Sanmati Library, Jaipur
Samadhitantra
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विषय-सूची
विषय
पृष्ठ
१ समर्पण
२ अन्धके प्रकाशनमें धनकी सहायता देनेवाले सज्जन
३ प्रकाशकके दो शब्द
४ अनुवादकीय निवेदन
५ प्रस्तावना-
१-२१
[क] श्रीपूज्यपाद और उनकी रचनाएं-जैनेन्द्रव्याकरण, वैद्यकशास्त्र, शब्दा.
ववार और सर्वार्थसिद्धि, इष्टोपदेश आदि दूसरे अन्थ, सारसंग्रह
जीवनघटनाएँ, पितृकुल और गुरुकुल
१-१०
[ख] समाधितंत्र-परिचय, ग्रन्थनाम और पद्यसंख्या
१०-१९
[ग] टीकाकार प्रभाचन्द्र
१९-२१
६ प्रस्तावनाकी कुछ अशुद्धियां
२१
७ समाधितंत्रकी विषयानुक्रमणिका
२२-२४
८ समाधितंत्र ग्रन्थ, संस्कृत और हिन्दी टीकासहित १-१०५
६ शुद्धिपत्र
१०६-१०७
१० समाधितंत्रके पद्योंकी वर्णानुक्रम-सूची
१०८
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The Vikas, Printing Works Saharanpur.
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सामणि
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जिनकी सत्प्रेरणाको पाकर मैं इस 'समाधितंत्र'
अन्थके अनुवाद-कार्यमें प्रवृत्त हुआ और
सफलता पूर्वक उसे समाप्त किया उन
धर्मप्रेमी, विद्यानुरागी, परोपकारपरायण,
त्यागमूर्ति, पूज्य बावा भागीरथजी
वीके कर-कमलोंमें अपना यह
अनुवाद
करता हूं।
सादर समर्पण
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विनीत
परमानन्द
जैन
M
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ग्रन्थके प्रकाशनमें धनकी सहायता
देनेवाले
सज्जन
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इस ग्रन्थके प्रकाशनमें बाधा भागीरथजी वर्णीको प्रेरणाको
पाकर जिन सज्जनोंने धनको सहायता प्रदान की है वे सव
धन्यवादके पात्र हैं। उनके शुभ नाम सहायता की रकम सहित
इस प्रकार हैं:-
१२५) श्रीजैनस्त्री-समाज, पहाड़ी धीरज, देहली।
१००) श्रीमती शकुन्तला देवी, सुपुत्री ला० माडेलालजी जैन
रईस खतौली जि० मुजफ्फरनगर,
धर्मपत्नी
रायसाहब
बाबू किशनलाल जी एडवोकेट कानपुर ।
५०) श्रीमती जैनमती देवी, सुपुत्री उक्त ला० माडेलालजी,
धर्मपत्नी ला० दर्शनलालजी रईस देहरादून ।
४०) श्रीमती रामप्यारीजी, माता ला० कन्हैयालाल जैन
हलवाई घंटेवाला, देहली।
४०) ला० स्वरूपलालजी ठेकेदार, घरनावा जि. मेरठ।
३५) जोड़
-प्रकाशक
FE
प्रकाशकके दो शब्द दो वर्षसे कुछ ऊपर हुए श्रद्धेय बाबा भागीरथजी वर्णी वीर-सेवामन्दिरमें पधार थे और कोई साढ़े तीन महीने के करीव ठहरे थे। उस समय आपने इस ग्रन्थ- को संशोधनादि-पूर्वक छपा देनेका काम मेरे सुपुर्द किया था। वीरसेवा-मन्दिरकी नई व्यवस्थाओं के वश अनवकाशसे लगातार घिरा रहेनेके कारण मुझे कुछ अर्से तक भापा टीकाको जाँचने और उसमें उचित संशोधन कर देनका कोई अवसर नहीं मिल सका । कार्यको प्रारम्भ करनेपर भी बीच में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती रहीं। आखिर १४ जून सन् १९३८ को १६ रिम कागजकी-बिल्टी-सहित ग्रन्थ प्रेसमें दिया गया और उसकी आधे करीब साफ प्रेस-कापी उसी समय प्रेसके हवाले की गई और शेप यादको भेजी जाती रही । जिस प्रेसकी योजना की गई उसकी अच्छी ख्याति थी और यह आशा थी कि वह समयपर अपने वादेके अनुसार काम देगा- वादा भी अधिकसे अधिक डेढ महीनक भीतर ग्रन्थको छापकर देदेनका हो गया था । परन्तु प्रेस एक लिमिटेड कम्पनीका प्रेस होते हुए भी बहुत ही गैरजिम्मेदार तथा अपने वादोंका कच्चा निकला-उसने एक दिन भी अपना वचन पूरा करके नहीं दिया ! हां, इस वीचमें वह कुछ आपत्तियोंसे भी घिरा रहा है। कहा जाता है कि ये आपत्तियां उसे अपनी पूर्वमें की हुई कुछ राजनैतिक संवाओंके उपलक्षमें उठानी पड़ी हैं, जिससे वह क्षमाका पात्र अवश्य है । अस्तु, प्रेसके कारण मुझे बहुत ही हैरान व परेशान होना पड़ा-धीसियों बार स्वयं सहारनपुर जाना तथा पं० परमानन्दजी आदिको भेजना पड़ा और उसीका फल है कि यह प्रन्थ इतने अधिक विलम्बसे प्रकट हो रहा है। इस विलम्बमें अधिक नहीं तो ११ महीनेक विलम्बका जिम्मेदार प्रेस जरुर है। इस आशातीत विलम्बके कारण उक्त बाबाजी- को तथा ग्रन्थक प्रकाशनमें धनकी सहायता देने वालोंको जो प्रतीक्षाजन्य कष्ट उठाना पड़ा है और वावाजीको जो विशेष आकुलता रही है उसके लिये मैं सबसे पहले क्षमा-प्रार्थी हूँ। आशा है वे मेरी इस मजबूरीके कारण मुझे जरुर क्षमा करेंगे। यद्यपि प्रसकी गड़बड़के कारण ग्रन्थकी छपाई मेरे मनोऽनुकूल नहीं हो सकी, फिर भी इस ग्रन्थमें संस्कृत टीकाकं सार्थ जो हिन्दी टीका प्रकाशित हो रही वह अब तकके प्रकाशित अनुवादोंसे कहीं अच्छी तथा विषयको स्पष्ट करने वाली है । साथमें प्रस्तावना भी कुछ कम उपयोगी नहीं है। एक अच्छी स्पष्ट विषयानुक्र- मणिका और मूलकी पद्यानुक्रमणिका भी साथमें लगा दी गई है। इस तरह ग्रन्थका यह संस्करण अच्छा उपयोगी बन गया है। यह सब देखते हुए पाठकोंका ध्यान छपाई-सम्बन्धी त्रुटियों पर अधिक नहीं जायगा, ऐसी आशा है । यह ग्रंथ बावा भागीरथजी की इच्छानुसार ही मोटे टाइपोंमें छपाया गया है, जिससे वृद्धावस्थादिक कारण मद दृष्टि वाले भी यथेष्ट लाभ उठा सकें, और खुशी की बात है कि वाबाजी को यह सब प्रकारसे पसन्द आया है। मूल ग्रन्थ कितने अधिक महत्वका है और अपनी क्या कुछ विशेषता रखता हैं यह सब मैंने प्रस्तावनामें प्रकट कर दिया है, उसे यहां फिरसे दोहरानेकी जरूरत है ।
[ ६ ] नहीं है । मुझे तो यह अन्य बड़ा ही मंगलमय मालूम होता है, और इसी लिये वीर- सेवा-मन्दिरसे प्रकाशित होनेवाली ग्रन्थमालामें मैंने इसे मङ्गलाचरणकं तौरपर प्रथम स्थान दिया है। मुझे यह प्रकट करते हुए बड़ा आनन्द होता है कि वावा भागीरथजी वर्णीने इस ग्रन्थकी कुछ प्रतियाँ दातारों-प्रकाशनमें धनकी सहायता देनेवालों-तथा बनारस और सागरके विद्यालयोंके लिये नियत करके शेष सब प्रतियां वीर-सेवा- मन्दिरको इस लिये अर्पण करती हैं कि वे उसके द्वारा 'अनेकान्त'के ग्राहकोंको उपहार में दी जासकें और दूसरा भी उनका अच्छा उपयोग, योग्य विद्वानोंको भेंटादिक रूपमें होसके। इसके लिये वीर-सेवा-मन्दिर और अनेकान्त कार्यालय श्रद्धेय वात्रा भागीरथजी वर्णीक बहुत आभारी हैं और मैं दोनोंकी ओरसे उन्हें इस उदार विचारके लिये सादर धन्यवाद भेंट करता हूँ । आशा है दृमरे भी उदार महानुभाव इसका अनुकरण करेंगे और वीर-सेवा-मन्दिर, उसकी अन्ध-माला तथा 'अनेकान्त' पत्रको इस प्रकारके सहयोगों द्वारा अपनाकर गौरवान्वित बनायेंगे। सरसावा बि सहारनपुर ता०२६-७१९३९ निवेदक- जुगलकिशोर मुख्तार अधिष्ठाता 'वीर-सेवा-मन्दिर' -.- - अनुवादकीय निवेदन श्राचार्य पूज्यपादका 'समाधितंत्र ग्रन्थ अध्यात्म-रससे ओत-प्रोत है और श्रात्मस्वरूपको प्राप्तिकं इच्छुकोंके लिये बहुत ही उपयोगी है। इसमें आत्मस्वरूपका और उसकी प्राप्तिका बड़ा हो मुन्दर सरस वर्णन है । यह ग्रन्थ मुझे बहुत प्रिय है और इसी लिये मै इसकी हिन्दी टीका लिखनेकी बहुत दिनों तक इच्छा करता रहा, पर अनवकाश आदिक कारण उसे कार्यमें परिणत न कर सका। कुछ समय बाद त्यागमूर्ति पूज्य यावा भागीरथजी वर्णीने मुझे इस ग्रन्थकी टीका लिखनेकी प्रेरणा की; क्योंकि यह ग्रन्थ उन्हें बहुत अधिक प्रिय है, वे इसका निरन्तर ही पाठ किया करते हैं। उनकी इस प्रेरणा और अनुराधने मेरे हृदयमें नई स्फूर्ति पैदा करदी । फलतः मैंने इस शुभ कार्यको सहर्प अपने हाथ में ले लिया और कुछ समयके भीतर ही टोका बनाकर समाप्त करदी, जिसकी सूचना समाप्तिकं अनंतर ही पूज्य बाबाजी- को दे दी गई। कुछ समय बाद उक्त बायाजीकी बीमारीके कारण न्यायाचार्य पूज्य पं० गणेशप्रसादी वर्णीका खतौजी पधारना हुआ । मुझे भी आनेको आज्ञा मिली और मैं सेवामें उपस्थित होगया । उसी समय यह स्थिर हुआ कि 'समाधितंत्र'की हिन्दी टीकाको संस्कृत टीकाकं साथ प्रकाशित किया जाय और पूज्यपादाचार्यका ऐतिहा- सिक परिचय भी प्रस्तावनादिके रूपमें लिखाकर साथमें लगाया जाय । प्रकाशन- खर्चके लिये कुछ सज्जनोंके वचन भी प्राप्त हो गये, जिसके लिये वे सब धन्यवादके पात्र हैं। आचार्य पूज्यपादक ऐतिहासिक परिचयके अर्थ इस ग्रन्थकी महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना लिखने के लिये मैंने जैनसमाजकं सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक विद्वान् पं० जुगल किशोर जी मुख्तार सरसावासे प्रार्थना की । सौभाग्यकी बात है कि उन्होंन मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कर लिया। तदनन्तर मेरी नियुक्ति वीर-सेवा- मन्दिरमें होजाने पर मुख्तार माहवने टीकाके संशोधन, सम्पादन और प्रकाशनादिक भारको अपने ऊपर लेकर और वीर सेवा-मन्दिर-ग्रन्थमालामें इस ग्रन्थको प्रथम स्थान देकर मुझे बड़ा ही अनुगृहीत किया है। इस महती कृपाके लिये मैं उनका बहुत ही आभारी और चिरकृतज्ञ हूँ। इस प्रन्थके अनुवादादिकार्यमें न्यायाचार्य पूज्य पं० गणेशप्रसाद वर्णी, त्याग- मूर्ति वावा भागीरथजी वर्णी और सिद्धान्तशाखी पं० याचन्दजी न्यायतीर्थ आदि गुरुजनोंने अपने सत्परामर्श आदि द्वारा जो सहायता प्रदान की है उसके लिये मैं उनका भी बहुत आभारी हूं । इनकं सिवाय, अन्य जिन सज्जनोंने मुझे इस कार्यमें सी प्रकारका भी सहयोग प्रदान किया है उन सबका मैं हृदयसे आभार मानता हूँ। किसी ग्रन्थका अनुवाद करने अथवा टीका लिखने का मेरा यह पहला ही प्रयास है। इसमें त्रुटियोंका रहनाना संभव है । अतः विद्वज्जनोंसे मेरा नम्र निवेदन [ ८ ] है कि वे इसके लिये मुझे क्षमा करते हुए उन त्रुटियोंसे कृपया सूचित करें, जिससे अगले संस्करणमें उन्हें निकाला जा सके। वीर-सेवा-मन्दिर, सरसावा ता० २४७-१९३९ निवेदक- परमानन्द जैन प्रस्तावना श्रीपूज्यपाद और उनकी रचनाएँ जैनसमा समाज में 'पूज्यपाद' नामक एक सुप्रसिद्ध श्राचार्य विक्रमकी छठी (ईसाकी पाँची) शताब्दामें हो गये हैं, जिनका पहला अथवा दीक्षानाम 'देवनन्दी था और जो बादको 'जिनेन्द्रबुद्धि' नामस भी लोक में प्रसिद्धिको प्राप्त हुए हैं । आपके इन नामों का परिचय अनेक शिलालेखों तथा ग्रन्थों आदि परस भले प्रकार उपलब्ध होता है । नीचे कुछ अवतरण इसके लिये पर्याप्त हैं:- यो देवनन्दिप्रथमाभिधानो बुद्ध या महत्या स जिनेन्द्रवुद्धिः । श्रीथूज्यपादोऽजनि देवताभिर्यत्पूजितं पादयुगं यदीयम् ॥ -श्रवणवेल्गोल शि००४० (६४) प्रागभ्यधायि गुरुणा किल देवनन्दी वुद्धया पुनर्विपुलया स जिनेन्द्रबुद्धिः। श्रीपूज्यपाद इति चैष वुधैः प्रचख्ये, यत्पूजितः पद्युगे बनदेवताभिः ॥ -श्र०शि० नं० १०५ (२५४) श्रवणबेलगोलके इन दोनों शिला-वाक्यों परसे, जिनका लेखनकाल. क्रमशः शक.सं.१०८५.व १३२० है यह साफ-जाना जाता है कि आचार्यमहोदयका प्राथ- मिक नाम 'देवनन्दी' था, जिसे उनके गुरु ने रक्खा था और इसलिये वह उनका- दीक्षानाम है, 'जिनेन्द्रबुद्धि! नाम.बुद्धिको प्रकर्षता एवं विपुलताके कारण उन्हें बाद- को प्राप्त हुआ था; और जबस उनके चरण-युगल देवताओंसे पूजे गये थे. तबसे. वे बुधजनों द्वारा 'पूज्यपाद नामसे विभूपित हुए हैं । श्रीपूज्यपादोधृतधर्मराज्यस्ततः सुराधीश्वरपूज्यपादः । यदीयवैदुष्यगुणानिदानी वदन्ति शास्त्राणि तदुधृतानि ॥ धृतविश्वबुद्धिरयमत्र योगिभिः कृतकृत्यभावमनुविभ्रदुच्चकैः । जिनवबभूव यदनाचापहृत्स जिनेन्द्रवुद्धिरिति साधुवर्णिनः॥ -श्र०शि० नं० १०८ (२५८) शक संवत् १३५५में उत्कीर्ण हुए इन शिलावाक्योंसे स्पष्ट है कि श्रीपूज्यपादने धर्मराज्यका उद्धार किया था- लोकमें धर्मकी पुनः प्रतिष्ठा की थी इसीसे आप देवताओंके.अधिपति-द्वारा पूजे गये-और 'पूज्यपाद' कहलाये। आपके विद्याविशिष्ट [ २ ] गुगोंको आज भी आपके द्वारा उद्वार पाये हुए-रचे हुए-साख बना रहे हैं- उनका खुला गान कर रहे हैं। आप जिनेन्द्रकी तरह विश्वबुद्धिके धारक-समम्त शाख-विषयोंके पारंगन-थे और कामदेवको जीतनेवाले थे, इमीसे आपमें ऊँच दर्जेक कृतकृत्य-भावको धारण करनेवाले गोगियोंने आपको ठीक ही जिनेन्द्रबुद्धि' कहा है। इसी शिलालेखमें पूज्यपाद-विषयक एक वाक्य और भी पाया जाता है, जो इस प्रकार है :- श्रीपूज्यपादमुनिरप्रनिमौषधर्द्धिजीयाद्विदेहजिनदर्शनपूनगात्रः । यत्पादधौनजलसंस्पर्शप्रभावात् कालायसंकिल नदा कनकीचकार ।। इसमें पूज्यपाद मुनिका जयघोष करते हुए उन्हें अद्विनीय औषध-ऋद्धिक धारक बनलाया है। माथ ही, यह भी प्रकट किया है कि विदेहक्षेत्र स्थित जिनेन्द्र- भगवान्के दर्शनसे उनका गात्र पवित्र होगया था और उनके चरण-घोए जलक स्पर्शस एक समय लोहा भी सोना बन गया था। इस तरह आप इन पवित्र नामोंके साथ कितना ही इतिहास लगा हुआ और वह सब आपकी महती कीर्ति. अपार विद्वत्ता एवं मानिशय प्रतिष्ठाका द्योतक है। इसमें सन्देह नहीं कि श्रीपूज्यपाद म्वासी एक बहुत ही प्रतिभाशाली प्राचार्य, माननीय विद्वान् , युगप्रधान और अच्छे योगीन्द्र हुए हैं । आपकं उपलब्ध ग्रन्थ निश्चय ही आपकी असाधारण योग्यताके जीते-जागते प्रमाण हैं । भट्टाकलंकदेव और श्रीविद्यानन्द-जैसे बड़े बड़े प्रतिष्टित आचार्योंन अपने राजवार्तिकादि ग्रन्थों में आपके वाक्योंका सर्वार्थसिद्धि श्रादिक पदोका खुला अनुसरण करते हुए बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें स्थान ही नहीं दिया बल्कि अपने ग्रन्थोंका अंग तक बनाया है। जैनेन्द्र-व्याकरण शन-शाख में आप बहुत ही निष्णात थे । आपका 'जैनेन्द्र' व्याकरण लोक- में अच्छो ग्व्याति एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है-निपुण वैयाकरणोंकी दृष्टिमें सूत्रोंके लाघवादिकं कारण उसका बड़ा ही महत्व है और इसीसे भारतके आठ प्रमुख शाब्दिकोंमें आपकी भी गणना है। कितने ही विद्वानोंने किसी प्राचार्यादिकी प्रशंसा उसके व्याकरण-शास्त्रकी निपुणताको आपकी उपमा दी है। जैसा कि श्रवणबेलगोलके निम्न दो शिलावाक्योंस प्रकट है :- "सर्वव्याकरणे विपश्चिदधिपः श्रीपूज्यपादः स्वयम् ।" -शि० नं०४७.५० "जैनेन्द्रे पूज्यपादः। -शि००५५ पहला वाक्य मेषचन्द्र विद्यदेवकी और दूसरा जिनचन्द्राचार्यको प्रशंसाने कहा गया है। पहलेमे, मेघचन्द्रको व्याकरण-विषयमें स्वयं 'पूज्यपाद बतलाते हुए, पूज्यपादको 'अखिल-व्याकरण-पण्डितशिरोमणि' सूचित किया है और दूसरमें इन्द्रश्चन्द्रः काशकृस्नपिशलीशाकडायनाः । पाणिन्वमरजैनन्द्रा जयन्त्यष्टौ च शालिकाः ॥-धातुपाठः।
जिनचन्द्रक 'जैनन्द्र' व्याकरण-विपयक ज्ञानको स्वयं पूज्यपादका ज्ञान बतलायां है, और इस तरह 'जैनन्द्र' व्याकरणके अभ्यासमें उसकी दक्षताको घोषित किया है। पूज्यपादकं इस व्याकरणशास्त्रकी प्रशंसामें अथवा इस व्याकरणको लेकर पूज्यपादकी प्रशंसामें विद्वानोंके ढेरके ढेर वाक्य पाये जाते हैं । नमूनके तौर पर यहाँ उनमेंस दो-चार वाक्य उद्धत किये जाते हैं :- कवीनां तोर्थकृदेवः किंतरां तत्र वय॑ते । विदुषां वाङमलध्वंसि तीर्थ यस्य बचोमयम् ॥ -आदिपुराणे, जिनसेनः । अचिन्त्यमहिमा देवः सोऽभिधंद्यो हितैषिणा। शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति साधुत्वं प्रतिलम्भिताः । -पार्श्वनाथचरिते, वादिराज़ः । पूज्यपादः सदा पूज्यपादः पूज्यः पुनातु माम् । व्याकरणार्णवो येन तीणों विस्तीर्णसद्गुणः ॥ -पाण्डवपुराणे, शुभचन्द्रः। शब्दाब्धीन्दु पूज्यपादं च वन्दे । --नियमसारटोकायां ,पद्मप्रभः। . प्रमाणमकलंकस्य पूज्यपादस्य लक्षणम् । द्विसंधानकः काव्यं रत्नन्नयमपश्चिमम् ॥ -नाममालायां, धनञ्जयः ।। नमः श्रीपूज्यपादाय लक्षणं यदुपक्रमम् । यदेवात्र तदन्यत्र यन्नानास्ति न तस्क्वचित् ।। -जैनेन्द्रप्रक्रियायां, गुणनन्दी ।। श्रपाकुर्वन्ति यदाच कायवाञ्चित्तसंभवम् । कलंकमंगिनां सोऽयं देवनन्दी नमस्यते ॥ -ज्ञानार्णवे, शुभचन्द्रः। इनमेंसे प्रथमके दो वाक्योंमें पूज्यपादका 'देव' नामसे उल्लेख किया गया है, जो कि आपके 'देवनन्दी' नामका संक्षिप्त रूप है । पहले वाक्यमें श्रीजिनसेनाचार्य लिखते हैं कि 'जिनका वाङमय-शब्दशास्त्ररूपी व्याकरणतीर्थ-विद्वज्जनोंके वचन- मलको नष्ट करनेवाला है वे देवनंदी कवियोंके तीर्थङ्कर हैं, उनके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय ? दूसरं वाक्यमें वादिराजसूरिने बतलाया है कि 'जिनके द्वारा-जिनके व्याकरणशास्त्रको लेकर-शब्द भले प्रकार सिद्ध होते हैं वे देवनंदी अचिंत्य महिमायुक्त देव हैं और अपना हित चाहनेवालोंके द्वारा सदा बंदना किये जाने के योग्य हैं। तीसरे वाक्यमें, शुभचन्द्र भट्टारकने, पूज्यपादको पूज्योंके द्वारा भी पूज्यपाद तथा विस्तृत सद्गुणोंके धारक प्रकट करते हुए उन्हें व्याकरण-समुद्रको तिरजानेवाले लिखा है और साथ ही यह प्रार्थना की है कि वे मुझे पवित्र करें।
[ ४ ] चौथेमें, मलधारी पद्मप्रभदेवने पूज्यपादको 'शब्दसागरका चंद्रमा' बतलाते हुए उनकी वंदना की है। पांचवेंमें, पूज्यपादके लक्षण (व्याकरण) शास्त्रको अपूर्व रत्न बतलाया गया है । छठे में, पूज्यपादको नमस्कार करते हुए उनके लक्षणशास्त्र (जेनेन्द्र) के विषयमें यह घोषणा कीगई है कि जो वात इस व्याकरणमें है वह तो दूसरे व्या- करणोंमें पाई जाती है परन्तु जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं होती, और इस तरह आपके 'जैनेन्द्र' व्याकरणको सर्वाङ्गपूर्ण बतलाया गया है। भव रहा सातवाँ वाक्य, उसमें श्रीशुभचन्द्राचार्यन लिखा है कि 'जिनकं वचन प्राणियोंके काय, वाक्य और मनः सम्बन्धी दोषोंको दूर कर देते हैं उन देवनन्दीको नमस्कार है। इसमें पूज्यपादके अनेक ग्रन्थोंका उल्लेख संनिहित है-वाग्दोषोंका दूर करनेवाला तो आपका वही प्रसिद्ध 'नैनेन्द्र' व्याकरण है, जिसे जिनसेनन भी 'विदुषां वाङ मलध्वंसि' लिखा है, और जिसके कई संस्करण अपनी जुदी-जुदी वृत्तियों सहित प्रकाशित हो चुके हैं। चित्तदोषोंको दूर करनेवाला आपका मुख्य अन्थ "समाधितंत्र" है, जिसे 'समाधिशतक' भी कहते हैं, और जिसका कुछ विशेष परिचय इस प्रस्तावनामें आगे दिया जायगां । रहा कायदोषको दूर करनेवाला ग्रन्थ, वह कोई वैद्यकशास्त्र होना चाहिये, जो इस समय अनुपलब्ध है। वैद्यक शास्त्र विक्रमकी १५ वीं शताब्दीक विद्वान् कवि मंगराजन कन्नड़ी भाषामें 'खगेन्द्र- मणिदर्पण' नामका एक चिकित्साग्रन्थ लिखा है और उसमें पूज्यपादक वैद्यकग्रन्थ- का भी आधाररूपसे उल्लेख किया है, जिससे मंगराजके समय तक उस वैद्यकग्रन्थ के अस्तित्वका पता चलता है परन्तु सुहृदर पं० नाथूराम जी प्रेमी उस किसी दूसरे ही पूज्यपादुका ग्रन्थ बतलाते हैं और इस नतीजे तक पहुँचे हैं कि 'जैनेन्द्र' के कर्ता पूज्यपादने वैद्यकका कोई शास्त्र बनाया ही नहीं यों ही उनके नाम मँढा जाता है। जैसा कि उनके "जैनेन्द्रव्याकरण और आचार्य 'देवनन्दी' नामक लेखक निम्न वाक्यसे प्रकट होता है :- "इस (खगेन्द्रमणिदर्पण में वह (मंगराज) अपने आपको पूज्यपादका शिष्य बतलाता है और यह भी लिखता है कि यह ग्रन्थ पूज्यपादक वैद्यक-ग्रन्थसे संगृहीत है । इससे मालूम होता है कि पूज्यपाद नामकें एक विद्वान् विक्रमकी तेरहवीं (१४वीं?) शताब्दीमें भी हो गये हैं. और लोग भ्रमवश उन्हींक वैद्यकग्रंथको जैनेन्द्रक कर्ताका ही बनाया हुआ समझकर उल्लेख कर दिया करते हैं।" * + पूज्यपादकी कृतिरूपसे 'वैद्यसार' नामक जो ग्रंथ 'जैन-सिद्धान्तभास्कर' (त्रैमासिक) में प्रकाशित होरहा है वह इन श्री पूज्यपादाचार्यकी रंचना नहीं है । हो सकता है कि यह मंगलाचरणादिविहीन ग्रन्थ पूज्यपादके किसी ग्रंथ परसे ही कुछ सार लेकर लिखा गया हो परन्तु स्वयं पूज्यपादकृत नहीं है। और यह वात ग्रंथके साहित्य, रचनाशैली और जगह-जगह नुसखोंके अन्तमें 'पूज्यपादेन भाषितः-निर्मितः' जैसे शब्दोंक प्रयोगसे भी जानी जाती है। ॐ देखो, 'जैनसाहित्यसंशोधक भाग १, अङ्क २, पृष्ठ ८३ और 'जैनहितैषी' माग १५, अङ्क १-२, पृष्ठ ५७.
[ ५ ] इस निर्णयमें प्रेमोजीका मुख्य हेतु 'मंगराजका अपनेको पृज्यपादका शिष्य बतलाना है', जो ठीक नहीं है । क्योंकि प्रथम तो ग्रन्थ परसे यह स्पष्ट नहीं कि मंगराजने उसमें अपनेको किसी दूसरे पूज्यपादका शिष्य बतलाया है -वह तो पृज्यपादक विदेहगमनकी घटना विदेहगमनकी घटना तकका उल्लेख करता जिमका सम्बन्ध किसी दूसरे पूज्यपाद के साथ नहीं बतलाया जाता है। साथ ही, अपने इष्ट पृज्यपाद मुनीन्द्रको जिनेन्द्रोक्त सम्पूर्ण सिद्धान्तसागरका पारगामी बत- लाता है और अपनको उनके चरणकमलके गन्धगुणोंसे आनन्दित-चित्त प्रकट करता है; जैसा कि उसके निम्न अन्तिम वाक्योंसे प्रकट है :- "इदु सकल-श्रादिम जिनेन्द्रोक्त-सिद्धान्तपयःपयोधिपारग- श्रीपूज्यपादमुनीन्द्रचारु चरणारविन्दगन्ध-गुणनंदितमानस-श्री- सदखिनकलागमातंग-मंगविभुरचितमप्प रु.गेन्द्रमणिदर्पणदालु षोडशाधिकार समाप्तम् ।। ॥" --(भाग-जैन सि० भ० प्रति) इससे मंगराजका एज्यपादक साथ साक्षात गुरुशिप्यका कोई सम्बन्ध व्यक्त नहीं होता और न यही मालूम होता है कि मंगराज्कं समयमे कोई दूसरे 'पूज्यपाद' हुए हैं-यह तो अलंकृत भापामें एक भक्त.का शिप्य-परम्पराक रूपमें उल्लेख जान पड़ता है । शिष्यपरम्पराक रूपमें ऐसे बहुतसं उल्लेख देखने में आते हैं। उदाहरणक तौर पर 'नीतिसार' के निम्न प्रशस्तिवाक्यको लीजिये, जिसमें ग्रन्थकार इन्द्रनन्दीन हजार वर्षसे भी अधिक पहलके प्राचार्य कुन्दकुन्दस्वामीका अपनेको शिष्य (विनेय) सूचित किया है :- "-स श्रीमानिन्द्रनन्दी जगति विजयनां भूरिभावानुभावी दैवज्ञः कुन्दकुन्दप्रभुपदविनयः स्वागमाचारचंचुः॥" ऐसे वाक्योंमें पदों अथवा चरणोंकी भक्ति आदिका अर्थ शरीरके अङ्गरूप पैरोंकी पूजादिका नहीं, किन्तु उनके पदोंकी-वाक्योंकी-सेवा-उपासनादिका होता है, जिसस ज्ञानविशेपकी प्राप्ति होती है। दूसरे, यदि यह मान लिया जाय कि मंगगज साक्षात गुरु दूसरे पूज्यपाद थे और उन्होंने वैद्यकका कोई ग्रंथ भी बनाया है, तो भी उससे यह लाजिमी नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि उन्हीके उस वैद्यकग्रन्थक भ्रममे पड़कर लोग 'जनन्द्र' के कर्ता पूज्यपादको वैद्यकशास्त्रका कर्ता कहने लगे हैं। क्योंकि ऐसी हालतमें वह भ्रम मंगराजके उत्तरवर्ती लेखकोंमें ही होना सम्भव था-पूर्ववर्ती नहीं । परन्तु पूर्ववर्ती लेखकोंने भी पूज्यपाक चैद्यकग्रन्थका उल्लेख तथा संकेत किया है । संकेतके लिये तो शुभचन्द्राचार्यका उपर्युक्त श्लोक ही पर्याप्त है, जिसके विषयमें प्रेमीजीने भी अपने उक्त लेखमें यह स्वीकार किया है कि "श्लोकके 'काय' शब्दसे भी यह बात ध्वनित होती है कि पूज्यपादस्वामीका कोई चिकित्साग्रन्थ है ।" वह चिकित्साग्रंथ मंगराजके साक्षात् गुरुकी कृति नहीं हो सकता; क्योंकि उसके संकेतकर्ता शुभचंद्रा- चार्य मेंगराजके गुरुसे कई शताब्दी प्रहले हुए हैं। रही पूर्ववर्ती उल्लेखकी वात, उसके लिये उग्रादित्य आचार्यक कल्याणकारक' वैधकप्रथका ..उदाहरण प्रर्याप्त है, जिसमें पूज्यपादके वैद्यक-प्रन्थका "पूज्यपादेन भाषितः" जैसे शब्दोंके [ ६ ] द्वारा बहुत कुछ उल्लेख किया गया है और एक स्थान पर तो अपने ग्रंथाधारको व्यक्त करते हुए "शालाक्यं पूज्यपादप्रकटिनमधिक" इस वाक्यकं द्वारा पूज्यपादके एक चिकित्साग्रन्थका स्पष्ट नाम भी दिया है और वह है 'शालाक्य' ग्रन्थ, जो कि कर्ण, नेत्र, नासिका, मुख और शिरोरोगकी चिकित्सासे सम्बन्ध रखता है। अतः प्रेमीजीने जो कल्पना की है वह निदाप मालूम नहीं होती। यहां पर मैं इतना और भी प्रकट कर देना चाहता हूं कि चित्रकवि सोमने एक 'कल्याणकारक' वैद्यग्रन्थ कन्नड़ी भाषामें लिखा है, जोकि मद्य-मांस-मधुकं व्य- वहारसे वर्जित है और जिसमें अनेक स्थानोंपर गद्य-पद्यरूपसं संस्कृत वाक्य भी उद्धृत किये गये हैं। यह ग्रन्थ पूज्यपाद मुनिक 'पल्याणकारकवाडसिद्धान्तक' नामक ग्रन्थ के अाधारपर रचा गया है; जैसाकि उसके "पूज्यपादमुनिगर्नु पेल्द कल्याणकारकबाहडसिद्धान्तकदिष्ट" विशेषणसे प्रकट है। इससे पूज्यपादकं एक दूसरे वैद्यकग्रन्थका नाम उपलब्ध होता है। मालूम नहीं चित्रकवि सोम कब हुए हैं । उन- का यह ग्रन्थ श्राराके जैनसिद्धान्त-भवनमें मौजूद है। इसके सिवाय,शिमोगा जिलान्तर्गत 'नगर' ताल्लुकके ४६ वें शिलालेखमें, जो कि पद्मावती-मंदिरके एक पत्थरपर खुदा हुआ है, पूज्यपाद-विषयक जो इको- कत दी है वह कुछ कम महत्वकी नहीं है और इसलिये उसे भी यहां पर उद्धृन कर देना उचित जान पड़ता है। उसमें जैनेन्द्रकर्ता पूज्यपाद द्वारा 'वैद्यकशास्त्र' के रचे जानका बहुत ही स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यथाः- "न्यासं जैनेन्द्रसंज्ञं सकलवुधनुतं पाणिनीचस्य भूयो- न्यासं.शब्दावतारं मनुजततिहितं वैद्यशास्त्रं च कृत्वा। यस्तार्थस्य टीकांध्यरचयदिह तांभाग्यसौ पूज्यपाद- स्वामी भूपालवंद्यः स्वपरहिनवचः पूर्णदृग्योधवृत्तः ॥" शब्दावतार और सर्वार्थसिद्धि 'नगर' ताल्लुकके उक्त शिलावाक्यमें पूज्यपादके चार ग्रन्थोंका क्रमनिर्देश- पूर्वक उल्लेख किया गया है, जिनमें से पहला ग्रन्थ है 'जैनेन्द्र' नामक न्यास (व्या- करण), जिसे संपूर्ण बुधजनोंसे स्तुत लिखा है; दूसरा पाणिनीय व्याकरणके ऊपर लिखा हुआ 'शब्दावतार' नामका न्यास है; तीसरा मानव-समाजके लिये हितरूप 'वैद्यशास्त्र' और चौथा है तत्वार्थसूत्रकी टीका 'सर्वार्थसिद्धि'। यह टीका पहले तीन अन्थोंक निर्माणके वाद लिखी गई है ऐसी स्पष्ट सूचना भी इस शिलालेखमें की गई है। साथ ही, पूज्यपादस्वामी विषय लिखा है कि वे राजासे वंदनीय थे, स्वपर- हितकारी वचनों (प्रन्थों) के प्रणेता थे और दर्शन-ज्ञान-चारित्रसे परिपूर्ण थे। इस अवतरणसे पूज्यपादके 'शब्दावतार' नामक एक और अनुपलब्ध ग्रंथका पता चलता है, जो पाणिनीय-व्याकरणका न्यास है और 'जैनेन्द्र' व्याकरण के बाद लिखा गया है । विक्रमकी १२ वीं शताब्दीके विद्वान् कवि दृत्तविलासने भी अपने 'धर्मपरीक्षे' नामक कन्नडी ग्रन्थमें, जो कि- अमितगतिकी 'धर्मपरीक्षा' को लेकर * यह गंगराजा 'दुर्नीित' जान पड़ता है, जिसके पूज्यपाद शिक्षागुरु थे।
[ ७ ] लिखा गया है, पाणिनीय-व्याकरणपर पूज्यपादके एक टीकाग्रन्थका उल्लेख किया है, जो उक्त 'शब्दावतार' नामक न्यास ही जान पड़ता है। साथ ही, पूज्यपादके द्वारा भूरक्षणार्थ (लोकोपकारके लिये) यंत्र-मंत्रादि-विपयक शास्त्रोंके रचे जानेको भी सुचित किया है जिसके 'आदि' शब्दसे वैद्यशास्त्रका भी सहज ही में ग्रहण हो सकता है और पूज्यपादको 'विश्वविद्याभरण' जैसे महत्वपूर्ण विशेषणों के साथ स्मरण किया है। यथा- "भरदि जैनेन्द्र भासुरं एनल मोरेदं पाणिणीयक्के टीकु ब- रेदं तत्त्वार्थमं टिप्पणदिम् भारपिदं यंत्रमंत्रादिशास्त्रोक्तकर। भूरक्षणार्थ विरचिसि जसम तालिदं विश्वविद्याभरणं भव्यालियाराधिनपदकमलं पूज्यपादं व्रतीन्द्रम् ॥" पाणिनीयकी काशिका वृत्तिपर 'जिनेन्द्रवुद्धि' का एक न्यास है। पं० नाथू- रामजी प्रेमीने अपने उक्त लेखमें प्रकट किया है कि 'इस न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि के नामक साथ 'बोधिसत्वदेशीयाचार्य' नामकी चौद्ध-पदवी लगी हुई है, इससे यह ग्रन्थ बौद्ध भिक्षु का बनाया हुआ है। आश्चर्य नहीं जो वृत्तविलास कविको पूज्यपाद- के 'जिनेन्द्रबुद्धि' इस नाम-साम्यके कारण भ्रम हुआ हो और इसीसे उसने उसे पूज्यपादका समझकर उल्लेख कर दिया हो।' परन्तु उपरके शिलालेखमें न्यासका स्पष्ट नाम 'शब्दावतार' दिया है और उसे काशिकावृत्तिका नहीं बल्कि पाणिनीयका न्यास वनलाया है, ऐसी हालतमें जब तक यह सिद्ध न हो कि काशिकापर लिखे हुए न्यासका नाम 'शब्दावतार' है और उसके कर्ताके नाम के साथ यदि उक्त बौद्ध- विशेपण लगा हुआ है तो वह किसीकी वादकी कृति नहीं है तब तक धर्मपरीक्षाक कर्ता वृत्तविलासको भ्रमफा होना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पूज्यपादस्वामी गंगराजा दुविनीतक शिक्षागुरु (Preceptor) थे, जिसका राज्यकाल ई० सन् ४८२ से ५९२ तक पाया जाता है और उन्हें हेचुर श्रादिकं अनेक शिलालेखों (ताम्रपत्रा- दिकों) में 'शब्दावतार' के कर्तारूपसे दुर्विनीत राजाका गुरु उल्लेखित किया है ।। इष्टोपदेश आदि दूसरे ग्रन्थ इन सब प्रन्थों के अतिरिक्त पूज्यपादने और किनने तथा किन किन ग्रंथों को रचना की है इसका अनुमान लगाना कठिन है-'इष्टोपदेश' और 'सिद्धभक्ति' जैसे देहलीके नये मन्दिर में 'का शिका-न्यास' की जो हस्तलिखित प्रति है उसमें उसके कर्ता 'जिनेन्द्रबुद्धि' के नामके साथ 'बोधिसत्वदेशीयाचार्य' नामकी कोई उपाधि लगी हुई नहीं है-ग्रन्थको संधियोंमें "इत्याचार्यस्थविरजिनेन्द्रबुद्ध्युपरचितायांन्या- स(तथा 'काशिकाविवरणन्यास')-पंचिकार्या" इत्यादि रूपसे उल्लेख पाया जाता है। +देखो 'कुर्गइन्स्क्रिप्शन्स' भू०३, 'मैसूर ऐण्ड कुर्ग जिल्द १, पृ० ३७३, 'कर्णाटफभापाभूपणम्' भू० पृ० १२, 'हिस्टरी श्राफ कनडीज़ लिटरेचर' पृ० २५ और 'कर्णाटककविचरिते। * सिद्धभक्तिके साथ श्रुतभक्ति, चरित्रभक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति तथा नन्दीश्वरभक्ति नामके संस्कृत प्रकरण भी पूज्यपादके प्रसिद्ध हैं। .
, [ ८ ] प्रकरण-ग्रंथ तो शिलालेखों आदिमें स्थान पाये बिना ही अपने अस्तित्व एवं महत्व- को स्वतः ख्यापित कर रहे हैं। 'टोपदेश ५१ पद्योंका एक छोटासा यथानाम तया- गुणमे युक्त सुन्दर आध्यात्मिक ग्रंथ है और वह पं. आशाधरजीकी संस्कृतटोका- सहित माणिकचन्द्र-ग्रंथमालामें प्रकाशित भी हो चुका है। "सिद्धभक्ति' ९ पद्योंका एक बड़ा ही महत्वपूर्ण 'गम्भीरार्थक' प्रकरण है इसमें सूत्ररूपसे सिद्धिका, मिद्धि के मार्गका, सिद्धिको प्राप्तहोनेवाले अात्माका, श्रात्मविषयक जैनसिद्धांतका' सिद्धिक काम- का, सिद्धिको प्राप्त हुए सिद्धोंका और सिद्धांक सुखादिका अच्छा स्वरूप बतलाया गया है । 'सिद्धिसोपान' में यह अपने विकासके साथ प्रकाशित हुआ है। हां लुप्रप्राय ग्रंथों में छन्द और काव्यशास्त्र-विषयक आपके दो ग्रंथोंका पता और भी श्रवणबेलगोलकं शिलालेख नं०४. के निम्न वाक्यसे चलता है:- "जैनेन्द्रं निजशब्दभागमतुलं सर्वार्थमिद्धिः परा सिद्धान्त निपुणवमुद्घकवितां जनांभिषेकः स्वकः । छन्दः सूक्ष्मधियं समाधिशतकं स्वास्थ्यं यदोयं विदा- माख्यातोह स पूज्यपादमुनिपः पूज्यो मुनीनांगणैः॥४॥ इस वाक्य में, ऊँचे दर्जेकी कुछ रचनाओं का उल्लेख करते हुए, बड़े ही अच्छे ढंगसे यह प्रतिपादित किया है कि जिनका जैनन्द्र' शब्दशास्त्रमें अपने अतुलित भागको, 'सर्वार्थसिद्धि' (तत्त्वार्थटीका) सिद्धांतने परमनिपुणताको, 'जैनाभिपेक' ऊँचे दर्जेकी कविताको, 'छन्दःशास्त्र बुद्धिी सूक्ष्मता (रचनाचातुर्य) को और 'समाधिशतक' जिनकी स्वात्मस्थिति ( स्थितप्रज्ञता) को संसारमें विद्वानों पर प्रकट करता है वे 'पूज्यपाद' मुनीन्द्र मुनियोंके गणोंसे पूजनीय हैं। 'एकान्तखण्डन' ग्रंथमें लक्ष्मीधरने, श्री पूज्यपादस्वामीका 'पड्दर्शनरहस्य- संवेदन-सम्पादित-निस्सीमपाण्डित्य-मण्डिताः' विशेषण कंथ स्मरण करते हुए, उनके विषय में एक खास प्रसिद्धिका उल्लेख किया है-अर्थान् यह प्रकट किया है कि उन्होंने नित्यादि सर्व । एकान्त पक्षकी सिद्धि में प्रयुक्त हुए साधनोंको दूषित करनेके लिये उन्हें 'विरुद्ध हेत्वाभास इतलाया है। जब कि सिद्धसनाचार्यने 'असिद्ध' हेत्वाभास प्रतिपादन करनेमें ही संतोप धारण किया है और स्वामी समन्तभद्रने 'असिद्ध-विरुद्ध' दोनों ही रूपस उन्हें दूषित किया है। साथ ही, इसको पुष्टिमें निम्न वाक्य 'तदुक्तं रूपसे दिया है :- असिद्धं सिद्धसेनस्य विरुद्ध देवनन्दिनः। व्यं समन्तभद्रस्य सर्वथकान्तसाधनमिति ॥ क्रियाकलापकै टोकाकार प्रभाचन्द्रने अपनी सिद्धभक्ति-टीकामें "संस्कृताः सर्वा- भक्तयः पूज्यपाइस्वामिकृताः प्राकृतास्तु कुन्दकुन्दाचार्यकृताः" इस वाक्यकं द्वारा उन्हें पृज्यपाइ-कृत बतलाया है। ये सब भक्तिपाठ 'दशभक्ति'. आदिमें मुद्रित होकर प्रकाशित होचुके हैं। * प्रस्तावना-लेखक-द्वारा लिखी हुई यह.४८८ पृष्टको 'सिद्धिसोपान' पुस्तक वीरसेवामन्दिर, सरसावा से विना. मूल्य मिलती है।
[ ९ ] एकांत-साधनको दूषित करनेमें तीन विद्वानोंकी प्रसिद्धिका यह श्लोक सिद्धि- विनिश्चय-टीका और न्याय-विनिश्चय-विवरणमें निम्न प्रकारसे पाया जाता है- असिद्धः सिद्धसेनस्य विरुद्धो देवनन्दिनः । बेधा समंतभद्रस्य हेतुरेकांतसाधने ॥ न्यायविनिश्चय-विवरणमें वादिराजने इसे 'तदुक्तं पदके साथ दिया है और सिद्धिविनिश्चय-टीकामें अनन्तवीर्य आचार्यने इस श्लोकको एकबार पांचवें प्रस्तावमें “यद्वक्ष्यत्यसिद्धः सिद्धसेनस्य" इत्यादि रूपसे उद्धत किया है,फिर छठे प्रस्तावमें इसे पुनः पूरा दिया है और वहां पर इसके पदोंकी व्याख्या भी की है। इससे यह श्लोक अकलंकदेवक सिद्धिविनिश्चय ग्रंथके 'हेतुलक्षणसिद्धि' नामक छठे प्रस्तावका है । जब अकलंकदेव जैल प्राचीन-विक्रमी सातवीं शताब्दी के महान् आचार्यों तकने पूज्यपादकी ऐसो प्रसिद्धिका उल्लेख किया है तब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि पूज्यपाद एक बहुत बड़े तार्किक विद्वान ही नहीं थे बल्कि उन्होंने स्वतंत्ररूपसे किसी न्याय- शास्त्रकी रचना भी की है, जिसमें नित्यादि-एकान्तवादोंको दूषित ठहराया गया है और जो इस समय अनुपलब्ध है अथवा जिसे हम अपने प्रमाद एवं अनोखी श्रुतभक्तिके चश खो चुके हैं !! सारसंग्रह श्री धवल' सिद्धान्तके एक उल्लेखसे यह भी पता चलता है कि पूज्यपादने 'सारसंग्रह' नामका भी कोई ग्रंथ रचा है, जो नय-प्रमाण-जैसे कथनोंको भो लिये हुए है। आश्चर्य नहीं जो उनके इसी ग्रंथ में न्याय-शास्त्र का विशद विवेचन हो और उसके द्वारा नित्यादि-एकान्तवादियोंको दूषित ठहराया गया हो। नयके लक्षणको लिये हुए वह उल्लेख इस प्रकार है:- "तथा सारसंग्रहेऽप्युक्तं पूज्यपादेरनन्तपर्यात्मकस्य वस्तुनो- ऽन्यतमपर्यायाधिगमे कर्तव्ये जात्यहेत्वपेक्षो निरवद्यप्रयोगो नय --'वेदना' खण्ड ४ ऊपरके सब अवतरणों एवं उपलब्ध ग्रंथोंपरसे पूज्यपादस्वामीकी चतुर्मुखी प्रतिभाका स्पष्ट पता चलता है और इस विषयमें कोई संदेह नहीं रहता कि आप उस समयकं प्रायः सभी महत्वके विषयों में ग्रन्थोंकी रचना की है। आप असाधारण विद्वत्ता धनी थे, सेवा-परायणोंमें अग्रगण्य थे, महान दार्शनिक थे, अद्वितीय वैया- करण थे, अपूर्व वैद्य थे, धुरंधर कवि थे, बहुत बड़े तपस्वी थे, सातिशय योगी थे और पूज्य महात्मा थे। इसीसे कर्णाटकके प्रायः सभी. प्राचीन कवियोंने ईसाकी ८ वी, ९ वी, १० वीं शताब्दियोंके विद्वानोंने-अपने-अपनेग्रन्थों में बड़ी श्रद्धा-भक्तिके साथ आपका स्मरण किया है और आपकी मुक्तकंठसे खूब प्रशंसा की है। जीवन-घटनाएँ आपके जीवनकी अनेक घटनाएं हैं. जैसे कि १ विदेहगमन, २ घोर तपश्चर्यादिके इति।"
[ १० ] कारण आंखोंकी ज्योतिका नष्ट हो जाना तथा 'शान्त्यष्टकमक एकनिष्टा एवं एकाग्रता- पूर्वक पाठसे उसकी पुनः सम्प्राप्ति, ३ देवताओंसे चरणोंका पूजा जाना ४ औषधि- ऋद्धिकी उपलब्धि ५ और पादस्पृष्ट जलके प्रभावसे लोहेका लुबर्णमें परिणत हो जाना (अथवा उस लोहेसे सुवर्णका विशेष लाभ प्राप्त होना)। इनपर विशेष विचार करने तथा ऐतिहासिक प्रकाश डालनका इस समय अवसर नहीं है। ये सब विशेष ऊहापोहके लिये यथेष्ट समय और सामग्रीकी अपेक्षा रखती हैं । परन्तु इनमें असं- भवता कुछ भी नहीं है-महायोगियोंके लिये ये सब कुछ शक्य हैं। जवतक कोई स्पष्ट वाधक प्रमाण उपस्थित न हो तवतक-"सर्वत्र वाधकाभावाद्वस्तुव्यवस्थितिः" की नीतिक अनुसार इन्हें माना जासकता है। पितृकुल और गुरुकुल पितृकुल और गुरुकुलके विचारोंको भी इस समय छोड़ा जाता है । हाँ, इतना जरूर कहदेना होगा कि आप मूल-संघान्तर्गत नन्दिसंघके प्रधान प्राचार्य थे, स्वामी समन्तभद्रके वाद हुए हैं-श्रवणवेल्गोलके शिलालेखों (२०४८, १०८) में समन्त- भद्रकं उल्लेखानन्तर "ततः" पद देकर आपका उल्लेख किया गया है और स्वयं पूज्यपादने भी अपने 'जैनेन्द्र में "चतुष्टयं समन्तभद्रस्य" इस सूत्र (५-४-१६८) के द्वारा समन्तमद्रके मतका उल्लेख किया है। इससे आपका समन्तभद्रक बाद होना सुनिश्चित है। आपके एक शिष्य वननन्दीने विक्रम सं० ५२६ में द्राविड़संघकी स्थापना की थी, जिसका उल्लेख देवसेनके 'दर्शनसार' ग्रन्थमें पाया जाता हैx। आप कर्णाटक देशके निवासी थे। कन्नड भाषामें लिखे हुए 'पूज्यपादचरिते' तथा 'राजावलीकथे नामक ग्रन्थोंमें आपके पिताका नाम 'माधवभट्ट तथा माताका 'श्रीदेवी' दिया है और आपको ब्राह्मणकुलोद्भव लिखा है। इसके सिवाय, प्रसिद्ध व्याकरणकार 'पाणिनि' ऋषिको आपका मातुल (मामा) भी बतलाया है, जो सम- यादिककी दृष्टिसे विश्वास किये जानेके योग्य नहीं है। समाधितंत्र-परिचय अव मैं पूज्यपादके ग्रन्थोंमेसे 'समाधितंत्र' ग्रंथका कुछ विशेष परिचय अपने पाठनोंको देना चाहता हूं। यह ग्रन्थ आध्यात्मिक है और जहाँ तक मैंने अनुभव किया है अन्धकार-महोदयके अन्तिम जीवनको कृति है-उस समयके करीवकी रचना है जव कि प्राचार्यमहोदयकी प्रवृत्ति वाह्य विषयोंसे हटकर बहुत ज्यादा यह शान्त्यष्टक "न स्नेहाच्छरणं प्रयान्ति भगवन्" इत्यादि पद्यसे प्रारम्भ होता है और 'दशभक्ति आदिके साथ प्रकाशित भी हो चुका है। इसके अन्तिम श्राठवें पद्यमें "मम भाक्तिकस्य च विभो दृष्टिं प्रसन्नां कुरु" ऐसा द्वयर्थक वाक्य भो पाया जाता है, जो दृष्टि-प्रसन्नताकी प्रर्थनाको लिये हुए है। x जैसा कि दर्शनसारको निन्नदो गाथाओंसे प्रकट है: सिरिपुजपादसीसो दाविडसंघस्स कारगो दुद्दो। णामेण वजणंदी पाहुडवेदी महासत्तो ।। २४ ॥ पंचसा छब्बीसे विकमरायस्स मरणपत्तस्स । दक्षिणमहुराजादो दाविडसंघो महामोहो ॥२८॥ - [ ११ ] अन्तमुखी हो गई थी और आप स्थितप्रज्ञ-जैसी स्थितिको पहुँच गये थे। यद्यपि जैनसमाजमें अध्यात्म-विषयके कितने ही ग्रन्थ उपलब्ध हैं और प्राकृतभापाके 'समयसार' जैसे महान् एवं गूढ ग्रंथ भी मौजूद हैं परन्तु यह छोटा-सा संस्कृत ग्रंथ अपनी खास विशेषता रखता है। इसमें थोड़े ही शब्दों द्वारा सूत्ररूपसे अपने विपयका अच्छा प्रतिपादन किया गया है। प्रतिपादन शैली बड़ी ही सरल, सुन्दर एवं हृदय-ग्राहिणी है; भाषा-सौष्ठव देखते ही बनता है और पद्य-रचना प्रसादादि गुणोंसे विशिष्ट है । इसीसे पढ़ना प्रारम्भ करके छोड़नेको मन नहीं होता-ऐसा मालूम होता है कि समस्त अध्यात्मवाणीका दोहन करके अथवा शास्त्र-समुद्रका मन्थन करके जो नवनीताऽमृत (मक्खन) निकाला गया है वह सब इसमें भरा हुआ है और अपनी सुगन्धसे पाठक-हृदयको-मोहित कर रहा है । इस ग्रन्थके पढ़ने- से चित्त बड़ा ही प्रफुल्लित होता है, पद-पद पर अपनी भूलका बोध होता चला जाता है, अज्ञानादि मल छंटता रहता है और दुःख-शोकादि आत्माको सन्तप्त करने में समर्थ नहीं होते। इस ग्रन्थमें शुद्धात्माके वर्णनकी मुख्यता है और वह वर्णन पूज्यपादने आगम; युक्ति तथा अपने अन्तःकरणकी एकाग्रता-द्वारा सम्पन्न स्वानुभवके बलपर भले प्रकार जाँच पड़ताल के बाद किया है। जैसा कि ग्रन्थके निम्न प्रतिज्ञा-वाक्यसे प्रकट है:- श्रुतेन लिङ्गन यथात्मशक्ति समाहितान्तःकरणेन सम्यक् । समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये ॥३॥ ग्रन्थका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे भी यह मालूम होता है कि इसमें द-जैसे प्राचीन श्राचार्योंके आगम-वाक्योंका बहुत कुछ अनुसरण किया गया है । कुन्दकुन्दका- "एगो मे सस्सदो अप्पा पाणदसणलक्खयो । सेसा मे बाहिरा भावा- सव्वे संजोगलक्खणा"* ॥ यह वाक्य तो इस ग्रन्थका प्राण जान पड़ता है। प्रन्थके कितने ही पद्य कुन्दकुन्दके 'मोक्ष प्राभृत'की गाथाओंको सामने रखकर रचे गये हैं-ऐसी कुछ गाथाएँ पद्य नं० ४, ५, ७, १०, ११, १२, १८, ७८, १०२ के नीचे फुटनोटोंमें उद्धृत भी करदी गई हैं, उन परसे इस विषयकी सत्यताका हरएक पाठक सहज हीमें अनुभवकर सकता है । यहां पर उनमेंसे दो गाथाएँ और एक गाथा नियमसारकी भी इस ग्रंथके पद्यों सहित नमूनेके तौर पर उद्धृत की जाती है : * यह गाथा नियमसारमें नं० १०२ पर और मोक्षप्राभृतमें नं० ५९ पर पाई जाती है। इसमें यह बतलाया है कि'मेरा आत्मा एक है खालिस है, उसमें किसी दूसरे का मिश्रण नहीं-शाश्वत है-कभी नष्ट होने वाला नहीं और ज्ञान- दर्शन-लक्षणवाला (ज्ञाता-द्रष्टा ) है; शेष संयोग-लक्षणवाले समस्त पदार्थ मेरे आत्मा से बाह्य हैं-वे मेरे नहीं हैं और न मैं उनका हूं।' श्री कुन्दकुन्द- [ १२ ] जं मया दिस्सदे रुवं तण्ण जाणादि सव्वहा । जाणगं दिस्सदे णं तं तम्हा जंपेमि केण हं ॥२६॥ -मोक्षप्राभृत यन्मया दृश्यते रूपं तन्न जानाति सर्वथा । जानन्न दृश्यते रूपं ततः केन ब्रवोम्यहम् ॥१८॥ -समाधितंत्र जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकजम्मि । जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणे कज्जे ॥३॥ -मोक्षप्राभृत 'व्यवहारे सुषुप्तो यः स जागांत्मगोचरे । जागर्ति व्यवहारेऽस्मिन्सुषुप्तश्चात्मगोचरे ॥ ७ ॥ -समाधितंत्र णियभावं ण वि मुच्चइ परभाई णेव गेएहह केई । जाणदि पस्सदि सव्वं सोहं इदि चिंतए णाणी ॥१७॥ -नियमसार यदग्राह्य न गृह्णाति गृहीतं नापि मुञ्चति । जानाति सर्वथा सर्व तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥२०॥ -समाधितंत्र इससे उक्त पंद्य नं० ३ में प्रयुक्त हुआ 'श्रुतेन' पद बहुत ही सार्थक जान पड़ता है। लिङ्गन' तथा 'समाहितान्तः करणेन' पद भी ऐसे ही सार्थक हैं। यदि श्रीकुन्दकुन्दके समयसारकी गाथा नं० ४३८ से ४५४ तक के कथनकी इस ग्रंथके पद्य नं० ८७,८८ के साथ तुलना की जाय तो पूज्यपादकी विशेषताके साथ उनके युक्ति- 'पुरस्सर तथा स्वानुभवपूर्वक कथनका कितना ही सुन्दर आभास मिल सकता है वस्तुतः इस ग्रन्थ में ऐसी कोई भी बात कही गई मालूम नहीं होती जो युक्ति; आगम तथा स्वानुभवके विरुद्ध हो। और इस लिये यह ग्रन्थ बहुत ही प्रामाणिक है । इसोसे उत्तरवर्ती आचार्योंने इसे खूब अपनाया है-परमात्मप्रकाश और ज्ञाना- र्णव-जैसे ग्रंथों में इसका खुला अनुसरण किया गया है, जिसके कुछ नमूने इस ग्रंथके फुटनोटोंमें दिखाये गये हैं। चूँकि ग्रन्थमें शुद्धात्माके कथनकी प्रधानता है और शुद्धात्माको समझनेक लिये अशुद्धात्माको जाननेकी भी जरूरत होती है, इसीसे ग्रन्थमें आत्माके बहिरात्मा अन्तरात्मा और परमात्मा ऐसे तीन भेद करके उनका स्वरूप समझाया है। • साथ ही, परमात्माको उपादेय आराध्य), अन्तरात्माको उपायरूप आराधक और रात्माको हेय त्याज्य) ठहराया है। इन तीनों आत्म-भेदोंका स्वरूप समझाने के । [१३] लिये ग्रंथमें जो कलापूर्ण तरीका अख्तियार किया गया है वह बड़ा ही सुन्दर एवं स्तुत्य है और उसके लिये ग्रन्थको देखते ही बनता है। यहां पर मैं अपने पाठकोंको सिर्फ उन पदोंका ही परिचय कग देना चाहता हूं जो बहिरात्मादिका नामोल्लेख अथवा निर्देश करनकं लिये ग्रन्थमे प्रयुक्त किये गये हैं और जिनसे विभिन्न आत्मा- ओंके स्वरूप पर अच्छा प्रकाश पड़ता है और वह नयविवक्षाकं साथ अर्थपर दृष्टि रखते हुए उनका पाठ करनेसे सहज हीमें अवगत होजाता है । इन पदोंमेंसे कुछ पद ऐसे भी हैं जिनका मूलप्रयोग द्वितीयादि विभक्तियों तथा बहुवचनादिके रूपमें हुआ है परन्तु अर्थावबोधकी सुविधा एवं एकरूपताकी दृष्टि से उन्हें यहां प्रथमाके एकवचनमें ही रख दिया गया है । अस्तु, बहिरात्मादि-निदर्शक वे पद्य क्रमशः निम्न प्रकार हैं । उनके स्थान-सूचक-पद्याङ्क भी साथमें दिये जाते हैं :- (१) बहिरात्म-निदर्शक पद- बहिः ४, वहिरात्मा ५, ७, २७; शरीरादौ जातात्मभ्रान्तिः ५, आत्मज्ञानपराङ: मुखः ७, अविद्वान् ८ मूढः १०,४४,४५; अविदितात्मा ११देहे स्ववुद्धिः १३; मूढात्मा २९,५६,५८,६०, उत्पन्नात्ममतहे ४२, परत्राहम्मतिः ४३, देहात्मदृष्टिः ४९, ९४; अविद्यामयरूपः ५३, वाक्शरीरयोः भ्रान्तः ५४; बालः ५५, पिहितज्योतिः ६०, अबुद्धिः ६१, ६९; शरीरकंचुकंन संवृतज्ञानविग्रहः ६८; अनात्मदर्शी ७३, ९३; हढात्मबुद्धिहादौ ७६; आत्मगोचरे सुषुप्तः ७८, मोही ९०, अनन्तरज्ञः ९१,- अक्षीणदोषः-सर्वावस्थाऽऽत्मदर्शी ९३, जडः १०४ । (२) अन्तरात्म-निदर्शक पद- अन्तः ४, १५, ६०, आन्तरः ५, चित्तदोषाऽऽत्मविभ्रान्तिः ५; स्वात्म- न्येवात्मधीः १३, वहिरव्यापृतेन्द्रियः १५॥ देहादौ विनिवृत्तात्मविभ्रमः २२ अन्तरात्मा २७, ३०, तत्त्वज्ञानी ४२, स्वस्मिन्नहम्मतिः ४३, बुधः ४३, ६३-६६, आत्मदेहान्त- ज्ञानजनिताल्हादनिवृतः ३४, अवयुद्धः ४४, आत्मवित् ४७, स्वात्मन्येवात्मदृष्टिः ४९,- नियतेन्द्रियः ५१श्रारब्धयोगः-भावितात्मा ५२, वाकशरीरयोरभ्रान्तः ५४, आत्म- तत्वे व्यवस्थितः ५७, प्रबुद्धात्मा ६०, बहिर्व्यावृत्तकौतुकः ६, दृष्टात्मा ७३, ९२९ आत्मन्येवात्मधीः ७७, व्यवहारे सुषुप्तः ७८, दृष्टात्मतत्त्व विभ्यस्तात्मधीः ८०, मोक्षार्थी ८३, योगी ८६, १८०, दृष्टभेदः ९२, आत्मदर्शी ९३, ज्ञातात्मा ९४, मुनिः १०२, विद्वान् १०४, परात्मनिष्ठः १०५ । (३) परमात्म-निदर्शक पद- अक्षयानन्तबोधः १, सिद्धात्मा.१ अनीहिता-तीर्थकृत् २; शिवः-धाता-सुगतः- विष्णुः २, जिनः २, ६, विविक्तात्मा ३, ७३; परः४,८६, ९७, परमः ४,३१, ९८, परमात्मा ५, ६, १७, २७, ३०; अतिनिर्मलः ५, निर्मलः केवलः-शुद्धः-विविक्तः-प्रभु:- परमेष्ठी-परात्मा-ईश्वरः ६ अव्ययः ६, ३३, अनन्तानन्तधीशक्तिः अंचल स्थितिः ९, स्वसंवेद्यः ९, २०, २४, निर्विकल्पकः १९, अतीन्द्रियः-अनिर्देश्यः २२; बोधात्मा २५, ३२७-सर्वसंकल्पवर्जितः २७, परमानन्दनिवृतः ३२, स्त्रस्थात्मा ३९; उत्तमः'कायः ४०, निष्ठिनात्मा ४७; सानंदज्योतिरुत्तमः ५१; विद्यामयरूपः ५३, केवलज्ञप्तिविग्रहः ७०, [ १४ ] अच्युनः ७९, परमं पदमात्मनः ८४, ८९, १०४, परं पदं ८५, परात्मज्ञानसम्पन्नः ८६ अवाचां गोचरं पड़ ९९ । यह त्रिधात्मक-पदावली.त्रिधात्माके स्वरूपको व्यक्त करनेके लिये कितनी सुन्दर एवं भावपूर्ण है उसे बतलानकी ज़रूरत नहीं-सहृदय पाठक सहज ही में उसका अनुभव कर सकते हैं । हां, इतना जरूर कहना होगा कि एक छोटेसे ग्रन्थमें एक ही अात्मविषयको स्पष्ट करने के लिये इतने अधिक विभिन्न शब्दोंका ऐसे अच्छे ढंगसे प्रयोग किया जाना, निःसंदेह, साहित्यकी दृष्टिसे भी कुछ कम महत्वकी चीज नहीं है । इससे ग्रंथकार महोदयके रचना-चातुर्य अथवा शब्द-प्रयोग-कौशल्यका भी कितना ही पता चल जाता है। समाधितंत्रमें और क्या कुछ विशेष वर्णन है उस सबका संक्षिप्त परिचय ग्रंथके साथमें दी हुई विषयानुक्रमणिकाको देखनसे सहजमें ही मालूम हो सकता है । वहीं पर कोष्ठकमें मूल श्लोकोंके नम्बर भी दे दिये हैं। यहां पर उसकी पुनरावृत्ति करके प्रस्तावना कलेवरको बढ़ानेकी ज़रूरत मालूम नहीं होती। और न ग्रन्थ- विषयका दूमरे तत्सम ग्रन्थोंके माथ तुलनाका अपनेको यथेष्ट अवकाश ही प्राप्त है, अतःजो तुलना ऊपर की जा चुकी है उसीपर सन्तोष रखते हुए शेषको छोड़ा जाता है । ग्रन्थनाम और पद्यसंख्या यह ग्रंथ १०५ पद्योंका है, जिनसे दूसरा पद्य 'वंशम्थ' वृत्तमें, तीसरा 'उपेन्द्रवज्ञा' में, अन्तिम पद्य 'वसंततिलका' छन्दमें और शेष सब 'अनुष्टुप छंदमें है। अन्तिम पद्यमें ग्रंथका उपसंहार करते हुए, ग्रंथका नाम 'समाधितंत्र दिया है और उसे उस ब्योतिर्मय कैवल्य सुखको प्राप्तिका उपायभूत-मार्ग वत्तलाया है जिसके : अभिलाषियोंको लक्ष्य करके ही यह ग्रंथ लिखा गया है और जिसकी सूचना प्रतिज्ञा- वाक्य (पद्य न. ३) में प्रयुक्त हुए "कैवल्यसुखस्पृहाणाम्" पदके द्वारा की गई है। साथ ही, ग्रंथ प्रतिपादित उपायका संक्षिप्त रूपमें दिग्दर्शन कराते हुए ग्रंथके अध्ययन एवं अनुकूल. वर्तनका फल भी प्रकट किया गया है। वह अन्तिम सूत्र वाक्य इस प्रकार है:- मुक्त्वा परत्र परवुद्धिमहंधियं च संसारदुःखजननी जननादिमुक्तः ज्योतिर्मयं सुखमुपैति परास्मनिष्ठस्तन्मार्गमेतद्धिगम्य समाधितंत्रम् ॥ १०५॥ प्रायः १०० श्लोकोंका होने के कारण टीकाकार प्रभाचंद्रनें इस प्रथको अपनी टीकामें 'समाधिशतक' नाम दिया है और तवसे यह समाधिशतक' नामसे भी अधिकतर उल्लेखित किया जाता है अथवा लोकपरिचयमें प्रारहा है। मेरे इस कथनको 'जैनसिद्धांत भास्कर' में श्री पूज्यपाद और उनका समाधि- तंत्र' शीर्षकके नीचे-देखकर डाक्टर परशुराम लक्ष्मण (वी० एल०) वैद्य, एम० ए० प्रोफेसर वाडियाकालिज पूनाने, हालमें प्रकाशित 'समाधिशतक के मराठी संस्करणकी अपनी प्रस्तावनाम, उसपर कुछ आपत्ति की है.। आपकी रायमें प्रन्थका असली नाम * यह लेख : 'जैनसिद्धान्त भास्कर' के पांचवें भागकी प्रथम किरणमें प्रकाशित हुआ है।
[ १५ ] 'समाधिशतक' और उसकी पद्यसंख्या १०० या ज्यादासे ज्यादा १०१ है। आप पद्य नं०२,.३, १०३, १०४ को तो निश्चितरूपसे (खात्रीने) प्रक्षिप्त' बतलाते हैं और १०५ को 'बहुधा प्रक्षिप्त' समझते हैं । 'बहुधा प्रक्षिप्त' समझनका अभिप्राय है उनकी प्रक्षिप्ततामें संदेहका होना-अर्थात् वह प्रक्षिप्त नहीं भी हो सकता है। जब पद्य नं० १०५ का प्रक्षिप्त होना संदिग्ध है तव ग्रंथका नाम 'समाधिशतक' होना भी संदिग्ध हो जाता है। क्योंकि उक्त पद्यपरमे ग्रंथका नाम समाधितंत्र ही पाया जाता है, इसे डाक्टर साहवन स्वयं स्वीकार किया है । अस्तु । जिन्हें निश्चितरूपसे प्रक्षिप्त बतलाया गया है उनमेंसे पद्य नं० २,३ की प्रक्षि- सताके निश्चयका कारण है उनका छन्दभेद ये दोनों पद्य ग्रन्थके साधारण वृत्त अनुष्टुप् छन्दमें न लिखे जाकर क्रमशः 'वंशम्थ' तथा 'उपेन्द्रवना' छन्दोमें लिखे गये हैं । डाक्टर साहवका खयाल है कि अनुष्टुप् छन्दमें अपने ग्रन्थको प्रारम्भ करने वाला और आगे प्रायः सारा ग्रन्थ उसी छन्दमें लिखने वाला कोई ग्रन्थकारं बीच में और खासकर प्रारम्भिक पद्यक वाद ही दूसरे छन्दकी योजना करके 'प्रक्रमभंग' नहीं करेगा। परन्तु ऐसा कोई नियम अथवा रूल नहीं है जिससे ग्रन्थकार की इच्छापर इस प्रकारका कोई नियंत्रण लगाया जासके । अनेक ग्रन्थ इसके अपवाद-स्वरूप भी देखने में आते हैं । उदाहरणके लिये महान् ग्रंथकार भहाकलंकदेवके 'लघोयस्त्रय' और 'न्यायविनिश्चय' जैसे कुछ ग्रंथोंको प्रमाणमें पेश किया जा सकता है जिनका पहला पद्य अनुप् छन्द में है और जो प्रायः अनुष्टुप् छन्दमें ही लिखे गये हैं परन्तु उनमेंसे प्रत्येकका दूसरा पद्य 'शार्दूलविक्राडित छन्दमें है और वह कण्टकशुद्धि को लिये हुए ग्रंथका खास अंगस्वरूप है। "सिद्धिविनिश्चय' ग्रंथमें भी इसी पद्धतिका अनुसरण पाया जाता है। ऐसी हालतमें छन्दभेदके कारण उक्त दोनों पद्योंको प्रक्षिप्त नहीं कहा जा सकता। ग्रंथके प्रथम पद्यमें निष्कलात्मरूप सिद्धपरमात्माको और दूसरे पद्यमें सकलात्मरूप अहत्परमात्माको नमस्काररूप मंगलाचरण किया गया है-परमात्मा के ये ही दो मुख्य अवस्थाभेद हैं, जिन्हें इष्ट समझकर स्मरण करते हुए यहां थोड़ा- सा व्यक्त भी किया गया है । इन दोनों पद्योंमें ग्रंथ-रचना-सम्बन्धी कोई प्रतिज्ञा वाक्य नहीं है-ग्रंथके अभिधेय-सम्बन्ध-प्रयोजनादि को व्यक्त करता हुआ वह प्रतिज्ञावाक्य पद्य नं०३ में दिया है। जैसाकि ऊपर उसके उल्लेखसे स्पष्ट है। और इसलिये शुरूके ये तीनों पद्य परस्परमें बहुत ही सुसम्बद्ध हैं-उनमेंसे दो के प्रक्षिप्त होनेकी कल्पना करना, उन्हें टीकाकार प्रभाचन्द्रक पद्य बतलाना और उनकी व्यवस्थित टीकाको किसीका टिप्पण कह कर यों ही ग्रंथमें घुसड़ जानेकी बात करना बिल्कुल ही निराधार जान पड़ता है । डा० साहब प्रथम पद्यमें प्रयुक्त हुए"अक्षया- नन्तबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः" (उस अक्षय अनन्तबोधस्वरूप परमात्माको नमस्कार) इस वाक्यकी मौजूदगीमें, तीसरे पद्यमें निर्दिष्ट हुए ग्रंथके प्रयोजनको * डाक्टर साहबने द्वितीय पद्यको 'उपेन्द्र वना' में और तृतीयको 'वंशस्थ' वृत्तमें लिखा है, यह लिखना आपका छन्दशासकी दृष्टिसे गलत है और किसी भूलका परिणाम जान पड़ता है। - का- [ १६ ] अप्रस्तुत-स्थलका (वेमौका ) वतचाते हुए उसे अनावश्यक तथा पुनरुक्त तक प्रकट करते हैं। जबकि अप्रस्तुत-स्थलता और पुनरुक्तताको वहां कोई गंध भी मालूम नहीं होती; परन्तु टीकाके मंगलाचरण-पद्यमें प्रयुक्त हुए "वक्ष्ये समाधिशतक" (मैं समाधिशतक की व्याख्या करता हूं ) इस प्रतिज्ञावाक्यकी मौजूदगीमें, तीसरे पद्यको टीकाकारका बतलाकर उसमें प्रयुक्त हुए प्रतिज्ञावाको प्रस्तुत-स्थलका, आवश्यक और अपुनरुक्त समझते हैं, तथा दूमरे पद्यको भी टोकाकारका बतलाकर प्रतिज्ञाके अनन्तर पुनः मंगलाचरणको उपयुक्त समझते हैं, यह सब अजीब-सी ही बात जान पड़ती है ! मालूम होता है आपने इन प्रभाचन्द्रकं किसी दूसरे टीकापथके साथ इस टीका की तुलना नहीं की, यदि रत्नकरण्डश्रावकाचारकी टीकाके साथ ही इस टीकाकी तुलना की होती तो आपको टीकाकारक मंगलाचरणादि-विषयक टाइप- लेखनशैलीका-कितना ही पता चल गया होता और यह मालूम होगया होता कि यह टीकाकार अपनी ऐमी टीका प्रारम्भमें मंगलाचरण त । प्रतिज्ञा का एक ही पद्य देते हैं, और इसी तरह टीकाकं अन्तमें उपसंहार आदिका भी प्रायः एक ही पद्य रखते हैं, और तब आपको मूलग्रन्थक उक्त दोनों पद्यों (नं० २, ३, को बलात् टीकाकारका बतलानेकी नौबत ही न आती। हां, एक बात यहां और भी प्रकट करदेने की है और वह यह कि डासाहब जब यह लिखते हैं कि "पूज्यपादानी हा विषय आगम, युक्ति, आणि अंतःकरणाकी एकाग्रता करून त्यायोगे स्वानुभवसंपन्न होऊन त्याच्या आधारे स्पष्ट आणि सुल- भरीतीने प्रतिपादला आहे" तब इस यातको भुलादेते हैं कि यह आगम, युक्ति और अन्तःकरणकी एकाग्रता-द्वारा सम्पन्न स्वानुभवकं आधारपर ग्रंथ रचनकी बात पूज्यपादन ग्रंथके तीसरे पद्यमें ही तो प्रकट की है-वहींस तो वह उपलब्ध होती है- फिर उस पद्यको मूलग्रंथका माननेसे क्यों इनकार किया जाता है ? और यदि यह बात उनकी खुदकी जांच-पड़ताल तथा अनुसंधानसे सम्बन्ध रखती हुई होती तो वे आगे चल कर कुछ तत्सम ग्रंथोंकी सामान्य तुलनाका उल्लेख करते हुए, यह न लिखते कि 'उपनिषद् ग्रंथके कथनको यदि छोड़ दिया जाय तो परमात्मस्वरूपका तीन प.. रूप वर्णन पूज्यपादन ही प्रथम किया है ऐसा कहनमें कोई हरकत नहीं। क्योंकि पूज्यपादसे पहलेके प्रसिद्ध आचार्य कुन्दकुन्दके मोझाप्राभूत (मोक्खपाहुड) ग्रन्थमें त्रिवात्माका बहुत सष्टरूपसे वर्णन पाया जा है ।और पूज्यपादने उस प्रायः उसी अन्थपरसे लिया है। जैसा कि नमूनके तौरपर दोनों ग्रन्थोंके निम्न दो पद्योंकी तुलनासे प्रकट है और जिससे यह स्पष्ट जाना जाता है कि समाधितंत्रका पद्य मोक्षप्राभृतकी गाथाका प्रायः अनुवाद है:- तिपयारी सो अप्पा परमंतरवाहिरो हु देहीणं । तस्थ परो भाइज्जइ अंतोचारण चयदि बहिरप्पा ।।-मोक्षप्रा० बहिरन्नः परश्चेति निधारमा सर्वदेहिषु । उपेयात्तत्र परमं मध्योपायाद्यहिस्त्यजेत् ॥-माधितंत्रम् मालूम होता है मैंने अपने उक्त लेखमें ग्रन्थाधारकी जिस वातका उल्लेख करके प्रमाण में ग्रंथके पद्य नं०३ को उद्धत किया था और जो ऊपर इस प्रस्तावनामें .
" [ १७ ] भी पद्य नं०३ के साथ ज्यों को त्यों दी हुई है उसे डाक्टर साहबने अनुवादरूपमें अपना तो लिया परन्तु उन्हें यह खयाल नहीं आया कि ऐसा करनेसे उनके उस मन्तव्यका स्वयं विरोध हो जाता है जिसके अनुसार पद्य नं०३ को निश्चितरूपसे प्रक्षिप्त कहा गया है। अस्तु । अब रही पद्य नं० १०३, २०४ की बात, इनकी प्रक्षिप्तताका कारण डा० साहब ग्रन्थक विषय और पूर्वपद्योंके साथ इनके प्रतिपाद्य-विषयकी असम्बद्धता बतलाते हैं-लिखते है “या दोन श्लोकाच्या प्रतिपाद्य विषयांशी व पूर्व श्लोकांशी काहीं च संबंध दिसत नाही" । साथ ही, यह भी प्रकट करते हैं कि ये दोनों श्लोक कब, क्यों और कैसे इस ग्रन्थमे प्रविष्ट (प्रक्षिप्त) हुए हैं उसे बतलानके लिये वे अस- मर्थ है। पिछली बातक अभावमें इन पद्योंकी प्रक्षिप्तताका दावा वहुत कमजोर हो जाता है। क्योंकि असम्बद्धताकी ऐसी कोई भी बात इनमें देखनेको नहीं मिलती। टीकाकार प्रभाचन्द्रन अपने प्रस्तावना-चाक्योंक द्वारा ग्रन्थक विषय तथा पूर्व पद्योंक साथ इनके सम्बन्धको भले प्रकार घोषित किया है । वे प्रस्तावनावाक्य अपने अपने पद्यक साथ इस प्रकार हैं- "ननु यद्यात्मा शरीरात्सर्वथा भिन्नस्तदा कथमात्मनि चलति नियमेन तच्चलेत् तिष्टति तिष्टेदिति वदन्तं प्रत्याह- प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छादेषप्रवर्तितात् । वायोः शरीरयन्त्राणि वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु ॥१०३ ॥ "तेषां शरीरयन्त्राणामात्मन्यारांपाऽनारापो कृत्वा जडविवेकिनौ किं कुर्वत इत्याह- तान्यात्मनि समारोप्य साक्षाण्यास्ते सुखं जडः। त्यक्त्वाऽऽरोपं पुनर्विद्वान् प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १०४ ॥ इन प्रस्तावनावाक्योंक साथ प्रस्तावित पद्योंक अर्थको साथमें देखकर कोई भी सावधान व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि इनका ग्रन्थक विपय तथा पूर्वपद्योंक साथ कोई संबंध नहीं है-जिस मूल विषयको ग्रन्थमें अनेक प्रकारसे पुनः पुनः स्पष्ट किया गया है उसीको इन पद्योंमें भी प्रकारान्तरसे और भी अधिक स्पष्ट किया गया है और उसमें पुनरुक्तता-जैसी भी कोई बात नहीं है। इसके सिवाय, उपसंहारपद्यके पूर्व ग्रंथक विषयको समाप्ति भी “अदुःखभावित" नामके भावनात्मक पद्य नं० १०२ की अपेक्षा पद्य नं० १०४ के साथ ठीक जान पड़ती है, जिसके अन्तमें साध्यकी सिद्धिक उल्लेखरूप "प्राप्नोति परमं पदम्" वाक्य पड़ा हुआ है और जो इस ग्रन्थके मुख्य प्रयोजन अथवा आत्माके अन्तिम ध्येयको स्पष्ट करता हुआ विषयको समाप्त करता है। अब मैं फ्ध० १०५ को भी लेता हूँ, जिसे डाक्टर साहबने सन्देह-कोटिमें रक्खा है । यह पद्य संदिग्ध नहीं है, बल्कि मूलग्रन्थका अन्तिम उपसंहार-पद्य है। जैसा कि मैंने इस प्रकरणके शुरूमें प्रकट किया है । पूज्यपादके दूसरे प्रन्थोंमें भी, जिनका प्रारम्भ अनुष्टुप् छन्दके फ्यों-द्वारा होता है, ऐसे ही उपसंहार-पद्य पाये जाते हैं जिनमें ग्रन्थ-कथित विषयका संक्षेप में उल्लेख करते हुए प्रन्थका नामादिक [१८] भी दिया हुआ है। नमूने के तौर पर 'इष्टोपदेश' और 'सवार्थसिद्धि' ग्रन्थोंक वे उपसंहार-पद्योंको नीचे उद्धृत किया जाता है : इष्टोपदेशमिनि सम्यगधीत्य धीमान् मानापमानसमतां स्वमताद्वितन्य । मुक्ताग्रहो विनिवलन्सजने वने वा मुक्तिश्रियं निरुपमामुपयाति भव्यः ।।-इष्टोपदेशः । स्वर्गाऽपवर्गसुखमाप्तुमनोभिराय- जैनेन्द्रशासनवरामृनसारभूता । सर्वार्थसिद्धिरिनि सद्विरुपात्तनामा तत्त्वार्थवृत्तिरनिशंमनसा धायर्यासवार्थसिद्धिः। इन पद्योंपरसे पाठकोंच्चे यह जानकर आश्चर्य होगा कि ये दोनों पद्य भी उसी वसन्ततिलका' दन्दमें लिखे गये हैं जिसमें कि समाधितंत्रका उक्त उपसंहार- पर पाया जाता है। तीनों प्रन्थों ये तीनों पद्य एक ही टाइपक हैं और वे अपने एक ही आचार्य द्वारा रचे जाने की सष्ट पारणा करते हैं। इसलिये समाधितंत्रा पच नं० १०५ पूज्यपादकृत ही है, इसमें सन्देहको जरा भी स्थान नहीं है। जब पच नं० १०५ असिन्दवल्पसे पूज्यपादकृत है तब ग्रन्थका असली मूल नाम भी समाधितंत्र ही है। क्योंकि इसी नामका उक्त पद्यमें निर्देश है, जिले डा० साहबने भी स्वयं स्वीकार किया है। और इसलिये 'सनाधिशतकं नामची कल्पना वाद की है-उसच अविक प्रचार टीकाकार प्रभाचन्द्र के बाद ही हुआ है। प्रवणबेलगोलक जिस शिलालेख नं.४ में इस नामा उल्लेख भाया है वह विकमकी १३ वी शतान्दा है और टीकाकार प्रभाचन्द्रका समय भी विक्रमकी १३वीं शताब्दी है। इस तरह इस ग्रन्धका मूलनाम 'समाधितंत्रउत्तरनाम या उपनाम 'समा- विशतक है और इसको पद्य संख्या १०५ है-उसमें पाँच पद्योंके प्रक्षित होनेकी जो कल्पना की जाती है वह निरी निमूल और निराधार है। अन्यकी हस्तलिखित मूल प्रतियोंमें भी यही १०५ पद्यसंख्या पाई जाती है । देहली आदिक अनेक भण्डामें मुझे इस मूलमन्यकी हस्तलिखित प्रविशंक देखनेका अवसर मिला है- देहली सेठके कूचे मन्दिर तो एक जीर्ण-शीर्ण प्रति कईसौ वर्षकी पुरानी लिखी हुई जान पड़ती है । जैनसिद्धान्त-भवन श्राराक अध्यक्ष ५० के भुजवलोजी शास्त्री से दर्यापत करने पर भी यही मालूम हुआ कि वहां ताडपत्रादि पर जितनी भी मूलप्रतियां है उन सबमें इस प्रन्यन्नी पद्यसंख्या १०५ ही की है। और इसलिये डा० साहवा यह लिखना उचित प्रतीत नहीं होता कि 'इस टीका से रहित मूल- अन्यकी हस्तलिखित प्रचियां उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा नालून होता है कि 'शतक नाम परसे डा. साहकको अन्धने १०० पद्योंक होनेकी कल्पना उत्पन्न हुई है और उसी परसे उन्होंने उक्त पांच पद्योंको प्रक्षिप्त करार देनके लिये अपनी त्रुद्धिका व्यापार किया है, जो ठीक नहीं जान पड़ता - - [ १९] क्योंकि शतक मन्थके लिये ऐसा नियम नहीं हैं कि उसमें पूरे १०० ही पद्य हों, प्रायः १०० पद्य होने चाहिये-दो, चार, दस पद्य ऊपर भी हो सकते हैं। उदाहरणक लिये भर्तृहरि-नीतिशतकमें ११०, वैराग्यशतकमे ११३, भूधर-जैनशतकमे १०७, ध्यानशतकमें १०५ और श्रीसमन्तभद्रके जिनशतकमें ११६ पद्य पाये जाते हैं। अतः ग्रंथका उत्तर नाम या उपनाम 'समाधिशतक' होते हुए भी उसमें १०५ पद्योंका होना कोई आपत्तिकी बात नहीं है । टीकाकार प्रभाचन्द्र इस ग्रन्थके साथमें जो संस्कृत टीका प्रकाशित होरही है, उसके रचयिता 'प्रभानन्द्र' हैं । अन्तिम पुष्पिकामें प्रभाचन्द्रको 'पण्डित प्रभाचन्द्र' लिखा है; परन्तु इससे उन्हें कोई गृहस्थ पण्डित न समझ लेना चाहिये । टीका-प्रशस्तिमें 'प्रभेन्दु' के लिये प्रयुक्त हुए 'प्रभु' आदि विशेषणोंसे यह साफ जाना जाता है कि वे कोई प्राचार्य अथवा भट्टारक थे। अविद्वान भट्टारकों से व्यावृत्ति करानेके लिये वादको अच्छे पढ़े-लिखे विद्वान् भट्टारकोंके नामकं साथ 'पण्डित' विशेषण लगाया जाने लगा था; जैसा कि आजकल स्थानकवासी समाजमें जो मुनि अच्छे पढ़े-लिखे विद्वान् मिलते हैं उन्हें 'पण्डितमुनि' लिखा जाने लगा है। टीकाप्रशस्ति अथवा टीका उपसंहार-पद्यमे टीकाकार प्रभाचन्द्रका न तो कोई विशेष परिचय है और न टीकाके बननका समय ही दिया है। टीकाकारने कहीं पर अपने गुरुका नामो- ल्लेख तक भी नहीं किया है। और जैनसमाज में 'प्रभाचन्द्र' नामके बीसियों मुनि, आचार्य तथा भट्टारक होगये हैं, जिनमें से बहुतोंका संक्षिप्त परिचय मैंने रत्नकरण्ड- श्रावकाचारकी अपनी उस प्रस्तावनामें दिया है जो माणिकचन्द्र-ग्रन्थमालामें प्रकट होनेवाली सटीक रत्नकरण्डप्रावकाचारके साथ प्रकाशित हुई है । ऐसी हालतमें यह टीका कौनसे प्रभाचन्द्रकी बनाई हुई है और कब बनी है, इस प्रश्नका उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जहां तक मैंने इस प्रश्नपर विचार किया है मुझे इस विषयमें कोई संदेह मालूम नहीं होता कि यह टीका नन्हीं प्रभाचन्द्राचार्यकी बनाई हुई है जो कि रत्न- करण्डश्रावकाचारकी टीकाके कर्ता हैं। उस टोकाके साथ जब इस टीकाका मिलान किया जाता है तब दोनोंमें बहुत बड़ा सादृश्य पाया जाता है । दोनोंकी प्रतिपादन- शैली, कथन करनेका ढंग और साहित्यकी दशा एक-जैसी मालूम होती है। वह भी इस टीकाकी तरह प्रायः शब्दानुवादको ही लिए हुए है। दोनोंके आदि-अन्तमें एक एक ही पद्य है और उनकी लेखन-पद्धति भी अपने अपने प्रतिपाद्य विषयकी दृष्टिसे समान-पाई जाती है । नीचे इस साहश्यका अनुभव करानेके लिये कुछ उदाहरण नमूनेके तौर पर दिये जाते हैं :- (१) दोनों टीकाओंके आदि मंगलाचरणके पद्य इस प्रकार हैं समन्तभद्रं निखिलात्मबोधनं जिनं प्रणम्याखिलकर्मशोधनम् । निवन्धनं रस्नकरण्डक पर करोमि भव्यप्रतिबोधनाकरम् ॥१॥ -रत्नकरण्डकटीका [ २० ] सिद्धं जिनेन्द्रमलमप्रतिमप्रवोधं निर्वाणमार्गममलं विवुधेन्द्रवंद्यम् । संसारसागरसमुत्तरणप्रपोतं वक्ष्ये समाधिशतकं प्रणिपत्य वीरम् ।। -समाधितंत्रटीका ये दोनों पद्य इष्टदेवको नमस्कारपूर्वक टीका करनेकी प्रतिज्ञाको लिये हुए हैं, दोनोंमें प्रकारान्तरस ग्रन्थकर्ताक और मूलग्रंथको भी स्तुतिका विषय बनाया गया है और उनके अप्रतिमप्रबोध-निखिलात्मबोधन तथा निर्वाणमान-अखिलकर्म- शोधन, इत्यादि कुछ विशेषण भी, अर्थकी दृष्टिन, परस्पर मिलते जुलते हैं। (२) मंगलाचरणके बाद दोनों टीकाओके प्रस्तावनावाक्य इस प्रकार हैं- श्रीसमन्तभद्रस्वामी रत्नानांरक्षणोपायभूतरत्नकरण्डकप्रख्यं सम्यग्दशनादिरत्नानां पालनोपायभूतं रत्नकरण्डकाख्यं शास्त्रं कर्तुकाम निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमाप्त्यादिकं फलमभिलषन्निष्ट- देवताविशेष नमस्कुर्वन्नाह । --रत्नकरण्डकटीका श्रीपूज्यपादस्वामी मुमुक्षुणां मोक्षोपायं मोक्षस्वरूपं चोपदर्श यितुकामो निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमापयादिकं फलमभिलष- निष्टदेवताविशेषं नमस्कुर्वाणो येनात्मेत्याह। -समाधितत्रटीका (३) दोनों टीकाओंमें अपने ग्रंथके प्रथम पद्यका साराँश इस प्रकार दिया है- "अत्र पूर्वार्द्धन भगवतः सर्वज्ञतोपायः, उत्तरार्द्धन च सर्वज्ञ- तोक्ता।" -रत्नकरण्डकटीका "अत्र पूर्वार्दैन मोक्षोपायः, उत्तराईन च मोक्षस्वरूपमुप- दर्शितम् ।" -समाधितंत्रटीका इससे स्पष्ट है कि दोनों टीकाओंके कथनका ढंग और शब्दविन्यास एक- जैसा है। (४) दोनों टीकाओंमें 'परमेष्टी' पदकी जो व्याख्या की गई है वह एक ही who परमे इन्द्रादीनां वंद्ये पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी। -रत्नकरण्डकटीका परमे इन्द्रादिवंद्य पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी स्थानशीलः । -समाधितंत्रटीका (५) दोनों टीकाओंके अन्तिम पद्य इस प्रकार हैं- पहले पद्यमें 'जिनेन्द्र' पदके द्वारा ग्रन्थकर्ताका नामोल्लेख किया गया है। क्योंकि पूज्यपादका 'जिनेन्द्र' अथवा 'जिनेन्द्रबुद्धि' भी नामान्तर है और "विबुधे- न्द्रवंद्य पद पूज्यपाद नामका भी द्योतक है।
[२१] येनाज्ञानतमो विनाश्य निखिलं भव्यात्मचेतो गत सम्यग्ज्ञानमहांशुभिः प्रकटितः सागारमार्गोऽखिलः । श्रीरत्नकरण्डकामलरवि: संमृत्सरिच्छोषको जीयादेष समन्तभद्रमुनिपः श्रीमत्प्रभेन्दुर्जिनः ॥ -रत्नकरण्डकटीका येनाम्मा बहिरन्तरुत्तमभिधा त्रेधा विवृत्योदितो मोक्षोऽनन्तचतुष्टयामलयपुः सद्ध्यानतः कीर्तितः । जीयात्सोऽत्र जिनः समस्तविषयः श्रीपादपूज्योऽमलो भव्यानन्दकरः समाधिशतकः श्रीमत्प्रभेन्दुः प्रभुः ।। -समाधितंत्रटीका इन दोनों पद्योंमें, अपने अपने ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयका सागंश देते हुए, जिस युक्तिसे जिनदेव, ग्रन्थकार (श्रीपादपूज्य, समन्तभद्रमुनि), ग्रन्थ (सम्मधि- शतक, रत्नकरण्डक) और टीकाकार (प्रभेन्दुप्रभाचन्द्र) को आशीर्वाद दिया गया है वह दोनों में बिल्कुल एक ही है, दोनों की प्रतिपादन-शैली अथवा लेखन-पद्धतिमें जरा भी भेद नहीं है, छंद भी दोनोंका एक ही है और दोनों में 'येन, जिनः श्रीमान्, प्रभेन्दुः, सः, जीयात्' पदोंकी जो एकता और 'कीर्तितः, प्रकटितः' आदि पदोंके प्रयोगकी जो समानता पाई जाती है वह मूल पद्योंपरसे प्रकट ही है, उसे और स्पष्ट करके बतलानकी कोई जरूरत नहीं है रत्नकरण्डश्रावकाचारकी टीका विक्रमकी १३ वीं शताब्दीकी बनी हुई है, यह वात मैं ने रत्नकरण्डश्रावकाचारको अपनी उक्त प्रस्तावनामें सिद्ध की है, और इस लिये समाधितंत्रकी यह टीका भी प्रायः विक्रमकी १३ वीं शताब्दीकी ही जान पड़ती है। वीर-सेवा-मन्दिर, सरसावा ता०५-५-१६३६ जुगलकिशोर मुख्तार प्रस्तावना की कुछ अशुद्धियां प्रथम पृष्ठकी १० वीं पंक्तिमें 'श्रीपूज्यपादो की जगह 'श्रीथूज्यपादो', द्वितीय पृष्ठ के फुटनोटमें 'काशकृत्स्ना'की जगह 'काशकृत्स्न', 'जयन्त्यष्टादि'के स्थानपर'नयन्त्यष्टौ च' और 'कविकल्पद्मा की जगह 'धातुपाठ:' गलत छप गया है । इसी तरह पृ० ३की १८ वीं पंक्तिमें 'कवे की जगह 'क', पृ०८की २४ वीं पंक्ति में सर्वथा'को जगह 'सर्व ।', पृ० फुट नोटमें 'भावप्राभृत'को जगह 'मोक्षप्राभृत', पृ० १३को २२वी पंक्ति में 'आत्मदेहान्तर'की जगह 'श्रात्मदेहान्त' और पृ०१६की ३७ वी पंक्तिमें 'उद्धृत' के स्थानपर 'उद्धत' अशुद्ध छप गया है। पाठकजन इन अशुद्धियोंको सुधार लेवें। ११के . समाधितंत्रकी विषयानुक्रमणिका ३० , ८ विषय पृष्ठ विपय पृष्ठ सिद्धात्मा और सकलात्माको नमस्कार- आत्मस्वरूप-विचार (२४) रूप मंगलाचरण (१,२) १ आत्मानुभवीका शत्रु-मित्र-विचार विषय तथा प्राधारको स्पष्ट करते हुए (२५, २६) ग्रन्थ रचनेकी प्रतिज्ञा (३) ६/ परमात्मपदकी प्राप्तिका उपाय (२७) ३२ आत्माके बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मपदको भावनाका फल (२८) ३३ परमात्मा ऐसे तीन भेद और उनकी ! भय और अभयके स्थान (२९) ३४ हेयोपादेयता (४) आत्माकी प्राप्तिका उपाय (३०,३१,३२)३५ बहिरात्मादिका जुदा जुदा लक्षण (५) १०/ आत्मज्ञानके विना तपश्चरण व्यर्थ- परमात्माके वाचक कुछ नाम (६) १२ मुक्ति नहीं हो सकती (३३) वहिरात्मा के शरीर में आत्मत्वबुद्धि होने आत्मज्ञानीको तपश्चरणसे खेद नहीं होता (३४) ३८ का कारण (७) १३ चतुर्गति-सम्बंधी शरीरभेदसे जीवभेदकी खेद करनेवाला आत्मज्ञानी नहीं-निश्चल मान्यता (८,९) मन प्राणी ही आत्मदर्शी होताहै (३५)३९ १४ आत्मतत्त्व और आत्मभ्रांतिका स्वरूप वहिरात्माकी अन्यशरीर-विषयक और उसमें त्याग-ग्रहण (३६) मान्यता (१०) १६ मनके विक्षिप्त तथा अविक्षिप्त होनेका शरीर में आत्मत्व-बुद्धिका परिणाम (११,१२) ४१ कारण (३७) १७ वहिरात्मा और अन्तरात्माका कर्तव्यभेद चित्तके विक्षिप्त-अविक्षिप्त होनेका वास्त- (१३) विक फल (३८) ४२ १९ शरीरमें आत्मत्वबुद्धिपर खेद (१४) २० अपमानादि तथा रागद्वेषादिको दूर शरीरसे आत्मत्वबुद्धि छोड़ने और करनेका उपाय (३९) ४२ अन्तरात्मा होने की प्रेरणा (१५) २१ राग और द्वेषके विषय तथा विपक्षका ४३ अन्तरात्माका अपनी पूर्व अवस्थापर प्रदर्शन (४०) खेदप्रकाश (१६) भ्रमात्मक प्रेमके नष्ट होनेका फल(४१)४४ २२ तपसे बहिरात्मा क्या चाहता है और आत्मज्ञानका उपाय (१७) २३ अन्तरंग और वाह्य वचन-प्रवृत्तिके त्याग बहिरात्मा और अन्तरात्मामें कर्म- अन्तरात्मा क्या (४२) का उपाय (१८) अन्तर्विकल्पोंके त्यागका प्रकार (१९) २५ वन्धनका कर्ता कौन (४३) ४६ आत्माका निर्विकल्पक स्वरूप (२०) २५ बहिरात्मा और अन्तरात्माका विचार- भेद (४४) आत्मज्ञानसे पूर्वकी और वादको चेष्टाका अन्तरात्माकी देहादिमें . अभेदरूपकी विचार (२१,२२) भ्रांति क्यों होती है (४५) लिंग-संख्यादिविषयक भ्रमनिवारणात्मक अन्तरात्मा उस भ्रान्तिको कैसे छोड़े. : विचार (२३) २८ ७२ [ २३ ] विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ वहिरात्मा और अन्तरात्माके त्याग- मूढजन किसको आत्मा मानते हैं (६९)६९ ग्रहण का स्पष्ट विवेचन (४७) ४९ | आत्मस्वरूपके जाननेके इच्छुकोंको अन्तरात्माकं अंतरंग त्याग-ग्रहणका शरीरसे भिन्न आत्मभावना करनेका प्रकार (४८) उपदेश (७०) स्त्रीपुत्रादिक साथ वचनादि-व्यवहारमें | आत्माकी एकाग्र भावनाका फल (७१)७१ किन को सुख प्रतीत होता है और चित्तकी स्थिरताके लिये लोकसंसर्ग- किन को नहीं (४९) का त्याग (७२) अन्तरात्माकी भोजनादिके ग्रहणमें प्रवृत्ति क्या मनुष्योंका संसर्ग छोड़कर जंगल में कैसे हो सकती है (५०) ५२ निवास करना चाहिये (७३) ७३ अनासक्त अन्तरात्मा आत्मज्ञानको बुद्धि आत्मदर्शी और अनात्मदर्शी होनेका में कैसे धारण करे (५१) ५३ फल (७४) इंद्रियोंको रोककर प्रात्मानुभव करनेवाले वास्तवमें आत्मा ही आत्माका गुरु है को दुख-मुख कैसे होता है (५२) ५४ आत्मस्वरूपकी भावना किस तरह करनी | बहिरात्मा तथा अन्तरात्मा मरणके चाहिये (२३) ५५ सन्निकट आनपर क्या करता वचन और शरीरमें भ्रान्त तथा अभ्रान्त (७६,७७) ७६ मनुष्यका व्यवहार (५४) ५६ व्यवहारमें अनादरवान ही आत्मबोधको वाह्य विषयकी अनुपकारता और अज्ञानी प्राप्त होता है, अन्य नहीं (७८) ७७ की आसक्ति (५५) ५७ | जो आत्माके विषयमें जागता है वही मिथ्यात्वक वश बहिरात्माकी दशा कैसी मुक्तिको प्राप्त करता है (७९) होती है (५६) ५८ | भेद-विज्ञानी अन्तरात्माको यह जगत स्वंशरीर और परशरीरको कैसे अवलो योगकी प्रारंभ और निष्पन्न अवस्था- कन करना चाहिये (५७) ५९ ओंमें कैसा प्रतीत होता है (८०) ७९ ज्ञानाजीव आत्मतत्वका स्वयं अनुभव कर आत्माकी भिन्न भावनाके विना भरपेट मूढात्माओंको क्यों नहीं बताते, जिससे उपदेश सुनने-सुनानेसे मुक्ति नहीं वे भी आत्मज्ञानी वनें (५८,५९) ६० होती (८१) मूढात्माओंके आत्मबोध न होनेका भेद-ज्ञामको भावनामें प्रवृत्त हुए अन्तः कारण (६०) ६२ अन्तरात्माकी शरोरादिके अलंकृत करने- रात्माका कर्तव्य (८२) में उदासीनता (६१)... अब्रतोंकी तरह व्रतोंका विकल्प भी ६३ संसार कब तक रहता है और मुक्ति-व्रतोंक विकल्पको छोड़नेका क्रम(८४ ८३ त्याज्य है (८३) ८२ की प्राप्ति कब होती है (६२) ६४ अन्तर्जल्पसे अन्तरात्माका शरीरके घनादिरूप होनेपर युक्त उत्प्रेक्षा-जाल दुःखका आत्माको घनादिरूप मानना मूलकारण है, उसके नाशसे परम ६५ पदकी प्राप्ति और नाश करनेका क्रम अन्तरात्माकी मुक्ति-योग्यता (६७) ६७ (८५,८६) ८३ शरीरादिसे भिन्न आत्माको अनुभव व्रतविकल्पकी तरह लिंगका विकल्प भी करनेका फल (६८) ६८ मुक्तिका कारण नहीं (८७) ८५ : ... . [ २४ ] विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ जातिको आग्रह भी मुक्तिका कारण अभिन्नात्माकी उपासनाका फल (९०) ९५ नहीं है (८८) ८६ / भिन्नाऽभिन्नस्वरूप आत्मभावनाका ब्राह्मण-आदि-जाति-विशिष्ट मानव ही उपसंहार (९९) ९६ दीक्षित होकर मुक्ति पा सकता है, ऐसा आत्मतत्वो विषयमें चार्वाक और जिनके आगमानुबन्धी हठ है वे भी सांख्यमतकी मान्यताओंका निरसन परमपदको प्राप्त नहीं हो सकते (८९) ८६ (१००) मोही जीवोंके दृष्टि-विकारका परिणाम और मरणरूप विनाशके हो जानेपर उत्तर- दर्शन-व्यापारका विपर्यास(९०,९१)८७ कालमें आत्माका अस्तित्व कैसे बन संयोगकी ऐसी अवस्थामें अन्तरात्मा सकता है (१०१) ९९ क्या करता है (९२) ८९ अनादि-निधन श्रात्माकी मुक्तिके लिये वहिरात्मा और अन्तरात्माकी कौनसी दुर्द्धर तपश्चरण-द्वारा कष्ट उठाना व्यर्थ दशा भ्रमरूप और कौन भ्रमरहित नहीं, आवश्यक है (१०२) होती है (९३) ९० शरीरसे आत्माके सर्वथा भिन्न होनेपर देहात्मदृष्टिका सकलशास्त्रपरिज्ञान और प्रात्माको गति-स्थितिसे शरीरकी गति- जाग्रत रहना भी मुक्तिके लिये स्थिति कैसे होती है (१०३) १०१ निष्फल है ९१ शरीर-यंत्रोंकी आत्मामें आरोपना-अना- ज्ञातात्माके सुप्तादि अवस्थाओं में भी रोपना करके जड़-विवेकी जीव किस स्वरूप-संवेदन क्योंकर बना रहता है फलको प्राप्त होते हैं २०४) १०२ ९२ चित्त कहांपर अनासक्त होता है (९६)९३ ग्रन्थका उपसंहार (१०५) १०३ भिन्नात्मस्वरूप ध्येयमें लीनताका फल | टीका-प्रशस्ति और अन्तिम मगल- (९७) ९४ १०५ ... . कामना ॐ श्रीमद्देवनन्द्यपरनामपूज्यपादस्वामिविरचित- समाधितंत्र (टीकाद्वय-संयुक्त) श्रीप्रभाचन्द्रविनिर्मितसंस्कृतटीका (मंगलाचरण) सिद्ध जिनेन्द्रमलमप्रतिमप्रबोधम् निर्वाणमार्गममलं विबुधेन्द्रवन्धम् । संसारसागरसमुत्तरणप्रपोतं वक्ष्ये समाधिशतकं प्रणिपत्य धीरम् ॥ १ ॥ श्रीपूज्यपादस्वामी मुमुक्षूणां मोक्षस्वरूपं चोपदर्शयितुकामो निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमाप्त्यादिकं फलमभिलषनिष्टदेवताविशेष नमस्कुर्वन्नाह येनात्माऽबुद्ध्यतात्मैव परत्वेनैव चापरम् । अक्षयानन्तबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः॥१॥ श्री पं० परमानन्द शास्त्रीकृत सान्वयार्थ हिन्दी टीका (मंगलाचरण) सकल विभाव अभावकर, किया आत्मकल्यान । परमानन्द-सुबोधमय, नमू सिद्ध भगवान ॥१॥ आत्मसिद्धिके मार्गका, जिसमें सुभग विधान । उस समाधियुत तंत्रका, करूं सुगम व्याख्यान ॥२॥ श्रीपूज्यपाद स्वामी मोक्षके इच्छुक भव्य जीवोंको मोक्षका उपाय और मोक्षके स्वरूपको दिखलानेकी इच्छासे शास्त्रकी निर्विघ्न परिसमाप्ति आदि फलकी इच्छा करते हुए इष्टदेवताविशेष श्रीसिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार करते हैं। अन्वयार्थ-(येन) जिसके द्वारा (आत्मा) प्रात्मा(आत्मा एव) आत्मा रूपसे हो (अबुद्दयत) जाना गया है (च) और (अपरं) अन्यको-कर्म [२] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-अत्र पूर्वान मोक्षोपाय उत्तरार्द्धन च मोक्षस्वरूपमुपदर्शि- तम् । सिद्धात्मने सिद्धपरमेष्ठिने सिद्धः सकलकर्मविप्रमुक्तः स चासावा.त्मा च तस्मै नमः । येन किं कृतं । अबुद्धयत ज्ञातः । कोऽमौ ? आत्मा । कथं ? श्रात्मैव । अयमर्थः येन सिद्धात्मनाऽत्रात्मैवाध्यात्मैवात्मत्वेनाबुद्धयत न शरी- रादिकं कर्मोपादितसुरनरनारकतिर्यगादिजीवपर्यायादिकं वा । तथा परत्वे- नैव चापरं अपरं च शरीरादिकं कर्मजनितमनुष्यादिजीवपर्यायादिकं वा परत्वेनैवात्मनोभेदेनैवाबुद्धयत् । तस्मै कथंभृताय ? अक्षयानन्तबोधाय अक्षयोऽविनश्वरोऽनन्तोदेशकालानवच्छिन्नस्समस्तार्थपरिच्छेदको वा बोधो- यस्य तस्मै । एवंविधवोधस्य चानन्तदर्शनसुखबीर विनाभावित्वसामर्थ्या- दनंतचतुष्टयरूपायेति गम्यते । ननु चेष्टदेवताविशेषस्य पञ्चपरमेष्ठिरूपत्वात्त- जनित मनुष्यादिपर्यायरूप पुद्गलको (परत्वेन एव) पररूप से हो (अबुद्धयत) जाना गया है (तस्मै) उस (अक्षयानन्तबोधाय) अविनाशी अनन्तज्ञानस्व- रूप (सिद्धात्मने) सिद्धात्मा को (नमः)नमस्कार हो। भावार्थ-श्रीपूज्यपाद स्वामोने श्लोकके पूर्व में मोक्षका उपाय और उत्तराईमें मोक्षका स्वरूप बताया है तथा सिद्ध परमात्मारूप इष्ट- देवताको नमस्कार किया है । यह जीव अनादिकालसे मोह मदिराका पान कर आत्माके निज चैतन्य स्वरूपको भूल रहा है, अचेतन विना- शोक परपदार्थों में आत्मबुद्धि कर रहा है, तथा चिरकालीन मिथ्यात्वरूप विपरीताभिनिवेशके सम्बन्धसे उन परपदार्थोंको अपना हितकारक समझना है और आत्माके उपकारी कर्नबन्धनके छुड़ानेमें निमित्तभूत ज्ञान- वैराग्यादिक पदार्थों को दुःखदायी समझता है । जैसे पित्तज्वर वाले रोगीको मीठा दूध कडवा मालूम होता है; ठीक उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि जीवको आत्माका उपकारक मोक्षका उपाय भी विपरीत जान पड़ता है। संसारके समस्त जीव सुख चाहते हैं और दुःखसे डरते हैं तथा उस से छूटने का उपाय भी करते हैं; परन्तु उस उपायके विपरोन होनेसे चतु- गैतिरूप संसारके दुःखसे उन्मुक्त नहीं हो पाते हैं। वास्तवमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान. और' सम्मक्चारित्ररूप रत्नत्रयकी एकता ही मोक्षकी समाधितंत्र [३] दत्र सिद्धात्मन एव कस्माद् ग्रन्थकृता नमस्कारः कृत इति चेत् ग्रन्थस्य कर्तु- ाख्यातुः श्रोतुरनुष्ठातुश्च सिद्धस्वरूपप्राप्त्यर्थत्वात् । यो हि यत्प्राप्त्यर्थी सं तं नमस्करोति यथा धनुर्वेदप्राप्त्यर्थी धनुर्वेदविदं नमस्करोति । सिद्धस्व- रूपप्राप्त्यर्थी च समाधिशतकशास्त्रस्यकर्ता व्याख्याता श्रोता तदर्थानुष्ठाता चात्मविशेषस्तस्मात्सिहात्मानं नमस्करोतीति । सिद्धशब्देनैव चाहंदादीनाम- पि ग्रहणम् । तेषामपि देशतः सिद्धस्वरूपोपेतत्वात् । प्राप्तिका परम उपाय है । इस रत्नत्रयकी परमप्रकर्षतासे ही कर्मोंका दृढ बन्धन आत्मासे छूट जाता है और आत्मा अपने स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। ग्रन्थकारने ऐसा ही श्राशय प्रकट किया है। जब यह आत्मा सुगुरुके उपदेशसे या तत्त्वनिर्णयरूप संस्कारसे आत्माके स्वरूपको विपरीत धनाने वाले दर्शनमोहनीय कर्मका उपश- मादि कर सम्यक्त्व प्राप्त करता है, उस समय अाम्मामेंसे विपरीताभि निदेशके सम्बंबसे होने वाली अचेतन-पर-पदार्थों में आत्मकल्पनारूप बुद्धि दूर हो जाती है । तभी मोक्षोपयोगी प्रयोजनभूत जावादि सप्ततत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान व परिज्ञान होता है, और पर द्रव्योंसे उदासीन भावा रूप चारिज हो जाता है । इसलिये कर्मबंधनसे छूटनेका अमोघ उपाय आत्माको आत्मरूप ही, तथा आत्मासे भिन्न कर्मजनित शरीरादि पर पदार्थोंको पररूप ही जानना या अनुभव करना है । पदार्थोंके यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान और आचरणसे आत्मा कर्मों के बंधनसे छूट जाता है, यही मोक्षकी प्राप्तिका उपाय है ज्ञानावरणादिक अष्ट कर्मोंसे रहित आत्माकी आत्यंतिक-अन्तमें होने वाली अवस्थाका नाम मोक्ष है । आत्माकी यह अवस्था अत्यंत शुद्ध और स्वाभाविक होती है-रागादिक औपाधिक भावोंसे रहित है। अथवा यों कहिये कि जीवकी यह अवस्था नित्य निरंजन निर्विकार निराकुल एवं अवाधिन सुखको लिये हुए शुद्ध चिद्रूपमय अवस्था है, जो कि सम्पत्वादि अनंत गुणोंका समुदाय है। इस अवस्थाको लिये हुए श्रीसिद्ध परमात्मा चरम शरीरसे किंचित् ऊन लोकके अग्रभागमें निवास करते हैं। ग्रन्थकर्ता श्रीपूज्यपाद स्वामीने अविनाशी अनंत ज्ञान वाले. सिद्ध सुगताय विष्णवे [४] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला अथोक्तप्रकारसिद्धस्वरूपस्य तत्प्राप्त्युपायस्य चोपदेष्टारं सकलात्मान- मिष्टदेवताविशेष स्तोतुमाह- जयन्ति यस्यावदतोऽपि भारती विभूतयस्तीर्थकृतोप्यनीहितुः । शिवाय धात्रे जिनाय तस्मै सकलात्मने नमः॥२॥ टीका-यस्य भगवतो जयन्ति सर्वोत्कर्षेण वर्तन्ते । काः ? भारती- विभूतयः भारत्याः पाण्याः विभूतयो बोधितसर्वात्महितत्वादिसम्पदः । कथं भूतस्यापि जयन्ति ? अवदतोऽपि ताल्बोष्ठपुटव्यापारेण वचनमनुच्चारयतो परमात्माको नमस्कार किया है। इससे मालूम होता है कि अन्यकर्ताको शुद्धास्माके प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा थी। जो जिस गुणकी प्राप्ति का इच्छुक होता है वह उस गुणसे युक्त पुरुपको नमस्कार करता है। जैसे धनुर्विद्याके सीखनेका अभिलाषी धनुर्वेदीको नमस्कार करता है। वास्तवमें पूर्णता और कृतकृत्यताकी दृष्टिसे परमदेवपना सिद्धोंमें ही है। इसीसे उक्त श्लोकमें अक्षय-अनन्त-ज्ञानादि-स्वरूप सिद्धपरमात्मा- को सर्वप्रथम नमस्कार किया गया है। अब उक्त मोक्षस्वरूप और उसकी प्राप्तिके उपायका उपदेश करने वाले सकल परमात्माकी-जो अपने इष्ट देवता विशेष हैं उनकी--स्तुति करते हुए भाचार्य कहते हैं- अन्वयार्थ--( यस्य) जिस (अनीहितुः अपि ) इच्छासे भी रहित (तीर्थकृतः) तीर्थंकरकी (अवदतः अपि) न बोलते हुए भी-तालु-अोष्ठ-आदिके द्वारा शब्दोंका उच्चारण न करते हुए भी- (भारतीविभूतयः) वाणीरूपी विभूतियाँ-अथवा वाणी और छत्र त्रयादिक विभूतियां (जयन्ति) जयको प्राप्त होती हैं (तस्मै) उस (शिवाय) शिव- +शिवं परमकल्याणं निर्वाणं शान्तमक्षयं । प्राप्त मुक्तिपदं येन सः शिवः परिकीर्तितः॥ -आप्तस्वरूपः समाधितंत्र [५] ऽपि । उक्त च-"यत्सर्वात्महितं न वर्णसहितं न स्पंदितोउदयं, नो वांछा- कलितं. न दोषमलिनं न श्वासरुद्धक्रमं । शान्तामर्षविषैः समं पशुगणैराक- णितं कणिभिः, तन्नः सर्वविदः प्रणष्टविपदः पायादपूर्व वचः ।।१।। अथवा भारती च विभृतयश्च छत्रत्रयादयः । पुनरपि कथम्भूतस्य ? तीर्थकृतोऽप्य. रूप-परम कल्याण अथवा परम सौख्यमय (धात्रे) विधाता अथवा ब्रह्म- रूप-सन्मार्गके उपदेश द्वारा लोकके उद्वारक (सुगताय) सुगतरूप- सवुद्धि एवं सद्गतिको प्राप्त(विष्णवे) विष्णुरूप-केवल ज्ञानके द्वारा समस्त चराचर पदार्थों में व्याप्त होने वाले (जिनाय) जिनरूप-संसारपरिभ्रमण के कारणभूत कर्नश त्रुओं को जोनने वाले X (सकलात्मने) सकलात्माको- सशरीर शुद्धात्मा अर्थात जीवन्मुक्त अरहंत परमात्माको (नमः)नमस्कार हो। भावार्थ-इस श्लोकमें प्राचार्य महोदयनेजैन धर्मके अनुसार सकल पर- मात्मा श्रोअरहंत भगवानकासंक्षिप्तस्वरूपबतलाया है। अरहंत परमात्मा- शरीर पर दारिक है, दिव्य है, ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अंतराय इन चार घातियाकमाके विनाशसे उन्हें अनन्त चतुष्टय. रूप अंतरंग विभूतियाँ प्राप्त हैं तथा समवसरणादि बाह्य विभूतियाँ भी प्राप्त हैं; परन्तु वे उन बाद्य विभूतियोंसे अलिप्त रहते हैं । मोहनोयकर्नका अभाव होजानेसे इच्छाएं अवशिष्ट नहीं रहतीं और इसलिये समवसरणमें बिना किसी इच्छाके तालु-ओष्ठ-आदिके व्यापारसे रहित अरहंत भगवानकी भव्य जीवोंका हित करने वालो धर्मदेशना हुअा करती है। समवसरण स्तोत्रमें भी कहा है कि- 'दुःवरहित सर्वज्ञको ,वह अपूर्ववाणी हमारी रक्षा करे जो सबके लिये हित रूप है, वर्णरहित (निरक्षरी) है-होठोंका हलन चलन व्यापार जिसमें नहीं होता, जो किसी प्रकारकी वांछाकोलिये हुए नहीं है, न किसी दोषसे मलिन है, जिसके उच्चारणमें वासका नकना नहीं होता और जिसे क्रोधादिविनिर्मुक्तों-साधुसन्तोंके साथ सकर्ण पशुओंने भीसुना है।' 'विश्वं हि द्रव्यपर्यायं विश्वं त्रैलोक्यगोचरम् । च्याप्तं ज्ञानविषा येन स विष्णुापको जगत् ।। ३॥ xरागद्वषादयो येन जिताः कर्ममहाभटाः । कालचक्रविनिमुक्तं स जिनः परिकीर्तितः ॥ २१ ॥-आप्तस्वरूप का . .
[६] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला नीहितुः ईहा वाञ्छा मोहनीयकर्मकार्य, भगवति च तत्कर्मणः प्रक्षयात्तस्याः सद्भावानुपपत्तिरतोऽनीहितुरपि तत्करणेच्छारहितस्यापि, तीर्थकृतः संसारोत्तर- णहेतुभूतत्वातीर्थमिवतीर्थमागमः तत्कृतवतः । किं नाम्ने तस्मै सकला- त्मने ? शिवाय शिवं परमसौख्यं परमकल्याणं निर्वाणं चोच्यते तत्प्राप्ताय । धात्रे असिमषिकृष्यादिभिः सन्मार्गापदेशकत्वेन च सकललोकाभ्युद्धारकाय। सुगताय शोभनं गतं ज्ञानं यस्यासो सुगतः, सुठु वा अपुनरावर्त्यगतिं गतं, सम्पूर्ण वा अनन्तचतुष्टयं गतः प्राप्तः सुगतस्तस्मै । विष्णवे केवलज्ञानेना- शेषवस्तुव्यापकाय । जिनाय अनेकभवगहनप्रापणहेतून् कर्मारातीन् जयतीति जिनस्तस्मे । सकलात्मने सह कलया शरीरेण वर्तत इति सकलः सचासा- वात्मा च तस्मै नमः । २ । ननु निमालेतररूपमात्मानं नत्वा भवान् किं करिष्यतीत्याह- श्रुतेन लिंगेन यथात्मशक्ति समाहितान्तःकरणेन सम्यक् । इस श्लोककी टीकामें सकलपरमात्मा श्रीअरहंतके विशेषणोंका खुलासा किया गया है और उसके द्वारा यह सूचित किया है कि घातिया कर्मरूपी शत्रुओंको जीतने वाले, रागादिअष्टादश दोषोंसे रहित, परमवीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशीअरहंत ही सच्चे शिव हैं, महादेव हैं, विधाता हैं, विष्णु हैं, सुगत हैं-अन्यमतावलम्बियोंने शिवादिकका जैसा स्वरूप बताया है उससे वे वास्तविक शिव या अरहंत नहीं हो सकते हैं; क्योंकि उस स्वरूपानुसार उनके राग, द्वेष और मोहादिक दोषोंका सद्भाव पाया जाना है। ॥ २॥ अब ग्रन्थकार ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयको बतलाते हुए कहत हैं अन्वयार्थ--(अथ) परमात्मा को नमस्कार करनेके अनंतर[अहं] मैं पूज्य- पाद आचार्य (विविक्त पात्मन) कमल रहित आत्माके शुद्धस्वरूपको (श्रुतेन) शास्त्रके द्वारा (लिंगेन) अनुमान व हेतुके द्वारा (समाहितान्तः- करणेन) एकाग्र मनके द्वारा (सम्यक समीक्ष्य) अच्छी तरह अनुभव करके (कैवल्य-सुखस्पृहाणां) कैवल्यपद-विषयक अथवा निर्मल अतीन्द्रिय समाधितंत्र [७] समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां विविक्तमात्मनमथाभिधास्ये ॥३॥ टीका-अथ इष्टदेवतानमस्कारकरणानन्तरं । अभिधास्ये कथयिष्ये । कं ? विविक्तमात्मानं कर्ममलरहितं जीवस्वरूपं । कथमभिधास्ये ? यथात्मशक्ति श्रा- त्मशक्त रनतिकमेण । किं कृत्वा ? समीक्ष्य तथाभूतमात्मानं सम्यग्ज्ञात्वा । केन ? श्रुतेन-“एगो मे सासश्रो श्रादा णाणदंमणलक्खणो। सेसा मे वाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्रवणा" इत्याद्यागमेन । तथा लिंगेन हेतुना । तथा हि-शरीरादिरात्मभिन्नोभिन्नलक्षणलक्षितवात् । ययोभिन्नलक्षण- लक्षितत्वं तयाआंदो यथाजलानयोः । भिन्नलक्षणलक्षितत्वं चात्म- शरीरयोरिति । न चानयोभिन्नलक्षणलक्षितत्वमप्रसिद्धम् । प्रात्मनः उपयोगस्वरूपोपलक्षितत्वात्-शरीरादेस्तविपरीतत्त्वात् । समाहितान्तः करणेन समाहितमेकाग्रीभूतं तच्च तदन्तःकरणां च मनस्तेन । सम्यक्- समीक्ष्य सम्यग्ज्ञात्वा अनुभृयेत्यर्थः । केषां तथाभूतमात्मानमभिधास्ये ? सुखकी इच्छा रखने वालोंके लिये (यथात्मशक्ति.) अपनी शक्तिके अनुसार (अभिधास्ये) कहूंगा। भावार्थ-यहां पर उस शुद्धास्म स्वरूपके प्रतिपादनकी प्रतिज्ञा कीगई है जिसे ग्रंथकारने शास्त्रज्ञानसे, अनुमानसे और अपने चित्तकी एकाग्रता- से भले प्रकार जाना तथा अनुभव किया है। साथ ही, यह भी बतलाया है कि यह ग्रन्थ उन भव्य पुरुषोंको लक्ष्य करके लिखा जाता है जिन्हें कौके क्षयसे उत्पन्न होने वाले बाधा-रहित, निर्मल, अतीन्द्रिय सुखको प्राप्त करनेकी इच्छा है। शास्त्रसे-समयसारादि जैनागम ग्रन्थोंसे मालूम होता है कि आत्मा एक है, निस्य है, ज्ञानदर्शन-लक्षणवाला है (ज्ञाता-द्रष्टा है) और शेष संयोग-लक्षण वाले समस्त पदार्थ मेरी आत्मासे बाह्य हैं-मैं उनका नहीं हूँ और न वे मेरे हैं । अनुमानसे जाना जाता है कि शरीर और आत्माजुदे जुदे हैं क्योंकि इन दोनोंका लक्षण भी भिन्न भिन्न है। जिनका लक्षण भिन्न भिन्न होता है वे सबभिन्न होते हैं। जैसे जल और भाग । इस वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला कैवल्यसुखस्पृहाणां कैवल्ये सकलकर्मरहितत्त्वे सति सुखं तत्र स्पृहा अभि- लाषो येषां, कैवल्ये विषयाप्रभवे वो सुखे ; कैवल्यसुखयोः स्पृहा येषाम् ॥३॥ कतिभेदः पुनरात्मा. भवति ? येन विविक्तमात्मानमिति विशेष उच्यते । तत्र कुतः कस्योपादानं कस्य वा कर्तव्य इत्याशंक्याह- *बहिरन्तः परश्चेति त्रिधामा सर्वदेहिषु । उपेयात्तत्र परमं मध्योपायोबहिस्त्यजेत्॥४॥ टीका-बहिर्बहिरात्मा, अन्तः अन्तरात्मा, परश्च परमात्मा इति त्रिधा प्रात्मा त्रिप्रकार प्रात्मा । क्व ? सर्वदेहिषु सकलप्राणिषु । ननु अभव्येषु बहिरात्मन एव सम्भवात् कथं सर्वदेहिषु त्रिधात्मा स्यात् ? इत्यप्यनुपपन्नं, तत्रापि द्रव्यरूपतया त्रिधात्मसद्भावोपपत्तेः । कथं पुनस्तत्र पंचज्ञानावर- णान्युपपद्यन्ते ? केवलज्ञानाद्याविर्भावसामग्री हि तत्र कदापि न भविष्यती- त्वभव्यत्वं, न पुनः तद्योगद्रव्यस्याभावादिति । भव्यराश्यपेक्षया वा सर्व- देहिग्रहणं । आसन्नदूरदूरतरभव्येषु अभव्यसमानभव्येषु च सर्वेषु विधाऽऽ तरह आगम और अनुमानके सहयोगके साथ चित्तकी एकाग्रतापूर्वक आत्माका जो साक्षात् अनुभव होता है वह तीसरी चीज़ है। इन तीनोंके आधारपर ही इस ग्रन्थके रचनेकी प्रतिज्ञा को गई है ॥३॥ आत्मा कितने तरहका होता है, जिससे शुद्धात्मा ऐसा विशेष कहा जाता है ? और उन आत्माके भेदों में किसका ग्रहण और किसका त्याग करना चाहिये ? ऐसी आशंका दूर करने के लिये प्रात्मा के भेदों का कथन करते हैं :- अन्वयार्थ (सर्वदेहिषु) सर्व प्राणियों में (वहिः) बहिरात्मा (अन्तः) अन्तरात्मा (च पर:) और परमात्मा (इति) इस तरह (त्रिधा) तीनप्रकार- का(प्रोत्मा) आस्मा [अस्ति] - है। (तत्र) आत्माके उन तीन भेदों से [मध्योपायात्] अन्तरात्माके उपायद्वारा [परमं] परमात्माको [उपेयात्] "तिपयारो सो अप्पा परमंतरवाहिरो हु देहीणं । तत्थ परो झाइजइ अंतोवाएण चयहि वहिरप्पा ।। मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः ।
समाधितंत्र [९] त्मा विद्यत इति । तर्हि सर्वज्ञे परमात्मन एव सद् भावाद बहिरन्तरात्मनोर- भावात्त्रिधात्मनो विरोध इत्यप्ययुक्तम् । भूतपूर्वप्रज्ञापन-नयापेक्षया तत्र तद्विरोधासिद्धः घृतघटवत् । यो हि सर्वज्ञावस्थायां परमात्मा सम्पन्नः स पूर्वब- हिरात्मा अन्तरात्मा चासीदिति । घृतघटवदन्तरात्मनोऽपि बहिरात्मत्वं परमा- स्मत्वं च भूतभाविप्रज्ञापन-नयापेक्षया दृष्टव्यम् । तत्र कुतः कस्योपादानं कस्य , , अंगीकार करे-अपनावे और [बहिः] बहिरास्माको [त्यजेत् छोड़े। भावार्थ-आत्माकी तीन अवस्थाएँ होती हैं-बहिरास्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा । उनमेंसे जब तक प्रत्येक संसारो जीवकी अचेतन पुगल- पिंडरूप शरीरादि विनाशीक पदार्थों में आत्मबुद्धि रहती है या आत्मा जब तक मिथ्यात्व-अवस्थामें रहता है तब तक वह 'वहिरात्मा' कहलाना है। शरीरादिमें आत्मवृद्धिका त्याग एवं मिथ्यात्वका विनाश होने पर जब आस्मा सम्यग्दृष्टि हो जाता है तब उसे 'अन्तरात्मा' कहते हैं। उसके तीन भेद हैं-उत्तम अन्तरास्मा, मध्यम अन्तरात्मा और जघन्य अन्तरात्मा। अन्तरंग-बहिरंग-परिगृह का त्याग करने वाले, विषय- कषायोंको जीतने वाले और शुद्ध उपयोगमें लीन होने वाले तत्वज्ञानी योगोश्वर 'उत्तम अन्तरात्मा' कहलाते हैं; देशव्रतका पालन करने वाले गृहस्थ तथा छ8 गुणस्थानवर्ती मुनि 'मध्यम अन्तरात्मा' कहे जाते हैं और तत्त्वश्रद्धा के साथ व्रतों को न रखने वाले अविरत सम्यग्दृष्टि जीव 'जघन्य अन्तरात्मा' रूपसे निर्दिष्ट हैं। आत्मगुणोंके घातक ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय नामक चार घातिया कौंका नाश करके आत्माको अनन्त चतुष्टयरूप शक्तियोंको पूर्ण विकसित करने वाले 'परमात्मा' कहलाते हैं। अथवा आत्मा की परम विशुद्ध अवस्था को 'परमात्मा' कहते हैं। यदि कोई कहे कि अभव्योंमें तो एक बहिरास्मावस्था ही संभव है, फिर सर्व प्राणियों में प्रास्माके तीन भेद कैसे बन सकते हैं ? यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अभव्य जीवों में भी अन्तरात्मावस्था और परमात्मावस्था शक्तिरूपसे जरूर है, परन्तु उक्त दोनों अवस्थात्रोंके व्यक्त होनेकी उनमें योग्यता नहीं है।। यदि ऐसा न माना जाय तो अभव्योंमें केवलज्ञानावरणीय कर्मका वन्ध व्यर्थ ठहरेगा । इस लिये चाहे निकट भव्य हो, दूरान्दूर भव्य हो [१०] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला वा त्यागः कर्तव्य इत्याह-उपेयादिति । तत्र तेषु त्रिधात्मसु मध्ये उपे- यात स्वीकुर्यात् । परमं परमात्मानं । कस्मात् ? मध्योपायात् मध्योऽन्त- रात्मा स एवोपायस्तस्मात् । तथा बहिः बहिगत्मानं मध्योपायादेव त्यजेत् ॥ ४ ॥ तत्र बहिरन्तःपरमात्मनां प्रत्येकं लक्षणमाह- * बहिरामा शरीरात जातात्मभ्रान्तिरान्तरः । चित्तदोषात्मविभ्रान्तिः परमात्मातिनिर्मलः॥५॥ टीका-शरीरादौ शरीरे श्रादिशब्दाहाङ्मनसोरेव ग्रहणं तत्र जाता अथवा अभव्य हो सबमें तीन प्रकारका प्रान्मा मौजूद है। सर्वज्ञमें भी भूत- प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा घृत-घरके समान वहिरात्मावस्था और अन्तरात्मा- वस्था सिद्ध है। आस्माकी इन तीन अवस्थाओंमेंसे जिनकी परद्रव्यमें आत्मबुद्धिरूप बहिरास्मावस्था हो रही है उनको प्रथम ही सम्यक्त्व प्राप्त कर उस विप- रीताभिनिवेशमय बहिरामावस्थाको छोड़ना चाहिये और मोक्षमार्गकी साधक अन्तरात्मावस्थामें स्थिर होकर आत्माको स्वाभाविक वीतरागमयी परमात्मावस्थाको व्यक्त करनेका उपाय करना चाहिये ॥ ४ ॥ अब बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मामेंसे प्रत्येकका लक्षण कहते हैं- अन्वयार्थ-(शरीरादौ जातात्मभ्रान्तिः बहिरात्मा) शरीरदिकमें आत्म- भ्रान्तिको धरनेवाला-उन्हें भ्रमसे आस्मा समझनेवाला-बहिरात्मा है। (चित्तदोषात्मविभ्रान्तिः श्रान्तरः) चित्तके, रागद्वेषादिक दोषोंके और आत्माके विषयमें अभ्रान्त रहनेवाला-उनका ठीक विवेक रखनेवाला अर्थात् चित्तको चित्तरूपने, दोषोंको दोषरूपसे और आत्माको प्रास्मारूपसे अनुभव करनेवाला-अन्तरात्मा कहलाता है । (प्रतिनिर्मलः परमात्मा) सर्व कर्ममलसे रहिन जो अत्यन्त निर्मल है वह परमात्मा है । भावार्थ-मोक्षमार्गमें प्रयोजनभूत तत्त्वोंका जैसा स्वरूप जिनेन्द्र- * 'अक्खाणि वाहिरप्पा अंतरप्पा हु अप्पसंकप्पो। कम्मकलंकविमुक्को परमप्पा भएणए देवो ॥५॥ मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः।
समाधितंत्र [११] आत्मेतिभ्रान्तिर्यस्य स बहिरात्मा भवति। पान्तरः अन्तर्भवः । तत्रभव' इत्यण- टर्भमात्रे टि लोपमित्यस्य नित्यत्वं येषां च विगेधः शाश्वतिक इति निर्देशात् अन्तरे वा भव श्रान्तरोऽन्तरात्मा । स कथं भूतो भवति ? चित्तदोषात्मवि- भ्रान्तिः चित्तं च विकल्पो, दोषाश्च रागादयः, त्मिा च शुद्ध चेतनाद्रव्यं तेपु विगता विनष्टा भ्रान्तिर्यस्य । चित्तं चित्तत्वेन बुध्यते दोषाश्च दोषत्वेन आत्मा आत्मत्वेनेत्यर्थः । चित्तदोषेषु वा विगता प्रात्मेति भ्रान्तिर्यस्य । परमात्मा भवति किं विशिष्टः ? अतिनिर्मलः प्रक्षीणाशेषकर्मफलः ॥ ५ ॥ देवने बताया है उसको वैसा न माननेवाला बहिरात्मा अथवा मिथ्या- दृष्टि कहलाता हैं । दर्शनमोहके उदयसे जीवमें अजीवकी कल्पना और अजीवमें जीवकी कल्पना होती है, दुःखदाई रागद्वेषादिक विभाव भावों- को सुग्वदाई समझ लिया जाता है, प्रोत्साके हितकारो ज्ञान वैराग्यादि पदार्थों को अहितकारी जानकर उनमें अरुचि अथवा द्वेषरूपं प्रवृत्ति होतो: है और कर्मबंधके शुभाशुभ फलोंमें राग, द्वेषं होनेसे उन्हें अच्छे बुरे मान लिया जाता है । साथही, इच्छाएँ बलवती होतो जाती हैं, विषयोंकी चाहरूप दावानलमें जीवरातदिन जलता रहता है। इसीलिये आत्मशक्तिः को खोदेता है और आकुलतारहित मोक्ष सुखके खोजने अथवा प्राप्त करनेका कोई प्रयत्न नहीं करता। इस प्रकार जातितत्त्व और पर्याय तत्त्वोंका यथार्थ परिज्ञान न रखनेवाला जीव मिथ्यादृष्टि बहिरास्मा है। चैतन्यलक्षणचाला जीव है, इससे विपरीत लक्षणवाला अजीव है, प्रास्माका स्वभाव ज्ञाता-द्रष्टा है, अमूर्तिक है और ये शरीरादिक परद्रव्य हैं, पुद्गलके पिंड हैं। विनाशीक हैं, जड़ हैं मेरे नहीं हैं और न मैं इनकी हूँ, ऐसा भेदविज्ञान करनेवाला सम्यग्दृष्टि 'अन्तरात्मा' कहलाती हैं। अत्यन्त विशुद्ध आत्माको 'परमात्मा' कहते हैं। परमात्माके दो भेद हैं- एक संकलपरमात्मा दूसरा निष्कलपरमात्मा । जो चार घातिया कर्म मलसे रहित होकर अनन्तज्ञानादि चतुष्टयरूप अन्तरंगलक्ष्मी और सम- वसरणादिरूप बाह्यलक्ष्मीको प्राप्त हुए हैं.उन सर्वज्ञ वीतरांग परमहितोप. देशी आस्माओंको 'सकलपरमात्मा' या अरहंत कहते हैं। और जिन्होंने सम्पूर्ण कर्ममलोंका नाश कर दिया है, जो लोकके अग्रभागमें स्थित हैं, निजानन्द-निर्भर निजरसका पान किया करते हैं तथा अनन्तकाल तक - [१२] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला तहाचिका नाममालां दर्शयन्नाह- * निर्मलः केवलः शुद्धो विविक्तः प्रभुरव्ययः । परमेष्ठी परात्मेति परमात्मेश्वरो जिनः ॥६॥ टीका-निर्मलः कर्ममलरहितः । केवलः शरीरोदीनां सम्बन्धरहितः । शुद्धः द्रव्यभावकर्मणामभावात् परमविशुद्धिसमन्वितः । विविक्तः शरीरकर्मा- दिभिरसंस्पृष्टः । प्रभुरिन्द्रादीनां स्वामी । अव्ययो लब्धानंतचतुष्टयस्वरूपा- प्रच्युतः । परमेष्ठी परमे इन्द्रादिवंद्य पदे तिष्ठतीति.परमेष्ठी स्थानशीलः । परात्मा संसारिजीवेभ्य उत्कृष्ट प्रात्मा । इति शब्दः प्रकारार्थे । एवंप्रकारा ये शब्दास्ते परमात्मनो वाचकाः । परमात्मेत्यादिना तानेव दर्शयति । परमात्मा सकलप्राणिभ्य उत्तम आत्मा । ईश्वर इंद्राद्यसम्भविना अन्तरङ्गबहिरङ्गण परमैश्वर्येण सदैव सम्पन्नः । जिनः सकलकर्मोन्मूलकः । ६ । आत्मोस्थ स्वाधीन निराकुल सुखका अनुभव करते हैं उन कृतकृत्योंको 'निष्कलपरमात्मा' या 'सिद्ध' कहते हैं ॥ ५ ॥ अब परमात्माके वाचक अन्य प्रसिद्ध नाम बतलाते हैं- अन्वयार्थ- (निर्मलः) निर्मल-कर्मरूपीमलसे रहित (केवलः) केवल- शरीरादिपरद्रव्यके सम्बन्धसे रहित (शुद्धः) शुद्ध-द्रव्य और भावकर्मसे रहित होकर परमविशुद्धिको प्राप्त (विविक्तः) विविक्त-शरीर और कर्मादि- के स्पर्शसे रहित (प्रभुः) प्रभु--इन्द्रादिकोंका स्वामी (अव्ययः) अव्यय- अपने अनंत चतुष्टयरूप स्वभावसे च्युत न होने वाला (परमेष्ठी) परमपद- में स्थिर (परात्मा) परात्मा-संसारी जीवोंसे उत्कृष्ट आत्मा (ईश्वरः) ईश्वर-अन्यजीवोंमें असम्भव ऐसी विभूतिका धारक और (जिनः) जिन-ज्ञानावरणादि सम्पूर्ण कर्म शत्रुओंको जोतने वाला (इतिपरमात्मा) ये परमात्माके नाम हैं। भावार्थ-आत्मा अनंत गुणोंका पिण्ड है। परमात्मामें उन सब गुणोंके पूर्ण विकसित होनेसे परमात्माके उन गुणोंकी अपेक्षा अनन्त नाम हैं। इसीसे परमात्माको अजर, अमर, अक्षय, अरोग, अभय, अविकार, समाधितंत्र [१३] इदानीं बहिरात्मनो देहस्यात्मत्वेनाध्यवसाये कारणमुपदर्शयन्नाह ॐबहिरात्मेन्द्रियहारैरात्मज्ञानपराङमुखः स्फुरितःस्वात्मनो देहमात्मत्वेनाध्यवस्यति॥७॥ टीका-इन्द्रियहारैरिन्द्रियमुखैः कृत्वा स्फुरितो बहिरर्थग्रहणे व्यापृ- तः सन् बहिरात्मा मूढात्मा । श्रात्मज्ञानपराङ्मुखो जीवस्वरूपज्ञानादहि- भूतो भवति । तथाभूतश्च सन्नसौ किं करोति ? स्वात्मनो देहमात्मत्वेना- ध्यवस्यति श्रात्मीयशरीरमेवाहमिति प्रतिपद्यते ।। ७ ।। अज, अकलंक, अशंक, निरंजन,सर्वज्ञ, बीतरोग, परमज्योति, बुद्ध, आनंद- कन्द, शास्ता, और विधाता जैसे नामोंसे भी उल्लेखित किया जाता है। ६ । अब यह दिखलाते हैं कि बहिरात्मा के देह में प्रात्मत्व वुद्धि होने- का क्या कारण है- अन्वयार्थ-[यता] चूंकि (बहिरात्मा) बहिरात्मा (इन्द्रियहारः)इन्द्रिय- द्वारोंसे (स्फुरितः) बाह्य पदार्थों के ग्रहण करने में प्रवृत्त हुआ(आत्म- ज्ञानपराङ्मुखः) आत्मज्ञानमे पराङ्मुख [भवति, ततः] होता है इस लिये (पात्मनः देह) अपने शरीरको (प्रात्मत्वेन अध्यवस्यति) आत्मरूपसे निश्चय करता है-अपना पास्मा समझता है । भावार्थ-मोहके उदयसे वुद्धिका विपरीतपरिण मन होता है। इसी कारण वहिरास्मा इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहणमें आने वाले चाह्यमूर्तिक पदार्थों को ही अपने मानता है। उसे अभ्यन्तर अात्मतत्त्वका कुछ भी ज्ञान या प्रतिभास नहीं होता है। जिस प्रकार धतूरेका पान करने वाले पुरुषको सब पदार्थ पीले मालूम पड़ते हैं, ठीक उसी प्रकार मोहके उदयसे उन्मत्त हुए जीवोंको अचेतन शरीरादि परपदार्थभी चेतन और स्वकीय जान पड़ते हैं। इसी दृष्टिविकारसे अात्माको अपने वास्तविक स्वरूपका परिज्ञान नहीं होपाता, और इसलिये यह जीवात्मा शरीरकी उत्पत्तिसे अपनी उत्पत्ति और शरीरके विनाशसे अपना विनाश समझना है ॥७॥ * बहिरत्थे फुरियमणो इंदियदारेण णियसरूवचओ। णियदेहं अप्पाण अज्झवसदि मूढदिट्ठी |८" -मोक्षप्राभृतकुन्दकुन्दः। x“स्फुरितश्चात्मनोदेह" इत्यपिपाठान्तरं ।
-- [१४] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला तच्च प्रतिपद्यमानो मनुष्यादिचतुर्गतिसम्बन्धिशरीरभेदेन प्रतिपद्यते तत्र- नरदेहस्थमात्मानमविद्वान् मन्यते नरम । तिर्यंचं तिर्यगङ्गस्थं सुराङ्गस्थं सुरं तथा ॥८॥ नारकं नारकाङ्गस्थं न स्वयं तत्वतस्तथा । अनंतानंतधीशक्तिः स्वसंवेद्योऽचलस्थितिः ॥ ६ ॥ टीका-नरस्य देहो नरदेहः तत्र तिष्ठतीति नरदेहस्थस्तमात्मानं नरं विमन्यते। कोऽसौ ? अविद्वान बहिरात्मा। तिर्यंचमात्मानं मन्यते । कथंभूतं ? तिर्यगङ्गस्थं तिरश्चामङ्ग तिर्यगङ्ग तत्र तिष्ठतीति तिर्यगङ्गस्थस्तं । सुराङ्गस्थं सुरं तथा मन्यते ।। ८ । नारकमात्मानं मन्यते । किं विशिष्टं ? नारका- अस्थं । न स्वयं तथा नरादिरूप आत्मा स्वयं कर्मोपाधिमंतरेण न भवति । कथं ? तत्वतः परमार्थतो न भवति । व्यवहारेण तु यदा भवति तदा इसी बातको स्पष्ट करते हुए मनुष्यादिचतुर्गतिसम्बन्धी शरीरभेद- से जीवभेदकी मान्यताको बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(अविद्वान)मूढ बहिरास्मा (नरदेहस्थं) मनुष्यदेह में स्थित (अात्मान) आत्माको (नरम्) मनुष्य, (तिर्यगङ्गस्थं) तिर्यंच शरीर में स्थित आत्माको (तिर्यञ्च) तिर्यंच (सुराङ्गस्थ) देवशरीरमें स्थित आत्माको (सुरं) देव (तथा) और (नारकाङ्गस्थं ) नारकशरीरमें स्थित श्रास्माको (नारक) नारकी(मन्यते) मानता है । किन्तु (तत्वतः) वास्तवमें-शुद्ध निश्चयकी दृष्टिसे (स्वयं) कर्मोपाधिसे रहित खुद आत्मा (तथा न) कनुप्य, तिर्यंच, देव और नारकीयरूप नहीं है (तत्वतस्तु) निश्चय नयसे तो यह आस्मा 8 'सुरं त्रिदशपर्याय पर्यायैस्तथानरम् । तिर्यञ्च च तदङ्ग स्वं नारकाङ्गच नारकम् ।।३३-१३।। वेत्यविद्यापरिश्रान्तो मूढस्तत्र पुनस्तथा । किन्त्वमूर्त स्वसंवेद्य तद्रूपं परिकीर्तितम् ॥ १४॥" -ज्ञामणचे,शुभचन्द्रः समाधितंत्र [१५] भवतु । कर्मोपाधिकृता हि जीवस्य मनुष्यादिपर्यायास्तनिवृत्तौ निवर्तमानत्वात् न वास्तवा इत्यर्थः । परमार्थतस्तहि क्रीडशोऽसावित्याह-अनन्तानन्तधी- शक्तिः धीश्च शक्तिश्च धीशक्ती अनन्तानन्ते धीशक्ती यस्य । तथाभूतोऽसौ कुतः परिच्छेद्य इत्याह-स्वसंवेद्यो निरुपाधिकं हि रूपं वस्तुनः स्वभावो- ऽभिधीयते । कर्माद्यपाये चानन्तानन्तधीशक्तिपरिणत श्रात्मा स्वसंवेदनेनैव वेद्यः । तद्विपरीतपरिणत्यनुभवस्य संसारावस्थायां कर्मोपाधिनिर्मितत्वात् । अस्तु नाम तथा स्वसंवेद्यः कियत्कालमसौ न तु सर्वदा । पश्चात् तद् प- विनाशादित्याह-अचलस्थितिः अनंतानंतधीशक्तिस्वभावेनाचलास्थितिर्यस्य सः ।यैः पुनर्योगसांख्यैर्मुक्तौ तत्प्रच्युतिरात्मनोऽभ्युपगता ते प्रमेयकमलमार्तण्डे न्यायकुमुदचन्द्रे च मोक्षविचारे विस्तरतः प्रत्याख्याताः ॥ ६ ॥ (अनंतानंतधीशक्तिः) अनन्तानन्तज्ञान और अनन्तानन्तशक्तिरूप वीर्य- धारक है (स्वसंवेद्यः) स्वानुभवगम्य है-अपने द्वारा आप अनुभव किये जाने योग्य है और (अचलस्थितिः) अपने उक्त स्वभावसे कभी च्युत न होने वाला-उसमें सदा स्थिर रहने वाला है। भावार्थ-यह अज्ञानी आत्मा कर्मोदयसे होने वाली नर-नारकादि- पर्यायोंको ही अपनी सच्ची अवस्था मानता है। उसे ऐसा भेदविज्ञान नहीं होता कि मेरा स्वरूप इन दृश्यमान पर्यायोंसे सर्वथा भिन्न है। भले ही इन पर्यायों में यह मनुष्य है, यह पशु है इत्यादि व्यवहार होता है; परन्तु ये सब अवस्थाएँ कर्मोदयजन्य हैं, जड़ हैं और आत्माका वास्तविक स्वरूप इनसे भिन्न कर्मोपाधिसे रहित शुद्ध चैतन्यमयटकोत्कीर्ण एक ज्ञाता द्रष्टा है, अभेद्य है, अनन्तानन्तशक्तिको लिये हुए है, ऐसा विवेक ज्ञान उसको नहीं होता। इसी कारण संसारके परपदार्थोंमें व मनुष्यादि पर्यायोंमें अहंवुद्धि करता है, उनको आत्मा मानता है और सांसारिक विषय सामग्रियोंके संचय करने एवं उनके उपभोग करने में ही लगा रहता है । साथ ही, उनके संयोग-वियोगमें हर्ष-विषाद करता रहता है। परन्तु सम्यग्दृष्टि जीव भेद-विज्ञानी होता है, वह इन पर्यायोंको कर्मोदयजन्य मानता है और प्रास्माके चैतन्यस्वरूपका निरन्तर अनुभव करता रहता है. तथा परपदार्थों को अपनी प्रास्मासे भिन्न जड़रूप ही निश्चय करता है। इसी कारण पंचेन्द्रियोंके विषय में उसे गृद्धता नहीं [१६] वीरसेवामन्दिरग्रन्थ-माला स्वदेहे एवमध्यवसायं कुर्वाणो बहिरात्मा परदेहे कथंभृतं करोतीत्याह- स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा परदेहमचेतनम् । परात्माधिष्ठितं मूढः परत्वेनाध्यवस्यति॥१०॥ टीका-व्यापार-व्याहाराकारादिना स्वदेहसदृशं परदेहं दृष्ट्वा । कथ- म्भूतं ? परात्माधिष्ठितं कर्मवशात्स्वीकृतं अचेतनं चेतनेनासंगतं । मूढो बहिरात्मा परत्वेन परात्मत्वेन अध्यवस्यति ॥ १० ॥ होतीऔर न वह इष्टवियोग-अनिष्टसंयोगादिमें दुखी ही होता है । इसलिये आत्महितैषियोंको चाहिये कि बहिरात्मावस्थाको अत्यन्त हेय समझकर छोड़ें और सम्यग्दृष्टि अंतरात्मा होकर समीचीन मोक्षमार्गका साधन करें ॥८-६ ॥ अपने शरीरमें ऐसी मान्यता रखने वाला वहिरात्मा दूसरेके शरीरमें कैसी बुद्धि रखता है, इसे आगे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(मूढः) अज्ञानी. बहिरास्मा (परात्माधिष्ठित) अन्यकी आत्मासहित (अचेतन) चेतनारहित (परदेह) दूसरेके शरीरको (स्वदेह- सदृशं) अपने शरीरके समान इन्द्रियव्यापार तथा वचनादि व्यवहार करता हुआ (दृष्ट्वा) देखकर (परत्वेन) परका आत्मा (अध्यवस्यति) मान लेता है। भावार्थ-अज्ञानी बहिरात्मा जैसे अपने शरीरको अपना आत्मा समझता है उसी प्रकार स्त्री-पुत्र-मित्रादिके अचेतन शरीरको स्त्री-पुत्र- मित्रादिका प्रात्मा समझता है और अपने शरीरके विनाशसे जैसे अपना विनाश समझता है ठीक उसी प्रकार उनके शरीरके विनाशसे उनका विनाश मानता है, अपनेलिये जैसे सांसारिक वैषयिक सुखोंको हितकारी समझता है, दूसरोंकेलिये भी उन्हें हितकारी मानता है। सांसारिक सम्पत्तियोंके समागममें सुखकी कल्पना करना है और उनकी प्राप्तिमें * 'णियदेहसरित्थं पिच्छिऊण परविग्गहं पयत्तेण । अच्चेयणं पि गहियं झाइज्ज परमभाएण ॥९॥ -मोक्षप्राभृते,कुन्दकुन्दः। स्वशरीरमिवान्विष्य पराङ्ग च्युतचेतनम् । परमात्मानमज्ञानी परखुद्धयाऽध्यवस्यति ॥३३-१५॥ -ज्ञानार्णवे, शुभचन्दः - समाधितंत्र [१७] एवंविधाध्यवसायाम्कि करोतीत्याह- स्वपराध्यवसायेन देहेष्वविदितात्मनाम् । वर्तते विभ्रमः पुंसां पुत्रभार्यादिगोचरः ॥ ११ ॥ टीका-विभ्रमो विपर्यासः पुंसां वर्तते । किं विशिष्टानां ? अविदिता- त्मनां अपरिज्ञातात्मस्वरूपानां । केन कृत्वा ऽसौ वर्तते ? स्वपराध्यवसायेन । क ? देहेषु । कथम्भूतो विभ्रमः ? पुत्रभार्यादिगोचरः परमार्थतोऽनात्मीय- मनुपकारकमपि पुत्रभार्याधनधान्यादिकमात्मीयमुपकारकं च मन्यते । तत्स- म्पत्तौ संतोषं तद्वियोगे च महासन्तापमात्मवधादिकं च करोति ।। ११ ।। दुःखका अनुभव, अपने स्वार्थके साधकोंपर प्रेम करता है और जिनसे अपना कुछ भी लौकिक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता उनसे द्वेषवुद्धि रखता है । इस प्रकार बहिरास्माकी शरीरमें आत्मबुद्धि रहती है ॥ १० ॥ इस प्रकारको मान्यतासे बहिरात्माकी परिणति किस रूप होती है उसे दिखाते हैं- अन्वयार्थ- (अविदितात्मनां पुसां) आत्माके स्वरूपको नहीं जानने वाले पुरुषोंके (देहेषु) शरीरों में (स्वपराध्यवसायेन) अपनी और परकी श्रा- स्ममान्यतासे (पुत्रभार्यादिगोचरः) स्त्री-पुत्रादिविषयक (विभ्रमः वर्तते) विभ्रम होता है। भावार्थ-यह अज्ञानी बहिरात्मा अपनी आत्माके चैतन्यस्वरूपको न जानकर अपने शरोरके साथ स्त्री-पुत्र-मित्रादिकके शरीर-सम्बन्धको ही अपनी प्रास्माका सम्बन्ध समझता है और इसी कारण उनको अपना उपकारक मानता है, उनकी रक्षाका यत्न करता है, उनके संयोग. तथा वृद्धिमें सुखी होता है, उनके वियोगमें अत्यंत व्याकुल हो उठता है। और यदि कदाचित् उनका बर्ताव अपने प्रतिकूल देखना है तो अत्यन्त-शोक भी करता है तथा भारी दुःख मानता है । वस्तुतः जिस प्रकार पक्षिगण नाना दिग्देशोंसे आकर रात्रि में एक वृक्षपर बसेरा लेते हैं और प्रातःकाल * सपरझवसाएणं देहेसु य अविदिदत्थमप्पाणं । सुयदाराईविसए मणुयाणं बड्डए मोहो ॥१०॥ -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः।
[.१८] वीरसेवामन्दिर प्रन्थमाला एवंविधविभ्रमाच्च किं भवतीत्याह- अविद्यासंज्ञितस्तस्मात्संस्कारो जायते दृढः । येन ‘लोकोऽङ्गमेव स्वं पुनरप्यभिमन्यते ॥ १२॥ टीका-तस्माद्विभ्रमाद्बहिरात्मनि संस्कारो बासना दृढोऽविचलोजायते। किनामा ? अविद्यासंज्ञितः अविद्या संज्ञाऽस्य संजातेति "तारकादिभ्य इतच्” येन संस्कारेण कृत्वालोकोऽविवेकिजनः । अंगमेव च शरीरमेव ।. स्वं प्रात्मानं । पुनरपि जन्मान्तरेऽपि । अभिमन्यते ।। १२ ॥ होते ही सबके सब अपने-अपने अभीष्ट (इच्छित) स्थानको चले जाते हैं। उसी प्रकार ये संसारके समस्त जीव नाना मंतियोंसे प्राकर कर्मोदयानुसार एक कुटुम्बमें जन्म लेते हैं व रहते हैं। यह मूढ़ात्मा व्यर्थ ही उनमें निज- स्वकी बुद्धि धारणकर पाकुलित होता है। अन्तराम्माकी ऐसी बुद्धि न होनेसे वह परद्रव्य में आसक्त नहीं होता, और इसीसे स्त्री-पुत्रादि- विषयक विभ्रमसे बचा रहता है ॥ ११ ॥ स्त्रीपुत्रादिमें ममत्ववुद्धि-धारणरूप विभ्रमका क्या परिणाम होता है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ (तस्मात) उस विभ्रमसे (अविद्यासंज्ञितः) अविद्या नामका (संस्कारः) संस्कार (दृढः) दृढ-मज़बूत (जायते) होजाता है (येन) जिसके कारण (लोकः) अज्ञांनी जीव (पुनरपि) जन्मान्तरमें भी (अंगमेव)शरीर- को ही (स्वं अभिमन्यते) आत्मा मानता है। भावार्थ-यह जीव अनादिकालीन अविद्याके कारणे कर्मोदयजन्य पर्यायोंमें आत्मवृद्धि धारण करता है-कर्मके उदयसे जो भी पर्याय मिलती है, उसीको अपना प्रास्मा समझ लेता है, और इस तरह उसंका यह अज्ञानात्मक संस्कार जन्मजन्मान्तरोंमें भी बना रहनेसे बराबर दृढ होता चला जाता है। जिस प्रकार पस्थरमें रस्सी आदिको निस्यकी रगड़से उत्पन्न हुए चिन्ह बड़ी कठिनतासे दूर करने में आते हैं। उसी प्रकार प्रास्मामें उत्पन्न हुए इन अविद्याके संस्कारोंका दूर करना भी बड़ा ही कठिन होजाता है ॥ १२ ॥ 'मिच्छाणाणेसुरो मिच्छाभावेण भांविओं संतो। मोहोदयेण' पुगरवि अंग' सम्मरणएं मणुओ ॥१२॥ -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः। .-
समाधितंत्र
[ १९]
एवमभिमन्यमानश्चासौ किं करोतीत्याह-
देहे स्ववुद्धिरात्मानं युनक्त्येतेन निश्चयात् ।
स्वात्मन्येवात्मधीस्तस्माद्वियोजयति देहिनं ॥१३॥
टीका-देहे स्वबुद्धिरात्मबुद्धिर्बहिरात्मा किं करोति ? श्रात्मानं युनक्ति
सम्बद्ध करोति दीर्घसंसारिणं करोतीत्यर्थः । केन ? एतेन देहेन । निश्चयात्
परमार्थेन । स्वात्मन्येव जीवस्वरूपे एव प्रामधीरन्तरात्मा । निश्चयाद्वियोज-
यति असम्बद्ध करोति ।। १३ ।।
-
अब पहिरास्मा और अन्तरास्मा का स्पष्ट कर्तव्यभेद घतलाते हैं-
अन्वयार्थ-(देहे स्वबुद्धिः) शरीरमें प्रात्मबुद्धि रखने वाला बहि-
रास्मा (निश्चयात्) निश्चयसे (आत्मानं) अपनी आत्माको (एतेन) शरीरके
साथ (युनक्ति) जोड़ता-वांधता है। किन्तु (स्वात्मनि एव आत्मधीः)
अपनी आत्मामें ही श्रात्मबुद्धि रखने वाला अन्तरास्मा (देहिन) अपनी
श्रास्माको (तस्मात्) शरीरके सम्बन्धसे (वियोजयति) पृथक् करता है।
भावार्थ-मिथ्यादृष्टि बहिरास्मा शरीरको ही आस्मा मानता है
और इस प्रकारकी मान्यतासे ही आस्माके साथ नये-नये शरीरोंका
सम्बन्ध होता रहता है, जिससे यह अज्ञानी जीव अनन्तकाल तक इस
गहन संसारवनमें भटकता फिरता है और कर्मोके तीव्रतापसे सदा
पीड़ित रहता है । जब शरीरसे ममस्व छूट जाता है अर्थात् शरीरको
अपने चैतन्यस्वरूपसे भिन्न पुद्गलका पिंड समझ लिया जाता है और
आस्माके निज ज्ञानदर्शनस्वरूपमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है तब यह जीव
सम्यग्दृष्टि अन्तरात्मा होकर तपश्चरण अथवा ध्यानादिकके द्वारा अपने
आस्माको शरीरादिकके बन्धनसे सर्वथा पृथक् कर लेता है और सदाके
लिये मुक्त हो जाता है । अतएव बहिरात्मवुद्धिको छोड़कर अन्तरात्मा
होना चाहिये और परमात्मपदको प्राप्त करनेका प्रयत्न करना
चाहिये ॥ १३ ॥
[२०] वीरसेवामन्दिर-प्रन्थमाला देहेष्वात्मानं योजयतश्च बहिरोत्मनो दुविलसितोपदर्शनपूर्वकमाचार्योऽनु- शयं कुर्वन्नाह- देहेष्वात्मधिया जाताः पुत्रभार्यादिकल्पनाः । सम्पत्तिमात्मनस्ताभि मन्यते हा हतं जगत् ॥ १४ ॥ टीका-जाताः प्रवृत्ताः । का:- ? पुत्रभार्यादिकल्पनाः । व ? देहेषु । कया ? आत्मधिया । क ? देहेष्वेव । अयमर्थः-पुत्रादिदेहं जीवत्वेन प्रति- पद्यमानस्य मत्पुत्रो भातिकल्पना विकल्पा जायन्ते । ताभिश्चानात्मनीया- भिरनुपकारिणीभिश्च सम्पत्तिं पुत्रमार्यादिविभूत्यतिशयं पात्मनो मन्यते जात्- कर्तृस्वस्वरूपाद् वहिर्भूतं जगत् बहिरात्मा प्राणिगणः ।। १४ ।। शरीरों में प्रास्माके सम्बन्धको जोड़नेवाले बहिरास्माके निन्दनीय व्यापारको दिखाते हुए आचार्य महोदय अपना खेद प्रकट करते हैं- अन्वयार्थ-(देहेषु) शरीरोंमें (अात्मधिया) आत्मबुद्धि होनेसे (पुत्र- भार्यादिकल्पनाः) मेरा पुत्र, मेरी स्त्री इत्यादि कल्पनाएँ ( जाताः ) उत्पन्न होती हैं (हा) खेद है कि (जगत्) बहिरात्मरूप प्राणिगण (ताभिः) उन कल्पनाओं के कारण (सम्पत्ति) स्त्री पुत्रादिकोसमृद्धिको [आत्मनः] अपनी समृद्धि( मन्यते ) मानता है और इस प्रकार यह जगत् ( हतं) नष्ट हो रहा है। भावार्थ-जब तक इस जीवकी देहमें आत्मबुद्धि रहती है तब तक इसे अपने निराकुल निजानन्द रसका स्वाद नहीं आता, न अपनी अनन्तचतुष्टयरूप सम्पत्तिका भान (ज्ञान) होता है और तभी यह संसारी जीव स्त्री-पुत्र-मित्र-धन-धान्यांदि सम्पत्तियोंको अपनी मानता हुश्रा उनके संयोग वियोगमें हर्ष-विषाद करता है तथा फलस्वरूप अपने ससारपरिभ्रमणको बढ़ाता जाता है। इसीसे प्राचार्य महोदय ऐसे जीवों- को इस विपरीत बुद्धि पर खेद प्रकट करते हुए कहते हैं कि 'हाय ! यह जगत् मारा गया! ठगा गया, इसे अपना कुछ भी चेत नहीं रहा ॥१४॥ .
समाधितंत्र
.
[२१]
इदानीमुक्तमर्थमुपसंहत्यात्मन्यन्तरात्मनोऽनुप्रवेशं दर्शयन्नाह-
मूलं संसारदुःखस्य देह एवामधीस्ततः ।
त्यक्त्वैनां प्रविशेदन्तर्बहिरव्यापृतेन्द्रियः ॥ १५ ।।
टीका--मूलं कारणं । कस्य ? संसारदुःखस्य । काऽसौ ? देहएवात्मधीः
देहः कायः स एवात्मधीः । यत एवं ततस्तस्मात्कारणात् । एनां देहएवात्मबुद्धि।
त्यक्त्वा अन्तः प्रविशेत् श्रात्मबुद्धिं कुर्यात् अन्तगत्मा भवेदित्यर्थः । कथं-
भूतः सन् ? बहिरव्यापृतेन्द्रियः बहिर्वाह्यविषयेषु अव्यापृतान्यप्रवृत्तानीन्द्रियाणि
?
यस्य ।। १५ ॥
अब वहिरास्माके स्वरूपादिका उपसंहार करके देहमें आत्मबुद्धिको
छोड़नेकी प्रेरणाके साथ अन्तरात्मा होनेका उपदेश देते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ (देहे) इस जड शरीरमें ( श्रात्मधीः एव) आत्मवुद्धिका
होना ही (संसारदुःखस्य) संसारके दुःखोंका (मूलं) कारण है । (ततः) इस
लिये (एन) शरीर में आत्मवको निथ्या कल्पनाको (त्यक्त्वा) छोड़कर
(बहिरव्यापतेन्द्रियः) बाह्य विषयोंमें इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिको रोकता हुआ
(अन्तः) अन्तरंगमें अर्थात् आत्मा हीमें (प्रविशेत) प्रवेश करे।
भावार्थ-संसारके जितने भी दुःख और प्रपंच हैं वे सब शरीरके
साथ ही होते हैं । जब तक इस जीवकी वाह्यपदार्थों में आत्मबुद्धि रहती
है तब तक ही आत्मासे शरीरोंका सम्बन्ध होता रहता है और घोर
दुःखों को भोगना पड़ता है। जब इस जीवका शरीरादि परद्रव्योंसे
सर्वथा ममस्वभावछूट जाता है तब किसी भी बाह्यपदार्थमें अहंकार-मम-
काररूप वुद्धि नहीं होती तथा तत्त्वाथका यथार्थ श्रद्धान होनेसे आत्मा
परम सन्तुष्ट होता है और साधकभावकी पूर्णता होनेपर स्वयमेव
साध्यरूप बन जाता है । इसी कारण इस ग्रंथमें ग्रंथकारने समस्त दुःखों
की जड़ शरीरमें प्रात्मवुद्धिका होना बताया है और उसके छुड़ानेकी
प्रेरणाकी है । अतः संसारके समस्त दुःखोंका मूल कारण देहमें आत्म-
कल्पनारूप वुद्धिका परित्याग कर अन्तरात्मा होना चहिये, जिससे घोर
दुःखोंसे छुटकारा मिले और सच्चे निराकुल सुखकी प्राप्ति होवे ॥ १५ ॥
है । ? [२२] वीरसेवामन्दिरग्रन्थ-माला अन्तरात्मा आत्मन्यात्मबुद्धिं कुर्वाणोऽलब्धलाभात्संतुष्ट श्रात्मीयां बहि- रात्मावस्थामनुस्मृत्य विषादं कुर्वन्नाह- मत्तश्च्युत्वेन्द्रियद्वारैः पतितों विषयेष्वहम् । तान् प्रप्रद्याऽहमिति मा पुरा वेद न तत्वतः ॥ १६ ॥ टीका—मत्त: प्रात्मस्वरूपात्। च्युत्वा व्यावृत्य । अहं पतितः अत्या- सक्तया प्रवृत्तः । क ? विषयेषु । कैः ? इन्द्रियहरैः इन्द्रियमुखैः। ततस्तान् विषयान् प्रपद्यं ममोपकारका एते इत्यतिगृह्यानुसृत्य । मां प्रात्मानं । न वेद न ज्ञातवान् । कथं ? अहमित्युल्लेखेन अहमेवाहं न शरीरादिकमित्येवं तत्त्वतो न ज्ञातबानित्यर्थः । कदा ? पुरा अनादिकाले । १६ ।। अपनी आत्मामें आत्मवुद्धि धारण करता हुश्रा अन्तरात्मा जय अलब्ध लाभसे सन्तुष्ट होता है तब अपनी पहिली घहिरामावस्थाका स्मरण करके विषाद करता हुआ विचारता है- अन्वयार्थ-(अहं) मै (पुग) अनादिकालसे (मत:) आत्मस्वरूपसे न्युत्वा) च्युत होकर (इन्द्रियद्वारैः) इन्द्रियोंके द्वारा (विषयेषु) विषयोंमें (पतितः) पतित हुआ-अत्यासक्तिसे प्रवृत्त हुआ हूँ। [ततः] इसी कारण (तान) उन विषयोंको (प्रपद्य) अपने उपकारक समझ कर मैंने (तत्वत:) वास्तवमें (मां) आस्माको (अहं इति) मैं ही आस्मा हूँ इस रूपसे (न वेद) नहीं जाना-अर्थात् उस समय शरीरको ही आस्मासमझने के कारण मुझे आत्माके यथार्थ स्वरूपका परिज्ञान नहीं हुआ। भावार्थ-जय तक इस जीवको अपने चैतन्य स्वरूपका यथार्थ परि- ज्ञान नहीं होता तभी तक इसे बाह्य इन्द्रियों के विषय संदर और सुखदाई मालूम पड़ते हैं । जव चैतन्य और जड़का भेदविज्ञान हो जाता हैं और अपने निराकुल चिदानन्दमयी सुधारसका स्वाद आने लगता है तब ये बाह्य इन्द्रियोंके विषय बड़े ही असुन्दर और काले विषधरके समान मालूम पड़ते हैं। कहा भी है- "जायन्ते विरसा रसा विघटते गोष्ठी कथा कौतुकं, शीयन्ते विषयास्तथा बिरमति प्रीतिः शरीरेपि च । जोष वागपि धारयंत्यविरतानंदास्ममः स्वास्मन- श्चिंतायामपियातुमिच्छनिमनो दोषैः समपंचताम् ।"
समाधितंत्र [२३] अथात्मनो ज्ञप्तावुपायं दर्शयन्नोह- एवं त्यक्त्वा बहिर्वाचं त्यजेदन्तरशेषतः । एष योगः समासेन प्रदीपः परमात्मनः ॥ १७ ॥ टीका-एवं वक्ष्यमाणन्यायेन । बहिर्वाचं पुत्रभार्याधनधान्यलक्ष्णान्व- हिरर्थवाचकशब्दान्।त्यक्त्वा अशेषतः साकल्येन । पश्चात् अन्तर्वाचं अहं प्रति- पादकः, प्रतिपाद्यः, सुखी, दुखी, चेतनोवेत्यादिलक्षणमन्तर्जल्पं त्यजेदशेषतः । एष बहिरन्तर्जल्पत्यागलक्षणः योग: स्वरूपे चित्तनिरोधलक्षणः समाधिः । प्रदीपः स्वरूपप्रकाशकः । कस्य ? परमात्मनः । कथं ? समासेन संक्षेपेण झटिति परमात्मस्वरूपप्रकाशक इत्यर्थः ॥ १७ ॥ अर्थात्-आत्माका अनुभव होनेपर रस विरस होजाता है, गोष्ठी, कथा और कौतुकादि सब नष्ट हो जाते हैं, विषयोंसे सम्बन्ध छूट जाता है; शरीरसे भी ममत्व नहीं रहता, वाणी भी मौनधारण कर लेती है और प्रास्मा सदा अपने शांत रसमें लीन होजाता है तथा मनके दोषोंके साथ साथ चिन्ता भी दूर हो जाती है। इसी कारण यह जीव जिन भोगोंको पहले मिथ्यास्व दशामें सुखका कारण समझकर भोगा करता था उन्हींके लिये सम्यग्दृष्टिं अन्तरात्मा होने पर पश्चात्ताप करने लगता है। यह सब भेदविज्ञानकी महिमा है॥१६॥ अब प्राचार्य आस्माको जाननेका उपाय प्रकट करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ (एवं) श्रागे कहेजाने वाली रीतिके अनुसार (बहिर्वाच) बाह्यार्थवाचक वचन प्रवृत्तिको (त्यक्त्वा) त्यागकर (अन्तः ) अंतरंग वचनप्रवृत्तिको भी (अशेषतः).पूर्णतया (त्यजेत् ) छोड़ देना चाहिये। (एषः) यह बाह्याभ्यन्तररूपसे जल्पस्यागलक्षणवाला (योगः) योग- स्वरूपमें चित्तनिरोधलक्षणात्मक समाधि ही (समासेन.) संक्षेपसे (परमा- त्मनः) परमात्माके स्वरूपका (प्रदीपः) प्रकाशक है। भावार्थ-स्त्री-पुत्र-धन-धान्यादि-विषयक बाह्यवचनव्यापारको और मैं सुखी हूँ, दुखी हूँ, शिष्य हूँ इत्यादि अन्तरंगजल्पको हटाकर चित्तकी एकाग्रताका जरे सम्पादन करना है वही योग अथवा समाधि है और वही [२४] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला कुतः पुनर्बहिरन्तर्वाचस्त्यागः कर्तव्य इत्याहं- यन्मया दृश्यते रूपं तन्न जानाति सर्वथा । जानन्न दृश्यते रूपं ततः केन ब्रवीम्यहम् ॥ १८ ॥ टीका-रूपं शरीरादिरूपं यद् दृश्यते इन्द्रियैः परिच्छेद्यते मया तद- चेतनत्वात् उक्तमपि वचनं सर्वथा न जानाति । जानता च समं वचनव्यवहारो युक्तो नान्येनातिप्रसङ्गात् । यच्च जानद् रूपं चेतनमात्मस्वरूपं तन्न दृश्यते इन्द्रियैर्न परिच्छेद्यते । यत एवं ततः केन सह ब्रवीम्यहम् ।। १८ ।। परमात्मस्वरूपका प्रकाशक है । जिस समय श्रात्मा इन बाह्य और प्राभ्य- न्तर मिथ्या विकल्पोंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिसे हटकर निज स्वरूपमें लीन होजाता है और शुद्ध प्रास्मस्वरूपका साक्षात्कार कर लेता है। वास्तवमें यह समाधि ही जन्म-जरा-मरणरूप अातापको मिटाने. वाली परम औषधि है और परमात्मपदको प्राप्तिका अमोघ उपाय है। ऐसो समाधिका निरन्तर अभ्यास करना चाहिये ॥ १७॥ अब अन्तरंग और बहिरंग वचनको प्रवृत्तिके छोड़नेका उपाय बताते हैं- अन्वयार्थ-(मया) इन्द्रियोंके द्वारा मुझे (यत्) जो (रूप) शरीरादिक- रूपी पदार्थ (दृश्यते) दिखाई दे रहा है (तत्) वह अचेतन होनेसे (सर्वथा) विल्कुल भी (न जानाति) नहीं जानता और (जानत् रूपं) जो पदार्थोंको जानने वाला चैतन्यरूप है वह(न दृश्यते) मुझे इन्द्रियोंके द्वारा दिखाई नहीं देता (ततः अहं) इस लिये मैं (केन) किसके साथ (ब्रवीमि) वात करूं । भावार्थ-जो अपनेको दिखाई पड़े और अपने अभिप्रायको समझे उसीके साथ बात-चीत करना या बोलना उचित है। इसी प्राशयको लेकर अंतरात्मा द्रव्यार्थिकनयको, प्रधानकर अपने मनको समझाता है कि-जो जाननेवाला चैतन्य द्रव्य है वह तो मुझे दिग्वाई नहीं देता और जो इन्द्रियोंके द्वारा रूपी शरीरादिक जड पदार्थ दिखाई दे रहे हैं वेचेतना- "ज मया दिस्सदे एवं तं ण जाणादि सव्वहा । जाणगं दिस्सदेणं तंतम्हाजपेमि केण है।। ।।२९॥" -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः। - समाधितंत्र [२५] एवं बहिर्विकल्पं परित्यज्यान्तर्विकल्पं परित्याजयन्नाह- 'यत्परैः प्रतिपाद्योऽहं यत्परान् प्रतिपादये । उन्मत्तचेष्टितं तन्मे यदहं निर्विकल्पकः ॥ १९ ॥ टीका-परैरुपाध्यायादिभिरहं यत्प्रतिपाद्यः परान् शिष्यादीनहं यत्प्रति- पादये तत्सर्वमुन्मत्तचेष्टितं मोहवादुन्मत्तस्येवाखिलं विकल्पजालात्मकं विजृम्भितमित्यर्थः । कुत एतत् ? यदहं निर्विकल्पको यद्यस्मादहमात्मा निर्विकल्पक एतैर्वचनविकल्पैरग्राह्यः ॥ १९ ॥ तदेव विकल्पातीतं स्वरूपं निरूपयन्नाह- यदग्राह्य न गृणहाति गृहीतं नापि मुंचति । जानाति सर्वथा सर्व तत्स्वसंवेद्यमरम्यहम् ॥ २० ॥ रहित होनेसे कुछ भी नहीं जानते हैं, तब मैं किमसे बात करूं ? किसीसे भी वार्तालाप करना नहीं बनता। इस लिये मुझे अब चुपचाप (प्रौनयुक्त) रहना ही मुनासिब है । ग्रन्थकार श्री पूज्यपाद स्वामीने विभाव-भावरूप झंझटोंसे छूटने और वचनादिको वशमें करनेका यह अच्छा सरल एवं उत्तम उपाय बनलाया है ॥ १८ ॥ इस प्रकार बाह्य विकल्पोंके त्योगका प्रकार बतलाकर अब आभ्यन्तर विकल्पोंके छुड़ानेका यत्न करते हुए प्राचार्य कहते हैं- अन्वयार्थ-(अहं) मैं (परैः) उपाध्याय आदिकोंसे (यत्प्रतिपाद्यः) जो कुछ प्रतिपादित किया जाता हूँ,तथा(परान्) शिष्यादिकोंको (यत्प्रतिपादये) जो कुछ प्रतिपादन करता हूँ (तत्) वह सब (मे) मेरी ( उन्मत्तचेष्टितं ) पागलों जैसी चेष्टा है (यदहं) क्योंकि मैं (निर्विकल्पकः) वातवमें इन सभी वचनविकल्पोंसे अग्राह्य हूँ। भावार्थ-सम्यग्दृष्टि अन्तरात्माके लिये उचित है कि वह अपने निज स्वरूपका अनुभव करे । मैं राजा हूँ, रंक हूँ, दीन हूँ, धनी हूँ, गुरु हूँ, शिष्य हूँ इत्यादि अनेक विकल्प हैं जिनसे आत्माका वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं हो सकता । अतएव ऐसे विकल्पोंका परित्याग करना चाहिये और यह समझना चाहिये कि आत्माका स्वरूप निर्विकल्पक चैतन्य ज्योतिर्मय है ।। १६॥ । .
[२६] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यत् शुद्धात्मम्वरूपं । अग्राह्य कर्मोदयनिमित्तं क्रोधादिस्वरूपा न गृहाति अत्मस्वरूपतया न स्वीकरोति । गृहीतमनन्तज्ञानादिस्वरूपं । नैव मुञ्चति कदाचिन्न परित्यजति । तेन च स्वरूपेण सहितं शुद्धात्मस्वरूपं किं करोति ? जानाति । किं तत् ? सर्व चेतनमचेतनं वा वस्तु । कथं जानाति १ सर्वथा द्रव्यपर्यायादिसर्वप्रकारेण । तदित्थम्भूतं स्वरूपं स्वसंवेद्य स्वसंवेदनग्राह्यम् अहमात्मा अस्मि भवामि ॥ २० ॥ इत्थंभूतात्मपरिज्ञ नात्पूर्व कीदृशं मम चेष्टितमित्याह- उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः स्थाणौ यहद्विचेष्टितम् । तद्वन्मे चेष्टितं पूर्व देहादिष्वात्मविभ्रमात् ॥ २१॥ उसी निर्विकल्पक स्वरूपका निरूपण करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(यत) जो शुद्धात्मा (अग्राह्य) ग्रहण न करने योग्यको (न गृगहाति) ग्रहण नहीं करना है और (गृहीतं अपि) ग्रहण किये गये अनन्तज्ञानादि गुणोंको (न मुंचति) नहीं छोड़ता है तथा (सर्व) सम्पूर्ण पदार्थोंको (सर्वथा) सर्व प्रकारसे (जानाति) जानता है (तत्) वही (स्व- संवेद्य) अपने द्वारा ही अनुभवमें आने योग्य चैतन्यद्रव्य (अहं अस्मि) मैं हूँ। भावार्थ-जबतक आत्मामें अनन्त दर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य अथवा क्षायिक सम्यक्त्वादि गुणोंका विकास नहीं होता तवतक ही आत्मा विभाव-भावोंमे मलिन होकर अग्राह्यका ग्राहक होता है अथवा काँका कर्ता और भोक्ता कहलाता है; किन्तु जब सम- स्त विगाव-भावोंका अभावकर प्रान्मा सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञाना-द्रष्टा हुअा आत्मद्रव्यमें स्थिर होजाता है तब वह अपने गृहीत स्वरूपसे च्युत नहीं होता और तभी उसे परमब्रह्म या परमात्मा कहते हैं। जीवकी यह स्थिति ही उसकी वास्तविक स्थिति है ॥ २० ॥ 'इस प्रकारके आत्मज्ञानके पूर्व मेरी कैसी चेष्टा थी', अन्तरात्माके इस विचारका उल्लेख करते हैं- अन्वयार्थ--(स्थाणों) स्थाणुमें ( उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः ) उत्पन्न होगई है - . A समाधितंत्र [२७] टीका-उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः पुरुषोऽयमित्युत्पन्ना भ्रान्तिर्यस्य प्रतिपत्तु- स्तस्य। स्थाणौ स्थाणुविषये । यहद्यत्प्रकारेण । विचेष्टितं विविधमुपकारादिरूपं चेष्टितं विपरीतं वा चेष्टितं । तहत् तत्प्रकारेण । मे चेष्टितं । क्व ? देहादिषु । कस्मात् ? आत्मविभ्रमात् आत्मविपर्यासात् । कंदा ? पूर्वम् उक्तस्वरूपा- त्मज्ञानात्प्राक् ॥ २१॥ साम्प्रतं तु तत्परिज्ञाने सति कीदृशं मे चेष्टितमित्याह यथाऽसौ चेष्टते स्थाणौ निरत्त पुरुषाग्रहे । तथाचेष्टोऽस्मि देहादौ विनिटत्तात्मविभ्रमः ॥२२॥ टीका-- असौ उत्पन्नपुरुषभ्रान्तिः पुरुषाग्रहे पुरुषाभिनिवेशे निवृत्ते विनष्ट पुरुषपनेकीभ्रान्ति जिसको ऐसे मनुष्यको (यद्वत्) जिस प्रकार (विचेष्टितम्) विकृत अथवा विपरीत चेष्टा होती है तिहत्) उसी प्रकारकी (देहादिषु) शरीरादिक परपदार्थों में (यात्मविभ्रमात्) आस्माका भ्रम होनेसे (पूर्व) आत्मज्ञानसे पहले (मे) मेरी (चेष्टितम्) चेष्टा थी। भावार्थ-अन्तरात्मा विचारता है कि जैसे कोई पुरुष भ्रमसे वृक्षके हूँठको पुरुष समझकर उससे अपने उपकार-अपकारादिकी कल्पना करके सुखी-दुखी होता है उसी तरह मैं भी आत्मज्ञानसे पूर्वकी मिथ्यात्व- अवस्था में भ्रमसे शरीरादिकको आत्मा समझकर उससे अपने उपकार अपकोरादिकी कल्पना करके सुग्बी-दुखी हुआ हूँ॥ २१ ॥ अब आस्मज्ञान हो जानेसे मेरी किस प्रकारकी चेष्टा हो गई है उसे बतलाते हैं। अन्वयार्थ-(असौ) जिसको वृक्षके ठूठमें पुरुषका भ्रम होगया था वह मनुष्य (स्थाणौ) ठूठमें (पुरुषांग्रहे निवृत्ते) यह पुरुष है ऐसे मिथ्या- भिनिवेशके नष्ट होजाने पर (यथा) जिस प्रकार उससे अपने उपका- रादिको कल्पनाको त्यागनेकी (चेष्टते) चेष्टा करता है उसी प्रकार (देहादौ) शरीरादिकमें (विनिवृत्तात्मविभ्रमः) आत्मपनेके भ्रमसे रहित हुआ मैं भी (तथा चेष्टः अस्मि ) देहादिकमें अपने उपकारादिकी बुद्धिको छोड़ने में प्रवृत्त हुआ हूँ।
[२८] वीरसेवामन्दिरग्रन्थ-माला सति यथा येन पुरुषाभिनिवेशजनितोपकाराधु धमपरित्यागप्रकारेण । चेष्टते प्रवर्तते । तथाचेष्टोऽस्मि तथा तदुद्यमपरित्यागप्रकारेण चेष्टा यस्यासौ तथा- चेष्टोऽस्मि भवाम्यहम् । क ? देहादौ । किं विशिष्टः ? विनिवृत्तात्मविभ्रमः विशेषेण निवृत्त अात्मविभ्रमो यस्य । व ? देहादौ ।। २२ ।। अथेदानीमात्मनि स्त्र्यादिलिङ्ग कत्वादिसंख्याविभ्रमनिवृत्यर्थं तद्विविक्ता- साधारणस्वरूपं दर्शयन्नाह- येनात्मनाऽनुभूयेऽहमात्मनैवात्मनात्मनि । सोऽहं न तन्न सा नासौ नैको न द्वौ न वा बहुः ।। २३ ।। भावार्थ-जब वृक्षके ढू'ठको वृक्षकाढूठ जान लिया जाता है तब उससे होने वाला पुरुष-विषयक भ्रम भी दूर हो जाता है और फिर उस कल्पित पुरुषसे अपने उपकार-अपकारकी कोई कल्पना भी अवशिष्ट नहीं रहती। इसी दृष्टिसे सम्यग्दृष्टि अंतरात्मा विचार करता है कि पूर्व मिथ्यात्व-दशामें जब मैं मोहोदयसे शरीरको हो अात्मा समझना था तब मैं इन्द्रियोंका दास था, उनकी साता परिणति में सुख और असाता परिणतिमें ही दुःख मानता था; किन्तु अब विवेक-ज्योनिका विकास हुआ-आत्मा चैतन्यस्वरूप है, बाकी सब पदार्थ अचेतन हैं-जड़ हैं, आत्मासे भिन्न हैं, इस प्रकारके जड़ और चैतन्यके भेद-विज्ञानसे मुझे तत्त्वार्थश्रद्धानरूप सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हुई है और शरीरादिकके विषय- में होने वाला आत्मविषयक मेरा भ्रम दूर होगया है । इसीसे शरीरके संस्कारादि-विषयमें मेरी अव उपेक्षा होगई है-मैं समझने लगा हूँ कि शरीरादिकके बनने अथवा बिगड़नेसे मेरी आत्माका कुछ भी बनता अथवा बिगड़ता नहीं है और इसीसे शरीरादिकी अनावश्यक चिंताको छोड़ कर अव मैं सविशेषरूपसे अात्म चिन्तनमें प्रवृत्त हुआ हूँ ॥ २२ ॥ अव आत्मामें स्त्री आदि लिङ्गोंके तथा एकत्वादि संख्याके भ्रमको दूर करनेके लिये और इन विकल्पोंसे रहित आत्माका असाधारणस्वरूप दिख- लानेके लिये कहते हैं- अन्वयार्थ (येन) जिस (आत्मना) चैतन्यस्वरूपसे ( अहम् ) मैं (आत्मनि) अपनी आत्मामें ही(प्रात्मना) अपने स्वसंवेदनज्ञानके द्वारा समाधितंत्र [२९] टीका-येनात्मना चैतन्यस्वरूपेण इत्थंभावे तृतीया । अहमनुभूये । केन का ? आत्मनैव अनन्येन । केन कारणभृतेन ? अात्मना स्वसंवेदन- स्वभावेन । क ? अात्मनि स्वस्वरूपे । सोऽहं इत्थंभूतस्वरूपोऽहं । न तत् न नपुंसकं । न सा न स्त्री । नासौ न पुमान् अहं । तथा नैको न द्वौ न वा बहुरहं । स्त्रीत्वादिधर्माणां कर्मोत्पादितस्वरूपत्वात् ।। २३ ।। येनात्मना त्वमनुभूयसे स कीदृशः इत्याह- यदभावे सुषुप्तोऽहं यद्रावे व्युत्थितः पुनः । अतीन्द्रियमनिर्देश्यं तत्स्वसंवेद्यमरम्यहम् ॥ २४ ॥ (आत्मनैब) अपनी आत्माको आप ही (अनुभूये) अनुभव करता हूँ (सः) वही शुद्धामस्वरूप (अह) मैं (न तत्) न तो नपुंसक हूँ (न सा) न स्त्री हूँ (न असौ) न पुरुष हूँ (न एको)न एक हूँ (न द्वौ) न दो हूँ (वा) और (न बहुः) न बहुन हूँ। भावार्थ-अन्तरात्मा विचार करता है कि जीवमें स्त्री-पुरुष आदिका व्यवहार केवल शरीरको लेकर होताहै;इसी प्रकार एक दो और बहुवचन का व्यवहार भी शरीराश्रित है अथवा गुण-गुणीकी भेदकल्पनाके कारण होता है; जय शरीर मेरा रूप ही नहीं है और मेरा शुद्धस्वरूप निर्विकल्प है तब मुझमें लिङ्गभेद और बचनभेद कैसे बन सकता है ? ये स्त्रीस्वादिधर्म तो कर्मजनित अवस्थाएँ हैं, मेरा निजरूप नहीं हैं-मेरा शुद्धचैतन्यस्वरूप इन सबसे परे है ॥ २३ ॥ यदि कोई पूछे कि जिस आत्मरूपसे तुम अपनेको अनुभव करते हो यह कैसा है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(यत् प्रभावे) जिस शुद्धात्मस्वरूपके प्राप्त न होनेसे(अहं) मैं (सुषुप्तः) अय तक गादनिद्रामें पड़ा रहा हूँ-मुझे पदार्थोंका यथार्थ परिज्ञान न हो सका (पुनः) और (यत् भावे) जिस शुद्धात्मस्वरूपकी उप- लब्धि होने पर मैं (व्युत्थितः) जागरित हुआ हूँ-यथावत् वस्तुस्वरूपको जानने लगा हूँ (तत्) वह शुद्धात्मस्वरूप (अतीन्द्रिय) इन्द्रियोंके द्वारा ग्राह्य नहीं है (अनिर्देश्य) वचनोंके भी अंगोचर है-कहा नहीं जाता। वह तो (स्वसंवेद्य) अपने द्वारा आप ही अनुभव करने योग्य है । उसी रूप (अहं अस्मि) मैं हूँ।
[३०] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यस्य शुद्धस्य स्वसंवेद्यस्य रूपस्य । अभावे अनुपलम्भे । सुपुप्तो यथावत्पदार्थपरिज्ञानाभावलक्षणनिद्रया गाढाक्रान्तः । यद् भावे यस्य तत्स्वरूपस्य भावे उपलम्भे । पुनयुत्थितः विशेषेणोत्थितोजागरितोऽहं यथा- वत्स्वरूपपरिच्छित्तिपरिणत इत्यर्थः । किं विशिष्ट तत्स्वरूपं ? अतीन्द्रियं इन्द्रियैरजन्यमग्राह्य च । अनिर्देश्यं शब्दविकल्पागोचरत्वादिदंतयाऽनिदन्तया वा निर्देष्टुमशक्यम् । तदेवंविधं स्वरूपं कुतः सिद्धमित्याह-तत्स्वसंवेद्य' तदुक्तप्रकारकस्वरूपं स्वसंवेदग्राह्य अहमस्मीति ।। २४ ॥ तत्स्वरूपं स्वसंवेदयतो रागादिप्रक्षयान्न क्वचिच्छत्रुमित्रव्यवस्था भवतीति दर्शयन्नाह- :क्षीयन्ते व रागाद्यास्तत्वतो मां प्रपश्यतः । वोधात्मानं ततः कश्चिन्न मे शत्रुर्न च प्रियः ॥ २५॥ भावार्थ-जव तक इस जीवको शुद्ध चैतन्यरूप अपने निजस्वरूपकी प्राप्ति नहीं होती तव तक ही यह जीव मोहरूपी गादनिद्रामें पड़ा हुआ सोता रहता है, किन्तु जब अज्ञानभावरूप निद्राकां विनाश हो जाता है और शुद्धस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है उसी समयसे यह जागरित कह- लाता है। संसारके रागी जीव व्यवहारमें जागते हैं किन्तु अपने आत्म- स्वरूपमें सोते हैं; परन्तु आस्मज्ञानी संयमी पुरुष व्यवहारमें सोते हैं और अात्मस्वरूपमें सदा सावधान एवं जाग्रत रहते हैं* ॥ २४ ॥ आत्मस्वरूपका अनुभव करने वालेकी आत्मामें रागादि दोषोंका अभाव होजानेसे शत्रु मित्रकी कल्पना नहीं होती, ऐसा दिखाते हैं- अन्ययार्थ-[यतः] क्योंकि (बोधात्मानं) शुद्ध ज्ञानस्वरूप (मां) मुझ आत्माका (तत्त्वतः प्रपश्यतः)वास्तवमें अनुभव करने वालेके (अत्र एव) इस जन्ममें ही (रागाद्याः) राग, द्वेष, क्रोध,मान, मायादिक दोष (क्षीयन्ते) नष्ट हो जाते हैं (ततः) इस लिये (मे) मेरा (न कश्चित्) न कोई (शत्रुः) शत्रु है (न च) और न कोई (प्रियः) मित्र है। जो सुत्तो ववहारें सो जोई जग्गए सकेंजम्मि । जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणे कब्जे ॥ -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्द समाधितंत्र .. [३१] टीका-अत्रैव न केवलमये किन्तु अत्रैव जन्मनि क्षीयन्ते । के ते ? रागाद्याः पादौ भवः श्राद्यः राग श्राद्यो येषां द्वेषादीनां ते तथोक्ताः । किं कुर्वन्तस्ते दीयन्ते ? तत्त्वतो मां प्रपश्यतः । कथम्भूतं मां ? बोधात्मानं ज्ञानस्वरूपं । तत इत्यादि-यतो यथावदात्मानं पश्यतों रागादयः प्रक्षीणा- स्ततस्तस्मात् कारणात् न मे कश्चिच्छत्रुः । न च नैव प्रियो मित्रम् ॥ २५ ॥ यदि त्वमन्यस्य कस्यचिन्न शत्रुमित्रं वा तथापि तवान्यः कश्विद्भविष्य- तीत्याशंक्याह- मामपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुर्न च प्रियः। मां प्रपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुर्न च प्रियः ॥ २६ ॥ टीका-प्रात्मस्वरूपे प्रतिपन्ने प्रतिपन्नेवाऽयंलोको मयि शत्रुमित्रभावं- भावार्थ-जब तक यह जीव अपने निजानन्दमयी स्वाभाविक निरा- कुलतारूप सुधामृतका पान नहीं करता तव तक ही वह बाह्य पदार्थोंको भ्रममे इष्ट-अनिष्ट मानकर उनके संयोग-वियोगके लिये सदा चिन्तित रहता है और जो उस संयोग-वियोगमें साधक बाधक होते हैं उन्हें अपना शत्रु-मित्र मान लेता है, किन्तु जब आत्मा प्रवुद्ध होकर यथार्थ वस्तु- स्थितिका अनुभव करने लगता है तब उसकी रागद्वेषादिरूप विभाव- परिणति मिट जाती है और इसलिये बाह्य सामग्रीके साधक-बाधक कारणोंमें उसके शत्रु-मित्रताका भाव नहीं रहता । वह तो उस समय अपने ज्ञानानन्दमें मग्न रहना ही सर्वोपरि समझता है ॥ २५ ॥ यदि कोई कहे कि भले ही तुम किसी दूसरेके शत्रुया मित्र न हो परन्तु तुम्हारा तो कोई अन्य शत्रुवा मित्र अवश्य होगा, इस शंकाका समाधान करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(मां) मेरे आत्मस्वरूपको (अपश्यन्) नहीं देखना हुआ (अयं लोकः) यह अज्ञप्राणिवृन्द (न मेशत्रुः न मेरा शत्रु है (नच प्रियः) और न मित्र है तथा (मां) मेरे अात्मस्वरूपको (प्रपश्यन्) देखता हुआ ( अयं लोकः ) यह प्रबुद्धप्राणिगण (न मे शत्रुः) न मेरा शत्रु है (न च प्रियः) और न मित्र है [३२] वीरसेवामन्दिर ग्रन्थमाला प्रतिपद्यते ? न तावदप्रतिपन्ने । मामपश्यन्नयं लोको न मे .शत्रुर्नचप्रियः । अप्रतिपन्ने हि वस्तुस्वरूपे रागाद्युत्पत्तावतिप्रसङ्गः । नापि प्रतिपन्ने यतः मां प्रपश्यन्नयं लोको न मे शत्रुनच प्रियः । प्रात्मस्वरूपप्रतीतौ रागादिकप्रक्षयात् कथं क्वचिदपि शत्रुमित्रभावः स्यात् ॥ २६ ॥ अन्तरात्मनो बहिरात्मत्वत्यागे परमात्मत्वप्राप्तौ चोपायत्वं दर्शयन्नाह त्यक्त्वैवं बहिरात्मानमन्तरात्मव्यवस्थितः । भावयेत्परमात्मानं सर्वसंकल्पवर्जितम् ॥ २७ ॥ टीका-एवमुक्तप्रकारेणान्तरात्मव्यवस्थितः सन् बहिरात्मानं त्यक्त्वा परमात्मानं भावयेत् । कथंभूतं ? सर्वसंकल्पवर्जितं विकल्पजालरहितं अथवा सर्वसंकल्पवर्जितः सन् भावयेत् ।। २७ ।। भावार्थ-आत्मज्ञानी विचारता है कि शत्रु-मित्रकी कल्पना परिचित व्यक्तिमें ही होती है-अपरिचितमें नहीं। ये संसारके बेचारे अज्ञप्राणी जो मुझे देखते जानते ही नहीं--मेरा श्रास्मस्वरूप जिनके चर्मचक्षओंके अगोचर है-वे मेरे बिषयमें शत्रु-मित्र की कल्पना कैसे कर सकते हैं ? और जो मेरे स्वरूपको जानते हैं मेरे शुद्धात्मस्वरूपका साक्षात् अनुभव करते हैं-उनके रागद्वेषका अभाव हो जानेसे शत्रु मित्रताके भावकी उत्पत्ति नहीं बनती, फिर वे मेरे शत्रु वा मित्र कैसे बन सकते हैं ? इस तरह अज्ञ और विज्ञ दोनों ही प्रकारके जीव मेरे शत्रु या मित्र नहीं हैं ॥ २६ ॥ बहिरात्मपनेका त्याग होने पर अन्तरास्माके परमात्मपदकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(एवं) इस प्रकार (बहिरात्मानं) बहिरास्मपनेको (त्यक्त्वा) छोड़कर (अंतरात्मव्यवस्थितः)अंतरात्मामें स्थित होते हुए (सर्वसंकल्पवर्जित) सर्वसंकल्प-विकल्पोंसे रहित (परमात्मानं) परमात्माको (भावयेत्) ध्याना चाहिए। भावार्थ-बहिरामावस्थाको अत्यंत हेय (त्यागने योग्य) समझकर छोड़ देना चाहिये और प्रास्मस्वरूपका ज्ञायक अन्तरात्मा होकर जगतके बंद फंद चिंता आदिसे मुक्त हुमा पास्मोस्थ स्वाधीन सुखकी प्राप्तिके - समाधितंत्र [३३] तद्भावनायाः फलं दर्शयन्नाह - सोऽहमित्यात्तसंस्कारस्तस्मिन् भावनया पुनः । तत्रैव दृढ़संस्काराल्लभते ह्यात्मनि स्थितिम् ॥२८॥ टीका-योऽनन्तज्ञानात्मक प्रसिद्धः परमात्मा सोऽहमित्येवमात्तसंस्कारः आत्तो गृहीतः संस्कारो वासना येन । कया कस्मिन् ? भावनया तस्मिन् परमात्मनि भावनया सोऽहमित्यभेदाभ्यासेन । पुनरित्यन्तर्गमितवीप्सार्थः । पुनः पुनस्तस्मिन् भावनया । तत्रैव परमात्मन्येव दृढ़संस्कारात् अविचल- वासनावशात् । लभते प्राप्नोति ध्याता । हि स्फुटम् । आत्मनि स्थिति आत्मन्यचलता अनन्तज्ञानादिचतुष्टयरूपतां वा ।। २८ ।। आत्मोत्थ स्वाधीनसुखकी प्राप्तिके लिये परमात्माके चिन्तन-आराधन पूर्वक नद्रूप बननेकी भावना करनी चाहिये ॥२७॥ अब परमात्मपदकी भावनाका फल दिखाते हुए कहते हैं अन्वयार्थ--(तस्मिन्) उस परमात्मपदमें (भावनया) भावना करते रहनेसे (सः अहं) 'वह अनन्तज्ञानस्वरूप परमात्मा मैं हूँ' (इति) इस प्रकारके ( श्रात्तसंस्कारः) संस्कारको प्राप्त हुआ ज्ञानी पुरुष (पुनः) फिर फिर उस परमात्मपदमें आत्मत्वरूपकी भावना करता हुआ (तत्रैव) उसी परमात्मस्वरूपमें (दृढ़संस्कारात्) संस्कारकी दृढ़ताके होजानेसे (हि) निश्चयसे (आत्मनि) अपने शुद्ध चैनन्यस्वरूपमें (स्थितिं लभते) स्थि- रताको प्राप्त होता है। भावार्थ-जब 'सोऽहम्' की दृढ़ भावना द्वारा परमात्मपदके साथ जीवास्माकी एकश्व वुद्धि हो जाती है तभी इस जीवको अपनी अनन्त. चतुष्टयरूप निधिका परिज्ञान होजाता है और वह अपनेको वीतरागी परम- आनन्दस्वरूप मानने लगता है । उस समय काल्पनिक क्षणिक सांसारिक सुखके कारण बाह्यपदार्थों में उसका ममत्व छूट जाता है, राग द्वेषकी मंदता होजाती है और अभेदबुद्धिसे परमात्मस्वरूपका चितवन करते करते आस्मा अपने प्रास्मस्वरूपमें स्थिर होजाता है। इसीको श्रास्मलाभ कहते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रास्मा अनन्तकाल तक निराकुल अनुपम ॐ ह्यात्मनः इति पाठान्तरं 'ग' प्रतो [३४] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला नन्वात्मभावनाविषये कष्टपरम्परासद्भावेन भयोत्पत्तेः कथं कस्यचित्तत्र प्रवृत्तिरित्याशङ्कां निराकुर्वन्नाह--- मूढ़ात्मा यत्र विश्वस्तस्ततो नान्यद्भयास्पदम् । यतो भीतस्ततो नान्यदभयस्थानमात्मनः ॥२६॥ टीका-मूढात्मा बहिसत्मा । यत्र शरीरपुत्रकलंत्रादिपु । विश्वस्ती- विंचकाभिप्रायेण विश्वासं प्रतिपन्नः-मदीया एते अहमेतेषामितिबुद्धिं गत इत्यर्थः । ततो नान्यद्भयास्पदं ततः शरीरादेर्नान्यद्भयास्पदं संसारदुःखत्रास- स्यास्पदं स्थानम् । यतो भीतः परमात्मस्वरूपसंवेदनाद्रीतः त्रस्तः । ततो. नान्यदभयस्थानं ततः स्वसंवेदनात् . नान्यत् अभयस्य “संसारदुःखत्रासा- भावस्य स्थानमास्पदम् । सुखास्पदं ततो नान्यदित्यर्थः ।। २६ ।। स्वाधीनसुखका भोक्ता होता है। अतः 'सोऽहम्' भावना बड़ी ही उप- योगो है, उसके द्वारा अपने आत्मामें परमात्मपदक संस्कार डालने चाहियें ॥ २८ ॥ यदि कोई आशंका करे कि परमात्माकी भावना करना तो बड़ा कठिन कार्य हैं, उसमें नो कष्ट परम्पराके सद्भावके कारण भय बना रहता है, फिर जीवोंकी प्रवृत्ति उसमें कैसे हो सकती है, ऐसी आशंकाका निराकरण करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(मूढात्मा) अज्ञानी बहिरात्मा (यत्र) जिन शरीर-पुत्र- मित्रादि बाह्यपदार्थों में (विश्वस्तः) 'ये मेरे हैं, मैं इनका हूँ ऐसा विश्वास करता है (ततः) उन शरीर-स्त्री-पुत्रादि बाह्यपदार्थों से (अन्यत्) और कोई (भयास्पदं न) भयका स्थान नहीं है और (यतः) जिस परमात्मस्वरूपके अनुभवसे ( भीतः ) डरा रहना है ( ततः अन्यत् ) उसके सिवाय कोई दूसरा (आत्मनः) प्रास्माके लिये (अभयस्थान न ) निर्भयताका स्थान 'नहीं है। भावार्थ-जैसे सर्पसे डसा हुआ मनुष्य कडुवा नीम भी रुचिसे चबाता है उसी प्रकार विषय-कषायोंमें संलग्न हुए जीवको दुःखदाई श्रीरादिक बाह्यपदार्थ भी मनोहर एवं सुखदाई मालूम होते हैं और .
.
समाधितंत्र
[३५]
तस्यात्मनः कीदृशः प्रतिपत्त्युपांय इत्याह-
सर्वेन्द्रियाणि संयम्य स्तिमितेनान्तरात्मना ।
यत्क्षणं पश्यतो भाति तत्तत्त्वं परमात्मनः॥३०॥
टीका-संयम्य स्वविषये गच्छन्ति निरुध्य । कानि ? सर्वेन्द्रियाणि
पाञ्चपीन्द्रियाणि । तदनन्तरं स्तिमितेन स्थिरीभृतेन । अन्तरात्मना मनसा ।
यत्स्वरूपं भाति । किं कुर्वतः ? क्षणं पश्यतः क्षणमात्रमनुभंवतः बहुतर-
कालं मनसा स्थिरीकर्तुमंशक्यत्वात् स्तोकेकालं मनोनिरोधं कृत्वा पश्यतों
यच्चिदानन्दस्वरूपं प्रतिभाति तत्तत्त्वं तद् पं स्वरूप परमात्मनः ॥ ३० ॥
पित्तज्वर वाले रोगीको जिस प्रकार मधुर दुग्ध कडवा मालूम होता है
उसी प्रकार बहिरात्मा अज्ञानी जीवको सुखदाई परमात्मस्वरूपकी भावना
भी कष्टप्रद मालूम पड़ती है और इसी विपरीत वुद्धिके कारण यह जीव
अनादि कालमे दुखी होरहा है । वास्तव में इस जीवके लिये परमात्मस्व-
रूपके अनुभवके समान और कोई भी सुखदाई पदार्थ संसारमें नहीं है
और न शरीरके समान दुखदाई कोई दूसरा पदार्थ ही है ॥ २६ ॥
अब उस आत्माकी प्राप्ति किंस उपायसे होती है उसे बतलाते हैं-
अन्वयार्थ-(सर्वेन्द्रियाणि) सम्पूर्ण पांचों इन्द्रियोंको (संयम्य) अपने
विषयोंमें यथेष्ट प्रवृत्ति करनेसे रोककर (स्तिमितेन) स्थिर हुए (अन्तरात्मना)
अन्तःकरणके द्वारा (क्षणं पश्यतः) क्षणमात्रके लिये अनुभव करने वाले.
जीवके (यंत) जो चिंदानन्दस्वरूप (भाति) प्रतिभासित होता है। (तत्)
वही (परमात्मनः) परमात्माका (तत्त्वं) स्वरूप है।
भावार्थ-परमात्माका अनुभव प्राप्त करनेके लिये स्पर्शन,रसना,घ्राण,
चक्षु और कर्ण इन पांचों इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयों में प्रवृत्ति करने-
से रोककर मनको स्थिर करना चाहिये । अर्थात् उसे अन्तर्जल्पादिरूप
संकल्प-विकल्पसे मुक्त करना चाहिये । ऐसा होनेपरजोअन्तरंगावलोकन
किया जावेगा उसीसे शुद्ध चैतन्यमय परमात्मस्वरूपको अनुभव हो
सकेगा । इन्द्रियों द्वारा ज्ञेयपदार्थों में भ्रमती हुई चित्तवृत्तिको रोके बिना
कुछ भी नहीं बनता। अंतः आस्मानुभवके लिये उसे रोकनेका सबसे
पहले प्रयत्न होना चाहिये ॥ ३० ॥
[३६] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला कस्मिन्नाराधिते तत्स्वरूपं प्राप्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह- यः परात्मा स एवाऽहं योऽहं स परमस्ततः । अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदितिस्थितिः॥३१॥ टीका-यः प्रसिद्धः पर उत्कृष्ट प्रात्मा स एवाहं । योऽहं यः स्वसं- वेदनेन प्रसिद्धोऽहमन्तरात्मा स परमः परमात्मा । ततो यतो मया सह पर- मात्मनोऽभेदस्ततोऽहमेव मया उपास्य पाराध्यः । नान्यः कश्चिन्मयोपास्य इति स्थितिः । एवं स्वरूप एवाराध्याराधकभावव्यवस्था ॥ ३१ ॥ एतदेव दर्शयन्नाह- प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितम् । बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानन्दनितम् ॥ ३२॥ अब यह बतलाते हैं कि परमात्मस्वरूपकी प्राप्ति किसकी आराधना करने पर होगी- अन्वयार्थ-(यः) जो (परात्मा) परमात्मा है (स एव) वह ही (अहं) मैं हूँ तथा (यः) जो स्वानुभवगम्य (ग्रह) मैं हूँ (स.) वही (परम:) परमा- स्मा है । (ततः) इसलिये-जव कि परमात्मा और आस्मामें अभेद है (अहं एव) मैं ही (मया) मेरे द्वारा (उपास्यः) उपासना किये जाने के योग्य (कश्चित् अन्यः न) दूसरा कोई मेरा उपास्य नहीं, (इति स्थितिः) इस प्रकार ही पाराध्य-आराधक-भावक्री व्यवस्था है। भावार्थ-जब यह अन्तरास्मा अपनेको सिद्ध समान शुद्ध, वुद्ध, ज्ञाता, द्रष्टा अनुभव करता हुआ अभेद-भावनाके वलपर शुद्ध आस्म- स्वरूपमें तन्मय हो जाता है तभी वह कर्मवन्धनको नष्ट करके परमात्मा बन जाता है । अतएव सांसारिक दुःखोंसे छूटने अथवा दृढ-बंधनसे मुक्त होनेके लिये अपनाशुद्धात्मस्वरूप ही उपासना किये जाने के योग्य है ॥३१॥ आगे इसी बातको और स्पष्ट करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(अहं) मैं (मयि स्थितम्) अपनेहीमें स्थित (बोधात्मान) * 'नाज्ञः' इति पाठान्तरं 'ग' प्रतौ ।
समाधितंत्र [३७] टीका-मामात्मानमहं प्रपन्नोऽस्मि भवामि किं कृत्वा १ प्रच्याव्य व्यावर्त्य केभ्यः ? विषयेभ्यः । केन कृत्वा ? मयैवात्मस्वरूणैव करणात्मना। क स्थितं माम् प्रपन्नोऽहं ? मयि स्थितं प्रात्मस्वरूप एव स्थितम् । कथ- म्भूतं मां ? बोधात्मानं ज्ञानस्वरूपम् । पुनरपि कथम्भूतम् ? परमानन्द- निर्वृतं परमश्वासावानन्दश्व सुखं तेन निवृत्तं सुखीभूतम् । अथवा परमानन्द- निवृतोऽहम् ॥ ३२ ॥ एवमात्मानं शरीराद्भिन्न यो न जानाति तं प्रत्याह- यो न वेत्ति परं देहादेवमात्मानमव्ययम् । लभते सननिर्वाणं तप्त्वापि परमं तपः ॥३३॥ टीका-यः प्रतिपन्नो देहात्परं भिन्नमात्मानमेवमुक्तप्रकारेण न वेति । ज्ञानस्वरूप (परमानन्दनिवृतम्) परम आनन्द से परिपूर्ण (मां) अपनी आत्माको (विषयेभ्यः) पंचेन्द्रियों के विषयों से (प्रत्याव्य) छुड़ाकर (मया एव) अपने ही दारा (प्रपन्नोऽस्मि) अन्मस्वरूपको प्राप्त हुआ हूँ। भावार्थ-जिस परमात्मपदके प्राप्त करनेकी अभिलाषा है वह शक्ति रूप से इस आत्मामें ही मौजूद है; किन्तु उसकी व्यक्ति अथवा प्राप्ति इन्द्रिय विषयोंसे विरक्त होकर ज्ञान और वैराग्यका सुदृढ़ अभ्यास करनेसे होती है । इस लिये हमें चाहिये कि हम जीवन्मुक्त परमात्माके दिव्य उपदेशका मनन करके उनके नकशे कदम पर चलें और उन जैसी वीतराग-ध्यानमयी शांत-मुद्रा बनकर चैतन्य जिनप्रतिमा बननेकी कोशिश करें तथा उनकी सौम्याकृतिरूप प्रतिबिम्बका चित्र अपने हृदय-पटल पर अंकित करें। इस तरह आत्मस्वरूपके साधक कारणोंको उपयोगमें लाकर स्वयं ही परमात्मपद प्राप्त करें और निजानन्द-रसका पान करते हुए अनन्त काल तक अनन्त सुखमें मग्न रहें ॥ ३२ ॥ इस प्रकार जो शरीरसे आत्माको भिन्न नहीं जानता है उसके प्रति कहते हैं:-- अन्वयार्थ-(एवं) उक्त प्रकारसे (यः) जो (अव्यय) अविनाशी (अ.त्मानं) आत्माको (देहात) शरीरसे (परं न वेत्ति)भिन्न नहीं जानता है ३ . [ ३८ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला किं विशिष्टम् ? अवव्ययं अपरित्यक्तानन्तचतुष्टयस्वरूपम् । स प्रतिपन्नान्न निर्वाणं लभते । किं कृत्वा ? तप्त्वाऽपि । किं तत् ? परमंतपः ॥ ३३ ॥ ननु परमतपोऽनुष्ठायिनां महादुःखोत्पत्तितो मनः खेदसद्भावात्कथं निर्वाणप्राप्तिरिति वदन्तं प्रत्याह- आत्मदेहान्तरज्ञानजनिताल्हादनितः । तपसा दुष्कृतं घोरं भुजानोऽपिन खिद्यते ॥ ३४ ॥ टीका-श्रात्मा च देहश्च तयोरन्तरज्ञानं भेदज्ञानं तेन जनितश्वासावा- (सः) वह (परमं तपः तप्त्वापि) घोर तपश्चरण करके भी (निर्वाणं) मोक्षको (न लभते) प्राप्त नहीं करता है। भावार्थ-संसारमें दुःखका मूल कारण आत्मज्ञानका अभाव है। जब तक यह अज्ञान बना रहता है तबतक दुःखोंसे छुटकारा नहीं मिलता। इसी कारण जो पुरुष आस्माके वास्तविक स्वरूपको नहीं पहचानता- विनश्वर पुद्गल पिण्डमय शरीरको ही आत्मा जाना है-वह कितना ही घोर, तपश्चरण क्यों न करे मुक्तिको नहीं पा सकता है; क्योंकि मुक्तिके लिये जिससे मुक्त होना है और जिसको मुक्त होना है दोनोंका भेदज्ञान आवश्यक है। जब मूलमें ही भूल हो तब तपश्चरण क्या सहायता पहुँचा सकता है । ऐसे ही लोगोंकी मुक्ति-उपासना बहुधा अन्य थाह्य पदार्थोंकी तरह सांसारिक विषय-सुखका ही साधन बन जाती है और इस लिये घोरातिघोर तपश्चरणद्वारा शरीरको अनेक प्रकारके कष्ट देते और सुखाते हुए भी वे कर्मबंधनसे छूट नहीं पाते, प्रत्युत अपने उस वाल तपश्चरणके कारण संसारमें ही परिभ्रमण करते रहते हैं। अतः आत्मज्ञानपूर्वक तपश्चरण करना ही सार्थक और सिद्धिका कारण है। किसी कविने ठीक कहा- "चेतन चित परिचय बिना, जप तप सबै निरत्थ । कण विन तुष जिम फटकते, कछू न आवे हत्थ ॥३॥ यदि कोई आशंका करे कि मुक्तिके लिये घोर तपश्चरण करने वालोंके महादुःखोंकी उत्पत्ति होती है और उस दुःखोत्पत्तिसे चित्तमें बराबर खेद बना रहता है तब उनको मुक्तिकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उसके उत्तर में कहते हैं:- -(आत्मदेहान्तरज्ञानजनिताहलादनिर्वृतः)प्रात्मा और शरीर- समाधितंत्र [३९] हलादश्च परमप्रसत्तिस्तेन निवृत्तः सुखीभूतः सन् । तपसा द्वादशविधेन कृत्वा । दुष्कृतं घोरं भुज्जानोऽपि दुष्कर्मणो रौद्रस्य विपाकमनुभवन्नपि । न खिद्यते न खेदं गच्छति ॥ ३४ ।। खेदं गच्छतामात्मस्वरूपोपलम्भाभीवं दर्शयन्नाह- रागद्वेषादिकल्लोलैरलोलं यन्मनो जलम् । स पश्यत्यात्मनस्तत्त्वं स तत्त्वं नेतरो जनः॥ ३५॥ के भेद-विज्ञानमे उत्पन्न हुए आनन्दसे जो आनन्दित है वह (तपसा) तपके द्वारा-द्वादश प्रकारके तपद्धारा उद्यमें लाये हुए ( घोरं दुष्कृतं) भयानक दुष्कमौके फलको (भुञ्जानः अपि) भोगता हुआ भी (न खिद्यते) खेदको प्राप्त नहीं होता है। भावार्थ-जिस समय इस जीवके अनुभवमें शरीर और आस्मा भिन्न भिन्न दिखाई देने लगते हैं, उस समय शारीरिक विषयसुखोंके लिये पर--पदार्थकी सारी चिन्ताएं मिट जाती हैं, उसके फलस्वरूप प्रास्मा परमानन्दमें लीन हो जाता है-उसे दुखिका अनुभव ही नहीं होता। क्योंकि संसारमें इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग, रोग और भूक-प्यासादिजन्य जितने भी दुःख हैं वे सब शरीर के आश्रित हैं-शरीरको आत्मा मानने- से उन सब दुःखोंमें भाग लेना पड़ता है। जब भेद-विज्ञानके द्वारा शरीर- से ममस्व छूटकर आत्मा स्वरूपमें स्थिर हुआ श्रानन्दमग्न होजाता है तब वह तपश्चरणके कष्टोंको महसूस नहीं करता और न तपश्चरणके अवसर पर आए हुए उपसर्गादिकोंसे खेदखिन्न ही होता है। उसका श्रानन्द अबाधित रहता है ॥ ३४॥ जिन्हें तपश्चरण करते हुए खेद होता है उन्हें आत्मस्वरूपकी उप- लब्धि नहीं हुई ऐसा दर्शाते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(यन्मनो जलम् ) जिसका मनरूपी जल (रागद्वेषादि- कल्लोलैः) राग-द्वेष-काम-क्रोध-मान-माया-लोभादि तरंगोंसे(अलोल)चंचल नहीं होता (स.) वही पुरुष (प्रात्मनः तत्त्वम्) आस्माके यथार्थ स्वरूपको (पश्यति) देखता है-अनुभव करता है (तत् तत्त्वम्) उस आत्मतत्त्वको क्षेतत्तत्वं, इति पाठान्तरं 'क' पुस्तके ।
१०] वीरसेवामन्दिर-प्रन्धमाला टीका-रागद्वेषादय एवं कल्लोलास्तैरलोलमचञ्चलमकलुषं वा । यन्मनोजलं मन एव जलं मनोजलं यस्य मनोजलम् यन्मनोजलम् । स प्रात्मा । पश्यति । प्रात्मनस्तत्वमात्मनः स्वरूपम् । स तत्त्वम् । स प्रात्म- दर्शी तत्त्वं परमात्मस्वरूपम् । नेतरो जनः [अन्यः अनात्मदर्शी जनः] तच्वं न भवति ।। ३५ ॥ किं पुनस्तत्त्वशब्देनोच्यत इत्याह- अविक्षिप्त मनस्तत्त्वं विक्षिप्त भ्रान्तिरात्मनः । धारयेत्तदविक्षिप्त विक्षिप्त नाश्रयेत्ततः ॥ ३६॥ (इतरो जनः ) दूसरा रागद्वेषादि कल्लोलोंसे आकुलितचित्त मनुष्य (न पश्यति) नहीं देख सकता है। भावार्थ-जिस प्रकार तरंगित जलमें जलस्थित वस्तुका ठीक प्रति- भास नहीं होता-वह दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार राग-द्वेषादि-कल्लो- लोंसे आकुलित हुए सविकल्प मनद्वारा प्रात्माका दर्शन नहीं होता। आत्मदर्शनके लिये मनको निर्विकल्प बनाना होगा । वास्तवमें निर्विकल्प मन ही आत्मतत्त्व है-सविकल्प मन नहीं ॥ ३५ ॥ आगे इसी श्रात्मतत्त्वके वाच्यको स्पष्ट करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(अविक्षिप्त) रागादि-परिणतिसे रहित तथा शरीर और आत्माको एक माननेरूप मिथ्या अभिप्रायसे रहित जो स्वरूपमें स्थिर है मनः) मन है वही (यात्मनः तत्त्व) आत्माका वास्तविकरूप है और(विक्षिप्त) रागादिरूप परिणत हुअा एवं शरीर नथा आस्माके भैदज्ञानसे शून्य मन है वह(आत्मनः भ्रान्तिः) आत्माका विभ्रम है-आत्माका निजरूप नहीं है (ततः) इस लिये (तत् अविक्षिप्त) उस रागद्वेषादिसे रहित मनको (धारयेत्) धारण करना चाहिये और(विक्षिप्त) रागदेषादिसे तुब्ध हुए मनको (न पाश्रयेत्) आश्रय नहीं देना चाहिये। भावार्थ-जिस समय ज्ञानस्वरूप शुद्ध मन, रागादिक विभावभावोंसे रहित होकर शरीरादिक वाह्य पदार्थों से आत्माको भिन्न चैतन्यमय एक . " समाधितंत्र [४१ ] टीका-अविक्षिप्त रागाद्यपरिणतं देहादिनाऽऽत्मनोऽभेदाध्यवसाय- परिहारेण स्वस्वरूप एव निश्चलतां गतम् । इत्थं भूतं मनः तत्त्वं वास्तवं रूपमात्मनः । विक्षिप्त उक्तविपरीतं मनोभ्रान्तिरात्मस्वरूपं न भवति । यत एवं तस्मात् धारयेत् । किं तत् ? मनः । कथम्भूतम् ? अविक्षिप्त । विक्षिप्तं पुनस्तत् नाश्रयेन्न धारयेत् ॥ ३६ ।। कुतः पुनर्मनसो विक्षेपो भवति कुतश्चाविक्षेप इत्याह- अविद्याभ्याससंस्कारैरवशं क्षिप्यते मनः । तदेव ज्ञानसंस्कारैः स्वतस्तत्त्वेऽवतिष्ठते ॥३७॥ टीका-शरीरादौ शुचिस्थिरात्मीयादिज्ञानान्यविद्यास्तासामभ्यासः पुनः पुनः प्रवृत्तिस्तेन जनिता: संस्कारा वासनास्तैः कृत्वा । अवशं विषयेन्द्रिया- धीनमनात्मायत्तमित्यर्थः । क्षिप्यते विक्षिप्त भवति मनः । तदेव मनः ज्ञान- संस्कारैरात्मनः शरीरादिभ्यो भेदज्ञानाभ्यासैः। स्वतः स्वयमेव । तत्त्वे आत्म- टंकोस्कोर्ण ज्ञायक स्वभावरूप अनुभव करने लगता है तथा उममें तन्मय हो जाता है, उस समय उस अविक्षिप्त एवं निर्विकल्प मनको 'श्रात्मनत्त्व' समझना चाहिये । परन्तु जब उसमें विकल्प उठने लगते हैं तर उसे आत्मतत्त्व न कहकर 'श्रात्मभ्रान्ति' कहना चाहिये। अतः आत्म- लाभके इच्छुकोंको चाहिये कि वे अपने मनको डांवांडोल न रखकर स्व- रूपमें स्थिर करनेका दृढ प्रयत्न करें, क्योंकि मनको अस्थिरता ही रागादि- परिणतिका कारण है ॥ ३६ ॥ किस कारणसे भन विक्षिप्त होता है और किस कारण ते अविक्षिप्त, आगे इसी बातको बतलात हैं- अन्वयार्थ-(अविद्याभ्याससंस्कारैः) शरीरादिकको शुचि, स्थिर और आत्मीय मानने रूप जो अविद्या अज्ञान है उसके पुनः पुनः प्रवृत्तिरूप अभ्याससे उत्पन्न हुए संस्कारों द्वारा (मनः) मन (अवश) स्वाधीन न रह कर (क्षिप्यते) विचिप्स हो जाता है-रागी देषी बन जाता है और (तदेव) वही मन (ज्ञानसंस्करैः) आत्म-देहके भेद विज्ञानरूप विद्याके संस्कारों द्वारा (स्वतः) स्वयं ही (तत्त्वे) अात्मस्वरूपमें (अवतिष्ठते) स्थिर हो जाता है।
[ ४२]
वीरसवामन्दिर-ग्रन्थमाला
स्वरूप अवतिष्ठते ।। ३७ ॥
चित्तस्य विक्षेपेऽविक्षेपेच फलं दर्शयन्नाह-
अपमानादयस्तस्य विक्षेपो यस्य चेतसः ।
नापमानादयस्तस्य न लेपो तस्य चेतसः॥ ३८॥
टीका-अपमानो महत्वखंडनं अवज्ञा च स आदिर्वेषां-मदेामात्सर्या-
दीनां ते अपमानादयो भवन्ति । यस्य चेतसा विक्षेपो रागादिपरिणतिर्भवति
यस्य पुनश्चेतसोनक्षेपी विक्षेपा नारित । तस्य नापमानादयो भवन्ति ॥ ३८॥
अपमानादीनां चापगम उपायमाह-
"यदा मोहाप्रजायते रागहषौ तपस्विनः ।
तदैव भावये स्वस्थमात्मानंशाम्यतः क्षणात् ॥ ३६ ॥
भावार्थ --अनके विक्षित होने का वास्तविक कारण अज्ञान है और
उसके अविक्षिप्त रहनेका कारण है ज्ञानाभ्य स । अनः परद्रव्यप्ने आत्म-
बुद्धिादिरूप अंज्ञान के संस्कारों को हटाना चाहिये और स्वपरभेदविज्ञान-
'के अभ्यासरूप ज्ञानके संस्कारोंको बढ़ाना चाहिये जिससे स्वरूपकी. उप-
लब्धि एवं आत्मस्वरूपमें स्थिति हो सके ॥ ३७॥
चित्तके विक्षिप्त और अविनित होने पर फल विशेषको दर्शाते हुए
कहते हैं----
अन्वयार्थ-( यस्य चेतसः ) जिसके चित्तका (विक्षेपः) रागादिरूप
परिणमन होता है (तस्य) उसोके (अपमानादयः) अपमानादिक होते हैं।
(यस्य चेतसः) जिसके चित्तका (क्षेपः न) राग-द्वेषादिरूप परिणमन नहीं
होता (तस्य) उसके (अपमानादयः न) अपमान--तिरस्कारादि नहीं होते हैं।
भावार्थ-जब तकचित्तमें रागद्वेषादिक विभावरूप कुत्सित संस्कारों-
का सम्बन्ध रहता है तभी तक मन साधारणसे भो बाह्य निमित्तोंको
पाकरे तुभित हो जाता है और अमुक पुरुषने मेरा मान भंग किया,
अमुकने मेरा तिरस्कार किया, मुझे नीचा दिखाया इत्यादि कल्पनाएं कर-
'के दुखित होता है । परन्तु जब विक्षेपका मूलकारण राग-द्वेष मोह-भाव
दूर हो जाता है तब वह अपने अपमानादिकको महसूस नहीं करता
और न उस प्रकारकी कल्पनाएं ही उसे सताती हैं ॥ ३८ ॥
समाधितंत्र [४३] टीका मोहान्मोहनीयकर्मोदयात् । यदा प्रजायते उत्पद्यते । कौ ? रामद्वेषौ । कम्य ? तपस्विनः । तदैव रागद्वेषोदयकाल एव । आत्मानं स्वस्थं बाह्यविषयाव्यावृत्तस्वरूपस्थं भावयेत् । शाम्यत उपशमं गच्छतः । गग-द्वेषौ । क्षणात् क्षणमात्रेण ॥ ३९ ॥ तत्र गगद्वेषयोविषयं विपक्षं च दर्शयन्नाह- यत्र काये मुनेः प्रेम ततः प्रच्याव्य देहिनम् । बुड्या तदुत्तमे काये योजयेत्प्रेम नश्यति ॥४०॥ अब अपमानादिकंके दूर करनेका उपाय बनाते हैं- अन्वयार्थ-(यदा) जिम ममय(तपस्विनः) किसी तपस्वी अन्तरास्मा- के (माहात्) मोहनीय कर्मके-उदयसे (रोगहषौ) राग और द्वेष (प्रजायते) उत्पन्न हो जावें (तदा एव) उसो ममय-वह तपस्वी (स्वस्थं प्रात्मानं) अपने शुद्ध अात्मस्वरूपको ( भावयेत् ) भावना करे । इससे वे रागद्वेषादिक (क्षणात) क्षणभरमें (शाम्यतः) शांत हो जाते हैं। भावार्थ-इन राग, द्वेष, काम, क्रोध, मान, माया और लोभादिरूप कुभावोंको उत्पत्तिका मूल कारण अज्ञान है। शरीर और आस्माका भेद- विज्ञान न होनेसे हो ये मनोविकार चित्तको निश्चल वृत्तिको चलायमान कर देते हैं। कुभावोंके विनाशका एकमात्र उपाय प्रान्मस्वरूपका चिंतन करना है। जैसे ग्रीष्मकालोन सूर्यको प्रचण्ड किरणोंके तापसे संतस हुए मानवके लिये शीतल जलका पान, स्नान, चन्दनादिकका लेप और वृक्षको सघन छायाका श्राश्रय उसके उस तापको दूर करने में समर्थ होता है, उसी प्रकार मोहरूपी सूर्यको प्रचण्ड कषांयरूपी किरणोंसे संतप्त हुए अन्तराम्माके लिये अपने शुद्ध स्वरूपका चिंतन ही उस तापसे छुड़ानेका एक मात्र उपाय है ॥३६॥ अब उन राग और द्वेषके विषय तथा विपक्षको दिखाते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(यत्र काये) जिस शरीरमें (मुनेः) मुनिका-अन्तरात्माका (प्रेम) प्रेम-स्नेह है (ततः ) उससे (बुद्धया) भेद विज्ञानके आधार पर [४४ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यत्रात्मीये परकीये वा काये । वा शरीरेन्द्रियविषयसङ्घाते । मुनेः प्रेम स्नेहः । ततः कायात् प्रन्याव्य व्यावर्त्य । देहिनं प्रात्मानम् । क्या ? बुद्धया विवेकज्ञानेन । पश्चात्तदुत्तमे काये तस्मात् प्रागुक्तकायादुत्तमे चिदानन्दमये । काये आत्मस्वरूपे । योजयेत् । कया कृत्वा ? बुद्धया अन्तदृष्टया । ततः किं भवति ? प्रेम नश्यति कायस्नेहो न भवति ।।४।। तस्मिन्नष्ट किं भवतीत्याह- आत्मविभ्रजं दुःखमात्मज्ञानात्प्रशाम्यति । नायतास्तत्र निर्वान्ति कृत्वापि परमं तपः ॥४१॥ (देहिनम) आस्माको (प्रच्याव्य) पृथक् करके (तदुत्तमे काये) उसः उत्तम चिदानन्दमयकायमें-आत्मस्वरूपमें (योजयेत) लगावे । ऐसा करनेसे (प्रेम नश्यति) बाह्य शरीर और इन्द्रियविषयोंमें होने वाला प्रेम नष्ट होजाता है। भावार्थ-जब तक इस जीवको अपने निजानन्दमय निराकुल शांत 'उपवन में क्रीडा करने का अवमर नहीं मिलता, नव तक ही यह जीव अस्थि, मांस और मल-मूत्रसे भरे हुए अपावन घृणित स्त्री आदिके शरीरमें और अन्य पांच इन्द्रियोंके विषयों में प्रासक्त रहता है; किन्तु जब दर्शनमोहादिके उपशम, क्षय, क्षमोशमसे इसके चित्तमें विवेक- ज्ञान जागृत होजाता है तब स्व पर स्वरूपका ज्ञायक होकर अपने ही प्रशान्त एवं निजानन्दमय सुधा रसका पान करने लगता है और बाह्य- इन्द्रियोंके पराधीन विषयोंको हेय समझ कर उदासीन होजाना है अथवा उनका सर्वथा त्याग कर निग्रंथ साधु बन जाता है और घोर तपश्चरणादि- के द्वारा प्रास्माकी वास्तविक शुद्धि करके सच्चे स्वाधीन एवं अविनाशी प्रास्मपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४० ॥ उस भ्रमात्मक प्रेमके नष्ट होनेपर क्या होता है उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(आत्मविभ्रज ) शरीरादिकमें आत्मबुद्धिरूप विभ्रमसे उत्पन्न होने वाला (दुख) दुख कष्ट ( आत्मज्ञानात ) शरीरादिसे भिन्नरूप आत्मस्वरूपके अनुभव करनेसे (प्रशाम्यनि) शांत होजाता है। अतएच जो पुरुष (तत्र) भेदविज्ञानके द्वारा आत्मस्वरूपकी प्राप्ति करने में (प्रयताः) समाधितंत्र [:४५] टीका-यात्मविनजं श्रात्मनो विभ्रमोऽनात्मशरीरादावात्मेति ज्ञानं । तस्माज्जातं यत् दुःखं तत्पशाम्यति । कस्मात् ? आत्मज्ञानात् शरीरादिभ्यो भेदेनात्मस्वरूपवेदनात्। ननु दुर्धरतपोऽनुष्ठानान्मुक्तिसिद्धरतस्तद्दुःखोपशमो न भविष्यतीति वदन्तं प्रत्याह-नेत्यादि। तत्र अात्मस्वरूपे श्रयता: अयत्नपराः। न निर्वान्ति न निर्वाणं गच्छंति सुखिनो वा न भवन्ति । कृत्वापि तप्त्वाऽपि । किं तत् ? परमं तपः दुद्धरानुष्ठानम् ।। ११ ।। तच्च कुर्वाणो बहिरात्मा अन्तरात्मा च किं करोतीत्याह- शुभं शरीरं दिव्यांश्च विषयानभिवांच्छति । उत्पन्नात्ममतिदेहे तत्त्वज्ञानी ततश्च्युतिम् ॥ ४२ ॥ टीका-देहे उत्पन्नात्ममतिर्बहिरात्मा । अभिवाञ्छति अभिलंषति । किं तत् ? शुभं शरीरं । दिव्यांश्च उत्तमान् स्वर्गसम्बधिनी वा विषयान् । प्रयत्न नहीं करते वे ( परमं ) उत्कृष्ट एवं दुद्धर (तपं ) बपको (कृत्वापि) करके भी (न निर्वान्ति) निर्वाणको प्राप्त करने में समर्थ नहीं होते हैं। भावार्थ-कर्मबंधनसे छूटने के लिये आत्मज्ञानपूर्वक किया हुआ इच्छा- निरोधरूप तपश्चरण ही कार्यकारी हैं। प्रात्मज्ञानसे शून्य केवल शरीरको कष्ट देने वाले तपश्चरण तपश्चरण नहीं हैं-संसारपरिभ्रमणके हो कारण हैं। उनसे आत्मा कभी भी कर्मों के बंधनसे छूट नहीं सकता और न स्वरूपमें ही स्थिर हो सकता है। उसकी कष्ट-परम्परा बढ़नी हो चली जाती है ॥ ४१॥ तपको करके बहिरात्मा क्या चाहता है और अंतरात्मा क्या चाहता है, इसे दिखाते हैं- 'अन्वयार्थ-( देहे उत्पन्नात्ममतिः ) शरीरमें जिसको अात्मत्वबुद्धि उत्पन्न होगई है ऐसा बहिरात्मा तप करके (शुभं शरीरं च) सुंदर शरीर और (दिव्यान् विषयान्) उत्तमोत्तम अथवा स्वर्गके विषयभोगोंको (अभि- वाञ्छति) चाहता है और ( तत्त्वज्ञानी ) ज्ञानी अन्तरास्मा (ततः) शरीर और तस्संबंधी विषयोंसे (च्युतिम्) छूटना चाहता है।
[४६ ] वीरसेवामन्दिर-प्रन्थमाला अन्तरात्मा किं करोतीत्याह-तत्वज्ञानी ततश्च्युतिम् । तत्त्वज्ञानी विवेकी अन्तरात्मा। ततः शरीरादेः। युतिं व्यावृत्तिं मुक्तिरूपां अभिवाञ्छति ॥४२॥ तत्त्वज्ञानीतरयोर्बन्धकत्वाबन्धकत्वे दर्शयन्नाह- परत्राहम्मतिः स्वस्माच्च्युतो बध्नात्यसंशयम् । स्वस्मिन्नहम्मतिश्च्युत्वा परस्मान्मुच्यते बुधः ॥४३॥ टीका-परत्र शरीरादौ ग्रहम्मतिरात्मबुद्धिर्बहिरात्मा । स्वस्मादात्मस्व- रूपात् । च्युतो भ्रष्टः सन् । बध्नाति कर्मबन्धनबद्ध करोत्यात्मानं । असं- शयं यथा भवति तथा नियमेन बध्नातीत्यर्थः । स्वस्मिन्नात्मस्वरूपे अहम्मतिः बुद्धोऽन्तरात्मा । परस्माच्छरीरादेः । च्युत्वा पृथग्भूत्वा । मुच्यते सकलकर्म- बन्धरहितो भवति ।। ४३ ।। भावार्थ-अज्ञानी बहिरात्मा स्वर्गादिककी प्राप्तिको ही परमपदकी प्रासि समझना है और इमीलिये स्वर्गादिकके मिलनेको लालसासे पंचाग्नि आदि शरीरको क्लेश देने वाले तप करता है। प्रत्युत इसके, प्रास्मज्ञानी अन्तरात्माकी ऐसी धारणा नहीं होता, वह सांसारिक विषयभोगोंमें अपना स्वार्थ नहीं देखता--उन्हें दुःखदाई और कष्टकर जानता है और इस लिये इन देहभोगोंसे ममत्व छोड़कर दुर्धर तपश्चरण करता हुआ शरीरादिकसे आत्माको भिन्न करनेका परम यत्न करता है-तपश्चरणके द्वारा इन्द्रिय और कषायों पर विजय पाकर अपने ध्येयकी सिद्धि कर लेता है ॥ ४२ ॥ अब यह बतलाते हैं कि बहिरात्मा और अन्तरात्मामें कर्मबन्धनका कर्ता कौन हैं- अन्वयार्थ-(परत्राहम्मतिः)शरीरादिक परपदार्थों में जिसकी आत्मबुद्धि हो रही है ऐमा बहिरास्मा (स्वस्मात्) अपने प्रास्मस्वरूपसे (च्युतः) भ्रष्ट हुअा (असंशयम्) निःसन्देह (बध्नाति) अपनेको कर्म बन्धनसे बद्ध करता है और (स्वस्मिन्नहमतिः) अपने आत्माके स्वरूपमें हो आत्मबुद्धि रखने वाला (बुधः) अन्तरात्मा (परस्मात्) शरीरादिक परके सम्बंधसे (च्युत्वा) च्युत होकर (मुच्यते) कर्म बन्धनसे छूट जाता है। भावार्थ-बन्धका कारण वास्तवमें रागादिकभाव है और वह तभी समाधितंत्र [४] यत्राहम्मतिर्बहिरात्मनो जाता तत्तेन कथमध्यवसीयते ? यन्न चान्तरात्म- नस्तत्तेन कथमित्याशक्याह- दृश्यमानमिदं मूढस्त्रिलिङ्गमवबुध्यते । इदमित्यवबुद्धस्तुनिष्पन्न शब्दवर्जितम् ॥४४॥ टीका-दृश्यमानं शरीरादिकं । किं विशिष्ट ? त्रिलिङ्ग त्रीणि स्त्रीपुंन- पुंसकलक्षणानि लिङ्गानि यस्य तत् दृश्यमानं त्रिलिङ्ग सत् । मूढो बहि- रात्मा । इदमात्मतत्त्वं त्रिलिङ्ग मन्यते दृश्यमानादभेदाध्यवसायेन । यः पुनरवबुद्धोऽन्तरात्मा स इदमात्मतत्त्वमित्येवं मन्यते । न पुनस्त्रिलिङ्गतया । तस्याः शरीरधर्मतया श्रात्मस्वरूपत्वाभावात् । कथम्भूतमिदमात्मस्वरूपं. १ निष्पन्नमनादिसंसिद्धम् तथा शब्दवर्जितं विकल्पाभिधानाऽगोचरम् ।। ४४।। बनता है जब प्रास्मा अपने स्वरूपका ठीक अनुभव नहीं करता उसे भूल कर शरीरादिक पर-पदार्थों में आत्म-बुद्धि धारण करता है। अन्तरात्मा चूंकि अपने प्रात्मस्वरूपका ज्ञाता होता है, इससे वह अपने मात्मासे भिन्न दूसरे पदार्थों में प्रास्मबुद्धि धारण नहीं करता-फलतः उसकी पर: पदार्थोंमें कोई आसक्ति नहीं होती । इसीसे वह कर्मोंके बंधनसे नहीं बंधता, किन्तु उससे छूट जाता है ॥ ४३ ॥ बहिरास्माकी जिस पदार्थ में आत्मबुद्धि हो गई है उसे वह कैसा मानता है और अन्तरात्मा की जिसमें आत्मबुद्धि उत्पन्न हो गई है उसे वह कैसा अनुभव करता है, आगे इसी आशंकाका निरसन करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(मूढः) अज्ञानी बहिरात्मा (इदं दृश्यमानं) इस दिखाई देने वाले शरीरको (त्रिलिंगं अवबुध्यते ) स्त्री-पुरुष-नपुंसकके भेदसे यह आत्मतत्त्व त्रिलिङ्ग रूप है ऐसा मानता है। किन्तु (अवबुद्धः) आत्मज्ञानी अंतरात्मा (इदं) यह आत्मतत्त्व है-त्रिलिङ्गरूप आत्मतत्त्वन ही है और वह ( निष्पन्न ) अनादि संसिद्ध है तथाः (शब्दवर्जितम्) नामादिक विकल्पोंसे रहित है (इति) ऐसा समझता है। भावार्थ-अज्ञानी जीवको शरीरसे भिन्न प्रात्माकी प्रतीति नहीं
[१८]
वोरसेवामन्दिर-प्रन्थमाला
ननु यद्यन्तरात्मैवात्मानं प्रतिपाद्यते तदा कथं पुमानहं गौरोऽहमित्यादि-
रूपं तस्य कदाचिदभेदभ्रांतिः स्यात् इति बदन्तं प्रत्याह-
जानन्नप्यात्मनस्तत्त्वं विविक्तं भावयन्नपि ।
पूर्वविभ्रमसंस्काराद्भ्रांतिं भूयोऽपि गच्छति ॥ ४५ ॥
टीका-आत्मनस्तत्त्वं स्वरूपं जानन्नपि। तथा विविक्तं शरीरादिभ्यो-
भिन्न भावयन्नपि उभयत्रोऽपिशब्दः परस्परसमुच्चये । भूयोऽपि पुनरपि ।
भ्रान्ति गच्छति । कस्मात् ? पूर्वविघ्नमसंस्कारात् पूर्वविभ्रमो बहिरात्मावस्था-
भावी शरीरादौ स्वात्मविपर्यासस्तन जनितः संस्कागेवासना तस्मात् ।। १५ ।।
होती, इस लिये वह स्त्री-पुरुष नपुंसकरूप त्रिलिङ्गान्मक शरीरको ही आत्मा
मानता है। सम्यग्दृष्टि वस्तुस्वरूपका ज्ञाना है और उसे शरीरसे भिन्न
चैतन्यस्वरूप आत्मतत्त्वकी प्रतीति होती है, इसलिये वह अपने आम्मा
को नद्रूप ही अनुभव कहता है-त्रिलिङ्गरूप नहीं और उसे अनादि-
सिद्ध नथा-निर्विकल्प समझता है ॥४४॥
यदि कोई कहे कि जव अन्तरात्मा इस तरहसे आत्माका अनुभव
करना है तो फिर मैं पुरुष हूँ, मैं गोरा हूँ इत्यादि अभेदरूपकी भ्रान्ति
उमें कैसे हो जाती है, इसका उत्तर देते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ अन्तरात्मा (श्रात्मनः तत्वं) अपने प्रान्माके शुद्ध चैतन्य
स्वरूपको(जानन् अपि) जानता हुअा भी (विविक्तं भावयन् अपि) और
शरीरादिक अन्य पर-पदार्थोंसे भिन्न अनुभव करता हुआ भी (पूर्वविभ्रम-
संस्कारात्) पहली बहिरात्मावस्थामें होने वाली भ्रान्तिके संस्कारवश
(भूयोऽपि) पुनरपि (भ्रान्ति गच्छति) भ्रांतिको प्राप्त होजाता है।
भावार्थ-यद्यपि अन्तरात्मा अपने आत्माके यथार्थ स्वरूपको
जानता है और उसे शरीरादिक पर-द्रव्योंसे भिन्न अनुभव भी करता है
फिर भी बहिरामावस्थाके चिरकालीन संस्कारोंके जागृत हो उठनेके
कारण कभी कभी वाह्य पदायोंमें उसे एकावका भ्रम हो जाता है।
इसीसे अन्तरात्मा सम्यग्दृष्टि के ज्ञान-चेतना के साथ कदाचित् कर्म-चेतना
व कर्मफल चेतनाका भी सझाव माना गया है ॥ ४५ ॥
समाधितंत्र ize] भूयो भ्रान्ति गतोऽसौ कथं तां त्यजेदित्याह-- अचेतनमिदं दृश्यमदृश्यं चेतनं ततः । क रुष्यामि व तुष्यामि मध्यस्थोऽहं भवाम्यतः॥४६॥ टीका-इदं शरीरादिकं दृश्यमिन्द्रियैः प्रतीयमानं । अचेतनं जडं रोषतोषादिकं कृतं न जानातीत्यर्थः । यच्चेतनमात्मस्वरूपं तददृश्यमिन्द्रिय- ग्राह्य न भवति । ततः यतो रोषतोषविषयं दृश्यं शरीगदिकमचेतनं चेतनं स्वात्मस्वरूपमदृश्यत्वात्तद्विषयमेव न भवति ततः। क रुष्यामि व तुष्याम्यहं । अतः यतो रोषतोषयोः कश्चिदपि विषयो न घटते अतः मध्यस्थः उदासीनो- ऽहं भवामि ।। ४६ ॥ इदानीं मूढात्मनोऽन्तरात्मनश्च त्यागोपादानविषयं प्रदर्शयन्नाह- त्यागादाने बहिमूढः करोत्यध्यात्ममात्मवित् । पुनः भ्रांति को प्राप्त हुअा अन्तरात्मा उस भ्रांति को फिर कैसे छोड़े ? इसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ अन्तरात्मा तब अपनी विचार परिणनिको इस रूप करे कि-(इदं दृश्य) यह जो दृष्टिगोचर होने वाला पदार्थ-समूह है वह सब (अचेतन) चेतनारहित-जड़ है और जो (चेतन) चैतन्यस्वरूप आत्म- समूह है वह (अदृश्य)इन्द्रियोंके द्वारा दिखाई नहीं पड़ना (ततः) इमलिये (क रुष्यामि) मैं किस पर तो क्रोध करूं और (क तुष्यामि) किस पर संतोष व्यक्त करूं ? (अतः अहं मध्यस्थः भवामि) ऐसी हालनमें मैं तो अव राग द्वेषके परित्यागरूप मध्यस्थभावको धारण करता हूँ। भावार्थ-अन्तरात्माको अपने अनाद्यविद्यारूप भ्रान्त संस्कारों पर विजय प्राप्त करने के लिये सदा ही यह विचार करते रहना चाहिये कि जिन पदार्थोंको मैं इन्द्रियोंके द्वारा देख रहा हूँ वे सब तो जड़ हैं-चेतना रहित-हैं उनपर रोष-तोष करना व्यर्थ है-वे उसे कुछ समझ ही नहीं सकते-और जो चैतन्य पदार्थ हैं वेमुझे दिग्बाई नहीं पड़ने- मेरे रोप- तोषका विषय ही नहीं हो सकते । अतः मुझे किसोमे राग-द्वेष न रख कर मध्यस्थ भावका ही अवलम्बन लेना चाहिये ॥४६॥ अब बहिरास्मा और अन्तरात्माके त्याग ग्रहण विषयको स्पष्ट करते हुए कहते हैं- [५०] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला नान्तर्बहिरुपादानं न त्यागो निष्ठितात्मनः ॥४७॥ टीका-मूढा बहिरात्मा त्यागोपादाने करोति । क ? बहिर्बाह्य हि वस्तुनि द्वेषोदयादभिलाषाभावान्मूढात्मा त्यागं करोति रागोदयात्तत्राभिलाषो- त्पत्तेरुपादानमिति । यात्मबित् अन्तरात्मा पुनरध्यात्मनि स्वात्मरूप एव त्यागोपादाने करोति । तत्र हि त्यागो रागद्वेषादेरन्तर्जल्पविकल्पादेर्वा । स्वीकारश्चिदानन्दादेः । यस्तुनिष्ठितात्मा कृतकृत्यात्मा तस्य अन्तर्बहिर्वा ना- पादानं तथा न त्यागोऽन्तर्बहिर्वा । अन्तस्त्यागोपादाने वा कुर्वाणोऽन्तरात्मा कथं कुर्यादित्याह- अन्वयार्थ-(मूढः) मूर्ख बहिरान्मा (बहिः) बाह्यपद ाँका (त्यागादाने करोति) त्याग और ग्रहण करता है अर्थात् द्वेषके उदयमे जिनको अनिष्ट ममझता है उनको छोड़ देता है और रागके उद्यसे जिन्हें इष्ट समझना है उन्हें ग्रहण कर लेता है, तथा (अात्मवित्) आत्माके स्वरूपका ज्ञाता अन्तरात्मा (अध्यात्म त्यागादाने कगेति) अन्तरंग राग-द्वेषका त्याग करता है और अपने मम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूप निजभावोंका ग्रहण करता है । परन्तु (निष्ठितात्मनः) शुद्धस्वरूपमें स्थिन जो कृतकृत्य परमात्मा है उसके (अन्तः बहिः) अन्तरंग और बहिरंग किसो भो पदार्थका (न त्यागः) न तो त्याग होता है और (न उपादान) न ग्रहण होता है । भावार्थ--बहिरात्मा जीव मोहोदयसे जिन बाह्य पदार्थोंमें इष्ट- अनिष्टकी कल्पना करता है उन्होमें स्याग और ग्रहणकी क्रिया किया करना है । अन्तरामा वस्तुस्थितिका जानने वाला होकर वैसा नहीं करता- वह बाहय पदार्थोंसे अपनी चित्तवृत्तिको हटाकर अतरंगमें ही त्याग-ग्रहणको प्रवृत्ति किया करता है--रागादि कषाय भावोंको छोड़ता है और अपने शुद्ध चैतन्यरूपको अपनाता है । परन्तु परमात्माके कृत- कृन्य हो जानेके कारण, वाह्य हो या अंतरंग किमी भी विषयमें स्याग : और ग्रहणको प्रवृत्ति नहीं होती। वे तो.अपने शुद्धस्वरूपमें सदा स्थिर रहते हैं ॥४७॥ अन्तरात्मा अंतरंगका त्याग और ग्रहण किस प्रकार करे, उसे बतलाते हैं- समाधितंत्र [५१ युञ्जीत मनसाऽऽत्मानं वाक्कायाभ्यां वियोजयेत् । मनसा व्यवहारं तु त्यजेहाक्काययोजितम् ॥४८॥ टीका-आत्मानं युञ्जीत सम्बद्ध कुर्यात् । केन सह ? मनसा मानस- ज्ञानेन चित्तमात्मेत्यभेदेनाध्यवसेदित्यर्थः । वाक्कायाभ्यां तु पुनर्वियोजयेत् पृथक्कुर्यात् वाक्काययोरात्माभेदाध्यवसायं न कुर्यादित्यर्थः । एतच्च कुर्वाणो व्यवहारं तु प्रतिपादकभावलक्षणं प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपं वा । वाक्काययोजितं वाक्कायाभ्यां योजितं सम्पादितं । केन सह ? मनसा सह मनस्यारोपितं व्यवहारं त्यजेत् चित्तेन न चिन्तयेत् । ननु पुत्रकलत्रादिना सह वाक्कायव्यवहारे तु सुखोत्पत्तिः प्रतीयते कथं तत्त्यागां युक्त इत्याह- जगदेहात्मदृष्टीनां विश्वास्यं रम्यमेव च । अन्वयार्थ-(प्रात्मानं ) आत्माको (मनसा) मनके साथ (युञ्जीत ) संयोजित करे-चित्त और आत्माका अभेदरूपसे अध्यवसाय करे (वा- क्कायाभ्यां ) वचन और कायसे (वियोजयेत् ) अलग करे-उन्हें आस्मा न समझे (त) और (वाक्काययोजितम् ) वचन-कायसे किये हुए (व्यवहार) व्यवहारको(मनसा) मनसे (त्यजेत्) छोड़ देवे---उसमें चित्तको न लगाये। भावार्थ-अन्तरंग रागादिकका त्याग और आस्मगुणोंका ग्रहण करनेके लिये अन्तरात्माको चाहिये, कि वह प्रास्माको मानसज्ञानके साथ तन्मय करे और बचन तथा कायके सर्वकार्योंको छोड़कर आत्मचिंतनमें तल्लीन हो जाये। यदि प्रयोजनवश बचन और कायको क्रिया करनी भी पड़े तो उसे उदासीनभावके साथ अरुचि-पूर्वक कड़वी दवाई पीनेवाले रोगीकी तरह अनासक्तिसे करे ॥४८॥ यदि कोई कहे कि पुत्र स्त्री आदिके साथ वचनव्यवहार और शरीर- व्यवहार करते हुए तो सुख प्रतीत होता है, फिर उस व्यवहारका स्याग करना कैसे युक्ति युक्त कहा जा सकता है ? उसका समाधान करते हुए कहते हैं- [५२] वोरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला स्वात्मन्येवात्मदृष्टीनां क्व विश्वासः क्व वा रतिः॥४६॥ टीका-देहात्मदृष्टीनां बहिरात्मनां जगत् पुत्रकलत्रादिप्राणिगणो विश्वास्यमवञ्चकं । रम्यमेव च रमणीयमेव प्रतिभाति । स्वात्मन्येव स्वस्व- रूपे एवात्मदृष्टीनां अन्तरात्मनां । क विश्वास: क वा रतिः १ न क्वापि पुत्र- कलत्रादौ तेषां विश्वासो रतिर्वा प्रतिभातीत्यर्थः ।। ४६ ।। नत्वेवमाहारादावप्यन्तगत्मनः कथं प्रवृत्तिः स्यादित्याह- आत्मज्ञानात्परं कार्य न बुद्धौ धारयेच्चिरम् । कुर्यादर्थवशात्किंचिद्वाक्कायाभ्यामतत्परः ॥ ५० ॥ अन्वयार्थ-(देहात्मदृष्टीना) शरीरमें आत्मदृष्टि रखने वाले मिथ्यादृष्टि बहिरास्माओंको (जगत्) यह स्त्री-पुत्र मित्रादिका समूहरूप संसार (विश्वा- स्य) विश्वासके योग्य (च) और ( रम्यं एव ) रमणीय ही मालूम पड़ता है। परन्तु (स्वात्मनि एव प्रात्मदृष्टीनां) अपने आम्मामें ही श्रात्म- दृष्टि रखने वाले सम्यग्दृष्टि अन्तरात्माओंको ( क विश्वासः ) इन स्त्री- पुत्रादि परपदार्थों में कहां विश्वास हो सकता है (वा) और (क रतिः ) कहां आसक्ति हो सकती है ? कहीं भी नहीं। भावार्थ-जब तक अपने परमानन्दमय चैतन्य स्वरूपका बोध न होकर इन संसारी जीवोंको देहमें आत्मबुद्धि बनी रहती है तब तक इन्हें यह स्त्री-पुत्रादिका समूह अपनेको आत्मस्वरूपसे वंचित रखने वाला ठग- समूह प्रतीत नहीं होता, किन्तु विश्वसनीय, रमणीय और उपकारो जान पड़ता है । परन्तु जिन्हें आत्माका परिज्ञान होकर अपने आत्मामें ही आत्मवुद्धि उत्पन्न हो जाती है उनकी दशा इनसे विपरीत होती है-वे इन स्त्री-पुत्रादिको 'आस्मरूपके चोर चपल ये दुर्गति-पन्थ सहाई' समझने लगते हैं, किसीको भी अपना आत्मसमर्पण नहीं करते और न किसीमें आसक्त ही होते हैं ॥ ४६ ।। यदि ऐसा है तो फिर अन्तरात्मांकी भोजनादिके ग्रहणमें प्रवृत्ति कैसे हो सकती है ? इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ अन्तरात्माको चाहिये कि वह (आत्मज्ञानात्परं) आत्म- १ समाधितंत्र [ ५३ ] टीका-चिरं बहुतरं कालं बुद्धौ न धारयेत् । किं तत् ? कार्य । कथम्भूतम् ? परमन्यत् । कस्मात् ? आत्मज्ञानात्। आत्मज्ञानलक्षणमेव कार्य बुद्धौ चिरं धारयेदित्यर्थः । परमपिकिञ्चिदाक्कायाभ्यां कुर्यात् । कस्मात् ? अर्थवशात् स्वपरोपकारलक्षणप्रयोजनवशात् । किं विशिष्टः ? अतत्परस्तदना- सक्तः ॥ ५० ॥ तदनासक्तः कुतः पुनरात्मज्ञानमेव बुद्धौ धाग्येन्नशरीरादिकमित्याह- यत्पश्यामीन्द्रियैस्तन्मे नास्ति यन्नियतेन्द्रियः । अन्तः पश्यामि सानन्दं तदस्तु ज्योतिरुत्तमम् ॥५१॥ ज्ञानसे भिन्न दूसरे (कार्य) कार्यको (चिरं) अधिक समय तक (बुद्धौ) अपनी बुद्धिमें (न धारयेत्) धारण नहीं करे । यदि (अर्थवशात्) स्व-परके उपकारादिरूप प्रयोजनके वश (वाक्कायाभ्यां) बचन और कायसे (किंचित् कुर्यात) कुछ करना ही पड़े तो उसे (अतत्परः) अनासक्त होकर (कुर्यात्) भावार्थ-आत्महितके इच्छुक अन्तरात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे अपने उपयोगको इधर उधर न भ्रमाकर अपना अधिक समय प्रात्मचिन्तन में ही लगावें । यदि स्वपरके उपकारादिवश उन्हें बचन और कायसे कोई कार्य करना ही पड़े तो उसे वे अनासक्ति पूर्वक करें-उसमें अपने चित्त को अधिक न लगावें। ऐसा करनेसे वे अपने प्रास्मस्वरूपसे च्युत नहीं हो सकेंगे और न उनकी शान्ति हो भंग हो सकेगी ॥ ५० ॥ अनासक्त हुआ अन्तरात्मा आत्मज्ञानको हो वुद्धिमें धारण करे-- शरीरादिकको नहीं, यह कैसे हो सकता है ? उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ अन्तराम्माको विचारना चाहिये कि(यत) जो कुछ शरीरादि बाह्य पदार्थ (इन्द्रियैः) इन्द्रियों के द्वारा (पश्यामि) मैं देखता हूँ। (तत्) वह (मे) मेरा स्वरूप (नास्ति) नहीं है, किन्तु ( नियतेन्द्रियः ) इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे रोककर स्वाधीन करता हुआ मैं (यत) जिस (उत्तम) उत्कृष्ट अनी न्द्रिय ( सानन्दं ज्योतिः ) आनन्दमय ज्ञान प्रकाशको (अन्तः) अंतरंगमें (पश्यामि) देखता हूँ-अनुभव करता हूँ (तत् मे) वही मेरा वास्तविक स्व- करे।
[ ५४ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यच्छगगदिकमिन्द्रियैः पश्यामि तन्मे नास्ति मदीयं रूपं तन्न भवति । तर्हि किं तव रूपम् ? तदस्तु ज्योतिरुत्तमं ज्योतिर्ज्ञानमुत्तममती- न्द्रियम् । तथा सानन्दं परमप्रसचिसङ्ग तसुखसमन्वितम् । एवं विधं ज्योति- रन्तः पश्यामि स्वसंवेदनेनानुभवामि यत्तन्मे स्वरूपमस्तु भवतु । किं विशिष्टः पश्यामि ? नियतेन्द्रियो नियन्त्रितेन्द्रियः ।। ५१ ॥ ननु सानन्दं ज्योतिर्यद्यात्मनोरूपं स्यात्तदेन्द्रियनिरोधं कृत्वा तदनुभवतः कथं दुःखं स्यादित्याह- सुखमारब्धयोगस्य बहिदुःखमथात्मनि । बहिरेवासुखं सौख्यमध्यात्मभावितात्मनः॥ ५२ ॥ रूप (अग्तु) होना चाहिये। भावार्थ-जब अन्तरात्मा भेदज्ञानकी दृष्टिसे इन्द्रियगोचर बाह्य शरी- रादि पदार्थोंको अपना रूप नहीं मानता किन्तु उस परमानन्दमय अती- न्द्रिय ज्ञानप्रकाशको ही अपना स्वरूप समझने लगता है जिसे वह इन्द्रिय व्यापारको रोक कर अन्तरंगमें अवलोकन करता है, तब उसका मन सहज ही में शरीरादि बाह्य पदार्थोंसे हट जाता है-वह उनको अाराधना नहीं करता किन्तु अपने उक्त स्वरूपका ही अाराधन किया करता है-उसीको अधिकांशमें अपनी बुद्धिका विषय बनाये रखता ॥ ५१ ॥ यदि अानन्दमयज्ञान ही आत्माका स्वरूप है तो इन्द्रियोंको रोककर आत्मानुभव करने वालेको दुःख कैसे होता है,यह बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(प्रारब्धयोगस्य) जिसने आत्मभावनाका अभ्यास करना अभी शुरु किया है. उस मनुष्यको-अपने पुराने संस्कारोंकी वजहसे (बहिः) बाह्य विषयों में (सुखं) सुख मालूम होता है (अथ) प्रत्युत इसके (अत्मनि) आत्मस्वरूपकी भावनामें (दुःख) दुःख प्रतीत होता है। किन्तु (भावितात्मनः) यथावत् आत्मस्वरूपको जानकर उसकी भावनाके अच्छे अभ्यासीको (बहिः एव) बाह्य विषयोंमें ही (असुख) दुःख जान पड़ता है और (अध्यात्म) अपने आत्माके स्वरूपचिन्तनमें ही (सौख्यम्) सुखका - AM ------ . - समाधितंत्र [५५] टीका-बहिर्बाह्यविषये सुखं भवति । कस्य १ प्रारब्धयोगस्य प्रथम- मात्मस्वरूपभावनोद्यतस्य । अथ पाहो । आत्मनि अात्मस्वरूपे दु:खं तस्य भवति । भावितात्मनो यथावहिदितात्मस्वरूपे कृताभ्यासस्य । बहिरेव बाह्य- विषयेष्वेवाऽसुखं भवति । अथ आहो । सौख्यं अध्यात्मं तस्याध्यात्मस्वरूप एव भवति ॥ ५२ ॥ तद्भावनाचेत्यं कुर्यादित्याह- तब्रूयात्तत्परान्पृच्छेत्तदिच्छेत्तत्परो भवेत् । येनाऽविद्यामयं रूपं त्यक्त्वा विद्यामयं व्रजेत् ॥५३॥ अनुभव होता है। भावार्थ-वास्तवमें आत्मानुभवन तो सुखका ही कारण है और इन्द्रिय-विषयानुभवन' दुःखका; परन्तु जिन्हें अपने प्रास्माका यथेष्ट ज्ञान नहीं हुआ, जो अपने वास्तविक सुखस्वरूपको पहचानते ही नहीं और जिन्होंने आत्मभावनाका अभ्यास अभी प्रारंभ ही किया है उन्हें अपने इन्द्रिय-विषयोंका निरोधकर आत्मानुभवन करने में कुछ कष्ट जरूर होता है और पूर्व संस्कारोंके वश विषय-सुख रुचता भी है, जो बहुत कुछ स्वाभाविक ही है। प्रास्माकी भावना करते करते जब किसीका अभ्यास परिपक्क होजाता है और यह सुदृढ निश्चय होजाता है कि सुख मेरे आत्माका ही स्वरूप है-वह आत्मासे बाहर दूसरे पदार्थों में कहीं भी नहीं है, तब उसकी हालत पलट जाती है वह अपने प्रात्मस्वरूपके चिन्तनमें ही परमसुखका अनुभव करने लगता है और उसे बाह्य इन्द्रिय- विषय दुःखकारी तथा आत्मविस्मृतिके कारण जान पड़ते हैं, और इस लिये वह उनसे अलग अथवा अलिप्त रहना चाहता है ॥ ५२ ॥ अब वह श्रास्मस्वरूपको भावना किस तरह करनी चाहिये उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(तत् ब्रू यात्) उसास्मस्वरूपका कथन करे-उसे दूसरों- को बतलावे (तत् परान् पृच्छेत्) उस आत्मस्वरूपको दूसरे प्रास्मानुभवी पुरुपोंसे--विशेष ज्ञानियोंसे-पूछे (तत् इच्छेत्) उस स्मिस्वरूकी इच्छा करे-उसकी प्राप्तिको अपना इष्ट बनाए और (तत्परः भवेत्) उस आत्म- [५६ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-तत् प्रात्मस्वरूपं ब्रूयात् परं प्रतिपादयेत् । तदात्मस्वरूपं परान् विदितात्मस्वरूपान् पृच्छेत् । तथा तदात्मस्वरूपं इच्छेत् परमार्थतः सन् मन्येत । तत्परो भवेत् अात्मस्वरूपभावनादरपरो भवेत् । येनात्मस्व- रूपेणेत्थं भावितेन । अविद्यामयं स्वरूपं बहिरात्मस्वरूपम् । त्यक्त्वा विद्या- मयं रूपं परमात्मस्वरूपं व्रजेत् ।। ५३ ।। ननु वाक्कायव्यतिरिक्तस्यात्मनोऽसम्भवात् तद् ब्रु यादित्याद्ययुक्तमिति यदन्तं प्रत्याह- शरीरे वाचि चात्मानं सन्धत्त वाक्शरोरयोः। भ्रान्तोऽभ्रान्तः पुनस्तत्त्वं पृथगेषांनिवुध्यते ॥ ५४ ॥ स्वरूपकी भावनामें सावधान हुअा अादर बढ़ावे (येन) जिससे (अविद्या- मयं रूपं) यह अज्ञानमय बहिरात्मरूप (त्यक्त्वा) छूट कर (विद्यामयं व्रजेत्) ज्ञानमय परमात्मस्वरूपकी प्राप्ति होवे । भावार्थ-किसीका इकलौता प्रियपुत्र यदि खोजावे अथवा बिना कहे घरसे निकल जावे तो वह मनुष्य जिस प्रकार उसकी हूँढ खोज करता है, दूसरों पर उसके खोजानेकी बात प्रकट करता है, जानकारोंसे पूछता है कि कहीं उन्होंने उसे देखा है क्या? उसे पाजानेको तीव्र इच्छा रखता है और बड़ी उत्सुकताकेसाथ उसकी बाट देखता रहता है-एक मिनटके लिये भी उसका पुत्र उसके चित्तसे नहीं उतरता । उसी प्रकार आत्म- स्वरूपके जिज्ञासुओं तथा उसकी प्राप्तिके इच्छुक पुरुषोंको चाहिये कि वे बराबर आत्मस्वरूपकी खोजके लिये दूसरोंसे आत्मस्वरूपकी ही बात किया करें, विशेष ज्ञानियोंसे आत्माकी विशेषताओंको पूछा करें, आस्म- स्वरूपकी प्राप्तिकी निरन्तर भावना भाएं और एक मात्र उसी में अपनी लौ लगाये रक्खें । ऐसा होनेपर उनकी अज्ञानदशा दूर हो जायगी- बहिरामावस्था मिट जायगो और वे परमात्मपदको प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे ॥५३॥ यदि कोई कहे कि बाणी और शरीरसे भिन्न तो पास्मोका कोई अलग अस्तित्व है नहीं, तब आत्माको चर्चा करे-भावना करे इत्यादि -- कहना युक्त नहीं, ऐसी आशंका करने वालोंके प्रति आचार्य कहते हैं- समाधितंत्र [५७ ] टीका-सन्धत्ते आरोपयति । के आत्मानम् | क्व ? शरीरे वाचि च । कोऽसौ ? वाकशरीरयार्धान्तो वागात्मा शरीरमात्मेत्येवं विपर्यस्तो बहिरात्मा । तयोरभ्रान्तो यथावत्स्वरूपपरिच्छेदकोऽन्तरात्मा पुनः एतेषां वाक्- शरीरात्मनां तत्वं स्वरूपं पृथक परस्परभिन्नं निबुद्धयते निश्चिनोति ॥५४॥ एवमवबुद्धयमानो मूढात्मा येषु विषयेष्वासक्तचित्तो न तेषु मध्ये कि- चित्तस्योपकारकमस्तीत्याह- न तदस्तोन्द्रियार्थेषु यत्नेमङ्करमात्मनः । तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञानभावनात् ॥ ५५ ॥ अन्वयार्थ-(वाक्शरीरयोः भ्रान्तः) वचन और शरीरमें जिसकी भ्रान्ति हो रही है जो उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं समझता ऐसा बहिरास्मा (वाचि शरीरे च) वचन और शरीर में--(अात्मानं सन्धत्ते) आत्माका अारोपण करता है अर्थात् वचनको तथा शरीरको अस्मा मानता है (पुनः) किन्तु (अभ्रान्तः) वचन और शरोरमें श्रात्माकी भ्रान्ति न रखने वाला ज्ञानो पुरुष (एषां तत्त्वं) इन शरीर और वचनके स्वरूपको (पृथक्) आत्मासे भिन्न (निबुध्यते) जानता है । भावार्थ-वास्तवमें शरीर और वचन पुद्गलको रचना हैं, मूर्तिक हैं, जड हैं, आत्मस्वरूपसे विलक्षण हैं । इनमें आत्मवुद्धि रखना अज्ञान है । किन्तु बहिरात्मा चिर-मिथ्यात्वरूप कुसंस्कारोंके वश होकर इन्हें श्रात्मा समझता है, जोकि उसका भ्रम है। अन्तरात्माको जड और चैतन्यके स्वरूपका यथार्थ बोध होता है, इसीसे शरीरादिकमें उसकी प्रात्मपनेको भ्रान्ति नहीं होती-वह शरीरको शरीर वचनको वचन और आत्माको अात्मा समझना है, एकको दूसरेके साथ मिलाता नहीं ॥ ५४ ।। इस प्रकार अात्मस्वरूपको न समझने वाला बहिरात्मा जिन बाह्य विषयोंमें अासक्तचित्त होता है उनमें से कोई भी उसका उपकारक नहीं है, ऐसा कहते हैं- अन्वयार्थ--(इन्द्रियार्थेषु) पांचों इन्द्रियोंके विषयमें (तत्) ऐसा कोई पदार्थ (न अस्ति) नहीं है (यत्) जो (प्रात्मनः) श्रात्माका (क्षेमंकर) भला [५८] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-इन्द्रियार्थेषु पंचेन्द्रियविषयेषु मध्ये न तत्किञ्चिदस्ति यत् क्षेमङ्करम् । कस्य ? श्रात्मनः । तथापि यद्यपि क्षेमकरं किञ्चिन्नास्ति । रमते रतिं करोति । कोऽसौ ? बालो बहिरात्मा तत्रैव । इन्द्रियार्थेष्वेव । कस्मात् ? अज्ञानभावनात् मिथ्यात्वसंस्कारवशात् । अज्ञानं भाव्यते जन्यते येनासावज्ञानभावनो मिथ्यात्वसंस्कारस्तस्मात् ।। ५५ ।। तथा अनादिमिथ्यात्वसंस्कारे सत्येवम्भूता बहिरात्मनो भवन्तीत्याह- चिरं सुषुप्तास्तमसि मूढात्मानः कुयोनिषु । अनात्मीयासभूतेषु ममाहमिति जाग्रति ॥ ५६ ॥ करने वाला हो । (तथापि) तो भी.( बालः यह अज्ञानी बहिरतमा (अज्ञानभावनात्) चिरकालान मिथ्यात्वके संस्कारवश (तत्रैव) उन्हीं इन्द्रियोंके विषयोंमें (ग्मते) आसक्त रहता है । भावार्थ-तत्त्वदृष्टिसे यदि विचार किया जाय तो ये पांचों ही इन्द्रियों के विषय क्षणभंगुर हैं, पराधीन हैं, विषम हैं, बंधके कारण हैं, दुरुरूप हैं और बाधासहित हैं-कोई भी इनमें आत्माके लिये सुखकर नहीं; फिर भी यह अज्ञानी जोव उन्हींसे प्रीति करना है, उन्हींकी सम्प्राप्तिमें लगा रहता है और रातदिन उन्हींका राग आलापता है । यह सब अज्ञानभावको उत्पन्न करने वाले मिथ्यात्व-संस्कारका ही माहात्म्य है॥ ५५ ॥ उस अनादिकालीन मिथ्यात्वके संस्कारवश बहिरास्माओंकी दशा किस प्रकारकी होती है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(मूढात्मानः) ये मूर्ख अज्ञानी जीव (तमसि) मिथ्यास्व- रूपी अंधकारके उद्यवश (चिरं) अनादि कालसे (कुयोनिषु)नित्य- निगोदादिक कुयोनियोंमें (सुषुताः)सोरहे हैं-अतीव जडता को प्राप्त हो रहे हैं । यदि कदाचित् संज्ञी प्राणियों में उत्पन्न होकर कुछ जागते भी हैं तो (अनात्मीयात्मभूतेषु मम अहम्) अनात्मोयभूत स्त्री पुत्रादिकमें 'ये मेरे हैं' और अनात्मभूत शरीरादिकोंमें 'मैं ही इन रूप हूँ' (इति जाग्रति) ऐसा अध्यवसाय करने लगते हैं। - - [५९ ] समाधितंत्र टीका-चिरमनादिकालं मूढात्मानो बहिरात्मानः सुषुप्ता अतीव जडतां गताः। केपु ? कुयोनिषु नित्यनिगोदादिचतुरशीतिलक्षयोनिष्वधिकरणभूतेषु । कस्मिन् सति ते सुषुप्ताः ? तमसि अनादिमिथ्यात्वसंस्कारे सति । एवम्भू- तास्ते यदि संज्ञिपुत्पद्य कदाचिद्द ववशात् बुध्यन्ते तदा ममाहमिति जाग्रति। केषु ? अनात्मीयात्मभूतेषु-अनात्मीयेषु परमार्थतोऽनात्मीयभूतेषु पुत्रकलत्रा- दिषु ममैते इति जाग्रति अध्यवस्यन्ति । अनात्मभूतेषु शरीरादिषु अहमेवैते इति जाग्रति अध्यवस्यन्ति ॥ ५६ ॥ ततो बहिरात्मस्वरूपं परित्यज्य स्वपरशरीरमित्थं पश्येदित्याह- पश्यनिरंतरं देहमात्मनोऽनात्मचेतसा । अपरात्मधियाऽन्येषामात्मतत्वे व्यवस्थितः ॥५॥ भावार्थ-नित्य निगोदादिक निंद्य पर्यायोंमें यह जीव ज्ञानकी अ- त्यन्त हीनता-वश चिरकाल नक दुख भोगता है । कदाचित् संज्ञी पंचे- न्द्रिय-पर्याय प्राप्त कर कुछ थोड़ा सा ज्ञान लाभ करता भी है तो अनादि- कालीन मिथ्यात्वके संस्कारवश जो आत्मीय नहीं ऐसे स्त्री-पुत्रादिकको ये मेरे हैं ऐसे आत्मीय मानकर और जो आत्मभूत नहीं ऐसे शरीरादिको 'यह मैं ही हूँ ऐसे आत्मभूत मानकर अहंकार ममकारके चक्करमें फंस जाता है और उसके फलस्वरूप राग-द्वेषको बढ़ाता हुश्रा संसार-परि- भ्रमण कर महादुःखित होता है ।। ५६ ॥ अतः बहिरात्म-भावका परित्याग कर अपने तथा परके शरीरको इस रूपमें अवलोकन करे, ऐसा बतलाते हैं- अन्वयार्थ--अन्तरात्माको चाहिये कि (आत्मतत्त्वे) अपने अात्मस्व- रूपमें (व्यवस्थितः) स्थित होकर (प्रात्मनः देह) अपने शरीरको( अनात्म- चेतसा) 'यह शरीर मेरा आत्मा नहीं' ऐसी अनात्मवुद्धिसे (निरन्तरं पश्येत्) सदा देखे-अनुभव करे, और (अन्येषां) दूसरे प्राणियों के शरीरको (अप- रात्मधिया) 'यह शरीर परका आस्मा नहीं ऐसी अनात्मवुद्धिसे (पश्येत्) सदा अवलोकन करे। * 'आत्मतत्त्वव्यवस्थितः' इति पाठान्तरं 'ग' प्रती।
वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला [६] टीका-प्रात्मनो देहमात्मसम्बन्धिशरीरं अनात्मचेतसा ममात्मा न भवतीति बुद्ध्या अन्तरात्मा पश्येत् । निरन्तरं सर्वदा । तथा अन्येषां देहं परेषामात्मा न भवतीति बुद्धया पश्येत् । किं विशिष्टः ? आत्मतत्वे व्यव- वस्थितः आत्मस्वरूपनिष्ठः ।। ५७ ।। नन्वेवमात्मतत्त्वं स्वयमनुभूय मूढात्मानां किमिति न प्रतिपाद्यते येन तेऽपि तज्जानन्त्विति वदन्तं प्रत्याह--- अज्ञापितं न जानन्ति यथा मां ज्ञापितं तथा । मूढात्मानस्ततस्तेषां वृथा मे ज्ञापनश्रमः ॥५८॥ भावार्थ-अन्तरात्माको चाहिये कि पदार्थके स्वरूपको जैसाका तैसा जाने, अन्यमें अन्यका अारोपण न करे। अनादिकालसे प्रात्माकी शरीरके साथ एकत्ववुद्धि हो रही है, उपका मोह दूर होना कठिन जानकराचार्य- महोदय बार बार अनेक युक्तियोंसे उसी बातको समझाकर बतलाते हैं-उनका अभिप्राय यही है कि संयुक्त होने पर भी विवक्षा-भेदसे, पुद्गलको पुद्गल और आत्माको आत्मा समझना चाहिये तथा कर्मकृत औपाधिक भावों को कर्मकृत ही मानना चाहिये-आत्माके निजरूप न समझ लेना चाहिये। प्रात्माका किसी शरीररूप विभाव पर्यायमें स्थिर होना उसकी कर्मोपाधि-जनित अवस्था है-स्वभाव नहीं । शरीरको आत्मा मानना ग्रहको ग्रहवासी अथवा वस्त्रको वस्त्रधारी माननेके समान भ्रम है ॥ ५७ ॥ इस प्रकार अात्मतत्त्वका स्वयं अनुभव करके ज्ञातात्म-पुरुष (स्वानु- भवमग्न अन्तरात्मा) मूढात्माओं (जडवुद्धियोंको) प्रात्मतत्त्व क्यों नहीं बतलाते, जिससे वे भी आत्मस्वरूपके ज्ञायक बनें, ऐसी आशंका करने वालोंके प्रति प्राचार्य कहते हैं- अन्वयार्थ-स्वात्मानुभवमग्न अन्तरात्मा विचारतो है कि (यथा) जैसे (मूढात्मानः) ये मूर्ख अज्ञानी जीव (अज्ञापित) बिना बताये हुए (मां) मेरे प्रास्मस्वरूपको (न जानन्ति) नहीं जानते हैं (तथा) वैसे ही (ज्ञापितं) बतलाये जानेपर भी नहीं जानते हैं । (ततः) इस लिये (तेषां) उन मूढ परुषोंको (मे ज्ञापनश्रमः) मेराघनलानेका परिश्रम (वृथा)व्यर्थ है, निष्फल है।
[६१ ] समाधितंत्र टीका-मूढात्मनो मां अात्मस्वरूपमज्ञापितमप्रतिपादितं यथा न जानन्ति मूढात्मत्वात् । तथा ज्ञापितमपि मां ते मूढात्मत्वादेव न जानन्ति । ततः सर्वथा परिज्ञानाभावात् । तेषां मूढात्मनां सम्बंधित्वेन वृथा मे ज्ञापन- श्रमो विफलो मे प्रतिपादनप्रयासः ।। ५८ ।। किंच- यद् बोधयितुमिच्छामि तन्नाहं यदहं पुनः । ग्राह्य तदपि नान्यस्य तत्किमन्यस्यबोधये ॥५६॥ टीका यत् विकल्पाधिरूढमात्मस्वरूपं देहादिकं वा बोधयितुं ज्ञाप- यितुमिच्छामि । तन्नाहं तत्स्वयं नाहमात्मस्वरूप परमार्थतो भवामि । भावार्थ-जो ज्ञानी जीव अन्नमुखा होते हैं वे बाह्य विषयोंमें अपने चित्तको अधिक नहीं भ्रमाते-उन्हें तो अपने प्रात्साके चिन्तन और मननमें लगे रहना ही अधिक रुचिकर होता है । मूढ़ात्माअोंके साथ श्रा- स्मविषयमें मराज-पच्चो करना उन्हें नहीं भाता । वे इस प्रकार जड़ात्मा ओंके साथ टक्कर मारनेके अपने परिश्रमको व्यर्थ समझते हैं और सम- झते हैं कि इस तरह मूहात्माओंके माथ उलझेरहकर कितने ही ज्ञानीजन अपने आत्महित-साधनसे वंचित रह जाते हैं । श्रात्महित-साधन सर्वोपरि मुख्य है, उसे इधर-उधरके चक्करमें पड़कर भुलाना नहीं चाहिये ॥५॥ और भी वह अन्तरात्मा विचारता है- अन्वयार्थ-(यत्) जिस विकल्पाधिरूढ अात्मस्वरूपको अथवा देहा- दिकको (बोधयितुं) समझाने-बुझानेकी (इच्छामि) मैं इच्छा करता हूं- चेष्टा करता हूँ (तत्) वह (अहं) मैं नहीं हूँ--श्रात्माका वास्तविक स्वरूप नहीं हूँ। (पुनः) और (यत्) जो-ज्ञानानन्दमय स्वयं अनुभव करने योग्य अात्मस्वरूप (अहं) मैं हूँ (तदपि) वह भी (अन्यस्य) दूसरे जीवोंके(ग्राह्य) न) उपदेश द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं है-वह तो स्वसंवेदनके द्वारा अनुभव किया जाता है (तत्) इस लिये(अन्यस्य) दूसरे जीवोंको (किं बोधये) मैं क्या समझाऊँ?
वीरसंवामन्दिर-ग्रन्थमाला यदहं पुनः यत्पुनरहं चिदानन्दात्मकं स्वसंवेद्यमात्मस्वरूपं । तदपि ग्राह्य नान्यस्य स्वसंवेदनेन तदनुभूयते इत्यर्थः । तकिमन्यस्य बोधर्य तत्तस्मार्तिक किमर्थ अन्यस्यात्मस्वरूपं बोधयेहम् ॥५६ || बोधितेऽपि चान्तस्तत्त्वे बहिरात्मनो न तत्रानुगगः सम्भवति । मोहो- दयात्तस्य बहिरर्थ एवानुरागादिति दशयन्नाह- बहिस्तुष्यति मूढात्मा पिहितज्योतिरन्तरे । तुष्यत्यन्तः प्रबुद्धात्मा बहिारत्तकौतुकः ॥६॥ टीका-बहिः शरीराद्यर्थे तुष्यति प्रीतिं करोति । कोऽसौ ? मूढात्मा । कथम्भूतः १ पिहितज्योतिर्मोहाभिभूतज्ञानः । क्व ? अन्तरे अन्तस्तत्व- भावार्थ-तत्त्वज्ञानी अन्तरात्मा अपने उपदेशकी व्यर्थताको सोचता हुआ पुनः विचारता है कि जिस आत्मस्वरूपको शब्दों द्वारा मैं दृनरोंको बतलाना चाहता हूँ वह तो सविकल्प है-आत्माका शुद्ध स्वरूप नहीं है; और जो आत्माका वास्तविक शुद्ध स्वरूप है वह शब्दों द्वारा बतलाया नहीं जा सकता-स्वसंवेदनके द्वारा ही अनुभव एवं ग्रहण किये जाने के योग्य है; तब दृमरोंकी मेरे उपदेश देने से क्या नतीजा १ ॥ ५६ ॥ आत्मतत्त्वके जैसे तैसे समझाये जानेपर भी बहिरात्माका उसमें अनुराग होना संभव नहीं; क्योंकि मोहके उदयसे घाद्य पदार्थों में ही उसका अनुराग होता है, इसी विचारको आगे प्रस्तुत करते हैं- अन्वयार्थ (अन्तरे पिहितज्योतिः) अन्नरझमें जिसकी ज्ञान ज्योति मोहसे आच्छादित होरही है-जिसे स्वरूपका विवेक नहीं ऐसा (मूढ त्मा) पहिरात्मा (बहिः) बाह्यशरीरादि परपदार्थों में ही (तुष्यति) संतुष्ट रहता है-आनन्द मानता है; किन्तु (प्रबुद्धात्मा) मिथ्यात्वके उदयाभावसे प्रबोध- को प्राप्त होगया है प्रास्मा जिसका ऐसा स्वरूपविवेकी अन्तरात्मा (वहिावृत्तकौतुकः) वाह्यशरीरादि पदार्थोंमें अनुरागरहित हुआ (अन्तः) अपने अन्तरंग आत्मस्वरूपमें ही (तुष्यति) संतोष धारण करता है-मग्न रहता है। भावार्थ-भूढात्मा और प्रवुद्धात्माकी प्रवृत्तिमें बड़ा अन्तर होता है। मूढारमा मोहोदयके वश महाअविवेकी हुआ समझाने पर भी नहीं समाधितंत्र [६३ ] विषये । प्रबुद्धात्मा मोहानभिभूतज्ञानः अन्तस्तुष्यति स्वस्वरूपे प्रीतिं करोति। किं विशिष्टः सन् ? बहिावृत्तकौतुकः शरीरादौ निवृत्तानुगगः ।।६०॥ कुतोऽसौ शरीरादिविषये निवृत्तभूषणमण्डनादिकौतुक इत्याह- न जानन्ति शरीराणि सुखदुःखान्यबुद्धयः । निग्रहानुग्रहधियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ॥६१ ॥ टीका-सुखदुःखानि न जानन्ति । कानि शरीराणि जडत्वात् अबुडयो बांहगत्मनः । तथापि यद्यपि न जानन्ति तथापि । अत्रैव शरीरादावेव कुवते । . कां ? निग्रहानुग्रइधियं द्वेषवशादुपवासादिना शरीरादेः कदर्थनाभिप्रायो निग्रह- बुद्धिं रागवशात्कटककटिसूत्रादिना भूषणाभिप्रायोऽनुग्रहबुद्धिम् ॥ ६१ ॥ ममझना और याह्य विषयों में ही संतोष मानना हुआ फंसा रहता है। प्रत्युत इसके, प्रवुद्धात्माको अपने प्रात्मस्वरूपमें लीन रहने में ही आनन्द आता है और इसा से वह वाह्य विषयोंसे अपने इन्द्रिय व्यापारको हटा- कर प्राय: उदासीन रहता है ।। ६० ॥ किम कारण अन्तरात्मा शरीगदिको वस्त्राभूषणादिसे अलंकृत और मंडिन करनेमें उदासीन होता है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-अन्तरात्मा विचारता है—(शरोगणि) ये शरीर (सुग्वदुःखानि न जानन्ति) जड़ होनेसे सुखों तथा दुखोंको नहीं जानते हैं (तथापि) तो भी [2] जो जीव (अत्रैव) इन शरीरों में ही (निग्रहानुग्रहधियं) उपवासादि- द्वारा दंडरूप निग्रहकी और अलंकारादिद्धारा अलंकृत करने रूप अनुग्रह- की बुद्धि (कुर्वते) धारण करते हैं [ते] वेजीव (अबुद्धयः) मूढ़ वुद्धि हैं-बहि- रात्मा हैं। 'भावार्थ-अन्तरात्मा विचारता है कि जब ये शरीर जड़ हैं-इन्हें सुख दुःखका कोई अनुभव नहीं होता और न ये किसीके निग्रह या अनु- ग्रहको ही कुछ समझ सकते हैं तब इनमें निग्राहानुग्रहकी बुद्धि धारण करना मूढ़ता नहीं तो और क्या है ? उसका यह विचार ही उसे शरीरों- को वस्त्राभूषणादिसे अलकृत और मंडित करनेमें उदासीन बनाये रखता वह उनकी अनावश्यक चिन्ताको अपने हृदयमें स्थान ही नहीं देता ॥ ६१ ॥ है .
वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला [ ६४ ] यावच्च शरीगदावात्मबुद्धया प्रवृत्तिस्तावत्संसारः तदभावान्मुक्तिरिति- दर्शयन्नाह- स्ववुद्ध्या यावद्गृहीयात् कायवाक्चेतसां त्रयम् । संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु नितिः ॥ ६२ ॥ टीका-स्वबुद्धया आत्मबुद्धया यावद् गृणहीयात् । किं ? त्रयम् । केषाम् ? कायवाक्चेतसां सम्बन्धमिति पाठः । तत्र कायवाक्चेतसां त्रयं कर्तृ । आत्मनि यावत्सम्बन्धं गृहीयात्स्वीकुर्यादित्यर्थः । तावत्संसारः । एतेषां कायवाक्चेतसां भेदाभ्यास तु अात्मनः सकाशात् कायवाक्वेतांसि भिन्नानीति भेदाभ्यासे भेदभावनायां तु पुननिवृत्तिः मुक्तिः ॥६२।। शरीगदावात्मनोभेदाभ्यासे च शरीरढतादौ नात्मनोहढतादिकं मन्यते शरारादिकमें जबतक आत्मबुद्धिसे प्रवृत्ति रहती है नभी नक संसार है और जब वह प्रवृत्ति मिट जाती है तय मुक्तिको प्राप्ति होजातो है, ऐसा दर्शाते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-यावत्) जबतक (कायवाक्चेतसां त्रयम्)शरीर, वचन और भन इन नीनोंको (स्वबुद्धया) आत्मबुद्धिसे (गृण्हीयात) ग्रहण किया जाना है (तावत्) नव तक (संसारः) संसार है (त) और जब (एतेषां) इन मन-वचन, कायका (भेदाभ्यासे) आत्मासे भिन्न होनेरूप अभ्यास किया जाना है तब (निवृत्तिः) मुक्तिकी प्राप्ति होती है। भावार्थ-जबतक इस जीवको मन-वचन-कायमें प्रात्लवुद्धि बनी रहती है-इन्हें आत्माके हो अंग अथवा अंश ममझा जाता है तबतक यह जीव संसारमें ही परिभ्रमण करता रहता है। किन्तु जब उसकी यह भ्रमवुद्धि मिट जाती है और वह शरीर नथा यचनादिको आत्मासे भिन्न अनुभव करता हुआ अपने उस अभ्यासमें दृढ होजाता है तभी वह संसार वन्धनसे छूटकर मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ ६२॥ शरीरादिक अान्मासे भिन्न हैं उनमें जीव नहीं-ऐमा. भेदज्ञानका अभ्यास दृढ होजाने पर अन्तरात्मा शरीरकी दृढनादिक बनने पर आत्मा- की दृढतादिक नहीं मानता, इस बातको आगेके चार श्लोकोंमें बतलाते हैं।
समाधितंत्र [६५] इति दर्शयन् घनेत्यादि श्लोकचतुष्टयमाह- घने वन्ने यथाऽऽत्मानं न घनं मन्यते तथा । घने स्वदेहेप्यात्मानं न घनं मन्यते बुधः ॥६३॥ टीका-घने निविडावयवे वस्त्रे प्रावृते सति श्रात्मानं घनं दृढावयवं या बुधो न मन्यते । तथा स्वदेहेऽपि घने दृढे प्रात्मानं धनं दृढं बुधो न मन्यते ॥ ६३ ॥ जीणे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न जोणे मन्यते तथा । जोणे स्वदेहेऽप्यात्मानं न जीर्णं मन्यते बुधः ॥६४॥ टीका-जीर्णे पुराणे वस्त्रे प्रावृते यथाऽऽत्मानं बुधो जीर्ण न मन्यते । तथा: जीणे वृद्ध स्वदेहेऽपि स्थितमात्मानं न जीर्णं वृद्धमात्मानं मन्यते बुधः ॥ ६४ ॥ . अन्वयार्थ-(यथा) जिस प्रकार (वस्त्रे घने) गाढ़ा वस्त्र पहन लेनेपर (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (आत्मानं) अपनेका-अपने शरीरको (धन) गाढ़ा अथवा पुष्ट (न मन्यते) नहीं मानता है (तथा) उसी प्रकार (स्वदेहेऽपि घने) अपने शरीरके भी गाढ़ा अथवा पुष्ट होनेपर (बुधः) अन्तरात्मा (प्रात्नानं) अपने जीवात्माको (धनं न मन्यते) पुष्ट नहीं मानता है ।। ६३ ॥ अन्वयार्थ-(यथा) जिस प्रकार (वस्त्रे जीर्णे) पहने हुए वस्त्र के जीर्ण- बोदा-होनेपर (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (आत्मानं) अपनेको-अपने शरीरको (जीर्णं नं मन्यते) जीर्ण नहीं मानना है (तथा) उसी प्रकार (स्वदेहे अपि जीर्णे) अपने शरीरके भी जीर्ण होजानेपर (बुधः) अन्तरास्मा (आत्मान) अपने जीवात्माको (जीर्णं न मन्यते) जीर्ण नहीं मानता है ॥ ६४ ॥ * जिरिंण वस्थि जेम बुहु देहु ण मण्णइ जिण्णु । देहि जिरिंण णाणि तह अप्पुण भएणइ जिएणु ॥२-१७९ ।। -परमात्मप्रकाशे, योगीन्दुदेवः [६६ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला नष्टे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न नष्टं मन्यते तथा । नष्टे स्वदेहेऽप्यात्मानं न नष्टं मन्यते बुधः ॥६५॥ टीका-प्रावृते वस्त्रे नष्ट सति प्रात्मानं यथा नष्ट बुधो न मन्यते तथा स्वदेहे विनष्ट कुतश्चित्कारणाद्विनाशं गते प्रात्मानं न नष्ट मन्यते बुधः ॥ ६५ ॥ * रक्त वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न रक्तं मन्यते तथा । रक्त स्वदेहेऽप्यात्मानं न रक्त मन्यते बुधः ॥६६॥ टीका-रक्त वस्त्रे प्रावृते सति प्रात्मानं यथा बुधो न रक्तं मन्यते तथा स्वदेहेऽपि कुसुमादिना रक्त प्रात्मानं रक्तं न मन्यते बुधः ॥ ६६ ।। अन्वयार्थ- (यथा) जिस तरह (वस्त्रे नष्ट) कपड़ेके नष्ट होजानेपर (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (प्रात्मानं) अपने शरीरको (नष्ट न मन्यते) नष्ट हुआ नहीं मानता है (तथा) उसी तरह (बुधः) अन्तरात्मा (स्वदेहे अपि नष्ट) अपने शरीरके भी नष्ट होजानेपर (प्रात्मानं) अपने जीवात्माको (नष्ट न मन्यते) नष्टं हुआ नहीं मानता है ॥ ६५ ॥ अन्वयार्थ (यथा) जिस प्रकार (वस्त्रे रक्त) पहना हुआ वस्त्र लाल होनेपर (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (प्रात्मानं) अपने शनीरको (रक्तं न मन्यते) लाल नहीं मानता है (तथा) उसी तरह (स्वदेहे अपि रक्त) अपने शरीरके भी लाल होनेपर (बुधः) अन्तरात्मा (आत्मानं) अपने जीवात्माको (रक्तन मन्यते) लाल नहीं मानता है ॥ ६६ ॥ भावार्थ-शरीरके साथ वस्त्रकी जैसी स्थिति है वैसी ही स्थिति स्वत्थु पणटुइ जेम वुहु देहु ण मण्णइ णछु । गटे देहे णाणि तह अप्पु ण मण्णइ णठु॥२-१८० -परमात्मप्रकाशे, योगीन्दुदेवः करतें वत्ये जेम बुहु देहु ण मण्णइ रत्तु । देहे रत्तिं णाणि तहँ अप्पुण मरणइ रत्त ।। २-१७८ ।। -परमात्मप्रकाशे, योगीन्दुदेवः समाधितंत्र [६७] एवं शरीरादिभिन्नमात्मानं भावयतोऽन्तरात्मनः शरीरादेः काष्ठादिना तुल्यताप्रतिभासे मुक्तियोग्यता भवतीति दर्शयन्नाह- यस्य सस्पन्दमाभाति निःस्पन्देन समं जगत् । अप्रज्ञमक्रियाभोगं स शमं याति नेतरः ॥६॥ नष्ट- आत्माके साथ शररीरकी है । पहने जाने वाले पत्रके सुदृढ-पुष्ट, जीर्ण- शीर्ण, नष्ट भ्रष्ट अथवा लाल आदि किसी रंगका होनेके कारण जिस प्रकार कोई भी समझदार मनुष्य अपने शरीरको सुदृढ-पुष्ट, जीर्ण-शीर्ण, भ्रष्ट अथवा लाल आदि रंगका नही मानता है, उसा प्रकार शरीरके सुदृढ- पुष्ट, जीर्ण-शीर्ण, नष्ट-भ्रष्ट या लाल आदि रंगका होनेपर कोई भी ज्ञानी मनुष्य अपने आत्माको सुदृह-पुष्ट, जीर्ण-शीर्ण, नष्ट-भ्रष्ट या लाल आदि रंगका नहीं मानता है। विवेकी अन्तरात्माकी प्रवृत्ति शरीरके साथ वस्त्र- जैसी होती है, इमोसे एक वस्त्रको उतारकर दूमरा वस्त्र पहनने वालेकी तरह उसे मृत्युके समय कोई विषादयारंज भी नहीं होता ॥६३-६४-६५-६६॥ इस प्रकार शरीरादिकसे भिन्नं पास्माकी भावना करनेवाले अन्त- रात्माको जब ये शरीरादिक काष्ठ-पाषाणादिके बण्ड-समान प्रतिभासिन होने लगते हैं उनमें चेतनाका अश भी उसकी प्रतीतिका विषय नहीं रहता-नंब उसको मुक्तिकी योग्यता प्रास होती है। इसी बातको आगे दिखलाते हैं- अन्वयार्थ-(यस्य) जिस ज्ञानी जीवको (सस्पन्दं जगत) अनेक क्रियाएँ- चेष्टाएँ करता हुआ शरीरादिरूप यह जगत ( निःस्पन्देन समं) निश्चेष्ट काष्ठ पाषाणादिके समान (अप्रज्ञ) चेतना रहित जड और (प्रक्रियाभोगं) क्रिया तथा सुखादि-अनुभवरूप भोगसे रहित (प्राभाति) मालूम होने लगता है (स:) वह पुरुष (अक्रियाभोगं शमं याति) परमवीतरागतामय उस शान्तिसुखका अनुभव करता है जिममें मन-वचन-कायका व्यापार नहीं और न इन्द्रिय-द्वारोंसे विषयका भोग ही किया जाता है (इतरः न)उससे विलक्षण दूसरा चहिरास्मा जीव उस शान्ति सुखको प्राप्त नहीं कर सकता है।
. [८] वीरसवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यस्यात्मनः सस्पन्दं परिस्पन्दसपन्वितं शरीरादिरूपं जगत् आभाति प्रतिभासते । कथम्भूतं ? नि:स्सन्देन समं निःस्पन्दन काष्ठपाषाणा- दिना समं तुल्यं । कुतः तेन तत्समं १ अप्रज्ञं जडमचेतनं यतः । तथा अक्रियाभोग.क्रियापदार्थपरिस्थितिः भोगः सुखाद्यनुभवः तौ न विद्यते यत्र। यस्यैवं सत्प्रतिभासते स किं करोति १ स शमं..याति शमं परमवीतरागतां संसारभोगदेहोपरि वा वैराग्यं गच्छति.। कथम्भूतं शमं ? प्रक्रियाभोगमित्ये- तत्रापि सम्बंधनीयम् । क्रिया वाक्कायमनोव्यापारः। भोग इन्द्रियप्रणालि- कया विषयानुभवनं विषयोत्सवः । तौ न विद्यते यत्र तमित्थंम्भूतं शमं स याति । नेतरः तद्विलक्षणा बहिरात्मा ।। ६७ ।। सोप्येवं शरीरादिभिन्नमात्मानं किमिति न प्रतिपद्यत इत्याह- शरीरकंचुकेनात्मा संरतज्ञानविग्रहः । नात्मानं बुध्यते तस्माद्ममत्यतिचिरं भवे ॥६८ ॥ टीका-शरीरमेव कंचुकं तेन संवृतः सम्यक् प्रच्छादितो ज्ञानमेव भावार्थ-जिस समय अन्तरात्मा अात्मस्वरूपका चिन्तन करते-करते अपने में ऐसा स्थिर हो जाना है कि उसे यह क्रियात्मक संसार भो लकड़ी पन्थर आदिकी तरह स्थिर नथा चेप्रारहित सा जान पड़ता है-उसकी क्रियाओं चेष्टाओंका उमपर कोई असर नहीं होना-तभी वह वीतराग- भावको प्राप्त होता हुआ शान्ति सुबका अनुभव करता है । दूसरा बहि- रामा जीव उस शान्ति सुखका अधिकारी नहीं है ।। ६७ ॥ अब बहिरात्मा भी इसी प्रकार शरीरादिसे भिन्न आत्माको क्या जानना नहीं ? इसीको बतलाते हैं- अन्वयाथ-(शरीरकंचुकेन) कार्माणशरीररूपी कांचलीसे (संवृतज्ञान-. विग्रहः अात्मा) ढका हुआ है ज्ञानरूपी शरोर जिसका ऐसा बहिरास्मा (आत्मानं) आत्माके यथार्थ स्वरूपको (न बुध्यते) नहीं जानता है (तस्मात्) उसी अज्ञानके कारण (अतिचिर) बहुत काल तक (भवे) संसारमें (भ्रमति) भ्रमण करता है। ..
समाधितंत्र
[६९ ]
विग्रहः स्वरूपं यस्य । शरीरसामान्योपादानेऽप्यन्त्र कार्मणशरीरमेव गृह्यते।
तस्यैव मुख्यवृत्त्या तदावरकत्वोपपत्तेः। इत्थंभूतो बहिरात्मा नात्मानं बुध्यते ।
तस्मादात्मस्वरूपानववोधात् अतिचिरं बहुतरकालं भवे संसारे भ्रमति ।६८
यद्यात्मनः स्वरूपमात्मत्वेन बहिरात्मानोन बुद्धयन्ते तदा किमात्मत्वेन
ते बुद्धयन्ते इत्याह-
प्रविशद्गलतां व्यूहे देहेऽणूनां समाकृतौ ।
स्थितिभ्रान्त्या प्रपद्यन्ते तमात्मानमबुद्धयः ॥ ६६ ॥
भावार्थ---इस श्लोकमें 'कंचुक' शब्द उस अावरणका द्योतक है जो
शरीरका यथार्थ बोध नहीं होने देता; सर्पके शरीर ऊपरकी कांचलो जिस
प्रकार सर्पके रंग रूपादिका ठीक वोध नहीं होने देता उसी प्रकार आत्मा-
का ज्ञामशरीर जब दर्शन मोहनायके उदयादिरूप कार्माण वर्गणाओंसे
आच्छादिन होजाता है तब श्रात्मा वास्तविक रूपका बोध नहीं होने
पाता और इस अज्ञानताके कारण रागादिकका जन्म होकर चिरकाल
तक संसारमें परिभ्रमण करना पड़ता है।
यहांपर इतना और भी जान लेना चाहिये कि कांचलीका दृष्टान्त
एक स्थूल दृष्टान्त है । कांवली जिस प्रकार सर्पशरीरके ऊपरी भागपर
रहनी है उस प्रकारका सम्बन्ध कार्माण-शरीरका श्रास्माके साथ नहीं है।
संसारी आत्मा और कार्माण-शरीरका ऐसा सम्बन्ध है जैसे पानीमें
नमक मिल जाता है अथवा कस्था और चूना मिला देनेसे जैसे उनकी
लाल परिणति होजाती है। कर्मपरमाणुओं का आत्मप्रदेशोंके साथ एक
क्षेत्रावगाहरूप सम्बन्ध होना है, इसी कारण दोनोंके गुण विकृत रहते
हैं तथा दर्शनमोहनीय करके उदयसे बहिरात्मा जीव श्रात्मस्वरूपको
समझाये जाने पर भी नहीं समझता। यदि समझना भी है तो भी
अन्यथा ही समझता है-श्रास्माके वास्तविक चिदानंदस्वरूपका अनु-
भव उसे नहीं होता। इसी मिथ्यास्व एवं अज्ञानभावके कारण यह जीव
अनादिकालसे संसारचक्रमें भ्रमण करता रहा है और उस वक्त तक
बराबर भ्रमण करता रहेगा जब तक उसका यह अज्ञानभाव नहीं
मिटेगा ॥ ६८॥
।
[७]
वीरसेवामन्दिर-ग्रन्यनाला
टीका-तं देहमात्मानं प्रपद्यन्ते । के ते ? अबुद्धयो बहिरात्मानः ।
क्या कृत्वा ? स्थितिभ्रान्त्या ! क ? देहे ! कथम्भृते देहे ? व्यूहे समूहै। केषां :
अणूनां परमाणूनां । किं विशिष्टानां ? प्रविशद्गलतां अनुप्रविशतां निर्गच्छता
च । पुनरपि कथम्भृते : समाकृतो समानाकारे सदृशा परापगेत्सादेन ।
श्रात्मना सहकनेत्रे समानावगाहेन वा । इत्थम्भूते देहे या स्थितिभ्रान्तिः
स्थित्या कालान्तरावस्थायित्वेन एकक्षेत्रावस्थानेन वा भ्रान्तिदेहात्मनोरभेदा-
ध्यवसायस्तया ।। ६६ ।।
ततो यथावदात्मस्वरूपप्रतिपत्तिमिच्छन्नात्मानं देहाभिन्नं भावये-
दित्याह-
यदि वहिरान्मा जीवान्नाके यथार्थ स्वरूपको नहीं पहिचानते हैं,
तो फिर वे किसको भान्मा जानते हैं ? इमो बातको आगे बतलाते हैं-
अन्वयार्थ-(अबुद्धयः) अज्ञानी बहिरामाजोव (प्रविशदगलतां अणूनां
व्यूह देहे) ऐसे परमाणुओंके समूहरूप शरीरमें जो प्रवेश करते रहते हैं
और बाहर निकलते रहते हैं (समाकृतो) शरोरकी प्राकृतिके समानरूपमें
बने रहने पर (स्थितिभ्रांत्यः) कालांतर-स्थायित्व तथा एक क्षेत्रमें स्थिति
होनेके कारण शरीर और आत्माको एक समझने रूप जो भ्रान्ति होती है
उससे (तम्) उस शरीरको हो (आत्मान) आत्मा (प्रपद्यन्ते) समझ लेते हैं।
भावार्थ-यद्यपि शरीर ऐसे पुद्गल परमाणुओंका बना हुआ है जो
सदा स्थिर नहीं रहते-समय समयपर अगणित परमाणु शरीरसे बाहर
निकल जाते हैं और नये नये परमाणु शरीरके भीतर प्रवेश करते हैं, फिर
भी चूंकि आत्मा और शरीरका एक क्षेत्रावगाह सम्बंध है और पर-
माणुओंके इम निकलजाने नथा प्रवेश पानेपर शरीरकी वाहच आकृनिमें
कोई विशेष भेद नहीं पड़ना-वह प्रायः ज्योंकी त्यों ही बनी रहती है
इससे मृडान्माओंको यह भ्रम होजाना है कि यह शरीर.ही मैं हूँ-मेरा
आत्मा है । उसी भ्रमके कारण मृढ बहिरास्मां प्राणी शरीरको ही अपना
रूप (प्रात्मस्वरूप) समझने लगते हैं। अभ्यन्तर आत्मतत्त्व तक उनकी
दृष्टि ही नहीं पहुँचती ॥ ६६ ॥
समाधितंत्र [७१ ] गौरः स्थूलः कृशो वाऽहमित्यङ्गनाविशेषयन् । आत्मानं धारयेन्नित्यं केवलज्ञप्तिविग्रहम् ॥७॥ टीका-गौरोऽहं स्थूलोऽह कृशोऽहमित्यनेन प्रकारेणाङ्गन विशेषणेन अविशेषयन् विशिष्ट अकुर्वन्नात्मानं धारयेत् चित्तेऽविचलं भावयेत् नित्यं सर्वदा । कथम्भृतं ? केवलज्ञप्तिविग्रहं केवलज्ञानस्वरूपं । अथवा केवला रूपादिरहिता ज्ञप्तिरेवोपयोग एवं विग्रहः स्वरूपं यस्य ।। ७० ॥ यश्चैवं विधमात्मानमेकाग्रमनसा भावयेत्तस्यैव मुक्तिर्नान्यस्येत्याह- मुक्तिरेकान्तिकी तस्य चित्त यस्याचला धृतिः। तस्य नैकान्तिकी मुक्तिर्यस्य नास्त्यचला धृतिः॥७१॥ ऐसी हालतमें प्रात्माका यथार्थ स्वरूप जानने की इच्छा रखने वालोंको चाहिये कि वह शरीरसे भिन्न आत्माकी भावना करें, ऐसा दर्शाते हैं-- अन्वयार्थ-(अहं) मैं (गौरः) गोरा हूँ (स्थूलः) मोटा हूँ (वा कृशः) अथवा दुबला हूँ (इति) इस प्रकार (अंगेन) शरीरके साथ (आत्मानं) अपने को (अविशेषयन्) एकरूप न करते हुए (नित्यं) सदा ही (प्रात्मान) अपने आत्माको (केवलज्ञप्तिविग्रहम्) केवलज्ञानस्वरूप अथवा रूपादिरहित उपयोगशरीरी (धारयेत्) अपने चित्तमें धारण करे ॥ ७० ॥ भावार्थ-गोरापन, कालापन, मोटापन, दुबलापन आदि अवस्थाएं पुद्गलकी हैं-पुद्गलसे भिन्न इनका अस्तित्व नहीं है । आत्मा इन शरीरके धर्मोंसे भिन्न एक ज्ञायकस्वरूप है । अतः आत्मपरिज्ञानके इच्छुकोंको चाहिये कि वे अपने प्रात्माको इन पुद्गलपर्यायोंके साथ एकमेक (अभेदरूप) न करें, बल्कि इन्हें अपना रूप न मानते हुए अपनेको रूपादिरहित केवल- ज्ञानस्वरूप समझे। इसीका नाम भेदविज्ञान है ॥ ७० ॥ जो इस.प्रकार आत्माकी एकाग्रचित्तसे भावना करता है उसीको मुक्तिकी प्राप्ति होती है अन्यको नहीं, ऐसा दिखाते हैं- * हउँ गोरउ हउँ सामलउहउँजि विभिएणउ वण्णु । हउँ तणु-अंगउं थूलु हउँ एहउँ मुढउ मण्णु ।। ८० ॥ - परमात्म प्रकाशे, योगीन्दुदेवः [७२] वीरसंवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-एकान्तिकी अवश्यम्भाविनी तस्यान्तरात्मनो मुक्तिः । यस्य चित्ते अविचला धृतिः अात्मस्वरूपधारणं स्वरूपविषया प्रसत्तिर्वा । यस्य तु चित्ते नास्त्यचला धृतिस्तस्य नैकान्तिकी मुक्तिः ।। ७१ ।। चित्तेऽचलाधृतिश्च लोकसंसर्ग परित्यज्यात्मस्वरूपस्य संवेदनानुभवे सति स्यान्नान्यथेति दर्शयन्नाह- जनेभ्यो वाक् ततः स्पन्दो मनसश्चित्तविभ्रमाः । भवन्ति तस्मात्संसर्ग जनैोगी ततस्त्यजेत् ॥७२॥ अन्वयार्थ (यस्य) जिस पुरुषके (चित्ते) चित्तमें ( अचला ) आत्म- स्वरूपकी निश्चल (धृतिः) धारणा है (तस्य) उनकी ,(एकान्तिकी मुक्तिः ) नियमसे मुक्ति होती है। (यस्य) जिस पुरुषकी (अचलाधृतिः नास्ति) आत्मस्वरूपमें निश्चल धारणा नहीं है (तस्य) उनकी (एकान्तिकी मुक्तिः न) अवश्यम्भाविनी मुक्ति नहीं होती है ।। ७१ ।। भावार्थ-जच यह जीव आत्मस्वरूपमें डांवाडोल न रह कर स्थिर हो जाता है तभी मुक्तिको प्रात कर सकता है। आत्मस्वरूपमें स्थिरताके विना मुक्तिकी प्राप्ति होना असंभव है ॥ ७१ ।। चित्तकी निश्चलना तभी हो मकेगी जब- लोक-संसर्गका परित्याग कर आत्मस्वरूपका संवेदन एवं अनुभव किया जावेगा-अन्यथा नहीं हो सकेगो, इसी वातको आगे प्रकट करते हैं- अन्वयार्थ-(जनेभ्यो ) लोगोंके संसर्गसे (बाक्) वचनकी प्रवृत्ति होनी है (ततः) वचनको प्रवृत्तिसे (मनसः स्पन्दः) मनकी व्यग्रता होती है-चित्त चलायमान होता है (तस्मात्) चित्तको चंचलनासे (चित्तवि- भ्रमाः भवन्ति) चित्तमें नाना प्रकारके विकल्प उठने लगते हैं-मन तुभित होजाता है (ततः) इसलिये (योगी) योगमें संलग्न होनेवाले अ- न्तरात्मा साधुको चाहिये कि वह् (जनैः संसर्ग त्यजेत् ) लौकिक जनोंके संगर्गका परित्याग करे-खासकर ऐसे स्थानपर योगाभ्यास करने न बैठे जहां पर कुछ लौकिक जन जमा हों अथवा उनका आवागमन बना रहता हो।
समाधितंत्र [७३ ] तहि तैः संसर्ग परित्यज्याटव्यां निवासः कर्तव्य इत्याशंका निराकुर्वन्नाह- ग्रामोऽरण्यमिति द्वेधा निवासोऽनात्मदर्शिनाम् । दृष्टात्मनां निवासस्तु विविक्तात्मैव निश्चलः॥७३ ।। टीका-ग्रामोऽरण्यमित्येवं वेधा निवासस्थान अनात्मदर्शिनामलब्धा- स्मस्वरूपोपलम्भानां दृष्टांत्मनामुपलब्धात्मस्वरूपाणां निवासस्तु विमुक्तात्मैव रागादिरहितो विशुद्धात्मैव निश्चलः चित्तव्याकुलतारहितः ।। ७३ ।। भावार्थ-आत्मस्वरूपमें स्थिरताके इच्छुक मुमुक्षु पुरुषोंको चाहिये किं वे लौकिक जनोंके संसर्गसे अपनेको प्रायः अलग रक्खें; क्योंकि लो- किक जन जहां जमा होते हैं वहां वे परस्परमें कुछन-कुछ बात-चीत किया करते हैं, बोलते हैं और शोर तक मचाते हैं। उनकी इस वचनप्रवृत्तिके श्रवणसे चित्त चलायमान होता है और उसमें नाना प्रकारके सकल्प- विकल्प उठने लगते हैं, जो अात्मस्वरूपकी स्थिरताके वाधक होते हैं- आत्माको अपना अन्तिम ध्येय सिद्ध करने नहीं देते ॥७२॥ तब क्या मनुष्योंका संसर्ग छोड़कर जंगलमें निवास करना चाहिये इस शंकाका निराकरण करते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(अनात्मदर्शिनां) जिन्हें आत्माकी उपलब्धि-उसका दर्शन अथवा अनुभव नहीं हुआ ऐसे लोगोंके लिये (ग्रामः अरण्यम्) यह गांव है यह जंगल है (इति द्वेधा निवास:) इसप्रकार दो तरहके निवासकी कल्पना होती है (तु) किन्तु (दृष्टात्मनां) जिन्हें आत्मस्वरूपका अनुभव होगया है ऐसे ज्ञानी पुरुषोंके लिये (विविक्तः) रागादिरहित-विशुद्ध एवं(निश्चलः) चित्तकी व्याकुलतारहित स्वरूपमें स्थिर (प्रात्मा एच) अामा हो (निवासः) रहनेका स्थान है। भावार्थ-जो लोग आत्मानुभवसे शून्य होते हैं उन्हींका निवास- स्थान गांव तथा जंगलमें होता है कोई गांवको अपनाता है तो दूसरा जंगलसे प्रेम रखता है। गांव और जंगल दोनों ही बाह्य एवं परवस्तुएँ हैं। मात्र जंगलका निवास किसीको आत्मदर्शी नहीं बना देता। प्रत्युत इसके, [७४ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला अनात्मदर्शिनो दृष्टात्मनश्च फलं दर्शयन्नाह- देहान्तरगतेर्बीजं देहेऽरिमन्नात्मभावना ।। बोजं विदेहनिष्पत्तरात्मन्येवात्मभावना ॥ ७४ ॥ टीका देहान्तरे भवान्तरे गतिर्गमनं तस्य बीजं कारणं किं ? अात्मभावना । क ? देहेऽस्मिन् अस्मिन् कर्मवशाद्गृहीते देहे । विदेहनिष्पत्तेः विदेहस्य सर्वथादेहत्यागस्य निष्पत्तेर्मुक्तिप्राप्तेर्बीजं स्वात्मन्येवात्मभावना ।७४) जो आत्मदर्शीहोते हैं उनका निवासस्थान वास्तवमें वह शुद्धात्मा होता है जो वीतरागताके कारण चित्तकी व्याकुलताको अपने पास फटकने नहीं देता और इस लिये उन्हें न तो ग्रामवाससे प्रेम होता है और न वनके निवाससे हो-वे दोनोंको ही अपने प्रान्मस्वरूपसे बहिर्भूत समझते हैं और इसलिये किसी में भी आसक्तिका रखना अथवा उसे अपना (प्रारमाका) निवासस्थान मानना उन्हें इष्ट नहीं होता । वे तो शुद्धात्मस्वरूपको हो अपनी विहारभूमि बनाते हैं और उसीमें सदा रमे रहते हैं। ग्रामका निवास उन्हें आत्मदर्शीसे अनात्मदर्शी नहीं घना सकता ॥ ७३ ॥ अनात्मदर्शी और आत्मदर्शी होनेका फल क्या है, उसे दिखाते हैं- अन्वयार्थ-(अस्मिन् देहे) कर्मोदयवश ग्रहण किये हुए इस शरीरमें (आत्मभावना) आत्माकी जो भावना है-शरीरको ही आत्मा माननाहै- वहीं ( देहान्तरगतेः ) अन्य शरीर ग्रहणरूप भवान्तरप्राप्तिका (बीजं) कारण है और (अात्मनि एव) अपनी आत्मामें ही (आत्मभावना) आत्मा- की जो भावना है-आत्माको ही आत्मा मानना है-वह (विदेहनिष्पत्तेः) शरोरके सर्वथा त्यागरूप मुक्तिका (बीज) कारण है। भावार्थ-जो जीव कर्मोदयजन्य इस जड़ शरीरको ही आत्मा समझता है और इसीसे देहभोगोंमें आसक्त रहता है, वह चिरकाल तक नये नये शरीर धारण करता हुआ संसारपरिभ्रमण करता है और इस तरह अनन्त कष्टोंको भोगता है। प्रत्युत इसके, आत्माके निजस्वरूपमें ही जिसकी आत्मत्वकी भावना है वह जीव शीघ्र ही कर्मबन्धनसे छूट- समाधितंत्र [२] तर्हि मुक्तिप्राप्तिहेतुः कश्चिद्गुरूभविष्यतीति वदन्तं प्रत्याह- नयत्यात्मानमात्मैव जन्म निर्वाणमेव च । गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थतः ॥७॥ टीका-जन्म संसारं नयति प्रापयति । कं ? अात्मानं । कोऽसौ ? श्रात्मैव देहादौ दृढात्मभावनावशात् । निर्वाणमेव च श्रात्मानमात्मैव नयति स्वात्मन्येवात्मबुद्धिप्रकर्षसझावात् । यत एवं तस्मात् परमार्थतो गुरुरात्मात्मनः। नान्यो गुरुरस्ति परमार्थतः । व्यवहारेण तु यदि भवति तदा भवतु ।। ७५ ।। कर मुक्तिको प्राप्त हो जाता है और सदाके लिये अपने निराबाध सुख- स्वरूपमें मग्न रहता है । ७४ ॥ यदि ऐसा है, तब मुक्तिको प्राप्त कराने के लिये हेतुभूत कोई दूसरा गुरु तो होगा ? ऐसी आशंका करने वालेके प्रति कहते हैं- अन्वयार्थ-(भात्मा एव ) आत्मा हो (श्रात्मानं) आत्माको (जन्म नयति) देहादिकमें दृढात्मभावनाके कारण जन्म-मरणरूप संसारमें भ्रमण कराता है (च) और (निर्वाणिमेव नयति) प्रात्नामें ही आत्मवुद्धिके प्रकर्ष- वश मोक्ष प्राप्त कराता है ( तस्मात् ) इस लिये (परमार्थतः) निश्चयसे (श्रात्मनः गुरु:) आत्माका गुरु (आत्मा एव) आत्मा ही है (अन्यः न अस्ति दूसरा कोई गुरु नहीं है। भावार्थ-हितोपदेशक सद्गुरुत्रोंका हितकर उपदेश सुनकर भी जब तक यह जीव अपने अात्माको नहीं पहचानता और अंतरंग रागा- दिक शत्रुओं एवं कषाय-परिणति पर विजय प्राप्त कर स्वयं अपने उद्धारका यत्न नहीं करता तब तक बराबर संसाररूपी कीचड़में ही फँसा रहता और जन्ममरणादिके असह्य कष्टोंको भोगता रहता है । परन्तु जब इस जीवकी भवस्थिति सन्निकट आती है, दर्शनमोहका उपशम-क्षयोपशम होता है, उस समय सद्गुरुओंके उपदेशके बिना भी यह जीव अपने प्रास्मस्वरूपको पहचान लेता है और रागद्वेषादिरूप कषायभाव एवं विभावपरिणतिको स्याग करके स्वयं कर्मवन्धनसे छूट जाता है। इसलिये पारमार्थिकदृष्टिसे तो खुद श्रात्मा ही अपना गुरु है-दूसरा नहीं ॥ ७५ ॥ * 'वा' इति पाठान्तरं 'ग' पुस्तके । है - [७६] वीरसवामन्दिर-ग्रन्थमाला देहे स्वबुद्धिर्मरणोपनिपाते किं करोतीत्याह- दृढात्मबुद्धिर्देहादावुत्पश्यन्नाशमात्मनः । मित्रादिभिर्वियोगं च बिभेति मरणाभृशम् ॥७६॥ टीका—देहादौ दृढात्मबुद्धिरविचलात्मदृष्टिर्बहिरात्मा । उत्पश्यनव- लोकयन् । आत्मनो नाशं मरणं मित्रादिभिर्वियोगं च मम भवति इति बुद्धयमानो मरणादबिभेति मृशमत्यर्थम् ।। ७६ ।। यस्तु स्वात्मन्येवात्मबुद्धिः स मरणोपनिपाते किं करोतीत्याह- आत्मन्येवात्मधीरन्यां शरीरगतिमात्मनः । मन्यते निर्भयं त्यक्त्वा वस्त्रं वस्त्रांतरग्रहम् ॥७७॥ शरीरमें आत्मवुद्धि रखनेवाला बहिरास्मा मरणके संनिकट आनेपर क्या करता है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-देहादी दृढात्मबुद्धिः) शरीरादिकमें जिसकी आत्मबुद्धि दृढ होरही है ऐसा बहिरात्मा (आत्मनः नाशम) शरीरके छूटनेरूप अपने मरण (च) और (मित्रादिभिः वियोगं) मित्रादि-सम्बन्धियोंके वियोगको (उत्पश्यन्) देखता हुआ (मरणात्) मरनेमे (भृशम्) अत्यंत ( बिभेति) डरता है। भावार्थ-फटे पुराने कपडेको उतार कर नवीन बस्न पहननेमें जिस प्रकार कोई दुःख नहीं होता, उसो प्रकार एक शरीरको छोड़ कर दूसरा नया शरोर धारण करनेमें कोई कष्ट न होना चाहिये । परन्तु यह अज्ञानी जीव मोहके तीव्रउदयवश जब शरीरको ही आस्ना समझ लेता है और शरीरसम्बन्धी स्त्री-पुत्र-मित्रादि परपदार्थोंको आत्मीय मान लेता है तब मरणके समुपस्थित होनेपर उसे अपना (अपने प्रान्माका) नाश और आत्मीय जनोंका वियोग दोख पड़ता है और इसलिये वह मरनेसे बहुत ही डरता है ॥ ७६ ॥ जिसकी आत्मस्वरूपमें ही आत्मवुद्धि है ऐसा अन्तरात्मा मरणके समुपस्थित होनेपर क्या करता है उसे बतलाते हैं- समाधितंत्र [७७ ] टीका-आत्मन्येवात्मस्वरूप एव प्रात्मधीः अन्तरात्मा शरीरगति शरीरविनाशं. शरीरपरिणति वा बालाद्यवस्थारूपां आत्मनो अन्यां भिन्नां निर्भयं. यथा भवत्येवं मन्यते । शरीगत्पादविनाशौ आत्मनो विनाशात्पादौ (उत्पादविनाशौ इति साधुः) न मन्यत इत्यर्थः । वस्त्र त्यक्त्वा वस्त्रान्तर- ग्रहणमिव ।। ७७ ॥ एवं च स एवं बुध्यते यो व्यवहारेऽनादग्परः यस्तु तत्रादग्परः स न बुध्यत इत्याह- *व्यवहारे सुषुप्तो यः स यः स जागात्मगोचरे । जागर्ति व्यवहारेऽस्मिन् मुषुप्ताश्चात्मगोचरे ॥७॥ अन्वयार्थ-(श्रात्मनिः एव प्रात्मधीः) अान्मस्वरूपमें ही जिसकी दृढ आत्मबुद्धि है ऐसा अन्तरात्मा (शरीग्गति ) शरोरके विनाशका अथवा याल-युवा अादिरूप उसकी परिणतिको (प्रात्मनः अन्यां) अपने श्रात्मासे भिन्न ( मन्यते ) मानता है-शरोरके उत्पाद विनाशमें अपने अामाका उत्पाद-विनाश नहीं मानता-और इस तरह मरणके अवसरपर (वस्त्रं त्यक्त्वा वस्त्रान्तरग्रहम् इव) एक वस्त्रको छोड़कर दूसरा वला ग्रहण करने की तरह (निर्भयं मन्यते) निर्भय रहता है ॥ ७७ ॥ भावार्थ-अन्तरात्मा स्वपरके भेदका यथार्थ ज्ञाता होता है, अतएव पुद्गलके विविध परिणामोंसे खेद खिन्न नहीं होता। शरीरादि पुद्गलमय द्रव्योंको वह अपने नहीं समझता। इमी लिये शरीररूपी झोंपड़ोका विनाश समुपस्थित होनेपर भी उसे अाकुलता नहीं सनाती । वह तो निर्भय हुआ अपने आत्मस्वरूपमें मग्न रहता है और शरीरके न्याग- ग्रहणको वस्त्रके त्याग ग्रहणके समान समझना है ।। ७७ ।। इस प्रकार वही आत्मबोधको प्राप्त होता है जो व्यवहारमें अनादर- वान् है-अनासक्त है और जो व्यवहारमें श्रादरवान् है-श्रामक्त है- वह आत्मबोधको प्राप्त नहीं होता। * जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकजम्मि । जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणे कजे ॥ ३१ ॥ -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः ।
[७८ ] वीरसंवामन्दिर-अन्यमाला टीका-व्यवहारे विकल्पाभिधानलक्षणे प्रवृत्तिनिवृत्यादिस्वरूपे वा सुपुप्ताऽप्रयत्नपगे यः स जागात्मगाचरे प्रात्मविषये संवेदनाद्यतो भवति । यस्तु व्यवहारेऽस्मिन्नुक्तप्रकारे जागति स सुपुप्तः प्रात्मगोचरे ।। ७८ ।। यश्वात्मगोचरे जागति स मुक्तिं प्राप्नोतीत्याह- आत्मानमन्तरे दृष्ट्वा दृष्ट्वा देहादिकं वहिः । तयोरन्तरविज्ञानादाभ्यासादच्युतो भवेत् ॥ ७९ ॥ टीका-प्रात्मानमन्तरेऽभ्यन्तरे दृष्ट्वा देहादिकं बहिष्वा तयोगत्मदेह- अन्वयार्थ (यः) जो कोई (व्यवहारे) प्रवृत्ति-निवृत्त्यादिरूप लांक- व्यवहारने (सुषुप्तः), सोना है-अनासक्त एवं अप्रयत्नशील रहता है (स:) वह (अात्मगोचरे) अात्माके विषय में (जागति) जागता है-आत्मानुभवमें तत्पर रहना है (च) और जो (अस्मिन् व्यवहारे) इन लोकव्यवहारमें (जागति) जागता है-उसको साधनामें तत्पर रहता है वह (आत्मगोचरे) आमाके विषयमें (सुषुप्तः) सोना है--आत्मानुभवका कोई प्रयत्न नहीं करता है। भावार्थ-जिस प्रकार एक म्यानमें दो तलवारें नहीं रह सकती उसी प्रकार प्रा-मामें एक साथ दो विरुद्ध परिणतियां भी नहीं रह सकती। आत्मासक्ति और लोकव्यवहाराक्ति ये दो विरुद्ध परिणतियां हैं । जो आत्मानुभवनमें आसक्त हुआ अत्माके आराधनमें तत्पर होता है वह लौकिक व्यवहारोंसे प्रायः उदासीन रहना है उनमें अपने आत्माको नहीं फंसाता । और जो लोकव्यवहारों में अपने आत्माको फंसाए रखता है-उन्हींमें सदा दत्तावधान रहना है-वह आत्माके विषयमें बिल्कुल बेखबर रहता है-उसे अपने शुद्धस्वरूपका कोई अनुभव नहीं होपाता॥७॥ जो अपने आत्मस्वरूपके विषयमें जागता है-उसको ठीक साव- धानो रखता है-वह मुक्तिको प्राप्त करता है, ऐसा कहते हैं- अन्वयार्य-(अन्तरे) अन्तरंगमें (आत्मानम्) आत्माके वास्तविक स्वरूपको (दृष्ट्वा) देखकर और (बहिः) बाह्यमें (देहादिकं) शरीरादिक पर- भावोंको (दृष्ट्वा) देखकर (नयोः) आत्मा और शरोरादिक दोनोंके (अन्तर- समाधितंत्र [७९] योरन्तरविज्ञानात् अच्युतो मुक्तो भवेत् । ततोऽच्युतो भवन्नप्यभ्यासाभेद- ज्ञानभावनातो. भवति न पुनर्भेदविज्ञानमात्रात् ।। ७६ ।।.. यस्य च देहात्मनोभेंददर्शनं तस्य प्रारब्धयोगावस्थायां निष्पन्नयोगा- वस्थायां च कीदृशं जगत्प्रतिभासत इत्याह- पूर्व दृष्टात्मतत्त्वस्य विभात्युन्मत्तवजगत् । स्वभ्यस्तात्मधियः पश्चात् काष्ठपाषाणरूपवत् ॥८॥ टीका-पूर्व दृष्टात्मतत्त्वस्य देहाभेदेन प्रतिपन्नात्मस्वरूपस्य योगिनः विज्ञानात्) भेदविज्ञानसे तथा (अभ्यासात्) अभ्यासद्वारा उस भेदविज्ञानमें दृढता प्राप्त करनेसे (अच्युतो भवेत्) यह जीव मुक्त होजाता है। भावार्थ-जब इस जीवको अात्मस्वरूपका दर्शन होजाता है और यह शरोनादिकको अपने प्रात्सासे भिन्न पर पदार्थ सनझने लगता है तब इमको परिणति पलट जाती है-बाह्य विषयोंसे हटकर अन्तर्मुखो हो जाती है. और तब यह अपने उपयोगको इधर उधर इन्द्रिय विषयोंमें न भ्रमाकर आत्मारावनकी ओर एकाग्र करता है, अात्मसाधनके अपने अभ्यासको बढ़ाता है और उस अभ्यासमें दृढता सम्पादन करके अपने सम्यग्दर्शनादि गुणोंका पूर्ण विकास करलेता है। फिर उसका श्रास्तस्व- रूपसे पतन नहीं होता-वह उसमें बराबर स्थिर रहता है। इसीका नाम अच्युत होना अथवा अच्युन (मोक्ष) पदको प्राप्ति है ॥ ७९ ॥ शरोर और प्रास्माका जिसे भेदविज्ञान होगया है ऐसे अन्तरात्माको यह जगत योगाभ्यासकी प्रारम्भावस्थामें कैसा दिखाई देता है और योगा- भ्यासकी निष्पन्नावस्थामें कैसा प्रतीत होता है उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ (दृष्टात्मतत्त्वस्य) जिसे प्रात्मस्वरूपका दर्शन होगया है ऐसे योगी जीवको (पूर्व) योगाभ्यासकी प्राथमिक अवस्थामें (जगत् ) यह अज्ञ प्राणिसमूह (उन्मत्तवत्) उन्मत्त-सरीखा (विभाति) मालूम होता है किन्तु (पश्चात्) बादको जब योगकी निष्पन्नावस्था होजाती है तब (स्वभ्यस्तात्मधियः) अात्मस्वरूपके अभ्यासमें परिपक्वबुद्धि हुए अन्तरा- त्माको (काष्ठपाषाणरूपवत्) यह जगत काठ और पत्थरके समान चेष्टा- रहित मालूम होने लगता है।
[८०] 'वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला विभात्युन्मत्तवज्जगत स्वरूपचिंतनविकलत्वाच्छुभेतरचेष्टायुक्तमिदं जगत् नाना- बाह्यविकल्पैरूपेतमुन्मत्तमिव प्रतिभासते । पश्वान्निप्पन्नयोगावस्थायां सत्यां स्वभ्यस्तात्मधियः सुष्टुभावितमात्मस्वरूपं येन तस्य निश्चलात्मस्वरूपमनु- भवतो जगद्विषयचिन्ताभावात् काष्ठपाषाणवत्प्रतिभाति । न तु परमौदासी- न्यावलम्बात् ॥ ८० ॥ ननु स्वभ्यस्तात्मधियः इति व्यर्थम् । शरीराभेदेनात्मनस्तत्स्वरूपविढ- भ्यः श्रवणात्स्वयं वाऽन्येषां तत्स्वरूपप्रतिपादनान्मुक्तिर्भविष्यतीत्याशङ्कयाह- शृण्वन्नप्यन्यतः कामं वदन्नपि कलेवरात् । नात्मानं भावयेद्भिन्नं यावत्तावन्न मोक्षभाक् ॥८॥ भावार्थ-अपने शरीरसे भिन्नरूप जब अामाका अनुभव होता है नब योगकी प्रारम्भिक दशा होती है, उस समय योगी अन्तरात्माको यह जगत् स्वरूपचिन्तनसे विकल होनेके कारण शुभाशुभ चेष्टाओंसे युक्त और नाना प्रकारके बाद्य विकल्पोंसे घिरा हुआ उन्मत्त-जैसा मालूम पड़ता है। वादको योगमें निष्णान होनेपर जब आत्मानुभवका अभ्याम खूब दृढ होजाना है-बाह्यविषयों में उसकी परिणति नहीं जानी-तब, परम उदासीन भावका अवलम्बन न लेते हुए भी, जगद्विषयक चिन्ता- का अभाव होजानेके कारण उसे यह जगत काष्ट-पाषाणं-जैसा निश्चेष्ट जान पड़ता है । यह सब भेदविज्ञान और अभ्यास-अनभ्यासका माहात्म्य है ॥२०॥ यदि कोई शंका करे कि 'स्वभ्यस्तात्मधियः' यह पद जो पूर्वश्लोकमें दिया है वह व्यर्थ है-आत्मतत्त्वके अभ्यासमें .परिपक्व होनेकी कोई जरूरत नहीं क्योंकि शरीर और आत्माके स्वरूपके जाननेवालोंसे प्रा- न्मा शरीरसे भिन्न है ऐसा सुननेसे अथवा स्वयं दूसरोंको उस स्वरूपका प्रतिपादन करनेसे मुक्ति होजायगी, तो उसके उत्तरमें कहते हैं- अन्वयार्थ-आत्माका स्वरूप (अन्यतः ) उपाध्याय आदि गुरुओंके मुग्वसे ( काम) खूब इच्छानुसार. (श्रणवन्नपि ) सुननेपर भी तथा (कलेवरात्) अपने मुखसे (वदन्नपि) दूसरोंको लतलाते हुए भी (यावत) समाधितंत्र [८१] टीका-अन्यत उपाध्यायादेः कामं प्रत्यर्थं शृण्वन्नपि कलेवराद्भिन्न- माकर्णयन्नपि ततो भिन्नं तं स्वयमन्यान् प्रति वदन्नपि यावत्कलेवराद्भिन्नमा- त्मानं न भावयेत् । तावन्न मोक्षभाक् मोक्षभाजनं तावन्न भवेत् ।।८।। तदभावनायां च प्रवृत्तौऽसौ किं कुर्यादित्याह- तथैव भावयेदेहायात्यात्मानमात्मनि । यथा न पुनरात्मानं देहे स्वप्नेऽपि योजयेत् ॥२॥ टीका-देहाट्यावृत्त्य शरीरात्पृथक्कृत्वाश्रात्मानं स्वस्वरूपं श्रात्मनि स्थितं तथैव भावयेत् शरीराभेदेन दृढतरभेदभावनाप्रकारेण भावयेत् । यथा पुनः स्वप्ने स्वप्नावस्थायां देहे उपलब्धेऽपि तत्र प्रात्मानं न योजयेत् देह- मात्मतया नाध्यवस्येत् ।। ८२ ।। जबतक (आत्मानं ) श्रात्मस्वरूपकी (भिन्न) शरोरादि परपदार्थोंसे भिन्न (न भावयेत्) भावना नहीं की जाती । (तावत्) तब नक ( मोक्षभाक् न ) यह जीव मोक्षका अधिकारी नहीं होसकता ॥१॥ भावार्थ-जीव और पुद्गलके स्वरूपको सुनकर तोतेकी नरहसे रट लेने और दूसरोंको सुनादेने मात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । मुक्तिकी प्राप्सिके लिये अात्माको शरीरादिसे भिन्न अनुभव करनेकी खाम जरूरत है। जब तक भावनाके बलपर यह अभ्याम दृढ नहीं होता तब तक कुछ भी आत्मकल्याण नहीं बन सकता ॥१॥ भेदविज्ञानकी भावनामें प्रवृत्त हुए अन्तरास्माको क्या करना चाहिये, उसे यतलाते हैं- अन्वयार्थ-अन्तरास्माको चाहिये कि वह (देहात) शरीरसे (प्रात्मानं) आत्माको (व्यावृत्य) भिन्न अनुभव करके (आत्मनि) आत्मामें ही(तथैव) उस प्रकारसे (भावयेत) भावना करे (यथा पुनः) जिस प्रकारसे फिर (स्वप्ने - ऽपि) स्वममें भी (देहे) शरीरकी उपलब्धि होनेपर उसमें (आत्मानं) प्रास्मा- को (न योजयेत) योजित न करे अर्थात् शरीरको प्रात्मा न समझ बैठे। भावार्थ-मोहकी प्रवलता-जन्य चिरकालका अज्ञान संस्कार जब हृदयसे निकल जाता है तब स्वपमें भी इस जड़ शरीर में आत्माको बुद्धि [८२] वीरवामन्दिर-ग्रन्थमाला यथा पग्मौदासीन्यावस्थायां स्वपरविकल्पस्त्याज्यस्तथा बनविकल्पोऽपि । . यतः- , अपुण्यमत्रतैः पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तयोर्व्ययः । अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि ततस्त्यजेत् ॥८३॥ टीका-अपुण्यमधर्मः अवतहिमादिविकल्पैः परिणतस्य भवति। पुण्यं धर्मो व्रतैः अहिमादिविकल्यैः परिणतन्य भवति । मोक्षः पुनस्तयोः पुण्या- पुण्ययोव्ययो विनाशो मोक्षः । यथैव हि लोहशृङ्खला बंधहेतुस्तथा सुवर्ण- शृङ्खलाऽपि । अतो यथोभयशृङ्खलाभाव व्यवहार मुक्तिस्तथा परमार्थेऽपीति । ततस्तस्मात्माक्षार्थी अव्रतानीव इव. शब्दा यथाऽर्थः यथाऽप्रतानि त्यजेत्तथा व्रतान्यपि ।। ८३ ॥ नहीं होती | अन उक्त कारको दूर करने के लिये भेदविज्ञानको निरंतर भावना करनी चाहियं ॥ ८२.॥ जिस प्रकार परप उदासीन अवस्थामें स्वपरका विकल्प त्यागने योग्य होना है उसी प्रकार,व्रतोंके पालनेका विकल्प भी त्याज्य है । क्योंकि- अन्वयार्थ-(अवतैः) हिंमा, झूठ, चोरी, कुशील, और परिग्रारूप पांच अवतोंके अनुष्ठानमे (अपुण्यम् ) पापका बंध होता है और (व्रतैः) अहिंसादिक गंच व्रतोंके पालने मे (पुण्यं) पुण्यका बंध होता है और (तयोः) पुण्य और पार दोनों कोंका (व्ययः) जो विनाश है वहाँ (मोक्षः) मोक्ष है (ततः) इस लिये ( मोक्षार्थी ) मोक्षके इच्छुक भव्य पुरुषको चाहिये कि (अवतानि इब) अतोंकी तरह (तानि अपि) व्रतोंको भी (त्यजेन) छोड़ देवे। भावार्थ-मोक्षार्थी पुरुषको मोक्षप्राप्तिके मार्गमें जिस प्रकार पंच अव्रत विनस्वरूप हैं उमा प्रकार पाँच बन भी बाधक हैं; क्योंकि लोहेकी वेड़ी जिम प्रकार वन्धकारक है उसी प्रकार सोनेकी वेड़ी भी वंधकारक है। दानों पक रको वेडियोका अभाव होनेपर जिस प्रकार लोकव्यवहार- में मुक्ति आजादो) समझा जानो है उप्लो प्रकार परमार्थ नै भो व्रत और अतन दोनोंके अभावमे भुक्ति मानी गई है । अतः मुमुक्षुको अवतोंकी ? W समाधितंत्र [८३ j कथं तानि त्यजेदिति तेषां त्यागक्रमं दर्शयन्नाह- अवतानि परित्यज्य व्रतेषु परितिष्ठितः । त्यजेत्तान्यपि संप्राप्य परमं पदमात्मनः ॥४॥ टीका-अवतानि हिंसादीनि परित्यज्य व्रतेषु परिनिष्ठितो भवेत् । पश्चातान्यपि त्यजेत् । किं कृत्वा ? सम्प्राप्य । किं तत् ? फामं पदं परम- वीतगंगतालक्षणं क्षीणकषायगुणस्थानं । कस्य तत्पदं ? आत्मनः ॥ ८४ ॥ कुतोऽव्रत-व्रतविकल्पपरित्यागे परमपदप्राप्तिरित्याह- यदन्तर्जल्पसंपृक्तमुत्प्रेक्षाजालमात्मनः । मूलं दुःखस्य तन्नाशे शिष्टमिष्टं परं पदम् ॥ ८५॥ टीका-यदुत्प्रेक्षाजालं । कथम्भूतं ? अन्तर्जल्पसंपृक्त अन्तर्वचन- तरह व्रतोंको भी छोड़ देना चाहिये ॥३॥ अब उनके छोड़नेका क्रम बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(प्रव्रतानि) हिसादिक पंच अव्रतोंको (परित्यज्य).छोड़ करके (व्रतेषु) अहिंसादिक व्रतोंमें (परिनिष्ठितः) निष्ठावान रहे अर्थात् उनका दृढताके साथ पालन करे, यादको (आत्मनः) आत्माके ( परमं पद) राग द्वेषादिरहित परन वीतरागपदको (प्राप्य) माप्त करके ( तानि अपि) उन वूनोंको भी (त्यजेत्) छोड़ देवे ॥ ४ ॥ भावार्थ-प्रथम तो हिंसादिक पंच पापरूप अशुभ प्रवृत्ति को छोड़कर अहिंसादिक व्रतोंके अनुष्ठानरूप शुभ प्रवृत्ति करनी चाहिये । साथ ही, अपना लक्ष शुद्धोपयोगको ओर ही रखना चाहिये । जब श्रात्माके परख पदरूप शुद्धोपयोगकी-परमवीतरागतामय क्षीणकषायनामक गुणस्थान. की--सम्प्राप्ति हो जाये तब उन ब्रतोंको भी छोड़ देना चाहिये। लेकिन जब नेक वीतरागदशा न हो जाये तबतक व्रतोंका अवलम्बन रखनी चाहिए, जिससे अशुभको ओर प्रवृत्ति न हो सके। ८४ ॥ किस प्रकार अवतों और व्रतोंके विकल्पको छोड़ने .र परमपदको प्राप्ति होगी, उसे बतलाते हैं-- [८४ ] वीरसेवामन्दिर-प्रन्थमाला व्यापारोपेतं । श्रात्मनो दुःखस्य मूलं कारणं । तन्नाशे तस्योत्प्रेक्षाजालस्य विनाशे । इष्टमभिलषितं यत्पदं तच्छिष्टं प्रतिपादितम् ।। ८५ ।। तस्य चोप्रेक्षाजालस्य नाशं कुर्वाणोऽनेन क्रमेण कुर्यादित्याह- अवती व्रतमादाय व्रती ज्ञानपरायणः। परात्मज्ञानसम्पन्नः स्वयमेव परो भवेत् ॥८६॥ टीका-अवतित्वावस्थाभावि विकल्पजालं व्रतमादाय विनाशयेत् । व्रतित्वावस्थाभावि पुनर्विकल्पजालं ज्ञानपरायणो ज्ञानभावनानिष्ठो भूत्वा अन्वयार्थ (अन्तर्जल्पसंपृक्त) अंतरंगमें वचन व्यापारको लिये हुए (यत् उत्प्रेक्षाजाल)जो अनेक प्रकारकी कल्पनाओंका जाल है वही (प्रात्मनः) आत्माके (दुःखस्यो दुःखका (मूल) मूल कारण है (तन्नाशे) उस विविध संकल्प-विकल्परूप कल्पनाजालके विनाश होनेपर (इष्ट) अपने प्रिय हितकारी (प-मं पदं शिष्ट) परमपदकी प्राप्ति कही गई है। भावार्थ-यह जीव अपने चिदानन्दमय परम अतीन्द्रिय अविनाशी निर्विकल्प स्वरूपको भूलकर जब तक बाह्यविषयोंको अपनाना हुआ दुःखोंके मूल कारण अन्तर्जल्परूपी अनेक संकल्प विकल्पोंके जाल में फंसा रहता है-मन-हा मन कुछ गुन गुनाता अथवा हवासे बातें करता है--तब तक इसको परमपदकी प्राप्ति नहीं हो सकती और न कोई सुख ही मिल सकता है। सुखमय परमपदकी प्राप्ति उसीको होती है जो अन्तर्जल्परूपी उत्प्रेक्षाजालका सर्वथा त्याग करके अपने ही चैतन्य चम- स्काररूप विज्ञानघन आत्मामें लीन होजाता है ।। ८५ ॥ उस उत्प्रेक्षाजालका नाश करनेके लिये उद्यमी मनुष्य किस क्रमसे उसका नाश करे, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(अवती) हिंसादिक पंच अचूतों-पापोंमें अनुरक्त हुआ मानव (व्रतं श्रादाय) चूतोंको ग्रहण करके, अवनावस्थामें होने वाले विकल्पोंका नाश करे, तथा (बती) अहिंसादिक धूतोंका धारक (ज्ञानपरायणः) ज्ञान- भावनामें लोन होकर, वृतावस्थामें होने वाले विकल्पोंका नाश करे और फिर अरहंत-अवस्थामें ( परात्मज्ञानसम्पन्नः) केवलज्ञानसे युक्त होकर समाधितंत्र [८५] परमवीतरागतावस्थायां विनाशयेत् । सयोगिजिनावस्थायां परात्मज्ञानसम्पन्नः परं सकलज्ञानेभ्यः उत्कृष्ट तच्च तदात्मज्ञानं च केवलज्ञानं तेन सम्पन्ना युक्तः स्वयमेव गुर्वाद्य पदेशानपेक्षः परः सिद्धस्वरूप प्रात्मा भवेत् ।। ८६ ।। यथा च व्रतविकल्पो मुक्तिहेतुर्न भवति तथा लिङ्गविकल्पोऽपीत्याह--- लिङ्ग देहाश्रितं दृष्टं देहएवात्मनो भवः । न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ॥८७॥ टीका-लिङ्ग जटाधारणनग्नत्वादिदेहाश्रितं दृष्ट शरीरधर्मतया प्रति- पन्न । देह एवात्मनो भवः संसारः । युत एवं तस्माद्य लिंगकृताग्रहाः लिंगमेवमुक्त हेतुरितिकृताभिनिवेशास्ते न मुत्यंते । कस्मात् भवात् ॥ ८७॥ (स्वयमेव) स्वयं ही-बिना किसीके उपदेशके (परः भवेत्) परमात्मा होव- सिद्धस्वरूपको प्राप्त करे। भावार्थ-विकल्पजालको जीतकर सिद्धि प्राप्तकरनेका क्रम अव्रतीसे व्रती होना, व्रतीसे ज्ञानभावनामें लीन होना, ज्ञानभावनामें लीनहोकर केवलज्ञानको प्राप्त करना और केवलज्ञानसे सम्पन्न होकर सिद्धपदको प्राप्त करना है ॥८६॥ जिस प्रकार वनोंका विकल्प मोक्षका कारण नहीं उसी प्रकार लिंगका विकल्प भी मोक्षका कारण नहीं हो सकता, ऐसा प्रतिपादन करत हैं- अन्वयार्थ-(लिङ्ग) जटा धारण करना अथवा नग्न रहना आदि वेष (देहाश्रितं दृष्ट') शरोरके आश्रित देखा जाता है (देह एव) और शरीर ही (प्रात्मनः) आत्माका (भवः) ससार है (तस्मात्) इसलिये (ये लिङ्ग- कृताग्रहाः) जिनको लिङ्गका ही आग्रह है-बाह्य वेष धारण करनेसे मुक्ति- को प्राप्ति होती है ऐसी हठ है (ते) वे पुरुष (भवात) संसारसे (न मुच्यन्ते) नहीं छूटते हैं ॥ ८७॥ भावार्थ-जो जीव केवल लिंग अथवा बाह्य वेषको हो मोक्षका कारण मानते हैं वे देहात्मदृष्टि हैं और इस लिये मुक्तिको प्राप्त नहीं हो सकते । क्योंकि लिंगका आधार देह है और देह हो इस श्रात्माका संसार -देहके अभावमें संसार रहता नहीं। जो लिंगके प्राग्रही हैं-लिंगको , [८६ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला येऽपि 'वर्णानां ब्राह्मणो गुरुरतः स एव परमपदयोग्य' इति वदन्ति तेऽपि न मुक्तियोग्या इत्याह- जातिदेहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः । न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ॥८॥ टीका-जातिाह्मणादिदेहाश्रितेत्यादि सुगमं ।। ८८ ।। तर्हि ब्राह्मणादिजातिविशिष्टो निर्वाणादिदीक्षया दीक्षितो मुक्ति प्राप्नोतीति वदन्तं प्रत्याह- जातिलिंगविकल्पेन येषां च समयाग्रहः । तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव परमं पदमात्मनः ॥ ८६ ॥ ही मुक्तिका कारण समझते हैं वे संसारके आग्रही हैं-संसारको अपनाए हुए हैं, और जो संसारके आग्रही होते हैं-उसीकी हठ पकड़े रहते हैं-वे संसारसे नहीं छूट सकते ॥ ८७ ॥ जो ऐमा कहते हैं कि 'वौँका ब्राह्मण गुरु है, इसलिये वही परभ- पदके योग्य है वे भी मुक्तिके योग्य नहीं हैं, ऐमा बतलाते हैं- अन्वयार्थ (जातिः) ब्राह्मण आदि जाति ( देहाश्रिता दृष्टा ) शरीरके प्राप्रित देवी गई है (देह एव) और शरीर ही (अात्मनः भवः) अान्मा- का संसार है (तस्मात्) इसलिये (ये) जो जीव (जातिकृताग्रहाः)मुक्तिकी प्राप्तिके लिये जातिका हठ पकड़े हुए हैं (तेऽपि) वे भी (भवात्) संसारसे (न मुच्यन्ते) नहीं छूट सकते हैं। भावार्थ-लिंगकी तरह जाति भी देहाश्रित है और इस लिये जातिका दुराग्रह रग्वने वाले भी मुक्तिको प्राप्त नहीं हो सकते । उनका जानि- विषयक अाग्रह भी संसारका ही आग्रह है और इसलिये वे संसारसे कैसे छूट सकते हैं ? -नहीं छूट सकते ॥८८ ॥ तब तो ब्राह्मण आदि जातिविशिष्ट मानव ही साधुवेष धारणकर मुक्ति प्राप्त करमकता है, ऐसा कहने वालोंके प्रति कहते हैं- अन्वयार्थ-(येषां) जिन जीवोंका (जातिलिंगविकल्पेन) जाति और वेष
समाधितंत्र
[४]
टीका-जातिलिंगरूपविकल्पो भेदस्तेन येषां शैवादीनां समयाग्रहः
आगमानुबंधः उत्तमजातिविशिष्टं हि लिंगं मुक्ति हेतुरित्यागमे प्रतिपादितमतः
स्तावन्मात्रेणैव मुक्तिरित्येवंरूपो येषामागमाभिनिवेशः तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव
परमं पदमात्मनः ।। ८६ ||
तत्पदप्राप्त्यर्थ जात्यादिविशिष्ट शरीरे-निर्ममत्वसिद्धयर्थ भोगेभ्यो
व्यावृत्यापि पुनर्मोहवशाच्छरीर एवानुबन्धं प्रकुर्वन्तीत्याह-
यत्त्यागाय निवर्तन्ते भोगेभ्यो यदवाप्तये ।
प्रीतिं तत्रैव कुर्वन्ति द्वेषमन्यत्र मोहिनः ॥६० ॥
के विकल्पसे मुक्ति होता है ऐसा.(समयाग्रहः) अगम-सम्बन्धा आग्रह है
अर्थात् ब्राह्मण श्रादि जाति उत्पन्न होकर अमुक वेष धारण करनेसे ही
मुक्ति होनी है ऐमा भागमानुवन्धि हठ हैं (ते अपि) वे पुरुष भी (प्रात्मनः)
श्रा-माके (परमं पदं) परमपदको (न प्राप्नुवन्त्येव) प्राप्त नहीं कर सकते हैं-
संसारसे मुक्त नहीं हो सकते हैं।
भावार्थ-जिनका ऐसा आग्रह है कि अमुक जातिवाला अमुक वेष
धारण करे तभी मुक्तिको प्राप्ति होती है ऐसा आगममें कहा है, वे भी
मुक्तिको प्राप्त नहीं हो सकते; क्योंकि जाति और लिंग दोनों ही जब
देहाश्रित हैं और देह हो अात्माका संसार है तब संसारका अाग्रह रखने
वाले उससे कैसे छूट मकते हैं ? ॥ ८६ ॥
उस परमपदकी प्राप्तिके लिये ब्राह्मणादिजातिविशिष्ट शरीरमें
निर्ममत्वको सिद्ध करनेके लिये भोगोंको छोड़ देनेपर भी अज्ञानी जीव
मोहके वश होकर शरीरमें हो अनुराग करने लगजाते हैं, ऐसा कहते हैं-
अन्वयार्थ-[यत्त्यागाय] जिस शरीरके त्यागके लिये उसमे ममत्व
दूर करने के लिये-और (यअवाप्तये) जिस परमवीतराग पदको प्राप्त
करनेके लिये [ भोगेभ्यः ] इन्द्रियोंके भोगोंसे (निवर्तन्ते) निवृत्त होते हैं
अर्थात् उनका त्याग करते हैं (तत्रैव) उसीशरीर और इन्द्रियोंके विषयोंमें
(मोहिनः) मोही जीव (प्रीतिं कुर्वन्ति) प्रीति करते हैं और (अन्यत्र) चीत-
रागता आदिके साधनोंमें (हेषं कुर्वन्ति) देष करते हैं ॥१०॥
[८८] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-यस्य शरीरस्य त्यागाय निर्ममत्वाय भोगेभ्यः स्रग्बनितादिभ्यो निवर्तन्ते । तथा यदवाप्तये यस्य परमवीतरागत्वस्यावाप्तये प्राप्तिनिमित्तं भोगेभ्यो निवर्तन्ते । प्रीतिमनुवन्धं तत्रैव शरीरे एव कुर्वन्ति द्वेषं पुनरन्यत्र वीतरागत्वे । के ते ? मोहिनो मोहवन्तः ।। ६. तेषां देहे दर्शनव्यापारविपर्यासं दर्शयन्नाह- अनन्तरज्ञः संधत्ते दृष्टिं पंगार्यथाऽन्धके । संयोगात् दृष्टिमङ्गऽपि संधत्ते तद्वदात्मनः ॥६॥ टीका-अनन्तरज्ञो भेदाग्राहकः पुरुषो यथा पङ्गो प्टिमन्धके सन्धत्ते आरोपयति । कस्मात् संयोगात् पंग्वन्धयोः सम्बन्धमाश्रित्य । तद्वत् तथा भावार्थ-मोहकी बड़ी ही विचित्र लीला है । जिस शरीरसे ममत्व हटाने के लिये भोगोंमे निवृत्ति धारणकी जाती है--संयम ग्रहण किया जाता है उसीसे मोही जीव पुनः प्रोति करने लगता है और जिस वीत- रागभावकी प्राप्तिके लिये भोगोंसे निवृत्ति धारण की जाती है-संयमका आश्रय लिया जाता है-उसोसे मोहो जोच द्वेष करने लगता है । ऐसी हालतमें मोहपर विजय प्राप्त करनेके लिये बड़ी ही सावधानीकी जरूरत है और वह भी बन सकती है जब साधकको दृष्टि शुद्ध हो । दृष्टिमें विकार आते ही मारा खेल बिगड़ जाता है-अपकारीको उपकारो और उपकारीको अपकारी समझ लिया जाता है ॥ १० ॥ मोहीजीवोंके शरीरमें दर्शनव्यापारका विपर्यास किस प्रकार होता है, उसे दिखलाते हैं-- अन्वयार्थ (अनन्तरज्ञः ] भेदज्ञान न रखने वाला पुरुष (यथा) जिस प्रकार (संयोगात्) संयोगके कारण भ्रनमें पड़कर-संयुक्त हुए लंगडे और अंधेको क्रियाओंको ठीक न समझकर (पंगोर्टि)लंगड़ेकी दृष्टिको (अन्धके) अन्धे पुरुषमें (संधत्ते), आरोपित करता है-यह समझता है कि अन्धा स्वयं देखकर चल रहा है-(तद्वत्) उसी प्रकार (आत्मनः दृष्टिं).आत्माकी दृष्टिको (अङ्गेऽपि) शरीरमें भी (संधत्त) आरोपित करता है-यह समझने लगता है कि यह शरीर ही देखता जानता है।
, समाधितंत्र [८९ देहात्मनो: संयोगादात्मनो दृष्टिमंगेऽपि सन्धत्ते अंग (गः) पश्यतीति [मन्यते] मोहाभिभूतो बहिरात्मा ॥ १ ॥ अन्तरात्मा किं करोतीत्याह- दृष्टभेदो यथा दृष्टिं पोरंन्धे न योजयेत् । तथा न योजयेदेहे दृष्टात्मा दृष्टिमात्मनः ॥ ६२॥ टीका- दृष्टभेदः पंग्बन्धयोः प्रतिपन्नभेदः पुरुषां यथा पंगोष्टिमन्धे न योजयेत् । तथा आत्मनो दृष्टिं देहे न योजयेत् । कोऽसौ ? दृष्टात्मा देहा भेदेन प्रतिपन्नास्मा ॥ १२ ॥ भावार्थ-एक लँगड़ा अन्वेके कंधेपर चढ़ा जारहा है और ठोक मार्गसे चलनेके लिये उस अन्धेको इशारा करता जाता है, माग चलने में दृष्टि लंगड़ेका और पद टांगे अन्धेको काम करती हैं। इस भेदको ठोक न जानने वाला कोई पुरुष यदि यह ममझजे कि यह अन्धा हो कैसो सावधानोसे देवकर चलरहा है तो वह जिस प्रकार उसका भ्रन होगा उसो प्रकार शरोरारूड आत्माको दर्शनादिक क्रियाओं को न समझकर उन्हें शरीरको मानना भो भ्रम है और इसका कारण आत्मा और शरार दोनोंका एक क्षेत्रावगाहरूप मम्बन्ध है। आत्मा और शरारके भेदको ठीक न समझने वाला बहिरात्मा हो ऐले भ्रमका शिकार होता है ।। ६१ ॥ संयोगको ऐमो अवस्था अन्तरामा क्या करना है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(दृष्टभदः ) जो लँगडे और अन्धेके भेदको तथा उनको क्रियाओंको ठोक समझता है वह (यथा) जिसप्रकार (पंगोष्टिं) लँगडे को दृष्टिको (अन्धे) अन्धे पुरुषमें (न योजयेत् ) नहीं जोड़ता-अन्धेका माग देखकर चलने वाला नहीं मानता-(तथा) उमी प्रकार (दृष्टात्मा) अात्मा को शरीरादि परपदार्थोसे भिन्न अनुभव करने वाला अन्तरात्मा (प्रात्मनः दृष्टिं) आत्माकी दृष्टिको--उसके ज्ञानदर्शन-स्वभावका (देहे) शरीरमें (न योजयेत् ) नहीं जोड़ता है-शरीरको ज्ञाता-दृष्टा नहीं मानता है। भावार्थ-जिस पुरुषको अन्धे और लँगडेका भेद ठोक मालूम होता है ऐसा समझदार मनु य जिस प्रकार दोनोंके संयुक्त होनेपर भ्रममें नहीं [९] वीरसंवामन्दिर-ग्रन्थमाला वहिरन्तरात्मनोः काऽवस्था भ्रान्तिः का वाऽभ्रान्तिरित्याह- सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव विभ्रमोऽनात्मदर्शिनाम् । विभ्रमोऽक्षीणदोषस्य सर्वावस्थाऽऽत्मदर्शिनः ॥६३॥ टीका-सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव विभ्रमः प्रतिभासते। केषाम् ? अनात्मदर्शिनां यथावदात्मस्वरूपपरिज्ञानरहितानां बहिरात्मनाम् । प्रात्मदर्शिनोऽन्तरात्मनः पुनरक्षीणदोषस्य मोहाक्रान्तस्य वहिरात्मनः सम्बंधिन्यः सर्वावस्थाः सुप्तो- न्मत्ताद्यवस्थावत् जाग्रत्प्रबुद्धानुन्मत्ताद्यवस्थाऽपि विभ्रमः प्रतिभासते यथावद्ध- स्तुप्रतिभासाभावात् । अथवा-सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव एवकारोऽपिशब्दार्थे तेन पड़ता-अन्धको दृष्टिहीन और लंगड़ेको दृष्टिवान् समझता है-उमीप्रकार भेदविज्ञानी पुरुष अात्मा और शरोरके संयोगवश भ्रममें नहीं पड़ता- शरोरको चेतनारहित जड और आत्माको ज्ञानदर्शनस्वरूप हो समझता है, कदाचित् भी शरीरमें आत्माको कल्पना नहीं करता ॥ १२ ॥ वहिरामा और अन्तरात्माको कौनसी अवस्था भ्रमरूप और कौनसी भ्रमरहिन मालूम होती है उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(अनात्मदर्शिनाम्) आत्मस्वरूपका वास्तविक परिज्ञान जिन्हें नहीं है ऐसे वहिरात्माओंको (सुप्तोन्मत्तादि अवस्थाएव) केवल सोने व उन्मत्त होनेकी अवस्था हो (विभ्रमः) भ्रमरूप मालूम होती है। किन्तु (आत्मदर्शिनः) आन्मानुभवो अन्तरात्माको (अक्षीणदोषस्य) मोहाक्रान्त बहिरात्माको (सर्वावस्थाः) सर्व हो अवस्थाएं-सुप्त और उन्मत्तादि अव: स्थाओंको तरह जाग्रत, प्रवुद्ध और अनुन्मत्तादि अवस्थाएँ भी-(विभ्रमः) भ्रमरूप मालूम होती हैं। द्वितीय अर्थ-टोकाकारने 'ऽनात्मदर्शिनां' पदको 'न आत्मदर्शिनां' ऐसा मानकर और 'सर्वावस्थात्मदर्शिना' को एक पद रखकर तथा एवं' का अर्थ 'भी' लगाकर जो दूसरा अर्थ किया है वह इस प्रकार है- आत्मदर्शी पुरुषों की सुप्त व उन्मत्त अवस्थाएं भी भ्रमरूप नहीं होती; क्योंकि दृढतर अभ्यामके कारण उनका चित्त आत्मरससे भीगा रहना है-स्वरूपसे उनको च्युति नहीं होनी-इन्द्रियोंकी शिथिलतायारोगादि- AN FEESH - समाधितंत्र. [ ९१] सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थाऽपि न विभ्रमः । केषाम् १ श्रात्मदर्शिनां दृढतराभ्यासात्तद- वस्थायामपि श्रात्मनि तेषामविपर्यासात स्वरूपसंवित्तिवैकल्यासम्भवाच्च यदि सुप्ताद्यवस्थायामप्यात्मदर्शनं स्यात्तदा जांगदेवस्थावत्तत्राप्यात्मनः कथं सुप्तादिव्यपदेश इत्यप्ययुक्तम् । यतस्तत्रेन्द्रियाणां स्वविषये निद्या प्रति, बन्धात्तद्वयपदेशो न पुनरात्मदर्शनप्रतिबन्धादितिं । वहि कस्याऽसौ. विनमो भवति ? अक्षीणदोषस्य बहिरात्मनः । कथम्भूतस्य ? सर्वावस्थात्मदर्शिन सर्वावस्थां बालकुमारादिलक्षणां सुप्तोन्मत्तादिरूपां चात्मेति पश्यत्येवं शीलस्य ।। ३ ।। ननु सर्वावस्थात्मदर्शिनोऽप्वशेषशास्त्रपरिज्ञानान्निद्रारहितस्य मुक्तिर्भवि- ष्यतीति वदन्तं प्रत्याह.. . विदिताशेषशास्त्रोऽपि न जायदपि मुच्यते।। देहात्मदृष्टितिात्मासुप्तन्मित्तीऽपि मुच्यते॥ ६४ ॥ के वश उन्हें कदाचित मूर्छा भी आजाती है तो भी उनका आत्मानुभव- रूप संस्कार नहीं छूटता-वह बराबरं बना ही रहता है। किन्तु अक्षीण- दोष बहिरास्माके, जो घालं युवादि सभी अवस्थारूप प्रात्माको अनुभव करता है, वह सब विभ्रम होता है। । :' भावार्थ-जिनको त्मिस्वरूपी ज्ञान नहीं है उनको केवल सुप्त व उन्मत्त जैसी अवस्था, ही भ्रमरूप मालूम होती हैं किन्तु 'आत्मदर्शियोंको मोहके वशीभूत हुऐं रागी पुरुषोंको सभी अवस्थाएँ भ्रमरूप जान पड़ती हैं-भले ही वे जाग्रत प्रबुद्ध मेंथा अनुन्मन्स-जैसीअवस्थाएँ ही क्यों न हों। वास्तवमें घहिरात्मा और अंतरात्माको प्रस्थाले बडा भेद है. अन्त- रात्मा आत्मस्वरूपमें सदा जाग्रत रहता है, जबकि हिरीत्माकी इससे विपरीत दशा होती है ।। ६३.॥ rai - यदि कोई कहे कि बाल-वृद्धादिसर्व अवस्थीरूप आत्माको मानने वाला सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करणनेस निद्राहित हुआ मुक्तिको प्राप्त हो जाएगा, तो उसके प्रति आपाय कहते ..अन्धयार्थ-दहात्मदृष्टि:) शरीरमात्मवुद्धि रेखुनै चाला बहिरात्मा . ॥ . it । [९२] वीरसेवामन्दिर-प्रन्थमाला टीका-न मुच्यते न कर्मरहितो भवति । कोऽसौ ? देहात्मदृष्टिबहि- रात्मा । कथम्भूतोऽपि ? विदिताशेषशास्त्रोऽपि परिज्ञाताशेषशास्त्रोऽपि देहात्म- दृष्टियतः देहात्मनोहेंदरुचिरहितो यतः । पुनरपि कथम्भूतोऽपि ? जाग्रदपि निद्रयाऽनभिभूतोऽपि । यस्तु ज्ञातात्मा परिज्ञातात्मस्वरूपः स सुप्तोन्मत्तोऽपि मुच्यते विशिष्टां कर्मनिर्जरां करोति दृढतराभ्यासात्सुप्ताद्यवस्थायामप्यात्म- स्वरूपसंवित्त्यवैकल्यात् ॥ ४ ॥ कुतस्तदा तदवैकल्यमित्याह यत्रवाहितधीः पुंसः श्रद्धा तत्रैव जायते । यत्रैव जायते श्रद्धा चित्तं तत्रैव लीयते ॥ ५ ॥ (विदिताशेषशास्त्रः अपि) सम्पूर्ण शास्त्रों का जानने वाला होनेपर भी नथा (जाग्रत् अपि) जागता हुआ भी (न मुच्यते) कर्मयधनसे नहीं छूटना है। किन्तु(ज्ञातात्मा) जिसने प्रात्माके स्वरूपको देहसे भिन्न अनुभव कर लिया है ऐसा विवेकी अन्तरात्मा (सुप्तान्मत्तः अपि) सोना और उन्मत्त हु भी (मुच्यते) कर्मबंधनसे मुक्त होता है--विशिष्टरूपसे कर्मोंको निर्जरा करता है। . भावार्थ-अनेक शास्त्रोंके जानने तथा जाग्रत रहनेपर भी भेदविज्ञान एवं देहसे आत्माको भिन्न करनेकी रुचिके बिना मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । देहात्मदृष्टिका शास्त्रज्ञान तोतको राम राम रटनके समान भाव- भासनाके बिना आत्महितका साधक नहीं हो सकता । प्रत्युत इसके; भेद-विज्ञानी होनेपर सुप्त और उन्मत्त-जैसी अवस्थाएँ भी आनाका कोई विशेष अहित नहीं कर सकती, क्योंकि दृढतर अभ्यासके वश उन अवस्थाओंमें भी आत्मस्वरूप-संवेदनसे च्युति न होनेके कारण विशिष्ट रूपसे कर्मनिर्जरा होती रहती है, और यह कर्मनिर्जरा ही बन्धनका पयव- सान एवं मुक्तिका निशान है। अतएव भेदविज्ञानको प्राप्त करके उसमें अपने अभ्यासको दृढ करना सर्वोपरि मुख्य और उपादेय है। ॥१४॥ सुप्तादि अवस्थाओं में भी स्वरूप संवेदन क्योंकर बना रहाता है, इस बातको स्पष्ट करते हैं- ? समाधितंत्र [ ९३ ] टीका-यत्रैव यस्मिन्नेव विषये अाहितधीः दत्ताबंधाना बुद्धिः । “यत्रात्महितधीरिति च पाठः यत्रात्मनो हितमुपंकारस्तत्र धीबुद्धिरिति” । कस्य ? पुंसः । श्रद्धा रुचिस्तस्य तत्रैव तस्मिन्नेव विषये जायते । यत्रैव जायते श्रद्धा चित्तं तत्रैव लीयये श्रासक्तं भवति || ५ || क पुनरनासक्त' चित्तं भवतीत्याह- यत्रानाहितधीः पुंसः श्रद्धा तस्मान्निवर्तते । यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्चित्तस्य तल्लयः ॥६६॥ टीका-यत्र यस्मिन्विषये अनाहितधीरदत्तावधाना बुद्धिः । “यत्रैवा- हितधीरिति च पाठः यत्र च अहितधीरनुपकारकबुद्धिः ।" कस्य ? पुंसः । अन्वयार्थ--(यत्र एव) जिस किसो विषयप्ने (पुंसः) पुरुषको (आहितधीः) दत्तावधानरूप बुद्धि होती है (तत्रैव) उसा विषयमें उसको (श्रद्धा जायते) श्रद्धा उत्पन्न होजातों है और (यत्र एव ) जिस विषयमें (श्रद्धा जायते । श्रद्धा उत्पन्न होजातो है (तत्रैव) उस विषयमें हा (चित्तं लीयते) उसका मन लीन हो जाता है-तन्मय बन जाता है । भावार्थ-जिस विषयमें किसी मनुष्यको वुद्धि संलग्न होती है- खूब सावधान रहती है-उसीमें आसक्ति बढ़कर उसकी श्रद्धा उत्पन्न होजाती है, और जहां श्रद्धा उत्पन्न होजाती है वहीं चित्त लीन रहता है। चित्तकी यह लीनता ही सुप्स और उन्मत्त-जैसी अवस्थाओं में मनुष्यको उस विषयकी ओरसे हटने नहीं देती-सांतेमें भी वह उसीके स्वप्न देखता है और पागल होकर भी उमीकी बातें किया करता है ॥६५॥ अब चित्त कहांपर अनासक्त होता है, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(यत्र) जिस विषयमें (पुंस:) पुरुषकी (अनाहितधीः) बुद्धि दत्तावधानरूप नहीं होती (तस्मात्) उससे (श्रद्धा) रुचि (निवर्तते) हट जाती है-दूर होजाती है ( यस्मात् ) जिससे श्रद्धा (निवर्तते ) हट जाती है (चित्तस्य) चित्तकी (तल्लयः कुतः) उस विषयमें लीनता कैसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं होती।
६.९४. वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला तस्माद्विषयात्सकाशात् श्रद्धा निवर्तते । यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्वित्तस्य तल्लयः तस्मिन् विषये लय... अामक्तिस्तल्लयः कुतो नैव कुतश्चिदपि ॥६६|| . .. यत्र च चित्तं विलीयत. तद्ध्येयं भिन्नमभिन्नं च भवति, तत्र भिन्ना- त्मनि ध्येये फलमुपदर्शयन्नाह- भिन्नात्मानमुपास्यामा परो भवति तादृशः। वर्तिीपं यथोपास्य मिन्ना भवति तादृशी ॥१७॥ टीका-भिन्नात्मानमाराधकात् पृथग्भूतमात्मानमर्हत्सिद्धरूपं उपास्यारा- ध्य आत्मा आराधकः पुरुषः परः परमात्मा भवति तादृशोऽर्हत्सिद्धस्वरूप- सदृशः । अत्रैवार्थ दृष्टान्तमाह-वर्तिरित्यादि । दीपाङ्गिन्ना वतियथा दीपमु- पास्य प्राप्य तादृशी भवति दीपरूपा भवति ॥ १७ ॥ भावार्थ-जिस विषयमें किसी मनुष्यकी, बुद्धि संलग्न नहीं होती- भले प्रकार माधान नहीं रहती---उमसेसे अनासक्ति बढ़कर अंडा उठ- जानी है, और जहांसे श्रद्धा उठजाती है वहीं फिर चित्तकी लीनता नहीं हो सकती। ..अतः किमी. विषय में श्रामक्ति न होनेका रहस्य बुद्धिको उस विषय की और अधिक न लगाना ही है-बुद्धिका जितना कम व्याः पार उस तरफ किया जायगा और उसे अहितकारी समझकरः जितना कुन योग दियाजायगा, उतनी हो उस विषय अनासक्ति होती जायगी। और फिर सुप्त तथा उन्मत्त अवस्था होजानेपर भी उस ओर चित्तकी वृत्ति नहीं जायगो ॥ ६६... जिस विषयमें चित्त लीन होना चाहिये वह ध्येय दो प्रकारका एक भिन्न, दुसरा अभिन्न । भिन्नात्मा ध्येय में लोनताका फल-क्या होगा, उसे बतलाते हैं- अन्वयार्थ- (आत्मा) यह प्रान्मा (भिन्नात्मानं) अपनेसे भिन्न अर्हन्त- सिद्धरूप परमात्माकी (उपास्य) उपासना-आराधना करके (तादृशः) उन्हीं: के समान (पर: भवति) परमात्मा होजाता है (यथा) जैसे (भिन्ना वर्तिः) दीपकसे भिन्न अस्तित्व रखनेवालो बत्तो भी ( दीपं. उपास्य ) दीपककी अाराधना करके उसका सामोप्य प्राप्त करके (तादृशी) दीपक स्वरूप भवति) . समाधितंत्र [९५] इदानीमभिन्नात्मनोपासने फलमाह--- उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमोऽथवा । मथित्वाऽऽत्मानमात्मैव जायतेऽग्निर्यथा तरुः॥१८॥ टीका-अथवा प्रात्मानमेव चित्स्वरूपमेव चिदानन्दमयमुपास्य यात्मा परमः परमात्मा जायते । अमुमेवार्थ दृष्टान्तद्वारेण समर्थयमानः प्राह- मथित्वेत्यादि । यथाऽऽत्मानमेव मथित्वा घर्षयित्वा तरुरात्मा (१) तरुः स्वत एवाग्निर्जायते ॥ ८ ॥ होजाती है। भावार्थ-जिसमें चित्तको लगाना चाहिये ऐसा आत्मध्येय दो प्रकार- का है-एक तो स्वयं अपना अात्मा, जिसे अभिन्न ध्येय कहते हैं और दूमरा वह भिन्न प्रात्मा जिसमें आत्मगुणोंका पूर्ण विकास होगया हो, जैम अर्हन्त-सिद्धका आत्मा, और जिसे भिन्न ध्येय समझना चाहिये । ऐसे भिन्न ध्येयकी उपासनासे भी बाल्मा परमात्मा बनजाता है । इसको समझानेके लिये बत्ती और दीपकका दृष्टान्त बड़ा ही सुन्दर दिया गया है। बत्ती अपना अस्तित्व और व्यक्ति-व भिन्न रग्वते हुए भी जब दीपक- की उपामनामें नन्मय होतो है-दोपकका सामीप्य प्रास करती है तो जल उठतो है और दोपकस्वरूप बन जाती है। यही भिन्नात्मध्येयरूप अर्हन्त-सिद्धकी उपासनाका फल है ॥ १७ ॥ अब अभिन्नात्माकी उपासनाका फल बतलाते हैं- अन्वयार्थ-(अथवा) अथवा (आत्मा) यह आत्मा ( आत्मानम् एव) अपने चित्स्वरूपकों हां (उपास्य) चिदानन्दमय रूपसे अाराधन करके ( परमः ) परमास्मा (जायते) होजाता है (यथा) जैसे (तरुः) बांसका वृक्ष (श्रात्मानं) अपनेको (आत्मैव ) अपनेसे ही (मथित्वा) रगड़कर (अग्निः) अग्निरूप (जायते) होजाता है। भावार्थ-जिस प्रकार बांसका वृक्ष बांसके साथ रगड़ खाकर अग्नि रूप होजाता है उसी प्रकार यह प्रात्मा भी प्रात्माकी-आत्मीय गुणोंकी- अाराधना करके परमात्मा बन जाता है। बांसके वृत्तमें जिस प्रकार अग्नि 7 [९६ ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला उक्तमर्थमुपसंहत्य फलमुपदर्शयन्नाह- इतीदं भावयेन्नित्यमवाचांगोचरं पदम् । स्वतएव तदाप्नोति यतो नावर्तते पुनः ॥ ६ ॥ इति एवमुक्तप्रकारेण इदं भिन्नमभिन्न चात्मस्वरूपं भावयेत् नित्यं सर्वदा । ततः किं भवति ? तत्पदं मोक्षस्थानं । कथम्भूतं ? अवाचांगोचरं वचनैरनिर्देश्यं । कथं तत्प्राप्नोति ? स्वत एव प्रात्मनैव परमार्थतो न पुन- गुर्वादिबाह्यनिमित्तात् । यतः प्राप्तात तत्पदानावर्तते संसारे पुनर्न भ्रमति || || शक्तिरूपसे विद्यमान होती है और अपने ही बांसरूपके साथ घर्षणका निमित्त पाकर प्रकट होजाती है उसी प्रकार आत्मामें भी पूर्ण ज्ञानादि गुण शक्तिरूपसे विद्यमान होते हैं और वे अात्माका आत्माके साथ संघर्ष होनेपर प्रकट होजाते हैं । अर्थात् जब आत्मा आत्मीय गुणोंकी प्राप्तिके लिये अपने अन्य बाह्याभ्यंतर संकल्प-विकल्परूप व्यापारोंसे उपयोगको हटाकर स्वरूप-चिंतनमें एकाग्र कर देता है तो उसके वे गुण प्रकट होजाते हैं उस संघर्षसे ध्यानरूपी अग्नि प्रकट होकर कर्मरूपी ईधनको जला देती है। और तभी यह आत्मा परमात्मा बन जाता है ॥१८॥ अब उक्त अर्थका उपसंहार करके फल दिखाते हुए कहते हैं- अन्वयार्थ-(इति) उक्त प्रकारसे (इद) भेद-अभेदरूप अात्मस्वरूपकी (नित्यं) निरन्तर (भावयेत् ) भावना करनी चाहिये । ऐसा करनेसे (तत्) उस (अवाचांगोचरं पद) अनिर्वचनीय परमात्मपदको (स्वत एव) स्वयं ही यह जीव (श्राप्नोति ) प्राप्त होता है (यतः) जिस पदसे (पुनः ) फिर (न आवर्तते) लौटना नहीं होता है--पुनर्जन्म लेकर संसारमें भ्रमण करना नहीं पड़ता है। भावार्थ-आत्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिये प्रास्मस्वरूके पूर्ण विकासको प्राप्त हुए अर्हन्त और सिद्ध परमात्माका हमें निरंतर ध्यान करना चाहिये-तदुरूप होनेकी भावनामें रत रहना चाहिये-अथवा अपने आत्माको आत्मस्वरूपमें स्थिर करनेका दृढ़ अभ्यास करना चाहिये । ऐसा समाधितंत्र [ ९७ ] न चासौ तत्त्वचतुष्टयात्मकाच्छरीरातत्त्वान्तरभूतः सिद्ध इति चार्वाकाः । सदैवात्मा मुक्तः सर्वदा स्वरूपोपलम्भसम्भवादिति सांख्यास्तान प्रत्याह- . अयत्नसाध्यं निर्वाणं चित्तत्त्वं भूतजं यदि । अन्यथा योगतस्तस्मान्न दुःखं योगिनां क्वचित् ॥ १० ॥ टीका-चित्तत्त्वं चेतनालक्षणं तत्त्वं यदि भूतजं पृथिव्यप्तेजोवायु- लक्षणभूतेभ्यो जातं ययभ्युपगम्यते तदाऽयत्नसाध्यं निर्वाणं यत्नेन तात्पर्येण होनेपर ही उस वचन-अगोचर अतीन्द्रिय परमात्मपदको प्राप्ति हो सकेगी, जिसे प्राप्त करके फिर इम जीवको दूसरा जन्म लेकर संसारमें भटकना नहीं पड़ता-वह सदाके लिये अपने ज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और सब प्रकारके दुःखोंसे छूट जाता है ।। ६६ ।। वह अात्मा पृथ्वो जल अग्नि वायु इन चार तत्त्वरूप जो शरीर है उससे भिन्न किसी दूसरे तत्त्वरूप सिद्ध नहीं होता है, ऐसा चार्वाक मत वाले मानते हैं, तथा आत्नाके सदा स्वरूपकी उपलब्धि संवेदना बनो रहनेसे वह सदा हो मुक्त है, ऐसा सांख्य लोगोंका मत, है इन दोनोंको लक्ष करके उनके प्रति प्राचार्य कहते हैं- अन्वयार्थ-(चित्तच्चम् ) चेतना लक्षणवाला यह जीव तत्त्व (यदि भूतज) यदि भूतज है-चावाकमनके अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुरूप भूतचतुष्टयसे उत्पन्न हुआ है अथवा सांख्यमतके अनुसार महज शुद्धात्मस्वरूपसे उत्पन्न है-उस शुद्धास्मस्वरूपके संवेदनद्वारा लब्धात्मरूप है, तो:(निर्वाणं) मोक्ष (अयत्नसाध्य) यत्नसे सिद्ध होनेवाला नहीं रहेगा अर्थात् चार्वाकमतको अपेक्षा, जो कि शरीरके छुट जानेपर आत्मामें किसी विशिष्टावस्थाको प्राप्तिका अभाव बतलाता है, सरणरूप शरीरका विनाश होनेसे प्रात्माका अभाव होजायगा और यहो अभाव बिना यत्नका निर्वाण होगा, जो इष्ट नहीं हो सकता । और सांख्यमनकी अपेक्षा स्वभावसे ही सदा शुद्धात्मस्वरूपका लाभ मानलेनेसे मोक्ष के लिये ध्यानादिका कोई उपाय करने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी, और इस तरह निरुपाय-मुक्तिको प्रसिद्धि होनेसे बिना यस्नके ही निर्वाणं होना ठहरेगा जो उस मतके अनुयायियोंको भी इष्ट नहीं है । (अन्यथां) T [९८] वोरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला साध्यं निर्वाण न भवति । एतच्छरीरपरित्यागेन .विशिष्टावस्थाप्राप्तयोगस्या- मन एव तन्मते अभावादित्यात्मनो मरणरूपविनाशादुत्तरकालमभावः । सांख्यमते तु भृतजं सहजं भवनं भूतं शुद्धात्मतत्त्वं तत्र जातं तत्स्वरूप संवेदकत्वेन लब्धात्मलाभं एवंविधं चित्तत्त्वं यदि तदाऽयत्नसाध्यं निर्वाण यत्नेन ध्यानानुष्ठानादिना साध्यं न भवति निर्वाणं । सदा शुद्धात्मस्वरूपा- नुभवे सर्वदेवात्मनो निरूपायमुक्तिप्रसिद्धः । अथवा निप्पन्नेतरयोग्य. पेक्षया प्रयत्नेत्यादिवचनम् । तत्र निष्पन्नयोग्यपेक्षया चित्तत्त्वं भूतजं स्वभावजं । भूतशब्दोऽत्र स्वभाववाची । मनो वाक्कायेन्द्रियैरविक्षिप्त- मात्मस्वरूपं भूतं तस्मिन् जातं तत्स्वरूपसंवेदकत्वेन लब्धात्मलाभं एवं- विघं चित्तत्त्वं यदि तदाऽयत्नसाध्यं निर्वाणं तथाविधमात्मस्वरूपमनु- भवतः कर्मबंधाभावतो निर्वाणस्याप्रयाससिद्धत्वात् । अथवा अन्यथा प्रारब्धयोग्यपेक्षया भूतजं चित्तत्वं न भवति । तदा योगतः स्वरूपसंवेदना- त्मकचित्तवृत्तिनिरोधाभ्यासप्रकर्षानिर्वाणं । यत एवं तस्मात् क्वचिदप्य- वस्थाविशेषे दुर्धरानुष्ठाने छेदनभेदनादौ वा योगिनां दुःखं न भवति । आनन्दात्मकस्वरूपसंवित्तौ तेषां तत्प्रभवदुःखसंवेदनासम्भवात् ।। १०.॥ यदिचैतन्य प्रामाभूतचतुष्टयजन्य तथा सदाशुद्धात्मस्वरूपका अनुभव करने वाला नित्य-मुक्त नहीं है। तो फिर (योगतः) योगसे-स्वरूप संवेदनात्मक चित्तवृत्तिके निरोधका दृढ अभ्यास करनेसे ही निर्वाणकी प्राप्ति होगी (तस्मात्) चूं कि वस्तुतत्त्वकी ऐसी स्थिति है इसलिये (योगिनां) निर्वाणके लिये प्रयत्नशील योगियोंको (क्वचित) किसी भी अवस्थामें-दुर्द्धरानुष्ठानके करने तथा छेदन-भेदनादिरूप उपसर्गके उपस्थित होनेपर-(दुःखं न) कोई दुःख नहीं होता है। भावार्थ--श्रात्मतत्त्व यद्यपि चेतनामय नित्य पदार्थ है परन्तु अनादि- कर्मपुद्गलोंके सम्बन्धसे विभावपरिणतिरूप परिणम रहा है और अपने स्वरूपमें स्थिर नहीं है। ध्यानादि सत्प्रयत्न द्वारा उस परिणतिका दूरहोना ही स्वरूपमें स्थिर होना है और उसीका नाम निर्वाण है। चार्वाककी कल्पनानुसार यह जीवात्मा भूतचतुष्टयजन्य नहीं है । भूतचतुष्टयजन्य अंनित्य शरीरको आस्मा मानना भ्रम तथा मिथ्या है और ऐसा माननेसे .
समाधितंत्र [९९] नन्वात्मना मरणरूपविनाशादुत्तरकालमभावसिद्धः कथं सर्वदा- ऽस्तित्व सिध्येदिति वदन्तं प्रत्याह- स्वप्ने दृष्टे विनष्टऽपिन नाशोस्त यथात्मनः। तथा जागरदृष्टेऽपि विपर्यासाविशेषतः ॥ १०१॥ शरीरका नाश होनेपर आत्माका स्वतः अभाव हो जाना ही निर्वाण ठहरेगा, जो किसी तरह भी इष्ट नहीं हो सकता। ऐसा कौन बुद्धिमान है जो स्वयं ही अपने नाशका प्रयत्न करे ? इसी तरह सांख्यमतकी कल्पनाके अनुसार प्रात्मा सदा ही शुद्ध-बुद्ध तथा स्वरूपोपलब्धिको लिये हुए नित्यमुक्तस्वरूप भी नहीं है। ऐसा माननेपर निर्वाणके लिये ध्यानादिके अनुष्ठानका कोई प्रयोजन तथा विधान नहीं बन सकेगा। सांख्यमतमें निर्वाणके लिये ध्यानादिका विधान है और इस लिये सदा शुद्वात्मस्वरूपकी उपलब्धिरूप मुक्तिकी वह कल्पना निःसार जान पड़ती है। जब ये दोनों कल्पनाएँ ठीक नहीं हैं तब जैनमतकी उक्त मान्यताको मानना ही ठीक होगा, और उसके अनुसार योगाराधनद्वारा स्वरूप- संवेदनात्मक चित्तवृत्तिके निरोधका दृढ अभ्यास करके सकल विभाव- परिणतिको हटाते हुए शुद्धात्मस्वरूपमें स्थितिरूप निर्वाणका होना बन सकेगा। इस अात्मसिद्धिके सदुद्देश्यको लेकर जो योगिजन योगाभ्यास: में प्रवृत्त होते हैं वे स्वेच्छाने अनेक दुर्द्धर तपश्चरणोंका अनुष्ठान करते हुए खेदखिन्न नहीं होते और न दूसरोंके किये हुए अथवा स्वयंवन पाए हुए उपसौंपर दुःख ही मानते हैं-ऐसी घटनाओंके घटनेपर वे बराबर अपने साम्यभावको स्थिर रखते हैं ॥ १० ॥ यदि कोई कहे कि मरणरूप विनाशके समुपस्थित होनेपर उत्तर-कालमें आत्माका सदा अस्तित्व कैसे बन सकता है ? ऐसा कहने वालों के प्रति आचार्य कहते हैं- अन्वयार्थ-(स्वप्ने) स्वमकी अवस्थामें ( दृष्ट विनष्ट अपि) प्रत्यक्ष देखेजाने वाले शरीरादिके विनाश होनेपर भी (यथा)जिस प्रकार (आत्मनः) आत्माका (नाशः न अस्ति) नाश नहीं होता है (तथा) उसी प्रकार (जागर- दृष्टे अपि) जाग्रत अवस्थामें भी दृष्ट शरीरादिकका विनाश होनेपर आत्मा [१०० ] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-स्वप्ने स्वप्नावस्थायां दृष्टे विनष्टेऽपि शरीरादौ प्रात्मनो यथा नाशो नास्ति तथा जागरदृष्टेऽपि जाग्रदवस्थायां दृष्ट विनष्टेऽपि शरीरादौ आत्मनो नाशो नास्ति । ननु स्वप्नावस्थायां भ्रांतिवशादात्मनो विनाश: प्रतिभातीति चेत्तदेतदन्यत्रापि समानं । न खलु शरीरविनाशे आत्मनो विनाशमभ्रान्तो मन्यते । तस्मादुभयत्राप्यात्मनो विनाशोऽनुपपन्नी विपर्यासाविशेषात् । यथैव हि स्वप्नावस्थायामविद्यमानेऽप्यात्मनो विनाशे विनाशः प्रतिभासत इति विपर्यासः तथा जांग्रवस्थायामपि ।। १०१।। नन्वेव प्रसिद्धस्याप्यनाद्यनिधनस्यात्मनो मुक्त्यर्थं दुई रानुष्ठानक्लेशो व्यर्थो ज्ञानभावनामात्रेणैव मुक्तिसिद्ध रित्याशङ्कयाह अदुःखभावितं ज्ञानं क्षीयते दुःखसन्निधौ । तस्माद्यथाबलं दुःखैरात्मानं भावयेन्मुनिः ।।१०२॥ का नाश नहीं होता है । (विपर्यासाविशेषतः) क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं- में जो विपरीत प्रतिभास होता है उसमें परस्पर कोई भेद नहीं है। भावार्थ-आत्मा वास्तवमें सत् पदर्थ है और सत्का कभी नाश नहीं होता-पर्यायें ज़रूर पलटा करती हैं। स्वप्न में शरीरका नाश होनेपर जिसप्रकार अात्माके नाशका भ्रम होजाता है किन्तु आत्माका नाश नहीं होता उसीप्रकार जाग्रत अवस्थामें भी शरीरपर्यायके विनाशसे जो आत्माका विनाश समझ लिया जाता है वह भ्रम ही है-दोनों ही अवस्थात्रोंमें होने वाले भ्रम समान हैं-एकको भ्रम मानना और दूसरेको भ्रम'माननेसे इनकार करना ठीक नहीं हैं । वस्तुतः झोंपड़ोके जलने पर जैसे तगत आकाश नहीं जलता वैसे ही शरीरके नष्ट होनेपर अात्मा भी नष्ट नहीं होता है। आत्मा एक अखंड और अविनाशी पदार्थ है उसके खण्ड तथा विनाशको कल्पना करना ही नितान्त मिथ्या है ॥ १०१ ॥ जब इसप्रकार आत्मा अनादिनिधन प्रसिद्ध है तो उसको मुक्तिके लिये दुर्द्धर तपश्चरणादिके द्वारा कष्ट उठाना व्यर्थ है; क्योंकि मात्र ज्ञान- * सुहेण भाविदं गाणं दुहे जादे विणस्सदि । तम्हा जहावलं.जोई अप्पा दुक्खेहिं भावए ।। ६२ ।। -मोक्षप्राभृते, कुन्दकुन्दः .. समाधितंत्र [ १०१ : टीका-प्रदुःखेन कायक्लेशादिकष्ट विना सुकुमारोपक्रमेण भावित- मेकाग्रतयो चेतसि पुनः पुनः संचिन्तितं ज्ञानं शरीरादिभ्यो भेदेनात्मस्वरूप- परिज्ञान क्षीयते अपकृष्यते । कस्मिन् ? दुःखसन्निधौ दुःखोपनिपाते सति । यत एवं तस्मात्कारणात् यथाबलं स्वशक्त्यनतिक्रमेण मुनियोंगी प्रात्मानं दुःखैर्भावयेत् कायक्लेशादिकष्टः सदाऽऽत्मस्वरूपं भावयेत् । कष्टसहो- भवन्सदाऽऽत्मस्वरूपं चिन्तयेदित्यर्थः ।। १०२ ।। ननु यद्यात्मा शरीरात्सर्वथाभिन्नस्तदा कथमात्मनि चलति नियमेन तच्चलेत् तिष्ठति तिष्ठदिति वदन्तं प्रत्याह- प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छाद्वेषप्रवर्तितात् । वायोः शरीरयंत्राणि वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु ॥ १०३ ॥ भावनासे ही मुक्तिंकी सिद्धि होती है, ऐसी धाशंका करने वालेके प्रति आचाय कहते हैं- अन्वयार्थ-(अदु:खभावितं ज्ञानं) जो भेदविज्ञान दुःखोंकी भावनासे रहित है-उपार्जनके लिये कुछ कष्ट उठाए बिना ही सहज सुकुमार उपाय-द्वारा बन पाता है-चढ़ (दुःखसन्निधौ) परिषह-उपसर्गादिक दुःखों- के उपस्थित होनेपर (क्षीयते ) नष्ट होजाता है। (तस्मात् ) इस लिये (मुनिः) अन्तरात्मा योगीको (यथाबलं) अपनी शक्तिके अनुसार (दुःखै) दुःखोंके साथ (श्रात्मानं भावयेत् ) आत्माकी शरीरादिसे भिन्न भावना करनी चाहिये। भावार्थ -जबतक योगो कायक्लेशादि तपश्चरणोंका अभ्यास करके कष्टसहिष्णु नहीं होता तबतक उसका ज्ञानाभ्यास-शरोरसे भिन्न प्रास्माका अनुभवन-भी स्थिर रहनेवाला नहीं होता । वह दुःखोंके अाजानेपर विचलित होजाता है और सारा भेदविज्ञान भूल जाता है। इस लिये ज्ञानभावनाके साथ कष्ट-सहनका अभ्यास होना चाहिये, जिस- से उपार्जन किया हुआ ज्ञान नष्ट न होने पावे ॥ १०२ ।। यदि आत्मा शरीरसे सर्वथा भिन्न है तो फिर आस्माके चलनेपर नियमसे शरीर कैसे चलता है और आस्माके ठहरनेपर शरीर कैसे ठहरता -- [ १०२ ] वीरसंवामन्दिर-ग्रन्थमाला टीका-प्रात्मनः सम्बंधिनः प्रयत्नाहायुः शरीरे समुच्चलति कथंम्भूतात् प्रयत्नात् ? इच्छाद्वेषप्रवर्तितात् रागद्वेषाभ्यां जनितात् । तत्र समुच्चलिताच्च वायोः शरीरयंत्राणि शरीराण्येव यंत्राणि शरीरयंत्राणि । किं पुनः शरीराणां यंत्रैः साधर्म्यं यतस्तानि यन्त्राणीत्युच्यन्ते ? इति चेत् उच्यते-यथा यंत्राणि काष्ठादिविनिर्मितसिंहव्याघ्रादीनि स्वसाध्यविविधक्रियाणां परप्रेरितानि प्रवर्तन्ते तथा शरीराण्यपीत्युभयोस्तुल्यता । तानि शरीरयंत्राणि वायोः सका- शाद्वर्तन्ते । केषु ? कर्मसु । कथम्भूतेषु ? स्वेषु स्वसाध्येषु ।। १०३ ।। तेषां शरीरयंत्राणामात्मन्यारोपाऽनारोपौ कृत्वा जडविवेकिनौ किं कुर्वत- इत्याह- है ? ऐसा पूछनेवालेके प्रति कहते हैं- अन्वयार्थ-(आत्मनः) आमाके (इच्छाद्वेषप्रवर्तितात् प्रयत्नात् ) राग और द्वेषकी प्रवृत्तिसे होनेवाले प्रयत्नमें (वायु:) वायु उत्पन्न होती है- वायुका शरीरमें संचार होता है (वायोः) पायुके संचारसे (शरीरयंत्राणि) शरीररूपी यंत्र (स्वेषु कर्मसु) अपने अपने कार्य करनेमें (वर्तन्ते) प्रवृत्त होते हैं। भावार्थ-पूर्वबद्ध कर्मोंके उदयसे आत्मामें राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, राग देषकी उत्पत्तिसे मन-वचन-काभकी क्रियारूप जो प्रयत्न उत्पन्न होता है उसमे आत्माके प्रदेश चंचल होते हैं, प्रात्मप्रदेशोंकी चंचलतासेशरीरके भीतरको वायु चलती है और उस वायुके चलनेसे शरीररूपी यंत्र अपना अपना कार्य करने में प्रवृत्त होते हैं। यदि कोई कहे कि शरोरोंकी यंत्रोंके साथ क्या कोई समान-धर्मता है जिसके कारण उन्हें यंत्र कहा जाता है तो इसके उत्तरमें इतना ही जानलेना चाहिये कि काष्ठादिके बनाये हुए हाथी घोड़े आदिरूप कलदार खिलोने जिस प्रकार दूसरोंकी प्रेरणाको पाकर हिलने-चलने लगजाते हैं अर्थात् अपनेसे किये जाने योग्य नाना प्रकारकी क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं, उसी प्रकार शरीरके अंग-उपांग भी वायुकी प्रेरणासे अपने योग्य कमौके करनेमें प्रवृत्त होते हैं। दोनों ही इस विवयमें समोन हैं ॥ १०३ ॥ उन शरीर-यंत्रोंकी आत्मामें आरोपना-अनारोपना करके जड़-विवेकी जीवक्या करते हैं, उसे बतलाते हैं- समाधितंत्र [१०३ ] तान्यात्मनिसमारोप्य साक्षाण्यास्तेऽसुखं जडः । त्यक्त्वाऽरोपं पुनर्विहान् प्राप्नोति परमं पदम् ॥१०४॥ टीका-तानि शरीरयंत्राणि साक्षाणि इंद्रियसहितानि श्रात्मनि समा- रोप्य गौरोऽहं सुलोचनोऽहमित्याधभेदरूपतया अात्मन्यध्यारोप्य जडो बहि- रात्मा असुखं सुखं वा यथा भवत्येवमास्ते । विद्वानन्तगत्मा पुनः प्राप्नोति किं ? तत्परमं पदं मोक्षं । किं कृत्वा ? त्यक्त्वा । कं ? प्रारोपं शरीरादीना- मात्मन्यध्यवसायम् ।। १०४ ॥ कथमसौ तं त्यजतीत्याह-अथवा स्वकृतग्रन्थार्थमुपसंहत्य फलमुपदर्श- यन्मुक्वेत्याह- मुक्त्वा परत्र परबुद्धिमहंधियं च, संसारदुःखजननी जननाद्विमुक्तः । अन्वयार्थ (जडः) मूर्ख बहिरास्मा (साक्षाणि) इन्द्रियों सहित(तानि) उन औदारिकादि शरीरयंत्रोंको ( अात्मनि समारोप्य ) आस्मामें आरोपण करके-मैं गोरा हूँ, मैं सुलोचन हूँ इत्यादि रूपसे उनमें आत्मत्वकी कल्पना करके-(असुखं आस्ते ) दुःख भोगता रहता है (पुनः) किन्तु (विद्वान) ज्ञानी अन्तरात्मा (आरोपं त्यक्त्वा) शरीरादिकमें प्रास्माकी कल्प- नाको छोड़कर (परमं पदं) परमपदरूप मोक्षको (प्राप्नोति) प्राप्त करलेता है भावार्थ-मृढ बहिरास्मा कर्मप्ररित शरीर और इंद्रियोंकी क्रियाओंको अपने प्रात्माकी ही क्रियायें समझता है और इस तरह भ्रममें पड़कर विषय-कषायोंके जालमें फँसता हुआ अपनेको दुखी बनाता है । प्रत्युत इसके, विवेकी अंतरात्मा ऐसा न करके शरीर और इंद्रियोंकी क्रियाओंको आत्मासे भिन्न अनुभव करता है और इस तरह विषय-कषायोंके जालमें न फंसकर कर्मबन्धनसे छूटता हुआ परमात्मपदको प्राप्त करके सदाके लिये परमानन्दमय हो जाता है ॥ १०४॥ प्रास्मा उस आरोपको कैसे छोड़ता है उसे बतलाते हैं अथवा श्री पूज्यपाद आचार्य अपने ग्रंथका उपसंहार करके फल प्रदर्शित करते हुए कहते हैं- [१०४ वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला ज्योतिर्मयं सुखमुपैति परात्मनिष्ठ- स्तन्मार्गमेतदधिगम्य समाधितंत्रम् ॥ १०५ ॥ टीका-उपैति प्राप्नोति । किं तत् ? सुखं । कथम्भूतं ? ज्योतिर्मयं ज्ञानात्मकं । किं विशिष्ट सन्नसौ तदुपैति ? जननाद्विमुक्तः संसाराद्विशेषेण मुक्तः । ततो मुक्तोऽप्यसौ कथम्भूतः सम्भवति ? परमात्मनिष्ठः परमात्म- स्वरूपसंवेदकः । किं कृत्वाऽसौ तन्निष्ठः स्यात् । मुक्त्वा । कां ? परमा- (परा ?)त्मबुद्धिं अहंधियं च स्वात्मबुद्धिं च । क ? परत्र शरीरादौ । कथम्भूतां ? संसारदुःखजननी चातुर्गतिकदुःखोत्पत्तिहेतुभूतां । यतस्तथाभूतां तां त्यजेत् । किं कृत्वा ? अधिगम्य । किं तत् ? समाधितंत्रं समाधेः पर- मात्मस्वरूपसंवेदनैकाग्रतायाः परमोदासीनताया वा तन्त्रं प्रतिपादकं शास्त्रं । कथम्भूतं तत् ? तन्मार्ग तस्य ज्योतिर्मयसुखस्य मार्गमुपायमिति ॥१०५।। अन्वयार्थ-(तन्मार्ग) उस परमपदकी प्राप्तिका उपाय बतलाने वाले (एतत् समाधितंत्रम्) इस समाधितंत्रको-परमात्मस्वरूप-संवेदनकी एका- ग्रताको लिये हुए जो समाधि उसके प्रतिपादक इस 'समाधितंत्र' नामक शास्त्रको (अधिगम्य) भलेप्रकार अनुभव करके (परात्मनिष्ठः) परमात्माकी भावनामें स्थिरचित्त हुआ अन्तरात्मा ( संसारदुःखजननी ) चतुर्गतिरूप संसारके दुःखोंको उत्पन्न करनेवाली (परत्र) शरीरादि परपदार्थों में (अहं- धियं परबुद्धिं च) जो स्वा-मवुद्धि नथा परात्मवुद्धि है उसको (मुक्त्वा) छोड़कर ( जननाद्विमुक्तः ) संसारसे मुक्त होता हुआ ( ज्योतिर्मयं सुखं) ज्ञानात्मक.सुखको (उपैति) प्राप्त करलेता है। 'भावार्थ-ईस पद्यमें, ग्रंथके विषयका उपसंहार करते हुए, श्री पूज्य- पाद आचार्यने उस वुद्धिको संसारके समस्त दुःखोंकी जननी बतलाया है जो शरीरादि परपदार्थों में स्वात्मा-परास्माका आरोप किये हुए है- अर्थात् अपने शरीरादिकको अपना आत्मा और परके शरीरादिको परका आत्मा समझती है। ऐसी दुःखमूलक बुद्धिका परित्याग कर जो जीवा- स्मा परमात्मामें निष्ठावान होताहै-परमात्माके स्वरूपको अपना स्वरूप समाधितंत्र [ १०५ ] टोका-प्रशस्तिः येनात्मा बहिरन्तरुत्तमभिंदा त्रेधा विवृत्योदितो, मोक्षोऽनन्तचतुष्टयाऽमलवपुः सयानतः कीर्तितः । जीयात्सोऽत्रजिनः समस्तविषयः श्रीपूज्यपादोऽमलो, भव्यानन्दकरः समाधिशतकश्रीमत्प्रभेन्दुः प्रभुः ॥ १ ॥ इति श्रीपण्डितप्रभाचन्द्रविरचिता समाधिशतकटीका समाप्ता ।। समझकर उसके श्राराधनमें तत्पर एवं सावधान होता है वह संसारके बन्धनोंसे छूटता हुआ केवलज्ञानमय परम सुग्वको प्राप्त होता है। साथ ही, यह भी बतलाया है कि यह 'समाधितंत्र' ग्रंथ उक्त परमसुख अथवा परमपदकी प्राप्तिका मार्ग है-उपाय प्रदर्शित करने वाला है। इसको भले प्रकार अध्ययन तथा अनुभव करके जीवनमें उतारनेसे वह प्राप्ति सुखसाध्य होजाती है और इस तरह इस ग्रंथकी भारी उपयोगिताको प्रदर्शित किया है ॥१०५ ॥ अन्तिम मंगल-कामना जिनके भक्ति-प्रसादसे, पूर्ण हुश्रा व्याख्यान । सबके उरमंदिर बसो, पूज्यपाद् भगवान ॥१॥. पढ़ें सुनें सब ग्रन्थ यह, सेवें अतिहित मान । श्रात्म-समुन्नति-बीज जी, करो जगत-कल्यान ॥२॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः [१६] वीरसेवामन्दिर-ग्रन्थमाला समाधितंत्र स्टीकका शुद्धिपत्र ब ५ वास श्वास कॉलंचक्रविनिर्मक्तः अशुद्ध कालचक्रविनिर्मुक श्रात्मनम् जलानया: भिन्न २६ ८ स्य वा १२ जनानलयाः भिन्न भिन्न कन्यत्रा त्यागः लीपमित्यम्यानित्यत्वं वरूपादप्रच्युतः इन्द्रियद्वारैः मूढ दिट्टीओ नरम् मन्यते मनुष्य १३ लोपमित्यस्य नियन्वं स्वरूपाप्रच्युनः. इन्दियद्वारः मुढनिट्ठीआ नरंम विमन्यते कनुप्य १३ १४ AS १४ * २३ ११ २९ १६ ५ १९ बेत्य नत्र वीर ३३ स्वरूपानां फरोनि स एवात्मधीः इन्द्रियेद्व लक्ष्णान परिज नात्पूर्व फिर उस पाञ्च अत्मानं अवव्ययं भुज्जनोऽपि माना है भुनानोऽपि वेत्त्य तन्न वीर्यका ३२ स्वरूपाणां करोति देहिनं स एवात्मा इनि धीः इंन्द्रियद्वारः लक्षणानू परिज्ञानात्पूर्व २३ उस ३३ ३५ ३७ १६ ५ ३८ . ३८ or w ...com पञ्चा मात्मानं अव्यय मुजानोऽपि जानता है मुश्चानोऽपि तस्य चेतसः यस्य चेतसः झानाभ्यास माजयेत ४४ ४९ धमोशम ज्ञानाभ्यास योजयेत् क्षयोपशम (Sचेतन) (प्रचेतन) २ ६ mar 11 ७७ विनाशोत्पादौ समाधितंत्र [ १०७ ] पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध मूढा मूढो १० (अम्तु) (अस्तु) अनात्मीयात्सभूतेषु अनात्मीयात्मभूतेषु ५८८ वहिरतमा बहिरात्मा ६० व्यवस्थितः व्यवस्थितः ६१ मूढात्मनो मूढात्मानो अन्तमुखा अन्तमुखी एवानुरोग दिति एवानुरागाद्विति फमके कर्मके ७१ स्थूलोऽह स्थूलोई मुढउ मूढ संगर्ग संसर्ग ७३ सकल्प संकल्प परमथितो परमार्थतो (निर्वाणिमेव) निर्वाणमेव) आत्मनो प्रात्मनः विनाशात्पाझे वन वलं ९ मुपुमाश्चात्मगोचरे सुषुप्ताश्चात्मगोचरं जागांत्मगाचरे जागांत्मगोचरे लतलति बतलाते पुण्यापुण्ययोव्ययो पुण्यापुण्ययोययो ८२ है। मन-हा-मन मन-ही-मन ९ होती है। अगम-सम्बम्धा आगम-सम्बन्धी देहाभेदेन देहाङ्देन ८९ मनुय मनुष्य ९२ पयवसान पर्यवसान ९२ रहाता रहता लीयूये लीयते ९६ प्रात्मस्वरूके आत्मस्वरूपके निर्वाण निर्वाणं ९८ तत्स्वरू तत्स्वरूप ९८ निर्वाण निर्वाणं १०२ कामकी कायको नोट-टूटी मात्रा तथा विन्दु-विसर्गदिकी दूसरी ऐसी साधारण अशुद्धियोंको यहां देने की जरूरत नहीं समझो गई जो पढ़ते समय सहज ही में मालुम पड़ जाती हैं। ७८ .. ८० Mov. होता है or ८७ ८९ ८ treen Focww . समाधितंत्रपद्यानां वर्णानुक्रमसूची य त ८६ / यत्त्यागाय निवर्तन्ते : न . ८ र अचेतनमिदं दृश्य- ४६ तथैव भावयदेहाद १९ प्रज्ञापितं न जानन्ति ५८ | तद्व्यात्तत्परान्पृच्छेत ५३ यत्परैः प्रतिपाद्यो हं अदुःखभावितं ज्ञानं १०२ / तान्यात्मनि समारोप्य १०४ | यत्पश्यामीन्द्रियैस्तन्म. ५१ ९६ यत्र नाहितधीः पुंसः त्यक्तैवं बहिरात्मान- अनन्तरज्ञः संधत्ते २७ यत्रवाहितधीः पुंसः ९५ अपमानादयस्तस्य ३८ / न्यागादाने बहिर्मूढः ४७ यथामौ चेष्टते स्थाणौ २२ अपुण्यमव्रतैः पुण्यं ८३ द २० यदग्राह्यं न गृह्णाति हदामबुद्धिदहादा- अयत्नसाध्यं निर्वाणं १०० ७६ यदन्तजेल्पसंपृक्त ८५ दृश्यमानमिदं मूढस् ४४ अविक्षिप्तं मनस्तत्त्वं ३६ यदभावे सुपुप्तोऽहं ९२ दृष्टिभेदो यथा दृष्टिं अविद्याभ्याससंस्कारैः ३७ ४० गत्र काये मुन: प्रेम अविद्यासंज्ञितरतस्मात् १२ देहान्तरगतेजिं यदा मोहात्प्रजायने ३९ देहे स्वबुद्धिरात्मानं अनतानि परित्यज्य १३ / यद्वोधयितुमिच्छामि ५९ अवतीव्रतमादाय ८६ देहे स्वात्मधिया जाताः १४ | यन्मया दृश्यते रूपं १८ यम्य मस्पन्दमाभाति ६७ आत्मज्ञानात्परं कार्थ ५० न जानन्ति शरीराणि ६१ युंजीत मनसात्मानं ४८ आत्मदेहान्तरज्ञान ३४ न तदस्तीन्द्रियार्थपु ५५ यनात्मनानुभूये:- २३ आत्मन्येवात्मधीरन्यां ७७ | नयत्यात्मानमात्मैव ७५ अनात्माऽवुध्यतात्मैव आत्मविभ्रमजं दुःख- ४१ / नरदेहस्थमात्मान- योन वेत्ति परं देहा ३३ आत्मानमन्तरे दृष्ट्वा नष्टे वस्त्रे यथात्मानं ६५ | यः परात्मा स एवाह ३१ नारकं नारकांगम्थं ९ इतीदं भावयेन्नित्य- ९९ | निर्मलः केवलः शुद्धो ६ | रक्ते वखे यथात्मानं ६६ रागद्वेपादिकल्लोलेः २५ उत्पन्नपुरुषभ्रान्ते २१ / परत्राहं मतिः स्वस्माच् ४३ उपास्यात्मानमेवात्मा ९८ पश्यनिरन्तरं देह ५७ | लिंगं देहाश्रितं दृष्टं पूर्व दृष्टात्मतत्त्वस्य व एवं त्यक्त्वा बहिर्वाचं १७ विदिताशेषशास्त्रोऽपि ९४ प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं ३२ क्षीयन्तेऽत्रैव रागाद्या- २५ / प्रयत्नादात्मनो वायु-१०३ / व्यवहारे सुषुप्नो यः प्रविशद् गलतां व्यूहे ६९ शरीरकंचुकंनात्मा ६८ गौरः स्थूलः कृशोवाह- ७० बहिरन्तः परश्वति प्रामोऽरण्यमिति द्वेधा ७३ शरीरे.वाच चात्मानं ५४ ४ बहिरात्मा शरीराती ५ | शुभंशरीरं दिव्यांश्च ४२ घन वस्ने यथात्मानं ६३ / बहिरात्मेन्द्रियद्वारैः शृण्वन्नप्यन्यतः कामं ८१ बहिन्तुष्यति मूढात्मा ६० | श्रुतेन लिंगेन यथात्म- चिरं सुषुप्तास्तमसि ५६ भिन्नात्मानमुपास्यात्मा ९७ / सर्वेन्द्रियाणि संयम्य ३० जगद्दहात्मदृष्टीनां • ४९ ५२ जनेभ्यो वाक् ततः स्पन्दो ७२ मत्तश्च्युत्वेन्द्रियद्वारैः १६ सुप्तोन्भेत्ताद्यवस्थैव ९३ जयन्ति यस्यावदोऽपि २ मामपश्यन्नयं लोको २६ / सोऽहमित्यात्तसंस्कारम् २८ जातिदेहाश्रिता दृष्टा ८ | मुक्तिरेकान्तिकी तस्य ७१ | स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा १० जातिलिंगविकल्पेन ९९ मुक्त्वा परत्र परबुद्धि- १०५ | स्वपराध्यवसायेन ११ जानन्नप्यात्मनस्तत्त्वं ४५ मूढात्मा यत्र विश्वस्तस् २९ स्वप्नं दृष्टे विनष्टेऽपि १०१ जीर्णं वने यथात्मान. . ६४ / मूलं संसारदुःखस्य १५ । स्वबुध्या यावद् गृणंहीयात् ६२ ए क ७८ ग ब . घ । च ३ भ सुखमारब्धयोगस्य . . , .