमेक्स स पोतपिसावकमत्ताय स्वानि । यसपास्ते प्रति. विवसम् । एमालास्तरेण हिण्डमामो बपिछ । सतमोदिमस्तस्मादपि स्पा घिर्गतोऽम्य दीपं गतः । तपापि वनगुन्याविपितानि फरानि मुक्ताम् । एवं यम पम पाति तम वा कुन मान् । पपविषय परमवेऽपि दीनबास्पादिस्नोत्तपते इति म युक्तो बातिमयः ॥ ८ ॥ मप-वाति पोरके मासे सम्मत एमा मनुप्प इस मेको पिचारका तर दुधी। व पामबमें नियमसे नीच गात वगैरहको प्राप्त होता। मावाप-एक बापणपर पवित्र मृत स्वार हो गया। पक्षिा एनेकी इमासेमा समुपोंकी बस्तीको गोरा समुद्र के स्थित एक दीपमें बाफर ने ज्या। मसी म्पापारीका पार समर इब नपा पा । बहता हमाग म्पापारी परम्पार उस शीपमें गा गा। इस दाहोटी मा मसका रस पीनेसे म्पापाचे गुरु विपाकी का यो होने नी । उस -पामारेमाप । -स-बा-वाम्परि-प-सदोष-.-4 । ५-एम-प-1 पापा-प । नगरम-प 4.। -पोला-मु.1 -मा-फार । १-मा-प.।११-प्रमेव पच-फ..१९-बोलपम्प ।

रापबम्मनसासमामपाम् [षष्ठोऽभिम बपे मारतानाम बापपने नापिनियों सा और सास गनेपर प्रतिदिन उमाको साकर वारानेगा। एक दिन उसको पी पद ए म्पापारीपर पर गई। बता उसे मना होगामा मोर पर बस स्थानको मी मेरा सरेपमें पग गया। पपा मी मित फोको पाठा । इस तागाँ मपा, पापा से इस भोगना पड़ा। इसी प्रकार विस पुस्परर गर्दछ भूत समR होता उसे मी बस भोक और परमेक हब मोगना पकता है। सर्वमदस्थानानां मूलोदातार्थिना सदा यतिना । आत्मगुणैरुत्कर्ष परपरिवादम संत्याज्य ९९ ॥ टीन-तस्मात् सरेपा नात्यादिमइस्पानानामयमामपि पम्मूल गीय गम्मि तदुवावो दिनाचा सबिना मानामापरिबपार्पिना सदा सर्वकार्म पतिना मामसापनमाम प्रपन- बदर मास्मगुपैर्यापारिभिः यसो गई परेपाल परिवाया मर्पमाप परिभा परित बनीय इति ॥१९॥ पप-ब सब मोके मह मानकलापको मान करमेक इक मुबिको सर्वदा अपने गुमोको प्रशसा गोर इसकी निन्दाका छोड़ देना चाहिए । मागाप-मामबाप की सब मोब। गो साधु उसे ठाना चापा उसे मोअपनी प्रसंसा करनी चाहिए और न सरोकी मिन्दा कानी पाहिए। पस्मात् पुमा परपरिवादस्पोम्पते इस्पाह पर-निया क्यों होना चाहिए, या बागवे परपरिभवपरिवादात्मोपच यम्यते कर्म । नीचेगॉत्र प्रतिभयमनेक भवकोटिदुर्मोचम् ॥ १०॥ टीन-परस्म परिमय-स्पस्या किमनम बास्पादिशीमेन इति। परिवारस्त मर्पमापणम्-ए पापमारपीप कवि। मास्मनमोलपात-बास्पाविभिन्नतामा पना पप्प समारीपते कम मीषोमाकपम् । पत्र पमोत्तपते. तमतमधीनमातिए मेड- रासचाणादिपु वनुमति । तमममपत्वात् ससारस्प तत्वं संसारपरिश्रम सम्म बरामरममबम्पम् । प्रविममिति-मयामिमुखं सपा भीतिपुहम्। भयमा प्रतिमपम् भरे मो पथा। मवाना बम्मना कोटिः। ममन्नवासी मोटियमबमोटिया मवाव्या मेहमा पुर्मो धर्मोसं मानुमति सम्पम् पया। नामगोप्रयोविसावरिया सिति' इविवचनात् ॥१ - ॥ - १- परिप-प १-सम्प-प। 1- पराममनाप्रो बरगपोबारमारने . बीच पैलवता मा-परम्प ।५-1-4 ।।-को-प।

धारिका ९९१-११२] प्रामतिपपरपम् मप-दूसरोंक तिरस्कार मोर निन्दासे सपा अपनी प्रशसासे मन-मनमें नीचगोत्रकर्मा कम होता है जो मयोंकीबनेक परम्परामों में मी नहीं मोगा गा सकता । माषाप-नीचगोत्रकर्मको उस स्थिति बोस कोराकोडी सागर प्रमाण पवई गई है। पर एक मया गाँमा हवा भनेक ममि मी नहीं मोगा गा सस्ता 1 ऐसी दशा म-मबमें बांध पए कर्मका मोग तो कोसों मोमें भी होना अशक्य है। कोश्याम सीमादिजातिपु सम्म मबति माकस्मात् इति परायप्ति- कोरपके कारण ही नीष बगेय गालियों में चन्म होता है, यह मतगते है कर्मोदयनिर्वृत्तं हीनोचममध्यम मनुष्याणाम् । तविधमेव तिरभां योनिविशेपान्तरविभक्तम् ॥ १०॥ टी-मशम्येम गोममेवामिसम्मन्यते । हीनं नीचोप्रकर्मोदयात् उत्तममुबोम- कर्मोवपात् मम्पर्म म्पतिमिधर्मोदयात् । मनुप्पाणां तिरमोच मिनिममपि मववि चविष- मेष विरधाम् इति पबमात् । अपम्पोत्तममम्पमम् ' इस्पर्यः । पोनिवितोपान्तरपिमतम् इति-विग्योनिविभेदेन मनुम्पपोनिभेदेन च विमकलपिमागम् । पिपास्तु तिरमामेकशि मिचतुपोम्नियाम्पा, मनुष्याणां सम्मनगमशातिविशेपाः । मम्सरपामोऽम्पत्तप्रतिपाव नापा। इति परिकाच मितम् । १.१॥ मप—मनुप्पोमें नीचपना, उबपना और मप्पमपना काके उदयसे होता है। सिर्पोंमें मी उसी मा मानना चाहिए । अन्तर के इवमा है कि दोनोम योनि के भेदसे मेद पाया जाता है। मावाप-यापर कर्म शम्से मोत्रकर्म म्मिा बाधा है। मीचगोत्रकर्म ठरपसे नीचपन होता है सब गोवर्मके उदयसे सबपन होगा बीर रोगों कोंके उदपक मेस मप्पपन होगी। मनुप्प वीर विनोंमें ये वनों ही पम पापे नाते है। इसमें तिर्यप्रयोनि वोर मनुम्पपोनके मेरसे मेर। विधोंके मेद एकेन्द्रिय दोहविय, व्यय चौलिय और पत्रिय है और ममुप्पोंक समूभरन्मयमे, गमसम्म बादि मेद है। पक्मुक्तेन म्पायेन होनाविधम्मपतिपत्ति कर्मोदयनितेति मावैराग्पपरपम् तपेष मपर पग्पस्प निमित्तमामयावि- इस प्रकार उठ गरिसे मीच पोरर सोको काँका फल गनन महान् राम्प उत्पम होता है। बसपा पम्प मी मरिच पाते। देशकुलदहविज्ञानायुर्वलमोगमतिवेपम्यम् । राष्ट्रवा कथमिह विदुपा भवससारे रतिर्भवति ॥ १०२ ॥ १-नि-फ र । २-प्रवीयवेमेस्य नाम निम्।

स्पषम्दानशासमामपाम् [पोऽभिकार, भय पदत्तावान टीन-देसो मगपाकिदिपर्प, सायमनबिरातादिरमार्फः । मिसाल हरिताविषम् मपर मेप्यासचाणामणिम् । सपणापपपतषियेविगेपो रेहम मपरा माणसपिशादिः। विज्ञान विशिष्टो बोमो पीपाविपदार्पपिपा मपर प्रहाशानपरिगतः विधिनादीपायुपा पपाकालपिमागवर्तिना गुरु मपरस्तु गमकौमारपीवनापस्मारिष मनिमताया। पर भारीपरि, वेन सम्पयो वीर्यवान् मपरो युग सारिकपि कति पार पति । मोगमानमेवेरसम्वादिसम्पनुपमोगसमय मपये मोगणीवस्सतोऽपि च मोगामसमर्यो मोन्तम् । शिरम्पसुपर्वमनमाम्बाविषिमूत्पा युक्त एक मपणे पापियामिभूतो बाकी मग निबसमा एपी देशाबीना समविपर्यन्तामा पम्प पिपमा निकोप कर्मोपबनिवाम् बन्न प्रकारेप, विदूपा पुदिमा मरम्पविमवर्ससारे रति प्रीतिर्मवति । पति फर्मोदयनिमित्र समाप्तुम म्सपरेशापि शिाय देगा ससापका । तसा मर्मानुष्ठाभादर एष भेवान् इति । १ २. मर्ष-देस कुम, सर्गर बार बाप, या मोग और सिविकी रिपमता देखकर निशानोंको इस रकादिरूप संसRA से रविही! मावार्य कोई मगध, बा कमि कमेण बार्प देशमै चन्म या शक, पान सराव पीराममा रेशमें बम्म मेता है। कोई इसाक हरबंश बाद में जन्म देता है। कोई मिजारमा बगेरहके मीच कुम्म गम्मते हैं। किसी पर पुम पण बौर पुम बापसे उब और मिस सक कर सत्तामवाण है।किसीको गीपादि परामोका विnिt गोरको विमानी है। किसीकी वायु सूर म्मीगोपने समपपर पकनेवाग्र होती है और नर्माणत्वामें, अपना अपनत्वा वा मायमानी ही मर बाव।कोई पसाबमको गि निक, को बनेक मोगों को भोगने समर्पी बर सीक सहि होते हुए भी तो मोगनेको मोग नही पा मोग-सामी होतेए मी मोक्नेकी सति बा। एक सोना-बी, समाचार मिति पुतीय गली में दिन करता है। इस सिमताको रेखार मान् स्नुप्प संसारसे कैसे प्रीति र समय है। उन्हें वो सस्परसे एप बिना पिए । र धर्म-धमें पिचगानाही मिलकर है। तपाऽपर पग्पनिमित्तमायचा- पापको और मीमित गते । अपरिगणितगुणदोप स्वपरोभययाधको भवति यस्मात् । पवेद्रियवरविवलो रागद्वेपोदयनिषद ॥ १०३ ॥ टीप-गुपाय दोपाय गुणोपा, मपरिगमिता ममारता गुणोपाय पेनासो मपरिगणिवामहोप । प्रेमापूचरी गुपाम् दोपाध विधाप गुप प्रपतवे दोपान पपिति। पमानारोषिवगुणदोपा ससा स्पपेमपनापने मबति । समरमान पायवेऽपय वापते । २-रव- । -अब मनप । -4 ।

कारका 1.1181 प्रशमरतिप्रकरणम् दोपप्रवृत्तावास्मानं वापते. पयाऽय प्रहचस्तयानमपि प्रवतयामि इति परमपि नापते। पचन्द्रियरमेन पिवको विगतबका । पन्त्रिपरलेन माताऽमिभूवत्वादुम्मागपापिमाऽन्पेन पटेम मार्ग प्रतिपावपितुमशक्यः इति विवक । पगदेपोदयेम निवयो नियमितः रागदेप परिणतः इस्पयः ॥ १०॥ यस्मादनाठोषितगुणोप एवंवियो मपति- मर्य यत पात्रों इनियों के बम्के बागे निकपुत्रा मोर राग वपाईपके उदयसे करा मा मनुम्प गुम मार देपा Aचार नहीं करता बार अपनेको, दूसरों को पारोमोको कर दवा है। मारार्य-सोच-विचार कर काम करनेवाग मनुष्प गुम और दोपका विचार करके गुमोंमें प्राधिकरता वीर दोर्पोको छोर रेता है। यो गुण-दोपका विचार नहीं करता, वह दोपोंमें प्रार होकर अपनेको कर देता है। तथा उसकी देख-देसी दूसरे गेग मी दोषोंमें प्रवृत होते । पा सरोको भी पीराका कारण होता है। तया पाचों इन्द्रियों के बामें यह एसा फंस गायक प्रयान करनेपर भी उसे मुमार्गपर गना कठिन होता है। तस्माद् रागद्वेपत्यागे पञ्चेन्द्रियप्रशमने च । शुभ परिणामावस्थितिहेतोर्यनेन घटितव्यम् ॥१०४ ॥ टीका-यस्मादेव तस्माइ पपा गगदेपपोरास्पम्पिकस्पागो मवति वयाष्ठेपम् । पोन्त्रिपवर पपा प्रशाम्पति नोवश्वशक्तिमपति वपा धर्मपरिणामावस्मिवितोपस्नेम पटितन्यम् । भुम एक परिणामो पया देशपिसानादिप्वाप्पते, शुम परिणामावस्पाने यो वर, वस्म देतो प्रपोनापाप्तिपपा स्यात् तपा चेरिखम्पमिति भर्य - घुम परमाकी स्पितिके लिए राग और रेपर स्पागनेमें वा पाँचों इत्रियों को साप्त करने में प्रयास करना चाहिए। मागाप-पर गुण-दोषका विचार न करनेवाले मनुप्पमें उस गायों पाई गठी है। मतः ऐसा प्रफल करना चाहिए, मिससे एग को पच सपा अमात्र या पाचवों को मलि पर उसके लिए शुम मावोंको प्रात करने क्या उने नाप का प्रमाण करमा पाहिए। तत्कथमनिष्टविषयामिकाद्रिणा भोगिना वियोगो वै । सुन्याकुलादयेनापि निभयेनागम कार्य ॥ १०५ ॥ से पभिर माव- -सालि सानिमाये पर- ४-पर-५ ।५-पपो-पानसरो-प।-मामिला।

. रापयन्द्रमनधारमामयाम् [सममोमिका, चार टीका- तरूपं पेएितम्पम् इस्पाह-ममिय विपया पापमाणेन म्पायेम, दाम् मावि मभिसपति शेन मनिए विपपामिलिया मोगिना मोगासलेम, कपमास्पन्तिको वियोगाम्यामि सा इति । देशमा पारपूरणे । मुटुम्पायरयेनापि बाई म्पप्रारपेमापि सता । निमपेन यमाम् विनाप एनानिह पस पापापागन् पापाविपिपयान् । मागमा कापा-मागमो भगवसनप्रणीतोऽम्पासितम्या पापः । वर्षपामास्पम्ति स्वास्मनि प्रग्यो भषस्पनेनाम्पुपापनेति ॥ १ ॥ मप-प्रत्य)-अनिए Aपोंका इस करनेवाले मोगासक मनुप्पसे इन विषयोंघ बियोग से हो साता ।। (उचर)-सक पाव म्माकुछ होनेपर मी इन पियों को गामकर बागमका अम्पाप्त करना चाहिए) भावाप-पाया प्रभ किया गया है कि मनुप्प मोगोंमें वासको प्रभाव मोमोंकी माय माता यता है वो वा उन लपपोका स्पा से कर सका। बादमें उसका ठहर या गपा मोनों के लिए भास होनेपर मी पाए उसे मोगोरी बसहियको पालना चाहिए. ये लपप इसोक बौर परगेमें दुम्मायी है। उसके पार मनमान् मन्दिरके रारा उपविए बागमप मम्पास करना चाहिए । इस उपापसे उन विपर्यावरच विमल गए हो माठी। कर्म पुनरनिरा विपपाः' इत्पा- विषय बनिए स्पों पर बताते आदावत्यम्युदया मध्ये श्रृगारहास्यदीपरसा । निक्पे विपया वीभत्सकरुणलबाभयप्राया ॥ १०६ ।। टीप-मा प्रयम नरमसुखापा मस्परपान उसबभूवाम् मम्पते । रसप भागमिप्पतीति मनपानन्दभेतसि प्रपमम् । मम्मे विषयप्राप्ती सत्या झारपामरणाच कण्ठापमुखपुम्पनहरयासतमहारपपिासम्पपपादिमस्वाद वीरसाः। 'निरपे वि- विधिएसपोगोत्तर पिया स्पशापया प्रतिमान्ति बीमस्सा निरसनत्वात् प्रष्ट गुरपणा पितरानात् । परमास्तु बहुषिमपविसयमनमवणात प्रमाणपत्वामुम्मापामत्वात् । परिसमाप्तप्रयोजना पवरिततरमावचे प्रपावती निवसमावि विमेति च गुरुमनादासह 'मा मैपवियामधामीत् पमित् इति । एपमवे पिपपा बीमस्तकम्मम्बामपापासमागः परम्ते। मप्पेऽप्यविततीसमोरमेना भारम्मे कामलापमाषाच बाधित्स्वास्म्पमापादयन्तीति स्पाम्या" मप-पे विषय प्रारम्ममें एसपकी सदमप्प बार बार हास्पसे रसको तीस करो है।बोर बन्दमें कीमत्स. कममा ममा मोर मय गैसको करते है। १-गर्मपुर-फ। ४-मिर-मु.। ५साप-फ. ।-मेल-फ।। - नाव-फ.. ।

- - . २ कारका १६१०८ प्रेशमरतिमारपम् । मापाप-प्रारम्ममें या मनुष्य काम्से इन विपोको ठासबोंकी का मानता है। वर्षात् से किसी उसकी सूचना मिम्ने पर उससे मानन होता है वैसा ही बानन्द विषयों की प्रामि होमेसे पारे होता। बिपों प्राप्त होनेपर शार बेप, पगार, हास्प, प्रम-कोप वार समोगके अन्तम सुमेहए कामाको देसका बी ग्यानि होती है। नपोकाके भीत्कारको स्मरण करके उसपर दया वाती है। एक दूसरेको मन देसकर समा होती है। उस वास्ता गुम्बनोंके देश नेपर भप म्गा यता है। इस प्रकार बरवमें ये विषय पनि कामा, ज्मा पौर मप वगैराको उत्पम करत है। मप्पमें महकी तीन बेदमा सय करते हैं और वारम्ममें कुवार भोर रस्मकता पैदा करते है। पे कमी मी मनुम्पको सस्प नही होने देते। पर छोरनेके योग्य हैं। मनु प उपमुम्पमानः मुसोमोपभोकारमनुराहतो पिपया' संपमिकारे पटति- बिफ्फ मोगसे मनुप्पचे पोगत पुस भी ऐप है, बट पप उपकारक, इसका उत्तर.देवे यद्यपि निपेव्यमाणा मनस परितुष्टिकारका विपया । किपाकफलादनवद्भवन्ति पभादतिदुरन्ता ॥ १०७ ॥ टीन-निपम्पमाणा उपभुम्यमामा भणमामयपपि मनोहप बनपन्ति तपापि पवार पिपाकका मापातरमपीपा मपि सन्तः पिंपाकफरममणोपमा सिंपावरफनिहि रस- मामेनोरिसमानानि स्वानि सुरमीमि प परिणति पयमुतया पोयपम्ति । मतो सुरम्ता साम्ता स्पपा १.७॥ मर्प-पपपि सेवन करते समप पिप मनको पुपरमाते है पापि किपा सके - के मधमके समान में यापी होते हैं। मावाप-किंपाक वृक्षके फस गाने में गवादिए और गम्मित रोवेल पेमें गॉवेही मारकर काम करते हैं।पयों को भी एसा ही नाममा पाहिए। तपाऽपर निर्देशनमाह- सप उदाहरण है यवच्छाकाप्टादशमन्न घहुभक्ष्यपेयवत् स्वादु । विपसयुक्त मुक्तं विपाककाले विनाशयति ॥ १०८ ।। टी-माईतीमनमशवश यस्प व प्राकाष्टादशमनम् । बामस्प मोरादि, पेम पालकविछपा सीपसमादिया, तपेयं यमास्पद वत्सेयवादनम् । साधु-मपुपदिरसपुळे विपम्पतिमिष भुकम्, विपापाय परिणतिसमेपे पपा स्निाशपवि॥१८॥ -वेफ -स्परिनोप-फ मोहम-फ..। ४-पिणार-फ ।५-परकाममारकारिप-बुद फ ।--फर। - .

" - पपचन्द्रमैनधाममाछापाम् [ ममोपकार, NIC तद्वदुपचारसमृतरम्पकरागरससेविता विषया । 'भवशतपरम्परास्वपि दु खविपाकानुवन्धकरा ॥ १०९ ॥ टीका-पातिकमप रयम्तेम समीकरोति तदन्' इति । उपचार पादुम्म पिनव प्रविपति नोपचारेप संपव गत एम्पई रमणीयस्वमदिरापप्रीतिरोतुस्सम, रागा स्नेह- विपा,तस्परस-भतिशयः, उपचारसंमतरम्परागरसम सेविता उपमुक्ता विषयाः शम्बावः । समरपरिवान् विपाबरावं पूरीमति पचान-मपसवाना परम्पफ पदतका सम्तवपा वासकुमेन पिपान मसुगन्धरमपीना दासावित्रकारित इति ॥ १.९॥ मर्प-गिस प्रकार मामा प्रकार के पास बसे गने योग्य और पीने पोप सारिश पस्मोंसे पुछ सादिर मोगन परि पैम हो तो उसके बानेसे बम्समें मृत्यु होती है। उसी प्रकार सुग्राम को बिनप गैरहसे मी रसीया और बापट (गसे मोगे हुए पप सको मप्रेकी परम्परामें मी दुस-मोलकी परम्पराको करनेवाछ होते हैं। मानाय पिप भोग इस्पर विरस मोबनके समाम बन्द हुसदापी होता है। फिरे मोसम के गानेसे तो एक ही बार मृत्यु हो । किन्तु विषयोंके सेक्मसे मा-मामे का उठाना परा। अपि पश्यतां समक्ष नियतमनियतं पदे पदे मरणम् । येषां विपयेपु रतिर्भवति न तान् मानुपान् गणयेत् ॥ ११०॥ टीका-पायतामपि समर्म पस्पशेष ममाम मरवं निपमम्मनितम्या परमारपा नियतकारमेष । मनियतन मनुम्पाना तिरमा पापरे परे स्पाने स्थाने मारकादिगम्मनि मापानापारिमेरे गोमहिप्पनाविधादिमरे कामपा निपतम् इति साम्मे मनिपर्व मनु पतिरामायुः सम्प्रतिवमानाम् । एवमवगवामिस्पॉपु सहपामा मपि येता विपये रतिः शक्तिमरविन तान् मानुपान् गणपेत् कुराः। विपये एप हिते नियुदिपस्वादिति।.. मम-गालमा निक्त मोर मनिपत ममको प्रापा र मी निमा पोमे गाडि ६ में मनुप्पोम महागिनमा चाए। मावाप-ब से तय होता है एक फार मोर सय बनिपत पर। समोर मार मर मिका मामें होता कि उनकी कार मोटी कि बाड मरन मनुप्प गति और विर्यम गतिमें होता है। समी मतिपो मृत्यु प्रप। संसारमें ऐसा को भी स्थान नही माँ पापुमती हो। बसाइसरा बर्ष एसा मी सकस १-रये रिसर ।-10-01-01+मापीचा, फ.. ५ फ। - .

५ धरिका १९१०११११११] प्रसामरतिपकरणम् सदा ही पनिपत पोंकि मामु प्रस्पेक समपमें पप होगी। और पह बात हम अपने सामने मनुष्यों और वीर्षोंने प्रत्यक्ष देखते हैं। वो भी मायुको बनिरय गानकर मी यो लिपपोंमें से एरे, उनै मनुप्प नही समझना चाहिए । मासमा होने के कारण वे पच है। विषयपरिणामनियमो मनोऽनुकूलविपयेष्वनुप्रेक्ष्यः । द्विगुणोऽपि च नित्यमनुग्रहोऽनवद्यम संचिन्त्य ॥ १११ ॥ टीका-मनोमुरझा पे विपपा प्रणा शम्बाइपस्पा विपयाणा परिणामोऽमुस्मा-पिम्तमीप मागेपनीया । इएपरिणामाः सन्तोऽनिएपरियामा मन्ति, मनिष्टपरिपामामामीर- परिणामा भास्ति, नावस्पिटा कथित् परिणामोऽस्ति । एपमानपस्पितपरिणामविषय विरती सस्पामनुप्रो दिगुणोऽमपपप संचिन्त्य । मनप्रहा-गुणपोगा, सप विगृणः । गुप्प एक रिगुणे उहा, विधम्मस्पोपासपस्यात्। ममपातौ पापरम्पामावात इत्पमुपेत्या १११ भय-मनबनु रिपोंमें विपर्योके परिणामके मिपमा बारम्बार चिन्तन करना चाहिए भोर सबदा निपि वा गुणयुक्त डामका विचार करना चाहिए। मावार्य-ममको मिप मामेबारे विषयों के भावी परिणामका विचार करना चापिए । अर्थात् मछे गनमा पिप कालावरमें मुरे गते हैं और पुरे म्गनेद्य विषप काग में गा गने ते है। उनका कोई परिणाम सर्वदा नही रहता। भतः स्पिर परिमामय बिपोंसे महिनेपर भारमाका बना मा0 दोप रहित कत्माम छतापोंकि पिपासे पिरहि होनेपर पापकर्मम मतदोवाट ठसामका सर्वरा विचार करते रहना चाहिए। इति गुणदोपविपर्यासदर्शनाद्विपयमूर्छितो खात्मा । भवपरिवर्तनभीरभिराचारमवेक्ष्य परिरक्ष्य ॥ १२ ॥ टीका-वि स्पं गुणान् दोपरपेण या पापति कोपाय गुणरूपेण प्रेभने विपयास- पना परीस्पं अयपते । पिपपेषु शमादिपु मूञ्चिा-चम्मपां गतोय मात्मा। मा ससार, म परिवर्तन मरकादिप बम्ममरणपणम्पः तस्मात् विम्पद्भिः माचारमपेस्प प्रपमानाय मचिस्प परिरस्पा परिपाम्नीय इति ॥ ११२ । मपस प्रकार गुण और रोपमें विपत रन होनेसे पापामा विषयों में मासको पासR-भमसे रखेगा मम्म नो बाचारका बमुजिन करके उसय रया करनी चाहिए। मापाप -पसारमा गुनो रोपरूपसे रेखा और दोपोंको गुमरूप देता है। इस रिपक्व रमनसे संपर्कोको उपदापी समसका या उनमें गेन हो यागो मम्पनीष नरसाद मातियोंमें ममम करनेस सवेरे, नमें बाबा बध पम्पास करके अपनी मामा रपा कासीदिए। C ।

, - - TE रामचन्द्रनमासमाखाबाम् [ सप्तमोऽधिकारः, बाचा स वाचापका पथकारा पति दसति समासेन- उस पाचपके पाँच भेद है। सभेपमें सरेंगते हैं सम्यक्त्वज्ञानचारित्रतपोवीर्यात्मको जिनेः प्रोक्त । पञ्चविधोऽयं विधिवत् साध्वाचार 'समनुगम्य ॥ १३ ॥ टीका- तत्तापमयानगमक सम्पक्स्वानाए । तापडीतो मस्पादिवानपञ्च पचार। मविपकमपपरिशीपरपाचारिभाधारा । पोखिममेरमनशनावि तप माषाण। पीमात्मासिषापा । एवमेव पबमवर माषाए प्रथमाझा तीपरनिरपंतोऽमिति: सकिय सूभीकता, विषिक्त सम्मुगम्पा गिोपा। पुनर्षिभिः । सपमापरिनिस्तार एमबोगावि, मर्पग्रहपपिपिरलुपोगमस्थापनादि । साधूनामाचार साप्पाषारमहोगा म्पम्वरेनष्ठेवा किपालाप इति ॥ १९॥ । मर्प-बिन मगकन्ने सम्परत्व, काम, चामित्र तप और पीरूपसे सम्मायके पाँच मेर परे । साधुओंके इस बाधारको विकिसत् मानना चाहिए। मापापका मान बना सम्पालाचार है। सम्पावागारसे कुछ पॉवहान समाचार बाठ प्रकार के मौकोमा करनेवाण पत्रात मनन गेरर के मेदसे बारह प्रकारका तप पाचार है। बापाकी सपि पीचर है। इस प्रकार रोक्ने बाचाराम पाप बापाका वरूपसे कायम किया है। उनके सिम्प ममपरदेयोने सूत्ररूपमें मिक्स हिमा है। सामोंके इस बापतको रसव की जानेवाग किसानों को विक जानना चाहिए । विमतवाप्यापारस्प पचपा मनपरमात्मणाम्पयनापिकापोरण पुनयो- देसतोऽपमापरे समातेन- इस प्रसभाबारे बापारपर बाचार के सामा पसे पार मेरी उम्र मासके प्रम भुवस्कायमें नो प्यपन है। बा अब उनके माधारपर बाचा नो मर संघपसेर पजीवकाययतनालोकिकसन्तानगौरवत्याग । शीतोष्णादिपरीपहविजय सम्परत्वमविफम्पम् ॥ ११४॥ संसारादुद्वेग' क्षपणोपायम कर्मणां निपुण । वैयावृत्योधाग तपोविधिोपितो त्याग ॥ ११५॥ टीम-यासपयिापापबीपनिकापा पिम्पसबोनापुरमस्सविमसाम्पा तमादी बीमास्तिस्वमविपावन सामाम्पेन त पपिम्पादिषपसरपम्पावप्पनम् । पवमात् संसापेज . । - 4 १-बारपाका. --स्पन-फाए।

कारका १९३१५०११५] माप्रशमरतिप्रकरणम् कमरम्पः । सदमविरतिय मनोपारकाये रुतकारितानुमतिपरिहार इति । पदेस बीपमिनयेषु सतना। प्रयास्तवसमे भानपूषन्ने म्यापारपति कोविश्ये गैफिसमतानगीरवत्याग किसन्तानो मावपिमन्नया शेपास सबनसम्पम्भिमा पत्री-पुमादया, वेषु गौरवम् मावरा खासक्ति, स्पागा । तपा कोपमानमायालोमापापविखयो रिपेयो पसमता समाविमा बछेन । शीतोप्पीपाप्पयने शीतोष्णादिपरीपहपिवय-भुतिपासादिपपपाशशिबिया- भमिममः । तत्र सीसत्वरपरीपदी माक्तः पीती विसतिरुप्मा शेपा । सम्पमस्याम्पपने शादिशपाई तत्तापप्रधानमसर्म सम्पग्वानिमषिकम्पपरई निषित पर्यते ॥ ११५॥ गोकसाराम्पपने-कसार इति मन्दपनाम माविपदेनार्मतिरिति । तम संसारा देग हिंसाविपत्तो न मुमि ववितोमुनिकितना काममोगेपदिनोनिगदोपवशनात् । धर्म- पोभ संपमनिषापाम्प नोक्सारमोस्पमाषा संसहायो मागमेापरित्यैभन् सारमेवासादपति गोस्पेति। धूताप्पपने सबनमिलमपुप्राविनिरपेक्षता वदिषून तत्सरिस्पाग, कमणाब हातावरणादीनां विघ्ननोपाया, मुतज्ञानानुसारिक्रियामुष्ठोम शरीपेपकरणत्याग येति । महापरि माया मूठोत्तरगुणान् परिणाप पपापोत्प मम्मतन्माकाशगतिमम्पिनुपगीवनम् । प्रत्यास्पान' पयिायाम प्रत्यास्पोकतम्पानि पारचेन सदा मानवानबरसेप्युक्तेन भषितम्पमिति तवार यारोपोगः । विमोसपत्तनाम्पायने भाषकानो देशविमोमा सापूनों सपषिमोससीपकर्मणा मुक्कामामात्मनोऽपि सबमिरेप कर्ममि बरस्प सकसकर्माश-वियोगो मोसा सप्रपञ्चो मत प्रस्पास्मागिनीपादपोपगमनमर बापते । पोषिकि मापाम्पद् गीता । उपमानते मगक्ता श्रीपर्वमानस्वामिना सानुष्ठिवतपोग्यावणनं पोपित्पागो प्रमपरिग्स छतम्। परमावापे नभाम्पायनारमकोयतो विमुकः ॥ ११५ । मर्प-बीकापौकी स्थापना, टुम्पी बनों पक्का पागधीत अष्ण नेह परी पोको पीसना, निमा सम्पमत, सारसे पराइट को जप करनेका का उपाय, पाइसमें परा, वपकी Rनि मोर चिपोका माग-से वाचार के मो मेद है। मावार्य-साइपरिणा नामके पार वष्ययन में प्रारम्ममें सामान्य जीवके वत्तिया कपन किमा। उसबादमें प्रदिप्रकाप बप्काम, सिकाप, गापुछाप, बसतिप्रम मोर पसायका वर्णन मिला है। उनका पान करनेसे ससरका, एम-फर्मवन्य पेय है। बता मन, पचन काप बोर हर कति नमोरनासे उनके समक्या नाग करके सनकी रपाका प्रवन करना चाहिए। गेडीयप मामे बप्पएतमें मातमा पितृर्षक और पनी मोपमें भासपि मागका कमवा रम्पराम्पा स्पावा -मु। 4- SP नै-. ५-पल-प.1.1-मोप्रा-मु.। ,मेष पापा -मैपोलिम । १- नाफा "नाना-प। ११-माप पपिप-मुक - । -मपत्तप..। 1 1 गत मन -- गपषमतासमानाम् [ससमोऽसिकार अपार पपा बनेवर बोद, मान, माया मोर गेम लापको जीउनेका निवास है। सोचनायो रे अप्पपलमें मूरप्पास, ममी-सहा पोप पईस परीपके तनेजान है। उम्पात मारके नीचे मममममें सवार रोपोंसे पताका मानरूपब सम्परागच वर्षमसार वारक पाँचों बम्पपममें संसारसे गए कालो दिसा कोप मा माप मुमि महाराज बोधि वगैगाम प्रकोप देखा उपसे रिप हो गयी वा काम भोवसे सिक और बपरिमही होगा प मुनि कसारको दोपम मुमि मा मेसकर येणे सरको प्रामरता है। नाक बप्पकसमें एनी मन्त्री, पु बगेबसे निरपेष सलेकर, उनके परिश्माका, नागारमादिक गोथे पर करके गायन मुबान नुसार भाचान करनेका मोर पर दबा उपकरणों के त्यागनेश पर है। माप मामके माता बापत भूर और उपगुमोको ममाति गामार नागामी शनि प्रयोग न करनेका भान है । को प्रापास्मानपषि त्यागने पोप गलोच पण सके कि बोका काले, सम वा परित्र मा पर प्रलेख Anाल से ही यावत्पर्मे ठपर बा अपहै। मोधपमा मायके बा अपफ्नमें आपके एजेष मोषका और सामोरे सरिय मोपात्र हर्नन है।वर्षद पोंके एकससे कोच पर होता है। समय एकरेख मोष का पता है, और समयों समस्त नग है। समय से मोसा गाता है । कसे मन होने का नाम मोप है। मापन गमी और पादपोपगमन मानो मा मोशन स्थिर पण मय गया है। प्रधान शेनेसे कपोनिरिक मामा ! प नामक मोरे मप्पपमें मगवान् मामलामी वपन्न परिर्पोफे त्यानरूप प्रयच बान है। इस प्रकार मोप्पो मापारपर बापरके नौ र गमे ।। सम्मति माचारमेषु मम्मपनपनापाहणे विस्वरिवेषामित्र नम्बम्से- बब बचपी पप्पयनोंसे कर सिम्पस र नये लिप तस्कयाकी प्रथम विध विकाका नव- विधिना भैषयमदणं स्त्रीपशुपण्डविवर्जिता शय्या। ईर्याभापाम्परभाजनैपणापहा शुदा ॥ ११६ ॥ रोमा- पिणाप्पपने अमोत्पामिफ्पादोर्षितो मिझातम्यो प्राया। पप्पा प्रतिमा, वम श्रीपशुपातिपनिये स्पाने स्पसम्बम् ममेवरगुमाया सम्या प्रामा' पप्पपने मिसाप्रमणादिबियामास मने पानी पुरस्ता पुगमा निस्दाशि स्वामपनि बानि र सस्पानि परिमम् गस्तीति। मापामावाप्पपने पम्पमात्मपराविरोम्पायन १-सम्म मि पर पत्र में बार बारिम र पना बोलने मार-मु .--.1 -भिम -१ । ५-मा- । -जयी -- - ग " . T कारिका ११६१९] प्रशमविप्रकरणम् पाम्पमिति । बसपणाप्पयने ममेघरगुणाई प्रभणयुक्तं वासा समादेपमत्सपरिकमादि । पापपमापामपि बोगमादिवियपाप्रप्राममोम्बादि पयोक्तमारेपम् । मध्यापतिमाग्यपनेऽ पदो रेखपणापतिप्रपातरसापार्मिधमा पनपा। सपा समता परिमिदोऽप्रमो पाम्पो पम मावनमाठन प्रभाषपुर्णपोस्सगसाप्यापस्थानयुक्तोऽवो पोग्पा । इति प्रपमग समाप्पपमपरिमापेयम् ॥ ११॥1- मय-वकिमिधापान, बी, पशु पो पलक (नपुंसक)से हवा शप्पा, धुनि, मातापि, पहा भूपण मुनि और प्राणार, ये प्रथम चूचिकाके सात अपपनोंके माम है। मावाप-पिमैपमा मामके पप्पपनमें उनम, उत्पादन और एपमा दोपसे व मिक्षा ग्रहण करनेका निभान से सम्पपमा बामक सम्पपनमें सी, पषु बोर पणक (मपुसक) वित स्थानमें यरमेका पर्याप्पपनमें कहा कि साधु भिक्षाने और के लिए गमन करवायोमाग एक पुगमपत्र (पार प्रविधिको देखकर प्रसार स्पार नीमको रखा करता मापीरे-गोरे गमन करता है। माणगप्पपन में अपने बोर दूसरों के अतिम्स सोपल योग्नेका विपान परेपणा नामके अप्पपन में म् शुष और चगुमोदी मुरवाके अनुरूप पसे भेष विमान विसमें कम बारम्प से। पापमा मामकेबपपनमें मी सामादि दोपोंसे पद पात्र भनेका कपन बEARNपत करते। उस पार मेदगेकके मप्प समेक पाटो भी सिट बाठ माप प्रदेसे देकर बापा रक्षिण माम रेम किस्त । भरत क्षेत्र चाप्ती गमाको मिसियत है। गाँप कस (a) उपान,, पछार गुपपद उस त्यानके मानिसमारदारको फिफ्त है।दिस ग्राम ममें यरला हो उस गायके भरोष उस गास्की किमत है। और पिस स्थानमें समापमा बम्प मापुगेप परे, स्ान उन सापयोगी पद है। इन मालिकों से मरनेके लए परिचित स्पानकी पारना परना चाहिए तान इतना हो उसमें बर्तन मोने, मम्-न त्यागने और साप्पाप पद परने को मरिच हों। सम्पति विवीपासप्तापयनानि समप्रमिमानानि, समापिए- बस सस ससकी सीप विका परिकापते:- स्थाननिपद्याव्युत्सर्गशब्दरूपक्रिया परान्योन्या । पञ्चमहानतदाव्यं विमुक्तता सर्वसङ्केभ्य ११७ ।। टीका-प्रपमाम्पपने स्पानं प्रायोत्सर्गापप बम्पते । विवीपाप्पपने निपपास्पान मिरिनापमास्यापते । दीपाम्पयने उपापमपणत्पागपोग्पपरेशमपण पुस्सग स्थाममुहम् । पतुपाप्पपने प्रयासपरिणवदम्पमाणे पति पगदेपत्पागा । पबमाम्यपने -भाजीपा-पात ---प्रार मु.। (PCOS मा सर अब गाम्पबाभूत १५-गापि-प-मोप-प.।

मावाय- रायवमानशास्त्रमावायाम् स्मयोऽनिकाय च मानाविपरूपदर्शनम गगपपरिस्पागः पापः। सर्पम कियोगमेनामिसम्मम्मा- स्वामप्रिया मिपपाक्रिया 'स्पादि। पष्ठे परडिपानिपेमा-प्रपलवस्तपसिलाचस्प निविर्मघरीरस परा पापक्रोति संसरोति सद्युतम् । सप्तमाम्पपनेऽम्पोम्पझिया परस्परक्रिया साऽपि निपतिधर्मरपुपो म मुम्पत पति । वतीपपूण मावना। तमापनस्वमावनी पिाय प्रसस्व माक्नादसनवानपरमतपोरेग्पादित माम्पो एफमहानवमाषनाथ पब' पबमामा पारपापमिति । विमुक्तता सरसम्पा' इति चतुर्थरिकापा विमुक्तापपने कममो विमुक्तिरोपतो वेपतो पापि चिस्पते-पापाता बेचित् समास्तम्पो दिमुक्तिरिति । मिशीया प्पपर्ने पक्षमी पूरा पत्यप पढासु पोऽतिधारस्तविनववर्य पापभिड़ान मेति ॥ ११७ ।। मर्प-त्पानक्रिया, मिपाप्रपा, मुसर्मनिया, समनिपy रूपत्रिपा, परकिपा पाच पाप पवा मोर समस्त परिमाका स्वाग-पो बम्पपनों के नाम है। -पापन कापोरसके पोम्प स्पानका वर्गम है। दूसरे बप्प्पन साध्याप करनेक पोग्य स्थान वर्णन है। ती बापपन, मा-बरे वागने पोम्प स्थानका वारे पप्पपनमें सुनाई पड़नेमा सो राग को देपफे स्पागनेका पर्मन है।पाच भागपनमें विसर्ग परनेपा बनेक प्रकार के रूपोंमें राग और इसके बागरेका पन अप्पफ्नमें परकिया निपप किया है। वरस्पाम गे पुए साधुको गृहस्सा औररके बरामई सेवाप्रपाकी राय करमा युछ नही । सात बम्पबनमें साधुओंके लिए परस्परम एफ मेकी परिचर्पा करनेको बळकारितीय भूमिकामे ये सात सम्पयन बसालिकाका माम माना है। साधुको बाम मातामों को होगा दशन हाल चारित्र तप वगैरह पुम भाषनाएँ मानी चाहिए । एक एक महारतको पाँच पाप मानारे रोती है। उनके मानेसे पार महसत पते है। बोरी बुटिका विमुप्पपनमें एकोण मामा सर्पदेश कर्मास मुखोनेका विचार किया गग। बर्वाद गोकुल पर उससे मुळ होनेकर उसमें वर्णन है। पानी शिकामा माम निीवामपन है। उसमें चार पूरिकाओं में यो क्षार ग बात है उनी सिर के लिए प्राधा देने पर सावाचार खल्वयमष्टादशपदसहसपरिपठित । सम्पगनुपाल्यमांनो रागादीन मूलतो रन्तिः॥२१॥ टीका-परमेपा तानामाषाए-मनुशमोऽपारणे यात्मक पवित- परगमनपा मारापासानात्मक परिपरितः । पम पर्पोपछम्भिस्तत्पर्मिति सम्बर पयात विपिना प्रापमारणानुपन पाम्पामिरनुपाल्पमान-सम्पत्पमानो रागदेपमोहाम्, सम्पाप पतीति । मपचापपे गुमा प्राप्पते । ११८॥ मा.-सानि-फ.t-| ४-बाप । ५-ने- । (और पम्प गए-गाराम एकोम एक करो। मारपसम्म। -- समा-पार । -पारणामाबर-4 | -सपाल-प । . .

1 कारिका ११८ ११९ १२ ] प्रशमविपकरणम् मय-इस प्रकार अठारह हमार पोंके द्वारा छे गप सामुमोके बापारके विधिक पान करनेसे ग्रगादिका मुम्से नाश हो जाता है। मावाय -बो साधु शीके मठार हजार मरों का विष पान करता है और इनमें निकमी दोप नही माने रेप, उसाच राग गासे नए हो जाता है। आचाराध्ययनोक्तार्यभावनाचरणगुप्तहदयस्य । न तदस्ति कालविवर या कवनाभिभवन स्यात् ॥ ११९ ।। टीका-मापारम्पपनम्-मापारागम, तपोको पोऽपस्तप भाक्मा पासनाम्यासा पशीरमियपतनाविका वापरमेम प गुप्तहलपम्प मूठोत्तरगुणगुप्तमनस्कम्प तवमुष्ठान म्पग्रस्प हिमवति । इस्पारन तदस्ति कार विपर काचिन कपित् । यम विभि भूपते पापपमाररिकयादिमिरनापारिमिचिति ॥ ११९॥ मप-आचारागके अपनों को मापार का मया है, उसक मावनापूर्वक वापरगसे सब स सुरक्षित काध ऐन एक मी धन मही , जिसमें रागारिक उसे जा सके। मापाप-योमाचारगमे थे गये बाचाका एपसे पान करता है, वह कभी भी रागारिकके वशीभूत नहीं होता। 'तपा मापाराग्यप्रस्म म पिदिमधिमुक्तिपरिपम्पिनी सापोमबति 'स्पार- जब पा बताते है कि बिसन्न मन भाचारमें रम जाता है उस सापुको कभी भी मुकिकी बाधा कुदि उपपमही होती.- पेशाचिकमाख्यान श्रुत्वा गोपायन च फुलवध्वा । सयमयोगरात्मा निरन्तर व्याप्त कार्यः॥ १२० ।। टीफा-नचित्र यपिा मम्ममम पिपापको पीता। पिशापरेनोचम्- ममानारानमनपरत अपम्। पदबाद न उमे सपाई मगम्त विनापयामि ति। प्रतिपय पनिमा मावा प रचा। प्रारममनपान्यानपनानकरमवादिपिविरिश पपा पणिमा सम्पारिता पिपापम् । पुराना मागिता । मिया मिहितम्- दीपवर्म नमानीप गाने निसाप मारोहनमरणध प्रीयास्तापपारदन्यस्पापारामस्पायप्रयो मगति' इति । न स्ति विविध पिशायमामिमम स्यादिवि। सापोरप्पहारापाम्पन्तरानुष्ठपासु किपात पवमानस्य मास्ति मित्र रिस्रोतसागमनमिति । मपरा पर पतारापरवी नविन पिटन प्य प्रापिता परिमोगम, प्रविपमध तया, १-47-4 11-सार-प..11- प्रतिक-प I +m-4...1-8- -प । - - ८-स।

८१ पपपमानशास्त्रमागावाम् [सप्तमोऽधिकार, बाट पाया भक्षा परिक्षाप क्वभिमार्प सम्म गृाम्पापारे नियुख्छ । प्रातरेष पाप्रमार्बमगोमुक्त कापमाणमभाग्नाविभपपरयनपरिक्पषमानमावनोपपमहणालटेनपाइपमानाम् मनामेकाम्पमा सम्प्रेण निद्रामासादयति । तस्मा मुरादेष विप्रार्थना कमा म्पपेता। सामोरप्पाचार-म्पप्रस्य विमरत्वान्पा विपपादिसति । मत संपमयोगैयरमा निरन्तर म्याका कार्य संपमा समदराभेदा सविपया योगप्पापापा, तपस्मा मापवो पत्र पर्य इति ॥ १२.1 मप–पिसाबको कला बोर कुम्भके रमनको समर बारमाको सर्परा सपमझे पान परमे मापे रहना चाहिए। मावाप-विासी बनिपने मा-बरसे एक पिनाचको पशमें कर मिा । पिसाबमे ग्रा-मो सबा कोई न कोई काम करनेको बता दते समा चाहिए । बभी मुझे बता नही मिलेगी, तमी में मापको मार मा । परियेने यह बात मानी और उसे पर पार परमे, ठमें धम्माल्य मकर रखने का सोना चांदी पोरखसे भरपूर करनेकी बाबा । मिवाचने उसका पान बिमा और नि महा मामी । बान ने कहा-एक मामा बाँस पर उसे रकबामममें गादो और बक में Tी भाडा नबा पर पो बोर ठमो। ऐसा करने से विधायकोई ऐसा बासर नहीं मिडकर, किम पनियेके प्राम सके। इसी प्रकारको साधु के बदर बाबरन करनेके पोग्म विषावोंक पासममें खापर प्रताप कमी मी प्रमार मौरके पशीभूत महरा होता। इसका एक भी। किसी दुराचारीकी की एक टी पुपरीपर पसी। उसने उससे संभोग प्राना की। पाये उसे तीकार कर लिया। उसकी सासको ना पर बात मालूम ई तो उसने बारे करके काम पायमें या दिपा । चारी र पुमा उठ्ने दी मरमें देती की, उसक बार गायोंछे सानी बरती की उसके पार बर्तन माती मोक्ष दी, फिर रसोई बनाती थी। पर परके समग मोगम करते थे वो फिर न मन्त्री भीमपीपी पाम्प बोगटी पाप-पैर भोती पी सासको भगाय पी। इत्पाद बनेको दिन-रावनी ही पी। पतको मोनेल समप भी कठिनास मिल पाया। इस प्रकार के सममें फस गाने कारणमा उस दुराचारी मनुमा मात्र ही भूल गई। इसी प्रकारचे साए अपने बाबर पाम्नमें दिन-पत मा प्रब उसे विपर कोराकी कवा मूगी मारी। नामाचे सदर संपम्के म्पापर माप ना चाहिए। एप विहितबिमालयनम्पप्र पेरिस मोगमारणेषु माषपेनिस्पताम् स्पार-- इस प्रकार को साधु शापिहित मनमोके पाम्नमें तारराव से इसक सम्पनी मोन कारमा बतिस्पतापमचार करना चाहिए, पात्रते - १-माप । २-या-मु । -मा स-फसाये-401 । चारिका १२१ १२२] प्रशमरतिप्रकरणम् क्षणविपरिणामधर्मा मानामृद्धिसमुदया सर्व । सर्वे च शोकजनका सयोगा विप्रयोगान्ता १२१ ॥ टीप-सणेन विपरिणाममा विद्यमा कस्सापाम् । इस्सिा परिणामपमा सदा प्रीतिकारिणासन्तोश्रीविद्यारिणः परिणतिविशेपोचायन्ते सत्सेमैप कानाम्पसमावा भवन्ति। मरपपमाणो मत्या' तेपामृदिसमुदयों विभूविसमुइया पनपाम्पहिरण्यसुवर्मादपाः सर्वे दमिणो सरमपुरविपनिवासिबपिग्दपरिभूतिसमपन् मन्यपास्पद प्रतिपमा पोस्नेतको नियमे म स्पु । संयोगाः पुमपनीममतपो विप्रयोगाम्वा एव भवन्ति । म सनु पमित्संयोगोऽस्स्या- स्पन्तिः। इति भावपसोऽमिनापस्तेषु न मरतीति । १२१ ॥ मय-ममुपोशी समी सम्परा कमरमें बदम्मेवी है। समी सपोग बन्तम योग पाने वारण योकको पैरा करते हैं। भावाप-मनुष्य समापसे ही मस्युव बाहर है। उसकी पन पम्प सम्पदा मी ममरमें होती है। रसाएँ उसे बार प्यारी मगठीही कसरी गने घाती है। परथी, पुगेर सम्पप भी बनमें रिपोगक लिए ही रोता है। कोई समन्य सर्व मापनावर उम्से रंजीव ऐसा मचा रहनेसे उनमें अभिनपा नही। तस्माम विधि विपपपुलामिठापेण इति दपायचार- बम विपप-मुखकी ममिगपा करना म्पर्य है या बताते है भोगमुखे किमनित्यैर्भययहुले कांक्षिते परायचे । नित्यमभयमात्मस्य प्रशमसुख तत्र यतितव्यम् ॥ १२२ ॥ टी-मुम्पम्त इति मोगा शमादप दमानितानि मुखानि भोगसुखानि । तानि पोखम म्पायेनानित्यानि। रिम् इति मपे। मरिधिरेमिः इस्पभिमाया। भाषपन् परिमापावामिभूपतिम्पो नित्यमेवपाते। भोगसुखकारणे फेदिसमुइयेषु भपपासेषु प्रभूत. मपेप। वाभि इति-भमिठापित। परापर्च' पनि प्रमादिपिपापतः। ममोहारिस सम्पादित सामु मुसमुपवायवे मागरवामिति । तस्माचपु ममिरापमदाय निस्पम्-मास्पम्ति पम्, मभयम्-मरिपमामभीतिरम्, मास्मस्पम्-मारमापचे न पराप प्रशमसुल मम्पस्फ स्मारधदिएस्पोपताम्वरूपापस्प परिमम् । तर पपस्ता बाप भति । १२२ ॥ मप-जनित्प, मपसे मि, मोर परापान मोगा मा पा माम। समता- सपी सनिाप , मोहितोपानी मामा म उसमें से प्रपत्र बना पिए। पायाभी-HEWI- 1-43समापी-1-पान- IR-4.- रशिलापमान - नर--01- - - पपवनसानमासयाम् [भएमोऽधिकार, मापना मापाप-मोगोंसे उत्पन हमारा समाप ऐता , त-दिन चोरोप, कुटुमियोप, मामका मीर राराका मम भगाया है। रायमारिक पियोंके प्राट होनेपर रोष पप महीरोजाबता उसकी बीम न करके और पके सागसे अपम होना समवरूपी मुखये मात्र का प्रफलमा पाहिए। पर मर निस्प है। इसमें किसी प्रकारका मनोरम पर परवीन सब मुममेव पति बयतवि- पर मुखम है यह बात है यावत्स्वविपयलिप्सोरक्षसमूहस्य चेष्टपते तुष्टौ । तावत्तस्यैव जये वरतरमशठ फूतो यनः ॥ १२३ ॥ टीम-ममसमास्प-मन्त्रिपप्रामस्प सक्सिपरिम्सो पाम्दारिरिपयामिवापिमा पाबादीम् सपरिपपान् सम्भुमिगत तरी पिये तम्ये पापचस्पते स्पासा कियते । तापचय बमे ममसमूहस्पामिमो निमो नियमने परतरं शोमनव, पागुणमण्ठं मापापविना दिवन पहा स्वार परखरममयम् इति फिपाविक्षेपपम् । पर वन कियते स परवरमयति । स्वप प्रामसुख पमम् ॥ १३॥ मर्म-अपने विपाकी मुफ इशयोंकी साधिकए बिना प्रथम निप्प बाग ठमके पौतम एकपट दिव उमाप्रपन करना श्रेष्ठ है। भाषाय-ददिया था। बपने Aपोको पारती है । उमें सेवर के लिए ममुण रिखमा प्रपन सब उना प्रयास की सरक विचसे इन्द्रियोकरमन करनमे मा गायेगे उससे महम प्राति पर सकी। तपा- यसर्वविषयकालोद्भवं सुखं प्राप्यते सरागेण । तदनन्तकोटिगुणित मुधैव लमते विगतरागः ॥ १२४ ॥ का-पमुल सम्पत्पिमसामग्पामाचारितापाम् म्यूवम् उपबातम् अपमेष पगस्ता भूपासापासेन प्राप्पवे । तदेव सुखमनम्तामिः घटिमिषितम् मम्पस्व मुपैर बिना मूस्मेन पिना पापासेन सिमक्षपणा सममुसमरामोतीति ॥ १२४ ॥ मर्प-पनी मनुष्प सब नोक प्राविसे उत्पथ गए विस पुरको प्राप्त करता ८ वी मनुप्प उससे बात कोटिगुने मुभको सहर ही में प्राप्त करता है। भाषाप-गौ मनुप्पको सांसारिक पाने के एि नियामरके पी इस सती एम्स प्रालिले ए दिन-रात परिकम परता. न कहा दोबास र निम्बर बीरगी - - वा कारिका १२१ १२२ १२२ १२६] । प्रभमरतिपकरणम् मनुप्प समस्त विम्तायोंसे मुल होने के कारण उससे बनम्तगुने मुसो बिना परिश्रम किय ही प्राप्त कर देता है। क्योंकि मामिक-मुश्के लिए किसी परपदापैकी भावस्पकता नही होती है। बोर मी इष्टवियोगाप्रियसप्रयोगकामसमुद्भवं दु खम् । पामोति तत्सरागो न सस्पृशति तद्विगतराग ॥ १२५ ॥ टीका-एस्प अप्पा पुमादेवा हिरण्पसुपदियो वियोगे, मनिप्ठस्य पाप्रियस्प संपोगे इष्रे तावविप्रपोगाफात मनिष्टे प विपपोगा तस्या बापाः समुन्तम्-उत्पन पाल सरागो विपपमुमामिधापी पत् प्राप्नोति तास विगतरागो न संस्पृशति-नासादपति। विगतरागण मध्यस्पेन सप प्राप्यते ' सपा ॥ १५ ॥ मप-एका वियोग, बनिएका संपोग इसके वियोग न होनेकी इम, बोर भनिएक सपोन होनेको इम्यासे होनेवाग बोस मरागीको उठाना परता देवीवानीको यह इमा श्य मी माही। मावा- पुत्र उमेरहका प्रयोग हो बानेपर तपा बनिए-बपिय पस्तुका सपोग हो बालेपर गोको गार वारे वा रात-दिन ए पी चाहता रहता है किसी इस बस्तुका उसके योग मो और बनिएका पोग न हो। किन्तु वीतरागी इप और विपमें सममुदि होता है। उसे प-योग बोर बनिए-सयोगसे होनेवाग इस कभी मही होता । प्रशमितवेदक्पायस्य हास्यरत्यरतिशोकनिमृतस्य । भयफत्सानिरभिभवस्य यत्सुख तत्कुतोऽन्येपाम् ॥ १२६ ।। टीन-प्रशमिता प्रशम नीता पेकपापा पेन । बेदाः मी पुषप्सफामपाः । पायाः कोपारया । वेदोवपासुमानमिठपति सिपम् स्त्री प पुर्मासम् तमय नपुसा तमयाब [वदुमयस्प बामा-] मप्राप्तो सम् । प्रशमितवेदस्प तब मदि। क्रोपापग्म्पार्शपितोऽपि रातमागेप बापते । शमितरूपापस्मातु तदमागः1 हास्म पाहपतिः रवि प्रीतिपिपयेपु सक्ति । मतिदेगः। पोको मानस समिविपोगावी। एतेषु हास्पादिपु मोहमदेप निमृता सस्सा सस्पपि दास्पारणे नास्ति हास्पं न रतिमापतिः। सस्थापि तस्कारप्पेषु मनिस्पता भाषना ववम शोऽपि नास्पेव । मपमिागेोदि सप्तविषम् । यस्ता मुगुप्सा निम्मा। साप्प निस्पतामापनात पबनिनिता। भपमपि सापएम्ममेष मपफारणापगमावा पिवयते । एवं मप प्रत्ताम्मामनमिभूतस्य यम्मुख प्रशाम्तपेतसा तक्ततोऽम्पा रागिणामिति ॥ १२ ॥ -निप-फ.। -पुतामि-फ,01 -मुखाच-पामार-. । ५- मा रत्न नप प्रतिपाति । -रा-फ, प.1-म्पास्मस तममास मु.।

- रापपचनशासमामपाम् [वमोऽधिमाल, माला मर्प-रिसने मेरा सामों को ग्राम्स मरया , रात रवि, बी वीर गोमें ये स्वस्थ पता ६ वा मप और मासे गो पराभूत नहीं होता, उसे बोस होत्यप ससस कसे प्राप्त हो सकता। भाषाप-रके परपसे पुरुप पीकी बमिपाकर सो पुरुपकी बमिडापा की मोर मासह दोनों अमिगपा करता है। उनके म निम्नैपर रीवा है कि सिन्ध केर सातरोगता है उसे पास महाँ होनासी प्रकार पापी माम मामा मामी में गुल्मी की होता । शिसभी पाप गत ऐ बाती ६ उसे पापमोहोवा । सीता मस्थ मेरसको भी एक कप गानमा चाहिए। इसके कारण उपस्थित होनेपर मी गोपाल महारय, प्राधिक कमन उपस्पित होनेपर मी किसीसे प्री महरम' तोगकारक उपरिक्स होनेपर मी टीम नही रोजगार शोकके मम उपस्थित होनेपर मा घोकमही करवा जिसे किसी प्रकारका मब सतायो र म यो मिन्के बसमें ऐवा , उस समदसा मनुम्पको पोस होगा एपी सोको कैसे प्राप्त हो सकता है। पुमा प्राममुखस्योत्वस शिपयनादिरायचार- फिर मी मिपम मुबसे प्रामम्प पुरको मतप बगवे। सम्पम्हष्टिांनी प्यानतपोयळयुतोभ्यनुपशान्त । ते लमते न गुणं यं प्रशमगुणमुपाश्रितो लभते ॥ १२७ ॥ मंत्र-वियोपरदिका सम्पदर्शमसम्पन्न, पपासमयं च मस्पाविज्ञानेन युक्त, भुमम्मानयन प पुकोऽपि सम्मनुपशाच-मसामिव दक्पापोऽनुपमान्त न मते म पामोवि प्रशमगुलमुपाभिवो 4 गुपं ग्मने बानपरियोपत्रपम्म निमबरगुप च । म पानुपधाक गुपमयामोतीति । तस्मात् अमममसाव पवितम्पमिति । १७ ।। भ-सम्पम्प, नी भोर पान तथा तपोबस्ते पुष म मा परि बसन्त महो को उस गुमको प्राप्त महासमता, बो गुण प्रभम गुमसे बुध साधुने प्राव होता है। मापाप-कोई साधु सका बाद दोपोंसे रहित सम्मारक, सापोग्य मति वगैरह बाल, और एनसे पुरुहोपोरसा मारी वपत्ती मी-होमित पर उसके प्रम मोपारिक सम्त यहाँ पए तो उसे उतरान, चारित्र कोय उन गुोंधी प्राधि न हो सकती, मो गुभकाम बोपारिक तने सारे सार हमें प्रात ऐ जाते है। मह प्रम सुख प्राप्ति मिए प्रसन P करमावादि भूयोऽपि प्रसमायोसस्याफ्नापा:- पिन मी प्रसस एकमाता बताते है.

ARक १२-१२८] प्रशमरतिपकरणम् । ७ - - नेवास्ति राजराजस्य तत्सुख नेव देवराजस्य । यत्सुखमिहेव साधोलोकव्यापाररहितस्य ।। १२८ ॥ टीका-राबर-बरी बासुदेवादि। पुम्सकलमखमेमाधिपति, उत्तपेऽष भरतापिपतिः । मनुप्पसम्ममुतस्प प्ररूपगर्तिनापतौ। क्रास्पदचक्रवसिनोपि नास्ति तार मुलं पारणं प्रशमस्थितस्पति । वदिपक बिसुल प्रबाविसमृदिगनिवम् तस्य पानिस्पर्स प्राक प्रतिपादितम् । मकान्तेन मुखोतुत सम्मादीनां रिपरिमविषमत्तात् । देवेन्द्रस्प मुलं महर स्पाविति तदपि चोपरितनेन्द्रसुसपकपदसनात्तवाभिमा पुतिपिम्वनाम पुसम्पति कीर्णमेव । मपरा देवराम सरदेवोत्तमत्वानुत्तरपिमानवासी वस्यापि, यत्सुत तदपि सितिसर्य मनुम्पोपियुदरगर्वनिमम पालमनुचितपतस्तस्यापि म तारसमस्ति गुम्नशाम्माहित परिक्षक मुलं सामोर्मनुप्पसम्मनि प्रशमस्थितस्प पिनिहत्तसगावस्यात्मरितगोपियो विशिष्ट पानसमम्मितस्प छोकम्पापारहिवस्प। टोकापापार सम्पादिहात्तिनममोगसाधनोपादिस्सा। एरिपेम म्पापारेण हितस्प प्रसमसुल एष म्पबस्मापितयेतोमवेपस्मुलन तर पसरावे न देवपये प्रति ॥ १२८॥ मप-सांसारिक टोंसे रहित सापुछ इसी म यो ससमय सबन तोवर पचापोर मचको दी मुहम है और म देवराज इम्मोही मठम है। भाषाय-बाबी अपना बसुदेव बगेर वर्षचा रागाोंके रामाकरेगा है। पकाची समस्त मरममा स्ामी होता।ये दोनों ही पर मनुप्प पर्याप सबसे डरे होते हैं। स्तिपमें भी पुरमही होता यो मिरत साधुको होगा। क्योंकि पानी बरहका पुरा सांसारिक रिपयों पर मासे उत्पम रोता दबट मामिल है। यह बात पारे बन बापे हैं कि विपप सपा सबक देनेग्रामहरी, स्यों में स्थापी नहीं होते है। रेम्पपेपमें इनका पर सासे टकर फितु इसको भी अपनसे उपरके एमोंधेरेसस उसी गाय सती रहती है और मप समीप मानेपर वहाँसे पुत्र की सिय मताने मारी है। मनः मन मग कर होनेपर मी एबसे मिमामा।बा सयों में उत्तम होने धारण पनुपरबासो देशको मार सकते हैं। देशमुके रिनारा और मनुप्प पोनिमें पुनः उम्म ने इसके चार करमेपर उनका पुष भी इसे मिग एका प्रतीत हो गया है। मक वैशम्पमें मान समस्त मनो हित बरमशिवको दोगनेगळे विस हानी और सांसारिक प्रवृत्तियोंसे रहने सामुइसी चम्पमें गोपनासमो परामोंके गये प्राप्त रमलों । पण प्राप्त है। १-फानी पासपुरेपचारिप-मु.। -पक-फ..

१८ रायचायनशास्त्रमाला लायाम् मोऽधिकार, माना प्रक्षमापुसमेव पुमा समपति- प्रशम हम्को पुन सुजसा सत्यज्य लोकचिन्तामात्मपरिज्ञानचिन्तनेभिरत । जितरोपलोममदन सुखमास्ते निर्वर साधु ॥ १२९ ॥ टीका-गोकः सबमः परिबनय ददिपपा चिन्ता पारिपोर्माग्वादिनसमा मध्यपुष्पानाम परगो दुर्गतिप्राप्तिग्समा, तो परित्यम्प पिाप मास्मनापपिानम्-मनादी संसारेऽपमात्मा शापषि मानसानिमाम्पनुमा तप्ताकाममोगसुमेरूपमपि ममुप्पसम्मा सादितवान् मोपिध तरभुना यया संसारे बहसंघट म भ्रमति वा प्रपस्नः कार्यों मपा इति मारमायामचिन्तन पवामिरता परकायपिमुस । बिताः परिभूता रोपगोममरनावको मेन । रोपमापार पर सोमप्राणाबाग ममप्रापात् पुसदापि । एतबपाच मुलमास्ते-स्वस्त स्तिठस्पुपवारितः । मरा रोगविशेपा, वेन प्रस्तः परितापधिधिरतसमेन' विमपिलान् कमास्ते । स पवियो निगतोऽपतो भरो पस्मात स मिषः । मार इस मरो पेपडोममय नाम्पा । मोमसापनाम्मुफ्ता सामुरिति ॥ १९ ॥ मर्मतमा परचनको पिताको मेसकर वारमाशामके बिल ममग एमा को ग रेप और कामको सातवेगामा बदएन बीरोग मा साधु बासनपूर्वक पता। भाषा-अपने गुम्मियों और रसरे गेगोगेक करते है। उसकी रहिव्य, बनाना- पना, पुम्प न करनेपर परोको पुर्नतिको प्राप्ति, इस्पानि मावोका दबार रया गोकविता। साधु समास दूर रहता है। तपा सदा पाचार करवा पाकि- इस संसारमें हारिक पोर मानसिक गुम्मों को मोगते गए और काम मोगसे कमी तस न होठे हुए इस मारमाने मसी क्या मनुष्पसम्म भीरमान प्राप्त किया है। मट बर मुझे ऐसा प्रश्न करना चापिए निमसे दुम्से मे पर इस ससारमें पुन' भ्रममा नरमा परे । तया समग मोर कामको जीव नेपाल प्रसाद रोगपत हो पाता है कि रामाविक गारिक रोगोंके समान ही दुरापी है। बतः संसारके कोमोको पिता प्रेमात पारिन्न करनेवाण तपनी साधु पुचक निवित पारे। संत्पम्प छोपिम्वाम् इस्पतम् । ततम परिस्परमेषित मरणपोषमारी तिरात्मना सान्। स्पाइ- मर की मेगनेका निर्देश दिया है। मरमेकी पिसाबका साथ अपना मरण-गोपन से लेगा। इसका समाधान है। या चेह लोकवार्ता शरीरवार्ता तपस्विनां या च । सदर्मचरणवार्तानिमिचकं तद्वयमपीष्टम् ॥ १३० ।। १-नए प. फ। - स हरका १२९ १३ १९१] प्रथमविप्रकरणम् टीवा-बर्तन इतिः भरणपोपणाविका चिरेवशारा पस्पाविपते सा बाता मपि पमुपास्पबामिम्पादि बोकस्य वार्ता तस्मा पिम्तनमेतावदेव डोकपातायामुपस्पिते मिभामा स्पापमपोपसामितेऽानाविप हिणमानोवारिसानुमतमशनादि पठम्पवे गोकमाता । पतस्वीरवार्तायाः परण मरति सानो शरीरमृत्ते शरीरस्थितेनिमित्तं भवति तपसिनाम्, तब पेय मोकलार्वा याच पस्मिना शरीरसंपारणगावा पत्तवादियमपि सदमपरमाता मिमिसामिष्टम् । सदो दशासपक समादिः । चरण मनोसरगुणकलापः । सदमपरमाप्ति समचरणपाता। सबमवरपारमन्तर फारम गरीरसंपारणम् पारीरसमारणासोपा पाशिरणम् । पारम्पपेण सदर्मवरणमाया को बाता कारणमिति ॥॥॥ मप-यो डोकवार्ता और शरीर-वार्ता सापुमोके समीचीन धर्म और चारित्रकी प्रवृधिमें करम दोनों भाषाप-बता सके दो बर्ष होते हैं-एक जीविका वीर सा बात । सेती पशु-पान म्पापार औरह गेक्वार्वा को गाते हैं । मिपाके योग्य कामें भरीरको स्पिति के लिए मोजम समेतक सिमित भ्रमण करता साधु कारित मोरनुमोदनास रहित मोबन कोर प्राप्त करता या पार्यायागेकपास मौके परकी स्तिविकता करण होती है। और ये दोनों ही बताए उत्तम मारिरूप धर्म और बगुन तपा उचरम्हगुमरूप पारित्रको प्रतिमें कारण होती है। मोकि मोबनके बिना धरी महाग सकता और घरीरको स्पिति बिना पर्माचरण नही सकता | बापमाचरममें सर-सव कारण है और शरीरको स्थितिका कारण लोकमार्गबत परम्परासे मेकपा मी धर्माचरणको प्रतिमें कारण । इसलिए प रोनो ही इए है। किन्तु इवना प्यान रपना चाहिए : शरीरका पिन्य सदनी दो पर्याप्त गितमी धर्माचरणके रिए भावापक हो वोर मोबनको पर्वामी मीही पर्याय तिमी घरीएको मापे रखनके लिए भापको। मपि प मोरपार्वाम्मेपणे प्रयोगनमिबमपरम्- बोकमार्गको रणने में एक दूसरा कारण मी बतात लोक खल्वाधार सपो ब्रह्मचारिणा यस्मात् । तस्माकविरुद्ध धमविरुद्धच सत्पाजम् ॥ १३ ॥ टी-गोर बनपाखत शम्शेत्रपारणे । गाफ पपारा सोपो प्रसपारिमा पस्मान-प्रम संपम सप्तवमा तपोगान् सममिनस्तेषां सर्वपामिति गपमासिनो ग. निगमाया तम्मा ताके पविश्य बातमवासासम्बनिराहावारिशेष मिमादिग्राम- मोम्पेप्प पपिापम् । या वायरप्युतमुक्तम्- सारमा एवं 10.1 -जि-फ..मो-.। -पर -1 रापाबममासमालयाम् [भोकम, माना नेपाल डिपो म पम्मापणसहि भत्तपापेठ । विपापणे परिष्टा बसेस ता पयत्तेप।१।' पच गोविन्द मधुमासम्मनीबानम्तापादि समसामनपिम्दमनक वपि पपिामिति ॥ ११॥ मर्य ---पर सभी सपमिमोश बापट करिमा बोर्मविर कापाको र देना चाहिए। मापार्ष-समी सम्मी में ही निगास करते है। जो काम कारबेरी- सम्म मामले सूताना मोर नाति परिमय बगेर मरोम भिमा ना, न करमा पारिए । मागे फार्म धर्मगम से मदिरा, पांस नाम और बनातकम्प मत्पतिका माग नैया, उने मी मरना चाहिए। वध सामाम्पि मेयोतः इति पर्णपति- अपोकाको कापामारी - देहो नासाधनको लोकाधीनानि साधनान्यस्य । सदर्मानुपरोधाचस्माको भिगमनीय ॥ १३२ ॥ टीम-परीरमापं मम ममसापनम् । तस्स रेस्पारोपभियप्या सारनम् सामनरशिवस्मयेस्पासमय एव । तानि पास्प सापनामि ठोधपीनानि शेकापतानि भवन्ति । मत फिम्। सदर्मानुपपेपान-समस्प क्षमादेपिरोपान बोप्रेमिगमनीपा-माता- मपणमेषमय करनीपम् इति । १३ ॥ मप-साएमके स्निा शरीर नही समसार उसके सापन गेकके वाचन है। बत समापीन धर्मकेविसका अनुसरण करना चार मागाप धर्म सापनका प्रधान परमार सरीरक सावन मोबन पोपके बिना शरीरका PRAL बसमनदी।पित समी साधनको मापीन है। गेष्मान करनी चाहिए कि इलमा पान रखना चाहिए कि बोकवार्ता धर्म: मिस । पर एसोपण मपति गुणदोपपोः इत्यार- रोपप गुणकी विधा मेसे होनी चाहिए, पर वे है:- दोपेणानुपकारी भवति परो येन येन विद्वेष्टि । स्वयमपि तरोपपदं सदा प्रयवेन परिहार्यम् ॥ १३३ ॥ -राम-फर । -मामा प। ३- - ब 1-4-4 फ।

कारका १३२ ११५११४] प्रशमतिप्रकरणम् टीका-पेन येनाम्यस्पमानेन फमणा पसे तोको मिटेष्ठि-कुम्पति, मपति बानुपकारी, प्रस्पुवापपरे प्रवर्तते । सपमपि मात्ममापि तदोपपई परिहार्पमप्रमचेन सवा मन्या सम् परस्प पिचिदप्रियकारणम् तस्य स्वयमपि सोपस्मान परिहायम् मनेनास्पाप्रिय मपति इति सकसपमापरहितेन परिस्पबनीयमिति । १५। भप-निस विस दोपसे दूसरे ठोग बनुश्कारी हो ना पकाने उगते है, उस रोष स्पानको सर्य मी सदा प्रयतपूर्वक पदेना चाहिए। मावार्य-दिन काोदेकरनेसे दूसरे लोग कोधित हो पाते हैं और आपकारतक करनेपर स्वार हो जाते हैं, बिना किसी प्रमारके उन बोको तुरन्त होर देना चाहिए । बर्षात् साधुने पदि किसी बादमीको कोई ऐसा पिप कार्य करते देखा बिससे गेग उसके रामन हो गये वो उस कचर्प- को दुराईका पर मानकर साधुको उससे बचना चाहिए। पर्यतत्पपिरणीप तपैतदपि ' इस्या- पिण्डेपणानिरुक्त फयाकस्यस्य यो विधि सत्रे । प्रइणोपभोगनियतस्प तेन नेवामयमय स्यात् ॥ १३ ॥ टीका-पिणेपणाम्पपने निरुत-निमपेमाभिहिता उदमोत्पादनपणावोपरपितो यो गिकि सनीपापनीया-मामत्याग्पनसमा समे पारम भागमे । प्रामे निपक परिमिवो प्रायो पपागममीपदोपो न भवति, उपभोगे पनिपता शामिंग्रतः कपनामा म्यूमानामेबाम्पबहार प्रयः । ताप्पायुक्तम्- मरमसणस्स समबनस्स पुजा बस्स दो माए । पायपपियारपट्ठा मार्ग उपर्प मा।। स्पच प्राणोपमोगनियतस्प पसनीपम्प तेन विपिनाऽभ्यपहिपमाणस्प म बार- गि मामपमपम्-मनीपानितम्यापिमपं भवेत् । पर्व १ मान्पारियोपामिकरणपपिारा पम्पोम प क्रिपासु मारपपिाणिः । तस्मादपप्पपयिारेणापरिमितानिपत मोगत्यागेन च मुभानस्प म विधिप्पतीति ॥ १३ ॥ मप-परमाममम पिमेषमा मामके बप्पपरमें प्राण र पोम्प बोर मामन योग्य रूप यो म बई उसी से गो साधु पमिका प्राण बोर पामिका उपमोन कर उसे कमी प्रेगका मप मी राख । १-तो-फ ०।२-वर-प-पेस-मुक। -परमपि-प-11-मासम- पर प्राम-प समापम म ।५-निममा फ .माप । - ૨ गपनशासमागणाम् [भामोऽपिघा, माला भाषा--परमानमा एक बप्पपन में मिलाकी विधि इसी में एमप्या- सर्गिसमा बप्पयन । इसमें बताया कि सापुके ग्राम करने पोप था मेरने योग्य क्या है। उसके अनुसार परि साधु परिमित भोग्न प्राम, विठसे उसे मन रमेन पाप व उपना परेनषा परिमित अर्थात् बचीस ग्रामसे कम ही मोनको, वो इसे बनी मम्मा पोय रोग नही हो सकते और पार्मिक सोंमें शनि होरेको समाना नहीबारी पर मितका पान करके भोजन करनेबारे साधुको कई रोप नही रमता। एतदेव स्पश्यनार~ सीधे स्पड करते है व्रणलेपाक्षोपानबदसङ्गयोगभरमारयानार्यम् । पभग इवाम्यवहरेदाहारं पुत्रपलवध ॥ १३५ ॥ टीका-पोपक्र ममोपानव इति मन्तब्यम्। वामपस्वाषामेमरेपो पाता पूपाविरिपसहने भवता । मतोऽतिमात्रयाऽपिबितरमेव मानम् । मक्षस्व उपा मम्पयनम् दब नबनीवादितारमाममेव दीपते पामता प्रकट भारमुदाति मनापासेन । पास्तीति हा प्रश्नम नानीतादरम्पचनस्प दानम् निष्फरसात् । ऐर सामुनाऽपि न संपणापमापमानमसापोगमरमामपापाप कार्मम । सास्नेहा योगा मनोभाया। योगेषु सरीपरिष छावग्यमबापासमपपिपेऽसमतोऽसायोगा-पोगेपसंगा | पोगाना मर-निपाठनम् । पापता क्रियासमय शरीरादि मावि तापम्माममेषाम्मपति, माविरितम् । पामा पसपिपवनारसमाचारिस्वाप्पापभिसामपावित्र, पामा तापम्। पपार- पिसारसम्म मुंबता मोदम्परम् । पम्मपुराणापात्प भरपसोपगोपपर्य।१। मोबनैपणामपियाह- पचग साम्पारेवापारम्। सोहि मस्पमपिता न पमाघरवि प्रस्व एवं गिक्षस्व सपा सापुरपि भुधामो न परोवि।सपा पापा मो पामाउ हपाठ पारिन पुप संकर्ममा पारिवाठ बाम स्वादि। अपग-पर्व मासम् पुपमासम् इस्पषं। पुमराहोऽपस्पषमा | पिमतपुर पापादितविधांसास्वादनपरित । मपममिमाया-पितातुमा ममपवस्तम्मास न मास्ति रसगावपम् एपररमणायमेव रेल साम्पामाससारित मरसार्यपापा मासोपयोगा। तमा सामाऽपि रसेप्मादेन परिवर्थितन पपाहम्म-अपनीयम्-मोहम्पमिति ॥ १॥५॥ १-4-4 । पिमम्-प | को-प । -पुष मार-फ।।

कारिका १३९ १३६] प्रशमविप्रकरणम् मप-परीरादिको निस्पक्षता, संपमका निर्वाह गीर पात्राके लिए पाके पकी तरह, गारी परिपके बगल की तरह, और पुत्रके मांस तरह सापकी नाई माग्न बना चाहिए। मापाय--पापपर उसना ही पगाना चाहिए, तिने से उसका मबाद रहो सकबोर पार मर सक । उससे अधिक प गाना पकार है। परियेको भागते समय उतना होते देना चाहिए जिससे गादो सम्ाफ साप मोटो सके। अधिक वे दना देकर है। इसी प्रकार सामु मी मूमरूपी पाबको एमके लिए बाहररूपी पो उठना होता है, जितनेस धरोगदिको पापम्प और सर्ग गैदा मात्र उत्पथमोपोर मरीरारिक निस्प-नियाम करनेमें -साम्पाय भिक्षाटन बगेर तरा गमनागमन करने में समर्प बना रह। वा साप वैसे अपने बाहारको बट निगल जाता है-सबा पा कर मी पाता, से ही साधु भी चबा चबा कर नही मावा । तपा- जिस प्रकार पुनके द्वारा मारी गई पुत्रीका माँस उसक पिता वगैरहम का अपने भरिकी रवा लिए ही गाया पा उस मासके स्वाद में उनकी कोई भासचिनही पी, रेसे हो साधुको भी स्वाद मासळ न होकर समासूम सा निकाय, साना चाहिए । पुनरम्यवहारमेप विनिमशि- फिर मी मोबना दो बारेमें करते? गुणवदमूर्छितमनमा तद्विपरीतमपि चापटुटेन । दारूपमतिना मवति कल्यमास्वाद्यमास्वाद्यम् ॥ १३६ ।। टीका-गुणपन्तएरसगम्यम् । मूर्षितं प्रीत पगयुतं तो यस्य स मूठितमनाम मूठितमना ममूर्णितमनाः देन ममूर्षितमनसा मन्त्यमास्वाप मोम्पमिति । तदिपरीतमिति ममनोवमनिरसगम्पम् । तदपि भटन मविष्टेन देपलितेन इस्पा । पाप्रासापनमाप्रमा उममीहस्प परिविक्षपणीपमरावऐन विप्तनाम्पवरेन् । बारुपमा प्रतिपस्पामिकारिणी। काष्ठं हि बाप्पारिभिस्तम्पमाणं न वेपं भवत नापि पमनपुप्पानिमिा पुग्पमान राग- मुदाति। यपा तरचतन रागदपतं तवत्सासु मापि सत्यपि पवनामानिएऽपामाम सवि मोकम्पम् भरतदिष्टेन फत्पनीपमाम्बापेभसापम् । पुनः माम्पापम् ' ति मोत. म्पम् 'स्पयः । ११४।। मप-एक समान पैशाखी साधु परम कामरे योग्य सादिक्ष मोगना परत मन मोर सादरहित मोजनको भी पीठ मनस पनि समारोप मोना योग्य मोसम होगा। -माग- । - वस्म मु.। -- छ .. ।५ ---- रापचन्द्रनमानमामबाम् [बमोऽधिकार, माया मापाप-पतीको यदि बसूनसे मेवोपदेप नोकरी, मोर पदि पुप समन वगैगसे उसकी एग करो तो यह राग नहीं करती। उसी प्रकार सापु सचेतत होनेपर भी इस बार बना सम्पाममें रमपमही करता । इस मा राग और रेप रविव मनसे फिसा मा मोबन ही सापुका उपपुच मोबन होता है। 'तब मोबन भावपेसमभ्पपड़ियमाणं मागीविवोपरि भवति इति वसंपति- कागरिक की अपेक्षासै प्रान किसा मा मोबम, वार्म बगेय रोगोंको सपन मही करता, यह बताते काल क्षेत्रं मात्र स्वात्म्यं द्रव्यगुरुलाघवं स्ववलम् । नात्वा योऽम्पवहार्य मुझे किं भेफ्जेस्तस्य ॥ १३७ ॥ टी-मोरमा कागेऽपेक्षपीप प्रीप्मासिशिरमेकप्रीप्मे एपानी पासम्म मतः ससवर भुरके यन मक पान मानव श्रीपते । तया पाम सापारणं भाई पान पपोपपदमाग यो मपति तपाभुरते। मिशिरे पोरमेव मुस्ले सासवरमुदम्मापिबति । तमा धे सोपेस्पम् मम लिग शिशिरं च विधा पमम् । वम से पुरानी पामतमोगी भरति । स्मिग्मे सम्पावविरपे माममाम्पमार राति पपा मुबरं मपति ! वा शिशिरमेने सीता पम्मीफ्यो मनपरिपाक मुनो मगति पपा माऽममार्तमम् । माषा निवाप्रियतापेसा । प्रमाणयुक्तोऽप्पाहारा पसचिव समते. मता वारसी मात्रा पतम्पा बा मुबप भवति। साम्प इति समापः । स्पषिवत्पन्चलिम्प पपवार मन परिषमते पस्पचिया, सम्पाचिन्मयः । विम्याम्पसम्पर्गेऽपि स्पषित मुबागा, स्पषिमुसकरा, स्वास्पस्पानेकपभरवात् । दम्म माहिर रपि भीरपा गुरु, बन गम्ब पपि पयोमा । एवमम्मेषामपि प्रमाना गौरव गर्व मनापाम्पोदनादीना शिप मम मावकोपानि म्पामिपितमापित चमात्या पाऽम्पमार्यमचापि भुरके कि मेपर- स्तस्प इकिपिपिरोपस्तस्प प्रपोवनम्। ममरणानिहित मेपमानि यः ॥१४॥ पर्व-कर क्षेत्र, मात्रा, समात्र, इम्पका मापना भो हापमा वा अपनी पतिको जानकर को मोगम करम ससे मोवपिसे स्पा प्रमोबन । भाषा-मोजाको गी मी बोर पारमा पाम रबर मोबन ममा पारिए। गयों पानी बक्षिक पीना चाहिए और भोग्न कम होना चाहिए। जिससे मोरब सरबतासे सम्म हो सके। इनमें साफारम पान-पान का परवा चाहिए, रितने से पेट म्य माग गया माम रमिला परतीमा पानी कम पीना चाहिए। मोवाको हो पिको मोरी प्ररेण्य पान रखकर मोग्न करना चाथिए । पिले प्रधान प्रदेशमें परिमित मोबन करना चाहिए। १-०२-या पाव- । -4.-.। ५. पान- पायोमासम-फ. ०।

। मरका १७१३८] पशमतिप्रकरणम् सोठ (बठियापार) वगैरह से प्रदेशमें पेटका या माग पा रहार भोजन करना चाहिए। शीतपमान कासीर मरहमें समा मोबन करना चाहिए किया ससक एरम ऐ सके। मा मोउनकी मात्राका मी मान मना रही परिस्ति माहार मी किसी किसीकोहम महोता। बस माहारको माय इतनी होनी चाहिए, जिसका सरबतासे पाचन हो सके। सपा मोगन प्राण करते समय अपने समाका मी प्यान रखना चाहिए । चिसोको बापत रिजन मोगन ही बना पाता है, और किसीको सूमा मोमन अनुग परता है तपा किसीको न भनि विग भौर न वधिक सूगा मोसम बनुन परता है। विर सहयोंका सयोग मी किसीको अनुकूल पम्वा है और किसी को प्रशिक परवा । म काकी- मारी ऐता और गौका पी-ष का होता है। मोसम सम्प मोजनके माधन और तपनका मी प्यान रखना चाहिए तपा अपनी प्रति मोरहका भी ध्यान रमना पाहिए कि मुझे बात वगैरहको कोई म्पाधि तो नही है। उन सब बातोका प्पान समारो मोबन करता है उसे कमी गोपनि मनेकी भापकता नहीं पाती, पोंकि म कमी बीमार नही पर। मर्नु प पिणपतिपयवसपापादि परिरहन् कपमधिमा म्यात्मापुरपणिो मन् । इस्या- शका-मोमन, बामप, बस, पात्र मोह प्रहम करनवा साधुको अपरिमाही कसे घाया समासका समाधान करत- पिण्ड शय्यावलेपणादि पात्रेपणादि यच्चान्यत् । कस्याकल्प्य सदर्मदेहरक्षानिमित्वोक्तम् ॥ १३८ ॥ टोडा- पिरति माहारमर्षियोऽशनीपादि । शम्पा पविभपः । स पाप- परपोपहरुमुलपस्मिनगि । मारिमाणात बलपाणे यो विपिठकः स स परिगृहाते। पापप्राणान् प्रविप्राकमामध्माणम् । साप्याविप्राणाम् पाप्रपपारिपा पो बिपि तम्पापि माणम्। पपाम्पत् पति मोपप्रतिक आदि सहीत पसनीय तागात्सगवः सदम- रमानिमिचोकम् । देश परीरम् सो पक्षणसमाधि। शरीरममे सति सदमरसर्फ सम्मस्वादमानुपानस्म । शरीर संपमानुष्ठानापं पोप्पत समावेपमस्पापारस्तविति। समीपस्थ पासामे उपुतग्योपासेपन प्राग्वापाकमप्राणम् । एष सम्पारनपाप्रवनका रिपपि योम्पम् । साप विपया सापपारा मयुनरापम् । एवं सदमामा परमपाप प सपमुनम् । म पासी पग्निमाम्शितत्तत् । मूण परिग्रहः इति वक्षमारिविunl मप-II पा लिपिक और पार-एमा त पम्प यो प्रान कान पोपकार महम कम योग्य का किया सम समीचीन पर्व और कोया मिस हो। . 11-01-15 ए. ..॥-पार पर्ष रिमा-माप IR-414-4स - .

. - रापरम्नमासमागवाम् [मोऽका, मामा भावाब-वादि पपसे और पान मार करने को मि पाई गई। उस पित्र प्राण किया गया है। पाम्प परसे दणात ग्राम किपा) इन सब वस्तुओं का प्राम पर्म बोर रिकी रक्षा के निमिपसे किया नाता है। मसला होनेपर ही धर्मकी बाहो सकती है क्योंकि पीनानक भूक शरीर है।सपके पाम्न बरमके लिए ही परीरका पोपन किया गमता है। इसीलिए सबमि वासरूपसे ग्राम करने योग्य बस्तुके प्राणी विधान, तपापि यार अपमाररूपसे प्राण करने पोप बलकाममनोवो बस्तदोलसे पुज रस्तके महम करमेका दिवान किया। मधुमके सिमाम अम्प समी लियो अपवाद है। इस प्रकार की रमाक या समक्षात पर मानही त्रागा सकता क्योंकि साधको उनमें ममल नही रहता भोर ममोही परिग्रह करते है। एवमुक्ता निम्परिमाता, सैप स्पय पुम किप~ उसी माताको शिर मी स्पा करते कल्याकल्यविभिन्न संविमसहायको विनीतात्मा। दोपलिनेऽपि लोके प्रविहरति मुनिर्निरुपलेप ॥ १३९ ॥ टीकम्पमीर्य पम्प्यम्-उमाविमुबमाबारोपमिशम्पादि। समाविश्वास नीपम् । वस्प विधि-विधामम्- पनामेन शरीरैमाए इयर्यात् मति मनपनापेनाप्न सता कार्प यजमता पावरमेन मार्गेप इस्पेन विधि। तबानातीति अम्बामापरिमिता। मंरिम सापका संक्षिप्रा संसार मीरपो शामकिया या परं विमा सहाया पस्स संविग्रसमाप । मसाायः मुसहापोगा। वितीतारमेति-विशेपेण नीव मात्मा गानवर्सन पारिभोपचारविनवणापता स पिनीतारमा । पपतिमा साना हापमभिनेऽपि गरेमामलिने पि मनुम्पमके। एगोपी वा पोपताम्पामर्य ममिनो एपितः सो स्मेका पविमो मप्पास्वपि प्रकच विविधममेकअपर मो इति प्रपिरति मुनि निपपा-रागडे मामस्पर सर्वपनविनासपरिपा पा मेम मूवमननामस्तो निरापरप इति । कर्मागास पूर्वपचमोमणाय परतत इति ॥ १३९॥ मर्प-सेनयमावर वसनीयकी विधिको जामता, संसारसे भयमात संपभी बम गिसक सहायक और रिसने अपनी मम्मको हाम, बन तिन मोर उपचार निमसे पुष कर पामा साधु रानीपन रक्ति मेको मी राग इसे आमाRRER करता है। मागाय-मारिसे पर बारादिकको पासप पाते हैं। और उनमार दोपों पुछ माहारादिकको मनमानी करते है। मानवीय वस्तुओंसे शरीरकी सा कानी पारिर । परि करसमाप नो अप्समापसे मी रमन किया ग सकास्पादि ARTजो सापुस पिको जानता है संसामा संयमी गोंधी गोरी, सवा Reोपदोपोंसे भोपसमें मी एक -पुमा पुगसमेकिराये प 1-4 11-12- - कारिका १३९१५ ११] प्रामरतिपमपम् हित होकर मचाता है। उसकीन कर्म-कब नहीं होता पपा पर बरे हुए कमांकी निर्गरा होती सकिनपिपी मोर प्रति करनेकी ANको मानता है। पर्य पुनर्वापरलोकान्तपाती ससस्तससर्गो दोपेन लिप्यते इत्पाह- दोपोंसे भरे ए सोको एकर मोर उसके साप सम्मन रसकर मी साधु दोपोंसे लिप्स पो नहीं होता। इसका समाधान करते हैं यद्वत्पाधारमपि पङ्कज नोपलिप्यते तेन । भोपकरणधृतवपुरपि साघुरलेपकस्तद्वत् ॥ १४०॥ टीका- पदेत् इति इष्टयम्तोपग्यासे । यथा पशुपार पामध्यात्पर्ध पामध्ये सित पा पार महिनं। नोपमिप्यते न स्पृश्पते कामेम। धर्मोपकरणमतवपुरपि सापुरपका- धर्माममुपकर धर्मोपकरण रबोदरणमुसालिका बोरपापात्पादि वेन भूतपुरपि शरीर सरसोऽपि सम्पतिरिकत्रीमकायावसरमणाय साधुरखेपफ एप डोमोपेण न स्पृश्यते गुवा- धपत्वात् भहितस्यात्' इस्पर्पः ॥ १५ ॥ मर्प-निस प्रकार कीपासे उत्पम होनेपर तपा कीपर के मध्यमें एमेपर मी कमीच से मिस महीरो से ही धर्मक उपकरमोंसे शरीरको धारण करनेवाम साधु मी दोपोस प्ति नही हो। मावाय-मको परम करते । पोंकि या परकीपरसे उत्पम होता है। परम्त भिस प्रकार कीपरमें पैा होनेपर कमको बीस नही श्वा, उसी प्रकार मम-सस गररस शरीरमा रख कर ए मी साधे सांसारिक दोष मत या क्योंकि उसका पासप निर्दोप ।। उसे किसी मी बससे ममत्व महो। तयाऽपरोऽपि त्यस्ता- इसरारान्त देते यदत्तुरग सत्स्वप्याभरणविभूपणेष्वनभिसक्त । तदुपमहवानपि न सगमुपयाति निर्मन्य ॥ १४१ ॥ रीमान -पपा तुरगा सस्स्वपि विभूपयेपुवासम्पदनाविषयमनलकेपुवाऽममिसक्ता- भरिकता मातगाद, म सम पणिपासी परिणवान । सददिति-शाम्तन समारपति वाशस्विकमयम् । तदुपप्राणामपि-धमापोपकरणमुपमा वानपि मर्मोपपरणयुक्नेऽपि एपपः। म सर्ग स्नो मामुपपाति । मत एप प बामग्रम्पामावादम्पतरनामादिनम्या मापाप निप्रम्प इति । निगप्तो प्रम्पो निम्रम्पः । १५१॥ -त्- |-वनी-फ 11-11-फर।

। पयचन्द्रमशासमाशापाम् [पामोविकार, मामा भय से धोका अपने योग्य गहनोंसे भूपित होमपर भी उनसे मोहनही कर। उसी प्रकार निर्मम परिमासे पुछ होनेपर मी उससे मोहमही करता । मावार्य--पबपि निब साधु पार्मिक उपकरणों को रपते फिर भी उनमें ममत्व म बोनस ठमें परिग्रही मही माना जा सकता । जिस प्रकार पारेको मसि माविक बगरों में बारम्स करनेपर मी या उनसे मोह नहीं करता है, उसी प्रकार ALम्प सामु मी धर्मोपकरपोंसे मोह नही रखत्म है। इसलिए पा परमा उसके संसार अन्य कारण महा। पुनरप प्रपा पार- निर्मचका सरूप मतका ग्रन्थ कर्माष्टविध मिथ्यालाविरतिदुष्टयोगाम । तच्चयदेतोरशठं सयतते य स निर्मन्य १४२ ॥ टीका-प्रेमपते पेटपते पम्पते येन स प्रम्पाप मठप्रकार कर्म ज्ञानापरवायत रापपयवसानम् । मिथ्यावाविरतिदुपयोगाश्च । मिम्याद सत्वाभिदानम् । मपिरतिः भनि पतिः पाणातिपातादिम्पः । दुटपोगा मनोनापकाया । मिम्पात्वावप मारपिस्प फममो इसप इति प्रम्पक्षपापा । तेपी फर्ममिम्यात्वादीना बपेऽमिमब निराकरणे परते मापारि शत्पादितस्तापदेतो। तान् अप्पामि इति भाट सम्पगागमोफत बिमिना स निम्म्य पति । पतेम मूरतमाधिविगम्बरा प्रत्युतम् । १४२ ॥ मप-पाठ प्रकारकर्स मिप्यास्त्र पति और बम पोग प प प्रम्प है। बनें अखने के लिए बो कासट रहित होकर विधिपूर्वक प्रयत्न करता मीच है। भावाप-रिसके । प्राची बाधा राना, उसे प्रम्य का।सीए पामारमा मक कर्म तवा उनके कारण मिपाव बगैरवको म्य करते जिसने गार परमका लाग कर रिया है वो इन परोको बीतने के लिए मो फनशीही मनो। सिंपुमा पाप्यमारप! इत्या- कापकबापका समप बतात- यज्ज्ञानशीलतपसामुपग्रह निग्रह च दोपाणाम् । कल्पयति निभये यचत्कल्प्यमकल्स्यमवशेषम् ।। १५३ ।। टीम- यत् इति पस्मान पान भूतमागम, मील मूलोत्तरगुणा तपाऽनसानारि वारसभेरम् उपग्राम्-उपाइलनं संपनम् निई योपामाम्बोपाः इत्पिपासावा पीताप्पाइपोगाएगपपभूतपापा सपा निप्रई निवागति। सपति समर्षमुपपानिमा मायापा-प..। २-411म-फप | म प । Aरसेफ।

- - कारका १०९ १.३ १४ १५] परामरतिप्रकरणम् पोर्मवति । पदास्त आहारोपनिशम्यादि। निमपेम्पपहारे पा। असो निमयो सिमि, मपवादो म्पवहारो विधिः । तत्कस्यम् । यस्माधिभये म्यवहारे जानादीनामुपग्रहकारि दोपामा व निमापारि पदस्त वत् पारसनीयमबशिष्टमिति ॥ १४ ॥ मर्प -यता जो बस्तु बाम शील और पकोडातीऔर दोषों को दूर कर निम्पस काम्पो षौर बाकी सब अकस्प है। माषाय-म्पसारमें मो बाबारादि यस्तु मम मूल्गुण उचरगुण और वपको बाटो हो, मूस-पास भषा राग-रेप गैरह दोषों को दूर करती हो, वही साधुके प्राण करने योग्य है। स्ति शिसके सेवन धर्माराधनमें प्रमाद से और कमोवाक Rका उपमहोते हों पर बप्रायो। ऐनमेवाय सरपति- इसी बातको ही स्पए करते है यत्पुनरुपघातकर सम्यक्त्वज्ञानशीलयोगानाम् । तत्कल्प्यमप्यक्ल्य प्रवचनकुत्साकर यच ॥ १२४ ॥ टीका-उपपातो विनाश, सं करोति यदस्तु माहारादि प्रम्पमार्ण प्रस्पुतोपाम्ति सम्यम्र्णनम् सम्पग्मानमागमारम्पम्, शीर म्हगुणों उत्तरगुणाध, मोगा मनोवसापामपाः मार्निशाम्पम्तरानुष्ठेया वा ग्पापारा योगा । तपपातकारिस्वान् साप्पमपि सदसत्प्पमेष सम्पम् । प्रसपनरसाकर पथ-पच प्रवपनासाकरे कुस्सा निमा गहा करोति यत्तसप मकसनीय मासमपादि मभोग्पादि ने भक्तपामावियाण सपमेष प्रवचनकत्सापारि मवत्पमस्पमिति । १४॥ मप- यो पस्तु सम्पग्दर्शन सम्पगडान सम्पचारिक दौर दिननातमें की जानेवारी क्रियाओं मर करती है, तया बिससे शिम शासनकी निमा होटी मासुकन्य होने पर भी अपप्प है। मावाप-बिस रस्तुसे सम्पादन सम्पमान एक सम्पचारबमें बाधा उपस्थित होती। दैनिक समीचीन क्रियाओं को क्षति पांचटी है और जिसके उपपोगम जैनेन शासन कसहित रोता देर पहा बाप्प ही मामी गानी चाहिए। किविच्छुद क्स्यमक्स्य स्पात्स्यादक्स्यमपि कल्प्यम् | पिण्ड शग्या वस्त्रं पात्र वा भेपजाद्य वा ॥१५॥ १-एसमेए । २-गुषोचर-फ. प.1 1- हा मां व पति पाठक-फ।

रायचदमपासमामयाम् [वामोऽधिकार मापना टीका-विधिकारादि उनमारियमपि पमहापमा सवार प्रतमीरदपि गुसधि विकारोतुस्वारनपो पविापम । तपा ममम्पमपि प्यम्-सदेम भीपादि रातपिकारिणी र बापत । पिणा ति माहारभर्विषः शम्मा प्रतिभपा, पर्स पार्य भेपमा पा। भोपपमपि म्पाप्पााना मि मपेतन का पसनीवमेव मीरोगरपस्वाम- मिति ॥ ४ ॥ मर्म-भोगन शम्पा बच पारमा बोपन बनेरा कोई पस्त पर बतएव अस्प होने पर भी अफापहो जाती है और मकरस्पोनेपर मी कम्प्प होगा। मापाप-मसार मगेर उनमादि दोपोंसे पुरोनेपर भी अकरम हो गाते हैं। जैसे भी रही गुरु पोरा कसको उत्पम करते है। बता सप्प होनेपर मी मागये पोग्य है। वाममाय मी कम्प्प हो पाता है। वैसे यही भी रूप बगारिकारी ममुमोडेलिए कम्प्प होते है। इसी प्रकार बोपन भी रोगों के लिए फरम्प भी है। और सस्त मनुप्पोक किए मास्प है। का परम्पपदा पाकम्प विनिमयदे- उपस्तर का कारस्य होती है मोर का बकाप्प रोधी पहाते है देशं कालं' पुरुपमवस्थापघातशुद्धपरिणामान् । प्रसमीक्ष्य भवति फल्प नैकान्तात्कल्पते कल्प्यम् ॥ १४६ ॥ टीकार्य प्राप्प विधियाम्पमपि परम्प मपति। कालो दुर्मिमारि प्राप्पेरम्। पुस्पो पचारिक प्रविता, तापमाप्पमपि सम्पम्। मवस्था मापारिका तपापियो पदेशारकाम्पमपि सम्पम् । उपपाता सेसकोप, तप महमादि-संसकमनाममप्रथम, वर चाम्पालामे पातमत्पपेस्प प्रामं पप्पमिति । मुबपरिबीमामिति प्रश्परिनाम क्तः । समाग गहतोऽसबमपि कम्प्पं मक्तीति । एतदेव दर्शपवि पधान- प्रतमीस्प सम्पगारोग्य कसनीय सूतो नैकान्तालाम्पते सम्पमितिमा एकाम्वेव काम्यते बापते पप्पम् । मपणा माम्मैव परम्पवेषाप्पम् भारम्पमेमन्तेनेन म पम्पते । म अस्पनीपमालम्पमिति। पस्मात् देशकामपपेसपा कमप्यममप ममति, भारम्पमपि कम्पनीयमिति । मप-रेछ काम, पेत्र पुरुष, परवा उपमान और पुर परिणामोकाचार करके क्व काप्प होती।कोई वस्तु सपा काम नही होती। मापाप किसी में मम्म बस्तु भी काम्प होती।मिस प्रकार विस रेस मे साधुबोरवाहारादिकी पिसे परिचित नही। हाँ बाप आहार भी करप्प है। सिंध -AO-T । १-केन-प । -IAN ARो-पर। ५. पुन्टेगा-फ६ -- । -मुमति-पफ मार-म । ममा-प बाममिचि-प । ११-बापरे-फ । १२-रा पपसे-म 1-1-1 कारिका १४६१५-१८] प्रशमविप्रकरणम् मादिक समयमें भी भरस्प फास्प हो जाता है। राघराने वगैरहके किसी पर पुरपने दोधा ठीको तो उसके लिए बकाप मी कम्प्प होतीमारी बारिम परे करनेसे धारप भी करपना चीनसे संयुब रस्त, भाप्पो किम्त पदि दूसरी रस्तु न मिट तो बार देर-मार वही कम्प रोगी । तया भुस मौके होनेपर मी भफाप काप्प हो गया। कोई बस्तु न सपा काप्प होती है और म सर्पमा बकम्प्प ही । देश, कार पराकी अपेक्षासे काम बाप हो जावा और ममी कारण होता है। एपमनैकान्तिक प्यारम्परिषि निरूप्प पोगप्रपनियमनाया। संभपतः-- इस प्रकार बनेकान्तबदके अनुसार कास्य और बायको विको गन्ध मन, बपन पौर पम्प योगको कम करने के लिए संक्षेपमें कान करते तचिन्त्य तद्भाष्य तत्कायं भवति सर्वथा यतिना। नात्मपरोभयवाधकमिह यत्परतभ सर्वादम् ।। १४७॥ टीका-मनसा सदेव पिम्पम्--मागोच्यमावपत्रम्यानदपम्पुसेन यमात्मना परस्पोमयस्प बाप भवति । पाषाऽपि तदेव भाप्प भापणीयं पनास्मादीनो बाल मबति सपमा। पतिमा मायेनापि पापनबर्गनापिक्रियास्पागेन तदेव कार्य प्रताप यमारमादीनां बाप भपति। सपायमिति-मदा काळ, सपकाळम् इरपथा। यतमाने मागते प। तपापि यतमाना म्यापारिक परिणाम भनागत सब पब । मतो मनोवाएपिः सम्पगपापाप फापास्वपा पपा स्पस्सोऽपि फमरग्यो म प्रापते सि । १७॥ मर्प-मुनिको सुइ प्रारस रही विचारणा चाहिए, कही गोगना चाहिए और ही करना पारिए, जो इस लोक बोर परगेको सान मापनेचे दुखदायी म इसरो इसायीको मोर म समय को दुमदापी हो। मावाय-बाप्पान मोमपानको छोरन मनस पहीचाना वापर वो अपने को, इसरोंको बोर दोनोंको कमी भी अपक न हो। गीसे भी एसी होगात बोडनी पदिए बोअपनेको और इसको कमी भी कर देनराधी म रो। वरा शरीरसे मी ही भय करनी चाहिए वो अपनेको मोसको कभी भी कर देनेपानी न हो। सामि पर मन, बचन बोर कापसे इस निसे समाना चाहिए कि उससे पोडासा मीर्मपम से। सम्पति इन्द्रियनिपममाप:- बब इस्त्रिोको वसमें काले हिर करते है सर्वाध्विन्द्रियसंगतेपु वैराग्यमार्ग विनेषु । परिसंख्यान कार्य कार्य परमिच्छता नियतम् ।। १५८ ॥ 1-HARE-प फार रापचयनशासमासामाम् [भएमोऽभिकरः, मा टीप-सर्व बाष भन्दापगम्मरसस्पर्धाः । इन्द्रिमा सेगता-न्द्रिवाना गोपतां गतास्तेषु । पैराग्यमार्गविमेषु-पराम्पमा सम्पन्हानप्रिया, सविए-तबम्पर प्ररिपु । शम्दापिपिए । परिसंस्मानं कापम्-स्वरनेतान् शम्मादीन् विहार नि स्सारामापतापरिवान् परिसमपाप मस्पाम्पाप गोचरवर्तिनोऽपि रागदेपर्यनवारेन धानपरिषपा प्रस्पास्यानपरिपा इस्युभाम्पा प्रकाराम्या परिसस्यान कार्यमित्वमः । अस्मासना संमभापम्ते गोचरमागता पिपया सम्पादयः । इत्पा-कार्य परमिग्छता निपतम् । पप सम्ममयम्सपो मोमः । प्रकार परम् । धर्मापकाममोक्षाना मोमालपमेय काप पर पापम् । समस्प इलास्मसात् पुसोतस्मात् सत्तासम्पभिवापत् । मपस्पात रमणमपसहिसारियोपतानान् ममषानुबम्प्रिताप सरपपाणां भातिशयुत्तत्वात् । मम्मुवपसमपस्प धर्मस्यार्पघमफरमान पुप्ता । सर्वम पात्पम्तिहमासिकसुनसभाक्यात पर माप मोसः । समिमता । निपतं वाचतम् सपमा । तता पर कार्य रिपपसलेस निस्सटेप मषितम्यम् ॥१८॥ मप-चल आर्य मोधक अमिगपी मुनिको एपके मार्नमें मिल रमेश त्रिप सम्बन्धी समस्त पोमें सर्वामियम करना चाहिए। भावार्ष-र रूप गभ, रस और स्पर्शये पाँची इमियों के पपर। समी दिपम सम्यक मान-सम्मान मोर सम्पाहमालि बागले । भक इस फिनाशी, सावित मोर उत्तरमा बतिपरक बानकर पालना बालिए । बर्म, 4 काम मोर मोबस मोधी अस पुस्पा । क्योकि घाम पुस्पा के गुसम्म कारन होनस तुप बारीवर्ग पुरमा वर्षके समाने रक्षा करने और मारा होने वगेरहमें अनेक रोष पापे माताप कारम। मनुष्ण सपा पोका मी ऐश्वर्य मए से गाय है।मत शम्स कारण है। पुम्पानुनी पर्म पुस्पान कर पर और काम है। 4 सपा बस्मिाता और मुस सरूप होने के कारण मात्र ही परम पुस्पार्ष। जो मुनि उस परम पुस्पाको प्राप्त करना चाहता है, उसे उस रिफ्य-मुबमें निस्पृह मरत होना चाहिए। निस्पृहता भानिस्पस्वादिमाक्लापता प्रसार- मिसळ, बरियादि का मानाओं सीम| मपया पारह मारनामों पिन का उपदेश - भावयितव्यमनित्सत्वमशरणत्वं तयेकतान्यत्वे । अशुचित्व ससार कर्मायवसवरविधिध ॥ ११९॥ - १HAR- 4-4 माफ द म्-म ।

कारिका ११९३.] प्रसमातिप्रकरणम् निर्जरणलोकविस्तरधर्मस्वारव्याततत्त्वचिन्ताम । बोधे मुदुर्लभत्व च भावना द्वादश विशुद्धा ॥१५० ॥ टीका-भावयितम्पम्-मानिश चिन्तनीयमम्पसायम् । किंतत्। भनित्यत्वम्- सबस्पानाम्पशापतानि संसारे नास्ति विमिनिस्पमिति। तथाऽशरणस्तम्-अम्मत्रपमरणामि भूतस्य नास्ति चिदपि पारणम् । तया एकस्वभावना- एक एवाहम् इत्यादिका । सपा उम्पस्वमानो-मम्प पवार स्पबनकेम्पो पनघाम्पहिरण्यसुवणारे शरीरकावेति । तयार मुपिस्वभावना-भायुत्तरकारणामुविस्तारिख । सपा संसारमावना- माता भूत्वा दिसा मापा ससामी वासो अनुभवति इस्पाविका । नपा कर्माभवमाषमा-माभववाराणि विएतानि भिवाति मारपत्तम्मात् स्थगनीपानीति।तपा सबरपिषि-माभावारमिरोषास्पगनम् । मिरुदेवाभावारेपू मागमनिराधा कृतो मपति । तया नियमापना निम्न्येपाम्यपदारेप पूर्वोपाचस्प कर्मणा तपसा सपो ममतीति तया मोकलिस्तरमायनाम् 'उदापस्थिप ग्सोके भ्राम्तमनादी ससारे सप्र विस्तृत मातभ प्रति चिन्तपेत् । सामयातममचिन्तन समादिवशक्षणको भमा शोभन भामपातो निर्दापः भम्पसत्तानुग्रहाय इति भाषपेत् । पोष दुमता भावनीया-मनुप्पमम्मम्मभूम्पार्पदेशामफ्ल्पतायुरुपराभी सत्यापि सम्प. स्वमानापरणानि बोमि, सम्प दुलमस्यमानि मावपेन् । परमेता दास भापमा: सततममुश्पः ॥ १४२-१३ ॥ भप-बनिस्पन, वरमा एकप बम्पत्य बाचित ससार कमोफबासकी मित सबरी मिरा, मेकीस्तर बी Rसे परागा धर्म और पान दुर्गमन पे पाय मापनाएँ हैं। इनका रिन्कम करना चाहिए । भावाप-समी वस्तुएँ अनिरप है, समामें कुछ भी नही। इस प्रकारक NिFaन करनेको भनिसमारना करते हैं। मम्म जरा मोर मापुसे तिरेर प्रामीधेशो भी शरण नहीं ६ ऐसा चिन्तन करनका बारमासमाना करते हैं। मैं बस इस्पारिकारने को एकलमामा करते हैं। अपन युनियों पम-धाम्प सोना-बी बगेर वा और चारिस में भिम ऐसा रिचारमेको बम्पसभामा प्रते हैं। के बाद कारण रज-कीय तपा उचर बमम पमान भावर परति है। भट र मी सावित्रताका रो-एमा किन कानको भासमाना पत है। समार मा फमीमा पसी हो गती और पी माता पा बीमोगामी सामी पस पा BI बम गाता है, इस प्रघर Bहार-सहपके रिम्समको संसारमाना है। माया मोके गुल रहनेपर कर्म बात अतः ठरेमकामा दिर-एसा पर मनको कम्मापन मारना का असर रोपने को सर छोरामक हो वामपरोस भारा क नाबारे, एसा किनेको मारमाना परत भागेर रोगनिर के 1-1-पाप । १-मातम । 1-3 चिफ प रावयम्बनशास्त्रमाप्रपाम् [भामोऽपिका, मामा शरा पर बोचे गए मौका होता है, ऐसा चिम्म करनेको नरामाना करते हैं। बनारिकाबले कर्णगेक, अधोक और पप्प गेको भमण करता इत्यादि के स्वरूप पिचरयेको करिस्परमापना करते हैं। मम्प बोंके पागके लिए उचम चमादि रसामरूप धर्म मम कहा, ऐसा चिम्न करमधर्म-स्वालणतमाया है। मनुष्प यम कर्मभूमि, वायफ कुछ लिगा और बापुके पानेपर मी सम्पमझानका पानाम है, ऐसा AIRमको बोधिम मापना करते हैं। इस प्रकार इन बार मावनाबोका राम चिन्तम करना चाहिए। सम्प्रति पसना कारिकपा मापनामेनापतितम प्रपमा माक्नाऽनिस्वारमा, वर्मपचार- का एक एक कारकासे एक एक मापनाको करते हैं। उनमेसे पाये बनिममामाको करते है इष्टजनसप्रयोगर्दिविपयमुखसम्पदस्तपारोग्यम् । देहम यौवनं जीवितच सर्वाग्यनित्यानि ॥ १५१ ॥ टीका-टेन बनेम सा संपोगोऽमिस्पा । इविविपयससम्पदा-मादि सम्पर विभूति साप्पनिस्पा । विपपाः शवादप, सबनिता मुलसम्पदनिस्पा । मारोग्य मीरोगत. वदनित्वम्, पर मरीष्माहारस्नानपानापादनानुरागीवम् एतवप्पनित्पम् । बीवनमपि कतिपपदिवसरमणीपम् बीपितमप्पश्चगमगुरम् । ऐषम् एतत्सर्वमनिस्पम्' इति मात्र पतो न भक्ति स्नेह समुपमापते । निस्साच मोसचिम्तापामेप म्याप्रियत इति ।। १५१॥ मर्ष -वामन म्पोन भी विपक्ष सम्पदा, बारोग्य सरीर पोक्न और जीनो समी बनिस्प है। भावार्य-पिप बोका सम्बन्ध बनिस्व है । धन-सम्पदा मी बनिमा लिप और सबसे होनेपाम पुर मी बनिस्प।मारोगता मी बनित बान-यान मान को मसे मित समि भी अनित्यबानी भी पार मी चादनी है। बीवन मी असममें हीमोगामेवाला। इस प्रकार हम सबकी बनिस्पताका Aचार करते समेसे किसीसे पन उत्पम नहीं होगा। बट मारीत मामी मोमकी विम्ब होगा राखौ। मसरपमानामपिठस्पाह- अक्षरममावनाको काते जन्मजरामरणभयैरभिनुसे व्याधिवेदनाग्रस्ते । जिनवरवचनादन्यत्र नास्ति शरणं पचिसोके ।। १५२ ।। १-मा-५ ।५---१--प ।

कारिका १५१ १५२ १२३] प्रश्नमतिप्रकरणम् टीन बन्म-म्पत्ति, वरा बयोहानि, मरण प्रापपरियाग, एम्पो मपामि ते। ममिते ममिभूते । म्यापयो मरातीसापयोगादयः, देवनाः शरीरमा ममोमवाया। म्पामिवेदनाग्रस्से म्माधिवेइनामिगृहीते, छोके प्राजिसमझे । बिनपरा बिनप्रवाना तीयकः इत्ययः । तेपा वपन बाग्योगस्तत्प्रतिपादितोऽयः । तमावाय मायोपशमिकमार पतिमिगणपणम्प वावधाएं प्रवचनम् । वम्मुक्त्वा अम्पम नास्ति शरम' प्राणमिति ॥ १५२ ॥ मय-चम्म, चरा वीर मरणके मयसे म्याप्त पा रोम और कोंसे मरे हुए इस ससारमें भगवान् विमेन्द्रदेखके पचोंके सिपाप अन्य कुछ मी भरम नही है। मापाप-ससारके सभी प्राणियोंके उपर जीवन-मरम वोर मुसापेका मप सबार । समीके पीठ रोग और कर गेहए। यतः बिनममवान्के रिम्प उपदेशको सुनकर गणधरदेषोंने गो वारसा मुतकी रचना की है उस भूतके सिवाय मम्प कुछ मी यो परम नही है। एकस्वभावमामविसस्याह- एकबमासनाको करते है एकस्य जन्ममरणे गतय शुभाशुभा भवावर्ते । तस्मादाकालिकहितमेकेनेवात्मना कार्यम् ॥ १५३ ।। टीका- एकस्य ' इति मसहायस्प बम्म प मरमय । न बलस्प बापमानस्प प्रियमाणस्य मा कधित सहायोऽस्ति । गतयो नारकापा। मरमोचरकाल मरकारिगतिपु स्कवकमफलमनुमयतो नास्ति कमिस्परः । मुमा वेषमनुप्पत्तिर्यग्पोमया, मरगति रमुमा । भवो बन्म मा एव मावर्तः सतारामयः । यस प्रदेश भाम्पवास्ते पर तब पस भाषतः । बीस्पापि वम तप बम्ममरने समनुममतो मवावः। सस्मा माकाठिकम्- मामीनम् । दिवमनबास्मना कार्यम्-दित सपमानुष्यने सत्याप्पो वा मोसोऽस्पन्तस्विम्, एरेन मसहानात्मना स्वम्पामिति ॥ १३॥ मय-ससाररूपी मगरमें पनामा या गील बा ही बम्प मेता है, अगदी मरता है। और बोला ही गुम व बाम गतियों में जाता है। बस को को अपना स्थायी मित करना चाहिए। भाषाप-समुद्र में बिस मिस स्पानपर पपर पाकर पानी नीको माता ६ उसे बाल भवर करता है। संसार-समुद्रमें मी भोर हो ना गम्न स्ता या माया मा प्रापत का जाता है। उस मरूपी भाव में जीव के ही गम्म महामार माहीमाब।बमम्मीर मरते समय उसका कोई म सहापी नहीं ह । मानके पद नरकादि गतिमि अपन प्रिय हुए फक १-तापा-प० ।- परिणा-प ।-4-प ..|४-मालापया- -- रायपनशासमागवाम् [ममोऽस्किार, माप फको मी बम ही मोगय है। जीवन ति सपमका पान कामा अव उसके पास होनेवाग मोष हीरो कमी मी नाह को प्राप्ठ मही होता। बता सब या पीब बाहरी पए मोगता है उसे भी अपना निम्-साम मी करना चाहिए। मम्पस्वमारनामषिपार- पालमाबमा करा- अन्योऽहं स्वजनात्परिजनाथ विभवाच्छरीरकामेति । यस्य नियता मतिरिय न वाधते तं हि शोककलि ॥१५॥ टीप-सोगमा सबनो मातापिपादित पत्नीपुमारिम। मस्मालामम्मो विमिक पृपा । परिबनो पासबासीमभूतिः । मस्माच परिवनादम्ब एमालम् । बिमयो पनपाम्पादिनकरबतपनादि । ममाबम्पोत्रम् । सरीरममुपभोगाधिष्ठानम् वस्मारक स्मान्तमिम एवारम् । इस्प परमेयं पुदिनियता मतादिनमारोपित नपामते वे न पीरपति । दियो यस्मा। पत्तदोनिस्पामिसमम्पात् । पस्मारे मावयव पोम्पते घोफसकिना, वस्मारपतर (इम्पस्व) मानना भी: १५४॥ मर्प- अपने मुटुभियों मौकर-बानों, मम पाप सम्पदा बोर पीस मिला। विसकी इस प्रकारको निश्चित मति से धोकरूपी विभाग कर नहीं देता। भावार्प-विसकी पुरिमें रामदन पही AR बना हमें ममता, पिता, पी. पुत्र गण टुम्बिसे भिरासी पास गरह परिजनोंसे मिम, पन-बाप, सोनागौरी, जय मा मिम! मोग-उपपोन बामप इस घरसे मी मिच से कमी भी शोक गहरी सकता। पर अपामारना करनी चाहिए। मशुचित्तमाक्मामभिहस्पार- बपितमानाचे मरते- अशुचिकरणसामर्थ्यादाधुचरकारणाशुचित्वाच । देहस्याशुचिभाव स्याने स्थाने भवति चिन्त्य ॥१५५॥ टीम-विमोऽपि दम्पस्सामुपितकरणमस्ति सामम्प प्रतियोमा । वमनागा मादि प्रम्म सपदसुम्पेष नापते । वस्मारमुविकरपसामपावसामुषिसमन पिम्पनीपम् । पपार- पतावदेवदापि नाम्पत् विधि विपते । पया प्रप कर पदा वेनव पितम् " 1-1-- |-भाव भरनावारी-फ.11-अगर-1-1- 4 चारिका १५३ १२५ १५६ ] प्रशमरविप्रकरणम् १०७ मायुचरपरणशुचितार । मादिधरण शुभशोणितम् । उत्तरकारणं बनन्यामा स्वस्थ (म्पपरम्प) मसारस्प रसारण्योपनीसस्प रसस्वास्लाइममत्पन्वायपि। एषमा- सरकारणपोरघुचित्वापि इति प्रतिमणमनुचिन्तनीपम् । सामे सामे इति शिरा- कपाधापायपेषु परणाम्नेषु स्पगाण्यापितासग्मासमेदोमवास्पिस्नायुगातसम्वानबम्भेषु न चिपचिगन्धोऽस्वीत्पथुपिगम्य एष विमते इति ॥ १५॥ मर्प-इस सरीरमें पवित्र परायचे मी अपवित्र कर देनेशी समिइसके बाधिकरण तथा तरकारण मी बपवित्र हैं। प्रत्येक पानपर उसको वपवित्रता चार फरमा चाहिए। मावाप-कपर, वादन, बगुरु फेसर पर मुगन्धित दम्प भीमें गानेसे दुर्गश्चित हो बाते है। तमामरका बादिकमण रस और बीप, पोकि प्रारममें उनके मिनसे घरीर बनमा पुरुहोपबादको माता गो मोना करती है, उस मोमध बोरस हरेगाम बाant उससे शरीर बनाबट सरका गम्मिक कारण मी मन्दा और उत्तरकारण मी गम्दाबोर उनके मन्दे होमेसे शरीर मी गदा ।इन घरमोंसे मिसे कर पैरखक सरीरके प्रत्येक बाम गठ- निम्म्दनीकर AIR करना चाहिए। वर्मा मह सोचना चाहिए कि यह शरीर चामसे महामारे। इसके बादर न मास, परी, मन्ना गोर पर्यों मरी हई , जो मोके गाम्से वेरित है। इसमें करी मी चिपमा नरामविपना ही बावा पता। संसारमानामपित्यार- संसारमानाको करते है- माता मृत्वा दुद्दिता भगिनी मार्या च भवति ससारे । नजति सुत पितृतां मातृतां पुन शत्रुतां चैव ॥ १५६ ॥ टीका-ससारे परिषमता सत्त्तानो माता भूस्ला भूया संप पुदिता मपति, संप पुनर्मा। संपप सेसवी परिषदमाना बामिपि भवति । तया पुमो भूता पिता मवति । स पर मुवा पुमर्माहत्वमापाति । स एप प पु सपस्ना मरतीस्पेषमावर्षीमारे पापे संसारे सपसका पितृत्लेन मातृत्वेन पुमलेन यमुत्तेन पेस्पादिना समान रुखसम्बम्पा बापिति ॥ १५६. मप-ससारमै भीर माता होकर पुश्री, मीन बौर पाली हो नाता पुत्र कर दिया प्राय हो पाया। मावार्य-संसारमें परिभ्रमन काख मा बीब माता ऐन पुत्रीरो गाता ६ पुी होत बीन रोपाखा र बहिन कर पुत्री से बात तय पुत्री होकर पिणे माता पियन - मग ममपनप प्रतिरोबो स्पमितिनामुवान मे माराम पंचमममा कामेरा भार न मनीमान्दव ए पासयममें सपा।

रायपद्रवनवासमाममाम् [बमोऽपिका, माला 1 । मर्म रोमावारे मोर माइ होकर शव हो राख। इस प्रकार इस संघारमें सभी प्रामी माता, पित्य, पु, व इलादि हो चुके है।बत एकसे यग और सरेसे इस पना पर्व है। मपापमानाममित्यार- पासबमामाको करते- मिथ्यावृष्टिरविरत प्रमादवान् यः कपायदण्डलचि । तस्य तथासवकर्मणि यतेत तनिमहे तस्मात् ॥ १५७॥ टीका-मिम्पादनावर धर्मप्प माभवाः । तत्ता प्रदानण्मणो मिम्मारएि। मिप्पावरानोदवाव कमपन्या । भविएत सम्पासिपि यो न विरता अधिवपि प्रामावि पातदोपावसाबपि मारोप पतसे । सम्पगरिपिरतोऽपि या सोऽपि कमश्रित्यारचे। प्रमानम् निवाविषयमापरिष्टविकमारमा पत्रमा । मनेन प्रमादेन पुतः कर्म नमावि। पारप्रमावो गरीगामिति भरेनोपापानम् । रणमिमा ममोपाप्रपाम्प' । मनसातवाम्मरसाय- कर्मामवति । पापाऽपि सिकारुपादिवपा कम नमाति । पामेनापि माक्मालगनाप्पानादि पेप कौरीपते । पम्तीति । मन एवं पणमस्पास्मानम् । एषमितपणपि । वस्पासमोतोमणि किया पवेत मम गीत । तेषामायबापा निग्रहो निराससमापला दिति । मिताम्पासबदापपि यथा म समपन्ति सपा परत ॥ १७ ॥ मर्य-बो प्राणी मिपानि रित और प्रमारी या पाप मोर पोगमें मंच रखो, उसके कमेका भाषण होता है। उनके रोकने का प्रयत्न करमा पारिए। भाषाप-मिपावन कौए को पार करण। मिप्यारि जीव पिप्पावधमका उदय होता है उसके कर्मबन्ध होता है । सम्मारिकर मी से रिसा वगेरह पापोसे विरत नहीं होबो उसके मो को समापन होता है। सम्माधि और मर रोकर मी जो प्रमादी है उसके मी काश बापर होगा। प्रमापाच मरनिदा पिप पाय, निकर वोर विका । गो इन प्रमोंसे उपयोता है उसके कर्ममय होता है। यपि प्रमाद ही पापा बतौर रोगायो तथापि पाय मम्मानी पर उसका से महल रिपारे। पण तीन भद। मन न बोर काप । बात बौर परनामबागा जी मनसे कर्म करतार सकबीर स्टोर पानी बोकमा चमसे कर्मबन्ध करता है और सैर उम्र गगन करके आपसे पन्ध करवाजो दम देते है हमें रण प्रवेशमा वामाको दम दता भर ममोदार कमा पाता है। इसी प्रकार बबन मोर परममें मी समामा पाहिए । ये सब जामके को गाते। क्योंकि इनके सर्म 4 बटनामा म मुरम में ऐसा प्रपन करना चाहिए। संपरमारनामपिरवार- सरमारमा करवेरे- कारिका १२७१५८ १५९] प्रशमरतिप्रकरणम् या पुण्यपापयोरग्रहणे वाकायमानसी वृत्ति । सुसमाहितो हित सवरो वरददेशितभिन्त्य ॥१५८ ॥ टीका-पुण्यकम सावादि । पाप पानावरणादि । तपो पुण्यपापपोरणापेऽनु पादाने । पासपमानसी पत्तिया म्पापार इस्पयः । भग्राण च समृतासमदारस्य मवति म पुना पुण्यमारते न पापम् । मुसमाहितः पुर समाहितः मास्मम्यारोपितः, हितम मापत्या वापत्ते प संपर मायपामिरोषठमणा । बरदास्तीपरुता । इप्सितायदानावरदा । मोसाय भेप्सितः । स चिम्समीयो भाक्नीप प्रत्यपः । १५८॥ मय-मम पचन वोर कापके बिस म्पापारसे न हो पुण्यकर्मका वास होता है और न पाप कर्मका बाबर होता है वास्मामें वी साहसे भारम किये गये उस पापारको ठीकर मगवान्के शारा अपदिए हितकारक संपर करते है। उसका पिम्तन करना चाहिए । भाषार्प कोके मामय रोकनेको संकर पाते हैं। यह संपर ही चीनकर बम हितकारी है। इति परको दनेबारे तीर्थकोंने उसका उपदेश दिया है। उसकी भावना करनी चाहिए। नियरामावनामपिरुपाह- निरामायनाको करते- यद्विशेषणादुपचितोऽपि यत्नेन जीर्यते दोप । तद्वत्कोपचित निर्जरयति सवृतस्तपसा ।। १५९ ॥ टीका कार्य पुमः संहतारमनः कमनिबरममिति परापति--मिस्येपासबारेषु सट्ट पास्मनोऽपूर्ण मप्रवेशो नास्ति पूर्वोपात्तस्य च क्रममा प्रतिमर्ण सपस्तपस्पतो मगति । यपोपषितम्यादीपस्प मामविग्यविष्ठम्परसोपरक्षणम्प माहानियेचे सवि पिशोपणापा प्रतिदिवस भयो मववि प्रपरलेन दोपामामामादीनाम् तस्कमापि पानापरणारि पित समती भ्रमता पशुपकाएमदशमवावशादिमिस्तपाविसपनारसीकरोति । नीरसीह प मिनमाम्प निप्पीडितसमक्त परिमटत्पास्म प्रदेशेम्म इति । १५९ ।। भय-से बड़ा एमा यी विकार प्रसन करनेसे अपनसे मर रोगा से ही संपरसे मुक मनुप्प भए धर्मको तपस्पासे धीन कर गमता है। मावाय-समरसे युद्ध मनुप्प किस प्रकार काली मिरा करवा पाबत बासक शो के पदोगानेपर नये कमोनो प्रोश ही नही होता । भोर पहरे गए कर्म वपस्यास प्रतिधम भए होते पाविस प्रकार महाएमा मी अगीन सामा बम्द सरक मन परनसे प्रसिदिम धम होता है, उसी प्रकार संसारमें भ्रमण करते ए जीरने से मानारमादि कर्म का रस बर्षक, १-पारानेन-फ.२ पेषाम-प. ।। ऐपमारी नाम्-फ..॥

रापपत्र नशाखमालापाम् [वमोऽधन, मामा
बम, रसम, पारस वादि पोदाराव नीरस होगा और मरस होगानेसे मना फसलिये
फर्म मसरे गये कुसुमको हबमासेर त ।
मोफमारनाममिहत्पाह-
बोकमामाल करते -
लोकस्यास्तिर्यक्त्वं चिन्तयेदर्वमपि च वाइल्यम् ।
सर्वत्र जन्ममरणे रूपिद्रव्योपयोगांध ॥ २६०॥
टी-बीपानीवापारोम वस्पापस्तिपग्मा पिन्ववेत् । पाइल्प विस्वरम्।
मपा सप्तरमुप्रमाणो विस्तीतपा रोगा। विर्पर रनुप्रमाणा । उस मोके पर
एमप्रमाणः । पपन्चे रगप्रमाण इति । ममः (प) पाप भतशरण
प्रमाण । सर्वम सो बम्ममरने समनुभूते म्पापकमापिकरणम् । नास्ति पिपमियोऽपि
मोचकासदेशो पम म गाव न मृत पा मयेति । रूपिनम्मोपपोगांति स्पीषि वानि इम्पानि
परमाणुप्रस्तीम्पनम्तानम्बसम्पपपरसानानि तेपी म उपयोगा परिमोणो मनोवाधारा
पारोमासनिवासादिस्पेन सर्वेपी शवोऽनादो सपपटवा, पास्मि म तृप्त इस्पक्षणमपि
न्तयेदिति ॥ १५॥
मर्प-नीचे, Eि और उपर भेकने विस्तR AIR करना चापिए सपा पर भी विचार
करना चाहिए कि कमें सर्वत्र ही में जन्मा पोर मरा और ममी सपी दम्पोंघ ने उपमोग दिया।
मापार्यों और बोकेबापारभूत क्षेत्रोकते हैं। उसके न माग -
भयोगेक, मम्मोक पा सकोक और कर्ममेका बमोगेकका प्रस्तार स्वार है। निगमेकम
एकनी पर कर्मका विस्तार प्रयोको स्मीयमें पाच परमार ने एक राम।
सदसे बपोमेकसे कर सोक तक सम्पूर्ण मेकली गई पोदर पासमा कोको बनम
या मरमका बनुमा दिपा है। मेकामा शिरावर मी को एसा साल महोदय मोम
मिाहोपोर में मम हो । परमाणुसे समन्चनम्परेसी रूप कतिने पुराम
कासे अमन भते गए मैंने मन पचव काप, बER बोर मास उमस पोरके उन सभाको
भोग गगदेवो मौ मे तन प्रौई। इस प्रकार प्रविसमम विचार करते समा चाहिए।
स्पारम्पावधर्ममाननामपिस्पार-
स्वास्मातर्ममाफ्नाको करते है
धर्मोऽयं स्वास्यातो जगदितायें जिनेर्जितारिगणे ।
ये' रतास्ते संसारसागर लीलयोची ॥११॥

कारका १६०-१६११५२] प्रशमविप्रकरणम् टीका-मुवषमभारिप्रघमय सह निर्वोपमाल्पावः । किमयमारम्पात इस्पाह- बगदितापम् बगप्पचेन प्राणिनोऽमिपिस्सिता गगनपा प्राणिम्पो हितमेतदिति । प्रति विधि प्रपोबनमुदिस्पारपातः । बिस्तीपतिः । मरया क्रोधाविपरीपार्मास्याः । वितोऽमिभूतो निणनोऽरिगपो येस्ते वितारिगणाः । इत्पंठमणे प म मागमस्से ममादिळ मणे पाये रखाः सफास्ते ससारसागर कोठया मनायासेन सुखपरम्परपा । उसीमा पर पारमुपता। मोम प्राप्ता इत्पयः॥ ११ ॥ मर्म-कर्मरुपी शत्रुषों के नेता अबकों ने संसारके कल्पामके लिए इस भागमरूप बोर उत्तम पमादि बम धर्मका निर्दोष कान किया है। इसमें गो अनुरळ ए, उन्होंने संसाररूपी समद्रको अमापास ही पररदिया। मापाप-पक मार्ग-पर मनसे ही मनुप्प बाम फत्पाण कर सकता है। बबक प धर्मक पस्ते पर नहीं पाता, उसका अनादि ससR परिभ्रमणके पासे छुटकारा नहीं सकता । कर्म प्रोपर निरप प्राप्त करनेपा मिनेन्द्रमगन्ने इस धर्मके दो रुप पतापे । पाग बागमरूप है और इसरा उचम धमार दक्षनरूप है। भागमहा धर्मसे मनुष्य ल और परका बोध करताबोर अपनी बग्रिम सापनासे संसार पासे मुजि गाम करता है। उचम घमादिरूप धर्मका गम मी प्रानियोंकोसी प्रकार समार-सागरसे पार उताता है। वर्णमयोमिस्वभावनामधिकृत्पाह- दुमिबोधिमापनाको करते हैं मानुष्यफर्ममूम्यार्यदेशकुलकल्पतायुरुपलब्धो । अवाकयकश्रवणेपु सत्स्वपि सूदुर्लमा बोधि ॥१६२ ॥ टी-पान वान्मामुपवर्मष दुसर्म बोधविश्यम्बसन विमापनीयम् । सति च मामुपगन्मनि कमभूमि सुदूर्लमा । कर्मभूमिरपि यम तीपल उत्पपम्ते सदसना प्राणा परिनिप्प प्राप्नुवन्ति मम्पा, पर मरतानि, पराक्तानि निदेशास पर्वष । मानुपये पर्मम्मी व सस्पाम् मार्यो देशो मगमो मंगकलिंगादिरा बुलमा । सस्वेप भिए, जन्ममय- पिशुरिईर्टमा । इस्माइमारिवशादि ठम् । एतेपपि पर्यन्तेषु सवा मीरोगवा पुर्समा। पोपुर समतान्देषु ममाप्तेपू दीर्घमायुदरमम् । भायुप्माम्तेपु प समासादितेषु भवामम विकासा दुखमा । सस्पामपि विज्ञासापा पर सदमम्याश्याता दुर्लमः । सस्पपि पर प्रणमाम्मन प्रस्तावमापा वुलभम् ममेगाकापम्पमत्ताइ मालस्पमोहापामसमाब सपपलमयघोचपानफनासविभिश भक्म प्रति न प्रप्तिमरति । सस्वप्मेतेषु भापपपम्तेषु १-मामा-फ.०२-अनाठे-क..।

रायपयनशानमालायाम् [बमोऽभिकम., माया प्राप्तेपपि सदरमा पोमिर्मपति । बोषिः सम्पम्दशनसम्मवानामा । तत्सम्पात मालदिशत्परवि वर्सम मक्तीस्पर्मः ॥ १२ ॥ मर्प-मनुम्प सम्म फर्ममूमि मापदेश कुछ मारोगता बर मायुके प्राप्ठ होनेपर आप महा सार भोर शाव-पके होनेपर मी सम्पमा प्रम होगाममा कठिन है। मावाप-सबसे पहरे मनुप्प समय पाना दरीतुमरे। यदि मनुष्य जम्म मिग मी गम्य दो मर्मभूमिका मनुष्य होना दुर्गम है। पाच मरत, पाँच ऐमत पार पॉप शिये पदार्थ भूमिया इनमें हर सम्म म् । मोर सब पर्मका उपदेश करता यहाँसे मम्पयीय पोष प्रास मनुप सम्म भोर कर्ममम्भिके प्राप्त होनेपर भी ममम, (ATT)मा (गाय) करिंग (सीसा) जगह ना देनाका मम्मा दुबम। इन तीनों के मिलने पर मो इसाफ-रिश से अब कुछ मिना तुम है। इन सबके मिनपर भी नीरोग भरीरका पाना हुई है। नीरोगताके पामेपर मी पी वायुका पाना दुर्गम है। दीर्य बायु पच सब बादोंके मिस गानेपर मी भर्मको पागनेको सिका होना है। धर्मको नानने की इसके होनेपर मी सुख धर्मका उपदेश मिडमा दुर्गम है। उपदेयके मिस्नेपर भी उसका उछ सुनना म है । क्योंकि परक काम में पा रहमके कारण तथा बासस्प, मोह बनादर घमा प्रमाद, मनमी र, ब, नाम पर मायके कारण पर्व भवनकी बोर पि ही नही हो। मनुप्प बग्मठे र माचपर्यम्त सब बातों के प्रास होनेपर मी सम्पादर्सन गो सम्पान का प्राप्त रोना बना दम है। ता दुर्लमां भवशतैर्लयाम्यतिदुर्लमा पुनर्विरति । मोरादागात्कापथविलोकनाद्वौरववशाम ॥ १६३ ।। टीका-ता युगमा सम्पग्दर्शमादिका पोधिमवाप्प । भूपोऽपिदुर्दमा विरति स+ पिरविशपिरतिप। किं पुमा कारण सम्पक्स्पयामे सति विपतिदुर्गमेस्पाइ-मोहोमानम् । मोहमस्या सपानुष्ठाप पता प्रबिम्पामीति भापकमम मा प्रतिपस्ये न समसाम इनु पाकोमीत्येतदयानम् । मेहमपगमस्पागमामिद बीवितं सहसैप यसवे नाम प्रस्ताव प्रतीयत इति । रागादा म ममते वितिम् । पत्नीपुबारिश, मनुरचनायो म सानोति स्पस्ट रावासतिम् । स्विता पम्बानः कापया- तेपिंगे चित्तनमः । पुमरण पम्प संसातारये मम इति बापचयनितान्तिपर्सनापि अंशमधामोति । पुरतर एक वारिफ मामः । गारपसाचेति मौरबमावरम शक्ति प्रदिरससुखेपु । प्राधिषिभूतिमरती ब्रम्पसम्पन् तां पातुन मोति गोममायानुगतचेता । रसपमीस विताविप प्रतिराहणे गोर्ष से मध्यति हाच रसनम्निपपरपात् । पुलगौरव पयसम्पपेस प्रमावनिया मापारण शम्पास शयनाहारमिराबरनादिविपन गम्बधूपमालाविसेवनमिष्टसीपरिमोगस तापस्पर पपिम् । मतो गोपिनाम सत्पपि सक्रिटिमेस्सुक्तम् ॥ १३ ॥ १-पी-फा कारका १६३१६४] प्रशमरविप्रकरणम् मप -सैक्सों भवोंमें उस दुर्गम सम्पम्मानको प्राप्त करके मी वानस रागसे, कुमार्गके रेस से बोर सांसारिक मुस्के बौन होनेसे पारिप्रकार प्राप्त करना पन्त दुग्म है। भावाप-सेकड़ो मब पारण करने के बाद पदि किसी तरह सम्पग्मानका डाम दो मी गया तो देशचारित्र गौर सकसचारित्रका पाना बड़ा कठिम में सोंकि मनुष्पके पीछे मोह गराए। मोरके मधीभूत हवा मनुम्प सोचा है कि वमुफ भमुक काम करके दीया बैंगा। वरा भास्कके भवगा। क्योंकि मैं सकल त्याग नहीं कर सकता है। मोहके उदयसे यह या मही मानता है कि पह गीवन परमगुर पाबचानक ही न होगयीवार पर किसीकी प्रतीमा नहीं करता है। या रामके मण मी पारिक पारन नहीं कर पाता क्योंकि पल्मी-पुष बगेर अनुरक होनेके फारम भरपर मही डोस सफठा। इसके सिपाय अमेक कुमागोंके मोहगामें परकर मौ मा ममार्गको प्रहण नहीं कर पाता । इसलिए मी चारित्रका Bाम उसे नहीं पाता । तवा गेम पापके वध होकर गहन सम्पदाको गोलने वचका है। सना इन्द्रियके वसमें होने के कारण इए रसों को नहीं छोग सकता । पुसमें वासव होने के कारण इतुके बनु आहार-विहार शप्पा, चन्दन बगेराकर प, धूप माग, मी गैराको छोरन भसमर्थ होता है।वतः सम्पगडानका गम होनेपर मी सकाचारिका पाना शुभ है। तत्याप्य विरतिरव विरागमार्गविजयो दुरधिगम्य । इन्द्रियकपायगौरवपरीपहसपत्लविधुरेण ॥ १६४ ॥ टीका-सन विरतिरस्न प्राप्य यदुक्तं पूर्व दुग्मं तमाम्प सपविरतिस्लम् । विरागमागविषयो पुरपिगम्यः । विरागस्प मार्गो गगहाणमार्गः पपोशलक्षण, शासे 'हिंसाविधिहामुम चापायावयदशनम् सलमेव पा, इत्यादि । एग्मणास्त्र विरागमागस्प वियप परिचयोऽम्पसनम् । मपिगम्पवे पाप्यतेऽधिगम्प पुस्तेनापिगम्पा दुम्माप्प स्पयः । कस्मात् पुमर्द मेनापिगम्यत इत्याह-त्रिपाणि परिपम्पानि निराग- मार्गस्प विमफरणामि । कपापा मारप, सपना चमक परिपम्पिन | गौरवमुक्ततम मिया-मदिरससातारम्पम् । सुस्पिपासाइया परिपहा, वे पानम्पाल्पा सपनाः । एभिरि निपादिमि सपनविपुगे विसंस्थत माडीमत न वैराग्यमागमम्पसितु समां मपति। इम्निपादिसपलबिपुरेप म शम्पवे निरागमार्गवियपा कतमिति ॥ १५ ॥ मप-उस सकाचारित्ररूप एन प्राप्त करके इन्वय, पाप, लिपप-मुरूम भादरमाग पोर पीपहरूप भोंकेरा प्याकुल हुए मनुष्पके सर एम्प मार्गचे जीवमा मत करना है। मावार्य-यो, कोमादि कयाय, धन-सम्पदा, रस मोर मुसमें भाररमार और भूत-पास को मापा, ये सभी राम्प मार्गके मनु । सकसवार पारन करके भी नो इमें नही सच, पर पेसम्म मर्म बम्पास नहीं कर सकता।बत वैराग्य मार्ग सकस चारित्रसे मी दुप्पर है। सम्पप-4.1मरणात-फ प.! न L रायपत्रबमाशासमामपाम् [वामोऽधिकार, माला तस्मात्परीपहेन्दियगौरवगणनायकान् कपायरिपून् । शान्तिथलमार्दवार्जवसन्तोपे साधयेदीर. ॥१६५ ॥ टी-पस्मादेवे रिपको पधिमा आपमणापत्रः । तस्मात् मामानेष पुष मायका निम्नियादीनां विषयेत । बितेपुप मायके इवं सैम्पमनापत्रमिनियादीनि। गपाल प्रपेममिसबम्यते इन्द्रिपगपस्प परीपागणस्य गौरवगमस्य माया प्रभार नेताए । तान् पापा रिमा शान्तिसम्मादबाबसम्वोपर्पयारिम्म सापयेबी०। पर समा प्रस्पेकमामिसंगम्मते मास्तिवमेन मार्दषयनेन भावयन सम्योपपमेन बाइबर नामुमा बसेन सापयेत् उस्थितान विरागमार्गादीरा सालिक रपया । ममासम्म कोषाको रिपमा मात्पपिपी साप्पा भवन्ति ॥ १५ ॥ मर्य - पीर ममुप्पो परीपा, इन्दिप बोर गौरव (विषय में बादर माग समाके मापक क्यापरूपी शापोंको क्षमा, मार्दव, पार्यग और सन्तोपरूपी यो धारा जीना पाए । भाषाय-पर ये शत्रु बग्वान् दौर उनका प्रधान मेत्य पाप है, पर पारेमाको ही जीतना चाहिए। क्योंकि सेनापति के पराजित होनेपर निमा मापसी सेवा लप ही फ्राधित हो गी। गण सम्मको प्रापेको साप बगाना चाहिए । मद इश्विपान परीपागम, मोर मोर गणके मेवा कसायरूपी मधुमोको समझ ममावरा मामा आगोर म्ोपरूपी बाया सेगासे पसमें करना चाहिए । बर्ष कोष कपापको धमालम्से, मात कपको मासे, मामा कपापको बासे और गेम सापको संतोपका जीना चाहिए । सचिन्त्य कपायाणामुदयनिमिचमुपशान्तिहेतुं च । निफरणशुद्धमपि तयो परिहारासेवने कायें ॥ १६६ ।। टीका मापामामुदमनिमित्तमाोग्य कोपादीनामनेपमिमिन मर्म रोमादि कमायो बापत इति उपशामितपत संचित मनेन छिपमानापम्पशाम्पति कमाया प्रशम गति । मतस्तपोमयनिमित्तप्रशमोत्तोपमासम्म पविार मासेक्न पर्यम् । पपिरोऽपि धप अपवाग्मनोमि पारितालमतिमिमोदष-निमित्रस्प उपसान्ति। नामपि वकारिताप्नुमतिमिा पापानिमिमापन निकरणमा अर्पमिति पगदेवमोहापा मिवारणार्धम् ॥ १॥ भप-कसापोंके सबस्के मिराबोर उपसके मितको बी पास शिपरकर पब, पान और कापी अम्रिसे उन दोनों मम स्पग मोर सेवन ना चाहिए। मापार–पा विचारना चाहिए कि किस सिमिपसे क्रोध का उत्पम होनस निमितसे उनकी प्राप्ति होय।। दोनों पार करके मन, पचम का और छत, परित, अमुमो- १-कोलकाः।-मी मोषममा फा कारका १६९१५६-१६७-१६८] प्रवामतिपकरणम् -- दमासे उत्पालिके निमिचोंको स्पागना चाहिए और शान्टिके निमिोंका पान करना चाहिए । वर्षात् बिन बिम कारमोंसे पाय उत्पच होती हो, उम उन कारमोंसे दूर रहना चाहिए वोर नि निन करमोसे क्याप शान्त होती हो, उन उन कारणों का बम्पास करना चाहिए। सेव्य झान्तिर्मादवमाजवशोचे व सयमत्यागौ। सत्यतपोब्रमाकियन्यानीत्येप धर्मविधिः ॥ १६७ का सेम्पोऽनुष्ठेपो दशपियो भमः । तान् दशमेवान् माममाबमाचरे। सास्ति समूप' साने समितम्पा माक्रोशमहाराष्प । मादव मानविजयस्वदतापनोदः । मागण साडता यमाचरिताम्यापिता। मुचिमार शौचम् । मगेमता विगतदप्पतम् । संपमः पभावादिविरमर्प पूपिणीकायसयमाविर्षा सप्तदशमेवः । सपबन्धनाविस्पागः प्रामुकेपणीय पा सासुम्पो मक्तपानबमपाप्राविधान पतिरेव पदावि स प स्पागा । सस्प सपो हित सस्पम् । तचापि संपाइनारिचवर्षियम् । तपो वाबसमेरमनशमादिकम् । मय मनापो नितिर्मयुननिहचिरित्पर्यः । भकिबनस्प भाष माचिम्प मिप्परिणासा । पर्मोपकरणारसे माम्पत् विजन परिणामम् । एप धर्मस्प विधिमद इस्पयाः ॥ १७ ॥ मर्प -धमा, पर्दव, बार्यप, शौच, सपम, त्याग, सत्प, तप, असपर्य, बोर बाकिमप- धर्मके ये रस मेद हैं। इनका सेवन करना चाहिए। माराय-पके इस मैदोष पान करना चाहिए । उन बस मेदोंको बसा है। घातमापसे गाली-गणेग मोर मार करके सहनको क्षमा करते हैं। मान कराके जीवनेको माईश करते है। सरम्ताको भार करते हैं वर्षात् जैसा करना रेसा ही बना बार्य है। पवित्रताको पौष करते बत् िगेम न करना तृप्पाका न रोना-चौष । मारक कारपरसा कोरा पाँच पापोंसे बिस्तरोना वा परिकाप वगैरराम संपम करना म्यम है। पर, बम्पन वगैरहका त्पागमा बमा सामुभोंको प्रामक मिया देना स्पाग है। रितकर पचन मोरया साप । बनयन पारिको तप करते है। मेधुनसे निहत होनेको अपवर्ष प्रते है। परिमाके समापसे चर्पत् पर्षक उपकरमोके सिपाय बम्प न मी परिमहके न रपमेने बाकियाम्प करते हैं। भात प्रामान्य प्रदरायचा- धमापर्म की प्रधानता बताते है- धर्मस्य दया मूल न चाक्षमावान् दया समादचे। तस्माद्य शान्तिपर स साधयत्युत्तमं धर्मम् ॥ १६८ ।। टी-पोऽपं पनरोपमस्तस्प पमस्प रया मूत्रम् । दया प्रामिना रसारिस स्पपा । सा मूर्स प्रविष्ठा, पमस्पासिविरमपत्वात् । प्रापिप्रापरमणामबाप १११ रापपन्द्रौनशाक्षमालापाम् [नयमोऽधिकर, पर्म पतोपदेशः । म चाममावान् इयां समादत्ते । मरिचमानमान्दिरमम, नासी पपा समाइते, = संपदातीति । क्रोपापिरो दिन भिवपेसवे पेतनमन पा ऐहिकमामुमि प भत्पपापम्, तमापा समाप्रेमानः मान्स्पा मा प्रा स सापयत्पारापयति । समयमुरम पर्ममिति ॥ १८॥ मर्य-पत्र मूग,दपा मितु पो पाचौर नही है यह रसाको पारण यही कार सकता।बत यो पम्प धर्म पर ही उत्तम धर्मको सापन करता है। मावाप-धर्मके यो इस भैर बनाये गये है, उनका मूग या। क्योंकि एप बारिसको करते है बोर वर्मा सम बरसा है। दिने प्रयाये गये हैरेसम प्रानियों के प्राणों की रक्षा करनके बिम ही पाये गये है। किन्तु गो धमाशीक नारे, प्राणियों पर रपा मह कर सकता कि कोपी मनुप्पको चेतन-अचेतन मनमा इसक-परलोकछा यो पान नही गय । बट गो धमाधम के पास करनेमें सदा पर हवा या समक्ष धर्मका पान र समयाहै। मार्दवमपित्यार- मार्दनको करते- विनयायचाभ गुणा सर्वे विनयम मार्दवायत्त । यस्मिन् मार्दवमखिल स सर्वगुणमाक्त्वमामोति ॥ २६९ ॥ टीम-नियो बामदनचारिणोपचायला । तदापत्ता गुणो। स पिनको मानायचा । मादरच मानपिवया । म निपटने उपचारक्नियोऽम्मुत्थामामिमहाविक पारपा पर्जुम् । पम च पुस्से मार्यम्ममि बात्पादिमदारकनियरि स सर्पगुणमाम् मपति । नचारित्रसाप्पा स गुणासम संमतीति । तस्माम्मान नियम मामासेरनीपम् ॥ १९॥ मर्य-सम गुन दिनपके पापीन है और बिनय माय मानव है। बिसमें पूर्व माषपो या सब गुमोको प्रत करता है। मावार्य-सम्पमान सम्पादन गरेर सम्पक्षामित्र के प्रति मन, पचन और कापसे गो मारामात प्रगट किया बाया सप्टे पिनप करते हैं। स्व गुपोका मम मियशुम है। मालिक गुप उसीको प्राप्त ऐवा, रोमानको बीत मेध है, क्योंकि नसे एरो मानेपर ही दूसरों के Pए उठा सा ऐ गाना, मौर हाल गोदना गए राम मिले ना सकते हैं। विस मनुपमें मामें मोको र पारनेराग मार्दषधर्म पास भने गता है ममुप्प सगुण- उम्पच होग-सम्म गुम माफर उसमें इस बाते हैं। बट मनको दूर करके माईकका सेन करना चाहिए। १-पगराए । २-गुमा में मोपपमा ।

कारिका १५९ १५०-१७१] प्रशमरतिमकरणम् - मायामधिकृत्पा- बारपर्मको करते है नानार्जवो विशुध्यति न धर्ममाराधयत्यशुद्धात्मा । धर्माहते न मोक्षो मोक्षात्परं सुख नान्यत् ॥ १७० ॥ टीका-माया घाट्यं कोटित्पम् सत्यतिपसमावर्ष माता यपास्ति तपास्यावि न विविवपाडवे । पस्तु तया न करोति, ससस्तनाबमा वस्प प मुपिनास्ति । तस्माषपा- मपातापपपप्रतिपचपापभित्तस्प गुन्दियते । विपरीतस्पन बारापिपुदिन पाणु दारमा पममारापयति समादिकम् । न पाम धममम्तरेण मोशावाप्तिः। न मोक्षाराप्ति मम्सरेपकास्तिग्रस्पम्तिनविसुखयम इति । तस्मारपुना मवितप्यमासोबनादाविति ॥१७॥ भय-मायके दिना शुटि नहीं होती। बार बारमा धर्मका वारापन नही कर सकता । धर्मके पिता मोक्ष प्राप्ति नहीं होती और मोनसे कसकर सरा कोई सब नही है। मावाप-कुटिम्टाको मापा करते है। उसका प्रतिपक्षी वाव है।बाब परम्ताको करते है। बार बा किया वैसा कर देना और गुस्से कुछ भी न पाना वार्यपधर्म। ऐसा नहीं करता, उसकी भुमि नहीं होती। अतः जो अपने किये हएको पैसाका सा गुस्से का देता। वीर चो प्रायविच देते है ससका पान करता है, उसकी मुम्ल होती है। किन्तु जो किस हुए अपरामक लिया जाता है, उसकी पुम्द कमी मी नहीं होती। ऐसा करटी गारमा धमा बगेरह धर्मका भी यैक टीक पाउन नारी कर सकता और उनके पान किये बिना मोपको प्रामि नहीं हो सकती। तामोस प्राप्त किये पिना गरिनशा मुबकी प्राठि नहीं सक्छ । मत. सापुको बागेचना बाद करत स्पप सदा सरगना चाहिए। सौषमधिपार-- घोषभर्मको मते यद्रव्योपकरणमक्तपानदेहाधिकारक शौचम् । तद्भवति भावशौचानुपरोधाद्यलतः कार्यम् ॥ १७१ ॥ टीका विविध शाप नापमानमेवरान् । वा प्राप शीर्ष वामयम्पम् । वामप्प प सचेतनमवेतनवा सादि, “मझास पुरिसे पीसे इस्पीच इस मासेमपम्पारणा मक पिा मपा पुष इस्मिपा " इत्यादि सोपस्वास्पाम्पम् । उपहरणमुपधरि मादी माम् । तमोनमादिदं शुषि मरति मम्पयाम्मुनीति । सपा मालपानमप्युटमाविदोपररित शुषि मन्पपाशुभीति । देशात पुरीपापुस्तगपूर्व निपं निगम्पति पतानि प्रयोग माम्पमिस्प परमा वदपिकारक वनपति वस्त्रय कार्य मक्सीवि । भाष सोपस्पानु- पपसम्बनमालमाठापाम् [ मनमोऽधिकार, पर्ष परोपाववाचनात् । यबत इति प्रपस्नता परीस्प सचेतनमितवा उपकरणावि मपभाना विपि प्रापमोकेम पिपिनाउनुष्ठेयम् । मारपीचं म नि मता। सोमरूपवारभितो तुमसाल पति तस्वसाम्मच परमापतो मारमापमिति ॥ ११ ॥ मप-म्म सपकरम सान-पान वोर भरको कर दो चौर किया यावत से प्रसनसे इस प्रकार करना चाहिए कि उससे माचीच पापान। मारा-गौच से क्या है-एक इम्पशौच और दूसरा मारपोच । इम्पोष पाप सम्पको कार किया जाता है। जिला मी पेदन मनमा पापम्प, उसे सदोष बाम स्वाग देना चाहिए जानारिको दो सापक हो उसे उपकरण कावे ।।बो उपकरण वाम बार दोपोंसे पुरोगी पवित्र होता है। दो बेसा नहीं होता है पर वपवित्र शान-पाल भी मो टाइम बारियोोसे रहित होतो पवित्र होता है और वो मेसा महारोगह बपरित्र है। मम्-सपमान करने के बाद सेप और गन्धसे परिव र पति ये सब इम्म सौचास साम्प सोचोंको इस प्रकार करना चाहिए कि मापसोचमें कोई बापा म बसे। बाद उपकरणको दूब रेप-माल करके होना चाहिए और सामुहिमें मी साबमें उपदिए विभि वनुसार ही प्रति करनी चाहिए । निर्गमवाको मासोल करते हैं। विसका बाला गेम मापसे गाबाद उसकी विना कठिन है। बोर मेमच नाम ही पपा मापसोग। संयमममिकस्पार- सपा को बताते है- पचास्त्रवाद्विरमण पधेन्द्रियनिग्रहम कपायजय । दण्डत्रपविरतिमेति सयम सप्तदशभेद ॥ १७२ ॥ टीच-पम्पगुपरम पापस्मानेम्पः स्पः सरस प्रकार-पबामग्रा पापानिपावरमा मापपावचादानमैनपरिप्रसार कर्मादानदेव स्वेम्पो पिरम मिरविकर संपमा । पम्पिापि स्पर्सनाधीनि सेर्मा निमो निपमनं निरोम। मम्बादिषु गोपरमानेनरक विस्वा माम्पसम्पम् । म संधार, कम्पवे पप गीय सममिा मप्यते पीनवे वस्माषाः पातितर भोपालपमत्वारस्तेपा बमोमिमखयनिरोप, उदितामा वा विपातापादनम् । दण्य मनोगापापापा। ममियोहामि मानेमारिम्सपो मनोरम | मितपसातादिम्मणो पादया । पानवस्रामप्टनादि--कपा अपरा । पम्मो विरविनिहति । एषमेप संघमा सप्तरसमेो मति । मा कम्पेन प्रमेणायमेपायी मिवर । मिप्यतेगोगामुपमस्पतिविपिनापोन्त्रिपेषु संपमा । तपा पुस्तकापपरिया भनीएकापसपमा । मेमामेवाममारनापरिमापनयमा मनोसामाप संपम पति ॥ १७२ ।।

११९ कारिघ १७२ १.५] प्रशमरविप्रकरणम् मप-धामके कारण पाँच पापोंसे रिख होना, पाँचों इन्द्रियोंका दमन करना, चार कसापोको बीना बोर मन, पचन, मोर कापकी प्रवृतिको रोकना-इस प्रकार सपमके सत्रा - भाषाय-रसा पुट, पोरी, कुसी भर परिप्रह-पाच पाप कोंक पाषाके कारण हैं। इनका स्पाग फरमा पालिए । स्पर्धन वगैरह पाँच इन्द्रियों को बसमें करमा पाहिए।गो सम्ब पारनमें परें उन पुनकर राग-देप नहीं करना चाहिए । पर चीन अपने हारा किये गए मासे सतापा पाता है, उसे कय बर्षात् ससार करते है। उस ससकी प्राप्ति के कारण कोष बनेर कपाप को गाते हैं। उनमें प्रीतमा चाहिए, वर्षात् ठमके उदयको रोकना चाहिए। वीर यो सरपमें बाणे, ठरें बेकार कर देना चाहिए । दण्के तीन मेद ?-ममोदण्य, बचनदण और पदण। वमिद्रोह वमिमान और पी गयो मनोदणदते है।रिसफ, कठारे और वाप बनको बबनदण करारना झरना फौदना गैराचे कापदण करते है। इनको नहीं करना चाहिए। ये सब सपमाके मेर। बागममें में इसी तरह से गिमायो । पूपी, चम, बग्नि, वायु, वनस्पति बोर दोहन्द्रियः देन्द्रिय, पौत्रिय और पत्रिकी रक्षा करना सपम है। पुस्तक वगैरण न रसना पवद्याप सपम है। स्पागमपिएस्पाह- पानधर्मको करते? वान्धवधनेन्द्रियमुखत्यागात्त्यकमयविग्रह साधु । त्यतात्मा निर्ग्रन्यस्त्यक्ताहकारममकार ॥ १७३ ।। टीर-चाम्पमा सबनका, पन हिरण्पसुपर्मादि, इन्द्रियामि स्पधनादीनि वधि- पर्प मुलम् । एपी त्यागादिन्त्रिपसम्मम्मी मुलस्पागा। पासेषु विपपेषु समाविप माप्य- स्प्पम् । त्यसमयक्ग्रिा सामु, मपमियपरलोकायानादि सप्तपिपम् विप्रः पारीर स्प स्पागो निष्पविकर्मधरीता, कसा बन्दादि विग्रह । म्पयरमा मसंपमपरिणामसभण मात्मा । भरविषप्रम्पविकपमहतो निम्पा । स्पच्याकारममकार इति भरत- दिए इस्पप ॥१७॥ अप-टुम्ब, पन और इशिप सम्मश्री पुरको पाग देनेज सिमे मप और कामको स्पाग पापा का बोर ममकारो स्पाग पाहै पस स्यामति साधे निर्मप करते हैं। भाषाप-लुम पन, इनिप-मुर मप, कम बरा शरीर एग,रेप मादि परिमाके त्पागनेको त्याग करते है। सस्पमधिकृत्पा:- सम्पपते है- पपपन्द्रबनसासमायपाम् [नमोऽधिकार, मई अविसवादनयोग कायमनोवागजिझता चैव । सत्यं चतुर्विधं तच्च जिनवरमतेप्रस्ति नान्यत्र ॥ १७ ॥ टीच-विसपादनमम्पपास्पितस्पाम्पा मापणम् गामश्वम् मन । गामिति भापत । पिषुनो पाऽम्पपा पान्मया पम्पुदग्राम प्रीविजेदन करोति विसंवादपति । विस- पादनेम पोगा सम्मम्मा, म विसपाइनयोगाऽरिसंपादनपोगः । सस्प सपा पमानबस्त- मापपम् । फापेनाविमता विमा टिटो मठीमस: अपनान्यपपारितपा प्रतारपति, न विमोमिम दिखीम सत्पमेक । ममसा वाऽविमता सत्यम् मनप्ता प्रागागोप्य मापते पार प्रापो म सारगारोपपति निझेन पेन पर मतार्यते एप दवीपो भए । मागमिसवा प सत्वम् विमा कार यूवनिडवा मसस्तोमा पसायावि वि चतुर्पो मेछ। एकच मनेन्द्र एष मते. माम्पम सत्पमिति । १५॥ भप-सा रेसना पैसा कमा, काम, मन और पचनकी बटिम्या ये समके पार मेद । यह सब धर्म गिनेनदेयके ममें ही कहा गया है। मम्प मतों नहीं कहा गया। भाषाप-अप बहतको पाप करना, जैसे माप घोसा करना वोर बोरको गाप करना सिमावन है । वा पुगम्पोर बादमी सुटी बातें बमान किसीको प्रीधिको मारा, उसे भी मसवाइन करवस प्रकार के संपादकको न मा और सी बात होसी काम कर सपका पाण मेर। बिए फटको करते हि बाइसी एस रेप बनाकर शरसे दूसरों को टमता है। ऐसा म फरमा सत्पका दूसय मेर। मनमें टिम्साघम ऐना मी समो। सपा बारमी पहरे मनमें विचार करता है। पर ऐसी बातें नहीं सोचाप, बससे इसरों टमा बासके। पर समकासरा मेर। बबनमें कुटेक्वानहोगा मी सम है। सभी पाखको जपान, स्ट पातको प्रकट करमा, पानप, फोर और पाचन मोम्मा बमपरे। ऐसा न करमा सत्व है। पर समय पौषा मेर। सपके ये चार मेर सिमसासनमें ही बेगम पोंकि बम्प मोमें कोरबारिपनोंको बप नही कहा गया है। सपा सम्मस्पुम्पते- समका- अनशनमूनोदरता वृचे सक्षेपण रसत्याग । कायलेश सलीनतेति वार्स तप प्रोक्तम् ॥ १७५ ॥ टीका-समानराम चतुर्षमयदि पग्मासाम्तम् तपाऽपर भामस्पारपालम् दिनीमरणम् पादोपममनमिति । मोदवा मार्मिशतः सवेम्पो यमापति ननयस्पाला पाबदामहार इति । हचिम मिमा तस्सा समेपर्म परिमितमाम रचिभिभिमामिम। रसस्पाम, रसा सीबपिनम्मीतमवगुणविपस्तयो मिहतपस्वासा मागः । प्रयोग कारका १७४ १५ १७६] प्रशमरविप्रकरणम् प्रयोसोकटु यसमातापनादिः । संगीन भागमोपदेगेन, बदाम सीनता पन्त्रिपनोइन्द्रिप भेदात् दिपा । इन्द्रिय संगीनः सइतेत्रियम्पापा ममत् यमाङ्गानि स्वास्मम्पाहारपति र्मः सवपिन्द्रिपानि मास्मम्पारस्य विष्ठति सामू रागपातुम्प शबादिम्पो मिवत्प म्परस्पापितेन्द्रिय इन्द्रियसठीमः । नोइम्पिं मनः क्रोपाइयम । मात्तपैदम्पानररित ममसि मोइम्लियसम्मनः । क्रोधादीनामुइपनिरोपः अयप्राप्ताना प फल्यापारनं मो इन्त्रिपसंतीनवा । पोद्म विमर्क बाप तपः पपेमसम्पत्वाइवाममुम्पते ॥ १७ ॥ मय-अनसन, मोदरता, शिक्षेप रसमाग पाश मोर सोनवा पे नापतप कर गया। मावाय-एक उपाय करम उपपासतफबान-पासका स्पामना बममाया मछ- प्रस्याम्मान, इंगिनीमरण बोर पादपोपगम्नमें दो बीवनपत यन-पानका त्याग किया माता प्रमी बनधनप। पचीस कोरसे पपासकि कम बाहर करमा छनोदर है। मिसाको परिमित करने के लिए घर बहाव परिमाण करना कि भार में इतने परोसे मिक्षा ग्रहण कगा, वृत्तिसक्षेप है। दूध, दही, पी गुरु गैर रोके त्यागको रसमाग करते हैं। कायोत्सग, उत्कटासन, बातापन केरा शरीरको त देनेको कम्पोम प्रते हैं। सभगवाके दो मेव है पन्द्रियसभेमता वोर नोनियमनता, रिस प्रकार कलुवा अपन बनेको संकोच म्याद, उसी प्रकार सामु पग-पके कारण आप पमेयसे अपनी इन्द्रियों सकोच मेता है। इसे इन्द्रियसीनय करते।बाप्पान रोप्पानका न होमा, ग्रेप वगैरहको सापम न होने देना और यदि उत्पन हो पाये वो उसे विफल कर रेना नोसिंगला है। बारसपके ये का मेद है । ये मों पसरोंके परा देखे गावे ६. इसलिए उन्हें पाप करते हैं। माम्पम्तरतपोनिरूपणापार- बाम्न्तरणपका निरूपम करते- प्रायभित्तच्याने वैयावृत्यविनयावयोत्सर्ग । स्वाध्याय इति तप पदप्रकारमभ्यन्तरं भवति ॥ १७६ ॥ टीका-पापो बाहत्येन् पिचविशोपन प्रापभिसमारोपनादि स्वातीचारमस. प्रमानायम् । एमपित्तनिरोपो ध्यानमामलान् । वप्रारणे म्पुइसनीपे । मास चतुर्मिषम् ममगोषिपपसंप्रयोगे तदिप्रयोगाप विचमिरोग ! धिरोपेगादियदनापाथ विप्रपोगार्यो मनोनिरोप । मनोविषयसम्प्रपागे सविप्रयोगार्यो मनोनिऐफ। चन्दनोशीपदियनित मुखपेरनापाभाषिप्रपोगावीमत्तनिरोपः मातम्यामम् । एवं हिंसानुबन्मि, सूपापुरन्धि स्वेपानगम्मि विपयसंरमं चेति । पतपोस्पागस्तप । पम्प शुक्ल पम्पानमनष्ठेपम् । पमाइनपे पम्प पिमम्-मामामिपमपापविश्यं विपापिय संसानपिवयं पति । - - परम्बनधासमागपाम् [मबमोऽभार पर्यः शुइ मोबस शारीरं मानस पेवि वसनाति विश्मरीति सत्रम् । प्रपोदयदिपाया संस्कार । तबर्षियम्-पुपरस्तीपतक सपिचारम् एकस्वपितमविचारम् सम्मनियम प्रतिपाति पतनियमनुवर्तनम् । म्यापकमायो पाहत्पम्, माघार्पोपाप्पावादीना मक पानवलपामाविना रणामामुपमा अपरमुपा पेति । स्निीयते येनाष्टविय कर्म सरिनमः शानदसनचारिमोपचारमेक । वमोपवाबिनयो दिनयाई भम्युत्पानमासदानामप्रिय बणयामपरपमसाममदनादि । मुत्सर्माऽतिरिछपकरमसंसक्तमक्तपानादेस्मानम् । मम्मम्तरस १ मिम्पादनमापारेरपाकरणम् । ससाप्पापः पापा पाचमा, पूछना मनुमा भाम्नाग पर्मोपदेशमा वम मावमा मागपमानम्, समातसम्योपणनपूपमा मनपेमा मनसा परिर्वनमागमस्म, माम्माप मात्मानुयोगकपनम् मर्मोपदेश माशेपपी विपणी सरदनी निदमी पेखि पपा धर्मोपदशः । परमम्पम्वरमपि पोरा वफ ॥१५॥ मप-प्रायमिन, प्यान, देपालनप ठासम बार स्पप्पाम इस प्रकार बाम्पमतप र प्रकार होता है। मापार्य- ए वोपोंने दूर करने ए जो बामेचना मादि की पाती है। इसे प्रायमितरते हैं। माता के लिए एक विषपने मनके गानेको पार करते है। उस पार कर 1-मार्च, पर्म बाप्पानके मी चार मेर-(१)वप्रिय बाब समय होनेपर उसके प्रयोग किए पिम्सा करना, (२) मारको पोकाकोर करने का काम (१) पिपलका पोग होनेपर उसके स्योगके लिए विन्य नागौर (1) पल बस कोहरे भगानेसे म्पस र समधलयोन न होनेके म बिबरमा । गप्पामके भी चार मेर-१) सिमें बार बनुमन करमा (२) एह बोलने भागार मनुमब करना (1) चोरी करने बाद अनुमय परमा पोर (१) परिमा-सत्र मानन्द बनुमग करना। ये दोनोपान मेगमे पोग्बी गर्म पुरसम्मान करने योग्बो । धर्मपुत्र पानको पम्यान लाते हैं। उसके में चार मेद -भप्राविषय, मपापरिचय पालना और संस्थान गो पाम ATRक को मानसिपमुलका न करता , उस एप्पान करते हैं, इस बार मारे (1) समाचार (२) एपिपरिचा, (१) सूरमाया प्रविमति, बोर (1) सुपरवनियमित । भाचार्य, उपाप्पाय, पस्ती, शेष नमन, रोगी, सापुर मोड इन इस प्रकार के सापों सेना मुना करने पावस्व प्रते है।शान रमन, चारित्र और उपचार मेदसे मायके -पवाजमार हत्तर मिराम बाप मेरम्प। समाव-भाग्मी प्रातिमिमा।

कारिका १७१८] प्रथमातिप्रकरणम् १२३ पार मेद दिनप करने के योग्य मादरणीप पुस्पोको देखकर उठना, उपेटके दिए वासन देना उमके मागे हाय बोरना, उनके उपकरम ना, पैर धोना, बा दबाना बगेर उपचारविनय है। सेप सोनों पर है। वधिक उपकरण, मध्यान पगेयके स्पागनेको वायम्मुत्सर्ग करते है।और मप्पा रर्शन बारिक स्यागनेको बम्पन्मरम्मुरसर्म करते हैं। स्पापापके पाँच मेद है-वाचना, पृष्ठमा भनुप्रेधा, बामाप और धर्मोपदेश । शम्पा वपके पाठको याचना करते हैं। स्न्दर र परमके लिए पूछनेको पृष्टना करते हैं। बागमके वर्षका म्नमें पिम्तन करनेको अनुप्रक्षा करते हैं। पाटके पुस्ताक उबारम करमेको माम्नाप प्रते । माक्षेपपी, निक्षेपमी, सदेनी और निरनीकसा करनेको भर्मोपदेश करते हैं। इस प्रकार वाम्पसर वपके मी सह भेद होते हैं। सम्प्रति बचपप्रतिपादनापार- बर प्रापवर्पको करा- दिव्यात्कामरतिसुखात्रिविधं त्रिविधेन विरतिरिति नवकम् । औदारिकादपि तथा तद्रझाष्टादशविकल्पम् ।। १७७ ॥ टोका-विम्प मरमपतिम्पन्तरम्पोतिषविमानवासिदेम्पा, ताम्पो विपतिसिविल मिरियमेति । मनसा न करोति नकारपति, मानुमम्पते । पर्व पापा कापेन पेवि से मवमेवा मौवारिसं मानुप्पविर्यस्त्रीषु । मम मनोवाकापः सवप्विानुमतिमिम पिविरिति नगमम् । वदेवझारावयमेवं मपति ॥१७॥ मर्प-देना समभी का गोवारिकर समापी कम्ममोगसे नो मो प्रभासे मत होनेसे अपच वठार मद रोते है। मावाप-मनपासी म्पम्स म्पोतिफ मोर मानिक मोके मोग-सबसे मन, पचन, काप बोरस, सरित, अनुमोदनापूकि मिरत होनेसे मी भद होते हैं। इस प्रथम प्रसव के बटर मद। मापियाम्पमपिलपार- बाकिसम्पधर्मको करते- अध्यात्मविदो मून्छां परिग्रई वणयन्ति निमयतः । तस्याद्वैराग्येप्सोराकिम्वन्य परो धम ॥ १७८ ॥ या-भप्पास्मानास्मन्येष म्यापाप, पमपमारमा पप्पते पं का मुप्पन पति पात्मविद विक्तिपरम्परा परिण मारमर्ष गणपम्ति । मूग्ण गाम्पम्। निभपनपाभिप्रापेमारममा प्रतिनिशिए परिषामा पणिरामपाप्पा । पम्पारेसमा पणिस्वमदिराप्पमिमता माविम्यं परोपमा नपिम्मूप्य चम्पेवि पाइन् ॥ १७ पपचनशासमायपाम् [ मनमोऽपिता, पर भवप्पासानी नपसे ममलो परिमा करते हैं। बटोपा मुक उसघ पाकिसम्प परमर्म है। मावाप-गो र पानव है बारमा कैसे पता है पर से हटता है।' उन पारमानियों पारम्बानी करते हैं। बप्पामसानो थियनपसे वात्माके मोहपरिणामकोनी परिमा कर।सोकि उसके रोनेसे ही मनुष्प बाम परिमाके सपने प्राव बोरोबर परम्प नामिडापी उन्हें घरपरिकसे मी ममम महाबमा पारिए । पचमाविमपर्म है। पर्मानुष्ठाने पापति- - दशविधधर्मानुष्ठायिनः सदा रागद्वेपमोहानाम् । दृढस्डघनानामपि भवत्युपशमोऽपकालेन ॥ १७९ ॥ टी-रसमा समादिधर्म, समुष्ट्यापिनस्तबासेपिना। सरवानबरतम् । पगोन। मोहानामुपशमो मावि । पते प संसारभ्रमणस्म मूसर की पनाम सदर रागावा मना पामा प्रभूवकर्माशा । मपवा पपासम्म सा राग, सो क्षेपः, पनो मोह । एवं विमानामपि सत्समय पान मस्युपरामा भयो वा ॥ १७२। मर्प-यो रस प्रकारके धर्मका सदा पान करते हैं। उनमें पिरका सचित पम, मोरपोरेरी समपर्मे उपभम होगा। भावार्प-संसारके मुझारम पम रेप और मोह । पिरषा समित होते-होते में मात्मामें स्थिरसे हो जाते है और उनका मेरन बना बा कठिन होबा। शितो उस रस अमोल सहा सेक्म करते समके दुर्मेच एण-रेप और मोह धनमा 0 सान्त होगा। ममकाराहकारत्यागादतिदुर्जयोदतप्रवलान् । इन्ति परीपइगौरवकपायदण्डेन्द्रियन्यूहान् ॥ १८ ॥ टी-ममम मापा,प्रेममा मात्र मानः प्रोपमा वयोमर्माभिरको सम्पामा । किं भवतःपार-मविपर्ययोदम्पपठान् मतीव दुबपानुदोष तापम्मान महापाप । इम्ति मिनासयति । परीपागीरमाणपरणेमियम्भून् परीना पुत्पिपासादया, गीर गरपापिस पापा कोपामः दणा मनोपासवान समिपाधि, पा म्हाः समूहा पाम्पूहगमम्पूनिम्म्या प्रामः । वाम् इन्धि विवरते मिमक्तीस्पपा १८ ॥ --सनापान फाप ।

कारिका १७९१८०-१८१] प्रपमरविप्रकरणम् मर्य -माम और ममकारके मागसे बमन्त दुर्यप, ठदत और बम्शाये परीपर, गौरव, कमाय, योग धौर इन्द्रियोंके सम्बको नए कर गता। भाषाय-माया मोर गेमको ममकार करते हैं और मान मोकोपको वाकार करते हैं। जो दस धोका पान करता है, उसके ममकार और मकर सूट वाले हैं। बार उनके छुटमय वामा के प्रमा भन्नु परीषह वगैरके म्पाको मेमे में समर्प होगा। पपा पैराग्यमार्गे स्पय मपति तथा प पक्त इस्पार- जिस विस वैराग्यमामि सिरता दोन पैसा या करता है, यह करते? प्रवचनभक्ति श्रुतसम्पदुद्यमो व्यतिकरच सविग्ने । वैराग्यमार्गसद्धावभावधीस्पेर्यजनकानि ॥ १८१ ।। टी-मोम्पन्ते येन जीपस्तस्परचनम् तप भकि सरा वनुम्पानपरता सर- महारको पा प्ररपन प्रबत्तीति । भुतसम्पनि उपम स्वाद, अतमागमस्तस्प सम्पर उपबम' भपूर्वमपूषमपीते प्रवचनम् । म्पतिकरण सविनी सविनाः ससारमीरवस्ता सहसम्पर्षे पयोक्त- कियालयपिमितिका संसर्ग । पभिराग्यमागस्थप भवति। म पलं अपग्यमागस्थपम्, सदावमाषपोदिस्तस्याथ मवति स्यैपम् । सनाया गीपारय । एसे पपपा मगलियस्त पेति सिरीमपति पुदि । भाग सपोपमम वशनादि मगनस्स. का तीपस्सु साधुप "पने पम्पनीपा पूजनीया " इति एपिपाया पिप स्पप बनयन्त्येतानीस्यपः ॥ ११ ॥ मर्य-प्रवचनमें मछि, साम-सम्पतिमें उत्साह और ससारसे मीतबोन सम्पर्क राम- मार्ग सादिक पराम और क्षयोपशमारिफ भामें मुश्किो रिस करता है। --शाषको प्रथम पते ।पोकि उसके द्वारा गादि पोधान या गाता है। भाषा परम मारक अम्तिरको प्रवचन करते हैं क्योंकि ये प्रवनका उपरम परते, उनमें मठि रसनेसे मनपे मामाका अप्पपन रफ अपने शासनासो सून पानेस बोर संसारसे Rरक सानो सम्पर्क गने से मन मार्गमें सहोता है। बीमा कम माखिय- मुद्धि होती है भो नोपशमादिम्प सम्पम्नार मानो प्राधि होती है। बाद मजिक गामाभ्यास करने और साधुबोकी समाप्ति एवम् समयमाम मन खिो गा है। टीको ARIKगपे पदामि या मार सरोजाना दिवस से 03, असे कि मगन्ने र कामि एम युमिमी और किसी जाती है। पतेप्पेस मीस्पपमिणता पर्णिमा पमापाऽम्पसनपिस्पाइ-- इनका बुद्धिधे रस रमने लिए चार प्रसारकी पर्मा अमास करने दिया प्रवे मावाय- - १२॥ - पपपमुमशासमागपाम् [समोऽपि आक्षेपणी विक्षेपणी विमार्गवाधनसमर्थविन्यासा । श्रोतृजनश्रोत्रमन प्रसादजननी यथा जननी ॥ १८२ ॥ चतुर्विधा पर्मपामस्तुतेवि सम्पमाह, पार प्रकमकी का सेवाशक्ती संवेदनी च निवेदनी च धम्या कयां सदा कुर्यात् । स्त्रीमतचौरजनपदक्याम रात्परित्याज्या ॥ १८३ ॥ टीप- मासिपस्पार्षपस्पमिपुत्रीकरोति पा सा माक्षेपमी कपाशापविमाना। रिमिपति भोमामिगपाचा काममोगेषु पैमुखमापादयति विक्षेपपी। पिमार्ग सम्म मसमाविषपपिपरीवासुगवादिप्रतिस्वस्प बापन योपपलम्पापनम् । विमाममापने समक्ष पाको बिवासोरचना पस्पाः सा स्मिार्गमापनसमर्पम्पिासा। मोतीवि पोवा बनो डोर मोदवनस्वस्म भोमं मनर को प्रसादो पो बम्पते पया सा मोदमनमोमममम्मसावजननी। पपा बनमी माता हितकारिणी सदुपदेशवापिनी स्थापत्पाना भोममनती प्रसादयाति परि वोपयति पापीवि समन्मा। १८२॥ टीका-सम्पमेयवे म प्रायवे बोवा पपा सा पिदिनी कपा । भरगतामा मनः पीताप, म बास्त्पमिनिमेपमाममपि तस्मा बेदनाया विश्वा । वम वापसी मेहना ममुमता अपम्पेन सर्पसामाण्पुस्तण अपसिंगासागरोपमापीति । विग्योनायपि शीतोष्पमुपातिगुवमारसंवापर्य दुई पानवानदमनम्मरमादि चेति । भानुपेबपि कानमनामनगागपिराम्पसमाविवाहासत्तानि मरणोपकासाविसापोगोनाम । वमा मिपपिप्रपोगाप्रिपसम्प्रयोगेप्सितारामदारियदीमनस्परमम्ममामिमोगादिसानुभमः। रेष पोलपविणेपवर्सनावात्मनस्तरामेमानमः । दबा बनता देवेनामिपोगाइम्स पुण्याकरितपमाएतमपुराविरूपाणि चरिता सन्तो वामन्ते प्रतिसेम्पन्ते ग। तपा भगनाने मायुपिपमासापोप उपपत्तिसानानिमी मत्सानि निहताहतीम्पबपिनामेप मागसम मवन्ते। मतभरिपादपि संसारादुनियते मोसापमेव प पटा इति । निद मीपते पपा ममोमेपु सा निदनी । इत्ता काममोगा न इप्तिमामातुमात्मनः पृत्वमाः । सदा शियम स्त्रीमणो दुर्गम्भि रसुषिरत्पन्तबगुप्सिक्स्तम भारतिरिस्पेर्व पामन व परिगताण मोहोरपास्मुसमिति मम्पते, मतो निरिया परिस्परप काममोगान् निसा सिदिनप्पारापने प्रपर्वत इति । परमेता सदनीं निपनी प पा सदा कुर्यात् पर्मादमपेतामित्पमा सम्पारिकपाप पत् परियाम्पा । वम सीकपा, पपीनमारण्योपमानापमपानि योपितो वर्मपति पया सा नीच्या, मठमाहारसापा, मोदनम्पश्नमणलापादिपरिमिटियाम्ता महापा। पीप मनिम्मा ममुना प्रमरेप लामावि बनम्ति एकाप गाउपन्ति, तामाम्पुबाटयन्वीविपर - ।

चारिका १८२ १८५] प्रशमतिप्रकरणम् कपा । यमपदफया “ सेवानि श्वानि वा सस्पाम्पस्मिन् वनपरे बायम्ते, मस्मिबति- भूतो गा रसः शातिमुद्रगोधूमादि पोत्पपवेऽत्र नाम्पप्रेति' जनपदफया । एवमेता मनसापि नाठोप्या किमुत पायेति दरात् पपिाः॥१३॥ मय-सम्मानका उम्छेद करने में समप स्मनासाठी, ओ श्रोतामोंके कानों और मनको मात्यकी मा बामम्द देनेवाम्मे भाक्षेपणी, Aपनी संपेइनी और मदमी पमकमा सदैव करनी चाहिए । वा सोका, मामकर, चोरकपा और दशकपाचे रस ही छोड़ देना चाहिए । मावाप-बो का पीबोंको धर्मको बोरे बभिमुख करती है, उसे वापसी करते हैं। गो का बीपीको प्रममोगसे विमुख करती है, उस क्षिपणे पाते हैं। मो कप्प बीयों को संसRसे मपमीत की उसे मदनी करते हैं। वैसे मरकगठिम सर्दी और गर्माका बना कर एक धमके लिए मी ठस कासे पुकारा नहीं होता । फमसे कम दस हजार पटक वीर अभिकसे अधिक सेवस सागर वक बों पा कर मोगना परता है। सबमनिमें भी सदी गर्मा, भूरा पास वोर वतिमारक के साप ही साप सवारी गुम्ना गमीयसे पीटा बाना नासिय कोणब दा बाना बादिका रुप भोगना परय । मनुष्पगतिमें मी कामा, भगरा, पोना, मासमा बहरा अन्या, कुबड़ा और कुरूप ने सिमाप सर, फोर यस्मा साँसी, रस्त ठप हरपके रोगों का मी उपना परवा वा प्रिपरमका पोल, प्रिपजनका सपोग, इस्ति बस्तुका न मिम्मा गरीबी, भमागापन, मनकी पर Reaा और समन्चन गराए बनेक सुखों को भी मोगमा परखा है। गतिमें वाय देवोंका सकर्ष मोर अपमा अपर्स रेपर रहता है, तवा परवान् देवकी बास बम्प सप पुष्पा रेण पी, मोगा, और मसूर पगैरहका रूप धारण करक सबारीक काममें छापे गाते।पा पर तसे पुत होने पर माह पापी र गाते हैं मो भवधिानसे अपने गन्दे बोर मरे सम्मानको नामकर बरे दुश्ी होते हैं। इस प्रकमकी संमेदभीमपासे यह गौष चतुगतिरूप संसारसे कर मोपौ भाव है। गो का काममोगसे रम्य उपम फाती है उसे मदनी करते हैं। वैसे प्राममोग क्षणिक वरमाकी वृद्धि करने में समर्प नही। बीकी पोनि सरा गोली, दुर्गभित, अपवित्र कर बापत मानियो उत्पम कानेगम होती है। उसमें रवि करनेवाग मनुप्प मोरके उसे उसी समानता है, वैसे मारका रोगी पारको नुगमें मुम मानता है। ROM मनुप्प काममोगोको मेकर मुद्धि-उस्मो वायफ्ना करता है। इस प्रघा इन पम्पुष चारों मामों को करमा पाहिए, क्योंकि ये कपार मागध नारा मनमें सपर्प रोटी, वो जिस प्रम माता रितका उपदेश देकर मानी सम्वान के कान मोर मन प्रसन्न करती है, उसी प्रकस पर मी पुननेवाके कान व मन आनन्दत माती क्स. इन कथाओंको सदरा करना चाहिए। पोर मोमता, मचकपा, बसपा, और देशसयो रस ही घोरना पादिए । पों मप यौन जम्म 4, भूध तपासको पर्ग प्रनेको खोकशाप समान, रारा गाम पर पाग कोण मोजनकी पर्वा करनने मध्यापास। बमुक पध्मसे ना मोर ग , गोठे बदत, धरणे, सय्यत पादिर्ग ܝܢ १२८ पपचन्द्रमसासमागयाम् [रसमोऽधिकार, पण पारचौरकमा करताबमुक रममें सब सम्म पैरा वा अमुक रेस म एवायसे वारे गाया जायण, मग गई बमेह उत्पम होयरे, सरी बगाय को पैरा महाँ -स प्रकारको वर्षाको बनपरका कराइन कामोध मनमें मी नहीं सोचमा पादर, पचनसे कारनकी तो पात ही क्या है! ॥ १८२-२६॥ मपि - । गोरमी यावत्परगुणदोपपरिकीर्तने व्याप्तं मनो भवति । तावद्वर विशुद्धे ध्याने न्यग्र मन कर्तुम् ॥ १८ ॥ टीका-पावरिति मतपरिमाणम् । यायत कार्स परस्प गुणान दोपाम परितिक स्पवाटपवि पवमापापाये मपति । परोपोहने म्पापारपप्ति म्पन मनः कपति, पंचम्पान् समबन्यपारिवादिति तावन्त पर शोमनवर निबरायमात् । विमुये प्याने निम शुर। म्पाएतमणि मनः फलमिति । ननु । परगुणोत्कीर्दन म निन्यम् । उम्पवे मम्पास्मपिता- परस्प न वनापि फिभिप्रपोवनम् ॥ १८॥ मप-रतने समपा मा सगुण र दोपों काम गा रहाउतने सम्पक उसे रिपुर प्यार में माना श्रेष्ठ है। भावापस गुमाँ और दोनों के प्रम सममें फ्नक मने बनेसे मेल होगा। इसक्षा मम पानी मगा उन्म कोंकि उसे को मिय होती। पश-सरेके गुणों पर करमा दुरा कम्म महो। समाधान-सम्पनिमें महुए साधुको उम्से मी मा प्रपोगन है। बस इसके गुणदोश पागेमा मनोन मार विनुरप्पानमें ही उसे माना पाहिए। विशुनपानपरसनापार- मनुरप्पानको मरते- शास्त्राप्ययने चायापने च सचिन्तन तयात्मनि च । धर्मकपने च सतत यल सर्वात्मना कार्य ॥१८५ ॥ -प्रिप्यम्स मेमोग्मागप्रस्पिता इति धासम् । शास्तीति शास्त्रम् सम्पापार विरक्षापाम् । सम्पाप्पपनमपूषप्रदप पूरशीवानचिन्वनं पापनादानभिस्पादि, मम्पापरमा पाए । सपिम्तम संचिन्त्य पधारोपारिरिमुवमभ्यापति । पपासोचते चारमनि “निमय मपा वं पायोन कि पामो मतामिति । परिमपमास्याने व सतर्व पर सगरमना मनाप्रामायापा॥१५॥ - -- कारका १८० १० १८१८७] प्रशमरविप्रकरणम् मय-शासके पाने, पकाने में, मारमचिन्तनमें और धर्मोपदरामें सामन, वचन, और कापसे पन करमा चाहिए। मापायनापे-नये शास्त्र साप्पाप करना चाहिए। पास पर हुए शासन रिचार करना चाहिए और विचार कर पूसरों को पढ़ाना चाहिए । मा प्रतिदिन पह सोचना चाहिए कि 'भार मेरे शावमिति कम किया है या नही !' इसके सिपाप दस प्रकारके लोक कपन नमें भी मनको मनाना चाहिए। ये सभी कार्य सपुर प्यानमें गर्मित। शासशय म्मुत्पत्त्ययमाह- साब-शमकी गुत्पसिकरारे- शास्विति वाग्विधिविद्भिर्धातु पापय्यतेऽनुशिष्टपर्थ । बेलिति च पालनार्थे विनिभित सर्वशब्दविदाम् ॥ १८६ ॥ टीका-शासु मवृशिष्टापिति । वाग्विनिविदधतदशपूर्वपराः । पापठ्यत इति मम्- मासनेऽत्पय पठ्पत इस्पा । भनेकाया मातब इस्पन्यस्मियप्पर्य तिरस्वाति तापयति-- यमुनिएपप इति । प्रेम पालने । विनिभितो विशेपेण नियतः । समाम्यपिया प्राक्तसंसार सम्पमामृतधाना विमिमित इत्ययः॥ १८ ॥ मर्प-बौदा पूर्ण पारी 'शाम् पातुको 'बनुशासन ' वर्षमें पड़ते हैं। मोर 'प्रेर' पातको समी शम्सचा 'पासम' में भित करते हैं। मापाय-शाम सम्म दो पातु से बना है। उनमेसे शास्' धातु वा मनुशासन पोर मे पातुका बर्ष पाम है। उळ पातुओंका यह पप हमरा रा नामित पर पति भारी बोर सत्तन प्राक्त बादि सम्मोक पाना इस वर्णको म काठ मानव है, किन्तु से अप उमो मापे हुए बोर निभप किये हुए हैं। यस्माद्रागद्वेपोदतचिचान् समनुशास्ति सदमें । संजायते च दु खाच्छासमिति निरुच्यते सद्धि ॥१८७ ॥ सका-सासनिवपनदारेण पाच संसारपति । एगदेपाभ्पामुदतमुहरण पिच येपी वम रागदेपोयतपिसान् सम्पगनुशास्ति । सद्धर्म समादिपरासणे सदमपिपमनुशासन पति । समापते पसात शारीराम्मानसापेवि परिरसति यम्माचम्माायमभिपीपत। सनिययान्पापनादिभिनिभयेनोपवे निपम्पत इत्यय ॥ १८॥ १-कारस.।

1
मापाप पर
सपबम्जैनपासमाप्रपाम् [दशमोऽधिकार, पर्ममा
मप-पट राग मोर पवेगिरके वित्त म्पास समको समीचीन में अनुशासित
at Rबसे बचाता है, इसलिए समम ससे भावपते हैं।
सास् । पातका बर्ष बनुशासन बोर ! पाच वर्ष रखन
बताया है। मा रोमा पामोंसे शाबर बना है। पर वो रानी और देणी मनुप्पोको
उत्तम प्रमादिरूप रसपा शिक्षा रेप और मरकादि गतियों के शारीरिक और मानसिक
@से उपाय, उसे सब वे हैं। पापके अनुसार दोम्मेवाने AIN पी बर्ष
Pea नियो।
शासनसामध्येन तु सनाणवलेन चानवद्येन ।
युक्त यत्तच्छासं तचैतत्सर्वविवचनम् ॥ १८८ ॥
टीच-ग्रासनसामनानुपासमप्तममिदं वचाई प्राथनमतस्तेम पासन
सामन संसारसमाश्मनुस्यता सविपरीत प मोक्षमार्ग पसंपवा निरापा परिरमाता प
पारमागतान प्रापिनोऽनपोपायेन भित् परिरमपम्पानुपश्य तपेवं शासन स्पचिप
मात मुकमि प्रतिबदम् । पता शाममुक्केनामदयेन बतास समिर सास्प
बधनमम्मपहारेण सीमापपगदेपमोहस्प नाम्पस्पेति ॥ १८८ ॥
मय-मोदिप चासममधि और समके पासे पुच होता है, उसे शव का है।
ऐसा समय बम ही हो सकता है।
माषाप-रसारूप प्रवचन का अनुसासन रममें समई, मा सप्तरका
समाव कामगार और उम्स पित पोषक मार्गको इसका भरपमें अमे ए प्रानियोंकी
निदोष उपापसे या प्रनमें सपर्य है। मिस प्रकार राग दूसरों पर करके किसी एक था
करता है उसी प्रकार यह सस सीस पातक नहीं है। मत था उस दोनों बातोसे पुष
होतापमान साप चोर तमोह मायान् समासन पषन सकता है।
मोर ठीक चोमें मगरको हिप शिवम दनेश और पि विस उससे मन
करनेकी अनुपम सामप्प है।
तदेव सरपवयममुऐसतो इधपपार-
अब उनी परेरके बनाये सात है
जीवाजीवा पुण्यं पापासवसवरा सनिजरणा ।
वन्धा माझमेते सम्यक् चिन्त्या नवपदाया ॥ १८९ ॥

कारिका १८८ १८९] प्रशमरविप्रकरणम् टी-जीवा इति समयम्सा माणमाब उक्का ते पम्पमालमेरेन प्राणा विप्रकापा। तमद्रम्पप्राणा पत्रिपाणि मिविर्ष व उपासनिःश्वास तयायुरिति । पापास्तु शामवशनोपयोगास्या: 1 एमिः प्रापैरवीविपुषींवम्ति गीविप्यन्ति पति भीमा । सदि परीतास्ववीपाः । पुम्पं सातादिवाचत्वारिंशस्वममतपः । पापं स्पषिकानीति फर्ममेवानाम् । भासमापवाग्मनोमिः कर्मयोग मात्मनः । पपामेवाभवापा निरोप संबः सा निबरणेन सनिबरमाः । निसन्देप्पासकवारेपु गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीपाययचरणयुक्तस्य तपोऽनुष्ठानात कम निबरप मस्तीति । मिप्यावशनाइयो बन्योतक । सयोगात् सम्मापः समामा कममोयोग्यान् दहानायते स बन्यः । बम्परत्वमावनिपराम्पा सरस्नकमसयो मोक्षः। एपमेते सम्पर चिम्पाः सम्पगामेच्या मन्यस्मै प्रतिपापा नव पदापार 1 ननु च साले सप्तामिदिवा, रुपमम मपेति । ठम्पो-याने पुण्पपापपोगापमानेर ग्रहणात् सप्त समया।हत मेदेना- पावान पुष्पपापप्रतिविमागपतिपादनामिति ॥ १०॥ मर्य-पीप, पनीर, पुण्य, पाप वापर, सकर, मिरा, बब बोर मोक्ष नन नो पदायों का चिन्न करना चाहिए । मापाय-यो अपने अपने योग्य प्रागोंको धारण करते है, उनें गीर करते है। प्राम रो प्रकार के होत ।-एक इम्पप्राम वौर दूसरे मा प्राप । पाँच इन्द्रियों, न बस, शासोमास घोर भायु-ये दस इम्पप्राण है। उपा ज्ञानोपयोग और दर्सनोपयोग, मामान है। इन प्राणोंसे बोलियो, गीते है, वौर भीगे ठमें पीव करते हैं। उनसे पिपरीत बगीच होते हैं । सातारमीप गए १२ प्रतिपको पुण्य करते हैं। बसतावदलीप बादि कर्मप्रातियों को पाप करते हैं। मनोयोग पचनपोग, बोर कायपोगसे बाग्मामें कके बामेको बारप करते हैं। पाकर रोक्मेको संगर करते । बाधबके शरोंके रोनेपर गुस समिति, पर्म अनुप्रेक्षा, परीपहरयार पारिबसे बुख साधुके तप करनेसे बो कर्म करते हैं। मिरा है। पके कारण मिप्पादन बगेयके मिचसे पाप सरित मारमा यो कमोके योग्य पुगेको ग्राम काप उसे बन्य करते है। बलक करगोंके समाव र मिर्जरके निमिठसे बारमास समस्त कर्मोक पप हो जानेको मोष करते है। इस प्रकार हननी पदापात्र मन्त्री र मनन करना चाहिए और दूसरों को उपदेश देना चाहिए। श-म्य धाओं हो पात पराई पाये हैं। यही नो क्यों है। समापन-अप साबोंमें पुष्प वोर पापध बम्वार धर्म कर लिया गया है।पदयो सात ही मनाये है। पो पुष्प को और पाप कोका मेद मक्लामेरे लिए उन पृपा प्राण दिया। बीवमेवमतिपादनायाह- भीमाके मेद क्या है पपपप्रमशासमाछापाम् [ एयरसार, पीविमानानि जीवा मुक्ता ससारिणम संसारिणस्त्वनेकविधा । लक्षणतो विनेया द्वित्रिचतु पचपदभेदा ॥१९० ॥ टोष-विप्रा बीमा । मुझ सम्ममयमार पपरपा । संसारिपस्तक रिपोचतुर्गविता येते पानेकमेवाभारकास्तिर्यो ममुप्पा पेपाः । पुना एलप्रमापुषियी नारका स्पादिमेवा । विपनोऽप्पेअविमित पञ्चेम्ब्रियमेवाः । पुनरेफेन्द्रिया पपिपारिभवः । विन्द्रिपाः शंसयुक्तिकालयः । श्रीन्द्रियाः पिपीलिकामा । परिनिया मनिकाप्रमरप- तसादयः । पवेन्द्रिया गोमनिम्यजाविधवपो गर्मम्मुतवान्तारपा संमूनाथ । मनुप्मा भार- मेणादिमेवाः गभगः संभूनामेति । देवा भपनपतिम्पम्वरम्मोतिकमानिक । भवन पतयो दशासरावया । म्पम्वराविषयरपोरमेवा म्पोतिम् पयावर मादया। मानि सोपर्मयास्पायव ति ॥ १९ । मपीब दो प्रकार के होते है-मुवीय बौर संसारोपीय । समारोपीय यो, गा पार, पारोब मेररूप बनक प्रकारकावे । म पमे-अपने बिनोसे जानना चाहिए । मागा-सीय दो प्रकार के होते हैं। उनमें से मुख्यष समस्त बोसे मुळ होनेके कारण सब एकसे ही होते है RT संसारोग बरेक प्रकारक होते हैं। सबसे पहले चार गदियों की अपेक्षासे पार मेदनारको पिड मनुप्प बोर देव । फिर रत्नप्रभा विधी पगेशकी पेमासे मारपिके बोक भेद है। वर्पयोंके एपेन्द्रिय, होइन्द्रप, त्रिय गोत्रिय, पवेभिप बाद मेर। एकेन्द्रियों पृथिवी बाद मेर है। रोधियों के संग-सीप वगेरह मेद है। अभियों बाटी बार मर। पोरपियोंके मासी मोरा, पापगेख मर । पचन्धिपक माय मस पारा, महा मोरा तपा गर्मर बार सम्म मेरा मेर है। मनुष्योंके वार्य, मो मर्मन, समय बाद मेद है। २६ मननपति, पर, ग्योतिष्प वोर मानिक होते हैं। मानवापि ममामार कोण रस और सम्पन्स किवर कौर बाद मंद । पोविपके सूर्य औरह पाच मेदोर मानिक सौपर्मपसी गय मे। प्रकरणपरस्पनेमविपत्तमम्पपापापति- मापार समारीचीयों के रोशन और मेरों करते है- द्विविधाभराचराख्यात्रिविधाः स्त्रीपुनपुंसका श्रेया । नारकतिर्यग्मानुपदेवामतुर्विधा प्रोक्ता' ।।१९१ ।। टीक पराममास्योगापूवीमियादयः मषपा स्पावरा पिम्पादयः । मिविमा सिया पुमासो नसभा। मारभरिमदेन परिया।। सामनेऽमिनिवाः ।१९१ ॥ पोमार।

प्रशमरविप्रकरणम् १५३ नका १९-१९१ १९२ १९१] मय-समारीची पर दौर बबरके मदसे से प्रचारफे और मो, पुष और मपुसको से हीन प्रकारक बानमे चापिए । प्पा नरकी, विपत्र, मनुष्य वोर देवक भेरसे चार प्रकारक ३ गये। मावाप-सकाप, मायुकाय हीलिप बगैरह मंगम प्रानियोंको पर परत हैं। परिचय तर स्पार प्राप्पिोचे बघा करते हैं। समारीचके ये दो भेद है। ताबी पोराकी अपेक्षासे न मेद वीर नारकी मगही अपेक्षासे बार मैद है। पञ्चविधास्त्वेकद्वित्रिचतु पञ्चेन्द्रियाम निर्दिष्टा । क्षित्यम्वुवहिपवनतरवनसाभ पह मेदा ॥ १९२ ।। टीपा-पचाप एकदिभिपतुःपम्बिया पिताः । भूमिवम्महिलायुक्मस्पति जीन्द्रिपादपति पर भेदाः ॥ १९२ ॥ मष-पत्रिप, रोइन्द्रिय, क्षेत्रिय, चोइन्द्रिय और पन्द्रिय-पे पाच मद और मिली, बम, बानि, पप, बनस्पति वीर बस-पेम मेद को। मापाय-संसायचीबके एपेन्दिप बनेखकी अपेक्षासे पाँच मैद है। और प्रविण वगैरा र कम्पोंकी अपेक्षासे मेद है। एवमनेकविधानामेकैको विधिरनन्तपर्याय । प्रोक्त स्थित्यवगाहज्ञानदर्शनादिपर्याये ॥ १९३ ॥ टीका-एवमुक्तेन म्पापेनामेषिपानामनेकमेवानामेको विधिमूहमेवोऽनम्त. पपापोऽनम्तमेव पितः । न फारमेन स्पिवितोऽगाइतो पानतो वर्धनतम । स्पिति वस्वावदनम्तपपाया। मनावी संसारेऽमम्ता स्मिविपर्यापार मगाइयोप्पसनपेयप्रदेशावगारे हीनामिक्समप्रदेशमेरेनारगाहोऽपि पापकार । तपा पानवोऽम्पनन्तपपापळा रसनवमा पपोकम् ~ मर्पवा पाणपसना, ममता समपबरा।" एकमो नारधविमेदो पासमा ममतपपायो मरति ॥ १९३॥ मप-स प्रकार बनेक मेदोमसे एक-एक गभेदके स्थिति, वार, बान रर्शन वगैर पापोपचासे बनम्त मेद को। मापाप उच्च प्रकार के समागमों के भोक मेद है। उय बनेक मेदोमसे मी एक-एक मेरो यकी सेवासे बनन्त मेद । स्पिति एक पावसे मार ठेवीस सागर कही । पयनशास्त्रमाणापाम् [एकादसाऽपिकार, जीवादियायल्पनि ।। अतः स्थितिको अपेक्षा कमन्त मेद । एक गीपकी भगाहना गेकके मर्मसात मानके पराम है। सरकमेटेर होमे कारण प्रदेसकी हीनता और अधिक होनेसे बगाहनाकी पेक्षा मी पावसे मेद है। पाशाम वौर दर्शनकी अपेक्षासे मी वनन्द भेद होते हैं। मोकि सूक्ष्म निगोरिया सम्पपर्यामरके पानसे मेकर कब्जानपर्यन्त बास्के बनत मेर। इस प्रकार एक एक मारकादि भेदक समब अमम्त मद ।। बीपरसवामपिसवाह- बीरका भण करते हैं- सामान्य खलु लक्षणमुपयोगो भवति सर्वजीवानाम् । साकारोऽनाकारम सोष्टभेदभतुर्धा तु ॥ १९४ ॥ टीका-सामान्पर सबीवानामुपयोगवना शानदर्शनम्पापार । नऊ सदोऽ पपारणे । उपयोग पर सामाम्परक्षणम् । सीवानामिति । मुपपोर्ग विस्परपति- सारोपयोगः मापे विस सहावरेप साधरः सविसापोशामम्पापा । मनानरो वर्मनोपयोग । सामाम्पग्राप निम्पिमिस्पपा बानोपयोगोऽसमेष-मविभूतापभिमना पपापमम्मस्पज्ञानमुतासाममिंगकामाम्या । पानोपयोग-पभुरषभुरगापिक्स पानाम्पा । १४॥ मर्प-सम बीच सामान्य क्षप उपयोग ।।परो प्रकारका होता है-साकार बनाकार । साकाठपयोगके माठ मेरो और बनाकारलपपोनके बार मेद है। मागाय-मानने-समम रूप पम्पापारको उपयोग करते है।पा उपयोग की सब पीपेश साम्प पर है। उसके रो मेर?-साकारउपयोग बोर बमाकाठपयोग । 'पा पटइस प्रकारके मकसको पार करते है और सविसक कामम्पापरको सामोपयोग नते है । वा निम्पिक रमन-मापारको बनाकरउपपोग करते नोपयोगके बाठ भेद है। मतिबाट अबाग बधिान मनापम्पमान बेमान, पत्यान भुबान और मंगवान । रोपपोग के बार मेद है-पभुन पर्दर्शन पविदर्शन बोर वर्सन | वानारी मेदामतुरम विस्वरत कपपति- इम बार पर मरों विस्तारसे प्रते- ज्ञानाशाने पचत्रिविकसे सोश्टधा तु साफार । चक्षुरचक्षुरवधिक्वलद्दग्विपयस्त्वनाकार ॥ १९५ ।। । बामस्पर।

कारिक १९, १९५ १९६-१९७] प्रशमरसिप्रकरणम् टीका-पयासम्म पचविकास मत्पादिशामम्, मिविमापफमशान मत्पशानादि। एपोऽप्रकार उपयोगः साकारः । तुशब्दोपारणे। मष्ठविप एवेति । पार्दर्शनादिसामा म्योपयोगमतपेति ॥ १९५॥ मर्प-पाँच प्रकारका बान और धन प्रकारका जवान इस प्रकार भाठ प्रकारका उपयोग सास होता है। चक्षुर्रर्भन, भचक्षुर्दर्शन अवधिदर्शन, केवछदर्शनका विषय बनाकार सेवा। मीस्पयमुपयोगसमणस्प सता परिणविषिशेपाम् मावाम् पयमाह- इस प्रकार बीका पक्षण उपयोग है। पब ससके मार्योको तगवे हैं- भावा भवन्ति जीवस्पोदयिक पारिणामिकभेव । औपशमिक क्षयोत्थ क्षयोपशमजम पञ्चेते ॥ १९६ ।। टीका-पोते जीपस्य भावाः परिणतिषिशेपाः कर्मोदयोपशममयोपशमक्षपमिहत्ताः । भौदपिका पारिवामिक मीपशामिक सायिफ सायोपशामिकच पधेति ॥१९॥ मर्य-जी बौदपिक पारमामिक, गोपथमिक वापिक और क्षापोपत्रमिक पाच मार होते हैं। भाषाप-बीवकी परिमति निक्षेपको माव करते हैं। वे पाँच प्रकार के होते है, और कमों के उरप उपशम, क्षयोपशम मधय बरबसे उत्पन होवे है। पपापीपसमिकादिभेवाना क्रमेण मेदानपरे- इन बीपशमिकादि मायके मेद प्रमशः पाती ते चविंशतिनिद्विनवाटादशविधाभ विजेया । पष्ठभ सान्निपातिक इत्यन्य पवदशमेद ॥ १९७ ॥ यनि--कर्मोदपे मर फर्मोदयनिहत्तो पा मोदपि म एफपिशाविभः । गसिनार पादिम चतुरिया, कपापाः पावपातुपा, निङ्ग पीपुनपुंसफारम्प प्रिपा मिम्पारगम मदालसणमेच्यचरम् ममानमेकपिपम् भसंयतत्वमेकपपरम् मसिदस्यमेकापिय या पट्मारा । एते गत्याइयः स फर्मोदयात् प्रादुभवम्ति । मनाविपारिनामिको मापरिनिया बीम भम्पत्वममम्पर पति । नते धर्मोदयापपेसम्ते । कर्मोपशमनिवृत्त भीपपमिक, सम्पाव पारिप प दिपिया सपोप कमसपानाता सापिकास नका

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पपचम्बनमासमानामाम् [एकारचाऽविकार, नीमारिनतत्याने
मेड़ा-सम्मानम, मानम् पानसम्पः, सामम्मि, मोगरम्भिा, उपभोगम्भिर
बाममम्मि सम्पन पारिरिति । सपोपएमय भायोपसमिक | सोमायसमे--
मस्पाविधान पर्मिषम् महान मत्पपानादि मिवियम् पनि पर्शिनादि मिविषम् ,
दानाविम्पपा पर, सम्पर, पारिमं संपमासंयमयति । पष्ठम साविपातिक इति
सापिपास संपोग' । सचिपाता प्रपोबममस्पेति साबिपातिक संयोगको मा । वर
पमानामावानामपिपिपलमियापिकमायोपसमिङपारिपामिना हिचविसंयोगेन पार्षि
प्रतिकित्सा मपन्ति | तब पिरोपित्ताल स्याम्पा । गोपा पासाविरोफिन
समन्ति । वेपामविरोपान पसाना मान हरी प्रकरणपणेति । वे पामी पिया।
मम परिकस्म साविपातिक पर्व । १९७ ॥
मर्षौदमिक बानि मात्र इपीस न हो, नौ और बार प्रकारके जानने चाहिए।
तामा सामिपातिक मामय एफ व मात्र मी है। उसके पबह मेर।
मापार्य-बोके उपपसे वो मान होता है उसे पौराणिक करते हैं। उसके फीस मेद
1-परक बार बार मविपा, कोप बगैरह बार काम बी पुस मोर नपुंसकम एक मिप्पा
रोग, एक महान एक बसपत एक बसिबल बोर मया । ये सभी मारकर्मर उपपसे होते
है। पारमामिकमात्र बना है। उसके टीम भेद-बीवल, मम्पल और बमबल माल
कम बफेवासे नही रोते।
कति उपभमसे बो मार हत्या से भोपामिक करते हैं। उसके दो मेरसम्ममरण
और पारिन्न । कक सपो यो मात्र हो उसे पाविक करते हैं। उसकेनी मदमम्मान
कामन रामम्पि, ममाम्प, मोगमयि उपभोगम्पि, बीपि, सम्पल पर पारिष । कोंके
पयोपशमसे गो माग होय, उसे पक्षमिकरते है। उसके बाद मेर-बार प्रकारका
मप्रदिशान तीन प्रसन्न महान मन प्रकारका पुर्यन बार दर्सन, पाँच मारम्भिर
सम्पाल, पारित कर संपम्पसम्म । इन पाँच मानोंके सिवाय एक महा माल और मालिसे
माधिपातिकमा मते । सानिमत संबोगपो तेरे। पांचों मानों के संबोनसो माग होते
उनमें समितिकमाल करते हैं। वर्ष सम्मपादिकई सालमा विस्त मोमग
मार। उसके पास मेद होनो स्पोगी रस न समोमी बस, चार संमोनी पान और
पाच सपोनी एक । इससे मिोषी होनेसे ग्पार मात्र प्रेरने कोय राप पर माय बकिमी
राप्रपाकारले अभिोपी पमा मात्र ही मन किसा।
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एमिर्भावे स्थान गतिमिन्द्रियसम्पद सुखं दु खम् ।
समामोतीत्यात्मा सोष्टविकास समासेन ॥१९८ ॥

कारख १९८१९९] प्रशमविपकरणम् टीका-एमिदयिकादिमिर्मायो स्थान प्राप्नोतीस्पास्मा । सानमिति स्पीपवे यस ससारे तत्स्या सामाम्येमाथिोपित प्रायोति । पत उत्तम्- * सम्बाहामाई मखासपासषदेक्छोएम। ममुरमुरनारपाणं (नया) सिदिविसेसा साइप ॥१॥" गति नारवादीनां गतिं प्रामोति मावरेप । ननुप गतिस्मानयोर्नास्ति पिपा। उम्पवे-नरकगतान नपम्पमध्यमोहरामि स्पानानि पनि सम्सीवि वत्प्रतिपादनाप स्पान ग्राण प्रपगिति । इन्द्रियाणि स्पसनादीनि । पपा सम्पस्तमप्रताऽविकमतावानम्बिपसम्पन प्राप्नोतीस्यास्मा। मयवा इन्द्रियाणि प सम्पदभविभूवप इस्पप' । सपा मुल पुल मीपिक मावरमादलामोति। मतति गति सांस्तान् स्मानादिविशेपान् प्रामामोतीत्यारमा।स पारमेय संमेपतोऽमुगन्दम्य ॥ १८ ॥ मय-न मासे बारमा स्थान, गति, इन्द्रिय सम्पति मुरबोर दुम्सको प्राप्त करता है। सक्षेपसे उसके बाठ मेर। भावायन बोरपिक वादि मानोंसे मात्मा स्थानको प्राप्त करता है। समारमें गवारमा बाप उसे ससल कर स्पाम कमोके सदपसे प्राप्त होता है। मोसे ही गति प्राप्त होती है। शा-ति बार स्थानमें तो को बन्न महा। समाधान नरकादिक गसिपोंमें ही अप, मप्पम और तस्कर एक्से स्पाम है। हमें सगनके लिए स्थानका पृपा प्राम किया है। इथियों से सम्पूर्णाको इत्रिम सम्पत् पहले है। बसपा इथपा और सम्पति ऐसा बर्ष मीनसको इन्द्रप-सम्पत् भी मासे 0 प्रास होती। का सम्पमा वादपिकमायके परम ही प्राप्त होता है। सपेपमें उस बारमा बाठ मेर। तानी विमसानमिपातकाम मार- उन पाठ भेदों को बताते है- द्रव्य कपाययोगादुपयोगो ज्ञानदर्शने चेति । चारित्रं वीर्य चेत्यष्टविधा मार्गणा तस्य ॥ १९९॥ टी-म्पारमा मापारमा, पोगारमा उपपोगमा प्रामारमा पनामा परिमारमा पीपास्मा, ति मविपासप्रश्न मार्गणा गरेपणा परीमा तस्यास्मनः पर्यवि।। मप-म्पामा रुपापरमा पोमारमा, उपपोगा मा, शानरमा, दमारमा, बीमामा और नामा मारमाीबाट मामनाएँ। -भीपरिमारियों सपना नई-री-भाइ ।। २-4-1 १८ पवयम्जनमासमानापाम् [एसोऽस्किार, गोवादिनस्तापान मागापमानना योजनेवा परीधा करने का दम्प बादि बाठ प्रकारों से बामाकीपोचकी बाती है। सम्प्रस्मैपी दम्पापात्मना सापनिवसपार- जाइन इम्पारमा बारिक सस्मते- जीवाजीवानां द्रव्यात्मा सकपायिणां कपायात्मा। योग सयोगिना पुनरुपयोग सर्वजीवानाम् ॥ २००॥ टी-बीमत्वमनाविपारिपामिकामाकाजीपय दम्पमापी सब परिणामपपर्याय नुस्तं दम्पति वाखान् पपामामामोति मारावीन् । सर्वमापियन पर्वते । एक प्रम्प अम्पारमा सर्वप्रामति सम्मारिति । एमवीवानामपि योऽनम्मंशा पुगो सम्मात्मा । ममापीमा परमवपा उपारादिपरिणामास्तमाप्पम्बपी ब्रम्पारमेति । पाप क्रोपावपस्ते सम्ति पा ते पापिणस्परिणविपामारमा मायैः सोमवापत्ते आवस्मेसम्पते । योगा मनोवाका पम्मणास्तदेवपरिणत मात्मा पः ससस पोगास्मा समोगानामिति । उपयोगोशालयन म्पापाये पविपस्तत्परिवत भास्मा उपयोगास्मेति सर्वबीवक्पिपः । समागमुक पणियाम् । २० । मी और अमीनों के इम्पारमा होती । साप नीयों कपागमा होती है। सपोगियोंके पोनरमा ती सब पीके उपयोगारम्न होती है। भाषापीपल बनाहि पारिमानिकमाव है। और और कपीममा समय पायोंमें अनुस्पूठ पता है। नकादिक पापों को प्रश्न करता है उसे इम्प करते है। बीचमा अपना सब परिमि रहताबदए इम्प है। वप्पको ही दम्याय को मोकि बाबपी समस्त सामोंमें बन्चित पता । इसी प्रकार बरीष पुनम पर्म गैरमें योगमपीबह होता उसे मम्मामा प्रवे। इस बार पीच मग इम्पोंके प्रम्पारमा होती है। सारांश यातन बोर बचेतन मोदमों को स्पतिरूप बोलपकी प्रत्येक पोयमें कापप बाउसे पा बामा एपसे कहा गपापोकि सब इम्प अपने उस भयको कमी ना करते है। जिस प्रकार सोने के बम्पनों में पुनर्मल सापी यापपर्णको मात्मा का वा उसी प्रकार साइपों का अपना अपना सापी बंछ उनी अम्ममा सामना काशिए । पपछे पुर जीयाको समाप करते है और उनकी बात्माको समयावात्मा करते है। क्योंकि उनकी बात्मा कपाय साप ममी होती है। मन पचम भापकप योनसे कुछ बारमाको योगात्मा करते है। पोगामा स्योगिको होटी है। मानवरूप म्यापारको उपयोन तेहै। उससे पुछामको उपयो मामा करत है।पा उपयोगाय समी बीके होतो व मप उपयोग हो।

कारिफा २० २१२२] प्रशमतिप्रकरणम्। ज्ञान सम्यग्दृऐर्दर्शनमम भवति सर्वजीवानाम् । चारित्र विरतानां तु सर्वससारिणां वीर्यम् ॥ २०१ ॥ टीका-सम्यग्दर्शनसम्पमस्पास्मनस्तत्वाय मदानपरिमाममायो यो पानपरियामा स पामारमा । दशनात्मा पमुपशनाविपरिपतस्पास्मनस्तदेपतापचेर्दर्शनात्मा । समीप पिपयप्रापातिपाताविपापस्पानेम्पो विरतस्य तदाकारपरिमसस्प चारित्रास्मा । मीर्य शक्ति पेय । न पीपैन सबै ससारिणो बीर्यास्मान उच्यते ॥ २०१। मप-सम्पारणी हानामा होती है। सब चीपोंके दर्शनारमा होती है। प्रतियों के पार माहोटी बोर सब संसारियोंके वीर्यात्मा होती है। मावार्य-सम्पदर्शनसे पुच मात्माका बोशानरूप परिणाम तत्त्वाके भवानसे युख होता है, उसे बानरमा करते हैं। बता सम्पररीकी बात्मा हानामा होती है। मचा गरम दमोंसे पुल बामाको दर्शनारमा करते हैं। यह वामा समो जीवोंके होती है क्योंकि समो वीपों में दर्शन पाया जाता है। पार्हसा बगैरह पापके सामोसे मिक साधुके चरित्रामा होती है। वीर्य सक्रिको करते हैं। कि समी मीलोंमें पाई जाती है। वह सब ससारी बीमोंके वीर्यारमा हो। एवमेतेऽये मात्मनो विकासाः प्रतिपादितास्वप्र बम्पास्मानमाशाइते-मबीवरिपपा त्मेति शानदनोपयोगस्वभाव मेवना प्रतीतः कप पुलाविप्वात्मसन्दमानिरिक्षम्यवे- इस प्रकार बामाके से माठ भेद पता है। उनसे दम्पारमाके बारेमें पा मारोती कि बममा पतनी बार पानदर्शनरूप उपयोगमपी है। पो बीबके सामनी मी दम्पामा मतगई पायक नहीं पोंकि बगीव पुद्रगतिकको पल्मा सदसे केसे करामा समयसका उत्तर देते हैं- द्रव्यात्मेत्युपचार सर्वद्रव्येषु नयविशेपेण । आत्मादेशादात्मा भवत्पनात्मा परादेशात् ॥ २०२ ॥ टीका-उपचारो म्पपहाए सम्बनिबम्पनः। स प घम्दो निमित्तमाभिस्य प्रति । वप निमिचमुमयम तत्पम् । स पयैव पेतनो भाति तयाऽतनोऽपि मन्पपी पायोs ततीवि ममत्पात्मसमवाया । समग्रम्पपिपपप न्याय इति । नपविधपेपेस्पार-सामान्य प्रादिमा नपमेरेन सपमास्मसम्वप्रातिः । मप सोऽप्पास्मा बम्पसेमादिविषमयास्ति न सपा । व सस्पेनारिये विवमित मात्मास्ति, परम्पेमादिये नास्ति । पप सास्ति लावस्तीत्युम्पने, तपा परमास्तित्वानास्तीत्युप्यते । सापगाइसेप्राविण्य पायपाति, १-पतिवा-१०॥

. पपपन्द्रीनपासमागयाम् [ एसोभिरमा जीपारिवानि नाम्पेन । एवं भलामा तमामतमाविष्टोऽस्ति मतीतानागवतया मास्ति। भावविदर्शना मन्यतमम मारेनादियोऽस्ति पप भाषन मानि॥ २० ॥ मथनप रसरसे उब दम्पोंमें 'इम्परमा पसा पपरस्पेधासे धामावर परकी अपवासेजनामा है। माराय-दिस म्पमारको उपचार प्रतेहैम उपगार मिसीमितसहित चाया है। AAS और और अमेर-दोनों में ही समान, रक गोबरपरपसे सर पामि गमन करता है, उसमा पतपिस प्रम मापानी पर्यायाने माती है रखी प्रकार पुरणदिसाम्प मी अपनी पनि बनी। में भी भरमा आमसे या नावासथिए सामान्यमानी नपरेप सब इम्पोरे बरमा शपका पात्र हो । मात्मा मी अपने दम्प बनेरह मधासे 0६, सगा नात् गा उस समय उस रूपसे रिति रिया शाहओर जब उसे परसपसे Riya रिसा सत्य परमा।जिस प्रस्म अपने पस्किनी अपेपासे पा सत्यागी। उसी प्रकार इसके अस्तिताको अपेपासे परमसत् ही गाती है। स योक हरेक पस्त अपने सरूपसे और पर सहपसे नहा।से पर अपने सापसे गरे पट अपने सापसे, पिन परम पटव तरूप पापा गायबर न पटमें पटा सा पाया गया। बक पर पट समापसे मतभर पट पर सारपसे ही प्रस्सार सभी बल, भाने अपने सरूपसे 'सत्र मापन विग प स सोसे असत् है प्रथम गाय से पत्रको बसेपासे मोर पर-वध बपेपासे महा।समानघा मी अपेक्षा ६ मत, Karna कामी पेपासे नही । लामोदरक बाद मासे किसी एक Aक्षित माबोपारेको परिमित बम्प मापश्री बपेश नहीं है। सपा प्रस्पेस पस्त बपने दम्प, बम्मे पत्र अपने पर और अपने माजी अपधावे ही सत् रोबोबोर फ्यम्प, परपत्र, परम पर- मामी मफेवासे असत् ऐती है। साम्प पोर परम्पका उदाहरण आर रिमा ग पोथी पट मिस पर बवान उसी पनकी बधासे सत् , मप देश्की बपेपासे पत्नहरी । पर ऐसा न माना गाना के ये घट मापक हो जामा पा उस डिबमार हो गया। र विस चामे । सीमाकी वस्वा सद६ भाव समास असत् है। परि ऐसा न माना गाया पट निम शे गाय पा रसबमालो गापमा सीमाबाट बपमे सति माली ही अपेक्षा , बनियमित परमारमा महापरि ऐसा माना पारगाो सम्पूर्ण म्पसमा मनोगती। इस प्रकार समस्त मस्त सत् और बम्त् बालगी पाहिए। एवं सयोगात्सवहुत्वाद्यकश स परिमग्य । जीवस्यैतत्सर्व स्वतत्त्वमिह लक्षणेष्टम् ॥ २०३।। - १४१ परिघ २ १२..] प्रशमतिप्रकरणम् टी-संयोगस्तावपेन येन सयुक्तम्नेन तेन रूपेणास्मास्ति येनासंयुक्तस्तेन नास्ति। मारमा नरकगतिसंयोगेनैव विपन्ते न वगतिसंयोगेनेति। मन्पत्वेन पहुस्नेन बोरिष्ट स्पायस्ति स्पाचास्ति । मत्सत्वे मनुष्पा, देवा मसमयया । तत्रासमपेयतेनव तियचो निम्तसमयाः । तेन तियक संश्यात्मना मनुप्यो नास्तीति मनुम्पेम्पस्तिपसोऽमन्ताः । वेन कारणेन संख्यात्मना नास्ति मनुष्य इस्पापमा (दिमा) सबस्वादिचिन्ता प्रया । भाविप्रमापामायनुसयोगदारभेदेनास्तिस्पनास्तित्वे भावपितम्ये । मनेश इत्यनेम मेवेन निर्देशस्वामित्पादिनापि मारमा परिमृग्या परीक्षणीयः । पर्व । जीवस्य स्वतत्त सरमेर समाष्टम् । नस्पते पेन पेनास्मा देशादिना सकसम नापारम् । तेससमाष्टमुपलापमा मेदमित्ययः ॥२३॥ मर्पस प्रकार सपोग, असाल वगेरहके हारा अनेक प्रकरसे धारमा चार करमा पारिए । यहाँगीमा पर सब समर सक्षों के उपसभ होगा। मावाय-दम्प पत्र, कार, मारकी तरह सपोग, वरसपास्व रहकी अपेक्षासे भी भारमाय चार करमा पालिए । पपा भारमा बिस जिससे सयुध उसी पेक्षासे है और जिस बिससे सपुत महा। उसकी अपेक्षास महो । से मारकी नराविक सयोगको अपेधासे होने दम्मति संयोगको अपक्षासे महा। इसी प्रकार वारमा अत्राप्त भोर गुपकी अपेक्षासे मी सत् भोर बस से मनुप्प पोरे। उनसे बहफ्यात गुने और निश अनन्त मर्पोको सम्पादीपेक्षा मनुष्प नहीं है पोधि मनुप्पोसे विधि मनता और अपनी समयको भपया मनुष्य है। वारि शरस माम भादि अनुयोगदारों की अपेक्षास भी स्त् चोर बस MAR गरना पाए । सपदेश सामित्व हकी अपेपासे मी आमाचार रमा पारिए। इस प्रवर विपार एनसे भारमा सापपी प्रवीति होती है। उत्पादविगमनित्यत्वलक्षणं यचदस्ति सर्वमपि । सदसद्वा भवतीत्यन्ययार्पितानर्पितविशेपात् ॥ २०४ ॥ टीन-उम्पत्तिम्पार । विगमो विनाप । निस्पस्पं प्राप्पम् । सर्वमेपोत्साम्पयनी प्पनसमे समवस्पगुडिन् । पपा मम्तस्पेनांगुडिसम्धिता पुरा, फास्ता विनष्ट परस्पेनी सति । परं पदुस्साशादिप्रपरसदस्ति साम् । पाम्नि सदस्पादादिप्रपादपि न भवति । तरीपापारिन् । भवो विपत्पदयमुटम् -पादन्ति, स्पापास्तीति । सदसदा भपतीति सतीपरिम्सा पादस्ति प नास्ति पेति । भम्पयापितानपितपितपिपारिति परमाण - धम्म समापि १ ARU RAM IN New, kathav AH NROn १५२ पपचम्बनशासमाभपाम् [एकमयोऽपिका, जीवादमपानि विकता सूषिताः-स्पायकम्प' स्पादस्ति पावसम्पय स्वास्ति भावकम्म स्पावस्ति पनास्ति पापकम्पति । तमास्ति पनास्ति चेति एकस्य पटम्मस्प देयो प्रीपारि सद्भावपर्यापपादिशे प्रीवत्वेने मपरम देशस्तपैक बस्तुमोऽसावपपारंपरिरो चस्पेन परगवपपविण पासवस्तु मस्ति च नास्ति पेति मारना कार्या । स्मारकम्प इवि सम्म मेपास्वणि तवस्त मर्यान्तरसूतैः पटाविमि पपापविश्वाप्पानोरापनपीपारिमिर्ष गपाभिमा समादिर नास्तीति पार्नु न शपके म चास्वीति पाई पायवे । पुगपदेश परप्राप्ती बनविशेमातीतलादेवापतम्पमिति । मस्ति पावलम्पति पबमो विकत्सा । यसैग पटमेषस्तुना पने देगः समारपपिपदिरोऽपरो पा सपापी परपपिच पुमपदाविष्ट स्वरसम्पमस्ति पावलम्प प । पष्ठो विकल्पो नास्ति पातम्पय तस्मैव पटाम्पस्प एफमेशा परपपिपदिए, मपरपेश सपाप परपपाष गुगपवादिष्ट, तखम्म नास्ति पावसम्म प भवति । मप सप्तमो विस–सरे पयदिखम्ममेस्मिन् देशे सपर्षिपदिएम् , मम्बम देणे परपगापराविष्टम् भपरण देणे सपर्यायः परपवर्षिय युगपवाविरम् मस्ति । मास्ति पापम्प चेति । समप सप्तप्राय पचनपिनमः । मम व तस्मदेशासपा- स्पास्ति स्पाचास्ति, स्मादपकपा । पामत्ता विकासा-सादस्विच मास्तिाव नमेष माना, स्मादस्ति चापसम्मथ, स्वास्ति पापकम्पम, स्पास्ति च नास्ति पापहम्पति। मतोऽम्पपा पाम्पयापित विपितमुपतिम् मनपिवमनिमपिवमनुपनी स्पेतस्माविरोपात् सप्तवित मस्तीवि noorn मर्प-चो ठापार प्पप और प्रौम्प मापसे अब म सदाबोर को उससे Rahat या नसत् है। इस प्रकार प्रति और बमर्पित मेदसै बद पौर बसत् होती। भाषाप-उत्पत्तिको उपार करते है I AM विगम अपपा म्पप और हप्ताको प्रोमका में उत्पार, म्पप और प्रीम पापा पापसाव होता है। किसने अपनी सीमागुडीको मोह लिया। तो वीपास टेली होने पर मी रंगुनी गुम ही पी, क- पप्रम्प है। सपा सीमापन मा होश टेकापन बागपा । र सीपमा बास मगर टेपनकी उत्पति हो गई। इस प्रस्मस यो स्पारमय और प्रौम्पसे पुच दरोगा सब सत् और बिसमें उत्पार, म्पम पर मौम्प नहीं होते हैं प स ।। से गपके सस । इससे प्रबकारने स्पद है और स्वत् महो। इन दो निकम्पोचेवा।। 'मसर से पार रेगोर स्यात् मार परस्य विन्स समपारेर पारिवारिप सेप कर रिम्प सपित मिले। बार किस इस प्रकार है स्पात् पापम्प, स्पारो और बाचम्म स्पात महाबोर मायम, स्पारस्पत् महारेर बसम्म है। पाग और दूसरा मा म्या त्या इया गया है। तीसरा मग इस प्रकरो -किसी एसपट पगेन पराध मान पर भी मन काय अपेक्षा सत् है भार उसीदेप मामा पोमपचासे असत् है । वर्ष मनन माग गरेमरूप होनस मार भगका और परिका २] प्रशामरविप्रकरणम् मदन माग बम्य मागरूप ही है।बपा या मी कर सकते हैं कि घट घटरूपसे सत् है और पटरूपसे बसत है। क्तः पट 'स्पा है वौर स्पार नही का माना है। दोनों धोको पर एक साप बनेकी रक्षा हो तो वोपण 'स्पात् बातम्य' मारोप है । जैसे यदि उसी पटमो पयदि वगेरह परपर्यापोंसे और अपनी या गोगनर बगैर पर्यायोंसे एक साप फरा गाये तोग वो उसे वसत् ही कहा जा सकता है और म सत्य या जा सकता है। इस मा एक साप दोनों फोकी मिया होने पर पचनके बगोचर होनेसे बस्तु स्पात् वाकम्प' कही बाती है। उसी घटको बचपनी पर्यापोसे तपा एक साप अपनी और परकी पर्यापोंसे शिक्षित किया जाता है तो पापट स्पात् सत् और परसम्प' का नाता है। उसी बटको पन परपर्यायोंकी अपक्षासे बोर एक साप वपनी वा परपया अपेक्षासे मषित किया गया है तो बापट स्पात् असत् भोर माकम्प' या गावही घट जब क्रमशः और एक साप वपनी भौर परकी पर्यापोंसे पित किया जाता है तो उसे 'स्पात् सत् मोर असत् कौर बबलम्प' या गाय है। इस प्रकार बनके पे सात प्रकार हैं। इनमें स्पात् सत् स्पात् असद, बीर स्पात् बबळम्प ये न मा सफगदेश । भोर शप चार मा फलादेश । बस्तुके बिस धर्मकी सपा होती है उसे वर्पित या प्रमान पते और बिस धर्मका पचा मह होठी उसे समर्पित पा गौम करते हैं । इस गोषवा पोर मुस्पताके मेसे उफ सात किस्स होते हैं। इसममङ्गी मय करते हैं। उपादाविषयमाक्मापार- उत्पाद बगेबका सहप का है- योज्यों यस्मिन्नामूत् साम्पतकाले च दृश्यते तन । तेनोत्पादस्तस्य विगमस्तु तस्माद्विपर्यास ॥ २०५॥ टीका-पटा मस्पिणे मास्ति माभूविस्पप । स प मृत्तिनमारोपणादिना परिबिमिना पर्वमानाले परिनिष्पन उपठम्यते पटोऽयमुत्पम इति । सेनापरेपोत्पाद स्वस्म पटस्पेति । विगमस्त बिनाशस्तस्मादुत्पादाविपर्यासो विपरीत । पिणो मिनटो मोप सम्पले मरस्पस इति ॥ २०५॥ मप-रिसमें गोबर्ष मही शामित पम्पममें रेसा गाता है। उसकी उस बरस पति ऐसी रमाश उससे वपरीत है। माराप- पिणमें बट पदाच मी पाकिस्तु उस महक पिणका कुमार के पास पर पर पर पुमाया जाता है पपोषी में बदए गाया है। इस प्रकार मिक पिडा १-समान विस्त न इस भूमिन मोर मोamil रेखिए । -fru मु प्रवाया रापपद्रवमशास्त्रमाप्रपाम् [एकादसोऽपिया, बीमारिनतरपनि उस बटरूपसे उस्पति होती है। इसे ही पटका उत्पाद प्रते है।पट उपर होने बाद मीका पिड रदबईमरी परता परमोगाव।की बिनासरे। मधर्म, उत्पारगमनाम मानके रो पभोंकी ई-मिचाईको मा सहमाली है। मिस प्रकार ताप पर एक पमा भीचा होता तोसरा पमा वास ही पाहोता है, इसी प्रकार पिस सम्प मिडी पिण मिास होताउसी समय घटका उत्पाद होतारे और जिस समय पटप उपार रोता है, उसी सम्प परिपका नाश होता है। मानौ नबो बिनाश अभावरूपोरन वस्तुची किसी पामे पर्यापन रिनास हुए बिना सी पर्यकको उत्पत्ति होती है। साम्मतकाले चानागते च यो यस्य भवति सम्बधी। तेनाविगमस्तस्पेति स नित्यस्तेन भावेन ।। २०६॥ टी-पतमकाऽभागते मविम्पत्ति व पाच शयारवीतकाळे । या पनामों मृदारिम्पार न पाति) वर्तमानपटपर्यायसम्बन्धी सम्मदिति मिकाविसमा पिएम अपामापरतासुम नशे म विगतः स तेन मावेन मृदादिना यो भवति निस्पा । एवं पदस्ति सस्समुत्पादम्पयनौम्मरूपम् । मम भीम्पमम्परेपोत्पादविनापोनि पो. संभा । थिए त्तपते वक्त मौम्पनासबदेव । विनश्परपि प्रोम्पोत्सावापेमम् । पुसमुस्पापविमाणापेमम पिनासापेक्षमक्निास (विना) माविस्तात् परस्परमुत्पादादीमामिति ॥ २ ॥ मर्प-स्तुपयोगरूप मान, अतीस बार बना काम पो उस सरूपस उस पाना मोना-पी उस सरूपसे निपक्षो। मापाप-मिशी बतीत विण मास्साबो माल मट वाला है और बानामी कसा जस्मा लाम:मान रही है। वनों ही मारयामोंमें मिका माय मागोवा | उसकी बार- शियों पर बात।बत मिही मिहीरूपसे निमो। इस प्रकार समाप्त पाएँ उत्पाद, पप बोर ब्रम्पकप है।मको पापमोर कोई सपा सत्यार-म्पप रूप ही है। प्रोम्म ना उत्पाद म्पय माहो सकते, असे R मिशीके स्निा नपिगमासान मा हो सकता है मोर म पटकी उत्पति हो पर कोई पत्तु सत्पम होतो तो घोम्म मनामको पेवासे ही उत्पपीबिस प्रकार पटका उत्पाद मितीकी पुस्ता र विपके पिनासके स्मिा मा मपरि कोई बात ना होटी है वो प्रोम र उत्पादकी फेवासे रीना बीरे से पिणका मास माहा मोर पर उत्पादक पेषा रखता है। दो उत्पादक्मिासमीकरे पी है। सपा ना को बस्तु नही है। बता दे को ही परस्परमें बदबामा है। - 1-तीसरा प फ । २-वाशित भौर पंचाभाग गत्ताराम मिय सन्म देती कारका २ ६२०२८] प्रशमविप्रकरणम् १५ -- भनीवामधिसत्यार- भीष इम्पोंका वर्णन करते हैं- धर्माधर्माकाशानि पुगला काल एव चाजीवा । पुद्गलवर्जमरूप तु रूपिण पुद्गला प्रोक्ता ॥ २०७ ।। टीका-मद्रम्पम् मपर्मवम्पम् भाकामदम्पम् प्रावग्यम् साम्यम्पमिति पजाबीवदम्पाणि । तम तेषु पम पुग्यम्प स्परसगम्पस्पशम् । प्रेप ब्रम्पचतएपम- रूप म्पादिवबिवमित्पपा । सपिण इत्पम्म गम्परसस्पर्माः सर्वदा रूपाविनाभाविन इति परमाणावपि सम्मपन्तीति दशि भवति ॥ २०७॥ भय-पम्प, वाम्प, माकरणम्प काव्यम्प बोर पुरसम्प-पे पाँच भीष इम्प है। पुरके सिवाय क्षेप पारों इम्प बरूपी मोर पुनगम्प रूपी को गये हैं। मावाय-अवीव प्रम्य पाँच हैं। उनमें से केवल एक पुरगम्प रूपी है। उसमें रूप, रस गाय और पर्म-पेपरों गुण पाये गाते। चारों गुण परस्परमें अपिनामाती है । इसलिए पी ऐसे उन पाका महम होखब मितने मी परमामु', उन सबमें चारों ही गुम पापे गाते है। इसलिए ये कपी को गाते हैं। परन्त क्षेप इम्पोमें कपादि गुम नही पापे गाते, इसलिए ये वरूपी भवना बमनाक कागते हैं। सम्बास्तु- अनबम्पके सम्बन्धमें कुछ और भी करते हैं- वयादिप्रदेशवन्तो यावदनन्तप्रदेशको स्कन्धा' । परमाणुरप्रदेशो वर्णादिगुणेषु भजनीय ॥२०८ ।। टीका-पादिप्रदेशभामा सम्पा समाता एयपणुप्रसृतमा । पोरयोसपापा वेस्पादिमारप्पाः पापदनम्तमदेणाः सर्ने सम्भा परमानुस्त नसाम्पसम्मामिपेपोऽप्रदेशत्वात् । माहितस्प बम्पप्रदेशा सम्पन्थे । सपमेवासी मठा। प्रसो वेसोऽनपा प्रदेशः । म तत परमम्पा सम्मतमोऽस्ति पुनम् । पम्पप्रदेशो पर्फरसगम्पसागुपे मबनीयाः सेवनीया परेशसेन समितिम वर्षापपोषपणास्तरवप सम्देश एवासी इम्पारपरमादेश इति। पपोतमामे-कारणमेव तदप पामो मित्पथ मपति परमाणुः । एक रसगम्भवों विस्तापडिप ।१॥ इति । १-परेमिकास।

रापचन्द्रनशासमाम [पर्दयोऽधिकार, पसम्मति मय-दो बाद प्रदेशोसे कार बमवदेशी तक कम होते है। परम्परा के प्रदेस नही होते । रूप पोरा गुणोंकी बपेक्षासे परमाणु विमान रना चाहिए। माषाप-दो बार प्ररेण्या पुद्रको पकाते हैं। प नाम संभावकारी बनेक परमाणमोके संपात वर्षांत समय मयपणे काम करते । पिस प्रकार दो परम्पक मेसे पणक नामक कप पोर तीन परमाणुयोंके मेम्से अमुक मामा कप ऐवासी र बसन्त परमत्युगों मेगसे बनन्तप्रदेशी स्परपद परमाणु सिबाप मेप मितने पर- रम्य बिनमें एकसे बपिक परमाणु पाये गावे सब कप काम के परमाणु स्काया मही कहा गया क्योंकि बादेशी है।बाम एकदम्प होनेसे उसके अन्य प्रदेश महोते। पासप एकप्रदेस । पुरके सबसे छोटे बायको प्ररस करते हैं। परमाणुसे सूक्ष्म कोई रम्प पुना नहीं होता | पर परमाणु बहुप्रदेश मात्राम यादेती है। पर बादशी परमाणु की रूप स मम्म मोर पर्व गुण पापे गाये है। इसAए गुपौकी पचासे मी परमाणु सप्ररची हीरे फेल इमरूप बसों के मनके कारण मी पा प्रदेशी ।। साव धार- पा परमाणु कारण कि सीसे समस्त मात्र उत्पम हो।पाप और सूक्ष्म 1ोकि उससे भी होय इम्प नही होता । नित्य क्योकि उसका कभी नाश नही होता क्या उसमें एक रस. एक गध, एक रूप और दो स्पर्म (स्नान पर्मेसे कोई एक और भीमसे कोई एक) होते है या उसके पापोंसे ही उसे गाना नयोंकि सूक्ष्म होने के कम 4 सरसई नही देता। कस्मिन् पुननि भौरपिनदो पर्मादीम्पनीखम्पापि तम्त इत्पा- मोरपिक मादि मापोंमें धर्म वारि बबीब मौके कौनसा माल वायर बk- मावे धर्माधर्माम्बरकाला परिणामिके जेया । उदयपरिणामिरूप तु सर्वभावानुगा जीवा ॥२०९ ॥ टी-ममलिपारिपामिकमाये पर्मापानमनखम्मापि पारि वर्तन्ते बीच मम्पलादिक्त् । पपा पानादि संसारसपा पर्माविद्रम्पपरिमामोऽपीति । ममापिचमाविसम्म त मसमोरा सम्ये पुनरीपिके मारे मपति पारिभामि।परमानु' परमायुपिति मनादिपारिपामिश्मे मार । मादिम पारिणामिकस पपुवादिरसनापनुरालिमा वरतानि पारिभामिनस्तु परमापूना सम्पाना पावपिको माक पारिताविपरिणाम प्रति ॥ २ ॥ मर्प-दर्भ, बबई, बाबय पोर काम्यम्पके पारिपामिकमात्र बालना चापिए । पार इम्पके धौवपिक पोर पारमामयमान होते है। क्या गीतों के वो सभी माल रोते है। मागाप-विस प्रकार सबके मम्पन्न बगैर मात्र पारिवामिल होते है, उसी प्रकार धर्म, जर्म, बााध और समपोके भी पारिपामिनमार ही दोष क्योंकि जैसे संसार बनान।

भरिका २ ९२१] परामरतिपकरणम् १५७ से ही पर्मादि दम्म मी अनादि । मोक कमी धर्मादि इम्पोस रहित नहीं पा । पुद्दापक मौदपिक मोर पारमामिकमान होते हैं। पुट्ठका परमाणुरुप परिणाम हो धनादि है और दूपणुक माइम, इनस्नुप वगैरह परिमाम सादि। परमाणुषों और कोंमें गो रुपरस वगैरह परिणाम पाये गावे वपा परमाणुमोंके मिळमेसे गो पणुक बनेर परिनाम बनते हैं, वे मोरपिक है। सारांश पर बनादि परिणामको पारमामिकमाष और मारि परिणामको मोदपिकमाबमें समाना पाहिए। रूप, रसादि परिणाम पनि मनादि । परन्तु उनमें गो हानि-शि होती रहती है। साहो । पीपा पुन सर्वमावेषु मौपधमिपि क्वम्त इति पूर्वमेवमाषितम् । मपोऽप मेक स्पागते, किं ब्रम्पान्तरमुताम्पत् किंपिरित्या- पर या बसमाते है कि यह क क्या वस्तु है ! क्या यह मी कोई इम्पो पापौर गोर कुश!-- श्रीरके वोपरामिक बगैर पाँचों ही मात्र होते है यह पहले बम पुके। जीवाजीवा द्रव्यमिति पड्विध भवति लोकपुरुषोऽयम् । वैशाखस्थानस्थ पुरुप इव कटिस्थकरयुग्म ॥ २१०॥ टीका-बीपा मनीषा भर्मापासपुयाः प्रम पर बम्पाणि । लोकपुरपा पुरस स नोकपुरमा प्रतिविधिप्रस्थानत्वात् । मम भीवादीना दम्पामामापारभूतं यत्सम सन्तोक- धपामिप मोरपुरुप प्रत्युक्तम् । सम निबम्पनमा-गावस्पाम इति । वैशाख पानुपस्प स्थानकम् । ऊपमपस्पिद पुरुमा विभिप्तादयः यो म्यवस्मापिवाचितास्तदयो पपा वदत्तोकपुरूप इति ॥ २१॥ मप-स प्रकार जब बोर बीबके मरसेब इम्प होते हैं। पीओक पुष्परोनों पापोंको कमरक दोनों पोर पर रखकर, पैर फैलाकर सरेर पुरुपके समान उसका बाजार है। मावाप-गो दम्पोंके समाको मेक बात है। बात् बितने में जो इम्प रहते है उले क्षत्रको गेय सागेक मुस्पके बार उसे माँगेक.मुरूप के मामसे कहा रोनों भागोंको सार मोर दोनों हाणेथे कमर के दोनों बातोपर रखकर गए मनुप्पके समान मेकका बाम गामना पाहिए । पा- -समय रावपम्बनमासमानाबाम् [चतुरंयोऽधिकार, पहमान तदेव यशाबस्पाम दापवि- उसीको स्पन करते- तप्राधोमुखमलकसस्थान वर्णयन्त्पधोलोकम् । स्थालमिव तिर्यग्लोकमूर्वमय मल्लकसमुद्वम् ।। २११॥ ठीक-तम तस्मिन् पारे भगोनोविमाग मयोभुखमत्त्वपमा उपरि संक्षिप्तमयो विसा पर्पमानामपोमुख भवति । रबवस्मामार तिर्पग्योपणपन्ति । तिबग्गोग्राम मसपटाकारमूनसोध वर्षपम्ति । ममसमुहम एक अपमानसम्मुखमपर थपणम- पोमुख स्पोपरीति । पतत् प्रतिपादपति कामे । गोमा सारगुश्मापो मिस्वरेप । तिप- ग्गोको रपयुममामा | अस्पुटमम्ये पारगुममाण उपकरगुपमाष इति १२११ मर्प-उसकोको बनोगेको नीचे मुख किसे हुए सकोरे बापर मतमते, मम्मको को पाम बाकार बताते है और अपनेक मारे पर रक्से र दो सकोंके माधर गते हैं। मावापोतन माग-योगेन विम्योक या मम्मोको ठमेल बाकार नीचा मुख करके रोप सकोरे पैसासकोको उम्टकर र रेमेसे उसके नीचेष मान बोनापार ठपरका माग समय होता हैसे ही बपोगेका का विस्तार सात राम्रीगोर पर विस्तार एक निम्होक पायेके माम गोश है। उसका सवार एक सप। हिम्मेहके पर दो सकोरोनापरका सर्पगेका वात् एक सोधे कारकी बोर करके बोबो सेको ठस म्पर मोचको मुरकेरमो ये उनके बारके समान हर्मोषणा नाकार नाममा बाधिए । उसके मम AOR पाँच पर बोर कार सवार एक तर। पषमपस्विर्पगर्म पिभक्के मोकेको विमाम प्रतिषिष इति वर्मपवि-- इस प्रघर गेले दोन लियान पाकर बस प्रापेक दिमाग मेहमाम है- सधविधोऽधोलोकस्तिर्पम्लोको भवत्यनेकविध । पथदशविभाने पुनरूपलोक' समासेन ।। २१२॥ टीप-समारनधि संसपेव । पत्रमादिमेदेन महातपमान सतपायो मेका तिपम्मेो मेमानो बमदीपादिमदन मपतमदादिमेदेम । मसस्पेपा दीप समुद्रा इति । म्पोतिमा मेदा मपि विपम्मेष एव । उप्योरप पथरममे सास सौधर्मादप' मानवमापतकाकारण, परेवसामित्वात् । मारमा पती च । एवं स स | -मन - पबरपतिमाल इलाम सपनो मे area मौसमय - मप- - कारब २११२१२ २१३] प्रशमरतिप्रकरणम् प्रयप्राणि प्रीणि ममोमध्यमोपरितनभेदेन । पध महापिमानानि पतुरनो भेर । ईपत्या. ग्मारामप' परमो भेए पति ॥ २१२ । -अमोगेके सात मेद, तिगेकक बनेक मेद और वर्मगेकके संभपसे पदा मेरो। मागापालप्रमा, धाप्रमा, पालमप्रमा पाइप्रमा, धूमप्रमा, वमप्रमा और महातम.प्रमा पपियके मेदसे बचोगेको साव Aमाग है । विम्योकमें बडीप और सरगसमुद्रको वादि कर संकगात दीप और समुद्र । म तिगेकके भी मनेक दिमाग है। ता म्पोसिफ चाविक देस भी नियोको निवास करते हैं । सोको पन्द्रा मेद हैं। सौपर्म गैरह बारह से जामत पोर प्राणस तपा मारण और बप्पुत स्गों में एक एकत्र होने के कारण इस भद होते हैं। सोसे पर भी प्रेरेपक है। उनके तीन भेद है-अप्रेषयक, मप्पम प्रेषक बोर उपरितन मोपका पाच अनुचर विमानोका एक भेद हबीर ईपयाग्मार बिस सिदक्षिणा भी कहते है, मामका एक मेर। इसे प्रकार सपकक १+++१=१५ मर होते हैं। मपान किंमेकमाप्रमेवाहोस्मिन् समस्याह- बरपा माकान्स छोकप्रमान हो? या सर्वत्र म्यात पापगते है- लोकालोकव्यापकमाकाश मर्त्यलोकिक काल । लोक्व्यापि चतुष्टयमवशेपं त्वेकजीवो वा ॥ २१३ ॥ टी-पापमिति गेनरोडम्यापमुपते डोकलापमोम्पाप प । बोला- जीवापारमेम ठोकतक परमखोफ इति । पमाणे बीमाधीवाविपापपई छोपायम, पमामापो बीमादीनां तदोकानमिति बोषापामारमूखो भेदोऽम्पपा एकमेवाभधम् । मस्पोकिक काम 1 मत्पनो मनुप्पोक-मपनृतीया दीपा समुद्रदयं च मानुपोत्तर महीरेप परिभिः । तापत्येष सप्रे बतमानादिसमन पो म परतः । सम्पापिबतुष्ट- पमबशेपं घमापममीरपुरमामयम् । सपम स्प्रेचकाये पमापमा । सामशरीराम मन्तर सर्व येक पग । पुरसाम परमाणुप्रभूतप सक्सोक इति । एकोऽपि वा पीक सलोनकाश म्पापी पउिसमुदातमाठ एव भवनाति । २।३। मप-भाश मेक और बगेको म्यापक है । काय म्पसार मनुष्पगेकी ही होता बारे चार बम्प बोम्पापी है। एक सीब मी छोम्पापी होगा। १-fa At फ पुलो। २-रिमा वि १२ प्रमोडे पर, सरकार मेर, अप अनुप्र ए मेरभर नरसिमर मेर समर मा मेर गिताये।

-- रापपम्द्रीनशासमागपाम् [चतुरंशोऽभकाम, पझम्पनि भाषापाकासम्म गेसकप मी है और बोसकर भी है और बालों पापारम्त क्षेत्रको कमी। उसम परे बोकामिन बापाने गीत और अजीर नगर पापों रम्य पापे बाते | उसे गेगकाश करते हैं और गोर बा का रिस बमा, उसे बोकाका प्रवेशास प्रकार जीवारिक बोदेवर भर न रहने पापो समान से गये ।पा भाकाय एक बार मरण है। मानुयोचर पठसे लिए कार्यप और रो सममोंको भनुम्पोक करते । उतने ही क्षेत्र भूत, मविपत् और वर्तमान सर काका म्पहार होता है। पौषि म्पसारखा पोरीकों के भ्रममा और समय भमण फेरा मनुष्य- गेको हो । बाफीके पर्म, पर्म चीन और पारदम्प कम्पापी । धर्म और बपाम्प समस्त मसमें पाप्त सूक्ष्म शरीरवार श्रीष मी समसबमें पाये गावर परमाणु पोप पुराणम्प मी सम्पूर्ण पोको यो । एक और भी सम्मिमा ममप सम्पूर्ण ठोकायसमें म्पास हो पाता है। रिमेकम्प पिामेचम्पमित्पाद- भस इन इम्पोमें कौन कौन ब्रम्प एक और कौन बनेकपा समावे- धर्माधर्माकाशान्येककमत' पर निकमनन्तम् । फालं विनास्तिकाया जीवमूते चाप्यकतृणि ॥ २१४ ॥ दीन-पदम्पमपर्मणम्पमानपदार्प प पीग्यप्ये दम्पाणि पश्मे प्रम्प धर्म, मपर्माप्रमावपि तपैष म्पोमसम्म पुगेकायकसरपमेडमेति प्रतिपत्तम्पम् । बीवद्रम्पमनम्स- संस्पम् । तपा प्रताप काग्रम्पमप्पनम्वतमपमतीदामागवादिमदनेति । मबापमस्ति कापसम्म किं सबडम्पपिपपा । मेस्पार-प्रसादिनाऽस्तिकापा | पत मास्वियमा । म प्रपोऽस्वि समायानाम् । बतमानस्तक एर समपात मास्तिपः । मम्पम प्रथमोऽस्ति । मसम्पेपरेशो मीप । तया प्रमापर्मावपि । मोमानवमरेप पुदम्प का बीमारते सम्मानि पानि मृतपर्याप पानि । मावस्तु पर्ता प्रमाणुभाना धर्ममामिति । २१४ ॥ मर्प पर्य, बर्म और बायस इम्प एक एक । पातीक तीन सम्म बनता दिमा ऐप इम्म मस्तिकापरे और बके बिना भेष म्म बस्तिकामी बोर के पिना क्षेप इम्पकार। मावा-धर्मरम्म एक मपर्म इम्म एकरे मोर भेक वा बगेपस बाससम्म मी एकही। बीपम्प बनम्त है । पुमाम्म बचतका कान्द्रम्म मा बतीत, बनामत मोरा के मेरसे मनम्न समपान है। इस कहों दोसे का पिना आप पागों इम्मास्तिकाय रे । कान्द्रम्प बस्तिकप नहीं है। क्योंकि उसके सम्पोछा प्रचय महोय। पर्वमानमा प्रमान एसमय है। बद यह बस्तिकाच महा मत प पोंके प्रदेशका प्रथम होता। तोकिये गहमरेटी है। पौष पर्म और कपम्प बसायासी है। बाकस ५१ पमिका २१५-२१५] प्रशमविपकरणम् बनम्रप्रदेशी रे मोर पुद्रठ मी बनम्रप्रदेशी होता है। बहरे पापों स्तिकाय को चावे । बीसके सिवाय शेष धर्मादि प्रम्प कर्तवपर्यापसे रित हैं। पोंकि इम और वषुम काका कर्ण के बीखम्मसीहोता है। फर्मादीनि दम्याणि कामिति निरिशमाह- दोका कार्य सण- धमा गतिस्थितिमता द्रव्याणा गत्युपग्रहविधाता । स्थित्युपकृञ्चाधर्मोऽवकाशदानोपरगनम् ॥ २१५ ॥ टीका-धर्मदम्प गतिमा दम्पाणा सपमेष गतिपरिपतानामुपग्रहे पर्वते बीमपुरला माम् न पुनरगामीवदम्प पुनप्यम्प पा बलामपति भमः । किंतु सयमेव विपरिपताप- समते घमदम्पेण । महम्पस्य गप्ठतो बसम्पमियोपमादकम् । ययावा म्पोमदम्य सत्यमेव मम्पस्पावगाहमानस्य कारण मरति, न पुनरमबगाहमान पवादवगार्ड कारपति । पया प सोपताना प्रारम्भ स्वपमेप कर्तुमुपतानामपेसाकारण बप मवति, न प वानगता की पगम् पठात् फर्षि कारपति बपी । यया वा गर्षितम्मानिसमाकपमा बगाना गर्मामान- मसमा ममत. न वामप्रसपती पगतिशय प्रसाइपति । पयामा पुरुषः प्रतिगोप निमिच पापाविरमति म बाविरमन्त पुमास बसापति बोयो विरमपवीति । एवं गतिपरिणाम भाषा परम्जीवानामपेसाकारणं धर्मवग्पम् । तपा स्पितिमता बम्पामा स्पिवेरपेसाकारणम पर्मदम मयमेव तिष्ठताम् म पाविष्ठहम्मे वळावपमः स्यापपति । एव स्थितिमा नग्माण पित्युपकारी मापपर्म । गगर्म तु वीयपुतानामपगाइमानानामबागादानेन ग्यापियो ११ मय-धर्मवम्प पन्ते हुए दो चम्ने में सहायता करता है। वधर्मद्रम्प यो एपोके घरममें सहायकोबार बारपम्प समी दम्पोको बाघच पता है। मावाप-धर्मरम्प सपो पम्ने हुए चीन और पुगेको बसनेमें सहामा करता। किन्तु न पर जीपम्प मोर नवम्पको बर्दस्ती नहीं पता है। जिस प्रकार र माउन पाने में सहायक घिस प्रकार भावसम्म सर्प ही माराम पुक प्रम्पको नाकाम रान करवा पाक किसीको बाकश नहीं करता, विस प्रवर सपही खेली गे पर सामोरे वर्षा सहायक होती है किन्तु सेती न करनेवाले किसानों पर मेटीमें मो पानी मिस प्रकार मपी गर्गनाको पुनका मारा बगुलामोंक गर्माधान अपना प्रसव नाt- परि गुणवयं ही सब म को तो पो गर्गना उसे यापूर्वक प्रसव सोपती बप विस प्रकार भोप मिस मनुप्प पापका त्याग कर दस्य है किन्तु यदि पुरस पापसे रिकम होतो १-विदोघेरे भावि चिराग पाप गुरेखमा प्रधनमा५. पर।

१५१ रायचन्द्रमशास्त्रमाशापाम् [অনুভৗখিক, বশি बर्मोपदेस उसे बम्पूर्णफ स्पागोता। उसी प्रकार पाए धीर और पुगेको धर्मवम्म पम्मे सहारा करखा। पासप ही सो पुए बम्पोको बर्मग्रम ठहरनेमें सापद्य करता है। पित यो ए इम्पन्चे बक नही पाता है। बाकासम्म बगारके इपाक जीव और पामेको बाम-दान करता है। सरसोविटीयो ही दम्म अपने अपने कार्यों के प्रति उसीन करम प्रेरक परम नही। पुण्यम्म' पमुपकार विपत्त इस्पाइ- पुरखम्पका उपकार करते है। स्पर्शरसगन्धवर्णा' शब्दो पन्धम सूक्ष्मता स्पोल्यम् । सस्थान भेदतमश्छायोद्योतातपश्चेति ॥ २१६ ।। कर्मशरीरमनोवाग्विचेष्टितोच्छ्रासदु खसुखदा स्युः । जीवितमरणोपग्रहकराम संसारिण स्कन्धा ॥ २१७ ॥ टीप-सदिय प्रत्यम्पस्पोपकारः । तपा एम्बपरिणामा पुगनामेबोपन। बन्धन बन्ध धर्मपुरानामात्मप्रवेसामा च सीरोदात् पनीमार पत्यम्पस्पोपकार। समतापरिवाम पुरस्मनामुपनरोऽनम्तप्रदेशाला सम्पानाम् । तमा सीसपरिणामोडमा पमुपपीनाम् संस्पान पतुरतादि पुरोपचर । मेवाणरूप सोऽपि परिपामा । तमोऽम्पसर परिनामा बम्बापामेवोपकार । पापि अपरिपामः । उपोवसम्मवार दीना पुनस्परिनामाः । मातपो दिनमपपीनों पुनरपरिमामः ॥ २१॥ कर्म मानावरणावि मेपन । भरीरमौवारिदि परिणाम । मनोवाटावर प्रापरिणाम । विवि किपा पुरम्परिणाम । उपास प्राचापानी पुलपरिणामः । कुर्स मुचेति पुनमनितमेव । बीपितोपाकर भीरपृताविप मरपोपहरा स्पिगपरि पनग सर्वेऽप्येते प्रामामुपकाप । ससारिवीनपिपा मम्मरूपेयपरिषतामा न परमाणु पेणति ॥२१॥ मप-पर्स, रस, गन्ध, वर्ण शप, कप, सूरमा, त्यस्ता नाकार, पण पत्यकाम छापा, पम्नमा वारिका प्रकार तथा बाम समीयोंके हामारणादि कर्म, सार, मब बचन बिपा, पास उसासमोर र तवा चीन मोर माममें सहायक सलपा सम पामा उपकार है। -- १- पागमम् वाण भयोमा सम्पूर्ण मानिनामेव पुसी पनि ।

- कामेघ २१६.१७११८] प्रथमपतपरिणम् मापाय-पाठ प्रकारका स्पर्श, पाँच प्रकारका रस, दो प्रकारकी गन्ध भोर पाप प्रकारका रूपये सब पुगरके गुम रोनसे पुनसका ही उपकार समाना चाहिए। रान मी पुदी ही पयाप है। परमाणुका परमामुळे साप अपना कर्मपत्रण बारमा प्रदेशों के साप रो प- पानीकी का बल होता, या मी पुद्रसर ही उपकर है। बनम्तमम्सप्रदी स्मोंका भी माम्प होना, भोर पादर, मभनुप वादिका स्पूछ होना मी पुखका मी उपकार तिकोम वगैरह माकार, पर मादिके टुकर मधकार माया चाँदनीका प्रकाश सूर्पका प्रकाश ये सब पुगसके ही कार्य हैं । तपा दिन सम्भोंसे ससारी जीयों के कर्म घरीर, मन, वचन, वास उपास भगण बनते हैं, दिन के सनसे उगे सुख और दुसया बनुभव होता है और गो उनके जीवन में सहायक-से प, श्री आदि और गे उनकी मृत्युमें करम , सपि मगरहने सब पुन केही कार्य नाममा पाए। पाउसोपकारदशनाया- कारबीर बीब बम्पर उपकार बताते :- परिणामवर्तनाविधिः परापरत्वगुणलक्षण काल । सम्यक्त्वज्ञानचारित्रवर्यि शिक्षागुणा जीवाः ॥ २१८ ।। का-परिणामास्वापदपवेसरोपवे वाऽपक्षीपवे पिनश्यतीत्पारिक कार बनित उपकार पचनकि-बत्तत इस कामापेममेवामिषानं प्रपुत्रम्ते विदाम्स' । बनाया विपि प्रचार उक्तन म्पायेम । परतामपरत प घसरुवम् । पचासत्पबाधितिबपाऽपरः पथविधतिबास्पबाशवपापर। पर्व परियामाविगुणवस कार परिणामादिभिपयावस्पत- इन्यप । मय बीमा रेनोपारेणोपड़ाते सम्पत्तमामुत्पारमेन । वम तत्वार्यभवानलक्षण सम्प समुक्तमुत्पादयन्ति । धान अवापपिगमयन्ति। पारि मियानुमानमुपविशपम्ति । बीप शक्ति विद्यप वर्षपन्ति सिमा ठिप्यसपरिसविधान बमपन्ति। पते वीरक्रिया (स्ता) उपकारा ॥२१वा मय-यामाम वर्तनापरत्व और अपराव गुम सम्पके हैं। और सम्पमात्र, शान बारित्र, वीर्य पार शिक्षा नीम द्रम्पके गुम माषाप-का पटना उसका बड़ना का पटना, इत्पादि परमाम म उम्पका उपचा। अमुक मस्ती इस्मादि पवारको बना कहते हैं। पवना भी IN उपकार, मोनिका Aमिपसे ही बारिम्पार होगा। पचास वर्षके मामी पेनासे पचीस वर्पन युगक कार–छोटा कामा। बोर पचीस वर्ष पुगी पेवासे पचास पप बामी परहा कामता है। यह मेटामा म्पहार मी का इम्पका ही कार्य है। इन १- परम पोम्पास मुहुमागे। दुरस्त गोवपमिय २-पापरामु । श्रीमान प्राRre पपपम्बनशासमायाम् [ोऽधिकार, मापदा गुणों-कम्पोसे का व्रम्पको चाना नाता है। ता सम्पातल मेरा जीके गुण है। स्पोकि जीप वत्वापानरूप सम्पत्त्यको उत्पमकर धोको पड़ते चारित्रक पाम्म वा उपदेश करते । सतिका प्रदर्शन का लिपि बक्षर गैरह शान करने सब पीके गुम-उपकार पाने चाहिए। एवं बीवानीगनमिघाव प्रपद्येन पुण्यापुण्यपदार्पश्यममिमित्सुण- इस प्रकार जीव बोर बजरीव पराकारतारस पुम्प वीर पाप पराको करते हैं- पुद्गलकर्म' शुभ यत्तत्पुण्यमिति जिनशासने दृष्टम् । यदशुभमथ तत्पापमिति भवति सर्ववनिर्दिष्टम् ॥ २१९ ।। टीका-विपस्वारिंशवमस्वप नुमाः पुम्पाभिषामा । पूपिनपीविरमास्तमासीमा पापानिपाना एषमा साहति मागममामा पदार्पोऽयमिति प्रतिपादपति ॥२१९।। मर्पयो पार कर्म मरे पुस्पद ऐसा बिनशानमें रेखा गया है। या यो बनुम है पा पाप है ऐसा सम भगवान्ने त्रा। माार्य-सपोय मोफी एम प्रकृतियोंकों पुण्य और ८१ माम प्राधिोको पाप भो। सर्वत्र निर्देश फरमेसे मन्चकारका नमिप्राप हो कि पुण्य-पाप पार्ष बागमका विषम है।बीर मिशासनमें उसका निस्तासे वर्षम पापा जाता है। मासयसपरी निकपपति- भास और ससका निरूपम करते है योगः शुद पुण्यासवस्तु पापस्य तद्विपर्यासः । वाफायमनोगुप्तिर्निरासवः सवरस्तूक्त ॥ २२० ॥ टीका-पोगा मनोकामापारम्प स जलागमपूर्वको म्यापार सेस्कस पापस्या साति । सपामेगावपापा निरोपो गुप्तिसमितिपुरस नियमिवमनोवारापनियम तारो भवति सगिवानपदारस्पस्पर्पः ।। २२ ॥ मर्म-भर बोनसे पुम्प करना होता है और अगर योगसे पाप कर्मका बाबा होता है । पचन गुष्टि कामधि और मनोगुठिसक बासकालेको सर करते हैं । इस Aपन पाकिया ग मुख। १-मालि मिरर पुरखो। पुखरे । यस्मात मासपमये सति समता पर महम्मद पुखो।

प्रशमविपकरणम् १५५ कारिक २१९२२-२२१] - T - भावाय-बागममें विशित मिर्षिक बनुसार यो मन, वचन वार कम्पकी प्रगति होती है उससे पुष्प वर्मका वास होता है। और सेठापूर्वक प्रवृति करनेसे पाप कर्मका भाषा होता है। गरि समितिका पान करते हुए सर्व मन बचन और कार्यकी क्रियाको नियमित करनेसे गे समस्त बासकामरोष होता है, उसे संपर करते हैं। निर्बरणबन्धमोसप्रतिपादनाया:-- मिरा कप और मोक्षको माते- सवृततपउपधानं तु निर्जरा कर्मसन्ततिवन्ध । पन्धवियोगो मोक्षस्त्विति सक्षेपानव पदार्थाः ॥२२१ ॥ टी-एष सहवासपदारस्प तपसि पथाशक्ति भ मानस्पापूर्वकमप्रवेशनिराधे पूर्णर्षिकर्ममतपसा सय । निबरा निशरणम् । उपधानमियोमानं शिरोषरापा मुहहेतुर्यमा सपा पोऽपि बीचस्प मुखहेतुस्वादुपधानमुम्यते । कमसम्ततिपन्या । कमां कामावरणादीनां सम्ततिरविणेदो पम्पकमत एवं कर्मोपादानमात्मम इस्पय । कात्स्पन पम्पषियोगो मोमः । शापित्युत्तरेऽपि महाविशते निधोपना मामे मोमो मबति । इत्युक्ताः संपतो नव पदार्पा: २२१ ॥ मप-सबरसे मुछ गरीबके तप-उपधानको मरा करते है । कोंकी सन्तानको बन्द करते ।मोर पके मामले मोष करते । इस प्रकार सोपसे मो पदार्य। भावार्ष-सके द्वारों पद करके शतक अनुसार तपस्पा मनसे मबीन कोंके मानक रक मानेपर पहरे पि ए कोका तपस यो पप होता है उसे निरा का। उपपान को करते विस प्रकार तकिया सिरके लिए समय घरण हो, उसी प्रकार आप मी बीके मुका कारण है। तप करनेसे मुस्की प्राप्ति होती है। बता सपको उपधाम कहा। सासाराम मादिकमाके माश न होनेको उनकी परम्परा के बराबर पते पलेको सम्ध करतेपोकि कमोसे ही बारमाके कर्मबन्ध होते हैं। वर्षात् पहले पाए कर्म ही नवीन कौके सदमें कारण होवे। सीसे कमाको सम्तानको बावका कारण होनेसे बय है। मिस मारो चानेको मोक्ष पाते। क्योंकि १२२ प्रतियों के विपुल क्षीम गानेपर मोक्ष होता है। इस प्रकार सपेपसे ये मी पाई है। सम्पग्वसनसम्पनिरूपणापमा सम्मानका स्वरूप करते- एतेष्वप्यवसायो योऽयेषु, विनिमयेन तत्त्वमिति । सम्यग्दर्शनमेत तन्निसर्गादधिगमाद्वा ।। २२२ ।। १-मेल, ।

१५१ रामपमयनशासमाययाम् [ईसोऽपि सम्पदमनाने टीका-पतेपु जीवाविपदापु पोऽम्यवसायो निनिधन परमार्पन, म वासिण्या नास्पा तत्त्वमिति सत्यं वयं क्वमित्पपा । एतदेव प्रवर सम्पग्दर्शनम् । तनु मोहक निसगावभिगमादेवि । निसर्गः समाप संसारे परिसमवो जीवस्पानामोगपूरफ कम क्षपपतो प्रन्विस्थाममामस्मापूरपरमामा प्रदि विवाश्यतः शुमा परसापम्प पिमिमग्र पेरनि चिरमप्राप्ती शुमपरिणामस्य स मिसगतः स्वमापादेव सत्साराभवामय सम्पयन मुत्पपते । भगवरमतिमावर्धनात् सापुपर्मनावा चमपरिणामो निसर्गः समारकापा । प्राचिन सम्पी मिचे शिप्पमावस्यागमोपदेणावाकलपा शक्तोऽपिगमसम्पपर्सन- मुस्पयते ॥ २२२ ॥ मर्य-इन बीमादि पापोंमें परमासे पेतली ऐसा योगप्पासाप-परिणाम होता है उसे सम्मान प्रवेम सम्पाश्चम समापसे अपना परोपदेशसे होता है। मावार्य -उच मीपनि पदामि परमासे, न कि सरोक बारसे, स्पताकी दो प्रतीति होते कि यही बात पहोवो ही समय यही पारीक, उसे सम्मान का। उस सम्पादनके दो खो-एक निसर्ग और दूमा मभिगम । मिस लमानको करतो । संसारमें ममम परम हुमा जीव काम्याम प्राप्त होनेपर Aमा मोने हो कोषधपम करता है। बोर मिप्पा- वरूपी प्रपिस्तानको प्राप्त करके बपूर्णकाम पामके पमपामो प्रबको मेरवा ।म परिपायोक रामप्पा-प्रविका मेद करके पार बनिनिकरण मानके परिणामों प्राप्त करता है। हम उसके समावसे ही सपालमानका सम्पादन उत्पन होता है। इस प्रकार चिनहर की प्रतिमा के दर्शनसे बचा साधुओं नसे पूषोत रीतसे जो सम्पन्न प्रकट होता या निसर्ग सम्पादक । तया पश्चिमेर होनेपर गुरु मारके उपदेश पुनमेसो सम्पच होता है पर अभिगम सम्बग्दर्शन है। सागरा पारे कि सम्पादयतको उत्पत्तिको करण :-एक मन्त्र और मा पाप । बम काम दोनों ही सम्पदर्शनमें समान र पनि होमों ही प्रकार के सम्पर्मनी उत्पत्ति के लिए मिप्यास्त्वरूपी प्रविध मा बामा बाफ्पको और उसके के लिए अपप्रवृत्तिम अकरम मोर बनिवृत्तिमरम नामके परिमाका होना सारे । मत पारिक प्रत्रिपा तो दोनों समान रे। पास कामोंमें पता है। निर्म समादर्भममें निक प्रतिमा साधु बगेहप वर्मन पाप करप होता है। उनके दर्शन मात्र हो म माोंकी पारा महने गी है। मिस्त अधिगम सम्पमतमें परफा उपदेश याद करप होता है। रोनोंमें फरक इतना ही मन्त। एतदेव पति- इसी बात को करते है शिक्षागमोपदेशश्रवणान्येकापकान्पाधिगमस्य । एकार्थ परिणामो भवति निसर्ग स्वभावभ ।। २२३ ।। नीरास फा f कारका २२२२२२२२५] प्रशमविप्रकरणम् L टीका उहापा कारिपेयम् ॥ २२॥ मय-शिक्षा, बागम, उपदेशप्रवक-ये बनिगमके समानार्थक हैं। और परिमाम, मिर्ग और स्वमार-प दोनों एकार्यक है। भाषाप-जिस प्रकार बेनपर्मक मम्याससे, वागमके पड़मेसे, धौर उपदेशके सुननसे गो सम्पास उत्पम होता है, यह अधिगम है, उसी प्रकार परफे उपदेशके बिना समापसे ही नो सम्पास होताय निसर्ग है। एतत्सम्यग्दर्शनमनधिगमविपर्ययो तु मिथ्यात्वम् । ज्ञानमथ पञ्चभेद तत् प्रत्यक्ष परोक्षं च ॥ २२४ ॥ टीका-एतदिप्रकार सम्पयशनमापिगमिक मैसर्गिक प । एताविपरीत मिम्पारक मनभिगमनमर्य तत्वायामदानम् । मतत्त्वविरिति विपर्ययः । शान मत्पादिमेदेन पचमा। पत् समासतो विधा-प्रत्यक्ष परोसे प । सम प्रत्यसमाधिमनःपर्यायवास्यमम स्पास्मनः सासावित्रियनिरपेस मयोपशमन मयोप॑ प । मतिमते परोसमिम्मियानिन्द्रिय निमित्तमिम्ब्रियदारक म पुनरात्मनः सासादमादमिवानयत् । त्रियमनोमानापापमपोपसम बम्पं पपेसमिति - २२५ ॥ मर्य -पा सम्पादन। और तत्सापक प्रदान न करना बरका विपरीत मशान करना मिप्पाप है। बानके पांच मेद । प्रमस और परोक्ष होता है। भाषाप–इस प्रकार सम्पादन दो प्रकारका होता है-अभिगमन मोर निसर्गय । इससे उल्टा मिप्यावहै । तत्तामा मवान न करना अधिगम मिप्यास है। और तत्वमें बसपमुनिका होना विपर्पप पिप्याती। इस प्रकार सम्यग्दर्शनका कपन करके सम्पबानका फपन करते है ।हानके पाँच पर-पति, अन, मपनि मनापर्यप और ना या स्वेपसे दो प्रकार का होता है-प्रस्मक्ष र पोध । पपि मनापप बोर के प्रया क्योंकि ये हान इन्त्रिपोंकी सहायता मात्र केवल भारमासे ही उत्तम होते हैं। इनमेसे वाभि बोर मनःपर्यप धायोपश्चमिको भोर केवमान पायिक। मी और सुन परोधी पोंकि ये इन्द्रिय और ममकी सहापदासे उत्पन होता है। जैसे मसे बपिन मान सनेमें घूम सहायक होता है। वैसे ही पेशान मी इन्द्रिय और मनकी सहायता से परापोको चानते है । अतः यो मान इन्द्रियावरण और अनिन्द्रिपारम कर्मके पपोपश्चमसे होता मा पोषो। तन परोक्षं द्विविधं श्रुतमामिनिवाधिक च विज्ञेयम् । प्रत्यक्ष चावधिमन पर्यायो केवलं चेति ॥ २२५ ॥ टीमा-भूतमागमोतीम्ब्यिक्पियो पापपरिच्छेविस्थात् प्रमाणम् । मामिनियोपिक मविरिति तुस्पार्यों । सा च मानसी मतिरपापापा। सतः पा बिबादादधविध भूत ।

सपचनशासमानामान् [पयोऽभिव, सम्पपापम् मपति । मत्पर्य पुनरपवादिपवम् । मिथ्यावसनपणिहाग्मविश्वापपपो विपपवासानमपि मपवीति । २२५॥ मर्म-उमसे पपेक्षके रो मर जानने चाहिए-एक मुत पोर रसप भामिनियोटिक । सामाधि, मनपर्पप वार करणानको प्रस्पा मानना चाहिए। भाषाव-भागरिकशानको गुसकरते हैं। बामिनियोजिमेर मतिमा एकही। पहले बर्षापा बादिरूप मलिान होता है। उसके बार बनेक प्रकारका क्यान होवामपनि कीय तीन बान प्रत्पर है। मिपावके साप नेसे मति, बवाल मिप्पासास मोवे है। वर्षात् ये वनों बान सबै पो होते हैं और मिप्पा मी होते हैं । यदि सम्पक्सके साथ हो तो सब होते हैं और पदि मिप्यार के साप होमिप्या होते हैं। एपामुत्तरभेदविपयादिभिर्भवति' विस्तराधिगम । एकादीन्पेकस्मिन् भान्यानि ताचतुर्य इति ॥ २२६ ॥ टी-पपा मस्पाविधानानामुत्तरमेवस्पियादिमिर्मरति विस्तापिगमः । तमे विवानिम्पिमेदाम्वविय मतिबानम् । भक्पहाविमेदान्धर्विधम् । पाविमेदवनेकया । भुवमप्पालामाङ्गपिएमेबारेमा । मायाममममधरम् । मावश्पणापपिएमप्पाचायति पावसविषम् । वन परोपमसरसम्पत्पिपम् । मरियम्पमभ्पमोत्तयारिमेनानेकपा सपि सम्पनिबम्मना । मम पापळाममपि अपिपुठमत्यादिमेवमपितानविपनीलाम्मानम्तमान निबम्पनं विजयवर पेति । एष विम्तविगमः । माविमापात् सेवकारारिमागोऽपि स्मः। मतानि पर बालाम्पेस्मिनारमनि पुगपत् पिपम्ति ममम्तीस्थाह-एमादीनीत्पादि। एक मतिमान बपम्पत भुवनानममपरम सत्र में समबतीत्येवमुक्तमे मतिज्ञानमिति । सम्पमा मानव सगीवानामागमेऽमिशिवम् । सपा याचिम्मतिमुते ममता । मा पिपमि मति पवामिहानानि । कदाचिम्मतिमुवापभिमन पर्पयज्ञानानीति । न बाधित पदापि पुगपत् समबन्तीति । २२ । मप-इन मानो उसमे वीर पिप गैरसे इसका RORसे हाल होता है। एक और में एक्सेस पाप कपिमान करना चाहिए। माया-मे-प्रमेन और फ्य बारसे शामोंको सब विस्तार साल पाना जा सया। वैसे इन्द्रिय समित्रिपके मेदसे मक्षिान से प्रकारका है।बरमा ईहा बबाव और पारमा मेरसे चार प्रका। ये चारों ज्ञान पाचों इन्द्रियों और मनसे उत्पन होते हैं। महिान ५-२१ प्रकाश माविष, पिन पनिासर, बमुल, एप एक एपिप निसल, समोर १-रिमबिधिसमाति- । १ एमास मारम बिपरिपये मगर वापर-4. पुयोनालि। मामी पुस् नारिका २२५-२२६ २९.] प्रचमतिप्रकरणम् प्रसन चार प्रकारके पदापोंके मानादि चारों हाल होते हैं और उनमेसे प्रत्येक पार पाँचों इलियों और पनसे उत्पन होता है। मतियान १९x१x६ = २८८ प्रकारका है। सपा माके हो मेद है। एक वर्षावना और दूसरा पचनावमा । म्पमनापमा पा मोर मनके सिवा क्षेप चाही इन्द्रियोंसे शेतातीर पर ही प्रकारके पदापात्र होय है। मट उप्त १२४१-१८ मेर होता है। पूर्वोत २८८ मरोंमें १८ मेदोंको मिठामेसे मतितान ११६ प्रकारका होता है। स्ववान मी मगमाप बोर वगप्रविएके मेदसे दो प्रकारका है। बंगबाप मुलके वनेक मेद । पनप्रनिए अपके पाचाराक, सूत्रमग बादि बारह मेरा ये दोनों परोहान समस्त दम्पोंकी बुन पर्ययोंकर मानते हैं। साधानके अपम्प, मप्पम, उमर मादि भनेक मेद रे। पापा रूपी दोको ही गमता है। मन पर्यपणानके मदि, विपुलमति वगैरह मेद है। पशिानके मसपीमूत रूपी ब्रम्पके बसन्त मागको नागवारे ।मतः उसकी अपेक्षासे निशुस्तरी । वेवण्डान समस्त दम्पोकी समस्त पापोंको मानत है । इस प्रकार मेदों मोर विपकी अपेक्षासे बालोध विस्तारसे पोप होता है। पारि पदसे क्षेत्र मोर काकी अपेवासे मी दिमाग कर देना चाहिए। हम पाँची बानोमेसे एक बार एकसे मेर पार हान तक हो सकते हैं। एक बाम मधिान होता है। बमरम्मक समान सब बीमाके महीपा । बा बोग मनिशान बनाया है। कभी मति मोर हा दोनों रोठे ।। कमी मति, और अपपि सीन शाम होते हैं। कभी मतिबमि जोर मनापर्यव ये बार बान होते । किन्तु एक साप पांचों हार कमी नहीं होते।' सम्पग्वानमिप्यावानयोः किंतो मेव इस्पाह- सम्पमान वर मिप्याबानमें मेरा होने का कारम बनते हैं- सम्यग्दृष्टानं सम्यग्ज्ञानमिति नियमत सिदम् । आद्यायमज्ञानमपि भवति मिथ्यात्वसयुक्तम् ॥ २२७ ॥ टीका-सम्पगटिस्वस्तापभवानरामयसम्पग्दशनसम्पच. महादिग्रस्परहिवस्तस्प पगानं तरसम्पग्धामम् ययापस्थितपरापपरिणदित्वात् मिपमेमेषाम्पभिचारि सिद्धम् । मापनयमशानमपि । मिथ्यादशमयोगात् मतिभुतावपय सदसदविशेषपशिाना रातो पासपम्म्म्म्मचक्र । पानफगमापारप मिम्यारऐपमानमेव ॥ २२७॥ मय-सम्भणीकर शान सम्पवान गए या नियमसे सिर । नारिके टीन मति अन, और अधि, मिपावसे सपुत होनेपर मम्माल मी ऐद है। १- बाद मान मनमानि बोम्ममिकानि अपराशिदे ।। मबहरे । पशिभूषविमान मशिनासममामि या NAIR मनुमाविमापयति । २ पर स्थामावानात् । भापत पाराशर, पपस मणार न।।।

[ - रायचम्बनमानमामपाम् पपरोऽधिकार, बारिवम् भाषाप-तलाके प्रधानरूप सम्यग्दर्शनसे मुख और सदादि दोपोंसे रहित सम्पनीका शाम होता है उस सम्पदान करता है। स्पोंकि मा पस्तुके सहपको सा कसा गाना है। परमात पिसेपपिबारी है। बात् सम्पपीकहानक सम्मान होममें कमी को मापा नही रेशी गई और न कमी सम्पपीक सिवा किसी अम्पका नाम सम्पग्रामीणा गया है। वारियर्सन हाम-पति पुन, और बरि मिप्पाबान मी होते हैं। बात् प टीनों कान मिप्पाची मी होते हैं। बताये मिप्पावाल मोरे पाते हैं। स्पोंकि मिप्पारन के सम्बन्धसे ये तीनों बान सत् और बसमें भर मकर सकनेके काम उम्मच मनुप्पकी भाबपनी इसे सत् को बस कर देते है और मसत् को सत् करते हैं। पर कभी सत्को सत् और बमको बस मी करे वो मी उमें प्रामाणिक मही माना जा सकता । जिस प्रकार की ममुम्प सरपके नशेमे बोको माता मोर माटाको श्री कात्य । कथित् मत्ाको माता दी को पी मी कर देता है किन्तु इससे उसे होशमें नहीं माना जा सकता । इसी प्रकार मिप्पाची जीव मी आमधानसे विमुख होने कारण संसारके पदापों मिम्पायुधि रखता है-यो अपने महा। उन्हें अपना सम्प्राता है। उनमें किसीसे रान बार किसीसे रेप करता है। बट ठसका भान यान या मिप्याशाम करा पा हैइस प्रकार सम्मान और मम्मायके करम बान, सम्पबाव बोर मिप्यादान होता है। सम्परधनसम्पगाने निरम्य पारिप्रतिपादनापमाह- सम्पादर्सन मोर सम्पवान मिलपन करके सम्पमारित्रका प्रतिपादन करते हैं सामायिकमित्याचं छेदोपस्थापन द्वितीयं तु ।' परिहारविशुदिकं सूक्ष्मसम्पराय ययाख्यातम् ॥ २२८ ।। टी-भरकविए समस्वस्प मापो माम उपभयो हानारे समाप, स फ्योग नमस्पति सामापिगम् । पपमपरिश्रमतीपहरपारिस्परं सामापिकम् । मम्पमतीपमा पावरबीविकम् । पूर्वपपापण्छेदाचरपर्यापारपापन प्रापस्थापनम् । प्रपमपभिमसीप- पारेष वीर्य । परिहारविशुविक पपिारेप मापाम्नमनिवापारपरिहारेप तस्परित्यागेन विमुदि कम पम सत् परिवारविशुचिष्म् । पपीतनगमपूज्यतीपाचारसम्सूना साना गफ पिनिगताना पापिारिफास्पम्पितवन प्रिया स्पितानां प्रीम्मशिसिरवास परिवारपास भकमामिनामाचाम्मेनय पपिारिधर्मा प्रतिदिनापानमोगमा मास्पितस्प पहास्य पास्प पाण्मासापापवमोग्गुन पपिारिधिषमुच्यते । तथा सामसम्परार्य सम्पराम पापोपस्प सूरमा सोमारम्पसससस्मसम्पराप दशमगुणस्मानातिनापारि भाति । पपाम्पात तूपपावसापस्प भीमापापस्प नवरा बाप र गुणस्पान बतमामस्प भवति । पपा मगपशिएम्पावे यन प्रवरेण पापित कये पारम्पातमापापस्य पारिफ मिस्पेयमारम्पातम् । १५८ नाबारपरका ।

काप २२८ २२९] प्रतमविप्रकरणम् इत्येतत् पश्चविध चारित्र मोक्षसाधन प्रवरम् । अनेकानुयोगनयप्रमाणमार्गे समनुगम्यम् ।। २२९ ॥ टीका-पभाविध सामापिकादियमास्यातपयन्तमएवियफमरयरिक्तीकरणापरिभम् । मोमसापमं सम्पगबानपूपर्क क्रियानुष्ठानम् । प्रवर प्रधानम् । मनेकानुयोगदारमार्गेण मनेकेन चमयमार्गेम मंगमाविना तया प्रमाणमार्गेण प्रत्यक्षपरोक्षगोचरेम । समनुगम्प समपिगमे पमिस्पया । २२९॥ मय–पहा सामापिक, इसरा देशेपस्यापना, तीसरा परहनिमुदि, पौषा सूक्ष्मसम्पराप पोर पाँचयों यथाम्यात ये चारित्रके पाँच भइ। यह पारिप मोपका प्रधान कारण है। बनेक अनुमोगमरोंसे नोस मोर प्रमाणोंसे उसे अच्छी तर गामना चाहिए। मावाप-नाग और देपस रहित परिमामको सम करते है उसकी प्राप्तिको 'समाप करते है।' समाप वर्षात् साम्पमावकी प्राप्ति ही बिसका प्रयोपन है, उसे सामायिक रते हैं। पासे पोर मन्तिम तीर्थकरको सामापिकधारित्र कुछ समय तक पता और मप्यक सीपैदरोंके जीवनपर्यन्त पता है। पर्यापन और पाक उतर पर्यायके पारण कानको दोपस्थापना करते है। यह पारित्र पारेका वसिम करके टीपमें ही होता है। वामय यह दीशा धारण करते समय सामायिकपम0 पारण किया गया है। पाइमें उसमें दूपण गनेपर छेदोपस्थापनपारित्र पारण करमा होता है। पर पम पहरे मोर वन्तिम तीनों के समपर्ने ही गत है। बस उनके टीमें पानों पारियोंकी प्राधि पाती। विन्तु मध्यके पाईस तीफ्कोंके में सामायिक रूपण गनेका प्रसङ्ग उपस्थित नहीं होता । र उनके टीम चार ही सपोंको प्रति यती है। बाबामाके सिमा उप बाहार मी माग कर इनेसे बरमा यो विशुदि उत्पन होती है उसे परिहारनियुरिचारित करते है। नौ पूर्वको तीसरी भाचार पस्नुके पाठी मी साधु गछसे निकास पारिवारिक कम्पमें लित होते और प्रोम, शिशिर तथा वर्षा ऋतुम एकसे कर पाधतक उपवास करते हैं। बर्मात् प्रोप्म प्रतुमें रमम्पसे एक, मप्पम दो बार ठप टीम उपवास, शिशिर में चपम्पसे रो, मप्पम धन और वकपसे पार सपास तथा वर्षा ऋतु समापसे तीन, मप्पमसे बार बोर उस्करसे पाँच उरवास करते है। पारणाकम वाचाम्प मोचन करते है। सम्परायफपायको फरसे है । जिसके सम्म मेमकयाप बाकी पगढी ६ उस दम गुमत्तानमा गीबके इस्मसम्परापचार होता है । ग्यायों और पहा गुणस्थान उपशात अयाप मोर सीपकपाप मुनि पचास्यात बारित होता है। मगवान्ने रिस प्रघरसे का सी प्रकारसे पूर्ण पारित्रको पपासाठबारित्र प्रते हैं। यह बात सपाके रोना है। इस प्रकार चारित्रके पोचपा चारित्र पाठ प्रारक को समहको म सम्वा, म मोभी १-अनुरोप-4.1 म ११ - रापचम्बनसासमाठापाम् [पचापोऽपिचर, पारिवम् प्रति प्रधान कारण है। अनेक बनुयोगोंसे, भोक मोसे तपा प्रत्यक्ष परोष प्रम्पमोंसे इस पारिको बडी तय नाममा पाहिए ॥ २२८ २२९ । सम्पमर्शन सम्पमान सम्पचारि कि समुश्विमेव सामनमाहोधित कमपीत्पाशपाह- सम्पादन सम्पबान और सम्पचारित्र हीनों मिकर ही मोधके सापन पप एक एक सामनरे! या मासा करते है- सम्पक्त्वन्नानचारिनसम्पद साधनानि मोक्षस्य । तास्वेकतरा भावेऽपि मोक्षमार्गोऽप्यसिद्धिकरः ॥ २३०॥ टीका-समुदितमेव भिवयमावळ मोमसापनम् । एकसरामाऽप्पसायनमिति । पता सम्पासाविसम्पदाः । परस्परापेमा पप माझे सापयन्ति विपळाग्यपदेशपरे । एकतरामाय तु सापनामाषा, म मोस सापपम्तीत्पप ॥ २५ ॥ मर्ष-सम्पपर्यन सम्यवान और सम्पचारित्रहपी सम्पदा मोचका साधन है। उनमेंसे एक मी वमाबमें मोपमा सिरि नही होती। मावार्य-पे तीनों मिम्री मोक्ष सापन। एकके मोबमासमें मोबके सामन महीने सके। जिस प्रकार हर मोरा और बाभमके मासे 0 विफग मामक बोपन बार होती वमा पर रोगोंका ठग्म्म करती है। उसी प्रकार ये टीमों ही परस्परमें एक सरेको फेला रखकर ही मोक्षका सावन करते हैं। इससे परि एक मी न हो वो ससररूपी रोगोंसे मुछि मही मिक समी। पूर्वव्यसम्पद्यपि तेषां भजनीयमुत्तर भवति । पूर्वद्वयलाम पुनरुतरामे भवति सिद् ॥ २३१ ॥ टीका-सम्परगनसम्पगहानपो सतोरपि पारिपसम्पत् कापिर मपति, मा विति मगमीयमुत्तर पारिममिस्पर्य । पदा पुनभरण मम्मे ता पूर्णवसम्ममो नियमनेष । महि सम्पयनसम्पगानाम्पा पिना परपसमबअपूर्वस्वाचारिपस्म । तस्माचरपनमा विनामूते सम्परत्वसम्पगबाने २१ ॥ मर्य-उममेसे पा रो-सम्पादन और सम्मान होनेपर सी बारित मननीय है-कमी होत चार कमी नहीं होता। जिस पारित होनेपर पर दोनों-सम्पदर्शन और सम्पाद्वान मरी। १- समपन्न सामो तिम -पु. पुरे मालि। र समाचारपतम्। इलाममामानव विदुरप्रसा - कारिका २३०-२२१२१९३५] प्रशमरविप्रकरणम् मावाप-सम्पादसन धौर सम्पबानक प्राव होनपर मो किसीक चारित्र होता है वोर मिसीके महोबा। रिस प्रकार बर्ष गुमस्मानमें सम्पदर्शन और सम्यग्नानक होनेपर मी चामत्र महा होता कि छह बादि गुणस्थानोंमें होता है। परम्त जिसके पारित होता है, उसके सम्पग्दराम पौर सम्पमान नियमसे होते । क्योंकि उनके बिना चारित्र हो ही नहीं सकता । सम्पग्दर्शन और सम्पमानके होनेपर ही पालि होगा। बतः पारिवकी प्राप्ति उन दोनोंकी भविनामारी है। कर्ष पुनः सम्यक्त्वाविसाधनमाराम्पमविकममनुष्ठेपमित्पाद- सम्परसव बोरकर मारापान किस प्रकार करना चाहिए ! या मतगत धर्मावश्यक्योगेपु भावितात्मा प्रमादपरिवर्जी । सम्यक्त्वज्ञानचारित्राणामाराधको भवति ॥ २३२ ॥ टीका-पर्म बारिधे समाविक मावश्यषु । सानि पावश्पकानि प्रतिक्रमणारोपन साम्पापफ्स्युपेमणप्रमावननिगमप्रवेशादीन्यवश्यफरणीयानि वेषु । मावितात्मा माद समस्त पमावपयिारी सम्पत्पादिसामनामामाराम माप्ति परिसमापयिता मक्तीस्पया ॥ २३२ ॥ मर्ष :-क्षमा आदि मोम और बारम्पक्रियायाम याची दक्षा प्रमाद न कामेवाण वामा सम्पदर्शन सम्पमान वीर सम्पचारिका बाराषक होता है। मावाप-बोरस प्रकारके धयोंमें बौर प्रतिक्रमम बागेचन साप्पाप प्रत्युपेधष, प्रमान और मामा-भाना पर वायरक्ककिसानोंमें प्रा रमव्य हे या वाबस्य नहीं कराय सम्पादन बादिकी बासबना कर सकता है। आराधनाथ तेषां तिस्रस्तु जघन्यमध्यमोत्कृष्य । जन्मभिरष्टत्येके सिम्यन्त्याराधकास्तासाम् ।। २३३ ।। टीन-पा सम्पपत्पादीनामापपनास्तिनो प्रपम्पमप्पमोसमयविमरेन समवन्ति । सम बसम्पाटभिवम्मभिर्देषमनुप्पेपूजावस्प मगति. मरामिस्तेपी मरम्म पाति सिदि प्राप्मोतीस्पयः । मप्यमा स्वागपना बम्मप्रयेम मनुप्पगन्मपूर्षिका । समय स्वारापना पनेर मरेन मद्देम्पा इस मपति । एबमारामास्वान्यापचयतीति । २३॥ मप-उन सम्परत वगैरहकी उपश्य मप्पर और टारके मेदसे तीन प्रकार बारामना ।और उनके बारापक पाठ तीन और एक सम्ममें मोक्षको प्राप्त करते है। मावार्थ:-उनकी वापना म प्रकमकी होली -मान्य मध्यम और उमए । समय पापना के बारापक बीब माठ मानें मोधने प्रास करता है। मप्पम बारापमा तीन मबमें मोक्ष प्रा को बोर नहा माराक्नाके बाप की उसी मासे मोप-गम करते है।

पपपत्रानभासमानापाम् [पंचासो पनि तासामाराधनतत्परेण तेप्वेव भवति यतितव्यम् । यतिना तत्परजिनभक्त्युपग्रहसमाधिकरणेन ।। २३४ ॥ टोन-तासां सम्पक्तबानपारिपसम्पदाम् मारापनतत्परेण संप्रेर म्पक । तम् सम्पपत्यादिपु पतितम्मे भगति । पविना साधुना । तत्परमिनभात्पुपमासमाधिकरमेन तस्पर पति सत्यादिपरेण बिनभाना समुपतेन भगवतामहा पयाकाळ पवनगुमारीतनपरेप उपप्रडो भगविमरतिष्ठापापनादि । भयवा सानामुपप्रदो रसपासमक्तपानादि समाप्पु स्पादनेन प साधूनागपयति प्रयत्नमेष समिति ॥ २३ ॥ भर्प-यो साधु उन सप्पास्य पान को पारिश्री माराफ्नामें पर है। उन सम्पसमा रिमें बर सारो और विनमगवान्सी मति, उपप्र र समानिक रारा उनमें से प्रपन रमा पाहिए। भारापको साए सम्पयान और सम्पपा बारापमा पर है, उसे उगा बन करते हमा पावर और उस उसे सम्पमतादि परम्प सामुमोदी तप पोरकी मदन राति भोरर करनी चाहिए । निविष्ठा बरहका पान् फर and राना चाहिए। सासग करते रहना चाहिये, वय समामि सर मा पारिए | भायम यह सम्पयशान करा पा सको सम्पास, धान और पारियो भारी भी रासे बाराना बरसा पारिए। समय यत्ने प्रपचन सपति- RARसे उस पालन कर है- स्वगुणाभ्यासरतमते परवृत्तान्तान्धम्क्यधिरस्य । मदमनमोहमत्सररोपविषादेरघृप्यस्य ।। २३५ ॥ प्रशमाव्यानाधमुम्बाभिकाशिण मुस्थितस्य सदर्म । तस्प रिमपिम्प स्यात् सदेवमनुजेपि रोकेस्मिन् ॥ २३६ ॥ रोग-मगुण सम्पम्सगनापामपा सामुगुणासमभ्यास भास्पयन कप गता मनिपम्पामा मगुणाभ्यासरतमानि । म पसारते परसातायो परपरिनाम्या, मपति पाहापान गुणान सामगुणमा मम्पति पनवा म प परवापान गुपान पनि मनाम पा म्पन परगणरापारापमानान गरि रमयति । मा गर । मरन राम | मारा पायामपित्तम्प समपान हिपालमा भरारमामा पापभिनति । गम्मतनपनामापारमादिमि। मिनाधिपापसापादिता मा भिमारिभिरणप्पम्पाननिसम्म ५५ परिघ २३४ २२५-२१६-२१] प्रशमरविप्रकरणम् प्रशमसुलाभिकाभिम मम्पापापमोमसुखकामिणश्च । सदमे मुसोचप्सभने । मुस्पिवस्म निधक्स्प। सस्पैपरिषस्प सामोनोपमानं क्रियेत । मस्मिन् के सदेवमानुपे। मासस्पेन देखेप मानुपेषु पा प्रशमसुनतुल्प मुलम रत पर मोमसुखमिति ॥ २५ ॥ मर्प-विसकी मति अपने गुणों के बम्पासमें गी हुई ६ मो दूसरों की बामि भया, गंगा और मदिरा, जो गर्म काम, मोर सरे, रोष बोर नपादसे वमिस्त नही होत्य, यो प्रथम पुस मोर बापा (पित मोक्ष एसयुको और अपने धर्म परे, देव और मनुष्योंसे पुछ इस गेको उस पुष्पच उपमा किससे दी जा सकती। माराय-यो बपने सम्पमत्व हामोर पारिभोंके पाम्नमें सदा सरीन यता, इमों के रोपों अपना गुणोंको मही देखता, अपने ही गुर्योक बाराममें म्पम यता है दूसरों के दोपों वपना गुमोको मही करता है यदि दूसरा को काम हो वो सबर कान नहीं देता, गर्व, प्रम और मोर बादि के वशमें नहीं होता, कपडप्रतम पुरा मोर मोक्ष-पुरकी ममिगपा करता है और वपमे पर्म स्थिर रासा, ऐसे साधुको उपमा किससे दी गये। इस गोको ये दव और मनुम्प रहते हममें से कोई भी उसकी बराबरी नही कर सकता। -- मपिप और मी- स्वर्गमुखानि परोक्षाण्यत्यन्तपरोक्षमेव मोक्षसुखम् । प्रत्यक्षं प्रशमसुख न परवशं न व्ययप्राप्तम् ॥ २३७ ॥ टी-स्वर्गे मोसम पराम सम पस्मुख तदपमपि परोपमागमगम्पम् । मोक्ष सवमस्पन्तपरोसमेव । मस्पतमिति सुतरां परोक्षम् । स्वगसुखस्प फेरपिस्सेशेम सिंविदित उपमान स्पात, न तु मामलस्पेति । मसोऽस्पम्तपरोमम् । सपप्रमाणम्येष्ठेन प्रस्पमेण साम- पर्विना परिठियमाम प्रशमसुल मन परामीन स्वायत्तमेष । मापि प्यपप्राप्तम्। सामीनता । पतस्वयम्पेति न विगवि। पपित मुलं परम पिपयापीम निपपामा त म मरवीति ॥ २३७॥ मप-तके मुह परोठा और मोक्षका 8 वाव परोप। एक प्रश्नम-मुख प्रत्यक्षमा पराधीनोमोरमविनायी। मापाय-सर्ग मोर मोप- दोनों ही परोक्ष र का गाँगे पुराता है, यह मी परोही, उसे पासे शान सकते हैं। स्वर्गक सबका ये पोहान वापस भी हो सकती विही रिम राब है गर प्रार नो होठा मे मारले को मागसती . मी गम्य परमेर सम से रोष भवे ।। १ मिमो मखम शिम ने पिरले।

रापचन्द्रनमासमाठावाम् [पंपरसोभिकार, पारगम् पहॉपर मी पिकही पुराना मोशन मुसको मापात परोध है। उस पुरा हम ससारी बोधेबामास मी नहीं हो सकता । परन्तु प्रथम पुराका बनुमम तो हम अपनी वरमा हीर सकते हैं। पर मुडन को पराधीन है और म विनाधीक है। पिपिक-मुख नियमतः पराभेन । स्पोरियमयों की प्राप्ति होनेपर वो और पोंके गमावले मही होता। निर्जितमदमदनानां वाक्कायमनोविकाररहितानाम् । विनिवृत्तपराशानामिहेव मोझ मुविहितानाम् ।। २३८ ।। टी-पातमकामाना सस्पीभूतचेतसा शाम्ताना बागाविधिकारादितानाम् । पारिकारो सिपस्मानुवादि । कापविमरो' भावनालगनादि । मनोविकारोऽभिगोहामि मानेमादि । एमिमिवानाम् । विनिाचा परपिपया माचा पेपा ते पिमितपपसः । परस्मादि म्यं पनपाम्परबतारितु परस्तमिमामामोपबीविनः। सोऽपि पदिग्मते अपवनोकेन विपिना ततः सामु हामचारिमोपचारिताम् । न सम्पवे वेतन वाधवस्त्र निरैवेति । एवंविधानां यतीनी मिल मोमः । मोममुलमुपमानमुपमेयं प्रसमसुखामिति ॥a मर्प-पम कम्स और ममय विवरसेपेत गर्न बोर कामके बीतने परफी मात्रा परमेपासव विपिके पाक साबों पहा मोधरे। भाषा-दिनोंने गई और घमको गीत बिमा का विच सतबो सात पचमके किर-कठोरता बसवता सिफता गयर करके प्रकार-वीरमा फॉरना गवसे, और मम र-अमियोर बभिमान पिसे बोरगत, मासे प्रास होनेवाले मामान्य सोना चारी वकी रपमान भी राम करके गो फेस मिपासे प्राप्त होनेवाले मपानसे अपना जीवन नर्स बता मी परि सानिवि पिक अनुसार मिसावो को बम्पपा मो वडामको से परम लिएका काम मानकर उसमें दी सोप और बपने परिमामाको पुर एम ऐसे मुनीबरों ने इसी मेको मोप । वर्षात् प्रथम पुरानो मोप-पुरके ही तम्प समाना चामिए । शब्दादिविफ्यपरिणाममनित्य दुःखमेव व ज्ञात्वा । ज्ञात्वा च रागपात्मकानि दुःखानि ससारे ।। २३९ ॥ स्वशरीरेऽपि न रन्यति शनावपि न प्रदोपमुफ्याति । रोगजरामरणभयरल्यथितो य स नित्यमुखी ॥ २४० ॥ टी-मारयो विपया समस्परसगरमसस्तेिपा परिणाम पयनिता सामादि लिपपरिणामाच पस्सुम सदनिस्पम् । विपपसमिती मवति तपमा च म मात्पनिस्पम्। १-चि परमिर-4 पुस। -स्वेरिफ पुयोरेमपत्तलाम।

1 २१८-२१९२४०-२०१] प्रशमविपकरणम् पेप जमेवेद वैपपिक मुलं पाममपुरुपकसिसुसात् । इसमेवार्य सुखाभिमानोऽस साम् । पर पिनाप शास्वाप । रागदेपास्मन्ननि गरेपपरिपतिबावानि पगदेपानुषिदामि सामि संसारे करोतीवम् :२२९॥ निवारिऽपि न रम्पति एर्ग न करोति स्नेहमिस्पर्प । समावपिन पदो प्रदेर्प पेति। रोगो मरादि। बप क्योहानिः । प्राणमाशो मरणम् । मपमिहोत्रादि सप्तमभारम्। पि पदमायें । एमिम न म्पयितः सपतगिरपि न पापितः । पम्यो न मीतो पास स्पमेव मुखी निस्पसुतीति ।। २५.॥ मप-यो शब्द बादि लपयों के परिणामको ममिस्प और सहप बामकर सपा संसारके चोंचे पग बोर देपसे होनेवाले जानकर भरने शरीरमें मी एग महा करता और असे मी दूप सीकरता, रोग बुढापा पुस्यु और भपसे पारित यह मनुष्य सर्परा है। मागाई-गद, रूप रस गन्ध, और पर्म-पे पाँचों इन्द्रियों के अपय है। इनमें चोदा अपम अनि धुनि होती है, पही उनका परिमामा परिणाम पनिस्प। सोकियोमपप बाग सुखकर पनवे हैं का यही पापी माने गते हैं। इसीलिए उन विपर्योके समापसे गो एस होताप मी भनित्य , पयों के होनेपर होता है उनके गमाव नहीं होता । तपा मह पपिक वापास्तवमें दुलही।बिस प्रकार सापका रोनी बारके शुनगमे मानता है, उसी प्रकार पानी प्राणी निपप सेक्ममें सुबका बमिमान करते हैं। सपा पिर्योका बनुमान करनेसे यग बोर रेप नप उत्पन होते है ।बो पिप प्रिय गते, उनसे राग होता है गोर बो बपिप गते हैं उनसे प होता है। ये राग बोर उप 0 ससRके गुणों के मुकारण है। ऐसा बामकर गो वपने शरीरसे मो राग नहीं करता है और मधुसे मौ हेप नहीं करता है सपा यो रोग, पुरापा, पापु बार मपसे रखा महापरि मे उपसित मी हो जाय तोकिम नहीं होता, प मनुप्प सर्वदा सय सवार। धर्मध्यानाभिरतत्रिदण्डविरतत्रिगुमिगुप्तात्मा । सुखमास्ते निन्द्रो जितेन्द्रियपरीपहरूपाय ॥२४१॥ टी-पमावमपेतं पम्प म्पानमामाविषयावि, समाभिरतस्तस्परस्वम सक्त । मनोबारापाम्पारणमयादितः । ममागम मनोवालापम्पापाये वः । तिम्रो गुप्तयस्ता भिगुप्तात्मा । मौनी मिरवधमापी । पास (स्तन) पोत्सग प्रपचनोतपिपिना गामी पा पर्मप्पापी निसदाचरोदाम्यवसाय सुनमाम्ते निपपापमोपहियानुष्ठान अन् । निवन्दो निगतसस्नोपन एपकी नियो मा बितानीमियाणि बसे स्थापितानि । परीपहा सम्पद सामन्ते । पापापामुद्दयो निसर उदितो वा विकसीत । स एपिफ मुखमास्ते ॥ १ ॥ -मज पसमिई-प.ब.पुखम्।

३ पपचम्बनधास्त्रमालायाम् [पचदशोऽधिकार, बारिकम् मन-धर्मपानमें महीम, दीन रणोंसे विरफ, तीन गुप्ति से पुरधित, इन्द्रिय पपा मोर कसायका सा काम रवि सामु पुर्णक या है। मावाप-वर्मयुद्धपानको धर्मप्मान पते को उसमें गा रहता है मन बरन मोर कायके वागमस्यि म्मापारने दगा करते, गोइन क्षणों का पानी टीम गुलियोन पान करस्य वर्षात् सा मौन पारम करता, विक्षेप वापता परनेपर परि मोम्दे तो रिस-मिस्त मान ही दोस्तार काफम्यापार न करता, वागममें की गई विभिक अनुसार केला धर्मका ही चिन्तन करता है, बाबोर र प्यानो कमी मी मनोनही मावा गई प्रगमोंसे दूर पवामियों को अपने काम रमता, परीपोंको मन्त्री कासे सहता, कसायोके वापको पा बेरोक देता है या उसे म्पप देता है ऐसा साधु सन्चे पुसको मोगता है। विषयसुखनिरभिलाप प्रशमगुणगणाभ्यलक्त साधु । द्योतयति यया सर्वाण्यादित्य सर्वतेजांसि ।। २४२ ॥ टीका-आम्दादिमिते पिपपसुन निर्गतामिलापो मिमवेष प्रशमगृपा पे साम्या मसम्वोपावपस्तेपी गका समूहस्तेमागतो विभूषित । साधुमासर प । पोतपति ममि मावि तारकाविधमा स्प्रभपा तिपेमाम्म स्पोष एष प्रयापति समावि पाणि वेवास्पमिमक्वीस्पमः । तदन् सापुरकामपुक सर्वरोगांति देवमनुम्पादीनामभिभूग प्रसवे सबसति ॥ २॥२॥ मर्प-रिप-मुखी बमिपासे रहित और असम गुणों के समासे मुसोमित साध सूर्पक समान समरोको बमिमूत करके प्रकाशमान होता है। मावार्य-सद बारिसे उत्तम होनेगा विपप-मुन्नी मिसे चाह नहीं कर समन्येप दमा प्रथम्पुमोके समासे बो विभूपित र साधु सूर्यके समान चमकवाचिस प्रकार सूर्प अपनी प्रमासे मरों मारकी प्रमाचे अभिभूत करके अपने सिरे प्रकासित करा ससी प्रकार उतर गुणोंसे बुध साधु समी रेस और मनुमोंधे पमित कर बपने गुणोंसे तप ही प्रथापित होता है। सम्यग्दृष्टिोनी विरतितपोवलयुतोऽप्पनुपशान्त । स न लमते गुणं यत् प्रशमसुखमुपाश्रितो लभते ॥ २४३ ।। टीप-सम्पपपनसम्पः सम्बबालसम्पप । विरक्षितपोपटपुतोऽपि विस्व म्झौतरगुणेन पुतोऽपि तपोक्छेन र सम्पः । मनुपशाच क्रोपारिकमायोरपसाम्पमतमः । व गुपन भते सापोदये पवमानः । ५ गुर्व प्रप्समगुपमाभिक पाप्माति । प्रामस्पसहि माग्यर्षिता पर गुणाः । तस्मादृपयाम्तमापेण मक्तिम्पमिति ॥ २४ ॥ -प्ररिही।

११ ९ । - तपसा कारका २९२२५२-२१४ २४५ ] प्रशमरविप्रकरणम् भए सम्परालो, 'सम्पावामी वोर मत तवा ठपके बम्से सुरू होत हुए भी यो उपशान्त महाँ, ह उस गुणको प्राप्त नहीं कर सकता, विस गुणको प्रक्षम मुधर्मे स्थित साध प्राप्त करता है। भावाप-सम्पादर्सन, सम्पराग, सम्यक्षारिन मोर तपोक्से सम्पम होते पुए मी निस मापुकी मोपारिपाय साम्त नहोस साथ उस गुणको प्राप्त नहीं कर सकता नो गन प्रसम, मायाले साधुको प्राप्त रहता है। प्रथम, स्फ्ति साधुक गुप्प पहले बदला पाये हैं। बता पार्योको सात करमा पालिए। सपा सीगङ्गानामविकतामामेपविन एक निप्पादको भवतीति वशपति- प्रथम गुणवाग साधु ही शीफे सम्पूर्म गोंकी साधना करता है पर ममत है- सम्यग्दृष्टिोनी विरतितपोध्यानभावनायोगे । शीलासहस्राष्टादशकमयलेन साधयति ॥ २४४ ॥ टीका-सम्पदनसम्पगामसम्पनो' विरत्या सोप्तरगुणसम्पया । पानानादिना । पानेन च धर्मादिना । भाग्नाभिश्वानित्पादिकाभियोग प्रशस्तमनो पाकापम्पापा । शीमगसहस्रामामशवशफमष्टादशाहोरमसहस्राणीस्पयः । मपलना पासेन कीउपेव । सामपति सीकरोतीति । मर्प-सम्पररी वीर नानी प्रत, तप पान, भावना और पोगके शाप धीबके वठारह गरपको स्मिा यलकेही सापन है। -यो सम्पादन और सम्पदामसे पुछ रे। मम्गुण मोर उत्तरगुपए मत, बाराम बगेर तप प्रमादि ध्यान बनिहादि भावमा, बोर मन, वचन, कापके प्रशस्त म्पापारक परा सौम्मेबठापागार मेदोको बिना किसी परभो धारण कर म्वा है। कानि पुनस्तानि महादशाशीमसहस्राणीति न पोपायेनाभिगम्पानीस्याह- शीतके कठायागर बों और उनकी उत्पत्ति के उपाय बताते है- धर्माजम्यादीन्द्रियसनाभ्य करणतम योगाच । शीलाइसहस्राणामष्टादशकस्प निप्पत्ति ॥ २४५ ॥ टी-भमाविवशम्भपने पम प्रपमर्पता रपमीयः । तम्या मप्पमो दितीपपत्ती भूम्पमवेशोषागुनसतिदीस्त्रियमीन्त्रिपचतुःपशेम्बिया मसीपकायच विम्यसनीयः । सम्पा मप्यपस्वायती श्रोप्रपभुप्रापरसमस्पशनानि प्रेमपानि । तस्या भप्पपश्चनुर्थपती माहार भयपरिणामधुनसंवा पनीयाः । पचमनायम्सम्या न करोति म कारयति म पन्तमम मावाप- १-समसिममो बिना।

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फारिका २१६२१०] "प्रशमरतिप्रकरणम् और काप बमी बासी हैं। बता उनके मी मय हमार मद होते हैं। इस प्रकार तीनों निगकर श्रीम्के बाहनार मेद बनते हैं। शीलार्णवस्य पार गत्वा संविमसुगमपारस्य । धर्मपानमुपगतो वैराग्य प्राप्नुयायोग्यम ॥ २४६ ॥ टीपा-पीळ मूळोत्तरगुणाः । शीचममय इस पुस्तताब् ममेप्रतिक्षपनिनापावा । पार गत्वा सम्पूर्णमपाप्य । कप पुन फेन वा पार गम्पते । सैषियसुगमपारस्पति-संगिमा सुसारमारम मुखनैव सम्मशीलपापिणो' मपन्ति । सम्मा प सम्पूपशी पमध्यान प्रामाः । पैराग्र्प माप्नुयापोम्पमिति । तत्काळापस्पापामुचितं प्रापयग्पमित्यर्फ ॥ २४ ॥ मर्प-ससारसे मपमीत साबुप्रोफे शरा सरसासे पार करने के पोम्प, सीमापी समरके पारको प्राप्त करके जो पर्मप्पाममें तत्पर होते है, उन्हें पोग्य रायकी प्राप्ति होती है। मावाप-पाधीक समुद्रके समान है। गिस प्रकार समुहका पार पाना कठिन होता और उसके बदर भनेक महमूस्य रण भरे होते हैं, उसी प्रकार सीके मेर-प्रमेय पार पानामा यो चोर उसके मदर मी वनेक गुण-रान मरे हुए हैं। गो साबुन संसारसे मपमौत इस भीम-सामरको समतासे पार कर सकते है । बता उसे पार के लिए ससरमौर होना चाहिए। पौर बो उसे पर करके वर्षात् शीतके असरह हजार मेदोंको पारम करके धर्मपानमें अपने मनको ब्यबरे, उसे उस अास्था योग्य BE राग्यकी प्राप्ति होती है। यही उसका प्रा। वाप पमपाल चतुर्मेरमापसाप मार- पप्पानके बार मेद करते है- आवाविषयमपायविचय च स म्यानयोगमुपसृत्य । तस्माद्विपाकविचयमुपयाति सस्थान विचय च ॥ २४७॥ टी-मावारिषयमपापविषय विपाविषय संस्पानविष । स सस पर अपरं पमपान पीडाणपारगामी । माषम्यामपमुपाभित्र सम्पाप्प ववस्वीपं सिपा त्रिपमुपयाति । स्तरीय संस्थानाविषयमम्मेति ॥ २७ ॥ मर्प-पी-समुहका पारगामी साधु बापाविचय और सपायनिय नामो प्यानयोगको सस करके Aपाकविषय बोर संवानमिष मारके धर्मप्यानों को प्राप्त करता है। मापाप-पर्मप्याम भार मद-बादिषय, पापीष, मिपाकविषय और सस्थान, पपपनसासमामयाम् [प्रेयसोऽकर, सानि भानुमोदपति, पतप साप्पम् । स्वाप्पम पाठपंछी मनसा बापा प्रयेनेति पिएपनी पम् । वम मिस्त्यामयने स्पारणम् । समयाबिट प्रमीकापसमारम्म संवत्रीपम्बिमदारा माहारसवापि पुको मकरोति मनसा । एक पप्णीकापमपरिस्पनन् बरा विमान् छमते । परमप्यापसमारम्भाविपपिपरा पा विक्रमा सम्पम्ते । तेरस पराका पवम् । एतपत मामेम्पिम्मुखता सम्पम् । पप सुपरिमिरपि शतं सत उम्पते। मातामि प शतानि । एतापावरसंहाममुशता भन्मानि। तपा मवर्मपुमपरिणासंचाविमिरपि प्रस्पेय पथ पर प्रतानि म्यते । बात सासदपम् । एतत् सासवर्ष नपरोमीस्पमुखता सम्पम् । एषमिव सम्बामपि देसाले समे। तब पट् सामावि बातानि । एतानि च मनसा सम्मानि । पाचापि पट् सामाणि । प्रमेनापि पोग सासामीति । एषमेपा सीगङ्गाना साकारणा नामयबससामापि निम्माफ्ते ॥ २५५ । मर्प-कर्म, पप्पकाव पर इन्द्रियाँ संत्रा, इत, कारित, अनुमोदमा, मोर मन, वचन मायके केसे पीडकबगार भोकी पति रोती है। 7, माषा-पाय पदिमें धमा बादि इस मोको रपमा पाहिए। उसके नीचे एसरी पलिमें यूपी, बस, बामि, यम, नस्पति, परिवप, दमिय, पौत्रिय पवेत्रिय और भगीयकापको रसमा पाहिए। उसके नीचे बसा पलिमें भोग चा प्राम, रसना बोर स्पर्धन इन्द्रियों को बरा बाधिए । उसके बीच पीपी पदिय बाहर, मप, मधुन और परिमासाको रखना चाहिए। उसके माय पानी पति म करता , बाताबरन मौको परखामा देकर उसको बनुमोदना परवा'- इम मा स्थापना मी पाहिए । उसके पीचे टी परिमें मन मोर कम्पको सना चाहिए । इमो मगर मेदोध उबरण इस प्रकार करना चाहिए-पमा धर्मसे बुण पप्पीछपके बारमको मोत्रिपके कारोबार करके बाहारसबासे रवित मनसे महावस प्रकार प्रयास मोर उसके मोष सब कपोको वसों भोंडे साप मामेसे दस मेद होते हैं। इसी प्रकार उमाप, अनिखाप पोय दूसरी पडिक रसों कम्पों के दस इस मेद भान ने चाहिए | समर मेराए। इन सो मेदोंमें मोमिप सम्मिसि ।पोंकि पापके परम पमेपर मी मीबके सब रिप प्रपेको साब पोंके में रहते हैं। पर मोन्धिपके स्थानों पद्रिय खसे उसले मी इस प्रकार सो भर होते है। इसी प्रकार ऐप इथियोंक मी गारने पाहिए। इस प्रकार पायोनियोंके पाँचसो मेर होते हैं। इन पाचसौ मेदों से प्रत्येक साल माहारसा म्गी कि धर्म, कम गानि परिवर्तन होने पर भी नमी संवा मारक परिक्तन महीमा । म मासरसंवा कोवा मप, मैमुन और परिमासाने मी पाँचसी पापसी मेदए । स लिमकर दो बार मेराए। इम रोग मेरम प्रस्पेसके साप महाग रिकस भ्याबमोटिवमी खासे नाNA REपोम परिवर्तन नाप रोकोमोरो रोहगार मर होते हैं। बीना मिगलबलर मेहरोते हैं इन महसR भेदों से प्रापसके साथ मन सम्मिसिचा -- कारका १६२१.] प्रशमतिप्रकरणम् १७१ और काप वमी बाकी हैं। बता उनके मी जामाबर मर होते है। इस प्रकार कीनोंके निमन्त्र श्रीम्के बटयारागार मेद बनते हैं। शीलार्णवस्य पार गत्वा संविमसुगमपारस्य । धर्मध्यानमुपगतो वैराग्य प्राप्नुयायोग्यम् ॥ २४६ ॥ टीकाशी मूसोत्तरगुणाः । श्रीसमर्पक इस दुरुसरस्वा ममेचविशपमिनापावा। पारं गत्वा सम्पूणमपाप्प । कर्य पुम न पा पार गम्पते । संविममुगमपारस्पति-संविमा संसारमारप सुनेनैव सनाधीठपापिणो' मपन्ति । छाप्या च सम्पूर्णशील ममध्यानं प्रातः । पैराग्यं प्राप्नुपायोग्यमिति । सकाळापम्यापामुषितं प्रवराग्पमित्यय । २१ ॥ मर्प-सारसे मयमीत सापुरनों पप समासे पार करने योम्प सीवरुपी समुद्रके पारको प्राप्त के यो धर्मप्पानमें पर होते है, उमें योग्य यापकी प्राशि होती है। भाषाप-पाशील समुद्र के समान है। विस प्रकार समुद्रच पार पाना कठिन होगी पौर उसके पर बनेकपामाप ल मरे होते हैं, उसी प्रकार घीउ मेद-प्रमोध पार पाना मी कठिन है और उसके गदर भी बनेक गुण-रान मरे पर हैं। यो साधुगम ससारसे मपमीत रस सौ-सागरको साम्पसे पार कर सकते हैं । वहा उसे पार कामके दिए संसदमीक होना चाहिए। मोर गे उसे पार करके वर्षात् भीमके वघरह हगार मेदोको पारम करके पप्पानमें अपने मनको मगधरे से उस पापाके योग्य नकर रपट प्राप्ति होती है। यही उसका फो। वप पर्मभ्यान चतुर्भेवमाचसाप मार- धर्मपानकेपार मेद प्रवे- आनाविचयमपायविचय च स प्यानयोगमुपसृत्य । तस्माद्विपाकविचयमुपयाति सस्थानविचय च ॥ २४७ ॥ यौन-मामापिपपमपापविषय विपाविपर्य सस्पानविपर्प । सब पर प्रकार पमप्पानं शीवाणापारगामी । भापम्पामध्यमुपामिस्प सम्पाप्प ववस्वताप सिपा विपयमुपपाति । मतपय संस्पानविषयमम्पेति ॥ २७ ॥ मप-धी-समुद्रच पारगाो साधु बाबाविषप मोर नपापरिचय नामके पानोगको का के पास मोर सस्पाननिषप मामले पर्मप्पानों प्राय काय है। भावाप-पप्पा पार मद-भावाविषय, पापरिषद, पर सत्तर. सम्मपरियो-म-.-सोमारा।

૨૭૨ । - रापचवर्जनशानमाम्याम् [सम्वोऽपिकाय, म्यानानि विषय गो ग्रेम-समुरक पारको प्राप्त र तारे ग इन चारों पानौमसे पार मार दूसरे प्यानको प्राप्त करके तार और बोरे धर्मप्पानको प्राप्त करता है। तभावाविचापापापविषययो सम्पनिरूपनाया- आप्तवचनं प्रवचन चाज्ञाविचयस्तदर्यनिर्णयनम् । आसवविक्यागौरवपरीपहायेष्वपायस्तु ॥ २४८ ॥ टीका-माता पीणापरागदेपमोहस्तस्प पर्न प्राचनमसीकादिर्शकादिरहित दावशाङ्गमागमा । तस्या सत्ताबापा सर्पाचापा विपपो गरेपर्ष गुणपत्वेन निपित्वेन मावस्पार्षमापनस्म निनपन मिनिमम । समानपानिपेकरसत्वावमुक्तम् । म कमि दोपोऽस्तीति । मातापिपयोऽम्पासा पमार्पविषय । मानक प्रापवाग्मनासि । विरुपा स्रीमतपरिबमपरविपपाः | गौरवमदिसातरसारर्य मिपा । परीपहर मुत्पिपासापक । मादिप्रामाप्तितमसमिति । एतेषु वर्तमानस मम्तोरपापाव नारविपक्सवेष. मानुपमम्मसु प्रायेण प्रत्पपापा समरम्ति भूपास इति पचाउँन निरुपितमपापविषयम् Real मर्य-बायके मचनको प्रचम पाते हैं। उसके अर्पक मिकपन करमा,, बापाविषय मामक धर्मप्पाम है। और बाहर निकला, गौरण, परीपा पगैरहमें बनर्पक विम्बन करना पापरिचय नामसर्मप्पालो। मावाप-किसके समस्त राग रेप और मोहीम होमपे , उसे बात करते है और उसनको प्रवचन प्रतवर्षात् असापय और शबानोपोसे रत सरगमागमको प्रपन पर है। उसकेका वर्णय मातापिचप मामा धर्मप्पान है। सपा प्रपचमके रूप सपरेको यो बाहारी उसकी गुमणारिता और निर्यापवाघ AIR करना बापाविषम । साक्ष पराग गामी वर्ष सम्पास करमचे बानिय करती। मन बचन बोर कम्पक म्पापार को वापर करते है। मोम को रेसकी बाते करमा कि ऐसर्प पुस मोर रसको गौरव करते हैं। भर-प्पास बारिप बापाको परीपा प्रते ।बा परसे गुठि और सविस अमार ना पीए । यो नीव हममें परखो। उसे लेकर उठने परमरकर्पत मनुप बोर रेणानिने उसे प्रायः एक यात दुप मोगमा परता है। इस प्रकार मामय मादिकी मुखोप पिम्तन सना-पायरियपधर्मप्यम है। वतीयपतुपभेदयोनिस्पपायाह- हमारे और चौरे प्रेरणा सहप प्रवे- सातामा । भारतमामकार- । - 7 - .

5 भरिमा १८२१९२९ ] प्रशमरतिप्रफरणम् - अशुभशुभकर्मपाकानुचिन्तनायां विपाकविचय स्यात् । द्रव्यक्षेत्राकृत्यनुगमन सस्थानविचयस्तु ॥ २४९ ॥ टीका-मणुमं शुमं च कर्म योकोऽयो (टयो) बतवे तम्प पाको विपाकोऽनुभयो रस स्पपा । तस्यानुचितम प्रयोगममशुमा कमाशानामय विपाक सुभाना पायमिति । संसारमाबा बागानां तदम्वेपमं विपाकविषय' । उम्मक्षेत्रास्पमुगमवान् पो दम्पमपमय सी गेकपरिणामी यो सस्यानं गोत्रकायस्पैम । तप्रायोमुखमल्सका इत्पादायुधम् । सम्पम्पमनेकाकारमपित्तमहास्कम्पश्प सवलोकाघर । बीवोऽप्यनेकाकारा शरीराविमेदेम पाययोकाकारः समुशातफाले । फाळोऽपि पवा क्रिपामामं बम्पपयायस्ता ब्रम्पकार पक्ष । पदा तुम्मतन्न पातम्य तवकसमपाश्चततीपदीपसमुत्राकतिरित्पेकसप्पानविषय | RI मर्य-बधुम बौर घुम कोके रसमा मिबार करना-पाकविभप नामके धर्मप्पानका बर्ष और दम्प ठया क्षेत्रके मारा चिन्तन करना सत्तानविषय नामका धर्मप्पान है। मावार्य-कर्म दो प्रकारक है-एक गुम वोर दूसरा बमुम । दोनों ही प्रफलक काँक वनुमका विचार करना कि बाम कर्मोका पा प्रम होता है और पुम कर्मोका यह फल होता है इसे विपाकरिचय करते हैं। बीच, पुस, धर्म, धर्म, भाषा वोर का ये मरम्प । गेरू, मप्पोक पोरबभोगेक-ये तीन क्षेत्र है। इनके बाकारका बिम्न काना संस्थानविषय है। जैसे वर्ष और गर्म दम्प कके बराबर है। उनका संस्पान ढोकाकारके ही समान है।णेकका बाकार पारेखा भाप है। पुरबदम्पके बनेक बाकार हैं। बचेतन महाकम्प सम्पूर्व लोकके यार है। सीव मी सरीर पाकि मेसे अनेक बाबरवान केवी समुद्नातके समप मागेको साकार हो जाता है। कागदम्प भी स इम्पकी पर्यापरूपसे या पायी तो दम्पके ही बाकार होता है और सब साइम्परूपसे या परेवो वाई दीप पौरो समुत्रपती एक समपरूप है । इस प्रकारका विचार सस्पानविषय है। सम्पति पारम्पपेण पमप्पामस्य विपिएफरदशमापाह- वा परम्परासे धर्मप्यानच विशेप फक्तग- जिनवरवचनगुणगण स चिन्तयतो वधायपायाभ । कर्मविपाका विविधान् सस्थानविधीननेकांभ ।। २५० ।। टीका-बिमामा परास्तीपकरास्तेपी पवन तस्य गुणा भरिसम्वादयस्तेपी गण, समास्तम्। सपिम्सयतासम्पगारोपपत भावागुणान् । वपापपायाम वितीयमेत निम्तपतो वघवन्यनाभियोगासमापिप्रमृतीन । नृतीयभेदेनप कमणो विपाश्यन् विविधान् मुमानगुमाया बापमेये सस्पानविपीन् सम्पानपरान् बहूनिति । २५ ॥ भासी समन परिपुर मे संपापा । रमपरेनुप फ । ३- गुणा मारमा नाम् इति पर्यन्त. पाम नास्ति-फ र पुखम्।

पपषमनशासमामपाम् [वासोरिया पर विभक्तीस्वार- नित्योविमस्पेव क्षमाप्रधानस्य निरभिमानस्य । धुतमायाकलिमलनिर्मलस्य जितसर्वतृष्णस्य ॥ २५१ ॥ टीका-निस्पमित्पानिंगमुदिनो मीता सतारात् । पपमळेन प्रकारेण । समाममानस समाम्यवादमस्प तत्यपानत्वम् । निर्गताभिमानम्प गररित्स्वेति । पुतमापाटिमानि मठस्प युवा रिसिप्तो मषिष कपिमा मर्प पाप तथपपत्र वितम्य (सप) सोमपा पस्प ।। २५१ ।। तुल्यारण्यकुलाकुलविवियन्धुजनशत्रुवर्गस्य । समवासीचन्दनकल्पनमदेहादिदेहस्य ॥ २५२ ॥ टीकातुस्पमरण्यं मलम बापर साफ सारमपम्पगलात् । गारगरण्य तारग बनाइसमपि । विविकाशमयापुरगस्प मन्पुमनः स्वबनमेष समुप! रिपुसमास्ती विपिको पस्प पृषामूवारमना सकासात् । पपा बम्पुरगस्तपा शपुनर्गः, मच्चोम्प पपपपुषगः समुपर्गप पिवित, तम स्मारित्तहति । पा समवर्गस्तमा पानुपर्गोऽपीति । तया समस्त स्पोपो पास्पा वस्नोति बम बादनादिनोपसिम्पति । प्रसन मनम् प्रो उपडेपने पाला- बीमः । ता समवासी पम्पमापनमोको (हारिर्पस्पैविपाशा) पस्म स पषमुक्तः ॥ २५२ ॥ आत्मारामस्य सत समतृणमणिमुक्तलोएकनकस्य । स्वाम्पायप्पानपरायणस्य दृढमप्रमत्तस्य ।। २५३॥ टीका-मात्मम्पेमारमति प्रीति रोति सचर्य एष म्पापिष, न पनि मम्ति पप्मादि । सम सप धर्मादि मपपप पचरागारक गोष्ठं मनच मुक्त पेन नामिपिवम् पमा मेष्ठ सपिग्मे मामिरम्पते एवं नामपि । एतयुक्त मावि, सपिगस्तृप्पास्पई तथा कनकमपि पस्प समुत्तमोकामना । मुच्छ परिस्पतम् । स्साम्पापो पापनादिपाय। पान पादितत्पराममस्तवपास्तदुपयोगः । दाई छ । ममममस्प सम्पमापरि पारिक ॥२५॥ अध्ययसारविशुद्ध प्रमत्तयो विशुद्धपमानस्य । चारित्रशुशिमग्यामवाप्य लेश्याविशुदि च ।। २५४ ।। -बावस्यामाप्रमा--फ पुर। + पनि २०१२५२ २९३ २९१ २५६] प्रशमतिप्रकरणम् टीका-मम्परसापपिादिमनःपरिणामस्प निमरता । तस्याभाध्यपसायविश्व वावा । प्रमत्तयोगैपिचयपमानस्प प्रमत्तस्य ये म्यापारा ममोबापायविपयास्तविशोपमशी- स्प विशुदपमानस्पेति । ततमपरिप्रधुदिममा प्रपानभूतामपाप्य रेस्पाविशुदिप बसी पपनुक्रमेश्यामामम्पतमश्याया' प्रहयो विशुदि समाप्पेति ॥ २५४ ।। पता सपा पूर्वाला संप्रत्युत्तरपियामिसायमार- तस्यापूर्व करणमथ घातिकर्मक्षयेकदेशोत्यम् । शुदिप्रवेकविभववदुपजात जातभद्रस्य ।। २५५ ॥ टीका-पदेतयुक्तमेतदम्तेऽपूर्वकरणमुपबातमप्राप्तपूर्व पातिकमर्माणि पानावरपानाम रममोहनीपान्तरापास्मानि तेपामेवेशभया । पस्पपित् समय । तस्माइस्तमाविमूतम् । मुदिमका मुदिपकराम्तेपी विभक प्रानुप ते यम विपन्ते तम शुदिमवेशसिमपषत । मयंक साप मुचिपकायस्तस्पामबस्पायामुपापन्ते विपन्नमनरैप्रियाणिमादिका। बात म त्या- ममम्येति । वस्य बातमद्रस्य ।। २५५ । मप-बिनेन्द्र मनमान्के वचनमें दो गुन है उनके समान हिंसा वादि बनोका, का विपाक और बनेक प्रकारको माइतिर्योका AIR करनेवाठ ससारसे सर्पदरा मपमीत, प्रमाशीच गरहित, मापासपी कालिमाको पो सबमेसे निमम सब तप्पाों के बेता बन और नगरमें, मित्रर्म मोर शत्रुवर्गम समबुद्धि, शरीरको कसू से चीरनेमें मोर बम्हनसे मिस करनेमें समान, अपनी मात्मामें ही रमते हुए, तृम और मणिको समान समाहनेवाले गेष्ठकी तरह पुर्ण मी त्यागी, स्पाप्याप मोर प्यानमें तत्पर प्रमादसे विकु मिसि परिमार्यो के विमुख होनके कारण योगोंसे मधुर, प्रभान चारित्रकी बम्द बार रेश्यातीमुरको प्राप्ठ पाणमति, साधुके पातिकमरे क्षय एकदेशसे मत्तम होनेमण और मेक अनियों के मबसे युधपकरण मामय वाठों गुणस्पान प्राप्त होता है। मानाप-यो धर्मप्यानके पहरे मदमें वीर्षकों के वचनरूप अगम बाहिंसा मह जो कनक गुमर उनकाम करता है सरे भेदमें हिंसा बसमारि वादि जो पाप है उन चार करता है, तीसरे मदमें कोके नुमाधुम फाका AIR करता और वर्ष मेदमें बोकेको क्षेत्रके शोक मनेक माकाशे विचार करता है तथा इन वर्मप्पानोको करम को रात-दिन संसारसे रहा पता है दस पाक मधमाधमन पान करता है गर्षसे रपि । निसन मायापाररूपी महिमाको पो गणी बिसे गेम छमी नहीं गया है, यो मन मोर मनरमें, शत्रु और किनमें, बम्पन और सगके प्रहारोम सूप भी मभिमें तारे और सोनेमें समान माप रसता है। वर्षात् जिसके भए मासा नगर गे शत्रु मोर मिश्-दोनों ही बपनेस मिप गानर समान भाषसे देण्याउसके जरिये से परोसे चीरता है वो उसपर बरमका ठेप करवाए उम रापचन्द्रयनशास्त्रमाठायाम् [अपरयोऽभिकार, भपकोनी रोगों में ही रो समभाव रस्ता, पिसी में वासतिन और बहुमप ममि समान है, जो मिक रेकीमा सोने की भी नहीं करता गोबपनी बापामें ही की गाराम पदार्मासे गिसत्र सम्म महोते, साप्याप और प्पाममें उपर हारे, समस्त प्रमादचे पामें ना। फटकने दवा परिनामों के निर्म होनेके कारम निसके मम पचम और फापका म्पापार उरोल AR होता गाता जिसका चरित्र पुरी म्या Aमु पकापानम् सामु वर्गकरम नामक माठ गुमत्पामको प्राप्त करता है । इस गुषस्थानमें बर्ष गति को कमी प्राप्त नहीए-एस करम बर्षात् परणाम होत , इसलिए इसे अपूर्वकरण करते है। यह भारत पातिकमा एकरेषके पर होनेपर प्राप्त होता है। इसके प्राप्त होनेसे अनेक ऋमियों की प्राप्ति होती है। सारस पीरि- पर्मप्पानों को करमसे साभुको अनेक गुमोची प्रामि होमके साथ ही साथ उन गुषों की प्राप्ति होती है, वो गुम उसे पकिरण नामक माठमें गुणस्पानको प्राप्त कराने समर्प होवे ।।२९-१५१ १५२२५१ २१४२९५ सातर्दिरसेष्वगुरु सम्प्राप्य विभूतिमसुलभामन्ये । सक्त प्रशमरतिमुखे न मजति तस्यां मुनि सगम् ॥ २५६ ।। टीप-मात प्रो रसेप मगुमवादः । सम्माप्प विभूतिमायनगममादिकाम् । मम्पामुळमाममाताम् । ताररचारिसतोऽमिरवमसमरतिमुसे। न भवति न करोति । वस्या विभूती मुनि संग स्नई नापनीववि सम्मीप्पियः ॥ २५ ॥ मर्य -साव आदि मोर रसमें बार न रहनेवाम्म मुनि दूसरों को प्रासम हो सकनेग्री प्रारको प्राप्त करके पराम्पफे प्रेमसे सत्पम होनेवाले मुममें पास होता मा उस शीसे ममाल मही करता। मापाप-धर्मम्मायक करनेसे मुनिको ममेक इदयोंकी प्राप्ति होती है। किन्तु प मुनि सांसारिक मुह की और रसन्धियके सफ्पमें वारमात्र नही रस्ता और रात दिन मममम्म में ही निमम बताए । मत उम दुग्म शारों को पार भो उसे उमसे जरा मी मोह नही गरे। सर्ववपतिमापिना पतीनामदिमपति परमाविवावमास्यादिति एर्मयति- मुनियों को दो शमियाँ प्राप्त होती है यह सब शर्मियोंसे अस होती है, पर बताते है- या सर्वसुरवरदिविस्मयनीयापि सानगारद। नार्षति सहसभाग कोटि शतसहस्रगुमितामपि ॥ २५७ ॥ टी-सगपुराना से परा कसापिपतयात्रा सम्पया कम्पातीवामातेपामृदि- विभूतिया ता विस्मपरिणी मपति प्राणिमाम् । भवो पिस्मपनीपापि मढी सा विभूति ग्मगारई सापुमनतमूटनापति साषमागम् ! कोरिप्तवसामगणितापि सा मुग्गदि प्रामिषगुपिदापि नापति । सामधिनाप्पमगारन तुत्ववामतीत्व ॥ २७ ॥ - ७ कारिख २९६ २९७२५८ १५९] प्रश्नमतिपकरणम् मर्प-समस्त देवतावोंमें प्रधान बम्न बारिकी यो प्रति होती हवार्यकारी होती है। विन्तु यदि उस वायर्यकारिणी अमिको एक मस कोटिसे गुणा किया जाये तो मी यह परि मुनिको प्राप्त प्राधिके एक हार भागके बराबर मी मही होती। मापार्य-संसारके प्रामियोंकी रहिमें सौ वधिपति इनों पा सातीत मामिदोंकी बमूति बही वापर्यकारिणी होती है। उसे सुनकर उ मापर्य होता है। परन्तु मुनिजोको जो श्रया प्राप्त होती हैं उनके सामने से लिया एकाम तुम्हारे। तज्जयमवाप्य जितविघ्नरिपुभवशतसहस्रदुष्पापम् । चारित्रमथाख्यात सम्प्राप्तस्तीर्थकृत्तुल्पम् ॥ २५८ ॥ टीका-स्पा बयसमपस्तमबाप्य । वग्गय विभतेर मुपीकनम् । उपचानामपि मम्मीना सामयो न परिभोगान् विश्पते । बिता निपाता विममपाना रिपक मापाः कोपारयो मवयवसायमनमामिरपि दुष्पा पुम पारिप्रमपोरग्यात पयागपातमबारम्पात सम्प्राप्तस्तीमत्यम्, यया तीयकरस्तस्पान सपाऽसापपि मस्तीति विशिष्टेनोपमा कियते ॥ २५८॥ मर्य-विन करनेवाले कोपारि कमायोकत्र येता मुनि, उन दियोपर विजय प्राप्त करके गहों मोमें भी दर्तम पचामपातचारित्रको दीपकरके समान प्राप्त करता है। मावाप-बरोंके प्राप्त होनेपर भी साधुबन उमका उपमोग नही करते है। बता यो उपभोग न करना ही उनपर विजय प्राप्त करना है। तथा पवारूपावचारिकी प्राप्सिमें कोपार साप बाधक है। गे साधु उन कयायोको गीतकार प्राप्त अधिोपर भी विजय प्राप्त करता है, उसे टीमों के समान चारित्रकी प्राप्ति होती है। भत् िबिस प्रकार तीर पाल्पातबारको प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार मी पपासातबारबधे प्राप्त करता है। यह पायात चार गो मोम भगम। इसके बिना कोंके मी मोषकी प्राप्ति नहीं रो सकती । इसीसे उसका मइस मतगनके ए की उपमा दी। शुक्लप्यानाथद्वयमवाप्य कर्माप्टकप्रणेतारम् । ससारमूलयीजं मूलादुन्मूलयति मोहम् ॥ २५९ ॥ 1- मोहमीस किलोमात पाच मारमसम्यवस्थामा मापारिमिता स्पयो। पूमचारिमामानिमियमा मा पारोमोसमाम्मामिलामम् । मन लाभिषोपमोलोसिमान्तरमाविमती पालिका सम्परामायोSATANTRA मार मा परिमातोपमः सो समाचार समापारिकमाविया -भARA- चरित्र मप्यास १८ मे पाता

पिपम्वनधाममाठायाम्
[ मोऽभित्र, धपकमी
टीप-मरम्पानस्पायदपमबाप्प प्रभावितकसविचारमेस्सवितामपिचार ।
किरोति । मोहमुम्मनपति । फी मोहम् । मारपम्म प्रणेतारं नायकम् । संसारतरोमूल-
माप प्रपमैं बीजम् । समूगडा पस्पुम्मस्पतीति । २५९ ॥
भय-मालको शुटप्पानोको प्राप्त करके वालों समोरेनापक, संसारमा मोहनीय
को जबसे प्रसार वा।
मावाप-माओं कौमें मोरनीयर्स ही प्रधान है।ग्री संसाररूती पक्षका पी। मुनि
परमपवितरसविचार और एफसविताचार नामक पुस्सापानबठसे उस मोहनीयाको रस
नए कर ममता।
मपन प्रकारेण मोहोन्मममित्या-
मोहनीपकर्म के उम्मका करमकी प्रक्रिया बसा है-
पूर्व करोत्पनन्तानुवन्धिनाम्नां क्षयं कपायाणाम् ।
मिथ्यात्वमोहगइन क्षपयति सम्यक्त्वमिथ्यात्वम् ॥ २६० ।।
टीफा-ममम्तानुगन्धिनः कापमाममापासोमास्तान् प्रथम सपपति । श्राप क्त् !
मोहगान मोहो गहनो मनो पस्मिन् मिम्पाये तम्मोहगहनम् । धन सम्पग्मियात
क्षपपति ।। २६ ।
मर-सबसे पारे समन्वानुबन्धी रोष मान माया गरम नामकी कपाशा धप करव्य
है। उसके बाद मर पाल मोच क्षय करता है और इसके पप सम्पक मिशाला
पर करता।
भाषापमोहनीयम रोम मेरदर्शनमोलीय और चारित्रमोहनीप । रर्धनमो-
हनीपक हीन भेद है और पारिबमोहमीपके पचीस । इनमें से दर्शनमोहनीफर्म प्रसार सके
न मोम मी मिप्यात पमान है। उसके रमेसेरी मोइलीपकर्म प्रमाण पता है। मोहनीयकर्मके
इन वर्षास मेरोंमे सबसे पहले बनम्नानुकभी पापोंका माध करवा । उसके बाद ममः
मिप्यास बोर सम्पमिपातका माछ करता है।
मम्यक्त्वमोहनीय क्षययत्सप्टाक्त पायांम ।
झपयति ततो नपुसक्वेद स्रीवेदमय तस्मात् ॥ २६१ ॥
टीन-तवा सम्पस अपपति । ततोऽप्रस्पाइपानबाई प्रत्यास्पामावरपम्पाय
चतुप भपपति । ततो नसायम् । पभान मी पुस अपकपिमारोहम् । परा सी
ममागाति तथा नापर्व पभात् सपपति । भय नपुंसक मारोबाते सवो नपुंसकर
पभान् भपपति ॥५॥

धरिका १६ २६१२१२ १६१] प्रशमरतिमकरणम् प्रस्थ मय-उसके बाद सम्पमपा भपण करता है। उसके बार पाठ कार्योंका अपण परता है। उसके बाद नपुक्षक पदका नाश करता है । उसके बाद सीओ चा नाश करता है। भावाप-मिप्यास और सम्पग्म यात्वा क्षपण करने के पचात् कमरा सम्यमय स्पान कोर मान मापा गेम प्रस्यास्सान कोष, मान, माया, गेम नपुंसक बदभार सोवेद मी क्षपण प्राइमा विद्यपी कि यदि सीवेदी क्षपकममी पायी तो सीपरका पण बाइमें पाता। और परि मसकोदी पकौमी पावतो नपुसकोदका अपम बादमें करता है। वर्षात् पुरुषपदी मस नपुंसको जीवेद मोर पुरुषोदका धपण करता है। जीवेही क्रमस नपुसको पुरेद और जीवेदना धरण करीतपा नपुसकरदी कसे बोरेर पुरेद और मपुंसकोरका क्षरण करता ।। हास्यादि तथा पदक शपयति तस्माच पुरुपवेदमपि । सज्वलनानपि हत्वा प्राप्नोत्यथ वीतरागत्वम् ॥ २६२ ॥ टीका-दास्प तिररतिभयं शोको गुप्ता पति पङ्गम् । वम पुरुपयेव सपपति। समरमानपि मपयिता पीवरागसमवामोति । उ मूलितऽष्टामिंशातपिप मोरे वीतरागो मरतीति । २२॥ मप-उसके बाद मास्प रति, परति, भय, शोफ मोर गुप्ता क्षप करता है। उसके पर पुरपोदका क्षय करता है। उसके बाद समान कोष, मान, मारा और छोमको नए कारता गवाको प्राप्त करता। मावाय-उप कमसे मोहलीपकर्षकी २८ प्रतियों के मर होनेपर मुम बीवगग हो जाता है। सोंदातितमोहो निहतक्लेशो यथा हि सर्वज्ञः । भात्यनुपलक्ष्यराष्ट्शोन्मुक्त पूणचन्द्र इव ॥ २६३ ॥ टीका-सक सकल उपातितोमस्तो मोहो येन स सर्वोत्पादितमोर । निरवाशा पेनासा तपाठ । लेवायम्तीति लेशा कापाइप पर हुइमत्तान प्रपगुपाता । यया दिसा सतबननमानो भवति । स तु भपितसम्मो समयद्धाति शोमते । मनुपरम्पय:- पोन्मुक्तः मनुपलम्पो राहगो मुसापिरिमागस्तन मुक्त पुमपम्म १५ । भतिसपेणोता भपकपी प्रकरणप्ररेण, प्रसनमाप्रतवान् । भनुना रिपोम्पो मनम्वानुगम्भिनाभर. रूपायान् युगपम् सपपति । तपामनम्तमाग पोपं मिभ्यास्त्र पभिप्प मिप्पा भपति । मिम्पाबाग पोप सम्पग्मिप्यात प्रसिप्प सम्पम्मियात सपपवि वर सम्पस पभिप्य सम्पासमपि सपपति। यदि पायायुप्पम्तन सीणस्माता भरतिष्ठनि मोपया रोति । भरदायुपस्तु भविशाम्त्या मविप्पाइन सम्मा पिमध्यादति । वताध्य पायान् भपपति । स प सावराप पूरक पुरस्ताउगति । मसना च पापापा समयेषनाग भपयन पपचम्बनभासमागवाम् [अमरसाऽभिकार, पानी मिमबभागे नामकर्मण इमा महतीसमोरश सपबति--मरकतिर्यग्गती दे एकदिमितुरि नियमातपमतम, मरकतिर्षग्गस्वानुपम्पों पे, मप्रसस्तगिहायोगति, स्मारामापतिक साधारणसरीरनामानि तानिनावरणीपर्मणय तिस महती सपबतीमा-निदा निद्रामपमापगस्पानदरम्बा तितो यबरसेपमशना सत् सपपति नापानामप्रत्यास्थान भस्यास्पानावरणानाम्। ततो नपुंसक स्त्रीय च । ततो हास्यप्परविमपसोनगुप्सा सय ममति । ततः पुरुपये प्रिपा एस्मा युगपनागदये सपपित्ला एवीपमार्ग समाउनकोरे प्रसिप्प कोपमपि निमा रुपा युगपद्मागदर्य सपपित्या वतीपमार्ग संगमनमाने प्रसिप्प सम्मान मानमपि मिपा एमा पुगपद्मागवयं सपयित्वा पतीपमार्ग (संगठनमावा ताप मिया हत्या मागदर्ष पुगपरमपपित्वा वतीय) सपनोमे प्रसिप्प मिया हया युगफमागवर्ष मपवित्ला पमानवीपमार्ग संस्पेगानि संगानि करोति । तानि सपपम् नावपषि संपनि पाररसम्पपप उभ्यते । पपरम संस्पेषवम सर्ग संम्पनिमानि करोति । वानि मेष सपपम् सामसम्पपप उप्पते । वेमपि रिसेपता भपितेपु निर्मपो भवति । मोरसागराचीर्य । तीर्ला मोहमहासमू मातमा विभाम्पति । भगापसोतीम उमगापपुस्सात् । विभाम्प प समपदये गोपे मुहर्तरूप । तब वपोर्दयो समपपो प्रपमे समपे निद्रा प्रवर्ग वनावरणमाती सपपति । परमसमपे सामावरण पापपरम् पर्समावर पतुर्वियम् मन्तपपं पञ्चविध पुगपत् सपपिरमा देवमान भामोति । एवं पामित्युत्तरमतमम्पे पष्ठमा प्रतिमि मपिताभिः मनमामो भवति ॥ २१॥ -समस्त मोहको ना करके और धों को र करके मुलि सही मानव देनेबारेणके मागसे छ्टेपुर पूर्ण चन्द्र के समान प्रक्षोमिव होगा। भावार्पस प्रकार समक्ष भावासमार मासे मुपहोनेपर रेपणानसे मासमान होय उसी प्रकार मोर मोर सोसे मुकावा मुनि के प्रामसेर पनिमाके वनमाके समान मोमिव होय है । पचपि मो में सेतोंका मोक्ताको पाता है। क्योकि सार्योकोहोरोप कावे. पापि उसका दमन ए होनेसे पो उनको परक महल किया है। प्रसामने पति सोपस धपकमीका काम किया है। उसे कुछ स्परसे करते है।बर "अनुक्कीकी चारों सार्पोका एकसार बरन करता है। उनको उप मन में मनको दिमामें मिलाकर मिपावर पपम करता है। मिपावका भी ऐष मान सम्मतिरपाल मिशन सम्परमप्पामा अपम करता है। उसममी ऐप मान सम्मस्वम मिगर सम्ममयका मी परम करमरपन करनेवासा मम्पस भागामी मरकी बाइच पुजा उस सात प्राधिोक पपन करके रस गाय पर महाभब परिपाबसायुफोटोमर्पत् वामामी मबी मापु महा रोपोनिमारके समरकोनीपर मातम सात प्रतियों पपप करमेक बार पाठ सादों पपम पारे। सर चमडेप मासको बगेको प्रम मा गाणी। भामें मायके समपामें भाग यम करके मम्पमें मामा व वेद प्रयोग एपम काम- परिका २६१] प्रशमरविप्रकरणम् परफमति, निर्यशानि, एकामय, सीनिय तेइन्द्रिय बोर चतुरिन्द्रिय गाति, नरकास्पानी, सिमस्यानु , प्रसस्तहिापोगति, स्पार, सस्स पर्यटक और सापारमधर । या दर्शनावरपकर्म निदा विदा, प्रग-पग और स्पानर-न टीन प्रहरियोंका पप्प पता है। ठसक बाद प्रस्थान रम्पानावरम बार प्रत्यास्मानारगकी भाठ कपापोंका मो माग भगशिए बता है, उसका भरम करपा । उस पार मपुसकोद और सीवेदका आपण करता है। उसके बाद स्प, वि, रति, मय प्रोक और बुगुप्सा क्षय करता है। उसके बाद पुस्पोरके तीम माग करके रो मानोंका एकसाप बाम परबी और तीसरे मागको समन मानमें मिशा तारि झोपके मी न माग करके रो मागोंका एमाप अपन करवा और तीसरे मागको संगम मान मिग देवा । फिर समबन मानक मी न माग सके दो मागोंका एकसाप वपन करता है। और ठीसरे भागको समान माया मिग रेगा। फिर संगम मापा मी दोन माग करके रो मागोज एकसाप धरम प्रता, और तीसरे मागको समान ममें मिला देवा। पिर समन भोमफे मी तर माग परके रो मार्गोध एकसाप धारण करता है। उसके बाद एक मागके समपात पण करता है। स्पा सण्या परम करता गुमा मुबिबादासाम्पराम्प (नवम गुमस्थानस्ती ) स्यूस कपापबाग का वादा। इनसे बोबम्मि समपात पण अवक्षेप रातो ठसा मी बसपात सण । उन सूक्ष्म पोंको क्रमसे पपम काम एमापक सूक्मसम्पयप-सूस कपापबाग (सम गुणत्पामबी) का गाया है। उन सूक्ष्म कणोंका भी पूरी तरह से अपन करनेपर निम्म्य (बारह गुणस्थानबदा) प्रेता है। परमिन्य मोहरूपी महासमुद्रको पार करता है। मोर पार करके एक मार्च तक सी Aमाम करता, शिस प्रकार माप समुद्रको पार करके कोई मनुप विमाम करता है। इस प्रकार वाम के पचात् स महमें दो सम्प क्षेप र गाते हैं, वो उन दो समयोंमें पहले समपमें रखनातरमको मद्रापार प्रण प्रहसिका अपम करता है और अन्तिम समयमें ज्ञानासपकी पाँच पर्धनावरणको बार, बोर बत्तरापकी पाँच प्रतियाँका एकसाप पपग करके फेरगानको प्राप्त करता है। इस प्रस एकसमास प्रकचों से साठ प्रासयों का क्षपण करने पर पछतानकी प्रारम होती। 1- भक्तामधयमनरपरेषु स्तिमित्त मन समीर पानिमाम्मानमोपवितुपुमा । यामाचरमणमानिधि TIMITRA पिबारमापूर्वमोसमगुपत्तासापरवपमनुभूय मामिनाएमिरविणासापासबिनुमा RT वामाना मिसिलारसम्योरपम गुमधाममणि मसायरमीपेरोमा परेरामा पनपत्यकामगारमापारसमेभागप्रेषमारतानfam प्री मेनोपमम मम ममम मापन पोम पो तर्मयोदमानुपान पणापमपरेपमाग् मति । बाजुरा पग । मया पुमरी प.पनुपरकर प्रतिनिर्वि३ । ० एव पापा सविणापामा रंगा असिमानामा दिएरपा महत्वा पिएस्प शायममुग्यरेस प्रविमिः पूर सपम्मामा पापको मापमापाप भी इग्मील नीरवाई पहिला पुरे पडतने फोनम मामे याबdn माग गम्ने माग मानवकष बाकीमापेय पुनीष मनाहितरम्प परम्परामा संत नाममात्रम्भुपूर्व मरवणे मेसी Aat विमानवामि १८२ पपत्रवेनमासमानराम् [शादोऽधिकार, अपकामी तस्पो पसपरभण्या बतमामस्प कापसा बापत इत्पाह- पोपीपी बास्ताका वर्णन करते है। सर्वेन्धनकराशीकृतसन्दीसो घनन्तगुणतेजः । ध्यानानलस्तप प्रशमसवरहविर्विदवल, ॥ २६४ ।। टीका-सम्पमाना पुत्रील्लानामेकराधीका सन्दीप्त इम्पनराशिईत्तामिया गितानिपपा दाति एवमनम्तगुणतेशामा (या) नानम् । तपो बादरामेदम् । प्रशमा मायाप संपर मायबनिरोपः उपप्रशमर्सवरा एव विष। सस्य पात् विशपेम पूर्व पर शतिपस्य पा (प्पा) मानस्पेति ॥ २५॥ स सससा (पा) नानसः किंकरोती पाह- क्षपकश्रेणिमुपगत स समर्थः सर्वकर्मिणां कर्म । पयितुमेको यदि कमसक्रम' स्यात् परकृतस्य ॥ २६५ ॥ टीका-सपरभेणिमनुप्राप्त परिवहन् प्रमाणिया (प्या) मानस समर्थ शफ। सर्पमिका सर्वेपी ससारिणा कर्मयता क्रममावा पत् कम । तेषु म्पबस्पिर्व पुस्तिं तत् अपपितमेोऽसाप । परि कमणा परालम्प तस्य तस्मिन् सपरपिस्पे सहमा स्पास् सत् मास्ति । तस्मात् सामप्पमाममि वस्प पप्पट वा (पा) मानवस्प ॥ २॥५॥ मय- सब इसका एक देरकर उसमें बाम मानेपर से यह सम्वा । सीमा प्रगत मन्तगुण तेजवामी तर दर और संपरसपी पी सम्मेस सूर बरसाम्मे परकोपीम प्राप्मा प्पामरूपी बमि, पदिप जीमो कोका मी उसमें सक्रमण हो सना होगामे ही सबबी को भरण पनमें समर्थ।। भावाप-धम्कनी में तप राम्प और सारक परसे पामकरी मानिसी प्रो गाती कि यदि उसमें समस्त समारी भाषामा राड दिया गये तो सब जरर मस्म हो सकते है। किन्तु जान पारस भपन ही कोश पपम किया जा सकतारबार यहार कर सकी पनि बताया।। २६॥ ६॥ बाममोरमा बम आप प्रामुम्भीर uplबनसपी रामनाम पानापाषा समई सम्मान तयार बनारसमा ARRAR HOROTARA मापनियम ATHAATAFROMपमा समाधान वानरर्थना MIRALमेरा, समितीच्या स्वारप्रnि it भी। -भीममा kिes com प्रतिष २१ १५५ । .मा. (पाम पर निको मारिप पुस।

१८३ फारच १६१ २६५ २६६२६७] प्रधमरतिप्रकरणम् एतदेव स्पष्टयपाह- इसी बातको स्पए करते- परकृतर्मणि यस्मान्न नामति संक्रमो विभागो वा । तस्मात् सत्त्वाना कर्म यस्य यत्तेन तद्वेधम् ॥ २६६ ॥ टीका-परेणात कम तस्मिन् परफलममणि विपये। यम्मामास्ति सझमः । मम्पेन यताम ( फसमस्तीति ) तदन्यप्र में शामति न सक्रान्तिमपति । सबम्य फमपा संकमो मा मोकस्य मविप्याति नेत्या-रिमागोवा । नाप्यफर गोविमागः सचमनीस्पय तमाशा स्वाम्यागमप्रसगात् । तस्मात् सत्त्वानो प्राणिनां यस्य यत्कम पाणिनस्तेन तदेपमनुभानीय मिति । मयवा म कामतिम मते , मपति संक्रान्तिरिति ॥ २१ ॥ मय-पतः सरके आप किसे हुए कर्ममें न सकम होता है और न माग हो । यतः मानियमिजो प्राणाविस कर्मको करता है उसे वही मोगता है। मापाय-सरके द्वारा किया हुमा कर्म न तो सर सर ही भम्पके कोंमें पारस सजा और न उसका कोई माग री बम्पके को नाकर मिल सकता है। प-ि ऐसा तो सनारा और बवाम्पागमका प्रसग उपस्थित होगा। पात् परि सम्पन्च किया जा कम जम्पको मोगमा सो निसने कर्म किया है, उसके कर्म तो नाश हो गरेगा और जिसने कर्म महाया । उसे बहकर्मी प्राप्त हो जायेगी । और एमा होनेसे तो नही कि कहावत बालाप रोनी कि कोई वीर मर कोई ।" बट जो करवा रही मोगता भी है। मोहनीयमभयापकममयोऽयं भाषीति दरापति- बा यह बतमाते कि मोहमीपकके भय होनेपर केप फोका क्षय जात्य हो जाता है- मस्तकसूचिविनाशाचालस्प यया ध्रुवो भवति नाश । ततर्मविनाशो हि मोहनीयक्षये नित्यम् ॥ २६७ ॥ टीप-तारतये शिरसि सपिया परोहति । तविनाश प नाउतरोरपक्ष्यमा सो नामः । तब-सपा अपफमा विनाश भयोऽशविरातिविचमोदनोपसय पुगे निस्पात्पपा ॥२७॥ । ताम्म प्रमो सिमामा रा Careesmr.jatala - 77 पचनबनसासमालायाम् [मणोऽपिकार अपनी मर्य-विस प्रकार रसके सिरपर गो सूची शाखामार ममता 4. उसके बारसे वार पपका भास माश्य से वाय, उसी प्रकार मोरनीयक के मापसे सेप मोका माय बातो भावा। छमस्थवीतराग काल सोन्तर्मुहूर्तमय मृत्वा । युगपद्विविधावरणान्तरायफर्मक्षयमवाप्य ॥ २६८ ॥ टीकाप पावरण व सिव उपस, पीतरागम पपितकपापत्वात् । भन्स- मुंह पटिकाम्याम्पम्वरका बीयपगो मूत्वा । मुगपत् समयमेष। विविष शानावर भति- सामादिमेई पसनावरण वर्षियम् । पिपिपमित्पनेमपम् । क्याम्वयंप दानान्तरापादि प्रकारम् । परम कर्मसयममाप्य ॥ २॥८॥ बिमाप्तगानिस्पार- शाश्वतमनन्तमनतिशयमनुपममनुचर निरवशेषम् । सम्पूर्णमप्रतिइत सम्प्राप्त केवलनानम् ॥ २६९ ॥ टीका-सव सम्मात्मन सामाक्सिमे मावति-मासमपर्यवसानम् । मरियमामातिय महातिशयम, मक परमविधयोति म व निविपतिशम्मत पर। मषिपमानोपममनुपम् तत्साशामापात् । मविधमानमुत्तर जाने पर तदनुत्तरम् । निएप क्षेपमास्मनः सम्म सम्पूर्णम् सम्योपमारित्वात् । भविषमानमप्रतिमातमप्रतिशत समी. तमुवाबावपि न प्रतिबम्पते सम्प्राप्ता प्राप्तवानविर्ष सम्वालम् ॥ २९॥ मर्ष-उसके बार बामा तक प्रत पीक्षा एकर पर मुभि एकसार नारण, वापरब, रापच अप करके Aल्प मनातमसिमय, मनुपम अनुवर, विलोम, समन और मसिहत रिमालको प्राप्त करता है। भावार्य-बाय गुषत्वानका नाम मत्तीवराग रेप बासमको खोबर गुपरमानके गोंके मामाईक गुमनॊपर बालान पठा। उ, एपस कामो कसाणे रूप से गानेफर पहले गुमत्तानकी प्रालि होचो।मता उसे पोस गुमत्तानमती मुनि समाग को मारे । बारह गुणस्नमें बार बार मुम एक मतमा कास्क बनानपी रोग, रनारमकी मोर मसाप पाँच प्रतिमान एक्साप क्षप करा । इस परत ही उसे केरणानकी प्राठिो गातीया गणात सरासस उसका करीब 40 उससे ! अधिष्ठप हो । उसई समान एम्पको १- at-फर एखो। २ दिन. तासाभम् ।

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रिफा २०२२-१-२०] प्रधमरतिमकरणम् मापाय-केपटीक मायुर्मी स्पिति कम होती है और शेष तीनों फोकी रियनि- पारित होती तोपा वेदनीपारि कर्पोको स्थितिको मायुकर्मको स्पिति के बराबर करने के लिए समुखात करते हैं। उत्तर गममको समुदात करते हैं। इसमें मात्मा के प्रदेश भरीरके बाहर कर समस्त काकाम म्पा होगाते हैं।मत पाउहर गमन कागा है। इससे मी उत्तर बम्प कोई ममन नही होता, पोंकि छोरसे गाहर मामा गमन नहीं होता । वस्प पाय पिपिलम्यते- समुदायकी विर बहाते। दण्ड प्रयमे समये कपाटमय चोचरे तथा समये । मन्यानमथ तृतीये लोकव्यापी चतुयें तु ॥२७४ ॥ टीमा-सपारीरप्रमाणदणमाइस्पेनोर्षमम भारमप्रवेशान् विभिपत्पाठोकान्तात् । तमे अपने समये दणम् । दितीपसमये तु कपाटीकरोति दक्षिणोत्तरवो विस्तारयत्यालोकान्तान् । एवं सूतीयसमये तदेव कपार मन्पाम करोति पूर्वोत्तरपोर्विस्तारयत्पालोकान्ताव । एष पतप समपे मम्यानान्तराणि पूरपिस्या चतुर्थे लोकपापी भवति । एषमारमप्रदेशेष नियमरणेन पोर्येण पिरसितेपु कम वेपादिपपमापुपा सम करोति । मापुष्क । नापपर्तते । ममपरतिता देवेत्युक्तम् । भात्मप्रदेशाविस्तारणाप तदेपादिकम मतिरिक्त सर्प गण्डदायुपा सर समीकरोति ।। २७४। मप-अपम समपर्म रड, सरे समम कपाट, तीसरे समपमें मपानी, वीर जीप समपमें मोरपापी होता। मावाप-यो समपमें अपने शरीरक बराबर मोटे रणके मार पर मोर नाचोको पन्तलफ माक प्रदेशों के विस्तारता है। इस समयमें तो कराटने वार करता है मत रक्षिण उधर दिशामें गोकक वातटक फैलाता है । सीसरे समपर्ने उस पारको पानी के वाक्यर करता है, मात् पूर्वपश्चिम दिशा बोको बन्दक ठिाता है। ता पीपे समपमें मपानीको अन्तरा भागीर गता उनें पूकर मेकम्पापी हो गता है। इस प्रकार करने मियपरम भगवीर बनाके रोंका केसानेपर बदीप मादि तीन कोको पायुकरके बराबर काता बापुर्मिक मान नहीं करता। परमशरीरोग मायुका पातमा होस माया गोगसे निरिक नाक पर लीप, माम और गोर्म मी मापुरर्मो बार तो होगाते हैं। इस सम्मान्ने गीर मा UP Pया गया है। जिस प्रकार गोठे पकोटाकर १- पापे - सिम बरा- पापा r-uty-..-वार-.jrati १८८ रापपम्ननशासमानापाम् [एकोबारिशानिमः समुद्रात परि एक बना रख दिया गाने पे उसे सूसनेमें गुत समय मातापितु पदि उसे फैला दिया मासे वो पा रही हो सूस गा, उसी प्रकार कृषित दशामें जो वर्मर बारमासे पक् होनेमें अधिक समय टी पी समुदात दशा बारमा के प्रदेर्शोके गये गानेपर कम समयमें प्रश्न होने के योग्प हो जाती है। संहरति पभमेत्वन्तराणि मन्थानमम पुन पठे । सप्तमके तु कपाटं संहरति सतोष्टमे दण्डम् ॥ २७५ ॥ टीका-एवं भर्मि समपैसा प्रमेण म्पाप्म पतुर्मिरे समविपरीत सहपति पडमे समये मम्पानान्सराण्युपसहति । पष्ठे समपे मम्बान सहरति । सप्तमे समये कपाटम् । मम्मे समपे दणमुपसंहप शरीरम्प एक मरति । १४ ॥ मर्ष-पाँच सम्पमें सम्मान के प्रदेशोंको सोचता है। समपमें मम्मानको संकोचता है। सात समपर्म कपाटको संकोचा और बाल समयमें दमको सोचता है। भावापनस प्रकार करीतसे चार समयमै ऋमसे तो म्पास का समय उससे परी कपसे प्ररेखोंका उपहार करय है। पर्यात् पाँच एमबमें मपानीके बालों को बास्म-प्रदेस है, समका संकोच करता है। और इस प्रकार मेकम्मापासे पुनः मपामीके माकम करता है। समयमें पूर्व पश्चिमके प्रदेशों का संहार करके मेवानीसे पुनः कपाटके बाकाम करता है। और सातवें सम्पर्मे उत्तर-पग के प्रोच संहार करके कपाटसे दणके बाफर करता है और माठ, समममें दणका मी उपसहार फरक पहम्को तर अपने सरीरमें ही त होगाता है। इस प्रकार बार समय रमसाट मपानी बोर गेकम्मापी तपा पार समयमें मंगानी कपाट दम और बपने भीरमें स्थित होगा। इस प्रकार केपी-एमुसा में बाठ समय जाते है। भय पम्मिम् समये को योगः समुपातका ममतीस्थाह- समुपातमें किस समय कोन पोन होगा ताव- औदारिकपयोक्ता प्रपमाष्टमसमययोरसाविष्ट । मिश्रौदारिकमोक्ता सम्मपष्ठद्वितीयेषु ॥ २७६ ॥ प्रथमेऽस्मे प समये भौहारिक एष पोगो मपति शपरस्पस्मात् । पाटोपसहरने साम । मापसारमे पाठ । कपाटकरपे विवीयः । एतेषु मिपि समवेषु पर्मणम्पतिमित्र भीवारिक पोगो मपति। जामण परीरपोगी चाप पत्रमे स्तोमे । समपनपेपि १-पाण-फ। २-मारिक-फ.। -राति एष-फा ४-भरि सारा स्मामे नाति धरका २०२७३.२०] प्रामरतिप्रकरणम् तस्मिन् मवस्यमाहारको नियमात् ॥१॥ मध्यान्तरपुरणसमपमतपः । मन्यातसंहरपसमय पबम । मम्पानकरणसमपस्वतीयः । समयप्रपेऽपस्मिन् कार्मणशरीरयोगा। तम निपमेन- बीपो भवत्पमाहा ॥२७॥ मर्य-पारे मोर माठ समपमें फेरठीके मौदारिकतापयोग हो।मोर सात वा सो समपर्णा बोदारिकमिश्योग होता है। मावार्थ-पहले मोर वामें समयमें बौदारकसोग ही होता है। क्योंकि उस समय के बपने शयरमे ही स्वर होवे है। कपाटा उपस्वार सात समपमें होता है। मपानीका उपसहार सम्पमें होता है और पारमा भाकर दिखय समपमें होता है। इन कनों समयोंमें पौरारिकमिभकाय पोम पता है। का २- केत कारिकाका म्याम्पा.-- मर्प-बौरे, पाच और तीसरे समयमें केवी कार्माणकापयोगमारे होते है। इन तीनों समयाम नियम बनातारक होते हैं। मापार्य-ौरे समपमें पानी के अन्तराको मरा गावा, मर्पद कम्पापी होता है। पाँच सममें मवानी के अन्तराका उपसंहार करता है और तीसरे समपमें मवानी के बाकार होता। इन बनों ही समोंमें कार्मागकापयोग होता है और उसमें गी नियमसे बनाहारक रोग। स समुद्धातनिवृतोऽय मनोवाफाययोगवान् भगवान् । यतियोग्ययोगेयोका योगनिरोध मुनिरुपेति ॥ २७७ ॥ रपिा सलह केवडी समीक्तचतुष्कर्मा । ततः समुहाताभिहत । बनम्तरं मनो- पाहापयोगी मगवान पोगत्रपक्वीति । मप ममोपोग केवमिन त युध्यते-परि मामा सुसपै मनसा तमम्प एष पृष्ठे मम्मो बा देवो मनुप्यो वा ततो भगवान मनोदम्पापाराम मनापपाप्तिकरणेन तस्मसम्पाकरमे करोति सुत्पमनोपोगेन मसत्तापपामनोयोगेन म्या पेति । तया माध्ययोगोऽपि भगक्तः सत्या मसात्यासपाक्सो पा । कापपोगस्तीवारिका विगमनादिक्रियासापन । पतिपोग्पयोगयोक्तम्पाने तत् प्रतिपादितम् । तस्यामपस्पापात पति केली पोग्पमुचित योर्ग सन्पकपमसत्पमपाकप पा परते ॥२०॥ भय-मन वचन और धप योगवा पलीभगवाम् प्रमुबारसे नाच होकर मुनिक योग्प पोगको कार ए पोगका निरोप करते है। मोम -पर-तरापणे म-गेर मामा-फल्म।४-- पपपीनशाखमालापाम् [एफोनवसापितम, समुवात माषार्थ -पा के चारों को बरामद करके समुहातसे निचपाते हैं। उसकबार सन के पाम्को तय सीमों पोगे हो गावे है। शहा कोके मनोयोग किस प्रकार है! उत्तर-पदि कोई अनुतपासी अपना कोई बम्प देव या मनुष्य अपन स्थानपर ही अपने मनमें प्रम करे तो कात्ममगवान् उसके मनोरम्पोचे मानकर ससस्नोपोग अपना मनुमयमनोयोगक द्वारा उन प्रभोका उत्तर देते है। पाचनपोग मी मनवान्के साप पररावनुमपनप है। चम्ने फिरनेमें सहायक नारिक मादकपदोन तो उनके होते हैं। करी अवस्था के पतिमौके पोप सस्वरूप भवना अनुमक- का योगको करते हैं। उसके बाद जब पौवा गुणस्थानमें गाने के अभिमुम हो तो योगनिरोप सम्पति वान् पोगामिपेडमिनमुना प्रकारेण निरुपदि- बब पोग-मिरोष करनको शिबगते हैं। पवेन्द्रियोज्य संत्री य पर्याप्तो जघन्ययोगी स्यात् । निरुणादि मनोयोगं ततोऽप्यसख्यातगुणहीनम् ॥ २७८ ॥ टीका-सपोगम्प सिदिनास्तीति पोगोऽयं मिपेदाप । उप प्रपमं मनोयोग मापेमेपर निस्मादि । मन पर्याप्पासं करणं शरीरप्रतिष पेन मनोबम्पप्राणं करोति । १- मयमा अध्ययनोचोपलाई बसमाचाम्यापम मात्रामातत्वमेधम्मोगोयल तत्व न मानणणय मापारी बवानापरवानवाबनवमीलमपसमोसनस्पमति पर पतविरोप म पतियो बर्ग याममायामाना मिपि दासानायबाप परोपपगापिगमार वर्षप्राममनवरता मलित एष तोम् । एमवाय सर्व पय इति सन लादादिमहलमेनपत्रमाण परमहरमाटामावरच विमापात्मा मेष वरन नामाषा मदिति रोज परिणामबभूवालिस प्रश्मिानापल चमेरसम्म लागार पदारमतमरितामति पावास्लमेति निरपणनाता त बनिवासरे।। बामिला महिनो मन त समयमा स्तात् । मत मम्मतानकामिनि कानु तापरममिम्पसामान बलरले बनोसपटक प्रतिपाबामामा गोमा भोगोबारिचमानोजी सारने प्रबला मिति सहा मसिमावति । HEARभरपोरबमा मार बन्ने मापनापतिल प उपचापौषत: मुलपिविषामात् । -मीभाव मिति मम्मकार मौर परम्म मोटोरोनाचा परममत्र - म म १९८१-१० कारका २७) प्रशमरतिप्रकरणम् दियोबनापमनम्तबीय सम् मनोविपय निरुन्धन् निरुणादि । पूर्व पदिपस्प संदिना मन पर्याप्तिकरणयुक्तम्प प्रयमसमयपयाप्तकस्य अपन्ययोगस्प मनोब्रम्पवर्गणास्पानामि मिरुणदि सारमनि । ततोऽपि वप्राणहाम्पा मसरूपपगुणाम्परस्पानामि निरुणाद। पयादमनको मपति मनःपर्याप्तिरहित इस्पर्य ।। २७८ ॥ मर्प-यो पन्द्रिय सेनी पर्याप्तक और गाय योगदान होता है, उससे मी बसस्या- गणेशरीन मनोयोगको रोकता है। मावाप-योग सहित जीवको मुक्ति महाँ होती बतः योगको मपश्य ही रोकना चाहिए। उबमेंसे पारेपेक्षिा योगका विरोध करता है। ममाप्ति नामका एक करण शरीरसे सपर विसके हारा भोप मनोरम्पवर्गणामोको प्राण करता है। उस मम पर्याप्तिके वियोग करनेके लिए मन्त शहिका पारक मीष मनके पपको रोकता है। उसे रोकने के लिए यह पहरे ममपति गसे युक्त एमन्द्रिय महीनीषके पर्याप्तक होनेके प्रथम समपमें बमम्य मनोपोग उतने मनोदम्म बर्नमाके स्वानोको अपनी मामा रोकता है। उसके बाद प्रठिसमय उसके बसम्मावगुने हीन स्थानों से रोकता है। इसके पचात् या समस्त स्थान क पाते है तो ममनस्क वर्षात् मनापति क्षत है। साध पा कि मेरी खनो योगोंमें से पाणे मनोयोगको रोकते है। जिन पुनर- पाणावोंसे मन बनता। उने ममोहम्पवर्गणा करते हैं। और मनोदम्पवर्गमा प्राम करने योग्य सखिके पापारको ममोयोग करते हैं। बता रमे धीरे धीरे मनोपोगका निरोध करके अमनको जाते हैं। पशकसी बिमके सस्पमनोयोगका समाग रहा बारे । क्योंकि वापर बस्तके पपाशानका समाप पाया गाता है। परन्तु उनके बसत्पपुषामनोयोगका सा समय मापक पर सशय और बमप्पासापकप शानका बमात । समापानी पोंकि सशग मोर वनप्परसापके कारगरूप पचनका काम मन होनेसे उसमें मी अनुमपरूप बम रह सकता है। स्योगीबिनमें मनुमप मोपोगका समाप स्वीकार करने कोई रोपनही गाता है। पहा केवीके वचन संधप और जनप्पलसापको पैदा करते हैं, इसका क्या तात्पर है। समापान समके शासके विषपभूत पदार्प बनन्त होनेसे पोर प्रोता मारकर्मका पोपम मतिसमेत होनेसे काम चोंके मिमिवसे सराप और बगप्पसायको सत्पति पाशा-करके वचम बमपरकप होने के कारण पनिरूप । मोर इसलिए वे एकमा और एकप होने के कारण वे सब वोर बनुमप इस प्रकार रो प्रकारके नहीं हो सकते है।

१६२ रावचम्बनशास्त्रमाममाम् [सिंथानिकमा, योगनिरोपः - समापान-महा। क्योंकि केवीके बचन 'स्थात् 'इस्पादि सपसे मनुमफ्लप पनका स्मार पापा गावासपए केसीको पनि बनसम्मको यह बात मासिव है। शकेरीको पनिको साबर मात्र मेपर उनके पम प्रतिनिपत एक मावारूप की होंगे, बसेषमापारूप नही स समाधान हो।योंकि म विशिष, पारमक, अनेक पंकियोंके समुचारूप और म भोतायो प्रात होनेवाण ऐसी देवीको पनि सम्पूर्ण मानारूप होती है, ऐसा मान में कोई मरोष नही माता। शा-या कि मा बनक मापासपरें तो उसे पनिरूप कैसे माना जा सका है। समाधान-पोकि केस के पवन इसी मापसप ही पसा निर्देश नहीं किया सकता है।सलिए उनके पचम पनिरूप यह बात सिरोगा। पान-मध्य क्तीन्त्रिमशाम होता है, इसलिए उनके मम नहीं पाया जाता है ! समामानीपोंकि उम्पमनका स्मात पाया जाता है। णा केसीके मम्ममनका समान या बाये, परत पॉपर उसका कार्य महा पापा बाता है। समामान-अम्प ममक रूप सफ्योगात्मक पायोपसमिकामका भाष महोबा बारे परम्त इम्पमनके उत्पप करनेमें प्रपत्व पापा गायोकि इम्पमाकी पणामोंके मकर होनेबारे प्रकलमें कई प्रतिबक काम नहीं पाया जाता है। इसलिए यसमा कि उस मनके ममिवसे यो बामा परिस्पदरूप प्रयत्न होखो से मनोयोग करते हैं। गह-कायके इम्पमनको उत्पन्न करनेमें प्रफल विचमान मते ए मीन बपने बर्षको पोहोर। समापान-नही। क्योंकि केटीके मानसिककालके सहकारी मारनप अपोपसमका बमा ससिर उनके ममोनिमित्कार महाँहोता है। शाहब केजी पवार्म अर्माद भायोपशमिकमान नहीं पाया गाना tो उम्से समोर अनुभप नारो प्रकरके वचनोंकी सपति को समती समापान-पो हपचारसे मना उन दोनों प्रकार के मौकी परिप विधान किया गया।

। परामरतिपकरणम् ततो पाग्पोर्ग निरुणदि। सनिरूपणापा:- मनोपोगके बाद वाग्योगका निरोष करता है। बता उसका निरूपम करते है द्वीन्द्रियसाधारणयोर्वागुच्छासावधो जयति यद्वत् । पनकस्य काययोग जघन्यपर्याप्तकस्याध ॥ २७९ ॥ टीका-दीस्पिस्प प्रपमसमपपयाप्तम्स्य पापयाप्तिसरण पत्ता निपटयति । वस्प पवाग्पोगो या सापारगीक्स्प प प्रयमसमपपपाप्तकस्य पशासनिस्वासपर्याप्तिकरण पागुफासो मम तवा तापविरुणदपसमपेयगुणाम्या याक्न समस्तवाग्पोगो निस्ट सनिश्वासपर्याप्तिकरण च । तददिति यया मनो निरणचि तवदागुरासायपि निम्णदी । तम मनोबाबोनिस्दयोः काययोगनिरोध करोति । पनक उठिशीवस्तम्य प्रपमसमप स्प का प्रययोगो अचम्यस्ततोऽप्पमाऽर्ममपेपगुप्पदाम्पा निरापरणवीर्पस्यात् सकस राग मिरुणादि ॥ २९॥ मप-नियमीवके यो चनयोग होता है और सापरणामस्तजीवके वो बासो होता है मनोपोगकी ही तरह उससे बसंभपातगुण हीन पवनयोग बोर वासोपनासका निरोप करते समस्त रचनयोग और वासोवासका निरोप करता है। उसके बाद पम्पपर्याप्त पत्रक यो कापयोग होता है, उससे बसरूपगुणे दीन कापयोगका विरोध करने से समस्त गिका मरोप करता है। मापाप-जिस प्रकार ममोपोगका विरोध करता है उसी प्रकार पचनयोग और सोमास- नरोध करता है। वर्षात् इन्द्रिय पपाप्तकगीसके प्रपम समय को अगम्य बरयोग होता। पर्याप्तक साभारगजीवके प्रपम समयमें से श्मसापसास होता है उससे असंन्यातगुमे हीन यात गुने पचनयोग और वासोवासको प्रतिसमय तक्तक रोका। बतक समस्त चिनयोग पासोझास पाशिकरण रोष महाबो माता। मनोयोग मोर पचायोगके स्मोपर कापपोगका विरोध करता है। पयात पनक इटिमीब सम्पमें रो पम्प पयोग होता। उससे मी बसमपातगुम हीन फापयागका प्रतिसमर करता है। इस प्रकार मरोष करते-करते सका पायपोगका करवाई। काययोगनिरोपकासे प- पापयोग रोक समय यो एक होता है, उसे बताने- १९५ पचनशासमाहवाम [मोऽधिकार, योगनिरोष सूक्ष्मक्रिपमप्रतिपाति काययोगोपयोगतो ध्यात्वा । विगतक्रियममनिवर्तित्वमुत्तर न्यायति परेण ॥२८० ।। टोक-म्पाने सामकिपमपतिपाति पुस्मनपयोगसित पर म्यापति । तदेव खेप्सी मिमागहीनमात्मप्रदेशपशि करोति । किमर्षमिति पेपानि शरीरे निर्विवानि मुखममा नासिमरिषिवाणि तत्परिपुरणार्य पनीरोति मारमान दिमागहीनापगासस्थानपरिभाई परोतीस्वर्प । स्तमपुरम्पाममे परेण म्पावति । विगतक्रियममिवर्तिप्यान निम्दयोमो म्यूपरतसम्मकिपमनिवर्तिमानमुचरम्पानं (न्यायम् ) परमार्मार्श सपमति ॥ २८ ॥ मई-कापपोगा निरोप करते रही सम्मक्रियणप्रतिपाति नामका तीसरा प्रायान उस पानके बनान्तर विगठक्रिय नामक भ्यान होता है। इस प्याके पपात् बप कोई पान नही होता, मका या समुहै। मावास समप फार्म सूस्मपोगमें स्थित होते हैं, उसी समप उनके सूक्ष्मकिम अप्रतिपाति नामका सरा सम्प्पान होता।बोर ठी सम्प'शी करते है। उस समय उनके बाममोठोंकी बारामा शरीरको मामासे एफबिआई हीमो पाती। क्योंकि शरीर मुफ, मालपोपमें जो परिव हो पाते है और उसके पुर जाने से मात्मा के प्रदेस मनीभूत हो बये हैं। पता मामाके प्रदेशों की मनमाना शरीर बगाहमास प्रमागहीन सपाटीसके पवार सकायोगका निरोप रोनेपर म्पुपरतसामकिष नामक पौषा सम्मान हो। इस मामके राशि कर्मप्रतियों को पप कर देते हैं। घरममवे संस्थान याहम्पस्योन्यप्रमाणं च । तस्मात्रिमागहीनावगाइसस्थानपरिणाइ ॥२८१ ।। टीका-उक एपार्थोऽस्पा परिषमा, पुनस्वबाप्पुप्यते । घरममये पश्चिम- बम्ममि । संस्थानमाकारा बारम् पम्प सिविमुपनिगमिपो संस्थान पारीरोन्याय पप प्रमाणम् । सस्प निमागदाम्पा संस्थानपरिपाई करोति । २८१ ।। मय-अन्तिम भवमें मिस केका बिना गाकार गौर तिनी घाई होती है, उससे उसके सरीरका पाकर और उचाई एक सिम हो जाती है। भावाप-स कारिफापर्व परपि पहले वामे वापिसाता ए पुनः कावे। शिस ममाका मन्तिम मरमें सा साकार होगी और मिमी चाहती है उससे उसकी बाई तवा मार एक विशाई महा बाता । मर्मात् उसकी मनाहना दो तिहाई माफी माती है। ११च मान-..। १-ममबर-औमिनावमाभमा सातापक माप, १८९-बालमपि गापा ९ri कारका २८ २८१२८२२८१) प्रशमरतिपकरणम् साम्प यार किबीर प्रमाण भपने शरीरके बराबर होता है। जैसा और निम्ना धीर वाका रोटा सा और उतना ही जाकार बीवक प्रदेशोर होता है। मन केसीके वाम प्रदेश मी शरीर पाकर मोर उतने प्रमाण होसे है किन्तु आरके माफ, काम मुंह, सदर बगैरहमें माम्सा माग धान पाठन सामे मागोम जीबफे प्रदेश नहीं होते। परस्त हेग्री हो जानेपर प्पानास साठी- माग माम-प्रदेशोंसे पूरित हो जाते हैं । वौर उन मार्गोके परित हो गनेसे भामा प्रदेश बनीमूत रोमाते । गौर इस प्रकार बनीमूत हो पानसे शरीरकी बगाहनासे नारम-प्रदेशोंकी गाना एकतिहाई माग कम हो जाती है। मप स भगवान कीरगवस्पो निम्त्वेषु योगेषु भवतीत्पाह- पोगनिरोष होनेपर केजगमगवाम्को यो नास्पा होती उसे बताते है सोऽय मनोचागुच्छ्वासकाययोगक्रियार्यविनिवृत्चे । अपरिमितनिर्जरात्मा ससारमहार्णवोचीण ॥ २८२ ॥ टीका-स भगवान् केपटी पाहापमानातोपासपोगक्रियाविनिहतो निलसकस क्रिप । मपरिमितनियर मारमा पस्प पार्ममपणयुक्तः संसारमहापयाधीण पर । २८२ ।। भष-योगनिरोधके बलम्तर मनोपोग, बचमयोग, कम्पपोग, भोर वासोट्यसको विपासे मार होकर र वडीमगवाम् कोकी अपरिमित निरा करते हैं, मोर संसाररूपी समुदसे पार गाते है। माषाय-पोगका मरोभ होगानेपर नवीन बार यो सर्मपा पमान हो जाता है और पीपल प्राप्तयोंको मी एक वर्पतम अपण कर गठता है।गत से ससार-समुदसे पार माही समझना चाहिए। सम्परतक्रियानिपतिप्पानकारी परम्पो पातीस्पार- भर पुपरवायानितिप्पानके समप वर की बास्पाचे प्राप्त परावे- ईपद्मस्वाक्षरपमकोहिरणमात्रतुल्यकालीयाम् । सर्यमवीर्याप्तवल शैलेशीमेति गतलेश्य ॥२८३ ॥ नाममा । -मापापाम् ।।

: रापषमयमशासमानापाम् [एकशिधिकार, मोक्षगमविपमम् टी-पम्मनाम् इसानामसराणां सगमा इत्पपामुवारणाकात अहिरक- मुग्चारणं तमुस्पषीया तापत्रमाणा शशीमा । सपमेनानुत्तरेण मीण व प्रासस पणिमिति विगतनेदप । शेरोश इस मेसरव निष्पकमो पस्पामपस्पापा भरति सामस्मा खेतीति भारिशमा प्रपोदपविपाठात संसिपते । शठानामीसतया लानामीश्वरी ता पीडश्यपस्पेति । विगता मेश्या माषाममा पम्प स विगतलेश्या । इम्पसेस्पामापार मेश्मानामसमयः ॥ ०८३॥ भव-संगम बार वीर्षक द्वारा बन्को प्राप्त करने, प्रसारित हुए मा काममनपान कोशी बरस्पाको प्राप्त करते है। मुख इस पाँच बरों के उपन करने में शितमा समप समता, उतना ही काल इस सेशी बरपाक है। भावाप-बीदा गुणस्तानमें ही अशी बरसा प्राप्त होती है। गो-पालोका ईरा- स्वामी होने के कारण पुमेरको सोशपते है। ममेरकी सामा बिस बरस्पामें प्रात होती। उसे रोसी बस्ता है। सपस्त योगोंके मरोष, सहा संरकी प्राप्ति और श्याका बमात्र होगामेके कारण पर मावा बोर गुणमानमें ही प्राप्त होती है। और कस गधर पा बाससम पाँच हतबनरों के उबारन करने में ना करता उतना ही उसका होता। पूर्वरचित च तस्यां समय श्रेण्यामय प्रतिशेपम् । समये समये क्षपयत्यसरूपगुणमुत्तरोचरत' ॥ २८४ ॥ टी-प्रथममेव समुपातका रचित पपस्थापित समपमेग्या समवपकी । प्रतिमेप' प्रफ्नामगोनापुर्पा परबसिरमासे तत् प्राकृतिशेपम् । प्रतिसमय कपपम्तसमोर गुन्मुसरेगोचरेषु समपेषु ।। २४ ॥ मर्प-पूरित बाधित कर्मप्रमियोंको धीबरला समोसी पति में प्रत्पेक समय उसोतर बसपात्गुणी बसम्मातगुनी चपाता है। माषा समपातके एमप हनीप, माम गोत्र और बापुर्मका यो माम क्षेप नगपा पा, उस मागको ठेगी कामे समर्पोमें मपाता है और प्रत्येक एमपमें उचोज मसतगुमे बसमातगुमे रोखपाया है। वर्षात् प्रथम सम्प रितने कि सपाता सो समयमै समसे बसमातगुगे रसिकाको पपाय । इसी प्रकार बागे समर्पोमें भी संतागुमे रमको सपाता है। १-पीमैट बारम (प्रसारमा) या पाठो पाप । ५- मम पर मामले को मात मई-ऐव मकिपा है। पिन-फ । मारिष परमर-प. पुन्त। ५-पाय-फा। -ति फ।

कामका २८३२८ २८६२८.] प्रशमरतिपकरणम् चरमे सयमे सख्यातीतान विनिहन्ति चरमकमांशार । क्षपयति युगपत् कृत्स्न वेद्यायुर्नामगोत्रगणम् ॥ २८५॥ टीका-पभिमसमयेऽसमपेयान विमिरम्ति शावपति । परमा ये कमाप कमभागा स्वान् युगपन् सपपति । व एष माशा विशिष्यम्ते-पायुामगोप्रगणमिति । एषा कर्मा मंशा इति तस्मिन् सम्ने मपिता बेपादिगणे परमझमाशा मपिता पब भवन्तीति ॥२५॥ अन्तिम समयमें बाकी पोए सस्मात फर्ममोको पाता है। वो इस प्रकार समस्त पेदनीय, पापु नाम और गोत्रको सम्बको एकसाब नए कर गटता है। मापाप-प्रतिममप बसस्यातगुमे बसंस्पातगुणे कर्मदसिकोको सपा सपाने का अन्तिम समपर्मे पावन है तो चारों यातिककी तरह प्रपियों के दो बसस्ससगुण कर्म कियादि पाते। उन सबको एकसाप सपा गमता है। उनके एहसाप अप कर दी गपातिकमो समूह भाश हो गाम है। मय- उसके पभाव- सर्वगतियोम्यमसारमूलकरणानि सर्वभावी नि । औदारिकतैजसकार्मणानि सर्वात्मना त्यक्त्वा ॥ २८६ ॥ टीका -सपा गतपो मरकतिपयमानुप्पदेवापास्तासा पोग्यानि ससारमूलमरणानि संसारपरिभ्रमणप्रतिष्यनि निमितानीस्पर्प । मीदारिकादीनि म नस्लोवारिकारिमिपिनास गतपः प्राप्यन्ते । सबभावीमि सर्वम भगम्ति नरकाविगतिपु परीपणि मौरारिक वस फार्म विद प्रक्रिपतवसकामगानि । सस्मिना स्पक्त्वा सर्वेपामारमा भीदारिदीना पर स्वरूप तेन सग सापेण स्पफ्स्वा ॥ २८॥ देहत्रयनिर्मुक्त प्राप्यर्जुश्रेणिवीतिमस्पर्शाम् । समयेनेकेनाविग्रहेण गत्वोमप्रतिष' ।। २८७ ॥ -सिदयवस्तु नियममैप ऐसपमादारिकवसकामपानपं मपति । तेम निरपोषण मुक्त निमुक्तो विरहित । प्राणिपीति ममा भेण्या पीर्ति गतिम् । पाप्य। २- मिल-फ...1 रापचन्द्रनशास्त्रमालायाम् [एकविंशाधिकार, मोधनममनिभानम् श्रीरशीमस्पर्शामविषमामस्पशाम् । सपनाममपसमपाइप समय म स्पृशति नापि सावगाहप्रवेशान् प्रदेशात स्मसतीत्पम्पर्शत्युग्पते । एकेन समपेनासापविग्रोपागस्पा गत्वोर्ण गोकान्तमप्रतिषोऽप्रतिशतगतिः । पुनरविनामार्म समयविक्षेपणम् । म कस्मिन् समपे विप्रो संमतीति ॥ २०७॥ स पुनर्गमा प्रवतिष्ठत इस्पार- मिविक्षेत्रे विमले जन्मजरामरणरोगनिर्मुक्त । लोकाप्रगत' सिम्पति साकारणोपयोगेन ।। २८८ ॥ रीम-कास्पैन कर्मनाश- सिदिस्वम्पा मेममायाम् । पमापगाहा सिब्स्प। तबेपत्यागमाराविम्पुपमित तस्मा पिम्पा उपरितमतगपहुपरितन योवन, तस्प पहुपरि- वन गम्भूतम् । तस्मापि गम्पवस्पोपरितनो प. पद्मागसीपि पनुशतानि अपसिंगादपिकानि पनुपम दिमाग । पप गम्पूचस्प पदमाग।। साक्प्रमागमाकाम सिदिक्षेप्रमुच्यते । मत्रा पगमन्ते सिवा इति । पिमस इति विपिक मम्पटाभिवे । बमबरामरपेन पेगेमपदिमि रिरिक शोकाप्रमत । स एव गम्भूतपश्मागो मेनप्रम् प्राप्त सिप्पति । पूर्वोषितगति संसारमाये सति सिय उम्पते । सप्रस्व साधरणोपपोगेन सानोपपोगेन पर्वमान सिपपति नपर्सनोपयोग इति। पस्माइसम्पप सः साचपेपयुकम्प मषम्तीस्वागमः ॥२८८॥ मर्प - गसिपोक पोष, संसारके म्म्याप और सब मना होने पर गोवारिक कि और कामनहरीको सर्पबा स्पाग पतनों शीसे मुखमा जीप, स्पर्स टीगरको प्रम कराव एकसमयमें बिना किसी बाप पर मात्र गरबा मान प्राप्त करणे याम, बग, मन मोर रोगसे मुफ होता वा बिमा सीमेत्रमें साकर उपयोगसे सिविपदको प्राप्त होगा। मापाप-पौरारिक, बस मोर कर्मनापर, नरक, तिर्पण मनुष्य और देव नामकी समी गरियो पोम्पसके बिना सब गलियों की प्रास ना हो सकती। पोक ममुष्प और विणी मरा स गसिपोम पोबार ठमकेही ठोसatमहतो शाम ही सब गतिपोंके पोप है। स्पा संसारक मम्ममममी कही पदि बीके साप सरन मोह वो उसे संसारमें भ्रमण कारवाही पर सब्यापापे समी मतिपोमें पाये बातेमस मेर कर्मो समी संसारागीयों होते हैं। मनुस्प बोर तिवमति समके सापौरारिएकासी होता है और रेव तपा माफगसमें उसके साप विपरीत होता है। हम रोंको सिमस्याग करके १-AS-। २- मवा माथि- पुर।-मेलको ।-नल' कारिक १८८९९९] प्रशमतिप्रकरणम् R, सेगस मोर कामनशरीरसे मुखामा गोर ठानमन करता है। यह कार्पगमन सुमेनिगतिसे होता है । जिस स्थानपर नीव कर्मपन्धनसे मुक्त होनहाँसे लेकर गको परत मागवक पाकासके प्रशोंकी गे सीधी पति होती है, उसीके मनुसार मोहित सीमा गमम करता है। और बिना किसी नपटके एकसमपमें ही नोक अप्रमागको प्राप्त हो जाता है। इसीलिए इस गतिको रस दस का पोंकि जिस समपमें हर्षगमन करता है, उसी समयमें मपमे गम्तम्प-पानसक पाँच गाठा है, सम्पान्सरका स्पर्श नहीं करता है । तपा मिस प्रदेश पछिमें गमन करता है, उससे अन्य प्रदेश पछिका स्पर्श नही करता है। उसीमें गमन करता लागेको वा मागतक चला जाता है। मां सिदिक्षेत्र है। स्प मासे मौके नाम हो जानेको सिद्धि करते हैं और उसके क्षेत्रको सिदिक्षेत्र कहते है। सिदाब इसी सिदिक्षेत्रमें पत है। मेकके वय माग पत् प्राग्मार नामकी एक विकी है। वही सिबभूमि है। उससे एक योगम उपर गानेपर मेकका बात होता है।पा पृषी सपमुस सके माकार । । इसकी सम्बाई और चौड़ाई १५ गस योपन है तथा बाप माप माठ पोजन है और दोनों ओर घटते पटते बातमें गुम बसपाट माग है। इस पृषीके ऊपरसे सबसे र बोकालतको एक पोजन प्रमाण पत्र, उस सत्र मी गो सबस परका एक कोस क्षेत्र है, उस एक कोस पत्रमें मी उसका गो उपरका एटा माग है, सिध प्रमाग १ अनुप अपने प्रमाण भाकाको ही सिदिक्षत्र करते है । सम्म, परा, मग बोर रोगसे मुल ए सिद्गीन मत रक्षित इस सिमिक्षत्रमें ही साकर धरते हैं, तपा बोनोपयोगर्ने पर्चमान पते हुए भी इस सदस्पालको प्राप्त होते दर्शनोपपोगर्ने वर्तमान रहते हुए माँ क्योंकि मागममें करते कि साकारो- पयोगीको ही समस्त सम्मिपा प्राप्त होती है। सादिकमनन्तमनुपममन्यायधिसुखमुत्तम प्राप्तः । केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनात्मा भवति मुक्त ॥ २८९ ॥ टीका-सहाविमा सादिक सिदत्वपपापक । मनम्तमपपरसानम् । मरिचमानोप मानम्नुपम् । मरियमानापानापमम्यापापम् । रोगान्तकादिवट्रादितम् । एविष मुल मामः। केवल सायिक सम्पवस्वम् । केवल मानम् । केवई दशनम् । फेवसमिस्पसहाय सम्पन्न गीतम् । पताम्यारमा यम्प ममा स एषरूपम्तम मुक्त इति । २० मई-सादि बनत, अनुपम भोर कम्याच उत्तय पुलको प्राप्त होते हुए देर सम्पर मान लीन सरपी भामा मुछ होता है। मापाप-मुनीको जो एम प्राता है, यह सिदत्वापिकी तरह सामोर अनन्त है। वर्षात् जिस प्रकार सियतपर्याय मादिसहित और बान्तारित है। एक बार इस घमी प्राप्त 1- मारा बीर सावष २८११- ५.१ । ।मविरमाएगा RB मा पा ...- . मा, मा १५१ भीमदया तामिलामा ४-माल, मा १ ५-A मोनापारियो मने मोर मा माग सपा भाषासामिापना पा. पर-4-1 एनिमपरम- पपचनशास्त्रमासापाम् [पमाधिकार बोधगमनिपानम् होनेपर फिर भी उसका नाश नही रोग । वषा मा पुस ममुगम है कि संसारका कर्म मी एस उसके समान महीपाराशत भी है। क्योंकि उसे प्रास करके रोग कगेरहमा मय नही पहता । मुसीब से उच्म सबको प्राप्त करके शपिकसम्पा, केसगान बोर कानप समारसे पुष होते है।पाप यह कि मुच बास्पाम बारिमा-गुणोंका बमा महागा | किस्तान, दर्शन, सम्माल मावि सामानिक गुम बानी पाम सीमाको प्राप्त होकर सदैव प्रासमान रहते हैं। पाविमाषमा मोसस्तनिराकरणापाह- कुछ बादी मोक्षको केक ममावतस्प ही मानते हैं उनके निराकरण के किस करते हैं- मुक्त' सन्नामाव स्वालमण्यात् स्वतोयसिद्धेभ । भावान्तरसंकान्ते' मर्वनानोपदेशाच ।। २९० ॥ टीम मरामि कर्ममिर्मुक्त मास्मा चेतनास्तमाको धानबममापयोगमणा । वस्म समारमना निरषयो नाश पति इसाम्पम् परिणामित्वान् प्रदीपशिलापम् । हि प्रदीपनगाहापारेग प्राइ पम्ति, पुनध परिणामान्तरेण पापम्त इति प्रत्यसप्रमाण- समभिगम्याः । मिरम्पपना व नेम्बान प्रतिवयतानामसमय पप । मत परिमामित्वात बीगो शानदर्शनोपपोगारमा न पुनरमावः । परमपमुपपोगस्ताप सारसप तमात् म्यास सम्पात् । न बानुचिपयोगात्मसतत बहाति बीया स्वत एपमापी (2) सिदा (क)। मागासनोपयोगम्पमाषत्वमारमनो मनश्चिचिमिचाइत्पन्न । मत एवासाबनवितारणोऽपः । पपिप्रायोपरत उपमोगान्तरमुरेति, वपाप्मुपपोगसामाम्बान मिपये।हामस्तमामात्। तथा भाषान्तरसमाते, मागो हि मागास्तरोन सकामतिम सपयोगिम्यते इम्प सेमकासमाषापेक, इतो प्रामाम्तरगतपुरुपदिल । सम नामावो मुक्तः । समारोपोशान् पीतएगा सपनास स्पषीवागम मा तापदेशात् सिदास्मा ज्ञानदर्शनसमापोऽस्तस्ति म्पम्पिमिति । ५९०n भय-मुनीयममारूप नही पोकि नीरका धन उपयोग नाही सही तसा मा करती है। और मात्र ही मावन्तररूप होत है। धरा कदे ग बागम्मे ऐसा ही मा। मावार्ष-बाठो कोसे मुल बारमा पैतम्पवरूप है।हामोपयोग और दर्शनोपयोग उसका यसबामा लिएर मात सापोकिरदीपली शिवानी बाद परिणामी । पीपकसी सिसा घमाबाद रूपसे परिनमन कर है। उसके बाद उससम्ममा मौ कोई सरा परिमान देखा पाच है। यह पात प्राय सिरहै। मलय निाश माननेपर उसकी सरिके किए हेतु मोर ura मिझना बसना ही है। परिनामी होने के कारण बीमा सरूप धानोपयोग १-विमर्मचार्य। ।

भारका २९ २९१] प्रशामरतिप्रकरणम् मोर एरानोपयोग ही धमाष महास्योंकि गीत कमी मी अपने उपपोगनपी स्वमाको नदी मेरा । तपा पदार्थ सतही सिद्ध होते. अठ बामाका बानोपयोग और दर्शनोपयोग समान किसी परफे मिठसे उत्तम नहीं होता किन्तु पर बमारिठसे ही स्वामिय। पपपि उपयोगसे पपोनामदोवा यताकत हपयोग सामान्या मारा कमी नहीं होता। क्योकि महमानस्लमात्र है। गरि एक मात्रा मानन्तररूपसे परिमपन होगो परम्त उसका सर्वपा नाश महा होता निस मकर को पुस्प एक मासे दूसरे गामें पग गत्व है तो उस पुस्पा सपा अमात्र नवा उसी प्रकार गौरके मुक होनेपर मी उस अमाव नही हो जाता। इसके सिपाप भीतर समाके दारा प्रतिपादित भागममें भी मुलामाको पान दर्शनस्थमा का है। अतः मुकावस्या भीष सर्वपा समान भूप सिरीसेना - त्यक्त्वा शरीरवन्धनमिहेव कर्माप्टकक्षयं कृत्वा । नस तिष्ठत्यनिवन्धादनाश्रयादप्रयोगाच ॥२९१ ॥ का-५ मनुष्यसो कम्माष तिष्यति । उपते-गारीरमेष बम्पन वविहाय कप पुनरास्पम्तिकशरीरत्यागः कर्माएकसपकरणास्पतषियोगा शारीरस्य । नासासिल तिष्ठति, मनिषाबनस्वात् । म हि तम्पे विधिभिवरपनमासने कारणमस्ति । शरीरादिनि पम्पनमिावस्याने मवति । तब समस्तमेव स्तम् । मनाप्रपत्वाम्मुतस्यात्पम्तम्पोरामय सबम्प मोकामाशिवरं मपति । भोपारकासिताम्मम्मकम्पा मखमपतिप्वम्पायस शीमपु पेषु बसस्योपर्यवास्थानमामयो नामः तवा मुतस्याप्यमोपमो नास्तीस्पत समावतिष्ठत पति समाप्रपोगान् मप्रयोगो म्यापार मात्मनस्तम्प पतारी नामित किया यपाबम्पान त्पपिप्पते । भतोऽभयोगाचमस तिष्ठन्योति ।। २९१ ।। मय-सारीररूपी वनको त्याग कर और बाठों को पय करणे मुर्गा मनुष्य- में महा सरता, पोंकि यहाँ मरने न तो कोई कारण है, न बाप रे मोर न कोई म्यापार है। मावाप-पाशाहो सकती है, मुबोनेपर मौक पोतों नहा रहता । अतः उसका समाधान करते है। बालों कोका समूल नाश करनेसे शरीररूपी साधनका मी भापम्त वियोगको माता है। इसका पोग होनेपर सीब ममुम्भोको महा भरता कोंक उसके पायरमा कोई कारण नहोला । परीर मारि बों के होनेसे ही जीव पहा मरता कि ममतोमा हो बुके । र पो उसके मरने के योग्य मामम भी प्रार। स्पोकि मुनीष पन्त के हो बाते । उनका बाप गेकमा बम माग हो होता है। विस प्रकार वाठोस किस को मार बके बीच फेक दिया गापेको छन माझे पोंके पुरु मानेपर पी सके पर बाबरी मीच महाराठी। उसी प्रकार मुजवीवको मा यहाँ रोक्नोपान को प्रशिक्षक मही पता HERE रापचनबमशास्त्रमासापाम् [एफरिसमिस, शिषगमनम् यहाँ न बरता । तपा मुजचीच कोई ऐसी दिपा भी नहीं करता, बिसक कारम सस्क यहाँ पारनेकी कम्पमा कोपा सके।बाप यहाँ महाया। पर्व मनमेव तेन गम्तम नाम्यति तो नियम स्मार- पत्र-पदि मुजीब पही मही पाता है तो म यरा, रितु उसे पर ही गाला चालिए, ममत्र महाऐसा नियम किस कमनसे है ! नाधो गोरवविगमादशक्य (दसग ) भावाच गन्छति विमुक्त । लोकान्सादपि न पर प्लवक इवोपग्रहाभावात् ॥ २९२ ।। टीका-पतो' गुखम्पमपो गए पापागादि, तम्प गौरव नाम्स्पपतकर्मत्वात् । मशक्पमावाच मापोशुपपच लव मावो ' पन् समाविनिमुकोपासतपुरको गमिप्यतीति । म प होजातात परतो गण्ठति उपहचरियमदम्पामाषाम् । परकम्तार सवत् पानपामा मत्स्यादिवदा । बप गममशरमावान् ॥१२॥ मर्प-मुकरीब नीचे नही जाता है क्योंकि उसमें गौरवका बमात मीर ऐसा होगा किसी प्रकार सम्म भी महामार वानिकी मा गोमातसे भागे मी नही गायोंकि पहा समापक धर्मखम्पा मारी। भावाप-पापाप कोरा मारी-भरकम पाई मीच पाते पर रेसे पारित मुज- बीमें भारीपन नहारे । पोंकि पोंक मारसे मुक हो चुका है। फिर यह बात किसी प्रकार सम्म हरेक समस्त कर्मोंसे मुलाबा अपत मुबीवनाचे मारे । 4 मीच बाबा शम्म महासथिए भगमन बी पुछरे। पर पर मी गेम बससे मागे नही पोंकि ममममें सहायक कमरम्प ने मतकही पाया जाता है । मागे उसका ममागर । मत विस प्रकार बहार पामी तक पा सकते हैं महतक उसका सहायक पानी होता है उसी प्रकार मुतबीय मी पाक गाने तक सापक धर्माम्प वर्तम्पन है। योगप्रयोगयोभाभावाचिर्यग्न तस्य गतिरस्ति । सिदस्योर्व मुक्तस्यालोकान्ताद् गतिवति ।। २९३ ॥ टीप-पोगा मनोवाम्पसममास्तरमावात् । प्रयोग पारमन लिपा तामावान। विपग्विभु प्रामारिया । म सम्म पतितमक । तम्मावपस्तिपरवा गतेसममान् । चापपाने माम्ति चिधित्वरणमतो गडस्पूममेव सिर । साचो गतिफ्सोकान्तादेव मरति, म परतः उपनामावादिस्पष॥ १९॥ (-01-फ-11-पप्रमा- । --फ. !-मसमरि-फाम कारका २९२ २९१ २९५ ] प्रशामरतिश्करणम् २. मप-पोग और प्रिया नमार होनस मिसा मी गमन नही करता T! मुळ सिरसीपको गति सार सीची होको भासतक होती है। भावार्य-मुख्यीय म तो मनोयोग, पचनयोग और कापयोग दी और न किया दी | बादि दिशामोंसे उसकी गति सम्मब महीपोंकि उसके सिर्पग्गमनमें मोग पोर किया ही कारण है और उसके इनका सर्वपा ममाप है । इस प्रकार बामनीचे मा सस्तारम विहे बा सकता है। इसके अतिरित यही बनेका मी कोई कारण नहीं है। सिमीत ऊपरको ही बाता है। किन्तु उपर मीगेको सतकही गातार मागे नहीं पाता क्योंपि गमनमें महापक कर्मदाम काम्तसे भागे महीयता । पर पहले कर चुके है। मपोर्णगतिन्तम्प निष्क्रिपस्प मता कर मरतीस्पाइपाह- श -परि मुख्य क्रिया भी महो। तो या वर्षगमन केसे करता है। इसका उत्तर पूर्वप्रयोगसिद्धवन्धच्छेदादसगभावाच ॥ गतिपरिणामाच सथा सिदस्योर्ष गति सिद्धा ॥ २९४ ॥ टीका-पूषप्रयोगम्दवीपे शुझम्पाने सामक्रियाप्रतिपातिनिवर्तमानेम देवभिभाग पानिविधानका ये सम्भार माहितः । किपापाम्न पूषप्रपोगेम सिदेम्पपोदात् मसंग मागावतस्प गमनं सिम्पति । मनः पूषप्रयोगसिदेवोगगमनबत् पूर्वसंस्कारमयति । तपा बम्बमम्वादेरगीबमिकावत् कमबम्मनमोटनाइन गति सिदा मपति मुक्तास्मनः । मसंग- भाषात । गतछेपागारमा पपसि पूषते। संगो सेपम्तवमावादर्सगस्वात् । वमा गसिपरिणामा दीपशिलान् । महि पम्प बातचिकित्सा मेम्मिाढा निमित्तामा सति तिरंगपोवा ममति । तम्मापूर्णमेष गम्हति मुक्ताम्मेति ॥ २९ ॥ मप-पूर्ण प्रयोगसे सिद्धि होने के कारण पर्सया दरो मानेके कारण, निपरिमा होने के कारम सपा पर मालेका तमात्र होने के कारन सिवनीवी सानिवि सिय।। भाषाप-रिस प्रकार कुमार पारे दणके सहारसे पसको पुमाता है और इसके पचात् दण्मे हटा पर मी या पुस्ता ही राव है। उसी प्रकार सूक्ष्मकिपमप्रतिपादि नामक सरे पारके समय बाम मरेपो बगाहनाको एक बाई न करते हुए नीवमें पाका यो संस्कार पाता, उसी मकारक पासे यह पारो उपगमन करता है। पूर्ण-- । ५-तृतीचा-.। - बनेगरणगाव तोऽकम-.. अन्यायो । 1 रापपम्पनशास्त्रमाअपाम् [साधिकार शिबगानम् वा निस प्रकार एक घटने ही उसके बीर बिटकर छपरकी मोर मात, सी प्रथा कर्म बनके टूटनेपर मुखात्या अपरको पाता है। मासे पो पारिक परे मारसे मुव होते हो इंवी नाकेबरसे मम्त उपर बा गाती है से ही समस्त संग गरिमहसे मुखमा बीब उपरको पोलिस प्रवर दोपकको शिक्षामा बगेर ममि लिपा समापसे छपरकोही मोर पाय उसी प्रकार मुहारमा मी खगरने की बात है। भापम तब ममम्तीति कपमवगम्पत इस्पा:- मुवीकेबमुपम न करते :- देहेमनोवृत्तिम्पा भवत शरीरमानसे दुखे । तदमावाचदभावे सिद्ध सिदस्य सिदिसुखम् ॥ २९५॥ टीप-रेहासरी मनमयोसियसन समाप मारमनि संपन्तम सरीरोगा फरीर जमुपगापवे । ममासम्मम्याच मानस इममिष्टवियोगावी । तम्पप शरीरमनतोर मागे सति साहसम्म कुलस्पामार | Fमामा प सिई सामाफि प्रतिष्ठितमम्बावत सिबिसुलमिति ॥ २९५ ॥ मर्प-पार और मनके सम्मापसे सारीक मोर मानसिक रो। तवा र मोर सकर मार होनेसे पाएमा पतसिहानीके सिविल पुस । मावार्थ-पास पत्र कारण है और मानसिक रकमम मन ! मुळ बीके र कसरी होता है और म मन ही।बत के इन दोनों कममों के न होने से किस बीका दोनों प्रकार के इस मही होते । एसके न होने तामासिक पुस मर ही सोंकि मात्माक ए गुमका पर हो र किमके दूर हो जानेपर एम्गुन सामाशिपमें पर्तमान पता है । वा बार एस परस्पर परोया। एको बमानमें सरा मा रहता है। दोनोच नमान किसी भी स्तनमें मी सफला । बत मुहारमोंसे मुखोगानेपर त्मा- विक मयत्य। यस्तु यतिघटमान सम्यक्त्वज्ञानशीलसम्पम । वीयनिगहमान' शमत्पनुरूपप्रयलेन ॥ २९६ ॥ टीका बतिस्तपस्वी साबुटमान मेहमानः प्रवचनोकसमस्तकिमानुष्ठापी । सम्ब परसेन कादिसम्पपीतेन । सम्पगगानेन भूतादिना । चीन व महोत्तगुणापेन सम्म ! १ पान नाशि-फ प्रले। मेवाराम बुरिप-फो।

। - परिका २९५ १९६२९४२९८ ] प्रशमतिपकरणम् पाक्तिलीप सामपं तदनिग्रहमानोऽपहलमहयन् मशरपनुरूपेण प्रपत्लेन पेष्टते ! मानिशमनु हेपाल किया पाव्यगीत ॥२५॥ संहननायुर्वलकालवीर्यसम्पत्समाधिवकल्यात् । कर्मातिगौरवाद्वा स्वार्थमकृत्वोपरममोति ॥ २९७ ॥ टी-सहनन अपमनारापादि । मायु म्पत्सम् । बम्मानिषा पुबलशपरत्वाय सानप्पस्प हेतुः । कालो दुष्पमादि । पीर्य सम्पग् मास्ति प्रशुरवीर्यस्त्वामावः । सम्पदनादि। पमाधि सस्पता पित्तम्पाम्पप्रता सापि नास्ति । एषा सहननादीनां पाकिस्तात् । गर्मषा पातिगीरवार शामावरणादीनामतिगौरव निकामनासम्मापाप्तिः । माप सकनकम सपः । तमरुवा प्रियते उपरमपेतीति तपम्मी ॥ २९७ ॥ मोधर्मादिष्वन्यतमकेषु मार्यसिदिचरमपु । स मवति देवो वैमानिको महर्दिशुतिवपुष्क ॥ २९८ ॥ टीच-सम्पगर्षिमामिकेपोवोत्पपते सोपर्मादिषु अपेपू पावश नाम प्रपरेषु, पसु सपिसिविविमानेषु सर्गप्रयसम्पाम्पिवेषु देवा संभापते पैमानिकाम्पत मम्पाने विमानवासीस्पप । माती प्रदिपविषपुष यम्प स माम्पुितियपुप्फः । दिः परिवापदिका । पुति शरीरापा वपुः शरीर तदपि मातं (मापरित ) कि स्वहीनम् । समचारवं संस्थान प्रक्रिपमुत्तरोत्तासंस्पानप्राप्ती र मिति प्रमाण । सुमादिभिः प्रष्ट मरतरं प्रकटतम मरतीति ।। २९८॥ मप-यो साधु सम्पदशन सम्पशान बोर सम्पचारिसे पुल हक है, और अपनी अषिको नहीं मामा अपमे सामर्पके अनुसार सपमके पागमें प्रपनशांक दवा है वा सनम बाबु, पर शति-सम्परा बार प्यानको कमाके कारण एक कर्मोके पति मिनर होमेके कारण स्पर्ष समयको पसिना ही मरमको प्राप्त होता है, पर सापु सौधर्मतर्गस रेकर सासन पच म.सी एक विमानमें बरणीय ऋषि, कान्ति और शारीरका पारक मालिकदेव होता है। भाषाव-बो सापु प्रवचनमें की गई समस्त शिपायोंको पो प्रपानसे अपनी शनि दिन उनके पास में सहयम हवा । स चार रोपोंसे सित सम्पास, सम्मानस माम बोर उत्तरगुणका बाबा पाम करता है परन्तु सपना पादि उत्तम सहननक न होने पापु होठ शरीरमें बम होनेसे, पंचम आदि का होमसे १- चले इसारम पापररिक सी पन्ना पाठापा पने मास्ति। -नास्ति समागम २.1 त्वचनमशालमाछापाम् [शशिानिम तामिभानम् बीसी कमी काम करता महस, तपा को साबितबम्ब होनके कारन सफल कोका कप किसे ममा ही पाम सापासापु सौपर्मलनबाRE कम्पोंमें, नया वना पाँच बनुपरविमानों से किसी एकमें अम्म वा वीर इस प्रकार मानिकदेवोंमें ही रुपम होता तमाम बड़ी मारी धर्म, कान्ति मोर समचतुरसतानसे पुछ उत्तम प शामिका पारक होता है । सास लिन साधुबोको मुधि प्राप्ति के समस्त साधन पुग्म रहते हैं मोज प्राप्त करते है RO मि इस कारण सामाग्री प्राप्ति महाँ होती मकर प्रमालसामी मार्मिक रेष होते हैं। १९८१९४ १९८ ।। तत्र सुरलोकसोन्यं निरमनुभूय स्थितिक्षयात्तस्मात् । पुनरपि मनुष्यलोके गुणवत्सु मनुष्यसंघेषु ॥ २९९ ।। टीका-रामेति तीधर्मादी पुरोके सौम्यममुम्य चिरं स्थितिमेरापर्युपरीति । ततः म्बितिक्षमावायुप । तस्मात पुछोकामनुप्पोमागस्प गुणकाम मसुम्पेर विशिधापयेषु पातिकमचारसम्पन्नेषु विपिति पापुलोपु । २९९ ॥ जन्म समवाप्य फुलपन्धुविमवरूपमल दिसम्पन्न । श्रवासम्यस्त्वज्ञानसवरतपोषलसमग्र ॥ ३०० ॥ टीन-सममाप्प बम्मनाम चम्म । बन्यु माबोका पितरम्पक । पिमपो प्रम्पसम्पत् । परिसिरथरीरावयासविरमा । बर्स पीपसम्पत् । विपत्तिम्पादि। पमिमन्सानिमिः सम्पर मम्मम्मः । बदा मगरात पीतिरतिरापगती पमिनीवपुष पति प्रथा परिवोपः । सम्पस तसाममदासम्मम् । शाम मत्पाविधान पपासमयम् | संबर मासपनिरोपमपस्तपोषन तपसि दरमिमे उस्सादोशष्ठान प । पमि. समन सम्पूर्ण संपतो पेति॥॥ मर्प-पहात तक पुरषोतके पुरको मोगका बाबुष र होनेपर पास कर मी मनुम्मडोक भाकर गुपवान् मनुष्य परिवार अब होगा है। बार बन्छ, सम्पपि, रूप म, मौर मुषिसे पुछ होता है या सम्मान काम संकर भोर तपोबासे पूर्ण होता है। मापार्ष सापु माविकागोमें सम्म मात कातक रेमे एको मोगता है। मायुधो बाटोमा पुत होकर सिर मी मनुस्मोक गायीमोर मासिक बार बाबारसे पुक सब मनुम्प परिवार सम्म ताहै।पो मी उसे नमस मिलताब मानुगामा मोम सीद, सपि, मोर दुर्मि प्राप्त होती है। मायाम् परन्तरे सस मिर तो माता - Sat मा पूर्वम् । - ।

पमा ९९३ ३१११} प्रामातिप्रकरणम् गदी मारी प्रीति होती है। सम्पादन, सम्पदान मोर भाव निरोररुप सबरस प पुक्क होता है। बारह प्रकरके तपोभाचरणमें ससे बड़ा-मारी उत्साह रहता है। पूर्वोक्तमावनामि वितान्तरात्मा विघ्तससार । मेत्स्यति तत पर वा स्वर्गान्तरितत्रिभवभावात् ॥ ३०१ ॥ टीका-पूर्वोक्तो दादश मावमा या भनिन्पादित । एतामिमावितो पासितोऽस्तग'मा मानररानोपयोगम्बमानो विभूतस्त्यत्तने विक्षिप्त संसारोमेन नरकादिगतिमेदःम विधूतससा | उत्ताणपाप ससारसागरात् मन्पशेपभव इम्यय । सेस्म्पति सिदि प्राप्म्पति । पिपत्रिपा पठातापा, वत-पर प्रकर्पत मगान्तरितमिमपमावान सम्प्रति मनुष्य उमास्तरहिपानुष्या तो रस्तम्मान प्रत्युतः पुनर्ममुप्प भमेत्म्यतीति। प्रीन भपाननुम्प पीपि सम्मानि मायग्यप ॥ १.१॥ भय-पार की गइ पार६ मापनामोस उसको पतरामा सबसिन और ससारका मारा कामेराम होता है तथा उसका मप्प वर्ग मम्म कसरीसर मामें मुनिको मास पाता। मावाय-उसकी गामा पहस ही ( ARE मारनामा रममें दूनी रुपा पास मनुप्प सम्ममें जो बारह मारमाओं का निम्तन किपा का उसका संस्कार भी बार बना हितास सापो ससार-समुद्रसे पार हुमा हो समन्नना चादि । पोंकि उसक मा गात हो पर शेष त है। काम न ही मर पारण का मुरू होता है। मसात् वर्तमान पर मनुपात मोम होगा उसकबारक होता है और सभ्युत शेर पुनः ममुप-बर मारन पके मोर परगा। पर पतेधयामभिपाप ग्रहामिग प्रम्पाह- इस प्रकार मुमपा बनगार गुहस्पीमा बनठा- यभेद जिनवरमते गृहाश्रमी निभित सुविदितार्य । दर्शनशीलवतभावनाभिरभिरप्रितमनस्क' || ३०२ ॥ रोमा- मनुष्पमा यो गामी गम्म मापा पम्प र सीपयन मरिरिताप मामित सर्व भगवनिग्नम् । एतदेव ममापनारस मापनम् । दान नमानसमापन TratarAT.SEHR4 Y...

२.८ -- रापचन्द्रनमशालमामायाम् [बाझिाकिर, ममिषानम् वत्तापभयानम् । गीतमुत्तरगुणाः । मतनपाइपुगतानि । भनिस्पादिका बादश माना। पदर्शनादिमिमिरवितं पासितं मनो पम्प स भवति ममिप्रितमनकः ॥ १० ॥ स्थूलवधानृतचोर्यपरस्रीरत्यरतिवर्जित सततम् । दिग्नतमिह दशावकाशिकमनविरतिं च ।। ३०३ ॥ टी-म्भूत्या प्राणापातादिपति प्रमममनुवतम् । म्यूग बावरा पाणिनो वे वेम्पो बिरतिस्पामयः । म सम्मेम्पो पिरतिः पृपिपादिकायेम्पो विपतिः। मपमा सकसमा स्पस्तम्माविति । संकल्प दि म्पवस्पाप्प म्यापाइमामीति म्यूसमामातिपातम्माधिरति अममममुनतम् । म पुनरारममादितिरिति । परमभूत पनिरोमरमनपकमावित्पमगातापि रोहने सस्पम्पपावृत्तमम्पपा मापने तम्माविरति म पपिासादिमापनात । चाममदत्तस्मादान स्पसम् यस्मिन्नपहले नामिविश्वपदिश्यते तत्म्यूनम् तम्मादिरतिः। परदारनितिकम्प तु परपरिग्रहीतस्त्रीपरिहारः न पापपिार । रस्परसिम्पो परिसस्पतः । स सरा रतिषिपये प्रीति, मरतिस्पेगो प्रवपरिपारमारिरियाम्पिति पासवादिपिका । तम्पाय परिमाण मतमेतापनि वास्तनि प्रापि हिरण्यमुषर्षमेतावत् मा पनं पार्म स्टाहादि पोपम्परमात सब परिमितं पामिति । परिमागाइपयुपरि म्पूर्व तम्माशिविरमवम् । सा मापात्पमपि शेप मतग्रहमाशक्षिप्त एम्पम् । परिमोधनविरतिय पपासतीति । विगत चतमप पिम उम्मपथ गमनपरिमानमताप गवर्मा न परत पति परतो गमनाहिरति । पतमाम्पादिप स एति । तपा पेसापत्राशि वर्त प्रतिदिवसमम्पे पतावती मर्यादा मम गमनम्मेति तम्मेष सहलसहीतम्प दिग्मतम्प देणेऽनपर्श पपति देशासाशिकमतम् । मनपरगविपतित प्रपोमनामापोऽनप फ्निा प्रयोभनेमात्मानं णपति मग्निशम्माविमाना दिलाउनेकमेदेन तम्माविरक्तिमतम् ।।।। मामायिक घ कृत्वा पौषधमुपमोगपारिमाण्य च । न्यायागतं च कल्प्य विधिना पात्रेपु विनियोज्यम् ॥ ३० ॥ टीप-सामायिक प्रतिक्रमणम् । मषा पस्पायतनतापुतबिमा पा पावदाम्ते ताइन् सामापिति- करोमि मइम्त सामापिकम् सार योग प्रस्पारपामि यावधिपमं माविमसामूम् पा पमुपासे विषिष मिषियनेला । " तपा पोपपता १-मर- । -विषम- कान-4.1 ४-पापी -फ -- यसका लारम्प की पापा-मालामाल मिर-फ पुत्व कारका २१११३.५१६] प्रशमरतिपकरणम् पापच माहापरिसास्य पारणं निवारण प्रतिपेय पीपम । स पारशरीरसत्कारजसपर्याप्पा पारभेदेन तुमि । मएमीपौर्णमास्यादिषु क्रिपते । उपमोगपरिमाणवतमुपभोग पुप्पधूप स्नानागपगादि। परिमोगो समापनादि । सब देवा-मोजनत कमतम । मोचनतोड पानपानमापसापरुप मासमपानन्तकायमप्यादिविषय । कर्मप्त पञ्चदशमेषा, मगारफरणवन सामाटापिसमापः । भपिकाविरतिर्मासादेस उपमोगपरिमोगपरिमाणत्वतः (मतम् )। पायोऽतिपिसपिमागः । स पापमपारणकाले म्यापागतम्यागहितम्यौपारणोपात्तम्प दुग्मतादेपसाधितस्प फरसनीपस्प सापेनालस्प । विभिनेसि यानिवृत्त पाकासबस्प सस्तारपूर्वक साना पारेषु वान पिनियोग । पाप्रप्राणान् सागुम्पो प्रहमागतम्यो देयम्, न समाजमेप सा मीत्वा सार्पसती देयमिति । यच माधुम्पो मदतं पारणकाठे तमाम्यबहरवि सापमिति ॥३०॥ चैत्यायतनप्रस्थापनानि कृत्वा च शक्तित प्रयत । पूजाम गन्धमाल्याधिवासघूपमदीपाद्या ।। ३०५ ।। टीका कप चितपा प्रतिमा इत्येकायः । तेपामायतनमाश्रयस्पकुमामि । प्रस्यानि म्पापनानि सम्पापनानि। मास्पा विभूस्पा बादिमनृस्पतासानुपारसमनपरिमारादिकया सम्पा पना प्रतिप्रति तानि सा शक्तित प्रयत्नवान् पया पपा प्रवचमोशेषम मावि तपाइलेति । पूमा सपया । गग्मो विशिष्टयम्पसम्बग्पी । मात्प पुप्पम् । मभिवासा पटवासासि। भूपाः अपमिदम्पसपोगद । । प्रदीप प्रदीपदानम् । मादिग्रहणानुपपनसमाजनसणस्फुटित संम्परणविप्रकमाणि चेति । १०५॥ प्रशमरतिनित्यतृपितो जिनगुस्मत्साधुवन्दनाभिरत। सलेखनां च काले योगेनाराप्य सुविशुदाम् ॥ ३०६ ।। टीका-प्रशमा कपापाविनयस्तप रतिः प्रीतिम्तस्पा मशमरता निरपमेन तृषित साभिमाप- का साधुस्वमषाप्प पापरिप बेप्पामीति ।" निमाना तीपा गुरुणामा पार्योपाप्यापारीना, सापुरमभ्य साधुनोहम्प पवम्दने ममम्बरषे प्रतिक्षणममिरतः । माणा- तिसरेसनामले प्रस्यासने मीवितफरे । ब्रम्पको मानतम ससिभ्य पारी पाया। योगेनेति प्पानेनापप्पामिमुखीकृत्य पर्मेणासाविषपादिना मुष्ट पारे रिशुदा निमना नीति --- १-परिमोगार-- । -परमाEि-- | ४-या-फ। ५-रिमाल-4 परिवानागुज-प.। समपारेपो-गर। फर। ९-रणा-फ 11-मारपास्तिता। -TRषा- ८मी म.

पपचन्द्रमैनशास्त्रमाणापाम् [विशाधिकार, स्वामिभानम् मरपार्शसावियोपरहिता स्पेति सम्माय । एवं गो स्थितो पारमपिर्ष भारकपर्ममनुपास्म पवानुमवानि पीमि गुणवतानि विपरिमाणमुपमोगपरिमोगपरिमाणमनयंदोदितिय । सिमानवामित्वारि सामावि देशामकाशिर्ष पापपोपपासोऽतिपिसंबिमागति वापस प्रकारमप्यनुपारप मिसना धाराम्प ॥३॥ माप्त कल्पेष्विन्द्रत्व वा सामानिकत्वमन्यद्वा । स्थानमुदार तत्रानुम्य व सुख तदनुरूपम् ॥ ३०७ ॥ टी-कस्सा सापमावयम्सेपिनत्वमधिपतिस्वमपाप्यारापिश सामानिकारक मिम्मवत्पत्वम् । इन्द्रस्वरदिवास्य सामानिका मबम्ति रोपे स्पिस्पावित्पम् । मम्यवा स्मान मुपारं विशिष्ट सामाम्परेको माप्प रैमानिधेषु । तम र देवबग्मनु स्मानानुरूपमनुभूप अपम्बम्पमोक्रुसम् ॥१७॥ नरलोकमेत्य सर्वगुणसम्पद दुलमां पुनर्लग्ध्वा । शुद्ध' स सिदिमेष्यति मवाटकाभ्यन्तरे नियमात् ॥ ३०८॥ टीम-स्पितिभपातन प्रच्युतो मनुप्पोके समागस्प गुपक्स मनुप्पेषु भार्य देशादिपु बातिकसविमापसीमाग्पदिका सपई सम्पपस्वादिगुगसंपर व सम्मा। प्रद समर्मयानिमुक्तः स पर्व भुतपरंपरयों सिदिमप्पति'। भष्टाना मवानामपागम्यन्तरे निपमेनेति । तस्मानाबरमता स्पपर्मोऽप्पापात्म परम्ते च सामुपर्म इति ॥er मर्प-१२-३ ८) इस गेमें गो भाका तीर्थकरके ममि सास करके लाको गीत गाकर सप्वदर्शन, मौज व बोर मारनामोंसे अपने ममको मासित करो सके लिए स्पून हिंसा पूरल स्पून चोरी परवी राग बौर देसको त्याग करके उसके पसाव PIE, देशामसिकार भारम्यान, समापिक, प्रोपप और मोगोपभोग गरिनानको करके पापन सपारित वादि ब्रम्पको पात्रोंमें विपूर्वक देकर पिके बनुसार प्रपालपूर्वक त्यामों की प्रतिष्ठा करके मन्च, पाग पनिवास भूप पक कौयसे ग करके सदा प्रसमाविका मुकता तर भाचार्य, पाप्यार और साभुगोंको बमस्कार करने में पर होता मा मरमा बानेपर प्पामा परिपुर सोनाका बायन करके सौधर्मारक कसौमे इनपद, साप्पनिकपद, आप पसी महान् परको प्राप्त करता है। गौर हो उस सापके अनुरूप एन्को मोगकाप, मनप्पोन वाकर म्म समत्त गुम-सम्पराको मात करके बार मोंके बर पुर रोकर शिवम सिविको प्रास करता। १-एलो ।िपामिर पुति-सम्प-1-प्रसाफ मोर्च प्रपलति हानिक. पुले।

परिफा ३४३०८) । प्रशमरतिप्रकरणम् २१२ मापाय-स मनुम्पटोक्में जो गास ! तलाको बी तह मानकर सिमेन्द्र मामानके पचनोंमें निथप करता है कि मगवान्का पन सत्य है, उनके द्वारा सपदिए प्रवचन की संसरसे पर गावाग है। इस प्रकार निभप करके सम्पादर्सन मणुमत, कोणत, बोर बनियान पादि पानावोस वपने मनको समासित करता है। प्रत और सीड मिस प्रकार है- स्पून हिंसाका स्पाग पण मणुक्त है । जो प्राप्पी बादर होते, भाषक उनकी हिंसा नही फरता किन्तु यो प्रणीकाय वगैरह सूस्म जीव होते हैं, उनकी हिंसाका उसे स्पाग नहीं होता। नपता सा दो प्रकार की होती :-एक संकसी गौर दूसरी बारमी । मैं इसे मारूंगा'-ऐसा इयमें सकम्प करके जो किसी भी प्राणीका व किया गातार संकपीसिा है। और बारम करने से दो दिसा होती है, पावामीसा भाषक संकल्पीसिाय स्पाग करता, वारमीका महा मोकि भारम किसे मिला उसका पीबम-म्पापार मही चल सकता । ' स्यून वर्षात् सफरपीरिसाका त्याग पाग बणुका है। त्पा हठका पाग दूसरा ब्णुमत है। गोबस्त सौ ६ उसे देसी म बतला- कर सम्पपा पतामा बसम्पति सी दिछगीमें गो बम्पपा मापण किया जाता है मारक ठसका त्याग नहीं करता है। विमा री मस्तके प्राण करनेको चोरी करते है। जिसके प्राण करने से मनुप्प पोरका भाता है, पर रह चोरी है। याक एसी बोका त्याग करता है। पर सरा बात है। पीप अणुस्तके दो प्रकार -एक स्वदारसम्तोप और दूसरा परदाRATलि सहरसम्तोपातीके लिए परणीसेन और वेश्यागमन-दोनों ही त्यूा बता पर दोनोक त्याग करता कित परदारनितिक पालक परमीगमनका तो त्याग करता है, परमेश्यागमनका त्याग महा पाता क्योंकि या किसीकी परिगीत सी महा। सदा विपर्यो प्रीति काम और तपासन बादि फिगों में इस बारने त्याग करना पाच वणुः स तो पिरिमाण भी करते है। वर्षात् पेन मञ्चम पोयको इसाय परिमाप करना कि इतने मकान मेष, इतना सोना-पोदावना पर-याम्य वगैरह रहनेवा में नियम करता-पर विपरिमाण नामक पौरनों पर। पाधि रात्रिभोजमातका मी पालन करना चाहिए । पाँच मस्त है । सती निम्न प्रकार है- का शाओं तथा उपर-नीचे जाने परमाण करना कि में अमुक में ममुक स्थानतको बागा-उससे भागे मी गगा; पर परमा विनत के द्वारा पमित देशमें प्रतिगमनानामनको मारकी म किनार पमुष अमुक सालता बाप उस शाकाशिकात परते हैं। बिना प्रयोग मन, पचन कापरी प्रवृत्ति करने को मनाते है। इसके बने में और उसके त्यागको बात करता है। प्रतिपयको मात्रा मन, कापसे साप प्रवृति त्याग करनेको साप्रापिक पाये । नामपर्ने सपना सामों मप्टो भर बेठला तक सामापि पानी प्रतिया करता है कि- मगान्। में सामायिक बरसा मुर बमुर सम्पन सापयोगका पाग पातामपरा अमुक अमुर समपता मगान् सिक भारमियाममा नतिमा -बाबामदापास-सानालासर... - २१२ रावचन्द्रमशासमामपाम् [शावसानिकार, गमिषानम् मिम्मकी बोर साधुओंको उपासना करता मामी-पौनमासी भादिके दिन बाहारारिको पीपा करते है। उसके बार मेदबावारका वाम धरके सलारका साग प्रापपर्य धारण और पापधुप म्यापारका पान । पुष्प, धूप लाम मगराग गए दिन पत्तयों को एक बार की मोन सकते है, में सपमोग करते है चोर पस, सम्या बादि यो मत 4R-चार मोगनेमें बादी में परिमोग करते । सनके परिणाम करनेको मोनोपमोगपरिमामात करते हैं। यह परमान दो प्रकारसे होता है-- एक मोगमकी बधास और रस कार्यकी बफेवास। मोम्म पान पाप लाप बारिका परिमान करमा और मष मांस, मधु बमकाप बराच त्यागना भोग्नकी अपेक्षासे परिम्पम करनाला बाग पन माली मावा बादि पनर प्रकारके हरफमोसे बागम स्वाग करमा की पेमासे परिमान करना है। सातलोत गतिषिसविमान है। पौषको पारपाके समपमें व्यापक बनिननीय म्पापरके II उपापित सम्पसे मीरे गये एस चालक, पी वगेरह प्रमोसे साधुकै उपपसे न मापे नमै मोगममें से भर बापे हुए सापुलोंको पिपूर्वक बो दान दिपा बाय, ससे बसविसनिमागपत करते हैं। पाचपानसे या स्परपर पमरे हुए सापुर्बोको ही बावापान देना चाहिए । अपमे बर्तनों में सागोको पतियों के बाकर नारेना चाहिए। वातविधिमागसी मकबो मस्त साबुमोको नही देत्य, पारमा सम्पद बस्तु सप मी नही माता । इस प्रकार प्रावक इन पाँच गणों और सात पोर्गा पाम करता है। अपनी राधिके अनुसार गाने-बाये, सबम-परिवारकबरे मारी समारोहके साप बिससे प्राची प्रमाना हो, उस रंगसे बलापोंकी प्रशिक्षा पर और दीपप माग पनेरासे सममगवान्की पूरन करता है। उसकी सब नही बभिगमा यतीक कष साधु मकर मामलपी मनुषोंको बीते। इसके सिबाप मवीर भवाम्, बाचार्य ठपाप्पाव गण गुरु वैर साधुग्नोको नमस्कार करने में सरेष सम्म सवा हैमरमा बाग को भी और कसाब बारिको भा करके सानिधपमान भाग हारा बीने-मरमेम बादियोपोंसे रीत र सपनाक मरम पाता है। इस प्रकार गाल पाँच मत बन गुमपात, शिक्षाम-मबार प्रकार के प्रामक बका पालन करके बात सत्मामा बाराबन करोगेकौ पातोपत्रपरको प्रास करता बिमकी समान सामानिक परको प्रस करवा पा मिसील प्रमलशाली मानकरेमका पर प्राप्त करता है। पर अपन परके पहप समाप, मप्पा बमा नपसको मोग। पाके पर होनेपर बास बसकर मनुमोमें सम्म म्यापोपर मी उसे बात कुम म, रूप सोमाय बादि सम्पदा सम्पाप भारि प्रसस्त पन प्राप्त होते है। इस प्रकार भी १ मे परकर्म मम पास बने । विमानस्यमोहनम् ॥ २॥ निर्गम्यमान्दीपोपोमवरणमाम् । पिकायमस्मीभ ॥ १९॥ विविवार कल्याणाम् । भरनामा प्रोपपरिवार प्रति ॥५॥ -सित समार-मारकर्मभूव मा - कारिफर : ९१ ] प्रशमतिप्रकरणम् परम्पराका मोग करते हुए यह गहरण माठ मोके बन्दरी नियमसे मोसको प्राप्त करता है। मक प्राममें गारप-धर्मका मी पान करना चाहिए और वम्तमें साधु-धर्मका पालन करना चाहिए। इत्येव प्रशमरते फलमिह स्वर्गापवर्गयोम शुभम् । सम्प्राप्यतेज्नगारेरगारिमिभोचरगुणाव्ये ॥ ३०९ ।। टीका-तिशमा प्रकरणपरिसमाप्तिपशानाय । एषमिति पर्मितेन म्यायेन। पति मनुष्येव पाएस्पेन सर्गफलम् । तियग्गतौ च पांचित मगाबासिनाम्पम । मपवगफलम्। पुनर्मनुप्येषेष । एममिति पपिकम्वामाविकमेदादुमपमाप फलै मुममिति । तदेव तापनगा राय फा पाप्यतेऽनगारे । सामिा । मगारिमिम स्वर्गफवं प्राप्यते। मपरगफस तु पार. म्पपैमावाप्यते ग्राममिमिरिति । कीरिनेगारेरगारिमिया उत्तरगुणाध्यै प्रमानगुणयुक्तम् पोचरगुणसम्पमरावनिरषयाशेपसंयमामुष्ठापिमिपित ३२॥ मर्य-इस प्रकार मनुप्पोंमें ठहरगुर्गोस सम्पम मुनि मोर गास्प प्रशमति के बारा स्वग पौर मोक्ष तुम फरको प्राप्त करते हैं। यही ' इति शद इस प्रकरणकी समाविका सूपा है । तपा घर' पदसे मनुष्योंका माण करना चाहिए, क्योंकि सर्ग-परकी मासि बरिषापा ममुर्योकोही होती है। लिगतिम मी सग-फरकी प्राप्ति होती है परन्तु मात कम । तपा मोघ फल पो मनुपातिम प्राप्त होता हैयहाँ दोनों प्रकारके फोका माण किया गया है-एक पपिक चोर दूसरा तामाका पिकासो परिस स्वग प्रभान और सामानक फीटिसे मोश भान है। मोक्ष पहको निरोप संपमक मनुष्याला संपनी मन ही प्राप्त करते है और गाय म सग-फरको प्राप्त करता परम्परासे मोक्ष यो प्राप्त करते हैं। प्ररामराग्पमें पति-प्रीति होने के कारण होपा सब पस-प्राति दोबसपमें ममको सगाना चाहिए। टतो पोऽपा प्रकरणमारंभात् प्रति स सर पर परखने, म मया ममनीपिकया किचिन कत्पितममा प्रावनम्प व महानुमाग्यमनपापया ददापति- प्रवचन माहाम्प बगते गए मम्पकार करता है कि इस प्रकरण में बार से लेकर मतक से एका सब प्रवचन पिन --मानी से करत महा- जिनशामनाणवादामृष्टां धर्मयिकामिमां श्रुत्वा । रत्नाकरादिव जरत्कपर्दिकामुद्दत्ता भक्त्या ।। ३१०॥ टीका-शिनासममणबस निशामनाणाः । बरबादापनिपान ठप मानोपमेपमा । तम्माभितशामासागरानिमशमासिमा मिनशासमोदपो नितानपा चरम नियमानानिमि सर्वस पर पुसो माना - रापचनसाममातायाम् [शनिमाधिकार, बस्तमममियाणम् मुपादाप हापा पमकमा कविता । म बिस्तारणोदिता । समिप्तायोमिमामारप भुत्तारपान रत्नाकरादिव बस्कपश्चिमिस्पात्मन मारप परिदति । रामापदमेकरलानिः । तस्माषणा बरतपरिका समापती मोममा मबति बरपरिका । परिपेतमा निःसारापमपारसमविना तहर्षि गररूपविशाम्पानीपा माझ्या हा जरत्कारिकापाता मगरम साधुपु मतिर्मा प्रीतिस्तया प्रेरितेमाकष्टामिति । भाति प्रामरति सम्मप्पते उदृतेति कपरिम संपदयते इति ॥ ३१॥ निस्सापप्पा मधमरति- सद्भिर्गुणदोपर्दोपानुत्सृज्य गुणलवा प्राधा । सर्वात्मना च सतत प्रशमसुखायैव यतितव्यम् ॥ ३११ ॥ टीका-सम्त सामवस्तगुणोपगुम दोपाल मगठन्ति पे ते गुणदोमास्त सदिन दोपानुस्मग्प पाएहन्योऽपादियान परिस्पग्य गुगमपा प्राप्पा । पनानारत्तगुभो पति । रिपता गुमान गई शम्नोस्पस्मशादि । सगात्मना सम्पयनन । सततं सरंप । पमिक सननिरमिगषेम प्रधर्मसुखायमेव झूमा प्रपवितम्पमिति । ३११ ॥ मर्प-रामोंके गाकर समरसे निकाली गई शीर्ष सीकी तरह बिनधासमरूपी समरसे मलिक में गई इस धर्मकताको मनका गुन और रोता सहनोंको दोपको मेगकर गुपके योको प्राण प्रना चाहिए। मोर सर्परा व प्रामक प्रथम-समय मानके ए की प्रफल करना चाहिए। मापाप-भिनयासन समुरको हनमर और भोक वापोको पान है। उस रिशासन रूपी समुद्र में पहुए बको कर यहाँ सवेपमें धर्मकता प्राममतिको बताया है। समग रमाकर भी कायोकि उसमें रत्न मी पाये जाने तक, सीप कोपा बेटी उ बस्तर मी पापाची IS प्रपर अपने परमको ए करने के लिए एक मिनसाप्सनरूपी मारसे कारी गई रेपर भी पपा मकसा रामके समान मानमान् महाँ मिस विविसकोगीको निसर। फिर मी मने मविपासका उबर लिया है। सिर होनेपर मी से सरकार गुन बार रोपौके परखी समगोंको इसमें गेरोप में उने र देना चाहिए । बोर को गुनग में ठाम करना चाहिए । इसलिए कि हमारे देसे मस्समधिमन समर्म गुपोप कम कर ही केसे सपने उन गुजमोको काम करके Aपमुको ममिणपको मेसका नरन्तर सब प्रकार प्रम-सबकी प्राधिकए ही पेपर बना चाहिए । साध संसारको प्रथम पुरको बार बार टप्पस प्रम बनाया नया वीर इसमें पड़ी एक गुपन है। उसे माम करके इस बोर बना चाहिए । इवना होने से प्रवास अपने बमको सफर, २१५ सारिका ११११२१५ प्रशामरतिप्रकरणम् यच्चासमंजसमिह छन्द शब्दसमयार्यतो मयाभिदितम् । पुत्रपराधवत्तन्मर्पयितव्यं बुधैः सर्वम् ॥ ३१२ ॥ टीका-मसमजसमपटमानम् । पदिश प्रामरता । केनाकारणासमडसम्। समसा शशास्त्रेण प्रबचनप्रसिदस्पायम्पाम्पपाप्ररूपमेन । पुपापरापन सत् मपयितम्पम् । पपा पुनस्प विशोरपपप पितामृप्पति समते तया प्राचाहदै सर्वमशेप मम्तम्पमिति । ११२ ॥ भय-इस प्रशामरतिम मने छ -IN, शम्द-साधम भागमके मर्पस बसंगत को कुछ करा हो, उसे विहानोको पुरके अपरामको तरह क्षमा करना चाहिए । - भावार्थ अपकार करते हैं यदि इस प्रकरणमें मैंने छन्द-शासके प्रति कोई रचना की हो या म्याकरण-याबके प्रतिकूट लिसा हो अपना प्राचनमें प्रसिद किसी वर्षका बम्पमा प्ररूपण किया रोवो मिस प्रकार पिता अपने पुत्र अपरानको क्षमाकर देता है, उसी प्रकार प्रापन के माता रमको मी वपने बचेका वपराप समझकर मुझे क्षमा करना चाहिए। सर्वमुखमूल्बीज सर्वार्थविनिश्चयप्रकाशकरम् । सर्वगुणसिद्धिसाधनधनमईच्छासन जयति ॥ ३१३ ॥ टीका सर्वमेष मुलं सपमुलं सोशाकसहित मतिमुखम् वस्प मापं प्रयम पीबमारासमम् । मयमा पिपिकाणां सुखाना मुक्तिमुलम्प र सपा मुलाना मग्नी मिन शानम् । सबैच तेऽपि सपाया पनास्तितिकापा' ससमयाः सप सपार्षेषु पो मिश्रा परिष्क एवं संसारस्थितिमामा मुक्तिमार्गति । प्रकाशपति प्रतिपाइपति देनमेव शासनम् । सर्वे ते गुणाभ सर्पगुणा । समगुणानां सिदिनिप्पत्ति सगुणसिदि।। साम्पते पेन पनेन हरप मनमिदमेष प्रवचनम् । मा सगुणसिदिसापनमनमरम्सन दम्पपर्यापनपप्रपचास्मकमम्पशासनम्पग्मान नपति॥१३ मप-समस्त मुझे मरदीय और सामक निर्णयको मकर बरसेगस गुमौकी मिति करने के लिए धमकी व साम स्वरूप मिनधासन पपपत पवा।

रापचयनशासमायायाम धारिका ke मावार्थ-मिसासन एकिक पा पारौकिक समस्त पुरोका तथा इसके ससे भी (दिव मुनि-मुहका पीर उसके बिना मुबकास मी प्रत नही हो सकस । पंचास्तिाप बाद संसारके समस्त पराका वा संसारके ताप मोर मुळिके मार्गका प्रतिपादन भी बिनसासन ही करता है। विस कमसे समस्त की प्राम की गा सकती है पर बन मी निमशासम है। ब्रम्प पर्याय और मयका विषम करनेवाग व निमशासन पप शासनास वतन और भुतहममें उपसित होकर मरेप बमभीत एखा। टीकाकारस्प प्रशस्ति- मौहरिमाचा रवि प्रशमरतिरिकर वित् । परिमाम्म टीका एसयोमा समासेन ॥ १॥ अमरिम्पाटकनगरे नीमबसिहदेव सपराम्पे । बालसम्म (१९८९) संस्मतो परे प्रति भोपानमारमानिकपुत्रपशोनागनापपीती में । सापामय विदेत समाव गोषित पेवि ॥ ५॥ मप-प्रशमरविप्रकरणका पह संक्षिप्त विवरम (टीका) श्रीहरिमहाचार्पने पूर्वापानी टीकानोंका मनन करके इस रिसे म्सिा कि जिसके पाठक इससे मर्मको सरमास समा सके। होने इसकी बिना अपसिंहदेयके राम्पके बम्तर्गत भणदिसपाटकनगरमसं ११० में श्रीपपस मोरयाठिकले पुत्र पसोनाग नापसे साभार्पित किये गये उपायबमें की गोरीपर पसका सशोधन मी कसा। ।। इति प्ररामरठिटीम परिशिष्ट -अवधि । भगा- नमः । भीममरते-पामस्य पीठबनानागारिमार्ण-नियेच मरस्थान चारो मारनामः ॥वानुमाया योगो मना (n) पानि पिम् । सीमा भानमनि" पास मोन प्रमः वर्गमनाविधानमन्तमरपार विरामिणरा प्रमा समर्म विकासम् ॥३॥ौरमासाविमापा पमपवरपरपेय प्रणमरविकर मारपसारी पडमा- मामे परमो पा कायमरमदाबा परममा राषिनी पेपम् ॥ १॥ महाविहायान् । पायो । सिमागमात् विवीधरम्मत् प्रणमातिप्रकरणमिप: १॥ मनम्तानि पनि ममगाम पागमा मार्या वापर। पापा शापवासा मेरा परिवर्तिनः पयरिसमान कुरादिनामरामि पा । बर्षा पमानाममिरे मानि प्रमविलास सिकारको पा। नोऽपूर्णागनोगमा मनमानुपपधिराम राममा प्रसारकोमा गमापा पमामित्रमवारबारावपाइपमारलानि मामतापप्पारगम । ३॥ इम्मागमो पुधिरोपागारिन (पानिपादिका) मविरत एष लिमो वर्ग वेन परिमारानाम मानाबानामुमो मोन गरेपनि शपुरमयेपमित४॥ चर्षणपूर्वविनिमा मा पनि कामो मोगा। प्रति प्रपिता निगमा शुभप्रदानुगारिक माचो विशुपा परियारियायाः भायमनपनापामा पषताःरनेनेष पप उत्सेभिः परिणरिया ॥ ॥ भुवाइपुग्यरित्रामानणय किया कामुक पापमयातनानुसता BAपयमायोगिरिमा विगयामा पर सान बस्सा मयासार गोड स्पा नाम बानिये मेमोरमानमार्ग मंगोमा ॥ ८ मा सामिपमे पार समाचारमत् गेम पनि भारत मेति । पारमावि मरमा मिर्गः समानता समको पति मगमत्तरिमा समान ॥९॥णापा प्रकम् । कमिमानमावि मत् मते AR मन मसिम्पच्यावर बसर पपितमपि मनकापनमपि प्रवारिम् ११ गणार पितो मारी भाषा पभावोयमनुको रम् ॥ १२॥ पूसि पेटमा पुमा पुरा देखते जमुना पासवेन पामिप विसर पाम् ॥ १४ ॥ नानावे कर्म मार पर भमका १५ वामपनुमि मावेनापरवाना मातो तोपा । १८n मिसालोदवा गामा पिरषा पुछा महावितर्मण पवाभनमागण्य मामाया पौदारणार I A सानु निमम यो RA I पंजा एप का ॥ २१: पब कपमा पर परमारबत् माना पाखरसंतुलितमिन Aकपि जीपापब रात गुरपयोमा fa ARMA को ना मनुगत बातचनामवामिगपापी मामीचाविकपनीताम् .np पम्ममा पहा मालपतम् ॥ १४ नामोनिपत परेषु प्रेग्यम् ॥ ५॥ मामायने दोरेगोगो माdि nापापापना रवानस पूरिसपम्पहनयममार्पल नम परवत प्रागम्य बनवि कामपि भारत प्रसार मारपत् मुखरपोरिति म || मोनापार माया पिपास प्राये मापा मारेगा ए मा परमवार unामो थमोपासावा पासपति परमावरम् || १ गई समाल, tan Rn मिपार सायरामा प्रमाणे मचारि, मोमा बतास, सन्धिपातानिरनिममारि रापचयनमासमागमाम् [हिंसानिकम, what भाषा--मिशासन पगकिक तथा पारगेकित समस्त एका तथा सके हसे मी रवित मुन्ध-मुखका मूम्बी है उसके बिना हमारा मी प्राप्त नही हो सकता । पंचारितभर ante संसारके समस्त पातिमा ससरके सहप और मुछिदे मार्गका प्रतिपादन मी रिमधामन ही करता है। जिस पनसे समस्त मोंकी प्राप्ति को मा सकसीमापन मी निघासन । इम्प, पर्याय बोर नपका विषा करनेवाण प निघासन मय शासमोसे सतत को बटममें उपस्थित होकर सदेव पयसीत प्रताहै। टीपारस्प प्रशस्ति- मोहरमदाचा रचित प्रश्नमरसिविपरन किषित् । परिमाम्य पाटीका मुखोपा समासेन ॥१॥ बम्पाटमनगरे श्रीममपसिंहष पराम्पे । मानस (१९८५) संसपे विमवो सारे प्रगति प्रता मोर मांग्णाविकपशोनागनापमिती । सपा ममे Rara समाते शोभिवं ॥२ मय-प्रसार विप्रनमा पद संधिप्त विरण (टीका) मीहरिमदाचार्यने पूर्वाचापाकी टीवोंका मनम करके इस पसे गिया। रिसके पाठक इससे मर्मको सरम्हासे समा सके। उन्होंने इसकी रचना अपसिंहदेष सम्पके बर्गत महिपाटनगरमें वि स ११० में भीषण मासानिके पुत्र पशोनाग नापरके पार्पित किये गये उपाभप को दोपर इसका सशोषन मी किमा। पनि रामसिटीका

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प्रसमातिपकरणम् [१.१-१२९ भामेर मेव मे मतितरविमा परन्त विमानम् ॥ १॥ पाया मराग मित व मातरमे ।।९बाबरीप एपरियो श्रिमाना मिनिमविषयवार देन नियमे गणमारवामा पमोपोनिमा पनि सनम् । १४. मामिलाह-बनिनियामिथिला मौयिन मोगायो सपना सावि प्रमे | भानमोऽमनीला । मापार मारणेनापि पारिवानामाभ्याम्के मानावः ।।५॥ नौमुरबार! प्रस्मेवपहनाप मान्ने बीमाणिमिणा ॥११॥ Tura || t..ारो पर मन मोरवागार परिषतिता १.८ उपचारमममै समप्रति नामसम्मानि पिम मरिनरपरिषः ॥१९॥ माया ARCH का मानिमा मनुमधिमाम् ॥ ११ । सिरिमामा मोऽनिसरकाAII, परिनामा ast परिणामाः । मामेवनीयः नमस्वाभारितात् । एवं पारिवारिमामविषमरितो बानुग्रहो तुनाव उन्नालागुना, निता । १११॥ मना रोपाप गुभाष विरामक Aथ प्रथमोप तिबेल परिक्षा ११२ विपिना ALI १११ बबरम माबमापना मा पेमार-मानसिपावित पौरपाना चादनी परगाववना परमेऽभरने मायामो दिन पिंपतिलिपिनमातीसम्म परे ॥ १५ बायोपा पचमे मंगवायो रात बमा समे, सपोनिषिपो बोलित वाया बोरिया नगमे । मेरा मान पाहत गेला वयानमा विवादमा परिमन व बायोलम Ara लापानमा पामा मापयोगमा सिपमा न पानिमाया, प्रकास निर्मवर पो पशुपति संतरोधि वायु, म पि नेप्पविर्मपुपो म पुनवे ॥ ११ ॥ सपना पूर्णकामा मालामबम भ प्रलमा १९८॥ भावना पालाम्पाला पतनियमबमारिका परमेन पतात व गोचरगुमनामममस्म । मायाम कारबा पार मोमिलते प्रमाणपातिक परिमिः ॥ ११९॥ सरकार परिमामयसमामा माप भासलमाण, मन्ना भरपो मनुस्माले भरिपुरका परमात्मदिरमसमिरमा ममिला। मोगा पुस्लीपमाविमन्बा मायानगला TRI माति व MANTाममोच । १२९॥ मोमबनिस सपनिमा ममातिमा सक्मिा रिमानविAANोजनमेमिः । वस्थापनामामाल सम्माविषणमास मामले सा मनु ममत्वबारक- बालोग मारतपथम किये जीप मम ॥ १२ ॥ गणामस बापत ममता मे पलथा वाचस्मसमास AT परत पर्वकारिन मा १२॥ प्रमेष मोमुख्न तिमिमा समाबमाकोमलव पूर्व मानापालेय पोषयमा मामोति ॥ १२४ ॥ सत्य (0) पानि विषयोयोग पुग्न पण प्रामो मा II IRH पोपु पाताल मेरेषु लिमवासरत बानु हागिनो ॥१५॥ एनबुतो गामड पदावोग्रामिवियामागुच नियम समुपपरम्प मापोटापुरमा बारा वास्तित्व मोडलमारी पारसमस्तिस १९सयमविप rotatta बनाम्मापनेपादिमा RIN | बामपरम्मा गरे रमितमामा वापिस इस योजना पमिस्दती मोगबणा बारे बहन प्रमति पत्र प्रयोगमा कालमान किय मामिला परवायाga Aवमरिन्दना पाखे तस्व अपORIGIRL Rastar पनि प्रसाचा पाठमालमत सम्यो A२९ विमा माननापन m

३.-१५०]
परिशिष्ट-१ मबरि
२२१
मार्च पर्मनिराम परिनिवाभिम्वन ोमनवान्नारियर्मचरनमाया एउपसमोर माता
मार्णमाः परपम् ॥ १५ || माघार मामको पठन इति घोष धर्मचारिमा सममिमा मेरे बातम्या
नेणापयमनाहि मधुमासगरि धर्मपिमम् ॥ १५१ रे पगरे मेर ममपानपानामिबिना पार्नुि
पारः सरगनबनारिवानानि हरमल चमारेमिरोवदहगवत्पागेनानार्दनी ॥ १५२ रोपेमानुर
को मात प्रत्यापपरेप प्राने रोग पति मात्मना ॥ ११॥ पियापरनमवितो बिन
सम्मो नमोऽस्प: पाहा: भाममे भादागबनमोनियाचा वेग विपिपहीवादरेष || १४ प्रम
बी मयस्स पोर्म मम्मामात योनमगा मनोवालपेपर्समाः पारखेगा योग
निरामुमन देवा मा संचार, एप मा एप बाप निरा धर्मानुगनिमामिलापप्रमो
सपा वर्षपठिमेर ति एवं सापुर विधारिपुत्रमातिनधिमुनायोगसारसरितृपुषारता पाता
पर चारनामे एका पा सापुरम ॥ १५ ॥ पियवाई अपवित्र गाउनेति !
जीपस्तमतिपमानारमाहमति पनि हो पा रस पिरस पान विष्पी बताना पाकर
मातिना समससमाथिा भासाप बल सार्या ॥ १५ ॥ काम्पुण कामगार सिम्बेदिन
मिवार । मात्राममारिल वाम पपत्प्रेग्मुई परिपतमेश
मगुरारीना गुमन
पुर्व । 40 पेत्र प्रयोगमुझेन गुना पौरब शेपाषा गर चारमन सात् । मोम्ब बस || १३.॥
भवसिदि का कार्य सर्व मरारो यारामनेन मारहमरि मै अपुलदोग्रगम
ममरेपनिमिया गोषम् । १५८॥ पम्पास्याशारविपिः ना पाननिगाबुच्या जाता
पत्त समास्निातः पप पतेऽपि प्रमादि: १९ भोपारमेन बबगारिन पुरस मोरको
मेमेन नखारते ॥ १४ ॥ बदमामा बोरकरमपुतोऽपि म स्नेहपुरगपति निको पासमापपरिमारक्षित
TR: प्रदेश समता प्रामागिदिगो निषित भगुममोजाबामा पर्ट
पागारबाट सम्मगुपति NA परमर्म मा माहारे मागररूपे सरीन मुग्मापार, पानी
निरपि, पास्तु चिये परम्ना माणिम् ॥१४ भागमा पनगाराचाहोरामा
पवनयापन मनापारि, पर प्राचनलामा मपातकनगमोगामियामाचार
प्रापमपास्पम् ॥ स्मारक परखनुपानिपत पुरषायोतपेवि र मान
परमार गरि निविते. मेरेषा, मीरा मेरा सर करतेप्रारमणे पुरविरत
प्रये मिसरपुषः प्रावितसमाधि पत्य मा पारिता एवेगममपिम्प गयोगादि
परिवामान् साम्टेन र म कान पम् ॥ 1 दिना गाना रे
बिना म.पणी कापेर कर्म परामर र उपमेय वापसमाति. मारिनma
भ समारिया शारीविनगरस पोबा प्रावेपुरापमामी सम्हाकिमान तामा
Rसंबमिततनिहारतातिलरिम पार पवम् न प्रपा प्रजान लिप पावर
पास मेवमादिरमिनलगिरिया ॥ १४८. भारिश्ममा मिनीयममध्नाय REAM
मारे नरवानानामणमतवा मरणत सम्ममरनामिन्नत मावि पिचर सतमेड पसार।
मयत समसारासमोर एका । माघातमापुक्षपणापनिवास परवामिबिला
KIR मावापता मपिता पाहिमामामा बानि पनि
पापा बर.
सपना बोरा Anापामारियोskan uोमनोज मस्सलामा
पिता पोर्ममा पनि प्रायम् ॥ ९ ॥

मरामरतिप्रकरणम् [१५१-१०१ एमाप्रपोमाम विषय संपामः प्रत्येक पोला ॥ १५१ मा प्रमिलते ॥ १५१॥ भागतिक मरा मानगुमाचा पगारमाय सलाय । १५. सारत मार, परिभरादाला, सम्मानः परीगरेताच तेम्मो मियो एपमासमेत मरेगो Nिमार पोरAnासम्मम् ॥ १४ ॥ गना बपुरसिमरामप्पात् । प्रायोमिलापाचारपानामप्रगनापुताराप्रमाभिावात् ॥ १५॥ वतारमानाम्पा-पिता राम ॥१५॥ सम्मान प्रामानिावर नोऽपि प्रमाणान् । मेगा वारसा RTE करे परमार बावर्षी प्रमालपान् मोलस पते मेरा पारखवानामपि मामास्वामान माम्बाति । भामरपिस्वस्मियाममा चि मेदाला मी पो । १५ अनुगराप विमारा । पागधरे गुमिमीन । मात्मनापितविपरमिः Indalोपरगन् । उरषियोऽ पुरी। रोडमक मारित बबरमा सामोसारः | का मन मोठिा समापुण्यमान्वनन्तरम्पारणानि मावि । टेषा मनकारी मिरपयोगा । म व अनुत Arwal । १५ । महिलामा पिसाप मुबारसा ।। पसमा । मागापुका परामर्मविजाना | समाचार्या मा पा । एसेपु मानु रक्चर जुम्मे R | रोगियावामामाने सम्बनमामो माति । १५ ९पमहमदपत् पानिमा रमानात एमबिममनोवाममारपसमिनिसार नादरा- मौरमाया ॥ ११ ॥ रामपापम्पों पुराने गदिममा मारि मारेन नियमामधीलपम्तेन प्राप्तो मबति निविमोति १४ मा प्रकामिारपो मेवा ताराबार पूर्व गमासमितिमामात् ॥ १५५ रितामे सनिमि मापुर पा का का बाजार परिवारपणन्दिोगनी किरणारं समायोनि, मुर। ति मारपरिकामा धौच संबम विपा भाचारानापरिप्रोभागपरे। पम पम । सो मममम । १५. मायामः ॥ १५॥ गुमगावागायना गुना जाना । परिमन् पुरणे ९विपासास पार चाल पेतनारि-बारत पुरिमा बोले रत्यौनु त गाईसेन । ममामला जमरा चि ( निमगरवाति) ute सारी सामान परमार प्रताप मलगमा मिति पनि बिनानि । यि दुरीम Art बहमति प्रान मारपी- मावि ग म Ut मोनई पामिर पुमरिय सामानमा मापाविगारका सम्परामापळेम्पो Als पापान सRN काम श्रेणारबादास्परसतिरोषः। मामा, बभि भिगारका मी मापारगम पास पयसम्म AART 1ो माचिव सरप मेरा माRAAT सागा पन दिनार समिममियम एसी सायत् । पपलिये मार AN AALEoot प्रमैना लामा तामा पपिपमपरिणामाचा पपिललमिमानोरकीला मारने पापाप र मोबा ARYोर भरपनामा परेरणारिला रिमयरपतिमनमा मायाम मोपेवरा बनेन मारा कोरगापापा । एनागरिक समसnatom RATAR Mdm मा मध्यमाकारितारपमानापमानोरम tam मोसमाविमानसी न मिया स्पा और चिमिचिमित पामारल्या १७५-१९९) परिशिष्ट-मणि २२० रामियोमा गाविपEिR प्रोटा प्रोयोतानातानमामि । समम सिबायोपोगोन पत्रिपनोभामेरेन मारलचा निरसमेवाबलेनियमागपशर्मवत् । मोरन्दियतनो ममामा पर्व मनोपरन् पपेम्बासमा पाई बिनादिमि in पाधिमाश्रमाविषमतावाममहामना । एकाभिचनिगो पान । माग मुरलनी, पर्मोपातमे | मार मारोमा माघापना रणना मकानमामिपमा पराभूषा । दिनी गावि सियो धनरचारिणोपचारमेदात् । मुस्ता प्रविरिकारमधमकगनादेन्तन । सामायो पातमा पानिमन्तरस पिपानापावारपारपाचपोऽपि । न मानेन अन्लोसियतमामवासिवाना संरधि वस्मात् मोवाया स्वभारिखनुमक्षमा निविषमेरा दौरारिक मनुष्यावसन वापि मनोनाबाEिमहिमिम मिनि मारमा मnिt... बारबम्परमारोन्मार्म परमात्मा गप्पचे काम विधिरावासपामनिरस्ते मूह गमप ममय माभिमानास्पना BAपरिसम्मको परमाणसापनमा पन्ति । स्मारे माता मारा परों घमा महम्मति नियतम्बत रवम् । १८ ॥ भाषमारिधर्मस्मानुए पिनस्वरागिन मानवर शिवोगावनि साना मेराना मा विरामस्थितिमा पनाना गरमा एरिया नयमान १९ माग माम मामा म मामा नापति वारिधि मोग ॥ १८ ॥बिर :, Ara माविमापा मारा पीपादसा, एकान की मानि ॥ १८९मालपम्वे धर्म प्रवमिमुहार मानियो का माले भी पवे परावरिपत्र परमेय व माननीमराणी विमानाने एकान्तमा लगाने कम पापना पसारनाभोवा बालीबममप मोरपम दोस्तपोः प्रचारबननी बयबननी माग १८||पियवे मरवारिकियो म प्रामठे मा का बनी । तर प्रममे पेम्मो मराज एवमेवाम् ta| ARIES ममाम्परिन्यपाल, मटेना पारेषगुनका नामापारेष परियोन बापता प्पम मालम् ॥१॥ नाचरमपा-परेषा पाने बाप मरामित्वाति तात्पनि मिल्ने ५१०५ सादर मनुमिति पारिवामिविरसारण गोरेय ना मरेरमा पाबना पराक्रमालाम AIR I tan गोमातापिचान लिएपनि निमीतमएम मा इस ममपर एममपित कर इत्यादिना। पप समाते परियाबारे । लिवाAAषः । ये मरमरिस्कार १८० ॥ चापनस्थ स्थ तामणे परिसरमेन बालस्त पाकर बोन - उमोर गावं सपनाममुमो विरासतमाप मगर मोर दा सबिरामेवापसम् १८८ 1 बाबा मोगदान मोगा कामापा १८९॥ CwR AIRjसायम्मानार-प्रसस्नेकपरेशमा रोपपम्पमा पुधा शिरा । रिपो परमार पमित मिसानो सम्पादि मनोऽधारणसम्म १९ । समानामे शविरको मोनत्तिारनपवा माता पोवा वर्मा बस नहरमा विक्षयरोगयाग बास रिपतयः मैगुणगोषमागसम्म पातलोवपार, सविशेषावरण रमे रखामापाषा पर्णपारम्पषिसेवा । १९५॥ सपोम मेतराशायरनमापार. साहाये रसम्ममोरगा तो मनोपयोगा पा १४॥ कान महान महायो म मोरोपरखतमाता मशाय गालि १९५०मोरविहाबीरातमनामुमो नमारिवारी पारिवामिगतमायामम्मत्वारिकममममसविस्त, एमाला पिगमोडम्योरपामारस्ते भौमिक मालबारिमाला समालमारिरिस्पा मोरया १९५ पवार प्रेमारा VIP माला मिपात भागने मस्त ममिता हे गौरपारा प्रामातिप्रकरणम् [१९७-२२० RI बारिमा चिनिषद्विपकी माता, अन मोरवरिकामा समापि समाचारियोपगमरनानारियमदत । थामेरामारपरिण, माताशिनानगुरिन रामरमर समात पारित नियतिमेदि । म किन EARTHपाएमेमन एपरबमारस्वाग्यो तित् ... मिणमिदिमियो, मात्मा स सान मा हविषा कm, नुस एक गप्रोतिरे ममापी रामारमनापामा एमागचा याममा १९८॥ प्रमागामा रोगामा सयामा रमात्मा पारिवारमा पारमा माना पा RABा सा गाय-बचानामे समान नागनामयमय पर AREAP पिसाबमोमाग सपिया arhaराम्मा ३ बोया मोबानागरानोलारिषव मामा बोयामा बाना फगाACTRO Tगरमा चारपाना . 1 मसारण महासम या दो शावनमाया माया पारिवारियाना पनामा समानानिगरपगामे ला TARIRaनबारपसमाबी fन प्रचारपा ११॥ एत्रो fasum प्रतिपरिवाना साना- toभाष देना ador Ang KIRRORIचिसियोपो पाये un. tarमा मात मुरारित पमपान मावि र विमरोगर माला र सामराजे act, मोज AROIN Art R सपरिमानिसमा सरमा पर भोजन बनाए मारिकिसिरिसराम pianarts गन् । PHOTO माति पर I ala fath Aama Aile ale Ravid H बसिनाम् .. नावापासपो पाया। पोhdsir रस ॥ ३५॥ पानीले पल परा Materaturalnuarut prATatt HERE fair १ ममागिरिमा मोadatd. MardinmeHARASHIROIRatarian rudr Raftatinators, gnent main felmपाकिसme HINMAmitun PuTRitertARAT Heartpagir ॥ १९५॥ Oman at Prem ramrem umar | रामा IT Iturri (411441 m marge fil 1411A Akaun Hayo 163111** tus Asi mhygte are free dort erform बरTIOnanewATTRIChe. ARMA ANTI पासागाani m umruthame PRAru.१९८-ARMITT THnet भार । NAL ... AATMAIL ५ सय १११-१५७] परिशिष्ट-१ मपति २१५ पारिवस्व मंत्रः पा । उपचान गोहानादिन सम्पर्मप्रणामापः ॥ २२१ दिपु पयेव परिणाम स्वमिति । २२२ । पिया बिनोरिकामपाम्पाठः पुनः पुन || २२३॥ एकदमका विस्यपिममो मिस्रपरिरः विपरीतार्षमादी प्रत्ययो विपर्यय: हमारेषा। २४ ।माभिनियोपिक मशिनम् ॥ २२५॥ मनाना मेवारियविधिमेरा उतरा IAपयो गोषये मतिभूत्यो सामान्यतः सम्मेषु करनेषु । अभिरूपषु । मनापाक मनोगदम्मेषु । तु मानवियु । भानियमाप्रमाण समिः । एतस्मिन को मुगपरेका ने कियमित माग्य मबनीमानि | पलारि वापरापावालपरवाना- पत्रः ।। २२९ - मतिमुवानपवा ० २२० । उमो पगाविसस्स पायो वामन मा सामाजिक प्रापजन परपोर उधरपपारस्थापन । परिहर परियारलेन पर मोमबनिक परामो बोमरूपापः एस्म पपनस्थानपनि जापान पाम्माम् ॥ २२८ ॥ अनेचकर अनुयोगैः कतिपय स्मारिभिः पमा प्रारमि समनुगमम् ॥१९९० एकस्पाः समापनारि ममानेऽपि । मतिः पूरमे । मोजमार्योऽपि मुकिस पकोडीन सिलिकामदेवत् । २५ । चारिमनशम्मम पारिनामे ॥५१॥ बी एणका माषपनि प्रत्रिमबागेचमाया ॥ २९॥ तमरवाना बश्वापारापनानाम् ॥ २१ ॥ समक्तारिपरी रेष मनन । यो समस्तारिषु । परेषु साप बिषु म जस्ता प्रीतिः । उपप्रास्तनिवासापानमनानारिपरारूप: उमावित लास्र्य समरको एनेगा करणेन ॥ २३४ ममेव प्रपत्र पति-शुपाना शनापना पतिपु मममस्तावनीरत्त । मन्तबचरम एष भेट । २१५॥ प्रथम एप निराला सरासरे खस्स पोरवस्थ दिसाय पुरामुरनरअरमन् । २५६॥ नाति मन प्रापितं पावितम् ।। २३० निाचा परस्मित्राण वाम् ॥ १८॥ शीना विपमा परिचाममम्ममा मासम्म पखमेष व मचा बारे इसष पगापाहमकानि । २५९ प्ररोष प्रार्प मम्मपितोऽपी कि ॥ २४ ॥ मी मरवचम्मकी, एकाकी नमामो का पये रसामिप्यनि पा सम्म मन्ते प्रमाणामुरको मिया ॥ १४१० मारिन लिम्वर मण्मगुगावाप्पातारा सेवा समूहस्तेन विम् स्विमिममम रेषमनुम्माया र २ रिता पपविरमन वर्मप्यानारि माचना अनिवासापाः गोवा मारामारियापा, नुमेन । ५४ । बर्मात् बीरमा १ "मारिगरा मनमा । । परमारणानुमतित्रयम् । मोपचमकारत्रयम् ॥ २५ संसारमाधमुखापपारत माता रिमा (वाग) पूरनुअखिम समस्यावाति माम् । पर्यभानस्ल मेरबारमार-मबुदिपर्वमा पीस्पयरचन गवा मा यो उमा भनिन । पमितमिरागरिपामा पाररित मकरंपाविनमपस्मो मर्माधिमा चिलते सोऽपापनिषता । १४८. मामम्मी पचतिषिमना, एम. मा NिAIRATRI विषाको रसा मुणमधुरत्वादिस्यमामुनिन्ना, अम्माचा पसा भाभ सिमे पामाकारानुषिकनमनुगम्न निम् ॥ ९ ॥ नित्लोशिल समारोपरि निमरे पति पास म पा मिस ॥ २१ ॥ विरची पपा मूत्यै बन्दुसमक्यों पस्म समस्नुस् राशनमाम्य पारमारि लानुवमानः परम पनि सो बस ॥ ५९॥ रमाभिरते: एष ग्याप्रियते । बरि पीक पति, रामप्रमत्तल ॥ २५५ । सत् प्रमादरपोषित समापन निम्ममानस न बामभूतम् ॥ २५४ ॥ प्रास्तारमवारपरक समानत पाविरमानी सोमवाल समापभाषा प्रयका बागिनादिविणेवा, रास्नुषामादपि नए वादमा पते पापा बात हमलापमास पल ॥ २५५ । लिविणापामाहाए मगुमगीरपणा नवारा सपमानापनमवार मा कापुरमा सामामालपारिमन्नै प्रातानामपि । नुरिममिय २२१ प्रशमरविप्रकरणम् 1 २५८-२८१ स्पोऽनुममयानुमतिमिल्वाभिम् पा सरकारमान मावस्याऽसति मी । १९८ । प्रत मपि । एकनिमविवार राम लामिमम् । २५९: मपपोनिमारोन् ममस्मन् प्रथम बनन्यानुवरिको पालामालावरपालिसाचा जो सिप्पासमोर एष पान GatsAR समी समान वसम्मग्मिपाल काम विभम् ॥ २६ मत भयोगपमित्रपुवा न्यो दिवसकताबार ॥५१॥स्वरमारि समूग (बिते) विपतिसमौ पातायो मावि स स सानियो पतो मोमेन , म नुपम्सो नाचारि लता प्रचमिपुर गारनि मायामा पूर्वपद्रो सोपी Ad मम्मनुपमको मात्र पावोरमावि । पद्यमामिणमिा करि एवं ममानित। समन्वगु गोबत । मोऽअनादि । व एष हतितम् । १५४ । मनुपाता परमवा माना गया मागे रोत् परममा लात् ॥ २१॥ नमः मत्वेन धर्मपमेष, बरवाय एकोऽपि नाप्रम | स. पिया मायनागात् पल हो निमय मवति ॥ ११ || पसिनावात् बन्द वापरला मला पुगपरेकामारब ५ वापर ४ बलपानीमापास८ साबमपरमान- वात् नमन वामाचात् नाति स्पनियमितुमचलार मनुपममपयवोमारता मागुरमीयमानी- सत्चत् निरपोष परिपूर्णत्वोपचे, पूर्व पाहिल त् मावि भापि मतिपावनमानात् ॥ ५९ भारम्परिकामे हलगरपरिवार गुरुपर्गरमपम, मानिनी पुषा अपमाविना गाः It taste ) २. जपनिसमचतुपा मोमबार मन पनि भागम् । २०१० मानुपाम ग पोरोम पस्तिचरमभरपोषमाः ना दमननवाद, पना हनीम कर्म तुपमा माइग्रेरणा यामते गुमनामनामनातभावमचा र मेवाला । पिस्तम् ॥ २॥ मूवमतमन्ना पाहता परमाने कपाट पूररोमान्समापन पर फरम्बारनायकम्पा । मपनि मनातप्ररेणन् ।मोरारिषगरीरमा मात्र समायो: करजेडी । प्रवरचषयमपोगान् विर्य र लियो यो मापन बुक प्रल मोयो मे पति मोमनिरोपमुपैति प्रायोति । पषम मनोयं बनापत्तियतिसम्मलाई पनि मनोनपार जना पत्रात नो मांना प्रथमचमाताल बलमनोयोगो मनोवलंबाप्रमियाना समासहमति भयो मगुपया प्रतिम निसी मनमर्षापा यो मति निमाकार कारिया मारणा रामदारको ममेष रामपिसिम्बो ममममममातमोजमापरेको अमर पापी बाबामसेगुना निमः | समभरोगनिने नमक उनियारतमानस गुचीमा पनि माविमचापपरोपकाते सूतीममा म विना- साविरमप्रतिनिक मारते । बस मेणे सोषिपणीमात्मपरेमापनमावि रोग पापाय! (पुषEEMARATति पान पावर परसम्मा १८ । परममममनुपम खान रोपाप्रमा बस तिपिपा परिमाया हुवीरसिम स्पून नाना पानामा १८१ ममबार र तत्सना मनोगामा सानिमामोपमा पति महमु गामा परपसारमा- उमगणात एक Raatruth साना मार लाम मागार समाचार बारामबापानानुसाएपण एपारपारकर, मिra सा मानना पस nid पवममेर गएपोटापापित जाति २८१-३६] परिशिष्ट-२ भवति २२७ मोजमेणापुपो वाभिमास्के, निओर्ष बिममा मन्तगतसमप्रमाणादा संसाप हम समापन बरसागुषमुत्तरोतरेषु समवेषु ॥ २४ ॥ परमकर्माखानुधपती पोरमा विनापपनीष पुगरदेश मम् ॥ २८५ ॥ सगरिमोम्पपारम्पयन, न मानसोगान, मोरारबारिणरोगना बस्ती निष रहि ॥ २८ मामेनियति, मरिचमानसपा, मणममा मप्रनिदगतिः ।। १८० जानोरयोगेब वर्तमान क्सा परमुरगार मिदानामिति ॥२८८ मस्मिन् हिरोनि मारिहाला मनम् पुनापामावात मातापात पापति A पारिकात मुठ मर्मबार || २८मुचम् पोषोऽमानोऽवर्ग सायस्प शानदर्शनादेगात् सोऽविरा बा आरिवरपोपात्तनसोयोमान्दरपुरेति पाप्पुरोग नाम्मा पिते मलबत्ता मारा। स्विमगम स्मोऽरने कि रसत उपन् ॥ २९ ॥ बारेमविति मसिवात् मनुनारिमरकारनामामामात् मनामधात् मुहम्मद मनुषमतोलाम, मदिरेष संचारमागरमाला परिवारपामागार । २९१. मग म पनि गुमनामावात् । मधयोऽ मातो पामुकोऽपो गति । मेमन्तारपि पायो म माविका उपमापरिचर्मरम्मा- मावा । प्रसारका पानपा या सम पावि उपमहामावात् । २९१ । पोगो मनापमति, मपोग पारमा कमा रमाबाट ग्यविरहित । ता निरस मुघरो मेड माविमति पिपापरासतम् । २५ मारणमामिचम्म व्यापायमायेऽपि प्रवपत् एफडात् सम्पनुषत् परमसात् मनमबत् तृतीये पप्पामे पकिराया प्रोपेन ॥१४॥ परमाना प्रवनीतापक्रमास प्रस्मेन पेवेनि विवाद । २९५ पसरणासवमृतिः। एतेन मनाना नातामा निशाना प्रापिमालाऽरिपार उपरम दिनारामेति गपति । २९ मत प्रेम। म मामा' इति बातोमान्ति पानि लिपि बस. १९८N ROLI पापम्पेर गुरस्नु पासारिष इतेषु । १५९॥ उत्पधिमात्ममम प्राप। दमानि । कन्या मारिष लिमयो पनादि । म पुरण अपरि मासमा मा । हिरोलविवारिक वामि संपा। मारितोणत्या नो पसल 1 पर मनुमच्या सगPIRas | ॥र मनुपर मिनामये मनुमा भबन नियम । मसिगातामिरेषा, वन मा गुरगुणा RIA मनाविरमानिनितिगगुम्वानि मावना माघमावारिस हापण एमी रमित बालि मनो बसपार रसुण भारत पामिना सेमो वितिसमपरा पुषिमारिस्पायरोगा । मारिसितमतमसमार। सो बस्थिन् बोलिभारिसमागम पिसारिए पनि, मानसिक, सामा सरा पति पर रिमु पर्ममपरिमान रणपाणिमिरियमनाम पारा भारती प्रोमा तोरणालामायिक विव रिचय पत्र मारपयोगमा बिमसपर MICRORENRपासकायोप्रमारिए गिरोदेशासमोयो प्रगामपुमपूरपागा पारिपरिमोरोपमा मापाचनतनवारिता Rमा बारिमारायवरिवार गोरा साना साहय साधूनामरिता मग प्रारम् ॥१॥ स्पति रनि मारवानि वामेपागापति परवाना देशमा प्रामारिना मालमारवागनुपर समारादिसरा विनिता Nिa HTAमारेष प्राचनमोनावमा रगण सपा प्रथमे पारितोकिदिनि राशतता शामिल IAsस्त, गुमmamta मनमाटो मारमय प्रा सामुण्डेरा at IINITION fortोमेन एप विरामारामाभिमुनीर प्रमो नारा भरितिका पानि ।

२२८ प्रसमविप्रकरणम् भारमन्ना तामायदेव विमानसासतिमिलाप स्मानानुम मुखम् ॥५॥ मारेगापिकविम्य स्मीमापारिक सम्मतवारिगुपच ॥१८॥ मनुपे ॥११॥ तिमन मोबान पयित-पम- करिन सिमपर्मप्रविधिमा मसावि मरासिय नागरिशामिल प्रपमाला ॥१॥ नाममा समनपरत साकाः ॥१॥ एमविपरमेऽवामपन मोरपनाविमा मा परिमेरमित्र, रसायात, स्लायमि मन्तिमम् ॥ ३१२ ॥ श्रामिकमुखमूहकार नमसम्म विनियोलस प्रयकर बल्लादिराम दिगने बनमिन बममनुमति परिशिष्ट चरिकांप पृष्ठांक २२२-१५५ २२१-४ -प्रशमरतिपकरणकी कारिकामोंकी मनुक्रमणिका। कारिका पठाक एतेषु मरस्सामेषु मागपत। २५४-१४एतेरपणातायो पो मम्पारमनियो मू- १८-१९ एमिर्मयः स्पान मनपनमूनोदरता २४-१२ एषमषिपामामेको अपेक्षा मोनिका .१-१८ एपमने रोना मम्बोबसबनाबारिबनास १५४-१६ एवं रामो मोदी मपरिमपिष्गुणदोष एवं रेपो मानो भारपाय हम ११ -४ एवं संयोगासबहुताये भबिसेबारमबोपा १४-१२ एणमुरमेरदिपमा पाविपरवामी भी नएमममसर्मपालानु २१-१॥ भोमारोहा मस मूलनिकम कर्ममा मापापप्पयनोच ११९-~८१ पमपरमोपम्मि भारमारामस्थ २२५१-१४ कौरवाना भावापापम्पुरमा ममे १५-२ मारमा ममानिर्मच भात प्रापन १४८-११ समिठमपुरमा पारापनाला १५-१५ समाकस्पाविषित भाषामुपगारवा १५-पिनुमोपि दिया भामेरमा छेपनी १८२-१२१ कास्तो मापरिषरमरावाविषय १४७-१.१ कारपयोग बचत कार्याधनियम कामूकाकामा १८-१५ का माना रवि गुपोतविपर्याय ११२-- भिवपुर्व स्पमाप रत्वेस्ट पाप २२१-१५१ किमबखन रवमयमा सनि १९-२१३ महापमापनका पानसप्रयोग १५१-१४ पात् सारिवाति पषियोपामियप्रयोग १०- बोम मि पास श्रेषत् प्राविषिमाध १८५-१९५ धारिगरकर रोगो १९-योनिदरमुसाल २९०-९५२ ४१-१२ उत्पारमियमनिस्पात गरपोरयमनिमिचे २-१२ २४-trt पारमाबिनण ८. पतिप्रमेडिवाकार म परमात्मा -१५ गुषपचास्मामामा re-६ कार्यालय बमोपनको २२४-१. 6-१ पाममसरप १९-४८ प्रक्रिया एततमपर एरोतमारपार मसमरतिपकरणम् कारिक पृष्ठ परम सम मागन् चम्पारतमप्रस्थापनात ४-१ ११२-१ १५-4 २२-११९ सम्मबराममोर बम्म पापमन्यु जानिएस्सरहाम बापारियोमा बिनविणEAR मिनास्पषगर्च बिमाबाबारा मिनधिावा पानान् बाजीनाममिति बीपालनमा बोलबाला पुर्ण चारपारगारगाव निम्ममा द त्यापनापति पनिषदिनधि प्रमावरनि पसचिमर्पित पचारपरम्पक पावरमपुरमनुकम्ममा बलापन हमारामपतिमा मारबोपना उत्पाबरवमय परिक २८५-१९. शिवरामपपरामा भाषापयो ५८-ter सरिति १५९-१४ पुगतासनिरन्तर --२६ पुविधा माणसवये ८ -५५ एमहिमा १८-. दुम्पमवस्था १-१ सम्मतिमा मना २५ -१निकाय ११-२१५ो नागमणे २-३ रोपेवा परी २१ - दापति राय १ -१८ समरिक पाएमा अपस्मेबुपचार १९ -१२२ मापारमाबुप २५८-11 मारपोरि मल्ल १५ वर्ममयमा १५४-११५ पसया पून .-८ पर्ममात्रिय १९-४ वषर्मापान १-५५ वर्मा १५५-१९४ मावास्यु ८८-१ पौ बाम १४-१ बमोबस्तासादो २५-१५मा मामी २१५-१५. महाभियविषयो मरकमेव गुणहम्मद २९९-१६ मानो औषतिजमारपत्र २११-१४८ मापनमो नापश्य 16--1 मामेशपाया २५-१११ विपरिये ५२-10 मोमिनमा २१४-१५ २१२-१३ परेसको नपुरको पानामा पकप्रमोद वोएमा मा ववाद किया ८५-५ २५१-४ जम्मी विधवार मारापरवमरेष पनि २१४-१५४ हमारमा २५३-१४ मा बाधिषिोता ११-१५ वाच शबराबरत मागापासति २४२-14 परिवारका 1-40 १२८-40 देगामवरणमा सालापान परिसर रपापिष्टमपिन मालाममिया पभोलीया २॥४-१८ सयमांपाच १५-१४ पपारमारियो m- परामरामस्थ २५१-१९८ २८-१९ २१६-१० ..-1८ परिशिष्ट २-भरिकानुक्रमणिका कारिक पुण्य २४-९१ ०८-५५ २९१-२४ १८०-१९५ ररियामवर्तनानिधि परिशहामिप्रवाहार मिपा पम्पायपादि पिणेचानिराकर पुसकर्म संवत पूर्वरनिवजा करोवाचनपश्चि पूयसम्पची पा पूर्वपुरपसिना शिरा पूर्वपयोगतिरेक्ष पूजमाबनामि पैचारिफमायमान प्रकृतिपयमनीषा प्रपचनकि मुम्सम प्रचयिताषावस्व प्रथमरविनिमतो प्रणमाम्मापाषाणा प्राणापरवमापन प्राप्त कम्पकाव प्रारबिचप्पाने पाव बाबोधी बस्माधरः मिम्मिमा पायापन्द्रिमुख बाबस्वबमाबचन मायमिरमुखम माववितापमानाबम माया ममतालो यादेपाव गरमाग मोममुसा ममिले ममकाएकाप्पावा मस्कारमाराया मायमूनि रिमामा माय मूला दिगमगनी मन्दवरामनियमच्य मानुपाममा मायामापाप मायामपुरको मारपेपमान मिणतारिमन कारिफांक पृष्ठांक २१८-१३ बपावधीपाडा १-१२ वस्पुनरपवार १५८-९५ पाया उत्स्वनामरण १५४-९१ पालाचारमति २१९-१४ पारिमेषमाइपनिोऽति २८४-१९५ बम विषयकासोन्दर्ष २५ -१८ बामोरमधमत्तान २५१-१५२ परी निम्ममामा ममत ११-१२ पपपपगीता मया २१४-२५ बचपनन्वयमपर्यबाप ३१-२ . बाहाकारामई १२.-८ पपपपुक्तपूर्वमति १५-२८ परिपपाप मात्र २८१-१२५ सत् परिचवीर १२६-८५ वरिपरिदविषये ३-२१ परवरबिमरमसे २१५-१५४ सहपरिषरमानः ६.-४१ बरमावायोपोदतपिचान बत पुन महिमा ११-१२१ बसाई पौर पामाचा ५-- पा पुनपापबोरमाणे १४-१५९ सारगुपोषगरकारी ११-१५ वारस्वरिपरि १४-५ पासुरवरबिरिस्मर दोत्तमाता १९५-योपनिगवानबम्मानपद २:- याममा १५१-८५ १८ - पोपों मस्मिशास्तू ११- पपोमोपस्यसमेत २६०-१८५ रायोपरियो १५१-१. रूममुहिमपीड "-१५ वावविर्स १५१-१११ मेगमेकम्मापक भेला सलाबा २८-१९ बिना भरमा ९५---47 मिना पणा ५-२५ फिनयमपेपन १५-१८ दिमपान गुमान m-५ विपरिबामनियमो विसपमुखमरमिका राममायस्थितम २१२-२१५ वर्षमै पारंप १८-१२८ १२-८४ २५-१५ २२-१२ म गापुम्पासषस २९१-२२ २२-१५४ २ म र १११-८२ १२६-८ .२-५१ २-१५८ मिप्यत्रमागरम्प मुका बामपः प बबालमनशमिह २१२ भामरसिपकरणम् कारिक पोक कारिक पोक बम्भावोपास्मरण ११५-१२ सामान सपनायबाहन ४५-11 मायानिकमिसाप २१८-१८ पामानिरवरियाम १५-१६ मानिसला भारतमनन्धमानठिसव २१९-१८४ लाम्पतलापानगते २५-17 वायमाAaमरव -बिरे दिम ९८८-१९८ बामामामपामापने १८५-१२८ स्माभिरमप्रविधि २८-११४ पाठमवामन १८८-१५ समासान्तमार पातिति पाकिपिविनिर्माता ta-१९९ोष मनोवालात शिखामोपदेय भाषा २२१-१५९ कमारिमय सीवस्व पारंगता ११-१0. सचिन घामावापुर मानाचारमपाव २५-१-चममेडमिन्ना १२९-८८ हुन्धुतिमियानक ४- परमण सुसी भीनयमपूरमत्त २०-२१ संपरचरनी 144-१५ पावसामया ११४-व्यापमान २२१-१५५ सम्प्रेषमागमाना स ४-१९ मारेको वानरचनावाद १४-२५ सनमायुमसम्मा १९०-२५ परियोपतान २१-१४ मेमाल २-१८८ गरपदापत् वगुणामाराम २५-११४ २.१-१४८ लामुलानि परेशान १११- सानपणाप्त २११-१८ लूमावचीय उपचार २१-१५२ बाबारामतक उम्पनील ४-५८ महामारीमम्म माम मम्मप्रार २.-१५९ सरितमानस सम्परम्पनीर पो ११- स्वपोप्रीपरी सभ्यरितीनीधा- हाला याबरक जमुम्भ ९९५ परमानमुपपता स १५-९८२ यहिबगर १९५-१९. परिगरियाममा १२१-८३ भरमालामा ११-१८ दौरचनामा २.१-१८५ मातापिया २९-२३ पत्ता मापरित भ ८१-५५ चम्पती २९४-९८१ सानासमेचबिम्स्पे बसम्मान १९-२१५ धर्म धनपत्र उपविधिपयवेणु MARATरसेनु पौरातिदमेहो २५१-११ पर्मनपावरमा २०-१८९ बरमबलप्रमाण ofरपथगुरु १५-M बनी मषिमनामनिपान जरियामनुपम १८९-१९९ भारम९ि-(पी अमाचारस्परम इति विपी) परिशिएस्तव या उदयों मनुस्मनिका । पवररेवानि कारबप सबमल २८-14 बबालभाषानराम्। १८९-१० कम्मच रिप्रेमी मूह परिप्रहार बम्बाध्यता(पिपी) बेरमा समेन् भरकम-पर्चा) परराव ११५-१९ मचाईमालाई . मम्माम्मे-(पानी) ९११ सदिबदो विदे--(पनो) ८-१०

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Prashamaratiprakaran

Author
Swati, Shrimaduma
Title
Prashamaratiprakaran
File name
Prashamaratiprakaran
Text
OCR done
Citation
1950
Published
2011/08
Publisher
Bambai, Ragunath Deepaji Desai, New Bharat Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
244
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314118
Barcode
99999990312264.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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