Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Darshan Vishuddi

Suri, Vijaychandra · 2011/03

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दर्शन विशुद्धि
लेखक
पूज्यपाद् प्राचार्य देव श्री विजयचन्द्र सूरीश्वरजी
महाराज साहेबके गिप्यरत्न
शासनप्रभावक पूज्य गरिएवर्य श्री भुवनविजयजी महारान
प्रवाश
श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्री संघ
उदयपुर
पीर स २५०४ ]
[ विक्रम स २०३४

प्रकाशक:-
श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ
उदयपुर
प्राप्ति स्थान
श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ
श्रीसंघ
मालदास स्ट्रीट,
उदय पुर-३१३००१
प्रथम आवृति- १५००
मूल्य- २.५० रु.
मुद्रक :-
विपिन बिहारी मेहता
तरुण प्रिन्टर्स
भामाशाह मार्ग,
उ द य पुर.

भावी तीर्थकर देवाधिदेव श्री पद्मनाथ स्वामी उदयपुर

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निवेदन मौराष्ट्र केशरी शासन प्रभावक पुज्य गणीवर्य श्री भुवन विजयजी महाराज माव एव मृदुभाषी पुज्य मुनिराज श्री यगोविजयजी महाराज गत वर्ष का चातुर्माम शिरपुर (खानदेश) मे यंगस्वीरुप से परिपुर्ण कर वहा से माडवगढ तीर्य के लिये छ री पालता सघ लेकर पंधारे, वहा मे मध्यप्रदेश सभाग का विहारपुर्ण कर उन्हैल पधारे। वही - दिनो कि स्थिरता मे पुज्य गणीवय श्री के उपदेग में श्री नागेश्वर तीर्थ का छरी पालता संघ निकाला गया। इन्हीं दिनो उदयपुर श्री मघ को मुनिद्वय के पधारने की सुचना मिली तब तक तो मुनिवर चित्तौड पधार गये थे निश्चित समाचार प्राप्त होते हि श्री मघ का एक प्रतिनिधिमडल पाण्डोली पहुचा और वन्दन करने के बाद विधिवत पुज्य गणीवयं श्री को उदयपुर मे इन वर्ष का चातुर्माम करने का भाव भरा निवेदन किया। गणीवयं श्री ने भुपालसागर की यात्रा करते हुवे उदयपुर होकर श्री केशरीयानाथ की यात्रा करने कि अपनी इन्चा मे हमे अवगत कराया, और इसी क्रम मे उदयपुर शहर मे पुज्य गणीवर्य श्री का प्रवेश हुवा। प्रथम व्यास्यांन सुनकर सभी थावक श्राविका मनमुग्ध हो गये एव समी कि यही प्रबल माग रही कि पुज्य श्री का उदयपुर मे ही चातुर्मास कराया जाय । अनेक विध प्रार्थना करने पर भी ( II ) पुज्य श्री ने तव तक अपना मन्तव्य प्रगट नही किया और श्री केशरीयाजी को यात्रा का विहार कर दिया तव भारी संख्या में श्रावक श्राविकाए केशरीयाजी पहुंचे और वहा भी पुर्ण हार्दिक भावना से चातुर्मास के लिये विनती की गई। इन्ही दिनो अहमदावाद, जयपुर, मारवाड आदि स्थानो के श्रावक वर्ग अपने स्थानों पर चातुर्मास करवाने के लिये पहले ही उपस्थित थे, परन्तु वहा भी किसी को कोई निश्चित उत्तर नहीं मिल सका सभी को एक हि मन्तव्य दर्शाया कि हम यहा से विहार कर सिधा पाली- ताना पुज्य आचार्य श्री के पास पहुंचेगे चुकि वहा से समाचार आये है कि पुज्य आचार्य श्री का स्वास्थ्य खराब है इस लिये हमारा वहा जाना अत्यन्त आवश्यक है। तब उदयपुर श्री संघ के कार्यकर्ता पुज्य श्री से एक पत्र लेकर पालीताना पहुंचे अनेक विध अनुनय विनय के पश्चात अन्ततोगत्वा पुज्य आचार्य महाराज साहब का स्वीकृतिमुलक आदेश प्राप्त हो हि गया और वह आदेश पत्र लेकर सभी डुगरपुर पहुंचे जहा पुज्य गणीवर्य श्री विहार कर पहुंचे ही थे। पुनः पुज्य श्री से निवेदन किया गया और फलस्वरुप शासन देव कि असीम अनुकम्पा से अक्षयतृतिया को उदयपुर चातुर्मास करने कि जय बोला दी गई। दिनांक १५-५-७७ को उदयपुर श्री संघ ने अपने परम्परा- गत रूप से नगर प्रवेश करवाया ओर तब से प्रतिदिन भारी संख्या मे सभी वर्ग एवं श्रावक श्राविका व्याख्यान का आस्वादन ( III ) लेने आने लगे। पुज्य गणीवर्य श्री के तात्विक व्याख्यानो मे सभी प्रभावित हुवे है। इसी अवधी मे अनेक धार्मिक अनुष्ठान एव बडी वटी तपश्चर्याये भी हुई प्रमुख रूप से श्री शखेश्वर पार्श्वनाथ जी के अप्ठ्छम तप. श्री गौतमस्वामिजी के छल्छ एव स्वस्तिक तप को आराधना उल्लास पुर्वक हुई। पचायती नोहरे मे इसी अनुक्रम म पर्वाधिराज पर्यु पण महापर्व कि भव्य आराधना भी सम्पन्न हुई। कालान्तर में व्याख्यान फ्रम मे "उपदेशमाला ग्रन्य" का श्रवण, मनन करते हुवे हमारे मनमे "मूर्तिपूजा शाश्वत है तो अपने हि कुछ बन्यु उसका इतना प्रवल विरोध क्यो करते है ? ऐसा समस्यामुलक प्रश्न पंदा हुवा। इस प्रश्न का अत्यन्त मार्मिक नाविर एव गास्त्रीय आधार पर, समानानात्मक उत्तर देते हुवे पुज्य श्री ने मवका ममुचित समाधान किया। ? झे लगा कि इस महत्वपूर्ण विषय पर उज्य थी कोई लेखबद्ध रचना लिये। हमारी प्रार्थना स्वीकार कर पुज्य श्री ने बिलकुरा माध्यस्त इप्टी में “दर्गन विशुद्धि" नामक पुस्तक कि रचना की। इस महान कार्य के लिये उदयपुर श्री मघ पुज्य श्री का बहुत-बहुत कृणी रहेगा। पुज्य श्री ने यह पुस्तक वडो उच्च भाषा मे लिखी है इममे किसि के प्रति कोई द्वेग भावना रखे बिना 'विपया पर मास्त्रीय ग्राधार पर मार्गदर्शन किया है।

( Iv ) । 1 • इस महत्वपूर्ण पुस्त कि प्रेश काँपी तैयार करने में श्रीमति राजमणी (धर्मपलि श्री उगरसिंहजी गौरवाडा) का महत्व पूर्ण योगदान रहा है एवं सुचि में दिये गये धर्मानुरागी महानुभावों का आर्थिक योगदान ओर तत्परता से प्रकाशित करने में तरुण प्रिन्टल को सहयोग रहा इन सभि के सद्प्रयासों के लिये हम सबका बहुत बहुत आभार मानते है। अन्त मे आगा यहि है कि सभी मुमुक्ष जन इस मार्मिक पुस्तक का अध्ययन एवं मनन करके सारग्रहण कर अपने जीवन को सफल बनावे। इसी अभिलाषा के साथ- ० जैन भवदीय के० एल० मन्त्री श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्री संग उ द य पुर (राज.)

देवाधिदेव श्री सहस्त्रफणा पार्श्वनाय स्वामी
उदयपुर
road
पू. गगोव्य श्री भुवन विजयजीमा पा. व मुनिधी यगोविनयजी मा सा
दर्शन करते हुए।

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उपोद्घात है वि-म- २०३४ को साका नातुर्मास मेवाड की राजधानी उदयपुर शहर में होने जा रहा है चातुर्मास मे अनेा धर्मानुष्ठान गो के माथ गामन प्रभावसारे भी बन्न मे महान कार्य हुए - गवमे का महान कार्य तो यह हुग्रा की थीसघ की कई वर्षों में विगाल पालय के लिए नया परीदने की भावना थी वह नावना भी इन पाल चातुर्माम गे पूर्ण हो गई है। चातुर्मास प्राधनामय व अत्यन्न पानिपूर्ण हुमा है। मेगाट के महान तीय केशरीयाजी,करेडा पार्श्वनाथ,चित्तोड- गढ वो तीयों की यात्रा का नो अपूर्व नाम मिना, महान तीर्थ केगरीयाजी पो यात्रा के ध्येय से ही घर की क्षेत्र म्पन्ना मेगा एव नागः प्रदेश के बहत मे क्षेत्रो को पर्गना की है यो गानिमदिगोदान बदन का अपूर्व लाभ प्राप्त दुग्रा -मवार में बगेका प्रत्येक धेरे में प्राचीन जिन मदिर गाणे गांव म जेनी रहा है जीरे पूर्वजोने भव्य मंदिर निर्मा, राप मगर गरमी पा सपांगुट जाने में वे मूर्ति VI पूजा से विमुख बन गये है-इससे मंदिरो में आशातनाए भी बहुत हो रही है. जहा उपासना करने वाले नही है वहां और क्या होने वाला है। इधर की परिस्थिति का माप निकाल के मंने यह "दर्शन विशुद्धि नामक छोटी सी पुस्तिका लीखी है इस पुस्तिका में प्रतिमा पूजन भी सामायिक प्रतिक्रमण पौपधादि अनुष्ठानो की माफक शास्त्र परंपरा मान्य अनृण्ठान है, प्रतिमा पूजा आज कल से नहीं मगर अनादिकाल से है जिनप्रतिमा जिनसारिखी-याने जिनप्रतिमा साक्षात् जिनेश्वर के समान है-इन सब बातो की पुस्तिका मे सिद्धि की गई है। प्रतिदिन जिन प्रतिमा के दर्शन वंदन एवं पूजन से क्या क्या आत्मिक लाभ होते है वह वरावर बताया गया है श्री भगवती सूत्र ठाणांग सूत्र रायपसेणी सूत्र जिवाभिगम सूत्र उपादनांग सूत्र महा- कल्प सूत्र प्रशमरति सूत्र वगेरे सुत्रो के पाठो पर से प्रतिमा पूजन की सिद्धि की गइ है सूत्रो के पाठ भी दीए गये है- जैसे की प्रदेशी राजा का जीव यहां से मृत्यु पाकर सौधर्म देवलोक में सूर्याभ नामक देव हुआ है वहां पहले रत्नमय पुस्तकका वाचन करके धार्मिक व्यवसाय करने की इच्छापूर्वक जहां नंदा नाम की बावडी है वहां जाते है ओर बावड़ी में हाथ पांव का पक्षालन करने पूर्वक शरीर के सर्व अवयवो की शुद्धि कर लेते है VII उसके बाद बावडी मे से चादी के कलश मे निर्मल जल एव कमल के फून हाथमे धारण करके। 16 जेणेव सिद्धाययणे तेणेव उवागड उवागच्छिता मिहाय- याणस पुरन्थि मिल्लेण दारेण अणुपविमइ जेणेव देवन्दए जेणेव जिण पडिमानो तेरणेव उवागच्छड उवागच्छिता जिण पडिमाण पालोए पणाम करेइ करेइत्ता लोमहत्यय गेण्हर, गेण्हिता जिणाडिमाण लोमहत्यएण पमज्जड पमज्जइत्ता जिण पडिमानो सुरभिणा गवोहदएण व्हावेइ व्हावेइत्ता सरसेण गोसीस बदरणेण गायाइ अणुलिपइ अणुलिपइत्ता जिणपडिमाण ग्रह्याइ सेयाइ देवदू सजुयथलाइ नियसेइ नियसेइत्ता पुप्फारुहण मल्लारुहण गधारहण वण्णरुहण चुण्णाम्हण आभरणारण करेड। - जहा सिद्धायतन है वहा सूर्याभदेव सर्व-ऋद्वि के साथ पहुचता है और सिद्धायतन मे पूर्व दिशा के द्वार से प्रवेश करके जहा देव छदक एव जिन प्रतिमाए है वहा पहुच के जिनप्रतिमाओं का दान परके प्रणाम करता है प्रणाम करके मयूर पिच्छसे जिनप्रतिमानो का प्रमार्जन करता है उसके बाद पवित्र जल मे अग्हित परमात्मा की प्रतिमायो का अभिषेक करता है उसके बाद अगलूच्छणाग्रो से प्रतिमाजी को पोछता है पोछने के बाद गोशीप चदन से विपन करता है दिव्यवस्त्रयुगल प्रतिमाजी पर चटाता है जैसे जिनमदिरो मे प्रतिमाजी पर भव्य स ग रचना होती है जिसको प्रागी कहते है- VIII और सत्तरा भेदी पूजा मैं अभीभी वस्त्र युगल प्रभु के समीप रग्बने में पाते है-देवदूस्य पहनाने के बाद सूर्याभ ने प्रतिमाजी पर पुप्प चढाए सुगंधमय पदार्थों का प्रतिमाजी पर आरोपण किया-मुगट अलंकार पहनाए-प्रतिमाजी के समक्ष स्वस्तिक दर्पण वगेरे अष्ट मंगल का आलेखन कीया उसके वाद "धूवं दाऊण जिणवराणं" जिनेश्वर भगवान के समक्ष धूप जला के धूप पूजा की। "धूव दाऊण जिगावराणं" इस गयप्पसेणी सूत्र के पाठ पर से सिद्ध होता है की जिन प्रतिमो जिनेवर के समान है क्योकी पाठमे साफ लिखा है की जिनेश्वर के समक्ष धूप कीया-धूप करने के बाद एक लो आठ अर्थ गंभीर श्लोको से प्रतिमाजी समक्ष परमात्मा की स्तवना कीया उसके बाद नमुत्थूण के पाठ से चैत्य वंदना की-यह सारी विधि रायप्पसेणी मूत्र में विस्तृत विवेचन से लीखी हुई है मैने पाठ का संक्षेप करके विवेचन दीया है अरिहंत की प्रतिमा को साक्षात अरिहंत समज के देव जो सर्वोत्तम द्रव्यो से परमात्मा की पूजा उपासना करते है वह नास्त्रो मे पढते है तव रोम रोम खडे हो जाते है और मन मे विचार आते है की समकिति देवो के हृदय में जिनेश्वर परमात्मा के प्रति कीतनि विवेकपूर्ण भक्ति होती है-सूर्याभ ने जैसे अरिहत परमात्मा की विधिपूर्वक पूजा की है वैसे ही यहा पर भी प्रत्येक जिन मंदिरो मे पूजा उपासना होती है समकित की IX करणी में चाहे देवलोक हो के मृत्यु लोक हो कही अतर नही रहता है महान गीतार्थ पुरुषो की परपरा से जो प्राचार चला या रहा है उसे जीत पाचार कहते है उस पाचार मे भी पूजा उपासना करने वाले महान पुन्य के भागी बनते है जो के समकिति देव तो धर्मबुद्धि से शाश्वत अरिहत परमात्मा की प्रतिमाए पूजते है मगर जीत पाचार में भी शुभकरणी की जाय तो पुन्य वध का कही निपेघ नहीं कीया गया है विशेष सूर्याभदेव का अधिकार इसी पुस्तक में दीया हुआ है वाचक वही मे पढ़ लेवे उपोद्घात मे तो सूत्र पाठ का थोडा नमुना बताया है पुस्तिका में तो बहुत से ) पाठ दीये है ऐसा ही जिवाभिगम मूत्र मे विजयदेव का अधिकार आया है-ज्ञाता सूत्र में द्रोपदी का अधिकार आया है । हिंसा हिंसा पुकार के यदि जिन पूजा का निषेध किया जाता है तो मुनिविहार सुपानदान म्वामिवात्मल्य, पुस्तक छपाना, दूर विराजे हुए साधु साध्वीजीयो को दर्शनवदनार्थ जाना इन सभी धर्मप्रवृत्तियो का निषेध करना पडेगा-क्योकि हिंसा का दोप इन सभी क्रियानो मे थोडा बहुत लगेगा हो-इसीलिए जहा महान लाभ होता हो वहा सामान्य दोप गीनती में नही लीया जाता है- इस बात पर पुस्तक में विस्तृत विवेचन दीया है अनुवध हिंसा, हेतु हिंसा, और स्वरप हिंसा ये हिंसा के तीन प्रकार है उसमे मिथ्या द्रप्टियो को रोद्र परिणाम से एव जिनाना का उल्लघन करने से जो हिंसा लगती है वह अनुवध हिंसा है प्रत्येक कार्य में जतना का X पालन नहीं करने से हिसा लगती है वह हेतुहिंसा और मनमे सम्पूर्ण अहिसक भाव होने पर भी सुपात्रदान, स्वामिवात्सल्य मुनि को विहार में नदी पार करने मे,श्रावक को जिनपूजा वगेरे धार्मिक अनुष्ठानो मे जो सामान्य दोप लगता है वह स्वरुप हिंसा है इस तरह से सूक्ष्म बुद्धि से हिसा अहिसा का स्वरुप जानने से मन का संपूर्ण समाधान हो शक्ता है स्वरुप हिंसा देखने पूरती सावध है मगर परिणामे निरवद्य है, जमाली वगेरे ने उपर उपर से दया धर्म का बहुत पालन कीया मगर जिनाज्ञा भंग रुप अनुबंध हिंसा का दोष लगाने से आखिर वे कष्ट को ही प्राप्त हुए है मगर दया धर्म का वास्तविक फल उन्हे नही मिला है दया धर्म का मूल है मगर जिनाज्ञापूर्वक की दया ही वास्तविक धर्म है यह बात भूलने योग्य नही है। जिसको देखके आत्मा के ज्ञानादि गुणो का एव आत्मा के शुद्ध स्वरुप का चितन होवे उसी को चैत्य कहते है इसलीए जिन मंदिर एवं जिन प्रतिमाही चैत्य शब्द का वास्तविक अर्थ होता है इस बात पर एवं मानसिक एकाग्रता के लिए प्रतिमा का पालंबन कितना जरुरी ही है इस बात पर भी पुस्तिका मे काफी प्रकाश डाला है। पुस्तिका मे आगम शास्त्र के पाठ उपरांत पू-कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्यजी पू-पानंदघनजी पू-उपाध्याय यशोविजयजी पू- XI उपाध्याय देवचद्रजी वगेरे महापुरपो के कइ जगो पर श्लोक एवं म्तवनो की गाथाए पर विवेचन दीया गया है पू-पानदघनजी के नोवे सुविधिनाथ भगवान के स्तवन पर का पुरा विवेचन पुस्तिका मे छपाया है। उस स्तवन पर के विवेचन का वाचन करने से वहुत मे सशय विच्छिन्न हो जायगे। . मुनिश्री यशोविजयजी ने प्रफ वगेरे का ससोधन अच्छे ढग से कीया है प्रत्येक शुभ प्रवृत्ति मे मुनिथी का सहयोग रहता है इसलीए उनको आशीर्वाद देता हु की ऐसे शुभ कार्यों में उनका मन निरतर लगा रहे। " उदयपूर श्री नन श्वेतावर मूर्तिपूजक श्रीसघ ने पुस्तक प्रकाशन का कार्य करते सम्यग्ज्ञान प्रचार का अपूर्व लाम उठाया है इस बदल श्रीसच को पन्यवाद दे रहा हु जिन जिन मुमुक्षु भाई बहनो ने पुस्तक प्रकागीत होने के पहले इस ज्ञान प्रचार के गुभ कार्य में सहयोग दीया है वे भी धन्यवाद के पात्र बने है । पुस्तक में जो अष्ट्रिया रह गड है उसका शुद्धिपत्रक छपाया गया है वाचन के समय गुद्धिपत्रक का अवश्य ख्याल रखे। पुग्नक में शास्त्र विरुद्ध कुछ भी लोखा गया हो लो मिच्छामि दृक्कडम् दे रहा है।

XII
वांचक इस पुस्तिका का वाचन मनन कर के इसमें से सार
अहण कर यथाशक्ति पाचरण करके अपने जीवन को सफल बनावे
इसी अभिलाषा के साथ उपोद्घात पूण कर रहा है।
वि-सं-२०३४
कार्तिक शूक्ला पंचमी
अजितनाथ जैन
धर्मशाला
उदयपुर
( राजस्थान)
मुनिभुवन विजय गरणी

.
Ja
I
पू प्राचार्य देव श्री विजय चन्द्र सुरीश्वरजी
मा सा के शिप्यरत्ल शासन प्रभावक पूज्य गणीवय
श्री भुवन विजयजी मा मा

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दर्शन विशुद्धि प्रतिष्ठा एवं सम्यग् दर्शन, सम्यग् जान और मन्यम् चारिय स्वप मो माग की सिद्धि के लिये जैन धर्म गाम्बो म अनेक धर्मानुष्ठान बनाये गये है। धर्मानुष्ठान यदि मोच पद की प्राप्ति के व्येवम किये जाते है तो उन्हें अमृतानुष्ठान बहे जाते है और जो भान भौतिक मुख की प्राप्ति रे ध्येय मे अनुष्ठान किये नाने है तो उन्हें विपानुष्ठान कहे जाते है। भीतर के ग्रगृभ प्राशय में कितने भी वर्मानुष्ठान क्येि ना उममे वाम्नविक मिद्वि नही मिलती है। धर्मानुष्ठान यदि शुद्धाशय पूर्वक रिये जाये तो प्राबिर तात्विक फलम्वरप माक्ष पद की प्राप्ति होती है। भीतर के प्रागय को नो अपन स्वय ही जान सकते है अथवा अतिढिय नानी पुस्प जान सकते है। ऊपर ऊपर मे कई महान पर्मात्मा दीखते है मगर भीतर के उनकै मन परिणाम इतने दर्पित होते है कि मच्चे अर्थ में वे वर्मात्मा नहीं कहे जा सकते है। भीतर के गुद्धाशय के प्रभाव में धर्म निया अमृत त्रिया बनती है वह क्रिया को भीतर का अद्धाशय विप क्रिया में पलट देता है। अमृत शिन्या के प्रभाव में प्रान्मा आखिर अजरत्व एव अमरत्व को प्राप्त कर लेता है जबकि विपक्रिया के प्रभाव में यात्मा चौरागो के चक्कर म भटक्ता ही रहता है।

- दिद्धि दर्शन विशुद्धि का महान प्रालंबन ग्रात्मा में अनत गुण है मगर उन गृणो मे मम्यग् दर्शन मम्यग् ज्ञान और सम्यग चारित्र ये मुख्य गुण है। इन्हीं के विकास के लिये एव इन्ही गुणों की आराधना के लिये आगम शास्त्रों में बहुत से अनुष्ठान बतलाये गये हैं। उसमे प्रतिदिन जिन मंदिर में जाकर के जिनप्रतिमा का दर्शन, वंदन एवं पूजन करना वह दर्शन विशुद्धि का महान प्रालंबन हैं। ज्योति से ज्योति प्रगट होती है वैसे ही परमात्मा के दर्शन से ही मन्त में प्रात्म दर्शन होता है। जिन प्रतिमा के दर्शन से मात्म स्वरुप की पहचान होती हैं। जिन प्रतिमा के दर्शन, पूजन के समय भवि जीव ऐसी भावना करता है कि है नाथ ! जैसा शुद्ध स्वरूप आपका है वैसा ही तत्व द्रष्टि से मेरी आत्मा का है मगर नाथ ! मेरी प्रात्मा पर आठ कर्मों के आवरण लगे हुए है इससे मेरा शुद्ध स्वरूप कर्मों के प्रावरण से छाया हुआ है और आपने कर्मो के ओवरणों को हटा कर अपना शुद्ध-स्वरूप प्रगट कर लिया है। नाथ ! आप ज्योतिर्घर बने हुए हैं जबकि सेवक का ग्रात्मा कर्म पड़ल से छाया हुआ है। आप ही की कृपा से यदि वर्गों के पडल हट जाय तो ज्योत से ज्योत मिलने में क्या देर लगने वाली है याने कर्मो के बंधन तोड़ के सेवक का आत्मा भी दर्शन विशुद्धि निमन ज्योति स्वस्प बन सकता है। नाथ । आप ही ने फर- माया है कि मत् पुस्पार्थ के बल में कर्मों के वधन तोड के कोई भी भवि जीव अन्त में परमात्म पद को प्राप्त कर सकता है। इलिका भमरी के ध्यान से भमरीपद को प्राप्त कर लेती हे वैमे ही परमात्मा के ध्यान से आत्मा परमात्म पद को प्राप्त कर लेता है। प्रतिमा के पालवन से ऐसा चिंतन बडी आसानी से होता है। प्रभु प्रतिमा के योग से जीव को अपनी प्रभुता का ख्याल अाता है । पर्याय दृष्टि से आत्मा और परमात्मा के बीच कितना भी अन्तर क्यो न हो? मगर द्रव्य दृष्टि से अथवा निश्चय दृष्टि से लव लेश भी अन्तर नही है। निश्चय दृष्टि से जो सिद्ध का स्वभाव है वही एक निगोद मे रहे हुए जीव का स्वभाव हैं । जो अन्तर है वह व्यवहार द्रप्टि में है और वह अन्तर इतना ही है कि ससारी जीव कमों से पाच्छादित है और सिद्ध जीव मुक्त बने हुए है। ऐसा स्वरूप का दर्गन हो जाय वही सम्यग् दर्शन है तथा वह प्रतिमा का पालन लिए बिना होना बहुत कठिन है। अध्यवसायो का सामर्थ्य । जिन प्रतिमा के दर्शन के समय भीतर के मन परिणाम पर अध्यवमाय इतने निर्मन हो जाते है कि वह अध्यक्साय के प्रभाव

दर्शन विशुद्धि
से जन्म जन्म के कर्म मल आत्मा पर से दूर हो जाते हैं। प्रात्मा
के शृद्ध अध्यवसायों मे इतना जबरदस्त सामर्थ्य है कि कर्म उसके
सामने टीक ही नहीं सकते हैं। जैसे अन्धेरे का क्या सामर्थ्य है
कि वह सूर्य के किरणों के सामने टिक सके ?
शुभ अध्यवसाय प्रतिमा के सालवन से सहजतया उत्पन्न हो
जाते है। जिन प्रतिमा का स्वरूप ही वीतगगी होता है तथा
वह स्वरुप इतना भाववर्द्धक एवं ग्राहल्लादक होता है कि भवि
जीव दर्शन करते समय सभी सांसारिक कार्यो को भूल जाता है
और उसका मन वीतरागी स्वरुप मे लीन बन जाता है। प्रालंबन
के बिना मन को एकाग्र करना बहुत कठिन है। मामने कुछ
प्रतीक होता है तव ही मन एकाग्र बनता है और मन की एकाग्रता
विना धार्मिक जीवन मे कोई सफलता नही है ।
प्रतिमा दर्शन से मार्द्रकुमार एवं शय्यंभव भट्ट
को
सम्यकत्व
प्राप्ती
प्रशमरस झरती तथा शांत रस नितरती जिन मुद्रा के
आलंबन से तो मन कभी-२ इतना तदाकार बन जाता है कि
भीतर की सुषुप्त चेतना जागृत हो जाती हैं। प्रार्द्र कुमार अनार्य
देश मे उत्पन्न हुए थे। वहां उनकी आत्म कल्याण के लिए कोई
साधन नहीं था सिर्फ अभयकुमार ने भेजी हुई जिन प्रतिमा के

दर्शन विशुद्धि . दर्गन ने ही उनका सम्यक्त्व परिणाम पुन जागृत हुआ था और प्राविर वे प्रयत्नपूर्वक पार्यदेश में पहुंचे और दीक्षा अगीकार कर ली तथा मभी कमों का क्षय करके अन्त मे मोक्ष में गये। यह उल्लेग नूयगडाग सूत्र की नियुक्ति मे पूज्य भ्रद्रवार स्वामी ने करीवन् तेइस मौ वर्ष पहले क्यिा हया है। पूज्य भद्रवाह म्वामी ने न तो रजोहरण भेजने का उल्लेख किया है और न मुहपत्ति भेजने का मिर्फ जिन प्रतिमा भेजने का माफ माफ शब्दो में उल्लेख किया है। वह उल्लेग नीचे के श्लोक मे है "पीतीय दोण्ह हुमो, पुच्चाणमभयस्स पत्यवे सोउ । तेणावि सम्मदिट्ठि ति होज्ज पडिमा रहे मिगया ।" प्रार्द्र कुमार और अभयकुमार के बीच मैत्री सम्बन्ध होने के बाद अभयकुमार ने प्रार्द्र कुमार को प्रतिवोध करने के लिये भग- वान न.पभदेव की प्रतिमा मेजी है उम बात का इस गाया में स्पष्ट उल्लेव है मगर मुहपनि अथवा ग्जौहरण भेजने का किमी प्राचीन गाया में उल्लेर नही पाया है। वमे ही दरवकालिक मूर के रचयिता मय्यभव स्वामी को भी जिन प्रतिमा के दर्शन से ही प्रतियोग हुया था। दगवैकालिक सूत्र की नियुक्ति में पूज्य भद्रवाह स्वामी ने स्पष्ट शब्दो मे लिया है दर्शन विशुद्धि सेज्जभव गणधर जिरण पडिमां दंसरोणं पडिबुद्ध । मग पिअरं दसकालियस्स निजहणं वदे ।। सय्यभव स्वामी मनक मुनि के संसारी पिता थे । मनक मुनि का आयुस्य अल्प होने से उनके उद्धार के लिये पूर्व वगैरे शास्त्रो के आधार पर से दशवकालिक सूत्र की जिन्होंने रचना की ऐसे सय्यभव स्वामी को मैं वंदना करता हूँ। यह उल्लेख पूज्य भद्र- बाहु स्वामी का है तथा वे जैन धर्म के स्तम्भ कहलाते है। उनके वचन मे यदि विश्वास नहीं रखा तो फिर जैनी कहलाने का अर्थ ही क्या है ? श्रमण भगवान महावीर प्रभु के पाच में गणधर सुधर्मा स्वामी के शिष्य चरम केवली जबुस्वामी हुए, जंबुस्वामी के प्रभव स्वामी और प्रभव स्वामी के सय्यंभव स्वामी हुए। प्रभव स्वामी ने अपना प्राप्य अल्प जान कर उपयोग लगाया कि मेरे पीछे गण- नायक अथवा पट्टधर कौन बनेगा ? अपने समुदाय में वसा कोई महापुरुष उनके ध्यान में आया नहीं फिर उन्होने पर समुदाय मे उपयोग लगाया तो सय्य भव भट्ठ पर उनकी नजर पड़ी, उस समय मय्यभव ब्राह्मण राजग्रही मे यज्ञ कर रहे थे। उनको प्रतिबोध करने के लिये दो साधुओं को प्रभवस्वामी ने भिक्षा के लिये जहा यज्ञ हो रहा था वहां भेजा और उनको कहा कि वहां जाकर सय्यसव भट्ट को यह सुनाना कि “अहो कष्टं अहो कष्टं तत्व न हुए दर्शन विशुद्धि . 7 विज्ञायते।" बडे कप्ट की बात है कि यह यज्ञ कर रहा है मगर नत्व नहीं जानता है। मय्यभव भट्ट दरवाजे के पाम ही बढा या उसके कान में ये शब्द पड़े वह सोचने लगा कि ये तपस्वी मुनि जिनका मोह शान्त हो गया है वे कभी झूठ नहीं बोलते है। मै नत्व जाने विना ही यज्ञ कर रहा हू ऐमा इन्होने कहा है तो फिर नत्व क्या होगा? यज्ञ विधि कराने वाले उपाध्याय को पूछा मुझे बतागो कि तत्व क्या है ? उमने कहा कि वेद ही तत्व है। मय्यभव भट्ट को यह वात रुचि नही, उन्होने म्यान में मे नलवार खोची और अध्यापक से पूछा कि बतायो तत्व क्या है भय के मारे उपाध्याय बोला-इन यन म्तम्भ के नीचे गातिनाथ भगवान को प्रतिमा है उसके दर्शन में ही आपको तत्व मिलेगा। यनो में नारद अथवा मरे कोई उपद्रव न मचावे इमलिए यज्ञम्तम्भ के किसी एक भाग म जिन प्रतिमा रखने का उस वक्त रीवाज जमा हो गया था। जिन प्रतिमा के दर्शन होते ही सय्यभवभट्ट को प्रतिबोध हो गया याने मम्यक्त्व प्राप्त हो गया फिर तो वे अपनी सगर्भा पत्नी को छोड कर प्रभव स्वामी के पास पहुचे और वर्म का स्वस्प-समझ कर उनके पास दीक्षित बन गये। गुरु निथा प अव्ययन करके चौदापूर्वी बने। अब आप समझ लो कि जिन प्रतिमा के पालवन मे भवी नौव पर क्या महान उपकार होता है ? कोटी कोटी मनुष्य प्रभु प्रतिमा को मि मुकाते , 1 प्रनिष्ठा के द्वारा उसमे परमात्म दर्शन विशुद्धि स्वरुप की स्थापना करके लाखों करोड़ों भक्तजन जिसकी पूजा उपासना करके अपने जन्म को सफल मानते है । उस बालंबन भूत प्रतिमा के लिए वह तो जड़ है पत्थर है भाठा है ऐसे तुच्छ गब्दों का प्रयोग करना वह सज्जनों को बिलकुल शोभा नहीं देना है। वैसे तो आगम भी कागज पर अथवा ताड़ पत्र पर लिखे हुए हैं वह भी तो जड ही है, अोघा मुहपत्ती वगैरह धर्म के उपकरण भी तो जड़ ही है उनसे जब लाभ माना गया है तो जिन प्रतिमा के आलंबन से भी लाभ मानने में दिक्कत क्या है ? अागम के मालवन से ज्ञान का प्रकाश मिलता है वैसे ही जिन प्रतिमा के दर्शन से सम्यक्त्व का प्रकाश मिलता है। सम्यक्त्व के आलवन को मिथ्यात्व मान लेना वह तो महा मोहनीय कर्म का मी उदय समझा जायेगा, मिथ्यात्व मोहनीय के तीन उदय के विना ऐसे भवोदधितारक आलंबन के प्रति आत्मा में अरुचि का भाव कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकता ? तत्वार्थ सूत्र में पूज्य-उमास्वाति महाराज ने दो हजार वर्ष पहले फरमाया है कि सम्यक्त्व दो प्रकार से होता है। उसमै लिखा है: "सन्निसर्गादधिगमाद्वा" तत्वार्थ का सम्यग् श्रद्धान ही सम्यक्त्व है। वह सम्यक्त्व निसर्ग और अधिगम दो प्रकार से होता है उसमें स्वभाविक तथा दर्शन विशुद्धि बम का क्षय क्षयोपशम अथवा उपशम होने मे जो सम्यक्त्व होता है वह निमर्ग कहा जाता है जैसे मरदेवी माता को मम्यक्त्व माया। जिनवाणी के श्रवण मे अथवा जिन प्रतिमा के दर्शन ने तो मम्यक्त्व होता है वह अधिगम सम्यक्त्व कहा जाता है। जो तत्वाय मूत्र की टीका मे महान प्राचार्य श्री हरिभद्रसूरीजी ने लिखा है कि "प्रतिमादि बाह्य निमित्तमाश्रित्य नत्वार्थ प्रद्धान भवति ।" याने जिन प्रतिमादि वाह्य निमित्तो ने आलवन मे तत्वार्थ श्रद्धान कप सम्यग् दर्गन जो जीव को होता है उसे अधिाम सम्यक्त्व कहा गया है। जिनेश्वर भगवान की प्रतिमा का दर्शन, वदन, पूजन वगैरह दर्शन गुण के ग्राल बन है वैसे ही ग्रागम शास्त्र वगैन्ह सम्यग् ज्ञान गुने पारवन है। मूत्र मिद्रात कान्वाध्याय करन मे ज्ञान गुण मा विजाम हाताह-वाचना, पृतना पगवर्तना, चर्म कथा, अनुप्रेना वगंग्ह म्वाभ्याय के पाच प्रकार है। गुरु भगवत अपने दिया पाचना दव वह वाचना स्वाध्याय। शिप्य विनम्र भावे गाय की पात पूर्व नो उसके मन T1 ममावान कर देना वह पृन्टना म्वा याय है। जो गास्त्र क्ठम्य किये है उसको दोहराना वह पगवतन म्याच्याय है। धर्म क्या या धर्म वा उपदेश दना दर्शन विशुद्धि वह धर्मकया स्वाध्याय है तथा सूक्ष्म बुद्धि मे तत्वार्थ का चितन करना वह अनुप्रक्षा स्वाध्याय है। इस प्रकार स्वाध्याय के पात्र मेद हैं। स्वाध्याय से प्रात्मा के ज्ञान गुण का अवश्य विकास होता है। रजोहरण मुहपति वस्त्र पात्र वगैरह चारित्र धर्म के उपकरण है। उनके द्वारा चारित्र गुण की सांगोपांग अाराधना हो सकती हैं। यों तो सम्यग् दर्शनादि तीनों आत्मा के गुण है। आत्मा अरुपी है तो उसके गुण भी अरुपी होते है मगर अभी जिसक। विवेचन कर गये है वे सब साधन है, सावन के बिना साध्य की सिद्धि नहीं होती। ज्ञान गुण के साधन सूत्र सिद्धात है, उसका पालंबन भी लिया जाता है। प्रोघा मुहपत्ति वगैरह चारित्र धर्म के जो साधन है उसका भी पालवन लिया जाता है तो फिर सम्बग दर्शन का महान प्रालंबन जिन मदिर और जिन प्रतिमा है, उसका श्रालंबन लेना भो तो अत्यन्त जरूरी है ? प्रतिमा पूजन भी शास्त्र मान्य अनुष्ठान सामायिक प्रतिक्रमणादि जैसे शास्त्रविहित और शास्त्र मान्य अनुष्ठान है वैसे ही जिन प्रतिमा का दर्शन, वंदन एवं पूजन भी शास्त्र विहित एवं शास्त्र मान्य अनुष्ठान है। रायप्पसेणी सूत्र में सूरियाम देव एव जीवाभिगम सूत्र में विजयदेव ने सौधर्म देवलोक

दर्शन विशुद्धि
११
में शाश्वत जिन प्रतिमाए है वहा उन देवो ने शाश्वत जिन प्रति-
मानो को बिलकुल शास्त्र विधि अनुसार पूजा की है और वह
मारी विधि रायप्पसेणी सूत्र मे सूरियाभदेव के अधिकार मे बताई
गई है। अष्टप्रकारी द्रव्यपूजा के बाद वहा सूरियाभ देव ने
नमुत्युण का पाठ बोल कर भाव पूजा भी की है। इस पुस्तक में
आगे इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। जैसे सूरियान
देव ने शास्त्रविधि अनुमार जिन प्रतिमा की पूजा की है वैसे ही
ज्ञाता मूत्र में साफ साफ शब्दो मे फरमाया है कि द्रोपदी ने भो
सूरियाभ देव की मापक शास्त्रविधि अनुसार जिन प्रतिमा की
पूजा की है। ज्ञाता सूत्र मे पाठ इस मुताविक है
"जहा सूरिया भो जिणपडिमामी, मच्चेई तहेब
भरिणयन्व जावधूव डहइ धुवडहित्ता वाम जाणु अचेइ ।
जाव कट्ट, एव वयासि 'नमो त्युण अरिहतारण
ममवतारण जाव सपत्तारण वदइ नमसइ
नमसिता जिरण धरायो पडिनिक्खमई
पडिनिक्खमायो जेरणेव अंतेउरे तेरणेव,उवागच्छई।"
यह जाता सून का पाठ क्या सूचित कर रहा है? इतना
गष्ट जिन प्रतिमा का ज्ञाता मून मे पाठ होने पर भी मूर्तिपूजा

१२ दर्गन विशुद्धि नहीं मानने वाले बोल देते है कि मूर्तिपूजा शास्त्र में कहां लिखी है ? शास्त्र में मूर्ति पूजा के पाठ है ही नहीं ? ऐसा बोलने में कितना कर्म बंव होता है ? जहां एक अधा आदमी भी पढ़ सके वैसे जगह-२ पर शास्त्रों में मूर्ति के पाठ है। वहां बोलना की मूर्तिपूजा शास्त्रों मे है ही नहीं ? वह सूत्र सिद्धांत का अपलाप करने जैसी बात है। ज्ञाता सूत्र मे द्रोपदी के अधिकार में स्पष्टतया प्रतिमा पूजन का अधिकार है। वहां द्रोपदी पहले जित प्रतिमा की पूजा करती है बाद धूप जला कर धूप दूजा करती है और आखिर भावस्तव स्वरुप नमुत्थुणं का पाठ बोलकर चैत्यवंदन कन्ती है। सव विधि करके जिन मंदिर में से निकल कर अपने अन्तःपुर में प्रवेग करती हैं। द्रोपदी के विषय मे इसी पुस्तक में आगे और नी विस्तृत विवेचन किया जायेगा। यहां तो इतना ही उल्लेव करने का है कि सामायिक प्रतिक्रमणादि शास्त्र मान्य अनुप्ठान है वैसे ही प्रतिमा पूजन मी गास्त्र परम्परा मान्य अनुप्ठान है। इस बात की पुष्टि के लिये रायपप्पणी सूत्र एव ज्ञाता धर्मकथा वगैरह सूत्रों का हवाला दिया गया है। निक्षेपात्रों की व्याख्या नाम स्थापना, द्रव्य एवं भाव ये चार निक्षेप कहे जाते है। कलिकाल सर्व श्री हेमचंद्राचार्यजी फरमाते है कि- -- दर्शन विशुद्धि १३ 'नामाकृति द्रव्य भावे, पुनतस्त्रिजगज्जनम क्षेत्रे काले च सर्वस्मिन्नहर्त समुपास्महे ।।" नाम आकृति, द्रव्य और भाव के द्वारा मर्व क्षेत्र एव सर्व- काल में तीनो जगत के पात्मायो को पवित्र करने वाले देवाधिदेव श्री अग्निपरमात्माग्रो की हम उपासना करते है। इस गाथा मे माटे पाठ मौ वर्ष पहने चारो निक्षेपो ने श्री अरिहत परमात्मा की म्तवना की गई है क्योकि जिनका भाव निक्षेप मच्चा है उनके चारो निरेप मच्चे काहे गये है। देवाधिदेव नीर्थ करो को भक्तजन चारी निदेप ने भज मने है। तीर्थ कर परमात्मा ममवसरण में बैठकर जब देगना देते है तव भाव निदंप से नीर्थ कर कहे जाते है। उन्ही के महामगलकारी नाम का स्मरण करना वह नाम निप कहा जाता है। जिन प्रतिमा जिन सारिखी भविष्य में प्रोणिक वगैरह जो तीर्थ पर होने वाले है अथवा मोक्ष में गई हई तीर्य कर की जो आत्माए है उन्हें द्रव्य निक्षेप की अपेक्षा तीर्थ पर माने जाते है। तीर्थ कर परमात्मा इन चारो निक्षेपो से पूजनीय है जैसे गजाया वर जो अभी गजा नहीं बना है मार भविष्य में राजा बनने वाला है उसका भी प्रजा प्रादर बहुमान करती है वैसे ही श्रेणी महाराजा अभी पती १४ दर्शन विशुद्धि नरक मे है मगर अगली चौविशी में प्रथम तीर्थ कर बनने वाले है तो उनका द्रव्य निक्षेप से अभी भी आदर बहुमान किया जा सकता है-अगली चौवीगी मे श्रेणीक पदमनाभ नामे प्रथम तीर्थ कर होवेगे-उनका अभी से उदयपुर शहर मे भव्य मंदिर बना हुआ है और उनकी प्रतिमा का पूजन अर्चन बडे ठाठ से हो रहा है। भगवान महावीर का जीव मरीची के भव में विदंडी के वेश मे था ओर उस समय भरत चक्रवर्ति ने उनको वंदना की है और साथ साथ खुलासाभी दे दिया की मै तुम्हारे इस त्रिदडी के वेष को वंदना नहीं कर रहा हू मगर तुम भविप्य मे तीर्थ कर वनने वाले हो उसी पद को मै वंदना कर रहा हु -इसीलिए जो तीर्थकर होने वाले है और हो गये हैं वे भी वंदनीय पूजनीय है। श्री ठाणांग सूत्र मे जो चार प्रकार के सत्य का प्ररुपण किया है उसमें स्थापना सत्य को मान्य रखा है। ठाणांग सूत्र मे लिखा है कि :- "चउदिवहे सच्चे पणते तं जह रगाम सच्चे ठवण सच्चे दब सच्चे भाव सच्चे।" सूत्र में कितनी बात स्पष्ट बताई है उसमे चारो निक्षेपात्रों को सत्य माना है। किसी के मन मे शंका हो सकती है कि मोक्ष में तो भगवान का स्वरुप निरजन निराकार है वहां तो भगवान का स्वरुप अरुपी है तो फिर प्रतिमा मानने से क्या लाभ होगा ?

दर्शन विशुद्धि १५ इम गका के ममाधान मे ऐमा समझना वि जमे मोक्ष मे भगवान का म्वरुप अम्पी है वैमे अनामि है याने जहा म्प नहीं है वहा नाम भी नही है तब भी भगवान का नाम स्मरण अपन यहा करते है। भगवान निरजन निराकार होने पर भी भगवान का जव नाम ले नकत है तो फिर उनका सवेरे मे उठने ही जिन मदिर मे जाकर मुह दबने में क्या हरकत पाई ? अपने पिता का नाम लेने वाने को घर मे यदि पिता का फोट लगाया हुआ है तो फोट का दगन करने में वाया क्या है ? भगवान निग्जन निराकार ज्योति म्वरूप है इममे किमी का कोई विरोध नहीं है मगर ऐसा होने पर भी किमी समय में भगवान इस पृथ्वीतल पर सदेह अवस्था मे विचरते थे यह बात भी तो माननी पटेगी? अभी वर्तमान काल मे भरत क्षेत्र मे भगवान नहीं विचरते है इसलिए भगवान के माक्षात दर्शन का अपने को विन्ह है । भगवान के विरह काल मे तो प्रतिमा परम पालवन रुप हे ऐसे विषम काल मे प्रतिमा का पालवन छोड देना वह तो परम अाधार को छोडकर निराधार वनने बराबर है। इस विषम काल में भवि जीवो के लिये जिनागम और जिनप्रतिमा यह दो ही परमालवन है-इनमे से एक का भी त्याग कर देना वह तो दो पाखो मे मे किसी एक प्राम्ब को अस्त करने जैसा तेल है।

दर्शन विशुद्धि परमतारक तीर्थकर भगवान जब साक्षात् सदेह इस धरातल पर विचरते थे उस काल मे भी जिन प्रतिमा का पावन तो था ही तो फिर इस विपम काल की तो बात ही कहां करने की है। महापुरुषो ने तो जिन प्रतिमा को साक्षात् जिनेश्वर के समान कही है क्योकि वह साक्षात् जिनेश्वर की ही प्रतिकृति हैं। साक्षा: जिनेश्वर के पालवन से जैसे कई भवि जीव सम्यक्त्व के परिणाम को प्राप्त कर लेते है वैसे ही जिन प्रतिमा के पालवन से भी बहुत से जीव सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेते है। स्थापना जिन भी महान उपकारी तीर्थकर भगवान समवसरण में बैठकर देशना देते है तव उनकी देशना चतुर्मुखी कहलाती है। श्रोतागण किसी भी दिशा में बैठे हो मगर वे भगवान का मुह देख सकते हैं। उनको ऐसा ही लगता है मानो हम भगवान के सन्मुख बैठकर ही देशना सुन रहे है परन्तु इतने से भगवान के चार मुह नहीं होते है पूर्व दिशा की और ही भगवान का मुह रहता है बाकी रही तीनों दिशाम्रो मे भगवान की प्रतिमाएं स्थापित की जाती है, वे प्रतिमांए तीनो दिशा मे देव बैठाते है ऐसा विधान समवसरण प्रकरण एवं समवा- चांग सूत्र की टीका में कीया गया है पूज्य देवचन्द्रजी महाराज ने शातिनाथ भगवान के स्तवन में फरमाया है कि- . -

दर्शन विशुद्धि
"दक्षिण पश्चिम उत्तर दिसि मुख
ठवण जिन उपकारी रे
तमु प्रालबन लहीय अनेक
तिहा थया समकितधारी रे
भविकजन हरखो रे
निरखी शाति जिगद" ।
पूज्य देवचंद्रजी महाराज को हुए ढाई सो तीन सौ वर्ष हुए
है,उन्होंने इस स्तवन में स्पष्ट शब्दो मे विधान किया है कि
समवसरण मे भाव जिनकी माफक स्थापना जिन भी महान
उपकारी है क्योकि तीनो दिशा में प्रतिमा के पालवन से भी कई
जीव ममकितवारी वनते है।
जिन प्रतिमा जिन सारिखी यह बात जीव को मव-स्थिति
का परिपाक एव कर्मों की लघुता हुए विना दिमाग मे नही बैठने
वाली है। कर्म जव पतले पडते है याने जीव पर से कर्मों का
भार कुछ कम होता है तब कही जाकर यह वात दिमाग में बैठती
है । क्षेत्रपान, गोनदेवता, रामदेपीर, काला गोरा भैरव, शीतला-
माताजी चामु डादेवी वगैरह दूसरे देव देवीयो के सामने अपने को
जैन कहलाने वाले सिर भुका तेहै और वेही जैन कहलाने वाले
जिनेश्वर की मूर्ति की बात आती ह तो बोल देते है वह तो

दर्शन विशुद्धि पन्थर है ? उससे क्या लाभ होने वाला है ? हम पत्थर पूजा में नहीं मानते है ऐसा बोल देते हैं मगर थोड़ा जीव्हा पर कंट्रोल रखना चाहिये। शास्त्र एवं सिद्धांत मान्य वस्तु के लिए ऐसे वचन निकालने से कभी तीव्रकर्म का वंध हो जाता है ! मूर्तिपूजा मान्य करे के न करे वह अलग बात है मगर जो चीज को लाखों करोडों मनुष्य मानते है उसके प्रति कम से कम माध्यस्थता तो जरूर रखनी चाहिये ? जडपूजा मे नहीं मानने वाले अन्य देवी देवताओं की मूर्तिों के सामने क्यों सिर झुकाते है ? ऐसा लगता है वहां कुछ स्वार्थ बुद्धि रहती है तो फिर परमार्थ बुद्धि से जिनेश्वर की प्रतिमा को मानना वह तो अनन्त लाभ का कारण होगा। भगवतो सूत्र, ठाणांग सूत्र, जाता सूत्र, रायप्पसेणी सूत्र,जिवाभिगम वगैरह सूत्रों में प्रतिमा पूजन के स्पष्ठ पाठ होने पर भी उसका उत्थापन करना वह तो अनंत संसार बढ़ाने जैसा ही होगा। सूत्र का एक अक्षर उत्थापे उसको भी अनंत संसारी कहा है तो फिर सूत्रों के पाठों का उत्थापच करे उनके लिये तो कहना ही क्या रहता है ? वह तो आप स्वयं ही अपने बुद्धिबल से सोच सकते हैं।

दर्शन विशुद्धि
भगवती मूत्र
-
सिद्धांत साक्षी से प्रतिमा पूजन की सिद्धि-
के वीम म गतक के नव मे उद्धे मे में जघाचारण
एव विद्याचारण मुनियो ने नदोश्वर द्वीप और रुचक द्वीप मे विद्या
केवल मे जाकरके शाश्वती प्रतिमाओ को वदन करने का स्पष्ट
अधिकार है। विधाच र । नुनि विद्या के वल मे यहा से एक ही
कदम उठाकर मानुपोत्तर पर्वत पर पहुच जाते है और वहा मे
दूसरा कदम उठाकर मीधे नदोश्व द्वीप मे पहुच जाते है। विद्या
के बल से वहा जाने वाले विद्याचारण और जपाचारण मुनि वहाके
जिन चैत्यो को एव गाश्वत प्रतिमानो को बदन करते है।
इस विपर भगवती मूत्र के वीमवे शतक मे श्री गौतम
स्वामी ने महावीर प्रभु को प्रश्न किया है कि भगवान ? विद्या-
चारण मुनिश्रो की तिरछी गति का विपय कितना हो सकता है ?
प्रत्युत्तर में भगवान ने फरमाया है कि-
"गोयमा। मेण इओ एगेरग उप्पाएगण नानुमुतरे
पवए समोसरण करेई, करेईवा ताहि चेइयाद्व वदह
वदइत्ता, वित्तिएण उप्पाएण नदीमरवर दीवे ममोमरण
करेई करेइत्ता ताहिं चेडयाड वदइ" |
गौतम । विद्यात्राग्ग मुनि यहा मे एक कदम उठा के मानु-
पोर पवत पर पहुंचते है और वहा पर्वत पर उतर कर वहा के

२०
दर्शन विशुद्धि
के
चैत्यों को वंदन करते है फिर वहां से दूसरा कदम उठाकर
नदीश्वर द्वीप मे उतर कर वहां के जिन चैत्यो को वंदना करते है
फिर एक कदम उठाकर सीधे यहां चले पाते है ? यहां आकर
यहा के चैत्यों को प्रणाम करते है। गौतम । विद्याचारण
मुनि की तिरछी गति का इतना विषय हो सकता है। भगवती
सूत्र मे विद्याचारण एवं जघाचारण मुनियो की गति के विषय मे
और भी बहुत से प्रश्न गौतमस्वामी ने पूछे है और महावीर देव ने
उन प्रश्नो का प्रत्युत्तर दे कर उनके मन का पूरा समाधान किया
है। अपने को तो इसमें से इतना ही मिद्ध करना है कि भगवती
सूत्र
में भी जिन प्रतिमा एवं जिन चैत्यो का स्पष्ट उल्लेख है।
पालोचना लेने का हेतू-
नंदीश्वर द्वीप से यहा पाने के बाद उन मुनियो को जो
आलोचना लेनी पड़ती है उसका कारण यही है कि गति करने का
जो प्रमाद दोष लगता है उसी की आलोचना लेनी पड़ती है।
जिन चैत्यो को जो वंदना करते है उसका दोष नही मगर अपूर्व
लाभ ही माना गया है फिर उसकी आलोचना लेने की बात
ही कहां रहती है ? जैसे मुनि गोचरी बहेर के आने के बाद
आलोचना करते है वैसे ही जंघाचारण मुनि गति करने का और
लब्धि फोरने का जो प्रमाद हुआ है उसी की आलोचना
करते है।

दर्शन विशुद्धि १२१ चैत्य शब्द का वास्तविक अर्थ- प्रतिमा पूजन मे श्रद्धा नही रखने वाले "डयाइ वदइ" ऐसा जो भगवती सूत्र मे पाठ पाया है वहा चैत्य शब्द का अर्थ झान कते है मगर वह अथ यहा लागु नही हो सकता है क्योकि यहा बह्वचन का प्रयोग हुअा है "चेडयाइ वदइ" यह बहुवचन है । यदि विद्याचरण मुनि ने ज्ञान को वदना की होती तो 'चेडय बदइ' मा शब्द प्रयोग होता क्योकि ज्ञान तो एक है याने प्रात्मा के अनतगुण है उममें जान भी प्रात्मा का एक प्रधान गुण है जव यहा तो बहुवचन का प्रयोग हुअा है क्योकि नदीश्वर द्वीप मे और अन्य स्थलो में चैत्य तो बहुत अधिक मन्या म है । व्याकरण को यदि व्याविकरण मान लिया जाय तो अर्थ का मम्यग् ज्ञान होगा ही कमे अव व्याकरण मब पढने लगे है व्याकरण पढने वालो को गब्दकोप का भी अभ्याम करना पड़ता है। कलिकान सर्वज्ञ हेमचद्राचायजी ने “मिदहेम व्याकरण" लिखा है और माय माथ 'अनेकार्य साह' कोप भी उन्होने बनाया है उसमें चत्य शब्द का अर्थ पू हेमनद्राचार्यजी ने फरमाया है कि- "चैत्य जिनौक स्तद्विम्बम्" ! चैत्य याने जिनेश्वर भगवान का मदिर एव जिनेश्वर प्रमु की प्रतिमा। अभिवान चिंतामणिकोप मे भी पू हमचद्राचार्यजी १२६ दम विशुदि ? पहले भी कल्याण होवे और पीछे भी कल्याण होवे। याने वर्तमान में भी हितकारक होवे और भविष्य में भी हितकारक होवे ऐसी कौनसी शुभ करणी है ? प्रत्युत्तर में सामानिक देवों ने कहा- "एवं खलु देवारगुप्पियारणं सुरियाभे विमागे सिद्धायतणे अठ्ठसय जिण परिमारणं जिगुस्सेह पमाणमेताग सन्नि विखतं चिठ्ठइ सभाएण सुहम्मारणं मारणवए चेश्यखंभे वइरामएसु गोलवट्ट समुगाएमु बहुमो जिणसकहानो सपिक्खित्तानो चिट्ठति" | "हे देवानुप्रिय अपने सूर्याभ विमान में सिद्धायतन (जिन मंदिर) है उन मंदिर में एक सोपाठ जिन प्रतिमाए है वे जिनराज की अवगाहना प्रमाण उंची है तथा सुधर्मा सभा में माणवक नामक वैत्यस्तंभ है उस स्तंभ में वज्रमय गोल डले है उनमें बहुत से जिनेश्वर भगवान की दाढाए एवं अस्थियां रखी हुई है। "ताओणं देवाणुप्पियाणं अन्नेसि च बहुणं वेमारणी- याण देवारणयं देवीणयं अच्चरिणज्जाओ वंदरिणज्जाओ, नमंसणिज्जाओ पूयरिणज्जाओं सक्कारणिज्जाओ,सम्माण- रिणज्जायो जाव पज्जुवातरिणज्जाओ"

दर्शन विशुद्धि
हे देवाणुप्रिय ये जिनप्रतिमाए और दाढाए आपको और
दूसरे भी वैमानिक देव देवीनो को अर्चन योग्य नमन करने योग्य
और मन्मान करने योग्य है।
"एयण देवाणुप्पियारण पुदि पच्छावि हियाए सुहाए
खमाए हिस्सेसाए आणुगामियताए भविस्सई" जिन प्रति-
मायो का किया हुआ पूजन अर्चन आपके लिये पहले और पीछे
हित के लिए, सुख के लिए, क्षेम के लिए और मोक्ष के लिए होगा।
यह सारा विवेचन रायप्पसेणी सूत्र में आया है। यह सूत्र श्वेताम्बर
मप्रदाय के ममी फिरके मानते है। सम्यग् द्रष्टि देव जिन प्रति-
मानो का कितना बहुमान करते है ? कितना सन्मान करते है और
भीतर के उल्लसित भाव से पूजन अर्चन करते है और पूजन उनके
लिये भवोभव में "हियाए सुहाए णिस्सेसाए' 'याने हित के
लिए मुस के लिए एव आखिर णिस्मेसाए याने मोक्ष के लिए
बनता है। यह सूत्र पाठ पढने पर मी यदि जिन प्रतिमा की श्रद्धा
नही हुई नो समझना अपने कर्म वहुत मारी है और सूत्र की वात
भी जितनी अपनी मान्यता के अनुरुप हो उतनी ही लेत है वाकी
सव दोड देते है अयवा अर्थ का अनर्थ करते है।
शुभ भाव पर ही सब कुछ आधारित
-
प्रतिमा भले पयर की क्यो न हो मगर मनुप्य वा हृदय का
उच्च भाव होता है तो वह पत्थर की प्रतिमा में भी परमात्मा का

२८ दर्शन विशुद्धि दर्शन करता है और उस प्रतिमा के माध्यम से उसको अपूर्व लाम होता है। आखिर तो मोक्ष मार्ग में हृदय के भाव पर ही मन कुछ आधारित है मगर अालंबन विना भाव प्रगट नहीं होते हैं और भाव प्रगट होने मे जीव की योग्यता पर भी बहुत बड़ा आधार रहता है। साक्षात भगवान पृथ्वी तल पर विरते थे तव भी भारे कर्मी जीव उनके लाभ से वंचित रहे हैं। सुबहतांग सूत्र में ३६३ पाखंडियों का वर्णन पाया है वे भगवान की वाणी का श्रवण करते थे तब भी मगशैल पत्थर की माफक उनका हृदय पल्लवित नहीं होता था। गोशाला पांच छ: वर्ष भगवान महावीर के साथ रहा था तब भी उसको कुछ लाभ नहीं हुआ अन्त में मृत्यु के समय जरुर पश्चाताप हुआ और समकित प्राप्त हुआ मगर भगवान के साथ जब विचरता था तव तो वैसा का वैसा कोरा कागज के समान रह गया था। यह बात लिखने का हेतू इतना ही है कि भारे कर्मी जीव साक्षात भगवान जब विद्यमान थे तब भी लाभ से वंचित रहे और हलुकर्मी जीव भगवान के प्रालंबन से तीर गये है वैसे ही प्रतिमा के प्रालंबन से भी भवसागर पार हो जाते है। जीव को किस निमित्त से कव लाभ हो जाता है उस पर निश्चयात्मक कुछ भी नहीं कहा जा सकता बड़े बड़े वैद्यों की दवाई से रोग नहीं मिटता है और एक सामान्य वैद्य की दवाई से रोग मिट जाता है इसलिए जब तक अपनी साधक दशा है तब तक श्रेष्ठ बालंबनों को कभी भी छोड़ना नहीं उसको तो बरावर पकड़कर रखना है।

दर्शन विशुद्धि २९ !! समकिति देवो की नित्य शुभकरणी रायप्पसेणी मूत्र मे पूर्व और पच्छा शब्द से प्रतिमापूजन समकिती देवो को नित्य शुभकरणी कही है तब भी विपरित प्ररुपण करना कि "देवो का जिन प्रतिमानो के साथ जित आचार पता ही सम्बन्ध है वे उसको धर्म का कारण ही नही मानते है" यह कितनी विपरीत प्ररुपणा है। सूत्र में तो "हियाए सुहाए" ऐने स्पष्ट शब्द लिखे है। जो चीज देवो के लिए हितकारक हे उसके साथ का सम्बन्ध कितना घनिष्ट हो सकता है और उस चीज के प्रति देवो के हृदय में कितना वहुमान, सन्मान और पूज्य भाव शास्त्र मे लिखा है। पृथ्वीतल पर जब तीर्थ करो का निर्वाण होता है तव अतिम मस्कार विधि के समय समझिनि देव दवेन्द्र तीर्थ कगे के मुह मेसे उनकी दाढाए निकाल नेते है और दाढायो को सुधर्मसभा में में चैत्य स्तभ होता हे उस स्तभ म वनमय गोन डब्बे में रखते है। जिन प्रतिमानो की माफक उन दाढायो की भी ममकिति व पूजा करते है। कितना समपिति देवो का भगवान के प्रति बहुमान होता है। वह दादाए देवादिव तीर्थ कगे की होने से कही भागातना का होप न लग जाय इसलिए उम सुधम सभा मे इन्द्रादिक देव किमी प्रकार की काम कीडा नहीं करते है। ऐसा विधान भगवती सून में है। - दर्शन विशुद्धि भगवान की मूर्ति से लाभ नही मानने वाले प्राजक, देखो वहां अपने फोटू वीचवाते है। उनके भक्तजनों के दूकानो में स्थान स्थान पर फोह देखने में आते है। वाणी और वर्नन का वि संवाद नहीं तो और क्या है ? रहना कि प्रतिमा जड़ है उससे क्या लाभ है तो फिर घर फोटू लगवाये जाते है उससे भी क्या लाभ होने वाला है, व तो जड़ का ही प्रालंबन है। पुस्तकों में भी उनके फोद् छपने है येन-केन प्रकारेण ग्रालंबन तो लेना ही पड़ता है तो फिर प्रतिमा का पालवन स्वीकार करने में संकोच क्यों होता हैं। वंश परम्परा को तारने वाला महान प्रालंबन शास्त्रों में जिन प्रतिमा का स्पष्ट उल्लेख होने पर भी बहु से मनुष्य अपने पूर्व ग्रह के कारण प्रतिमा को मान्य नहीं रखते है सत्य वस्तु को अंगीकार करने मे संप्रदायवाद भी सामने अ जाता है । जैन श्वेताम्बर परम्परा को मान्य बहुत से सूत्रों में जिन प्रतिमा के स्पष्ट उल्लेख मिलते है तो फिर सत्य वस्तु को मानने में हिचकिचाहट विलकुल नहीं रखना चाहिये शायद उनको संदेह रहता हो कि सत्य का स्वीकार करने से अपने संप्रदाय को धक्का पहुचेगा मगर सत्य वस्तु को स्वीकार करने से धक्का तो किसी प्रकार का नहीं पहुंचेगा परन्तु संप्रदाय का उद्धार जरुर हों जायेगा। जीवन मे सत्य का प्रकाश मिल जाय वही तो मनुष्य जीवन का सार है।

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३२ दर्शन विशुद्धि असत्य नहीं ठहराया जा सकता। शंजय महात्म्य पूधनेश्वर- सूरीजी ने करीवन् १८०० वर्ष पहले लिखा है और त्रिषष्टिश्लाका पुरुष चरित्र कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्यजी ने साढ़े आठ सो वर्ष पहले लिखा है। वे महापुरुष आगम शास्त्रो के पूरे ज्ञाता थे। उनके वचनों को प्रमाण भूत मानने में किसी प्रकार की शंका कुशंका रखने की जरुरत नहीं है। श्री ज्ञातासूत्र अतगढ़ सूत्र आदि सूत्रों में भी श्री शंत्रुजय तीर्थ का अधिकार दीया हुआ है पांडवतो शत्रुजय तीर्थ पर से मोक्ष में गये हुए है, राम भरत भी शंबुजय पर मोक्ष में गये है अकेले नही परन्तु करोड़ों मुनियों के साथ मोक्ष मे गये है। थावच्चा अणगार शुक्परिव्राजक, शैलकजी, देवकीजी के बटनंदन आदि सभी शत्रुजयपर अनशन, व्रत लेकर मोक्ष में गये हैं। भगवान आदिनाथजी के गणधर पुंडरिक स्वामी पांच करोड़ मुनियों के साथ शत्रुजय पर से ही मोक्ष में गये हैं। "काकरे कांकरे अनंता सिद्धया" यह बात शंत्रुजय तीर्थ के लिए जो कही जाती है वह बिलकुल यथातथ्य है। जहां से एक मुनि का भी. मोक्ष होता है उस स्थान को भो पवित्र समझ कर तीर्थ कहा जाता है तो गिरिराज शत्रुजय पर से तो अनंत जीव सिद्धिगति को प्राप्त हुए है तो उस स्थान के लिए तो कहना ही क्या है ? उसको तो तीर्थ ही नहीं दर्शन विशुद्धि ३३ तीर्थाधिराज कहना चाहिये । यो तो ढाई द्वीप मे सभी जगह से सिद्ध हुए है मगर शत्रुजय पर से तो तीर्थ के पालवन से सिद्ध हुए हैं इसलिए उस स्थान का महत्व बढ जाता है । एक महात्मा ने ठीक ही कहा है कि मनुष्य जन्म पाकर जिसने गिरिराज शगुजय की स्पर्शना नहीं की है वह जीव समय लेना अभी तक गर्भावाम में ही पटा है। भले उमका जन्म हुआ है मगर ऐसे महान तीर्थ की सरांना किये विना वह जन्म कोई काम का नहीं है। तीर्थ के परमाणु अत्यत पवित होते हैं वहा की स्पर्शना करने से अपने मन परिणाम भी अत्यन्त पवित्र हो जाते है पवित्र परमाणुगो का प्रभाव मन परिणाम पर अवश्य पडता ही है। आद, राणकपुर तारगा हील पर के मदिर नी विश्व विण्यात है। हजारो वर्ष पहले हुए विमलगा मत्री गजा कुमारपाल, वस्तुपाल, तेजपाल धरणासा मेट आदि महा-भाग्यवान पुरुपो ने भव्यातिभव्य कलात्मक मदिर निर्माण किये है। जिन मदिगे की शिल्पकला तथा वाघणी पाज मारे विश्व में सुप्रनिद्ध है। यूरोपियन भी पावू दे नवाडा की मिल्परला देखकर नतमन्नर बन जाते है। अरिहत परमात्मा के शामन एव जिन प्रतिमा प्रति उन महान पुरुषो के हृदय में कितना उत्कृष्ट भक्ति योग होगा? अब अाप इतना नो मोनो नि हजारो लादो वर्ष पहले ३४ दर्शन विशुद्धि जो मंदिर और तीर्थ निर्माण किये गये है उनके दर्शन, वंदन एवं भक्तिभाव से कितने जीवो का उद्धार हुआ होगा? कहना ही पड़ेगा कि हजारो लाखो नहीं परन्तु करोड़ों जीवों का उद्धार हो चुका है। चालू वर्तमान में भी कई जीवों का उद्धार हो रहा है और भविष्य में भी होता रहेगा। इसलिए पूज्य हरिभद्रसूरीजी ने पोड़षक शास्त्र मे लिखा है कि जिन मंदिर का पालेवन वंश रम्परा को तारने वाला है यह विलकुल यथातथ्य है। अनंतानंत जीव जिन मंदिर के पालंबन से तीर गये हैं। जिन मंदिर नहिं जाना ही प्रायश्चित का विषय इतने महान उत्कृष्ट प्रालंबन के लिए बोलना कि मंदिर में जाना बड़ा दोष का कारण है। उस दोष का तो प्रायश्चित होना कठिन है। जैन सूत्र सिद्धांत को जानने वाले ऐसा विचार शून्य प्रलाप कभी नहीं करेंगे क्योंकि सूत्र में तो स्पष्ट शब्दों में प्रतिमा एवं जिन मदिरों का विधान किया हुआ है। आजकल ऐसा युग आया है कि स्वयं मार्ग भूले हुए है, वह नहीं देखते हैं और दूसरों की आलोचना करते रहते हैं। उनको यह बात जरुर ख्याल में रखने की है कि पाप के बहुत से प्रकार है मगर सूत्र विरुद्ध प्ररुपणा करने जैसा कोई पाप नहीं है।

दर्शन विशुद्धि । भावना भावना मे महान अन्तर प्रतिदिन परमात्मा के दर्शन से मनुष्य को धर्म भावना में अभिवृद्धि होती रहती है। सुबह के समय में कोई एक मनुष्य हाथ में धली लेकर सब्जी बाजार तरफ जा रहा है और दूसरा मनुप्य हाथ मे चावल की डिब्बी लेकर जिन मदिर तरफ दर्शनार्थ जाने को निकला है। अब मोचने की वात यह है कि दोनो की भावना में कितना अन्तर रहेगा। एक के भाव अत्यन्त विशुद्ध रहेगें और दूसरे को ऐसे शुभ नाव पाने का स्कोप ही नही है वह तो मोचेगा कल भिडी लाया था आज तरोई खरीदना हैं सटाई के लिए दो चार नीबू भी सरीदने है, मब्जी बेचने वाला अपना पुराना दोस्त है नीबू तो शायद मुफत मेही मिल जायेगें। जबकि जिन मदिर जाने को निकला है उसको अच्छे विचार पायेगें वह सोचेगा प्रदर्शन से मेरा जन्म कृतार्थ और दिन सफल बन जायेगा। एकेन्द्रियादि कई योनियों में भटकता आया हू, जिन दर्शन का मुझे कही अपूर्व लाभ नहीं मिला है। मनुष्य भव में भी कई अनायं देश में जन्म लेते है उन्हे मनुष्य भव मिलने पर भी जिन दर्शन दुर्लभ है। मुझे आर्य देश में, उत्तम कुल में और उत्तम जाति म मनुप्य जन्म मिला है तो जिन दर्शन का लाभ मुझे मिल रहा है यहा क्या मेरा अहो भाग्य है ? कि मुझे मनुष्य भव मे 1

दर्शन विशुद्धि
यह अपूर्व लाभ मिल रहा है। भगवान महावीर परमात्मा के
दर्शन के लिए मै जा रहा हूं। भगवान महावीर देव ने जीवन में
कितना दूष्कर तप किया था ? तप के साथ भगवान में क्षमा गुग
भी कितना अपूर्व था ? छ: महिने तक भगवान ने चोविहार
उपवास किये थे। साढ़े बारह बर्ष के छमस्त काल में भगवान ने
सिर्फ ३४६ पारणे किये थे शेष सब चोविहार उपवास किये थे।
अहा ! क्या भगवान का वेजोड़ तप था ? अन्त में घाती कर्मों
के बंधन को तोड़कर भगवान ने अनंत ज्ञान और अनंत दर्शन
प्राप्त किया था। जिनमें ऐसे ऐसे महान लोकोत्तर गुण है उन
परमात्मा के दर्शन करने के लिए मैं जा रहा हूं सचमुच
मेरा जन्म सफल बन जायगा। ऐसी शुद्ध विचारधारा जो
जिन दर्शन के लिए घर से निकला है उसके हृदय में उत्पन्न होने
का बहुत कुछ अवकाश है क्योंकि निमित्तवासी अात्मा है। जैसे
निमित्त सामने आते है वैसे ही भाव जीव में प्रगट होते है।
प्रशुभालंबन से भाव में
अशुद्धता
तो
शुभालंबन
से शुद्धता-
दशकालिक सूत्र में बसती स्थान मे साधु जहां ठहरते है
वहां यदि काम वासना उत्तेजक कोई चित्र हो तो ठहरने मे
बड़ा दूपण बताया है। दशवैकालिक सूत्र में फरमाया है :
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दर्शन विशुद्धि
"चित्त भित्ति न णिज्जाए नारिंवा मुग्रल किया ।
भक्खर मिव दळूण दिट्टि पडिममाहरे"
पू उपाध्याय यशोविजयजी महाराज ने इसी गाथा का लोक
भाषा में अनुवाद किया हे कि
"दशवकालिक दूपण दास्यु. नारोचित्र ने ठामे,
तो किम जिन प्रतिमा देखीने गुणनवी होयपरिणामे" ।
यह गाथा करीवन तीन मो वर्ष पहले पू आब्याजी ने माटे
तीन मो गाथा के स्तवन मे लिग्वि है। दिवाल पर चित्रित
अलकारादि से विभूपित नारी को साघु पुरुप अपनी दृष्टि मे देने
नही, स्त्री का चित्र हो अथवा माक्षात स्त्री का स्वरुप हो उम पर
साधु पुरुप अपनी दृष्टि को स्थिर करे नही। प्रमाद के कारण
दृष्टि पड भी जाय तो जैसे मध्यान्ह काल के समय सूर्य मडल पर
दृष्टि पडते ही तुरन्त पुन खीच नी जाती है वैसे हो कोई पर-स्त्री
पर नजर पड भी जाय तो साधु पुरुष तुरन्त नजर को अपनी ओर
खीच लेते है और अपनी दृष्टि को अन्तय कर लेते है ।
"चित्त भित्ति न रिणज्जाए" दशवकालिक सूत्र को इस
गाथा मुजब जिम वत्यति स्थान म दिवान पर नारी का चित्र
लगाया हो उस वमति गान मे माधु ठहरे नहीं क्योकि उस
निमित्त से भी साबु के मन मे अशुद्ध भाव उत्पन्न हो सकते है
.

दर्शन विशुद्धि
इसलिए साधु ऐसे स्थान में रात्रि निवास न करे। निमित्तवश
मन परिणाम चंचल होने मे देरी नहीं लगती है। अब यहां सोचने
का इतना ही है कि खराब चित्र से मन परिणाम अशुभ
हो सकते हैं ? तो क्या वीतराग परमात्मा के दर्शन
वंदन से शुभ भाव उत्पन्न नहीं हो सकते हैं ? कहना
ही पड़ेगा जरुर शुभ भाव प्रगट हो सकते है। अशुभ
निमित्त से अशुभ भाव उत्पन्न होते है तो शुभ निमित्त
से जरुर शुद्ध भाव प्रगट हो सकते है। इस बात में लव
लेश भी सदेह रखने की गुजाइश नहीं है। अपन पहले ही
कह चुके है कि आखिर तो निमित्तवासी आत्मा है तो फिर प्रतिमा
जैसे महान आलंबन का लोप करना वह तो एक अपूर्व भाव
विशुद्धि के प्रालंबन से स्वपर को वंचित रखने जैसा है।
सगुरण से निर्गुण एवं साकार से ही निराकार
जिन प्रतिमा के दर्शन से दर्शन विशुद्धि होती ही है मगर
साथ-२ देवाधिदेव के गुणों का भी बड़ी आसानी से चितन हो
सकता है। इन्सान साकार उपासना के माध्यम से ही निराकार
उपासना का अधिकारी बन सकता है। उच्च लक्ष रखे बिना
कभी भी लक्षांक सिद्ध नहीं हो सकता। जहाज चलाने वालका

दर्शन विशुद्धि ३९ लक्ष ध्रुव काटे पर लगा रहता है तो जहाज किनारे पहुच जाता है वैने ही वीतरागी प्रतिमा के पालवन से इन्मान का लक्ष अपनी आत्मा के वीतरागी म्वरुप पर लगा रहता है तो वह आत्मा अाखिर वीतरागी बनता है। कहा पहुचना है उसका जिसने लक्ष नही रखा है वह तो भटकता रहेगा कभी भी इप्ट स्थान पर नहीं पहुचेगा। 7 वेदात दर्शन की भाषा में कहना हो तो कह सकते है कि सगुण उपासना के पालवन से ही निर्गुण उपासना की भूमिका तक पहु चा जा सकता है। अपर ब्रह्म का पालवन लिए विना पर ब्रह्म की प्राप्ति हो ही नहीं मकती। शरीर से भिन्न आत्म स्वस्प की विचारणा करना मैं कौन हू कहा से आया हू यहा से मृत्यु पा कर कहा उत्पन्न होऊ गा ? सचिद अानन्द ही मेरा स्वरुप है। इस तरह मे यात्म स्वरुप की विचारणा करना यह हुआ अपर बह और ब्रह्म स्वरुप मे लीन हो जाना निर्विकल्प स्थिति को प्राप्त कर लेना उसको ही कहा जाता है परब्रह्म वैमे ही बिलकुल निर्विकल्प स्थिति को प्राप्त कर लेना जिममे गुम मकल्प विकल्पो का भी सन्याम कर लिया जाय वही निर्गुण दशा है मगर वह स्थिति पर्यन्त सगुण उपासना के माध्यम से ही पहुचा जाता है । एक दम छलाग लगाकर कोई ऊपर पहुच ही नही सरना है अपने इप्ट परमात्मा की प्रतिमा का दर्गन, वदन, पूजन ४० दर्शन विशुद्धि करना ही सगुण उपासना है। यों करते करते अपने स्वरुप और अपने ज्ञान दर्शनादि गुणों का अपने को मान होता है और अन्त मे अात्मा अपने स्वरुप मे एकतान बनता जाता है। आखिर ऐसा भी वक्त आ जाता है कि जिस समय ध्याता ध्येय और ध्यान ये तीनों तदरुप हो जाते है याने तीनों की एकता हो जाती है फिर तो शुद्ध निरंजन स्वरूप की प्राप्ति होने में देरी ही क्या लगने वाली है ? ध्याता अपना प्रात्मा है, ध्यान परमात्मा का स्वरूप है और ध्येय परमात्म पद प्राप्त करने का है। इन तीनों की एकाकारता ही मोक्ष पद की प्राप्ति है। घो, गेहूं और गुड ये तीनों एक हुए नहीं कि मोदक बने नहीं वैसे ही व्याता. ध्येय और ध्यान ये तीनों ही एक हुए नहीं के जीव का मोक्ष हुआ नही । पत्थर की गाय दूध नही देती मगर अपने स्वरुप का परिचय तो अवश्य देगी। प्रतिमा का पालंवन जिनको मान्य नही वे ऐसा भी कह देते है कि पत्थर की गाय जैसे दूध नहीं देती है वैसे प्रतिमा भो जड़ है उससे क्या लाभ होने वाला है ? ऐसा प्रलाप करने वाले जीवों पर करुणा वृद्धि रखकर जानी फरमाते है कि अरे भाई ? पत्थर की गाय दूध नही देती मगर पत्थर की गाय देखने से गाय ऐसी होती है इतना जान तो अपने को जरुर होता है वैसे ही जिन दर्शन विशुद्धि ४१ है प्रतिमा के दर्शन में अपने को अपने शुद्ध स्वरूप का भान जरुर होता वह भी तो अपूर्व लाम है ? इमसे हम ज्यादा क्या कहे ? प्राधिर तो जमी दृष्टि मी सृष्टि है। जीव प्रमाद मे ही पडा रहे तो प्रोघा, मुहपति, माला आदि भी नाग्ने वाला नहीं है। जीव का मोक्ष तो आखिर अपने पुम्पार्थ मे ही होने वाला है तब भी अोघा, महपत्ति, माला आदि जैसे मवर निर्जरा के माधन कहे गाते है वैमे ही जिन प्रतिमा को सम्यक्त्व प्राप्ति का माधन कहने में कोई हरकत नही है। जिन जीवो में किमी प्रकार की पात्रता ही नही है उन जीवो को जिन प्रतिमा क्या? जिनागम क्या ? किमी मे क्या नाभ होने वाला है ? उनके लिए नो मात्र भी गम्याप बनते । जिम द्वादगागी के बालबन में अनतानत जीव तीर गये है उमी के पालवन मे बहुत से हलभागी जीव दव भी गये है वैसे ही जिन प्रतिमा के पालवन में मनक पिता गय्यभव म्वामी, ग्रा. कुमार जैसे क्तिने ही हलुकर्मी जीव तीर गये ह उमी चीज की विराधना कार्य कितने ही जीव इव ाय है। दृष्टि न विना विपरीत है तब तक वस्तु वस्तु रेम्बरप मे ममय म प्रावगी कैमरे साधन जरुर करे मगर साध्य का भी लक्ष रखे मेरे ममारित कुटुम्बी माता-पिता जैन यानक वामी नप्रदाय में थे मेरे भाजी म्याना वामी मप्रदाय म दीक्षित बने हुए थे। मै दीक्षा लेने से पहले उना दान करने 1

४२
वर्शन विशुद्धि
को गया था। मैंने दीक्षा अंगीकार करने की भावना उनक
समक्षा जाहिर की आनंद व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा तू दीक्षा
भले ही ले मगर अपने ब्रावीश संप्रदाय मे ले । मेरी उम्र उम
समय में सत्रह माल की थी इतनी कोई गम्भीर विचारणा मेरे में
नहीं थी तब भी मैने गुरुजी के साथ छ: सात महिना रहकरं जीव
विचार नव नत्व का अभ्यास कर लिया था। ओसियां गुरुकुल
साढ़े तीन वर्ष रहकर पंच प्रतिक्रमण का भी अभ्यास मेरा हो
गया था थोड़ा बहुत अभ्यास होने से सामान्य समझ मेरे मे
जरूर थी।
में
साध्वीजी महाराज से मैने कहा कि मे दीक्षा तो मंदिरमार्गी
संप्रदाय में ही लूगा क्योंकि जिन प्रतिमा में मुझे संपूर्ण श्रद्धा है
इसलिए दीक्षा तो मैंने जहां नक्की की है वही लेऊंगा सिर्फ आपका
आशीर्वाद लेने आया हूँ इतने में उन्होंने मुझे सुनाया कि "पत्थर
पूजे हरो मिले तो मैं पूजु गिरिराय" याने तू मूर्ति में
श्रद्धा रखता है मगर मूर्ति तो आखिर पत्थर की बनती
है पत्थर पूजने से यदि मोक्ष मिलता हो तो कई पहाड़
पूजने को तैयार हैं। मैने कहा महासतीजी यदि यह
छोटी सी मुहपत्ति बांधने से मोक्ष मिलता हो तो मैं
रजाई बांधने को तैयार हूं। मरे ! तू क्या बोल रहा

दर्शन दिशुद्धि है ? मैने कहा पहले यह सोचो कि आप क्या बोल रही हो ? मापने पहाड पूजने की तैयारी बताई तो मैंने रजाई वाघने की तैयारी वताई। जैसा आपने सवाल उठाया वमा मैने प्रत्युत्तर दिया है। सवाल पहले आप ही ने उठाया है मैने तो अपनी भावना आपके समक्ष प्रगट की थी। फिर तो दे तुरल बोले जहा तेरी इच्छा हो वहा दीक्षा ले । मैने कहा पहले से आपने इतना कह दिया होता तो यह चर्चा आगे बटती ही नहीं। साध्य की सिद्धि के लिए साधन अत्यन्त जरुरी है मगर यदि मावन को ही साध्य मान लिया जाता है तो जीव वही रुक जाता है और उसकी स्थिति कोल्हू के बैल जैमी होती है। जीव का मोक्ष तो राग द्वेप के त्याग से ही होने वाला है। मुहपत्ति,योधा, माला, जिन प्रतिमा आदि सव पालवन है तथा इसके सहारे जीव का विवास जरुर होता ही रहता है परन्तु इतने मान से साधन को साध्य ही मान लेना वैसी कोई बात नहीं है। हा। साध्य का लक्ष मामने रखकर साचन जरुर करने का है। प्रतिमा शाश्वती हो अथवा अशाश्वती हो दोनो पूजनीय- प्रतिमा पूजा में श्रद्धा नहीं रखने वाले भी देवलोक में शाश्वती प्रतिमाए जरुर मानते है मगर प्रतिमा पूजन में श्रद्धा वगन विशुद्धि रखने वाले सम्यग् द्रष्टि जीव गान्बत के अनापनमा दमन में नहीं रखते है। देवलोक के देव गायत विमानों में करने के दो मनुप्य गाम्बत मकान कहां लेने को गायने उनको भी मायन मकानों में ही रहना भाग है। नंदीश्वर द्वीप मे, सनर बी देव विमानों में गावती प्रतिमाए होती है नगर नाश्वन प्रतिमा वंदनीह पूजनीय है वैसे ही अगाश्वती प्रतिमा भी वंदनीय गाय पूजनीय मानने में कोईगास्त्रीय विरोध नहीं है सन्निए गाननी के अगाश्यती प्रतिमानो के बीच भेद रखने का कोई कारण नहीं है। प्रानन्द श्रावक एवं अंबड़ परिव्राजक की जिन प्रतिमा में अटूट श्रद्धा- तल्ल द्रष्टि में किसी भी धर्म क्रिया अथवा अनुष्ठानादि में जीव का जो निजि गुभ भाव है वही फल प्राप्ति में मुख्य कारण भाव विना की क्रिया फलवती नहीं बनती है। जिन प्रतिमा के ग्रालंबन से जीव म जो गृभ भाव प्रगट होने है वे नम भाव ही जीव के लिए महान फलदायक है इसलिए पूर्वकाल में यानंद कामदेव जैसे महावीर परमात्मा के महान श्रावको ने भी जिन प्रतिमा का बालंबन लिया था। अपने सम्यक्त्व को किसी प्रकार की बाधा न पहुंचे और उसमे पण न आवे इसलिए आनंद थावक ने भगवान महावीर स्वामी के पास ऐसा नियम भूत है। लिया था- -

दर्शन विशुद्धि
"नो खलु मे भते कप्पइ अन्नउत्थिय परिगायिाइ
अरिहत चेइयाइ वा वदित्तएवा नममित्तएवा" ।
हे भगवन । मुसको आजसे लेके अन्य तिथिक वौद्धचरकादि
एवं हरिहरादिक अन्यतीथिक देव, और अन्यतीयि ने ग्रहण किये
अहित के चैत्य जिन प्रतिमा इनको वदना करना नमन करना
वह कल्पे नही"। याने अन्यमति किसी सजोग वशात् जिन चैत्यो
पर अपना कब्जा करके जैन विधि के अलावा यदि अपनी परम्परा
अनुसार पूजा उपासना करते है तो वह जिन प्रतिमा होने पर भी
उसको नमस्कारादि सम्यग् दृष्टि श्रावक नही कर सकता है यदि
करता है तो उसके सम्यक्त्व को दोप आता है इसलिए आनद
आवक ने सम्यक्त्व उच्चरने के समय यह नियम किया है कि अन्य
नीथि के द्वारा ग्रहण किये गये जिन चत्यो को भी मैं वदना
नमस्कार नहीं करु गा। इस कथन मे दम बात की अपने आप
पुष्टि हो जाती है कि जैन धर्म की मान्यता अनुसार जिन जिन
चत्यो मे पूजा उपासना होती थी उन उन चैत्य और जिन प्रतिमानो
को आनद धावक जरुर वदना नमस्कार करते थे
ऐमा ही पाठ उववाई सूत्र में अवड परिवाचक ने अधिकार
में दिया गया है उसमे लिखा है कि
"मवइस्सरण परिवायगस्म नो कप्पट अण्ण उत्थिएवा

४६ दर्शन विशुद्धि अण्णा उस्थिय देवयारणी वा अण्ण उत्थिय परिगाहियाइ अरिहंत चेइयाई वा वंदित्तएवा नममित्तएवा गाण्याच अरिहंते वा अरिहंत चेइग्रारिणवा" || अंबड श्रावक परिवाजक होने पर भी महान सम्बग द्रष्टि थे। देवगुरु और जैन धर्म के प्रति पूर्ण बद्धावान थे। अपने सम्यक्त्व को दोप न लग जाय इसी कारण अब परिव्राजक में यह नियम लिया था कि अन्यतीथि के देव श्रीर अन्य तिथियों द्वारा ग्रहण किये अरिहंत चेत्य एवं जिनप्रतिमा को में वंदन नमन नही करुगा क्योंकि वे अन्यतीथि सम्यग् विधि अनुसार जिन प्रतिमा की पूजा उपासना नहीं करते थे इसी कारण जिन प्रतिमा होने पर भी उसकी पूजा उपासना ढंग से नहीं होने में बड़ परिव्राजक एवं मानंद श्रावक ने उपरोक्त नियम ग्रहण किये थे। जैसे नागेश्वर तीर्थ बहुत प्रख्यात है वहां चौदह फुट की पाश्र्वनाथ भगवान की हरे वर्ण की भव्य प्रतिमा कार्योत्सर्ग व्यान मे स्थित है। उस प्रतिमा पर कई वर्षो पर्यन्त एक बावाजी ने कब्जा कर रखा था। वे बावाजी शंकर भगवान समझ कर पूजा करते थे आखिर जैन संघ के पुन्योदय से प्रतिमाजी पर अपना कन्जा हुआ फिर उस प्रतिमाजी पर अपनी जैन विधि अनुसार पुनः संस्कार किया गया, आज तो वहां हजारों लाखों यात्री यात्रा करने जाते है। वहां भव्य मंदिर भी निर्माण हो रहा है। तीर्थ दर्शन विशुद्धि ४७ वहा की महिमा दिन प्रतिदिन बटती ही जा रही है। केशरीयाजी तीर्य की हालत भी आजकल वैसी ही होती जा रही है। तीर्थ में जाते हैं तो वडा दुम होता है और पाशातना भी बहुत होती है मगर श्वेताम्बर दिगम्बर दोनो सप्रदायो का विवाद होने से अपना कुछ भी चलता नहीं है। प्रानद श्रावक और अवड परिव्राजक ने जो अन्यतिथिको द्वारा ग्रहण किये जिन चत्य और जिन प्रतिमा को वोसराया है कीतनेक चत्य शब्द का अर्थ साधु करते है ऐसा अर्थ करना वह अर्थ बरार नही है क्योकि भगवतीसूत्र में ऐसा अधिकार पाया है कि नये उत्पन्न हुए असुरराज चमरेन्द्र को सोधर्म देवलोक के इन्द्र को वैभव देवकर मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई तथा उसके मन मे ऐसा विकल्प पाया कि यह मेरा ऊपरी कौन है? क्या यह मेरे से अधिक पूण्य प्रभाव वाला है ? में सौधर्मेन्द्र को उसकी शोभा से भ्रष्ट करके रहू गा। ऐमा सोचकर वह अपनी राजधानी चमर चचा ने सौधर्म दद-लोक तक पहुचने का द्रढ निश्चय कर लेता है। मगर उसके मन मे मदेह जरुर रहता है कि मौधर्मेन्द्र कही मेरा पराभव कर देगा तो उस वक्त वहा मेरी रक्षा कौन करेगा? इसलिए चमरेन्द्र जब सौधर्म देवलोक में जाते है तब पहिला अरिहत का दूनग अरिहत चैत्व का तथा तीसरा अणगार अर्थात साधु का गा अगीकार कर फिर यहा ने उर्ध्वगमन करते है जैसे चमर का उत्पति अपने मे प्रख्यात है जो अच्रा रुप माना गया Y दर्शन विशुद्धि है। बहुत लम्बे काल के बाद ऐसी घटना होती है मगर तीन में से किसी एक का भी शरण अंगीकार किये बिना नमरेन्द्र मोधर्म देवलोक तक जाने के लिए उर्ध्वगमन नहीं कर सकते है इन तीनां मे से किसी एक का आश्रय करके ही चमरेन्द्र पर जाने की हीम्मत कर सकते है। भगवती सूत्र के तीसरे शतक में फरमाया है कि- 'णण्णात्थ मरिहतेवा' अरिहंत चेइयाणिवा अरणगारेवा भाविपप्पणोणीस्साए उड्ढे उप्पयंति जाव सोहम्मोकप्पो'। 5 साक्षात अरिहंत परमात्मा अथवा अरिहत चैत्य याने अरिहंत की प्रतिमा और भावितात्मा अणगार याने साधु इन तीनों में से किसी एक की शरण अंगीकार करके ही उमरेन्द्र ऊपर जाने का साहस कर सकते हैं। इतनी स्पष्ट बात होने पर भी चैत्य शब्द का अर्थ साधु कैसे हो सकता है ? इस विधान में तो सानु के लिए अणगार शब्द का प्रयोग हुआ है और अरिहत की प्रतिमा के लिए "अरिहंत वेश्याणीवा" इस शब्द का प्रयोग हुआ हुअा है इसलिए इस भगवती सूत्र के पाठ पर से इतना स्पष्ट हो जाता है कि चैत्य शब्द का अर्थ जिन प्रतिमा के अलावा न तो जान है और न साधु है।

वर्शन विशुद्धि एक हजार वर्ष पहते हुए नवागी टीकाकार पू. अभयदेव मूरीश्वरजी ने भी आगमो में जहा जहा चैत्य शब्द पाया है वहा वहा उसका अर्थ जिन प्रतिमाजी किया है। ऐसे महान धुरवर पूर्वाचार्यों को छोडकर क्या आजकल के विद्वानो के वचन पर विश्वास रखेगे, जिनको पूर्वाचार्यों के मुकाबले प्रागमो का कुछ भी अनुभव नहीं है। श्रेणीक राजा एव संप्रतिराजा को अपूर्व श्रद्धा भक्ति उपरोक्त विवेचन में इस बात की पुष्टि हो गई कि पूर्व काल में आनद कामदेव वगैरह भगवान महावीर के सभी महान श्रावको ने जिन प्रतिमा का एव जिन चैत्य का पालवन मान्य रत्रापा। स्वय श्रेणिक राजा भी जिन मदिरो में त्रिकाल उपामना करते थे इतना ही नहीं चैत्यवदन के समय भगवान के ममक्ष मोने के बावल जैसे बनाये गये जवलो का स्वग्निक करते थे। अरिहतपद की आराधना के प्रभाव से ही श्रेणीक महाराजा ने स्वय अविरनिधर होने पर भी नीर्थ कर गोत्र वावा है। करीबन साढे बाईम सो वर्ष पहले राजा सप्रति ने भी जिन मदिर एव जिन प्रतिमानो को अपूर्व भक्ति भाव में उपासना की यो। पू स्थूलभद्र स्वामी के शिष्य दश पूर्ववर पार्यमुहन्ति से दर्शन विशुद्धि ४ संप्रतिराजा को प्रतिबोध हुआ था। प्रतिवोध तो ऐसा हुआ कि राजा संप्रति ने कई अनार्य देशों में भी जैन धर्म का पूर्व प्रचार करवाया था और बहुत से अनार्य भी अहिंसा धर्म की पीर प्रापित वन गये थे। संप्रतिराजा ने अपने जीवन में सवा लक्ष नये जिन मंदिर निर्माण करवाये थे और सवा कोटी जिन-प्रतिमाए उन्होंने भराई थी। जिन मंदिर के खनन विधि का समाचार मिलने के बाद ही वे पानी मुह में लेते थे। राजा संप्रति ने सारी पृथ्वी को मानो जिन मंदिरों से सुशोभित की थी। आज भी जहां कहीं भी खुदाई होती है वहां पृथ्वी में से राजा संप्रति के समय के प्रतिमाजी निकल आते है इतना ही नही बहुत से मंदिरों में संप्रति राजा के समय के प्रतिमाजी विराजमान है। वे प्रतिमाजी इतने भव्य एवं आहल्लादवर्धक होते है कि दर्शन करने के समय वहां से हटने की इच्छा ही नहीं होती है। दर्शन के प्रभाव से तुरणों का स्मरण एवं संसार का विस्मरण जिन प्रतिमा का दर्शन पूजन करने के समय मन भीतर से आनन्दविभोर होता है। दर्शन वंदन के समय परमात्मा के गुणो का हृदय में स्मरण होता है । ज्ञान, दर्शन, चारित्र, क्षमा, नम्रता, सरलता और निर्लोभता, तप संयमादि परमात्मा के गुणों का हृदय पनि विशुद्धि ५१ मे स्मरण होने से मारे संसार का विस्मरण हो जाता है। परमान्मा के गुणो ग म्मरण होने से आत्मा कभी कभी उसमें इतना तल्लीन बनता है कि उस वक्त आत्मा और परमात्मा के वीच का कोई अन्तर नहीं रहता है। अपनी प्रात्मा को परमात्मा के म्बम्प का स्वानुभव होने लगता है और फिर तो अतर में से ऐसा कोई गेनी अावाज छाने लगता है कि नाथ जो तू है वो ही में हूँ मेरी प्रात्मा के शुद्ध चिदानद स्वरुप का विस्मरण होने से ही में अनत काल मे चौरागी के चक्कर मे भटक रहा है। आज मुझे जिन दशन के प्रभाव में ही भीतर का साक्षात्कार हुआ है नाय ! जो अनत गुण आप मे है वे ही अनत गुण मेरी आत्मा में है इस बात में कुछ अतर नहीं है अतर मिर्फ इतना ही है कि आपके गुण आविर्भाव म्वरुप है और मेरे गुण तिरोभाव स्वरुप है याने कर्मों के बचन क्षय करके आपने गुण प्रगट कर लिए है वे ही ज्ञानादि गुण मेरी प्रात्मा मे सत्तागत पडे हुए है। नाथ श्राप अनत ज्ञान अनत दशन अनन्त वीर्यादि गुण प्रगट करके अनत चतुष्टय के म्यामी बन गये है। योग मार्ग में पुस्पार्थ करके मेरा ग्रामा भी अनन चतुष्टय का स्वामी बन मकता है । नाथ ! प्राप ही ने तो फरमाया है कि अरिहतपद का अथवा मिद्धपद का किमी का ठेका नहीं हैं नाथ । मत्ता को अपेक्षा चालू वर्तमान में मेरा भात्मा भी अनत गुगा ममुदाय का पिड है बही प्रात्मा पुरुपाय के बल से सत्ता - ५२ दर्शन विशुद्धि का प्रगटीकरण कर सकता है। अपने घर में ही पृथ्वी में दवा हुआ निवान है तो क्या उसको अपन प्रगट नहीं कर सकते है ? वैसे ही प्रात्मा सत्तागत अनंत गुण समुदाय का भंडार है तो क्या प्रात्मा उसको प्रगट नहीं कर सकता है। हां। घर में निधान होने पर भी यदि प्रमाद में ही पड़ा रहा तो भिण्डारी ही रहेगा और पुरुषार्थ के द्वारा जमीन खोदकर यदि निधान को प्रगट कर लेता है तो कोटी ध्वज सरदार बन सकता है वैसे ही पुरुपार्थ के द्वारा सत्तागत रहे हुए अनंत गुण समुदाय को प्रगट करके प्रात्मा भी कोटी ध्वज सरदार बन सकता है याने अनत ज्ञान और अनंत दर्शन को प्राप्त कर लेता है और वही आत्मा प्रमाद में पड़ा रहता है तो कंगाल का कंगाल रहता है। करोड़ो का जहां नफा वहां हजार दो हजार का घाटा क्या हिसाब में ? प्रतिमा के पावन से आत्मा महान उच्च गुणस्थान की भूमिका तक बड़ी आसानी से पहुंच सकता है। दशपूर्वधर आर्य सुहस्ति जैसे महापुरुष की निश्रा में संप्रति राजा ने सवा लाख जिन मंदिर निर्माण करवाये थे तो इससे सिद्ध हो गया कि प्रतिमा का पालंबन विलकुल शास्त्र परम्परा मान्य है। अपूर्व आत्मिक लाभ का हेतू होने से ही महान पूर्वधर जैसे महापुरुषों ने ऊसको दर्शन विशुद्धि मान्य रखा है। याज के कई मनुष्य हिंसा हिंसा कर के मदिर का पालवन छोड देते है तो क्या वह वात पूर्वधर जैसे महापुरुयो के दिमाग में नही आई होगी? उन महापुरुपो को वस्तु स्वरूप का दिन्य ज्ञान या वे महापुरुष समझते थे कि इसमे लाभ तो अनत गुगा है जब कि दोष तो नाम मात्र का भी नहीं है। 7 गगा सिन्धु मे जव पानी की वाढ पाती है तब उसमें किसी ने अफीम का एक टुकडा अथवा नमक का एक मुट्ठा भरके डाल दिया तो क्या इतने मे सारा पानी जहर अथवा खारा हो जायगा वैसे ही जिन प्रतिमा के पालवा में हृदय म जब गुम भावनायो का प्रवाह बहने लगता है अथवा तो भक्ति भावना की वाट पाती है तर उममे भगवान का अभिषेक क ने मे और पून चढाने मे जो मामान्य दोप लगता है वह क्या गिनती में रहे। व्यापार मे मे यदि लाभ करोडो का होता है तो उसमे यदि पाच दश हतार का घाटा भी हो गया तो वह घाटा क्या गिनती मे है ' याने कुछ भी गिनती में नहीं है। इस विषय मे इसी पुस्तक में आगे काफी विवेचन दिया हुआ है। पाठक ज्यो ज्यो पुस्तक का पठन मनन करते जायेगे त्यो त्यो मन का 'माधान होता नहगा। मप्रति जा की तरह माटे पाठ मौ वर्ष पहले ITI कुमार पाल ने भी परीवन बौदह ह नार नये जिन मदिर निर्माण करवाये थे और मोलह हजा प्राचीन मदिगे का जीणोंहार परवाया था।

२४ दर्शन विशुद्धि आज मी शनुजयगिरिराज पर,गिरनार पर,तारंगा हील पर राजा कुमारपाल ले जो मंदिर निर्माण करवाये थे वे विद्यमान है। इनके गुरु महान वर्म धुरंधर कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य थे विमल शा मंत्री, वस्तुपाल, तेजपाल ने जो प्राबू गिरिराज पर मंदिर बनवाय है उन मंदिरों की शिल्प कला आज सारे विश्व में प्रसिद्ध है। वरणाशा सेठ ने नाणपुर में जो जिन मंदिर सात सो वर्ष पहले निमाण करवाया था वह मंदिर माज समर विश्व में वेजोड़ माना जा रहा है। करीदन दो जो वर्ष पहले मोतीमा सेठ जैसे महान श्रावन ले बबई शहर में एवं जय गिरिराज पर महान विशाल जिन नंदिर निर्मात करना है नीर इस समय में भी बहुत से शहर और गांवों में जहां देखो वहां दिन मंदिर निर्माण होते जा रहे है। यह परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है और चलती ही रहेगी हो चीक्ष किन्तत एवं कास्न मात्र है उनके प्रति कितना भी कोई विरोध दावे वह चीज को विन्छिन होने वाली नहीं है उसकी फरम्परा तो अविच्छिन ही रहेगी। द्रोपदी ने कामदेव ही नहीं मार लिन प्रतिमा की पूजा की थी रकारह सूत्र में बढ़ा कि सूत्रज्ञाना धर्म कथा है उलये अधिकार आया है स्वयंवर मंडप में जाने के पहले द्रोपनी दे जिन मंदिर में जाकर आष्ट प्रकारी पूजा की थी अली द्रव्य पूजा ही नहीं दर्शन विशुद्धि मगर चैत्यवदना स्वस्प भाव पूजा भी की थी उसमे जिन प्रतिमा के सामने द्रोपदी ने नमुत्थुण का पाठ भी पढ़ा है तव भी कितने ही प्रतिमा का अर्थ कामदेव की प्रतिमा करते है जो अर्थ द्रोपदी के अधिकार मे विलकुल सगत नही होता है 1 शब्दो के अनेक अर्थ हो सकते है मगर जहा जो अर्थ सगत हो वहा वही अर्थ लगाना चाहिये अन्य देवो के लिए शास्त्रो में नाग, यक्ष, किन्नर ऐसे ऐसे शब्दो का प्रयोग किया गया है। कामदेव के लिए कदर्प, मदन, अनग ऐसे शब्दो का प्रयोग हुआ है। कामदेव सभी को जीतने वाला है इस अपेक्षा को ध्यान में रख कर कहीं जिन शब्द का अर्थ कामदेव भी किया होगा ? मगर यहा वह अर्थ मगत नहीं है- पू-अभयदेव सूरीश्वरजी आज से हजार वर्ष पहले महान समर्थ विद्वान हुए है। उन्होने ग्यारह अगसूत्र मे मे नौ अ ग सूनो पर अत्यत विद्वतापूर्ण टीकाए लिखि है उसमे श्री ज्ञाता सूत्र म द्रोपदी के अधिकार में जो पाठ पाया है कि- "जिणपडिमारण आलोए परणाम करेइ बिरण पडिमानो अच्चे"। इसमे जिन पडिमा इम गब्द का अर्थ पू-अभयदेवसूरी ने परिहत परमात्मा को प्रतिमा का द्रोपदी ने पूजन किया ऐसा नर्थ किया है और वह अर्थ इस अधिकार के लिए विलकुल सुसगत है ।

दर्शन विशुद्धि । ऐसा होने पर भी आजकल सूत्रों पर नई टीकाएं बनाने वाले जिण पडिमा का अर्थ कामदेव की प्रतिमा कर रहे हैं। पूर्वाचार्यो की टीकाओं का पालवन तों सभी को लेना ही पड़ता है प्राचीन टीकात्रों का पालंवन लिये विना तो सूत्रों का रहस्य पाना ही बहुत कठीन है। दृप्टांत ग्रादि लेने में वो प्राचीन टीकानों की मानो वे नकल ही कर रहे हैं। पूर्वाचार्यों ने सूत्रों पर जो टीकाए वनाई है उसमे सूत्रो के विलकुल सही अर्थ लिन्ने है मगर पूर्वाग्रह से पीड़ित नई टीका बनाने वालों को जहां अपनी मान्यया अनुसार अर्थ का तालमेल नहीं बैठता है वहां पूर्वाचार्यो के विरुद्ध कलम चलाने में भी उनको संकोच नहीं होता है। पूर्वाचार्यों का आधार लेकर उन्ही के विरुद्ध कलम चलाना वह तो उन महापुरुषों को घोर अन्याय करने जैसा है। कहां उन महापुम्पो का अगाध ज्ञान और कहां उनके मुकादले अपना अल्प ज्ञान ' आचारांग एवं सूत्रकृतांग सूत्र पर टीका लिखने वाले पू-शिलांकाचार्य,नवांगि टीकाकार पू-अभयदेव सूरी. कलिकाल सर्वज्ञ पू-हेमचन्द्राचार्यजी ये महापुरुष तो जान के महासागर थे उनके मुकाबले अपन तो घाघर भी नही है। वे ज्ञान सुधा के सिन्धु थे तो अपन विन्दु मात्र है। कहां उनका ज्ञान क्षयोपशम और कहां अपना अल्प क्षयोपशम ? कितनी ही वार याद करते या रटते है तव दो चार गाथाए कंठस्थ होती है तव महापुरुष तों प्रतिदिन सेकड़ो नई गाथाएं बना सकते थे।

दर्शन विशुद्धि वना मक्ते थे। उन्होंने जो सूत्रो का रहस्य पाया था उस रहस्य तो इस काल के मनुष्य क्या पायेगे। हजारो वर्ष पहले पूर्वाचार्यों न जो सूत्रों की व्याख्या लिखी है उसको मान्य रख कर ही इस काल के मनुष्यो को आगे बढना चाहिए वरना सूत्र विरुद्ध प्ररुपणा करने का आत्मा पर ऐसा कलक चट जायगा जो भवोमव में भटकने पर भी प्रात्मा निष्कलक होवेगी नहीं। अभी तक जिन्होंने सूनो पर को नियुक्ति भाष्यचूर्णी और टीकाए मान्य नहीं रखी थी सिर्फ मूल सूत्रो को ही मान्य रखते थे। कोई भी सवाल बडा होता या नव प्रत्युनर यही मिलता था कि मूल सूत्र में कहा लिखा है। हमें मूत्र पाठ बताइये ? अब वही सूनो पर नई टीका लिख रहे है तो फिर पूर्वाचार्यों की टिसाए मान्य ग्मने में कठिनाई क्या आई ? बस कठिनाई यही पाई कि मूत्रो में जहा “अरिहत चेइयाणी" अथवा "जिण- पटिमाण अच्चण करेइ" ऐमें पाठ पाये है वहा वहा हजार बारह प्रो वप पहने के टीकाकारो ने उन उन गन्दो का जिन प्रतिमा अय किया है। अब प्राचीन टीकाए यदि मान्य रस्त्री जाय तो प्रतिमा पूजा की प्राचीनता एव प्रतिमा पूजन की मुगानुमारिता अपने आप सिद्ध हो जाय इतिए प्राचीन टीकाकारो के यथार्थ अर्थ को पलटने को नई टीकाए बनाई जा रही है। ।

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शंन विशुद्धि
द्रोपदी शादी के पहले भी ससदिति थी-
द्रोपदी ने जिन प्रतिमा की पूजा करके अपने लिए अनुरल
वर नहीं मांगा है सगर नमुत्युणं का पाठ बोलकर मोक्षपद जर
मांगा है। यदि वह प्रतिमा कामदेव की होती तो द्रोपदी सी
विवेकी श्राविका नमुत्युणं का रा० नहीं बोलती क्योंकि नमुत्यु
के पाठ में जो जो गुण दत्ताये हैं ने लिनेश्वर मिवाय अत्य किमी से
घटित नहीं होते है इसलिए वह पाट अरिहंत परमात्मा की समद
ही बोला जा सकता है अथवा अरिहंत परमात्मा की प्रतिमा
समक्ष बोला जा सकता है जैसलमेर के नंडार से प्राचीन ले प्राचीन
जो ज्ञाता सून की प्रत निकलती है उसमें भी द्रोपदी ने जिनलिमा
के समक्ष जो नसुत्युणं का पाठ कहा है उसूला स्पष्ट अधिकार है।
वह पाठ पीछे से लिन्दा हुया नहीं है मूल अधिकार में है।
द्रोपदी को विवाह होने के बाद ससकित हुआ था उनके
पहले वह मिथ्या दृष्टि थी ऐसी प्ररुपमा करना वह भी सूत्रानुसार
प्ररूपणा नहीं है।
पू. उपाध्याय श्री बमोविजयजी महाराज ने इसी बात की
पुष्टि में लिखा है कि:-
"दर नवीमास्यो छे. पूजता, शकस्त शिवांगरे
भक्ति समी सूरिया ने विरति विशेषथी जाने

दर्शन विशुद्धि ५० उपापाप बी गोविजयजी ने करीबन तीन सौ वर्ष पहले लिवि टन गाया में स्पष्ट उल्लेख किया है कि द्रोपदी ने जिन प्रतिमा की पूजा करने ममय सपने को अनुकुल ऐमा वर नहीं मागा' है मगर नमुत्युण का पाठ बोल कर मोक्ष पट मागा है। गरपमेणी मूत्र में जैने मूरियाभदेव ने भक्ति को है वैसे ही अत्यन्त ही उल्लाम पूर्वक द्रोपदी ने भी जिनराज की भक्ति की है। इसमें कोई सदेह करेगें कि पानद श्रावक की तरह भक्ति की ऐसा उल्लेग नहीं किया और मूरियाम देव की तरह भक्ति की रोमा क्यो कहा गया। इसका उत्तर यही है कि मुरियाभ देव के अधिकार में पूजा के विषय में अत्यन्त विस्तृत विवेचन किया गया है एव सम्यग्दृष्टि देव जो परमात्मा को भक्ति करते है वह भी 'अत्यन्त विवेकपूर्ण होती है इसलिए द्रोपदी के अधिकार मे सूरियाभ कृन पूजा को जो पुष्टी दी गई है वह बिलकुल सत्य अर्थ में दी गई है। द्रोपदी के अधिकार में जो 'जिन प्रतिमा' शब्द पाया है उम पद का पालिकाल सर्वन हेमनद्राचार्यजी ने भी पप्टिशलाका पुरप चरिम में अरिहन पन्मात्मा की प्रतिमा ऐसा अर्थ किया है सलिए द्रोपदी ने पामदेव की प्रतिमा पूजी थी इस बात को तिदिन एक भी शास्त्रीय प्रमाण नहीं है।

. दर्शन विशुद्धि द्रोपदी ने जब जिन प्रतिमा की पूजा की उस समय वह मिथ्या दृष्टि थी इसलिए मिथ्या दृष्टि को करणी हमे मान्य नहीं है ? ऐसा कितने ही मानते है मगर उनकी वह मान्यता बिलकुल गलत है। ज्ञाता सूत्र में कहीं ऐसा उल्लेख नहीं पाया है कि द्रोपदी को विवाह होने के बाद समकित हुया है। द्रोपदी ने भवान्तर में पांच भरतार की पत्नी बनने का नियाणा जरूर किया था मगर नियाणा तो सारे भव तक पहुंचता है जैसे दशाश्रुत स्कंध मे नौ नियागे कहे है। उसमें नवमां नियाणा दीक्षा का कहा है सो दीक्षा लेने के समय नियाणां पूरा हो गया तो फिर उसी भव मे केवल ज्ञान होना चाहिए परन्तु नियागे वाले को उसी भव में केवल ज्ञान होने की गांस्त्रकारों ने मना किया है। इस बात पर से सिद्ध होता है कि नियाणा सम्पूर्ण भव पर्यन्त पहुंचता है और नियाणा यदि मन्द रस से किया होवे तो सम्यक्त्व आदि गुण प्राप्त हो सकते है। हां ! केवल ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। द्रोपदी का नियाणा मन्द रस पूर्वक का था इसलिए द्रोपदी को पाणीग्रहण के पहले ही सम्यक्त्व प्राप्त हुआ था इस बात में लव लेग भी संदेह रखने जैसा नहीं है इसलिए द्रोपदी ने पाणी ग्रहण करने के पहले जव जिन पूजा की थी उस समय वह मिथ्या- ष्टि नहीं मगर गृद्ध सम्यग् दृष्टि श्राविका थी इस बात का भी व मन मे सन्देह नहीं रखना चाहिए । द दर्शन विशुद्धि ६१ नियारणे का कर्म तो जिंदगी पर्यन्त तक भोगना पडता है उसमे ऐसा नही है कि पाच भरतार के माथ शादी होते ही निवाणा खत्म हो गया। कृष्ण वासुदेव भी नियाणा बाध कर आये थे और वह कर्म उनको मारी जिंदगी तक भोगना पड़ा था। वासुदेव पद मिला कि नियाणा खत्म हुआ ऐसा शास्त्र में कही नहीं लिखा है-तव भी श्री कृष्णजी को क्षायिक समकित का लाभ हुआ था। इससे सिद्ध होता है कि मन्द रस से बाबा हुआ नियाणा सम्यक्त्व प्राप्ति मे वाधा नही डालता है इसलिए द्रोपदी की जिन-पुजा प्रत्येक बावक श्राविकारो को अवश्य करने योग्य है। द्रोपदी भी शास्त्रो मे महा सती कहलाई है। "द्रोपदी अधिकार में प्रतिमा पूजन की पूज्य अभयदेव सूरी द्वारा पुष्टी"। करीवन हजार वर्ष पहले ज्ञाता सून पर लिखी टीका में पू अभयदेव सूरीजी ने ज्ञाता सूत्र के द्रोपदी अधिकार में द्रोपदी ने स्वयवर मडप में जाने के पहले जो जिन प्रतिमा की पूजा की थी उस बात की सपूर्ण पुष्टि की है। बात ऐसी होने पर भी ज्ञाता सूत्र पर इस वीसवी सदी में नई टीका लिखने वाले स्थानक वासी सप्रदाय के मुनि श्री घासीलालजी ने अपने द्वारा लिखी गई साता सूत्र की टीका के तीसरे भाग में ४०६ मे पेज पर लिखा रर्शन विशुद्धि "जिण पडिमारणं अच्चयं करेइ" इस पाठ के आधार से टीकाकार अभयदेव भूरी नं जिन प्रतिमा पूजन की जो बात लिखी है वह योग्य नहीं है क्योकि उनको मूल पाठ का निश्चय ही नहीं हुया है अब कहाँ अभयदेव सूरी का क्षयोपक्षम ? और कहां आजकल के मनुष्यों को शयोपशम ? पूर्वाचार्यों की टीकाओं के पावन से आज हम थोड़ा बहुत सूत्रों का रहस्य समझ सकते है उन महापुरुषों का तो अपने को अनंत उपकार मानना चाहिए कि जिन्होंने सूत्रों के रहस्य स्पष्ट किये है उसके बदले ऐसा लिखना कि अभयदेव सूरी ने जो जिन प्रतिमा की पूजा की बात कही है वह योग्य नहीं है ? क्या उन महापुरुष का नुकाबला करने जितना अपने में पांडित्य है ? पूज्यपाद अभयदेवसूरी क्या कम ज्ञानी थे? वे तो महाज्ञानी पुरुष थे ? उनको सूत्र पाठ का भी पक्का निर्णय था। द्रोपदी पूजा के अधिकार में किसी वांचना भेद की बात लिन्वि हो तो वह भी तो हजारों वर्ष पहले की लिखी है उसमे उन्होंने द्रोपदी ने जो जिन प्रतिमा की पूजा की है और पूजा के बाद प्रतिमाजी के सामने नमुत्थुणं का जो पाठ पढ़ा है वह बराबर मान्य रखा है। अव अभयदेवसूरी को सूत्र के मूल पाठ का निर्णय ही नहीं था यह वात कैसे मानी जा सकती है ? प्रतिमा पूजन मे श्रद्धा नहीं रखने वालों का तो उन महापुरुप के समय में जन्म ही नही दर्शन विधुद्धि हुअा या तो वे कौनसा आधार लेकर उन महापुरुष की समा. लोचना कर रहे है ? चाहें प्रतिमा पूजन मे नहीं मानने वाले जिन प्रतिमा अथवा चैत्य शब्द का अर्थ कुछ भी करे तव मी प्रतिमा पूजन की बात शास्त्रो में जगह-२ पाती है। अब कोई अर्थ का अनर्थ भी करे तो उनको इस काल में कौन रोकने वाला है? प्रतिमा पूजन को नहीं मानने वाले किसी भी जैन ग्रागम मूत्र में से एक भी ऐसा पाठ निकाल कर बतावे कि जिसमे ऐसा लिखा हो कि जिन प्रतिमा मानने योग्य नहीं है और मानने से उनमे बडा दोष है। जड प्रतिमा की उपासना मे कोई लाभ नहीं है। ऐमा पाठ मूल सूत्र में से निकाल कर बतावे ? तब हम उनकी बात सत्य अर्थ मे समझेगें और इस पुस्तक में हमने तो प्रतिमा पूजन की सिद्धि मे अनेक सूनो के पाठ प्रस्तुत किये है। पूर्वकाल के टीकाकार महापुरुषो ने भी जहा जहा सूत्रो मे जिन प्रतिमा एव अरिहत चैत्यो की बात आई है वहा-वहा इतना दिव्य प्रकाश डाला है कि उन टीकाप्रो के प्राचार मे अर्थ करने वाले किमी भी व्यक्ति को दिव्य प्रकाग मिल सकता है इतना ही नही स्पष्ट दर्शन होने से सम्यग् दर्शन का भी अपूत्र लाभ हो सकता है। कदाग्रह ही यदि नही छोडना है नो वैमै मनुष्यो को साक्षात ब्रहा भी नहीं समझा सकते है । तुल्य पूजा विधि मे पटकाय के प्रारम्भ का दोप बताकर कितने लाभ मेरु और दोष मात्र भरणु तुल्य वर्णन विशुद्धि ही पूजा का निपेध करते है मानों पूर्वाचार्यो को पटकाय के स्वरूप का ज्ञान ही नही था ? पूजाविधि बताने वाले पूर्वाचार्यों को षटकाय के स्वरूप का और उसके प्रारम्भ समारंभ का संपूर्ण ज्ञान था तब भी उन महापुरुपों ने फरमाया है कि जिस करणी में अल्प दोष हो और महान लाभ हो याने दोप तो अणु तुल्य हो और लाभ मेरु पर्वत तुल्य हो वह करणी गृहस्थों के लिए अवश्य करने योग्य है। इतना ही नहीं साधु मार्ग में भी महान लाभ के लिए कभी-कभी अल्प दोप का सेवन करना पड़ता है । साबु ग्रामानुग्राम विचरते रहे उसमें अपूर्व लाभ है। अव विहार में सामान्य दोप लग भी जाते है कदम उठाये बिना तो विहार हो ही नहीं सकता है। साधु भले ही इर्यासमिति का पालन करते हुए विचरण करते है तव भी प्रमाद के कारण कभी कभी विराधना का दोप लग ही जाता है। रास्ते मे नदी आवे और नदी पर पुल न होवे तो कच्चे पानी में पांव रखकर नदी पार करनी पड़ती है उसमें दोप तो जरुर लगता है मगर ग्रामानुग्राम विचरण करने से जो अपूर्व लाभ होता है उसके मुकावले दोप जो लगता है वह कुछ भी हिसाब में नहीं है। साधु नवकल्पी विहार का मार्ग छोड़कर यदि एक ही स्थान पर वर्षों तक पड़े रहेगें तो संग दोष लगे बिना रहेगा नहीं। संग दोष के कारण आखिर राग द्वेष उत्पन्न होवेगें फिर तो साधुता ही क्या रहेगी? उन महान दोषों की अपेक्षा विहार में जो भी दर्शन विशुद्धि दोप लगते है वे कुछ भी गिनती मे नही है। मार्ग की मर्यादा ऐसी होने पर भी यह कहते रहना कि जहा हिंसा वहा जिनाज्ञा नही। तो फिर पचमहाव्रतधारी साधुग्रो से विहार कैसे होगा? विहार में कभी नदी उतरने का समय आया तो नदी कैने पार करेगें हिंसा का सवाल आगे करके जो जिन पूजा का निषेध करते है उनको यह सव वाते विचारनी होगी। भगवान सर्वज्ञ एव हिंसा अहिंसा के सपूर्ण मर्मज्ञ होने पर भी विहार में साधुग्रो को नदी पार करके भी ग्रामानुग्राम विचरण करने की आजा फरमाई है। साधु एक स्थान में ही स्थिरवास करके रहे उस अपेक्षा ग्रामानुग्राम विचरते रहे उसमे भगवान ने महान लाभ देखा है। वर्षा काल मे साधु चार महिना किसी भी योग्य क्षेत्र मे चातुर्मास रहे वह बात अलग है क्योकि वर्पाकाल मे चार महिना एक स्थान म रहने की भगवान की प्राज्ञा है वाकी शेप काल में तो साधु विचरता भला क्यो कि- "वहता जल निर्मला बधा गदा होय ।" "साधुजन फिरते भले दाग न लागे कोय" । जैन धर्म का सापेक्षवाद समझे बिना एक भी वात दिमाग मे वेठने वाली नहीं है, हिंसा को सभी पाप समझते है मगर जहा भीतर के अध्यवसायो मे रोद्रता नही है बल्कि शुद्धता है वहा भले सामान्य दोप लग भी जाय मगर लाभा लाभ की अपेक्षा वह दोष किसी गिनती मे नही है। एक जिन पूजा में ही हिंसा है दर्शन विशुद्धि ओर किसी धर्मानुष्ठान में हिंसा कादोष लगता ही नहीं है ऐसी एकांतिक मान्यता हो तो वह विलकुल मिथ्या है। साधु साध्वीजी जहां चातुर्मास रहते है वहां उनके दर्शन वंदन को हजारों लोग गांवोगांव से आते रहते है उनकी व्यवस्था निमित्त चौका भी चलाना पड़ता है कई भाग्यवान सामिव वात्सल्य का लाभ उठाते है। चोका चलाने में प्रारंभ का दोष तो लगेगा ही तो वे सार्मिक भक्ति का लाभ उठाने वाले पूण्य के भागी होवेगें कि पाप कर्म के भागी होवेगें ? इस बात पर पूर्ण विचार करना होगा। मुनि भगवंतो को दान देने के समय गरम चाय अथवा गर्म दूध वेहराने के समय चाय या दूध में से जो भाप निकलती है उसमे असंख्य वायुकाय के जीवों की हिसा होती है तो जहाँ हिंसा है वहां सुपात्र दान का भी क्या महत्व रहेगा ? जिन पूजा मे जिन को हिसा का दर्शन होता है उनको इन सभी बातों में हिंसा का दर्गन कैसे नहीं हुआ? इतना ही नहीं चातुर्मास में साधु साध्वीजी को दर्शन वंदनार्थ कैसे क्या जा सकेंगे ? क्योंकि रास्ते में मोटर बसे चलेगी क्या कोई न कोई जीव की हिंसा हुए विना रहेगी ? बडे बड़े सांप भी मोटर के नीचे आ जाते है कीड़े मकोड़े जैसे छोटे प्राणियों की तो वाहन के नीचे हिसा होती ही रहती है। उसमें भी वर्षा-ऋतु में तो वाहन चलाने से इतनी विराधना होती है दर्शन विशुद्धि ६७ जिसका गब्दो मे वर्णन नही किया जा मकता है तब भी जहा बड़े महान प्राचार्यों का चतुर्मास कराया जाता है वहां दर्गनार्थियों की भीट लगी रहती है मारे चातुर्माम में मानो भक्त जनो का ताता लगा रहता है। अब रास्ते में घोर विराधना का दोष लगने पर भी साधु सतो के दर्शन वदन करके एव उनके मुह की अमृतमय वाणी का पान करके भक्तजन अपने को धन्य समझते है अब सोचौए कहा हिमा का दोष नही लगता है ? सलिए जिनको हिमा का दोष ही नहीं लगाना है उनके लिए तो एक ही रास्ता खुला रहता है वे किसी निर्जन प्रदेश में पादोपगमन सथारा कर लेवे। वाकि कोई गुभ प्रवृति होगी नहीं और सथारा करने पर भी नाक के द्वारा तो हवा निकलेगी उममे भी थोडा सामान्य दोप तो लगेगा ही। रोद्रपरिणाम के कारण तदूल मत्स्य की दुर्गति- मगुभ परिणाम से वध है और शुभ परिणाम से मोक्ष है इस मौलिक सिद्धात को जिन्होने सूक्ष्म बुद्धि मे नही विचारा है उनको सवर निर्जरा का रास्ता मिलना अति दुर्लभ है । तलिये मत्स्य का शास्त्रो मे दृष्टात पाया है ग्मिया गगैर चावल के दाने जितना होता है और प्रायुप्य सिफ दा घटी का होता है और यह रटे मत्स्य को श्राप की मोह में ७० दर्शन विशुद्धि क्रियाएं छोड़नी पड़ेगी सिर्फ पादोपगमन संथारा हो पच्चक्खना पड़ेगा? नहीं ! नहीं ! ऐसा मत कहो ! धर्म क्रियाए छोड़ने का हमारे लिए सवाल ही खड़ा नहीं होता है। हम क्रियाएं करते है तो उसमें हम हिंसा का भाव थोड़ा ही रखते हैं ? हमारे मन परिणाम उसमें शुद्ध होते है इससे हमे विरावना का दोप कैसे लगेगा? तो फिर ऐसा ही आप जिनपूजा के लिए समझ लो ने ? उसमें भी जो पूजा करने वाले है उनके मन परिणाम परमात्मा की भक्ति के होते है। जीववध के परिणाम उनके कतई नहीं होते है इसलिए जिनपूजा करने वालों को भी उस क्रिया से हिंसा का दोष लगने का सवाल ही नहीं रहता है अतः सामायिक, प्रतिकमण पौषध, व्रत, पच्चक्खाणादि शुभ-क्रियाए श्रावकों के लिए जैसे अत्यन्त शुभ फलदायक है वैसे ही जिन प्रतिमा पूजन भी सम्यक्त्व की महान शुभ करणी होने से श्रावकों के लिए महान फल- दायक है। एक अपूर्व घटना किसी गांव के बाहर बड़ा भारी जिन मंदिर था वहां वारह महिने में एक बार मेला लगता था। मेले के दिन यात्रियों की भीड़ लगती थी गांव में से बहुत से लोग दर्शन करने जा रहे थे दर्शन विशुद्धि ७१ उसमें एक बहन ठोटे बच्चे को साथ लेकर दर्शन करने के लिए पाई। दर्शन के बाद उसका वच्चा अपनी मा मे अलग हो गया और इधर उधर खेलने लगा और किसी एक गड्ढे में उतर पडा उस गड्ढे में साप का विल था और साप बाहर निकल कर बच्चे के नजदीक में ही फेन चटाकर बैठ गया इतने में उस बालक की मा बच्चे की शोध मे गड्ढे के पाम आ पहुंची और एक दम बच्चे को सीचकर गड्ढे में मे बाहर निकाल लिया जोर से खीच कर निकालने से उसके शरीर की चमडी रगडाने मे थोडा खुन भी बढे लगा मगर जीव वच गया शरीर को नुकसान तो थोडा सा हुना मगर जीव की रक्षा हो गई वह लाभ अनत गुणा हुअा वैसे ही जिनपूजा वगैरह धार्मिक अनुष्ठानो मे नुकसान देखा जाय तो कुछ भी नहीं है और लाभ तो इतना महान है कि आत्मा के ज्ञान, दर्शनादि रप भावप्राणो की रक्षा हो मकती है। यदि मनुष्य जिन पुजा जैसी शुभ करणी का त्याग करके विषय-कपाय स्प प्रमाद में पडा रहता है तो उसके भाव प्राणो का क्या रक्षण होने वाला है ? भाव प्राणो के नाश रुप भावमरण प्रतिक्षण जरुर होता रहेगा इसलिए क्वल नुकसान का ही पलडा नही देखने का है मगर लाभानुलाभ का भी पलडा अवश्य देग्वना होता है। प्रभु प्रतिमा के पालवन से कभी कभी ऐमे शुभ भाव प्रगट होते है कि यदि चोथे पारे का काल होव और - दर्शन विशुद्धि भोतर को परिणाम की धारा में यदि उत्तरोत्तर वृद्धि हो होती रहे तो जीव केवल ज्ञान को भी प्राप्त कर लेता है इस विषय की पुष्टी में नागकेतू का शास्त्रों में अत्यन्त सुप्रसिद्ध दृष्टात है जिसका उल्लेख श्री कल्पसूत्र की टीका में पूज्य उपाध्याय विनयविजयजी ने किया है नागकेतू जिन मंदिर में पुष्प पूजा कर रहे थे उसी समय पुष्प में रहे छोटे से नाग ने उनकी अंगुली पर डंक मारा मगर नागकेतु उस समय एक दम भावना की श्रेणी पर आरुढ हो गये और वही उनको केवल ज्ञान प्राप्त हो गया। पूज्य देवचंद्रजी महाराज ने ठीक ही फरमावा है कि- -- "स्वामी गुगा अोलखी स्वामी ने जो भजे दर्शन शुद्धता तेह पामे ज्ञान चारित्र तप वीर्य उल्लास थी कर्म झी पी वसे मुक्ति धामे" | देवाधिदेव अरिहंत परमात्मा के ज्ञान, दर्शन, क्षमा, नम्रता, सरलता आदि गुणो को पहचान कर जो उनको भजते हैं वे दर्शन विशुद्धि को प्राप्त कर लेते है इतना ही नहीं जान, चारित्र, तप एवं अपूर्व वीर्योल्लास के द्वारा सभी कर्मो का क्षय करके मुक्ति धाम में जा वसते है।

दर्शन विशुद्धि
७३
बाह्य दृष्टि से सावध मगर परिणामे निर्वद्य
परिणाम के वश वध और मोक्ष का जो विधान फरमाया है
वह यथा तथ्य है जैसे मुनि को विहार में नदी पार करने के समय
परिणाम में लव लेश भी अपकाय के जीवो पर निर्दयता का भात्र
नही होता है वैसे ही जिनपूजा मे श्रावको के मन परिणाम भी
विगुद्ध होते है। पुष्पादिक एकेन्द्रिय जीवो पर लव लेश भी हृदय
में निर्दयता का भाव नही होता है पूजा अनुष्ठान वाह्य दृष्टि से
सावध दिखता हो मगर वह अनुष्ठान परिणामे निर्वद्य है।
अत्यन्त शूभ भाववर्षक होने से सम्यक्त्व प्राप्ति एव दर्शन
विशुद्धि का प्रवल निमित्त भूत है।
इस विषय में कोई शका उठा सकते है कि नदी पार करना
वह तो मुनि के लिए एक अपवाद मार्ग है और उसका प्रायश्चित
भी लिया जाता है इस गका का समाधान यही हो सकता है कि
जिन्होंने विविध प्रारम समारभ का त्याग किया हुआ है उन
मुनियो को भी यदि अपवाद का सेवन करना पड़ता है तो फिर
श्रावक तो यो ही प्रारम समारभ में ही बैठा हुअा है वैसी स्थिति
में श्रावक को यदी परिणाम विशुद्धि का जिन पूजा के निमित्त
अपूर्व लाभ मिलता हो तो सामान्य दोष का सेवन
करने में धावक पणे को कौनसी बाधा पहुंचने वाली है ?
जिन पूजा के निमित्त ही श्रावक को प्रारभ का दोष

वर्शन विगुदि असदारंभी की अपेक्षा सदारंभी बनना बहुत ही अच्छा जब तक योग क्रिया नहीं थंभी है तब तक मभी जीव योगा- रंभी है क्योंकि जब देवो तब मन योग, बचन योग और काय योग का व्यापार चलता ही रहता है तो फिर उममें असदा भी होने की अपेक्षा सदारंभी होना क्या गलत बात है ? याने गुछ भी गलत वात नही है। घर का काम करने में, व्यापार वाणिज्य करने में, रसोई बनाने मे सब मे गृहस्य को प्रारंभ दोष तो लगता ही है वह सव असदारंभ है। अब पूजा में भी थोड़ा प्रारंभ दोप आता है मगर वह सदारंभ है वह सदारंभ ऐसा है कि उसके फलस्वरुप गृहस्थ आखिर निरारंभी बनता है। रोज जिन भगवान का दर्शन वंदन एवं पूजन करते करते श्रावक को एक दिन परमात्मा के वतलाये गये रास्ते पर मंगल प्रस्थान करने की भावना प्रगट होती है और वीतराग परमात्मा का प्रतिदिन दर्शन, वंदन पूजन करने वाला श्रावक विरक्त भाव में आकर अन्त में विरति का मार्ग पकड़ लेता है और प्रारंभ समारंभादि का त्याग करते हुए सर्वचा निरारंभी एवं विरति घर बन जाता है। महान पुरुषों की विशुद्ध परम्परा मूर्ति पूजा में श्रद्धा रखने वाले बड़े बड़े महान पुरुष जैन दर्शद दर्शन विशुद्धि ७७ की सुविशुद्ध परम्परा मे हुए है। इसी पुस्तक में दशवकालिक सूत्र के रचयिता मय्यभव स्वामी का उल्लेख किया गया है जिन प्रतिमा के दर्शन मे उनको प्रतिवोध हुअा था ऐसा विधान साफ माफ शब्दो मे भद्रबाहु स्वामी ने दशवकालिक नियुक्ति मे किया है। नियुक्ति मान्य रखने का भगवती मुत्र मे विधान किया गया है। श्री भगवती सूत्र के पच्चीस वे शतक मे कहा है- "मुत्तत्थो खलुपढमो वीयो मिज्जुत्ति मिस्सियो भरिणो" । प्रथम शिष्य को सूत्रार्थ देना दूसरा नियुक्ति महित सूत्र का रहस्य समझाना इस तरह भगवती सूत्र मे नियुक्ति मान्य रखने का विधान है ऐसा भी तर्क दिया जाता है कि नियुक्ति टीकामो मे परस्पर विरोध प्राता है इसलिए नियुक्ति हम मान्य नही रखते है है जब ऐसा ही है तव तो मूल सूत्रो के पाठ मे भी बहुत सी जगहो पर परस्पर विरोध पाता है। तव तो मूल सूत्र भी कैसे क्या मान्य करेगे? और मान्य रखते तो है श्री समवायाग सूत्र में श्री मल्लीनाथजी के ५७०० मनपर्यव ज्ञानी कहे है और श्री ज्ञाता सून मे ८०० क्हे है ये दोनो मूल सूत्र है। अव नियुक्ति टीका की वात छोटो मूल सूत्र को कैसे क्या मान्य करोगे? ?

७८ दर्शन विशुद्धि वे परस्पर श्री उत्तराध्ययन सूत्र के ३३ वे अध्ययन में वेदनीयकर्म की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहुर्त की कही है और पन्नवणा मूत्र के રે રે पद में बारह मुहुर्त की कही है। श्री ज्ञातासूत्र में श्री कृष्ण की ३२००० रानियां कही है और अन्तगढ़ दशांग में १६००० कही है अव ये सूत्र की परस्पर विरुद्ध बाते कैसे क्या मान्य करेगें ? जब ये बाते मान्य करेगे तो नियुक्ति मान्य करने में क्या हरकत है ? जहां मूल सूत्रों में विरोधाभास लगता हो उसका भी महापुरुषों ने योग्य समाधान निकाला है। भव भीरु महान गीतार्थ पुरुषों ने नियुक्ति भाष्य चूर्णी टीकाएं लिखी है उन लिखने वाले महापुरुषों ने भी कहीं सूत्र विरुद्ध प्ररुपणा न हो जाय उस बात का पूरा ख्याल रखा है क्योंकि उनको भी उत्सूत्र प्ररुपणा का पूरा पूरा भय था इसलिए मूल सूत्रों का सही वास्तविक अर्थ एवं रहस्य जानना हो तो मूल सूत्रों की तरह नियुक्ति भाष्य चूर्णी एवं सूत्रों पर की टीकामो को भी अवश्य मान्य रखना चाहिये। कितने ही अपनी मान्यता के अनुकूल जो जो पाठ टीका चूणि में हो वे ले लेते है और अपनी मान्यता के विरुद्ध मूर्ति पूजा के पाठ नियुक्ति भाष्य चूर्णी टीका में मिलते हो वहां उनको परस्पर विरोध महसूस होता है तो मूर्ति पूजा के पाठ मूल सूत्रों में भी कई जगहो पर मिल आते है जो हमने इसी पुस्तक में वे पाठ दिये हुऐ है। जब तक विपरित मान्यता का आग्रह वर्शन विशुद्धि ७० -- नहीं लुटता है तब तक सत्य का दर्शन होना अति दुर्लभ है । अाग्रह भले ही हो परन्तु दुराग्रह के वदले यदि मदाग्रह रखा जाय तो मनुप्य को तुरन्त प्रतिवोध हो सकता है। जैन शामन की अविच्छिन्न परम्परा में चौदह पूर्वधर भगवान स्थूलीभद्र स्वामी के शिष्य आर्यमहागिरिएव आर्यसुहस्ति दोनो महान समर्थ पुरुष हुए है उसमे आर्य सुहस्ति से राजा सप्रति को प्रतिवोध हुआ था। आर्यसुहस्ति दरापूर्वी थे उसके बाद भगवान उमास्वाति सिद्धसेन दिवाकर, जिन भद्रगणि, क्षमाश्रमण हरिभद्राचार्य, कलिकाल, सर्वज्ञ हेमचद्राचार्य जैमे जिननासन के स्तभ समान महान पुरुष हुए है। अभी अभी मे ३०० वर्ष पहले पूज्य उपाध्याय यशोविजयजी, योगीराज आनदघनजी जैसे महान जिन शासन में चमकते सितारे हुए है। इन सभी महापुरुषो ने सूने और सिद्धात की सास दे दे कर जिन प्रतिमा की सिद्धि की है। ये मव महान ज्ञानी और ज्योतिपर पुरुष होने पर भी जिन प्रतिमा वा पालवन मान्य रखने वाले थे। यह है जैन शासन की उज्जवल एव अविच्छिन्न परम्परा। शिथिलाचारी थे उस समय में भी महावत- धारी मौजूद थे- अब उन महान उज्जवल परम्परा को छोडकर करीवन चार सो पांच सौ वर्ष पहले लोकाशाह ने मूर्तिपूजा विस्ट परम्परा दर्शन विशुद्धि चलाई थी उस परंपरा को मान्यता देकर के आज तक में लाखो मनुष्य मूर्तिपूजा से विमुख हो गये। गृहस्थ का चलाया हुआ मार्ग मान्य ही नहीं हो सकता है जिस परंपरा का उल्लेख कर गये है वह परम्परा तो भगवान महावीर एवं सुधर्मास्वामी से अविच्छिन्न रुप से चली आ रही है जिसमे अनेक महान ज्योतिर्धर महापुरुष हुए है। आज उन महापुरुपों का साहित्य भी इस उज्जवल परम्परा की साक्षी दे रहा है। ऐसा होने पर भी बोलने वाले बोलते ही है कि “यतियों में बहुत शिथिलाचार व्याप्त हो गया था जैन मार्ग मे पूरी शिथिला फैल गई थी लोकाशाह ने शिथिलता को दूर किया और दया धर्म का उद्धार किया"। अपने मान्य पुरुषों का महत्व बढाने को सब कोई लिखते रहते है। शिथिलता तो आज भी बढ़ती जा रही हैं तो क्यां इतने मात्र से अपनी सुविशुद्ध परम्परा को छोड़ देना ? जिस समय मे शिथिलाचार फैला हुआ था उस समय प्राचार संहिता का पालन दृढ़ता से करने वाले महान पुरुष भी तो दूनिया में मौजूद थे। पू. पाद् जगद्गुरु-हीरसूरीजी महाराजा, पू. सेन सूरीजी महाराजा, पू. देवसूरीजी महाराजा पू-यशोविजयजी महाराजा, पू-विनयविजयजी, पू-यानंदघनजी महाराजा ये सभी महान पुरुष विक्रम सं-१५६६ की साल से सत्तरा सो की साल पर्यन्त में हुए है और उसके बाद भी पू-पं- दर्शन विशुद्धि मत्यविजय पू-पदमविजयजी आदि उत्तरोत्तर बहुत से धर्म धुरन्धर मुविशुद्ध चारित्र का पालन करने वाले महापुरुप हुए है। इन महापुरपो का ही प्रालबन लिया जाता तो सुविगुद्ध परम्परा छोटने का समय आता ही नही ? चैत्यवास के कारण यतियो में शिथीलाचार प्रविष्ट कर गया था तो वह उन्ही को मुबारक था। यतियो को ही क्या दोष देना एक समय ऐसा भी आया था जिस समय यतिमो ने भी धर्म की रक्षा की थी और आज प्रत्येक सप्रदायो के साधुनो मे भी शियिताचार प्रविष्ट करता जा रहा है और साय साथ इम पडते काल मे भी कई महापुरुष त्यागी, वैरागी, उग्र तपस्वी होने के साथ तलवार की धार पर चलने की माफक पचमहाव्रतो का पालन कर रहे है। जीवमात्र कर्माचीन है सयम मार्ग लेने पर भी तीव्र कर्मोदय के कारण उन्नति और अवनति हो सकती है परनु इतने मात्र से मूल मार्ग से विमुख बनने की कोई जरुर नहीं। पच महाव्रतधारी महापुरप ही मोक्ष मार्ग के महान सूत्रधार है। श्रावक तो श्रमणोपासक कहे जाते है। देवाधिदेव तीर्थ करो के द्वारा मोक्ष मार्ग प्रवर्ताया जाता है और उन महापुरुषो का निर्वाण होने के बाद पू-प्राचार्य एव उपाध्यायादि महापुरप ही मार्ग की बुरा को वह्न करते आये है और आगे भी वहन करते रहेंगे। इस पचम काल मे भी इक्कीस हजार वर्ष पर्यन्त शासन अविच्छिन्न रूप से चलने वाला है यह विधान भगवती सूत्र मे ८२ दर्शन विशुद्धि गणधर भगवंतो ने किया है बीच में विच्छिन्न हो गया ने फिर किसी ने उद्धार किया ऐसा किसी महापुरुष ने विधान नही किया है। जव जव प्रभावक महापुरुष होते है तव तव जिन शासन का प्रभाव जरुर बढ़ता है एवं धर्म का उद्योत भी होता है बाकि शासन विच्छिन्न होने का तो सवाल ही नहीं रहता है । में गृहस्थ कितना भी प्रभावशालि क्यों न हो मगर वह मार्ग का सुकानी नहीं बन सकता है। श्रावक तो श्रमणोपासक ही कहलायेगा। घड़ी भर के लिए मान ले कि लोकाशाह ने मार्ग का उद्धार किया और उस मार्ग में साधु भी बहुत है मगर लोकाशाह तो स्वयं गृहस्थ थे तव उस मार्ग में प्रादि दीक्षा गुरु कौन है ? चार सौ पांच सौ वर्ष पहले जव यह पंथ निकला और गुरुयात तो उस पंथ मे वावीश अादमी दीक्षित वने। उनके दीक्षा गुरु कौन बने थे ? स्वय लोकाशाह ने भी दीक्षा ली हो तो उनको दीक्षा देने वाले कौन थे ? जैन मार्ग में दीक्षित वनने वालो को गुरु तो पहले धारना पड़ता है। गुरु विना का जो भी पंथ हो उसको तो नूगरे का पंथ कहा जाता है। गुरु विना मार्ग ही कौन बतायेगा ? जवकि जैन मार्ग की मूल परम्परा मे, गुरुपद की परम्परा अविच्छिन्न रुप से चली आ रही है इस बात की पुष्टि में कई महापुरुषों के नाम का उल्लेख इसी पुस्तक में कर आये है।

दर्शन विशुद्धि ८३ बीच में महापुरपो की सुविशुद्ध परपरा का जो उल्लेख किया गया है उसमे पू-उमाम्बाति के नाम का भी उल्लेख किया है। उमाम्वाति ऐसे महान पुरप हुए है जो श्वेताम्बर-दिगम्बर दोनो परम्परा मे मान्य पुरुप है। उन्होने पाच सौ प्रकरण अन्य लिम्वे थे उसमे 'तत्वार्थ सूत्र' उनका लिखा हुअा अाज अत्यन्त सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है जिस शास्त्र को श्वेताम्बर-दिगम्बर दोनो मान्य रखते है। दूसरा प्रगमरति प्रकरण उन्होंने लिखा हुआ आज भी उपलब्ध है। जिस ग्रन्थ की रचना अत्यन्त भाव पूर्ण सुमर एव रोचक है आध्यात्मिक विषयो पर का सर्वोत्तम ग्रन्थ है। करीवन् दो हजार वर्ष पहले का शास्त्र है उसमें पू-उमास्वाति ने श्रावको के लिए प्रतिमा पूजन का उल्लेख इस प्रकार किया है कि- "चैत्यायतन प्रस्थापनानि, कृत्वाव शक्तित प्रयत । पूजाश्च गघ माल्याधिवाम धूप प्रदिपाद्या अपनी गक्ति अनुगर जिन चत्य पी स्थापना करके उसमे प्रतिप्ठिन किये ग्नि विव की श्रावक सुगधी पून तथा धूप प्रदि- पादी द्वाग पूजा करे । इम गाथा मे पू-उमास्वाति ने श्रावक को जिन मदिर निर्माण करने का एव जिन प्रतिमा का पूजन अर्चन करने का माफ साफ शब्दो म उपदेश दिया है। श्री पन्नवणा सूत्र के रचयिता ग्यामाचार्य एव उमास्वाति ममकालीन महापुरुष हुए है। जब ने महान ज्ञानी पुरणे के वचन भी अपनी श्रद्धा के ८४ दर्शन विशुद्धि विषय में नहीं लिये गये तो फिर यह जैन परम्परा मे जन्म लेने का भी क्या अर्थ रहेगा ? और भी जैन परम्परा में हुए सिद्धसेन, हरिभद्राचार्य, हेमचन्द्राचार्यादि महापुरुषों का इसी पुस्तक में उल्लेख कर चुका है। उन सभी महापुरुषों ने अपने अपने स्वरचित ग्रन्थों में प्रतिमा पूजन का सा साफ शब्दों में उलेख किया है। जैन शासन के उज्जवल इतिहास पर वेधक प्रकाश श्रीमद् राजचन्द्रजी अध्यात्मिक सत्पुरुप हुए है जिनसे महात्मा गाँधी को प्रतिवोध हुया था। गांधीजी ने तीन गुरु माने थे उसमे श्रीमद् राजचन्द्रजी को भी गुरु माना था। श्रीमद् राज- चन्द्रजी ने कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्यजी को अत्यन्त भावपूर्ण श्रद्धांजलि समर्पित की है। उपदेश नोंध में उन्होने लिखा है कि "श्री हेमचन्द्राचार्य ने बहुत कुछ किया। श्री आनंदघनजी हेमचन्द्राचार्य से छ: सौ वर्ष बाद मे हुर। इस छ: सौ वर्ष के अन्तराल में दूसरे उनके जैसे हेमचन्द्राचार्य की जरुर थी। विषमता व्याप रही थी, काल उग्र स्वरुप ले रहा था। वीच मे श्री वल्लभा- चार्यजी ने पुष्टी मार्ग को प्रवर्ताया था उसका उल्लेख करने के बाद उन्होने लिखा है कि "त्यां प्रतिमा प्रतिपक्ष जैन मांज उभो थयो" याने इतने में प्रतिमा विरोधी पक्ष जैन सम्प्रदाय में दर्शन विशुद्धि हो उत्पन्न हुप्रा। ध्यान का कारण स्वरुप प्राप्ति का साधन ऐसी जिन प्रतिमा प्रति लाखो दृष्टि विमुख हुए। वीतराग परमात्मा के गास्न कल्पित अर्थ करने में विरावित हुए। कितने ही तो समूल से खटित हुए। इस त ह से इस छह सौ वर्ष के बीच मे दूसरे हेमचन्द्राचार्य जैसे महान रप की जरुरत थी। अन्य बहुत से प्राचार्य हुए मगर वे हेमचन्द्राचार्य जैसे प्रतापी नही थे। इसीलिए वे विषमता के सामने टिक नहीं सके । विषमता वढती जा रही थी इतने में श्री ग्रानदधनजी दो सो वर्ष पहले हुए। श्रीमद् राज- चन्द्रजी ने कितना स्पष्ट खुलासा दिया है। मूर्तिपूजा मे श्रद्धा नही रखने वाले भी काठियावाड मे विचरने वाले साधु साध्वी जी श्रीमद् राजचन्द्रजी के साहित्य मे दिलचस्पी रखते है अपने व्यास्यानो में श्रीमद्जी के आत्मसिद्धि शास्त्र का एव अपूर्व अवसर वगैरह साहित्य का उल्लेख करते है मगर श्रीमदजी ने प्रतिमा के पालवन को भी मान्यता दे रखी थी। साहित्य का लाभ व्यापक दृष्टि से उठाना चाहिये जिससे अपनी दृष्टि का विकास होवे । यह वात विचारने योग्य है। पहाड़ पर का अग्नि तुरन्त दिखता है मगर पैर नीचे का नहीं दिखता- सूत्र मिद्धात एव इतिहास से प्रतिमा पूजन की सिद्धि होने पर भी ऐसा लिसना कि मूर्ति पूजक सम्प्रदाय पीछे से निकला और दर्शन विगुद्धि से भी सिद्ध होता है कि जिन प्रतिमा अनादिकाल से वंदनीय एवं पूजनीय है। जगत परिवर्तनशील नास्तिक कहता है कि आत्मा, पुन्य, पाप, परलोक कुछ भी नहीं है तो क्या नास्तिक के कहने मात्र से उन सभी चीजों का लोप हो जायेगा ? वैसे ही करोड़ों वर्ष पहले का ज्वलन्त इतिहास जहां जिन प्रतिमा की साक्षी दे रहा है वहां ऐसा लिखना और बोलना कि प्रतिमा पूजा कुछ वर्षों पहले शुरु हुई है वह तो लाखो करोड़ो वर्ष पहले के ज्वलन्त इतिहास को उल्टाने वरावर है। जिनका स्वय का चार सौ पांच सौ वर्ष पहले का कोई इतिहास नहीं है न तो पाँच सौ वर्ष पहले उनकी परम्परा में हेमचन्द्राचार्य जैसे कोई महान आचार्य हुए है और न तो पांच सौ वर्ष पहले का उनकी परम्परा की पुष्टी करने वाला कोई साहित्य है। जवकि जैन शासन की अविच्छिन्न परम्परा में तो हजारो वर्ष पहले का साहित्य आज भी मौजूद है। उन उन साहित्य की रचना करने वाले पू-भद्रवाहु स्वामी, पू. जिनभद्रगणी क्षमा श्रमण पू-सिद्धसेन दिवाकर, पू-हरिभद्राचार्य पू. मलयगिरि, पू-शीलांका- चार्य, पू-अभयदेवसूरी, पू-हेमचन्द्राचार्य आदि महापुरुष सारे विश्व में विख्यात है और उन सभी महापुरुषो का अाज अपने दर्शन विशुद्धि - महान पुण्योदय से माहित्य भी विद्यमान है। उपरोक्त महापुरुषो के समय में भी जिनकी विद्यमानता नहीं थी वे आज करोडो वर्ष पहने के इतिहास का अपलार कर रहे है तो उनकी बात पर कैसे विश्वास रखा जा सकता है ? प्रतिमा छोटी बड़ी का सवाल नहीं पाखिर वह प्रतीक किसका है ? इतना ही सोचने का है। ऐसी भी दलील दी जाती है कि भगवान ऋषभदेवजी की काया ५०० धनुष्य प्रमाण थी जवकि शन्नु जय पर रायण वृक्ष के नीचे उनके चरण इतने लघु कैसे हो सकते है ? नेमनाथ भगवान की काया दश धनुष्य प्रमाण थी उनके चरण गिरनारजी के पहाड पर सहमावन में है मगर उनके शरीर के प्रमाण जितने नहीं है। शरीर के अनुसार चरण होने चाहिए ने ? ऐसी दलील पेश करने वालो को इतना तो ख्याल रखना चाहिये की ज्योज्यो काल व्यतीत होता जाता है त्यो त्यो जगत के भावो मे परिवर्तन आता ही रहता है। परमात्मा की प्रतिमा एव चरण कितने भी लघु क्यो न हो मगर भजने वाले तो उनको परमारम स्वरुप समझ कर ही भजते है। बडे छोटो का सवाल ही नही है अन्त में वह प्रतीक किसका है इतना सोचने का है। उपभदेव भगवान के समय में साघु जो रजोहरण रखते होंगे वह उनके शरीर के प्रमाण मे ही रसते होगे। इस काल के साधु अपने शरीर प्रमाण रजोहरण ९० दर्शन विशुद्धि रखते है तो उसको भी पवित्र ही माना जायगा। भगवान ऋषभ देव की काया ५०० धनुष्य प्रनाण थी और महावीर भगवान की काया सात हाथ प्रमाण मानी गई है तो क्या दोनों का तीर्थ कर पद समान नहीं माना जायगा ? अवश्य माना जायगा वैसे ही प्रतिमा छोटी होने पर भी वह पूजनीक ही मानी जायेगी जैसे एक छोटा सा नकशा क्या सारे देश का परिचय नहीं दे शक्ता है- अवश्य दे शक्ता है वैसे ही परमात्मा की छोटी सी प्रतिमा परमात्म स्वरुप का अवश्य परिचय दे शक्ती है। हृदय का भाव तोडनाबहुत बड़ादोष भारत देश में मूर्ति पूजा के मूल इतनी गहराई में गये हुए हैं कि कितना भी विरोध होने पर लाखो करोड़ो मनुष्य अपने-अपने इष्ट देव की श्रद्धा, भक्ति से उपासना करते ही रहे है और करते ही रहेगें। मूर्तिपूजा में श्रद्धा नहीं रखने वाले भी हजारो लाखो मनुष्य तीर्थ करने के लिए जाते है और अट्ठाई ग्रादि तप करते हैं तव जिन मंदिरों मे लड्डू चढ़ाने को प्राते जाते रहते है। मूर्तिपूजा के प्रति लोगों में श्रद्धा का भाव बढ़ता जा रहा है ! हृदयं का जो भाव है वह महान किमतीं है किसी के भी हृदय के भाव को कभी नहीं तोड़ना चाहिये। मुसलमानों का जव युग था तव मंदिर और मूर्तियां उन्होने तोड़ी थी मगर किसी के हृदय की भावना को तोड़ना वह तो बहुत बड़ा भारी दोष है। प्रतिजा देना तो जुमा, गिकार चोरी, परस्त्रीगमन, वेश्यागमन आदि महाव्यसन त्याग

दर्शन विशुद्धि
करने की देना अथवा रात्री भोजन त्या व्यवहार में अनीति,
अन्याय, सिनेमा त्याग ग्रादि की प्रतिज्ञा देना उसके बदले दिर
नही जाना, इममे तो बटा दोप है, सभी दोषो का प्रायश्चित होगा
मगर मन्दिर जाकर पूजा करने मे जो दोप लगता है उसका तो
प्रायश्चित ही नही होगा। यह विचार शून्न प्रलाप नही तो
क्या है जैसे कोई सुपात्र मे दान देता हो, अध्ययन करता हो, उसमें
अन्तराय डालने से अन्तराय वर्म का बन्ध होता है वैमे ही जिन
पूजा मे अतराय डालने मे अन्तराय कर्म का वध होता है ऐसा
पू-देवेन्द्रसूरीजी ने ८०० वर्ष पहले स्वरचित कर्म ग्रन्थप्रकरण में
.
निखा है।
जीवनका अपूर्व विज्ञान
पू-मानदयनजी ने तीन मो वर्ष पहले के म्बरवित स्तवन म
लिखा है-
चित्त प्रसन्ने रे पूजना फल कयु रे
पूजा अवडित एह
कपट रहित थई ग्रातम अर्पणा रे
अानदधन पद रेह।
चित्त की प्रसन्नता पूजा का वास्तविक फल है। जिन गज
की अप्टप्रभारी पूजा करने के समय चित्त में जो प्रमन्नता का भाव
ग्व पाहल्लाद उत्पन्न होता है वह तो उमका अनुभव करने वाला
ही नान सकता है। मानसिन प्रसन्नता ही जीवन का अपूर्व

९२
दर्शन विशुद्धि
विज्ञान है। प्रसन्नता का फल मानसिक समाधि है, समाधि का
फल वीतरागता है, वीतरागता का फल केवल ज्ञान है और केवल
ज्ञान का फल मोक्ष है । कितने ही कहते है कि जिनपूजा से यदि
मोक्ष हो सकता है तो तप, जप, और संयम की क्या जरुरत है ?
पूजा से ही मोक्ष मिलता हो तो इतना कष्ट कीन करेगा ? तप
संयम का किसी ने निषेध नहीं किया है वह भी आखिर परमात्मा
की भावपूजा स्वरुप है। द्रव्य पूजा और भावपूजा दोनों का
मिलन या संगम करना ही सोने में सुगंध स्वरुप है। भावपूजा के
लक्ष्यपूर्वक जो द्रव्य पूजा की जाती है वही वास्तविक द्रव्यपूजा है।
प्राखिर तो परमात्मा की आज्ञा की परिपालना वही
वास्तविक पूजा है अथवा परमात्मा ने प्ररुपण किये हुए
सत्य, अहिंसा, नीति, न्याय, अपरिग्रह, क्षमा, नम्रता,
संतोषादि सिद्धांतों का शक्ति अनुसार पालन करना ही
परमात्मा की वास्तविक पूजा है मगर वह भाव-पूजा है
और द्रव्यपूजा का आलंबन लिए बिना भाव प्रगट होना
बहुत कठिन है इसलिए राजमार्ग यही है कि द्रव्य तथा
भाव दोनों का मिलन करके परमात्मा की उपासना की
माय । यही जैन मार्ग का परमसार है ।
,

दर्शन विशुद्धि
तलधारको धार सोहिली मगर चरणोकी
सेवा दोहिली
पू-पानदघनजी महाराज ने फरमाया है की-
पार तरवारनी सोहिली दोहिली
चौदमा जिन तरणी चरण सेवा
धार पर नाचता देख वाजी गरा
सेवना घार पर रहे न देवा
तलवार को धार पर से गुजरना आसान है मगर देवाधिदेव
के चरणो को सेवा अति मुस्केल है याने तलवार की धार सोहिली
है मगर सेवा अति दोहिली है-वह सेवा कोनसी बस इतना ही
विचारने का है।
आज कल जिन मदिरो मे जहा देसो वहा न्हाने घोने की
व्यवस्था होती है-वैशर चदन धूप दीप वगेरे अप्ट प्रकारी पूजा की
सामग्री भी बहुत से जिन मदिरो मे होती है-अव वताइए मदिर मे
जाके पूजा करने वालो को क्या मुश्केली है-तब भी आनदधनजी ने
चरण सेवा को इतनी दोहिली पयो वताइ है-इस बात का रहस्य
अवश्य समझना चाहिए।
भगवान की आज्ञा का पालन करना ही परमात्मा की
वान्नविक भावपूजा है-और द्रव्य पूजा भी अपने घर के उत्तम द्रव्यो
से करनी चाइए द्रव्य शुद्धि ही भाव पुद्धि मे कारण बनती है
भगवान ने फरमाया है हिमा नहीं करना, असत्य नही बोलना,

दान विशुद्धि -- चोरी नहीं करना, व्यापार में मिलावट नहीं करना, पर स्त्री को माता समान गीनना अधिक परिग्रह को पाप की जड समजना सूर्यास्त के बाद रात्री भोजन नहीं करना मांस मद्य जमी कंदादि अभक्ष का भक्षण नही करना एवं दारु भांग वगेरे अपेय का पान नही करना जूआ शिकार वेश्यागमन पर स्त्री गमन वगेरे सप्त महाव्यसन का सेवन नही करना यह सव भगवान की आज्ञाए है- इनका पालनही भगवानकी भावपूजा है एक छोटी सी वात आप ध्यान में लीजिए की भगवान ने फरमाया है कि गृहस्थ को व्यापार करना पड़े तो नीति न्याय से करे क्योकी नीति न्याय ही धार्मिक जीवन की नीव है इस आज्ञा का पालन भी मनुष्य को कीतना कठीन महसूस होता है अब तो आप समज गये होंगे की चरणो की सेवा कीतनी मुश्केल है। मानवी कितनी ही धर्म क्रियाए करे व्रत पच्चक्खाणादिभी करता रहे मगर जब तक नीति न्याय प्रमाणीकता एवं सत्य अहिंसा का जीवन में पालन नही होता है तब तक धार्मिक जीवन देदीत्य- मान नही बनता है वैसे मनुप्यो के कारण धर्मशासन की प्रभावना होने के बदले हेलनाभी हो शक्ती है धार्मिक जीवन की सफलता के लीए अरिहंत परमात्मा का जो उपदेश है और उनकी जो आज्ञाए है उन उन आज्ञाओ का अभ्यास करने पूर्वक जीवन में आचरण करना अत्यंत जरुरी है।

दर्शन विशुद्धि महाभारत मे एकलव्य भील का दृप्टात विख्यात है। वह द्रो चिार्य के पास धनुर्विद्या मीखने गया था मगर द्रोणाचार्य ने रसको विद्या नहीं सिखलाई। परन्तु उस भील का उत्साह ज्यो का त्यो बना रहा और उसने जगल में जाकर द्रोणाचार्य के स्वस्प जैमी प्रतिमा बनाई और उस प्रतिकृति के सामने उसने अव्ययन गुरु किया आखिर वह महान धनुर्घर बन गया। वैमे ही श्रद्धा एव भक्ति से जिनेश्वर को भजने वाला जीव भी आखिर जिनेश्वर वन मकता है । जहा श्रद्धा का अपूर्व वल है वहीं प्रतिमा में परमात्म स्वरुप का दर्शन हुए विना रहेगा नहीं है और उसको भाव से भजने वाला उसी स्वरुप को प्राप्त करेगा, करेगा ओर अवश्य करेगा? राजा रावण का वृतान्त राजा रावण ने भी जिन प्रतिमा का पूजन किया है। रावण की लका नगरी मे शालिनाथ भावान काव्य मन्दिर था। ऐसा उल्लेख पू-विमलसूरीजी ने उन्नीससौ वर्ष पहले लिन्ने "परमचरीय" ग्रन्य मे किया है और कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्रा. चार्यजी ने "त्रिषष्टि शलाकापुरुष" चरित्र मे किया है। रावण जब किसी भी काम के लिए नगरी के बहार जाता था तब अपने पुष्पक विमान में भगवान अरिहत परमात्मा की प्रतिमा साथ म रविता था। अतरिक्ष पार्श्वनाय तीर्थ जो सारे भारत में प्रसिद्ध है जहा पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा जमीन से अधर रही हुई है। जिन दर्शन विशुद्धि प्रतिमा का आज भी कितना अपूर्व प्रभाव है. वह देखना हो तो अंतरीक्षजी तीर्थ की यात्रा ज़रूर कर लेना? अाज भी वह प्रतिमा के नीचे से अंग लूछने । वस्त्र निकलता है। उस प्रतिमा की पूजा राजा रावण ने की थी। यह भी एक शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक अभूतपूर्व घटना है। लाखो वर्ष व्यतीत होने के बाद भी आज तक अंतरिक्ष पाश्वनाथ प्रभू की प्रतिमा टीकी हुई है। यह देवताई प्रभाव नहीं तो और क्या है ? राजा रावण और उसकी पटराणी मंदोदर अष्टापद तीर्थ की यात्रा को पहुंचे है। वहां मंदिर में भगवान के समक्ष मंदोदरी नृत्य कर रही है और राजा रावण वीणा वजा रहा है इतने में वीणा का तार टूट गया। राजा रावण ने हाथ में से अपनी नस निकाल कर तार को जोड़ दिया मगर भक्ति मे भंग नहीं पड़ने दिया। वहीं राजा रावण ने तीर्थ कर गोत्र वांध लिया। यह है अरिहंत परमात्मा की भक्ति का अपूर्व प्रभाव । हृदय में यदि अरिहंत परमात्मा की भक्ति का स्थान है तो उसको मुक्ति तक की चिन्ता रखने की जरुरत नही है क्योंकि भक्ति ही आखिर लोह चुम्बक की तरह मुक्ति को खींच कर ले आती है। महान प्रादर्शको अनुसरनेमे दिक्कत क्या ? भगवान का जन्म कल्याणक होता है तब इन्द्रादिदेव भगवान को मेरुगिरि पर ले जा कर क्षीरादी जल से अभिषेक करते हुए दर्शन विशुद्धि ९७ वटी धूम-धाम मे जन्म महोत्सद मनाते है। भगवान का जन्म मामान्य कक्षा में मानवी का जन्म नहीं है। भगवान के जन्म को जन्म कल्याणक कहा जाता है। भगवान का जन्म मभी जीवो के कल्याण के लिए होता है। इसलिए उनी जन्म को जन्म कल्याण कहना विलकुल नहीं अर्थ म है। उन लोकोत्तर महा पुन्पो के पाचो कल्याणको को देव देवेन्द्र भी बटी ही धूम-धाम मे मनाने है। तो फिर मनुष्य मनादे उसमे कौननी नई बात है। देवेन्द्रादि तीर्थ कर भगवतो पात्रो कल्याणक मनाते है उसी महान आदर्ग को नजर ममक्ष रसके दम काल में जिनमदिरो में प्रतिष्ठा एव अजन गलाका के प्रमग पर जन्म कल्याणक आदि पाचो कल्याणक मनाये जाते हो तो उसम गलत क्या है ? वह भी एक प्रकार का अपूर्व भक्ति योग ग ही मार्ग है। ऐने प्रसग मनाने का लाभ महान पुचोदय से मि दता है । वस्तुस्थिति यो होने पर भी स्थानकवासी संप्रदाय के किनी एक साध्वीजी ने अपनी गुजराती पुस्तक में लिया है कि 'भगवाननो जन्म नरावे, भगवान- ना माता पिता बने इन्द्र अने इन्द्राणियो बने मानव भवमा देव वनवाना लावा ले, अजन्मा बनी गोना प्रमुनो फरी-परी जन्म करावे। माता ने स्वप्न पाये हायी जोयो तो बोल हो। हाथी जोयो शु हाथी जोवे हागंज गये ले पेत्री मा भुरे नेने गर्भ माने । जन्म करावे अने जन्म यता मीमोटी वाडे। जन्म ना वधामणा प्रापे अने न्द्रो महोत्नव उजवे, देव होय ते धरती पर दर्शन विशुद्धि चाले, तेने परसेवा बले,मोढ़ा तो काला काला होय अने देव बनाने, अावा खोटा नाटक भजवे, रंग राग मां अने इन्द्रिय ना विषय ने पोपवा मां धर्म न थी। लौकिक लोकोत्तर मिथ्यात्व मां श्री सुन वनी धर्म ना साचा स्वरूप ने समझो"। अंजनशलाका के प्रसंग पर जो जन्म कल्याणक मनाया जाता है उस पवित्र प्रसंग के लिए उपरोक्त विवेचन में साब्बीजी ने भाषा प्रयोग करने में मर्यादा तक नहीं रखी है। जन्म कल्याणक जैसे प्रसंग की नाटक के साथ तुलना की है। दृष्टि मे जहां विपरीतता रहती है वहां ऐसा ही शब्द प्रयोग होने वाला है। --"मोढ़ा तो जाणे काला काला होय अनेदेव बनावे" ऐसा लिखने मे भाप समिति का उपयोग ही कहां रखा है। खुद नेमनाथजी का वर्ण श्याय था। कई देव भी श्याय वर्ण वाले होते है। कोई गोरा होवे कि काला होवे प्रभु भक्ति का लाभ लेने मे गौर वर्ण के श्याम वर्ण का सवाल ही नहीं रहता है-जिसका अंतःकरण शुद्ध है उसी को अपूर्व लाभ मिलने वाला है। भगवान का जन्म कल्याणक ननाने वाले अच्छी तरह से जानते है कि भगवान अजन्मा स्थिति को प्राप्त हो चुके है। वे कभी जन्म मरण के चक्कर में आने वाले नहीं हैं। तव भी भक्तजन जो जन्मकल्याणक आदि मनाते है वह भक्ति योग का अपूर्व लाभ समझ कर मनाते है। उसमें इन्द्रियो के विषय अथवा दर्शन विशुद्धि रा राग पोपने की कोर्ट वान ही नहीं होती है। उस समय तो भक्त जन आनद विभो वन के महोत्सव मनाते है और प्रभुभक्ति में इतने नीन बन जाते है मारे दुन्यवी वातावरण मे मन परिणाम दू हो जाते है । ऐने भव्याति भव्य धार्मिक प्रमग मनाने का जिनको नौभाग्य ही जीवन मे प्राप्त नहीं हुआ है शायद उन्ही के मन विषय कपाय रप दूपित भावो मे कलुपित रहते होवेंगे ? इस काल मे ही अजन शलानादि प्रमग मनाये जा रहे है। एमी कोई बात नहीं है पूर्व काल में भी राजा मप्रति, राजा कुमार पाल, विमलगाह मनी, वस्नुपाल, तेजपाल, पेयडगाह मत्री जैसे महान्पो ने महान दगपूर्वधर आर्य सुम्नि जैसे महान प्राचार्य भगवतो की नियामे अथवा जिस समय जो-जो महापुरुष विद्यमान थे उन महापुन्पो की निश्राम ने धार्मिक प्रमग कई बार मनाये थे। अजन शलाका अथवा प्रतिष्ठा महोत्सव मनाने की परपरा अर्वाचीन नहीं मगर अति प्राचीन परपरा है । भक्ति निमित्त वैल के स्वरुप को विकूर्वरणा वीतरागदेव और निर्ग थ पचमहाव्रतवारी गुरुयो को मासारिक नुन को बुद्धि से भजना वह देवगत अयवा गुरुगत लोगोत्तर मिथ्यात्व कहा जाता है। पच कल्याणक महोत्सव मनाना उनमे किसी प्रकार के मिथ्यात्व का दोप नहीं लगता है वल्कि सम्यक्त्व गुण की पुष्टी होती है। देव परती पर चलते १०० दर्शन विशुद्धि नहीं है उनके पैर धरती से चार अगूल ऊपर रहते है, देवों को पसीना नहीं होता है तथा उनके गले की माला मुर्भाती नही है यह वात तो थोड़ा सा भी जिनको धर्म का ज्ञान है उनके ध्यान में है ही ? मगर भगवान के जन्म समय इन्द्र जव भगवान को मेरु पर्वत पर ले जाते है तव वहां अभिषेक करने के समय इन्द्र एक साथ चार बैलों के स्वरुप की विकर्वणा करके आठ शृग के द्वारा भगवान का अभिषेक करते है। यह बात कल्पसूत्र की टीका में लिखी हुई है एवं त्रिषष्टिशलाका चरित्र में कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्यजी ने भी लिखी है। भगवान की भक्ति निमित्त इन्द्र जव जानवर का स्वरुप धारण कर लेते है तो फिर, मनुप्य परमात्मा की भक्ति के निमित्त यदि देव अथवा इन्द्र-इन्द्राणी का स्वरुप धारण करे तो उनके पीछे परमात्मा की भक्ति सिवाय दूसरा कोई खराब प्राशय नहीं हैं । जब भीतर का आशय शुद्ध है वैसे महोत्सव मनाने से सम्यक्त्व गुण की पुष्टी होती है उसमें मिथ्याव के दोष की कल्पना करना ही कल्पनातीत है। स्थानकवासी सौराष्ट्र लीवड़ी संप्रदाय के साध्वीजी लीलावाई महासती के व्याख्यानों का संग्रह अनाथिनिन्थ नामक पुस्तक बारह तेरह वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी। उस पुस्तक के दूसरे भाग मे ४६४ के पेंज पर उन्होंने जन्म कल्याणक के प्रसंग पर आलोचना की है जिसका उपरोक्त विवेचन में स्पष्ट प्रत्युत्तर दे दिया गया है।

रान यिदि
१०१
गरगोट 'मृगा" नामः पुनर प्रसाशित हुई है।
पुनर । ती या योग आसानो ग नग्रह गया
37 पुना में ४०० पेंज पर उन्होने विनन दिया है रि-
"पुम पापती ज्या गार जिनवर नो त्या नही पानाय"
'मामानेनाप्रmप्राणन्टीमो धर्म प्रायो
न। पाना मात्र प्रारोटरेलिभार मापी
fr" दो ममता निरा बाय पण हिंमा ची
निराजी भार उपयो होय तो मागला
पापा ने पटादला नी ?
अपुर में सम्पूर्ण विवगन गुजराती भाषा मे है
तिमीमो अनी राष्ट्र बराबर ला दिये हैं।
ए महापागेमानीगने पर जब्द प्रयोगटोक नहीं
लिया। भगगन गोपग मेन गयो नटाने है
?
मोगलान में निति का भाव । ती तुम्हागे
गट Triनी नमाने
होद मर में
दर, In। RT -दीन जीवनी |
मोगा। प्रारमा
སཨ པ་ { ·བས༔ སས r་་་་
44

१०२ दर्शन विशुद्धि चाहिये । लिखने में अथवा बोलने में सुमधुर शब्द का प्रयोग होता है तो वह बात किसी के भी दिमाग में बैठ जाती है। कटु वचन से सारी बात का रहस्य चला जाता है इसलिए साध्वीजी ने ऐमा शब्द प्रयोग किया होता कि अहिसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, क्षमा, नम्रता रुपी भाव-पुष्प परमात्मा को चढ़ानो और आखिर द्रव्य पूजा करने वालों का ध्येय भावपूजा का ही रहता है। ऐसा शब्द प्रयोग कितना अच्छा लगता ? शब्द ही शब्द ब्रह्म कहलाता है। गांवो गांव में जो जिन मंदिर है और शत्रुजय, गीरनार जैसे जो महान तीर्थ है वे तो भव समुद्र मे साक्षात नौका समान है । ऐसे भवोदधितारक आलंवनों का लोप करने की विपरित बुद्धि किसी स्वप्न मे भी न होवे ? शत्रुजय तीर्थ के लिए महापुरुषों ने फरमाया है कि- "पापी अभव्य नजरे न देखे हिंसक पण उद्धरिए शत्रुजयगिरि यात्रा नव्वाणु करीए"। करीबन डेढ़ सौ वर्ष पहले पू-पदमविजयजी ने यह गाथा स्तवन में फरमाई है-पापी और अभविजीव शत्रुजय गिरिराज को नजर से भी नही निहाल या देख सकते है और निहाले तो तो न्याल हो जावे के ? भारे कर्मी जीव गिरीराज शत्रुजय को नजरे

दर्शन विशुद्धि
१०३
नहीं निहाल सकते है तो भावपूर्वक स्पर्शन करने की तो बात ही
कहा रहती है ?
?
--
विसंवाद का मूल कारण
कई मनुप्यो को मदेह हुआ करता है कि मूर्ति-पूजा विलकुल
शास्त्र मान्य होने पर भी इतना विसंवाद क्यो खडा हुआ
इसका प्रत्युत्तर यह है कि जैन सप्रदायो मे कुछ सप्रदाय वाले सिर्फ
मूल सून ही मानते है-मगर नियुक्ति, भाप्यचूणि पोर टीका वगेरे
पचागी को मान्य नहीं रखते है । पवागी बिलकुल मान्य करने
योग्य है । भाष्य टीका चूणि मान्य किये बिना सूत्रो का सत्य अर्थ
समझ मे पाना बहुत मुश्किल है। अपनी स्वतत्रमति से मूत्रो का
अर्थ लगाने से ही यह सारा विसवाद खटा हुआ है।
पू-यानदघनजी ने नमोनाथ भगवान के स्तवन मे लिखा
है कि-
"चूणि भाग्य सूत्र नियुक्ति,
वृत्ति परपर अनुभव रे।
समय पुरुप ना अग कह्या ते,
जे छेदे ते दुभव रे ॥"
चूणि, भाप्य, नियुक्ति वृत्ति और सूत्र ये पाचो पागम स्पो
पुत्प के स ग है। इसमे से किमी का भी विच्छेद वही कर सकते

१०४ दान विशुद्धि है जो वहुल संसारी है। इस एक गाया में तो पू-योगीराज आनंदघनजी नेजैन शासन की अविच्छिन्न परम्परा को मानो प्रकाशित कर दिया है। पंचांगी प्रमाण नहीं रखने वाले भी आज अपने अपने सम्प्रदायों में चल रहे शास्त्रोद्धारादि के कार्यों में टीका चूणि भाप्य और नियुक्ति का उपयोग करते है। अजब गजब की बात तो यह है कि भाष्य और टीकाए देखने पर भी मूल मार्ग का उन्हे ज्ञान नहीं हो रहा है अपनी आवश्यकतानुसार चीज उसमे से निकाल लेते है और आखिर अपनी ही बोलवाला करते रहते है। टीका वर्णि और भाप्य लिखने वाले कौन महापुरुप थे? इतना ही ख्याल किया होता तो उनका भ्रम जरूर दूर हो जाता और मूल मार्ग पर आने का उनका मनोरय दृढ़ हो जाता। उनका भ्रम दूर होवे कैसे ? सूत्रों का अर्थ विठाने के लिए एक वाजु महापुरुषों की टीका चूणि का पालवन जरुर लेते है और दूसरी वाजु पूज्यपाद नवांगी टीकाकार अभयदेवसूरी, पू-कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्य जैसे महापुरुषों की समालोचना करने को भी तैयार हो जाते है। कौन अपेक्षा से उन महापुरुपों ने अर्थ घटना की है इतना भी यदि विवेक नहीं रखा जा सकता है तो फिर टीकाओं का पालंबन लेने का अर्थ क्या है ? कोई आगे पीछे का सम्बन्ध समझ में न आवे तो गीतार्थ प्राचार्यों के पास जाकर अर्थ दर्शन विशुद्धि समझना चाहिये। उसके बदले केवल अपनी बुद्धि ही चलाना और लिख देना कि टीकाकार अभयदेवसूरी ने जो यह बात लिखी है वह मूल सूत्र से विपरीत है। अब महान प्रमाणिक पुरुष के लिये ऐसा लिखना वह एक प्रकार का दु माहम नहीं नो और क्या है ? लिखना ही होवे तो ऐमा लिखना चाहिये कि टीकाकार महापुरुष अत्यन्त भव भीरु एव प्रमाणिक महापुरुष है उन्होने इस सूत्र की व्याग्या इस तरह लिखी है मगर ह्मको यह वात दिमाग मे इस तरह मे बैठती है- "तत्व केवली मो विदति"- टीकाकार स्वय अपनी लघुता भले कितनी ही दर्गावे मगर अपने मुकावले तो वे महाज्ञानी महापुरुष थे इसलिए अपना कर्तव्य तो उनका अनत उपकार मानने का है। स्थानकवासी मप्रदाय के 'साधुमार्गी जैन सस्कृति रक्षक मघ" की ओर से भगवतीसूत्र का भाषानुवाद हुया है। उसमे पू-अभय- देव भूरी की टीका का पालवन लिया तो अश्या है ? मगर उसकी प्रस्तावना मे सैलाना वाले 'रतनलालजी डोसी' ने पू- अभयदेवसूरी की ममालोचना की है। वैसे ही वे तीर्य करादि महापुरुषो के चरित्र लिख रहे है। वह साहित्य उन सम्प्रदाय के पास तो है नहीं इसलिए प्राविर हेमचन्द्राचार्यजी के विशष्टी शलाका पुरुष चरित्र का ही उनको ग्रालबन लेना पड रहा है। उसमें भी पू-कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्यजी का अनत उपकार मानना तो कहीं रहा ? और टीका टिप्पणी में उनर पड़े है । वे

१०६
वन विशुद्धि
से
कहते है कि हेमचन्द्राचार्य की लिखी हुई यह बात मूल सूत्र
मिलती नहीं है मानों मूल सूत्रों के ज्ञान का ठेका इन्होंने ही ले
रखा हो ? अरे ? माई कहा बाज अपना भयोपशम कहां
कलिकाल सर्वज का क्षयोपगम ? जिनका पालवन ले रहे हो
कम से कम उनका बहुमान तो करो ? बस उन्ही की भूल
निकालने को बैठ गये तो पहले उनकी योग्यता प्राप्त करो ?
जिनको सभी पागम कंठस्थ थे उन महापुन्पो का आगय समझने
को अपने को भव लेना पड़ेगा।
द्रव्यपूजा और भावपूजा दोनों की
अत्यन्त उपयोगिता
पूज्य-आनंदघनजी ने नवमे सुविधिनाथ भगवान के स्तवन में
अष्टप्रकारी द्रव्यपूजा और भावपूजा की विस्तार से विधि बतलाई
है। भगवान की स्तवना करते हुए फरमाया है कि-
"सुविधिजिनेश्वर पाय नमो ने, शुभ करणो एम कोजे रे,
अति घणो उलट अंग धरी ने, प्रह उठी पूजी जे रे" !!
सुविधि नाथ भगवान के चरणों में नमन करके इस प्रकार
शुभ करणी करने की है और अत्यन्त उल्लासपूर्वक सुबह में उठकर
परमात्मा का पूजन करना।

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१०८ दर्शन विशुद्धि माला वगैरह सचित द्रव्यों का त्याग करके मंदिर में प्रवेश करना । परमात्मा की पूजा के लिए पुष्प वगैरह जो द्रव्य लिए हो उसका परित्याग नहीं करने का है। अपने उपभोग के लिए जो द्रव्य लिए हो उसका त्याग करके मंदिर में प्रवेश करना यह पहला अभिगम है। दूसरा अभिगम है मन की एकाग्रता रखना। तीसरा अभिगम है अखंड उत्तरासंग करना। चौथा अभिगम है प्रभु मूर्ति पर दृष्टि पड़ते ही दोनो हाथो को अंजलीबद्ध करके प्रणाम करना। पांचमा अभिगम है कि अचित्त का त्यांग नहीं करने का होता है तब भी कोई राजा दर्शन को पाया हो तो उसको तलवार, छत्र, चामर, मुकुट, मोजड़ी आदि अचित द्रव्य होने पर भी उनका त्याग करके मंदिर जी में प्रवेश करने का है। इस प्रकार दश त्रिक और पांच अभिगम का संक्षेप में सिर्फ निर्देश मात्र दिया है इसका पालन किये बिना मन प्रभु भक्ति एकान नहीं हो सकता है। "कुसुम अक्षत वरवास सुगंधीधूप दीप मन साखी रे । अंग पूजा पण भेद सुरणी इम,गुरुमुख मागम भाखी रे॥" पुष्प, अक्षत (चावल). अत्यन्त सुगन्धयुक्त वासक्षेप, दशांग. धूप, दीपक वगैरह अंग और अग्रपूजा के प्रकार सुनने में आया है। पू-गुरु महाराज ने आगम की साक्षी से इन प्रकारों का श्रवण, कराया है।

दर्शन विशुद्धि
१०९
.
"तेहनु फन दोय भेद सुणीजे, अनतर ने परपर रे ।
प्राणा पालन चित्त प्रसन्नो, मुगति मुगति मुर मदिर रे ॥"
सुविधि
कार में बननाई गई पूजा का फन दो प्रकार का है-अनतर
और पपर। परमात्मा की आज्ञा का पालन और चित्त की
प्रसन्नता प जो फन है वह अनतर फल है और पासिर मोक्षपद
पी प्राप्ति और जब तक मोन प्राप्त न हो तर तक बीच में देव
और मनुष्य भव रस मुगति पी जो प्राप्ति है वह है परपर फल ।
कितना पूजा का महान फन बनाया है। तुत जो फल मिल
जाय वह अनतर और उत्तरोत्तर पुट नमय । वाद जो फन मिने
वह पपः। इस गाथा का अन्यान करने पे बाद कौन पूना के
नाम में वचित हंगा? पूजन पर मनुष जर मदिर से बहार
शिलता है तब नरै मन परिणाम इतने नुप्रसन्न होते है कि
नदी में वर्णन नहीं दिया जा माना है। महात्मा पुरपो
ने लिया है पि-
7
"जिन हो पाया तिनही दिपाया
न पहे गोठ के कान में
तातो लागो जय अनुभव को
तव जानन पोउमान में-
हम मगन भये प्रा ध्यान में" ||

११२
दर्शन विशुद्धि
केवल ज्ञानी भगवंतो ने उत्तराध्ययन मूत्र में फरमाया है इस गाथा
का रहस्य अति गंभीर है तब भी चल्प क्षयोपशमानुसार लिखने
की कोशीश की है। गीतार्थ महापुरुषों के पास जरुर इस गाथा
का रहस्य विचार लेवें।
"इम पूजाना बहु भेद सूरणी ने सुखदायक
शुभ करणी रे"।
"भविक जीव करसे ते लेसे
प्रानंदघनपद धरणी रे" ।।
में
इस प्रकार से पूजा के भेदों का श्रवण करके सुखदायक पूजा
रूप शुभ करणी को जो भी भवी जीव करते रहेगें। वे आखिर
आनंदघन स्वरुप मोक्ष पद को प्राप्त करेगें।
इस सुविधिनाथ भगवान के स्तवन मे पू-यानंदघनजी ने
द्रव्यं एवं भावपूजा का रहस्यमय स्वरुप बताया है। मूर्ति-पूजा
श्रद्धा नहीं रखने वाले भी कितने ही पू-आनंदघनजी के व्यक्तित्व
में श्रद्धा रखते है और वे आनंदघनजी के स्तवनों पर विवेचन भी
देते है क्योंकि आनंदघनजी ने चोवीशो भगवान के गंभीर अर्थ
वाले स्तवन लिखे है मगर वे सुविधिनाथ भगवान के स्तवन पर
ध्यान या जोर नहीं लगाते है क्योंकि इस पर जोर लगायेगें तो
मूर्तिपूजा के विरुद्ध बोल ही नहीं सकेगें मगर महापुरुषों के प्रति

दर्शन विशुद्धि
११३
वास्तविक श्रद्धा भक्ति उसी को पते है कि उनके मभी दृष्टी
विन्दुप्रो को लक्ष्य मे लिये जाय। प्रानदघनजी जैसे महान
पुरुप भो मृति पूजा के प्रसर हिमायती रहे है। अपने
स्वरचित स्तवनो में उन्होने मूर्तिपूजा पर काफी वल
दिया है । जिसको मा मूर्तिपूजा मे सदेह रहता हो वे
पू-यानदधनजी महाराज के नवमे सुविधिनाथ भगवान
के स्तवन पर ही चितन मनन कर लेगें तो उनका मदेह
अपने आप दूर हो जायगा ।
कोई मनुष्य वेचन द्रव्य पूजा एव द्रव्य क्रिया में ही न अटक
जाय -मलिए श्रेयामनाय नगवान के स्तवन में प्रानदपनजी ने
परमाया है कि-
"नाम प्रध्यातम द्रव्य मध्यातम
ठवण मध्यानम छटोरे।
भाव अध्यातम निजगुण साधे
तो तेह शु रट महोरे ।।"
भार पप्यागो प्रगट गररे पाने लिए नगर
सम्सारमा रमादी। नाम सध्याामन्य नाम और
पाना मातीनी नार प्रायमो मागन म जार।

११४ दर्शन विशुद्धि मगर साधन मे ही साधक अटक न जाय इसलिए स्तवन में फरमाया है कि नाम अध्यातम, द्रव्य अध्यातम और स्थापना अध्यातम छंडो और भाव अध्यातम से ही रढमंडों याने रढ या प्रीति लगायो। जब तक नौका किनारे नहीं पहुंची है तब तक तो उसका सहरा लेना ही होगा यदि किनारे पहुंचने के पहले ही नौका का प्रावन छोड़ दिया तो मजधार में ही रह जायेगें। किनारा पाने के बाद तो नौका का पालंबन छोड़ना नही पड़ेगा वल्कि अपने आप छूट जायेगा वैसे ही साध्य की सिद्धि होने के वाद साधन अपने आप छूटते जाते है छोड़ने नहीं पड़ते है । जैसे श्रावक को अष्टप्रकारी पूजा करने का विधान है मगर वही श्रावक जव पंचमहानतधारी साधु बनता है तव अष्ट प्रकारी पूजा का प्रालंबन छूट जाता है सिर्फ भावपूजा का ही आलबन लेने का रहता है। दर्दी को दवाई की जरुरत ससारी जीव विषय कषाय रुपी दर्द से घीरे हुए है उनको द्रव्यपूजा रुपी दवाई की अत्यन्त आवश्यकता है विषय कषाय रुपी व्याधि से साधु वहुत कुछ अश में मुक्त बने हुए है। दर्द से मुक्त होने से साधु महापुरुषों को द्रव्य पूजा रुपी दवाई की जरुरत नहीं रहती है तब भी मोक्ष रुपी भाव आरोग्य की प्राप्ति के लिए भाव पूजा तो उनको भी अवश्य करनी चाहिये। वैसे ही श्रावक

दर्शन विशुद्धि
११५
श्राविका भी जव उपधानादि क्रिया मे पोपध व्रत मे रहते है तव
उनको भी सिर्फ भावपूजा करने की होती है।
द्रव्यते भाव निमित्त
पू-पानदघनजी ने उपरोक्त गाया मे लाल वत्ती दिखलाई
है। कही साधन मे ही अटक नही जाना माधन जरुर करना
मगर साध्य का लक्ष छोटना नही। पूज्य-पानदधनजी के वचन
अर्थ गभीर होते है उसका रहस्य नहीं समझने वाने उपरोक्त गाथा
को आगे करके स्थापना निक्षेप का लोन करने लग जाते है।
आनदपनजी ने फरमाया है कि "नाम अध्यातम द्रव्य अन्यातम
ठवण अध्यातम छडो।" मगर यह विधान किम हेतू से मिटा
गया है इसका सागोपाग स्पष्टीकरण हमने उपरोक्त विवेचन मे कर
दिया है। उपरोक्त वात को यदि एकात दृष्टि मे पकड लिया नो
द्रव्य श्रृत का पालन भी कैसे लिया जायगा ? क्याकि द्रव्य श्रुत
भी तो यासिर अक्षर विन्यास रुप होने से वह भी तो स्थापना म्प
है तब भी द्रव्य श्रुत को भाव श्रुत का कारण माना जाता है तो
द्रव्य अध्यात्म एव ठवण अध्यात्म को भी भाव अध्यात्म का
कारण मानकर भाव अध्यात्म की तरह उनको भी तो मान्य
रखना पड़ेगा?
महापुरुष
जो वचन निकालते हैं उसके पीछे कुछ
न पुछ रहस्य रहता ही है। गानदघनजी जैसे महापुरप ने निश्चय
दृष्टि का कोई वचन उच्चारा हो तो उस वचन यो एकात दृष्टि से

११६
दर्शन विशुद्धि
नहीं पकड़ना चाहिये वल्कि आगे पीछे का भी विचार करना
चाहिये। उन्ही महापुरुष ने सुविधिनाथ भगवान के स्तवन मे
द्रव्य पूजा एवं स्थापना निक्षेपा पर कितना जोर लगाया है।
वह भी सोचना चाहिये। वह कुछ भी नही सोचना और एकाद
कोई वचन अपने मंतव्य के अनुकूल आ गया बस उसी को पकड़
कर वैठ जाना वह कहां का न्याय है ?
महाकल्पसूत्र में मूर्तिपूजा का स्पष्ट पाठ
श्री महाकल्प सूत्र मे साधु आदि जिन मंदिर नहीं जावे तो
प्रायश्चित लेने का बताया है। सूत्रकार ने फरमाया है कि-
से "भयवं तहा रूवं समणंवा महाणवा चेइय घरे
गच्छेज्जा ? हंता गोयमा दिणे दिणे गच्छेज्जा से भयवं
जत्थ दिणे ण गच्छेज्जा तो किं पायच्छितं हवेज्जा ?
गोयमा पमाय पडुच्च तहारूवं समणंवा माहणंवा जो
जिणघरं गच्छेज्जा तो छठु अहवा दुवाल समं
पायच्छित्तं हवेज्जा।
गौतम स्वामी ने भगवान महावीर प्रभु से प्रश्न किया है कि
प्रभु क्या श्रमण अथवा श्रावक को प्रतिदिन जिन मंदिर जाना
जरुरी है ? हां ! गौतम श्रमण अथवा श्रावक को प्रतिदिन जिन
मंदिर जाना चाहिए। प्रभु ? जिस दिन न जाय उस दिन

वर्शन विशुद्धि ११७ . उनको क्या प्रायश्चित करना होगा ? गौतम । प्रमाद के वश जिस दिन श्रमण वा श्रावक जिन मदिर नही जायेगें उस दिन उनको बेले का अथवा पाच उपवास का भी प्रायश्चित हो सकता है। दर्शनसे ही दर्शन विशुद्धि कोई माधु अथवा श्रावक कितना भी दुप्कर तप करे मगर जिन प्रतिमा के दर्शन वदन विना वह तप वास्तविक फलदायक नही वन शक्ता है इतना ही नही उसकी कायक्लेश में भी गणना हो शक्ती है। तामली तापस ने साठ हजार वर्ष पर्य त तप कीया तव भी वास्तविक फल प्राप्त नही हुआ क्योकि दर्शन विशुद्धि का अभाव होने से वह तप अज्ञान पूर्वक का था। यहा से मृत्यु पाकर ज्यो ही वह ताप स दूसरे इशान देवलोक मे इशानेन्द्र हुमा के वहा मिद्धायतन मे जिन प्रतिमा के दर्शन से तुरत उसको सम्यग् दर्शन का लाभ हुआ। यह है जिन दर्शन का अपूर्व प्रभाव । जिन दर्गन से दुरित का नाश होता है-वदन से वाछित फल प्राप्त होता है और पूजन से पूर्ण पद की प्राप्ती होती है इसीलीए महापुरुपो ने फरमाया है को- जिन साक्षाद् सुरद्र म जिन भगवान साक्षात् कल्प वृक्ष है-ससार में एक जिन प्रवचन ही अर्थस्प एव परमार्थ रुप है इसके शिवाय कितना भी धन वैभव क्यो न हो अरे' चक्रवर्ति का भी ११८ दर्शन विशुद्धि वैभव क्यों न हो वह भी अनर्थरूप है यह बात दृष्टि में वेठ जाय वही दर्शन विशुद्धि है। "गोयमा जो जिण पडिमं पूएइ सो नरो सम्पदिछि जाणियव्यो, जो जिण पडिमारणं न पूएइ सो मिच्छादिठ्ठि जाणियन्यो मिच्छादिठुिस्स नाणं न हवइ चरणं न हवइ मुक्खं न हवइ सम्मदिठुिस्स नाणं चरणं मुक्खंच हवइ से तेणठणं गोयमा सम्मदिठ्ठि सड्ढहीं जिणपडिमारणं सुगंध पुष्फ चंदण विलेवणेहिं पूया कायव्वा ।।" गौतम ? जो नर जिन प्रतिमा की विधि पूर्वक पूजा करता है उसको सम्यग्दृष्टि जानना जो जिन-प्रतिमा को नही पूजता है उसको मिथ्या दृष्टि जानना। मिथ्या दृष्टि को ज्ञान नही होता है और मोक्ष भी नहीं हो सकता है। सम्यग् दृष्टि को सम्यग् ज्ञान चारित्र और मोक्ष होता है इसलिए गौतम ? सम्यग् दृष्टि श्रावक को प्रतिदिन चंदन, पुष्प, धूप, दीप और विलेपनादि से अरिहंत परमात्मा की पूजा करनी चाहिए इस तरह से महाकल्प सूत्र जिन-पूजा एवं जिन प्रतिमा के दर्शन का साफ-साफ शब्दों में विधान किया गया है। नंदीसूत्र मे जहां सूत्रों के नाम का लिस्ट दिया गया है उसमे महाकल्पसूत्र का भी उल्लेख किया गया है । में

दर्शन विशुद्धि
११९
'उववाई' सूत्र मे चपानगरी के वर्णन मे लिखा है-
"बहुला अरिहत चेझ्याइ" याने चपानगरी के मोहल्ले-
मोहल्ले में जिन मदिर थे। वैमे ही द्वारिका राजगृही नगरियो में
भी मोहल्ले-मोहल्ले में जिन मदिर थे। इन सभी पाठो से मन का
मपूर्ण समाधान हो सकता है ।
पू-देवचन्द्रजी महाराज ने फरमाया है कि-
"निरस्यो मुविधि निणद समाधि रसे भर्यो हो लाल
प्रगटयो प्रात्म स्वरुप अनादि नो विसर्यो हो लाल
सकल विभाव उपाधि थकी मन उसों हो लाल
सत्ता साधन मार्ग भरणी ऐ मर्यो हो लाल ॥"
समाघि रसपूर्ण सुविवि जिणद को निरखते ही अनादि से
जिसका विस्मरण हो गया या उस अात्मस्वरूप का स्मरण अथवा
प्रगटीकरण हमे हुया है रागद्वे पादि रुप सकल विभाव उपाधि से
हमारा मन अव बिलकुल उठ गया है और आत्म सत्ता सिद्ध करने
का जो सम्यग्झानादि साधन मार्ग है उस मार्ग के प्रति हमारा मन
अब मचरने लगा है अनादिकाल से यात्म स्वस्प का जहा विस्मरण
था उम स्वरुप का जिस पालवन के प्रभाव से सस्मरण हुमा उमका
महत्व बताने को अपने पास शब्द नहीं है।

१२० दर्शन विशुद्धि यतना का पालन करने का आश्चर्य तो इस बात का हो रहा है कि जिन प्रतिमा की पुष्टि में इतने इतने प्राचीन उल्लेख मिलने पर भी अपने पूर्वग्रह के कारण कुछ संप्रदाय वाले प्रतिमा का पालंबन मान्य नहीं रखते है और शास्त्रों में कहीं उल्लेख नहीं होने पर भी अमुक चीज का बहुत ज्यादा आग्रह रखते है जैसे कि यतना के लिए मुहपत्ति का अवश्य उपयोग करने का शास्त्रों में बताया है मगर कायम मुह पर वांधने का किसी शास्त्र में नहीं लिखा है। विपाक सूत्र एवं भगवतिसूत्र के पाठ से मुहपत्ति समीक्षा विपाक सूत्र में मृगापुत्र का अधिकार पाया है उसके पिता का नाम विजय राजा एवं माता का नाम मृगा देवी था। उसको तीव्र अशाता वेदनीय कर्म का उदय था। जन्म से ही वह अंधा था एवं हाथ, पांव, नेत्र आदि अंगोपांग भी नही थे केवल उन अंगोपांगो के आकार चिन्ह ही थे। मृगारानी उसका पालन पोषण बड़ी सावधानी से कर रही थी। एक समय गौतमस्वामी का मृगादेवी के घर पर पधारना हुअा। मृगादेवी ने गौतम स्वामी को विधिपूर्वक प्रणाम करके पूछा प्रभु ? किस प्रयोजन के लिए आपका यहाँ पधारना हुआ है ? गौतम स्वामी ने कहा कि मैं दर्शन विशुद्धि १२१ तुम्हारे पुत्र को देखने के लिए आया है मृगादेवी ने अपने पुत्रो को वस्त्रालकारादि से अलकृत कर गौतम स्वामी को दिखलाए तव गौतम स्वामी ने कहा में इन पुत्रो को देखने नही आया हू में तुम्हारे ज्येप्ट पुन मृगापुत्र को देखने आया है जिसको तुमने भू- गर्म में रखा है। मृगारानी को बडा आश्चर्य हुआ कि भूगर्भ की वात को कैसे क्या जान ली? गौतम म्वामी ने कहा हे । देवानु- प्रिये मेरे धर्माचार्य भगवान महावीर प्रभु सर्वज्ञ सर्वदर्शी है उन्होंने ही मेरे को मृगापुत्र का स्वरुप वताया है। । . फोई जन्मगन्ध व्यक्ति जो हर तरह से बहुत दुखी था जिसके मुह के पास मक्खिया मिनमिना रही थी नगर के वालक भी उसके पीछे पड जाते थे वह व्यक्ति भगवान महावीर का आगमन सुनकर समवसरण मे दर्शनार्थ आ पहुचा था उस मनुष्य की वैसी हालत देखकर मैने भगवान महावीर प्रभु से पूछा यह मनुष्य जन्म से अधा और कितना दुखी है तब महावीर प्रमु ने मुझे तुम्हारे पुत्र का स्वरुप बताया और फरमाया मृगापुत्र राजा का पुत्र होने पर भी जो दुस का अनुभव कर रहा है उसके मुकाबले इस जन्मान्य व्यक्ति का दु ख कुछ भी नहीं है इसलिए में मृगापुत्र को देखने पाया हु। गौतम स्वामी की जिज्ञापा देखकर मृगादेवी ने गौतमस्वामी से कहा कि भगवन् पधारीए मैं आपको-मृगापुत्र को दिसलाती हु । मृगादेवी ने काप्ट की एक छोटी गाडी मे मृगापुर

१२२
दर्शन विशुद्धि
के लिए अशन, पान,खादिम,स्वाादिम रुप आहार भी साथ ले लिया
क्योंकि भोजन की वेला हो गई थी। वह पतला आहार उसके
शरीर पर ही डाला जाता था क्योंकि उसके शरीर के किसी भी
अवयवों का विकास नहीं था इन्द्रियों के स्थान पर छिद्र पड़े हुए थे
वह आहार उसके शरीर में प्रवेश करते ही खून और पाक के रूप में
परिवर्तित हो कर बाहर निकल आता था पुनः मृगापुत्र उस
आहार को चाटता था। ऐसी हालत में वह जीवन बीता रहा था
अत्यन्त दयाजनक एवं दुःखमय उसका जीवन था।
भवांतर में वह जीव अक्खाइ राठोड़ के भव में था उस भव
में उस जीव ने बहुत से दुष्कर्म किये थे उसी कारण ऐसी हालत में
उसको जन्म लेना पड़ा है आगे भी उस जीव को बहुत लम्बे काल
पर्यन्त नरक तीर्य चादि योनियों में भटकना पड़ेगा। कर्म के विपाक
बहुत खतरनाक होते है।
मृगादेवी भूमिगृह के पास उस गाड़ी को खींचकर ले आई
और “चउत्प्पुडेणं वत्थेणं मुहं बंध माणी" चार पड़ वाले
वस्त्र से अपना मुह वांध लिया साथ साथ गौतम स्वामी से प्रार्थना
करते हुए कहा की-
"तुब्भेवियरणं भंते मुहपोत्तियाए मुहं बन्धह"
भगवन आप भी अपनी मुख वस्त्रिका के द्वारा मुंह बांधलो
और गौतम स्वामी ने वैसा ही किया।

दर्शन विशुद्धि १२३ अब सवाल खड़ा होता है कि यदि मुहपत्ति से मुह बंधा हुआ होता तो भगवन | आप मुहपत्ति के द्वारा मुह वाचलो ऐसी प्रार्थना करने की जरुरत ही कहा रहती? मुहपत्ति हाथ में होने से मुह वाधने की प्रार्थना की है। कहते है कि मुह तो वाधा हुआ था रुमाल मे मुह और नाक वाधने की प्रार्थना की है यह अर्थ यहा घटित ही नहीं होता है रानी ने स्वय ने अपना मुह वाधा है वहा "वत्थेण मुहवध मारणो" ऐसा शब्द प्रयोग हुआ है तो पमीना पोछने के वस्त्र से यदि मुह वाचने की विनती की होती तो "वत्थेरण मुह बघइ" ऐसा शब्द प्रयोग होता मगर सीधा मुहपरि शब्द का ही प्रयोग हुया है। उस वालक के शरीर में से इतनी भयकर दुर्गन्ध फैल रही थी कि म्वास्थ्य की दृष्टि से मुह वाधना अत्यन्त जरुरी था साथ साथ नाक भी वाचा होगा मगर मूल विपाक सूत्र में 'मुहबघह' ऐसा ही सूत्र पाठ पाया है इस पाठ में मिद्ध होता है कि मुहपत्ति जव वोलना हो अथवा व्याख्यान में सूत्र वाचना देना हो तव जतना रखने का साधन जरुर है अथवा कथुप्रा मक्खि मच्छर वगैरह सपातिम सूक्ष्म जतु कहे जाते है जो उडते रहते है उनकी रक्षा के लिए भी जतना पूर्वक वोनने का विधान है वाकि कायम वाघ के रखने का मूत्र म विधान नहीं है। ऐमा ही विधान भगवती मूत्र के सोलहवे शतक मे भगवान ने फरमाया है वहा गौतम म्वामी ने प्रश्न किया है कि प्रभु । देवराज

१२४
दर्शन विशुद्धि
इन्द्र सावध भाषा बोलते है कि निर्वच भाषा बोलते है। भगवान
ने प्रत्युत्तर दिया कि-
"गोयमा सवज्जपि भास भासइ
प्रणवज्जपि भास भासई" ।।
गोतम । देवराज इन्द्र सावध भाषा भी वोलते है और निर्वद्य
भाषा भी बोलते हैं फिर गौतम स्वामी ने पूछा-
"केण?णं भंते एवं वुच्चइ सावजंपि
जाव अरणवज्जपि भासं भासई ।।"
हे भगवन ? आपने जो फरमाया कि देवेन्द्र सावध भाषा भी
बोलते है और निरवद्य भाषा भी बोलते है ऐसा किस हेतू आपने
फरमाया?
"गोयमा । जाहेणं सक्के देविदे देवराया सुहुमकायं
परिणजुहिताणं भाषं भाषइ ताहेणं सक्के देविंदे देवराया
सावज्जं भाण भासइ ।।"
गौतम जब देवेन्द्र हाथ अथवा वस्त्रादि से मुख को प्रावृत
किये विना वोलते है तब सावध भाषा बोलते है। टीकाकार
अभयदेव सूरीजी ने भगवतीसूत्र की टीका में लिखा कि देवराज

दर्शन विशुद्धि १२५ इन्द्र ज्व "हस्ताद्यावृत मुखस्य हो भापमारणस्य जीव सरक्षणतोऽनवद्य भाषा भवति अन्यातु सावद्येति। हस्त अथवा वस्त्र से उपयोग रखकर जव बोलते है तब उस भापा को निर्वद्य मापा कही जाती है। इस भगवती सूत्र के विधान में भी उपयोग एव जतना पर ही मार दिया गया है। सावध के निर्वद्य भापा का प्रश्न देवेन्द्र के विषय मे पूछा गया है किसी साधु अथवा श्रावक के लिए नही पूछा गया है और देवेन्द्र अविरतिघर होने मे मुहपत्ति पास में रखने का अथवा वाधने का सवाल ही नहीं रहता है। कई सप्रदायवाले देव अविरतिधर होने से उनकी करणी मान्य नहीं करते है यदि मान्य करते है तो समकिति देव जिन- प्रतिमा की पूजा करते है वह भी मान्य करना होगा? श्री प्राचाराग सूत्र के दूमरे श्रुत स्कघ में कहा गया है कि खासी खाते समय, ठीक लेते समय और डकार लेते हुए साधु को "पारिगणा परिपेहिता"हाथ से मुह टाकना। अव विचारो की मुह वाघा हुअा होता तो टाकना क्यो कहा जाता? दशवकालिक सूत्र में भी फरमाया है कि- "जय भुजतो भासतो पाव कम्म न धिई"। जतना पूर्वक भोजन करने वाला और जनता पूर्वक बोलने वाले को पाप वर्म का वध नहीं होता है अाखिर तो जतना में ही

१२६
दर्शन विशुद्धि
धर्म है। बोलने के समय मुहपत्ति वगैरह का उपयोग रखना
चाहिये यदि नहीं रखते है तो वह प्रमाद दोप है कहीं प्रमाद का
बचाव नही हो सकता है जितना रखा जाय उतना उपयोग रखना
चाहिए आखिर जीव का लक्षण भी तो उपयोग है।
शरीर के कई भागों मे से हवा का संचरण होता रहता है
मुह तो जब बोलना हो तब ही खुला रहता है उस समय तो
उपयोग अवश्य रखा जा सकता है मगर श्वांसोश्वांस नाक से
लिया जाता है उसमे से हवा का संचरण होता ही रहता है
श्वांसोश्वांस लिए विना जीवन ही नहीं रह सकता है। शरीर के
किसी दूकरे द्वार से भी कभी कभी वायु का संचरण होता ही रहता
है अव कहां कहां पट्टी लगायेंगे ? इसलिए चलते समय, वेठते
समय, उठते समय, शयन करते समय, वोलते समय जयणा का
पालन किया जाय वही धर्म है और जतनापूर्वक वह सब प्रवृत्ति
करने से पाप का बंध नहीं होता है, होता है तब भी अल्प बंध
होता है।
मूर्तिपूजा के शास्त्रों में जगह जगह पाठ मिलते है जबकि
कायम मुहपत्ति बांधकर ही रखना उसके पीछे शास्त्र का कोई
आधार नहीं है। तव भी उसका आग्रह रखा जाता है तो मूर्ति
पूजा जो शास्त्र एवं आगम मान्य चीज है उसको भी अवश्य प्रमाण
करना चाहिये ?

दर्शन विशुद्धि १२७ भक्तियोग में समर्पण भाव रहेगा ही कितने ही मनुष्य ऐसी भी शका उठाते है कि भगवान तो वीतराग एव सर्वज्ञ सर्वदर्शी है तो उनकी मूर्ति को प्राभूपण, अलकार क्यो चढाये जाते है ? इम शका का समाधान भाव यही है कि देवाधिदेव के प्रति जहा भक्ति का भाव है वहा समर्पण भी अवश्य रहेगा ? अरिहत परमात्मा को भजने वाले भक्त के मन मे ऐसे अध्यवसाय जरुर उत्पन्न होवेगे की यह देवाधिदेव मेरे अनत उपकारी है मै क्या इनको समर्पण करु ? मेरा धन तो क्या ? मेरे तन मन भी इनको समर्पण कर रहा हु। देवाधिदेव की आज्ञानुसार ही मेरे तन, मन, वचन अव से कार्य करते रहेगे । भक्तजन सुवर्ण, हीरा, मणि, माणिक्य के आभूपण भी भगवान को समर्पण भाव की बुद्धि से चढाता है। परीग्रह की मूर्छा उतारने का यही उत्तम मार्ग है। भक्तजन को भगवान की वात्यावस्था, राज्यावस्था, त्यागावस्था मभी अवस्थाऐ मान्य है इतना ही नही जब से भगवान गर्भाशय मे आते है तब से मति,श्रुत, अवधि ये तीन ज्ञान साथ मे लेकर पाते और देवेन्द्र गर्भाशय में रहे हुए भगवान की नमुत्युण के पाठ से स्तवना करते है। गर्भाशय मे भगवान उत्पन्न होते है तब से उनका देवत्व सिद्ध हो जाता है। कोइ कहेगा कि फिर साघुग्रो को भी कचन, हीरा, मणि माणिक्य क्यो नही समर्पण करते हो? भक्ति भाव तो साधु के प्रति भी होता ही है तो फिर उनको भी ममर्पण करो' मगर माधु साधक है जबकि १२८ दर्शन विशुद्धि परमात्मा सिद्ध है साधू संपूर्ण वीतराग नहीं हुए हैं उनमें अभी राग दशा पड़ी हुई है इसलिए निर्दोष आहार, पानी, वस्त्र, पात्र उनकी भक्ति की जाती है जबकि परमात्मा तो परिपूर्ण है स्थापना निक्षेप के माध्यम से ही मुकुट. कुडलादि अलंकार चढ़ाये जाते है । जब भगवान साक्षात विचरते थे तव तो भगवान भी निर्गथ अवस्था में थे भाव निक्षेप के माध्यम से भक्ति का प्रकार अलग है अलंकार आभूषण आदि स्त्रिों को, पुत्र पुत्रियों को समर्पण करने रागदशा बढेगी वही चीज परमात्मा को भक्ति भावना से अर्पण करने से परिग्रह की मूर्छा छुटेगी और आत्मा उस चीज मे पूर्ण वैराग्य भाव को प्राप्त करेगी। नैवेद्यादि चढ़ाने का ध्येय नैवेद्यादि जो चढ़ाये जाते है वह अणहारीपद प्राप्त करने के ध्येय से चड़ाये जाते है उस समय यह भावना रखी जाती है कि नाथ ? मै आहार संज्ञा से मुक्त होकर कब आपकी तरह अणहारी पद को प्राप्त करुंगा? भवोभव से आहारादि चार संज्ञा के कारण चार गति में भटकता आया हूं ऐसा मेरे में आत्म- बल प्रगटों कि चारो संज्ञा पर विजय प्राप्त करके आखिर आत्मा शुद्ध स्वरुप को मै भी प्राप्त करु। मंदिर में घंटा बजाया जाता है उसके पीछे भी ध्येय यही रखने का है कि मेरे जीवन में भी सत्य का घंट कब बजे ? सुगंध युक्त दशांग धूप जलाया जाता है उसके के दर्शन विशुद्धि १२९ पोछे ध्येय यह रखने का है कि मेरे जीवन में ने मिथ्याल रुपी दुर्गन्ध कैसे क्या हटे। स्वस्तिक के पोछे ध्येय यह रखने का है कि कब मेरी प्रात्मा रलवर की आराधना करके चारगति रुप ससार परिभ्रमण से मुक्त होकर युद्ध बुद्ध निरजन निराकार स्थिति को प्राप्त करके सिद्धशिला पर अपने स्वरुप की स्थिति में विराजमान होवे । और रति अरति दोनो से मुक्त होकर कब मैं विरति को प्राप्त करु ? ऐसी भावना से आरती उतारने को है ससार के इष्ट सयोग प्राप्त होते ही मन मे जो मानद उत्पन्न होता है वह रति और कष्ट पडने पर जो उदग उत्पन्न होता है वह सरति तव भगवान फैते है ? "प्ररइतिमिर विरहिय मुवरयजरमरण" मरति रति रुपी तिमिर से मुक्त है और इत्ती कारण-जन्म मरण से भी मुक्त बने हुए है। हम रति अरति के द्वद मे फ्ले हुए है जब विरति मे पायेगे तब अपन भी द्व दातीत बनेगे। मागल्पमाला के ध्येय से मगलदीवा उतारने का है। उसमें भी भावमालही मति- भेष्ट है भगवान का जब अभिषेक करते है तब सोचना चाहिये नाथ । माप तो कर्म मल से रहित होने से बिलकुल निर्मल हो मगर निर्मल जल से मापको अभिषेक करने के द्वारा में मेरे कर्म मल धो रहा है जिसके फलस्वरुप मासिर मेरी मामां भी निर्मल बने। "जिनवर पूजा-रे ते निज पूजना रे प्रगठे अन्वय शक्ति" १३० दर्शन विशुद्धि पू० देवचन्द्रजी ने फरमाया है कि जिनेश्वर की पूजना वह तत्व दृष्टि से निज स्वरुप की पूजना है क्योंकि वैसा ही वीतरागी स्वरुप तत्व दृष्टि से अपनी आत्मा का है पूज्य की पूजा करते-२ आखिर पूजक भी पूज्य बनता है अथवा चंदन में जैसी शीतलता है वैसी शीतलता अपने प्रात्म परिणाम में प्रा जाय और कषाय भाव की उग्रता दूर हो जाय इसी हेतू से चंदन पूजा करने की है। इस तरह की भावनापूर्वक जिनराज की पूजा उपासना करने से अनंत गुणा लाभ हो सकता है। शुद्ध हेतू पूर्वक क्रियाए करने से अमृत क्रिया का लाभ होता है और आज जो भजने वाला है वही भजते भजते आखिर भगवान बनता है। सूर्य के उदय से अंधकार का प्रतिषेध वैसे ही सत्य के दर्शन से संशय का विच्छेद- इस काल में माध्यस्थ दृष्टि से विचारने वाले मनुष्य भी है इस पुस्तक का वांचन माध्यस्थ दृष्टि से यदि किया जायगा तो बहुत कुछ लाभ का कारण होगा? जिन्होंने जिनप्रतिमा के विषय में अपनी पुस्तकों में बहुत ही विपरीत प्ररुपणा या रजुआत की है उनकी समालोचना इस पुस्तक में करनी पड़ी है। किसी भी जीव को सत्यवस्तु में संदेह न हो जाय और हुअा हो तो उसका भ्रम दूर हो जाय इसी शुभाशय से यह प्रयास किया गया है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद जिनप्रतिमा के विषय में हलुकर्मी जीवों के - दर्शन विगुद्धि सभी सशय दूर हो जायेगें। सूर्य का उदय होते ही जैसे अ धका का अपने आप प्रतिषेध हो जाता है वैसे ही सत्य वस्तु स्वरुप क- दर्शन होते ही सभी सशय दूर होने से मन का समाधान होता है वह समाधान ही आखिर मानसिक प्रसन्नता एव चित्त समाधि क- हेतू बनता है वैसा लाभ सभी जीव को हो यही एक वभिलाषा के साथ इस पुस्तक का पूर्ण विराम हो रहा है। POST Ty

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मुक्तिद्वार ( उत्तरार्ध)

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मुक्ति द्वार दुल्लहे खलु माणुसे भवे -श्री उत्तराध्ययन सूत्र के दशवे अध्ययन मे भगवान महावीर प्रभु ने मनुष्य भव को अति दुर्लभ बताया है-शास्त्रो में प्रत्येक महापुरुषो ने नर जन्म को ही दुर्लभ कहा है क्योकि अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने का मनुष्य भव ही एक अपूर्व अवसर है। मनुष्य जन्म सिवाय चोरासी का फेरा नही मिट सकता। देव भव सिफ भोग विलास के लिए है योग साधना मनुष्य भव मे ही हो सकती है इसीलिए मनुष्य जन्म ही मुक्ति का मगल द्वार है। फई मनुष्य सोचते है कि मनुष्य भव तो हमे मिल गया है- अब क्या इसकी दुर्लभता हमें ममझा रहे है मगर साथ साथ यह भी सोचना होगा कि कितना ममय व्यतीत होने के बाद मनुष्य भव मिला है ? अनत काल व्यतीत होने के बाद मनुष्य भव हाथ में पाया है और यदि प्रमाद के वग नर जन्म को हार गये तो पुन अनत काल में मिलना दुलंम हो जायेगा ? उ ची करणी के प्रभाव से मनुप्य भव सात पाठ वार पुन मिल सकता है। मगर फरनी और करनी में यदि गलती कर बैठे और जीवन भर दुष्कर्म

मुक्ति द्वार
ही करते रहे तो अनंत काल भटकना होगा फिर तो मनुष्य भव
नवर ही कहां लगने वाला है ?
सम्यग् ज्ञान दर्शन और चारित्र की प्रारावना मे ही
मनुप्य जन्म को सार्थक बनाया जा सकता है। मनुष्य
शरीर से पाप कर्म एवं भोग कर्म ही करते रहना, वह तो सोने के
थाल मे शराव भरने बरावर है। मनुष्य शरीर जो मोक्ष पद
प्राप्त करने का साधन है उसमें पाप कर्म का कचरा कैसे भरा जा
सकता है।
मानवता धार्मिकता प्रध्यात्मिकता एवं पूर्णता ये
धार्मिक जीवन के चार विभाग है उसमे सबसे पहले मानवता का
विकास होना चाहिये उसके प्रभाव से धार्मिकता का जरूर विकास
हो सकेगा।
वाणिज्य में अथवा कोई भी क्षेत्र मे सिर्फ अपना
सिर्फ अपना ही स्वार्थ
देखना वह मानवता नहीं मगर दानवता है। जीवन मे परमार्थ
करते रहना ही मानवता है। नीति न्याय से व्यापार करना ही
व्यापार है। अनोति से व्यापार करना वह व्यापार नही मगर
घोले दिन की लूट है। नीति न्याय ही धार्मिक जीवन की नीव
है। गरीबों का शोपग नहीं मगर पोषण करना है। शक्ति
अनुसार उनको सहायता पहुंचाना ही मानव धर्म है। जो इन्सान
मानव धर्म का पालन नहीं कर सकता वह प्रात्म धर्म का क्या
पालन करेगा?

दर्शन विशुद्धि
"~
अात्मा, शुद्ध, बुद्ध, निरजन निराकार, है । यह सब
वालना प्रासान है मगर आत्मम्वरप मे स्थिति एव रमणता करना
वह सामान नही मगर ग्रास्मान है। साधन को कभी भी साध्य
मान नहीं लेना मगर मापन के विना माध्य की सिद्धि नही होती,
वह भी विलकुल निश्चित वात है। मलीन वस्न मर देशरिया,
ग्ग चढना नहीं। वैसे ही मलीन व्यवहारी जीव पर निश्चय का
ग कभी नहीं चटेगा। मामयिक, प्रतिक्रमण जिन पूनादान, शील
उत पच्चक्लाण प्रादि मद्व्यवहार का लोप करने वाला अपने ही
बौधि वीज का घातकी बनता है। गुरुग्रात में अालवन का,
महारा लिए विना कोई भी जीव मागे नहीं वट सकता। व्रत
पच्चक्खाण यमनियमा दिका पालन प्रतिदिन देवपूजा स्वाध्याय,
मुपानदान तप जपादि करते रहना वह धार्मिकता है। प्रात्मस्वरूप
में रमणता करना ही अध्यात्मिकता है। केवल ज्ञान की प्राप्ति हो
पूर्णता है।
राग, द्वेप और मोह ये तीनो कर्म की मुरय ग्रन्थ है। उनमें
जो निवृत्त हुना वही निग्र थ है। राग आम्बिर याग है द्वेष से भी
राग सतरनार है। द्वेपदावानल है तो राग वडवानल है राम
पर विजय हा ताप पर विजय हो ही जाता है। फिर तो
देवना ही क्या
गारमा वीत राग वनती है वीतराग केवली
बनता है, फिर तो इस चक्पर में से टूटकारा हो ही जाता है।
ग

मुक्ति द्वार ૧૨૭ पर्वाधिराज पर्युषण पर्व की आराधना भी राग द्वेष बैर और क्रोधमान माया लोभ इन अांतर शत्रुओं पर विजय पाने के ध्येय से करनी चाहिए। कितना भी दुष्कर तप करने पर भी आत्मा यदि उपशम भाव में नहीं आती है तो उसको पारावना नही मगर विराधना कहीं है। यदि आत्मा अनुपशांत है तो भल भले ज्ञानी ध्यानी और तपस्वी जो गुण को प्राप्त नहीं कर सकते है उस गुण को उपशांत आत्मा प्राप्त कर लेता है। वैरभाव अोर कषायभाव को उपशमा के अपनी आत्मा को शुद्ध भाव में लाना ही पर्व पर्युषण का सार है, और वही निर्गय प्रवचन का सार है। ॐ

दिल और दिमाग
.
अाज रे मनुप्यो के पास दिमाग है मगर दिल नहीं है।
प्राजाल शिक्षण और वाचन वटने में वौद्धिक विकास जरूर
हुमा है, मगर माय-माय हृदय का विकास होने के बदले हदय
मपुचित होता जा रहा है। हृदय का विकास सिर्फ वाचन मे
नहीं होता, चिन्तन में होता है। मैत्री, प्रमोद कारुण्य और
माध्यस्थ ये चारो भावनामो का चिन्तन जीवन मे अत्यत जरुरी
है। सदभावना प्रधान य त परण को ही दिल कहा जाता है।
जबकि भावनाशून्य अन्त करण को दिल नही मगर पहना ही हो
तो विल जरूर कह सकते है। जगल मे दिन होते है, जिनमे सपों
का वाम होता है।
"प्रय निज परोवेत्ति, गरगना लघु चैतमाम् ।"
यह मेरा है और यह पराया है, "मी गिनती वहीं करते है
जो शुद्र हृदय रे होते है। जो उदार हृदय में होते है उनकी
दृष्टि म मागे पृथ्वी पर यवत् है ।
मतो पाहदय मपवन ना होता है, ना यः पवियो
पता, मा उमगा रहस्य पिनी ने नहीं जाना। अपने को
तापगने मनपरता। यषि मन्तो या दृदय तो पर
।

मुक्ति द्वार
१३९
दुःख से द्रवित हो उठता है। किसी का भी दुख देखकर हृदय
द्रवित हो जाय वही हृदय का सच्चा विकास है, जिसके दिल मे
दया है और जो दूसरो के दुःखो का शक्ति अनुसार प्रतिकार
करता रहे वही सच्चा इन्सान है ।
कई व्यापारी व्यापार में छल प्रपच करते हैं, गरीबो का
शोषण करते है, व्यापार में नीति नहीं रखते है। क्योंकि वे
दिमाग से काम लेते हैं, उनके दिल मे दया धर्म का यदि वास
होता तो वे गरीबो का शोषण नही बल्कि पोपण करते और
सभी आत्माओं को अपनी आत्मा के समान समझते । किसी के
भी साथ अनीति नहीं कर सकते। आज दिल की दुनिया में
स्वार्थ की आग भभक उठी है। इसी कारण दुनिया मे कई
अनर्थ मच रहे है। दिल में यदि राम बस जाये तो सभी अनर्थों
का अपने आप अन्त हो जाएगा।

द्रष्टा कौन? मभीमात्मामा को अपनी प्रात्मा के समान देखने वाला, पद्रव्य को पत्थर समान देखने वाला और पर स्त्री को माता ममान देने वाला हो मच्चा द्रप्टा है, पर स्त्री माता समान यह प्रार्य मम्कृति का महान सिद्धात है। यही अपने जीवन का, यादनं होना चाहिए। सभी वात्मानो को 'स्त्र' प्रात्मा ममान देखने वाला किसी भी इन्मान के साथ वेईमानी नहीं कर सकता, किसी जीव को दुस नहीं पचा मकता । अपनी आत्मा को जो प्रतिकूल है, वैसा वर्ताव वह अन्य किसी के भी प्रति नही कर सकेगा, क्योकि वैसा अपने, प्रति कोई करेगा तो अपने को इष्ट नहीं होगा। हिमा अनीति आदि जो अपने को अनिष्ट है वह सभी को अनिष्ट है, सभी प्रात्मा ममान है। आज कल कई मनुप्य रूप मौदर्य मे मोहित बन जाते है, मगर उनकी हालत पनग के जमी होती है पत्तग लाइट के प्रकाश मे इतना प्रामक्त बन जाता है कि आखिर उसका विनाग होता है। जो-जो मनुष्य इन्द्रियो के विषयो म लुव्य बनते हैं, उनका भी प्रातिर विनाग होता है। मीन, नग, हिरन, भ्रमर वगर एक- एक इन्द्रिय के विषय मे प्रामक्त बनने से भी विनाग को प्राप्त कर नेते है ! अब आप ही सोचिए जो गदम्पादि पाचो विपयो । -

मुक्ति द्वार
१४१
में आसक्त बने रहते हैं उनकी हालत क्या होगी ? दुनिया में कोई
चीज खराब नहीं है, भीतर की प्रासक्ति ही खराव है।
स्वयं आत्मा ही जाता और द्रप्टा है। ज्ञान दर्शन ही आत्मा
का स्वरुप है। राग द्वेप आत्मा का स्वभाव नहीं मगर विभाव
है। अपने स्वरुप को भूलकर ही जीव दुःखी बन रहा है।
शरीरादि को आत्मा मान लेना ही घोर अजान है। शरीर, धन
वैभवादि जड़ है, आत्मा चेतन है । जड़ चेतन को एक कैसे माना
जा सकता है ? शरीर की आदि है, जवकी आत्मा अनादि अनंत
है। पांच इन्द्रियां और मन से भी आत्मा निराला है, क्यो की
आत्मा अतिन्द्रिय है, दृष्टि तो आखिर दृष्टि ही है, आत्मा
द्रष्टा है, आज द्रप्टा के बदले भ्रष्टा वहुत बढ़ गये हैं। ज्ञान दृष्टि
से देखने वाला ही सच्चा द्रष्टा है।

प्रमाद ही अपना कट्टर शत्रु हीरा मणि माणक से भी समय महान किमती चीज है। करोडो सोना मोहर देने पर भी मनुष्य भव का एक क्षण का आयुप्य प्राप्त नहीं हो सकता। जो अायुष्य व्यतीत हो गया वह पुन देवेन्द्र को भी प्राप्त नहीं हो सकता है। इसलिये मनुष्य भव को जो जो क्षण जा रही है वह लाखेणी जा रही है। प्रत्येक क्षण को सफल बनाना ही जीवन की सच्ची सफलता है। अज्ञानी और प्रमादी मनुष्यो के अनेको वर्ष योही निकम्मे चले जाते है, तवभी उनके मन में कुछ नहीं लगता। जबकि ज्ञानी पुरुप का एक क्षण भी निकम्मा जाता है तो ज्ञानी को मन में वहा दुख होता है। क्योकि ज्ञानी पुरुष मनुष्य जन्म के प्रति क्षण को महान समझता है। वह सोचता है कि मेरा एक भी क्षण धर्मध्यान के विना निकम्मा जाय उसमे मुझे बहुत नुकसान है। ज्ञानी महापुरुषों का कहना है कि जो सत्कार्य क्ल करना है वह आज ही करलो, आज करना है वह अभी करलो। इस जिन्दगी का एक क्षण का भी भरोसा नहीं है। प्रमाद में पडे रहे तो कुछ भी नहीं होने वाला है, क्योकि प्रमाद अपना कट्टर दुश्मन

शुक्ति द्वार
१४३
है। और सत्पुरुषार्थ में यदि लग गए तो सिद्धि विल्कुल दूर नहीं
है। मोक्षमार्ग मे पुरुषार्थ यदि करते रहोगे तो प्रात्मा आखिर
परमात्मा वन जाएगा। भगवान महावीर का यह मौलिक सिद्धांत
है कि प्रत्येक आत्मा कर्मों का अय करके परमात्मा बन सकती है।
जैन दर्शन की यह स्पष्ट मान्यता है कि परमात्म पद प्राप्ति का
किसी का कोई ठेका नहीं है। जो कोई इन्सान सन्मार्ग मे
पुरुषार्थ
शील बना रहता है वही अत में परमात्मा बन सकता है ।
जीवन में परमार्थ किये बिना कोई भी इन्सान आगे
नहीं बढ़ सकता है। जब किसा पर मुसोबत का समय
रहता है तव प्रत्येक इन्सान का कर्तव्य है कि अपनी शक्ति
अनुसार पीड़ित और दुःखी मनुष्यों को अवश्य सहायता
पहुंचावें । अपने पर भी कब दुःख पड़ेगा इसकी कोई
कल्पना तक नहीं की जा सकती है। ससार में सब दिन
समान नहीं रहते हैं । "यह भो दिन चला जाएगा" यह
उक्ति सदा याद रखने जैसो है। "दुःखो मनुष्यों के
सामने आज हम नहीं देखेगे तो कल अपने सामने कौन
देखेगा ? अात्म धर्म का पालन अवश्य करना है। मगर
मानवधर्म का पालन किये बिना प्रात्मधर्म का पालन हो

दर्शन विशुद्धि
ही नहीं सकता है । जहा मानवता नही वहां भाध्या-
त्मिकता का विकास होगा ही कैसे ?
धर्म वृद्धावस्था में ही करना ऐसी वात नही है, धर्म जीवन
मे निरन्तर करना है। मृत्यु बाल्यावस्था या युवावस्था में
भी पा सकती है इसलिये प्रत्येक अवस्था मे धर्म का आचरण
करना चाहिये।
मृत्यु के साथ जिसकी मंत्री हो, मृत्यु के समय जिसमे
पलायन कर जाने की ताकत हो अथवा जो निश्चित जानता ही
है, कि में प्राज-कल तो मरु गा नहीं वही कह सकता है कि मैं
धर्म आज नही कल करु गा अथवा बुटापे में धर्म करु गा।
किसी का कोर्ट में कैम चलता हो तो कोर्ट में आप मुदत ले
मिले है, मगर धर्मव्यान क ना है तो उसमें कही मुद्दत नही
गेती है। एक क्षण का भी प्रमाद किये बिना आप जीवन में
धर्म का प्राचरण करते रहे, वम यही भगवान महावीर का
मगतमय उरदेश है।

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परमात्मा की
वास्तविक स्तवना
पू-उपाध्याय श्री यशोविजयजी ने अध्यात्मसार मे फरमाया
है की।
शरीररुप लावण्य, वप्रच्छत्र ध्वजादिभि
वरिणतर्वीत रागस्य, वास्तवीनोपवर्णना
वीतराग परमात्मा की उनके शरीर स्प लावण्य एव अष्ट
प्रतिहार्य के द्वारा जो स्तुति की जाती है वह वास्तविक स्तवना
नही है जैसे की हे नाथ ? क्या आपका अद्भुत रुप है, और क्या
आपके अतिशयो की शोभा है इस तरह से जो स्तवना की जाती है
वह व्यवहार स्तुति है-सर्व देव मिलके अपनी अद्भुत शक्ति
के द्वारा अपना सारा सौदर्य सचारित करके एक अगूप्ठ प्रमाण
रुप की विकूर्वणा करे तब भी भगवत के अगुष्ठ के साथ यदि
उसकी तुलना करने में आवे तो सूरज के सामने अ
वह तुच्छ शोमा विहीन लगेगा इतना अद्भूत रुप वैभव तीर्थ करो
का होता है-इस तरह से जो स्तवना की जाय वह व्यवहार
स्तुति है।
व्यवहारस्तुति सेय, बोतरागात्मयतिनाम ।
ज्ञानादीना गुणानातु, वर्णना निश्चयस्तुति ॥
की माफक

૧૪૬
दर्शन विशुद्धि
वीतराग परमात्मा के ज्ञानदर्शनादि गुणो की जो स्तवना की
जाय वही निश्चय स्तुति है-
समय लार में महर्षि कुंद कुंदाचार्य जी ने भी निश्चय स्तुति
का यही स्वरुप बताया है।
केवलोगुणो थुग द जोसोतच्च केवली थुणदि-
केवली भगवान के अनंता नादि गुणो की जो स्तवना करता
है वहीं परमार्थ से केवली को स्तवता है-जैसे नगर का वर्णन करने
मात्र से राजा का वर्णन नहीं होता है मगर राजा के शौर्य
गांभीर्य धैर्यादि गुणो का वर्णन करने से वास्तविक वर्णन जरुर
होता है। वैसे ही केवली के शरीर के गुणो की स्तवना करने मात्र
से वास्तविक स्तवना नहीं हो शक्ती है मगर उनके अत्यंतर गुणो
की स्तवना ही निश्चय स्तुति है।
जहां बोलरामता वहीं बहानता
महापुरुषो ने फरमाया है की नाथ ? अापके सानिध्य में
देवो का आगमन होता रहता है छात्र चामरा दि की विभूति
बिहार में भी आपके साथ चलती है सुर संचारीत सूवर्ण कमल
पर आपका विचरण होता है मगर प्रभु ? अाप इतने मात्र
हमारे महान नहीं है-क्योकी यह सव शोभा तो मायावी इन्द्र
जालीक भी खडी कर सकते है मगर आप वीतराग है इसी कारण
से

मुक्ति द्वार
१४७
हमा महान। बीत गगता के समान दुनिया में एक भी महान
तुई है पैदा गृन्यान की अपेक्षा वारा क्षीणमोह गुणस्थान
'मा मार्ग पोतराग बनता है उसके बाद अतर्मु हुतं-
म ग्रा.मानो यनतमान और अनतदर्गन की प्राप्ती होती है वत
ही प्रात्मा का वरप है-पूर्ण वीतरागना प्राप्त हुए विना
प्रनत नान ग्री- अनत दर्गन प्राप्त हो ही नहीं सकता है और एक
प मारा निना भी पुढगादि पर द्रन्चो मे राग रह जाता है तब
नक भी नपूर्णमारिक जान नही हो गस्ता है क्योकि तत्वद्रप्टि
में परद्रव्यो में एक परमाणु मान का भी आत्मा मालिक नहीं हैं
मलिए उच्च मिरा पर पहोचना है उनके जीए परद्रव्यो प्रतिका
परमाणु रितना ग भी उतरनाक है।
जिननितारमन में अपने गुद्ध वीतरागी स्वरप का
मार हो जाने वही अपून मिद्धि है प्रनु प्रतिमा के पालवन से
नी प्रापिान के प्रमो दयप पा श्रद्धा भासन
गंर माता वरना हो महान लोगोत्र सिद्धि है।
मुक्ति पी अधिक
तुन भक्ति
पुज नन वली

१४८ दर्शन विशुद्धि में ? दी जाय ? कल्पवेली के कल्ललता को उपना भी इसकी घटेगी मही ? शांत सुधारस में यह मुद्रा बोल रही है और अन्य भवि आत्मायो को मानो झोला रही हैं-इसको निरखते ही रहे मगर सृप्तिज नही होती है इस तरह की जो प्रिती मन में उत्पन्न हो जोय वही प्रिती अनुष्ठान कहा जाता है-उसके फलस्वल्प हृदय भक्ति जागृत हो जावे और उसके फलस्वम्प परमात्मा की भक्ति में मन लीन वन जावे वह भक्तिः अनुष्ठान ? फिर तो उसके अंतर में से ऐसो कोड अावाज उठेगा "मुक्तिथीं अधिक तुज भक्ति मुज मन वसी" नाथ ? मुक्ति से भी आप देवाधिदेव की भक्ति मेरे भन अधिक है क्योंकी मेरे हृदय में भक्ति है तो मेरे को मुक्ति की चिंता तक नहीं है क्योंकी प्राए परमात्मा की भक्ति आखिर लोह चुवक की माफिक मुक्ति को खींच ले पायेगी। प्रभ्यंतर प्रवेश उसके बाद परमात्मा के वचनानुसार सामायिक प्रतिक्रमण दानशील तप भाव जिनपूजा आदि अनुष्ठान में बीर्योल्लास पूर्वक लग जावे वह वचनानुष्ठान-क्रिया अनुष्ठान एवं जिनप्रतिमा के आध्यम से आखिर अपनी अभ्यंतर स्थिति में प्रवेश कर लेना ही प्रसंगानुष्ठान है-इसी बात पर पू-नान विमलसूरीजी ने फरमाया है की पहेला तो एक केवल हर्षे हेजा लु थइ लीयो गुण जाणी ने रुपे मीलीयो--अभ्यंतर जइ भलीयो। .

मुक्ति द्वार
१४९
इस गाथा का रहस्य उपर मे लीख दीया गया है आत्मा जव
अभ्यतर (अतरग) स्थिति में जा पहुचता है तव तो अतर में ही
अतरयामी में मिलन होता है-अतर्मुख हुए वीना अंतरयामि से
मिलन होड नहीं सकता है क्योकी अतरात्मा ही आखिर परमात्मा
बनता है।
राम भरत का जब मिलन हुना था उस समय का वर्णन कोन
शब्दो मे कीया जा शक्ता है-रावण सति सीता का हरण कर गया
था मीताजी की मुक्ति के लीए राम रावण के बीच वडॉ भारी
सग्राम खेला गया, आखिर रावण का वध हुआ उसके वाद पति
सीता और राम का जव' सुभग मिलन हुआ उसका वर्णन कौन
शब्दो मे हो गक्ता है श्रीपालजी देश देशातर मे गये थे और जव
'ऋद्धि'ममृद्धि के साथ 'लोटकर आये और मयणामु दरी और
श्रीपालका शुभग मिलन हुअा उमका भी वर्णन कौन. शब्दो मै हो
'गता मे हों अतरात्म भाव जागृत होते ही अतरयामि से
जेब मिलन होता है उसका वर्णन भी कौन शब्दो में हो पता है।
घट घर में अन्नरयामि है मगर जीव का उपयोग जव देखो
जब बहार मे हो भमता रहता है वह उपयोग श्रत ज्ञान के सावन
से अथवा जिनप्रतिमा के माध्यम से ज्योही अतर्मुख होता है त्यो
ही अन्तरयामिका दर्शन होता है-याने अपने शुद्ध स्वरुप का
स्वानुभव होने लगता है।
-
.
।
१

१५०
दर्शन विशुद्धि
-
वांको चित्त बछरुना मांय
जैसे पू-यानंदघनजी ने फरमाया है की-
उदर भरन के कारणे गौवा वन में जाय
चारो चरे चिहं दिशि फरे बांको चित्त
बछरुपा मांय रे
चार पांच साहेलिया जल भरन कु जाय
ताली दइ खड खड हसे रे वांको चित्त
घघरुमा मांय रे
ऐसा जिन चरो चित लावो. ने मना
गावो रे
गौवा जंगल में चारा चरने को जाती है दूर दूर जंगल में
घूमती फिरती है चारा चरती है पाणी पीती है सव कुछ करती है
मगर उसका चित्त अपने बछड़े में ही लगा रहता है-चार. पांच
'साहेलीया मिल के जल भरने को नदी किनारे अथवा कुवे कांठ
पर जल भरने को जाती है गिर पर जल से भरा डबल
वेडा रहता है रास्ते में साहेलीयो के बीच वार्तालाप एवं
हास्य विनोद की जडी लग जाती है मगर इतना होने पर
भी मस्तक पर का बेडा नीचे नही गीर पड़ता है-क्यों की
उनका लक्ष बेड़े में ही लगा रहता है वैसे ही सम्यग्
दृष्टि भक्तजन संसार में रहता हुआ व्यापार वाणीज्य घर
नित्य अरिहंत गुण
.

मुक्ति द्वार १५१ - काम वगेरे सब कुछ प्रवृत्ति करता रहता है मगर उसका चित्त जव देखो तव अपने शुद्ध स्वरुप मे अथवा देवाधिदेव अरिहत के ध्यान मे लगा रहता है वस यही सम्यग् दृष्टि जीव का मुख्य लक्षण है वह कर्मोदय के कारण घर में रहे मगर मन उसमें, रमें नही, जिनमदिर में जाके वीतरागी स्वल्प का दर्शन करता है अथवा उपाश्रय में जाके निर्ग य साधु महापुरुषो का दर्शन करता है,वस जब देखो तव उमका मन उसी स्वरुप मे रममाण रहता है हृदय मेरेमी भावना करता रहता है की कव में वीतरागी शुद्ध स्वरुप को प्राप्त कर और कव मेरा जन्म सार्थक कर द्वेष को जीतकर शुद्ध वीतरागी स्वरुप प्राप्त कीये बीना जन्म मरण का फेरा मिटने वाला नहीं है। नटवो नाचे चोक मे लोक करे लख सोर वासनही वरते चढे वाको चित्त न चलों कह ठोर ये जुगारी के मन जुगार कामी के मन काम पानदघन प्रभु-यु कहेरे तुमे ल्योने भगवत को नाम र- ऐसा जिन चरणे चित्त लामो ने मन नित्य अरिहत १ क्योकी राग . गुण गावो रे 'नटराज चोक में वास की दोर पर जव खेल करता है तब उसका खेल देखने वाले वार वार हर्पनाद करते रहते है वशमोर वा मोर भी पुकारते है मगर नटराज का लक्षा तो दोर पर ही दर्शन विशुद्धि 64 ।- - - -- लगा रहता है कामी - में . रहता है और वो यदि लभ चूक जाये तो चकनाचूर हो जाय, श्योंकी वो अपने प्राणो की वाजी लगा के खेल करता है । इसलीए घोलक्ष तो चूके काज नही वैसे ही कीतनी भी प्रवृत्ति में रहते हुए भी जो सच्चा भक्तजन है उसका लक्ष परमात्मा से नही हठता है- वह समजता है की में लक्ष चूका तो मेरा जीवन भी चकनाचूर हो प्रायेगा। re: ११. जुआरी का मन जब देखो तब जूए में का मन काम वासना. में लगा रहता है वैसे ही भक्त का मन भगवान लगा रहता है। आज कल कीतनेक मतुप्य मंदिर में दर्शन को जाते है दर्शन- विधि करके वहार निकलते है तब जो कोइ रास्ते में मिलते है उनको वोलते है अाप-दर्शन को गये थे अरे भाइ ? में तो नहीं शका-अरे पाप अमुक मंदिर में जरुर दर्शन को जाइए क्या भगवान की आंगी बनी है-आज की प्रांगी का दर्शन तो अवश्य करने योग्य है ऐसी हीरा मारणेक की प्रांगी बहुत लंबे समय के बाद बनी है-परन्तु उनको सोचना चाइए की दर्शन प्रांगीका करके का है के भगवान के वीतरांगी स्वरूप का दर्शन करके का है ? परमात्मा के बाह्य वैभव पर ही यदि दृष्टि की रोक ली गई तो उनके ज्ञान दर्शनादि अांतर वैभव का दर्शन होगा कैसे? प्रांगी के निमित्त भी कई जीवो का परमात्मा के दर्शन प्रति आकर्षण बढता है

मुति चार
इसलीए प्रागी का निपेध नहीं है अग रचना अवश्य करनी-और
वह भी शक्ति होये तो सोने के वरख वगेरे उत्तम द्रव्यो से करनी
जममे दर्शन करने वालो का भावोल्लाम बटे? मगर दृष्टि को
वही मिमित नहीं करने की है क्योकी वीतराग परमात्मा की
उपासना करते करते आखिर तो अपने को वीतराग बनना है
सापक दशा में अपन पालवन का सहारा अवश्य लेवे मगर
प्रासिर तो निरालवन वनना है-जिनेश्वर भगवान की प्रतिमा के
पालवन से व्यान कीया जाय वह सालवन ध्यान है-और उन्ही
परमात्मा के केवल ज्ञानादि गुणो की तन्मयता रुप जो ध्यान है वह
निरालवन ध्यान है-
आगी होवे उसी दीन दर्शन को जाने का है ऐसी बात नही
है प्रति दिन दर्शन को जाने का है और यो करते करते अात्मा
वीतरागी भाव के सन्मुव दनेगा और आखिर वीतगग बनेगा।
साधन जरर करने का है मगर साध्यका लक्ष भी जरुरे रसने
का है-मद्व्यवहार जरुर करते रहने का है मगर प्टि निश्चय
पर रखने की है बस यही जीवन का विज्ञान है और यही जीवन
का सार है
तेरो अगम अगोचर रुप
कलिकाल 'सर्वज्ञ पू-टेमचद्राचार्यजी ने वीतराग स्तोत्रमे
फरमाया है की।

হা হা
क्रोध लोभ भयाक्रांत, जगदस्माद्विलक्षणः ।
नगोचरो मृदुधियां, वीतराग कथंचन ।।
हे वीतराग प्रभो ? यह सारा जगत् क्रोध लोभ तथा भय ले
अाक्रांत बना हुआ है आप इन दोषो से सर्वथा मुक्त होने से संसारी
आत्मानो की अपेक्षा विलकुल विलक्षण है-इसी कारण अल्पमति
वालो को आप अगोचर है क्रोधादि कषायो पर थोड़ा सा भी
कंट्रोल कीये विना इन्सान वीतराग परमात्मा को अपने जीवन का
लक्ष नहीं बना शक्ता है।
और भी पू-हेमचंद्राचार्यजी ने फरमाया है-
मैत्री पवित्र पात्राय, सुदितामोद शालीने ।
कृपोऽपेक्षा प्रतीक्षाय, तुभ्यं योगात्मनेलमः ॥
मैत्री भावना के पवित्र स्थान रुप, पृष्ट ऐसी प्रमोद भावना
से परिपूर्ण है अतःकरण जिनका-कारुण्य एवं माध्यस्थ भावना के
द्वारा अत्यन्त पूजनीक ऐसे योग स्वरुपी आप देवाधिदेव को हमारा
कोटी कोटी वंदन हो ? मैत्री प्रमोद कारुण्य और माध्यस्थ इन
चारो भावनाओ को आत्मसात् कर लेना ही धार्मिक जीवन का
मुख्य लक्षण है इन चारो भावनाओ का परिशीलन ही मानसिक
स्वास्थ्य का द्योतक है-वीतराग परमात्मा की स्तवना के माध्यम
से महापुरुषो ने जगत को कितना उच्च अमर पैगाम दिया है।
॥ इति श्री॥

दर्शन दिशुद्धि पुस्तक प्रकाशन में
सहयोगी श्री सघ एवं
मनुक्षु भाई-बहनो को शुभ
नामावली
पूना नामावली
नगर
५०१
श्री नघ
11
११
श्री जैन श्वे,
मू पु
उदयपुर
विनय नितिमूरी म मा के प्रशिप्य म्व उमेदविजय
जी की स्मृति में जैन धर्म प्रचारक समिति
जोधराजजी कोठारी
कुन्दन लाल जी म्बीया
कालु लाल जी न
गगन तालजी मानि लानजी लोटा
अवनीलालजी मेहता
रतन लालजी नलवाया
मारो नालनी मेहना
प्रभुलानजी दोषी
भेनानी जावरिया
११ मोह्न लालजी दाजेट
पतेह लालजी वया
गरी मालजी परणपुरीया
"

1
११ गुप्त ह. साध्वीजी सुदर्शना श्रीजी
११ विजय सिंह जी मारवाडी
११ सागर वाईजी दलाल
११ मोहन लाल जी दलाल
११ भंवरलाल जी चावत
११ संतोक वाईजी सायरावाला
११ कंचन बाईजी भेरव्या
११ फतेह लालजी सिंघवी
११ रोशन लालजी हुंवड
११ मनोहर कुमार वया
११ बसंती लालजी बापना
करण सिंहजी नाहर
११ नन्द लालजी सिघवी
११ गोविंद सिहजी सिपाणी
११ भुरी लालजी सुराणा
११
कुसुम कुमारी चपलोत
११ मीठा लालजी तलेसरा
११ रोशन लालजी राजनगर वाला
११ भंवर लालजी गोडवाला
११ रेखा कुमारी मारवाडी ह. साध्वीजी कल्पलता श्रीजी
११ तेज सिंहजी दोषी
११
"

उन्हेल
उदयपुर
मुनानमलजी कन्हैया लालजी
तागचन्द जी उमगसिंहजी जैन
विजय मिहजी माभर
लेहर चदजी खावीया
श्रीमती नजरवाईजो मुरबाईनी मिघटवाडीया
ह मवर लालजी मिघटवाटीया
श्रीमती मणीराई मजु कुमारी मुडिया
भवरलालजी बहोरा
"

७७ निज्जुति ८४ १७ स्वरुप मिज्जुति स्यरुप क्रीडाका देदीत्यमान ६८ कोड़का देदीप्यमान १४ १५ १८ १२ श्याम किसी को १०२ ११६ १० १५ श्याय किसी सम्यगजानादि चउत्प्पुडेणं दूकरे सम्यग् ज्ञानादि १२३ १५ चउप्पुडेणं १० १२६ १२७ १२७ ४ भाव ५ समर्पण समर्पण का भाव

Darshan Vishuddi

Author
Suri, Vijaychandra
Title
Darshan Vishuddi
File name
Darshan Vishuddi
Text
OCR done
Citation
1977
Published
2011/03
Publisher
Udaipur., Shri Jain Swetamber Murtipoojak Shri Sangh
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550663
Barcode
4990010031481.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
hoNfOc8GDLS
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